1. A comparative study of the theory of Maya in Vaidic Manisha Gajae (Thesis)
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Saurashtra University SAURAS Re - Accredited Grade 'B' by NAAC SHTRA UNI (CGPA 2.93) VERSITY
Gajare, Manisha, 2011, "A comparative study of the theory of Maya in Vaidic philosophical tradition", thesis PhD, Saurashtra University
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C The Author
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A Thesis To be submitted to
Saurashtra University
In Philosophy
Faculty of Arts
ON
A COMPARATIVE STUDY OF THE THEORY OF MAYA IN VAIDIC PHILOSOPHICAL TRADITION.
Researcher Guide
Ms. Manisha Gajare Dr. Chandrika B. Vadher
M.Phil. Principal
Gandhidham Dharmendrasinhji Arts College,
Kachchha. Rajkot.
Reg. No. 3833 Date :- 28 / 2 / 2008
June - 2011
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प्रभा पत्र
जाथी प्रभाषित डरवामा जावे छे डे श्री मनिषा गथठरे से
"A Comparative study of the Theory of Maya in vaidic Philosophical Tradition." से विषय पर भारा भार्गदर्शन डेण डार्य दुरेस छे. या संशोधन अार्य तेभनुं भौबिड छ.अने तेनाथी ज्ञाननी समङ्ासीन स्थितिमां वधारो थाय छे.
वधुभां प्रभाषित उरवाभा जावे छे डे या संशोधन डार्य डे तेनो डोछ लाग आा युनिवर्सिटीभां डे खन्य युनिवर्सिटीभां अन्य अोछ यहवी भाटे शबू परेस नथी.
भार्गहर्श ङश्री,
ता. डा. यश्रिका जी. वाढेर
प्रिन्सीपास,
धर्भेन्धसंउ्व मार्टस डोसेण,
२19*12
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निवेहन
सभ्यास से प्रथभथी क भारा समत्र कवन तथा विदाडीय डारडटीनु खेड़ सविलाभय संग रुं छे. या छिशाभां सेभ,से तत्वज्ञानना अल्यास तथा जेइिस तत्वज्ञानभां भायावाह ना विषय पर सजवाभा आावेस सघुशोध निजधसे वधारे वियारवा भाे प्रेरणा जायी तथा Ph.D.नी यहवी भाटे सभय्र वैदिड शिंतनभा भाया सिध्धांतना स्वइथनुं विवेयन ऊरवाभा जावे तो विधाडीय तेभष्ठ साधना मार्गीय संहर्लभभां सेड जगत्यनुं अार्य थह शडे तेवुं साग्युं के भाटे सौराष्ट्र युनिवर्सिटीभां डॉ.सी.जी. वाढेर ना भार्गदर्शन डेठण जा संशोधन अार्यनो प्रारंभ थयो.
"Dissatisfaction from the first view of things is the mother of all metaphysics". डॉ. राधाइृष्णननु वाड्य भाइं भुष्य पथप्रहरेङ्ध जन्युं जने भूणलूत तेभष्ठ खन्य स्त्रोतो भांथी संशोधन डार्य पूर्ण उरेस छे.
संशोधन अार्यनी सइणता भाटे सौ प्रथभ भारा भार्गहर्शड डॉ. यंद्रिडाजेन वाढेशनो जालार प्रहर्शित उरं छ ते खेड़ औौपयारिउताथी धशु विशेष छे. तेजोश्रीना भार्गदर्शनथी छ खा संशोधनअार्थ पूर्ण थयुं छ. तदपरांत इिसोसोईी लवनना अध्यक्षश्री डॉ. सेस. सेस. शर्भा नो जालार मानुं छं.
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सौराष्ट्र युनिवर्सिटीभां संशोधन अार्यने अनुउप वातावरणनुं निर्भाण डरवा भाटे भाननीय डुसपति डॉ. उमसेशलाह भेशीपुरा नो आालार व्यडत डरुंछ.
तेभष्ठ ग्रंथासयभांथी संशोधन अार्य भाटे पुस्ती सुसल जनाववा भाटे ग्रंथपास श्री निबेशलाह सोनी नो जालार व्यकत उर छुं कवनना प्रत्येड् परिभाषनी भेम संशोधनसक्षी परिभाएभां पश माता पिताना जाशीवाह अनिवार्य छ. ेनी हुं अयभी नोध बछ जालार व्यकत उरु छं. ते सिवाय भारा खन्य परिवार कनो तेभष्ठ थिं. नेति डै क जधानी वात्ससयपुर्ण खने सहधयता पूर् औटुंजिड हुडने अारणे भने संशोधन अर्थमा सतत प्रेरणा खने मछछ भजी छे. तेथी ते जधानो हुं आालार मानु छं
विशेषतः भारा व्यावसायिड भार्गदर्शड तथा भुष्जी श्री भुरारी शर्भा नो विशेष जालार मानुं छुं सने या सिवाय सभय्र वैहिड परंपशा ना प्रत्यक्ष डे परोक्ष ३पे मार्गदर्शन तथा प्रेरणा आापनार तभाभ संतो मने जायार्योनो उधयपूर्वड आालार व्यड्त उरं छं. खने छेस्से भारा संशोधन अर्थने टाधय उरनार श्री यंद्रिडाजेन मेथ, सोसंडीनो जालार मानु छुं
डुं. भनीषा गढठरे
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सनडमलिड़ा
प्रङरणनुं नाम
१ विषय प्रवेश १२ थी १८
२ वैदिदु खने औौपनिषहिड तत्व थिंतनभां
भायानो सिध्धांत १ए थी४५
3 शांडर वेहांतभां भायानुं स्वरुप
४ शांडरोत्तर वेहांतभा भिथ्यात्व सने भाया १50 थी२34
पौराणीड खने भडाङाव्यनुं तत्त्वयिंतन २३5 थी२८१
निष्दर्ष :- २८२ थी २८७
संहर्ग्रंथ सूथि २८८ थी ३०८
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मनडमारिडा
प्रङ२ए-१: विषय प्रवेश १२ थी १८
9.9 प्रस्तावना
१.२ संशोधननो परियय.
9.3 संशोधनना उेतुओो.
१.४ संशोधननी सभङ्रासीन प्रस्तुता.
9.4 संशोधननी पद्धति तथा तेनुं क्षेत्र.
9.5 निष्दर्ष.
प्रङरए-२: वैदिद खने औौपनिषछिड तत्व चिंतनभा
भायानो सिध्धांत १ए थी ४५
२.१ प्रास्तावना
२.२ ऋगवेछ, सृष्टि भीभांसा खने भाया.
२.3 ऋग्वहभा भायानो ज्यास
२.४ उपनिषहोनी तत्व भीभांसा खने भाया.
२.४.१ ब्रहहारएथड उपनिषहभा भायानो सिध्धात
२.४.२ शवेताश्वतर उपनिषहभा भायानो सिध्धांत
२.४.3 छंदोग्य उपनिषहमा भायानो सिध्धांत 6
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२.४.४ भुंडड उपनिषहभां भायानो सिध्धात
2.४.५ 35 उपनिषह भां भायानो सिध्धांत
२.४.5 भांडूड्य उपनिषहभां भायानो सिध्धांत
२.४.७ तैतरीय उपनिषहभा भायानो सिध्धांत
२.४.८ छशावास्य उपनिषहमा भायानो सिध्धांत
2.4 उपनिषहोना भाया सिध्धांतनुं सभग्रसक्षी भूस्यांडन
2.4.9
2.4.२ उनिषहभा भायावाह नथी.
2.5 उपसंहार.
प्रदुरश-उ: शांडर वेहांतभा भायानुं स्व३प ४६ थी १५८
3.9 प्रास्ताविङ्
3.२ वेहांत ज्ञानभीभांसा खने वृत्तिज्ञान :-
3.3 अध्यासनो सिद्धांत खने तेना प्रडाशे :-
3.3.9 अध्यासनो सिद्धांत :-
3.3.२ अध्यासना प्रदाशे :-
3.8 ब्रह्मनो सिद्धांत :-
3.8.9 निर्गुए निराडार:
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3.४.२ लेहत्रय रहित:
3.8.3 छेशडासातीत:
3.4 ज्रह्म खने भगत:
3.4.9 दार्य डारणनो सिध्धांत-विवर्तवाह:
3.4.२ 9गतनी सनिर्वयनीयता :
-
5 ब्रम्म- सवर्णानीय सता:
-
5.9 ब्रह्मनुं उद्ारात्मङ वर्णन:
3.5.2 ब्रह्म नेति नेति खने नडारात्मड वर्शन:
3.9 भाया शब्हना लिन्न लिन्न र्थो :-
3.८ भायानुं स्व३प :-
3.c जम्म खने भगतनो संजध सने भाया :-
3.90 भायानुं डार्य :
3.99 सविधानुं स्वउप खने तेनो आाश्रय :-
3.१२ सविधानुं डार्थ :-
3.93 भायावाह सामेनी टीडाजो :-
3.93.9 भायावाह साभेनी रामानुभनयार्यनी टीड़ाजो :-
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राभानुभनयार्ये उरेसा आाक्षे पोना प्रत्युत्तर :-
3.93.2 भायावादनी श्रीभद वस्सलायार्यनी टीक्ा :-
3.98 ज्रम्म सूत्रभां भायानो ज्यास :-
3.94 गौडयाहायार्य खने भायावाह :-
3.95 वेदांतनी भाया सने सांज्यनी 'प्रङति' :-
3.99 स्वाभी विवेङ्ानंटनो भायानो ज्यास :-
प्रडरए: ४: शाडरेत्तर वेहांतभा भिथ्यात्व
खने भाया १50 थी२34
४.१ प्रस्तावना
४.२ शांडरोत्तर वेहांतभा भाया सने सविधा वश्थेनो लेह
४.3 सविदयानी विलिन्न व्याज्याजोनु परीक्षण
४. 3. 9 सव्याप्ति
(2) प्रथभ सत्याप्ति खने तेनुं निरनदरण
(ज) द्वितिय सव्याप्ति खने तेनुं निराहरण
(3) तृतीय सव्याप्ति सने तेनुं निराङरण
४.3.२ खतिव्याप्ति
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४.3. 3 खसंतवछोष
४.४ भिथ्यात्वनी विलिन्न व्याज्याजोनुं परीक्षण
४.४. १ प्रथभ भिथ्यात्व सक्षणा
पंथयाहिडाडारना भत जनुसार
४.४.२ द्वितिय भिथ्यात्त्व सक्षए
विवरणडार प्रङाशात्मयति अनुसार
४.४.3 तृतीय भिथ्यात्व सक्षणा
विवरणायार्य अनुसार
४.४.४ थतुर्थ भिथ्यात्व सक्षण
तित्सुजायार्य जनुसार
४.४.५ पंथभ भिथ्यात्व सक्षए
आानहजोध मह्टायार्य जनुसार
प्रदुरश-4: पौशलिड खने भहाङाव्यनुं
तत्वयिंतन २३5 थी २८१
4.9 प्रस्तावना :-
4.२ भहाङाव्योना तत्त्वयिंतनभा भायावाद : -
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4.3 भहाङाव्योनुं तत्त्वयिंतन खने भाया सिद्धांत :-
4.४ अध्यात्म राभायणभा भाया सिद्धांत :-
- 8.9 प्रस्तावना :-
4.४.२ श्री राभ हधयनु तत्त्वविज्ञान खने भाया सिद्धांत :- 4.४.3 ध्यात्म राभायणनी स्तुतिओो तथा उपदेशभा भायाना स्व३य
तेभ्ठ सिद्धांतनुं नि३4ण :-
4.४.3.9 श्री राम सक्ष्मए उपदेशभा भायानी व्याज्या खने भाया सिद्धांत :-
4.4 शाभयरित मानसभा भाया सिद्धांत :-
4.4.9
4.4.2 सृष्टि विज्ञान सने उस्य प्रह्मांड सिद्धांत :-
4.4.3 डाइलूबंडी-सोभश संवाह खने सद्वैतवाह :-
4.4.8 सभयनी साथेक्षता, भाया सिद्धांत तथा अनेड़ ज्रममांड सिद्धांत :-
4.4.4 भूस्यांडन खने उपसंहार :-
निष्दर्ष :- २८२ थी २८७
संहर्ल ग्रंथ सूथि :- २८८थी ३०८
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थ्रड२एा:१
विषय प्रवेश
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प्रड२ु-१
विषय प्रवेश
9.9 प्रस्तावना
१.२ संशोधननुं परियय.
१.3 संशोधनना उेतुओो
१.४ संशोधननी सभङ्रासीन प्रस्तुता.
9.4 संशोधननी यद्धति तथा तेनुं क्षेत्र.
9.5 निष्दर्ष
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थ्रड२ए:१
विषय प्रवेश
9.9: प्रस्तावना :-
प्रस्तुत प्रदरशभां संशोधनना स्वउप ने तेना हेतुओ वर्शी तेना पध्धतिशास्त्रीय भाजणानु निउपण मरवामा आावेस छे. संशोधन नुं स्व३य सभीक्षात्मङ, विवेयनात्मड तथा पुनर्ग्रथनात्मड छ. संशोधननुं पध्धतिशास्त्र जापेस है प्राप्त थयेस भूण खने द्वितीय उथाना ग्रंथोभांथी सघन तथा तात्विद् मध्ययन जाह संडस्पना संस्थनाना ४३री तत्त्वोनी तारवणी ऊरवानी थाय छे. संशोधननुं क्षेत्र वैदिड तत्त्वयिंतनथी सछने वेह खने उपनिषछ आाधारित दर्शन पध्धतियो,भहाडाव्यो तेभ खन्य धार्भिक, तात्विड भूण ग्रंथो सुधी विस्तरे छे. भायानी संडस्पनाने रेड़ तत्वविज्ञानीय परिप्रेक्षय भां तपासीने तेनी सांप्रत वैज्ञानिड तथा तात्विड संहर्लभभां प्रस्तुतता जताववी ते संभवित निष्डर्ष प्राप्त थाय छ.
१.२: संशोधन परियय :-
प्रस्तुत संशोधन प्रदस्प डे के सौराष्ट्र युनिवर्सिटीनी पी.जेय डी. यहवी भाटे तैयार डरवाभा भावी रडेस छ. तेभां सभ वैदिड दर्शन ने साहित्यभांथी भाया सिध्धांतनुं भेड़ सर्वग्राही विहंगावसोउन तथा भूस्यनंडन दरवानुं रहे छे. या संहर्लभां प्रारंलिड तष्जड़े भाया सिध्धांत खने वैदिड साहित्य अंगे डेटसीड स्पष्टताजो दरवी ४रुरी छ.
सौप्रथभ भाया सिध्धातथी संशोधनना प्रारंभनी लूभिडाये शु सलिप्रेत छे ते स्पष्ट दरवानु छे. भाया सिध्धांत तेना ज्ञानभीभांसाडीय तथा
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सताभीभांसाडीय संहर्लमां शांडर वेहांतनी डवसाद्वैत सिध्धांतभा सभाविष्ट थतो सिध्धांत छे. सने वैदिड साहित्यमां ते परंथरा भुक्ठ्ज उपनिषहोमा जा सिध्धांतनु प्रतिपाहन कोवा भणे छे. उबे या संहर्ल्भभां भेड़ निश्यत खेड़ देशीय लगभ प्रभाऐो भाया सिध्धांतनुं क्षेत्र गौडपाहथी श३ डरी ने शांडर वेदांत तेभष् शंडरोतरवेहात प्राप्त थाय परंतु भारतीय हर्शनोना जल्यास सने तेभा पए वैदिड सने वेहातिड परंपराना दर्शनोना सत्यासथी से जाजत संशोधड साभे स्पष्ट थती हेजाय छो ड माया शण्दनो प्रयोग वैदिड परंपशाभा वधारे व्यापड स्वउपभा थयो छो.सने वैहिड परंपर आाधारित हार्शनिड पौशणिड साहित्यामां परा खेड़ व्यायड संहलथी जा प्रयोग भोवा
भणे छे. या संहर्ल्भां डी. राघादृष्णननुं तेभना Indian Philisophy Vo.II भां
zlad sa "The dissatisfaction from the first view of
things is the mother of all metaphysics" (9)
भुक्ज सेवुं साग्युं छे डे अोछपा मादर्शसक्षी तत्वविज्ञान भाटे दश्य भगतने सेभने सेभष्ठ अंतिभ वास्तविडता तरीडे स्वीडारी सेवानु शक्य नथी. तेथी जानुलविड प्रहत्त पर तत्वविज्ञाननीय अभूर्तिङरणनी प्रद्रिया थवी अनिवार्य छे. मा जाजत खेड सर्व क्षेत्रीय तात्विड स्थिति तरीडे पश भोवा मणे छे. प्सेटोनी प्रतिक्ृतियो खने विथार३यो स्पिनोजाना पर्यायो ने द्रव्य, डेगसनी निश्यक्ष वास्तिविडता सने संश, डेन्टना प्रतिलाष खने प्रतिलाषातीत तथा ज्रेडसेना निर्ेक्षसत सने मालासोभां ज्ञात भगत खने सनुलवथी पर थवानी वातनो निर्देश अवश्य प्राप्त थाय छे. ा साथे से जाजत पएा जेटसी क यथार्थ कशाय छे कै उछयएा धार्मिड के माध्यात्मिड साधनामां विशुध्ध लौतडवाही परिप्रेक्ष्यथी उपर उठीने माध्यात्मिङ स्थितिन प्राप्त दुरवानो निर्देश उुरे छे. तेथी आानुलविड भगत मने संतिम यथार्थता तेभष्ठ व्यवारिड कवनने पारभार्थिड साधना मार्ग वश्थेनो संजंध भारतीय परिप्रेक्ष्यभा तपासवानी विशेष आावश्यडता भशाय छे. खा भाटे खेड़ परिभाश से वियारवानु थयु छे डै ो स
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वैहिड परंपराभांथी भाया सिध्धांतनुं भेड समग्र सक्षी खाडेड़ सभयोसन खने भूस्यांडन दश्वाभां आावे तो भेड़ सभयोगित संशोधन अर्थ थह शहे तेवुं भशाय छे.
१.3: संशोधनना हेतुओो :-
संशोधन हार्य सामान्य रीते डोर्डड सेडेडेलिड हेतुजोने ध्यानमा राजीने परवाभां जावतु होय छे. प्रस्तुत संशोधन निजंध भारतीय तत्वज्ञान तेभठ धाभिड़ यिंतनना डेटसाऊ भउत्वपूर्ण पासाओोने स्पष्ट डरवा भाटे हाथ घरवाभा आावेस छ. केमाना डेटसाड मउत्वपूर्ण हेतुओो नीये भुक्ज छे.
(१) वैदिड यिंतन परंपराभां माया शष्हनो खर्थ तेभ धार्मिड़ तथा ाध्यात्मिङ क्षेत्रभा तेनु प्रधान स्पष्ट 3२वुं
(२) शांडर वेहांत, तेभष्ठ शंडरोत्तर वेहांतभा तेनुं स्वउप क्षेत्र खने अार्य स्पष्ट रवुं.
(3) भहाअव्योना सांस्कृतिड तथा साभाणिड परिप्रेक्ष्यमा माया - सिध्धांत जताववुं
(४) भाया सिध्धांतनो प्राव पौराणिड संहर्ल्भभां उछ रीते भूसववार्भा भावे छे ते स्पष्ट डरवुं.
(4) सभग्र भाया सिध्धांतनुं सार ग्राही भूस्यांडन वैदिड साहित्यमां तथासवुं.
१.४: संशोधननी सभङ्रासीन प्रस्तुतता :-
अोछयए संशोधननी भूस्यसजिता से जाजत पर परा आाधार घरावे छेडे तेनी वर्तभान प्रस्तुतता उेटसी उह सुधी छे. या संहर्लभां या संशोधन नीथे
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भुनजना क्षेत्रभा सभङ्ासीन वियार यिंतनने उपयोगी छे.
(१) समानसक्षी विज्ञानो तभष्ठ मानव- विधाजोमां स्थानिड़ लाषजोमा वियार- यिंतन विस्तार पाभे ते आावश्यड छे. गुणठराती भाषाभा भाया सिध्धांतनुं तात्विड- अवासक्षी पौराणिड साहित्यने खावरी सहने भूस्यांउन थयेसुं नथी. ०े खर्थभां या संशोधन प्रस्तुत छे.
(२) भहाऊाव्यो खने पौरालिङ यिंतन भां भाया सिध्धांत तपासवो आावश्यड छे. भहाऊाव्योना यिंतन भां जा ज्यास धशो सगत्यनो छै.सने तेथी तेनु भूस्यांडन थाथ तो सभग्र यिंतननी पृष्ठलूभि वधारे स्पष्ट थाय तेभ छे.
(3) साप्रंत सभय धर्भने पुरा एगाथावाहना प्रासने जोधु भडत्व जापीने तेनुं ाध्यात्मिड पासु वघारे स्डुट दरवानी आावश्यडता छे. तेथी तत्वज्ञान नी
पृष्ठलूभिभां धभो" ड धार्भिड ग्रंथोनो जभ्यास थाय ते आावश्यड छे. सा
संशोधन ते दिशाभां भडत्वनुं प्रहान उरी शहधे तेभ छे. ते तेनी भहत्वपूर्ण प्रस्तुत छे.
9.4: संशोधननी पध्धति तथा तेनुं क्षेत्र :-
तत्वज्ञानना संशोधन अर्यनी पध्धतिनी केम या संशोधननी पध्धति भुज्यत्वे वर्णनात्मड जासोयनात्मऊ तेम् भूस्यांडनातम छै. या संशोधननुं खेड महत्वपूर्ण पध्धति शास्त्रीय पासुं आर्योनं तात्विड वांथने तेभ तेभा निदिष्ट संडस्थनाजोनुं पुर्नग्रथन सने साप्रत अर्थघटन छो.सा भाे ा संशोधन अर्थनु क्षेत्र वैदिड ग्रंथो- संडिताजो उपनिषटो विगेरे तेभ शंदरायार्थना लाष्यो मने शंडरोत्तर वेहांतना ग्रंथोभां ा सिध्धांतनो सल्यास दरवानुं छ. ते सिवाय पौरालिड ग्रंथोभां योगवशिष्ट, विष्णपुराश अने श्रीभद्द 17
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9.9:
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थ्रड२ए: २
वैहिद खने औौपनिषहिड तत्व यिंतनभां भायाना
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वैदिद खने औौपनिषछिड तत्व चिंतनभां भायानो सिध्धांत
2.१ प्रास्तावना
2.२ ऋगवेछ, सृष्टि भीभांसा खने भाया.
श.उऋवहभा भायानो ज्यास
2.४ उपनिषहठोनी तत्व भीभांसा खने भाया.
२.४.१ जहहारएथड उपनिषहभा भायानो सिध्धांत
2.४.२ शवेताश्वतर उपनिषहमा भायानो सिध्धांत
२.४.३ छांदोग्य उपनिषहभा भायानो सिध्धांत
२.४.४ भुंडऊ उपनिषहभां भायानो सिध्धांत.
2.४.4 36 उपनिषहभां भायानो सिध्धांत
2.४.5 भांडूड्य उपनिषहभां भायानो सिध्धांत
२.४. तैतरीय उपनिषहमां भायानो सिध्धांत.
२.४.८ छशावास्य उपनिषहभा भायानो सिध्धांत.
2.4 उपनिषहोना भाया सिध्धांतनुं सभग्रसक्षी भूस्यांडन २.4.१ उपनिषह मां भायावाह छे०
2.4.२ उपनिषह भां भायावाह नथी
2.5 उपसंहार.
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वैहिद खने औौपनिषछिड शिंतन भां भायानो सिध्धांत:
२.१: प्रस्तावना :-
जा प्रदरणभां भारतीय तत्वयिंतनना प्रारंभथी क सर्थातक्तवैहिड
तत्त्वयिंतनभां भायाना सिध्धांतनुं निउण सभग्रसक्षी रीते तपासवाभा सावेस छोमा निशयाा सषष्टिभीभांसाडीय संहलथी प्रारंभ दूरीने ऋ वेहना पु३षसूऊत तथा डिरएथगर्ल सूतमां तपासवामा जावेस छे. लाषाना तत्वज्ञातना संहर्लभां ऋग्वेहना सभा भंडणमां वाड्कूडतमां भायाना सिध्धांतनुं सत्ताभीभांसाडीय निउपण दरवामा
सावेस छ. वेहोना ज्ञात लाग तरीडे उपनिषदोभां भायाना सिध्धांतने सृष्टिभी भांसाडीय तथा सत्ताभीभांसाडीय संहर्ल्भभां भूसववाभा जावेस छ. विशेषतः श्वेताश्वतर उपनिषह, जृहहारएयडीयनिषट, दवेनोपनिषट, छस्वावास्योपनिषह तथा अन्य प्रायीन प्रभाशलूत उपनिषछो भांथी भायाना सिध्धांतना जी तथा स्पष्ट रुआातोनु तत्वविज्ञानीय पुनर्थ्रथन उरवाभां आावेस छे.
सभग्र भारतीय तक्ष यिंतनभां वैहिड तक्षयिंतन परंथरा से सौथी जसरडारड खने सौथी सभृध्ध यिंतन परंपशा रही छै.ा परंराना विशाज ईसड़ पर वैदिड संडिताजोथी सहने सभङासीन थिंतन प्रवाही सुधीना दर्शन तेभष्ठ वियार ग्रंथोनो सभावेश थाय छे. प्रस्तुत शोध - निजध तेना प्रथम तजश्वभा वैदिद सने औौयनिषहिड तक्षयिंतनभां भायानो सिध्धांत तपासवा भागे छे. तपासनी सभस्यात्मड लूभिद्ञानी खलव्यक्षि से छे डे पाश्यात्य तेभ्ठ डेटसाड़ भारतीय थिंतडी तथा वियारडीये खेवुं प्रतिपाधन आरवानो प्रयास श्रो छे. डे मायानी सिध्धांत वैदिड
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परंपराभां अनुस्यूत नथी परंतु ते वेह जाउय वियार धाराजो शेवी हु जौधध वियारधारानु परिणाभछे. (1)
वेदिड खने औौपनिषहिड तक्षयिंतनभां भायाना सिध्धांतने प्रतिपाहित दश्वानो भुख्य खाशय से छे डे से प्रहारनी तक्षविज्ञानीय भूभिङ्ा पुनग्रथित डरीने २शू दरवी हे कभा प्रतीयमान जानुलाविड् विश्वने अंतिभ सशा न गणीने अंतिभ सशा साथेना तेना संजंधना स्पष्टीदरणना डो्छड तजक्े सस्पष्टता के सवर्णानीयताना तथ जाववा अनिवार्य छे. तेभ जतावुं जा माटे ा ्रदुर ऋ वना सूक्षोभाथी भायानो ज्यास सैध्धांतिड स्व३थमा स्पष्ट दुरी जृडहारएयड, श्वेताघतर, डेन, खने छशावास्य केवा उपनिषदोभां सृष्टि भीभनेसाडीय संहलभथी भायावाहना सिध्धांतने २शू दरवाभां जावे तो सभय्र वैदिड परंपराभां ते प्रारंभनुं प्रास्ताविड् लूभिक्षा लठवी शहे जा माटे या प्रदरशमा सौ प्रथम ऋग्वेहमा भायानो ज्यास तपासी त्यार जाह औौपनिषहिड तक्यिंतनभां भाया सिध्धांतनी सभीक्षात्भड वियारणा उरवाभा आावेस छे.
2.२: ऋगवेछ सृष्टि भीभांसा खने भाया :-
श्री रामानुष्ठायार्थ अनुसार भायानुं अधिष्डान शुं छे? से पायानो
प्रश्न छे. ाया ज्रह्ममां होछ शडे, अारण के को खेभ होय तो सत्यभा क खालास सर्नारी शश्ि पहा रहेसी मानवी पडे. से रीते माया भगतभा पए न रही शह देभडे भगत तेनी खनेउता-विविध नामउप या जधुं भायानुं परिशाभ छे. तेथी सगुश प्रह्मशय व्यक्ष छश्वरभां शाश्वत कविया शश्उये भाया रहेसी छे सेभ उपनिषछो माने छ. ज्रह्मनी सपरोक्षानुलूति से उपनिषहोनु सक्ष्य छे. विविधतायुक्ष जा भगतथी पर थवाभां भायानी ज्यास सडाय जने छे. नगतनी भर्याहाजोथी सतर यित्त अभर्याहितनु
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साडसन दरी शडे नहि जनंतनो उपासड़ सांतथी पर जने से ाशयथी उपनिषटो भायानो वियार डुरे छे. भाया सेटसे भर्यादानु सर्वन दुरनारी शक्िक, ते परभात्मानी संउत्यशश्ि छ०ेभगतने उत्पन्न दुरे छे.
ब्रह्मनुं निर्षेयत्व भाजवी छश्वरनी क्िया शबउय माया मा विश्वनुं सर्वठन दुरे छ. सेभनी खनेड थवानी प्रड्िया उपनिषहो जा रीते रू दुरे छ. भाया शाश्वतशक्षि छे. अरणा हे ते इश्वर साथे भोडायेसी छे. परंतु सविधा शाश्वत नथी. विधानो उधय थतो सविधा नाश पाभे परंतु भाया तो रहे छे. साथी क भायाने वस्तुगत objective अने सविधाने व्यक्िगत objective भानवाभा आावे छे.
प्रस्तुत शोध महानिजंधभा शंडर ने शंडरेत्तर वेहातभा भायाना ज्यासने सबू दरवामा आावेस छे. तेथी या प्रङरशमां तेनी पूर्वलूभिडाउपे भायानो व्यास आायार्यश्रीना प्रादुलाव परेसा देवा प्रहारनो हतो ते भाशवुं स्वालाविद् रीते ० आावश्यड छे. जा उपरांत सौ प्रथम वेहोभां भाया ने औौनिषहि तत्वयिंतनभां भायाना ज्यासने भारावो पहा सत्यंत भ३री जनी काय छो सने तेथी क सही मा प्रदरणभां वैदिड तेभषठ औौपनिषछिड तत्त्वज्ञानभां भायाना ज्यासने सू दुरवामा आावेसछे.
सौ प्रथभ वेहोभां भायाना ज्यास विषे भोछसे
2.उ: ऋग्वेहमा भायाना ज्यास :-
भारतीय दर्शन परंपराभा भाया शष्नो प्रयोग सने तेनो वियार छड़ ऋग्वेहना सभयथी थयेस कोवा मणे छे. सौ प्रथमऋग्वेहमा छन्द्र जर्थातत्ातमा
खोड़ होवा छतां भायाओो वडे खने उपवाजो हीय ते हेजायछ ते प्रहारना भंत्रोनो उस्सेज छे.
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क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्त खहीं भाया शष्हनो प्रयोग मतीन्द्रिय डे गूढ शक्ना सर्थभां
वपरायेस छे.
तेवी क रीते खद्वैत वेहांतभा २शू थयेस भिथ्यात्वना वियारनो
प्रयोग डे संडेतथए सौ प्रथम ऋग्वेना नासहीय सूक्षमा कोवा भणे छै.या सूक्षमा
क्त क्त क्त क्त क्ततकत्तकतश्रेेवशकत केतवक्रतज्रकक्तततक
क्त क्त क्त क्त त्तक क्ततके शकतनक चंशक तक्रतक्रक्ततककक
क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्त अर्थातक्त सतक्त अने असतकी निरयेक्षी स्थिति सूथवतो
तत्वभीभांसाडीय खर्थ उरवाभा जावेस छे.खही सतत्तमने सतक्तनेनो निषेध भेवा
भजे छ. जा रीते सतत्तमने असतत्तमंनेनो निषेध भगत अारणा भूसाविदा भाटे ४ थयो
छ. तेभ छतां भूसाविद्या सद्वैत अनुसार सहत्तसह त्त निर्वाय्य छो ने मिथ्या छो. साभ
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जा भिथ्यात्वनो खर्थ जा ंत्रोभाथी पुरवा जावेछ
सायणायारये भूसाविधयाना विषय जंगे उपर्युक्ष भंत्रनी व्याज्या सापता भशाव्युं छेडे भगतनुं अारण राशविषणनी केम निशयाष्य नथी जने नती
सहकपथी ४ निर्वाय्य, परंतु जनेंथी विसक्षए अनिवाय्य उतुं.
क्त क्त
क्त क्त क्ततवक्रत्तकक्क्तक्ततककत कतकतते शककतवककत कतकच मन ननक
क्त क्त क्त
खही त्रीणा भंत्रभा त्तककतक त्तकत्तककक्तत्तमक्रक्तकककक्तकक्तकतक म
उ५ सविधा भाटे प्रयोकत थयेस छे. ०ेनो सर्थ सायणायार्ये भावरए शश्िवाणुं लावइप खज्ञान खुवो ४ड़ुरेस छे. (४)
उपर्युक्ष जने मंत्रोनां लाष्य द्वारा से निर्देश भणु छे डे खज्ञान शशविषाएनी ऐेम सशीड़ नथी खने त्रीा मंत्रना लाव्यमा तेने लाव इंेवामा
सावेस छ. क खशीडथी लिन्न छे. साभ खज्ञान लाव३प छे. सर्थातत्तमाडाश डुसुभनी
भेम सलावउय नथी जने ब्रहमनी नेम लावइय पश नथी परंतु जनेंथी विसक्षश सनिर्वयनीय छे. ते मिथ्या छे. तेथी खज्ञान पए मिथ्या ४ छे छटा मंडणमा
त्कक्तक््त्िककतक्तकककतक क दर्शाव्युं छे. खही सायएा 'प्रति३य' नो खर्थ
प्रतिजिंज दुशवाभा जावेस छे.
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जधा शरीर प्रतिषिंज लूत छे, अर्थातक्तकतकतकतनककमिथ्या छे.
• खन्य वेहोभा भायानो ज्यास :-
सथववेहमा अतुं छे डे भायानो कन्भ भायाभांथी थयो छे. सहीं भायानी वियित्र शक्िनो परियय थाय छे. (अथर्ववेह-ए, ५मने८:१ सैतरेय प्राह्मणभां भाया शष्ट अतीन्द्रिय शक्कि डे माहुछ शक्िना खर्थभां वपरायेस छे. तैतरीय प्राह्मणभां भाया शष्त दैवी शक्िना सर्थभा प्रयोभ्ठाये छ. तेवी रीते शतप ब्राह्मणमां माया शष्हनो खर्थ सायणायार्ये "जघित घटना शश्ि" "परभ व्योभोहडारिएी शश्" सेवो दुरेस छे.
२.४ उपनिषहठोनी तत्त्वभीभांसा खने भाया :-
श्री शंदरायार्यना भत जनुसार उपनिषहोभां भायानो सिध्धांत सशू थयेस छ. भूणतत्त्व सेड ४छ, ते ४ सत्य छे तो पछी जा खनेउ़तानो आालास डेम थाय छ? उपनिषहो सेताप जरहमने सत्य ने नेता भगतने मिथ्या मानी जा रीत खा प्रश्ननो जुसासी जाये छै. जाथी क उही शङाय डे उपनिषहोभां भायाना ज्यास खंगेना विथारजीण पडेसां ०छ.
भगत प्रवृतिशीसछे सयूर्शतामा ४ प्रवृति शक्ष जने. तेथी उपनिषो ब्रह्मभां प्रवृति नो सलाव बुजे छे.छतां तार्डिड दृष्टिसे सप्रवृत सेवुं ज्रम्म प्रवृति विना भगत सक शडे नही. जाभ होवाथी उपनिषहोमां खेडक ंति तत्व जे स्वउयमां व्यक्ष थाय छे. सडियाशीसनु ४ ेड स्व सिने छ.से ड्ियाशीस ब्रह्म जेटसे श्वर खने से छश्वरनी शाश्वत ड्वियाशीसता शक्ि मेटसे भाया शष्ट भगतनी अनित्यता सूयववा प वपरायेस छे. नाभउपना प्रथंथसभु भगत शवरनी
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भायाने सीधे नित्य जने भाडर्षड़ सागे छ. भगत भायाने सीधे सेड-खनेड इय लासे छ. ते भाया छश्वरमां क रहेसी छ. छतां छश्वरतो भायाथी सबिप्त छे. साभ उपनिषदोभां भगतने अनित्य अने अपूर्ए मानवानुं वसल "भाया" शब्द द्वारा व्यक्ष थाय छे ते तार्डिड सने पध्धतिसरनो "भायावाह" नो स्ध्धात नथी सैध्धांतिड स्व३मा भायावाह शंद्रायार्यना तत्त्वज्ञानभां विडास पाभ्यो, आाभ शंदरायार्यना मायाना ज्यासना वियार जीव उपनिषहोमां होवाथी शुहा कुछा उपनिषहोमां रडेसा भायाना सिध्धांतने उवे वियारीमे.
2.४.१: जृहछारएयड उपनिषछभा भायानो सिद्धांत :-
ग्निनो खेड़ दुए उडपथी इरववामा सावे तो थेभ खोड वर्तुज केवो सागे छे, ते रीते खेड़ सनंत ब्रम्म भायाने सीधे भर्यादित सने सपूर्ए बागे छे. तेथी सेभ उडी शङ्ाय के भाया निराहारने जाहार जापती शक्ि क नहि परंतु सपूर्णताभां सत्य डे पूर्णतानो खालास उलो दरनारी शक्ित पशा छे. जृहहारएय उपनिषहमां डतुं छ, "सत्य शण्ह त्ए क्षरोनो जनेसो छे .: क्तत्तवनकतनने क्त. तेभा
प्रथम खने छोदसी खक्षर सतक्े,परंतु वश्येनो खक्षर "ति" सनत छे ()तेनो खर्थ को
थाय छे डे भगतनी र्थना पडेसा ज्रम्म उतुं. भगतना विसर्न जाह पएा ज्रह्म हशे परंतु से जनेनी वश्थेनी स्थिति जेटसे नाम ने उपना विस्तारवाणु, भर्याहित खने सपूर्ए सेवुं ा भगत मायाने अरएा ्रम्म भगत३पे खेड़ जनेे लसे छ ते भाया छे ते माया छश्वरभा क रहेसी छे.छतां ६वर तो भायाथी ससिप्त छे.
जृहहारएय उपनिषर्मातकक कतत निकक्तक्ततकना लाव्यमां
सायार्य शंडरे ज्रह्मभा नानात्ते निषेध कर्या छे. नानात्वनी सविधाने अरणे मारो दुरवामा जावे छे. उडीउतर्मा क्त्तक्तततकक्तत्तनकतकतकत्तमरभार्थ द्वैत छे g नहि. (9)
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सर्थातक्तर भार्थ तः द्वैत मिथ्या छ.
खा उपशंत जृहहारएयड उपनिषछ १:३:२८ मां अतुं छडे"भ्या द्वैत केवुं त्तकक्तहोय त्यां सेडजी काने भुखे छ."
जाभ, जृहहारएथड उपनिषहमा भाया जने भिथ्यात्वना ज्यासनो उस्सेज स्पष्टयएो थयेसो भोछ शङ्ाय छ.
सेडत्वनी जनुलूती पर लार भूड़ता उपनिषहोमा इडेवामा खात्युं छेके कवात्माने लेदृष्टि होवाथी वामाने तु ज्ञान जञाा-जायना लेो पर अवसंजित होय छे.लहहष्टिया के हेजाय ते भगत खने सलेह छृ्टिमा जनुलवाय ते ब्रह्म खात्मष्टि सर्वत्र जेसे है जा दश्य- दश्य सेवा समस्त भगतभां खने तेनाथी जहार सेडत्व खनुलवे छे. क्तेकतक तवकतकतनक रिकतक तकक्तत्तेक्क्ेककतकनमीड खने शोङ, राने द्वैष से
कवात्मानी भर्यादित दृष्टिना परिणाभो छो.क जात्मारभा प्रतिष्ठित तयेक्ष छ. तेने भोड, भमता, छर्षा, द्वैष ऊशु क होतुं नथी.
नयां द्वैत छे त्यां भाएास जीणा भाएासनी गंध जनुलवे छे. जीभाने बुखे छे, सांलजे छे, जीभा साथे वात डुरे छे, जीभा विषे वियारे छो डे जीठाने सभण् छ. क्यां जघुं क आातभभय थयुं होय त्यां डोएा, डोना वडे डोने सुंधे, हुखे, सांलजे, वात दुरे वियारे के सभ ? शानथी जेने भारावो, केना वडे जछु भुआाय छे? खात्मा स्वयं ज्ञान स्वा३य छे. ते जाा, जे ने ज्ञाननी सेड़ता छै. जा जाताने ा साधनाथी भारावो? (6)
सही से स्पष्टपणो कोछ शजाय छे हे नगत खने ब्रह्म से दृष्टिलेहना हुहा शुछा तत्वो छे. उपनिषहो कवदष्टने खात्मष्टिभां परिवर्तित 28
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दरवानुं सूयवे छे. स्थण, दाज खने हार्यडारणाउये विलाकत थयेस जा भगत श्रीभट संठ रायार्यनी परिभाषाभां व्यावडारिड सत्ताउपे व्यावहारिद् भूभिडाये सत्य छे.
प्रम्मना पारभार्थिक अनुलवना संहर्लमां क कगतनुं मिथ्यापुं उपनिषटोने ान्य छे.
जाभ, ा भगतनुं ध्यान सततत्त्वनी योठनाभां नऊ्डी दरवानुं दाम घुं क दठिन छ, के क भुश्देसी उपनिषछना दृष्टिजोजे पए नुलवेसषी छे. भगतने सत्तत्तपए उही शङाय नहि तेभष्ठ भगतने सतत्तए उडी शङाय नहि मेवी
स्पष्ट प्रतीति तेभने थयेसी छे. जाथी क नगत सनिर्वयनीय छे.सेवो वियार २शू दरवाभा सावेस छे, डे लपाछणथी वेांत दर्शनभां 'भायावाह' नी लूभिड्ा जनेस छे.
२.४.२: शवेताश्वेतर उपनिषहभां भायानो सिद्धांत :-
खेताश्वेतर उपनिषहमा अतुं छेडे ज्रह्मभांथी सर्व उत्पन्न थाय छ तो पश पोतानी भाया शम्िना जणथी विश्वने उत्पन्न मरनार थाय छे.खही प्रडील जहसे "भाया" शब्ह प्रयोेसछे.
तेवी रीते खेताश्वतर उपनिषहमा प्रदृतिने माया तथा जडेश्वरने भायाने अधिति तरीडे जताववाभा आावेस छै
"भाया तुं" वगेरे खही प्रदृति माया ४ शब्ह द्वारा व्यक्ष थयेस छे. ऐ महान जने श्वर होवाने डारएो महेश्वर छे, ते भायावी भायाने सत्ा - 29
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स्कूर्ति वगेरे छेवावाजी छे. तथा अधिष्डानउपथी तेने प्रेरित ऊरवावाणी छ.२०४ वगेरे अधिष्डानोभां उस्थित सर्थाहि भायिड अवयवोनी अध्यास द्वारा ा संपूर् भगतव्याप्त छ. साभ खही प्रदृतिन माया तरीडे छ्शववाभा जावेस छ. तथा डेश्वरने भायाना अधिपति तरीडे जताववाभा आावेस छे.
२.४.उ: छदोग्य उपनिषहभां भायानो सिद्धांत :-
उपनिषहोां भाया, सविधा ऐेवा शष्होनां प्रयोग धशी भ्याये थयेस कोवा मणे छे. छांदोग्य उपनिषहोमा भशाव्युं छे तेभ तंकेककतशिकते क्ितकक्तवमा"खनृत" श्हनो खर्थ खायार्य शंदुरे सविधा थो
छे. खा शुज्हनो खर्थ मानहगिरिये प्रभाण क्रो छे.
शंदरायार्य भशावे छे हे विज्ारगत सभग्र डार्य भगत वस्तुतः अारएाथी लिन्न छ. केवी रीते शक्षोपाश्वानयुक्ष स्इटिड्रमलिमा पम्मरागभलिना अरभ थाय छे. वास्तवरभा से पघ्मरागभि नथी. तेवी ीते भगत ज्रहमथी ुछ उये सागे छे.परंतु डार्य भगत अारएा ब्रह्मथी लिन्न छे. (१२) बुहाउे हेजावुं ते ४ मिथ्या छे.
त्तकक्त क्तक्ततकक्तकक्तसृतिनी व्याज्यामां आानहगीरीजे ब्रह्मभां स्वगत, सातीय,
विषातीय सेभ त्रिविध लेहोनो निषेध ्ो छ. (13) केनो खर्थ लेह मिथ्या थाय छे. छांदोग्य उपनिषछमां उडेवाभां आावेस छेडे क्यां बुखे खन्यने बुखे छे खन्यने सांलणे छ, सन्यने भाऐो छे, ते सत्य छे. सर्थातत्तम न्यत्वनुं ज्ञान तथ्यीन छे. सन्यत्व मिथ्या
छ. शंडरे लाष्यभां सत्यने स्वप्नवतत्तमिथ्या डतुं छे. () आा खस्पनो खर्थ सीभित,
सीमानो खर्थ परिछिन्न, देश-अजथी परिछिन्न सेवो थाय छे. परिछिन्न वस्तु
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खद्वैतना भत जनुसार मिथ्या छे.
२.४.४ : भुंडड उपनिषहभां भायानो सिद्धांत :-
भुंडड उपनिषहमा उडेवाभा खावेस छे डे सविधा डे मज्ञाननी गांठ सहीं क जा भगतभां क पोतानाभा वसता शुद्ध संतरात्मा वडे क उडेसवानी छे. हटय३य गुझमा छुयायेसा संतर्याभी परभेश्वरने के काशी से छ ते या मनुष्य शरीरभा क सविदा भनित संतःडरणनी गांठने तोड़ी नाजे छे. सेटसे डे सर्व प्रहारना संशयो सने अभथी रहित थह परजरह्मने प्राप्त दुरे छे.
त्कक्रककककेतशकतशरतशर केकतककतेशेे शेककककक
क्त क्त भुंडड उ५निषधना त्तक्क्तक्तक्तकक्तक्तजवे ना भाष्यभा खायार्य
शंदुरे नाभइपने सवलास्य डतुं छ. सवलासनो खर्थ प्रातीतिड थाय छे. ऐेभ २०४भां सर्थनो लास सविधान अारणो थाय छे. तेवी क रीत सज्रल प्रत्यय सविदाभात्र छे. परभार्थ सत्य ज्रहमछ. (19)
2.४.4:5534निषहभा भाया :-
क्त क्त क्त क्त
36 उपनिषछमां उडेवामा खाध्युं छ, ते खनुसार विद्ा भने सविदा जनें प्रडाश अने संधडारनी पेठे विवेड़ अने सविवेडउय डोवाथी सेजे वश्थे 31
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भहान खंतर डोवाथी परस्पर विपरीत छे.
सविदामां इसाये साजोनी हुर्दशा वर्शवता था श्ृतिवयनभा भआाव्युं छे डे पंडित माननारा भूर्ज भाएसो सांधणा भाएासनी केम जनेड़ हुटिस गतिजोनी छरछा दरता रहीने लटक्षा दुरे छे.
2.४.द: भांडूश्र्य उपनिषहमां भाया :-
भांडश्रय उपनिषहमां पण भाया ज्यासनो उस्सेज थयेस भोड शडाय छे. ०ेमडे,
१८)
स्वप्ननी वृति सर्थातक्तस्वप्न स्थानभा थए यितनी मंहर
भनोस्थथी संडस्य दुरेस वस्तु जसतत्तहोय छे.डेमडे ते संडस्य पछी तत्क्षण हेजाती
नथी तथा स्वप्नावस्थाभा क यित्तथी जडार यक्षु वगेरे द्वारा ग्रहण दरेस घट वगेरे सतक्त
होय छे. सेवो निश्यय थह कवाथी यएा तेभां सतक्त जसतक्तो विलाग हेजाय छे. परंतु 32
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थित्तथी उस्पना दुरेस या खांतरिड खने जाए जंने प्रहारना पहार्थोनु भिथ्यात्व कोवा भजे छे.
कवोनो कन्म भायिड छे. से छशावता भाडक्रय उपनिषहमा डतु छेडे,क्त
क्त कक्ेशेके क्रतकतकतशकतवेशेश
धर्म (oa) के उत्पन्न थता उडेवाभा जाव्या छे. ते वस्तुतः उत्पन्न थता नथी तेनो न्भ भाया सहश छे ने भाया थएा वस्तुतः नथी
खा रसोडमा शंडुर तेना लाव्यमा भुशावे छे डे के खात्मा तथा जीभा धर्म () उत्पन्न थाय छे तेवी उस्पना उरवाभा जावे छे, ते जधा संवृतिथी ४ उत्पन्न थाय छे. यहींतशर द्वारा संवृतिनो निदेश थयेस छे.
तेजो तत्वतः परमार्थतः उत्पन्न थता नथी, डेमडे ते पूर्वोक धर्भोनो े संवृतिथी न्म थाय छे ते छेनाऐ डे भायाथी थतो नन्म होय सेवो छै. साथी तेने भाया सदश सभवाभा जावे छे. सहीं भाया भेड़ सत्य वस्तु सिध्ध थती सागे छ परंतु खेवुं नथी. ते भाया पमा नथी तात्पर्य से छे ड़े "भाया" जा सविधमान वस्तुनुं न नाभ छे.
त्यारजाहना शसोडमा जा धर्ा () नो न्म भाया सश डेवी रीते छे? ते जताववाभा साव्युं छेकेभडे,
शेवी रीते भायाभय जीवथी मायाभय संदुर उत्पन्न थाय छै.सने
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ते नतो नित्य क होय छे. खने न नाशवान तेवी रीते धर्भोना विषयमा परा युश्धि सभथवी भोछसे
ा उपशंत भादक्र डारिडामा कशाव्युं छे तेभ
क्तक्तक्तकतकतकतेकेककतवकेतवश्र कतेनशेकक्ततककतमनक (२२)
क्ततंककतक्रककेे क्रेक्तेतकेतकेत क्रिक्तकतकतक्क्ततगनकन ५२) त्तमक
जेटसे डे स्वयं प्रदाश खात्मा पोतानी भायाथी स्वयं उस्पना दुरे छेखने स्वयं ते लेहो ने भाऐो छे.
तेवी ण रीते
साम माडूक्रय डारिद्रामा मिथ्या खने माया शष्हनो प्रयोग स्पष्टयऐो थयेस कोछ शक्ाय छे.
2.४.9 तैतरीय उपनिषहमा माया :-
तैतरीय उपनिषहमां डतुं छे ते भुक्ज छन्द्र सेटसे परभेश्वर भाया वडे सेटसे नामउय भिथ्यातमानथी सघुउय समाय छपरभार्थतः ते
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क्ोततेश्रशवशकरकिते कक्तततक कितत करशक
क्तेशतेककक करेशिकक्तंक तवेसेेशक
सविधा द्वारा उस्पना दरेस संपूर्ण द्वैतनो निषेधावधिलूत ते सद्वैत ब्रम्म तेनी प्रतिष्ठा छे. डेभडेमानभयनुं पर्यवसान पर खेड़त्व्मा क थाय छे सविधा परिडस्थित द्वैतनुं अवसानलूत ते खेड़ ने द्वितीय ब्रह्म तेनी प्रतिष्ा छे.
2.४.८: छशावास्य उपनिषहभा माया :-
छशावास्य उपनिषहमां डबुं छेडे,
क्त क्त क्त सत्यनुं भुध डिरएयभय ( सोना शेवुं होय ते) यात्रथी ढंडायेसु छे, खने छश्वरनी दया वडे ते दूर थह सत्यनु दर्शन थह शहेछे.
साभ, जा शसोड द्वारा छशावास्य उपनिषहमा पह जज्ञान है भायाना ज्यासनो उस्सेज थयेसो भोवा भणे छे
उपरना मुहसोमा बुहा हुछा उपनिषहो तेभ वेहोभां भायाना
ज्यास ंगे भोयुं तेभ छता खेड़ प्रश्न से उलो थाय छे डे उपनिषदोभां भाया सविा,
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भिथ्यात्व केवा शष्टोनो उद्सेज तो थयेसो कोवा भणे छे. तेभ छता उपनिषहमभां "भायावाद " उपदेशायेस छेडेम? ते संगे उवेना भुछत्त्ां विस्तारथी वियारीशुं
२.4: उपनिषटो ना भाया सिद्धांतनुंसभग्रसक्षी भूस्यांडन
उपनिषछमां भाया शष्दनो प्रयोग अनेड वार अनेड भग्याजे थयेस होव। छतां उपनिषहमां "भायावाद" निउपायेस छे के डेम? ते संगे मतलेहो भोवा भणे छे. खेड़ पक्षना डेटसाड विधानो सेवुं माने छेड़े उपनिषदोभां भायावाह नथी. क्यारे जीवा डेटसांड विद्वानो सेवु माने छे डे उपनिषहोभां भायावाह छ. साथी प्रश्न से उलो छे डे आा जे पक्षभांथी क्ो भत सायो? शंङरायार्यनो मायावाह उपनिषदोमा कोवा भणे छेडु दे? जा प्रश्न धशो क जगत्यनो जनी काय छे. सा जनें भतोनी यर्था उवे पछीना भुछता 8ोछखे
-
- i: BuAei HaE : -
उपनिषहोभां भायावाह छे. या भतना सभर्थड डोयसन, गई, प्रलुछत्तशास्त्री केवा विद्वानोनो सभावेश उुरवाभा जावे छै.या विद्वानोना भत अनुसार भायावाह से शंडरना भतनी उ48 नथी. परंतु भायावाह तो धशा प्रायीन सभयथी उपनिषहोमां छे४४
डोयसन छसीस द्वारा उपनिषहमां भायावाह छे, सेभ शाजित दुरवाना प्रयत्न दुरे छे. "भाया" शण्द तेना हार्शनिड़ सर्थभां सौ प्रथम भसे शवेताश्वतर उपनिषछमां खाव्यो होय तो पशा डेटसाड प्रायीन उपनिषदोभां तेनो संडेत १३२ कोवा
भणेछ छा.त.तकत्तकत्तक्त्तक त्ततकतककतेहोग् उपनिषछ द्वारा खेभ सूयन थाय
छेडे जा शरीर तथा जा कगथना अन्वेषरा द्वारा क सम शङ्ाय डेते आात्मा नथी
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शरीरने खात्मा भानी सेवो ते भोटो अभ छे
जृउहारएथड उपनिषहमा याजवस्क् ऋष उहे छे तेभ सभस्त सांसारिड वस्तुखो ने संजधीनुं आातमाना संहलवना डशु भूस्य नथी छादोग्य उपनिषहमां उडेवाभा खात्युं छेडे पिंडने भालवाथी भाटीनी जनेसी जी वस्तुनुं ज्ञान थह काय छे. अरण हे विडार तो मात्र नामउपमा ४ छे. भाटी क सत्य छे. खन्य उपनिषछोभा पर उडेवाभा जाव्युं छे डे "क खहीं नानात्व भुखे छो ते मृत्युथी पर सेवा भृत्युने प्राप्त दुरे छे. खाना परथी खुभ स्पष्ट थाय छे डे के सिध्धांत खागण भता भायावाह तरीडे स्थयायो से खात्मवाहथी लिन्न नथी परंतु तेना सं३प छे.
प्राथीन उपनिषहो पश लारयूर्वड उहे छ डे नानात्वनो प्रथंथ मिथ्या छ. जा उपशांत उपनिषदो पडेसानी ऋगवेह गेरे संडिताजोमां पश उडेवामा साध्युं छे डे नानात्व मात्र शष्टोभां सतत्तो मात्र सेड छे. विद्वानो तेने अनेड डहे छे.
खात्मा वडे 9 भाएास सभस्त भोगतने भाशी शहे छ. खाथी तेनी सौथी प्रिय वस्तु जात्मा छे. जृहहारएयऊ उपनिष मा याजवस्क् मने मै्रेना संवाहभा जा वियार कोवा भणे छे. सात्मा क खेडमात्र सत्य तेभष प्राप्त ऊरवा योग्य छ,ने ते सभग भगतनो साधार छे. खात्मानी सत्यता तथा भगतनी जसत्यताना प्रभाशो जागण ता शवेताश्वतर उपनिषछमां पश कोवा भणे छे. तेवी रीते उठोयनिष जने श्वेताश्वतर उपनिषछमां पएा उडेवामा जावेस छे के सांज्यभत केने प्रदृति उडे छे सने भगतना उपाधान ऊार७३५ छ ते मात्र माया छे. छश उपनिषहमा पशा जात्माने इशवरभां सीन दरवानुं खने द्वैत नो निषेध ऊरवानुं उडेवाभा आावेस छ. वेहांतसार नाभना ग्रंथमा दर्नस केडुज पएा भशावे छे डे शंदरायार्यनो मायावाह उपनिषछ संतर्गत खनेड़ संहर्लोना जाधारे विडस्यो छै.जा उपशंत से नोधवु ४३री छे डे उपनिषहोना परस्पर विरोधी उथनोभां सभन्वय साधवाभा तेभष्ठ तेनी वश्ये संगति दर्शाववार्भा शंदरायार्य
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सइज रहा छे.
खाम कोता मायावाह उपनिषहमा छे० नहि खने मात्र शंद्ुशयार्यनी भतगढंत डेवण उस्पना छे खेभ उडेवुं होछ रीते योग्य गएी शङाय नहि. जा उपशंत सद्वैत सिद्धि भाटे भायावाहने साधन जनाववाभा श्रीभटटत्तमांदार्ार्नी
भौसिड्ता रहेसी छे.
2.4.२: उपनिषहभा भायावाह नथी :-
उपनिषहोभां भायावाह नथी जा जीभो भत छ. श्री शंदरायार्थ पछी थयेसा आायार्योंभां रामानुष्ठायार्थ, वस्सलायार्य, भाधवायार्य ेरे तभ आाधुनिद् भारतीय सने पाश्यात्य विद्यानोना भत अनुसार उपनिषटोभां भायावाह नथी. पएा श्री शंद्रायारयें श्रुतिजोना सिद्धांतोने तर्डसंगत जनाववा भाटे भायावादनु सभर्थन क्रु छ.
डा. थिजो भुशावे छे हे शक्ष छ डे डेटसीड कग्यासे शंङरनो भायावाह सक्ष्म जीव स्वइये कोवा मणे छे. न्यारे जीक जनेड भग्याये श्रुतिओो भायावाहनो स्पष्ट विरोध पमा दुरती भोवा मणे छे. उहाहरए। तरीडे छादोग्य उपनिषछना छटा प्रउस्पमा के सृष्टि वर्शन उरवाभा आावेस छे तेभ संसारना भिध्यात्वनो डशो संडेत भणतो नथी. जा वर्शन ोता भगत से ब्रह्मनु परिणाभ नहि परंतु विव्त छे सेवो ज्यास भावी शड तेभ नथी. उसटुं भगत सत्य छे, सेभ भशाय छे खने तेनो स्थयिता पएा सत्य तेभष्ठ वास्तविड् छे.
डा. थिजो भुशावे छे डे भाटीनो पिंड तथा सोनाना टुआडानुं ज्ञान थवाथी भाटी तथा सोनानी जनेस जघी वस्तुखोनु ज्ञान थह ाय छे. तेनो अर्थ खशे है ब्रम्म के समय्र भगतनुं उपाहान अरणा छ. तेना ज्ञानथी जधी वस्तुखोनु ज्ञान थह ाय
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छ. थेम घड़ो वगेरे भाटीनुं तथा सोनाना धरेशा सोनानुं परिशाभ छे. तेवी ४ रीते भगतना जया पहार्थो पमा ज्रह्मनु परिशाभ छे.ण ज्रम्म परिणाभवाहीजो छे तेमना भाटे भायावाह स्वीअारवानो प्रश्न उपस्थित थतो नथी. अरणनु अर्थभा परिणभवुं मिथ्या नथी. सृष्टिनां उत्पतिनां वर्शनो पहा जा क सर्थभा गएावाना छे.
उठीयनिषछमां परम खात्मा वडे लौतिऊ भगत उत्पन्न थयुं छे तेभ उडेवामा खाव्युं छे. भुंडडोपनिषह मां पश जक्षरथी पर डेवण दैवी पुश्षनी वात छे. सही के प्रदृति तथा खक्षर गेरे वर्शनो रवाभा आावेस छ ते भिथ्या नथी परंतु सत्य मानवाना छे. लौतिड भगत ज्रह्मभाथी उत्पन्न थयुं छे. तेवो खही योसो स्पष्ट संडेत प्राप्त थाय छेसने जाथी भगत मिथ्या नथी परंतु सत्य छे.
उपनिषदोभा भगतनी सत्ता ब्रह्मना जाश्रये रहेसी मानवाभा जावे छे सने साज्यनी ऐेम छश्वरथी स्वतंत्र सेवु अो प्रदृति केवुं तत्त्व स्वीडारेस नथी. परंतु भगत छश्वरनी आाश्यर्योत्याहड शश्िथी उत्पन्न थयेस छे.साथी भगतनी स्वतंत्र उस्ती नथी. 85 भगतना जघा पहार्थो खात्मतत्व सभक्ष सत्यंत तुय्छ छे, परंतु जा आाश्रितशु तथा तुश्छतानो र्थ शंदरयार्य दुरे छ, तेवो ेसे के अभ ने मिथ्या जेवो नथी संघडारभां केवी रीते होरडीभां सर्पनो लास थाय छे तेवो नथी, उपनिषदो तो मात्र सेभ क प्रतिपाहन दुरे छे डे भगतना पहार्थोनी ब्रह्मथी ससग जेवी स्वतंत्र उस्ति नथी जा जरी उडीउत न भाएवी तेनुं क नाम सविधा- खज्ञान उंडेवाभा आावेस छे. खने जा प्रहारना खज्ञानने दूर दरवानो उपदेश उपनिषहो जाये छे. छशावास्य उपनिषहोमां उडेवामा जाव्युं छे तेम जया पहार्थोभा व्यायेसा ब्रम्म यैतन्यने भोवुं- भालवुं से क माणसनुं परम दर्तव्य छे. जृउहारएयड उपनिषहना डेटसाड वाक्षोमां भगतनां भिथ्यात्वना डेटसाड संहलो कोवा मणे छे. नानात्व सने द्वैतने छव' शष्छ द्वारा छ्शववाभा जावेस छ.परंतु खानो खर्थ भायावाहनी उस्पना क्र्ा विना सेभन समक शकाय के कगतमा हेजाती लिन्न लिन्न वस्तुओोनु भूज डारएा जह्म होवाथी ते 39
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तेनाथी लिन्न नथी
साम उपयुक्र जंने मतोमा कशाव्या भुक्ज उपनिषहमा भायावाह छे. खने उपनिषछमा भायावाह नथी सेवा जे भती ोवा भणे छोजने जाथी ४ जरेजर उपनिषहमां भायावाह छेडे नहि? या प्रश्ननु निराङरण दरवुं से भुश्देस जाजत जनी भाय छे.
ा प्रश्ननुं भूण भायावाहना सिद्धांतमा छे. डी. शनडे तेभना पुस्त: "A Constructive Survey of Upanisadic Philosophy" भां भशावे छे डे समत्र रीते भोतां शंदरायार्य मने शंदरायार्य पछीना जायार्योंना भतने भोतां भायाना सिद्धांतनुं निउण उरवाभां भुष्यत्व त्श सिद्धांतो सशू थाय छे.
(१) प्रथभ से हे भायानो सिद्धांत उपनिषदोभां नथी परंतु ते तो शंङ्रायार्थनी भौबिड प्रतिला शक्नुं घोतड छे.
(2) जीभुं से डे शंद्रायार्यना खद्वैतवाहभां हेजातो भायानो सिद्धांत तेभना पर जौद्धोना शून्यवाहनी के जसर पडेसी तेनुं परिशाभ छे जाभ सहीं शंदरायार्यनी भौसिक््तानो नडार दरी तेभने "प्रश्छन्न जौध" तरीडे भाणावाभा जाव्या छै.
(3) त्रीणो भत से छे डे भायाना सिद्धांतनुं व्यवस्थित निउ्पश तो उपनिषहमा थयेसुं ४छ. शंदुर तो मात्र तेनो खर्थ स्पष्ट डरी जतावे छे सेटसु ४४छे.
भुछा कुछा जायारयोना मत परथी सेभ भाली शजाय छे है उपनिषछोमा स्पष्ट रीते अोछ वाह डे भायावाहनुं स्थापन थयेस नथी. जरी वात से छ ह उपनिषछोमां तर्ड वडे प्राप्त थता सिद्धांतो रशू थया छे तेभ मानवा दरता ते तो ऋषि- भुनिखोना रोवििन्ा ाध्यात्मि नुलवनी डायरीजोछ सेभ मानवुं वधारे योग्य छे०ठेवुं तेभऐ मनुलव्युं छ तेवुं तेभऐ डबुं छ. तरईथी
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प्रतिपाहित व्यवस्थित दार्शनिड सिद्धांतोनी उपनिषदोभां शोध ऊरवी से व्यर्थ जाजत छे. खने जा अार्य उत्तरडासीन खायारयोंसे पुरेसु छे खने तेना परिणाभे पाछणथी भायावाह जंगे वुछा वुछा खनेऊ भतभतांतरो उला थयेस ोवा भणे छे.
भायावाहनां प्रसिद्ध सिद्धांतभां नीयेना जे उप सिद्धांतो सभाछ
हाय छे.
(१) खात्मा क सत्य वस्तु छेमने
(2) भगत, कव, छश्वर गेरे रमभुभाँ सर्थनी आंतिनी ऐेम अभमात्र छे.सने ज्रम्म ज्ञान वडे तेनो जोध थाय छे. उपनिषहोमा सापश ने पडेसा उपसिद्वांतनुं प्रतिस्थापना कोवा भे छे.परंतु जीका भतने टेडी भणतो नथी, आात्माने सत्य पाभवो तेनो खर्थ जेवो नथी है कगत भृगतृषणानी केम ज्रल्ममात्र छे सेभ भानवुं.
"भारतीय तत्वज्ञाननी उपरेजा" मा प्रा हिरियाएणा भणावे छे डे उपनिषछ भां भायावाह तहन छे० नहि सेभ सिद्ध दरवानो के प्रयास डेटसाड सोडोखे श्रो छो ते जराजर नथी. भायावाह तो उपनिषहमा छ४ परंतु पाछणथी तेनो विस्तार तेभष्ठ विडास थवाथी शंङशयार्यना सद्वैतवाहमा तेना संग - उपागो रू थयां ते जघा उपनिषहोमां भोवा भणता नथी. उपनिषहो सौथी प्रायीन छे तेभा "भाया" श्ह जहु भवस्से भोवाभा जावे छ, परंतु मेना द्रताय भूना साहित्यमां ते कोवा भज छे, कोहे त्यां तेनो सर्थ संगे हमेंशा स्यष्ट निर्एय दुरी शङाय नहि.
जा उपशंत के उपनिषछो जहु क भोडा स्यायेसा नथी तेभा पर
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जा "माया" शब्ह बोवा मजेछ. उछाहरए तरीडे शवेताश्वतर उपनिषद ४-१० प्रायीनतभ उपनिषहभा थ्यां "भाया" रण्ह भोवा नथी भजता त्यां यर जेना केवो क खर्थ घरावतो "सविदा" शब् तो भोवा भजे छे, उहउरए। तरीडे
"Philosophy of the upanisads" ui sua भशावे छे हे "नगत ज्रह्मनो विवत छे से वियार उपनिषहोभां छे, केजोसेभ भाने छे डे भायानी सिद्धांत उपनिषदोभां भशातो नथी परंतु ते तो शंदरायार्थनु स्वतंत्र सर्वन छ. तेजोने भवाज जापता "A Constructive Survey of Upanisadic Philosophy" मार्डा. रानडे भआावेछेडे "भायानो सिद्धांत शंङरायार्य द्वारा थयेक नवीन सर्वन नथी है जुद्धना शून्यवाहभांथी यश। परिएभेस नथी जा उपरांत उपनिषदोमा पश पूर्विडसित३पे तेनु नि३्यण उश्वामां आावेस नथी. सर्वनना गूढ तत्त्वने सभ्ठवानो प्रयत्न उपनिषहोना ऋषिजोज पुरेसछ. तेभए मानेस छेडे ज्रह्म के सर्थभां सतक्त ते खर्थभां ने
ते उक्षाखे तो भगतने सतक्ता उही शङाय खने के तेभऐो भोयुं खने खनुलव्युं तेनु
तेभनी पोतानी रीते तेभऐ निदपश क्र्ु छे. शंदरायार्ये तो मात्र तेभना जा वियारोने व्यवस्थित उप जापेस छे.
2.5: उपसंहार :-
खाथी क सेम स्पष्टपऐो उडेवुं योग्य रहेशे हे श्रीभछक्त
शंदरायार्यनो हेतु उपनिषद्टोभां न होय सेवा भतनुं आापी साभे निइपशा दरी छेतरवानी प न होछ शडे. उपनिषहोना सिद्धांतोने परस्थर तर्ड संगत जनावी खेड पूर्ण हार्शनिऊ स्वउपमां सोडी सभक्ष भूडवानो तेभऐ प्रयत्न उरेस छे. 42
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विज्ञानवाही जौद्धोना सिद्धांतो से सभये विडास पाभी यूडेसा उता गोडयाहायार्ये पहा जौध्ध विज्ञानवाहना सिद्धांतोनी असरभा सावीने से प्रभाऐो उपनिषहोना खर्थो दरवानु श३ दरी हीधुं उतुं. खाथी ा सभये शंङशयार्थ उपनिषहोना सिद्धांतना सर्थघटनभा भायावाहनो विडास साधी से स्वालाविड छ. या सिवाय तेभनी पासे जन्य अोछ मार्ग नहतो. भायावाहना स्वीडार ्श्र्मा सिवाय उपनिषहोना सिद्धांतोभां तेजो परस्थर संगति जेसाडी तेभने सविशद्ध दर्शावी शडे तेभ न उतुं सने खाथी ४ श्रीभटत्तशंडरायार्थे
भायावाहनुं प्रतिपाहन दुरेस छे.
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संहर्ल नोध :-
(9) ऋ198-5:४:96
(२) ऋगd६-१०:१:१२८
(४) ऋगवह संडिता- १०/११/१२८/१3६
(4)ऋगवह संडिता-६/४/४७/१८, यातुर्थजंड सायण लाष्य
(s) aGElR0นs GuโyE -: น . 9.9
(9) जृहहारएथड उपनिषछ लाष्य -: ४/४१८
(८) जृहहारएयड उपनिषह-४:८
(ए) शवेताश्वतर उपनिषछ लाष्य :- २/४/१४
(११) छंदोग्य उपनिषछ, शांदरलास्य, आानंदगिरि टीडा ८/उ/9, आानंछाश्रभ
यूना १८८०
(१२) छंदोग्य उपनिषछ, शांदरभास्य, द/४/१
(१3) छंदोग्य उपनिषछ: ६/२/१
(१४) छंदोग्य उपनिषछ: ७/२४/१
(94) H55 641748 -: 2:9:90
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(95) H5 641748 -: 2:2:9 9
(99) $6 6417UE -: 9:2:X
(92) 58 64/748 -: 9:2:4
(१८) भांडूक्र्य उपनिषह, वैतथ्य प्रडरश: ८
(२०) भांडक्र्य उपनिषछ -: ४/५८
(२१) भांडूक्षक उपनिषछ -: ४/५८
(२२) भांडूक्र्य डारिडा२/१२
(23) भांदूक्ष् उपनिषछ -: ४/४५
(२४) तैतरिय उपनिषछ -: २/५
(२4) छशावास्य उपनिषद 2सोड -: 94
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2934 :-
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प्रड२ए-3
शांडुर वेधान्तभा भायानुं स्वउप
3.9 प्रास्ताविद्
3.२ वेहांत ज्ञानभीभांसा सने वृत्तिज्ञान :-
3.3 अध्यासनो सिद्धांत खने तेना प्रडाशे :-
3.3.9 अध्यासनो सिद्धांत :-
3.3.२ अध्यासना प्रडाशे :-
3.४ ब्रह्मनो सिद्धांत :-
3.8.9 निर्गुए निराडार:
3.४.२ लेहत्रय रहित:
3.8.3 छेशडासातीत:
3.4 ज्रह्म खने भगत:
उ.4.१ डार्य डारएनो सिध्धांत-विवर्तवाह:
3.4.२ भगतनी सनिर्वयनीयता :
- 5 ब्रम्म- सवर्णानीय सता:
3.5.9 ब्रह्मनुं उडारात्मङ वर्णन: 47
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उ.5.2 ब्रह्म नति नेति खने नडारात्मड वर्शन:
3.9 भाया शब्हना लिन्न लिन्न सर्थो :-
3.८ भायानुं स्व३प :-
3.C ज्रह्म खने भगतनो संजध सने भाया :-
3.90 भायानुं डार्य :
3.99 सविधानुं स्वउप भने तेनो आाश्रय :-
3.92 सविधानुं अार्थ :-
3.93 भायावाह साभेनी टीड़ाजो :-
3.१3.9 भायावाह साभेनी रामानुभ्नयार्यनी टीड़ाजो :-
रामानुभनयार्ये उरेसा जाक्षेपोना प्रत्युत्तर :-
१२० थी १३२
3.93.२ भायावाहनी श्रीभद्द वस्सलायार्यनी टीक्ा:
3.98 ब्रम्म सूत्रभां भायाना ज्यास :-
3.94 गौडयाहायार्य खने भायावाह :-
3.95 वेछांतनी भाया जने सांध्यनी 'प्रदकति' :-
3.99 स्वाभी विवेअानंहनो भायानो ज्यास :-
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प्रड२ए :- 3
शंङरोत्तर वेहांतभां भायान् स्व३प :-
3.9: प्रस्ताविङ़ः
खा प्रदरणभां वेहो जने उपनिषदोभां भायाना सिध्धांतना भू्स्यांउन जाह शांडरवेहान्तभा भायाना सिध्धांतनुं सभीक्षात्मड निउ्पण तथा भूस्यांडन परवामां जावेस छे. सौ प्रथम गौडपानी मांडकम हारिडामा जभातवाहना सिध्धांतभा
भायावाहना संहलथी भूस्यांडन दरवामा जावेस छे. त्यारजाह प्रस्थानत्रयी परना शांदरभाष्य तथा विशेषतः ब्रम्मसूत्र शांङरमाष्यभांथी भायाना सिध्धांतनुं निउपण ने भूस्यांडन तपासवानो प्रयत्न उरवाभा आावेस छे. भायानुं स्व३प, तेनो अर्थ तथा तेना डार्यो तपासी अन्य सभान्तर तत्वविज्ञानीय सिध्धांतो केवा डै अध्यास, विवर्त अने सविधा साथे तेनो संजंध तपासवाभा जावेस छ. संतभा भायावाह साभेना राभानुष्ायार्थ तथा जन्य तत्वयिंतडोसे दुरेसा ्षेोु भू्या े निसन दुशवामा जावेसछे.
जा पडे साना प्रटरणभां वैदिड जने औौपनिषछिड तक्षयिंतनभा भायाना सिध्धांतनुं खेड़ तक्षविज्ञानीय सिध्धांत तरीडे पुनर्रथन अने भूस्यांडन दरवामा खाव्यु केभां से प्रदारनं संभवित तारण प्राप्तथयुं छ डे सृष्टि भीभांसाडीय तेभषठ माध्यात्मिड संहर्लभां भायावाहना सिध्धांतनां संघटडी वैहिड तक्षयिंतनभा रहेसा छे. या पछी प्रस्तुत प्रदरणमां वैदिड यिंतन परंपराना तार्डिड तेभष्ठ औैतिहासिड विडासना सोपान भेवा शांडर वेहांतभा भायाना सिध्धांतने भूस्यांउन्ा रीते तासवारभा आावे छ
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शांर वेहांतभां दर्शन युगना संहर्लथी सामान्य रीते गौडयाहनी भांडूश्स आरिडाने प्रथभ ग्रंथ गणवाभा जावे छे. प्रस्तुत संशोधनभां भांडूक्रय डारिडाथी बछने शंद्रायार्यना यार शिष्यो से सजेसा हर्शन ग्रंथोना आधारे भायाना सिध्धांतनुं नि३4ण खने भूस्यांऊन उरवामा आाव्युं छ ऐमां शांडर वेहांतभा अंति तक्षनुं सेसे निर्गुण ब्ध्नुं स्व३प खने तेना आाधारे प्रतीयमान विश्व साथे तेना संजंधनी सवर्नीयताना संहर्ल तरीडे भाया सिध्धांत सणू उरवाभा आावेस छे. भाया सिध्धांतने शांडर वेहांतना जन्य तक्षभीभांसाडीय सिध्धांतों केवा डे अध्यास, विव्त ने सविधा साथे तुसनाथड भूस्यांऊन दरी सभग्र तक्षविज्ञानीय परिप्रेक्ष्यमा तेनु स्थान तपासवाभा जावेस छे. त्यार जाह भायावाह साभेना आाक्षेयनु निउपम अने भूस्यांडन दरी तेभना संभवित प्रत्युश्षरो सायवामा जा्या छे. तक्षविज्ञानीय सुसंगतता भाटे सौ प्रथम शांडर वेधांतभा निर्गुण प्रध्नु स्व३प तक्ष भीभांसाडीय संहर्ल्भभां स्पष्ट दूरी त्यार जाह भायाना सिध्धांतनुं भूस्यांडन दरवुं आावश्यड छे
संहर्लभां स्पष्टउरी त्यार जाह भायाना सिध्धांतनुं भूस्यांडन डरवुं आावश्य छे.
