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1. Abhinava Ka Rasa Vivechan Hindi Book Nagin Das Parekh

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अभिनव

रस-विवेचन

नगीनदास पारेख

विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसो

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अभिनव का रस-विवेचन

[साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत गुजराती ग्रन्थ 'अभिनवनो रस-विचार अने बीजा लेखो' का हिन्दी अनुवाद ]

मूल लेखक श्री नगीनदास पारेख

हिन्दी-अनुवाद-व्यवस्था डॉ० प्रेमस्वरूप गुप्त डॉ० सुरेशचन्द्र त्रिवेदी, डॉ० श्रीराम नागर

तत्त्वावधान

हिन्दी अनुसन्धान परिषद्, हिन्दी-विभाग, स० प० विश्वविद्यालय वल्लभविद्यानगर

विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी मेल्बाजहार

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जजगग ABHINAV KA RAS-VIVECHAN by Nagin Das Parekh

प्रथम संस्करण : १९७४ ई०

प्रकाश न वीश रुपये व् श्व वि सशा. मूल्य 24 चौक विराणसा

प्रकाशक : विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी-२२१००१ मुद्रक : ओमूप्रकाश कपूर, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी (बनारस) ७१३१-२६

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शुभकामना

हिन्दी इस राष्ट्र की राष्ट्र-भाषा है। उसका व्याप और आयाम अत्यन्त विशाल है। तदनुरूप उसके अध्ययन और अनुसन्धान की दिशाएँ भी विस्तृत होती चली जा रही हैं, यह प्रसन्नता की बात है। हमारे विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग ने भी इस दिशा में विविध प्रयास किये हैं। 'हिन्दी-अनुसन्धान-परिषद्' की स्थापना द्वारा विभाग अपने शोध-परक अध्ययन के क्षेत्र में गतिशील है। हिन्दी-शोध-सूचना- सम्बन्धी उसके प्रकाशन 'हिन्दी-अनुसन्धान-विवरणिका' का विद्वानों ने स्वागत किया, यह हमारे लिए उत्साहवर्द्धक हुआ। विभाग के सदस्य स्वतन्त्र रूप से भी शोध-कार्य की ओर प्रयत्नशील हैं। साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत श्री नगीनदास पारेख की गुजराती कृति 'अभि- नवनो रस-विचार अने बीजा लेखो' का यह हिन्दी-अनुवाद विद्वानों के समक्ष जा रहा है। आशा है, इससे हिन्दी अध्ययन क्षेत्र तो विकसित होगा ही, हिन्दी-गुजराती के पारस्परिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया भी उर्जस्वित होगी। इस ग्रन्थ की उपादेयता से श्री पारेखजी और हिन्दी-विभाग के प्राध्यापक-दोनों का ही श्रभ सफल होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। इसके प्रकाशन के अवसर पर मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

सरदार पटेल विश्वविद्यालय, रमेश सु० महेता वल्लभविद्यानगर, गुजरात उपकुलपति ७-१२-१९७३

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दो शब्द

सरदार पटेल विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग की 'हिन्दी-अनुसन्धान-परिषद्' ने महत्त्वपूर्ण एवं शोधपरक ग्रन्थों के लेखन, अनुवाद और प्रकाशन की योजना हाथ में ले रखी है। प्रस्तुत ग्रन्थ भी उसी योजना के अन्तर्गत पाठकों के हाथों में प्रस्तुत किया जा रहा है। सन् १९७१ में गुजराती के लब्धप्रतिष्ठ समीक्षक और विचारक श्री नगीनदासजी पारेख को उनके ग्रन्थ 'अभिनवनो रस-विचार अने बीजा लेखो' पर साहित्य अकादमी द्वारा पाँच हजार रुपये का पुरस्कार घोषित हुआ था। निस्सन्देह श्री पारेखजी का यह कार्य उपर्युक्त सम्मान के सर्वथा योग्य है। यह मूल ग्रन्थ गुजरती में था, अतः विभागीय अनुसन्धान-परिषद् ने यह अनुभव किया कि इस महत्त्वपूर्ण कार्य को अनूदित करके हिन्दी-जगत् के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए। हम श्री पारेखजी की उदारता के प्रति आभारी हैं कि उन्होंने अपनी कृति को अनूदित और प्रकाशित कराने की अनुमति हमें सहर्ष प्रदान की। मूल ग्रन्थ में अभिनव के रस-विवेचन पर एक लम्बा लेख तथा कई अन्य काव्य- शास्त्रीय लेख थे। अन्त में एक लेख 'नाट्यालंकार' पर था। इस अन्तिम लेख को इस अनुवाद में छोड़ दिया गया है क्योंकि 'नाट्यालंकार' लेख का सम्बन्ध मूलतः गुजराती साहित्य और तत्सम्बन्धी समीक्षा तक ही सीमित था, हिन्दी अथवा सामान्य काव्यशास्त्र से उसका विशेष सम्बन्ध न था। स्वयं पारेखजी की भी यही इच्छा रही थी। समस्त लेखों में सर्वाधिक महत्त्व 'अभिनवनो रस-विचार' सम्बन्धी लेख का है। अतः हमने प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद का नाम 'अभिनव का रस विवेचन' ही रखना उप- युक्त समझा है। अन्य लेख ग्रन्थ के आनुषंगिक लाभ समझने चाहिएँ। इस ग्रन्थ के लेखों के विषय हिन्दी अध्ययन-क्षेत्र के लिए अपेक्षाकृत अधिक अधीत और अधिक परिचित हैं। लगभग सभी विषयों पर पर्याप्त लिखा-पढ़ा जा चुका है। पर, काव्यशास्त्र के अध्येता अब भी यह अनुभव करते हैं कि इस क्षेत्र में लिखने और विचार करने की आवश्यकता चुक नहीं गयी है। श्री पारेखजी का यह कार्य अध्ययन- क्षेत्र में कुछ सफाई ला सके, विचार की कुछ और दिशाएँ खोल सके अथवा मूल कृतियों के विषय में कुछ और अवगति दे सके तो श्री पारेखजी और हिन्दी-अनुसन्धान- परिषद् का यह प्रयास सफल है, और हमें यह विश्वास है, ये दिशाएँ इस कृति से खुलेंगी। श्री पारेखजी के कार्य की गुजराती अध्ययन-क्षेत्र में तो उपयोगिता है ही उन्होंने अति सहज और सरल रूप में इन गम्भीर विषयों को गुजराती के स्वाभाविक मुहावरे में

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प्रस्तुत कर इस क्षेत्र की एक भारी कमी को पूरा किया है। अनुवादकों ने मूल कृति की चेतना को यथासम्भव सुरक्षित रखकर हिन्दी पाठकों तक पारेखजी के योग-दान को अनामृष्ट पहुँचाने का प्रयास किया है। अनुवादक डॉ० सुरेशचन्द्र त्रिवेदी और डॉ० श्रीराम नागर हिन्दी-विभाग के वरिष्ठ व्यक्ति ही नहीं हैं, गुजराती-हिन्दी के अभ्यासी अनुवादक भी हैं। स्वयं श्री पारेखजी ने भी अनुवाद को देख कर मूल चेतना से अविकल सम्पृक्त बनाये रखने का ध्यान रखा है। अभिनवगुप्त काव्यशास्त्रियोंके लिए एक चुनौती था और आज भी है। अपनी- अपनी क्षमता और दृष्टि के अनुरूप अध्येता उसमें अवगाहन करता है और उसकी अपनी उपलब्धि दूसरे की उपलब्धि से कहीं मिलती भी है, कहीं टकराती भी है। किसी विद्वान् का यह अन्तिम दावा नहीं हो सका है कि उसने अन्तिम रूप से अभिनव को पा लिया है। ऐसी स्थिति में अभिनव के अवगाढ़ विद्यार्थी श्री पारेखजी के प्रस्तुत अध्ययन से कहीं सहमत न हो सकें तो कोई आश्चर्य नहीं। मैं स्वयं भी अनेकत्र सहमत नहीं हो सका हूँ। अध्ययन-क्षेत्र की यह स्वतन्त्रता सभी के लिए स्वागत-योग्य है। हमारा लक्ष्य इस ग्रन्थ की समीक्षा करके हिन्दी-जगत् के समक्ष प्रस्तुत करना नहीं है, अपितु गुजराती के एक वरिष्ठ एवं अनुभवी अध्येता के श्रम से हिन्दी-जगत् को लाभान्वित कराने में माध्यम भर बनने का है। हमें विश्वास है, हिन्दी-जगत् श्री पारेखजी के इस महत्त्वपूर्ण योग-दान से अवश्य लाभान्वित होगा और उनके प्रति कृतज्ञता अनुभव करेगा।

सरदार पटेल विश्वविद्यालय, प्रेमस्वरूप गुप्त वल्लभविद्यानगर (३८८१२०) प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी-विभाग गुजरात

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निवेदन

विगत आठ-दस वर्षों में अध्ययन-अध्यापन हेतु लिखे गये भारतीय काव्यशास्त्र विषयक लेखों का यह संग्रह है। प्रथम लेख 'अभिनव का रस-विचार' तथा पंचम लेख 'रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार' लेख इस पुस्तक में प्रथम बार ही प्रकट हो रहे हैं, शेष लेख इसके पूर्व 'संस्कृति', 'स्वाध्याय' और 'साबरमती' में प्रकट हो चुके हैं। 'अभिनव का रस-विचार' लेख लिखने में मुझे अनेक ग्रन्थों से सहायता प्राप्त हुई है। इन सब में मुख्य है : प्रसिद्ध इतालवी विद्वान् श्री रान्येरो नोली द्वारा सभाष्य अनूदित व सम्पादित 'अभिनवभारती' का सम्बद्ध अंश। इस अंश को समझने में, अनूदित करने में तथा पाद-टिप्पणियों में मुझे उक्त ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है। श्री देशपाण्डे के ग्रन्थ 'भारतीय साहित्यशास्त्र' से भी मुझे अत्यधिक सहायता मिली है। 'अभिनवभारती' के पाठ के लिए मैंने श्री सुशीलकुमार दे, बड़ौदा के नाट्यशास्त्र का द्वितीय संस्करण, हिन्दी अभिनवभारती, हेमचन्द्र के काव्यानुशासन का तत्सम्बन्धी अंश और श्री नोली का सम्पादन आदि अनेक पाठों का उपयोग किया है और अभिनव के विचारों के सम्बन्ध में अपनी सूझ-बूझ के अनुरूप पाठ स्वीकार कर मैंने यहाँ अभिनव का मन्तव्य प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। उसमें कतिपय स्थल ऐसे हैं, जिनके विषय में अलग चर्चा करने को जी चाहता है, परन्तु इस लेख में मैंने इस तरह का कुछ भी करने का प्रयत्न नहीं किया। अभिनव के विचार-पिण्ड को प्रस्तुत करने में ही मैंने यहाँ इति-कर्तव्यता मानी है। 'अभिनव का रस-विचार' लेख पूरा मनोयोगपूर्वक सुनकर मेरी कतिपय गुत्थियों को सुलझाने के लिए मैं आदरणीय श्री रसिकलालजी पारीख का आभारी हूँ। उन्होंने रसाभास सम्बन्धी लेख भी छपने से पूर्व सुना था। रसाभास विषयक प्रथम लेख के सम्बन्ध में तो परम श्रद्धय श्री सुखलालजी के साथ विचार करने का भी लाभ मुझे प्राप्त हुआ है। 'अभिनव का रस-विचार' में दी गयी दो पाद-टिप्पणियों के सम्बन्ध में भी मैंने उनका समय लिया है, इसका यहाँ साभार स्मरण करते समय आनन्द होता है। उसी लेख का शृंगार, हास्य और शान्त-रस-सम्बन्धी अंश सुनकर कतिपय मूल्यवान सुझाव देने के लिए मैं आदरणीय श्री आठवलेजी दादा का ऋणी हूँ। उन्होंने 'जगन्नाथ का 'काव्य-विचार' लेख भी पूरा सुना था। प्राध्यापक जयन्त कोठारी ने भी 'अभिनव का रस-विचार' नामक लेख मनोयोगपूर्वक पढ़ कर कतिपय उपयोगी सुझाव दिये हैं जिनका मैं सहर्ष उल्लेख करता हूँ।

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पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने तथा उसे प्रकाशित करवाने के लिए सर्वश्री डॉ० प्रेमस्वरूप गुप्, डॉ० सुरेशचन्द्र त्रिवेदी तथा डॉ० श्रीराम नागर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। साथ ही, प्रकाशित करने के शुभ कार्य के दायित्व-वहन के लिए मैं विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी के संचालक श्री पुरुषोत्तमदास मोदी का भी आभारी हूँ।

१६-११-१९७३ २१, सरदार पटेल नगर, नगीनदास पारेख

अहमदाबाद-६

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अनुकम १ -- अभिनव का रस-विचार १-१२२ नाट्य के अंग १, नाट्य रस २, एक महारस ३, रसों का क्रम ५, स्थायी- भाव ५, तैंतीस व्यभिचारीभाव ६, सात्त्विकभाव ६, धर्मी ६, वृत्ति और प्रवृत्ति ७, सिद्धि, स्वर एवं वाद्य ७, गान ८, रंग-मण्डप ८, नाट्यांगों की संगति ८, रस का प्राधान्य ९, रस-सूत्र ९, लोलट का मत १०, लोलट के मत की अभिनवगुप्त द्वारा की गयी चर्चा १२, लोलट के मत की शंकुक द्वारा की गयी समीक्षा १२, श्री शंकुक का मत १४, सांख्यों का सुख-दुःखवाद २९, अभिव्यंजनावाद ३०, भट्ट नायक का मत ३.१, भट्टनायक के मत की अभिनवगुप्त द्वारा की गयी समीक्षा ३५, अभिनवगुप्त का मत ४१, रस-प्रतीति के विघ्न ४८, स्थायीभावों का स्वरूप ५३, व्यभिचारीभावों का स्वरूप ५५, रसप्रतीति का स्वरूप ५८, नाटक में रस प्रकर्ष ६४, नाटक का फल ६४, रसनिष्पत्ति को समझाने वाला भरत का दृष्टान्त ६५, रस किसलिए कहते हैं ? ६६, रस नाट्य है ६९, शोक रस-रूप कैसे बनता है ? ७०, रसोंमें से भाव और भावों में से रस १ ७०, रसों की उत्पत्ति ७३, रसाभास ७३, रसों का वर्ण ७५, रसों के देवता ७., शृंगाररस ७५, रति का स्वरूप ७६, शृंगार की दो अवस्थाएँ ७८, सम्भोगावस्था ७९, रसन-क्रिया झटितिप्रत्यय है ८०, सम्भोग-शृंगार के अनुभाव ८०, शृंगार के व्यभिचारीभाव ८२, करुण और विप्रलम्भ का भेद ८५, शृंगार का स्वरूप ८७, हास्य का लक्षण ८९, हास्य के विभाव ९०, हास्य के अनुभाव ९०, हास्य के दो प्रकार ९१, हास्य के छह भेद ९१, शान्तरस का लक्षण ९३, शान्तरस के विरुद्ध आपत्तियाँ ९४, शान्तरस का समर्थन ९५, शान्तरस का स्थायीभाव ९६, शान्तरस का नाम १०३, सभी रसों का शान्तप्राय आस्वाद १०७, शान्तरस का समर्थन १०७, शान्त के विभावादि १०८, डिम में शान्त का अनुल्लेख १०८, शान्त का आस्वाद १०९, रसों की संख्या १०९, वात्सल्यादि का अस्वीकार ११०, विभावादि की अलौकिकता ११०, काव्य का शब्द ११२, विततसाधारण्य ११५, चमत्कार ११७, आनन्द ११८, सन्दर्भ-ग्रन्थों की सूची १२१ । परिशिष्ट : भारतीय रस-विचार-रान्येरो नोली १२३-१३१ २-रसाभास : उसका स्वरूप और काव्य में स्थान १३२-१४९ ध्वन्यालोक में रसाभास १३२, अभिनव प्रदत्त इसकी स्पष्टता १३२, मम्मटका निरूपण १३३, इसकी चर्चा १३४, अनौचित्य की गणना १३५, अनौचित्य

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( २ ) के जगन्नाथ द्वारा स्वीकृत तीन प्रकार १३५, अनौचिंत्य विचार १३६, हेमचन्द्र का निरूपण १३७, विश्वनाथ का मत १३८, सुधासागर का निरूपण १२९, जगन्नाथ का मत ४०, रसासास की धारणा का विकास १४०, अनौचित्य के दो प्रकार १४१, अनौचित्य की जगन्नाथ द्वारा की गयी चर्चा १४१, जगन्नाथ द्वारा स्वीकृत अनौचित्य के तीन प्रकार १४२, चर्चा का सार १४२, रसाभास के विषय में श्री विष्णुप्रसाद १४३, श्री विष्णुप्रसाद के मत की समीक्षा १४ , रसाभास के बारे में श्री ज्योतीन्द्र दबे १४४, रसाभास के विषय में श्री डोलरराय मांकंड १४४, प्रकृति के अर्थ से सम्बद्ध गड़बड़ १४५, रसाभास के निरूपण का निषेध नहीं १४७, रसाभास हीन नहीं है १४९। रसाभास : थोड़ी चर्चा १५०-१५८ अनौचित्य-बोध कब होता है? १५०, रसाभास में अविध्ना संवित् १५२, काव्य में रसाभास का स्थान १५५, नीति के आग्रह से उत्पन्न गड़बड़ १५६। परिशिष्ट रसाभास १५९-१६१ ३ -- वक्रोक्ति अथवा कुन्तक का काव्य-विचार १६२-२०० भामह का काव्यालंकार १६२, काव्य-प्रयोजन और काव्य-हेतु १६२, शब्दार्थौ सहितौ काव्यम् १६२, वक्रता ही वाणी का सौन्दर्य १६३, वक्रोक्ति का अर्थ १६४, रीति अथवा मार्ग १६५, कुन्तक की विशेषता १६६, उसके ग्रन्थ का स्वरूप १६६, काव्य के प्रयोजन १६७, सालंकार ही काव्य १६७, काव्य की व्याख्या १६८, शब्दार्थो काव्यम् १६८, सहितौ १६९, शब्द १७०, रचना-प्रक्रिया १७२, अर्थ १७३, वक्रोक्ति १७५, साहित्य १७६, साहित्य की विस्तृत व्याख्या १७७, साहित्य का माहात्म्य १७७, वक्रता के छः प्रकार १७८, बन्ध १८०, हृद्विदाह्लादकारित्व १८१, मार्ग १८१, कवि- स्वभाव-भेद के आधार पर मार्ग-भेद १८२, सुकुमार मार्ग १८३, इसके चार गुण १८४, विचित्र मार्ग १८५, उसके चार गुण १८६, मध्यम मार्ग १८७, औचित्य १८८, सौभाग्य १८८, वस्तुवक्रता १९१, वाक्यवक्रता १९५, प्रकरण वक्रता १९७, प्रबन्धवक्रता १९८, उपसंहार १९८, सन्दर्भ-ग्रन्थ २००। ४ -- रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य विचार २०१-२२२ ग्रन्थ-परिचय २०१, काव्य-प्रयोजन २०३, काव्य की परिभाषा २०३, रमणीयता २०३, लोकोत्तरता २०४, पूर्ववर्ती आचार्यों की परिभाषाओं की चर्चा २०५, काव्य का कारण २०९, काव्य के चार प्रकार २१०, उत्तमोत्तम २१०, उत्तम २११, मध्यम २१२, अधम २१३, अधमाधम का अस्वीकार २१४, मम्मट के वर्गीकरण का विरोध २१४, ध्वनि के भेद २१४,

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रस स्वरूप २१५, नव रस, शान्त का समर्थन २१६, गुण-निरूपण २१७, भाव-निरूपण २१७, संलक्ष्यक्रमध्वनि २१८, अलंकार-निरूपण २१९, समापन २२०।

५-औचित्य-विचार २२३-२३७ क्षेमेन्द्र का औचित्य-विचार २२३, रस, मुण्आनन्दवर्द्धन का औनित्य-विचार २२५, रस, गुण और संघटना का सम्बन्ध २२५, वक्ता और वाच्य २२६, काव्य-भेद से संघटना-भेद २२७, प्रबन्ध में निर्वाहयोग्य अनौचित्य २२९, रति में अनौचित्य की आवश्यकता २३१, ऐतिहासिक और कल्पित वस्तु २३२, समापन २३७। ६ -- काव्य में अर्थ २३८-२५२ व्याकरण, न्याय, मीमांसा और काव्य २३८, पद-विचार २४०, वाक्यविचार २४१, महावाक्य २४२, वाक्यार्थ बोध २४ , शब्द की तीन वृत्तियाँ २४४, अभिधावृत्ति २४५, स्फोटवाद २४६, लक्षणावृत्ति २४७, व्यंजनावृत्ति २४८, लौकिक और अलौकिक व्यग्य २४८, रसादि ध्वनि ही मुख्य है २५०, व्यंग्यार्थबोध के लिए प्रतिभा आवश्यक २५०, सन्दर्भ-ग्रन्थ ५२२। परिशिष्ट : ठयंजना की स्थापना २५३-२५८

पद्यसूची २५९-२६२

नामानुक्रमणिका २६३-२७३

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अभिनव का रस-विचार

इस लेख का विषय है 'अभिनव का रस-विचार।' इसमें अभिनवगुप्त के रस- विषयक समस्त चिन्तन को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। अभिनवगुप्त ने स्वयं काव्यशास्त्र-विषयक कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं लिखा है, फिर भी हमारे देश में काव्य-चिन्तन के क्षेत्र में उनका अत्यन्त सहत्त्वपूर्ण स्थान है। रस- सम्बन्धी उनके विचार भरत के नाट्यशास्त्र पर उनकी लिखी वृत्ति 'अभिनव-भारती' में तथा काव्य-सम्बन्धी उनके विचार 'ध्वन्यालोक' पर उनकी लिखी टीका 'ध्वन्यालोक- लोचन' में उपलब्ध हैं। उनका समस्त चिन्तन प्रत्यभिज्ञा दर्शन पर आधारित है और उस दर्शन के विषय में उन्होंने कतिपय महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे। अतः विचारों की स्पष्टता के लिए यहाँ इन दो टीकाओं के अतिरिक्त उनके दर्शन-सम्बन्धी ग्रन्थों से भी आवश्यक उद्धरण लिये गये हैं। भरत के नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय में रस-निरूपण किया गया है। अतः छठे अध्याय पर उनकी व्याख्या ही रस-चर्चा के लिए सर्वाधिक विस्तृत और महत्त्वपूर्ण सामग्री है। इसमें उन्होंने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के मतों की चर्चा की है। तत्पश्रात् अपने मत की विस्तृत स्थापना की है। रस की यह सामान्य चर्चा भरत के रस-सूत्र की व्याख्या में आती है। भरत ने तो अपना रस-सूत्र अत्यन्त संक्षेप में ही प्रस्तुत किया है, परन्तु उस पर अभिनवगुप्त की व्याख्या ही भरत के रस-चिन्तन का उत्तमांश हुआ है। प्रथम तो भरत रस का सामान्य लक्षण देते हैं, बाद में विशिष्ट रसों के लक्षण देते हैं, अतः व्याख्या में भी वही क्रम स्वाभाविक है। इसके अलावा प्रथम व सप्तम अध्यायों में तथा अन्यत्र कुछ स्थानों पर भी, जहाँ प्रसंगतः रस की चर्चा आ जाती है, उन स्थानों पर प्रदर्शित विचारों को भी यहाँ यथासम्भव आकलित कर दिया गया है। जहाँ आवश्यक प्रतीत हुआ वहाँ अन्य आचार्यों के उद्धरण भी दिये गये हैं। भरत के नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में नाट्य की उत्पत्ति की कथा दी गयी है। द्वितीय अध्याय में प्रेक्षागृह-लक्षण दिये गये हैं। तृतीय अध्याय में रंग-देवता की पूजा-विधि का निर्देश है। चौथे अध्याय में नृत्य ताण्डव-लक्षण हैं और पंचम अध्याय में पूर्व रंग-विधि निर्दिष्ट है। तत्पश्रात् छठे अध्याय में रस का और सातवें अध्याय में भाव का निरूपण किया गया है।

नाट्य के अंग सब जानते हैं कि भरत की रस-सम्बन्धी चर्चा नाट्य-रस की चर्चा है। रस नाट्य का परम अर्थ है, अर्थात् नाट्य का पर्यवसान रस में होता है। नाट्य-प्रयोग सफल

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२ अभिनव का रस-विवेचन हो अर्थात् नाट्य का पर्यवसान रस में हो उसके लिए, अनेक वस्तुएँ जरूरी हैं और भरत ने एक संग्रह-श्लोक में इन सभी वस्तुओं को गिना दिया है : रसा भावा ह्यभिनया धर्मी वृत्तिः प्रवृत्तयः । सिद्धि: स्वरास्तथातोद्य' गानं रङ्गश्र संग्रहः ॥ १० ॥ अर्थात् रस, भाव, अभिनय, धर्मी, वृत्तियाँ, प्रवृत्तियाँ, सिद्धि, स्वर, आतोद्, गीत और रंगमंच-ये नाट्यशास्त्र के विषय हैं और उनका इसी क्रम में नाट्यशास्त्र में निरूपण किया गया है-केवल रंगमंच का निरूपण प्रारभ्भ में दूसरे अध्याय में किया गया है-इतना क्रम-भंग हुआ है। इसके पश्चात् भरत इन सब चीजों की नाम लेकर गणना करते हैं। प्रथम वे रसों को गिनाते हैं : आठ रस शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः । बीभत्साज्जुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसा: स्मृताः ॥ १५॥ श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत इस प्रकार आठ रस नाटक में इन्होंने स्वीकार किये हैं।

नाट्य-रस इस श्लोक की टीका में अभिनवगुप्त प्रथम 'नाट्य' क्या है-यह बतलाते हैं : नाट्य अर्थात् नट के अभिनय के प्रभाव से साक्षात्कृत और प्रेक्षकों के निश्चल अर्थात् एकाग्र मन द्वारा घनीकृत एवं अखण्ड स्वरूप में ग्राह्य, समस्त नाटकों व किन्हीं काव्य-विशेषों से प्रकट होने वाला अर्थ। यद्यपि इसके विभावादि अनेक अर्थ होते हैं, फिर भी उन सब जड़ विभावादि का संवित् में पर्यवसान होता है। यह संवित् तद् तद् पात्ररूप भोक्ता के साथ सम्बद्ध होती है; इस प्रकार नाटक में अनेक पात्रों की अनेक संवेदनाएँ होती हैं, फिर भी ये सब संवेदनाएँ प्रमुख पात्र में ही पर्यवसित हो जाती हैं और यह प्रमुख पात्र ही प्रधान भोक्ता होता है। वही नाटक का नायक और समस्त नाटक में सूत्ररूप से व्याप् उसकी स्थायी चित्तवृत्ति ही नाटक का एकमात्र अर्थ है। नाटक में प्रतीतिगम्य प्रधान पात्र की यह एक चित्तवृत्ति स्वकीय-परकीयता की सीमाओं से मुक्त होती है; क्योंकि वह गीत, वाद्य, नृत्य, गुण, अलंकारादि से सुशोभित व काव्य-महिमायुक्त नाट्य-प्रयोग की आश्रिता है। अर्थात् लौकिक चित्तवृत्ति का आश्रय कोई न कोई व्यक्ति हाता है, किन्तु नाट्य में अनुभूयमान इस चित्तवृत्ति का आश्रय गीत, नृत्य, काव्य आदि युक्त नाट्य-प्रयोग होता है, कोई व्यक्ति नहीं। इस प्रकार वह स्व-परभाव से अर्थात् व्यक्ति-सम्बन्ध से मुक्त होकर साधारणीभूत होती है, अतः वह अपने में सामाजिक को भी समाविष्ट कर लेती है और प्रयोग के साथ

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अभिनव का रस-विचार ३ उसका तादात्म्य साधित होता है। इस प्रकार प्रेक्षक का प्रयोग में अनुप्रवेश हो जाता है, वह भी उसका एक अपरिहार्य अंग बन जाता है और इसीलिए सत्ताईसवें अध्याय में प्रेक्षक का लक्षण निरूपित करते हुए कहा है कि : यस्तुष्टौ तुष्टिमायाति शोके शोकमुपैति च ॥ ६१॥ ऋ्रुद्: कोधे भये भीतः स श्रेष्ठः प्रेक्षकः स्मृतः। एवं भावानुकरणे यो यस्मिन्प्रविशेन्नरः ॥ ६२॥ स तत्र प्रेक्षको ज्ञेयो गुणैरेभिरलंकृतः ॥ना०शा० खं० ३, पृ० ३१३ अर्थात् जो सन्तोष का निरूपण होते देख कर सन्तोषानुभव करे, शोक में शोकानुभव करे, क्रोध में क्रोध अनुभव करे, भय में भय अनुभव करे उसे श्रेष्ठ प्रेक्षक, मानना चाहिए। इस प्रकार जिन-जिन भावों के अनुकरण के अवसर पर जो रसमय हो जाता हो उसे इन गुणों से युक्त प्रेक्षक मानना चाहिए। इस प्रकार नाट्य-प्रयोग का अवलोकन करते समय उसमें अभिव्यक्त होने वाली चित्तवृत्ति में प्रेक्षक का अनुप्रवेश हो सकता है, यही सिद्ध करता है कि यह चित्तवृत्ति लौकिक चित्तवृत्ति से भिन्न है। व्यवहार में अनुमान, शब्द-प्रमाण, योगि-प्रत्यक्ष आदि से हमें दूसरों की चित्तवृत्ति का जो ज्ञान होता है, वह तटस्थभाव से होता है। उसमें हमारा अनुप्रवेश होता नहीं है, परन्तु यहाँ इसके विपरीत ही होता है। और नाट्य से अभिव्यक्त होने वाली इस चित्तवृत्ति की प्रतीति प्रेक्षक को भी परिमित आत्मगतरूप में नहीं होती, अतः लौकिक प्रमदादि के कारण उत्पन्न होने वाले शोक-रति आदि की भाँति उसमें प्रेक्षक की निजी आसक्ति या तिरस्कार जैसी अन्य वृत्तियाँ भी नहीं जागतीं। अतः इस चित्तवृत्ति की प्रेक्षक को निर्विध्नरूप से प्रतीति होती है और इसलिए उसका मन उसमें विश्रान्ति अनुभव करता है। विश्रान्ति ही जिसका लक्षण है, ऐसी निर्विध्न संवेदना ही रसनाव्यापार है और इस रसनाव्यापार के द्वारा नाट्य से अभिव्यक्त चित्तवृत्तियों का ग्रहण होता है। अतः उसे 'रस' नाम दिया गया है। अतः रस ही नाट्य है। उसका फल भावक की प्रतिभा का विकास अथवा व्युत्पत्ति है।१ 'तत एव निर्विघ्नस्वसंवेदनात्मकविश्रान्तिलक्षणेन रसनापरपर्यायेण व्यापारेण ग्रृह्यमाणत्वाद् रसशब्देनाभिधीयते। तेन रस एव नाट्यम्। यस्य व्युत्पत्ति: फलमि- त्युच्यते।'-२६७। एक महारस यह रसना-व्यापाररूप रस एक ही है। इसीलिए भरत ने ३१ वें श्लोक के पश्चात् 'न हि रसाहते कश्चिदर्थः प्रवर्तते' में एकवचन का प्रयोग किया है। इस रस को अभिनव 'महारस' की संज्ञा देते हैं। और यह महारस ही विभावादि के भेद से १. लोचन में भी अभिनवगुप्त ने कहा है : 'यथा रामस्तथाहमित्युपमानातिरिक्तां रसास्वादोपायस्वप्रतिभाविजम्भारूपां व्युत्पत्तिमन्ते करोतीति कमुपालम्भामहे।'-पृ० १९०॥ 1 शवा स0 1उP। 3

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४ अभिनव का रस-विवेचन

भिन्न-भिन्न रसों के रूप में प्रतीत होता है। इस सम्बन्ध में मूल शब्दावली इस प्रकार है : -'ततश्र मुख्यभूतात् महारसात् स्फोटदृशीवासत्यानि वा अन्विताभिधानदशी- वोपायात्मकानि सत्यानि वा अभिहितान्वयददशीव तत्समुदायरूपाणि वा रसान्तराणि भागाभिनिवेशदृष्टानि रूप्यन्ते।'-इसमें यह कहा गया है कि एक ही महारस में से विभावादि के भेद से विविध रसों की प्रतीति होती है, इस बात को स्फोटवाद, अन्विताभिधानवाद, अभिहितान्वयवाद की दृष्टि से भी सिद्ध किया जा सकता है। हम जरा गहराई से इस पर विचार करें। T (१) स्फोटवादी मानते हैं कि पदस्फोट अथवा वाक्यस्फोट अखण्ड है। पद- स्फोट में वर्ण का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। इसी प्रकार वाक्यस्फोट में पद को स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। इस दृष्टि से देखें तो एक महारस का ही अस्तित्व है और भिन्न- भिन्न गौण रसों की स्थिति स्फोट के अवयवों की स्थिति की भाँति असत्य ही माननी पड़ेगी। : (२) अभिहितान्वयवाद ऐसा मानता है कि प्रथम हमें पद के अर्थ की प्रतीति होती है तदनन्तर आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि द्वारा उनके अन्वय का ज्ञान होने पर वाक्यार्थ का बोध होता है। इस प्रकार पदार्थ-बोध का समुदाय वाक्यार्थ हुआ। इसी प्रकार, काव्य-नाटक में अन्य सब रस पदार्थों की भाँति गोण होते हैं और वे सब मिल कर प्रधान रस का बोध कराते हैं। अर्थात् प्रधान रस सभी गौण रसों का समुदायरूप हाता है। (३ ) अन्विताभिधानवादी मानते हैं कि हमें वाक्य में स्थित पदों का अर्थ अन्वितरूप में ही प्रतीत होता है, अतः अन्वय के लिए अन्य किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार इस वाद के अनुसार पद के अर्थ की अलग सत्ता है, जो वाक्यार्थ बोध के उपाय के रूप में ही होती है। इसी प्रकार काव्य-नाटक में भी अन्य रसों की स्थिति महारस की प्रतीति के उपाय रूप में ही होती है। अतः अभिनवगुप्त कहते हैं कि मुख्यभूत महारस में से-(१) स्फोटवाद की दृष्टि से असत्य प्रतीत होने वाले, (२) अन्विताभिधान-वाद की दृष्टि से उपाय रूप में सत्ता रखने वाले और ( ३) अभिहितान्वयवाद की दृष्टि से अन्य रसों के समुदाय- रूप महारस के अंश रूप अन्य रस दिखायी देते हैं और इस प्रकार उनका निरूपण किया जाता है। इस प्रकार, नाट्य में रस ही मुख्य होने से प्रथम रस का निरूपण किया गया है। हम ऊपर देख चुके हैं कि भरत ने नाटक में आठ रस स्वीकार किये हैं, परन्तु अभिनवगुप्त शान्त के साथ नौ रसों का स्वीकार करते हैं। अतः कहते हैं कि रस नौ हैं। परन्तु जो शान्त-रस को स्वीकार नहीं करते वे यहाँ 'आठ' ऐसा पाठ स्वीकार करते

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अभिनव का रस-विचार ५

हैं। भरत में बारम्बार आठ रसों का उल्लेख आता है, परन्तु अभिनवगुप्त को तो नौ रस इष्ट हैं। अतः वे ऐसे सभी स्थानों पर नौ रसों की संगति बिठाने का प्रयत्न करते हैं। आगे भी कई प्रसंगों पर हम यह देखेंगे। रसों का क्रम इसके बाद इस बात का स्पष्टीकरण करते हुए कि भरत ने इन रसों का नाम अमुक क्रम में ही क्यों गिनाया है, अभिनवगुप्त कहते हैं कि इन सब रसों में काम सभी प्राणियों में सुलभ होता है, यह अत्यन्त परिचित है और वह सभी के लिए आह्लादकारी है, अतः शृंगार का नाम प्रथम लिया गया है। हास्य शृंगार का अनुगामी है, अर्थात् शरृंगार को हास्य उपकारक सिद्ध होता है। अतः शृंगार के बाद हास्य को रखा गया है। करुण निरपेक्षभाव वाला है और वह हास्य के विपरीत है। अतः हास्य के बाद करुण को स्थान दिया गया है। करुण के बाद उसके निमित्तरूप रौद्र को रखा गया है। वह अर्थ-प्रधान है। तत्पश्चात् काम और अर्थ धर्ममूलक होने के कारण धर्म-प्रधान वीर-रस को रखा गया है। इस बीर-रस का सार भयभीत को अभय- दान देना है। अतः उसके पश्चात् भयानक को रखा गया है। उसके तथा बीभत्स- रस के विभाव एक-से हैं, अतः भयानक के पश्चात् बीभत्स को रखा गया है। वीर का पर्यवसान अद्भुत में होता है। विस्मय यह वीर-रस का आक्षिप् फल है। अतः उसे बाद में बताया गया है। आगे अठारहवें अध्याय में मुनि कहेंगे कि नाटक के अन्त में सदैव अन्भुत-रस की योजना की जाय। (१८-४३)। इसके बाद प्रथम तीन पुरुषार्थ के साधनभूत प्रवृत्तिधर्म के विपरीत निवृत्तिधर्मरूप मोक्ष के फल वाला शांत-रस आता है। उसमें आत्मा का प्रवेश हो सकने के कारण इस रस की चर्वणा सम्भव होती है। स्थायीभाव रस का अनुभव विभावादि के कारण होता है। अतः रस के बाद भावों को गिनाया गया है। प्रथम भरत स्थायीभाव बतलाते हैं : रतिर्हासश्र शोकश्र क्रोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयश्रेति स्थायिभावा प्रकीर्तिताः॥। १७ ॥ अर्थात् रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा और विस्मय-ये स्थायीभाव कहलाते हैं। इस विषय में अभिनवगुप्त कहते हैं कि लौकिक रत्यादि चित्तवृत्तियों के ज्ञान के बिना कवि अथवा नट तत्सम्बन्धी विशिष्ट विभावादि का निरूपण नहीं कर सकता है, अतः रस के बाद तुरन्त ही स्थायीभावों का निर्देश किया गया है। ऊपरी कारिका में कुछ लोग 'विस्मयश्चेति' के स्थान पर 'विस्मयशमाः' ऐसा पाठ ग्रहण करते हैं और उसका अर्थ करते हैं कि शम शान्त का स्थायीभाव है। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि उत्साह शान्त-रस का स्थायीभाव है। कुछ जुगुप्सा को शान्त का स्थायीभाव

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६ अभिनव का रस-विवेचन

मानते हैं तो कुछ कहते हैं कि सभी स्थायीभाव शान्त-रस के ही स्थायीभाव हैं, परन्तु तत्त्वज्ञानजनित निर्वेद शान्त-रस का स्थायीभाव है। इसीलिए ही निर्वेद स्थायी और व्यभिचारी दोनों होने पर अमंगल होने पर भी व्यभिचारियों में उसको प्रथम स्थान पर रखा गया है तथा इसीलिए ही स्थायीभावों की संख्या का निर्देश नहीं किया गया है ऐसा कुछ कहते हैं। इसीलिए ये स्थायीभाव अन्य रसों में व्यभिचारी भी बन जाते हैं। इस बात का विस्तार हम आगे करेंगे। तैंतीस व्यभिचारीभाव तत्पश्चात् भरत तैंतीस व्यभिचारीभावों का उल्लेख करते हैं : निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, दैन्य, चिन्ता, मोह, स्मृति, धृति, ब्रीड़ा, चपलता, हर्ष, आवेग, जड़ता, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, सुप्, विबोध, अमर्ष, अवहित्थ, उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, त्रास, वितर्क-इन तैंतीस भावों को नाम लेकर बताया है-इन्हें व्यभिचारी जानिए। (१८-२१) इनके विषय में अभिनवगुप्त कहते हैं कि ये व्यभिचारीभाव हैं, इतने ही व्यभिचारीभाव हैं, यों दोनों रीतियों से अर्थ को नियन्त्रित करने के लिए 'तैंतीस' संख्या का निर्देश किया है। सात्त्विकभाव सात्त्विकभाव व्यभिचारी होते हैं और अभिनय में भी इनका समावेश होता है अर्थात् इन्हें अभिनयों से भिन्न बताया गया है। इनका आधार अभिनय पर होने से व्यभिचारीभावों के तुरन्त बाद सात्विक भाव गिनाये गये हैं। (२१) भरत ने स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभङ्ग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय-आठ सात्त्विक भाव बताये हैं। (२२) इसके बाद भरत ने चार प्रकार के अभिनय बताये हैं : आङ्गिक, वाचिक, आहार्य और सात्त्विक-ये चार नाटक में अभिनय के भेद मानिए। (२३) इन्हें समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि 'ये चार' इस पद द्वारा आहार्य अर्थात् धनुष, मुकुट आदि भी नाटक के वस्तु को प्रत्यक्ष करने में उपयोगी होने से उनकी अन्तर्भुक्तता का संकेत किया गया है। 'नाट्य में' कहने का तात्पर्य यह है कि लोक में तो गृहीत होने से अभिनयों का उपयोग न भी होता हो परन्तु नाट्य में तो ये प्राणस्वरूप होते हैं, अतः रस और भाव के बाद तुरन्त उनका उल्लेख किया गया है। धर्मी अभिनय लौकिक धर्म का तथा तजन्य एवं तदुपयोगी सामयिक (सांकेतिक) धर्म का अनुसरण करते हैं, अतः उनके बाद धर्मी का निरूपण किया गया है। भरत ने लोकधर्मी एवं नाट्यधर्मी-यों दो प्रकार के धर्मी बतलाये हैं। (२४)

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अभिनव का रस-विचार ७

क्वचित् नाटक में पुरुष स्त्री का और स्त्री पुरुष का अभिनय करती है। ऐसा केवल नाटक में ही बनता है। अतः इसे नाट्यधर्मी अभिनय कहते हैं। जहाँ पुरुष पुरुष का और स्त्री स्त्री का अभिनय करती है वहाँ लोकधर्मी अभिनय माना जायेगा। व्यवहार में जो चेष्टाएँ सामान्यतः होती हैं, वे जब अभिनय में प्रयुक्त होती हैं तब वे लोकधर्मी कहलाती हैं। परन्तु इनके सिवाय कुछ चेष्टाएँ जो केवल सौन्दर्य साधने के लिए अथवा समय के कारण प्रयोजित होती हैं, जैसे कि पात्र सुन्दर दिखायी देने के लिए, स्टेज पर अमुक प्रकार से हिलते-डुलते हों या दूसरे लोग नहीं सुन रहे हैं ऐसा संकेतित कराने के लिए दो उँगलियाँ ऊँची करके बोलते हों यह सब नाट्यधर्मी कहलाता है। वृत्ति और प्रवृत्ति इसके बाद भरत ने भारती, सात्वती और कैशिकी तथा आरभटी-ये चार वृत्तियाँ बतायी हैं और यह कहा है कि नाटक उन पर आधारित है। (२४) इनकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि अभिनेतव्य के अभाव में अभिनय सम्भव नहीं है और दस प्रकार के रूपकों से सम्बद्ध होने के कारण उसकी उपकारक होने से वृत्तियाँ कही गयी हैं। दो-तीन या पाँच संख्या का निराकरण करने के लिए चार कही गयी हैं। इसके बाद भरत ने पाँच प्रवृत्तियाँ कही हैं : आवन्ती, दाक्षिणात्या, औड्रमागधी, पाञ्चाली और मध्यमा। (२५-२६) वृत्ति अर्थात् मन, वाणी एवं काया का व्यापार। यह वृत्ति भिन्न-भिन्न देशों के वेश, भाषा, आचार आदि के माध्यम से ही प्रकट होती है। वृत्ति को प्रकट करने वाली है-प्रवृत्ति। सिद्धि, स्वर एवं वाद्य इसके पश्चात् भरत ने दैवी और मनुषी यों दो प्रकार की सिद्धियाँ बतायी हैं (२६)। तदनन्तर शरीर से तथा वेणु-वीणा आदि के माध्यम से उत्पन्न होने वाले सात स्वर बताये गये हैं-षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद' (२७)। और फिर चार प्रकार के वाद्यों को गिनाया है : (१) वीणा, सितार जैसे तन्तु-वाद्य, (२) ढोल, तबले जैसे चमड़े से मढ़े आनद्ध; (३ ) ठोस घण्टा, घड़ियाल (पखावज) जैसे घन और (४ ) वेणु, मुरली जैसे छन्द वाले सुषिर। (२७-९) १. स्वरों का विवरण इस प्रकार है : षड्ज मयूर का, ऋषभ गाय एवं बैल का, गान्धार बकरों आदि का, मध्यम क्रौंच का, पञ्चम कोकिल का, धैवत घोड़े का, निषाद हाथी का। नारद ने कहा है कि : षड्जं रौति मयूरस्तु गावो नर्दन्ति चर्षभम्। अजाविकौ तु गान्धारं क्रौञ्चो नर्दति मध्यमम् ॥१॥ पुष्पसाधारणे काले कोकिलो रौति पञ्चमम्। अश्वस्तु धैवतं रौति निषादं रौति कुज़रः॥२॥

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८ अभिनव का रस-विवेचन

गान फिर गान के पाँच प्रकार भरत ने बताये हैं : (१) प्रवेशक, (२) आक्षेपक, (३ ) निष्क्रामक, (४) प्रासादिक और (५) आन्तर-इस प्रकार पाँच प्रकार के ध्रुव वाले गान होते हैं। (२९-३०) इसे स्पष्ट करते हुए अभिनव गुप्त कहते हैं कि पात्र के प्रवेश के समय भाव, प्रकृति, अवस्था आदि को प्रकट करने वाला गान प्रवेशक कहलाता है। प्रविष्ट पात्र की अन्तर्गत चित्तवृत्तियों का परिचय सामाजिक को कराने वाला गान प्रासादिक गान है। अन्य रस का सूचक गान आक्षेपक गान कहलाता है। पात्रों के हलन-चलन, गति, परिक्रमण आदि के समय गाया जाने वाला गान आन्तर गान है। पात्र के निष्क्रमण के समय गाया जाने वाला गान निष्क्रामक गान कहलाता है। प्रवेश आदि शब्द उपचार से गीत को लागू किये गये हैं। गीत के आधारभूत नियत पद-समूह को ध्रुव कहते हैं। उससे सम्बद्ध होने से, उसकी प्रधानता वाले गीत को सामान्य संगीत से अलग कर दिया गया है। रङ्ग-मण्डप इसके बाद भरत ने चतुरस्र (चौकोर), विष्कृष्ट (लम्ब चतुष्कोण), त्र्यस्त् (त्रिकोणाकार)-तीन प्रकार के रङ्ग-मण्डप बताये हैं। नाट्याड्गों की सङ्गति भरत द्वारा निर्दिष्ट ११ नाट्याड्गों की सङ्गति इस प्रकार देखी जा सकती है। रस ही नाट्य है। अतः रसों को प्रथम स्थान दिया गया है। उसकी निष्पत्ति विभावादिकों से होती है अतः भावों का स्वरूप भी बताना पड़ेगा। नाट्य-लेखन के समय पर अथवा नाट्य-प्रयोग के समय कवि अथवा नट को प्रेक्षकों के समक्ष जिन विभावादि को प्रस्तुत करना होता है, उनमें औचित्य आवश्यक है। इस औचित्य का निर्वाह तभी हो सकता है, जब कवि को या नट को लौकिक चित्तवृत्तियों का ज्ञान हो। अतः लौकिक स्थायीभाव का निरूपण भी करना पड़ता है। अभिनय तो नाट्य का प्राण है। उसकी योजना तो नाट्य में ही होती है। लौकिक-व्यवहार में उसका उपयोग होता नहीं है। अतः रस और भाव के पश्चात् अभिनय का उल्लेख किया है। यद्यपि अभिनय कृत्रिम ही होता है, किन्तु उसका आधार लौकिक धर्म अथवा लौकिक धर्म के आधार पर उपस्थित संकेत होता है। उन संकेतों का अनुकरण कर ही अभिनय चलता है। अतः अभिनय के बाद लोकधर्मी एवं नाट्यधर्मी की चर्चा अपेक्षित है। इस लोकधर्मी का अनुसरण करने वाले अभिनय के लिए कुछ न कुछ अभिनेय भी आवश्यक होता है। तदर्थ वृत्तियों को लाना पड़ेगा। वृत्ति अर्थात् मन, वाणी और काया का व्यापार। उसी का अभिनय करना होता है। परन्तु यह वृत्ति देश-भेद से अलग-अलग वेष, भाषा, आचार आदि प्रवृत्तियों के द्वारा प्रकट होती है, इसलिए प्रवृत्तियों का ज्ञान आवश्यक हो जाता है। इन सबका पर्यवसान प्रयोगसिद्धि में होना

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चाहिए। अतः सिद्धि का विवेचन भी आवश्यक है और इस समस्त नाट्य-प्रयोग को उठाव दे देने के लिए स्वर, गान, वाद्य आदि की तथा पात्रों के व्यवहार व दृश्यों के लिए रङ्गमञ्न की भी आवश्यकता होती है, अतः रङ्गमञ्च का विवेचन भी अपेक्षित है। इस प्रकार नाटक में आवश्यक वस्तुओं की गणना कराने के बाद रसों की व्याख्या की प्रस्तावना के रूप में कहते हैं कि रस के बिना कोई भी अर्थ प्रवृत्त नहीं हो सकता है। 'न हि रसाहते कश्चिदर्थः प्रवर्तते।'

रस का प्राधान्य इसे समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि यदि कोई यह प्रश्न करे कि पहले रस की परिभाषा ही क्यों दी ? तो उसके निराकरण के लिए यहाँ इस क्रम का एक अन्य कारण दिया गया है और वह इस प्रकार है : एक तो यह कि रस के बिना विभावादि अर्थ व्याख्येयरूप में बुद्धिगम्य हो ही नहीं सकता और रस के बिना नाट्य का जो प्रयोजन-आनन्दपूर्वक व्युत्पत्ति देना-भी सिद्ध नहीं हो सकता। तीसरा यह कि रस के प्रति आदर वाले तथा जिनका चित्त रसात्मक प्रतीति में ही एक घन विश्रान्ति अनुभव करते हैं, ऐसे सामाजिक भाव आदि अन्य अर्थों को रस के बिना स्पष्टतः समझ नहीं पाते; क्योंकि विभाव, अनुभाव वगैरह सभी जड़ वस्तुओं की प्रतीति का जिसे सहयोग प्राप्त है ऐसी स्थायीभाव-संज्ञक चित्तवृत्ति में अन्तर्भुक्त होकर ही विभावादि की प्रतीति हो सकती है। मतलब यह कि रस के बिना विभावादि की भी सार्थकता नहीं है। इस प्रकार व्याख्याकार, नट और सामाजिक के विचार से रस ही मुख्य है, अतः उसका ही पहले उल्लेख किया है और उसी के लक्षण आदि प्रथम दिये जाने चाहिए ऐसा यहाँ तात्पर्य है। प्रथम 'रसाः' बहुवचन में प्रयुक्त किया था और बाद में 'रस' एकवचन में क्यों प्रयुक्त किया? यदि कोई ऐसा प्रश्न करे तो उसका उत्तर देते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि-वस्तुतः तो नाटक में एक ही रस सूत्ररूप में दृष्टिगत होता है। उसके अंग- रूप में ही दूसरे रसों का विभाजन किया जाता है। उस मुख्य रस के विभागरूप अन्य रस भी उस प्रधान रस के मुखापेक्षी अर्थात् आश्रित होकर रहने के सिवा अन्य किसी प्रकार रह सकते नहीं हैं। यह हम उद्देश्य की चर्चा करते समय कह चुके हैं और आगे भी उसका विस्तार करेंगे।

रस-सूत्र इस प्रकार रस का स्थान पहले रखने का कारण समझाने के बाद रस से सम्बन्धित सूत्र-लक्षण-सूत्र कहते हैं-'तत्र विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः ।' अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। [देखिए टिप्पणी १ ]

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१० अभिनव का रस-विवेचन

: भरत ने स्वयं इस सूत्र की कोई विस्तृत व्याख्या नहीं की है। अतः विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के संयोग का अर्थ क्या, और रस की निष्पत्ति का अर्थ क्या इसके सम्बन्ध में परवर्ती आचार्यों ने भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। यहाँ अभिनवगुप्त अपने पूर्ववर्ती तीन आचार्यों की व्याख्या की चर्चा करते हैं और पश्चात् अपने मत की स्थापना करते हैं। वे कहते हैं- लोल्लट का मत इस सूत्र का अर्थ भट्ट लोल्लटादि इस प्रकार करते हैं : यहाँ संयोग अर्थात् स्थायीभाव का विभावादि के साथ संयोग, ऐसा अर्थ है। यह संयोग होने पर रस- निष्पत्ति होती है। विभाव स्थायी चित्तवृत्ति की उत्पत्ति में कारणभूत हैं। भरत के सूत्र में जो अनुभाव कहे गये हैं वे रसजन्य अनुभाव नहीं हैं; क्योंकि उन्हें अनुभाव मान लेने के बाद उन्हें रस के कारण नहीं माने जा सकते, परन्तु ये तो भावों के अनुभाव हैं।१ व्यमिचारीभाव भी चित्तवृत्तिरूप हैं, और स्थायीभाव भी चित्तवृत्ति- रूप हैं। ये दोनों चित्तवृत्तियाँ एक साथ चित्त में रह नहीं पातीं। अतः यहाँ स्थायी- भाव का वासनात्मक रूप ही अभिप्रेत (इष्ट) मानना चाहिए।२ भरत द्वारा दिये गये उदाहरण में भी कतिपय व्यजन स्थायीभाव की भाँति वासनारूप में स्थित होते हैं। शेष व्यभिचारी की भाँति प्रकटरूप में होते हैं। इस प्रकार विभावादि से उपचित हुआ स्थायी ही रस है। अनुपचित अवस्था में जब वह होता है, तब वह स्थायी कहलाता है। वह दोनों में रहा होता है। मुख्यवृत्ति से वह रामादि-अनुकार्य में रहा होता है और रामादि के रूपानुसन्धान के बल से अनुकर्ता नट में भी प्रतीत होता है।

१. रस भी भावक में कुछ प्रभाव उपस्थित करता है। भय से वह बड़बड़ाने लगता है, या उसे रोमांच होने लगता है। इन अनुभावों को रस का कारण नहीं माना जा सकता। रस के कारण तो स्थायीभाव के अनुभाव ही हो सकते हैं। दासगुप्ता यहाँ दूसरे ढंग से अर्थ करते हैं। २. यह एक सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है कि दो चित्तवृत्तियाँ चित्त में एक साथ उद्भूत हो नहीं सकतीं। इस का विरोध टालने के लिए भट्ट लोल्लट कहते हैं कि स्थायीभाव चित्त में सुप्त अवस्था में वासना या संस्कार के रूप मैं रहा होता है। संस्कार अर्थात् चित्त में अज्ञात रूप से अननुभूत पदार्थों की छाप। ज्ञान, भावना और कार्य-विषयक हमारे सभी अनुभव अर्धमग्नावस्था में रहते हैं। अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर स्मृतिरूप में उसे पुनः ताजा किया जा सकता है। वासना शब्द बाद में आया प्रतीत होता है (योग-सूत्र ४-२४)। यह शब्द वस्-धातु (रहने के अर्थ में) से निष्पन्न लगता है। यह कई बार संस्कार के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है और व्यारु-भाष्य में (४,९) इन दोनों को एक ही माना गया है। परन्तु सामान्यतः 'वासना' पूर्वजन्म की वृत्तियों के लिए प्रयुक्त होता है। इनमें से बहुत-सी चित्त में मग्नावस्था में रही होती है। जिसे अनुकूलता प्राप्त हो वही इस जीवन में प्रकट होता है। परन्तु संस्कार तो अनुभव द्वारा निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं; जब कि वासना तो पूर्वजन्म में प्राप्त किये गये संस्कार हैं। दासगुप्ता : 'हिस्टरी ऑव इण्डियन फिलोसोफी' खंड १, पृ० २६३ ।

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अभिनव का रस-विचार ११

'तेन स्थाय्येव विभावानुभावादिभिरुपचितो रसः । स्थायी भवत्वनुपचितः । स चोभयोरपि। मुख्यया वृत्या रामादौ अनुकार्येऽनुकर्तर्यपि चानुसन्धानवलात्-इति।' पृ० २७२/ इसका सारांश यह है कि भट्ट लोल्लट के मतानुसार स्थायीभाव के साथ विभावादि का संयोग होने पर रसनिष्पत्ति होती है और वह मुख्य वृत्ति से रामादि अनुकार्य में तथा रूपानुसन्धान के बल से अनुकर्ता नट में भी प्रतीत होता है। रस अर्थात् विभावादि से उपचित हुआ स्थायी। इतना कहकर फिर जोड़ दिया कि प्राचीनों का भी यही मत है और दण्डी के काव्यादर्श में से दो उद्धरण दे दिये हैं-'रतिः शृङ्गारतां गता, रूपबाहुल्ययोगेन।' (काव्यादर्श, २-२८१) अर्थात् रूपबाहुल्य के कारण अर्थात् दूसरे तत्त्वों से परिपुष्ट रति श्रृंगारता को प्राप्त होती है। 'अधिरुह्य परां कोटिं कोपो रौद्रात्मतां गतः।' (काव्यादर्श, २-२८३) अर्थात् परा कोटि को पहुँचते ही क्रोध रौद्र-रस बन जाता है। आदि ·. जैसा कि ऊपर बता चुके हैं, रस-सूत्र के अर्थघटन में दो शब्द महत्त्वपूर्ण हैं- 'संयोग' और 'निष्पत्ति'। ऊपर दी गयी व्याख्या में इन दोनों के विषय में सन्तोषप्रद स्पष्टीकरण मिलता नहीं है। अतः हम मम्मट की सहायता से इसे समझने का प्रयत्न करें-मम्मट ने काव्य-प्रकाश में लोल्लट का भत इस प्रकार उद्धृत किया है : 'विभावैर्ललनोद्यानादि भिरालम्बनोद्दीपनकारणैः रत्यादिको भावो जनितः, अनुभावैः कटाक्षभुजाक्षेपप्रभृतिभिः कार्यैः प्रतीतियोग्यः कृतः, व्यभिचारिमिर्निर्वेदादिभिः सहकारिभिरुपचितो, मुख्यया वृत्या रामादावनुकार्ये तद्रपतानुसन्धानान्नर्तकेऽपि प्रतीयमानो रसः इति भट्ट लोल्लट प्रभृतयः । (पृ० ८७ ) अर्थात् विभावों से अर्थात् ललनादि आलम्बन कारणों से और उद्यानादि उद्दीपन कारणों से रत्यादिभाव उत्पन्न होता है, अनुभावों से अर्थात् कटाक्ष और भुजोत्क्षेप आदि कार्यों से प्रतीतियोग्य बनता है, व्यभिचारियों से अर्थात् निर्वेद आदि सहकारियों से उपचित अर्थात् पुष्ट होता है, वह साक्षात् रूप में रामादि अनुकार्य में होने पर भी उसके रूपानुसन्धान-बल से नट में भी प्रतीत होता है तब रस कहलाता है, ऐसा भट्ट लोल्लट आदि का मत है।

इसे स्पष्ट करते हुए 'प्रदीप' टीका में गोविंद ने कहा है कि स्थायी के साथ विभाव के उत्पाद्य-उत्पादक सम्बन्ध से और व्यभिचारी के पोष्य-पोषकभाव के सम्बन्ध से रस की निष्पत्ति अर्थात् उत्पत्ति, अभिव्यक्ति और पुष्टि होती है, ऐसा अर्थ होता है। अर्थात् लोल्लट के मतानुसार भरत के सूत्र में स्थित 'निष्पत्ति' शब्द का अर्थ उत्पत्ति, अभिव्यक्ति और पुष्टि-तीनों का समावेश कर लेता है। रस मुख्यतया रामादि अनुकार्य

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१२ अभिनव का रस-विवेचन

में स्थित हैं, नट में तो समानरूपता के अनुसन्धान से उसका आरोपण होता है और वही सामाजिकों के साश्चर्यानुभव अर्थात् चमत्कार का कारण बन जाता है।१ लोल्लट के मत की अभिनवगुप्त द्वारा की गयी चर्चा :- अभिनवगुप्त ने 'लोचन' में बिना नाम दिये लोल्लट के मत की चर्चा की है-उसे यहाँ हम देखें-यह अंश इस प्रकार है : "पूर्वावस्था में जो स्थायी होता है, वही व्यभिचारी द्वारा परिपुष्ट होकर रसरूप में आस्वाद्य होता है और वह अनुकार्यगत होता है। नाट्य में वह प्रयुक्त होता है, अतः उसे नाट्य-रस कहते हैं-ऐसा कुछ लोगों का मत है। स्थायीभाव तो एक प्रकार की चित्तवृत्ति है। चित्तवृत्तियाँ सदैव प्रवहमान होती हैं। तो फिर एक चित्तवृत्ति का दूसरी चित्तवृत्ति द्वारा परिपोषण कैसे हो सकता है ? और आप यह भी नहीं कह सकते कि एक ही चित्तवृत्ति सदैव बहती रहे अतः कालान्तर में वह परिपुष्ट होती है। कारण यह कि हम देखते हैं कि विस्मय, शोक, क्रोध वगैरह चित्तवृत्तियाँ उदय-काल में जितनी तीव्र होती हैं उतनी ही तीव्र हमेशा नहीं रहतीं, बल्कि ज्यों-ज्यों समय बीतता है त्यों-त्यों मन्द होती जाती हैं। अतः उनका परिपोष नहीं हो सकता। अतः यह कहना उचित नहीं कि अनुकार्य रामादि में रस उत्पन्न होता है। "और यह रस अनुकर्ता नट में होता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि नट में यदि उसकी अपनी ही चित्तवृत्ति का परिपोष हुआ तो वह नाटक में लयादि (जिसकी रक्षा करनी होती है) की रक्षा नहीं कर सकता। (नट में अपने आपमें ही यदि भाव उत्पन्न हो तो केवल लयादि का भंग ही नहीं क्वचित् मूर्च्छा आदि या क्वचित् मरण तक की स्थिति पैदा होगी। इस सीमा तक उसे भ्रम होने लगता है, ऐसा अभिनवगुप्त ने अभिनव-भारती में उद्धृत किया है, ऐसा श्री देशपाण्डे कहते हैं) इसी प्रकार सामाजिक में भी ऐसा परिपोष होता है, ऐसा भी माना नहीं जा सकता। कारण यह कि सामाजिक में यदि अपनी निजी चित्तवृत्ति उत्पन्न हुई और उसका उपचय हुआ तो वह नाटक का आनन्द ही कैसे ले सकता है ? यह तो रसानुभूति में बड़ा विघ्न है। यही नहीं, करुणादि रसों में उसे दुःख का ही अनुभव होगा। अनुकार्य, अनुकर्ता या सामाजिक किसी की भी दृष्टि से इस उत्पत्ति और परिपोष की बात स्वीकार नहीं की जा सकती।" (पृ० १८४-५) लोल्लट के मत की शंकुक द्वारा की गयी समीक्षा :- लोल्लट के परवर्ती आचार्य १. इस प्रकार भट्ट लोल्लट का मत समझाने के बाद गोविन्द कहते हैं कि "यह ठीक नहीं है। क्योंकि (१) सामाजिक में यदि उसका अभाव हो तो उसे चमत्कारानुभूति कैसे हो सकती है ? (२ ) और ऐसा ज्ञान केवल चमत्कारिक हो नहीं सकता; क्योंकि यदि ऐसा होता मान लें तो ऐसा मानना पड़ेगा कि शब्द-ज्ञान से भी चमत्कार होता है और लौकिक शृंगारादि के दर्शन से भी चमत्कारानुभूति होती है। यह स्वीकार करना पड़ेगा। (३) अनुभावों के ज्ञान के बल पर होने वाले आरोप को साक्षात्कार नहीं समझना चाहिए; क्योंकि चन्दन जिसे लगाया जाता है, उसे ही उसका सुख मिलता है, अन्य किसी को नहीं। (४) इसे अन्य किसी रीति से भी समझाया नहीं जा सकता; क्योंकि प्रमाण का ही अभाव है।"

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अभिनव का रस-विचार १३

शंकुक ने लोल्लट के मत पर सात आपत्तियाँ उठायीं। वे कहते हैं कि यह मत ठीक नहीं है; क्योंकि" .. (१) विभावादि के संयोग के बिना स्थायी का ज्ञान होना ही सम्भव नहीं है। जिस प्रकार बिना धुएँ के पर्वत पर के अग्नि का ज्ञान होना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार स्थायी के ज्ञान के लिए कारणभूत विभावादि लिंगों के बिना स्थायी का ज्ञान होना सम्भव नहीं है। (२) यदि लोल्लट के कथनानुसार रस के पहले स्थायीभाव का अस्तित्व स्वीकार करें तो भरत को चाहिए था कि वे पहले स्थायीभाव का निरूपण करते और पश्चात् रसों का निरूपण करते, परन्तु उन्होंने उसके विपरीत ही किया है। उन्होंने छठे अध्याय में रसों का और बाद में सातवें अध्याय में भावों का निरूपण किया है। यह दूसरी आपत्ति हेमचन्द्र में ईषत् भिन्न रीति से प्रस्तुत की गयी है। वहाँ यह कहा गया है कि यदि ऐसा मान लें कि भाव स्वयं अपने-आप उत्पन्न होते हैं, विभावों से व्यंजित होते हैं, अनुभावों से पुष्ट होते हैं और व्यभिचारी के साथ संयोग से रसत्व प्राप्त करते हैं, तो प्रथम स्थायीभावों के उद्देश्य-लक्षण कहे जाने चाहिए, परन्तु भरत ने ऐसा किया नहीं है। उन्होंने पहले रसों के उद्देश्य-लक्षण कहे हैं। (३) यदि रस केवल उपचित स्थायीभाव ही है तो भरत को रस के और स्थायीभाव के-दो प्रकार के विभावों की दो बार गणना कराने की आवश्यकता नहीं थी। (४) उपचित स्थायीभाव ही रस है, ऐसा स्वीकार कर चलें तो प्रत्येक स्थायी- भाव की उपचय की मात्रानुसार मन्द, मन्दतर, मन्दतम, माध्यस्थ आदि अनन्त श्रेणियाँ स्वीकार करनी पड़ेंगी। (५ ) हास्य के छ प्रकार ही नहीं रहेंगे। अनन्त प्रकार मानने पड़ेंगे। (६) उसी कारण से काम की दश दशाओं में भी असंख्य रसभाव मानने का अवसर उपस्थित होगा। (७) स्थायीभाव का उपचय रस, ऐसा मानें तो शोक प्रारम्भ में तीव्र होता है और कालक्रम से वह कम होता जाता है। इसी प्रकार क्रोध, उत्साह, रति इत्यादि में अमर्ष, स्थैर्य और सेवा जैसी परिपोषक सामग्री न हो तो घटाव होने लगता दिखायी देता है, अतः उन सब स्थायीभावों का उपचय नहीं अपचय होता प्रतीत होता है। अतः स्थायीभाव उपचित होता है तभी रस बनता है, यह बात स्वीकार की नहीं जा सकती। परवर्ती आचार्यों ने इस उत्पत्तिवाद का अधिक तात्विक भूमि पर विरोध किया है। उनका कहना यह है कि विभावादि यदि रस के निमित्त कारण माने जायँ

१. देखिये आगे हास्य-रस में। २. ,, आगे श्रृंगार-रस में।

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१४ अभिनव का रस-विवेचन

तो कारण के नष्ट होने पर भी कार्य बना रहना चाहिए। जिस प्रकार कुम्हार के मर जाने पर मटका मिट नहीं जाता, परन्तु रस तो विभावादि हों तब तक ही होते हैं; हम विभावादि को रस का ज्ञापक कारण भी नहीं मान सकते; क्योंकि तब तो यह मानना पड़ेगा कि रस तो पहले से सिद्धरूप में था और विभावादि ने उसका ज्ञान कराया, परन्तु रस कहीं पहले से सिद्ध होता ही नहीं है और फिर कार्य और कारण एक कालवर्ती नहीं हो सकते। चन्दन का लेप लगाने पर शीतलता का अनुभव होता है। दोनों अनुभव चाहे कितने ही क्षिप्र क्यों न हों, उनमें पूर्वापर क्रम होता ही है; परन्तु रसानुभव में तो विभावादि का ज्ञान भी होता ही है। इस सबसे सिद्ध होता है कि विभावादि और रस के बीच कार्यकारण-सम्बन्ध हो ही नहीं सकता अर्थात् यह मत अस्वीकार्य है कि विभावादि से रस की उत्पत्ति होती है। श्री शंकुक का मत भट्ट लोल्लट के मत का खण्डन करने के उपरान्त श्री शंकुक अपना मत इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं : 'तस्मात् हेतुभिर्विभावाख्यैः, कायैरनुभावात्मभिः सहचारिरूपैश्र व्यभिचारिभि; प्रयत्नार्जिततया कृत्रिमैरपि तथानभिमन्यमानैः अनुकर्तृस्थत्वेन लिङ्गबलतः प्रतीयमानः स्थायीभावो मुख्यरामादिगतस्थाय्यनुकरणरूपः। अनुकरणरूपत्वादेव च नामान्तरेण व्यपदिष्टो रसः । (पृ० २७२ ) अर्थात् "इसलिए, विभाव की संज्ञा से पहचाने जाने वाले कारणों से अनुभावरूप कार्यों से, सहचारीरूप व्यभिचारियों से, लिंगबल से अनुकर्ता नट में प्रतीत होने वाला स्थायीभाव मुख्य रामादि के स्थायीभाव की अनुकृतिरूप होता है। यह कार्य, कारण और सहचारी नट के द्वारा प्रयत्नपूर्वक सिद्ध किये गये होने से कृत्रिम होते हैं, किन्तु सामाजिकों को ये कृत्रिम प्रतीत नहीं होते। इस प्रकार नट में प्रतीत होने वाला स्थायीभाव अनुकरणरूप होता है, अतः वह स्थायीभाव के नाम से न पहचाना जाकर 'रस' ऐसे अपर नाम से पहचाना जाता है।" इसका अर्थ यह हुआ कि नाटक में हम जो विभावादि देखते हैं, वे कृत्रिम होने पर भी, नट द्वारा सिद्ध यत्नपूर्वक कौशल के बल पर किये गये अभिनय के कारण हमें कृत्रिम नहीं प्रतीत होते, किन्तु इन विभावादिरूप कारण, कार्य एवं सहचारियों की सहायता से हम नट में स्थायी का अनुमान करते हैं। नट में इस प्रकार अनुमित किया गया स्थायी मूल रामादि के स्थायी के अनुकरणरूप होता है और इसलिए इसे स्थायी न कह कर 'रस' के नये नाम से पहचाना जाता है। विभाव तो काव्य-बल से प्रत्यक्ष होते हैं, अनुभाव नट के कौशल से प्रत्यक्ष होते हैं और व्यभिचारीभावों का प्रत्यक्षीकरण, कृत्रिम व्यभिचारीभावों के अनुभावों को प्रकट करने की नट की शक्ति के कारण होता है, परन्तु स्थायी तो काव्य-बल से भी प्रत्यक्ष किया नहीं जा सकता। उसका तो अनुमान ही करना होता है। 'रति', 'शोक'

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अभिनव का रस-विचार १५

आदि शब्द तो रत्यादि का अभिधा के बल पर केवल अभिधान ही कर सकते हैं। वाचिक अभिनय के रूप में उसका अवगमन नहीं करा सकते। केवल शब्द वाचिक अभिनय नहीं हैं, परन्तु शब्दों के माध्यम से होने वाला कार्य वाचिक अभिनय कहलाता है, जिस प्रकार अंगों से होने वाला कार्य आंगिक अभिनय कहलाता है, यथा :- विवृद्धात्माप्यगाधोऽपि दुरन्तोऽपि महानपि। वाडवेनेव जलधिः शोकः क्रोधेन पीयते।। 'अर्थात् 'मेरा शोक अत्यन्त बढ़ गया है, अगाध है, असीम है, महान् है, यह सब ठीक है, किन्तु फिर भी जिस प्रकार बाडवाग्नि सागर को पी जाती है उसी प्रकार मेरा क्रोध इसे पी जाता है।' यहाँ शोक का केवल अभिधान, कथन ही है, अभिनय नहीं है, अतः उसका अवगमन भी होता नहीं है। इसी प्रकार शोकेन कृतः स्तम्भस्तथा स्थितो येन वर्धिताक्रन्दैः। हृदयस्फुटनभयार्तैरोदितुमभ्यर्थ्यते सचिवैः ॥

अर्थात् 'शोक से स्तम्मित होकर वह ऐसे पड़ा है कि उसके सुहृदों का क्रन्दन बढ़ता ही जाता है और इस भय से कि कहीं उसका हृदय फट न जाय, वे उसे रोने के लिए प्रार्थना करते हैं।' इस श्लोक में भी शोक का केवल अभिधान ही है, अभिनय नहीं। अब इस श्लोक को देखिए :- भाति पतितो लिखन्त्यास्तया बाष्पाम्बुशीकरकणौघः । स्वेदोद्गम इव करतलसंस्पर्शादेष मे वपुषि।। [ रत्नावली २, ११ ] 'रत्नावली' नाटिका में सागरिका उदयन का चित्र अंकित करती है। वह चित्र उदयन को दिखायी देता है। उस चित्र में जल-बिन्दु गिरने का-सा एक दाग है। उसे देख उदयन कहता है-'मेरा चित्र अंकित करते-करते उसके नेत्रों से अश्रु-बिन्दु गिरे हैं, परन्तु वह उसके कर-स्पर्श से मेरे शरीर पर हुए पसीने के समान लगते हैं।' यहाँ इस वाक्य के द्वारा उदयन के सुखात्मक रतिभाव का अभिनय होता है, केवल अभिधान नहीं। अभिनयन ही अवगमन-शक्ति है। यह शक्ति शब्द की वाचक (अभिधा) शक्ति से भिन्न होती है। 'अवगमनशक्तिर्ह्यभिनयनं वाचकत्वादन्या।' (पृ० २७३) इस प्रकार कवि द्वारा वर्णित विभाव, शिक्षा द्वारा प्राप्त कौशल के बल पर नट के द्वारा प्रत्यक्षीकृत अनुभाव और अभिनय द्वारा व्यंजित व्यभिचारियों की सहायता से

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१६ अभिनव का रस-विवेचन

स्थायीभाव का ज्ञान अथवा अनुमान होता है। इसीलिए भरत ने अपने सूत्र में स्थायी का उल्लेख नहीं किया है। यों अनुकृत रति ही शंगार सिद्ध हुई। अतः शृंगार- रस रति-स्थायीभावात्मक है और रति में से ही उसकी उत्पत्ति होती है, ऐसा कहना 6 युक्तिसंगत है। नट में अनुमित की गयी रति तो अनुकरणरूप होने से मिथ्या है, तो इस मिथ्याज्ञान द्वारा वास्तविक रत्यादि के आस्वाद का आनन्द किस प्रकार प्राप्त हो सकता है, ऐसी शंका का निवारण करते हुए शंकुक कहते हैं कि मिथ्या ज्ञान भी कभी- कभी क्रियाकारित्वयुक्त होता है, अर्थात् वह परिणाम उत्पन्न कर सकता है। रज्जु में हुए सर्प के मिथ्या ज्ञान के कारण भी भय से लोग भाग जाते हैं। इतना ही नहीं, कभी- कभी मृत्यु तक भी हो जाती है। 'अभिनव-भारती' में इस प्रसंग पर एक उदाहरण दिया गया है कि मणि और दीप की प्रभा को मणि समझ कर दो व्यक्ति उसे लेने के लिए दौड़ पड़ते हैं। जो व्यक्ति दीप की प्रभा को मणि समझ कर दौड़ा था, वह तो खिसियाना पड़ जाता है और जो व्यक्ति मणि की प्रभा को मणि समझ कर दौड़ा था, उसे मणि प्राप्त होती है। इस प्रकार दोनों को अलग-अलग फल प्राप्त हुए, किन्तु दोनों का ज्ञान तो मिथ्या ही था। इसी मिथ्या ज्ञान ने ही दोनों को दौड़ने के लिए प्रवृत्त किया, प्रेरित किया था। इस प्रकार अमुक परिस्थिति में मिथ्या ज्ञान भी क्रियाकारित्व रखता ही है।१ नाटक में भाव का प्रस्तुतीकरण अनुकरणात्मक और उसका ग्रहण अनुमानात्मक होता है, ऐसा कह कर शंकुक, अब नाटक में होने वाली प्रतीति की विलक्षणता समझाते हुए चित्रतुरग का दृष्टान्त देते हैं। जब हम घोड़े का चित्र देखते हैं तब हमें ऐसी प्रतीति होती है कि यह घोड़ा है, किन्तु यह प्रतीति सम्यक प्रतीति नहीं है; क्योंकि वह वास्तविक घोड़ा नहीं है और वह मिथ्या प्रतीति भी नहीं है; क्योंकि बाद में वह घोड़ा नहीं है ऐसा बाधक ज्ञान भी नहीं होता। यह घोड़ा है या नही ऐसी संशय-प्रतीति भी नहीं होती; क्योंकि हमारे मन में 'यह घोड़ा है।'-इसके विषय में कोई शंका नहीं होती। इसी प्रकार 'यह घोड़े-जैसा है।' ऐसी सादृश्य प्रतीति भी नहीं होती; क्योंकि हम उसे घोड़े-

१. 'अर्थक्रिया' अथवा 'अर्थक्रियाकारित्व' (परिणाम उत्पन्न कर सकने की शक्ति) यह सम्यक ज्ञान की अथवा वस्तु के अस्तित्व की आधारभूत कसौटी है। उदाहरणतः मनुष्य मृगजल देख उस तरफ दौड़ने लगता है, पर वहाँ पानी नहीं होता अतः वह स्नान-पान भी नहीं कर सकता; तब उसे प्रतीति होती है कि मेरा ज्ञान मिथ्या था। परन्तु कभी-कभी मिथ्या ज्ञान भी अर्थक्रियाकारित्व धारण करता है। ऊपर के उदाहरण मैं एक व्यक्ति को सचमुच रत्न की प्राप्ति होती है, अर्थात् उसकी आकांक्षा पूरी हो जाती है, वह छला नहीं जाता। धर्मकीर्ति का कथन है कि जो मिथ्या ज्ञान ज्ञाता को न ठगता हो, वह सम्यक् ज्ञान का साधन बन सकता है। अब यदि मिथ्या ज्ञान को भी अर्थक्रियाकारित्व प्राप्त हो तो अनुकाररूप ज्ञान को अर्थक्रियाकारित्व-लाभ अधिक सम्भवित है, ऐसा शंकुक का कथन है; क्योंकि उसमैं भावक ठगे नहीं जाते, किन्तु उनकी आकांक्षाएँ पूरी होती हैं।

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अभिनव का रस-विचार १७ जैसा नहीं बल्कि घोड़ा ही कहते हैं। इस प्रकार चित्रतुरग-प्रतीति चारों प्रकार की प्रतीतियों से भिन्न ही है। इसी प्रकार सीता-मिलन से प्रसन्नतानुभव करने वाले राम का अभिनय करने वाले नट को देख कर हमें १. यह नट ही सुखी राम है अथवा यही राम नहीं है, ऐसी सम्यक प्रतीति नहीं होती है; २. वह सुखी नहीं, ऐसी मिथ्या प्रतीति नहीं होती है; ३. वह राम है कि नहीं, ऐसी संशय-प्रतीति भी नहीं होती; और ४. यह राम के जैसा है, ऐसी सादृश्य-प्रतीति भी नहीं होती, परन्तु सम्यक्, मिथ्या, संशय, सादृश्य चारों प्रतीतियों से भिन्न ही 'यह सुखी राम है।'-ऐसी प्रतीति चित्र-तुरगादिन्याय से होती है। इसीलिए कहा है कि प्रतिभाति न सन्देहो न त्त्वं न विपर्ययः । धीरसावयमित्यस्ति नासावेवायमित्यपि। विरुद्धबुद्ध यसम्भेदादविवेचितसम्प्लवः युक्ता पर्यनुयुज्येत स्फुरन्ननुभवं कया। अर्थात् कला की प्रतीति में सन्देह, सत्य या भ्रान्ति नहीं होती। यह प्रतीति 'यह अमुक है'-इस प्रकार की होती है, 'यह सचमुच अमुक ही है।' इस प्रकार की नहीं होती। कला की प्रतीति में परस्पर-विरोधी बुद्धि भी नहीं होती अतः उसे भ्रान्ति भी नहीं कहा जा सकता। यह एक प्रकार के प्रत्यक्षानुभवरूप होती है अतः किस तर्क से इसको नकारा जाय ?' शंकुक का यह मत मम्मट ने 'काव्य-प्रकाश' में इस प्रकार प्रस्तुत किया है : 'यह राम ही है।' अथवा 'यही राम है' ऐसी सम्यक प्रतीति, 'यह राम नहीं है' ऐसी बाद में प्रतीति होने पर बाधित हुई 'यह राम है' ऐसी मिथ्या प्रतीति 'यह राम हो सकता है या नहीं भी' ऐसी संशय-प्रतीति और 'यह राम-जैसा है' ऐसी सादृश्य- प्रतीति से भिन्न ही प्रतीति द्वारा हम नट को 'यह राम है' के रूप में ग्रहण करते हैं। यह नट काव्यानुसन्धान से, शिक्षा व अभ्यास से प्राप्त अपने कार्यरूप अभिनय से कारण, कार्य एवं सहकारी को प्रस्तुत करता है, जो विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी के नाम से पहचाने जाते हैं। ये सब कृत्रिम होते हैं मगर कृत्रिम लगते नहीं हैं। इन भावों के १. कला की प्रतीति यह एक प्रकार का मानस प्रत्यक्ष है। मन को इसकी प्रतीति सुखदुःखादि की भाँति अव्यवहितरूप में होती है। इस दृष्टि से देखने पर कला की प्रतीति निश्चित, अव्यवहित, स्वसंवेद्य, संशयातीत है ऐसा कह कर श्री नोली जॉन स्टुअर्ट मिल का एक कथन उद्धृत करते हैं : What ever is known us by consciousuess is known be- yond possibility of question. What one sees or feels, whether bodily or mentally, one cannot but be sure that one sees or feels. No sci- ence is required for the purpose of establishing such truths; No rules of art can render our knowledge of them more certain than it is it self. A System of Logic, p. 84. २

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१८ अभिनव का रस-विवेचन

संयोग से अर्थात् गम्यगमक-भावरूप सम्बन्ध से हम नट में रत्यादि स्थायीभाव का अनुमान करते हैं। यह अनुमेयभाव वस्तु-सौन्दर्य के कारण सामाजिकों की वासना की चर्वणा का विषय बनता है, अतः वह अनुमान के अन्य विषयों से भिन्न होता है और वह रस कहाता है, ऐसा शंकुक का मत है। शंकुक ने एक बात यह कही कि नाट्य-प्रतीति अन्य लौकिक प्रतीतियों से भिन्न है। यह प्रतीति चित्रतुरग के जैसी प्रतीति है। इसमें एक प्रकार की स्वैच्छिक आत्म- वंचना और Willing Suspension of disbelief है। नट राम नहीं है यह जानने पर भी उसे राम के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसका कारण नट द्वारा किया गया अनुकार्य का स्थायी कुशल अनुकरण है। नट द्वारा अनुकरण के माध्यम से प्रस्तुत किये गये अर्थात् कृत्रिम विभावादि के बल पर हम नट में अनुकार्य के स्थायीभाव का अनुमान करते हैं। यह अनुमान अन्य अनुमानों की तुलना में विलक्षण होता है। कारण, यह सामाजिकों की वासना की चर्वणा का विषय बनता है। इस प्रकार इस मत में अनुकरण और अनुमान द्वारा रस की निष्पत्ति होती है। अतः इसे अनुकृति- अनुमिति-वाद भी कहते हैं। इसमें 'संयोग' का अर्थ गम्यगमक-सम्बन्ध और 'निष्पत्ति' का अर्थ 'अनुमिति' ऐसा किया गया है। हम स्पष्टतः देख सकते हैं कि रसानुभव को समझाने में लोल्लट की अपेक्षा शंकुक एक डग आगे बढ़े हैं। लोल्लट ने रस-निष्पत्ति को जागतिक अनुभव के आधार पर समझाने का यत्न किया। विभावादि को उसने रस के कारण बताया और निष्पत्ति का अर्थ उत्पत्ति, अभिव्यक्ति, पुष्टि ऐसा किया एवं नट के अभिनय-कौशल के कारण अनुकार्यगत रस का नट में आरोप होता है, ऐसा कहा। शंकुक ने ना्य-प्रतीति का स्वरूप समझाने का प्रयत्न किया और नाट्य को लोकवृत्त का अनुकरण बताया। कुशल अनुकरण के कारण नट में अनुकार्य के स्थायी का अनुमान होता है और वही रसरूप में आस्वाद्य बनता है, ऐसा बताया। शंकुक के मत की भट्ट तौत द्वारा की गयी समीक्षा है :- शंकुक के मत की' अभिनवगुप्त के गुरु उपाध्याय भट्ट तौत ने विस्तृत समीक्षा की है, जिसे हम अभिनव-भारती के आधार पर देखें : भट्ट तौत प्रथम यह प्रश्न करते हैं कि रस अनुकरणरूप है, ऐसा जो आप कहते हैं, यह किसकी प्रतीति को ध्यान में रख कर कहते हैं ? १. सामाजिक की, २. नट की, ३. वस्तु-वृत्त का विवेचन करने वाले विवेचक की या फिर ४. भरत का ऐसा मत था ? १. शंकुक की भूल यह है कि उन्होंने कलानुभव अनुकरणात्मक है, ऐसा कह कर उसे सविकल्प 3 स्वीकृत किया और तिस पर भी यह कहा कि अन्य सभी सविकल्प ज्ञान से वह भिन्न है। यही स्वविरोध इनके लिए घातक है और भट्ट तौत ने इसी की विस्तृत चर्चा यहाँ की है। २. यह उद्धरण प्रमाण-वार्तिक के स्वार्थानुमान-परिच्छेद पर धर्मकीति की स्ववृत्ति मैं से लिया गया है। 'व्याख्यातारः खल्वेव विवेचयन्ति न व्यवहर्तारः। ते तु स्वालम्बनमेवार्थक्रियायोगं

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अभिनव का रस-विचार १९

१. सामाजिक की प्रतीति को ध्यान में रख कर आप कहते हों तो यह बात टिक नहीं सकती। जो कुछ किसी प्रमाण से सिद्ध हुआ हो, उसे अनुकरण कहा जाता है; यथा-अमुक व्यक्ति इस प्रकार मद्यपान करता है, ऐसा कह कर किसी को हम प्रत्यक्ष जल पीते देखें तो कह सकते हैं कि यहाँ अनुकरण है। जल पीने की क्रिया मद्य- पान की क्रिया का अनुकरण है, परन्तु नट में ऐसा क्या होता है ? जिसे हम रत्यादि का अनुकरण कह सकें ? नट का शरीर, उसके द्वारा धारण किये गये वस्त्रालंकार, उसे प्राप्त रोमांच, उसका गद्गदित स्वर, उसका हलन-चलन, उसके कटाक्षादि हमें दृष्टिगोचर होते हैं। परन्तु इसे हम रत्यादि चित्तवृत्ति का अनुकरण नहीं कह सकते; क्योंकि नट में देखी ये सारी वस्तुएँ तो जड़ हैं। इनका ग्रहण भिन्न इन्द्रिय के द्वारा- आँख के द्वारा ही होता है और उसका आश्रय शरीर है। जब कि चित्तवृत्ति तो प्रकृत्या चेतन वस्तु है, उसका ग्रहण मन के द्वारा होता है और उसका आश्रय मन होता है।१ इस प्रकार इन दोनों के बीच पर्याप्त भेद है। हमने मूल वस्तु और उसकी अनुकृति दोनों को देखा हो तभी कह सकते हैं कि एक, दूसरी की अनुकृति है। परन्तु राम का रतिभाव तो हमने कभी पहले देखा नहीं है अतः यह बात नहीं टिक पाती कि नट राम का अनुकरण करता है। अब यदि आप यह कहते हैं कि नटगत चित्तवृत्ति ही जब प्रतीत होती है तब वह रति के अनुकरणरूप होने से शृंगार कहाती है, तो प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यह प्रतीति कैसी होती है ? प्रमदादि कारणों, कटाक्षादि कार्यों और धृति आदि सहकारीरूप लिंगों के बल पर जिस लौकिक चित्तवृत्ति की हमें प्रतीति होती है, वैसी ही यदि नटगत चित्तवृत्ति हो तो नट में हमें रति नामक चित्तवृत्ति ही प्रतीत होती है, ऐसा कहना पड़ेगा। इसे रति का अनुकरण कैसे कहा जायेगा ? अर्थात् यह तो लौकिक प्रतीति ही हुई, यह रसानुभूति नहीं है।

मन्यमाना दृश्यविकल्प्यावर्थावेकीकृत्य प्रवर्तन्ते।' धर्मकीति के मतानुसार व्यवहार तो स्वलक्षण और मानस-प्रत्यय दोनों को एक मानवर ही चलता है। मन वस्तु पर अपने द्वारा अनुभूयमान उसके रूप का आरोप करता है। एवं ज्ञाता मान लेता है कि मुझे वस्तु का बाह्य ज्ञान हो जाता है। स्वलक्षण वस्तु और उस पर मन द्वारा कल्पित विवल्प के आरोप के बीच जो भेद है वह केवल विचारगत है, इसे व्याख्याताओं, तत्त्व-चिन्तकों ने उपस्थित किया है। इसके खण्डन में अभिनवगुप्त कहते हैं कि किसी वस्तु के विषय में व्यावहारिक स्पष्टीकरण उसके अनुभव का विरोधी हे तो विचार-जगत् में तात्विक दृष्टि से भी चल नहीं पाता। अर्थात् जब भावक नाट्य को देख कर रस में लीन हो गया होता है तब उसे यह पता नहीं होता कि वह किसी अनुकरण का अवलोकन करता है। यह तथ्य स्वयं ही अनुकरणवाद का खण्डन करता है। १. माणिक्यचन्द्र इस प्रकार समझाते हैं : तथा हि नटवपुरादीनां जडत्वं चक्षुर्ग्राह्यत्वं रतेरजडत्वं मनोग्राह्यत्वं च। प्रतिशीर्षकादीनां वपुरधिकरणं, रतेस्तु मनोऽधिकरणंमिति।-नट का शरीरादि तो जड़ और चक्षुग्राह्य है, जब कि रतिरूप चित्तवृत्ति तो जड़ नहीं है और मनोग्राह्य है। मुकुट इत्यादि का अधिकरण शरीर है, जब कि रति का अधिकरण मन है। जिकाी स

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२० ९ अभिनव का रस-विवेचन

यदि आप कहें कि राम के विभावादि सच्चे होते हैं, परन्तु नट के सच्चे नहीं होते, यह इन दोनों के अन्तर हैं, तो कहना पड़ेगा कि इतना अन्तर भले ही हो। तिस पर भी ये विभावादि नट के स्थायी भाव के कारण, कार्य या सहकारी नहीं हैं; परन्तु काव्य- शिक्षा आदि के बल पर प्रस्तुत व कृत्रिम हैं, ऐसा सामाजिक मानता भी है क्या ? यदि सामाजिक इन्हें कृत्रिम मानता हो तो इनके बल पर उसे रति की प्रतीति होगी ही नहीं। इसलिए शंकुक का पक्ष कहता है कि इसीलिए तो हम व हते हैं न कि जो प्रतीति होती है, वह रति की नहीं मगर रति के अनुकरण की होती है। इसके प्रत्युत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि रति नामक चित्तवृत्ति और इस चित्तवृत्ति का अनुकरण ये दो भिन्न वस्तुएँ हैं। चित्तवृत्ति और अनुभाव इन दोनों के बीच कारण-कार्य सम्बन्ध होता है। ये अनुभाव मूल चित्तवृत्ति के भी हो सकते हैं और उसके अनुकरण के भी। हम जिसे देखते हैं, ये अनुभाव रत्यात्मक चित्तवृत्ति के अनुकरण हैं, ऐसा जो लोग जानते हैं और जो इस बात के ज्ञान के साथ इन्हें देखते हैं, उन्हें ही केवल उन अनुभावों के आधार पर रति के अनुकरण का ज्ञान होगा। परन्तु सामान्य प्रेक्षक इस बात का ध्यान रख कर देखता नहीं है। अतः वह तो इन अनुभवों को रति के अनुभाव के रूप में ही ग्रहण करता है। तो फिर उसे रति के अनुकरण की प्रतीति कैसे हो सकती है ? यह बात अभिनवगुप्त ने एक उदाहरण के द्वारा समझायी है। ऐसा माना जाता है कि बिच्छू दो तरह से उत्पन्न होते हैं। एक तो बिच्छू से बिच्छू उत्पन्न होता है, दूसरे गोबर में से बिच्छू उत्पन्न होता है। यदि किसी तद्विद को हम बिच्छू दिखावें तो वह तुरन्त कह देगा कि यह बिच्छू गोबर में से उत्पन्न हुआ है जब कि विसी सामान्य व्यक्ति को दिखाया जाय तो वह तो वही बात कहेगा जो प्रसिद्ध है। अर्थात् वह कहेगा कि यह बिच्छू बिच्छू में से ही उत्पन्न हो गया है और उसकी बात असत्य ही सिद्ध होगी। जहाँ लिंग ज्ञान ही मिथ्या हो वहाँ उसके आधार पर किया गया अनुमान भी मिथ्या सिद्ध होता है, इसमें आश्चर्य क्या है ? और वास्तविक जगत् में रति के जो कटाक्षादि कार्य देखने को मिलते हैं, नट के अनुभाव उनसे मिलते-जुलते ही होते हैं अतः उन्हें देख कर सामाजिक को राम की रति के समान ही चित्तवृत्ति का ज्ञान होता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि कार्य के आधार पर कारण का अनुमान करना योग्य हो तो भी कार्य-जैसी वस्तु के आधार पर कारण-जैसी वस्तु का अनुमान करना किसी भी तरह उचित नहीं है। धुएँ पर से अग्नि का अनुमान हो सकता है मगर धुएँ-जैसे पदार्थ कोहरे के आधार पर अग्नि के समान प्रतीत होने वाले जासूद के फूल का अनुमान कैसे किया जा सकता है ? इसी प्रकार राम के अनुभावों के बल पर राम की रति का अनुमान करना उचित है, परन्तु राम के अनुभावों-जैसी प्रतीत होने वाली वस्तुओं के आधार पर राम की रति से मिलती-जुलती वस्तु का अनुमान कैसे किया जा सकता है ?

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अभिनव का रस-विचार २१

वस्तुतः क्रुद्ध न होने पर भी नट क्रुद्ध हुआ प्रतीत होता है, यह ठीक है; मगर उसका अर्थ इतना ही है कि क्रद्ध व्यक्ति में और नट में भृकुटिभंग आदि का सादृश्य है। परन्तु इतने मात्र से उसे अनुकरण नहीं कहा जा सकता। गाय और नील गाय दिखने में समान होती है, परन्तु इससे भला एक को दूसरी का अनुकरण नहीं कहा जा सकता है। प्रेक्षकों को ऐसी प्रतीति नहीं होती है कि नट हमारे समक्ष किसी का अनुकरण करता है। नट के विषय में प्रेक्षकों की प्रतीति भावशून्य होती ही नहीं अर्थात् नट जिन भावों का अभिनय करता है, वे उसमें वस्तुतः हैं ही ऐसा ही सामाजिक को प्रतीत होता है और वे स्वयं भी उसमें लीन हो गये होते हैं। फिर भी, यह प्रतीति अनुकरण की होती है-ऐसा कहें, तो इस तर्क में कोई बल नहीं। आप जो यह कहते हैं कि 'यह नट राम है' ऐसी हमें जो प्रतीति होती है, वह सम्यक अर्थात् सच्ची भी नहीं है और मिथ्या अर्थात् असत्य भी नहीं है-यह भी बराबर नहीं है; क्योंकि जहाँ तक नट हमारे समक्ष होता है तब तक अर्थात् नाटक समाप्त होने तक 'यह राम है' ऐसी निश्चयात्मक प्रतीति होती हो और बाद में होने वाली 'यह राम नहीं है' ऐसी बाधक प्रतीति का उस समय हमें स्पर्श तक न हो, तो इस प्रतीति को सम्यक प्रतीति क्यों न कहा जाय ? और उसी प्रकार 'यह राम है' यह प्रतीति, बाद में 'यह राम नहीं है' ऐसी प्रतीति से बाधित होने वाली है, यह जानकर आप नाटक देखते हों, तो उसे मिथ्या प्रतीति क्यों न कहा जाय ? वस्तुतः तो यह मिथ्या प्रतीति ही है; फिर भले ही बाधक प्रतीति उस क्षण उत्पन्न न होती हो। वह अनुकरणात्मक है, ऐसा जो आप कहते हैं इसका अर्थ इतना ही है कि वह मिथ्या है। अतः आगे जो कह गये कि कला की प्रतीति में परस्पर-विरोधी बुद्धि होती नहीं है, यह गलत सिद्ध होता है। आप जो यह कहें कि यदि कोई दूसरा नट राम का अभिनय करे तो भी हमें 'यह राम है' ऐसी प्रतीति होगी, तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप स्वीकार करते हैं कि रामत्व सामान्य रूप है। अभिनवगुप्त के विचार से कला की प्रतीति बौद्धिक प्रतीति से भिन्न ही प्रकार की प्रतीति है। अतः उसमें सामान्य के विचार को स्थान नहीं है, साधारण्य और बौद्धिक व्यापार द्वारा निष्कर्षरूप में प्राप्त सामान्य दो नितान्त भिन्न ही वस्तुएँ हैं। आप जो यह कहते हैं कि काव्य द्वारा नट के समक्ष विभावादि प्रत्यक्ष होते हैं, यह भी समझ में नहीं आता है। सीता मेरी कुछ है, ऐसी आत्मीयता की भावना नट में होती ही नहीं है। अर्थात्, नट काव्य में निहित विभावों को अपने व्यावहारिक जीवन के अंगरूप में देख ही नहीं सकता है। मतलब यह कि विभावादि का अनु- सन्धान नट को काव्य में से होता ही नहीं। यदि आप ऐसा कहते हैं कि सामाजिक को विभावादि की इस प्रकार प्रतीति कराना ही अनुसन्धान का अर्थ है, तो ऐसा अनुसन्धान स्थायीभाव का अधिक होना चाहिए; क्योंकि वही मुख्य होने से सामाजिक को ऐसी प्रतीति होती है कि 'इसमें यह स्थायीभाव है।' 'केवल शब्द ही वाचिक

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२२ अभिनव का रस-विवेचन

अभिनय नहीं है' ऐसा कह कर शंकुक ने अभिधान और अभिनय के बीच जो महत्त्वपूर्ण अन्तर है, उसे स्पष्ट किया है, उसकी चर्चा योग्य अवसर पर (अर्थात् ९वें अध्याय और १४वें अध्याय में) करेंगे। इस प्रकार सामाजिक की प्रतीति के विचार से रस अनुकरणरूप है, ऐसा कहना असत्य है।

२. नट के विचार से भी यह अनुकरणरूप स्पष्टीकरण अधिक टिक नहीं पाता। 'मैं राम का अथवा उसकी चित्तवृत्तियों का अनुकरण करता हूँ' ऐसा नट भी नहीं मानता। 'अनुकरण' के दो अर्थ हैं, एक तो कोई करे वैसा (सदृश) करना, दूसरा कोई करे उसके पश्चात् करना। प्रथम अर्थ लें तो नट ने पहले कभी राम को देखा नहीं है, तो फिर वह उसका अनुकरण क्योंकर कर सकता है ?१ दूसरा अर्थ लें तो भी व्यवहार में भी एक के करने के बाद दूसरा उसे करे तब उसे अनुकरण कहने का अवसर उपस्थित होता है।

यदि आप कहें कि नट किसी विशिष्ट व्यक्ति का अनुकरण नहीं करता है, मगर उत्तम प्रकृति के पुरुष के शोक का अनुकरण करता है; तो यह अनुकरण किससे करता है, यह देखना चाहिए। ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि नट शोक का अनुकरण शोक से करता है; क्योंकि नट में शोक होता नहीं है। अश्रुपात आदि की सहायता से नट शोक का अनुकरण करता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। कारण यह कि अश्रुपात आदि तो जड़ हैं और शोक तो चित्तवृत्ति होने के कारण चेतन है-यह तो हम पहले ही कह चुके हैं। आप कदाचित् इतना कहें कि उत्तम प्रकृति के पुरुष के शोक के जो अनुभाव होते हैं, उनका नट अनुकरण करता है, परन्तु वहाँ भी यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उत्तम प्रकृति के किस पुरुष के अनुभावों का वह अनुकरण करता है ? यदि कहें कि उत्तम प्रकृति के किसी भी पुरुष के अनुभावों का, तो वहाँ भी उसे विशिष्ट किये बिना नट उनका बुद्धि द्वारा आकलन ही कैसे कर सकता है ? यदि ऐसा कहें कि जो कोई इस प्रकार शोक करता हो, उसका वह अनुकरण करता है; तो फिर इसमें नट का भी अनुप्रवेश हो ही गया, अतः यह अनुकार्य और यह अनुकर्ता ऐसा भेद ही नहीं रहा। यह अन्तिम वाक्य माणिक्यचन्द्र इस प्रकार समझाते हैं-'यो एवं रोदिति चेत् तर्हि स्वात्मानमपि नटोऽनुकरोति इति आयातम् तस्यापि रोदनसद्द्ावात् इति गलितो Sनुकार्यानुकर्तृभावः।' अर्थात् 'जिस प्रकार यह रोता है उसका वह अनुकरण करता है'-ऐसा अगर कहो तो नट अपने आपका भी अनुकरण करता है, ऐसा मानना पड़ेगा; क्योंकि वह खुद भी शोक का अनुभव करता होना चाहिए। तो फिर अनुकार्य और अनुकर्ता का भेद रहता नहीं है।

१. इस सम्बन्ध में 'रस-प्रदीप' में प्रभाकर ने एक मार्मिक प्रश्न उपस्थित किया है। वे कहते हैं कि पौराणिक किंवा ऐतिहासिक नाटकों के पात्र पहले हो चुके होते हैं अतः उनका अनुकरण तो सम्भव है, परन्तु प्रकरण वगैरह में तो पात्र कल्पित होते हैं, वहाँ अनुकरण कैसे सम्भव है?

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अभिनव का रस-विचार २३

नट प्रशिक्षित होता है, वह अपने विभावों का स्मरण कर सकता है और चित्तवृत्ति के साधारणीभाव (साधारणीकरण) से उसका हृदय-संवाद सिद्ध होता है और उस अवस्था में वह केवल अनुभावों को प्रकट करते-करते उचित काकु आदि के साथ काव्य का पाठ करता हुआ रंगमंच पर घूमता होता है-उसे इन तीन वस्तुओं का ही ज्ञान होता है। स्वयं किसी वस्तु का अनुकरण करता है ऐसा ज्ञान उसे होता नहीं है। कारण यह कि राम की चेष्टा का अनुकरण कान्ता के वेश के अनुकरण के समान नहीं होता है। यह हम प्रथम अध्याय में भी बतला गये हैं। इस लेख में यह चर्चा अनुव्यवसाय की स्पष्टता में समाविष्ट कर दी गयी है। ३. समीक्षक की दृष्टि से भी यह अनुकरण है, ऐसा स्वीकार नहीं किया जा सकता। कारण घटनाएँ तो पहले घट चुकी होती हैं और उनका संवेदन (अनुभूति) वह बाद में करता है। उसने इन घटनाओं को प्रत्यक्ष देखा नहीं होता, तो फिर नाटक में जब ये प्रस्तुत होती हैं, तब वे अनुकरण हैं ऐसा वह कैसे कह सकता है ? ४. भरत ने स्वयं कहीं पर भी कहा नहीं है कि 'स्थायी का अनुकरण रस है।' ऐसा संकेत तक कहीं भी मिलता नहीं है। इसके विपरीत नाटक में नट को हलन-चलन करते समय ध्रुवागान, ताल, लास्य आदि की सुरक्षा करनी पड़ती है, यह तो उल्टी बात का ही संकेत करता है। इस बात का विस्तार हम सन्ध्यङ्गों के अध्याय के अन्त में करेंगे। भरत में 'सप्तद्वीपानुकरणम्' नाटक सप्द्वीप के अनुकरणरूप है, आदि वाक्य बार-बार दिखायी देते हैं, इनका अर्थ दूसरी तरह से भी किया जा सकता है। अभिनवगुप्त के मतानुसार ऐसे सभी स्थानों पर 'अनुकरण' का अर्थ अनुकीर्तन अर्थात् अनुव्यवसाय ऐसा करना चाहिए और क्षण-दो क्षण के लिए यह अनुकरण है, ऐसा मान लें तो भी कान्ता के वेश-गति आदि के अनुकरण में और इसमें क्या अन्तर है ? यह जड़ का ही अनुकरण होगा।१ नाट्य-प्रतीति को शंकुक ने चित्र-तुरगन्याय से समझाने का प्रयत्न किया है, इस सम्बन्ध में कहते हैं कि यह दृष्टान्त रसानुभूति को लागू नहीं होता है। दीवार (भीत) पर रंगों के संयोजन से जो घोड़े की प्रतीति होती है उसे यदि आप घोड़े की अभिव्यंजना कहें तो वह गलत है; क्योंकि सिन्दूर आदि से अभिव्यक्त घोड़ा, प्रकाश से अभिव्यक्त होने वाले सच्चे घोड़े से भिन्न होता है। इतना सही है कि घोड़े के अवयवसन्निवेश से मिलता-जुलता दीवार पर रंगों का सन्निवेश किया गया होता है। अतः वह घोड़े-जैसा है ऐसा प्रतिभासित होता है, परन्तु विभावादि के समूह को रतिसदृश प्रतिभासित नहीं कहा जा सकता। अतः आप जो ऐसा कहते हैं कि भावों का अनुकरण रस है (भावानुकरणं रसः), यह गलत है। इस चर्चा में चित्रादि चक्षुगम्य कलाओं को काव्य-कला से भिन्न कोटि की माना गया है। रंगादि तो भौतिक जड़ वस्तुएँ हैं और वे जड़ वस्तुओं का अनुकरण करते हैं। अभिनवगुप्त का

१. श्री नोली और आचार्य विश्वेश्वर यहाँ ऊपर से भिन्न अर्थ करते हैं।

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२४ अभिनव का रस-विवेचन

कहना है कि फिर भी काव्य में किया गया विभावादि जड़ वस्तुओं का निरूपण चेतनरूप चित्तवृत्तियों का अनुकरण कर सकता है, ऐसा सम्भव नहीं। आगे भी यह आपत्ति उठायी जा चुकी है। भट्ट तौत का अनुव्यवसायवाद : भट्ट तौत द्वारा शंकुक के अनुकृतिवाद का यह जोरदार खण्डन पढ़कर हमें सहज ही यह हो सकता है कि तो फिर नाटक में वस्तुतः होता क्या है ? भटट तौत का उत्तर यह है कि नाटक में जो होता है, वह अनुकरण नहीं होता, अनुव्यवसाय' होता है और अनुव्यवसाय और अनुकरण दोनों एक नहीं हैं। भट्ट तौत ने अपना मत काव्य-कौतुक नामक अपने ग्रन्थ में समझाया है, परन्तु वह ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं है। अतः इसके विषय में जो विवेचन 'अभिनव-भारती' के प्रथम अध्याय के १०७वें श्लोक की व्याख्या में किया गया है, वही हम यहाँ देखेंगे। वहाँ प्रसंग ऐसा है कि इन्द्र के उत्सव पर अभिनय के लिए भरत ने प्रथम जो प्रयोग (नाट्य-प्रयोग) आयोजित किया, उसकी कथावस्तु असुर-पराजय-प्रसंग से ग्रहण की गयी थी, फलतः असुर क्रुद्ध हुए और उन्होंने कहा कि हम यह नाट्य-प्रयोग होने नहीं देंगे। इसमें हमें बहुत हीन अंकित किया गया है। तब उन्हें समझाते हुए ब्रह्मा ने कहा कि नैकान्ततोऽत्र भवतां देवानां चानुभावनम्। त्रैलोक्यस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम्॥१०७॥ इसमें देवों का या आप लोगों का व्यक्तिगत चित्रण है ही नहीं। इसमें तो समस्त विश्व के भावों का अनुकीर्तन है।

१. अनुव्यवसाय-न्यायदर्शन का शब्द है। अनुब्यवसाय अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा प्रस्तुत की गयी सामग्री पर होने वाला मन का व्यापार। अर्थात् इन्द्रिय द्वारा हुए ज्ञान का पीछे से (अनु= पश्चात्) मन द्वारा विया गया साक्षात्कार। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्तिविमर्शिणी', खं० ३, पृ०४३ पर कहा गया है : 'मनः (अंतःकरणं) अनुव्यवसायं साक्षात्कारविमर्शस्य पश्चाद्भाविनं विमर्श विदघत् क्रियासम्बन्धादिविषयाः कल्पनाः विकल्पज्ञानानि प्रमातृव्यापारप्राधान्येन करोति।' अर्थात्, मन-अन्तःकरण अनुव्यवसाय करता है, इसका अर्थ है कि इन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्षीकृत पदार्थ का पीछे से होने वाले साक्षात्कार से क्रिया सम्बन्ध आदि विषयक विवल्प ज्ञान प्रमातृ- व्यापार जिसमें प्रधान हो इस प्रकार करता है। अनुव्यवसाय का प्राचीनतम उल्लेख न्यायसूत्र, व्यास-माष्य-१-१-४ में उपलब्ध हैं : 'सर्वत्र प्रत्यक्षविषये ज्ञातुरिन्द्रियेन व्यवसायः पश्चान्म- नसानुव्यवसायः ।' प्रत्यक्ष इन्द्रिय द्वारा प्राप्त होने वाला ज्ञान वेद-व्यवसाय कहलाता है। तत्पश्चात् मन द्वारा होने वाला साक्षात्कार अनुव्यवसाय। कलानुभव के सन्दर्भ में अनुव्यवसाय का अर्थ है-सत्य और मिथ्या के विचार से मन को सर्वथा मुक्त कर वस्तु का साक्षात्कार करना। वह व्यक्ति-सम्बद्ध नहीं, विन्तु साधारणीभूत ही होता है। संक्षेप में अनुव्यवसाय का अर्थ है व्यवहार-जीवन की वस्तुओं का मानस-साक्षात्कार।

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अभिनव का रस-विचार २५

इसकी व्याख्या में अभिनवगुप्त कहते हैं कि नाटक में हम जिन पात्रों को देखते हैं उनके विषय में हमें ऐसा नहीं लगता कि १. ये सच्चे हैं अथवा २. युग्मक की भाँति सच्चे हैं, ३. सीप को देख कर उसमें होने वाली रजत की भ्रान्ति की तरह (शुक्ति) भ्रान्तिरूप हैं अथवा ४. सत्यज्ञान के बाधित होने पर होने वाले मिथ्या ज्ञान की तरह आरोपरूप हैं अथवा ५. मुख में चन्द्र की उत्प्रेक्षा करते हैं, वैसे उत्प्रेक्षारूप हैं अथवा ६. 'वाहीक बैल' की भाँति अध्यवसायरूप हैं अथवा ७. चित्र या खिलौने की भाँति उसकी प्रतिकृतिरूप हैं अथवा ८. गुरु की भाँति शिष्य के प्रवचन करने की प्रकृति की भाँति अनुकरणरूप हैं अथवा ९. उसी समय उत्पन्न की गयी इन्द्रजालिका के समान हैं अथवा १०. युक्ति से उत्पन्न किये गये आभास के कारण दृष्टिगत हस्तलाघव आदि की माया-जैसे हैं। कारण यह कि इन सबमें साधारण्य के अभाव के कारण प्रेक्षक उदासीन होता है और रसास्वाद की सम्भावना नहीं होती। 'तथा हि-तेषु न तत्वेन धीः, न सादृश्येन यमलकवत्, न भ्रान्तत्वेन रूप्यकस्मृति- पूर्वशुक्तिरूप्यवत्, नारोपेण सम्यग् ज्ञानबाधानन्तरमिथ्याज्ञानवत्, न तदध्यवसायेन गौर्वाहीकवत्, नोत्प्रेक्ष्यमाणत्वेन चन्द्रमुखवत्, न तत्प्रतिकृतित्वेन चित्रपुस्तकवत्, न तदनुकारण गुरुशिष्यव्याख्याहेवाकवत्। न तात्कालिक निर्माणेन इन्द्रजालवत्, न युक्तिविरचिततदाभासतया हस्त लाघवादिमायावत्। सर्वेष्वेतेषु पक्षेषु असाधारणतया द्रष्टुरौदासीन्ये रसास्वादायोगात्।' नाट्यशास्त्र, खंड १, पृ० ३५। कवि के विचार से भी किसी निश्चित व्यक्ति का वर्णन करने के अवसर पर अनौचित्य परिहार असंभव हो जाए तो काव्य बन ही नहीं सकता, तब तो कवि द्वारा वर्णित मुख्य पात्रों का अथवा उनका अभिनय करनेवाले नट का व्यवहार लौकिक युगल के व्यवहार का-सा बन जाय और उसमें भी सांसारिक हर्ष-क्रोधादि वृत्तियाँ उदित हों और फलतः चित्त व्याकुल होने पर रसानुभव ही नहीं हो पाता। तो फिर नाटक में होता है क्या ? इसके प्रत्युत्तर में अभिनव कहते हैं कि ये रामादि कभी हमारे प्रनाण (प्रत्यय) के विषय बन नहीं पाते। जब शास्त्र या इतिहास में उनका शाब्दिक वर्णन किया जाता है तब रामायण जैसे किसी महावाक्य में से उनका विशिष्ट व्यक्ति के रूप में बोध होता है, फिर भी विशेष व्यक्ति वर्तमान रूप में प्रतीत हों तो ही उनमें अर्थक्रिया के सामर्थ्य वाला स्वतन्त्र व्यक्तित्व (स्वालक्षण्यम्) प्रकट होता है। परन्तु यह वर्तमानता उनमें होती नहीं है, अतः उनके विशेष व्यक्तित्व को स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं है अथवा यह व्यक्तित्व बाधा रूप सिद्ध होता नहीं है। अर्थात् उनका साधारणीकरण हो सकता है। यह बात समझाते हुए श्री० नोली कहते हैं कि रामादि के विशेष नाम रूप की अर्थात् स्थलकालादि विशिष्ट स्वरूप की हमें प्रतीति होती है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हमें साधारण रूप (भाव) से इनकी प्रतीति हो ही नहीं सकती। कोई व्यक्ति आदि जब हमारे समकालीन होते हैं अर्थात् हमारे अपने व्यक्तित्व के वर्तमान और

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२६ अभिनव का रस-विवेचन लौकिक स्वार्थ से जुड़े हुए होते हैं, तभी हमारे जीवन में उनका प्रवेश होने लगता है। अर्थात् वे अर्थक्रिया सम्पन्न होते हैं। जब ये व्यक्ति हमारे समकालीन नहीं होते तब वे स्वाभाविक अर्थक्रिया सम्पन्न भी नहीं होते। कलानुभव में वे वास्तविकता एवं अवास्तविकता के ख्याल ( विचार) से मुक्त होते हैं, अतः साधारण भाव से उनकी प्रतीति होती है। इस अर्थ में उनका वैशिष्ट्य साधारण्य का विरोधी नहीं है; मतलब यह कि उनका वैशिष्ट्य स्थायी बने रहने पर भी इनकी साधारण भाव से प्रतीति हो सकती है। अभिनवगुप्त आगे कहते हैं कि काव्यों में भी हृदय में विभावादि का ऐसा साधारणीभाव उत्पन्न होता है। केवल सभाओं में भी ऐसा साधारणीभाव संभव है, फिर भी 'जो ऐसा करता है, उसे ऐसा फल मिलता है।' ऐसे वाक्य की तरह उसमें रंजनातिशय का अभाव होने से उसमें चित्तवृत्ति की तल्लीनता हो नहीं पाती।' परन्तु काव्य में तो उसके शब्दार्थ गुणालङ्कारों से मनोहर बनने के कारण लोकोत्तर रस ही उसके प्राणभूत होते हैं और इसलिए हृदय-संवाद के कारण उसमें चित्तवृत्ति की निमग्नता, तल्लीनता हो सकती है। किन्तु सभी को उसमें साक्षात्कार जैसी अनुभूति होती नहीं है। नाटक में यह मुसीबत नहीं होती। नाटक में तो 'आज तो मुझे कुछ सच्चा काम करना ही चाहिए।' ऐसे उद्देश्य का लेश मात्र भी नहीं होता। उसके स्थान पर 'आज मैं समस्त परिषद् को एक-सा आनंद देनेवाला व अंत में सांसारिक विषयों के प्रति विरसता जगाने वाला आदरणीय लोकोत्तर पदार्थ देख पाऊँगा।' ऐसा इरादा होता है। और इसके कारण सामाजिक नाटक में आये हुए गीत-वाद्य की चर्वणा से सांसारिक भाव भूल जाता है, और उसका हृदय स्वच्छ दर्पण जैसा बन जाता है। और इसलिए वह चतुर्विध अभिनय को देख कर जगे हुए प्रमोद-शोकादि भावों में तन्मय बन जाता है, अभिनेय नाटक के पाठ सुन कर वह अपने से भिन्न पात्र में प्रविष्ट हो जाता है। और इस प्रकार उसे राम- रावणादि का ज्ञान होता है। इसमें देशकाल की मर्यादा नहीं होती और सम्यक्- मिथ्या-संशय-संभावना आदि के ज्ञान-विषयों से वह मुक्त होता है। इस ज्ञान के संस्कार गीत-वाद्य और स्त्रियों के प्रत्यक्ष अनुभव के संस्कारों से व्यंजित होते हैं। और ये आनंद- दायक वस्तुएँ ही इन संस्कारों के बनाये रखने में कारणभूत होती हैं। भावक रामादि के ज्ञान के संस्कारों वाला बन जाता है। और चमत्कारपूर्वक प्रस्तुत होनेवाले उसके चरित्र में अपने आप को भुला कर तल्लीन हो जाता है। और स्वयं रामादि हों इसी भाव से विश्व को देखने लग जाता है। इससे सभी सामाजिक 'ऐसा करे उसे ऐसा फल प्राप्त होता है।'-ऐसी संवेदना का अनुभव करते हैं। यह संवेदना देश-काल के विशेषणों से मुक्त होती है। इसका उपरंजन करने वाले प्राणप्रिय के-से रसास्वादन के साथ रम्य गीत-वाद्य के संस्कार मिल जाते हैं और हृदय में बाण की तरह ऐसे गड़

१. आचार्य विश्वेश्वर यहाँ भिन्न पाठ की कल्पना करके भिन्न ही अनुवाद करते हैं।

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जाते है कि सैंकड़ों प्रयत्न करने पर भी इन्हें निकाला नहीं जा सकता या म्लान नहीं किया जा सकता। अतः जिस भावक को यह संवेदना प्राप्त हुई हो वह सदैव उसके चित्त में जाग्रत रहती है और अपने में शुभ का आचरण करने और अशुभ का त्याग करने की सदैव वृत्ति होने के कारण वह शुभ का आचरण करता है, अशुभ का त्याग करता रहता है। इसलिए यह अनुकीर्तन अथवा अनुव्यवसाय विशेष, जिसे नाट्य भी कहते हैं, अनुकरणरूप है ऐसा मानने की भूल न करनी चाहिए। क्योंकि उसमें भाँड़ (नट) ने राजपुत्र की अथवा किसी अन्य की नकल की है, ऐसा कुछ नहीं लगता। यह नकल तो विकृति= विकार है और केवल मध्यस्थों को ही हँसाती है। इसीलिए तो भरत ने बाद में सप्तम अध्याय के दसवें श्लोक में कहा है कि परचेष्टानुकरणाद् ह्रासः समुपजायते। दूसरों की चेष्टा का अनुकरण करने से हास्य उत्पन्न होता है, और यह हास्य जिसका मजाक उड़ाया गया हो उसके पक्षधर व्यक्तियों में द्वेष, असूया और निवृत्ति आदि पैदा करता है। यहाँ दैत्यों ने भी 'देवों ने हमारा मजाक उड़ाया' ऐसा मान कर ही हृदय-क्षोभ अनुभव किया था। मजाक के कारण ही वे विरत हुए थे, नाटक में भाग लेने से रुक गये थे, किसी के कहने से नहीं। इसके विरुद्ध अनुकृतिवादी कदाचित् ऐसा कहेंगे कि नाटक में कथानक से लेकर सभी बातों का साधारण्य होता है, यह स्वीकार्य है। यह भी स्वीकार्य है कि उसमें कोई भी बात व्यक्ति सम्बद्ध नहीं होती। परन्तु केवल इतने आधार पर ही ऐसा किस प्रकार कहा जा सकता है कि नाटक में अनुकरण ही नहीं होता। नाटक में नियत अथवा विशिष्ट व्यक्ति का अनुकरण भले ही न हो परन्तु उसमें अनियत का अनुकरण क्यों कर न होगा ? इसके प्रत्युत्तर में अभिनव गुप्त कहते हैं कि आपत्ति यही है कि यह वस्तु असंभव है। अनुकरण अर्थात् सदृशकरण। प्रश्न यह है कि किसका सदशकरण है ? रामादि का तो नहीं ही। क्योंकि उनका अनुकरण तो हो ही नहीं सकता है। अतः प्रमदादि विभावादि का अनुकरण हो नहीं सकता है, इस बात का स्वीकार किये बिना कोई चारा नहीं है। इसी प्रकार, शोक, क्रोधादि चित्तवृत्तियों का भी सदशकरण नहीं हो सकता। नट राम के शोक की मिलती-जुलती पद्धति से शोक करता नहीं है, क्योंकि उसमें तो शोक का सर्वथा अभाव है। और कहें कि उसमें शोक होता है तो फिर वह अनुकरण नहीं रह जाता। और शोक जैसी अन्य कोई वस्तु भी नहीं होती अतः नट तो केवल अनुभाव ही प्रकट करता है। परन्तु वे अनुभाव भी सजातीय होते हैं, तत्सदृश होते नहीं। जो वस्तु साधारण रूप हो उसके साथ दुनिया में किस चीज का सादृश्य हो सकता है ?' १. सजातीय और रुदश-इन दोनों का अंतर समझ लेना चाहिए। सजातीय अर्थात् एक जाति के। सभी गायें अथवा सभी मनुष्य सजातीय हैं। जाति नित्य धर्म है और अनेक पदार्थों में स्थित हो सकतो है। नित्यत्वे सति अनेक समवेतत्वं जातिः। उसी को सामान्य भी कहते हैं।

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२८ अभिनव का रस-विवेचन

सादृश्य तो विशिष्ट और समकालीन पदार्थों का ही हो सकता है। कभी-कभी नियत पदार्थों का समय के अन्तर से भी अनुकरण किया जा सकता है किन्तु अनियत का तो अनुकरण संभव ही नहीं है। अतः नाटक अनियत का अनुकरण है, ऐसा मानने की भूल नहीं होनी चाहिए। हमारे उपाध्याय ने (भट्ट तौत ने) 'काव्य कौतुक' में भी यही मंतव्य (अभिमत) प्रकट किया है। इन सब का अर्थ यह हुआ कि नाट्य अनुव्यवसाय विशेष का विषयभूत कार्य है। १. इसमें विशेष प्रकार की वेशभूषा के कारण यह ज्ञान नहीं टिक पाता कि यह चैत्रमैत्र नामक स्थलकाल विशिष्ट अमुक नट है। परन्तु कम से कम अमुक विशिष्टता के बिना तो प्रत्यक्ष ज्ञान संभवित ही नहीं है अतः उसे रामादि के प्रसिद्ध नाम से पह- चाना जाता है। रामादि आदरणीय चरितवाचक प्रसिद्ध नाम होने के कारण भावक में संभावना विरह का निराकरण हो जाता है और इसी कारण यह अनुव्यवसाय प्रत्यक्ष- वत् हो जाता है। २. दृश्य अभिनीत हो रहा हो उस वक्त आह्लादक गीत इत्यादि का उसमें सहयोग होता है फलतः वह चमत्कार पूर्ण बन जाता है और उसमें हृदयानुप्रवेश की क्षमता आ जाती है। ३. चतुर्विध अभिनयों के कारण नट का स्वरूप आच्छादित हो जाता है। ४. प्रस्तावना इत्यादि के कारण यह सत्य नहीं मगर नट का कार्य-नाटक है, ऐसा बोध-संस्कार सहायभूत बन जाता है। इस प्रकार सारी रंजक सामग्री में नट का अनुप्रवेश हो जाता है, उसका सत्य स्वरूप आच्छादित हो जाता है, और उसे देख कर पूर्व के प्रत्यक्ष अनुमानादि संस्कार- युक्त, सहृदय, हृदय-संवाद के कारण तलीन हो जाने की क्षमता वाले सामाजिक में एक अनुव्यवसाय जगता है, उसका स्वरूप सुख-दुःखादि चित्तवृत्तियों से चित्रित अपने संवित्प्रकाश से प्रकाशित, आनंदमय व विचित्र होता है।१ यही रसन, आस्वाद, चमत्कार, चर्वणा, निर्वेश, भोग इत्यादि नामों से पहचाना जाता है। और उसमें जो वस्तु प्रत्यक्ष होती है, वही नाट्य है। उस अनुव्यवसाय में प्रत्यक्ष होनेवाली वस्तु केवल ज्ञानाकार रूप होती है या नित्यमेकानुगतं सामान्यम्। सजातीय पदार्थ भिन्न-भिन्न कालवर्ती भी हो सकते हैं। कृष्ण की गाय और आज कल के कानजी गवाले की गाय दोनों सजातीय कही जा सकती हैं। इसी प्रकार राम का शोक और आज के किसी व्यक्ति का शोक दोनों शोकत्व की समानता के कारण सजातीय कहे जाएँगे। 'सदश' शब्द का अर्थ है 'समान आकृति वाला'। समान आकृति तो दो विशेष एवं समकालीन पदार्थों की ही हो सकती है। राम का शोक आज विद्यमान नहीं है अतः आज उसका सादृश्य भी संभव नहीं है। सादृश्य केवल विशेष पदार्थों में ही संभव है, सामान्य में नहीं। अतः अभिनवगुप्त ने कहा है कि जो साधारण सामान्य रूप है, इसके साथ जगत् में किसका सादृ्श्य होगा ? १. आचार्य विश्वेश्वर के अनुवाद में यह भाग छूट गया है।

