1. Abhinavgupta ka Lochan ek Samalochatmak Mulyakan Anjali Asthana (Hindi Thesis) (LQ)
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आचार्य अभिनवगुप्त का लोचन-एक समालोचनात्मक मूल्यांकन (इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डी० फिल्० उपाधि के लिये प्रस्तुत शोध-प्रबंन्ध)
शोधकर्त्री कु० अञ्जलि अष्ठाना
निर्देशक डॉ. चण्ड़िकाप्रसाद शुक्लू रीडर संस्कृत-विभाग लिट
इलाहावाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
संस्कृत -विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद १६७६ ई०
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गव्काल में ध्यनन-सिदान्त का यभरिमानि नेते की हुवा हे केो रनी बौर किव्स ने मम्य प्रमाताहण का। विविय मत के संगातों ने माजे के किउमिहाती बाहितयास्म की निनावरी स्वाएफ नाननम बस णोदम के नना हठी। समस्त तमिद्ा विनस्स हो नई बर नर्षत प्रकाश-पुंव फ्रवर गया। तवनन्तर ्रारम्म हुद सतियाएन के अभििन्य निकय का, जिसमें काब्य का कोई कौनर मी-नाति निससे पिना नहीं का। उचका फ्रयन अंपनी सकय बुथमा से कखा रठा बर उसका वास्तनिक स्व्म, जाँ सनुबय-मृकय में कैंसक मल्पना के रप में था, परत्थमा प्रकट को गया। ध्वनि-शिहान्त के पूर्व का काभ्यशासत्रीय निंतन की वानन्यवर्णन के अकतार की पूर्व पीठिया थी, बपवा उनकी श्यामक परवाईं, इसने बाद का पिंन उन्हीं का प्रहस्ति-नान वपना उस बीपश्िया का प्रसास। पुर्वपती दार्षारय शिंड व्यंन्य- वर्ष को मंगी-मणिति, बपवा इायोसि, बदोप, व्ासृति सत्यादि वठकारहं मैं ही दे रहे थे, उद व्यंष्मवर्ष-मी भाकतय के वास्तकिक वैश्विब्दुय को बानन्द- वर्णन श्ी तल्याविनिवेधियो कृल दृषष्टि ने ही पहनाना। न्ंग्य-वर्ष को बपनी रक्ति का अर्पस्य बनाकर नालीकि, व्याद, काडियास आादि कवियों ने अपनी माज्य-दाका की थी । वह इनकी नाज्य-पृतिमा का मुछ बीम था। उसे उस रप में नहीं सफने के कारण परव्ती वाचार्य महाकनियों की काय्योकितयों का सही स्वप निर्वारण की नहीं कर सो। दुमाग्य से ने महाकनि स्वयं बांचाय नहीं ने कि अपनी कविता की मीमांदा में काच्यशास्त्-मृन्ध ठिकार उपका वास्तकिक परिषय देंते। परिणका: व्वान्मियों तक वटच नाचियां चलती रवीं बौर नेवस वानन्यवर्णन की लैकनी के साथ यह तल्य वास्तनिक रूप में समृबय समाय के समपा का सहा, जो तन मशवरनियों की काब्य-वाचना का मुछ्र बीज या और कवितान्नामिनी का डर्वश्व सावन्य था। नाब्य में व्यंग्य-वर्ष को ली बापावों मे पश्वाना ना, निन्तु उसी प्र्यनिता बानम्यवर्वन को ही हुई - उस्का
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वास्नित नकन वानन्मवर्मन की प्रता ने ही बाना - 'मन्तः ऋ्रयनितेनो सौ शन्मदाथी पशाके:'। और उनहोंने नय ब्यन्य, वर्न को प्रवान-रम ने अभिष्यम्त्
पर्पर का विदान्त बिकाफतों के नम्म मान्य हुदा। कर सूर्व के प्रसाव की भीन न्सार कर कता है। व्यनि-सिदान्त का मास्तमिक स्वमम प्कास में या बाने पर, दही कब्यास् का सर का नया। 3 मान-दवर्वने के व्वन्याकोक की रपना के साम की उक्ी टीक टिप्पणी परम्म हुई। यर टीककार बुष् बत्ू के कम में उसने विरोन के लिए प्रमृष हुए, बौर बुछ्ध ने अपनी अपर्यिमम अपवा ब़ौड़ वृद्ि के नाते बसरे सिदान्तों का प्रन्ंत परिकिय दिया। फखताः ध्याि के विषय में न कैवड निदेच अमतु उपवास्वाल्म विरोय प्रारष्य हुदा, बर वह बांभी तब साया हुई, का कमन १५० ड० पशनात् 'कोमन' डीना की रचना हुई। इससे ध्यनि के बनैक यूपम तल्य स्पष्ट हो गए। किन्मु, बाननदवर्वन का निंतन कृलन होते हुए नी बदु अच्दों में था, न कि अमिनव बुप्त की फ़रार परतिमा ने अपने 'कोमन' को इतना सम्पन्न बनाया कि यह सरय-तरह से नौमिष्ट हो नवा बर बाधारण नैदुच्ध के सस्रों के लिए प्रादूब बन गया। 'श्रोचन' में यम वे अपना मतमेव देते हैं तब बह सामान्कता: यद में नहीं बाता बर रेश फ्रीस होता है कि यही बवानुवारी व्याल्यान है,जुए भी इल्कृन नहीं। ऐसे बनैक स्थछ हैं, बर ने एमक इसने मार्णि एवं मर्त्य के हैं कि वहां बपना म स्तपर बभिनम मुप्त ने पुरे विदान्त का स्वरूप ही बदल दिया और वह ध्वनि-विदान्स वानन्वर्वन का नहीं, बमिनम नुख्ा श्रानदा हो गया। दमिन ही राजा बन नया। ब: प्रस्तुत प्रबन्ध में डोचन-व्याल्यान में निरित स्वतम्त मतों को अंगित करने का प्रवल्न किया गया है। एम प्रार प्रसतुत समीस्षर पांव अष्यायों में निनवत हो नई है :- पमम अध्याय- विषय-प्रकेत। द्वितीय अध्याय- रिहान्तपा। तृतीय अध्याय- यार्जनिय निमेशन। सुर्च अष्याय- व्वन्याल्रोड के परिष्रेतष में लोचन का भुरयांपन। पंम वध्याय- लोचन का परव्ती ध्वनि-सम्परदाव पर प्रपाम। परस्तृत शोम कार्य में परतृत करने का नेव कु्य मुरवर्ष डा० पण्डिका प्रवाद शुन्ह नी को है। नहैव मुडबर्य का अदार से यह बानुष रडा है - बौडिक दाख्ता
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क परिवेश् के सर्वया मुक्य रकर एवं निमय शोकर स्यन्ब कप से लोचन का वध्ययन बरना। बन्हीं के निर्देशानुवार प्रस्तुत अध्यमन किया है। यह-प्रवास कहां तक सपड हुबर है इसके खिए विजानु बटुपयमर की पनाण हें। शोम नार्य को बास्तमिक प्रेरणा देने थाडे तमा शात्रों के प्राति वात्सर्पुर्ण बववार करने वाडे मदेव पुरमर्म दा. बामापताड मिल के पृत्ि कुल बुकक क. इस्सुल शोम्दुनन्य इन्हीं के बशीवांद का एक पूर्व कम है। पुनक में डाविरियिम पैसना की बानरित करने ारे पहन आदरणीय मुडवर्व डाक मण्लितक्रमान तृुष्क बी ने सम्मुष श्रवापत हं. बन्दीं के लौड एवं डपवेस ने यर सोम-डरमन्य सम्पम्म हो का। ध्वनि- सिदान्त पर स्वर बनेक मृं्यरलन खिये नर हैं। मेंने मर्खम प्रकलम किया है कि उनमें शक विवार-मणियों का पुर्ण उपयोग नह सथा बनने बार मागरों का कवासम्मद अनुवरण क्रं। क: मैं तन नौरव मुन्यों तथा उनके मनीची लैवरषों के पृति सपी- शर्िक ससख्ता प्रष्ट कस्तीूं। नंगनाय का-रिवर्ड-न्टीट्स्ट के पृति बमारी डूं, नशां से पुस्तनें भुछन होती रहीं। प्रवान विश्वनियाशय-पुस्तशाठ्य के अधिवारियों के पृत्ति नी सुलक मूं. जिमहननि हेसों, पत्रिकारबों एवं दुरकम पुस्तवों को देने की व्यवस्था की। की मंगावर विवारी ने परस्तुत प्रबन्ध की यपाद्ञकति वल्प समय में टॉक्त किया है, उसके लिए- सत्यन्द बानारी हूं। टंकण कार्य में जो अनिवार्य अुचियां रव नईं हैं, उनके लिए सविनय दाना प्राप्मिी हूं। ध्वनि-बरेम विद्ानों के कर नमकों में कसी अनर्पित करते हुए की यह पंकित बराबर बाद या रही है-
हैममः सपमती सृपण्णी विवुति: श्यामिकादयि बा ।।
पिनीता
अंनोड अल्खाना
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विभयाकनणी
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पुकम व्याय
(पुष्ठ १-२९
विभय प्रवेश
१- संसूत काव्यशास्त्र में ध्वानि-विदान्त का स्थान २- ध्यन्याछोद की टीफा ठोच ३- होचनकार वाचार्य वभिनयनुच्त
ड. इतियां न, बाबार्ब वमिियनुप्त एक अमलोचक और व्वाल्पाकार -१० ४- विभय की उपयोगिता तथा उचका महत्व ५- बचन पृतियों का बाचयन -१4 4. व्वन्यारोड डोचन के संस्वरण -१4
द्वितीय सध्याय
रिटान्स पदा स्वन्चारोक में विभय वोक्ा -२२ १- ध्याने के विरोनी मतों का परस्ताव और उनका अयान -२३
-२३ 8. मालवादी म, अनिरवमनीयतायादी -२६ व, ध्यन विरोनी कों का लामान -२०
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२. वाज्य से पुपष् व्यंग्य वर्ष की. तता एवं भक्ता ३, गाब्य के -
४- व्यनियावय ध्वनि राब्य के ने क. समवलतसममितियलतद बनिविधिततवाज्य इ.१. अयान्तरमंड्निववाच्य इ.२. अस्यम्ततिरल्यु सवाच्य
रवमेद
रस्पूकाक
इम्मशक्तिनड पदपकाश्य अंकाररूपव्यंग्य बाक्यपृताश्य वउनारपव्यंग्य नर्थश नितमलय वस्तुव्यंज्य नविप्रोट़ो िसिड स्वत:सम्मषि अंकारव्यंग्य
वस्सपुकाश्य ४- गुणीमव्यंग्य भ्राब्य - 44 मुणीमृतव्यंग्य काब्य के पैद -14
- 44
-40 वक््यमून व्यभ्य .4c रानिजार
वस्तु रप बळ्का ररूप
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- व्यंग्यों का दरामान्याप्रामन्यं विषेक ७. ध्यनि सम्मतण
• बन्देड
६. विभनाव्य ६. शन्द व्यापार क. वायकल्य
म. व्यवाल्य न. १. बाककल्ण और व्यंगलल्य म. २. वेवाकरण बौर व्यंबसाय म. ३, गुणवृति और व्यंकल्य म. ४, बनुमान और व्यंबलल्य १०- गुण •
मामुर्य
पचाद -१२ ११- बरंगार व्यनि काव्य में बकार -्योज्ता १२. संगटना का स्कप और ध्यनि काव्य में उपवा मह्त्य. -६ १३, ध्वनि शव्य में पृत्ति तल्य १४. गाच १५. इविशिका रवों का विरेष बविरोय विवार -oV
अम्य में खक-पोक्ता प्बन्ध में विरेषी रस की योजना के उपाय -११३ -११४
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स्वनि रवना के प्रतिमावान् कवि क्री श्ीमृति १. बवस्वा बैदं सें नवीन्ता - ५१२२ २. देश मेद से नवीनता ३. कार मेद से कवीनता ४. स्वाउत्यण्य से नवीनता • ५. डकत वैभिक्ष से नवीनता -१२4 . 4, माचा बैविकूष से नवीनता सवाद -१२८
-१२६ सुल्कदेडिकस् -१२६
सवीय वष्याय
वार्जनिक विजेयन
१. काशनीरी जैव कझी -१११ क. परत्यभिज्ादसनी के जतीय तत्वों का विवेशन न३२ 5. विन्नमय बामरस्य की अवस्था न. अमेदवाद, वामाखाद म. समरस्ता -११६
ह. बानन्दवाद २. भाव्य तत्य और वभिनवमुष्त की जैव वर्शनामित दृष्टि -१४० 5. रस तल्य और जैन बह़नी से उचका सम्बन् -१४१ ग.१. वकसितल्म और रकतत्थ न.२. बामासवाद और रवामिव्यनित क .. लरत्ता बर समारणीवरण कु४. कलानन्म बर रदानन्द
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क. ४ रस की कोनिक्ता -१Y० 4. 4 वानन्दवाद बर आनम्पस्वरम रव नतर्थ अध्याय
विवेशन और विश्ेषण
१- ध्यन्चाडोक के परिप्रेष् में लोनन का मुल्यांकन क, वाल्मा पद के विभिन्न वर्ष -१५० ३, व्यन बौर फ्रीयमानार्थ का पार्थकम न. प्रतीयमानार्थ के येद म. रवादि का मह्त्य ड. ध्वनि का लपाण -44 म, ध्यनि के पांन अर्ष -१44 ह. ध्वनि के बिरोषी म. बानन्दवर्णन का ध्यनिविरोमियों को नत्तर -१७० क ध्यनि काव् के -१७१
कन अविषतिततवाच्य व्यनि -१७१ फर. १. अपन्तिर सुमतवाच्य 1
फ१र, अचम्स तिरसृतवाक्य विवशिता यपरवाज्य ध्यनि
अभिनवनुक्त का रस-सिदान्त .
भावव्यंग्य
मागपृत्ादि
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क. २. २. २,व्यललपुद्मत अनुस्वानोव्यंग्य ध्यनि नम्ड
ब. प्रबन्ध के व्यंयकष्य का निबन्धन अनीय
ह. वणों का रपमोसन -२० ह. बंणटना का रवाभिव्यंताल्य ह. तात्पर्यकित की स्थापना -२०३ ग. शन्त रस -२०५
आन्त रस का स्थायी नाव -२०१ .
स. शूंगार रख में विरोम वविरोय का नि्पण -२१७ म, वाटू से अपन्तिर प्रतीति के स्थल में गुणीमुतव्यंग्यत्य- २१६ द, ध्वनि इभ्मिमण न. ध्यननि मेद अं्या . री- शोबन व्याल्यान में बार हुए नामड, उद्मट, वामन प्रमृति बाचायों को दृष्टि में रक्ते हुए विश्वेषण -२२७
क. मामह व. उड्मट म. वामन म. वारिण और बृविकार -२४४
मिन्नतकल्य -२४4 अभिन्मतवलय -२५८
निवर्य -२६०
पदम अध्याय (पृष् स१२-1० शोनन का परम्ती ध्यनि सम्यृपाय पर पुमाव -२६२ १. बंग्य वर्ष और व्यनि में ऐेवप की प्रान्ति -२६२
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२. रव प्रड़्रिय्म -२44 ३- रव संस्या .
शन्स रस *- इृन्द सक्तयां
-२००
कपगर इकति -रू१ (वाक्य क्री) सात्पर्वनित -रेर
कदा शक्ति -२६० अभिवाणता श्रब्दी व्यंजा -२६१ वार्पी ब्यंल्ा -२६४
५- ध्यनि भाव्य मेद -२१० 4- भाय्य मे -३ a२
७- उपरचार -३०३
=- परिशिष्ट।
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विचय भरक
संकच सार्भयदाल में ध्वनि-विदान्त का स्वान :-
भविता रपी पावन सरिदा मानव की सांस्डूसिक पैठना के ाय प्रूकस हुई, गौर ननी हे यह कर मर कौ वानन्यक् में निमम्य परती रही। उममें बकनाहन तरे बनी बदुपय मन करसें रहे, नि्सु उकरी स्वाद का परियिय मनीभह बापानों का नसरवाखिल्य ना। संसृत में, बानार्य मस्त हे कैहर नान सक किने मी पस्दान फूसव बाचार्य हुए, बनी ने अपने बमने पुतिन्मीक्त के गाम्य के स्मम का वैदान्यिय विश्वेषण किया। इपर्कों (को एक काच्य हैं नैद ही है) मैं रस की अनिवाया प्रतिमादिद करने नार्डे थाचार्य नरत ने - 'रसः भाच्यार्थ:' एवं 'म वि स्वायृती कशमिमर्म: प्रनतती' बरा नाट्य में एव का मकम पाया। मण्डी, नानक अद्मदालि मैं नाब्य सूना का बारा बण्मर्म बकशररं में पाबा बर नवी भाच्य का सवश्म निगात हु। इनकी दुष्टि में र एं क्रसार का अलगर का रा। न नामम ने 'रीसि' निवेयन के पवन में 'मुण्र' की पाच्य का क्रान सल्य नाया तब नसत दारा प्रतिनाकित 'रत' नर्वा एक प्रकार का मुष् बन नया। क नगर मस्व द्वारा ड्रविपाित रव नरदीं अंगर मचाना नीं पुण्। अयें शोई हनदद नतीं कि बसे अर्ष कम की अमयम माना नया। बाचार्य मस्त नै उसे न्याक माना था, नि्दु + बगर बर मुण् बादियों ने उमर स्यान नहीं दिया। दही स्यिति 'ब्यंग्य-वर्प' की मी कुई। बाननदवर्मन के पुषपरती बाचाबों की बुददधि में नह व्यंष्य वर्ष और व्यंश्ापृत्ति अस्कूट मप दे सयुसित बौ रवौं दी, दयाननि दे दामार्थ रसे किन्दीं अफाररों के अनयगत माच्य के उमल्कास्क कम में शी पाते रे । वपा *
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भामश ने समासीकि बठकरर के कर्तणा में पहा- कर्ा स्मान गिैषणों के द्वारा कन्द अर्व नम्थ हौ, वर्श समादीसिबंगर है'। एस परसार मानड ने वपान्तर की नम्यमानतर के दारा बाच्य के मिन्म ग्लंम्यार्यं की दर सच् सेद किया है। परवांपौत्त अकार में ब्येन प्रणारे णामिवीको ' द्वारा परोचा रूम के व्यंश्ापृत्ि की बर ही सस है। नण्डी ने सो ,बवाक थाईनर के प्रमंद मैं 'ब्वक्ि' कर का प्रयान भी किया है। बर पपाँचोस बलार के अराथ मैं 'पणरान्वराल्यानम्' द्वारा व्यंशामृत्ि की बर श्त पिया। बनन्ोंे इल्पेसा के चयंक इब्दों की गिनारी हुए 'व्यन्पी'। पद का प्रयाग भी पिया
उपयुंक्त कलिमम सवापरणों के स्पष् हे कि ब्म्य-वर्ष पुर्ववरती वापागों को जात था । किस्तु, ने काव्य में उसने मश्ल्द का उनित वाचउन नहीं कर चार। मानवद दानार्य सम्ालंर एवं काच्यासकारं में की भाच्य का बारा बौन्दव बौजो से। क्योंकि सव्ार्थ की काज्य के विषायष तल्न या डरीर हैं। इनकी दृषष्टि काव्य के नाष्यासंकरण नात्र तक बी सीमित पी, उश्री दृष्टि के मे मववनियों के काव्य का पूरयांक करने का फ्रत्म करती रहे। इन्नोंने वर्डकार मुण, रीति शबि के बठतरों है महवर्मियों के काच्य की तौजना पाचा था, बौर उबी का इरतिमादन कहने में सन्छोंने-बपनी दारी शत्ि रा दी । विन्तु उमहोंने कान् और शरीर के मीकर की भाच्यात्मा को म पशलाना औौर न पश्चानो का प्रक्न किया । व्पन्य-वर्ष हे परिषित होते हुए भी उली दृकट मदा एवं नस्तर का परतिनाकन करना एक फ्रकार के पूरवपृतिन्कित शास्त्रों की मान्यतातों को पुनौती दैना था, जिस्ना उनमें सादस नहीं था, क्योंकि व्यम्म
१- गययारंगर श0 alt
सुव्योकतपिति प्रक्तमुतावकयमथ्रः।। माव्यापर्ड २110३
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वर्य को पूफू सवीकार करने पर, समुवांमड व्यानार की नी फरनना करनी क़वी। बमिना तमा सस्तणा के बचिरि्क कोई बन्य ब्यापार सुा नदीं नया था। प्वाकिर वानामों ने रह की भी कभी कनी माच्य वार्द रप अमता वर्ष तुण कम तक दी मान कर सन्सोच् किया। फिन्यू, मवाभनियों के साच्य में कभलने बाडे उद तयूष विहैष्य- 'व्यंग्य-वर्ष को प्ानतपडी ननारय नानमपवजे नें पर्वाना, जाँ महपनियों के कतच्य का प्राम् ततन था। उभी ब्यंग्य-वर्ष की दृ्टि से वानन्यवर्णन ने वाच्य-स्वरूप का विवेशन किया। उसशे बाच्य के वाचय वर्ण(रपमादि) फुवारों से नर्ईमा मिन्न काना। पु्व्कती बानायों में बदुना व्यास्यान विदा था, कत: वानन्यवर्णन ने कस वयुवार्भिव समूद की पुरावृति नहीं की, सपयोनानुवार उद्तपर वनुपदन मात्र करने छौड़ दिया । कैमक वर्यज्य- वर्ष के स्वश्म कर वर्पणा ुकम दृष्टि से निम्वण किया बर व्यंग्य के दाम उसह इतिनाका व्यंक् की नी बनिवाय पृतिक्ा की। यै दोगों तल्य व्यन- सम्यदाय के बापारत हैं। वह व्यंग्य-वर्ष पृतिना स्फल नहवनियों की वाण्ी में स्कुनिय बौचर है और नैवस भाच्वार्थ के सल्पतों दारा बाना माता है। बा मंस्यू, शरललड बर एव रूप बौँसा के। काच्य में बयष्य-वर्ष को सवपररि मक्ता की नई बौर सवी दृष्टि से भाब्य का पुरवांक किया । निविन व्यग्य-वर्ष में विहेष मलत्ब 'स्ब्दग्य' की रिया। बिल्ा प्रामान्येन कृषपात नानार्थ नरत ने किया था, रस्चा बित स्मह्म पर्किम एवं मुलयांकन वानन्यवर्णन में किया -
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बौर, यह रद रूम व्यंग्य-शर्म न बैकत समूगों की कलौकिक नदातमत नानन्द मैतर है, वाचति ननियों को क्ाज्य-रचना के जिए अधीम स्वासन्तून एवं मौखिकता के पुपशन का बनन्ना अनवर फ्न कहता है। मयाँरक , र के सम्पर्व वे बणन कहने पर दे पालें मी अवीन उपती हैं, जिस्सा पूर्व के कमियों मे
एपं प्रार वानन्यव्वनर ने स्वण्य-शर्ष की नपराति में पुास की नांधि शव्यृष्टि में कसारणर की बौर नतुरान न्यंम्म के सनानन के साथ की साम्य की बनास अंभर बौर मुण् कपी कौनिक तमा मयुरों के सुंकारों से मंचू शे उठा। बराई में वावन या नदा। बादि भाच्य-ामायण के केनर दारी कौकिक काथ्य परम्परा का क्राण तल्म संसृस की नहीं, निश्यं के सहंसिल्य का कसन सयुदयों की न्यंग्व वर्ष फ्रतीत होरे ला। बार रेवा ला कि नम तर काब्य हे विषय में दृष्टि स्मष्ट नर्वीं से पाई थी। वह काज्य तल्थ सदियों को श्मष्द था, कि्सु, ने दानारवँ न ने यय: इन्योंने सडू नर्दों को उदणा परिषिय शार्त रूप में न पिवा । फैव माज्य में उत्तका प्रवीन कही रहे । वानन्दवर्वन को हमा कि 'अ्वार्प' ही भाब्य का कतम हे बोरं नयंम-च्यंज का रतत प्रोन कलने की सच्य रना दा्भक मन सस्ती है। उद व्यंन्य-वर्ष की पुमान कम है व्यकत करने नार्डी बाच्य को" व्वनि अंा दी। बर भाच्य का एक सी प्रसर नानर कध्यनि'। न्लम्य वर्ष के अनमान रहनी पर 'मुणौद्व्यंम्य' नाम रहा। वह गुगीस्च्ंस्ान् ध्यनि निभ्यन्समुत
कें नवर ल्वामाल्वि मजुात कप पुवा: 11 व्य. ४।
*- (१) व्यनिरेन काच्यु। (३) सम्मर वस्वापे प्रिाणे नार्ल्येव व्यनिव्यतिरिक: काब्य
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慧 कः नह मी व्यनि-वाद ही है। व्यग्व-बरम के बमान में तौ वित्तान्म भ्ाचय
एव क्रकार बनमवर्मन ने जिस व्यनि-्दान्त की स्पापा की य हस्च क्र्य - रामायम, मशमासत बानि में यो उसमा प्रकरिटि म्परवार पाठा दी पा, बस्कूट रम में पुर्व्सरीं बाणावों के मुत्यों में भी उसरी नाया कवन्य - नै ही उद सलम की फुम बार इक्कि कम में पकनाना और सबी इम्मीततया हुब्बवरयित रूम से स्यापना की । बानन्यवर्णन ने कयमि पुरानी बात को दी कहा, बिन्यु कदा नुसन एवं सी दृष्टि है। नवि वाण्ी के नुदुध वर्ष को विकृस कर इनहनि निरशुम्त माम्य-विदान्त की बामुत किया। बर थगर-
ए प्रकार- संत्रा की नननी सी का संस्यूय माब्मशाएय में बगार, रीवि, मुण, वानि प्तृत कमाम बसितित्न में या नर थे। उसमें वाचार्य वानन्यवर्पन ने ध्याने सथ्युताय नामर नया इस्छदाय बौड़ा, निसें शासत काव्यांनी - र, बरलगर, मुण, रीति, दृषि, कक्ोकि बदि को ध्वान-भाब्य कपी बल्मूस्त की हाथर में सनारित कहने का चकक प्रवास किया। निःकन्दे नयन्दाशोक परकी पुर के सिए एव बाशौक सम्भ है, जो काष्य के शस वाम्यवर पफों की बाळीकित कर रवा हे औौर वषिमों के सिए बान्द, अवीन काव्यगन प्रस्तुत करता है। नर्योंकति क्वनि के अरे प्रनि प्रामीन व्पूको
शामिनी का बराव याकन एवं पिर कृतन सुंसर नना।
--- -रामायणमतामा सपृतिनि सपमे सर्पन प्रसिदव्यनवारं कप्ाकाम एममृoर 著 餐 पश्यमपचिया कवाचीय् ।1 न्य. पृ० ४४२
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शी सन्ममेदामि फ्लरेण सििचिया। वाणी नकयमायाति पुवपिन्यियसत्यपि।।