3.२: वेहांत ज्ञानभीभांसा खने वृत्तिज्ञान :-
सद्वैत वेहांतभा परोक्ष डे आानुसांगिड ज्ञानने सभाववा भाटे "वृति" नो ज्यास छ्शववाभा जावेस छे. वृति से संतःदरशनो प्रहार छे. संतःदरण ने जुद्धि, भानस, यित्त, हधय, विज्ञान केवा नाभोथी पहा जोजजवाभा जावे छे. संतःदरण मे खात्मानी उयाधि छे. वृतिना ज्यासनो स्वीडार ऊरवो क पडे डेमडे कोजा सिद्धांत न स्वीडारवाभा जावे तो ड तो जधी वस्तु उमेंश माटे ज्ञात रहे थवा तो उभेश भाटे खज्ञात क रहे छ. वेना सवधान ने जनवधान ज्ञाननी डाथरी तथा गेरडायर शक्र जने छे ते मनसत्तात्व छे. () छन्द्रियोनो विषय साथे संयोग थयो होय परंतु को तेभा
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संतःदरण जैध्यान होय तो ज्ञान शक्ष न जने साभ सेभ उडी शङाय के ज्ञानात्मड द्वियात्मड खने लावानात्मड सेभ जधी मानसिड डियायोने श्री शंङराथार्य अंत:डरशी वृत्तिजो तरीडे ४ छशावे छे. या संतःकरश साथे नित्यपश कोडायेस होवाथी कव स्वप्नावस्थाभां आानहना अनुलव दुरे छ. शंदरायार्य 'ज्ञान' शष्हनो अर्थ मात्र शुद्ध येतना जेटसो क नथी उस्ता परंतु तेना द्वारा प्रेरित अंतःउरशनी वृत्तियो सेवो र्थ मात्र शुद्ध येतना जेटसो नथी उसता परंतु तेना द्वारा प्रेरिति अंतःउरशनी वृत्तियो सेवो खर्थ पएा दुरे छे. जा जीा सर्थभा के 'ज्ञान श् प्रयोायो छ,ते संजंधमा ४ सापऐो ज्ञान उत्पन्न थयुं, अद्रश्य थयुं जेभ उडीसे छीसे. कव कशुद्ध ज्ञान स्व३प छे ते अंतःउरणनी वृत्तियो द्वारा संसर्गभां जावता विषयने सवलासित दुरे छे. याशुद्ध येतनाने वेदांतीओो "साक्षी" डे साक्षी ज्ञान तरीडे भोजजावे छे. ज्ञानना जहलता भता पासाने तेजो "वृत्तिज्ञान" उडे छ. शंदशायार्य भत जनुसार द्रष्टि जेछे: भेड़ नित्य द्रष्टि डे के खद्रश्य छे. उछाहरए। तरीके द्रष्टानी द्रष्टि खने जीक सनित्य द्रष्टि केके द्रश्य छ. तेनी जा नित्य प्राप्त जने शाश्वत द्र्टि, डे क तेनो स्वयंप्रऊाश३य स्वलाव छे तेनाथी द्रष्टा वासनाजो खने छरछाजोने भाग्रत खने स्वप्नावस्थारभा निहाणे छे () जीठा संहर्लभां सेभ पशा मानवाभा जावे छो है द्र्टिनी केम वृति पश जे प्रहारनी छ: खेड़ शनित्य सेवी क्षेत्रेन्द्रियनी श्रृति खने जी शोधत आात्मस्वउपनी श्रृति
वृत्तियो सहित संतःऔरणने सवलास्य सेटसे डेके प्रडाशित थाय छसने कवात्माना प्रडाशने खवलासड़ मानवाभा जावे छै. या सवलास ने सवलास्य वय्थेना तझ्ञावतने न जोजजी शडवो से रोना जनुलवनी जात छे. प्रडाश शुद्ध होवाथी ते े विषयने प्रडाशित रे छे तेनुं ३प ग्रहण दरे छे. उ६ाइ२ए। तरीडे विषय खेटसे डे वस्तु सास होय तो ते प्रदाश पश सास रंगनो जने छे. तेवी ४ रीते शुद्ध थित् पए जुद्धिनी वृत्तियोने प्रााशित ऊरतु डोवाथी ते द्ियाशीस होतु नथी, मात्मा स्वयं प्रङाश३५ छे. तेभां उशी गति शक्ष नथी डे उशी डिया पएा संभवती नथी. (3) श्री
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शंद्रायार्य जूज 9 लारपूर्वड से प्रतिपाहित दरवा भागे छे डे सापला रोहा अनुलवने घडती परिवर्तनशीस ित्तनी वृत्तिो उपरांत भेड़ नित्यभासमान प्रडाश डे शुद्ध यित्तनुं अस्तित्व छे. सने पेसी वृत्तियो डे प्रदाशे से तेना विषय छे. सने तेना विना स्मृति डे प्रत्यलमिज्ञा शक्ष नथी.
श्री रामानुष्ायार्यना भत नुसार ज्ञान जाा मने जेय नेना निर्देश ऊरे छ. तेभना भत जनुसार विशेष डे ले जा जञानोने ि ३री छे. न मात्र साभान्यने क्व्यारेय ग्रहण दरी शकतुं नथी. जेटसे हे निर्विशेष वस्तुने डडी ग्राह डरी शदतुं नथी. वस्तुना साभान्य ज्ञान थवानी साथे अछने छोछ विशेष धर्भ ज्ञात थतो होछ छे. क्यारे डोछ वस्तु ज्ञात थाय छे त्यारे ते डोछने अोड धर्भथी विशिष्ट ज्ञात थाय छ. विशिष्टाद्वैत भत अनुसार सभय प्रत्यक्ष जनुलव निर्विदस्य ने सविडस्य जंने समान रीते निश्ययात्मड छे. ज्ञान उोछने होछ विषयनी साथे क पोतानुं पश ज्ञान उरवे छे, ते विना स्वतंत्रथऐो क्रारेड पोतानुं ज्ञान दरावतुं नथी.
ज्ञान से मात्र मन डे डोछड छन्द्रियनी मह पाभेसा मन वडे डार्य डुरे छे जने जा छन्द्रिय द्वारा ज्ञाननो प्रवाह पहेसेथी जटसे के ज्ञानोत्त्ति पहेसा थए। अस्तित्व घरावता विषयो तरइ वहे छे. ज्ञाननी प्रडिया राभानुक्ठना भत अनुसाश खात्माथी श३ थाय छेसने पछी मनने पहोयी छन्द्रियो द्वारा जहार नीडजी जाह पहार्थोने छ भणे छे. साभ खात्मा भननी साथे संयुक्ष थाय छे.सने से रीते ज्ञाननो उधय थाय छे. साभ ज्ञान विषय जवशाही छे. रामानुभायार्य भाने छेड़े निर्विशेष वस्तुनुं ज्ञान थह शङतुं नथी. स्मृति पश पृथड प्रभाश नथी. डैभडे स्मृति पए प्रत्यक्षनी खंतर्शत छे. पहेसा जनुलव परेस वस्तुना संस्टारथी स्मृति उत्पन्न थाय छे.सने से रीते ज्ञाननो उधय थाय छे. साभ ज्ञान विषय सवग्राही छे. रामानुष्ायार्थ माने छेडे निर्विशेष वस्तुनुं ज्ञान थ शजतुं नथी. स्मृति पश पृथड प्रभाश नथी, डैभडेस्मृति पश प्रत्यक्षनी संतर्गत छे. पडेसा अनुलव उरेस वस्तुना संस्डारथी स्मृति उत्पन्न थाय छे. 52
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प्रत्यत्मिक्षा यएा प्रत्यक्षनी संतर्गत छे. सलाव पशा भावान्तर ३प डोवाथी सलावनु ज्ञान पएा प्रत्यक्षनी संतर्गत छ. पुएयशाजी भाएासनी प्रतिला योगकठ ज्ञान पश प्रत्यक्षनी संतर्गत छे. सर्व ज्ञान सत्य अने सविशेष विषयड डोवाथी निर्विशेष वस्तुने ग्रहए दुरवी जसतवि छे. ब्रह्मनु ज्ञान, स्वप्नाहिडिनुं ज्ञान वगेरे जया ज्ञान छे. क्तेकतकेक्तेककतकेक्रे त्तकतेक्रिेततकक्त्तकत्तकतकत्त यमान खने र्थापति पएा जनुमान
संतर्गत छे. सने तेथी तेने वुछा प्रभाए तरीडे स्वीअारवानी आावश्यडता नथी. आायार्यश्रीना भत अनुसार ाउषेय ने नित्य ेवा वेवाक्ष ४ र् प्रभाश छे
श्री रामानुष्यार्थ तेभना तत्वज्ञानभा क ने ्वर जा जे तत्वोने स्वीडारे छे खने तेथी ज्ञानने धर्मलूत ज्ञान जेटसे डै गौए ज्ञान उडे छे. धर्मलूत ज्ञान कवो है छश्वरनुं "विशेषण" छे.खने ते उमेंशा कव ह इश्वरथी गौए छै. आा धर्भलूत ज्ञान खने कव के छश्वर वस्थेना संजध जपृथब्िद्ध छ. कव केईश्वरनो धर्म होवा
छतां ज्ञानने पोताने "द्रव्य३य" मानवाभा साव्युं छे. संडीय-विस्तार द्वारा ते परिणामनो जाधार जने छो सने ते गौए छै. डमडेते कव छे है इश्वर केवा जीभा द्रव्य पर आाधारित होवानी ते स्वतंत्र नथी. धर्भलूत ज्ञाननो जा ज्यास शांडर वेहांतना संतःदरएना वियार साथे साभ्य घरावे छे. (४देमडे त्यां पशा संतदुरण ज्ञान उत्पन्न दरता पहेसा से क रीते विषयो तरई तुं ने तेमनो आाडार धारणा सरतु मानवामा जावे छे. पह खद्वैतभत अनुसार ंतःदर वव होवानी तेने ज्ञानभा परिवर्तित दुरवा भाटे साक्षी यैतन्य केवा अोछ खन्य सहायऊनी अपेक्षा रहे छे. श्री राभानुण्ठायार्यना भत भुकठज खा धर्मलूतज्ञान स्वयं ज्ञान छे. न सने छन्द्रिय भेवानी ब३री सहाय तो मात्र खभुड़ रीतनो जेनो ज्ञाननो बाडार नडडी दुरे छे.ऐेम डेउपनु ज्ञान, शब्हनुं ज्ञान वगेरे मात्र ज्ञानने ४ नहि परंतु छरछा, अोध वगेरे भेवी जात्मानी मांतरिड जवस्थाजो पहा हुहा हुछा जञानी ४ छे.
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उ.3: अध्यासनी सिद्धांत खने तेना प्रदाशे :-
भारतीय तत््वज्ञानना क्षेत्रभा अध्यासनो
ज्यास जूज क नोधपात्र स्थान घरावे छे. सद्वैतवाहयोना भत भुक्ठ्ज ज्रल्म से भसेड़ मात्र सतक खने खद्वितीय छे. सेटसे डे ज्रम्म सिवायनुं के अछ होय तेनुं पारभार्थिक
स्तित्व नथी अने तेथी तेने परभ सतक् गणाता मिथ्या गएावुं भासे
क्कशकतन क्रेक्तेकेतेशिकतक्रितकक्रक्तकत्तकत्तकोकछा व्यवहारभा खायएोे दश्य
भगतभां रहीने तेनी विविध सद्वैतवाहीजो भाया है मिथ्या उडीने छह उठावी हेता होय तो ते मानवुं अशक्ष जनी ाय छ. या भगत खने को से जु शुं मिथ्या डडीनै डावी देता होय तो ते मानवुं सशक्ष जनी ाय छे. सा भगत खने कवो से जु शुं मिथ्या ४ छे? ज्रहमने 8 खेड़ मात्र सत्य मानीसे तो ज्रह्म सिवाय जीलुं के कुंछ होय तेने स्वालाविड रीते मिथ्या मानवुं पडे. खने तेथी जह्म खने कगतनां संजंधने साभान्य सोडी सत्य माने छे, परंतु खद्वैतीजो मिथ्या माने छेजने ा भिथ्यात्वना स्पष्टीडरण भाटे सिद्धांतोनुं निउणा डरे छे. केमां पहार्थोनी त्रिविध सत्ता भागृत, स्वप्न, सुषुप्ति वगेरे तष सवस्थाओो ने अध्यास ेवा सिद्धांतोनो सभावेश थाय छे सद्वैत वेहांतभा सविधा खने भायाना सिद्धांतोनो े विडास थयो तेना पायाभा डे जी स्वइय अध्यासनो सिद्धांत रहेसो छे. जाथी क शद्रायार्ये ज्रह्मसूत्रना लाव्यनी रइजातमा क उपोहतउय अध्यास लाष्य सज्यु छ
उ.3.9: अध्यासनो सिद्धांत :-
भुंडडोपनिषह मां उंडेवामा खात्युं छेडे परजल्म खद्रश्य छे, सग्राह छे गौत्र सने वर्एथी रडित छे. नेत्र ने द्वान विनानुं छ. हाथअने यश विनानु
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छे. तेभष्ठ ४ नित्थ, व्यापड, सर्वगत खने सत्यंत सूक्ष्म छेते सव्यय सविनाशी ब्रह्म छे. ते 9 सर्व प्राएाजोनुं जाहि अरण छै. सेभ धीरकनोने दर्शन थता होयछै. (4)जा रीतना श्रृति वाक्षो परषम्मना वर्शन उस्ता वाशीनी भर्याहा दशवे छे. ने तेथी क नहारात्मङ रीते क्ततकततकतकत डे श्रृति वाश्ो कोवा भणे छे. सहीं प्रश्न से थाय डै को त े शृति से
जंने पश सर्वोथ्य सत्य परज्रह्मना वर्णन डरवा भाटे जसभर्थ जनता डोय तो तेने उुछ रीते भाशी शङाय?
शंद्रायार्य ज्रह्मसूत्र परनां लाष्यभा सजे छे के प्रत्यगाभा ते पोते उभेंशने भाटे ज्ञाननो अ-विषय छेखेम नथी "हुं" से रीते ज्ञाननो विषय ते आात्मा छे जने प्रत्यगातभा तो जध प्रसिद्ध होवाथी ते स्वप्रमाश छे. प्रत्यगात्मानी उपर पए। जनात्माइय रडेसा पहार्थोनो अध्यास ऊरवो सेा अछ विद्द्ध नथी जा प्रडारना अध्यासने पंडितो सविधा के खज्ञान पहा उहे छ.सने तेनाथी लिन्न पहार्थनुं के जयं स्वइप छे तेने भाएवुं तेने विद्ा हे छे.त्क्रक्तक्ंs a generic term and
when it is applied to an individual it is called e1?1."
को खात्मा स्वतावथी क नित्य भुक्ष छेतो से जा संसारमा जय होय तेभ ड्ेम नथरे पडे छे? खद्वैत वेहांतीजोनो या धशो भहत्त्वनो प्रश्न छे.कोते निरतिशय जानह स्व३य ४ छे तो पछी ते या प्रथंथमां इसाने दृष्ट शा भाटे उठावे छे? जा प्रश्ननो गवाज से छेहे या जधानुं अरएा सध्यास छो. खभुड जोटी भान्यताथी द्रढ थह गयेसी टेवने सध्यास उडेवाभा जावे छे. सध्यासनो खर्थ आंति, अ्रभणा, खारोय, विपर्यय, जोटुं ज्ञान जेवो उरवामा जावे छ.क पहार्थभां डोछ खन्य पहार्थनी प्रतीति थाय छे ते पहार्थने अधिष्ठान उडेवाय छे. छा.त, २ु सर्पनी प्रतीति थाय छे. रु अधिष्डान छे. ते पहार्थभां प्रतीत थतो जोटो पहार्थ डे खन्य पहार्थ ते अध्यस्त उडेवाय छे. सधिष्ठानमां अध्यस्त केना सीधे लासे तेने ध्यास इंडेवामां
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आावे छे. कत्तकततकत्तकतक्क्ततकक्तत्तकक्तममध्यासनुं शास्त्री्र सक्षए सायवामा
सावेस छे डे "अधिष्ठानथी विषभ सेटसे डे साव शुछा प्राशनी सत्तावाणो के सवलास ते अध्यास"उहाहरए तरीडे होरडीमा सर्य हेजाय, तो जा उहाहरमा होरी मे सधिषडान छे, साथ से अध्यस्त छेसने सर्नी आंति थाय छे, ते ध्यास छे. होरी े व्यावहारिड पहार्थ छे, डेमडे सौडिड व्यवहारभां तेनो उपयोग डरीसे छीसे. पए तेभ छतां तेभां हेजातो लासमान सर्य प्रातिलासिड छ. डेमडे मन्वाणु थता ते साव उडी हाय छ खने उडया पहेसा है ते पछी पएा साथ तरीडेनो व्यवहार तेनाथी डे तेना प्रत्येना द्रष्टथी थह शङतो नथी अधिषठान ने ध्यासना अस्तित्वो सेसे हैसता हुही गुही छे. छोरडा३य व्यावहारिड अधिषडानना अस्तित्वथी सर्थउय मध्यस्तनी प्रातिलासिड सत्ता जसग छ. खने तेथी होरडाभां साथनो अध्यास उडेवाभा आावे छे. आा जने सत्ताजो विषभ छे. समान नथी. छोरड३ व्यवडारिड सत्तावाजा सघिष्ानथी प्रातिलासिड सर्प विषभ सत्तावाणो छेसने तेथी ते वलास, प्रतिलास डे सध्यास छे.
श्रीमहत्तशंदरायार्थ ब्रम्मसूत्रनी शहजातमा अध्यास भाष्यमा
खात्माना संजधभा जनात्मनो सध्यास क्रारथी खने हेवी रीते श३ थयो हतो ते र्शावे छे. सा भुगतभा जे प्रारनी पहार्थोनी सत्ता अनुलवी शङ्ाय तेवी छे. सस्मतक्ता त्यक्ष
खेटसे डे विषयी सने विषय, जापशी साभे जावता विषयमा जीका विषयना जाशोने अध्यास उुछ रीते शक्ष जने ? शंदरायार्य जना भवाज सायता भुशावे छे डे खात्मानु विषयी डोवु से जराजर छे. परंतु खात्मा पशा "हुंछं" सेवा ज्ञाननो विषय तो होय छे. साम ते परा क्ारेड विषय जने छे जरो? प्रत्यक्ष विषयभां विषयांतनी सारोय थह शडेछे सेवो पोछ नियम नथी. उाउरए तरी डे खाडाश सप्रत्यक्ष छे, परंतु खाडाश पर भविनता वगेरे आाहि गुणोनुं आारोपश डेटसाड सोडी डुरे छे. तेभ खात्मा सप्रत्यक्ष होवा छता पश तेना पर शरीर धर्भोनो आारोप ऊरवो से स्वालाविड छे.
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जा सध्यासनी शहजात श्रांथी थह? तेनो भवाज श्रीभक्त
शंदरायार्य जापता भशावे छे डे सध्यास से जनाहि छे, सनंत छे, नैसर्ग्ि छे.उर्तृत्व: लो्ृत्व वगेरे मिथ्या ज्ञाननो प्रवर्त अध्यास छे. नगतना तभाभ प्रभाए प्रभेय व्यवहारनुं भूज सध्यास कछ. या जाजतभा पशु ने भाएास वथ्ये डो तज्ञावत मने से जघुं खज्ञाननुं क परिशाम छ वेहांतभा तेने अध्यास उडेवाभा सावे छै. ा जजानने दूर दरवाना मात्र खेड़ क उपाय छे. खात्मज्ानथी खज्ञान हूर थाय छे स्व-स्वशपनुं ज्ञान प्रत्यनथी साध्य जने छे. (9)
शंद्रायार्य अध्यासनी व्याज्या सायता भुआावे छे डु क्तकतकतेकतकक्ेतेकककत्तत त्तहार्थोां तहक्मन्न पहार्थोनो आारोय
दरवो तेनु नाम अध्यास सेटसे के अोछ वस्तुभां तेनाथी शुद्टी क वस्तुना धर्मो डे गुशोनु आारोपण डरवुं तेने खध्यास उडेवामा जावे छे. उहाहरए। तरीडे डोछ भारास पोताना पुत्रनो सत्डार के तिरस्डार थाय तो ते पोतानो सत्डार डे तिरस्डार मानी से छे त्यारे ते पोतानाथी जाह धर्मोनो पोताना पर जारोय हुरी है छे, तेने गौए मध्यास इडेवामा जावे छे. तेवी रीते छन्द्रियोनी जामीने सीधे डोछ व्यक्ि पोताने संध डे सेु माने त्यारे ते पोताना पर जल्यंतर धर्भोनो जारोय दुरे छै. या प्रहारना मध्यासु अारण सविधा छे. सविधाने सीधे भावुं थाय छे. आाभ अध्यास से सविधा नथी परंतु ते सविधानुं परिणाम छे. सविदा जने कव जंने जनाहि छै. मध्यासथी ते उत्पन्न थाय छे. खने तेवी क रीते ज्ञानथी ते हूर थाय छे.
शंदरायार्थ भआवे छे त्तकतकक्त क्त्कतनक क्तेक्रकक्क्ततकतकक्तत्तकत्तक तक
क्त उपहेश साउस्त्रीभां तेजोश्रीजे गु३ शिष्य संवाहउपे अध्यासनु वर्शन डर्यु छ दोछ वस्तु खेडवार कोछ होय खने तेनुं स्मरण रही गयु होय, त्यारजाह जन्य डोड वस्तु कोछन मनभां खालास थाय डे जगा ोयेसी वस्तु ते या छो तेनु नाभ मध्यास
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खेटसे के कोछ वस्तु जरेजर केवी नथी तेवी तेने भानी सेवी ते अध्यास, उहाहरए। तरीडे सर्थ न होय त्यां होरडीमां जरेर सर्थ मानी सेवो ते अध्यास छे. वेहांतसारभा डबु छे तेभ क्तक्तकक्ततकतशेकेतककतेकतेतेकेिककेकतकतक नयाँ ध्यास छे त्यां जे
प्रदारना सतक्तमेजसेज थह गया होय छे. क्त्तकतककतजकक्तक्ततक तकतक्कत्तकक्त्तत्तेककेक
क्त क्तत्तकत्तकक्तक्ततम्क साम सध्यासना भूजमां सविधा छे.
डॉ. जार. डी डरमारडर भआावे छे डे There can be no
Adhyasa in a Vacum.(90) अध्यासभुं अधिष्ठान खात्मा छे. सधिष्ठान विना अध्यास संभवि शडैे नहि. अध्यासउय भिथ्याज्ञाननी निवृत्ति थाय त्यारे आात्मानु ज्ञान प्राप्त थाय छे. पश ते नैसर्गिड़ खने मनाहि मानवाभा आावेस छै.सही खेड़ प्रश्न से थाय डे सत्य स्वश्प ज्रह्ममां तेनुं अस्तित्व शुं तेने विहारी जनावे छे? श्री शंदरायार्य खानो भवाज से खाये छे डे ज्रहमज्ञानथी अध्यासना जाध थाय छे. जरेजर
अध्यासनुं वस्तु- सतत्तमेवुं अस्तित्व ४ नथी. अध्यासथी मात्मा व नेड सस्म
उपशंत 'युस्मक्त्तयोमां ग्रहण उरवाभा जावे छ. शदरायार्यनी सविधा सिद्धांत मा
सध्यास पर ४ आाधारित छे. खाभ शंडर भिथ्यात्वनो आाश्रय व ारवस्थानो सलाव प्रतिाहित दरता नथी. तेवी रीते भिथ्यात्वना उपभा व्यावहारिड सत्तानो
निषेध पएा उता नथी. तेभना अध्यासनो उददेशतर अनित्यथी भावृत नित्य मात्मा,
४डथी जललूत यैतन्य खात्मा खने भिथ्यात्वभा जय खद्वितीय जात्मानी नुलूतिनो छ. तेभनो हेतु मध्यासनुं अधिष्डाननुं नित्य, शुद्ध, भुक्ष स्वभाव जेवा आात्माने सिद्ध दुरवानो छे.
उ.3.2: मध्यासना प्रदाशे :-
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सद्वैत वेहांतभां अध्यासनो सिद्धांत शिरभोर सभी ाशवारभा आावे छे. सध्यास सेटसे शुंते कोया पछी खहीं अध्यासना प्रहाश ंगे भोशु
सध्यासना जे प्रडारो पाडवाभा जावे छे.
(१) झानाध्यास (२)सर्थाध्यास
(१) झानाध्यास :-
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वयावहारिङ पहार्थभां साभान्यतः जे वस्तुओो ोवा मजे छो खेड़ वस्तु पोते खने जीभुं ते वस्तु विषेनुं ज्ञान उछाइरए। तरीडे साथ खने सापने सगतु ज्ञान. तेवी क रीते यांही खने यांहीने सगतुं ज्ञान, या जंने व्यावडारिक छे. साथ न होय तो साथनुं ज्ञान पएा न डोय. जाभ अध्यासनी भग्यासे जे जे वस्तुओो ेड़ साथे ३48छ. यशा ते जनेने सत्य न मानी शङाय, डेमडे से नित्य खने त्रिअासाजाघित नथी, तेने जसत्य पए न उडी शङाय डेमडे तेनी प्रतिती तो थाय ४ छे, सने जेटसा ४ भाटे सतत्तम सतकी विसक्षण मेवी अनिरवयनीय वस्तु खने तेनुं ज्ञान जंने त्यां उ4० छे,जने तेथी तेने ज्ञानाध्यास उहे छे.
(२) खर्थाध्यास :-
वस्तु जरेजर थेवी होय तेनाथी शुछा उे तेने भानी सेवानी टेव तेने अध्यास उडेवाभा जावे छे. सर्थाध्यास सेटसे के खर्थ उडेता विषयोने सगतो अध्यास सर्थातत्ताय छन्द्रियोना श०्ह, स्पर्श, ३प वगेरे विषयो छे तेना संजंधभा 59
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आंति डे जोटा ज्ञानने साथुं भानी सेवानी लूस, तेवी क रीते उस्पना, मनोश्थ वगेरे पएा अध्यासना क उयो छे उहाइरए तरीडे यांहीनो छीयमा अध्यास थवो ते, सने तेने यएा प्रातीतिs subjective ने व्यावडारिड सेभ जे विलागभां वर्डेयवाभा आावे छे. प्रभाता, प्रभाए डे प्रभेयमा रहेसा छोषने सीधे के सध्यास थाय छे ते प्रातीति, केनुं निवारण छोष दूर थतां थाय छे. तेभां जात्मज्ञाननी क३२ रहेती नथी. क्यारे व्यावहारिड सर्थाध्यासनुं निवारण आात्मसाक्षत्डारथी ४ शक्ष जने छे.
जा उपरांत अध्यास संगेना (१) आर्यध्यास खने (२) डारएाध्यास सेवा पएा जे प्रडारो पाडवाभा जावेस छो.
(3) डायध्यास :-
पडेसा भोयेसा वस्तुनी के प्रतीति शुद्टी वस्तुभा थाय छे, ते स्थृति३पछ. "उहाहरए तरीडे होरडीमा पडेसा भोयेसा सर्थनी स्मृति थाय, मध्यासनुं उपर जतावेस सक्षए डार्याध्यासनुं छे.
(४) डारएाध्यास :-
5ारएाध्यासने सविदाध्यास जेटसे डे जज्ञानाध्यास तरीडे यए जोजजवाभा जावे छ. डेमडे सहंडार से खज्ञाननुं क हार्य खेसे के परिणाम छ,खने जजान सहंडारनु डारएा छै.
अोछपण सध्यास जेटसे के आंतिनु अारएा सविधा, सज्ञान कमानवाभा जावे छे, खने सेटसा भाटे ते अरएा छै. ने तेनो जीठा पशाभां अध्यास थवो ते डारएाध्यास उडेवाभा जावे छे. सविधाउय अारएा वडे सहंडार गेरे उत्पती थाय छे, खने तेनो जीा पहार्थभों के खध्यास ते आरयध्यास उडेवामा सावे छे. पहेसा
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अनुलवेसा हुं पशानी स्मृतिथी जात्मामा हुं पशाना अध्यास थाय छो ० हुं पाशु सविधाउय डारणनु अर्यमात छे, पश जात्मामा जज्ञाननो अध्यास थवारमा स्मृतिने स्थान होछ शडे नहि उत्तरअासीन सद्वैत वेहांतभा 'अध्यास' ने आंतिना यथार्थ तरीडे 9 मानवाभा जावे छ. आंतिज्ञानना विषयने भिथ्या वस्तु अने स्वतः आंति ज्ञानने अध्यास उडेवाभा जावे छे.
जा अध्यासनो सिद्धांत सद्वैत वेहांतभा खेड़ महत्वना ज्यास तरीडे गएावाभा जावतो होवा छता डेटसाड जासोयडोसे या सिद्धांतनी साभे डेटसाड वांधाजो प्रस्तुत कर्या छे. या वांधाजो जा प्रभाऐो रू दुरी शङाय जा शोघाजोनी स्बूजातनी साथे तेना राङ्य उत्तरो जापवानो पए नहीं प्रयास उरवामा जाव्यो छ.
(१) 'अध्यास' ना ज्यास साभे सौ प्रथम से वांधी उाववाभा आावेस छड को खध्यास शंडरे भानेस छे तेभ नैसर्गिड़ ४ होय तो पछी तेनुं भूज केम होछ शडे जा प्रश्ननो उत्तर से छे हे खज्ञान, सविधा, भूज प्रदृति तेना स्वइपनी द्रष्टिसे विधिवासी जेटसे डे लावप छ ते इस्त निषेधात्मङ नथी. ते स्थूज कगतनुं सूक्ष्म द्रव्य छे. सैद्धांतिड द्रष्टिजिंहु जनुसार भोवाभा जावे तो खात्मा खेडखने खद्वितीय छोखने वगतनुं निभित्त ने पाहान जंने अरा छ परंतु व्यावहारिड रीते भोतां ते प्रदृति, भाया डे जज्ञान क जेनुं उपाहान डारण छे. सेष् द्रष्टिसे अध्यासने निभित्त डारण डडी शङाय
जा उपशंत सागण भोयेसा अध्यासना जे प्रडाशो अारणाध्यास खने डार्यध्यासना संहर्भभां उडी शङ्ाय डे शंडशयार्य क्यारे सोडव्यवहारनी वात दुरे छे त्यारे ते अर्यध्यासना उहे छे. मात्र प्रदृतिने ४ सृष्टिना उपाधान डारए। तरीडे गणवाभां उशु वांधाणनऊ नथी. तेवी क रीते अोछयण द्रव्य के लौतिङ विषय स्वयं अध्यास विना अस्तित्वभान छे तेभ भाशी शङाय नहि ज्ञानमां
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द्रष्टा खने द्रश्यनो लेह सभायेसो ४ होय छ. परा शुद्ध, खेड खने खद्वितीय सेवो खात्मा जा जेभाथी सेड़ पएा नथी माठ डाराथी तेने जहारनी डोछ वस्तुनो स्पर्श पहा न थह शडे पए सीभित स्व हे खहं प्रत्यक्ष विषयनो अनुलव ज। दरी शहे खने आा सनुलव ते डारया ध्यासनुं परिणाम छे.
(२) अध्यास संजंधी जीभो वांघी formal जेटसे डे रौपिड छे. श्रीभटत्तं दरायार्यना भत अनुसार विषय अने विषयी परस्पर विरोधी छ केवी
रीते प्रदाश खने संघडार परस्थर विरोधी छे.सने ाथी क व्यावहारिङ रीते खा जंने सेडजीथा साथे लेजसेज डरीसे तो पएा सैद्धांतिड दर्टि जिंहुथी तो तेजो सेडजी भाथी गुहा छे.
क डोछ खेड़ इपमां खेड़ जांजो हीवो राजेसो होय तो त्यां तेनी जासपास अनवाणुं भोवा मजे छे. परंतु दूर जूशाभां तो संघाइं पहा हेजाय छै. सने ाभ संधाएं जने खनवाणु परा खेड़ क साथे होछ हेछ. सासोयडोनी दरष्टिसे आा भेड वांधो छे. खने जा वांधानो भवाज से छडे शंदरायार्यनो उडेवानो लावार्थ से छे डे संघाइ खने खनवाणु या जने खेडसाथे स्तित्वमा न होछ शडे,नेा जंने लजी कछ खेडने जहसे जीभुं मानी जेसीखे खेभ जनतु नथी, डेमडे क्यां खेड़ हशे त्यां जीभुं नहि ४ होय.
क खावी क रीते खेड़ सेवो वांधी पहा रबू उरवामा जावेस छेडे संधडारनो सर्थ मात्र सलाव- प्रदाशनो सहंतर सलाव सेवो उरवाभा सावे छे.खाथी तेने विषयनी साथे उपभाथी सरजावी शङाय नहि जानो उत्तर से इसत सलावात्मड़ नथी. डेमडे पूर्ण रीते प्रदाशता सेवा इपमा रहेस भारास पश भो पोतानी खांजो जंघदरी ते तो खांजना डोणाखन पोपया वश्थेनी ्याभा संधडारनो ते जनुलव दरे छे.
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क खा वांधा साभे प्रतिस्पर्धी जेवा छसीस दुरे छ के संधडार लावउप होयखने तेथी तेने योश्वस उप डोय तो ते छन्द्रियस्परशथी देम भशातुं नथी? जा प्रश्ननो भवाज खापी शङाय डे केवी रीते पवननी जाजतभां थाय छे तेवी रीते डोछपरा वस्तुने स्पर्शथी अनुलवी शङाय मने तेभ छता तेने ऊशु ३प न हीय तेभ जने तेवी रीते संधडारने स्पर्शी शहातो न होय तो पश तेने द्रश्यभान ३पे छे तेवी 9 रीते धूभाडानो यक्षु छन्द्रिय साथे संयोग थयाथी तेनो जनुलव थाय छेसने जेटसा भाटे तेने यएा ३५ छे तेभ उडेवुं पडे; खने तो खे रीते खेभ डेमन मानी शङाय डे संघडारने पशा ३प छे. पछी लसे ते स्पर्श छन्द्रियथी जनुलवी न शातुं होय, साभ संघडार से मात्र निषेधात्मड नथी, परंतु लाव३प छ, ने तेथी क शंदरायार्य जापेस विषय सने विषयी से प्रदाश सने संधडारनी केम खेडजी बाथी विरोधी छे, सेवी उपभा साभे डोछ वांधी नथी.
(3) अध्यासना सिद्धातनी साभे त्रीे वांधी पशा उठाववाभा जावे छे. सने सा वांधाने रबू डरवा भाटे छीय खने याहीनु प्रज्यात उहाहरए। जाथवाभा जावे छे.
छीयनोत्तकतमंश के जनेमां साभान्य छे. छीयने यांही मानीसे
छीसे त्यारे के "जा" पशानुं ज्ञान होय छे ते सने यांहीनो क्कतमंश विशेष
छे. छीयमां यांहीनो अभ पएा छीयत्ववाणी छीयने जाधारे थनय छे. तेना द्वारा छीय सने याही जा जंने वय्ये ताहात्मयनी उस्पना उरवामा जावे छो खने क आमड़ छ ते उपड़ द्वारा खात्मा मात्मा खने जनात्मा वय्येना ताहात्भने सभभाववाभा जावे छे. सा हसीत टडी शङती नथी.
छीय खने यांहीना द्रष्टांतभा के जे संशोनी वात छ. सेटसे है सामान्य संश जने विशेष अंश ते खात्मा ने जनात्माना उहाहरमां सागु दुरी न शडाय डेमडे खात्माने उुंछ कोछ शङ्ाय तेवुं द्रश्यमान ३प के खन्य धर्भो
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भोवा भणता नथी. जने तेथी ते छन्द्रिय अनुलवना भगतथी पर डोवाथी तेनो भगतना जीभा विषयो साथे भ थवाना प्रश्न उपस्थित थतो नथी, ने तेथी खात्मा जने जनात्मा वस्थेना आभड़ ताहात्मयनो प्रश्न रहेती नथी जानो भवाज सेभ खायी शजाय के को है या जधी वस्तुओो जरी छ छता श्री सायार्थ उहे छे डे ायशा जधानो जनुलव सामान्यतः सेवो छो है या रीतनुं आभड़ ताहात्म्य सस्तित्व घरावे छोसने ते जनाहि अणथी यात्युं जावे छ.जने वय्ये जीठाडुर न्यायनी ेम अर्य-र संजध छ क सविरत यह वेहांतभा उमानुसार वर्णन दुरेस छ. उर्तृत्व, लोऊतृत्व, विशिष्ट कव सने जा संसारनो प्रवाह के सविरतपऐो रागद्वैवना सीधे यासु क रहे छो सने रागद्वैषनु अरणा छ व्यक्तिमां रहेस खहं खने जा सहंलाव सविवेडने अारणो उस्सवे छ. या
सविवेड खात्मा तेभषठ मनात्मा वय्ये मानी सीधेसा ताहात्यने सीधे उ६स्सवे छ.
क खध्यडासने सीधे छ. साभ ोहे तो सर्वना भूजमां अध्यास, सविधा है खज्ञान क छे सने सा खज्ञानन जात्मज्ञा नथी क छूर दरीशहाय छे
(४) अध्यासना सिद्धांत खंगे खेड़ जन्य वांधी उठाववाभा जावे छे के मन खने शरीरनो सभावेश कवात्मा जेटसे के यैतन्यमां थह काय छोखने तेथी जा जंने वय्ये मिथ्या तेभ्ठ अभाऊ ताहात्म्य सधाय छे सेभ उडेवुं जोटुं छे.सा वांधानो प्रत्युत्तर खेभ खायी शजाय के जरुं भोता खात्मा नित्य, शुद्ध छोखने तेथी तेभां न तो भनसनो हे न तो शरीरनो सभावेश थाय छे, ड न तो तेनी साथे जरेजर छोडाय छडे तेने सहायउप नीवडे छे, कै न तो तेनी साथे ताहात्म्य साधे छे. भाया के पद्धिति से भगत३ये व्यक्ष थती डे परिणभती होवाथी ते उपाधान डारए छ. खने संसारजंधंननु निभित्त अरण से अध्यास छो.सही ध्यास सेटसे "जात्मानुं प्रदृति के खनात्माविषय साथेनुं आभड ताहात्म्य भानी सेवुं ते. ा सध्यास भाएासने सेवा मिथ्या ज्ञानथी लरभावे छो डे ज्ञाता, ज्ञाननो विषय; 64
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ज्ञानना साधनो वगेरे जघुं यथार्थ छे.उडीउतमा जा जधुं क व्यावडारिड़, क्षणिड खने द्रश्यमान जेवा से भगतना संहर्ल्भभा जइ गशी शङाय थए स्वनो स्व तरीडे यथार्थ जनुलव थतम जेटसे के खात्माडार वृति क ऐेमां खेड खने खद्वितीय सेवो शुद्ध यैतन्य नडि परंतु साक्षी यैतन्य प्रदाशे छे त्यारे या सध्यास दूर थह काय छे. को जापएो आभड़ अनुलवनी यथार्थ तानो विषय जने विषयीना ताहात्म्यनो स्वीडार न उरीखे तो खात्मानुं तेनी लौतिऊ उपाधि साथेना संसगनु ओछ जीनु ऊारए शोधवानुं रहे हे के खात्मा खने जनात्मा वश्ये साद्रश्य स्थापी शड, पए खात्मा जने जनात्मा थेवा परस्पर साव विशोधी सेवा जे तत्वो वय्ये अाछ भूण ३4 छ खने ते छेडना संघातने; के के लौतिऊ उपाधि छे, खने भगतना खनाहि अणथी यासी आावे छे तेभांथी अंतिभ भुक्षि भणे छे त्यां सुधी यासु रहे छे. तेने सागु पड़ी शड्े नहि.
(4) अध्यासना सिद्धांतनी साभे पायभो वांधो से उठाववाभां जावे छेडे विषय सने विषयी जथवा तो ४5 उपाधि खने चिछात्मा वय्ये ताहात्म्य से सोड़ व्यवहार छे. तेनुं 5ारण से जनेनुं मिथुनीदरण अध्यास छे, सेबु सद्वैतीजोनुं भंतव्य स्वीडारवानो डोछ जाधार नथी. जानो भवाज से खायी शङाय ड सापएो प्रतीति खने भूजइय वस्ये लेह पाडवो ४३री छे. मिथुनीदरण (अध्यास) खने सोडव्यवहार जा प्रदारनी के जे प्रद्ियाओो छे ते हेजाय छे ससग परंतु जइं भोतां ते खलन्न छ, डेमडे भाया से जनेनु समान पर उपाहान अारएा छै. मा भगतभां खापएी प्रवृत्तियो 'हुने ' े े्रारनी छ, खने द्वैतीना भत जनुसार भिथुनीदरण जेवा शब्होमा या जनेना भूणनो निर्देश परवामा जावेसो छे. या प्रहारना अध्यास वगर 'हु' हे 'भारं' सेवा या व्यवहार भगतना डोछ लेह शक्ष नथी.
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3.४: ज्रह्मनो सिद्धांत :-
समय्र वैदिड जने औौपनिषहि तत्व थिंतनभां ब्रह्मनो ज्यास सत्ताभी भांसाना संहर्लभा भेड़ सौथी अगत्यना ज्यास छे. उपनिषहमा विशेषत: भुंड जने जृहहारएयक उपनिषहमां ब्रम्मनो ज्यास उेन्द्रवर्ती जने छ. खने तेने सभांतर यासता खात्माना ज्यासनी साथे अंतिम यथार्थताना वर्शन तरीडे जनेनु पूर्ण ताहात्म्यीदरण से औौषनिषछिड तत्व विज्ञाननो भेड़ ग्नो इसितार्थ छे. त्यारजाह दर्शन युगमां उपनिषहोना भूजलूत तात्विड सिध्धांतोने सार३प सभायोकठनभा व्यकत ब्रम्म सूत्रोभां ब्रम्मनो ज्यास डेन्द्रवती जने छ. तथा ततकक्ततकत्तकक्तत्तनकक्तत्तकत्तने पडेसुं
ब्रल्मसूत्र छखने जीभा सूत्रभा जरलमने ४ ऋगवेह आाहि शास्त्रोना भूण तरीडे तेभ भगतना जाधार तरीडे खू रवामा जावे छ.ज्रह्मसूत्र पर सजायेसा लाष्योथी जायार्थे परंपराजोमां के ते तात्विड संप्रहायनी तत्वविज्ञानी य विशिष्टता के ते लाष्यमां थयेसा प्रह्मना स्वउपना प्रतिपाठनथी विशेषतः लसक्षित थायथाय छे
'ब्रह्म श्ह भूण' क्तकतवातु पश्थी उत्तरी सावेस छे. 'जृड' मेटसे
वधवुं ज्रम्म शष्हना तात्पर्य परथी तेनो अर्थ निरतिशय भोटी वस्तु सेवो मरवाभा आावे छ. शब्छ व्युत्पतिनी दरष्टिये भोतां ब्रल्मनो खर्थ जृहह थता थता वधु विस्तार भाटे जवडाश क न रहे जेवी खधिङ्ािड विस्तृत जृउत्तभ स्थिति जेवो पवा ावे छे रत्नप्रला टीडा जनुसार ते वृद्धि रहित महतत्तसवउप छ. अरण डे ज्रह्मना स्व३पमा
संडोयनो सलाव छे. डेन उपनिषछमा (13) उडेवामा माव्युं छेडे०ने तभे ब्रह्म३ये पूकठो छो ते जरेजर ब्रम्म नथी, े सायुं ब्रम्म छे तेने वाली, श्रोत्र, यक्षु, प्राश खने मन जा पांयेय दिव्य शक्षयो यथार्थ इपे भाएती नथी. निष्प्रपंथ, असंग, परिपूर्ण अने यैतन्य सेभ यतुर्विध मेनु स्व३प वर्शववाभा जावे छे. भाएसनुं भंति भूण स्वपनी प्राप्ति
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पछी जीनुं हुंछ भेजववानुं जाडी रहे नहि ते ज्रह्म छे. ज्रह्म कोछ भाति नथी. डेभडे 'सतक्त
वगेरे शष्दो तेना भाटे वापरी शमाता नथी. ते गुणयुक्ष नथी देभ हे ते निर्गुण छे.सने गुणवायी शष्टोथी तेनो निदेश नथी थतो. ते रीते द्िया निर्देशड शष्टोथी पण तेनु नि३यशा थह शडतु नथी. डेमडे ते निष्टिय छे () ते भाऐोसा जने नहि भाऐो साथी वुुं छ. ते नठन्भ, निंद्रा, स्थान, नाभ, ३प जेभानुं उशुय नथी. ते सर्वा विशेषयऐो लासमान खने सर्वज छे. सेने हशी डिया दरवानी नथी. ज्रह्मने यथार्थसत्ता उडेवानुं तात्पर्य से छे दे ते प्रतीति३प हेडिङ, लौतिड खने यैतन्य भगत जघाथी लिन्न छे, () ्ड.राधाकृषणनक्त
भआावे छेडे निर्येक्ष आात्यंतिङ सत्य भाटे संस्दृत श्ह 'ब्रल्म' छे. ते साध्य खने साधन जनेनो वायड छे. प्रेश्ड माहर्श तेभष्ठ तेनी प्राप्ति जंने सूथवे छे.आात्मानो परभात्मानी प्राप्ति भाटे प्रयत्न ते पमा ज्रम्म उडेवाय छे. प्रह्मने 'सतक्त्ते 'असतक्तमे भांथी सेड़ यश
रीते उडि शङांतुं नथी. आरण हे ते सत्तमने सतत् टूंढथी पर छे. (19) परज्रह्मनुं
खांडुंसन ऊरवा भाटे वियारनी डोछ पएा छोटि नहभी निवडे छे. वाशीथी तेनुं वर्शन थह रऊतुं नथी. ब्रम्म से सतत्ताथी. द्रेम डे प्रदृत्ति, परभाषुं वगेरेने छे ते प्रहारनी हस्ती
ब्रह्मनी नथी. ते असतत्तए नथी. डेभडे शून्यनो केवो जलाव छे तेवो ब्रह्मनो जलाव
नथी. श्री शद्रायार्यना भत जनुसार उपनिषद्ोभां वर्वाभा आवेस ज्रम्मनु स्व३प पएा माठ प्रदारनं छे उपाधिशून्य ज्रम्म शांत, अनंत खेड़ खने खदवितीय तेभष्ठ नित्य छ. (१9)
3.४.१ : निर्गुण निशाङार :-
श्रृति वयनोभांथी डेटसा ज्रह्मने निर्गुश तरीडे वएे छे. डेटसांड सगुश तरीडेनु निइपश रे छ.खाथी ब्रममनु जरेज३ स्वइथ श्रुं? ते उडेवु भुश्देस जनी हाय छ. सगुण श्रृतियोभों के परस्पर विदद्ध भत हेजाय छे तेभा ्रा भतनो स्वीडार 67
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उरवो? जा प्रश्ननो उत्तर खापता खद्वैतीजो भशावे छे डै सगुशनी निउपम दरती श्रृतिओो सता सतत्तनत्वनुं निर्शुण स्व३पे वर्शन उरती श्रृतिओो समयानुदम ुक
पोछसे तो पछीनी छ. खाथी निर्गुण श्रृतियोनु सशुण श्रृति उरता प्राभाएय वधु छ
उपनिषहना ऋषिजो सेभ मानता डे परज्रह्म सयिन्त्य खने सप्रभेय छे, खने तेथी तेनी व्याज्या जाभी शङ्ाय नडिने तेभ छता तेजो रषहना वर्शनो जाये छे. परष्रह्मने तेखो सव्यय ने अविडारी, स्वयंभु ने स्वतंत्र सतत्तारीडे
माने छे. उपनिषहोमां डेटसाड विधानोभा ब्रह्मने विश्व३य जेटसे हे पोताना स्वपभा सभत्र भगतने सभावी सेतुं सप्रपंथ तरीडे जोजजावे छे. छादोग्य उपनिषहमा ब्रह्मनी व्याज्या त्तकतकक्तत्ततेवा सूत्रना उपभां साथवामा जावे छे. जेटसे है "ते कगतने
वन्म खाये छे. तेने पोताना स्वउपमा सय दरी हे छो खने तेने टडावी राजे छे. "सेटसे के ज्रह्मने भगतनी उत्पति, स्थिति सने सथनुं अरण मानवाभा आावे छे. क्तककक्तत्तक ते
तेनुं तटस्थ सक्षण छे.
भगवहत्त्री ताभां ब्रह्मने सर्व जाणु हाथभगवाणु सर्व जाणुथी नेत्र,
शिर ने भुजवाणुं खने सर्वसोऊमां व्यापीने रहेसु हशवस छ. (१८) तेवी क रीते जृहछारएयड उपनिषहमां गार्गीना प्रश्नना भवाजभा याजवस्थ् ब्रह्मनु वर्शन मात्र निषेधड रीते क दुरे छ खने भशावे छे डे परभ सत्यनुं आाडसन भाएासना मनवाशीथी दरी शङातुं नथी. ब्रम्म निर्गुए छे. तेना निरपेक्ष स्वउपने संज्याना विडस्यो साशु पाडी शङाय नहि. तेथी रहनेत्कक्तक्ततककतकक्तकक डेवाभा साध्युं छे. () साभ सेभ
उही शङ्ाय के उपनिषो खप्रपंथ ने निष्प्रपंथ ब्रम्म वश्ये अोछ लेहरेजा पाडता नथी
निर्गुश ज्रह्म खने सगुश ब्रह्म जेटसे के जेयज्रलम सने उपास्य है भगतडारण तरीडे ज्रह्म या जंने खेड़ साथे उछ रीते स्वीडारवा से खेड़ ्रश्नछ.या 68
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प्रश्न के सभस्याना उद्ेस भाटे शंदरायार्य द्रष्टिजिंहुना जे लेह स्वीडारे छे.
(१) पारमार्थिड
(२) व्यावाहारिङ्
ब्रम्म खद्वैत खने निर्पेक्ष तेभ सर्वोपरी सतत्े. तेना सिवाय
जन्य दशु सतक्ताथी, पश साथेक्ष व्यावडारिड दरष्टिसे भगतना अारए तरीडे जायणाने
ब्रह्म हेजाय छे. शंदरायार्य ब्रहमना जे इयो जतावे छे. (9) नाम इपना लेहथी परिषभतुं उपाधि स्व३प सगुश ज्रम्म मने (२) सर्व उपाधिथी रहित होय तेनु स्व३प, निर्गुए ज्रल्म खाभ ज्रम्म तो खेड़ ने खद्वितीय छ, यहा उपाधि संजधयुक्ष तरीडे तेनी उपासना दरवानो जने उयाधि संजधभुक्ष तरीडे तेनुं ज्ञान भेणववानो शांडर वेहांतनो उपहेश छे. (२०)
डा. राधाङृष्णनत्त भत जनुसार परषहमना निर्गुश अने सुण,
जयौरुषेय जने पौरुषेय निराहार ने साडार े ो नु वर्शन वानी निरेक्ष जने सापेक्ष रीतो छे. न्यारे सापएो स्वतंत्र ३पे सतक्तुं स्वप निहाणीसे त्यारे
परजह्मने कोहसे छीसे,खने से सतत्ा सायशी साथेना संबंध पर लार भूड़ीसे त्यारे
परमात्माने कोहसे छीसे (१1) सगुश ने निर्गुश ब्रमनो के तहावत हेजाय छे ते जरेजर लूस छे. डेमडे जा लेह मात्र तात्विड छ. वास्तविड़ रीते जावा डोछ लेह नथी. जा लेह मात्र वैयारिक रीतेछ.परष्र भगतनुं सधिषान छ. तेथी परष्रलने निर्विकार खने सविडार जंने रीते वर्शववाभा जावे छे. डी. महादेवन सजे छेहै निशयाधिड खने निर्गुण जेवा परभसतक्ते न्यारे भगत जने कवना संहलभा भो से
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त्यारे तेने हश्वर उडेवामा जावे छे.सने निर्गुण ने सगुश जंने रीते ब्रम्म तो खेड छ. उपनिषहोनु सर्थघटन उसता ब्रह्मनी निर्गुणता सबू दरता वाश्योने सभभावता श्री रामानुषायार्थ भआावे छे डे ज्रलममा छुःज, भृत्यु डे परिवर्तन केवा हेय (अशुल) गुणो नथी सेवो खर्थ मरवानो छे. खाभ तेखो शद्रायार्यथी वुहो भत दर्शावीने सशुण छ्वरनुं प्रतिपान दरे छे. परंतु उड्ीउतमा निर्गुण ज्रह्म से सगुण ब्रह्मना खलाव३प डे तेनुं विरोधी नथी पश तेनुं भूण स्व३्प छे. सगुश ब्रम्मना प्रत्येड घटडमा ते अनुस्यूत छ. 'निर्गुश' नो अर्थ साभान्य रीते के उरवाभा जावे छे. तेवो नथी है ते शून्य छे. पएा जेटसो क छे डेमन के डांछ वियारी शड तेवुं अशु ४ वस्तुतः ज्रह्ममां नथी. परष्रह्मभा अंतर्गत सतत्तत्वनो सयार जने अठोड लंडार रहेसो छे. तेने सीधे
जुद्धिथी तेनुं पृथ्थदुरण दरी शङातुं नथी. परज्रल्म गुणभात्रथी पर सेटसे है निर्गुश हे त्रि गुणातीत छे. तेनाभा कोधपएा भातनो सवशछेह सेटसे डे मर्याहा संलजाती नथी. ते जाडार मात्रभां प्राश पूरनार होवा छ्तां ते निराडार छ. (२२)
3.४.२ : लेहत्रय रहित :-
ब्रह्मनो ज्यास सर्व सभावेशड तत्त्वविज्ञानीय भेड़त्वनो ज्यास छे. तेथी उछयण उपनिषछ जाधारीत तत्व विज्ञानीय पध्धति अंतिभ विविधताने स्वीडारी शर्डध नहि तेथी अोछड प्रदारनो सलेह हे सद्वैत वेहांतनी प्रत्येड पध्धतिने स्वीडारवुं जनिवार्य छे. सा भाटे हार्शनिड परिभाषाभा त संभवत लेोनी यर्था डरीने ब्रह्ममा से लेहना स्वीडार डे जस्वीडार संगेनी वियारणा उरवाभा जावे छे. वेहांतभा ब्रम्मने सलेह स्व३प मानवाभा आावेस छै.या संहर्लभभां शास्त्रा शवस ऋ ेो नीथे भुकष छे.
- सभातीय लेह :-
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सभ्ातीय लेह सटसे सेड़ िा लिन्न लिन्न पहार्थो वश्ये रहेसो लेह
सामान्य द्रष्टिसे खेड़ घडो जीभा घड़ायी के लिन्न हेजाय छे ते सषठातीय लेहनु उ६ार।.कुं वधारे सारं तात्विड उहाहरए। सांज्य दर्शनना पुद्षो डे वैशेषिड दर्शनना परभाशुओोथी सभभावी शङाय, उवे ब्रह्म डोछ विशेष पहार्थ नथी खने तेथी तेभां सभवाय के डोछ संजंधनी डोछ ब्रह्मत्व नाभनी भती जनुस्यूत रहेती होय तेवुं नथी. भाटे ज्रल्म केवा जन्य ब्रह्मनी धारणा ऊरवानो सधिडार तार्डिड के तात्विड द्रष्टिे प्राप्त थतो नथी. भाटे ब्रह्ममा सातीय ले नथी.
- विभातीय लेह :-
विभातीय लेहमा भाति शष्द खगत्यनो छ. तात्विड द्रष्टिये कोहसे तो काति शष्दनो प्रयोग प्रायीन न्याय, नव्य न्याय के लाषाना तत्वज्ञानमां पश उरवामा सावेस छे. उडीउतभा प्रस्तुत संहर्लभां अाति मेट से तहक्त समान गुणधर्भा घरावनार छता विशेष नाभना विशेष पहार्थने डारणे
लिन्न लिन्न व्यक्षियोमां अनुस्यूत रहेनार सामान्य पहार्थ, उवे को डोछ जे पहार्थो के व्यक्षियोनी भाति लिन्न छे, तो तेनो खर्थ सेवो थाय डै तेनो अर्थ सेवो थाय डे तेना खभुड़ गुएाधर्भो तहक्त लिन्न छे तेथी जावा जे पहार्थो वश्ये
लेह रहेवानो छ. उछाहरए। तरीडे 'घट' खने 'पट' से जंने जसग शातिजो छै तेथी जने वय्ये विषातीय ले छ उवे ब्रह्मनी प्रस्तुत यर्थाभां भेवुं सभवानु छे डे ज्रह्मथी तहक्तलिन्न, होय तेवो डोछ जन्य पहार्थ नथी. तेथी ब्रह्ममां विभातीय
लेछ नथी. खने उपर दर्शाव्युं तेभ सेभ पएा समनवानुं नथी है ब्रहमनी डोछ
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भाति छे
- स्वगत लेह :-
स्वगत लेह खेटसे अछपएा पहार्थ, सता के वस्तुभां तेना मांतरिड संश्थनात्मड गुणधर्भोने अरणे धारवाभा आावेस लेह तेना सवयब तरीडे सस्तित्व घरावे छे.सने से पएा स्पष्ट थवुं ३री छे हयाप्रहारना स्वगत लेह उभेशा प्रत्यक्षहर्शी होय तेवुं ब३री नथी, केमके पाशीमां हेजीती रीते धन पहार्थोनी केम डोछ सवयब हेजाता नथी, छता पाएी हारईड्रोनन खने जोक्ष्कीवननु जनेसुं डोवाथी पालीभा स्वगत लेह गणाय हवे ज्रह्ममा खा प्रहारना होछ खांतरिङ संश्यनात्मड गुएधर्भो नथी. 9ेनुं तत्वाविज्ञानीय डारण। से छ ड ब्रह्मनी अनतता जवदाशीय अनंतता नथी ने तेथी संश्यनातम गुएधर्भो भाटे ब३री सेवुं सवदाशीय संश्यनानं जंधारण के भाजजुं ब्रह्ममा प्राप्त थतुं नथी. तेथी ज्रम्म देश असातीत डोवाथी तात्विड द्रष्टिसे ४ स्वगत लेहथी रहित सत्ता छे. ज्रह्म जा रीते लेहत्रय रहित सत्ता छे.
भगत उत्पन्न थया पडेसा मात्र सतत्त तुं. तेना सिवाय जीभो
पहार्थ न उतो. जीभो होय तो ते सणातीय, विषातीय डे स्वगत सेभ उपर भशाव्या ते भांथी अोधपण लेहदर्शी पहार्थ डोवो भोसे मात्र के सहकप छे तेने
वयव होवानुं उस्थी शङातुं नथी. जाथी तेभां स्वगतलेह संभवित नथी, आा भेड़ सतच्ीना विषातीय लेददर्शड जीभुं सतत्ता डोवाथी तेभां सातीय लेह यशा
उस्थी शङातो नथी या सतनु विरोधी ेवु ो सता्व नथी. जसक
खेटसे डेवण सलाव के शून्य होछ तेने ते "छ' खथवा 'उतु' खेभ पएा उडी शङाय नहि. जाथी सृष्टि पडेसा के उतुं ते सहकूप, स्वगत सभातीय के विषातीय सेवा 72
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त्रऐ प्रडारना लेहथी रहित उतुं. तेथी ज्रह्मने लहत्रय रडित भानेस छे. (२3) श्री शंदरायार्य भशावे छे तेम द्रष्टा, दर्शन, छश वगेरे भावथी शून्य सेवी वस्तु
क निर्विडार, निर्विशेष तेभ लेह ांथी हो? तेां तििरनी ेम कमां भरंतिनु अारएा सीन थह गयुं ते निर्विशेष, खद्वितीय परतत्वने विषे लेह होय श्ांथी (२४)
उ.४.3 छेशङ्ासातीत :-
ब्रह्मने त्रिविध परिश्छेह रहित उडेवाभा जावे छे. परिशछेह सेटसे मर्याहा जा परिशछेहना शास्त्रमां त प्रदाश पाडवाभा जावे छे
(१) हेश परिशछेह
(२) डाज परिशछेह
(3) वस्तु परिशछेह
०ेने परिशछेह होय छे ते पहार्थने परिच्छिन्न उडेवाभा जावे छे.प्रह्मने छेश परिश्छिन्न न उही शडाय डेमडे ते खद्वितीय डोवाथी तेना सिवाय जीठो पहार्थ नथी, जेटसे हे ते खभुड़ स्थणे छेडे खभुऊ स्थणे नथी सेभ उडी न शडाय सटसे है ते खभुड़ स्थणे नथी सेभ उुडी न शङाय सटसे है ते विलु छ, सर्वव्यायी छे. वस्तु देशथी परिश्छिन्न न होय तेने अजनो परिरिछह पर न होय सेटसे हे ते त्रिडासाजाघित होय छे. स्पीनोज तेना मेथीडसमा उडे छे तेभ,
Eternity cannot be defined in terms of
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time, nor can it have any relation to time. (२५) सतत्तस्तु सिवाय
जन्य होछ पहार्थ क नथी. को जेवो पहार्थ छे सेभ मानीये तो डाँ तो ते सतत्तहोय
जथवा अ-सतत्तोय सेभ मानवुं पडे को ते सतत्होय सेभ भानीसे तो सतत्तास्तु वडे
परिश्छन्न दूरी शकाय नहि जने को तेने जसतक्त मानीये तो ते वंध्यापुत्र के
शश-शृंगनी ऐेभ सर्वथा जसतक्त सेभ मानवुं पडेने तेथी सतत्तास्तुने असतक्े
सलाव वडे परिश्छिन्नडरी शङ्ाय नहि ाभ ज्रम्म से हेशडासा ीत छै
उ.4: ज्रह्म खने भगत :-
श्रीभटटक्तां डरयार्य ब्रम्म खने नगत वय्ये पूर्णता जैक्षनी स्थापना
दरता नथी. शंदरयार्य जरम्म खने भगत वय्येना मात्र लेहनो क नहार रे छ. (२5) भगतनुं भूण प्रदृतिना विज्ासभां शोधवाभा जावे छो; ने ा प्रदृतिन ४ द्वत वेहांतमा "भाया" उडेवामा जावे छे. सांज्य दर्शननी 'प्रदृति' उरता खद्वैत वेहांतभा दशवेस "भाया" से सर्थभां शुही छे है ते ज्रह्मथी स्वतंत्र भानवाभा सावेस छ. भाया ज्रह्म पर आाधारित छे. प्रदृति डे भाया सडित ब्रम्म से सगुण ज्रह्म के ईश्वर छे. ते खात्माजो खने विषयोनी विविधतान पुरेपूरी रीते भाऐ छै. क्रारेड छवरने ख। सृष्टिना सर्वड गणवाभा जावे छेसने भायाने तेनी सर्नशश् तरीडे मानवाभा आावे छ. खा खर्थमा छश्वर जा सृ्टिु पाधान ने निित े ंने रा छे(
जा भगत के ऐोने खनात्म ऊवस्तु उडेवाभा जावे छो ते पोतानो सर्थ परभ सतसांथी तारवे छे. सेटसे के भगत जहम पर प्रतिष्ठित छे. सात्मा डे थितथी
लिन्न भगतनी उस्ती नथी. मात्र जात्मा क स्वात्मसतक्तो, तेनुं अस्तित्व स्व-खर्थ खने
स्वयाधारित छ; क्यारे वस्तु भगतनुं अस्तित्व जीभ भाटे खने जीभा पर आाधारित 74
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छ. क्यारे वस्तु भगतनुं खस्तित्व स्वयं पोताना पर आाधारित नथी. तेथी भगतने सन्भूस खने सत्प्रतिष्ठ उडेवाभा जावे छे. ा सर्थभा भगतनी सत्ताथी निम्न पक्षानी छ.() भुगतनी सत्ता आभड़ छ. भगतभा अछपए वस्तु सेवी नथी है के अाछड डारएाथी जरेजर उपातर पाभती होय खने छता नित्य डोय, तेथी र्डा. राधादृष्णन त्त गतना
परिणाभी नित्यत्वने नित्यत्वना मालासवाणु उडे छे.
ज्रम्म सतत्छे अने भगत निर्येक्षपऐो सत नथी तेभ छता भगत
जसतक्ते मात्र शून्य छे सेवो खर्थ पहा नथी. जा भगतनी व्यावहारिड सत्ता छ.सने ते
खेड् जाणुथी ब्रम्मनी शाश्वत सत्ता जने जीक जाणुथी मात्र ससतके शून्यथी लिन्नछे.
डॉ. राधादृष्णानत्तजे छ डे खद्वैतवाहीजो 'खेड' ने जातर 'अने नी उस्तीनो छ उडावी
छेछे सेभमानवुं जोटुं छे. सद्वैत ब्रह्मवाह तो जेसु क कआावे डे खेडने दिीय सेवुे रम्म ते भगतने व्यापेसुं पूर्ण यैतन्य छ. सने तेठ भगतनो प्रेर्ड तेभ संतर्याभी जात्मा छे. तेनो खर्थ से नथी थतो है जा कगत मिथ्या डे सविधमान छे
जसतत्ते शून्यनु अस्तित्व होछ क न शडे छाजसा तरीडे शश-शृंग; वन्ध्या-पुत्र,
शक्ष नथीजमनासंलथी ोवाभाजाे तो नी उस्ती साथेकष छ े सक
न उही शङाय डेमडे भगतनो जनुलव थाय छे.
आा संसार परस्पर विशध्ध धर्भयुक्ष छ. तेनी उत्पत्ति डेवी रीते थह? तभष शाभाटे यह ते ाशी शदातुं नथी. सत्य ने सत्ना भिश्रणना आाधारे 9 खा भगतनो नैसर्गिड़ सोड्यवडारयासी रडयो छ.(२e)
An Ideatist view of life मा डा. राधाडृष्णन भआावे छे. "No teacher of the Advaita holds that the world is
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absolutely unreal or illusory. It is real as manifestation of being; but unreal as a self-subsisisting entity." (30)
सापऐो तो नाटदशाजाना प्रेक्षडी माटेना 'पीट' शरासभा जेठेसा छीसे खने तेथी पडछा पाछण शुं यासी रहयुं छे ते भाराबुं आापशा भाटे जशक्षवत छे से गूढ सर्थातत्तमडण वस्तु छेखने तेनो पूक्यलावे स्वीडार ऊरवो रडयो ४श्वर खने
भायावी भगत वश्येनो संजध जनाहि छेज्रह्म असातीत छे, ते प्ोछड़ रीते छिड सासनी
मर्याहायुक्ष या भगतभा प्रतिबिंजित थाय छे. भगत से ब्रह्मनो जाविलाव छे. भगत प्रथंथनी खनेउताने सीधे ब्रह्मनी खेड़ता पर जसर पडती नथी, आा विश्व खेड क वस्तु ब्रहम३य छे. अरण डे मात्मा-स्वउप से सिवाय खन्य डोछ वस्तु ४ नथी. जा सभत्र कगत खनेड शुहा कुहा ३परंगवाणुं हेजाय छो; जेनुं अारए खज्ञान छे. जरी रीते तो से जघुं सभत्र भावनाउप दोष विनानु बम्म ४छ. विविधतावाणा भगतभा थता ईरझरनी ब्रह्मना सेडत्व पर अधयएा रीते जसर पडती नथी. परंतु भगत प्रथंथ डे व्यावहारिड भगत ते विषयी यै तन्यनुं परिशाम छे; सेभन उही शङाय, अारए डे मेनो खर्थ सेथाय डे ज्रह्म से सधिषठान सतक् ने भगत मालास छे डे तेनी पाछण उंछड सधिष्ठानसतक्त
पडेसुं छसे भारवानुं खापशी पासे डोछ साधन नथी. सौथी सारो उद्स से छे डे सेभ मानी सेवुं के भगत से ब्रह्मनो साविाव छे, छता तेने सीधे ज्रह्मना सेडत्व खने पूर्ण त्वभां क्षति जावती नथी. बह्म खने भगत वय्येना या प्रहारना संजंधने भारतीय विथारडी 'विव्त' तरीडे भोजजावे छे.
भगतनो ब्रम्म साथेनो संजंध अपृथत्ताात्म्यनो छे. वेहांत
शास्त्रोमां प्रम्मनेष्ठगतनुं अारण माने छे. (अ) वेधांतनो सिध्धांत सतत्तार्यवाहमा जे
सिध्धांतभां सभायेसा छे. (उ२)
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(१) खलव्यक्षिनी पडेसा अारणाभां रहेसी अर्यनी सव्यक्ष सत्ता
(२) अार्थनी डारएथी सपृथङ्स्ाव
उपर्युक्ष सिध्धांत भांथी प्रथभ सिध्धांत वडे भगतनी वास्तविड् सत्ता सिध्ध थाय छेक्यारे जीभा सिध्धातथी ब्रम्म साथे भगतना ृथत्तंं स्पष्ट थाय
छ.
सांज्य दर्शनभां अार्य-आारणनुं अनन्यत्वने मानवाभा जावे छे, जेटसे सेभनु कड प्रधान अारण यित्तनी विद्वियाथी परिणाभने पाभे छे ते अर्य ने डारए- प्रधान से जेनु जैक्ष ४. प्रधानथी बृदुं परिशाम थाय छे सेभ तेजो स्वीडारता नथी. जाटसा पूरतो क सेमनो भत वेदांत संभत छे, जेटसे के अरएमा दार्यनो सहससाव छे सेटसो स्वीडार वेहांत साथे समान छे. ज्रह्मसूत्रमां पशा कगतना
प्रत्येड अार्यने भूण डारणा ज्रह्म 'सतक्तडे 'खात्मा' नी साथे जनन्यत्ववाणु क डडेवामा
आावे छे. (33)
सतकारणवाह अनुसार अारण सत्य छेखने हार्य मिथ्या छै. या
वेहांतना डारणवाहनो खर्थ से छे डे अारण से डार्यनुं भूण खने खाश्रय छोसने अारए विना अार्य संभवतुं नथी, तेनो खर्थ से डे अारए मने अार्यनुं खपृथउत्ताहात्म्य छे,
सेडत्व नथी
शंदरायार्ये से लारपूर्वड भशावे छे डे अर्य मने डारए वस्थे
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सपृथउत्ताहत्म्य छेखने भगत खने ज्रम्म वय्ये पएा जपृथ ताहा्मय संजध छे. ०वी
रीते डारएथी शुद्दी अर्यनी सत्ता नथी तेवी रीतेष्रलमथी शुद्ी भगतनी सत्ता पए न भानी शङाय, अलव्यक्ष थया पडेसा अार्यनी सत्ता उपे कगतनी सत्ता स्वतःसिध्ध छे जने कगत तथा ब्रह्मना भेडत्वनो 'अार्यडारण वडे रहेसु छे अरण डार्य वडे नहि सेभ स्पष्ट निषेध उरेसो छे. (उ) प्रथंथ३य भगत ज्रह्मात्म छ,ज्रह्म प्रथंथात्मड्ड नथी (उप) खाथी भगतनो ब्रम्म साथे भेड़त्वनो नडि पएा जपृथत्ता ाम्नो संजध छ
श्री शंङरायार्य डार्यडारण संजधनी योकना "सव्यतिरेड" पहथी डुर छ. तेनो खर्थ "सपृथद लाव" छे. खेड़ पहार्थनी सत्ता जीभा पहार्थनी सत्ता पर जनिवार्ययणो आाधारित छे केना सावभा पूर्व प्रहार्थनी सत्ता शक्ष नथी "जनन्यत्व" शष्दनो प्रयोग डार्य- डारण लाव खने भगत तेभ ज्रह्मना संजधभा थाय छे, तेनो खर्थ अार्य मने अारए भेडत्व नहि परंतु अरएथी पृथड ार्यो मनेज्रलथी पृथ भठगतनी सत्ता नथी जेवो दरवाभा जाव छो. सेटसे डै, "जृथ ताहाम्य" सेवो दसवानो छे. शांडरवेहांत अनुसार परिशाम से अरएाथी खलन्न छ, भगत ज्रह्म ४छे तेभष्ठ नाम उपवाजु जा सर्न े ो श् मात्र छो, ेभ भाटीनो घड़ो नाभथी घडो छे यरा छे तो भाटी(3) ज्रह्मथी जसग जेवा भगतनुं अस्तित्व ४ नथी, जा गत जी नुं अांछ नहि परंतु ज्रल्म ४छे.
शांदुर वेहांतीजो ज्रह्म विषे भगतनी आंति थाय छेसेम भुआावे छे खने जा माट होरडीसर्नु उहाहरए आाये छे. छोरडीमां केवी रीते साथनी आंति थाय छे तेवी ४ रीतेज्रम विषे भठगतनी भरंति थाय छे. पहा जा दृष्टांत तर्ड संगत गशी न शकाय डेमडे खही छोरडी ने साथ जंने साडार ने समानडार छ.ए। भायावाहीजो ेजलनी वात डुरे छे ते निराहार छ.अने तेथी निराहार ब्रह्म विषे साडार भगतनो अम कुछ रीते थह शहे? जने सेटसा माटे जा उहाहरए योग्य गएी शङ्ाय
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नहिं. को जा दृष्टांत स्वीडारीसे तो पहा भायावाह साजित थतो नथी, डैभडे होरडीमा साथनी आंति थया पडेसा जापएो उड़ीउतमां साथ कोयो डोय छे सने मानसयट पर पडेसा संस्डारने डारणो होरडीमा सापणाने साथनी आंति गन्भे छे. खाभ को खा छाउरए स्वीडारवाभा जावे तो जा उहाहरए नुसार पडेसा अोडवार भगतनुं दर्शन थयेक्ष मानवुं पडे. भगतने सत्य स्वीजारीये तो आंतिनो सवास ० उठतो नथी
गतनुं डारएा सविधा मानवाभा जावे तो भगतनो सय यए। सविदामां क मानवो पडे तेथी भायावाहभा सर्वात्मभावनो प्रसंग ४ नहि जावे, ज्रल्म सत्य छे; तेथी प्रल्मज्ञानथी भगतनुं ज्ञान पहा शक्ष नथी भगत से हार्य छो खने से जसतत्ताथी डेमडे अार्यनी प्राप्ति थाय छे. वस्तु होय तो उपसन्धि थाय अर्यने असतक्त
भानवाभा जावे तो भोक्ष प्राप्ति डरवानी प्रयत्न संभवी शड नहि सहीं छसीस दुरवामा जावे डे अर्य जसतक्त, परंतु वासनाथी डार्य हेजाय छे, परंतु तेभ नथी; डेमडे वासना
भगत वगर शक्ष नथी. पहार्थ वगर वासना थती नथी, क्यारे वासना विना पहार्थनी प्राप्ति थाय छे. सन्वय व्यतिरेउथी पमा थतुं नथी; डेमडे गत पशा ब्रह्मस्व३य छे. ब्रह्मनी जनन्य खने खलन्न छे.
उ.4.9: कार्य डारएनो सिध्धांत-विवर्तवाह :-
अार्य डारएनो वियार मे तत्वज्ञानना पायानो ज्यास छे तेभ उडी शङाय. तेना विना तत्त्वभीभांसानो उधयशक्ष नथी. जा ुगु भू डर शु? तथा तेना स्वशय जंगे खनेड़ उस्पनायो सू थयेस छ.पंडित सुजसास तेभना भारतीय तत््वज्ञानभां अर्य- हारण लावनी त्ए लूभिदाजो नौधे छ (9) छडसोड (२) सोडान्तर (3) असौडिड (39) जीभा वियारओी वडे तेनु जंडन पश थतुं रहयुं छ.आाभ छड वेहना सभयथी माठ् सुधी डार्य अारए ंगे वियारणा थयेसी भोवा भणे छे.
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भगतभां थतुं निरंतर परिवर्तन के भाएासना अनुलवभा जावे छे ते साथुं के या परिवर्तननी पाछण रहेसु स्थिर तत्त्व सोथुं? खेड ४ साथे नित्य सने अनित्य साथा न होछ शङ,जने को या जंने विशोधी तत्त्वोनो स्वीडार उरवाभा आावे तो पए जंने वय्थेनो संजंध वियारो ब३री जनी काय छे. छाजसा तरीडे डोछ खेड़ जनावामा 'A' ऊ२ए छे खने तेना परिणाम ३ 'B' जने छे. या A जने Bजंने वश्येनो संजंध देवा प्रहारनो मानवो? कोया जने वश्थेनो संजंध ताहात्म्य होय तो ड जन्युं छे तेभ उडी शङाय? को जंने वय्ये लिन्नतानो संजंध होय तो तेने डार्य खने डारए नाम उुछ रीते खायी शडाय? जा उपरांत त्री शक्षता डे परिवर्तनने अंशतः ताहात्म्य उप खने संशतः लिन्न मानवाभा जावे तो पएा सभस्या उस थती नथी. जानु डारए को दे जने वय्ये ताहात्म्यनो स्वीडार डरीसे तो परिवर्तन सभभावी शङातुं नथी; खने जंने वश्थे लिन्नतानो स्वीडार उरवाभा जावे तो जंने वश्थे डोछ संजंध स्थायी न शङाय खाभ लेहालेहनो ज्यास तो वहतो व्याघात जने छे.