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अभिनव का रस-विचार २९

आरोप रूप होती है या सामान्यात्मक होती है, या तत्कालनिर्मित रूप होती है-उसकी चर्चा में उतर कर और अन्य दर्शनों का अपना ज्ञान प्रकट करने के लिए प्रस्तुत चर्चा में विघ्नरूप बननेवाली बातें लिखकर हम सहृदयों को उबाना नहीं चाहते। अर्थात् अनुव्यवसायात्मक अनुकीर्तन, विकल्परहित संवेदन नाट्य है।१ नाट्य में इस संवेदन का अनुव्यवसायात्मक निर्विकल्प प्रतीति द्वारा होता है। इस प्रकार नाट्य अनुकरण नहीं है।2 फिर भी मूल पात्रों का लौकिक व्यवहार उसमें किया जाता है अतः उसे अनुकरण कहना हो तो कहें, इसमें कोई दोष नहीं है। दोनों वस्तुएँ भिन्न हैं, इतना समझ लेने के बाद इसके लिए कौन-सा शब्द प्रयोग किया जाय इस विषय में मतभेद नहीं होना चाहिए। भरत ने नाटक को 'लोक वृत्तानुकरण' कहा है, वहाँ उसका अर्थ 'लोकवृत्तानु- सरण'-ऐसा करना है। उन्हें कहना यह है कि नाट्य लोकवृत्तानुसारी होता है। परन्तु लोकवृत्त का दर्शन कराना हो तो किसी आश्रय के बिना केवल तात्विक रूप में नहीं कराया जा सकता। अतः कवि पात्र रूप आश्रय का निर्माण करता होता है। लोकवृत्त के जिस विशिष्ट अंग का दर्शन कराना होता है उसके लिए प्रारंभ से ही रामादि किसी ऐतिहासिक या पौराणिक व्यक्ति प्रसिद्ध हो तो उसी व्यक्ति का, कवि परंपरा के रूप में उपयोग करता है या आश्रय लेता है। एतदुक्तं भवति-लोकवृत्तानुसारेण यत इयं नाट्य क्रीडा लोके च धर्मादयोऽनाश्रया न संवेद योग्यः तेन धर्मादि विषये यो यथा प्रसिद्धा रामादिः स शब्द मात्रोपयोजित्वेन मुख्यया प्रणालिकया गृहीतः । (हिं० अभिनव भारती, पृ० २१०) इस प्रकार नाटक में उस-उस (तद् तद्) व्यक्ति का अनुकरण नहीं होता परन्तु उस-उस पात्र के आधार पर लोकवृत्त का अनुसरण होता है। नाटक को लोकानुकरण कहने में मूल कल्पना सदशकरण की नहीं किन्तु लोकानुसरण की है, यह बात कभी भूलनी नहीं चाहिए, ऐसा भट्टतौत का कहना है। परवर्ती आचार्यों ने तो शकुक के मत का जो दुर्बलतम अंश था-'रस प्रतीति अनुमानात्मक है'-उस पर ही आक्रमण किया और कहा कि प्रत्यक्ष ज्ञान ही चमत्का- रक होता है, अनुमानात्मक ज्ञान नहीं, और शंकुक के मत में स्थायी का अनुमान ही रस है, ऐसा कहा गया है, जो किसी प्रकार स्वीकार किया नहीं जा सकता। एतदपि अह्रदग्राही, यतः प्रत्यक्षमेव ज्ञानं सचमत्कारं नानुमित्यादिरिति लोक प्रसिद्धिवधू यान्यथा कल्पने मानाभावः ।-गोविंद

सांख्यों का सुख-दुःखवाद इसके पश्चात् अभिनवगुप्त सांख्यों के सुख-दुःखवाद का खंडन करते हैं। उनका कहना है कि नाटक में विभावादि के रूप में प्रस्तुत होती विषय-सामग्री बाह्य ही है, १. यह पाठ हिन्दी अभिनव भारती के अनुसार ग्रहीत है। २. यह वाक्य आचार्य विश्वेश्वर के अनुवाद में छूट गया है।

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३० अभिनव का रस-विवेचन और उसे ही रस कहते हैं, अतः उस सामग्री का स्वभाव ही सुख-दुःख उत्पन्न करना होने से रस भी सुख-दुःखात्मक ही होता है। उनके मतानुसार इस सामग्री में विभाव दल अर्थात् उपादान स्थानीय है। उस पर अनुभाव और व्यभिचारी भावों का संस्कार होने पर इन तीनों की सामग्री-अर्थात् संयोग में से सुख-दुःख स्वभाववाला आंतर स्थायी उत्पन्न होता है और उसे ही रस कहते हैं। इसके विरुद्ध दो आपत्तियाँ उठाई जाती हैं। एक तो यह कि यदि यह मत स्वीकार करें तो 'स्थायि भावान् रसत्वमुपनेष्यामः ।' आदि सूत्र का अर्थ करते समय लक्षणा का आश्रय लेना पड़ेगा। लौकिक दृष्टि से जो स्थायीभाव हैं उन्हें रसत्व किस प्रकार प्राप्त कराया जाय यह हम दिखाएँगे-ऐसा इस सूत्र का अर्थ होता है परन्तु स्थायीभाव ही रस है ऐसा इस मत में कहा गया है, अतः यह अर्थ नहीं लिया जा सकता। और लक्षणा का आश्रय लेना पड़ता है। सूत्र का अर्थ करने में ही लक्षणा का आश्रय लेना पड़े यह दोष समझा जाता है। अतः अभिनव गुप्त ने यहाँ कटाक्ष में लिखा है कि जिन्होंने इस सूत्र का अर्थ करने में लक्षणा का आश्रय ग्रहण किया उन्होंने मूल ग्रंथ से अपना विरोध स्वीकार कर लिया है तथा हमारे जैसे प्रामाणिक व्यक्तियों को ऐसी प्रकट भूल बताने की मूर्खता से बचा लिया है। इसके लिए उनका जितना आभार प्रकट किया जाय उतना अच्छा है। इसके अतिरिक्त दूसरी आपत्ति यह है कि सुख-दुःख स्वभाव वाले बाह्य विषय ही यदि रस हैं तो एक ही बाह्य विषय एक को सुखद और दूसरे को दुःखद लगने की संभावना है। यों एक ही रस की प्रतीति में वैषम्य उत्पन्न होगा, अर्थात् एक ही रस की प्रतीति भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न रूप में होगी। अतः यह मत स्वीकार करने योग्य नहीं है। अभिव्यं जनावाद इसके बाद अभिनव गुप् ने भट्ट नायक के मत की चर्चा की है। परन्तु भट्टनायक ने आनंदवर्द्धन के अभिव्यंजनावाद का भी विरोध किया है, अतः ऐतिहासिक क्रम की रक्षा के लिए और विवेचन को ठीक-ठीक समझने के लिए हम अभिव्यंजनावाद का संक्षिप परिचय प्राप्त कर लेवें। ध्वनिवादियों के विचार से काव्य का अर्थ कुछ तो वाच्य और कुछ तो प्रतीयमान होता है। इस प्रतीयमान अर्थ का बोध प्रतिभाशील पाठकों को अभिधा लक्षणा और तात्पर्य के अतिरिक्त काव्य में ही व्यापारवती व्यंजना नामक शक्ति द्वारा होता है।२ यह तीन प्रकार का होता है; वस्तु रूप, अलंकार रूप, और रसादि रूप। वस्तु और अलंकार का पर्यवसान रस में ही हो जाता है अतः रस ही काव्य का मुख्य अर्थ है,

१. आचार्य विश्वेश्वर जरा भिन्न रीति से अर्थ करते हैं। २. देखिए, टिप्पणी २।

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अभिनव का रस-विचार ३१

और वही आत्मा है। वस्तु एवं अलंकार शब्द वाच्य बनते हैं परन्तु रसादि स्वप्न में भी कभी स्वशब्द वाच्य बनता नहीं है। कवि शब्दों के द्वारा तो केवल विभावादि का ही वर्णन कर सकता है। शब्दसमर्पित इन विभाव आदि का साधारणीभाव से ग्रहण होने पर भावक के चित्त में वासना रूप स्थित स्थायीभाव जाग्रत होता है। और उससे चित्रित होकर भावक के संवित् के आनंदमय चर्वणा-व्यापार से रस आस्वादित किया जाता है। यह केवल काव्य-व्यापार से ही अनुभव गोचर हो सकता है। यस्तु स्वप्नेऽपि न स्वशब्द वाच्यो न लौकिक व्यवहार पतितः किन्तु शब्द समर्प्यमाण हृदयसंवाद सुन्दर विभावानुभावसमुचितप्राग्विनिविष्ट रत्यादिवासनानुराग सुकुमार स्वसंविदानन्दचर्वणा- व्यापार रसनीय रूपो रसः, स काव्य व्यापारैक गोचरो रसध्वनिरिति.स एव मुख्यतयात्मेति।-ध्वन्यालोक लोचन, पृ० ५१-५२ । अर्थात् उनके विचार से स्थायी- भाव के साथ विभावादि के संयोग की स्थिति अर्थात् व्यंग्य-व्यंजक सम्बन्ध होने पर रस अभिव्यक्त होकर आस्वादित होता है। इस प्रकार उनके मतानुसार 'संयोग' का अर्थ 'व्यंग्य व्यंजक रूप सम्बन्ध' और निष्पत्ति का अर्थ अभिव्यक्त होता है। अभिनव गुप्त स्वयं अभिव्यंजनावादी ही है और यह मत उन्होंने आगे विस्तार से स्थापित किया है। भट्ट नायक का मत भट्ट नायक कहते हैं कि रस न तो उत्पन्न होता है, जैसा कि लोलट मानते हैं; न ही प्रतीत या अनुमित ही होता है जैसा कि शंकुक मानते हैं; और न ही वह अभिव्यक्त होता है जैसा कि आनंदवर्द्धन मानते हैं। यदि मानें कि रस प्रतीत होता है, तो वह या तो स्व-गत रूप में प्रतीत होगा या पर-गत-रूप में। स्व-गतरूप में उसे प्रतीत होता हुआ मान लें तो करुण रस की प्रतीति के अवसर पर दुःखानुभव होना चाहिए। जो वस्तुतः होता नहीं है। यदि यह मान लें, रस आत्मगत रूप में प्रतीत होता है तो यह स्वीकारना ही पड़ेगा कि रसोत्पत्ति भावक के अपने मन में होती है। क्योंकि १. भावक सीतादि को अपने विभावादि के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता और २. यह भी संभव नहीं होता कि उसे उस समय अपनी पत्नी का स्मरण होता है। ३. देवादि के प्रति हममें जो पूज्य बुद्धि है उसके कारण उनका साधारणीकरण नहीं हो सकता।१ इसके अलावा ४. समुद्र लंघन आदि कार्यों १. साधारण्य यह रसानुभव की मुख्य विशेषता है। विभावादि जो घटनाओं या तथ्यों के द्वारा निमित हैं, उनका किसी विशिष्ट व्यक्ति के साथ कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं होता है। उसी प्रकार अन्य किसी प्रकार के लगाव भी नहीं होते। जैसा कि मम्मट कहते हैं-जो वस्तु प्रस्तुत की जा रही हो उसके सम्बन्ध में हमारे मन में ऐसा भाव नहीं होता कि 'यह मेरा ही है' अथवा 'यह मेरा ही नहीं है'; 'यह तटस्थ का ही है।' या 'यह तटस्थ का ही नहीं है।'; 'यह शत्रु का है' या 'यह शत्रु का ही नहीं है।' अतः साधारण्य का अर्थ प्रस्तुत होने वाले विभा- वादि के साथ ऐसा तादात्म्य जिसमें कोई स्वार्थ न हो। और इस दृष्टि से जिसका संकुचित अहम् के साथ कोई सम्बन्ध न हो। अर्थात् जो निजी न हो। इसी कारण से विभावादि लौकिक

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में ऐसी अलोकसामान्यता है कि उनका भी साधारणीकरण संभव नहीं है। ५. ऐसे पराक्रमशील राम की स्मृति भी संभव नहीं है, क्योंकि राम को किसी ने प्रत्यक्ष देखा नहीं है। शब्द प्रमाण तथा अनुमान आदि द्वारा यह प्रतीति होती है, ऐसा मान लें तो भी उससे रसानुभूति होना संभव नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा मान लें तो लौकिक घटना देख कर भी रसास्वाद संभव है, ऐसा मानना पड़ेगा। जब कि वस्तुतः होता यह है कि नायक-नायिका का प्रत्यक्ष व्यवहार देख कर चित्त में उलटे लजा, जुगुप्सा, स्पृहा आदि दूसरी-दूसरी वृत्तियाँ जगती हैं और चित्त व्यग्र बन जाता है तथा रसास्वाद के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती है। और यदि ऐसा मान लें कि यह प्रतीति परगत रूप में होती है, तो भावक तटस्थ ही रहेगा और फलतः आस्वाद संभव ही नहीं होगा। अतः इससे स्पष्ट होता है कि रस की प्रतीति को प्रत्यक्ष अनुभव या स्मृति रूप मानना ठीक नहीं है। रस उत्पन्न होता है, ऐसा मानने में भी ये ही सब आपत्तियाँ आवेंगी। रस प्रथम से वासना रूप में स्थित है और वासना रूप में अभिव्यक्त होता है, ऐसा मान लें तो कठिनाई यह आती है कि शक्ति रूप में रहे इस रस को अभिव्यक्त होने के लिए जिन-जिन विभावादि की जरूरत होती है वे न्यूनाधिक मात्रा में प्राप्त हों और उसी अनुपात में रस की अभिव्यक्ति में न्यूनाधिकता आ ही जाएगी।१ अथवा

कारण कार्य आदि से अलग-अलग होते हैं। सामान्य जीवन में जो रति, शोक या क्रोध की अनुभूति होती है, वही वाव्यानुभव के समय नितान्त भिन्न स्वरूप में प्रकट होती है। जीवन में प्रेम प्रसंग का दर्शन, देखनेवाले में, उसके पात्रों के साथ उसके सम्बन्ध के मुताबिक क्रोध, ईर्ष्या, जुगुप्सा, आदि भाव जगाता है। यदि इन प्रसंगों में लीन पात्रों या उनके व्यवहार के प्रति वह उदासी रहे तो वह तटस्थ रहा कहा जाएगा। यह भी रसानुभव के नितान्त विप- रीत बात हुई। क्योंकि रसानुभव में तो प्रस्तुत होते वस्तु में भावक का अनुप्रवेश होता है। वही दृश्य रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाय तब सभी प्रकार के विशेष सम्बन्धों से मुक्त होता है। और उसमें क्रोध, जुगुप्सा आदि बाह्य विघ्न भी नहीं होते। भावक को सामान्य जीवन की भाँति न कुछ प्राप्त करने या खोने का प्रयोजन भी नहीं होता। वह तो केवल रसानुभव में ही लीन हो गया होता है। अन्य किसी वस्तु का उसे पता नहीं होता। काव्यवाणी से सिद्ध होते माधारण्य के परिणामस्वरूप उसका परिमित प्रमातृत्व भेदा जा चुका होता है और तज्जन्य सभी विघ्न भी दूर हो गये होते हैं। १. 'लोचन' पर 'बालप्रिया' टीका में पंडित रामषाटक इस वाक्य को ईषत् भिन्न रीति से समझाते हैं। वे कहते हैं, जिस प्रकार अँधेरे में स्थित घटादि की अधिकाधिक अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य अधिक से अधिक प्रकाश की प्राप्ति के लिए प्रवृत्त रहता है, उसी प्रकार वासनादि के रूप में स्थित रत्यादि की अधिकाधिक अभिव्यक्ति के लिए उसके उपायभूत विभावादि की अधिक से अधिक प्राप्ति के लिए सहृदय प्रवृत्त होंगे ही। यहाँ तात्पर्य यह है कि अधिक से अधिक विषयों का अनुभव प्राप्त करने से वासना की एक दम (सदः) अभिव्यक्ति संभव होती है। यथा अन्धकारस्य घटादेरधिकाधिकाभिव्यक्तये तदुपायभूतालोकस्याधिकाधिकस्यार्जने जनानां प्रवृत्तिः तथा वासनात्मतया अन्तः स्थितस्य रत्यादेरधिकाधिकाभिव्यक्तये तदुपायभूतस्य

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यह अभिव्यक्ति क्रमशः होगी, जो स्वीकार किया नहीं जा सकता। इसके अलावा यह अभिव्यक्ति स्वगतरूप में होती है या परगतरूप में यह प्रश्न भी रहेगा ही। यों, उत्पत्ति, प्रतीति या अभिव्यक्ति-एक भी मत स्वीकार किया नहीं जा सकता ऐसा कह कर भट्टनायक अब अपना मत प्रस्तुत करते हैं। काव्य और शास्त्र दोनों शब्दार्थ रूप होने पर भी, दोनों में शब्दार्थ का कार्य भिन्न-भिन्न होता है। काव्य में वाच्यार्थ, रस और वाचक इन तीन का संबंध होता है।१ और इसके अनुसार काव्य में व्यवहृत शब्द की शक्ति के तीन अंश होते हैं। वाच्यार्थ की दृष्टि से शब्द में अभिधायकत्व अर्थात् अभिधाव्यापार होता है। रस की दृष्टि से शब्द में भावकत्व अर्थात् भावना व्यापार होता है और सहृदय की दृष्टि से शब्द में भोगकृत्व अर्थात् भोगीकरण व्यापार होता है। और काव्य के शब्द की अभिधाशक्ति भी शास्त्रादि में प्रयुक्त शब्द की अभिधा शक्ति जैसी शुद्ध नहीं होती। उसमें भावना एवं भोगीकरण-इन दो वृत्तियों का संमिश्रण होता है। ऐसा यदि न मानें, और काव्य में तथा शास्त्र में शब्द की बोध शक्ति (अभिधा) समान ही होती है ऐसा मान लें तो तन्र्र अर्थात् जिसमें दो-दो अर्थ करने पड़ते हैं ऐसे शास्त्र नियम और श्लेषालंकार के बीच कोई भेद ही न रहेगा और उपनागरिकादि वृत्तियों का वैचित्र्य अर्थ ही न बन जाएगा। इसी प्रकार श्रुतिदुष्टादि दोषों के परिहार का भी कोई अर्थ न रहेगा। किं त्वन्यशब्दवैलक्षण्यं काव्यात्मनः शब्दस्य व्र्यंशताप्रसादात्। तत्राभिधायकत्वं वाच्यविषयम्, भावकत्वं रसादिविषयम्, भोगकृत्वं सहृदयविषयम् इति त्र्ययोंS- शभूता व्यापाराः। तत्राभिधायोगो यदि शुद्धः स्यात्तत्तन्त्रादिभ्यः शास्त्रन्यायेभ्यः श्लेषाद्यलंकाराणां को भेदः। वृत्तिभेदवैचित्यं चाकिञ्चित्करम्। श्रुतिदुष्टादिवर्जनं च किमर्थम् ? पृ० १८२-३ । इस प्रकार काव्य और नाटक दोनों में शब्द की अभिधा शक्ति के अतिरिक्त अन्य दो शक्तियाँ व्यापारवती बनती हैं; भावना अथवा भावकत्व और भोग अर्थात् भोजकत्व। हम जब काव्य पढ़ते हैं अथवा नाटक देखते हैं तब अभिधा द्वारा या

विभावादेरधिकाधिकस्यानुभव रूपार्जने सहृदयानां प्रवृत्तिः प्रसज्येतेत्यर्थः । अधिकाधिकविषया- नुभवे वासनाया झटित्यभिव्यक्ति संभवादिति भावः। पृ० १८२ । १. यह आपत्ति स्फोटवाद के विरुद्ध बौद्धों व मीमांसकों की-सी आपत्ति हैं। शंकुक ने भी रस की ऐसी तरतम अभिव्यक्ति के विरुद्ध आपत्ति उठाई है। यह हम पहले देख चुके हैं। देखिए, पृ० १८। २. भट्टनायक का अब तक का अन्य मत खण्डन से सम्बन्धित भाग लगभग इन्हीं शब्दों में अभिनव गुप्त ने 'लोचन' टीका में भी दिया है। पृ० १८०-८२। उसके बाद का भाग भी वहाँ थोड़े बहुत फेरफार और न्यूनाधिक रूप सहित आता है। मैं अभिनव भारती और लोचन दोनों का उपयोग कर के अब आगे बढ़ता हूँ। प्रारंभ का अंश 'लोचन' से लिया गया है। ३

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३४ अभिनव का रस-विवेचन प्रत्यक्ष अभिनय देखने पर हमें विभावादि का ज्ञान होता है। तत्पश्रात् अभिधा से दूसरी शक्ति भावनव्यापार में आती है और उसके कारण विभावादि का साधारणी- करण और भावक के चित्त के मोहादि का-विध्नों का निवारण होता है।१ काव्य में दोष के अभाव के कारण और गुणों व अलंकारों की स्थिति के कारण तथा नाटक में चतुर्विध अभिनय के कारण ऐसा बनता है। भावना से भावित अर्थात् आस्वाद- योग्य बना रस, अनुभव और स्मृति से भिन्न ऐसे भोग नामक तीसरे व्यापार द्वारा भोगा जाता है। यह भोग सत्त्व, रजस् और तमस् के मिश्रण से वैचित्यमय बना होता है। अर्थात् द्रुति, विस्तार और विकासरूप होता है।२ और यह भावक की स्वसंवित् की विश्रान्तिरूप होता है।१ अर्थात् उसमें अन्य सारा ज्ञान तिरोहित हो चुका होता है। १. कलानुभव के समय भावक का चित्त सभी सांसारिक भावों से मुक्त हो चुका होता है, उसे नाटक की प्रतीति परगतभाव से नहीं होती। उसका परिमित प्रमातृत्व कलानुभव के समय लुप्त हो चुका होता है। और उस क्षण तक के लिए माया का आवरण दूर हो चुका होता है। मोह यह तमोगुण का विशिष्ट परिणाम है। २. आत्मा का अथवा चित्त का प्रकाश सांसारिक जीवन में अपने शुद्ध स्वरूप में प्रकट नहीं होता है। तीन गुणों की छाया उसमें पड़ी होती है। सत्त्वगुण निर्मलता, प्रकाश और सुखरूप है; रजोगुण राग, प्रवृत्ति और दुःखरूप है; और तमोगुण अज्ञान, जड़ता एवं मोहरूप है। ये गुण कभी अकेले नहीं होते हैं। तीनों का न्यूनाधिक मात्रा में संमिश्रण होता है। जब निर्मल सत्त्वगुण का उदय होता है, तब प्रकाश और आनन्द, जो आत्मा के गुण हैं वे अवश्य प्रकट होते हैं। अभिनवगुप्त की 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्तिविमर्षिणी' में कहा है कि-'सत्त्वं प्रकाश- रूपं निर्मलनभप्रख्यं सर्वतो जलदपटलेन इवावरणात्मना तमसा समावृतमास्ते। तत्र च मारुत- स्थानीयं प्रवृत्तिस्वभावं रजः क्रियात्मकतया क्रमेण तमोजलदमसारयतिन्यग्भावयति' अर्थात् सत्त्व प्रकाशरूप और निर्मल आकाश जैसा है, और आवरणरूप तमस् से, बादलों की तरह, चारों ओर से ढँका है। रजस् क्रिया रूप है और इसलिए प्रवृत्ति उसका स्वभाव है। वह पवन की तरह धीरे-धीरे तमस्-बादलों को हटा देता है, गौण बना देता है। इन तीन गुणों के कारण चित्त की तीन अवस्थाएँ होती हैं : सत्त्व के प्राधान्य से विकास, रजस् के प्राधान्य से द्रति और तमस् के प्राधान्य से विस्तार। ये तीन अवस्थाएँ अमुक रसों के साथ जुड़ी हुई हैं। श्रृंगार- करुण और शान्त मैं द्रुति, वीर, रौद्र और बीभत्स में विस्तार, हास, अद्भुत और भयानक में विकास। विशेष के लिए द्रष्टव्य-ध्वन्यालोक, लोचन, पृ० २०६-२१३ । ३. 'विश्रान्ति' का अर्थ है किसी वस्तु में डूब जाना, लीन हो जाना। उस समय ज्ञान के समस्त विषय विगलित हो गये होते हैं (विगलितबेद्यान्तरता)। चित्त में अन्य कोई वृत्ति या इच्छा जग कर विघ्न उपस्थित नहीं करती। रसानुभूति की भाषा में, विशेषरूप से, विश्रान्ति का अर्थ कलाकृति के भावन में लीन हो जाना है और उसके आनन्द में निमग्न हो जाना- ऐसा भी अर्थ होता है। शैव-मत में 'विश्रान्ति' अर्थात् (का अर्थ है) सब कुछ का 'मैं' मैं विरमित हो जाना। जो कुछ है वह सब ही चित्त में विश्राम कर रहा होता है पर चित्त अपने सिवाय अन्यत्र कहीं भी विश्राम करता नहीं है। वह अपने में ही विश्रान्ति पाता है। अतः चित्त की विश्रान्ति का अर्थ है परिमित 'मैं' की परिपूर्ण शुद्ध चित्त में विश्रान्ति। निर्वृत्ति, लय, समापत्ति आदि का भी वही अर्थ होता है।

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अभिनव का रस-विचार ३५ सत्त्व के उद्रेक के कारण वह प्रकाशमय व आनन्दमय होता है। यह आस्वाद परब्रह्मास्वाद के समान होता है।१ तस्मात्काव्ये दोषाभावगुणालङ्कारमयत्वलक्षणेन, नाट्ये चतुर्विधाभिनयरूपेण, निबिड- निजमोहसङ्कटतानिवारणकारिणा विभावादिसाधारणीकरणात्मनाSभिधातो द्वितीयेनांशेन भावकत्वव्यापारेण भाव्यमानो रसोऽनुभवस्मृत्यादिविलक्षणेन रजस्तमोऽनुवेधवैचित्र्य- बलाद् द्रुतिविस्तारविकासलक्षणेन सत्वोद्रेकप्रकाशानन्दमयनिजसंविद्विश्रान्तिलक्षणेन परव्रह्मास्वादसविधेन भोगेन परं भुज्यत इति। तत्पश्चात् अभिनवरुप्त भट्टनायक के 'हृदय-दर्पण' में से दो श्लोक उद्धृत करते हैं जिनमें इनका मत संक्षेप में आ जाता है :- अभिधा भावना चान्या तद्भोगीकृतमेव च। अभिधाधामतां याते शब्दाथीलङ्कती ततः॥ भावनाभाव्य एषोऽपि शङ्गारादिगणो हि यत्। तन्भोगीकृतरूपेण व्याप्यते सिद्धिमान्नरः ॥ अर्थात् अभिधा, भावना और भोगीकरण ये तीन व्यापार हैं। शब्दार्थ और अलङ्कार अभिधा-व्यापार से अभिहित होने के बाद दूसरे भावना-व्यापार से शृङ्गारादि रस भावित होते हैं, और उसीका तीसरे व्यापार से भोग होने पर वह अधिकारी भावक को व्याप्त कर लेता है। रस-निष्पत्ति से सम्बन्धित चर्चा में भट्टनायक का योगदान महत्त्वपूर्ण है। एक तो उन्होंने बताया कि रस का अधिष्ठान भावक का चित्त है। इसके कारण भावक का भी इस क्रिया में अन्तरङ्ग रूप में प्रवेश हुआ। दूसरा उन्होंने बताया कि विभावादि के साधारणीभाव के बिना रसानुभूति सम्भव नहीं है। तीसरा यह कि रसानुभूति की दशा सत्वोद्रेक के कारण प्रकाशानन्दमय है और वह आनन्द ब्रह्मास्वाद जैसा है-ऐसा कह कर काव्यानन्द का स्वरूप समझाया। कलानुभव के विचार से अति महत्त्वपूर्ण ऐसे ये तीन तथ्यों के विषय में उन्होंने नवीन प्रकाश फेंका, और हम देखेंगे कि अभिनवगुस ने थोड़े से परिष्कार-संशोधन के उपरान्त इन तीनों तथ्यों को अपने मत में स्वीकार किया है। भट्टनायक के मत की अभिनवगुप्त द्वारा की गयी समीक्षा इस प्रकार भट्टनायक का मत उद्धत करने के बाद अभिनवगुस कहते हैं कि इस निरूपण में भट्टनायक ने लोलट के जो भी दोष बताये हैं इनका हम भी स्वीकार

१. कलानुभव को ध्यान द्वारा होने वाले ईश्वरानुभव के साथ जोड़ने वाले कदाचित् भट्टनायक प्रथम व्यक्ति ही हैं। कलानुभव का परिमित प्रमातृत्व के साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं हैं। वलानुभव के समय भावक स्वयं जिस कृति का भावन करता होता है, उसमें ही लीन हो चुका होता है। सारा वास्तविक जगत् उसकी दृष्टि से लुप्त हुआ होता है। ध्यान द्वारा होनेवाले ईश्वरानुभव में भी ठीक इस प्रकार होता है इस दृष्टि से कलानुभव ब्रह्मानुभव के जैसे

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नहीं करते; क्योंकि हम लोलट का मत ही स्वीकार नहीं करते अतः उसका पुनः खण्डन करने की स्थिति ही उपस्थित नहीं होती है।१ वैसे प्रतीति आदि से भिन्न ऐसा भोग इस दुनिया में क्या हो सकता है ? यह हमारी समझ में नहीं आता। यह रसनारूप है, ऐसा कहो तो भी वह एक प्रकार की प्रतीति ही हुई। मात्र उसका उपाय भिन्न होने से उसे अलग नाम दिया गया है, दर्शन, अनुमान, श्रुति, उपमिति, प्रतिमान।२ ये सभी नाम भी इसी प्रकार भिन्न उपायों के कारण दिये गये हैं। रस निष्पन्न भी नहीं होता है और अभिव्यक्त भी नहीं होता है। ऐसा कहें तो फिर ऐसा मानना पड़ेगा कि या तो रस नित्य है या उसका अस्तित्व ही

(सविध, सब्रह्मचारी, सहोदर) होता है। भट्टनायक और अभिनवगुप्त (क्योंकि अभिनव- गुप्त भी भट्टनायक का मत स्वीकार करते हैं-देखिए, पृ० १९०, ध्वन्यालोक लोचन : पर- ब्रह्मास्वाद सब्रह्मचारित्वं चास्त्वस्य रसास्वादस्य) फिर भी इन दोनों की विशेषताओं पर बल देते हैं। भट्टनायक कहते हैं (ध्वन्यालोक लोचन, पृ० ९१)। वाग्धेनुर्दुग्ध एतं हि रसं यद् बालतृष्णया। तेन नास्य समः स स्याद् दुह्यते योगिभिहि यः॥ अर्थात्, कला वा आनन्द तो वाणीरूपी धेनु ने अपने बच्चों की तृष्णा-प्रीति के लिए बहाया है, अतः योगी (प्रयत्नपूर्वक) जिस आनन्द को दुह लेते हैं वे उसकी समता कर ही नहीं सकते हैं ; वह और यह दोनों समान हैं ही नहीं। इसी विचार को प्रकट करने वाले भट्टनायक के दो श्लोक महिमभट्ट ने (च्यक्तिविवेक, पृ० ९४) उद्धृत किये हैं : पाठ्यादथ ध्रुवागानात्ततः सम्पूरिते रसे। तदास्वादभरैकाशो हृष्यत्यन्तर्मुखः क्षणम्। ततो निर्विषयस्यास्य स्वरूपावस्थितौ निजः। व्यज्यते ह्रादनिष्यंदो येन तृप्यन्ति योगिनः ॥ अर्थात् नाटक के पाठ और ध्रुवागान से रस को सम्पूर्णता प्राप्त होती है। उसके आस्वाद में एकाग्र बना भावक अन्तर्मुख होने पर उस समय के लिए आनन्दित होता है। इस प्रकार अपने भीतर ही लीन हुआ वह अन्य सब कुछ भूल जाता है और जिससे यौगी तृप्ति का अनुभव करते हैं वह आह्लाद के साररूप आनन्द उसमें झरने लगता है। इन दो स्थितियों का साम्य इन दोनों के नामों में भी दृष्टिगत होता है। दोनों को विश्रान्ति, निर्वृत्ति, लय, निर्देश, समापत्ति, चमत्कार आदि समान संज्ञाओं से पहचाना जाता है। १. आचार्य विश्वेश्वर यहाँ कुछ भिन्न अर्थ करते हैं। २. यहाँ 'प्रतिमान' अथवा प्रतिमा शब्द "भावी की धरना को जान पाने की अगम्य शक्ति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। उसमें सभी शब्द, सभी प्राणियों की भाषा समझने की शक्ति का तथा दैवीदर्शन की शक्ति का भी समावेश होता है।"-दासगुप्त, हि० ई० फि०, खण्ड ५, पृ० १२७ ।

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नहीं है (असत्)। तीसरा कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि जिस वस्तु की प्रतीति नहीं होती उसका अस्तित्व है, ऐसा कहने में कोई तत्व (सार) नहीं है। कदाचित् आप कहेंगे कि रस की प्रतीति ही भोगीकरण है और उसका स्वरूप द्रुति- विस्तार-विकास मात्र होता है। वैसा होगा परन्तु वह तीन रूपों में ही हो यह असम्भव है; क्योंकि जितने रस हैं उतनी ही आस्वादरूप भोगीकरण की प्रतीतियाँ भी हैं। क्योंकि सत्त्वादि गुणों के अङ्गांगी मिश्रण तो असंख्य प्रकार के हो सकते हैं, वह सहज कल्पनीय है। तो फिर भोगीकरण के ये तीन ही प्रकार हैं ऐसा कैसे कहते हैं ? भट्टनायक ने पूर्वाचार्यों का जो खण्डन किया है उसमें 'रस प्रतीत नहीं होता' ऐसा कहा गया है। और प्रतीति या तो स्व-गत है या पर-गत यों दो विकल्प दिखला कर दोनों टिक नहीं सकतीं, ऐसा सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है। यह हम देख चुके हैं। यह खण्डन भट्ट लोलट के उत्पत्तिवाद के सम्बन्ध में तो ठीक है, मगर अभिव्यक्ति वाद के सन्दर्भ में ठीक नहीं है। अतः उसका उत्तर देते हुए अभिनवगुप्त 'लोचन' में कहते हैं कि 'रस प्रतीत नहीं होता' ऐसा तो कहा ही कैसे जा सकता है ? इसे स्वीकार किये बिना कोई चारा ही नहीं कि 'रस की प्रतीति होती है।' रस की प्रतीति यदि न होती हो तो जिस प्रकार हम अप्रतीत पिशाच के विषय में कुछ भी नहीं कह सकते, उसी प्रकार रस के विषय में भी कुछ नहीं कह सकते अतः रस की प्रतीति का अस्वीकार किया नहीं जा सकता। परन्तु इतना अवश्य है कि यह प्रतीति विशिष्ट प्रकार की है। परन्तु यों तो व्यवहार में भी प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, योगी प्रत्यक्ष आदि उपायों से होने वाली प्रतीति भिन्न-भिन्न नामों से पहचानी जाती है। जैसे कि प्रत्यक्ष प्रमाण से होने वाली प्रतीति प्रात्यक्षिकी, अनुमान प्रमाण से होने वाली प्रतीति आनुमानिकी, आप्-वाक्य से होने वाली प्रतीति शाब्द-प्रतीति और योगी-प्रत्यक्ष से होने वाली प्रतीति योगीप्रत्यक्षजा प्रतीति कही जाती है। और इन सभी प्रतीतियों में 'प्रतीतित्व' का धर्म सामान्य होने पर भी उपाय-भेद से उनमें अन्तर पड़ेगा ही। इसी प्रकार चर्वणा, आस्वादन, भोग, समापत्ति, लय, विश्रान्ति, आदि नामों से पहचानी जाने वाली प्रतीति भी उपाय-भेद से अन्य प्रतीतियों की अपेक्षा भिन्न ही होंगी, कारण कि उसकी विभावादि सामग्री लोकोत्तर हैं। ये विभावादि हृदय-संवाद उत्पन्न कर सकते हैं, यही उनकी लोकोत्तरता है। इस प्रकार ये-प्रतीति के उपाय अलौकिक हैं अतः इस प्रतीति का स्वरूप भी अलौकिक है। रस अभिव्यक्त होता है, इस मत के साथ भट्टनायक ने यह आपत्ति उठायी कि, यदि यह मत स्वीकार करें तो रस प्रारम्भ से ही सिद्ध होता है-ऐसा स्वीकार करना पड़ेगा। इसका उत्तर अभिनवगुप्त 'लोचन' में इस प्रकार देते हैं कि "रस प्रतीत होते हैं।" ऐसा जो हम कहते हैं वह 'वह चावल पकाता है' के जैसा प्रयोग है। जैसे चावल ही पक कर भात बन जाता है, इसे ध्यान में रख कर ही चावल पर भात का आरोप किया जाता है, उसी प्रकार आगे होने वाली प्रतीति का विषय होने से 'रस प्रतीत

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होते हैं।' ऐसा प्रयोग किया जाता है। वस्तुतः तो, रस प्रतीयमान ही होता है- प्रतीयमान एव हि रसः । मतलब यह कि जब वह प्रतीत होता है, तभी रस है। अर्थात् प्रतीति ही रस है। रस और प्रतीति दो भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। यह प्रतीति आस्वादरूप विशिष्ट है और इसीलिए वह लौकिक अनुमान-प्रतीति से भिन्न प्रकार की ही होती है। फिर भी लौकिक अनुमान-प्रतीति की सहायता की उसे अपेक्षा है। इसी प्रकार लौकिक शाब्द-प्रतीति से वह भिन्न है। फिर भी उपाय के रूप में उसे उसकी अपेक्षा रहती है। तात्पर्य यह कि सहृदय को अपनी व्युत्पत्ति के लिए लौकिक अनुमान और शाब्द-प्रतीति की आवश्यकता रहती है; क्योंकि इस प्रकार व्युत्पन्न व्यक्ति को ही रस-प्रतीति हो सकती है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि रस-प्रतीति भी इन लौकिक प्रतीतियों की सी ही है।

तत्पश्चात्, भट्टनायक ने ऐसा जो कहा कि 'रामादि लोकोत्तर पुरुषों का चरित्र काव्य में पढ़ने या नाटक में देखने पर उसके साथ हृदय-संवाद साधित नहीं हो पाता'-यह तो महान् साहस किया है ऐसा कह कर अभिनवगुत् योगसूत्र में से दो सूत्र उद्धृत करते हैं और कहते हैं कि वासनाएँ तो अनादि हैं और इसीलिए एक ही आत्मा द्वारा धारण किये गये दो भिन्न शरीरों के बीच जाति, देश, काल आदि का व्यवधान होने पर भी स्मृति एवं संस्कारों की एकरूपता के कारण उसकी निरन्तरता बनी रहती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब कोई बच्चा जन्म लेता है तब जन्म लेते ही वह अपनी योनि के अनुरूप प्रवृत्तियाँ कैसे करना शुरू कर देता है ? सामान्य नियम यह है कि हमारी प्रवृत्ति अनुभवों के आधार पर होती हैं। प्रथम कभी भूख लगने पर दूध पीकर उसका उपशमन न किया गया हो तो भूख लगने पर दूध पीने से उसका उपशमन होता है, ऐसा ज्ञान ही हमें नहीं होता। फिर भी बच्चा जन्म लेते ही भूख लगने पर स्तन-पान करने की प्रवृत्ति करने को प्रेरित होता है, इसका स्पष्टीकरण इन योगसूत्रों के आधार पर ऐसा है कि बच्चा जन्म-मरण के अनन्त प्रवाह में कभी इस योनि में उत्पन्न हुआ होगा और तब का उसका अनुभव संस्काररूप में अथवा वासना- रूप में उसमें पड़ा होता है, अतः पुनः योनि के शरीरादिरूप व्यंजकों की सहायता से वह प्रगट होता है, और बच्चे में अनुरूप प्रवृत्ति की प्रेरणा जगती है। इसी प्रकार रामादि का चरित्र काव्य में पढ़ने अथवा नाटक में देखने पर उसके अनुरूप सहृदय की वासना या संस्कार उदित होना असम्भव नहीं है। अतः रामादि लोकोत्तर पात्र और उनके लोकोत्तर का्यों के साथ भावक का हृदय-संवाद अवश्य हो सकता है।

भट्टनायक ने भावना और भोगीकरण नामक जो दो वृत्तियों का कल्पन किया है, उनके सम्बन्ध में अभिनवगुप्त 'लोचन' टीका में कहते हैं कि रस-प्रतीति के लिए शब्द और अर्थ का अभिधा से भिन्न ऐसा व्यंजनात्मक ध्वनन नामक व्यापार ही उपयोगी होता है। अतः आप जिसे भोगीकरण कहते हैं, वह काव्य का रस-विषयक

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ध्वनन-व्यापार ही है। इसके सिवा कुछ भी नहीं है। तात्पर्य यह है कि ध्वनन-व्यापार द्वारा अभिव्यक्त किया गया रस ही रस का भोगीकरण है। और आप जिसे भावना अथवा भावक वृत्ति कहते हैं वह उचित गुणालङ्कार परिग्रह-रूप ही है। मतलब यह कि समुचित गुणालङ्कार योजना ही आपका भावकत्व व्यापार है। इसमें नवीन क्या है ? आप जो यह कहते हैं कि, काव्य रस का भावक अर्थात् उत्पादक है, इससे तो आप स्वयं जिसे खण्डित कर चुके हैं उस उत्पत्तिवाद को पुनः जीवित कर रहे हैं। काव्य के शब्द ही केवल रस के निष्पादक हैं, ऐसी बात नहीं है; क्योंकि यदि अर्थ समझ में न आवे तो रस निष्पन्न नहीं होता है। अतः अर्थ भी रस-निष्पादक है। इसी प्रकार केवल अर्थ भी रस-निष्पादक नहीं है; क्योंकि उन्हीं अर्थों को अन्य प्रकार के शब्दों में रखें तो रस-निष्पत्ति नहीं होती है। अतः ये दोनों-शब्द और अर्थ-रस के भावक हैं, ऐसा हम भी कह चुके हैं। ... यत्रार्थ शब्दो वा तमर्थ व्यङ्क्त :.. का अर्थ यह हुआ कि व्यञ्जकत्व नामक व्यापार द्वारा गुणालङ्कार औचित्यादि-रूप इतिकर्तव्यता से भावक के रूप में काव्य-रसों को निष्पन्न करता है अर्थात् भावक को रसों का भावन कराता है; इस प्रकार तीन अंशों वाली भावना में करण अंश में अर्थात् साधन के रूप में ध्वनन-व्यापार ही आता है। हम इस वस्तु को जरा अच्छी तरह से समझ लें। भट्टनायक ने अपने मत के प्रतिपादन के लिए जिस 'भावना' शब्द का प्रयोग किया है, वह मीमांसा-दर्शन का पारिभाषिक शब्द है। अतः वह पारिभाषिक अर्थ यहाँ रस-निष्पत्ति पर भी किस तरह लागू होता है, वह देख लें। 'स्वर्गकामो यजेत'-स्वर्ग की कामना वाला व्यक्ति यज्ञ करे। इस वाक्य को हम मीमांसा-दर्शन की दृष्टि से समझें। इस वाक्य में मनुष्य को स्वर्ग-प्राप्ति के लिए यज्ञ करने का आदेश दिया गया है। इसमें 'यजेत' क्रिया की मूल धातु और उसमें लगे हुए प्रत्यक्ष भावना का ही अर्थ प्रगट करते हैं। भावना अर्थात् अस्तित्व धारण करने वाली वस्तु को अस्तित्व में लाने के लिए अनुकूल होने वाली क्रिया। यह भावना दो प्रकार की होती है :- १. आर्थी और २. शाब्दी। आर्थी भावना में तीन वस्तुएँ अपेक्षित हैं-१. साध्य, २. साधन और ३. इतिकर्तव्यता। मतलब यह कि भावना के विषय में तीन बातें पूछी जा सकती हैं-कौन-सी वस्तु भावित अर्थात् निर्मित की जा रही है ? इस उदाहरण में भावित की जाने वाली वस्तु स्वर्ग है। दूसरा प्रश्न यह कि इसे किस साधन से भावित किया जा रहा है। उत्तर यह है कि यज्ञ के साधन से उसे भावित किया जा रहा है। और तीसरा प्रश्न यह कि किस प्रकार, क्या-क्या कर इसे भावित किया जा रहा है ? उत्तर यह है कि प्रयाज आदि करियाएँ कर इसे भावित किया जा रहा है। यही बात हम रस-निष्पत्ति को लागू करें तो कह सकते हैं कि काव्य रस का भावक-निष्पादक है। अर्थात् काव्य रस को भावित करता है। इस प्रकार यहाँ साध्य है रस। इस साध्य को सिद्ध करने के लिए साधन हैं-ध्वनन-व्यापार, विभावादि का

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साधारणीकरण। और इसकी इतिकर्तव्यता का अर्थ है-इसके लिए किया जाने वाला काम है-गुणालङ्कार-योजना और अभिनय। उस उदाहरण में स्वर्ग साध्य है, यज्ञ साधन है और प्रयाजादि कार्य इतिकर्तव्यता है। इस प्रकार यहाँ रस साध्य है, साधारणीकरण साधन है और गुणालङ्कार-योजना और अभिनय इतिकर्तव्यता है। इस प्रकार भावना-व्यापार का जो मुख्य अंश-साधन-अंश है वह ध्वननरूप ही है, ऐसा कह चुकने के बाद भोगीकरण भी ध्वनन ही है ऐसा कहते हैं। भोग भी काव्य के शब्दों द्वारा नहीं होता। मोहरूप अन्धता की बाधा का निवारण होने पर आस्वादन के नाम से अभिहित द्रुति। विस्तार और विकासरूप अलौकिक भोग सिद्ध करने में भी लोकोत्तर ध्वनन-व्यापार ही मुख्य है। अर्थात् मोहान्धतारूप संकट का निवारण कर अलौकिक रस का आस्वादन कराने वाला भोग-व्यापार भी ध्वनन अर्थात् व्यञ्जना के कारण ही सम्भव होता है। और रस को व्यञ्ञनागम्य मानने पर भोगीकरण भी स्वतः- सिद्ध हो जाता है। कारण यह कि, आस्वादन से उत्पन्न होने वाले चमत्कार से भिन्न ऐसी-भोग नामक कोई स्वतन्त्र वस्तु है ही नहीं। इस प्रकार भोग नामक अलग व्यापार मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। (लोचन, पृ० १८७-१९०) इस प्रकार, भट्टनायक के मत के अपने लिए अस्वीकार्य ऐसे अंशों का खण्डन करने के बाद अभिनवगुप्त स्वीकार्य अंशों का अब उल्लेख करते हैं। 'भावनाभाव्य एषोऽपि शृङ्गारादिगणो हि तत्'। अर्थात् शृङ्गारादि रस भावना- N व्यापार से आस्वाद योग्य बनते हैं। इसमें 'तथा काव्येन भाव्यन्ते रसाः' अर्थात् काव्य द्वारा रस आस्वादित किये जाते हैं-इन वचनों में 'भावन' का अर्थ यदि विभावादि- जनित चर्वणात्मक आस्वादरूप प्रतीति का विषय बनाने की शक्ति ही किया जाता हो तो हमें वह स्वीकार्य है ही। और यह जो कहा गया है कि भावसंयोजनाब्यंग्यपरसंवित्तिगोचरः । आस्वादनात्मानुभवो रसः काव्यार्थ उच्यते॥ अर्थात् विभावादि के संयोग से व्यक्जित, परा संवित्ति के लिए गोचर, आस्वाद- नात्मक अनुभवरूप जो रस है, वही काव्यार्थ है। इसमें रस को व्यंग्य अर्थात् व्यञ्जित होता कहा गया है। इसमें व्यञ्जना का स्वीकार है ही, अतः इस विषय में मतभेद नहीं है। यहाँ 'अनुभव' कहा गया है, उसका विषय ही रस है यही समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त 'लोचन' में अभिनवगुप्त कहते हैं रसास्वाद को परब्रह्मास्वाद जैसा (सब्रह्मचारी) कहा गया है, सो ठीक है। भट्टनायक ने काव्य का गौण फल व्युत्पत्ति बताया है। इसके सम्बन्ध में अभिनवगुप्त कहते हैं कि काव्य से हुई व्युत्पत्ति, शास्त्र और इतिहास से होने वाली व्युत्पत्ति से भिन्न प्रकार की होती है। जैसे कि शास्त्र में या इतिहास में से 'मैं राम की तरह आचरण करूँगा' ऐसी जो तुलना हमारे मन में जगती है, वैसी तुलना ही केवल काव्य में नहीं जगती, काव्य में इससे कुछ विशेष होता है।

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अभिनव का रस-विचार ४१ उसमें तो रसास्वाद के उपायरूप भावक की अपनी प्रतिमा का ही अन्त में विकास होता है। यही बात 'अभिनवभारती' के प्रथम अध्याय में इस प्रकार कही गयी है- 'ननु किं गुरुवदुपदेशं करोति ? नेत्याह, किन्तु बुद्धिं विवर्धयति। स्वप्रतिभामेव तादृशीं वितरतीत्यर्थः'। अर्थात् नाटक क्या गुरु की भाँति उपदेश करता है ? नहीं, वह तो बुद्धि-वर्धन करता है। अपनी प्रतिभा को ही वह ऐसी बना देता है। इस सबका सार यह है कि 'रस'-व्यञ्जना अथवा ध्वनन-व्यापार से अभिव्यक्त होते हैं और रसों की प्रतीति ही आस्वादन है। अभिनवगुप्त का सत इस प्रकार, पूर्वाचार्यों के मतों की चर्चा-विचारणा कर लेने के पश्चात् अभिनव कहते हैं कि यहाँ किसी को कदाचित् यह प्रश्न उठ सकता है कि तो फिर रस के विषय में सत्य क्या है ? और फिर कहते हैं कि हमें क्या करना चाहिए ? यहाँ वे अपने प्रयत्न का स्वरूप और अपनी दृष्टि समझाते हुए चार श्लोक लिखते हैं- आम्नायसिद्धे किमपूर्वमेतत्, संविद्विकासेऽधिगतागमित्वम्। इत्थं स्वयंग्राह्यमहार्हहेतु द्वन्द्ेन किं दूषयिता न तोकः। ऊर्ध्वोध्वंमारुह्य यदर्थतत्वं, धी: पश्यति श्रान्तिमवेद्यन्ती। फलं तदाद: परिकल्पितानां, विवेकसोपानपरम्पराणाम् ॥ चित्रं निरालम्बनमेव मन्ये, प्रमेयसिद्धौ प्रथमावतारम्। तन्मार्गलाभे सति सेतुबन्ध- पुर-प्रतिष्ठादि न विस्मयाय॥ तस्मात्सतामत्र न दूषितानि,

पूर्वप्रतिष्ठापितयोजनासु, मतानि तान्येव तु शोधितानि।

मूलप्रतिष्ठाफलमामनन्ति अर्थात् परम्परा से प्राप्त सत्य का ही विस्तार करने में पिष्टपेषण का दोष होता है। और फिर उसमें कुछ भी नया नहीं है। यह दोहरा दोष मुझ पर लोग लगायेंगे। मनुष्य की बुद्धि बिना थके ही ऊपर ही ऊपर उठ कर सत्य को देखती रहती है। वह विचार की सीढ़ियों की तरह आयोजित पूर्वाचार्यों की विचारणा का फल है। यह एक आश्चर्य की बात है कि, सत्य की स्थापना करने के पूर्व ( प्रथम) प्रयत्न

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निरालम्ब, आधारहीन लगते हैं। परन्तु एक बार उसका मार्ग मिल जाने पर सेतुबन्ध या पुर (बाठ) की प्रतिष्ठा से भी आश्चर्य नहीं होता। इस प्रकार पूर्वाचार्यों द्वारा स्थापित विचारसरणी की विरासत में से लोग नवीन नींव डालने का फल-लाभ करते हैं। इसी प्रकार यहाँ मैंने पूर्वाचायों के मतों को दोष नहीं दिया किन्तु उनके मतों को संशोधित ही किया है। अपना उद्देश्य पूर्वाचार्यों के मतों के दोष बतलाना या मतों का खण्डन करना नहीं है, किन्तु इनका संशोधन करना है, ऐसी स्पष्टता करने के बाद वे अपने द्वारा परिशुद्ध किया गया रस-तत्त्व समझाते हैं और इस प्रकार विनम्रतापूर्वक आरम्भ करते हैं कि ऐसा करने में वे नवीन कुछ भी न कह कर मुनि (भरत) की कही हुई बात ही समझा रहे हैं। हम उनके ही शब्द देखें। तो इसे परिशुद्ध तत्त्व कहिए, ऐसी विनति के प्रत्युत्तर में वे कहते हैं कि यह तो मुनि ने कह ही दिया है। मुझे कुछ नवीन कहना नहीं है। भरत ने कहा है ही कि 'काव्यार्थान् भावयन्ति इति भावाः।' काव्यार्थों को आस्वादयोग्य बना दे उसे भाव कहते हैं। (नाट्यशास्त्र, ७)। यह काव्यार्थ अर्थात् रस ही है। सप्तम अध्याय में उपर्युक्त वाक्य समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि काव्य में निहित पदार्थों व वाक्यारथों-दोनों का पर्यवसान रस में होता है। इस प्रकार रस यह काव्य का असा- धारण धर्म है, काव्य में रस का ही प्राधान्य होता है, अतः रस ही काव्यार्थ है। यहाँ 'अर्थ' से अभिधेय का तात्पर्य नहीं ग्रहण करना है किन्तु इसका अर्थ है 'प्रधानतः अभिप्रेत'। ध्वनिकार ने यह बताया है कि रस स्वशब्दवाच्य नहीं है। अतः वह मेरी 'सहृदयालोकलोचन' टीका में देख लेना चाहिए।

इस प्रकार, रस ही काव्यार्थ है। उसे जो आस्वादक्षम बना दे वह भाव कहाता है। भाव शब्द को समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि हम तो कहते ही हैं कि भाव शब्द से सभी चित्तवृत्ति-विशेष ही उद्दिष्ट हैं। और वे प्रसंगानुसार स्थायी, सञ्चारी, विभाव, अनुभाव कहे जाते हैं। ऋतुमाल्य आदि जो बाह्य विभाव हैं, और अश्रु आदि जो नितान्त जड़ प्रकृति के अनुभाव हैं, वे भाव नहीं कहलाते हैं। केवल स्थायी, व्यभिचारी, और सात्त्विक इतने ही भाव कहलाते हैं। 'तस्मात्स्थायिव्यभिचारिसात्विका एव भावा:।' विभाव अनुभाव को तो उपचार से ही भाव कहा जाता है। -पृ० ३४३/ स्थायी और व्यभिचारी के समूह में से ही आखाद्य अलौकिक अर्थरूप रस सिद्ध होता है। सहृदय के लौकिक व्यवहार में प्रथम उसे स्थायी, व्यभिचारी आदि का ज्ञान होता है। तत्पश्चात् काव्य-पठन-वाचन के अवसर पर अथवा नाटक देखते समय साधारण्य की भूमिका के कारण वह उसका आस्वाद ले सकता है। इस प्रकार लौकिक जीवन में होने वाला स्थायी-व्यभिचारी भावों का पूर्व ज्ञान उत्तरकालीन

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आस्वाद में उपकारक सिद्ध होता है। इसीलिए एक अर्थ में स्थायी को रस का भावक अर्थात् निष्पादक कहा गया है। यह रस-निष्पत्ति कैसे होती है, यह समझाने के लिए अभिनवगुप्त ने एक दृष्टान्त दिया है। परन्तु उसे देखने के पूर्व हेमचन्द्र द्वारा दिया गया एक दष्टान्त हम लें जिससे उसे समझने में सरलता रहेगी। आरोग्यमाप्तवान्साम्बः स्तुत्वा देवमहर्पतिम्। स्यादर्थावगतिः पूर्वमित्यादि वचने यथा॥ ततश्रोपात्तकालादि न्यक्कारेणोपजायते। प्रतिपत्तुर्मनस्येवं ग्रतिपत्तिर्न संशयः॥ यः कोऽपि भास्करं स्तौति स सर्वोऽप्यगदो भवेत्। तस्मादहमपि स्तौमि रोगनिर्मुक्तये रविम्। अर्थात् 'साम्ब ने सूर्य का स्तवन किया और वह रोग-मुक्त हुआ'-यह वाक्य सुनते ही हमें पहले उसका वाच्यार्थ समझ में आता है। (इस वाच्यार्थ का सम्बन्ध साम्ब, उसकी विशिष्ट सूर्य-स्तुति और उसकी विशिष्ट रोग-मुक्ति के साथ है।) यह ज्ञान होने पर 'जो भी सूर्य-स्तुति करेगा वह रोग-मुक्त होगा'-ऐसी स्थल-काल व्यक्ति निरपेक्ष सामान्यस्वरूप की, केवल वाच्यार्थ से अधिक ऐसी प्रतीति हमारे मन में होती है। ऐसी प्रतीति होते ही 'मैं भी सूर्य स्तवन करूँ और रोग-मुक्त होऊँ।'-ऐसा हमारे मन में होता है। इस प्रकार प्रथम व्यक्तिसम्बद्ध ज्ञान, पश्चात् सामान्य प्रतीति और तत्पश्चात् आत्मानुप्रवेश-ऐसा क्रम यहाँ है। इस उदाहरण में पुराण-कथा को ग्रहण किया गया है जब कि अभिनवगुप्त द्वारा दिये गये उदाहरण में वेद-वाक्य ग्रहण किया गया है : 'वनस्पतयः सत्रमासत।' वनस्पतियों से सत्रारम्भ किया। 'तामग्नौ प्रादात्'-उन्हें अग्नि में होम दिया। ऐसे वेद- वाक्य सुनते ही अधिकारी व्यक्ति के मन में व्यक्ति-सम्बद्ध वाच्यार्थ से अधिक प्रतीति जगती है। बाद में होने वाली इस प्रतीति में वाच्यार्थ के साथ लगे हुए देश-काल- व्यक्ति आदि के सम्बन्ध छूट जाते हैं और 'इस प्रकार सत्रारम्भ होता है।'-'इस प्रकार हवन होता है।'-ऐसी सामान्य प्रतीति जगती है। इस सामान्य प्रतीति का अनुसरण कर अधिकारी व्यक्ति भी कार्य में प्रवृत्त होता है। इस सामान्य प्रतीति को ही भीमांसा- दर्शन में भावना, विधि, नियोग, आदि नामों से पहचाना जाता है। इन दोनों उदा- हरणों में हमें होने वाली सामान्य प्रतीति की एक विशेषता यह है कि भूतकाल की व्यक्तिगत बात सुनते ही जिस क्रम में हमें सामान्य की प्रतीति होती है, वह क्रम हमारे ध्यान तक में नहीं रहता। इन पौराणिक या वैदिक वाक्यों में से जिस प्रकार अधिकारी व्यक्ति को केवल वाच्यार्थ से अधिक प्रतीति होती है, उसी प्रकार काव्य-गत शब्दों में से भी अधिकारी को विशेष प्रतीति होती है। यहाँ अधिकारी से तात्पर्य है-विमल प्रतिभासम्पन्न हृदय

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वाला व्यक्ति। 'अधिकारी चात्र विमलप्रतिभानशालि हृदयः ।' उसे ही सहृदय भी कहते हैं। अभिनवगुप्त ने स्वयं 'लोचन' में सहृदय की परिभाषा इस प्रकार दी है : 'येषां काव्यानुशीलनाभ्यासवशाद्विशदीभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मयीभवनयोग्यता ते सहृदय- संवादभाजः सहृदयाः। (पृ० ३८-९) अर्थात् काव्यानुशीलन के अभ्यास के कारण विशदीभूत जिसके मन-दर्पण में वर्णनीय विषय में तन्मय होने की जिनमें क्षमता है, ऐसे सहृदय संवाद वाले ही सहृदय हैं। ऐसा अधिकारी सहृदय जब शाकुन्तल के प्रथम अङ्क में इस श्लोक को- ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने बद्धदृष्टिः, पश्चार्धेनप्रविष्टः शरपतनभयाद्भूयसा पूर्वकायम्। दभैंरर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः कीणंवर्त्मा, पश्योदग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति॥

१. प्रतिभा के दो प्रकार माने गये हैं। कारयित्री और भावयित्री। कवि के लिए उपकारक वारयित्री और भावक के लिए उपकारक भावयित्री। यहाँ भावयित्री प्रतिभा का उल्लेख है। अभिनवगुप्त ने 'लोचन' में भी प्रतिभा का सहयोग व्यअ्जना के लिए आवश्यक समझा है। 'प्रतिपत्तुप्रतिभारूहकारित्वं ह्यस्माभिर्द्योतनस्य प्राणत्वेनोवतम्।' ५ृ० ६८। भवक की प्रतिभा के सहकार को हमने द्योतन अर्थात् व्यञ्जना का प्राण कहा है। उसे ही वासना भी कहते हैं। वाव्य-प्रकाश में मम्मट ने भी कहा है कि व्यंग्य अर्थ प्रतिभाजुषाम्=प्रतिभा-सम्पन्नों की ही समझ में आता है। इस सम्बन्ध में प्रदीपकार ने कहा है कि 'प्रतिभाजुषाम् इति अनेन नव- नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा प्रतिभा वा वासना इत्युच्यते तस्य सत्यामेव वक्तृवैशिष्ट्यादि सत्वेऽपि व्यंग्यप्रतीतिरिति प्रतिपादितम् । अतएव वैयाकरणानां न तथा रसप्रतीतिः। तथा चोक्तं-सवा- सनानां नाट्यादौ रसस्यानुभवो भवेत्। निर्वासनास्तु रगान्तः वेश्मकुड्याश्मसन्निमाः ॥' प्रतिभाजुषाम् अर्थात् नवनवोन्मेषशालिनी जो प्रज्ञा प्रतिभा जिसे वासना भी कहते हैं, वह जिसमें हो तभी वक्ता की विशेषतादि के कारण व्यंग्यार्थ की प्रतीति हो सकती है ऐसा प्रतिपादित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि वैयाकरणों को ऐसी रसप्रतीति नहीं हो सकती। कहा भी है कि वासनाग्रस्तों को ही नाटक आदि में रसानुभूति होती है। वासनारहित तो रंगभवन की भींत के पत्थरादि के सदश हैं। २. अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में कहा है कि तथा हि मधुरे गीते स्प्शे वा चंदनादिके। माध्यस्थ्यविगमे यासौ हृदये स्पन्दमानता ॥। आनन्दशक्ति: सैवोक्ता यतः सहृदयो जनः । अर्थात् मधुर गीत के श्रवण से, अथवा चन्द्रनादि के स्पर्श से मध्यस्थता चली जाती है और हृदय स्पन्दयुक्त होता है। इसी का नाम आनन्दशक्ति है। इसीके कारण मनुष्य सहृदय वहा जाता है। 'अभिनव-भारती' के दूसरे खण्ड में पृ० ३३९ पर अभिनवगुप्त ने कवि के हृदय के साथ तादात्म्य साधित करने की शक्ति को सहृदयता कहा है। 'सहृदयत्वं हृदयस्य हि कविहृदय- तादात्म्यापत्तियोग्यतैव।' 'लोचन' में पृ० १५५ पर अभिनवगुप्त ने सहृदयता को हृदय-संवाद का अपर पर्याय कहा है। हृदयसंवादापरपर्याय सहृदयता और आनन्दवर्द्धन ने पृ० ३५९ पर रसज्ञता को ही सहृदयता कहा है-'रसशतैव सहृदयत्वमिति।'

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अर्थात् पीछे दौड़ते रथ पर बार-बार एकटक दृष्टि से देखने वाला, ग्रीवाभङ्ग से अभिराम, बाण लगने के भय से अपने शरीर के पिछले आधे भाग को पूर्वार्ध में प्रविष्ट किये हुए, थकावट से खुले हुए मुख से आधे चबाये हुए कुशों से जिसका मार्ग व्याप् हो गया है, ऐसा यह मृग देखो, लम्बी-लम्बी छलाँगों से आकाश में ही अधिक, पृथ्वी पर कम ही दौड़ रहा है। जब पढ़ता है, तब उसके वाच्यार्थ का बोध हो जाने पर तुरन्त ही उसे साक्षात्कारात्मक मानसी प्रतीति होती है।१ यह प्रतीति देशकालादि की मर्यादाओं से मुक्त होने से सामान्यस्वरूप की होती है। इसमें जो मृगबाल दिखायी देता है, वह कोई विशिष्ट मृगबाल नहीं होता परन्तु केवल भयभीत होता है। उसे त्रास पहुँचाने वाला व्यक्ति भी कोई पारमार्थिक व्यक्ति नहीं होता। अतः इस दृश्य में से देशकालादि की उपाधि से मुक्त केवल भय की ही प्रतीति होती है। अर्थात् भावक और उसकी प्रतीति दोनों मृग के या नट के स्थल-कालादि से मुक्त होते हैं। कलानुभव में ये दो स्थल-काल उभय को अप्रभावी कर देते हैं। अतः एक तरफ मृगादि स्थल-काल की सीमा से मुक्त हो जाते हैं और वे व्यावहारिक जगत् के अंश- रूप प्रतीत नहीं होते किन्तु साधारण्य की भूमिका पर प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार नट और उसके द्वारा प्रदर्शित भीति भी व्यावहारिक जगत् के अंश के रूप में प्रतीत नहीं होती। अतः जो प्रतीत होता है वह स्थल-काल असम्बद्ध होता है, साधारणीभूत स्थायी- भाव बल्कि रस होता है। और इस मय (भय) की प्रतीति भी स्वगत, परगत, मित्र- शत्रु या मध्यस्थगत के रूप में नहीं होती, अतः उसमें स्वगत भय के कारण उत्पन्न होने वाला 'दुःख अथवा शत्रुगत भय के कारण होने वाला सुख अथवा लौकिक भय में जैसा अनुभव होता है कि बह रहे या जाय-ऐसी वृत्ति भी जगती नहीं है। इस प्रकार इस प्रतीति में लौकिक प्रतीति में आने वाले कोई भी विघ्न नहीं होते हैं, अतः यह भय निर्विघ्न प्रतीति का विषय बनता है। अतः उससे सहृदय के हृदय में प्रविष्ट होकर उसके नेत्रों के समक्ष तैरता हो इस प्रकार साक्षात्मयानक रस के रूप में प्रतीत होता है। ऐसे भय में सहृदय की आत्मा विशेषरूप से उल्लिखित भी हुई नहीं होती और न ही तिरस्कृत भो हुई होती है। यदि यह उललिखित हुई हो तो यह प्रतीति सामान्य लौकिक बौद्धिक प्रतीति बन जायेगी और यदि यह तिरस्कृत हुई हो तो बौद्धिक ज्ञान और विकल्प के अभाव मे यह प्रतीति योगी की रहस्यपूर्ण प्रतीति के सदृश बन जायेगी, रसानुभूति नहीं रहेगी। और इस प्रतीति की एक अन्य विशेषता यह है कि यह जैसी ( जिस रूप में) एक भावक को प्रतीत होती है वैसी ही अन्य किसी मी भावक को भी प्रतीत होती है। अर्थात् उसका साधारण्य भी मर्यादित नहीं होता, वितत होता है। जिस प्रकार धूम १. सुख-दुःखादि की संवेदना की भाँति कलानुभव भी एक प्रकार का मानस-प्रत्यक्ष है। यह स्वसंवेदन सिद्ध है।

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एवं अग्नि तथा भय और कम्प का सम्बन्ध व्यापक होता है, वैसे ही यह साधारण्य भी व्यापक-वितत होता है।१ काव्य इसका मानस-साक्षात्कार है। नाटक में नटादि सामग्री द्वारा इस साक्षात्कार की परिपुष्टि होती है।2 काव्यगत प्रतीति को मर्यादित करने वाले प्रमाता के और काव्य- निरूपित वस्तु के देशकालादि की विशेषता ही होती है। पर नाटक की प्रतीति में इन देशकालादि के उपरान्त नटगत सीमाएँ सन्निविष्ट होती हैं। जैसे कि 'उत्तरराम- चरित' पढ़ते समय हमारी प्रतीति को केवल रामत्व की ही मर्यादा बन्धनरूप होती है और उस रामत्व का निरसन होने पर शोक-वृत्ति साधारणत्व प्राप्त कर लेती है। परन्तु नाटक में जब हम वही प्रसंग देखते हैं तब वहाँ राम का शोक नट द्वारा प्रकट होता होने से रामत्व और नटत्व-यों दो विघ्न बाधारूप होते हैं। और दोनों का निरसन होने पर ही करुण का आस्वाद सग्भव होता है। परन्तु यह प्रमाता की और पात्र एवं नटगत देशकालादि की विशेषता को उभयतः अप्रभावी कर देता है, अतः इन विध्नों का भी निरसन होता है। और इसीलिए ही सभी सामाजिकों की प्रतीति में नाटक देखते समय एक घनता आ सकती है और फलतः रस का परिपोष सिद्ध होता है। ऐसा होने का कारण यह है कि लौकिक अवस्था में सभी सामाजिकों का चित्त अनादि वासना से चित्रित हुआ होता है, अतः नाटक देखते समय इनका हृदय-संवाद सिद्ध होता है।"

१. देखिए, टिप्पणी ३। २. इसका अर्थ यह कि, नाटक में प्रस्तुत की गयी घटनाओं की प्रतीति साक्षात्कार जैसी (साक्षात्का- रायमाण=साक्षात्कार कल्प= प्रत्यक्षकल्प) होती है। प्रत्यक्ष अनुभव वा तो वास्तविकता के साथ अपरिहार्य सम्बन्ध होता ही है। इस दृष्टि से रसानुभव का आधार सत्य मिथ्या पर नहीं होता। इसलिए उसे प्रत्यक्ष अनुभव या साक्षात्कार नहीं कहा जा सकता परन्तु अभिनवगुप्त कहते हैं कि यह प्रत्यक्ष अनुभव के सदश है। 'प्रत्यक्षकल्पानुव्यवसायविषयो लोकप्रसिद्ध- सत्यासत्यादि विलक्षणत्वात्'-नाटक तो प्रत्यक्ष्कल्प अनुव्यवसाय का विषय है, क्योंकि वह लोकप्रसिद्ध सत्यासत्यादि से विलक्षण है। (नाट्यशास्त्र, पृ० ४३) दूसरे शब्दों में कहें तो वह एक ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव है जिसका व्यावहारिक जगत् के सत्यासत्य से कोई लेना-देना

३. 'एक घनता' शब्द 'घन' से वना है। 'घन' के सम्दन्ध में आनन्दरकुमार स्वामी का मन्तव्य इस नहीं है।

प्रकार है : " 'घन' 'घन्' अर्थात् प्रहार करना, मारना, विघ्न उपस्थित करना, ऊपर से बना है। इसका मुख्य अर्थ 'ठोस' अर्थात् बिना अधिक जगह घेरे अनेक तत्त्वों का एक साथ रहना। इसके आधार पर श्री० नोली के कथनानुसार इसका अर्थ 'निबिड', 'संहत', 'एकरूप', Dense, Compact, Uniform आदि अर्थात् निर्विध्न होता है। विघ्नों की चर्चा आगे आयेगी। ४. भट्टनायक ने जो यह कहा था कि रामादि जैसे दैवी पात्रों के साथ भावक का तादात्म्य हो नहीं सकता है, उसका अभिनवगुप्त इस तर्क से प्रत्युत्तर देते हैं। पशु, मानव या देव कोई भी जीव ऐसा नहीं है जिसके साथ मनुष्य का प्रकृतिगत साम्य न हो। क्योंकि यह संसार अनादि है, अतः आज की देह घरने के पूर्व उमने किसी न किसी समय अन्य सभी योनियों की देह धारण की ही होती है; अतः उसमें इन सभी के संस्कार एवं वासनाएँ होती ही हैं। और इसलिए वह रामादि के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकता है।

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इस प्रकार सामाजिक को होने वाली यह निर्विध्न एकधन संवित्-प्रतीति ही काव्यगत चमत्कार' और उससे उद्ूत कम्प पुलकादि भी चमत्कार ही कहलाते हैं। जैसे कि अज्जवि हरी चमक्कइ कहकह विनमंदरेण दलिआइं। चन्दकलाकन्दलसव्छाइं लच्छीं अंगाइं। अर्थात् चन्द्र कला के कन्द जैसे स्वच्छ सुकुमार लक्ष्मी के अंग समुद्र-मन्थन के समय मन्दराचल से पिस क्यों न गये ? इसी विचार-मात्र से आज भी हरि को चमत्कार होता है और फलतः उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि चमत्कार अर्थात् अच्छिन्नपूर्ण तृप्तिरूप भोग में लीन हो जाना। यों भी कहा जा सकता है कि अद्भुत भोग के स्पन्द में लीन भावक को जो अनुभूति हो सो चमत्कार। भले ही वह साक्षात्कार के रूप में, मानस अध्यवसाय के रूप में, संकल्प के रूप में, या स्मृति-रूप में स्फुरित हुआ हो। जैसे कि कालिदास ने कहा है कि रम्याणि वीक्ष्य मघुरांश्र निशम्य शब्दान्, पर्युत्सुकीभवति यत्सुखितोऽपि जन्तुः। तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्वम्, भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि। अर्थात् किसी रम्य दृश्य को देख कर या मधुर शब्दों को सुन कर सुखी मनुष्य भी उदासीन हो जाता है और वासनारूप में स्थिरीभूत जन्मान्तर की मैत्री का अनजाने ही स्मरण करता है। यहाँ कवि ने जिस स्मृति का उल्लेख किया है वह तर्कशास्त्र में कथित लौकिक स्मृति नहीं है; क्योंकि वह स्मृति तो पूर्वानुभव हो तभी सम्भव हो सकती है। ऐसी प्रतिभानमय साक्षात्काररूप निर्विध्न प्रतीति ही काव्यगत सौन्दर्य अथवा चमत्कार कहाती

१. देखिए, टिप्पणी ४. २. इसके विषय मैं अभिनव-भारती के २२ (बाईसवें) अध्याय मैं कहा गया है कि 'इह चित्त- वृत्तिरेव संवेदनभूमौ संक्रान्ता देहमपि व्याप्नोति।' अर्थात् चित्तवृत्ति ही जब संवेदना का विषय बनती है तब वह देह में भी व्याप्त हो जाती है। नाट्यशास्त्र, खं० ३, पृ० १५२। ३. स्पन्द का अर्थ प्रवृत्ति, स्फुरणा, शक्ति ऐसा होता है। कश्मीर शैव-दर्शन के अनुसार चिति अथवा संवित् स्फुरणारूप है। अविरत शक्ति रूप है, जिसमें से सब कुछ प्रकट होता है। सविकल्प विचार अथवा बौद्धिक विचारणा इस प्रकाशमय आदि-तत्त्व के घनीभवन का परिणाम है। यह तत्त्व भय, आनन्द, वगैरह स्वाभाविक चित्तवृत्तियों के रूप में व्यक्त होता है। शब्द में से शब्दान्तर में और विचार मैं से विचारान्तर में जाने का समर्थन करने वाली यही शक्ति है। इच्छा-शक्ति की यह प्रथम प्रवृत्ति है, आत्मा का यह प्रथम व्यापार है। चिति के किसी भी स्वरूप में यह गभित रही है ही। हृदय, विमर्श, आनंद, स्फुरता, घूर्णि आदि शब्द इसीके पर्याय हैं। यहाँ स्पन्द का अर्थ रसानुभूति का आन्तर लय अथवा गति है। रसानुभव एक प्रकार का सुख-दुःखादि जैसा मानससाक्षात्कार (मनःकार) हैं-और इस अर्थ मैं यह विकल्पक ज्ञान अथवा बौद्धिक प्रत्यय से भिन्न है।

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४८ अभिनव का रस-विवेचन

है। इस श्लोक में ऐसी आस्वादरूप प्रतीति का विषय है रति। इसे स्थल-काल या व्यक्ति की सीमाएँ नहीं होतीं अतः वह न तो लौकिक, न ही मिथ्या है; क्योंकि उसका अनुभव होता है; न ही यह अनिर्वाच्य है क्योंकि भाव रूप में उसका वर्णन किया जा सकता है; न ही यह लौकिक जैसी है' क्योंकि उसके आस्वाद के लिए योग्यता पहले (पूर्व) के अनुभव से प्राप्त होती है। इतने आधार पर ऐसा नहीं कहा जा सकता। न ही वह उसके आरोपरूप है क्योंकि वह उसकी सजातीय है। अन्त में यह देशकालादि से मर्यादित नहीं है इस अर्थ में उसे उपचयावस्था कहना चाहें तो कह सकते हैं। उसमें लौकिक का अनुगमन होने के कारण उसे अनुकरण कहना हो तो भी कहिए" तथा विज्ञानवादियों के अर्थ में आप उसे सामग्री कहना चाहें तो वैसा कहिए" परन्तु इतना तो निश्चय ही है कि निर्विघ्न रसनारूप प्रतीति से ग्रहण किया जाने वाला भाव ही रस है।-'सर्वथा रसनात्मकवीतविघ्नप्रतीतिग्राह्यो भाव एव रसः।' इस सबका सारांश यही है कि रस न तो स्थायीभाव है; न ही स्थायी का उपचय भी; न स्थायी का अनुमान भी है और न ही साधारणीभूत स्थायी का आत्मगत उपभोग ही है। वह तो निर्विघ्न रसनात्मक प्रतीति का विषयरूप भाव है। इसी निर्विघ्न रस- नात्मक प्रतीति को ही चर्व्यमाणता कहते हैं और वही रस का एकमात्र प्राण है। 'चर्व्यमाणसैक प्राणः।' इस प्रतीति के बाधक जो विघ्न होते हैं उनका निवारण करने वाले विभावादि ही हैं। लौकिक व्यवहार में भी ऐसी निर्विध्न, सकल विध्नों से पूर्णतया मुक्त प्रतीति को ही चमत्कार, निर्वेश, रसना, आस्वादन, भोग, समापत्ति, लय, विश्रान्ति आदि नामों से अभिहित किया जाता है। रस-प्रतीति के विघ्न इस रस-प्रतीति के विघ्न कविगत, काव्यगत, नटगत या भावकगत भी हो सकते हैं। अभिनवगुप्त ने ऐसे सात विन्न बताये हैं :- १. अर्थात् उसके अनुकरण रूप। शंकुक का मत। २. 'आरोप' शब्द बौद्धों द्वारा प्रयुक्त होता है वैसे अर्थ में यहाँ प्रयुक्त हुआ है। वे मानते हैं कि बौद्धिक ज्ञान वस्तु पर किया गया स्वैर और मायात्मक आरोपण है। ३. लोलट का मत। ४. शंकुक का मत। अभिनवगुप्त ने पहले भी कहा है कि उसमैं मूल पात्रों का लौकिक व्यवहार दिखाया जाता है अतः उसे अनुकरण कहना हो तो कहिए। देखिए पीछे, पृ० ३६। ५. विज्ञानवादी बौद्ध मानते हैं कि जो कुछ है वह सब संवितरूप है। अतः रस भी संवित्रूप हुआ। इसे स्वीकारने में अभिनवगुप्त को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। सामग्री अर्थात् भिन्न- भिन्न उपकरणों का उपचय। विभावादि की सामग्री-ही रस। यह मत भट्टनायक का है। ६. रसानुभूति के बाधक विध्नों को अभिनवगुप्त समझा रहे हैं। संवित्ति की एकता में, घनता में विघ्नरूप हानोपादान की इच्छा, चिन्ता आदि बाह्यतत्व विघ्न कहे जाते हैं। धर्मानुभव के सम्बन्ध में भी ऐसा अनुभव प्रायः दृष्टिगत होता है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्तिविमशिणी' में

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अभिनव का रस-विचार ४९ १. संभावना-विरह रूप प्रतिपत्ति की अयोग्यता, २. स्वगत परगतदेशकालादि विशेषावेश, ३. निजसुखादिविवशीभाव, ४. प्रतीति-उपायवैकल्य, ५. स्फुटत्व का अभाव, ६. अप्रधानता, ७ संशय योग। इस प्रकार सातों विन्न बताने के बाद उनका स्वरूप समझाते हैं और यह भी बताते हैं कि उनका निवारण कैसे हो सकता है। हम इसे अधिक विस्तार से देखें। १. प्रथम विन्न है संभावना विरहरूप प्रतिपत्ति की अयोग्यता। संभावना विरह अर्थात् वस्तु संभावित न प्रतीत होना। जो अपने समक्ष प्रस्तुत संवेद्य वस्तु को संभव ही नहीं मानता वह अपने संवित् का उसमें प्रवेश ही नहीं करा सकता। तो फिर उसमें विश्रांति की तो बात ही क्या करना ! उसका निवारण लोकसामान्य वस्तु से सिद्ध होने वाले हृदय संवाद से हो सकता है। कवि ने वस्तु ही लोकसामान्य ग्रहण किया हो तो भावक का हृदयसंवाद आसानी से सिद्ध होगा और यह विन्न नहीं उपस्थित होगा। यदि अलोकसामान्य वस्तु को प्रस्तुत करने का प्रसंग उपस्थित हो तो रामादि प्रसिद्ध व्यक्तियों का उपयोग करना जिससे कि भावक के चित्त में उस पात्र की अखंड प्रसिद्धि के कारण दृढ़ीभूत प्रतीति उद्बुद्ध हो जाय; इसीलिए कहा है कि नाटक का उद्देश्य असामान्य उत्कर्ष का निरूपण कर उपदेश या व्युत्पत्ति देना हो तो उसमें प्रख्यात वस्तु का ही निरूपण किया जाय। प्रहसनादि में ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। यह सब उचित अवसर पर कहा जाएगा' यहाँ इतना ही पर्यात है। कवि जब प्रकृति-औचित्य चूक जाता है तब यह दोष प्रवेश कर जाता है। इसकी विस्तृत चर्चा 'ध्वन्यालोक' के तृतीय उद्योत की दसवीं कारिका पर की वृत्ति में अभिनव गुप्त ने कर दी है। वहाँ उन्होंने कहा है कि विनेयों की प्रतीति खंडित न हो ऐसा वर्णन किया जाय। केवल मानुष प्रकृति का पात्र सात समुद्र लाँघ जावे ऐसा वर्णन यदि किया

विघ्नों की परिभाषा इस प्रकार दी जा चुकी हैं-विध्नन्ति, विलुम्पन्ति कर्तव्यमिति विध्नाः आध्यात्मिकादयोऽनवधानदोषादयस्त्रिविधोपघाताः तदधिष्ठातारश्च देवताविशेषाः। कर्तव्य में अड़चन या बाधा उपस्थित करे वह विध्न है। ज्ञाता वगैरह में स्थित अनवधानादि विघ्न तीन प्रवार के होते हैं। उनके अधिष्ठाता देव भी विघ्न कहलाते हैं। विध्नों का मूल अनवधानता- विषय में चित्त की विश्रांति का अभाव-है। १. दस प्रकार के रूपकों के उचित विषयों की चर्चा नाट्यशास्त्र के १८ वें अध्याय में आती है। अभिनव गुप्त ने 'अभिनव भारती' में प्रारम्भ में ही एक सामान्य सूचना दी है, जो समझने योग्य है- न च वर्तमानचरितानुकारो युक्त । विनेयानां तत्र रागद्वेषमध्यस्थतादिना तन्मयीभावा- भावे प्रीतेरभावेन व्युत्पत्तेरप्यभावात्। वर्तमान चरिते च धर्मादि कर्मफलसम्बन्धस्य प्रत्यक्षत्वे प्रयोगवैयर्थ्यम्। पृ० २७ अर्थात्, वर्तमान जीवन घटना का अनुकरण उचित नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर सामाजिकों में राग, द्वेष, ताटस्थ्य, आदि उत्पन्न होने से वे उसमें तन्मय ही नहीं हो सकेंगे और फलतः आनंद के अभाव में व्युत्पत्ति अर्थात उपदेश भी उन्हें प्राप्त नहीं होगा। उपरांत वर्तमान जीवन की घटना ग्रहण करने से धर्मादि कर्मों का उनके फल-सहित सम्बन्ध [फलों के साथ सम्बन्ध ] प्रत्यक्ष होने से प्रयोग ही व्यर्थ बन जाएगा। ४

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५० अभिनव का रस-विवेचन गया होगा तो वह असंभाव्य होने के कारण उचित नहीं है, ऐसा उनको प्रतीत होगा और फलतः नाटक का उपदेश' भी गलत है ऐसा उन्हें लगेगा। रामादि के विषय में तो पूर्व प्रसिद्धि के कारण जो विश्वास दृढ़ हुआ होता है इस कारण ऐसा वर्णन अनुचित प्रतीत नहीं होता। फिर भी ऐसे पात्रों के विषय में भी जब अन्य प्रभावों की कल्पना की जाय तब उसमें भी ऐसा ही होगा। अतः असंभव प्रतीत हो ऐसा वर्णन न किया जाय : यत्र विनेयानां प्रतीतिखण्डना न जायते तादृग्वर्णनीयम्। तत्र केवलमानुषस्य एक- पदे सप्तार्णवलङ्गनमसंभाव्यमानतयाSनृतमिति हृदये स्फुरदुपदेश्यस्य चतुर्वगोपायस्या- प्यलीकतां बुद्धौ निवेशयति। रामादेस्तु तथाविधमपि चरितं पूर्वप्रसिद्धिपरंपरोपचित संप्रत्त्ययोपारूढमसत्यतया न चकारिति। अतएव तस्यापि यदि प्रभावान्तरमुत्प्रेक्ष्यते तथा तादृशमेव। न त्वसंभावनापदं वर्णनीयमिति। (पृ० ३३१ )। २. दूसरा परम विघ्न है स्वगतपरगतदेशकालविशेषावेश। यह विन्न भावकगत है। कुछ भावक नाटक देखते समय भी अपने सुखदुःखादि का आस्वाद लेते होते हैं। ऐसे भावकों में सुखादि के अनुभव के समय कदाचित् यह सुख चला जाएगा, ऐसी भीति, अतः उसकी रक्षा के लिए व्यग्रता, और इसी प्रकार के अन्य अनुभव पाने की इच्छा होती है। और दुःखादि अवसर पर वे उससे छूटने की अथवा उसे प्रगट करने या छिपाने की भावना उनमें होती है। इस प्रकार अन्य प्रकार की वृत्तियाँ जगने के कारण उसकी प्रतीति गँदली (बाधित) क्षुब्ध हो जाती है। कुछ भावक ऐसे होते हैं जो सब कुछ परगत भाव से ही देखते हैं अतः उनके चित्त में सुख-दुःख की संवेदना के समय सुख-दुःख ताटस्थ्य, मोह आदि अन्य ही संवित् जगते हैं और वे विन्नरूप हो जाते हैं। अतः वे नाटक के वस्तु के साथ हृदय संवाद साध नहीं पाते। इस विन्न के निवारणार्थ पूर्वरंग और प्रस्तावना के द्वारा 'यह नट है' ऐसी प्रतीति करा कर मुकुटादि वेशभूषा द्वारा उसे आच्छादित कर अलौकिक भाषा, लास्यांग, रंगपीठ की कक्षाओं व नाट्य १. नाटक का एक प्रयोजन व्युत्पत्ति अर्थात् उपदेश है, ऐसा अभिनव गुप्त भी स्वीकार करते हैं और इसीलिए उनके ग्रंथों में ऐसे वचन बार-बार आते हैं। किन्तु उन्होंने व्युत्पत्ति द्वारा भी आखिर में तो प्रीति अर्थात् आनंद ही सिद्ध होता है, ऐसा कह कर आनंद को ही प्रधान प्रयोजन कहा है। 'लोचन' में उन्होंने कहा है कि कवि कीति के माध्यम से प्रीति अर्थात् आनंद ही पाना चाहता है। कहा है कि 'कीर्ति का फल स्वर्ग है।' यद्यपि श्रोताओं को व्युत्पत्ति और प्रीति दोनों प्राप्त होते हैं। वहा है कि सत्कार्यों का सेवन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में और कलाओं में वैचक्षण्य तथा कीर्ति और प्रीति का संपादन करा देता है, फिर भी उसमें प्रीति ही प्रधान है। नहीं तो प्रभुसंमित वेदादि और मित्र संमित इतिहासादि व्युत्पत्ति के हेतुओं की तुलना में कांता संमित काव्यरूपी व्युत्पत्ति हेतु की विशिष्टता किस प्रकार? अतः प्रधानतः आनंद का ही उल्लेख किया गया है। और भट्टनायक के मत की चर्चा करते समय भी उन्होंने 'लोचन' में यह बात कही है, जो हम देख चुके हैं, पृ० ५२।

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अभिनव का रस-विचार ५१ धर्मी अभिनयों का उपयोग करना चाहिए। इसके कारण भावक को यह प्रतीति नहीं होगी कि उसे ही, यहों पर इसी समय सुख-दुःखादि की अनुभूति होती है। नाटक में प्रस्तुत किया गया दृश्य नट के सच्चे स्वरूप को तथा रामादि अनुकार्य के सच्चे स्वरूप को आच्छादित कर लेता है; इसलिए यह संभव होता है। तात्पर्य यह कि नट के तथा अनुकार्य रामादि के स्थलकाल एवं व्यक्तित्व उभय को परस्पर निष्प्रभावी कर देते हैं। और वस्तु साधारण स्वरूप में ही ग्रहीत होता है। एक तरफ से नट के सच्चे व्यक्तित्व का आच्छादन होता है और दूसरी तरफ मन प्रस्तुत किये गये पात्र में ही विश्रांति नहीं पाता' अतः रामादि का प्रतिभास नट के सच्चे व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से तिरोहित कर नहीं सकता। और नाटक में आसीन पाठय और पुष्पगंधिका आदि जो नृत्य योजित होते हैं वे व्यावहारिक जीवन में देखे नहीं जा सकते तिसपर भी यह न मानना चाहिए कि वे नितान्त निकम्मे हैं क्योंकि इनका कोई न कोई उपयोग संभव है। इस प्रकार साधारणीभाव (साधारणीकरण) उत्पन्न करने के लिए भरत मुनि ने यह सब संबंधित वस्तुएँ आयोजित की हैं। यह सब यथास्थान स्फुट हो जाएगा। अतः इसे यहाँ समझाने की आवश्यकता नहीं है। ३. तीसरा विन्न है निजसुखादिविवशीभाव अर्थात् अपने सुख-दुःखों से विवश हो जाना। जो व्यक्ति अपने सुख-दुःखों से विवश हो गया हो वह अन्य किसी वस्तु में किस प्रकार एकाग्र हो सकता है ? और उसमें किस प्रकार विश्रांति अनुभव करेगा ? ऐसे व्यक्ति को रसास्वाद होना संभव नहीं है। इस विन्न का निवारण करने के लिए नाटक में भाँति भाँति के गीत, वाद्य, मंडपवैचित्य, विदग्ध गणिकाओं का नृत्य आदि उपरंजन की योजना की गई होती है। इन उपायों से अहृदय भावक का हृदय भी निर्मल बन जाता है। और वह सहृदयत्व को प्राप्त करता है। इसीलिए ही नाटक को दृश्य एवं श्रव्य कहा गया है।२ ४. चतुर्थ विघ्न प्रतीति के उपाय का वैकल्य है। काव्य नाटक में विभावादि के कारण हमें रस प्रतीत होता है, अतः विभावादि प्रतीति के उपाय कहे जाते हैं। यदि विभावा- नुभावों की संगतिपूर्ण योजना न हो पाई हो अथवा उतनी मात्रा में न हो पाई हो अथवा उसका नितान्त अभाव ही हो तो रसास्वाद संभव नहीं है। यह विघ्न काव्यगत है और १. यदि विश्रांति पावे तो यह अन्भव लौकिक वास्तविक अनुभव ही बन जाएगा। जब कि नाटक मैं यह रामादि का अनुभव सत्यासत्य के विचार से मुक्त होता हैं। २. अर्थात् नट व्यावहारिक जीवन मैं जैसे राम थे, वैसा बन नहीं जाता; वह राम ही है, ऐसा नहीं लगता। ३. अभिनवगुप्त ने प्रथम अध्याय में इस 'दृश्य' और 'श्रव्य' को समझाते हुए कहा है कि र्पशें- द्रियादि से गृहीत अनुभूति मैं साधारण्य आता नहीं है। दृश्य एवं श्रव्य विषय ही अत्यंत साधारणीभाव से ग्रहीत हो सकते हैं। जो साधारणी भाव से ग्रहण किये नहीं जा सकते उनसे भावक के चित्त मैं ईर्ष्या, क्रोध आदि ही पैदा होते हैं। सर्वसाधारणतयैव यद्योग्यं तच्च स्पृश्यादि रूपं न भवति।

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५२ अभिनव का रस-विवेचन उसमें दोष कवि का है। उसके निवारण के लिए कवि विभावादि की योजना औचित्य- पूर्ण एवं उचित मात्रा में करे। ५. पाँचवाँ विघ्न है स्फुटत्व का अभाव। जिस पर से भावक निरूपित वस्तु का अनुमान कर सके ऐसे मात्र शब्दरूपी लिंग हो, केवल उतने मात्र से प्रतीति की विश्रांति संभव नहीं है। अर्थात् यदि विभावानुभावों का केवल शाब्दिक कथन ही किया गया हो तो मात्र इतने आधार पर ही भावक वस्तु या पात्रों के साथ तादात्म्य साधित नहीं कर सकता। इसके लिए तो विभावादि की प्रतीति स्फुट रूप में अर्थात् प्रत्यक्षवत् होनी चाहिए। न्यायसूत्र में कहा गया है कि 'सर्वाचेयं प्रमितिः प्रत्यक्षपराः' । अर्थात् सभी प्रतीतियाँ प्रत्यक्ष पर होती हैं। मनुष्य का स्वयं साक्षात्कृत जो होता है, उससे भिन्न प्रतीति हजारों शास्त्रवचन एवं अनुमानों से नहीं कराई जा सकती। यह सभी लोगों का स्वानुभव है। अलातचक्र आदि के विषय में अन्य साक्षात्कृत ज्ञान होने पर ही पूर्व ज्ञान के प्रति अनादर होता है। लौकिक अनुभव की भी यही स्थिति है। चतुर्थ और पंचम इन दो विध्नों के निवारण के लिए लोकधर्मी, वृत्ति और प्रवृत्ति तथा प्रवृत्ति पर आधारित चतुर्विध अभिनयों का उपयोग करना चाहिए। ऐसा करने से विभावादि की विकलता दूर होती है। और काव्यार्थ प्रत्यक्ष कल्प बन जाता है। अभिनय की शक्ति शब्द-रूपी लिंग की शक्ति से भिन्न ही होती है। वह प्रत्यक्ष के समान ही होती है।१ इस बात का आगे विस्तार से निरूपण होगा। ये दोनों दोष कविगत, काव्यगत या नटगत भी हो सकते हैं। ६. छठा विध्न है अप्रधानता। नाटक में जो प्रधान हो उसे छोड़ कर अप्रधान पर बल दिया जाय तो यह विघ्न उपस्थित होता है। अप्रधान वस्तु में किसका चित्त रममाण हो सकता है ? क्योंकि अप्रधान वस्तु की प्रतीति को भी कालान्तर में प्रधान वस्तु की प्रतीति में पर्यवसित होना है। अतः भावक की संवित् उसमें विश्रांत हो नहीं पाती। यों स्थायीभाव ही रस का विषय बन सकते हैं। विभाव और अनुभाव तो जड़ हैं। व्यभिचारीभाव संविदात्मक होने पर भी सदैव परमुखापेक्षी होते हैं। दूसरों पर दृश्य श्रव्ययोस्तु बहुतसाधारण्योपपत्तिः। असाधारणे चेर्ष्याक्रोधादय एव प्रवर्तन्ते। वहाँ 'दृश्य' का अर्थ आनन्ददायक और श्रव्य का अर्थ व्युत्पत्ति अर्थात् उपदेशदायक ऐसा भी किया गया है। दृश्यमिति हृद्यं श्रव्यमिति व्युत्पत्तिप्रदमिति प्रीति-व्युत्पत्तिदमिति अर्थ इति। नाट्यशास्त्र, पृ० ११। १. अभिनव गुप्त ने २२ वें अध्याय की वृत्ति मैं कहा है कि- अभिनयनं हि चित्तवृत्ति साधारणतापत्तिप्राण साक्षात्कार कल्पाध्यवसाय संपादनमिति। अर्थात् अभिनयन का अर्थ है साक्षात्कार के सदृश प्रतीति उत्पन्न करना। चित्तवृत्ति का साधारण्य ही उसका प्राण है। (नाट्यशस्त्र, खंड ३, पृ. १५०)। ऐसा भी कहा गया है कि विध्न संभावनाविहीनसकलसाधारणस्पष्टभावसाक्षात्कारकल्पाध्यवसायसंपत्तये सर्वेषां प्रयोग इत्युक्तम्। अर्थात् फिर कहा है कि चतुविध अभिनयों का प्रयोग भावों के स्पष्ट साक्षात्कार जैसी प्रतीति उत्पन्न करने के लिए है। इसमें विघ्नों की संभावना ही नहीं होती है। और सभी सामाजिकों के लिए यह साधारण होती है ( ना० शा०, खं० ३, पृ० १४८)।

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आधार रखने वाले होते हैं। अतः दोनों गौण माने जाते हैं। चर्वणापात्र तो स्थायी ही है।' अतः उसका ही प्राधान्य सुरक्षित रहना चाहिए। अप्रधानता का विघ्न उपस्थित न हो इसलिए कवि एवं नट को तो स्थायी पर ही विशेष ध्यान देना चाहिए। स्थायीभावों का स्वरूप यहाँ अभिनव गुप्त ने स्थायी भावों के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा की है और उसमें पुरुषार्थ निष्ठ प्रधान स्थायी भाव, स्थायी भावों का स्वरूप, स्थायीभावों को स्थायी किस लिए कहते हैं ? स्थायी और व्यभिचारी के बीच का भेद आदि समझाया है। हम इसे विस्तार से देखें- वे कहते हैं कि कुछ संवित् पुरुषार्थनिष्ठ होती हैं। वे ही प्रधान समझी जाती हैं। यथा, रति कामनिष्ठ है। वह आनुषंगिक रूप में धर्म, अर्थ से भी सम्बद्ध है। क्रोध प्रधान व्यक्तियों में क्रोध अर्थनिष्ठ है परन्तु उसका पर्यवसान काम एवं धर्म में भी होता है। उत्साह धर्मादि तीनों पुरुषार्थों में निष्ठ है; तत्त्वज्ञान जनित निर्वेद जिसका स्थायी भाव है ऐसा शांत मोक्ष का उपाय है; अतः इतने ही प्रधान माने जायेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि जो स्थायीभाव पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए आवश्यक हैं वे ही प्रधान माने जाएँगे। जैसे कि रति 'काम' पुरुषार्थ का साधन है, फिर भी उसके माध्यम से अर्थ एवं धर्म भी सिद्ध होते हैं इसीलिए भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के १८ वें अध्याय के ७२वें दलोक में शंगार के तीन भेद बताये हैं : १. धर्मशंगार, २. अर्थ- शृंगार, ३. कामशृंगार (नाट्यशास्त्र, खंड २, पृ० ४३९)। क्रोध और उत्साह क्रमशः अर्थ और धर्म के साथ संयुक्त हैं। तिस पर भी ये दोनों-तीनों पुरुषार्थों का साधन बन सकते हैं। अभिनव गुप्त ने 'लोचन' में भी कहा है कि वीररौद्रयोस्त्वत्यन्तविरोधोऽपि नास्ति। समानं रूपं धर्मार्थकामार्जनोपयोगित्वं। अर्थात् वीर और रौद्र का अत्यंत विरोध भी नहीं है। क्योंकि ये दोनों धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि में समान रूप से उपयोगी हैं। (पृ० ३९३)। और शांत का फल मोक्ष है। यों अभिनवगुप्त ने चार पुरुषार्थों के साथ सम्बद्ध चार स्थायी भावों को प्रधान माना है : रति, क्रोध, उत्साह एवं निर्वेद। इन प्रधान स्थायी भावों का उल्लेख करने के बाद वे कहते हैं कि ये प्रधान स्थायी भाव परस्पर गौणत्व धारण करते हैं। फिर भी एक-एक रूपक में इनमें से एक प्रधान होता है और अन्य स्वतः गौण होते हैं। अधिक गहराई से देखें तो एक ही रूपक में अलग-अलग भाग में अलग-अलग स्थायी भाव की प्रधानता भी दृष्टिगत होगी। ये सभी स्थायी भाव सुखप्रधान हैं क्योंकि स्वसंवित् की चर्वणारूप एकघन प्रकाश १. यही बात अभिनवगुप्त ने 'लोचन' में इस प्रकार कही है विभावानुभावौ तावत् स्वशब्द- वाच्यावेव। तच्चर्वणापि चित्तवृत्तिष्वेव पर्यवस्यतीति रसभावेम्यो नाधिकं चर्वणीयम्। अर्थात विभाव एवं अनुभाव तो स्वशब्द वाच्य ही होते हैं। उनकी चर्वणा भी आखिर चित्तवृत्तियों में ही पर्यवसित होती हैं। अतः रस एवं भावों के अतिरिक्त कुछ भी चर्वणायोग्य नहीं होता-पृ० १७७।

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आनन्दमय ही होता है।' उदाहरणतः हम लौकिक जीवन में भी देख सकते हैं कि लोग एकघन शोक की चर्वणा में भी हृदय विश्रांति अनुभव करते हैं। और निरन्तर विश्रांति ही सुख का स्वभाव है।२ इसी प्रकार अविश्रांति ही दुःख का स्वरूप है। अतः कपिल मुनि के शिष्यों ने चांचल्य को ही रजोवृत्ति का लक्षण और दुःख का प्राण बताया है। (सांख्य कारिका १३)। अतः सभी रस आनन्द रूप हैं। आनन्दरूपता सर्वरसानाम्। फिर भी उपरंजन रूप इन रसों में भी कटुता का स्पर्श होता ही है। जैसे कि वीररस में क्लेश सहिष्णुता ही प्राण है। इस प्रकार रत्यादि प्रधान हैं। परन्तु हासादि के तो विभाव सभी लोगों को अत्यन्त सुलभ हैं अतः वे प्रधान नहीं माने जाते। और इसीलिए जिन में उत्तम प्रकृति के नायक नहीं होते ऐसे रूपकों में हास्य इत्यादि की प्रभूत मात्रा में स्थिति दृष्टिगत होती है। सभी पामर (तुच्छ) व्यक्ति हँसते हैं, शोक करते हैं, डरते हैं, परनिन्दा करते हैं, सुभाषितों का किंचिन्मात्र भी प्रयोग देख कर सभी सर्वत्र विस्मयानुभव करते हैं। परन्तु ये हासादि भी जब रत्यादि के अंगरूप बन कर आते हैं तब पुरुषार्थ की सिद्धि में उपयोगी होते हैं।१ रूपक के दस भेद हैं, वे भी स्थायी भावों की प्रधानता व गौणता के आधार पर ही बने हैं। अतः इन नौ को ही स्थायी माना गया है। मनुष्य जन्म लेता है तब से ही इन नौ स्थायी भावों का उसमें उदय होता है। कहा गया है कि 'मनुष्य दुःख का द्वेष और सुख का आदर करता है।' तदनुसार प्रत्येक मनुष्य रमण की इच्छा (रति) रखता है, अपने को श्रेष्ठ मान कर दूसरों का उपहास (हास) करता होता है, अभीष्ट के वियोग से संताप (शोक) अनुभव करता है, वियोग के कारण पर क्रोध भी करता है। उसके निवारण की शक्ति के अभाव में भयभीत भी होता है। फिर भी विजयी होने की इच्छा रखता है : (उत्साह), किसी वस्तु को अनिष्ट मानता हो तब वह अनुचित वस्तु के प्रति विमुखता से आक्रान्त होता है (जुगुप्सा), और अपने तथा परायों के

१. देखिए, टिप्पणी ५। २. यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि व्यवहार जीवन में भी कई बार मनुष्य को शोक मैं ही अपनी सर्वस्व इच्छा की परिपूर्ति का अनुभव होता है; उसका हृदय उसी मैं विश्रांति अनुभव करता है। उसके मन मैं अन्य किसी वस्तु का विचार तक नहीं आता। अतः उसके लिए यह दुःख ही सुख रूप बन जाता है। मन को दुःखानुभूति तो तभी होती है जब वह जिसे भोगता हो, उसमें विश्रांत न हो पावे। अर्थात् जिसका उपभोग करता हो उससे भिन्न ही कुछ वह चाहता हो। चित्तवृत्ति की एक-सी घनता में विघ्न रूप में इच्छाएँ ही बाधक होती हैं। यहाँ श्री नोली ने किंचित् भिन्न पाठ ग्रहण कर भिन्न अर्थ किया है। ३. श्री नोली आदि कुछ विद्वान् यहाँ भिन्न अर्थ करते हैं; हासादि तो, सभी लोगों को-उसके विभाव सुलभ होने के कारण प्रधान माने जाते हैं और इसीलिए तो अनुत्तम प्रकृति के मनुष्यों मैं हासादि प्रभूत मात्रा में दिखाई देता है ....... फिर भी वे रत्यादि के अंगरूप हैं और इस प्रकार पुरुषार्थों की सिद्धि मैं भी उपयोगी हो जाते हैं।

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असामान्य कार्यों को देखकर विस्मयानुभव करता है; और किसी वस्तु का त्याग करना चाहता है (निर्वेद)१। इन चित्तवृत्तियों की वासना से रहित कोई भी प्राणी नहीं होता। किसी में कोई चित्तवृत्ति अधिक होती है, किसी में कोई कम; किसी में उचित विषय में नियन्त्रित होती है, किसी में नहीं होती। अतः कुछ ही पुरुषार्थ के लिए उपयोगी होती है, और उनका ही उपदेश करना चाहिए। उत्तम, मध्यम, अधम ऐसे प्रकृतिभेद भी इन स्थायी भावों के आधार पर ही किये गये हैं। व्यभिचारीभावों का स्वरूप इनके अलावा ग्लानि, शंका आदि जो चित्तवृत्तियाँ हैं, वे उचित विभावों के अभाव में जीवन में कभी प्रकट होती ही नहीं हैं जैसे कि रसायन का सेवन करने वाले मुनि में ग्लानि, आलस्य, श्रम आदि का कभी उद्भव होता नहीं है। विभावों के कारण जिन में उत्पन्न होता है उनमें भी कारण नष्ट होने पर ये नष्ट होते हैं एवं संस्काररूप में शेष रहते ही हैं। ऐसा अनिवार्यतः होता नहीं है। परन्तु उत्साहादि तो अपना कार्य पूर्ण करने के बाद प्रलीन हो जाते हैं फिर भी संस्कार रूप में तो शेष रहते ही हैं। क्योंकि अन्य कार्यों के सम्बन्ध में उत्साह तो अखण्डित ही रहता है। जैसे कि पतंजलि ने कहा है-"चैत्र एक स्त्री में अनुरक्त है इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य स्त्रियों में विरक्त है" (पातंजल सूत्र, व्यासभाष्य, २-४)। "अतः ये सभी व्यभिचारीभाव स्थायी रूप चित्तवृत्ति के सूत्र में पिरोये गये होते हैं, और वे उदय और अस्तरूपी लाखों विचित्रतायुक्त अपने स्वरूप को प्राप्त करते हैं; वे लाल, नीले आदि सूत्र में थोड़े-थोड़े-से अन्तर पर पिरोये गए और अलग-अलग होने के कारण हजारों भाँति के तेज वाले स्फटिक, काँच, पझ्मराग, मरकत नीलम आदि की गुरियों की तरह होते हैं; वे उस सूत्र में अपने रंगों का वैचित्र्य दाखिल नहीं करते, १. हेमचंद्र यह भाग इस प्रकार देते हैं जात एव हि जन्तुरियातीभिः संविद्धिः परीतो भवति। तथा हि दुःखविद्वेषी सुखास्वादनलालसः सर्वो रिरंसया व्याप्तः स्वात्मन्युत्कर्षमानितया पर- मुपहसति, उत्कर्षापाय शंकया शोचति अपायं प्रति क्रुध्यति, अपाय हेतु परिहारे समुत्सहते, विनिपाताद् विभेति, किंचिदयुक्ततयाभिमन्यमानो जुगुप्सते, तत्तत्स्वपरकर्तव्यवैचित्र्यदर्शना- द्विस्मयते। किंचिज्जिहासुस्तत्र वैराग्याच्छमं भजते-पृ० १२४-२५। २. कहने का तात्पर्य यह है कि ये नौ स्थायी भाव ही पुरुषार्थ को उपयोगी हैं। व्यभिचारी भावों मैं वह शक्ति नहीं है। संभव है हेमचंद्राचार्य ने अभिनवगुप्त के शब्द ही उद्धत किये हों। अयं च निर्वेद: स्वयं पुरुषार्थसिद्धये वा उत्साहरत्यादिवदत्यन्तानुरंजनाय वा हासविस्म- यादिवन्न प्रभवतीत्यन्यमुखप्र क्षित्वाद् व्यभिचार्येनेति। विवेक, पृ० १३९। अर्थात् यह निर्वेद स्वयं उत्साह रत्यादि की भाँति पुरुषार्थ सिद्धि मैं अथवा हास विस्मयादि की भाँति अत्यंत अनुरंजन में उपयोगो हो नहीं सकता। क्योंकि वह परमुखापेक्षी है और इसीलिए वह व्यभिचारी ही है। ३. नाटक का लक्ष्य पुरुषार्थों की सिद्धि के उपाय के दृष्टांत और उपदेश देना है।

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लेकिन उस सूत्र के कारण प्राप्त सौन्दर्य खुद धारण करते हैं और स्वयं को तथा विचित्र अर्थ वाले स्थायी सूत्र को विचित्रित करते हैं और बीच-बीच में शुद्ध स्थायी सूत्र को भी प्रकट होने का अवकाश देते हैं, फिर भी आगे-पीछे के व्यभिचारीरूपी रत्नों की छाया से अवश्य शबलता को उत्पन्न करते दिख पड़ते हैं। इसलिए उन्हें व्यभिचारी भाव कहते हैं। तस्मात्स्थायिरूपचित्रवृत्तिसूत्रस्यूता एवामी व्यभिचारिणः स्वात्मानमुदयास्तमय- वैचित्र्यशतसहस्त्रधर्माणं प्रतिलभमाना रक्तनीलादिसूत्रस्यूतविरलभावो (गो) पलम्भनस- म्भावितभङ्गीसहस्रगर्भस्फटिक का चाभ्रकपद्मरागमरकतमहानीलादिमय गोलक वत्तस्मिन्सूत्रे स्वसंस्कारवैचित्र्यमनिवेशयन्तोऽपि तत्सूत्रकृतमुपकारसन्दर्भ बिभ्रतः स्वयं च विचित्रार्थ- स्थायिसूत्रं च विचित्रयन्तोऽन्तरान्तरा शुद्धमपि स्थायिसूत्रं प्रतिभासावकाशमुपनयन्नोऽ- पिपूर्वापरव्य भिचारिरत्नच्छाया शबलिमानमवश्यमानयन्तः प्रतिभासन्त इति व्यभिचारिण उच्यन्ते-२८३। यहाँ अभिनवगुप्त ने व्यभिचारीभावों का स्वरूप समझाने के लिए माला का दष्टान्त दिया है। माला में अनेक रंग की गुरियाँ होती हैं। इन गुरियों के कारण डोर के स्वरूप में कोई अंतर नहीं होता फिर भी उसमें एक प्रकार की शोभा तो आ ही जाती है। जहाँ-जहाँ जिस रंग की गुरिया होती हैं वहाँ-वहाँ सूत्र भी वैसे ही रंग का प्रतीत होता है। किन्तु बीच-बीच में सूत्र का शुद्ध रूप भी दिखाई दे जाता है। इसी प्रकार रसानुभूति के समय व्यभिचारी भाव स्थायीभावरूपी सूत्र में संग्रथित गुरियों-के से होते हैं। वे स्थायीभाव के स्वरूप में कोई परिवर्तन करते नहीं हैं। विभिन्न व्यभिचारी भाव जिसमें संग्रथित हैं, ऐसा सूत्र रूप स्थायीभाव तो यथावत् (जैसे का तैसा) ही रहता है फिर भी इन व्यभिचारियों के कारण उसमें वैचित्यानुभूति होती है। और बीच-बीच में जिस प्रकार माला में सूत्र का शुद्ध रूप दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार शुद्ध स्थायीभाव की भी अनुभूति होती रहती है। ऐसी ही उपमा अभिनवगुप्त ने शृंगार तथा शांत के निरूपण के समय प्रयुक्त की है, यह आगे देखेंगे। अतः 'इसे ग्लानि हुई है।' ऐसा कहने पर 'कैसे ?' ऐसा हेतुप्रश्न पूछा जाता है। यहीं इस भाव की अस्थायिता व्यंजित करता है। परन्तु 'राम उत्साह शक्ति वाला है,' ऐसा कहने पर कोई यह प्रश्न नहीं करता कि 'कैसे ?'। मतलब कि, व्यभिचारी भावों के विषय में उनके कारण पूछे जा सकते हैं, परन्तु स्थायी भाव के संबंध में कारण नहीं पूछे जा सकते। एक उदाहरण लें-शकुन्तला के प्रति रति जगने के बाद दुष्यंत राजा के मन में यह शंका होती (उपस्थित होती) है कि यह मेरे लिए विवाह-योग्य है कि नहीं। इस स्थिति में हम यह कहते हैं कि राजा शंका में है। और यह प्रश्न किया जा सकता है कि 'क्यों ?'। उत्तर में कहना पड़ेगा कि क्योंकि वह शकुन्तला के प्रेम में है। इस प्रकार यहाँ इस धर्मभीरु राजा की शंका के मूल में उसकी शकुन्तला के प्रति

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रति है। परन्तु 'राजा शकुन्तला के प्रेम में है' ऐसा कोई कहे तो वहाँ पर 'क्यों ?' ऐसा हेतु प्रश्न पूछा नहीं जाता क्योंकि 'रति' स्थायी भाव है। विभाव तो इन स्थायीभावों के केवल उद्बोधक हैं और उनके स्वरूप का उपरंजन कर रत्युत्साहादि के औचित्य-अनौचित्य का एक मात्र कारण बन जाते हैं। विभावादि के अभाव में स्थायी भाव तो ठेठ (निरूपाख्य अर्थात् तुच्छ बन नहीं जाते हैं। क्योंकि वासना रूप में तो वे सभी प्राणियों में होते हैं, ऐसा कहा गया है। परन्तु व्यमिचारियों का तो अपने विभावों के अभाव में नाम तक नहीं होता। इस प्रकार स्थायी के निरूपण द्वारा अप्रधानता का निवारण करना चाहिए। इसी लिए भरत मुनि ने कहा है कि स्थायि भावान् रसत्वमुपनेष्यामः । हम स्थायी भाव को रसत्व तक पहुँचा देंगे। अर्थात् स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त कर सकते हैं' विभावादि रसत्व को प्राप्त नहीं कर सकते और इस प्रकार रस का सामान्य लक्षण देने के पश्चात् विशेष लक्षण देने का प्रारम्भ किया है। इस प्रकार स्थायी भाव का स्वरूप और उसका प्राधान्य विस्तार से समझाने के पश्चात् अभिनवगुप् विघ्नों का विवेचन आगे बढ़ाते हैं। ७. सातवाँ और अंतिम विध्न है संशययोग। विभाव, अनुभाव और व्यभिचारीभाव द्वारा स्थायीभाव की अभिव्यक्ति होती है। यह बात सच है किन्तु अमुक कोई एक विभाव, अनुभाव या व्यभिचारी का अलग विचार करें तो वह किसी अमुक ही स्थायी- भाव के साथ नियत सम्बन्ध रखता नहीं है। जैसे कि 'अश्रु' यह अनुभाव है परन्तु वह आनन्द के कारण, दुःख के कारण या शोक के कारण भी उत्पन्न हो सकते हैं। इसी प्रकार 'बाघ' विभाव है किन्तु वीर पुरुष के लिए क्रोध का और अन्य किसी के लिए

१. भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के सप्तम अध्याय मैं यह बात इस प्रकार समझायी है : "यदि काव्यार्थ के आश्रयस्थित विभाव-अनुभाव से व्यंजित होते उनचास भावों द्वारा सामान्यगुण के योग से अर्थात् साधारण्य के कारण रस निष्पन्न होते हों तो आप ऐसा क्यों कहते हैं कि स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त करते हैं। कहते हैं-जिस प्रकार समान लक्षण वाले, समान हाथ, पैर, पेट, शरीर वाले, एक से ही अंगोपांग वाले पुरुषों में से भी अमुक ह कुल, शील, विधा, कर्म, शिल्प विचक्षणता के कारण राजत्व को प्राप्त करते हैं, और अन्य कुछ कम बुद्धिवाले उनके अनुचर बनते हैं, उसी प्रकार विभाव, अनुभाव, और व्यभिचारी भाव स्थायीभाव के उपाश्रित बनते हैं। अनेकों के आश्रयभूत होने से स्थायी भाव स्वामी बने हुए हैं। इसी प्रकार स्थानिक पुरुष जैसे अन्य भाव इन से गौण बने रहते हैं। स्थायी भाव रसत्व को प्राप्त करता है। व्यभिचारी परिजन सदश हैं। इनका कोई उदाहरण है ? जिस प्रकार राजा के इर्दगिर्द आदमी होने पर भी अकेला वही राजा का नाम धारण करता है, अन्य कोई नहीं फिर चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो ? इसी प्रकार विभाव, अनुभाव और व्यभि- चारी से संवलित स्थायी भाव ही रस संज्ञा पाता है।" पश्चात् एक श्लोक दिया गया है : यथा नराणां नृपतिः शिष्याणां च यथा गुरुः। एवं हि सर्वभावानां भाव: स्थायी महानिह॥ पृ० ३४९॥

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भय का विभाव भी हो सकता है। श्रम और चिंता ये व्यभिचारी भाव हैं, परन्तु ये उत्साह, भय, आदि अनेक स्थायीभावों के सहचारी के रूप में दिखाई दे देते हैं। अतः यदि हम इन तीनों का अलग-अलग विचार करें तो किस स्थायी के ये विभाव हैं, अनुभाव हैं या व्यभिचारीभाव हैं, यह निश्चयपूर्वक कहा नहीं जा सकता परन्तु इन तीनों का समग्रतः विचार किया जाय तो वे अमुक ही स्थायी के विभावादि हैं, ऐसा निश्चित रूप से कहा जा सकता है। जैसे कि जहाँ बन्धु का विनाश अर्थात् मृत्यु विभाव हो रुदन, अश्रुपात इत्यादि जहाँ अनुभाव हो और चिन्ता, दैन्य आदि जहाँ व्यभिचारी भाव हो वहाँ निःसंशय रूप से कहा जा सकता है कि यहाँ शोक ही स्थायी- भाव है। ऐसे स्थान पर संशय जगने का कोई अवकाश (गुंजाइश) ही नहीं होता। ऐसा संशय जगने की जहाँ गुंजाइश हो-संभावना हो वहाँ इस शंका रूप विघ्न का निवारण करने के लिए इन तीनों का 'संयोग' साधित होना चाहिए, ऐसा भरत मुनि ने रससूत्र में कहा है।

रसप्रतीति का स्वरूप इन सातों विध्नों का ऊपर कहे अनुसार निवारण हो जाय तभी रसप्रतीति हो पाती है। इस रसप्रतीति का स्वरूप कैसा है ? वह अब अभिनवगुप्त एक लम्बे वाक्य में प्रकट करते हैं। मैं इस वाक्य को मूल में ही यहाँ उद्धृत करता हूँ: तत्र लोकव्यवहारे कार्यकारणसहचरात्मकलिंगदर्शने स्थाय्यात्मकपरचित्तवृत्त्य- नुमानाभ्यासपाटवादधुना तैरवोद्यानकटाक्ष धृत्यादिभिः लौकिकीं कारणत्वादिभुवमति क्रान्तैः विभावन-अनुभावन-समुपरंजकत्वमात्र प्राणैः, अत एव अलौकिक विभावादि व्यपदेशभाग्भिः प्राच्यकारणादिरूपसंस्कारोपजीवनाख्यापनाय विभावादिनानानाम- धेय व्यपदेश्यैः गुण प्रधानतया पर्यायेण सामाजिकधियि सम्यक् योगं (संयोगं) सम्बन्धं ऐकाश्यम् वा आसादितर्वद्ध्िः, अलौकिक निर्विन्न-संवेदनात्मक चर्वणा गोचरतां नीतो- 5र्थः, चर्व्यमाणतैकसारः न तु सिद्धस्वभावः तात्कालिक एव न तु चर्वणातिरिक्तकालाव लम्बी स्थायी विलक्षण एव रसः । अर्थात् लोक-व्यवहार में कारण, कार्य और सहचर वस्तुएँ मनुष्य के देखने में आती हैं, अतः उन पर से अन्य की स्थायी चित्त वृत्ति का अनुमान करना होता है। और इस प्रकार बार-बार अनुमान करने के अभ्यास के कारण उसमें अनुमान करने की कुशलता आ जाती है। काव्य-नाटक में भी वे ही उद्यान, कटाक्ष, धृति आदि कारण-कार्य और सहचर होते हैं, लौकिक करणत्वादि की भूमिका लाँघ कर विभावन, अनुभावन, समुपरञ्जन के कार्य करते हैं, और इसी लिए उनके इन कार्यों के अनुरूप विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव ऐसे अलौकिक नामों से उन्हें पहचाना जाता है, लौकिक व्यवहार में कारण-कार्य आदि की प्रतीति होने से मनुष्य के चित्त में जो संस्कार पड़े हुए हैं, वे संस्कार ही इन विभावादि के आश्रय होते हैं, फिर भी यहाँ उनके कार्य लौकिक व्यवहार के कार्यों से भिन्न ही हते हैं, यह बतलाने के लिए इन्हें काव्यशास्त्र

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में विभाव, अनुभाव, और व्यभिचारीभाव, आदि नये ही, अलौकिक [अर्थात् लोक- व्यवहार में अप्रयुक्त ] नाम दिये जाते हैं। भावक के चित्त में इन अलौकिक विभावादि के प्रधानत्व एवं गौणत्व का तारतमिक औचित्यपूर्ण योग (संयोग) संबंध अथवा एकाग्रता सिद्ध होती है' और इस कारण अलौकिक निर्विन्न चर्वणा का विषयभूत काव्यों का अर्थ ही रस कहाता है। यह रस स्वयं चर्वणारूप होता है। चर्व्यमाणता अर्थात् आस्वाद्यता ही उसका सार अथवा प्राण है। यह पहले से सिद्ध रूप नहीं होता। वह तत् तत् काल पर्यत ही होता है। चर्वणा जब तक टिकती है तब तक वह टिकता है। तात्पर्य यह कि चर्वणा शुरू होने पर वह अनुभव-गम्य बनता है और चर्वणा समात होने पर ही उसका अनुभव भी समाप्त हो जाता है। अतः वह स्थायी नहीं किन्तु स्थायी से विलक्षण अर्थात् भिन्न प्रकृति वाला है। शंकुक इत्यादि जो यह कहते हैं कि विभावादि से अनुमित स्थायी ही आस्वाद्यता के कारण रस कहलाता है, यह ठीक नहीं है। क्योंकि यदि वह वैसा होता तो लौकिक व्यवहार में भी स्थायी रस-रूप में आस्वादित किया जा सकता। शंकुक के मतानुसार रत्यादि स्थायी तो रामादि में होते हैं। नट में तो होते नहीं हैं। फिर भी वह यदि रस रूप में आस्वादित किया जाता हो तो फिर लौकिक व्यवहार में तो स्थायी भाव वस्तुतः अस्तित्व रखता है, वह रसत्व को कैसे पाता है ? अतः विभावादि के आधार पर होने वाली स्थायी की प्रतीति रस नहीं है। और इसीलिए भरत मुनि ने अपने रस-सूत्र में स्यायी का उल्लेख ही नहीं किया है। किन्तु यदि किया होता तो शल्य (बाधक) रूप होता। स्थायी रसीभूतः; 'स्थायी रस बन गया' यह जो कहा जाता है वह केवल उप- चार ही है। ऐसे उपचार का कारण इतना ही है कि तद् तद् स्थायी के कारण और कार्य के रूप में जो वस्तुएँ लौकिक व्यवहार में हमें परिचित होती हैं, वे ही यहाँ काव्य में विभावानुभाव रूप में आकर विभावन-अनुभावन आदि चर्वणा के लिए उपयोगी कार्य करती हैं।१ लौकिक चित्तवृत्ति के अनुमान में क्या रस मिलेगा? अतः १. भरत प्रयुक्त शब्द 'संयोग' का दोहरा अर्थ होता है। एक तो विभावादि एक-दूसरे के साथ संयोग कर एकत्व को प्राप्त होते हैं। और दूसरा, भावक का चित्त इन सब के साथ तादात्म्य सिद्ध करते हैं, अथवा उनके द्वारा निरूपित दृश्य में भावक के चित्त का अनुप्रवेश होता है। २. अभिनव गुप्त ने 'लोचन' में कहा है कि-इह तु विभावादिचर्वणाद्भुतपुष्पवत्तत्काल सारैवोदिता न तु पूर्वापरकालानुबंधिनी।-पृ० १६०। इसके स्थान पर काव्यानुभाव मैं तो विभावादि की चर्वणा होती है। वह जादू से उत्पन्न फूल के सदृश है। वह तात्कालिकी ही होती है [ वह अकस्मात् उत्पन्न होती है और अकस्मात् ही विलुप्त होती है ] इसका पूर्व या पश्चात् काल से कोई सम्बन्ध नहीं है। मतलब यह कि इसका कोई व्यावहारिक प्रयोजन भी नहीं होता। ३. 'लोचन' में अभिनवगुप्त ने कहा है कि 'शोके हि स्थायि भावे ये विभावानुभाव्रास्तत्समुचिता चित्तवृत्तिश्चर्व्यमाणात्मा रस इत्यौचित्यात्स्थापिनो रसतापत्तिरित्युच्यते।' अर्थात् शोक स्थायीभाव में जो विभावादि होते हैं उनकी उचित चित्तवृत्ति की चर्वणा रस है। यह जो

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अलौकिक चमत्कार रूप आस्वाद स्मृति, अनुमान और लौकिक संवेदन से भिन्न ही होता है।' लौकिक अनुमान के अभ्यास के संस्कार से सम्पन्न भावक को

कहा जाता है कि स्थायी भाव रसत्व को प्राप्त करता है, वह केवल उपचार ही समझना चाहिए-पृ० ८९। १. 'लोचन' में अभिनवगुप्त ने रसानुभूति को स्मरण-अनुमान मानने वाले मीमांसकों के मत का विरोध किया है। वे प्रथम मीमांसकों का पक्ष स्थापित करते हैं और तत्पश्चात् उसका खण्डन करते हैं। मीमांसकों का कहना है कि जिस प्रकार धूएँ को देख कर अग्नि का स्मरण या अनुमान हो जाता है, उसी प्रकार विभावादि की प्रतीति के बाद रत्यादि चित्तवृत्ति का ज्ञान होता है। इस मैं शब्द का कोई व्यापार ही नहीं होता। अभिनव गुप्त व्यंग्य में कहते हैं कि प्रतीति का स्वरूप समझने वाले इस मीमांसक से यह पूछा जाय कि आप दूसरों की चित्तवृत्ति मात्र की प्रतीति को ही रस प्रतीति मानते हैं क्या ? देखिए कहीं ऐसी भूल न कर बैठना क्योंकि लौकिक चित्तवृति के अनुमान को ही आप रसप्रतीति मानते हों तो लौविक चित्तवृत्ति के मात्र अनुमान मैं ही कैसे रसप्रतीति होगी? अलौकिक चमत्कार रूप जो रसास्वाद है, काव्यगत विभावादि की चर्वणा हो जिसका प्राण है, उसे आपको स्मरण-अनुमान के साथ तुलनीय कर उड़ा न देना चाहिए। सत्य तो यह है कि लौकिक कार्य-कारण के अनुमान से ही सामाजिकों का हृदय संस्कारप्राप्त हो जाता है। वह जब विभावादि को निरूपित होते देखता है तब उनका ग्रहण ताटस्थ्य पूर्वक नहीं करता। परन्तु हृदयसंवादपूर्वक अथवा सहृदयतापूर्वक करता है। सहृदयता के बल पर आगे परिपूर्ण होने वाला रसास्वाद अंकुरित होने के कारण अनुमान-स्मरण आदि सोपानों को चढ़े बिना ही तन्मय हुआ जा सके वैसी चर्वणा से अर्थात् साधारणी भाव से वह विभावादि का ग्रहण करता होता है। यह चर्वणा प्रथम अन्य किसी प्रमाण से उत्पन्न नहीं होती है क्योंकि अलौकिक अनुभव मैं प्रत्यक्षादि प्रमाणों का कोई उपयोग नहीं है। इसीलिए विभावादि अलौकिक नामों का उपयोग किया जाता है। कहा गया है कि विशेष रूप मैं ज्ञान करावे सो विभाव। 'विभावो विज्ञानार्थः' लोक मैं तो वह कारण ही कहा जाता है विभाव नहीं। अनुभाव भी अलौकिक होते हैं। कहा है कि 'यदयमनुभावयति वागङ्गसत्त्व कृतोऽभिनयस्तस्मादनुभवः' इति। यह वाचिक, आंगिक और सात्विक अभिनयन (स्थायी और व्यभिचारी भाव का) अनुभव कराता है, इसलिए उस अभिनय को अनुभाव कहते हैं। अनुभव में तन्मय हो जाना ही अनुभवन है। लोक में उसे कार्य कहा जाता है, अनुभाव नहीं। इसलिए यह कोई परायी चित्तवृत्ति का अनुमान मात्र नहीं है, ऐसा सूचित करने के लिए 'विभावानुभाव व्यभिचारि संयोगा द्रसनिष्पत्तिः ।' इस सूत्र में स्थायी भाव का उल्लेख नहीं है। उल्लेख होता तो बाधक (शल्य) होता-पृ० १५६।

ऊपर कथित 'अनुभवन' को समझाते हुए 'बालप्रिया' टीका मैं कहा गया है कि केवल परायी चित्त वृत्ति का ज्ञान होना ही अनुभवन नहीं है, किन्तु परायी स्थायी चित्तवृत्तियों के साथ सामाजिक का तन्मय हो जाना तद् तद् चित्तवृत्ति के भावन द्वारा उसकी सजातीय ऐसी सामाजिक की चित्तवृत्ति जाग्रत होना और उसका अनुभव होना ही अनुभवन; ऐसा अर्थ है- न परकीयचित्तवृत्त्यवगममात्रमिहानुभवनं किन्तु तासा चित्तवृत्तिनां स्थाख्यादि रूपाणां सम्बन्धि यत् सामाजिकानां तन्मयीभवनं, तत्तच्चित्तवृत्तिभावनया तत्सजातीयस्वीयचित्त वृत्ते रूद् बोधनानेनानुभवनं तदेवेत्यर्थ :- पृ० १५६।

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काव्य नाटक में जब प्रमदादि विभावादि की प्रतीति होती है, तब वह ताटस्थ्य से नहीं होती, किन्तु हृदय संवादपूर्वक होती है। हृदय संवाद की शक्ति का अर्थ ही सहृदयता है। सहृदयता के बल पर वह उसमें तन्मय हो जाता है, और उसे वह उचित चर्वणा व्यापार के द्वारा विभावादि का युगपत् व अखंड ग्रहण करता है। उसे अनुमान, स्मृति आदि सोपान चढ़ने की जरूरत नहीं होती। तन्मयीभाव के उचित ऐसी विभावादि की चर्वणा अंकुर के समान है, और रसास्वाद उसका पूर्णत्व-प्राप्त स्वरूप है। पूर्णता को प्राप्त कर रसास्वाद में परिणत होने वाली यह चर्वणा पहले से ही अन्य किसी प्रमाण से उत्पन्न नहीं होती जिससे इस समय उसे स्मृति कहा जा सकता है। और वह लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाण का भी विषय नहीं बनती किन्तु वह तो केवल अलौकिक विभावादि के संयोग के कारण ही निष्पन्न होती है। व्यवहार में प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमा आदि लौकिक प्रमाण द्वारा रत्यादि का जो बोध होता है उसकी अपेक्षा यह चर्वणा रूप प्रतीति भिन्न ही होती है। इतना ही नहीं किन्तु योगि प्रत्यक्ष जनित तटस्थ पर संवित्तिज्ञान से तथा पक्व योगी के सभी बाह्य विषयों के संपर्क रहित स्वात्मानन्द की एक घन अनुभूति से भी भिन्न है। क्योंकि लौकिक प्रमाणों से होने वाली लौकिक रत्यादि की प्रतीति में ज्ञातागत आसक्ति, तिरस्कार आदि विन्न उदित होते हैं, तो अपक्व योगी की प्रतीति में तटस्थता होती है, अतः उस में स्फुटता का अभाव है और पक्व योगी के एकघन अनुभव में एक ही विषय में पूर्ण तल्लीनता होती है।१ अतः इन सब में रसास्वादोचित सौंदर्य संभव नहीं है।

१. योगानुभव के समय सारे द्वन्द्व मिट चुके होते हैं। उसमैं सूर्य, चंद्र, रात, दिवस, सुन्दर- असुन्दर किसी का अरितित्व नहीं होता। प्रत्यगात्मा शिव अथवा भैरव में अर्थात् उपास्य मैं पूर्णतः लीन हो चुकी होती है। चित्त में से सभी कुछ तिरोहित हो चुका होता है। जब कि रसानुभव के समय तो विभावादि के व्यापार से उद्बुद्ध रत्यादि की वासना की उपस्थिति आवश्यक होती है। दूसरे ढंग से कहें तो रसानुभव के लिए भावक में चित्तवृत्तियों का पूर्व ज्ञान आवश्यक होता है। यह ज्ञान कुछ अंशों में सहजात होता है अर्थात् मानव प्रकृति का ही अंश होता है और कुछ अंशों में जीवन के अनुभव मैं से अर्थात् अपने व पराये प्रतिभावों के निरीक्षण में से प्राप्त किया गया होता है। किसी सुन्दरी के काव्यमय वर्णन से व्यक्त होता रस उस वर्णन से उद्बुद्ध रति की चित्तवृति से अनुरंजित होता है। यह चित्तवृति भावक में वासना या संस्कार रूप में स्थित है ही, विभावादि से वह उद्बुद्ध होती है। इन चित्तवृत्तियों के अनुरंजन के कारण रसोचित आनन्द का अनुभव होता है। उपरान्त 'लोचन' में भी अभिनवगुप्त ने कहा है कि अनुभावविभावबोधनोत्तरमेव तन्मयीभवनयुक्त्या तद्विभावानुभावोचितचित्तवृत्ति- वासनानुरज्जितस्वसंविदानन्द चर्वण गोचरोऽथों रसात्मा स्फुरत्येव-पृ० ८१। अर्थात् अनुभाव विभाव का बोध होने के बाद तन्मय हो जाने के कारण तद्-तद् विभावा- नुभावों के उचित चित्तवृत्ति की वासना से अनुरज्जित स्वसंवित् की आनंदमय चर्वणा को गोचर रसरूप अर्थ स्फुरित होता ही है।

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परन्तु इस चर्वणाप्रतीति में पक्व योगी के अनुभव जैसी केवल अपने में ही लीनावस्था संभव नहीं होने से उसमें विषयावेश के कारण आनेवाली विवशता होती नहीं है; उसमें भावक का स्वात्मानुप्रवेश होने से उसमें मितयोगी के अनुभव जैसी तटस्थता नहीं होती, उपरान्त उसमें विभावादि के साधारण्य के कारण उसके लिए उचित अपनी रत्यादि वासना का भावक आस्वाद लेता है इसलिए उसमें अर्जन आदि लौकिक विन्न संभवित नहीं हैं ऐसा हम कई बार कह चुके हैं। इस प्रकार यह चर्दणा निर्विन्नहोती है अतः उसमें सौंदर्य अथवा चमत्कार का अनुभव होता है। इस तरह विभावादि रस के कारक हेतु नहीं हैं; क्योंकि यदि उन्हें कारक हेतु मान लें तो विभावादि की प्रतीति हो जाने के बाद भी कार्य रूप रस बना रहना चाहिए। पर वैसा होता नहीं है। जब तक विभावादि रहते हैं तब तक रस चर्वणा होती है और विभावादि के न रहने पर रस चर्वणा भी समाप हो जाती है तथा विभावादि रस के ज्ञापक-हेतु भी नहीं हैं। यदि उन्हें ज्ञापक-हेतु मान लें तो उन्हें लौकिक प्रमाण मानना चाहिए और रस को भी प्रमेय अर्थात् सिद्ध रूप ही मानना पड़ेगा किंतु रस कभी सिद्ध रूप होता ही नहीं है। तो फिर ये विभावादि क्या हैं? चर्वणा के लिए उपयोगी होने के कारण वे विभावादि कहे जाते हैं। और ये नाम लौकिक नहीं हैं अर्थात् व्यवहार में इनका उपयोग होता नहीं है। कारण भी न हो और ज्ञापक भी न हो ऐसा दूसरा कोई कारण भी होता है क्या ? यदि कोई ऐसा कह दे तो हमारा उत्तर यह है कि यह कोई दोष नहीं हैं, क्योंकि यही सिद्ध करता है कि यह वस्तु अलौकिक है। गुड, काली मिर्च, आदि में भी कभी शर्बत (पानक) का आस्वाद होता है क्या १' पर ऐसा ही कुछ है। यदि रस किसी भी प्रमाण का विषय नहीं है, तो वह अप्रमेय है क्या ?