'डोपन' के सविया दानाव बभतिवतुष् हैं। इसमें बानमुभ मै वान्यवर्वन ने ध्वनि-िदान्त का विस्वुत व्वास्यान किया है। अपने 'काचन' या महत्म प्रतिवरमित कहते कुए स्वर्म अभिनयमुमा पकते हैं - 'प्चिं कौपर्न पिना- शौदो मासि पन्किादिहि'। विदानों ने भी ध्यन्ाशांक के अध्ययन में कोचन का नही मसल्ब पादा है, जो व्याकरण में पंमत्ि के मंशमाम् का बपवर वेदाम्सपृतों के अध्यमन में अंगाणार्म के माच् का । एम बाकियों में क पूर का ककता है सयादि ये बतिकयीकिपृण है। 'शापन' में अनितमुम्त का सत्मृष्ट पाण्सिल्य वर्तन कअवा है। जैर वशन के कौत में उनकी परसिमा ने जो माम बा रही भी उसका परिणाम यद रया कि दासिति्य के पात में उनती 'अभकमास्ती' बर 'कैनन' दागों हृतियों ने मुन्य प्रतिक्ा क्राप्त की । बाचार्य ने नतमसक हाँकर बानिल्यक शास्त में बमिक की कम दोनों टीकानों के माध्यम से कही नई उक्ियों का आाण मानर बर ड्राया निही ने उनी कपर की प्ामाणिका की सीसर भरना मी उन्ति न सफर। इसका निवेवन पुषों यणास्मान करने।
(२) दाबाय बनिमृच्त ने 'बोपन' में अक स्वशें पर 'पन्दिण' का डीक का नाम किया है निसे त्ष्ट है कि धयन्याठांक पर 'कोचन' दील के दुई 'पण्कित टीका मी किही नई थी, जिलले ल्किता सम्पक्ता वनिनमुन्त के दी पृरषनि थे।
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बाचारय अभियुन्ध दी साक्िय बातू में 'डिलनारकीगर' एर्वं 'शाबकारं के नाम हे पसिद हैं, यह मामवामानं मे संर-बिम्मिक्' में निविच् शकमाच्यकार नाकप दैश्ाडी बभियुद्ध दे भिन्न हैं। वभिसुम् बनि- गौनीय ड्राइण मे। अभिननमुप्त ने वन्ताशक में अपने पुण्ण वभ्तिम्त का ब्णन कहते हुए खिया है कि निदी कारणवड़ कश्नीर राजा उंितिाित्य ने कम्मौन पर फढ़ाई कर दी । उस सपय कग्मीज के राजा महौवना मे, कम झुद में यहोचना पराक््त दो नर। महौषना के यद ब्तििम्त नाम के एक बहुत बड़े विदान थे। कशनीर के राजा बवितिानित्य बनितुम्त की बपने दर्दा के बार बौर गडे सम्माननृवी हन्ों खा। बमदीं वभितिुप्त के वंत्ु में छममन २०० वर्च बाद वमिनसुम्त सपन्ल हुए। बामयमुन्त ने चन्पाशांक में अपने पियामस नराशुन्त, पिा नरभिंबुच् (सुुब) का बर्णन किया है। इुन्बीं नरतिंुच्त के पुत्र अभिनन्तुष्त दे। बमिकव श्री मा का नाम पिनवा था । अभिनन के समी पुर्वष पशम सिन मक थे। पिता- मव वरायुन्त भो तौ अभिमन ने सिप का ही बसार ना है। फिा
१- सम्पूर्ण विवेशन का बमार कृन्य - हा० कान्तिक्ड पाण्ेव का अभिनुच्यरै।
को डथ्या-्तुस शत नान कि्लगोत् सास्णा्यिलंगफठो मपनसत्य।न।।। कान इंिाकियोँ रया निर्य पहमानयत। पणगरमवास् कदनीराएमं विवालय-
है- मल्म हि क्फा नर विदु भानिक्वास्पी पिरी हवि- सन्त्राक्रोड १११५
वं स्मरलक्लूकुलिं मालतवरी परतदुरने ए मक:।।
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नरर्जिंलुन 'संवारकृान्त परांपु: ए्ं 'व माता पिक्ठा पी शिममल पीं। कत: अभिननमुम्ध पर भी हय वातानरण का पुमान पड़ा बोर मे भी जैप वर्श के सकण् विजान हुए । वमिनननुन्त ने बाजीयन सतपर्व फ्रूव् का पाकव किया, मयादवि माल्याड़ मैं की मातर के मत हो नाने पर, पिता नर्तिंयुन्त नी बमृंरी को पर । परिजम या हुवा कि बभिकद की सांसारिक बीयन के ड्रंांति आापयण बेने पाठा कोई न रवा। फछत: के संगारिक बीयन है अर्पदा विस्क को नर । वै एक मात्र र्रिगमस्ति बौर दार्जनिक विषययों के अ्ययन में कम गर। उम्फोंने शै- दशन को आल्मदात् कर किया तथा बसे पुणत: अपने बीयन में व्यवकूस करने का प्रततन किया। बाएम, उनकी अपल्त विवारपाराएं डैन कसने पर की आाचृष हैं। बािम ने अा सम्पूर्ण दीयन दाजीनक निन्न,ननन में एवं दाहिल्यदेवा में बी ला किया। वचिक ने किवी एक युह से आ्ञन नरतीं क्राम्य किया था। उनहोंने स्वयं
हर्वाटर इने मिन्न-ि्म शलतों के मिन्म-निन्न कुह मे, चिली सुरी निम्न विव्ित है- पिता रररसि मुब(कुक् के व्वाकरणुठाज , नुविराम के प्राषिया मृतिरायानम से डैपय : नाननाम से वैतनेतय्ह मपामण मृम्त कै
र हम्पवीमम में कोषवतनीमनीनणल् काममि फैव जुनः ।। समीकाम्मोमावियसमै पुरा करौदि दाल्यं गुरवेशनडु स्वयन्।
६- बोनाक तविमताम्परमनगन्यि। बीमृविराजाय: स्पिज्रवायः। •- वानर्ईस स विमवार्णकवणनार: सवेशिमसवरा्मयनामनायः तन्त्रालोक 37/60-62
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सितती निमांश, पटेन्दुराज हे व्वनिसिदाम, तमा मद्वाँद के नाट्कास्त्र का बध्चपन किवा। इन दात गुरुओों का तो अभिनन ने शचय के बसिति बस्ैव किया है।
١٠
विधिन शताबों पर छिहे नर हैं। इनने अतिरक व्वन्याकन पर डचन बौर मस्त के नाट्यसाएम पर छिदी वनिकवनासवी टीकारं बासिल्फाल्रीय
எ,-ாணச, ஜஅள்-,
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१० ३- मेवाद विवारण,अ- देवीक्तत्रिनिनरण,10- सत्वाच्यपुशरिा,
११- मुतरखनर्परणखवोद ४: ननाटवाडोक. ४४- बलुवस्ता चनिनिती। अभिनव गुप्त की सभस्त कृतियाँ उपलब्ध नहीं हैं। किन्तु उपलब्ध क्ृतियों से यह स्पष्ट है कि वे उच्च कोटि के शैवदार्शनिक: अभिानुन्त को उपरे सिन्य हैच बर सिप का वक्तार मानते मे िक विच्य मे बपने गुरु अधिनयुप्त की पवंदा करते हुए डिका के :-
लप-्चरीकसमरी निक्सति नियमेन मोफाउलीप।।। शयी कुार समेन्ड्र ने भी अभिनव की अपना बासित्य गुरु बताया है बौर इन्हें 'बोमवारिदि' अवाए जनसागर पहा है- कुत्नानिश्यु स्ताल्यात् वाहिल्यं बोचवारियै: ।(डॅमैन्ड
क! इसमें कम्दह नहीं कि वभिननमुन्त एक सपरित पैतना के परम यौनी मे। यह प्रत्िटटि है नि बभितमुष्त ने बारत की खिन्द तथा विभ्यायों के साथ कमीर की जीकतर वर मुछमर्न के बीन नीक्ना नाम है प्रसिद गांग की , भही नाम से नाम मी विपवान। नैरव भुकर में नैश्वसवोम कर पाठ़ कहते हुए प्रास किया बीर बर्वीं भन्त भात ने फिए उन्होंने समाि हे की। विद्वानों ने बक द्रामाण्क परिवीलनों के भशचात नाचार्य अमिनुथ्या या दाठ ६६० ई० हे कैसर १०३० ई० तब निश्यित निया है।
वाचार्थ वमिनसुच्: एक समाठोनन बर व्वास्याकार -
अभिन्तृप्त ने वातित्यताए्र पर कोई मोडित मृन्य नहीं छिटा, भरा पक्ते पदा का पु है, उनकी नैद दी आकित्य-तृतिया हैं - वभभिवनारती बर कैचर बर दोनों डीका कम हैं। डौकाकार होते दुए मी अंगराणार्य के
(२) मैसस्ान का नाठ कसते हुए मुकर में प्रवैश की बास डा० गागे ने
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१९ कमान अभितमुम्य" बाचार्य कर पर बनिच्िक हैं। वर्ह स्वामानिक कय कै यह विादा दोती है कि बिम भारणों से उम्हें वापांकय पर की स्वाति निछी। इक स्पाति के मिकने ने जनैम कारण हो सनती हैं यया- पह-विभयय इनरा कयुलीय-नान, रवाल-आ्न समाषि, निन्यु उन समसा कारणों में के कर्मं प्रतुस शरण इनका मोकि्यित रक-सिदान्द की है। पएववीं बनानों में मम्मट आनदि नें उसी बनार पर बपने कल्द में एसविवार कमारिया किया। रव पृप्रिया की डेकर अभिुम्त बवने वनिकि प्रसिय हुए कि उवाललाय के म्रकस बाचार्य मस्त की भुछ्ा या दिया गया। सम, शोनम में प्रतिनिष्यित होती हुए वमिनय के एक समाकनक बोर व्याल्या गर के व्यतित्व का परीक्षण कले। दाम ही, यह देंही कि बांभाव मे किद प्रार वाननवणर के पिदान्तों की बंयामृत करने का प्रकलन किया है और पहन एवं वर्पशामम का दामय कैसर किद प्रकार उनहोंने बपने वारशनिक मार्नों बौड तालि प्रकिना का भंदुड समन्यव स्ाशिल्य में किया है। इकी यह जात को बायैनगा कि भण्यशास्त्र को बनििन बुम्ध का कया योगमान हे और भास्तीय सपाफोना अन्तू में अमिनव मुष्ध का कौन का स्पान है। यह निश्कित रप के कमर सम्मन नहीं है कि कौचन में कोई एक स्वाल्या पहांदे सी अपनाई न्ह है। बनी पृति में फोयें नैखिवटम काने के विवार के अभिमन ने निदी एक पडालि का अवतप्यन करना उपति नहीं सपका। बपनी डीका भो इम्ससोि की मौखिक दृषि सिद करने के छिए विभिन्न व्वास्या पहंियों कड को एक दाय कौम डीना में साम करने का इनहोंने फ्रकलम किया चिके बमिनय कै व्यास्यान ने एक क्या रुप है छिया। अमिन मुम्ह ने व्पाल्यान की उम पदति को सरवधिक अपनाया है, निलनें पकी कुवस के कम में प्रतिपत्ियों के नतरों की उपस्यित करने उनके फल्यैक तुष ना रमन शहो हुए, अ्त्त में बपने विान्द परा की स्पापा की बाती है। सपकर-मण्डन करती हुए अमिन पुम्त कर सर्ज की नरम अवस्था पर पहुंद बाते हैं, तब उनका कदार स्कम इृत्िनोचर कोता है। उपयुक्त इब्दों का नयन करते हुए यर कहो ससलता के ली मानमों में प्रतुन कहते हैं, तब रसा प्रतीत हौता के बेे
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१२ इनकर आाकिति हुसय शी माचड के रूप में परिणात क नया कौ, वह माचा सवीकर की माचर न रकमर एक मम पाच्य बर्न नर् हो। यह माचा बभिष शी हुलय के बाँच प्रांस माचा है, कयौँंनि, कोचम में शी नहीं बमिन पाखवी れ 中 m 中 学 き ゃ ご 工 き き す 学 き き き रेही ही माचर का प्रयाँन कहते हैं। वपश को सो ठैशन-पसा का केी नरमान मिठा हो । कह चियी एक विनय को उैकर वर्ह करना प्रारम्म कहते हैं तो माचा के विभिन्न डाँतों बीर सर्ह के विभिन्न दृष्टिनोणो है कम विभय का सविस्तार विवैधन करते हैं। नमिनन के व्याल्पान के मलल्यपुर्ण होरी हुए मी, माष्कियुरण इमाकी बौर वर्म के विसार के कारण उसमें बतिकव गौच या गर हैं। उनका व्यास्यान
नहीं करण है कि डाव: उनके व्यास्यान के प्रवाह में व्यपमान की ज्रीति दाँची है। निदी गात की कस्ते-नहती बीड में कोईं दूसरी बास ध्यान में या नर्ष सौ उसे भी दे नहीं पर कह ऐेंते हैं। नानों इन्न्ें आशंद ही कि बाने बूपसर मिठैगा या नहीं । फल्ता ने नविकम महमबद तपुषों की भी बया कदा भोड़ केते हैं। इन्य सपूयों का निवैशन कहती हुए मी बभिनिकमुचा वानदवर्णन के स्रिान्तों को कहं तम ही साता है, बभ्लामिक उम में स्पष्ट कहने ही का फ्रकन करते हैं। वानन्यवर्वन के पस्ताकित नन्तथ्य की सपनती स्मय बभिियमुमत उसा अमो शीव बवशय करती हैं। नया *
एय प्रसार बर मी नई एकह डोचन में मिकती हैं। वागलुम् ध्नि-िान्त मे न स्वफार कहने वाठों का विराम बरती है गारे कम ाफौलमों का रौत्र बाित्य, पकन या व्याकरण तुस नी हो। इन निरोषियों के यृद्ति अभििव की नाचा वयन्त कट दी बठी है। यमा *
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கீ்ன்எச்எளாள்ண-
नाय मान रवा है। बनिम बपने मायुक स्यमान के कारण की रेसा क बेते
बानन्पनमने पर उपमें भकन भहर हे और बनके निरेमियों पर बात्राय । बमिमन मुम्त व्यास्यान के पर्वर में प्राय: विल्वास और प्रस्तिक इन्दान्यों எர்்ன்-ன- ரளிரண் . इृ्दानोन। यहां बुवि्यात- मान्ताडीयन्चायेन कूर प्रान कहती है बर्द सुपरिति शरात्ि्याय, शजयतपरीस्ाप्टायमेद, पायरटिकल, ग्रेन्- प्रसारपायेन, का मी प्रयान करते हैं। एक और वपवासासमर बपना देवे कौगों मे फिर प्रदुणत कहती हैं जो निनर विवेक के दुवरों का कन्मान्वरण कहते हैं * சர்கர்ா ரிக் ஸ்: बमिनन की माचा बकु कूड और सम्यन्म है। उसमें विषिन रमों का सपानेश है। उनकी माचा को बहुरंी पाचा कहा काय तो बतिशियोक्ि न होगी। उनये अंिकांत इब्मद वारकिंगों के बी है क्री - अ्पय, व्पर्तिहक, ब्यापि, अतिय्यान्रि, बाध्यामा, बादि, का, पही, मान्यरीया्मा बदि। स एर्र साक्िय कमालोनत होने के करण एक ही पद के विभिन्न ररपों को पुपर
पवलाण :. परववनानतचार :: रचिता, रस्यनान्वाचार:, रस्यमाना, ध्वन, प्वन्को, धवनम सवादि। इम प्रगार काचन में अभशद बुध्ध के पसा, निनस में बगैंक तथूप लौने का खाे हैं। शके शशा्ति में शोल के पुर्नवतीं बाषाषों के विषय में अैक सपूवों का
-்சா ர்ஏஸ t ் 1 19 ६- डोकृ. २२०
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ज्ान शोवा है, विहैन्य कम दे तम आभायों के बननी पुकियों का कौ थाज बनुपतच्य हैं। दोमाम्यवत ने बुरियां नैक अभिसुण्ह की ही प्राम पीं का। भहत से डैकर ध्यनि सस्टताथ के विलाय कातम तक सोने बार्डे वििन्न बानायों मे नषों का रक्ेस लमें लोपन में निक्ता है। बभिननमुम्ता अपने पुवकतीं बानाबाँ के विरेष करते हुए मी उनने सिदानतों को पनी कनी पुत्र अंत में मान भी हँते है, ग - युनंदस का विरोम, उनसी नादविवान। किर मी बगिनव बहुनाज का के सिदान्तों के प्रनामित होते हैं, बनते नतों को युक् सप तक स्वीकार करके वापने विान्त में मिका ही हैं। यहां एक समुय विहेन कम है उलेसनीय है कि वनिनमुप्त व्यनि-सिान् को रसी रम में व्याकुत नर्बीं कहते हैं बिस रुप में जनम्मवर्मनी ने उसे परस्तुत पिला। ए्क एसकह पर ने बानन्वर्णी हे वहमत नहीं होते। किन्तु वे तनक विरोष थी
व्यास्पान कर येते हैं। वमििनमुन्त व्याल्वा करते कपमम उसमे बािक सल्ीन हो गाते हैं कि पी कनी एक ही वंड् का बतिनिययृत स्याल्यान करने सपते हैं, बर उथ प्रत में व्याकरण, दहे, बाे सम्बन््ित बपने ज्ञान का प्रद्शननर देते हैं। नदी पर्ण मैं बाड कुम्यम कुस को बमने पुर्वषदीं आचादों के म को भी उपरियिा करते बनका कच्चन ूवों कहने कपते हैं । बानन्यवर्णन ने ज भास की-बीन पखियोंमें भरछ पाफी में की है, सी ही बनिस्सुमा पुा-करा कर वे कम हे सुआकर कर समकनने का प्रकन कहती हैं, विन्सू सस परावी में कही नई बाठ कुकने के कमाय बर बाचिक उडक पाती है। आमिनव जी लही सृति के कारण उनकी टीस नढव कर नर्ष है। वौर , कपी शरण तुलालमम अध्यपर हेतु परे-भव
एम पलिक गौचों के रसी हुए मी, वभिक ने परपरवीं बाचायों को कयन्त पानत किया। अभिममुम्त के व्यास्यान में विदान्द बौर साउाचना क गंक लन्वा हुता है। की शरण हे कि वार्जनिक मागों से युकत बनकी स़-महात ने परनवीं बानामों को कमावित किया।
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विषय की उपमोकिता तमा उद्णा मदल्य
அ்ர்ரனர்எ்!ளண்ளி वे सुलना करने पर यह बैनम्म कड़ा भष्ट हो बाता है। उव्चालौक की टृषटि भा का वनिगवमुंच्त माथ्य करते हैं जो एक और बसई बनकी मैवा पाजनिक सकुों எரன்நளர்ளரள்ள்ர்ை शरी की दामान्य तपूनों की भी सक्का देती है। சண் அர்ைறம் ினரஜண் निःकन्देव बकिसुन सुरल पाश्कित्य के नी एवं कौनिक पतिमा सम्प्म दाईनिय बचारय हें किन्तू बाकिय के निकम पर उनफी बीमारं ल्न्द ही बाबी है। डॉप और बमतियनासती - दाँनों की सार्ि यारत्ीय टीवाबों को वनिनन बुप्त ने बपनी बारण्ाओां, मान्यताबरं के परियेत में सय कर खिया है। वनितसमुन्त के पास बपनी एक निन्सम दृ्टि थी। उमछोंनि न शैवल मरत कै पाठ्कतास्थ को वाहिकि धवन्तरकीय की भी नर अम में पस्तु कहने का मकण किया। नतशन उनका व्वास्पान की पनी स्वतम्म निन्दन का रप के डेता है बौर क्योंकि वे कलौनिक पुतिना एवं क्लौनिक दृष्टि के परििणं बाणार्य मे ततः उनकी माम्फताएं एक नया बाबाम प्रस्कृत मस्ती हैं। कही करण है कि परवी पार्तििय-शारय बिन के अचिक पुमावित किवार्ई पहणा है, आचार्य मख एवं बानन्यवर्णन से य। क्वानि-विदान्दा में र्वानि निल्पण के प्रम् में परवती காளீ் எ-எளமினஎ்எணஎ்்எ்
की केक्षा इपये डीककार धमिनुच्त द्ारा प्रार्सत या नन गया। बैे, वैदन्त अरादार्ज का ही नवा बौर बानरायण्त मुछ् दि गर।
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व्याल्या के व्यपमस से स्वर्य प्ुवान बन नर हैं, बन्मीसिय कला है। बौर
किवर हे बपवर न्यन्चाडीन में बर्वां कहां कपने मद की मलालू बारोित चिया
पस्तून: बानाय वभिनयमुच्या दारा ध्यनि-विकान्स में परियिर्शन कर दैनी से म्याने का स्कू्प दी नकत नपा, अत: प्रसुत विभय की उपयोगिता यही है नि ध्यान-सिान् का परिणार करके ढुडे पुस्ड्रीसना िस किया नाय । मिसी गान्कार में स्याने का स्वमम उभ्ी रम में समुनयमरों के सनमा अपसिया की सके, किद एम में दाननपरमी ने पस्सुत किया था। वहां या जीसित करना ववि-
ஜூரச்னணண்ண்ஈர்எ
संसंकत: प्रस्तृत कम्पयन का नरी पुार है कि वानम्यवर्णनी के विदान्य को वितू रम में पशनामा नाम कपा सपता पुवर्निवा रम्म किया नाय।
ய்ள்ஸ்ன்ஸ
ச்ன்் ண்்ின் इतियों में कुक् पृत्ति कश्नीर मशाराम के बाभिति कयोतिरषिद दवाराम तर्ा शी पुक्त का गसूर प्रकस्ना पी। विवीय पृति नीरामृष्णमाण्यासवर के मून्यकल्न राजीय पुल्तशरम की पुस्तर थी, यह नी करमीसिक पुस्तत ना इकस् पी । सुरिय इृत्रि मतुर के नरनिलतम्मा सूछ के संकषाध्यायत दाचार्य
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मूक की दृष्टि से पाथ: बाँच पूर्ण है। रम्पृति कई पाण्युडिपियां मिक्र पुगी हैं- १७
वथा महावशपाध्याय पी०ली. भाणे का करा है सक माण्ारकर संस्थान में पांव पाज्युकिपियां देवनामरी बफरों में और दो सारमा किषि में पाष्त हैं। कठकदा बंस्मृल सीरीड़ ने अवम्मालंक का बंस्मरण मनपुबन मिम्र लिकित अपनान" नानक नई डीचा के नान प्रवास्ित किया। महामशोनाध्याय पी oी. गाणे के अनुवार इस्डा बबार काण्यमाठा संस्करण है। डा० नाकोनी ने ड्वन्चाछोड का कने माचा में बुवाड किया। उनहरने स्थान स्थान पर बुछ पाठों की बोर भी सोत किया है, जो परवती संस्वरणों में माम्य हुए। व्यन्याओक के नुर्थ उभोत ने डोचन के अर्पकृमम सम्पादन का नेव डा. स्स. के० डे को है ।E, Krshno- moorty भ inendvandhmn's Dvanyaloke 1956 में प्रवाजिय हूई। तवनन्तर सम्पूर्ण व्यन्याडोक ठोचन,नी पट्टानिराम शस्त्री द्वारा 'बाड- प्रिया' बर 'बिभ्वांजा' टिम्पणी के बाम १६४० में पलासित हुई। बाजी भौहम्वा से पं० बदरीनाम का की 'दीमिति' टीका के बाम केवठ व्यम्यालोन प्रकात में बाया ।ई० ब् १२४४ में धयन्यालोय -डोमन का प्रमम सपात उदुगोदयराय की 'कौमुदी' ब्याल्वा बौर मशनशोषाध्याम शास्त्री के उपशोचन के साथ मदास
व्वयन्यारौड का हिन्दी बुबाद एवं व्याल्वान -सर्पपरक बाचार्य विश्वेश्वर ने १६४२ ईड में पस्तुत फिया ।ई५५ ई० में पुना बोरीरैन्टड बीरीड में डा० रृण्णमूर्ति ने तम्पूर्ण व्वन्याकरेक का केदी का बनुवाद पुस्तुत किया।सत्पश्यात् श्री विष्णुपय मद्ावार्य ने ध्वन्धालीय के परथम बर ज्वितीय उ्वास का बनेगी ब्याल्थान फपर: १६४६ बर १२४० ई० में प्रस्तुत किया । १६५६ ई० में वाशाकता ने, क्रोमन पर हरमि डीका हिही। बाचार्य कन्नाथ पाठक ने सम्पूर्ण व्वन्याठोक- गैवन का हिन्दी बुवाद १६t४ ई० में पुस्तुत किया। डा० रामबागर त्रिपाठी मे व्यन्चालोन -ोमन पर बाराज्ी हिन्दी डीका पस्तुत की है। बर बाच ही व्यन्पाडोननलोयन का हिन्दी सुवान भी किया है। बनुवाद के साथ हिन्दी टीण का पुतिामन रस दिश्ा में वापका कार्य नवीन एवं सफल सुवा है। इसके अतिरिकता भी he Masson सuTH,T.Patwardhan दारा me का अेबी अुषापHarard की पाष्युदिपि के अनुसार) मण्डारकर
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बोरिएण्टड रिसर्मी स्टीटूट, पुना के प्रकाश्ित को रहा है। डॉ० बण्डिका प्रवाद शुकछ दारा उम्पूर्ण ध्बन्याछोन की इंग्यू टीच्ा - 'बीपरिता तथा हिन्दी टीना - परिवीमन का प्वाल विश्वविवाउय-प्रगश वाराणबी से हो रहा है।
पंस्करण है। प्रस्तत प्रबन्ध का बाचारकत संस्करण योडम्वा का 'बाठप्रिया वाडा
स: उपउब्य आयोचनलमक मृन्यों का बाक्यन :
आषार्यं वमिनतनुप्त ने दर्झन एवं काव्य का सम्बन्ी विविन तथूयों का व्यवस्कित एवं बांनोपांग अध्ययन का प्रकम प्रवास डा० कान्सिपन्ड् पाण्डेव का है। इनहोंे अमिनयनुम्त का विशेष वम्ययन Athinaragupta An Historieal and Philesophieal Study में attiadian Acsthottes में पस्तुत किया। सनके इस वध्ययन से भारतीय बोम्यवशसत्र सम्बन्धी विवेधन को एक नया बायान प्रवान किया । वयपि लोमन बर वभिनियमारती सुसंपाचित रूप में युछ पहले से की उपशक्य ये, बिन्तु माना और सब्वाबडी की तुरब ता के कारण, दार्जनिक मार्नों की बटिल्ता के कारण उसे सही वर्ष में गृहण करना कठिन था। डा० पाण्ेव ने अमिनवमुप्त के दा्जननिक विवारों की स्पष्ट कर उनके संदर्म में काव्य कडा सम्बन्भी नान्यतायों की प्रामाणिक व्याल्या परस्तुत की, जिससे भारतीय बौन्दर्वत्ाल्थ् का नहन दाजनिक बोर बाहिल्यिक नर्म उद्या टिस हुआा। जिस सय बमनिवमुम् एक बर डा० कातिबन्द पाण्डेव कार्य कर रहे थे, हममन उसी समय सटळी में R. Gnols मे मी me Asathetie expariance Aecording to Ahhineragupta नाम से अभिनवमुप्त, के बाध्याल्िक अनुपृति इम्बन्दी बिवार्रों का बनोदी बनुबाद एवं विस्तुत व्याल्यापरक तुउल्मक अध्ययन
टिम्मणियों के दाम रोमन बफारों में मुछ्र पाठ को परस्तुल निया Gnols ने बड़े ही व्ववस्ित एवं सर्ष पूर्ण रीति से अभिनवमुम्त के वार्सनिक विवारों के प्रस्तुत किया है। वभिकनुप्त के दार्जनिक समवों का विवेषन J.1,Maason ओोर H.V. Patwasdhan मे बपनी पुल्तक - iantarasa and Abhtnaragupta' Philomphy of Aestheties और Assthette rapture Vol.I. I.