श्री शंद्रायार्यना भत जनुसार ताहात्मय संजंध से छड़े के क्षारेय जहसाय नहि खने तेभ छत्ा के जहसाय छे ते ताहात्म्यमा क जहसातु कशाय छे. तो शुं इ्ष नित्य होय ते जहसाय? अर्यअारणमा या विशोधालास भूजगत छे. "Causation cannot lead us from phenomenon to nounmenon as Kant has pointed out. It is a bridge as Caird says, which colleapses when we walk over it."
द्ार्य-5ारएनु जनन्यत्व जेटसे ज्रह्महारएमा क भगतहार्यनु व्यक्ष होवापणु जे रीते शक्ष थाय छै; डेमडे खेड साथे डार्य अरएानी लिन्न प्रतिती जनुलवथी विश्ध्धनी जाजत छे. अ तो अरणमा हेजातु आार्य मिथ्या होय जथवा तो ऊरए पोते हेहाता सेवा डार्यइये क वास्तविड़ रीते जहसाह कुतुं होय; तो अर्य-
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दारएनुं जनन्यत्व जनुलवाय पडेसो वाह उपनिषहक्तत स्वीअार्य छेडेभडे अार्यत्मङ
विडारोने श्रृति "वाशीना आाश्रयवाणु नाभ३य मात्र" ४ छे जेटसे डे वस्तुतारंहित उहे छ. (उc) आा ल भत श्री शंदरायार्य पश स्वदारे छे. (उ०)
जीणो अत द्वैतवाही सांज्य दर्शननो खने सद्वैती सेवा राभानुष्ठायार्थनो छे. तेभां सांज्यनी प्रघति सने रामानुकठु ेड़ ब्रर वस्तुताये दरीने अार्यात्मड भगत३ये परिणमे छोया मत युशिहीन छे. ज्रहमनु सेमा उपभर्दन थतां ब्रल्म खठर खने मर उटी ाय छे सने आवुं परिशाभ पाभेस भगत नाशवंत जनुलवीसे छीसे खने तेभ छता तेने अारए साथे सत्य अने सविनाशी भानवुं डे छे. भगत सत्य३य डोवाथी तेनुं ज्ञान अाघित थतां ज्ञानथी क भुक्षि परा भणे छे, सने ाथी न योगभतभा पएा सभ्यउज्ञान थवाथी यित्तवृत्तिजोना निरोधी उत्पन्न थाय छे खने संयभ थवाथी प्रदृतिना धर्भोनी सृष्टि शभी काय छे सेवो स्वीडार डर्यो छो ते भुभज धर्भोना य परिशाभो वास्तविड़ डीय तो शभे नहि धर्भोना जावा परिणाभो तेथी भायिड ० छ.
सतसार्यवाह अनुसार उत्पति थाय त्यारे अार्यनुं अस्तित्व डोय
छ उत्पति पडेसा तेनुं अस्तित्व नथी. भूण डारणने के परिणाभी, नित्य माने छे ते अर्थमात्रभां भूण औारणना अंशोनो वास्तविड़ पुर्वठी के सस्तित्व स्वीडारे छे,सने तेथी तेखो सत्डार्यवाही तरीडे जोजजाय छे. "डार्य उमेशा अारएानी मंहर प्रथभथी सभायेसुं होय छे."
क्ततकरनकतक्र तक तेक्रतेवक कतव कतक्क्ततकतनक
क्तत्तकतजनक त्वक्रत्तकतके क्ततकतकक्ततनक (x१)
तेवुं सत्डार्यवाही सेवा सांज्य खने वेहांत जंने निउपश डरे छे. 81
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दोछ वस्तु खसतत्ते शून्यभांथी तहक्त नवी नथी. जेटसे वस्तु "उत्पन्न थह" सेभ
अडेवाय नहि.त्कक्तक्तकक्ततक्रक्तककत्तकक्तके वस्तु तेना उपाहान अारएनी मंहर तो
अर होय छे. उछाउरए। तरीडे घड़ो भाटीभा खने भुगट सोनाभां तो रहेसो ०छ. ते तहक्त नवा उत्पन्न थता नथी. भाटी खने सोनाभा सेसे है तेना डारएभांथी क ुहा
बुछा नाभ इये प्रशट थाय छे,अने श्रारेड ते डारणमा विसीन थहने सदश्य थह हाय छे. सेटसे डे हार भुगटनो जर्थातक्तार्यनो आविा सने तिरोलाव थाय छे.
सेटसे के तेना भूण अारणभां समाह गयेस हो अार्यउपे हेजातुं नथी. वर्तमान स्थितिभां तेनी मात्र सलिव्यक्षि थाय छे. अर्य नित्य छे सने लूत, भविष्य ने वर्तमान से तेनी हुह्ी वुही सवस्थाजो छे. सांज्य खने परिणाभवादी वेहांत जा वाहने स्वीडारे छे. उडीउतभां ससतसांथी सत नथी थतुं. ससतभांथी जसतत्ताय सेभ अडेवुं मर्थडीन छे
खने सतसांथी
सतत्ताए "थाय छे" सेभ उडी शहातुं नथी. जेटसे के सतत्छ, ते
छ०छ.
क्यां द्वैत होय त्यां अार्य- डारएनो वियार जनी शह छे, पहा सद्वैतभां ते जनतो नथी (४3)
विवर्तवाह :-
सां्यदर्शन सतसार्यवाह स्वीडारे छे. तेभष्ठ खद्वैतवेहांत यए
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सतसार्यवाह स्वीडारे छे. परंतु तेनेसतर्यवाहमा लिन्नता छ. सद्ैत वेहांतना
सतसर्यवाहभां लिन्न खर्थ खने भूण अारणभां अर्योन शश्क ३ये अस्तित्व से जीठो सर्थ
दुरवाभा जावे छ. शंडरायार्यना खद्वैतवेहांतभा सतसर्यवाह छ.परंतु ते भुहा खर्थभां
छ. (४४) श्री शंदरायार्थ सतर्यवाह से प्रभाऐ रू कुरे छे के अछयएा अर्य खने तेना
उयाधान डारए वय्थे शो संजंध होय छे ते कोता खेभ भशाय छे हे हार्य से डारएाथी लिन्न वस्तु नथी. (िय) अरएथी जसग डार्य नधी ऊरवु शक्ष नथी. भाटीनु वासण भाटी सिवाय जीभुं डशु नथी. सोनाना घरेशा से सोनुं छे. मात्र तेना नाम अने ३प शुछा छ. अार्य तेना उपाहान डारएथी सविश्छेद छे. डार्य तेना वगर उस्ती घरावी शडे नहि. (४s) सोनाथी सोनाना घरेशाने वुहा दरी शङाता नथी. भाटीना वासएाने भाटीथी ुहा दूरी शङाता नथी जेटसे डार्य पडेसा अस्तित्व घरावतुं न हतुं अने नवीन उत्पन्न थयुं छ; खेभ उडेवुं जोटुं छे. डार्य उमेशा तेना उपाधान अारएमा पडेसाथी ४ रहेसु छे. सलाव पहार्थ भांथी होछ उत्पन्न थाय छे जथवा तो जसतसांथी सतक्ाने छेसेम डडी
शङाय नहि मात्र खुटसु उही शङाय डे लेवी रीते सोनाभांथी ुहा वुहा घरेणा जने छे; भाटी भांथी जसग जसग जाडारो जने छ. तेवी रीते मात्र सेटसुं उडी शङ्ाय के द्रव्यनु खेड़ इपमांथी जीभा उभा उपातर थाय छ सतांथी ो सतक्तत्पन्न थतुं डोय तो
रेतीने पीसवाथी पश तेस नीडणतुं होत. निभित्त अारण जेटसे डे प्रस्तुत उ६ारएमां कुंलार के सोनीनी ड्वियाथी पएा अोछ नवा द्रव्यनी उत्पति थती नथी. द्रव्यभा के पहेसाथी क होय छे. तेनी मात्र जन्य रीते सलव्यक्षि थती भोवा भजे छे.साभ ्रम्म सूत्र शांडर लाष्यमां डतुं छे तेभ अर्यने डारएथी अनन्य अने प्रथभथी क तेभां रहेसु मानवुं पोछ से. अार्य से डरनी सवस्था मात्र छे
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शांडुर वेहांतना भत भुक्ज डार्य से डरएाथी खलनन नथी. तेवी 9 रीते लिन्न पहा नथी. तेभ डारएथी नने लिने जंने पएा न होछ शडे, खाभ अार्यने जुभांथी खेड़ परा रीते वर्शी न शङाय मने तेथी ते अनिवयनीय छे.
ते सतत्ताथी खने असतत्ताए नथी. अनिवयनीय जेटसे हे मिथ्या छे.
शंद्रायार्यना भत भुष्ठज सतक्तार्यवाह सांख्यना सतक्तार्यवाह ०ेवो
नथी डेमडे तेनुं तो ते जंडन दुरे छे. उडीउतमा सद्वैतवाह के ब्रह्मकारणवाह छे सेभ
उडेवुं वधारे योग्य छे. श्री छासगुप्ता तेमना "A history of Indian Philosophy" Vol. भां जा जंगे भुआावे छे ह "वेहांत खने सांज्य जंनेना दार्य-5रए सिध्धांतने पएा डेटसीडवार सतसार्यवाह उडेवामा सावे छे. डेटसाड
विवेयड्ी सेभ भशावे छेडे 'वेहांतना अार्य - 3ारए' सिद्धांतने 'सत्डारएवाह' उडेवो कोहसे देमडे ते भत भुक्ज मात्र अारणा सत्य छो खने जघा डार्यो से अारएाना खालासी हे विवतो छे. न्यारे सांज्य दर्शनना भत अनुसार अार्य से डारएभां तिशोषित 9 छे खने तेथी ते नित्य सने सतक्े. " (४८)
डेटसाऊ विद्वानोना भत भुष्ज शंदरायार्यना अर्यकारण सिध्धांतने "सत्डार्यवाह" तथा "सत्डारणवाह" सेभ जंने उडी शङाय, डेमडे सत्यडार्यवाह द्वारा
तेभऐो सतत्तात्वना सस्तित्व विषेना पासा पर लार जापेत छे न्यारे "सत्वारएवाह"
द्वारा तेभऐो सतत्तात्वना भूस्यना पासा पर लार जापेस छे.परा खस्तित्व सने भूस्य
खेड्खने सविलाभ्य छे. तेवा सिध्धांतभांथी क सत्डार्यवाह इसित थाय छे. (४e)
वेहांतसारभां उडेवामा आाव्युं छे. तेभ
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अोछयणा वस्तु जरेजर जहसाहने बूछूं ३प धारण दुरे त्यारे ते भूण वस्तुनो विडार जेटसे डे परिणाम उडवाय, परंतु ते जरेजर न जहसाय त्यारे तेने विवर्त उडेवाभा जावे छे. सेटसे डे पहेसानुं ३4 छोड़ीने जीनुं उप धारण डरवु तेनु नाम परिशाम: हाजसा तरीडे छूधनुं हडी थाय ते परिशाम परंतु छीप यांही इये सथवा छोरुं साथ उपे हेजाय ते विव्त उडेवामा जावे छे. भूण वस्तु शेवी होय तेनाथी वुहा प्रडारनी देजाय ते विव्त-भूण वस्तुमां ईरइर थयेसो न होवा छता तेभां ईरझर थयेसो होवा केवुं भशावानी आंतिने विवर्त उडेवाभा जावे छे.
र- साथना उहाहरएमां संधाराने अारणो जथवा जांजनी जाभीने सीधे नमीन परनु होरहुं साथइपे हेजाय ही साथ होरडानो विवरत इडेवाभा जावे छ. पोताना भूण, शुद्ध स्वइपनो सहेव्ठ पश विडार थवा हीधा विना जेसे है सडेण पशा ईरझर डर्या विना, पोताना होरडीयशाभा सहेव पए परिवर्तन थवा हीधा विना क सर्य उप डार्य के परिणामने उत्पन्न दरवावाजी भूज वस्तु या 6इरए।मा होरडी से सर्प३पी विवर्तनु उपाहान डारण पश उडेवाय छे. अारणा डे अन्य स्व३पमा भासती वस्तु सर्पनुं खु ४ अधिष्ठान सेटसे हे साधार छे.खही सधिष्डानउय होरडी अाथठर न होय तो तेभां थतो सर्नो आालाष पह न होछ श्डैा विवर्त थवाना निभित् अारणो संधारं, खांजोनी जाभी वगेरे छे, अरण के तेना सीधे अभ उलो थाय छे. जज्ञान दूर थाय छे. जा उहाहरए परथी उडी शङ्ाय के खज्ञान के सविधाने सीधे सविडारी, सवियण ब्रम्म- परमात्मा, कव तथा गतउे यस खने विडारी लासे छ से स्थितिने विवर्त उडेवाभा जावे छे.
शंदरायार्यना तत्वज्ञान जेटसे डेशांडर वेहांत पारभार्थिड दष्टिये भगतनी उत्पतिनो स्वीडार ऊसतुं नथी. तेखो भगतने ब्रह्मनो विवर्त भाने छे. तेने मिथ्या खेटसे डे सनिर्वयनीय तरीडे भोजजावे छे. साभ सेभ उडी शङाय के पारभार्थिड दृष्टिथी कोता ते सत्डार्यवाही नडि परंतु सत्डारणवाही छे. शांडर वेहांतभा अारणनी 85
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सत्ता अर्यनी सत्ता दरता उश्य डोटिनी छे. ०ेवी रीते सोनाना घरेशाभां सहत्तवस्तु सोनुं
छे तेभ ज्रम्म से भगतनुं सतत्तात्व-तेनुं सत्त सामान्य सर्वनो समान आाधार छ.भगत
से ज्रह्मनो आविाव छे; तेभ छता तेना अरएे ब्रम्मना पूर्णत्वभा क्षति थती नथी. जरह्मे जन भगतनो जा प्रहारना संजधने विवर्त उडेवामा जावे छ. श्री शंदरायार्य भशावे छ हे सविधा थडी डस्पित सेवा नाभ-३4 से इपी व्याहृत खने ऐेने से उय पशा न उडी शङाय खने ेने सेथी वुहा पएा न उडी शङ्ाय जेवा उपलेहने सीधे बरह्म परिणाभाहि सर्व व्यवहार पाभे छे, खने पारभार्थिडउये सर्व व्यवहार्थी जतीत सपरशित रहे छे. द्ेम सविधाथी पस्थित के नाभ- ३4 लेह मात्र वालीथी श३ थयेसा छे सने तेथी ब्रह्मना निरवयवत्वने जाध जावतो नथी (4I) जाभ भगत से ज्रह्मनो विव्त परंतु भायानुं परिणाम छे.
वेहांतभा ज्रह्मने भगतनुं उपाहान खने निभित्त जंने डारए। मानवाभा जावे छे. भगतनुं सर्वन ब्रल्म द्वारा थयुं छे, तेभष्ठ ज्रह्मभांथी थयुं छे. 3छइरए तरीडे भाटीभांथी घड़ो थाय छ ते रीते घड़ी ते भाटीभांथी ईरझर थहने जन्यो छे सेभ नथी सभन्वानुं भाटीनो से खेडआलास मात्र छ (प) सेसे के मिथ्या सागतु परिणाम के विवत छेखने तेवी क रीते या भगत से ब्रह्मनो विव्त छे. ज्रह्ममा तेना अार्य तरीडे लासे छे; जरेजर ते छे ण नहि, (43)
सविडारी ब्रह्मनुं उपांतर नथी थतुं ते पोते क निर्विडार रहीने भगतउये हेजाय छे. या दर्शनभा ब्रह्मनुं सभग्र दर्शन थतुं नथी. तेना पर विविध विडारोइपी पडछो डोवाथी ते जघूरं हेजाय छे. या भत ते शंङरायार्यना निव्तवाहन नाभथी जोजजाय छ. परिषाभवाहने logical औरवाथी विवर्तवाह स्वयं उपसी आावे छ. तेथी सेभ उडेवुं यथार्थ रहेशे डे विवर्तवाहनी पूर्वलूभिक्ा परिशाभवाह छे. निर्विडार ब्रह्ममा परिणाम उछ रीते जावे? सने तेथी परिणाम मिथ्या छे. परिणाभने मिथ्या
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सभष्ठवाथी प्रह्मना निर्विदारत्वने जाध जावतो नथी. संक्षेप शारिशडभा सर्वज्ञात्मभुनि भशावे छे तेभ "परिणाभवाह स्थापित थयो सेसे सेभाथी विवर्तवाह स्वयं नीडजी आावे छे."
उपर्युक्ष सभग्र विवेयन भोतां सेभ उडी शङ्ाय के श्री शंदरायार्य पारभार्थिक दृष्टिसे विवर्तवाह तेभष्ठ व्यावहारिड रीते परिणाभवाहनो स्वीडार डरेछे, जने खाथी क तेभएो योगायार ने माध्यभिड् जौध्घोना विज्ञानवाह तेभ शून्यवा साभे सत्डार्यवाह खने सत्वारणवाह जंनेनुं सभर्थन डर्यु छे. (प५)
उ.4.२: ४गतनी सनिर्वयनीयता :-
खद्वैत वेहांतयोना भत अनुसार थ्या अभ थाय छे त्यां तेटसा पूरती ते वस्तु अस्तित्व घरावे छे. हाहरए। तरीडे छोरडीने भग्याये साथनो मालास थाय छे त्यारे त्यां सर्थ मिथ्या स्वउपभा अस्तित्व घराे छे,सने ो े ही तो जापशाने साथनी अभ उत्पन्न क न थाय पश ते साथनुं स्वश जोजजी शज्ाय तेवुं न होवाथी तो साथने "अनिर्वयनीय" उडीसे छीसे,ने ते होरी विषेना अज्ञानभांथी उत्पन्न थाय छे. "जा छोरी छ" सेवुं ज्ञान थाय त्यारे ते सज्ञान नष्ट थह ाय छे. वस्तु हेजाय छे खने तेथी या वाहने अनिरवयनीय ज्यातिवाह तरीडे जोजजवाभा आावे छ.
देवसाद्वैती भाया डे सविदा सनिर्वयनीय छे तेवुं भशावे छे त्यारे अनिर्वयनीयनो अर्थ ेनुं वर्शन थ शहे नह क ने सभावी शङाय नहि तेवो दरता
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नथी. शांडर वेदांती भशावे छे तेभ अध्यस्त पहार्थ मात्र सतक्ताथी. तेवी रीते मात्र
अ-सतत्तए नथी, तेवी रीते रोड से सतक्त सत्ा नथी, ने हशः सतक्त
खने जसतत्तए नथी. छाजसा तरीडे भृगनठ्णनी प्रतीति प्रत्यक्ष भण शेवी सत्य नथी
डेमडे जा वणथी तरस छीयावती नथी तेवी रीते वंध्या पुत्रनी भेम मात्र जसतक्त
नथी. डेमडे जापशने तेनो लावात्मड जनुलव थाय छे. खेड़ क्षऐों ते सतक्त असतत्ता
होछ शडे. डेमडे जे परस्पर विरोधी गुणो भेडक छेश-अणभां साथे न रही शडे तेवी ०४ रीते खेड़वार सत्य होयने पछी ससत्य थह ाय सेवो थएा पहार्थ नथी. डैभडे सतक्त
होय ते स-सतक्ता थाय सने ससतक्ोय ते उही सतक्ता थह शडे.परंतु जा जया वर्शन
दुरवाना प्रदारोथी वुछा प्रदारनी ते प्रतीति छेखने या प्रडारना खद्वैत वेहांतभा अनिर्वयनीय ज्याति सेवु नाभ सायवाभा जावे छे.
शांडुर वेहांतना मत भुक्ज भगतना संह्लभां परा कगत सतको है
जसतत्ते नधरी थह शउतु नथी. भगत को सतत्तोय तो तेनी "जाध" न थाय सेटसे तेभा
ईरइर न थाय ते को जसतत्तोय तो जिसडुस हेजाय क नहि क वस्तु छन्द्रियोथी
नुलवाय छे ते नथी सेभ उछ रीते उडेवाय? ते पारभार्थिड नहि पए व्यावहारिङ् सत्य छे. श्री शंद्रायार्य १शावे छे तेभ भगत सतत्तमने ससतक्तुंभिश्रण छ. सत्य मने ससत्य
जा जनेना मिश्रणने जाधारे क जानगना व्यवहार याते छे
खा संसार खेड़ प्रदारनो अभ क छ खने या अभ थयानुं जइं हारए जज्ञानने डारए आावरए जने विक्षेप थाय छे.प्रहमनु शुध्ध स्व३प ढंडाई काय छे खने भगतनी प्रतीति थाय छे. खही सवास से थाय डे वास्तविड् भगत जा पहेसा उदापि प्रत्यक्ष ण न थयुं होय तो पछी वर्तमान भगतनी प्रतीति उछ रीते थाय? सद्वैत 88
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वेछांतीजो जा प्रश्ननो उत्तर जायता भशावे छे डे सृष्टिनो प्रवाह मनाहि छे, सने या संसारनी पडेसां अनेऊ सृष्टियो हती. तेना संस्डारो जीए ३े कवोभां रही काय छे. श्री शंडरायार्य "अध्यासनो अर्थ पूर्वे थयेसा जनुलवनो त्यारपछी थता आाधारभा जवलासित थवुं ते" तेवो कुरे छे. तेजोना अत भुष्ज खापएी खज्ञानने सीधे पूर्वनन्भोभां अनुलवेस शुहा शुछा विषयो शुध्ध सत्ता डे ब्रह्ममां आारोपित डरीसे छीसे भोवा मणे छे.
उ.6: ज्रम्म- सवर्णानीय सता :-
श्री शंद्रायार्यना भत अनुसार परभ सततत्व ेसे डेब्रल खेड़
खने सदवितीय One Without the Second छ. शंडराथार्य भेड़ तत्ववाही छे. खने खाथी तेभना भत जनुसार खेड़ परभतत्वनो स्वीडार डुरे छे,नेापरभतत्वने
ज्रह्म नाम जापवाभा आावेस छे.त्तकक्ततकक्त कक्तकतवा जछुं ज्रह्म १ छो. खा
पूर्ण ज्रह्म खद्वितीय छे. श्री शंदरायार्य ब्रह्मनुं निदपण ऊरवा श्रृति वयनो अने तर्डशास्त्रनो आाश्रय से छे. नित्य अने निर्विकार जेवा ज्रम्म तत्वने भयतनी परिभाषमा वएववानो प्रयत्न भिथ्या साजित थाय छे. तेभ छता श्री शंदरयार्य माने छेडेसपरोक्ष जनुलव हे साक्षत्वारथी भगतना जाहि अरणउय ब्रम्मनो साक्षत्डार जेसे डेज्रलनुं हर्शन थह शहछे.
आा ज्रम्म तत्त्वनुं वर्शन डरवुं ते भगतनी भाषाभां मिथ्या प्रयत्न छे, सेटसे डे सेभ उडी शङाय है जा ज्रम्म से सवर्नीय छो.ा वाु सभर्थन दरता डा. राधादृष्णन्त आावे छे डे "परज्रह्मनु वर्शन ऊरवा भाटे वियारनी डोछ परा डोटी
नडाभी नीवडे छे. वियार डे वाशीथी तेनुं यथार्थ वर्णन डे साउसन थह शहतुं क नथी. से सतत्ततत्वना खपार जयरिभित वैलवनो ताथा अढवानी सायशी परिभिति जुदिमां
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ताङात नथी. श्री तुससीहासना शब्होमा जा क वातने उडीये तो
ततकतशतकतकक्ेतमक्कतक्रक त्तकतक्न्क5)
तंतरीय उपनिषहमा उडेवाभां आाव्युं छे.
तेभ छतां ब्रम्म तत्वनुं उदारात्मद खने नदारात्मऊ वर्शन दरवाभा आावेस
उ.द.9: ज्रह्मनुं हड्ाशात्मङ वर्णन :-
श्री शंदरायार्य सहकस्तुने यिहकपय मानंह३प, ज्ञान३प भने
जनंत तरीडे जोजजवे छे. प्रहमना जा सक्षणो जायवाभा आावेस छे.० गुण डे धर्भ (Attribute) पोताना सक्ष्य सिवाय जी०े रहे नहि तेवो गुण तेने जसाधारण धर्भ उले छे. वस्तुनी अाति सने तेनो साधारण धर्भ भणी तेनुं सक्षए (Definition) जंधाय छे. ब्रह्मनुं जावुं कोछ सक्षए खायी शङाय डे नहि ते भोवुं ब३री जनी काय छे. वेहांत परिलाषाभां सक्षणाना जे प्रडारो पाडवाभा जाव्या छे.
(u८)
क्त (१) स्व३प सक्षण
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(२) तटस्थ सक्षएा
क सक्षराने पहार्थथी छूर दरवामा जावता भूज पहार्थ क रहेतो नथी तेने स्वशय सक्षण उडेवामा जावे छे.हाजसा तरीडे सर्यहा नह ज्रम्म, सत्य, ज्ञान, खनंत ज्रल्म वगेरे
संतरेय उपनिषहमां पएा ब्रह्मनुं सक्षणा जापता उडेवामा आाव्युं छे डे क्तकत्तकतकक्तर्क्तं छांदोग्य उपनिषछ शांडर भाव्यभा पएत्तक
क्तत्तक्रक्ततककततक्कत्त री डे सक्षएा सायवाभा जावेस छे (9)
के सक्षएा स्थायी नथी पएा जहसाया ऊरतु होय छे तेने तटस्थ सक्षएा उडेवामा जावे छे. उहाहरए। तरीडे ऐेभाथी भगतनी उत्पति, स्थिति खने सय थाय छे. ते.
भगत उर्तृत्व से ब्रह्मनो औौपाघिड गुण छे, स्वशगुण नथी.
शाश्वत, आानंह, ज्ञान, सत्ता से ब्रह्मनु स्वदप छे. तैत्तरीय उपनिषहमां पमा ज्रह्मने सत्य, ज्ञान अने अनंत तरीडे वर्शववार्भा आावेस छे. 'सत्य' शण्ह सेभ सूयवे छे ते तत्त्वनो आापशनेजपरोक्ष अनुलव थतो डोवाथी तेनी हस्ती निश्यित खने निःसंदेह छ, 'ज्ञान' शष् सूथवे छ डे तत्त्व यैतन्य३प छे, तेभष्ठ अनंत शण्ह सूयवे छ डे तत्व सर्वग्राही खने खपरिभित छो.साभ सत्य,ज्ञान वगेरे ब्रह्मना विशेषणो नथी. परंतु स्व३प सक्षणोछ.डेवसाद्वैता 'ज्ञान' से ब्रम्मनु सारलूत तत्व छे
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जने जञाता, ज्ेय हे सेवो अोछ लेह शंदरायार्थना भत जनुसार ब्रह्ममा भोवा भजतो नथी (3) ब्रह्मना स्वपने वर्णववानी या रीत मानव जुद्धिने ्रम्मनी विशेषता सने सर्वात्मता समभाववा भाटेछे, वस्तुतः ब्रह्म सवएय छे. () वर्शन उरनार स्वयं ज्रम्म छ, केवी रीते खांज जबुं भोछ शडे छे परंतु पोताने भोछ शहती नथी, तेभ कव पए स्व -स्वइप खेवा जेवा ज्रहमने कोछ के वर्शी शङतो नथी. प्रा. डिरियाएणा भशावे छे डे "खद्वैत संभत परभ सतक्ते ब्रह्म मात्र अनिर्वयनीय ४ नथी, ते अज्ञेय पर छे,डेमडे
क्षऐी तेने ज्ञाननो विषय जनाववाभा जावे ते क्षऐो ते "जञाता" साथे संजंध थह भवाथी खगुर जनी काय छे.
डोयसनना मत भुकज
खा उपशांत केने जाहि डे खंत नथी सेवो नित्यनो खर्थ दुरी न शङाय, डेमड़े को ते खानुलविड् खाहि खने खंत होय तो खने ब्रह्मना संजंधभा ते साथुं दुरे तो ते खनित्य जनी छाय को यथार्थ जाहि सने यथार्थ अंत सेवो खर्थ डुरवामां जावे तो कगत पएा नित्य जनी भाय, डेभडे भगतने साया खर्थभां जाहि डे संत नथी खेभ खद्वैती भाने छे. नित्यत्व से ब्रम्मनुं स्वशप छे से उंडेवाभा जावे तो ज्रम्म साथे ताहात्म्य उप जनी नता "ब्रम्म नित्य छ."सेबुं विधान जिन ४३री गणाशे, नित्यत्वने को ब्रह्मनु सक्षणा मानवाभा जावे तो ज्रम्म स्वशपनी दृष्टिथी वर्णनीय डे व्याज्येय जनी नशे. साभ निर्गुण ज्रह्मने नित्य डडी शङाय.
उ.5.2: ज्रम्म नेति नति खने नङारात्मड वर्णन :-
ब्रह्म तत्वनी पडेसा के पछी ऊशु नथी. ज्रह्म तत्व सनंत छे, पूर्ण छ. आा ज्रह्म तत्वने खद्वितीय तरीडे जोजावाभा आावेस छे. तेने अोछ संज्या के नाभ, ३4 नथी ज्रलमनुं स्वशय छोछ जौधिड जीजाभा ढाणी न शङाय (4)ने तेथी
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उपनिषछमा ब्रम्म तत्त्वने 'नेति' 'नेति' शण्द वडे वर्शन परवाभा आावेस छे. (59) त्यां सुधी आांज पडोयी शङती नथी, त्यां भन पश पडाथी शहतुं नथी. ज्रल्मनुं स्वप आावुं छे' सेभ दर्शावी शङ्ाय तेवुं नथी. मानव जुध्धि वडे जरह्मने भाशी शङाय तेभ नथी है जन्य पासेथी पहा काशी शङ्ाय तेभ नथी. परंतु जा ज्रह्म तत्वने श्रृति सने पहेसाना खायार्योना जनुलव उथन वडे क भाशी शहाय छे.
जा ज्रह्म तत्व शून्य नथी. ज्रम्मः खात्मा केवा शब्हो खद्वैत ३पी सारनो निर्देश डरे छे. प्रम्माहिडक्ताणनी भर्याहाथी पर छे. प्रह्मतत्वने डार्य-डारणनो
नियम सागु पडतो नथी. जुध्धिथी उरेस उस्पनायो तेने स्पर्शी शहती नथी. परंतु मेटसा भाटे से जसतक्छ के खेनी उस्ती ४ नथी सेभ मानवुं से लूस छ.ब्रह्म सवर्शनीय छे
जेनो खर्थ से नथी डे ज्रम्म स्वयं छे० नहि जेटसे है ते खेड़ त्त्वडीन, रिक्षता के शून्य छ. ज्रम्म परिपूर्ण छे, सतत्छ, परभतत्व छे. परष्रह्मनुं वर्शन डरवा भाटे विथारनी
दोछयण डोटि नडाभी जने छ. वियारथी जने वालीथी ब्रह्मनुं खाडसन थह शहतुं नथी.
परभज्रम्म सव्यय अने सविडारी, स्वयंू अने स्वतंत्र सतक्े.ेसतततात्वना सार
अयरिभित वैलवनो ताथ भेणववानी शक्रि सायशी परिमित जुध्धिमा नथी (59) वियार्थी पर जेवी जा लूभिद्ा पर पहोयता ध्याननी सांजी ाऐो हे जायभी ाय छे जने जुध्घिनी यासएगाड़ी यासी शऊती नथी. सेवा से दिव्य भूभिद्ा पर थरयेसा सनंत जनुयम जने स्व-संवेध नुवनुं स्पष्ट श्होभां वर्शन डरवु े डर्य,श्ज्रनो ताग डाढेस परिपक्ष प्रज्ञावाणा पंडितो खने डविजोनी वाशीने भाटे परा डेवण मशक छ. (८)
'नति' शण्छ द्वारा सेभ सूयवाय छ डे ज्रह्म सवर्शनीय छे. जौध्धोनु ० शून्य छे तेणठ भायावाही जोनु जरल्म छे जावा भध्वना भंतव्यने शंदशयार्य टेडी आाये छे. तेखो शावे छे डे "सायायर्थभां सत्यंत निरपेक्ष तत्व डोवाथी ब्रलम' मजुधघन 93
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शून्य होुं तेवुं लासे छे. () ज्रम्म सिवाय अन्य वस्तुनो निषेध पसवाथी ब्रम्म शून्य ेवुं थतुं नथी. ते तो सत्यनुं पश सत्य छे.ज्रम्म ज्ञानभां केनो निषेध थाय छे ते डोछ साथी वस्तु नथी, मात्र उस्पितनो निषेध दरवान छे. (90)
ब्रह्म ससतस्ताथी, ते मात्र डोरी उुस्पना नथी, डेमडे डोछ अास्यनिड
वस्तु भाटे पएा तेनी उस्पना डरवा माटे डशोड़ आाधार तो भोहसे क जघा विद्वानो सीधी डे खाडउतरी रीते क्यारे सतक्तात्वनो निर्देश रे छेसने तेभ निर्देश डरवाभा क्यारे
निषेधात्मड विधानोनो उपयोग दुरे छे त्यारे तेभना या निषेधभा पश विधिनु सूयन सभायेसुं डोय छ. संक्षेप शारीरडमा भशाव्युं छेडे निषेध से विघिनी मात्र पूर्वलूभिङ्ा ४ छ. डशुंक नथी, जेटसे के पशुउ छ निषेधात्मड वर्शननो हेतु परजरल्मनी लावात्मड़ सत्ता सेटसे के उस्ती हरी सेवानो नथी, सेटसे डे ब्रह्मनी सत्ता नडारवानो नथी, यश सीभित जुध्धिन ब्रह्म डेवुं परात्यर सागे छे ते छर्शाववानो छे. या ब्रह्मना जे स्व३ छे: खेड़ खाडार खने जीबु निराडार, व्यायडु जने जव्यापऊ, खेड़नरी जांजे हेजाय छोसने जीभुं तेनी पार छे, ते नरी जांजे हेजातुं नथी 'नति', 'नति' उडेवाभा जावे छे तेन खर्थ से छ डे अार्य- प्रथथ ब्रह्म नथी, अरण पणा ज्रम्म नथी सेड़ ज्रह्ममा डार्य - अारएलाव थतो नथी, जने तेथी ४ वाशीने भाजवी नहि, वक्षाने भारावो,भरानारने भरवो ४३री छ. छष्टाने भोवो क्तक्तकक्तकककत्तकत्तनमजाथऐो मात्र शब्होथी, वाशीना
विश्लेषणथी डे ते विषे वियार ऊरवानी आापएी दृष्टिथी परभतत्व सुधी पहोंथी शहता नथी. जा जघाथी सेटसु उही शङाय हैते छ ने ते परा शष्होना आाधारथी नहि परंतु खनुलूतिने आाधारे उडी शडाय शष्टो से तो इक्ष अनुलूतिनुं वर्शन डरवा माटेना साधन छे, के सलव्यक्ष ऊरवा सहायलूत थाय छे. श्रृतिमां उंडेवाभां खाव्युं छेडे " कारो छे डै में जलमने काऐस छे, तेऐ ज्रह्मने भाएयुं नथी" (91) तेनो खर्थ से डे ज्रम्म मात्र सवर्णनीय ४ नथी, परंतु मज्ोय पाा छे. ब्रह्म सज्ञेय छे सेवा उथन परथी 'नेति'
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'नति' सिध्धांतने सज्ञेयवाहनुं जिउह न खायी शङाय, डेमडेर सतत् निउयश भाटे
तड शक्ष नथी जने जुध्धि सीभित डोवाथी ब्रहमनुं खाडसन ऊरवा माटे जुध्धि सपर्याप्त जने छ सेटसुं क मात्र ते द्वारा सूयन थाय छे. (०२)
ब्रह्मनी व्याज्या जाथवी भुश्देस छ. तेथी तेने सव्याज्येय उडेवामा जावे छे. ब्रह्मनी परिलाषा जापवाभा जनेड भुश्देसीजो उली थाय छे० जघी वस्तुओोनुं सारलूत तत्व हीय तेने वर्शवी शद्ातुं नथी. आायार्यश्री भणावे छे तेभ ज्रम्म खेड़ नथी त्यां जे देवी रीते होय? ते ड्ेवण नथी तेभष ंडेवण पएा नथी, शून्य नथी तेभष्ठ खशून्य पएा नथी, आरण ड जेनामा खेड - जे,शून्य - खशून्य, देव - सडेवज सेबु द्वैत नथी. भन अांछ वियारी शडे तेवुं ब्रह्ममां डशु ४ नथी.
साम ज्रह्मने खेड खने खद्वितीय सेवुं सरियहा नंह स्वउप तरीडे जोजजावे छ. श्री शंदरयार्य भशावे छे डे हेशडासातीत, लेहशून्य ज्रह्म मंछजुद्धि पुद्षोने 'असतकतेवुं सागे छे, परंतु ज्रल्मसाक्षत्डार थयेसाने तेभा सर्व अांछ उपसष्ध
छ. 'नति', 'नति' से पहोनो शंदशायार्य जेवो खर्थ दुरे छ है उश्वरनो अोधपण गुण नथी, भ्यारेश्री रामानुष् सेवो खर् कुरे छे. परा 'नेति', 'नति' से कोमात्र निषेध रीते ० सिध्ध होय तो द्वैतापति थाय; डेमडे खेड़ सगुण जने जीभु सगुए नहि ते जेसे है निर्गुश सेभ जे थाय. तेथी श्रृतिभां अायभ क्तक्तकतकत्तकतककत्तेवा भडावाश्रोथी
ब्रह्मने लावस्वउप ४ निउधवाभा जावे छे. निर्गुश सेठ सगुश बल्म छेसेम इंेवामा जावे छे. साभ से स्पष्ट रीते उडी शङाय डे व्यवसायात्मड ज्ञानने शक्र जनाववा जुद्धिसे उपभवेसा द्रव्य, गुण, धर्म वगेरे categories थी ब्रह्मनुं वर्शन शक्ष नथी. खाथी सद्वैतीजो 'त' 'त ने गौए स्थान ाये छने तत्वभ ऐेवा महावाक्ने भहत्व साये छे. या रीते त्तकक्तकतकतननकक्ततकत्तक गेरे पहोनी सने वगेरे साथे पूर्श
संगति छशविस छे सेटसुं क नहि परा खेड़जीभा विन्ा द्वैतापत्ति उत्पन्न डरे छे ते 95
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मानेसछ. (७3)
3.9: भाया शब्हना लिन्न लिन्न सर्थो :-
०ेवी रीते उपनिषहमा लिन्न लिन्न भग्यासे भाया विषेना ज्यासो कोवा मणे छे. तेवी रीत माया श्हना जर्था पहा जसग ससग रीते थयेसा कोछ शजाय छे. हध्यमा शुछा प्रदारनो लाव राजीने जहारथी शुछा प्रदारथी व्यवहार दुरवो सेवा डपटना खर्थभां 'भाया' शष्होनो प्रयोग परवामा सावे छो. रस् खने तभसूथी नहि हजायेसी शुद्ध सत्त्वगुण प्रधान (प्रदृति) ने भाया उरेवाभा जावे छो. ०ेनुं निउयणा डुरवुं खशकय छे. तेभ छता के स्पष्ट रीते लासमान छो ते आाया. पोताना आाश्रय३य जरहने ढांडे छे ते भाया. धरनी यार हीवासो व्ये रहेसी संधडार ेम पोताने जाश्रय जापनार घरने ढांडे छे; तेभ पोताने आाश्रय सायनार जहमने भावरण उरे छ; खेटसे के काशवा हेता नथी परंतु तेनी उग्याये पोताने क जतावे छे ते भाया. (७४) अम उत्पन्न उरवावाजी के शकिति छे तेने पएा भाया उडेवाभा सावे छे.
देवी उपनिषहमा उडेवाभा माध्युं छे ते भुक्ज ४ संडटभांथी जयावे छ तेने हुर्गा उडेवाभा आावे
आा शक्ति विना पांछडुं परा इरडी शडतु नथी
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जहमा, विषणु तथा शिवना स्वशपमा भोवा भजती सर्णन, पासन तथा संहारनी के शकति छेते क जा 'शकति' छे. तेने "भूण प्रदृति" पश डही छे. केवी रीते तसभा तेस रखुं छ. तेवी रीते छश्वरनी या शक्ति जेटसे के माया छश्वरभां अंतर्निडित छ. या भाया शक्ति, नित्य, आाहि तथा सनातन छे. भाया जेटसे के सत् नथी ते. ते सविधमाननुं नाभ छ. भायानी व्याज्या सर्वसारोपनिषहमा जा प्रभाऐ सायवामां जावेस छे. "के जनाहि छे, क निर्गुण छे, भेनुं जंडन खने भंडन जंने दुरी शजाय छे, के सत्य पएा नथी तेभष्ठ असत्य पश नथी, सत्यासत्य पण नथी; पोते सविडारी होवाने सीधे विडारना हेतुनुं निशणा ऊरती वजते सविधमान डोय छो सने डेतनुं निशपणा दरवानुं न होय त्यारे के विधमान होय या प्रभाऐ केनुं वर्शन दुरी न शङाय ते 'भाया' उडेवाय छे." ()
"भाया" शब्हनो सन्वय डरवाभा जावे तो "म" खने "या" सा जे खक्षरनो जनेस छे. "भा" नो खर्थ 'नहि ने 'या नो खर्थ "ते"परवाभा जावे छे. खेटसेडे "के नथीते" ेवो थाय े नथी तेभ छता हार्य दुरे छे.खही "भाया" नु सनिर्वयनीय स्वय ोवा भणे छे. पोताना आधारनी नित्यताथी भाया सविदामान छे सेटसे के मायाना आाधारतत्वना परिवर्तननुं अरण निश्थित थयेस छे, पशा भायानुं उपाधान अरण नऊ्डी थता भायानुं सस्तित्व रहेतु नथी. दश्यमान भगतनुं स्व३प छश्वर्भांथी के तत्व द्वारा उददलवे छे तेने "भाया" उडेवामा जावे छे.
"भाया" श्हना जर्थनी स्पष्टता दरता डॉ. राघादृष्णन उडे छ है कवात्मा खने भगतनी दश्य नाभशयात्मात्तानो वायड शब्ह "भाया" छे. माया जेटसे विश्वनी क्ष्मणलंगुरता, दश्य भगत खने तेभांना कवो मालासमात्र छे सेवो भायानो खर्थ नथी, अरण डे सृष्टिनी सभत्र गति खने आाधार परमात्मा, वस्तु मात्रथी पर होवा छतां वस्तु मात्रभा जोतप्रोत रहेसा छे.
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"भाया" शब्छ खेड़ खन्य खर्थभां पए प्रयोवाभा जावेस छे. जायणुं छन्द्रिय गभ्य व्यक्तित्व से्ठ जायशुं साथुं स्वप छे सेभ मानवुं जने आाशी ाध्यात्मिङ् यिह् उपता मने तेनी परिपूर्ण प्रज्ञा तेभष्ठ निश्थतताथी विभुष थवुं सेवुं के कवनुं वसश भेवा मजे छे, तेने पश भाया तरीडे जोजववाभा जावे छै.श्री कृष्णस्वाभी जैयर भआावे छे तेभ भायाना सिध्धांतनी भेड़ विशेष प्रारनी जासियत दृष्टि जहार रहेवी भेहसे नहि खेडभाथी खनेऊनी उस्ती देवी रीते उद्दलवे छ तेनु स्पष्टीडरण ऊरवानी खशक्तिनो निशाड वियार तो तत्वज्ञाननी जयी क शाजाजोमा स्वीडारवामा जावेस छे.सने तेथी क सेभ उडी शङाय के "भाया" से इसत स्पष्टीडरए दरवानी खशक्तिनी सूयड नथी पण प्रश्ननु गुढ स्वशप व्यकत दुरे छे. या उपरांत खा गुप्त वात भडेर दरवा भाटे डोछ लूतने उजर जहार साववानी १३२ नथी, (७८)
उपर भुकज जारीते माया शब्हना लिन्न लिन्न सर्थो भेया जाह खा भायानुं स्वउय डेवु होछ ? से प्रश्न सले वे उददलवे, जाभ भायानुं स्वउप भशवुं खत्यंत सावश्यड होछ प्रस्तुत भुदाभां भायाना स्व३प जंगे भसे
3.८: भायानुं स्व३प :-
भाया शष्हना विलन्न खर्थो भया जाह मायाना स्वउप संगे संक्षिप्त वियारणा डुरीशु केना वडे अभ उत्पन्न थाय ते सिध्धांत ते भाया. भाया भाएासोभां रहेसी छ. भाया से कवात्माओोनो येतन धर्भ छे, तेभनी प्रदृतिमां ४रहेसी छ. ते खेड़ प्रदारनुं जनाहि सेवुं खज्ञान छे. भाया जनाहि ने लावउय छो.पर ब्रह्मनी केभ भाया से मनाि नं त शाश्वत थी. अरए है ज्ञानथी तेनु निरसन दरी शङाय छ. या वातुं सभर्थन गोपाणागीताभा थतुं भेवा भणे छे.
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"नन्यां सगी ज्ञानयक्ष नव उघडे, त्यां सगी सजज से भाया;
ज्ञाने दरीने ज्ञानवंतने, लासे भृगकण छाया."(७e)
भाया जनाहि छ; पएा अनंत नथी. ब्रम्मनो साक्षात्डार थता ते हूर थह भय छे. माया से ब्रह्मनी जीव शक्तिउय छ. ते सविधा स्वउप छे. 'अव्यकत शब्हथी तेनुं वर्शन थाय छे. भायानो जाश्रय इ्वर छे. से भायाभय छे. ते भाया सुषुप्ति केवी छे; सने पोताना जरां स्वउपना ज्ञान रहित सेवा संसारी कवो तो ते भायाभां रभभाए रहे छे. (6) सव्यकत से माया छै.अरण कै तेनु सत् के खसत् खेभ जेभांथी खेड़ पश रीते निउणा थह शहतु नथी. भाया से ईसत नथी परंतु तेनाथी उं्छड विशेष पएा छे. या वातने स्पष्ट उरवा भाटे जायार्यश्री कणावे छे. भाया से 'त' "Itself" पएा नथी; तेवी रीते भाया 'अ-तत्' "Non- Itself" ५एा नथी जथवा तो जन्य रीते उडीसे तो भाया तत् पहा छो जने स-तत् पहा छै. भाया से मात्र 'वाह' नथी; परंतु वास्तविड उडीउत छे. तेनो स्वीडार डर्या विना यासी शडै तेभ नथी. दारए डे खापएे भायाना क राश्यमा रहीसे छीसे विविधता, द्वैत, दन्द, नानात्व, साथेक्षता जा जघुं कु माया छो .. जी.मेस डोस्डेन भशावे छे तेम "जा लौतिड ४गत ते जेना परता उडे रडेसा सत्य पहार्थोनो आालास है विवत छे. से सत् पहार्थ हनु जायणा यर्भयक्षुने जगोयर छ अने वैज्ञानिड़ श्रध्धाउय यक्षुथी तेनु मात्र जांजु खने आाछु-पातणुं हर्शन थह शडे तेम छे" ("9)
भायानुं स्व३प सभवुं े्ू ठन छ.भायाना स्व्प विषे खेड़ सवास से पए थाय छे- भायानुं स्वशप सत् छे? डे जसत् ? भाया सत् पश नथी जने जसत् पएा नथी. भगतभा खनेडता तो हेजाय छ. तेथी सेभ उंडेवु पडे के माया ख-सत् नथी. तेभ छता खद्वैतना ज्ञानथी भायानो जाध पएा थाय छे. तेथी भायाने सत्पए न उडी शङाय. तेवी क रीते भाया सत् अने जसत् जंने पश न गशी शङाय
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5ारए डे सत् खने जसत् जंने गणीसे तो वहतोव्याघात थयो गएाय. तेथी भायाने अनिर्वयनीय गएवाभा जावे छे. साहित्य पुराणमां डबुं छे :
तेकतकेतवशकतेhकेवशत केतवशकतकत्तकक्ततकक्रकत्तनक
क्त क्त क्त क्त क्तक्तकक्त्कतकतककतकत क्रितकक्ततक्रक्ततककतवननक (4२)
भाया विषेनी अधयए पूछ्परछ तेनु ज्ञान भेजववा भाटे नथी. परंतु भायाथी पर थवा माटेनी छे. तेनाथी पर थथा पछी डोछ सभस्या उदेसवानी रहेती नथी. भायानो निर्एय न थह शडे से भायानुं दूषण नथी परंतु भूषए मानवाभा आावे छे. शैव सद्वैतीयो भायाने सतत्तवाा नहि त सत्ता नहि ा सर्थभा नहि
मानता इक्ष सतत्तमाने छे. तेजोना मानवा प्रभाऐ भायाभा जसत ंश नी ए।
भाया से प्रदृति छ भाया या लौतिड गतना भूण अरएाइप छ सने शिवे रयेस सृष्टिना निम्न प्रदाशना स्वइपनी छे. पांयरात्र सिध्धांतभा पश भायानुं स्थान शैव सद्वैतीयजोना कणाव्या भुक्जु ा न तहा े डे पायरात्रा भत जनुसार भूण स्वइपथी सेसे डे तत्वतः भायानुं विष्णु साथे पूर्णऐ ताहा्म नथी भ्यारे शैव सिध्धांत अनुसार भाया शिव साथे ताहात्मय संजंध छे.
भाया विषे उडीये तो माया से लावयहार्थ छो डे इक्ष सलाव पहार्थ से जाजतनी विद्वानोभां धी यर्या थाय छे. (<3) सद्वैतीजो भायाने लावप - positive गणे छे. खही स्पष्ट डरवुं ४३ी छेडे लावनो अर्थ सतistent े
नहि. भाया खने ब्रह्म जंने लाव३प छे, पहा तझ्ञावत से छडे ब्रम्मलाव तेभ सतकूप छे.
खने भाया डे सविधा लाव३प छ; परंतु सतकूप नथी. आाभ भायानुं तार्डिड द्रष्टिये
भोता खलावात्मड पासु छेअभुऊ वस्तु भायाभय छे तेभ उडेवु जेनो र्थ से डे ते
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स्वविरोधी छे सेटसे हे तेभां क्तक्तकतकतकत्तकतर हेसो छे. या कगत पएा भाया३५ छ.
तेभ जापएो जा सर्थभां क समवानु छे ड़े :
"लेभ डायनु मंहिर श्शयुं
पएा कव थह भान्युं साथ ।. (८४)
सांप्रहायिड द्रष्टिखेथी, आायारोथी, शास्त्रज्ञानथी, पाडित्यथी, वाह विवाहथी, दर्भडांडथी, यज्ञयागथी भाया तरी नवाय खने परमात्मानो अपरोक्ष अनुलव थाय तेभ मानवुं से लूस छै.या जधाभा तो सविधा क ोतानी रभत रभी नाय छे. सापऐो रभीये छीसे ते जाए तो तेना हाथमा छे. सापशु ज्ञान से डांछ कवने वणगेसो डोछ छूटो पहार्थ नथी है तेने उयडीने इंडी हछसे सेटसे निशंत, भाया नवरी जैसे तेवी नथी. अज्ञान सने भाया गतिशीस सने डियाशीस छे. वस्तुनी साथे रही वस्तुनो विपर्यास दरे छे. अोछ पहार्थ ससत्य मास्यो परंतु थ्यां सुधी ते ससत्य छे जेवी श्रध्धाने साधारे जापशी वृति ने व्यवहार इरे नहि त्यां सुधी से जात ज्ञान रहेसुं ४छ. संसार छोड़ी भाएास साधु थाय परंतु भंगसमां डे भंिरभां शिष्योनी हुनिया - पूक्ठापाठनो प्रथंथ रये तो तेए संसार छोड्यों ४ नथी. पेसी भायाये नवुं ३५ धारी तेनो डेडो पहडयो छे. भायाये साधुने खाजाह जनाव्यो छे. ()तो कवने रभाडे छे से वात रजे गीताभां परा छशववारभा जावी छे.
"जाजड भ्यम रभाडे श्वान, दूर थडी हेजाडे धान ....
समा खेभ रभाडे भाय". (८s)
केवी रीते जाणड डूतराने छूरथी रभाडे छे तेभ भाएासने भाया रभाउे छे. भाया बिना होछ प्रवृत्ति शक्ष नथी. भायानो स्वीडार ऊशवो ४४ रहो. भाएासनी हरेद प्रवृत्ति से भायानुं क अर्य छे. स्वाभी विवेदानद कआावे छे तेम माया जेटसे
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सायऐो के डांछ छीसे से तथा सापएी सासपास के अाँछ छ ते. भाया से तथ्यात्मड विधान ४ छ डेटसाड विद्वानोना भते माया जेसे भगत खने जहम वश्येना भगतना संजंध विषेनी अनिवायता दर्शावती व्यक्षिनी शक्िनी स्वीअर्यता पश सायऐ डजूस दरवुं कोधसे हु जा प्रकारनी अशक्ष से तो मानवज्ञानभां प्रथमथी ४रहेसी छे. सभग्र भानवीय ज्ञान जन्ट्रान्डि रसेस भआावे छे तेम अ्योधक्ष तेभ क जांशिक होय छै. खा भगतनुं संपूर्ण रीते जुध्धिगभ्य सेवु स्पष्टीदरण जायवुं से मानवजुध्धिनी भर्याहानी डै क्षेत्रनी जहारनी वस्तु छे. () भायाना सिध्धांतने सर्वसंभत रीते सभाववो के मायाना प्रश्ननो सर्वसभंत उद्ेस खाथवो सने ते पर जौदिए रीते संतोषय्रह डोय तेवो, से जलु ड ठिन जाजत छे. खद्वैती पएा उजूस दरे छे डे मायाना सिद्धांत साथे डशुड जजौद्धिड़ तत्व भोडायेसुं छ. भायाभां जेवी वििन्न सुश्याह छो डे ते क्रांथी भावी मेनी तपास दरवा भशो तो ते भती रहेशे. छास धीरो डडे छे:
"भुनिशठ्न भोहा रे, भडा भस्तानी भाया;
जंघने जंधाया रे, रंडने राशी भया ..... (८८)
"Maya stands for want of enquiry .... "
भाया भे सिध्ध दूरी शङाय तो द्वैत थह भय. तेथी माया जराजर स्ष्ट रीते समक न शङाय से भायानु दूषण नथी परंतु भूषए छे.
भायानुं स्वशय भेया जाह शंङ्रायार्यना भते माया डे सविधाना सक्षणो संगे वियारीये तो भाया संगेनी भुख्य साक्षिडताजो ाप्रभाऐ माी शङ्ाय
(१) भाया निश्येतन तेभष् ४ड़ात्थिका छे.
(२) भाया ज्रह्मथी खलन्न खने तेनी जीवशक छे.
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(3) केवी रीते भगत जनाहि छो तेवी रीते माया पहा मनाहि छे
(४) भाया सतत्ताथी परंतु लाव३प छे. भावरण जने विक्षेय जा जंने भायानी शककियो छ.
(4) भाया सवर्णनीय खने अनिरवा्य छे. ते न तो सतके अारााा हे (() जाघित
थाय छे सने न तो जसत छडारणा डे प्रतीत थाय छे,परंतु ते परभ सतक्त
नथी. तेनु स्वय स्वतःस्पष्ट नही होछ निर्यनीय छे
(s) भाया अध्यासउय छे, रु सर्पनी ेम आंति छे.
(9) भायानी व्यावडारिड मने सापेक्ष सत्ता छे ते मात्र विव्त छे.
(८) भायानुं ज्ञान वडे निरीसन थह शहेछे.
(c) भायानो जाश्रय जने विषय ब्रह्म छेसने तेभ छता ब्रह्म तेनाथी सस्पृश्य छ. भेम भहुगरनी तेना भहुनी जसर थती नथी तेभ ज्रह्मने तेनी भाया
जेटसे डे स्वभाया डे खात्मभायानी जसर थती नथी.
भगतमा के अछ ज्ञान खथवा प्रतीति थाय छे तेभां दर्शन तो ब्रह्मनुं थाय छे. पशा के वेष्टन (पडछो) ने सीधे ते ज्ञान धुरं थाय छे ते पडछो भाया डे सविधा छे.
क्त क्त भायाना त्रिविध पासा छे. श्रृति के जोध साये छे ते संहर्लभां ाया जसतत्तमे टसे है Unreal छ तेना स्वइपभा भेये तो ते सनिर्वाय्य छे
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खने व्यवाहारिक द्रष्टिसे भेहसे तो ते उस्ती घरावे छे, जेटसे डे माया भाव३प छ. (ए) भायाना स्वशनुं वर्शन दरता श्री सेस डै.हास भशावे छे हे 'भायाने जनाहि तेभष्ठ लावउप वर्शववाभा जावे ोसने छता ज्ञान द्वारा तेनु निरसन थह शडेछ. परंतु पहना युस्त अर्थमां तेने लावउप गएवानी नथी. ते लाव३प से खर्थभां छे के ते मात्र खलाव३प डे शून्य नथी, भाव डेसलाव सेभ जेभाथी खोड़ पएा डोटीभा तेने भूड़ी शङाय तेभ नथी. से जनेथी लिन्न डोछ त्रीु क तत्व छ. (<3)
उ.ए: जरम्म खने भगतनो संजध खने भाया :-
भाया से शुं छे? तनी साक्षणिडताजो वगेरे जा जघा भुदायोनी यर्था श्र्ा पछी ब्रह्मनो भायानो साथेनो जथवा सविधानो ६व2 साथेना संजंध अंगे वियारणा हुरवी सत्यंत सावश्यड छे
भाया से उवाभा तो न सटड़ी शडे, तेथी भायानुं डोछड सधिष्डान डोवु भेसे. परभेश्वरना संजंधभा वियारणाभा जावे तो भायाने परभेश्वरथी जसग सेवुं स्वतंत्र अस्तित्व नथी. ते परभेश्वरना आाश्रये रहेसी छे. (ए6) सांज्यनी प्रदृति तो पुद्षथी स्वतंत्र छे. पुद्षना खेडसताथी उत्पति थह न शडे खही माया श्वरने साधीन रही भगतने उत्पन्न दुरे छे. मे ससतत्त्वतंत्र रहे तो से शक् रहित थता
भगतनी उत्पत्ति न थह शङ. मात्र यित पश खसतभा पेठा सिवाय पोतानी शश्ि प्रेगट दुरी न शह्रे खने कगत खशक्ष जनी भय. जाभ जंनेना जन्योन्याश्रय भगतनो भायिड सविलाव शक्ष जने छे.
शेताश्वतर उपनिषहमां पशा कणाव्युं छे डै या सभ -प्रदृति छश्वरना अधिष्ठान नीये रहेसी छे, सने जा शकि छो.परभेश्वरभांथी ते
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उदस्सवी छ. सांज्यनी प्रदृतिनी भेभ तेनुं स्वतंत्र अस्तित्व नथी. भायानुं छश्व२नी
आाश्रये रहेवुं ते सपराविद्याने अनुसक्षीने उडेवायुं छे. केभ, पोतानी शश्िथी उत्पती दरेसा भहुथी भहुगर पोते सेपातो नथी डे भायावी पोते तेनी छन्द्रभणभा इसातो नथी तेभ शुध्ध ज्रम्म भायाथी सेपातुं नथी. भगतलमनी डोछ जसर जरेजर ब्रह छ तऐ अजमां के खा अर्यात्मड भगत हेजाय छे ते स्वइये ब्रम्म ४छ. भूज अारण छ. अर्य ॐारए३य४ थाय छे. जेटसे डे अर्यनी जशुध्धता के भडता के भायिक छते उड़ी भय छ ने हार्य अारणाउपे थह रहे छ. घडो लांगता ते भाटी३ थाय छे भाटी घडाउप थती नथी. भाटीनी भेम अारण तो स्वइपथी घट वगेरेमा स्थिर छ. विडारो नष्ट थाय छे. डूटस्थ वस्तु जेटसे डे ज्रलम नहि. तेथी डार्य क डारणाइये थाय छे पएा डारए डार्यउपे थतु नथी.
ब्रम्मनी द्रष्टिसे भेता मायानुं सस्तित्व ४ नथी. भाया सतक्त वस्तु छे०४
नहि. तेनुं दशु खस्तित्व नथी. भांडूश्रडाडिमा डतुं छेतेभ
क्तत्तकतक कितश्रप नवचक्रbककतक्रत केतवशेे शकक्तक्तज्रनक्रकक
क्ततकत्तवतकतकत्तवश
कवो (धर्मो) उत्पन्न थाय छो सेभ उस्पाय छे.
ते तत्वतः थता नथी सेमनो कन्म तो मायाना केवो क छे खने सेवी भाया वस्तुतः तो कशाती नथी. वस्तुतः होय क नडि तेना विषे "ते आा छै" सेभ
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उंडेवुं तेनुं नाम क भाया छ. शवी० रीते भायाभय जीणभांथी भायाभय क संदुर थाय जने ते नित्य होता नथी. तेभ तेनो छह खेटसे डे अंत पएा नथी. तेभ ा कोनु परा तेभ छे.
सद्वैतवाह समय डारणतानो नडार दुरे छेजने सभतिवाहनो स्वीडार डरे छ. भाया सडित ज्रम्म सेश्वर छ. सने भाया तेनी शम्मि छ.सने ते वडे क खा नामशयात्म भगत जनेस छे, नामप से संसाराम जी४३य छे. इश्वरनी से प्रदृति छे.
चेशकतशक्रतककक्तेिकतक तेककतकेेशकेकेेश क्रतकेक्रितकक्तकतनक
क्ततकततक्रत्तक तनकककतननज़कतनर्क
भायावरछन्न ज्रह्म से क सद्वैतनो छश्वर छे. खेड़ 9६२वर
भाया वडे दूरी खनेड़ होय ते लासे छे.
क्त क्त क्त सापऐके भगतभा रहीसे छीसे तेनु स्पष्टीरण स्वयं भगतभांथी भतुं नथी. भगतनुं व्यावडारिड स्वउप माया शब्ह जोजजवाभा जावे छे. प्रा. डिरियाएणा कआावे छे ड माया से लौतिड भगतनुं जाहि अारएा छो. ज्रल्म डूटस्थ नित्य छे, क्यारे भाया परिशाभी नित्य छे. (<८)
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परभ सततत्व सेटसे डे ज्रहमना जा भगत साथेनो संजध सभ
शहातो नथी डारण डै जने परस्थर वुछा स्वइपनां छ. तेथी तेनो संजंध स्पष्ट दरी शङातो नथी 'भाया' शण् द्वारा तेनी अनिवयनीयतानु सक्षण तरी जावे छै. भायामां जाध तथा प्रतीति सेभ जंने प्रहारना विशध्ध धर्भो होवाथी तेने अनिरवयनीय इडेवामा जावे छे. (ए) सापऐो के जा भगतने ब्रह्मनुं अार्य मानीसे ने बरह्मने भगतनुं अर्य भानीसे तो से खर्थभा भगतथी रापण से यातु नथी. ब्रम्म भेनुं अधिष्डान छो सेु मा भगत ते आया छे. ज्रह्म सत्य छे खने कगत मिथ्या छे. छता या सत्य ब्रह्म मिथ्या भगतइय प्रतीत थाय छे. सपरिवर्तनशीस ज्रम्म आापशी दृष्टि सभक्ष परिवर्तनशीस खने अनेडविध भगत३ये जड थाय छे. ते मालास छसने जा आालासने सभभवा भाटे के सिध्धांत रबू थाय छे तेने थए ाया उडेवामा सावे छे. खाभ भायाने भगतविषयड अ्रभनुं भूजडारण उडेवाम जावे छे.
भे खापऐो सायुं सक्ष मानुलविड भगत पूरतु सीभित राजीमे जने तडयुक्ष छसीसनो आाश्रय सये तो खापशने खेड़ पूर्ण व्यक्षित्व घरावता सेवा छश्वरनो ज्यास मजे छ. या छश्वरमां खात्मा सलिव्यक्िनी शक्िने परा धशीवार 'भाया' तरीडे जोजजवामा ावे छ. खाम ज्रम्म के उ्वरनी भगत उत्पन्न दुरवानी शक्षि ते माया (100) प्रा. हिरियाएणा उडे छे तेम माया भगतनुं उपाहान डारए नथी यएा पोतानाभाथी भगतने उत्पन्न दरनार छश्वरनी सहायड शक्ष छे.इश्वरनी या शकिनुं उपातर उपाधि डे स्वभर्याहामां थाय छे खने सर्व अंछ या सव्याहृत प्रद्कतिभांथी नीसरे छे. प्रदृति से विषय छे. ेभांथी सर्वोथ्य विषयी जा विश्वने विजासशीस जनावे छ. इश्वर वस्तुतः अविलक्ष डोय तेवो आालास थाय छे. सा खालास ते भाया छे. (109)
ब्रम्म से निरपेक्ष भूस्य छे. विश्व न तो निरपेक्ष भूस्य छेडेन
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तो पूरपणे सभूस्य छ. या रीते विश्वनुं सक्षण भायवुं से शंङरनी जौद्धिड परिपक्षता हशवे छे. परंतु इक्ष ९परछस्सी वियारणा उरीने मासोयडोसे "के तत्व पएा नथी जने जतत्व यए नथी " जने "के सहत्तप नथी ने सह्त नथी, तेथी
जनिर्वयनीय छे."सेभ उडी जंने विधानो वश्ये ताहात्म्य मानेस छे. शंदरायार्ये मायाना संजंधभां तेभना लाष्योभां श्रांड क्तक्तक क्तक्तकककतकतक त्तककक्तक्ततकतमे वुं विधान दुरता
नथी. 4ए त्तकतक्त्तकततकत्तकतकततकत्तककक्तक्तकतनेम डहे छ. ज्रह्म भऐो 'ततक्छ पए
ब्रह्मनी सत्ता तेना तत्त्वभां रहेसी छ.े सश्यिहानंह प्रति निर्देश डरे छे. साथा खर्थभां त्तकक्तमे 2 से त्तकक्तक्तत्तकतक णे निर्येक्ष भूस्य छेजने ज्रह्मलाव परा ते छ."(१०२)
शांदुरवेहांत नाभना पुस्तडमा डॉ. आार. पी. सिंग डहेछे. (१०3)
श्री डॉ. छासगुप्ता, डॉ.राधादृष्णानत्ती डोडिसेश्वर शास्त्री, थिजो वोरे जया विद्वानो
तकत क्रतकत केत्विकतकतकत्तककक्तक्तकतन। विधानोने अस्तित्वसक्षी ददषष्टि जिंहुथी हुजे छे
खने जा नामय जानुलविड भगतने "either being nor- non being" उहे छे. खाम उपरना जने विधानो वश्थेना तज्ञावतने सभभववाभा तेजो सईण थता नथी. डोयसन केवाजा भगतनी व्यावडारिड सत्ताने विल्रभ डे स्वप्न साथे सरजावे छे.
खा उपशंत मध्ययुगना विवेयडी केवा के लास्डरायार्य खने राभानुभयाये पश शंदरना भायावाहनी उटु जासोयना दरी छे ते तेनो भूण सर्थ नहि सभनवाना औारएों क खने मात्र सस्तित्वना दृष्टिजिंहुने न०र सभक्ष राजीने ४डरेस छे. जरेजर तो भायावाह न तो मात्र शंडरे उपभवेस छे डे न तो जौद्धोना शून्यवाहनी भात्र खसर छ. शंडुरे उपनिषहना वियारोने वधु स्पष्ट रीते रबू दुरी खने पोताना सद्वैत दर्शनने अनुउय जनाववा भाटे प्रयत्न र्या छे. तेनी तात्विड भीभांसा सने ज्ञान भीभांसाभांथी ते स्वालाविड़ रीते इसित थाय छे. भायावाह से मात्र 'वाह' नथी हे ते 108
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रोछ सिद्धांतडस्पना' पएा नथी से तो सतत्तात्वना स्वयनु निउ्पश परतु वास्तवसक्षी
डथन छे. शंडरे पोताने भाटे क्रांथ "भायावादी" शब्द नो उपयोग श्रो नथी जरेजर तो जा शब्ह तेभना विरोधी जोखे वायरेस छ उहर तरीडे लास्रायार्ये तेभने वारंवार भायावाही प्रश्छन्न जुध्ध तरीडे ोजजावेस छेखने शांडरवेहांतने जौद्ध विज्ञानवाहनी मात्र नडस तरीडे गणी डाढेस छे.
शंडरे तो पोताने ज्रह्मवाही उडेवडाववाना भतना छसने योताना भतने ज्रह्मडारणवाह उडेवो वधु पसंह डरे छे. पोताने तेखो भोक्षवाही तरीडे पए जोजजावे छे. भोक्ष तेभने भन सर्वोथ्य भूस्य छे. वायस्पतिभिश्रे पर शंडरवेांतना संजंधभा मायावाह शष्दनो प्रयोग क्रो छे. पए लास्डश्यार्य सने वायस्पतिमिश्र जंनेना "भायावाह" ना शष्हप्रयोगभा पायानो तझ्ञावत से छेडे भायावाही सेटसे है लास्डरने मन अजाध्ययार्थवाही परंतु वायस्थतिभिश्र जासंगे शंङरनो भत स्वीडारे छे. जेटसे डे ज्रल्म पोतानुं भूण स्वशप गुभाव्या वगर जा नाभपात्म गतनु सर्न दरे छे. टूंडमा भायावाह दरता "ज्रहमवाह" शब्त वधु योग्य छे. खने ते शण्ह द्वारा शंद्रायार्थनो भत वधु स्पष्ट थाय छे. (१०४) तेवी रीते स्वाभी गोविंदानंहे तेभनी रत्नप्रला टीडाभां भायावाह खने ब्रह्मवाह जंने श्होने सभानार्थी तरीडे हशिस छे.
3.90: भायानुं डार्य :-
भाणसनी प्रदतिमां 8 संन्निप्ति, जनाहि खज्ञानदय, सेवी भायानुं स्वश्य जूज क विसहता भया जाह हवे से प्रश्न थाय छे डे साव स्व३प धरावनार भायानुं डार्य शुं छे? या भुदाभां भायानुं के विविध अार्य छेसे संगे वियारण। डरीशुं.
भायानुं स्व३प व्यापड गतिशीस छे, अ्रभ उत्पति डरे तेवुं छ. य।
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संहर्लभां प्राहिरियाएणा कशावे छे तेम सविधानी भेभ भायानी "सावरण" सने "विक्षेय" जा जे शकतिजो छै
क्त क्त क्त .04)
प्रद्ृतिनी भगत उत्पती ऊरवानी शक्ति ते विक्षेपशकति छ. विक्षेप शडितिथी जा भत थाय छे. भायानी विक्षे शक्त नाम पात्मड व्यवहार भगतना खालास उत्पन्न दुरे छे.भायानो जा उडारात्मड गुण छ. क्यारे याथार्थ स्वउपनु धर्शन न थवा देवानी शक्ति ते भायानी भावरण शक्ति छे. ा भावरण शक्तिथी परमात्मानु जरुं स्वशय ढंडाई भय छै. या शकतिथी ते कवने पोताना भोउपाशर्भा राजे छ. भायानो जा नहारात्मड गुण छे.आायार्यश्री भणावे छे. तेभ क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ,्ि ्ने थित् इपी जे प्रदृतियो ते छश्वरनी ४ जे शक्तिजो छ. गीतालाष्यभां तेजो हशवे छे डे सत्यकत भाया ते ज्रह्मनी शडति छ. आावरण शक्तिनुं अर्य सभत्र गतना भूजमां रहेसी ब्रम्मनी भेड़ताने जावृत दरवानुं छे. खने विक्षेय शक्तिनुं अार्य नहारात्मड व्यवहार भगतनो जालास उत्पन्न दरवाु छे.ख संहर्भभां वेहांती उवि सजो उहे छे :-
"शब्हभण भायानुं डुंड, त्यां नश्पशु पडे भति भूढ;
शहागारी वाली सौ गाय, भोहा कव सांलवा भय."
प्रथम जावरण जने पछी विक्षेय "suppression precedes substitution."विवेड्यूडाभणीभां जायार्यश्री भायाना जा द्विविध अार्य जंगे इपडनी भाषामां वशावे छेडे,
"णेभ सर्यना जिंजने राहु ढांडी हे छे, तेभ सजंड, नित्य
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जने खेड़ व ज्ञान शकतिथी प्रदाशता अनंत वैलववाणा, खात्मतत्व ढंडाई भय छे. त्यारे भोडने अरण कव, 95 छेहनेक "जा हुंछं" खेभ मानी जेसे छ. सने तेथी रभेगुणनी "विक्षेय" नाभनी शडत, अभ, अोध वगेरे पोताना जंधनडारा गुणोथी मेने डेशनपरेशान दुरे छे. या सावरण मने विक्षेप शक्ति अंगे विवेड्यूडाभिना शसोडी
सावरण शक्ति :-
-(905)
क्तक्ततककत्वकतकत्त्केकत्तक ंशकतकेतेवशेशकतेशवकतक तकतक्रकतत्रककककतननक
विक्षेपशकति :-
क्तकतनक तेकतक कत्त्ेक्रकत्ेतेकतेश्रेकेते के क्तकक्तत्तक
(909)
ऋषि युषन् देव प्रत्ये प्रार्थना दरता भांगणी दुरे छे के के उुंछ सत्यनु प्रसोत्मड सावरण डोय ते छूर दर, केथी सत्यनुं मान दरावनार दष्टि उघडे (१0८)
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शंद्रायार्यना द्वैतवेहांतने सभवा भाटे यशा भायानो सिध्धांत सभथवो सत्यंत जावश्यड छे. "भाया" से येतनधर्भ छे. तेना भाटे तेने आाश्रय
(locus)यने विषय (content)नी आावशभ्यता रहे छे. भाया अंगे से सवास थाय के भायानो खाश्रय शुं छे१ अने भायानो विषय शुं छे? भायाना या जंने प्रश्नो विषे उही शङाय के ायानो आाश्रय कव छेसने तेनो विषय ब्रह्म छे. तेम छता सहीं प्रश्न से थाय छे डे मायानुं अार्य श३ थथा पडेसा कव आ्यांथी जाव्यो ? कवात्मानी उस्ती न स्वीडारीखे तो भाया भाटे आाश्रय भेवुं अछ रहेशे नहि खही अन्योनयाश्रय जथवा तो परस्पर आाधारनो छोष थशे, मेन खर्थ से थाय हे मायाना डार्य माटे कवात्मानी सावश्यकत्ता रहे छे. सने कवात्माना सस्तित्व भाटे भायाना अर्यनी आावश्यकता रहे छ. योगवास्षि्मां उडेवाभा खाव्युं छेतेम वगर लीते जा यित्र उलुं डर्यु छो या भुश्डेसी छूर ऊरवा भाटे खद्वैत्तीजो उुहे छ डे माया मनाहि छे.
डेटसांड जन्य खद्वैत वेछांतीजो माने छेडे ज्रह्म स्वयं भायानो आाश्रय खने विषय जंने छे. या भत नुसार जधुं क भाया ने तेथी मिथ्या छै. य। भतने सद्वैतवेहांतनो टेडी भणतो नथी जा उपरांत ृत नुसार ब्रम्म शुध्ध, निर्षेय डोवाथी ते भायानो जाश्रय जनी शहै नहि. भायाथी पसुषित थह शहे नहि. अारण है भाया तो अशुध्ध छे, मज्ञान छ. साथी शुध्ध यिहउप ज्रह्मने अज्ञानना जाश्रये मानी शङाय नहि.
आायार्यश्रीनो भत से छे डे वेयडितड खात्मा खेटसे डे कवात्मा से भायानो जाश्रय छे. सज्ञान के सविधा सापशाभा छसने ज्रह्म ते भायानो विषय छे. ब्रह्मज्ञान थवाथी जापणाभा रहेस भाया डे सविधानो नाश थनय छे. भगतलभ भाटे भाया खने ब्रह्म सेभ जंने डारणो छै.
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उतरअासीन वेहांतीयोभां संक्षेप शारीरडना डर्ता श्री सर्वज्ञात्मा भुनिना भते माया हे सविदा से ज्रह्मना माश्रये रहेसी छे. वायस्पतिभिश्रना भते पए। आया छश्वरनी जने सविधा कवनी सिध्धांतिंहुना उर्ताना भत अनुसार पशा सविधा से कवना आाश्रये रहेसी छे.
कव से माया द्वारा उत्पाहित छै.जाथी माया कवना जधारएमां प्रवेशे छे तेनो खर्थ से थाय डे को सेभ मानीसे डे भायानो जाश्रय जन्या पहेंसा कवनुं प्रथम जस्तित्व तो होवु क भेहसे तो तेनी जेसे केकवनी उस्ती न संलवे, "भाया कवमां रहेसी छ."सेटसे केम "होछ वस्तु टेजसना जानाभां रडेसी छ." सेभ नडि, परंतु कवनुं कवपशुं जेटसे क माया डे सविधा, जा संगे जापएे डडी शडीसे है कव पोताना स्वशपनु विश्वेषणरे छे त्यारे तेने कशाय छे हे ते तो आायाछे, जाभा ब्रह्मनी सत्यता गृहीत छ. परंतु भाया जावी ड्यांथी? सने पोतानी उस्ती पडेसा भायानी उस्ती संभवे क केम? ते विषे व इशों क बवाज खापी शडरे नहि, अाराणा हे या जधुं तेनी वियार शक्तिनी पेसषी पारनी वस्तु छे.