१. पानक का दष्टांत हमारे देश के विमर्श में बारम्बार प्रयुवत होता है। उदा०-न्याय मंजरी में कहा है कि-एवं पदार्थेभ्योऽन्यो एव वाक्यार्थः पानकादिवत्, यथा पानकं शर्करा नागकेशर मरीचादिम्योडर्थान्तरमेव, यथा च सिन्दूर हरिताललाक्षादिभ्योऽर्थान्तरमेव चित्रं, यथा वा षडजर्षभगान्धारधैव तादिभ्योऽर्थान्तरमेव ग्रामरागः, तथा पदेभ्यो वाक्यं, पदार्थेभ्यो वाक्यार्थः। -पृ० ३४१। पानक की भाँति पदार्थ से वाच्यार्थ भिन्न है। जिस प्रकार पानक शर्करा, नागकेसर, काली मिर्च, आदि से भिन्न वस्तु है, जिस प्रकार, सिन्दूर, हरताल, लाक्षा आदि से चित्र भिन्न ही वस्तु हैं। अथवा जिस प्रकार षड्ज, ऋषभ, गांधार, धैवत आदि से ग्राम राग (कोई संगीत की चीज) भिन्न ही है, उसी प्रकार पद से वाक्य और पदार्थ से वाक्यार्थ भिन्न ही वस्तु है। पानक के स्वरूप एवं गुण-दोषों का वर्णन 'भाव प्रकाश' के पूर्व खण्ड के दूसरे भाग में इस प्रकार किया गया है : अम्लिकाया: फलं पक्वं मर्दितं वारिणा दृढम्। शर्करामरिचैर्मिश्रं लवङ्ग न्दुसुवासितम् ॥ अम्लिकाफल सम्भूतं पानकं वातनाशनम्।। पित्तश्लेष्मकरं किञ्चित् सुरुच्यं वह्निबोधनम्॥

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ऐसे प्रश्न के उत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि बात वैसी ही है। रस्यता, आस्वाद्यता ही उसका प्राण है। अतः लौकिक प्रमाणों का विषय बनना उसकी प्रकृति ही नहीं है। तो फिर सूत्र में 'निष्पत्ति होती है' ऐसा क्यों कहा ? उसके प्रत्युत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि वहाँ निष्पत्ति का कथन है, सो रस की निष्पत्ति नहीं है। रस विषयक रसना की निष्पत्ति का कथन है। सूत्र का अर्थ ऐसा है कि विभावानुभाव व्यभिचारी के संयोग से भावक में रसना की अर्थात् चर्वणा की क्रिया निष्पन्न होती है। रस इस चर्वणा का विषय बनता है। और चर्वणा पर ही उसके जीवित का आधार है, अर्थात् इस अर्थ में यदि आप उपचार मात्र से यह कहें कि रस की निष्पत्ति होती है, तो उसमें कोई दोष नहीं है। परन्तु इतना याद रखना चाहिए कि, यह रसना अथवा चर्दणा व्यापार प्रमाण व्यापार भी नहीं है, तथा न ही कारक व्यापार भी है। फिर भी इतने पर से यह अप्रामाणिक है, ऐसा भी नहीं है। क्योंकि यह स्वानुभवसिद्ध है-स्वसंवेदनसिद्धत्वात्। यह रसना अथवा चर्वणा बोधरूप ही है। परन्तु अन्य लौकिक बोधों की तुलना में यह बोध भिन्न है। कारण यह कि इस बोध के विभावादि जो उपाय हैं, वे स्वयं लोकोत्तर हैं। अतः ऐसे अलौकिक विभावादि के संयोग से रसना उत्पन्न होती है और रसना का विषय बनने वाला लोकोत्तर अर्थ ही रस, ऐसा इस सूत्र का अर्थ होता है। ऊपर की समग्र चर्चा का संक्षिप् सार देना हो तो यों दिया जा सकता है कि जब हम नाटक देखते हैं तब मुकुट आदि वेशभूषादि के कारण यह नट है, ऐसा बोध ढँक जाता है। काव्य के बल पर हम उसमें 'यह राम है' ऐसी बुद्धि स्थापित करते हैं परन्तु प्रथम के प्रगाढ़ संवित्संस्कार के कारण वह टिक नहीं सकती। अतः पहले घटित राम के तथा वर्तमान राम बने हुए नट के स्थलकालादि के साथ के सम्बन्ध छूट जाते हैं।' रोमांचादि रति की प्रतीति कराते हैं, ऐसा हमारे व्यवहार में कई बार देखा जा चुका है, अतः नाटक में भी रोमांचादि देखकर हमें रत्यादि की प्रतीति होती है। परन्तु यह प्रतीति देश-काल-व्यक्ति के संबंधों से मुक्त होती है। हमारी आत्मा स्वयं भी रत्यादि की वासना से युक्त होती है अतः साधारणीभूत रत्यादि में उसका अनुप्रवेश होता है। अतः हमें जिस रत्यादि का बोध होता है, वह तटस्थतापूर्वक होता नहीं है। और ऐसा

१. इस सम्बन्ध में श्री नोली लिखते हैं कि इससे भावक राम को ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में नहीं देखता। यदि देखे तो भावक राम के स्थल-कालादि मैं लीन हो जाएगा अर्थात् उसका समकालीन बन जाएगा। अमुक स्थल-कालादि से सम्बद्ध भावक का व्यवहार जीवन-संस्कार भावक को राम के स्थल-कालादि में संपूर्ण रूप में तल्लीन हो जाने देता है। अर्थात् उसे राम अपने जीवन के अंग रूप प्रतीत नहीं होता। नाटक के प्रेक्षक के चित्त मैं ऐसा एक ख्याल प्रायः स्पष्ट रहता है कि रंगमंच पर जो कुछ हो रहा है वह सच नहीं है, किन्तु यह केवल दिखाया गया हैं। जो कुछ घटित हो रहा है, उसका उसके जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। वह उसके अपने जीवन में प्रवेश नहीं कर पाता। अभिनय करने वाले लोग भी सत्य पात्र (अनुकार्य) नहीं किन्तु नट हैं। [ए० टिल्घर 'एस्तेरिका', रोम, १९३१,पृ० ६२] इस प्रकार भावक न तो नट के स्थल-कालादि में (अर्थात् उसके स्थल-कालादि मं निमग्न हो पाता है न ही ऐतिहासिक व्यक्ति राम के स्थलकालादि में मग्न हो जाता है)।

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भी नहीं है कि वह व्यक्तिगत विशेष कारणों को लेकर होता है। अतः ममत्व के कारण ये सारे कारण बने रहें ऐसी आसक्ति भी उसमें जगती नहीं है। इन रत्यादियों का बोध परगत भाव से भी नहीं होता है। अंतः दुःख, द्वष आदि भी हमारे चित्त में उदित होते नहीं है। हमारी ऐसी साधारणीभूत और सन्तानवाही अर्थात् एक के पश्चात् एक आने वाली अथवा एक ही संवित् को गोचर होने वाली रति ही शृंगार है।१ नाटक में रस प्रकर्ष रसास्वाद के लिए आवश्यक ऐसा साधारणी भाव विभावादि के कारण सिद्ध होता है। और जब विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी का काव्य नाटक में समान प्राधान्य होता है तब ही रत्यादि के आस्वाद का पूर्ण उत्कर्ष, साधित हुआ होता है। ऐसा तो प्रबंध में ही और सच पूछा जाय तो, नाटक में (दशरूपक) ही संभव है। इसीलिए तो वामन ने संदर्भों में नाटक को श्रेष्ठ कहा है। प्रबन्धों में भी नाटक जैसी ही चर्वणा प्राप्त करनी हो तो भावक को उसमें नाटक की भाँति ही पात्रोचित भाषा, वेश, प्रवृत्ति के औचित्यादि की कल्पना कर लेनी चाहिए। मुक्तक में से साधारणतः भाव की प्रतीति होती है, परन्तु रस की प्रतीति के लिए भावक को पूर्वापर सम्बन्ध की औचित्यपूर्वक कल्पना करनी पड़ती है कि यहाँ प्रसंग इस प्रकार का है, वक्ता ऐसा है, आदि। अतः जो लोग काव्य के अध्ययन से पूर्व के संस्कारों के बल पर सहदय होते हैं वे विभावादि का पूरा वर्णन न किया गया हो तो भी साक्षात्कार के जैसा (सदृश) ही स्पष्ट काव्यार्थ समझ सकते हैं। अतः वे तो अभिनयादि की अपेक्षा किये बिना केवल काव्य में से ही प्रीति और व्युत्पत्ति प्राप्त कर सकते हैं-रसास्वाद ले सकते हैं फिर भी ऐसे सहृदयों को भी नाटक अधिक निर्मल हृदय वाला बना देता है जिस प्रकार चंद्र की किरणें सामान्य पदार्थों पर पड़ती हैं तो उन्हें प्रकाशित करती हैं और यदि दर्पण आदि तेजस्वी पदार्थों पर पड़ती हैं तो उनकी तेजस्विता में वृद्धि होती है। और जो अहृदय होते हैं उन्हें तो हृदय की निर्मलता प्रदान करने वाला नाटक ही है। नाटक का फल इस प्रकार नाटक सहृदयों को तथा अहृदयों को-दोनों को उपकारक सिद्ध होता है, ऐसा बतलाकर अभिनवगुत एक दृष्टांत द्वारा नाटक की उपयोगिता समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि जो मूर्ति का ध्यान करते हैं वे भला मूति को देव मान थोड़े ही लेते हैं! फिर भी मूर्ति द्वारा देव की कल्पना स्पष्ट होती है। और उसके द्वारा भी फल-प्राप्ति तो होती ही है। इसी प्रकार नट को देख कर भी 'यह राम ही है' ऐसी प्रतीति होती नहीं है, फिर भी नाटक द्वारा जो अत्यंत स्पष्ट अर्थात् प्रत्यक्षवत् प्रतीति होती है, उसके कारण नियत देश-कालादि के सम्बन्ध से रहित 'ऐसा करने पर ऐसा फल मिलता है।' उपदेश १. इसका अर्थ श्री नोली ऐसा करते हैं कि नाटक मैं अथवा लंबे काव्य मैं भावक के चित्त में रति, शोक आदि अनेक भाव क्रम से जगते रहते हैं, जब कि लघु काव्य में सामान्यतः एक ही भाव प्रधान होता है।

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(भावार्थ) मिलता है। नाटक में दृश्य अभिनयादि में या उससे उत्पन्न चित्तवृत्ति में किसी प्रकार के विन्न होते नहीं हैं इसलिए यह प्रतीति संपूर्णतः सम्यक ज्ञानरूप ही बन जाती है। इस कारण 'यह राम है।' ऐसी ही प्रतीति होती है, 'यह राम नहीं है' अथवा 'अन्य कोई है।' ऐसी प्रतीति होती नहीं है। यहाँ थोड़ा सिंहावलोकन कर लेना आवश्यक है। हमने देखा कि भरत ने प्रथम नाट्य की सिद्धि के लिए आवश्यक रस भावादि-ग्यारह अंग तथा उनका परिगणन कराया है। तत्पश्चात् उन सभी अंगों में रस ही मुख्य होने से उसका निरूपण पहले किया है। इस निरूपण के प्रारम्भ में ही उन्होंने रसनिष्पत्ति से सम्बद्ध सूत्र दिया है। अबतक हम उस सूत्र पर भट्ट लोलट, श्रीशंकुक, भट्ट नायक-इस प्रकार तीन मुख्य आचार्यों की व्याख्याएँ व उन पर अभिनव गुप्त द्वारा की गई विवेचना देख चुके हैं। तत्पश्रात् अभिनव गुप ने अपना मत स्थापित किया है। अब हम भरत के ग्रंथ का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ेंगे। रसनिष्पत्ति को समझाने वाला भरत का दृष्टान्त भरत ने रसनिष्पत्ति-विषयक सूत्र में कहा है कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग से रसनिष्पत्ति होती है। अर्थात् अनेक पदार्थों के संयोग से एक नवीन पदार्थ ही उत्पन्न होता है, ऐसा यहाँ कहा गया है। यह बात नयी है। अतः अभिनव कहते हैं कि यह अलौकिक अर्थ किसी दृष्टान्त के बिना समझ में नहीं आ सकेगा ऐसा सोचकर भरत ने यहाँ एक प्रश्न उपस्थित किया है कि अनेक वस्तुओं के संयोग से एक अपूर्व रस उत्पन्न होता हो ऐसा कोई दृष्टान्त कहीं देखा है ? यह अंश भरत में इस प्रकार है- को दृष्टान्तः । अत्राह-यथा हि नानाव्यञ्जनौषधिद्रव्यसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः तथा नानाभावोपयोगाद्रसनिष्पत्तिः। यथा हि-गुडादिभिर्द्रव्यैर्व्यञ्ञनैरोषधिभिश्र षाडवादयो रसा निर्वर्त्यन्ते तथा नानाभावोपगता अपि स्थायिनो भावारसत्वमाप्नुवन्तीति। अर्थात् कोई दृष्टान्त है ? उत्तर यह है कि-जिस प्रकार भाँति-भाँति के व्यंजन, औषधियों व द्रव्यों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। जिस प्रकार गुडादि द्रव्य, व्यंजन तथा औषधियों के द्वारा षाडवादि रस उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अनेक भावों के संयोग से स्थायीभाव रसत्व को प्राप्त करते हैं। इसे स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि तिक्त अथवा कटु, मधुर, खट्टे आदि स्वादवाले दही आदि व्यंजन; इमली, हल्दी आदि औषधियाँ और गुडादि द्रव्यों को पकाकर कुशल रसोइया योग्य रीति से योजना करता है तो फलतः उससे लोक में प्रसिद्ध और एक-दूसरे से भिन्न मधुर, तिक्त, खट्टे, नमकवाले, कडुवे, तुरे आदि छः रसों से और उनके संमिश्रण से भिन्न ही षाडव नामक रसवाले अनेक स्वादिष्ट-अर्थात् आस्वाद्य पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार नाना भाँति के विभावादि द्वारा प्रत्यक्षीकृत लौकिक की अपेक्षा अधिक स्थायी ऐसे स्थायीभाव नाटकादि में रसत्व को प्राप्त करते हैं। और रस्य- मानता अर्थात् आस्वाद योग्य होना यही रस का प्राण है। ५

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इसका अर्थ यह हुआ कि पाकरूप सम्यक योजना से लौकिक रस अर्थात् स्वाद उत्पन्न होता है। इसमें प्रधानतः जल स्वाद का अभिव्यंजक होता है। अतः व्यंजन विभावादि रूप होते हैं। इमली, हल्दी आदि अनुभावादि रूप होते हैं और गुडादि द्रव्य उनके खट्टे आदि स्वाद से भिन्न मधुरादि स्वाद के योग से व्यभिचारी-रूप होते हैं तथा अन्य में अपने स्वाद का संक्रमण कर वैचित्र्य उपजाते हैं। लौकिक रसों के विषय में- काव्य में स्थायीभाव के रूप में स्थित व मिश्रण के समय ही उत्पन्न होने वाला विशेष स्वाद विभाव के रूप में रहे हुए व्यंजनों के कारण उत्पन्न होता है-ऐसा मानना ही उचित है। यह रस तो लौकिक है किन्तु काव्यनाटक में प्रतीत होने वाला यह रस तो केवल कुशल कवि ही निष्पन्न कर सकते हैं और तद्विद् ही अर्थात् सहृदय ही उसे आस्वादित कर सकते हैं। अतः इस दृष्टान्त में 'अन्न' अध्याहार है, ऐसा मानना उचित नहीं है। जिस प्रकार मूल नाट्य-रस के सूत्र में स्थायी का उल्लेख शल्यरूप सिद्ध होता है ( बाधक सिद्ध होता है) उसी प्रकार लौकिक रस के दृष्टान्त में भी स्थायी के स्थान पर रहे अन्न के सिवा तीनों का ही उल्लेख उचित है। संक्षेप में, जिस प्रकार विविध व्यंजनों, औषधियों तथा द्रव्यों के संयोग से षाडवादि रस अर्थात् स्वाद उत्पन्न होता है उसी प्रकार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग से काव्यरस निष्पन्न होता है। यह बात हम गणित-पद्धति से निम्न रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं :- १. व्यंजन = विभाव, २. औषधि = अनुभाव, ३. द्रव्य=व्यभिचारीभाव, ४. रस (स्वाद)= स्थायीकल्प वासना-संस्कार। रस किसलिए कहते हैं? विभावादि के संयोग से रसनिष्पत्ति होती है, ऐसा कहकर भरत मुनि 'रस क्या है ?' अर्थात् 'रस' को 'रस' क्यों कहते हैं, ऐसा प्रश्न उपस्थित कर उसका उत्तर देते हैं। रस इति कः पदार्थः ? उच्यते-आस्वाद्यत्वात्। अर्थात् रस किसलिए कहते हैं, आस्वाद्य होता है, इसलिए। इसे स्पष्ट करते हुए अभिनव गुप् कहते हैं कि भरतमुनि ने काव्य-नाट्य में होने वाली प्रतीति को 'रस' संज्ञा प्रदान की। सामान्यतः रस शब्द मधुर आदि रस, पारद, विषय, सार, जलसंस्कार, अभिनिवेश, क्वाथ (काढ़ा), देह की धातु या सत्त्व के अर्थ में प्रसिद्ध है। अन्य अर्थ में प्रसिद्ध नहीं है, तो फिर आपने इस शब्द को यहाँ शङ्गारादि के अर्थ में प्रयुक्त किया है, इसका क्या अर्थ? अर्थात् इस शब्द का इस प्रकार उपयोग करने का कारण क्या है? इसका प्रत्युत्तर यह है कि यह आस्वाद्य है, यही कारण है। परन्तु आस्वादन तो रसनेन्द्रियजन्य ज्ञान होता है, यह प्रसिद्ध है। किन्तु काव्यार्थ का बोध तो रसना से होता नहीं। वह तो मन से ही होता है। तो फिर ऐसा प्रयोग किसलिए

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किया ? रस का आस्वाद और काव्यार्थ की प्रतीति दोनों की प्रक्रिया के बीच साम्य है, इसलिए ऐसा प्रयोग किया है, यह समझाते हुए भरतमुनि कहते हैं-'कथमास्वाद्यते रसः। यथा हि नानाव्यअ्नसंस्कृतमन्नं भुञ्जाना रसानास्वादयन्ति सुमनसः पुरुषा: हर्षादींश्चाधिगच्छन्ति तथा नानाभावाभिनयव्यञ्ञितान् वागङ्गसत्त्वोपेतान् स्थायिभावाना- स्वादयन्ति सुमनसः प्रेक्षकाः, हर्षादींश्चाधिगच्छन्ति। तस्मान्नाट्यरसा इति अभि- व्याख्याताः'। अर्थात् रस कैसे आस्वादित होता है ? जिस प्रकार नानाविध व्यंजनों से संस्कृत अन्न आरोगने वाला एकाग्रचित्त पुरुष रसों का आस्वादन करता है, हर्ष तथा सन्तोष पाता है, उसी प्रकार नाना भावों के अभिनय से व्यंजित होते व वाचिक, आंगिक, सात्त्विक अभिनयों से युक्त स्थायीभावों को एकाग्र चित्तवाला सहृदय आस्वादित करता है तथा हर्ष एवं सन्तोष पाता है। इसलिए नाट्यरस कहे हैं। इसकी व्याख्या में अभिनवगुप्त कहते हैं कि यहाँ भरत भोग्य, भोक्ता और फल का साम्य बतलाते हैं। जिस प्रकार व्यंजन में संस्कृत अन्न आस्वाद्य होता है, एकाग्र चित्तवाला (क्योंकि जिसका चित्त अन्यत्र हो वैसा व्यक्ति भोजन करे तो भी आस्वाद पा नहीं सकता) भोक्ता आस्वादक है और हर्ष, तृत्ति, जीवन, पुष्टि, बल और आरोग्य यह आस्वाद का फल है; वैसा ही अभिव्यंजित रस में भी समझना चाहिए। यथा स्थायी शब्द अभिहित किया गया रस आस्वाद्य है, एकाग्र चित्तवाला सामाजिक तन्मयभूत आस्वादक है, और आनन्दप्रधान धर्मादि का ज्ञान, व्युत्पत्ति व वैदग्ध्य आदि आस्वाद का फल (परिणाम) है, ऐसा यहाँ अर्थ समझना चाहिए। यह वस्तु सारणीबद्ध पद्धति में इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है :-

भोग्य भोत्ता फल व्यापार

१ व्यंजन संस्कृत अन्न सुमनस पुरुष हर्ष-तृत्ति रसना (आस्वादन) विभावादि व्यंजित प्रेकक रमना २ स्थायी सुमनस पुरुष हषे-तृसि निर्विध्न संवित् /9 तीतिनिशक (आस्वादन) यहाँ अभिनवगुप ने एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी दी है। ऊपर भरत के मूल वचनों में हर्षादि शब्द प्रयुक्त हैं उसमें 'आदि' का अर्थ कुछ लोग 'शोक वगैरह' करते हैं। इस विषय में अभिनवगुप्त कहते हैं कि यह उचित नहीं है। 'स च न युक्तः । सामाजिकानां हि हर्षैकफलं नाट्यं न शोकादिफलम्'। क्योंकि, सामाजिकों के लिए नाटक का एकमात्र फल हर्ष अर्थात् आनन्द ही होता है, शोकादि नहीं होता। नाट्य का फल शोकादि होता है, इस बात का कोई प्रमाण प्राप्त नहीं, और यदि कोई ऐसा फल हो तो लोग उसका त्याग ही करेंगे। इस सबका विचार कर कुछ आचार्य यहाँ 'हर्षाश्चाधिगच्छति' पाठ ग्रहण करते हैं। यह बात श्लोक में इस प्रकार कही गयी है- धर्माआमि का हर्धम मी न्यतपत्ति

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आस्वादयन्ति भुआ्जाना भक्तं भक्तविदो जनाः ॥ ३२ ॥ भावाभिनयसम्बद्धान्स्थायिभावांस्तथा बुधः । आस्वादयन्ति भुआ्जाना तस्मान्नाट्यरसा:स्मृताः ॥३३॥ अर्थात् जिस प्रकार बहुविध द्रव्य व व्यंजनों से युक्त पकाया गया अन्न खाते-खाते भोजन- रसिक व्यक्ति उसका आस्वादन करता है, उसी प्रकार विविध प्रकार के [ विभावादि और व्यमिचारीभाव-रूप ] भावों और अभिनयों (अनुभावों) से युक्त स्थायीभावों को बुध जन मन से आस्वादित करते हैं अतः उन्हें नाट्यरस कहा गया है। इसकी व्याख्या में अभिनवगुप्त ने दो बातें कही हैं-एक तो यह कि 'बहुविध व्यंजनोंवाला' कहा है जिससे यह प्रकट होता है कि रसभेद का कारण विभाव-भेद है। अर्थात् विभिन्न विभावों के कारण विभिन्न रसों की प्रतीति होती है। इसके पश्चात् इन्होंने भोजन करने और आस्वादन करने का अन्तर स्पष्ट किया है। यह समझने योग्य है। वे कहते हैं कि "खाते खाते आस्वादित करते हैं।" ऐसा कहकर यह बताया गया है कि रसनेन्द्रिय का व्यापार जो भोजन है, उससे कुछ अधिक जो मन का व्यापार है, वही (42 आस्वादन है। 'रसनाव्यापाराद् भोजनादधिको यो मानसो व्यापारः स एवास्वादनमिति दर्शयति'। और बाद में कहते हैं कि आस्वादन रसना का व्यापार नहीं है। यह तो मन का ही व्यापार है और वह तो यहाँ नाटक में भी अविकल होता ही है। 'न रसनाव्यापारः आस्वादनम् । अपितु मानस एव । स चात्र अविकलोऽसिति'। अतः शृंगारादि के लिए 'रस' शब्द का प्रयोग पूर्णतः औचित्यपूर्ण है। उसमें उपचार का आश्रय लेने की भी आवश्यकता नहीं है, परन्तु लौकिक मधुरादि रसों के विषय में प्रथम रसना का व्यापार होता है तथा बाद में यह मानस-व्यापार-रूप आस्वादन होता है, यह अति प्रसिद्ध है। केवल इतने भर के लिए ही उसे प्रथम उपचार कहा है। ऐसा कहकर यह रस किस प्रकार भोगा जाता है यह बतलाते हैं-कहते हैं कि दूसरे श्लोक में जो 'भाव' शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका अर्थ विभाव एवं व्यभिचारीभाव करना चाहिए, और अभिनिय शब्द का अर्थ अनुभाव करना है। यद्यपि 'भाव' में इसका समावेश हो जाता है फिर भी प्राधान्य के कारण इसका अलग उल्लेख किया गया है। इन विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के आस्वादन के समय पहले भावक के साथ इनका हृदय-संवाद स्थापित होता है। फिर वह उसमें तन्मय हो जाता है और भावक व स्थायीभाव के बीच भेद रहता नहीं है। ऐसे इन अनिर्वाच्य स्थायीभावों की प्रतीति चारों तरफ से अर्थात् साधारणी-भाव से एवं निर्विघ्नरूप से मन को होती है और इसमें अन्य इन्द्रिय-प्रतीतियों की तरह विध्नों की संभावना ही नहीं होती। और इसमें चमत्कारा- नुभव होता है और फलतः वह रागद्वेषादि विध्नों से युक्त लौकिक प्रतीति से तथा विषयास्वाद के अभाव के कारण कठोर योगी-प्रत्यय से भी भिन्न होती है। ये सुख-दुःखादि विविध वासनाओं से चित्रित होने से अतिशय आनन्ददायक संवित चर्वणारूप बन जाते हैं-

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'आ-समन्तात्साधारणीभावेन निर्विघ्नप्रतिपत्तिवशात्। मनसा इन्द्रियान्तरविघ्न- सम्भावनाशून्येन स्वाद्यन्ति स्वपरविवेकशून्यस्वादचमत्कारपरवशतया लौकिकप्रत्ययादुपा-

वासनानुवेधोपनतहृद्यतातिशयसंविच्चर्वणात्मना भुञ्जते'। - नाट्यशास्त्र, खण्ड १, पृ० २९०। इस श्लोक में 'बुधाः' शब्द का जो प्रयोग हुआ है, उसका अर्थ यह कि ये भावक लौकिक प्रत्यक्ष कार्यकारणादि से स्थायी का अनुमान करने में कुशल होने चाहिए। इन लौकिक प्रत्यक्षादि का पूर्वज्ञान नाट्यानुभव में उपयोगी हो जाता है। रस नाट्य है इस श्लोक के अन्तिम चरण का अभिनवगुप्त विविध तीन प्रकार से अर्थ करते हैं : १. विभावादि के समुदायरूप नाट्य में से रस अभिव्यक्त होते हैं, २. अथवा नाट्य ही रस हैं, ३. रस-समुदाय ही नाट्य है। और फिर कहते हैं कि रस नाट्य में ही होते हैं। काव्य में भी रस नाट्यरूप में स्थित होता है। 'नाट्य एव च रसाः। काव्येऽपि नाट्यायमान एव रसः'। वे अपने उपाध्याय का कथन याद करते हैं कि जब काव्यार्थ प्रत्यक्षकल्प संवेदन का विषय बनता है, तब रसानुभव जगता है। 'काव्यकौतुक' में कहा है कि 'प्रयोगत्वमनापन्ने काव्येनास्वादसम्भवः'। प्रयोग अर्थात् अभिनय के न रहने पर काव्य में आस्वाद सम्भव नहीं है। कुछ लोग तो काव्य में भी गुणालंकार के सौन्दर्यातिशय के कारण रसचर्वणा होती है-ऐसा मानते हैं। परन्तु हम तो कहते हैं कि काव्य मुख्यतः दशरूपकात्मक अर्थात् नाटक-रूप ही होता है। उसमें उचित भाषा, वृत्ति, काकु, नेपथ्य आदि से रसवत्ता पूर्णतः आ जाती है। सर्गबन्धादि प्रबन्धों में नायिका भी संस्कृत में ही बोलती है-ऐसा बहुत कुछ अनुचित केवल शक्ति के अभाव में ही वर्णित होता है। इतने भर से भी ये आनन्ददायक तो होते हैं-ऐसा कहने से इनका अनौचित्य दूर नहीं होता। इसीलिए तो वामनाचार्य ने कहा है कि सन्दर्भों में दशरूपक श्रेष्ठ है। दशरूपक का अर्थ है नाट्य। इसमें हृदय-संवाद की तारतमिक स्थिति के अनुसार श्रोता और प्रेक्षक को न्यूनाधिक स्फुटता के अनुसार रसानुभव होता है। जो स्वभाव से ही निर्मल दर्पण जैसे हृदयवाले होते हैं, उनका ही मन संसारोचित क्रोध, मोह, अभिलाषा आदि से पराधीन नहीं हो जाता, उन्हें दशरूपक सुनते समय साधारण रसनात्मक चर्वणा द्वारा ग्रहण किया जानेवाला रस-नाट्य के रूप में स्फुट होता है। परन्तु जो ऐसे नहीं होते हैं उन्हें प्रत्यक्षोचित चर्वणा का लाभ मिल सके इसलिए नटादि की प्रक्रिया है। स्वगत क्रोध, शोकादि विध्नों की ग्रन्थियाँ तोड़ने के लिए गीतादि प्रक्रिया की भरतमुनि ने व्यवस्था की है; क्योंकि शास्त्र तो (सहृदय-अहृदय) सभी पर अनुग्रह करता होता है। इस प्रकार नाट्य में ही रस अनुभूत होते हैं, लोक में नहीं, ऐसा यहाँ अर्थ है। काव्य भी नास्य ही है।१ १. 'तत्र ये स्वभावतो निर्मलमुकुरहृदयास्त एव संसारोचितक्रोधमोहाभिलाषपरवशमनसो न भवन्ति। तेषां तथाविधदशरूपकाकर्णनसमये साधारणरसनात्मकचर्वणग्राह्यो रससञ्चयो

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शोक रस-रूप कैसे बनता है ? इसके बाद अभिनवगुप् अनुकरणवादियों के मत की चर्चा करते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग रत्यादि के अनुकरण को रस कहते हैं और बाद में यह शंका करते हैं कि शोक सुख का कारण कैसे हो सकता है ? और फिर यह समाधान प्रस्तुत करते हैं कि नटकर्म में ऐसी कोई विशिष्ट शक्ति है, जिसके कारण शोक भी आनन्दरूप में-करुण रस में परिणत हो जाता है; इनके सम्बन्ध में यही कहना है कि प्रथम तो यह शंका ही गलत है; क्योंकि ऐसा कोई नियम थोड़े ही है कि प्रतीत होने वाला शोक भावक की आत्मा में भी शोक उत्पन्न करेगा ही ? शत्रु का शोक देखकर हर्ष भी होता है। अन्य किसी का शोक देखकर मनुष्य तटस्थ भी रहता है और इसका जो समाधान दिया गया है वह भी निर्बल है; क्योंकि नाटक में प्रस्तुत होते शोकादि का यह स्वभाव ही है ऐसा कहना तो केवल वस्तु के स्वभाव का कथन हुआ। इस बात का इसमें समाधान नहीं दिया गया है कि ऐसा क्योंकर होता है ? ऐसा कहकर अभिनवगुत् अपना मत प्रस्तुत करते हैं कि हम तो ऐसा मानते हैं कि आनन्दघन संवेदन ही आस्वादित किया जा सकता है। फिर भला उसमें दुःख की आशंका हो ही कैसे सकती है ? रति-शोकादि वासनाओं का व्यापार तो केवल इन संवेदनों को चित्रित करता है और अभिनयादि व्यापार इन वासनाओं को जगाता है। 'अस्मन्मते तु संवेदनमेवानन्दघनमास्वाद्यते। तत्र का दुःखाशङ्का। केवलं तस्यैव चित्रताकरणे रतिशोकादिवासनाव्यापारस्तदुद्- बोधने चाभिनयव्यापार:'-पृ० २९२।

रसों में से भाव या भावों में से रस? इसके पश्चात् भरत ऐसी एक शङ्का उपस्थित करते हैं कि रसों में से भाव उत्पन्न होते हैं या भावों में से रस जन्म लेते हैं ? कुछ तो ऐसा भी कहते हैं कि परस्पर के सम्बन्ध से इनकी उत्पत्ति होती है, पर वैसा नहीं है। हम देखते हैं कि भावों के माध्यम से रस की सिद्धि होती है। रस के माध्यम से भाव की सिद्धि नहीं होती है। इसे समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि इसमें तीन पक्ष हैं : १. रसों में से भाव जन्म लेते हैं। २. भावों में से रस जन्म लेते हैं। ३. दोनों परस्पर में से जन्म लेते हैं। विभावादि से रसनिष्पत्ति होती है, ऐसा तो कहा ही है। यह दूसरा पक्ष हुआ। लोक में विभावादि तो होते ही नहीं हैं; क्योंकि लोक में तो विभावादि कारण-कार्य- रूप में पहचाने जाते हैं। परन्तु रस के सम्बन्ध में उन्हें विभावादि के नाम से पहचाना जाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि रस भावों को जन्म देता है। यों विभावादि से नाट्यलक्षण: स्फुट एव। ये तु अतथाभूतास्तेषां प्रत्यक्षोचिततथाविधचर्वणालाभाय नटादि- प्रक्रिया। स्वगतक्रोधशोकादिसंकटहृदय ग्रन्थिभन्जनाय गीतादिप्रक्रिया च मुनिना विरः चिता। सर्वानुग्राहकं हि शास्त्रमिति न्यायात्। तेन नाट्य एव रसा न लोक इत्यर्थः । काव्यञ्च नाख्यमेव'। पृ० २९१

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रस और रस से विभावादि अस्तित्व में आते हैं, यह सिद्ध हुआ। इसका अर्थ यह है कि दोंनों परस्पराश्रयी हैं। तीनों मत सत्य हैं :- इस सम्बन्ध में भरत निम्नलिखित श्लोक कहते हैं : नानाभिनयसम्बद्धान्भावयन्ति रसानिमान्। यस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाट्ययोक्तृभिः॥३४॥ नानाद्रव्यैबहुविधैरव्यञ्ञनं भाव्यते यथा। एवं भावा भावयन्ति रसानभिनयैः सह॥ ३५॥ न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः । परस्परकृता सिद्धिस्तयोरभिनये भवेत्॥ ३६॥ व्यअ्षंनौषधिसंयोगो यथान्नं स्वादुतां नयेत्। एवं भावा रसाइचैव भावयन्ति परस्परम्॥ ३७ ॥ यथा बीजोन्भवेद्वृक्षो वृक्षातपुष्पं फलं यथा। तथा मूलं रसा: सर्वे तेभ्यो भावा व्यवस्थिताः ॥ ३८॥ अर्थात् नानाविध अभिनयों से सम्बद्ध रसों को उत्पन्न करने के कारण नाट्य-प्रयोजक इन्हें भाव कहते हैं। जिस प्रकार नाना प्रकार के अनेक द्रव्यों से व्यंजन उत्पन्न होते हैं अथवा भावित होते हैं, उसी प्रकार विभावानुभाव इत्यादि भाव अभिनयों से मिलकर रस को निष्पन्न करते हैं। भावविहीन रस और रसविहीन भाव हो नहीं सकता। अभिनय में इन दोनों की परस्पर सिद्धि होती है। व्यंजन और औषधि का संयोग जैसे अन्न को स्वादिष्ट बनाता है वैसे भाव और रस परस्पर उपकारक बनते हैं। जिस प्रकार बीज में से वृक्ष होता है और वृक्ष में से फूल-फल होते हैं, उसी प्रकार रस मूल हैं और उनसे सभी भाव व्यवस्थित होते हैं। अन्तिम श्लोक के पूर्व का श्लोक समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि जिस प्रकार व्यंजन और औषधि का संयोग अन्न को और अन्न व्यंजन तथा औषधि को सुस्वादु बनाता है, लसी प्रकार भाव और रस परस्पर को निष्पन्न करते हैं। 'भावाः रसान्भावयन्ति निष्पादयन्ति। रसास्तु भावान् भावयन्ति। भावान्कुर्वन्ति भावादिव्यपदेश्यान्कुर्वन्ति इत्यर्थः'। रस भावों को उत्पन्न करते हैं अर्थात् भावादि नाम से पहचाने जाते हैं। इस प्रकार यहाँ रस और भाव परस्पराश्रयी हैं फिर भी उनकी क्रिया भिन्न होने से कोई दोष नहीं होता है। यहाँ भरत प्रतिपक्षी से ऐसी शंका कराते हैं कि यदि भावों से रस की निष्पत्ति होती है तो आप ऐसा क्यों कहते हैं कि रस के बिना कोई भी अर्थ प्रवर्तित होता नहीं है? इसके समाधान के लिए भरत ने अन्तिम श्लोक दिया है ...... यथा बीजात् ..... आदि। इसे समझाते हुए अभिनवगुप कहते हैं कि बीज जिस प्रकार वृक्ष के मूलस्थानीय है, वैसे रस भी (काव्य के) मूलस्थानीय हैं। जिसके मूल में रस हो ऐसी व्युत्पत्ति ही आनन्ददायक होती है और उन रसों को ही पहले समझाना चाहिए। कवि का साधारणीभूत संवित् काव्य के मूल में अवस्थित है और उस काव्य के बाद नट का

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कार्य आता है। कवि का साधारणीभूत वह संवित् ही वास्तव में रस है।१ ......... इस प्रकार देखा जाय तो बीजरूप कविगत रस ही मूल रस है .. उसमें से वृक्षस्थानीय काव्य आता है-इसमें पुष्पादि के स्थान पर नट का अभिनयादि रहता है और फल- स्थान पर सामाजिक का रसास्वाद है। इस प्रकार सब कुछ रसमय होता है- १. इस रस से कवि का हृदय पूर्णरूप से भर जाता है, तब वह उमड़ कर काव्य के रूप मैं बाहर प्रकट होता है, ऐसा अभिनवगुप्त ने 'लोचन' में कहा है। वहाँ वाल्मीकि का शोक श्लोकत्व प्राप्त करता है इस बात को समझाते हुए लिखा है कि 'क्रौंचस्य द्वन्द्ववियोगेन सहचरी- हननोद्भूतेन साहचर्यध्वंसनेनोत्थितो यः शोकः स्थायिभावो निरपेक्षभावत्वाद्विप्रलम्भ शृङ्गारो- चितरतिस्थायिभावादन्य एव, स एव तथाभूतविभावतदुत्थाक्रन्दाद्यनुभावचर्वणया हृदय- संवादतन्मयीभवनक्रमादास्वाद्यमानतां प्रतिपन्नः करुणरसरूपतां लौकिकशोकव्यतिरिक्तां स्वचित्तद्रुतिसमास्वाद्यसारां प्रतिपन्नः रसपरिपूर्णकुम्भोच्चलनवच्चि त्तवृत्तिनिष्यन्दस्वभा- ववाग्विलापादिवच्च समयानपेक्षत्वेपि चित्तवृत्तिव्यन्जकत्वादिति नयेनाकृतयैवावेशवशा- तसमुचितशब्दच्छन्दोवृत्तादिनियंत्रितश्लोकरूपतां प्राप्त :- 'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः। यत्कौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्।। इति। न तु मुनेः शोक इति मन्तव्यम्। एवं हि सति तद्दुःखेन सोडपि दुःखित इति कृत्वा रसस्या- त्मतेति निरवकाशं भवेत्। न च दुःखसन्तप्तस्यैषा दशा इति। एवं चर्वणोचितशोकस्था- यिभावात्मककरुणरसमुच्चलनस्वभावत्त्वात् स एव काव्यस्यात्मा सारभूतस्वभावोऽपर- शाब्दवैलक्षण्यकारकः। एतदेवोक्तं हृदयदर्पणे-'यावत्पूर्णों न चैतेन तावन्नैव वमत्यमुम्' इति। पृ० ८६-८७ अर्थात् सहचरी की हत्या होने पर उनका साहचर्य ध्वस्त हो गया। उसके कारण क्रौंच में जो शोकरूपी स्थायीभाव उत्पन्न हुआ वह निरपेक्ष होने से विप्रलम्भ शृंगारोचित रतिरूपी स्थायी से भिन्न ही था। यह शोकरूपी स्थायी भाव ही श्लोकत्व को प्राप्त हुआ है। इसमें जिसका साहचर्य खण्डित हो चुका है ऐसा क्रौंच विभाव है, इससे उत्पन्न उसका आक्रन्द आदि अनुभाव है। इस विभावानुभावादि की चर्वणा होने पर मुनि के हृदय का क्रौंच से हृदय-संवाद सिद्ध होता है और वे उसमें तन्मयीभूत होते हैं। इस प्रकार यह शोक आस्वाद्य बन कर करुण-रसरूप हो जाता है। यह लौकिक शोक नामक चित्तवृत्ति से भिन्न ही है। उसका आस्वादन चित्त की द्रुति से होता है। जैसे जल भरा घड़ा छलक जाता है अथवा दुःखादि चित्तवृत्तियाँ जैसे विलापादि के रूप मैं उभर आती हैं, उनमें संकेत न होने पर भी वे (विलापादि में) जैसे चित्तवृत्ति के व्यंजक हो जाते हैं वैसे यह शोक भी हृदय में पूर्णरूप से व्याप्त हो जाने पर, किसी भी प्रकार के बुद्धिपूर्वक प्रयत्न के बिना ही, सिर्फ आवेश से ही योग्य शब्द छन्द, वृत्त आदि से नियन्त्रित होकर श्लोक का रूप पा गया है। यहाँ शोक मुनि का शोक न मानना चाहिए। यदि यह मुनि का शोक होता तो उसके दुःख से मुनि भी दुःखी हो जाते और वह रस काव्यात्मा है ऐसा कहने कि गुंजाइश न रह जाती; क्योंकि ऐसा लौकिक शोक रस नहीं होता। इसके अलावा जो स्वयं दुःखसन्तप्त स्थिति में है, वह श्लोक रचने की स्थिति मैं हो ही नहीं सकता। किन्तु चर्वणोचित शोक स्थायीभावात्मक करुण-रस का स्वभाव ही उछल (छलक) आना है। और वही काव्यात्मा अर्थात् सारभूत होता है। और वह अन्य शाब्दबोधों से भिन्न होता है। 'हृदय-दर्पण' में भट्ट- नायक ने भी यही कहा है कि जब तक कवि स्वयं पूर्णरूपेण रस से भर नहीं जाता तब तक काव्य के रूप में उसके उद्गार प्रकट नहीं हो पाते।

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'बीजं यथा वृक्षमूलत्वेन स्थितं तथा रसाः। तन्मूलादि (हि) प्रीतिपूर्विका व्युत्पत्ति- रिति त एव च व्याख्यानार्हाः। कविगतसाधारणीभूतसंविन्मूलश्च काव्यपुरस्सरो नट- व्यापारः। सैव च संवित्परमार्थतो रसः। ...... तदेवं मूलं बीजस्थानीयः कविगतो रसः। ·.. ततो वृक्षस्थानीयं काव्यम्। तत्र पुष्पादिस्थानीयोऽभिनयादि नटव्यापारः। तत्र फल- स्थानीयः सामाजिक रसास्वादः। तेन रसमयमेव विश्वम्'। रसों की उत्पत्ति इस प्रकार रस का सामान्य लक्षण देने के पश्चात्, अब विशेष लक्षण के अंशभूत रसों की उत्पत्ति, वर्ण, देवता और निदर्शन अर्थात् दृष्टान्तों का उल्लेख करने की भूमिका तैयार कर भरतमुनि उत्पत्ति की बात पहले करते हैं और कहते हैं कि अन्य रसों की उत्पत्ति में ये चार रस हेतुरूप हैं : श्रृंगार, रौद्र, वीर और बीभत्स। श्रृंगार से हास्य, रौद्र से करुण, वीर से अद्भुत और बीभत्स से भयानक उत्पन्न होता है। इसका स्पष्टी- करण बाद के दो श्लोकों में दिया गया है। शृंगार की अनुकृति ही हास्य, रौद्र का जो कर्म अर्थात् फल वही करुण, इसी प्रकार वीर का फल अन्भुत और बीभत्स का विभावादि-रूप दर्शन भयानक रस है। (३९-४१)। रसाभास शृंगार में से हास्य उत्पन्न होता है। श्रृंगार की अनुकृति हास्य है-यह समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि हास्य श्रृंगार के आभासरूप, अनुकरणरूप है, इसलिए यहाँ श्रृंगार को इसका हेतु बताया गया है। विभावाभास से, अनुभावाभास से, व्यभिचार्याभास से रत्याभास प्रतीत होने से चर्वणाभासरूप शृंगाराभास की प्रतीति होती है। यह केवल कामना या अभिलाषरूप रति होती है। अतः व्यभिचारीभाव ही होता है। यह स्थायी नहीं है, स्थायीवत् प्रतिभासित होता है, इतना ही। इसके कारण विभावादि भी आभासरूप ही होते हैं; अतः यहाँ प्रतीत होने वाली रति भी स्थाय्याभासरूप ही होती है। ऐसा कह कर रावण की सीता के प्रति रति का उदाहरण दिया गया है। इसमें सीता को रावण के प्रति प्रेम नहीं है अतः वह रावण की रति का विभाव नहीं हो सकती तिस पर भी ऐसा आभास होता है कि वह विभाव है। इस प्रकार विभावाभस में से ही अनुभावाभास और व्यमिचार्य्याभास प्रकट होता है। इन सबके संयोग से जो रति उद्बुद्ध होती है वह भी आभासरूप ही होती है- रत्याभास ही होती है। अतः उसकी चर्वणा भी चर्वणाभास और उसका विषय बनने वाला रस भी शृंगाराभास माना जाएगा। यहाँ रावण को यह प्रतीति स्पर्श तक नहीं कर पाती कि सीता मेरी उपेक्षा करती है। यदि स्पर्श कर पाती होती तो उसका अभिलाष अवश्य विलीन हो जाता। और वह मुझ में अनुरक्ता है, ऐसा निश्चय भी किसी काम का नहीं है; क्योंकि यह कामजन्य मोहरूप है-शुक्ति में रजत के आभास का सा है ऐसा कहकर रावण की उक्ति उद्धत कर दी गयी है : दूराकर्षणमोहमंत्र इव मे तन्नाम्नि याते श्रुतिं चेतः कालकलामपि प्रकुरुते नावस्थितिं तां विना।

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एतैराकुलितस्य विक्षतरतेरङ्वैरनङ्गातुरैः सम्पद्य त कर्थ तदाप्तिमुखमित्येतन्न वेदि स्फुटम्'॥ अर्थात् दूर से ही आकृष्ट करने वाले मोहमन्त्र के समान उसका नाम जबसे मेरे कानों पर पड़ा है तबसे मेरा चित्त एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहता। अन्य विषयों में से मेरी रुचि मर गयी है। मैं विह्वल बन गया हूँ। मेरे इन अनंगातुर अंगों द्वारा मैं उसे पाने का सुख कैसे पाऊँ, यह मेरी स्पष्ट समझ में नहीं आता। और फिर कहा है कि रावण की इस उक्ति में रत्याभास ही है। यहाँ हास्य स्फुरित होता नहीं है, फिर भी सीता को विभाव मानकर उच्चरित किया गया रावण का यह वचन है। चिंता, दैन्य, मोह आदि जो व्यभिचारी भाव निरूपित किये गये हैं, वे भी प्रकृति के विरुद्ध है तथा अश्रुपात, रुदन आदि अनुभाव भी अनौचित्य के कारण आभासरूप होने से हास्य के विभाव होते हैं। कहा है कि विकृत परवेशालंकार आदि से हास्य निष्पन्न होता है। इस प्रकार रस के आभास का प्रकार यहाँ शृंगार के द्वारा सूचित किया गया है। इसके आधार पर करुण आदि के आभास में भी हास्य मान लेना चाहिए;' क्योंकि अनौचित्य-प्रवृत्ति ही हास्य का विभाव है और सभी रसों में विभावादि का अनौचित्य सम्भव है। अतः व्यमिचारीभावों को भी यही बात लागू होती है। इसलिए प्राचीन आचार्यों ने 'रस-भाव और उसका आभास' ऐसा प्रयोग तद्-तद् स्थान पर किया है। मोक्ष का हेतु न हो तब रस के आभास के कारण शान्ताभास हास्य ही बन जाता है। अतः सभी पुरुषार्थों में प्रहसनरूप अनौचित्य का त्याग करना १. 'लोचन' में रसाभास का विषय लगभग इसी प्रकार दिया गया है, फिर भी मैं उसे यहाँ उद्धत करता हूँ: "किन्तु जब विभावाभास के कारण रत्यांभास का उदय होता है तब विभावानुभास के कारण चर्वणाभास होता है, अतः वह रसाभास का विषय बन जाता है, यथा रावण का काव्य सुन कर शृंगाराभास होता है। यद्यपि मुनि ने 'शृगार की जो अनुकृति हास्य' ऐसा कहा है तथापि उस हास्य-रस की प्रतीति बाद में होती है। 'दूराकर्षण' वगैरह में तो हास्य की चर्वणा का अवसर ही नहीं आता। यहाँ कोई ऐसी शंका उपस्थित करे कि यहाँ रति स्थायीभाव ही नहीं हैं; क्योंकि यहाँ परस्पर आस्था-बन्ध अर्थात् प्रेम का अभाव है तो उसका उत्तर यह है कि कौन कहता है कि यहाँ रति है ? यह तो रत्याभास ही है। सीता मेरी उपेक्षा करती है अथवा मेरा द्वेष करती हैं, ऐसी प्रतीति उसके हृदय को स्पर्श तक नहीं कर पाती, इसीलिए वह रत्याभास है। यदि उसे ऐसी प्रतीति स्पर्श करती होती तो उसका भी अभिलाष विलीन हो जाता। वह मुझ में अनुरक्त है ऐसा निश्चय भी किसी काम का नहीं; क्योंकि वह काम- जन्य मोहस्वरूप है। अतः यहाँ वस्तुतः शुक्ति में रजत के आभास की तरह रति का आभास ही उपस्थित होता है। इस बात का संकेत मुनि ने 'शृंगारानुकृति' शब्द का प्रयोग कर किया ही है। 'अनुकृति' अर्थात् अमुख्यता, आभास ऐसा एक ही अर्थ है। अतः अभिलाष एकनिष्ठ (एकतरफ) हो तब भी जहाँ-जहाँ शरृंगार शब्द प्रयुक्त हो वहाँ-वहाँ सर्वत्र उसका अर्थ शृंगाराभास करना चाहिए। शृंगार के माध्यम से वीरादि की भी व्यंजना हुई समझें। इस प्रकार भाव-ध्वनि आदि भी रस-ध्वनि के ही निष्यन्द रूप हैं-आदि"। पृ० १७७-७९

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चाहिए, ऐसा कह कर हास्याभास का एक उदाहरण अपने पितृव्य वामनगुप्त की रचना में से देते हैं-अपना बन्धु न हो ऐसे व्यक्ति के शोक से भी हास्य ही प्रकट होता है। ऐसा सर्वत्र समझना। एक रस के फलस्वरूप दूसरा रस प्रगट होता हो इसका दृष्टांतभूत रौद्र का फल बन्धवधादि में आता है, और वह करुण का विभाव बनता है, यह बताया है। इसी प्रकार रौद्र में से भयानक प्रकट होता है, वैसे ही शरृंगार में से करुण और वीर में से भयानक प्रकट हुआ करता है। युद्धवीर में पर-पराजय में से उद्भूत प्रताप ही शत्रु-हृदय का सन्तापक और उसकी पत्नियों के लिए भयानक हो जाता है। समग्र चर्चा का उपसंहार करते हुए कहा है कि यहाँ जिन चार रसों को अन्य रसों की उत्पत्ति का कारण बताया गया है वे यथायोग्य चार पुरुषार्थों से सम्बद्ध हैं और ये चार ही सौन्दर्यातिशय को जन्म देने वाले हैं। और रसाभासादि को भी इन चारों के अनुगामी के रूप में रूपक इत्यादि में स्थान दिया जा सकता है। रसों का वर्ण तत्पश्चात् भरत रसों के वर्ण बतलाते हैं। यथा शृंगार का श्याम, हास्य का सफेद, करुण का राख-जैसा, रौद्र का लाल, वीर का गौर, भयानक का काला, बीभत्स का नीला, अद्भुत का पीला। जो लोग नव रस स्वीकार करते हैं, वे यहाँ 'पीतश्चैवाद्भुतः स्मृतः' के स्थान पर 'स्वच्छपीतौ शमाद्भुतौ'-पाठ ग्रहण करते हैं और शम का स्वच्छ रंग-ऐसा अर्थ लगाते हैं।१ (४२-४३) रसों के देवता तत्पश्चात् सब रसों के देवता बताये गये हैं-शंगार के विष्णु अर्थात् कामदेव; हास्य के प्रमथ अर्थात् शंकर के गण; रौद्र के रुद्र; करुण के यम; बीभत्स के महाकाल; भयानक के काल; वीर के महेन्द्र और अद्भुत के ब्रह्मा। जो लोग नव रस (९ रस) मानते हैं वे 'अद्भुतो ब्रह्मदैवतः' के स्थान पर 'बुद्धः शान्तेऽब्जजोऽद्द्ुते' पाठ ग्रहण कर अर्थ करते हैं कि शान्त रस के देवता बुद्ध हैं। (४४-४५) तत्पश्चात् प्रत्येक रस का विशेष परिचय आता है। इसमें प्रत्येक के स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारीभाव बताये गये हैं तथा उनका अभिनय कैसे किया जाय यह भी बताया गया है। इस लेख में मैं केवल शृंगार, हास्य और शान्तरसों से सम्बद्ध भाग ही प्रस्तुत करना चाहूँगा; क्योंकि इनमें प्रत्येक में कोई न कोई विशिष्टता दृष्टिगत होती है। शृंगाररस भरत ने शृंगार-रस का लक्षण इस प्रकार दिया है-"रसों में रतिनामक स्थायी- भाव से उत्पन्न होने वाला और उज्जवल वेशवाला शृंगार है।" इसे स्पष्ट करते हुए १. नाट्यशास्त्र नटों के लिए रचित होने से इसमें यह निरूपण तात्त्विक कोटि का न होने पर भी आहार्य अभिनय में चित्रकारों के लिए तद्-तद् रस का चित्र अंकित करने में, सूचना देने मैं सहायक होता है। कृष्ण वा रंग श्याम है जो श्रृंगार का भी रंग है।

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७६ अभिनव का रस-विवेचन अभिनवगुप्त कहते हैं कि सभी रसों में काम पुरुषार्थरूप फलवाला होने से और उसमें सभी लोगों का हृदय-संवाद साधित हो सकने के कारण सबसे प्रथम काम-प्रधान श्रृंगार-रस का लक्षण देते हैं। उसके बाद 'शृंगार' नाम से सम्बन्धित चर्चा आती है, जिसे यहाँ छोड़ देता हूँ।

रति का स्वरूप सूत्र में ऐसा कहा गया है कि शंगार का स्थायीभाव रति है। उसे समझाते हुए भरत कहते हैं कि यह रति स्त्री-पुरुष-हेतुक और उत्तम युवा प्रकृति की होती है। अर्थात् वह उत्तम युवक-युवतियों में स्त्री-पुरुषभाव अर्थात् परस्पर अनुरक्त स्त्री-पुरुष- भाव के कारणरूप होती है। इसे स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि स्त्री- पुरुष परस्पर के अभिलाष व संभोग के विषय हैं ऐसी जो लौकिक साधारण मान्यता है और जिसके आधार पर 'यह इसकी स्त्री है' ऐसा जो कहा जाता है, उसका अनुगमन करते हुए यहाँ 'स्त्री-पुरुष' ऐसा कहा गया है। अतः केवल अभिलाषरूप कामावस्था में रहने वाली व्यभिचारीभाव-रूप जो रति है, उससे भिन्न ही स्थायीभाव-रूप और प्रारम्भ से फल-प्राप्ति तक रहने वाली केवल परिपूर्ण सुख ही देने वाली रति इस शृंगार रस का कारण होती है। 'तेनाभिलाषमात्रसारायाः कामावस्थानुवर्तिन्या व्यभिचारि- रूपिणी या तया विलक्षणैवेयं स्थायिरूपा प्रारम्भादिफलावाप्तिपर्यन्तव्यापिनी परिपूर्ण- सुखैकफलारतिरुक्ता भवति हेतुरस्य'। (यह पाठ आचार्य विश्वेश्वर के अनुसार है।) यहाँ केवल अभिलाषरूप रति को व्यभिचारीभाव कहा गया है और परस्पर निष्ठारूप रति को ही स्थायीभाव रूप माना है। और उसीको शृंगार-रस का कारण माना है। कवि भी लौकिक रति की वासना से पूर्ण होकर ऐसे विभावादि की योजना करता है तथा नट भी ऐसी योजना कर अनुभाव प्रदर्शित करता है कि जिससे रति का आस्वाद शंगार रस में परिणत हो। आस्वादक को भी पूर्व रति का ज्ञान आस्वाद में उपयोगी अर्थात् आवश्यक होता है यह पहले ही कहा जा चुका है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार शृंगार के निरूपण के लिए कवि में श्रृंगार के संस्कार आवश्यक हैं उसी प्रकार उसके आस्वाद के लिए भावक में भी इसके संस्कार आवश्यक हैं, जिनके बिना वह आस्वाद नहीं कर सकता। और कहते भी हैं कि रति का अर्थ है क्रीडा। यह तो वस्तुतः परस्परानुरक्त कामी जनों में ही सम्भव है; क्योंकि उन्हें ही इसमें सुखकी धारा-विश्रान्ति होती है। भावकों को तो कवि द्वारा वर्णित ऋतुमाल्यादि के सौन्दर्य का ही कल्पना के बल पर अनुभव करना होता है और नायक-नायिका के परस्पर में लीन होने के मिलन-प्रसंग' का कल्पना के बल पर अनुभव करना होता है, अतः उन्हें परम भोग अर्थात् आस्वाद का आनन्द प्राप्त होता है। दूसरों को अर्थात् मूल पात्रों को तो केवल जड़ का ही भोग प्राप्त होता है, आस्वाद का नहीं। इसीलिए कहा है कि-'श्वासायासविडम्बनैव वपुषि १. आचार्य विश्वेश्वर यहाँ भिन्न अर्थ करते हैं।

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प्राणाः पुनजानकी'। अर्थात् श्वासोच्छ्वास का आयास तो विडम्बना मात्र है, देह में सच्चे प्राण तो जानकी ही है। यहाँ कुछ लोग ऐसी शंका उपस्थित करते हैं कि रति के आधार तो भिन्न-भिन्न होते हैं, फिर भी आप एक ही रस क्यों कहते हैं ? अर्थात् स्त्री और पुरुष की रति के आधार दोनों के हृदय होने से, रति के आधार भिन्न-भिन्न हुए फिर भी रस एक है ऐसा क्यों कहते हैं। उसके उत्तर में कहते हैं कि यह शंका अज्ञान में से उत्पन्न है; क्योंकि समग्र रति एक ही है बल्कि नायक और नायिका दोनों के हृदय में स्थित रतियाँ मिल कर ही एक रति होती है।' अन्योन्य संविदा में से एक को अलग नहीं किया सकता। यदि इस प्रकार दोनों में से एक हृदय अलग हो जाय तो रति का अस्तित्व ही न रहेगा। परस्पर आस्था ही रति का स्वरूप है। इसके पश्चात् 'उत्तमयुवप्रकृति' शब्द की व्याख्या करते हैं। इसका अर्थ ऐसा है कि नायक एवं नायिका दोनों उत्तम प्रकृति के होने चाहिए। और युवा भी होने चाहिए। यहाँ उत्तम और युवा शब्दों का अर्थ उनके सवित् करना है, शरीर नहीं। मतलब कि नायक-नायिका मन से-आत्मा से उत्तम प्रकृति के व युवा होने चाहिए केवल देह से नहीं, ये दोनों विशेषण चैतन्य की विशेषता बताते हैं। 'अत्रोत्तमयुव- शब्देन तत्संविदुच्यते, न तु कायः। चैतनस्यैव हि परमार्थतः उत्तमयुवत्वं विशेषः'। और वह संविद् आस्वाद्य होने के कारण शंगार-रस में परिणत हो जाती है। यदि नायक-नायिका उत्तम प्रकृति के न हों तो उनमें रति की स्थिरता अर्थात् दृढ़ता नहीं रहेगी। इसी प्रकार यदि वे युवा प्रकृति के न हों तो भी रति की स्थिरता नहीं होगी, और इसीलिए रति नहीं कहीं जाएगी; क्योंकि उसमें वियोग की सम्भावना रहती है और वियोग होते ही रति का भंग होता है। हम अवियुक्त हैं ऐसी संवित् ही शृंगार का प्राण-तत्त्व है। 'अवियुक्तसंवित्प्राणस्तु शृंगारः'। उसके बाद शृंगार को 'उज्ज्वल वेशात्मक' कहा गया है, उसे समझाते हुए कहा है कि यहाँ 'वेश' का अर्थ है विभावानुभाव और व्यभिचारीभाव। चित्त वृत्ति का बोध कराकर अन्य में उसका संक्रमण कराने के कारण विभाव-अनुभाव को 'वेश' कहा १. यहाँ आचार्य विश्वेश्वर भिन्न अर्थ करते हैं। २. शृंगार के लिए भरत ने नायक-नायिका में उत्तम प्रकृति आवश्यक मानी है। उत्तम प्रकृति के स्त्री-पुरुषों के लक्षण भरत ने नाट्यशास्त्र के २४वें अध्याय में दिये हैं जो नीचे उद्धृत हैं- उत्तम पुरुष जितेन्द्रिय, ज्ञानवान्, नाना शिल्प में विचक्षण, दक्षिण, भीत को शान्ति देनेवाला, विविध शास्त्रों के अर्थ का ज्ञाता तथा गाम्भीर्य, औदार्य, स्थिरता और त्याग आदि गुणों से युक्त होता है ( श्लोक २-३)। उत्तम स्त्री मृदुभाववाली, अचपल, स्मितभाषिणी, अनिष्ठुर, गुरुजन की आज्ञापालन में दक्ष, सलज्ज, विनयी, रूप, आभिजात्य, माधुर्य, गाम्भीर्य, धैर्य वगैरह स्वाभाविक गुणों से युक्त होती है। -नाट्यशास्त्र, खण्ड ३, श्लो० ९-१०, पृ० २४९-५०

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गया है। और स्थायीभाव में समाविष्ट हो जाता है इसीलिए व्यभिचारीभाव को भी 'वेश' कहते हैं। प्रथम अर्थ में 'वेषयति' अर्थात् 'व्यापयति' व्याप् करता है, फैलाता है, संक्रान्त करता है, ऐसा समझना चाहिए। दूसरे अर्थ में 'वेषयन्ति' अर्थात् व्याप्नुवन्ति' व्याप हो जाता है, समाविष्ट हो जाता है, ऐसा समझना चाहिए। यहाँ 'वेश' का अर्थ 'वस्त्र परिधान' करना नहीं है। शृंगार की दो अवस्थाएँ भरत कहते हैं कि श्रृंगार की दो अवस्थाएँ हैं-सम्भोग और विप्रलम्भ। जिस प्रकार गाय के दो रंगवाली और अनेक रंगों वाली ऐसे भेद किये जाते हैं; ऐसे ये भेद नहीं हैं। परन्तु इन दोनों दशाओं में समानरूप से स्थित आस्वादात्मक रति का आस्वाद्यमान रूप ही शरृंगार है। कालिदास ने 'मेघदूत' में कहा है कि- एतस्मान्मां कुशलिनमभिज्ञानदानाद्विदित्वा मा कौलीनादसितनयने मय्यविश्वासिनी भूः । स्नेहानाहुः किमपि विरहध्वंसिनिस्ते व्वभोगा दिष्टे वस्तुन्युपचितरसा: प्रेमराशी भवन्ति'॥ उत्तरमेघ, ४५ अर्थात् उसके द्वारा दिये गये स्मृति-चिह्न के बल पर मुझे तुम कुशल जान कर हे काली आँखों वाली, लोगों की बातों का विश्वास कर मुझ पर अविश्वास मत करना; क्योंकि विरह में किसी भी कारण स्नेह कम हो जाता है। परन्तु इष्ट वस्तु के अ-भोगे गये रसों के संचय से प्रेम के राशि बनते हैं। इसीलिए संयोग में वियोग की भीति बनी रहती है और वियोग में भी संयोग के मनोरथ मिले रहते हैं। इस प्रकार संयोग और वियोग दोनों मिल कर शृंगार का शरीरगठन होता है और यदि आस्थाबन्ध-रूप रति होती है तो अभिलाषा, ईर्ष्या, प्रवास आदि दशाओं का उसमें समावेश हो जाता है। अतः भोग न हो वहाँ भी उपचार द्वारा सम्भोग-शृंगार वगैरह का व्यवहार होता है। यों दोनों दशाओं के मिलन में चमत्कार का अतिशय अनुभूत होता है; अर्थात् जहाँ इन दोनों दशाओं का युगपत् वर्णन हुआ हो तब ही वास्तविक चमत्कारानुभव होता है। जैसे कि 'एकस्मिन्शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो- रन्योन्यं हृदयस्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम्। दम्पत्यौः शनकैरपाङ्गवलनान्मिश्रीभवच्चक्षुषो भग्नो मानकलि: सहासरभसव्यासक्तकण्ठग्रहम् । अर्थात् हृदय में अनुनय होने पर भी अपने मान की रक्षा करने के लिए, एक ही शय्या पर एक-दूसरे से मुँह मोड़ कर सोये हुए, मौन धारण करने वाले दम्पती की आँखें एकाएक अन्योन्य से मिलीं, वैसे ही मानकलह भंग हो गया, दम्पती हँस पड़े और एक- दूसरे के गले से लग गये। यहाँ ईर्ष्या, विप्रलम्भ और संयोग का मिलन हुआ है और

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एकात्मभूत पति-पत्नी के विभाव, अनुभाव और व्यभिचारीभाव द्वारा रस की अनुभूति चमत्कारपूर्ण बनती है। सम्भोगावस्था इसके पश्चात् भरत सम्भोगावस्था का निरूपण करते हैं। वे कहते हैं: इन दोनों में से सम्भोग ऋतु, माल्य, अनुलेपन, अलंकार, इष्टजन, विषय, सुन्दर भवन का उपयोग, उपवनगमन, श्रवण, दर्शन, क्रीडा, लीला आदि विभावों से उत्पन्न होता है। इसे स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि सम्भोग में वस्तुतः स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के लिए विभाव होते हैं। ऋतु-माल्यादि उनके उत्तमत्व के लिए आवश्यक होते हैं। अर्थात् ऋतु-माल्यादि सामग्री न हो तो उत्तम प्रकृति के पात्रों की रति सम्भव नहीं होती। ऋतु, माल्य, अनुलेपन, इष्टजन, अलंकार, आदि उद्दीपकों से रहित स्थिति में उत्तम प्रकृति के स्त्री-पुरुषों में रति का उदय सम्भव ही नहीं है। इसीलिए 'रत्नावली' में हर्म्य-वर्णन, उद्यान-गमन, कामदेव-पूजन, वसंत आदि सभी 'राज्यं निर्जितशत्रु योग्यसचिवे न्यस्तम्' (शत्रुहीन राज्य योग्य सचिव को सौंप कर ...... ) श्लोक में उल्लिखित है। इस प्रकार नायक-नायिका एवं ऋतु-माल्यादि सब मिल कर ही विभाव बनता है। आलम्बन विभाव और उद्दीपन विभाव-ये भेद काल्पनिक हैं। 'एवं च सर्वे एव समुदितो विभाव इति काल्पनिकमालम्बनविभावउद्दीपनविभाव इति'। इसके लिए भरतमुनि ने कहीं भी कोई भी उल्लेख या संकेत तक नहीं किया है और वही योग्य है। जिससे एक ही रूपक में उद्यान, ऋतु, माल्य आदि विभावों को एक साथ देखकर, विभावों में भेद न होने के कारण एक ही रस की निष्पत्ति हो सकती है। रस की निष्पत्ति के लिए ऋतु-माल्यादि सभी सामग्री आवश्यक है ऐसा ऊपर बताया गया है, इस पर यह आपत्ति उठायी गयी है कि जब नायक प्रथम बार नायिका से मिलता है, अथवा नायिका को देखता है तब उद्यान, भवन आदि न भी हों, तो फिर रस कैसे उत्पन्न होगा ? उत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि कौन कहता है ? अर्थात् वैसा है ही नहीं। क्योंकि यह सारी सामग्री आक्षेप द्वारा उपस्थित मान लेनी है, भले ही वह प्रत्यक्ष उपस्थित न हो, उत्तम प्रकृति के पात्रों में इन सबका आक्षेप कर लेना होता है और इस प्रकार वहाँ भी ऐश्वर्यपूर्ण विभाववर्ग की पूर्णता का ही अनुभव होता है और इसके कारण ही रसनिष्पत्ति होती है। रूपक में इन सब वैभव- ऐश्वर्य की पूर्णता होती ही है। मुक्तक आदि में जिसमें यह सारी सामग्री अलग रूप से वर्णित नहीं होती, वहाँ भी रस की प्रतीति होती है; क्योंकि उत्तम अर्थात् रसपर्यव- सायी मुक्तकों में बिना कहे ही इस सारी सामग्री का आक्षेपद्वारा ग्रहण हो जाता है। और अनुत्तम अर्थात् भावपर्यवसायी मुक्तकों में एकांग का अर्थात् आलम्बन का ही निरूपण ऐसा सौभाग्यपूर्ण हुआ होता है कि उसके कारण चमत्कारानुभूति होती है। वहाँ भी उद्दीपन के अभाव में रसानुभूति होती है ऐसा नहीं समझना चाहिए।१ १. यहाँ अर्थ सन्दिग्ध हैं।

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रसन-करिया झटितिप्रत्यय है इसके बाद अभिनवगुप् एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं कि कवि द्वारा निरूपित तथा नट द्वारा साक्षात्कृत इन विभावादि के द्वारा सम्यक अर्थात् निर्विन्न भोगरूप शृंगार- रस सदः ही उत्पन्न होता है।१ रसन-क्रिया गमन-क्रिया की भाँति ठेठ अन्त में सिद्ध नहीं होती परन्तु प्रथम वार में ही सिद्ध होती है। 'न हि गमनक्रियावत् पर्यन्ते रसनक्रिया निष्पद्यते अपितु प्रथमावसरे। स च विभावसाक्षात्कारात्मक एव', कहने का तात्पर्य यह कि हम किसी स्थान पर जाना चाहें तो चलते-चलते अन्त में गंतव्य स्थान पर पहुँचने का फल प्राप्त होता है, परन्तु रसन-क्रिया की स्थिति वैसी नहीं है। रसन- व्यापार तो पहले से ही (प्रारम्भ में ही) शुद्ध हो जाता है। विभाव का साक्षात्कार होते ही रसन-व्यापार शुरू हो जाता है।

सम्भोग-शृंगार के अनुभाव इस सम्भोग श्रृंगार का अभिनय किस प्रकार किया जाय ? इसे समझाते हुए भरत कहते हैं कि नयनचातुरी, भ्रूक्षेप, कटाक्ष-संचार, ललित-मधुर, अंगहार और वचनों के द्वारा इसका अभिनय किया जाय। इस सम्बन्ध में अभिनव गुप्त कहते हैं कि ये अभिनय रस को आस्वाद-योग्य बनाते हैं। [रसनाद्याभिमुख्यं नीयन्ते ] अतः उसे अभिनय और अनुभाव कहते हैं। इनका काम अभिमुख्यनयन का तथा अनुभावन का है। रस को आस्त्राद योग्य बनाने में वह उद्दीपन कहलाता है। इसलिए अभिनय और अनुभाव के बिना विभावादि का वर्णन जिस काव्य में मुख्यतः किया गया हो, उसमें भी चमत्कार की अनुभूति होती नहीं है; क्योंकि वहाँ रसना-व्यापार का अभाव होता है। जैसे कि भट्ट इन्दुराज के इस श्लोक में :

'उपपरिसरं गोदावर्याः परित्यजताध्वगा: सरणिमपरो मार्गस्तावद् भवद्धिरवेक्ष्यताम्। इह हि विहितो रक्ताशोक: कयापि हताशया चरणनलिनन्यासोदञ्चन्नवाङ्कुरकञ्जुकः । अर्थात् हे पथिक गोदावरी के तट का यह निकट मार्ग छोड़ कर आप लोग कोई दूसरा मार्ग हूँढ़ लीजिए। यहाँ तो किसी हताश स्त्री ने अपने चरण-कमलों को रक्त अशोक से छुआ कर उसे नवांकुरित कर दिया है। ऐसा अन्यत्र भी लागू होता है। ऐसे स्थान पर अभिनय की योजना करनी चाहिए तात्पर्य यह कि केवल शाब्दिक कथन पर्याप्त नहीं है। (देखिए, पृ० १९-२०)

१. आन्दवर्द्धन ने भी ध्वनि को झटितिप्रत्यय कहा है : तद्वत्सचेतसां सोडर्थो वाच्यार्थविमुखात्मनान्। बुद्धौ तत्त्वार्थदर्शिन्यां झटित्येवावभासते।। -पृ० १०२ मम्मट ने भी 'समनन्तरमेव' कह कर वही बात कही है।

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यहाँ एक ऐसा प्रश्न उपस्थित किया गया है कि अनेक रसों में विभावों की वही स्थिति (साधारण) होने पर भी नाटक में सदैव अमुक रस की ही निष्पत्ति कैसे होती है ? अन्य रस की क्यों नहीं ? इसका उत्तर यह है कि यही तो कवि-कर्म-प्रभाव से समाविष्ट विशिष्टता है।-यही कवि-कर्म की विशेषता है। इसी के कारण रस को उत्पन्न करने वाले धर्मों का आविर्भाव होने पर प्रगट होने वाले रस के प्रभाव से विभावादि की प्रमुख रस में ही विशेष भाव से विश्रान्ति हो जाती है। उदाहरणतः "हा प्रिये जनक- राज पुत्रि !" ऐसे राम के सीताविषयक वचन सुनते ही रति के सिवाय अन्य किसी भाव की आशंका तक नहीं होती। इस प्रकार "कुणप या कामिनी" ऐसा कोई विकल्प उपस्थित नहीं होता। यहाँ 'कुणप और कामिनी' शब्द प्रयुक्त हुए हैं, जो एक श्लोक में से उद्धृत किये गये हैं। जो इस प्रकार है : परिव्राट्-कामुकशुनां एकस्यां प्रमदातनौ। कुणपः कामिनी भक्ष्या इति तिस्रो विकल्पना।। अर्थात् एक ही प्रमदा के शरीर को संन्यासी, कामीजन तथा कुत्ता तीन विभिन्न दृष्टियों से देखते हैं-संन्यासी उसे शव के समान देखता है, कामी-जन उसे कामिनी के रूप में देखता है और कुत्ता उसे खाद्य-पदार्थ के रूप में देखता है। यहाँ स्त्री का शरीर तो वही है फिर भी उसे देख कर तीनों में अपने-अपने संस्कारों के अनुसार अलग-अलग तीन बुद्धियाँ जाग्रत होती हैं। परन्तु नाटक आदि में विभाव अनेक रसों में समान होने पर भी कवि व्यापार के कारण प्राप्त विशेषता के कारण नाटक में इन विभावादि की विश्रांति प्रधान रस में ही होती है; अलग-अलग विकल्प उपस्थित होते नहीं है। अनुभावकत्व के कारण ताटस्थ्य का परिहार होता है, और आभिमुख्य-नयन के कारण केवल अपने में संवित् की विश्रान्ति होने की शंका का निवारण हो जाता है; अर्थात् जो प्रतीति होती है वह ताटस्थ्य से भी नहीं होती और न केवल आत्मगतत्वेन ही, किन्तु साधारण्य की भूमिका (साधारणीकरणद्वारा) पर होती है। ऐसा ही अन्यत्र भी समझना चाहिए। इस प्रकार विभाव के ग्रहण के समय ही स्थायीभाव रसनीयता प्राप्त करता है। और अनुभाव के ग्रहण के समय एक ही अवस्था के साक्षात्कार से विरसता प्राप्त कर लेता है किन्तु उसकी अपनी रसनीयता को चित्रित करने वाले व्यभिचारीभाव बाद में उसके सौन्दर्य को पुष्ट करते हैं, अतः उन व्यभिचारियों का भी निरूपण किया गया है। यहाँ कहने का तात्पर्य केवल यही है कि विभाव से विज्ञात स्थायी अनुभावों से अनुभवगम्य हो जाने के बाद उसमें किसी प्रकार का वैचित्य नहीं आ जाता है। अर्थात् उसे विरसता प्राप्त होने की सम्भावना रहती है। किन्तु बाद में व्यभिचारीभाव आ मिलते हैं, उसमें वैचित्य ला देते हैं और उसके सौन्दर्य की पुष्टि करते हैं। वस्तुतः ६

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तो व्यभिचारियों के बिना रसानुभूति में वैचित्र्य आ ही नहीं सकता और इसीलिए अब शृंगार-रस के व्यमिचारियों की विवेचना करते हैं। शृंगार के व्यभिचारीभाव भरत ने कहा है कि शृंगार-रस में आलस्य, उग्रता और जुगुप्सा के सिवाय सभी व्यभिचारियों को स्थान हैं। इसकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि बीभत्स के स्थायी भाव जुगुप्सा को भी शृंगार में निषिद्ध बताया गया है, उस पर से पता चलता है कि स्थायीभाव भी अन्य रस के व्यभिचारीभाव के रूप में आ सकते हैं। इस प्रकार श्रृंगार-रस के व्यभिचारीभाव एक साथ बता देने के बाद भरत ने विप्रलम्भ के व्यभिचारीभाव अलग से बताये हैं। उनमें निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, श्रम, चिन्ता, औत्सुक्य, निद्रा, स्वप्न, विबोध, व्याधि, उन्माद, अपस्मार, जाड्य और मरण-इतने बताये गये हैं। इनके सम्बन्ध में अभिनवगुप्त कहते हैं कि यहाँ बताये गये निर्वेदादि दुःखप्रधान व्यभिचारियों के सिवाय तथा पहले निषिद्ध आलस्यादि को छोड़ कर शेष सुखप्रधान धृति आदि व्यभिचारीभाव ही संयोग-शृंगार में निरूपित होने चाहिए। सम्भोग और विप्रलम्भ परस्पर न्यूनाधिक मात्रा में संरलिष्ट ही होते हैं अतः यहाँ 'अस्य' अर्थात् 'उसका' ऐसा सन्दिग्ध सर्वनाम प्रयुक्त किया गया है जिससे कि दोनों का समावेश हो सके और इसीलिए ही भगवती सरस्वती की कृपा से पवित्रभूत वाणी वाले कवि कालिदास ने 'रघुवंश' में सम्भोग व विप्रलम्भ (संश्रित) सम्मिश्रित का रसास्वाद सम्भव हो एतदर्थ लंका-विजय के पश्चात् पुष्पक विमान में अयोध्या लौटते समय उल्टे क्रम में रामचन्द्र के अपने कार्यों का तथा पूर्वावस्था का वर्णन प्रस्तुत किया है। निद्रा में समाविष्ट हो जाने पर भी, सम्भोग और विप्रलम्भ की मिश्र प्रतीति में उपयोगी होने के कारण 'स्वप्न' का अलग उल्लेख किया गया है। कुमारसम्भव (५-१४) का 'क्व नीलकण्ठ व्रजसि' श्लोक इसका उदाहरण है। सम्भोगावस्था में तो स्त्री-पुरुष-रूप विभाव के सान्निध्य के कारण निद्रा का अभाव होता है, अतः विबोध (जागरण) को भी व्यभिचारीभाव कहा गया है। सम्भोग में सुरत-श्रम के कारण आने वाली निद्रा यद्यपि यहाँ होती है, फिर भी उसके कारण रति में किसी प्रकार का वैचित्य आ नहीं जाता है। विप्रलम्भ में तो इसके कारण रति भाव में भेद उत्पन्न हो जाता है। अतः बहुलता के कारण से निद्रा की गिनती की गयी है। उन्माद, अपस्मार, व्याधि आदि को भी विप्रलम्भ के व्यभिचारीभाव कहा गया है, परन्तु उन सब की केवल वे दशाएँ ही काव्य किंवा नाटक में निरूपित हों, जो अति कुत्सित न हों। कुत्सित दशा तो सम्भवित हो तो भी न दिखाई जाय-ऐसा वृद्धों का कथन है। हम तो कहते हैं कि अपने जीवन की निन्दात्मक दशा तो देहोपभोग ही जिसका सार है ऐसी आस्थाबाधक रति ही विच्छिन्न हो जाती है, मतलब कि स्थिर नहीं रहती। अतः यदि मृत्यु का वर्णन करना ही पड़े तो केवल मृत्यु की सम्भावना का ही

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वर्णन किया जाय अथवा जिसमें से तुरन्त ही पुनः मिलन सम्भव हो ऐसा मरण वर्णित किया जाय, जिससे शोक को कोई स्थान ही प्राप्त न हो। जिस प्रकार रघुवंश में कालिदास ने किया है : तीर्थे तोयव्यतिकरभवे जहुकन्यासरयोः, देहत्यागादमरगणनालेखमासाद्य सद्यः। पूर्वावस्थाधिकचतुरया संगतः कान्तयाऽसौ लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥ [रघुवंश, ८-९५ ] अर्थात् गंगा तथा सरयू के जल के संगमस्थानभूत तीर्थ पर देह-त्याग करने से देवता की कोटि में सद्ः प्रविष्ट हो जाने से पहले से भी अधिक सौन्दर्ययुक्त कान्ता को प्राप्त कर नन्दनवन स्थित क्रीडा-भवनों में वह पुनः रमण करने लगा। यही कारण है कि यहाँ सुकवि कालिदास ने शब्दान्तर से भी मरण का उल्लेख नहीं किया है। बल्कि अमरत्व की प्राप्ति का वर्णन किया है और देहत्याग के कारण होने वाला शोक न टिक पाये इसलिए तीसरी पंक्ति में पुनः विभाव (इन्दुमती) की प्राप्ति का वर्णन कर दिया है 'पुनः' ऐसा कह कर दुबारा सम्भोग का ही प्रतिपादन किया है। कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि विप्रलम्भ में मृत्यु का जो उल्लेख है, उसका अर्थ जीवन की समाप्ति नहीं मगर प्राणत्याग करने तक तैयार जीवितावस्था ही करना चाहिए, और उसे ही प्रसंगानुरूप व्यभिचारी के रूप में ग्रहण करना है। इसके उदाहरण आसानी से मिल सकते हैं। विप्रलम्भ में विडम्बन अर्थात् हताशा सिद्ध होती है, जब कि सम्भोग में वह उसके फल के रूप में विचरण करती है; क्योंकि परस्पर रतिभाव जिनमें हो उनमें विडम्बन सम्भव नहीं है। अतः विरह द्वारा साधित सौन्दर्य बताकर भरत मुनि ऐसा संकेत देते हैं कि विरह के बिना शृंगार-रस नाटक या काव्य में हृदयङ्गम नहीं बन पाता। अतः सम्भोग में भी केवल मिष्ट ही मिष्ट अनुभव हो, इस अवस्था को टालने के लिए गोत्र- स्खलन आदि प्रसिद्ध उपायों से जागत ईर्ष्या अथवा अन्य कलह-विप्रलम्भ के कारण- रूप वैषम्य का कवि निरूपण करते हैं। 'तथा हि सम्भोगेऽप्येकघनशर्करास्वादस्थानीयता- परिहाराय वैषम्यं गोत्रस्खलितं, स्पर्द्धामन्यद्वा कलहविप्रलम्भहेतुभूतं कवयो निबध्नन्ति।' वात्स्यायन आदि ने भी कहा है कि 'वामो हि कामः' ( कामसूत्र २-७-१) अर्थात् काम बहुत अटपटा होता है। भरतमुनि ने भी आगे कह दिया है कि काम वामाभिनिवेशी होता है। (२२-२०७)। ये व्यभिचारीभाव विद्युत् की भाँति कौंधते हैं, बुझ जाते हैं। ये स्थायीभाव के सूत्र में प्रगट होते हैं और तिरोहित हो जाते हैं तथा उसके सौन्दर्य की वृद्धि करते हैं। ये स्थिर नहों होते। यद्यपि स्थायी स्वयं भी स्थिर नहीं होता, फिर भी संस्काररूप में तथा धारावाही सजातीय प्रवाह के रूप में वह स्थिर ही होता है। किन्तु व्यभिचारी-

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भाव तो क्षण मात्र भी स्थिर नहीं होते हैं तथा अपने संस्कारों को भी स्थायी के संस्कार में मिला देकर उसे पुष्ट करते हैं।' ऐसा होने से व्यभिचारीभावों के अलग-अलग उदाहरण देने की जरूरत नहीं है और शास्त्रसंगत भी नहीं, यों कह कर दो-तीन श्लोकों की अभिनवगुप्त ने चर्चा की है। वे कहते हैं कि धृति के उदाहरण के रूप में 'असम्भाव्यं' श्लोक दिया गया है उसमें भी हर्ष, विस्मय, गर्व, मति आदि अनेक भाव स्थित हैं। उन सबका समुदाय ही तात, मामू, वलित आदि पदों से व्यंजित किया गया है। 'किमपरं त्रैलोक्यं' इस श्लोक में भी अवान्तर वाक्य के प्रारम्भ में ही स्मृति आदि भाव सर्वत्र होने चाहिए। ऐसा न हो और केवल धृति का ही कथन हो तो समग्र श्लोक में अर्थ की चित्रलिखित-सी एक ही दृष्टि दिखायी देगी। मतलब यह कि व्यभिचारीभाव एक के बाद एक निरूपित हों तभी वे सौन्दर्याधायक होते हैं। नहीं तो अगर एक ही का वर्णन हो तो चित्र में अंकित आँख की तरह उसमें स्थिरता ही होगी, पलक गिरे ही नहीं, अतः वैचित्र्य सिद्ध होगा नहीं 'अस्याः सर्गविधौ,' (विक्रमोर्वशीय १-१०) श्लोक में भी अवान्तर वाक्यों की समाप्ति होने पर धृंति, हर्ष, विस्मय वगैरह उपस्थित होते ही हैं। अर्थात् एक भाव टूटता है, दूसरा उदित होता है। व्यभिचारीभाव क्षण भर भी टिक नहीं पाता। सत्त्व, रजस् और तमस् इन गुणों का स्वभाव ही चल है, ऐसा सांख्य- शास्त्र के आचार्यों ने कहा है। इसी कारण प्रयोग में वैचित्य आ जाता है। नहीं तो वैचित्य के अभाव के कारण प्रयोग एकरूप हो जाता। इस श्लोक के मध्य में और अन्त में धृति, विस्मय वगैरह व्यभिचारीभावों का आश्रय स्पष्ट है और वह धृति-विस्मय आदि का संकेत करता है। विप्रलम्भ और सम्भोग दोनों मिल कर शृंगार बनता है, इसी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए भरत कहते हैं कि कदाचित् किसी के मन में यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि यदि शृंगार रति से उत्पन्न होता हो तो उसमें करुण में स्थित निर्वेदादि भाव कैसे हो (रह) सकते हैं ? इसका उत्तर यह है कि सम्भोग और विप्रलम्भ दोनों मिलकर श्रृंगार होता है, ऐसा हम पहले ही कह चुके हैं। उसमें विप्रलम्भ शरृंगार में करुण के जैसे निर्वेदादि व्यभिचारीभाव भी होते हैं। यह केवल हम ही नहीं कहते, काम- शास्त्र के आचार्यों का भी यही मत है। उन्होंने काम की दश दशाएँ बतायी हैं ही।२ (पृ० १०२ पर) इसकी बात हम सामान्य अभिनय की चर्चा के प्रसंग में १. एते च व्यभिचारिणोविद्युन्मेषनिमेषयुक्तैव स्थायिसूत्रमध्ये प्रगटयन्तस्तिरोदघतश्च तद्वैचित्र्य- मावहन्ति न तु स्थिराः । यद्यपि स्थाय्यपि न स्थिरः तथापि संस्काररूपतया धारावाहिसजातीय- प्रवाहरूप तया च स्थिर एव। व्यभिचारिणस्तु नैवं क्षणमपि भवन्ति। संस्कारमपि स्वकं स्थायिसंस्कार एव प्रौढयन्ति। पृ० ३०८ २. काम की दस अवस्थाएँ इस प्रकार हैं :- १. अभिलाष, २. अर्थीचिंता, ३. अनुस्मृति, ४. गुणकीर्तन, ५. उद्वेग, ६. विलाप ७. उन्माद, ८. व्याधि, ९. जडता, १०. मरण। (नाट्यशास्त्र, अध्याय २२, श्लो० १५९-७२, पृ०१९९)

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करेंगे। इसे समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि यहाँ 'अवस्था' का अर्थ यह कि ये दश अवस्थाएँ विप्रलम्भ के विभिन्न प्रकार नहीं हैं। चिन्ता आदि को तो इन आचार्यों ने व्यभिचारीभाव के रूप में ही स्वीकार किया है, ऐसा इसका अर्थ है। और वाक्य में भी जो 'च'कार का प्रयोग हुआ है, उसका अर्थ यह है कि परस्पर आस्थाबन्ध-रूप रति मौजूद हो तो उसके अंगभूत ये दश अवस्थाएँ विप्रलम्भ का अंग बन जाती हैं। जिस प्रकार 'रत्नावली' में चित्र देखने से लेकर उदयन की दश दशाओं का वर्णन आता है। इसके सम्बन्ध में एक ऐसा प्रश्न उठाया गया है कि वहाँ राजा केवल चित्र देखता है, सागरिका को नहीं देखता है; तो फिर रति कैसे सम्भव है ? उसके उत्तर में अभिनव- गुप्त कहते हैं कि वहाँ केवल चित्र ही नहीं है परन्तु सागरिका की कामावस्था की तथा उसकी उस कदलीकुञ्ज में कुछ क्षणों की उपस्थिति की साक्षीभूत कमलिनी की शैय्या आदि मौजूद हैं। और उस शैय्या पर कामसन्तप्त सागरिका के शरीर की आकृति भी अड्वित देख कर उसकी काम्यमानता का औचित्य सिद्ध होता है। अतः रति उत्पन्न हो इसमें अनौचित्य नहीं है। कारण यह कि यह सारी सामग्री किस कार्य में उपयोगी है, इस विषय में तद्विद् ही प्रमाण हैं। काम की जो दश दशाएँ बतायी गयी हैं वे दोनों पक्ष में जब रति वस्तुतः उपस्थित हो तभी विप्रलम्भ शृंगार का अंग बनती हैं। परन्तु यदि वैसा नहीं होता तो वे दशाएँ स्वतन्त्र ही रहती हैं। विप्रलम्भ का अंग बनती नहीं हैं। जिस प्रकार बालरामायण में रावण की दस दशाओं का वर्णन आता है, वह रावण के प्रति सीता की रति के अभाव में विप्रलम्भ का अंग नहीं बन पातीं और स्वतन्त्रमात्र रह जाती हैं। ऐसा कह कर अभिनवगुस अपने गुरु भट्ट तौत का आधार लेकर उद्धृत करते हैं कि स्वतन्त्र- रूप में प्रवृत्त हों तब ये दशाएँ सर्व प्राणियों में सम्भव हैं-'स्वातन्त्र्येण प्रवृत्तौ तु सर्वप्राणिषु सम्भवः।' करुण और विप्रलम्भ का भेद यदि करुण और विप्रलम्भ के व्यभिचारीभावों में कोई अन्तर न हो तो फिर इन दोनों का भेद कैसे किया जाय ?- ऐसे प्रश्न के उत्तर में भरत कहते हैं कि शाप और क्लेश से ग्रस्त इष्टजन के विभवनाश, वध या बन्धनादि से उत्पन्न निरपेक्ष भाव करुण कहलाता है। इसकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप् एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं कि अधम प्रकृति के पात्रों में स्त्री-पुरुष के वियोग के बाद रतिरूप स्थायीभाव टिक नहीं पाता। अतः उसके अभाव में विप्रलम्भ ही सम्भव नहीं। प्रेयसी-रूप विभावादि सामग्री के अभाव के कारण स्थायीभाव का भी अभाव होता है। 'अधम प्रकृतेस्तावन्न विप्रलम्भः स्थाय्यभावात्। तद्भावो विभावसामग्री वैकल्यादिति।' अतः ऐसे अवसरों, स्थानों पर स्वतन्त्ररूप से करुण-रस प्रतिष्ठित हुआ होता है। मतलब यह कि वहाँ विप्रलम्भ नहीं किन्तु करुण-रस होता है।

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उत्तम प्रकृति के पात्रों में भी रति से विपरीत ऐसा शोक करुण-रस में स्थायीभाव होता है। अतः विप्रलम्भ और करुण का भेद स्पष्ट करने के लिए करुण को 'निरपेक्ष भाव' कहा गया है। 'निरपेक्ष भाव' का तात्पर्य यह है कि रति में जिस प्रकार बन्धु- जन की अर्थात् आलम्बन विभाव की अपेक्षा होती है वैसी यहाँ नहीं रहती। विप्रलम्भ में हमेशा प्रियजन से मिलने की आशा बनी ही रहती है, जबकि करुण में प्रियजन की मृत्यु के कारण ऐसी आशा नहीं होती। इसे ही यहाँ निरपेक्ष भाव कहा गया है। जिस प्रकार कालिदास ने मेघदूत में कहा है : 'आशाबन्धः कुसुमसदृशः प्रायशो ह्यङ्गनानाम्।' यह आशाबन्ध विप्रलम्भ में अटूट बना रहता है। [ मेघदूत-१० ] करुण में यह टूट गया होता है, वहाँ पुनः मिलन की आशा नहीं होती। इस प्रकार विप्रलम्भ यह सापेक्ष भाव है जब कि करुण निरपेक्ष भाव है। जहाँ यह सापेक्ष भाव नहीं होता वहाँ शोक नामक भाव होता है। और वह शाप- क्लेश आदि में ग्रस्त इष्टजन के वध, बन्धन या विभवनाश में से उत्पन्न हुआ होता है। यहाँ शाप को इसलिए सम्मिलित किया गया है कि उसका प्रतिकार सम्भव नहीं है। अतः उत्तम प्रकृति के पात्रों को ऐसे अवसरों पर शोक की अनुभूति होना उचित है ऐसा बताना चाहिए वरना तो ये वध-बन्धनादि शोक के विभाव बनने के स्थान पर उत्साह, क्रोध आदि के विभाव बन जायेंगे। शोक का ही परिहार करने के लिए कविकुल चक्रवर्ती कालिदास ने 'विक्रमोर्वशीय' में शाप का निरूपण इस प्रकार किया है कि उसका पता पुरूरवा को नहीं चल पाता। अगर पुरूरवा को पता चल जाये तो शोक स्थायी हो जायेगा और करुण-रस की स्थिति हो जायेगी किन्तु यहाँ पुरूरवा को शाप का पता तक नहीं है अतः विप्रलम्भ हुआ है। इस प्रकार विभाव, अनुभाव और स्थायी का भेद बताया गया है। निर्वेदादि जो व्यभिचारीभाव हैं वे भी वस्तुतः तो रति के अनुरूप नहीं हैं अतः वे निरपेक्ष शोक- रूपी स्थायीभाव में से उत्पन्न होते हैं अतः वे भिन्न ही हैं। इस प्रकार प्रसंगत: करुण का स्वरूप कह कर पुनः मूल विषय पर आ जाते हैं। भरत का कहना है कि औत्सुक्य और चिन्ता से उत्पन्न होने वाला सापेक्ष भाव विप्रलम्भ के कारण होता है। इस तरह करुण अलग है, विप्रलम्भ भी अलग है। इसी प्रकार आलस्य, उग्रता और जुगुप्सा के सिवाय शेष सभी भाव शृंगार में होते हैं। इसे स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप् कहते हैं कि यहाँ पर जो 'चिन्ता' शब्द प्रयुक्त किया गया है, वह निर्वेदादि सभी व्यभिचारियों के लिए प्रयुक्त है। औत्सुक्यप्रधान जो चिन्तादि हैं उनमें से उत्पन्न सापेक्ष भाव ही विप्रलम्भ शरृंगार है। ये चिन्तादि व्यभिचारीभाव सापेक्ष रति स्थायीभाव में से उत्पन्न होते हैं। विप्रलम्भ के स्थायी और विभावादि संयोग शृंगार से भिन्न नहीं होते हैं एक ही होते हैं, ऐसा हम बार-बार कहते आये हैं। मतलब कि विप्रलम्भ और संयोग श्रृंगार में-दोनों में आलम्बन विभाव तथा स्थायीभाव वे ही होते हैं-भिन्न नहीं।

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यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि औत्सुक्य अर्थात् विषय के प्रति उन्मुखता, यह उन्मुखता विषय के नष्ट होने पर रह ही नहीं पाती। चिन्ता, औत्सुक्यादि आलम्बन विभाव की मौजूदगी में ही सम्भव है। करुण में तो आलम्बन विभाव का नाश हुआ होता है। अतः चिन्ता, औत्सुक्य आदि कैसे सम्भव हैं ? इस प्रकार विस्तार से परीक्षा कर, इस परीक्षा का फल उपसंहार के रूप में कहते हैं कि 'शृंगार' एकवचन पद का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ यह है कि संयोग और वियोग दोनों पक्ष मिल कर एक ही शृंगार का निर्माण होता है। यह पूरा एक शृंगार है। इस तरह सूत्रार्थ की परीक्षा कर, उसका अर्थ निश्चित करने के बाद यह सरलतापूर्वक समझ में आ सके इसलिए सूत्रार्थ के विवरणवाले अर्थ की कारिका यहाँ उद्धृत करते हैं :-

शृंगार का स्वरूप सुखप्रायेष्टसम्पन्नः ऋतुमाल्यादि सेवकः। पुरुष: प्रमदायुक्त: शङ्गार इति संज्ञितः ।।४६॥। अर्थात् सुखमय एवं इष्ट सामग्री से सम्पन्न, ऋतु तथा माल्यादि का सेवन करने वाला व प्रमदायुक्त पुरुष ही शंगार कहलाता है। इसकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि यहाँ 'पुरुष' शब्द का अर्थ संवेदनशील भोक्ता किया जाय। स्थायीभाव की संवित् ही भोक्ता है। व्यभिचारी तो भोग्य-स्वरूप होते हैं। अतः 'रति' ही पुरुष है। कहा है कि 'श्रद्धामयोऽयं पुरुषः ।' जैसी श्रद्धा वैसा पुरुष। इसी तरह प्रमदा भी रतिरूप ही है। अब भोक्तृत्व के विषय में पुरुष की प्रधानता होती है। पुरुष प्रधान होता है, स्त्री भोग्य होती है। पुरुष प्रधान होने से ही वह भोग्य के अर्थात् स्त्री के अधीन नहीं होता। अतः इसीलिए वह अन्य (दूसरी) नायिका के साथ सम्बन्ध रखता है तब भी शृंगार को हानि नहीं पहुँचती है। परन्तु भोग्य स्त्री तो परतन्त्र है अतः वह अगर दूसरे किसी नायक से सम्बन्ध करती है तो शृंगार-रस का भङ्ग होता है, ऐसा कहा गया है : 'तत्र भोक्तृत्वे पुरुषस्य प्राधान्यं, प्रमदायास्तु भोग्यत्वम्। प्राधान्यादेव च तस्य भोग्येनापरतन्त्रीकरणमिति नायिकान्तरयोगेऽपि न शृङ्गारहानिः। भोग्यस्य तु पारतन्त्र्यादेवान्यसम्मीलने शृङ्गारभङ्ग इति दर्शितम्।' अतः यह शङ्का न रखी जाय कि स्थायीभाव भिन्न वस्तु है। मतलब यह कि स्त्री और पुरुष उभय की रतियाँ मिल कर ही एक स्थायीभाव होता है ऐसा समझना चाहिए। 'सुख- प्रायेष्ट सम्पन्नः' यह विशेषण पुरुष के लिए प्रयुक्त कर ऐसा संकेतित किया गया है कि यह सब मिल कर शंगार-रस का विभाव होता है। अर्थात् आलम्बन और उद्दीपन- १. उस युग की सामाजिक मर्यादाओं का इसमें प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है तथा उनका समर्थन करने का प्रयत्न भी। विचारों पर स्थल और काल का कैसा प्रभाव पड़ता है, इस बात का यह दृष्टांत है।

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८८ अभिनव का रस-विवेचन

ऐसे दो विभाव नहीं हैं। और ये विभावादि रस के उदय और आस्वादन के द्वारा भोक्ता में समाविष्ट हो जाते हैं, अतः भोक्ता को प्रधान कहा गया है। आवश्यक सामग्री पूर्णतः उपलब्ध है, ऐसा निश्चय हो जाने पर ही 'रति' को मानना उचित है। इसीलिए 'रत्नावली' नाटिका में उदयन के प्रति सागरिका की रति का जो वर्णन है, उसमें सागरिका की रति का तभी औचित्य-सिद्ध होता है जब उसे यह पक्का भरोसा हो जाता है कि इसी राजा उदयन से विवाह करने के लिए ही मेरे पिता ने मुझे भेजा था। और इसीलिए तो कवि ने सागरिका के द्वारा यह कहलाया है कि 'यह वही राजा उदयन है, जिसके हाथों पिताजी ने मुझे सौंप दिया है।' और 'इस प्रकार के कर्णपूर के दर्शन से .... ' आदि के कारण सागरिका के उच्च-कुलोद्भव का पता चलता है। और इसलिए रति का औचित्य सिद्ध होता है। इस सबके द्वारा यही दिखा दिया है कि नायिका सर्वसम्पन्न है। यदि ऐसा न किया गया होता तो उसका उत्तमत्त्व सिद्ध न हो पाता; क्योंकि अपनी जाति और कुल के अनुरूप सम्पत्ति न हो तो रति पुरुषार्थरूप नहीं बन सकती और रति का ऐसा निरूपण करना उचित नहीं है। इसीलिए ऐसी अननुरूप रति में सभी सहृदयों की प्रतीति में अन्य प्रकार की ही विरसता की अनुभूति होने की सम्भावना रहती है। ऐसा इस श्लोक का अर्थ हुआ। शंकुक आदि जो यह मानते हैं कि विषयसामग्री की पूर्णता ही रस है, उन्हें भ्रान्ति कराने वाला यह श्लोक है। परन्तु हमने ऊपर जो अर्थ किया, वैसा अर्थ यदि किया जाय तो फिर यह भ्रान्तिजनक नहीं रहता। 'संज्ञितः' शब्द से यह संकेतित किया जा चुका है कि शृंगार नाम अन्वर्थक नहीं किन्तु केवल संज्ञा-यदच्छा रूप है। यही बात निम्नलिखित दो आर्याओं में भी कही गयी है :

ऋतुमाल्यालंकारैः प्रियजनगान्धव काव्यसेवाभिः। उपवनगमन विहारैः शृङ्गाररसः समुद्भवति॥ ४७ ॥ नयनवदनप्रसादैः स्मितमधुरवचोध्टतिप्रमोदैश्र। मधुरैश्राङ्गविहारैस्तस्याभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥। ४८ ।।

अर्थात्, ऋतु, माल्य, अलंकार, प्रियजन, संगीत, काव्य-सेवन, उद्यान-गमन, वन-विहार आदि से शृंगार-रस उत्पन्न होता है। नेत्र व मुख की प्रसन्नता, स्मित, मधुर वचन, धृति, प्रमोद तथा सुन्दरतापूर्वक अंग-संचालन द्वारा इसका अभिनय किया जाय। इसकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि यहाँ 'प्रियजन' से तात्पर्य विदूषक आदि से है, 'गान्धर्व' शब्द का अर्थ गीत आदि मनोहर वस्तुएँ करना है। 'काव्य-सेवा' शब्द से विभावरूप विषय-भोग के संकल्प का संकेत किया गया है। जो लोग ऐसा कहते हैं कि, काव्य का अर्थ बने हुए प्रकृत रस में से काव्यार्थविदों को दूसरे भावों का बोध होता है और वह सुखरूप होने से काव्यार्थ-रस कहा जाता है, उन्हें इससे प्रत्युत्तर मिल जाता है। 'धृति', 'प्रमोद' इन शब्दों द्वारा व्यभिचारी भावों

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का संकेत किया गया है। प्रारम्भ में कही गई दो अवस्थाओं-सम्भोग और विप्रलम्भ द्वारा वस्तुतः श्रृंगार-रस बनता है। इस प्रकार इस प्रकरण का उपसंहार किया गया है।

हास्य-रस

हास्य का लक्षण हास्य का लक्षण भरत ने इस प्रकार दिया है : हास्य हास स्थायीभावात्मक है। इसे स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि यहाँ हास्य को 'हास स्थायीभावात्मक' कहा है, श्रृंगार को 'रति स्थायिभावप्रभवः' (रति स्थायीभाव प्रभव) कहा था। इसका अर्थ यह है कि रति जब आस्वादन नामक प्रतीति को उत्पन्न करती है, तब वह उसे सजातीय रति के रूप में ही उत्पन्न नहीं करती। अर्थात् रति के आस्वादन के समय भावक में रति का ही उदय होता नहीं है। इसका कारण यह है कि उसके मुख्य विभावादि असाधारण होते हैं, लोकोत्तर होते हैं, अर्थात् यदि हम व्यवहार में किसी युगल को प्रेम-चेष्टा करते देखें तो हम में, हमारे चित्त में स्पृहा, ईर्ष्या, जुगुप्सा, आदि भाव जगते हैं, परन्तु जब काव्य या नाटक में किसी प्रेमी युगल की प्रेम-चेष्टा का निरूपण देखते हैं तब ऐसे भाव जगते नहीं हैं कारण कि नाटक में स्थित विभाव व्यवहार जगत् के पात्रों जैसे नहीं होते, अलौकिक होते हैं, असाधारण होते हैं। परन्तु हास के आस्वाद में जो विभाव हैं, जैसे कि विकृत वेश आदि, वे ही लोक-व्यवहार में भी हास के कारण बनते हैं। इस प्रकार हास के विभाव व्यवहार-जगत् में हास के कारण बनते हैं। अर्थात् काव्य में और व्यवहार में ये विभाव हास्य ही पैदा करते हैं। यों ये विभाव साधारण हैं, काव्य में और व्यवहार-जगत् में इनका स्वभाव एक-सा ही है। इस प्रकार यहाँ हास स्थायीभाव की चर्वणा हास्यरूप ही होती है। परन्तु रति और शोक ये दो स्थायीभाव ही ऐसे हैं कि जिनका जब आस्वाद होता हो तब भावक सजातीय रति और शोक का अनुभव करता नहीं है किन्तु सुख और दुःख का अनुभव करता है, अर्थात् स्थायीभाव से भिन्न ही भाव का इन रसों में भावक को अनुभव होता है। कारण यह है कि इनके हेतु-रूप जो विभाव हैं वे साधारण नहीं हैं और इसीलिए इन दो रसों के विषय में भरत ने 'आत्मक' के स्थान 'प्रभव' शब्द प्रयुक्त किया है। हम शंगार- निरूपण में देख चुके हैं कि वहाँ 'शृद्गारो नाम रति स्थायिभावप्रभवः'-ऐसा लक्षण दिया गया है। इसका अर्थ यह कि रति स्थायीभाव में से उत्पन्न शृंगार भावक के अनुभव में शरृंगार के रूप में नहीं आता, सुख रूप में आता है, और इसी तरह शोक में उत्पन्न करुण भी भावक के अनुभव में शोक रूप में नहीं आता, दुःख रूप में आता है। परन्तु इन दोनों के सिवाय अन्य रसों में जो-जो स्थायीभाव होते हैं, वे उन्हीं-उन्हीं रूपों में अनुभूत होते हैं; क्योंकि उनके विभाव साधारण होते हैं। अतः इन सब रसों के लक्षण देते समय भरत ने 'आत्मक' शब्द का प्रयोग किया है; यथा-

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हास्य का लक्षण : हास स्थायिभावात्मक, तो रौद्र का क्रोध स्थायिभावात्मक, वीर का उत्साहात्मक, बीभत्स का जुगुप्सा स्थायीभावात्मक और अद्भुत का विस्मय स्थायीभा- वात्मक-इस प्रकार दिया गया है; क्योंकि इन सभी रसों में अच्छे-बुरे सभी मनुष्यों को सब काल में और अपूर्व वस्तु हो तो भी उत्साह, क्रोध, भय, जुगुप्सा, विस्मय वगैरह भावों के विभावों की अनुभूति काव्य में व व्यवहार में एक-सी ही होती है। हास्य के विभाव तत्पश्चात् हास्य के विभाव गिनाते हुए भरत कहते हैं कि यह हास्य विकृतपरवेशा- लंकार, घृष्टता, लौल्य, कुहक (गुलगुली), व्यर्थ की बड़बड़ाहट, व्यंग्य आदि का दर्शन तथा दोषों के उदाहरण आदि विभावों से उत्पन्न होते हैं। इन्हें समझाते हुए अभिनव- गुप्त कहते हैं कि यहाँ 'वेश' का अर्थ है केशादि की रचना। 'अलंकार' का अर्थ है कटक इत्यादि। इन दोनों की देश, काल, प्रकृति, वय और अवस्था के अननुरूप विपरीत योजना हास्य का विभाव बनती है। इससे यह भी संकेतित होता है कि सभी रस हास्य में समाविष्ट हैं। सभी रसों का आभास हास्य में परिणत होता है। विदूषक भी वैसा ही हास्यजनक वेश धारण कर हास्याभास को ही प्रदर्शित करता है। 'परवेशालंकार' में 'पर' का अर्थ है पराया-दूसरे का, पर सम्बन्धी। देवदत्त का वेश अथवा अलङ्कार ऐसा है, ऐसा कह कर 'उद्धट्टक' और भाण्डों के नृत्य वगैरह में जब बताया जाता है, तब हास्य उत्पन्न होता है। 'वेशालंकार' में, बोल-चाल का समावेश भी हो जाता है। 'धृष्टता' का अर्थ है निर्लजता। लौल्य अर्थात् विषय में अनियतता, कभी इस ओर आकृष्ट होना, कभी उस ओर आकृष्ट होना। कुहक अर्थात् गुदगुदी करना, बगल, कमर आदि स्थानों का स्पर्श कर बच्चों को चमकाने की प्रसिद्ध रीति-अंग की हानि यानी नकटापन आदि को व्यंग कहा गया है। दर्शन शब्द को इन सबके साथ समास में ग्रहण करना है। दोष अर्थात् जो ऐसी प्रकृति का न हो उसमें भी भयादि दिखाने की प्रवृत्ति, अथवा अनुचित कार्य करना। अथवा ऐसा अर्थ भी लिया जा सकता है कि विकृत वेशादि रचना। इन सबका उदाहरण अर्थात् वर्णन, 'आदि' शब्द से संकल्प-स्मृति आदि समझना चाहिए।

हास्य के अनुभाव हास्य का अभिनय कैसे किया जाय? उसके व्यभिचारीभाव कौन-से ? इसे कहते हुए भरत ने लिखा है कि होंठ, नाक, कपोल का स्पंदन, आँखें खोलना और मींचना, पसीना, मुखराग, कमर पकड़ना आदि अनुभावों द्वारा उसका अभिनय किया जाय। इसके व्यभिचारीभाव अवहित्थ, आलस्य, तन्द्रा, स्वप्न, प्रबोध और असूया आदि हैं। इन्हें स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि विभावों एवं व्यभिचारियों की योजना तीन प्रकृतियों के अनुरूप जो स्मित वगैरह भेद अब आगे बताये जायेंगे, तदनुसार औचित्य की रक्षा करते हुए की जाय।

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हास्य के दो प्रकार भरत कहते हैं कि हास्य दो प्रकार का है : आत्मस्थ और परस्थ। स्वयं हँसे तब आत्मस्थ और दूसरे को हँसावे तब परस्थ। इसकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि हास्य-रस दो प्रकार का है-अपने में स्थित (आत्मस्थ) विकृत वेशादि विभावों के द्वारा विदूषक स्वयं हँसे तो वह उसका आत्मस्थ हास्य कहा जायेगा और देवी को हँसावे तो देवी का परस्थ हास्य कहा जाता है-ऐसा जो शंकुकादि ने भेद किया है, वह गलत है। ऐसा करने पर तो विभावों के आत्मस्थ और परस्थ दो विभाग करने पड़ेंगे, हास्य के नहीं, अन्य कारण यह भी है कि स्वामी का शोक उसके अनुजीवियों में भी शोक उत्पन्न करता है। अतः यह व्याख्या स्वीकार कर लें तो सभी रसों में परस्थता का स्वीकार करना पड़ेगा। देवी वगैरह में स्वयं उत्पन्न होते हास्य को परस्थ कहो तो गम्भीर प्रकृति के स्वामी में अनुजीवीगत अनुभावों से उत्पन्न क्रोध (रौद्र-रस) को भी परस्थ कहना पड़ेगा। अतः यह व्याख्या या समझ उचित नहीं है। और दूसरे लोग जो यह कहते हैं कि अपने में विभाव हों तो आत्मस्थ और अपने में विभाव न हों तो 'परस्थ' यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि ऐसा मानने पर पराया हास्य भी आत्मस्थ हास्य का विभाव बन जायेगा और ऐसा भेद रत्यादि सभी स्थायीभावों के विषय में करना पड़ेगा। अतः यहाँ सही अर्थ इस प्रकार है : दूसरे को हँसते देख कर स्वयं विभावों को न देखा हो फिर भी मनुष्य हँसता है, ऐसा लोक (जगत्) में देखा जाता है। इसी प्रकार विभावादि देखने पर भी गम्भीरता के कारण जिन्हें हँसी नहीं आती ऐसे लोग भी दूसरों को हँसते देख कर हँसने लगते हैं, मनुष्य की प्रकृति ऐसी है। जिस प्रकार खट्टे दाड़िम आदि का रसास्वाद संक्रामक होता है। किसी के मुख में .. पानी आते .. देख कर हमारे मुख में भी.पानी आने .. लगता है, इसी प्रकार हास्य भी प्रकृत्या संक्रामक हैं। वह भी काष्ठ में अग्नि फैलती है-इस प्रकार फैल जाता है। इस प्रकार जो हास्य मूलतः अपने में उत्पन्न हुआ हो वह 'आत्मस्थ' और जो दूसरे में संक्रान्त हुआ हो वह परस्थ ऐसा समझना चाहिए। इसके पश्चात् भरत दो आर्याएँ उद्धत करते हैं उसमें हँसता है, और हँसाता है- इस प्रकार इन दो रीतियों से हास्य की व्याख्या की गयी है। विपरीत अलंकार, विकृत आचार, अभिधान और वेश तथा विकृत अर्थ-विशेषों के द्वारा (भावक-प्रेक्षक) हँसता है इसलिए उसे हास्य कहते हैं। (४९) विकृत आचार तथा वाक्यों से, अंग-विकारों तथा विकृत वेश से (नट या विदूषक) लोगों को हँसाता है इसलिए वह हास्य कहलाता है। (५०) हास्य के छह भेद इसके बाद भरत हास्य के छह भेद बताते हैं : स्त्री और नीच प्रकृति के पुरुषों में हास्य अधिक देखा जाता है, इसके छह भेद मानिये। उन्हें मैं कहता हूँ : स्मित, हसित,

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विहसित, उपहसित, अपहसित, अतिहसितं। प्रथम दो प्रकार उत्तम प्रकृति में, अन्य दो मध्यम प्रकृति में और अन्तिम दो अधम प्रकृति में होते हैं-ऐसा समझना चाहिए। (५१-५२) इन्हें समझाते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि इन छह भेदों में दो-दो में यथाक्रम विभावों का तारतम्य होता है, ऐसा कुछ लोग जो कहते हैं, वह उचित (ठीक) नहीं है; क्योंकि इस प्रकार यदि विभाव तारतम्य स्वीकार करें तो अन्य भी अनेक भेद स्वीकार करने पड़ेंगे। अतः ये भेद मंक्रमण की दृष्टि से ही किये गये हैं ऐसा समझना चाहिए। जिस प्रकार उत्तम प्रकृति में स्मित होता है वही जब संक्रान्त होता है तब हसित बनता है। इस प्रकार तीन युग्मक बनते हैं : १. स्मित संक्रान्त होकर हसित, २. विहसित संक्रान्त होकर उपहसित, ३. अपहसित संक्रान्त होकर अतिहसित। अतः हास्य की तीन अवस्थाएँ आगे कही जायेंगी। नहीं तो हास्य के छ प्रकार होते। हास्य जब कम हो तो स्मित कहा जाता है, पर जब बढ़ता है तो हसित कहा जाता है। उससे भी अधिक बढ़े तो उसे विहसित कहते हैं; उसकी मात्रा और भी बढ़े तो उपहसित और इससे अधिक होने पर अतिहसित कहलाता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न उपसर्गों के कारण भिन्न-भिन्न अर्थ होता है। भरत आगे कहते हैं कि स्मित और हसित उत्तमों में, विहसित और उपहसित मध्यमों में, और अपहसित और अतिहसित अधमों में समझना चाहिए। (५३) और तत्सम्बन्धी श्लोक उद्धत करते हैं :- किंचित् विकसित कपोल एवं सौष्ठवयुक्त कटाक्षमय, दाँत न दिखाई दे ऐसा उत्तम पुरुषों का धीरस्मित कहाता है। (५४) मुँह और आँखें खिल उठें, कपोल अधिक विकस उठे, दाँत जरा-जरा दिखायी दे उसे हसित कहते हैं। (५५) इसके सम्बन्ध में अभिनवगुप्त कहते हैं कि जब स्मित ही संक्रान्त होता है तब हसित बन जाता है। तत्पश्चात् मध्यमों के विहसित और उपहसित के वर्णन आते हैं। आँख और कपोल संकुचित हो उठें, मुँह लाल हो उठे ऐसा, समय पर होने वाला, आवाज युक्त और मधुर हो उसे विहसित कहते हैं। नासिका फूल उठे, आँखें तिरछी हो जावें, अंग व सिर झुक जाय उसे उपहसित कहते हैं। (५६-५७) इसकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि 'समय पर होने वाला' का अर्थ सभा वगैरह में-योग्य अवसर पर होने वाला-यह लिया जाय। बाद में भरत अधमों के हास्य के विषय में कहते हैं : अस्थान पर (अनवसरोचित) उत्पन्न, जिसमें आँखों से आँसू बहने लगे, कन्धे व सिर डोलने लगे वह अपहसित; और जिसमें आँखों में आँसू आ जावे, जो सुनने में अच्छा न लगे (खराब लगे), जिसमें पसलियाँ हाथ से दबानी

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पड़े वैसा अत्यन्त वेगपूर्ण (उद्धत) और निरन्तर चलता रहने वाला हास्य अतिहसित है। (५८-५९) इसकी व्याख्या में अभिनवगुप्त कहते हैं कि 'अस्थान पर' का अर्थ है-श्रवण-कटु। नाटक में कार्यवशात् जो-जो स्थान हास्यमय हों उनमें उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के अनुरूप यहाँ प्रदर्शित प्रकारों का विनियोग करना चाहिए। (६०) इस प्रकार कह कर भरत उपसंहार करते हैं कि इस प्रकार यह हास्य रस स्वसमुत्थ और परसमुत्थ- दो प्रकार का, तीन प्रकृतियों और तीन अवस्थाओं वाला होता है। (६१) इन्हें स्पष्ट करते हुए अभिनवगुप् कहते हैं कि स्वसमुत्थ अर्थात् स्मित, विहसित और अपहसित रूप असंक्रान्त हास्य; और संक्रमण से हसितादि रूप को प्राप्त उत्तम प्रकृति में असंक्रान्त रूप में स्मितादि होता है। मतलब यह कि उत्तम प्रकृति में असंक्रान्त अवस्था में स्मित होता है, वही संक्रान्त होने पर हसित बनता है। आदि". यह हम पहले ही कह चुके हैं कि रति, क्रोध, शोक वगैरह का संक्रमण होता नहीं है। इन सबके विषय में विभाव एक साथ ही ऐसी चित्तवृत्ति वाले पुरुष में विश्रान्त हो जाते हैं। यह विभाव उसकी चित्तवृत्ति को प्रस्तुत कर हास्य की भाँति प्रस्तुतकर्त्ता के सिवा अन्य में संक्रमण करता नहीं है। अन्य कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि आत्मस्थ, परस्थ ये उपलक्षण सभी रसों को लागू होते हैं। परन्तु यह सत्य नहीं है; क्योंकि यह तो अनुभवसिद्ध बात है कि हास्य ही संक्रान्त होता है, अन्य भाव नहीं संक्रान्त होते। अन्य कतिपय व्याख्याकार ऐसा कहते हैं कि तीन प्रकार की प्रकृतियों में तीन अवस्थाओं वाला हास्य विभावों की तारतमिकता के अनुसार दो प्रकार का अर्थात् छह प्रकार का होता है। उसमें पुनः आत्मस्थ और परस्थ के भेद से बारह प्रकार का हास्य होता है। ऐसा इस कारिका का अर्थ है। और इन बारहों प्रकारों में अलग- अलग विभावन भी होता है परन्तु इस प्रकार तो अतिप्रसंग होगा-अर्थात् खूब खींचातानी करनी पड़ेगी अतः यह मत प्रस्तुत किया नहीं गया है।