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में किया है,। अभिनियमारती बर डोमन से शान्त रव सम्बन्यित वं को भी a y4 Santarasa and Abhinavgupta's Philosophy of Aes- theties में अनदों ने वस्त किया है। उपर्युक्त रश सम्बन्धित समी मुन्यों से अभिनवमुक्त के जैप-दती को पूर्ण तथा अवगत करने में बहुत बहायता मिठी। डा० नने्ड ने - रस विहान्त(१६६४) में रव विषयव विभिन्न सयूबों पर विवार किया है। दाब शी उनहोि बावारय अमिनकुच्त के खिवान्त में दोच मी निवार हैं। एस विशा में डा० नमेन्ड का यह पम्म प्रवास है। पट्ठोल्ट, श्रीशद एवं भटुनायक के पर में समहोंने अनैक तयं उपस्थित किए है। डा० नगेन्ड ने खाडोपना मात्र की हैतम निशेच स्वों का निर्वस नहीं पिया है, अगं आनन्दवर्वन से अमिनतनुम्त कैमल्य रखते हैं। नदेव गुरुवर्ष डा. बच्टियापृवाद मुवक का केत "what inandvardhan Meant by Dhvand"f The Joural of the danginath Jna Researeh Instttate में प्रणशित हुया था, वह परसतुस शोम-प्रबन्ध में बकुत सवायक हुदा। उनहोंने उन प्रतुख स्यों पर निर्देस किया है, नहां आाननदवर्णन से अभिननमुच्त का कैनत्य हो बाता है। डा० मुकुन्द माचम इर्ना ने अपनी पुसतव me lvan 2eorr ia Sannkel# Postiees2968 में स्थान स्थान पर बभिनवमुष्त के स्वतंत्र मतरें का सोत किया है। पस्तुत पुस्तक क्मारे सीच कार्य में विज्ेष् उपयोगी रही है। में इसके छिए उब ्न्य तथा उसके विद्ञान मनीची हैतव के पृत्ति अपनी हार्दिक शरकत प्रफ्ट करनी हूं। डा० रेवापरताद पिनेदी ने भी अपने मृं्य आ्नन्यवर्धन में अभिनवमुप्त के स्मंत्र नतों की और सोत किया है। डा० दियेदी का मुल्य उच्य तो आानन्य- वर्धन के व्िवान्तों को निसृद कम में परस्तुत करना था। ब: च्वन्यालोक़ के रिदान्स को इन्होने सर्पवा सुद कम में, कोचन से सर्वधा बकता रखने का पूर्ण प्रकल्न किया है। इम्हों यहां कोचन में स्वतंत्र मत मिसे बझो उनहोंने फूटनोट में रा दिया है। डा० डिमेदी ने परारम्म में सी एक अपीड की है।
१- रस विदान्स पृ० १००।
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२० अनुरोष :· ध्वम्याउक के अध्येताओं से समारा अनुरोम है कि ये एय मृन्ध का अध्ययन स्वतंत्र रूप से करें। इसके छिए वे रपमात्र लोचन पर निर्मर न रहें। ड० विबेदी का यद बनुरोम कें शंच कार्य में निहन्तर पेतावनी देता रश है। वही निर्वेस पुण्य गुरुचर्य डा० बच्किताप्रवान शुकछ जी ने भी हमें श्रीम कार्य प्रारम्प करने के पूर्व दिवा था। किन्तु, डा० रेवापरवाद पिवेदी जी जिल्होंने एवयं अध्येताओों को"शोचन" के पृति कर्क किया है वह एक ए्यड पर स्वयं स्वकतित की गए, जिसते हैं ध्वनि के तीन मेद हैं- वस्तु, अऊंसर एवं रस अत्यादि। बस्तुतः यह मेद ध्यनि का नहीं बरनु फ्रतीयमान या व्यंग्यार्य का है। एस तथूय का विवेयन ए प्रबन्प मान में यवास्थान करेंगे। हन ब्तियों के बलिरिकत Dr.R.C.Dudvedt की पुस्तक Prinatplos of literary Critieiam in Sanskrit. 1969 K.K,Krishnamoosthy wEsaays ia Sanakrit oritiodelt avantaleka and its eritdos डा. निर्मंदा बेन का रवससिदिाम्त और सान्परवशाल्थ्, गुरुकर्व डा० झुरेशयन्द पाण्डेव का ध्वनि सम्युदाव विरेषी विदान्त बीर उननी मान्यतायें हल्यादि मुन्य प्रसतुत शोष प्रबन्ध में बकुत बहायत हुए हैं। अमिनवमुप्त ने ध्वन्चाछोन में स्पक-स्थ पर अपने स्वतंत्र मतों को नुख ढंम से निवेखित किया है- इस तथूय की और कशिपय विद्ानों ने सकेत मात्र कर दिया है। किन्सु बनी तक किसी ने उसका विश्वेषण करने यह नहीं सिद निया है कि किस प्रकार वमिननमुम्त ने आनन्यवर्णन के मत को गोण करके अपने मस को प्रमान बना दिया है, वे कौन से कतिमय तथूय हैं जो व्यन्यालोक पर वमिनयनुप्त द्वारा बलातू बारोपित चौकर स्वयं प्रधान बन नर हैं। एप सम्बन्ध मैं इन्दीं तथूयों को प्रस्तुत करने का प्रवास किया नया है। संगोप में, प्रसुस प्रबन्ध का उददेश्य-छोचन का मुल्यांकन है, इसमे अभिनव गुन्त की व्यास्या वहति का तमा व्यनिकार के सिदान्तों के बाथ अभिनवनुच्त
१- बान ्दवर्मन २- वानमदनर्चन पृ० ४३८
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के वैमल्य का समाकोमनाल्मक अध्ययन है। पूर्व पूरियों दारा दिवार गर मार्ग पर वह कर मुफे बस्तुत: अधिक प्रयास न करना पड़ा। महाववि काजिवाद के सब्दों में -
(रपुवंश)।
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ध्वनि-सिहान्त के मुछ्र परववर मानम्मवमी संसृत काच्य डाल्य
स्वमाच्त: यह शँफ अवाधीन ही नीं, वा्ति बैन रका है। व्वनिर के எள்்ணணனள்சா்று इन्दीं की उंियों तमा उनने सपमासिय मनोहम नामक कदि के एम श्कोक के बाँती है। प्यने गिाम्म सुयों के मम्य बैवड पर्वा का वियय बना हया था। उकी स्कद का विदान्स रुप में, निही कृम्य में पतिपामन नहीं हो पाया था। वान ही उडके स्यिर वि्दान्तों के अनाम में ध्यन के पृत्ति नविदेयम्म वर्वमा सयानादिन था। सी कारण स्यनिशर ने सृचर्यों के नू:ड्रीदधि के खिए व्यनि के स्वम्प का मुल्य रूप में प्रतिणामन का निश्यम किया ।
नार्य सृध्वनिता सरन्यितमिति ड्रीस्चा फ्राल्को,
वस्दमार्न मतूररे नाक माइृच्यन्ये।
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₹- म्वान के िरैनी नतरो का पुस्लान और उपका अमाभान :- बानन्यवमे ने व्यनिल्यम परतिनामन के प्रश्न में पुवषया के रप में ध्वनि विरनिां कानिष्मशि्ित कों में परिकि निवा -
य़ - माकवादी
.- घमापवादी -
पुर्व्रवती चनार, रीवि, मुण बादि के सभी सनी बानायँ इस वर्म में पल्कित पिर गर। यै ध्यनि के वाफातू विरोनी को नहं हैं। यवपि इनहोंने कतीं इच्मतः ध्यान का विरोन नहीं किया है। किन्तु, व्यनि कर बसैस ही न फरना - इन्तें ब्यान का अमापवानी मानने में पवांध्त है। यादि स्वान की कता उनके विवार से दोसी तौ पिसी न निसी प्रशंन में बनका ने उल्ेस ननर्य मस्ते। क्योंकि उमहोंने व्वनि का वस्लेह नहीं किया नत: आन्यवर्वन ने उनकी भणना बनाववान ने सन्तगत की है। और तम अमायनादियों के निवारों की बीन कम में पस्तुत किया, नो परम्पर एक दुसरे के कुपतः सम्बद विवार गर हैं। पक्टे वमायगाणी ने को यह मानते हैं कि - माच्य का करीर इन्म बौर वर्ष है। तब्द को मल्यूस कहने बाहे ब्युड्रासानि इब्दाडंकर होते हैं सथा अर्ष कौ ममत्ूद करने बारी उपनादि वर्वाईंकर होते हैं। वणों के विशिन्ट विन्यान के होने काही नमल्कार की महयुरव वनि पुणों के पुवारर माता है। एस क्रकार मुण बौर अदर में की बारी बाकदा का बन्तमांन की बाता है। रोखियां बर दुरियों नी तुणपाईंगर में अन्सपूत की बाती हैं। क्याँकि, उद्मट के द्वारा बवाबी गई इपानरिकि आनि मृषियां बलुडास की नाशिरम कोने के कारण सलुडार बलर के बयिष्म हैं तमा नानन के दारा कहायी नह रीतिया रुणकगिशिन्ट फरपा रम मोने के शारण् पुणों के बविरिक नहीं हैं। अ: इनी बातिरिकिा प्यनि नान का कोर्ई नवा नवा्य सम्पम नहीं।
माधमनिवलती5ममिं प्रीय्ते । करपतिरिय पृतयी पृतवा Sि या: कैस्णुपनान- रिजिवा इशरिया: ता बि कार नवणनानस्। (तेड म बगे पुष्छ पर)
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दूवरें नमायवानी कहती हैं - गाब्य है सम्पन्यित व्यनि नामम कोई सतथ नहीं है। क्यॉक्कि कमिका सिस मार्म के परम्परर ने व्यकवार करती भे ना री हैं, वही गब्य का पृक परम्मान है। कमरे व्यविरिक पृल्यान मानने पर सक्कन की शनि शेनी। समुदयों को बामुसाकित करने नाठा इन्ान ल्पमम ही गब का हरण हे।। इके बविरिक ध्यनि इल्यान कसममर मे : जैक क सकूरयों के नरा ध्यने को भाच्य माना भी नाम तो यह सनी विद्ानों श्ो मनौनुशी नर्वीं बाना । कपाति संदोन में कहा का सन्तर है कि सनने बुवार व्यनि पम्कारी सत्य नहीं है। वीडरे कमापनानियों का कपर है कि ध्यन नाम की कोर्ई बपुन पस्तु सम्मद नहीं है। प्योंसयि, बनि ध्यनि भोई कपनीय काच्य तत्य है वो निश्चम ही इसका पुणनंगर में हे-सी-निी-न-पान-पस-पर-नननि वन्तमाव को बारपा। बौर, वदि तम मुण्ानंगर में ने ही निस्ी का नाम मकत कर ध्यनि नाम है रिवा बार, तो वद कोई विहेष बाड नहीं। बौद, किर नाम्यिवल के तो ननन्त क्रगर कम्पन हैं, ब: क्रामीन बाबादों ने सच्य के विषय में कप कुस नहीं कद किया। यकि इनकी कुसम पुस्धि मै युम बूटट मी कया ही सो बते भी ध्यननि नाम ने पुफारा ना स्वा है। जिन्दू, बसे भव्य की आत्मा कीं कक्षा या सनता। बन्य बानायों ने सवारों बकरहं के मैद कतार हैं बर नहती हैं, विन्सतु उनकी सेवी मानार की स्मिति नहीं पुाई कती। का म्यनि पुार मात हे। क: इका कोई विवारोभ्य तल्य
व्वन्िमिति। (च्यनृ० १५-२०)। १- वपे ड: - नल्तेव व्यनि:। इकल्नान व्पतिरैनिण: नाव्यणरल्व- सच्कपशाने: पसूमपुर्वास्दा कितन्दामनक पैम काच्यस गमू । न बोक इस्वा- गाविरैनिो नार्नस्य सलयम्ममतति। न य मल्य्यान्सापातिन: सुरबान् कंडिम-
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२५ परकाखित नही पिया या सल्ा। एक बमापवादियों को कम निम्मलिसित पूरवों में प्रस्तृत कर सभती मैं १- व्वनि का प्रामीन काच्यासत्र में बनाय, ै- व्यन में पकचार या भाच्यमर्म ता का बनाव, सना *- म्वाने में सच्याल्पता का बनान।
मलति या उपणा में की ध्यानि का अन्तमान करने वारै मालबादी है। कगमि वान्मवर्मे के पुरव निदी भी आणगरिय ने ध्यनि सन् ना नाम हैमर कसे सरामानम्य नहीं कहा तमादि इनदोंने शब्म के अभिमैवार्ण के बतिरिक अर्पन्चिर की कवा सीकार की है। रेे निदी आापार्य का नाम बान्यनर्मनर ने नहीं किया है, फिन्तु अभिकवमुच्ध ने मानड, सटनुट, नामर यादि या नाम डिया है। मामक विनरणकार उ्मट पुल्य बमिनाज्यानार के डविरिक मुणवृत्ि को स्वीकार करते हैं। आाचाय नामन कड़ोकि बलंकार में बापृश्म - निमिया कप्तणा की कता मानते हें। किन्सु एय सप्तणा के वनन्तर प्रतीस्ष होने वाहे परवोक् रप वर्ष की ज्यीति के लिए उयोंने ध्यनि व्यनहार नहीं किया। हयरे रैवा उगता है कि मानी दे अभिमेम वर्य के बतिरिक बनी नरमों को ससुलय नर्म माकतो मे और उत्चा में सी सो का क्सनान कर ठे दे। स्वीखिए
१· दुररे वस्मामाममयमा कमीक़ु: - न सम्मकयैत व्यन्िलिापुवी किषठ ।
मस्पैन का ब्पुरवतनाश्यामानमरण न्रतयति यल्यिंगन कपनतं स्वाएू।
विवानिनि: प्रिदेराक्िी पकारती व्यनिष्यनिरिति नरैतपतीनसुरकम-
सहनाल्ज्ामनाय न्वनि:। न स्वरम सीदमाम चत्पं निंभियमि पणासयं-
र हदननामनिवामममिवा कपारो कुष्मी मुणवृतिश्न कति मोडुमट :- गैसृ०रर
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आानन्यवर्मने कहतो हैं- इद्मामानियों में अमन्तर (व्युल्याण) की का लीकार कर ध्यननिविडा का सम्मीकन तो पिया निन्तु बंदा को डस्तिद नहीं निया।
दी ध्वनन, अ्तमनि कर रेते हैं ।
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इसके समपशों का कत है कि ध्वन एक अनिवसनीय तत्य है। ஜர்ப்ணர்ளஎணாபண்னீா सता। इन शोर्गों ने ध्यनि को स्वीकारं सो किया नि्यू, उहणा भग माना- इब्द वर्म का रकूत नातिनिवैम के समान विशिष्ट नाठा द्वारा सैम किन्तु वनालेय पाललय। नाननदवमने के तषों में मे लनशन ना तौ सुार हैं बौर अपाण - निर्माण का बो कौर नम है उसे करने में कहनरम हैं या किर इन्में नहन एवं कृपन वस्तु का सिलेनच करनर नहीं बाता।
हरपित्नुगर: पुमखित:, तवामि बहत्यूरणा काम्मैभ ब्यपवारं पकका
- २- नेनित्पुस्स मवरणशाबीनडयो व्वनलत्मं निराननामरं सटृसयधुषयसयै
हंि। ध्य. पु० ११०न८।
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ध्यने विरोनी कों का समामान *
पुषोक् बदोषों का समाधान आ्नन्यवर्णन ने निम्न पुकार के किवा रै - यनारवादी
शनायवादी माच्यपानयान में ही काब्य का बारा पस्कार बोग्ा गाहती हैं, विन्तू व्वनिवादी की किा इयदे भिन्न है। नव की ध्यनि गाब्य में वाच्कार्म का सँपा उपय्न मानता है। अपातू नहा बाभ्यारमं बपने कौ सपा वाचम इब्द बनने वर्ष की बपमान मनाबर प्रतीयमनान दर्ष को व्याक्त करतेक हैं नहीं क्याने है। शपी स्कमासरे कलगरों का ध्यनि हे स्ब्ट व्यायररम का बादा है. क्यॉकि उपमरदि कपासिंर बान्यार्थ के समा अनुड्रायादि इन्दाकजर बाकक इब्बम के सी पाहत्य बेु शोते हैं। इनसे व्यनरति का विनय भिन्म है। दूवर बलाकनानियों का म था 'पृशिकर्पानावियमिणो मार्नल्य गब्कानैव्वीरनासय इत (म्वनपूमर कर)। अहनन्यवर्मन श्पका तसर येती हुए भहती हैं- यह यह मौ ठीफ नहीं हे कर्योरि काच्य उसणवारों के जिए सी पैमक मुणाउंगर कम इल्मान दी इस्दि नहीं है नरतू उबचे बविरिक ध्वनि पस्कन नी है। नही धयाने क्म सदुसयों को बास्डापित करने नाडा ,भाच्यान
बानन्पन्परे एपका भी सण्कन करते हुए कलते हैं कि यह मी अशनीचीन है। नयोंककि नाम्यपमनान पर बनित मुणासंगरों में व्यम्यव्यंकमान पर बान्ि माने का सी ब्समान हे सपता है। कयौँकि बाज्यमामल के पाहत्पमडु बंभर
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बादि उस ध्यंनि के अंसदृत हें और ध्यनि बी हैं। वानम्यवपने ने स्व० १।३ मैं रे पों क प्रयोन किया है जो बीनों प्रकार के अनायवाण के उतर कम हें पैद्ा कि उछोंने एवर्म पृत्ि में भवा है तमा भ्योट सानी मनि ्कीरवानि निरासननिवि - इल्सीक् स्वामी इति। इस पर पुवषसी यह कम सप्ता है कि मिर बहफारों में ज्रवीयमान अर्य की स्पष्ट रम हे प्रतीतति नहीं होती तन बगरों में को की ध्वनि का अन्समावि न हो कि्तु काशीकि, आपोय, क्वानोका, वा्दृति बादि जि बर्फरों मैं शरीय्मान का पपल्कार त्न्द रप मे कृरसा रक्ा है उनमें हो ध्यनि का अवश्य ही अननामाव माना या सस्सा है। उपयुक्त पुवंपर के सतर में आनम्यव्मन परती हैं * हसमें बाच्यार्य बपने को नौण नहीं ककता स्वासिए इममों ध्यनि नहीं कहे। व्यंग्यायं के प्रमान होने पर ही व्यनि शेती है। अनारोकि बानि कंगरों में व्यंग्य की स्कुड परतीति रौती ववश्य है निन्तु इन एकों में ब्यंग्यार्य वाण्याय की बी उमसस करने कनता है। नाच्यार्म का उपलासष होने के कारण उनी बफरों में भणना बाती है। नः बाज्याम को नौण करते व्यंभ्यार्यं के क्राणान्य के बमाप के बी कारण सार्रोति बादि कंगरों में ध्यान का बन्यमांन नहीं की सन्ता। यददि व्यंस्वाय प्रमान दो बर वाम्याय नोण दो अपायोति शाि कफरों मैं व्यनि का नहीं, पसू व्वन में शी अपोंकि बादि बडनरों का बन्चमान हा नायेना। बयांसू तब मे ध्यनि के कुसार हो ायने। एस प्रसार वमायवावयियों के मत का सामान किया। मालवाद का समाधान-
मरि में की म्यनि का बसमय मानने वाछे माक् बादियों का अनाधान करते हुए थान्यवर्व शकते हैं-
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ध्वनि- माि के डाय स्कय फाम्य नहीं कर सभ्षी। भयोंि ना बाब्यवाक का पतिमादन व्यंष्याम के प्रामान्य के छिर हो नर्दा स्यनि होती है। बौर. मक्ति सो उकवार मात्र है। बदि मालि,ध्वनि का लपण हे सौ वतिष्या्ि बौर वषाप्ि पाच दा काले। बािव्यापि दौच - माने से निन्न एकह मैं भी चाछ्ि सम्पम है नव बतिच्यात्ि है। कां न्यंग्युत मवाग्रोच्म नहीं होता वदों नी कनिका प्रतिडिय इपवसि तब्द ब्यानार द्वारा व्यववार कही हैं यपा * 'परिक्कानं पीनलन' सतवादि में 'सुांन्पा: बन्लापं नरसि पिली-
है। ए्मा प्ुगार का प्रवोन कनी व्यनि का विभय नहीं होता। क्यांल को शहल्य पुसरी बाकि हे क्माखित नहीं विया का बवा है बये प्रवासिय करने बाठा एवं स्यपंस्ता की वारण कहने वाछा की शब्द व्वनि का विभय
कमर उदावूर विभय में 'नवति' कर उपवास्ति वृष्धि के बतिरिक बकि में अशनम होने के शारण माकतम की भयवता का हेतु नवीं है। गयोँकि उसने स्पान पर पष्टमति र किया भार तो कोर्ई पाल्यय नहीं वाला। नो को शब्द बपने विचय के अन्मम विषय में जी शब्द भद़ को नाते हैं, शैे डावच्यादि प्रतुल इब्द, वे ध्यनि के विषय नहीं होते। यदि उस प्रुकार के विषय में कहीं बयाने का व्यकसार सम्मम होता भी है दो यह तस तब्म के द्वारा नहीं शोदा वरनु पुकारान्र वे बौता है। उमवास्टृति व्यदलल्द का सपाणा काते हैं - 'बि कड को उद्देश्य करके उुल्य दृति की बौड़ कर युणवृत्ि हे वर्य का नान कराया बाता है वरशां ह उस फड्ड के बौचन में) सच्म सवलमती कपाि बाचिवारय नहीं होता है।' कयॉँन माकस्याविकम के विशिष्द वर्ष के प्रणाश रूप फ्रवोम्तर के कोने पर बनि बन्दर की स्सुल्पता रव नई सो उसके प्रयोन में दुच्छता शोगी। परन्तु रैवा नहीं, है। नही करण एष प्रकार कया नया ·
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10 'वायन्त्मं के बाबार पर मुणदृति न्यपसकि है, न्यंस निक्म रनान्र मृत्र हे, सस ध्वनि का वद सपाण क्री ही क्ती है ? एम कारण व्यि भिन्न है बर मुणदृति मिम्म है।'
बपने कपय में अंस्ा न होना बब्या्ि है। निव्त्तिवा-्यार- बाज्य रम ध्यनि फैर बर बन्म बहुत हे प्रसार मलि के ब्हामा नर्ही हैं, बह: नरि व्यनि का लाण नहीं है। 'माँलि' क्याने के कियी मेद का उपकत्ण दो सपती हे निन्तू मक्ति में ही ध्यानि का बन्समान करना वर्पमा असम्मव है। आनन्दवर्णन ने मकि के छिए मुणवृत्ि का पुवोन किया है और माकि क 'इममार' भी नता है। क: बानन्दवर्णन के मह में मक्ि, गुणवृषि, उकासुनि, आणावृति सी कयमिताजी तब्य हैं। दृवीय समात में नी बानम्यगर्पन ने व्पंकशम बौर नौगतम में स्वम्पतः बौर विभयत: मेरोणाकान किया है। इम्पकत: व्यनननिरोनी माकवानियों के सिए यह सर्प सपरिकिा किए गर है। इसुतः माक्तवादियाँ (कस् मावाकियों) को सम तम परास् नहीं किया या सस्ता का तब उत्त णावति तदा व्यंावत्ति की परल्पर मिन्न्मरपता तथा निन्नविवकता का मुसम विवेवन न की बाय। हनी पूवन की स्यनिकार व्यन्याशोद के तुलीय रमांत में बठाते हेैं बौर नितान्य कुमम बौर सर्कीक्ष्मद कमामान प्रस्कृत करते हैं। इसका विवैशन तम अन्मव्यावार के प्रत में करेने। अनिवमनीय्ताबाद का अबान *
ध्वाने के स्वहप को अनिवततीय काने पाठों का यादि यद वभिमिाव है कि स्यनने का बाण्ी दारा निवस नहीं को बता तो उपशा ध्यनि विद्ान्त का इवना विस्तृत विवैयन हो नाने से ही स्वत: बण्डन हे नाता है। बर बादि कर्णनीक्ता से उनका अभिदराय ध्यनि की उत्तृष्ठता सिह करना हे यो उनकर कयन वचित प्रवीस बौसार है।