क्त क्त क्त
भाया अनिर्वयनीय छे. ते आ्यांथी जावी ते प्रश्न छे सेभ भठवा छतां शा भाटे खद्वैतीये तेनो लोग थवुं? डॉ.पी.टी.राु भशावे छे तेभ: "The question arise because of the prejudice of reason to account even for the unaccountable." (110)
आायाशजस ज्रह्म से भगतनुं अरएा छै. माया के सविधा से अनिर्वयनीय छे. भाया सने ्रम्म वय्येनो संजध सभवो े धशी अठिन जाजत छे
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डॉ. पी. टी. ाु Thought and Reality ४ouव छ तेभ
"We will not be required to apologise forour being finite." (111)
जनाहि, अनिर्वयनीय जेवी सविधा पश भगतनुं डारएा होछ न राड भे सविधाने मनाहि मानवाभा जावे तो द्वैत जावी भशे. सविधा मनाहि नथी; परंतु दशाउभांथी कन्भेसी छ सेम उडीसे तो ब्रह्मने क तेनुं अारए मानवुं पडे; खने खाभ भायावाहनो त्याग डरी ज्रह्मवाह डे के शुध्धा द्वैतीनो छे तेभां प्रवेश थह ४शे. आाठ रीते सविधा डोछ सभये संभवे तेवी डोय सेभ मानवुं परा योग्य नथी डेम केमना होय ते खनंत डोवु भेसे जनाहि सविधा सान्त अंतवाणी न होछ शड, प्राशलाब खेटसे के अर्य उत्पन्न थथा पडेसा तेना अरएभा सलाव डोयछे.प्राशलाव इडेवामा जावे छे. ते जनाहि छे. छतां सान्त- जनंतवाणो छै. तेभ सविदा परा मनाहि छता सान्त होछ शडडे सेभ तड हुरवो पहा योग्य नथी. अरण डे प्रागलावने से जघा तत्वयिंतडोसे स्वीडारेस नथी. शुध्धद्वैतीनी भाइड आविाव तिरोलाव स्वीडारता प्रागलाव वगेरे स्वीअारवानी ४३२ रहेती नथी. वणी प्रागलावनुं दर्ष्टात जेटसे डेघडी तैयार थयो ते पडेसा ते भाटीभां न उतो, या सविधाने साशु पाडी शहाय नीड. अरणा डै शांङरभतवाहिजोजे सविधाने लावउप माभेसी छै.भ्यारे प्रागलाव से तो सलाव छ भावउपमां लावउपनुं दष्टात आायवुं योग्य गणाय; सलाव नहि जाभ जा द्ष्टात सही जयोग्य छे. तेवी रीते सविधा जनाहि ने नंत मानवा कता अनिर्भोकषनो प्रसंग जावशे जने भे सनिरवयनीय सविधाने जनाहि ने सानत उडीशु तो तेनु अनिर्वयनीयपणुं ४ रहेशे नडि अने अनिरवयनीय मायाने अरए मानता 95 डारएवाहमां थता जया होषो थशे जाथी सविदा भगतनुं अारएा होछ शडे नहि
3.99: अविद्यानु स्वउप ने तेनो आाश्र :-
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सविदा माएासना जघा क छुःजोन अारएा छै. विद्या डे ेने आायऐो ज्ञान उडीसे छीसे. या ज्ञान भाएासने भुझत आाये छे.डॉ.राधाडृष्शन् कशावे छे तेभ सविधा जेटसे जुद्धि द्वारा भणेसु जने जुद्धिमां क रही गयेसु ज्ञान डोयसन उडे तेभ अविदया "The innate obscuration of our knowledge" सविद्याथी जहलाव वन्भे छ. सने सापशाने जायणा जज्ञाननुं लान नथी, श्रीभ लगवद गीतामा ड तुं छे तेभ
क्त क्त क्त क्त सर्थात खज्ञानने सीधे ज्ञान ढंडा भवाथी सोडो मोहित थर्छ जधनमा पडेछे. (११२)
सविदा जेटसे डे जज्ञाननी जे शक्तिजो आावरए तेभ विक्षेप छ. साया स्व३पनुं दर्शन न थवा देवानी शक्ति भावरण शडति छ. न्यारे प्रदृतिनी भगत उत्पती दरवानी शक्ति ते विक्षेय शकति छे. अज्ञानने सीधे उला थतां भावरण खने विक्षेपने हूर परवाथी क जात्मज्ञान राज्य थाय छे.
शंदुरायार्यसे माया खने सविधा वय्ये जास तज्ञावत जतावेस
नथी.त्कत्तकक्तत्तवक तततकत्तक क्तकतकतकतक3) क्यारे परवर्ती सायार्यों से सविा
खने भाया वय्ये लेह छशस छै. भाया जने विद्या है ज्ञान ा जने शब्होनो संगलग खेड क खर्थ दुरवाभा जावे छ. विधारएय स्वाभी विशुध्ध आातभ प्रधान प्रदृतिने "भाया" तेभष्ठ भविन खात्मप्रधान प्रदुतिन सविधा डहे छे. (११४)
शांदर वेहांतजोभां डेटसाड भाया सने सविधाने भेड़ भाने छे; तो जीभ उेटसा लिन्न माने छे.मा जीभ वर्ग मनुसार भाया प्रलुनी सने सविधा कवनी गणावाभा जावे छे. तेखो उहे छे तेम "कवनु कवयशु जेनु क नाभांतर सविधा छे.
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जने सविधान प्रतीत थवुं जमां ४ ुंकवु छोजर्थात् कवलाव ने सविदा खेड़ क वस्तस्थितिना जे नाम छ (१4) साभ माया सभ्ट३य छे. क्यारे खज्ञान से व्य्टि३य छ. जेटसे के छश्वरना संजधथी तेने भाया जने कवना संजधथी तेने जज्ञान उहे छ. भायानो खर्थ मात्र ज्ञाननी गेरडाणरी ४ दश्वाभां जावतो नथी. परंतु जयथार्थ ज्ञाननी अथरी पएा उरवामा जावे छे. जाथी क मायाने "भिथ्यायार३या" डेविपरीत ग्राहिका पएा उडेवाा जावे छ. केवी रीते जांजवाना कण आ्यारेय रेतीना उएाने
डाहववाणु जनावी शदता नथी. तेभ सविधा परा परभ सत् तत्व सेटसे डे Ultimate Reality ने उछ नुदशान दरी शऊती नथी. शंदरायार्यना भते खात्मा सने जनात्मा खा जंने तदन लिन्न होवा छता से जेनो विवेड नडरी शउवाथी शिहात्माभां छेड, छन्द्रियो, मन, जुद्धि वगेरेनो तेभषठ तेना धर्मोनो "अध्यास" ऊरीने "जा हुं ने मा भारुं" सेवा भिथ्याज्ञान सजथे केडायेसो जधो सौडिड से वैदिड व्यवहार यासे छै. या खात्म खने जनात्मा इृत अम कवने छे, श्वरने नथी. जा अध्यास नैसर्गिड खने जनाहि छे. शंदरायार्ये सविधा उप शस्त्रथी तत्त्व ज्ञानना खघरा डोयडाने अथी नाज्या छ. उहाइरए। तरीडे सापएो क्यारे खरीसामां भेहसे छीसे त्यारे साया भुजनु प्रतिबिंज तेभा हेजाय छे, परंतु जापऐो भलीसे छीसे डे जरीसाभा भुज छे४ठ नहि ते तो मात्र अभ छे. तेवी रीते भिन्भात् Pure Consciousness निर्विशेष ब्रह्ममा खहं के जञातानो ज्यास से मात्र अभ छे. जरेजर तो ज्रह्ममा जञाता डे कवना ज्यासने उत्पती दुरनार सविधा छे. ज्रह्म उपर पडेस सविधानुं आायरणा कवने कव३य उत्पन्न दुरे छ.
शंद्रायार्यना भत जनुसार सविधा से मात्र व्यं्तिसक्षी क नडि परंतु वस्तुसक्षी पशा छे. साभ व्यावडारिड् दष्टिडोएथी भेवामा जावे तो सविधा, प्रद्ृति, भाया केवा शण्दो समान अर्थभा क प्रयोवाभा जावे छे. भायानो ज्यास सविधाना ज्यास साथे जास संजंधित छ. सा सनुलव भगत जजने अारएोछै.भतना
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जालासनुं अारण जापऐो ज्रह्ममा नहि, परंतु आापशी मज्ञान यु्त जुध्धिमां शोधवानु छे. सविधाने सीधे क भाएास भगतभां इसाय छे. भाएास थ्यां सुधी सविधामां इसाये सो होय त्यां सुधी परभसत् तत्त्वनुं ज्ञान भजी शडै नहि, सविधा से भारासना ४श्वरवत खस्तित्वभांथी विभुष ऊरवावाजी खेड़ निषेधात्म शकत े ड के ज्ञान प्राप्तिभा विशोध दुरे छे.
सविदा जेटसे ज्ञाननी गेरठाणरी, शंास्यह डे लूस लरेसुं ज्ञान तत्वप्रहीिडामां डबु तेभ सविदा से मात्र आलाव३प क नथी, सेलाव य थए छै
क्त क्त क्त क्त
सविधा मिथ्या ज्ञान३य छे उपनिषो पह सविदाने भाएासना ज्ञानथी विशुध्ध जेवा खज्ञान तरीडे खोजजावी छै. खही े नोधनीय जात छे है सविदा से विधानी विरोधी छे, परंतु विधानो सलाव नथी, सविधा से -सत् ए नथी तेनुं अरण से छे हे ते खालास उल्ो दरे छे; तेनो जनुलव सापएने थाय छे. तेवी क रीते सविधा से पूर्ण डे निर्येक्षसत् पशा नथी. डैमडे माध्यात्मिड ज्ञानथी तेनो नाश थह शहेछ.
Indian Philosophy Volp II भां डॉ. राधा5डन 8वे छेडे सविदा अनित अध्यासनुं भूण तात्विड नथी. परंतु तार्डिड अने भनोविज्ञानिड छे. "The root of the illusion is logical and psychological and not metaphysical4 for it is a phantom brought about by the innate tendency of sentiency to look out objectively as contrasted from looking in subjectively. " (119)
शांदुर भत जनुसार सविधाना त्ए प्रहाशे पाडवाभा जावेस छे, नीये भुक्ज छो
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(१) भूसाविधा :-
ब्रह्म येतन्यना जाश्रये रहेसी भूज सविधा, तेनाथी भगतनी उत्पति थाय छे.
(२) तुसाविदा :-
र०नुमां सर्थनी आंति डरावे तेवी प्रातिलासिड़ सतावाणी तुसाविधा केनो जाघ ब्रह्मज्ञान विना थह शडेछे.
(3) सेशाविदा :-
कवनभु्तने प्रारब्धनो लोग खायवा भाटे के सविधा रहे छे,
तेने सेशाविद्या उहे छे.
उपरनी उड़ीउतने ध्यानमा सछ वेहांतभा भगतना प्रथंथने सविधानुं परिशाम अने ब्रह्मनो विव्त मानवाभा जावे छ. यिछात्मामा केनुं स्वउय न होय खेवी सेवी मिथ्या वस्तुनो आारोय ऊरवो खने तेना संबंधनी उस्पना ऊरवी तेनु नाम सविधा छ. खानु भुख्य अारए से मानवाभा जावे छे डे खात्मा खने खनातमाना स्वलावनो भाएासे वियार उरेसो नथी होतो खात्मा खने जनात्मानो, प्रभता खने प्रभेयना विशुध्ध स्वलावनी लेजसेज दरी तेभना धर्मो डे गुणो मेडजीभमा सारोय दरनार के वृत्ति छे. तेने सविधा नाम सापवाभा जावे छे केना जावरएथी वस्तु केवी छ तेवी न हेजाय,जने ऐेनाभा ध्यान भय तो कव सनर्थभां जावी पडे छे तेने सविधा उहे वाभा जावे छे.
शंदरना भत अनुसार तकतकककेशकककत्तकककक्तक्त्तकत्तन्क८
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कोछ वस्तु खेड़वार भेछ होय तेनुं स्मरण रही गयुं होय त्यारजाह जागज भता खन्य अोछ वस्तु भेछन मनभां आालास थयो डै पेसी खगाउ भेयेसी वस्तु ते क जा जीक रीते उडीखे तो अोछ वस्तु केवी जरेजर नथी. तेवी तेने भानी सेवी तेने "अध्यास" डहे छे.
क्ततक्रतकत्तकतकतकक्तकतक्रकक्रतकतननक
क्त सवस्तुभां वस्तुनो आारोय ते अध्यास छे.उहाहरए तरीडे छीयभां याहीनो भिथ्या जारोय ते अध्यास छे. या सध्यास से सविधानु परिशाभ छे. अध्यास से सविधा नथी परंतु यिन्भात्रनो आाश्रय मरार, यिन्मात्ने विषय दरनार, जनाहि, निर्वयनीय सविदधा जथवा तो भाया श् वडे ्रयोवांभा जावती लाव३प शकिति छ. ते मात्र कव सने ब्रह्मनी सेड़ता दुरी ाये तेवी विद्या वडे दूर थाय छे. अध्यास से सविधानु अर्य छे. तेनो खर्थ से थाय के सविधा हो तो ध्यी थाय छे. खने सविधा न होय तो अध्यास थतो नथी. जाभ भेहसे तो सध्यास से हार्य३य सविधा छे; अने सविधा से डारएाउप अध्यास छे.
उवे जा सविधा डे खज्ञान संगे खनेड़ पायाना प्रश्नो उलाथाय छ. या खज्ञान से जावे छे ज्यांथी? सविधानुं भूज शुं छे? अविधा डे भाया संगे शंदरायार्थ पछीना शंदरना अनुयायीजोभा अनेड भतो भेवा मणे छे.
वायस्पति भिश्रना भत अनुसार माया से मात्र सहडारी डारण छे. सविधा कवनी छे. सविधानुं भूण व्यन्तिमां रहेसु छ. सर्वज्ञात्मभुनि भशाये छे तेभ ज्रह्म से उपाहान अरण छो खने माया द्वारा- डारएा छे. सविधा ज्रह्मना माश्रये रहेसी छे. सहानंह तेभना वेहांतसारमां सविधानी भावरए सने विक्षेय मेवी जे शक्तिजो गणावे छे. सा सावरश शक्ति वडे भूज वस्तु जेसे के ज्रह्मने छयाववाभा हे ढांदवाभां जावे छे. सने विक्षेय शक्ति द्वारा जरेजर न होथ तेवी वस्तुनुं आारोप दुरवाभा जावे छे. खाभ सविधा के माया के लाग लभ्वे ते जंगे कुहा ुछा भतो होवा 119
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छत्तां जछा क खद्वैती खो नीये ा वेसा गौडपाहना भतहने जनुमोहन आाये छै
"से प्रदाश स्वदय खात्मा पोतानी भाया वड़े पोतानी मंहर पोताने उुस्ये छे. से जधा क पहार्थोने भऐो छ सेवो वेहांत शास्त्रीनो निर्एय छे. ('८)
खहिं जा जंगे शंडा दरवामा जावे डे सविधा से खहंत व्यक्तिमत्तानुं अारण न होछ शडडे डेमडे व्यडतिजोनुं प्रथभ स्तित्व न होय तो तेनु खस्तित्व 9 न संभवे, सविधा ब्रह्मनी छे तेम पएा न उही शङाय डारण डे ज्रह्म तो शुध्ध ज्ञान प्रदाश स्व३्प छे. अने तेथी ते ब्रह्ममा पश न रही शडे जाभ न तो सविधा ब्रह्ममां रही शड्रे है न तो ते व्यक्तिभां रही शह, खने तेथी सेभ स्पष्ट रीते उडी शङाय तेभ छेडे सर्वज्ञात्मभुनिनो डे वायस्पतिभिश्रनो जा जनेभांथी डोछ भतने स्वीडारी शङाय नहि जेटसे डे विडारी ब्रह्म सविदानो ाश्रय छे ते पए न उही शङाय डरम डै सविधा विना ब्रम्म विडारी देवी रीते जनी शहे? जने तेथी क रामानुष वगेरे हरेड कवनी बुही वुही सविधानी उस्थना दुरे छे. डेमडे नहि तो खेड़नो भोक्ष से जधानो भोक्ष सेवो सर्थ थाय छे.
उपर्युउ्त भत सेटसे डे शंङानुं सभाधान शदरायार्यना भते से रीते खायी शङाय डे भूण प्रश्न क सस्थाने छे. अप्रस्तुत सविधाना अरएानी शोध दुरवी से सर्थडीन जाजत छे. डेमडे सापऐी भशीसे छीसे हे सविधा छो सने ते अारय डरी रही छे. भे सापएे खात्मा खने सविधा वस्थेना संजधने समके तो जापएो जा जनेथी पर होवा भेसे. सविधा से खात्मानो आावश्यड गुए नथी ने भे सविधाने खात्मानो आावश्यड गुए मानवाभा जावे तो भुश्देसी थाय हे खात्मा उदि सविदाभाथी निवृति ४ न भेजवी शडे क्षर कवोनी उत्पति पश सविधाने सीधे नथी; डेमडे क्षर कवनी साक्षणिकता क सविदा छे. सविधा खने ब्रल्म परस्थर विरुध्ध धर्भ होवा छता जंने डेवी रीते सह-स्तित्व घरावे छो से प्रश्ननु निराहरण री शवु े धशी उठीन जाजत
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छे. ज्रह्म से सविधानी उ48 नथी के न तो से सेना अभनी जसर तणे छे.ज्रह्मनी जी कोछ सयेतन व्यडति छे नहि कै के ज्ञानने उत्पन्न डुरे. जाभ शाश्वतः शुध्ध खने स्वयंल्ू ज्रह्ममा होवा छता अधड़ रीते हुन्वयी कवमां प्रवेशेस या सविधानु भूण कआावी तेनुं स्पष्टीदरण दरवुं से जुजण् मुश्देस छ. खही जेटसु उही शङाय के मिथ्या वस्तुनी स्थापना ने के वस्तुभां धर्भ न हीय ते धर्भनु ज्ञान राजवुं ते जंने भजीने अध्यासनुं अार्य थाय छे ते ४ सविधानुं अर्य छे ०ेवी रीते छीयभां यांही नथी, छता तेभां यांही मानीने याहीनी जुध्धि दरवी तेनुं नाम सविधानुं अार्य छे तेभ खात्मामां 4श खात्मानी भग्यासे जनात्माना ध्यास थाय छे
सहीं शंडा थाय छे डे मे सध्यास से संसारना मनर्थनो हेतु होय तो मननुं जराजर निउपश थह शङशे नहि भन नथी जथवा तो ऐेने भन नथी जथवा तो के दशाभा जमनीलाव (मन नथी ते) छशाभा अध्यास थतो नथी. ऐने मन छे तेने अध्यास थाय छे. सेभ स्वीडारीसे तो न उया मध्यासथी उत्पन्न थयुं से दर्शववु पडे को मन सध्यास्त नथी, तो ते मिथ्या डेम उडेवाय छे? भे मन साथुं डोय तो खद्वैतनी सिध्ध उ्छ रीते थाय? खात्मा खने मनात्मानो अध्यास डोएा रहे छे? से प्रश्ननो भवाज पएा खाथवो पडे उबे मात्मा सध्यास दरे नहि, द्ेम डे ते शुध्ध स्व३य छ जुध्धिथी अध्यास थाय नहि, ड्रमकेजु्धि योते योतानो विषय दुरे नहि मेसे है पोताना धर्मने जीने भेछ शडे नहि, डेमकेते जनात्मा छो. साभ सध्यास न थवाथी शांडर वेहांतीजो सविधानो स्वीडार डुरे छे. तेभ छता से स्पष्ट छेडे सविधानुं स्व३प न5डी थछ शहतुं नथी
उपर्युऊत शंडाना सभाधान स्वउपमा प्रतिस्पधीन सवास दुरी शङाय डेते ....
अध्यासनुं निउपणा थह शङतु नथी जेसा ४ भाटे अध्यास ४ भाटे मध्यास
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नथी सेम भुआावे छे?
भननुं डारण भजतुं नथी जेटसा भाटे ध्यासथी ुही डोछ भूज सविधा छो खने ते भननुं उपाधान अरण छे सेभ माने छे? वजी शुं जेभ उंडेवा भागे छेड़े युकति न होवाथी अध्यास थतो नथी डै सध्यास हेजातो नथी सेटसा भाटे अध्यास नथी खेभ माने छे?
प्रतिस्पर्धि खेभ उडेवा मागे छेडे सध्यास सिध्धी डरवामां तार्डिड हसीस भजती नथी तो ते जाजत शांडर वेहांतने मान्य छे. वणी सध्यास तार्डिड छसीस खथवा तो युकतिथी डे अोछ प्रभाशोथी नडडी थह भय सने तेथी साथी वस्तु केवो जनी भय खने तेथी साथी वस्तु केवो जनी भय तो ते छूर दुरवानो प्रयास ऊरवो नहभी छे. सेवी सविधानी निवृत्ति थह न शङ के जधाना जनुलवभा जावती वस्तु होय तेने अ मिथ्या दुरी न शडे, खाभ साजित थाय छे डे खध्यास से हेजाव मात्र छो. (१२०)
श्री पार्थसारथि मित्र डे के डुभारिस लट्टना जनुयायी भशाय छ. सा पार्थसारथि मिश्र वगेरे पशा सद्वैत वेहांतना सविधाना ज्यासनी ससोयना दुरी छे. तेखो सवास दुरे छे ड (१) शुं अविधा से मिथ्या ज्ञान छे? (२) शुं भविधानुं अरण ज्रह्म छे? तेभना भते सविधा से भे मिथ्याज्ञान डोय तो ड तो ते ब्रहमनुं होवु भेहसे जथवा तो कवोनुं होवु भेसे जा जनेभांथी भेड़ पएा विडस्य राज्य नथी. ड्रेम डे ज्रल्म शुध्ध ज्ञान - स्वशय होछ तेा सविधा जथवा तो भिथ्याज्ञान राज्य नथी तेवी रीते कवो यहा तेमना जरा स्वइमा ब्रह्मथी भुछा नथी. तेथी तेभने यह मिथ्या ज्ञान न होई शडेजाभ मिथ्या ज्ञान छे०ु नहि. श्री पार्थसारथि मिश्र उडे छे डे सविधानुं अरण ज्रह्ममां के ज्रह्मनी जहार न होछ शडे ज्रह्मा तो ख-ज्ञान न होय खने ब्रहथी लिन्न भे
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सविधानी उस्पना दरवाभा जावे तो खद्वैत न रहेता द्वैतनुं स्थायन थह भय. साभ सविधानो ज्यास जुद्विग्राह नथी सेभ खद्वैतवाहना आासोय डोनो भत छ
3.१2: सविधानुं डार्य :-
आा प्रदरशनी प्रस्तावना भया पछीना भुदाभों से भेयुं के भाया शष्ह नो शक्ति तरीडे प्रयोग थयो छे. छन्द्र, व३श केवा हेवोना शुहा शुछा साभर्थ्यने व्यक्त उसतो शब्ह भाया छे. डे० उपनिषदोभां जात्मानी प्रडाशशोध्ड शक्ति तरीडे प्रयोशवाभा जावेस छे. भाया सने सविदा जंने पर्याय तरीडे वपरायेस छो. भाया श०्ट सर्वन शकति, दसाशकित, के यतुराह माटे खही प्रयोवाभा सावेब छे. प्रश्नोपनिषहमा ते प्रथथ; छणडपटना सर्थभां पशा वयरायेस छे. साभ सभय्र रीते भोता वैदिड साहित्यमां भाया ने सविधाना अर्थमा पहेसा तझ्ञावत जने पाछणथी जंने पर्याय शष्छ तरीडे वपरायेसा भेवा भणे छे.
सृष्टिना विज्ासना संहर्लभां शंदरयार्य त्ए शब्द वायरे छे. उछाइरए तरीडे, सविधा, माया, जज्ञान, शंदरायार्य पोते खाना तझ्ञावत संगे वधारे थर्था नथी दरी परंतु शंङरयार्यना अनुयायीनो सविधा खने भाया वय्ये तज्ञावत डे लेह दर्शाव्यो छे. जरेजर तो लाष्योभां 'भाया' जने 'सविधा' ा ंने श्ो वश्ये तह्ञावत भेवा भणे छे.
शारीरड लाष्यना जनुवाहनी लूभिड्रामा डॉ. थिजो डडे छे ै भायावी पोतानी भायाथी जनेड़ सकव खने निर्शव पहार्थो उत्पन्न दरे छोसने याछा तेनाभा क सभावी से छे. तेभ सविदा जेटसे के माया वड ईश्वर संसार खने तेना थुछा शुछा नाम३4 प्रपंथने उत्पन्न दुरे छ खने तेभां क सीना परा दुरे छे जा सविधा है भाया संसारनं उपाहान डारणा छ. जाना परथी जेटसु स्पष्ट हेजाय छेड. डॉ.थिजोना भत खनुसार माया खने सविधा वस्ये होछ लेह सेटसे के तझ्ञावत नथी. शारीरिङ 123
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लाष्यमा (१२1) सा जघी क बुग्यासे सविदा खने भाया श्तो प्रयोवाभा जावेस छे. जीभ अध्यायमा भगतनी उत्पत्तिना वर्शनभा ने तेवी रीते प्रथम अध्यायरमा केम भाटी धडानुं खने सोनुं ईुंडमनं तेवी रीते सर्वज सर्वेश्वर भगतनी उत्पत्तिनुं डारए छे तेभ भशाव्युं छे. तेवी क रीते २:१:१४ भां पण "यिछात्भाभा सविधा वडे आारोपित नामउपात्मड संसारना डारणा३य जी४ से कजा सर्व छवरनी भायाशक छ." खेभ भशावी माया जने सविधानो ले व्यक्ष दरेस छ. सविधा मने भाया भेड़ नथी पएा आंत प्रतीति ते भाया उडेवाभा जावे छे तेनुं अरण से सविधा छै. ०ेवी रीते शारीरिद् लाष्यमा 'सविधा डस्पित', 'सविधाडते', 'सविधा निभित्त' कवा श्ो प्रयोभयेसा छ. तेभ 'भायाउस्पित', 'भायाहृत' ेरे केवा श्दो वपरायेसा भेवा भजता नथी. ज्रह्मसूत्र लाष्य सःरः२ मां डसुं छे डे सविधा उस्पित नामउपात्मड कगत से क आाया छे. ज्रह्मसुत्र लाष्यमा संगलग जही कग्यासे सविधा खने भाया शष्दोनो प्रयोग थयो छे. तेना निष्दर्ष उपे उडी शङाय डे संसारनी आंत प्रतीति से भाया छ. ते नाभशपात्मड छे.खने ते नामशपात्म उस्पना सविदाडृत छे.ज्रल्मसूत्र शांदरलाष्य १:३:१ए मां भआाव्युं े डे कव खने छश्वर जेवा के लेह छो ते खज्ञान सविधाडृत छे से लेह वस्तुतः नथी. हीं भाया ने सविधा शब् पहा समान सर्थभां प्रयोभवाभा जाव्या छे. उहाहरए। तरीडे क्तत्तकक्तत्तकत्तकत्तक क्तकतकतकत्तक खावा
उहाडरए जडु थोडा भेवा मणे छे.
शांदुरवेहान्तीजोमो डेटसाड भाया जने सविधाने खेड़ माने छे. तो डेटसाड वुही माने छे.(१२3) खा जीभ वर्गना भाया प्रलुनी ने सविधा कवनी गएो छ. तेजो भशावे छे डे कवनुं कवयशुं जेनु क नाभांतर सविधा छै.सने सविधानु प्रतीत थवुं जेमा 8 कवनुं कव याशु छ. सेसे डे कवलाव ने सविधा सेड वस्तु स्थितिना जे नाम छ. भाया खने सविधा जंने खेड डे लिन्लिन् जा सवासना
ववाजमा डॉ. राधादृष्णानत्तशावे छे डै या वस्तुसक्षी जाणुथी भेहसे तो भाया सने 124
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खात्मसक्षी डे व्यक्षिसक्षी जाणुथी वियारीसे तो सविधा सेवो भवाज खायी शक्ाय साभ माया जने सविधा सेड छ. शंडश्ार्य कशावे छ डे तेजो ेवी ो व्यक्षिविशेषनी वात नथी दरता सायणायी पर होवा छता सायशी वैयमड ये तनाने जज सायती ते सया दषय शश शय छ. व्यक्नी सविधा सने ब्रहमनी प्रदृति साथेक उत्पन्न थाय छे सेभ वियारवुं जशक्ष छे. सांज्य हर्शनमां सविधाने सनाहि भानवाभा जावेस छ. सविधा बुद्धिनो गुश सने तेथी सविधा जुद्धिमा रहे छे. जुदधि से प्रद्ृतिनो प्रडार छ. साभ खहीं सविधानी वस्तुसक्षित भभवी राजेस छे.
सविधा अंगे डेटसाड प्रश्नो थाय छेडे सविधा जावी क्रांथी? मायानुं खस्तित्व ४ श1 भाटे छे? अविधा उस्ती शा भाटे घरावे छे? सा प्रश्नो उठाववा से धशी सरण जाजत छे. परंतु तेने उदेसवा उठिन जाजत छ. सात्मा हे शुद्ध ज्ञान स्व३प छे ते गभे ते डारएथी सविदामा सपेटाय छो.केभ शुद्ध सत् छे. तेभ छतां हिडू, डाज, अार्य-डारए युस्त खेवा जा भगतभां ईखवाय छे. प्रा. हिरियाएणा 'भाया' शब्हनो खर्थ विश्वव्यापी अभ सेवो डुरे छो.खने तेनी कवात्मा पर के जसर छे तेनुं नाम सविधा से भआावे छे. साभ माया अरभनुं विश्वव्यायी घटडु छे. सने सविधा मे भनो वयक्षिगत कवमा कतो साविलावि छे
शंद्रयार्य ज्ञान द्वारा सविधानी डे भायानी निवृत्ति थवी शक्र होवानी तेने सविधा डे ज्ञान तरीडे जोजजावे छ. उडीउतमा वस्तुसक्षी डे विषयसक्षी भाया सगुण ब्रह्म साथे सहयस्तित्व (Co eternal) धरवे छ. शंद्रायार्यना भत अनुसार प्रसयावस्थाभा पश मायानुं जस्तित्व छे. इश्वर के के पोतानी माया पर आाधिपत्य लोगवे छे तेने पोताना संडुशरभां राजे छे, तेने सविधा शेवुं डशु नथी. वधुमा शंदरयार्य भआावे छे के छश्वरभां सेवी शक्ित छे डेक व्यक्किभा सविधा कन्भावे छे. तेखो भाया जने सविधा शष्ह समान सर्थभां प्रयो छे. सृष्टि रयनाना संहर्लभभां तेो भाया शष्हनो प्रयोग दुरे छे.खने कवना ज्रम्म साथेना प्रश्ननी यर्था दरती वजते 125
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सविधा शष्दनो प्रयोग दुरे छे. उडीउतमा माया छश्वरनी जी शक्षि छो.ने तेने वस्तुसक्षी संहर्लभां सभभवानी छ. न्यारे सविदा से शुद्ध ज्ञानात्मऊ खने व्यक्षिसक्षी धारणा, संडुस्यना छे.
शदरयार्य पछीना वेहांती जोमा कव, 5श्वर संजधनी भान्यताना तझ्ञावतने बहने भाया खने सविधाना संजधमा पश भतलेहो उला थयेसा भेवा भणे छ. उ६रए तरीडे पंयदशीभां विद्ारएयभुनि (१रह) भाया खने सविधा वस्ये लेह जतावे छे. तेभना भत अनुसार त्ए गुणो जेटसे डे सत्व,रवस खने तमस या तए गुणोनी साभ्यावस्था से प्रदृति तेना जे लेह छे- खेड माया जीक सविधा २४स खने तभसनी भविनता रहित सेटसे डै विशुद्ध सत्वप्रधान प्रदृतिने भाया ने भविन सत्वप्रधान प्रदकति ते सविधा माया वडे आारछन्न जहमने श्वर जने सविधा वडे आारछन्न जरह्मने कवने उहे छे. भे हेया भतनो विडास पाछणथी थयेस छे. वेहांत परिलाषा अनुसार मायाने भूसाविद्या सने सविधाने तुसा विदा डै गौएी सविधा उंडेवामा जावे छे. शुद्ध साक्षी३प यैतन्यने ढांडे ते भूसाविद्या तेभष छछभावरिछन्नी येतन्यने सावरे ते सविधा.
साभ शंदशयार्य ऐेने सविधा, भाया डे प्रदृति तरीडे वए छे ते इसत त्श गुणवाजी सांज्यना ऐेवी नथी. जा उपरांतयोगर्शना तंसिे शवस छे तेवी पए नथी. जने रविंहना पूर्णयो गर्भा जतावेसी छे तेवी पश नथी. शंद्रयार्य केने आाया तरीडे खोजजावे छे ते तो खात्माना वियारथी उत्पन्न थाय छ. खने खात्माना वियार्थी दूर थाय छे.जनात्माना धर्मोनो जने खात्माना धर्भोना परस्पर अध्यास से श्री शद्रायार्य अनुसार भाया छै.से लावप नथी डमे मना्मज्ञानथी हूर थाय छे. ते साव सलावउप पशा नथी, डैभडे सामान्य भाशसना पशा अनुलवरभा ते जावे छे. या उपरांत सांज्य दर्शन, योगदर्शन ने श्री अरविंहना पूर्णयोगभा भाया ब्रह्मथी वुद्दी नथी. जने तेथी विशद्ध धर्भोनो जुसासो भजतो नथी. उहाउरए तरीडे श्री 126
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सरविंह भायाने लावउप भाने छे. अने तेनुं उपातर थता ते भगवाननी शक्ति जनी भय छे. खने लगवानथी लिन्नपऐ रहे छे. वेहातभा भायाने सलाव प्रतिसिद्ध भानवाभा जावे छे. वेहांतभां भायाने अनिरवयनीय गणावेस छ. मेटसे डेआात्माज्ञानना सलाव सभये हेजाय जने ज्ञान थता थती रहे, भाया नित्य भगवानभा रहे तो भायाना धर्म, भन्भ, भरणा वगेरे यशा नित्य परमात्माना संजंधभा मानवा पडे. तेथी लगवान विडारी थाय खने लगवाननुं भरए थाय जाथी जा भत योग्य नथी
उ.93: भायावाह साभेनी टीडाजो :-
सविदा, खज्ञान, भाया जा जधा शण्हो तत्वानना क्षेत्रभा जूज४ महत्वना छे. खद्वैत वेहांतभा भाया, सविधा धशु ४ अगत्यनुं स्थान धरावे छे. तत्वज्ञाननी यर्थाना भुददाजोने भेता जा विषय पंडितोमा पशा जूज क यर्यान विषय रहो.
खा उपशंत भायावाहनुं जंडन जास डरीने लट्ट लास्डरे ज्रह्मसूत्र उपरना लाष्यमा छसीसो साथे घशुं ४ विशहताथी रेस छे. या लास्दरायार्य वैष्शव संप्रहायना वेहांती हता, डे केखो ज्रह्म, विवर्तवाह नहि पएा ज्रम्म परिणाभवाहने स्वीकारता हता. तेखो ज्ञान खने उर्भ द्वारा भोक्ष भणे छे तेभ मानता उता. तेवी रीते भगतने उत्पन्न उरनार ज्रह्म भायाना संजंधवाणु डोवाथी ते गौए ज्रह्म छे सने तेथी मिथ्या छे. या वाहनुं जंडन ज्रह्मसूत्रऔार पहा विस्तारथी दुरे छे.जा ंनी डेटसीड छसीसो नीये भुन्ज दर्शावी शङ्ाय
(१) भे ज्रह्ममां भुगतनो लास भायाने अारणे छे सेभ मानवाभा सावे तो पछी ब्रहम खने भाया जेवा जे वुछा तत्त्वो मानवा पडे जेटसे के द्वैत खापीतनो छोष नडे छे.
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परंतु भायावाहीजोना भते तो परमतत्व सेडछ
(२) भाया जनाहि लावउय छे. खने अभ उत्पन्न दुरे छे. सेभ मानवाभां जावे तो यरा उपर हशविस छोषो थाय छे.मे सलावउय मानवाभा जावे तो भगतनो अ्भ १ संभवतो नथी.
(3) होरडाभां सर्पनी आरांति थाय छे. जा उहाहरश थएा ज्रहममा थती भगत प्रतीति साथे बंधजसतुं नथी. डेमडे होरडुं ने सर् जंने जाअारवाणा छै. न्यारेष्रल् तो निराहार निरठन छे. तेभां देजातुं अभउय भगत साडार छे. ने तेथी निराअारभां साडारनो अभ थह शडे नहि.
(४) भूणवस्तु पडेसा भेयेसी होय तेनी आंति थाय. सायो ड्यारेड भयो न होय तेने सर्प विशेनी आंति उछ रीते थह शड? खाभ ज्रह्मभा भगतनी आरंति थाय छे सेभ उडेवावाणा भायावाहीसे साथुं भगत पडेसा भेयेसुं डोवुं क भसे
शंदरायार्य पछीना खायार्योंमां भाया विशुध्व हसीस दुरवामा रामानुजूषण् ध्यान जेये छे. रामानुकना अत जनुसार इश्वर संगेनु ज्ञान प्राप्तदशवाभाऊर्भ, उपासना ने लडित विशेष भहत्त्व घरावे छे. तेनुं डारण से छसामान्य नसभाष् तेने सभ शहे छे,अने ते अनुसार तेनुं आायरणा पएा डरीशडे छ. रामानुष्ठ तेभना ज्रह्मसुत्र परना श्री लाष्यभा भायावाद विशुध्ध हेटसा आाक्षेय डुरे छ. या जाक्षेपो विस्तारथी भोता पडेसा भायाना संहर्लमां शंदर अने रामानुकना वियारो भेसे
उपनिषछोमा जास श्वेताश्वतर उपनिषहनुं अनुसरण दुरता रामानुष् भायानो उद्सेजदुरे छ. राभानुभयार्य भायानो खर्थ "श्वरनी वास्तविड सृष्टि स्थवानी शक्ति" सेवो हुरे छ. रामानुभयार्य भायाने ब्रह्मभां सवस्थित नित्य सयेतन तत्त्व माने छे. शंङरायार्य पए भायाने ब्रह्मनी शडति भाने छे. पश तेभना भत 128
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जनुसार या शक्ति ब्रह्मनुं नित्य स्व३प नथी (राभानुष्ठयार्य तेने नित्य स्३य भाने छ.) पएा खेड छरछा मात्र छे, केनो तेखो छरछे तो त्याग दरी शहे छ. शक्ति३ये भाया ज्रह्मथी वुहो पहार्थ नथी. शंङशयार्य प्रदृतिन भाया तरीे जोजजावे छो.शकत े भाया संसारनी प्रदृति जेटसे है जाहि डे भूण डारएा छे. क्यारे रामानुकठना भत भुक्ज प्रह्ममां सवस्थित सयित् तत्त्वभां खने जाथी ज्रह्मभा पए वास्तविड् परिवर्तन थाय छे, खने शंदरना भत जनुसार ब्रह्ममां कोछ वास्तविड् परिवर्तन थतुं नथी. जाभ शंडुर मने रामानुण्ठना ज्यासा तह्ञावत भेवा मजे छेखने जा द्टिसे भेा, खेड ४ भाया रामानुकठना मत भुक्ज ज्रह्ममा परिणाम उत्पन्न दरे छ. क्यारे शदश्यार्यना भत जनुसार भा विर्वत उत्पन्न ऊरवावाजी छे. विडार उत्पन्न दरवावाणी नहि.
श्री रामानुभयाये ब्रह्मनी वेभव कव सने भगतने पए सत भानेस छ. रामानुण् शंडरे प्रतिपाहित दरेस जसत् भायानुं जंडन दरेस छे. तेभ विवर्तवाहनी भग्यासे परिणाम वाहने मान्य राजेस छे. भाया से भिथ्या नथी, परंतु परभेश्वरनी सयिन्त्य शडिति छे, सेभ राभानंशयार्य स्वीडारे छे. रामानुक्ठना भत भुकज भाया शाश्वत तो छे० यएा सत्य पएा छ. ते इश्वरनो संश (संहेश) शक्ति डे गुणा छे. छश्वरनी उस्ती विना तेनुं अस्तित्व नथी. जा पराश्रयताने सीधे तेभा जसतूनो संश छ, तेभ शोधी शङ्ाय पएा राभानुभ्यार्थने तेभां रस नथी. ज्रह्मभा माया कवना ले स्वीडारी रामानुष्ट सत् खने जसतूनी सभस्यामांथी उगरी भय छे. परा संश खने संशी नो लेह तर्डनो विषय जनी भय छे.मे उपनिषहोना भंतव्यने भेवाभां जावे तो सेभ सागे छे डे भाया सत् छेसेवो राभानुक्ठनो भत तभष्ठ भाया परमार्थतः जसत् छे, सेवो शंदरनो भत-जंने खतिवाही जेटसे डे extreme छष्टििंहुजो छ,जने ा उपरांत जंने परस्पर विरोधी छे. रामानुष् भत भुक्ज परमात्मा या सभ विश्वनुं उपादान खने निभित्त जंने डारणा छ. सृष्टिना कड खने येतन खेटसे क सयित् खने थित् से मेना शरीर३५ छ. जाम कव, भगत खने हश्वर से जे वस्थे शरीर शरीरीलाव संजंध छे.
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आा संजधनो विशेषण विशेष्यलाव डे प्रडार-प्रडारिलाव परा उडेवाभा जावे छे. साभ भगत से मात्र ब्रह्मममां अध्यस्त डे ज्रह्मभांथी नीडेसो पहार्थ नथी परंतु यित् खने सयितनी सूक्ष्मावस्थाविशिष्ट जेवा ज्रम्मनुं के सूक्ष्मावस्थाविष्ट थवुं तेनु नाभ सृष्टि छ तेभना मत भुकज जरलम जरेजर डेवण नथी, परमात्मा तो जया क उस्याएाडारी गुण युस्त छ, परंतु यित्-अयित्नी सूक्ष्म डे स्थूण अवस्थाथी उभेंशा विशिष्ट रहे छे. राभानुक्ने भायावाह स्वीडर्य नथी. निर्गुए ज्रहमवाह माननारने भायावाह स्वीडारवानो रहे छे. राभानुष् सगुण प्रह्मवाह स्वीडारनार छे.तेज निर्गुश ेसे कै डेयगुरविनानो सने उ स्याए गुएावाणो' सेवो खर्थ उरीने भायावाह भानवनी भुश्डेसीभाथी छूटी भय छे. पएा जाभ मानवा थता तेजोने जन्य खेड़ भु्देसी जावे छे.प्रह्म भे डेयगुएारंडित होय तो 'हेयगुण नुं उत्पाहड होएा? त्यां ब्रम्म सिवाय अोछ 'खन्य' तत्व मानवुं पडे छे. खानो उस्सेज दरीने डॉ. राघादृष्शन् उडे छ डे सत्, शुभ, पुएय से खसत्, खशुल, पाप पर विष्य भेजवे छे, जेवी जातरी जापएाने आ्यारे भजे? इश्वर, शुभ खने उुस्याएा गुणवाजो छे खने खशुल के ससतनुं उत्पाहन सेवु जीबु अोछ तत्व हश्वरनो विरोधी ऊरी रहुं छे खेभ मानवानी जावी जातरी नथी. सगुए इश्वर से खद्वैतवाहीजोनु निर्गुण ज्रल्म खने से ब्रम्म संपूर्ण होछसत् ने स्शुभ ने शु केवा इन्दोथी 4२छे.
3.93.9: भायावाह साभेनी रामानुभनयार्यनी टीड़ाजो :-
श्री रामानुभयार्य सगुश ब्रलमवाददी छ तेजो ्रम विवर्तवाहभा नथी मानता यश ज्रल्मपरिशाभवाहनो स्वीडार दुरे छे. तेमना भत भुक्ज जा भगत से भिथ्या नथी परंतु सत्य छ. भायाना सिध्धांतनो तेजो स्वीडार दरता नथी आा ने भायायुत डे अभात्मङ् मानता नथी. खने तेजो शंङ्रयार्यना भायावाहना सिध्धांतनी टीडा दुरे छे. शंडरना भायावाहना सिध्धांत साभे तेखो सात भुछाओो रु डरी टीडा डर
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छ. जा खाक्षेयो नीये भुक्ज छे. खही सौ प्रथम आाक्षेय ने त्यारजाह ते वु ाक्षेनो राङ्य उत्तर खायवानो प्रयत्न ऊरवाभा जाव्यो छ.
(१) खाश्रयानुंथपत्ति :-
भायानो जाश्रय शोछे? भायानो जाश्रय सविधा होय तो ते ड्या रहे छे? माया के सविधा केवी अछ वस्तु होय तो सापऐो तेना माश्रयविशे पूछी शडीसे. ते ब्रह्ममा न रही शड्ड ड्ेम के तो ब्रह्मनुं निर्गुश सेड़त्व नाश पाभेसौयरंत ज्रम्म तो शुद्ध, स्वयंप्रडाशी, चिह३प छे. ने ते शुद्ध ज्ञान स्व३्प छे. क्यारे सविधा से जशुद्ध तेमष् खज्ञानउय छने तेथी ज्ञान ज्ञानमा तो न रही शहजा उपरांत सविधा वैयडतक कवमा परा न रही शडे ड्रेम डे कवनुं कवत्व से क सविधानु परिशाम छे. खने तेथी के डारएा छो ते परिणाम उपर आाधार न राजी शाहे,मने तेथी सविधा ज्रह्ममां रही शडे तेभ नथी है कवभा पएा रही शडे तेभ नथी जने जायी क उडी शङाय के सविदानो ज्यास से तो अभात्मड छोखने सद्वैतीनी मात्र तार्डिड उस्पना छ
खा उपशंत शुं ज्ञान सविधा (अज्ञाननो आाश्रय जनी शह?) से तो वह तोव्याघात थयो गशाय, जाभ रामानुष्ठ सर्व प्रथम से खाक्षेय भुझे छेडे माया डै सविधा शेना आाश्रये रहेसी छे ते निश्थित नथी. भायानो अछ आाश्रय कन होय तो आापऐे तेने स्वीडारीजे कछ रीते? या जाक्षेपने आाश्रयानुयपत्ति नाभ ायवारभा आावे छे.
(२) तिरोधानानुयपत्ति :-
सविधा ब्रह्मने उुछ रीते सावृत दुरी शह? खने भे ते तेभ दुरी शदधे तो ब्रम्म स्वयंप्रडाशी, स्वमानयुत छे तेभ उडी शङाय नहिं. तेनो खर्थ से थाय है संधाइ से खनवाणाने ढांडी शहेछै रात्रिनुं अार्य छिवसने छुपावी देवानुं छे. 131
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भायावाहीयो माने छेडे सविदाथी ब्रम्म तिरोडित थयुं छे. पश या वस्तु तर्डसंगत सागती नथी. ब्रल्मनुं स्वउप तो स्वयंप्रदाश जने ज्ञानभात्र छ. प्रडाशनो तिरोलाव खेटसे शुं? तेना उत्तरभां जे राङ्य ताजो छे.अं तो प्रडाशनी उत्पत्तिने रोडी छेवी अथवा तो विधमान प्रदाशने नष्ट डरवो. पश भायावाहीजोना भते शुध्ध ज्ञान के जलम भूज स्व३प छे तेनी न तो उत्पति रक्य छेडे न तो तेनो नाश थह शहेछे. ते तो खेडरस खने खजंड निर्विडार रहे छ. तिरोधान मेटसे प्रङाशनो नाश मेव अर्थ उरीये तो तेनो स्पष्ट खर्थ से थाय हे सविधा ब्रह्मना स्व३पज्ञानने नष्ट दरवानी क्षमता घरावे छे. परा या वस्तु पए प्रतिपक्षीने भान्य नथी. जाथी सिद्ध थाय छेडे सविधा सने ज्रह्मना संजंध भायावाहओो तर्डसंगतपऐो दर्शावी शहता नथी. या आाक्षेपने तिरोधानानुथयत्ति उडे वाभा जावे छे.
(3) स्वशपानुंपपत्ति :-
खही खेड प्रश्न उठावी शजाय डे सविधानुं स्वउय डेवुं छ? सविधा लावइप छे डेसलाव३? ४ गतनी जधी ४ वस्तुने डां तो लाव३य जथवा ३प जेभ जे लागभा विलाकत दरी शहाय, जधी लावउप वस्तुओो पारभार्थिक सत्ता घरावे छ. डेभडे खसत्भांथी अंछ सतूनी उत्पति थती नथी. पए भायावाहजो सविधाने पारभार्थिड सत्ताना स्थाने भूडता नथी. अरणडे तेभना भते तो डेवण खेड मात्र निर्गुण ब्रह्म क सत्य छ खने जाडी जघुं सत् के मिथ्या छो.मे सविदा से ज्रह्म सिवाय डो सत्य वस्तु नथी तो पछी ज्रह्ममां प्रथंथश अभ उया छोने सीधो उलो थाय छे? अभ उत्पन्न थवा भाटे अोछ सत्यहोषनी ब३२ रहे छे. उहाय जेवो भवाज सायवाभा जावे डै अरभात्मड जह्म जाह नथी यशा ब्रह्मनुं क खेड स्व३प छ. तो तेनो खर्थ से थयो डे ज्रहम नित्य छे. भाटे तेना छोष वडे उत्पन्न थतो प्रथय के अभ पश नित्य डोवो भेसे खने तो पछी कव माटे भोक्ष भेणववो जशडय जनी भय छे. डेम के अभ नित्य टडी रहेशे.
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अ्रभ सतत्छोछ उही दूर नहि थाय मने परिणाभे कवनो उदी भोक्ष थाय नहि.
सविदाने लाव उप मानवाभा जावे तो तेने सविधा उछ रीते डडी शजाय ! सविदा सेटसे खज्ञान खने खज्ञान सेटसे ज्ञाननी गेरडाथरी, खज्ञानने भाव३प मानवुं से तो वहतोव्याघात थयो गणाय, जने के ज्ञानने लावात्मड् मानवाभा आावे तो तेनो कछि नाश थ न थाथ, डेमडे के लावउप होय तेनो क्रारेड डि नाश न थाय, खद्वैतीजों से वस्तु उजुसदुरेछ,ज्ञाननु ज्ञान वडे निरसन थह शहछ. साथी खज्ञानने लावउप पश न भानी शज्ाय वर्जी मे सविधा सलावउप सेभ जंने छे, तेभ उडीखे तो स्वविरोधनो छोष थशे, सने सविधा से नथी लावउप डे नथी आलाव३य खेभ जंने छे, तेभ उडीये तो स्वविरोधनो छोष थशे. ने सविधा से नथी लाव३य डे नथी खलावइय सेभ उडीसे तो ते तडने तिसांवसि खाथवा जराजर थशे मा आाक्षेपने स्व३पानुपपत्ति उडेवाभा जावे छे.
खद्वैतीजो सविदाने अनिवयनीय उे छ तेनु वर्शन दुरी शहाय तेभ नथी जेभ भशाये छो. या पए स्वविरोध थयो गशाय, आा विशोधभाथी भार्य डाढवा भाटे सद्वैतीओो उडे छे डे सविधा तेना पूर्ण खर्थभां निरपेक्षपऐो अनिरवयनीय नथी. तेने अनिर्वयनीय उडेवानो आाशय से छ डे तेने सतक्े असतत्तेभ जेभांथी सेड़ परा रीते
निइची शङाय तेभ नथी. अनिरवाय्यनो खही न तो सतते तो सतततेवो सर्थ
दुरवाभा जावे छे. परंतु या वस्तु पशा जराजर नथी डेमडे तेमा त्डनु लारोलार जून थतुं भशाय छे. अोछ वस्तुने सतत्तए नहि ने जसतक्ताए नहि सेभ उडवु मेटसे
शाब्हिड तर्डकण सिवाय शु नथी. 'सतक्तने 'असत होने परस्पर व्यावर्तड
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तेभष्ठ निःशेष मानवाना छ. ते पूर्णविरोधी छेसने संशविरोधी नहि अप वस्तु तो सतत्ोय जथवा तो जसतत्ोय, ते जे वय्ये होछ ती शक्षता रहेती नथी. वस्तुओो
विषेनुं आापशुं ज्ञान डा तो तेनी उस्ती विषेनुं होय अथवा तेनी गेरडाथरी विशेनुं डोय. जा उड्ीउतनो नडार ऊरवो से स्वयं वियारशक्िना नडार दुरवा जराजर छे. तडना नियभोनुं केम के पूर्णविरोध खने वर््ित मध्य या जंने नियभोनुं उस्संधन दरवा जरजर छे. आा खाक्षेपने अनिरवयनीयत्वानुयपातति उंडेवमा जावे छ
(4) प्रभाणानुथपत्ति :-
सविधा छे सेवुं ज्ञान भेजववा भाटे सापशाने डोछ प्रभाश भजतुं नथी. प्रत्यक्ष, जनुमान सने श्रृति-या त्रऐ प्रभाशोभांथी दशाथी सविधानुं अस्तित्व साजित थह शऊतुं नथी. रामानुभ्यार्य सविधाना अस्तित्वने साजित डुरवा भाटे शांदरभतवाहिखो के के प्रभाए जाये छे, ते जधानी परीक्षा दुरे छो सने जतावे छे डे ते जधा प्रभाशो खपूरता छे, सने तेभांथी अोछ प्रभाए सविधाने साजित डरी शडे तेभ नथी. उवे प्रश्न से थाय हे सविधानुं लान डेवी रीते थाय छे? तेने भरवी उछ रीते? तेनो प्रत्यक्ष थछ शडे तेभ नथी. अारण के डोछ वस्तु नथी. "हुं खज छुं" सेवो जनुलव दोछ लावउप वस्तुनुं सूयन उसता नथी, परंतु आात्माना ज्ञानना प्राशलावने क सयवे छ. ज्रहमने लावउप जज्ञाननो जनुलव उदायि थतो नथी. तेवी क रीते तेनुं खनुमान दरी शङाय नहि. अरण डे तेमां मध्यपछनी गेरठाणरी छे. नुमान द्वारा पशा डोछ
भावउप खज्ञान वस्तु सिद्ध थती नथी. अभभा यश असतत्तस्तु ज्ञान थतु नथी. परंतु
सतत्तवस्तुनुं ज्ञान (सतत्तयाति) अभभां थाय छे. स्वप्नावस्था, भेड यंद्रने स्थाने जे
यंद्र हेजावा, सईह शंज पीणो हेजावो वगेरे जया प्रहारना अरभ सतज्यातिना ४ सूयद छ. भायाने श्रृतिना आाधारे पश स्थापी शङाय तेभ नथी ड ते तो जेभ निउपश दरे
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छे डे माया से छश्वरनी शक्ि छे. तेवी भहुछ शक् के के साथी छे ते वडे भायावी छश्वर जा भगतनुं जरेजर सर्वन दुरे छे. जाथी सविधा अभात्मड़ नथी. परंतु साथा भ गतनी सायी शउय छ.जाथी भगत भाया हे मिथ्या नथी परंतु सत्य छे.
श्रृतियोभां भायावाहनुं निइपश थयुं छे तेभ उडी शङाय तेभ नथी. श्रृतियोमां "अनृत" शष्द अनिर्वयनीय सविधा (भाया) ना अर्थभा नहि परंतु आासक्ियूर्वड सांसारिड पहार्थोमा छरछा घरावी उरवाभा जावेसा दर्मना सर्थभा वापरवाभां आावेस छे. तैतरीय वगेरे श्रृतियोभां सतत्तमने असतत्ताष व्यष्टि३य थित
जने सयितत्त सर्थभां प्रयोभयेस छ. जसतत्ो खर्थ डेवण सव्यादृत, सव्यक्ष पहदति
छ. परंतु शांडर भतना अनुयायीजो भाने छे तेभ प्रदृतिन अर्थ सहसासक्निर्वयनीय
भाया सेवो नथी शवेताश्वतर उपनिषहमा पश भाया शण् पहटतिना सर्थभां वपशायो छे. भाया सेटसे विथिन सृष्टि उत्पन्न ऊरवावाजी शश प्रदृतिने भाया उडेवानुं डारण खे छेडे तेना वडे या वियित्र सृष्टिनुं निर्भाण थाय छे. भाया सेसे मिथ्या मेवो सर्थ थतो नथी. गीता तथा पुराओी वगेरेभा पए भायावाहनुं प्रतिपाद्ठन थयुं छेसभ साजित थह शहतुं नथी. जा जाक्षेपने प्रभाशानुपपत्ति उडेवाभा जावे छे
(s) निवत्तङ्ानुपपतति :-
सविधाने कोछ छूर दरी शड तेभ नथी. सद्वैतजो सेभ माने छेडे निर्गुए अने निर्विशेष प्रह्मज्ञाननी प्राप्तिथी सविदा निवृत थाय छै. सविधा दूर थह शड छे, परंतु खा प्रदारनुं प्रह्मज्ञान शक्ष ४ नथी. परस्पर लेहऊ़ तत्व तथा निर्णायडता से तो ज्ञान भाटे अति सावश्यड वस्तु छ. शद्धहात्म्य से तो मात्र सभूर्तता ४ सूथवे छे. ताहात्म्य उमेशा लेह द्वारा क सूयित थाय छे. खेड़ता विविधताना संहर्लमभां ४ सम शङाय छे. साथी निर्विशेषे ने शुद्ध शिह तत्व (अभूर्तन) ज्ञान थ शहतु नथी ने
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आा प्रडारनी गेरडाणरीभां सविधा दूर थह शऊती नथी
श्रृति सेम उडे छे डे ज्रम्म सङ्स उपादेय गुश विशिष्ट छे. जने सगुए सविशेष ब्रम्म (हव2)ी उपासना द्वारा ४ भोक्ष प्राप्ति थाय छे 'तत्त्वभसि' थेवा महावाश्नो सर्थ पए निर्विशेष वस्तुमोनी भे़ता ेव थता नथी 'ततक्तशण्दनो खर्थ सर्वज्ञ, सतकंडत्थ, भगत्डारण जह्म छे खने 'त्वं' यह-
थितक्तजयितक्त विशिष्ट कव शरीखवाणा ब्रहमना वायड छे. सेड़ ज्रह्म जे प्रडाशोभिा
स्थित होवाथी जाभ समानाघिडरण (जे विशेषणोनुं क्यारे भेड़ साभान्य विशेष्य डीय छे त्यारे तेने समानाघिहार उडे छ) दरवामा माव्युं छ. खावा भहावाओ्रोनो अर्थ डोछ जज्ञान डुस्पित अमने जाछ डरवानो नथी. परंतु खेड़ जरहमने जे प्रडारे स्थित जताववानो छ. समस्त भगत छश्वरुं शरीर छेने इश्वर जधानो संतर्याभी छे. छश्वर सविशेष छे. भावी निर्विशेष ब्रह्मनुं ज्ञा भोक्षहायड जनी शड तेभ नथी आा आाक्षेपने निवर्तअनुपपतति उडेवाभा जावे छे.
(9) निवृत्यानुपपत्ति :-
जापऐी भागण भेयुं छे डे सविधानी निवृत्ति थह शडे तेभ नथी. सद्वैतीजो खाथी क सविाने लावउय माने छेभावी भावप वस्तुने डेवी रीते हूर दूरी शङाय? के वस्तु जरेजर उस्ती घरावे छे तेनुं अस्तित्व ज्ञान द्वारा डेम भिटावी शहाय? कवात्माना जंधननु ज३ अारण तो उर्भ छोखने उर्भ से भूर्त सत्ता छ. क मूर्त ज्ञान द्वारा दूर दूरी न शङाय तेने तो ऊर्म, ज्ञान, लक्षि खने हश्वर दया वडे क छूर दुरी शङाय क्यारे दर्भनु जंधन दूर थाय त्यारे कवात्मानुं खज्ञान परा नाश पाभे छेसने छश्वरनी ध्याने जाधीन सेवो कव तेनी द्पाथी तेभष्ठ लक्षिथी अज्ञानभांथी निवृति भेजवी शडे छे, खने परिणाभे भोक्ष भणे छे. भायावाहीजोना भत जनुसार जञाता, ज्ञान
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खने ज्ञेय जघु मिथ्या छे. पश शुं भिथ्याज्ञानथी क्रारेड भायानी निवृति थह शडे जरी? जा मिथ्याज्ञान परा डोछ जीभ प्रहारना ज्ञान द्वारा दूर थवुं भेहसे खने ते ज्ञान इरी सन्य ज्ञानथी, जाभ संते जनवस्थादोष थाय छे. भायावाह अनुसार सविधानो नाश थवाथी स्वयं जञाता पहा जञाता तरीडे रहेतो नथी. तेनो सय थाथ छे. तो मेवो डोए। दर्ता हशे हे के पोताना सय खर्थ ऊर्भ डुरे? ा खाक्षेपने निवृतत्यानुपपत्ति उंडेवामा जावे छे.
साम उपर भेयुं ते भुक्ज राभानुभनयारये भायावाहनुं सजत राब्होमा जंडन क्रु छे. आाठ सुधी मायावाह उपर ऐेटसा जाक्षेयो थथा छो ते जघा उपरना सात जाक्षेयोभा सभाह भयछे
सही जेभ उही शङाय के सविधा के मायाने ध्यानभा राजी सद्वैती पर खा जधा जाक्षे यो सविधा के भाया शण्ना साथा अर्थने सभ न शङवाने डारणो भुडाये सा छ. या खाक्षेयोना प्रत्युत्तर पम खदवैत भतवाहीजो तरइथी जायवाभा जावया छ. ० टूंडमां नीये भुरज छे.
राभानुभयार्ये दरेसा जाक्षेपोना प्रत्युत्तर :-
(१) राभानुभ्नयार्य प्रथम आाक्षेप जाश्रयानुपपत्ति डरवा कता जे लूस डरे छ. खोड़ तो रामानुष्ठ प्रथमथी जोटी रीते सेभ भानी से छ डे माया नामनी दोछ वस्तु छेसेने भाटे तेनो डशोड़ आाश्रय Locus होवो भेजे.परंतु जरी रीते भोता माया हे सविधा से डोछ वस्तु नथी, सविधा सेटसे विद्या डे ज्ञाननुन होवु ते. माया जेटसे नथी ते केम साउडाभा ्न रहेसो छे,परंतु तेने ज्ञान नथी. से वु रीते जापएो जरेजर ब्रहम छीसे पएा जनेड उपाघियोने सीधे आापशाने शुद्ध ज्रह्मनुं ज्ञान थतुं नथी.
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रामानुकनी जीक लूस से छे डे तेजो जलम खने कव सेभ जंनेनु प्रथभथी द्वत मानी सह खाक्षेय कुरे छे. जहं भोता कव खने ब्रह्म सेभ जे ससग तत्वो छे४ नहिं. शरीर, मन, छन्दिय वगेरे नेड उपाधियोथी घेराये सो जेवो ब्रम्म से व छे. क्त्तकक्तकक्तक्तककतजनना उपाधिजोथी ज्रह्म, कव
तभषठ परमात्मा सेभ जे उये विलक्ष यह भय छे से उंडेवु से ससंडारमात्र छ. सविधानो आाश्रय शोछे? तेनो उत्तर से छेडे सविधानो आाश्रय उपाघियो adjuncts &.
(२) जीभे खाक्षेय तिरोधानानुपत्ति डरवामा पश राभानुभार्थ भायावाहनो खर्थ जराजर सभ्ता नथी. खज्ञान से अाँछ सहात्मक डे लावप वस्तु नथी डे के वस्तुत्वनुं तिरोधान दरी शडड, खज्ञान, सविदा डे भाया विगेर शठ्हो मात्र न्यूनता खने सलाव जोधड़ छ. सापशो खात्मा नित्य, स्वयंप्रआाश जने थिह३य छे. परंतु ते जापएो भराता नथी. जने से ु जाु खज्ञान ने सविधा छे. सज्ञान से मात्र ज्रम्मात्मड्लावना ज्ञानने तिरेडित डरे छे,ज्रह्मने नहि. प्रह्मना प्रडाशने ते नष्ट दरी शहतुं नथी. ज्रह्मना स्वयं प्रदाशित्वने सविदा अछ हानिदूरी शङती नथी. द्ेवण ते स्वयं प्रडाशित्वना अपशोक्ष उपना अनुलव दरवाभांथी ते जापऐोने रोडे छे
(3) त्रीमे खाक्षेय स्वउयानुयपत्ति पश तुश्छ छे. भायानुं पारभार्थिड दष्टिसे अस्तित्व छे० नहि, परंतु व्यवहारभां भायानुं अस्तित्व आापऐो स्वीडारीखे छीसे. भायानुं व्ययहारिड सत्य छे. भगत से व व्यवहार खने व्यवहार जेटसे कगत. भाया शुं छे? सेवो के रामानुक्ठनो प्रश्न छेते सतिप्रश्न छे. संसारमां हरेड़ वस्तुनुं आापऐो डारण पूछी शडीसे छीसे. भायामां रहीने ४ प्रश्न पूछी शङ्ाय पश जा निभितात्मड प्रश्नथी जापएो प्रथंथ, मेटसे
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के भायाना क्षेत्रनी जहार थछ शडीसे नहि से प्रयास असवाथी जापएी विउध्ध त्डो Antinomies नी भजमां इसाछ कहसे छीसे, खने तत्त्वोनो पतो सागतो नथी भाया डे प्रथथना क्षेत्रभा वस्तुभात्रनुं अारण भणी आावे परंतु स्वयं भायानुं अारण भेजववुं खशक्य छे. सत्यना छोष विना अभ उत्पन्न थह शऊतो नथी, सेवो रामानुक्ठनो जाक्षेय मान्य यह शहे तेभ नथी डेमडेके खायऐी ब्रह्मनी जीक सेवी अोछ वस्तुने सत्य मानीशुं तो द्वैतलाव थशे सने श्रुतिप्रतिपाहित सद्वैतथी तेनो विरोध थशे.
(४) योथो आाक्षेय अनिरवयनीयानुपपत्ति पर्थी जेभ कशाय छे है रामानुक् सद्वैतना सिध्धांतने जराजर रीते सभ शहा नथी. सत् ने सत् शुण्छ सामान्य रीते सेडजी भना विरोधी शब्हो छे.छतां खेड क वस्तुना संहर्लभां ते योग्य रीते वापरी शङाय छ. अनिर्वयनीय शष्दो योग्य अर्थ सभ सेवो ४३री छ. भायाने जापऐो सत् जेटसा माटे उंडेता नथी है ते खात्मानी भेभ सर्वडाणमा हस्ती घरावती नथी. ज्ञाननो उधय थता ४ ते नाश पाभे छे. खात्मा जीवनाशी, सविदारी खने तऐ अाणभा उस्ती घरावे छे. ते देवण सत् छे. भाया से सर्वथा जसत् पएा नथी, अारएा है ते प्रत्यक्ष नुलवाय छे. वन्ध्यापुत्रीनी भेभ ते सर्वथा जसत् होत तो अार्य उत्पन्न परत नहि, भाटे तो त्कतता७ द्वारा तेनो संडेत
दुरवाभां जाव्यो छे. तात्पर्य से छे हे ते होछ डवार छोसने डोईडवार नथी, मेटसा 9 भाटे ते सनिर्वयनीय छे.
(4) पांयभा जाक्षेय प्रभाशनुथपत्तिनो उत्तर से छे हे मायाने क्यारे जाथऐ सहू वस्तु तरीडे मानता नथी तो पछी तेना अस्तित्वनुं प्रभाए आापशी पासे भागवानो जर्थ नथी. भेमायानु जरेजर सस्तित्व स्वीअारवाभा जावे तो प्रभाश जायवानी ब३र उली थाय, भायानो प्रत्यक्ष अनुलव थाय छे ते छ्शववा
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भाटे होछ तर्ड कणनी ४३२ नथी. सविधा से शुं छ? ते भेड स्वयंसिध्ध उडीउत छे. नित्य शुध्ध, जुध्ध खने भुक्त सेवों के द्ेवज खात्मा छे, तेमां जाह भगत तथा शरीराहिना गुणो तथा संजधोनुं भिथ्यारोपशनु नाभ सविधा छ. डेटसीड श्रृतिओोनो भनगभतो खर्थ दरीने सेभ जनुमान डरवुं के जधी क श्रृतियो आवो ४ खर्थ दुरे छे ते योग्य नथी. जाथी भायावाहनुं निरसन थह तु नथी े श्रृतियोनो तेभऐ खाश्रय सीधो छे तेनो तखो गभे ते जर्थ रे परंतु भायावाहने तेथी कोछ क्षति पहायती नथी. े श्रृतियो सिवाय खनेड श्रृति वाडयोना सवतरणोथी भायावाह स्थायी शङाय छे. राभानुष्ठ तेनो शो अर्थ उरशे ? भे है वास्तवभां से श्रृति सिद्ध छोड़े खेड़ खने खद्वितीय परष्रमम विना जीभु अछ छे० नहि खने ते परज्रह्म से क जायशो जात्मा छे, तेम छता सायऐो जेम उडीसे है सापऐो ब्रह्म नथी खने ब्रह्मथी जन्य अँधड़ वस्तु छीसे खने के जा सर्व प्रथंययुक्त भगत के केमां खापएो रहीसे छीसे से सत्य छ. तो पछी सायए छुन्वयी अनुलवरभा तथा वास्तविड् सत्यताभों के तझ्ञावत छे तेनुं अारण शुं? से जताववुं सावश्यड छ. शुं ते खेड़ खहलुत घटना नथी? से सायुं मज्ञान मात्र छ, मिथ्यारोय छ. ते ४ खहलूत सविधा डे भाया छ. से सिवाय आापऐो डशु डडी शडीसे तेभ नथी
(5) जा छटा आाक्षेप निवतअानुयपततिनो साधार से छोड़े परजल मे निर्गुश निर्विशेष नथी. या हड़ीउतनी साजिती भाटे श्री रामानुभयार्य खने श्रृतिवयनोना जाश्रय से छे. परंतु भेभ अनेड़ श्रृतियो सगुश सविशेष ब्रम्मनुं नि३पणा दुरे छे सेम जीक डेटसीड श्रृति पर निर्गुश, निर्विशेष ब्रम्मनुं प्रतिपाहन यएा दुरे छे. उवे भे जने प्रहारना श्रृति वाड्योने परस्पर खेडजी भथी विशध्ध भानीये तो श्रृति वयनोनो साथो अलप्राय क्यो ? आया वयनने प्रभाश भानवुं ? शंदरायार्य उहे छे ते तो जुद्धि द्वारा श्रृतिवाओ्योनो साो अर्थ तारवी शहाय छे, ड
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तर्डथी श्रृति वयनो योग्य रीते सभभय छे. तेभना भत अनुसार सगुण ब्रह्मनुं निउयश परती श्रृतिओोनो सभावेश सपरविद्याना क्षेत्रे थाय छेसने निर्गुश ब्रह्मनुं निउपण परती श्रृतियो पराविद्याभां सभाय छ.व्यवहारभा जाय लसे बह्मने सगुण मानीसे परंतु उड़ीउतमा तो ते निर्गुण क छ या उपरांत "तत्वभसि' केवा भहावाओयोनो रामानुष्ठ के र्थ दुरे छो ते योग्य नथी. सविधाने स्वीडार्य विना से भहावाअयनो खर्थ पहा युक्तिसंगत जनतो नथी. खेड़ व ज्रह जे विशध्ध प्रडारोभां स्थित छे जेभ उंडेवुं से क्यां सुधी से जे प्रदारोभांथी ेडने जसत्य, मिथ्या अने भायाहृत न भानीसे त्यां सुधी युदत संगत नथी जनतु थित खने सयित से परस्पर विरोधी गुणो छ. जंने ब्रह्मना सत्य प्रडार छेसेम मानी शङाय नहि. संसारन परमात्मानुं शरीर मानवुं से ईसत सर मात्र छे परभात्माने सभस्त हेयगुण विशिष्ट मानीसे, ने सत्य भानीखे तो संसारभा सधर्भ, होषो गेरे छे तेनुं सभाधान डरवुं भुश्देस जनशे.
(9) सातमो आाक्षेय नित्यानुपपतति छे. सायला दर्भजंधनो खात्मज्ञाननो उहय थाय त्यां सुधी निःसंदेड सत्य सागे छै. जी वस्तुओो ए यथार्थ सागे छे सने व्यवहार अवस्थाभां तेने सत्य पएा उडी शङाय, 4श परभार्थतः ते ससत्य छे. भायावाह भुक्ज के पुरषे ब्रह्मतत्त्वनी जपरोकष३पे जनुलव दुरेस छे तेने उर्भना जंधनो जांधी शहता नथी सावा मनुष्य छरछरीउत, निःसंग जनी अोछ उर्भजंधन थाय तेवुं दर्भ दरता नथी. उर्भना नियमो मात्र व्यावहारिड भगतने सागु पडे छे. ते ब्रह्मज्ञानने उत्पन्न दरी शड नहि, ने तेथी भोक्षना साधनउय पश न गएी शङाय, अर्भ स्वयं नाशवंत छे. तेनाथी सत्यनी उछ रीते उत्त्पतत्ति थाय?
केजो तात्विड़ वियारणा ऊरवा जसभर्थ छे, तेभना भाटे डर्भ जन उपासनानो मार्ग छे. ईश्वर अनुग्रह graceनो वियार पश योग्य नथी. 141
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न्यां सुधी पूर्ण सैड्यलाव न स्थपाय त्यांसुधी अनुग्रपशा संभवित नथी. ज्रह् जने खात्माना सेडयना ज्ञान विना भोक्ष राजय नथी. ज्ञान विनानु दर्भ ने उपासना आापशने ते माहर्श सुधी पडोंथाडी शडे नडि.
जञाता, ज्ञान खने झेयनो तझ्ञावत पारभार्थिक दष्टिये ससत्य छो.परंतु व्यावहारिड़ ददष्टिसे सत्य छे. सविदाजाघड़ ज्ञान मिथ्या नथी. डारएा हे०े मिथ्या होय ते सविधानो जाध दरी शडे नहि स्थूज दृष्टिजिंहु मनुसार ४ने ज्ञान उडेवाभा जावे छे ते सविधानो हूर ऊुरवा भाटे अशन्तमान छे. ब्रह्मज्ञानभां ज्ञाता, ज्ञान खने जयनो लेह क नष्ट थह कय छे.
उ.१3.२: भायावाहनी श्रीभद वस्समायार्यनी टीका :-
शंङरायार्यना भायावाहनी रामानुभमयाये हुरेसी टीड़ा खने मा टीडाजोना सद्वैतभतवाहीजो तरइथी जायवाभा जावेसा प्रत्युतर भया जा उपरांत शंदरयार्थना भायावाह साभे श्रीभद् वस्सलायार्यक से एा टीड़ाज दुरेसी छै.जा थएा २ण दरवी सावश्यड छ. तेथी सही जा टीडाजो न्ेु रवामा आावे छे
श्रीभहू शंङ्रयार्यनो भायावाह श्री वस्सलायार्यने स्वीडार्य डु मान्य नथी. तेभना भत जनुसार शंडरयायनु ब्रम्म "डेवस" इडेवाता छता वस्तुतः प्सूषित सेटसे के भाया वेष्ठित जनेस छे. राभानुभनयार्य नुं विशिष्ट ज्रल्म 4श विशेषणोथी अशुध्ध जनेस छे. भाधवायार्यना द्वैत सिध्धांततो श्रृतिथी वि३ध्ध ४छ. जरो सिध्धांत शुध्ध सद्वैततनो ४छे. सेटसे के खद्वैत पहार्थ ज्रम्म ते उभेशा शुध्ध ने शुध्ध रहीने भगत३ये परिणाभे छो, खने तेभांथी केवी रीत अग्निभांथी तरजा नीडजे छ, तेवी रीते कव नीडणे छ. सेटसे डे ब्रल्मभां भाया३पी भिथ्यात्वना तत्त्वना सहु यएा जवडाश नथी के अाछ लासे छे ते परमात्मा क लासे छ खने वस्तुतः भासे छे
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ब्रह्म परिणाभ जेटसे हे विडार पाभवा छता विडार रडित छे तेनो जुसासो भायाथी दुशवानो नथी.