शान्तरस

शान्तरस का लक्षण भरत ने शान्त-रस का लक्षण इस प्रकार दिया है : मोक्ष की ओर ले जाने वाले शमस्थायिभावात्मक शान्त-रस कहलाता है। यह तत्त्वज्ञान, वैराग्य, चित्तशुद्धि आदि विभावों से उत्पन्न होता है। यम, नियम, अध्यात्म, ध्यान, धारणा, उपासना, सर्वभूत- दया, लिंग (वैराग्य के चिह्न)-धारण, आदि अनुभावों द्वारा इसका अभिनय किया जाय। इसके व्यभिचारीभाव निर्वेद, स्मृति, धृति, शौच, स्तम्भ, रोमांच आदि हैं। इसके विषय में आर्याएँ व श्लोक इस प्रकार हैं :- मोक्षाध्यात्मसमुत्थस्तत्वज्ञानार्थहेतु संयुक्त: । नैःश्रेयसोपदिष्टः शान्त रसो नाम सम्भवति॥

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अर्थात्, मोक्ष और अध्यात्म का जनक तत्त्वज्ञानरूप हेतु वाला मोक्ष-प्राप्ति के लिए उपदिष्ट शान्त नामक रस होता है।

सर्वप्राणिसुखहितः शान्त रसो नाम विज्ञेयः ॥ ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय का निरोध करने वाले व आत्मनिष्ठ साधक द्वारा प्राप्त किया जाने वाला, सर्वप्राणियों के लिए सुख कर शान्त रस को समझिए। यत्र न दुःखं न सुखं न द्वेषो नापि सत्सरः। समः सर्वेषु भूतेषु स शान्तः प्रथितो रसः ॥ जिसमें न दुःख है, न सुख, न द्वेष, न मत्सर ऐसा सर्व भूतों में समभाव वाला शान्त रस प्रसिद्ध है। भावा विकारा रत्याद्याः शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः । स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद्भावः प्रवर्तते॥ पुनर्निमत्तापाये च शान्त एवोपलीयते। एवं नव रसा दृष्टाः नाट्यज्ञैलंक्षणान्विताः॥ रत्यादि भाव तो विकार हैं, परन्तु शान्त तो प्रकृति है। ये विकार प्रकृति में से जन्म लेकर पुनः प्रकृति में लीन हो जाते हैं। अपना-अपना निमित्त मिलने पर तद् तद् भाव शान्त में से उत्पन्न होकर निमित्त के चले जाने पर पुनः शान्त में लीन हो जाते हैं। इस प्रकार नाट्यज्ञों ने ऐसे लक्षण वाले नव रस माने हैं। इतना अंश भरत के नाम पर पाया जाता है, पर प्रक्षिप्त होने की पूर्ण सम्भावना है। अभिनवगुप्त ने भी कतिपय प्रतों में इस भाग को शृंगार-निरूपण के पूर्व देखा है और उस पर टीका लिखी है। अब हम वही देखेंगे। अभिनवगुप्त कहते हैं कि जो लोग नव रस मानते हैं उनके मतानुसार अब शान्त- रस का स्वरूप कहा जा रहा है। इस विषय में कुछ लोग यह कहते हैं कि शान्तरस शमस्थायीभावात्मक है। वह तप, योगी सम्पर्क आदि विभावों से उत्पन्न होता है। उसका अभिनय काम-क्रोधादि के अभावरूप अभिनय से करना होता है और धृति- मति आदि व्यभिचारी उसके व्यभिचारीभाव हैं। शान्त-रस के विरुद्ध आपत्तियाँ परन्तु अन्य समीक्षकों को यह स्वीकार्य नहीं है। वे शान्त-रस को स्वीकारने के विरुद्ध सात आपत्तियाँ प्रस्तुत करते हैं। १. शम और शान्त ये पर्याय हैं अतः शम को स्थायीभाव और शान्त को रस मान कर भेद करना उचित नहीं है। २. भरत ने कुल ४९ भाव बताये हैं; इनमें 'शम' को बताया नहीं है। अगर

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शान्त को रस मान लें तो उसके स्थायीभाव 'शम' को भी स्वीकारना पड़ेगा तथा भरत के बताये ४९ भावों के स्थान पर ५० भाव मानने पड़ेंगे। ३. ऋतु, माल्यादि विभाव अपने बाद में उत्पन्न होने वाले शृंगारादि रस के कारणरूप प्रतीत होते हैं। परन्तु तप, अध्ययन आदि शान्त या शम के हेतु के रूप में प्रतीत नहीं होते। अगर आप यह कह दें कि तप, अध्ययन आदि तत्त्वज्ञान के बाद उत्पन्न होने वाले साक्षाद्वेतु हैं तो ये शम के पूर्व उत्पन्न होने वाले कारण भी हैं ऐसा कहना पड़ेगा। और तो फिर ये तप और अध्ययन आदि शम के विभाव नहीं हो सकते। कामादि के अभाव को भी उसके अनुभाव नहीं कहा जा सकता; क्योंकि शान्त- रस के विरोधी वीरादि अन्य रसों में भी कामादि का अभाव होता ही है। अतः कामादि का शान्त-रस को अन्य रसों से अलग करने वाला लक्षण नहीं है। और यह लक्षण ऐसा भी नहीं है जिसके आधार पर हम शान्त-रस का निर्णय कर सकें। ४. शान्त-रस का प्रयोग अर्थात् अभिनय में समावेश हो नहीं सकता; क्योंकि चेष्टा के अभाव का अभिनय नहीं किया जा सकता। सुप, मोह आदि का भी निःश्वास, उच्छ्वास, पतन, भूशयन, आदि द्वारा ही अनुभव कराया जा सकता है। ऐसा चेष्टा के अभावरूप शम के विषय में सम्भव नहीं है। ५. धृति वगैरह को शान्त-रस के व्यभिचारीभाव बताये गये हैं परन्तु धृति अर्थात् विषयों का उपभोग करने से उत्पन्न होने वाली तृप्ति। तो फिर यह धृति शान्त-रस में किस प्रकार सम्भव है ? ६. शमप्रधान पुरुष तो निश्चेष्ट बन कर बैठा रहेगा। ऐसा अकिंचित्कर (कुछ भी न करे ऐसा) पुरुष तो तत्त्वज्ञान प्राप्त करने के उपाय भी नहीं करेगा। और अगर करे भी तो उसे तत्त्वज्ञान प्राप्त न होगा। और तो फिर शान्त-रस के फलस्वरूप मोक्ष की प्राप्ति भी उसे नहीं होगी। ७. आप शान्त-रस को सुख-दुःख रहित मानते हैं परन्तु ये साधक तो तत्वज्ञान प्राप्त होने के बाद भी संसार में रहते हैं और पराये सुख से सुखी और पराये दुःख से दुःखी होते दिखायी देते हैं। अतः शान्त-रस का स्वीकार हो नहीं सकता। शान्त-रस का समर्थन इस प्रकार पूर्वपक्ष मण्डित कर चुकने के बाद अभिनवगुप्त कहते हैं कि इस सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि संसार में जिस प्रकार धर्म, अर्थ, काम-ये तीन पुरुषार्थ माने जाते हैं वैसे शास्त्र, स्मृतियाँ और इतिहासादि में मोक्ष नामक एक चौथा पुरुषार्थ भी उपायों द्वारा सिद्ध होता दिखाया जाता है, यह एक अत्यन्त सुपरिचित बात है। जिस प्रकार कामादि में उचित ऐसी रत्यादि नाम से पहचानी जाती चित्तवृत्तियाँ कवियों व नटों के व्यापार द्वारा हृदय-संवाद वाले सामाजिकों के लिए आस्वादयोग्य बनायी जाकर शृंगार आदि रसों को प्राप्त करायी जाती हैं, उसी प्रकार मोक्ष नामक चतुर्थ परमपुरुषार्थ को, उचित चित्तवृत्ति को भी क्यों नहीं रसत्व तक पहुँचायी जा

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९६ अभिनव का रस-विवेचन सकती है ? इसको भी आपको बतलाना चाहिए। मोक्षरूप पुरुषार्थ के लिए उचित जो भी कोई चित्तवृत्ति हो वही शान्त-रस में स्थायीभाव है। शान्त-रस का स्थायीभाव इस प्रकार शान्त-रस का अस्तित्व सिद्ध कर चुकने के बाद अब इसका स्थायीभाव कौन-सा ? यह चर्चा शुरू करते हैं। ऊपर अन्तिम वाक्य में किसी स्थायीभाव का स्पष्ट नाम लिया नहीं है। इसका कारण यह है कि शान्त-रस के स्थायीभाव के सम्बन्ध में अनेक मत प्रवर्तित हैं। अब यह चर्चा ही शुरू करें। अभिनवगुप्त कहते हैं कि अब हमें इसी बात का विचार करना है कि उस स्थायी- भाव का नाम क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि तत्वज्ञान (दर्शन) में से उत्पन्न निर्वेद शान्त-रस का स्थायीभाव है; क्योंकि १. दारिद्रय में से उद्धूत निर्वेद इस निर्वेद से भिन्न ही है। ऐसा होने का कारण यह है कि उसका कारणभूत तत्त्वज्ञान ही भिन्न है और इसीलिए भरत ने उसे स्थायीभाव और संचारीभाव के बीच में रख दिया है। वरना मंगलकामी मुनि ने उसे व्यभिचारियों के प्रारम्भ में ही न रख दिया होता। कोई यहाँ यह प्रश्न भी कर सकता है कि भरत ने तो उसे ( निर्वेद को) व्यभिचारियों में स्थान दिया है और आप उसे शान्त रस का स्थायीभाव बताते हैं। यह किस प्रकार सुसंगत है ? उसके प्रत्युत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि भरत ने शृंगार के व्यभिचारीभावों में जुगुप्सा का निषेध किया है। जुगुप्सा कोई व्यभिचारीभाव नहीं है, वह तो बीभत्स-रस का स्थायी- भाव है। फिर भी शृंगार के व्यभिचारी के रूप में उसका निषेध किया गया है। इसका अर्थ यह है कि सभी स्थायीभाव अन्य रसों में व्यभिचारीभाव बनते हैं। इस प्रकार एक ही भाव स्थायी और व्यभिचारी के रूप में प्रसंगतः काम कर सकते हैं। २. दूसरी बात यह कि दर्शन (तत्त्वज्ञान) जनित निर्वेद अन्य स्थायीभावों को दबा देता है। व्यभिचारीभावों के वैचित्य को सहन करने वाले रत्यादि स्थायीभावों की अपेक्षा परम स्थायी स्वभाव वाला निर्वेद ही अन्य स्थायीभावों को दबा सकता है। अतः तत्त्वज्ञानजनित निर्वेद को ही शान्त-रस का स्थायीभाव मानना चाहिए। इसका भी कुछ लोग विरोध करते हैं। उनका कहना यह है कि जो लोग तत्त्वज्ञान- जनित निर्वेद को शान्त का स्थायीभाव कहते हैं, उन्होंने तत्त्वज्ञान को ही उसका एकमात्र विभाव माना है। अब यहाँ विचारणीय यह है कि मोक्ष का कारण वैराग्य है और वैराग्य का कारण अथवा बीज तत्त्व-दर्शन है ( तत्वज्ञान है)। तो उस तत्त्व- ज्ञान को मोक्ष का साक्षात्कारण कैसे माना जा सकता है ? इसे समझाने के लिए कहा है कि वैराग्य बीज-तत्वज्ञान विभाव किस प्रकार बन सकता है ? अगर यह कहें कि वैराग्य का वह तत्वज्ञान कारण है तो कारण के कारण के रूप में परम्परा से उसे

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विभाव माना जा सकता है तो उसमें अति व्याप्ति का दोष आ जाता है, अतः तत्वज्ञान-जनित निर्वेद को शान्त-रस का स्थायीभाव नहीं माना जा सकता। दूसरी बात यह है कि कोई भी वस्तु उपादेय (लेने जैसी) नहीं है ऐसा मानने में जो निर्वेद है वही वैराग्य है। यह तो उल्टे तत्वज्ञान का उपकारक होता है; क्योंकि जिसमें वैराग्य जगा हो वही तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है, और तत्त्व- ज्ञान से मोक्ष प्राप्त करता है। परन्तु इससे उलटा बनता नहीं है अर्थात् तत्वज्ञान प्राप्त करने के फलस्वरूप मनुष्य निर्वेद प्राप्त करे और निर्वेद के कारण मोक्ष प्राप्त करे ऐसा बनता (होता) नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि निर्वेद या वैराग्य यह तत्त्वज्ञान का कारण होता है, कार्य नही होता। वैराग्य से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है, तत्त्वज्ञान से वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। अतः त्त्वज्ञान से उत्पन्न वैराग्य अथवा निर्वेद को शान्त- रस का स्थायीभाव कहना उचित नहीं है। और इसीलिए परमपूज्य श्री ईश्वर कृष्ण ने कहा है कि आत्मज्ञान के बिना केवल वैराग्य से प्रकृति-लय प्राप्त होता है (सांख्य- कारिका-४५)। यह तर्क ठीक-ठीक समझने के लिए सांख्य और योग वगैरह दर्शनों में मोक्ष की क्या कल्पना है, यह समझना आवश्यक है। उन दर्शनों में मोक्ष के साथ-साथ 'विदेह' और 'प्रकृतिलय' की दशाएँ भी उल्लेखित हैं। सांसारिक विषयों के दोष देख कर साधक उनसे विरक्त होकर योगमार्ग की साधना में प्रवृत्त होता है और तप वगैरह का आचरण (साधना) करता है। जिस साधक को सद्गुरु के उपदेश से तत्त्वज्ञान अर्थात् आत्म-साक्षात्कार हो जाता है वह अपनी उस साधना के फलस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है। परन्तु जो साधक अज्ञान के कारण आत्मा के स्थान पर मूल प्रकृति को अथवा उससे उद्भूत किसी विकृत या अनात्म वस्तु को आत्मा मान कर उसकी उपासना या साधना में लग जाता है, उसे तत्वज्ञान हुआ न होने से मोक्ष प्राप्त नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति मृत्यु के उपरान्त अपनी साधना के कारण 'विदेह' अथवा 'प्रकृतिलय' की अवस्था को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति मूल प्रकृति को आत्मा मान कर साधना करता है, उसे मृत्यु के उपरान्त 'प्रकृतिलय' की अवस्था प्राप्त होती है। और जो व्यक्ति महत्तत्व, अहंकार, पंचतन्मात्रा, पंचस्थूलभूत अथवा इन्द्रियादि विकारों को आत्मा मान कर साधना करता है उसे मृत्यु के उपरान्त 'विदेह' कहा जाता है। जीवन में जिस प्रकार की साधना मोक्ष प्राप्त करने वाले व्यक्ति ने की हो, वैसी ही साधना 'विदेह' अथवा 'प्रकृतिलय' की अवस्था प्राप्त करने वाले पुरुष ने की होती है। परन्तु प्रथम को तत्त्वज्ञान हुआ होता है, अन्य दो को नहीं, अतः तीनों की साधना एक-सी होने पर भी उन्हें फल अलग-अलग मिल जाते हैं। प्रकृतिलय की दशा को प्रात्त और विदेह व्यक्ति अमुक समय तक मोक्ष के-से सुख को अनुभव कर पुनः संसार में लौट आता है। इन तीनों को प्रारम्भ में वैराग्योदय तो होता है, परन्तु तत्पश्चात् जिसे तत्वज्ञान होता है, वह मोक्ष पाता है, जिसे तत्त्वज्ञान नहीं होता उसे या तो विदेह-अवस्था प्राप्त होती है या प्रकृतिलय की ७

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९८ अभिनव का रस-विवेचन अवस्था। इसलिए सांख्यशास्त्र में कहा है कि तत्वज्ञानहीन केवल वैराग्य प्रकृतिलय का कारण बनता है, मोक्ष का नहीं। उसका यहाँ उल्लेख है। यहाँ कदाचित् कोई यह कह दे कि तत्वज्ञानी को सभी बातों में दृढ़तर वैराग्य देखा जाता है। अतः पूज्य पतञ्जलि मुनि ने अपने योग-सूत्र में कहा है कि 'तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।' [योगसूत्र-१-१६] अर्थात् आत्मज्ञान होने से प्राकृतिक पदार्थों के प्रति जो वितृष्णा पैदा होती है, वही परम वैराग्य कहलाती है। अतः तत्त्वज्ञान-जनित निर्वेद को शान्त का स्थायीभाव मानने में कोई दोष नहीं है। तो उसके प्रत्युत्तर में कहना यह है कि यह बात सत्य है, किन्तु उस प्रकार का वैराग्य तो ज्ञान की पराकाष्ठा (चरमावस्था) का ही दूसरा नाम है। यह तो शेषनाग के अवतार भगवान् पतञ्जलि ने स्वयं कहा है। इस प्रकार तत्वज्ञान की परंपरा से पुष्ट तत्वज्ञान ही परम वैराग्य कहा जायेगा। अतएव निर्वेद शान्त का स्थायीभाव नहीं है, परन्तु तत्त्वज्ञान ही उसका स्थायीभाव है यही परिणाम निकलता है। और व्यमिचारीभावों को समझाते समय हम कहेंगे तदनुसार, लम्बे समय की भ्रान्ति के कारण धोखा देने वाले विषयभोग उपादेय हैं, ऐसी भ्रान्ति (या भ्रान्त बुद्धि) का निवारण करने के लिए ही यह तत्त्वज्ञान है। यथा :- वृथा दुग्घोऽनड्वान् स्तनभरनता गौरिति परं, परिष्वक्तः षण्ढो युवतिरिति लावण्यरहितः। कृता वैदूर्याशा विकचकिरणे काचशकले, मया मूढेन त्वां कृपणमगुणज्ञं प्रणमता।। अर्थात् गुणों को न पहचानने वाले तथा कृपण ऐसे तुझे प्रणाम कर मैंने स्तनों के भार से नत गाय समझ कर साँड़ दोहने का व्यर्थ प्रयत्न किया; लावण्यरहित षण्ढ को युवती समझ कर वृथा आलिंगन किया और किरणों को पैलाने वाले काँच के टुकड़े में व्यर्थ ही वैदूर्यमणि की आशा की। अभिनवगुप्त आगे कहते हैं कि यहाँ गौण-रूप में तत्वज्ञान को निर्वेद का कारण कहा है जो मोक्ष के साधन-रूप निर्वेद का नहीं है, किन्तु खेद-रूप निर्वेद का कारण समझना चाहिए। यह बात भी हम व्यभिचारीभावों की चर्चा के प्रसंग में कहेंगे। इस प्रकार तत्त्वज्ञानजनित निर्वेद शान्त-रस का स्थायीभाव नहीं है, ऐसा अभिनवगुप्त का मत है। यहाँ तत्वज्ञानजनित निर्वेद को शान्त-रस का स्थायीभाव मानने वाले नया प्रश्न उपस्थित करते हैं। इसके पूर्व उसने योगशास्त्र के अनुसार तत्त्वज्ञान को निर्वेद का कारण सिद्ध करने का प्रयत्न किया था, परन्तु अभिनवगुप्त ने यह कह कर उसका निरसन कर दिया कि ज्ञान की चरमावस्था ही वैराग्य है, अतः तत्वज्ञानजनित निर्वेद नहीं किन्तु प्रकृति-पुरुष के विवेकरूप तत्वज्ञान ही मोक्ष का कारण है। अब वह न्याय- शास्त्र के अनुसार तत्वज्ञान को निर्वेद का कारण सिद्ध करने का प्रयत्न करता है। वह

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अभिनव का रस-विचार ९९ कहता है कि अक्षपाद ने अपने सूत्र में कहा है कि विषयों के साथ का मिथ्याज्ञान- मूलक सम्बन्ध तत्त्वज्ञान से नष्ट होता है (१-१-२)। यहाँ उन्होंने मिथ्याज्ञान का नाश करने वाले तत्वज्ञान को दोषाभावरूप वैराग्य का कारण कहा है। तब अभिनवगुप्त प्रतिप्रश्न करते हैं कि इससे क्या१ अर्थात् पूर्वपक्ष का उत्तर यह है कि वैराग्य ही निर्वेद है। अतः तत्वज्ञानजनित निर्वेद को शान्त-रस का स्थायी- भाव मानने में दोष नहीं है। समग्र तर्क इस प्रकार है : तत्वज्ञान से पहले तो मिथ्या- ज्ञान का नाश होता है, मिथ्याज्ञान का नाश होने पर रागद्वेषादि दोषों का नाश होता है। तत्पश्चात् प्रवृत्ति अर्थात् धर्माधर्म का नाश होता है। और इसके कारण जन्म का नाश होने पर दुःख का भी नाश होता है। यही मोक्ष है। इस प्रकार त्त्वज्ञान से मिथ्या- ज्ञान का और उससे दोषों का नाश होता है, ऐसा कहा गया है। अतः तत्वज्ञान को वैराग्य का कारण माना जा सकता है; क्योंकि तत्वज्ञान मिथ्याज्ञान के नाश का कारण है और वैराग्य दोष के नाश का कारण है अतः तत्वज्ञान को वैराग्य का कारण मानना सर्वथा उचित है। इस प्रकार तत्त्वज्ञानजनित निर्वेद को मोक्ष का कारण और शान्त-रस का स्थायीभाव मानने में दोष नहीं है। ऊपर पूर्वपक्षवाले ने यह जो कहा है कि वैराग्य ही निर्वेद है, उसके सन्दर्भ में अभिनवगुप्त प्रतिप्रश्न करते हैं कि कौन कहता है कि ये दोनों एक ही हैं ? निर्वेद तो शोक-प्रवाह के प्रसाररूप चित्तवृत्ति-विशेष है, और वैराग्य रागादि का नाश है। इन दोनों को एक किस तरह कहा जा सकता है ? तिस पर भी वैराग्य ही निर्वेद है, ऐसा क्षण भर के लिए मान भी लैं तो भी वहाँ क्रम यह है कि तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञान का नाश होता है, उससे दोष का, उससे प्रवृत्ति का, उससे जन्म का और उससे दुःख का नाश होता है। तो दुःखनाशरूप मोक्ष तो अन्त में सबसे आखिर में आता है। मध्य में होने वाले दोषनाशरूप वैराग्य को उसका साक्षात् कारण कैसे मान लिया जाय ? यह हम पहले भी कह चुके हैं। और फिर इसमें दूसरा दोष यह भी आता है कि त्त्वज्ञान से निर्वेद की उत्पत्ति होती है, ऐसा कहने पर तो निर्वेद शम का ही अपर नाम हो जाता है। अतः निर्वेद के स्थान पर शम को ही शान्त-रस का स्थायीभाव मानना चाहिए। शम और शान्त ये दोनों तो एक-दूसरे के पर्याय हैं, इस आपत्ति का उत्तर तो इसी बात से मिल जाता है कि हास और हास्य भी परस्पर पर्याय हैं तथापि एक को स्थायी और दूसरे को रस के रूप में स्वीकृत किया गया है। आप यदि यह कहें कि यह तो पिष्ट-पेषण है तो इसका निराकरण यह है कि स्थायीभाव लौकिक है और रस अलौकिक। इसके अलावा स्थायीभाव असाधारण अर्थात् व्यक्तिसम्बद्ध है और रस साधारण अर्थात् सभी सामाजिकों के लिए आस्वाद-योग्य होता है। अतः शम एवं शान्त दोनों एक नहीं हैं, भिन्न होते हैं ऐसा समझना सरल है। [चाहिए ] अतः निर्वेद शान्त-रस का स्थायीभाव नहीं है।

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१०० अभिनव का रस-विवेचन अन्य कुछ समीक्षक तो ऐसा कहते हैं कि-रत्यादि आठ ही चित्तवृत्तियों को प्रथम स्थायीरूप में गिनाया गया है। इसलिए ये रत्यादि स्थायीभाव ही पहले कहे जा चुके रत्यादि के विभावादि से भिन्न अध्यात्म आदि अलौकिक विभावादि की सहायता से रसादि से भिन्नरूप में आस्वादित किये जाते [ सकते ] हैं। मतलब यह कि जिस प्रकार शृंगार-रस में रति स्थायीभाव है, उसी प्रकार वही रति नामक स्थायीभाव अध्यात्मादि अलौकिक विभावों की मदद से शान्त-रस के रूप में आस्वादित किया जाता है। इसी प्रकार प्रथम बतलाये गये आठों स्थायीभाव शान्त-रस के स्थायीभाव बन सकते हैं। अतः उनमें से किसी एक को यहाँ स्थायीभाव मानना चाहिए। अतः १. अखण्ड आनन्दरूप आत्मविषयक रति ही मोक्ष का साधन होती है अतः उसे ही शान्त-रस में स्थायीभाव मानना चाहिए। गीता में भी कहा है कि- यश्चात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते। (गीता ३-१७ ) २. इसी तरह सभी वस्तुओं में विकार देख कर उत्पन्न होने वाले हास्य के स्थायीभाव हास को शान्त-रस का स्थायीभाव मानना चाहिए। ३. समग्र संसार को शोच्यरूप में देखने वाले साधक को करुण-रस का स्थायीभाव शोक। ४. सांसारिक घटनाओं को आत्मा की अपकारक समझने वाले के लिए रौद्र का स्थायीभाव क्रोध। ५. अत्यन्त ज्ञानप्रधान वीर्य अर्थात् उत्साहवाले को वीर-रस का स्थायीभाव उत्साह। ६. सभी विषयों से भयभीत होने वाले को भयानक का स्थायीभाव भय। ७. सर्वलोक-स्पृहणीय प्रमदा की भी जुगुप्सा करने वाले को बीभत्स का स्थायीभाव जुगुप्सा और ८. अपने अपूर्व आत्मस्वरूप की प्राप्ति के कारण विस्मयानुभव करने वाले को अद्भुत-रस का स्थायीभाव विस्मय-इस प्रकार रतिहास से लेकर विस्मय तक का कोई भी एक शान्त- रस का स्थायीभाव समझा जाना चाहिए। और यह भी नहीं है कि यह मत भरतमुनि को स्वीकार्य नहीं है; क्योंकि जब वे भिन्न-भिन्न रसों के विशिष्ट विभावों को गिनाते हैं तब अन्त में 'आदि' शब्द से ऐसे अन्य विभावों को भी स्वीकार करते हैं। इससे यह समझना चाहिए कि ऐसे सामान्य हेतु से भिन्न अध्यात्म-चर्चारूप अलौकिक हेतुओं से उत्पन्न होते रत्यादि को भी मोक्ष के साधन के रूप में स्वीकार करते हैं। इस मत के विषय में अभिनवगुप्त कहते हैं कि ऐसा मानने वाले तो परस्पर करें तो भी कोई एक ही स्थायीभाव है, यह बात टिक ही नहीं पाती। यदि हम इन आठों को शान्त के स्थायीभाव मानें तो शान्त-रस की निष्पत्ति में भिन्न-भिन्न आठ उपाय स्वीकार किये ऐसा सिद्ध होगा, यह उचित नहीं है; क्योंकि यदि प्रत्येक व्यक्ति में शान्त-रस के लिए भिन्न-भिन्न स्थायीभाव मानें तो फिर निष्पन्न होने वाले रस के भी अनन्त भेद मानने पड़ेंगे। यदि ऐसा कहें कि इन सबका फल मोक्षरूप एक ही होने से रसों को भी एक ही रस मानना चाहिए, तो वीर और रौद्र में भी चतुर्विध पुरुषार्थ में

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से एक धर्मरूप फल मिलने वाला होने से दोनों को भी एक ही मानना चाहिए। इन सब दोषों के कारण रत्यादि आठ स्थायीभावों में से किसी एक को शान्त का स्थायीभाव मानने का मत स्वीकार्य नहीं हो सकता। अन्य कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि, पानक रस की भाँति इन आठों स्थायीभावों के एकरूप होने से शान्त-रस का स्थायीभाव बनता है। परन्तु रत्यादि विषयक अनेक चित्तवृत्तियाँ एक साथ ही चित्त में उपस्थित हों, ऐसा सम्भव नहीं है। इसी प्रकार हास और क्रोध तथा वीर और भयानक वगैरह चित्तवृत्तियाँ एक-दूसरे की विरोधिनी हैं। अतः यह मत भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। तो फिर शान्त का स्थायीभाव कौन-सा ? इसके प्रत्युत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि यहाँ प्रथम तो यह ध्यातव्य है कि तत्वज्ञान ही मोक्ष का साधन है। अतः मोक्ष के विषय में उसे ही स्थायीभाव मानना चाहिए। और तत्वज्ञान ही आत्मज्ञान का दूसरा नाम है और आत्मज्ञान अर्थात् इन्द्रियादि से भिन्न ऐसी आत्मा के सम्बन्ध में ज्ञान। इसका अर्थ यह है कि आत्मा अनात्मा से भिन्न है। यह सब हमारे गुरु भट्ट तौत ने विस्तार से समझाया है और हमने भी अन्यत्र अर्थात् गीता के भाष्य में विस्तार से इसका निरूपण किया है। अतः यहाँ इसका विस्तार करने का आग्रह नहीं रखा है। इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान और आनन्द आदि विशुद्ध धर्मयुक्त और परिकल्पित विषय- भोगरहित आत्मा ही शान्त-रस का स्थायीभाव है। यदि शान्त-रस में 'आत्मा' को स्थायीभाव मानते हैं तो अन्य रस में भी आत्मा को ही स्थायीभाव क्यों नहीं मानते ?- ऐसा प्रश्न उपस्थित हो इसलिए अभिनवगुप्त कहते हैं कि आत्मा को स्थायी कहा इसका मतलब यह नहीं कि रत्यादि को अस्थायी समझा जाय; क्योंकि यह रत्यादि अपने-अपने कारण उत्पन्न होने पर और इनके विलय होने पर उद्भूत होते हैं तथा निरोध प्राप्त करते हैं। और आत्मा का आश्रयण प्राप्त कर व्यभिचारीभावों की तुलना में कुछ अधिक समय तक स्थायी होते हैं अतः स्थायी कहे जाते हैं। परन्तु तत्वज्ञान तो अन्य सभी भावों का आश्रयभूत है, अन्य सभी स्थायीभावों की अपेक्षा अधिक स्थायी है और रत्यादि सभी वृत्तियों को अपनी अपेक्षा अर्थात् अपनी तुलना में व्यभिचारी बना देता है, अतः स्वाभाविकतया ही वह स्थायीभाव के रूप में सिद्ध होता है। अतः उसकी अलग गणना भी नहीं की जाती। जिस प्रकार रुण्ड और मुण्ड के बीच तीसरा गोत्व अलग गिना नहीं जाता। इस प्रकार उसकी अलग गणना न की जाने के कारण भरतमुनि द्वारा निरूपित ४९ भावों की संख्या ज्यों-की-त्यों कायम रहती है। यहाँ प्रतिपक्षी ऐसा प्रश्न उठाते हैं कि यदि आप शान्त के स्थायीभाव की अलग गणना करते नहीं हैं, तो शान्त-रस की भी अलग गणना क्यों करते हैं ? इसके प्रत्युत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि हम शान्त-रस को अलग इसलिए मानते हैं कि उसका आस्वाद अन्य रसों से भिन्न है। रत्यादि स्थायीभावों की प्रतीति नितान्त भिन्न-भिन्न अलग रूप से हो सकती है, किन्तु शान्त के स्थायीभाव आत्मा का स्वरूप इस प्रकार

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लौकिक प्रतीति-गोचर नहीं हो पाता। समाधि अवस्था में इसका स्वगत-ज्ञान होता है एवं समाधि पूर्ण होकर उतरते समय व्युत्थान दशा में तो वह किसी-न-किसी अन्य वृत्ति से कलुषितरूप में ही प्रतीत होता है। इस प्रकार लोक में आत्मा की अलग प्रतीति सम्भव ही नहीं है अतः आत्मा की स्थायीभाव के रूप में अलग गणना की नहीं गयी है। परन्तु शान्त-रस की अन्य रसों की अपेक्षा भिन्न प्रतीति होती है, अतः उसकी अलग गणना की गयी है। फिर भी तर्क के लिए ही क्षण भर मान लें कि लोक में आत्मा की प्रतीति अलग रूप से हो सकती है, तो भी सम्भावना मात्र से उसकी गणना स्थायी के रूप में नहीं की जा सकती; क्योंकि ऐसे सम्भवित स्थायी रसनिष्पत्ति में उपयोगी नहीं होते। बल्कि ऐसे सम्भवित अर्थ तो व्यभिचारी होते हैं और स्थायीरूप में अलक्षणीय होते हैं, ऐसा समझा जाता है। यों ४९ भावों की पूर्ण सङ्गति बैठती है। और भरतमुनि ने इस आत्मस्वरूप स्थायीभाव का उल्लेख 'शम' शब्द से नहीं किया; क्योंकि १. अन्य रसों में वह व्यभिचारी के रूप में नहीं आता है, २. अन्य भावों में वह वैचित्य लाता नहीं है और ३. उसे 'शम' कहने में औचित्य नहीं है। यद्यपि उस आत्मस्वरूप को 'निर्वेद' या 'शम' शब्द से उललेखित करने में कोई आपत्ति नहीं है, फिर भी इतना ध्यान में रखा जाय कि 'शम' एक भिन्न प्रकार की ही चित्तवृत्ति है और शान्त-रस के स्थायीरूप निर्वेद भी दारिद्रयादि भावों से निष्पन्न निर्वेद का सजातीय नहीं है, किन्तु भिन्न है। यहाँ कोई प्रश्न कर सकता है कि आप दारिद्रयादि से निष्पन्न और तत्त्वज्ञान-जन्य दोनों को निर्वेद कहते हैं, फिर भी दोनों एक-से नहीं हैं, यह भी कहते हैं, यह विचित्र नहीं है क्या ? इसके प्रत्युत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि दोनों के कारण भिन्न हों फिर भी एक ही प्रकार के दो पदार्थों को एक ही नाम से पहचाना जाता है। रति, भय इत्यादि के विषय में ऐसा ही है। मतलब यह कि भिन्न-भिन्न कारणों से उत्पन्न भय भिन्न-भिन्न होने पर भी 'भय' के एक ही नाम से पहचाना जाता है। भिन्न-भिन्न कारणों से उत्पन्न रति भी भिन्न-भिन्न होने पर भी एक 'रति' के ही नाम से पहचानी जाती है। इसी प्रकार दारिद्रयादि से उत्पन्न और तत्वज्ञान से उत्पन्न 'निर्वेद' भी भिन्न-भिन्न होने पर भी एक ही नाम से पहचाना जाता है। परन्तु वह निर्वेद अथवा 'शम' आत्मा का स्वरूप नहीं है, किन्तु एक चित्तवृत्ति है, अतः वह शान्त-रस का स्थायीभाव नहीं है, स्थायीभाव तो आत्मा ही है। अब आत्मा का यह स्वरूप ही तत्त्वज्ञान या शम है, उसीके कलुषित रूप रत्यादि के रूप में प्रतीत होते हैं। मतलब यह कि शंगारादि रसों में आत्मा का विशुद्ध स्वरूप नहीं होता है किन्तु तद्-तद् चित्तवृत्ति से कलुषित रूप होता है। फिर भी, समाधि के बल पर उसके विशुद्ध, अव्यवहित स्वरूप का अनुभव करने के बाद व्युत्थान दशा में भी कुछ काल तक प्रशान्ति रहती है। योगशास्त्र में कहा है कि 'तस्य प्रशान्त- वाहिता संस्कारात्' (योगसूत्र, ३-३०) अर्थात् समाधि के पश्चात् भी उसकी मतलब

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कि चित्त की संस्कार के कारण से प्रशान्तवाहिनी स्थिति बनी रहती है। अतः 'आत्मा' अथवा तत्वज्ञान ही शान्त-रस का स्थायीभाव है। और ये सारी लौकिक-अलौकिक चित्तवृत्तियाँ तत्वज्ञानरूप उस स्थायीभाव की व्यभिचारीभाव बन जाती हैं। उस तत्वज्ञान के अनुभव ही यमनियमादि से अनुकृत अनुभाव बन जाते हैं। आंगिक अभिनयों का निरूपण करने वाले तीन अध्यायों में (८, ९, १०) जिसे स्वभावाभिनय कहा जायगा, वह सब इसी से सम्बद्ध है; क्योंकि वह शान्त-रस ही वस्तुतः स्वभावप्रकृतिरूप है। ईश्वरानुग्रहादि रूप उसके विभावों का और क्षयोन्मुख रत्यादि का उसमें आस्वादन होता है। इसमें केवल इतना ध्यातव्य है कि जिस प्रकार विप्रलम्भ में और सम्भोग में भी 'प्रेमासमाप्तोत्सवम्' श्लोक में बताये गये अनुसार औत्सुक्य तथा जिस प्रकार करुण, वीर, भयानक और अद्भुत-रसों में अनुक्रमेण निर्वेद, धृति, त्रास, हर्ष आदि व्यभिचारी- भाव भी प्रधानतः प्रतीत होते हैं, वैसा जुगुप्सा के सम्बन्ध में होता नहीं है। कारण वह राग से नितान्त विपरीत है। [ यहाँ पाठ अत्यन्त त्रुटित है, अतः इतना अंश छोड़ दिया है ]।

शान्त-रस का नाम इस प्रकार शान्त-रस के स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभावों का निरूपण करने के बाद उसके नाम की चर्चा का प्रारम्भ करते हैं। अभिनवगुप्त कहते हैं, जो मनुष्य अपने में कृतकार्य हो, वह परोपकार करने में उद्योगशील होता है। अतः परोपकार-विषयक इच्छा-प्रयत्नरूप उत्साह-जिसे दया भी कहते हैं-वही शान्तरस में अन्तरङ्ग-महत्त्वपूर्ण वस्तु है। इसीलिए कुछ उसे दयावीर तो कुछ उसे धर्मवीर कहते हैं। यहाँ यह प्रश्न उपस्थित किया जा सकता है कि उत्साह तो अहंकारमूलक होता है और शान्त में अहंकार शिथिल हो जाता है, अतः शान्तरस अहंकार का विरोधी है। तो फिर आप उत्साह को शान्त-रस का अन्तरङ्ग कैसे कहते हैं ? इसका उत्तर यह है कि विरुद्ध भाव का भी व्यभिचारी के रूप में वर्णन करना अनुचित नहीं है जिस प्रकार रत्यादि में निर्वेदादि का वर्णन अनुचित नहीं माना जाता। तत्पश्चात् 'नागानन्द' में से एक श्लोक उद्धृत किया है: शय्या शाहलमासनं शुचिशिला सझ् द्र् माणामधः, शीतं निर्झरवारिपानमशनं कन्दा सहाया मृगाः। इत्यप्रार्थितलभ्यसर्वविभवे दोषोऽयमेको वने, दुष्प्राप्रार्थिनि यत्परार्थघटना वन्ध्यैर्वृथा स्थीयते।। अर्थात् हरे-हरे घास की शय्या, पवित्र शिला का आसन, वृक्ष की छाया का घर, शीतल झरने के जल का पान, कन्दमूल का आहार-इस प्रकार बिना माँगे ही सारा वैभव मिलता रहे ऐसे वन में रहने में एक ही दोष है कि यहाँ याचक-गण मिलना दुर्लभ है,

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१०४ अभिनव का रस-विवेचन अतः परोपकार करने के अवसर से वञ्चित पुरुषों का जीवन व्यर्थ सिद्ध हो जाता है। [नागानन्द ४-२] इस श्लोक में परोपकार करने के उत्साह का ही उत्कर्ष दिखायी देता है। उत्साह- शून्य कोई अवस्था ही नहीं होती; क्योंकि इच्छा और प्रयत्न के बिना तो मनुष्य पत्थर बन जाता है। जिसने आत्मा-परमात्माविषयक ज्ञान प्राप्त किया है, उसको अपने लिए कुछ भी करना शेष नहीं होता। अतः ऐसे शान्त हृदयवाले पुरुष परोपकार के लिए अपनी देह का, सर्वस्व का दान कर दे यह बात शान्त-रस की विरोधिनी नहीं है। आत्मानं गोपयेत् (अपने आपका रक्षण करना चाहिए) ( गौतम-धर्मसूत्र, ९-३५) ऐसा जो उपदेश किया गया है, वह तो जो अकृतकार्य हैं [ अर्थात् जिन्हें आत्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है] उन्हें ही अपने आपका रक्षण करना चाहिए-ऐसा कहने के लिए ही कहा गया है; क्योंकि धर्म का आचरण शरीर के द्वारा ही किया जा सकता है और आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए भी मनुष्य को जीवित तो रहना ही पड़ता है। संन्यासियों को तो अपनी देह-रक्षा करने का कोई प्रयोजन नहीं होता; क्योंकि- धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राण: संस्थितिहेतवः । तन्निघ्नता किन्न हतं रक्षता कि न रक्षितम् ।। [हितोपदेश १-८३ ] अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की रक्षा का साधन है, प्राण। उसका घात करने वाला किसका घात नहीं करता और उसकी रक्षा करने वाला किस वस्तु की रक्षा नहीं करता ? इसमें सुप्रसिद्ध चतुर्वर्ग के साधन के रूप में ही देह की रक्षा करने की बात कही गयी है। कृतकृत्य अर्थात् ज्ञानी के लिए तो 'जलेडग्नौ श्वभ्रे वा पतेत्'-जल में, अग्नि में या पर्वत की खाई में कूद पड़ना-ऐसा संन्यास-धर्म में कहा गया है। अतः ज्ञानी को तो किसी-न-किसी उपाय से शरीर का त्याग करना है ही। तो फिर शरीर का त्याग परोपकारार्थ किया जाये इससे बढ़ कर और क्या बात हो सकती है ? इसके विपरीत यदि कोई यह आपत्ति उठावे कि जीमूतवाहन आदि तो संन्यासी नहीं हैं तो उत्तर यह है कि इसमें क्या हो गया ? वे तत्त्वज्ञानी तो हैं ही न ? ऐसा न हो तो देह को ही आत्मा मानने वाले के लिए तो देह ही सर्वस्व है। अतः धर्म उसका लक्ष्य ही नहीं है। अतः परोपकार के लिए देह का त्याग करना यह उसके लिए सम्भव ही नहीं होता। युद्ध में भी लोग मरने के लिए नहीं जाते, किन्तु परायों का पराजय करना ही उनका लक्ष्य होता है। भगु पतन आदि में भी प्रधानतः तो दूसरी अच्छी देह प्राप्त करने की आकांक्षा रही होती है। अतः किसी भी प्रकार के स्वार्थ से रहित परोपकार के लिए ही उपदेश-दान से लेकर देहत्याग तक के जो-जो कार्य हैं, वे उन लोगों के लिए सम्भव नहीं हैं, जिन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई है। अतः ऐसा त्याग करने वाले जीमूतवाहन आदि तत्त्वज्ञानी ही माने जाएँगे। ऐसे व्यक्तियों को संन्यास ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा बताने के लिए कहते हैं कि श्रुति

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अभिनव का रस-विचार १०५

व स्मृतियों में भी कहा गया है कि-तत्वज्ञानिनां सर्वेष्वाश्रमेषु मुक्तिः। तत्वज्ञानियों को सभी आश्रमों से मुक्ति मिल जा सकती है। कहा है कि- देवार्चनरतस्तत्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिप्रियः । श्राद्ध कृत्वा ददद् द्रव्यं गृहस्थोपि हि सुच्यते॥ अर्थात् देवपूजा में लीन तत्त्वज्ञाननिष्ठ और अतिथिप्रिय एवं श्राद्ध करके द्रव्य-दान करने वाला गृहस्थ भी मुक्ति प्राप्त करता है। यों गृहस्थों की भी मुक्ति होती है, फिर भी इसमें इतना अन्तर है कि परोपकाररूप फल-प्राप्ति की कामना से ही किये गये तथा परार्थ-साधना की इच्छा से आचरित धर्म कारण बोधिसत्वादि ज्ञानियों को पुनः स्वानुरूप शरीर की ही प्राप्ति होती है। इसका अर्थ यह है कि तत्त्वज्ञान प्राप्त होने के पश्चात् भी साधक कुछ काल तक जीवित रहता है; इस काल में वह जो कुछ भी कार्य करता है, वह प्रायः निष्काम-भावना से ही करता है अतः इसके कारण नवीन कर्माशय या भोगजन्य संस्कार उत्पन्न होते नहीं हैं। अतः देह का नाश होने पर वह सदा के लिए मुक्त हो जाता है। परन्तु तत्त्वज्ञान होने के पश्चात् भी साधक जब परोपकार की इच्छा से सकाम कर्म करता है, तब वह सकाम कर्मों से उत्पन्न होने वाले धर्म के कारण पुनर्जन्म की सामग्री एकत्र करता है। और ऐसे साधक जिन्हें बौद्धधर्म में बोधिसत्त्व कहते हैं, पुनः जन्म धारण करते हैं। अर्थात् गृहस्थ और संन्यासी इन दोनों के मोक्ष में यह अन्तर है कि संन्यासियों के लिए तत्त्व- ज्ञान होने पर सकाम कर्म करने की आवश्यकता नहीं होती अतः वे सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं और गहस्थ साधक तत्व-ज्ञान होने के बाद भी परोपकार की भावना से सकाम कर्म किये जाता है, अतः कुछ समय के लिए उन्हें तत्त्वज्ञान के कारण मोक्ष जैसा सुख मिलता है किन्तु सकाम कर्मजनित संस्कार के कारण पुनः देह धारण करनी पड़ती है। सांख्य वगैरह में इसी को ही 'विदेह' कहते हैं, उसी का नाम 'प्रकृतिलय- दशा प्राप्त' है। इस प्रकार अन्य रसों में भी कर्तव्य-भावना से अपना कर्तव्य करने वाले को उस कार्य के स्वभावौचित्य के कारण सुख की प्राप्ति होती है। जैसा कि वीर-रस के अङ्गभूत पिता की आज्ञा पालने के कारण राम को सुख-प्राप्ति हुई थी। वैसा ही शृंगारादि का समझिए। इसीलिए ही जीमूतवाहन में परोपकारप्रधान त्रिवर्ग की प्राप्ति को ही फलरूप में अभीष्ट होने के कारण, अर्थात् मोक्ष अभीष्ट न होने के कारण शान्त का स्थायीत्व होने पर भी प्राधान्य नहीं है। इसी आशय से नाटक के लक्षणों में यह कहा जाएगा कि 'ऋद्वि विलासादि गुणों से नाटक युक्त होना चाहिए'। (नाट्य-शास्त्र १८-११, खण्ड २, पृ० ४१२) यहाँ भी ऋद्धि और विलासप्रधान अर्थ और काममय, सर्व सहृदयों का हृदय- संवाद साधित करने वाले सुन्दर प्रयोजन-प्रधान चरित, नाटक में योजित किये जायँ, ऐसा कहा गया है। और इसी आशय से अर्थात् नाटक के लक्षणों में ही शान्त-रस में भी ऋद्धि-अंगों का समावेश हो जाने के कारण भरतमुनि ने शान्त-रस में किसी प्रकार. के ऋद्धि-अंगों का प्रयोग सूचित नहीं किया है। अतः शान्त-रस में ऋद्धि-विषयक

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अंगों का विनियोग उल्लेखित नहीं किया गया है अतः शान्त-रस में उसका अभाव है, ऐसा कहना गलत है। उत्साह को शान्त-रस का अन्तरंग सहायक न मानने वाले अन्य समीक्षक ऐसा कहते हैं कि 'नागानन्द' में जीमूतवाहन ने तो "हे पुत्र, तेरी रक्षा कौन करेगा ?" ऐसा कहने वाली शरणार्थिनी वृद्धा की रक्षा की थी। इसमें उसकी कोई शक्ति प्रगट नहीं होती तथा उसमें परहिंसा भी नहीं आ जाती। ये दो वस्तुएँ वीर-रस में आनी ही चाहिए। इन्हीं का यहाँ अभाव है तो फिर उसे धर्मवीर या दयावीर कैसे कहा जा सकता है ? इसके प्रत्युत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि आपका कथन सत्य है, परन्तु बोधि- सत्वों के मन में जीवन में पुनः अभ्युत्थान-उन्नति प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं होती तथा शक्ति का उपयोग करने की इच्छा भी होती नहीं है। अतः जीमूतवाहन में इन दो वस्तुओं का अभाव हो तो इसमें कुछ भी असंगत नहीं है। इस चर्चा से यह सिद्ध होता है कि दयारूप उत्साह यहाँ प्रधान है। अन्य भाव व्यभिचारी के रूप में यथायोग्य आ जाते हैं। योग सूत्र (४-४७) में कहा है कि 'तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः।' अर्थात् समाधि के छिद्रों में अर्थात् जब समाधि छूट जाती है तब संस्कार के कारण अन्य ज्ञान भी होते रहते हैं अतः शान्त-रस में निश्चेष्टता के कारण अनुभावों का अभाव होता है ऐसा जो कहते हैं यह गलत है। जीमूतवाहन की मनःस्थिति में जो शान्त-रस दिखायी देता है वह भला उत्साहशून्य निश्चेष्ट शान्त-रस नहीं है, बल्कि उसमें दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राण तक दे देने का प्रबल उत्साह है और वह तदनुसार कार्य करता भी रहता है। बोधिस्त्वों का शान्त-रस ऐरा होता है। परन्तु जब अन्तिम भूमिका पर पहुँच जाता है तब भावों का अभाव हो जाता है और तब इस शान्त रस का प्रयोग हो नहीं सकता। अर्थात् अभिनय नहीं हो सकता। परन्तु वैसे तो अन्तिम अवस्था (भूमिका) में रति शोकादि भी अभिनेय नहीं रह पाते। मतलब यह कि सम्भोग-श्रृंगार की भी चरमसीमा-चरमपरिणति निश्चेष्टता में ही होती है। और विप्रलम्भ में तथा करुण में भी चरमपरिणति व्यापारशून्यता में ही होती है। इस दशा में इन रसों का भी अभिनय नहीं हो सकता। फिर भी उन्हें रस कहते हैं तो फिर शान्त को रस के रूप में स्वीकार करने में क्या आपत्ति हो सकती है ? और शान्त-रस में ऐसे तत्वज्ञान के बीजभूत संस्कारसम्पन्न अन्तःकरणों का हृदयसंवाद भी साधित होता ही है। यही बात आगे ( नाट्यशास्त्र, २७-५८) कही जाएगी। वहाँ कहा है कि- तुष्यन्ति तरुणा: कामे विदग्धाः समयान्विते। अर्थेष्वर्थपराश्चैव मोक्षे चाथ विरागिण: ।। शूरास्तु वीररौद्रषु नियुद्धेष्वाहवेषु च। धर्माख्याने पुराणेषु वृद्धास्तुष्यन्ति नित्यशः ॥ [नाट्यशास्त्र, खण्ड ३, पृ० ३१२ ]

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यहाँ प्रतिपक्षी ऐसा प्रश्न उपस्थित करता है कि ऐसे शान्त-रस-प्रधान नाटक में वीररस का आस्वाद कैसे सम्भव होगा ? तो उत्तर है कि जहाँ इस शान्त-रस का प्रयोग किया जाता है, वहाँ पुरुषार्थ को उपयोगी ऐसा शृंगार, वीर आदि अन्य कोई रस ही होता है और उन अन्य रसों का आस्वाद ही शान्त-रस में होता है। प्रहसन आदि में जहाँ हास्यादि की प्रधानता होती है, वहाँ भी बाद में प्रतीत होने वाला अन्य रस ही प्रधानतः आस्वाद्य बनता है। इस सबसे यह सिद्ध होता है कि शान्त-रस की स्थिति है ही। इसीलिए प्राचीन पुस्तकों में 'स्थायिभावान् रसत्वमुपनेष्यामः ।' इस वाक्य के बाद 'शान्तो नाम शमस्थायिभावात्मकः' । आदि शब्दों से शान्त का रक्षण दिया गया दिखायी देता है। मतलब यह कि अभिनवगुप्त को नाट्य-शास्त्र की ऐसी कतिपय प्रतियाँ प्राप्त हुई थीं जिनमें विशेष रसों के निरूपण के पूर्व शृंगार के भी पहले शान्त-रस का निरूपण किया प्रतीत होता था। सभी रसों का शान्तप्राय आस्वाद विषयों के प्रति विमुखता हो जाने के कारण शान्त ही प्रधान हो जाने के कारण सभी रसों का आस्वाद शान्त जैसा ही होता है। 'तत्र सर्वरसानां शान्तप्राय एवास्वादो विषयेभ्यो विपरिवृत्या, तन्मुख्यतालाभात्।' मात्र उस आस्वाद में अन्य वासना अवस्थित होती है। अर्थात् जिसप्रकार सम्भोग की चरमावस्था में सभी काम व्यापारों की उपरति हो जाती है और तभी चरमास्वाद अनुभूत होता है, उसी प्रकार सभी रसों का आस्वाद शान्तप्राय ही होता है। अन्तर इतना ही है कि इसमें अन्य रसों की मुख्यता होने के कारण इस आस्वाद में अन्य वासनाएँ अवस्थित होती हैं। इस प्रकार वही सब रसों की प्रकृतिरूप है, ऐसा बतला कर उसी का प्रथम निरूपण किया गया है। शान्त-रस के स्थायीभाव का अलग उल्लेख क्यों नहीं किया, यह समझाते हुए कहते हैं कि सभी में जो सामान्यरूप में स्थित हो उसकी लोक में गणना नहीं की जाती है अतः शान्त के स्थायी को अलग नहीं गिनाया गया है। परन्तु सामान्य को भी समीक्षक को तो अलग गिनना चाहिए अतः समीक्षक को मान्य ऐसी सामाजिक की आस्वादात्मक प्रतीति का विषय बनने के कारण शान्त-रस का स्थायीभाव अलग है ही।

शान्तरस का समर्थन अब शान्त-रस का समर्थन अन्य शास्त्रों के आधार पर करते हुए कहते हैं कि इतिहास, पुराण, अभिधान-कोश, आदि में नव रस बताये गये मिलते हैं। हमारे गुरु- देव उत्पलाचार्य के 'प्रत्यभिज्ञादर्शन', में भी ऐसा ही है। वहाँ कहा है कि- अष्टानासिह देवानां शंगारादीन्प्रदर्शयेत्। मध्ये च देव देवस्य शान्तं रूपं प्रकल्पयेत् ।। अर्थात् यहाँ, आठ देवताओं के शंगारादि की परिगणना हुई, उन्हीं के बीच महादेव के शान्त-रूप की रचना की जाय।

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शान्त के विभावादि इस शान्त-रस के वैराग्य, संसारभीरुता आदि विभाव हैं। उनके वर्णन से शान्त- रस का ज्ञान होता है। मोक्षशास्त्र का विचार आदि उसके अनुभाव हैं। निर्वेद, मति, स्मृति, धृति आदि इसके व्यभिचारीभाव हैं। अतः स्मृति-मति, धृति उत्साह आदि से युक्त ईश्वरप्रणिधान-विषयक भक्ति और श्रद्धा भी इसी शान्तरस के अंग हैं। अतः इन दोनों को अलग रस के रूप में माना नहीं गया। इस विषय में संग्रह-कारिका इस प्रकार है : मोक्षाध्यात्मनिमित्तस्तत्वज्ञानार्थहेतुसंयुक्त: । निःश्रेयसधर्मयुतः शान्त रसो नाम विज्ञेयः ॥ अर्थात् मोक्षरूप आध्यात्म की प्राप्ति के कारण तत्त्वज्ञानरूप हेतु से युक्त और निःश्रेयस- रूप धर्म वाला शान्त-रस समझिए। उसके विभाव, स्थायीभाव, अनुभावों का सम्बन्ध तीन विशेषणों से क्रमशः बताया गया है। मतलब यह कि 'मोक्षाध्यात्मनिमित्त' पद विभावों का सूचक है, 'तत्वज्ञानार्थ- हेतुसंयुक्त' पद स्थायीभाव का व्यंजक है और 'निःश्रेयस धर्मयुत' पद अनुभावों का व्यंजक है। शान्त-रस ही अन्य सब रसों की प्रकृतिरूप है, इस बात का आगे की कारिका में उल्लेख हैं :- स्वं स्वं निमित्तमासाद्य' शान्ताद्भावः प्रवर्तते। पुनर्निमित्तापाये तु शान्त एव प्रलीयते। अर्थात् अपने अनुरूप कारण प्राप्त होने पर शान्त-रस में से ही भाव उत्पन्न होता है और कारण के नष्ट होने पर पुनः शान्त में ही लीन हो जाता है। 'डिम' में शान्त का अनुल्लेख इसके पश्चात् 'डिम' विषयक चर्चा उठाते हैं। भरत ने डिम में हास्य और श्रृंगार के सिवा छह रसों का निरूपण किया जाय ऐसा कहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि रस आठ ही हैं। अर्थात् भरत ने शान्त को स्वीकार नहीं किया है। इस सम्बन्ध में अभिनव- गुप्त कहते हैं कि डिम में हास्य और शृंगार को छोड़ कर शेष छ रसों की बात कही है, जिसका अर्थ यह है कि डिम को भरत ने दीप्त-रस-प्रधान कहा है। अर्थात् रौद्र-रस- प्रधान डिम में उसका विरोधी शान्त-रस सम्भव ही नहीं है अतः उसका अलग से निषेध करने की आवश्यकता भी नहीं रहती; क्योंकि ऐसा कहा गया है कि डिम दीस-रस- प्रधान है। अतः दीप्-रस का विरोधी रस उसमें आ ही कैसे सकता है? यह बात स्वतः स्पष्ट है। यदि हम यह मानें कि भरत को शान्त-रस मान्य (स्वीकार्य) नहीं है तो फिर 'दीप्तरसकाव्ययोनिः' विशेषण से वे किसका व्यवच्छेद करना चाहते थे? और 'शृंगार- हास्यरहित और छह रसों वाला' ऐसा कहने के लिए क्या आवश्यकता थी? इस सम्बन्ध में पूर्वपक्षी ऐसा कहते हैं कि 'दीप्तरसकाव्ययोनिः' इस पद के द्वारा करुण और अन्भुत-रस के प्राधान्य का व्यवच्छेद किया गया है। परन्तु अभिनवगुप्त

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कहते हैं कि आपकी यह बात ठीक नहीं है; क्योंकि भरतमुनि ने डिम को सात्वती व आरभटी वृत्तियुक्त बतलाया है। और करुण तथा अद्भुत रस में इन दो वृत्तियों का अभाव होता है। अतः उनका निरास (निरसन) तो 'सात्वत्यारभटीवृत्तिसंपन्नः' इस पद से ही हो गया है, किन्तु शान्त में सात्वती ही वृत्ति होती है अतः इस पद द्वारा उसी का व्यवच्छेद किया है, ऐसा सिद्ध होता है। और इस प्रकार देखने से तो डिम का लक्षण भी शान्त रस के अस्तित्व का ही साधक है। अभिनवगुप्त आगे कहते हैं कि इसके अलावा 'डिम' में बलात् सेवित श्रृंगार सम्भव है क्योंकि उसके अंग के रूप में हास्य भी सम्भव है अतः इसीलिए इन दोनों का निषेध किया गया है। नाम लेकर इन दोनों का स्पष्ट निषेध करने का विशेष कारण है। ये दोनों जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है डिम में सम्भव हैं और सभी रूपकों में ये दोनों समानभाव से रहते हैं अतः डिम में भी रहते हों ऐसा लगता है, इसलिए इन दोनों का नाम लेकर निषेध किया गया है। शान्त-रस का स्थायीभाव आत्मा है, अतः उसके रंग या देवता की कल्पना करने में औचित्य नहीं है। फिर भी अन्य रसों के साथ समानता रखने के लिए उसके भी रंग और देवता की कल्पना की गयी है ऐसा समझना चाहिए। शान्त-रस की उपपत्ति तो इसके पूर्व हम बता चुके हैं ही। अतः यह रस यम, नियम, ईश्वरप्रणिधान आदि के उपदेश में सहायभूत होने के कारण मोक्षरूपी महाफल की प्राप्ति कराने वाला है। सब रसों में प्रधान है और कथानक में उसकी व्यापकता युक्तिसंगत है अतः अधिक चर्चा निरर्थक है। शान्त का आस्वाद उसके तत्त्व का आस्वाद कैसा होता है ? ऐसे प्रश्न के उत्तर में अभिनवगुप्त कहते हैं कि आत्मा के स्वरूप को ढँक देने वाली रति, उत्साह आदि से आच्छादित आत्मा का जो स्वरूप है, वही दूर-दूर पिरोए गये गुरियों के बीच में दिखायी देने वाले सफेद व चमकते सूत्र (डोरे) के समान क्वचित्-क्वचित् क्षण-दो क्षण के लिए भासमान होने पर रत्यादि उपरञ्जकों के यथावत् रहने पर 'सकृद्विभातोऽयमात्मा' वचनानुसार एक बार प्रगट हुआ होने पर भी यह आत्मा विषयोन्मुखतारूप सब दुःखों के जाल से रहित और परमानन्द की प्राप्ति के साथ अभिन्नरूप में काव्य तथा नाटक प्रबन्ध आदि द्वारा एक-सा प्रतीत होता है। और एक प्रकार की अन्तर्मुख अवस्था द्वारा लोकोत्तर आनन्द प्राप्त करा कर हृदय को भी वैसा अर्थात् आनन्दमय बना देता है। रसों की संख्या इस प्रकार ये नौ ही रस हैं। [ यों रस नव ही हैं ] ये पुरुषार्थों के लिए उपयोगी हैं। उनमें रंजन-शक्ति अधिक है। अतः इनका ही स्वीकार करने योग्य है। शंकुक आदि ने जो यह कहा है कि इनके अलावा भी अन्य रस सम्भव है, फिर भी ऋषियों ने नौ रस कहे हैं जो प्रसिद्ध हैं, अतः संख्या नौ तक सीमित है, सो ठीक नहीं है। यही बात भावाध्याय में भी कहीं जाएगी।

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वात्सल्यादि का अस्वीकार इसके पश्चात् वात्सल्य और लौल्य-रस का खण्डन करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि आर्द्रतारूप स्थायीभाववाला स्नेह नामक रस है, ऐसा जो कहा जाता है, सो ठीक नहीं है। स्नेह एक प्रकार का आकर्षण है और वह सब प्रकार की रति और उत्साह में पर्यवसित हो जाता है। जैसे कि बच्चे का माता-पिता के प्रति, युवकों का मित्रों के प्रति, लक्ष्मणादि का भाई के प्रति, स्नेहोदय रति में ही समाविष्ट हो जाता है, उसी प्रकार वृद्धों का पुत्र-पुत्री के प्रति स्नेह का भी समझिए। और अर्ध स्थायीभाव- वाले लौल्य-रस के अस्वीकार में भी यही पद्धति मान लेनी चाहिए; क्योंकि उसका समावेश हास में या रति में या अन्य किसी में हो ही जाता है। भक्ति के विषय में भी ऐेसा ही समझना चाहिए।

टिप्पणी १

विभावादि की अलौकिकता सामान्य जीवन में रति, शोक, हर्ष आदि स्थायीभाव प्रकट होते हैं, उनमें तीन तत्त्व होते हैं : कारण, कार्य और सहचर। कारण अर्थात् जिसके कारण वह भाव प्रगट हुआ हो ऐसी घटना, वस्तु या व्यक्ति। कार्य अर्थात् इस भाव के जगने पर होने वाले शारीरिक विकार या चेष्टाएँ और सहचर अर्थात् मुख्य भाव के साथ-साथ अन्य जो भी गौण, क्षणिक भाव चित्त में जगते हैं, वे। ये ही कारण, कार्य तथा सहचर जब नाटक अथवा काव्य में प्रस्तुत होते हैं तब वे अपने अनुरूप तद्-तद् भाव को जगाते नहीं है किन्तु उससे भिन्न ऐसी एक संवित् की अभिव्यक्ति करते हैं, जिसे रस कहते हैं। यह संवित् इन कार्य, कारण और सहचर से अनुरंजित होती है। अतः यदि ये सच्चे होते तो वे जिस भाव को जगाते उसकी वासना से अनुरज्ञित होते हैं। परन्तु जब ये कार्य, कारण और सहचर प्रत्यक्ष जीवन का अंग नहीं होते तथा काव्य नाटकादि का अंश होते हैं, तब वे विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी अथवा संचारीभाव के नाम से पहचाने जाते हैं। इनका कार्य विभावन, अनुभावन तथा संचारण अथवा समुपरञ्जन होता है। विभाव भावक में अपने अनुरूप स्थायीभाव की वासना को जागरित करते हैं और उस वासना से रस अनुरज्चित या चित्रित हुआ होता है। विभावन आदि की व्याख्या विश्वनाथ ने इस प्रकार की है : "विभावनं रत्यादेविशेषेणास्वादाङ्कुरण योग्यतानयनम् अनुभावनमेवंभूतस्य रत्यादेः समनन्तरमेव रसादिरूपतया भावनम्। सञ्चारणं तथा भृतस्यैतस्य सम्यक् चारणम्।" अर्थात् रत्यादि को विशेष आस्वादन-क्षम बनाना ही विभावन, ऐसे रत्यादि का

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साथ ही साथ रसादिरूप में भावन अर्थात् आस्वादन कराना ही अनुभावन कहलाता है। ऐसे रस को घन या परिपुष्ट करना संचारण है। वस्तुतः तो रसास्वाद एक अखण्ड अनुभूति ही है। उसमें ऐसे खण्ड सम्भवित ही नहीं हैं। फिर भी विभावादि के अलग- अलग कार्य समझाने के लिए ऐसे विभाग व कार्य कल्पित किये गये हैं। इस बात को हम अधिक विस्तार से देखें- हमने देखा कि लौकिक जीवन में भाव की उत्पत्ति के जो कारण, कार्य और सहचर The the Ahe s होते हैं उन्हीं का वर्णन काव्य मे किया जाता है और नाटक में भी वे ही प्रस्तुत किये जाते हैं, किन्तु काव्य-नाटकादि में इनका प्रयोजन व्यवहार-जीवन के प्रयोजनों से भिन्न होता है। इसलिए इन्हें विभावादि के भिन्न नामों से पहचाना जाता है। कोई व्यक्ति शत्रु को देख कर क्रोधित हो तो उसके कपाल पर वक्र रेखाएँ होंगी, आँखें लाल होंगी, चेहरा फूल जाएगा, शरीर कम्पित होने लगेगा। यहाँ क्रोधित व्यक्ति की दृष्टि से देखें तो दुश्मन का दर्शन ही उसके क्रोध का कारण है। कपाल पर वक्र रेखाएँ उभरना, आँखें लाल होना, आदि क्रोध के परिणाम अर्थात् कार्य हैं। अब मान लीजिए कि हम उसको दूर से देखते हैं तो हम उसकी भौंहें चढ़ी देखते हैं, आँखें भी लाल हुई देखते हैं। इस पर से हम अनुमान कर सकते हैं कि यह क्रोधित हुआ है। हमारे मन में यह जिज्ञासा या कुतूहल जगता है कि वह किस पर और क्यों क्रोधित हुआ है ? तभी वह दुश्मन भी दिखायी देगा और हम निश्चित अनुमान कर सकेंगे कि यह व्यक्ति अपने उस दुश्मन पर क्रोधित हुआ है। इस उदाहरण में हमारी दृष्टि से देखने पर, उस व्यक्ति के शरीर में हुए विकार और उसके शत्रु का दर्शन दोनों अनुमान के लिंग बनते हैं। इसके आधार पर हम ऐसा अनुमान कर सकते हैं कि यह व्यक्ति उस शत्रु पर क्रोधित हुआ है। इस प्रकार उस व्यक्ति के लिए जो क्रोध के कारण व कार्य थे, वे हमारे लिए अनुमान के लिंग या साधन बनते हैं। इन दोनों प्रसंगों पर इन कारण-कार्यों का स्वरूप लौकिक ही रहता है। परन्तु यही वस्तु जब काव्य-नाटक में प्रस्तुत होती है तब उसका प्रयोजन भिन्न होता है। वहाँ पात्र की चित्तवृत्ति की निष्पत्ति प्रयोजन नहीं होती अतः उन वस्तुओं में कारण-कार्यभाव नहीं होता तथा पात्र की चित्तवृत्ति का हमें बोधमात्र कराना भी उसका प्रयोजन नहीं होता। अतः ये वस्तुएँ हमारे लिए अनुमान के लिंग या साधन रूप भी नहीं होतीं। काव्य में इसका प्रयोजन रसनिष्पत्ति ही होता है। इस प्रयोजन को ये वस्तुएँ कैसे सिद्ध कर सकती हैं ? व्यवहार में जो वस्तु चित्तवृत्ति की उत्पत्ति में कारणरूप होती है, वही काव्य अथवा नाटक में स्थायीभाव का निश्चित बोध कराती है। व्यवहार में उसका कार्य निष्पात्त है, जब कि काव्य में 'विभावन' है और इसीलिए उसे 'विभाव' कहते हैं। भरत ने कहा है कि 'विभावो विज्ञानार्थः'। वाचिक, आंगिक और सात्विक अभिनय का इससे विशेष बोध होता है इसलिए उसे विभाव कहते हैं। अर्थात् उसके शत्रु को देख कर उसके क्रोध के अभिनय को हम विशेषरूप से समझ सके। अभिनवगुप्त

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ने कहा है कि अभिनय तो अनेक हेतुओं से किये जाते हैं जैसे कि अश्रु का अभिनय अनेक बातें सूचित कर सकता है-गरमी, धुआँ, रोग, शोक आदि। परन्तु जब विभाव का पता चले तब हम इस अभिनय का सही अर्थ क्या है, इस विषय में एकदम निर्णय कर सकते हैं-"अभिनयानामनेकहेतुजत्वम्। तद्यथा हर्षादिभ्यो हासः । घर्मधूम रोगादिभ्यो बाप्पः । तद् बाष्पात्किं प्रतीयताम्। विभावात्तु झटित्येव निश्चयः ।" पृ० ३४७। व्यवहार में लाल आँखें आदि स्थायीभाव के परिणाम-कार्य रूप होती हैं। अथवा उसके अनुमान के लिंगरूप होती हैं परन्तु काव्य नाटकादि में उनका काम रसिकों को चित्तवृत्ति का अनुभावन कराना है। अर्थात् चित्तवृत्ति में तन्मय बनाना है। अभिनव- गुप्त ने लोचन में कहा है कि 'तन्चिर वृत्तितन्मयीम्वनमेव अनुभावनम्।' पृ० १५६ । यहाँ 'लोचन' पर 'बालप्रिया' टीका से यह अर्थ सम्झ में आता है कि 'विभावों के अनुरूप चित्तवृत्ति की सजातीय ऐसी भावक की अपनी चित्तवृत्ति का उद्बोधन होता है और उसमें भावक तन्मय बनता है।' 'तच्चित्तवृत्तिभावनया तत्सजातीयस्वीय चित्तवृत्तेरुद्- बोधनेनानुभावनम्' (पृ० १५६) इसलिए काव्य या नाटक में यह अनुभाव कहलाता है। भरत ने भी कहा है कि 'अनुभाव्यतेऽनेन वागङ्गसत्वकृतोऽभिनय इति' (६० ३४१) अर्थात् वाचिक, आंगिक और सात्विक अभिनय को अनुभव-गोचर बनाता है अतः उसे अनुभाव कहते हैं। व्यवहार में लज्जा, अमर्ष आदि सहचर-भावों के आधार पर हम दूसरों की स्थायी चित्तवृत्ति का अनुमान कर सकते हैं। अर्थात् हमें स्थायी चित्तवृत्ति का केवल बोध होता है, परन्तु काव्य में वही वस्तुएँ स्थायी का समुपरञ्जन करती हैं। अर्थात् स्थायी को आस्वाद्य बना देती हैं। इसलिए व्यवहार में वे सहचर या सहकारी कहलाती हैं, किन्तु वे ही काव्य-नाटक में व्यभिचारी कहलाती हैं। व्यवहार में कारण- कार्यादि के द्वारा हमें दूसरों की चित्तवृत्ति का तटस्थ बोध होता है, किन्तु काव्य- नाटकादि में विभावादि के कारण हमारा उसमें अनुप्रवेश होता है, और वह अनुभवन निर्विन्न तथा निरपेक्ष होने के कारण चर्वणा या रसनारूप होता है। इस प्रकार व्यवहार के कारण, कार्य और सहचारी काव्य नाटक में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारीभावों के रूप में आते हैं। और वहाँ वे क्रमशः विभावन, अनुभावन और समुपरञ्जन का कार्य करते हैं। कारण-कार्यादि व्यक्तिसम्बद्ध होते हैं जब कि विभावादि साधारणीभूत होते हैं। इन सब कारणों से इन्हें अलौकिक कहा जाता है। टिप्पणी २ काव्य का शब्द काव्य का शब्द व्यवहार के शब्द से भिन्न होता है, यह समझाते हुए अभिनवगुप्त ने 'ध्वन्यालोक लोचन' में कहा है : रसचर्वणा काव्यात्मक शब्द को निचोड़ने से ही होती हो ऐसा दिखायी देता है। हम देखते हैं कि सहृदय उसी (एक ही) काव्य को पुनः-पुनः पढ़ते हैं और आस्वादित करते हैं। अतः 'कार्य पूरा हो जाने पर उपाय के रूप में स्वीकृत वस्तुओं का त्याग कर देनें'

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का जो व्यवहार जगत् में प्रचलन है, वह काव्य को लागू नहीं होता क्योंकि काव्य में तो शब्द अर्थ की प्रतीति करा दे उसके पश्चात् भी उसकी उपयोगिता बनी रहती है। ध्वनन- व्यापार में उसका उपयोग होता है। इसीलिए मुख्यार्थ से ध्वन्यर्थ में संक्रमित होते समय क्रम लक्षित नहीं हो पाता है। (यहाँ कहने का तात्पर्य केवल इतना है कि काव्य में शब्द अर्थ का अर्थात् विभावादि का बोध कराता है, इतने मात्र से उसकी उपयोगिता समाप्त नहीं हो पाती। उसके पश्चात् भी वह ध्वनन-व्यापार में उपयोगी हो जाता है। अभिधा से विभावादि का बोध होते ही शब्द की व्यंजना शक्ति की सहायता से रसादि व्यंग्य की प्रतीति अर्थात् चर्वणा, आस्वाद प्रगटित होता है। विभा- वादि का रस में इतना शीघ्र संक्रमण होता है कि विभावादि का बोध और रसास्वाद इन दोनों के बीच कोई भी क्रम लक्षित नहीं हो पाता। और इसीलिए रसादि ध्वनि को असंलक्ष्य क्रम ध्वनि कहते हैं। ऐसा होने का कारण यह है कि शब्द की अभिधाशक्ति से विभावादि का बोध होता है, उसमें तो संकेतादि लौकिक उपायों की आवश्यकता होती है, परन्तु जब वही शब्द व्यंजना द्वारा रसादि ध्वनि की प्रतीति कराता है तब संकेतादि लौकिक उपायों की आवश्यकता होती ही नहीं है।) कुछ लोग जो ऐसा कहते हैं कि तो फिर वाक्य-भेद होगा, अतः एक ही वाक्य के भिन्न-भिन्न अनेक अर्थ होंगे-वह केवल अज्ञानवश ही कहते हैं। (यह आपत्ति शास्त्र- वाक्यों को लागू होती है अतः उसका उत्तर भी उसी रीति से देते हैं।) शास्त्र-वाक्य एक बार उच्चरित हो गया और संकेत-बल से उसका अर्थ समझ में आ गया, उसके पश्चात् वह अन्य किसी अर्थ का बोध कैसे करा सकता है ? कारण कि श्रोता को एक ही साथ परस्पर-विरोधी अनेक संकेतों की स्मृति रहना संभव नहीं है। और यदि संकेत परस्पर विरोधी न हों तो प्रश्न ही नहीं उठता-एक ही अर्थ होता है। यदि ऐसा कहो कि ये भिन्न-भिन्न अर्थ एक के बाद एक समझ में आते हैं तो हमारा उत्तर यह है कि शब्द एक अर्थ का बोध करा कर विलीन हो चुकने पर दूसरे अर्थ का बोध कराने के लिए समर्थ रहते ही नहीं हैं। और वह वाक्य पुनः उच्चरित किया जाय तो भी संकेत, प्रकरण आदि वे ही होने के कारण अर्थ भी वही रहता है। यदि कोई ऐसा कहे कि संकेत और प्रकरण को उपेक्षित कर दूसरा अर्थ नहीं हो ऐसा नियम नहीं है, तो उसका उत्तर यह है कि फिर तो शब्द और अर्थ का सम्बन्ध रहेगा ही नहीं तथा धर्मकीर्ति द्वारा निर्दिष्ट दोष आ घुसेगा-'स्वर्ग पाने की इच्छा वाले व्यक्ति को अग्निहोत्र करना चाहिए'-इस श्रुति-वाक्य का अर्थ 'कुत्ते का मांस खाना चाहिए' ऐसा नहीं है-ऐसा कहने के लिए हमारे पास क्या प्रमाण होगा ? अर्थात् इस वाक्य में से ऐसा अर्थ भी निकल सकता है, तो फिर अर्थों का कोई अन्त ही नहीं रहेगा। परिणामतः अनि- श्चितता फैलेगी। इस प्रकार एक वाक्य के अनेक अर्थ हो सकते हैं, ऐसा स्वीकार करना सदोष है। काव्यास्वाद में तो इससे भिन्न ही होता है। उसमें तो विभावादि की प्रतीति होते ही वह चर्वणा का विषय बनता है, अतः संकेत वगैरह लौकिक उपायों की आवश्यकता

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११४ अभिनव का रस-विवेचन रहती ही नहीं है। काव्य की प्रतीति शास्त्र की प्रतीति के सदश नहीं होती कि 'मुझसे यह करने को कहा गया है'; 'मुझे यह करना है'; 'मैंने अपना कार्य पूरा किया है'। इस प्रतीति में तो बाद में कुछ करने का दायित्व होता है (उत्तर कर्तव्यता) अतः वह लौकिक बन जाती है। जब कि काव्यास्वाद के समय तो विभावादि की चर्वणा जैसे जादू से उत्पन्न फूल की तरह उत्पन्न होती है। वह केवल उस समय तक के लिए ही होती है। भूत या भविष्य के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः वह चर्वणा अथवा रसास्वाद लौकिक आस्वाद से तथा योगी के विषय से भिन्न ही वस्तु है (पृ० १५८-१६० ) । "काव्यात्मकशब्दनिष्पीडनेनैव तच्चर्वणा दृश्यते। दृश्यते हि तदेव काव्यं पुनः पुनः पठंश्चर्व्यमाणश्च सहृदयो लोकः, न तु काव्यस्य तत्र 'उपादायापि ये हेया' इति न्यायेन कृतप्रतीतिकस्यानुपयोग एवेति शब्दस्यापीह ध्वननव्यापारः । अत एवालक्ष्यक्रमता। यत्तु वाक्यभेदः स्यादिति केनचिदुक्तम्, तदनभिज्ञतया। शास्त्रं हि सकृदुच्चारितं समय- बलेनार्थ प्रतिपाद्यदुगपद्विरुद्धानेकसमयस्मृत्ययोगात्कथमर्थद्वयं प्रत्यायेत्। अविरु- द्वत्वे वा तावानेको वाक्यार्थः स्यात्। क्रमेणापि विरम्यव्यापारयोगः । पुनरुच्चारितेऽपि वाक्ये स एव समयप्रकरणादेस्तादवस्थ्यात्। प्रकरणसमयप्राप्यार्थतिरस्कारेणार्था- न्तरप्रत्यायकत्वे नियमाभाव इति तेन 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति श्रुतौ खादेच्छूमांसमित्येषनार्थ इत्यत्र का प्रमेति प्रसज्यते। तत्रापि न काचिदियत्तेत्यना- श्वासता इत्येवं वाक्यभेदो दूषणम्। इह तु विभावाद्येव प्रतिपाद्यमानं चर्वणा विषयतोन्मु- खमिति समयाद्युपयोगाभावः। न च नियुक्तोऽहमत्र करवाणि कृतार्थोऽहमिति शास्त्रीय- प्रतीतिसदृशमदः। तत्रोत्तरकर्तव्यौन्मुख्येन लौकिकत्वात्। इह तु विभावादिचर्वणाद्- भुतपुष्पवत्तत्कालसारैवोदिता न तु पूर्वापरकालानुबन्धिनीतिलौकिकास्वादाद्योगि- विषयाच्चान्य एवायं रसास्वादः।"-पृ० १५८-१६० व्यवहार की वाणी और काव्य की वाणी का भेद स्पष्ट करते हुए 'लोचन' में अभिनवगुप्त ने स्पष्ट कहा है कि व्यवहार की वाणी का हेतु सामने वाले व्यक्ति को किसी न किसी क्रिया में प्रवृत्त करना होता है, जब कि काव्य की वाणी का हेतु कवि द्वारा विभावादि के माध्यम से व्यक्त किये गये अभिप्राय (मन्तव्य) में ही अर्थात् भाव में ही (भावः कवेरभिप्रायः) भावक के चित्त को विश्रान्त करना होता है। व्यवहार की वाणी क्रियापर्यवसायी होती है और इसीलिए वह अभिप्राय (अभिमत)-निष्ठ होती है, न कि अभिप्रेत वस्तुनिष्ठ। अर्थात् रसास्वाद का पर्यवसान अभिप्रेत वस्तु की प्राप्ति में या उससे सम्बन्धित किसी कर्तव्य में होता नहीं है किन्तु केवल प्रतीति-विश्रान्ति में ही होता है। और यह प्रतीति-विश्रान्ति केवल अभिमतनिष्ठ होती है, अभिप्रेत वस्तुनिष्ठ नहीं होती है- "काव्यवाक्येभ्यो हि न नयनानयनाद्युपयोगिनीप्रतीतिरभ्यर्थ्यंते अपितु प्रतीति- विश्रान्तिकारिणी, सा च अभिप्रायनिष्ठैव, न अभिप्रेतवस्तुपर्यवसाना।" -पृ० ४४२

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टिप्पणी ३

विततसाधारण्य

इसका अर्थ यह हुआ कि रसानुभूति के समय सामाजिकों का व्यावहारिक व्यक्तित्व- जो प्रत्येक का अलग-अलग होता है, वह क्षण भर के लिए लुप्त होता है; और उसके स्थान पर एक ही सामाजिक चिति उत्पन्न होती है, जो साधारणीभूत और स्थल- कालादि के निर्णय की सीमाओं से मुक्त होती है। यह नई चिति अथवा संवित्ति ही रस है। अभिनवगुप् कहते हैं कि किसी एक दृश्य का आनन्द प्रेक्षकों की संख्या अधिक होने पर बढ़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जब प्रेक्षक को पता चलता है कि इस दृश्य को दूसरे प्रेक्षक भी देख रहे हैं तो उसका आनन्द बढ़ता है। अभिनव- गुप्त ने 'तन्त्रालोक' में कहा है कि- 'तथा ह्येकाग्रसकलसामाजिकजन: खलु। नृत्तं गीतं सुधासारसागर वेन मन्यते।। तत एवोच्यते मल्लनटप्रेक्षोपदेशने। सर्वप्रमातृतादात््यं पूर्णरूपानुभावकम्।। तावन्माव्रार्थसंवित्तितुष्ठाः प्रत्येकशो यदि। कः सम्भूय गुणस्तेषां प्रमान्नैक्यं भवेच्च किम्॥ यदा तु तत्तद्वेद्यत्वधर्मसन्दर्भगर्भितम्। तद्वस्तु शुष्कात् प्राग् रूपादन्यद्युक्तमिदं तदा ।।' अर्थात्, जो सब सामाजिक एकत्र होकर नृत्य-गीत आदि का आनन्द मनाते हैं, उन्हें वह वस्तुतः सुधा (अमृत) के सागर के समान प्रतीत होता है। (जयरथ इसके ; सम्बन्ध में कहते हैं : कोई भी देख सके ऐसी स्पष्ट यह बात है कि जो दृश्य सभी व्यक्ति मिल कर एक साथ देखते हों, वह व्यक्तिशः देखने वाले दृश्य की अपेक्षा अधिक आनन्द देता है।) अतः जो लोग मल्ल नटादि के खेलों का वास्तविक स्वरूप समझाते हैं, वे कहते हैं कि इन सबमें प्रमाताओं का तादात्म्य सिद्ध होता है और इनसे पूर्ण रसा- स्वाद का अनुभव होता है। (जयरथ कहते हैं: पूर्णरूपेति इयदेव हि पूर्ण रूपं यद् विगलितवेद्यान्तरतया तत्रैवानन्याकांक्षत्वेन परामर्षणं नाम-पूर्ण अर्थात् जिसमें ज्ञान के सभी विषयों का बोध विगलित हो चुका हो, और अन्य कोई भी आकांक्षा भी न हो ऐसा परामर्श) यदि वे रंगमंच पर जो कुछ देखते हैं, उतने से ही (अर्थात् अन्य लोग भी यह दृश्य देखते हैं-ऐसे ज्ञान से हीन) व्यक्तिशः प्रेक्षकों को सन्तोष होता हो तो सभी सामाजिक एकत्र होने पर जो भिन्न प्रकार की ही संवित्ति प्रगट होती है, उसका स्पष्टीकरण क्या है ? तो फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि सामाजिकों का तादात्म्य साधित होता है ? जब सामाजिक को यह पता होता है कि अन्य सब लोग भी यह दृश्य देख रहे हैं तब वह दृश्य पूर्व की शुष्क स्थिति से भिन्न ही बन

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११६ अभिनव का रस-विवेचन जाता है, कोई भी यह देख सकता है। (जयरथ कहते हैं : तब दृश्य नवीन रूप ही धारण कर लेता है, जिसके कारण चमत्कार अनुभव किया जाता है।) व्यक्तित्व का ऐसा लोप और संवित्ति का प्रकर्ष धार्मिक विधियों के समय भी अनुभूत होता है, ऐसा अभिनवगुप्त कहते हैं- संवित्सर्वात्मिका देहभेदाद्या संकुचेत्तु सा।

उच्छलन्निजरश्म्योघः संवित्सु प्रतिबिम्बितः । बहुदर्पणवद्दीप्तः सर्वायेताप्ययत्नतः॥ अत एव नृत्तगीतप्रभृतौ बहुपर्षदि। यः सर्वतन्मयी भावे ह्लादो न त्वेककस्य सः ।। आनन्दनिर्भरा संवित् प्रत्येकं सा तथैकताम्। नृत्तादिविषये प्राप्ता पूर्णानन्दत्वमश्नुते॥

विकस्वरा निष्प्रतिद्य संविदानन्दयोगिनी॥ अतन्मये तु कस्मिश्चित्तत्रस्थे प्रतिहन्यते। स्थपुटस्पर्शवत्संविद्विजातीयतया स्थिते।। अतश्चकार्चनाद्य षु विजातीयमतन्मयम्। नैव प्रवेशयेत्संवित्संकोचननिबन्धनम्। अर्थात्, सर्वात्मिका संवित् देह-भेद के कारण संकोच प्राप्त करती है, परन्तु उत्सव (मेले) में पारस्परिक प्रतिबिम्बित होने से वह विकस्वर बनती है। अपनी संवित् का उछलता रश्मि-ओघ अन्य संवितों में प्रतिबिम्बित होता है और अनेक दर्पणों में प्रति- बिम्बित की भाँति अधिक दीप्त बनकर स्वतः सर्वव्यापी बन जाता है। इससे नृत्त-गीतादि में अनेक व्यक्ति एकत्र होने पर सबकी तन्मयता साधित होने पर जो आनन्दानुभूति होती है, उसे एक-एक सामाजिक अलग-अलग अनुभव नहीं कर सकता है। व्यक्तिगत संवित् भी आनन्द-निर्भर ही होती है। वह भी नृत्त-गीत में ऐसी परिस्थिति में एकत्व पाते ही परिपूर्ण आनन्दमय बन जाती है। उस परिस्थिति में ईर्ष्या, असूया आदि संकोचक कारणों के अभाव में वह विकस्वर, निर्विन्न और आनन्दमय बन जाती है। परन्तु यदि प्रेक्षकों में से कोई एक तन्मय होता नहीं है और सबसे अलग प्रकार का बन कर बैठा रहता है तो खुरदरे स्पर्श के सदृश संवित में विक्षेप होता है। इसलिए चक्र- पूजादि में अन्यों से अलग रहने वाले अतन्मय व्यक्ति को प्रवेश करने न दिया जाय; क्योंकि इससे संवित् का संकोच होता है। जयरथ कहते हैं कि यह सब संविन्मय है और संवित् तो एक ही है। भेद तो माया का खेल है। रसानुभूति में जब सभी सामाजिक विगलित वेद्यान्तर होकर एक ही वस्तु में तन्मय हो जाते हैं तब यह भेद लुप्त हो जाता है और वितत संवित्ति प्रगट होती है।

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टिप्पणी ४

चमत्कार

'चमत्कार' अर्थात् रसानुभूति, आस्वाद। योगवासिष्ठ से लेकर अग्निपुराण और अभिनवगुप्त से लेकर पं० जगन्नाथ तक के भारतीय धर्म-विचार तथा रस-विचार में यह शब्द प्रयुक्त होता आया है। चमत् + कार दोनों मिल कर यह शब्द बना है। चमत् का अर्थ होता है-विस्मय अथवा आश्रर्य का उद्गार, इतना ही सम्भव है और 'कार' का अर्थ है, ऐसा उद्गार करने या चित्तवृत्ति अनुभव करने की क्रिया। हमारे चित्त में एकाएक प्रगट होती किसी वस्तु से होने वाले विस्मय का भाव 'चमत्कार' शब्द में सदैव निहित है। महिम भट्ट के 'व्यक्ति-विवेक' पर अपनी टीका में रुथ्यक ने (पृ० ५३ पर) कहा है कि "आलेख्यलेख्यादौ सन्तमसावस्थिते प्रदीपादिना प्रकाशिते झटिति अद्भुतार्थप्रकाशनाच्चमत्कारो जायते तद्वद्रसादौ।" चमत्कार की पारम्परीण व्युत्पत्ति है :- 'चम्' अर्थात् खाना, स्वाद लेना, उसके आधार पर भोग करना 'भुज्' भी। इस व्युत्पत्ति के अनुसार चमत् 'चम्' धातु का वर्तमान कृदन्त है, चमत् का अर्थ है, किसी वस्तु के आस्वादन लेने की स्थिति, वही चमत्वम्। अभिनवगुप्त इन दोनों ही व्युत्पत्तियों को स्वीकार करते हैं। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा- विमर्शिनी' के तृतीय खण्ड में पृ० २५१ पर वे कहते हैं :- "चमत्कारो हि इति स्वात्मनि अनन्यापेक्षे विश्रमणम्। एवं भुञ्जानतारूपं चमत्वम्। तदेव करोति संरम्भे विमर्शति नान्यत्रानुधावति। चमदिति वा आन्तरस्पन्दान्दोलनोदित- परामर्शमयशब्दना व्यक्तानुकरणम्। काव्यनाट्यरसादावपि भाविचित्तवृत्योदयनिय- मात्मकविभ्नविरहित एवास्वादो रसनात्मा चमत्कार इति उक्तमन्यत्र।" अर्थात् 'चमत्कार' के मानी हैं अपनी आत्मा में अन्य निरपेक्ष विश्रान्ति अर्थात् 'चमत्' का अर्थ किसी वस्तु के आस्वादन की स्थिति। उसका कर्ता केवल वही करता होता है। उसी का एकाग्रता से (१) विचार करना होता है। अन्य किसी वस्तु के पीछे दौड़ता नहीं है। 'चमत्' क्रिया-विशेष का संकेत करता है। समस्त शब्द का अर्थ हुआ 'निर्विन्न आस्वाद'। यह भी कहा जा सकता है कि 'चमत्' आन्तर स्पन्दनों- आन्दोलनों से जागत आनन्द से उत्पन्न शब्द का अनुकरण या उद्गार है। काव्य- नाट्यादि में रसानुभूति अन्य चित्तवृत्तियों के अभाव में निर्विन्न होती है, और उन्हें भी चमत्कार कहा जाता है। इन सबकी चर्चा अन्यत्र की गयी है। इस प्रकार चमत्कार निर्विघ्न तथा व्यावहारिक प्रयोजनरहित संवित्ति है। उसमें व्यक्तित्व के सभी विशिष्ट तत्वों का लोप हो गया होता है। अतः 'चमत्कार' का अर्थ अहं का विकास होता है। विश्वनाथ 'साहित्यदर्पण' के तीसरे प्रकरण में कहते हैं: 'चमत्कारश्चित्तविस्ताररूपो विस्मयापरपर्यायः।' चमत्कार चित्त के विस्ताररूप विस्मय का दूसरा पर्याय है। प्रत्यभिज्ञादर्शन में 'चमत्कार' का उदार अर्थ ग्रहण करें तो सब प्रकार की संवित्तियाँ संवित्ति का प्राण, संवित् को तथा आत्मा को जड़ से अलग करने वाले तत्त्व ऐसा

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११८ अभिनव का रस-विवेचन अर्थ होता है। 'परात्रिंशिकाविवरण' में पृ० ४९ पर अभिनवगुप्त कहते हैं : "सर्वतो हि अचमत्कारे जडतैव अधिकचमत्कारावेश एव वीर्यक्षोभात्मा सहृदयता उच्यते यस्यैव एतद्भोगासंगाभ्यासनिवेशतानन्तब्रह्मकवीर्यब्रह्मितं हृदयं तस्यैव चातिशयचमत्कारिता।" अर्थात् चमत्कार का सम्पूर्ण अभाव तो जड़ता ही है। सहृदयता का अर्थ है अतिशय चमत्कार में मग्नता। जिसका हृदय उसके भोग के अभ्यास में निरन्तर रत अनन्त वीर्य से पुष्ट होता है, वही चमत्कार के अतिशय का अनुभव कर सकता है। जब-जब विभावादि की प्रतीति होती है, तब-तब चमत्कार पुनः अनुभव किया जाता है। यहाँ विष्णु को चमत्कार अनुभव करते वर्णित किया गया है यह इस चमत्कार की-रसानुभव की विशिष्टता का उदाहरण है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्तिविमर्शिनी' में भी अभिनवगुप्त ने चमत्कारिता का लक्षण इस प्रकार दिया है : 'चमत्कारिता हि भुञ्जानरूपा स्वात्मविश्रान्तिलक्षणा' अर्थात् चमत्कारिता यह किसी वस्तु के आस्वाद लेने की स्थिति है और अपने में आत्मविश्रान्ति ही उसका लक्षण है। ( ३-२५२ )

टिप्पणी ५

आनन्द शैवमतानुसार संवित् अथवा 'अहं' का सारसत्त्व आनन्द है। आनन्द के अभाव का तथा दुःख का कारण, आत्मा से भिन्न किसी वस्तु की आवश्यकता या न्यूनता का बोध या इच्छा है। ऐसी किसी इच्छा का अभाव, केवल आत्मा में विश्रान्ति ही सुख या आनन्द है। 'अहं' में सब कुछ समाबिष्ट हो जाता है, जो कुछ है वह सब उसके असीम स्वातन्त्र्य से उद्भत है। उसमें किसी प्रकार की शून्यता या अभाव को स्थान ही नहीं है और उसे अपने से भिन्न तथा किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती है। कामानुभव का अर्थ है, अपनी संवित् का आस्वाद या चर्वणा अर्थात् अपने सारसत्त्व रूप आनन्द की चर्वणा। इस अर्थ में रस एक ही है। यह चर्वणा रत्यादि चित्तवृत्तियों की वासनाओं से अनु- रज्जित अथवा दूषित होती है। ये वासनाएँ विभावादि से अर्थात् काव्य के शब्दों से जागत हुई होती हैं। इस दृष्टि से देखने पर विभावादि के भेद से भिन्न-भिन्न रसों का अनुभव होता है। "अस्मन्मते तु संवेदनमेव एकघनमास्वाद्यते। तत्र का दुःखाशंका। केवलं तस्यैव चित्रिताकरणे रतिशोकादिवासनाव्यापारस्तदुद्बोधने चाभिनयादि व्यापारः ।" (पृ० २९२) हम तो ऐसा मानते हैं कि आनन्दघन संवेदन ही आस्वादित होता है। फिर उसमें दुःख की आशंका हो ही कैसे सकती है ? रति-शोक आदि वासनाओं का व्यापार तो केवल उसको (संवेदन को) चित्रित करता है और अभिनयादि व्यापार उस वासना को जगाता है।

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अभिनव का रस-विचार ११९

इस आनन्द का स्वरूप 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्तिविमर्शिनी' में खण्ड २, पृ० १७७ पर अंकित है जो नीचे उद्धृत किया जा रहा है : 'स्वरूपस्य स्वात्मनः परिपूर्णनिजस्वभावप्रकाशनमेव परामर्शमयतां दधदानन्द इति उच्यते, तथा देहादिसंकोचकलुषापरिपूर्णप्रत्यगात्माहम्भावनिष्ठत्वेन शरीरस्य रिक्ततया

सम्भवति, ततोऽयमनानन्द इव आस्ते। सति आत्मपरामर्शमये स्वानन्दे यदा तु अन्न- परिपूर्णजठरता अस्य, तदा तद्रिक्तोद्रेकरूपातावदपूर्णता विनष्टा। संस्काररूपतया तु तदानीं यदभिलषणीयं कान्तालिङ्गानादि परामर्शनीयं स्थितं यदाह गुरु: पतञ्जलिः 'नहि चैत्र एकस्यां स्त्रियां रक्त इति अन्यासु विरक्तः' इत्यादि तद्योगादपूर्णोडयमानन्द इति परमानन्दोऽयं न भवति सांसारिकश्च सर्वोऽस्यानन्दो 'लाभे भाविवियोगभीरु .. ' इति 'विषयो विषयान्तरार्थितां जनयन् वा जनयेत् कथं सुखम् ।' इति च न्यायेन व्यतिरिक्ता- कांक्षाविच्छेदमयतां सर्वात्मना न स्वीकुरुते इति ततोऽपि अपूर्ण एव, यस्तु आनन्दतांश- स्तत्र सर्वात्मपरामर्शरूपतैव प्रयोजिकेति। तत एव उक्तम्- त्रैलोक्येऽप्यत्र यो यावानानन्द: कश्चिदीक्ष्यते। स बिन्दुर्यस्य तं वन्दे देवमानन्दसागरम् ।-स्तवनचिन्तामणि-६१ इति भट्टनारायणेन। तथा च मधुरादौ रसे औदरिकाभ्यव्यहारवैलक्षण्येन प्रवृत्त इदमि- त्थमिति प्रमातरि विश्रमयन् प्रमातृभागमेव प्रधानतया विमृशन् भुञ्जान इति उच्यते। यत्रापि अत्यन्तमन्यथाभावमतिक्रयसुखमास्वाद्यते अर्जना ब्विसम्भाव्यमानविन्नान्तर- निरासात् वैषयिकानन्दविलक्षणशृंगारादौ नाट्यकाव्यादिविषये, तत्र वीतविघ्नत्वादेव असौरसनाचर्वणानिवृत्तिः प्रतीतिः प्रमातृविश्रान्तिरेव तत एव हृदयेन परामर्शलक्षणेन प्राधान्यात् व्यपदेश्या व्यवस्थितस्य अपि प्रकाशभागस्य वेद्यविश्रान्तस्य अनादरणात् सह- दयता उच्यते इति निर्विन्नाः स्वादरूपाश्च रसनातद्रोचरीकार्याश्चित्तवृत्तयो रसा नव इत्ययमथोडभिनवभारत्यां नाट्यवेदविवृतौ वितत्य व्युत्पादितोऽस्माभिरिति। तत्कुतूहली तामेव अवलोकयेत्। इह तु प्रकृतविन्नकारित्वात् न विततः । तस्त्रदिनुपचरितस्य संवेदन रूपतानान्तरीयत्वेन अवस्थितस्य स्वतन्त्रस्यैव रसनैकघनतया परामर्शः परमानन्दो निर्वृत्तिश्चमत्कार उच्यते। तस्मात् युक्तमाह 'चमत्कृतेरभावात्' मधुरादिरसास्वादे तु विषयस्पर्शव्यवधानम्। ततोऽपि काव्यनाट्यादौ तद् व्यवधानशून्यता तद् व्यवधानसंस्कार- वेधस्तु। तत्रापि तु तथोदितव्यवधानांशतिरस्क्रिया सावधानहृदया लभन्त एव परमा- नन्दम्। यथोक्तम्- 'जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दव्यवस्थिते।'-विज्ञानभैरव, ७२ इत्यादि -ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्तिविमर्शिनी, खण्ड २, पृ० १७७-१७९ अपने स्वरूप का अर्थात् अपनी आत्मा के परामर्श वाले अपने स्वभाव का परिपूर्ण प्रकाशन आनन्द कहाता है। उदाहरणतः जो व्यक्ति भूखा होता है उसे अपने शरीर में खालीपना महसूस होता है। देहादि के संकोच के कलुष के कारण अपरिपूर्ण प्रत्यगात्मा

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१२० अभिनव का रस-विवेचन के बोध वाला उसका अहं भाव अपने से भिन्न ऐसे अन्न के अभिलाष से विवश हो चुका होता है। उससे उसमें आत्मा का परामर्श एकघनवृत्ति से होता नहीं है। अतः ऐसा पुरुष स्वयं आत्मपराम्शरूप आनन्द से सम्पन्न होने पर भी मानो आनन्दमय हो, इस प्रकार बैठा रहता है। परन्तु जब उस व्यक्ति का पेट अन्न से भरा होता है, तब पेट खाली होने की अपूर्णता नष्ट होती है। उस समय भी कान्ता का आलिंगन करने आदि की अभिलाषारूप परामर्श की वस्तु वासनारूप में स्थित ही होती है। गुरु पतंजलि ने कहा है कि-"चैत्र एक स्त्री में रक्त है, इसका मतलब यह नहीं कि अन्य स्त्रियों में वह विरक्त है।" (योगसूत्र, व्यास-भाष्य २, ४) इसीलिए अर्थात् उसमें अन्य अभिलाषाएँ होती हैं, इसलिए ही, उसका आनन्द अपूर्ण होता है और वह परमानन्द बन सकता नहीं है। कुछ प्राप्त करने पर भविष्य में उसके नष्ट होने या चले जाने का भय रहता है। इसलिए एक विषय अन्य विषय की इच्छा को जन्म देने वाला होने से वह सुख कैसे दे सकता है ?- इसी न्याय से अपने से भिन्न किसी वस्तु के लिए आकांक्षा का विच्छेद वह सर्वात्मना स्वीकार कर नहीं सकता है, अतः वह अपूर्ण ही रहता है। उसमें आनन्द का जो अंश होता है, उसके मूल में अपनी आत्मा का परामर्श ही अवस्थित है। इसीलिए भट्ट नारायण ने कहा है कि "त्रैलोक्य में जहाँ कहीं जितना आनन्द दिखायी देता है, वह जिसके बिन्दु सदृश है, ऐसे आनन्द-सागर परमात्मा की मैं वन्दना करता हूँ।" (स्तवन-चिन्तामणि, पृ० ६१) उदाहरणतः जो व्यक्ति मधुरादि रस का आस्वाद करता है, उसकी प्रतीति पेटू की तरह आहार करने वाले व्यक्ति से भिन्न होती है। उसे तो केवल 'यह ऐसा है' उतनी ही प्रतीति होती है। अतः उसे तो प्रधानरूप से प्रमाता अंश का ही परामर्श होता है और इसलिए उसे 'भुज्जान'- आस्वाद लेने वाला कहते हैं। इससे भिन्न और बाह्य बाधारहित एक आनन्द काव्य- नाट्यादि में रत्यादि का आस्वाद करने वाले व्यक्ति को अनुभूत होता है। उसमें अर्जन आदि विन्न न होने से वह व्यवहार-जीवन के अन्य आनन्दों की तुलना में भिन्न ही प्रकार का होता है। और निर्विन्न होने से वह रसना, चर्वणा, निर्वृत्ति, प्रतीति और प्रमातृ-विश्रान्ति के नाम से पहिचाना जाता है। इसी कारण से, परामर्श वाला हृदय ही उसमें प्रधान होने से वह आनन्द-हृदय (हृद्य) नाम से पहिचाना जाता है। और वेद्य में स्थित प्रकाश भाग चालू तो रहता है, परन्तु वह अधिक मात्रा में न होने से यह स्थिति 'सहृदयता' कहलाती है। निर्विन्न आस्वादरूप रसना का विषय बनती चित्तवृत्तियाँ ही नौ रस हैं यह बात हम नाट्य-वेद की विवृत्ति (व्याख्या) अभिनव-भारती में विस्तार से बता चुके हैं अतः जिज्ञासु उसे वहाँ पढ़ लें। यहाँ प्रस्तुत विषय में विघ्नरूप होने से उसका विस्तार किया नहीं गया है। अतः संवेदन से अभिन्न और वस्तुतः स्वतन्त्र ऐसी आत्मा का रसना की एकघनता पूर्ण परामर्श ही चमत्कार, परमानन्द और निर्वृति कहा जाता है। इसलिए उत्पलाचार्य ने योग्य ही कहा है कि 'चमत्कार के अभाव में' .. आदि। परन्तु हमें यह न भूलना चाहिए कि मधुरादि रसों के आस्वाद में तो विषय-स्पर्श का ही व्यवधान होता है और काव्य-नाट्य में ऐसा व्यवधान नहीं होता,

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फिर भी वह संस्काररूप में स्थित है ही। काव्य-नाट्य में भी जो सहृदय इस व्यवधान अंश को ढँक देने की सतर्कता रखते हैं, उन्हें परमानन्द की प्राप्ति होती ही है। कहा है कि खाने-पीने से होनेवाले उल्लास में भी परमानन्द का अनुभव होता है (वैज्ञान- भैरव, श्लो० ७२) । तुलना कीजिए-तन्त्रालोक खण्ड ३, पृ० २१८, क्षेमराज स्तव- चिन्तामणि, पृ० ७१। "इत्थं च तत्तत्परिमितानन्देऽपि एकाग्रीभावितचित्तः परमानन्द- माविशति योगिजनः ।" अर्थात् तद्-तद् परिमित आनन्द में भी योगीजन एकाग्र चित्त बन कर परमानन्द प्राप्त करता है। सन्दर्भ-ग्रन्थों की सूची १. नाट्यशास्त्र (अभिनव-भारतीसहित), खण्ड १, संस्करण दूसरा, १९५६, प्राच्य विद्यामन्दिर, बड़ौदा। २. नाट्यशास्त्र (अभिनव-भारतीसहित ), खण्ड २, संस्करण पहला, १९३४, प्राच्य विद्यामन्दिर, बड़ौदा। ३. नाट्यशास्त्र (अभिनव-भारतीसहित), खण्ड ३, संस्करण पहला, १९५४, प्राच्य विद्यामन्दिर, बड़ौदा। इस लेख में नाट्यशास्त्र के तथा अभिनव-भारती के उद्धरण इन ग्रन्थों के आधार पर दिये गये हैं। 4. The Aesthetic Experience According to Abhinav Gupta-Rani- erio Gnoli Instituto-Italiano per il Medeo ed Estremo Oriente Roma 1956. मूल समझने, अनुवाद करने तथा पादटिप्पणियों में भी मुझे इस ग्रन्थ से पर्याप्त सहायता मिली है। ५. हिन्दी अभिनव-भारती, सम्पादक तथा भाष्यकार-आचार्य विश्वेश्वर, सिद्धान्त- शिरोमणि, हिन्दी-विभाग, दिल्ली विश्वविद्याल्य, दिल्ली, १९६० । इसमें केवल १,२,६ अध्याय ही हैं। उसमें मूल, पाठचर्चा, अनुवाद तथा व्याख्याएँ समा- विष्ट हैं। ६. ध्वन्यालोक (लोचन तथा बालप्रिया टीकासहित), काशी संस्कृत सिरीज। चौखम्भा संस्कृत सिरीज ऑफिस, १९४० । इस लेख में ध्वन्यालोक तथा लोचन सम्बन्धी उद्धरण इस ग्रन्थ के आधार पर दिये गये हैं। ७. ध्वन्यालोक, खण्ड १-२ ( लोचन तथा तारावती हिन्दी टीकासहित), अनुवादक तथा व्याख्या करने वाले डॉ० रामसागर त्रिपाठी, एम० ए०, पी-एच० डी०, आचार्य; मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, १९६३। ८. भारतीय साहित्य-शास्त्र (मराठी), गणेश त्यंबक देशपाण्डे, पॉप्युलर बुकडिपो, बम्बई, १९५८ ।

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१२२ अभिनव का रस-विवेचन मूल समझने में मुझे इस ग्रन्थ से भी पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई है। 9. History of Sanskrit Poetics :- Sushil Kumar De, Firma K. L. Mukhopadhyay, Calcutta, 1960. 10. Some Problems of Sanskrit Poetics :- Sushil Kumar De, Firma K. L. Mukhopadhyay, Calcutta, 1959, ११. काव्यानुशासन, आचार्य हेमचन्द्र, सम्पादक : रसिकलाल छोटालाल परीख, श्री महावीर जैन विद्यालय, बम्बई, द्वितीय संस्करण, १९६४ । १२. काव्य-प्रकाश (वामनाचार्य झलकीकर की बालबोधिनी टीका सहित), छठा संस्करण, भाण्डारकर ओरिएण्टल इंस्टिट्यूट, पूना, १९५० । १३. काव्य-प्रकाश, कलकत्ता संस्कृत सिरीज, सम्पादक : अमरेन्द्रमोहन तर्कतीर्थ तथा उपेन्द्रमोहन सांख्यतीर्थ, अंग्रेजी में २३ पृष्ठों की भूमिका-श्री सुशीलकुमार दे, एम० ए०, डी० लिट्, अंग्रेजी १५० पृष्ठों में ग्रन्थसार-श्री अमरेश्वर ठाकुर, एम० ए०, पी-एच० डी०, वेदान्ततीर्थ। दस पृष्ठों में सभी कारिकाएँ अलग दी गयी हैं। दो संस्कृत टीकाएँ हैं। प्रकाशक :- मेट्रोपोलिटन प्रेस एण्ड पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, १९३६ (१९३६)। १४. रस-सिद्धान्त, डॉ० नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, १९६४।

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परिशिष्ट भारतीय रस-विचार (लेखक : रान्येरो नोली) भारत में रसानुभूति के विवेचन का जन्म केवल तत्व-जिज्ञासा में से नहीं, किन्तु व्यावहारिक उपयोग के प्रयोजन में से हुआ है। प्रारम्भ में यह नाटक तक सीमित था। इस विषय पर प्राचीनतम ग्रन्थ तो नाट्यशास्त्र है (ई० स० ४थी या ५वीं शती)। परम्परागत मान्यता है कि उसे भरत ने रचा था। उसमें नास्य-प्रयोग तथा नटों के प्रशिक्षण विषयक अनेक नियम व सूचनाएँ (निर्देश) संग्रहीत हैं। उसमें नाट्य पर दृश्य और श्रव्य-कला के समन्वय के रूप में विचार किया गया है। अन्य किसी भी कला की तुलना में नास्य में ये दो अधिक सरलतापूर्वक सहयोग कर प्रेक्षक में ऐसी प्रतीति उत्पन्न करती हैं, जो साक्षात्कारत्मक होती है। उसका अनुभव रस या स्वाद-जैसा होता है, और उसे 'रस' कहा जाता है। प्रेक्षक जब इस रस का आस्वाद करता है तब वह उसमें व्यात हो (फैल) जाता है तथा उसे आनन्द की अनुभूति कराता है। अतः रसानुभूति का मतलब है, इस रस का आस्वादन, अन्य सब कुछ भूलकर इसी में तल्लीन हो जाना। भरत ने अपने प्रसिद्ध रस-सूत्र में कहा है कि नाट्य का नटों के अभिनय के साथ संयोग होने पर रस निष्पन्न होता है। इस सूत्र की परवर्ती आचार्यों ने भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ की हैं और उसमें से 'रस-निष्पत्ति' विषयक भिन्न-भिन्न वाद उत्पन्न हुए। भरत द्वारा कथित यह रस-तत्व ही अनेक आचार्यों के अध्ययन व विश्लेषण का विषय बन गया है। प्रत्येक आचार्य ने भरत मुनि के वचनों की विस्तृत व्याख्या करने का प्रयत्न किया है। ऐसे आचार्यों में प्राचीनतम हैं, दण्डी और भट्ट लोल्लट। दण्डी का समय लगभग सातवीं शती तथा लोल्लट' का लगभग नौवों शती है। आश्चर्य की बात है कि ये आचार्य रस को सुख-दुःखादिवत् लौकिक चित्तवृत्ति मानते थे। नाट्य-प्रयोग और नट के व्यापार के सम्मिलित प्रभाव से यह चित्तवृत्ति जब परिपोष की चरम सीमा तक पहुँच जाती है तब रस कहलाती है। भट्ट लोल्लट के मतानुसार रस मुख्यतया अनुकार्यगत और अनुसन्धान-बल से केवल उपचार से ही अनुकर्ता (नट) गत है। लोल्लट के बाद थोड़े समय में हुए शंकुक ने अपने पूर्ववर्ती आचार्य के मत का स्पष्ट विरोध किया। उनके मतानुसार रस परिपुष्ट स्थायी नहीं है, १. देखिए, पृ० १३-१६। २. देखिए, पृ० १७-२३ ।

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१२४ अभिनव का रस-विवेचन किन्तु स्थायी का अनुकरण है-अनुकृत स्थायी है। नट रामादि के स्थायी का अनु- करण करता है और प्रेक्षकों को उस अनुकृत स्थायी की रसरूप में प्रतीति होती है। यह प्रतीति सत्य-मिथ्या के विचारों से मुक्त है। शंकुक कहते हैं कि चित्रकार द्वारा अंकित घोड़ा प्रेक्षक को सत्य भी प्रतीत नहीं होता, मिथ्या भी प्रतीत नहीं होता, उसे सत्य-मिथ्या का ख्याल लागू होता ही नहीं है। सत्य-मिथ्या का विचार उत्पन्न होने के पूर्व ही वह मूर्तरूप में अनुभूत हो जाता है। लोल्लट और शंकुक के मतों की भट्ट नायक ने सख्त आलोचना की है। भट्ट नायक' भारतीय रस-मीमांसा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। भट्ट नायक के मतानुसार रस न तो परिपुष्ट स्थायी है, न ही अनुकृत स्थायी। ये दोनों मत (वाद) रसानुभूति की विशिष्ट प्रकृति को स्पष्ट समझाने में असफल हुए हैं। भट्ट नायक के मतानुसार रस एक ऐसा आनन्द है, जिसका किसी व्यक्ति के साथ सम्बन्ध नहीं है। कला द्वारा अनुभव किया जाने वाला स्थायीभाव-रति, क्रोध, दुःख आदि किसी भी स्वरूप का क्यों न हो-व्यवहार-जीवन का भाग बनता नहीं है, किन्तु नितान्त निदैयक्तिक रूप में अनुभव किया जाता है। काव्य-नाटक में होने वाली घटनाएँ व्यावहारिक जीवन के साथ किचिन्मात्र भी सम्बन्ध रखती नहीं हैं तथा इन घटनाओं का काव्य अथवा नाटक के नायक किंवा नट के जीवन से भी कोई सम्बन्ध होता नहीं है। अतः ये सब केवल साधारणीकृत रूप में अथवा साधारण भाव से प्रतीत होते हैं। वे व्यक्ति-सम्बद्ध नहीं हैं। भट्ट नायक-प्रतिपादित रसानुभव के साधारण्य (साधारणीकरण) का अभिनव- गुप्त ने स्वीकार किया उसमें किंचित् संशोधन भी किया। इस साधारणीकरण में स्थल-काल की सीमाएँ नहीं होतीं। [स्थल-काल का सम्बन्ध तो बौद्धिक सविकल्प ज्ञान से है] और इसीलिए भावक की परिमित प्रमातृत्व की सीमाएँ भी उसे होती नहीं हैं; इसका अर्थ यह हुआ। भावक स्वयं इन स्थलकालादि की सीमाओं से परिबद्ध होता है किन्तु रसानुभूति के समय, उस काल के लिए वह स्थल-काल तथा कार्य-कारण सम्बन्धों से परे तथा अपने व्यवहार-जीवन-प्रवाह से भी परे, दुनिया से ऊपर उठ जाता है।२ कार्यकारण से प्रभावित संसार के साथ का सम्बन्ध रसानुभूति के समय स्पष्टतः छिन्न हो जाता है। रसानुभव तो जादू से खिले फूल की तरह प्रस्फुटित हो जाता है। इसका अपने पूर्ववर्ती या परवर्ती व स्वाभाविक गति से चलने वाले व्यवहार-जीवन के साथ स्थलगत या कालगत कोई सम्बन्ध नहीं होता। इस प्रकार भट्ट नायक तथा अभिनवगुप्त ने रसास्वाद को लोल्लट तथा शंकुक द्वारा निरूपित प्राथमिक व अत्यन्त स्थूल अवस्था से उबार लिया है। रस कोई

१. देखिए, पृ० ३९-४५। २. देखिए, पृ० ५५-५६।

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अनुभव के पूर्व सिद्ध पदार्थ नहीं है किन्तु उसकी प्रतीति ही रस है। यह प्रतीति निर्विध्न तथा सभी व्यावहारिक प्रयोजनों से मुक्त होती है अतः वह रसरूप में आस्वादित की जाती है।' भावक को रसास्वाद के समय उस चर्वणा में ही अपनी सभी इच्छाओं की परिपूर्ति प्रतीत होती है; इस अर्थ में रस आनन्द, निर्वृति और विश्रान्ति तथा लय रूप होता है। रस का अपने से बाहर कोई प्रयोजन नहीं है, वह सम्पूर्णतः आत्म- पर्याप्त है। और इसीलिए वह आनन्दमय, निर्वृति तथा विश्रान्तिरूप होता है। रसानुभव के लिए सभी व्यावहारिक इच्छाओं का क्षय और भावक की विषय में ही तल्लीनता- विगलितवेद्यान्तरता-आवश्यक है। भावक के चित्त में व्यावहारिक इच्छाएँ तथा प्रयोजनों का उदय होते ही स्वतः ही रसानुभूति की एकघनता में विक्षेप होता है; ये बाह्य वृत्तियाँ उसमें विघ्नरूप हो जाती हैं, क्योंकि उनके मूल में विक्षोभक अहं स्थित होता है।१ रसानुभव, धर्मानुभव तथा योगानुभव के पारस्परिक सम्बन्ध का परीक्षण करना भारतीय-विचार का प्रिय विषय है तथा भट्ट नायक की, उससे भी अधिक स्पष्टरूप से इसे समझने वाले अभिनवगुप्त के रस-विचार की तो यह एक विशिष्टता है। भारत में चिन्तकों ने अमूर्त विचार को उसकी संकुल आध्यात्मिकता की व्यवस्था के मूर्त साक्षात्कार से कभी अलग किया ही नहीं है। वे सदैव उसे जीवन में आचरित करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। इस दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक अभिगम के फलस्वरूप आगे चलकर उन्होंने वस्तु को मानस प्रत्यय कल्पित किया है। भारतीय चिन्तन पश्चिमी चिन्तन से भिन्न मार्ग पर चला है, फिर भी उसे एक समय यह प्रतीत हुआ कि वस्तु तो ज्ञानरूप है, विचाररूप है और समग्र विश्व अन्ततः तो 'आत्म' पर आधारित है। रस-विचार भी आध्यात्मिक (दार्शनिक) विचारों के अंचल में जन्मा है, विकसित हुआ है अतः रसानुभव और धर्मानुभव के बीच का भेद व उसका अध्ययन करने से वह चूका नहीं है। इस प्रश्न का सर्वप्रथम मुकाबला करने वाले थे-भट्ट नायक। उनके मत में रसानुभूति में भावक आस्वाद्य विषय में विगलित वेद्यान्तर भावेण लीन हो जाता है, अतः उसमें उसका व्यवहार-जीवन उस क्षण-भर के लिए स्थगित हो जाता है; उस अंश में रसानुभव ब्रह्मास्वाद सहोदर है।" किसी भी प्रकार का आनन्द वह दैवी परमानन्द का रूप ही है और वही चिति का प्राण है।4 रसानुभव व्यक्ति- । सम्बन्धों से और व्यावहारिक प्रयोजनों से 'मुक्त होता है अतः वह योगी को प्राप्त परमानन्द का एक प्रकार ही है और तत्कालपर्यन्त वह संसार को निर्वाण में परिवर्तित कर देता है। योगानुभव में आत्मा का पूर्ण साक्षात्कार होने पर दुःख भी सुख बन जाता है, वैसा ही रसानुभव के समय भी देखा जाता है। उसमें भी बहुत तीव्र शोक १. देखिए, पृ० ७२-७३। २. ,, पृ० ४३-६०। ३. ,, पृ० ५७। ४. ", पृ० ४३-४४। ५. ,, पृ० ६६।

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१२६ अभिनव का रस-विवेचन को निर्विध्न चर्दणा में, तन्मयतारूप आनन्द में परिवर्तित कर देने की अद्भुत (जादुई) शक्ति है। दुःख जो रजस् का धर्म है और चांचल्य व अविश्रांति रूप है, उसे रसानुभव में स्थान ही नहीं है, क्योंकि रसानुभव का अर्थ ही विश्रान्ति, निर्वृति तथा सर्व इच्छाओं की परिपूर्ति है।१ अभिनवगुप्त ने भट्ट नायक की व्याख्या स्वीकार की, किन्तु साथ ही उन्होंने रसानुभव और योगानुभव की भेदक रेखा भी स्पष्ट खींच दी। धर्मानुभव में सभी द्न्द्व पूर्णरूप से नष्ट होते हैं। ईश्वर की द्रावक अग्नि में सभी भेद गल जाते हैं। चिति की प्रोज्जवल ज्वाल में चन्द्र, सूर्य, रात-दिवस, शुभ-अशुभ सब भस्म हो जाता है। फिर योगी अपने चित्त की एकघनता में सविकल्प विचार से दूर-दूर अकेला रहता है। परन्तु रसानुभव में भले ही व्यवहार-जीवन के भाव व घटनाएँ रूपान्तरित हुई हों, सदैव बनी रहती हैं। अर्थात् एक तरफ से रसानुभव अपने शुद्ध और सच्चे स्वरूप में सामान्य अनुभव या प्रतीति से भिन्न है और इसलिए बौद्धिक सविकल्प ज्ञान जैसा नहीं है, तो दूसरी तरफ इसके विषय की दृष्टि से सभी व्यक्ति-सम्बन्धों से मुक्त ऐसा व्यवहार-जीवन ही उसका विषय है, अतः रसानुभव भी किसी भी प्रकार के सविकल्प ज्ञानवत् ही है। कला का अर्थ जीवन का अभाव नहीं है-(कलानुभव में जीवन के सभी तत्त्व समाविष्ट हैं)-यह तो जीवन ही है। वह तो केवल सभी विषयों से विमुख व शान्त है। (तत्र सर्वरसानां शान्तप्राय एवास्वादः, विषयेभ्यो विपरिवृत्या।-अभिनव- भारती, खं० १, पृ० ३३९) और भक्ति तो यह चाहती है कि भक्त परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण समर्पण कर दे।१ ईश्वर यों तो सर्वव्यापी है और उसका विचार करने वाला विचार के साथ एक- रूप होता है, फिर भी अभिनवगुप् के मतानुसार योगानुभव के क्षण उससे भिन्न व पर बन जाता है।" योगी का लक्ष्य उस 'पर' तत्त्व से तादात्म्य साधित करना होता है। अतः धार्मिक भक्ति में अपने से बाहर किसी ध्येय के प्रति निरन्तर गति गर्मित है और रसानुभूति तो उससे बिलकुल उलटी ही वस्तु है। रसानुभूति तो पूर्णतः आत्मपर्यास होती है। काव्य भाषा की प्रकृति कैसी होती है ? इस प्रश्न ने ९वीं शती में आनन्दवर्द्धन

१. देखिए, पृ० ६६। २. देखिए, पृ० ७६। ३. 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञादर्शनविवृत्तिविमशिनी', खण्ड १, पृ० २५ पर भक्ति को 'परमेश्वरविषयवै- वेश्यसमावेश रूपा' कहा गया हैं। ४. विमर्श अथवा संवित् स्वयं तो ज्ञाता है, फिर भी वह जब ज्ञान का विषय बनता है, अर्थात् जब संवित् का विचार किया जाता है या उसका ध्यान किया जाता है, तब वह अहं, आत्मा, चिति (संवित्) ईश्वर, परमेश्वर, शिव आदि वा रूप धारण करता है। यह विचार 'ईश्वर- प्रत्यभिज्ञाविवृत्तिविमशिनी' में तथा 'ईश्वरप्रत्यभिश्ञादिवृत्ति', ख० १-५, श्लो० १५-१७ में विस्तार से विवेचित हैं। तुलना कीजिए ई० वि० ख० १, पृ० ५५-५६।

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का ध्यान आकृष्ट किया था। वह अपने योग्य रीति से ही प्रसिद्ध हुए ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' में कुछ ऐसे निर्णय पर पहुँचे थे जिनमें से प्रायः सभी-अल्प अपवादों को छोड़कर- परवर्ती आचार्यों द्वारा स्वीकृत हुए हैं। १५० वर्ष बाद अभिनवगुप्त ने उस ग्रन्थ पर टीका लिखी थी। आनन्दवर्द्धन कहते हैं कि काव्य-भाषा गद्य की व्यवहार-भाषा से भिन्न होती है, वह वाचक में प्रतिघोष व भाव उजागर करती है। संक्षेप में वह रसानुभव कराती है। गद्य ऐसा नहीं करता। वह तो केवल जानकारी व उपदेश ही देता है। गद्य के शब्दों की दो अथवा किन्हीं-किन्हीं के मतों से तीन शक्तियाँ होती हैं जिनमें मुख्य अभिधा होती है तथा वह संकेतित अर्थ का बोध कराती है। रसोद्बोध को तथा वाच्यार्थबोध को एक या अभिन्न नहीं समझा जा सकता। आनन्दवर्द्धन रसानुभूति को एक शक्ति, व्यापार या वृत्ति के रूप में कल्पित करते हैं। वह अकल्पनीय ढंग से और असंलक्ष्यक्रम से एक नवीन अर्थ का बोध कराता है। वह अर्थ वाच्यार्थ से भिन्न होता है। वही रस है। उसे ही इस सम्प्रदाय ने ध्वनि या रसध्वनि ऐसा नाम दे दिया है। अपनी टीका में अभिनवगुप्त रस और शब्द के पारस्परिक सम्बन्ध को समझाते हैं। यह न तो प्रकृति-गोचर कार्य-कारण सम्बन्ध है, न तो ज्ञानशास्त्र में निरूपित ज्ञाप्य-ज्ञापक सम्बन्ध ही। परन्तु वह सम्बन्ध व्यंग्य-व्यंजक सम्बन्ध है। रस कवि के शब्द से न तो उत्पन्न ही होता है, न ज्ञात ही, किन्तु वह तो अभिव्यक्त होता है। इस प्रकार काव्य-शब्द से उत्पन्न या ज्ञात नहीं किन्तु अभिव्यक्त होने वाले रस को अपने पूर्व या पर की किसी स्थिति से कोई लेना-देना (सम्बन्ध) नहीं है किन्तु व्यवहार-जगत् के प्रवाह में वह एक अद्भुत अंगरूप होता है। अभिनव- गुप्त के मतानुसार गद्य शब्द तो केवल जानकारी (ज्ञान) का साधन है। और उसका कार्य पूर्ण हो अर्थात् उसके अर्थ का बोध हो जाने पर उसका कोई उपयोग नहीं होता है। इसके विपरीत काव्य का शब्द तो स्वयं ही साध्य है। एक बार उसे पढ़ा हो अथवा उसका आस्वादन किया हो, फिर भी उसका मूल्य जरा भी कम नहीं होता, वह बिलकुल वैसे का वैसा नया ही रहता है। परम्परा तथा भट्ट नायक के विरुद्ध जाकर अभिनवगुप्त मानते हैं कि कला उपदेश नहीं देती है, अगर देती भी है तो परोक्ष पद्धति से ही देती है एवं भावक की प्रतिभा को अथवा सहृदयता को केवल वर्द्धित करती है। रसानुभव का मुख्य सम्बन्ध भावक के साथ है। उसकी चर्चा के साथ ही भारत में कृतिकार जिस क्षण अपनी कृति में प्राण फूँकता है, उस सृजन-क्षण का भी विचार लगा हुआ है। काव्योत्पत्ति का विचार करने वाले आचार्यों में आनन्दवर्द्धन, भट्ट तौत और अभिनवगुप्त तीन मुख्य हैं। आनन्दवर्द्धन कहते हैं : 'अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः। यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥' "अपार काव्य-संसार में कवि ही एक प्रजापति है। उसे जैसा रुचता है, वैसा सब कुछ पलट जाता है।" कवि तो ऋषि भी हो सकता है और वर्णनानिपुण भी होता है।