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बानन्दवर्न ने सक्ी लनीदारषों को दो नर्षों में बांढा है (१) बमृदय, (२) दाजीनेक। स्वललड बदि कोई अपा गीवताबादी कहो कि • बिव क्रुार सतम की अत्यूष्ट नानीकतर नैसस निडेचज बारर सीम शाँडी के बर बकमा सब्दें दारा बर्णन वसममम हे ससी क्रकार काच्य में सच्य विह्ेष सना वर्ष विवैष का पक्टय जैवड सांध्वनासनेय होने के कारण् वणनीय है। सैे ही गाच्य को व्वाने का नादा है। बानन्दवर्वन उपतुक्त सर्ज कर सण्कन करती हुए नसती हैं - 'लेवा कसा उपति नहीं है। न्योकि व्यनि काब्य के शब् स्वाफ्य: ब्तिष्ट एवं बुसक होते हैं, क्यात ने नामुषं या बँद की अपुत्ि के निपरीत नवीं पक्षी औौर बन्दर्ष एवं सम्पूर्ण रूप से सामत रसी हैं। इन सब्दों में जो वच्पर्ष वर्यत्पस्ा रक्ती है यह भी ल्ब्द और ड्राशानिक रस्वी कै, मिलें क्रीयमान वर्ष का मी प्रविनाकन करने की समवा रवा करती है। बौर, ध्यन भाच्य के वर्षों की वितेचखर हुय करवी है- 'उनका स्ष्द रप से ज्रवीत शोनरा, पृतृत फ्रीयमान वर्ष की प्रतौति कराने में कपमान बनकर वत्पर रक्ा समा स्वमं के नीतर बवाम्तर गंम्य वर्षों को हिपार रसना। कः बाननदवर्मन के सुसार ध्यनिनाथ्य के मटक सम्म बौर अर्ष में रेवा फोर्ई नी झत्म नहीं रस्सा निवस निर्वश समुदनों बारा मी न पिया या रे। रा्जीनरमों के विलीक्ताबाद को वानन्यवर्वन ने निम्मशिकित त्रीन रपा मैं प्रस्तुत किया है-
- इनानां स्कपाक!(पिरेन:) बक्िन्टल्ने चपमुतप्रवोन: वाकतानसु पुवानी व्यदतमं नेविनिटेन:। उप० पृ० सए। *- बर्वानां म समुस पेनानमार्जर वमम्यपरतर्म वयम्यासनितिच्ठमं नेति विेष:।
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(क) बानापांस्पविनिकल्वत म्मानोपरंतावाय तमा (न) वनिवेरक्तापार। (क) सर्वशब्दागोचरसखवाद:ै बचिक मानुक हैं कि ध्यन को सनीकार को करते हैं किन्यु तक्ता इब्दरं बारा निमिन करना नहम्मद मानती हैं। बानत्वर्मर हनरी विन्य मैं कके हैं - रवी अनिवलीक्ता तो प्र्येक पदार्थ में रस्ती है, बैक ध्यननि में नहीं। पाहे कुछ भी सर्ष पिवा नाय फिर भी अनिवगतीय कार्थ की भी कम सै कम वनिवपनीय सब्म हे तो कधा की या सता है।
सवे बनुचार शेव वस्तु का भो बौद शौता है उकमें वस्तु के द्ामान्य रूम का बानाड बौता है, विशिष्ट रूप नर नर्वीं - र नियम के बुवार व्वन वाब्म का नानान्य रप नहीं, उकणा विशिष्ट र्म है। का: इबों दरा उपस निरवशन बम्पर है। बिस क्रुकार इन्द सून के दामान्य रम का ज्ान करा सन्ता है कपती वितेमतरा (पवाडिटी ग नी)। बानम्मवमन नक्षतों हें- उपयुक्त सर्ष अर्सता हे कयोंकि काच्य बर रन वौनों के सी स्का्म की प्यास्मर उरागवारों ने की है। यह सय है कि व्यनि तल्ब नवदसकीन नहीं भोता ठीक केी ही कैे इलरों का बात्चत्म (पाविडी)। यः व्यपतत्र को के की सब्पाल न लाफ बारं विन्दु भो समृषय बोते हेंने मै दसे नन्न ही पहण कर हेी हैं। एम प्रसार ध्यनि में वादि कौई बनान सिद शौसा है, तो यह नैस समम्तसेमरय का बलान है, बहः उसमें वनि वनिवशीयता का बनान सीकार करना को जो कैवव वामारण कहों दारा वहप्मन नियगनीयतर
कलाल्पेकर्म डर्पनोनसल्यैन न कस्मचित् सम्मति। बन्ततो नाल्येपतव्न -
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बात्यन्दिक बनान चिद नहीं दोचा। बलिकियम्मं सदुचम कसतर निर्यदन कर की
एछ शेन बाँदों के समर्भवाद के फपाकित बौंगर म्वाने को मी घट यर आदि सनी कायों के कमान बनिवेश्यं नानते हैं। यै लाँन प्रत्येष वस्तु की सता को प्राव रप में सवीकार कहते हैं। प्रत्यैक मदार्थ निल्य परिकनिसीड़ हे अः इनकर सराणा नहीं पिया ना सन्ता। कबी प्रकार ध्वननि नी है। किन्तू भाणभेनवानी गाँदों ने क्रयसामि प्रमाणों के अाणा बनाये हैं। बादि उनकी उपयोनिता हे तो ध्यनि कसण की समवोनिता में फारे कैचह नहीं।
भान्य में वाल्यैय कंड नासित की उहे व्यनि कहते हैं - यह स्वनि का सर्तण भना दचिद नहीं। रर प्रकार वानन्यवर्मी ने ध्वनि निरेनी बीनों काँ बनाकपाकड़ माजचाद एवं वननिवमनीक्ताबार का अपस्नामन नरते तनका अानान किया। २- माच्य से नुक् व्यष्म-वार्ष की बवा एवं पक्षा
कान्य में पूतुसत होने नारी गाण्याम बौर बयम्पाय में दे व्यंग्यापीक्रीया- नापी का बकिति भकतम है। न्यंस्वारम का बचित नतत्म बाने पर मी, ब्यंग्वारम
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न हरार्ज, शर्ण तु बामीनोडस्य नयोपिसम् ।1 नव० पृ० १२०।
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- परति माचान् का माच्यार्य के छिए उबी क्ुगार बल्न करते हैं जिए प्रकार याछोकारनीं दोपरिया के हिए। क्वाँल, वाम्याम ब्यम्दारय बौद का बनिवायं पामन है। बिस क्रवार पदार्म के दारा नाकवार्य की जीति दौँती हे नबी फसर
पुवक्टन बोने पर मी व्यंग्य -वर्म का प्रामान्य व्याहुन् नहीं शोता। तमा चिद कार पदार्थ स्मचानमूरव दारा वाच्याम को प्रणासिव करता सुंदा भी ब्यादार- निम्ति की स्विति में निमल" कप से नाकत नहीं दौँचा बसी क्रकार वाण्याय है वियृस वाल्मा वाडे समूनषों की सल्मार्णारिंनी इुडि में व्यंग्य-वर्ष कदिति वा- मारित हो कवा है,उसरें वाम्यामं पूकर कम के प्रतीस नदीं शोता। दरशं एक समूप की बर सौद कर दैना बाकशयम है कि जानम्पवणी ने(ववड १११० में बझ रै- 'यया हि पार्ष दारैण नानवाचमिलसमा माज्याजश्जीवि पु्वित नंम्वसवापस परदयत्िः'। वश बैक उपवानान के कारण वाम्य भी पिरसा है। बस्तत: नाच्यव्यंग्य में पवार्थ-पामवाय न्याय पाठ्स नर्वीं होता। इकमें पटज़रोप चाय की पाकय गोडा है। क्योंसक स्यंस्याय-क्रीति के सम माच्यारय-ज्रीति दसी प्रगर दुब्द नहीं दोची, चिव क्रार पटपशम के बननतर प्ीम शी कता । निन्तु पदार्य नानवार्ज म्याव में रेवा नहीं शाता। बाननदवरवद ने बाच्य बोर व्यग्य इम दोनों फरकार के वर्षों में से व्यम्य-वर्य या क्रतीयमान-्दर्म पर ही बपनी बन्दीशिका टिकायी है। सती का विवेन करना पस्तृ पुवन ना कोका हे। पवीयमान-वर्य - शीयान-वर्षा या व्यंग्य-वरवं तीम प्रणार के ई - वसू, अकार एवं रवादि। यह व्वनि काच्य का दारयुत सल्य है। इसके सा्ति एवं वच्ति इम्निवेश से गच्य में पारल्य दा बाता है। इ्वारए नही मुमुदयों दवारा
'कदा कार्पशारेण' स्यायुक समुमाक मातरातथाम्यविपताया।
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महवनियों की दी गाण्ो कस व्न्य वर्ष का निम्णकन भरती एवं कौकिक पतिना विहेन का स्करण नरची हई बनिव्मयम शोती हे। इम मनियों की पाणी में निकित व्यम्यनदँ सम्म के ड्रासिड बरों के बवरिरिय एक वर्ष कपू ही है। जो सबी फ्रकार भासिय शावा से बिक पुणडु कलनर में शनच् । यर क्रीयशान वर्ष वाच्य से सर्मा फिम्म होता हे।
नाच्य के व्यंम्य का पायल -
शर्म का बह भी श्रतीयमान रप है वस माच्य के निम्न
(ख) बा कीं वाच्म एम में विष्याल्म दोता है यो प्रीयनान रम में निर्यषाक एक। उवावरणार्य - 'है मार्सि! बाम का निरयिन्त शौनर बुमिर। जम पुते कौ गौदावरी तट के अतानयन में निवास कहने पाठे उ्मद सिंह ने आय नार डाका। कवां 'दुमिर' प्रिवाचद है, वाच्य उप में अणकरिया का निवान किया या रदा है। अ: बदां जी वानवार्ज से तकणा फ्रारम्यित रुप निध्यारणा है। बिम्यु, नाकम जि परिस्यिति में कता नया है उसे देशने से स्वष्ट हो बाता है
१- माच्यस्य कि शरिता रितन्निवेश्वारण: कीरस्पेवतना बारफमा दिक!
१- प्रीईनानं पुतर यमेद वाभ्यावसत्यस्िति वाणीषू मवाल्वीनान । --*
।िल्ाकपुती वाच्याछुर विम
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वरश - अणंनिबेय रूप - दूसरा ही वर्ष निक्ड रवा मे, नही प्रतीयमान बर्ष है। (स) नहीं वर्द का माच्य कम निर्भमात्मक दौदा मे बर क्रीयमान रम निध्वालमय
'मैरी बूड्ी दाप वर्श बौती है, बौर नर्हा में। दिन में बस सप बैंद जा। हे रचिक ! कीं तुम बनारे निशोने कर न निर पज्ञा, सुमं राथ कौ ख्ानी
वशं जी वाच्माम निष्क रा हे यह नि्यमाल्म है। किन्सु यह कपा जिले डारा का गदा हे और पिप परिस्िति में कया नवा है वसते पुर बौर की रहस्य निम्क रसर है। नामिका निवैम के सक से पाचिक कौ बवश्यमैन बौर निर्निन्तत्रा के नाम पने पास बाने का सत नर रवी है। यह श्रीयमान वर्ष विध्यात्ण हे। (ग) कीं बाच्य के विधि कम होंने पर ब्यंग्य न विधिन तमा न निर्यचाम दोचा हे। नान, उण्यदाथ बौर कमन कँंडी मुके ही मोनने पड़े। उस्ी विवाग मैं नह चयपा मेरे पाव रात्तिम्म के कारण या जाने के तुध्हें मी न उठाने क़। २
यहं किसी नाविका का अपने ऐेसे प्रिप के पृत्ति कमन है जो दूसरी है शिन कर प्रे करता के बौर उसके पास से लोट कर बाया है। वश 'बाबो' अ विवाल्का कर हे को सितीय दान फ्रीत दो रवा है वह न विध्याल्मय हे बौर न निर्यदाल्म । नह हे अ्म नामिवावति रम। (२) हसी प्रकार बाण्य के प्रतिवैम कप बोने पर न्यण्य न विभिम्व वौर न निवेम रुप दोचा है है यपा * 'मान ना, प्रकन्न हो बा, छौट क । बरी बू तो अनी पुलान्ति हे नसगर खुब की दूर कर रही है। बरी कवाउे, तू तो दुपरी बभिवार्णिबों को मी निष्म में खाह रही है।
₹- इ० अ० पृ० ७।
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वर्म निक्क रस है नक निर्यमाल्मत हे बर न विष्यालमा। वद मे पाठुभाम। (ब) कीं कीं बा्याम हे वििन्न विषय एप वयपस्थाकि प्रीयनान वर्ष शोसा है। बा - 'पि के इृणमुख ननर की बैसार ना कि रोच,नहीं बाचा, बरी पना कहने पर नी नोरे बसिति कमक झुंसी वाडी, बम डू उका इमरिणान E B दहा बाम्यायँ सौ अनिनौत्वतरीं के प्रति है परन्तु उपसियित व्यनियों में शौन हे रेख को इपसे निकलने वारे वर्ष से सहूता रव गवा हो । नायक हे ना नया कि इपनी की शब्दी हे। उसका नमर बन्य किदी कारण नहीं, वचिु पस्तां के कुष्ठा है। उपपति हे कहा या रवा है कि एस बार ती सुम्धारी एय परियर की किही प्रसार कदार हँवी हूं, मनिष्य में यदि रैसा हाना सौ बण्डा नहीं। बाँदों बौर फहौकियों से का नर कि मैरे रक्े सुम्ारी इरावारं पूरी नहीं हो सबतीं। मैरी की बम मी अपने मतति को च्वारी रलौ। स्वयं नामिका हे भी कहा का रस है कि तुम निश्यिन्त रकर। तुम्धारा पकि सपत्मियों के बीम सुम्धारा विरस्कार नहीं कोना। मैं यूं वो सुम्धारा नाईं कछ नवीं विवाड कनदा। इवमें जी बास निक्मी कपय करने कही ना रही है उसी श्रीति उम्ा च्यांस्ि निहेन कह बी बीकित है। कपर वर्ष के दी ए्वमों का विवैवन मुद् - वाच्य और फ्रीयमान। समर्में के बाच्य के दूपर नमन्य या प्रतीयमान की कहा देी। बन उप प्रीयमान के मल्ल्द का प्रतिमामन करंने।
वानन्यवर्मन ने क्रतीयमान वर्ष का विवेयन करते हुए पनंच किरन्या मे उफते मशल्य का मी पृतियायन पिया है। फ्रीयमान वर्ष के प्रशिनाकर के काव्य में को पैहिन्दूय या नाता है यद मा्याम या
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सचा मी प्रल्येक वनि में नहीं धोगी। नद वस्तु सरम ( क्रीयनान बी कांि परृविया डा्यम्म महावमियों की गाण्ी में ही स्कुर योता है। यह 'वर्ई' नैपक शन्द नौर बर्ष के नियनों के आ्न नातर से नहीं बाना या कनदा परू
शास्त में फ्ुक प्रत्येक दन्द में नतीं बोती। उसने सिए विस्क उब्म की सपुक हाते हैं। उद क्रीयमान वर्म को अभिष्यक कहने में सर्य सषों का भयन करी मशकान कर ससता हे, जो भाच्वाथ सल्यता हो। ना: नहवनि को उना
बानननवर्णन ने भशकमियों की कोटि में कासिदाम बादि दो बार या पाड हर महवनियों की भणना की है। वि की मक्ता उपयुष ज्रीयमान वर्ष றள்ணன்ள,என்ாின்1 कः बन्द-वसमान को काच्य में बु्दर हद के सपनिवन्यित कहने है ही भभषियों को मववनिल्म का द्ञान पौतर है, न कि वाच्यनाचत के सवनामान्र हे। समादि, मशवनि व्यंग्यव्यंस को प्रमान रप के पतिवाकिय करते के ू्व पाच्य-पाचक का की उपपावन कहते हैं, क्योंकि माच्य और न्यंन्द में परलपर बाजम-बाशी इम्मन्म रख्वर है। किस क्रुगार बालोकार्ची उपायन गीपरिया के हिए कलन कशवा से कजी प्ुसार व्यंम्य अर्ष के पृत्ि सनुपय का वाज््य वर्म के --- - इति वत्न कहते हैं। बिन्दु नद न्यंग्य वर्ष की प्रीति के समय माच्याय की प्रीति उडी पुसार व्याहुन्त नहीं छोती, बि क्रसार पट की प्रतीति के समय
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प्रीप की। निन्तु नह जरतीदि अवनी डीड़ू शोती है कि वह पूपू सप से बामा पिव नहीं गोची। एवीखिए कया नया + मह वर्ष वाच्यार्म के विययुव वात्मा वारे समूदय बों की सत्नाणासिी दुद्धि में कट दे सी बनासिस को बाबा है। एद चम्द दर्ष का सं बूदुत नैशिच्कुन यह हे कि व्यंग्य वर्ष का बाक्ा कैकर प्रतिया इम्क्म कनिका फिल्म पवीन काष्य रया कसी रस्ते हैं। प्रामीन मदियों दारा नियद वर्ष कर संफ्मई बोने पर मी बदि उम वर्षं को न्यम्य द्वारा सिविवित कर दिया माता है को उसरें नमल्य का माता है।
• उप्दुकत अ्ंच्यार्थ की पानता तथा कमानता के बभार पर गाच्य के दी नैद फिर मर * १-स्ान
कहां माच्य की अज्ा स्यंन्य वर्प की प्रणापता दोती है, पर्ाध्ननि- मव्य' शोदा है समा बहरं व्यग्य की बपैसर नाच्य का वचि याहत्य कोचा है नर्व 'मुणीकृत बग्यनपाज्य' हता है। नानन्मवणन के स्युसार ये ही दो यास्वनिक माब्यपरवार है। र्ैन व्यंग्य के राजय भाच्य-रसारं गब्द गहीं, माब्य का चित्र या वित्ञणण् है। कॉल, इकमें वयम्य मास्विकलन शौता है। उनमें बाज्य-माचक का ही मनसकार रक्वा है। आनन्यवपन शय प्रसार के काच्य की माच्यापुहुतिमान्र कहते हैं।
- संग्यापस प्रमाम्ते व्वनर्वज्तितता व्नार: भुणमाने हु पुणीमृतव्यग्यता।
न्च। गमानुशरो एसो1 व्य० पु० ४२४।
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ध्वनने भाव :
भयन्याशोक के कम्म उशांत में दुसरी भारिणा के नारणनीं शरिणा कम सयम्य-वर्म का परियिम देने के भशनाण् वानपमकी ने (चप० ११९३ म्) पयने स्सद का प्रतिवादन का फ्रणार पिया है
या नंग्य-वर्ष को प्रवान रूम दे व्यनत कहते हैं, निक्ूकर उम पाचनिहेय को 'म्यानें कहो है। बानन्पवर्ण ने ध्यनि की शैवस नही एक परिणाचा दी हे नौर बनें भृ्य में उसशा कैसा एम 'माथ्मविहेन्'' के वर्प में ही इल्लेव किया है। ए वयूष की पुष्टि इनती निम्मालिरित पंक्ियों से बाती क - १- बंन द्ामाम्म हि ब्यानि:। १- गव्वितैयोडडी व्यनिरिसी वम:। - व्यनिवशित: प्ुगर: गान्यस्व व्यचत: बोडनु।
१- गंग्योडपाँ उजताचनण्याल्यो प्रतिपाभितस्य प्रमान्पे अनिरियुक्तम्। उत्यादि। एमा प्रकर ध्यनि की बिकुष् प्रमेमों में विनक् कप के विवेकित होना, रक ऋच्यनिहेय है ना 'सथ्यसवार्मा ध्यनि:' के बनुवार द्ानान्य क्राय्य में बाल्मा न्द अवादि बैन्ड बंत् रूप से सिकि रक्ता है। को 'निःतेमणयुत पन्दम स्पर्ट' हत्यादि काच्य में 'बम' एर में पम्यनि है ज सम्पूर्ण काव्य का सर्वनैच् बं
१- कायः उन्दो का सम्युपवमी शस्नाों। संका! सज्यपितैक: मे ध्यननििवि बूरिनि: कचिष: ।1 स्य० १११३ *- व्व. पृ० १र
4- न० १०१५ oot of oha oi
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बया वातना कम हे, ससी तरब कम स्याने मेद मी काच्य के मीतर विषपान शैनर माव्य को उद़ीमा वपता सनीय करते हैं। 'व्वनि एक गच्यपिहैन है' - शस तथय की तद क्रगार नी सपका का
विहेन'के सी करण त 'विदुर्यनान' कम विशिष्ट संा.ने सियषिन निवा बातर है। बचमा यद समान नैंस बुसारें का ब्लूस मात्र बौना। अधी क्ार नाय्य सदी सनान मैं ध्यनि'एक फा्पपुरा कृत 'माव्यवितैन' है। और तद माव्यविहेन का प्राणमत ततम वयन्य वर्य है। जो तम भाच्य में प्रवान रुप से अभिष्कल बोडा है। व्वनिनेद- प्वनिर ने व्यनि के नेदों का निम्मण दो परसार से विया सै - मंब्बरुपैग बौर मंकातपैण। व्यंग्यतपैण में - वस्तु, बलगर एवं र्ादि के बाबार पर निल्यण हुया है: और न्पंयमस पैण में - व्यंस के गनन्तप्रसर हैं। शी भन्य, दायय, क, पार्य की भास होते हैं। वानयव्मी ने सुनीय उ्पास में ब्पंबकसमेण निश्वण् चिया है। ब्यंग्यमुवेन तपा व्यंकमुतेन मेर निक्पण करना नानो ब्यान भाव्य का बी मै किपण कहना है। ध्यने के स्पंप्रण दो दे हैं- (१) ववि्वाित माज्य
बनिवशितनाच्य कनाने दह हे नहां नाण्याम सर्पमा बनुपमुल (बनिवसित) वपवा बन्चनायोग्य रस्ा है। बसे तपा मामकम स्यानि मी कहते हैं। क्ोंककि यहां पर यह प्रमोमन्नमती करथाा के दाम प्रतुष्त वाची है। अपणा मी उपाान- हरजा तमा शरण-कस गर कम की फ़रृत हौती हे। इन्हीं दो मेदों के आभार
हामाप्यैम। व्व. १/१7 की दृषि ।
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पर वविवनितंवाच्यध्यनि के दो बैर धाते हैं-
(२) अचवतिरमतवाज्य
हसे पतों हैं नशां नाच्य वर्ष एक स्मिति हे दूसरी स्विति में कुन कसता है। क: बानन्पवमी ने शो नर्मा नरयत्रंं्रित कया बौर लयती
नत्म-वतिरण् ववाब्य में बाच्य वर्ष का जीलमना परिवर्तन हो बाता है। जमरें बाच्य वर्ष की संमा उपेसा कर दी बासी हे समार को दुसरर वर्ष बाचा है यह परमा नाक सन्च्ापार के बाता है। उसे वाच्य नवीं, सरम कदा का साक
रम प्रार बकननिततमाज्य ध्यन के की मैद हुए - अर्मान्तरमंद्मितनाम्यव्यननि और अचवतिरमयृनान्यध्यनि। यै दोमों नैद नर्तीं एक मद के ककाजित शोते हैं बर कीं कौत कों है। अैक पों के प्रशासित हाने नर हम्मी नानम के परणासित पहा ना क्ता है। एस करकार इपके भी दौ जार हैँ- (१) कशकारय तक (२) बाचयमुशश्य
लिम्मयामान्विडिन्च वियिोनिलकामा पा-
नर्म बन्चूं पूटं कलीसुनमोएकसोडसिन बर्व ने। क्षेद्री तु कर्म नविच्यांति बस दा देदी बीरा ना ।। दर्श रामो फिन में राम यद का वाच्यायं बनुपपन्म दौकर राजनिवसि किनरणावि नतव दु:कों की कैलनी वारे (राम) रम वर्ष में परिणत को बाता
विभयाक्धि: केयाननि कैयनि पवात्यमन्रिणि: । पैमामि विषानव: कैवतथ्यविचाण: काठः ।। (डय०व० RE)
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क्नाएू सपय भी है, यश निदी के छिए विष्य बम पाता है, किली केखिए बलूड, निसी मे छिए निभ्य बीर बुस दोनों बौर चिसी के छिए न विय्व न
पहां दिन्य बर बकू पर नाहकवार पतुआ फिए या से हैं निन्तु सनभ
बाहे दिष्य बर बुष शर्षों के व्यनवार हे, तम करसार यह अवन्तिरमड्रयित पाण्य का व्यंकर है।