श्री वस्सलायार्यना जा भतने सविदित परिणाभवाह तरीडे जोजजवाभा सवे छ. ेवी रीते सेनाभांथी खनेड घाटो घडवा छता सोनुं े सोनुं क रहे छे तेम भगत से ब्रह्मनुं ब्रम्म ४ रहेछे. तखो गत प्रथंथने भिथ्या नहि,परंतु सत्य माने छे, परंतु खहंता भभतात्मऊ संसारने भिथ्या भाने छ.श्री वस्सलायार्यक माने छे डे भुगतनो जुसासो भायाना सिध्धांतथी थह शह नहि डेम डेजल पोते ४ परस्पर विशध्ध धर्भनो आाश्रय जनी शडे छ सने ब्रह्मनी से शक्ति के सीसा छे. श्रृति पए विषय वगेरे विडारने भिथ्या नथी उडेती, परंतु घट से भृतिडाउपे सत्य छे सेभ छशे छे. कवनुं खहं खने भमत्वशय खज्ञान से क सविा छ.ज्रह्मनी माया जेसे ब्रह्मनी सीसाशडिति तेभना तथा तेभना अनुयायीजोना त भुकज माया से तात्विड सिद्धांत नथी. माया जेसे कवनुं खज्ञान, जा भाया वडे जुदधि पर भावरश जावी भय छोसने ० ने परिणाभे माएास छश्वर साथेनो पोतानो संबध लूसी भय छ. वस्सलायार्थ डंडे छे के भायावाहनुं प्रतिपाहन तो वैराग्य भावना उत्पन्न दुरवा माे दुरेसु छे
शंङ्रायार्य भतना अनुयायीजो भगतने भायिङ ने नाशवंत माने छे तेभष्ठ भायाना संजधयी ह्म भगत अारएा छे, भायाना संजंध विना ज्रल्म कगतनुं डारएा नथी 9 खेम उहे छे, यएा खानी साभे से टीड़ा दूरी शङ्ाय के माया भन्य छे डु खनन्य ? (१२५)
भे बुन्य छे खेभ उडीसे तो तेने उत्पन्न दुरनार डोएा से सवास उलो थाय छेसने सृष्टिना माहिडाणमा जीणु अछ नहि होवाथी ब्रह्म क तेनो उत्पन्न उरवावाजो छे, सेभ उडीये तो ज्रह्मने के निर्विशेषपणुं; सर्वधर्भ रडितपाशुं छे तेने जहसे
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सविशेषयणुं भायाने उत्पन्न डरवा ३५-धर्भ सडितपशुं ब्रह्मने सागशे, तेवी क रीते 'भाया सनन्य छे' सेभ उडेवामा जावे तो ब्रम्म खने भाया सेभ जे तत्वो ने जंने अनन्भा थशे खने तेने परिणाभे द्वैतनु स्थायन ने सदैतनुं उछहन थशे भायाने उहायित्याशुं छे सेटसे हे ते आ्यारेड होय मने ्यारेड न होय सेभ पश मानवुं शक्य नथी, डारण डे तेम उहायित् पशुं थवाभा पशा डोछड अारण तो होवुं क भेजे ते ब्रह्ममां छे' तेम उडी शङातुं नथी. जा भगत पहेसा जात्मउय ४ उतुं. श्रृतिनो जाध जाववाथी माया जनाहि सने सांत छै, जेवी हसिस दुरवी पएा राज्य नथी. े मनाहि होय ते खनंत पएा होय सेवो नियम छे, सेटसा भाटे भायाने जनाहि मानवाभा भावे तो तेने अनंत पए मानवी पडशे मने तेभ थता आ्यारेड तेनुं निरसन शाक्य नडि जने भायावाहीना मनभा अार्य-डारएमा सांडर्य सिद्ध थाय छे तेनी निवृति भाटे श्री वस्सलायार्य कसे खद्वैतने शुध्ध यह विशेषउये योेसु छे, तथी शुध्धद्वैत सिद् रेु छ. शुद्धद्वैत यहभा क्तक्तक्ततक्रक्तकतक्रक्तकने प्रभाण दर्भधारय सभास थशे,
ने त्तकक्तत्तक्तक्रक्तककतमं ने शुध्धनुं खद्वैत सेवी रीते षष्टी तत्पुउपे सभास थशे, भेवुं
पंडितो नि३पणदरे छे.
भाधवायार्यना मत जनुसार भाया से विषणुनी स्वउपश्त Natural Power छ. खा शक्तिनी विषणु भगत उपर निगम उहे छे. तेनुं विषशु साथे ताहात्म्य होवा छतां विशेषे डरीने तेने लिन्न भानी शङाय, विषुथी विषणुनी शक्ति हुही छे, परंतु तेना आाश्रये रहेसी छे.सने नित्यभु्त छ. लेहने मात्र निउयनार के मिथ्या दर्शावनार शंडरायार्यनो डवसाद्वैतवाह भध्वायार्थने स्वीडार्य नथी. जा उपरांत सद्वैत खलेहने थोईं यमा मान जायनार रामानुष्, निम्जार्ड वणेरेना विशिष्ट द्वैतने द्वैताद्वैत-लेछालेह वगेरे सिद्धांतो पए तेभना भत जनुसार जोटा छे.जरी रीते े नाना जेटसे लेहवाजुं छे तेने नाना थेवुं जेटसे के इस्त लेहनी छायावाजु क भेवुं से लुस छ. सेटसे डे लेहने वास्तविड् मानवानी श्रृतिनी आाजा छे. 144
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जा उपशंत यैतन्य कवगोस्वाभी खने जसहेवना तत्वज्ञानभा यएा भाया खने सयर शक्तिनो सिध्धांत रहेस भेवा मणे छै. आाया से प्रदुतिनु जीनु नाम छोखने खयर शक्ति द्वारा सविलकत ज्रह्म, कवोभां विभु्त ने छोसने पोतानी खेड़ता तेमनाथी छुपावे छो सने सेाथी याछा कव ह्वर साथेनी खेड़ता मनुलवे छे. खाभ जा दर्शनभा माया तेभष्ठ अयर शकत जंने सत Real छ खने ६रनी शकि्तियो छे. जौद्ध दर्शनभां पश भाया तेभ्ठशण् सत् पए नहि ने असत् पए नडि तो कोह डवार सत् खथवा ससत् जेभ जंने सर्थरभां वपरायेस छे.
भायावाहना उटु खासोयडीमां महर्षि खरविंहनुं नाम पाशा जूज४ जगत्यनुं जने भोजरानु स्थान लरावे छे. तेभना नुयायी श्री संुलाह पुराशी भुआावे छ हु (१२9) "भायावाह तरीडे के वेछुत प्रयसित छे तेभां खने उपनिषछोना वहतव्योभां पश छर छ. छाजसा तरीडे छशोयनिषद्नो शह्जातनो मंत्र "जा सघणु छशने रडेवानुं रहेठ:श छे" से जतावे छ हे तेनी दष्टिसे भगत से भाया नथी. तैतरीय उपनिषहमा खन्नने ब्रम्म स्व३य विस छे.ब्रहमये हेजाय छो सेभ इंडेस नथी, जा उपशंत उपनिषदोभां पश भगतन तथा सर्व पहार्थोनो त्याग क डरवानो उपहेश जापवाभां आावेस छे. तेवुं भानी शङाय नहि, ड्रेम डे भुझ्तात्माना सक्षणोमा सर्वस्व त्याग दरवानी शक्तिनुं वर्शन जावे छे. तेटसा प्रभाएभां तेने पहार्थनी सभृद्धिवाणो लौतिड पहार्थोनी आानंह लोगवनार थएा उडेवाभा जावेस छ.शेता श्वतर उपनिषहमा "तुं पु३ष छ" खेभ उडेवामा जावेस छे, परंतु तुं पु३ष३ये हेजाय छोसेभ ड बुं नथी.
जा उपरंत भायावाहनी के जन्य जाभी से छे डे भायावाह जनुसार जवतारवाहनी समुती भेजववी खशक्य जनी भय छै.भे खा विराट रहेसो सभस्त विश्व भाया जने तेथी भिथ्या होय तो लगवान जेवा भगतभा सवतार शा भाटे धारण ऊरे? तेनाथी तो छूर रहेवुं क वधारे साइ भे खेभ मानवाभा जावे है 145
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भगवान प्राशीजोने सज्ञानभा राजवा माटे सवतार धारणा दुरे छे. तो ते सृष्टिनी उत्पति भाटे भवाजहार सेवा भगवान पोताना प्राशीजोने से प्रभाश भी भेहन अज्ञानभां सजडवा राजवानो प्रयास दुरे छोजने या सृष्टिना भूणभांथी भाया३पी ज्ञानना तत्वने प्रवेश ऊरवा छछने ४ नहि पणा पछी स्वयं से सौडिड भगतमा सवतार धारण उरीने भनुष्यना अज्ञानने थिरंकवी ऊरवानो प्रयास दरे छेसेभ मानी शङाय तेभ नथी.
सांप्रत सभयभा भाया डे सज्ञात केवा शब्होनी परंपराथी यास्या जावता प्रयसित जर्थोने जहसवानो सभय जावी गयो छै. अज्ञान सेटसे भा जसत्य है मात्र माया सेवो थतो नथी, परंतु विश्वमा छश्वरनो दविव्य तत्वनो के उभे हमे आाविलाव थह रहो छे ते भेता विज्ास पाभी रडेसा सर्वजताये पोताना पर भुद्ेस स्व भर्याहाजोनुं परिशाम से खज्ञान सेभ उडेवु भे से ज्ञान ेटसे परिभित ज्ञाननी सीसा, ज्ञाननो अत्यंतालाव नहि.
शंद्रायार्यना भायावाह साभे अनेड़ विशोधी सूर उला हता ७६ाइरए। तरीडे वैष्णव संप्रहायभा ड्यारेड पए भायावाह स्वीडारेस नथी. जा उपरांत शांदुर भतभां सृष्टिनी उत्पति दरनार पएा पोते मिथ्या सेवी भाया शक्तिनो के स्वीडार दरवाभा खावे छे; ते तांत्रि भतवाणा पएा मान्य उरता नथी. तेखो लगवाननी जाधा शकतिने विश्वना अंतिम परम सत्य तरीडे माने छे. आाभ तेखो भायानु स्वप साव जहसी नांजे छे.
भायावाहना डेटसाड गेरसालोने पए श्रीपुराशी छर्शवे छे तेमां भआावे छड "भायावाह जुद्धिशाजी वनभंडणमां प्रधान थयो जने परिणामे कवनमा 9छाुछा क्षेत्रोमांथी डेटसीड उतभोत्तम व्यड्तिजो दूर थवा सागी. तेभ छता कवनना क्षेत्रभां योग्य नेताजोनी जाभी खने प्राशनी हरिद्रता हेजावा सागी, खने तेनो साह
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आायणा सभाठनी जनवान व्यक्तियोने साभर्थ्यपूर्वड आार्षतो उतो. वेहांतना वाह सने व्यवहार भीभांसा खने कवन वय्थेनो तज्ञावत घीमे धीभे वधवा साग्यो खने तेना परिणाभे "वेदांती" से शण्द विथार अने वर्तन वश्येनो लेह छ्शावनार व्यक्ति भाटे भश्दरी तरीड़े वपरावा साग्यो, "जेहांती" सेटसे याववाना खने हेजाडवाना वुहा से व्यवहा३ जयलंश स्वइप तेनु स्पष्ट उ६ार३ पाडे छ. या उपरांत कगतना भिथ्यातत्वोनो वियार मात्र संन्यासीजोनो ४ नहि परंतु साभान्य भाएासोमा पर प्रयकित उतो. भायावाही े हिन्दु धर्मनुं सार छे सेभ तेखो मानी सेता उता. सेवा सोडो पोताना कवन विग्रहमांथी जने वास्तविड हुःजोभाथी छूटवाना उपाय तरीडे भायावाहनो ाश्रय सेता उता सने से रीते भायावाहनो खर्थ पए दरता हता परिणामे लौतिड दृष्टिसे केने प्रगति डे साउस वगेरे उडेवामा सावे छे तेने प्रे२। जापनारी शक्ति जोछी थवा सागी उती.
साम उपर कशाव्या भुकज लिन्न लिन्न हार्शनिडोसे भायावाहनी उटु जासोयना दुरेसी भेछ शहाय छे. तेभ छता श्री अरविंहना अनुयायीजो भायावाहना व्यावहारिड उपयोग तथा तेना प्रदाननी परा नोध से छे. श्री संजुलाह पुराशी शांडरवेहांत खंगे भशावे छे डे शांडर वेहांते हिन्दने साक्षत्डारनो के डिंभती वारसो आाप्यो छे तेने अवगएी शङ्ाय तेभ नथी. भानवनुं तथा विश्वनुं जिनसंगत खने तटस्थ दर्शन भायावाह दुरावे छे-भायावाह माएासने खात्मा तरीडे क बुजे छोखने खात्मा शुद्ध भु्त सने दिव्य छे खेभ भाने छे. साभ मानववनी दिव्यता स्वीडारी जीक जाणुथी सैडिड भडताने धन, सतः, लोग वगेरेने भायावाह क्षुद्र जने तुश्छ गऐ छै. तमा क्षणिड़ सैश्वर्य खने समृद्धियो रता खात्मानी माध्यात्मि समृद्धि ते अनंतगएी यडियाती माने छे. भायावाह मानवने से जोध साये छेछ डेकवननी भायामा परस्पर जगडता इन्होमां खात्मानी तटस्थता, निष्ठियता खने सभता भजवशी भेसे
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भायावाह मानवनी ददष्टिने अनंतनी उपर ठेखे छे सने सभस्त व्यावहारिड कवनने से दर्शन वडे नियत डुरे छे. (१२७)
उ.१४: ज्रम्म सूत्रभा भायानो ज्यास :-
श्री जाहरायणना ब्रह्मसूत्रोभा 'भाया' शण्दनो प्रयोग सड़वार थयेसो होय तेवु भेवा मणे छे. तेवी क रीते खन्य खेड़ कग्यासे मायाना ज्यासनो जाडडतरो उस्सेज थयेसो भेवा मजे छे. (१८) जा उपशंत खेड़ भग्यासे "जालास" शण्ह नो प्रयोग पम उरवाभा जावेस छ
ब्रल्मसत्र परना शांडर लाष्यभा "भाया" शष्नो प्रयोग धशी भग्यासे थयेसो भेवा भणे छे. उवे ज्रम्मसूत्रार भायावाहनुं स्थापन दुरे छेडेडेम?या खंगे भारतीय हार्शनिडो अंगे पाश्यात्य विद्वानोभां भतलेह भेवा भे छै
डॉ. थिजो तेभना वेदांत सूत्रो- शांदरलाष्यना अनुवाहनी प्रस्तावनामा भूआावे छे डे ज्रह्मकन्डार भायावाहने टेडी जायता भशाता नथी. वेहांतनु ध्येय ब्रह्मज्ञाननी प्राप्तिनु छसने प्रह्मज्ञानथी भोक्ष भे छे.प्रहमज्ञानी परिलाषा जायतां सूत्रऔार भआावे छे हे के वडे भगतनी उत्पति, स्थिति ने सय थाय छे ते ज्रह्म छ. क्त्तकतकत्तकतकक्ततनरक खा भत भायावाहीजोना भत साथे सुसंगत नथी. ज्रह्मनी
जा रीतनी व्याज्या शांडरभतभा ड्यांड भेवा भणती नथी. भायावाहभां ब्रह्मनी व्याज्या खेड़, खजंड निर्सय, सश्यहानंह, हेश अासातीत, स्वयं यैतन्य स्वइये सेभ सायवामा जावी छे ज्रह्मसूत्रडार भे भायावाहना पुरस्डर्ता तो भायापहिय ज्रम्म डे सपरज्रसमने योग्य रहे तेवी व्याज्या आापत, परंतु क्तत्तकतकत्ततकक्ततननसेभ न डडेत.
जा उपशंत सूत्रडार २ःःए भां उडेछ डे प्रसय सभये क्यारे संसार प्रह्मभां सय पाभे छे त्यारेभठगतनी त्रूटियो मने अवगुशो वगेरेनो ब्रह्म पर डोछ 148
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प्रलाव पडतो नथी जा जा ए भायावाह साथे सुसंगत नथी. डैभे भायावाह अनुसार प्रसय सभयमा गत ज्रह्ममां सय पाभतु नी, परंतु भायाभा क सय ाभे छ सूत्रडार भआावे छेड़े ०ेवी रीते छूधनुं दशा जाए डारएा बिना हडी जनी भय छे तेवी रीते ज्रम्म पएा जाए उशा साधननी महह बिना भात पोतानी शक्तिथी क कगत३ये परिणाम पामे छे.मे सूत्रहार शंदरायार्यनी ऐेम खेभ मानता होत डे ज्रह्म स्वयं परिणाभी जनतु नथी परंतु जा संसार से तो मात्र भायानुं क परिशाभ छोसने ब्रह्मनो ते विवर्त मात्र छे, तो या रीतनुं उहाहरएाजायत नहि डेमडेजाउहरएथी तो ज्रह् सविडारी सिध्ध थाय छेसने भगत से ब्रह्मनी विद्ृत अवस्था छो सेभ साजित थाय छे. आायार्य श्रीन प्रसिध्ध उ६ाउरए- भायानी तथा तेनी भायाभण- सूत्रकारना ध्यानभा सात्युं सागतुं नथी. जा उपशंत प्रथम अध्यायना संभा सूत्ररे ्रमने निमित डार 8 नहि, परंतु उपाहान अरएा पश भानेस छे. मे सूत्रहार भायावादी होत तो ज्रह्मने शुध्ध नहि परंतु भायोपहित जल्म अबुं होत जथवा तो ब्रह्मना आाश्रये रहेसी भाया भगतनुं उपाधान डारए। छ खने संसार सत्य नहि परंतु मिथ्या छे सेभ डबुं होत, यश तेभऐ संसार ब्रह्मनो विडार छेसेम भशाव्युं छे.
"भाया" शष्हनो प्रयोग सूत्रहारे उ:२ः3 भां र्यो छे त्यां शांडर लाष्य जनुसार जेवो खर्थ उरवामा जावे छे डे स्वप्नावस्थाना पहार्थो भग्रतावस्थाना पहार्थो ऊरता विशध्ध स्वलावना होवाथी मात्रा छो.भे सासर्थने साो मानवाभा आावे तो सूत्र डारनो भत सेवो सिध्ध थाय छेडे ननग्रतावस्थाना पहटार्थो भायावी नहि परंतु सत्य छे, अरण के ससत्य खने मिथ्या तो स्वप्नावस्थाना पहार्थो होय छै. साथी स्पष्ट थाय छे हे सूत्रहार भायावाहने टेडी जायता सागता नथी. माया शष्हनो तेभए दुरेस शण्ह प्रयोग पए शांडर वेदांत संभत नथी रामानुभयार्य पमा कशावे छे हे 'माया' नो खर्थ सूत्रडारना भनभा तो मात्र आाश्यर्यकनऊ वस्तु सेवो ४ हतो
डॉ. थिजोना भतथी विश्ध्धनु भंतव्य जायता सुंहरभ् 'वेहांत 149
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सार'नी लूभिडामा सेवुं साजित दुरवा मागे छे डे ज्रह्मसूत्रडार पश भायावाहना पुरस्डरता हता तेखो जा वात नीे भुकज रुरेछ
श्री शंद्रायार्यना भत जनुसार माया, सविधा, सव्यडत, भाडाश वगेरे शठ्हो धएी वजत समान खर्थभां क वपराय छो.जा वात डॉ.थिजो लूसी गया बागे छेडॉ. थिजो मायाने उपाहानअारण सम से छे. व्यावहारीड दष्टिसे या वस्तु साथी डोवा छतां शांडर भत अनुसार भेता पारभार्थिक दष्टिसे ससत्य छे, डेमडे मेड ज्रह्म क तेभना भते सत्य छे खने सेने भएय: पछी जीनुं उशु भरावानुं रहेतु नथी खाथी ब्रम्म मायानुं उपाहान डारण छ ते स्पष्ट थाय छे. शांडरलाव्यभां तेजो डहे छे है ब्रह्म निभित्त खने उपाहान खेभ जंने अारएा छे. भाया से ज्रह्मनो विवत सने ब्रम्म भायानुं विव्तापाहान छे. ज्रम्म से संसारनुं अारण छे. प्रसयसभयभा क नहि परंतु ऋ्षोय अाणमां अरण खने अर्यभा खेड़ता रहेसी छे. प्रसयङाणे तेना डारएमा तेनी त्रुटियोनो प्रलाव उत्पन्न उरने तेवी छसीस पएा र्थडिन छे, डेमडे अार्य अारएमा जैड्य स्वीडारवाथी जा हसीस सृष्टि खने प्रसयदाण से जनेने साशु पाडी शहाशे
डॉ. थिजो खेभ माने छे डे शंद्रायार्यना भत जनुसार प्रसयअाजमां भगत ज्रह्ममा सय थतुं नथी परंतु या व्यक्त संसार सव्यकत भायामां सीन थाय छ खने जाथी ज्रहममा अछ परिवर्तन थतु नथी. पश खही तेमनी लूस थाय छ तेजो से वस्तु लूसी भय छ डे ज्रम्म क भायानुं विवर्तोपाान अारए छै. जाभ शंदर खने सूत्रआारना भतभा लेह नथी. सिध्धांतने वधारे सष्ट डुरवा मटे आायार् श्री र्छन्द्रभ्णनुं दष्टांत जाये छे. भायावी केभ पोतानी भायानी जसर डेण जावतो नथी तेभ ज्रम्म पएा संसारनी जसर जावतुं नथी. डॉ. थिजो भाने छेडे शंडरना भत अनुसार ब्रम्म नहि परंतु माया कगतनुं उपाहान डारएा छ. तेभना जोपोनो भूज साधार जा तेभना लूस लरेसु भंतव्य छे.
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विवर्तवाह जीभु नाभ भायावाह छे. भायावाही भशावे छेहै भगतनुं उर्तृत्व भाया विशिष्ट ब्रह्मनुं छे. निर्गुण निराहार ब्रह्मनु नथी. भगतने उत्पन्न डरनार ज्रम्म भायाना संजंधवाणुं डोवाथी ते गौए ज्रह्म छेसने तेथी ते मिथ्या छे, तेनुं हार्य जा भगत पएा तेथी ४ मिथ्या छे. या भतनी डेटसीड भुज्य हसीसो या प्रभाऐ छे.
ब्रह्मभां भगतनो आालास भायाने सीधे डोय छे तो पछी ब्रम्म खने भाया सेवा जे बुछा तत्त्वो मानवा पडे, जेटसे के द्वैतापत्तिनो छोष थाय छे. भायावाही जोना भत अनुसार तो सेड तत्वछ.
जनाहि लावउय भाया अभ उत्पन्न दुरे तो उपरनो छोष आावे भो तेने सलावउप मानवांभा ने तो भगतनो अभ कठ संभवे नहि
छोरडीभां सर्पनी आंति थाय छे सेभ उडेवामा जावे छे परंतु या दष्टांत ज्रह्ममा थती भगत प्रतीतिमां बंघजसतुं नथी, डेमडे होरडुं खने साथ जंने खाडारवाणा छे न्यारे ज्रम्म तो निराार छ,खने तेभां हेजातुं आभड कगत तो साडार छ. तेथी निराअारमां जाडारनो ब्रह्म न थह शडे
जा उपरंत आंति तेने थाय के ते भेनारे भूणवस्तु पहेसा लूतडाणभां भेयेसी डोय भ वास्तविड सर्थ होछ छिवस भयों न होय तो तेना विषेनी आंति उछ रीते थाथ ? तेभ ज्रह्मभा भगतनी आंति उडेनार भायावाहीसे साथुं भगत पडेसा भेयेसु होवुं 9 भेहसे
जाम भगत बंति नथी परंतु वास्तविड् उडीउत छ. शंदरायार्थना भत्तानुसार भायावाहनुं सभर्थन ब्रम्मसूत्रोभा भशातुं नथी, आायार्यश्रीनु ज्रम्मसूत्र भाष्य तो भायावाहथी सतर छे. परंतु क्यां क्यां तेभए भायावाहनुं स्पष्टीडरण मने सभर्थन उरेस छ त्यां त्यां ते भत सूत्रडारनो नहि परंतु आायार्यश्रीनो पोतानो हीय सेभ सागे छ. सूत्रहारे शंद्शायार्य साभेस डोय ते उहाहरशो खाप्या होय तेवुं सागतुं नथी. योग्य 151
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खर्थ जाएया विना सूत्रोने सभठवां भुश्देस छे तो पए सूत्रऔार भायावाही उता सेभ साजित थतुं नथी.
उ.94: गौडपाहायार्य खने भायावाद:
गौडयाहायार्थ तेभनी भांडूड्य डारिडामां भाया शष्दनो प्रयोग जनेडवार उहे छे. (१30) उ६रए। तरीडे "मनाहि भाया वडे निंद्राधीन थरयेसो कव क्यारे सारी पेठे भगे छे त्यारे ते सठठ्भा, निंद्रारडित, स्वप्नरडित, खद्वैतनुं तेने लान थाय छे. "भो खा संसार तथा पहार्थो इयी प्रपंथ जरेजर विधभान होत तो तेनु निवारण थात परंतु खा द्वैत इसत भाया क छे सने परमार्थत तो सद्वैत छ.""प्रडाश-स्व३५ खात्मा पोतानी भाया वडे पोताने पोतानी संहर उस्थे छे, से जया क हार्थोने भऐो छे से जघी हेवनी पोतानी भाया छे,डै केना वडे या पोते व भोडित थयेसो छ.""9ेवा स्वप्न खने भहु हेजाय छ. ठेवुं गंधर्वनगर हेजाय छे तेवी रीतनुं जुद्धिमानोजे वेहांतभां विश्वनुं हर्शन डर्यु छ.""जधा ४ टैडिड संधातो आात्मानी सविधाउप भाया वडे क स्वप्ननी भेम सारी रीते श्यायेसा छ.""४३२ से खद्वैत ब्रह्म भायाथी लेछवाजु थाय छे, सनन्म जीक अो रीत सेु थाय नहि, र डे तत्वतः लेहवाु थतां ते सभृत ते भ्त्यताने पाभे." "सत् वस्तुनो कन्भ भाया वडे ४ यो शङाय जेभ छ, तत्त्वतः जरेजरो नहि.""पहार्थो के उपणता उडेवाय छ ते तत्त्वतः उपकता नथी खेभ खेमनी उत्पति माया भहु, छन्द्रभना वन्म केवी छो खने से भाया परा जर उडेता छेणठ नहि,""णेवी रीते स्वप्नभा द्वैतनो आालास भाया वडे यित्तने यंथण जनावे छ तेवी रीते भगतभां द्वैतनो आालास भाया वडे यितने प्रवृतिभान डरे छे."
जाभ "भाया" श्छ गौडयाह द्वारा डोछ खेड क निश्ित खर्थभां प्रयोभठवाभां आावेस नथी, साभान्य रीते भाया द्वारा
(१) खात्मा खने भगत वश्थेना संजंधनी अनिर्वयनीयता. 152
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(२) छश्वशनी शकति
(3) कगतनुं स्वप्नना केवुं प्रथंथात्मड स्व३य - वगेरेनु सूयन थाय छे.
उपर्युउत् पडेसो खर्थ डॉ. राधाडृषणनूना (131 (१31) भत खनुसार शंदरायार्थे वधु भउत्त्वनो गणावेस छे, परंतु त्रीभ खर्थ तरई जडु ध्यान सायेस नथी, डेमडे ते द्वारा गौडयाह भगतना व्यावडारिङ् सत्य दरता माध्यात्मिङ दर्शननी वधु नकड सागे छे. डॉ. रानडे पहा भशावे छे हु (१उ2) सा भगतने मात्र स्वप्न गएवुं डे अरभ गएवुं डे नहि ते विशे गौडपाह योउडस भत घरावता नथी. अोछ भग्यासे तेखो भगतने भायिङ के अभात्मड डहेनारने वजाऐ छे तो डोछवार भगतनी र्थना संजधोभां विलिन्न भतो गणावतां तेखो पोतानी ठेम जन्य विद्वानो पएा ा भगतने स्वप्नवत डे भायिड गए छे तेभ उहे छे. तो अोछड वजत उपरना भतथी साव विश्ध्ध जेवो भत रबू उरता भआावे छे केखा गतनी रथना जिसडुस थह ४ नथी. अभतवाद सेवो भत घरावनार साथे संभत छ, पहा खही खेड़ वस्तु भहत्त्वनी छोखने ते से डै नैतिड सहायार खने माध्यात्मिड पूर्णता भाटे गौडपाहने या भगतनी सत्ता स्वीअार्या विना यासी शड तेभ नथी, पछी ते तात्विड ददष्टिये लसे स्थायुं होय डे नीउ शंडरायार्यनी या प्रङाशनी विथारणाथी तेभने योडडस इायहो थयो छ. जा उपरांत उपनिषटो अने गौडयाह वगेरेना विथाशे भांथी शंदर पोताना भायावाहना वियारोनुं गूंथन दरे छ.
गौडयाह खने शंदरयार्यना तात्विड वियाशोमां भूजलूत रीते भेवाथी डोछ तज्ञावत भशातो नथी, जथवा तो साव नवगएय तझ्ञावत सागे छे.
Shankar agrees with Gaudapada that
"To be an object is to be unreal but uncertainity for Shanka is never absolute." 153
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जंने खद्वैतखोछे, जंने भगतने ससत् भाने छे, तेभ छतां जा संगे जंनेना भतनुं तुसनात्मऊ अध्ययन दरता सागे छे के तेने पोताना सिध्धांत भाटेना आाधार विधानो परस्पर विशध्ध दृष्टिजिंहुभांथी तारवे छ.
गौडयाह भुख्यत्वे ज्रह्मने दृष्टिभां राजीने पोतानुं तत्त्वज्ञान जापता होवाथी भगतने तेखो जसत् माने छे, क्यारे शंदुर या दष्यमान भगतने भायानी दृष्टिये निउता डोवाथी तेखो तेने सत् भाने छ.्या सुधी कवात्माने भगत विशे मान छखने व्यक्तिनुं या प्रदारनुं लान के ज्ञान, प्रह्मणानथी जाघित थयुं नथी त्यां सुधी ते व्यक्ति भाटे भगत सत् छे. गौडयाह से वातनो संतोष भानी से छेड़े तेभऐो आालास खने सत् वस्थे डशो संजंध नथी तेभ सिध्ध दुरेस छे खने खानाथी तेभना भते खालास सत् छे हे सस्तित्व घरावे छेसे जाजतनी संभावना क रहेती नथी, परंतु शंडर भायानुं अस्तित्व सिध्ध दरवा भाटे प्रयत्न ४ दरता नथी, तेभनो आाशय ब्रह्म सत् छे ते जताववानो छे.
उ.95: वेहांतनी भाया खने सां्यनी 'प्रदृति' :-
वेहांतना सिध्धांतो सांज्य- योगना सिध्धांतो साथे जूज ४ भजता जावे छे. खा उपशंत वेहांतना सिध्धांतोनी पृष्ठलूभि सांध्य डोय तेवुं सागे छ. सृष्टि तेभष्ठ प्रसय, ज्रह्म, कवात्मा सविदा थेवा अनेड सिध्धांतोनी तुसना थह शहे तेछ
भगतना माहिारणो भायाने साज्य योगनी प्रदृति साथे सरजावी शङाय परंतु जंने वय्ये तज्ञावत पएा छे. भगत विषयड ब्रह्मनुं भूजडारए डोवाथी भायाने मनाहि उंडेवाभा जावे छे, परंतु ते संपूर्ण सत्त नथी, क्यारे सांध्यानी प्रदृति तेना पूर्श अर्थभां सत् छे. भाया विश्वव्यापी सत्ता उपर निर्लर डोवाथी स्वतंत्रथऐो डार्य डरी श्डे नहि. तेथी भगतनी उत्पत्तिभां भाया तथा छश्वर जंने तत््वोने लेगा डारएउय मानवा भेछसे सेवा खद्वैतनो भत छ.परंतु सां्यदर्शनभा सभ्र ण भगतना सविलाव भाटे 154
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आावश्यड सेवी स्वाविड् शक्ति प्रदृतिमां रहेसी मानवाभा जावी छे. भाया भगतनु उपाधानअारए नथी, परंतु पोताभाथी भगतने उत्पन्न दरवार छश्वरनी सहायड शक्ति छ. (१33)
सांज्यना भत जनुसार त्रिगुणात्मड सव्यकत प्रदृतिथी क सत्त्व, र०स खने उभोभय प्रदृति खने तेना कड प्रपथनो विदास से सृष्टि छ. वेहांत पर जव्यत्मांथी क 9 प्रद्ृतिनो उद्दलव माने छे. तेने त्रिगुणात्मड़ पश उहे छे. पए जनेभा तझ्ञावत से छेडे सांज्यमां सत्यकत तथा तेना सत्त्व, २४स, तभस् वगेरे गुणो जधा वस्तुउप सत् छे. क्यारे वेहांतना मत भुक्ज जा जया माया डे सविधाभूसड छे सव्यकत्तनुं डारण वेहांतभा माया डे सज्ञान छ के सव्याज्येय छै. ा भाया सर्वना माहि भूजइप छे. सांज्यमां पश सर्वना भूण माहिभूणउप सत्यकत-अप्रत्यक्ष छो. साथी वेहांत तेने खनुमानिङ ४ उहे छ. प्रत्यक्षमा तो ते पहा अाछ नथी. मात्र सलव्यक्तना सीधे ु सत् उदेवाय छ. सांज्य दर्शनभां सृष्टि से सव्यकतनुं वास्तविड् परिणाभ छे, क्यारे खद्वैतवेहांतभा सृष्टिने सविधाभूसड तथा ज्रह्मनो विवर्त डडी छे.
सांज्यनी प्रदृति स्वतंत्र छे, वेहांतनी प्रदृति छश्वरनी भाया छे जने हमेशा 5श्वर पर माश्रित छे. सांज्यना भते प्रदृतिन सगुए मानवाभा आावे छे, छतां ते प्रदृतिने स्वतंत्र तेभष्ठ नित्य पश भाने छे. वेहात भतने या वस्तु स्वीअर्य नथी के वस्तु सगुण होय ते नाशवंत डोय छे. तेथी सत्व, रस ने तभस् युं्त प्रदुतिने पु३्षथी स्वतंत्र भानवी सने तेने नित्य भानवी से युक्तिसंगत नथी. शंङरायार्य क्यारे भाया शब्ट साथे प्रदकतिनी अलन्नता जतावे छे त्यारे तेनो अर्थ से छो ड से सर्ना्म शडिति कु जा ा भू स्त्रोत छे. सां्यना भत भुकज प्रदृति राक्य छे, तथी ते निवृत थवी जहु भुश्देस छ. वेहांतना भत भुष्ठज प्रदृति सत्यवत- ज्ञान थया पछी ससत्यवत छे. तथी तेने अनिवर्यनीय उडेवाभा आावेस छे, प्रदृति न हीय तो कवने लोग डे भोक्ष राज्य न जने भगत खने ब्रह्मनुं जास- जैड्य छे, तेथी ज्ञानडाणे ते 155
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भगत नथी परंतु जरलम छे. मरुलुभिमां भणनुं जाए सैड्य छे तेम कव सने ब्रह्मनुं सैडय से घटाडाश ने भहाऊशना जै्यनी ऐेम सक्ष्यार्थे भुख्य जै्य छो.प्रदृतिथी खात्मालिन्न छे ते सांज्यनु इण छसने वेहांतनुं साधन छे. खात्माथी लिन्न दुरछ नथी से वेहांतनुं इज छे, सांज्यनी केम के भोक्षनी दशाां पश प्रदृतिने साथी भानी से छे. वेहांतभा ज्ञान छशाभां प्रदृतिनो सलाव मानवाभा आावेस होवाथी मात्मा सर्वव्याड थह शहेछेखने तेनो ब्रल्मउये जनुलव थह शहेछे.
भगतनो ज्यास कव, भोक्ष, भुझ्ति, ज्ञाननी लडतनुं अधिकथाशु वगेरे केवा विषयोभां थोडी लेहलाव दरीसे तो राभानुभ्नयार्थ, भाधवायार्थ, वस्सलायार्य वगेरे आायार्यो उभेशा भायावाहनुं जंडन दरवा तत्थर रहे छे.
3.9: स्वाभी विवेद्ानंनो भायानो ज्यास :-
स्वाभी विवेडानंछ तेभना दर्शनना सैद्धांतिड पक्षमा शंद्रायार्यनो 'डेवसाद्वैत' सिद्धांत स्वीडारे छे. सापएो खगाउ भेयुं तेभ डवसाद्वैतना सिद्धांत अनुसार ंतिभसत्ता से खेड मात्र निर्गुश ब्रम्म छे,डै क छेश, डाण, डार्यडारए जने जघा क खानुलाविड़ विधेयो तेभन लाषडिय वर्शनोथी पर छे. या सिद्धांत साभे भहत्वनो प्रश्न या हेजीता वैविध्यपूर्ए आानुलाविड भगतनो जूसासो जापवानो रहे छे, णे शंदरायार्यना तत्त्वज्ञानभां भेवा भणे छे, परंतु तेनी साभे डेटसाड़ वांधाजो उला थाय छे, क सापऐो पछीना प्रदरशभा भेवाना छीसे
स्वाभी विवेङानं पोतानी भौषिड़ सूज अने साक्षलिड़ शैसीमा या प्रश्ननी सभस्याने उणवी ऊरवा प्रयास दुरे छे. विवेदानं उडे छ, "सृष्टि सस्तित्वने सभभववा भाटेनो माया खेड़ सिद्धांत नथी. से तो उड़ीउ़तों के रीते सस्तित्वभा छे सेनु साहु विधान क मात्र २ु दरे छे डे सापशा अस्तित्वना पायाभा ४ विशेधालास छे खने प्रत्येड अवस्थाभां जापएो जावा विशोधालासभाथी क पसार थवु पडे छ. यां 156
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छ०८ छ त्यां सनिष्ट पएा छे,खने खेथी उस्टु क्या सनिष्ट छ त्यां कुड छष्ट परा छे. (१3४)
विवेअानंहनी छष्टिसे माया जेटसे भहु नहीं. शहजातना उपनिषहोभां जथवा वैदिड साहित्यभां भायानो अभ के आ्न्ति तरीडे थयो, पएा पछी धएुं मोडेथी छस्साम छोस्सा खेताश्वतर उपनिषहमा माया शष्हनो अर्थ तकतककेेकिकेके शिककेxitxchtxhकक दवमा खा्यो र्थात
'प्रइृतिने भया भरावी सने स्वयं परभेश्वरने भायाना आाधीश भरावा.
विवेडानंछ तेभना ज्ञानयोग नाभना पुस्तउभा भाया विशे वधुभा भशावता उहे छे डे माया शष्हनो उपयोग पाछणथी जौध्धभत प्रभाऐ विज्ञानवाह तरीडे तथा शंदरयार्य कसे जा शब्हनो उपयोग वधु हार्शनिड जनावेे कमां आायऐ शु छीसे क्ततकत्तक त्तकक्ततक क्तकत्तकतकत्तनकतउ4 खने डेवुं दर्शन डरीसे छीसे सेवी
उडिडि्त जताववा प्रयत्न थयो छे.
कवन गभे तेटस समृध्ध सागे, भगत गभे तेटसुं खाङर्षड़ होय छता सर्वनो अंत निश्थित छे. स्वाभी विवेदानंछ तेभना प्रवयनोभा उडे छ, "जधु भृत्युनी तरई ढसडाछ रखुं छेसने छ्ता कवनने वणशी रेवानी जा तीव्र सासया यादुं छे. खावी सासयाने आापऐी छोड़ी शऊतां नथी सने तेनुं नाभ माया, " (१39) भायाने तोडवी जूज भूश्डेस छइ ते भोडनु उवय पडेरीने जेडी छे. योवीस डसाड सतत भृत्यु या। धुनियामां सापशो पीछो दुरे छे सने तोय सापऐो हिसथी मानीसे छीसे है सही जाथएी अायम रडेवाना छीसे. निराशाना अस्तित्वभां ाशावाही जनवुं, लयानड छुःजोभा रहीने पोताना सुजनी जाजाही निहावी जा क भायानुं परिणाभ छे, सेवुं विवेडानंछ सभकता हता
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कक्ततशत वशxशxbकbकतवshxlक कक
क्त क्त क्त (शरीर गणी गयुं, भस्तऊ धोणा वाणवाणुं थयुं, भुज हाँत विनानु जन्युं ने वृद्ध थवाथी पुद्ष साउडी बहने यासे छे तो परा खाशाना चिंडने छोडतो नथी.)
साभ माया ड्यारेड सत्यनी लाज थवा हेती नथी. स्वाभी विवेअानंह भायाना या प्रदाशनुं सर्थघटन दरता तो त्यां सुधी उडे छडे उत्डातिवाही दष्टिसे छ:र्जनो धीरे धीरे विनाश थाय छोसने सुजनो व्याय वघतो भय छे, भेड़ डिवस सर्वत्र सुज ४ उशे-आा पए भायाना परिणाभ स्वशय आाशावाह ४ छेउडिडता तो जपऐो खेवु कोह से छीसे डे सुजनी फेटसी सगवडी वधी रही छे तेटसी ४ हुःजोनी संज्याभां पश वधारो थतो रहो छे. सारं मने नरसुं, कवन खने भृत्यु, उसवुं मने २वुं सा जासाक्षेपमा रहे छ. नयां डास्यनी श्ति हशे तेनी पछवाडे रुहन पएा हशे 8. जाभ वेहांत इिससुरी विवेअनंहना भते आाशावाही पए नथी डै निराशावाही 4श नथी. ते मात्र वास्तववाही छे तेभ तेखो भाने छे.
विवेअनंहना तत्त्त्ञानभां भायानो सेड़ जीभे वियार थयो छे ते भुषठज माया जेटसे 'पडवुं' क सत्य (जस्ति) छो तेने अभ (नास्ती) छ ते जनेने थिटडीने रडेवुं. परंतु वेहान्तनी इिससुरी प्रभाऐ भेड़ हशे तो जीनु पएा सवश्य हशे ४ भाटे सागण- पाछणनुं जंने छोडवुं से सौथी उत्तभ सने भायाभांथी जयावनारुं छे खाना भाटे उपनिषहोसे डुं'त्यागने लोगवो' कवनभार्ग उपर यासुं पडे
क्तक्रत्तकतंक् त्तेकतनिक् त्ततकत कतककेकत्तेक त्े क्रितवकतकतनक
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क्त क्त
क्त (लोग द्वारा लोगनी छरछा उही शभती नथी, उस्टुं लेम
केम खग्नियां घी होभवाथी ते वधु प्रभवसित थाय छे, तेभ लोग द्वारा भोगनी तृषा
वधती 9 भय छे.)
क्त
क्त
क्त
क्त
क्त
क्त
क्त
क्त
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(1) ७. सू. शा. Mा. २ - उ-उ२
(२) जृह 34. ा. 9 - ४ - १०
(3) जृहउ4.1.४-3-9
(४) प्रा. डिरियाएणा भारतीय तत्त्वज्ञाननी उपरेजा
(4) भुंडड उपनिषछ: १:5
(s) विवेड यूडाभलि शसोड नं. 43
(9) ज्रह्मसूत्र शा. भा. १:१:१
(८) वेहांतसार उर
(८) ज. सू. शा. ला. १:१:१
(90) Karmarkar R. D. : Samkara's Advaita P. 3
(११) ७. सू. श1. Cा.
(१२) ज. सू. श1. Mा.
(१3) देन उपनिषह- प्रथम जंड, अडिडा-3, 4
(१४) लगवहत्त्त्रीता शांदरभाष्य, अध्याय- 93,2सो3 9२
(१4) ज्रह्मसूत्र शांदरभाष्य ४:३:१४
(१5) तै. उ4निषछ २:४:१
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(१७) विवेड यूडाभलि- २सोड २२७, २३८, २४०
(१८) लगवछत्तरीता शांदरलाष्य ख. १3, सो. १3, १४
(29) sylE, HisAu siRsl, ali. 4l. 9:3:90, 9:9:8
(33) Dr. Mahadevan T. M. P., "The Philosophy of Advaita, P. 118
(२४) विवेड् यूडाभणी, आायार्यश्री, "सर्ववेधांत सिद्धांतसार संग्रह", 2सोड नं. 95८
(₹4) Spinoza, Ethics, 5:1
(२9) शवेताश्वतर उपनिषछ ४- १०
(₹2) Mahadevan R. D. "A constructive survry of Upnisadic philosophy, Paga No. 231.
(२८) ज्रह्मसूत्र शांदर लाष्य, उपोछसमत.
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(30) Dr. Radhakrishnan S., : An Idealist view of life, Page
No.343-344
(39) जृह. उ4. शा. I. २-२-१
(32) बृह. उशi. Mा. १-२-१
(33) जहसूत्र २:१-१४
(3४) तैत. उ4. शा. भा. 2-६-9
(34) ज. सू. शा. Mा. 3-२-29
(35) छiंछो. 34. 5-9-8
(39) थं. सुषसास मा. त. पृ. 95
(3८) छiछो. 34.5:9:४
(3ल) विवेड यूडाभणी, २२८ थी २३८
(४०) गीता शां. ला. ८-२२
(४१) ७. सू. शा. Mा. २-१-१४
(४२) गैडयाह डारिजा- III, २१
(४3) मा.Sl.शi. Cl. 3,94, 2, 92,४, १४, ४०.५. सू.शा.Mा.२-१-33, २-१-१४
(४४) पं. सुषसास, भारतीय तत्त्वविद्या, पृ. २१
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(४५) विवेड यूडाभणी, 2सोड-२30
ब्र. सू.शा. भा. 2-१-१८
बर.सू.शा. Mा. २-१-१८
बर. सू.शा. भा. २-१-२०
(४ड) ज.सू.शा. Mा.
(४७) ७.सू.शा.ला.
(xc) Dr. Das Gupta S. N. : "A history of Indian
Philosophy", Vol. I, Page No. 258
(x€) Singh R. P. "Vedanta of Shankar, Page No. 306
(4०) वेहांतसार
(५१) वेहांतसूत्र, शांद्रभभाष्य, २-१-२७
(42) छांछो. उ4. शां. ला. 5
(43) छांछो. उ4. शां. ला.
(4४) संक्षेप शारीरिड
(44) छाछो. उ4. शा. ा. १-२-१
(49) तैतरीय उपनिषह
163
Page 165
(4८) वेहांत परिभाषा
(ल) तैतरीय उ4. २:१:१
(50) खैतरीय उपनिषह
(59) छiछो. 6. Mा. ४:८:४
जर. सू.शां. भा. २:३:२२
(52) ज.सू. १:१:२
(द3) भांडूक्षय डारिड शां. Mा. ४:१
(द४) स्वामी अाधवती्थ, वेहांत रसाभृत, पृ. २२५
(54) शवेता उ4. 5:92
(55) डेन. उ4निषछ-9:3
जृहहारएय उ4. 2:3:5,3:0:25
(द9) डा. राधाइृष्णनकर्छन्डीयन इीसो, Vol.II, Page No.533
(F८) विनोजा-उपनिषहोनो सभ्यास, पृ. ४
(sल) छछो. G4. शा. l. ८:9:9
(90) Jha Ganganth, "Sankar Vedant" Page No. 109
(99) ड्ेन उ4निषछ २:3
(७२) प्रा. डिरियाएणा- "लारतीय तत्त्वज्ञाननी ३परेजा", यृ. ५४८
164
Page 166
(93)लगवह सीता शांदराभाष्य, अध्याय- १3,2सो3-9२
(७४) छारशनिड डोश, सं. छो. न. लट्ट, य.250
(७4) ज्रह्म वैवर्त पुराण - २७.
(95) देवी भागवत्.
(99) सर्वसारोपनिषह.
(9c) Vedant or the Science of Realty, P. 170 - 172.
(८०) शारीरिङ्र लाष्य- १:४:3.
(<9) Indian Philosophy, Dr. Radhap
(८२) माहित्य पुराण.
(23) Idealistic thought of India, Dr. P. T. Raju.
(८४) खजेगीता, डडवुं-92,9-८.
(cu) "उपायान" श्री विष्णप्रसाह त्रिवेटी, षष्टिपुर्ति खलनंहन ग्रंथ, पृ. २४१.
(c9) Human Knowledge, Its Scope and Limits.
(22) El E2ì.
(८८) ज्रह्मसूत्र शांदरभभाष्य: 2:2:२5.
165
Page 167
(८o) छांदोग्य उपनिषदद शां. Mा. ८:१४:१.
(८g) श्रीभछ् लगवह गीता: जःय: श्बोड: १५.
(() V. J. Kirtikar : "Studies in Vedanta : Chap. III.
(e3) A Systematic Study of Vedanta Lect. VII.
(८४) ज्रह्मसूत्र शांदरभाष्य, १:४:3,२:१:१४, १:४:८.
(eu) भांडूड्य डारिक्ा: प्रदरण: ४, औरिडा: 4८ खने पए
(८ड) शारीरिद्र लाष्य
(८9) ज्रहमसूत्र शांदरलाष्य: १:3:4:96
(८८) ज्रह्मसूत्र शांदरभाष्य: १:9:४ खने १:४:७.
(८c) ज्रल्मसूत्र शांदरभाष्य: २:१:१४ खने २:१:२७.
(१०0) भगवह गीता शांदरभाष्य: ख-१3,2सो3-२0.
(१0१) लगवह गीता शांदरालभाष्य: ज-१3,2सो3-95.
(१०२) गीतालाष्य, अध्याय- 2,2सोड - 95.
(903) Shankara Vedanta, Chap. : XI
(१०४) डॉ.आार. सेस.नवसणा तेना थीसीसने "शंङरनो ब्रह्मवाह" सेवु शीर्षड
जाये छे.
(१०५) छगदश्य विवेड - १3, १५,
166
Page 168
(909) la5 Y51H9 : 4 - 980.
(902) S2. 64 7 - 94.
(90c) Dr. Raju P. T.
(990) Dr. Raju P. T. : Thought and Reality, P. 154.
(993) 282l.
(995) . 11 0911 4 : Vol. I1, P. 583.
(92) 14 4 : Vol. II, P. 558.
167
Page 169
(१२3) पंथछशी तत्त्वविवेड, १:१4:१७.
(१२५) शुद्धाद्वैतभार्तएड - 2सोड नं. २२, गोस्वाभि गिरधरक भहारा४.
(१25) यिंतनना पंष्यो, से. श्री संजुलाह पुराशी.
(१२७) यिंतनना पुष्यो - पृ.59.
(१२८) ज्रह्मसूत्र शांदरभाष्य: १:१:७, १:3:92, १:४:3, २:१:१, २:१:८,२१.
(१२८) ज्रह्मसूत्र शांदरभाष्य: 9:9:२.
(१3०) भांडूड्य डारिद्ा प्रदुरश- १, ह1रिका १5 खने १७.
भांडूड्य डारिडा प्रड२श- २, आरिडा १७ खने उ9.
भांडूड्य डारिडा प्रङ२ए।- 3, S।RS। १०, १८, २४, २७, २८.
भांडूड्य डारिडा प्र5रए- ४, 51रिङा ४४, ५८, ५८, ६१.
(939) Radha Krishnan : Indian Philosophy, Vol. II,
P. No.461.
(9 3₹) A Constructive Survey of Upanisadic Philosophy, P. 229-30.
(933) ज्रह्मसूत्र शांदरभाष्य र:१:5:१४.
(१3४) स्वा. वि. "ज्ञानयोग" भांथी
168
Page 170
(१३५) स्वा. वि. "ज्ञानयोग" भांथी
(१35) शंदरायार्थ स्तोत्र, यर्थटपकजरिडा
169
Page 171
्रड२१:४
भिथ्यात्व खने भाया
170
Page 172
प्रड२एl:४
शांडरोत्तर वेहातभां भिथ्यात्व ने भाया
४.१ प्रस्तावना
४.२ शांडरोत्तर वेहातभा भाया खने सविधा
वश्येनो लेह
४.3 सविदानी विलिन्न व्यज्याजोनुं परीक्षण
४.3.१ सत्याप्ति
(2) प्रथम सव्याप्ति खने तेनुं निरनडरण
(ज) द्वितिय सत्याप्ति खने तेनुं निराहरण
(3) तृतीय सत्याप्ति अने तेनुं निराहरण
४. 3. २ खतिव्याप्ति
४.3.3 खसंतवहोष
४.४ भिथ्यात्वनी विलिन्न व्याज्याजोनुं परीक्षण
४.४. १ प्रथभ भिथ्यात्व सक्षणा
पंयपाहिडाङारणना भत खनुसार
171
Page 173
४.४.२ द्वितिय भिथ्यात्व सक्षए
विवरणडार प्रङाशात्मयति अनुसार
४.४.3 तृतीय भिथ्यात्व सक्षणा
विवरशायार्य जनुसार
४.४.४ थतुर्थ भिथ्यात्व सक्षएा
वित्सुजायार्य जनुसार
४.४.५ पंयभ भिथ्यात्व सक्षएा
आानंहजोध सट्टायार्य जनुसार
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्रड२एl-४
शांडरोत्तर वेहांतभां भिथ्यात्व सने भाया
४.१: प्रस्तावना :-
आागणना प्रपरशभा शादरवेहान्तरभा भायावाहना निइपश जाह शंडरेतर वेहान्तभां भायावाहनी लूभिङ्ा तपासवाभा आावेस छे. शंडरोत्तर वेदान्तभा उर्षनुं जंडनजंडजाछ, यित्सुजायार्थनुं थित्सुजी तथा भधुसूदन सरस्वतीनं अद्वैत सिध्ध य। त्ा भुख्य ग्रंथोभांथी माया, सविधा, जाध खने अनिर्वयनीयत्व केवा ज्यासो तथासवाभा जाव्या छे. त्यारजाह पंथदशी केवा प्रद्रिया ग्रंथमां भायावाह नो सिध्धांत तथा माया तेभष्ठ सविधानो लेह ने परस्परना संजध सडित स्पष्टीडरण डरवामा आात्युं छ. शंडरोत्तर वेहांतभां भायावाह नी साभे के जाक्षेयो द्वैतवाही वेदान्त संप्रहायो तरइथी उरवाभां खाव्या तेभनुं निराहरण दरी भायावाह नुं सभग्र ज्ञानभीभांसाडीय तथा तत्त्वभीभांसाडीय भूस्यांडन उरवामा आावेस छे.
भारतीय दर्शनभां सद्वैतवेहांतना प्रतिपाध विषयोभां सविधा से खेड़ जसाधारए विषय छे. सविधा, भिथ्यात्व से शास्त्रार्थनो विषय रहो छ. सहवत वेहांतनुं जंडन ऊरवा के ग्रंथो र्थाया छे, तेभां भध्य संप्रहायना कयतीर्थभुनि रथित 'न्यायसुधा' श्रेष्ठ ग्रंथ छे. तेने अनुसरी आायार्थ व्यासतीर्थ न्यायाभृतनी स्थना डरी. न्यायाभृतमां सद्वैत वेहांतीना जघा क सिद्धांतोनुं निपुणताथी जंडन पशवमा साव्यु छे न्यायाभृतमा उडेवामा सात्यु छेडे मिथ्यात्वनां विविध सक्षणो छे. सद्ैतवेहांतीजोखे जन्य सक्षणोनो निषेध उरी पांथ सक्षणो स्वीडार्या न्यायाभृतनुं जंडन डरवा मधुसूहन सरस्वतीये सद्वैतसिद्धिनी रयना दूरी छे. प्रस्तुत प्रदरशमा खद्वैतसिद्धिमां सशू थयेस 173
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सविधाना सक्षए दर्शा्या छे. पूर्वपक्ष तरीडे न्यायाभृत ने न्यायाभृत तरंगिए सने सिद्धांत पक्ष तरीडे खद्वैतसिद्धि सघुभुन्द्रिका जने स्ैतही पीडा भुख्यपऐ भेवा भणे छे.
सद्वैतवेछांतभा भिथ्यात्वनी व्याज्या जे दृषष्टिजिंहुथी डरवामा सावेस छे ज्ञानभीभांसाडीय खने तत्वभीभांसीडीय दृष्टिजिंहुथी ज्ञानभीभांसाडीय दृष्टिथी व्याज्या ऊर्वाभा प्रपंथ ज्ञानभां मध्यसी सिद्ध थाय छे. खही न्यायाभृतप्वाराहटि पूर्वपक्ष द्वारा भिथ्यात्व परना जाक्षेयोनी व्याज्याजो प्रस्तुत डरवाभा आावेस छो ने त्यारजाह तात्विड दष्टिथी भिथ्यात्वना स्वउपना सक्षणो द्वारा व्याज्या सायवामा सावेस छे. खही शंडरोत्तर वेदातायार्यना भिथ्यात्व विषय भत रशू वामा जाव्यो छ.
४.२: शांडुरोत्तर वेहांतभा भाया सने सविदा वश्येनो
लेह :-
ज्ञान वडे सविधानी निवृति थवी शाक्य डोवाथी शंदरथार्थ तेने सविधा के सज्ञान तरीडे भाजजावे छे. पहा वस्तुसक्षी डे विषयसक्षी भाया तो सर्वोथ्य सगुश ज्रम्म साते सहयस्तित्व घरावे छे.श्री शंदरयार्य उडे छे डै 5शवरभां मेवी शक्ति छ डे व्यक्तियां सविधा भन्भावे छे. "भाया" खने "सविधा" श्होना प्रयोग डेटसीडवार समान अर्थभां प्रयो्ठवारभा जावेस छे. सृष्टि श्यनानो संहर्लभां होय त्यारे "भाया" शब्द प्रयोग दुरे छोखने को ब्रह्म साथेनो संहल होय त्यारे ते "सविधा" शब्छ प्रयोग डरे छे. भाया छश्वरनी जी शकति छसने तेने वस्तुसक्षी संधर्लभां सभवानी छ, भ्यारे जीक जावुथी सविदा से शुद्ध ज्ञानात्मऊ ने व्यक्तिसक्षी धारणा छै. साभ श्री शंदरयार्य भाया जने सविधा वश्ये जास डोछ लेह ्शवता नथी
174
Page 176
परंतु शंऊरेत्तर वेहांतभां भाया जने सविधा वय्ये ले पाडेसछे शंदर पछीना वेहांतीजोभा माया जने सविधाना संजध संगे -वर संजधमा मान्यता लेहना सीछे मतलेह उला थया छे. उहाहरए तरीडे पंयहशीअार विधारएय भुनि भाया खने सविधा वय्ये लेह पाडे छे. तेभना भत अनुसार सत्य, री ने तभस् से त्ऐो गुणोनी साभ्यावस्था से प्रदृति, तेना जे लेह याडे छ- खेड़ माया जने जीक सविधा
तकतकेकककत क्रकतश्रे किते कैक्कक्ततवकक्ततमनक
क्त क्त (१)
२४स खने तभसनी भविनता रहित जेटसे डे विशुध्ध सत्वप्रधान प्रदृतिने भाया उडेवाभा जावे छे सने भविन सत्वप्रधान प्रदृतिन सविधा उडेवाभा भावे
छ. आयाथी आायछन जह्मने खवर तथा सविधाथी साछन्न जहमने कव इडेवाभा जावे छ. ा वातनुं सभर्थन पंथहरीभां जा प्रभाऐ जायवाभा आावेसछे
जामत पाछण विडसेसो छ. वेहांत परिलाषा अनुसार भायाने ने सविधाने तुसाविदा डे गौएी सविधा उडेवाभा आावे छे. शुद्ध साक्षी३प यैतन्यने ढांडे ते भूसाविदया खने छभावशछनी यैतन्यने सावरे ते सविधा, सद्वैतवाही मालासमान स्वव्यत्व खने खेड़त्वनी व्याज्या ऊरवा भाटे 'भाया' श्दनो प्रयोग दुरे छसने भायानी उस्पना सभषष्टि तेभष्ठ व्यषष्टउपमा डुरे छ, सेटसे डे शुध्ध सनंत सययहानह ज्रम्म सर्वशक्तिभन्त भायाना प्रतावथी पोताने उयाधि यु्त दुरी खनेड प्रदारना कव 175
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विषयोयु्त या भगतइे पोताने प्रडट डरे छ. श्रीउरियाएणा उडे छे, तेभ भाया मे भगत विषयड विश्वव्याय अरभनुं भूण आारणा छोयने विषयोनो प्रतिलास द्राववाभां ते सामान्ययऐ थता लूमना डारएाइय सविहा साथे साम्य घरावे छे. प्रत्येड कव सविदाथी ग्रस्त जनी खेड प्रम्मनी भग्याये मनेड प्रहारना विषयो तथा को ुजे छे. जा व्यक्तिगत माया डे सविधानी उस्पना छै. वात खेड़ होवा छता परंतु कुहा कुहा दृष्टिजिंहु छ. खेड़ सभ्टिनी दष्टि छेजीक व्य्टिनी, क्यारे या रीते लेह छशववाभां जावे छे त्यारे भुज्यत्वे पडेसा अर्थां 'भाया' खने जीभ सर्थभां सविधा शष्दनो प्रयोग उरवाभा जावे छे. साभ भाया जने सविधा वश्येनो ले शंडर वेहांतभां नथी खा लेह शंडरोत्तर वेहांतभा पाडवाभा जावे छे
४. उ : सविधानी विलिन्न व्याज्याजोनु परीक्षण :-
सविधानो ज्यास से सद्वैत वेहांतभा डोछ नवीन क ज्यास नथी. सद्वैत वेहांतीओो तेने औौपनिषहिड सिद्धांत तरीडे भोजजावे छे. भारतीय हर्शन परंरामा सद्वैत वेहांतना सविधानो सिध्धांत शास्त्रार्थनो विषय रहो छे. तेवी रीते सद्वैतवेहांतना प्रतिषाध विषयोभां सेड़ साधार विषय सविदा छै
श्री शंदरायार्ये अध्यासताव्यमा भ आाव्युं छे डे :
क्त क्त क्तकक्ततकतकेतेककत्तकैक्त तेकैक्तेतेंक्रतेक तेककक्त्ततवेशनन्क
आा भाष्यनी व्याज्याभा जायार्थ पद्पा "पंयािङा" ग्रंथरा भआावे छे डे मिथ्यालूत मज्ञान अध्यासनुं उपाहान छे. "मिथ्या" - शष्हनो अर्थ
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अनिर्वयनीय: जने खज्ञान श्दनो खर्थ बड३य सविधा मरवाभा जावे छे. लाष्यडारे सोउव्यवहारनो उद्सेज डर्यो छे. तेनो खर्थ अध्यास डुरवाभां जावे छे.
क्क्तत्तरकक्तत्तक ततकक्ततकत्तक रवेकतवशकेतकेतके शेजकतकत्तननननवक
अोछ स्थणे सविधाने नाम३य उडी छे, तो अोछ स्थणे सव्याहृत डही छे. साभ सविदा भाया, प्रदृति, अंग्रहणा, सव्यडत, तभस्, डारण, सथ, शकति, भडासुप्ति, निंद्रा, क्षर, आाडाश वगेरे नाभे सविधा डे जज्ञाननो उस्लेज थयो छे. (४)
भारतीय ार्शनिड़ प्रशाबिदा मनुसार छोछ वस्तुनु प्रतिान दरती वजते ते वस्तुनुं सक्षए जेटसे डे व्याज्या मने प्रभाश सायवुं भ३री जनी भय छे. सक्षए जने प्रभाएथी क वस्तुनी सिद्धि थह शडेछे. सक्षण द्वारा वस्तुने छत्तर व्यावृत३ये संदधि दरवामा जावे छे खने प्रभाए द्वारा ते वस्तुनी स्व३पसत्तानी विलिन्न व्याज्याजोनुं निउपणा जने परीक्षण ऊरवानो प्रयास उरवाभा साव्यो छै.
भध्व भतना विद्वान व्यासतीर्थे तेना ग्रंथ न्यायाभृतभा सद्वैतवाहनु जंडन दर्यु छ. या ग्रंथमां सविधाना त सक्षणो भशावी तेभनु जंडन दरवामा साव्यु छ. आा सक्षणो नीये भुकज छे.
(१) के जनादि लावउप डोवा छता ज्ञाननिवत्थ छे तेने सविधा उडेवाभा जावे छे.
(२) 8 अमनुं उपाधानऊा२ छ तेने सविदा उहे छे.
(3) ऐ ज्ञान निवत्य छे ते सविधा छे.
177
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प्रदाशात्मयतिद्ृत विवरण, यित्सुजायार्थना थित्सुजी केवा सद्वैतवाहना भहत्वना ग्रथोभां सविधाना या त सक्षणोनु सर्भथन थयेस छ न्यायाभृतडारे प्रथम सक्षणमा यथाऊभे सव्याप्ति, अतिव्याप्ति खने जसंलव या त्र छोषो हर्शाव्या छे.
सविधा मनाहि वस्तु छे तेम लाव वस्तु परा छे. के सनाहि छे. जने ज्ञान निवत्य छे ते सविधा छै. साभ,
सविधानुं सक्षण छो. न्यायाभृत खने सद्वैतसिद्धिमां या सक्षने सविधाना सक्षए तरीडे गणावेस छे.
४.3.9: खव्याप्ति :-
(ख) प्रथम सव्याप्ति अने तेनुं निरादरण :-
द्वैतवाही भध्वानुयायीजो जा सक्षणमा सौ प्रथम सव्याप्ति छोषो द्शवे छे. खापेसष सक्षएामा त्ए मंश छे.
(१) खनाहित्व
(२) भावत्व
(3) ज्ञाननिव्त्थत्व
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सक्ष्यपहना विस्तार दरता के सक्षणामां जोछी जाजतोनो निदेश थतो होय तो सव्याप्त सक्षणानो छोष जने छे. भे डे डोछ सविदाभां मनाहित्व, भावत्व खने ज्ञाननिवत्यत्व होछ शडे परंतु जघी सविदामा जा तएा होता नथी, तेथी सहीं सत्याप्ति छोष थाय छ. सद्वैतवाहीजो शुद्यव्छिनन ैतन्नी ावरड सविधाने अध्यस्त रकतनुं उपाधान अार गएो छे. या शुद्त्यवश्छिन्न यैतन्यनी सावरड सविदा जनाहि होछ शडे नहि द्ेम के यैतन्य मनाहि डोवा छता शुस्तिनी उत्पति थती डोवाथी ते खाहि छ. आाहि शुझ्तिथी सवश्छिनी यैतन्य पएा ाहि ४ डोय तेथी शुद्त्त्यवशछिन्न जाहि यैतन्यनी आावरड सविदामां मनाहित्व धर्भ न होयने तेथी ायेस सक्षमां सत्यापतिहोष सावे छे. (9)
कोछ सविहामां भावत्व धर्म परा नथी. छाजसा तरीडे आारोपित सलावनी उपाहान दारालूत सविदामा भावत्व धर्भ नथी तेथी सक्षणमा सत्याप्तिहोष थाय छे. न्यारे घटवत् लूतसमा डोछने घटलावनी भरंति थाय छे त्यारे लूतस पर घटालाव आारोपित (अध्यस्त) थयो इंडेवाय या ारोपित आभावनु परिणाभी उपाहान अरण सविधा छे. सभावनुं उपाधान अारण के होय ते लाव वस्तु होछ शडे नहि. तेथी आारोपित सलावनी उपाधान डारणलूत सविदामा भावत्व धर्भ न होवाथी सविधा सक्षएामा सव्याप्तिहोषो थाय छे.
भे सद्वैतवेहांती सेभ उुहे डै खारोपित साव लाव३य सविदोपाहानऊ छ. सलावनुं उपाहान डारए लाव पएा डीय छे, तो सविधानी सिद्धि क नहि थाय, ड्रेम के मिथ्या भगतनुं उपाधान डारए मिथ्या वस्तु होय से यत छो सेभ भानीने मिथ्या सविधाने मिथ्या भगतनुं उपाहान गएवाभा जावेस छे. लाव सने सलाव वय्ये साउप्य नथी. तेथी लाववस्तु सलावनु उपाहान जनी शडे नहि उयाधान अारए ने उपादेय अार्य वय्ये साउप्य सयेक्षित न होय तो सत्य ज्रह्म पए मिथ्या भगतनुं उपाधान अारण जनीशडर भे साभ थाय तो सविधानी सिद्धिनी डो संभावना 179
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रहे नहि. तेथी जारोपित सावना उपाधान अरएभा भावत्व होड शडे नहि (3)
सद्वैतवेछांती उहे छे डे खारोपित भाववस्तुनुं उपाधान डारण लाव३प सविधा होवा छतां खारोपित सलावनुं उपाधान अरण सविधा के लाव३प ४- नथी ड्ेम डे लाव सलावनुं उपाधान अारण जनी शडे नहि भे सेभ थाय तो आारोपित सलावनी ज्ञान द्वारा निवृति थह शहे नहि भरोपित वस्तुमात्र ज्ञान द्वारा निवृत थाय छो डरेम कै आारोपित वस्तुमात्र सविदापाहानऊ छे. ज्ञाननी साथे सविदाने विरोध छे. तेथी ज्ञाननी साक्षत् सविदानी निवृति थाय छे तेम जाम थवाथी सविधा भेनुं उयाहान ऊरए छ, ते खारोपित वस्तु पश निवृत थह भय छे. सारोपित सलाव भे सविदायाहानङ् न होय तो ज्ञान द्वारा आारोपित सभावनी निवृत्ति न 9 थाय. (4)
द्वैतवाहीसे छशविस सव्याप्ति छोषोनी सापति सद्वैतवाही डेवी रीते छूर दुरे छे ते भेछखे.
सद्वैत सिद्धिधार कआावे छे डे शुउत्यवश्छिन्न यैतन्यनी सावरड सविदामां मनाहित्व नथी. तेथी अविदासक्षएाभां सव्याप्तिहोषो आावे छो सेु विशोधा उहे छ. पहा जरेजर सव्याप्तिहोषो थतो ४ नथी. रतनी उपाधान डारणलूत सविधा जनाहि यैतन्यने आाश्रित होवाथी मनाहिछ सदैतसिध्धांतभा सविधा 9 वस्तुनी भावरद जनती नथी. ते शुध्ध यैतन्यनी 9 सावरड जनी शहे छे. प्रडाशस्व३प यैतन्य क सविदाथी भावृत थाय छे. यैतन्यनुं आावरण ४ सार्थड छे. तेनुं भावरण न दरवाभा खावे तो ते प्रदाशभान ४ थह भय, यश 8ड वस्तुनुं आावरण न दरवाभा आावे तो स्वलावतः सप्रदाशस्वलाव 85 वस्तु दुछ प्रदाशभान थह भती नथी, तेथी प्रडाशस्व३प सिध्ववस्तुना अप्रदाश भाटे सविधानुं भावरए सार्थड थाय छे. शुद्त्यवश्छिन्न यैतन्य विषय सविधानो विषय शक्त नथी. शुक्ति तो सविधाना विषयलूत शुध्ध यैतन्यनी सवश्छेहड़ मात्र छे.
180
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शक्ति सविधानो विषय उही न जनी शडै ते मात्र सविधाना विषयनी अवशछेहड़ जनी शड यैतन्य जनाहि छो ते मनीह यैतननी आाश्रित ने जनाहि यैतन्यनी आावश्यड सविधा परा जनाहि छै.परवर्ती अाणे मनाहि यैतन्भा शक्ति सध्यस्त थता मनाहि अणथी यैतन्यनुं आावरण उसती पूर्वसिध्ध सविधा शुद्त्थवछिन्न यैतन्यना आावस्डउय प्रतीत थाय छई तेथी विशेधीसे शुद्त्त्यवश्छिन्न यैतन्यनी सावरड सविधाने जाहि उडी सव्याप्तिहोषो माध्यो ते जराजर नथी (10)
सद्वैतवाही उहे छे डे शुद्त्यवश्छिन्न यैतन्यनुं आावरण ऊरवानी शड्ति भूसा सविधामां छे ते शतिथी क निवृत्ति श्तिज्ञान द्वारा थाय छे. शुउत्यवश्छिनी यैतन्यनुं आावरण दरवानी शक्तिथी विशिष्ट जेवी सविधानी निवृति शुस्तिज्ञानथी थवानी साथे क सविधाना डार्य रतनी निवृति थाय छे. सविसास सविधानी निवृति थता आारोपित रकत३प सविहा अर्थनी साथे ४ शुद्त्यवशछिन्न यैतन्यनुं आावरण ऊरवानी शं्तिथी विशिष्ट जेवी सविधा शुस्तिज्ञान द्वारा निवृत थाय छ. खही से सापति जावे छो है ज्ञान साक्षत् सविदानुं निवर्तड नथी पएा सविदागत आावरए शक्तिनु निव्तड छे सेभ खद्वैतवाही स्वीडारे छे. तेथी साक्षत् ज्ञाननिवत्यत्व सविदामां नथी पएा सविदागत भावरण शक्तिमां छे, परिणाभे ज्ञाननिवत्थत्व३य सविदयासक्षएानी आावरएशन्तिभां अति्याप्ति ने विहानो सव्यप्ति थाय छै.आाना ववाजमा गौडयाह ब्रम्मानंह "सुयन्द्रि" म स्पष्ट दरता भुावे छैहै सविदयासक्षणोमों के "ज्ञाननिवत्यत्व" भूडेस छे तेनो अर्थ "ज्ञाननिवत्यश्तिमत्व" समनवानो छ. (१1) तेथी भे शक्ति सविधायी वुही होय तो पएा खायेसा सविदासक्षणमां सतिव्याप्ति सने सव्याप्ति होषो घटशे नहि
181
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(ज) द्वितीय सव्याप्ति खने तेनुं निराहरण :-
पूर्वपक्ष सापति रबू दुरे छे डे खारोपित सलावनी उपाधान डारएलूत सविधा लावउय वस्तु होछ शडे नहि. तेथी सविदाभा भावात्व धर्भ नथी. तेथी लावत्वरहित सविद्यासक्षएामां सव्याप्तिहोषो थाय छे.
सद्वैतवाही भबाज साये छ डे पूर्एपक्षीसे के डबु ते ससगत छे. देम के खद्वैतवाहीजो भावत्मधर्मने सविदामां स्वीडारता नथी सविधाभा भावत्वधर्भ न होवा छतां सविधाने लावउप उडेवाभा जावी छ. वैशषिङ्भतसिद्ध सलावत्त्वधर्भ पएा सविधमां नथी सलाव वैसक्षएय सविधामा होवाथी क सविान लावइय उहे वाभा जावी छे. तेथी सक्षएागत भावत्व विशेषएनो अर्थ सलाव विसक्षणतत्व थाय छे. आारोपित सलावनी उपादान अारणलूत सविहामां परा सलाव विसक्षणत्व तो छे ४. खने जा सलाव विसक्षणत्व क सविधा सक्षणागत भावत्व छे. तेथी विसक्षणमा भावत्व छे तेथी सव्याप्ति होषो थाय छे सेभ उंडेवुं जोटुं छ. सलाव विसक्षणत्व३प भावत्व भारोपित सलावनी उपादान अारणलूत सविदामां छे. तेथी लावत्वरडित सविधा सक्षणमां सव्याप्तिहोषो जावतो नथी, (१२)
पूर्वपक्ष भुआावे छे हे सलाव विसक्षण सविधा आारोपित सलावनुं उपाधानऊारए डेवी रीते जने? औारए मने अर्यनुं सभतीय होवु ४३री छ. तो ४ अर्थनी उत्पति थाथ, नहि तो न थाय उपाधान सने उपाहेयनी सभतीयताना नियमने स्वीडारणाभा न जावे तो ससत्य वस्तेनुं उपाधान सत्य वस्तु जनी शङे सत्यज्रम्म ससत्य प्रथथनुं उपाधान जनी शहे खने तो सविधाने मानवानी डोछ आावश्यकता न रहे.