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१२८ अभिनव का रस-विवेचन वस्तुतः तो रस कवि में ही रहा होता है। वह उसकी साधारणीभूत संवित् होती है।१ कवि जब रस से लबालब भर जाता है तब पानी से भरे हुए घड़े की तरह काव्य के रूप में वह छलक जाता है जिस प्रकार भावावेश के समय अभावित उद्गार होते हैं वैसे। इसका अर्थ यह है कि काव्य कवि के अन्तर्गत साधारणीभूत भाव का अर्थात् स्थल-काल तथा व्यक्तिरहित भाव का अव्यवहित उच्चार है। इसमें लौकिक लाभ- अलाभ का कोई स्थान नहीं है। कवि में स्थित संस्काररूप प्रतिभा के बल पर वह प्रकट होता है।१ यही साधारणीभाव काव्य में व्यक्त होता है तथा व्यक्त होने के बाद वह नट में या पाठक में एवं प्रेक्षक में संक्रमित होता है।1 वह कवि-हृदय में जन्म लेता है, नट में खिलता है और भावक में फलता है।4 इस प्रकार काव्यनाट्य के भावन में वस्तुतः तीनों मिल कर एक भावक बन जाते हैं तथा इन तीनों का अनुभव एक ही होता है।१ अभिनव-परवर्ती कतिपय आचार्यों ने कहा है कि सृजन का क्षण केवल आनन्द का क्षण नहीं होता, उसमें चिन्ता, श्रमादि भी होते हैं। इस प्रकार वे सृजन-प्रक्रिया के दो विभाग कर देते हैं : प्रथम भूमिका में कवि सृजन को थका दे ऐसी प्रवृत्ति में लीन होता है, दूसरी में वह स्वयं मानो अपने आपसे अलग निकल कर अपनी ही कृति का भावकवत् आस्वादन करता है।" १. 'कविगतसाधारणीभूतसंविन्मूलश्च काव्यपुरःसरो नटव्यापार, सैव च संवित् परमार्थतो रसः ।' अभिनवभारती, खं० १, पृ० २९४।

८६, अभिनवगुप्त कहते हैं कि कविता तो रससमुच्चलनस्वभावा-होती है। (ध्वन्यालोक, पृ० ८७) वहीं अभिनवगुप्त ने भट्टनायक का एक श्लोक उद्धृत किया है-यावत्पूर्णों न चैतेन तावन्नैव वमत्यमुम्।' ३. अभिनवभारती, खं० १, पृ० ३४५ पर कहा है कि 'कवेः वर्णनानिपुणस्य यः (भावो) अन्त- र्गतोऽनादिप्राक्तनसंस्कारप्रतिभानमयो, न तु लौविकविषयजो देशकालादिभेदाभावात् सर्व- साधारणीभावेनास्वादयोग्यस्तं भावयन् आस्वादयोग्यी कुर्वन्' ... पाठ सन्दिग्ध है। (तुलना कीजिए, ध्वन्यालोक, पृ० ४९८)। ४. अभिनवभारती, खं० २, पृ० ३३९ पर अभिनवगुप्त कहते हैं कि सहृदयत्व अर्थात् कवि के हृदय के साथ तादात्म्य साधने की शक्ति। कविहृदयतादात्म्यापत्तियोग्यता। ५. अभिनवभारती, खं० १, पृ० २९४ : 'ततोवृक्षस्थानीयं काव्यम्। तत्र पुष्पादिस्थानीयाऽभि- नयादि नटव्यापारः। तत्र फल स्थानीयः सामाजिक रसास्वादः। ६. भट्ट तौत का अभिनवगुप्त द्वारा 'ध्वन्यालोक-लोचन' में उद्धृत श्लोक देखिए :- 'नायकस्य कवेः श्रोतुः समानोऽनुभवस्ततः।' पृ० ९२। ७. हेमचन्द्र विवेक मैं पृ० ४ पर कहते हैं- 'कवेरपि भावकावस्थायामेव रसास्वादः सम्पद्यते पृथगेव हि कवित्वाद्भावकत्वम्। माणिक्यचन्द्र कहते हैं (पृ० ७) कि सृजन के क्षणों में कवि काव्यार्थ की चिन्ता में लीन होता है [ काव्यार्थ चिन्तन पर ] यह विचार ठेठ अभिनवगुप्त तक पहुँच गया ऐसा

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भाव को स्थलकालादि से मुक्त कर रस में रूपान्तरित करनेवाली शक्ति, प्रतिभा है। प्रतिभा ही चिति, आत्मा है। अधिकांश व्यक्तियों में वह स्थलकाल की तथा व्यवहार के सम्बन्धों की मर्यादा के बन्धनों में से अपने को मुक्त कर नहीं पाती, परन्तु कवि में वह शुद्ध तेज (प्रकाश) के रूप में प्रकाशमान होती है और योगियां में तो अपने सम्पूर्ण तेज से प्रकाशित हो उठती है।१ कलाकृति का सृजन एक नये विश्व के सृजन के सदश है जो कवि की प्रतिभा में एकदम खिल उठता है। यह सर्जक प्रतिभा ही परावाक् वही अचेतन पदार्थों को चेतनायुक्त तथा चेतन पदार्थों को अचेतन बना देती है। वह नवनवोन्मेष का अक्षय भण्डार तथा उद्भव स्थान है।१ और उसके द्वारा सर्जित रूप संसार के रूपों की तुलना में जरा भी कम सत्य नहीं होते, भले ही भिन्न भूमिका पर हों। इस दृष्टि से विचार करने पर कवि-प्रतिभा विश्व-प्रतिभा का ही एक तत्त्व है। यह विश्व-प्रतिभा ही विश्व का सृजन करती है और उसे निरन्तर नवीन रूप प्रदान करती रहती है।" हेमचंद्र ने बहुधा भट्ट तौत के ही तीन श्लोक उद्धृत किये हैं जिनमें. यथा यथा चाकृतकं तद्रूपमतिरिच्यते। तथा तथा चमतकारतारतम्यं विभाव्यते॥ मानना-नितान्त उपेक्षणीय नहीं है। (उसने अपने ग्रन्थ 'काव्य कौतुक विवरण' में इसकी चर्चा की हो ऐसा सम्भव है; किन्तु वह ग्रंथ आज अनुपलब्ध है। इसमें सृजन की पूर्ण चर्चा की गयी थी।) ध्वन्यालोक में पृ० ९६ पर अभिनव गुप्त कहते हैं कि कवि किसी लौकिक भाव के वशीभूत नहीं होता। अतः वह दुःखानुभव करता नहीं होता; किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह सृजन प्रयत्न की चिन्ता से व्यग्र नहीं है। १. यह विचार तंत्रालोक में खं० ११, पृ० ६०-६२ पर व्यकत किया गया है। २. तुलना कीजिए, ध्वन्यालोक, पृ० ४९८ भावानचेतनानपि चेतनवच्चेतनानचेतनवत्। व्यवहारयति यथेष्टं सुकविः काव्ये स्वतन्त्रया।। ३. भट्ट तौत ने प्रतिभा की परिभाषा एक अति प्रसिद्ध श्लोक मैं इस प्रकार दी है। 'प्रज्ञा नव- नवोन्मेष शालिनी प्रतिभामता।' प्रतिभा एक प्रकार की प्रज्ञा है। प्रज्ञा और प्रतिभा का सामान्य अर्थ भविष्य वा एकदम होने वाला ज्ञान है। जैसा कि 'कल मेरा भाई मुझसे मिलेगा' ... आदि। राजशेखर तीन प्रकार की बुद्धि बतलाते हैं। भूतकालीन अर्थ की स्मृति देने वाली-स्मृति, वर्तमान का चिन्तन करानेवाली मति और अनागत का विशेष ज्ञान करानेवाली प्रज्ञा (काव्य मीमांसा-४) काव्यप्रतिभा प्रत्यक्षकल्प होती है। और वह निविंकल्प होती है। ४. आनन्दवर्द्धन, ध्वन्यालोक, पृ० ९१ पर कहते हैं कि कविप्रतिभा का विशेष प्रकार (प्रतिभा- विशेषम्) है। उस पर अभिनव टीका करते हुए कहते हैं 'प्रतिभा' अपूर्व वस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा; तस्या 'विशेषो' रसावेश वैशद्यसौन्दर्य काव्यनिर्माण क्षमत्वम्।' शैव दर्शन मैं प्रतिभा को सर्जक विसर्ग कहा गया है। तन्त्रालोक खं० ५, पृ० ४३२ पर कहा गया है-विसर्गानन्द- धारया। सिक्तं तदेव सदविश्वं शश्वन्नवनवायते॥ ९

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आद्यमयीय वर्णान्तर्निमग्ने चोत्तरोत्तरे। संकेते पूर्वं पूर्वाशमज्जने प्रतिभाभिद:॥ आद्योद्रेक महत्वेऽपि प्रतिभात्मनि निष्ठितः। ध्रुवं कवित्ववक्तृत्वशालितां यान्तिसर्वतः ।। यावद्धामनि संकेत निकारकलनोज्झिते। विश्रान्तश्चिन्मये किं किं न वेत्ति न करोति च।। सर्जक प्रतिभा तथा बुद्धि के बीच का भेद तथा उनकी विशेषताएँ स्पष्ट की गयी हैं।' इन श्लोकों में ज्ञान को दो प्रकार का बताया गया है-१. बुद्धिगम्य अर्थात् विकल्प गोचर ज्ञान, सामान्य विषयक ज्ञान तथा २. विशेष विषयक ज्ञान, जो बुद्धि व्यापार के पूर्व उत्पन्न होता है और भाषा के क्षेत्र के बाहर की चीज है। अन्तिम श्लोक में कहा है कि प्रत्यक्ष का विषय विशेष है और वही प्रतिभाशील सत्कवियों की वाणी का विषय होता है। इस प्रकार प्रतिभा एक प्रकार की साक्षारात्मक प्रज्ञा है और कवि जब रचना के पूर्व की खोज में तथा श्रम में डूबा होता है तब वस्तु के स्वरूप लक्षण के स्पर्श से वह एकदम प्रगटित हो उठती है। अर्थात् उसमें मन का व्यापार होता नहीं है। योगचिन्तन के क्षेत्र से उधार उपमा लेकर कवि-प्रतिभा को शिव का तृतीय नेत्र कहा गया है। इससे कवि त्रिकालवर्ती पदार्थों का बुद्धि की सहायता के बिना ही साक्षात्कार कर सकता है।२ न्याय की तथा व्यवहार की भाषा वस्तु तथा हमारी चिति के बीच व्यवधान रूप बन जाती है। काव्य की तथा व्यवहार की भाषा के बीच अन्तर यह है कि काव्य की भाषा में ये भूमिकाएँ होती ही नहीं हैं; और इससे उस वस्तु का स्वरूप विकल्प ज्ञान में बँधने के पूर्व ही उसका साक्षात्कार करती है। इस अर्थ में काव्य की भाषा सहजोद्गारों के सदृश काकुवत् या मंत्रवत् होती है।१ १. विवेक, पृ० ३८० : उच्यते वस्तुनस्तावद् द्वैरूप्यमिह विद्यते। तत्रैकमत्र सामान्यं यद् विकल्पैकगोचरः॥ स एव सर्वशब्दानां विषयः परिकीर्तितः । अतएवाभिधेयं ते ध्यामलं बोधयन्त्यलम्।। विशिष्टमस्य यद्रपं तत्प्रत्यक्षगोचरः। स एव सत्कविगिरां गोचरः प्रतिभाभुवम्॥ २. हेमचन्द्र विवेक, पृ० ३८०: रसानुगुण शब्दार्थचिन्तारित्तमित चेतसः क्षणं स्वरूपस्यर्शोत्था प्रज्ञैव प्रतिभा कवेः। साहि चक्षुर्भगवतस्तृतीयमिति गीयते। येन साक्षात्करोत्येष भावस्त्रैलोक्यवर्तिनः॥ ३. परात्रिंशिका विवरण, पृ० २०२ पर अभिनव गुप्त कहते हैं :- एता एव हि (स्वराः) चित्तवृत्तिसूचका नादात्मकाः करुण शृंगार शान्तादिकां चित्त-

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परिशिष्ट १३१

अभिनव गुप्त के बाद भी आज तक रस शास्त्र का अध्ययन भारत में चालू रहा है; किन्तु इसमें कोई नवीन सर्जक परिबल (तत्व) प्रगट नहीं हुआ। आनन्दवर्द्धन, भट्ट तौत और अभिनव ही अधिक से-अधिक विशेषता रखने वाले विचारक हैं। कभी-कभी अनिश्चित तथा युक्ति-पूर्ण प्रतीत होने पर भी अभिनव गुप्त कतिपय ऐसे निर्णयों पर पहुँचे हैं, जो आज भी प्रामाप्य तथा पश्चिमी चिन्तन के लिए भी नवीन प्रतीत हों ऐसे हैं। पश्चिम में कान्ट द्वारा स्थापित यह दर्शन कि कला व्यावहारिक लाभालभ से परे तथा आत्मा की प्रवृत्ति है, भारत में ठेठ दशवीं शती में चर्चा (विवेचन) का विषय बन चुका था। अभिनव गुप्त तथा आनन्दवर्द्धन कहते हैं कि काव्य तो निर्वाण है। वह आज है और सदैव रहेगा। प्रेम की भाँति उसने मानव- हृदय को नये व स्पंदनशील जीवन से चेतनायुक्त बना दिया है तथा बनाता रहेगा। वह मानव प्रकृति का आवश्यक व स्वतन्त्र अंश है और कवि गण उसके स्रोत में से ग्रहण करते हुए कभी रुकने वाले नहीं हैं। वह केवल अधिक-से-अधिक शुद्ध व नये- नये अनुभवों से समृद्ध होता रहेगा ।

वृत्तिमाक्रन्दन चाटुकस्तुत्यादौ केवला वा योनिवर्णननिविष्टा वा तिर्यक् तत्तहदर्जातादिश्वपि प्रथमत एवापतन्तः संकेत विध्नादि नैरपेक्ष्येनैव संविदासन्न वर्तित्वात्स्वर काक्वादिरूपता मश्नुवाना: प्रकाशयन्ति । * 'The Aesthetic Experience According to Abhinava Gupta'- की प्रस्नावना।

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रसाभास : उसका स्वरूप और काव्य में स्थान मैंने आज अपने व्याख्यान के लिए 'रसाभास : उसका स्वरूप और काव्य में स्थान' विषय चुना है। पहले मैं यह बताने का प्रयत्न करूँगा कि प्राचीन शास्त्रकारों के मतानुसार रसाभास का स्वरूप कैसा है और उन्होंने काव्य में उसे क्या स्थान दिया है ? बाद में श्री विष्णुभाई, श्री ज्योतीन्द्र दवे और श्री मांकड के लेखों से उत्पन्न कुछ मुद्दों की चर्चा करूँगा। ध्वन्यालोक में रसाभास आप सभी जानते ही हैं कि आनन्दवर्द्धन ने अपने ग्रंथ ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत में ध्वनि की स्थापना करके उसके दो प्रकार बताये हैं : १. अविवक्षितवाच्य ध्वनि और २. विवक्षितअन्यपरवाच्य ध्वनि। इसके बाद दूसरे उद्योत में इन दोनों के प्रभेदों को दर्शाया है। इनमें अविवक्षितवाच्य के दो भेद-१. अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और २. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य हैं। बाद में विवक्षितअन्यपरवाच्य के प्रभेदों को बताते हुए वह कहता है : इसके दो प्रभेद हैं-१. असंलक्ष्यक्रम और २. संलक्ष्यक्रम। इसके बाद वह तीसरी कारिका में कहता है कि- 'रस, भाव, उसका आभास तथा उसकी प्रशान्ति आदि रूप व्यंग्यार्थ जब अंगी भाव में प्रकट हो तब उसे असंलक्ष्यक्रम ध्वनि कहा जाएगा।' अभिनव प्रदत्त इसकी स्पष्टता ध्वन्यालोक की कारिका अथवा वृत्ति-इनमें से किसी में भी रसाभास का स्वरूप समझाया नहीं गया है। किन्तु इस कारिका की लोचन टीका में अभिनव गुप ने कहा है कि- यदा तु विभावाभासाद्वत्याभासोदयस्तदा विभावानुभासाच्चर्वणाभास इति रसाभासस्य विषयः ।-पृ० १७७-८ 'अर्थात् जब विभावाभास से रत्याभास का उदय होता है तब विभावानुभास से चर्वणाभास होता है और वह रसाभास का विषय माना गया है।' वह आगे कहता है : 'जिस प्रकार रावण का काव्य सुन कर शृंगाराभास की प्रतीति होती है ... यहाँ स्थायिभाव ही नहीं-इस प्रकार की अगर कोई आपत्ति उठाये तो उसका उत्तर है कि यहाँ परस्पर आस्थाबन्ध का अभाव है, अतः यह कौन कहता है कि यहाँ स्थायि- भाव है ? यह तो रत्याभास है। यहाँ आभासत्व इसलिए है कि सीता मेरी उपेक्षा करती है अथवा मुझसे द्वेष करती है, इस प्रकार की प्रतिपत्ति रावण के हृदय को स्पर्श नहीं करती और अगर स्पर्श कर जाय, तो उसकी भी अभिलाषा विलीन हो जाय।

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दूसरे, रावण के मन का यह निश्चय कि सीता मुझमें अनुरक्त है, व्यर्थ है क्योंकि वह कामजन्य मोह से जन्मा है। इसलिए यहाँ वस्तुतः तो शृंगार का आभास है- शुक्ति में रजत के आभास के समान।' अगर इससे हम कोई परिणाम निकालना चाहें तो पता चलेगा कि शंगार रस के विभाव अर्थात् आलम्बन विभाव बनने के लिए दोनों पात्रों में एक-दूसरे के प्रति आस्थाबन्ध होना आवश्यक है। इसके अभाव में आलम्बन विभाव हो ही नहीं सकता। यहाँ सीता के मन में रावण के प्रति आस्था नहीं है, अतः सीता रावण के लिए आलम्बन विभाव नहीं बन सकती। रावण सीता के प्रति आसक्त है इसीलिए वह सीता को अपना आलम्बन मान बैठता है और इससे जो चर्वणा उत्पन्न होती है वह वास्तविक चर्वणा नहीं, पर चर्वणाभास मानी जायेगी। इसलिए यहाँ शृंगार की नहीं अपितु शृंगाराभास की प्रतीति होती है। यह तो मत अभिनव गुप् का हुआ। सम्मट का निरूपण अब हम मम्मट का निरूपण देखेंगे। मम्मट काव्यप्रकाश के प्रथम उल्लास में काव्य के उत्तम, मध्यम और अधम ऐसे तीन भेद करता है और उन्हें क्रमशः ध्वनि, गुणीभूतव्यंग्य और चित्र नाम प्रदान करता है। द्वितीय और तृतीय उल्लासों में शब्दशक्तियों का निरूपण कर चौथे उल्लास में ध्वनिरूप उत्तम काव्य के भेद समझाता है। वह भी आनन्दवर्द्वन का अनुसरण कर १. अविवक्षितवाच्य और २. अविवक्षित- अन्यपरवाच्य नामक सुख्य दो भेद करता है और बाद में इनके भी, आनन्दवर्द्धन का अनुसरण कर, दो-दो प्रभेद दर्शाता है। बाद में आनन्दवर्द्न की कारिका के ही शब्दों में ४२वें सूत्र में यह बताता है कि असंलक्ष्याक्रमव्यंग्य में किस-किस का समावेश होता है : रसभावतदाभासभावशान्तयादिरक्रमः अर्थात् रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशान्ति आदि का समावेश अक्रम में होता है। इसके बाद वह रस को स्पष्ट करता है और बाद में भाव को स्पष्ट करता है और तत्पश्चात् ४९वें सूत्र में रसाभास और भावाभास को स्पष्ट करता है। वह इस प्रकार है: तदाभासा अनौचित्यप्रवर्तिताः । यहाँ 'तदाभासा' अर्थात् रसाभास और भावाभास। अर्थात् अनौचित्य से प्रवर्तित होने पर रस रसाभास और भाव भावाभास होंगे। अभिनव गुप्त का कथन है कि विभाव के आभास से रसाभास और भावाभास जन्म लेते हैं, उसके स्थान पर यहाँ यह कहा गया है कि अनौचित्य से प्रवर्तित होने पर रसाभास और भावाभास जन्म लेते हैं। इसको व्याख्या के बाद में आने वाले हेमचन्द्र ने आंशिक रूप में और विश्वनाथ तथा जगन्नाथ ने पूर्णरूप से स्वीकार कर लिया है।

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१३४ अभिनव का रस-विवेचन इस व्याख्या में महत्त्वपूर्ण शब्द है अनौचित्य। काव्यप्रकाश की उद्योत टीका में लिखा है : अनौचित्यं च सहृदयव्यवहारतो ज्ञेयम् यत्र तेषाम् अनुचितमितिधीः। अनौचित्य किस प्रकार जाना जाय ?- सहृदय के व्यवहार से। जहाँ उसे प्रतीत हो कि यहाँ अनौचित्य है, वहाँ अनौचित्य मान लिया जाय। इसी बात को वामनाचार्य ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है : अनौचित्यं हि शासत्रलोकातिकमात् प्रतिषिद्धविषयकत्वादिरूपं सामाजिकवेद्यम्। अर्थात् शास्त्र और लोक का अतिक्रमण करके प्रतिषिद्ध विषय के प्रति हुआ कोई भाव का निरूपण जब सामाजिक को अनुचित लगता है तब उसे अनौचित्य कहा जाएगा। काव्यप्रकाश की काव्यादर्श-संकेत टीका में कहा गया है कि अन्योन्यानुरागाद्य- भावेनानौचित्यम्। अर्थात् अन्योन्य अनुराग के अभावादि के कारण अनौचित्य जन्म लेता है। इस प्रकार वह अभिनव गुप्त के आशय को ही इसमें से भी फलिति करता है। मम्मट ने रसाभास का एक और भावाभास का एक, इस प्रकार दो ही उदाहरण दिए हैं। प्रथम उदाहरण में अनेक कामुक विषयक अभिलाषाएँ हैं और बलात् आलिंगन करने का वर्णन है, अतः शास्त्र और लोक का अतिक्रमण होने के कारण रसाभास प्रतीत होता है। दूसरे उदाहरण में रावण का सीता के प्रति चिन्तारूपी व्यभिचारी भाव मुख्यतः व्यक्त हुआ है। यहाँ टीकाकार कहता है कि इस मामले में अनौचित्य इसलिए है कि पहले स्त्री का अनुराग बताना चाहिए और उसके बाद उसके इंगित पर पुरुष का। यहाँ इससे विपरीत ही है अर्थात् स्त्री के अनुराग वर्णन के पूर्व ही पुरुष का अनुराग-वर्णन कर दिया गया है। इसका अर्थ हुआ अनुरागहीन स्त्री के प्रति अनुराग-वर्णन, परिणामतः अनौचित्य का प्रवेश हुआ है। व्यभिचारी मुख्यतः व्यंग्य होने के कारण जिस भाव की प्रतीति होनी चाहिए उसके स्थान पर भावाभास की होती है। यहाँ अनुभयनिष्ठरति होने के कारण भावाभास है, हम यह भी कह सकते हैं। इसकी चर्चा यहाँ शुद्ध काव्य-दृष्टि नहीं पर लौकिक आचार के मानदण्ड भी काव्य-विचार में प्रवेश करते हुए दिखायी देते हैं। अभिनव गुप्त ने तो केवल काव्य की दृष्टि से ही रसाभास का निरूपण किया था : यदि विभाव वास्तविक सत्य न हों, केवल आभास- रूप हों, तो अनुभाव भी आभासरूप ही होंगे और अन्ततः जो चर्वणा होगी वह भी वास्तविक चर्वणा न होकर चर्वणाभास ही होगा और इस प्रकार वहाँ रस की नहीं, पर रसाभास की प्रतीति होगी। मम्मट ने जो उदाहरण दिए हैं उन दोनों में हम देखते हैं कि बहुनायकविषया रति में रति के उत्कर्ष के लिए जिस प्रकार के विभाव की आवश्यकता है वैसा न होने

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के कारण वह विभावाभास है और अनुभयनिष्ठ रति में उत्कर्ष के अनुकूल परिस्थि- तियाँ नहीं होतीं, अतः वहाँ भी विभावाभास है और परिणामतः जो प्रतीति होती है वह रस या भाव की नहीं पर उसके आभास की होती है। इस प्रकार मम्मट द्वारा प्रस्तुत दोनों उदाहरणों को हम केवल काव्य-दृष्टि से ही समझा सकते हैं और यह भी कह सकते हैं कि इसमें लोकाचार की दृष्टि से उचित-अनुचित का बाह्य विचार समाविष्ट नहीं है। अनौचित्य की गणना अब हम लोग आगे बढ़ें। टीकाकार अनौचित्य की गणना करते समय इसके अतिरिक्त वस्तुओं को भी गिनाते हैं जिन्हें हमें देखना चाहिए। उपनायकसंस्थायां मुनिगुरुपत्नीगतायां च। बहुनायकविषयायां रतौ तथानुभयनिष्ठायाम्॥ आभासत्वं कथितं तथैव तिर्यगादिविषयतायाम्। उपनायक यानी जारगत, मुनिगुरुपत्नीगत, बहुनायकविषया और अनुभयनिष्ठ तथा तिर्यगादि विषया रति जहाँ होती है वहाँ आभास दिखायी देता है। इसी प्रकार दूसरे रसों में भी अनौचित्य को समझने की बात कह कर इस मामले में भी थोड़ा-बहुत दिशा-निर्देश किया गया है, वह इस प्रकार है : गुरु आदि को लेकर हास, वीतरागादि को लेकर करुण, माँ-बाप आदि को लेकर रौद्र व वीर, वीर को लेकर भयानक, यज्ञ-पशु के रक्त-मांस-चरबी को लेकर बीभत्स, ऐन्द्रजालिक आदि को लेकर अन्भुत और चाण्डालादि को लेकर शान्त रस का निरूपण होने से आभास माना जाता है। अनौचित्य के जगन्नाथ द्वारा स्वीकृत तीन प्रकार विश्वनाथ के साहित्यदर्पण में यह सूची इससे भी अधिक लम्बी है। जगन्नाथ' ने रति के मामले में तीन ही प्रकार के अनौचित्य रवीकार किए हैं जो इस प्रकार हैं : १. अनुचित विभाव के होने पर २. स्त्री की बहुविषयक रति होने पर ३. अनुभयनिष्ठ रति होने पर इसमें प्रथम प्रकार के उदाहरण के रूप में जो श्लोक दिया गया है उसमें राजा का कोई नौकर अनेक कष्ट सहन कर रानी के शयनागार में प्रवेश करता है। वहाँ सुधाफेनधवल पुष्प के बिछौने पर रानी को सोता हुआ देखकर उसे १. इत्थं चानुचितविभावालम्बनाया बहुनायकविषयाया अनुभयनिष्ठायाश्च संग्रह इति।-पृ० ९९। पुरुष को अनेक स्त्रियाँ रखने की छूट थी, अतः यहाँ बहुविषयक रति का उल्लेख केवल स्त्रियों के विषय में ही किया गया है।

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१३६ अभिनव का रस-विवेचन जगाता है और चकितनयना स्मरमुखी तरुणी का प्रबल श्वासोच्द्वासपूर्वक आलिंगन करता है।१ यहाँ रानी नौकर के लिए अगम्या है, इसलिए कहा गया है कि यह अनुचित विभाव है। अनौचित्य-विचार अनौचित्य के इन सभी उदाहरणों को देखने पर यह प्रतीत हुए बिना नहीं रहता कि इन सब की पृष्ठभूमि में सामाजिक लोकाचार अथवा प्राचीन परिभाषा का प्रयोग करें तो शास्त्र और लोक एक मुख्य बल है। इस पर भी मैं आपसे इस विषय पर इस प्रकार विचार करने की विनती करता हूँ : लोगों में जिस-तिस काल और जिस-तिस स्थल में जो आचार सर्वसम्मति से सम्पूर्ण समाज में प्रतिष्ठित हो गया है, उसका प्रभाव उस समय के तथा देश के सहृदयों के चित्त पर होता भी है या नहीं ? अगर होता है तो इस प्रकार के संस्कार वाले सहृदय को अपने इन संस्कारों के विरुद्ध हुआ निरूपण अनुचित लगता है या नहीं ? केवल तात्विक दृष्टि से तो शृंगार का निरूपण किसी भी एक स्त्री और किसी भी एक पुरुष को आलम्बन मान कर किया जा सकता है, पर पिता-पुत्री के बीच का शृंगार सहृदय को अनुचित तो लगेगा ही। इस पर भी, यह उचितानुचित सम्बन्धी धारणा एक ही समय में अलग-अलग देशों में अथवा समाज में भिन्न-भिन्न हो सकती है अथवा अलग-अलग समयों में एक ही देश अथवा समाज में भिन्न-भिन्न हो सकती है। इसे स्वीकारने पर भी काव्य को लेकर औचित्य-अनौचित्य का विचार करना ही पड़ता है, इसे अस्वीकृत नहीं किया जा सकता। अगर इतनी बात स्वीकार कर लें तो यह प्रतीत हुए बिना नहीं रहेगा कि प्राचीन शास्त्रकारों ने यह वस्तु उदारतम रूप में, अर्थात् त्रिकालाबाधित रूप में प्रस्तुत की है। उन्होंने इतना ही कहा है कि जहाँ रस अथवा भाव अनुचित रूप से प्रवर्तित हुआ है वहाँ रसाभास अथवा भावाभास की प्रतीति होती है और इसका निर्णय भी सहृदय ही करता है। अर्थात् एक ही काव्य में भिन्न-भिन्न संस्कार वाले सहृदयों में से किसी को रस की, तो किसी को रसाभास की प्रतीति होगी। यहाँ हमें इतना याद रखना चाहिए कि रस और रसाभास के कारण काव्य में उच्चावचता नहीं आती। जहाँ रस प्रतीत होता है और जहाँ रसाभास प्रतीत होता है-ये दोनों ही उत्तम काव्य १. शतेनोपायानां कथमपि गतः सौधशिखरम्। सुधाफेनस्वच्छे रहसि शयितां पुष्पशयने। विबोध्य क्षामांगी चकितनयनां स्मेरवदनाम् सनिः श्वासं श्लिष्यत्यहह सुकृती राजरमणीम्। २. शृंगारतिलक के अनुसार अगम्य स्त्रियों की सूची : : संबंधिमित्रद्विजराजहीनवर्णाधिकानां प्रमदा न गम्याः । व्यंग्यस्तथा प्रव्रजिता विभिन्नमंत्राश्चधर्मार्थमनोभवज्ञैः ॥

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माने जायेंगे। कारण कि चर्वणा तो दोनों में ही होती है, मात्र रसाभास के बारे में चर्वणा के बाद कुछ अनौचित्य लगता है जिससे वह इस अनुभव को रसाभास कहता है। इस सम्बन्ध में वामनाचार्य के वचन खूब द्योतक हैं। वह लिखता है : रसानौचित्यस्य रसावगमोत्तरमेव अवगमात् आभासताप्रयोजकता एव। रस के अनौचित्य का बोध रसावगमन के बाद ही होने के कारण अनौचित्य की वजह से आभास है, हम इतना भर कहते ही हैं अन्यथा यह अनौचित्य वाच्यवाचक के अनौचित्य की भाँति रस-भंग का कारण नहीं बनता। न वाच्यवाचकानौच्यिवतू रसभंगहेतुता इति बोध्यम्।-पृ० १२२-३ हेमचन्द्र का निरूपण किन्तु मैं थोड़ा आगे निकल गया था। मम्मट के बाद हेमचन्द्र आता है। उसने रसाभास आदि की व्याख्या तनिक अलग ही की है और अलग-अलग दो सूत्रों में इसका निरूपण किया है। वह ८०वें सूत्र में कहता है : निरिन्द्रियेषु तिर्यगादिषु चारोपात् रसाभावाभासौ। ५४। अर्थात् निरिन्द्रियों में अथवा वृक्ष, लता, मेघ, विद्युत, नदी, सागर, चन्द्र, रात्रि आदि में और तिर्यगादि में भाव का आरोप करने से रसाभास और भावाभास जन्म लेते हैं। इसके उदाहरण हैं : पर्याप्तपुष्पस्तबकस्तनीभ्यः स्फुरत्प्रवालौष्ठमनोहराभ्यः । लतावधूभ्यस्तरवोऽप्यवापुर्विनम्रशाखाभुजबन्धनानि ।। यहाँ लता और वृक्षों में सम्भोग का आरोपण है। मधुद्विरेफ: कुसुमैकपात्रे पपौ प्रियां स्वामनुवर्तमानः । शृंगेण संस्पर्शनिमीलिताक्षीं मृगीमकंडूयत कृष्णसारः॥ यहाँ मृग-मृगी और भ्रमर-भ्रमरी में सम्मोग का आरोपण है। हेमचन्द्र की यह व्याख्या हमें रस्किन की असत्य भावारोपण की याद दिलाती है। जिनमें मानव-भाव सम्भव नहीं है उनमें इनका आरोपण करना मात्र आभास ही है और इसलिए यहाँ वृक्ष-लता और भ्रमर-भ्रमरी में कल्पित या आरोपित सम्भोग को सम्भोगाभास कहा गया है। पर, इस मत का जो विरोध हुआ था, उसकी चर्चा आगे आयेगी। तदुपरान्त ८१वें सूत्र में वह कहता है : अनौचित्याच्च। ५५। अनौचित्य से भी आभास जन्म लेता है और वृत्ति में इसकी स्पष्टता करता हुआ कहता है : अन्योन्यानुरागाद्यभावेन अनौचित्यात् रसभावाभासौ। अर्थात् अन्योन्य अनुरागादि के अभाव के कारण प्रविष्ट अनौचित्य से रसाभास,

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१३८ अभिनव का रस-विवेचन भावाभास प्रतीत होता है। इसके बाद उसने रावण की सीता के प्रति रति का और अनेक कामुकविषय अभिलाषा का-इस प्रकार उपर्युक्त दो उदाहरण दिए हैं। यहाँ एक भेद समझ लेना आवश्यक है। हेमचन्द्र ने तिर्यगों की रति को जो आभास कहा है उसमें और उपर्युक्त सूची में वर्णित तिर्यगादिविषया रति को जो आभास कहा है उसमें एकत्व नहीं है। इस सूची में तिर्यगादि में तिर्यंग, मलेच्छ, हीन पात्र आदि समाविष्ट हैं। इसलिए वहाँ अर्थ इस प्रकार होता है कि किसी आर्य स्त्री की मलेच्छ के प्रति अथवा किसी उत्तम स्त्री की हीन पात्र के प्रति रति अनुचित विभाव के कारण आभास मानी जायेगी। किसी मलेच्छ स्त्री की मलेच्छ पुरुष के प्रति रति में कुछ भी अनौचित्य नहीं है; किसी भील-स्त्री की किसी भील के प्रति रति में कुछ भी अनौचित्य नहीं है। अर्थात् इन सभी स्थलों पर उच्च पात्र की नीच विषया, मलेच्छ- विषया, तिर्यगविषया रति ही अर्थ लिया जाना चाहिए और कपोत-कपोती या चक्रवाक-चकवी का शृंगार अनुचित नहीं मानना चाहिए। मम्मट ने स्वयं 'काव्य- प्रकाश' में तिर्यगादि पर आधृत भयानक रस को निरूपित करने वाला दृष्टान्त दिया है : 'ग्रीवाभंगाभिरामम्०' और तिर्यंगविषयक विप्रलम्भ का भी उदाहरण दिया है : 'मित्रे क्वापि गते०।' पर, इस दृष्टि से शकुन्तला का वृक्षलता अथवा हरिणों के प्रति प्रेम आभास ही माना जाएगा। विश्वनाथ का मत हेमचन्द्र के पश्चात् 'साहित्यदर्पणकार' विश्वनाथ को देखें। उसने रसाभास की व्याख्या मम्मट की भाँति ही दी है : अनौचित्यप्रवृतत्व आभासो रसभावयोः । और फिर लोकशास्त्रादि विरुद्धत्व के रूप में ही अनौचित्य का अर्थ देता है। इस पर - भी चर्चा के अन्त में वह यह निष्कर्ष निकालता है कि 'अनुचितविभावालंबनंरसाभास- त्वम्। अनुचितविषयत्वं भावाभासत्वम्।' अर्थात् अनुचित विभाव पर आधृत जहाँ रसनिष्पत्ति होती हो वहाँ रसाभास और अनुचित विषय में जहाँ भावनिष्पत्ति होती हो वहाँ भावाभास होता है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने ऊपर जो तिर्यगादिविषया रति का अर्थ दिया है उसे 'साहित्य-दर्पण' की टीका में दिए गए शरृंगार रस सम्बन्धी निम्न वचनों से समर्थन मिलता है : तद्वत् अनुरागे अधमपान्रे असत्कुलजातकिरातादिनी च नायके तथा तिर्यंगादौ मनुजेतरजन्तुषु तापसादो च गते विद्यमाने सति शंगारे अनौचित्यम्, तेषाम् नायक- लक्षणाभावेन अनुरागतत्वज्ञानासमर्थत्वात्। यहाँ ये सब पात्र नायक के लक्षणधारक नहीं हैं, इस प्रकार कहा गया है और यह भी बताया गया है कि इसके मूल में अनुराग तत्त्व के समर्थन का अभाव है।

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विश्वनाथ के अनुसार अनौचित्य अर्थात् अयोग्यता जो धर्मशास्त्र के विरोध से, अस- म्भव से तथा तत्वज्ञान के असमर्थन से आती है। यहाँ नायक के लक्षण जानना उप- योगी होगा। 'साहित्यदर्पण' में नायक के लक्षण इस प्रकार हैं : त्यागी कृती कुलीन: सुश्रीको रूपयौवनोत्साही। दक्षोऽनुरक्तलोकस्तेजोवैदग्ध्यशीलवान्नेता।।३०।। त्यागी, कृती, कुलीन, श्रीमान, रूप-यौवन व उत्साह सम्पन्न, दक्ष, लोकप्रिय, तेज, वैदग्ध्य और शील वाला नेता अर्थात् नायक होता है। नायिका में भी यथासम्भव नायक के लक्षण होने चाहिए। नायकसामान्गुणैर्भवति यथासंभवैर्युक्ता ॥५६।। सुधासागर का निरूपण रसाभास का सर्वाधिक सुन्दर विवरण मुझे काव्यप्रकाश की टीका 'सुधासागर' का लगा है। उसे मैं यहाँ उद्धृत करता हूँ : अनौचित्येन प्रकर्षविरोधिना रूपेण इत्यर्थः । अनौचित्य से अर्थात् प्रकर्ष-विरोधी रूप में ह तच्च एकाश्रयत्वे तिर्यगादि विषयतायां बहुविषयत्वे व्यभिचारिणाम् आभा- साङ्गतायां वा द्रष्टव्यं इति प्रदीपकाराः। एकाश्रयत्व, तिर्यगादिविषयता, बहुविषयता और व्यभिचारी जब आभास का अंग बन जाते हैं तब उसके कारण यह अनौचित्य उत्पन्न होता है। प्रदीपकार का मत इस प्रकार का है। यह परिगणन सम्प्रदाय का अनुसरण मात्र है। 'इदं च परिगणनं सम्प्रदायानुसरणमात्रम्।' कारण कि इसका 'कण्ठाभरण' में दी गयी अनौचित्य की सूची के साथ विसंवाद है। वहाँ इस प्रकार कहा गया है कि जहाँ हीन पात्र, तिर्यग, नायक प्रतियोगी और गौण पदार्थगत भाव- निरूपण होता है तो आभास माना जाता है। (बाद में वह कहता है :) वस्तुतस्तु अनौचित्यमात्रमेव अमीषां मनसाभासताप्रयोजकम्। वस्तुतः इन सबके बारे में आभास शब्द का जो व्यवहार करते हैं उसका कारण अनौचित्य मात्र ही है। तिर्यगाद्यो तु अनौचित्याभावात् रस एव। तिर्यगादि में तो अनौचित्य के अभाव होने के कारण रस ही प्रतीत होता है-न तदाभासः । उसका आभास नहीं। अतएव वृत्तिकारों 'ग्रीवाभंगाभिरामम्' इत्यादौ (८५ उदाहरण) तिर्यंगविषयतया भयानक, 'मित्रे क्वापि गते' इत्यादि (३४४ उदाहरण) तिर्यंगविषयतया विप्रलंभं च उदाजहार। इसलिए ही वृत्तिकार ने 'ग्रीवाभंगाभिरामम्' आदि में तिर्यगविषयक भयानक रस का और 'मित्रे ववापि गते' आदि में तिर्यगविषयक विप्रलम्भ का उदाहरण दिया है। इसलिए दूसरी जगह अनेककामुकविषया रति से आभास प्रतीत होने पर भी पाण्डवों के विषय में द्रौपदी की रति इस प्रकार की नहीं है। स्वकान्ता को लेकर भी शोकादि अवस्था में रति-वर्णन अनौचित्य से प्रवर्तित होने के कारण आभासरूप ही समझना चाहिए। (आने वाला वाक्य महत्त्वपूर्ण है)

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१४० अभिनव का रस-विवेचन यद्यपि काव्यनाट्यश्रवणदर्शनाभ्यां विभावादिसाधारण्यज्ञाने सति सामाजिकानां स्वीयस्थायिव्यक्तिरित्यलौकिकरसः स्वतोः नाभासः ।-पृ० १२१-२ यद्यपि काव्य-नाटक के श्रवण-दर्शन से विभावादि साधारणीकृत होने पर सामा- जिकों के अपने स्थायी की अभिव्यक्ति होती है, अतः यह अलौकिक रस स्वयं आभास नहीं होता। तथापि असाधारण्यप्रतीतिप्रयोजककाव्यवर्णिते यत्र च अनौचित्यप्रतिसंधानं तत्र व्यंग्ये रसेऽप्याभासव्यवहार इति ध्येयम्। तो भी असाधारण की प्रतीति का प्रयोजक जो काव्य-वर्णित अर्थात् काव्य में व्णित की गयी वस्तु में जब अनौचित्य प्रविष्ट करता है तब व्यंग्य रस भी आभास ही कहा गया मानना चाहिए। वामनाचार्य भी यही बात कहता है : नन्वेतावता लौकिकस्याभासत्वमागतं न तु सामाजिकनिष्ठस्यालौकिकस्येति चेन्न साधारणीकरणोपायेन सामाजिकस्य वर्णनीयतन्मयीभावात्सामाजिकनिष्ठरतेरप्याभासत्व- मितीति।-पृ० १२३ आप कहते हैं उससे तो लौकिक का अनौचित्य समझ में आता है, पर सामाजिक- निष्ठ अलौकिक का नहीं। इस प्रकार अगर कोई कहता है तो ठीक नहीं है। कारण कि साधारणीकरण के उपाय से सामाजिक वर्णनीय में तन्मय हो जाने के कारण उसमें निहित रति को भी आभासता प्राप्त हो जाती है। जगन्नाथ का मत इससे एक वस्तु तो स्पष्ट हो गयी होगी कि जिसे रसाभास कहा जाता है उसका अनुभव रसानुभव ही है, पर इस अनुभव के बाद इसकी वस्तु में अनौचित्य लगता है, अतः इसे रस न कह कर रसाभास नाम दिया गया है। इसी बात पर विचार करते हुए 'रसगंगाघर' में पण्डित जगन्नाथ कहते हैं : 'रसाभास और भावाभास' ये रस और भाव ही हैं या भिन्न हैं ? कुछ कहते हैं कि भिन्न हैं क्योंकि दोनों समानाधिकरण नहीं हैं अर्थात् एक स्थान पर रहने वाले धर्म नहीं हैं। जो निर्मित होता है, किसी भी प्रकार के अनौचित्य से रहित होता है वह रस अथवा भाव है पर जब उसमें अनौचित्य प्रविष्ट करता है तो उसे रसाभास अथवा भावाभास कहना चाहिए। दूसरे कहते हैं कि रस में दोष के प्रवेश करने से आत्महानि नहीं होती अर्थात् उसके स्वरूप का नाश नहीं होता, वह रस मिट नहीं जाता। अर्थात् जिस प्रकार निर्दुष्ट स्थायिभाव-दोषरहित स्थायिभाव रस कहलाता है उसी प्रकार सदोष स्थायिभाव भी रस माना जाएगा। मात्र उसमें निहित दोष को संकेतित करने के लिए उसे आभास कहते हैं। जिस प्रकार सदोष अश्व को लोग अश्वाभास कहते हैं पर रहता तो वह अश्व ही है। रसाभास की धारणा का विकास हमारी अब तक की चर्चा के आधार पर रसाभास की धारणा किस प्रकार विक- सित होती गयी उसका एक संक्षिप् विवरण हमें देख जाना चाहिए।

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हमने देखा कि अभिनव गुप्त ने मात्र विभावाभास के होने पर ही रसाभास माना है और उसका उदाहरण अनुभयनिष्ठ रति से दिया है। रावण की सीता के प्रति रति, सीता परस्त्री है इसलिए अनुचित है यह बात नहीं है, पर चूँकि यह अनुभयनिष्ठ है इसलिए अनुचित है। मम्मट ने अनुभयनिष्ठ रति के अतिरिक्त बहुकामुकविषया रति को भी रसाभास में लेकर रसाभास की व्याख्या में अनौचित्य शब्द का प्रयोग किया। हेमचन्द्र ने निरिन्द्रिय और तिर्यगादिगत रति का समावेश किया और अनौचित्य प्रवर्तित व्याख्या को भी बनाए रखा। विश्वनाथ ने अनौचित्य प्रवर्तित वाली व्याख्या को स्वीकार कर उसके दष्टान्तों में अच्छी-खासी वृद्धि की। 'उपनायकगत, मुनिगुरुपत्नीगत, बहुनायकविषया, अनुभयनिष्ठा, प्रतिनायक- निष्ठा, अधमपात्रगता और तिर्यगादिगता रति, गुरुआदिगत रौद्र कोप और हास्य, हीननिष्ठ शान्त, ब्रह्मवधादिमें निष्ठा उत्साह, अधमपात्रगत वीर, उत्तमपात्रगत भयानक यज्ञ-पशु के रक्तादि में जुगुप्सा।' अनौचित्य के दो प्रकार आभासत्वप्रयोजक अनौचित्य दो प्रकार का मालूम होता है : एक तो मनोगत और दूसरा लोकशास्त्रगत। अनुभयनिष्ठ और बहुनायकविषया रति का अनौचित्य मनोगत कहा जाएगा। इसी प्रकार निरिन्द्रियों में हुआ भावारोपण भी मनोगत अनौ- चित्य में समाविष्ट होगा। तिर्यचों में मानव भाव नहीं होते, यह मान कर तिर्यगादिगत रति को भी इसमें समाया जा सकता है। तिर्यचों और हीन पात्रों के प्रति रति पर हम आलम्बन के अनौचित्य की दृष्टि से विचार कर सकते हैं, जिसे अभिनव गुप्त ने विभावा- भास कहा है। तिर्यच मनुष्य के प्रेम का मनुष्य की भाँति उत्तर नहीं दे सकते, अतः उनमें प्रेम का जिस प्रकार का परिपाक होना चाहिए वैसा होने की संभावना नहीं होती, इसलिए यह रति परिपुष्टता के अभाव में आभासता को प्राप्त करती है। हीन पात्र भी प्रेम की परिपुष्टता में पूरा साथ नहीं दे सकते, यह मानना बिल्कुल निरर्थक न होगा। आलम्बन विभाव होने के लिए अर्थात् नायक बनने के लिए यहाँ अमुक संस्कारादि की अपेक्षा अभिप्रेत है।-मुझे ऐसा लगता है और यह मनोविज्ञान की दृष्टि से उपेक्षा करने लायक नहीं है। पर, इसके अलावा सभी उदाहरणों को शास्त्र- लोकातिक्रम के कारण होने वाले अनौचित्य के उदाहरण मानने होंगे। अनौचित्य की जगन्नाथ द्वारा की गयी चर्चा इस अनौचित्य की जो चर्चा जगन्नाथ ने रसगंगाधर में की है, यहाँ दर्शनीय है। वह कहता है कि जहाँ रस का आलम्बन विभाव अनुचित हो वहाँ रसाभास कहलाता है। आलम्बन विभाव का अनौचित्य लौकिक व्यवहार से समझना चाहिए। अर्थात् जिसके विषय में लोगों को अनुचित होने का बोध होता हो, कुछ के अनुसार उसे अनुचित मान लेना चाहिए।

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१४२ अभिनव का रस-विवेचन पर, रसाभास के इस लक्षण को दूसरे नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि यद्यपि इस लक्षण में मुनिगुरुपत्नी आदि से सम्बद्ध रति का समावेश होता है फिर भी अनेक नायकनिष्ठ रति का अथवा अनुभयनिष्ठ रति का समावेश नहीं होता। कारण, वहाँ विभाव अनुचित नहीं है। अतः रसभास के लक्षण में 'अनुचित' विशेषण विभाव के लिए न लगा कर रति आदि स्थायिभाव के लिए लगाना चाहिए। अर्थात् लक्षण इस प्रकार बनाना चाहिए कि जिसके रति आदि स्थायीभोव अनुचित रूप से प्रवृत्त हुए हों वे रसाभास कहे जायेंगे। इस प्रकार तो सभी का समावेश हो जाता है। यद्यपि इस मत में भी अनौचित्य की परिभाषा तो पहले की भाँति ही रहती है-अर्थात् जिस रति को लोक अनुचित माने उसे अनुचित रूप में प्रवृत्त रति कहा जाएगा। वस्तुतः ये दो मत हैं : एक अभिनव गुप्त का और दूसरा परवर्ती मम्मट आदि का। जिन्होंने 'अनौचित्यप्रवर्तितः' ऐसी व्याख्या का उपयोग किया। जगन्नाथ द्वारा स्वीकृत अनौचित्य के तीन प्रकार जगन्नाथ ने अनौचित्य के तीन प्रकार स्वीकृत किए हैं : १. जहाँ अनुचित विभाव हो, २. जहाँ बहुविषयक रति हो, ३. जहाँ अनुभयनिष्ठ रति हो, और इन तीन के ही उसने उदाहरण दिए हैं। इसमें उसने मम्मट और अभिनव गुप्त द्वारा स्वीकृत दोनों प्रकार मान लिए हैं और मद्यावधि में प्रचारित तिर्यगादि के अलावा सभी प्रकारों को अनुचित विभाव में समाविष्ट कर दिया है। पर, अभिनव गुप् ने जिसे अनुचित विभाव अथवा विभावा- भास कहा था उससे भिन्न ही वस्तु को अनुचित विभाव कहता है जो सभी के ध्यान में आया होगा। अभिनव गुप्त ने अनुभयनिष्ठ रति के विभाव को ही विभावाभास कहा था पर जगन्नाथ ने शास्त्रलोक जिसे अनुचित माने उसे अनुचित विभाव कहा है और अभिनव के अनुचित विभाव को अनुभयनिष्ठ रूप में ही स्वीकारा है। चर्चा का सार अब तक की अपनी चर्चा का निष्कर्ष हम इस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं : ध्वनिरूप उत्तम काव्य के तीन भेद हैं : वस्तुध्वनि, अलंकारध्वनि, रसध्वनि, रसाभास रसादिध्वनि का ही एक प्रकार है। इसका विभाव अनुचित; अतः आभास- रूप होने के कारण इसकी चर्वणा, अभिनव के अनुसार, चर्वणाभास है और अन्य आचार्य इसकी चर्वणा को रसचर्वणा ही मानते हैं पर चूँकि सहृदय को इसमें अनौ- चित्य का अनुभव होता है, अतः इस सीमा तक ही उसे आभास जैसा नाम दिया गया है। जिस अनौचित्य के कारण इसे आभास नाम दिया गया है वह, कुछ अंशों में काव्य और कुछ अंशों में लोकाचार की दृष्टि से प्रतीत अनौचित्य ही है। साथ ही, यह

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भी नहीं माना गया कि इसके कारण रस-प्रतीति में बाधा या विलम्ब होता है। इसी- लिए इसकी गणना काव्य-दोष में नहीं की गयी। इसकी प्रतीति रसावगम के बाद ही होती है, यह भी मान लिया गया है और काव्य में इसके निरूपण का निषेध नहीं किया गया है। रसाभास के विषय में श्री विष्णुप्रसाद अब हम श्री विष्णुभाई आदि द्वारा की गयी रसाभास की चर्चा पर आते हैं। श्री विष्णुभाई ने 'रसना सिद्धान्तमां सापेक्षता' नामक लेख में इस सम्बन्ध में थोड़ी चर्चा की है। शृंगार रस के बारे में ही जिन-जिन सम्बन्धों को अनुचित मान लिया है उसकी सूची देते हुए वे कहते हैं -- "इस एक ही विषय में कला-प्रदेश कितना संकु- चित हो गया! रसाभास की कल्पना से मनुष्य के स्वभाव के यथातथ्य चित्रण की अवगणना हुई है, इतना ही नहीं पर अनुभाव (रेसपोन्स) [ प्रतिभाव कहा होता तो गड़बड़ तो न हुई होती। न.] प्राप्त न करती हुई रति, जिसमें भाव-मंथन का हृदय- स्पर्शी प्रसंग आता है, कवि छोड़ देता दिखायी देता है।" यहाँ श्री विष्णुभाई ने यह मान लिया प्रतीत होता है कि प्राचीन शास्त्रकारों ने रसाभास के निरूपण का निषेध किया है। पर, यह जानकारी का दोष है। उन्होंने श्री दे के 'अलंकारशास्त्र के इतिहास' के आधार पर पाद-टिप्पणी में लिखा है कि 'अकेले जगन्नाथ पण्डित अनौचित्य से प्रवर्तित रस में या रसाभास में दोष नहीं देखते।' दूसरे आलंकारिकों के प्रति अन्याय करने वाले इस प्रकार के वचन भी जानकारी के अभाव के कारण ही कहे गये हैं। वे आगे लिखते हैं : 'गुरु आदि के प्रति रति या हास को रसाभास के रूप में स्वीकृत करने में उच्च नीति की धारणा को कला में खींच लाया गया है, तो समाज के निम्नस्तरीय पात्रों में, वर्णित शम या उत्साह को रसाभास मानने में अपने धर्म की अस्पृश्यता के रोग की छृत कला को लगा दी गयी है।' आदि। श्री विष्णुप्रसाद के मत की समीक्षा जैसा कि हम पहले कह आए हैं, यह परिगणना परम्परानुसरण है; सिद्धान्त नहीं है। सिद्धान्त इतना ही है कि सहृदय को जहाँ रसानुभव के बाद यह लगे कि अनौ- चित्य है वहाँ आभास मान लेना चाहिए। जिस देश में वैष्णव धर्म इतना अधिक प्रसृत हो वहाँ यह किस प्रकार कहा जा सकता है कि निम्नस्तरीय लोगों पर आधार रख कर शम का निरूपण न किया जाय ? भक्ति-सम्प्रदाय, जैन-सम्प्रदाय तथा बौद्ध- सम्प्रदाय ने शताब्दियों तक निचले तबके के लोगों को अपनाने का महान काम किया है। इनके भिक्षुओं, साधुओं और भक्तों में से कितने ही निचले तबके से आये हैं और यह भी कैसे कहा जा सकता है कि उन्हें अपने देश के साहित्य में स्थान नहीं

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१४४ अभिनव का रस-विवेचन मिला है ? ये सभी दृष्टान्त तत्कालीन प्रचलित लोकशास्त्र के आधार पर दिए गये हैं, पर उनकी उपेक्षा भी समय समय पर हुई है और होनी भी चाहिए। जो एक समय अनुचित माना जाता है वह दूसरे समय उचित माना जाएगा। तिस पर भी अनौचित्य का यह नियम अबाधित ही रहेगा। अपने समाज की बात करें तो पहले कभी जब साहित्य में विधवा की रति का वर्णन किया जाता था तो अत्यन्त ऊहापोह मच जाता था। उस जमाने में यह अनुचित था। आज यह अनुचित नहीं है। एक समय अपने यहाँ अन्तर्जातीय विवाह की भी यही स्थिति थी, आज यह भी नहीं रही है। परन्तु इससे कहीं मूल नियम नहीं बदल जाता। समय-समय और स्थान-स्थान पर औचित्य-अनौ- चित्य की धारणा बदलती रहती है, पर प्रत्येक युग अपनी इन धारणाओं का अनुवर्तन करता ही है। प्रत्येक युग में औचित्य-अनौचित्य का भेद तो होता ही है। रसाभास के बारे में श्री ज्योतीन्द्र दवे श्री ज्योतीन्द्र दवे की धारणा कुछ विष्णुप्रसाद की धारणा के समान ही है। उन्होंने अपनी 'रसमीमांसानी परिभाषा' नामक लेख में लिखा है : "ऐसा प्रतीत होता है कि किसे रस माना जाय और किसे रसाभास माना जाय ? इसका निर्णय भी शास्त्र की शुद्ध दृष्टि से न होकर सामाजिक नीति-भावना अथवा तत्कालीन कविसमय के आधार पर किया गया है। पशु-पक्षी की रति रस नहीं, पर रसाभास में परिणत होती है, यह जो कहा गया है वह मात्र रति तक ही सीमित नहीं है पर सभी भावों पर लागू पड़ता है; इसे यदि मान लें तो इस नियम में बहुत से अपवाद करने पड़ेंगे।" तदुपरान्त वह प्राणियों के भावों का निरूपण करने वाली कितनी ही कृतियों का उल्लेख करता हुआ कहता है कि 'इन सबके लिए अगर रसा- भास का नियम निरपवाद रूप से मान्य रखें, तो इन्हें साहित्य के प्रदेश से देश-निकाला देना पड़ेगा।' हम जिस प्रकार देख आये हैं, तिर्यगादि के भाव के निरूपण को, प्राचीन आलं- कारिकों में से कुछ रस के रूप में ही स्वीकार करते हैं। इससे पहले मैंने 'सुधासागर- कार' के वचनों को उद्धृत किया था। जगन्नाथ में भी तिर्यगादि की रति का अनुचित रूप में उल्लेख नहीं है। पर सबसे महत्त्व की बात तो यह है कि ऐसे भाव-निरूपण को रसाभास या भावाभास नाम देकर भी उसकी आस्वाद्यता को किसी ने नकारा नहीं है और किसी ने भी इसके निरूपण का निषेध नहीं किया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि उनकी उक्त आपत्ति और साहित्य-क्षेत्र के संकुचित हो जाने की भीति-दोनों ही अपूर्ण जानकारी के कारण उदित हुई हैं। रसाभास के बारे में श्री डोलरराय मांकड महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के गुजराती विभाग के अतिथि अध्यापक के रूप में दिए गये व्याख्यानों में से पहले व्याख्यान 'रसाभासनुं स्वरूप' में डोलरराय मांकड ने इस विषय की चर्चा की है। इस लेख में उनका नीति-अनीति से सम्बद्ध

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आग्रह इतना प्रबल है कि उसके कारण बहुत-सी चीजें गड़बड़ा गयी हैं। हम प्रत्येक मुद्दे पर क्रमशः विचार करने का प्रयत्न करेंगे। मम्मट ने 'काव्यप्रकाश' में ध्वनि अर्थात् उत्तम काव्य के दृष्टान्त के रूप में जिस श्लोक को उद्धृत किया था उसे प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं : यह ठीक है कि इसमें वाच्यार्थ की अपेक्षा व्यंग्यार्थ मुख्य है, पर इतने भर से किसी काव्य को उत्तम कह देना पर्याप्त-स्तरीय नहीं है। संस्कृत काव्यशास्त्र के ग्रन्थों में ऐसे स्पष्ट असभ्य अर्थवाले बहुत से उदाहरण मिलते रहते हैं। उनके मत में इसका कारण यह है कि रसाभास के विषय को हमारे काव्यशास्त्र में यथोचित महत्त्व नहीं दिया गया है। तदुपरान्त वे मम्मट की रसाभासवाली व्याख्या देकर और समझाकर यह कहते हैं कि उक्त श्लोक रस का नहीं, पर रसाभास का द्ृष्टान्त है। बाद में वे अभिनव गुप्त के आधार पर रसाभास का स्वरूप स्पष्ट करते हैं और इस बात पर भार देते हैं कि जहाँ विभाव अनुचित अर्थात् आभासी होता है वहाँ चर्वणाभास और रसाभास होते हैं। इसके अनन्तर उन्होंने 'ध्वन्यालोक' के तृतीय उद्योत से दशम कारिका और तत्सम्बन्धी वृत्ति को उद्धृत कर जो यह कहा है कि प्रकृति-सम्बन्धी अनौचित्य काव्य में निरूपित नहीं होना चाहिए, उसमें प्रकृति अर्थात् आलम्बन विभाव जैसा समीकरण बना कर प्रकृति विषयक जो कुछ कहा है उस सबको आलम्बन पर लागू करने का प्रयत्न किया गया है, वह सब गलत रास्ते पर ले जाने वाला है। तीसरे उद्योत में इस स्थान पर दोष-परिहार की बात चलती है और वहाँ आनन्दवर्द्धन कहता है कि प्रकृति- विपर्यास नहीं करना चाहिए। इसी बात को आनन्दवर्द्वन के आधार पर मम्मट और हेमचन्द्र ने अपने-अपने ग्रन्थों में लगभग इन्हीं शब्दों में रसदोषवाले प्रकरण में लिया है। दशम कारिका में वह इस प्रकार है :

विधि: कथाशरीरस्य .. भावार्थ : विभाव, भाव, अनुभाव और संचारी के औचित्य से चारुतायुक्त कथा- शरीर का विधान करना चाहिए। इस पर लिखित वृत्ति से मैं प्रस्तुत भाग उद्धृत करता हूँ : तत्र विभावौचित्यं तावत् प्रसिद्धम्। भावौचित्यं तु प्रकृत्यौचित्यात्। प्रकृतिर्हि उत्तममध्यमाधमभावेन दिव्यमानुषादि भावेन च विभेदिनी। इसका गुजराती में रूपान्तर करते हुए श्री मांकड़ ने 'भाव का औचित्य प्रकृति पर अवलम्बित है' कह कर इसके बाद एक वाक्य और जोड़ दिया है : 'प्रकृति अर्थात् पात्र'। इसके कारण सब गड़बड़ हो गया है। प्रकृति के अर्थ से सम्बद्ध गड़बड़ यहाँ प्रकृति का अर्थ है कि दिव्य मनुष्य और उत्तम, मध्यम और अधम आदि। जिस पात्र की जैसी मनुष्यगत प्रकृति हो उससे वैसे ही उचित कार्य करवाये जायें, १०

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१४६ अभिनव का रस-विवेचन देवोचित सप्त सागर-लंधन की तरह के काम उससे न करवाये जायें। अगर करवाये भी जायें तो उसका वर्णन चाहे कितना ही सौष्ठवपूर्ण हो वह सदा नीरस ही होगा, अतः रस-निष्पत्ति में बाधक ही होगा। श्री मांकड़ ने प्रकृति के इस औचित्य को व्यवहार या वर्तन के औचित्य के साथ मिला दिया है और अगर कोई पात्र अनुचित बर्ताव करे अर्थात् उनकी रुचि के अनुसार आचरण न करे तो वे उसे अधम प्रकृति का कहते हैं। और वे जब प्रकृति माने पात्र और पात्र माने आलम्बन ऐसा समीकरण करके ऐसे सब स्थानों पर प्रकृति का अनौचित्य बताते हैं तो वह ठीक नहीं है। इस नीति-अनीति के आग्रह के जोश में वे निम्न पंक्तियों से निकलने वाली संकेत-भंग की ध्वनि को भी बेवफाई का अर्थ देकर पूछते हैं कि 'बेवफा प्रेम के ऐसे अर्थसंधान में ये काव्यशास्त्री क्यों नहीं समझते हैं कि इनमें प्रकृति अर्थात् आलम्बन का अनौचित्य समाविष्ट है।' उअ णिच्चलणिप्पंदा भिसिणीपत्तम्मि रेहइ बलाआ। णिम्मलमरगअ अभाअण परिठ्ठिआ संखसुत्ति व्व।। अर्थात् देखो, पद्मिनी के पत्र पर स्थिर और न हिलने वाली बगुली शोभा पा रही है, मानो स्वच्छ मरकत के पात्र में रखी हुई शंख की कटोरी। इसमें से निकलने वाले संकेतभंग की ध्वनि को भी वे बेवफा प्रेम का अर्थ कहकर पूछते हैं : -"बेवफा प्रेम के ऐसे अर्थ शोधने वाले ये काव्यशास्त्री क्यों नहीं समझते कि यहाँ प्रकृति का यानी आलम्बन का अनौचित्य है।" यहाँ प्रकृति के अनौचित्य का सवाल ही नहीं है। साथ ही, यह भी समझ में नहीं आता कि ये दो व्यक्ति परस्पर आलम्बन के रूप में क्यों अनुचित हैं? यहाँ नायक या नायिका जिसने संकेत को भंग किया हो उसने अनुचित किया है, यह तो कहा जा सकता है पर इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रकृति-अनौचित्य का उदाहरण है। यह एक बहुत बड़ी नादिरशाही मानी जायगी कि कोई व्यक्ति संकेत- भंग करने के कारण ही अपनी आलम्बन बनने की योग्यता ही खो बैठे। उनके इस पुण्यप्रकोप की पराकाष्ठा तो उक्त श्लोक के बाद में आये श्लोक के विवरण के अन्त में आती है। पंथिअ ण एत्थ सत्थरमत्थि मणं पत्थरत्थले गामे। उण्ण अप ओहरं पेख्खिऊण जइ वससि ता वससु ॥ अर्थात् हे पथिक, इस पत्थर वाले गाँव में बिछौना बिलकुल नहीं मिलेगा। उन्नत पयोधर को देखकर यदि रहना चाहो तो रहो। इसके विषय में वे लिखते हैं : 'घर आये राही को ऐसा अनीतिमय सम्भोग का निमन्त्रण देने वाले पात्र को प्रकृति के अनौचित्य में ही माना जायगा। अतः ऐसे उदाहरणों को मैं आलम्बन-विभाव के औचित्य के (मैं मानता हूँ यहाँ 'अनौचित्य' होना चाहिए-न) अर्थात् आभास के

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ही उदाहरण समझता हूँ। संस्कृत-काव्यशास्त्री ध्वनि को ढूँढ़ने निकले और उसे हवूँढ़ कर महान् सिद्धि भी प्राप्त की पर बाद में वे एकांगी हो गये और उदाहरण देते समय यह भूल ही गये कि यहाँ आलम्बन ही गलत है, अनुचित है। इस पर फिर चाहे कैसा ही व्यंग्यार्थ क्यों न हो, वह उत्तम काव्य बन ही नहीं सकता। उत्तम तो क्या काव्य भी नहीं बन सकता।' अगर कवि किसी असती स्त्री का निरूपण करता हो, उसमें किसी प्रसंग पर उससे यह श्लोक कहलाये और वह उस स्त्री के स्वभाव के साथ सुसंगत हो तो इसमें अनीतिमय सम्भोग का निमन्त्रण होने पर भी इसे किन कारणों से काव्य और उत्तम काव्य न माना जाय, समझ में नहीं आता। यहाँ भी अनीतिमय सम्भोग का निमन्त्रण देने के कारण उन्होंने, उस पात्र को प्रकृति के अनौचित्य में गिनने की जो बात की है वह युक्ति-संगत नहीं है। वे इसे आलम्बन-विभाव के अनौचित्य का उदाहरण मानते हैं तदनुसार व अभिनव गुप्त के अनुसार भी इस श्लोक को रसाभास का उदाहरण मानना चाहिए। और उन्होंने इस व्याख्यान के अन्त में कहा है कि काव्य में आभास के लिए भी स्थान है। तो यहाँ इस स्थान को छीन लेने का क्या कारण है ? हम पुनः एक बार उस मिथ्यावादिनी दूती के पास चलें। उस दूती ने नायक के साथ रति-क्रीड़ा की, अतः वे रति के उद्भेद के लिए उसे अनुचित आलम्बन मानते हैं और 'इसीलिए यह कहते हैं कि इस श्लोक में जो कुछ हो पर वह वास्तविक नहीं है, आभास है, अतः यहाँ वस्त्वाभास है।' यों इस श्लोक में व्यभिचार है, तो क्या व्यमिचार मिट जाता है ? आगे चल कर वे कहते हैं : 'यह भी कहा जा सकता है कि ऐसे चरित्रवाली दूती इसी प्रकार का वर्तन करेगी और उसके द्रोह से दुःखी नायिका इसी प्रकार उपालम्भ देगी। इस बात को स्वीकार कर लेने पर यह सम्पूर्ण निरूपण औचित्यपूर्ण है।' पर मुझे यह कहना है : 'ऐसा समाज-विरोधी पात्र या प्रसंग-निरूपण स्वयं अनुचित है और यह अनौचित्य पात्र अर्थात् आलम्बन-विभाव के कारण ही है। ... दूती द्वारा किये गये व्यभिचार का निरूपण चाहे कितना ही सचोट हो, फिर भी उसमें मूल प्रकृति का चयन ही गलत है। अतः इस तरह के दृष्टान्तों में आभास ही है, वास्तविकता नहीं।' रसाभास के निरूपण का निषेध नहीं क्या इसका अर्थ यह किया जाय कि कवि समाज-विरोधी पात्र या प्रसंग का निरूपण ही न करें ? ऐसे प्रसंग या पात्रों के प्रति उचित भाव जगा सकने वाले प्रसंगों या पात्रों का अगर निरूपण हुआ हो तो क्या उसे अनुचित ही माना जाय ? यहाँ प्रकृति-चयन किस कारण गलत है ? आनन्दवर्द्धन के जिन वचनों को उन्होंने अपने समर्थन में प्रस्तुत किया है, मुझे नहीं लगता कि वे जिन सन्दभों में लिखे गये हैं उन्हें

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१४८ अभिनव का रस-विवेचन देखते हुए उनसे उनका अभीष्ट अर्थ निकलता है। मैं उन सन्दर्भों को बता कर उन वचनों को उद्धत करता हूँ। हम पहले देख आये हैं कि प्रकृति-व्यत्यास न किया जाय और जिस पात्र की जैसी प्रकृति है तदनुसार उसे उचित मान कर उसके व्यवहार का निरूपण किया जाय।-आनन्दवर्द्धन का यही मत है। तदनन्तर वे यह प्रश्न उपस्थित करवाते हैं कि 'उत्साहादि भाव-वर्णन में दिव्य मनुष्य आदि की प्रकृति के औचित्य की दृष्टि से कसौटी करनी हो तो करो पर रत्यादि में इसकी क्या आवश्यकता है ? कारण, यह निश्चित है कि रति तो भारतवर्षोचित व्यवहार के अनुसार ही दिव्य की भी वर्णित की जानी चाहिए।' इसके उत्तर में आनन्दवर्द्धन कहता है कि 'ना, ऐसा नहीं है। रति के मामले में अगर अतिक्रमण होता है तो बड़ा दोष आ जाता है। इसलिए अधम प्रकृति के लिए जो रीति उचित है उसके अनुसार अगर उत्तम प्रकृति के शृंगार का भी वर्णन किया जाय तो क्या वह उपहास्य न होगा ? भरत के नाट्य- शास्त्रानुसार मनुष्य, उत्तम प्रकृति राजा आदि को लेकर जिस प्रकार का शृंगार- निरूपण उचित माना गया है उस प्रकार का ही दिव्य प्रकृति के पात्रों के विषय में भी शोभित होता है। साथ ही, नाटकादि में राजादि को लेकर प्रसिद्ध ग्राम्य शृंगार का निरूपण देखने में नहीं आया है, अतः देवों के मामले में उसका परिहार किया जाय। अगर यह कहें कि नाटकों में तो अर्थ अभिनय से बताना होता है और सम्भोग शृंगार का अभिनय असभ्य दिखायी देता है इसलिए नाटक में उसका परिहार किया जाता है, तो यह ठीक नहीं है क्योंकि अगर ऐसे अभिनय को असभ्य मान लें तो काव्य में ऐसे विषय की असभ्यता कैसे टाली जा सकती है ? अतः अभिनेयार्थ और अनभिनेयार्थ-दोनों ही प्रकार के काव्यों में उत्तम प्रकृति के राजादि का उत्तम प्रकृति की नायिका के साथ ग्राम्य सम्भोग का वर्णन अगर कोई करता है तो वह माता-पिता के सम्भोग-वर्णन की भाँति ही अत्यन्त असभ्य माना जायगा। यही उत्तम देवतादि के विषय में भी मान लेना चाहिए।' यहाँ आनन्दवर्द्धन जो आपत्ति उठाते हैं वह उत्तम प्रकृति के पात्र के शृंगार का वर्णन अधम प्रकृति के शृंगार की भाँति करने पर है अर्थात् प्रकृति-विपर्यास पर है। और वे आगे चल कर कहते हैं कि 'अगर उत्तम प्रकृति के सम्भोग का वर्णन करना हो तो सम्भोग शृंगार का सुरत ही एक मात्र प्रकार नहीं है। परस्पर प्रेम प्रदर्शन आदि अनेक प्रकार सम्भव हैं तो उत्तम प्रकृति में उनके वर्णन आप किसलिए नहीं करते ? अर्थात् उत्साह की भाँति ही रति में भी प्रकृति-औचित्य का अनुसरण करना चाहिए।' तस्मादुत्साहवत् रतावपि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्तव्यम्। इससे स्पष्ट होगा कि आनन्दवर्द्धन की आपत्ति सुरत-वर्णन पर नहीं है पर जिस प्रकृति के पात्र में जो घटित न हो उसका वर्णन करने पर है अर्थात् प्रकृति-विपर्यास पर है जबकि मांकड़ की आपत्ति ऐसे विषयों के निरूपण पर ही है जिसे आनन्दवर्द्धन का समर्थन मिलना सम्भव नहीं है।

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रसाभास हीन नहीं है सम्पूर्ण लेख पढ़ने पर एक ऐसी छाप उत्पन्न होती है कि श्री मांकड़ रसाभास को हल्की वस्तु मानते हैं। यह मान्यता उचित नहीं है, क्योंकि जैसा कि हम देख आये हैं ध्वनिरूप उत्तम काव्य के रसादि ध्वनि-प्रकार के जो आठ भेद हैं उनमें रस और रसाभास, भाव और भावाभास का भी समावेश होता है। इसमें उच्चावचता की धारणा नहीं है। सम्पूर्ण लेख में, अनौचित्य के कारण प्रतीयमान रसादि के आभास को लेकर रोष व्यक्त करके लेख के अन्त में वे कहते हैं कि 'काव्य में आभास का स्थान है ... काव्य में, साहित्य में और कला में वस्तु है और उसका आभास है। दोनों का स्थान है। काव्यादि में तो शायद आभास के लिए अधिक स्थान है, क्योंकि आभास की तुलना में वस्तु-सत्य का बोध कराना पड़ता है जो कवि के अनुकूल रहता है। (मुझे लगता है कि यहाँ उन्होंने आभास शब्द से प्रेरित होकर गड़बड़ की है। अप्रस्तुत की भाँति ही दूसरी ही बातें की हैं। आभास की तुलना में वस्तु-सत्य का बोध कराने की एक युक्ति के रूप में काव्य में रसाभास आता है-यह शायद ही कहा जायगा। यह कहना उचित नहीं है कि जहाँ-जहाँ रसाभास आता है वहाँ-वहाँ उस रस के सत्य- बोध कराने की युक्ति के रूप में आता है, अस्तु !- न ) हमारा कथन तो इतना ही है कि हमें वस्तु को वस्तु के रूप में और आभास को आभास के रूप में जान लेना चाहिए।' मुझे लगता है कि यहाँ भी वही गड़बड़ चल रही है। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे देश के शास्त्रकारों ने रस और रसाभास के बीच भेद किया ही है और उसका पृथक निरूपण भी कर बताया है।

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रसाभास : थोड़ी चर्चा 'संस्कृति' पत्रिका के अगस्त, १९६३ के अंक में मेरा एक लेख 'रसाभास : उसका स्वरूप और काव्य में स्थान' नाम से छपा है जिसमें मेरा आशय हमारे प्राचीन आचार्यों ने रसाभास का जो स्वरूप कल्पित किया है और काव्य में जो स्थान उसे दिया है उसका खयाल देने का तथा उसके आधार पर रसाभास के बारे में हमारे तीन प्रौढ़ विवेचकों ने जो चर्चा की है उसका परीक्षण करना था। उस लेख के अन्तिम भाग में श्री डोलरराय मांकड़ के 'रसाभास का स्वरूप' नामक व्याख्यान की कुछ उत्तियों की मैंने चर्चा की थी जिसे ध्यान में रखकर उन्होंने 'संस्कृति' के जून, १९६५ के अंक में 'रसाभास' नामक एक लेख लिखा है। उस लेख से उपस्थित होने वाले कुछ मुद्दों की चर्चा करने का मैंने विचार किया है। अनौचित्य-बोध कब होता है? १. मैंने रसाभास का स्वरूप समझाते हुए उस लेख में पृ० ४७० पर वामनाचार्य के वचन उद्धृत कर जो लिखा था वह इस प्रकार है : ' ... इस सम्बन्ध में वामनाचार्य के वचन खूब द्योतक हैं। वे लिखते हैं : रसानौचित्यस्य रसावगमोत्तरमेव अवगमात् आभासताप्रयोजकता एव। रस के अनौचित्य का बोध रसावगमन के बाद ही होने के कारण अनौचित्य की वजह से आभास है, हम इतना भर कहते ही हैं अन्यथा यह अनौचित्य वाच्य-वाचक के अनौचित्य की भाँति रस-भंग का कारण नहीं बनता। न वाच्यवाचकानौचित्यवत् रसभङ्गहेतुता इति बोध्यम्।' तदनन्तर अनौचित्य से सम्बद्ध थोड़ी दूसरी चर्चा की और पृ० ४७२ पर चर्चा का सार देते हुए कहा था कि 'जिसे रसाभास कहते हैं उसका अनुभव रसानुभव ही है पर इस अनुभव के होने के बाद इसकी वस्तु में अनौचित्य लगता है अतः इसे रस न कह कर रसाभास नाम दिया जाता है।' इस सम्बन्ध में डोलरराय मांकड़ ने इस लेख में कहा है कि 'नगीनभाई का यह कथन कि रसानुभव के बाद अनौचित्य का पता चलता है, मुझे सत्य प्रतीत नहीं होता। मुझे यह भी नहीं लगता कि उनके द्वारा पृ० ४७२ पर उद्धृत संस्कृत वाक्यों में भी कहीं ऐसा कहा गया है।' इसमें दो बातें हैं : एक तो यह कि अनौचित्य का अनुभव रसानुभव के बाद होता है जो उन्हें सत्य नहीं लगता और दूसरी यह कि उन्हें यह नहीं लगता कि मैंने पृ० ४७२ पर जो संस्कृत वाक्य उद्धृत किये हैं उनसे इस प्रकार का अर्थ निकलता है। अर्थात् मेरा यह कथन निराधार है।

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इनमें से पहली बात की चर्चा थोड़ी देर के लिए स्थगित कर मुझे दूसरी बात के विषय में इतना ही कहना है कि मेरे उस कथन के समर्थनरूप मैंने वामनाचार्य के जो वचन पृ० ४७० पर उद्धृत किये हैं और उनसे मैंने जो अर्थ निकाला है वैसा अर्थ निकलता भी है या नहीं इसका निर्णय वाचक कर सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि श्री मांकड़ साहब ने यह मान लिया है कि पृ० ४७२ पर मैंने जो वाक्य उद्धृत किये हैं उनमें से मैंने यह अर्थ-घटन किया है, अतः उन्हें ऐसा लगा है, अन्यथा उस कथन के लिए आधार तो मैं पृ० ४७० पर उद्धृत कर आया हूँ जो उनके ध्यान में, लगता है, आया नहीं है। अपने कथन के समर्थन में मैंने उस लेख में जो दिया था उसे मैंने ऊपर उद्धृत कर दिया है। इसके बाद अभिनव गुप्त भी यही मानता है कि आभासता बाद में प्रतीत होती है। निम्नोद्धृत वचनों से मैं यही समझा हूँ। 'ध्वन्यालोक' के प्रथम उद्योत की टीका में ध्वनि का तीसरा प्रकार रसध्वनि भी वाच्य से भिन्न है, इस वस्तु को स्पष्ट करते हुए अभिनव गुप् कहता है : रसभावतदाभासतत्प्रशमाः पुनर्न कदाचिदभिधीयन्ते, अथ चास्वाद्यमानताप्राणतया भान्ति। ... औचित्येन प्रवृत्तौ चित्तवृत्तेरास्वाद्यत्वे स्थायिन्या रसो, व्यभिचारिण्या भावः, अनौचित्येन तदाभास: रावणस्येव सीतायां रतेः। यद्यपि तत्र हास्यरसरूपतैव, 'शृङ्गारादि भवेद्धास्यः' इति वचनात्। तथापि पाश्चात्येयं सामाजिकानां स्थितिः, तन्मयीभवन- दशायां तु रतेरेवास्वाद्यतेति शृङ्गारतैव भाति पौर्वापर्य-विवेकावधीरणेन 'दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि यातेश्रुतिम्' इत्यादौ। तदसौ शृङ्गाराभास एव। पृ० ७८-९। अर्थात् रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम कभी भी अभिहित नहीं होते अर्थात् शब्द- वाच्य नहीं होते। और इस रूप में प्रकट होते हैं कि मानो उन सभी का प्राण आस्वा- दयमानता है अर्थात् ये सभी आस्वाद्य हैं ... औचित्य से प्रवृत्त होकर स्थायी चित्तवृत्ति अर्थात् स्थायी भाव आरवादनीय बनकर रस होते हैं, व्यभिचारी भाव भाव बन जाते हैं और अनौचित्य से प्रवृत्त ये दोनों क्रमशः रसामास व भावाभास बनते हैं, जिस प्रकार रावण की सीता के प्रति रति (आस्वाद्य होकर रसाभास बनती है) 'यद्यपि शृंगार से हास्य जन्म लेता है'-यह जो कहा गया है तदनुसार यह वहाँ हास्य ही है। इस पर भी सामाजिक की यह स्थिति तो बाद में ही होती है। तन्मय होने की स्थिति में तो रति की ही आस्वाद्यता होने के कारण 'दूराकर्षण' श्लोक में पौर्वापर्य के विवेक के अभाव में शृंगाराभास है। लोचन पर लिखित 'बालप्रिया' टीका के अनुसार इसका अर्थ करें तो इस प्रकार होगा : रावण जब सीता के सम्बन्ध में यह श्लोक बोलता है तब हम रावण की रति में इतने तन्मय हो जाते हैं कि उस समय विभाव और रत्यादि के पौर्वापर्य का विवेक रहता ही नहीं, अर्थात् विभाव की आभासता का हमें ख्याल नहीं रहता, पर बाद में विभावादि के पूर्वापर विवेक की दशा प्रास्त होते ही यह निश्चय हो जाता है कि उसमें विभावाभास और स्थाय्याभास है, अतः हास्य-रस का उद्बोध

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१५२ अभिनव का रस-विवेचन होते ही हास्य की चर्वणा होती है और यह निश्चित हो जाता है कि पहले की शृंगार- चर्वणा शृंगाराभास की चर्वणा थी। साथ ही, दूसरे उद्योत में जहाँ रसाभास का निरूपण है वहाँ भी अभिनव गुप् ने स्पष्ट कहा है कि 'यथा रावणकाव्यकर्णनेन शृङ्गाराभासः' । यद्यपि 'शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हासः' इति मुनिना निरूपितं तथाप्यौत्तरकालिकं तत्र हास्यरसत्वम्।' अर्थात् 'जिस प्रकार रावण का काव्य सुन कर शृङ्गाराभास का अनुभव होता है। यद्यपि भरत मुनि ने यह कहा है कि 'शृंगार की अनुकृति हास्य है' तथापि उस हास्य का अनुभव तो बाद में ही होता है।' इसके बाद वाली रावण की उक्ति उद्धृत कर उन्होंने कहा कि 'इत्यत्र तु न हास्यचर्वणावसरः।' यहाँ किसी हास्य-चर्वणा का अवसर नहीं है अर्थात् यहाँ तो शंगार की ही चर्वणा है। औचित्य का अनुभव बाद में होता हो चाहे पहले ही होता हो, चाहे जब होता हो पर जहाँ-जहाँ अनौचित्य का अनुभव होता है वहाँ-वहाँ रसाभास कहलायेगा। इस चर्चा के लिए इतना ही पर्याप्त है। रसाभास में अविध्नासंवित् २. रसाभास का अनुभव रसानुभव माना गया है, इसका अर्थ है कि रसाभास भी रस की भाँति ही चर्वण-योग्य है अर्थात् आस्वादन किये जाने योग्य है, अर्थात् अगर कवि-कर्म सांगोपांग सफल हुआ है तो उसकी भी 'अविघ्नासंवित्' होती है। श्री मांकड़ इस लेख में कहते हैं कि 'रसाभास में विभावादि के अनौचित्य का बोध हमें आरम्भ से ही हो जाता है अर्थात् उसकी संविद् सविध्ना बन जाती है, निविघ्ना नहीं।' और 'रसाभास में संवित् सविध्ना है अतः रसाभास रस नहीं है।' मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि श्री मांकड़ ने 'रसाभास का स्वरूप' नामक व्याख्यान में प्रकृति माने पात्र ऐसा समीकरण बनाकर जो गड़बड़ की थी वैसी इस लेख में 'रसाभास में संवित् सविघ्ना है' कह कर की है। राजा भर्तृहरि की रानी का राजा के अश्वपाल के साथ प्रेम था-इस प्रकार की किंवदन्ती है। रानी अश्वपाल के लिए अगम्या है इसलिए यहाँ रति अनौचित्य-प्रवर्तित है। अतः जिसमें इन दोनों के बीच के प्रेम का निरूपण आता हो वह शंगाराभास का उदाहरण बन जाता है। कवि भर्तृहरि के चरित्र को वस्तु-रूप में ग्रहण कर यदि कोई कवि काव्य लिखे और उसमें अश्वपाल और रानी का प्रेम-निरूपण हो तो इसकी चर्वणा में किस प्रकार विघ्न आयेगा, यह मेरी समझ में नहीं आता। यहाँ संवित् अविघ्नता ही है, अगर कवि-कर्म सांगोपांग सफल हुआ हो तो। पर, मांकड़ की आपत्ति उस रानी के चरित्र को लेकर है। वह दुष्ट है इसलिए उसे लेकर रचित काव्य भी दुष्ट है, यह जो उनका तर्क है, मैं मानता हूँ कि काव्य-प्रदेश में नहीं चल सकता। 'सरस्वतीचन्द्र' के प्रथम भाग के प्रथम पृष्ठ से लेकर अन्तिम पृष्ठ तक सरस्वतीचन्द्र कुमुद के लिए परपुरुष है और कुमुद सरस्वतीचन्द्र के लिए परस्त्री है फिर भी इस ग्रन्थ

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में इन दोनों के बीच के प्रेम का निरूपण है। कौन कहेगा कि उसकी चर्दणा सविघ्नासंवित् है ? देवयानी गुरुपुत्री है, अगभ्या है अतः मांकड़ के मतानुसार तो इनकी प्रीति का निरूपण रसाभास होने के कारण उसकी चर्वणा सविध्ना है। मुझे यह बात स्वीकार्य नहीं लगती। अभिनव गुप्त ने भरत के नाट्यशास्त्र पर रचित अपनी अभिनवभारती नामक टीका में अविध्नासंवित् को समझाते हुए रसास्वाद के सात विघ्न माने हैं, जो इस प्रकार है : १. प्रतिपत्तावयोग्यतासम्भावनाविरह :- सहृदय में कल्पना-शक्ति की कमी हो और कवि द्वारा पात्र-चयन में पर्याप्त औचित्य का ध्यान न रखा गया हो तो काव्य में वर्णित घटना सम्भव नहीं लगती और रसानुभव में विघ्न उपस्थित होता है। अतः समुद्रलंघन, दनुजों के साथ युद्ध आदि अलौकिक घटनाएँ उन पात्रों के साथ ही निरूपित होनी चाहिए जिनके विषय में दीर्घकाल की प्रसिद्धि के कारण वे सम्भव प्रतीत हों। २. स्वपरगतदेशकालविशेषावेशः-यह प्रतीत होते रहना कि काव्य में वर्णित सुख-दुःखादि अपने ही हैं या पराये ही हैं तो ये रसानुभव में विघ्नरूप हैं। ₹. निजसुखादिविवशीभाव :- अगर सहृदय अपने सुख-दुःख से विवश हो गया है तो इससे चर्वणा में बाधा उपस्थित होती है। ४. प्रतीत्युपायवैकल्य-प्रतीति के उपाय कहते हुए अगर विभावादि विकल हों अर्थात् यथायोग्य रूप में निरूपित न हों तो चर्वणा में विघ्न होता है। ५. स्फुटत्वाभाव-विभावादि अगर पूर्ण रूप से स्फुट न हुए हों, प्रत्यक्षवत् न हुए हों तो रसानुभव नहीं हो सकता। ६. अप्रधानता-काव्य में मुख्य को गौण और गौण को मुख्य बना देने से भी रस-प्रतीति में बाधा उपस्थित होती है। ७. संशययोग :- विभावादि के द्वारा स्थायी की अभिव्यक्ति होती है। पर, यह निश्चित नहीं है कि अमुक स्थायी के अमुक ही विभावानुभव हैं। एक ही प्रकार के विभावानुभव अनेक रस के सूचक हो सकते हैं। अतः कवि को इस प्रकार की योजना करनी चाहिए कि यह सन्देह ही न रह जाय कि ये विभावादि किस स्थायी के हैं। इन सात विघ्नों में से मांकड़ कदाचित चौथे विश्न में आलम्बन के अनौचित्य को गिना सकते हैं। यह प्रथम दृष्टि में तो ठीक लग सकता है, पर वह उचित नहीं है। यहाँ जिस वैकल्य का उल्लेख किया गया है वह लौकिक अनौचित्यजनित नहीं है, पर जहाँ तक मैं समझा हूँ कि जिस स्थायी की अभिव्यक्ति के लिए जिन-जिन विभावों और अनुभावों का जितनी मात्रा में निरूपण आवश्यक हो उसमें जितने अंशों में कचाई रह जायगी उतना ही वह प्रतीत्युपायवैकल्य है।

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१५४ अभिनव का रस-विवेचन इसके आधार पर यदि मांकड़ यह कहते हैं कि रसाभास में संवित् सविध्ना होती है और रस में संवित् अविध्ना होती है तो यह बात अनुभव के विरुद्ध है। ३. श्री मांकड़ ने पृ० २१० पर यह कहा है कि 'रसध्वनि की बात करते हुए आनन्दवर्द्धन ने कहा है कि रसभावतदाभासतत्प्रशान्त्यारक्रमः। पर, इसके आधार पर रसाभास रस है या रस का प्रकार है यह प्रमाणित नहीं होता। यहाँ आनन्दवर्द्धन को जो कहना है वह केवल इतना ही है कि रस, भाव, रसाभास आदि अक्रम अर्थात् संलक्ष्यक्रम है .. रसानुभव की प्रक्रिया एक ही नहीं कही जा सकती। पहले जैसा कहा जा चुका है तदनुसार रस का अनुभव निर्विध्न है और रसाभास का सविघ्न है।' यह ठीक नहीं है। अभिनव गुप्त ने स्पष्ट शब्दों मे कहा है कि रसाभास भी रस- ध्वनि का ही एक प्रकार है। अपने लेख में श्री मांकड़ ने 'शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हासः' नामक वाक्य, अभिनव अनुकृति का अर्थ अनुचित शरंगार मानता है, कह कर उद्धृत किया है। उसके तुरन्त बाद यह वाक्य आता है : अतएव अमलिाषे एकतर- निष्ठेऽपि शृङ्गारशब्देन तत्र-तत्र व्यवहारस्तदाभासतया मन्तव्यः । अर्थात् जहाँ अभिलाष एकतरनिष्ठ हो और शृङ्गार शब्द का प्रयोग हो वहाँ उसका अर्थ आभास करना चाहिए। आगे कहता है : शृङ्गारेण वीरादिनामपि आभासरूपता उपलक्षिता एव। शरृंगार कहते ही उसमें वीरादि की आभासता समझ लेनी चाहिए अर्थात् भरत द्वारा जहाँ श्रृंगार कहा गया है वहाँ केवल शृङ्गाराभास ही नहीं वरन् दूसरे रसाभास भी समाविष्ट हुए मान लेने चाहिए। और बाद में समारोप करते हुए कहता है : एवं रसध्वनेरेवामी भावध्वनिप्रभृतयो निष्यन्दा आस्वादे प्रधानं प्रयोजकमेवमंशं विभज्य पृथग्व्यवस्थाप्यते। (पृ० १७९) इस प्रकार रसध्वनि के ही ये सब भावध्वनि (रसाभा सध्वनि, भावाभासध्वनि, भावोदयध्वनि, भवसन्धि-ध्वनि, भावशबलताध्वनि) आदि निष्यन्द हैं, और आस्वाद में जिरुका प्राधान्य हो तदनुसार उन्हें अलग कर उनकी अलग-अलग व्यवस्था की जाती है अर्थात् उन्हें अलग नाम दिये जाते हैं। वह एक और उदाहरण देकर इस बात को स्पष्ट करता है : यथा गन्धयुक्ति शैरेकरससम्मृ्च्छितामोदोपमोगेऽपि शुद्धमास्यादिप्रयुक्तमिदं सौरभ- मिति। जिस प्रकार गंधद्रव्यों के मिश्रण को एक गंध के रूप में उपभुक्त गंध के विषय में भी यह कहते हैं कि यह जटामासीयुक्त है, उसी प्रकार, अर्थात्, अनेक गन्धद्रव्य १. यहाँ एक वस्तु स्पष्ट करने की आवश्यकता है। भरत में रसाभास का उल्लेख नहीं आता है, पर अभिनवगुप्त अपने समर्थन में भरत का ऊपर उद्धृत वचन 'शरृङ्गारानुकृतिर्या तु स हासः' उद्धृत करता है और उसमें प्रयुक्त 'अनुकृति' इव्द का अर्थ आभास करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि शृंगाराभास से हास्य प्रकट होता है। और वह कहता है कि जहाँ कहीं रति एकतरनिष्ठ हो और श्रृंगार शब्द प्रयुक्त हुआ हो वहाँ श्रृंगार श्रृंगाराभास ही समझना चाहिए। अतः जहाँ 'शृङ्गारादि भवेत् हास्यः' वहाँ भी श्रृंगार से शरृंगाराभास ही समझना चाहिए। बाद में वह कहता है कि यहाँ श्ृंगार अर्थात् सभी रसाभासों से हास्य प्रकट होता है, यह मान लेना चाहिए। अभिनवभारती में भी उन्होंने इसी प्रकार स्पष्टता की है।

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रसाभास : थोड़ी चर्चा १५५ एकत्र किये गये हों और उसमें एकरस हुई गन्ध का अनुभव होता हो तो भी उसके विशेषज्ञ यह कह देते हैं कि इसमें जटामासी की गन्ध मुख्य है और यह गन्ध जटामासी की गन्ध से युक्त है तदनुसार ही रसध्वनि में भी आस्वाद में जिसका चमत्कार मुख्य हो उसके आधार पर पृथक-पृथक नाम देते हैं, यथा, रसाभास, भावाभास, भावसन्धि, आदि। यदि तात्विक दृष्टि से विचार करें तो रस भी आठ, नौ या दस नहीं हैं, अनन्त हैं। रुद्रट ने अपने 'काव्यालंकार' ग्रन्थ के बारहवें अध्याय में दस रस गिनाये हैं और यह कहा है कि निवेदादि को भी रसता प्राप्त होती है और इसके कारण उसने यह दिया है कि आस्वादन-योग्यता के कारण रत्यादि स्थायी भाव रसता को प्राप्त करते हैं तो यह आस्वाद-क्षमता अगर निर्वेद आदि में भी पर्याप्त है तो वे सभी रस कहे जायेंगे। रसनाद्रसत्वमेतेषां मधुरादीनामिवोक्तमाचाचैः । निर्वेदादिष्वपि तन्निकाममस्तीति तेऽपि रसाः ।।८।। इस पर टीका लिखते हुए नमिसाधु कहता है : अयमाशयो ग्रन्थकारस्य-यदुत नास्ति सा कापि चित्तवृत्तिर्या परिपोष गता न रसीभवति। भरतेन सहृदयावर्जकत्वप्राचुर्यात्संज्ञां चाश्रित्य अष्टौ नव वा रसा उक्ता इति। अर्थात् ग्रन्थकार का आशय यह है कि ऐसी कोई चित्तवृत्ति नहीं है जो परिपुष्ट होकर रस न बन जाय। भरत ने सहृदय को पिघलाने की शक्ति के प्राचुर्य के कारण नामाभिधान कर आठ या नौ रस माने हैं। अर्थात् हृदय को स्पर्श करने वाली चर्वणाक्षम किसी भी वृत्ति का आस्वाद रसास्वाद ही है। बस भेद इतना है कि हम सुविधा के लिए अलग- अलग नाम देते हैं। इसी बात को अभिनव गुप ने यह कह कर प्रकट किया है कि रस तो एक ही है और ये सब तो उसके विवर्त हैं। दोनों का अर्थ एक ही है।

काव्य में रसाभास का स्थान ४. काव्य में रसाभास के स्थान को लेकर श्री मांकड़ ने यह स्पष्टता की है कि 'रसाभास जब दूसरे रस के अर्थात् रसध्वनि के उद्दीपक के रूप में प्रयुक्त होता है अर्थात् व स्तुध्वनि के उद्दीपक के रूप में निरूपित होता है, उस समय रसाभास का काव्य में स्थान है और ऐसे अवसरों पर रसाभास दोष नहीं है।' मान लीजिए कि भर्तृहरि की रानी ने अपनी दासी को अश्वपाल के पास भेजा और वह मम्मट द्वारा दिये गये ध्वनि के उदाहरण-स्वरूप उद्धृत श्लोक में जैसा व्यक्त है तदनुसार व्यवहार कर आती है और उससे रानी यह श्लोक अगर कहती है तो यह उत्तम काव्य का दृष्टान्त हुआ या नहीं ? श्री मांकड़ के इस लेख के कथनानुसार कदाचित यह उत्तम काव्य कहा जाय और उसमें रसाभास दोष न हो पर ऐसा ही श्लोक जब सन्दर्भ-निरपेक्ष हो तब उसमें रसाभास दोष माना जायगा और वह श्लोक काव्य ही न माना जायगा।

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१५६ अभिनव का रस-विवेचन उनके द्वारा दिया गया उदाहरण देखिए : देखो, पद्मिनी के पत्र पर स्थिर और न हिलने वाली बगुली शोभा पा रही है, मानो स्वच्छ मरकत के पात्र में रखी हुई शंख की कटोरी। इसके विषय में श्री मांकड कहते हैं : 'इसमें जो दो पात्र हैं वे पति-पत्नी नहीं हैं। स्त्री परकीया है, पुरुष परपुरुष है। इस प्रकार पात्रों के बीच रति का प्रकरणनिरपेक्ष निरूपण अनौचित्य उपस्थित करता है।' अब, यहाँ मुझे जो समझ में नहीं आता वह इतना ही है कि रानी उस दूती को उपालम्भ देती है तो उनके अनुसार वह श्लोक उत्तम काव्य होगा। तो क्या वहाँ परकीया रति नहीं है ? और वहाँ अगर चर्वणा में किसी प्रकार का विघ्न नहीं होता, रसाभास दोष नहीं बन जाता तो इस मुक्तक में किसलिए विघ्न उपस्थित होता है और वह दोष रूप माना जाता है ? और इस प्रकार के मुक्तकों को वस्तुतः प्रकरणनिरपेक्ष कहा भी जा सकता है क्या ? क्या उसका प्रकरण इन दो या चार चरणों में सूचित नहीं कर दिया गया ? सूचित न कर दिया गया हो तो यह श्लोक किस प्रकार समझ में आता ? मुझे ऐसा लगता है कि इस तरह के मुक्तकों पर विचार करते समय श्री मांकड़ यह मान लेते हैं कि कवि वाचकों को इस प्रकार व्यवहार करने की प्रेरणा देना चाहता है। कवि के ऊपर यह हेत्वारोपण उचित नहीं है। नीति के आग्रह से उत्पन्न गड़बड़ ८. मैंने अपने प्रथम लेख में भी यही कहा था कि श्री मांकड़ की विचारण में नीतिविषयक आग्रह बाधक सिद्ध होता है। उनके इस लेख में भी आग्रह ने कितनी ही उलझने पैदा कर दी हैं। रसचर्वणा अथवा अविध्ना संवित् और पात्रों के चारित्र्य की नैतिकता-अनैतिकता उनकी विचारण में मिल गयी हैं और इसी कारण जहाँ-जहाँ उन्हें व्यवहार दिखायी देता है वे उसे सविध्ना संवित् मान लेते हैं, जो उचित नहीं है। किसी पापी के पाप-कर्म के प्रति चाहे कितनी ही घृणा हो फिर भी काव्य में ऐसे पात्र के हुए निरूपण के आस्वाद में यह वस्तु बाधक नहीं होनी चाहिए। यह मान लेना भी उचित नहीं कि कवि जो कुछ निरूपित करता है उस सबका वह समर्थन करता है। अगर श्री मांकड़ की दृष्टि ही सच्ची है तो 'घरे बाहिरे' में विमला और संदीप के बीच के व्यवहार का निरूपण हमारे लिए आस्वादयोग्य नहीं होना चाहिए। पर, हम सभी का अनुभव है कि यह संवित् अविध्ना है, यथा-विमला और निखिल के पारस्परिक व्यवहार की है। पर, इन पात्रों के चारित्य पर विचार करते हुए इतना अवश्य कहें कि विमला संदीप के साथ जिस तरह व्यवहार करती है वह उचित नहीं है और निखिल के साथ भी उसका व्यवहार उसके लिए शोभाप्रद नहीं था। पर, यह नहीं कहा जा सकता कि जहाँ जहाँ वह धर्मनीति छोड़कर व्यवहार करती है वहाँ-वहाँ उसका निरूपण रस-वाहक नहीं होता।

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मैं इसका एक उत्कट उदाहरण देता हूँ। विख्यात जर्मन लेखक टामस मान ने 'द होली सिनर' नामक एक उपन्यास लिखा है जिसमें भाई-बहन और माता-पुत्र के शृंगार का वर्णन आता है। इस उपन्यास में एक ठाकुर के पुत्र-पुत्री परस्पर प्रेम करने लगते हैं और पिता जिस रात को मरता है उसी रात को वे समागम करते हैं। भाई पश्चाताप का मारा राज छोड़कर चला जाता है और बहन से जो पुत्र उत्पन्न होता है उसे अमुक वस्त्र और लेख के साथ नदी में बहा दिया जाता है। एक मछियारे के हाथ में आ जाने से वह उसे पालता है और समीपस्थ आश्रम के पादरी उसे धर्म-शिक्षा देते हैं। बड़े होने पर उसे पता चलता है कि उसके माता-पिता ने उसे विचित्र स्थितियों में छोड़ दिया था, अतः वह माता-पिता को ढूँढ़ने निकल पड़ता है। घूमता-घूमता वह अपनी माता के राज्य में आता है; वहाँ उसकी माँ उससे प्रेम करने लगती है और दोनों विवाह कर लेते हैं। उनके एक पुत्री उत्पन्न होती है। पर, यह जान कर कि यह मेरी माता है, वह घर छोड़कर चला जाता है और साधना व अध्ययन के बल पर अन्ततः वह पोप बनता है। उसकी माता भी सच्चे सम्बन्धों की जानकारी होने पर पश्चाताप करती हुई प्रायश्चित के लिए अपनी पुत्री को लेकर पोप से मिलने जाती है। इस तरह इन तीनों का पुनः विचित्र संयोगों में मिलन होता है। अब, इसमें अगर कुछ आस्वाद्य है तो वह ऐसी विचित्र परिस्थितियों में फँसे मनुष्यों के मनोभावों का हृदयस्पर्शी निरूपण ही है। लेखक का यह कहने का आशय नहीं है कि जिस प्रकार इस कहानी में हुआ है, उसी प्रकार समाज में भी हुआ करे अथवा इस कहानी के पात्र जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं उस प्रकार का व्यवहार सभी करें। यहाँ मेरी यह समझ में नहीं आता कि काव्य का काव्य के रूप में रसास्वाद लेने में इसमें निरूपित अत्यन्त विलक्षण घटनाएँ क्यों और किस प्रकार बाधक बनती हैं। इसी तरह की एक लोककथा श्री यशोविजयजीकृत जम्बूस्वामी रास के दूसरे अधिकार की छठी और सातवीं ढाल में आती है। वहाँ भी विलक्षण परिस्थिति ही आस्वाद्य है और उसके आस्वादन में विघ्न के लिए अवकाश नहीं है। श्री मांकड़ की विचार-धारा में जो दोष है; मुझे ऐसा लगता है कि उन्होंने अनौचित्य के तीनों अर्थों को एकाकार कर दिया है। जिसके कारण रसाभाव रसाभासता को प्राप्त होता है, वह अनौचित्य मानसिक-लौकिक है, जिसके कारण भाव-निरूपण में दोष आता है, वह अनौचित्य पात्र-प्रकृतिगत है और जिसकी वजह से संवित् सविध्ना बनती है वह अनौचित्य कवि-कर्मगत है। इन तीनों को एक मान लेने से श्री मांकड़ की विचार-धारा गड़बड़ा गयी है। साथ ही, अविध्नासंवित् का विघ्न और पात्र की नैतिकता-अनैतिकता-यह भी एक वस्तु नहीं है। मेरी बुद्धि के अनुसार, कविनिमित पात्र या प्रसंग की प्रत्यक्षवत् प्रतीति और अनुरूप संवेदन जहाँ हो उसे अविष्नासंवित् कहा जाय-भले ही ये पात्र या प्रसंग कुछ भी हों : प्रसंग राम और सीता का हो,

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१५८ अभिनव का रस-विवेचन दुष्यन्त और शकुन्तला का हो, देवदास और पार्वती का हो, जमाल और अलककिशोरी का हो, मैडम बावरी की एम्मा और उसके किसी यार का हो, माता का शिरच्छेद करने के लिए तैयार परशुराम का हो, दशरथ पर क्रोध से आगबबूला हुए लक्ष्मण का हो, राम के प्रति आकर्षण से विह्वल हुई शूर्पणखा का हो या फिर पिंगला और अश्व- पाल अथवा उसकी दासी का हो। कवि का यह काम है कि वह निरूपितार्थ निश्चित वस्तु की प्रत्यक्षवत् प्रतीति कराये और ऐसा करने में ही उसकी सफलता है। इस तरह का अनुभव होने पर जब हम उस पात्र के पात्रत्व का विचार करते हैं तब अगर उसमें किसी नीति से अलग या अशोभन कार्य दिखायी दे तो उसी अनुपात में उस पात्र का गौरव कम हो जाता है, उसी अनुपात में हम पात्र को निम्न कोटि का मानते हैं। पर, यह मानना युक्तिसंगत नहीं है कि यदि पात्र निम्न कोटि का है इसलिए उसकी निरूपण-प्रतीति सविध्ना होती है। यदि इस प्रकार होता तो 'ईडिपस सेक्स' का रसानुभव किस प्रकार होगा ? श्री मांकड़ में इन दो वस्तुओं की गड़बड़ दिखायी देती है। श्री अभिनव गुप्त ने सहृदय की व्याख्या देते हुए कहा है कि 'येषां काव्यानु- शीलनाभ्यासवशाद्विशदीभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मयीभवनयोग्यता ते स्वहृदयसंवादभाजः सहृदयाः।' अर्थात् काव्यानुशीलन के अभ्यास के कारण विशद बने जिनके मनोमुकुर मे वर्णनीय वस्तु में तन्मय होने की योग्यता हो ऐसे हृदयसंवाद वाले सहृदय होते हैं। अविध्नासंवित् होने में जो विघ्न आते हैं उनमें से कितने ही सहृदयगत होते हैं और कुछ कविकर्मगत होते हैं। सहृदयगत विध्नों में से एक 'स्वसुखादिविवशीभावः' माना गया है। इसे जरा विस्तृत करने पर इसमें पसन्द-नापसन्द को भी स्थान दिया जा सकता है। श्री मांकड़ के मामले में इनका नीति-अनीति विषयक आग्रह उनके वर्णनीय वस्तु में तन्मय होने में बाधक होता है अर्थात् उनकी तन्मयीभवनयोग्यता इतनी मात्रा में कम होती है, अतः उन्हें ऐसा लगता है कि जहाँ-जहाँ लौकिक अनौचित्य है वहाँ-वहाँ संवित् सविघ्ना है। यह दोष कवि के निरूपण का नहीं पर सहृदय की विवशता का है।

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परिशिष्ट

रसाभास 'रसाभास : थोड़ी चर्चा' नामक लेख लिखने के पश्चात् मेरे हाथ में श्री के० कृष्णा- मूर्ति की पुस्तक 'अँसेज़ इन संस्कृत क्रिटिसिज़्म' आयी। इसमें रसाभास पर एक लेख है जो मेरी रसाभास-सम्बन्धी धारणा का समर्थन करता है, अतः उसके आधार पर यहाँ थोड़ा विवरण और जोड़ता हूँ। श्री कृष्णामूर्ति ने पूना ओरियन्टल सीरीज़ में ध्वन्यालोक का अँग्रेजी अनुवाद प्रकट किया है और 'ध्वन्यालोक ऐण्ड इट्स क्रिटिसिज़्म' नामक एक पुस्तक भी मैसूर के 'काव्यालय' की ओर से प्रकट की है। इनकी इस पुस्तक का प्रकाशन कर्नाटक यूनिवर्सिटी ने किया है। भरत के नाट्यशास्त्र के केन्द्र में रस है और उसे ध्यान में रख कर नाटक के वस्तु, पात्र तथा प्रसंग-निरूपण से सम्बद्ध अनेक नियम बताये गये हैं। भरत ने नाट्य के अनेक प्रकार स्वीकार किये हैं पर उनमें नाटक को सर्वोत्तम माना है और इस बात पर बल दिया है कि नाटक में वस्तु और नायक सदा उदात्त होते हैं। आठ या नौ रस स्वीकार करने पर भी नाटक में अंगीरस बनने के लिए उसने दो को ही- शृंगार और वीर को ही-पात्रता प्रदान की है। और इसका कारण आनन्दवर्द्धन और अभिनवगुप्त जिस प्रकार प्रस्तुत करते हैं तदनुसार नाटक केवल जीवन का दर्पण ही नहीं है पर वह अपने नायक के चरित्र के द्वारा सदाचार का उपदेश भी देता है : 'शृङ्गाररसाङ्गैःरुन्मुखीकृताः सन्तो हि विनेयाः सुखं विनयोपदेशात् गृह्नन्ति। सदाचारो- पदेशरूपा हि नाटकादिगोष्ठी विनेयजनहितार्थमेव मुनिभिरवतारिता।' (ध्वन्यालोक, ३-३० पर वृत्ति, पृ० ३९८-९) अगर ऐसा करना है तो नायक-नायिका का चरित्र उदात्त होना चाहिए। (मैंने अपने पहले लेख में नायक नायिका के लक्षण बताये थे) भरत शृंगार को शुचि, उज्जवल और दर्शनीय के रूप में वर्णित करता है और आनन्दवर्द्धन भी इसे मधुर और सुकुमारतर रूप में परिचित कराता है। तनिक-सी ग्राम्यता अथवा अनौचित्य उसे हल्का बना देती है। अर्थात् गम्भीर नाटकों में हल्के प्रकार का प्रेम अथवा शृंगार अंगीरस नहीं हो सकता। पर, जीवन की भाँति नाटक में तो सभी प्रकार के पात्र और भाव आयेंगे ही। तो इन सबका क्या स्थान ? इसका उत्तर सरल है। नाटक में नायक-नायिका का भाव ही अर्थात् अंगीरस ही उदात्त होना चाहिए। प्रतिनायक अथवा पताकाप्रकरी आदि के पात्रों के भाव यथाजीवन वास्तविक अथवा वस्तुतः हल्के और ग्राम्य भी हो सकते हैं, क्योंकि इनके कारण उसका कला-मूल्य जरा-सा भी कम नहीं होता। इसीलिए भरत ने कहा है कि नाटक के अलावा अन्य स्वरूपों में, यथा-प्रहसन, भाण और उत्सृष्टिकांक में इस प्रकार के

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१६० अभिनव का रस-विवेचन अनौचित्य का विचार अंगीरस के विषय में भी नहीं किया जाता; क्योंकि ये प्रकार ही रंजक रसप्रधान हैं। इसका यह अर्थ हुआ कि रस के भी दो प्रकार हैं : एक केवल रंजक और दूसरा रंजक होने के साथ साथ बोधक (एडिफाइंग)। नाटक में ये दूसरे प्रकार के रस ही अंगी हो सकते हैं और नाटक के अलावा अन्य प्रकारों में पहले प्रकार का भी अंगीरस हो सकता है। साथ ही, इससे यह भी फलित होता है 'कि नाटक में रस-विचार दो स्तरों पर किया जा सकता है : कला के स्तर पर और नीति के स्तर पर। अंगीरस का विचार केवल कलास्तर पर ही किया जाता है जब कि अंगीरस का विचार कला-स्तर के अलावा नीति के स्तर पर भी किया जाता है। आनन्दवर्द्धन या मम्मट ने रसाभास को रसदोष नहीं माना है। शिव-पार्वती के सम्भोग-वर्णन में जो अनौचित्य है वह इन दोनों के मतानुसार दोष है, पर रसाभास इस कोटि में नहीं आता। इसका कारण यह है कि रसदोष सहृदयों में विरसता पैदा करता है, पर रसाभास वैरस्य पैदा नहीं करता, इतना ही नहीं पर अनौचित्य होने पर भी वह आस्वाद्य होता है। इस प्रकार दोष का अनौचित्य और रसाभास का अनौचित्य भिन्न हैं। सभी रसों का आभास तो अन्ततः हास्य में परिणत होता है। अभिनव गुत ने इसे 'शृंगारानुकृतिर्हासः' कह कर समझाया है। इसका अर्थ हुआ कि उदात्त रस और उसका विडम्बनारूप हास्यरस-इन दोनों के बीच रसाभास का स्थान है। रसाभास का कारण-रूप अनौचित्य उदात्त पात्रों के आधार पर निरूपित हो रहे रस के निरूपण में दोष की छाया डालता है, फिर भी गौण पात्र अथवा प्रतिनायक के निरूपण में यह गुण-रूप बन जाता है, क्योंकि उनके चरित्र की यह हमें प्रत्यक्षवत् प्रतीति कराता है। बाद में रूप गोस्वामी, कर्णपुर आदि ने तो कृष्ण-गोपियों के शरृंगार को शृंगाराभास नहीं, पर श्रेष्ठ शृंगार माना है। सीता-विषयक रावण की उक्ति के बारे में कहा है कि इसमें रावण की सीता के प्रति उत्कट प्रीति प्रकट होती है। रावण की निगाहों से देखने पर तो वह शंगार ही है। उसका प्रेम गहरा और चाहना तीव्र है। अतः प्रेक्षक भी आरम्भ में तो रंगभूमि पर इसका अभिनय देख कर शृंगार का ही आस्वाद प्राप्त करते हैं। पर, थोड़ी ही देर में उन्हें मालूम होता है कि यह तो एकपक्षीय प्रेम है, और इसी कारण रावण के प्रति उनकी सहानुभूति समाप हो जाती है और इसके अनन्तर रावण के प्रयत्न हास्यास्पद बन जाते हैं। फिर भी उन्होंने आरम्भ में रावण के प्रेम का जो आस्वाद किया वह मिट नहीं जाता; वह विशुद्ध शंगार भी नहीं है। वह हास्य भी नहीं है। यह बात दूसरी है कि बाद में वह हास्य का विभाव बन जाता है। प्रश्न है कि तो यह कौन सा रस है ? अभिनव के मतानुसार यह रस न होकर रसाभास है। अगर हम थोड़ीसी शिथिल भाषा का उपयोग करें तो इसे शरृंगार-रस कह सकते हैं। पर, शास्त्र की दृष्टि से तो यह शृंगाराभास ही है। इसमें अनौचित्य है, पर यह अनौचित्य दोष नहीं बन जाता, क्योंकि यह मुख्य अथवा अंगीरस का स्पर्श नहों करता, कारण यह है कि यह

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परिशिष्ट १६१

प्रतिनायक के भाव-रूप में निरूपित है। इसी तरह दूसरे रसों के बारे में मान लेना चाहिए। अभिनव गुप्त इन सभी के दृष्टान्त नहीं देता। रसाभास का अनौचित्य विरोधी रसों के निरूपण की भाँति विघातक नहीं है। यह रस का ही ईषद्ऊन रूप है और यह ऊनता इतनी अल्प होती है कि तत्काल तो यह परिपुष्ट रस का आभास पैदा कर देती है-सीप में रजत के आभास की भाँति। यहाँ यह बात ध्यान में आ गयी होगी कि कम-से-कम शृंगार के मामले में तो अनौचित्य का विचार कला-स्तर के अतिरिक्त नीति के स्तर पर भी करना पड़ता है।

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वक्रोक्ति अथवा कुन्तक का काव्य-विचार

मैंने अपने व्याख्यान के लिए विषय रखा है : 'वक्रोक्ति अथवा कुन्तक का काव्य- विचार।' भामह का 'काव्यालङ्कार' इससे पहले कि मैं कुन्तक की काव्य-चिन्ता पर आऊँ, मुझे थोड़ी भूमिका बाँधने की आवश्यकता है। हमारे यहाँ काव्य अथवा साहित्य की स्वतंत्र चर्चा करने वाला अगर कोई प्राचीनतम ग्रंथ मिलता है तो वह भामह का 'काव्यालंकार' है। इसके पूर्वं भरत के नाट्यशास्त्र में वाचिक अभिनय का निरूपण करते समय सोलहवें अध्याय में वाक्य के गुण-दोष और अलंकार की चर्चा की गयी है और उसमें मात्र दस गुण, दस दोष और चार अलंकारों की बात आती है। भामह का यह ग्रंथ तो काव्यशास्त्र का ही ग्रंथ है और इसमें उसने साठ कारिकाओं में काव्य-शरीर का, एक सौ साठ में अलंकार का, पचास में दोष का, सत्तर में काव्य-न्याय का और साठ में शब्द-शुद्धि का निरूपण किया है। साथ ही, इसमें उसने लक्षण और उदाहरण स्वयंरचित दिये हैं। काव्य-प्रयोजन और काव्य-हेतु काव्य-प्रयोजनों में आनन्द (प्रीति) को गिनाने वाला वह प्रथम ही है। भरत में और बहुत है, पर आनन्द का नामोल्लेख नहीं है। काव्य के हेतुओं में प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास का उसने अपने ढंग से उल्लेख किया है। शब्दार्थो सहितौ काव्यम् उसके जमाने में आलंकारिकों के दो वर्ग थे : एक वर्ग अर्थालंकारवादी था और दूसरा शब्दालंकारवादी था। प्रथम वर्ग यह मानता था कि रूपकादि अलंकार ही काव्य-शोभा के निष्पादक हैं जब कि दूसरा वर्ग यह मानता था कि अर्थालंकार तो बाह्य हैं, क्योंकि पहले तो शब्द ही सुनायी देता है और बाद में अर्थ समझ में आता है। हृदय पर पहले शब्द का असर होता है अर्थात् शब्दालंकार ही मुख्य हैं। अर्थ न समझ में आने पर केवल शब्द-माधुर्य से भी श्रोता आनंद प्राप्त करता है। अर्थात् उसके मतानुसार सौशब्द ही, शब्द-सौंदर्य ही काव्य है। अर्थ-व्युत्पत्ति ऐसी नहीं है। इन दोनों आत्यन्तिक मतों का समन्वय करता हुआ भामह कहता है कि शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों भिन्न हैं अर्थात् उसे तो ये दोनों ही इष्ट हैं। केवल शब्दालंकार अथवा केवल अर्थालंकारों से काव्य नहीं बन जाता, काव्य तो शब्दों और अर्थ के साहित्य से बनता है : शब्दारथौं सहितौ काव्यम्।

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वक्रता ही वाणी का सौन्दर्य यह हमारे काव्य की प्राचीनतम व्याख्या मानी जायगी; पर संभवतः भामह द्वारा ये काव्य की व्याख्या के रूप में कहे गये वचन न भी हों। उसके सम्पूर्ण ग्रंथ को देखने से लगता है कि उसे इतना ही नहीं कहना है कि शब्द और अर्थ का साहित्य अर्थात् काव्य। हम देख आये हैं कि शब्द और अर्थ दोनों मिलकर ही काव्य बनता है अर्थात् शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों के लिए काव्य में स्थान है। यह अलंकरण अथवा सौंदर्य किस प्रकार साधित होता है ? भामह कहता है : वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलक्कतिः ।-१-३६ अर्थात् वक्र शब्द और अर्थ वाली उक्ति ही वाणी का इष्ट सौंदर्य है। भामह ने अपने ग्रंथ के पाँचवें परिच्छेद में कहा है कि कितने ही कवि तेजस्वी रत्नों से, फलों से नमित वृक्षों से और मुकुलित पुष्पों से वाणी को अलंकृत करते हैं, पर इनसे काव्य की शोभा अभिवृद्ध नहीं होती। इन सबसे तो भूषण, उपवन, माला आदि की ही शोभा बढ़ती है। वाणी की शोभा तो वक्रोक्ति से सिद्ध होती है : अंशुमद्द्िश्च मणिभिः फलनिम्नैश्र शाखिभिः । फुल्लैश् कुसुमैरन्यैर्वाचोऽलङ्कुरुते यथा॥ ६४॥ तदेभिरडगैर्भूष्यन्ते भूषणोपवनस्रजः । वाचां वक्रार्थशब्दोक्तिरलङ्काराय कल्पते॥ ६६ ॥ काव्य के विविध प्रकार बताने के बाद वह कहता है : युक्तं वक्रस्वभावोक्त्या सर्वमेवैतदिष्यते।-१-३० अर्थात् ये सब साहित्य अथवा काव्य-प्रकार वक्र-स्वभाव वाली उक्ति वाले होने चाहिएँ। आशय है कि सभी प्रकार के काव्यों में वक्रोक्ति होनी चाहिए। साथ ही, अपने ग्रंथ के छठे परिच्छेद में किन शब्दों का काव्य में प्रयोग किया जाय और किनका नहीं, इसके विवेक की प्रस्तावना के रूप में वह कहता है : वक्रवाचां कवीनां ये प्रयोगं प्रति साधवः । प्रयोक्तुं ये न युक्ताश्च तद्विवेकोऽयमुच्यते॥ ६-२३॥ 'कवि की वाणी में किन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए और किनका नहीं तत्सम्बन्धी विवेक अब कहा जायगा।' यहाँ भी कवि-वाणी को वह वक्र कहता है जो द्रष्टव्य है। इस प्रकार हम भामह की समग्र विचारणा को ध्यान में रखें तो यह कहना पड़ेगा कि वक्रतायुक्त शब्द और अर्थ का साहित्य काव्य है। उसका ऐसा मत है कि जहाँ वक्रता न हो वहाँ काव्य भी नहीं होगा। दूसरे स्थान पर उसने यह कहा भी है। हेतु, सूक्ष्म और लेश-इन तीन अलंकारों को वह स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उनमें वक्रोक्ति नहीं होती। हेतुश्र सूक्ष्मो लेशोऽथ नालङ्कारतया मतः। समुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिधानतः ॥। २-८६ ।।

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१६४ अभिनव का रस-विवेचन आगे चल कर वह कहता है कि वक्रोक्तिहीन उक्ति काव्य नहीं मानी जायगी, यह तो कहानी कहने की अपेक्षा समाचार कहा जायगा, रिपो्टिंग कहा जायगा। गतोऽस्तमर्को भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः । इत्येवमादि किं काव्यं वार्तामेनां प्रचक्षते॥ २८७॥ सूर्य अस्त हुआ, चन्द्र प्रकाशित होता है, पक्षी घोंसलों में जाते हैं, आदि-यह कहीं काव्य है ? यह तो समाचार कहा जायगा। वक्रोक्ति का अर्थ भामह ने वक्रोक्ति को स्पष्ट नहीं किया है, पर अतिशयोक्ति अलंकार की चर्चा के अन्त में इस प्रकार कहा है कि- सैपां सवैंव वक्रोक्तिरनायार्थो-विभाव्यते। यत्नोडस्यों कविना कार्यः कोऽलङ्कारोऽनया विना॥ २-८५ ॥ ये सभी अतिशयोक्ति वक्रोक्ति है। इसके द्वारा अर्थ का विभावन होता है। अतः कवि को इसे सिद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके बिना अलंकार कैसा ? आनन्दवर्द्धन ने अपने ग्रंथ में यह श्लोक उद्धृत किया है। इसका विश्लेषण करते हुए अभिनव गुप्त ने कहा है कि प्रथम जो अतिशयोक्ति के लक्षण बताये गये हैं वे सब वक्रोक्ति अर्थात् अलंकार के प्रकार हैं, क्योंकि भामह स्वयं कहता है- 'वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलङ्कतिः।' और बाद में इस श्लोक को समझाते हुए कहा गया है कि 'शब्द की वक्रता और अर्थ की वक्रता अर्थात् शब्दार्थ का लोकात्तीर्ण रूप में अवस्थान। इस प्रकार यही उस अलंकार की अलंकारता है।' यहाँ वक्रता का अर्थ 'लोकोत्तीर्ण' रूप में अवस्थान किया गया है। भामह ने स्वयं अतिशयोक्ति अलंकार का लक्षण देते हुए कहा है कि- निमित्ततो वचो यत्तु लोकातिकान्तगोचरम्। मन्यन्तेऽतिशयोक्ति तामलङ्कारतया यथा ॥ २-८१॥ 'किसी कारणवश लोकोत्तर-अलौकिक अर्थ का बोध कराने वाले वचन अतिशयोक्ति हैं।' यहाँ वक्रता का अर्थ भी लोकोत्तीर्णं रूप में अवस्थान किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि अलंकार मात्र में अतिशयोक्ति का अनुप्रवेश होता है। इसके कारण ही अलकार अलंकार होता है। आनन्दवर्द्धन ने यह बात स्पष्ट शब्दों में कही है : तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य चारुत्वातिशयोगोऽन्यस्य- त्वलङ्गारमात्रतैवेति ... । पृ० ४६७-८ 'कवि-प्रतिभा के बल पर अगर अलंकार में अतिशयोक्ति की स्थापना हुई है तो उसमें चारुत्व अधिक दिखायी देता है; दूसरे तो मात्र नाम के ही अलंकार होते हैं।' अब यह लोकातिक्रान्तगोचरता अथवा लोकोत्तरता क्या करती है ? तो कि अनयार्थों विभाव्यते। इसके द्वारा अर्थ विभावित होते हैं। 'विभावित होते हैं'-इसके अभि-