निःशनाचान्य स्वापडपडना न पणओ।। वरहा कन्म डमा बादह दानों में(यपल्द कप) एक वर्भियोमलम रम चन्चय शी विद्ि न डोने से बम्म अन्म के माच्याचीदृन्टिहीन) का समा सिरसार कर रिवा नया। तवनन्तर कन्मतूत वर्म का बाँच दता है, निले निन्यण- माद बादि कन्म पर्र प्रतीत होते हैं। न: वहं कन्म कर अपन्त विरसृत हे।
वाक्युशस्म कायन्त तिरसूचनाज्य व्यनि -
या निया परवाना सर्मा मानर्षि अंदनी। सर्वां भाृति कुतानि का निका परयवी भुै:।। कम बारे अंगर में रात्रि रसी है तम संपनी मापता हे बौर का बारा संवार बानर है सम संपमी के जिए राकी रल्वी हे। वदा 'पिक्ा' और 'बामृति' कै सुत्तः वाज्यार्थयृणज्ानाय बौर निदामाय का वत्यन्किक विरसार को नादा है समा कमतः मतल्मपरांमुक्ता तमा तल्प- शनवाय परतीत होते हैं। कर्योंकि बर्व कई बार नयुकत निता बर बानर्ति परों
हप परछर वनिवनिततनाण्यव्यनि का प्रतिमादन किया गया। इसमें चार
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१- पपकाश्य नपन्तर संत्रमत माज्यम्वनि। २- वाक्पकूकारंय सन्यन्तिर संसनित पाज्यम्यनि। * पकशशम अचन्ततिरसृत वाज्यम्वनि।
(बाच्य नामक बैेएक कप के बमदा स्मगोग्य) बोता हुवा मी व्यश्यनिक्क शैंदा
() ஏாணணன்றாண்)
रवादि कप व्यंस्वार्मं की प्रतीति माच्याय के बन्यर बोती है,वसः वाज्य से व्यंग्य की प्रीति में यूम तो रस्वर है बिन्यु, अवितीय्रता के कारण आपत्रदल- नेैदन्चाद हे यर गारित नहीं शोता। शबी कारण इवे वगपज़व्यग्म
वयतस्यमबबग्य का फैवठ एक मेर स्वादि हैं। रवादि में रस, नाच, रवापास, पादामास्, पाचमुकर, मानशान्ति बानि का क्ृक््ण धोता हे। प्वाने के वात्मूकत स्वामि के बी एम से भाकित शोने पर अ्कम्ंगय- स्यानि शोती है। बचमा रवादि कलकर के बंग बोने बरु बौर वप्तर के नानवार्ज छोकर प्रमाम बोने पर र्ात्ि थर होते हैं। ब: ध्वनि का
प्यनैराल्ना निमानेन माकलानी व्यपस्कि: ॥ व्य० २।३ पानेडका वान्मामे मवान सू रखाकय:। जची बकिांगरो रवाबिरिति मे मस: ।1 व्व. सए
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. और खवानि बाभर का विभय कनबन है। रवानि भंरों का विवेशन मुणीसुव्यग्य के प्रण् में करंने।
शरार्द वानम्पमर्मर ने नी रसों में से नैवस शाम्भ सथा झार रवों का की निस्युत निवैसन किया तमा अन्म खरवां का सीत कर बौड निया।
पृंगर:अनन्यवणन ने झंगर को कण्मान और विपलम्म नामक दो इर्पों में नियक्त पलठाबा है। यण्मोग के नरस्पर परैसूष पन, मुस, विकार बादि बक क्रगार हैं। नियमम्ण के अनिताच,षष्या, निरक,उान नाम गार मेदों जी नणना कसनी कसी प्रकार के बन्म नेदों को मणनावीत स्वीकर किया है। रंति को इसके स्वानी नाव के अम में स्वीकारा बर मादुरष की मुण रम में। वापन्मवणनी के अतानुवार कवर्ि मापुर्व कहण में नी विकान रस्ता हे तमाधि बरंगोन की बपैदा विदकम्म मंवार में एवं करण में मापुय का फूष्य देवा पाता है। क्योंकि इनमें मम अधिक आर्भमाय ड्राय् कखतर है। इंगार सव(विवेचतः विदम्म) कतना सूकनार होता है कि ब्यें निवी नी क्रगर की कहोखा चमूप नहीं दोती। बानन्यवमनी ने सब् इम्मां मैं परतिमादिय किया है कि हुविदृष्ट आनि अनिल्य पाच व्वन्चाल्यय भुंगर-
२- व्य० शैस्ट की पृति। इन्मम भाक्यािम मा्यव प्रतितिकदि 11 व्य. २1७
मायुस्ता याि सरता मि न: ।। शक *- विकन्मे पौजानावित्ा: स्वान्फो म०श११ की दुषि,पृ० र१० नौर व्य० २१२६
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सलुबन्द रप में पूतूर बयुद्ास न्यंक नहीं बौबर। उनकी अुवार डुंगुर रा
गूंगर में किया नाय सम बमनी नियसा रपस्येव को, भरी अ अम ै पिवसा न हो। सय के महण की बर स्थान मी को, बकुत दुर तम निर्वाह बहने की इमयर न हो। बादि दुर तब नियाह को नया सो उसे अमय में ही रकरना शाहिर। की कमत आदि वर्उशरपर्न के अंग बोने का डायनु है। कय प्रकार के उपनिवण्यमान कसार स्वामिव्यकत का बेद्ध बोता है। उपपु सगरों का बक्किण वौर वनिति जी अवायमानी के सकर्नग को बासर है। कत: र-बोब्ला में मादि को अपरिक् कयकिि इवना पादिर। हंगार स संगरी कों के सुन का विषवय होने के सारण, बया कभी ररवों की केस्ा बािक कपीय होने के भारण प्रमान के और सल्नमा- मगौदारी है। रपते बंगों का कलानेह भाच्य में बलिशव शोमाचाय शैसर के बादि मदि एस एस से मामिय चौंकर कविया कर्वा के को उसके माच्याय् का बणू-नण्ू रसमम शे उठता है। गुंगर-रस नेीं बंगों द्वारा सन्मूत किए बाने
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के किए यस एक उतम माच्यम है। .
स्वीसिए वानन्यवर्मन कही हैं - अमशादि बलंगरों का कौ रवादि विभय के बयंदतम में उदण का परगार निवाया है, उच्णा बनुपरण कस्ता कुआा। बौर एवपं बन्द करण का कत्मुकण कसता हुद, अशिनता कनि बदि मरमथन्यव्वनि के बनन्तर कामि रव व्यन्पालुस भंगुर र का स्वनियक पह्ता है वो उरे महान बारनहाम वोसा है।
चाल शन्त र शन्त शोते हुए नी विद्ानों को बहुत ब्यान्त कस्ता र। कनैव आाषायों में अान्त रव के निनयय में समेद हैं। नि्तु बानन्यवर्म मे शान्त रव की स्वीकार किया है। और इसका स्वाबी नान तृष्जाजमसुस
दिन्य महनू यूछ मी इसी बौलसवीं पहा की नहीं पाती। यि सस आान् रा का सुपर फ्रथेक व्यप्ि की नहीं शोता सो इतने के सनी अस्वीकार नहीं चिवा या लवा। इका बनुमत कलौन बानाम्य महपुस को के निस्नृविवितेम में कुछ विद्रान वीररस में ही? शेता है। न्त का कनसनाने कररे , शान्त का युकर बस्वित्म नहीं मानते। विन्यु यह सर्पमा बुबित है। वीर रह में शान्य रव का बन्समनि नहीं को कत्ता, कयाँर नीर रव अभिमानयुक्त दौता हे बौर शान्द र में बलंगर का प्रनन रस्वा है। गाँगों परस्पर मिन्न हैं। यह तक पवावीर का सम्मन्द है इबसें निस्यृत्ति नितैचरैं के अर्नमा वरलगर रसिस बोने के कारण, नव सान्भ रद का की एम प्रमेम की क्ता है। न कि वीर में ही शन्य का असनयि। बीर बर झन्त के अर्पमा निन्न रके भी बदि शन्य का अन्समनि बीर में कहता कीण्ड हे दो नीर बौर रौड़ में नी ल्वी प्रकार की बष्यवस्था का पूव स्परिकिा हागा।
*श्मू म 11- ननृ. १ ।
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भवंभार के रकी शान्यत रस की निसी भी क्रगार बल्नीकार नीं किया दा शपता। न्योंकि उसमें सारतीय दृष्टि से मोसा कम एक अन्यिम पुरुमाम किसित हे और नाष्मृष्टि से मृष्णा-्नाय वपिति कुट का परिषाकत रम शन्द रा बी कनेण विवासित है। कम निृद्ध ए्व लणीबाजं कर पृति- पाचन स्वयं कविमेमा कृष्णापनामर (च्यात) ने मदानास्त के अ्न्त में सरियतर्णन
पणिंत हुवा रै, मुल्त: उकका उदैश्य संत्ारातीय तत्न का निक्पण हे। उसमें दैवतादों, बीर्मों बर तम बादि के वशिरम पवाव का को वर्णन परुक़ की पाप्ि का ही उपाय है। नयोंँदकि बैमतनयों को परक् का ही एक अं काया गवा है। पाच्नों की यहा के वर्णन का वारपर्यं भी शोनों के मन में वैराभ्य
எ்ற ராரரள்சணை, ஒணரபஜரள का सपाय पतादा नया है। नवानू की को भाम््ि है नही परनरवा परडस की ही प्राप्ति है। बौर बायुदैन नाम से जिस भनवानू का इसमें भारिवि वणिति है, नह मी परठ्रत की है, मयौंलि नीवा में बन्न्हें वपरिमित अं्ति ना स्वान एवं परात्पर इरस रप में परस्तुत किया गया है। वह नैव मुरा में पापूण डून्ण दी नहीं, बहनु पस्कत स्कम निवतित हैं। सवीडिए उन्हें व्याप ने लालन भी का है। शसन यह बनिया है िले भवान् के समी रूपों का सात पिता है। स्हीखि रामायणु वादि में मनवानू की अन्य बुर्तियों के लिए इम शब्द का प्रयोन किया नया है।
की बनित्य सिद कर पुरुचार्थ के रप में मौँपा और रव के रूप में शान्त की पृतिका की भां है ।
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वस्सूत! शद सथूप तम सानारण अण्येता कयासिर नतीं पहंग पाठा करयांति इस सारकूत दमुष का बाब्य कम से पतिनादन नवीं किया गया है, भयोंकि मस सास्त्र वर्ष लव इन्न के वाभिनेय कम से कुणाज्ित शैकर विशेष आमा बारण इरवा है। ए्वीसिर तद मशवनि नें कस सथूष को व्यंम्य कप में विभिक पिया
क: निकवर्य कह कि श्ञान्त रा मी एक रव हे बर बपा स्यानीभाय - t.
आनन्दवर्धन ने अपमपरम्वननि में रव के व्यंकक रूप में वर्ण: कादि, वाकय, संकरा तमा कृकषम को स्वीफारहू है। पवादि में आादि पद
नानन्पवर्चन के बनुसार रों के कणखत भंशोते हैं :- १- वर्ग
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१- वर्ण प्रकाश्व रस - कन वर्ण, विशेच रसों के सिए वनयत होते हैं सवन बणों के य्रुणत हो बाने पर एव गौसिति नहीं रौता की स, न, रंक के बान सरंयीन सवा 'ट' अुंगार रुष् के बिरेनी हैं, किन्तु ये की वर्ण बीमल्स र के -
बाके संफ्टमायां न स पुपम्कीडप बोक्को ।। क्य० २।२
विरोमित ख्यु: जारे सैन वर्णा रवच्युलः ।। ह एव हू निवेस्ये पीमल्खादी रे यया । सदा से पोममनदयेप से न वर्णा रवब्युव: 11 व्य० शर
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इम से अन्मय-व्यत्रिरेक दारर नण्ों का माँसिकतम झात को बायेगा'। मजे बाद पर बारा रा पोसन का इपयोंने अवावरण परस्सुस मिया हे। 'बापतततयराम' नाडक में नासपतर के क दाने का
अ्कम्पनी ककनरिम्सितांदुणन्ता शे कोलनी प्रविनितं निदुरे सिपन्सी शृरेण दारणसवा एसैप नच्भा -
व्यनस कर रवी है।
ड्रीडायोना मवरका बन्मियाने पुहणरं
सिष्देतयुक विभिव न समा बु चकुतपुण्य
वर्व 'बिमान:' पद में स्वीक् वंगल्ता है।
नाकय दो पुकार से रस की परवारिय कख्वा है சனீரணான்
इनरमें हे पप्त का उवावरण रामान्युदय का है :- (٤) جودمر مدرط ميقد
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वममदि नता दश्य डीरमा कुवापि सवाम्भवा नव कबर-रनाना: फयनू किहो नववीं लिा पहिदृरवो बीकयेन क्रि स स प्रिय: ।। बदं पूरा वाक्य की राम बर शीक्ा के परम्पर ब्युरान कौ पासिष्ट कक्ा हुना, कन नूसारं के अमृष्ह स्वतत्थ को कुगाख्ित पसता है। दुधर बर्नारातरवंगीर्ण का उवावरण :- म्मशवलीपुरेणोड़ा: प्र्मुरुखुषि-
नवन-न्नलिोगाजा मीवं सिवन्ति सवं परिा: ।। वरहां बारम्म में 'एमसमी नवीन नीपुर' एस अंड में बर 'नवननाली- शाक'तवा 'मुलुषेद में ए्मसलर है। तभा दे वुर्ण मनौहुष हैं। बहः नैमोें है शी र पान नर रहे हैं,- तस प्रठार नर्श रम्ान के पृत्ति वपुणभनोरयाय बैदुू है। बः वह काच्याकिन कंगर है। गस्ठी नाछ है रससान पक़माक नियु करता है, का यह राम्रिशाड़ में बिदुड़ बाता है। बह: वशं पर प्रिय बौर क्रिया के ग्यनहार पर सकताम और पकवाजी के अ्पवार का बराँप होने से सहर बवायोरि बरलगर नी है। एम क्रार यह पुरा कयतब्य बंगर- युलत है। मै सनी बहगर यहां मायलनाजिया के परलर च्यक रतिनामड स्पायी माद का परिषाच कसती और विदष्म अुवार की अलपृतति कराते हैं। वह मानयमुकाशन रढ का निवेचन हुवा। बभिननमुन्ध ने मर्षा एक तमूय यद उपर्यित किया है नि वर्ण, पर और पवाकपर रव प्शसक नहीं को साते, नयौँकि रव बाहुवाथं से दी परषाशिव शोता हे बर विनावानि खानडी निना बानवायड्रान् नदीं दाची।
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शदी प्रकार कहां मानम को फरणासा माना बाता है वर्ह पानि की पृसवा १२
भी रक्ती है कयोंकि नाकय निना पद के नवीं मनाड सयामि वर्ष पर में नी व्यंजबर नहीं रखी। दद कोई सा न व्यंद नहीं राचा ,्बप्ु प्राय: सी पर व्यंस होते हैं स्वासरि कैस अंस्नानिमय के पारण नानम को नरमंस या प्शास कय दिया नाणा हे।
संमटपा त्रीन कुकार की कही है :- मई
२- मण्यम सपाचा
संपटना के नियामा भुण हैं। पुणों के बहचार पर की यह निणय किया नाता है कि नदों कैवा बनाय नपैशित है। मुणेरं के की बामार पर यह निरयत पिया नाता है कि किस अंफटना में फठोर वर्ण हॉ बौर निकें कोनड। वदि मामुर्य की बबिष्वनित बैशित हे को अंफदना में बार परों के घदक वर्ण मुर बौर गैमड होने। बौज के छिए उसने वर्ण पहुच बाँने। प्रवान मुण में वणों की स्विति दोनों क्रकर की हो सन्ती है। काः संवटना के नियाणत गुण दी हैं, और बंवटना रस की अनिष्यनित होती है। बा: संपटना रव के ब्यंसर, सपट्रना होते हैं। और
के व्यदलन स कला बौर बाज्य का बौमितय बौता है।
रानावण और मशामारत्र इसके बुसि आाण हे। स्मन्म के शंदा बोने में निम्मशिकित वमुष होने वाखिए - विराय, नाम, बुमाड, अंारी के शौनित्य के सुन्दर रेलिसाचिक नृड कपदर अलडृािड(बालियि) क्ावरीर का नि्माण। हतिमृत में प्रतिकूच रस क्री स्मिति को बौड् कर कल्पना वे बीद में वीब्ट रसू द्वारा उनित का था कम्ममादइन्यि गर एमी ना मौना सानिन्यानि सुरप दोना चाहिए, न कि
₹व्य. मर्द की दृषि
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नैमळ शस्य की नरवांदर को सवतिकससाव सम्मन्म करने की इम्दा के।नपबर पर रव का उद्दीयन बर बृहनन, सभा बीच में बारण्य बौचर नियान्य काती हर मी ख का कुब्चान, डकि होने पर नी बहशरों का बोक् कुलका है कला पाविर। बर्वाधु काब्य नि्वाण करठी समप कति को सर्पमा र के लीन डोना बारकि । बौर कवायूरीर एव पुजार करिकिा करना पाहिए
कलकमवंग्यम्वनि में तक एप व्यषरशों के अतिरिका पुछ्र, सिक्कध नपन, सम्बम्य, नारस-सलि, सुछू, सकित, उमास और शब्द, निवास ,प्वर, गाह वादि मी व्यंच बोते हैं।
पयसारो एलेन मे यपस्वसमा ध्यपी सापय: शोभ्योर निशन्ति रामाचमुं बीकमवी रावण: विष्किकशि प्रोशिकता मिं कुष्मरणन ना
एय रशौक में बत उपकुक्स बनी का व्यंसम्म है। यहां 'में अहखयः' के सुतु इम्यन्द बौर नवन का बनिव्यसल्म है। 'सम्राम्यर वापम:' बर्द बाक्व बौर नियास का न्यंदलम है। 'बॉर्व्कीन निशन्त् रापाचुत बीकचश राषण:' नदं सिदूबर भारनाकियों का। 'निन्किफुच' सत्यावि श्डोणर्य में मशब्ति,बार बर उपर्श का म्यसत है। पर क्रार के बहु: नर्यंस्रम के चठित होने से काब्यम की अवालिशािनी कचदा सुन्नीडित रोती हे। नहीं कहीं व्यंग्य को अमारित करने वाये ए क के रसे पर मी नाच्य में बन्पष्तावा बोती है। अ: प्रतिमा विशेष
१- प्० दु. स्वास भ२रक-र भ्ारिणा
३. शाडरी सर्पाकल कार्य चवा सपा। यपा रखममे स्यमम करपुविमाके।। व्य० पु० ३२ 772
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महात्मानों के इस प्रकार के इम्चनुकार अफत्: बेे जाते हैं। रूपर एक की श्लोक में कब (मुू का म्मंदलल्म प्ररकित किया नगा। कही आदि)
पुार कप का पुप्टू-पुकट बवाकुत रकोषों द्वारा मी व्यंदलम मानपपमे ने प्रं्षि किया है। यह तन कम कयवरणों की नहीं किया मया है। यशं तक निवसितानस्नाज्य कवनि के एक मैद अपबमणयंग्य का सि्मण हुा है। बम ससने दुवरे मे नुरणनोमनव्यन्य (डंपपुव्य) का बानन्यवर्वन के अनुसार विवेशन करेंने। सुरणनोवव्यंग्य स्वन : एकमें वाच्य बौर न्यंग्य का कम उप्ी प्रकार ररित रोता है बिह प्रकार पण्डा-रणन के बुरणन का। रबी कारण व्यनितर मी बुससान्नि कहते हैं। वानन्यपनी नें एम ध्यनि वर्म को दो भार्नों में विनक्त किया है। :-
इम्तनियुल सुरानोच च्यन्य ध्यनि :
मह सललाु उमनसदुन-म्वनि है। इकर्में न्यंग्य-वर्ष कें दो प्रगार क होँते हैं- वस्तु बर बईगर। बान्व्म अण्मशनितमुल ध्यनि के अन्समत बैवस बंगर-न्यम्य की मानते हैं, वस्तु-व्यंग्य नहीं। तमरी बसुचार करवां बम्ु- डम दुणशर शोता है- वश कर्पन सम्म स्केम होता है।
इममार्पिुलपातु शैडनि देना न्यवस्कि: ।1 व्य. २१२० र- बाससम्ा लाईंगर: इन्फकमा इगखी।
एसी व्वनिरित्यल्नान विवशितम्। बस्तुकगे म सम्तक्या परकाश्ताने श्ठै।
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वशं फरश्न उतता है कि व्यनिकार अष्मशनतिमुतक मस्तू न्यंम्य को नहीं मान्ो? उनये परवी ध्यनिवादी आपार्य को स्वीकार करते हैं। रेस जीस दोता है कि बानन्यवर्मन के कस्ने का अभिषिाय यह है कि त ब्मडकतयुक अनुस्वानोमम व्यम्य में न बैंकस नस्तु बचिहु चठंगार मी फ्रणासिव बोँता है, किन्सू शहैब में वसतनसरमान प्णासकित होता है। 'बैनवमस्त ननोनानेन' मे स्ेम ली भरण है कि यशां दुसरा पवाश्यमान वर्ष नैक्ड, मस्तू-हम" है। बदि, इसके दाद नवा बठगर नी डोचा, तो यही ध्यननि का उवाहरण बन बाता। वि्तु, फिर का परश्न उतता है कि यदि वनन्यवर्णन अन्पशनितमुड में वस्तू-न्यंन्द को स्वीकर कहते हैं तो उत्ला उवावरण कयों नहीं केी ? दुसरर तमूप यह है कि 'बास्सिया: स्वाउंगर:' में पयृकत 'एव' क नैमड अठकर व्यग्य की और सेद पखता है बौर बही की वृति में नकते हैं - 'वस्मानमंरो न वस्तुमाच' हयादि में स्पच्छा:' न वस्तुनाफू नद दिया है। बदि इन्हें बलंकार के डाय वस्तु-ध्यंग्य नी बमीष्ड था सो 'मल्ापएंरों' के बाद 'ब या वाि कुस उनारे। वसतुत: बानम्दवर्पन बहशर-व्यंग्य को स्वसिए स्वष्ट कप हे स्वीकार कहते है कि स्कमें किसी फरगार की वापति का अनवर नहीं है किन्सतु मस्तु-व्यंग्य मान हेमे पर, शहैम वियया बोक विदिृतिमरियों की सम्माचना होने के भारण की वस्तु-व्यंन्द को दर्वे स्पर में कस प्रसार करते हैं - 'बस्नापअंशरो न वस्तुमाजं'- तत्यादि। बौर उफे बाद स्तैच और सव्सनितमत का मेर भी काते हैं - नरहं तृब् शुक्ति के वास्ापठंकारासतर बाच्य रम से पतीस योता है, यद सब 'श्लेष' का विष्य है। और, जहाँ शब्द-शक्ति के सामर्थ्य बाक्िय एवं बाच्य के अविर्मत व्यम्य की बल्चारान्तर के कगक्ित हेता हे, यह ध्याने का विभय है। यह तल्च है कि आनन्यवर्मन ने स्वच्छत: यह नहीं कहा है कि सब्पशनतनता म्यनने में बस्तू बौर कहगर दोनों व्यंग्द होते हैं। हमारे विवार वे बानन्यवर्न शैचक बंगर पस में की हैं। किन्तु उनने परपती वाचार्य मव्स -
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विश्वनाय, पन्नाय ने सष्मशकितनत में वस्तु व्यंष्य को भी नाना है। सब्दक्तमता ध्यननि में वयांद रूप से स्लीकार किया नाने पाठा इब्म गौ कपों में च्यंस शेता है। १- पदल्प से- मानकय। इन दाँनों फसर के व्यंस तबों के को वर्ष ब्यंस्याम रम के मुल्त है यस सममान्र वर्लरम सोवा हे। य: ह्म प्यनि के दी मे नमती है-
इसवर उवादरण वनन्दवर्मन एस फ्रसार देते हैं- परावूं भीरविशस्य मार्च्डा दैवेन दृष्टी यादि नाम नारिम।