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सद्वैतवाहीजो खाना भवाज साये छो डे पूर्वपथीनी वात जराजर नथी, ड्ेभ डे सर्वथा विभतीय वस्तुओो वय्ये डे सवथा सभ्तीय वस्तुओो वय्ये दए आर्यलाव हेजातो नथी, पूर्वपक्ष जेवुं डोछ. पाहान जतावी शहशे क नहि के उपाधेयनु सर्वथा सभ्तीय होय पूर्वपक्ष डया द्ष्टातथी अारण- अर्यनी सर्वथा सभ्तीयत्वनी सिद्धि दुरशे? उपाधान उपाहेयनी लेहसिद्धि दुरवा भाटे लेहना खनुभायड विशध्ध धर्भो स्वीडारवा भेसे. केखो उपाधान खने उपादेयनो सलेह स्वीडारे छे तेखो यएा तेभनो खत्यन्त लेह स्वीडारता नथी. अरए अारण ने उत्पन्न दुरे तो अर्योत्यत्ति खसंलव थछ भय. तेथी सलेहवाहीजोखे यहा अार्य-डार लेहालह स्वीडार्यो छलहालेहने आाधारे क ताहात्म्य स्वडारी शङाय सत्यंत लेह कै सत्यंत े ां ताहा्म् शक्य नथी. जाध हार्य- डरनो अले माननारानो सिध्धात छे. अर्य-डरणनु सर्वथा
साभत्य सद्वैतवाहीने अयेक्षित नथी ा ा ्रलमसूत्रना त्ककक्ततकतनईर 9.5
सूत्रभां उडेवामा जावेस छे. लाष्ठडारे पएा या सूत्रना भाष्यभा विसक्षए उत्पतिनो प्रथथ हर्शा्यो छ. पूर्वपक्ष या सूत्रनी व्याज्या शुं दुरशे? मे उपाधान खने उपादेयनुं यत्टिंयत साउप्य अयेक्षित होय तो तेवु साउप्य तो आारोपित सलाव सने तेनी उपाधानकारलूत सविदामा छे४. आारोपित सलाव खने तेनी उपाहान डारणलूत सविदा जंने मिथ्या छे. क5 मने दश्य छे. भे अर्यना खाडार साथे अरएानः खाडारनो यएा सलेह स्वीडारवामा आावे तो डार्य डारएालाव ण न छटे (13)
पूर्वपक्षीसे डतु छेडे साउप्य न होवा छतां के डार्य - डारए थतो होय तो सत्यवस्तु पम जसत्य वस्तुनुं उपादान जनी शङर,ने सत्य ब्रह्म पएा भिथ्या प्रथंयनुं उपाहान जनी शड्रे, खद्वैतवाही जोना भते जा वात तदन असंगत छे. सत्थ वस्तु भे मिथ्या वस्तुनुं उपाद्वान होय तो भिथ्या वस्तुनी उदी निवृति थह शह क नहि.डेमडे भिथ्या वस्तुनी उपाहानलूत सत्य वस्तुनी निवृति संभवित नथी. सत्य वस्तुनो नाश नथी. उपाधानलूत सत्य वस्तुनो विनाश संभवित न हीय तो तेनी उपाहेयलूत मिथ्या
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वसतुनी निवृति थह शडे नहि. उपाधाननी निवृति विना उपाेयनी निवृति न थह शङे सत्य वस्तु, ज्रम्म सपरिशाभी छे. तेथी सत्य वस्तुनुं ब्रह्मनुं मिथ्या वस्तुउपे परिणाभ पएा संभवतुं नथी. (१४)
"न्यायाभृत तरंगिएी" मां उतु छे तेभ केभ सत्य हुध वगेरे वस्तुओो परिशाभी छे. तेभ सत्यज्रम्म पशा परिणाभी होछ शडेछ. (4) जाना भवाजमा "सघुयन्द्रिडाभा" ब्रम्मानं उहेछ डे हुध आाहि वस्तुओो उी सत्य नथी, हुध आाहि वस्तु दश्य, परिश्छिनी सने ४s छ. दश्यत्व वगेरे धर्भा भिथ्यात्वना व्याप्य छे. ०े दश्य, परिश्छिनी डुs छ ते मिथ्या छे. तेथी ४ सत्य वस्तु परिणाभी होछ शड नहिं, (19) वधुभां तरंगिशीडार उडे छ डे सत्य वस्तुनो नाश थवाभां डोड जाध नथी. सभवायिडारए नाश वगेरे द्वारा सत्य वस्तुनो परा नाश थह शडेछ. (१9) ब्रह्मानंह जाना भवाजमां कआावे छे डे नाश्यत्व भिथ्यात्वनुं व्याप्य छे. के नाश्य छे ते मिथ्या छो. ० मिथ्य: नथी तेनो नाश पए नथी. तेथी तेथी सत्य ब्रम्मनो नाश थाय नहि सत् वंध्यपुत्र माहिनो यका नाश संभवतो नथी. ड्रेम डै ते न्य वस्तु भिथ्या वस्तु नथी. े नठन्य भिथ्या सस्तु छे तेनो नाश थाय छे. क नन्य मिथ्या वस्तु छे तेनुं उपाधान डारए सविदा छे. ज्ञानथी सविधानो नाश थाय छेसने सविधानो नाश थता सविधान्य भिथ्या सस्तुनो नाश थाय छे. (१८) खही से सवास थाय डे सत्य वस्तु मे मिथ्या वस्तुनुं उपाधान जनी शङती
सूत्रने दछ रीते घटावशो? खद्वैत अधिकार खाना भवाजमा भुआावे छ है त्कककतक्ेेकमक्रेकेतक्क्तककतककतननानो खलप्राय से छ डे सत्य ज्रह्म मिथ्या
प्रथंयनुं परिणाभी उपादान न होवा छता सधिष्ठान तो जनी शहे छे. सत्य वस्तु ४ विवर्तनुं अधिष्डान जने छे. तेथी अधिष्डानावइप उपादानत्व ब्रह्ममा छे. तेथी सापेस श्रृति खने स्मृतिनो सत्य वस्तु भिथ्या वस्तुनुं उपाहान जनी शङती नथी से सिद्धांत साथे पोछ विरोध नथी. 184
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(3) तृतीय सव्याप्ति खने तेनुं निराङरण :-
सविद्ासक्षणाना त्रीभ संश ज्ञान निवत्यन सीधे थयेस सव्याप्ति छोष खंगे न्यायाभृतडार भआावे छे डे सविधाने ज्ञान निवत्य उडेवाभा जावी छे ते जराजर नथी. हेम डेशुद्ध ज्रम्म विषयड सविधानुं ज्रह्मज्ञान निवत्यपशु संभवतु नथी. 9े विषयनी सविदा होय ते विषयनी विद्या थाय तो ते सविधा ते विधाथी दूर थाथ, नडि तो दूर न थाथ, भाभतीडार वायस्पत्तिभिश्राना भत अनुसार शुद्ध प्रम्म संतःदरणवृति३प ज्ञाननो विषय जनी शडतु नथी, क्यारे शुद्ध प्रम्म वृति ज्ञाननो विषय जने छे त्यारे ज्रह्म वृत्युपडित जनी वतु होवाथी तेनी शुध्धता रहेती नथी. परिणाभे शुध्ध ज्रत्म विषयड सविधा ज्ञान निव्त्थ संभवती नथी. वायस्पतिभिश्रना भत भुष्ज "सविधा ज्ञाननिवत्य छ." सेभ उडी शङ्ाय नहि भे शुध्ध ब्रम्म विषयड सविधा ज्ञान निवत्य न होय तो खायवाभा आावेस सविधा सक्षएामां सव्याप्तिहोष आावे (१)
सद्वैत सिद्धिधार सव्याप्तिहोषोनुं निराहरण जा रीते जाये छे. समानविषयड ज्ञान क सविधानुं विरोधी जनी शडेसे सिध्धांत भुक्ज ज्रम्म विषयड सविधानुं निर्वतड जनवाभा डोछ जाधा नथी, डेम डेशुद्ध ब्रह्मनी भावरद सविधा शुद्ध प्रह्ममा सव्यस्त थता शुद्ध ज्रम्म पहा सविदापाहित क जनी भय छै. सविधानी मध्यासहशाभा ब्रह्म सविदोपहित नथी होतु खेभ डडी शङाय नहि सविधा सविधोपहित ब्रह्मनुं क आावरए परती नथी. पएा शुद्ध ब्रह्मनुं भावरण दुरे छे. खही ब्रह्म सविदोपित होवा छतां सविधोपहित ज्रह्म सविधानो विषय नथी. शुद्ध ज्रम्म सविधानो विषय छे डेभ ? अविदोपहित ब्रह्मने सविधानो विषय भानीसे तो अविधा पोते सविधानो विषय जनी भय, पहा सविधा पोते सविधानो विषय जनी शडे नहि. खेडक वस्तु विषय अने विषयी, उर्भ ने डिया जनी शडे नहि. तेथी क सविधा सविदानो विषय न जनी शडे. शुद्ध श्रह्म क सविधानो विषय जनी शडे
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आा रीते भेम सविदानो विषय शुद्ध ज्र्म छे तेम वृतिज्ञाननो विषय परा शुद्ध जरम्म छे. केम शुद्ध ब्रम्म विषयड सविधा होय छे त्यारे ज्रह्म सविधोपहित होय छे तेम शुद्ध प्रम्म विषयड वृतिज्ञान होय छे त्यारे वृत्तिज्ञानोपहित् होय छे. खाभ सविधा अने वृत्तिज्ञान जनेनो विषय तो शुद्ध ब्रम्म क होय छे शुद्ध ब्रह्मनी उपाधिलूत सविधा डे वृत्ति सविधा डे वृत्तिनो विषय जनतो नथी. शुद्ध ब्रह्मविषयड ज्ञानथी शुद्ध ज्रम्म विषयड सविधानी निवृत्ति थवाभा डोछ जाधा नथी तादश ज्ञान द्वारा सविधानी निवृति थवाभां भाभतीडार वायस्पतिना भते परा डोछ जाध नथी. () वायस्पतिना भत जनुसार पहा सविदा उपडित ज्रम्म विषयड होवा छता उपाध्य विषयड छसने ब्रह्मज्ञान परा उपडित प्रह्मविषयड होवा छता उपाध्य विषयड छ. साम सविधा ने ज्ञान जंने समान विषयड डोवाथी सविधा ज्ञान द्वारा निवृत थाय छे.
तरंगिलीडार सद्वैतसिधिडारना भतभा खेड़ प्रश्न दुरे छ शुद्ध ज्रत्म विषयड वृति ब्रह्मनी उपाधि छो से उपाधि ज्रह्मना वृत्तिज्ञाननो विषय जनती नथी उयाधि स्व३सत् होवाथी ब्रहमने उपाहित दुरे छ. सहीं से प्रश्न थाय छे डे स्वउप सत् उपाधि स्वोपधेय शुद्ध ज्रह्ममा भरा यहा भाबिन्य उत्पन्न दुरे छे डे नहि? भे भालिन्य उत्पन्न ऊरती होय तो उपधेय ब्रह्मनी शुद्धता न रहे, अशुद्ध ज्रह्मविषयड वृत्तिने शुद्ध ब्रह्मनुं वृत्तिज्ञान गशाय क नडि तेथी ते सविदानुं निवतड जनी शड नहि भे सद्वैत वेछांती सेभ उडे के वृतिशय उपाधि स्वोपधेय ब्रह्ममा भरा पशा भाबिन्य उत्पन्न ऊरती नथी. तो ज्रम्म शुद्ध प्रम्म तो वृत्तिनो विषय जनी न शह सने तो पछी शुद्ध प्रह्मविषयड सविधानी निवृत्ति पशा असभव क जनी भय ज्ञान सने सविधा सभान विषयड न डीय तो विरोधी न होय, (२१)
तरंगिलीडारे उपाधि३य वृतिथी स्वोपध्ेय ब्रह्मभां भासिन्यनी शंडा दूरी छे पएा सविधाउप उपाघिथी स्वोपधेयभां भाविन्य जावतुं डोवाथी शंडा डोड 186
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दरतु नथी सविधाउय उपाधिथी जम्म मात्र उपदित थाय छे. ज्रह्ममां अनध्यस्त सविधा ब्रह्मनी आावश्यड नथी. उयाधि ज्रह्ममां भाबिन्य उत्पन्न दर से संभवित नथी ब्रह्मयैतन्य अध्यस्त वृत्तिज्ञान डे सविधा वडे ब्रह्मनी शुद्धताने डोछ हानि थती नथी. शुध्ध प्रह्मयैतन्य वृतिव्याप्य डे वृत्तिनो विषय नथी जेभ उडेवाभा जावे छे त्यारे उंडेवानो खाशय से छे डे वृत्ति प्रह्मयैतन्यभां अध्यस्त थया विना ब्रह्मने विषय दरीशड नहि या वातनी सद्वैत सिद्धिमां दगदभ्य संजंध प्रसंगे जासोयना डरवाभा जावी छे. ज्ञान खने शेयनो माध्यासिड संजधथी वुहो जीभे पोछ संजंध संभवतो नथी. (२२)
सविदामां ज्ञाननिवत्यत्व धर्म न होवानु भशावी आायवामा आावेस सव्याप्तिना सभर्थ नभा न्यायभृतदारे जन्य जे उहाहरशो छ. (9)औयाघिड अभोपाहानड सविधानुं दष्टांत, (२) कवनभु्तनी सविधानुं दष्टांत
औौयाधिड अभभां अभोपाधान सविधा ज्ञान द्वारा निवृत थती नथी औौपाधिड़ अभभा अधिष्ाननु यथार्थ ज्ञान डोवा छता न्या सुधी उपाधि होय त्यां सुधी औौपाधिड अमनी अनुवृति होय छे व, हहरएथी सकसे तो होछ वणाशयना अाठे जावेसु वृक्ष वणाशयमा प्रतिजिंजित थता ते प्रतिलिंष३य वृक्ष अधोजय हेजाय छे, जेटसे के प्रतिजिंजना वृक्षनो उपरनो लाग भूण तरइनो होय तेभष्ठ नीयेनो लाग घटानो डोय तेवु हेजाय छे. तीरस्थ जिंजउप वृक्ष उध्वय छेसे ज्ञान तो भनारने होय छ. स्त्री सध्यासना अधिष्डान उध्वय् तीरस्थ जिंज वृक्षनो साक्षत्डार होवा छता कजमां वृक्ष प्रतिजिंजशय अध्यासनी उपाधान सविधा झाजनिवत्य जनती नथी जने तेथी प्रस्तुत सविधा सक्षणामा सव्याप्ति छोष थाय छे. तेवी रीते जीभ दष्टातभा ब्रम्म साक्षत्डार थता क प्रारण्ध डर्भोनी निवृत्ति थह भय जने तेनी भिथ्यात्व वगेरे प्रवृति खशक्य जनी भय. तेथी कवनभु्त पुश्षनी सविधा ब्रम्म साक्षत्डार द्वारा निवृत थती नथी सेभ सद्ैत वेहांतीने स्वीअारवुं पडे छे. आाभ
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कवनभुस्त पुद्षनी सविधाने सविधा सक्षए सागु न पडवाथी सव्याप्ति छोष थाय छ (२3)
सद्वैत वेछांती जाना भवाज जा प्रभाऐ जाये छो. न्यायभृतारे खाभ उडेवुं योग्य नथी. डेभडे उपाधिनुं होवुं औौपाघिड अभनी निवीत्तभा प्रतिजंधड छ तेभ प्रारण्ध दर्भ सविधा निवृत्तिभां प्रतिबंधड छ. प्रतिजंधडनी उयातीभां अरए होवा छतां अर्य उत्पन्न थतुं नथी. प्रतिजंधडना जलावरभा क अरण अर्यने उत्पन्न दुरे छे. प्रतिजंधडना सभाव थवाभां विसंज थवाथी सविधानिवृत्तिभां विसंज थतो होवा छता प्रहरशित सविधा दवयनी ज्ञान निवत्यतभा कोछ क्षीत सावती नथी. तेथी प्रथम द्ष्टातभा उपाधिनी निवृत्तिना सहभारथी ज्ञान औौपाधिड अरभनी उपाधान लूत सविदयानु निवत जनी शहे छे, तेमष्ठ जीभ दष्टांतभा लोग द्वारा थती प्रारब्ध अर्भनी निवृत्तिना सह़ारथी कवनभुक्त पुद्षनुं तत्वज्ञान सविदानु निरवतड जने छे.साभ जंने स्थे सविधाभां ज्ञान निवत्यत्व धर्म छे. तेथी सविधा सक्षएाभां सव्याप्तिहोष जावतो नथी. (२४)
न्यायभृतडार सापति हशवे छेडे यही जंने स्थणे ज्ञान थयुं होवा छतां प्रतिजंधडनी अाथरी डोवाथी ज्ञान सविधाने दूर दरतु नयीजेभ सद्वैतवेहांती उही शड्े नहि. खही खेड़ जन्य सवास से थाय हे ज्ञान उत्पन्न थथा यछी सज्ञान है सविद्यानी निवृत्तिभां विसंज भानीये तो शुं छोष थाय? ्या अनुलवनो विरोध थाय? न्यायभृत औरनो भवाज से छे डे ज्ञान उत्पन्न थवा छतां सज्ञाननी निवृति न थाय तो ज्ञात वस्तुभां पशा सज्ञातत्वनी आापति थाय, वस्तुनुं ज्ञान थयुं छेभाटे ते ज्ञात, पर ते वस्तुना अज्ञाननी निवृत्ति नथी थछ, भाटे ते खज्ञात तेथी ज्ञात वस्तुमा "जा वस्तु खज्ञात छे" से भतना व्यवहारनी सापति जावे तेथी ज्ञात उत्पन्न थवा छता सविहानी निवृति थती नथी सेभ उडेवाय नडि ने सेभ उडेवाभा जावे तो अनुलव विरोध थाय. (२५)
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खाना भवाजमा खद्ैत सिध्धिकार उडेछ ते न्यायभृतहारे जनुलव विरोध हर्शा्यो छे ते योग्य नथी. ज्ञात वस्तुमां सज्ञातत्वना व्यवहारनी सापति जावी न शडे डेमडे सविदानी भावरए खने विक्षेय जा जेशकति छै. सविधा विषयनुं खावरण दुरे छे. ज्ञान विषयनो प्रदाश दरे छे. सावरए मने प्रदाश परस्पर विरोधी छे खाने सीधे क सविधानी साथे ज्ञाननी विशोधता छे. ज्ञान उत्पन्न थता सविधा सावरण डरी शडे नहि, पएा सविधानी विक्षेपशकत साथे ज्ञाननी विशे विशेधता नथी. भावरण शक्ति विशिष्ट सविधा ४ 'अज्ञान' व्यवहारनु अारणा छे. ज्ञानथी आावरणशक्ति निवृत थतां आावरणशक्त विशिष्ट सविधा रही श्ड नहि. तेथी ज्ञात वस्तुमां 'अज्ात' व्यवहार परा थह शड नहि ()
४.उ.2: खतिव्याप्ति :-
सविधा सक्षणमां सतिव्याप्तिहोष जताववा भाटे न्यायाभृतडार भआावे छ, सद्वैत वेहांतीसे () (2) छश्वर (3) विशुध्ध यैतन्य (४) कवने छखरनो लेह (4) कव खने छश्वरनो लेह (6) सविधा खने (9) सविधा मने यैतन्यनो संबंध, आा छ वस्तुखोने मनाहि स्वीडारी छे. सविधानी साथे यैतन्यनो संजंध जनाहि लाव वस्तु छे. ज्ञान द्वारा या संजंध दूर थह शहेछ. तेथी सविधासक्षएमा सतिव्याप्ति छोष जावे छे. (२) जाना भवाजमां सद्वैत सिध्धिकार भशावे छे हु सहीं विदासक्षणमां सतिव्याप्तिहोषो छे ४ नहि सविधा ज्ञान निवत्य उही छे. नही ज्ञाननिवत्यनो खर्थ साक्षत ज्ञाननिवत्य छे. ज्ञाननी परंपराथी निवत्थ वस्तुने ज्ञान निवत्य उडी नथी. ज्ञान द्वारा साक्षात निवृत सविधा ४ थाय छे. सविधानी निवृतिने परिणाभे सविधा-यैतन्य संजंधनी निवृति थाय छे. ज्ञान सविधा यैतन्यनुं साक्षत निवर्तड नथी. तेथी ज्ञान द्वारा साक्षत निवत्य सविधा क होछ,ज्ञान द्वारा परंपराथी निवत्य सविधा- यैतन्य संजंधभा सविधा सक्षएानी सतिव्याप्ति थती नथी, (२८)
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ा खंगे विशेषमां सद्वैत सिध्धिकार कआावे छे डे सविधा- यैतन्य संजंधभां सविध: सक्षणनी अतिव्याप्तिनी शंडा थह शहती क नथी डेमडे सविदयानो यैतन्य साथे स्व३ संजंध स्वीअारवाभा जा्यो छो. संयोग, सभवाय वेरे संजंध संभवित नथी. स्व३प संजंध संजंधीथी तिरित ी, संजधीथी नतिरि्त संजंधने क स्वउप संजंध उडेवाभा जावे छे. सविधानो संजंध सविधा स्व३प छे. तेथी सविधा यैतन्य संजंधभां सविदा सक्षणानी सति्याप्ति छेतेम उडेवाय डेम (खही न्यायभृतडार जेवी जापत्ि रबु डरे छे डे सविदासक्षएागत "ज्ञान निवत्थ" शहनो सर्थ 'ज्ञान द्वारा साक्षत निवत्य" जेवो होय तो या सविधा सक्षणोमा मनाहित्व विशेषण भूडवुं व्यर्थ जने छ."
खाना भवाजमा सद्वैत सिध्धिकार भणावे छे डै "ज्ञान निवत्य" पहनो खर्थ ज्ञान द्वारा साक्षत निवत्य डोवा छता सनाहित्व विशेषए व्यर्थ जनी तुं नथी. डेमडे सविदा सक्षणोभां सनाहित्व विशेषण व्यर्थ जनी भतुं नथी, ड्रेमडेसविधा सक्षणोमा 'सनाहित्व' विशेषण न हीय तो उत्तरज्ञान द्वारा साक्षत् निवत्य पूर्वज्ञानभां सविधानुं सक्षए अतिव्याप्त जनी भय, तेवी रीते सविदा सक्षएभां भावत्व विशेषए न होय तो खर्थात् "जनीह सने ज्ञान द्वारा साक्षत निवत्य" सेु सविधा सक्ष उडेवाभा जावे तो ज्ञानना प्रागभावभा सक्षणानी अतिव्याप्ति थाय. ज्ञान प्रशलाव जनाहि यहा छे, सने ज्ञान द्वारा साक्षत निवत्य पएा छे. तेथी ज्ञान प्रागलावरभा सविदासक्षणानी अति व्याप्ति सटडाववा भाटे भावत्व विशेषण भुडवाभा आाव्यु छे (
साक्षत् ज्ञाननिवत्य उडेवाने जहसे ज्ञानत्वइये ज्ञान निवत्थ उडेवामा न जावे सेटसे है ज्ञानभां सविधानुं के निवत उत्वनो अवशछेहड़ धर्भ ज्ञानत्व स्वीडारवामा जावे, जेटसे है ज्ञानत्व स्वइये ज्ञान सविधानुं निवतड छेसेम इंडेवामा जावे तो सनाहित्व खने भावत्व जंने विशेषशनी आावश्यडता रहे नहि उत्तरज्ञान पूर्वज्ञाननुं निवतड जने छे तेभां उत्तरज्ञान ज्ञानत्वइपे निवतड जनतुं नथी, पश विलु 190
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जात्माना विशेष गुएत्व३पे निवतड जने छ. तेथी संस्डार के छरछ। पूर्वज्ञानना निव्तड जने छे, ते जधा पूर्वज्ञानना निव्तड तो विलु आात्माना विशेष गएत्वउपे जने छे. तेथी ज्ञानत्व३पे ज्ञानने सविधाना निवर्तड तरीडे स्वीअारता उत्तरज्ञान निवत्य पूर्वज्ञानभां सविधासाक्षएानी अतिव्याप्ति नहि थाय. ज्ञान स्वप्रागलावनु निवतड जने छे तेभा ज्ञान ज्ञानत्व स्व३े निवतड जनुतुं नथी, परंतु प्रतियोगित्वउपे निवतड जने छे तेथी प्रागलावभां सविदाना सक्षणनी अतिव्याप्ति थती टडाववा भाटे भावत्व विशेषएनी
पएा आावश्यडता रहेती नथी. त्कत्ततकत्तक्त्तकतककततकत्तत्तडेता सापेस जंने
भग्यासे सक्षणानी अतिव्याप्ति थाय "ज्ञानत्व३ये ज्ञान निवत्यत्व" से ये सविधानु खेड़ स्वतंत्र सक्षण खायी शङाय खेड़क सक्षणाना पाय सक्षणो होय तो तेभा डोछ छोषो नथी. सनाहि, लाव३य, साक्षत् शान निवत्य वस्तु सविधा छो से सक्षए निर्होष मा प्रथम सक्षण सत्यप्ति डे सतिव्याप्तिथी भुड्त छे. (3२)
४.उ.उ: खसंभवछोषो :-
न्यायभृतडार सविधाना प्रथम सक्षणमा जसंभवदोष जतावे छे जने तेभां पश सौ प्रथम अविधा सक्षणागत "मनाहित्वसंशमा ससंतवहोष जतावे छे. तेखो कशावे छे हे सविधा पस्थित वस्तु छे, तेथी ते छोषनन्य ज्ञानभात्र३प छ. दोषनन्य ज्ञानभात्र३प सविधा जनाहि होड शड नहि सविधाने मलावलन्न खने विनाशी सेटसे है ज्ञाननिवत्य उडेवामा जावी छे. सलावलिन्न विनाशी वस्तु आाहि क होय छे. जाथी सलाव विसक्षए विनाशी सविधा मनाहि न संभवे, सद्ैतवाही भआावे डे "सलावलिन्न विनाशी वस्तु मनाहि संभवे छे, ेभडे खने यैतन्यनो संजंध, तेथी सलावविसक्षण ज्ञाननिवत्य सविधा वस्तु अन:ह संभवे छ. सविधा -यैतन् संबंध सलाव विसक्षण खने ज्ञान निवत्य डोवा छतां मनाहि छे. तेवी रीते सविधा सभाव विसक्षण तथा ज्ञाननिवार्य डोवा छता मनाहि छे." तेभनी जा वात योग्य नथी,
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सलाव विसक्षए घट, पट वगेरे विनाशी वस्तु माहिभत डोयछ. ते प्रभाऐ सविधा - यैतन्यनो सलाव विसक्षण विनाशी संजंध परा माहिभत क डोवो भेसे. तेथी सविधा - यैतन्य संजंधनी केम सलावलिन्न विनाशी सविधा पएा जाहि क होय, खाभ जनाहित्व घटित सविदा सक्षएा असभवहोषथी दूषित छे.
सद्वैतवाही ाना भवाजमा भशावे छे डे न्यायभृतडारे आाभ उडेवुं योग्य नथी. सविधा उस्थित वस्तु होवाथी ते छोषनन्य ज्ञानभात्र शरीर छेहेजाहि छे खेमन उडेवु भसेकयां कयां डस्पितत्व छे, त्यां त्यां छोषन्य ज्ञानभात्र शरीरत्व है साहित्व छे सेवी व्याप्ति नथी. धर्म उस्पितत्व धर्भनो व्यायड नथी. भे व्यायड होत तो उस्थिततत्व धर्म द्वारा सविधाना छोषनन्य ज्ञानभात्र शरीत्व डे जनाहित्व डे माहित्वनु जनुमान थात, परंतु थतुं नथी. उस्पित वस्तु पहा जनाहि डोई शहेछे. तेभ छोषकन् ज्ञानभात्र शरीर न पशा डोय के छोषनन्य ज्ञानभात्र शरीर छे तेने प्रतिलासिड उहे वाभा जावे छे. उछाइरए। तरीडे शुक्तिरकत, प्रतिभासिङ वस्तुनी सज्ञान सत्ता होती नथी. केटसी क्षएा ज्ञान डोय छे तेटसी क्षएा ते वस्तु होय छे. क्यारे तेनुं ज्ञान होतु नथी त्यारे ते वस्तु पएा होती नथी जा सर्थभा रातिासिङ वस्तुने प्रतिलासमात्र शरीर डे ज्ञानभात्र शरीर उडी छे. प्रतिलास मात्र शरीशनो जेवो सर्थ नथी डै प्रतिलास व्यतिरिस्त् प्रतिभास्य वस्तु हुंछ छे० नहि सेवो खर्थ उरवाभां जावता प्रतिभास्य वस्तु प्रतिलासना जाऊारनी क थह पडे खने विषय ज्ञानना जाडारनो छसेम उडेवु पडे या ४ विज्ञानवाही जौध्धोनो सिद्धांत छे, पए खद्वैत वेहांतिजोनो आावो सिद्धांत नथी शुस्तिरणताहि प्रातिलासिङ वस्तु तेना प्रतिलासथी लिन्न छे. पश ते प्रतिलासड्ास मात्र स्थायी डोवाथी तेने प्रतिलासमात्र शरीर उडेवामा जावी छे.
प्रतिलासिड वस्तु डस्थित छे तेम व्यावहारिङ वस्तु परा डस्पित छे, तेभ छतां छोषभन्य ज्ञान मात्र शरीर नथी. डेभ डे ते प्रातिलासिङ नथी. व्यावहारिड वस्तुनी अज्ञात सत्ता स्वीअरवामा जावी छ. ज्ञान पूर्व खने ज्ञान पछी व्यावहारिड़ 192
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वस्तुनुं स्तित्व होय छे. साभ, व्यवडारिङ़ वसतु छोषन्य ज्ञानभात्र शरीर नथी, 4ए तेथी तेना उस्पितत्वने कोछ हानि थती नथी, परिणाभे के डुस्थित होय ते छोषनन्य ज्ञानभात्र शरीर क डोय खने तेथी माहि क डोय सेभउडी शङाय नहि सविहा डुस्पित छ. पणा छोषभन्य ज्ञानभात्र शरीर डेजाहि नथी. ते मनाहि छे.
सविधानुं जीनु सक्षएा :-
सविधानुं जीणु सक्षएा "ब्रभनुं उपाधानङारए के छ ते सविहा छ" अमनुं उपाधानत्व सविधा छ. या विश्वलभनुं उपाधान भाया डे सविधा छे. ज्रह्म विश्वल्मनुं अधिष्डान छे, उपाहान नथी भे ज्रह्म विश्वलभनु उपाहान होय तो या द्वितीयक्षणानी ब्रह्ममां सतिव्याप्ति थवानो छोष थाय. तेथी केजो सविधानुं जा द्वितीय सक्षए स्वीडारे छे. तेभना भत जनुसार ज्रम्म विश्वलभनुं अधिष्डान ४छ, उयाहान नथी केजो विा सहि लने विश्वलभनु उपाधान स्वीडारे छे तेमना भते जा सक्षए संगत थतुं नथी डेभडे तेमना भत भुक्ज जह्म खने सविधा जनेभा विश्वलभनुं उपाधानत्व होवाथी ज्रह्मभा सविदयासक्षणानी अतिव्याप्तिनो छोष भावे छे
केजो ब्रहमने यहा लंभनुं उपाहान गऐे छे तेभना भते भायाना, सविधाना उपाधानत्वथी ब्रह्मना उपादानत्वभान वेसक्षएय छ. सविधा परिशाभी वस्तु छे, जने ब्रम्म सपरिशाभी वस्तु छे. परिणाभत्व३ये उपादानत्व सविदामां ४ संभवे छ. ब्रह्ममांनडि सविदा 85 छे. ज्रह्म से येतन छ. सयेतनत्वइपे उपाहानत्व सविधामां ४ संभवे छे, प्रह्ममां संभवतुं नथी परिणाभित्वउपे के सयेतनत्वइपे उपाधानत्व सविद्यासक्षणा छे सेभ उडेवाथी ब्रह्मभांसक्षणानी अति व्याप्ति थवानो छोष आावशे नहि.
अभनुं परिणाभित्वउय उपाधानत्व के अमनुं सयंतनत्व३पे उपाधनत्व क सविधात्व छे, क उपाहानतानो सवशछेह धर्भ परिणाभित्व डे सयेतनत्व
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छ ते उपाधानता ४ सविधानुं सक्षणा छे. ाभ उंडेवाथी ज्रह्मने अभनुं उपाहान स्वीडारीखे तो परा ब्रह्मभाजा जीभ सविधा सक्षरानी अतिव्याप्ति थवाना छोष नहि आावे.
सयेतनत्व धर्भ ब्रह्ममा नथी, तेथी सयेतनत्वउये ब्रम्म अ्रभनु उपाधान नथी 8. 9 उपाहानतानो सवशछेहड़ सयेतन्यत्व छे ते उपाहानता प्रह्ममा नथी 9. खाभ द्वितीय सविदासक्षएा सतिव्याप्तिहोषथी दूषित नथी (33)
सही न्यायाभृतडार शंडा दुरे छे डे सलावभ्रमनुं उपाहान लाव३य सविधा जनी शडे नहि लाव सने सलावनुं साउप्य न होछ खाभ खलावज्रमनुं उपाछानत्व लाव३य खज्ञानभा न होछ अभोपाहाततव ज्ञान सक्षण सत्यापि्तिहोषोथी दूषित जने छे. खाना भवाजभा सद्वैत सिद्धिहार भशावे छे डै सलावरोयना निवतड प्रलाज्ञान द्वारा निवत्य जज्ञानभा जा जी सविधा सक्षएानी सत्याप्ति थवानो छोष थतो नथी. तेनुं अरण से छे हे सभावविकषण मज्ञान 4र सलावनुं उपाहान जनी शडे छे. (उ४)
न्यायाभृतडार खही शंडा दूरे छे डे लावविसक्षण मज्ञान भरभनु उयाधान जनी शडे नहि डेमडे उपाहान खने उपाधेयनुंशाउप्य होयछे. लाव विवक्षण खज्ञान भे अभनु उपाहान होय तो उपादेय अभ पशा लाव विसक्षए जनी भय. अभने भावविसक्षण स्वीडारवाभा जावे तो अभ उपादेय घटे ४ उडि, घट, पटाहि लाववस्तु ४ उपादेय जने छे. मे अम उपादेय जने तो अभनुं उपाहान खज्ञान देवी रीते जने? साभ भे खज्ञानने लाव विसक्षण मानवाभा जावे तो द्वितीय सविधासक्षए असंभवहोषोथी दूष्ति थाय भाव विसक्षण वस्तु उपाद्देय होता नथी, से डारएथी भे सद्वैतवाही अरभनुं भावत्व स्वीडारे तो तेऐ तेना उपाधान जज्ञानने पश भाववस्तु
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भानवी पडे जघा नन्य भाववस्तु लावो पाहानऊ छ. लावविसक्षण खज्ञान उपाहान जनी शडडे नहि. (उ4)
सद्वैत सिद्धिधार खाना भवाजमा भशावे छे डे, लाववस्तु उपाधान थह शड खने उपादेय थह शडे खर्थात् भावत्वधर्म क उपाहानत्व खने उपादेयत्वनो प्रयोषड जेटसे व्याप्य छे सेभ उडी शङाय नहि, डेमडेशुद्ध खात्मामां भावत्व होवा छतां शुद्ध जात्मा उयाहान के उपाददेय नथी. तेथी भावत्वधर्भ उयाधानत्व के उपाहेयत्वनो प्रयोण्ड नथी. अर्योवयी अरणत्व क उपाहानत्वनुं प्रयोड छ. निभितडारण अर्थनुं सन्वयी अारए नथी. जघा निभित्तारण अर्थभा अनन्वयी होय छे. भाटी घटनु सन्वयी अारएा छे, तेथी भाटी घटनु उपाहान छे. छंड, यरु घटनुं सन्वयी डारए नथी त. घटना उपाधान अारए नथी पए निभित्त अारणा छे. अर्यमा अनुश्युत डारएने व जन्वयी डारए उडे छे निभित्तकारण अार्यात्मड नथी. साभ सन्वयीडारणत्व धर्म उपाधानत्वनो प्रयोणड छे खने माहित्व धर्भ उपाददेयत्वनो प्रयोषड छे. लावत्व धर्म उयाधानत्व के उपाहेयत्वनो प्रयो्ड नथी लावत्वध्म उयाधानत्व है उपाहेयत्वनो व्याप्यनथी जर्थात् केमां लावत्वनथी तेभा उपाधानत्व के उपाधेयत्व नथी ेवुं नथी, तेथी सविदामा भावत्व धर्म न होवा छता तेभां अ्रभनुं उपाधानत्व होवाभां डोछ जाधा नथी (3ड)
न्यायाभृतडार जापति र०ू दूरे छे डे मे लावविसक्षए जज्ञान यएा लूमनुं उपाधान जनी शडे तो ज्ञान प्रागलाव व्यतिरिस्त सज्ञान भानवानी सावश्यडता उछ? ज्ञान प्रागलाव ४ ब्रमनुं उपाधान जनी शहे ते लाव विसक्षण छे४. तो पछी भावालाव उलयविसक्षण मज्ञानने अ्रभनुं उयाहान अारण उस्यवानी सावश्यडता उुछ छे?
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सद्वैत सिद्धिधार भशावे छे डे न्यायाभृतडारे खाभ उंडेवुं योग्य नथी प्रागलाव प्रतियोगीनो 9 9नद जनी शडै, घटप्रागलावनो प्रतियोगी घट छे, तेथी घटप्रागलाव घटनो क बनड जनी शडे प्रागलावनुं प्रतियोगिभात्णनउत्व प्रागलाव३य धर्मना ग्राउड प्रभाएथी ४ सिद्ध छे. प्रागलाव प्रतियोगीनो ४०न०छ से नियम छ. तेथी प्रागलाव अभनो 9नड नथी अभनो के बुनह नथी क तेनाभा अ्रभनुं भनउत्व विशेष३य उयाछनत्व खत्यंत जसभव छे. खज्ञान खने अभ जंने सछसद्विसक्षण छे. तेथी तेभनी वय्ये उपाहानो याहेयलाव डोवाभा डोड छोष नथी (39) जाभा उयाधान खने उपादेयनुं साउप्य रक्षित थयुं छे. सजगत्व जेटसे लावत्व सने जसद्रयत्व सेटसे सलावत्त्व तेथी सदसद्विसक्षी जेसे लावलावविसक्षए मने ते अनिर्वाय्यत्व छे. (36)
न्यायाभृतडःर शंडा दरे छे लूभो याहान्त्व जज्ञाननुं सक्षण जनी राड्धे नहि अज्ञान खने अमने हमशः उपाहान जने उपाहेयउये स्वीडारेस जोवाथी तेभनो सलेह छे. पएा अभ प्रतीतिनो विषय ज्ञान जनतुं नथी. तेथी अज्ञानने अभनु उयाधान मानवुं योग्य नथी (उe) सद्वैत सिद्धिधार भवाज साये छो डै न उपाददेय वस्तु उपाधानभांथी उत्पन्न थाय छ. ते उपाददेय वस्तु ते उपाहानानुविध्धउपे नियत प्रतीत थाय सेवी व्याप्ति डे सेवो नियम नथी. डेमडेघटना उपनुं उपाहान घट छे, पए घटनुं ३4 घटोपाहनड होवा छता ते ३प घटानुं विद्उये प्रतीत थतुं नथी. "सर्प घटः" सेभ घटथी खलन्नउये प्रतीत थतु नथी सां्य दर्शनभा प्रदति भगतनुं उपाधान छे. वैशैषिड दर्शनभां द्वैयगुण त्यणुड उयाहान छे. तेमना भतभा पश उपाधेय वस्तु
उपाहानानुविद्धउपे प्रतीत थती नथी. नहि तो क्क्तततकक्तततकतककतकचक्कक्तक्तके वी
सलेह प्रतीतिनी सापति जावे, तेथी न्यायाभृतारे जतावेसी व्याप्ति सर्वथा ससिध्ध छ. (४०) न्यायाभृतडार भआावे छे हे त्कक्तकक्तनबेवी खलेह प्रतीति न थवा छता
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त्कक्तक्त क्ककतकत्तकक्तके रीते तो उपाहानथी खलन्नउय उपादेय प्रतीत
थाय छे. अर्छड उये उपाधेय उपाहानथी खलन्नउये प्रतीत थाय छे, खेभ भे न्यायाभृतडार उडेता होय तो से तो खद्वैतवाही पश स्वीडारे छे. सज्ञान परा कवड वस्तु छ, लूम पएा 85 वस्तु छे, तेथी 8डत्वइय अम खज्ञानालिन्न जने छे.
त्तकक्तत्ततकक्तेवी प्रतीति थती नथी, परंतुत्तक्तकक्तेवी प्रतीति थाय छे.
अभज्ञाननी प्रतीति थाय छे. त्यारे अभज्ञान ज्ञानत्वउे प्रतीत थवा छता अरभत्व ३पे प्रतीति थतुं नथी. जाघज्ञानदासे अरम पमा अज्ञानउये प्रतीत थाय छे, ेमडे "२ के ज्ञान थयुं छ."सेवी प्रतीति थाय छे. तेथी जाघडाजे अमज्ञान मज्ञानालिन्न ३पे प्रतीत थतुं होवाथी अ्रमनी अज्ञानो पाहानताभा डोछ छोष नथी (४9)
न्यायामृतडार जापति सबू डरे छे डे लूभोपाधानत्त्व योग्थता १ भे खज्ञाननुं सक्षए होय तो योग्यतावरछहड़ धर्म क्यो छो? सद्वैत सिद्धिहार भशावे छे है प्रथम सक्षण ४ जीभ सक्षणमा छशविस योग्यतानु सवरछेहड़ छै. सजञानमा अभोपादानत््व योग्यताछे, तेनो सवरछेहड़ धर्भ छ. तकक्ततककत्तकक्तक्ततकत्तकत्तकतकेत्तकक
त्तककतकक्तो थी जा जीभ सक्षएा निर्होष छ. सज्ञाननुं सडत्व स्वीडारीये तो
अभोपाहनत्व क खज्ञाननुं द्वितीय सक्षएा छो. (४२)
विवरणनी टीडा भावप्रडाशिअमां नृर्सिहाश्रम जवस्था जज्ञानना माहित्वनुं जंडन दूरी खनाहित्वनुं समर्थन दुरे छ. तखो भशावे छे हे सज्ञान मात्र जनाहि छे. भो ते जनाहि न होय तो ते खज्ञान क न होछ शडे खज्ञाननु सक्षएा जनाहित्व घटित छे. भो देज्ञान निवत्यउप जज्ञाननुं जीभुं सक्षए जाहि सज्ञानभा घटे छ. भूसाज्ञानना जया अारयो ब्रह्मज्ञानथी ४ निवत्य छे. भूसाज्ञानना जिनवर्तड ज्ञान द्वारा भूकाज्ञाननुं डार्य निवृत थह शडे नहि ब्रह्मज्ञान क भूसाजाननुं निवतड छे, खने
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जेटसे ४ प्रहमज्ञान 8 भूसाज्ञानना जया आायोनु निरवतड छे. सवस्था खज्ञान यर। भूसाज्ञाननुं डार्य डोवाथी ते प्रह्मज्ञानथी क निवृत थाय. घटाहिविषयड ज्ञानथी निवृत न थाय. अवस्थाजज्ञान घटाहिविषयड ज्ञानथी निवृत थाय छे,से मानता तो सवस्था जज्ञाननी उस्पना व्यथजने छे. "लाव प्रङाशिङा" भा या संगे विस्तृत यर्था दरवामां आावेस छे. (४3)
केजो भूसाज्ञाननी जवस्था विशेष स्वीडारता नथी, तेजोना भतभां शुस्तिज्ञान भूसाज्ञाननी सवस्था विशेषनुं निवतड छ, सेभ उडेवुं जसंगत छे. तेथी सद्वैतसिद्धिार उहे छे हे या विषयनी विस्तारथी जासोयना जभे पोते सिद्धांतसिंहुमा दुरी छ. (उ) सिद्धांतजिंहुभां के डतुं छ तेनो साशय से छे डे शुझ्ति प्रभाविरड विशिष्ट भूसाज्ञान त्तकत्तक्तककत्तकतब गेरेनुं नियाभड जने छे.
शुक्तिप्रभा उत्पन्न थता भूसाजान त्तकत्तक्तकतकत्तकते वा व्यवहारनु 9नड जनतु
नथी तेथी शुझति प्रभात्ततकत्तत गेरे व्यवहारनी निवतड जने छे, परंतु
भूसाज्ञाननी निर्वतड जनी नथी. साभ स्वीडारता शुस्तिज्ञानथी भोक्षनी सापति पश जावती नथी (िप) साम सविधानुं जीभुं सक्षएा निर्धोष छे.
सविधानुं त्रीणु सक्षण :-
ज्ञनत्वउये साक्षत ज्ञाननिवत्यत्व सविधानुं त्रीम सक्षणा छे. खेटसे के ज्ञानत्वइये ज्ञान केनुं साक्षत निवतड छेते सविधा या सक्षएा नव्य सदैत वेछांतीजोने मान्य छ.जा त्रीभ सक्षणानुं विस्तारथी आासेजन प्रथम सक्षए छर्शावती वजते ४ विस्तारपूर्वड दरेस छे तेथी न्यायाभृतडारे के डबुं छेड़े सविधानुं सक्षए संभवतुं 8 नथी ते साथुं नथी (४9) के हे जा त्रीभ सक्षणानुं सभर्थन नवीन सद्वैतवेहान्तीजोखे डर्यु छ तेभ छता ा सक्ष विवरणायार्यने पर मान्य छे
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विवरणायार्य डबुं छे डे त्तकत्तमकतकतकितक्रत्तक क्तत्तक क्ितकतक (४9) खा विवरश वाड्यनो
खर्थ क जाछे. ज्ञानत्वइये साक्षत् ज्ञान निवत्य े छोते खजान भोपाहानत्वउप जीभु सविधा सक्षएा पएा विवरणायार्यने भान्य छे.
४.४: मिथ्यात्वनी विलन्न व्याज्याजोनुं परीक्षण :-
वेहांतयार्योसे खद्धतवाहनुं जंडन दरवा भाटे खनेड़ ग्रंथो सज्या छ, थेमां न्यायपरिशुद्ध, शतदूषणी जूज व तर्डपूर्ण ग्रंथ छे, भेमां भगतभिथ्यात्ववाहनु सुंहर रीते जंडन डर्यु छे खने खद्वैतवाहना भुख्य शतदूषण जताव्या छ. या गथना भवाजमां क खनंतदृष्ण शास्त्रीे शतलूषणी नाभनी ग्रंथ सज्यो छो, ेमां सद्वैतवाहमा छशविस सात दूषशोने लूषण तरीडे सिद्ध डरवाभा आावेस छे.
भाध्व संप्रहायमा भगतभिथ्यात्ववाहनी जंडन परंथराभा पंडित व्यासतीथे न्यायाभृत ग्रंथमा भगतमिथ्यात्ववाहनुं जंडन संहर तर्ड द्वारा डर्यु छे खने तेना भवाजमां भघुसुछन सरस्वतिये सद्वैतसिद्धि ग्रथ सज्यो छो. सद्वैत सिद्धिनु जंडन न्यायभृत तरंगिएीडार व्यासराभयारये जर्यु जने न्यायाभृत तरंगिशीनु जंडन सधु यन्द्रिडाडार ज्रल्मानंह सरस्वतीये कर्यु छे.
व्यासराणना जंडन युझ्तिजोनुं अध्ययन दर्या पछी वेहांत देशिङायार्य खने भाधवभुङुन्ायार्थनी युक्तिजोां ोड नवीनता नथी सागती, तेथी प्रस्तुत भुदाभां व्यासराणठनी यु्तिजोनु अध्ययन इरवामा साव्युं छोसने पूर्वोउ्त सने आायार्योनी युक्तियोनी शक्य तुसना पए आ्याड प्याड दरवामा आावेस छे.
अध्वाहि पूर्वपक्षियो सेभ माने छे डे प्रथंथनुं भिथ्यात्व प्रत्यक्षसिद्ध नथी, परंतु प्रथंथसत्यत्व जने नानत्व क प्रत्यक्षसिद्ध छे. साभ प्रत्यक्षसिद्ध भाटे श्रृतिप्रभाश अथवा तो अनुभान क प्रभाश होड शह सद्ैतवाही
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तमककतशिकतक्ेततकतकक (िए खनुभानभा साध्य 'भिथ्यात्व' छे. खही भिथ्यात्व शुं
छ? ते प्रश्न थशे, जेटसा भाटे मिथ्यात्वनी परिलाषा जायवाभा जावे छे. न्यायाभृतडार व्यासराष भिथ्यात्वना जार सक्षण जाये छो खने हरेड़ने ससभव सिध्ध दुरे छ.
प्रथभ सक्षणा :-
जर्थात् के सत्यंत जसत् होय ते मिथ्या छे. भिथ्यात्वनुं आावुं सक्षए खद्वैतवाही खायी न शहे, डेमडे खह्ैतवाही भगतने मिथ्या ४३२ उहे छे परंतु "खादाश डुसुभ" नी केभ सत्यंत सत् नथी मानती, ने सेभ उडेवाथी प्रथंथनी व्यावहारिड सत्तानी साथे विरोध थशे. तेथी सद्वैतवाही शून्यता३प भिथ्यात्व मानता नथी, डेभडे सेभ मानवाथी जयसिद्वांत- छोष थशे भगतना व्यवहारसोपनो प्रसंग थशे.
जीभु सक्षणा :-
र्थात् अनिवय्यत्वनुं सक्षणा छो तेम पएा उडी न शडाय, डेमडे से सक्षएा सायवाथी भिथ्यात्वनुंभानमा साध्या प्रसिद्धिधोष थशे 9गतसत्यत्वाहीना मनभा अनिवाय्य पहार्थ प्रसिध्ध नथी. सत् डे जसत् सिवाय अनिर्वाय्य वस्तु न स्वीअारवाथी द्वैतवाही सप्रसिध्ध विशेषण छोष जतावशे, साम जीभुं सक्षण पएा असलव छे.
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त्रीकुं सक्षणा :-
त्तकक्तक्र कित्तकक्तक क्ररिकतक्रितक्रक्तक
सहथी लिन्न सर्थात् सुहूलेह केभां डोय ते मिथ्या छे- आावुं सक्षए पएा खायी शङ्ाय नहि डेम डे खोड ह वस्तुथी खन्य वस्तुनो लेह तो सिद्ध छे४ सर्थात् घटथी घट लिन्न छे से सिद्ध छे. तेथी सेवंलूत सक्षएांमा सिद्ध साधनता छोष थशे.
योथुं सक्षण :-
जर्थात के सत्वनुं जनविडरण डोय खने सधिडरण न होय ते मिथ्या छ. जा सक्षणमा परा छोष छे. ब्रम्म स्वयं निधरभड छे. ज्रह्मभां सत्य३प धर्भ पएा होछ शडे नहि, डेमडे खाभ स्वीडारवाथी ब्रह्म निधर्मड रही शर्ड नहिं. भ्यारे ज्रह्मभा सत्व धर्भ पए न डीय त्यारे ब्रह्मभा सत्व धर्भ पए न होछ त्यारे ज्रह्म सत्वानघिड्रण उडेवाशे जने तेथी भिथ्यात्व सक्षणानी ति्याप्ति ब्रहममा थशे. सद्वैतवाही उहेछे डे ब्रह्म सत्वनुं जनविदरण थहने पए तह३प छे सेटसो भाटे ज्रह्मभां भिथ्यात्व नडि थाय जानी साभे द्वैतवाही भशावे छे डे प्रथंथ पश। सत्वन अनविडरण थहने ब्रम्मनी भेभ सहउप थशे खने प्रथथनुं भिथ्यात्व सिद्ध नहि थाय भे खद्वैतवाही ब्रह्मनी केभ प्रथथभा निधर्भताना स्वीडार नथी दरता तेथी ब्रम्म समान प्रथंथभा सत्व नथी तो पए व्याघात थशे.
कने निधर्भड मानवाभा जावे तेनाभां धर्भनो स्वीडार नडि थाय. भे तेनाभां धर्मनो स्वीडार डरवामा जावे तो व्याघात थशे, जावी रीते ज्रह्ममा 201
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त्कत्तकतत कक्त्तेरकित्क्रितकत्तक्तक्तकसे साध्य मानवाभा आावे तो निधर्भउत्वनी
साथे इरी व्याघात थशे. तेथी ब्रह्ममां सलाव३प धर्भ तो स्वीडारवो ४ पडे. सलाव३य धर्भ स्वीअारवाथी निधभक्ातानी भुश्देस थशे. तेथी ज्रह्ममा अतिव्याप्तिना लयथी योथा सक्षणने पए त्याग डरवो पडशे.
पांयभुं सक्षण :-
तवत कतक्रत्तकततकत क्ररिकतक्रितमक्क्ततवक
सर्थात् प्रभितिनुं सविषयत्व क भिथ्यात्व छे, भावुं सक्षए पए। जसलव छ. वेहांत वाज्यकन्य वृति पश प्रभिति छे, तेथी ब्रह्ममां सतिव्याप्ति दोष नहि थाय परंतु शुक्ति-२तभा प्रभितिनुं सविषयत्त्व नथी, तेथी सक्षणभा सभव होषो थशे. शुक्ति-र४त साक्षत प्रभितिनो विषय नथी सने शुक्ति-२9तनुं व्यवसायात्मऊ ज्ञान पशा प्रभा नथी. तो पएा जनुवय्व्सायातमड़ ज्ञान तो प्रभा छे४ अभज्ञान विषयड ज्ञान अभ डोवाथी अभने भरावावाणो पु३ष पश बंत हशे. शुझ्ति-रतना व्यवसायात्मऊ ज्ञान पछी क्यारे "हुं शुझ्ति-रत ज्ञानवान छुं" जा रीते अनुव्यवसायात्मऊ ज्ञान थाय छे त्यारे शुझ्ति-रशत द्वारा अनुव्यवसायनो विषय थाय छेसने या सनुव्यवसाय पूभा छ, तेथी शुक्ति-२४ तभां प्रभित्यविषयत्व न रहुं. तेथी सक्षणभा ससंभव छोषो छे.
छटू सक्षण :-
त्तकत्तकतकत्तकतक्रर निकतक्तककतन3)
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आंतिज्ञाननों के विषय ते मिथ्या छे- खा सक्षए पएा सक्षएा यएा निर्होष नथी, डेमडे जा प्रडारना सक्षणानी सतिव्याप्ति ज्रहमज्ञानमा अधिष्डाननो यरा लास थाय छे. प्रहाघिष्ठानड़ अभमा पर अधिष्ान३पथी भासित थाय छे, तेथी अधिष्ानउपथी ज्रम्मपए अभज्ञाननो विषय थयो तेथी सक्षणमां सतिव्याप्ति छोषो खतिव्याप्ति निवाखवा भाटे
त्तकत्तक्ततकशिकतकेतक्रतजकतकतमकक्ततमा रीते सक्षएा सायवाथी थएा सक्षए
निर्होष नथी उपरनी केम "मात्र" यह सायवाथी ब्रह्म वेहातवास्यक्न्य वृतिशय प्रभानो यहा विषय जने छे, तेथी ब्रह्मभां सक्षणानी सतिव्याप्ति नहि थाय, परंतु शुझ्ति २तमान के सक्षणानुं सक्ष्य छे, सक्षए नडि भय. डेमडेशुक्ति
२४त तकत्तक क्तेतकतशक्रक्ततक्रत्तकक्तकतक अनुव्यवसायउय प्रभाएज्ञानना
विषय जने छे. तेथी शुक्ति-२४त, मात्र आंतिज्ञाननो ४ विषय नथी थयो पए प्रभाएज्ञाननो यश विषय थयो. तेथी सक्ष्यभा सक्षण न शवाथी सव्याप्ति - छोष थयो जा रीते छटट सक्षए पएा निर्होष नथी.
सातभुं सक्षण :-
त्वकतमशतक्रत निकतक्रितमक्रक्तनक
के जाध्य छे ते मिथ्या छे. जाध्यत्व भिथ्यात्वनुं सक्षए थह शदशे खेबुं पएा उडी शङाय नहि, डेमडे खही प्रश्न से थशे है जासत्वनो अर्थ शुं छ? भे सभ्यड् जन्यथा विज्ञात वस्तुनुं सभ्यड विज्ञान क जाध्यत्वनो जर्थ छे, तो सिध्ध- साधनता थशे. डेमडे सद्वैतवाहीना भते जा प्रथथ भिथ्याउपथी जने विज्ञानवाही जौध्धोना भते क्षणिडत्वउपथी ज्ञात थाय छ. या द्वैतवाहीना भते खेड़ प्रडारे जन्यथा विज्ञान थयुं द्वैतवाहीने आा प्रथथ स्थायी ने सत्य
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उपथी विज्ञात थाय छे. साभ जन्यता विज्ञात प्रथथ सत्वत्व जने स्थाथित्व३पथी सभ्यड विज्ञात थयुं जाभ सिध्ध साधनता थशे डेमडे खाभ सभ्यड सामउय जाध्यत्व तो प्रथंथसत्यत्वनुं सविशेधी थयुं.
आाठभुं सक्षणा :-
त्तकतकक्त ततेकतकतेक्ररतिकतक्तक्रकतप
जा सक्षए यएा निर्होष नथी, डेमडे जा सक्षए ज्रह्ममा सतिव्याप्त छे. ब्रह्मविषयड ज्ञान ४ प्रथंथ जाघड़ ज्ञान छे. सेवंलूत जाघड़- ज्ञाननो विषय जरह्म छे. तेथी ज्रह्ममां सक्षणानी अतिव्याप्ति थह भे निषेध्यत्व३पथी जाधड़ ज्ञान विषयत्वने भिथ्यात्वने उडेवाभा जावे तो पएा सक्षएाभा छोष थाय 9 छे, डेमडे निषेधत्व३पथी जाधड़ ज्ञाननो विषय शु्ति- २४त यएा नथी. शुस्तिमां रत अरभ सिवाय त्कतकत्तकक्तकतकमा रीतेनो जाघ थाय छे सने सा
जाधपज्ञाननो विषय प्रतिलासिक रत थाय छे, डेभडे प्रतिलासिङ २०तनो
जाध थवाथी त्मककश केतकेतशकत्तकतकत्ततवे वो तैडासिड निषेध
नथी थतो. प्रतिलासडासमा तो रतने मानवुं ४ पडशे. प्रतिलासडासमा सद्वैतवाही यए प्रतिलासिड रकनी सत्ता माने छे, तेथी रतनो त्रैडासिड निषेध नथी थह शङतो, तेथी निषध्यत्व३पथी शुक्ति- रत जाघडज्ञाननो विषय नथी जेटसा माटे सक्षणामा जसलव छोष छे.
नवभुं सक्षण :-
जा रीते सकत्ततकतकतेकेकतेक्रितमककककक (us) जञान द्वारा
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निवत्य थाय ते मिथ्या छ. या रीतनुं सक्षए पएा संगत नथी, डेभडे तेभा जर्थानान्तरता दोष थाय छे. पूर्व ज्ञान परा उत्तरज्ञान द्वारा निवत्य छे, परंतु तेभां भिथ्यात्व व्यवहार थतो नथी.
छसभुं सक्षण :-
पोताना अधिडरणमां विद्याभान के सत्यंतलाव तेनो प्रतियोगित्व ४ मिथ्यात्व छे. जा सक्षएा पएा जसगत छे, डेमडे खाभा पए जर्थान्तरताहि छोष छ. सव्यानयवृति-संयोगाहिभां सक्षएान सभन्वय नथी थछ शङतो
खगी यारभुं सक्षण :-
जव्याप्यवृति- संयोगाहिमां जर्थान्तरता निवारण भाटे सा
क्त
परंतु जा सक्षरानी पएा जाशोपित संयोगाहियां सव्याप्ति छे. आारोपित संयोगाहि मिथ्या छ. तेथी भिथ्यात्व सक्षणानुं सक्ष्य डोवु भेसे सा सक्ष्यमा सक्षए नथी जेटसा भाटे सव्याप्ति छोष थाय छे.
जारभुं सक्षणा :-
त्तक त्तकक्तत्तकेतक ेककेतशशककेेशिकरिकक्रक््त
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सविधा जथवा सविधा-अार्य क मिथ्या छो. या सक्षएा पए। संगत नथी, डेमडे खद्वैतवाहीना भत जनुसार कव, शव2, कवेश्वर, लेहाहि पहार्थ जनाहि छे. या अरएो सविधानुं अार्य नहि थह शडे, डेमे डर्य माहि होय छे ते जनाहि पहार्थ सविधा पएा नथी, जने के रेाहिने मिथ्या डसु छ ते कवेश्वर लेहाहियां या सक्षएानो सभन्वय नडि थाय,जेसा भाटे सक्षएानी सव्याप्ति थह द्वैतवाहि भध्वाहिना भत अनुसार अज्ञान सने ज्ञानडार्य थए। सत्य छे. लेह यएा सत्य छे. सेटसा भाटे सविधा खने तेनुं डार्य भिथ्या नथी पए। सत्य छे.
आा सक्षशो सिवाय पएा यित्सुणायारये पूर्वपक्षना ३मा भिथ्यात्वना सक्षणो जाप्या छे. ऐेमांना भोटालागना सक्षणोनो जा सक्षणोमा सभावेश थह कय छे. तेथी ा सिवायना सक्षणोने भही संक्षेमा नीथे भुक शभू दशवाभा जावे छे.
प्रभाष साभ्य सर्थात् प्रभाएनो विषय मिथ्या छे, जा सक्ष छोषपूर्ण छे, डेमडे जा सक्षराथी तो ब्रह्ममा पए भिथ्यात्व सावी १शे. सद्वैतवाही ब्रह्मने स्वप्रडाश माने छने स्वप्रभाशता जया प्रभाशोथी जगोयर भानवाभा जावे छे. तेथी प्रभाएजगोयर ज्रह्मभा सक्षनी अति्याप्ति थशे.
प्रभाए ज्ञानना विषय मिथ्या छोजने
त्तक क्तक्तकक्तकतेशतक्ररशकश्रतक्रक्तनवक (द2 )
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जयथार्थ ज्ञानविषयत्व भिथ्यात्व, जा प्रङाशना जंने सक्षणोमा सर्थातराहि छोष थाय छे. जौध्घोना 'जघु क्षणिड छ' या सिद्धात अन्य संप्रहाय भाटे जा सप्रभाए ज्ञान कछ. या रीते तो सत्य जया प्रथय ने ब्रम्म पश। मिथ्या थह कशे. या उपशंत स्मृति विषयमा पश अतिव्याप्ति थशे डेमडे स्भृतिने धएा हार्शनिडी प्रभाए नहि माने.
सत्थी विसक्षण छो ते मिथ्या छे. आावुं सक्षएा जायवाथी शशविषाणाभों के सत्थी विसक्षण छ .- सक्षणानी अतिव्याप्ति थशे.
तकक्त्तक्रेक्तेतेशिकक्त तेकतकतशकतक्रितवक्रक्तशिकनकक
क सतूथी ने जसतूथी पएा विसक्षण छे सर्थात् के सतू पएा नथी खने जसत् पएा नथी ते मिथ्या छ.सही आाक्षेप थशे डै क सत् नथी ते असत् हशे खने के जसत् नथी ते सत् हशे. सत् अने जसत् परस्पर विशोधी छे. परस्थर विरोधी वस्तुओोमा खेड़ना मिथ्या होवाथी जीभु सत्य जनशे सद्वैतवाहीनी सहजसह विसक्षण वस्तुनी वात सप्रसिध्ध छे.
वितुसणायार्ये उपर कशाव्या प्रभाष भिथ्यात्वना पूर्वपक्षना नव सक्षए रबू दर्या छे. खने संतमा छसभुं खेड़ निर्दुष्ट सक्षण उत्तर पक्षना सिध्धांतना ३पमा सथू डर्यु छे० उवे पछी रणू उरवाभां आावशे.
उवे तात्विऊ दष्टिसे भिथ्यात्वना स्वइपना सक्षणों द्वारा व्याज्या सायवाभा आावशे (सिध्धातपक्ष)
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४.४.१ प्रथभ भिथ्यात्व सक्षणाः-
पंययाहिडाडारनां भत जनुसार :-
खा शब्होने आाधार मानीने ४ पद्मपाहयार्ये पंथाहिमां डहुं छे:
क्त क्त र्थात् मिथ्या शष्हना जे सथो थाय छे.
(१) खयद्वववयन
(२) अनिर्वयनीय
खही भिथ्या शण्दनो अर्थ अनिवयनीय थाय छे.
जाभ भिथ्यात्वनं सक्षए सत 4ए
नडिजसत् पएा नहि, सहसहउप पए नडि, त्रऐेथी विसक्षण सेवुं जायवाभा जावे छे. नृसिंहाश्रमे वेहांत तत्त्वविवेडमां पंयपाहिदानुं जा क सक्षण हशविस छे. तुशछ आाडाशङुसुमाहिमां जनयत्वाहि धर्भ पए संलव नथी. तेथी तुश्छमा सक्षरनी सतिव्याप्ति नथी थती जन्यत्वाहि धर्भ तु्छभा मानवाथी तो ते पए प्रथथ संतर्गत थशे अने तुश्छ तो निःस्व३प छे. (८)
क्त पंययाहिजानुं या सक्षए यित्सुजायारये 'तत्त्वप्रहीपिडा'
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(थित्सुजी) मां पंथम सक्षराना उपमा जापेस छे () खने या सनिरवयनियत्व अप्रसिध्ध छे सेवो साक्षेय द्वैतवाही न्यायन्तर दुर छे,ने सह सहनधिदरत्व३प साध्यना ऋ्ए विद्स्य जापीने ऋ्णोमा जर्थान्तर वोरे होषो र्शा या छखा
विड्स्योभांथी जीभ
विद्स्पने भानी सेवाथी पूर्वोक्त दोषोनी संभावना नथी (9) अप्रसिद्धि विशेषणता सर्थात् साध्या प्रसिद्धिनी आापत्तिना निरसन भाटे अनुभान प्रयोगयी साभान्य रीते साध्यनी प्रसिद्धि दरवाभा जावे छ. यथा सत्व ने जसत्व अने उलय धर्मोनो डोछ खेड़ धर्मभां सलाव योउडस हशे. धर्म डोवाथी उपरसनी समान, ेभडेउयजनेरस पृथ्वी खने कसना धर्भ छे सने ा जनेनो सलाव वायुभा सिध्ध छ. उप खने रसमा धर्भत्व उप हेतु छे खने खेड धर्भ वायुभा उप ने रसनो सत्यंताव छो साभ हेतु, साध्य जने हेतु खने साध्यनी व्याप्ति पश प्रसिध्ध छे. पूर्वोक्त अनुभाननो यक्ष सहसत्व छ तेभा हेतु धर्भत्व सिद्ध ४ छ. सर्थात् हेतुनी पक्ष वृत्तिता सिद्ध थछ. तेथी सनुभान जजथी सत्वासत्व धर्मोनो जत्यंतलाव डोछ खेड़ धर्भमां सवश्य हशे या रीते सत्वासत्वानधिदरणत्वउप साध्य साभान्यतः सिद्ध थवाथी साध्य प्रसिद्धि छोषो नही दुरी
शङाय
पूर्वपक्षीनुं उडेवुं छेडे उप खने रसनो सलाव वायुमा छे. परंतु सत्य ने ससत्य जंने परस्पर विउद्ध धर्भ छे, क सत् नहि होय ते जसत् हशे जने के सत् हशे ते जसत् नहि होय, डेमडे मधवना भते जाधयत्व क ससत्व छो खने खजाध्यत्व सत्व शुक्ति- २४ ताहि जाध्य होवाथी सत्यंतासत् छे. तेभना भते प्रपथ परिशाभी तो छनठ परंतु ते मिथ्या नथी. प्रथंथ सत्य छे परंतु ते परिणाभी सत्य छे, साभ मध्वाहिना भत भुष्ठ्ज सत्यंतजाध आ्यारेड थतो नथी. तेथी शुक्त-२तनी केम जाध न थवाथी प्रथथ प सत्य छे. शुझ्ति-र9त या भत भुकठ्ज आाडाश डुसुभनी केम मिथ्या छे.
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खा भतभां सत्त्वासत्वनी वश्ये प्रातीतिङसत्व स्वीडार्य नथी. तेथी सत्वासत्वानविडरणत्वउय भिथ्यात्व मानवाथी छता व्यक्ति छे४. खा आाशंडाना भवाजभां खद्वैतवादी पूर्वपक्षीने से पुछे छे डे व्यक्तिनो हेतु शुं छे? र्थात् ते व्याघात सत्वासत्वना परस्पर विरडउपतया, परस्परविरउव्यापतया थव। परस्पर विरडव्याप्यतया छे. (9२)
सघुयन्द्रिडाऊरे या त विद्स्योने जे- जे विलान दुरी छ विद्रस्य जापया छे.
(१) सत्वना खभावउप ससत्व
(२) जसत्वना सभाव३प सत्त्व
(3) सत्व सलाव ससत्वन व्यायड
(४) खसत्वनी सलाव सत्वन व्यायड
(4) सत्वनो सलाव जसत्वनो व्यायड़
(5) जसत्वनो सलाव सत्वनो व्यायडु, (93)
जा रीते व्याघातमा छ प्रजारना प्रतिङूण तह हेतु थह शहे छ. सिध्धांतनो भवाज से छेडे व्याघात हेतुलूत प्रथम जे प्रतिडूण तर्ड सनिष्टडारड नथी. डेमडे सद्वैतवाही सत्त्व, जसत्व जनेने परस्पर विरडउ नथी मानता. सहैत भत्भा से नियम नथी है अोछ पहार्थ सत् नथी ते जसत् छेसने ससत् नथी ते सत् छे. जेवो पहार्थ पए संलव छे डे के सहसहू खनुमयउय डोय, डेमड़े सिद्धांतथक्षमा त्रिडासाजाध्यत्व ३५ ४ सत्व छे सेवंलूत सत्वनो सत्यंतालाव ४ ससत्व छे सेभ
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नथी जसत्वनुं स्वशय "के अधयए धर्ममा सत्वइपथी प्रतीत न थाय " (४) ० अ्रभउपथी, प्रभाइपथी अधयण प्रहारे डोधपर उपाघिभां प्रतीतिनो विषय न होय ते तकतकक्तक क्रिततकक्तत्तत्त हथी विवक्षित छे. खाडाश डुसुभाहि स्यारेय यए
ोछयण रीते प्रतीतिनो विषय नथी जनता घटाहि पहार्थ प्रतीयमान थाय छे. परंतुडोहयण वस्तुनी प्रतीति मात्रथी वस्तु सत् नथी जनी भती, डेमड़े प्रतीति अरभवसात पशा थाय छे. त्रिडासाजाध्यत्वउय सत् खेडमात्र जह्म ४छे. जसत्वना सक्षएाभा त्तकक्ततकक्ततकक्ततकत्ततह गु३त्वाहिमा अतिव्याप्ति निवारण भाटे सायवाभा
सावेस छे, डेमड़े गुउत्व पश निउ्पाधिड स्वयं प्रतीतिनो विषय नथी जनतो त्तकक्ततक्रतकत्ते वुं खनुभान पश गुदत्वनी सिद्धिमां सर्थ छेडेमे नुमानो
यक्ष गुउत्व क ससिद्ध छ. तेथी घटाहि उपाहिभां सर्थात् आाश्रयमा माश्रितपथी गुइत्वनुं अनुभान डरवुं ५5शे. त्कक्तकक्तत्तकतकक्तमे वुं खनुभान घटाश्रयथी सहने
दुरी शडाय छे. उपाधि यह सायवाथी जने घटउय उपाघिभा गुदत्वनी प्रतीति थवाथी गुइत्वमां जसत्वसक्षणनी सतिव्याप्ति नथी थह, ()ेमे ो ीे उयाधिमा प्रतीतिनो विषय नथी होतो, घटाहि योते योतानाभा सहउपथी प्रतीत थवानुं साभर्थ्य धरावतो नथी. तेथी सहूउय ज्रह्ममा ताहात्मतया अध्यस्त हने घटाहि "घट छे" "वस्त्र छ" वगेरे उपोथी सहउपेश प्रतीत थाय छे. (99) शुझति -र४तनी भेभ ब्रह्मज्ञानउय जाधड़ ज्ञानथी घटाहि ज्ञान डार्य जाघित यह भय छै.याडरा र्थात जाधित थवाथी सने प्रतीयभान थवाथी घटाि क्तक्तकक्तककक्तततकक्तक्तक्त्मथ्या छे. तेथी
सत्त्वासत्व धर्भोने परस्पर विरड इप न स्वीअारवाथी पूर्वोड्त व्याघातहोष खायी शङतो नथी.
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४.४.२: द्वितीय भिथ्यात्व सक्षणाः-
• विवरएडार प्रदाशात्मयति जनुसार :-
पंयपाहिका विवरशडार प्रङाशान्भयतिसे
त्तकतककतकतकतकत्तकक्ततकक्तशकेकतकित कक्तकरेशिकक्रतकरककतनकजा रीते
भिथ्यात्वनुं सक्षण आाप्युं छे. सद्वैत सिद्धिधारे सक्षणाने वधु स्पष्ट डुरवा भाटे सक्षएामा सलाव पछनी भग्याखे त्रेडासिड निषेध शष्दनो प्रयोग र्यो छे. (9) विवरएडारे
त्तवकक्ततकतकत्कतसा श्रृतिनु अनुदरण दरीने जा सक्षएा माध्यु छे. सक्षएनो सर्थ छोघ
"प्रतियोगीना आाधारशपथी प्रतीत", के सधिडरण, सेवलूत अधिडरणमां त्यंतालावनो प्रतियोगित्व भिथ्यात्व छे, जा सक्षएमा स्वाश्रय३पथी सलभत
सर्थात त्तकक्ततकत्तकतकक्तक्तकत्ता पहनी ग्रहण दुरवाथी खाडाश डुसुमाहिमा
भिथ्यात्व सक्षणानी अति व्याप्ति नहि थाय, (७८)
खही शंडा डरवामा जावे छे डे प्रतिपत्ति पहथी सहीं साभान्य प्रतिपत्ति मानवाभा जावेस छे, अभ डे समाउप विशेष नहि मानाथी पश सिद्ध साधभता छोष तो थशे ४, डमडे जन्यथाज्यातिवाही नैयायिडना भनभा शुझ्ति -२४त विभ्रभ स्थणभां सन्यत्र स्थित रतनी क ज्ञानसाए सन्निदर्ष द्वारा शुक्ति-२तना इपमां प्रतीति थाय छे, सने जाघजुद्धि द्वारा शुक्तिमा "जा रक थी" जा रीते रत्वनो जाछ थाय छे तेभना भते शुझ्तिभां पह रकत तो मिथ्या क छे, सन्यत्र स्थितिभां २४तछे, जेटसा भाटे शुं्तिभां स्थित भिथ्या रत अत्यंतालावनो प्रतियोगी छे तेनो जाध थाय छे. से तो नैयायिडने पए स्वीडार्य छे तेथी सिद्ध साधनता छोष छे. खाना भवाजमा खद्वैतवेहांतनु उडेवु छ के मात्र "प्रतिपन्नोपाधौ " न उडीने
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रककतेकितकतकतकतकत्तजे उंडेवु पडशे खने खेभ उंडेवाथी सिद्ध साधन छोष
नडि थाय.
पूर्वपक्ष तरइथी श्रृति प्रभाए पर जाक्षेय उरवाभा जाव्यो हतो है भिथ्यात्व घटडु त्रैासिड़ निषेषने रीते स्वीडार उरवाथी तशिकतशनकक्तक्त क्तकतकत्तब गेरे खद्वैतनुं प्रतिपाहन ऊरती श्रृतियोभां
यएा अप्रभाणिकता जावी कशे, डेमडे जा शरृतिजोभां परा ब्रह्मरभाजाध्य व्यावहारिड निषेधनी प्रतिपाहउतया जतात्विड छै.या शंडानो भ्वाज सद्ैतवाही सायता बआावे छे डे प्रथंथनो त्रैडासिड़ निषेध व्यवहारिड छे. जा निषेध परा ज्रम्म पए। प्रभाजाध्यतया जतात्विछते सतःत्विड निषेधनो
श्रृतियों के तात्पर्यतः प्रतियाहन डरे त्यारे खयारभार्थिड निषेध जोघत्व युक्त अप्रभाएयपति थाय डेडे अजाघितार्थ जोघडत्व प्रभाऐ ने व्याघितार्थ जोघडत्व खयंभाएा छे. (e)
सद्वैतवाही भशावे छे हे प्रपंथ निषेधड श्रृतिओोनु पारभार्थिड् प्राभाएय न डोवाथी यए व्यावहारिड प्रभाएय तो छे४ व्यावहारिड खर्थात् मिथ्या वस्तुनी प्रतिपाहड श्रृतियोनुं व्यावहारिड प्राभाएय असगत नथी,्यां धर्म नथी त्यां उहाय ते धर्भ जोधड होय तो व्यावहारिड़ खप्राभाएयता त्यां हशे,ने ते मिथ्या छे खने ते मिथ्या वस्तुओोनुं तहउपभा प्रतिादन अप्रभाएय डेवी रीते होछ शहे? थी प्रथथ निषेधड श्रृतियोनुं व्यावहारिड प्राभाएय स्वीडार डरवुं ४ पडे ( खने के ासत्रयाजाध्य वस्तुना प्रतपाहडने तत्त्वावेहडउप प्रभाश भानवानी जाग्रह छेत्यारे तो तककत निककत्तकतकक्तक्तकब गेरे श्रृतिओो द्वारा व्यवहारिड निषेधनु प्रतिपाहन
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दरवानुं दारएा उपत श्रृतियोने तत्त्ववेह्ड३प प्रभात्य नथी से तो सद्ैतवाहीजोने ए मान्य छे, परंतु त्कतक्रक्तत्वक्र क्ततकक्तकत्तक्रक्तक्तकथवहारिड प्रभाएय तो छेणठ खजंडार्थ
प्रतिपाहड़ वगेरे श्रृतियोना
तत्वेहउत्व३य प्रभाए छ. (1) डेमडे ते श्रृतिखोनो प्रतिपाध विषय शुद्ध यैतन्य छे. ते शुद्ध यैतन्य सजंड खने आासतयमा सजाध्य वस्तु छे तेम अाजाध्यवस्तुनी प्रतियाहड श्ृतियोनो तत्वावेहउत्व सक्षण प्रभाएय संभव छे.