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नवगुप्त तीन अर्थ करता है : (१) सभी लोगों के उपभोग के कारण पुराने पड़ गये अर्थ का विचित्र रूप में, सुन्दर रूप में भावन होता है। (२) इस जगत् के प्रमदा उद्यान आदि सामान्य पदार्थ भाव जगाने वाले विभावरूप बन जाते हैं। (३) ये पदार्थ भावरूप बन जाते हैं, रसमय बन जाते हैं। इस तरह वक्रोक्ति के कारण पुराने अर्थ भी नये जैसे लगते हैं, भाव जगाने वाले विभावरूप बन जाते हैं और अन्ततः रसमय हो जाते हैं। इससे स्पष्ट हो गया होगा कि भामह के मतानुसार 'शब्दार्थौं सहितौ काव्यम्' सही है, पर यह शब्दार्थ वस्तु को रसमय बनाने वाली वक्रोक्ति से प्रयोजित होना चाहिए। रीति अथवा मार्ग शब्दार्थ का साहित्य और वक्रता इन दो मुद्दों के बाद मैं भामह के रीति अथवा मार्ग से सम्बद्ध मुद्दा लेना चाहता हूँ। उन्होंने इन दोनों में से एक भी शब्द का प्रयोग नहीं किया है। उनके युग में काव्य की रीति अथवा मार्ग के आधार पर वैदर्भ और गौड़ीय नामक दो वर्ग माने जाते रहे होंगे। इनमें से कितने ही विद्वान् वैदर्भ को ही श्रेष्ठ मानते थे और गौड़ीय में अर्थ-सौष्ठव होने पर भी उसे स्वीकारने के लिए तत्पर न थे। इस सम्बन्ध में भामह कहता है कि काव्य में गौड़ीय और वैदर्भ के आधार पर भेद किया जा सकता है क्या ? पर मूर्ख गतानुगतिक न्याय के कारण ऐसा करते हैं। (मूर्ख शब्द मेरा नहीं है) गौडीयमिदमेतत्तु वैदर्भमिति किं पृथक्। गतानुगतिकन्यायान्नानाख्येयममेधसाम् ॥१-३२॥ वह आगे कहते हैं : 'अश्मकवंश आदि वैदर्भ कहलाता है। उसे कहलाने दो। नाम कहीं गुण देख कर नहीं दिये जाते, इच्छानुसार दिये जाते हैं।' ननु चाश्मकवंशादि वैदर्भमिति कथ्यते। कामं तथास्तु प्रायेण संज्ञेच्छाती विधीयते॥ १-३४॥ वैदर्भ-रचना में अधिकांशतः स्पष्टता, सरलता और कोमलता होती है। इसीलिए भामह कहते हैं कि अगर किसी रचना में ऋजुता और कोमलता तो हो पर अर्थगौरव और वक्रोक्ति न हो, तो वह काव्य थोड़े ही कहा जायगा; वह तो केवल संगीत के समान कान को मधुर लगने वाला है, बस। यहाँ भी उनका वक्रोक्ति पर दिया गया बल द्रष्टव्य है। अपुष्टार्थमवक्रोक्ति: प्रसन्नमृजु कोमलम्। भिन्नं गेयमिवेदं तु केवलं श्रुतिपेशलम् ॥ १-३४॥ इसी प्रकार अगर कोई गौडीय रचना अलंकारयुक्त, ग्राम्यतारहित, अर्थपूर्ण, न्यायसंगत और अनाकुल अर्थात् जटिलता आदि दोष से मुक्त हो तो वह गौडीय होने

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पर भी श्रेष्ठ मानी जायगी, और अगर कोई रचना वैदर्भ है पर उसमें ये गुण नहीं हैं तो वह केवल वैदर्भ होने के कारण श्रेष्ठ नहीं होगी। अलङ्कारवदग्राम्यमर्थ्य न्याय्यमनाकुलम्। गौडीयमपि साधीयो वैदर्भमिति नान्यथा॥ १-३५॥ इस तरह हम देखते हैं कि भामह रचना की उत्कृष्टता का निर्णय उसकी गौडीय या वैदर्भ होने के आधार पर करने के विरुद्ध है। वह कहता है कि उसमें काव्य-गुण- वक्रता, अर्थगौरव आदि हैं या नहीं यह देखना चाहिए। उसका यह स्पष्ट मत है कि अगर ये गुण नहीं हैं तो रचना काव्य नहीं मानी जायगी। अब, हम कुन्तक का काव्य-विचार देखेंगे। एक तरह से कहें तो कुन्तक ने भामह के ही काव्य-विचार को अपनी प्रतिभा के आलोक से आलोकित कर उसकी जानकारी सभी को देकर प्रस्तुत किया है; अथवा भामह के विचार में निहित बीज कुन्तक में अंकुरित, विकसित और पल्लवित होकर विलास करते हुए दिखायी देते हैं। कुन्तक की विशेषता कुन्तक की पहली विशेषता यह है कि वह कवि-कर्मपर खूब भार देता है। बारम्बार वह कवि-व्यापार का उल्लेख करता है। काव्य की व्याख्या ही वह 'कवि का कर्म वह काव्य' कह कर देता है। उसकी विचारणा में कवि केन्द्र में है। कवि का व्यक्तित्व काव्य-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भाग अदा करता है जिसे कुन्तक ठीक तरह से समझता है और इसीलिए उसने मार्ग अथवा रीति की चर्चा करते समय स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कवि के स्वभाव-भेद से मार्ग-भेद दिखायी देता है। कारण, कवि का जैसा स्वभाव होता है तदनुरूप ही वह व्युत्पत्ति प्राप्त करता है और ये दोनों मिलकर उससे दोनों के अनुरूप काव्यमार्ग का ही अनुसंधान करवाते हैं। इस तरह, उसके मार्ग की कल्पना में 'द स्टाइल इज दि मैन' का पूर्वरूप देखा जा सकता है। अंग्रेजी में स्टाइल का जो अर्थ है उसे कुन्तक का मार्ग शब्द बहुत अंशों में व्यक्त करता है। इसे हम मार्ग की चर्चा के समय विस्तार से देखेंगे। उसके ग्रन्थ का स्वरूप आरम्भ में मैं ग्रंथ के स्वरूप के विषय में दो शब्द कहना चाहूँगा। उसका मूल ग्रंथ कारिकाओं के रूप में लिखा हुआ है। इस ग्रंथ का नाम 'अलंकार' है। इन कारिकाओं को समझने के लिए उसने स्वयं वृत्ति लिखी हैं और उनमें बीच-बीच में श्लोक भी ग्रथित हैं। इन श्लोकों को 'अन्तरश्लोक' कहता है। जिन्होंने ध्वन्यालोक पढ़ा है उन्हें तुरन्त याद आ जायगा कि उसकी रचना भी इसी प्रकार की है। वहाँ अन्तरश्लोक को संग्रहश्लोक कहा गया है। उन्होंने अपनी इस वृत्ति का नाम 'वक्रोक्ति- जीवितम्' रखा है। आज मूल 'अलंकार' ग्रंथ नहीं मिलता है; 'वक्रोक्तिजीवित' नामक वृत्ति के साथ ही मिलता है, अतः वह ग्रंथ ही 'वक्रोक्तिजीवित' के नाम से विख्यात है। मूल नाम विस्मृत हो गया है। यद्यपि कुन्तक तो मंगलाचरण के बाद आने वाली

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दूसरी कारिका में ही कहता है कि इस ग्रंथ का नाम 'अलंकार' है : 'ग्रन्थस्यास्य अलंकार इत्यभिधानम्।' इस कारिका में उन्होंने कहा है कि लोकोत्तर, चमत्कारी वैचित्र्य की सिद्धि के लिए काव्य का यह कोई 'अलंकार' रचा गया है। इसमें भी कवि-कर्म पर दिया गया बल देखा जा सकता है। काव्य के प्रयोजन तदुपरान्त वह काव्य के तीन प्रयोजन गिनाता है : १. राजपुत्र आदि अभिजात वर्ग के लिए कर्त्तव्याकर्त्तव्यरूपी धर्म का उपदेश, २. अमात्य, सेनापति, सुहृद, स्वामी, सेवक आदि के लिए उचित व्यवहार की शिक्षा और ३. चतुर्वर्ग के फल के आस्वाद से भी ऊँचे ऐसे काव्यामृत के रस का अनुभव कर तद्विदों अर्थात् काव्य- मर्मज्ञों के हृदयों में चमत्कार फैलाना अर्थात् बारम्बार आनन्द उत्पन्न करना। यों पहले दो प्रयोजनों का एक ही में समावेश हो सकता है अर्थात् हम यह कह सकते हैं कि कुन्तक काव्य के दो प्रयोजन मानता है : उपदेश और आनन्द और आनन्द को वह चतुर्वर्ग के फल के आस्वाद से भी उच्च मानता है। सालङ्कार ही काव्य इसके बाद छठी कारिका में वह खूब महत्त्व की बात करता है : अलङ्कतिरलङ्कार्यमपोद्धृटत्य विवेच्यते। तदुपायतया, तत्त्वं सालङ्कारस्य काव्यता॥ १-६॥ "यहाँ काव्य को पूरी तरह समझने के लिए अलंकार और अलंकार्य को अलग कर उनका विवेचन किया जाता है।" शब्द, अर्थ और अलंकार-ये तीनों मिल कर ही काव्य नामक एक अखण्ड पदार्थ बनता है। इसमें, बाद में, तीनों का पृथक् अस्तित्व नहीं रहता। तदपि काव्य के स्वरूप को पूरी तरह से समझने के लिए उस अलंकार्य शब्द और अर्थ और उनके अलंकारों को पृथक कर यहाँ उनका विवेचन किया जाता है- "जिस प्रकार वाक्यों में पदों का अथवा पदों में प्रकृति-प्रत्ययों का पृथक अस्तित्व न होने पर भी व्युत्पत्ति के लिए उन्हें अलग कर उनका विवेचन किया जाता है। सत्य बात तो यह है कि सालंकार होने पर काव्य बनता है।" अतः इसका अर्थ यह हुआ कि- सालङ्कारस्यालङ्करणसहितस्य सकलस्य निरस्तावयवस्य सतः काव्यता कविकर्मत्वम्। तेनालङ्कतस्य काव्यत्वमिति स्थितिः, न पुनः काव्यस्यालङ्कारयोग इति। "अलंकार सहित अवयवहीन सम्पूर्ण वचन ही काव्य है। अर्थात् हुआ यह कि अलंकार वाला होने पर ही वह काव्य है। ऐसा नहीं है कि काव्य अलग और उस पर आरोपित अलंकार अलग हों।" यहाँ हम एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त का प्रतिपादन होते हुए देखते हैं कि कलाकृति एक अखण्ड निरवयव पदार्थ है। इतालवी दार्शनिक क्रोचे ने काव्य में अलंकार को लेकर जो कहा है वह यहाँ याद आये बिना नहीं रहता। उसने कहा है कि-

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१६८ अभिनव का रस-विवेचन "One can ask oneself how an ornament can be joined to an expres- sion ? Externally ? In that case it must always remain separate. Iater- nally ? In that case, it does not assist expression or mars it; or it does form part of it and is not ornament, but a constituent element of exp- ression, indistinguishable from the whole." -Aesthetic, Ch. IX, p. 113. आनन्दवर्द्धन ने भी उत्तम काव्य के अलंकारों के विषय में कहा है कि- अलङ्कारान्तराणि हि निरूप्यमाणदुर्घटान्यपि रससमाहितचेतसः प्रतिभानवतः कवेरहंपूर्विकया परापतन्ति। .. तस्मान्न तेषां बहिरङ्गत्वम् रसाभिव्यक्तौ। "कोई प्रतिभाशाली कवि जब रस में ध्यान केन्द्रित करता है उस समय विचारों में दुर्घट लगने वाले अलंकार' मैं पहले, 'मैं पहले' करते हुए उसके आगे आने के लिए स्पर्धा करते हैं ... अर्थात् रस की अभिव्यक्ति में उन्हें बाहर का नहीं माना जा सकता।" -पृ० २२१-२२ 'सालंकारस्य काव्यता' का जो अर्थ ऊपर दिया गया है उसके अलावा यह अर्थ भी सही है कि सालंकार न होने पर वह काव्य नहीं माना जायगा। अलंकारों के बिना काव्यत्व आता ही नहीं। काव्य की व्याख्या तत्श्चात् वह काव्य की व्यवस्थित व्याख्या देता है जो इस प्रकार है : शब्दार्थौं सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणि ॥ १-७ ॥ अर्थात् वक्र कवि-व्यापार वाले, तद्विदों के लिए आह्लादक बंधयुक्त शब्द और अर्थ काव्य हैं। इनमें से प्रत्येक शब्द स्पष्टता की अपेक्षा रखता है और जब हम कुन्तक द्वारा दी गयी प्रत्येक शब्द की व्याख्या समझ लेंगे तब हम उनकी काव्य-धारणा समझ सकेंगे। अतः उन्होंने जिस क्रम से यह व्याख्या समझायी है उसी क्रम से उसे समझने का प्रयत्न करेंगे। शब्दार्थो काव्यम् पहली बात है : शब्दार्थौ काव्यम्। शब्द और अर्थ मिल कर काव्य बनता है। शब्द और अर्थ-दोनों मिल कर एक काव्य होता है। यह तो विचित्र कहा जायगा। पर, यही बात सत्य है। कितने ही कवि-कौशल द्वारा रचित सौन्दर्यातिशय वाले शब्द को ही काव्य कहते हैं, तो कितने ही रचना-वैचित्र्य को लेकर चमत्कार उत्पन्न करने वाले अर्थ को ही काव्य कहते हैं। इन दोनों पक्षों का इससे खण्डन हो जाता है। जिस प्रकार प्रत्येक तिल में तेल होता है उसी प्रकार शब्द और अर्थ में-प्रत्येक में तद्विदाह्ना- दकारित्व होता है, किसी एक में नहीं।

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इसके बाद वह दो-तीन उदाहरण देकर बताता है कि वर्ण-साम्य से सिद्ध रम्यता मात्र से काव्य नहीं बन जाता। अर्थ भी मनोहर होना चाहिए। साथ ही, अर्थ तो सुन्दर हो पर उसे व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त शब्द रमणीय न हों तो भी काव्य नहीं बन जाता। इसका अर्थ यह हुआ कि केवल रमणीय शब्द से अथवा केवल रमणीय अर्थ से काव्य नहीं बन जाता। तस्मात् स्थितमेतत्, न शब्दस्यैव रमणीयताविशिष्टस्य केवलस्य काव्यत्वम्, नाप्यर्थस्य। यहाँ इस प्रकार यह कह उसने भामह की तीन कारिकाएँ उद्धृत की हैं जिन्हें हम पहले देख आये हैं। इस प्रकार शब्द और अर्थ मिल कर काव्य होता है। ये दो होने पर भी, इनमें से एक तनिक भी कम हो तो भी वह साहित्य तो कहा जायगा पर वह इष्ट नहीं है इसीलिए तो वह कहता है कि 'सहितौ'-अर्थात् सहभाव से रहने वाले होने चाहिएँ। सहितौ यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध तो नित्य है, दोनों कभी पृथक नहीं होते फिर यह क्यों कहा है कि साथ होने चाहिएँ ? इसका उत्तर देते हुए कुन्तक कहता है कि यह बात ठीक है पर यहाँ जो साहित्य अभिप्रेत है वह विशिष्ट प्रकार का साहित्य है। कैसा ? तो वह ऐसा कि जिसमें वक्रता के कारण विचित्र गुणों और अलंकारों की सम्पत्ति परस्पर स्पर्धा करती हैं। इस बात को वह अन्तःश्लोक द्वारा समझाता है : मेरे मतानुसार जिसमें सर्वगुणसम्पन्न और दो मित्रों की भाँति परस्पर संगति में निहित शब्द-अर्थ आपस की शोभा बढ़ाते हों वह रचना काव्य कहलायेगी। मम सर्वगुणौ सन्तौ सुहृदा विव सङ्गतौ। परस्परस्य शोभायै शब्दार्थौं भवतो यथा ॥ १८ ॥ इसके पश्चात् कारिका में प्रयुक्त शब्दार्थौ शब्द द्विवचन में है जिसका कारण समझाते हुए वह कहता है कि यहाँ एक शब्द और एक अर्थ इस प्रकार दो व्यक्ति- वाचक द्विवचन नहीं हैं, पर दो जातिवाचक द्विवचन हैं अर्थात् शब्दजाति और अर्थ- जाति, इस प्रकार दो भिन्न-भिन्न जातियों का सामूहिक उल्लेख है। अतः द्विवचन प्रयुक्त है। इसका अर्थ यह है कि एक शब्द और एक अर्थ मिल कर काव्य नहीं बन जाता। समग्र अर्थजाति और समग्र शब्दजाति से साहित्य बनता है। इस बात को ध्यान में रख यदि हम 'सहितौ' का अर्थ करें तो वह इस प्रकार होगा कि शब्द अपनी जाति के दूसरे शब्दों के साथ और अर्थ अपनी जाति के दूसरे अर्थों के साथ जहाँ परस्पर स्पर्धा करते हैं वही साहित्य यहाँ विवक्षित है। सहितावित्यत्रापि यथायुक्ति स्वजातीयापेक्षया शब्दस्य शब्दान्तरेण वाच्यस्य वाच्या- न्तरेण च साहित्यं परस्परस्पर्धित्वलक्षणमेव विवक्षितम्।

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यदि ऐसा नहीं है तो तद्विदाह्लादकारित्व को हानि पहुँचेगी। तदनन्तर, कुन्तक जिनमें शब्द की शब्द के साथ और अर्थ की अर्थ के साथ स्पर्धा वर्तमान हो, साहित्य के ऐसे दोनों प्रकार के उदाहरण देकर अन्त में कहता है कि इन उदाहरणों में से प्रत्येक के शब्द या अर्थ के प्राधान्य के अनुसार मैंने किसी एक के साहित्य का विरह-अभाव दर्शाया है। पर वास्तव में तो यदि किसी एक प्रकार का विरह हो तो वह दूसरे प्रकार के साहित्य के विरह में पर्यवसित हो जाता है और इस तरह कवि के चित्त में स्वयं पैदा होने पर भी यदि उसे व्यक्त करने के लिए समर्थ शब्द न मिले तो अर्थ मृतवत् ही रहता है और शब्द भी काव्योचित अर्थ के अभाव में दूसरे अर्थ का वाचक बन कर वाक्य के लिए व्याधिरूप बन जाता है। तथा चार्थ: समर्थवाचकाऽसद्भावे स्वात्मना स्फुरन्नपि मृतकल्प एवावतिष्ठते, शब्देऽपि वाक्योपयोगिवाच्यासम्भवे वाच्यान्तरवाचकः सन् वाक्यस्य व्याधिभूतः प्रतिभातीत्यलमतिप्रसङ्गेन। अब तक की चर्चा का सार है : बंध में प्रयोजित पारस्परिक स्पर्धा करने वाले शब्दार्थ ही काव्य हैं। वह और आगे कहता है कि वह बंध कैसा होना चाहिए ? तो वह 'वक्रकविव्यापारशाली' होना चाहिए। 'वक्र' अर्थात् शास्त्रादि में शब्द और अर्थ के जो प्रसिद्ध प्रयोग हैं उनसे भिन्न छः प्रकार की वक्रता वाले प्रयोग; 'कविव्यापार' अर्थात् कवि का क्रिया-व्यापार। उसके माध्यम से जो सुशोभित हो उसे बंध कहा गंया है। जिसमें प्रसिद्ध प्रयोग से भिन्न शब्द और अर्थ के प्रयोग हुए हों वह रचना दूरारूढ़ कल्पना वाली भी हो सकती है, पर इस दूरारूढ़ता के निवारण के लिए कहा गया है कि बंध तद्विदाह्लादकारी होना चाहिए। तद्विद का अर्थ है काव्यमर्मज्ञ। अर्थात् काव्यमर्मज्ञ को आह्राद देने वाला बंध होना चाहिए। यहाँ वह वक्रता के प्रकार और तद्विदाह्लादकारित्व की स्पष्टता नहीं करता और यह कहता है कि बाद में यथावसर इसे दिया जायगा। शब्द इस तरह काव्य के लक्षण देने के बाद वह शब्द और अर्थ का स्वरूप विस्तार से समझाता है। यह तो सभी जानते हैं कि वाचक का अर्थ शब्द है और वाच्य का मतलब अर्थ से है। इसके अलावा द्योतक और व्यंजक शब्द भी होते हैं जिनका समावेश उपचार से वाचक में ही कर लेना चाहिए, क्योंकि अर्थ-प्रतीति कराना तीनों का ही सामान्य धर्म है। इसी प्रकार वाच्य में द्योत्य और व्यंग्य का भी समावेश हो जाता है। यद्यपि यह बात लोकप्रसिद्ध है कि शब्द और अर्थ क्रमशः वाचक और वाच्य है तथापि साहित्य-क्षेत्र में इनका नया ही अर्थ होता है, यह कह कर वह उनके विषय में कहता है : शब्दो विवक्षितार्थैकवाचकोऽनयेषु सत्स्वपि। अर्थः सहृदयाह्लादकारिस्वस्पन्दसुन्दरः ॥ ९ ॥

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'एक ही अर्थ के दूसरे शब्द होने पर भी विवक्षित अर्थ का जो एकमात्र वाहक है वही शब्द कहलायेगा। इसे समझाते हुए वह कहता है कि कवि स्वयं जो अर्थ प्रस्तुत करना चाहता हो उसे व्यक्त करने वाला जो एक मात्र शब्द हो-उस अर्थ को व्यक्त करने वाले अनेक शब्दों के होने पर भी-एक ही शब्द जो कवि के इष्टार्थ को समुचित रूप से व्यक्त करता हो वही शब्द है; दूसरा नहीं। विवक्षितो योऽसौ वक्तुमिष्टोऽयंस्तदेकवाचकः, तस्य एक: केवल एव वाचकः। कथम्, अन्येषु सत्स्वपि। अपरेषु तद्वाचकेषु बहुष्वपि विद्यमानेषु। कुन्तक कहता है कि विवक्षित अंर्थ का एक मात्र वाचक शब्द ही है। इसी को वाल्टर पीटर ने 'दि यूनीक वर्ड' कहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि मानो वह कुन्तक के शब्दों का ही हजार वर्षों के बाद अनुवाद करता हुआ कहता है : "The one word for the one thing, the one thought amid the multi- tude of the words (अपरेषु तद्वाचकेषु बहुष्वपि विद्यमानेषु), terms that might just do ...... the unique word, phrase, sentence, paragraph, essay or song absolutely proper to the single mental presentation or vision within." -Appreciations, Style, p. 29. (काम दे सकने वाले ऐसे अनेक शब्दों और पदों में से विवक्षित एक वस्तु, एक विचार के लिए एकमेव शब्द-अद्वितीय शब्द ;...... वाक्यांश, वाक्य, परिच्छेद, प्रबन्ध अथवा गीत केवल एक ही मानस-दर्शन अथवा अन्तःदर्शन के लिए सर्वथा उचित होता है।) जहाँ सामान्य का कथन करना हो वहाँ विशेष का कथन करने वाले शब्दों से काम नहीं चल सकता। वह इस बात को उदाहरण देकर समझाता है : कल्लोलवेल्लितद्टषत्परुषप्रहारैः रत्नान्यमूनि मकराकर माववंस्थाः । किं कौस्तुभेन भवतो विहितो न नाम याञ्चाप्रसारितकरः पुरुषोत्तमोऽपि ।। यहाँ उत्तरार्द्ध में 'रत्न' नामक सामान्य संज्ञा के उपयोग करने के स्थान पर 'कौस्तुभ' नामक विशेष संज्ञा के प्रयोग करने से काव्य की चोट लग गयी है। काव्य का लक्ष्य वेध पूरा हो गया है। कारण, कौस्तुभ नामक विशेष रत्न में निहित किसी गुणविशेष के कारण कदाचित् विष्णु उसकी याचना करें और दूसरे रत्नों के लिए न भी करें। यह कहकर वह तीसरी पंक्ति का पाठान्तर इस प्रकार प्रस्तुत करता है : एकेन किंन विहितो भवतः स नाम। सच्चे कवि जहाँ विशेष अर्थ के प्रतिपादन की आवश्यकता होती है वहाँ विशेषार्थ- प्रतिपादक शब्द का ही प्रयोग करते हैं। जैसे कालिदास ने किया है : द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया कपालिनः। कला च सा कान्तिमती कलावतः त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी॥ यहाँ शंकर वाचक हजारों शब्द मौजूद होने पर भी बीभत्स रस के आलम्बन-विभाव का वाचक शब्द 'कपाली' जुगुप्सा की व्यंजना के लिए प्रयुक्त है जिससे इसे अपूर्व

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१७२ अभिनव का रस-विवेचन वाचकता प्राप्त हुई है। 'सम्प्रति' और 'द्वयं'-ये दोनों शब्द भी अत्यन्त रमणीय हैं। कारण कि पहले तो अकेली उस चन्द्र की कला ही (कपाली के समागम की प्रार्थना- रूप) दुर्व्यसन-दूषित होने के कारण शोक का कारण बन गयी थी। और यह कहकर कि अब तू भी उसे इस खराब कांम में मदद करने के लिए तैयार हुई है, उसका मजाक उड़ाया गया है। 'प्रार्थना' शब्द भी अत्यन्त रमणीय है, क्योंकि काकतालीय न्यायानुसार यदि तेरा समागम कापालिक के साथ हुआ होता तो कदाचित् इतना निंद नहीं माना जाता; पर तू तो स्वयं भाग कर उसके साथ मिल जाती है जो कुलीन के लिए अत्यन्त कलंककर है। 'सा च', 'त्वं च' की पदयोजना करने के कारण दोनों के परस्परस्पर्धी लावण्य का जो अनुभव होता है उसका यहाँ प्रतिपादन हुआ है। 'कला- वतः' और 'कान्तिमती' पदों में मत्वर्थीय प्रत्यय का उपयोग किया गया है, अतः दोनों की प्रशंसा ध्वनित होती है। इस प्रकार इसका प्रत्येक अर्थ किसी दूसरे शब्द द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि 'कवि द्वारा विवक्षित विशेष अर्थ का कथन करने का सामर्थ्य ही वाचकत्व अर्थात् शब्द का लक्षण है।' कविविवक्षितविशेषाभिधानक्षमत्वमेव वाचकतवलक्षणम्। रचना-प्रक्रिया तदुपरान्त वह रचना-प्रक्रिया का निरूपण करता है जिससे इस बात की स्पष्टता होती है कि कवि को अपने विवक्षित अर्थ को यथावत् व्यक्त करने के लिए उचित शब्द कैसे मिल जाते हैं, अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो काव्य में शब्द और अर्थ का साहित्य किस प्रकार सिद्ध होता है-हो सकता है। वह कहता है- यस्मात् प्रतिभायां तत्कालोल्लिखितेन केनचित्परिस्पन्देन परिस्फुरन्तः पदार्थाः प्रकृत- प्रस्तावसमुचितेन केनचिदुत्कर्षेण वा समाच्छादितस्वभावाः सन्तो विवक्षाविधेयत्वेनाभि- धेयतापदवीमवतरन्तस्तथा विधिविशेष प्रतिपाद नसमर्थेना भिधानेनाभिधीयमानाश्चेतन चम -र त्कारितामापद्यन्ते। 'जिससे उस (काव्य-रचना के) समय (कवि की) विशेष प्रतिभा में विशेष रूप से प्रगट किसी एक परिस्पन्द के कारण (वास्तविक जगत् के) पदार्थ भावोज्जवल बन जाते हैं अथवा प्रकृत प्रसंग के अनुकूल किसी गौरव से उसका मूल स्वभाव ढँक जाता है तथा उस प्रकार के विशेष अर्थ का प्रतिपादन करने में समर्थ शब्दों द्वारा कहलाया जाकर सहृदयों के चित्त के लिए चमत्कारक हो जाता है।' अगर दासगुप्त का आधार लेकर इस खण्ड को समझने का प्रयत्न करें तो कुन्तक का कथन इस प्रकार लगता है कि काव्य-रचना के समय कवि के चित्त में एक स्पन्दन जगता है और इसके कारण इस जगत् के बाह्य पदार्थ अपना बाह्य स्वभाव छोड़कर कवि-हृदय में भावमय रूप धारण करते हैं। इस प्रकार ये पदार्थ कवि की विवक्षा के

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अनुकूल भावमय अर्थ बन जाते हैं और तदनन्तर इसी परिस्पन्दन के कारण इन भावमय अर्थों को उचित रूप में अभिव्यक्त कर सकने वाले शब्दों के द्वारा उनका कथन होता है। अतः वे सहृदयों के लिए आह्ादकारी बन जाते हैं। इसमें दो बातें होती हैं : एक तो कवि-चित्त में जाग्रत परिस्पन्दन के कारण जागतिक पदार्थं भावमयमूर्ति धारण करते हैं और फिर इस परिस्पन्दन के कारण कवि को इस भाव-मूर्ति को शब्द- बद्ध करने में समर्थ शब्द भी मिल जाते हैं। इस तरह पदार्थों को भावमय बना देने वाला और भावमय रूप को शब्द में मूर्त करने वाला एक ही परिस्पन्दन होता है। अतः उस भावमय अर्थ और उसे व्यक्त करने वाले शब्द के बीच पूरा-पूरा सामंजस्य होता है। वास्तव में तो यह अर्थ जब अपने लिए उचित शब्दों में प्रस्तुत कर दिया जाता है तभी अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकाशित होता है। क्रोचे जो यों कहता है कि 'इन्ट्यूशन' ही 'एक्सप्रेशन' है, अथवा एक्सप्रेशन के अभाव में 'इन्ट्यूशन' नहीं है, इसके समान यह है। कुन्तक ने कहा है कि 'कवि-प्रतिभा में जब अर्थ प्रतिभासित होता है तब वह अनगढ़ पत्थर के टुकड़े के समान लगने वाली मणि के समान होता है, पर जब वह किसी विदग्ध कवि द्वारा रचित काव्य में ग्रथित होता है तब सान पर पहली बार चढ़े हीरे की भाँति मनोहर बनकर तद्विदों के लिए आह्लादजनक काव्यत्व प्राप्त करता है-।' प्रथमं च प्रतिभाप्रतिभासमानमघटितपाषाणशकलकल्पमणिप्रख्यमेव वस्तु विदग्ध- कविरचितवक्रवाक्योपरूढं शाणोल्लीढमणिमनोहरतया तद्विदाह्लादकारिकाव्यत्वम- धिरोहति। तात्पर्य है कि पहले कवि के चित्त में स्फूर्त अर्थ सान पर बिना चढ़े हीरे की भाँति पत्थर के टुकड़े की तरह होता है उसका रूप रेख स्पष्ट नहीं होता पर जब वह पूर्णतः व्यक्त करने में समर्थ शब्दों में मूर्तिमन्त हो जाता है तभी उसका यथातथ अथवा वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। अर्थात् तभी उसका स्वरूपगत आकलन होता है। अभिव्यक्ति सिद्ध हो तभी भाव का पूरा आकलन होता है-इसका यही अर्थ है। अर्थ इस तरह काव्य में उपयोग में आने वाले शब्द के स्वरूप का निरूपण कर कुन्तक अर्थ की बात करता है। अर्थ कैसा होना चाहिए ? सहृदयों को आह्लाद देने वाला अपने स्वभाव को लेकर सुन्दर होना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि पदार्थों के धर्म तो नानाविध होते हैं, पर काव्य में उनमें से ऐसे ही धर्मों के साथ उसका सम्बन्ध बताना चाहिए जो सहृदयों को आनन्द दे सकें अर्थात् उसमें इतनी समर्थता होनी चाहिए कि जिससे स्वभाव की कोई महत्ता या रस का पोषण करने की शक्ति प्रकट हो। इसके उसने दो उदाहरण दिये हैं जिन्हें हमें देखना चाहिए। प्रथम उदाहरण रघुवंश के चौदहवें सर्ग से दिया गया है। इस श्लोक में उस समय का वर्णन है जब

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लक्ष्मण सीता को वाल्मीकि के आश्रम के पास छोड़ गये तब सीता का रुदन सुनकर आवाज का अनुसरण करते हुए वाल्मीकि उसके पास पहुँच जाते हैं : तामभ्यगच्छद्रुदितानुसारी मुनिः कुशेध्माहरणाय यातः। निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थ श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोकः ॥। ७० ॥। अर्थात् कुश और समिधा बीनने के लिए निकले हुए मुनि रोने की आवाज का अनुसरण करते हुए उसके पास पहुँच गये। ये वे मुनि थे कि निषाद द्वारा मारे गये पक्षी को देखकर उत्पन्न जिनका शोक श्लोकत्व को प्राप्त हुआ था। इस श्लोक में कौन से ऋषि ?- तो वाल्मीकि का मात्र नाम देने के बदले 'निषाद द्वारा मारे गये पक्षी को देखने मात्र से जिनका शोक श्लोकत्व को प्राप्त हो गया था वे : 'परमकारुणिक मुनि'। इसमें कवि का अभिप्राय यह है कि ऐसे ये मुनि इस दशा में पड़ी हुई जनक राजा की पुत्री को देखकर अवश्य विवश हो जायँगे और उनके अन्तर में जो भाव जगेगा वह करुण रस को परिपुष्ट करने में उपयोगी सिद्ध होकर सहृदय के हृदय के लिए आह्रादक हो जायगा। इस रूप में यहाँ वाल्मीकि के एक धर्म का वर्णन किया गया है जो रस-परिपुष्टि में उपकारक होकर सहृदयों को आह्राद देने वाला बन जाता है। दूसरा उदाहरण मेघदूत से दिया गया है। मेघ को अलका जाकर जो संदेश देता है उसका यह प्रथम भाग है : भर्तुमिंत्रं प्रियमविधवे विद्धि मामम्बुवाह तत्सन्देशाद्हृदयनिहितादागतं त्वत्समीपम्। यो वृन्दानि त्वरयति पथि श्राम्यतां प्रोषितानां मन्द्रस्निग्धैर्ध्वनिभिरबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥५६॥ इस श्लोक में प्रथम सम्बोधन हीयक्ष-पत्नी को आश्वासन देने वाला है। 'अविधवे' शब्द से यह सूचित होता है कि तेरा पति स्वस्थ है। 'मुझे अपने पति का मित्र मानो' शब्दों से मेघ की विश्वसनीयता सूचित होती है। मित्र भी कोई सामान्य नहीं है- 'प्रिय' है। इससे यह सूचित होता है कि मैं सभी विश्रम्भकथा-गुप्त बातों के लिए भी उचित पात्र हूँ। इस प्रकार पहले चरण में उसे आश्वासन देकर अपनी ओर उन्मुख कर 'उसका संदेश लेकर तेरे पास आया हूँ' कह कर प्रस्तुत बात आरम्भ की गयी है। संदेश को 'हृदयनिहित' अर्थात् 'हृदय में धारण किया हुआ' कहा गया है। इस प्रकार इससे यह सूचित होता है कि 'यह संदेश पत्ररूप में नहीं है, मौखिक है और उसे मैंने अपने हृदय में धारण किया है, ऐसा मैं सावधान हूँ।' कदाचित् यह शंका हो कि संदेश पहुँचाने में कुशल बुद्धिशाली किसी दूसरे को क्यों नहीं रखा गया ? इसीलिए वह कहता है कि मैं इस मामले में कुशल ही हूँ। 'मैं अम्बुवाह हूँ।'-यह कह कर वह यह भी सूचित करता है कि वह संदेश वहन कर सकता है। मैं कैसा हूँ? प्रवासियों के समूह में लवरा पैदा करता हूँ अर्थात् उन्हें झटपट घर पहुँचने की

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प्रेरणा देता हूँ। ये प्रवासी कौन हैं ? ये प्रवासी विश्राम करने वाले हैं अर्थात् थके हुए हैं और जो विश्राम करते हैं, जल्दी नहीं कर सकते।' समूह शब्द यह सूचित करता है कि अनेक प्रवासियों से इसी प्रकार जल्दी करवाता हूँ अर्थात् ऐसा करवाने का मुझे अभ्यास है, मैं इसमें कुशल हूँ। किस प्रकार जल्दी करवाता हूँ ? तो गंभीर और स्निग्ध ध्वनि से अर्थात् मधुर और रमणीय शब्दों द्वारा, विदग्ध दूत के उत्तेजक शब्दों के द्वारा उतावल करवाता हूँ। ये प्रवासी कहाँ विश्राम करते हैं ? वे मार्ग में विश्राम करते हैं। इससे ध्वनित होता है कि मुझे किसी स्थानविशेष की आवश्यकता नहीं होती। मैं तो कहीं भी जहाँ प्रवासी हों उन्हें घर जाने के लिए उत्तेजित कर सकता हूँ। तो फिर अपने मित्र को प्रेम के लिए क्यों नहीं उत्सुक बना सकता ? प्रवासियों के समूह कैसे हैं ? 'अबला की वेणी को छोड़ने को उत्सुक हैं।' यहाँ 'अबला' शब्द से उनकी प्रियतमाओं द्वारा विरह-दुःख सहन न कर सकने की दुर्बलता सूचित होती है। 'वेणी छोड़ने को उत्सुक' कथन से उनके मन का पत्नी के प्रति अनुराग ध्वनित होता है। अतः इस श्लोक का यह अर्थ हुआ कि भाग्यवश विरह-वेदना झेलते हुए और परस्पर अनुराग वाले प्रेमीजनों को समागम का सुख प्राप्त करवाने रूपी मित्र-कार्य करने का मैंने व्रत लिया है। यहाँ कवि ने मेघरूप पदार्थ के जिस स्वभाव का वर्णन किया है वही, वास्तव में तो इस प्रबन्ध के 'मेघदूतत्व' का जीवित है अर्थात् तद्विदों को अत्यन्त आह्राद देने वाला हो सकता है। वक्रोक्ति काव्य की व्याख्या में प्रयुक्त शब्द और अर्थ के जो प्रसिद्ध अर्थ हैं उनसे भिन्न ही अर्थ यहाँ लिये जायँ-यह कहकर वह कहता है कि ऐसे शब्दार्थ मात्र से काव्य नहीं बन जाता। ये दोनों तो अलंकार्य हैं। इन दोनों को अलंकृत करना चाहिए। इनका अलंकरण किन अलंकारों के द्वारा होना चाहिए ? तो कहते हैं कि वक्रोक्ति ही वह अलंकार है। उसे ही वह वैदग्ध्यभंगीभणिति कहता है : उभावेतावलङ्कार्यौं तयो: पुनरलङ्कतिः । वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभङ्गीभणितिरुच्यते॥ १० ॥ 'वैदग्ध्यभङ्गीभणिति' को वह इस तरह समझाता है : वैदग्ध्य अर्थात् कविकर्म-कौशल। उसकी भंगी अर्थात् विच्छिति अथवा शोभा तथा उससे युक्त भणिति अर्थात् उक्ति। संक्षेप में वक्रोक्ति माने विचित्र (असाधारण) कथनशैली। यहाँ वह एक बात की पुनः स्पष्टता करता है कि इसका अर्थ कदाचित् कोई यह भी करे कि शब्दार्थ अलग हैं और उन्हें किन्हीं दूसरे अलंकारों से सजाना है। पर इसका यह अर्थ नहीं है। वक्रता अर्थात् वैचित्र्यपूर्ण कथन करना ही अलंकार है। यहाँ वह वक्रोक्ति और स्वभावोक्ति की चर्चा करता है जो उसके सिद्धान्त की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। ऊपर ऐसा कहा गया कि शब्द और अर्थ का अलंकार केवल वक्रोक्ति ही है। तो दूसरे आलंकारिकों ने स्वभावोक्ति को जो अलंकार माना है उसका

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१७६ अभिनव का रस-विवेचन क्या होगा ? इसके उत्तर में कहता है कि जो आलंकारिक स्वभावोक्ति को अलंकार कहते हैं वे विवेक-शक्ति से हीन हैं और अलंकार और अलंकार्य के बीच भेद नहीं कर पाते। वस्तुतः स्वभावोक्ति को अगर अलंकार मान लें तो अलंकार्य क्या होगा ? स्वभाव के उल्लेख के अभाव में तो किसी वस्तु की बात ही नहीं की जा सकती अर्थात् स्वभाव-वर्णन के बिना तो वस्तु ही निरुपाख्य बन जाती है। स्वभाव के अभाव में तो चस्तु खरगोश के सींग की भाँति शब्द और ज्ञान के लिए अगोचर हो जाती है। अगर आप स्वभाव-कथन को ही अलंकार कहें तो फिर गाड़ी वाले के वचनों को भी काव्य कहने की बारी आ जायगी। आप यह क्यों नहीं समझते कि अगर किसी वस्तु का वर्णन करना हो तो उसके स्वभाव का ही वर्णन करना पड़ेगा और वह तो वर्ण्यं- विषय अर्थात् शरीर होगा। यह शरीर अन्य किसको सुशोभित करेगा ? अपने को सुशोभित करेगा, अगर आप यह कहेगे तो मैं पूछता हूँ कि यह शरीर स्वयं ही स्वयं को किस प्रकार सजायेगा? कोई क्या अपने ही कंधे पर चढ़ सकता है ? शरीरं चेदलङ्गारः किमलङ्गुरुते परम्। आत्मैव नात्मनः स्कन्धं क्वचिदप्यधिरोहति ॥ १३॥ अन्त में वह कहता है कि अगर दो घड़ी के लिए स्वभाव को अलंकार मान लें तो उसका परिणाम यह आयेगा कि जब कोई अलंकार रचा जायेगा तब उसका ज्ञान स्पष्ट या अस्पष्ट रूप में होगा। अगर स्पष्ट रूप में होगा तो वहाँ संसृष्टि होगी और अस्पष्ट रूप में होगा तो वहाँ संकर मानना पड़ेगा और बाद में संकर और संसृष्टि के अलावा कोई शुद्ध अलंकार रहेगा ही नहीं। अतः वस्तु का स्वभाव ही काव्य का विषय है और उसका वर्णन किसी अलंकार के द्वारा किया जाना है। इसीलिए नौवीं कारिका में अर्थ को सहृदयों को आह्लाद देने वाला होने के कारण सुन्दर कहा गया है और दसवीं कारिका में शब्द और अर्थ को अलंकार्य कहा गया है। साहित्य इस रूप में काव्य की व्याख्या में निहित 'शब्दार्थौ' पद की व्याख्या कर अब वह 'सहितौ' पद को समझाता हुआ कहता है : शब्द और अर्थ तो सदा ही संयुक्त रूप से ज्ञान का विषय बनते हैं तो यहाँ 'सहितौ' कह कर नया क्या कहना चाहेंगे? इसके उत्तर में कुन्तक कहता है कि शब्द और अर्थ का जो नित्य सम्बन्ध है उस अर्थ में इस साहित्य को नहीं समझना है। अन्यथा व्याकरण के सूत्र और गाड़ी वाले का असम्बद्ध भाषण भी साहित्य मान लिया जायगा। यहाँ तो व्याकरण, मीमांसा और न्याय की अपेक्षा किसी अन्य तत्व को ही साहित्य कहा है। 'यह भी प्रसिद्ध ही है। पुनः कथन की क्या आवश्यकता ?' अगर कोई इस प्रकार की बात करे तो इसके उत्तर में वह एक गर्वभरी उक्ति प्रस्तुत करता है और वास्तव में तो उसके इस गर्व के लिए पर्याप्त कारण हैं। वह कहता है कि "इसलिए जरूरत है कि यह साहित्य आज तक के लम्बे समय तक केवल साहित्य शब्द मात्र से ही पहचाना जाता रहा है। पर कवि-कर्म-कौशल की

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पराकाष्ठा पर पहुँचने के कारण रमणीय बने इस साहित्य के विषय में 'इसका सही अर्थ यह है' पर किसी भी विद्वान् ने आज तक विचार नहीं किया है। अतः मैं आज सरस्वती के हृदयरूपी अरविन्द के मकरन्द-बिन्दुओं से सुन्दर और सत्कवि की वाणी के अन्तःआमोद से मनोहर प्रतीत होने वाले इस साहित्य शब्द के अर्थ को सहृदयरूपी भ्रमरों के समक्ष प्रस्तुत करता हूँ।" अत एवैतदुच्यते यदिदं साहित्यं नाम तदेतावति निःसीमनि समयाध्वनि साहित्य- शब्दमात्रेणैव प्रसिद्धम्। न पुनरेतस्य कविकर्मकौशलकाष्ठाधिरूढिरमणीयस्याद्यापि कश्चिदपि विपश्चिदयमस्य परमार्थ इति मनाङमात्रमपि विचारपदवीमवतीर्णः । तददय सरस्वतीहृदयारविन्दमकरन्दबिन्दुसन्दोहसुन्दराणां सत्कविव चसा मन्तारामोदमनोहर- त्वेन परिस्फुरदेतत् सहृदयषट्चरणगोचरतां नीयते ॥ १६ ॥ यह कह कर वह शब्द और अर्थ के साहित्य की स्पष्टता करता है : साहित्यमनयोः शोभाशालितां प्रति काप्यसौ। अन्यूनानतिरिक्तत्वमनोहारिण्यवस्थितिः । १७॥ 'प्रशस्य सौन्दर्य सिद्ध करने के लिए शब्द और अर्थ-इन दोनों की, इन दोनों में से कोई भी दूसरे की अपेक्षा उच्च या निम्न न हो इस कारण से मनोहर कोई विन्यासभंगी साहित्य है।' दोनों में से कोई किसी से उच्च या निम्न न हो ऐसा तो दोषयुक्त शब्दार्थों में भी दिखायी देता है पर उसे टालने के लिए कहा गया है 'प्रशस्य सौन्दर्य सिद्ध करने के लिए।' साहित्य की विस्तृत व्याख्या इस प्रकार खुद के द्वारा दी गयी काव्य की परिभाषा की विस्तृत व्याख्या करते हुए अन्त में तीन अन्तःश्लोकों में साहित्य की विस्तृत परिभाषा देता है : मार्गानुगुण्यसुभगो माधुर्यादिगुणोदयः । अलङ्करणविन्यासो वक्रतातिशयान्वितः ॥ ३४॥। वृतौचित्यमनोहारि रसानां परिपोषणम्। स्पर्धथा विद्यते यत्र यथास्वमुभयोरपि॥ ३५॥ सा काप्यावस्थितिस्ताद्वदानन्दस्पन्दसुन्दरा। पदादिवाक्परिस्पन्दसारः साहित्यमुच्यते॥३६॥ अर्थात्, मार्ग के या रीति के अनुरूप माधुर्यादि गुणों का उदय, वक्रता अर्थात् वैचित्र्या- शयी अलंकारों का विन्यास और वृत्ति के औचित्य से मनोहर रस का परिपोष-ये बातें पारस्परिक स्पर्धा करती हुई शब्द और अर्थ दोनों में उचित रूप से विद्यमान हों ऐसी तद्विदों को आनन्द देने वाली कोई अलौकिक अवस्थिति साहित्य है। साहित्य का माहात्म्य पद, वाक्य, प्रमाण और साहित्य इन चारों का अर्थात् व्याकरण, मीमांसा, प्रमाण और साहित्यशास्त्र का प्रत्येक रचना में उपयोग होता है और अपने-अपने विषय में १२

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१७८ अभिनव का रस-विवेचन उनका प्राधान्य होता है, फिर भी दूसरे विषयों में साहित्य गौणरूप में आता है। इतने पर भी वह अपने परिमल मात्र से उसको सुगन्धित कर देता है और अगर साहित्य की ऐसी सुगन्ध नहीं है तो उस रचना में रमणीयता का अभाव रहता है और उसकी रचना व्यर्थ जाती है। साहित्य के माहात्म्य से आगे बढ़ कर वह दूसरे चार अन्तःश्लोकों में कहता है : अपर्यालोचितेऽप्यर्थे बन्धसौन्दर्यसम्पदा। गीतवद् हृदयाह्लादं तद्विदां विदधाति यत् । ३७।। वाच्यावबोधनिष्पतौ पदवाक्यार्थवर्जितम्। यत्किमप्यर्पंथत्यन्तः पानकास्वादवत्सताम् ॥ ३८।। शरीरं जीवितेनेव स्फुरितेनेव जीवितम्। विना निर्जीविताम् येन वाक्यं याति विपश्चिताम् ॥ ३९॥ यस्मात् किमपि सौभाग्यं तद्विदामेव गोचरम्। सरस्वती समभ्येति तदिदानीं विचार्यते॥ ४० ॥ अर्थात् अर्थ का विचार न करें तो भी केवल बन्ध के सौंदर्य की सम्पत्ति से ही जो तद्विदों के हृदय में संगीत के समान आनन्द उत्पन्न करते हैं, और वाक्यार्थ को समझ लेने पर तो पदवाक्यार्थ से पृथक ही और उससे दूसरे छोर के पानकरस के आस्वाद के समान आस्वाद का जो सहृदयों को अनुभव कराता है, जिसके अभाव में रसिकों को वाक्य प्राणरहित लगता है, स्फुरण के अभाव में जीवित भी मृत जैसा लगता है और जिसके कारण तद्विदों को ही जिसका अनुभव होता है इस प्रकार को किसी अपूर्व सौभाग्य अर्थात् सौन्दर्य तक कवि-वाणी किस प्रकार पहुँचती है, अब हम इस पर विचार करेंगे। वक्रता के छः प्रकार काव्य को अलौकिक सौन्दर्य प्रदान करने वाला तत्त्व वक्रोक्ति है-अथवा कवि- व्यापार की वक्रता। इसके छः प्रकार हैं और उनके अनेक भेद हैं। वक्रता के छ: प्रकार इस प्रकार हैं : १. वर्णविन्यासवक्रता, २. पदपूर्वार्द्धवक्रता, ३. प्रत्ययवक्रता, ४. वाक्यवक्रता, ५. प्रकरणवक्रता, ६. प्रबन्धवक्रता। १. वर्णविन्यासवक्रता वर्णों की व्यवस्था का सौन्दर्य है। इससे सम्बन्धित कुन्तक ने दूसरे उन्मेष में जो संकेत किये हैं वे महत्त्वपूर्ण हैं। उसने कहा है कि वर्ण-विन्यास इस तरह करना है कि वह प्रस्तुत औचित्य से सुशोभित हो अर्थात् जिस वस्तु का निरूपण करना हो उसके लिए उचित कहे जाने वाले वर्गों से ही उसकी बुनाई होनी चाहिए। मात्र अनुप्रास के व्यसन के कारण प्रस्तुत औचित्य को धूमिल करने वाले वणों की योजना नहीं होनी चाहिए। जहाँ प्रस्तुत रस के लिए उपकारक हों वहाँ कठोर व्णों की योजना करनी चाहिए। यहाँ उसके द्वारा दिये औचित्य पर बल द्रष्टव्य

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है। उसने यह भी कहा है कि वर्णविन्यासवक्रता अत्यन्त आग्रह के साथ आयोजित नहीं होनी चाहिए। अति आग्रहपूर्वक अर्थात् व्यसन-लिप हो अथवा व्यसनिता से उक्त वक्रता की योजना नहीं की जानी चाहिए। "व्यसनितया प्रयत्नविरचने हि प्रस्तुतौचित्यपरिहाणेर्वाच्यवाचकयोः परस्परस्पर्धित्व- लक्षणसाहित्य विरहः पर्यवस्यति।" कारण, इस तरह करने से प्रस्तुत औचित्य का भंग होता है और वह शब्दार्थ के परस्परस्पधित्वरूप साहित्य के विरह में परिणत होता है। साथ ही, इस वकता की रचना रस-विरोधी कठोर वर्णों से भी नहीं की जानी चाहिए। पहले जिसकी आवृत्ति हो चुकी हो उसे छोड़ कर नये वर्णों की आवृत्ति से उसे मनोहर बनाना चाहिए। यमक आदि में प्रसाद गुण विशेष रूप से विद्यमान रहना चाहिए। श्रुतिकठोर वर्ण को टालना चाहिए और प्रस्तुतौचित्य को बनाये रखना चाहिए। उसने शब्दालंकारों को लेकर प्रस्तुतौचित्य और अयत्ननिर्वर्त्यंता पर जो बल दिया है वह वस्तुतः सभी अलंकारों पर लागू पड़ता है। २. पदपूर्वार्द्धवक्रता : प्रकृति और प्रत्यय मिल कर पद बनते हैं। यहाँ पर प्रकृति अर्थात् मूल शब्द की वक्रता की बात कही गयी है। उसके आठ प्रकारों को दिखा कर दूसरे उन्मेष में कुल दस प्रकारों का उल्लेख है। ३. प्रत्ययवक्रता में उसने काल, कारक, वचन, पुरुष, उपग्रह (आत्मनेपद- परस्मैपद) और प्रत्ययमाला की वक्रता की चर्चा की है। ४. वाक्यवक्रता में सभी अर्थालंकारों का समावेश हो जाता है। इसीलिए उसने कहा है कि वाक्यवक्रता तो अनन्त है; यहाँ उसने उदाहरण के रूप में रघुवंश के चौदहवें सर्ग के ६०वें श्लोक को उद्धृत किया है। उपस्थितां पूर्वमपास्य लक्ष्मीं वनं मया सार्धमसि प्रपन्नः । त्वामाश्रयं प्राप्य तया नु कोपात् सोढाडस्मि न त्वद्भवने वसन्ती।। लक्ष्मण सीता को वन में छोड़ कर वापिस आते हैं उस समय राम के लिए सीता द्वारा प्रेषित संदेश का यह वाक्य है। इसका अर्थ है कि पहले जब लक्ष्मी तुम्हारी सेवा में उपस्थित हुई थी उस समय तुम उसका त्याग कर (उसे एक ओर हटा कर) मेरे साथ वन में आये थे। उस रोष के कारण आपके आश्रय को प्रात्त उससे यह नहीं सहा गया कि मैं तुम्हारे घर में रहूँ। इसकी ध्वनि यह है कि दुःख में जिसे साथ रखी थी उसे राज-सम्पत्ति मिलते ही बिना किसी अपराध के कठोर गर्भावस्था में त्याग देना कितना उचित है, इस पर आप ही विचार करें। ५. प्रकरणवक्रता : प्रबन्ध के किसी एक भाग के रूप में किसी प्रसंग की वक्रता प्रकरणवक्रता है। इसमें उसने रामायण के एक प्रसंग की चर्चा की है। स्वर्ण मृग के वेश में उपस्थित मारीच को मारने गये हुए राम का करुण आक्रन्दन सुन कर घबरायी

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१८० अभिनव का रस-विवेचन हुई सीता ने, उनके प्राण बचाने के लिए, अपने जीवन की रक्षा की चिन्ता न करते हुए कठोर वचन कह कर लक्ष्मण को भेजा। वाल्मीकि ने ऐसा जो निरूपित किया है, वह बिलकुल अनुचित है। कारण, अनुचर के रूप में लक्ष्मण के पास होने पर भी मुख्य पात्र द्वारा इस प्रकार का काम किया जाना सम्भव नहीं है। विशेषतः तब राम को सभी प्रकार की अतिशयोक्ति से युक्त वर्णित किया गया है। अतः उसके प्राणों की रक्षा छोटा भाई करे यह सोचना ही अत्यन्त अनुचित है। इस पर विचार कर कवि ने 'उदात्त राघव' नामक नाटक में मायामृग को मारने के लिए गये हुए लक्ष्मण को बचाने के लिए सीता ने राम को भेजा था, इस तरह का निरूपण कर बहुत-सा वैदग्ध्य भर दिया है। ६. प्रबन्धवक्रता : किसी कवि द्वारा रचित राम की कथा-विषयक नाटकादि में पाँच प्रकार की वक्रता से सुन्दर सहृदयाह्लादकारी महापुरुष का वर्णन करने का ही उपक्रम प्रतीत होता है। वास्तव में तो ऐसा ही विधिनिषेधात्मक उपदेश ही परम अर्थ होता है कि 'राम के समान व्यवहार करो; रावण की भाँति नहीं।' इसे ही प्रबन्धवक्रता कहा जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि सम्पूर्ण प्रबन्ध की जो ध्वनि है वही प्रबन्ध की वक्रता है। इस सम्बन्ध में उसने चौथे उन्मेष के एक अन्तःश्लोक में कहा है कि कथाभाग का वर्णन समान होने पर भी शरीर में समान दिखायी देने वाले प्राणियों की भाँति अपने पृथक गुणों के कारण काव्य, नाटक आदि प्रबन्ध अलग होते हैं। कथोन्मेषसमानेऽपि वपुषीव निजैर्गुणैः । प्रबन्धाः प्राणिन इव प्रभासन्ते पृथक्-पृथक् ।। ४२॥ बन्ध कुन्तक की काव्य की परिभाषा से अब तक हम 'शब्दार्थौ', 'सहितौ' और 'वक्र- कविव्यापार' नामक पदों की व्याख्या देख आये हैं। वह अब 'बन्ध' की व्याख्या करता है : वाच्यवाचकसौभाग्यलावण्यपरिपोषकः । व्यापारशाली वाक्यस्य विन्यासो बन्ध उच्यते ॥ २२ ॥ इसका अर्थ यह है कि शब्द और अर्थ के सौभाग्य और लावण्य का परिपोषण करने वाला और काव्य-रचनारूप व्यापारवाला वाक्य-विन्यास ही बन्ध कहलाता है। इसमें उसके जिन दो गुणों का उल्लेख है उनके लक्षण इस प्रकार हैं : सौभाग्य का अर्थ है प्रतिभा के स्फुरण के परिणामस्वरूप जन्म लेने वाला चेतनचमत्कारित्व अर्थात् सहृदयों के चित्त को चमत्कार का अनुभव कराने की शक्ति और लावण्य ही सन्निवेश का सौन्दर्य है। अतः 'बन्ध' का अर्थ यह हुआ कि सहृदयों के चित्त को चमत्कार का अनुभव कराने वाली शक्ति और सन्निवेशसौंदर्य को पोषण देने वाला कविव्यापार- युक्त वाक्य का विन्यास।

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तद्विदाहादकारित्व अब व्याख्यान में एक ही शब्द की व्याख्या देनी शेष है और वह शब्द है

वाच्यवाचकवक्रोक्तित्रितयातिशयोत्तरम्। तद्विदाह्लादकारित्वं किमप्यामोदसुन्दरम्॥ २३ ॥ अर्थात् शब्द, अर्थ और अलंकार इन तीनों से स्वरूप में पृथक और अतिशय में लोकोत्तर किसी अनिर्वचनीय अर्थात् सहृदयों के हृदयों द्वारा अनुभूत आमोद अर्थात् रंजन करने की शक्ति के कारण जो सुन्दर तत्त्व है वह तद्विदाह्लादकारित्व है।

मार्ग इस तरह काव्य को समझाने के बाद वह कहता है कि इस काव्य में तीन मार्ग सम्भव हैं : १. सुकुमार, २. विचित्र, और ३. उभयात्मक मध्यम । उसने स्वयं इन तीन मार्गों का निर्देश किया है, अतः स्वभावतः ही पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा की गयी मार्गों की चर्चा के परामर्श का समय उपस्थित होता है और उसने ऐसा किया भी है। पूर्ववर्ती आचार्यों ने देश के नाम के आधार पर तीन या दो रीतियाँ स्वीकार की थीं और उसने उन्हें उत्तम, मध्यम और अधम-इन तीन प्रकारों में विभक्त किया था। इन दोनों बातों का वह विरोध करता है। हम उसके अपने ही शब्द यहाँ देख रहे हैं। "इस मामले में अनेक मतभेद होने सम्भव हैं। कारण, (वामनादि) पूर्ववर्ती आचार्यों ने विदर्भ आदि देशविशेष के आधार पर वैदर्भी आदि तीन रीतियों का उल्लेख किया है। साथ ही, उनके उत्तम, मध्यम और अधम नामक तीन प्रकार भी दिये हैं। (दण्डी आदि) दूसरे आचार्यों ने वैदर्भ और गौड़ीय नामक दो मार्ग गिनाये हैं। ये दोनों बातें युक्ति-संगत नहीं हैं। कारण, अगर देश-भेद से रीति-भेद स्वीकारें तो देश तो अनन्त हैं; अतः रीतियाँ भी असंख्य माननी पड़ेंगी। साथ ही, देश- धर्म के अनुसार मामा की लड़की से विवाह करने के समान ही अमुक ही काव्य रचे जायें, इस तरह की व्यवस्था नहीं की जा सकती, क्योंकि देश-धर्म तो मात्र वृद्धों की परम्परा पर आधृत होता है, अतः उसकी व्यवस्था करना असम्भव नहीं है, पर इस प्रकार की काव्य-रचना करना जो सहृदयों को आनन्द देने वाली शक्ति, व्युत्पत्ति आदि अनेक कारणों की अपेक्षा रखता है; अतः तत्सम्बन्धी इस प्रकार की व्यवस्था नहीं की जा सकती। "दक्षिण के लोगों में जिस प्रकार संगीत के लिए अच्छा कण्ठ आदि होते हैं तदनुसार काव्य-शक्ति स्वाभाविक नहीं होती। अगर इस प्रकार होती तो सभी ने ही ऐसे काव्य रचे होते। इसके अलावा शक्ति होने पर भी व्युत्पत्ति आदि आहार्य (स्वयं प्राप्त की जाने वाली) कारण-सामग्री अमुक देश में पैदा होने भर से नहीं मिल जाती,

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१८२ अभिनव का रस-विवेचन क्योंकि यह सामग्री किसी एक ही देश में होने का नियम नहीं है। उस देश में भी कितने ही लोगों के पास वह नहीं होती; अन्यथा वह भी दिखायी देता है।" "साथ ही, यह भी उचित नहीं है कि रीतियों के उत्तम, मध्यम और अधम भेद किये जायें। कारण, सहृदयों को आनन्द प्रदान करने वाली काव्य-रचना में गौड़ी और पांचाली रीतियों में अगर वैदर्भी के समान सौन्दर्य सम्भव ही नहीं है तो मध्यम और अधम रीतियों का उपदेश देना व्यर्थ है। यदि इस तरह कहें कि इसका परिहार करने के लिए उसका उपदेश देना पड़ता है तो वह भी युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि वामन भी यह नहीं कहता है। इसके अतिरिक्त दरिद्रों को यथाशक्ति दान देने के न्यायाधार पर यथाशक्ति जैसे बने वैसे काव्य की रचना करना भी उचित नहीं है। इस प्रकार हमारी आपत्ति देशविशेष के आधार पर नाम डालने से ही सम्बद्ध नहीं है पर जो दो रीतियाँ स्वीकार करते हैं उन पर भी यह दोष लागू होता है। अतः इस निस्सार वस्तु की चर्चा को बढ़ाने का कोई अर्थ नहीं है।" कवि-स्वभाव-भेद के आधार पर मार्ग-भेद "कवि के स्वभाव-भेद के कारण काव्यप्रस्थान-भेद मानना ही उचित है। सुकुमार स्वभाव के कवि में वैसी ही सहज शक्ति उद्भूत होती है, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान के बीच भेद नहीं होता। यह शक्ति अपने अनुरूप सौकुमार्य के कारण रमणीय व्युत्पत्ति प्राप्त करती है, और यह शक्ति और व्युत्पत्ति दोनों मिल कर कवि को सुकुमार मार्ग का अभ्यास करने में तत्पर बनाती हैं।" इसी प्रकार विचित्र और मध्यम मार्ग के विषय में भी समझ लेना चाहिए। रीति की चर्चा में कुन्तक का महत्त्वपूर्ण योग-दान है। उसने रीति का मूल कवि- स्वभाव में बता कर इस चर्चा में कवि को केन्द्र में स्थापित किया है और जैसा उसका स्वभाव वैसी ही उसकी रीति के समान मनोवैज्ञानिक निरूपण किया है। पीटर का अत्यन्त प्रचलित वचन-'दि स्टाइल इज दि मैन', हम इस रूप में भी समझ सकते हैं। अमुक रीति उत्तम और अमुक रीति अधम-इस प्रकार के भेद को भी वह नहीं स्वीकार करता और कहता है कि ये तीन स्वभाव वाले कवि सुकुमार, विचित्र और उभयात्मक काव्य रचने में प्रवृत्त होते हैं और उनको इस तरह प्रवृत्त करने वाले ये मार्ग ही कहे जाते हैं। वह स्वीकार करता है कि कवि-स्वभाव-भेद से मार्ग-भेद मान कर चलें तो अनन्त पृथक-पृथक मार्ग स्वीकार करने पड़ेंगे, फिर भी उन सभी की गणना करना असम्भव है, अतः सामान्यतः तीन ही मार्ग मानने उचित हैं। "अगर अब रमणीय काव्य को स्वीकार करने की दृष्टि से देखें तो एक सुकुमार स्वभाव वाले काव्यों का समुदाय मानना पड़ेगा। इसके अलावा अ-रमणीय काव्य तो स्वीकार करने लायक ही नहीं हैं, अतः सुकुमार से भिन्न पर रमणीय काव्य का दूसरा वर्ग हो जाता है। यह विचित्र कहा जायगा। इन दोनों के रमणीय होने के

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कारण इन दोनों की छाया जिनमें हो ऐसे उभयात्मक मध्यम वर्ग को भी रमणीयता से युक्त मानना ही युक्तिसंगत है। अतः इन तीनों में से प्रत्येक अपने निर्दोष स्वभाव के कारण तद्विदों को आह्लाद देने की पूरी शक्ति रखते हैं, इनमें कोई कमी नहीं है।" यहाँ कुन्तक एक शंका उत्पन्न कर उसका निरसन करता है। शंका है कि यह तो समझा जा सकता है कि शक्ति अर्थात् प्रतिभा आन्तरिक होने के कारण उसके स्वभाव के साथ सम्बद्ध है, पर व्युत्पत्ति अर्थात् अभ्यास तो बाहर से प्राप्त होता है तो यह बात उस पर किस तरह से लागू होती है ? इसका उत्तर यह है कि 'अगर काव्य-रचना को एक तरफ रख दे तो भी दूसरी बातों में भी अनादि वासना के अभ्यास वाला कोई भी व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप ही व्युत्पत्ति और अभ्यास धारण करता है और ये दोनों व्युत्पत्ति और अभ्याम-स्वभाव की अभिव्यक्ति द्वारा ही सफल होते हैं। कारण, स्वभाव और इन दोनों के बीच उपकार्य और उपकारक का सम्बन्ध होता है अर्थात् स्वभाव इन दोनों को उत्पन्न करता है और ये दोनों स्वभाव को परिपुष्ट करते हैं। इससे अचेतन पदार्थों के स्वभाव भी अपने स्वभाव के अनुरूप दूसरे पदार्थों के सान्निध्य के प्रभाव से अभिव्यक्त होते हैं : जिस प्रकार चन्द्रकान्तमणि से चन्द्र की किरणों के स्पर्श मात्र से स्वभावतः पानी झरने लगता है।' सुकुमार मार्ग तदुपरान्त वह इन तीनों मार्गों का परिचय क्रमशः देता है। सबसे पहले वह सुकुमार मार्ग को लेता है। अम्लानप्रतिभोदि्भन्ननवशब्दार्थबन्धुरः । अयत्नविहितस्वल्पमनोहारिविभूषणः ॥ २५ ॥ भावस्वभावप्राधान्यन्यक्कृताहार्यकौशलः । रसादिपरमार्थज्ञमनः संवादसुन्दरः ॥ २६॥ अविभावितसंस्थानरामणीयकरञ्जकः विधिवैदग्ध्यनिष्पन्ननिर्माणातिशयोपमः ॥२७॥ यत्किञ्जनापि वैचित्र्यं तत्सर्वं प्रतिभोद्भवम्। सौकुमार्यपरिस्पन्दस्यन्दि यत्र विराजते ॥ २८॥ सुकुमाराभिधः सोडयं येन सत्कवयो गताः। मार्गेणोफुल्लकुसुमकाननेनेव षट्पदाः।। २९॥ 'अम्लान अर्थात् दोषरहित प्रतिभा से अंकुर के समान स्वयं फूट निकला हुआ, तद्विदों को आनन्द देने में समर्थ शब्दार्थ वाला, निरायास रचित स्वल्प और मनोहर अलंकार वाला, पदार्थों के स्वभाव ही जिसमें मुख्य हों अथवा व्युत्पत्तिजन्य आहार्य कौशल जिसके सम्मुख फीका लगता हो वैसा, रसादि के रहस्य को समझने वाले सहृदयों के मनःसंवाद के कारण सुन्दर, विचार या प्रयत्न के न होने पर भी स्वभावतः जिसमें पदादि की योजना इस प्रकार हुई हो कि उसके सौन्दर्य से रसिकों के मन का

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रंजन होता हो वैसा, विधाता के कौशल से सिद्ध हुए निर्माण के अतिशय अर्थात् सुन्दर सृष्टि के समान, उसमें जो कुछ विचित्र हो वह सभी प्रतिभा में प्रकटित और सौकुमार्यमंडित हो वैसा, यह सुकुमार मार्ग है। इस मार्ग पर कुसुमित वन में होकर जिस तरह भ्रमर जाता है उसी प्रकार सत्कवि गये हैं। इस वर्णन से लगता है कि सुकुमार मार्ग में जो कवि-कौशल होता है वह आहार्य नहीं होता, उसमें वस्तु-स्वभाव का प्राधान्य होता है अर्थात् उसमें जो कुछ भी वैचित्र्य होता है वह अनायास होता है। उसमें कवि की स्वाभाविक प्रतिभा अबाधरूप से प्रयुक्त होती दिखायी देती है और अभिव्यक्ति के अतिशय को सिद्ध करती है। उसमें ध्वनि तो होती ही है पर रस स्वभाव-निरूपण का अंग होकर रहता है। कुन्तक ने इस मार्ग के जो उदाहरण दिये हैं उनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है। बालेन्दुवक्राण्यविकासभावाद् बभुः पलाशान्यतिलोहितानि। सद्यो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम्।। खिले हुए न होने के कारण बाल चन्द्र के समान टेढ़े और अत्यन्त लाल रंग के पलाश पुष्प, बसन्त के साथ जिसका अभी समागम हुआ है ऐसी वनस्थली के नखक्षतों जैसे सुशोभित होने लगे।-कुमारसंभव, ३-२९ तस्य स्तनप्रणथिभिर्मुहुरेणशावैर्व्याहन्यमानहरिणीगमनं पुरस्तात्। आविर्बंभूव कुशगर्भमुखं मृगाणां यूयं तदग्रसरगर्वितकृष्णसारम्॥। दूध पीने में मस्त छोटे-छोटे बच्चे हरिणियों के चलने में बारम्बार बाधा डालते थे और जिसके आगे गर्व से भरा हुआ मृग-मुखिया चल रहा था। ऐसी मुख में कुश धारण किये मृगों की टोलियाँ उसके सामने दिखायी दीं।-रघुवंश, ९-५। शृङ्गेण च स्पर्शनिमीलिताक्षीं मृगीमकण्डूयत कृष्णसारः।। जिसकी आँखें स्पर्श-सुख से बन्द हो गयी थीं ऐसी हरिणी को कृष्णसार (काला मृग) सींग से खुजलाता था।-कुमारसंभव, ३-३५। इसके चार गुण इस सुकुमार मार्ग के चार गुण हैं। एक माधुर्य अर्थात् समासहीन मनोहर पदविन्यास है। दूसरा प्रसाद अर्थात् ऐसा गुण जिससे वक्रोक्ति का अभिप्राय और रस बिना कष्ट के समझ में आ जाये और तुरन्त अर्थ की प्रतीति हो जाय। तीसरा लावण्य अर्थात् वर्णविन्यास की विच्छित्तियुक्त पद-योजना की स्वल्प सम्पत्ति से उत्पन्न होने वाले बन्ध का सौन्दर्य; और चौथा आभिजात्य अर्थात् श्रवण सुभग, चित्त को सुखद स्पर्श की भाँति स्पर्श करता हुआ स्वभावतः कोमल छायावाला गुण। १. यहाँ कुन्तक ने स्वयं बन्ध-सौन्दर्य को लावण्य कहा है और आनन्दवर्द्धन ने प्रतीयमान वस्तु की अंगना के लावण्य के साथ तुलना की है, इस विषय में जो थोड़ी चर्चा उसने की है उसे हम देखेंगे। प्रश्न यह है कि कितनों ही ने, 'प्रतीयमान वस्तु ललना के लावण्य के समान होने के कारण लावण्य कही जाती है' का प्रतिपादन किया है, जिस प्रकार :

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विचित्र मार्ग तदनन्तर विचित्र मार्ग का लक्षण आता है। प्रतिभाप्रथमोद्भेदसमये यत्र वक्रता। शब्दाभिधेययोरन्तः स्फुरतीव विभाव्यते॥ ३४॥ अलङ्कारस्य कवयो यत्रालङ्करणान्तरम् । असन्तुष्टा निबन्धन्ति हारादेमणिबन्धवत् ॥३५॥ रत्नरश्मिच्छटोत्सेकभासुरैरभूषणैर्यथा। कान्ताशरीरमाच्छादये भूषायै परिकल्प्यते॥ ३६॥ यत्र तद्वदलङ्कारैभ्राजिमानैनिजात्मना। स्वशोभातिशयान्तःस्थलङ्कायं प्रकाश्यते । ३७॥ यदप्यनूतनोल्लेखं वस्तु यत्र तदप्यलम् । उक्तिवैचित्यमात्रेण काष्ठां कामपि नीयते॥ ३८ ॥ यत्रान्यथाभवत् सर्वमन्यथैव यथा-रुचि। भाव्यते प्रतिभोल्लेखमहत्वेन महाकवेः ॥३९॥ प्रतीयमानता यत्र वाक्यार्थस्य निबध्यते। वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां व्यतिरिक्तस्य कस्यचित् ॥ ४० ॥ स्वभाव: सरसाकूतो भावानां यत्र बध्यते। केनापि कमनीयेन वैचित्र्येणोपबृंहितः ॥ ४१॥ विचित्रो यत्र वक्रोक्तिवैचित्र्यं जीवितायते। परिस्फुरति, यस्यान्तः सा काप्यतिशयाभिधा।। ४२॥ सोडतिदुःसञ्चरो येन विदग्धकवयो गताः । खड्गधारापथेनेव सुभटानां मनोरथः ॥ ४३ ॥ 'प्रतिभा के प्रथम प्रकाशन के समय में ही जिसमें शब्दार्थ के भीतर वक्रता चमक उठती है, जिसमें कविगण एक अलंकार के बाद दूसरे अलंकार को, पहले से संतुष्ट न होने के कारण, हार में मणिबन्ध की भाँति जोड़ते चलते हैं, जिसमें रत्नों की किरणों की छटा के बाहुल्य से चमकते हुए अलंकारों के द्वारा ढँका हुआ कान्ता का शरीर

प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम्। यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु।। तो फिर आप केवल बन्ध-सौन्दर्य को ही लावण्य क्यों कहते हैं ? इसके उत्तर में वह कहता है कि यह कोई दोष नहीं है। कारण, इस दृष्टान्त से तो इतना ही सिद्ध होता है कि वाच्यवाचक- रूप प्रसिद्ध अवयवों से भिन्न रूप में प्रतीयमान वस्तु का अस्तित्व होता है, परन्तु इससे कहीं सभी पुरुषों के लोचनों द्वारा ग्रहण किये जाने वाला ललना का लावण्य और केवल सहृदयों से ही अनुभव की जानेवाली प्रतीयमान वस्तु, ये दोनों समान हैं, यह सिद्ध नहीं हो जाता। साथ ही, पद और पदार्थ से अनभिज्ञ का भी हृदय हर लेने वाले रस-सौष्ठव को ही लावण्य कहा जा सकता है। कहने का अभिप्राय है कि जिस प्रकार ललना का सौन्दर्य साधारण पुरुषों को भी

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१८६ अभिनव का रस-विवेचन जिस प्रकार सुशोभित होता है उसी प्रकार चमकते हुए अलंकारों के द्वारा अपने शोभातिशय के भीतर छिपा अलंकार्य ( रस) अपने रूप में प्रकट होता है, जिसमें अनूतन वर्ण्यविषय भी उक्तिवैचित्य मात्र से किसी पराकाष्ठा को पहुँच जाता है, जिसमें कवि-प्रतिभा से असुन्दर वस्तु कवि-रुचि के अनुसार अलग ही (सौन्दर्ययुक्त ) बन जाती है, जिसमें वाच्यवाचकवृत्ति से भिन्न वाक्यार्थ की प्रतीयमानता आयोजित की जाती है, जिसमें पदार्थों का सुन्दर अभिप्राय वाला स्वभाव किसी कमनीय वैचित्य के द्वारा वर्णित हुआ होता है, जिसमें वक्रोक्ति का वैचित्र्य जीवितरूप बन जाता है और उसमें किसी अपूर्व अतिशय का कथन हुआ होता है, इस प्रकार के दुःसंचर विचित्र मार्ग पर चल कर-तलवार की धार के मार्ग पर चल कर सुभटों के मनोरथों की भाँति विदग्ध कवि गये हैं।' इस विचित्र मार्ग के वर्णन से समझ में आता है कि उसमें वक्रोक्तिवैचित्य प्रधान है और कवि-प्रयत्न इसे सिद्ध करने में लगा हुआ है। इसमें कला मुख्यतः अलंकार- प्रधान होती है और उसमें भणितिवैचित्य किसी अपूर्व उत्कर्ष को प्राप्त करता है। इसमें भी प्रतीयमानता तो होती ही है। सुकुमार मार्ग में पदार्थ के स्वभाव का वर्णन होता है जबकि इसमें स्वभाववर्णन रस के अभिप्रायानुसार किया जाता है। यह मार्ग अत्यन्त कठिन है, क्योंकि इसमें प्रतिभा के अतिरिक्त पुष्कल व्युत्पत्ति की भी आवश्यकता होती है। उसके चार गुण इस मार्ग के भी उपर्युक्त चार गुण हैं। पर उनकी व्याख्या अलग है। पहला गुण माधुर्य का है जिसका आशय है शैथिल्य का त्याग कर पदों का दृढ़ सन्निवेश। दूसरा प्रसाद गुण है; इसमें ओजगुण से संयुक्त पदों का समासरहित विन्यास होता है। इसमें एक वाक्य में दूसरे व्यंजक वाक्य पदों की भाँति ग्रथित कर दिये जाते हैं। तीसरा लावण्य है जिसमें समाविष्ट हैं ऐसे पद जिनमें विसर्ग का लोप न हो और संयोगपूर्व ह्रस्व स्वर का आगमन हो। चौथा आभिजात्य गुण है; इसमें न तो अत्यन्त कोमल और न अत्यन्त कठोर ऐसी प्रौढ़ियों से उत्पन्न गुणों का समावेश होता है। इस मार्ग के भी हम दो-तीन उदाहरण देखें : हे हेलाजितबोधिसत्व वचसां कि विस्तरैस्तोयधे नास्ति त्वत्सदशः परः परहिताधाने गृहीतव्रतः । अनुभूत होता है उसी प्रकार काव्य का बन्ध-सौन्दर्य पदपदार्थ के ज्ञान से अनभिज्ञ सामान्य मनुष्यों को भी श्रवण मात्र से अनुभवगोचर होता है। अतः बन्ध-सौन्दर्य को ही लावण्य कहना उचित है। प्रतीयमान अर्थ तो काव्य के मर्मश्ञों के लिए ही अनुभवगोचर होता है : जिस प्रकार कामिनी का सौभाग्य-सौन्दर्य उसके उपभोग करने वाले पात्र नायक को ही होता है, पर उसका लावण्य तो सत्कवियों की वाणी के सौन्दर्य की भाँति सभी मनुष्यों को अनुभवगोचर होता रहता है। यह पहले ही कहा जा चुका है; अतः यहाँ विस्तार करना व्यर्थ है।

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तृष्यत्पान्थ यजनोपकार घटनावैमुख्यलब्धायशो भारप्रोद्वहने करोषि कृपया साहाय्यकं यन्मरोः ॥ बड़ी आसानी से बोधिसत्त्व को पराजित करनेवाले हे वारिधि, मैं और क्या कहूँ? परहित करने का व्रत लेने वाला तेरे जैसा और कोई नहीं है। प्यासे पथिक से विमुख होकर जो कलंक पाया है उसका भार उठाने में तू मरुभूमि की सहायता करता है। इसके सौन्दर्य को समझाता हुआ कुन्तक कहता है कि इस श्लोक में अत्यन्त निंद्य चरित्र वाले कृपण धनिक सम्बन्धी दूसरा अर्थ मन में रख कर उसके समान (पानी होने पर भी प्यासे के लिए व्यर्थ) समुद्र का वाच्य रूप में वर्णन किया गया है। यही अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार का स्वरूप है। प्रतीयमान निंद्य कंजूस के दूसरे ही अर्थ में पर्यवसित वाक्य भी, आरम्भ से ही रमणीय रूप में रचित होने के कारण सहृदयों को आह्लाद देने वाला हो जाता है। इस प्रकार यह व्याजस्तुति जैसा दूसरा अलंकार अप्रस्तुतप्रशंसा के आभूषण के रूप में आया है। यहाँ संकरालंकार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दोनों अलंकार स्फुट रूप में पृथक-पृथक दिखायी देते हैं। यहाँ संसृष्टि भी नहीं है, क्योंकि दोनों के लिए प्रधानता समान नहीं है। दोनों वाच्यालंकार भी नहीं हैं, क्योंकि एक अर्थ वाच्य है और दूसरा प्रतीयमान है। इस तरह यहाँ एक अलंकार में दूसरा अलंकार गूँथा गया है। किं तारुण्यतरोरियं रसभरोद्भिन्ना नवा वल्लरी लीलाप्रोच्छलितस्य किं लहरिका लावण्यवारांनिधे: । उद्दामोत्कलिकावतां स्वसमयोपन्यासविश्रम्भिणः किं साक्षादुपदेशयष्टिरथवा देवस्य शृङ्गारिणः ॥ यह क्या तारुण्य तरु की रसबाहु्य से निकली हुई नयी वल्लरी है ? या लीला से उछलते हुए लावण्यसिन्धु की यह लहर है ? या अत्यंत उत्कंठित प्रेमियों को अपने सिद्धान्त सिखाने में तत्पर श्रृंगार के देव (कामदेव) की उपदेशयष्टि है ? इस श्लोक में रूपकालंकार है और उसके सौन्दर्य को अतिशय प्रकट करने के लिए संदेहालंकार वाली उक्ति आयोजित है, जो चमत्कार है। मध्यम मार्ग विचित्र मार्ग का निरूपण कर अब वह मध्यम मार्ग के निरूपण का उपक्रम करता है। वैचित्र्यं सौकुमार्यं च यत्र संकीर्णतां गते। भ्राजेते सहजाहार्यशोभातिशयशालिनी ।।४९ ॥ माधुर्यादिगुणग्रामो वृत्तिमाश्रित्य मध्यमाम् । यत्र कामपि पुष्णाति बन्धच्छायातिरिक्तताम् ॥ ५० ॥ मार्गोडसौ मध्यमो नाम नानारुचिमनोहरः । स्पर्धया यत्र वर्तन्ते मार्गद्वितयसम्पदः॥५१॥

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१८८ अभिनव का रस-विवेचन अन्रारोचकिन: केचिच्छायावैचित्र्यरन्जके। विदग्धनेपथ्यविधौ भुजङगा इव सादराः ॥ ५२ ॥ "जिसमें वैचित्य और सौकुमार्य का मिश्रण हो, ये दोनों सहज और आहार्य सौन्दर्य से सुशोभित हों, जिसमें माधुर्यादि गुण मध्य वृत्ति का अनुसरण कर बन्ध के सौंदर्या- तिशय को पुष्ट करते हों, जिसमें दोनों मार्ग की सम्पत्ति परस्परस्पर्धि रूप बनी हो, ऐसे इस मध्यम मार्ग को सुन्दर वेशभूषा के शौकीन किसी भुजंग के समान कोई सौंदर्या- न्वेषण का व्यसनी कवि पसन्द करता है।" इन तीनों के मार्ग से सम्बद्ध दो-तीन कवियों के नाम कुन्तक ने दिये हैं जिनके आधार पर हम दूसरे कवियों पर विचार कर सकते हैं। उसने कालिदास, सर्वसेन आदि को सुकुमार मार्ग का कवि माना है। बाणभट्ट के हर्षचरित को और भवभूति, राजशेखर आदि द्वारा रचित मुक्तकों को विचित्र मार्ग के काव्य माने हैं। इसी प्रकार उसने मातृगुप्त, मायुराज, मंजीर आदि को मध्यम मार्ग के कवि स्वीकारे हैं। औचित्य इस तरह तीन मार्ग और उनके चार-चार गुणों की चर्चा करने के बाद वह दूसरे दो गुणों का उल्लेख करता है जो उक्त तीनों मार्गों के लिए आवश्यक हैं। इनमें पहला गुण औचित्य का है। कथन के वैचित्य से वस्तु-स्वभाव के उत्कर्ष को यह स्पष्ट रूप से पुष्ट करता है और स्वभाव का औचित्यपूर्ण कथन ही उसका जीवित है। जिसमें वक्ता या श्रोता के स्वभाव से शोभातिशययुक्त वाच्य वस्तु आच्छादित हो जाती है, वही औचित्य है। उदाहरणस्वरूप उसने निम्न श्लोक उद्धृत किया है : शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन् आभासि तीर्थ प्रतिपादितर्द्धिः। आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिः स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः I-(रघुवंश, ५-१५) हे राजन्, सत्पात्र को अपनी सम्पत्ति का दान करके केवल शरीर से स्थित आप, आरण्यकों ने जिसके सब कण ले लिये हैं ऐसे नीवार के ठूँठ की तरह दीखते हैं। इस श्लोक में दानवीर राजा के स्वभाव का वर्णन करने के लिए मुनि ने अपने अनुभव-क्षेत्र से नीवार के पौधे की उपमा दी है। यहाँ वक्ता के स्वभाव से वाच्यार्थ का स्वभाव आच्छादित हो गया है। सौभाग्य दूसरा गुण सौभाग्य है। यह गुण काव्य-रचना की समग्र सामग्री-कवि-प्रतिभा, शब्द-सामर्थ्य, अर्थ-सामर्थ्य, गुण और वक्रता-के सहयोग से सिद्ध होता है, यह सहृदयों के चित्त को अलौकिक आनन्द का अनुभव कराता है और यही काव्य का एक मात्र जीवित है। ये दोनों गुण तीनों ही मार्ग के काव्यों में पद, वाक्य और प्रबन्ध तीनों में व्यापक रूप से अर्थात् प्रत्येक अवयव में व्याप्त होकर विद्यमान रहते हैं। पदौचित्य अर्थात् पद की नाना प्रकार की वक्रता। स्वभाव का स्पष्टतः वर्णन

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करना ही वक्रता का परम रहस्य है। औचित्यपूर्ण कथन ही जीवित रूप होने के कारण वाक्य के किसी एक अंश में भी अगर औचित्य का अभाव हो तो उससे तद्विदाह्राद- कारित्व को हानि पहुँचती है, यह कर उसने कितने ही उदाहरणों की चर्चा की है जो दर्शनीय है। पहला उदाहरण रघुवंश से लिया गया है। राम लंका-विजय के बाद पुष्पक विमान में आरूढ़ हो अयोध्या जाते हुए रास्ते में आने वाले विविध स्थान बताते हैं, उसमें निषादराज का स्थान आते ही उसका परिचय देते हुए वे सीता से कहते हैं : पुरं निषादाधिपतेस्तदेतद् यस्मिन्मया मौलिमणिं विहाय। जटासु बद्धास्वरुदतसुमन्त्र कैकेयि कामा: फलितास्तवेति। -रघुवंश, १३-५८ "यह निषादराज की नगरी है जहाँ मौलमणि को उतार कर मेरे द्वारा जटा बाँधे जाते समय सुमंत्र ने रोते-रोते कहा था कि "हे कैकेयी, तेरे मनोरथ सिद्ध हुए !" यहाँ रघुपति मान्य महापुरुष के रूप में वर्णित हैं, अतः वे रामचन्द्र 'कैकेयी तेरे मनोरथ सिद्ध हुए' इस प्रकार के तुच्छ वचन याद रखें और अब उन्हें पुनः कहें यह अत्यन्त अनुचित लगता है। इसी प्रकार का दोष उसी काव्य में दिलीप और सिंह के संवाद में दिखायी देता है। सिंह कहता है : अथैकधेनोरपराधचण्डाद् गुरोः कृशानुप्रतिमाद् विभेषि। शक्योऽस्य मन्युर्भवतापि जेतुं गा: कोटिशः स्पर्शयता घटोघ्नीः ॥ -रघुवंश, २-४९ "अगर एक गाय के रक्षण करने में असफल होने के अपराध के कारण क्रोधाग्नि से सुलगे हुए गुरु से तू डरता है तो तू इस क्रोध को घड़े के समान स्तनोंवाली करोड़ों गाय दे कर शमित कर सकने में समर्थ है।" सिंह तो राजा का उपहास करता है अतः वह ऐसा कहे तो उचित है पर राजा इसका जो उत्तर देता है वह अपने यश-रक्षण में जीवन को तृणवत् मानने वाले के लिए उचित नहीं है। राजा इस प्रकार कहता है : कथं च शक्योऽनुनयो महर्षेविश्राणनादन्यपयस्विनीनाम्। इमां तनूजां सुरभेरवेहि रुद्रौजसा तु प्रहतं त्वयास्याम्।। -रघुवंश, २-५४ "दूसरी गायें देने से मुनि का क्रोध किस प्रकार शमित हो सकता है ? कारण, यह तो कामधेनु की पुत्री है", आदि। अगर दूसरी गायों को इसके बदले दिया जा सकता है, यह मान लें तो कदाचित् मुनि और मेरे द्वारा इसकी प्राण-रक्षा की उपेक्षा करना उचित माना गया होता। यही इसका फलितार्थ है, जो अनुचित है।

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१९० अभिनव का रस-विवेचन तीसरा उदाहरण कुन्तक ने कुमारसंभव से दिया है। कामदेव इन्द्र के सम्मुख अपनी शक्ति का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करता है। उसमें एक स्थान पर कहता है : कामेकपत्नीव्रतदुःखशीलां लोलं मनश्चारुतया प्रविष्टाम्। नितम्बिनीमिच्छसि मुक्तलज्जां कण्ठे स्वयंग्राहनिषक्तवाहुम्॥ 'सौन्दर्य के कारण तेरे चंचल मन में प्रविष्ट पर पतिव्रत के कारण तेरे वश में न आने वाली कौन-सी पतिव्रता है जिससे तू यह चाहता है कि वह अपनी लज्जा छोड़ कर तेरे गले लग जाय।'-कुमारसंभव, ३-८ । स्वर्ग के अधिपति-पद पर प्रतिष्ठित इन्द्र की भी ऐसी इच्छा पूरी करने में संकेतित किसी पतिव्रता के पतिव्रत का नाश करने के अविनयी आचरण का कथन अत्यन्त अनौचित्यपूर्ण लगता है। इस अनौचित्य के उदाहरण को दे कर और उसकी चर्चा करने के बाद वह जोड़ता हुआ कहता है कि ऐसी चर्चा तो कालिदास जैसे कवियों के मामले में ही हो सकती है कि जिसकी सूत्तियों का स्वाभाविक सौन्दर्य सहज सौकुमार्य की मुद्रा वाला होता है। जो केवल आहार्य अर्थात् व्युत्पत्तिसिद्धि काव्य-रचना-कौशल को ले कर प्रशंसाप्राप्त होते हैं उन कवियों के बारे में इस तरह की चर्चा नहीं हो सकती। सुकुमार मार्ग के कवि के लिए यह कितनी बड़ी अंजलि हैं। औचित्य जिस प्रकार काव्य के प्रत्येक अंग के लिए आवश्यक है उसी प्रकार सौभाग्य भी प्रत्येक अंग के लिए आवश्यक है : सौभाग्यमपि पदवाक्यप्रबन्धानां प्रत्येकमनेकाकारकमनीयकारणकलापकलितिराम- णीयकानां किमपि सहृदयहृदयसंवेद्यं काव्यैकजीवितमलौकिकचमत्कारकारिसंव लितानेक- रसास्वादसुन्दरं सकलावयवव्यापकत्वेन काव्यस्य गुणान्तरं परिस्फुरतीत्यलमति प्रसंगेन ॥५७॥ यहाँ मैं कुन्तक के ग्रंथ के प्रथम उन्मेष का परिचय पूरा करता हूँ। इसमें उसकी सम्पूर्ण काव्य-चिन्ता का चित्र आ जाता है। तदुपरान्त वह दूसरे उन्मेष में वर्णविन्यास- वक्रता के छः प्रकारों का सोदाहरण उल्लेख करता है। जिस प्रकार एक, दो या अधिक वर्ण थोड़े-थोड़े अन्तर पर आकर बारम्बार रखे गये हों तो ये वर्णविन्यासवक्रता के पहले तीन प्रकार हुए। चौथा प्रकार अर्थात् अपने वर्ग के अन्तिम वर्ण के साथ संयुक्त स्पर्श वणों की आवृत्ति। ५. दुहरे त, ल, न की आवृत्ति। ६. इसके अलावा वर्णों की रेफ आदि से युक्त रूप में आवृत्ति। यहाँ कुन्तक ने इतनी स्पष्टता की है कि अगर आवृत्ति के बीच अन्तर न हो तो भी स्वरों के भेद से वक्रता सिद्ध होती है। इसके बाद वह पदपूर्वार्द्धवक्रता के १. रुढ़िवैचित्र्यवक्रता [ (अ) असम्भाव्य धर्मारोप; (आ) सद्धर्मातिशयारोप ]; २. पयार्यवक्रता; ३. उपचारवक्रता; ४. विशेषणवक्रता; ५. संवृतिवक्रता; ६. पदमध्यवर्तीवक्रता; ७. वृत्तिवैचित्र्यवक्रता; ८. भाववैचित्र्यवक्रता; ९. लिंगवक्रता; १०. क्रियावैचित्र्यवक्रता के पाँच प्रकारों का निरूपण कर पदपरार्द्ध-

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वक्रता के १. कालवैचित्र्यवकता; २. कारकवक्रता; ३.संख्यावक्रता; ४. पुरुषवक्रता; ५. उपग्रह [ परस्मैपदी, आत्मनेपदी ] वक्रता; ६. प्रत्ययवक्रता; ७. उपसर्गनिपात- वैचित्र्यवक्रता का सोदाहरण निरूपण करता है।

वस्तुवक्रता तीसरे उन्मेष में वाक्यवक्रता का निरूपण करने से पहले पदार्थ अथवा वाच्य या वस्तुवक्रता का निरूपण करता है। वस्तुवक्रता की व्याख्या वह इस प्रकार देता है : अत्यन्त रमणीय स्वाभाविक धर्मयुक्त रूप में वस्तु-वर्णन वस्तुवक्रता है। उदारस्वपरिस्पन्दसुन्दरत्वेन वर्णनम्। वस्तुनो वक्रशब्दैकगोचरत्वेन वकता ॥ ३-१ ॥ यहाँ स्वयं 'वक्रशब्दैकगोचरत्वेन' कहा है; वाच्यत्वेन नहीं कहा। इसमें निहित आशय को समझाता हुआ वह वृत्ति में कहता है : "यहाँ 'वाच्यत्वेन' नहीं कहा गया है, क्योंकि व्यंग्यत्व से भी प्रतिपादन सम्भव है" और यह उसे इष्ट भी है। यहाँ वह एक चेतावनी भी देता है कि वस्तु स्वभाव के सौकुमार्यवर्णन में उपमा आदि वाच्यालंकारों का अधिक उपयोग करना उचित नहीं है, क्योंकि इनसे स्वभावसौकुमार्य का अतिशय फीका पड़ जाता है। यहाँ कुन्तक ने पुनः स्वभावोक्ति से सम्बन्धित चर्चा उठायी है। उसे भी हम देखते चलें। ऊपर कुन्तक ने यह कहा है कि वस्तु के स्वभाव-वर्णन में उपमादि वाच्यालंकारों से स्वभाव-सौन्दर्य के फीके पड़ जाने का भय रहता है; उसे लेकर शायद कोई इस प्रकार का प्रश्न उठाये कि आप जिसे वस्तु का स्वाभाविक और सुन्दर वर्णन कहते हैं, जिसे आप वस्तुवक्रता अथवा वाच्यवक्रता कहते हैं, उसे ही पूर्ववर्ती आचार्यों ने सहृदयाह्लादकारी स्वभावोक्ति अलंकार कहा है। तो फिर आप यह क्यों कहते हैं कि वस्तु के स्वभाववर्णन में वाच्यालंकारों का अधिक उपयोग वस्तु-सौन्दर्य को फीका बनाने वाला हो सकता है ? यहाँ अलंकार्य तो वस्तु का सामान्य धर्म मात्र है और इस धर्म का जो अतिशय बताया गया है, वह अलंकार रूप में प्रतीत होता है और स्वभावोक्ति भी वस्तु के स्वभाव-अतिशय का ही परिपोषण करती है; अतः स्वभावोक्ति को अलंकार ही मानना चाहिए और इस प्रकार देखने से वाच्यालंकार वस्तु के सौन्दर्य को फीका बना दें, यह सम्भव नहीं प्रतीत होता। इसके उत्तर में कुन्तक यह कहता है कि आप जो यह कहते हैं कि वस्तु का सामान्य धर्म मात्र 'अलंकार्य' होता है और उसके अतिशययुक्त स्वभाव का वर्णन 'स्वभावोक्ति अलंकार' होता है, अतः स्वभावोक्ति अथवा वस्तुवक्रता अलंकार रूप में ही होने के कारण रुपकादि अलंकारों द्वारा उसके सौन्दर्य के फीके होने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता-यह ठीक नहीं है। इस तरह की बात मानने में दो दोष हैं : एक तो यह कि काव्य-रचना अपरिहार्थ की भाँति जैसे-तैसे निबटा देने की वस्तु नहीं है, क्योंकि काव्य का लक्षण ही यह है कि उसे तद्विदाह्रादकारी होना चाहिए।

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१९२ अभिनव का रस-विवेचन इसका अर्थ कुछ ऐसा प्रतीत होता है कि वस्तु के किसी भी सामान्यतः चर्चित, अचमत्कारपूर्ण धर्म का वर्णन करना काव्य का काम नहीं है। काव्य को तो तद्विदाह्लाद- कारी धर्म का वर्णन करना है। जब कि आप तो कहते हैं कि काव्य का वर्ण्य विषय वस्तु का सामान्य धर्म है। यदि ऐसा है तो काव्य तद्विदाह्लालकारी हो ही नहीं सकता जो पहला दोष है। दूसरी कठिनाई यह है कि अनुत्कृष्ट धर्मयुक्त वर्ण्य पदार्थ को अगर आप अलंकृत करें तो वह दीवार पर चित्रित चित्र की भाँति शोभाजनक नहीं होगा। गदहे पर अम्बारी शोभा नहीं देती। इसलिए मेरा कहना तो यह है कि अत्यन्त रमणीय स्वाभाविक धर्मयुक्त वस्तु ही वर्णन के लिए पसन्द करनी चाहिए और उसे यथायोग्य औचित्य- पूर्वक रूपकादि अलंकारों से सुशोभित करना चाहिए। पर, अतिरिक्त रूप में इतना कहना चाहिए कि जब कवि वस्तु का स्वाभाविक सौन्दर्य ही वर्णित करना चाहता है तब अधिक अलंकार उपकारक नहीं होते; क्योंकि अधिक अलंकारों के कारण वस्तु के स्वाभाविक सौन्दर्य अथवा रसादि परिपोषण के ढँक जाने का भय रहता है। जिस तरह विलासवती स्त्री को स्नान के समय, विरहव्रत धारण किये हो उस समय अथवा सुरतावसान के समय अधिक अलंकार शोभा नहीं देते उसी प्रकार ऐसे प्रसंगों में अलंकार्य को अधिक अलंकार शोभा नहीं देते। कारण, स्वाभाविक सौन्दर्य ही रसिकों के हृदय को आनन्द देता है। यहाँ वह कुमारसंभव से एक श्लोक उद्धृत करता है : तां प्राङमुखीं तत्र निवेश्य तन्वीम् क्षणं व्यलम्बन्त पुरो निषण्णाः । भूर्तार्थशोभाहियमाणनेत्राः प्रसाधने संनिहितेऽपि नार्यः ॥ -- कुमारसंभव, ७-१३ शिव-पार्वती के विवाहोपरान्त पति मिलन के लिए पार्वती को सजाने आयी स्त्रियाँ उसे सामने बैठा कर और प्रमाधन सामग्री पास होने पर भी पार्वती की स्वाभाविक शोभा से दृष्टि आकषित होने के कारण क्षण भर तो इसी विचार में बैठी रहीं कि इसे सजाने की क्या आवश्यकता है ? यहाँ कवि का अभिप्राय ऐसे सौकुमार्य से मनोहर शोभा के अतिशय का प्रति- पादन करना है। और उसे अलंकार पहरा देने से शायद उसका स्वाभाविक सौन्दर्य ढँक जायेगा, ऐसी शंका की सम्भावना उन स्त्रियों के बैठे रहने का कारण है। कारण, जिस वस्तु के सौन्दर्यातिशय का वर्णन करना हो उसके स्वभाव से सम्बद्ध सहज सौन्दर्य को ढँक देने वाले और अन्य धर्मों की प्रतीति की अपेक्षा रखने वाले अलंकारों की रचना उपकारक नहीं होती। इसके अलावा रस पोषण के कारण सुकुमार प्रतीति को विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के औचित्य के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार उपस्थित करने की चेष्टा प्रस्तुत वस्तु अथवा रस में बाधक बन जायेगी। यौवन में प्रवेश करती हुई तरुणी आदि ऐसे सुकुमार पदार्थ हैं कि उनका प्रतिपादन करनेवाली वाच्यवक्रता के अतिरिक्त

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किन्हीं अन्य अलंकारों से उन्हें सजाया नहीं जाता ... और कदाचित् अलंकार आयोजित किये जाते हैं तो वे स्वाभाविक सौकुमार्य को अच्छे ढंग से प्रकट करने के लिए होते हैं, न कि अलंकारवैचित्र्य सिद्ध करने के लिए। अगर किसी अतिशयविहीन धर्मवाली वस्तु को सजायें तो वह पिशाच की भाँति तद्विदाह्ादकारी न होने के कारण अनुपादेय ही रहेगी। अथवा प्रस्तुत औचित्य के कारण मुख्यतः वस्तु का स्वभाव ही अतिशयोक्ति रूप में वर्णित होने की वजह से दूसरे अलंकार को सहन नहीं करता, कारण, वह स्वयं ही अत्यन्त शोभाशाली होने के कारण अलंकार्य होता है; फिर भी उसे अलंकार कहते हो तो यह तो हमारा ही पक्ष हुआ। इनके अतिरिक्त अलंकारों को अलंकार कहने में हमारी आपत्ति नहीं है। इस प्रकार कवि की सहज प्रतिभा से प्रकटित वस्तु के स्वभाव का सुन्दर वर्णन प्रथम प्रकार की वस्तुवक्रता है। दूसरे प्रकार की वस्तुवक्रता कवि के स्वाभाविक और आहार्य अर्थात् व्युत्पत्ति और अभ्यास से प्रकटित कवि-कौशल से सिद्ध होती है। ऐसी रचना अपूर्व कल्पना के कारण लोकातिक्रान्तगोचर बन जाती है। इसका अर्थ यह है कि कवि जहाँ कुछ भी वर्णन करने योग्य पदार्थ न हो वहाँ भी नवीन उत्पन्न नहीं करता। वह तो केवल सत्ता मात्र से प्रतीत होने वाले पदार्थों में ऐसी कुछ विशेषता प्रदान करता है जिससे वह सहृदयहृदया ह्वादकारी रमणीयता को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार सत्ता मात्र से प्रतीत होने वाले पदार्थों में किसी अलौकिक शोभातिशय उत्पन्न करने वाले सौन्दर्य का कथन किया जाता है जिससे उन पदार्थों का वास्तविक स्वरूप आच्छादित हो जाता है और अपूर्व सौन्दर्य से मन को हरण करने वाले और अपने ही तेज से जगमगाते हुए रूप में उसी समय प्रतीत होने वाले वर्णनीय पदार्थ के स्वभाव का सौन्दर्य प्रकट होता है। इसीलिए वह कवि को विधाता कहता है। यह दूसरे प्रकार की आहार्यवकता अलंकार के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। अतः उसके अनेक भेद होते हैं। एक उदाहरण दे कर वह बात स्पष्ट करता है। अस्याः सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्रो तु कान्तिप्रदः शङ्गारैकरसः स्वयं नु मदनो मासो नु पुष्पाकरः । वेदाभ्यासजडः कथन्नु विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः ॥ इसे रचने में क्या कान्ति देने वाला चन्द्र अथवा केवल शृंगार-रसमय मदन अथवा पुष्पाकर वसन्त स्वयं ब्रह्मा हो गया था ? कारण, वेदाभ्यास से जड़ीभूत और विषयों से विमुख वृद्ध मुनि तो ऐसे सुन्दर रूप की रचना करने में कैसे समर्थ होगा ? यहाँ कान्ता के असीम कान्तिमत्व, असीम विलास-सम्पत्ति की पात्रता, सरसता, लोकोत्तर सौन्दर्य और सुकुमारता को प्रतिपादन करने के लिए उस स्वभाव के प्राधान्य १३

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१९४ अभिनव का रस-विवेचन के कारण उचित सम्भावना का अनुमान कर के पृथक-पृथक अपूर्व निर्माण की उत्प्रेक्षा की है। अर्थात् शान्ति के लिए कान्तिदाता चन्द्र की, असीम विलास-सम्पत्ति के लिए उसके आश्रयभूत कामदेव की और सरसता, असामान्य सौन्दर्य और सुकुमारता के लिए उनके कारणभूत वसन्त की ब्रह्मा के रूप में कल्पना की है। अर्थात् चन्द्र की रचना होने के कारण उसमें कान्तिमत्व, कामदेव की रचना होने के कारण असीम विलास-सम्पत्ति तथा सरसता और सुकुमारता वसन्त की रचना होने के कारण असामान्य सुकुमारता और सौष्ठव का होना सम्भव है। इसलिए इन तीनों की ब्रह्म-रूप में उत्प्रेक्षा की है और इन तीनों के साथ प्रयुक्त विशेषणों के साथ 'स्वयं' शब्द का योजित सम्बन्ध इसी बात को स्पष्ट करता है। जो चन्द्रमा स्वयं मनोहर कान्ति वाला है वह अपने सौजन्य के कारण अरोचकी अर्थात् जिसे असुन्दर वस्तु पसन्द नहीं है ऐसा होने के कारण यह स्वाभाविक है कि उसमें सुन्दर वस्तु निर्माण करने की निपुणता हो, जो स्वयं ही केवल शृंगार रसरूप है अपनी रसिकता के कारण यह सर्वथा उचित है कि वह सरस वस्तु निर्माण करने की कुशलता रखता हो; जो स्वयं ही पुष्पाकर है अपने आभिजात्य के कारण यह उचित है कि वह ऐसी सुकुमार वस्तु का ही सर्जन करे। इसलिए श्लोक के उत्तरार्द्ध में प्रयुक्त विशेषण से व्यतिरेक द्वारा, कान्तिमत्व आदि गुण किसी अन्य रूप में सम्भव नहीं है, यह बतलाया गया है। कारण, ब्रह्मा तो वेदाभ्यास के कारण जड़ बन जाने से कान्तिमय वस्तु की रचना करने में अनभिज्ञ है, विषयों के प्रति कौतूहल न होने के कारण सरस पदार्थों की रचना करने में विमुख होता हुआ और वृद्ध होने के कारण सुकुमारता तथा सरसता की रचना से पराङगमुख होता हुआ प्रतीत होता है। इस प्रकार, कवियों ने अपने वर्ण्य विषय को अलौकिक विशेषता प्रदान करने के लिए उत्प्रेक्षा अलंकार का आश्रय लिया है, और यह विशेषता स्वयं अपने स्वाभाविक सौन्दर्य के कारण तथा इस अलंकार की सहायता से वणनीय विषय को महिमा- मण्डित करने के लिए सन्देहालंकार का साथ ग्रहण करती है। अतः नायिका की सुन्दरता स्पष्ट होती है। इस तरह कवि ने यहाँ नायिका के सौन्दर्य में किसी लोकोत्तर विशेषता का निर्माण किया है जो लोकोत्तर निर्माता की ही निर्मिति हो सकती है और इसलिए ऐसा लगता है मानो वह पहली ही बार निमित हुई है। पर कितनी ही बार कवि काल्पनिक वस्तुओं का वर्णन करते हैं, उस समय वस्तु का स्वरूप नहीं पर उसका अपूर्व सम्बन्ध कवि का वर्ण्य-विषय होता है और यह अलंकार द्वारा ही हो सकता है। इसके उदाहरण के रूप में कुन्तक निम्न श्लोक उद्धत करता है : कस्त्वं भो दिवि मालिकोऽहमिह कि पुष्पार्थमभ्यागतः किं ते सूनमहक्रयो यदि महच्चित्र तदाकर्ण्यताम्। सङ्ग्रामेष्वलभाभिधाननृपतौ दिव्याङ्गनाभिः स्रजः प्रोज्झन्तीभिरविद्यमानकुसुमं यस्मात्कृतं नन्दनम् ।।

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अरे भाई, तू कौन है ? मैं स्वर्ग का माली हूँ। यहाँ क्यों ? फूल खरीदने आया हूँ। तुझे फूल खरीदने की क्या जरूरत ? तुम्हें अगर बहुत आश्चर्य होता हो तो सुनो। युद्ध में किसी अज्ञात नाम वाले राजा पर मालाओं की वर्षा करती हुई स्वर्ग की अप्सराओं ने नन्दनवन को पुष्परहित कर दिया है, अतः मुझे यहाँ आना पड़ा है। ऐसे उदाहरणों में वर्णनीय वस्तु का विशेष अतिशय सिद्ध करने के लिए अलंकार- योजना करनी पड़ती है। जिस प्रकार इस उदाहरण में अलंकार की कल्पना के वगैर किसी भी ढंग से वाक्यार्थ की संगति सिद्ध नहीं होती, क्योंकि इस प्रकार के कल्पित विषय में प्रत्यक्षादि प्रमाणों से वस्तु की उपपत्ति स्थापित नहीं की जा सकती, अतः स्वाभाविक वस्तु (स्वर्ग का माली यहाँ फूल खरीदने आए ऐसा वर्णनीय विषय) यहाँ धर्मी के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता। इसलिए विदग्ध कवि की प्रतिभा के द्वारा प्रयुक्त अलंकार का विषय होने के कारण ही वह सहृदयहृदयाह्लादकारी बनता है।१ इस प्रकार इस श्लोक में उत्प्रेक्षा अप्रस्तुतप्रशंसा के सम्बन्ध के कारण वर्ण्यमान राजा के प्रताप के अतिशय को विशेष मनोहर रूप में परिपुष्ट कर स्वयं अत्यन्त सुन्दर रूप में प्रकट हो, सहृदयों के हृदयों को आकृष्ट करती है। इस तरह ही कवि-प्रतिभा द्वारा उत्प्रेक्षित अत्यन्त असम्भव पदार्थों का वर्णन भी संगत लगता है-स्वतन्त्ररूप से संगत नहीं लगता।२

वाक्यवक्रता इस तरह अर्थ की दो प्रकार की वक्रता का वर्णन करने के पश्चात् वह वाक्य की वक्रता का उपक्रम करता है और उसका लक्षण इस प्रकार देता है: मार्गस्थव क्रशब्दार्थगुणालङ्कारसम्पदः अन्यद्वक्यस्य वक्रत्वं तथाभिहितजीवितम् ।।३।। मनोज्ञफलकोल्लेखवर्णच्छायाश्रियः पृथक। चित्रस्येव मनोहारि कर्तुः किमपि कौशलम् ॥४॥ इसका अर्थ यह है कि सुकुमार, विचित्र आदि मार्ग में प्रयुक्त शब्द, अर्थ, गुण और अलंकार की सौन्दर्य-सम्पत्ति से पृथक इस ढंग से कहना यही जिसका प्राण है ऐसी वाक्य की वक्रता पृथक ही होती है। सुन्दर फलक पर चित्रित चित्र के रंगों के

१. विदग्धकविप्रतिभोल्लिखितालङ्करणगोचरत्वेनैव सहृदयहृदयाह्लादमादधति। २. कविप्रतिभोत्प्रेक्षित्वेन चात्यन्तमसम्भाव्यमानमनयैव युवत्या समन्जसतां गाहते, न पुनः स्वातन्त्र्येण। इन दोनों ही स्थानों पर उसके द्वारा प्रतिभा पर दिया गया बल द्रष्टव्य है।

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१९६ अभिनव का रस-विवेचन सौन्दर्य से पृथक ही चित्रकार के मनोहारी अनिर्वचनीय कौशल के समान काव्यकर्ता का कोई अनिर्वचनीय कौशल ही वाक्यवक्रता है। इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार चित्र के फलक, आलेखन, वर्ण, छाया आदि सभी उपकरणों से अलग और चित्र में प्रस्तुत प्रकृत पदार्थों के जीवनरूप पृथकशः मुख्यतः प्रतीत होता है उसी प्रकार शब्द, अर्थ, गुण और अलंकार, मार्ग आदि पदार्थों से अलग, काव्य में वणित प्रस्तुत पदार्थों के जीवनरूप सहृदयसवेद्य कविकौशलरूप वक्रत्व वाक्य में प्रतीत होता है। वह आगे चल कर कहता है कि यद्यपि रस, स्वभाव, अलंकार इन सभी का जीवित कवि-कौशल है तथापि अलंकार का तो यह विशेष रूप में जीवित है। कारण, इसके अभाव में अलंकार में तद्विदाह्लादकारित्व का लेश मात्र समावेश नहीं हो सकता। यहाँ हम देख सकते हैं कि कुन्तक कवि-कौशल को कितना अधिक महत्त्व देता है। तदुपरान्त वह वर्ण्य विषय के दो प्रकार करता है : १. चेतन और २. अचेतन। इसमें भी चेतन के दो भेद हैं: १. मुख्य चेतन-देव, मानव आदि, और गौण चेतन-सिंह, मृग आदि। इनमें से मुख्य चेतन पदार्थों का वर्णन रत्यादि रस के पोषणवाला और सम्बद्ध जाति के स्वभाव के वर्णन से युक्त होता है। गौण चेतन पदार्थों का और जड़ पदार्थों का भी वर्णन मुख्यतः रस के उद्दीपन विभाव के रूप में किया जाता है। पदार्थों का वर्णन दो रूपों में किया जाता है-स्वभावप्राधान्य से और रसप्राधान्य• से। दोनों अलंकार्य ही हैं। पदार्थ का स्वामविक स्वरूप अलंकार नहीं हो सकता- यह पहले बता दिया जा चुका है। मुख्य चेतन पदार्थों का रसप्रधान स्वरूप भी अतंकार्य ही है, यह कह कर वह रसवत् अलंकारों का खण्डन करता है। उसका तर्क यह है कि रसवत् अलंकार में, जिस प्रकार दूसरे अलंकारों में होता है, अलंकार्य और अलंकरण नामक दो पृथक वस्तुएँ प्रतीत नहीं होतीं। उद्भट ने अपने ग्रन्थ 'काव्यालंकारसारसंग्रह' (४-४) में रसवदलंकार की व्याख्या में रस को स्वशब्दनिष्ठ भी कहा है। उसकी टीका करते हुए उपहासपूर्वक कुन्तक कहता है : रस स्वशब्दनिष्ठ है, ऐसा तो हमने आज तक नहीं सुना। इसलिए रस पर समग्रतः एकचित्त होकर विचार करने वाले और उसके परम अर्थ को जानने वाले विद्वानों से यह पूछना चाहिए कि स्वशब्दनिष्ठत्व किसका होता है ? रस का या रसवदलंकार का ? अगर पहला विकल्प स्वीकार किया जाता है तो यह कहना है कि 'जिसका आस्वाद लिया जाय वह रस'-यह रस की व्याख्या है, अतः 'रस स्वशब्द- निष्ठ हैं' कहने पर इसका अर्थ यह होता है कि शृंगार आदि रस-शृंगार आदि शब्द में ही निहित हैं और जिस किसी को इस शब्द का ज्ञान होता है, उसे उसका आस्वाद भी मिलता है। आशय है कि शृंगारादि रसों को स्वशब्द से उल्लिखित होते सुन कर सहृदयों को उसके आस्वाद का आनन्द प्राप्त होता है। इस न्याय के अनुसार तो

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घेवर आदि पदार्थों के नाम लेने मात्र से उसके आस्वाद का आनन्द मिल जाता है; अतः इन उदारचित्त महापुरुषों ने किसी भी सुख के उपभोग का सुख प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले सभी के लिए नाम मात्र लेने से त्र्यैलोक्य के राज्य की प्राप्ति तक के सभी सुख बिना मेहनत प्राप्त करवा दिये हैं। नमस्कार है उन महात्माओं को ! 'इति अनेन न्यायेन घृतपूर प्रभृतयः पदार्थाः स्वशब्दैरभिधीयमानास्तदास्वादसम्पदं सम्पादयन्तीत्येवं सर्वस्वं कस्यचिदुपभोगसुखार्थिनस्तैरुदारचरितैरयत्नेनैव तदभिधान- मात्रादेव त्र्यैलोकराज्यसम्पत्सौख्यसमृद्धिः प्रतिपाद्यते इति नतस्तेभ्यः।' इस प्रकार तीसरे उन्मेष में कुन्तक रसवत्, प्रेयस्, उर्जस्वी, उदात्त और समाहित आदि का खण्डन कर दूसरे लगभग पच्चीस अलंकारों कानिरूपण करता है। भामह की ही कारिका उद्धृत कर उसने हेतु, लेश और सूक्ष्म अलंकारों को भी अस्वीकृत कर दिया है और अन्त में स्वीकार किया है कि इनके अलावा दूसरे आलंकारिकों के द्वारा स्वीकृत अलंकारों में शोभा का अभाव होने के कारण अथवा उनका दूसरे अलंकारों में समावेश हो सकने के कारण वे उसके द्वारा अस्वीकृत किये गये हैं। भूषणान्तरभावेन शोभाशून्यतया तथा। अलङ्कारास्तु ये केचिन्नालङ्कारतया मनाक्॥ उक्त अलंकार-चर्चा के भाग में ग्रन्थ का पाठ अनेक स्थानों पर खण्डित और भ्रष्ट है अतः अर्थ करने में कठिनाई होती है।

प्रकरणवक्रता चौथे उन्मेष के पाठ भी अनेक स्थलों पर खण्डित और भ्रष्ट है फिर भी उसमें से प्रकरणवक्रता के नौ प्रकार प्राप्त होते हैं : १. पात्रप्रवृत्तिवक्रता-जिसमें पात्रों के अदम्य साहस के कारण संवाद में चमत्कार उत्पन्न हुआ होता है। २. उत्पाद्यवक्रता- जिसमें किसी प्रसिद्ध वस्तु में नई उत्पाद्य कथा जोड़ कर वक्रता सिद्ध की गयी है। ३. उपकार्योपकारवक्रता-जिसमें नाटक या प्रबन्ध के किसी एक अंश पर दूसरा अश प्रभाव डालता है, यथा-'उत्तररामचरित' में चित्र-दर्शन में जिसका उल्लेख है वह जम्भकाओं का प्रभाव पाँचवें अंक में लवकुश-युद्ध में दिखायी देता है और सीता के पुत्र के रूप में लव को पहचानने में भी सहायता करता है। ४. आवृत्तिवक्रता- जिसमें एक ही वस्तु का बारम्बार वर्णन होने के पश्चात् भी हर बार नया ही प्रतीत होता है। ५. प्रासंगिकप्रकरणवक्रता-इसमें जल-क्रीड़ा वर्णन आदि से सौन्दर्य सिद्ध किया जाता है। ६. प्रकरणरसवक्रता-काव्य या नाटक के किसी एक प्रकरण में मुख्य रस का ऐसा उत्कर्ष दिखाया जाय जैसा उसके पहले या बाद में मिलता न हो, यथा-'विक्रमोर्वशीय' के उन्मत्तांक में। ७. अवान्तरवस्तुवक्रता-जिसमें मुख्य वस्तु की सिद्धि के लिए अवान्तर वस्तु की विचित्रता दिखायी गयी हो। ८. नाटकान्तर्गत- नाटकवक्रता-इसमें एक नाटक में दूसरा नाटक अभिनीत किया जाता है, यथा-

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१९८ अभिनव का रस-विवेचन 'उत्तररामचरित' के सातवें अंक में अथवा 'बाल रामायण' के सातवें अंक में। ९. सन्ध्यंगविनिवेशवक्रता-सन्धियों और अंगों की यथायोग्य योजना से सिद्ध वक्रता। प्रबन्धवक्रता अन्ततः प्रबन्धवक्रता के छः भेद बताये गये हैं : १. रसपरिवर्त्तनवक्रता-प्रसिद्ध वस्तु का जो रस है उसके स्थान पर अन्य रस का निरूपण करना, यथा-महाभारत और रामायण का मुख्य रस शान्त है फिर भी उससे वस्तु ग्रहण कर कवि ने 'वेणी- संहार' नामक वीर रस का नाटक लिखा और 'उत्तररामचरित' करुण रस का नाटक लिखा गया। २. समापनवक्रता-प्रख्यात वस्तु के नायक का सम्पूर्ण जीवन निरूपित न कर उसके किसी भाग का ही निरूपण कर मौन हो जाना। इसका उदाहरण है 'किरातार्जुनीय' जिसमें दुर्योधन की मृत्यु तक की कथा निरूपित करने का उपक्रम किया गया है पर पाशुपतास्त्र की प्राप्ति पर ही कथा रुक जाती है। ३. कथाविच्छेद- व्रता-इसमें मुख्य वस्तु के सम्बन्ध को गोपित रखने वाले किसी दूसरे कार्य के व्यवधान में टूट कर विरस बनी हुई कथा में जहाँ विच्छेद दिखायी देता हो वहीं कार्य की सिद्धि हुई प्रतीत होती है, यथा-'शिशुपालवध' में कथा दुर्योधन के मरण तक जाने के स्थान पर शिशुपाल के वध पर आ कर ही अटक जाती है पर उससे ही मुख्य कार्य सिद्ध हुआ प्रतीत होता है। ४. आनुषंगिक फलवक्रता-एक फल प्राप्त करने के लिए उद्यत नायक को जब दूसरा फल भी मिल जाता है तब यह वक्रता होती है। ५. नामकरणवक्रता-ग्रन्थ के नाम में निहित चमत्कार ही उक्त वक्रता है। इसमें उसने 'अभिज्ञानशाकुंतल', 'मुद्राराक्षस', 'मायापुष्पक' आदि की प्रशंसा की है और 'शिशु- पालवध' और 'हयग्रीववध' तथा 'पाण्डवाभ्युदय' आदि नाम चमत्कारहीन कहे हैं। ६. तुल्यकथावक्रता-एक ही वस्तु के आधार पर रचित कृतियाँ अपने पृथक् व्यक्तित्व के कारण जब आनन्द प्रदान करने वाली बन जाती हैं तभी यह वक्रता सिद्ध होती है, यथा-'रामायण' की कथा के आधार पर रचित 'रामाभ्युदय', 'उत्तरराघव', 'वीर- चरित्र', 'बालरामायण', 'कृत्यारावण', 'मायापुष्पक' आदि कृतियाँ। यहाँ कुन्तक के ग्रन्थ का सार पूरा होता है। अब मैं यहाँ उसके काव्य-चिन्ता सम्बन्धी प्रमुख बिन्दुओं को प्रस्तुत कर अपना वक्तव्य समाप्त करूँगा। उपसंहार कुन्तक काव्य के प्रयोजनों में उपदेश और आनन्द इन दोनों का समावेश करता हैं। काव्य-हेतु में वह प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास इन तीनों का उल्लेख करता है। काव्य की परिभाषा वह वक्र कवि-व्यापारशाली और सहृदयों को आनन्द प्रदान करने वाले बन्ध में प्रयुक्त शब्दार्थ के रूप में देता है। वह वक्ता को लोकोत्तरचमत्कारी बैचित्य कहता है और उसके मतानुसार यही काव्य की आत्मा है। कवि के लिए विवक्षित अर्थ का जो एकमेव वाचक होता है उसे ही वह शब्द कहता है और तद्विदों को आह्राद प्रदान करने वाले को ही अर्थ कहता है। शब्द का दूसरे शब्द के साथ

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और अर्थ का दूसरे अर्थ के साथ परस्परस्पर्द्धित्वरूप साहित्य काव्य के लिए आवश्यक है। इसी प्रकार शब्द और अर्थ भी दो सुहदों की भाँति किसी एक दूसरे से कम या ज्यादा न होकर परस्पर के सौन्दर्य को अभिवृद्ध करने वाले हों इतना ही नहीं पर काव्य के सभी अंगों अर्थात् मार्ग के अनुकूल गुण, वक्तायुक्त अलंकार और वृत्ति के औचित्ययुक्त रसों के परिपोषण में भी परस्पर स्पर्धा करते हों तभी सच्चे साहित्य की सिद्धि हुई माननी चाहिए और ऐसा काव्य ही पदवाक्यार्थ के परे किसी अलौकिक अर्थ की प्रतीति करवा कर काव्य के प्राणरूप रस का आस्वाद कराता है। काव्य में यह शक्ति कविव्यापारवत्रता के कारण आती है। यह वक्रता छः प्रकार की है। इस तरह कुन्तक कवि-व्यापार को खूब महत्त्व देता है और इसीलिए उसकी चिन्ता में कवि केन्द्र में है। कवि का जैसा स्वभाव है तदनुसार ही वह काव्य-रचना के लिए मार्ग स्वीकार करता है। काव्य-मार्ग तीन हैं : सुकुमार, विचित्र और मध्यम। सुकुमार मार्ग में कवि की स्वाभाविक प्रतिभा निरायास व कम-से-कम अलंकारों का प्रयोग कर वस्तु के स्वभाव को ही मुख्यतः निरूपित करती है। जब कि विचित्र मार्ग में कवि की प्रतिभा को व्युत्पत्ति का सबल सहयोग मिलने से वह प्रतिभा से उत्पन्न अयत्न- निर्वर्त्य अलंकारों के प्राचुर्य से सजा कर वस्तु के स्वभाव को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करती है। इसमें पुरानी वस्तु भी उक्तिवैचित्य से नई बन जाती है। यह मार्ग सभी से कठिन है। इन दोनों मार्गों के मिश्रण रूप में मध्यम मार्ग सौन्दर्य-शोध के शौक़ीन अरोचकी कवि पसंद करते हैं। इनमें प्रत्येक के वह चार-चार गुण बताता है और तदुपरान्त वह यह कहता है कि अन्य दो गुण सभी मार्ग के काव्यों के प्रत्येक अंग में व्याप् होने चाहिएँ। औचित्य और सौभाग्य ये दो गुण हैं। अलंकार प्रतिभा से प्रकटित अयत्न- निर्वत्य और प्रस्तुतौचित्य वाले होने चाहिएँ, तभी वे उपकारक होते हैं अन्यथा तो अपकारक हो जाते हैं-यही उसका मत है। वह व्यंजना को स्वीकारता है और रस को भी वक्रोक्ति में समाविष्ट कर लेता है; पर रस का महत्त्व वह अच्छी तरह समझता है और उस पर बारम्बार भार देता है। कुन्तक के काव्य-विचार की विशेषता यह है कि वह कवि-व्यापार पर खूब बल देता है, काव्य-सर्जन की प्रक्रिया समझाता है और यह स्पष्ट करता है कि कवि के स्वभाव का उसकी रचना के रस और रीति पर पूरा प्रभाव पड़ता है। उसकी सम्पूर्ण विचारणा में एक प्रकार का स्वातन्त्र्य और ताजगी वर्तमान है। उसके द्वारा अपने ग्रन्थ में दिये गये उदाहरण और विशेषतः उन पर की गयी चर्चा उसके सूक्ष्म काव्य-बोध का आह्लादक अनुभव कराती है और इस प्रकार काव्य- शिक्षण का महत्त्वपूर्ण काम पूरा करती है। कुन्तक के बारे में विद्वानों का अनुमान है कि वह आनन्दवर्द्धन के बाद और अभिनव गुप्त से पहले हुए थे। इस प्रकार देखें तो इसके ग्रन्थ की रचना और विषय-निरूपण पर ध्वन्यालोक का गहरा असर दिखायी देता है। 'औचित्यविचार-चर्चा' में औचित्य के जो विविध स्थान दर्शाये गये हैं उनके साथ भी वक्रोक्ति के प्रकारों का कितना साम्य है! इतना होने पर भी अपनी स्वतन्त्र निर्भीक विचारणा के कारण कुन्तक हमारी आचार्य-परम्परा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