यह एक ऐेसे पस्ता का बमूनार है जो कवार है, निन्यु नरीनी के भारण दूबरों की इच्या पुरी करने में अहमम है। बत: प्रस्तुत कमन में 'भह:' पर बचता मै बपने दिए प्रमुक्त किया है, पिन्तू उसका सम्बन्म पून और चाशान के सान मी प्रीत शोसा है। पकतर पून की निनत्ता एवं शौतकतर मी व्यकत करना पाह रहा है। पपता के कलन है यर क्रतीत दोता है कि बदम कैन व्यक्ित की बनेसा कमेशन कू बैन्ड है, जो शीकाल नी ह वर परोप्सार में वार्प मी। बामाप्पता: उवार व्यक्ति को प्रक्न वलाडम का उपमान बढाया बाता है । वम रपमान की कौसा उपमेम उत्युण्ड होचा है तब व्यविरेव नाम नर माना नाता है। का: यदां व्यविरेणासंगर व्यकत दो रस हे बार मदां शीतक्तर रूपी दी अर्म व्यपत को रवा है यह बड़:' नर से। एस नम के सटाते ही यह कर्षर भी वट बाता है। नंगर म्यने का रक है।
समुणक्ा (ध्यलृ० २4) ---- वरपैम वान्यमणखवर उत्यादि (व्यoृ०२)
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इप्शा उ्वावरण बन्पवर्पनर ने वाणाभट्ट के अमभरिय से सयु किया है। रा्यपभे की कत्या हो बाने पर सैापति सिंलान ह्मंतंमद के पास बासा हे औौर मसता है :- पे डररिल् मशमूक भरणीभारणावाझणा लवं हैभय: । मदं मशंय्ाम, नरणीनारण और ड्ेच सीनों इन्म बनशाफी हैं। अम उ्वावरण हे जो प्रप्म वर्ष निक्क रखा हे गमे मसामणय के समय शेच्यनान ब्वारा पृक्ीविष्ड को स्पिर बनार रसने की बास भी गिलल्ी है। बिन्तु पामणणक वर्म है कि प्रमाकरवर्मन बौर राज्यनर्वन कें अनान में प्रयापाउन के लिए समवर्म का रेब रला। वर्स प्रावरण्यिक बर कपानरणिक वर्ष में उप्ानोभोवनान की कपनर करने पर वहं बाम्य बोने से उमासंार है। बरहा कपक आगर मी से कप्ता है कयाँरि नह मी बाम्यन ही होता हे बार यहा खेचयनान का बनंबर्म पर बारोम ज्रीत शैता है । बहा, भववावत होने के कारण यह इन्म शकतिमुत्त हे बर वाकयपषाश्य हे। इसमें व्यम्वार्म की ज्रीति क्रम के बाँती हे ना: सुरणनोजा नी है कः यह पानयमुशशवतमनितमालनानुरणनोप अंरव्यंन्य का उवावरण कुडा।
मत्रर और कर्पतककितकं,नद मी निन्तीं प्रममों में पौसिय होते हैं - वपा - 'मयुल विकय में नांपकन्म की अनितयों में। बपपा की जानन्यवर्णन के 'वियम- राणसीडा' में कामरेय के अकषपर के कुमाचम के प्तत में। बौर के 'मशभाख' मैं भृुोमायुयवाद बानि प्ररण में। नमने यहां परक्मुरम, इब्मक्ति न्तुस्नानोमर न्यंग्य के बाद की वर्पकित सुल्ानोफ न्यस्व का भी सलतैत कर दिया है। निन्तु किर नी अर्थतक चुड्मय सुस्नानोक सयम्य के प्रतर में पुकचुशाश्य का पुथ्ट् विवैधन करेंने।
इ. ए० भरर बौर इकी दृदि।
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कहां नाज्य वर्ष इन्य भ्ापार के बिना शी बपने दामपूर्ष के कपन्सर की अभिव्यमत कर्ता है वहाँ वर्पनुपून ध्यनि शोदी है। यह व्यंग्वार्म की दृष्टि है को नागों में नियव्त ही मासा है १- वस्तुन्मं्य ₹- वयगरव्यंम्य १- वस्तु न्यंग्य - व्यंद की दृष्टि से ससाते को भेद हैं -
निच्यन्न शरीर।
इम्पी, कद बर वाक्म परताश्व मी हाते हैं। एम फ्रकार इसये नार नैद को नाते हैं-
- पदपूकस्व-एवत: समव्पवकितयुक वस्मु व्यंग्य तया ४- वाधयमशाशय एकत: जंतव्व्पतनितमळड मस्तुववंग्य इसमें एक भेद प्रबन्ध से भी भासित होता है, अतः इसके पाँच भेद हो जाते है बंकार व्यंग्य में जैवस दो ब्यंक होते हैं। :-
वस्ताल्पपण बरत्ममव्यपतचुक्त बिा स्क: 11 "्य० २१२२
नरषां पि विविय: फ्ोक्ी बस्सूनी नयस्य दीफक:। स्व० २।र व्ससोएकगरी कान्यन: प्रीयी। सुल्ानोम्तन्यन्य: क क्ररी परो कयने: ्प० २।२४ सुगझता के डिर स्वन्याठोय शर की यृषि इष्टव है।, - अनुस्थानोपभात्मापि प्रभेदो य उदाहृतः। धवनेरस्य प्रबन्धेणु भासते सोडपि के षुचित्। ६व.२/१५ !- बोकनेन ग्यप्काथाननि, कलशाराण क्मो मति: - क्वापिवसतनात्रेण- स्यन्पने भ्ानिसतगरेण।
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(1) ஹஹராணாண்
कया हरवियय में-
यवां अुनतर ( नापरेय) ने पत्सतरपी के वहर्ि युव्र की मक्षण किया। एकमें किया सार्फि किए ही एस अर्पा का बनिकन करने पाठा बनि' पम बर्गंि के मामदेय के वकार्चार-कमी वस्तु को व्यमत कर रहा है। यध वमिष्यक्ि बिद्य वर्ष ने सी रही है नह कनिकिलि्यित या उझरी फौड नमिक
यहां एक समुय अमेय है नि उपयुक्त मेद की वरो नैव मस्तुव्यंज्य के नन्सगत कय बार हें बर इसे उववरण में मुवाखपणी को सा हु्परी कै रूम में बर झुकर नाम की रसिय युकत के रप में विधित करने पर कर्बा आशोरि बसर नाना या प्रपता है। का: यहं व्यंद वर्ष बगर कम है। फिर नी, आवण लामान यह हो काता है कि वर्हा कगर बिना यूकतन के स्कतः या गवा है। ब: कोई बोच नहीं। बर एय पुरै रठौक के जौ अर्प फरवीस रैडा है उपरमें 'करमर्मित' पर बचिक संक्रिम हे नत: इसे उपसुंचद ध्यान नैद के उनावरणाम रा सरते हैं।
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बाहिणदतदवारुने गवमस्ममचके वणगर्य गर।। इकमें हुरनिवाड बाणों की तैवार कर रवा है, विन्तु नानदेव की वकित
बविकम कार्नोम्मार्डेकम नस्टू की न्यम्म कर रवा है। इची ज्रीति में प्रणक
ண்ர்ன்சன்ணக !- भिरिगि का नु नाम कियिकिवरं कियनिवानमधानतरायु नय:ः ।
यह निवी नाभिाम मुल की उतत है। कसने नमन से सुम्कारे बेवी बीड़ पाना के नारी माच्य की बास है, ए्वयं सुम्हों या ठेना को बयुण गूुए तै - वह वस्तुरूण परतोदि वाक्पार्ण के न्यम्त हो रही है। बहां माममार्म के को अभिगेय
कयोंककि पिन्नाकड नपर की उपमर माना नाता कै विन्यु, बर्वा अपर की उप्रान माना गदा है बर निम्यफड़ की उकेम । बडी व्यकत्किन के यहां ज्रवीप बठगर
एम ध्यनि मेर में जी पक्छा उमासरण दिवा या उसका वकता स्वयं वषि या कत: एस सकक्रिोदोनिवसिट वर्प था। एस दुसरे कयसवरण का पनता कि
इनके बानार पर प्रोदोकितसिदमं के चष्य व्यन्य वर्ष की नर्षणा में कोर्ई अहिक्य नतीं बाता। अह: नानमवर्धन ने एम याँमों को मेदस नहीं माना है।
नाणिद इतियिन्ता सुी बममर्ण नम्पमनतीर।
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னீன்' எர்ரசா ண ரரர मैं आाशकत नर न्यायसुड का दौ्नत्य प्रवीद दो रवा है- वह स्म: बम्पवी है। ब: का फमशस्मक:सम्मव्यपसतु नम्य का उवावरण है।
बयातू नौरमर्तों मे कनपकूख् पक्षी, न्याय की फ्नी मुलाफड के बने पता वाछी बोदों के नीन नवोंडी शंकर पुक्ी हे। बरशां वाकमार्य हे मौर-परंतों के अबमूक वाली नकवरिणीता किछी बान फनी का बसितिव बौनाज्य पृासित को रा है। वा व्यायपुष नववबु के दाम सपमात्र सम्मान में र रवने के कारम कैख मोर नाहती में बी सपर्प रह नवा है। बली बविरिंक, विस्वरिणीत मुकाफड के नने सक्
समियों का म कहने में सुमाा सपर्य रस्ा भा बर न्मुलावों है बन्हें कपन्कित ब्स्वा था , यह वस्तु न्यंग्य है। यस वर्ष ए्पत: सम्मनी है नयोंकि ससडी विद्ि निसी कनिकलपा की बायशयसतर नहीं रवी। ब: यह
'मशनाख' के शम्िका के १५३ में अध्याय में - युतनाखम कर वैलार दिन में मांखपाण में सपमे चिद्, उप मासक के सम्बन्ियों को वाडय को शैकार पर छोट नाने की ड्रेरणा कहता सुवा कह रवा है-
நர்ளாஎர்வ்ள்்ப
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इकके निनरीत राधरि में वैस सपरे और मिद आाि के निष्नों से रंसि निर्कि शंकर मसणा करने में सुराछ यह पास्या हे कि ये कान सुवास्य चक परवां कपरे, सूपरत के नान बरा मुफे बाने कौ मिक बाया। यः प यू मारड के सम्मन्यियों की सतफावा हुय मसा है
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१
कस प्ुकार यहां मृद् और कुाख की डकित से सेडा फ्रीय बौता है कि दौनों द्ञान बर बैराण्य का अपमेत ने रहे में बर दौनों पृव बाखक के संपधियों के यह़े सिौची हैं किम्मु, उनमा रपसम सम बास वौता का नीच्म कलते हैं- मे यपने स्वाथक् रेसा नक रहे हैं, मस्तत: ने दाँनों कप मपाणा मे बननी सूषा की दुन्ति करना पाठती हेैं। कद प्ुसार यह पूरा प्रकरण बाच्य रप में सारनीय आ्न प्रस्तुत नस्वा के, किन्तु हकी वस्तुब्यग्य ही रहा है- दौगों स्वापियों कर स्वाथं। नूड्र बीर शाह की रकिवां प्रक्य के प्रगास्ित बौर स्कासि है। क: नवनाख का यह पूरा फरण प्कुतरलक:सम्मणपीभिनुलनसु न्यंग का रक है। - कंगरल़ाल कंगार च्यंग्प -
यपा ड्राप्नीरैम फलनारयुनरनि मदि वं नम्पतैद निपष्या नििदानव्यल् पुवमिवतकनदी नैव सम्मानयानि। मेुं कमनाति युव: विमिति म सदी न्ामान्ुवास- सपमूमावारें निवर्ानिति नमता स्यामाति कम्यः कयायेः।।
१-घं पू० सार की दुषि।
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बयाति नंतर हसी सपनी क्राम्म ही नह हे तम किर यह रों मुनमें मन्पा परेना ? बाउस्य-ररिव मम बाहे एपकी निमा की मी सम्मायना नहीं ही कसा हूं. कया शला शीक्ार्यों ने बयुन यह पुनः बेत्ु मनापेता ? एा क्ुगर इुस्सूरै बाननन पर पिसकों की नारण कस्ा हुसा स्यूड़ का नम्म म्ीद की रसा है। वर्श बाच्य हे बहन्मैश और बल्पेसा का आर। शसो न्यम सौ सा- रस बीर पुरुष्म पर विषणु का बारोप और यह बारोय के अम बठगर है। एस प्रगर वहां बहशर वे अपर की व्यंष्य की रसा है। (२) वानन्दवजर ने डपकार्संगगर व्यंग्य का एक बर स्वरनिव उवावरण दिवा रै-
स्मैरैडपुना तम पुे वराकाकि। सोमं कौदि न मनानि तैन अन्ये सुच्पक मेद कराशिएवं पयोभि: ।। है नंबक बीर बाक नैदों बाछी इबरि, सुम्कारे दुट के मुल्ान की छानण्य भान्ति है बिहाएं नर कहीं। बसने पर नी ए्व बनड में मवाननि कौम (ज्वार) नहीं बाबा, निश्चम ही या करात्ति' है। वरशं पर बरा्ति में स्हैम है , बंसृत में क बौर क' मुतियों में बगैद माना दाता है। वा 'करारि' इन्द का बर्म दोना कता की ररकि। जिसें सनिक भी शम्परवशान नर्वीं है। बमा यड़ हे। यहै बाच्य वर्ष है। इसहे व्यंग्य को
रे बगर च्यंग्य का उवावरण हे । १- उ्पा-
नीराणं सा इुडिणवगम्मि भा तदा पिवानगुण्ले। दि्ही सिनकुम्मपनमि क मस्लसिन्दुरे।।
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बीरों की द्ृष्टि प्रिया के मुम्लारम सनीं नर उतनी नहीं रकी किलनी शिपुर हे नरे नव्बुमों पर सकी है। वदं पिया की बपेसा युद मार्य में आकर्वकता का काभिक पाय् हैं। यह स्यतिरैक आगर हे। बौर सवनकूष्म बर नन्कु्ब की छुलसा प्रवीस सो रुही है। वहाँ बुलसा-सुई बपा की नम्य है। यह: वद नी बलगर के बहार, जा न्याल
बाननरवर्ी में हसी प्रकार वापाम, अपन्तर-चाह, व्वतिरन, उत्परसर, शेम बर यवासल्य की प्रीयमानता मतडाई हे। बौर प्रत्यैक के उवावरण भी पुस्तृत फिर हैं।
वलापकारण बवंकार व्यङ्रत्र -
यपा-
बनांतु बंड में निम्यन बौर बुष्म पुत्र नहे ही काना नहे नि्मु मु ्योंक़ मैं स्वामी शोते हुए नी परि्टि न नुं। वहां की माच्य नर्म निक् रवा है अपमें गोई बलंर नहीं है। किन्यु बाच्यारम हे यव प्रतीस को रहा है नि पनता, मनुच्य लीफर कारिट्रि ननने की अपेस्ा दा्डि बृंत बाना बॉकित नैन् समता है। बह: यशं अगर रित वाज्या्म है व्यतिरैक बरलकार न्यंन्रिकि को रवा है। नर्योँलि वर्दा माच्यार्थ में कोई बंगर नहीं है बा: क पसुनान मानना दोना। बत: बर्श मल्ुतारय कार बंग हे। एव' शुरणनोम्तव्यंन्य ध्यननि' मैं एक समूप निरेष रम मे अवमेग है कि एवनें ने सी बर्सर ब्च्य नाने या काी हैं जिसमें वाच्यार्य की अपेकर व्वंग्याय मैं दाहत्ोत्वर्म ही। वर पासत्व मात्रा तम वो निश्नय की विक रहेनी
१- या नात्वाईंशरों न करिच - डी० पृ० २0०- यह अमनिवगुम्त का मत है। १- कगरानतरनग्यमाम नक्यंत्रा नातु।
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नम ने नडर नैसक नच्तु से व्यपत हॉने, बेहे बनी कबर कहे नर 'मस्ूपणरम- बंगर' में। क्योंरके इसरें काय्यत्व की निम्मति की वरकार के बबार पर होनी। कैवक मस्तु कपने बय में भहच्य नहीं बन सफी। किन्यु थर्ठगर के आहगर बंम के एक में बसपुल सुरणनमबंम्य का व्पसातु सनी बोना का गहतमोल्तरच प्रमान कम के पृीयनान बईगर में शना। बन्पणा वह व्यनि का विषय नहीं नाना या समा। कयोंल नंरम्तर की पीसि में बर्ा वाच्यु का सत्नरत्म पाक्षित नहीं बाता नह ध्यनि का विचय नहीं माना भया है। साहरणाई
सो: सरशांनर कान्यल्या सम्पी: पिकी मुर्वी।। अवति नन्दनिरणों के रातरि, कात पुष्नों ने अतिरी, पुमतुन्द के सा, संदी के सरल्याड की शोमा बौर सम्मों से काययल्पा गौरानकि की बाती है। वशं पर मिहा, नाली, ज्ता, अस्खोना, तमा कच्यामा-हम पस्सुष पानों का 'पिससे सु्ी' एमा एक ही धर् से अन्मव को रव है। ब:वर्श नाच्य कगर- बोफ है। बर की इण्डकिरणों के रानि नौखायि दौवी है नही सगर कसपुण्ों से कमसिनी। एस प्रकार रातरि, उता, पाब्यल्ा बादि में लानता की ज्रीदि भी को रवी हे। यह साना की उप्ना-बलगर है। दो ग्कमान हे, फिन्सु इकमा-बशर के नम्यपान (व्यम्य) होते हुए मी वरदं याच्यारम का व्यंष्यार्मं के परतति ाहत्वोत्चम नहीं है। बाज्यार्म की एवयं प्रमान बन नया है। य: यह ध्यननि का एयह नहीं है। किसी भी कगर के न्ंम्य होते हुए भीडू यनि यह अम्रमान को बाता है तो वह बठनारं- ध्यन भाब्य शी फोटि में नहीं या बाथा।
गन्तच्च: । सप० पु० २ू०-२०१ ४- व्य० २।२७ ५- व्य० पृ० २५०
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44 बदि बंग्य बठंनर गाण्याये की अपेस्र प्रमान रप से पासतयोत्यम्ंन शेदा है तो यह ध्यननि काज्य के अन्चनव जा बाता है। व्यनि का किवना नादात्म्य है! को बदार काच्य के अरीर - इब्द वर्ष के उपकरण नात्र धाते हैं रे सी मयने काव्यमोटि में बाते की काच्यात्मा का जाते हैं।
यहां का ध्यनि नेदों का निवैश मुद नब मुणीयव न्म्य कान्य का विवैमन करें।
पणीश संम भाम *
का प्रीय्मान दर्ष या ब्यंग्यारय बाच्याम की कत्ा बमुवान रक्ता हे बीर उसये नाण्याम का की बासट्ुयोषर्म बोता हे को वहा गाब का अ्प कुार - मुणीकनग्य दोता है। यह मुणीस्बन्य शब्य व्यनितिष्य चहन है। क्वातू एवमें नी प्रीव्लान का बंस्प रस्ता है। सिद काच्य की प्रवीयमान वर्ष के संस्मर्व का सोमान्य नहीं निल्वा, यह सतूखयों का करककारि नहीं बाँदा। अ: पुणीमतव्यंन्य गाब्य मैं नी व्यंस्यार्य रस्ता है किन्तु गीण रम के। अयनि बर मुणीमृत नंग्य के मष्य नैव पमल्कार परिणाम का की बन्चर है, बागर ना नहीं। स्वकिए दोनों के मेदों में पायः बाना है।
बानन्दवमी ने गुणीपूद व्यंग्य के भेदों का परतिवादा निम्न क्रकार हे किया है :-
रेडकमरा परों दर्वा बान्ति वयपंतरां नव:॥। व्य० शरू
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(१) विरसतनाच्य :-
हन्मम्मति हिससटु्पटी न का नापरे प्रल्ितभ्ज़ृणालनदा एव पम में शवण्यतित्तु निय्ी बयुत हुदरी को का का रवा हे, अम
सरयों की तमा मृणानण्ड पाहुतों को। कि्यु मैशिब्ट्स यह हे कि टुडरी ना उडने बों के नामम सषों का प्रवान नहीं किया नया है। परिणामत: डावण्यसिन्यु आादि पषों से निल्लने वाही बाच्य-वर्ष का पर्ियान कहने पर हुन्दरी विनयक वर्षों की प्रिति दौतो है। कस परिविर्तन के नो वर्ष क्रीय्ान अर्म के उम् में निवस रवा है नम है- 'बाकर्डना कदी बिन्दु की अपेक्षा नाविशा की हिन्दु की सदुषा'। एकी नाय की बाकार्डन बर नाचिल हपी बिन्दु के बीम व्यततिरैक मी है। क्योंकि बाफर्जाना में वानि सन्पमा रस्ता हे वो सूदुस कमत नहीं, अपड चन्ड की पैंलकर क्म की बाते हैं। समलीईैक किन्सू हमा हुपरी सनी खिन्दु में दोनों दाम दाम विशार्न के रे हैं। न्यतिरैक-बरजगर की ज्रीति दश मक्डियोति-बांगर के दारा क्रीय्ान वर्य के तम में ही हो रही है। अ्यतिरेक भपी क्रतीयमान वर्ष की प्रीति 'शममत्र' कर ये सो रवी है। बौर इपते की पनल्कार निक्क रवा है यह नाजय- विदि का ही ओी है। क्योंकि प्रतीयमान वर्ष के ज्न के न आानन्पनाय ही रस है, यर बविकमोिस हे सोने बारे बाच्यामं के ज्ान दे न कम है औौर म बंि। इस प्रकार कक बभिद में नाण्य बर ब्ंग्य दोनों वर्षों का पकतचार नाना में आनान है। ब्यन्द का पक्चार, नानरा में बाज्य के सस्कार से बाच नहीं है। कन्ता कह सक 'मुणीमृतष्ंग्या का है। बौर कयांकि इकमें नाच्य वर्म में परिकविमने बोदा मे बत: कह विरसूतवाम्य पुणीन्ृच्य गएक र ।
(२) बविदत् नाज्य :- इकमें बान्य वर्ष में परिव्तन नहीं होता।
१- म्समव्यड्रय
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எர்ணண்ர்ணை' எளவீரனீ बाबाबों हे चिन्म कम में किया है। पुर्व्वतीं धानायों ने रलसु अब् का
ண்ராச்ள் சாாா:ழார் ரன शब्द की निभ्वरि मानपर बाचार्य मानन्यवर्मन ने रद्ससू के विभय में अननरा नवीन रिवान्स पस्तु किया बोर नदा कमि रा सा कुवान दी रख्ा है, कि्दु का कह सृपान से बाता है नन नद एस न फललाफर रवानिनगर म्यछाता हे। न्योंरके यह दुवर की सौमा कढ़स्ता हुवर निहाई केवा है। वस्सुब: नह रस रव की नहीं बाता। यह सो स्वायी नान या अंारी नाव
बचि दुष्ट रक्ी है। स्वीलिए सी स्वानिएगर कर दिया नाता है। उवाहरणाव कोर्ई कतम सपने याजवराता से कस्सा है :- रचिं शस्पे न मे स्वास्वति कुः ड्रायरिवाद् कमें
சார noாi Tgw: 11 हम कम में राबा की स्युति प्रवान है। सृति में कानि राजा की पाठ- गरिा कर रहा हे निसमें बुनारियों की वरणस्मिति बं ना रवी है, बौर बी से पाटलम प्रयोगगर: कह गस्विति प्रेोअंगर की पुच्ट करमरवी है। रहग रव का स्वाबी नाम-'डाफ' है। यहां शोन की स्थिति,सामान्य शाक की बपेशा बचिक कृद की नर्ह है, नतः उसे रख के समान या रसपल् *
शी -भी कुमान रव के दाय अगार मी श्वष्ट रकते हैं। यमा -
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எண் ஸ்ஜிசாி: எரின்ன:
ச்எ்ளனசர்ாகண்டர்ட, கரீர் எ் के समी वितेषण नानी में सामू होते हैं औौर 'मामी के अनाम कस ज्रार उन्ना-
सानिशगर का बाला। इकदिरजतयएथड कतियम सनीक्नों का यह है कि स्वानिनगर नहीं स्वेसा नहे पतन नस्तु का दृवान्त गौना। बदि बतन वस्तु कर स्वाम्त की बी अहे प्रमान नहीं होना पािर। प्रमानता सर्वंदा नेननस्ु्त्न्स में दी डोनी पाडिए। मह सथूप नसां तर ठीक है यह नहीं कडा ना बाता। कयोंकि इसके अनैक अपवाद ऐसे
नी मिकी हैं, जिनमें बपेतन की प्रषानता रखवी हे और रपता में कमी नवीं
ममाबि याति सासि्यिममिक्याय बहुसर नवीडवेणयं पुडसवका का परिणवा।।
यह डक , बभी वे वियुल पुरुरना की है, जो अगैसन नी को हपय करचे कही नई हे। अपनें बनेशन नदी की की पाना है।
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00 ள்ளச்்ண !-
ह पेनामरणे: स्लाइनिरशड् विवान्सुन्नाकलना।
ச் மா மி எான் எ!