खाना 4२ प्रतिवाही इरी शंङा दुरे छे
त्तकतकततकेकतकत्तक्क त्वकक्े रिकतनकत्त्कतककतकत्तकक्तता भिथ्यात्व सक्षएामा जथवा
कशि कतकत्ततकक्तत्तब गेरे श्ृतियोमांतवम् ा क निषेध प्रतीत
थाय छे ते निषेधनो प्रतियोगितावरछेहड धर्भ कयो छ? सर्थात् निषेध प्रयिोगितानो अवरछेछड़ धर्म स्वशप छे डे पारभार्थिउत्व ? (८२) निषेध प्रतियोगी प्रथंथ, प्रथंथनु साभान्य स्व३प दश्यताहटि ने विशेष स्वशय आाङाशत्वाहि छे
प्रतिवाही जनवस्था छोष साये छे. पूर्वोउ्त पारभार्थिउत्व स्वयं पारभार्थिड नथी डेमडे जाध्यात्वालावउय सजाध्यत्व क पारभार्थडत्व छसने सा सलाव जाहत्वनिउपित छे, तेथी व्यावहारिड छे. तेथी पारभार्थिउत्व धर्भ पए व्यावहारिड थछने व्यावहारिडपक्षड मिथ्यात्वानुभानना पक्ष संतर्गत जावी गयो, डेमडे जघी व्यावहारिड वस्तुखोनो पक्ष जनावीने भिथ्यात्वानुभननी प्रवृति छे. पारभार्थिउत्व धर्म निधभड़ ब्रह्मनो धर्भ न थह शहे, तेथी ब्रह्मथी लिन्न थयो. भे पारभार्थिउत्वउपथी त्रैडासिड निषेध प्रतियोगित्व मिथ्यात्व छे. त्यारे तो पारभार्थिउत्व धर्म पशा मिथ्या छे. पारभार्थिउत्व धर्भ व्यावहारिड छे तेभो पए। पारभार्थिउत्वथी भिथ्यात्व सिद्ध डरवु पडशे. या रीते मनवस्था छोष थशे, तथी पूर्वपक्षीनु उडेवुं छे डे स्वउपत त्रैडासिड निषेध प्रतियोगित्व भिथ्यात्त्व अडेवाथी 214
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प्रतियोगीनो सत्यंतासत्वापति थशे. त्कततकक्तत्तकक्तक्तकत्तैडाबिड निषेध
प्रतियोगित्व मिथ्यात्व उडेवाथी जन्योन्याश्रय ने अनवस्या छोष थशे. तेथी प्रतिथन्नोपाघिभां त्ैडासिड् निषेध प्रतियोगित्वउय भिथ्यात्वं जसंलव छे. (3)
सद्वैतवेहांती पूर्वपक्षमांथी जर्थात् त्तक्क्तक्तकतनिक़कत्ेकेेशिकत मिकतेकेकेकेशेशिकतक्रितनकत्ता पक्षनो स्वीडार दुरीने
उदूलवता छोषोनु निराहरण ुरे छे. सधिष्ठानभां आारोपित वस्तुनो निषेध स्व्पतः थाय छेसे सनुलव सिद्ध छ. ा नुवने प्रभा मानता उंडेवाय डे प्रथथ ने शु्ति-रकत स्वउपतः ४ तैदाविङ् निषेधना प्रतियोगी छे. प्रतिलासिङ वस्तु केवी रीते स्वयषिष्ठानभा त्रैडासिड निषेध तो प्रतियोगी छ, तेवी रीते व्यावहारिड प्रपंथ यष स्वयधिष्डान ज्रह्ममा स्वउपतः त्रैमासिड निषेधनो प्रतियोगी छो सा भिथ्यानुभानभां शुक्ति-२४तनुं स्वउपतः त्रैअाबिङ्व निषेध प्रतियोगित्व सिध्ध थवाथी ते जनुसातर पक्षीहत व्यावडारिड़ प्रपंथभा पश ते सिद्ध थशे (४)
विवरणायार्य भआावे छे ते भुष््ज भिथ्यात्व सक्षणानी सेवी
व्याज्या सायवाभा जावी छे. सायार्थनु वाक्य छे डे त्तकतकक्ततकतकतकत्तमा त्ैडासिड
सलाव प्रतियोगित्व भिथ्यात्व े ते भिथ्यात्व प्रत्यक्ष ४ छे, डेमडे जाघडज्ञानमा प्रतिन्नोपाघिभां सलाव प्रीतयोगी उपथी रतपासित थाय छे ()यित्सुजायार्ये यए। सायार्यना वाडयने टांडीने डबुं छे डे त्क भक्र क्ततक्ेक्क्ततकतकक
जाघड़ ज्ञानभां प्रतिलासिड रशत सौडिडि रकत नथी सेवो जोध थाय छे ते सन्योन्यालाव छे. सत्यंतलाव भाटे तो प्रातिलासिड रतक निषेधनो प्रतियोगी छ, डेभडे शुक्तिभां व्यावडारिड़ रतनो निषेध असंभव नथी. तेथी न्यां यरा पूर्वायार्थ द्वारा व्यावहारि रतनो निषेध परवाभा आावेस सर्थनो जोध थाय छे त्यां
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अनुयोगी शुक्ति नडि परंतु प्रातिलासिड रकतछे,अने प्रतियोगी व्यावहारिक र४त छे, सने प्रतियोगी व्यावहारिड् रशत तेथी अन्योन्यालाव सिद्ध थयो, जा आाशयने तित्सुजायार्ये तेनस "तत्व प्रीपिक्ा" भां व्यक्त कर्यो छे.
त्तक
क्ततजकक्
क्तत्कक् तशश
क्तक्तकक्तककतेकरतकरे से तेते कतेेश्रे क्क्तकतवकक
(65)
खानु तात्पर्य से छे डे पूर्वायार्य सेटसे डे विवर्तएाडार ने
व्यावहारिड २०तने त्तकक्तककक्तकतना निषेधनो प्रतियोगी उह्यो छे ते क्तकककनर्थात्
प्रातिलासिड रत सौडिड पारभार्थिक त््क्ततक्रतकक्ततकत्या वहारिड नथी.
खप्राय से छे डै प्रातिलासिड रत व्यावहारिड रतथी लिन्न छो. जा रीतथे लेह३य निषेधनी प्रतियोगिता तो व्यावहारिड रतमा छे ४ सत्यंतालावनी प्रतियोगिता व्यावडारिड र० तभा डेवी रीते रही शडे छे?
सद्वैत सिद्धिधार पूर्वोउत जंने खायार्योना वाड्योनो आाशय प्रस्तुत
दरता भशावे छे डे पंयपाहिका- विवरएडारना त्कक्ततकक्ततमका प्रडारना
जाघज्ञानने भे जन्योन्यलाव -विषयड मानी सेवाभा जावे तो पर प्रातिलासिड
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र० तनुं खार्थिड भिथ्यात्व सिद्ध थह भशे. प्रातीतिड रतभा परभार्थ रतनो लेह प्रतीति थवाथी जेवुं ज्ञान थाय छे डे प्रतीत रकत परभार्थ २तथी लिन्न छे. तेथी
थयो उतो. तेथी सत्यंतालाव प्रतयोगित्व३य के भिथ्यात्व ते उड्त जाघोडत लेहज्ञान - सल्य छे. या डरणे विवरशायार्य सत्यंतालाव प्रतियोगित्वने भिथ्यात्व डतुं छे. पंयपाहिडामां उस्त लेह-विषयड जाघज्ञाननो यएा जत्यंतलाव -विषय ज्ञानभां पर्यवसन छे, जेटसा माटे पंथपाहिमाना यहा लेह-विषयड जाघगान जतावीने
प्रतिपन्न रतने मिथ्या अतुं छ.्यां त्तकक्ततकजेवो खनुलव थाय छे त्यां
त्तक्तकक्तकतजे वो निषेध थाय छेसे याँ त्तकक्ततनकक्तकया तकतकतनकक्ततकजे वो जाघ
थाय छे, सा सनुलव सिद्ध छे. (८9)
४.४. उ: तृतीय भिथ्यात्व सक्षण :-
विवरणायार्य जनुसार :-
ज्ञान द्वारा केनो जाघ थाय छे ते मिथ्या छे विवरणायार्य प्रडाशात्मयति अनुसार त्ततकतकत्तकतकतकतको खने ा जाध्यत्व प्रतिपन्नोपाधिमा
सलाव प्रतियोगित्वउप जथवा ज्ञाननिवत्थत्व३य छे.
जा सक्षएभा पूर्वपक्षी छोष भशावता उहे छो डे ज्ञान निवत्यत्व ०४ मिथ्या छे, सेवुं उडेवाथी के अोछ उपमा ज्ञान निवत्थत्व सावी शडाय छे, सर्थात् स्वोत्तरवर्ति योग्य विलु- विशेष गुणत्व३पथी पश ज्ञान द्वारा निवत्यत्व सावी शङ्ाय छे. जावो सर्थ परवाथी उत्तर ज्ञान द्वारा पूर्वज्ञानभां भिथ्यात्व सक्षणानी सतिव्याप्ति 217
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थशे. (८) ० भडेत्तकक्तक्क्तेवुं भने ज्ञान थयुं त्यारणाह त्तकक्तकतकजेवुं ज्ञान थयुं.
सही उत्तरज्ञान उत्पन्न थवाथी पूर्वज्ञान नष्ट थह भय छे सेवो नियम छे सने जनुलव सिद्ध पश छे. तेथी पूर्वज्ञानभां भिथ्यात्व सक्षणानी सतिव्याप्ति थह, डेमडे उत्तर ज्ञान द्वारा नाशवंत पूर्वज्ञान विनाशी तो छे, यह ते मिथ्या नथी. सक्ष्यमा सक्षए थवाथी सतिव्याप्ति थह तेथी सिद्ध साधनता छोष थशे
द्वैतवेछांती सव्याप्ति- होषना निराहरण भाटे पोताना यक्ष २णू रे छ. सक्षएामां "अवस्थिति साभान्यनो सलाव" पहने सेवाथी यह सव्याप्ति नथी थती. डेभडे सवस्थिति साभान्य विरड तो राशविषाशाहिनो पशा छे. परंतु रशविषाशाहिभां ज्ञान युदधत्व न होछ शडे. तेथी मशीड़ पहार्थोभां अतिव्याप्ति छोष थशे नहि (८o)
सद्वैत सिध्धिडारे त्तकत्तकक्तकक्त त्तकत्तवक्रत्तकत क्रित्तकतवकतेभिक कितेक
क्त ततकक्ततवकतक्क्तक्नकतक्तकतनक्षणभा अर्यन स्वयतः ने डारणा३पथी
नाशनुं सभर्थन वार्तिङडार अने विवरणकारनी श्िोने टांडीने क्र्ुछ,
क्त क्त क्त सर्थातक्रमज्ञाननी वर्तमान स्थूण सने डारएाउपथी स्थिति सूक्ष्म डार्यो सडित ज्ञान द्वारा निवृति ४ जाध छे.
त्तकत्तककतो खर्थ ज्ञान द्वारा व्यायड त्तककतमो खर्थ छे.
क्तत्तकत्तनककत्तकतनं ने रीते हही शह्ाय छे. निवृतिनो खर्थ सत्यंतालाव थाय तो
निवृति ज्ञान नो व्यापड खने नाश थाय तो निवृति ज्ञानधीन छे. 218
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ज्ञानोत्यडाणमा क खज्ञाननी निवृत्ति रही शहे छ. या डारऐो ज्ञाननो व्यायड़ खर्थ डरवामा जाव्यो छो.के क्षऐो ज्ञाननी उत्पति थह ते क्षऐो सज्ञाननी निवृति थह भय छ सेवो डोछ नियम नथी है ज्ञानोत्यतिड्ाणभा उत्तर क्षराभां जज्ञाननी निवृति नथी थती(3) सज्ञान निवृति ज्ञानाधीन जा पक्षमा पमा छोष नथी ेवी रीते घटावीन घट प्रागलावनी निवृति छे सर्थातक् प्रागलावनी निवृति त्यारे थाय छे न्यारे घट उत्पन्न थाय छ.या अरएे घटप्रागलावनी निवृतिन घटाधीन जा डरए घट प्राशलावनी निवृत्तिने छटाधीन उडेवाभा जावे छे, सने तेनी घटप्राशलावनिवृति धटस्व३य होवाथी घटोत्पति समझासीन छे. तेथी तेनी उत्पति सभङासीन वस्तुमा तहची नत्व रडेवाभां ससंगति नथी. (<४)
पूर्वपक्ष शंडा दुरे छे डे खद्वैत वेहांतभा खेड़ खज्ञानवाही सद्वैत वेछांती पहा छे, केना प्रभाऐ खज्ञान सेड़ छै. तेज घटविषयड, 4ट विषयड डे ब्रह्मविषयड खज्ञानने लिन्न लिन्न नथी मानता, परंतु बयु खेड़ खजान छे सेभमाने छ. तेभना भते खज्ञान डे खज्ञाननुं अर्य ब्रह्मज्ञानथी निवर्तनीय छे. शुश्करताहि प्रातिलासिड वस्तुयोनी निवृति शुक्ि वगेरे साक्षत्वारथी नथी थती डेभडे सेवु भानवाथी सज्ञानना सेड थवाथी सर्वत्र अज्ञाननी निवृति भनाशे सने शुक्ध साक्षत्डार द्वारा भुक्षि प्रसंग थशे जने शुक्ध रकत भिध्यानुभान ददर्ष्टात पर जनी कशे, ((प)
ा आाक्षेपना निराडरण माटे क सद्वैतसिद्धिर खज्ञानने विषयलेहथी नाना ाने छे() शुक्धिरत स्थसाहिमा पश शुश्ध ज्ञानथी सज्ञाननी
भूसतः निवृति नथी थती. अर्थातत्सुक्ष्म३पथी डे डारय३पथी शुश्ध विषयड मज्ञान थतुं
रहे छे. संपूर्एपऐो जज्ञाननी सवय्थितिनुं साभान्य विरड ब्रह्मज्ञानथी ४ थशे सेवुं भानवाथी सेवा खज्ञान पक्षमा थर छोष नथी
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सद्वैत सिद्धिडार दहे छे
क्त कककेक्कतकतकक्तका सक्षएा यहा निरहोष छे () खाना पर
पूर्वपक्षी जाक्षेय दुरे छे डे उत्तरज्ञान निवत्थ पूर्वज्ञानभां तिव्याप्ति थशे से ससंगत छ, डेभडे उत्तरज्ञान द्वारा पूर्वज्ञाननी निवृत्ति ज्ञानत्व व्याप्य धर्मउपथी ज्ञान निवृति नथी, परंतु स्वोतरोपन्न खात्म विशषेश गुणात्वउपथी पूर्ज्ञान उत्तरज्ञान द्वारा ज्ञानत्व व्याप्य धर्भउपथी निवत्य पाभवाथी ज्ञानोतर के हरछा छे ते हरछा द्वारा ज्ञाननी निवृत्ति नडि थाय. तेनाथी सलिभत सिद्धांत डानि थशे. आात्म विशेष गुशोने स्वोत्तरवर्ति गुण नास्य मानवाभा जावेस छ. हरछा ज्ञानत्वनो व्याप्य धर्भ विशिष्ट नथी. जावी रीतेततहरा पशा हरछानी निवृति नडि थाय ज्ञान, छरछा, छति, सुज,
छुःजाहि जधा स्वोतरवर्ति आात्माविशेष गुएत्व३पथी आात्माविशेष गुण द्वारा नाशवंत छे.
खा व्याज्याथी उत्तर द्वारा निवत्य- पूर्वज्ञानभां के अतिव्याप्ति जायवाभां जावी हती तेनुं निराहरण थयुं तेना पर ईरी े प्रर्वपक्ष तरइथी से शंडा दरवाभां खावी हती कै ज्ञानात्वनो व्याप्यधर्भ स्मृति छे, सने स्मृति द्वारा स्मृतित्व३पथी निवत्थ संस्डार छ. स्भृतिनिवर्त्य संस्डारोभां अतिव्याप्ति, तथा भिथ्यात्वात्नुंभानभा सिद्ध साधनता छोष परा छे. डेभडे स्मृतित्व संस्डारोना निव्तअवशछेहड़ धर्भ ४ नथी. स्थृतिनी संस्डारनाशउतामा डोड पएा प्रभाश नथी, परंतु जाधड़ पंभाएा छे. स्मृति उत्पन्न थवाथी संस्डार नष्ट थता नथी परंतु छढ थाय छे सेवो जनुलव छ. ("e) सद्वैतसिद्धिधार अंतभा ततकत्ततनक तमशशकतेतेक्रत्तकतककतकतकनिकक्ततकककतवर्क0 खेभ
ड बुं छे, सर्थात् दुरीने त्तकत्तकत्तवक त्तक्जककततक
क्त क्तत्ततककत्तकततत्त भिथ्यात्व छे सेभ पतुं छे. स्मृति द्वारा संस्डारोनो नाश
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थवाथी पश स्मृतित्वउपथी ज्ञानत्व व्याप्य धर्भथी संस्डारोनो नाश थाय छे. साक्षतत्वारत्वउपथी नहि जावी रीते उत्तरज्ञान निवत्य-पूर्वज्ञानमा 4श खतिव्याप्ति नथ, डेभडे त्तकत्तकत्मककेकक्तक्तकत्तकतकककततकतकत भिथ्यात्व
उडेवाभा जावे छे.
४.४.४ तुर्थ भिथ्यात्व सक्षणा :-
थित्सुणायार्थ जनुसार :-
तित्सुजायार्ये जनुसार भिथ्यात्व सषण मा प्रभाऐ जायवाभा जावेस छे.
क्त 90१)
ा भ क्षणाने सद्वैत सिद्धिारे जा रीते रू र्यु छ
सर्थात भिथ्यावस्तुना आाश्रयना उपभा अलभत के सधिडरण ते अधिदरणमां के सत्यंतालाव, ते सत्यंतालावनो प्रतियोगित्व विथ्या छे, केमड पटाहि लाववस्तुखोना आाश्रयउपथी सल र्ात् प्रतीत तंतु वगेरे, त्ष् पटाहिना सत्यंतालाव प्रतियोगित्व मिध्यात्व छ. (103)
भ्यां के वस्तु जरेजर नथी. त्यां ते वस्तु प्रतीत थवाथी परा ते मिथ्या छे. तंतु पटाहिनुं अरण छ सने पटाहिनी भे अोछ सभये प्याय सत्ता होय तो तंतुयोमां ४ संभव छे. तंतुओोनो त्याग उरीने पटनी सत्तानो सलाव थाय जर्थात् 221
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सलाव सिद्ध उरवाभा आावे त्यारे तो गएपाहुअन्यायथी पटनु भिथ्यात्व स्वीडार डरवु 4डे (१04)
अार्थनी सत्ता डारणमों क होय छेखने डारणमा अार्यनी सत्तानो सलाव सिद्ध थह भवाथी अार्य मिथ्या थह कशे. खाना पर पूर्वपक्ष तरइथी शंडा उठाववाभां खावी छे डे खाश्रित घटाहि वस्तुयोनु भिथ्यात्व या रीते सिद्ध थवाथी यए। जनाश्रित परभाणुं जने जाडाशाहि वस्तेजोे सक्ष सव्याप्त छ.डेभे नित्य परभाशं जने नित्य जाडाश कोछमां परा माश्रित नथी. तेथी प्रथथभा सर्वतर सक्ष नथय (10 पूर्वपक्षना जा जाक्षेपनो भवाज सद्ैती जाये छो ड खदैतभतमा ब्रहमारिडत यावत् वस्तुओो माश्रित छे. रताहि केवी रीते शुक्तिभां माश्रित छेसेवी रीते सभय्र प्रथथ प्रहमाश्रित छ. खेडमात्र ज्रह्म क जनाश्रित छ. सेवी रीते सक्षणामां सतिव्याप्ति छोष यएा खायी शङाय नहि, डेमडेज्रम्म डोछनाभा परा माश्रित नथी (109)
परस्पर घटाहि साथे ताहात्म्याध्यास थवाथी थए सत् जरम्म आाश्रित नथी. घटाहि पहार्थ जने तहध्यासाहि ब्रहमउय डारमां डुस्पित ४ छ. इरी पूर्वपक्ष शंडा और छे डे न्यायभतभां संयोगाहिन सव्याप्तवृति मानवाभा जावे छ. तेथी खेभ भानी शङाय डे खेड़ वस्तुना खेड़ संशभां संयोग छे, जन्य संशभां नहि, त्यारे उडेवुं पडशे डे संयोगाघिडरएमा ४ संयोगालाव छे.ा रीते संयोगभा पएा भिथ्यात्व जावी भय छे. तेथी खर्था तरता छे. (१0८) खानो भवाज सद्वैतवाही जा शीते साये छे ै लाव खने सलावने भे खेड़ालिदरण मानवाभा जावे जर्थात् खेड़ क िडरएमा संयोग अने संयोगालावनो स्वीडार उरी सेवाथी विरोधनु नाभ ४४गतथी उी १शे, डेभड़े संसारमां क्यां पणा विरोध छे, लसे जे लाव पहार्थोभां क ड्रेम न होय, भावालाव-प्रयुस्त विशोध थया दुरे छे. गोत््वाश्वत्वाहि विरोध परा लावालाव प्रयुक्त विरोध छ. सर्थात् गोत्वा सने गोत्वालाव परस्पर-विशद्ध छ. तेथी गोत्वालावव्याप्य सश्वत्वभां पशा विशोध रहेशे. 222
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पूर्वपक्षी स्वीडार दरे छेडे खेड्व वस्तुभा क्यारे लावालाव थाय छे तो सभानांशने सछने नहि, परंतु अन्यांशने सीधे थह शहेछ. तेनो अर्थ से थयो है शाजांशभां अपि संयोग छेसने भूसांशभां संयोगलाव छे, त्यारे सिद्धांती पश स्वीडार कुरे छ, डेमडे सवशछेहड़ धर्म लिन्न होवाथी अधिदरण पएा विशेषण प्रयु्त लिन्न थह भशे. शाजावश्छेटेन उपिसंयोनी वृक्ष छसने भूसाव्य्छेटेन नथी, तेथी सव्याप्ति नथी खद्वैत वेहांती सव्याप्तवृति स्वीजारता ४ नथी. संयोगाहि पश व्याप्यवृति छो. न्यां संयोग डोय छे ते संयु्त स्थानने व्याप्त डरीने होय छे. त्तककमकत्तककतकक्ततकतवम
शाजा उयि संयोगी छे ते संयोगाघिडरए छ. संयोगाहिनी सव्याप्यवृतिता स्वीडारवाथी सवशछेहड़ परंपरानी पाछण मनवस्था थशे संयोगाहिन सव्याप्यवृति स्वीडार दरवाथी पएा जर्थातरता नथी, त्यारे सक्षणानी व्याज्या जा रीते डरवी पडशे, "न्यां के वस्तु यह वशछहउपमां के संजंधथी होय त्यां ते वस्तुना अवश्छेहउयभां सने ते वस्तुथी सत्यंतालावनो प्रतियोगित्य भिथ्यात्व छ." (१०८) जथवा भिथ्यात्व घटडु जत्यंतालावभा त्तकत्तततक्त्तकक्त्तकक्तत्तकतकत्तक 0 विशेषए आायवुं पडशे. मेनो खर्थ
थशे निश्वश्छिनी वृतिड सत्यंतालाव!त्कक्तकत्तककक्तकत्तमा के खर्थातरता
सायवाभा जावी छे त्यां संयोगालाव भूसाव्श्छेहेन डोवाथी सत्यंतभाव निश्व्छिन वृत्तिङ न थयो, तेथी सर्थातरतानो प्रसंग ४ नथी.
जसत् ज्याति खने सन्यथाण्याति निवारण भाटे यित्सु जायार्थ द्वारा जायवाभा आावेस भिथ्यात्वसक्षएा,
११)
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जेवुं दरवामा जात्यो छे. जावो खर्थ परवाथी डोछ प्रदारनो छोष नथी. जा सक्षनो खर्थ छ, के ड्ेवज पोतानो सत्यंतालावना अधिडरएमा ्रतीत छै.सन्यन् झ्यांड यए प्रतीत न होय ते मिथ्या छे.
पूर्वपक्ष तरइथी इरी शंडा उरवाभा जावी छ डे संयोग संजंधथी लूतसभा घटालाव घटना रडेवाथी नथी रडी शङतो. सत्यन्तालाव प्रतियोगीनो विशोध प्रभाष सिद्ध छ. घटाहिना भिथ्यात्व प्रतिपानभां सिद्धांत से े प्रतियोगीनी साथे तेनो सत्यंतालावना समानाघिडरण जर्थात् विशोध उ्ो छ ते ससगत छे. (११२) तेना उत्तरभां सिध्धांत उहे छे डे समान सत्तङ- सलाव खने प्रतियोगीभां विरोध थवाथी यशा लिन्न सत्तानो जलाव अने प्रतियोगीभां विरोध नथी (113) थित्सुजायार्यना सक्षणमां उंडेवामां सात्युं छेडे स्वसमानाघिङ्रणत्यंतालाव प्रतियोगीत्वं भिथ्यात्वभ् जने विवरणायार्थ प्रहर्शित प्रथम सक्षणमा उडेवाभा माव्युं छेडे प्रतिपन्नोयाधो त्ैडासिड़ निषेध प्रतियोगित्वभं जा जंने सक्षणोभां विशेष्यदस सभानार्थ छडरमे सत्यंतालाव प्रतियोगित्व जने त्रैआासिङ निषेध प्रतियोगित्वभां मार्थि संतर नथी खने जंने सक्षणोभा विशेषणाहस पएा समान छ. डेभडे प्रतियोगीनु खीधडरण मने प्रतिपतियधिडरण या रीते जाा परा मार्थि संतर नथी, मेसा माटे मिथ्यात्व यतुर्थ सक्षणमां पुनरुडित निवारण माटे सद्वैतसिद्धिधार भघुसुहन सरस्वती सने यितुसुजायार्यना सक्षणने परिवर्तित दरीने
क्त क्तकतकक्ततकतकक्ता रीते प्रस्तुत डर्युं छे. साभा मात्र विशेष्य अने विशेषण
दसोभां विपर्यास थयो छे. आावी रीते पुनरु्तितनुं निराहरण ऊशवाभां आावेस छे.
४.४.4 पंथभ भिथ्यात्व सक्षणः-
आानंदजोध लट्टारडायार्य जनुसार :-
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श्री मानदजोधे "न्याय हीयावि" ग्रंथभा
तंकककेेेिकतकिककतकततकतकक जा रीते भिथ्यात्वनुं अनुभान सबू डर्यु छे
सहीं सक्षएाभा साध्यनी प्रसिद्धि पर वियार उरता तेभऐो 'सत्य विवेड' ने मिथ्या डह्ो छ. अर्थात् 'सत्य लिन्नत्व' भिथ्यात्वनुं सक्षण थयुं जा सक्षणने सद्वैतसिद्धिडारे त्क त्तेतेतकेतककेरेेकतेक्ितकतक्रितमकक्तमनक4) से रीते सद्ैतसिद्धिमा र डर्यु छ
त्तकक्ततकत्तकक्तत्तकतमको खर्थ सत्तनो लेह र्थात् सत्वावश्छिन्न प्रतियोगिताड लेह,
'विवेड' पहनो खर्थ पर लेह क डवोछ.खेड़ मात्र ्रम्म सहवस्तु छ. वियहाहि प्रथय सहू ज्रह्मथी लिन्न छे, तेथी मिथ्या छे. वियहाि प्रपंथ ४ भिथ्यात्व सक्षणानु सक्ष्य छे. तेथी सक्षणनी सभन्वय थयो.
सही शंडा थाय छे डे मे सहूतिन्नत्व क मिथ्यात्व छे त्यारे खेड सह वस्तु पर्थी उपर सहवस्तु पर लिन्न छे. तेथी हलूत सहलेहमा सक्षणानी अतिव्याप्ति थवाना अारणे दिथ्यात्व सक्षणमां सिद्धि साधनता थशे ? पूर्व पक्षनी जा शंडाना भवाजमा खदैतवेहांती उहे छ डे 'सहविविस्तत्व' नो खर्थ सहलेहन दरता "सहउयत्वालाव" सेवो दुरवो भहसे. घटाहि सह्वस्तु पटाहटि सह वस्तुओोी लिन्न स्वीडृत थवाथी पश पूर्वपक्षी अनुसार स्यारेय परा घटाह वस्तुखोी लिन्न स्वीडृत थवाथी यए पूर्वपक्षी अनुसार पटाहटि वस्तुओोा सयत्व छे सत्वनु सक्षण छ. "प्रभाषसिद्धत्व" (१19) जने प्रभाए "होषासउडत ज्ञानदुररत्व" (119) डोवु भेसे सर्थात् लेहनोे प्रतियोगितावश्छेहडसत्व छे ते प्रभाए सिद्ध होवो भेसेप्रभाश सिद्धनो खर्थ प्रभाषष्ठ्न्य विषयत्व छोखने प्रभाश छोषान्य प्रभाएज्ञाननुं औरण छे. सेवुंलभूत प्रभाशसिद्ध सत्वावश्छिन्न पूतियोगिताड क ले ते भिथ्यात्व छ. विपहाहि प्रथयनुं ज्ञान छोषकन्य प्रभाश सिद्ध छे, तेथी सक्षणनी संगति छै. भे सेभ उडेवामा
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जावे डे वेहांत भहावाअयनन्य खजंडाअरवृत्तिउय ज्ञान पमा अधिय छोष छ तेथी ब्रह्मज्ञानने पए छोषठन्य मानवुं पडशे ?
खानो भवाज से छ डे छोषसहकृतनो खर्थ छोषइपथी छोषानन्य छ. होष सहदृत अारण के ज्ञाननुं बनड होय छे ते ज्ञान अभ हशे, ते ज्ञाननुं दरश 4। प्रभाए नहीं मानवाभा आवेककक्ततमवा्यन्ंतदुर वृति ज्ञानमां
परिणामी उपाहान३पथी सविधानन्यता छे, परंतु छोषउपथी सविधानन्यता नथी डेमडे छोषउपथी अरणत्व निभितकारण होय छे उपाहान नहि मेटसा भाटे सद्वैतसिद्धिङार वेहांत भहावाअ्यनन्य खडारवृत्तिउय ज्ञान ोषान् ज्ञानछे, तेथी प्रभाष ज्ञान छे. (११८) प्रथथ विपहाहिनुं ज्ञान सविद:दोषन्य छे. तेथी भिथ्यात्वनुं सक्षएं प्रथंथभा संग छ. केवी रीते स्वप्नभां हेजातो हाथी वेरे भिथ्या छे तेवी रीते भगत प्रपंथने पशा सभवुं भेसे
जानहजोघायारये सत्यनु साप्युं छे, त्तकत्तकक्त
क्त सत्य पदनी 2
सद्वैतसिद्धिारे 'सत्व' यह द्वारा व्याज्या जायी छे.पूर्वपक्षी तरइथी इरी शंडा डवारमा जाी छे डे सिद्धांतभतभा ससत् शशविषशाहिन ज्ञान थतुं नथी. मेसा भाटे विथ्यात्वसक्षएा मलिड शशविक्षाणाहिमां सतिव्याप्त छे. (१21) छोषो्- ज्ञानदुरणथन्य- ज्ञानविषय लिन्नत्व भिथ्यात्व छे,खने सेवंलूत लिन्नत्व जञाता विषय शशविषशाहिभां पहा नथी. जावी रीते डेटसाड वेहांते उहेशी शुद्ध ज्रह्मने वृति विषय मानता नथी. तेभना भत भुष्ठ्ज जेवी रीते ज्ञान विषयना ले भिथ्यात्व शुद्ध ब्रह्ममा पहा छे. तेथी शुद्ध ज्रह्ममा पह सतिव्याप्ति छे. (१२२) जा शंडाना भवाजमा सद्वैतसिद्धिधार उहे छे हे खहीं पएा अतिव्याप्ति निवारण भाटे 'सत्वेन पूतीयभानत्वं' विशेषए आापवुं पडशे,(१२3) तेनो खर्थ से थयो हे के सत्वउपथी प्रतीतिनो विषय हीय
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छेखने छोषाठन्यज्ञान विषय लिन्नत्व पएा डोय ते मिथ्या छे. या सक्षएा अनुसार शशविषाए जने ब्रह्ममा सतिव्याप्ति नहीं थाय अस वस्तुनी सत्वप्रारड प्रतीति नहीं थाय खने े सोडो शुद्ध ब्रमने संडाारवृति विषय नथी मानता तेभना भते शुद्ध ज्रम्म पएा प्रतीतिनो विषय नथी. तेथी शुद्ध प्रह्ममा पम सति्याप्तिनो प्रश्न नीड थाय.
खही त्कत्तकत्तक्रकतेककतकतकेतेक्रेत्तेककेतेिकतकके केे क्रिर श्रिकतेक्रेतकक्ते वुं
सक्षए थयुं जा सक्षए साथे प्रथम भिथ्यात्व सक्षणनी पुनरुत निवारण भाटे क या पंथम सक्षणमां सत्वनी खर्थ 'प्रभाष सिद्धत्व' परवाभा आावेस छे. 'सहूविविङ्तत्वं भिथ्यात्वम्' या सक्षणमा 'सहविविउ्तत्वं' नो खर्थ 'सह्उपत्वालाव' मवामा साव्यो उतो. न्यायहर्शन भुकठ्ज सत्ता भतिमां छे ते सत् मानवाभा जावे छ. प्रर्वथक्षी नैयायिड उहे छे के ज्रह्मभां सत्ताभति नथी. डेमडे सिद्धांती अनुसार ब्रम्म निधर्भड छे. सर्थात् सर्वधर्भ शून्यता उप छे. तेथी सह उपत्वालाव थवाथी ज्रह्ममा सक्षणनी सीतव्याप्ति यह जा संगे दवतवाही भशावे छ डे पूर्वपक्षनु या उथन स्वयं प्रर्वक्षमा पएा सत्य नथी, डेमके सताभति केमां होय ते सत्, सत्ताभति ऐेमां न होय ते जसत् सेवो नियभ स्वयं सत्ताभति भाटे सागु नथी. पूर्वपक्षी सत्ता भतिने सत्ताशून्य होवा छतां पए सत् भाने छे. सत्ताभति स्व३प संजधथी सत् छेसेवो पूर्वपक्षीनो सिद्धांत छ. भे सत्ताभति सत्ताशून्य थहने पश सत् थह शहेछे तो ज्रह्म पएा सत्ताभति शून्य थहने सत् ड्ेम न थह शडे? ज्रह्ममां सहूउपत्व नथी, परंतु स्वउपतः ज्रह्मसत्त छे. तेथी ब्रह्ममां सतिव्याप्ति नथी
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संहर्लभ सूथि :-
(१) पंयदशी: १-१५
(2) पंयहशी: 9-95
(3) पंथपाहिडा, विष्यनगर, सं. ५. ४
(४) पंथथाछिडा, पृ. २०
(4) खद्वैतसिद्धि, यृ. 4४४
(5) खद्वैतसिद्धि, यृ. 4४४
(9) न्यायभृत, उ०४, खद्वैतसिद्धि, 4४४
(८) खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४४
(c) खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४४
(१०) खद्वैतसिद्धि, पृ. ५४४
(११) "सधु यन्द्रिङा" 4.4४४
(१२) खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४४
(१3) खद्वैतसिद्धि, पृ.4४४
(१४) न्यायाभृत तरंगिणी, पृ. २४४
(१५) सघुयन्द्रिडा, यृ. ५४४
(१८) न्यायाभृत तरंगिणी, पृ. २४४
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(१७) सघुयन्द्रिडा, पृ.५४४
(१८) न्यायभृत, पृ. 300
(१८) न्यायभृत, पृ. ५४४, सधुयन्द्रिक्ा, पृ. ५४४
(२०) न्यायभृत तरंगिशी, पृ. २४४
(२१) खद्वैतसिद्धि, पृ. ४43-४4८
(२२) न्यायभृत, पृ. ३०१, खद्वैतसिद्धि पृ.५४४
(२3) न्यायभृत, पृ. ३०१, खद्वैतसिद्धि पृ.4४४
(२४) न्यायभृत, पृ. ३०१, खद्वैतसिद्धि पृ.4४४
(२५) खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४४
(२5) न्यायभृत, पृ. 3०१, खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४४
(२७) खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४४
(२८) खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४४ सघुयन्द्रिका, पृ. ५४४
(२८) न्यायाभृत, पृ. 3०१, खद्वैतसिद्धि, यृ. 4४४
(30) खद्वैतसिद्धि, यृ. ५४४
(39) खद्वैतसिद्धि, यृ. 4४४
(32) अद्वैतसिद्धि, पृ. 4४५
(33) न्यायभृत, पृ. 30४
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(3४) न्यायभृत, पृ. 304, खद्वैतसिद्धि, यृ. 4४4
(34) सद्वैतसिद्धि, पृ. 484-485
(36) अद्वैतसिद्धि, पृ. 4४5
(39) अद्वैतसिद्धि, पृ. 4४5
(3८) अद्वैतसिद्धि, यृ.4४5
(3ल) खद्वैतसिद्धि, पृ.4४5, न्यायभृत, ५.309
(४०) खद्वैतसिद्धि, यृ. 4४5
(४१) खद्वैतसिद्धि, पृ. 4४5
(४२) लाव प्रडाशिङ्ा, पृ. उ२ - 33
(४3) खद्वैतसिद्धि, यृ. 4४5
(४४) "सिद्धांत जिंहु" राऐेन्द्रनाथ घोष, पृ. ५४४
(४4) सद्वैतसिद्धि, पृ. 4४5
(४द) विवरण, विनठयनगर सं., य. १5
(४७) न्यायभृत, निर्एयसागर, १5०७, पृ.६
(४८) न्यायभृत, निर्एयसागर, १६०७, ५. १3
(४८) न्यायभृत, पृ. १३, १४
(4०) न्यायभृत, पृ. १४
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(५१) न्यायभृत, पृ.१४
(4२) न्यायभृत, पृ. १४
(43) न्यायभृत, पृ. १५
(4४) न्यायभृत, पृ. १५
(44) न्यायभृत, पृ. १५
(4द) न्यायभृत, पृ. १५
(49) न्यायभृत, पृ.95
(4८) न्यायभृत, पृ.१5
(4c) तत्वहीपिका, यृ. 32
(50) तत्वहीपिका, यृ. 32
(59) तत्वहीपिका, (यित्सुजी) पृ. 32, 33
(52) ततत्वहीयिका, (यित्सुजी) पृ.33
(द3) तत्वहीपिका (थित्सुजी) पृ.33
(5४) जह्मसूत्र शांदर भाष्य, लूभिङ्ा, 4ृ. 94
(54) पंयथाछिडा, पृ.59-56
(55) पंथपाहिडा, यृ.८८
(s9) वेहांततत्तविवेड पृ. 33
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(5८) थित्सुजी, पृ. 33
(sल) न्यायभृत, पृ. २२
(90) खद्वैतसिद्धि, पृ. 40
(99) खद्वैतसिद्धि, पृ. 40
(७2) खद्वैतसिद्धि, पृ. 40
(93) खद्वैतसिद्धि, यृ. 40,4१
(७४) सघुयन्द्रिङ्ा, यृ.4१
(94) खद्वैतसिद्धि, यृ.395
(95) खद्वैतसिद्धि, पृ.८४
(७9) सघुयन्द्रिका पर विट्ठसेशोपाध्यायी टीडा, यृ.८४
(७८) खद्वैतसिद्धि, पृ. ११०,११२
(७८) सघुयन्द्रिडा, ५ृ.११२
(८०) सधुयन्द्रिडा, ५ृ. ११२
(८१) खद्वैतसिद्धि, पृ. १२,१४
(८२) न्यायभृत, २७
(८3) खद्वैतसिद्धि-सधुयन्द्रिका, ५ृ. १२०
(८४) पंथथादिडा विवरण, ५ृ. ११3
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(८4) थित्सुजी, पृ. ८०
(८5) खद्वैतसिद्धि, यृ. १3०
(८१) सधुयन्द्रिङायृ १5४
(८८) खद्वैतसिद्धि, यृ. 950
(८ल) खद्वैतसिद्धि, यृ. 953,958
(८o) पंथपाहिडा विवरण, पृ. २१५
(८१) सघुयन्द्रिङ्ा यृ १5४
(ल2) सधुयन्द्रिद्ा यृ. 954
(८3) सघुयन्द्रिक्ा यृ १5८
(८४) खद्वैतसिद्धि, य. १5८
(cu) खद्वैतसिद्धि, यृ. १5८
(Cद) खद्वैतसिद्धि, पृ. १७१
(८9) खद्वैतसिद्धि, 4.999,995
(८८) खद्वैतसिद्धि, यृ.१७9
(८ल) खद्वैतसिद्धि, यृ. १७८
(१००) थित्सुजी, प. 3८
(१०१) खद्वैतसिद्धि, यृ. १८२
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(१०२) ित्सुजी, पृ. 3८
(१०3) थित्सुजी, पृ. 3८
(१०४) थित्सुजी, प. 3८, ४०
(१०4) थित्सुजी, पृ. ४०
(१05) थित्सुजी, पृ. 3८
(१09) थित्सुजी, प. 3८
(१०८) सधुयन्द्रिकायृ १८3
(१०८) सघुयन्द्रिक्ा यृ १५१
(११0) खद्वैतसिद्धि, यृ.१८१,१८२
(१११) खद्वैतसिद्धि, यृ. १40
(११२) सधुयन्द्रिडायृ १८८
(११3) न्यायही पावसी, मानहजोध, यौ ंजा, १८०१, ५.१
(११४) खद्वैतसिद्धि, यृ. 9८५
(११4) खद्वैतसिद्धि, यृ. 9८4
(११5) खद्वैतसिद्धि, 4. १ल4, 9८७
(११७) सघुयन्द्रिदा यृ. 9५
(११८) खद्वैतसिद्धि, 4ृ.१८७
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(११८) न्यायहीपावलि, यृ. १
(१२०) सधुयन्द्रिङा पृ. २०१
(१२१) सधुयन्द्रिडा यृ. २०१
(१२२) खद्वैतसिद्धि, पृ.२०२
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पौराणिड खने भडाङ्ाव्यनं तत्त्वयिंतन
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पौराणीड खने भहाङाव्यनं तत्त्वयिंतन
4.9 प्रस्तावना :-
4.२ भहाङाव्योना तत्त्वयिंतनभा भायावाद -प्रास्तविद :-
4.3 भहाङाव्योनुं तत्त्वयिंतन खने भाया सिद्धांत :-
4.४ खध्यात्म राभायणभां भाया सिद्धांत :-
4.४.१ प्रस्तावना :-
4.४.२ श्री राम हधयनु तत्वविज्ञान खने भाया सिद्धांत :-
4.४.उ खध्यात्म राभायणानी स्तुतियो तथा उपहेशमा
भायाना स्व३प तेभठ सिद्धांतनुं नि३4ण :-
4.४.3.१ श्री राम- सक्ष्मण उपदेशभा भायानी
व्याज्या खने भाया सिद्धांत :-
4.4 शभयरित मानसभा भाया सिद्धांत :-
4.4.9- प्रस्तावना :-
4.4.2 -सृष्टि विज्ञान खने डस्प ज्रहमांड सिद्धांत :-
4.4.3-डाइलूबंडी-सोभश संवाह खने सद्वैतवाह :-
4.4.४- सभयनी साथेक्षता, भाया सिद्धांत तथा मनेड़ ज्रम्मांड सिद्धांत
4.4.4- भूस्यांडन खने उपसंहार :-
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प्रडरश :- 4
पौराणिड खने भहाअाव्यनं तत्वयिंतन :-
4.9: प्रस्तावना :-
जा संशोधन अर्यभा जा पडेसाना प्रदशशोभां वैदिद सने वेहांतिड परंपराभां भाया सिध्धांतनुं सर्वांगीए भूस्यांडन उरवानो प्रयास थयो छो. आाप्रयासभां के जाधारो सेवाभा आावेस छे ते जघा भारतीय दर्शनना, भूण तत्त्वज्ञान परंपराना ग्रंथो छे. वेह, उपनिषद, ज्रह्मसूत्र, लगवहसीता सने वेहांतना तेभ विशेषतः
शांऊरवेहांत ना ग्रंथो, तत्त्वज्ञाननी भुख्य धारा (Main stream philosophy) संतर्गत जावे छे. सने ते ग्रंथोनी तत्वज्ञानीय लूभिका जंगे लारतमां डे आांतरराष्ट्रीय स्तरे अोछ विवाह नथी. सभय्र वेहांत परंपशानी विद्ास तत्त्वज्ञानने भुख्य विषय तरीडे डेन्द्रभां रशीने थयो छे सने तेनुं वियार विश्व भुज्यत्वे हार्शनिड छे. परन्तु भारतीय िंतन परंपरानी से खेड़ खगत्यनी साक्षणिडता रही छे डे तेनो विडास ने विस्तार जहु खायाभी रहो छे. सर्थातक्भारतीय चिंतन प्रशासीभा को भुख्य विषय तरीडे
विशुध्ध तत्त्वयिंतन रशू न थयुं डोय तो पएा तेनो आाधार बहने, तेनी पृष्ठलूभिभां अन्य परिभाशोनुं निउपण मने विडास डरवानी सेड़ परंपरा रहे छै.जा डरे सभ भारतीय थिंतनभां नीतिशास्त्र, सभाष्ठ सक्षी यिंतन, धार्भिडयिंतन तेभष्ठ अध्यात्मसक्षी सिंतन पश तात्विद भूभिडाना आाधारे कसशू थयेस हेजाय छे.
आा सवसोडन विशेषतः धार्भि िंतनने साशु पडे छे से उडेवानी लाग्ये क४३रियात रहे छे डे लारतीय संहर्लभां पश्रिक्षता तत्त्वयिंतन ससग
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ससग दिशाभां डे परिभाशोभां थयेस वियार धाराओो नथी. सभ धार्भिड चिंतन डोछने दोछ तत्त्ववियार पर सीधी रीते आाधारित छसने या तत्त्ववियार ेटसो वेहांतथी प्रभावित छे तेटसो जन्य डोछ वियारधाराथी प्रभावित थह शङतो नथी.
उवे सभय्र मानवभातना धार्भिड शिंतननी जाजतभा के परिषणो कोवा भणे छे तेभां खेड़ सौथी गत्यनी जाजत नौधयात्र छे. सेवु शक्र जन्युं नथी है धार्भिड वियारन नि३4ण तेभ लव्यक्ि दरण विशुध्ध तात्विड डै नैतिड भूभिडाये दरी छेवाभा जावे, खर्थातक्तवार्भिड येतनाना उर्ध्वीदरण तेभ धार्भिड सिध्धांतोना
प्रजोधन माटे मात्र ब३री माध्यात्मिङ सत्वोनुं निद्पण अने नैतिड सिध्धांतोनु स्पष्टीदरण ते पृष्ठलूभिभां अनिवार्य परो अाथठर होवा छतां- पर्याप्त नथी, आा भाटे धार्मिड यिंतनभां अछने होछ प्रारना पुराए- गाथा वाहीय परिभाओों (My tho logical dimension) नो आाधार खने उपयोग अनिवार्य जने छे. आा संोगोभां भारतीय तत्त्वयिंतनना संहर्भमां पुराणशाथावाह जन तत्त्वज्ञान वय्येनो संजंध तथासवो ४३री छे. सेवुं जा तजश्र भशाय छे. ऐेमां, या प्रयास प्रारंभ दरता पडेसा डेटसीड स्पष्टताजो वद्री जने छे.
भारतीय तत््वज्ञानना क्षेत्रभा विशेषतः जोगणीसभी सही जाह० जल्यास, वियार, शिंतन अने संशोधन यासी रुं छ अने विशेषतः युनि तेभ ४ संशोधन संस्थाओोना क्षेत्रभा प्रवर्तमान छे. ते भारतीय तत्वयिंतन े ते सभयेे पध्धतिजो तेभव्ठ परिभाणोथी पाश्यात्य ज्ञानक्षेत्रेना संर्डमा ायु तेना र आाधारित छ. (1) जा संहर्लभां के जाजत नौधयात्र छो. ते या छ डे पश्भनी सल्यास खने संशोधन पध्धति साथेनो या संपड क्यारे भारतीय तत्वयिंतनने विश्व सभक्ष भूङवानो प्रयास उरे छे त्यारे तेनी रबूजात तेभ ४ विषयवस्तुनी पसंदगी पर पाश्यात्य अलिगम, जथवा तो जोछमां जोछ पश्यमना विथार-विश्वने सभावी शङवानी
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लूभिडा साभे थाय तेवी स्थितिनुं निर्भाण थयुं छ. तेथी क्यारे २०भी सहीना प्रारंभभा 'भारतीय तत्वज्ञान' पर डे भारतीय तत्त्वज्ञानना छतिहास पर जभ्यासपूर्ण पुस्त सजाया त्यारे तेभां निउपश थयेस तत्त्वज्ञाननो भुष्य वियार-क्षेत्र परंपरागत प्रशिष्ट भारतीय तत्त्वयिंतननुं ४ नि३यश थयुं उतुं (२) तभां पौरालिड ग्रंथोभां थयेसा तत्वयिंतनने स्थान भण्युं नथी. तेवी रीते भारतीय खलगभथी सजवाभा जावेस षड्तर्शन सभुश्यय डे सर्वदर्शन संग्रह केवा ग्रंथोमां पह पौरालिड तत्त्वयिंतननु
निशयमा सत्यंत सस्य प्रभाएमां भोवा मणे छे. या संोगोभा जा संोगोमं से जाजतनी स्पष्टता वधु प्रासंगिड जने छे डे पौरालिड तत्ववियारभा भाया सिध्धांतनो विभर्श डेटसो औौयित्य पूर्ण डे प्रासंगिड गणी शङाय?
ा वियारणा सुसंगततानी दरष्टिसे यथार्थ छे. परन्तु तेभां भेड़ जाजत छे. केना पर पूरतु ध्यान खापी शङ्ायु नथी. पुराणगाथावाह ने वैज्ञानिड़ खलगभथी तथासवानो प्रश्न उपस्थित थतो नथी. परन्तु तेनी साभे ते परा जेसुं ४ यथार्थ छे डे पुराए गाथावाह ने संपूर्श परी- डथा (fairy told) ४ेवुं गशीने छोड़ी छेवाभां पएा औौयित्य नथी. धणा हार्शनिङ सिध्धांतोनो, विदास, जभुऊ उह सुधी पौरािड सिंतनमां भोवा मणे छे. तो डेटसाऊ नवा हार्शनिड तथा सृष्टि भीभांसाडीय सिध्धांतो सेवा छ डे केमनो प्रारंभ पौराशिड तत्त्वयिंतनभा थयेसा छै. खेड उहाहरएथी जा स्थापनाने सभर्थन जायवानो प्रयास डरीजे
खनेड़- विश्व सिध्धांत जर्थातत्तमायणुं जा ब्रमांड से मात्र खेड़
8 ज्रह्मांड नथी परन्तु तेना केवा डै तेनाथी असग, जनंत, खनेड़, ब्रह्मांडी जावेसा छे. खा सिध्धांतनो निहेश पौराि तत्वयिंतनभा ोवा भणे छे श्रीभटत्तभावतक्त
योगवशिष्ठ महाराभायए तेभ क स्ंछपुराण थेवा ग्रंथोमां अनेड़ ब्रम्मांड सिध्धांत भोवा भणे छे.उवे खा खनेड-प्रम्मांड सिध्धांत से साप्रेत-विज्ञानभां पश भेड़ ग्नी
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प्रस्तुतता घरावतो सिध्धांत छे. या सिध्धांतनो विभर्श तात्विड द्रष्टिसे थवो आावश्यड छेसने विशेषतः भाया सिध्धांतना संहर्लभां अनेड विश्व सिध्धांत अनेङ सुसंगत परिभाणो घरावे छे. तेथी पौरािड थिंतनने योग्य रीते ध्यानभां सेवाभा जावे तो जात्मसत्ता तथा प्रवीसमान विश्व केवार्ड़े जनेड़ ब्रम्मांड सिध्धांत ना संहलभभा धाशु भार्गदर्शन भजी शड तेभ छे.
खा सिवाय भेड़ जन्य भउत्वपूर्ण जाजतनी स्पष्टता डरवानी रहे छ. पौराणिड लाषा खने वियार विश्वमां के जलव्यक्ि ोवा े तेनेतात्विड संहर्लभां प्रतीअात्मड समठशनी छे. लाषाना यिंतनना संहर्लभां तेनो खर्थ सेवो थाय डे त्यां सीधो उड़ीउतसक्षी संहर्ल प्रस्तुत होवाने जहसे प्रतीअत्मड सतव्यक्िनी सपेक्षा वधारे होय छ. या संभोगोभां पुराशो ने तेनाथी संजंधित साहित्य वैदिड जने वेहांतिड परंपराना सिध्धांतोनो क्यारे स्वीडार हरीने पुराण-गाथावाहनी परिलाषयां क्यारे उद्सेज डुरे छ त्यारेतेभां उड़ीउत सक्षी संहर्लनो सीधो निदेश थवानी जहसे तेभां प्रतीअात्मड ध्वनिने वधारे सुसंगतताथी सेवानो रहे छे.
आा संभोगोभां प्रस्तुत शोधी प्रजधभा वेहांतना तत्वदर्शननी भाया सिध्धांतना संहर्लभां वियारणा थर्ा जाह उवे जाखने तेना छीना प्रदरशमां पौराशिड साहित्यभांथी, तत्वज्ञानना संहर्लभभां माया सिध्धांत तेभ क तेनाथी संजंधित सद्वैतवाहने सगता सिध्धांतोनो उपयोग उछ रीते थयो छो ते कोछने सिध्धांत स्व३पनु विवेयन डश्वानो प्रयास डरीशुं.
4.र: भहाङाव्योना तत्वयिंतनभा भायावाह-प्रास्तविड :-
पौरािड ग्रंथोनी ऐेभव्ठ राभायण तथा भहालारत ेवा ग्रंथोमां विशुध्ध तत्त्वयिंतन भोवा भणे छे. प्राथभिड् लूभिडाना स्पष्टीडरश जाह राभाया - साहि्यमा
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राभयरितमानसभा जासडांडभा शिव-पार्वती संवाहभां तथा उत्तरडांडना डाड भुशुण्डि ग३ड संवाहभा भायावाहनी सिध्धांत तपासवाभा ावेस छै ा सिाय मध्या्म राभायण मां 'श्री राभ हरधय' केवी संउस्यनाओोभा भायावाहना सिध्धातनु निउपण ने भूस्यांऊन स्पष्ट दरवामा आावेस छे. महालारतभा खद्वैतवाही तत्वयितननी भूभिङा स्पष्ट दूरी उद्योगयर्वमा घृतराष्ट्र सनत्सुभ्ठातु संवाहभां सद्वैतवाह तथा भायावाहना तत्वोनुं खाउ्सन तेभष्ठ भूस्यांडन रवाभा आाव्युं छे
खंतमा हरेड द्रष्टिये, समग्र वैदिड साहित्यभां भायावाहना सिध्धांतनी तात्विङ, साध्यात्मिड खने धार्मिड भूभिद्ानु सारग्राही भूस्यांडन दरी तेनी सांभ्रत प्रस्तुतता जतावेसछे.
4.उ: भडाङाव्योनुं तत्त्वयिंतन खने भाया सिद्धांत :-
आागणना प्रदरणमां के रीते पौरािड तत्वयिंतन भांथी खहभवाह तथा भाया सिध्धांतने सगता सिध्धांतो ने संउस्पनानु परिशीसन डशवामा खात्यु ते ४ संहलथी भहाअव्योना तत्त्वयिंतनभांथी माया - सिध्धांतने तपासी ते आावश्यड जने छे. महाडाव्यो साभान्य रीते या संहर्लभभां राभाय अने भहालारतने उहेवामा जावे छे.खने या प्रदरशभाँ प्रस्तुत शोध निजधनु वियार विश्वजाजनें भडाऊव्यो पूरतुं भर्याहित छे.
रामायणा खने भहालारतभा सौ प्रथम राभायणना तत्त्वयिंतनभांथी भायावाह खने द्वैतवाहने सगता तात्विड सिध्धांतो तपासवा ४३री छे. या यिंतन पए तेनी हेजाती पृष्ठलूभि तरीडे पुराश गाथा वाह पर आाधारीत छे. परंतु वाछभीडी राभयण पछी राभायण उथानो के अनेड राभायएस मने ग्रंथोमां विस्तार थयो तेभां पौराणिड साक्षणिउताने जाह उरवाभा जावे तो डेटसाऊ महत्वपूर्ण सृष्टि भीभांसाडीय खने तत्त्वविज्ञानीय प्रतिपाठनो भणे छे.डेऐमा भगत मने अंतिभ 242
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सत्ता वय्येना संजंधनी सवर्णनीयतानी स्थितिन भायाथी जोजजी शडाय खा सिध्धांतोभां व्यायड स्तरे वैश्विड सर्गनो यह पंनशावर्ती युक्त अनेऊ उस्य सिध्धांत
थतो अनेड़ विध सिध्धांत जा अने विध ने नंत उस्प सिध्धांतनी पृष्ठलूभिभा
राभायण तेभष्ठ राभयरित मानस भांथी हमश स्पष्टतः द्वैतवाह सभर्थड माया सिध्धांत के के स्पष्टतः संडेतिड थथा भुक्ज शांडर वेहांतना लाभती प्रस्थानना सवरछेहवाह साथे तत्सम छे. तथा परोक्षता संडेतिड थतो भायावाहनो सिध्धांत डे खनंत उ्स्थ, खनेड़ विध सिध्धांतनी पृष्ठलूभिभां अलसक्षित थाय छे, तेनो वियार दुरवानो छे. ते सिवाय भहालारतना उद्योग पर्व भांथी धृतराष्ट्र सनत्सुभ्ठात संवाहभांथी भृत्युखने सभस्तना संहर्भभा येतनाना पारणाभी स्वपनु निउ्श तासीने तेभाथी सद्वैतवाह संहलिभित मायावाहने स्पष्ट डुरवाना छे. साभ या प्रदरणमां उपर्युउत
थिंतनभां भायावाहनुं निउपश दरवानुं रहे
दशवाभा जावेस छे.
4.४: अध्यात्म राभायणभा भाया सिध्धात :-
4.४.१: प्रस्तावना :-
अध्यात्म राभायणने सामान्य रीते ब्रमांड पुराश संतर्गत खेड कृति मानवाभा जावे छे. शेनुं खेड़ स्वतंत्र धार्शनिड जने धार्मिड ग्रंथ तरीङेन पएा अस्तित्व छे. ऐेभा साभान्य रीते राभना यरित्रनुं राभायणा आाधारीत वर्शन
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दरवाभा आावेस छ. परंतु या सभग्र ग्रथ खद्वैतवाहनी पृष्ठ लूभिभा सजायो छे. केभा विशेषतः प्रसंगो सिवाय स्तुतीयो ने प्रार्थनायमा रेतवाह तथा भाया सिध्धांत रणू थयेसो हेजाय छे. ग्रंथनी विशेषता मे छे डे तेभा सद्वैतभार्गीय ज्ञान भार्ग होवा छता राभायण उथा विस्तारना तत्डासीन प्रवाहीनु भेड संडसन भोवा भणे छे. सने तुससीहासना रामयरित मानस पर पशा विशिष्ट प्रलाव अध्यात्म राभायणा नो छे. या ग्रंथभा भायासिध्धांतनुं निउपा मने ्याये थयुं छ, केमा प्रारंभभा ४ श्री राभ - सीता जने हनुभान व्थेना संवाहनो विलाग डे केने श्री रामहधय उडेवाभा जावे छे.त्यांथी सहने सयोध्या डांडमा राभनो सक्षण ने उपदेश सरएय डांडमां सरभंग- सुतिष्ण सने सयत्स्य द्वारा राभनी स्तुती तेभषठ संडाडडा छन्द्र खने ल्मा द्वारा रामनी स्तुती भेवा खने प्रसंगोभां सद्वैतवाहनी तथा भाया सिध्धांतनी स्पष्ट रुजात ो शङाय छे ग्रंथनी संस्थना तेभ तत्वभीभांसाडीय प्रतिपाहननी छष्टिसे डेवसाद्वित सवछेहवाह खने भाया सिध्धांतने अलव्यत ताशरी राभ ुधयनी विशतोनी धर्शनिड वियारणाथी भूस्यांडन दरवाना प्रयास डरीशुं
4.४२: श्री राम हधयनु तत्त्वविज्ञान खने भाया
श्री रामसहय से उड़ीउतमां जासडांडना प्रथम सर्गना जत्रीस थी
जावन (उर+ 4२) शसोड सुधी सभ तत्त्वनुं डेवसाद्वैतवाही निइ4णा छ.०ेनी शउजातमां सीता द्वारा उनुमानने राम तत्वना परजल तरीडेना निइपशथी प्रारंभ दरवाभा जाव्यो छे, तेभां भशावायु छेडे.
244
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क्त क्त क्त
सर्थातत्ताभने साक्षतक्त सद्विय, सरयहानंह परषल् सभोसे
अोछयए भातना संदेड वगर सभस्त उपाधीजोथी रहित सत्ताभात्र मन तथा छन्द्रियोना सविषय, आानंदधन, निर्भक, शंत, निर्विदार, निरठन, सर्वव्या4ड, स्वयं प्रदाश अने पाय रहित परमात्मा छे.जा वर्शनभां े विधिवासी अने निषेधवाथी विधयोनो प्रयोग उरवाभा जावेस छे. ते भउछ संशे उपनिषद खने सद्वैत वेहांतभां संतिभसत्ताना निषेधड वर्शनने समातर ा छपरश् भाया रहित सत्ताने सुथवे छे. क या वर्शन भां उपाधिथी विनिर्भुउत्त शष्ह प्रयोग द्वारा जताववाभा जावेस छे. मन तथा छन्द्रियोनु सविषयत्त् खने सत्ता मात्र डोवा पशु परभ सत्तानी सवर्णनीयता सूयवे छे. स्वयं प्राशत्व शंडरेत्तर वेहांतभां स्वीडृत सतक्ता स्व३प मने भापदंडनो निदेश दुरे छे. सने खन्य
निषेधवायी विशेषणो परभ सत्ताना वर्शन भाटे औौपनिदिड परंपरानी स्थिति सूथवे छ. या४ स्थितिन भागण ४3 मा शसोडमा नीये भुकज जाववामा जावेसछे.
जर्थातश्राभने साक्षत्रजद्वितीय, स्यान परष्श्व सभ े अोछयश भातना संदेड वगर सभस्त उपाधीजोथी रहित सश्ाभात्र मन तथा छन्धियिोना सविषय, आानंद धन, निर्भक, शांत, निर्विकार निरधन, सर्वव्यायड, स्वयं प्रदाश सने पाय रहित परमात्मा छे.या वर्शनभा विघिवायी सने निषेधवासी विधेयोनो प्रयोग उरवाभा जावेस छे. ते भउहमंशे उपनिषद मने 245
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सद्वैत वेहांतभा अंतिभसध्वाना निषेधड वर्शनने समातर ाय छ.परष्रश्श् भाया रहित सश्वाने सुथवे छे. के या वर्शनभा उपाधिथी विनिर्भुक्ष शब्ह प्रयोगो द्वारा जताववाभा जावेस छे.मन तथा छन्धियोनुं सविषयक्ष ने सका मात्र होवा पशु पर्भ सश्वानी सवर्शनीयता सूयवे छे. स्वयं प्रदाशत्व शंडरोश्वर वेहांतभां स्वीदृत सतका स्वक्ष अने भापदंडनो निर्देश डुरे छे. सने खन्य निषेधवायी विशेषणो परभ सश्वाना वर्शन भाटे औौनिषहिड परंपरानी स्थितिने आागण ४उ मा शोडभा नीये भुकठ्ज जताववाभा आावेस छे.
"खा राम न तो यासे छन उला रहे छे. न शोड डुरे छ. न छरछ। दुरे छ. न त्याग दुरे छे. के न कोछ खन्य क्िया क दरे छे ते खानंह स्वक्, सवियस जने परिणामडीन छ. परंतु डेवण भायाना गुणोथी व्याप्त थवाने डारऐो ते जा प्रहारना हेजाय छे."(3)
खा वर्शन उपनिषहोमां के रीते दन्द्व रंहित अंतिभ सशानुं वर्णन दरवाभा जावे छे. प्रदारनुं वर्णन छे. ऐेभडे छशावास्य उपनिषहमा ब्रश्वभाटे ते स्थिर पएा नथी खने यासतो पहा नथी. ते नशड पएा नथी जने हूर पएा नथी से रीते द्वन्दव रहित तात्विड स्थितिनुं वर्शन थयुं छ. तेवी४ रीते खहिं इन्द्रातीत जवस्था जताववाभा जावी छै.क डेवसाद्वैतना अंतिम तक्षनी सेड़ साक्षणिडता छ. भायानी साथे गुए शष्दनो प्रयोग डरीने साभान्य रीते व्यावहारिड स्तरे भायाने ज्रश्वनी शक्षि तरीडे जतावीने वेहांत वियारधाराजोमां सांज्यनी प्रदृतिना ज्यासनो के प्रारनुं सभातर स्वक्ष कोवा भणे छे. ते दर्शावायु छे.
जा तक्षभी भांसाने वघारे स्पष्ट ऊरवा माटे राभ हनुमानने जागण भशावे छे. तेभा परज्रश्ु स्वक्ष ने व्यवहारिड सशा साथेनो तेना संजंधने स्पष्ट डरवानो प्रयास स्पष्ट थाय छे. ऐेमा सवछेहवाह जनुसार नीथे
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भुकज स्पष्टीदरण दरवामा जाव्युं छे
सर्था हुं तमने खात्मा जनात्मा खने परमात्मानु तक्ष जतावु ुं ते सांलजो कणाशयमा खाडाशना त्रए लेह स्पष्ट हेजायछो. सेड हडाश जीभो कसाविशछिनी खाडाश खने त्रीो प्रतिजिंजाडाश ेम ाशना ा त्ा लेह हेजाय छै. से प्रहारे येतनना पएा ऋए लेह छो सेड़ जुश्वियवशछनी येतना जीणु के सर्वत्र परिपूर्ण छे ते येतन खने तीणु क जुश्विमा प्रतििंजित थाय छे. ते येतन हे लेने आालास येतन पए उडेवाभा आावे छ.
सहीं वसाडाश प्रतिबिंजाडाश खने भहाडाशनी उपभा द्वारा येतनाना त्ए स्तरोने के रीते समभाववाभा जाव्या छो ते सद्वैतवेहांत खने विशेषतश्रशंरोश्वर खद्वैत वेहांतने जनुक्ष छ.० रीते शांडर वेहांतना लाभती प्रस्थानभा व्यावहारिड सश्ाना अस्तिक्षने परभ सशानो सवशछेह गशीने जाडाश खने भहादाश द्वारा सभाव वा भा जावे छै. ते जाजतने खही शनोड़ सागण विस्तारीने जर्थातश्रज्ञान भीभांसीडीय संहल बहने जुश्ि सछनी येतननी साथे जुश्वि प्रतिबिंजित येतननी धारणा पएा साथे बहने ज्ञाता होय दन्द्व युक्ष ज्ञान भीभांसाना क्षेत्रनुं सार्तत्व अने सर्ग डे संसारना क्षेत्रनुं उतृक्ष्कम, यएा खद्वैतवाहनी भूभिडाभा रहीने सभववाभा माव्यु छेडराडे त्यार पछीना क शयोडमा उडेवायु छे डै "जा जधाभा मात्र आालास येतन सडितनी जुश्ि मां उतृक्ष छ. सर्थातश्रयहालास सडित जुध्धि क जघु अार्य दरे छो. खा रीते खही भाया सिश्धांतनुं स्पष्ट निक्षण भो शडाय छ.आा जाने स्ष्ट दरता खने भायावाहना सिश्वांतने सभर्थन जापता भागण उडेवायु छेडे खजानी भाएासो बरंतिने वशीलूत थहने निर्व्छिन्न, निर्विदार खने साक्षी क्ष खात्माभा उतृत्व श्वश्नुं आारोपण कुरे छे.खने तेने उर्ता खने लोक्षा मानी से छे. 247
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भाया सिश्वांतने अनुक्ष उणु वधु उडेवाय छे डे आालास येतना तो मिथ्या छे. खने जुश्वि सविधानुं अार्य छे. तथा परष्रश्व वास्तविद्तामा विश्छेसडित छे. तेथी तेनो विश्छेह पश विडत्यथी क मानवाभा जावे छे. साधना पश्चति परा भायावाहन जनुक्ष ४ निक्षवामा जावी छे. डरणडे तेना सहंडार स्वक्ष सवश्छिनी येतन सेटसे डे श्ववनी तक्षभसि वगेरे महावाक् द्वारा पूर्ण येतनज्रक्षनी साथे खेड़ता जतावाय छै.सने सेभ पएा उडेवायु छेडे श्वयारे या प्रदारनुं खेकक्ष स्थापित थाय छे, त्यारेयविद्या पोताना डार्य सडित ते ० सभये नया थह काय छे.
समय्र धष्टसे प्ोत सेवु भशाय छे डे अध्यात्म राभायणभा खने विशेषतश्वतेना श्री रामश्य विलागभा के खद्वैत वाहनुं प्रतिपाहन थयुं छे. तेभा शंडरोश्वर वेहांतना पंथदशी थेवा प्रडिया ग्रंथनो विशेष प्रयाव कोवा भणे छे. ०ेनी यर्था प्रस्तुत शोध निजंधना प्रडरश यार भां उरवाभा जावेस छे. नही भाया खने सविधा से जने शष्दोनो प्रयोग थरयो छो. सेड़ प्रारे जा माहित्य खने अाव्योनो ग्रंथ डोवाथी जनेना सश्ाभीभांसाडीय स्पष्टीडरणो जंगे सूक्ष्म तार्डिड श्रष्ट न होय ते सभश् शङाय छेडे श्वयारे परष्रश्वना संहर्लभां व्यावहारीड सश्वाना संजंध संगेनो प्रक्ष होय छ. त्यारे भाया शष्हनो प्रयोग थयो छो सने जुश्ि सवशिछिनी येतन तथा जुश्धि प्रतिमिंजित येतन खने तेना अार्य वर्गना संजंधनो प्रक्ष छे त्यारे सविधा शष्हनो प्रयोग थयो छे साभ अध्यात्म राभायणाना प्रारंभभा क खद्वैतवाह तथा भाया सिध्धांतनी लूभिक्ा स्पष्टशो जांधी छेवाभा सावेसछे.
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4.४.उ: अध्यात्म राभायणनी स्तुतियो तथा
उपदेशभां भायाना स्वक्ष तेभ ४ सिध्धांतनुं
निक्रपणा :-
ा पहेसाना पेटा विलागमा जापए कोछ गया है अध्यात्म रामायण जासडांड ना प्रथभ सर्गभां जावेसा 'श्री राभ रर' विलागमा परभ तत्वनुं स्वक्ष तथा भाया सिध्धांत सद्वैतवाह साथे सुसंगत होय े रीते ोा भणे छे. ा सि ध्घांतना जीण खने वर्शनो समय अध्यात्म राभायणा मां खने भग्याखे भोवा भणे छे. तेनुं अध्यात्म राभायण तरीडेनु नाभ सार्थड डरे छे. सही राभायणाना रावणा जने विलीषश केवा यात्रो पए श्वयारे प्रसंग जावे छे त्यारे खद्वैतनी ज्ञानात्मड लूभिडासे क योतानी सव्य र दै - सिध्धांतनी साथे भाया सिध्धांत पएा प्रगट थता हेजाय छै. आा शोध निजंधना सीभित इसडमा तेभ क जा प्रदरणमां अध्यात्म राभायणाना सीभित निक्वणनी स्थितिभां सभग्र सद्वैत वाही डे भायावादी वर्शनोनु निक्षण जगर तो भूस्यांडन शक्र नथी. तेथी तेमना डेटसाड भुजट प्रसंगोजे निध्धत भाया सिध्धांतनी रबुजात दरीशुं, प्रारंभ सरएयड़ांडमा श्री राम द्वारा सक्ष्मणाने जपाता उपददेशथी दरीशु. ऐेभा भायानी व्याज्या जायवाभा जावेसछै.
4.४.3.१: श्री राम- सक्ष्मण उपदेशभा भायानी
व्याज्या खने भाया सिध्धांत :-
श्री राम सक्ष्मणान अयायेस ज्ञानात्मड उपदेश मरएयड़ाडना सर्गनुं ४ ना शमोड नं. १८ थी शश्थाय छे. ऐेने प्रारंभभा 'गुाय खने परभ 249
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रहस्य' तरीड़े जोजजवाभा जावेस छ. ( सा उपदेशमा आागण भायानी व्याज्या नीये भुकुज सायवाभा सावी छे.(
जर्थातक्तरीर वगरे जनात्म पहार्थोभों के खात्म जुशि थाय छे.
तेने व माया उडेवामा जावे छे. उडीउतभा खहीं भायानो सर्थ वैयक्ष येतना ना संहर्लभां सेवाभा जावेस छे. ०ेने थोडी वधारे सुसंगता श्रष्ट जिंहुथी सविधा पणा उही शङाय जा क मायाने ते शोडना आागणना शोडमा सागजना
उ्रस्यनानु उदस्सव स्थान जतावे छ. केमां उडेवायुं छे डे
खर्थातक्तसेना द्वारा ४ सभय्र संसारनी उस्पना दुरनार शकि
जतावीने त्यार जाह मायाना ते डार्यो डे के साभान्य रीते सद्वैत वेहांत तेभ वेछांतनी जन्य शाजाजोभा पय प्रयित छ. तेभने हीं भायाना क्र तरीडे जताववाभा जावेस छ. केमा उडेवायु छे डे
"भायाना जे सत्य स्वक्षो मानवाभा जावेस छे. खेड़ विक्षेय खने जीभु आावरण भडत तक्षथी सहने जश्व सुधी सभस्त संसारना स्थूणने सूक्ष्म लेछनी उुस्पना दुरे छे जने जीनु आावरण शक्रि क संयूर्श ज्ञानने आावृश्व मरीने स्थिर रहे छे. (१०)
जा रीते सद्वैत वेहांतनी सैश्रांतिड परंपशा अनुसार भायानी आावरण ने विक्षेपनी शक्किजोनो स्पष्ट उस्सेज कोवा मणेछोसे पए वधाराभां स्पष्टता परवाभा जावी छो डे सावरण विक्षेय शक्कि से ४ हड़ीउतमा 250
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सृष्टि सर्गनो प्रारंभ दुरे छ. तथा या प्रारंभनी साथे ावरण शक्ि ज्ञानने आावृश्षदरी सर्गना नियभन भाटे पोते स्थिर रहे छे. या सभय् सैश्ांतिड खर्थना सार तरीड़े सद्वैत वेहांतना विष्यात उहाहरएना स्वक्षमा भागणना शोडमा उडेवाभा जावेस छेडे
"आा संपूर्ण विध रुभां सर्पनी शेम शुश्र ज्रश्मा भायाथी उस्थित छे. वियार परवाथी जा दशु पश स्थिर रहेतु नथी. मनुष्य उभेशा के डु पश सांलजे, बुखे डे स्मरण दुरे छ.ते जघु क स्वप्न खने मनोश्थनी केभ जसत्य छे. तेथी शरीर क जा संसार ्र वृक्षनुं भूण छे. (११
जा समय्र उपदेशभां के केभा भोक्षनुं निश्चियत साधन पूछवामा आावेस छ. सने ज्ञानना स्वक्षनु निक्षण जताववाभा जावेस छे. तेभा हार्शनिड संहलथी सद्वैतवाह प्रतिपाहित भायानो सिश्धांत भोवा भणे छे. प्रक्ष हीं भोक्षना सहलथी छे. सेटसे मायानी व्याज्या यएा वैयक्षिड खात्म येतनाना जनाहि खज्ञानना संहलथी सायवाभा जावी छे. केनुं साभ्य जशसूत्र शांडर भाष्यना प्रारंभभा २ु थयेस सभन्वय भाष्य डे अध्यास भाष्यमा कोध शङ्ाय छ. (१२)
श्रयां जनाहि, अनिर्वयनीय, सविधाने अारणो खेड
प्रत्यशात्मामा सस्मतत्तमने सुस्भत प्रत्यय ना अ्यासने निक्रवाभा आावेस छ
त्यां यण अध्यासनी के जतस्मीन तहजुश्रि (13) तरीडे नी व्याज्या जायवामा खावी छे. ते खन्े जपायेसी जनात्म पहार्थो मांनी खात्म जुश्विनी व्याज्याने सभांतर छाय छ. खावी क रीते भायानी शक्षजोनी यर्था ऊरती वजते विथार विभर्शनुं विध सृष्टि भीभांसाडीय जने छे. सने विक्षेय तेभष्ठ आावरणनी शश्िने मात्र वैयश्िड येतनाना पक्षे क नहि परंतु सभष्टिना संहर्लभां तेभनो संहल
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जापीने खद्वैतवाह साथे संसंगत सिश्वांतनी लूभिद्ा सणु उरवाभा खावी छ.लनी इस श्रृति सद्वैत वेहांतभा जडु प्रयसित रणू खने सर्थनु उ६ार ज्रश्र र सधिष्ठान पर ापी भाया सिश्वांतने पूर्तश्रनुभोन जायवारभा आावे छे तेवी रीते खही भोक्ष सिश्वांतना संहर्लभभां पहा अज्ञान निषेधनी निषेधड डिया सिवाय भोक्षमा अोधपए प्रडारनं उत्पाद के विद्ार्य मेवुं डार्यदरवानुं थतु नथी तेभ भशावीने शांडर वेहांत साथे सुसंगत होय ते रीते भाया सिश्वांतनुं निश्व्ण दुशवामा आावेस छे. (१४)
जरएयडांडमा राम सक्ष्मण संवाहनी भेम डिल्डिंघाडडमा राभ द्वारा ताराने जपायेस उपदेश तथा तेनाथी ताशाने प्राप्त थती कवन भुझ्ति नी स्थितभा सद्वैतवाह सभर्थड तत्वभीभांसा तथा भाया सिध्धांत भोवा भणे छो.सा पए खेड विशेषता छ डे वेहांतनुं संसारने भिथ्या गणतु वबणा अोयएा स्थितिभां योतानी तात्विड लूभिडा सबू डरी शडे छे. शांति पूर्ण वस्थामां विजासाना प्रत्युत्तरभा जपायेसा उपदेशभा केभ वेहात प्रतिपादित ज्ञान सवस्था तथा तत्वना स्वशयनुं निउपण थतुं हेजाय छे तेवी रीते शोड सने विसापनी सवस्थाभांथी परा सीधा तत्वजोध तरइना प्रभाएनी हिशा लुखी शहे छ.से जाजत डिल्डिधां डांडभां राभ-तारा संवाह सने रामना तारा प्रत्येना उपदेशभा भोवा भणे छे.