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२०० अभिनव का रंस-विवेचन

सन्द्भ ग्रन्थ १. वक्रोक्तिजीवित ऑफ कुन्तक-सुशीलकुमार दे, १९६१। २. हिन्दी वक्रोक्तिजीवित-आचार्य विश्वेश्वर, १९५५। ३. काव्य-विचार-सुरेन्द्रनाथ दासगुप्, १९३९। ४. भारतीय साहित्यशास्त्र ( मराठी)-ग. न्यं. देशपाण्डे, १९५८। ५. हिस्ट्री ऑफ संस्कृत पोइटिक्स-मुशीलकुमार दे, १९६० ।

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार

ईसा की सत्रहवीं शताब्दी में जन्मे पण्डित जगन्नाथ हमारे अन्तिम महत्त्वपूर्ण आलंकारिक हैं। वे सामान्यतः तो अभिनवादि का अनुसरण करते हैं, पर विस्तृति में अपना स्वतन्त्र मत धारण किये हुए हैं। स्वभाव से उग्र और अभिमानी होने के कारण इनके ग्रन्थ में भी एक प्रकार की युयुत्सा दृष्टिगत होती है। कभी-कभी तो वे सुरुचि का भी त्याग करते दिखायी देते हैं। भट्टोजी दीक्षित के ग्रन्थ 'मनोरमा' का खण्डन करने के लिए लिखे हुए ग्रन्थ का नाम इन्होंने 'मनोरमाकुचमर्दन' रखा था। अपने पद्यों के संग्रह के समय इन्होंने स्पष्ट करते हुए लिखा था : दुर्वृत्ता जारजन्मानो हरिष्यन्तीति शङ्कया। मदीयपद्यरत्नानां मञ्जूषैषा मया कृता।। जिन्हें उनकी कविता आनन्द प्रदान नहीं करती उनके लिए उन्होंने लिखा है : मधु द्राक्षा साक्षादमृतमय वामाघरसुधा कदाचित्केषांचिन्न खलु विदधीरन्नपि मुदम्। ध्रवं ते जीवन्तोऽप्यहह मृतका मन्दमतयो न येषामानन्दं जनयति जगन्नाथ भणितिः ॥ ग्रन्थ-परिचय हमें उनके काव्य-विचार पर ही आना चाहिए। इनके ग्रन्थ का नाम 'रसगंगाधर' है। आज समग्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। दूसरे आनन में उत्तर अलंकार तक का भाग ही प्राप्त होता है, पर जितना भाग मिलता है उसमें काव्य-प्रयोजन, काव्य-परिभाषा, काव्य-हेतु, काव्य-भेद, रस-स्वरूप, उसके भेद, भरत के रस-सूत्र की व्याख्या, रस-दोष, गुण-निरूपण, शब्द-गुण, अर्थ-गुण, भाव-ध्वनि, ध्वनि के प्रकार, अलंकार-निरूपण आदि काव्य से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण मुद्दों की चर्चा आ जाती है। वे पूर्ववर्ती आचार्यों की बेलाग चर्चा करते हैं और सभी उदाहरण स्वरचित ही देते हैं, जो इस ग्रन्थ की एक विशेषता है। ग्रन्थारम्भ में वे अपने पिता और गुरु की वन्दना करते हैं। इनके पिता पेरु भट्ट वेदान्त, वैशेषिक न्याय, पूर्व मीमांसा और व्याकरण आदि अनेक शास्त्रों के ज्ञाता थे अतः जगन्नाथ उन्हें 'सर्वविद्याधर' कहते हैं और उनकी महागुरु के रूप में वन्दना करते हुए कहते हैं कि उनकी शिक्षा ने ही मेरे समान पाषाण को भी अमृत बहाने वाला बना दिया है : पाषाणादपि पीयूष स्यन्दते यस्य लीलया। तं वन्दे पेरुभट्टाख्यं लक्ष्मीकान्तं महागुरुम् ॥३॥

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२०२ अभिनव का रस-विवेचन

इसके अनन्तर वे अपने ग्रन्थ के विषय में कहते हैं कि मननरूपी सागर के उदर में महाश्रम से डुबकी लगा कर मैं 'रसगंगाधर' नामक मणि इस जगत् में लाया हूँ। यह गुणीजनों के अन्तर के अन्धकार को दूर कर उनके हृदयों में अधिरूढ़ हो सभी अलंकार-ग्रन्थों का गर्व उतारे। निमग्नेन क्लेशैर्म ननजलधेरन्तरुदरं मयोन्नीता लोके ललितरसगङ्गाधरमणिः । हरन्नन्तधर्वान्तं हृदयमधिरूढो गुणवता- मलङ्कारान्सर्वानपि गलिवगर्वान् रचयतु ॥४॥ ऐसे ही दर्प के साथ वे आगे कहते हैं : सहृदयों में श्रेष्ठ कितने ही पण्डितों ने भले ही अर्थों का परिष्कार किया हो फिर भी मैंने जो श्रम किया है वह व्यर्थ नहीं जायगा। बड़े-बड़े तिमिंगलों ने भले ही सागर को मथा हो पर इससे कहीं मंदराचल का प्रयास असफल नहीं हो जाता। अर्थात् तिमिंगल चाहे कितना ही सागर को मथें उनसे कोई रत्न निकलने वाला नहीं है, यह काम तो मंदराचल से ही सिद्ध होता है। इसी प्रकार अन्य पण्डित भले ही काव्यशास्त्र की कितनी ही चर्चा करें पर उससे वह सिद्ध नहीं हो सकता जो मैं इस ग्रन्थ के द्वारा करना चाहता हूँ। परिष्कुर्वन्त्वर्थान्सहृदयघुरीणा: कतिपये तथाऽपि क्लेशो मे कथमपि गतार्थो न भविता। तिमीन्द्राः संक्षोभं विदधतु पयोधेः पुनरिमे किमेतेनायासो भवति विफलो मन्दरगिरेः ॥५॥ इसके बाद वे अपने ग्रन्थ की विशेषता बताते हैं कि मैंने इस ग्रन्थ में जहाँ जैसे चाहिए वैसे उदाहरण, काव्य रच कर दिये हैं। मैंने इनमें दूसरों का कुछ भी प्रयुक्त नहीं किया है। कस्तूरी को उत्पन्न करने की शक्ति वाला मृग क्या कभी पुष्पों की सुगन्ध लेने की इच्छा भी करेगा ? निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपं काव्यं मयात्र निहितं न परस्य किञ्ञित्। किं सेव्यते सुमनसां मनसापि गन्धः कस्तूरिकाजननशक्तिभृता मृगेण ॥६॥ तदुपरान्त वे अपने बारे में कहते हैं कि मननरूपी नाव के सहारे विद्या-सागर को पार करने वाले पण्डितराज जगन्नाथ 'रसगंगाधर' नामक यह काव्यमीमांसा कौतुक पूर्वक रचते हैं : मननतरिणीतीर्णविद्यार्णवो जगन्नाथपण्डितनरेन्द्रः। रसगङ्गाधरनाम्नीं करोति कुतुकेन काव्यमीमांसाम्।७॥ और बाद में अपने ग्रन्थ को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि 'रसगंगाधर' नामक यह संदर्भ-ग्रन्थ चिरजीवी हो और स्वभाव से ही रमणीय सत्काव्य रचने वाले कवि-वृन्दों का यह रंजन करे।

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार २०३

काव्य-प्रयोजन तदनन्तर वे काव्य-परिभाषा की प्रस्तावना के रूप में कहते हैं कि कीति, परम आह्राद, गुरु राजा देवता आदि की प्रसन्नता आदि अनेक प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले काव्य का बोध कवियों और सहृदयों के लिए आवश्यक है और उसके गुणालंकार आदि का निरूपण करने के लिए भी दूसरी वस्तुओं से पहले उसकी भिन्नता स्पष्ट करनी चाहिए; अतः आरम्भ में काव्य का लक्षण दिया जा रहा है। यहाँ हम देखते हैं कि जगन्नाथ ने काव्य के तीन प्रयोजन ही स्वीकार किये हैं : कीर्ति, परम आह्लाद और गुरु राजा आदि की प्रसन्नता। शेष को उन्होंने निषेध न कर 'आदि' में डाल दिया है। काव्य की परिभाषा जगन्नाथ काव्य की परिभाषा इस प्रकार देते हैं : रमणीयार्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यम् ॥१॥ रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है। इस प्रकार जगन्नाथ शब्द को काव्य कहते हैं। भामह से मम्मट तक के अनेक आलंकारिकों ने शब्दार्थ- युगल को काव्य कहा है जिसका वह विरोध करते हैं। 'शब्द ही काव्य है'-कह कर वह शब्द को विशेषणयुक्त बनाते हैं और कहते हैं कि यह शब्द रमणीयार्थ का प्रतिपादन करने वाला होना चाहिए। 'घट लाओ', 'पट लाओ' जैसे सामान्य वाक्यों का परिहार करने के लिए वह कहते हैं कि इन शब्दों द्वारा प्रतिपादित अर्थ रमणीय होना चाहिए। शब्द तीन प्रकार के हैं : वाचक, लक्षणिक और व्यंजक। जगन्नाथ को ये तीनों ही मान्य हैं अतः यहाँ उन्होंने जिसमें इन तीनों का समावेश हो जाय ऐसे प्रतिपादक शब्द का प्रयोग किया है। कारण, जगन्नाथ का मत है कि वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ भी रमणीय होने पर ही काव्य बनते हैं। वह सत्काव्य के लिए व्यंजना को अनिवार्य अथवा आवश्यक नहीं मानता। जिस प्रकार ध्वनिवादी काव्य के लिए ध्वनि को आवश्यक मानते हैं उस प्रकार की बात जगन्नाथ के साथ नहीं है। अर्थ का बोध तो नेत्र- कटाक्षादि से भी हो सकता है, अतः इन सभी के निवारण करने के लिए उन्होंने 'शब्द' पद का उपयोग किया है। जब किसी रमणीय अर्थ का शब्द द्वारा प्रतिपादन होता है, तब काव्य बनता है। व्याकरण आदि में भी रमणीय शब्दों का प्रतिपादन होता है, इसका परिहार करने के लिए उन्होंने 'अर्थ' का प्रयोग किया है। इस परिभाषा में 'रमणीय' विशेषण का महत्त्व है, अतः अब रमणीयता को समझ लेना चाहिए। रमणीयता रमणीयता च लोकोत्तराह्लादजनकज्ञानगोचरता। रमणीयता का अर्थ है लोकोत्तर आनन्दजनक ज्ञान का विषय होने का गुण। दूसरे ढंग से कहें तो जिसके ज्ञान से लोकोत्तर आनन्द मिलता है वह अथवा जिसके ज्ञान

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से लोकोत्तर आनन्द उत्पन्न होता है वह अर्थ रमणीय अर्थ कहलाता है। अर्थात् जिसके ज्ञान से लोकोत्तर आनन्द होता है ऐसे अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द काव्य है। यहाँ जगन्नाथ लोकोत्तर आनन्द के आशय की अधिक स्पष्टता इस प्रकार करते हैं : 'तेरे घर पुत्र जन्मा है' अथवा 'मैं तुझे धन दूँगा' आदि वाक्यों के अर्थ का बोध होते ही जो आनन्द मिलता है वह लोकोत्तर आनन्द नहीं है, अतः ऐसे वाक्य काव्य नहीं कहे जायँगे। इसका अर्थ यह है कि जिसके साथ लौकिक लाभ या प्रयोजन का सम्बन्ध हो अर्थात् जिसके साथ व्यक्तिगत लाभ-हानि जुड़ी हुई हो ऐसा आनन्द लोकोत्तर आनन्द नहीं है। लोकोत्तर आनन्द सांसारिक प्रयोजनों से परे है। यहाँ यह कहा गया है कि काव्य से उत्पन्न आनन्द लोकोत्तर है, अतः वह अब 'लोकोत्तरता' को समझाता है। लोकोत्तरता लोकोत्तरत्वं चाह्लादगतश्चमत्कारत्वापरपर्यायोऽनुभवसाक्षिको जातिविशेषः। अर्थात्, लोकोत्तरता माने विशेष जाति का आनन्द। वह इसे ही चमत्कार कहता है। और उस चमत्कार का अनुभव ही उसके अस्तित्व का प्रमाण है। अन्य किसी लौकिक प्रमाण के द्वारा उसका अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता। स्वानुभव ही उसका एकमात्र प्रमाण है। ऐसे लोकोत्तर आनन्द के उत्पन्न होने में निहित कारण को समझाता हुआ वह कहता है : 'कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः पुनः पुनरनुसन्धानात्मा ।' ऐसे लोकोत्तर अथवा चमत्कारपूर्ण आनन्द की उत्पत्ति में कारण है पुनः-पुनः अनुसन्धान करने वाली भावना विशेष। अर्थ यह है कि काव्य का बारम्बार अनुसन्धान किया जाता है, भावन किया जाता है और इससे लोकोत्तर आनन्द का अनुभव होता है। आशय है कि जब हम कोई काव्य पढ़ते हैं उस समय उसका अर्थ हमें पसन्द लगने लगता है और उसको बारम्बार अनुभव करने की इच्छा होती है। अतः हम उस काव्य के शब्दों का बारम्बार अनुसन्धान-पठन करते हैं; इस प्रकार हमारा काव्य का बोध धारावाही बन जाता है और यही धारावाही बोध अथवा भावना लोकोत्तर आनन्द को उत्पन्न करती है। जहाँ-जहाँ काव्य का पुनः-पुनः अनुसन्धान कहा गया है वहाँ काव्य में अगर व्यंग्यार्थ हो तो व्यंग्यार्थ का और व्यंग्यार्थ न हो तो वाच्यार्थ का अनुसन्धान समझना चाहिए। कारण, जगन्नाथ के मतानुसार विलक्षण वाच्यार्थ भी लोकोत्तर आनन्द दे सकता है। इस प्रकार, काव्य की परिभाषा में प्रयुक्त शब्दों की व्याख्या देने के बाद वह परिभाषा का सार देते हुए कहते हैं कि इसका अर्थ यह हुआ कि चमत्कार उत्पन्न करने वाली भावना का विषय बन सकने वाले अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द काव्य है; अथवा, शब्द-प्रतिपादित अर्थ को विषय बनाने वाली चमत्कृतिजनक

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भावना काव्य है, अथवा चमत्कृतियुक्त अर्थ की प्रतीति कराने वाला गुण अर्थात् चमत्कारत्व जिसमें हो वही काव्य है। यह तीसरी व्याख्या मूलतः इस प्रकार है : 'स्वविशिष्टजनकतावच्छेदकार्थप्रतिपादकतासंसर्गेण चमत्कारत्ववत्त्वमेव वा काव्यत्व- मिति फलितम्।' इसमें 'स्व' से चमत्कारत्व समझना है। चमत्कारत्व जिसमें हो वह चमत्कार (जिस प्रकार गोत्व जिसमें हो वह गो) है। भावना में उसे उत्पन्न करने की शक्ति निहित है और भावना का विषय काव्यार्थ है। [भावना यों तो सम्भव नहीं है। भावना का कोई विषय तो होना चाहिए और यह विषय काव्यार्थ है।] और काव्य का प्रतिपादन करने वाले शब्द हैं। अर्थात् 'चमत्कारत्ववत्वं काव्यम्' चमत्कारता जिसमें हो वह काव्य है-इस छोटी व्याख्या में भी मूल व्याख्या का पूरा अर्थ समाविष्ट हो जाता है। जगन्नाथ द्वारा दी गयी काव्य की यह व्याख्या दण्डी की व्याख्या 'इष्टार्थव्यव- च्छिन्ना पदावली' का ही अनुवाद कही जा सकती है। पूर्ववर्ती आचार्यों की परिभाषाओं की चर्चा अपनी काव्य की परिभाषा देने और समझाने के बाद वह पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा दी गयी परिभाषाओं की चर्चा करता है। इनमें वह पहले मम्मट और उसके समान व्याख्या देने वाले आचार्यों की परिभाषाओं की चर्चा करता है। वह आचार्यों का पक्ष इस रूप में प्रस्तुत करता है : 'अदोषौ सगुणौ सालंकारौ शब्दार्थौं काव्यम्'। इसमें भामह की परिभाषा 'शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्', वामन की व्याख्या 'काव्यशब्दोऽयं गुणालङ्कारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोर्वर्तते', मम्मट की परिभाषा 'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङ्कृती पुनः क्वापि' और हेमचन्द्र की व्याख्या 'अदोषौ सगुणौ सालङ्कारौ च शब्दार्थौ काव्यम्' का समावेश हो जाता है। इस पक्ष के विरोध में जगन्नाथ की सबसे पहली आपत्ति यह है कि 'काव्य' शब्द का अर्थ 'शब्दार्थयुगल' नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस प्रकार का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। 'काव्य जोर से पढ़ता है', 'काव्य का अर्थ समझ में आता है', 'काव्य सुना, अर्थ समझ में नहीं आया' आदि लोक-प्रचलित प्रयोगों से तो उल्टा यह समझ में आता है कि 'काव्य' पद का अर्थ 'शब्दविशेष' ही होता है, शब्द और अर्थ नहीं। अगर कोई यह कहता है कि 'काव्य' शब्द का अर्थ तो 'शब्दार्थयुगल' ही होता है, पर जहाँ केवल शब्द के लिए भी काव्य शब्द का उपयोग हुआ हो, वहाँ यह मानना चाहिए कि वह लक्षणा से हुआ है; तो इसका उत्तर जगन्नाथ इस प्रकार देते हैं कि 'काव्य' का अर्थ 'शब्दार्थयुगल' है, इसका कोई ठोस प्रमाण तो होना चाहिए न ? वह तो है ही नहीं। फिर तुम्हारा यह तर्क किस प्रकार स्वीकारा जाय ? 'अनेक पूर्ववर्ती आचार्यों के वचन इसके प्रमाण हैं'-अगर आप यह कहते हैं तो इसका उत्तर है कि विरोधी पक्ष के वचन श्रद्धेय प्रमाण-रूप नहीं गिने जाते, अतः यह तर्क भी नहीं चलेगा।

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इस प्रकार इसका कोई प्रमाण नहीं है कि 'काव्य' का अर्थ 'शब्दार्थयुगल' होता है, अतः पूर्वोक्त व्यवहार से यह सिद्ध होता है कि 'काव्य' का अर्थ 'शब्द-विशेष' ही होता है। ये तर्क बिलकुल क्षुल्लक हैं, और इसीलिए आचार्य आनन्दशंकर ध्रुव ने कहा है कि : 'शब्द और अर्थ' दोनों के मिलने से काव्य का स्वरूप बनता है : इस प्रकार कहने का विवक्षितार्थ अनेक टीकाकार-जिसमें 'रसगंगाधर' के रसिक कर्ता जगन्नाथ पण्डितराज भी एक हैं ?- इतना ही समझें कि काव्य में शब्द होते हैं और अर्थ भी होते हैं। पर शब्द शब्द होते हैं और केवल आवाज नहीं, तो शब्द के साथ अर्थ भी होता है, इसमें कहने लायक क्या है? पर टीकाकारों ने इतना ही अर्थ समझ कर एक महान् ( वस्तुतः निःसत्व) प्रश्न उठाया कि 'काव्य' के लक्षण में मुख्य पद शब्द रखेंगे या अर्थ ? और निर्णय किया कि हम 'काव्यं श्रुतं किन्त्वर्थो नावगतः' 'काव्य सुना पर अर्थ समझ में नहीं आया' जो कहते हैं उससे (१) काव्य का लक्षण 'शब्दार्थौ' न करके 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्द: काव्यम्' (जगन्नाथ)-'रमणीयार्थ को प्रतिपादित करने वाला शब्द काव्य है' के रूप में शब्दप्रधान किया जाय ! वस्तुतः यह तर्क शक्तिहीन है, इतना ही नहीं पर 'काव्य' का 'शब्दार्थौ' बल्कि 'शब्दार्थौ सहितौ' कहना केवल शब्द और अर्थ दोनों को गिनाना ही नहीं है, अपितु उनके संश्लिष्टत्व-शिव-पार्वतीवत् अर्थात् अर्द्धनारीनटेश्वरवत् एकांगित्व को बताना भी अभिप्रेत है। यह बात टीकाकारों की दृष्टि में आई ही नहीं।" जो आस्वाद का उद्योधन करता है वह काव्य कहलाता है और आस्वाद का उद्बोधन करने की शक्ति तो शब्द और अर्थ दोनों में निहित है, यह कहना उचित नहीं है। कारण, राग आदि भी रस-व्यंजक हैं। इसे ध्वनिकार आदि आलंकारिकों ने स्वीकार कर लिया है अतः राग आदि को भी काव्य कहने की बारी आ जायेगी। इतना ही नहीं, नाट्य के सभी अंग-नृत्य, वाद्य, नेपथ्य-सामग्री, आदि भी रस-व्यंजक है, अतः उन्हें भी काव्य में परिगणित करना पड़ेगा। इस प्रकार यह व्याख्या भी चल नहीं सकती कि जो भी रसोद्बोधक है वही काव्य है। 'शब्दार्थयुगल' काव्य नहीं है, इसके समर्थन में जगन्नाथ दूसरी दलील प्रस्तुत करते हैं कि अगर तुम शब्दार्थ को काव्य कहते हो तो तुम्हें यह भी स्पष्ट करना पड़ेगा कि शब्द और अर्थ दोनों मिल कर काव्य बनते हैं या काव्यत्व दोनों में पृथक्- पृथक निहित है। अगर प्रथम विकल्प स्वीकारें तो यह कहने की बारी आयेगी कि केवल शब्द अथवा अर्थ काव्य न होने के कारण 'काव्यवाक्य काव्य नहीं' है। हम कहते हैं कि 'एक दो नहीं है' अथवा 'घट यह कोई घट पट दोनों नहीं है।' अगर हम दूसरा विकल्प स्वीकारें तो यह कहना पड़ेगा कि एक ही काव्य में दो काव्य हैं। १. काव्यतत्व-विचार, पृ० ५०-१।

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कारण, शब्दांश में भी काव्यत्व है और अर्थोश में भी काव्यत्व है। साथ ही, तुम यह भी नहीं कह सकते कि यह इष्टापत्ति है। कारण, यह इस सत्य ज्ञान के विरुद्ध जाता है कि 'काव्य एक है।' और यह भी नहीं कह सकते कि 'काव्य एक है' यह सत्य ज्ञान नहीं है। कारण, बाद में इस प्रकार की बाधक प्रतीति नहीं होती कि 'काव्य अनेक हैं।' इसलिए इन सबका सार यह है कि शब्द को ही काव्य मानना चाहिए, शब्दार्थयुगल को नहीं। तदुपरान्त वह काव्य की व्याख्या में गुणालंकारों के समावेश करने का भी विरोध करता है। कारण, 'उदितं मण्डलं विधोः।' 'चन्द्रोदय हुआ' आदि वाक्यों में कोई गुण या अलंकार न होने पर भी इसमें चमत्कार व्यंग्यार्थ निहित होने के कारण इसे काव्य के रूप में स्वीकार करना ही पड़ेगा। यह वाक्य जिस दूती, अभिसारिका या विरहिणी के द्वारा बोला जाता है उसी के अनुसार उससे भिन्न-भिन्न अर्थों की प्रतीति होती है। यथा क्रमश :-- १. चाँदनी बरस रही है, मार्ग स्पष्ट दिखायी देता है, काँटा लगने का भय नहीं है अतः तू आराम से संकेत-स्थान पर जा सकेगी; २. चन्द्र के इस प्रकाश में संकेत-स्थान तक मैं जाऊँ कैसे ? लोग मुझे दूर से ही पहचान लेंगे, मेरी इज्जत का क्या होगा ? ३. इस उद्दीपक चाँदनी को देख कर मेरी विरह-वेदना का ज्वार बढ़ जाता है, मुझसे जिया नहीं जायगा, आदि। ऐसे ही अन्य वाक्यों 'गतोऽस्तमर्कः' आदि के विषय में भी है। इस तरह तुम्हारी व्याख्या में अव्याति-दोष आ जाता है। साथ ही, तुम यह भी नहीं कह सकते कि यह काव्य नहीं है, कारण, इसमें काव्य का जीवातुभूत तत्त्व चमत्कार होने पर भी उसके काव्यत्व को अगर अस्वीकार करोगे तो तुम जिसे काव्य कहते हो उसके काव्यत्व को दूसरे भी अस्वीकार कर देंगे। गुण और अलंकार की स्पष्ट व्याख्या हुई नहीं है; अतः काव्य की व्याख्या में इनका निर्देश नहीं करना चाहिए था। जिसका अपना स्वरूप ही निश्चित नहीं है वह दूसरे के स्वरूप को निश्चित कराने में कैसे उपयोगी सिद्ध हो सकता है ? 'दोषहीन'-यह विशेषण भी उचित नहीं है, क्योंकि यह भी कहा जाता है कि यह काव्य दोषयुक्त है। इसलिए इसका यह भी अर्थ हुआ कि दोषपूर्ण भी काव्य हो सकता है। अगर कोई यह कहता है कि काव्य के अमुक भाग में दोष और अमुक भाग में नहीं तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि काव्यत्व वृक्ष और पक्षी के समान अव्याप्यवृत्ति सम्बन्ध नहीं है, पर तिल में तैल के समान व्याप्यवृत्ति गुण है। और अगर किसी वृक्ष के मूल पर पक्षी बैठा है तो हम यह कह सकेंगे कि वृक्ष के मूल के साथ पक्षी का संयोग है, पर डाल के साथ नहीं। यह सम्बन्ध अव्याप्यवृत्ति सम्बन्ध है, किसी एक अंग तक सीमित हो सकता है। पर, काव्यत्व के विषय में ऐसा नहीं है। काव्यत्व के अमुक अंश में काव्यत्व है और अमुक अंश में नहीं-इस तरह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह सम्बन्ध व्याप्यवृत्ति है। जिस प्रकार पूरे तिल में तैल व्याप्त है उसी प्रकार काव्य भी सम्पूर्ण काव्य में व्याप् है।

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अतः काव्य के लिए 'दोष रहित' और 'दुष्ट' नामक दो विशेषण एक ही साथ नहीं लगाये जा सकते। जो पदार्थ अव्याप्यवृत्ति होता है उसी के बारे में इस प्रकार का प्रयोग किया जा सकता है, यथा-वृक्ष के मूल पर पक्षी है, डाल पर नहीं। गुण रस के धर्म हैं। इसी प्रकार अलंकार तो काव्य के शरीर-शब्द को और अर्थ को सजाने वाले आभूषण हैं। वे काव्य-शरीर के अंग नहीं बन सकते। इस तरह काव्य की व्याख्या में 'सगुणौ' और 'सालंकारौ' विशेषण जो शब्दार्थ के लिए लगाये गये हैं, उचित नहीं हैं। इन सभी तर्कों में पुष्कल चातुर्य होने पर भी वे टिकने में समर्थ नहीं हैं। 'काव्य सुना, पर अर्थ समझ में नहीं आया' के समान प्रयोगों से अगर यह कहा जाय कि काव्य का अर्थ केवल शब्द है तो लोगों में यह भी प्रचलित है कि 'काव्य समझ में नहीं आता'। और अगर प्रथम प्रयोग प्रमाण मान लिया जाय तो यह प्रयोग क्यों नहीं माना जायेगा ? इस प्रयोग से स्पष्ट होता है कि काव्य में केवल शब्द ही नहीं, अपितु अर्थ का भी समावेश होता है। केवल शब्द या अर्थ को काव्य नहीं कहा जा सकता। साथ ही, अगर केवल शब्द को ही काव्य कहें तो काव्य में शब्द-योजना अर्थानुसार ही होनी चाहिए, इसका आग्रह किसलिए ? अगर काव्य का अर्थ केवल शब्द होता तो प्राकृत उदा- हरणों की संस्कृत छाया काव्य के उदाहरण के रूप में प्रयुक्त ही नहीं की जानी चाहिए, और काव्य का अनुवाद ही सम्भव नहीं होना चाहिए। पर हम कितने सारे काव्यों का आस्वाद केवल अनुवादों के द्वारा लेते आये हैं ! शास्त्रों में जो परिभाषा दी जाती है वह वेवल लोक-व्यवहार के आधार पर नहीं दी जाती, पर शास्त्र द्वारा निश्चित अर्थ के अनुसार ही दी जाती है। शब्द और अर्थ दोनों मिल कर व्यास-वृत्ति से काव्य बनते हैं, अतः प्रत्येक- पर्याप्त एक-एक अंश में काव्य है। इस प्रकार मान लेने से निर्दिष्ट दोष का कुछ भी अर्थ नहीं रह जाता। शब्द-सौंदर्य और अर्थ-सौन्दर्य दोनों मिल कर एक नया ही सौन्दर्य पैदा करते हैं और यही काव्य-सौन्दर्य है। इसकी विस्तृत चर्चा कुन्तक में आ चुकी है। गुणालंकारों का काव्य-लक्षण के रूप में समावेश करने में कोई दोष नहीं है। कारण, गुण मुख्य वृत्ति से रस के और गुणवृत्ति से शब्दार्थ के भी धर्म माने गये हैं। साथ ही, जगन्नाथ स्वयं तो गुण को रस और शब्द, अर्थ, रचना आदि का धर्म मानते हैं, अतः वे तो इस तरह की आपत्ति उठा ही नहीं सकते। इसके अलावा अर्थ में व्यंग्यार्थ भी समाविष्ट है और उसमें रस का समावेश है ही। यह कहना भी उचित नहीं है कि गुणालंकार का कोई स्वरूप निश्चित नहीं है, क्योंकि प्रत्येक आचार्य द्वारा अपने तक सीमित रह कर लक्षण निर्णीत करके ही उनका प्रयोग किया गया है। 'गतोऽस्तमर्कः' आदि में प्रकरणादि की योजना के कारण रमणीयता आती है और तभी वह काव्य बनता है। इसमें स्फुट नहीं तो अस्फुट रूप में गुणालंकार आयेंगे ही।

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'अदोषौ' के प्रति आपत्ति भी व्यर्थ है। इसका अर्थ 'स्फुट दोषादि' किये जाने पर कुछ कहने के लिए रह ही नहीं जाता। इसे दोष मानने की आवश्यकता ही नहीं है। इसके बाद विश्वनाथ ने 'साहित्यदर्पण' में 'काव्यं वाक्यं रसात्मकम्' नामक व्याख्या दी है जिसका विरोध करते हुए जगन्नाथ कहते हैं कि यह कहना भी उचित नहीं है कि जो रसयुक्त है वही काव्य है। कारण, फिर तो वस्तुप्रधान और अलंकार- प्रधान काव्यों को अकाव्य कहने का अवसर आ जायेगा। यह इष्टापत्ति नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर तो महाकवियों को भी कविकुल से निकालना पड़ेगा, क्योंकि उनके काव्य में वस्तु-वर्णन की अधिकता होती है। अगर यह कहा जाय कि उनमें भी रस- स्पर्श होता हैतो फिर जगत् की सभी वस्तुओं में किसी-न-किसी रस के विभाव, अनुभाव या व्यभिचारी भाव के होने को मानना पड़ेगा और इस प्रकार 'बैल चलते हैं' या 'हरिण दौड़ते हैं' के समान वाक्यों को भी काव्य कहने की बारी आ जायेगी।

काव्य का कारण इस प्रकार काव्य की परिभाषा देकर तथा उसकी चर्चा करने के बाद वे अब काव्य का कारण बताते हैं। 'तस्य च कारणं कविगता केवला प्रतिभा'। काव्योत्पत्ति में वे केवल कवि प्रतिभा को ही कारण मानते हैं। मम्मट आदि ने व्युत्पत्ति और अभ्यास को भी हेतुओं में समाविष्ट किया था, पर जगन्नाथ ऐसा नहीं करते। उनकी दृष्टि में प्रतिभा काव्य की घटना के अनुकूल शब्दार्थ की उपस्थिति है : 'सा च काव्य- घटनानुकूलशब्दार्थोपस्थितिः ।' इसका अर्थ यह है कि काव्य-रचना के लिए जब जैसे शब्दार्थ की आवश्यकता हो तभी तदनुसार शब्दार्थ उपस्थित हो जाएँ, इसका नाम प्रतिभा है। जगन्नाथ द्वारा प्रदत्त प्रतिभा की यह व्याख्या रुद्रट की व्याख्या से मेल खाती है। रुद्रट कहते हैं :

मनसि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणमनेक्धाभिधेयस्य। अक्लिष्टानि पदानि च विभान्ति यस्यामसौ शक्तिः ॥ अर्थात् जिसके कारण काव्य-रचना में सुसमाहित अर्थात् एकाग्र चित्त में भिन्न-भिन्न प्रकार के अर्थ स्फुरित होते हैं और अक्लिष्ट पदावली सूझती है, उसका नाम शक्ति है। इसे समझाते हुए उन्होंने कहा है कि 'प्रणिधानसहकृते चेतसि यो झटित्युद्बुध्यतेऽ क्लिष्टपदपदार्थंगोचरः संस्कारः, सा प्रतिभा विद्वदादिपद-प्रवृत्तिनिमित्तम्।' अर्थात् एकाग्र चित्त में अक्लिष्ट पद और पदार्थ विषयक जो सस्कार एकदम जगते हैं उसका नाम प्रतिभा है; वह कवि आदि की शब्द-रचना-प्रवृत्ति का निमित्त अर्थात् कारण है। हमने देखा कि जगन्नाथ केवल कवि-प्रतिभा को ही काव्य का कारण मानते हैं। १४

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२१० अभिनव का रस-विवेचन पूर्ववर्ती आचार्यों में रुद्रट और वामन भी इसी मत के थे। पर, शेष बहुत से आचार्य प्रतिभा के अतिरिक्त व्युत्पत्ति और अभ्यास को भी काव्य के कारणों में समा लेते हैं। इनमें दण्डी,१ मम्मट,2 वाग्भट,१ पीयूषवर्ष® आदि का समावेश होता है। जगन्नाथ ने व्युत्पत्ति और अभ्यास की व्याख्या कुछ भिन्न ढंग से की है। वे प्रतिभा के दो भेद मानते हैं : १. देवता अथवा किसी महापुरुष के प्रसाद से प्राप्त और २. विलक्षण व्युत्पत्ति और काव्य करने के अभ्यास से उत्पन्न। 'तस्याश्र हेतुः क्वचिद्देवतामहापुरुषादिजन्यमदृष्टम्। क्वचिच्च विलक्षणव्युत्पत्ति- काव्यकरणाभ्यासौ।' प्रतिभा काव्य की उत्पत्ति में कारण है, और काव्य करने का अभ्यास व्युत्पत्ति का कारण है-क्या इस प्रकार के कथन में तर्क-दोष नहीं है ? प्रतिभा के अभाव में काव्य होगा नहीं तो फिर काव्य करने का अभ्यास ही बिना प्रतिभा के कैसे सम्भव होगा ? अतः यह अभ्यास प्रतिभा का कारण किस प्रकार हो सकता है ? अस्तु। काव्य के चार प्रकार इस तरह काव्य-प्रयोजन, काव्य-व्याख्या और काव्य-हेतुओं को दिखाने के बाद जगन्नाथ काव्य के प्रकार बताते हैं। उनके मतानुसार काव्य के चार प्रकार हैं : १. उत्तमोत्तम, २. उत्तम, ३. मध्यम, ४. अधम। उत्तमोत्तम उक्त चार प्रकारों का परिचय इस प्रकार है : शब्दाथौं यत्र गुणीभावितात्मानौ कमप्यर्थमभिव्यङ्क्तस्तदाद्यम्। जिसमें शब्दार्थ अपने को गौण बना कर किसी अलौकिक अर्थ को अभिव्यक्त करता हो वह उत्तमोत्तम है। अर्थात् जिस काव्य में व्यंग्यार्थ मुख्य हो और शब्दार्थ गौण हो वह उत्तमोत्तम काव्य है। यह व्याख्या आनन्दवर्द्धन और मम्मट की ध्वनि की व्याख्या से मेल खाती है। आनन्दवर्द्धन ने कहा है कि, यत्रार्थः शब्दौ वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वाथौं। व्यङक्त: काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभि: कथितः ॥। १-१३ ॥। १. स्वाभाविकी च प्रतिभा श्रुतं च बहु निर्मलम्। अ मन्दश्चाभियोगोऽस्याः कारणं काव्यसम्पदः॥ २. शक्तिर्निपुणतालोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात्। 2काव्यश्ञशिक्षयाडभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे॥ ३. प्रतिभा कारणं तस्य व्युत्पत्तिस्तु विभूषणम्। भृषोत्पतिकृदभ्यास [इत्यादिकविसङ्कथा।। ४. प्रतिभैव श्रुताभ्याससहिता कवितां प्रति। बीजोत्पत्तिर्लतामिव।। अर्थात्, जिस प्रकार लता की उत्पत्ति में मिट्टी और पानी के सहयोग वाला बीज कारण है उसी प्रकार कविता की उत्पत्ति में व्युत्पत्ति और अभ्यास के सहयोग से युक्त प्रतिभा कारण है।

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार २११

जिसमें शब्द और अर्थ दोनों ही अपने को गौण बना कर किसी नये अर्थ का ब्यंजना द्वारा बोध कराएँ उसे पण्डित ध्वनि अथवा उत्तम काव्य कहते हैं। और इसका ही अनुवाद करता हुआ-सा मम्मट कहता है: 'इदमुत्तममतिशयिनि व्यङ्गये वाच्याद् ध्वनिर्बुधैः कथितः।' अर्थात् जिसमें वाच्य की अपेक्षा व्यंग्यार्थ उच्च हो उस उत्तम काव्य को पण्डित लोग ध्वनि कहते हैं। जगन्नाथ ने अपने उत्तमोत्तम काव्य की व्याख्या समझाते हुए कहा है कि इसमें व्यंग्य अत्यन्त गूढ़ भी नहीं होना चाहिए और न अत्यन्त स्फुट ही होना चाहिए। कारण, इस प्रकार का व्यंग्य चमत्कारक नहीं हो सकता। और आगे चल कर उन्होंने यह भी कहा है कि इस उत्तमोत्तम काव्य को ही ध्वनि कहा गया है। इस प्रकार के काव्य के जगन्नाथ द्वारा उद्धत और चर्चित उदाहरणों में से एक हम देखेंगे। गुरुमध्यगता मता नताङ्गी निहता नीरजकोरकेण मन्दम्। दरकुण्डलताण्डवं नतभ्रू लतिकं मामवलोक्य घूर्णिताऽसीत् ॥। उस नतांगी को गुरुजनों के बीच बैठी हुई देखकर मैंने पद्म की कली से उसको धीरे से मारा, कि तुरन्त ही उसने अपने भवों को नचाकर कान के कुण्डलों को हिला- कर मेरी ओर देखकर अपना मुँह एकदम फिरा लिया। किसी नायक के द्वारा अपने मित्र के सम्मुख कहे गये ये वचन हैं। इन्हें समझाते हुए जगन्नाथ कहते हैं कि यहाँ 'घूम गई' वचन द्वारा इस तरह का अमर्ष नामक व्यभिचारी भाव मुख्यतः व्यक्त होता है कि 'ओ अविचारी, समय-कुसमय कुछ भी नहीं देखता ! यह तो तुमने कैसा अनुचित किया ?'। कारण, भावक का चित्त इस भाव की चर्वणा में ही विश्रान्ति प्राप्त करता है। इस प्रकार इस श्लोक में शब्द और अर्थ की अपेक्षा व्यंग्य भाव ही मुख्य है। उत्तम तदुपरान्त वे उत्तम काव्य का लक्षण इस रूप में देते हैं: 'यत्र व्यङ्गयमप्रधानमेव सच्चमत्कारकारणं तद्द्वितीयम्।' जिस काव्य में व्यंग्य गौण होने पर भी चमत्कार का कारण बनता है वह दूसरा अर्थात् उत्तम काव्य माना जाता है। यह व्याख्या मम्मट की गुणीभूतव्यंग्य की व्याख्या से मेल खाती हुई प्रतीत होती है। मम्मट की व्याख्या इस प्रकार है : 'अतादृशि गुणीभूतव्यङ्गयंव्यङ्गये तु मध्यमम्।' जब व्यंग्य अर्थ मुख्य नहीं होता तब काव्य गुणीभूतव्यंग्य कहलाता है। जगन्नाथ द्वारा दिया गया इस तरह का उदाहरण इस प्रकार है: राघव विरहज्वालासन्तापितसह्यशैलशिखरेषु। शिशिरे सुखं शयाना: कपयः कुप्यन्ति पवनतनयाय॥ राघव की विरह-ज्वाला से सन्तस सह्याद्रि पर्वत के शिखरों पर शिशिर में सुख से सोये हुए वानर हनुमान पर क्रुद्ध होते हैं।.FL,70 इसे समझाते हुए जगन्नाथ कहते हैं कि यहाँ व्यंग्यार्थ है कि हनुमान ने सीता का

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२१२ अभिनव का रस-विवेचन कुशल-समाचार देकर राम को शीतल बना दिया, अर्थात् हनुमान के मुख से सीता का समाचार जान कर राम का विरहताप शमित हो गया। जबकि वाच्यार्थ है कि वानर हनुमान पर क्रुद्ध हुए हैं। वानरों के क्रुद्ध होने का कारण यह है : राम जब तक विरह-सन्तप्त रहे तब तक पर्वत भी उनके ताप के कारण ऊष्मायुक्त था और वानर भी शिशिर की ठण्ड में भी सुख से सो सकते थे। पर, हनुमान ने आकर सीता के कुशल- समाचार सुनाये, अतः राम का विरह-ताप शमित हो गया, पर्वंत ठण्डा हुआ और वानरों को एकदम ठण्ड लगने लगी और उनकी नींद में खलल पड़ने लगा परिणामतः वे हनुमान पर क्रुद्ध हो गये। यहाँ वाच्यार्थ समझने के लिए व्यंग्यार्थ की सहायता लेनी पड़ती है। व्यग्यार्थ वाच्यार्थ की सिद्धि में सहायक होने के कारण वाच्यार्थ की अपेक्षा गौण होता है। फिर भी उसका चमत्कार कम नहीं है। जगन्नाथ कहते हैं कि जिस प्रकार किसी रानी का दुर्भाग्यवश दासी-दशा को प्राप्त करने पर भी उसका सौन्दर्य झलके बिना नहीं रहता उसी प्रकार यहाँ व्यंग्यार्थ गौण होने पर उसका चमत्कार- जनकत्व छिपा नहीं रहता : 'व्यंग्ये .. गृणीभूतमपि दुर्दैववशतो दास्यमनुभवद्राजकलत्र- मिव कामपि कमनीयतामावहति।' मध्यम इसके बाद वे तीसरे प्रकार के मध्यम काव्य का लक्षण इस तरह देते हैं : 'यत्र व्यङ्गयचमत्कारासमानाधिकरणो वाच्यचमत्कारस्ततृतीयम्।' जिसमें व्यंग्यार्थ के चमत्कार की अपेक्षा वाच्यार्थ का चमत्कार उच्च हो-अर्थात् जिसमें व्यंग्य का चमत्कार वाच्य के चमत्कार से ढँक जाता हो वह तीसरे प्रकार का अर्थात् मध्यम काव्य कहलाता है। इसका उदाहरण जगन्नाथ ने निम्न प्रकार दिया है : 'यथा यमुनावणने, "तनय- मैनाकगवेषणलम्बीकृतजलधिजठरप्रविष्टहिमगिरिभुजायमानाया भगवत्या भागीरथ्याः सखी इति।' यमुना का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि ( यह यमुना) "अपने पुत्र मैनाक को हूँढ़ने के लिए फैलाई हुई, समुद्र के उदर में पहुँची हुई, हिमालय की भुजारूपी भगवती भागीरथी की सखी है।" इसे स्पष्ट करते हुए जगन्नाथ कहते हैं कि यहाँ वाच्य उत्प्रेक्षा अलंकार ही चमत्कार का कारण है। इस वाक्य में गंगा में हिमालय की भुजा उत्प्रेक्षा की गयी है जिसमें गंगा की श्वेतता व्यंजित होती है, और 'मैनाक को हूँढ़ने के लिए फैलाई हुई, समुद्र के उदर में पहुँची हुई' नामक वचन द्वारा यह व्यंजित होता है कि गंगा पाताल की तली तक पहुँची हुई है। इन दोनों में चमत्कार का लेश मौजूद है फिर भी वह उत्प्रेक्षा के चमत्कार में ढँक जाता है और इस प्रकार लगता है कि मानो प्रसाधन में कुशलताहीन किसी ग्रामीण स्त्री के अंग की गौरता उसके द्वारा लगाये गये केसर-कुंकुम के अंगराग में ढँक गयी हो। 'श्वैत्य-पातालतलचुम्बित्वादिनां चमत्कारो लेशतया सन्नप्युत्प्रेक्षा- चमत्कृतिजटरनिलीनो नागरिकेतरनायिकाकल्पितकाश्मीरद्रवाङ्गरागनिगीणो निजाङ्ग- गौरिमेव प्रतीयते।'

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार २१३

इस प्रकार को लेकर उन्होंने यह और कहा है कि 'ऐसा कोई वाच्यार्थ नहीं है जो प्रतीयमान के लेशमात्र स्पर्श से रहित स्वयं ही रमणीय बन जाय। आशय है कि इस वर्ग के काव्यों में भी व्यंग्यार्थ भले ही कम हो और गौण हो पर होना तो चाहिए ही। इसके अभाव में रमणीयता ही सम्भव नहीं है।' 'न तादृशोऽस्ति कोऽपि वाच्यार्थो यो मनागनामृष्टप्रतीयमान एव स्वतो रमणीयतामाधातुं प्रभवति।' इसका अर्थ यह हुआ कि काव्य में व्यंजना होनी ही चाहिए। और तदुपरान्त काव्य की व्याख्या देते हुए जगन्नाथ ने 'प्रतिपादक' शब्द का उपयोग कर तीनों प्रकार के शब्दों का समावेश करने का आग्रह रख कर ध्वनिवादियों से भिन्न मत रखने का दिखावा किया था जो मात्र दिखावा ही था। वस्तुतः वह स्वयं भी काव्यत्व के लिए व्यंजना को अपरिहार्य मानता है। इस वर्गीकरण में अलंकारप्रधान काव्य का स्थान कहाँ है, इस प्रश्न का स्पष्टीकरण करते हुए जगन्नाथ कहते हैं कि इन दोनों अर्थात् दूसरे और तीसरे प्रकारों में व्यंग्य यद्यपि गुणीभूत होता है तथापि दूसरे प्रकार में व्यंग्यार्थ जागरूक अर्थात् चमत्कार- जनक होने के कारण अनुभवगोचर होता रहता है जबकि तीसरे प्रकार में वह अजागरूक अर्थात् विशेष चमत्कारजनक न होने के कारण अनुभवगोचर नहीं होता। अतः यह मानना चाहिए कि समासोक्ति आदि जिन अलंकारों में व्यंग्य गौण होने पर भी चमत्कारक होता है ऐसे अलंकारों वाले काव्य दूसरे प्रकार में और दीपकादि जिन अलंकारों में व्यंग्यार्थ गौण होता है और चमत्कार भी नहीं होता ऐसे अलंकार वाले काव्य तीसरे प्रकार में आते हैं। 'अनयोरेव द्वितीयतृतीयभेदयोर्जागरूकाजागरूकगुणी- भूतव्यङ्गययोः निखिलमलङ्कारप्रधानं काव्यम्।' अधम इसके बाद वे चौथे प्रकार के अधम का लक्षण इस रूप में देते हैं : 'यत्रार्थ- चमत्कृत्युपस्कृता शब्दचमत्कृतिः प्रधानं, तदधमं, चतुर्थम्।' जिसमें अर्थ के चमत्कार से परिपुष्ट शब्द का चमत्कार मुख्य हो उसे चौथा अधम काव्य माना जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस तरह के काव्यों में शब्दचमत्कृति ही मुख्य होती है, पर उसे अर्थ का सम्बल भी मिलना चाहिए। यह अर्थ रमणीय अर्थात् चमत्कारपूर्ण होना चाहिए। अगर इस तरह का अर्थ न हो तो काव्य ही नहीं बन पाता। जगन्नाथ द्वारा दिक्य गया इस प्रकार का उदाहरण निम्न है : मित्रात्रिपुत्रनेत्राय, त्रयीशान्नवशत्रवे। गोत्रारिगोत्रजत्राय, गोत्रा ते नमी नमः ।। मित्र (सूर्य) और अत्रि-पुत्र (चन्द्र) रूपी नेत्रवाले, वेदत्रयी के शत्रुओं (दानवों) के शत्रु, पर्वत के शत्रु इन्द्र के गोत्रजों (देवों) के त्राता (रक्षणहार), गोत्राता (गोपाल) को नमस्कार हो। जैसा कि जगन्नाथ ने कहा है, इसमें अर्थ की चमत्कृति शब्द की चमत्कृति में डूब गयी है।

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२१४ अभिनव का रस-विवेचन

अधमाधम का अस्वीकार इस प्रकार, स्वस्वीकृत काव्य के चार प्रकारों के लक्षण और उदाहरण देकर वे कहते हैं कि जिसमें अर्थचमत्कृति तनिक सी भी न हो और केवल शब्दचमत्कृति ही हो, ऐसे पाँचवें अधमाधम काव्य-प्रकार को भी मानना चाहिए। परन्तु ऐसे काव्य में रमणीयार्थप्रतिपादकतारूपी काव्य सामान्य का लक्षण न होने के कारण उसमें काव्यत्व का ही अभाव होता है, अतः महाकवियों द्वारा भी प्राचीन परम्परा का अनुसरण कर अपने काव्यों में ऐसी रचना को प्रवेश देने पर भी मैंने वस्तु-स्थिति से संयुक्त होकर इस वर्ग को स्वीकार नहीं किया है। जगन्नाथ के वर्गीकरण को संक्षेप में इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है : १. उत्तमोत्तम-जिसमें व्यंग्य मुख्य हो, २. उत्तम-जिसमें व्यंग्य गौण परन्तु चमत्कार हो, ३. मध्यम-जिसमें व्यंग्य गौण हो पर अर्थालङ्कार मुख्य हो, और ४. अधम- जिसमें अर्थ-चमत्कृति की अपेक्षा शब्द-चमत्कृति अर्थात् शब्दालङ्कार मुख्य हो। इसमें हम स्पष्टतः देखते हैं कि उन्होंने भी इन विभागों को व्यंग्यार्थ के आधार पर माना है और इसे ही काव्य का मुख्य लक्षण माना है, मात्र उन्होंने अर्थचित्र और शब्दचित्र को एक वर्ग में न रख कर उनके अलग-अलग वर्ग बनाये हैं। मम्मट के वर्गीकरण का विरोध तदन्तर वे मम्मट द्वारा स्वीकृत उत्तम, मध्यम और अधम नामक तीनों प्रकारों का विरोध करते हैं। कारण, अधम में मम्मट ने शब्दचित्र और अर्थचित्र दोनों का समावेश कर लिया है। उनका यह भी कहना है कि अर्थालङ्कार की अपेक्षा शब्दा- लङ्कार निश्चित रूप से श्रेष्ठ नहीं हैं, अतः इन दोनों को एक ही वर्ग में रखना उचित नहीं है। और वे कहते हैं कि इन दोनों के बीच तारतम्य होने पर भी यदि तुम दोनों को एक ही वर्ग में मानते हो तो ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य में बहुत ही कम अन्तर होने पर भी दोनों को अलग-अलग वर्ग में रखने का आग्रह किस लिए करते हो ? इस चर्चा का समापन करते हुए उन्होंने कहा है कि अगर किसी एक ही काव्य में शब्दचमत्कृति और अर्थचमत्कृति दोनों हों तो दोनों में जो मुख्य होगी उस पर विचार कर तदनुसार व्यवहार करना चाहिए। अर्थात् अगर अर्थचमत्कृति मुख्य हो तो उसे मध्यम मानना चाहिए और अगर शब्दचमत्कृति मुख्य हो तो उसे अधम मानना चाहिए। अगर दोनों की ही प्रधानता हो तो उसे मध्यम मान लेना चाहिए। ध्वनि के भेद इसके बाद वे यह कह कर कि उत्तमोत्तम काव्य ही ध्वनि है, जिसके यों तो असंख्य भेद हैं पर मैं यहाँ कुछ साधारण भेद बताता हूँ, वे ध्वनि के पहले दो भेद करते हैं :

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार २१५

१. अभिधामूलक, २. लक्षणामूलक। इसमें प्रथम प्रकार के तीन भेद हैं : रस, वस्तु और अलंकार। रसध्वनि असंलक्ष्यक्रम का वाचक है; अतः उसमें रस, भाव, उसका आभास, भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि तथा भावशबलता का समावेश हो जाता है। दूसरे प्रकार के दो भेद हैं : अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और २. अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य। इन पाँच प्रकार की ध्वनियों में परम रमणीय होने के कारण रस- ध्वनि की आत्मा जो रस है उसका स्वरूप निरूपित करते हैं।

रसस्वरूप जगन्नाथ का रस-स्वरूप-निरूपण अभिनव, मम्मट आदि के लगभग समान ही है। दोनों में थोड़ा भेद है जिसे जगन्नाथ स्वयं इस रूप में प्रस्तुत करते हैं : 'इत्थं चाभिनवगुप्तमम्मटभट्टादिग्रन्थस्वारस्येन भग्नावरणचिद्विशिष्टो रत्यादि: स्थायीभावो रस इति स्थितम्। वस्तुतस्तु वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्येन रत्याद्यवच्छिन्ना भग्नावरणचिदेव रसः।' अर्थात्, इस प्रकार, अभिनव और मम्मट भट्ट आदि के ग्रन्थों के अनुसार भग्नावरण चिति का विषय बने हुए रत्यादि स्थायी भाव रस हैं, जबकि सच तो यह है कि हम जिस श्रुतिवाक्य को अब उद्धृत करने वाले हैं उसके अनुसार रत्यादि स्थायी भाव- विशिष्ट भग्नावरण चिति रस है। दोनों के बीच अन्तर इतना ही है कि अभिनव गुप्त आदि यह मानते हैं कि स्थायी भाव जब भग्नावरण चिति का विषय बन जाता है तब वह रस-रूप में आस्वादित होता है जबकि जगन्नाथ के अनुसार रत्यादि स्थायी भाव को विषय बनाने वाली भगनावरण चिति स्वयं रस है। पहले मत में भग्नावरण चिति विशेषण है और स्थायी भाव विशेष्य है जबकि दूसरे मत में स्थायी भाव विशेषण है और भग्नावरण चिति विशेष्य है। दोनों में दोनों के अंश विद्यमान हैं। पर दोनों अपने- अपने दर्शन के अनुसार एक ही वस्तुस्थिति को दो अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। अभिनव गुप्त आदि को काश्मीर शैव मत का अनुयायी होने के कारण भग्नावरण चिति के अलावा दूसरे तत्त्व को स्वीकारने में आपत्ति नहीं है, इसीलिए तो वह कहता है कि भभनावरण चिति का विषय बना हुआ स्थायी भाव रस है, जबकि जगन्नाथ शांकर मत के केवलाद्वैतवादी हैं, अतः वे दूसरे तत्त्व को स्वीकार कर ही नहीं सकते फलतः वे भग्नावरण चिति को ही रस मानते हैं; मात्र उसे वह स्थायी भाव से विशिष्ट कहते हैं। जगन्नाथ ने रस के स्वरूप को ले कर समग्रतः अलग-अलग ग्यारह मतों की चर्चा की है और तदन्तर वह इस ग्यारह मतों के अनुसार भरत के रस-सूत्र की व्याख्या भी करने का प्रयत्न करते हैं। उन्होंने इस सम्पूर्ण चर्चा का समापन करते हुए कहा है कि यों तो मनीषियों ने अनेक प्रकार के मतों के अनुसार रस को अनेक रूपों में समझाया है फिर भी वह परमाहूलाद के साथ अविनाभाव से संयुक्त है और यह बात निर्विवाद है कि यह रस इस जगत् में या काव्य में रमणीयता लाता है।

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२१६ अभिनव का रस-विवेचन

नव रस, शान्त का समर्थन तदुपरान्त वे शान्त सहित नौ रसों का परिगणन कराते हैं और यह कहते हैं कि इसमें भरत का वचन प्रमाण है; इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने भरत-नाट्यशास्त्र का नौ रस वाला पाठ स्वीकृत किया है। शान्त रस के बारे में वे कहते हैं कि कुछ लोग शान्त रस को स्वीकारते ही नहीं। कारण, शान्त का स्थायी भाव शम है और नट में यह सम्भव नहीं होता, अतः वह उसका अभिनय भी नहीं कर सकता। इसीलिए नाट्य में आठ ही रस मानने चाहिए; शान्त रस-नाटक में मान लेना उचित नहीं है। इस तर्क का सार यह है कि शान्त-रस शम से सिद्ध होता है, यह शम वैराग्य से सम्भव है। नट तो सांसारिक मानव है, उसमें शम का होना सम्भव नहीं और अगर उसमें शम ही न हो तो वह उसे उसके अनुभावों को अभिनय द्वारा बता ही किस प्रकार सकता है ? इस तरह नाटक में शान्त रस को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसका उत्तर यह है कि नट में रस की अभिव्यक्ति होती है, यह बात ही स्वीकार करने लायक नहीं है। भावकों में शम होना ही पर्याप्त है। इसके बल पर उनको रसबोध में किसी तरह की कठिनाई नहीं होती। साथ ही, आप जो यह कहते हैं कि नट में अगर शम न हो तो वह उसका अभिनय नहीं कर सकता तो फिर तो वह भय, क्रोध, आदि के अभाव में, यह कहना पड़ेगा, इन भावों का भी अभिनय नहीं कर सकता। और अगर आप यह कहते हैं कि नट में क्रोधादि का अभाव होने से उसके वास्तविक वधबन्धादि कार्य सम्भव नहीं हैं फिर भी शिक्षा और अभ्यास के बल पर वह ऐसे कृत्रिम कार्यों को तो कर ही सकता है तो शान्त के मामले में भी यही बात लागू होगी। यह मानना ही पड़ेगा कि नट में शम न होने पर भी वह उसके अनुरूप कार्यों का अभिनय तो कर सकता है। यह कह कर अन्त में वह संगीत-रत्नाकर का एक श्लोक उद्धृत करते हैं : अष्टावेव रसा नाट्येष्विति केचिदचूचुदन्। तदचारु यतः किञ्ञिन्न रसं स्वदते नटः । अर्थात् कुछ लोग जो यह कहते हैं कि नाटक में आठ रस हैं, ठीक नहीं कहते। कारण, नट किसी भी रस का आस्वाद नहीं ले पाता। और वे कहते हैं कि इस प्रकार सिद्ध होता है कि नाट्य में भी शान्त रस होता है। और आगे बढ़ कर वे कहते हैं कि जो नाट्य में शान्त-रस को स्वीकार नहीं करते उन्हें भी महाभारतादि काव्य में किसी बाधक कारण के न होने से वहाँ शान्त रस अवश्य स्वीकार करना ही पड़ेगा। तत्पश्चात् स्थायी भाव, व्यभिचारी भाव, अनुभाव और विभाव की स्पष्टता देने के बाद वे विशेष रसों का निरूपण करते हैं। इसमें वीर-रस के मामले में वे कहते हैं कि वीर के चार प्रकार हैं : दानवीर, दयावीर, युद्धवीर और धर्मवीर। इनके अलावा भी वे सत्यवीर, पाण्डित्यवीर, क्षमावीर और बलवीर का भी उल्लेख करते हैं। भक्ति को वे रस के रूप में न स्वीकार कर भाव के रूप में ही स्वीकार करते हैं और

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार २१७

उसके कारण देते हैं : रसभाव की व्यवस्था में भरत ही प्रमाण हैं अतः यही उचित है कि उसके द्वारा की गयी व्यवस्था का ही अनुसरण किया जाय। गुण-निरूपण इसके बाद विरोधी और अविरोधी रसों की चर्चा आती है और इसके बाद रस- दोष-निरूपण आता है। तत्पश्चात् गुण-निरूपण आता है। गुणों के बारे में जगन्नाथ का मत अभिनवगुप्त, मम्मट आदि से तनिक पृथक् है। उसके मतानुसार चिति की द्रुति, दीप्ति और विकास नामक वृत्तियाँ ही माधुर्य, ओज और प्रसाद गुण हैं। रस तो काव्य की आत्मा है। आत्मा के गुण हो ही नहीं सकते। इस तरह वास्तव में देखें तो गुण रस के धर्म नहीं हैं। पर व्यवहार में हम कार्य को धर्म मान लेते हैं, यथा- हम कहते हैं कि सोंठ गर्म है, पर सोंठ गर्म नहीं होती। वह शरीर में गर्मी पैदा करती है। इसी के अनुसार सम्बद्ध रसों के अनुभवों के कारण इन वृत्तियों का जन्म होता है इसीलिए ये रस इन वृत्तियों के प्रयोजक माने जाते हैं। तदनुसार शब्द, अर्थ और रचना भी इन वृत्तियों के प्रयोजक होने के कारण उनके भी ये गुण धर्म कहलाते हैं। इस तरह जगन्नाथ के मतानुमार गुण यह केवल रस के ही नहीं वरन् रस, शब्द, अर्थ और रचना-इन सभी के धर्म हैं। मम्मट आदि जो यह कहते हैं कि गुण रस के धर्म हैं और वे रस में निहित हैं, इसीलिए 'मधुर रस' आदि का प्रयोग होता है, पर रसानुभाव का उपकारक होने के कारण शब्द, अर्थ, रचनादि के लिए भी उपचारवश ये विशेषण लगाये जाते हैं जो जगन्नाथ को मान्य नहीं हैं। अतः काव्य-लक्षण में जिन्होंने शब्दार्थ के लिए 'सगुणौ' विशेषण लगाया था उनके प्रति आपत्ति उठाने का उनके पास कोई कारण ही नहीं रहता। फिर भी वे यह केवल वितण्डावाद खड़ा करने के लिए ही करते हैं। इसके बाद वे वामनादि के मतानुसार जो दस शब्द-गुण और अर्थ-गुण स्वीकृत है उनका निरूपण करते हैं और मम्मट का अनुसरण करते हुए कहते हैं कि इन सभी गुणों को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इनमें से कितने ही तो दोषाभावरूप हैं और शेष उक्त तीनों गुणों में समाविष्ट हो जाते हैं, अतः गुण तो तीन ही हैं। भाव-निरूपण इसके बाद गुण-व्यंजक रचना का निरूपण आता है और तत्पश्रात् वे भाव-निरूपण आरम्भ करते हैं। इसमें विशेषता है कि वे भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि, भाव- शबलता और रसाभास, को भी भावध्वनि में समाविष्ट कर लेते हैं। वे कहते हैं कि अलक्ष्य-क्रमध्वनि भी कई बार लक्ष्यक्रम हो सकती है। अभिनव का भी यही मत है। इस चर्चा के अन्त में वे कहते हैं कि वर्ण-रचना रस की व्यंजक नहीं है, पर गुण की व्यंजक है : 'वर्णरचनाविशेषाणां माधुर्यादिगुणाभिव्यञ्जकत्वमेव, न तु रसाभिव्यञ्जकत्वम्, गौरवान्मानाभावाच्च।'

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२१८ अभिनव का रस-विवेचन

संलक्ष्यक्रमध्वनि यहाँ 'रसगंगाघर' का प्रथम आनन पूरा होता है। दूसरे आनन में संलक्ष्यक्रमध्वनि का निरूपण आता है। उन्होंने इसके तीन प्रकार माने हैं-१. शब्दशक्तिमूलध्वनि, २. अर्थशक्तिमूलध्वनि और ३. उभयशक्तिम्लध्वनि। शब्दशक्तिमूलध्वनि के दो प्रकार हैं : १. जिसमें व्यंग्य वस्तु है और २. जिसमें व्यंग्य अलंकार है। इसी तरह जगन्नाथ के मतानुसार अर्थशक्तिमूलध्वनि के आठ प्रकार हैं। कारण, व्यंजक या तो वस्तु होगी या अलंकार होगा। और फिर इन दोनों के दो-दो प्रकार होते हैं : १. लोकसिद्ध और २. कविप्रतिभामात्रसिद्ध। इस प्रकार चार भेद हुए। बाद में इन चार में से या तो वस्तु या फिर अलंकार ध्वनित होता है। इस तरह समग्रतः आठ प्रकार हैं। मम्मटादि के मतानुसार अर्थशक्तिमूलध्वनि के समग्रतः बारह प्रकार होते हैं। कारण, वे स्वतःसम्भवी, कविप्रौढ़ोक्तिमात्रसिद्ध, और कविनिबद्धपात्रप्रौढ़ोक्तिमात्रसिद्ध नामक व्यंजक के तीन प्रकार करते हैं जबकि जगन्नाथ स्वतःसम्भवी (लोकसिद्ध) और कविप्रतिमामात्रसिद्ध नामक दो ही प्रकार स्वीकार करते हैं। वह कविनिबद्धपात्र- प्रौढ़ोक्तिमात्रसिद्ध को भी कविप्रौढ़ोत्तिमात्रसिद्ध में समा लेते हैं। इसका कारण वे यह देते हैं कि यहाँ भले ही कवि का पात्र बोलता हो पर वह पात्र भी अन्ततः तो कवि-प्रतिभासजित ही है; अतः इसका समावेश भी कविप्रौढ़ोक्ति में ही कर लेना चाहिए। अन्यथा कवि-वर्णित वक्ता द्वारा वर्णित वक्ता की उक्ति और उस वक्ता द्वारा वर्णित वक्ता की उक्ति आदि अनेक भेद करने पड़ेंगे। उनका यही कहना है कि यह सब युक्तिसंगत नहीं है। जगन्नाथ के ये तर्क उचित प्रतीत नहीं होते। कविप्रौढ़ोक्तिमात्रसिद्ध में बोलने वाला कवि स्वयं होता है और कविनिबद्धपात्रप्रौढ़ोक्तिमात्रसिद्ध में बोलने वाला कवि- निमिंत पात्र होता है, अतः व्यंग्यार्थ में अन्तर आ जाता है। एक उदाहरण देखें : शिखरिणि क्वनु नाम कियच्चिरं किमभिधानमसावकरोत्तपः । तरुणि येन तवाधरपाटलं दशति बिम्बफलं शुकशावकः॥ किस पर्वत पर, कितने समय तक, कौन-सा तप उसने किया है, जिससे हे तरुणी, यह सुग्गा तेरे अधर जैसे लाल बिम्बफल को चुगता है। यदि इन वचनों को कवि द्वारा कहा हुआ मान लें तो इसमें अधिक व्यंग्यार्थ नहीं मिलता, पर अगर ये वचन किसी कवि-निर्मित पात्र द्वारा बोले गये हैं तो इनमें से नायिका के अधर-चुम्बन की अभिलाषा ध्वनित होती है और इसके माध्यम से शृंगार- रस की व्यंजना तक पहुँचा जा सकता है। इस प्रकार कवि के द्वारा कथित और कवि-निर्मित पात्र द्वारा कथित वचनों के बीच में व्यंग्यार्थ की दृष्टि से बहुत अधिक अन्तर है। अतः इन दोनों प्रकारों को अलग मानने में अनौचित्य नहीं है, अगर अनौचित्य है तो न मानने में है। साथ ही, यह कहना भी ठीक नहीं है कि पात्र-निर्मित वक्ता की उक्ति और उसके द्वारा निर्मित पात्र की उक्ति के आधार पर अनन्त भेद

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार २१९

करने पड़ेंगे, क्योंकि वह अन्ततः तो मात्र उक्ति ही है इसलिए व्यंजना में अन्तर आना सम्भव नहीं है। शब्दशक्तिमूलध्वनि के निरूपणोपरान्त लक्षणामूलध्वनि का निरूपण आता है। इसमें अभिधा और लक्षणा की विस्तार से चर्चा आती है और इसके बाद अलंकार- निरूपण आरम्भ होता है। अलंकार-निरूपण अलंकार-निरूपण की प्रस्तावना वे इस रूप में करते हैं : 'प्रागभिहितलक्षणस्य काव्यात्मनो व्यङ्गयस्य रमणीयताप्रयोजका अलङ्काराः।' अर्थात् काव्य की आत्मा व्यंग्यार्थ है और उसकी रमणीयता के प्रयोजक अलंकार हैं। जगन्नाथ ने 'रमणीयार्थ- प्रतिपादक शब्द' को काव्य कहा है। सभी अर्थों में व्यंग्यार्थ ही काव्य की आत्मा है और यह व्यंग्यार्थ भी रमणीय तो होना ही चाहिए। इस वाक्य का यह अर्थ हुआ कि यह रमणीयता अलंकारों से सिद्ध होती है। साथ ही, इसका अर्थ यह भी हुआ कि रमणीयता अर्थात् लोकोत्तर आनन्द प्रदान करने का गुण अलंकार में होना ही चाहिए। इसके अभाव में कोई अलंकार बन ही नहीं सकता। जगन्नाथ ने काव्यलिंग अलंकार को अस्वीकारते हुए कहा है कि 'काव्यलिङ्गो नालङ्कारवैचित्र्यात्मनोविच्छित्ति- विशेषस्याभावात्।' अर्थात्, काव्यलिंग अलंकार नहीं है क्योंकि इसमें वैचित्र्य जिसकी आत्मा है ऐसी विच्छित्तिविशेष का अभाव है (पृ० ४७०)। इसी रमणीयता को चमत्कार, चारुता, हृद्यता, सौन्दर्य, वैचित्य, विच्छित्तिविशेष, भणितिप्रकार, आदि नामों से पहचाना जाता है। जगन्नाथ ने ही कहा है कि 'सौन्दर्य च चमत्कृत्या- धायकत्वम्। चमत्कृतरानन्दविशेषः सहृदयहृदयप्रमाणकः ।' (पृ० १५७) अर्थात्, सौन्दर्य अर्थात् चमत्कार उत्पन्न करने की शक्ति। चमत्कार अर्थात् आनन्दविशेष, जिसका प्रमाण सहृदय का हृदय है। जगन्नाथ केवल कविप्रतिभा को ही काव्य का मूल मानते हैं, अतः काव्य में आने वाले अलंकार भी प्रतिभा से ही प्रकटित हों, यही उनका आग्रह है। उन्होंने कहा है कि 'वस्तुवृत्तस्य लोकसिद्धत्वेनालङ्गारत्वायोगात्। यतः बहिरसन्त कविप्रतिभा- मात्रकल्पिता अर्थाः काव्ये अलङ्कारपदास्पदम्।' अर्थात्, जगत् में अस्तित्व रखने वाला कोई भी पदार्थ वस्तुवृत्त है जो लोकसिद्ध होता है अर्थात् लोक-प्रचलित होता है, अतः वह अलंकार नहीं बन सकता। कारण, बाहर अर्थात् जो जगत् में न हों ऐसे कवि-प्रतिभा द्वारा कल्पित अर्थ ही काव्य में अलंकार-पद प्रात्त करते हैं। (पृ० ४४८ ) जैसा कि हम देख आये हैं कि अलंकार का अलंकारत्व विच्छित्तिविशेष में निहित है और इस विच्छित्ति की विलक्षणता के कारण ही अलङ्कार एक-दूसरे से अलग होते हैं। इनके मूल में कवि-प्रतिभा वर्त्तमान है। जगन्नाथ कहते हैं कि 'ननु केयं विच्छित्तिः १ उच्यते। अलङ्गाराणां परस्पर विच्छेदस्य वैलक्षणस्य हेतुभूता जन्यता-

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२२० अमिनव का रस-विवेचन

संसर्गेण काव्यनिष्ठा कविप्रतिभा, तज्जन्यत्वप्रयुक्ता चमत्कारिका वा विच्छित्तिः।' (पृ० ४६६) अर्थात् यह विच्छित्ति क्या है ? कहते हैं, अलङ्कारों के परस्पर भेद के कारण, वस्तुतः कविनिष्ठ भी काव्य कविजन्य होने के कारण उसमें अवतरित होने वाली अर्थात् काव्यनिष्ठ कविप्रतिभा, अथवा इस प्रतिभा से उत्पन्न होने वाली चमत्कृति ही विच्छित्ति है। इसका अर्थ यह हुआ कि अलंकार-भेद का कारण प्रतिभा है। प्रतिभा से काव्य जन्म लेता है अतः इस काव्य में प्रवृत्त प्रतिभा अथवा इस प्रतिभा से उत्पन्न चमत्कृत्ति विच्छित्ति है और अलंकार विच्छित्तियुक्त होता है। यह कुछ यों हुआ कि जैसी प्रतिभा वैसी विच्छित्ति और जैसी विच्छित्ति वैसा अलङ्कार। अलङ्कार प्रतिभोत्थ होना चाहिए, इस प्रकार का आग्रह हमें कुन्तक में बारम्बार देखने को मिलता है। वही यहाँ भी दिखायी देता है। 'रसगंगाघर' में हुई सत्तर अलङ्कारों की चर्चा आज उपलब्ध है। इसमें अन्तिम अलङ्कार उत्तर है और उसका उदाहरण भी अधूरा है।

समापन अन्त में जगन्नाथ के काव्य-विचार के मुख्य-मुख्य मुद्दे पुनः एक बार संक्षेप में लेकर अपने इस लेख को पूरा करूँगा। जगन्नाथ काव्य-प्रयोजन में तीन मुख्य मानते हैं : कीर्ति, परम आह्लाद और गुरु, राजा देवतादि की प्रसन्नता। काव्य-हेतु के रूप में वे केवल कवि-प्रतिभा को मानते हैं और व्युत्पत्ति और अभ्यास को वह एक प्रकार से प्रतिभा के कारण मानते हैं। काव्य की परिभाषा वे इस प्रकार देते हैं : रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द ही काव्य है। साथ ही, इसका विरोध करते हैं कि शब्दार्थयुगल या रसात्मक वाक्य को काव्य कहा जाय। रमणीयता की व्याख्या 'लोकोत्तर आह्लादजनक ज्ञान का विषय होने का गुण' कह कर देते हैं। चमत्कार का अनुभव कराने की शक्ति के रूप में लोकोत्तरता की स्पष्टता करते हैं। उनके मतानुसार प्रतिभा का अर्थ है काव्य-रचना के अनुकूल शब्दार्थ की उपस्थिति। वे काव्य के चार प्रकार बताते हैं : १. उत्तमोत्तम-जिससे शब्दार्थ अपने को गौण बना कर किसी अलौकिक अर्थ की अभिव्यक्ति करते हों, २. उत्तम-जिसमें व्यंग्य गौण होने पर भी चमत्कार मौजूद हो, २. मध्यम-जिसमें व्यंग्यार्थ के चमत्कार की अपेक्षा वाच्यार्थ का चमत्कार श्रेष्ठ हो और ४. अधम-जिसमें अर्थ-चमत्कार से परिपुष्ट शब्द-चमत्कार मुख्य हो। उत्तमोत्तम काव्य-ध्वनि के पाँच प्रकार स्वीकार करते हैं। अभिधामूलक के तीन : रस, वस्तु और अलंकार और लक्षणामूलक के दो : अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य। वे संलक्ष्यक्रमध्वनि के तीन भेद बताते हैं : १. शब्दशक्तिमूलक, २. अर्थशक्तिमूलक, ३. उभयशक्तिमूलक। इनमें तो कोई नवीनता नहीं है। पर, अर्थशक्तिमूलक के वे आठ प्रकार स्वीकार करते हैं। कारण, वे कविनिबद्धपात्रप्रौढ़ोक्तिमात्रसिद्ध को भी कविप्रौढ़ोक्तिमात्रसिद्ध में समा- विष्ट कर लेते हैं। रस-निष्पत्ति के बारे में वे अभिनव गुप का अनुसरण करते हैं। मात्र वे रत्यादि स्थायिभावविशिष्ट चिति को रस कहते हैं, जबकि अभिनवादि भझ्नावरण

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रमणीयता : जगन्नाथ का काव्य-विचार २२१

चिति का विषय बने स्थायी को रस कहते हैं। दोनों में इतना ही अन्तर है। वे शान्त-रस को मानते हैं, अतः वह कुल नौ रस स्वीकार करते हैं। वीर-रस के चार प्रकारों के अलावा वे सत्यवीर, पाण्डित्यवीर, क्षमावीर और बलवीर का भी उल्लेख करते हैं। रसाभास का समावेश वह भावध्वनि में करते हैं। गुणों को वे केवल रस के ही नहीं वरन् रस, शब्द, अर्थ और रचना के भी धर्म मानते हैं। काव्य में रमणीयता अलंकार से सिद्ध होती है और अलंकार प्रतिभा से प्रकटित होने चाहिएँ। यों जगन्नाथ में हमें कोई नया महत्त्वपूर्ण विचार नहीं मिलता है, पर बहुत से मुद्दों की गम्भीर चर्चा प्राप्त होती है जो अनेक बार केवल तर्कबाजी में परिणत हो जाती है। समग्रतः देखने पर उन्होंने ध्वनिवादियों के मत को ही स्वीकार विया है क्योंकि उन्होंने भी अलंकार-निरूपण के समय व्यंग्य को ही काव्य की आत्मा माना है और मध्यम काव्य-प्रकार की चर्चा के समय स्वीकार किया है कि कोई भी वाच्यार्थ प्रतीयमान के लेश मात्र स्पर्श के अभाव में रमणीय नहीं बन सकता। ध्वनिवादी इससे पृथक् और क्या कहेंगे ? केवल ध्वनि होने मात्र से कोई वस्तु काव्य नहीं बन जाती, पर यह तो ध्वनिवादियों का भी कथन है कि चारुतायुक्त होनी चाहिए,' और जगन्नाथ भी अलंकार-निरूपण की प्रस्तावना में यही कहते हैं।

१. 'विविधवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चारुणः काव्यस्य स एवार्थः सारभूतः ।' अर्थात्, अभिव्यंजनीय रस के अनुरूप विविध, शब्द, अर्थ और रचना की योजना के वारण जिसमें चारुता आती हो ऐसे काव्यों का यही (व्यंग्यार्थ) सारभूत होता है-आनन्दवर्धन ने यही कहा है। (पृ० ८७) यह समझाते हुए अभिनव ने वहा है कि जो व्यंग्यारट इस प्रकार चारता रखता हो वही ध्वनि कहलाता है। और केवल व्यग्यार्थ होने मात्र से ही सभी स्थान पर नाव्य-व्यवहार नहीं चलता, यथा-आत्मा होने पर भी जीव का व्यवहार कभी-कभी ही होता है : 'तेन सर्वत्रापि ध्वननसद्भावऽपि न तथा व्यवहारः। आत्मसद्भावेऽपि क्वचिदेव जीवव्यवहार इत्युक्तं प्रागेव।' पृ० ८८। विरोधी पक्ष यह सुन कर कहता है कि 'फिर तो चारुता की प्रतीति ही काव्य की आत्मा है, यही इसका अर्थ होगा।' इसके उत्तर में अभिनव गुप्त कहते हैं कि यह उसे स्वीकार्य है, अतः यह झगड़ा तो केवल नाम का ही है। 'चारुत्वप्रतीतिस्तर्हि काव्यस्यात्मा स्यात् इति तदङ्गीकुर्म एव। नाम्नि खल्वयं विवाद इति।'-पृ० १०५ सन्दर्भ-सूची १. रसगगाधरः ( नागेशभट्ट की टीका सहित), सम्पादक-महामहोपाध्याय पण्डित दुर्गाप्रसाद और वासुदेव लक्ष्मण शास्त्री पणशीकर, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई, १९१६। इस लेख मैं 'रसगंगाधर' के पृष्ठों का उल्लेख इसी आवृत्ति के आधार पर किया गया है। २. रसगंगाधरः । संस्कृत व्याख्याकार-पण्डित बदरीनाथ झा, हिन्दी व्याख्याकार पण्डित मदन- मोहन झा, चौखम्भा विद्याभवन, बनारस, १९५५। ३. हिस्ट्री ऑफ संस्कृत पोइटिक्स, एस० के० दे०, १९६०। ४. काव्यप्रकाश (मराठी) सम्पादक-कृष्ण श्रीनिवास अर्जनवाडकर और अरविंद मंगरूलकर, देशमुख प्रकाशन, पूना, ९९६८।

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२२२ अभिनव का रस-विवेचन ५. ध्वन्यालोक :- (लोचन और बालप्रिया टीका सहित), काशी संस्कृत सीरीज ग्रंथमाला-१३५, चौखम्भा संस्कृत सीरीज़ आफिस, बनारस सिटी, १९४०। इस लेख मैं 'ध्वन्यालोकलोचन' के उदाहरण और स्थल-निर्देश इसी पुस्तक के आधार पर किये गये हैं। ६. दि ध्वन्यालोक ऐण्ड इट्स क्रिटिक्स, डॉ० के० कृष्णामूर्ति, एम० ए०, बी० टी०, पी-एच० डी०, काव्यालय, मैसूर।

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औचित्य-विचार

क्षेमेन्द्र का औचित्य-विचार आनन्दवर्द्धन पर्यन्त और उसके बाद के कितने ही आलंकारिकों के ग्रन्थों में औचित्य-सम्बन्धी थोड़ी-बहुत चर्चा दिखायी दे जाती है, पर इस विषय पर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखने वाले तो अभिनव गुप्त के शिष्य काश्मीरी पण्डित क्षेमेन्द्र ही हैं। वे औचित्य को रस का जीवितभूत और सौन्दर्यानुभव में चमत्कार-साधक तत्त्व मानते हैं।' उनके मतानुसार तो औचित्य ही रस-सिद्ध काव्य का स्थिर और अनश्वर जीवित है। अलंकार केवल अलंकार हैं और गुण केवल गुण हैं। जिस काव्य में उसका जीवित रूप तत्त्व औचित्य हूँढ़ने पर भी न मिलता हो उसके अलंकार किस काम के ? उसके गुण व्यर्थ हैं। गिनते रहने से क्या लाभ ?२ यों क्षेमेन्द्र औचित्य को काव्य का जीवित मानते हैं और उन्हें गुण तथा अलंकार से भिन्न मानते हैं। इसी बात पर बल देते हुए वे कहते हैं कि 'अब जिसकी परिभाषा दी जायेगी वह औचित्य तो काव्य का स्थिर और अविनश्वर जीवित है। उसके अभाव में काव्य गुणालंकारों से युक्त होने पर भी निर्जीव है। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि उचित 'स्थान पर प्रयुक्त होने पर ही अलंकार अलंकार-रूप-शोभारूप होता है और औचित्यच्युत न होने पर ही गुण गुण बने रहते हैं अन्यथा दोष बन जाते हैं।" इस प्रकार औचित्य का माहात्म्य स्थापित करने के पश्चात् वे औचित्य की परिभाषा इस रूप में देते हैं : 'जिसके जो अनुरूप हो, आचार्य उसे उचित कहते हैं और उचित के भाव को ही औचित्य कहा जाता है।" इस व्याख्या से औचित्य के

१. कृत्वापि काव्यालङ्कारा क्षेमेन्द्र: कविकर्णिकाम्। तत्कलङ्कं विवेकं च विधाय विबुधप्रियम्।२।। औचित्यस्य चमत्कारकारिणशचारुचर्वणे। रसजीवितभूतस्य विचारं कुरुतेऽघुना ॥ ३ ॥ २. काव्यस्यालमलङ्कारैः किं मिथ्यागणितैर्गुणैः । यस्य जीवितमौचित्यं विचिन्त्यापि न दृश्यते ॥ ४॥ अलङ्कारास्त्वलङ्कारा गुणा एव गुणाः सदा। औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् ॥१५।। ३. औचित्यं त्वग्रे वक्ष्यमाणलक्षणं स्थिरमविनश्वरं जीवतं काव्यस्य। तेन विनास्य गुणालङ्कारयुक्तस्यापि निर्जीवित्वात्।। ४. उचितस्थानविन्यासादलङ्कतिरलक्कतिः। औचित्यादच्युता नित्यं भवन्त्येव गुणा गुणाः ।६।। ५. उचितं प्राहुराचार्याः सदशं किल यस्य यत् । उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते।।७।।

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२२४ अभिनव का रस-विवेचन स्वरूप पर कोई विशेष प्रकाश नहीं पड़ता; वह तो जब हम उनके द्वारा चर्चित दृष्टान्तों को देखते हैं तभी स्पष्ट होता है। तदनन्तर वे तीन कारिकाओं में औचित्य के अट्ठाईस स्थानों का निर्देश करते हैं : 'पद में, वाक्य में, प्रबन्ध के अर्थ में, गुण में, अलंकार में, रस में, क्रिया में, कारक में, लिंग में, वचन में, विशेषण में, उपसर्ग में, निपात में, काल में, देश में, कुल में, व्रत में, तत्त्व में, सत्त्व में, अभिप्राय में, स्वभाव में, सारसंग्रह में, प्रतिभा में, अवस्था में, विचार में, नाम में, आशिष में, और काव्यांग में निहित औचित्य को व्याप जीवित कहते हैं।" आशय यह है कि काव्य का कोई भी ऐसा अंग नहीं है जिसमें औचित्य की अपेक्षा न हो। औचित्य काव्य के कण कण में व्याप्त उसका जीवित है। तत्पश्चात् उन्होंने उपर्युक्त सभी स्थानों के औचित्य और औचित्य-भंग के क्रमशः उदाहरण देकर चर्चा की है। परन्तु जिन काव्यांगों का उन्होंने उल्लेख किया है उनकी विवेचना तथा औचित्य के दष्टान्त तक उन्होंने नहीं दिये हैं। उन्होंने केवल इतना ही कहा है कि काव्य के अंग तो अनन्त हैं और उन सभी के दृष्टान्त देने में पार नहीं आयेगा; अतः अध्येता इस प्रकार उन सभी अंगों में भी औचित्य देख लें। विविध रसों के औचित्य की चर्चा करने के बाद रसों के मिश्रण के औचित्य के बारे में उन्होंने कहा है कि 'जिस प्रकार मधुर, तिक्त आदि रस यदि कुशलतापूर्वक प्रयुक्त किये गये हों, तो विचित्र अर्थात् अनिर्वचनीय आनन्द प्रदान करते हैं, उसी प्रकार शृंगारादि रसों के विषय में भी है। उनके पारस्परिक आश्लेष-मिश्रण में औचित्य का निर्वाह होना चाहिए। अनौचित्यपूर्ण मिश्रण किसे पसन्द आयेगा ?'- पृ० १७-१८ । क्षेमेन्द्र अपने ग्रन्थ में खुल कर दृष्टान्त देते हैं और उनके औचित्य की चर्चा करते हैं, अतः वह जो कहना चाहते हैं पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है। उनकी निरूपण-पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यही है। वैसे उनके निरूपण में शास्त्रीय व्यवस्था कम ही है।

१. पदे वाक्ये प्रबन्धाथें गुणेऽलङ्करणे रसे। क्रियायां कारके लिङ्ग वचने च विशेषणे।८॥ उपसर्गे, निपाते च काले देशे कुले व्रते। तत्वे सत्त्वेऽप्यभिप्राये स्वभावे सारसङ ग्रहे ॥९॥ प्रतिभायामवस्थायां विचारे नाम्न्यथाशिषि। काव्यस्याङ्गषुच प्राहुरौचित्यं व्यापि जीवितम् ॥१०। २. यदा मधुरतिक्तादया रसाः कुशलयोजिताः। विचित्रास्वादतां यान्ति शृङ्गाराद्यास्तथा मिथः ।।१७।। तेषां परस्पराश्लेषात्कुर्यादौचित्यरक्षणम्। अनौचित्येन संस्पृष्टः कस्येष्टो रससंकरः॥१८।।

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औचित्य-विचार २२५ इस रूप में देखें तो इन्हीं वस्तुओं की आनन्दवर्द्धन द्वारा ध्वन्यालोक में की गयी चर्चा अधिक शास्त्रीय, अधिक तर्कसंगत और अधिक व्यवस्थित है। उसे भी हम देखें। आनन्दवर्द्धन का औचित्य-विचार हम ऊपर देख आये हैं कि क्षेमेन्द्र की औचित्य-व्याख्या उसके स्वरूप को स्पष्ट नहीं करती। आनन्दवर्द्धन और अभिनव गुप ने इसे अधिक स्पष्ट किया है। अभिनव गुप्त ने स्पष्टतः कहा है कि केवल औचित्य औचित्य कहने का कोई अर्थ नहीं है। कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु के सम्बन्ध में उचित या अनुचित होती है। इस प्रकार औचित्य दो वस्तुओं के बीच का सम्बन्ध है। अतः जब किसी वस्तु के सन्दर्भ में अमुक वस्तु के उचित या अनुचित होने पर विचार करना हो तो पहले उस वस्तु को जान लेना चाहिए, ऐसा करने पर ही दूसरी वस्तु के औचित्य अनौचित्य पर विचार हो सकता है। अब काव्य के मामले में जिन्हें लेकर दूसरी सभी बातों पर विचार करना है वे वस्तु रसभावादि के अलावा और कुछ नहीं हैं।१ इसकी स्पष्टता अभिनव गुप्त ने ध्वन्यालोक की अपनी लोचन टीका में अतिशयोक्ति की चर्चा करते समय की है। इसका अर्थ यह हुआ कि काव्य के सभी अंगों की परीक्षा इस रूप में करनी, चाहिए कि सम्बद्ध अंग काव्य के अन्तर्यामी जीवित रूप रसभावादि की दृष्टि से उचित हैं या नहीं, इसी का नाम औचित्य-विचार है। और आनन्दवर्द्वन ने रस को ही केन्द्र में रख कर औचित्य की चर्चा की है। रस, गुण और संघटना का सम्बन्ध असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य काव्य की ध्वनि वर्ण, पद और वाक्य की भाँति संघटना में भी व्यक्त होती है, यह कहने के बाद संघटना के स्वरूप का निरूपण करते हुए वे कहते हैं कि समास रहित, मध्यम समासवाली और दीर्घ समासवाली तीन प्रकार की संघटना है।२ यहाँ वे गुण, संघटना और रस के पारस्परिक सम्बन्ध की चर्चा करते हैं। गुण और संघटना के पारस्परिक सम्बन्ध के मामले में तीन विकल्प सम्भव हैं : १. गुण और संघटना एक ही हों, २. दोनों अलग हों और गुण संघटना के आश्रित हों, अथवा ३. संघटना गुण के आश्रित हो। १. उचितशब्देन रसविषयमौचित्यं भवतीति दर्शयन् रसध्वनेः जीवितत्वं सूचयति। तदभावे हि किमपेक्षयेदमोचित्यंनाम सर्वत्रोद्घोष्यते इति भावः ।-ध्वन्यालोकलोचन, पृ० ४५। औचित्यनिबन्धनम् रसभावादि मुक्त्वा नान्यत् किञ्िदस्तीति तदेवान्तर्यामि मुख्यं जीवितमित्युपगन्तव्यं न तु सा। एतेन यदाहुः केचित्-औचित्यघटितसुन्दरशब्दार्थमये काव्ये किमन्येन ध्वन्यात्मभूतेनेति ते स्व्वचनमेव ध्दनिसद्भावाभ्युपगमसाक्षिभूतं मन्यमाना: प्रयुत्ता:।-ध्वन्यालोकलोचन, पृ० ४६९। २. असमासा समासेन मध्यमेन च भूषिता। तथा दीर्घ समासेति त्रिधा संघटनोदिता॥३-५ १५

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२२६ अभिनव का रस-विवेचन गुण और रस के सम्बन्ध नित्य हैं जबकि संघटना के बारे में ऐसा नहीं है। इस नियम में किसी भी प्रकार का अपवाद नहीं है कि अमुक रस में अमुक ही गुण होते हैं, पर संघटना के बारे में स्थिति ही अलग है। कोई भी संघटना किसी भी रस को व्यंजित कर सकती है। माधुर्य और प्रसाद केवल करुण और विप्रलम्भ शरृंगार को ही व्यक्त कर सकते हैं, ओज केवल अद्भुत, रौद्र आदि को ही अभिव्यक्त कर सकता है, करुण को नहीं। पर इसके विपरीत दीर्घ समासवाली संघटना भी शृंगार को और समासरहित संघटना भी वीर या रौद्र को व्यंजित कर सकती है। इस प्रकार गुण और संघटना एक नहीं हैं, और गुण संघटना के आश्रित नहीं है। जिस प्रकार गुण और रस का सम्बन्ध नित्य है उसी प्रकार से गुण और संघटना का सम्बन्ध भी नित्य नहीं है। माधुर्य गुण तीनों प्रकार की संघटना में हो सकता है। सामान्यतः यह माना जाता रहा है कि ओज गुण रौद्र के साथ अविभाज्य रूप में संकलित है और जहाँ ओज गुण हो वहाँ दीर्घ समासवाली संघटना भी होती ही है। पर वस्तुतः ओज गुण का तो रस के साथ ही सम्बन्ध है, संघटना के साथ नहीं। अतः समास-रहित संघटना में भी ओज गुण सम्भव है और वह रौद्र-रस को व्यक्त करता है। इस तरह गुण और संघटना के क्षेत्र भी भिन्न हैं। दीर्घ समासवाली संघटना रौद्र का निरूपण करने में प्रयुक्त होती है, पर उस समय भी अगर दीर्घ समासा संघटना के साथ प्रसाद गुण का मेल होता है तभी रस-निष्पात्त हो सकती है। इसी प्रकार, करुण की व्यंजना भी अकेली समासरहित संघटना नहीं कर सकती। उसे प्रसाद गुण की सहायता की आवश्यकता रहती है। इससे यह सिद्ध होता है कि संघटना गुणों की सहायता से ही रसों को व्यंजित कर सकती है। आशय है, वह गुणों के आश्रित है। इसका अभिप्राय यह है कि संघटना का नियमन करने वाला रस भी नहीं है और गुण भी नहीं है। आनन्दवर्द्धन के मतानुसार रस संघटना का नियमन नहीं करते क्योंकि जहाँ रस नहीं होता वहाँ भी संघटना तो होती ही है। साथ ही, संघटना जब रस को व्यंजित करती है उस समय भी वह वक्ता आदि के औचित्य द्वारा ही करती है। इसलिए यह निश्चित होता है कि संघटना का नियमन करनेवाला तत्व वक्ता और वाच्य का औचित्य है।१ वक्ता और वाच्य वक्ता के विषय में विशेष स्पष्टता करते हुए वे कहते हैं कि वक्ता या तो कवि स्वयं होता है या कवि-निरूपित कोई पात्र होता है। वह पात्र भी रसभाववाला या रसभावरहित होगा; साथ ही, वह रस भी कथा-नायक के आश्रित होगा अथवा उसके विपक्ष के आश्रित होगा। कथानायक भी धीरोदात्त होगा अथवा इससे रहित होगा। इसी तरह वाच्य की विशेष स्पष्टता करते हुए वह कहता है कि वाच्य भी ध्वन्यात्मक रस का अंग होगा या रसाभास का अंग होगा, अभिनेयार्थ अर्थात् १. तन्नियमे हेतुरौचित्य वक्तृवाच्ययोः ॥३-६

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औचित्य-विचार २२७ अभिनय द्वारा प्रकट करना होगा या अनभिनेयार्थ होगा, उत्तम प्रकृति के आश्रित होगा अथवा इससे भिन्न होगा। इस प्रकार वक्ता और वाच्य के भी अनेक प्रकार हो सकते हैं। इसमें भी वक्ता अर्थात् कवि स्वयं अथवा कवि-निर्मित पात्र अगर रस- भावहीन है तो उसमें किसी भी संघटना का उपयोग किया जा सकता है। पर यदि कवि या कवि-निर्मित पात्र रसभावयुक्त है और रस मुख्य पात्र के अधीन रह कर ध्वनि की आत्मा के रूप में है तो वह संघटना समासरहित अथवा मध्यमसमासवाली ही होनी चाहिए । कारण, रस का अगर मुख्य रूप से प्रतिपादन करना हो तो उसकी प्रतीति में व्यवधान उत्पन्न करने वाले अथवा उसके विरोधी तत्वों का सर्वथा परिहार होना चाहिए। दीर्घ समासवाली संघटना कई बार बाधक बन जाती है, इसीलिए उसका अत्यन्त आग्रह नहीं रखना चाहिए-विशेषतः अभिनेयार्थं काव्य में अर्थात् नाटक में। इसके अतिरिक्त करुण और विप्रलम्भ श्ृंगार में भी यही होना चाहिए क्योंकि ये रस अत्यन्त सुकुमार हैं। इनमें तनिक भी अस्वच्छता होने पर अर्थ-बोध मन्थर बन जाता है। फिर भी जब रौद्रादि रस का प्रतिपादन करना हो तब मध्यम समासवाली संघटना और धीरोदात्त नायक हो तो दीर्घ समासवाली संघटना का उपयोग किया जा सकता है। इस तरह के प्रसंगों में रसोचित काव्य के लिए ऐसी संघटना की आवश्यकता होती है, अतः उसका नितान्त परिहार नहीं करना चाहिए। इसके बाद प्रसाद का महत्त्व समझाते हुए वे कहते हैं कि प्रसाद सभी रसों में और सभी प्रकार की संघटना में साधारण है। इसके अभाव में समासरहित संघटना भी करुण या विप्रलम्भ शृंगार को व्यक्त नहीं कर सकती और इसके मौजूद होने पर यह भी नहीं है कि मध्यमसमासवाली संघटना भी इन रसों को व्यक्त न कर पाये। अतः प्रसाद का सर्वत्र अनुसरण करना चाहिए। काव्य-भेद से संघटना-भेद इस तरह, संघटना के नियमन में वक्ता और वाच्य के औचित्य को समझाने के बाद वे कहते हैं कि इसके अलावा एक दूसरा तत्त्व भी संघटना का नियमन करता है क्योंकि काव्य भेद से संघटना में भी अन्तर आता है।१ यहाँ काव्य-भेद से आशय काव्य के अलग-अल्ग प्रकारों से है। यथा-निबद्ध रचना में मुक्तक, संदानितक, विशेषक, कलापक और कुलक अर्थात् क्रमशः एक, दो, तीन, चार और पाँच श्लोक- वाली रचनाएँ, पर्यायबन्ध अर्थात् वसन्तादि किसी ऋतु का वर्णन करने वाली रचनाएँ, परिकथा अर्थात् चार पुरुषार्थों में से किसी एक को लेकर अनेक वृत्तान्तों का वर्णन करने वाली कथा, कथा के अमुक खण्ड का वर्णन करने वाली खण्डकथा अथवा खण्डकाव्य, जिसमें अनेक वृत्तान्तों का वर्णन हो और वे सभी फल तक पहुँची हों ऐसी सकलकथा और सर्गबद्ध महाकाव्य; अभिनेयार्थ में दस प्रकार के रूपक और १. विषयाश्रयमप्यन्यदौचित्यं तां नियच्छति। काव्यप्रभेदाश्रयतः स्थिता भेदवती हि सा ॥३-७

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२२८ अभिनव का रस-विवेचन अनिबद्ध रचनाओं में आख्यायिका और चम्पू, इन सभी साहित्य प्रकारों का भी संघटना के चयन पर प्रभाव पड़ता है जो अब समझ में आता है। जैसा कि हम पहले देख आये हैं कि संघटना-प्रकार के उपयोग का प्रश्न तभी उठता है जबकि काव्य रसपरक हो; इसलिए अगर मुक्तक रसपरक है तो समासरहित अथवा मध्यम समासवाली संघटना का उपयोग करना चाहिए, वहाँ मनचाही किसी भी संघटना का उपयोग नहीं किया जा सकता। संदानितक आदि में तो विकट बन्ध ही आवश्यक होने के कारण मध्यमसमासवाली अथवा दीर्घसमासवाली संघटना का ही उपयोग करना चाहिए। ये मुक्तकादि अगर किसी प्रबन्ध के अंश हों तो प्रबन्ध के औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिए। यह मत आनन्दवर्द्धन का है। पर्यायबन्ध में समासरहित या मध्यमसमासवाली संघटना ही ठीक है। कदाचित् अर्थ के औचित्य के कारण दीर्घसमासवाली संघटना का उपयोग करना पड़े तो भी उसमें परुषा और ग्राम्यावृत्ति का परिहार करना चाहिए। परिकथा में किसी भी संघटना का उपयोग किया जा सकता है क्योंकि उसमें केवल वृत्तान्तों का ही सम्बन्ध बनाये रखना होता है, रसबन्ध महत्त्वपूर्ण नहीं होता। खण्डकथा और सवलकथा में तो दीर्घसमासवाली संघटना के प्रयोग पर कोई आपत्ति नहीं है, पर वहाँ भी रसानुरूप वृत्ति के औचित्य को बनाये रखना चाहिए। रसतात्पर्यवाले सर्गबद्ध महाकाव्य में रसानुरूप औचित्य की रक्षा होनी चाहिए। वहाँ मनमानी संघटना का उपयोग नहों हो सकता। अभिनेयार्थ काव्य में तो रसतात्पर्य का ही आग्रह रखना चाहिए। आख्यायिका और कथा में गद्य अधिक होता है और गद्य का मार्ग छन्दोबद्धता से भिन्न होता है, अतः उसके लिए नियम निश्चित नहीं हैं। इस पर भी, इसमें छन्दोबद्ध रचना के लिए निर्धारित औचित्य के नियमों का ही पालन होना चाहिए।१ अर्थात्, कवि अथवा पात्र अगर रसभावयुक्त न हो तो यथेच्छ और रसभावयुक्त हो तो उपर्युक्त नियमों का पालन कर रचना करनी चाहिए। इसमें भी विषय अर्थात् काव्य के प्रकार का औचित्य बनाये रखना चाहिए। आख्यायिका में तो अधिकांशतः मध्यमसमासवाली और दीर्घसमासवाली संघटना ही प्रयुक्त होनी चाहिए। कारण, गद्य में सौन्दर्य विकटबन्ध से ही आता है। कथा में विकटबन्ध की प्रचुरता अपेक्षित होती है, फिर भी रसानुरूप औचित्य का अनुसरण करना चाहिए। हम कादम्बरी में अनेक स्थानों पर, विशेषतः विप्रलम्भ और करुण के निरूपण के समय, नितान्त सीधी-सादी समासरहित छोटे-छोटे वाक्योंवाली रचना देखते हैं। इसलिए इन सभी का सार यह है कि रचना सदा रसानुरूप औचित्य से ही सुशोभित होती है, परन्तु विषय अर्थात् काव्य के प्रकार-भेद से उसमें थोड़ा बहुत अन्तर आ जाता है।२ अथवा यों कहें कि पद्य की भाँति गद्य में भी रचना रसबन्ध १. एतद्यथोक्तमौचित्यमेव तस्या नियामकम्। सर्वत्र गद्यबन्धेऽपि छन्दोनियमवजिंते ॥३-८॥ २. रसबन्धोक्तमौचित्यं भाति सर्वत्र संश्रिता। रचना विषयापेक्षं तत्तु किश्निद्विभेदवत् ।३-९।।

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औचित्य-विचार २२९ के औचित्य का अनुसरण करती है, पर काव्य के प्रकार-भेद से उसमें थोड़ा-बहुत अन्तर आ जाता है, सर्वथा अन्तर नहीं आता। इस प्रकार गद्य में आख्यायिका में भी विप्रलम्भ श्रृंगार और करुण में अतिदीर्घ समासवाली संघटना अच्छी नहीं लगती। नाटिका आदि में भी समासरहित रचना रखनी चाहिए आदि। प्रबन्ध में निर्वाहयोग्य औचित्य वर्ण, पद, वाक्य और संघटना की भाँति प्रबन्ध में भी असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि व्यक्त होती है। इसीलिए वह अब इसकी चर्चा उठाता है। पद या वाक्य की ध्वनि की भाँति समग्र प्रबन्ध की भी ध्वनि होती है। समग्र रामायण और महाभारत को भी महाकाव्य कहा जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि वाक्यों में पद जिस प्रकार आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि से समन्वित होकर एक अर्थ व्यक्त करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्रबन्ध के भी भिन्न-भिन्न अंश अपरिहार्य हो कर आने चाहिए और सभी अंशों के बीच पूरा औचित्य होना चाहिए। साथ ही, वे सभी अच्छे ढंग से एक दूसरे से ग्रथित हो कर एकत्व प्राप्त करने वाले होने चाहिए। सम्पूर्ण प्रबन्ध एक वाक्य बना हुआ होना चाहिए। प्रबन्ध को रसाभिव्यंजक बनाने के लिए आनन्दवर्द्धन पाँच वस्तुओं की आवश्यकता मानता है जो क्रमशः महत्त्वपूर्ण हैं, अर्थात् पहले का महत्त्व सबसे अधिक है, दूसरी का उससे कम है। इस प्रकार उत्तरोत्तर समझ लेना चाहिए। अब हम इन पाँचों वस्तुओं को क्रमशः देखेंगे। १. प्रबन्ध के रसाभिव्यंजक बनने के लिए पहले तो यह आवश्यक है कि कथा का शरीर विभाव, भाव, अनुभाव और संचारी के औचित्य से सुन्दर बना हुआ होना चाहिए।१ अर्थात् कथा में विभाव, भाव, अनुभाव और संचारी का औचित्य पूर्णतः बनाये रखना चाहिए। मान लीजिए कि शृंगार का निरूपण करना है तो कथा ऐसी लेनी चाहिए जिसमें नायक-नायिका का परस्पर औचित्य हो और जिसमें वसन्त ऋतु, माला आदि उद्दीपन विभाव और हर्ष, धृति आदि संचारी भाव स्पष्टरूप से आते हों। अब हम क्रमशः इन चारों औचित्यों पर विचार करेंगे। (क) विभावौचित्य तो प्रसिद्ध है, इस प्रकार जो कहा गया है उसका अर्थ यह है कि वह लोक-प्रसिद्ध है और भरतादि आचार्यों ने उसका विस्तार से निरूपण किया है। लोक में अमुक प्रकार का प्रेम उचित माना जाता है और अमुक प्रकार का अनुचित। किसी स्थिति में क्रोध उचित होता है तो किसी स्थिति में अनुचित। इसी तरह दूसरे भावों के विषय में भी कहा जा सकता है। भरत ने नाटक को लोकानुकीर्त्तन कहा है। शास्त्र-रचना लोक-स्वभाव के आधार पर ही होती है। अतः नाटक में लोक ही प्रमाण है। लोक की प्रकृति और प्रवृत्ति तो अनन्त हैं, अतः शास्त्र में उसका निरूपण सम्भव नहीं है। शास्त्र तो मात्र दिग्दर्शन कर सकते हैं। तदनुसार ही विभावौचित्य १. विभावभावानुभावसञ्चारयौचित्यचारुणः । विधि: कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा ॥३-१०॥

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२३० अभिनव का रस-विवेचन

को लेकर साहित्यदर्पणकार ने कहा है कि उपनायक विषयक, मुनि-गुरु-पत्नी आदि के प्रति, अनुभयनिष्ठ रति तथा प्रतिनायकनिष्ठ और अधम पात्र तिर्यक इत्यादि के प्रति श्रृंगार में अनौचित्य होता है। गुरु आदि के प्रति कोप, हीनपात्रनिष्ठ शान्त, गुरु आदि पर अवलम्बित हास्य, ब्रह्मवध आदि के प्रति उत्साह, अधम पात्रगत वीर और उत्तम पात्रगत भयानक अनुचित माने गये हैं। इसी प्रकार उद्दीपन विभावों के भी औचित्य का ध्यान रखना चाहिए। (ख) भावौचित्य अर्थात् प्रकृति औचित्य। प्रकृति के दो प्रकार से भेद किये जा सकते हैं : १. उत्तम, मध्यम और अधम, तथा २. दिव्य, अदिव्य (मानुष), दिव्यादिव्य (दिव्य-मानुष)। समान परिस्थिति में अलग-अलग प्रकृति के पात्र अलग-अलग ढंग से व्यवहार करते हैं, उनके मन में पृथक पृथक् भाव उत्पन्न होते हैं। बाघ को देख कर भीरू आदमी भय प्राप्त करता है तथा भाग जाता है और किसी वीर में उत्साह उत्पन्न होता है और वह शस्त्रों को सम्हालने लगता है। अतः पात्र की प्रकृति का टीक-ठीक अनुसरण कर अगर स्थायी भाव का निरूपण किया जाय और उसमें किसी विरोधी भाव का मिश्रण न हो तो और कोई अनुकूल या उदासीन भाव मुख्य न बन जाता हो तो स्थायी भाव औचित्यपूर्ण माना जायगा। अन्यथा केवल अदिव्य पात्रों से दिव्य पात्रों के और दिव्य पात्रों से अदिव्य पात्रों के काम करवाये जायें तो यह अनुचित होगा। इसी प्रकार, केवल अदिव्य राजा आदि के निरूपण में अगर सात समुद्रोल्लंघन जैसे कार्यों का वर्णन किया जाय तो वह सुन्दर होते हुए भी नीरस बन जाता है; इस नीरसता का कारण अनौचित्य है। इस प्रकार की किंवदन्ती है कि सातवाहन आदि राजा नागलोक गये थे तो सारी पृथ्वी का भरण-पोषण करने वाले राजाओं के अलौकिक प्रभाव का वर्णन करने में कैसा अनौचित्य ?- अगर इस तरह का प्रश्न उठे तो कहें कि इसमें अनौचित्य नहीं है। हमारा तो केवल इतना ही कहना है कि केवल अदिव्य पात्रों से सम्बद्ध उत्पाद्य वस्तुवाछी कथा के पात्रों में दिव्य पात्रों वाला औचित्य न लाया जाय। अर्थात् उनसे वे कार्य न करवाये जायें जो वेवल दिव्य पात्र ही कर सकते हैं। पर अगर दिव्यादिव्य पात्रों को कथा हो तो उसमें इस प्रकार के दिव्यादिव्य औचित्य की योजना में आपत्ति नहीं है, यथा -- पाण्डवों की कथा में। सातवाहन आदि की कथा के विषय में जितनी भी बातें प्रचलित हों उतनी ही की योजना की जाय यही उचित है। इसके अलावा जो वुछ योजित होगा वह भी उनमें अनुचित ही लगेगा। अतः इस मामले में सार की बात इतनी ही है कि अनौचित्य के अतिरिक्त रस-भंग में और कोई कारण नहीं है। प्रसिद्ध औचित्य का निरूपण ही रस की पराविद्या है-इसमें ही रसाभिव्यक्ति की मूल चाभी है।१

१. अनौचित्यादते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम्। प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा।।

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औचित्य-विचार २३१

इसी कारण भरत ने नाटक में प्रख्यात वस्तु और प्रख्यात व उदात्त नायक आवश्यक माना है। इस तरह करने से नायक के औचित्य अनौचित्य के बारे में कवि की भूल नहीं होती। जिस नाटक की वस्तु उत्पाद्य होती है उसमें अप्रसिद्ध और अनुचित नायक के स्वभाव-वर्णन में बड़ी भूल हो जाना सम्भव है।

रति में औचित्य की आवश्यकता यहाँ एक प्रश्न इस प्रकार का उठाया जाता है कि अगर आपको उत्साह आदि के वर्णन में दिव्यादिव्य आदि के औचित्य की परीक्षा करनी हो तो करें पर रति आदि में इसकी क्या आवश्यकता है ? रति तो भारतवर्ष के उचित व्यवहार के आधार पर ही दिव्य पात्रों की भी बतायी जाती है। इसके उत्तर में वे कहते हैं कि 'नहीं, ऐसा नहीं है।' इसमें अगर अनौचित्य का उल्लंघन हुआ तो बहुत बड़ा दोष हो जायगा। कारण, उत्तम प्रकृति वाले पात्र का शृंगार-निरूपण यदि अधम प्रकृति के औचित्य के अनुसार किया जाय तो क्या वह उपहास का पात्र नहीं होगा ? श्रृंगार को लेकर भारतवर्ष में तीन प्रकार के प्रकृति-औचित्य हैं। इसमें दिव्यौचित्य श्रृंगार-निरूपण में अनुपयोगी है-यदि आप ऐसा कहते हैं तो हम यह नहीं कहते कि शृंगार के बारे में दिव्यौचित्य अलग है। तो आप क्या कहते हैं ? हम यह कहते हैं कि भारतवर्ष में उत्तम नायक और राजाओं का शरृंगार जिस रूप में निरूपित होता है उसी रूप में दिव्य पात्रों का श्रृंगार भी अगर निरूपित किया जाय तो वह अच्छा होगा। नाटकों में राजाओं का शृंगार-निरूपण प्रसिद्ध ग्राम्य श्रृंगार के रूप में नहीं किया जाता। उसी के अनुसार देवों के विषय में भी ग्राम्य शृंगार का त्याग किया जाना चाहिए। नाटक आदि में अभिनय करना होता है और यदि सम्भोग शरृंगार का अभिनय किया जाय तो वह असभ्य हो जायगा। आप अगर इसीलिए कहते हैं कि नाटकों में इसका त्याग किया जाता है, तो कहना है कि यह बात नहीं है। अगर अभिनय में इस प्रकार के विषय से असभ्यता आती है तो काव्य में इस विषय से आने वाली असभ्यता को कैसे रोका जा सकता है ? इसलिए अभिनेयार्थ तथा अभिनेयार्थ काव्य में उत्तम प्रकृति के राजा आदि का उत्तम प्रकृति की नायिका के साथ ग्राम्य सम्भोग का वर्णन किया जाय तो यह माता-पिता के सम्भोग-वर्णन के समान ही अत्यन्त असभ्य है। उत्तम देवताओं के बारे में भी यही है।१

साथ ही, सम्भोग शरृंगार का सुरत ही एक मात्र प्रकार नहीं है; परस्पर प्रेम-दर्शन आदि दूसरे भी बहुत से प्रकार सम्भव हैं। तो फिर उत्तम प्रकृति के विषय में उसका

१. नाटकादेरभिनेयार्थत्वादभिनयस्य च सम्भोगशृङ्गारविषयस्यासभ्यत्वात्तत्र परिहार इति चेत्- न, यद्यभिनयस्यैवंविषयस्यासभ्यता तत्काव्यस्यैवंविषयस्य सा केन निवार्यंते? तस्मादभिन- येयाथेडनभिनेयाथें वा काव्ये यदुत्तमप्रकृते राजादेरुत्तमप्रकृतिभिर्नायिवाभिः सह ग्राम्य- सम्भोगवर्णनं तत्पित्रोः सम्भोगवर्णनमिव सुतरामसभ्यम्। तथैवोत्तमदेवतादिविषयम् ।-३३२

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२३२ अभिनव का रस-विवेचन ही निरूपण क्यों न किया जाय ?' इसी तरह उत्साह की भाँति रति आदि में प्रकृति- औचित्य का अनुसरण करना चाहिए और इसी तरह से विस्मय आदि में भी। इन मामलों में महाकवि भी बिना विचार किये व्यवहार करते दिखायी देते हैं। यह भी दोष ही है। यह दोष कवि की शक्ति के कारण ढँक जाने से ध्यान में नहीं आता, बस। यह पहले कहा जा चुका है। (ग) अनुभावौचित्य भरत आदि के द्वारा विस्तार से बताया गया है और अत्यन्त प्रसिद्ध है। जिस भाव के जो चेष्टा अनुकूल हो वही की जानी अथवा निरूपित होनी चाहिए। इसे ही अनुभाव-औचित्य का निर्वाह कहते हैं। मान लो कि कोई शोक का अभिनय मुँह खोल कर करे अथवा भ्रम की स्थिति में गम्भीरता धारण करे तो वह अनुचित ही होगा। इसी तरह अगर कोई नायिका किसी कामी द्वारा सम्बोधित होने पर क्रोध के उद्वेग को हास्य द्वारा व्यक्त करे तो वह अनुचित होगा। (घ) संचारी का औचित्य : अगर वेश्या में लज्जा का अथवा कुलस्त्री में लज्जा- हीनता का निरूपण किया जाय तो अनुचित माना जायगा। साथ ही, उत्तम प्रकृति के पात्रों में जैसी लज्जाशीलता होती है वैसी अधम प्रकृति के पात्रों में नहीं होती, अतः लज्जा के निरूपण में भी प्रकृति के अनुसार भेद होंगे। प्रबन्धौचित्य का सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण काम यह है कि इन चारों औचित्यों का ध्यान रख कर कथा-शरीर का निर्माण करे। इसीलिए अन्त में वह कवि को पुनः सूचना देता है कि इतना कहना चाहिए कि भरतादि के लक्षण-ग्रन्थों का अनुकरण कर, महाकवियों के प्रबन्धों का अध्ययन कर तथा अपनी प्रतिभा का अनुसरण कर कवियों को सावधान होकर विभावादि के औचित्य का भंग न हो, इसका पूरा प्रयत्न करना चाहिए। ऐतिहासिक और कल्पित वस्तु यह कहा गया है कि ऐतिहासिक, पौराणिक अथवा कल्पित भी औचित्यपूर्ण कथा- शरीर धारण कर रसाभिव्यंजक बन जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि इतिहासादि में रसपूर्ण लगने वाली अनेक प्रकार की कथाएँ होती हैं। फिर भी इनमें जो विभावादि के औचित्य से पूर्ण है उन्हें ही ग्रहण करना चाहिए, शेष नहीं। ऐतिहासिक अथवा पौराणिक की अपेक्षा कल्पित कथा में अधिक सावधान रहना चाहिए। कारण, उसमें अगर सावधान न रहे तो कवि के द्वारा अव्युत्पत्ति के कारण बहुत बड़ा दोष हो जाना सम्भव है। और अगर ऐसा दोष हो गया तो कवि यह बहाना नहीं बता सकता कि मैंने तो इतिहास का अनुसरण कर लिखा है और अगर वह यह बहाना बताये भी तो वह चल नहीं सकता; इस तरह कहने से दोष नहीं मिट जाता। उत्पाद्य वस्तु १. न च सम्भोगशृङ्गारस्य सुरतलक्षण एवैकः प्रकार: यावदन्येऽपि प्रभेदाः परस्परप्रेमदर्शनादयः सम्भवन्ति ते कस्मादुत्तमप्रकृतिविषये न वर्ण्यन्ते ।-३३३

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औचित्य-विचार २३३

का कथा-शरीर इस प्रकार रचना चाहिए कि जिससे सभी कुछ रसमय प्रतीत हो। इस तरह करने का यही उपाय है कि विभावादि के औचित्य का पूरी तरह से निर्वाह हो। साथ ही, सिद्ध रस के लिए रामायण आदि प्रख्यात प्रबन्धों में अपनी इच्छा से उत्पाद्य वस्तु नहीं जोड़ देनी चाहिए। और अगर जोड़नी ही पड़े तो वह रस-विरोधी तो नहीं होनी चाहिए।2 २. प्रबन्ध की रसव्यंजकता के लिए दूसरी बात यह महत्त्वपूर्ण है कि इतिहास का अनुसरण करते समय रस के प्रतिकूल अगर कोई स्थिति आती हो तो उसे छोड़ कर कल्पित वस्तु के द्वारा अभीष्ट रस के अनुकूल कथा का उत्कर्ष दिखाना चाहिए।३ कालिदास आदि ने यही किया है। कवि को काव्य रचने के समय सम्पूर्णतः रसपरतन्त्र रह कर ही व्यवहार करना चाहिए। इतिहास में अगर कोई स्थिति रस के प्रतिकूल आती है तो उसका त्याग करना चाहिए और रसानुकूल दूसरी स्थिति की कल्पना कर लेनी चाहिए। कवि का काम इतिहासमात्र का निर्वाह करना नहीं है। वह इतिहास से ही सिद्ध हो जाता है।" ३. प्रबन्ध की रसव्यंजकता के लिए तीसरी मुख्य बात यह है कि सन्धियों और उनके अंगों आदि का रसाभिव्यक्ति की दृष्टि से संघटन करना चाहिए। केवल शास्त्र के निर्वाह के लिए यह न किया जाय। इसका अर्थ यह है कि लक्षण-ग्रन्थों में प्रबन्ध की जो सन्धियाँ और उनके अंगोपांग बताये गये हैं उन सभी की योजना 'रत्नावली' के अनुसार रसाभिव्यक्ति को ध्यान में रख कर की जानी चाहिए। जहाँ इस व्यवस्था के निर्वाह से हानि पहुँचती हो वहाँ केवल काव्यशास्त्र का पालन करने के हेतु से इन अंगोपांगों की योजना नहीं करनी चाहिए। 'वेणीसंहार' में इसी प्रकार हुआ है। यहाँ प्रतिमुख-सन्धि का विलास नामक अंग योजित करने के उपक्रम में रस की हानि हुई है, जो नहीं किया जाना चाहिए। ४. प्रबन्ध की रसव्यंजकता के लिए चौथा यह महत्त्वपूर्ण है कि प्रसंगानुसार रस के

१. कथाशरीरमुत्पाद्यवस्तु कार्य तयातया। यथा रसमयं सर्वमेव तत्प्रतिभासते॥ २. सन्ति सिद्धरसप्रख्या ये च रामायणादयः । कथाश्रया न तैर्योज्या स्वेच्छा रसविरोधिनी। ३. इतिवृत्तवशायातां त्यक्त्वाननुगुणां स्थितिम्। उत्प्रेक्ष्याऽप्यन्तराभीष्टरसोचितकथोन्नयम् ।। ३-११। ४. कविना काव्यमुपनिबद्धता सर्वात्मना रसपरतन्त्रेण भवितव्यम्। तत्रेतिवृत्ते यदि रसाननुगुणां स्थिर्ति पश्येतदेमां भङ् क्त्वापि स्वतन्त्रतया रसनुगुणं कथान्तरमुत्पादयेत। न हि कवेरितिवृत्त- मात्रनिर्वहणेन किञ्चित्प्रयोजनम् । इतिहासादेव तत्सिद्धेः। ५. सन्धिसन्ध्यङ्गघटनं रसाभिव्यक्त्यपेक्षया। न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया॥ ३-१२।।

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२३४ अभिनव का रस-विवेचन

उद्दीपन और शमन का निरूपण होते रहना चाहिए।१ सतत एक ही रस की प्रगाढ़ता निरूपित करने का प्रयास नहीं होना चाहिए। अगर एक ही रस का परिमर्दन किया जायगा तो वह मालती के पुष्प की भाँति कुम्हाला जाता है। साथ ही, अगर इतिहास- निर्वाह के लिए किसी रस को लम्बे समय तक छोड़ देना पड़े तो बीच-बीच में उसका अनुसन्धान करते रहना चाहिए जिससे वह बिल्कुल ओझल न हो जाय। 'तापसवत्सराज' में इस युक्ति को आजमाया गया है। ५. प्रबन्ध की रसव्यंजकता के लिए अन्तिम पाँचवीं बात यह है कि शक्ति होने पर भी अलंकारों की योजना औचित्यानुसार करनी चाहिए।2 अनेक बार शक्तिशाली कवि भी अलंकार की योजना करते समय केवल उसी में लीन हो जाते हैं और रस की चिन्ता के बिना ही प्रबन्ध का आरम्भ कर देते हैं। उन्हें चेताने के लिए यह लिखा गया है। प्रबन्धों में केवल अलंकार-योजना में ही आनन्द लेने वाले और रस की अपेक्षा पूरी न करने वाले कवि भी देखे जाते हैं। इस प्रकार, प्रबन्ध में निर्वाह किये जाने वाले औचित्य को विस्तार से समझाने के बाद और यह कहने के बाद कि असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य की आत्मा रसादि है जो वर्ण, पद, वाक्य और प्रबन्ध से व्यक्त होती है, कहने के लिए कुछ भी नहीं रह जाता, फिर भी कवि-सहृदयों को सिखाने के लिए वे कहते हैं कि यह असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि कितनी ही बार सुप् (संज्ञा को लगने वाला प्रत्यय), तिङ (क्रियापद को लगने वाला प्रत्यय), वचन, सम्बन्ध, कारकशक्ति, कृत् प्रत्यय, तद्धित प्रत्यय और समास-इन सभी की विशेषता से भी द्योतित होती है। अर्थात् अगर ये सभी वस्तुएँ समुचित रूप से प्रयुक्त हुई हों तो वे भी रसादि की व्यंजक बन सकती हैं। क्षेमेन्द्र की औचित्य-स्थानों की सूची पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि उन्होंने इन अंगों को स्थान दिया है, उसका संकेत, सम्भव है, उन्हें यहीं से मिला हो। वहाँ उन्होंने इन और इन जैसे अंगों की पृथक्- पृथक उदाहरण देकर चर्चा की है। हम यहाँ आनन्दवर्द्धन द्वारा दिये गये एक ही इलोक को जरा विस्तार से देखेंगे। उसने एक ही श्लोक में इन सभी अंगों के विशेष उपयोग से अर्थात् औचित्यपूर्ण योजना से प्रकट होने वाली व्यंजना को समझाया है। 'हनूमन्नाटक' के चौंदहवें अंक में राम राक्षसों का विनाश करते हैं उस समय क्रुद्ध हुआ रावण आत्मतिरस्कार करता हुआ बोलता है : न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः । धिक्-धिक् शऋरजितं प्रबोधितवता कि कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुजैः॥ १. उद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा। रसस्यारब्धविश्रान्तेर नुमन्धानमङ्गिनः ॥ ३-१३॥ २. अलङ्गतीनां शक्तावप्यानुरूप्येण योजनम्। प्रबन्धस्य रसादीनां व्यअ्ञकत्वे निबन्धनम् ॥ ३-१४ ॥।

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औचित्य-विचार २३५

चर्चा में कुछ सहायता मिल सके इसलिए मैं इसका एक चलता हुआ-सा अनुवाद प्रस्तुत करता हूँ : मेरे कोई शत्रु हों यही मेरे लिए अपमान है, उस पर भी यह तापस ? वह भी यहाँ राक्षसकुल का वध कर रहा है और रावण जी रहा है, यह आश्चर्य की बात है। शक्र के जीतने वाले इन्द्रजित को धिक्कार है, कुम्भकर्ण को जगाने से भी क्या फल हुआ ? स्वर्ग की छोटी गँउटिया को लुण्ठित करके वृथा फूली हुई मेरी इन भुजाओं से भी क्या लाभ ? 'मेरे शत्रु हों यही धिक्कार की बात है'-इसमें विभक्ति, सम्बन्ध और वचन अभिव्यंजक हैं। 'मेरा' प्रथम पुरुष सर्वनाम के एकवचन की सम्बन्ध-विभक्ति का रूप है। इसकी व्यंजना यह है कि मैं अकेला ही जगत् को नष्ट करने में समर्थ हूँ। मुझ जैसे के कोई शत्रु हो यही आश्चर्य की बात है। 'मेरे' सम्बन्ध विभक्ति है। इसकी व्यंजना यह है कि मेरा कोई शत्रु हो और मेरा किसी के साथ वध्य और घातक का सम्बन्ध हो यह असम्भव है। कारण, मेरे साथ शत्रुता करने पर कोई जीवित नहीं रह सकता। 'शत्रु' में बहुवचन का व्यंग्यार्थ यह है कि पहले तो यही आश्चर्य है कि मेरे कोई शत्रु हो फिर बहुत से शत्रुओं का तो कहना ही क्या? 'उनमें भी यह तो तापस है।' इसमें तद्धित और निपात व्यंजक हैं। 'तापस' शब्द में 'वाला' अर्थ का 'अण्' तद्धित प्रत्यय है और 'अपि' निपात है। तापस अर्थात् जिसमें तप है वह। इसका व्यंग्यार्थ यह है कि जिसमें तप तो है, पर पौरुष नहीं है। कोई वीर पुरुष मेरे सामने सिर उठाये तो समझ में आता है, पर यहाँ तो मेरे सामने एक तपस्वी ने सिर उठाया है।' वह भी यहीं राक्षसकुल का निकन्दन निकालता है। 'यहाँ' भी से शत्रु की निर्माल्यता ध्वनित होती है। ऐसा वह निर्माल्य मनुष्य भी यहीं जहाँ मैं मौजूद हूँ, जहाँ मेरा पूर्ण प्रताप प्रवर्तित है वहीं, किसी दूरस्थ स्थान पर नहीं, राक्षसकुल का संहार करता है। 'निहन्ति' में 'नि' उपसर्ग है जिसकी ध्वनि यह निकलती है कि निःशेषतः- सम्पूर्णतः संहार करता है। 'अहो, रावण जिन्दा है।': और आश्चर्य की बात यह है कि रावण जिन्दा है। यहाँ रावण अपने लिए 'रावण' शब्द का प्रयोग करता है जिससे उसके 'अजोड़ पराक्रमशाली' होने की ध्वनि निकलती है। साथ ही, 'संहार करता है' और 'जिन्दा है'-इन दोनों क्रियाओं के रूप भी यहाँ व्यंजक हैं। रावण जिन्दा है फिर भी वह संहार करता है, कैसी असम्भव बात हो रही है। इसकी अपेक्षा मैं मर गया होता तो अच्छा होता। 'अहो' अव्यय भी व्यंजक है। इस प्रकार इस श्लोकार्द्ध का व्यंग्यार्थ यह होता है कि 'मैं, रावण, अजोड़ पराक्रमी और सम्पूर्ण जगत् को अकेले ही जीतने में समर्थ हूँ। मुझ जैसे का कोई शत्रु हो यही आश्चर्य की बात है। फिर भी एक-दो शत्रु हो तो समझ में आ सकता है, ये शत्रु जागे हैं। शत्रु भी अगर कोई पराक्रमशाली पुरुष हो तो समझ में आ सकता है; पर वह तो तापस है जिससे पराक्रम की अपेक्षा रखी ही नहीं जा सकती। वह भी दूर हो तो कोई