मे. कुद में अपही का नितण किया नया है, उडी के कारण एवमें पालतम है। उपयुक्त उदावरणों से यह स्मष्ट है कि रसनमसंहर में अनेल बस्ुशवान्ख शी पयानता रकी पर नी रकरवा में पनी नहीं बाबी। वहों का कस्वम़ाण्यंग्य के मुणीमृतव्यम्यम का पत्िायन किया गया। ம் ாபர்ரண் ண்ிண
(ग) भुरगगोल्तचम :
शुरणमोपतव्यन्द की कपरें में नुणीपुत दोधा है-
(२) वणगर नम
सुरानकी इ्चमा निकससकपुरसर:। शही बैवसिशयिया न वनाषि अान:।। वर्श बी है गाम्याम- हन्बया बीर विवव की स्पिति तथा अं है नंग्यार्य नाकड बर नाविका की स्मिति यह कायोसि बफर है। बायोलि में मल्बूब का शुान्द लवी प्ुकार कनबान और प्सुसरपी प्रमान की शोमा को சர்ண்பன்ற-ளர்சணஎ कतज कै, स्वयं थरहलर नहीं, का:ः वस्तु कम है। एम क्रसार यशां अनस्तुस-
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(२) बगर रप मुणीशृणयन्य-
वानन्यवर्णन में रस वर्म के दिए सेे सी उपावरण निर है सिरमे बठंगर की ब्यंसा बडगर के की बोतीड हे। ऐे एकगों को उन्हांने तीन ना्नों में बांढर के- (१) - मै एक निरें व्ंग्य रम में को्ई बामाण्य कहगर पुवीस बोता के की इक शादि में उपना ना सनी बगरों में अशिकयोमि। (२) - बे एक चिलें कोई विशिष्ट बपार व्ग्य शौता है, को व्यानसृति में इरवोसंगर तभा (1) - ने एक चिलें परस्वर व्यंग्यवा रख्ी है, कैी दीमड में उपना व्यंग्य रक्षी हे बौर उपमार बयाए माछोफा में बीफ़। वस्ु: नाच्याइंगरों को सरस्ता व्यंण्बांड के बंस्मर्त का बीमाम्य मिल्मे पर मी, बाज्यार्य का प्रामान्य को बाने के कारण इन्नों मुणीकृत न्ंग्य दराज्य श्री शोटि में सा बाता है। शाट से बाशिय पुणीश् अंग्य सटू हे बाशिम बयंम्याम मुण्ीनूस बोता है, न्यंग्यार्च के भुणीमुत होने के शरण की इकी नगनर नी मुणीमृतव्मंन्य करच्य के अन्स्नत शात्री हे ।यया- बेणीइंहर का कुसार पकतर है- "युतराब्यनुन स्वस्थ हाँ,' बजे बुनकर मीमरेन कृद रोकर पसता है क स्परमा नरन्ति नव नीयवि वार्तरान्ट्रा:' नीयतैन की सस रकति हे स्मष्ट है कि नस कौरनों को स्वर्म नवीं देलनर पाक्ता। उचके साथ यह मी ब्यांक हो रसा है कि पाण्कमों के साम कौरमों ने पयाम्त अल्याचार किए हैं। यह बनी सम्वाय आात्त स्वर ने व्याक्ष की रे हें और व्शा सनी नंम्दाम पुणीक् हैं क: बाड्टु के वश्िया मुणीमृतव्यंग्य का एक है।
·- बाध्याउंगरकमों मं व्यम्यांद्ानुनमे वति । प्रायेणेद परां हार्या निदल्ले निरीक्को ।। नव. सभं।
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गापुमान्र के अर्ष विद्ेध की ज्रीति नहीं होती। बहिकि शब्म डॉिस के अभिवेव की सामपूुन से आाभ्िया काड्ट के सरयोन ने वर्वनिश्ेय की प्रीदि शोती हे बौर यह (व्यंम्य) वर्ष नायुनितेष की बशायता वाहे उब्म के ब्याचार है कवाखड़ बोकर नी अर्थवामयुतिम्म होने के कारण ब्यंच् रुप है। जिन्यु, नंम्केशिन्टम वुल्त होने पर मी वाण्याभियानी होने के कारण को पुणीनृस व्यंग्य के अन्दणी रा नया है। इसे अतिरिया नानन्यवर्णन ने एक एथ पर बाया है कि व्यंग्य अर्ष किननन स्विवियों में नुण्ीक्स बोसा है- व्यंग्यस्य काड्ानान्यं माच्यनात्रानुयायिन:। कलोशेक चानवरतत माच्याझसय: स्टुटाः ।
न ध्वनि्यी ना सस्म प्राणान्यं न प्रतीमे।। एका विश्ठेचण करने पर इस्में व्यंग्यार्ज का बार बपरों में भुणीकृत- व्यंग्कर काया नवा ६ै- १- वाच्यनात्र का बुवावी होने हे व्यंग्य का कड़ानान्य ₹- सयंग्यार्य की पतिना मात्र या मिल्ठनीति(फअलाम) *- बाध्यार्च का बुनानी होने है, वाच्य व्यंग्य का सपदानान्य ४- भंम्दारय का अस्कुट पामान्य एप प्रगार वानन्पवतर ने पुणनीक्ृर्थ्यम्यत्य का पृत्िमायन व्यन्याछोय में एक स्कह पर नहीं किया है यह स्यक-एम पर निसरा हुद है। परवती बाचारयं मम्मटादि ने उचे सुंबीद करने बाड कमों वाडा कवाया है।
१- स्व. परू -
संग्यनैवं पुणीसतच्यंग्वर्वाण्टी मिवा: स्ूताः ।
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बाच्य बर व्यंग्यों के प्रामान्य बौर बवाणान्य का निकेक तम दुच्मर र्म हे क्योंककि इसमें बक्ुत मृलम दृषष्टि और नम्नीर फ्कन की बनैसा हसवी है। हन्दया यह स्वष्ट करना कहिन को बाता है कि नदा कयनि हे सरदं पुणीकत- बंन्य बौर कहां चंगार - इस विके/ पित न्यष्यार्च की ना्त सो पुर दुशिद बलंगारों के विचय में भी ब्यानोड हो बाता है। यषा - लावण्कड्विण व्यमो न नणित: क्ररेसो मधान् स्वीक: ए्मस्फृपस्य डं मलस्व एक: निन्सानडी पीपि: ।
वशं० कशिमय समाशौनकों की व्यायस्तृति का करम को बाता है। बस्तुतः बरदा अप्स्ूसपृतंता है। यह नर्नीरदि का पम हे औौर एक ऐेसे व्यप्िति के पृत्ि कशा नवा है जो अवीय मुण्ी था जिन्तु उसे सम्मान देने वाछा कोई नहीं था। सम्मकत: नह कर मर्ननीसि ने समं के किए जिसा है, कयोंकि पलीवि ने भही बान के अन्द पम मी खिे हैं। यहां व्यानोकिस नहीं हे कयाँकि यह चिद्ी शुरान बुन्छ व्यक्ति की डन्ति नतीं है। नह डकित नियी विसकता पुरुच की दी नहीं है। कयौँकि बानान्यता: विरमता का मन स्त्री की बोर नहीं बाबा। कत: वहं कपृस्तूत प्रसतर की है। इवरमें ब्यंग्वारयं प्रान है, वाज्याथ कपमान। बोर बपस्पूसप्रसतर थलनगर। यदि यवां व्यानसृति दाती तो वाध्याम प्रमान शोता बौर व्यंग्यायं बपुवान।
मुणीनृदव्यंग्यवोरनंगरणां वायणिणां विचय: सुावी नवति। बन्चवा गू परिवाईंगरविचय रव व्यानोष: प्रकतति। ध्य० १८1-00 । 2- व्व. पृ०१६।
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निश्नय ही संग्यार्म के प्रामान्ाममान्द का निर्णम एक वदिक कार्य है। कयोंककि ६. यही बंस्मारप प्यनि तमा मुणीन्बंग्य का निर्णाय हतम है।
स्वननि इष्मिषण -
सबर व्यन्द-वर्ष की प्रमान और बनमान रूप से विविम सिवथियरँ का दर्गन किया नया है, नही ब्यंग्वाय ननी - कमी अन्म सतयों से नी निचि रक्ता है। यो निम्म परकार हे- १- म्यान रुप - मुगीक्चंन्य रप - वाण्याजंगर रम ·- मंकारंगर रम मे निनण्न भी दो पुकार से शोवा हे- १- संगर कप्
संतर में निभित वस्तुओों का मैर प्रवीस नहीं बोता, नन कि मृन्चषि में उसी ज्रीति शोती है। कग्दात्यर निनण का उनावरण के दुम पानी का निवण, का कि संदृष्टि उम निमण का उवावरण हे तिक्न्युड का निनन। नंकर सीन स्ुगर का बोता है- मलुडाशवासालनान रम, क्पेह रप सभा र.
एम प्रगर उबतु का बार तल्न - ध्यनििप, मुणीक्ृव्यंग्याय, बाच्या- अंगरूम तमा सदु्हाईंशलम का निवण संतरम तथा संपुत्धितम के होने पर यह अनैक फुमेवों नाका को बाता है।
विशाय - कौभ्ीव्ान का बंस्ई नहीं होता वहा निश्वाण्य होता है। विसञान इल बोर कर्ष के मैद के की फोडियों में निनव्त हो वासा है-
सरमृष्टिम्या पुरयु्षाकी बदुना।। म्० श8।
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१- इमासत २- माज्यचिम सम्षित, इुम्मर याब बादि हैं। बौर ब्यंग्यारमं से संस्पर्ष के रसि, प्रमान्य
काः र माद-बादि तवा ब्यंग्यमात्र की विकसा म बौने पर बो बहंगर
निष्नवतः वानन्यवर्ण ने नाज्य का एम सी रूप माना - व्वनि काब्य। व्यंग्य वर्ष की पृषाक्ता तमा कलानता ने बबार पर का्य के दो क्रार सिकत फिए -अ्वनि काहम बर मुणीकष्यग्दाथ्य। हम दो के अतिरिय कम्षय जि्ञान्य के इमहने बसुब: ब्राच्य नाना ही नहीं। उसे माच्यानुदृति अपवर शव्य का विदन्नात्र कद कर वकन कर दिया। 'मुणीनृबयंग्याथ' मी व्यंग्य वर्ष की भौणता की दृष्टि से किया नवा एक प्रगार है, बच्चवा पवनसाबी इल्तवादि की दृष्टि से सो वह पुणीकव्यम्य मी ब्यननि ही कलला - शारोडयं पुणीमतर्व्यग्दी पि व्यनिरपार। करी रवायिवारमर्य पया्ियकवा पु: ।। मुमणीकृनंग्यो नि काचनुशारों रमामा वितातमवालोनने पुनष्वनिरेय सम्यकती।
नी नुट में ध्यनि की बी बा है- सपयं व्यनिनिन्यकपो न्वितोमोनि कवामनि विमयोडविरणियो अत्णी-
₹- मलू. 18-५। - पवानुणनानाम्यां ब्यंम्परमैन मयरकिी। हमे कार्च, कोडनम् क् वक्मि्मिनिकी ।। व्य० २१ ४- ्व० प० ४०ः
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क्य प्रकार वस्सूत: वाच्य का एक की स्कप है- व्वनि।
तम ब्यापार बानन्यवप्ती ने तीन क्रसार के सब्म व्यापार नाने हैं-
.
यह शब्द का मुल्य व्यापार है। इसमें इब्मद अभिवा वृति के द्वारा वर्ष का ज्न कहाता है। अर्मिनां ब्यानार से शब्द के परसिद्ध या मुल्पारम का बौम होता है। बर नो शब्द एस मुल्य अब्य सभित के द्ारा बर्ष भर ज्ञान कराता ही उसे वाचक कदा बाता है। बान्पवर्मन ने नाजतम को श्मनिदेष् का नियत बाल्ना कदा है, कयोंकि कुमशिकाड़ से केनर बाचकाण का इन् के साय बभिनामान सम्बन्य शैसा है। २-Tपा अनन्दमकी मुणवृति और नक्ति को ए ही नानते हैं। 'गुणवृरचि' पर में ही एपसा स्थाम निकिस है। बंसूत में भुण के नर्व बर्व हैं जिन्तु यदां मुण कद नर वर्ष समुत्यं हे और 'वृष्ति' का वर्ष ब्यायार'। जनन्दवती कों ईै - पुणवृति इब्म का समुल्बव्यावार है, बर कह नान्तय पर बाभि रसा है।
२- बानकलर्मं हि इन्निवेयस्व निका वात्ना स्युत्पचिकड्ाबारम्य तदविनानायेन सस्य पसिकत्वाट् - न्यलू० ४म *- वाननदवणी ने पक्षि में कननि के बन्तमणि का जो विकल् पस्तृत किया है उकमें वे रपसंवार के अनव नुषमृति के िए भक्ति सष्य का प्रयोन करते हैं - भक्ति गुणवृत्ति
स्यंकम नै्यहलय कपने: स्वासपार्ग कम्।। उ्व. श१८ *- (१) ककुत्पतदा ब्वानारो नुणवृति: पुणिसा: -ध्य० पृ०४र (२) बाज माकवैणय मृणवृतिध्यवरिया। व्य० मृ० १११६ (३) कसुणमुविस् यमेन न्वसयित मानक्यमेवोकयी। च्य. पृ०४र
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बानन्पवर्णतन के अनुसार मुणमृत्ि के दो नैद हैं- १- कोरोपवार कपा तथा
(१) लेगोपवासया - कसी बानन्दवमी ने उपवार भी कहा है। पवश्ित शुब् का, कनम निही वर्ष के पाव पहुंला। बानन्यवर्मे ने क्ी बीन क़ार ,ना
(१) (२) बंग्यलाक (1) निशदानय (१) वाच्यप्वान्रिय - सभ्यमनाजय में उपवार या अमैद का कारण नर्ष बाचा •े और कहा वर्म अब्कत: प्रकि रस्ता है। इय्पाठोन में रदणा सनाहरण है- (१) बीरणता के कारण वाडक बत् है। (२) बाल्काइक्ता के कारण मुव बन्द है। (२) व्यंग्यपनिप- व्यंग्यलनय में उनवार या कोद का कारण बपने वाच इब्द के प्चित नहीं रकवा। ध्यन्चाओोड में इदणा उवरण है- पिक्स नुनक नहीं बोता ।
१- (१) दुणमु रिस्तु उनवारेण अणया योमयानयाि नवति-ध्य०मु० ४२३ (२) तुणवृति: - अमेदोकवा रपा -व्य. पृ०४३
३- (१) उनवारमान नाि: -ग्ववृ० १४१ (२) इपनरियन् -अयमृ० सई
ममा प प्रियों को नाहिव पुसकान् सत्चादो । स्व.