जासी सुग्रीव युध्धभा राम द्वारा जासीना वध जाह भ्यारे तारा शोड खने विसापनी जवस्थाभों के जाएनी जासीनो वध उरवाभां साव्यो छो ते जासथी पोताने पश स्वर्गसोड भोडसवानी! (१) विनंती दुरे छे. त्यारे राभ तेने जासीनुं येतन जरेजर शुछे ते सभनवाना प्रयत्न कुरे छे. को जासी' जेटसे "तेनो छेउ' होय तो ते देड तो पंथमहात्मलू तनो जनेसो होवाथी ४डछसने ते तो साभे पडेसो छे माटे तेनो शोड ऊरवो सस्थाने छे तथा को 'जासी' सेटसे 252
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तेनो 'कव' होय तो ते कव तो 'खेड़, खद्वितीय खाडाशनी भेभ निर्वेय, नित्य, ज्ञानभय तथा शुध्ध छे. तेथी ते शोयनीय रहेतो नथी. (15)
उवे या लूभिङाना संहर्लभां तारा श्रीरामने े प्रश्न दुरे छे ते सत्यंत भडत्वनो छे. सेड़ तो ते प्रश्न शोऊनी लूभिडामां पश ज्ञान अवस्थानी प्रवर्तभान स्थिति सयवे छेने तेनुं स्वउप खद्वैत वेहांत तेभ येतनानी तत्त्वभीभांसाडीय स्थितिन सगती वियारधाराभा सत्यंत भउत्वपूर्ण छे. प्रश्न जा प्रभाऐ पुछ्वाभा सावेसछ. (19)
त्तकक्रकतकतकत्तक त्तेक तक्रक्ेतकतक्र तेकतनकतकतेकक्तततककक्त
सर्थातक्त "हे राम! छेड तो अष्टनी केम वडछेखने व नित्य तथा यैतना
३ छ. तो पछी सुजहुणात त्तमं जंघ अोनाथी थाय छे ते राभ भने
जतावो "
खा प्रश्न परंपरागत तत्वविज्ञाननो भेड़ सगत्यनो प्रश्न छे. तेना जनेड़ जायाभो कोवा भणे छेनमां मन शरीर-संजधनी सभस्या, 9s येतन वश्थेना संजंधो प्रश्न के तत्त्वभीभांसाडीय स्तरे सत्ताना लिन्न स्तरो वश्थेना संजंधनो प्रश्न ना उत्तरभां के सिध्धांत रणू उरवाभा आावेस छ. तेभा शांडर वेदांत प्रतिपादित सद्वैतवाहना परिप्रेक्ष्यभा भाया सिध्धांत तथा सविा सिध्धांत केवा सिध्धांतो नो सभावेश थह ाय छे. उत्तरनी शह्जात मनाहि सविधाना संहर्लभां भोड़ ठर्येतन भा थता जालासना वर्शन थी थाय छे राभ न व्याये छे डे
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"न्यां सुधी देउ खने छन्द्रियोनी साथे "हुं"अने "भारायशुं"
जाहि संजंध रहे छ त्यां सुधी खात्मा खने जनात्माना विवेडथी रहित कवात्मानो सुजहुत्ताहिना भाग ३प संसारथी संजल रहे छ (1८)
क्त क्त क्त खा व यरंपशान भागण वधार्ता भशाववाभा साव्यु छे डे,
"खा संसार खात्माभा मिथ्या क आारोपित थयेस छे तो पए। ज्ञानना उधय विना ते पोनानी भेणे निवृत थतो नथी. शेभ विषयोनुं निरंतर ध्यान दरनार पु३्षने स्वप्नमां अनेड पहार्थो हेजाय छे छता ते होता नथी." (१८)
संसारनु मिथ्या आारोपणा से सद्ैत वेहांत प्रतिपाहित सध्यास हे सविधनी भेभ भाया सिध्धांतने सैध्धांति रीते सभर्थन ाये छे ते सिवाय भाया डे सविधा नुं मनाहित्व तथा अनिवयनीयत्व जताववा भाटे नीये भुष्जनी तात्विड़ स्थितिनुं वर्शन दश्वामां आाव्युं छे.
"जा प्रदारे जा कव उर्मोने वशीलूत थहने प्रसय सुधी जावागभनना यह्ोमा पडयो रहे छ. प्रसय अाजमा जया लूतोना सषय थह नवाथी ते स्थितिभां परा पोताना दर्ता- लोकतापशाना सलनिवेशथी ते पोतानी वासनाओो तथा डर्भो साथे जनाहि सविदाथी मायछाहित थतो रहे छे. भ्यारे नवी सृष्टिनो प्रारंभ थाय छे त्यारे कव विवश थहने पूर्व वासनाजोथी युउ्त मन साथे घटीयंत्रनी ऐेम इरीथी उत्पन्न थह काय छे."(२)
था सिध्धांतभा सर्नु सात् भायानुं जनाहित्व ने प्रसयावस्थाभा कवनी जनाहि सविदाथी आााहित रहेवानी स्थितिन निउयणा परवामा साव्युं छे. खाभ तो अधयए भारतीय हर्शन पारंपशा प्रभाऐ
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संसारनो प्रवाह जनाहि छे. परंतु तेभा भाया सिध्धांतने उछ रीते सुसंगत पऐो सभाववो ते खेड़ प्रश्न छ. ा प्रश्ननु निराहरण अध्यात्म राभायमां प्रसय डाजने जवस्थामां परा कवने जनाहि सविदयाथी सायछाहित जतावीने डरवामा सावेस छ.० सामान्य रीते पंयदशी जने 'संक्षेप शारीरण' केवा ग्रंथोजतावेसी जनाहि वन्भ भरण यह्नी तेभष्ठ भोक्षनी व्यवस्थानी स्थिति साथे सुसंगत छे. जा क वर्शनभां जागण सेवो निर्देश जावे छ है जा प्रडारना उपदेशनी इणश्रृतिथी ताराने कवन भुस्तनी सवस्था नी प्राप्ति थाय छे. सने तेथी मात्र ज्ञान डे वैर्यना परिभाएथी क नहि परंतु शोड डेविसाथनी सवस्थाभाथी यए। पूर्व परियाऊ भन्य ज्रह्मतत्व जोधनी स्थितिमां कवन भुझ्तनी सवस्था प्राप्त थर्छ शडेछ. सा जाजत सभग्र भाया सिध्धांतने सुसंगतथऐो जनु३य छे.
जा रीते समय्र दष्टिसे वियारवामा जावे तो ब्रल्मांड पुराण संतर्गत आावेस अध्यात्म राभायण भोड़ भूण राभायण उथानो विस्तार जोवा छतां भूजलूत रीते शांडर वेहांतने अनुसरीने भद्वैत सिध्धांत नो ग्रंथ छे. ऐेभा सापऐो के प्रसंगो डे उपद्देशभांथी भाया सिध्धांतनुं सवसोडन जने भूस्यांडन दुरेस छ. ते सिवाय राभ-सुतीक्षण संवाह, रभ- सगत्स्य संवाह ४ठटायुनी रामनी स्तुति, छन्द्र खने ज्रह्मानी राभनी स्तुती तेभष्ठ रावण-भंछोहरी संवाहमां रावणना डेटसाड उथनोभा पमा अध्यात्म जक्षी सद्वैतवाह मने भाया सिध्धांतनुं निइपणा भोवा मणे छे.स्से उत्तर डाडमा राभ औीशस्या संवाहभां यएा जा क खद्वैतवाह खने भाया सिध्धांत रबू थयेसो हेजाय छ. जा रीते अध्यात्म राभायण से वैदिड िंतन परंपराभा भायावाहने सर्न आायनार खेड़ सगत्यनुं महाभाव्य छ. कमा सद्वैतवाहना डेटसाड सिध्धांतो तथा भाया सिध्धांतना प्रतिपाहनो स्पष्ट रीते भोछ शङ्ाय छे.
अध्यात्म राभायण सिवाय राभायण भहाअाव्य नो विस्तार मनेड
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वनयर्वभां सभय्र राभायणानी संक्षिप्त जावृति सणू डरवाभा खावी छे. तो पछी पुराभां रामायण उथानुं विस्तृत जासेजन उरवाभां जाव्युं छ.ड.स. नी १४ भी डे १य भी सही सुधी प्रयतित थयेस राभायणा संगेना जा जया क प्रवाड जने वियार धाराओो परथी तुससी छासे हिन्ही भाषाभा राभ यरित मानसनी र्थना उरेसी छ. ऐेमां भुज्यत्वे वास्मीडी राभायण अध्यात्म राभायण तथा पद्मपुरानो संहर्ल सेवाभां जात्यो छे. तेथी उवे पछीना विलागभां जायऐो
सिध्धांतोनुं निइपशा खने भूस्यांडन डरीश
4.4: शाभयरित मानसभा भाया सिध्धांत :-
राभ यरत मानस से पौरािड प्रष्ठलूभि पर आाधारित भहाङव्य छ. ऐमा परंपरागत प्रशाबिदाने अनुसारीने सात डडमा खने डiड तेना ते ४ नाभ साथे रामायशनी उथानुं निउपश जने वर्शन डरवाभा साव्युं छे परंपरागत सर्थघटन प्रभाऐ रामायणानी उथा पाछण रडेसा तत्वज्ञाननी पृष्ठलूभि विशिष्टाद्वैतना सिध्धांतनी छ. अने पौराणिड परंपशा वैष्शव धर्भनी छे. तेभ छतां ज्ञानात्मड लूभिडासे तेभा खद्वैतवाह तथा द्वैतवाह प्रतिपाहित भाया सिध्धांतना तत्वो स्पष्टपक हेजाय छै. या तत्वोने स्पष्टताथी सभवा भाटे राभायणनुं पौराणिड सृष्टि विज्ञान संक्षेपमा स्पष्ट डरवुं ४३रीछ.
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4.4.2: सृष्टिविज्ञान:
जनेड़ दुस्य ज्रलमांड सिध्धांत :-
शाभ यरित मानसभा लिन्न लिन्न राम उथाजोमा सावता लिन्न वर्ण नोभां स्पष्टी डरणो माटे जनत उस्प सिध्धांतनो आाधार सेवाभा साव्यो छे. खा सिध्धांत प्रभाऐ सृष्टीना उदस्सव ने प्रसय वय्थेना गाणाने डस्य इडेवाभा
जावे छे. वर्तमानउस्य पडेसा सृष्टिनी उत्पति सने प्रसयना अनंत उस्पो प्रसार थछ गया छे. खने उवे पछीयएा अनंत उस्पो प्रसार थशे. प्रत्येड डुस्थमां राभनो सवतार निश्चित छे. परंतु उस्पलेहथी थोड यरित्र लेहनु तत्त्व ोवा भणे छे. जा संहर्लभां अस्तित्व अने वास्तविडता वय्थेनो तज्ञावत खद्वैतवाही परिलाषाभां सेटसो यथार्थ रहेतो नथी. राभ थरित मानसभा यार उुस्पनी राभायण उथाजोनुं खेड वार्ता प्रवाडभां वशी सेवाभा सावेस छो.०ेशीव पार्वती संवाह, डाड- लुषंडी गरुड संवाह खने याज्ञ वस्कय- लारद्ाण संवाहमां व्यकत थाय छे. या यार उथाो उपरांत ा प्रडाशनी उथाजो नंत छ. तेभ जतावीने को सृष्टि यह्नु अनंत वणत पुनशावर्तन भावुं डोय तो प्रत्येड घटनानी सनंत पुनरावृतिनी संभावनाने नहारी शङाय नही खने तेथी डोयएा संभावना वास्तविडता जने छे. सने भाटे वास्तविद्तानो जा सभग्र व्याय तेनाथी जहारनी जेटसे डे पारभार्थिड छष्टिसे ोता खेड़ प्रारे खलास जनी काय छ
जा रीते क शभ यरित मानसभा अनत उसा सिध्धांतनी साथे जनंत ब्रह्मांड सिध्धांत परा भोवा भणे छे.सा सनंत ज्रम्मांड सिध्धांत भारतीय पौरािड यिंतनभांथी उददलवेस सेड़ विशिष्ट वियारधारा छे. प्रह्मांडनो सर्थ खावी अोधयणा वियारधारामां निश्थित संहर्लमां पौराशिड छे.सने तेना
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वैज्ञानिड सभर्थनना जाधारो शोघवानो प्रश्न तदन अप्रस्तुत छ. तेभ छता मेड ब्रह्मांड भीभांसाडीय के तात्विड वियार तरीडे खद्वैतवाहनी भूण वियारधाराने जनंत ब्रम्माड सिध्धांत सभर्थन से जाजतभा जाये छो डे तभा विशिष्ट सस्तित्व के क खेड़ विशिष्ट प्रह्मांडना लाग उप होय छो ने ते अारएथी तेने खेड़ प्रडारनी वैयडित ताहात्म्यनी निर्ेक्षता प्रधान थती डोय छेते निरयेक्षतानु जनंत प्रह्मांड सिध्धांतभा भेड़ विशिष्ट संहर्ल्भभां जायेक्षीडरए थह ाय छा साथेक्षीदरण सस्तित्वना वस्तुगत निरयेक्ष स्थापन साभे प्रश्न थिन्ह उला 3रे छे. खने जा प्रश्न थिन्ह खद्वैतवाहनी व्यावहारिड सत्ता तथा पारभार्थिड उक्षाये तेना जाधना प्रथभ राभ यरत मानस भांथी जनंत ज्रलममांड सिध्धांतना डेटसाड तत्वोने शूउरी तेभा भाया सिध्धांतना सभर्थड पासाओोनो वियार डरीशु
खनंत ब्रह्मांड सिध्धांतनो सौ प्रथम उस्सेज जासडाडमा खती भोडना प्रसंगभा थाय छे. उथागत संहर्ल जरएय अडनो छ. केभा राम सीतानी शोध सने शोउमा व्याडूण छे. शंडर तेभने सथ्यिहानंछ परजल उीने नभस्डार दरे छ. खने सतीन तेनी साथे ४ ज्रह्म तत्वना सवतारी पशानो संदेड थाय छे. जने त्यां क जघी खने विष्णु वश्येनो लेह जथवा अनंत ब्रम्मांडना जाधार सने सेड़ ब्रहमांडना संयासड वश्थेना लेहन स्पष्ट निर्देश डरवामा जावेस छे भोउनो प्रसंग जा रीते वर्ष वायो छे.
क्तक्तत्तकततकतेककरेिकतेक्रतेक क्ेतेकक्ेकेतककतकतक्र क्क्तक
जने कोजा सवतार ब्रह्मनो नथी पश विषशुनो छे तो,
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क्तत्तकत्तक्रतशिकतक तकतशतेश्रतकशक
सही सवतार लेहथी जनंत ब्रहमांडना आाधारूत तत्व तथा
विशिष्ट ब्रम्मांड संयासड वय्थेनो लेह स्पष्ट दुरी शंडा दरवामा जावी छे.
उपनिषछ प्रतिपाहित ब्रह्म तत्त्व छछा ईरझर खने लेहथी रडित छे. वेह मेटसे
डे उपनिषह पए तेनुं वर्शन नेति नेति थी डुरे छे. भाटे तेनो सवतार शाक्य नथी.
को जा सवतार विष्णुनो होय तो ा ब्रममांड पूरता विषणु पशा सर्वज छे
तेथी जा रीते सीतानी शोधनो प्रश्न उपस्थित थतो नथी भाटे शंडरना वयननी
तथास सावश्यड छे. या तपास भाटे सीतानो वेश धारएा दुरी रामनी साभे ाय
छे. खने राम द्वारा जोजजाय गया जाह तेभनी भायाना प्रभावथी क सनंत
ब्रह्मांड दर्शन सतीन थाय छे. तभा अनंत ब्रह्मांड सिध्धांतना जीव स्पष्टतः भोह
शडाय छे.
कतक्ततवशतके तेक्र तेकक तेक्रक्तेक्र तकतक
क्त क्त क्त क्त क्तत्तकक्ततकक्ततेश्रिकत करकतकततक क्त्तकत्तक
क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्त क्त क्ततकतेक्र रेशिक तेशकत्वीक्रक्तत्तकज्क
क्त क्त क्त क्त क्तक तक्क्तकत्तंक् क्तकत्तककत्तकक्त
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क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्त क्त तेशकतक क्ततक्रतकतककतततकक ततक
आा प्रभाऐ भायाथी हेजाडवाभा आावेस द्रश्यमा जनंत ब्रममांडनी
जसड़ भोवा मणे छे. सा स्थितिमां जनेड ्रम्मा, विषणु, महेश हेजायछो सने
यरयर संसारना जघा कवो भोवा भजे छ. परंतु सभत्र द्रश्यमा राभनु
स्वइय जीणु भोवा भजतुं नथी
खा व प्रसंगने जागण वघारवामा जावे तो ब्रम्म तरीडे रामनु
स्वउप तथा भगत सार्थ ब्रह्मनो संबंध सतीना पार्वती तरीडेना पुर्नकन्भ जाह
शिव-पार्वतीना संवाहमां खलव्यकत थाय छे. पार्वतीना प्रश्नोना उत्तरभां
तात्विड लूभिद्ा सणू दरवामा खावी छ. तेभां भाया सिध्धांत स्पष्टतक्तद्र[ट
गोयर थाय छे.
रामना स्वय जंगे वर्शन उसता भआावायुं छे ु (3)
क्त क्त क्त कतकतशेते कतेशककतवक्र क्त्तक्तक्ततत्तक
क्त क्त क्त क्तक्कतक्रक तेकतश्रतक्र क्कतकतक
क्त क्त क्त कतशतशे तशरकक्तत्तह शकक्तत्तकतक
क्त क्त क्त क शकशकतकशbरकतश कतकवक
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क्त क्त क्त क्तत्तकततक्क्ततक क्ततकतकतक त्तकक्ततकतक
क्त क्त क्त
क्त क्त क्त ऋशतशक्रतक्रनिकतकनकक
क्त क्त क्त जर्थातक्तराम तत्वभा भोउ डे अभनो सहंतर जलाव
जताववाभा आावेस छे. रामने सहभ्ठ प्रदाश स्वय जतावीने शंरेत्तर वेहातभां
२०ू थयेको स्वप्रभाशत्व नौ ज्यास सागु पाउवाभा जावे छै. जता- झेय दवन्दू
पर आाधारित ज्ञानभी भांसा हे केमां विशिष्ट ज्ञान संपाहननी प्रड्ियाभा विशिष्ट
ज्ञानोहेवनी संभावना रहे छे तेनो विज्ञाननी सवारे नो सहंतर निषेध डरीने
छन्दार दरवाा जात्यो छे. तथा उर्ष, विषाह, (उपर जतावेस अर्थमां) ज्ञान, खज्ञान, खह विगेरने कवना धर्मो जतावी परभ सत्ताभां तेभनो सहतर, निषेध ऊरीने तेना पारभायिड स्वशपनुं निइपण त्यार पछी तरत क जावता शिवना दथनभा तहक्तस्पष्ट थह काय छे. (४)
क्त क्त क्त तकतककत कतत क्रतकेक तेकत्तकतकेरंककशे शकरेशेशे कक्त
क्त क्त क्त तेक्ककककशhdxlhthhi/ah thxशककhतेश ककेक्रतकतक
राभ भाटे प्रयुकत सक्षणो (१) पु३ष (२) प्रसिध्ध (3) प्रगट (४) प्रडासनिश्य (4) परावर (ड) नाथ अंतिभ तत्वनुं स्व३प वेहांत परंपराभां संसंगत होय ते रीते व्यकत दुरे छ. पुद्षनो खर्थ पु३्ष सू्त मां प्रतिपाहित सर्वव्यायी येतन तरीडे सेवाभा आावेस छे. (१प) प्रसिध्ध तथा
वेहांतभा शांदरघाष्यभां त्क क्ततजक्कत्तकततकतकक्ततकत्तकतकत्तककतक" नी केम
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राभने प्रसिध्ध जताववाभा जावेस छे.आा श, रीते 'प्रङाशनिधि' शण्द थी स्वयं
प्रडाश स्वशय सत्ता तथा परात्पर से प्रहारना तत्त्वविज्ञानीय गुणधर्भोनो
उप्सेज दुरवामा जावेस छे. समत्र रीते ोता परभ तत्वने सत्व तथा
भगतना प्रडाशङ गशीने भगतने तेना आाश्रित सने पारभाशिड द्रष्टिे ससत्व
जताववाभा सावेस छे. भागणना संवाह पर्थी या जात वधारे स्पष्ट थह
हायछे (२७)
तकतकतक्र तेतक्रतक्रकतक्रतकतक्क्तकतक
क्त क्त कतके तेंकेके शतशकैत्रक्त्तक्ततक
क्त क्त केकतकर चेशशेशशकbतेकैक्तकत्तवक
क्त क्त रेशकतंक्र केकतक्र क्तक्तक्ततकतक्रत्क
क्त क्त thरbततशbशेशरbेतेकैक्रेशेशकक
क्ततकतकत्तकतकतकक्ततकत्तकक
क्तत्तकत्तक्रत्तकक्ततशक कतक्रत केतक
क्तत्तक क्रतेतेश्रिकत क्रत कतक्क्ततकतक
क्तक्ततकतक्रतकनिककततक ेशशतेरकेकेेशेकक्त चेडक तकतक्रतकशक
वर्एननो प्रारंभ व्यावहारिड- जानुभविद् ज्ञानभीभांसाथी 262
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दरवामा खावेस छे. (१) विषय (२) दरण- ज्ञानेन्द्रियो (3) सुर जर्थातक्त
प्रत्येड ज्ञानेन्द्रियना खात्ममानी छेवता (४) व या जघा ज्ञानभीं भांसा ना क्षेत्रभां उत्तरोत्तर सर्थातक्तेडथी खेड़ प्रदाशित छ. शेय, ज्ञानेन्द्रियोथी,
ज्ञानेन्द्रिय तेना खात्मभानी देवतार्थी, देवता कवथी प्रदाशित थाय छे. या सभग्र प्रदाश उप थवानी डिया भर्याहित छे तेम साथेक्ष छे. के जधाना 'परभ - प्रदासडे छे तेने राभ तरीडे खोजजवाभा जावेस छे. 'परभ' प्रडासड़ नो अर्थ सहीं स्वयं-प्रडाशत्वना साक्षणिदता केमां डोय तेवुं तत्व सेवो सभनठवानो छे. उवे के प्रदास्य होय ते संतिभ द्रष्टिये सतक्छोछ शहडे नहि. तेथी भगत-प्रदास्य
छे. भाटे पोताना जस्तित्व भाटे राम पर जाधारित छेसने रामनी, परभ तत्वनी सत्यताथी ४१ड खेवी माया 'सत्य३य' जेसे डे जरेजर सत्य नथी
उवे या 'ससत्य' गत है 'भाया' नो अंति सत्ा साथे े संजंध जताववाभा जावेस छे तेभां खद्वैत वेदांत प्रति- पाहित "शक्षि २४त' तथा भृग- कजनुं उदाउरए सेवाभा जावेस छे. या भगतने शुक्भां रहेसा २४तनी केमां जथवा सूर्य डिशणोमा रहेसा वजनी केम 'भृषा' जेटसे के मिथ्या गणवाभा जावेस छे. या भगत है भाया ससत्य छ.छतां नऐ डाजमा तेनो अरम डोछ टाजी ४ शङतुं नथी. त्यारजाह भागण सेवुं जतावायुं छे डे "आा४ रीते भगत हरिने खाश्रय मरीने रहे छे. ते ससत्य छेछता हुःज तो जायेछे. भो स्वप्नभां भाथुं अायवाभा जावे तो ागृत थया विना तेनु छुः ूर थह शु नथी. बुनी दृपाथी जा प्रारना अ भी ा े " ८
भगतनुं धिष्डान परभ तत्व छे.सने ते तत्वभां माश्रित रहीने रहेतु भगत सत्य नथी. छतां क्यां सुधी तेना ससत्वपशानो जोध न थाय त्यां सुधी तेनुं निराहरण थह शऊतु नथी. तेवी स्थितिनु निशणा खद्वैत वेहांत खने
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भाया सिध्धांतने समर्थन जाये छे. या सिध्धांतर्भा ्यां सुधी ा अनी स्थितिनुं निराहरण न थाथ त्यां सुधी ते स्थितिनुं सनाहित्व ने स्थायीत्व जतावीने भाया सिध्धांतने सुसंगत स्व३प जापवानो प्रयास उरवाभा जावेसछे
राभायणमा सद्वैतवाहने सभर्यड विवेयनो सने उार ने 8ग्याखे भोवा मणे छ. क जधानुं विवेयन ने संडसन अन्नेशक्ष नथी तेथी ा
जयायेस डाइलुषंडी ग३ड संवाहभां ज्ञानदीय वर्शननो प्रसंग तथा डाडलुषंडी- सोभश संवाहभा द्वैतवाहनो उपदेश या जे पर ध्यान डेन्द्रित डरीशु
4.4.3:515 लुषंडी-सोभश संवाह खने सद्वैतवाह
उत्तरडांडमा डाइलुषंडीना डाइशरीरमा उपातर थता पडे सानी या प्रसंग छ. केमां शंदरना श्रापभांथी निवृत्त थहने डाऊलुषंडी सगुण ज्रम्मनी आाराधना पुछवा माटे ऋषीजो पासे ाय छे. तथा ऋषिजोने पुछे छे ते जधा छघर सर्व लूत भय छे. (२ल) तेवो सर्वेश्वशवाह के सद्वैतवाह केवो उपद्देश जाये छे. छेवटे सोभश ऋषि सगुश ब्रह्मनी आाराधना जंगे डेटसीड उथार्थरा जाह प्रह्मना उपदेश नीये भुकज जाये छे.
क्क्कतकशशेशेिेश्रकतकतकतवशवक्रतवकश्रे क्रतक तेकक्ततवशवक्रे तकतकनकशक कतक
क्त क्त क्त क्ततकतक तेशतकेकेतशकककतवक केतक ककतक करेेशकककत्तज्रनक
कककतंक तेकतेक्रतकतक्र तेकेतेतेकेतवेशवेशवेतत कैरेशेशवेेशत कैतकरकेेशकतशनक
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जा उपदेशभां जह्मनुं अंतिभ तत्व तरीडेनु वर्णन उरवाभा आावेस छ. कना सक्षणोमा ज व खेटसे डे नन्म रंडित, खद्वैत,सगुन सेसे डै निर्गुण, हधयेश जेटसे के संतर्याभी खङ्स सेटसे के उसा खथवा ईरइर रडित मनीह जेटसे छछ रहित, खनुलवथी वरे, सजंड जेसे ड लाग रहित, ने खनूय जेटसे उपभाभां केुं उपभेय शोधी शङ्ाय तेभ नथी. ते प्रहारना तत्व तरीडे वर्णन थयुं छे. भागज से४ वर्शनभां ब्रम्म भाटे सने छन्द्रियोथी पर पार्ड सथवा क्षति रडित विनाश सडित निर्विअार परिश्छेह रहित तथा आानंहथी पूर्ण से प्रदारना सक्षणो जताववाभा सावेस छे.छेवटनी पंड्तिमां छादोग्य उपनिषहमां सद्वैत प्रतिपाहड सर्थभा रू थयेस तत्वभसिना उपदेश तेभ थननु युनःस्थापन उरवामा खात्यु छे.०ेने वस खने तरंग वस्थे केम डोछ तात्विड लेह नथी तेभ जतावीने सद्वैतवाह प्रतिपादठित अंति ततवना ्यासने सभर्थन सायवाभा जावेस छे.
क रीते सोभस ऋषिना उपदेशभा खद्वैत भतनु प्रतिपाधन थयेस कोवा मणे छे. ते रीते डाडलुशुन्डि द्वारा उत्तरडाडमा क गइडने खयायेसा उपदेशभां पह सद्वैतवाह तेभ भाया सिध्धांतनुं प्रतिपाधन थयेस वा भणे छे. जा उपदेश विराह खने छणवटपूर् छे. कमां ज्ञातानुं खेड़ हीयड तरीडे वर्णन दरवामा खात्युं छे तेभां साधना मार्गनी द्रष्टिसे भाया सिध्धांत तेभ सद्वैतवाहना तत्वो भणवाड रडेसा भोवा भणे छे.
आा ज्ञानहीय व्शनना प्रसंग उत्तरडाँडभां 'भाया' ना निवारणाना खेड़ साधन तरीडे वएववाभा आावेस छे. सौ प्रथम कवभा भायानी के ग्रथि पडी हाय छे. तेने स्पष्ट परता 'कव' नी व्याज्या डे समथर सायवाभा जावे छे. (उ)
क्तक्ततशक्र क्तत्त्तक्रत्तकत्त्तक् त्तकक्ततकत्तक
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क्त क्त क्त्त क्तक्तकतक्र क्तकत्तक्रक्तकत्त्तरक्त रकतशक
क्त क्त क्त अर्थातक'हश्वर नो अंश ने सविनाशी छ. ते येतन
छ, पापरडित छेसने सहष्ठ पऐों सुनो सभग्र समुहाय छे.
जा प्रदारना कवरमा डोडड प्रडार 'कड- येतन' ना संयोगयी खेड़ प्रदारनी ग्रथि पड़ी काय छे. या ग्रंथि 'मिथ्या' छे परन्तु सहण रीते छुटी शदती नथी (3२)
क्तक्ततकेतेशरक क्रत कत्तकतकक्रतक
क्त क्त क्त क्तक्ततकतक्रककककतक त्तककतक
'9ुS खने येतनानी ग्रंथि पड़ी गयेस छे. भृषा जेटसे है मिथ्या होवा छता तेने इस्वाभां भुश्देसी छ. ४s खने येतननी ग्रंथिने मिथ्या उडीने खही भायावाहने सभर्थन जाथवाभा जावेस छै.या गंथि छोडवाना मेड उपाय तरीडे के ज्ञानहीथनु वर्शक परवामां आाव्युं छ. तेभ भायाना उरछह भाटे ज्ञान-भार्ग प्रतिपादीत साधना मार्ग स्पष्ट पशो कोछ शहाय छ.
सौ प्रथभ तो 'ज्ञान- हीप' ना प्रदाश थवानी पूर्व शर्त तरीडे 'यभ नियम' डे ज्रह्मसूत्र शांदरभाष्यमा जतावेस 'शभहभाहि साधना संपत्ति पर लार भूडवामा आावेस छे. (33)
त्कतकिक्ततेकतक्रतक्रत्तेक्रक्ततकक
क्त क्त क्त क्तत्तवक्तशक क्तककतक्रकत्तक त्तकक
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क्त क्त क्त
क्त क्त क्त कतकक्र तकतक कतेक्र कतक्रकतेक कतकशक
क्त क्त क्त क्तशवशbbcbbb
क्त क्त क्त
क्त क्त क्त सौ प्रथम सात्विड श्रध्धा ने 'धेनु' जेटसे डे गाथानी उपभा
सायवाभा जावेस छे. साल्यात्मिङ प्रगतिनो खारंभ प्रोड प्रकाशनी श्रध्धा
सात्विड श्रध्धाथी क थह शडे. सराय के पोतानी क जुध्धि के शक्ति पर ४ संपूर्ण
विश्वास से वैदिउ मने वेहांत परंपरानो साधना भार्ग नथी. तेथी प्रतु क्रयाथी
प्रथभ तो सात्विड श्रध्धा उपी धेनु नो वास हयमा ४३री छ. योग र्शनभा 4ए 'नियमो' नी याहीभा ४श्वर प्रशिधान' नो सभावेश डरवाभा जावेस छे. नही
थएा से गनय ने े तृशु यरवाना नियमो है के शुभ धर्भना वेह प्रतिपाहित
साधार डोय त्यार जाह नैतिड पूर्व तैयारीखो तथा ाध्यात्मि शरतस भाटे
संतोष, मुहिता सने हभ-सयभ विगेशनी आावश्यकता जताववाभा आावेस
छ. (उ४) सा जधी प्रद्ियाभांथी वैर्यनो भधु अढवाभा जावेस छे. त्यारजाह
ज्ञानदीय तैयार थतभं तेनुं वर्शन नीये भुक्ज दशवामा जावे छ.क सद्वैत वेहांत
तथा भाया सिध्धांतने अनु३प छे.
क्तत्तकतक् ततकतक तवेशशकतेेशरकशh क्ेकक्तत्तकत्तक्तक्त
क्त क्त क्त
क्त क्त क्त क्त
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क्त क्त क्त त्तकक्तशकक रतक्रतवक्रतेजरक्रकतक्क्कतनकक त्तकतक्रककक
क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्त
क्त क्त क्त क्तत
खा वर्ण नभा सौ प्रथम ज्ञान३पी सग्नि शुल तथा खशुल अर्भोने जाजी नाजे छे. जाणी शडे तेभ जतावीने ज्ञान-मार्गनी प्रधानतानो निर्देश दुशवाभा आावेस छ. ते सिवाय जा सवस्था त्रिगुणातीत छे तथा भागृत स्वप्न जने सुषुप्तिनी सवस्थाओोथी पर छे तेम भशावी जा जानुलविड् सका पर होय तेवी पारभार्थिड सश्वानी लूभिका सणु दुरवामा भावी छे. त्तक्तकतकक्तत्तकुं
सजगी भवुं कोछ पएा प्रारना भभत्व अने शांडरवेहांतनी परिभाषभा इडेवाभा
आावे तो त्तक्तकत्तकतकत्तनुं सजगी बवुं जतावेस छै. जा स्पष्टश् भाया
सिध्धांतने अनुशय जाजत क छे. खा हीय के समगेछो. ते स्वयं विज्ञान स्व३प नछे. खर्थातक्त्ते ने अस खन्य विज्ञाननी अपेक्षा नथी. जीठो खर्थ से थाय छे है
ते सामान्य रीते ज्ञाताश्ज्षय दवन्ह पर आाधारित ज्ञानभी भांसाना क्षेत्रथी पर छे. खने तेथी तेनी नक्ड शता उवृ विगेरे आानुधविड् भगतनी जाजत, सजगी भाय छ. उवे या ज्ञानहीय हीपशिषा ना वर्शन तथा तेना परिणाभनी स्थितिमां स्पष्टतसजद्वैतवाहनो जोध प्राप्त थतो हेजाय छे.
आागजना वर्शनभा ज्ञानहीथनु वास्तविड वर्णन उपनिषह भहावाश्थी सावे छे. (उप)
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क्त क्त क्त ततकैतशकक तशतवहशेेशत कक कत्तक
क्त क्त क्त क्तततककतक क्तेकक्ततेकक्ततकक्कत्तेकत्तक
क्त क्त क्त
क्त क्त क्त जा शीजाना वर्शननो प्रारं उपनिषह महावाक् सोउमस्मि थी थाय छे. सोउभस्मि ने खही खेड़ खंड वृति तरीडे जताववामां जावेस छे. ज्ञान भीभांसानी छष्टिसे अछयडा धारावाडिड ज्ञानमा खजडवृश्ि होवा छतां भुक्ष हशानी यूरोशाभी खात्माडार डे ज्रश्डार खंंड वृक्ि सने सटा घटश्मे प्रदारे उत्पन्न थती धारावाडिड सर्जंड घटाडार वृश्चि घटाजान प्रडाशड छ. भ्यारे सोउमस्मि भेवी जात्माअर सजंड वृश्विडो जास ज्ञाननी प्रदाशकता घरावती नथी परंतु पोतेक विज्ञाता तेभष्ठ ज्ञान स्वइप होवानी अभिक्ा लवे छे. तेथी ४ त्यार पछीना वर्शनभां वृक्धिनो निर्देश खात्म जनुलव तरीडे डरवामा आावेस छे. खात्म अनुलवना सुषनी स्वयं प्रदाशभान स्थितिनी साथे लव सर्थातक्त भभरए ३प संसार यह ना भूणमां के रहेसु छे ते नाश पाभे छे. खही
भवभूस तरीडे लेह अभ जताववाभा जावेस छ. सर्थातकोपएा प्रडारना लेहनु
ग्रहण से खेड़ अभनी सवस्था छै. से अभनी जा सवस्था णन्म भरश ३५ संसार यहनं भूण छे. या सवस्थानुं छेहन सोउभस्मि शेवी सजंड वृक्षिी थाय छे. खने ते वृक्धि लेह अभ ३प खज्ञाननो नाश ऊरीने पोते परा सजड खात्म अनुभवमा विसय पाभे छे. 9ेनुं साधनाभार्गीय परिणाम से भणे छेडे ते ० क्षएो कवन भुक्षनी दशानो प्रारंभ यह काय छे. को के द्वियमाएा डर्भोनो लोग
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भोशेष रहो डोय तो तेनो पारभार्थिक ज्ञान साथे अोछ विशोध न डोवाथी तत्डाण शरीश्यात थाय ते उमेशा आावश्यड रहेतु नथी. या सभर परिस्थितिनु वर्शन तत्व विज्ञानीय तेभष्ठ आाध्यात्मिक संहर्लभा ज्ञानही वर्नभा तेना छस्सा तजडडडे दुरवामा खाध्युं छ. खने सागज सेम परा भशावायु छे डैजाप्रहारे 9ड अने येतनना संजंध ३प जनाहि अाणथी पडेसी भायाउपी ग्रंथी छूटी भता भोक्ष यह डे परम पहनी प्राप्ति थाय छे. उबे या जधु वर्शन सभय्र वैदिड तथा वेहांतिड वियार धाराने मनु३प छे. तेभ विशेषतश्रशांडर वेहांत ने तेभा प्रतिपाहित भाया सिध्धांतने वधु सुसंगत पऐो अनुउय जावे छे.
खा रीते डाइलूबंडी गउड सेवाभा ने ते सभ प्रसंगमा सोभष ऋषी द्वारा थता जरश्ना उपदेश तथा डाड लूषंडी द्वारा थयेस ज्ञानदीय वर्शनभा सद्वैतवाह प्रतिपाहित भाया सिध्धांतनुं निइण भोवा भणे छे. सभर राभ यरित भानसभा जा प्रारना निदपणो के थेभांथी प्रत्यक्ष डे परोक्ष रीते भाया सिध्धांत इसित थतो होय मनेड कग्यासे कोवा मणे छै. या जधा प्रसंगो डोछने डोछ संहर्लभां पौरालिड गाथावाह साथे संडणायेदा छे. तेभांथी पुराए गाथा वाहना तत्वोनी स्वतंत्र पहो सद्वैतवाहना तात्विड सिध्धांतो तेभ भाया सिध्धांतनी विगतो तारवी शडाय छे. भउछ संशे जापऐी उपर भोयेसा वर्शनोनी सभातर छे. तेभ छता सभयनी जायेक्षता तेभष अनेड़ प्रधांड सिध्धांतने सगता थोडा प्रसंगोनी संक्षिप्त यर्था डरीश.
4.4.४: सभयनी साथेक्षता, भायासिध्धांत
तथा जनेड़ प्रश्ंड सिध्धांत :-
शभ यरित मानसभा मायाना ईसड़ पर सभयनो प्रवाह जधी
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सेडसरजोवडेतो नथी. परंतु तेना प्रवाडभां सापेक्ष संहलथी वघारो डे घटाडी शक्र छ तेवुं खनेड कग्याजे जताववामा साव्युं छे.प्रथम उस्सेज जास डाडमा राम कन्भोत्सव ना प्रसंगमा भणे छे. (3) केमा कन्भोत्सव वजते खेड़ प्रडशनो मध्याउन खोड भडिना सुधी संजाय छे. सने छतां भेड भडिनो प्रसार थवानुं होछ मान के प्रभाए भोवा भणतुं नथी. मानस पियुसमा डेटसाड विवेयडी से ा स्थितिन मास्जर्ट मार्धनस्टार्घनना साथेक्षवाहभा रबू थती सभयनी साथेक्षता साथे सरजाववानो प्रयास कर्यो छे. या प्रयास तो तहन सप्रस्तुत छे. अारण डे सापेक्ष वाहभा सभयनी सापेक्षता निर्देश तंत्रनी सापेक्ष गति पर सवसंजित छे. नहि के होछ नुलवातीत भाया तत्व पर तेभ छता भायाना भेड़ डार्य तरीडे तेनो सभय पर प्रलाव तथा सभय जने मायानो पारस्परिड संजध से जंने वेहांत तत्त्व विज्ञाननी छष्टिसे सवश्य वियारणीय छे. तेटसो इसितार्थ या प्रसंगभांथी नीडजी शडे
जा सिवाय राम जास-सीसाना प्रसंगमा क्यारे पोताना छ0ट छेवसागण लोग घरावती वजते डौशस्याने रामना जे स्वउप हेजाय छै.सने ते अारएो भ्यारे भती अभ थाय छे. त्यारे राम पोतानुं सजड सेडरस स्वउप दर्शन दुरावेछ. (3़)
क्त क्त क्त
जर्थातक्तराम द्वारा जताववाभा जावेस पोताना महलूत खने
सजंड स्व३प दर्शनभा प्रत्येड शेभा डरोी ्रशंड रेसा छ. तेनु दर्शन थाय छे. उड़ीउतमा अोधपए भारतीय पुराश गाया वाहभा ब्रधांड शष्हनो अर्थ
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जगोज शास्त्रीय संहर्लभभां स्पष्ट होतो नथी के वर्शनो श्रीभ लागवत, विषशु पुराण डे जन्य पौराणिड ग्रथो मां प्रश्वंडना स्वइपने बगता भोवा भणे छे. ते जघाभां ब्रश्ांडनी खेड़ ब्रथंड गोसड़ तरीडे उस्पना उरवाभा जावेसी छै.खने तेना उेन्द्रभा उमेशा पृथ्वी ने ४ धारणाभां जावी छै. या लूहेन्द्रिय प्रशांडना भोडेस वैज्ञानिड दृष्टि से सशक्ष छोसने तेथी ा प्रहारना डोयए मनेड प्रथांड सिध्धांतना विशुध्ध जगोज शास्त्रीय इसितार्थो तारववानो प्रश्न रहेती नथी. मात्र तत्वविज्ञानीय उस्पना पर ४ वियारणाथी खहींया सत्यंत नानी भग्याभां वधारे परिभाए वाणी वस्तुओोनो सभावेश से संतर ने परिभानी साथेक्षता सूयवे छ. सेटसु तारवी शहाय, रोभ शष्हनो प्रयोग पश पुराण ग्रंथोभां अनेड वजत जावे छे.साभाथी पएा मानव रोपरा वाहने भुक्ष परवामा आावे तो रोभनो खर्थ परभ सत्ताना सृष्टि भीभांसाडीय सर्थो से प्रदाशनो क सह भशाय खने तेभा प्रत्येड संशभा डरोडो प्रश्ंड जवेदा छे. तेनो वियार २शू दरीने विशिष्टा प्रश्ंडगत अस्तित्वनी निरभेक्षता पर प्रश्न यिस् भूडीने भाया सिध्धांतने सभर्थन जापवाभा माव्युं छे.
आा सिवाय भाउत सिध्धांतने आानुवंशिड रीते वधारे सुसंगत पऐो भणतो जावतो सिध्धांत खेड़ी साथे स्वीडृत अनेड उ्रस्थ-खनेऊ प्रथंड सिध्धांत छ. सद्वैतवाहनी तत्त्वभीभांसा के सृष्टि- विज्ञाननो निदेश डरे छे. तेभां भेड़ी साथे जे प्रडारनी अनंत सृष्टियोनो वियार राभयरितमानसना उत्तरsमा कोवा मजे छे. डाइलुशुण्डि योतानुं राम द्वारा जताववाभा आावेस भायानुं वर्शन उत्तर डाडमा कुरे छ. खा वशनभां रामना जासउपभाथी जास यरित्रना दर्शन दरीने डाइलुशुण्डिने भोड थाय छे. तेभने वियार जावे छे टु (39)
क्ततक क्ततनकक्तररिक़त्तक त्तकत्तक
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क्त क्त क्त क्त
क्त क्त क्तक्ककतेशतक्र रेशकतेक्रकक्त
क्त क्त क्त क्त
राभायणमा जा खेड़ सामान्य जाजत छ डे रामनी नर-जास सीसा कोछन भोड नो प्रसंग उपस्थित थाय छे. गइडनी भेम डाउलुसुण्डिने 'भोह' थाय छे. रामना जश् पशाभा संदेड थतो नथी. परंतु जा भोउ शनित सवस्थाभां तेभने प्रश्न उहलवे छे डे खेड़ 'प्रादृत' सामान्य रीते भेना कन्म थयो छे तेवा शिशुनी ऐेमा 'यिधानं' खने 'संहोड' केवा प्रभुनु जा देवा प्रदारनु यरित्र छे? जर्थातक्त अनंत ब्रश्ंडना स्वाभी छे. तेभनु जयोध्याभा जा का
प्रडाशनुं 'डेवुं' यरित्र यासी रहुं छ! ज्ञाननी सभ्यड अवस्थामा उस्वेस य।
भोड शनित प्रश्ननुं निराहरण भायाना संपूर्ण सर्वन साथे थता परियय द्वारा थसह शडे तेथी जा 'वियार' के 'भोह' थोडो प दरढ़ थाय ते पहेसा डाइलुशुण्डिने भाया व्याये छे. या भाया डे अनंत ब्रह्मांडीतना संहर्ल्भभा शष्ह प्रयोग दरवानो थाय तो 'भहाभाया', 'छुःज' के 'संस्कृति' नुं डारण जनती नथी डारए डे तेनी स्वयं ४ डाड लुशण्डिने जोध थाय छे डु (3८)
क्तत्तवक्रतकतक्रतक्रतक क्तेतक्रतकतक तेकतक
क्ततकक्र तकतशेकतक्रत्तेकत्तकतक्रतकतक्नक
सही मायानुं खेड़ खेु पासु पशा ोवा मजे छोहे क हेय कै त्यान्य न होय से जाजत पर स्वलाविड छे. अारणा डे खही भाया शष्हनो सर्थ
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व्यैयश्िड खने साधना भार्गीय संहर्लभां विशेष सेवानो नथी परंतु ज्रम्मांड भीभांसाडीय संहर्लभां विशेष रीते सेवानो थाय छे. तेथी क जा भाया डाइलुशुण्डिन अवरोध३य डे संस्दृति ३प जनवा दरता ागजना उत्डर्षमा सहायऊ जने छे.
सभत्र वर्णनभा डडलुशण्डिने रामना उहरमा खनेड ब्रम्मांडीनु हर्शन थाय छे. सेटसु क नहीं पश ते प्रत्येड ब्रलमांडभा खेड़ - खेड़ ड्रस्यसुधी २हे छे. सभय्र वर्एनभां संशो जा प्रभाऐ छे.
ककतशक्रतकत्तक्क्ततक् क्तक्तत्रिकतक
क्तक च्तक् ततककतक्क्तक्तकक्त्त्नक
खनेड़ ब्रह्मांडोना उद्सेजनो जा सौ प्रथम वजत स्पष्टताथी कोवा भजे छे. खनेड़ ब्रल्मांडनो सभूह हेजाय छे. खने तेभां अति विथित्र सोड 4ए। भोवा मजे छे. या जघु पहेसा कआावाय तेभ त्तकत्तकतकत्तकत्तेटसे हे खा
ब्रह्मांडना सातेय आावरणो लेहीने, तेनी 'जहारे' नीडजी गया पछी हेजाय छे. खगाउ निउपशा दरवामा आाव्यु छे तेम सप्तावरण युक्ष ब्रलमांडनी उुस्थना लूडेन्द्रीय पौरालिड ब्रलमांडनी उस्पना छेनेम साधुनिड़ ज्रलमांडनी वियारणा साथे सुसंगत राजी शङाय तेभ नथी. तेभ छता तत्वनी द्रष्टिये खही सगत्यनु मेटसु ४ छ डे जानुलविड 'विश्व' खनंत ब्रह्मांडोभा विलाकित छो सने प्रत्येङ ब्रल्मांडभां सृष्टिना नियमो, उर्भ जने पहार्थो विजेरे सलग सबग छै.
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ा समय्र विथित्रताओोमा नत ब्रम्मांडी वय्ये संभावनात्मड सिध्धांतथी तेभ वैय्ड ताहात्म्यना तारतभ्यताना सिध्धांतथी डेटसीड जाजतो समान पमा कोवा भजे छे. केना वर्शनभां जागण भणावायु छे कै
क्तक्तक्ततकततकतकतेश्रेत कतेनककतश केवशवशb केशिक ककतकककतकककतक्न्नक
ककतक्रतककतऋ्र्तशे कत वेशवश्कते ककतक तेक्र तेशतविककतक्रत्तकतगनक
शकतक क्क्ततज्रककक शचकक तकतकक्ततकजमनवक
खही अनेड़ ब्रह्मांडोमां रडेसा जांतर ब्रह्मांडीय ताहात्म्य सूय व्यक्षित्वीदरणनी वियारणा ना जीव भोवा मणे छे. डाडलूबंडीने पोताने ब्रह्मांडीमां पोताना खनेड़ धन्भो हेजाय छ. तेवीन रीते सवघपुरीना सने सवधपुरीना निवासीजोना अने उपो हेजायछ. प्रत्येड ब्रममांडमा रामना सवतार थयेसो पहा हेजाय छे. परंतु अोधपएा ब्रल्मांडभा रामनुं स्व३प जीग। प्रदारनुं भशातुं नथी. जा व रीते तेभनु अभर मने ्रमांडीमा यासु रहे छे खने पछी भायाथी जेनु भशाय छे डै
क्तक्क्ततक्र त्े क्रितकक्तकशकतेशरे श्ववक्रेकतक्रत्तककत्तकक
सही जनेड़ ज्रह्मांडोमा अमग दुरती वजते डाइलूषंडीने सेवु भआाय छे डे थाऐो खेडसो खेड़ उस्य पसार यह गया छै. सेडसो ेड़ पुस्यथया
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जाह ते इरीथी पोताना से्ठ खाश्रभमा जावे छे. इरीथी से घटनानु पुनशवर्तन थाय छे, सने क्यारे राभ द्वारा भायानुं निवारण उरवाभा जावे छे. त्यारे उड़ीउतभां ते घड़ीनो सभय पसार थयो छै. जा रीते या प्रसंगभा भाया सिध्धांत तथा अनेऊ विध सिध्धांतने सांडजीन जानुविद सस्तित्वना साथेक्षीडिडरणनी लूमिडा सणू उर्वामा आावेस छे.
4.4.4: भूस्यांडन खने उपसंहार :-
राभयणना समय्र ईसड़ पर ते खेड़ वैष्णव मार्गीय खने लि प्रधान भहाव्य होवा छतां तेभां तात्विड पृष्ठलूभि तरीडे सद्वैतवाह खने तेना आानुषंगिड संघटड तरीडे भाया सिध्धांतना निद्पशो ोवा भणे छे.सेयथार्थ छे हे जधीण भग्याखे भायानो खर्थ यूस्तपए शांडर वेहातनी केम प्रथंथमा भिथ्यात्व डे अनिर्वयनीयत्वनुं निउपश सेवो थतो नथी. परंतु तेनी साथे साथे से पएा यथार्थ छे डे राभायण तेभष्ठ सभय्र वैहिड परंपरमा तात्विड छष्टिसे भगतनी प्रातिलासिडता तथा माध्यात्मिक दृष्टिसे भगतनी नि:सारतानु प्रतियाहन भोवा भज छ. उहाहरए तरीडे महालारतनुं उहाउरए सेवाभा खावे तो खने तेभा यएा श्रभत्तमगवहत्तगी ताना तात्विड विलागने जाह दुरीने को
भहाङाव्यने संबग्न होय तेनी घटनाओोना वर्शन तथा निउपरामांथी क खा सिध्धांतने भोवानो डे तारववानो प्रयत्न डरवाभा जावे तो उद्योग पर्वभां धृतराष्ट्र सनत्सुभ्ठातु संवाहभां सत्ताभीभांसाडीय संहलभथी सद्वैतवाह तेभष ाा सिध्धांतना जीव रडेसा भशाय छे. विदुर नीतिना नैतिड खने साभाड परिभाष पछी तरत क जावता सनत्सुष्ठातीय पर्वभां धृतराष्ट्र सनत्सुभातुने खेड़ तडपिति भाटे प्रश्न दुरे छे. धृतराष्ट्र उहे छ डे तेऐ सेवु सांलण्युं छे९ तेभना जर्था तत्तम नत्सुष्ठातुना भत अनुसार भृत्यु छे० नडि तो साथे साथे से
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यएा भाएाभा जावे छे हे यूर्वे देवताजो हश्वर पासे भृत्यु थी जयवानो तथा सभरत्व भेणववानो भार्ग शोघवा भाटे गया उता. (3८)
खा प्रश्नना उत्तरभां सनत्सुष्ातु के तत्त्वज्ञान रशू दुरे छ. ते व्यावहारिड मने पारभार्थिड सत्ताना निरपश जंगे उपनिषह प्रतिपाहित दन्द्वात्मडतर्डना निइपशनी पद्धति सूयवे छ. माध्यात्मिक संहलभभां कोहसे तो भ्यारे धृतराष्ट्र ब्रम्म अंगेनु वर्शन सांभजीने वारंवार आाश्यर्ययक्षि ने हर्षषित थाय छे. त्यारे सनत्सुभ्ठातु तेने येतवशी जाये छे.डे" तभे वारंवार ब्रह्म शष्ट तथा तेना निइयराथी के रीते हर्षित यह रहो छे. परंतु ज्रम्म विद्या जाणडोनी केभ उर्षित थवानो डे आाश्यर्य पाभवानो विषय नथी, (3e)
जा निउपणमा ब्रम्म वझासा डे जह्म प्राप्ति भाटे वेहांत परंपराभों के अनिवार्यजाध्यात्मिङ डे नैतिड पूर्व शशतोनो ज्यास वियारवामां जावे छे. तेनुं समर्थन भोवा भजे छे.आा रीते भहालारत शांतिपर्वभा 4ए। ब्रह्म विदाने सगता उपदेशो विशेषतः अनुगीताना संहर्लभभां कोछ शङाय छे. तात्पर्य निइपश जेवुं थाय छेडे लारतीय वैदिड वियार धाराभां भहाङाव्योभां पश तेनी तात्विड पृष्ठलूभि तरीडे वेदांत प्रतिपाहित सद्वैतवाह डे भाया सिध्धांत रहेसो छे. से हमेश सावश्यड नथी के महाअव्योभां तेनुं निशपण तार्डिड डे ज्ञानभीभांसाडीय उक्षाये शंडर डे शंडरोत्तर वेहांतनी ऐेभव्ठ थयेसुं होय तेभ छतां अोछपश प्रसंगभा अंतिभ सत्ताना स्वप वर्शननो संहर्ल सवश्य उपस्थित थह हाय छे. तारा विदाथभां विद्ापनी अवस्थाये पतिना वध मरनार पासेथी तत्वज्ञान ग्रहण दरवानी लूभिङ्ा वेहांतनी स्थिति सूयवे छे. तो से ४ रीते भंछोहरी विस्ापभां पह अंते से विसाय रामनी सेटसे डे ब्रह्मनी स्तुस्तमा परिएभी भाय छे. (४०)
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tतततhतbशरशकशकxशbव ककतनक
सर्थातक्तरावणाना भृत्यु ने मंछोहरी द्वारा विद्ापथी तेनी
लगवह साभनी प्राप्तिना संदेत दुरीने अध्यात्मसक्षी वणांड सभयवाभा जावे छे.
तो सेु रीते सग्न प्रसंगभा पए क्यारे ज्योध्या डांडमा राम, सक्ष्मण, भरत, जने शत्रुघ्नना सग्न, सीता, उर्भिसा, भांडवी जने श्रृतडीर्ति साथे थता डोय छे. त्यारे भंडय वर्शन वजते भादक्षय उपनिषह प्रतिपाहित येतनानी सवस्था तथ। तेना स्वाभी जोनु वर्णन जावी नाय छो. (४1)
कhतhशकत्जकतशककत ककतक ेशकैतक्कत्तते श्रजकक्ततक
क्क्ककतकतशशकतकतक्र क्ेेकरतवकेकत क्रतेककेकन्रिकक्ततककतकनक
सर्थातक्त पमा ससंडारनी प्रद्ियाभा पश उपभेय उमेंशा वेहात
संहर्लवन क सेवायी. खने तेथी क सग्न भंडपनी तुसना खात्माभा रहेसी भगृति स्वप्न सुषुप्ति मने तुरीय तथा तेना स्वाभी अने विराट, डिरएय गर्भ, प्राश डे ब्रल्म सेभ जतावीने तात्विड लूभिद्ा अोधयश प्रसंग भाटे सस्पृष्ट नथी तेनुं प्रतिपाहन उरवामा खाव्युं छे. तथा जा ीते खने प्रसंगोभां भुख्य तात्विड सिध्धांतनुं सतत प्रतिपाहन से समय्र वेहांत परंपराभा सदैतवाही सिध्धातनुं खने तेथी भाया सिध्धांतनी पए सतत हाथठरी सूयवे छे.
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संहरल नोछ :-
(१) "खध्यात्म राभायणा" जासडांड, सर्ग- 9 2सोड - 32
(2) "अध्यात्म रामायण" जासडांड, सर्ग- 9 2सोड - 33
(3) "अध्यात्म राभायणा" जासडाड, सर्ग - 9 2सोड - ४3
(४) "खध्यात्म राभायणा" जासडांड, सर्ग - 9 2स1ड - ४४
(4) "अध्यात्म राभायण" जासडांड, सर्ग - 9 2सोड - 84
(s) "अध्यात्म राभायण" जासडांड, सर्ग - 9 2सोड - 85
(9) "अध्यात्म राभायण" जासडांड, सर्ग- ४ 2सोड - १८
(८) "खध्यात्म राभायणा" जासडांड, सर्ग-४ 2सोड- २१
(c) "खध्यात्म राभायणा" जासडांड, सर्ग - ४ 2सोड - 2२
(१०) "अध्यात्म राभायण" जावडांड, सर्ग- ४ 2सो3 - २2-२४
(११) "अध्यात्म राभायणा" जासडांड, सर्ग - ४ 2सोड - 24-25
(१२) क्तक्तक्तक्ततक्रतकरशक्त्तंकततक क्ततकत्तकक्त्तकक्ततकत्तमत हैसा सावतुं अध्यास लाष्य
(१3) ibid मध्यास भाष्य
(१४) भाडूक्र्य उपनिषहा प्रथम भंत्र पर नुं शांदर माष्य
(१4) खध्यात्म राभायण डि्दिंधाडड सर्ग- 32स13-८-८
(१5) अध्यात्म रामायणा डि्डिंघाडाड सर्ग- 32स13-98-95
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(१9) अध्यात्म रामायणा डि्डिंघाडाड सर्ग- 32स13-99
(१८) खध्यात्म राभायण डिण्डिंघाडाड सर्ग- उ2सोड-96
(१८) अध्यात्म राभायण डि्डिंघाडाड सर्ग- उ2सोड-92
(२०) खध्यात्म राभायणा डिं्डिंघाडाड सर्ग- उ2सोड -20-24
(२१) शभयरित मानस भातम जासडांड- सतीमोउ प्रसंग
(२२) शाभयरित मानस मातम जासडांड-सतीभोउ प्रसंग
(२3) शाभयरत भानस मातम जासडांड-शिवपार्वती संवाह
(२४) शभयरित मानस भातम जासडांड-शिवपार्वती संवाह
(२4) मानस- पीयूष जंड-२ शिवपार्वती संवाह
(25) जहमसूत्र शांडर भाष्य, अध्यास भाष्य
(२७) शाभथरतमानस जासडांड शिव- पार्वती संवाह
(२८) राभयरितमानस जासडांड शिव-पार्वती संवाह
(२ल) राभयरितमानस उत्तरडांड डाइलुशुण्डि प्रसंग
(30) शभयरतमानस उत्तरडांड डाडलुशुण्डि प्रसंग
(3१) शभयरितमानस उत्तरडाड ज्ञानदेव वर्णन
(३२) राभयरितमानस उत्तरडांड ज्ञानदेव वर्णन
(33) राभयरतमानस उत्तरडाड ज्ञानदेव वर्णन
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(3४) राभयरतमानस उत्तरडाड ज्ञानदेव वर्णन
(34) राभयरतमानस उत्तरडाड ज्ञानदेव वर्शन
(39) ข เมน โกน ซน Gnesis 515ณยโขs มเนเยR์ + หม่อ เ
(3८) भहाभारत उद्योगपर्व घृतराष्ट्र सनत्सुभ्ठातु संवाह
(उल) भहालारत उद्योगयर्व घृतराष्ट्र सनत्सुभठातु संवाह
(४०) भडालारत उद्योगयर्व घृतराष्ट्र सनत्सुभ्ठातु संवाह
(४१) भहालारत उद्योगयर्व घृतराष्ट्र सनत्सुष्ठातु संवाह
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्रड२श:5
Aogl :-
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प्रडुर्श:5
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निष्दर्ष
सभग्र भारतीय तत्त्वविज्ञान, धर्मभीभांसा सने इधरविधाना संहलभां जने समय्र शोध निषंध भाया सिद्धांतनुं साभान्य रीते सेवाय छ. तेना ऊरता मे धशा व्यायड परियेक्ष्यमा खाडसन तथा भूस्यांऊन तथा ते जंगेना विविध भंतव्योने ध्यानभा राजीने के उंछ पश निदपशा जा शोल निजधभा थयु छे. तेना जाधारे जा संति प्रदरशभां निष्डर्ष सेवानो प्रयास उरवामा जावे छे. भूणलूत धारणाजो साथे सुसंगत रहीने संशोधड समय्र व्यायड इसउने खावरी सेतो नीये भुशठ्जनो निष्दर्ष हमशः जने भुछासर २०ू डरे छ.
(१) सभय्र वैदिक जने औौपनिषिड तत्त्वयिंतनभा जा संशोधन प्रडस्पना
प्रङ2ए-२ तथा तेना जंतगत भूजलूत वैदिड संद्विताजो तेभ प्रायीन उपनिषछोमां के तात्विड खने माध्यात्मिड वियारधारा सणु थ छे. तेने सभय दष्टिसे ध्यानभां सेता सेवुं स्पष्ट भशाय छे डे समय्र वैदिद ने औौपनिषछिड तत्त्वयिंतन खेड़ सक्षण तो स्पष्ट घरावे छे डे, प्रतीयमान आानुंभविड् विध से सत्ताभी भांसनी छष्टिये संतिम सक्ष्य नथी. 36 उपनिषहनु श्रेय खने प्रेय है भुंडड उपनिषछनी परा खने खपरा विद्या जा क जाजत तरइ निर्देश दुरे छे तो भांडूड्य उपनिषहनी तुर्या सवस्था डे जृहहारएयड उपनिषछनु सक्षर तत्त्व हेशडासातीत सत्तानो अनिवार्यपऐो ानुलविड् विद्ार्थी उश्यत्तर डक्षानी सत्ता जतावे छोसने तेथी व्यापड सर्थभां वैदिड जने औौपनिषहिड तत्त्वयिंतन भाया सिद्धांतने तेभनी तत्त्वविज्ञानीय पद्धतिना भेडसनिवार्य ंगे तरीडे स्वीडारे छ.
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(२) शांडर वेहांतने सगती वियारधारा भायावाहनुं सभर्थन दरे ते स्वालाविङ्
छ. पंतु या शोध प्रदरणमां संशोधड ने भेवुं अनिवार्यता कशायु छे डे शांडर वेछांत के गोडयाहथी सहने शंडरना प्रभुख यार शिष्यो सुधीनी तत्वयिंतनने जावरे छे. तेभां ाया सिद्धांतनो खर्थ वैदिड जने औौपनिषिड परंपर जनुसार 9 थाय छे. शांडर वेहांतना संहर्लभां भारा संशोधड तरीडेना निष्दणो नीये भुकज छे.
(१) वेहांत प्रतिपाहित सद्वैतवाह भाटे भाया सिद्धांतनुं सभर्थन अनिवार्य छे, भे संतिभ तत्त्व खेड़ ४ठ होय तो छेश खने अाजथी पर सेवा अंतिभ तत्वनी साथे जा जनेता घरावनार विधनो डो संजंध संजंधोनी खानुलविड परिपाटीये सभभवी शङ्ाय नहि. तेथी भाया सिद्धांतना संहर्लभां अनिर्वयनीयतानुं तत्त्व साववुं अनिवार्य छे.
(२) भाया सिद्धांत भगतने पूर्णता, तु्छ, खसीङ, स्वप्नवत गएतो नथी. तेथी शांडर वेहांतभा भाया सिद्धांतनी अाथरी तेभां डोछ रीते योगायार विज्ञानवाह डे माध्यभिड्ट शून्यवाहना तत्वो निर्देशती नथी.
(3) भायावाहनी साभे के टीडाजो रू यह छे ते तत्त्वभीभांसाडीय गेर सभथण थी उदलवे छे सने तेनाथी भायावाहनुं जंडन थतुं नथी.
(3) शांडर वेहांतनी दर्शन परंथरा शंडरोत्तर वेहांतभा पश यासु रहे छे.
भाया सिद्धांत साभेना जाक्षेयोनो भारतीय वाह शास्त्रनी भूभिङ्ा प्रभाऐोनो सामान्य परिणाभ तो असरडारड रीते तो भेवा मजेछे. परंतु तेथी विशिष्ट तारण से कआायु छे डे सद्वैत सिद्धि, यित् सुजी तेम जंडन जंड जाघ केवा ग्रथोभां माया सने सविधा वय्ये ले पाडीने वैहिड अध्यास तथा वैयत अध्यासनी लूभिद्ा के सबग रीते तथासे छे. तेनाथी भायावाहने सुसंगत 285
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स्वइप प्राप्त थयुं छे. केना भुख्य तारणो नीये भुक्ज छे.
(१) नव्य न्यायनी परिलाषाथी सतिसक्षित आाधार, सधिषान खने जाधनी संडस्थना भायावाहने पद्धति शास्त्रीय तेभष्ठ ज्ञानभीभांसाडीय संहर्लभां सुसंगत आाधार पूरो पाडे छे.
(२) औौयनिषछिड सर्थघटनना संहर्लभां भाषना तत्तवज्ञानना क्षेत्रभा भेवाभां जावे तो शंडरोतर वेहांतमा भहह, सशलह सक्षणाथी सर्थघटननी प्रड्रिया जायवाभा जावी छै ते साभान्य नुलवने तिभे छे, खने भायावाहने सभर्थन आापे छे.
(3) परंथरागत वाह शास्त्रना संहर्लभाँ नैयाविडी तथा भध्वभतना सभर्थडो द्वारा के जाक्षेयो भायावाह पर थया छे, तेनो संतोष डारड उत्तर जपायो छे, अने तेथी शुउरेत्तर वेधांतनी इणश्रृति तरीडे भायावाह भेड सुसंगत सिद्धांत तरीडे जहार जावे छे.
(४) जा शोध निजंधनी से विशेषता रही छो है कमा पौराशिड खने
भहाअव्योना चिंतनने जावरी सेवायुं छे-खही से साभान्यल्रभनुं निरसन दश्वानो नभ्र प्रयास थयो छे डे लडत भार्गीय परंपशा साथे भायासिद्वांत संगत नथी. अध्यात्म रामायणथी बहने शाभ यरित भानस सुधी क डा संहलभा ज्ञानात्मड वियारणानो संहर्ल जावे छे. तेभा जात विधना सतिजभरानी जाजत अनिवार्य छे. ते सिवाय खनेड विध सिद्धांत से भारतीय पौराशि िंतनने पुराण गाथा वाहथी घलु उपर बह भय छे.खने तेनी या सिद्धांत प्रभाऐो भायावाहना सभर्थनना अनेड़ परिभाणो प्राप्त थ शडेछे. साभ पौराणिड खने भडाअव्यनुं यिंतन सेवो स्पष्ट निर्देश जाये छे डे लारतीय पुराशो पुराश गाथा वाहथी तत्त्वभीभांसा तरइ संऊरभए दरी शड्या छो खने भाया सिद्धांत तेनुं स्पष्ट
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समत्र परियेक्ष्यमा खाउसन परवाभा जावे तेने खेवु सागे छे है ऋगवेहथी सछन सत्तरनी सही सुधी के अोछयए वियार प्रशासी वैदिद वियारधाराथी प्रलावित थहने विडसे छो ते अोछने उसह रीते भाया सिद्धांतनी आाश्रय से छ. तहुपरांत संशोधडने सेवु पश कशायु छे डे विशेषतः पौराशिड तत्त्व यिंतनभां के अनेड विध सिद्धांतनी वात थह छ. तेना तत्व भीभांसाडीय पासा उपर विशेष प्रलाव पाडतु संशोधन थवुं धसुंक ४३२ी छ. विशेषतः योगवशिष्ट, अध्यात्म राभायएा जने वासुदेव भहात्म्य केवा पौराशिड ग्रंथोने विशिष्ट तात्विड संहलथी भूसववाभां जावे तो ा शोध निषंधभा प्रतिपाहित भूणलूत स्थापनानी दिशा विस्तरी शड छ.
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संहर्ल ग्रंथ सूथि
तक्रतक्रक्त क्त्तक्रतकतक्रेकक्तव केतेशेश्ेककत्तववक्रतक्रतककक्त
क्त क्त क्तत्तकतककक्त
क्ततक्र ककतक
क्त रशशक क्त कत्ततकत कतेशिकते ककत्तकक
क्तत्तकतककक्त
क्त क्त क्त क्ततक्र कतक
क्त ककतकक्त केकतकतवशतेशेेश्रोकतेकैकेक क्रेतक क्त्तकतक्क्त
क्त क्त क्त क्ततकतककक्त
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क्त तक्रतक्रक्त त्तकक्तकतकत्तक
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क्त तक्रतक्रक्त क्तत्तकक्ततक्रत्तकक्तकतेक्रतक क्तकतकशक
क्त क्त क्त क्ततकतककक्त
क्त क्त क्त क्तत्तवक्र क्ततक
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(35) सद्वैत हीयिक्ा (नारायणाश्रभ विशयित विवरण सडित)
नृसिंहाश्रम यिरयिता भाग - १, २
'सरस्वतीलवन ग्रंथभाणा,
संपूर्णानंह संस्कृत विश्व विद्यासय,
वाशएासी, १८८२, १७८४.
(39) सद्वैतरत्न रक्षणा,
भधुसूधन सरस्वती,
निर्एयसागर,
भुंजछ.
(3८) सद्वैतसिध्धि,
भधुसूधन सरस्वती, सघुथन्द्रिडा, विट्टसेशीसडित,
परिभस पब्सिदेशन्स,
हिस्डी, समहावाह, १७८२.
(3c) अनु विवरण,
दसड़त्ता संस्डृत सिरिज,
डुसड़ता
296
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(४०) न्यायभृत,
व्यासतीर्थद्ृत,
(४१) न्यायभृततरंगिशी,
सभायार्थदृत,
निर्एयसागर, १८१०.
(४२) सघुयन्द्रिडा,
गौड ब्रह्मानंह विशाित.
(४3) विवरण,
प्रडाशात्मयति विशायित,
विकठयनगर, सं.
(४४)
भधुसूधन सरस्वती,
न्यायरत्नावसी सडित,
संपाछड- राकेन्द्रनाथ घोष
(४५) गौड्याडारिडा.
(४5) न्याय डुसुमां लि.
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(४७) भारतीय हर्शनेषु भाया स्व३प विभर्श,
डॉ. शशीजासा गौँड,
नाग प्रडाशन,
हिस्ही- 96८८.
(४८) आायार्योनुं तत्त्वयिंतन,
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नगीन 0. शाउ,
संस्डृत - संस्कृति, ग्रंथभासा-C.
(4२) भारतीय दर्शन,
खासोयन जने जनुशीसन,
यंद्रघर शर्भा,
भोती सास जनारसीहास,
हिस्ही
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श्री उर्ष,
यौजंसा विद्यालवन,
वाशएासी, १ल८२.
(4४) ज्रह्मसूत्र शांदर भाष्य,
आायार्य नगहीश शास्त्री,
भोतीसास-जनार सीहास
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(44) तत््व प्रहीपिडा,
(थित्सुजी)
स्वाभी योगीन्द्रानंह,
यौजंजा विदालवन,
वाशएासी.
(45) न्यायभृत सद्वैतसिध्धि, भाग - १, २,
स्वाभी योगीन्द्रानंह,
यौजंजा विदालवन,
वाराएासी.
(49) प्रस्थानत्रयी,
प्रा. सी. वी. रावस,
प्रज्ञाप्रङाशन, समहावाह.
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श्री राभ शर्भा जायार्थ,
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(4c) जृहहारएय उपनिषछ,
गीताप्रेस, गोरणपुर
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(so)
(s9)
(s₹)
(93)
(sx)
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(55) "उ4निषछ नवनीत",
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खायार्य भाजा धृव,
जार. जार. शेहनी सु
भुंजछ.
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(७४)
श्री भगनलाह यतुरलाई पटेस,
प्रदाशड: भुजकलारह सं. पटेस,
(७4) 'वेहांतनो सल्यास",
स्वाभीश्री लगवहायार्यक भहाराषट,
श्री उरिलाह लीजालाह शाड,
पेटसाह, प्रथम सावृति, वि. सं. १८८८.
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(७८) "वेांत सने योग",
स्वाभी श्री भाधवतीर्थ,
सेन. खेभ, 652, भुंजछ,
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सावृति - 9, 9८४५.
(७c) "सर्व वेहांत सिध्धांत सार संग्रह",
संथाहित, सस्तु साहित्य,
सभछावाह, सं. २००२.
(८०) "श्री भछू लगवहगीता" शांदरलाष्य,
संयाहित, सावृति- जीक,
सं. २०१८.
(८१) श्रीभछू शांडर भयंती व्याज्यानभाणा,
- ड. प्रा. त्रिवेही,
प्रथभ आावृति, १८१3.
(८२) "श्री भछू शंदरायार्थ,
वाभनराव प्रा. पटेस,
सस्तु साहित्य, सभहावाह,
४ थी सावृत्ति, छ स. १८७०.
(८3) "तत्वज्ञानना निजधो,
श्री मनुलाछ सी. पंडया,
सुंजछ, सावृति १ सी, १७२८.
305
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(८४) "हिन्ह तत्त्वज्ञाननो छतिडास",
श्री न. हे. भडेता,
गुण्ठरात विदासता,
समहावाह
(८4) "श्री शंदरायार्य",
हिन्हुस्तानी सेडेडेभी,
जसाडाजाह, 9K५०.
(८5) "खद्वैतावाह",
श्री गंगा प्रसाह उपाध्याय,
डसाप्रेस, खसाडाजाह, 9८५७.
(८9) "शंद्ुरायार्यनो भायावाह",
डॉ. मात्रेय जी. सेस,
जनारस, १ल52
(८८) "श्री शंदरायार्यडा जायार दर्शन"
डॉ. सभानंछ तिवारी,
डिन्ही साहित्य संभेसन,
306
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प्रयाग. संवत - २००६
(८८) "शंद्रायार्थ",
खनु प्रा. सेभ वी. जद्री,
नेशनस जुड ट्रस्ट,
न्यु हिस्ही, 9052.
(८०) "गाँडयाह डारिडा- खेड़ मध्ययन",
श्री स. ह. शास्त्री,
यूनीसास गांधी विद्यालवन,
सूरत, १८६४.
(c१) विवेड थूडाभलि,
भट्टरामशंडुर मोनक,
भोक्ष भंदिर,
खमछावाह- १८८४.
(८२) उपहेश साउस्त्री,
सस्तु साहित्य,
समहावाह
307
Page 309
(<3) द्रेनोयनिषह,
गीताप्रेस, गोरणपुर.
(८४) Seu- GyANE,
गीताप्रेस, गोरजपुर
(c4) तैतरीयोपनिषट,
गीताप्रेस, गोरजपुर.
(<5) भारतीय दर्शननी उपरेजा,
छन्द्रदसा जवेरी.
(८9) भारतीय हर्शन,
प्रा. सी. वी. रावस
(८८) भारतीय हर्शननो छतिहास,
डॉ. छासगुप्ता
(८c) भारतीय तत्वज्ञाननी उपरेजा,
प्रा. ेभ. डिरियाएणा.
(१००) वेहनी विथारधारा,
डॉ. राधाडृष्णान्,
खनु श्री यंद्रशंदर शुद्स,
308
Page 310
(१०१) उपनिषछोनुं तत्त्वज्ञान,
डॉ. राधाडृष्णन,
खनु. श्री यंद्रशंदर शुङ्स,
(१०२) दर्शन खने थिंतन,
4ं. सुजसासळ.
(१०3) उपनिषछ वियारण,
श्री नर्महाशंदुर डे. महेता.
(१०४) गीता दर्शन,
थंद्रशंडर प्राणशंदर शुङस.
(१०५) भारतीय दर्शन,
उभेश मिश्र
(१05) भारतीय हर्शनडा छतिहास,
डॉ. छेवराण खने डॉ. तिवारी.
(१०9) भारतीय दर्शन,
जसहेव उपाध्याय
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