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२३६ अभिनव का रस-विवेचन

· बात हुई, पर वह तो यहीं, जहाँ मेरा पूर्ण प्रताप प्रवर्तित है वहीं-मेरी छाती पर सवार है; इतना ही नहीं, राक्षसकुल का संहार करता है। इस तरह का संहार मेरे मरने के बाद हुआ होता तो ठीक होता। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह देखने के लिए मैं जिन्दा हूँ।' 'धिक् धिक शक्रजितम्'-'इन्द्रजित को धिक्कार है।' 'धिक्' शब्द दो बार प्रयुक्त हुआ है जो धिक्कार की तीव्रता बताता है। 'इन्द्रजित' के लिए 'शक्रजित' का प्रयोग किया है जो स्वयं भी व्यंजक हैं। 'शक्र' का अर्थ है शत्रुओं को जीतने वाला। शत्रुओं को जीतने वाले इन्द्र को जिसने जीता था उसके लिए मानव राम को जीतना तो खिलवाड़ था, पर उस मेघनाथ की शक्ति भी काम न आयी। धूल पड़ी उस इन्द्र को जीतने वाली शक्ति पर। यहाँ 'शक्रजित' उपपद समास व्यंजक बन जाता है। 'कुम्भकर्ण को जगाया, पर उससे भी क्या हुआ ?' यहाँ 'प्रबोधिवता' शब्द का उपयोग किया गया है। इसमें 'प्र' उपसर्ग का अर्थ प्रकर्ष है। 'बुध' धातु का प्रेरक रूप प्रयुक्त हुआ है जो इस बात को बताता है कि जगाने के लिए प्रयत्न करना पड़ा था। अर्थात् इसका अर्थ यह हुआ कि अतिपरिश्रम से कुम्भकर्ण को जगाने पर भी क्या हुआ? मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पराक्रम की बात भी भूतकाल की बात हो गयी। उसे याद करने से लाभ ? अरे, मेरा खुद का पराक्रम किस काम आया ? 'स्वर्ग' को एक तुच्छ गाँव की भाँति विलुण्ठित कर वृथा फूली हुई मेरी ये भुजाएँ किस काम की? यहाँ स्वर्ग को 'ग्रामटिका' कहा गया है। ग्राम का अर्थ गाँव है। इसमें अल्पार्थवाचक 'टिका' स्त्रीलिंग का प्रत्यय लगाया गया है जो क्षुद्रता और तुच्छता का बोध कराता है। स्वर्ग तो देवों का धाम है। उसे जीतना कोई हँसी-खेल नहीं है, फिर भी एक सामान्य गाँव को नष्ट करने के समान मैंने स्वर्ग को विलुण्ठित कर दिया था। 'विलुण्ठन' में 'वि' उपसर्ग की ध्वनि यह है कि निर्दयतापूर्वक आक्रान्त कर दिया था। इस तरह के पराक्रम से भुजाएँ फूलें तो यह स्वाभाविक है, पर यहाँ उन्हें वह वृथा कहता है, कारण, वे पराक्रमशाली भुजाएँ भी आज किसी काम की नहीं रही थीं-व्यर्थ सिद्ध हुई थीं। 'भुजाएँ' बहुवचनसूचक है जिसकी ध्वनि है कि मेरी ऐसी पराक्रमशाली बीस-बीस भुजाएँ भी अब व्यर्थ और भाररूप सिद्ध हुई। इस प्रकार इस श्लोक का प्रत्येक शब्द बल्कि अक्षर-अक्षर भाव-व्यंजना में उपकारक सिद्ध हुआ है। अभिनव गुप् ने ठीक ही कहा है कि अगर इस श्लोक के तिल के समान छोटे-छोटे टुकड़े भी कर दिये जायें तो भी वे सभी व्यंजकता से शोमित हो उठेंगे। यही श्रेष्ठ काव्य का लक्षण है। वे बाद में, विरोधी और अविरोधी, अंग और अंगी रस की योजना को लेकर औचित्य की विस्तार से चर्चा करने के बाद अन्त में जा कर कहते हैं कि रसादिविषयक औचित्यपूर्वक वाच्यों और वाचकों की योजना करना ही महाकवि का मुख्य कर्म है।"

१. वाच्यानां वाचकानां च यदौचित्येन योजनम्। रसादिविषयेणैतत्कर्म मुख्यं महाकवेः ॥३-३२॥

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औचित्य-विचार २३७

समापन इस प्रकार क्षेमेन्द्र की चर्चा में जो गर्मित है उसे ही आनन्दवर्द्वन की चर्चा में स्पष्टतः कहा गया है। औचित्य का विचार रस को ध्यान में रख कर ही करना चाहिए और विरोधी-अविरोधी तथा अंगांगी रसों की योजना में रस-भंग न हो, इसका ध्यान रखना चाहिए। क्षेमेन्द्र ने औचित्य को रस का जीवित भूत कहा है जिसका अर्थ यही है कि औचित्य के निर्वाह न होने पर रस-निष्पत्ति नहीं होगी और रस तो काव्य की आत्मा है। इसीलिए आनन्दवर्द्धन ने औचित्य की चर्चा रस को केन्द्र में रख कर की है। रस-निष्पत्ति के लिए जिस तरह के विभाव, भाव, अनुभाव और संचारी उचित हों उसी प्रकार उनका निरूपण करना चाहिए। जिसमें औचित्य का निर्वाह होता हो उसी तरह की कथा पसन्द करनी चाहिए। ऐतिहासिक अथवा पौराणिक कथा के लेने पर उसमें आने वाली रस के प्रतिकूल स्थितियों का त्याग करना चाहिए और रस का जिस रूप में उत्कर्ष हो उसी रूप में कल्पना से कथा का निरूपण करना चाहिए, कथा की सन्धियों और अंगों की योजना भी रसानुकूल ही करनी चाहिए-मात्र शास्त्र का पालन करने की दृष्टि से नहीं करनी चाहिए। अलंकारों का प्रयोग भी उतना और वैसा ही होना चाहिए जितना रस के लिए उपकारक हो। सुप, तिङ्, निपात, समास, लिंग, वचन, कारक, सम्बन्ध, आदि का प्रयोग भी रस को लक्ष्य में रख कर औचित्यपूर्ण ढग से करना चाहिए। संघटना की योजना भी मुख्यतः रसौचित्य को ही ध्यान में रख कर करनी चाहिए। यही उनकी चर्चा का समग्रतः सार है।

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काव्य में अर्थ

मेरे लिए विषय पसन्द किया गया है : 'काव्य में अर्थ' अथवा 'काव्य और अर्थ'। मुझे काव्य पर नहीं बल्कि अर्थ पर विशेष रूप से बोलना है। इसलिए मैंने आज अपने देश के आचार्यों द्वारा काव्य के सम्बन्ध में अर्थ को लेकर जो विचरणा की गयी है उसका परिचय देने का विचार किया है। काव्य शब्दार्थ से निर्मित है और काव्य का पर्यवसान रसास्वाद में होता है। पर शब्दार्थ का रसास्वाद में पर्यवसान होने के लिए काव्य में प्रयुक्त शब्दार्थों में अमुक विशेषता होनी आवश्यक है। यह विशेषता अपने देश के आलंकारिकों के मतानुसार गुणालंकार है। इस प्रकार गुणालंकार से संस्कृत शब्दार्थ ही काव्य-पद प्राप्त कर सकते है।-यह बात वामन कहते हैं।१ इस दृष्टि से देखने पर, काव्य के शब्दार्थ, रस और गुणालंकार, शास्त्रीय दृष्टि से पृथक विचारणीय होने पर तत्त्वतः अविभाज्य तीन घटक हैं और काव्यशास्त्र इन तीनों घटकों के पारस्परिक सम्बन्धों पर विचार करता है। आज हमें मुख्यतः शब्दार्थ पर विचार करना है। व्याकरण, न्याय, मीमांसा और काव्य शब्दार्थ पर विचार करते समय व्याकरण, न्याय और मीमांसा ये तीनों शास्त्र आँखों के आगे आ खड़े होते हैं क्योंकि इन तीनों ने अपने-अपने ढंग से शब्दार्थ पर विचार किया है। काव्यशास्त्र ने इन तीनों से अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ ग्रहण की हैं। फिर भी इसका व्याकरण के साथ जितना सम्बन्ध है उतना न्याय अथवा मीमांसा के साथ नहीं है। काव्यशास्त्र ने बहुत-सी बातों में व्याकरण का आश्रय ले रखा है, अतः यह कहा जाता है कि अलंकारशास्त्र व्याकरण की पूँछ है। यहाँ पूँछ का अर्थ है परिशिष्ट-अॅपेन्डिक्स। व्याकरणशास्त्र शब्द की शुद्धि-अशुद्धि पर विचार करता है तो काव्यशास्त्र अथवा अलंकारशास्त्र, व्याकरण द्वारा शुद्ध घोषित शब्दों में से कौन से अमुक सन्दर्भ में प्रयोग किये जाने योग्य हैं, उन पर विचार करता है। अतः दूसरे ढंग से कहें तो व्याकरण शब्द कीं शुद्धता-अशुद्धता पर विचार करता है और काव्यशास्त्र शब्द की योग्यता-अयोग्यता अथवा उसके औचित्य पर विचार करता है। उदाहरणार्थ रव, नाद, रणित, कूजित, स्तनित, गर्जित नामक सभी शब्द 'आवाज' का ही अर्थ देते हैं और व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हैं। फिर भी काव्य में ये मनचाहे ढंग से प्रयुक्त नहीं किये जा सकते। 'सिंहरव' नहीं कहा जा सकता, 'सिंहनाद' ही १. काव्यशब्दोडयं गुणालक्कारसंस्कृतशब्दार्थयो: वर्तते।-वामन, १, ११। राजशेखर भी यही बात कहते हैं : गुणवदलङ्कतं च वाक्यमेव काव्यम्।

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काव्य में अर्थं २३९

कहा जायगा। 'मण्डूकरव' ही कहा जायगा। कंकणादि का स्वर 'रणित' ही कहा जायगा, सेघ का स्तनित अथवा गर्जित ही कहा जायगा, पक्षियों का कूजित ही होगा। दो दृष्टात्तों में यह बात अधिक स्पष्ट हो जायगी। 'कुमारसम्भव' में बटुवेश में आगत शिव, पार्वती को शंकर से विवाह करने के उसके निश्चय से पतित करने के लिए जो तर्क देते हैं उसमें एक स्थान पर वे कहते हैं : द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया पिनाकिन: । कला च सा कान्तिमती कलावतः त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदो॥ अर्थात् तू पिनाकिन से विवाह करने के लिए तैयार है अतः हमें अब दो वस्तुओं का शोक करना रहा : एक तो कलावान चन्द्र की वह कान्तिमती कला और दूसरी इस लोक की नेत्रकौमुदी तू। यहाँ उमा की शिव के साथ जुड़ने की इच्छा में जो अनौचित्य निहित है उसे कवि गले उतारना चाहता है, अतः शिव के लिए प्रयुक्त शब्द 'पिनाकी' शिव के पराक्रम का व्यंजक शब्द होने के कारण यहाँ काव्य के लिए विशेष रूप से उपकारक नहीं है। अगर इसके बदले में छन्द में समुचित रूप से प्रयुक्त हो सकने वाला 'कपाली' शब्द उपयोग में लाया गया होता तो एक टीकाकार के अनुसार, अधिक अच्छा रहता। इस टीका में औचित्य का ही विचार प्रधान है जो सत्य भी प्रतीत होता है। इस लोक की नेत्रकौमुदी (आँखों को शीतल करने वाली) तू खोपड़ियों के हार पहनने वाले शिव से विवाह करने के लिए तैयार हो, यह तो गजब है !- अगर कवि ने यह पंक्ति इस तरह से लिखी होती कि 'समागमप्रार्थनया कपालिनः' तो यह भाव अधिक उठ पाता।

पाकिस्तान ने अपने देश पर आक्रमण किया तब राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने राष्ट्र के प्रति जो वायु-प्रवचन किया था उसके अन्तिम भाग में एक संस्कृत उक्ति उद्धृत की थी : वीरभोग्या वसुन्धरा। इसमें पृथ्वी के लिए अनेक शब्द होने पर भी कवि ने 'वसुन्धरा' शब्द का ही चयन किया है जो अत्यन्त औचित्यपूर्ण है। धनधान्य से पूर्ण इस पृथ्वी को वीर ही भोग सकते हैं, कायर नहीं। इस व्यंग्यार्थ को 'वसुन्धरा' शब्द अच्छा उठाव दे जाता है। इस प्रकार चूँकि व्याकरण द्वारा शुद्ध घोषित शब्दों का-काव्य-निरूपित सन्दर्भ की दृष्टि से उचितानुचित का, उसके औचित्य का काव्यशास्त्र विचार करता है इसीलिए उसे व्याकरण शास्त्र की पूँछ भी कहा गया है। पर, इसका अर्थ भी नहीं है कि काव्यशास्त्र सभी बातों में व्याकरणशास्त्र का अनुसरण करता है। जहाँ तक दोनों का मेल सम्भव हुआ वहाँ तक उसने व्याकरण के साथ मेल का निर्वाह किया, पर जहाँ दोनों में यह सम्भव न हुआ वहाँ उसने व्याकरण का साथ छोड़ दिया। अगर हम आज के विषय की बात करें तो काव्यशास्त्र ने स्वस्वीकृत अभिधावृत्ति के लिए व्याकरणशास्त्र का आधार लिया, पर चूँकि व्याकरण को लक्षणा मान्य नहीं है, अतः लक्षणा के लिए उसने मीमांसा

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२४० अभिनव का रस-विवेचन का आधार ग्रहण किया। पर, चूँकि व्याकरण और मीमांसा दोनों ही व्यंजना को नहीं मानते, अतः व्यंजना की सिद्धि के लिए उसने अपना स्वतन्त्र मार्ग अपनाया। और इसका प्रभाव अन्ततः व्याकरण के ऊपर भी पड़ा और बाद में व्याकरण ने व्यंजना को भी मान्यता प्रदान की। नागेशभट्ट ने अपनी 'परमलघुमंजुषा' में शब्दशक्ति के विषय में कहा है कि 'शक्तिर्दविधा-प्रसिद्धा अप्रसिद्धा च। आमन्दबुद्धिवेद्यत्वम् प्रसिद्धत्वम् ; सहृदयमात्रवेद्यत्वम् अप्रसिद्धत्वम्।' शक्ति दो प्रकार की हैं : प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध। मन्द बुद्धि वाला भी जिसे समझ सके वह प्रसिद्ध और जिसे केवल सहृदय ही समझ सकें वह अप्रसिद्ध शक्ति है। यह सहज ही समझ में आ जाता है कि अप्रसिद्ध शक्ति ही व्यंजना है। भर्तृहरि आदि ने भी निपातों की द्योतकता और स्फोट की व्यंजकता बतायी है। उसका उल्लेख कर अन्त में उसने स्पष्ट मत दिया है कि 'वैयाकरणानां अपि एतत्स्वीकारः आवश्यकः।' वैयाकरणों को भी इसे स्वीकार करना चाहिए। पद-विचार काव्यशास्त्र ने भी व्याकरणशास्त्र की भाँति ही पद और वाक्य पर विचार किया है। काव्य-दृष्टि से पदवाक्य पर विचार करते हुए राजशेखर कहते हैं कि 'व्याकरण-शास्त्र द्वारा शुद्ध घोषित शब्द अभिधान आदि में लिखित हैं। शब्द का जो अभिधेय होता है वह शब्द का अर्थ कहलाता है।' शब्द और अर्थ मिलकर पद बनता है।१ पद की यह व्याख्या व्याकरणशास्त्र का अनुसरण नहीं करती, पर न्यायशास्त्र का अनुसरण करती है। व्याकरण में सुबन्त या तिडन्त (संज्ञा अथवा धातु के साथ लगने वाले प्रत्ययों से युक्त शब्द ) को ही पद के रूप में स्वीकार किया गया है; पर न्याय मे 'शक्त पदम्' अर्थात् अर्थ व्यक्त करने की शक्ति से सम्पन्न शब्द ही पद है। इस प्रकार काव्यशास्त्र द्वारा स्वीकृत व्याख्या न्यायशास्त्र के समान है। शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य है, इस बारे में व्याकरण और मीमांसा एकमत हैं। मीमांसा में इसकी विस्तृत चर्चा आती है कि शब्द और अर्थ के बीच कैसा सम्बन्ध होना चाहिए। मीमांसा इस सम्बन्ध को नित्य और अपोरुषेय मानती है। इसका विरोध करते हुए पूर्वपक्ष कहता है कि 'शब्द और अर्थ का सम्बन्ध ही नहीं है फिर यह पौरुषेय और अपौरुषेय होने की बात ही क्यों ? यह समझाता हूँ कि यह किस रूप में है। अगर आपका यह अभिप्राय है कि शब्द और अर्थ का पारस्परिक सम्बन्ध संश्लेषात्मक है तो क्षुर के उच्चारण के साथ ही मेरा मुँह कट जाना चाहिए, और मोदक कहते ही मेरे मुख में लड्डू भर जाना चाहिए। पर, यह तो होता नहीं है। साथ ही कार्य-कारण, निमित्त-नैमित्तिक, आश्रय-आश्रयी आदि जो सम्बन्ध है वह शब्द और अर्थ के मामले में सम्भव नहीं है।' इसका उत्तर देता हुआ उत्तरपक्ष कहता १. व्याकरणस्मृतिनिणीतः शब्दो निरुक्तनिघण्टवादिभिनिदिष्टः तदभिधेयोऽर्थः । तौ पदम्। काव्यमीमांसा, अध्याय ६।

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काव्य में अर्थ २४१

है : 'वाह ! आप भी खूब हैं ! आपने इतने सारे सम्बन्धों का स्मरण किया पर एक सम्बन्ध नो शब्द और अर्थ के मामले में विशेष उल्लेख्य है उसका तो आप नाम ही नहीं लेते ! यह सम्बन्ध है प्रत्याय और प्रत्यायक का और इसका नाम है संज्ञासज्ञी सम्बन्ध।" अर्थात् शब्द संज्ञा है और अर्थ संज्ञी है। 'लड्डू' शब्द कहते ही मुँह भले ही लड्डू से न भरे पर लड्डू का मानसिक बोध तो होता ही है, यही इनका सम्बन्ध है।

वाक्यविचार पद के बाद वाक्य आता है। राजशेखर वाक्य की व्याख्या इस प्रकार देता है कि वक्रता के आशय को ग्रन्थित करने वाली पद-रचना ही वाक्य है-'पदानामभि- धित्सितार्थं ग्रन्थनाकरः सन्दर्भो वाक्यम्।-पृ०२२। वाक्य के बारे में व्याकरणशास्त्रियों का नियम यह है कि जितने ही क्रियापद हैं उतने ही वाक्य माने जायेंगे। काव्यशास्त्र में यह नियम लागू नहों होता। वहाँ क्रियापद तो चाहे कितने ही हों पर अर्थ अथवा आशय अगर एक है तो वह एक ही वाक्य माना जायगा। राजशेखर की धारणा के समान ही भोज ने भी काव्य- दृष्टि से इसी प्रकार की व्याख्या दी है : 'एकार्थपरः पदसमूहः वाक्यम्।' इसका अर्थ यह हुआ कि कवि एक ही साथ जितनी कल्पना अथवा जितना अर्थ प्रकट करना चाहता है उसे प्रकट करने वाला पद-सन्दर्भ अथवा पद-रचना ही वाक्य है। काव्य में वाक्यार्थ है एक सम्पूर्ण विचार अथवा कल्पना। एक पूर्ण विचार अथवा कल्पना को व्यक्त करने वाला वाक्य-भले ही उसमें एक या अनेक क्रियापद हों। काव्य में वाक्य का अभिधेय कोई प्रत्यय-आइडिया होता है। इस तरह के वाक्यों को ही काव्य में वचन अथवा उक्ति कहते हैं। जिस वचन या उक्ति अथवा वाक्य में विशेषता हो वही काव्य है : 'उक्तिविशेषः काव्यम्'। इस तरह के वाक्य में कितनी ही विशेषताएँ आवश्यक हैं : जिन पदों से यह वाक्य निर्मित है उन पदों में योग्यता, आकांक्षा और आसत्ति नामक धर्म होने चाहिए। योग्यता का अर्थ है पद-संगति। यथा-अगर कोई यह कहता है कि 'अग्नि से सींचता है' तो इसमें 'अग्नि' का अर्थ और 'सींचता है' का अर्थ परस्पर संगत नहीं है-इन दोनों का मेल नहीं है अतः इन पदों में योग्यता नहीं है फलतः यह वाक्य ही नहीं बना पाता। इसके स्थान पर अगर यह कहा गया होता कि 'पानी से सींचता है' तो १. नैव शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः कुतोऽस्य पौरुषेयता अपौरुषेयता वा इति। कथम्। स्यात् चेत् ...... अर्थेन सम्बन्धः क्षुरमोदकशब्दोच्चारणेमुख्यस्य पाटनपूरणे स्याताम् यदि संश्लेषलक्षणसम्बन्ध- मभिप्रेत्य उच्यते। कार्यकारणनिमित्तनैमित्तिकाश्रयाश्रयिभावसंयोगादयस्तु सम्बन्धाः शब्दस्या- नुपपन्ना एवेति। उच्यते, यो ह्यत्र व्यपदेश्यः सम्बन्धः तमेकं न व्यपदिशति भवान्। प्रताय- यस्य प्रत्यायकस्य च संज्ञासंशिलक्षण इति।-मीमांसादर्शन, शबरभाष्य, अध्याय १, पाद १, सूत्र ५। डॉ० झा के अंग्रेज़ी ग्रंथ के अनुसार मूल पाठ और अनुवाद दिये गये हैं। १६

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२४२ अभिनव का रस-विवेचन इन पदों के बीच में संगति होती और ये पद वाक्य बन जाते। आकांक्षा का अर्थ है श्रोता की जिज्ञासा-जानने की इच्छा। जिस शब्द के अभाव में श्रोता की जिज्ञासा सन्तुष्ट न हो उस शब्द को आकांक्षावाला शब्द कहा जायगा। इस बारे में मीमांसकों की व्याख्या इस प्रकार है : 'अर्थैकत्वादेकं वाक्यम् साकांक्षं चेत् विभागे स्यात्।'- जैमिनी, अध्याय २, पाद १, सूत्र ४६ । विभाग करने से साकांक्ष बन जाने वाले एक अर्थ का प्रतिपादक वाक्य है। अर्थात् जितने पदों से एक अर्थ की प्रतीति हो उतने ही पदों का एक वाक्य बनता है-पदों की संख्या चाहे कितनी ही हो। पर, यह किस प्रकार निश्चित किया जाय कि वाक्य में अमुक पद आवश्यक है या नहीं ? पदों से किसी पद को अलग कीजिए, उसके विभाग कीजिए और अगर वाक्य का अर्थ अधूरा रह जाता है तो मान लीजिए कि वह पद आवश्यक है। इस तरह के आकांक्षा- युक्त पद ही वाक्य के अंग बन सकते हैं। आकांक्षारहित पद वाक्य की दृष्टि से अनावश्यक है। इस प्रकार, वाक्य के पद योग्य और साकांक्ष होने के अलावा अविलम्ब बोले गये होने चाहिए, अर्थात् उनमें आसत्ति होनी चाहिए। इसके अभाव में वाक्यार्थ के बोध में एकता नहीं रहेगी और उसके खण्ड हो जाएँगे। इसमें आसत्ति साक्षात् पद का धर्म है, योग्यता पदार्थ का धर्म है और आकांक्षा श्रोता का आत्म-धर्म है। इस पर भी ये तीनों उपचार से पद-धर्म मान लिये गये है। महावाक्य अब तक हमने जिस वाक्य की चर्चा की वह पद-समूह से निर्मित हुआ होता है, पर इसके अलावा भी वाक्य का एक प्रकार होता है। इसे महावाक्य कहते हैं। आकांक्षा, योग्यता और आसत्ति के मिलने से जिस प्रकार वाक्य बनता है उसी प्रकार इन तीनों के आधार पर एकत्र अनेक वाक्य महावाक्य का निर्माण करते हैं। वाक्य में जिस प्रकार अनेक पद होने पर भी अर्थ की एकता बनी रहती है उसी प्रकार महावाक्य में भी अनेक वाक्य होने पर भी अर्थ की एकता रहती है, इसीलिए ऐसे वाक्यों के समुच्चय को महावाक्य कहा गया है। जगन्नाथ महावाक्य के उदाहरण-रूप रघुवंश, रामायण आदि का उल्लेख करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि सम्पूर्ण काव्य एक महावाक्य होगा। इनसे जो कुछ बातें फलित होती हैं वे काव्यार्थ की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं अतः हम उनकी जरा विस्तार से चर्चा करेंगे। राजशेखर कहता है कि वक्ता के अभिप्रेत अर्थ का ग्रन्थन करने वाले पदों का सन्दर्भ ही वाक्य है। तदनुसार कवि-मन में अर्थ का ग्रन्थन करने वाले वाक्यों का सन्दर्भ अथवा समूह महावाक्य है अथवा काव्य है। सम्पूर्ण काव्य के द्वारा कवि किसी एक ही अर्थ का कथन करना चाहता है। उस एक ही अर्थ की दृष्टि से जब हम काव्य के अलग-अलग घटकों पर विचार करते हैं तब घटकों की आकांक्षा (घटक कितने अंशों में अपरिहार्य और उचित हैं) पर भी विचार करते हैं। पदों की आकांक्षा और योग्यता के कारण हमें वाक्य का अर्थ-बोध होता है, तदनुसार ही वाक्यों की

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काव्य में अर्थ २४३

आकांक्षा और योग्यता के कारण हमें महावाक्य के अर्थ का बोध होता है। वाक्य में प्रयुक्त पद स्वतन्त्ररूप से अलग-अलग अर्थ व्यक्त करते हैं, पर जब वाक्य में उनका समुच्चय बन जाता है उस समय उन सब पदों के अर्थ से भिन्न एक विशिष्ट वाक्यार्थ हमारी समझ में आता है; उस्ी प्रकार अलग-अलग वाक्यों के समुच्चय से स्वतन्त्र वाक्यार्थों से भिन्न एक महावाक्य का अर्थ हमारी समझ में आता है। वे लोग काव्य समझ नहीं सकते जो महावाक्य के अंगभूत वाक्यों के स्वतन्त्र अर्थ तो कर लेते हैं पर उनके पार जाकर समग्र महावाक्य का अर्थ ग्रहण नहीं कर सकते। काव्यशास्त्र ने महावाक्य की यह कल्पना अपने घर से नहीं जोड़ दी है; वह तो मीमांसाशास्त्र से ग्रहण की है : कुमारिलभट्ट ने कहा है कि- स्वार्थबोधे समाप्तानामङ्गाङ्गित्वव्यपेक्षया। वाक्यानामेकवाक्यवं पुनः संहृत्य जायते॥ अपने अर्थ का बोध कराने की बात पूरी होने पर अंगांगिभाव की अपेक्षा से एकत्र वाक्यों की एकवाक्यता प्रकट होती है। महावाक्य के वाक्यों की योग्यता का अर्थ है काव्य के घटकों की सुसंगतता और सम्भवनीयता और आकांक्षा का अर्थ है उन घटकों की अपरिहार्यता। यदि काव्य- घटकों में सुसंगतता का अनुभव न हो अथवा उसकी सम्भवनीयता के विषय में शंका जाग्रत हो तो काव्य में असंगतिदोष और असम्भवदोष आते हैं, अगर यह प्रतीत हो कि कोई घटक अपरिहार्य नहीं है तो काव्य के एकत्व को क्षति पहुँचती है-वह काव्य नहीं बन पाता। कलाकृतियों में एकत्व की अपेक्षा रहती है, उनमें जो कुछ आता है वह सम्पूर्ण के साथ औचित्यपूर्वक अंगांगिभाव से एक-रूप होकर आता है, प्रयोजन के बिना कलाकृति में कुछ भी बढ़ाना सम्भव नहीं होता, इसी प्रकार अर्थाभिव्यक्ति के लिए जो कुछ आवश्यक है वह कम भी नहीं किया जा सकता। इन सभी को हमारे आचार्यों ने महावाक्य की कल्पना द्वारा बहुत ही सुन्दर ढंग से सूचित कर दिया है। वाक्यार्थ-बोधं हम पहले देख आये हैं कि काव्यशास्त्र ने नैयायिकों की पद-सम्बन्धी व्याख्या स्वीकार कर ली है : शक्तं पदम्। इसका अर्थ है अर्थ-बोध कराने की शक्ति से सम्पन्न शब्द पद है। इस शक्ति को शक्ति, वृत्ति अथवा व्यापार जैसे अलग-अलग नामों से पहचाना जाता है और काव्यशास्त्र ने इस प्रकार की तीन शक्तियाँ स्वीकार की हैं : अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। इनकी चर्चा हम आगे करेंगे; इन तीन के अलावा भी तात्पर्य नामक एक चौथी वृत्ति भी कितने ही मीमांसक और काव्यशास्त्री मानते हैं। अभिधा आदि तीन शक्तियाँ शब्दार्थ का बोध कराती हैं; तात्पर्यवृत्ति वाक्यार्थ का बोध कराती है। शब्दों के अपने अर्थ होते हैं, पर शब्द एकत्र होकर जब वाक्य बन जाते हैं तब वे उन शब्दार्थों से भिन्न उनमें से एक स्वतन्त्र अर्थ प्रकट होता है जो वाक्यार्थ

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२४४ अभिनव का रस-विवेचन

कहलाता है। यह वाक्यार्थ शब्द की अभिधा आदि शक्तियों से समझ में नहीं आता, इसके लिए तो एक स्वतन्त्र शक्ति माननी चाहिए। इन लोगों का यह मत है कि वह शक्ति तात्पर्य-शक्ति है। हम देख चुके हैं कि वाक्य का अर्थ समझने के लिए उसमें पदों की आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि गुण आवश्यक हैं। ये तीनों मिल कर ही तात्पर्यवृत्ति का निर्माण करते हैं। इन धर्मों के कारण पदार्थों का समन्वय हुआ अतः पदार्थों से भिन्न वाक्यार्थ प्रकट होता है। अभिधा आदि वृत्तियों ने जिसका बोध कराया है उन पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध दिखा कर उसके द्वारा वाक्यार्थ का बोध कराना तात्पर्यवृत्ति का काम है। इस मत को ठीक तरह से समझने के लिए एक उदाहरण लें : 'घटं करोति।' इसमें 'घटम्' और 'करोति' दो पद हैं। 'करोति' क्रियावाचक पद है। 'घटम्' के भी 'घट' और 'अम्' दो भाग हैं। 'घट' मूल शब्द या प्रकृति है और 'अम्' कर्मवाचक प्रत्यय है। इसलिए इस सम्पूर्ण पद का अर्थ 'घट' के आश्रित कर्मत्व हुआ। और 'करोति' करने की क्रिया का वाचक है। इन दो पदार्थों के बीच के सम्बन्ध को बताने वाला कोई भी शब्द इस वाक्य में नहीं है। प्रश्न है कि फिर यह सम्बन्ध कौन बताता है ? अभिहितान्वयवादियों का कहना है कि यह सम्बन्ध तात्पर्यवृत्ति बताती है। आकांक्षा, याग्यता और सन्निधि के कारण इन पदार्थों का पारस्परिक सम्बन्ध समझ में आता है और इस प्रकार पदार्थों के अन्वय होने पर हम सम्पूर्ण वाक्य का अर्थ समझने में समर्थ होते हैं। पर प्राभाकर मीमांसक इससे भिन्न ही मत रखते हैं। वे यह मानते हैं कि हमें शब्द का जो अर्थ समझ में आता है वह स्वतन्त्र रूप से समझ में नहीं आता; अन्वित अवस्था में समझ में आता है। अतः अन्वयबोध के लिए तात्पर्यवृत्ति की आवश्यकता ही नहीं है। मुकुलभट्ट ने 'अभिधावृत्तिमातृका' में इन दोनों मतों का समन्वय किया है और कहा है कि पद की दृष्टि से अभिहितान्वयवाद उचित है और वाक्य की दृष्टि से अन्विताभिधानवाद उचित है। शब्द की तीन वृत्तियाँ अब हम काव्यशास्त्र द्वारा स्वीकृत शब्द की तीन वृत्तियों पर आते हैं। हम देख आये हैं कि काव्यशास्त्र ने अभिधा, लक्षणा और व्यंजना नामक तीन वृत्तियाँ स्वीकारी हैं और जिस-जिस प्रसंग में जिस वृत्ति से अर्थ निकलता है तदनुसार शब्द वाचक, लाक्षणिक या व्यंजक कहलाता है। बात यह नहीं है कि अमुक शब्द वाचक हैं, अमुक लाक्षणिक हैं और अमुक व्यंजक हैं। एक ही शब्द वृत्ति-भेद से वाचक, लाक्षणिक अथवा व्यंजक हो सकता है। हम एक उदाहरण लें। 'राम वन में गये'- यहाँ राम का अर्थ 'दशरथ का पुत्र है और यह उसका मुख्य अर्थ है जो अभिधा- वृत्ति से समझ में आता है। इसीलिए इस वाक्य में राम शब्द वाचक है। पर गुजराती

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'इन्द्रजितवध' महाकाव्य में 'नहीं राम विशे अलि राम जरी' (अर्थात् हे सखि, राम में कुछ राम नहीं है। ) जैसा एक वाक्य आता है। 'राम में कुछ राम नहीं।' इसमें प्रथम राम वाचक है और दूसरा राम लाक्षणिक है। वहाँ वाच्यार्थ नहीं लिया जा सकता। अतः 'दम', 'शक्ति', 'शहूर' जैसा अर्थ-घटन करना पड़ेगा। यह लक्ष्यार्थ है और लक्षणा-वृत्ति से समझ में आता है अतः इस स्थान पर 'राम' शब्द लाक्षणिक है। लेकिन 'उत्तररामचरित' में जब शूद्रक का वध करने का प्रसंग आता है तब राम अपने दाहिने हाथ को सम्बोधित कर कहते हैं : हे हस्त दक्षिण मृतस्य शिशोर्द्विजस्य जीवातवे विसृज शूद्रमुनौ कृपाणम्। रामस्य बाहुरसि निर्भरगभखिन्नसीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते॥। अर्थात् हे मेरे दक्षिण हस्त, ब्राह्मण के मृत शिशु को जिलाने के लिए तू शूद्रमुनि के सिर पर तलवार का प्रहार कर; कठोरगर्भा सीता को वनवास देने में दक्ष राम का तू बाहु है, तुझमें दया कैसे हो सकती है ? यहाँ पहले 'राम' शब्द से 'क्रर कर्म करने में कच्चाई न रखने वाले' का लक्ष्यार्थ समझ में आता है। पर, इतने से ही काम पूरा नहीं हो जाता। 'राम' शब्द व्यंजक बन जाता है और राम द्वारा सीता के प्रति किये गये अन्याय का बोध, उससे जाग्रत आत्मतिरस्कार और हृदय में गहरा बसा हुआ दुःख-ये सभी इस 'राम' शब्द से व्यंजित होते हैं।

अभिधावृत्ति मम्मट ने वाचक शब्द की व्याख्या इस प्रकार दी है : 'साक्षात् सङ्केतितं योऽर्थम् अभिधत्ते स वाचकः ।' जो साक्षात् संकेतित अर्थ का बोध कराते हैं वे वाचक कहलाते हैं। संकेत से क्या अभिप्राय है ? नैयायिकों के मतानुसार इस शब्द का यह अर्थ लेना चाहिए कि जो ईश्वर की इच्छा है वही तंकेत है। पर नव्यनैयायिकों के अनुसार विशेष नाम और पारिभाषिक शब्दों का संकेत ईश्वर की इच्छा से नहीं पर मानव की इच्छा से उत्पन्न होता है अतः 'इच्छामात्रं सङ्केतः।' वे कहते हैं कि केवल इच्छा संकेत हैं। पर स्फोटवादी वैयाकरण इसका भी विरोध करते हैं : अमुक शब्द से अमुक अर्थ समझ में आये इस प्रकार की मनुष्य की चाहे कितनी ही इच्छा क्यों न हो तो भी यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि वह तदनुसार समझ में आयेगा ही। इन लोगों के मतानुसार शब्द, अर्थ और प्रत्यय-इन तीनों का एक-दूसरे पर अध्यास होने से इन तीनों का संकर होता है और ये तीनों एकरूप भासित होते हैं। शब्दार्थ का इतरेतराध्यास ही संकेत है। 'सङ्केतस्तु पदार्थयोरितरेतराध्यासरूपः स्मृत्यात्मकः योऽयं शब्द: सोऽर्थः, योऽर्थः स शब्द: इति।'-पातंजल महाभाष्य। अर्थात् पद का अर्थ पर और अर्थ का पद पर अध्यास अर्थात् गलत आरोप करना और दोनों को एकरूप मान लेना संकेत है। पर इतना वर्णन पर्याप्त नहीं है। कारण, संकेत की

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२४६ अभिनव का रस-विवेचन खबर होने पर भी जब शब्द सुनते हैं तब उसका स्मरण न रहने पर अर्थ समझ में नहीं आता। इसीलिए संकेत को स्मृत्यात्मक कहा गया है। संकेत किस में होता है ? इसे लेकर अलग-अलग मत हैं। वैयाकरण यह मानते हैं कि संकेत जाति, गुण, क्रिया और संज्ञा में होता है। नव्यनैयायिक मानते हैं कि संकेत जातिविशिष्ट व्यक्ति में है। मीमांसकों का मानना है कि संकेत केवल जाति में ही और बौद्ध यह मानते हैं कि अन्य से व्यावृत्ति, अपोह, अलगपने में संकेत है : यथा-'गाय' अर्थात् गाय के अलावा अन्य सभी से पृथक वह गाय। इन सभी में से काव्यशास्त्र ने वैयाकरणों के जात्यादिवाद-अर्थात् संकेत जाति, गुण, क्रिया और संज्ञा में है-को स्वीकार किया है। स्फोटवाद हमारे आचार्यों नेइस विषय पर भी विचार किया है कि शब्द से अर्थ किस प्रकार प्रतीत होता है। शब्द अनेक वर्णों से निर्मित होता है, तो हमें जो अर्थ समझ में आता है वह एक-एक वर्ण से अथवा सभी वर्णों के समूह से आता है ? अगर कोई कहता है कि 'एक-एक वर्ण से' तो उसका विरोध इस प्रकार किया जाता है कि अगर पहले वर्ण से ही शब्द का अर्थ समझ में आ जाता है तो शेष वर्ण निरुपयोगी और अतिरिक्त सिद्ध होंगे अतः उन्हें बोलने की क्या आवश्यकता है? और अगर कोई यह कहता है कि 'वर्णसमुच्चय' से अर्थ समझ में आता है तो उसका विरोध इस तरह किया जाता है कि वर्ण तो अनित्य हैं, क्षणिक हैं। बोलते ही नाश हो जाते हैं तो फिर वे एकत्र किस तरह हो सकते हैं ? जब किसी तीन वर्णों वाले शब्द का पहला वर्ण बोला जाता है तो उस समय दूसरे और तीसरे वर्ण उपस्थित नहीं होते; जब दूसरा वर्ण बोला जाता है तब पहले और तीसरे उपस्थित नहीं होते; इसी प्रकार जब तीसरा वर्ण बोला जाता है उस समय पहले और दूसरे वर्ण उपस्थित नहीं होते, तो फिर यह किस प्रकार कहा जा सकता है कि वे सभी एकत्र होकर अर्थ को समझाते हैं। इसका स्पष्टीकरण स्फोटवाद से किया गया है। कल्पना कुछ ऐसी है कि प्रत्येक शब्द का एक स्फोट होता है। स्फोट क्या है ? स्फोट वर्ण से अभिव्यक्त होने वाला, अर्थ की प्रतीति कराने वाला, वर्ण से अलग नित्य शब्द है। वह अखण्ड और निरवयव है। जैसे-जैसे वर्ण बोले जाते हैं वैसे-वैसे यह स्फोट थोड़ा-थोड़ा स्पष्ट होता जाता है और अन्तिम वर्ण के बोले जाने पर पहले वर्णों के संस्कार के साथ मिल कर वह स्फोट को पूर्णतः अभिव्यक्त करता है और उसी क्षण शब्द का अर्थ स्फोट से बिजली की चमक की भाँति प्रतीत हो जाता है।१ अभिधा से स्पष्ट अर्थ शब्द का मुख्य अर्थ है अतः कोशों में यही अर्थ पहले दिया १. वर्णातिरिक्तो वर्णाभिव्यङ्गयोऽर्थप्रत्यायको नित्यः शब्द: स्फोटः। .. तथाहि अभिव्यञ्जकोऽपि प्रथमो ध्वनि स्फोटमस्फुटमभिव्यअकक्रमेण स्फुटं स्फुटतमम्, ... ।-सर्वदर्शनसंग्रह। वर्णातिरिक्तः पूर्वपूर्ववर्णानुभवसहितचरमवर्णानुभवव्यङ्गयः अर्थप्रत्यायकः।-वाचस्पत्यम्।

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जाता है। सामान्यरूप में हमारा व्यवहार मुख्यार्थ से चलता है-विशेषतः कायदे तो शब्द के मुख्यार्थ को ध्यान में रख कर ही गढ़े जाते हैं। इसीलिए झगड़ा होने पर कोर्ट में प्रमाणभूत कोशों का आधार उद्धत किया जाता है। पर, लक्ष्यार्थ में ऐसा नहीं होता। इसलिए कुमारिलभट्ट का कथन है कि अपरिहार्य स्थिति में ही शास्त्रीय ग्रन्थों में लक्षणावृत्ति का उपयोग करना चाहिए: 'अगत्या लक्षणावृत्तिः।'

लक्षणावृत्ति लक्षणा कब व्यापार में आती है ? जब मुख्यार्थ बाध हो अर्थात् जब वाच्यार्थ के अनुसार संगत अर्थ करने में कठिनाई उपस्थित होती हो उस समय लक्षणा व्यापार में होती है। यह कठिनाई दो प्रकार की होती है : एक तो अनुपपत्ति की अर्थात् पदों के औचित्यपूर्ण अन्वय की, यथा-'गंगा में घर।' यहाँ यह कठिनाई है कि नदी के प्रवाह में घर नहीं बाँधा जा सकता। अतः इसे दूर करने के लिए लक्षणा का आश्रय लेकर 'गंगा' का अर्थ 'गंगातट' करते हैं। दूसरी कठिनाई तात्पर्य-सम्बन्धी है। माना कि किसी आदमी ने दूसरे आदमी का अनेक रूप में बुरा किया है और यह दूसरा आदमी पहले आदमी को सम्बोधित कर कहता है कि आपने मुझ पर इतने अधिक उपकार किये हैं कि क्या कहा जाय। आपकी सुजनता का चारों ओर बखान है। इसी प्रकार करते हुए आप सुख से सौ वर्ष जियें। इसमें अगर वक्ता का हेतु ध्यान में न लें तो अर्थ करने में कोई कठिनाई नहीं होती, पर वत्ता का हेतु ध्यान में लेने पर तो इन वाक्यों का जो वाच्यार्थ है उससे वक्ता के हेतु का कोई मेल ही नहीं बैठता। इस तरह जब बोलने वाले के हेतु और वाच्यार्थ के बीच मेल नहीं बैठता तब कटिनाई उपस्थित होती है जिसे तात्पर्य-बाध कहा गया है। फिर विपरीत लक्षणा से उल्टा ही अर्थ करना पड़ता है : उपकार- अपकार, सुजनता-दुर्जनता, आदि। इस प्रकार से लक्षणा की दूसरी शर्त यह है कि लक्षणा से जो दूसरा अर्थ किया जाता है उसका वाच्यार्थ अथवा मुख्यार्थ के साथ किसी न किसी प्रकार का सम्बन्ध होता ही है। उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में 'गंगा' और 'गंगातट' के बीच निकटता का सम्बन्ध है और दूसरे उदाहरण में 'उपकार' और 'अपकार' के बीच विपरीतता का सम्बन्ध है। इस तरह के पाँच सम्बन्धों की चर्चा की गयी है : अभिधेयेन सम्बन्धात् सादृश्यात् समवायतः । वैपरीत्यात् क्रियायोगात् लक्षणा पञ्चधा मता॥ अर्थात् मुख्यार्थ के साथ सम्बन्ध, सादृश्य, समवाय, वैपरीत्य और क्रिया का सम्बन्ध होने से पाँच प्रकार की लक्षणा होती है। लक्षणा-सम्बन्धी तीसरी वस्तु यह है कि लक्षणा किसी रूढ़ि से संयुक्त होनी चाहिए अथवा बोलने वाले का कोई विशेष प्रयोजन होना चाहिए। रूढ़ि से होने वाली लक्षणा तो अभिधारूप ही बन जाती है। अतः कुछ तो इसे लक्षणा ही नहीं मानते

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२४८ अभिनव का रस-विवेचन और काव्य में तो प्रयोजनवती लक्षणा का ही विचार किया जाता है। उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में यह बताना प्रयोजन है कि घर को गंगा के शैत्य और पावनत्व का पूरा लाभ मिलता है। तो दूसरे उदाहरण में अपकार और दुर्जनता के आधिक्य को संकेतित करना प्रयोजन कहा जा सकता है। वस्तुतः लक्षणा मुख्यार्थ की वृत्ति है। पर चूँकि उसका शब्द पर आरोप किया जाता है इसलिए यह आरोपित क्रिया कहलाती है। शब्द और लक्षणा के बीच कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। बीच में वाच्यार्थ आता है इसीलिए इसे सान्तरार्थ निष्ठ कहा गया है। नागेश ने इसका अर्थ इस रूप में किया है कि लक्षणा व्यापार 'साक्षादर्थ- निष्ठः परम्परया शब्दनिष्ठः ।' साक्षात् अर्थनिष्ठ और परम्परा से शब्दनिष्ठ है। साथ ही, अभिधा शब्द की स्वाभाविक शक्ति है, पर लक्षणा ऐसी नहीं है। हम ऊपर लिख आये हैं कि काव्य में प्रयुक्त लक्षणा प्रयोजनवती होती है। यह प्रयोजन व्यंजना से समझ में आता है और यह व्यंजना लाक्षणिक शब्द में निहित रहती है। यही सिद्धान्त है। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रयोजन व्यंग्य है। इस बारे में काव्यशास्त्रियों का एकमत द्रष्टव्य है : यह व्यंग्य न तो इतना गूढ़ होना चाहिए कि समझ में ही न आये और इतना अधिक अगूढ़ भी नहीं होना चाहिए कि उसमें कोई चमत्कार ही न रहे। व्यंजनावृत्ति लक्षणा के प्रकारों में न उतर कर अब हम तीसरी वृत्ति व्यंजना की चर्चा करते हैं। अभिधा, लक्षणा और तात्पर्य नामक वृत्तियाँ अपना-अपना काम कर रुक जाती हैं और इनके बाद जिसके कारण अतिरिक्त अर्थ-बोध होता है उसे विश्वनाथ ने व्यंजना के रूप में प्रस्तुत किया है।१ जिस प्रकार अभिधा एक शब्द-शक्ति है, लक्षणा भी शब्द-शक्ति मानी गयी है उसी प्रकार व्यंजना शब्द और अर्थ की शक्ति मानी गयी है। अर्थात् जिस प्रकार शब्द व्यंजक होता है उसी प्रकार अर्थ भी व्यंजक होता है और अभिनयादि भी कभी-कभी व्यंजक बन जाते हैं। व्यंजना का आधार कभी लक्षणा पर और कभी अभिधा पर रहता है। शब्द केवल व्यंजक नहीं होता। वह या तो वाचक और व्यंजक होता है अथवा लाक्षणिक और व्यंजक होता है, पर कभी भी शब्द वाचक और लाक्षणिक नहीं हो सकता। लौकिक और अलौकिक व्यंग्य व्यंजना से समझ में आने वाला व्यंग्यार्थ दो प्रकार का होता है : लौकिक और अलौकिक। लौकिक वह अर्थ है जिसे वाच्य में रखा जा सकता है और अलौकिक वह अर्थ है जिसे वाच्य में रखा ही नहीं जा सकता। इसे उदाहरण के द्वारा स्पष्ट कर लिया जाय : १. विरतास्वभिघाद्यासु यथाऽर्थों बोध्यते परः। सा वृत्तिर्व्यअ्ना नाम शब्दस्यार्थादिकस्य च।।

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गुञ्जन्ति मञ्जु परितः गत्वा धावन्ति सम्मुखम्। आवर्तन्ते निवर्तन्ते सरसीषु मधुव्रता। वाच्यार्थ है : भ्रमर मधुर गुंजारव करते-करते सरोवर की ओर दौड़ते जाते हैं और वापिस आते हैं। पर, इसका व्यंग्यार्थ है कि कमल खिलने का समय निकट आ गया है, अर्थात् शरद् ऋतु का आगमन हो गया है। यह व्यंग्यार्थ इस प्रकार है कि यदि कवि ने चाहा होता तो वह इसे स्पष्ट शब्दों में भी कह सकता था। यहाँ अमुक हक़ीकत का संकेत है और इसे वाच्य में रखा जा सकता है, अतः यह व्यंग्य लौकिक है। इसमें किसी हक़ीक़त या वस्तु का संकेत है इसलिए इसे वस्तुध्वनि भी कहा जाता है। अब हम दूसरा उदाहरण लेंगे : दयिते वदनत्विषां मिषात् अयि तेऽमी विलसन्ति केसराः । अपि चालकवेषधारिणो मकरन्दस्पृहयालवोऽलयः । प्रिये, तेरे वदन की प्रभारूप में केसर ही विलसित है और काले केशों का वेश धारण कर ये भ्रमर ही मरकन्द के लोभ से लुब्ध हो कर आये हैं। इस दृष्टान्त के वाच्यार्थ में दो अपह्ुति अलंकार हैं; उनका व्यंग्यार्थ है कि तू स्त्री नहीं पर कमलिनी है। पर, यह भी एक अपह्नुति अलंकार है। इस प्रकार इस उदाहरण में एक अलंकार संकेतित है। वह भी ऐसा है कि अगर चाहें तो उसे वाच्य में रख सकते हैं। अर्थात् यह भी लौकिक व्यंग्य है और इसमें अलंकार संकेतित होने के कारण इसे अलंकार-ध्वनि भी कहा जाता है। अब हम तीसरा उदाहरण लेंगे : गुरुमध्यागता मया नताङ्गी निहिता नीरजकोरकेण मन्दम्। दरकुण्डलताण्डवं नतभ्रू लतिकं मामवलोक्य घूर्णितासीत्।। बात यह है कि दोपहर में घर के काम से मुक्त हो नायिका सास, ननद आदि गुरुजनों के बीच में बैठी है। उस समय इस नायक ने धीरे से कमल-कली से उसे मारा। इसलिए उस नायिका ने भौंहों को चढ़ा कर उसकी ओर इस तरह देखा कि उसके कान के कुण्डल हिल उठें और मुँह मोड़ लिया। यहाँ नायिका ने जिस रूप में मुँह फेर लिया है उसका वर्णन हमें कितना अधिक कह जाता है : 'तुम तो कैसे हो। समय-कुसमय कुछ भी देखना ही नहीं।' .. नायिका का यह कोप, इस कोप से अधिक खिला हुआ उसका सौन्दर्य जिसे देख कर नायक को मिला एक तरह का तूफानी आनन्द और इन दो भावों के संयोग से संकेतित हुआ दोनों का मधुर दाम्पत्यप्रेम- यहाँ यह रसिक के आस्वाद का विषय है। इसे वाच्य में नहीं रखा जा सकता। इसे तो मात्र हृदय से आस्वादित किया जा सकता है। अतः इस प्रकार के व्यंग्यार्थ को अलौकिक कहा गया है। इसमें जो संकेत है वह किसी भाव या रस का है अतः इसे रसध्वनि भी कहा जाता है।

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२५० अभिनव का रस-विवेचन

रसादिध्वनि ही मुख्य है इस प्रकार हमने देखा कि ध्वनि के तीन प्रकार हैं : वस्तुध्वनि, अलंकारध्वनि और रसध्वनि। इनमें से प्रथम दो वाच्य के अन्तर्गत रखे जा सकते हैं और उन्हें लौकिक कहा जा सकता है। तीसरे को कभी भी वाच्य में नहीं लिया जा सकता और वह अलौकिक ही कहा जायगा। पर, इन तीनों प्रकार के ध्वनियों में रसादिध्वनि ही मुख्य माना गया है और उसे काव्य की आत्मा कहा गया है। काव्य में अन्य सभी वस्तुएँ रस के लिए ही आती हैं। रस से निरपेक्ष होकर काव्य में किसी भी वस्तु के लिए स्थान नहीं है। वस्तुध्वनि और अलंकारध्वनि का तो अन्ततः पर्येवसान रस में ही होता है। यही बात अभिनवगुप्त ने स्पष्ट शब्दों में कही है : 'रस एव वस्तुतः आत्मा, वस्त्वलङ्कारध्वनी तु सर्वथा रसं प्रति पर्यवस्येते।' ध्वन्यालोक में भी कहा गया है कि- व्यङ्गयव्यक्जकभावेडस्मिन् विविधे सम्भवत्यपि। रसादिमय एकस्मिन् कविः स्यादवधानवान् ॥४-५॥ विविध प्रकार के व्यंग्यव्यंजक भाव तो सम्भव हैं, पर फिर भी कवि को तो हमेशा रसादिरूप व्यंग्यव्यंजक भाव पर ही ध्यान रखना चाहिए। इन सबका यह अर्थ हुआ कि काव्य का अर्थ समझने का मतलब है व्यंग्यार्थ को समझना अथवा यों कहें कि रसानुभव करना। लक्षणा और उपमादि अलंकार भी काव्य में रसाभिव्यक्ति के लिए ही आते हैं। इसलिए जब तक हम लक्षणा में निहित प्रयोजन को न जान लें तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि हम काव्य समझ गये हैं। हम एक स्थूल उदाहरण लें। गुजराती कवि कलापी के एक काव्य में यह पंक्ति आती है : 'पासे जेवी चरती हती आ गाय तेवो ज हुं छुं।' (पास में जैसे चर रही थी यह गाय वैसा ही मैं हूँ।) यहाँ वक्ता गाय के साथ अपनी तुलना करता है। तो यह तुलना किसलिए की गयी है ? क्या वह यह कहना चाहता है कि मैं (पशु) ढोर जैसा हूँ ? आप सभी अपना सिर हिलाते हैं जिससे यह प्रतीत होता है कि आपको यह अर्थ मान्य नहीं है। अतः यहाँ गाय का पशुत्व विवक्षित नहीं है। हम 'गरीब गाय जैसे' कहते हैं। यहाँ 'गरीबपना' का अर्थ 'निरुपद्रविता' ही उद्दिष्ट है। 'जिस प्रकार गाय निरुपद्रवी है उसी प्रकार मैं निरुपद्रवी हूँ'-यहाँ कवि कहना चाहता है। मैं गाय के समान निरुपद्रवी हूँ अतः आपको मुझसे डरने, दूर भागने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ आप निस्संकोच व निर्भयतापूर्वक रहें, घूमें, चरें और किल्लोल करें। यह बात जब तक हमारी समझ में नहीं आती तब तक कविता समझी गयी नहीं कही जायगी। व्यंग्यार्थबोध के लिए प्रतिभा आवश्यक काव्य में वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ समझ कर सन्तोष मानना अलम् नहीं है। वहाँ

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तो इन दोनों के पार स्थित व्यंग्यार्थ को प्राप्त करना है, क्यांकि काव्य का वही मुख्य अर्थ है। मम्मट ने दोष की व्याख्या देते हुए कहा है कि 'मुख्यार्थ हतिर्दोषः।' मुख्यार्थ को हानि पहुँचाने वाला दोष होता है। रसश्र मुख्यः। और काव्य में रस मुख्य है। अतः रस को हानि पहुँच ने वाला दोष हुआ। इस प्रकार रस, रसादि व्यंग्य ही काव्यार्थ है, और शेष दूसरे अर्थ तो उसे प्राप्त करने के सोपान हैं। व्यंग्यार्थ के कभी भी शब्दवाच्य न होने के कारण उसे समझने के लिए प्रतिभा की आवश्यकता है। आचार्यों का यही मत है। ऐरा गैरा नत्थू खैरा इसे नहीं समझ सकता। अभिनवगुप्त ने यह कहा है कि भावक की प्रतिभा का सहयोग और द्योतन व्यंजना के प्राणरूप हैं। 'प्रतिपत्तप्रतिमासहकारित्वम् अस्माभिः द्योतनस्य प्राणत्वेन उक्तम्।' इसी प्रकार मम्मट ने भी व्यंग्यार्थ को समझने के लिए प्रतिभा की विशदता आवश्यक मानी है। इस अंश को हम जरा विस्तार से देखेंगे। वह 'शब्दव्यापारविचार' नामक अपने ग्रन्थ में कहता है : प्रज्ञावैमल्यवैदग्धप्रस्तावादिविधायुजः । अभिधालक्षणायोगी व्यङ्गयोऽर्थः प्रथितो ध्वनेः॥ 'यथा सङ्केतेन मुख्यार्थबाधादित्रितयेन च सहायेन अभिधायको लक्षकश्च, यथा वा पक्षधर्मान्वयव्यतिरेकिसहगतः विवक्षाया अनुमापकः, तथा प्रतिभाविदग्धपरिचय- प्रकरणादिज्ञानसापेक्षो वाचको लक्षकश्च व्यङ्गयमर्थ ध्वनिशब्दो व्यनक्ति।' 'संकेत की सहायता से शब्द वाचक बनता है अर्थात् वाच्यार्थ प्रकट करता है, मुख्यार्थ बाधादि तीन निमित्तों से वह लक्षक बनता है अर्थात् लक्ष्यार्थ प्रकट करता है; पक्ष-धर्म-अन्वयव्यतिरेक-आदि की सहायता से अनुमापक बनता है। अर्थात् विवक्षित अर्थ का अनुमान करने में कारणभूत बनता है; उसी के अनुसार प्रतिभा की विमलता, विदग्धता के परिचय और प्रकरणादि के ज्ञान की सहायता से वह वाचक-लक्षक शब्द व्यंजक अर्थात् व्यंग्यार्थ का बोध कराने वाला बन जाता है। इसे ही ध्वनि कहते हैं।" इसका अर्थ यह हुआ कि व्यंग्यार्थ का बोध होने के लिए विमल प्रतिभा, प्रवैदग्ध्य और प्रकरणादि का ज्ञान आवश्यक है-इसके अभाव में व्यंग्यार्थ का बोध सम्भव नहीं। मम्मट ने काव्यप्रकाश में भी इसी वस्तु को ज़रा दूसरे ढंग से रखा है :

१. नागेश भट्ट द्वारा 'परमलघुमंजुषा' में दी गई व्यंजना की व्याख्या भी देखने लायक है : मुख्यार्थबाधनिरपेक्षबोधजनको, मुख्यार्थसम्बन्धासम्न्धसाधारण, प्रसिद्धाप्रसिद्धविषयको वक्त्रादिवैशिष्ट्यज्ञानप्रतिभादयुद्वद्धः संस्कारविशेषो व्यज्जना। अर्थात् मुख्यार्थ बाध की अपेक्षा किये बिना बोध कराने वाला, मुख्यार्थ के साथ सम्बन्ध हो या न हो तो भी, प्रसिद्ध या अप्रसिद्ध विषय से सम्बद्ध, वक्ता आदि के वैशिष्ट्य के ज्ञान तथा प्रतिभा आदि से जाग्रत संस्कार विशेष ही व्यंजना है।

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वक्तृबोद्धव्यकाकूनां वाक्यवाच्यान्यसन्निधेः । प्रस्तावदेशकालादेवैंशिष्ट्यात् प्रतिभाजुषाम्।। योऽर्थस्यान्यार्थघीहेतु: ध्यापारो व्यक्तिरेव सा ।। यहाँ उसने उपर्युक्त परिगणित वस्तुओं के अलावा दूसरी कितनी ही वस्तुओं को, जो व्यंग्यार्थ-बोध में सहायक होती हैं, गिनाया है, यथा-बोलने और सुनने वाले की, काकु अर्थात् शोक, भय आदि के कारण आवाज में हुए परिवर्तन की वाक्य की, वाच्य की, किसी अन्य व्यक्ति के उपस्थित होने की, प्रस्ताव अथवा प्रकरण की, काल की, देश की, आदि की विशेषता का ज्ञान व्यंग्यार्थ के बोध में आवश्यक है। इस प्रकार काव्य में मुख्य अर्थ व्यंग्यार्थ अथवा ध्वनि है। तीन प्रकार की ध्वनियों में भी रसध्वनि मुख्य है, वही काव्य की आत्मा है, और उसे ही प्राप्त करने के लिए विमल प्रतिभा और वैदग्ध्य आवश्यक हैं। यही हमारे देश के प्राचीन आचार्यों का मत है।

सन्दर्भ-ग्रन्थ : १. भारतीय साहित्यशास्त्र (मराठी)-ग. त्र्यं. देशपांडे। २. इण्डियन थियोरीज़ आफ मीनिंग-के. कुंजन्नी राजा। ३. शबरभाष्य-गंगानाथ झा।

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परिशिष्ट

व्यंजना की स्थापना मम्मट के आधार पर संक्षेप में इससे सम्बद्ध चर्चा को देखेंगे कि व्यंजना-वृत्ति की स्वीकृति क्यों अनिवार्य है। अगर व्यंजना-वृत्ति का स्वीकार न करें तो यह मानना पड़ेगा कि व्यंग्यार्थ या तो अभिधा या फिर लक्षणा से समझ में आ जाता है, पर इनमें से एक बात भी टिक नहीं सकती। इसे जरा विस्तार से देखें। व्यंग्य के दो मुख्य प्रकार हैं: १. लक्षणामूला अथवा अविवक्षितवाच्य और २. अभिधामूला अथवा विवक्षितअन्यपरवाच्य। इनमें लक्षणामूला के दो प्रकार है : १. अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और २. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य। इन दोनों प्रकारों में लक्षणा का जो प्रयोजन अर्थात् व्यंग्यार्थ होता है वह तत्सम्बन्धी व्यंजना से ही समझ में आता है, अभिधा या लक्षणा से नहीं। अभिधा तो केवल संकेतित अर्थ का ही बोध करा सकती है और यह प्रयोजनरूप व्यंग्यार्थ कोई संकेतित अर्थ नहीं है। लक्षणा केवल बाधा दूर कर अर्थात् लक्ष्यार्थ का बोध करा कर ही विराम ले लेती है अतः वह भी प्रयोजनरूप व्यग्यार्थ का बोध नहीं करा सकती। हम एक उदाहरण लें: 'गंगा में झोपड़ी'। गंगा अर्थात् जल-प्रवाह में तो झोपड़ा नहीं बाँधा जा सकता। यहाँ बाध है, इसलिए लक्षणा से गंगा का अर्थ गंगातट किया जाता है। 'गंगातट' कहने के स्थान पर 'गंगा' कहने का प्रयोजन शैत्यपावनत्व को सुझाना है। यह प्रयोजन लक्षणा से समझ में नहीं आता। और अब दूसरी बार लक्षणा का आश्रय लिया नहीं जा सकता, क्योंकि अब मुख्यार्थ- बाध आदि हेतु रहा ही नहीं है। साथ ही, गंगातट यह तो लक्ष्यार्थ है, वह मुख्यार्थ नहीं है। उसका बाध भी नहीं होता है। इसके अलावा शैत्यपावनत्वादि जो अर्थ यहाँ लेना चाहते हैं उसके साथ उसका कोई सम्बन्ध भी नहीं है। साथ ही, इस प्रयोजन का कोई दूसरा प्रयोजन भी नहीं है और यह भी नहीं है कि मूल शब्द गंगा 'शैत्यपावनत्व' रूप प्रयोजन का बोध न करा सके। मात्र इस नये व्यापार अर्थ के लिए नया व्यापार मानना चाहिए और यह व्यापार व्यंजना-व्यापार है। यहाँ व्यंजना का आश्रय लेने में कोई प्रयोजन नहीं है फिर भी अगर किसी प्रयोजन को मान लें तो फिर उसके लिए किसी अन्य प्रयोजन को मानना पड़ेगा और इससे अनवस्था खड़ी हो जायगी जो मूलक्षयकारिणी है। अगर कोई यह कहता है कि लक्ष्यार्थ 'गंगातट' लेने के स्थान पर 'शैत्यपावनत्व विशिष्ट गंगातट' ही ले लें तो फिर व्यंजना की जरूरत ही नहीं रहेगी। पर, ऐसा करने में आपत्ति यह है कि लक्ष्यार्थ के साथ प्रयोजन को मिला देना उचित नहीं है। कारण, ज्ञान का विषय अलग है और ज्ञान का फल अलग है। यहाँ इस सामान्य नियम का

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२५४ अभिनव का रस-विवेचन

भंग होता है। इसलिए विशिष्ट लक्षणा भी सम्भव नहीं होती। इस तरह, यह मानना पड़ेगा कि प्रयोजनरूपी व्यंग्यार्थ अभिधा और लक्षणा से भिन्न व्यंजना-व्यापार से समझा जाता है। अभिधामूला व्यंजना के दो प्रकार हैं : असंलक्ष्यक्रम और २.संलक्ष्यक्रम। इनमें से प्रथम अर्थात् रसादि तो अवाच्य ही हैं अतः यह नहीं कहा जा सकता कि वह अभिधा से समझ में आ सकता है। और संलक्ष्यक्रम के दो प्रकार हैं : शब्दशक्तिमूल और २. अर्थशक्तिमूल। शब्दशक्तिमूल में तो अभिधा किसी एक अर्थ में नियन्त्रित होती है तब फिर वह जो दूसरा अर्थ समझ में आता है और उससे जो उपमादि अलंकार समझ में आते हैं वे, यह मानना रहा कि व्यंजना से ही समझ में आते हैं। अर्थशक्तिमूल का विचार करते समय अभिधाविषयक दो मतों को ध्यान में रखना चाहिए : १. अभिहितान्वयवाद और २. अन्विताभिधानवाद। इनमें अभिहितान्वयवाद के अनुसार तो अभिधा मात्र पदार्थ ही दर्शाती है, उसका अन्वय तक नहीं दिखा पाती। अन्वय तक पहुँचने के लिए तो आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि नामक तीन वृत्तियों की जरूरत पड़ती है। अन्विताभिधानवाद के अनुसार किसी पदार्थ के साथ ही अन्वित अर्थ अभिधा से समझ में आता है, विशेष पदार्थ के साथ अन्वित अर्थ समझ में नहीं आता। वह तो अवाच्य ही रहता है। तो इन दोनों मतों के अनुसार वाक्यार्थ संकेतित अर्थ नहीं है। अगर अभिधाशक्ति वाक्यार्थ भी नहीं समझा सकती तो वह व्यंग्यार्थ का बोध किस प्रकार करा सकती है ? कुछ यह कहते हैं कि शब्द से वाच्य अथवा व्यंग्य जो कुछ भी अर्थ समझ में आता है उन सभी का निमित्त शब्द ही है अतः व्यंजना नामक किसी नयी वृत्ति की कल्पना की कोई आवश्यकता नहीं है। यह मानना चाहिए कि यह अर्थ अभिधावृत्ति से ही समझ में आता है। इसके विरोध में यह कहा जा सकता है कि अगर शब्द को व्यंग्यार्थ का निमित्त मान लें तो वह या तो कारक है या ज्ञापक है। कारक तो हो हीं सकता क्योंकि शब्द किसी व्यंग्यार्थ को उत्पन्न नहीं कर सकता, मात्र प्रकट करता है। साथ ही, शब्द को व्यंग्यार्थ का ज्ञापक निमित्त भी नहीं कहा जा सकता। कारण, व्यंग्यार्थ पहले से ही सिद्ध नहीं होता। धुँआ अग्नि का ज्ञापक निमित्त हो सकता है, क्योंकि इन दोनों के बीच नियत सम्बन्ध है। व्यंग्यार्थ और शब्द के बीच इस तरह का सम्बन्ध नहीं होता। कुछ यह कहते हैं कि जिस प्रकार किसी बलवान बाणावली के द्वारा छोड़ा गया बाण वेग नामक एक ही व्यापार के बल पर शत्रु के कवच को बेध डालता है, मर्म को भेद देता है और उसके प्राण भी हर लेता है उसी प्रकार शब्द भी अभिधाशक्ति से ही अपना संकेतित अर्थ प्रकट करता है, उसका अन्वय भी दर्शा देता है और व्यंग्यार्थ का भी बोध करा देग है। अतः शब्द से जो कुछ अर्थ समझ में आये उसे मुख्यार्थ ही

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परिशिष्ट २५५

मानना चाहिए। साथ ही, शब्द का जो भी तात्पर्य है वह सम्बद्ध शब्द का ही अर्थ माना जाय। इसके उत्तर में यह निवेदन करना है कि ये लोग तात्पर्य का अर्थ ही नहीं समझते। पहले जो कहा जा चुका है उसके अलावा जो नया कहना है वह तात्पर्य है और वह शब्दों से सीधे ही समझ में आ जाता है। शब्द से किसी भी प्रकार जो कुछ प्रतीत होता है वह सभी उसका तात्पर्य नहीं कहलाया जा सकता। जिस प्रकार रास्ते पर चलते हुए जुलाहे से कहें कि 'किनारे वाली धोती बुनना।' अगर हम जुलाहे से इस विषय में पहली ही बार बात कर रहे हैं तो इस वाक्य का तात्पर्य त्रिविध है : एक तो हम उसे बुनने के लिए कहते हैं, बुनी जाने वाली वस्तु धोती है, यह कहते हैं और यह भी कहते हैं कि वह किनारे वाली है। अगर हमने उससे पहले कह रखा है कि हमें सूत बुनवाना है तो यह वाक्य दो ही वस्तुएँ नयी कहता है : बुनी जाने वाली वस्तु धोती है और वह किनारे वाली है। अगर हमने उससे पहले कह रखा है कि हमें एक धोती बुनवानी है तो यह वाक्य इतना ही नया कहता है कि किनारे वाली धोती बुननी है। इस प्रकार प्रसंगानुकूल इस वाक्य का तात्पर्य तीन, दो और एक वस्तु में भी हो सकता है। शब्द से, मनचाहे रूप में जो भी समझ में आये वह तात्पर्य नहीं कहलायेगा। अगर इस रूप में मान लें तो 'आगे वाला दौड़ता है' का अर्थ 'पिछले वाला भी दौड़ता है' किया जा सकता है, क्योंकि 'आगे वाला' कहने में 'पिछले वाला' संकेतित रहता ही है। अगर यह मान लें कि शब्द सुनने के बाद जो कुछ अर्थ प्राप्त होता है वह सभी अभिधा से ही प्राप्त होता है तो 'ब्राह्मण तेरे यहाँ पुत्र जन्मा है' अथवा 'तेरी कुँवारी लड़की गर्भवती हुई है' आदि से उत्पन्न हर्षशोकादि को भी वाच्य ही कहना पड़ेगा। फिर तो लक्ष्यार्थ के लिए लक्षणा मानने की भी क्या जरूरत है ? अगर हम व्यंजना को स्वीकार न करें तो फिर दोषों के नित्य और अनित्य नामक भेद करने की क्या जरूरत है ? हम शृंगार में श्रुतिकटुत्व को दोष मानते हैं पर रौद्र में नहीं। इसका कारण यही है कि वर्णों की भी व्यंजकता होती है। इसी प्रकार सभी समानार्थी शब्द भी सभी स्थलों पर काम नहीं कर सकते। कारण, समानार्थी होते हुए भी सभी की व्यंजना समान नहीं होती। यथा-'कपाली' और 'पिनाकी' शब्द समानार्थी होने पर भी-शिववाचक होने पर भी कालिदास की 'समागमप्रार्थनया कपालिनः' नामक पंक्ति में 'कपाली' शब्द ही अधिक उचित लगता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि अभिधा और व्यंजना एक नहीं हैं। किसी भी शब्द का वाच्यार्थ सभी के लिए एक ही होता है, पर व्यंग्यार्थ का अलग-अलग होना सम्भव है। यथा-'सूर्य अस्त हुआ।' इस शब्द का वाच्यार्थ सभी के लिए एक होने पर भी इसका व्यग्यार्थ सभी अलग-अलग लेंगे। निम्नलिखित मुद्दों से यह स्पष्ट हो जायगा कि वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ भिन्न हैं :

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२५६ अभिनव का रस-विवेचन

१. वाच्यार्थ के निषेधरूप होने पर भी व्यंग्यार्थ विधिरूप हो सकता है अथवा इसके विपरीत भी सम्भव है; इस प्रकार दोनों का स्वरूप भिन्न है। २. वाच्यार्थ पहले समझ में आता है और व्यग्यार्थं बाद में, इस प्रकार दोनों के बीच काल का भी भेद है। ३. वाच्यार्थ शब्द से समझ में आता है जबकि व्यंग्यार्थ शब्द के अतिरिक्त शब्दांश, अर्थ, वर्ण, रचना तथा अभिनय से भी समझ में आता है। इस प्रकार दोनों के आश्रय भी भिन्न हैं। ४. वाच्यार्थ समझने में व्याकरण, कोश आदि उपयोगी सिद्ध होते हैं जब कि व्यंग्यार्थ के लिए वक्ता, बोद्धा, प्रकरण आदि की विशेषता का ज्ञान उपयोगी होता है; इस तरह दोनों के निमित्त भी भिन्न हैं। ५. वाच्यार्थ केवल अर्थ-प्रतीति कराता है जबकि व्यंग्यार्थ चमत्कार पैदा करता है; इस प्रकार दोनों के कार्य अथवा फल भी भिन्न हैं। ६. वाच्यार्थ एक ही होता है जबकि व्यंग्यार्थ अनेक हो सकते हैं; इस प्रकार दोनों की संख्या भी भिन्न है। ७. वाच्यार्थ एक ही व्यक्ति को उद्देश्य में रख कहा गया होता है जबकि व्यंग्यार्थ में दूसरे व्यक्ति के प्रति भी हो सकता है, इस तरह दोनों के विषय भी भिन्न हैं। गुणीभूत व्यंग्य में व्यंग्यार्थ शब्द द्वारा कथित नहीं होता, इसी प्रकार वह तात्पर्य से भी समझ में नहीं आता अतः वहाँ भी व्यंजना को माने बिना काम नहीं चलता। यह सिद्ध करने के पश्चात् कि अभिधा से व्यंग्यार्थ समझ में नहीं आता और अभिहित अर्थ से व्यंग्यार्थ भिन्न है, अब हम यह सिद्ध करेंगे कि वह लक्ष्यार्थ से भी भिन्न है। अगर कोई यों कहता है कि १. लक्ष्यार्थ भी अनेक हो सकते हैं, २. उसके भी अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य नामक अलग नाम हो सकते हैं, ३. लक्ष्यार्थ के बोध में भी शब्द और अर्थ दोनों पर आधार रखना पड़ता है; चूँकि लक्ष्यार्थ शब्द से समझ में आता है अतः उसका आधार शब्द पर है, और चूँकि लक्षणा के लिए मुख्यार्थ-बाध आवश्यक है अतः उसके ज्ञान को लेकर उसे अर्थ पर भी आधार रखना पड़ता है। तथा ४. प्रकरण, वक्ता, बोद्धा आदि के ज्ञान की भी तात्पर्य-बाध समझने के लिए लक्ष्यार्थ को अपेक्षा रहती है। इन सभी बातों में लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ समान हैं अतः यह नया व्यंजना-व्यापार मानने की क्या जरूरत है? इसका उत्तर है कि १. यह सही है कि लक्ष्यार्थ अनेक हो सकते हैं। पर एक वाक्य में तो एक ही लक्ष्यार्थ लागू होता है, पर व्यंग्यार्थ एक ही वाक्य में अनेक हो सकते हैं। २. लक्ष्यार्थ का मुख्यार्थ के साथ किसी न किसी सामीप्य आदि का नियत सम्बन्ध होना आवश्यक है जबकि व्यंग्यार्थ के लिए यह आवश्यक नहीं है। उसके लिए नियत, अनियत अथवा सम्बद्ध किसी प्रकार का सम्बन्ध हो सकता है। ३. लक्ष्यार्थ के लिए मुख्यार्थ-बाध जरूरी है जबकि व्यंजना के लिए नहीं। ४. प्रयोजनवती लक्षणा में प्रयोजन बोध के लिए व्यंजना आवश्यक है। ५. अभिधा और लक्षणा दोनों का आधार समय अर्थात् संकेत पर है। अभिधा संकेतित अर्थ ही बताती है और लक्षणा में मुख्यार्थ-बाध

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परिशिष्ट २५७

आदि तीन समयों की जरूरत होती है। इस प्रकार लक्षणा अभिधा की पूँछ है। चूँकि व्यंजना अभिधा से भिन्न है, इसलिए वह लक्षणा से भी भिन्न है। ६. कई बार लक्षणा के बाद व्यंजना आती है, अतः ये दोनों एक नहीं हो सकतीं। ७. व्यंजना सदा लक्षणा के बाद ही आती है, यह बात भी नहीं है। वह कई बार अभिधा का अवलम्बन लेकर भी प्रकट हो जाती है। ८. यह बात भी नहीं है कि व्यंजना अभिधा और लक्षणा पर ही आधार रखती हो, क्योंकि वह कभी-कभी अवाचक वर्ण का अनुसरण करके भी प्रकट हो जाती है। ९. यह भी नहीं है कि वह शब्द का ही अनुसरण करती हो। कई बार वह अशब्दरूप नेत्रकटाक्षादि से भी प्रकट हो जाती है। उक्त सभी से स्पष्ट हो जाता है कि अभिधा, लक्षणा और तात्पर्य से व्यंजना-व्यापार अलग ही है। इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसके बाद वह वेदान्तियों और नैयायिकों को उत्तर देता है। वेदान्ती यह मानते हैं कि वाक्य का अर्थ सम्पूर्ण वाक्य से ही निकलता है, अलग-अलग पदों से नहीं। अतः सम्पूर्ण वाक्य ही वाचक है, और वाक्यार्थ में व्यंग्यार्थ भी समा जाता है। इसलिए व्यंजनावृत्ति स्वीकार करने की जरूरत ही नहीं है। इसका उत्तर है कि वेदान्तियों को भी व्यवहार में तो पद और पदार्थ का भेद करना ही पड़ता है, अतः व्यंजनावृत्ति स्वीकार किये बिना उनकी भी मुक्ति नहीं। नैयायिक यह मानते हैं कि व्यंग्यार्थ अनुमान से प्राप्त होता है। उसके उत्तर में सिद्धान्ती कहते हैं कि अनुमान के लिए जो शर्ते हैं वे सब व्यंजना में पूरी नहीं होतीं, अतः व्यंजना को अनुमान से नहीं समझाया जा सकता। हम यह एक उदाहरण से समझ लें : घूमो बाबाजी आराम से श्वान को आज मार दिया- सिंह ने, गोदावरी के तीर पर झाड़ी में रहता था जो। किसी कुलटा के एकान्त मिलन में फूल तोड़ने आये बाबाजी विक्षेप बन गये होंगे। उन्हें सम्बोधित कर यह कहा गया है। नैयायिकों का यह कहना है कि जो आदमी कुत्ते से डरता है, वह यह जान कर कि सिंह इधर आया है, इधर फटकेगा ही नहीं; यह अनुमान करना स्वाभाविक है। भीरू जहाँ भय के कारण का अभाव होता है, वहीं घूमता है; यहाँ भय के कारण का अभाव नहीं है, यह जानने के बाद वह वहाँ नहीं जायगा। यह सामान्य अनुमान है। इसका उत्तर सिद्धान्ती इस प्रकार देता है कि भीरु हो तो भी गुरु या प्रभु की आज्ञा से अथवा पत्नी के प्रेम के कारण अथवा इसी प्रकार के किसी कारणवश भय का कारण होने पर यहाँ जा सकता है। साथ ही अगर कोई कुत्ते से टकराने अथवा किसी अन्य कारण से भयभीत हो तो यह भी तो हो सकता है कि वह सिंह से न भी डरता हो। (लोग कहते हैं कि नेपोलियन चूहे से डरता था।) साथ ही, सिंह के आने की बात प्रत्यक्ष या अनुमान से सिद्ध नहीं होती; केवल एक कुलटा के वचनों से मान लेनी पड़ती है। इस प्रकार, इस १७

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२५८ अभिनव का रस-विवेचन उदाहरण से 'आराम से घूमो' से 'देखो, इधर आये तो।' का जो व्यंग्यार्थ समझ में आता है, वह अनुमान नहीं हो सकता। कारण, यहाँ अनुमान की शर्तें पूरी नहीं होतीं। इस तरह हमने देखा कि अभिधा, तात्पर्य, लक्षणा या अनुमान-इनमें से एक भी व्यंग्यार्थ का बोध कराने में समर्थ नहीं है, अतः इसके बोध के लिए व्यंजना के व्यापार को माने बिना काम नहीं चल सकता।

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पद्य-सूची

इलोक: क्रमाङ्क: श्लोक: क्रमांक: अज्ज वि हरि चमक्कइ ४७ आशाबन्ध: कुसुमसदशः ८६ अत एव नृत्तगीत ११६ इतिवृत्तवशायातां २३३ अतन्मये तु करिमश्चित् ११६ ईर्ष्यासूयादिसंकोच- ११६ अतश्चक्रार्चनाद्येषु ११६ उअणिच्च लणिच्चंदा १४६ अथैक धेनोरपराध- १८९ उचितं प्राहुराचार्या: २२३ अधिरुह्य परां कोटिं ११ उचितस्थानविन्यासादू २२३ अनौचित्यप्रवृत्तत्व १३८ उच्छलन्निजरश्म्योघ: ११६ अनौचित्यादृतेनान्यत् २३० उच्यते, वस्तुनस्तावत् १३० अपर्यालोचितेऽप्यर्थे १७८ उदारस्वपरिस्पन्द १९१ अपारे काव्यसंसारे १२ उद्दीपनप्रशमने २३४ अपुष्टार्थमवक्रोक्ति: १६५ उपनायकसंस्थायां १३५ अभिधा भावना चान्या ३५ उपपरिसरं गोदावर्या: ८० अभिधेयेन सम्जन्धात् २४७ उपसगें निपाते च २२४ १८३ उपस्थितां पूर्वमपास्य १७९ अम्लिकाया: फलं पक्वं ६२ उपादायापि ये हेया ११४ अलंकारवदग्राम्यं १६६ उभावेतावलंकार्यौं १७५ अलंकारस्य कवयो १८५ ऊर्ध्वोध्वमारुहय यथार्थतत्त्वं ४१ अलंकारास्त्वलंकारा २२३ ऋतुमाल्यालंकारैः ८८ अलंकृतिर लंकार्य- १६७ एकस्मिन्शयने पराङ मुखतया ७८ अलंकृतीनां शक्ताव- २३४ एकेन किं न विहितो १७१ अविभावितसंस्थान- १८३ एतद्यथोक्तमौचित्यम् २२८ अष्टावेव रसा नाट्ये २१६ एतस्मान्मां कुशलिनमभि- ७८ अष्टानामिह देवानां १०७ एवं भावा रसाश्च्ैव ७१ असमासा समासेन २२५ एवं भावानुकरणे ३ असंभाव्यं० ८४ औचित्यस्य चमत्कार २२३ अस्या: सर्गविधौ १९३, ८४ औचित्यंत्वग्रैवक्ष्यमाणलक्षणं २२३ अंशुमद्िश्च मणिभि: १६३ कथं च शक्योऽनुनयो १८९ अत्रारोचकिनं: केचिच्छाया १८८ कथाशरीरमुत्पाद्य २३३ आद्यमयीय वर्णान्त- १३० कथोन्मेषसमानेऽपि १८० आद्योद्रेकमहत्त्वेऽपि १३० कल्लोलवेल्लितदषत्- १७१ आनन्दनिर्भरा संवित ११६ कवण पर्वतपे जई २१८ आभासत्वं कथितं १३५ कस्त्वं भो दिवि मालिको- १९४ आम्नायसिद्धे किमपूर्वमेतत ४१ कामेकपत्नीव्रतदुःखशीलां १९० आरोग्यमाप्तवान्साम्ब: ४३l काव्यस्यालमलंकारैः २२३

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२६० अभिनव का रस-विवेचन

श्लोक: क्रमांक: श्लोक: क्रमांक:

किमपरं त्यैलोक्यं० ८४ धर्मार्थकाममोक्षाणां १०४

किं तारुण्यतरोरियं १८७ ननु चाश्मकवंशादि १६५

कृत्वापि काव्यालंकारां २२३ न भावहीनोऽस्ति रसो ७१

क्रुद्ध: क्रोधे भये भीतः ३ नयनवठनप्रसादैः ८८

क्व नीलकण्ठ व्रजसि ८२ नल सावित्री षोडश- गतोडस्तमर्कों भातीन्दुः १६४ नानाद्रवैरब हुविधैः ७१

गुञ्जन्ति मञ्ज परितः २४९ नानाभिनय सम्बन्ध भावयन्ति ७१

गुरुमध्यगता मया नताङ्गी २११, २४९ नायकसामान्यगुणैः १३९

गौडीयमिदमेतत्तु १६५ नायवस्य कवेः श्रोतु: १२८

ग्रीवाभङ्गाभिराम ४४ निमग्नेन क्लेशैर्मननजलधे- २०२

ग्रीवा भंगे रुपाबे ४४ निमित्ततो वचो यत्तु १६४

घूमे बाबाजी, आराम से २५७ निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपं २०२

चित्रं निरालम्बनमेव मन्ये ४१ नैकान्ततोऽत्र भवतां २४

जग्धिपानकृतोल्लास ११९ न्यक्कारो ह्ययमेव मे २३४

जो नव हाले चाले १४६ पदे वाक्ये प्रबन्धार्थे २२४

तत एवोच्यते मल्ल- ११५ परचेष्टानुकरणादू २७

ततश्रोपात्तकालादि ४३ ८१

ततो निर्विषयस्यास्य ३६ परिष्कुर्वन्त्वर्थान्सहृदय- २०२

तथा हि मधुरे गीते ४४ पर्यापपुष्पस्तबकस्तनीभ्यां १३७

तथा ह्यकाग्रसकल ११५ पंथी नथी पाथरणुं १४६

तददोषौ शब्दाथौं २०५ पाठ्यादथ ध्रुवागानात् ३६

तदेभिरङ्ग भूSष्यन्ते १६३ पात्रे समर्पी सदणी समृद्धि १८८

तद्वत्सचेतसां सोऽर्थो ८० पाषाणादपि पीयूषं २०

तन्नियमे हेतुरौचित्यं २२६ पाते जेवी चरती हतो आ २५०

तस्मात्सतामत्र न दूषितानि ४१ पुनर्निमित्तापाये च ९४

तस्य स्तनप्रणयिभि: १८४ पुरं निषादाधिपतेस्तदेतत् १८९

तां प्राङ मुखीं तत्र निवेश्य १९२ पुष्पसाधारणे काले ७

तामभ्यगच्छद्रुदितानुसारी १७४ प्रज्ञा नवनवोल्लेख- १२९

तावन्मात्रार्थसंवित्ति- ११५ प्रज्ञावैमल्यवैदग्ध्य- २५१

तीथें तोयव्यतिकरभवे ८३ प्रतिभा कारणं तस्य २१०

तुष्यन्ति तरुणा: कामे १०६ प्रतिभाति न संदेहो १७

तेषां परस्पराश्लेषात् २२४ प्रतिभाप्रथमोद्भेद- १८५

त्यागी कृती कुलीन: १३९ प्रतिभायामवस्थायां- २२४

त्यैलोक्येऽप्यत्र यो यावान् ११९ प्रतिभैव श्रुताभ्यास- २१०

दयिते वदनत्विषां मिषात् २४९ प्रतायमानता यत्र १८५

दूराकर्षणमोहमन्त्र ७३, ७४,१५१ प्रतीयमानं पुनरन्यदेव १८५

दुवृत्ता जारजन्मानो २०१ प्रयोगत्वमनापन्ने ६९

देवार्चनरतस्तत्त्व- १०५ प्रेमासमाप्तोत्सवम् १०३

दूयं गतं संप्रति शोचनीयतां १७१, २३९ बालेन्दुवक्राण्यविकास- १८४

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पद्य-सूची २६१

श्लोक: क्रमांक: श्लोक: क्रमांक:

बुद्धीन्द्रियकर्मेंन्द्रिय- ९४ यदा तु तत्तद वेद्यत्व- ११५

बेठेली वडीलो वच्चे २११ यदा मधुरतिक्ताद्याः रसाः २२४

भतुमित्र प्रियमविधवे १७४ यश्चात्मरतिरेव स्यात् १००

भाति पतितो लिखन्त्याः १५ यस्तुष्टो तुष्टिमायाति ३

भावनाभाव्य एषोऽपि ३५ यस्मात् किमपि सौभाग्यं १७८

भावसंयोजनाव्यंग्य ४० यावद्धामनि संकेत १३०

भावस्वभावप्राधान्य- १८३ यावत्पुणों न चैतेन १२८

भावाचेतनानपि १२९ युक्तं वक्रस्वभावोक्त्या १६३

भावानभिनयसम्बद्धान् ६८ रतिः शृंगारतां गता ११

भावा विकारा रत्याद्याः ९४ रतिर्हासश्च शोकश्र ५

भूषणान्तरभावेन १९७ रत्नरश्मिच्छटोत्सेक- १८५

मधु द्राक्षा साक्षादमृत- २०१ रम्याणिवीक्ष्य मधुरांश्र ४७

मधु द्विरेफ: कुसुमैक पात्रे १३७ रसनाद्रसत्वमेतेषां १५५

मननतरिणीतीर्णविद्यार्णवो २०२ रसबन्धोक्तमौचित्यं- २२८

मनसि सदा सुसमाधिनि २०९ रस भावतदाभास- १३३

मनोजफलकोल्लेख- १९५ रसभावतदाभासतत्प्रशान्ति १५४

मम सर्वगुणौ सन्तौ १६९ रसानुगुणशब्दार्थ- १३०

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम् ७२ रसा भावा ह्यभिनया २

मार्गस्थवक्रशब्दार्थ- १९५ राघव विरहज्वाला- २११

मार्गोडसौ मध्यमो नाम १८८ राज्यं निर्जितशत्रु ७९

मार्गानुगुण्यसुभगो १७७ रे हस्त दक्षिण, शिशु- २४५

माधुर्यादिगुणग्रामो १८७ वक्तृबोद्धव्यकाकूनां २५२

मित्रात्रिपुत्रनेत्राय २१३ वक्रवाचां कवीनां ये १६३

मित्रे क्वापि गते १३९ वक्राभिधेयशब्दोक्ति १६४

मुख्यार्थह तिर्दोष: २५१ वाग्धेनुर्दुग्ध एतं हि ३६

मोक्षाध्यात्मसमुत्थः ९३ वाच्यवाचकवक्रोक्ति १८१

मोक्षाध्यात्म निमित्तस्तत्त्व १०८ वाच्यवाचकसौभाग्य १८०

यः कोडपि भास्करं स्तौति ४३ वाच्यानां वाचकानां च २३६

यत्किञ्चनापि वैचित्र्यं १८३ वाच्यावबोधनिष्पत्तौ १७८

यत्र तद्वदलंकारैः १८५ विचित्रो यत्र वक्रोक्ति- १८५

यत्र न दुःखं न सुखं न द्वेषो ९४ विभावभावानुभाव- १४५,२२९

यत्रार्थः शब्दो वा २१० विरतास्वभिधाद्यासु २४८

यत्रान्यथा भवत्सर्व १८५ विरुद्धबुद्धिसंभेदात् १७

यथा नराणां नृपतिः ५७ विवृद्धात्माप्यगाधोऽपि १५

यथा बहुःव्ययुतैः ६८ विषयाश्रयमप्यन्यद् २२७

यथा बीजाद् भवेद् वृक्षो ७१ विशिष्टमस्य यद्र पं १३०

यथा मधुरतिक्तादया- २२४ वृत्तौचित्यमनोहारि १७७

यथा यथा चाकृतकं १२९ वृथा दुग्धोऽनड्वान् ९८

यदप्यनूतनोल्लेखं १८५ वैचित्र्यं सौकुमार्य च १८७

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२६२ अभिनव का रस-विवेचन

श्लोक: क्रमांक: श्लोक: क्रमांक:

व्यंग्यव्यंजकभावेडस्मिन् २५० स एव सर्वशब्दनां १३०

व्यंजनौषधिसंयोगे ७१ स तत्र प्रेक्षको शेयो ३

शक्तिर्निपुणतालोक- २१० सन्ति सिद्धरसप्रख्या २३३

शतेनोपायानां कथमपि १३६ सन्धिसन्ध्यङ्गघटनम् २३३

शत्रुओ मुज होय ऐ ज २३५ संबंधिमित्रद्विजराजहीन १३६

शब्दार्थौं सहितौ काव्यम् १६२,१६५,२०५ संवित्सर्वात्मिका देह० ११६

शब्दार्थौ सहितौ वक्र- १६८ सा काप्यवस्थितिस्तद्वत् १७७

शब्दो विवक्षितार्थक १७० सा हि चक्षुर्भगवतः १३०

शय्या शादलमासनं १०३ साहित्यमनयोः शोभा- १७७

शरीरं चेदलंकार: १७६ सुकुमाराभिध:सोडयम् १८३

शरीरं जीवितेनेव १७८ सुखप्रायेष्टसंपन्नः ८७

शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन् १८८ सैषा सर्वैव वक्रोक्ति: १६४

शिखरिणि क्व नु नाम २१८ सोडति दुःसञ्नरो येन १८५

शुं तारुणयतरु तणी रसभरी १८७ स्वं स्वं निमित्तमासादय १०८

शूरास्तु वीररौद्र षु १०६ स्वभावः सरसाकूतो १८५

श्रृंगारहास्यकरुणा २ स्वातंत्रयेण प्रवृत्तौ तु ८५ शृंगाराद्धि भवेद् हास्य: १५१,१५४ स्वाभाविकी च प्रतिभा २१० शृंगारानुकृतिर्या तु १५२,१५४ स्वार्थबोधे समाप्तानां २४३ शरृंगेण च स्पर्शनिमीलिताक्षीं १८४ हेतुश्च सूक्ष्मो लेशोडथ १६३ शोकेन कृतः स्तम्भ: १५ हे वारांनिधि, बोधिसत्त्व १८६ श्वासायासविडम्बनैव ७६-७ हे हेलाजितबोधिसत्त्व १८६

षड्जं रौति मयूर: ७ हे हस्तदक्षिणमृतस्य २४५

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नामानुकमणिका

अक्षपाद ९९ अपहसित ९२

'अग्निपुराण' ९३ अप्रधानता ५२

अत्यंततिरस्कृतवाच्य १३४,२१५ 'अभिज्ञानशाकु' तल' (शाकु तल) ४४, १९८ अनभिनेयार्थ २२७,२३१ अभिधावृत्ति ३३,२४५,२४६,२४८ अनिबद्ध २२८ प्रयोजन का बोध न करा सके २५३,२५६ अनुकरण १८,१९,२४ 'अभिधावृत्तिमातृका' २४४

और अनुसरण २९ अभिनय के चार भेद ६

अनुकीर्तन २४ की प्रतीति साक्षात्कार जैसी ५२,५३,८० अनुगमन ४८ अभिनेयार्थ २२६,२२७,२३१ अनुपपत्ति (अन्वयबाध) २४७ अभिनवगुप्त १-११०,११२,११३-११५, अनुप्रवेश ३,२८,४३ ११५-१२१,१२३-२६,१२७,१३१,१३२ अनुभवन ६० रसाभास सम्बन्धी १३२-३,१५४

अनुभाव ५८,६६,११०,११२ वक्रोक्ति विषयक २५० शांत के १०८ व्यंग्यार्थ बोध के लिए प्रतिभा आवश्यक संभोग शृंगार के ८० ४४,२५१

हास्य के 'अभिनव भारती' १,१२,१६, ९०

अनुभावन ५८,५९,८०,११०,११२ २४,३३,४१,४४,४७,४९,१२६,१५३

अनुभावाभास ७३ अभिलाष ८५

अनुभावौचित्य २३२ अभिव्यक्ति ३१

अनुमिति ११८ अभिव्यंजनावाद ३०-३१

अनुव्यवसाय २४ अभिहितान्वयवाद ४, २४५,२५४

और अनुकरण २४ 'अमरूशतक' ७८

और अनियत का अनुकरण २७ अमर्ष ६

और सदशकरण २७ अर्थ १७३

और अनुसरण २९ अर्थ क्रिया, (क्रियाकारित्व, अर्थ क्रियाकारित्व)

अनुस्मृति २९ १६,२५,२६

अनौचित्य १३४-५ अर्थशक्तिमूलध्वनि २१८,२२०,२५४

के दो प्रकार १४१ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य १३२,२१५

के तीन अर्थ १५७ अलक्ष्यक्रम, किसी समय लक्ष्यक्रम होता है २१८

की गणना २३० अलंकार, औचित्य से ही शोभा देता है २२३-

की जगन्नाथ द्वारा की गयी गणना १३५ २२४,२३४

की जगन्नाथ द्वारा की गयी चर्चा १४१-२ की अयत्ननिर्वर्त्यता १७९

के बारे में साहित्यदर्पणकार २३० का प्रस्तुतौचित्य १७९,१८४

अन्वयबाध (अनुपपत्ति) २४७ प्रतिभोत्थ चाहिए १८४,१८६,२१९-२० अन्विताभिधानवाद ४,२४४,२५४ विषयक आनंदवर्धन १६८

अपस्मार ६,८२ विषयक क्रोचे १६८

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२६४ अभिनव का रस-विवेचन

अलंकारध्वनि २५० इतिकर्तव्यता ३९,४० अवहित्थ ६,९० 'इन्द्रजितवध महाकाव्य' २४५

अवान्तर वस्तुवक्रता १९७ 'ईडी पस रेक्स' १५८ अविवक्षितावाच्य (लक्षणामूल) 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी' २४,३४,११७- १३२,१३३,२१५ ११८,११९,१२६ अव्यय २३५ उग्रता ६,८६ अव्याप्यवृत्ति २०७ उत्कीर्तन श्र ६,५७,५८ उत्तम प्रकृति के लक्षण ७७

असंभाव्यधर्मारोप १९० 'उत्तरराघवचरित्र' १९८

असलक्ष्यक्रम १३२,१३३,२१५ उत्तररामचरित ४६,१९७,१९८,२४५ असूया ६,८२,९० उत्पलाचार्य १०७,१२०

आकांक्षा २४१,२४२,२४३,२४४ उत्पाद्यकथावक्रता १९७

आख्यायिका २२८ उत्साह ५,५४,५८,८६

आत्मक ८९ शान्त का अंतरंग १०३-७;२३१

आत्मस्थ ९३ उद्भट १९६

आत्मानुप्रवेश ४३ उदात्तराघव १८०

आनध्य ७ उद्वेग ८४

आनंद ११८-२१ उन्माद ६,८२ आनंदवर्धन १२६-२८ कामदशा ८४ अतिशयोक्ति विषयक २२० उपकार्योपकारकवक्रता १९१

औचित्य विषयक २२५,२३७ उपचयावस्था ४८

ध्वनिकी व्याख्या २१० उपचारवक्रता १९०

रसाभास १३२ उपसर्ग २३६

रसाभास रसदोष नहीं १५४ उपसर्ग निपात वैचित्यवक्रता १९१

लावण्य १८५ उपहसित ९२

आनंदशंकर ध्रव २०६ उभय शक्तिमूलध्वनि २१८,२२०

आनुषंगिकफलवक्रता १९८ उमाशंकर जोशी ४५,२४५ आभिमुख्यनयन ८०,८१ एकधनता ४६

आरभटी ७ 'एप्रिशियेशन्स' १७१

आरोप ४८ 'ए सिस्टिम ऑव लौजिक' १७

आलस्य ६,८६,९० 'एसेझ इन संस्कृत क्रिटिसिझम' १५९

आवन्ती ७ 'एस्टेरिका' ६३

आवृत्तिवक्रता १९७ 'एस्थेटिक' १६८

आवेग ६ एस्थेटिक एक्स्पीरियन्स १६८

आसत्ति (संनिधि) २४१,२४२,२४४ एकोर्डिंग टु अभिनवगुप्त १३१

आस्वाद, मनका व्यापार ६८ औचित्य, विषयक अभिनवगुप्त १८८-१९०

आस्वादन ३७ आनंदवर्धन २२५

आहार्य ६ कुन्तक १८८-१९१

आंगिक ६ क्षेमेन्द्र २२३-५

आंतर (गान) ८ प्रबन्ध में सम्हालनेवाले २२९-२३७

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नामानुक्रमणिका २६५

अनुभाव का २३२ हेमचन्द्र २०५

भाव का २३० काव्य के कारण हेतु : जगन्नाथ, दण्डी २०९-१० वक्ता और वाच्यका २२७ पीयूशवर्ष २१०

विभावका २३० मम्मट २१०

विषयका २२८ रुट्रट २०९

संचारीका २३२ वाग्भट २१०

'औचित्यविचार चर्चा' २२३ काव्य का अर्थ रस चर २५०

औड्रमागधी ७ काव्य का शब्द (देखिये काव्य की भाषा) औत-क्य ६,८२,८७ ११२-११४

कथा विच्छेदवक्रता १९८ काव्यप्रकाश में लोल्लट का मत ११

करुण २,७३,८४ शंकुक का मत १७-८

विप्रलंभका भेद ८५-६ में रसाभास १३३-३४ १३८

निरपेक्ष भाव ५८५ व्यंग्यबोध के लिए प्रतिभा आवश्यक

कर्णपूर १६० ४४,२५१

कलानुभव और योगानुभव ३४-३५,६१,१२५, काव्य में अलंकार का स्थान : आनंदवर्धन १६८ १२६ कुंतक १६७

कलापक २२७ १६८ २१८ क्रोचे कविनिबद्धपात्रप्रौढोक्तिमात्र सिद्ध जगन्नाथ २१९-२० कविप्रौढोक्ति मात्र सिद्ध १२८ 'काव्यमीमांसा' १२९,२४० कान्तिलाल व्यास २६२ काव्यलिंग २१९ काम की दश दशाएँ ८४ 'काव्यादर्श' ११ 'कामसूत्र' ८३ काव्यालंकार (भामह) १६२

कारकवक्रता १९१ काव्यालंकार (रुद्रट) कारकशक्ति २३४,२३७ निवेदादि भी रसत्व को पाते हैं १५५

काल वैचित्र्यवक्रता १९१ काव्यहेतु २०९-१०

कालिदास ४७,८२,८३,८६,१७१,१८८, 'काव्यालंकार-सार-संग्रह' १९६

१९०,२३३ काव्योत्पत्ति के बारे में अभिनवगुप्त १२७-८

'काव्यकौतुक' २८,६९ आनंदवर्घन १२७

'काव्यकौतुक विवरण' १२९ माणिक्यचन्द्र १२८

'काव्यतत्त्व विचार' २०६ किराताजु नीय १९८

काव्य के प्रयोजन: कुन्तक १६७ कुन्तक १६६-२००

जगन्नाथ २०३ काव्य प्रयोजन १६७

भामह १६२ काव्य की परिभाषा १६८

काव्यकी भाषा (देखिये काव्य का शब्द) १२६७ के ग्रन्थ का स्वरूप १६६-७

काव्य की परिभाषा : कुन्तक १६८ वर्णन की दो रीत १९६

जगन्नाथ २०३ वस्तु के दो भेद १९५

भामह १६२,२०५ स्वभावोक्ति १७५-६,१९१-२

मम्मट २०५ कुमार-संभव ८२,१३७,९८,१९०,१९२,२३९

वामन २०५ कुलक २७

विश्वनाथ २०९ कुहक ९०-१

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२६६ अभिनव का रस-विवेचन

'कृत्यारावण' १९८ चंपू २२८ के० का० शास्त्री २६१ चित्रतुरगन्याय, का खंडन १७,२३ के० कृष्णमूर्ति १५९,२२२ चिंता ६,५८,८२,८५,८७ के० ह० ध्रुव ७८ जगन्नाथ ११७ कैशिकी ७ अनौचित्य के बारे में १४०-४२ क्रियाकारित्व १६,२५,२६ महावावय के विषय में २४२ क्रियावैचित्र्यवक्रता १९० रसाभास के विषय में १४० क्रोचे 'इन्टयुइशन' ही 'एक्स्प्र शन' १७३ जड़ता (जाड्य) ६,८२ काव्य में अलंकार का स्थान १८३ कामदशा ८४ क्रोध (कोष) ५,५३,५७,८६ 'जम्बूस्व्ामीरास' १५७ 'क्षेमराजस्तवरचितामणि' ११९,१२१ जयरथ ११५,११६ क्षेमेन्द्र २२३-५,२३४,२३७ जुगुप्सा ५,५४,८२,८६,१०३ गर्व ६,८४ जॉन स्टुअर्ट मिल, प्रनीतिका स्वरूप १७ खडकथा २२७ ज्योतीन्द्र दवे १३२,१४४ खंड काव्य २२७ टिल्धर ए ६३ गंगानाथ झा, डा० २४१,२५२ टोमस मान १५७ गान ८,१७ डिम १०८-९ 'गीता' १०० डोलरराय मांकड १३२ 'गुजराती साहित्य के स्वरूप' २६० रसाभास १४४-१४९,१५०-५८ गुणकीर्तन ८४ तत ८ गुण, के बारे में जगन्नाथ २१७ तद्धिनप्रत्यय २३४,२३५ सम्मट २१७ तद्विदाह्लादकारित्व १८१ वामन २१७ '(त्रालोक' ४४,११५,१२९ तीन आत्मा के ३४ तंद्रा ६,९० आभिजात्य १८४,१८६ तात्पर्यबाध २४७ औचित्य १८८ तात्पर्यवृत्ति २४४ प्रसाद १८६ 'तापसवत्सराज' २४२ माधुर्य १८४,१८६ तिङ २३४,२३७ लावण्य १८४,१८६ तुल्य कथा वक्रता १९८ गोविन्द (प्रदीपकार) ११,१२,२९,४३ त्रास ६,९५ 'गौतमधर्मसूत्र' १७० त्र्यस्त्र ८ ग्लानि ६,८२ दंडी ११,१२३ घन ७ काव्य-हेतु २१० 'घरे बाहिरे' १५६ दक्षिणात्या ७

चतुरस्त् ८ दासगुप्त, प्रतिभा ३६

चपलता ६ लोल्लट के मत का अर्थ ११

चमत्कार ४७,४९,११७-८ संस्कार और वासना, कुन्तक की रचना १० चर्वणा १८,३१,३७,५९,६१,६२, प्रक्रियाकी समझ १७२ ६३,६८,११४ दश्य ५२ चर्वणाभास ७३,१३२ दैन्य ६,५८

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नामानुक्रमणिका २६७

दोष ९० नाम वक्रता १९८

धर्मकीर्ति, स्व लक्षण और मानस १६ नायक नायिका के लक्षण १३९

प्रत्यय १९ नारद ७

धर्मी ६ निद्रा ६,८२

धीरुभाई ठाकर निपात २३५,२३७,२४०

'धी होली सिनर' १५७ निबद्ध २२७

धृति ६,५८,८४,९३,१०३ निरपेक्षभाव ५,८६

घृष्टता ९० निर्वेद ६,८२,९३

'ध्वन्यालोक' १,५०,१९९,२५० तत्त्वज्ञानजन्य ९५-१००

'ध्वन्यालोक एन्ड इट्स क्रिटिक्स' १५९ निष्पत्ति १०,११

'ध्वन्यालोक लोचन' ('लोचन') १,३,३३, अतः उत्पत्ति; अभिव्यक्ति और पुष्टि ३४,३६,४०,४४,५३,५९, ११,१२,१८ ६०,६१,७२,११२,११४ अनुमिति १८

अनुभावन ११२ अभिव्यक्ति ३१

काव्य का शब्द ११२,११४ भूक्ति ३४

रसाभास ७४ रसना की ६३

लोल्लट के मत की चर्चा १२ निष्क्रामक (गान) ८

व्यंजना ३०-३१ नोली रान्येरी १७,२३,२५,५४,६३,६४,१२३

शोक का इ्लोकत्त्व ७२-७३ 'न्यायमंजरी' ६२

मर्जन १२८ 'न्यायसूत्र' (वात्स्यायनभाष्य) २४

सहृदय की व्याख्या ४४ परंजलि ११९,१२०

नट, को आस्वाद नहीं है ६९,२१६ पद २४०-४१

नभिसाधु १५५ की नैयायिकों की व्याख्या २४१,२४३

'नमाख्यान' २६० की राजशेखर की व्याख्या २४०

'नागानंद' १०४,१०६ पदपरावर्धवक्रता १९०-१

नागेश भट्ट २४८ 'परमलघुमंजूषा' २४०,२५१

लक्षणा २५१ परावेशालंकार ९०

व्यंजना २५१ परसमुत्थ ९३

शब्द की वृत्तियाँ २४० परस्थ ९३

नाट्य के अंग २-३२ 'परात्रिंशिकाविवरण' ११७,१३०

के अंगों की संगति ८ परिकथा २२७

की व्युत्पत्ति ४९-५०,३,४० पर्यायबन्ध २२७

केवल हर्ष ६४ पर्यायवक्रता १९०

में ही रस का प्रकर्ष ६७ 'पांडवाम्युदय' १९८

नाट्यरस २,४,६९ 'पातंजल सूत्र' (व्यास भाष्य) ५५

नाट्यधर्मी ६ पात्र प्रवृत्ति वकता १९७

नाट्यशास्त्र १,३,२४-२५,३८,३९,५२,५३, पानकरस, का दृष्टान्त ६२

५७,६८,७७,८४,१०५,१०६,१०७,१२३ का स्वरूप ६३

नाट्यानुभूति का स्वरूप २-३,२४,४५-६ पांचाली ७

नाट्यान्तर्गतनाटक वक्रता १९७ पीयुषवर्ष, काव्य-हेतु २१०

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२६८ अभिनव का रस-विवेचन

पुरुषवक्रता १७९,१९७ बीभत्स २,७३

प्रकृति १४५,२३० भःट इन्दुराज ८०

प्रकृति पदनी २४३ भट्ट तौत १२८,१२९

प्रकृति औचित्य १४५,२३० की प्रतिभा की व्याख्या १२९,१३०

प्रकृ तिलय ९७,१०५ की शंकुक के मत की चर्चा १८-२४

प्रतिभा १२८-३० का अनुव्यवसायवाद २४२७

की अभिनव की परिभाषा १२८ प्रयोग बिना रसास्वाद नहीं है ६९

की जगन्नाथ की परिभाषा २०९ भट्ट नायक की रस सूत्र व्याख्या ३१-३५,१२३-४ की भट्ट तौत की परिभाषा १३० भट्ट नारायण ११८-९

की राजशेखर की परिभाषा १३० भय ५,५७

की रुद्रट की परिभाषा २०९ भयानक २,७३,१०३

प्रतिमुख (संधि) २३३ भरत १-११०,१२३,१५१,१५४

प्रतीति १७ भवभूति १८७

आनुमानिकी ३७ भामह, अतिशयोकि १६२

प्रात्यक्षिकी ३७ काव्य के प्रयोजन एवं हेतु, मिथ्या १६,१७,१८,२१ काव्य की व्याख्या १६२

योगिप्रत्यक्षजा ३७ वक्रोक्ति १६२

शब्दजा ३७ वाणी की सौंदर्यवक्रता १६३-४,५

सम्यक् १६,१८,२१ हेतु लेश सूक्ष्म का अस्वीकार १६२,१९६

संशय १६,१७,१८ भारती ७

की समझ ३६ भाव ४२

'प्रत्यभिज्ञादर्शन' १०७ भावना ३८-३९

प्रत्ययवकता १७८,१९० 'भाव-प्रकाश' २३०

'प्रदीप ११,४३ भाव वैचित्र्यवक्रता १९१

प्रबोध ९० भावौचित्य २३०

प्रलय ७ भोकतृत्व में पुरुषप्रधान ८८

प्रवेशक (गान) ८ भोग (भोजकत्व) ३४

प्रबन्धवक्रता १८० भोज, वाक्य की व्याख्या २३

प्रभव ९० मति ६,८४

प्रभाकर २२ मद ६

प्रमाणवातिक १८ मध्यमा ७

प्रासंगिक प्रकरण वक्रता १९७ 'मनोरमा' २०१

प्रासादिक (गान) ८ मनोरमा कुचमर्दन २०१

प्रेक्षक ३ मम्मट ११,१७-१८,४३,८०

प्रमशंकर भट्ट २६२ काव्य का वर्गीकरण २१३

बन्ध १८० काव्य का हेतु २०९

बाणभट्ट १८८ गुणीभूत व्यंग्य की व्याख्या २१०

'बालप्रिया' ३२,३३,६१ दोष की व्याख्या २११

अनुभावन ११२ ध्वनि की व्याख्या २५०

'बाल रामायण' १२८,१९७ रस प्रधान २११,२५०

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नामानुक्रमणिका २६९

रसाभास १३३-४ रमणोयता २०३-४

रसाभास दोष नहीं १३५ बिना व्यंग्य संभवित नहीं २१२

वाचक की व्याख्या २४५ रस अनुकृत स्थायी १४,४८ व्यंग्यार्थ-बोध के लिए प्रतिभा आवश्यक २५१ अनुमित स्थायी १४

व्यंजना की स्थापना २५३ उपचित स्थायी १०

मरण ६,८२,८३ निर्विध्न रसनात्मक ४८

कामदशा ८४ प्रतीति ४८,४९

महाकाव्य २२९,२४१,२४३ सामग्री ४८

महिम भट्ट ११६ आठ हैं २

मंजीर १८८ नव हैं ४,११०,२१६

माणिक्यचन्द्र सर्जनक्षण १२८ नट में नहीं ७०,२१६

मातृगुप् १८८ नाट्य है ६९

'माया पुष्पक' १९८ का प्राधान्य ९

मायुराज १८८ का स्वरूप १२३

मार्गो १८१-२ स्थायी विलक्षण ५८-५९

मध्यम १८८ रस प्रतीति का स्वरूप ५८-६४,१२४

सुकुमार १८३-१८८ के विघ्न ४८-५३

स्वभाव १८२-३ अप्रधानता १५३-४

भेदे मार्गभेद १८२-३ निजसुखादिविवशीभाव ४९,५३ १५३

'मीमांसादर्शन' (शाबर भाष्य) २४० प्रतिपत्तावयोग्यसंभावनाविरह ४९,५१,१५३

एकवाक्यता, वाक्य की व्याख्या २४१ प्रतोपत्युपायवैकल्य ४९,५०,१५३

मुकुल भट्ट २४४ संशययोग ५२,१५३,४९,५७,१५३

मुकुल भाई कलार्थी २६० स्फुटत्वाभाव स्वगतपरगतदेशकाल

मुक्तक ६४,७९,२२७ विशेषावेश ४९,५२,१५३

प्रकरण निरपेक्ष गिना जाय ? १५५ रस प्रतीति झटित प्रत्यय है

मुख्यार्थ २४५ ४९,५०,५१,१५३,८०

'मुद्राराक्षस' १९८ 'रसगंगाधर' २०१-२०३

'मेघदूत' ७७,८६,२७४ रसपरिपर्तन वक्रता १९७

'मेडम बावेरी' ९४ 'रस प्रदीप' २२

मोह ६ रसवत् १८१

यशोविजयजी १५७ रससूत्र १०

योग वाशिष्ठ ११६ की अभिनव की व्याख्या ५८,१२४.५

'योग सूत्र' ९८,१०२,१०६ की भट्ट नायक की व्याख्या ३१-३५,१२४

योग्यता २४१,२४२,२४३,२४४,२५३ की लाल्लट की व्याख्या १०-१३,१२४

'रघुबंश' ८२,८३,९३,१७९,१८८, की शंकुक की व्याख्या १४-१८,१२४

१८९,२४२ रसादिध्वनि २५०

रचना प्रक्रिया १७२ रससूत्र की व्याख्या १०

रति ५,५४,१०२,११०,२३१,२३२ अभिनवगुप्त ४१-४८

का स्वरूप ७६,७७ भट्टनायक ३१-३५

'रत्नावली' १६,७९,८४,८७,२३३ लोल्लट १०-१४

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२७० अभिनव का रस-विवेचन

शंकुक १४-१८ लोकोत्तरता २०४ रसाभास ७३-७५ लोल्लट, के मत की अभिनव द्वारा की गयी के बारे में अभिनव गुप्त १३२-३ चर्चा १२-१३ आनंदवर्धन १३२ के मत की शंकुक द्वारा की गयी समीक्षा जगन्नाथ १४० १३-१४ ज्योतीन्द्र दवे १४४ के मत का बाद के आचार्यों द्वारा विरोध १४ डालेरराय मांकड १४४,१४९,१५०,१५८ की रससूत्र की व्याख्या ९,१०-१२,१२३-४ मम्मट १३३-३५,१६० लौल्य ९०,१०९,११० सुधासागर १३८,३९ वक्रता १६४ विष्णुप्रसाद त्रिवेदी १४२-४३ के छ भेद १७८ का काव्य में स्थान १५६ वक्रोक्ति १६३,१७५ रसानुभव और योगानुभव ३५,१२४-६ 'वक्रोक्ति जीवित' १६६ ब्रह्मास्वाद सहोदर १२६ वचन २३४,२३६,२३७ रंगमंडप ८ वर्णन के दो ढंग १९६ राजशेखर, काव्य की व्याख्या २३८ वर्णविन्यास वक्रता १७८ प्रतिभा १३०,१८८ वर्ण्य वस्तु के दो भेद १९५ पद की व्याख्या २४० वस्तुध्वनि २४९

वाक्य की व्याख्या २४१,२४२ वस्तुवक्रता १९१ 'रामाभ्युदय' १९८ के दो भेद १९३ 'रामायण' २४२ वाक्य की व्याख्या, भोज की २४१ रीति, के बारे में भामह १६५-६ मीमांसकों की, राजशेखर की २४१ के बारे मैं कुन्तक १८१-२ वाक्यवक्रता १७९,१९५ रुद्रट, काव्य का हेतु २०९ वाग्भट, काव्य के हेतु २१० निर्वेदादि भी रसत्व पाते हैं १५४ वाचक २४४

प्रतिभा की व्याख्या २०९ की व्याख्या २४५

रुय्यक ११६ वाचिक ६

रूढ़ि वैचित्र्य वक्रता १९० व्याप्यवृत्ति २०७

रूप गोस्वामी १६० वात्सल्यादि का अस्वीकार ११०

रोमांच ६,९३ वाद्यो ७

रौद्र २,७३ वासना १०

लक्षणावृत्ति २४४-२४८ विकृष्ट ८ आरोपिता क्रिया २४८ 'विक मोर्वशीय' ८४,८७,१९७ सान्तरार्थनिष्ठ २४८ विध्न ४९ प्रयोजनबोध न करा सके २५३ विच्छित्ति २१९ लाक्षणिक २४५ वितत साधारण्य ३७,११५-६ लावण्य १८०,१८४-६ वितर्क ६ के बारे में आनंदवर्धन १८४-६ विदेह ९७,१०५ लिंग २३७ विप्रलंभ, सापेक्षमाव ८५

र्लिंगवक्रता १९० विबोध ६,८१,८२ लोकधमी ७ विभाव ५८

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नामानुक्रमणिका २७१

के आलंबन-उद्दीपन भेद काल्पनिक ७९,८७ विप्रलंभ के ८२ की पूर्णता से रसनिष्पत्ति ९७ शांत के ९३ विभावादि की अलौकिकता श्रृंगार के ८१ ६१,६६,११०,११२ हास्य के ९१

शान्त के ९३ व्यभिचार्याभास ७३

हास्य के ९० व्यंग्य, अतिगूढ़ या अतिस्फुट न चाहिए विभावन ५८,६०,११० २१०,२४८ विभावाभास ७३,१३२ जागरूक एवं अजागरूक २१२ विभावौचित्य २३० लौकिक एवं अलौकिक २४८-९ 'विज्ञान भैरव' १२०-१२१ व्यंजक २४४ विलाप ८५ व्यंजना २४३,२४४ विलास २३३ की स्थापना २५३,२५८ विविक्षितान्यपरवाच्य अभिधामूल १३२,१३३, का स्वरूप; नागेश २५१ २१४ मम्मट २५१ विशेषक २२७ विश्वनाथ २४८

विशेषणवक्रता १९१ व्याधि ६,८२,८३ विश्रांति ३५,२७,४९ कामदशा ८५ विश्वनाथ, काव्य की व्याख्या २०९ वीडा ६ चमत्कार का अर्थ ११७,१३५ शब्द १७० रसाभास के बारे में १३७-८,१४१ १११ 'शब्दव्या पारविचार' विभावन की समझ शब्दशक्ति मूल ध्वनि २१८,२२०,२५४ यंजना का स्वरूप २४८ शंका विश्वेश्वर आचार्य २४,२६,२०,२६,७६,७७ ६,९० शंकुक, के मत की समीक्षा विषाद १८,२४,१२४ ६ की रससूत्र की व्याख्या १४-१७ विष्णुप्रसाद त्रिवेदी १३२,१४२-३ काव्यप्रकाश में १७-१८,८८ विस्मय ५,१००,२३१ शांतरस ९३ विहसित ९२,९३ अभिनव गुप्त ९४ वीर २,७३,१०३,१०७ जगन्नाथ २१५-६ 'वीर चरित्र' १९८ के विभावादि १०७ वृत्ति ७ के आक्षेप ९४ वृत्तिवैचित्र्यवक्रता १९१ का समर्थन ९५,१०७ 'वेणी संहार' १९८,२३३ का नाम १०३ वेपथु ६ का लक्षण ९३

वेश ७७ का स्थायि भाव निर्वेद ९४,१०० वैवर्ण्य ६ आठ में से किसी एक ९९-१०१ वोल्टर पेटर एकमेव वाचक १७१ आठ ही साथ १०१

स्टाइल १८२ आत्मा १०२-३ 'व्यक्तिविवेक' ३५,११६ 'शिशुपाल बध' १९८

व्यभिचारी भाव ६ शृंगार रस २,७३,७५,९१

का स्वरूप ५५-५७,६६,८३ के व्यभिचारी ८२

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२७२ अभिनव का रस-विवेचन

की दो अवस्थाएं ७८ संभोगावस्था १४

दोनों के मिलन में ही चमत्कार ७९ के अनुभाव ८०

दोनों मिलकर संयोग १०

शृंगार ८४ स्थायीनो विभावादि साथे १०

का स्वरूप ८८ अतः उत्पाद्यउत्पादक संबंध ११

का लक्षण ७५ गम्यगमक संबन्ध ११,१८

शोक ५,५४ पोष्य पोषक संबन्धी ११

रसरूप क्यों बनता है ? ७० व्यंग्य-श्यंजक संबन्ध ३१,५८,५९

की चर्वणा आनंदमय ७०-७१,१०७ संलक्ष्यक्रमध्वनि १३२,२१८

शौच ९३ संवृत्तिवक्रता १९१

६,५७,८२ सशययोग ५३,५७,५८,१५३ श्रम

श्रव्य ५२ संस्कार १०

२२७ संध्यंगविन्यास वक्रता ८ सकल रथा सद्धर्मातिशयारोप १९१ सात्वती ७

सर्जन क्रिया के दो खण्ड १२९ सात्विक (अभिनय) ६

सर्जन क्षण १२९ सातत्विक भाव ६

सर्वमेन १८७ साधारण्य (साधारणीकरण) २६,१२३-४

समापन वक्रता १९८ सापेक्षभाव ८६

समास २३४,२३६,२३७ सामग्री ३०

समुपरंजन ६३ साहित्य १७६

५४,५५ की विस्तृत व्याख्या १७७ सहृदयता हृदय संवाद की शक्ति ७५-१९७ का माहात्म्य १७८

संकेत २४५ साहित्यदर्पण ११७,१३८-९

संख्यावक्रता १९१ अनौचित्य की गणना २३०

'संगीतरत्नाकर २१६ आख्यान की व्याख्या २६०

संचारण १११ उत्कीर्तन की व्याख्या २६३

संचारी १११ काव्य की व्याख्या २०९

संचारी का औचित्य २३२ नायक नायिका के लक्षण १३८

संदानितक २२७ निरुक्ति की व्याख्या २६३

संनिधि (आसत्ति) २४१,२४३,२५३ 'सांख्यकारिका' ५४

संबंध (विभक्त) २३५,२३६,२३७ सांख्यों का दुःखवाद २९-३०

संबध-आश्रय-आश्रयी २४० सिद्धि ७

उत्पाद्यउत्पादक ११ 'सुधासागर रसाभास १३८-९

कार्य कारण २४१ सुप् २३४,२३७

गम्यगमक ११,१८ सुप्त ६

निमित्तनैमित्तिक २४१ सुषीर ८

पोष्यपोषक ११ सौभाग्य १८

प्रत्याय्यप्रत्यायक २४१ स्तंभ ६,९

व्यंग्य व्यंजक ३१ स्थायी भाव ५

संज्ञासंजञी २४१ का स्वरूप ५३-५४

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नामानुक्रमणिका २७३

और पुरुषार्थों का सम्बन्ध ५३-५४ हास ५,५४,८९ सब ही सुख प्रधान ५४ हास्य ६,७३,८९,९३ सब जीवों को साधारण ५४-५५ के अनुभाव ९१ स्पंद ४७ के दो भेद ९१ स्फोटवाद ३,४,३३,२४५ ६ उसका अभिनव द्वारा किया गया अर्थ ९२ स्मित ९१,९२ के छ भेद ९२ स्मृति ६,८४,९३ उसके वर्णन ९३ स्वतः संभवी (लोकसिद्ध) २१८ के विभाव ९० स्वप्न ६,८२,८३,९१ की दो व्याख्याएँ ९२ स्वभावोक्ति १७५,१९१-२ के लक्षण ८९ स्वर ७ स्वसमुत्थ ने परसमुत्थ ९३ स्वरभंग ६ 'हितोपदेश' १०४ स्वसमुत्थ ९३ 'हिस्टरी ओव इण्डियन फिलोसोफी' १०,११ 'हनुमन्नाटक' २३४ 'हृदयदर्पण' ३५ 'हयग्रीववध' १९८ हेमचन्द्र १३,५५,१२८, १२९,१३० हर्ष ६,८४,१०३ काव्य को व्याख्या २०५ 'हर्षचरित' १८८ रसाभास १३७-८ हरित ९१,९२

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