र- ई० हिमणी बीं.पर -1-४।
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(३) किढन- पिड अदोमवार रेसे स्वमों में होता है, जिसमें कारण न तो बाच्य रस्ता है और न व्यंच्य। ऐे एकों की वान्पवर्मन ने निकठा अणा का एक कहा हे बौर कपका उवाहरण नाना से क्ामण्य बादि तषों को। शवण्द का वास्तविक वर्ष है- ननशीनमन । निन्तु नम कानण्म उब्म बंगों में काड़ाईे हर बान के आर्द में रढ़ ही नया है। (२) साण उवर गुणपृति - हपणहम नुणवृत्ि वदां बोती है नहां बादृश्य सम्मन्द नहीं रख्ा। यह अहराणीय वर्ष के साथ सम्बम्य मात्र के आानम से पाठकप व्यंग्य की प्रतीति के बिना मभी सम्मद दोती है। को - मंदा: क्ोशन्तील्यादो विभये। आानम्यवर्वन के अनुवार मुणवृत्ति के नेद निष्नप्रणार हे हैं-
वाच्यपमधिा i व्यग्यनाTजा कारहप
सदृश्वाखिा(नौणी) बादुश्यरजिता (शुदा)
१- हडा वे विभवैडन्यम इब्दा: स्वविभयादयि। शबच्याचा: प्रुक्तासो न नयन्ति पर् चवने: ॥ स्व० ११११ २- मुक्ताकतेभ दवावासतसयमिवान्तरा प्रतिमाति यवनेस्् तल्ावण्यमिहोचयते ३- वाषि उस्णकम युणवृति: काचयुक्तगीयायिष्धन्ममात्रामेण वालकप- न्ंग्यवीतिं विनाषि सम्मवल्येय, ममा- मंगा: कोशन्तीतयादो विषये -
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व्यकरन - दिव क्रार बाज्यार्म' का मुगाला 'बभिषा-व्यापार' के रोता है बर 'सुत्वाय' का प्रगल 'मुणवृतति' के बजी करार'ब्यंग्यार्जं का फकास 'वकतर' बानार दे दोता है। क:ः नंग्य का प्गाला ही बंकत्ब है। यह शम्म बौर वर्ष का नई है। इब्द बर वर्ष का ड्रसिह को बाज्यवानकनाय नाम बम्क्म हे उपनी वपेक्ा कस्ता तुया ही न्ंसलम कम ब्यानार दुवरी शान्ी के इम्यम्म के बोमानिंक रप के फ्रमुस गोता है। वानकरण इब्द विवेष निक्ञा बात्ना है किम्यू व्यंदलम बोदाचिक होने के कारण बनयित है। बयोँकि मृषरण वदि के दस्योन से सचरी जीति दोती है, बन्यमा उसरी ज़ीदि नहीं होती। वानन्पवर्णन ने नैवाकरणों के एकोेंट विहान्स के बाचार पर बपने या ध्वनि-स्िान्त की स्पापता की है। बर, नैयापरणों के अंदत्म के साम्य के बाचार पर की बपने पिदान्त को कध्यनि संह्ा दी। कयँकि बैवानरणिक इ्लाण दगरों में को अमतचता बौर निल्य ए्कोट के ब्यांका होते हैं, उम्ें ध्यनि ब्ववार कहते हैं। हनते न का बुबरण करने नाठे काज्य सत्वापाशिों ने 'वाच्मवामश्वम्मिम समारममा काच्य' भी 'व्यंसत्म' के साम्य के आधार पर ही 'ध्वनि' ना। यहां कक तयून अपमैव है ि ध्यनि के जैवस लीन विरोनी हैं - अनापवायी, भालवादी एवं वनिवगनीयताबादी। व्सुनानादि ध्यनि के विरेनी नहीं यक तो व्यंदलल्य के विरोणी हैं। इथशिए वानन्यवर्णन ने सुचीय स्वात में व्यंगालय शी स्थापा के प्रण में, उसका वाचलम, मुणवृति बर बुनान हे निन्न विभकय काबा है। बयोति व्यंग्य वर्ष पतिमायन में अभिवाषि अवयन्तर एवं व्ुनानादि प्रवाणानवर कपपा बस्पवे होते हैं। क: व्यंग्यार्य का पणाव
३- पॉरिनिस्कितनिरमकमम्णां निवरिणता भमा निल्ये प्रृणडमं
१- मानन्यवमे ने सम्पूर्ण व्वन्यालन में्ममरम पर का की प्रयोन किया है। कहीं कु प मी 'बंजा-ब्ादार' नहीं कता है। परनवीं वाचार्य अमिनव शादि ने 'ब्यंपा' नान कहाबा।
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करने में व्यंसल्म ही बराम है।
चंकतम (कंसा ब्ापार) विरोनी कशियम बानार्य नानमम(वनिना ब्यापार) के दी ली नर्मों को निकालना पाकी में।
(१) बाच्य वे एविरि्यता तम बन्ध अर्ष की च्यप्वार्म रम ने कम कर, माज्य रप सै मानना शकिति है, क्योंकि उमा वर्म के फुवावन में नाचव का बिना ब्याचार दी है। उसे निए ब्ंदल्द रम कन्म व्यापार की कलचना वनशयत है। क्योंकि वानय पिट प्रीति के छिए प्रमुकत शोता.मै, उनी सम्पूर्ण है, र्वडिए बये मुल्चाई नान कर पानकम( वमिवा ब्यानार) का की विभय मानना बुित
(२) बौर, कस बन्च (च्यम्य) वर्ष को वाज्याम नान हेने पर, नध्य में होने बाडी बाज्यान्तर प्रीति ससी क्रकार सपायमाम है किस क्रकार पवाभक्ीति, वाव्याजगोति का उनाय मात्र दोती है। बवाति पा के सास्पवनिमबीपतस बन्द वर्ष के नौचन में फ्रकम अर्थ, उवाय नात्र होसा है। व्यंलम विरोधियों को उत्तर येते हुए नानन्यवर्णन कहते हैं- बं इब्द कमने वर्ष का अनिवान करवा हुआ अ्पंन्सर का बननमन कस्वा ह यहां इन्द का स्वानधिना किलम(वानकम) बर कमम्तिराननमलय( व्यंमतष) मैं औेर नहीं ह क्योंकि वानकरम बर व्ंदलतम विषया: एवं स्काप्त: भिम्म है। बान्य दर्ष बौर व्यंग्यार्मं का रम पर व्यनवर सुसष्ट ही है। माच्य वर्ष शब्द का शसात् सध्बन्ती है, निम्तु नन्व वर्ष बभिषेद की सामपुर्ष से आस्तिया
१- सपेव व्यंमयुतेन व्वनियतारे् निववितै्ट्र कश्चिड कुसास् - व्य० पृ० ११३ गैकककर के बनुवार व्ययम विरि्मा मोमांसणादिहै।
*- इलारो ही ब्यापारी मिन्नबिचयो पिन्ममो न प्रतीकते एरवं- व्यलपूमर
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A शेकर इम्तणी का सम्चन्ती है। बदि ब्यंग्याम को नी शन्द का साजाु सव्हन्मी माना वायना, तब उसमें वयान्तिसन का व्यनवार की नहीं दोगा। अतः हम दोनों का विचय गैव स्ष्ट है। हम रोनों में स्कप नैद नी है कयौंकि जो बलिानशमित हे नही अनपन शॉक्त नहीं। क्री क्मामम नीस शब्म से मी रवानदि कम वर्ष का अपनमन काँचा हे और वानफय,विटीन बैन्दा बाि कनक अभियों से भी अर्यविहेम का
शदि ने अर्ष पणाव के बेड् पेष्टा विशेष को ही विवाया है। एम प्रार इब्द के स्वायांभिमाकिय(नानकतब) बर अपान्तरायनमसुहन (न्ंकरम) में वलपत: बौर विचयता: मेद ल्ष्ट होने के कारण, बभिमेय की गामकई हे बाक्िम् अरपान्तर को वाच्य ककना कचित नहीं। भीनांसों के वाज्य बर व्यंग्य में पमार्भवानयार्य म्याय का सम्न करते हर बानदवणी कतो हं- बाज्य बर ब्यंग्द में पवार्थ वायवार्य म्याय मठित नहीं हो सस्ता। कोंकि वान्याजकीति के अमय पवार्ण बौर नाकया्ज में कवार्थ प्रीति कूपष रूप के नहीं शोती विन्तु वाच्य बर ब्यंग्य में रेता नहीं है। दो नीनांसक बाज्यार्म को कवार्म स्यानीय तथा व्यंग्यार्य को वाकवारथ स्वानीय मान कर व्यंस्यार्च को सात्पवक्ित का ही विभय समसे: हैं, यह ठीक नहीं, क्योंकि वाज्य तमा व्यंग्य में पवार्ष बाक्यार्ज न्याय वासत नहीं शादा। पवार्य-नानमार्म में मठसमुपाणानमारण न्याय तमा नाच्य व्यंग्य में पटम्ीष न्याय ही मानना दािर। बिस प्ुकार घटदृि की बेठा में उसके उपादान कारण की पूषर क्रीति नहीं शोती, उड्ी जार वाक्यायवृि की बेठा में उझ्े उपाभान कम कवानों की पुकर पीति नहीं हौती। बदि पवार्यों की पृषु प्रतीति होगी तो वाक्याजृद्ि ही नहों को बस्ी क्योंकि माक्वार्थ में तो अर्ष की एककसा
३- डु० ब्य० पृ० १२०७२९।
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नाशिव होती है। बपयमों के निगन्त रसने पर अतण् अस्वनी की ज्रीति दंस नहीं रोती। किन्यु बाच्य और व्यन्य में यह निवम डानु नहीं होठा। भरोंककि संग्य प्रीति के सम्य माज्य दुद्धि दूर नहीं शोती, माण्यार्म, न्यंस्यार्ज के साम बनिनामान कम के नाखित डौता इस्ता है। स्वािए उम दाँनों में मस्मूरीम चाय है, क्याके की पट की पगस्ित कर बीक स्वर्म नी नारित ठोता रका कै सहीं प्रकार ब्बं्याम की कणासित कर माण्याम स्वरई नी पाजा रक्ा है बमात् माच्य बौर व्यंग्व नपना मट और प्रीम में कणरय तवा परणडम पौनों शी सामन्दाय प्रतीति कोती है। बह दूसरा सयूप है कि पणरड की कता, पकाश्व की तता के निवतम्य से पूरव भाविनी होती है। एव परवनावितय की दृष्टि में रा कर की व्यनिकार बपने मूल्य के फ्रकम उमात में ब्ंग्याय के प्रमि वाण्यामं की नैस उवाकपता (कारणवा) सिद करने के जिस भारथन वाज्यार्ज्वाद की उपरिक करते हें। नीमांख यर डंता नर लप्ता है कि यदि माच्यवयग्य में पटमरीप्याय माना बाया तो एक क्राड में नामम के अमक्ष्म की प्रतीति होने पर , वाचय की बाक्क्ता ही निवहित को बाननी। क्योंकि वाकय में तौ अदैशतय की हेना यादिएि। तम नंसर का काचान कहती हुए व्वनिकार ककती हैं - वाकय के वर्षक्म की गौति को्ई गोच नहीं,क्यांकि बाच्य बौर व्यग्म मुणपमानमाव के रसी हैं। नहीं पर बग्य-बकृनान सवा माच्य वर्म अमुमान रूम के रक्ता है और नहीं बाध्यार्म के परमान शोने पर व्यंग्वाये बनमान हो बाता है। ब्यंस्यायं के प्रमान होने पर बर बाच्याम के नौण होने पर ब्यनने काय्य शेता के बौर व्यंष्यायँ के बलुमान बोर नाज्य के परवान होने पर मुणीम्तव्यंग्य भाच्य।
१- यमा पार्मवारेण ायपार्य समयृीयो ।
१- प्वनि विान्द: विरोनीएपाय: बनकी मान्यवाएं-पृ० ३०५-३०0 ।
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हसी नर सिह है नि कान्य का व्यग्य में बात्परव होने पर व्यम्य का वनिनेकलन नहीं, बाष्ु न्ंग्काम ही होता ह। नीनांस नो कपैम बाकय की सात्पवं विभवीकस बोने के कारण माज्त्य रम की मानते हैं, नह पुणीमतव्यंग्य के एवड में नाकित होने बाड रयम्वार्य भो माच्य क्री क्रोने ? क्यौंति नहं पर सो बाकय बाज्याजसक गासा है नंभ्यायसम नहीं। व्यंस्पाम दो मास्रि बोकर पुनः बाच्य का की बुनायर परने लनता है। अ: का मीनांसड की मुणीमुतव्ग्य के एवत में ब्यंग्बारय की सवा स्नीकार की करनी पकती हे, तम व्वननि माच्य में, नवां तकता प्ायान्य है, वहं उसने स्कम का वाहय न्यों करते हैं? व्यंसश्म का वानकशम से निम्म होने का कारण यह है कि वाचरम रमात् शब्द के बागित रक्ता है, किन्दु व्यंगलय शब्ब बर वर्ष योगों के शाभि रा है। वानकम इब्द का निका बार्मा है क्योंकि उत्पततिकाठ के कैवर बसा हम इन्द के दाम वभिनामान सम्बम्म रखा है। के - मनानि वाच सब्ड का नवादि वर्ष के साद ब्युल्यचिकाड ने ठेवर नाज तब ए बूट इम्यम्म रहा है। व नी' मौ 'इन्द का सम्मारण बोमर 'नवादि विष्ड' की निकतन से प्रीति होनी। इके निपरीत प्यंक्तम तब्य का बनिकता बात्ना है। शब् बौर कर्ष का प्रकद जी बाज्यवामक मान सम्कन्भ है सही अपेसा करवा हु
इवर्में उपाधि है- भरण नव्मुननव्यादि नेशिक्टूर । निसी विशिन्ट बौबन्य को दृष्टि में एव कर प्रयोग निया नया वाकय उस बोगव्य के नान्मिष्य के कारण बपने बर्ष से किम्म एव अपन्तर(व्यम्य) की करीति परावा है बौर बारि यत गोमन्म न रहे सो सवाथाम में पर्यवक्षित हो बाता है। क -
२-१० गगम्ृ. १२२
नवचिवं म- व्य० दृ०१२२। ४ - ध्व. पृ. ४३६.
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'मम्य न वां ननति रैच्य:' सत्यादि नामम में को व्यंग्याय निक्ा है उसमर
न से सो इकनें कोई सका नहीं। बाः मंगरम बौपा बिक होने के कारण बनिक है। क्योंकि पमण आादि के अंेन के उकरी जीति शाती हे बंचवा उकरी ज़ीति नहीं होती। वहां पर ग्ीनास संग कसता है नि - बदि व्यंदलतम का सष्म के बनिव हम्कन्म है, तो उसके स्कम की परीक्ार से नया साम ? हसणा अमान करते हुए वानन्यवर्जन करते हैं - व्यंल्व का बनिकततम कोर्र गाँच नहीं। बयोंकि व्यंदलल्द का इब्म रूप के साप बनिकत सम्यम्य है, न कि व्यंभ्यारय के बाथ। व्वंग्यार्म के डाम तरे उचमा नभी कूसार नियता सम्यम्म है, किस क्रार कि बनिया का मामक तन्य के साम। कम दृष्टि से व्यंदत्व में शिगरम न्याय बी सस शोता है। किस प्रकार सिनल्ब बनुमान के अलीन धोने के कारण अपने विचय व्मि बादि में अब्पनिवारि(नियत) रप के की ज्रीत शौक्ा हे, पुर भी सिं तो सभी माना भाल्ना का अण्मि का बनुमान करना होना किन्त्ु रव झिंकु पूर का बन्मि के दाम नियता सम्कन्म तो सेव बेदा बाल्ना ।लयी प्रगर तब्म में व्यसबथ का बारोष करना सी सम्माचीन है विम्तु व्यंगलम होने पर तो ब्यंष्वार्म की निक्त रूप से प्रतीति होनी ही। रवाािए सब् में बनिकत हे रहने के भारण व्ंजत्य को मायपरण से नितान्त निन्म सपकना पाहिर। बनि व्यंकल्म मी मानकल्द का रपू शाँता तो तदा मी वानकत्य की तरर इब्ब के दाम निय्त सम्यम्य शोका। और मौनाख इब्द के बाम वर्ष का नित्य (बौल्परशिक) इम्ब्य माको हैं बौर इसे साम-वाथ बैदिक वाकयों कौ कौषिक वाचयों से चि्न् मी मानी हैं। उनके अनुसार बैदिम बानर्यों में बनोस जैयता का कारण एक: प्राण शेत है। कौनि नान पुरुयनिर्मिंद होते हैं, श्वंिर पुरुचाभिपाव ही सपती वाक्यता में पाण है। इसमें पुरुष दाचों के भारण नियुषार्थक्ता
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इम में स्यंदसम रुम बपाधिक धर्म को सवीकार करने पर ही डांिक तथा वैदिक वामयों में परम्मर मैद का उपवाचन हो सस्ता है। औौर्मसिक सम्यन्म की दृष्टि के दोनों क्रगार के बाकरों में वाच्यार्य बौमक्ता अन स
बभिद्रिावानुवार दोता हे और यह कमसवाएवर्द व्यंग्कम ही शाचा है। वकर
वन्क्ि शे र्ा है। क्सापशासिय का बन्द के साथ तौ माच्य-्पामल रम सम्जन्म अहम्मम है। सौवनसीली उसमें कैक बाँषामिर सम्बन्म ही ர்ணரா:ளிஸன்ரளர்ா पृशश होते हैं वत: व्यंसलम रुप जपर चिलमम के युक्त होते हैं। यही बापा- चिक वर्म रसे बनीर जेयरवैनिक माकयों के व्यायसित करता है। बैविक वामय निवी मुरुष द्वारा निर्मित न होने के कारण उपमें नमलुवारपर्य-यम उवामि क परून ही नहीं रुख्या। उसमें सौ वाक्य का नाचवायं कैदान बीचा निक सम्बन्द रक्ता है। काः निच्वर्च यह है कि लौकिक नाचम में कप्ता का बभिकाय अ्सनिरतित रस्वा है औौर यर बभकाय सौव व्यंग्य कप की रक्ता है। स्यीडिए मोणांस को मी बैपिक नाचम से क्रौफिय वाचय में मेर सत्कन्न करने वाहे धर्ष वर्यंतलय को लीशर कला ही पाहिए। वैवाकरण बर व्यंस्ा - जनन्यवर्णन को ध्यनि व्िान्य क्ी द्रैरणा दैवानरणिकों हे प्राप्त हुई है। क्वछिए व्यंगनासनत के समर्यर के छिए उनसे बीनांकों की तरह विरोन करने का प्रश्न नहीं उठता। वैवायरणिन बो स्फोट की प्रीति के जिर ध्यनिकों ने व्यंपत्म को मानते हैं। नः कह निरियित है कि मानशम और व्पंदलम स्वापत: बोर विभयत:
7- ध्यनि सिहान्त: विरोमी सम्पदाय: उनकी मान्यताएं। पृ० २०-२९० ३- (१) तसादनयतत्मवियां भोन सानशंकम पतराण: तब्ो व्यापारो न विरोनी सयुवानतुण एव सपको - स्व. पृ० ४४३ (२) परिमिरियितनिसमम्त वक््णां विवरिकता भतमा भिल्यैय प्रृषेडयं -
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विभया: के है। मुणवृति से मी व्पंदसल्य का स्वायतः बर
हम दोनों का पाइस्परिक स्व्य मेद यह है कि गुणवृति शन्द का ममुत्य व्यापार हे कि्तु व्यंदलम शब्द का कुल्य ब्यावार है। कुल्य व्यापार स्वंिटि है क्याँकि बग्य के जो सीन प्रार - वस्तू, अईगर और रवादि है, बनका शिचिननान्र मी ब्तुल्म ब्यापार नहीं शोडा। सतुल्द रूप से व्यपवरकि वायकय की ही मुणवृति कतो हैं। िन्ु व्यंदमल्म में शब्द का बसुम्यत्म या स्ूनतिल्य नहीं शौता क्याँकि यदि पाहत्वा- शिश्न के विशिष्ट वर्ष के प्रणस कम फ्रीक्ष कोने पर यदि शब्ब की बसुलका शी रह नह तो उडने प्रवोन में दुच्छा बोनी। किम्सु रेवा काचा नहीं है। नपति व्यंसरम के पूर्तन में शब्द का कुल्य ब्यावार ही शोता है। ए अन्म ने यह भी है कि का मुणवृत्ि में वर्ष अपन्तिर की उपत्तिय भतर के तम उचराणीय वर्ष के रप में ही नब परिणत ही बाता है। यणा- मनार्वा बोच: सवादि में। परन्तु व्ंदलम ना्न में वर वर्ष अवान्तर को सौती भोकिति पश्वा हे तम प्रवीप की मांगि 'एमंप को फरणाशित मश्वा हुवा भी कक बन्द वर्द का कुणका दोता है। कवा र्ीछाकपनांजि नणवामार पा्क्ी' हत्वादि में। मुणवृत्ति बौर नंदरम में विचय मेद नी है। क्योंकि वस्तु बठहर और रवादि ये बीनो व्यंदल्म के विष्य हैं। गुणवृत्ति में तम चीनों का व्यनार नहीं रोता। मुणवृत्ति में नैक प्रतिद्ि और बनुरोन से नौण सन्दरं का प्रयोम हेता है। बर को भी भुणवृत्ति का विषय दोना वह मी व्यंकलप के सम्पन्य हे होना। क: मुणवृति से व्यंदलम अयन्त विमाण है। यह निश्मित हुद कि नानकण और मुणवृद्टि के बाभिव रक्ता हुव भी क्ंकलन रोनों हे विकसण हैं, व्यंगलमम कहीं पर वानसय के बाजय के व्यवस्कि शौतर हे, मी - न्व्त्तियान्मपरवाच्य ध्यनि में, बौर नहीं पर
संकलर्मं एकपी विभयाहम मिकी। व्य० प०४२२ : 5ृ० व्यनृ. ४२४-२०
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ரர் ணியன்சண் वाचकम वर मुणवृत्ति के बान्रयत्य के पृतियादकार्य की ध्यनि के अरवकृम्त को मैद उम्मस्त किए गर। उन पर बाभ्ति होने के कारण व्यंतम के उपका रेकय नहीं नया या समा। कतः निदी भी तर्प दारा स्ंमलत्द की माचशम और नश्षक मुगमृति
व्यंकरम और बनुनान- क तार्निक क्ंगलरय को बनुनान में की बन्स- बुत करते हुर नहते हैं- शन्ों का मनसलष दी व्यंदस्तम हे नस शिंगलम ही है, ए्वाखिट वयंग्य
इपे बतस्कत नंग्दव्ंक माद नहीं बर नी व्यंसलतयवादी पर्ता के बभिदाय की बपेसा से नंवात्य का प्रतिवादन कस्ता है वह पयतता का अभिकाय बुमेय
पुमिसी के उपयुक्त सर्ब का कचर देते सुए आननयवर्मन कहती हैं - वाचकतय वौर पुणवृ्टि से बतिरिय व्यंदतम कम तब्ब् ब्यापार है। वह व्यंकसम खिसि्न के बपा यु बर इ्पसे कोर्ड प्रवोकन नहीं। जिन्मु इतना अवशय है कि नर वर्पकतम प्रसित शाबय प्रकार है सववा निकसण कोरे हुए नी डब्द- व्यादार का ही निषय है। बदि पुनषिण्ी को बुनान का अन्व्यापारत्य मान्य हे सो पुनपिसी बर सिहान्तपसी में कोर्ड निवान की नहीं। बर फिर पूपिशो के एम तर्ष में कोई सपून नहीं चि - व्यंबलम सिंगलन ही बे और
पुववसो ना य है कि - वन्ता का बभिकाय बनुनैय रूप कोने के कारण हबब लिं एम ही होते हैं । एपर पर बानन्दवर्मे ककती हें - इन्दों का विचय की प्रकार अंम है :-
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१- सुमनेव निकसा रम है। निससर की कगार की है - (१) शब्द के स्वरप केक परणाशन की अम्मा (२) इब् के वर्ष के पगाज्ा की कन्का किही के मुव जे अन्म निर्लता हे सो मुलने गाबा कह बयुमान कका है कि बवश्य की एम व्यक्ति के मन में कई बास फ्रण्ट परने की इचा है। सनी पक्ा हन इब्दों का प्रवीन पर रबर हे और तन अषों दारा यह वर्प पुण्ट करना पाड रस है। वकतर की इम्मर का ज्ञन पनता के मुस के अम्मर्वि शब्ण्म के ही बाभार पर होता है। ब: शब्द के पम्तार की इब्ममवनिन्दर तथा व्जगाहेन्यर का बनुमान होता हे। बत: चब्मों के यह कानों की निभय बयुनैन हें। २- बर , पोन्ता की व्तिपानन की इ्पयर के विचयीपृत वर् 'प्रतिपाण' है। वह भी दो भूगर का है-(९) वाज्य (२) ब्ंग्द प्रोक्ता की ल्वन द्वारा वर् का परवियामन करना पाक्ता ह बौर शररी स्वशष् के अनभिनेव रप के किली प्रवोकत की बपैसा करता है। यह नाज्य बौर व्यंग्य हम अन्दरों का 'प्रतिवाम' जिंनी रप से स्मय: फ्णाश्षित नहीं बोता, अपितु बृत्रिर बपता कृकषिर इम्मम्मन्तर के सकाकित दोता है। तब्दों के बैवठ इम वर्म का निपसा दिचयाण'सिंनी रुप हे प्रीत बोता है, 'स्वहण' नहीं। यियिननसी के बसुवार वर्ष के स्वाप की भी बनुगैम की मान डिया नाय बौर शबों का ब्यापार हिंग सिंनी मान के की दो कनी भी अर्ष के विभय मैं इम्यकरम तमा नियुवार्स का निवाय ही न ही, कयांकि पुन के दारा बयुनेय दग्मि का दम कमी नी पिकता ज्ान नहीं शोता। बदि कोई कहे कि बाच्य अर्ष का तो सम्म से बीमा सबब्य दोता है निन्तु बंन्य का नहीं, क्योंकि व्यम्य वर्ष नी दो बाच्यार्म से शी आभिम्या वौचा कै, स्वकरि नाज्य के समान वह भी उब्म का ही सम्बन्ती है। बन्तर फैवस ल्वना है कि मामवा्य उन्द का साजात् इम्बन्मी है बर व्यंम्यान कवासास् कवाद परम्परवा इम्बन्दी है। वदां बाज्ातू बौर अवापाहस् माव-इ्धन्य का यहां गोई पोल नहीं। वर व्यंशल्य का बाच्यवामक नानानवतम दोता ही है। न: यर सिह है कि यनता के अभिकराय रुम व्यण्य में सिंग रूप से शब्दों का
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व्यापार होता है। बर उसे द्वारा विथयीमृत वर्ष में प्रविणाम रुप के ।याह: दो बसुमान इब्ब सुकनी के शोता है, उसकी व्यंसलम से भिन्न नानना होगा। पुविकी के या फ्रशन करने पर कि - वभिद्राय रम(नियसित) बौर वानि- पव(बनिवशिद) रूम उम प्रीयनान में नाचकम के की ब्यापार बाना अयवा इम्बन्चान्तर हे? विन्तपफी पक्षा है- नानललम दे तो नहीं होना कैा कि पकी त्च्ट बर पुझे हैं। इपन्मान्तर कै व्यंदलम' ही है। बर व्यंदतम, सिंनत्च रप नहीं है।क - प्रीम घट का वुनामत नहीं बन ससवर नयोंकि घट का वो फूल्यरा हो दी रस हे बौर प्रदीम द्वारा प्रणासित घट का ज्ञान बवानाणिक है - रेख कोई नी प्रेसरवान् नवीं मान सप्ता कर्योंकि वह तो ब्सुय सिद आान हे। इस हिए इनों का प्रतिमाम विवय बाच्य की मांाति की सिंी रूप से सम्गम्य नहीं ससता। जो छिंी रप से तनका सम््यन्मी हे, यह माच्य रप के पृतीस्ष नहीं शंतर, बमि तु उवानि कम दोदा है। बौर प्रतियाम विभय व्यग्य रप के श्ीस शंवा हे। और काव्य के विषय में न्यम्य की प्रीति का सत्याअत्य निश्यण कयमोला हे। ल्वडिर नरशं पाणान्तर के व्यापार की परीक्षा उपवाकाएप शी हेनी। लवडिए सिंनी की फीदि की सपत व्यंग्य की ज्रीति हे, यह नहीं ना रमी। काः न्यंकरम को सुनान में अन्सकत नहीं किया ना कन्वा। बरि सर्मडासनी व्यंकरम को बपने बयुमान में अन्चप करना तो कसो अपने सुनान में की परिविर्तन करने होि * १- एव तो यह कि उसे अन्मशन्रि स्वीकार करना बोना। बौर १- दुबरा वह कि उसे पनाणत्य से हृ्म मानना होगा। हमा प्वार न्यंदरम को बनुमान रम मानते ही बनुमान का अपना स्वलय ही उसिन्न से बला। फच: स्ंदरम को बसुमान में बन्तूदत नहीं किया या दरवा। स्पानिर वानन्दवर्पन ने कदा है - गुणवृत्ि, वाचमय वाषि ठज्म पवारों है स्यंबललन नियनस: शी विकरण है। कह एक बतिरिकत शब्द व्यापार है।
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रस प्रकार वननदवर्णन ने व्यसम का स्वसय स्पष्ट करने, विद्ञानों के मध्न दो ध्यनि तत्य निमति का विचय बना या उसे प्रतिन्ित कर पिया । कपर ध्यनि नाज्य बर उसके मेद फ्रमेदरं का विवेयन भरते हुए अब्द व्यापारों எண் எரண்்ஸாரல்ர,்எ 、
ध्नि व्यवस्का में इसे शक्त स्थान एवं मुल्द का बानन्ववर्णन की दृषष्टि
फिम्म रद से किया है। बानम्यवर्णन ने भुणों की रसप माना है। मुण् के विभय मैं वानम्पवर्वन भरसते हैं- ச்ாந்ளிர் சி: : 184) जो रर रवादि कम प्रमान व्यंण्यार्य की अनलण्यन करते हैं ने नुण कधशारी हैं। शर इक्का उदावरण केी हैं- 'सौयानिसट्' अयत के औयादि मुण वास्ना के नर्म हैं, सरीर के नहीं, बिन्तु फिर मी शरीर के बुषट् रह कर फैच वाल्मा शोर्य नहीं बिसा पासी, बर करीर में रहु कर की शौयोि प्रपमी भरने में समर्म होती है। उबी क्गार मुण, 'बाब्यात्ना रव के धर्म होते हुए नी सष्मार्य- रपी काव्यशरीर के बाभ्ि नी रके हैं।
१- किनविदिययों य शाहीमनीनिजा कमविदितकत्थ: । व्यनिवात्त: प्ुकार: गन्यल्म व्योक: बोडयू ।1 म्पणशस पृकए-वद ₹- माच्यरवात्मा क स्वाम:।(्पं०११४) यश व सवार्म सव्यग्य के छिए बाया है।
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स्पाप : पिस की आपद का नाम नापुत"है। मापुरव पुण भृंगलय पाच्य का बाचम केवर प्रतिन्कित ोंबर है। टुंगर-ए अन्म सवों की बपैसर कमजय बाल्ाकक होने के भरण नमुर शौता है। नयोंककि मापुव भुण में लिस बमिक
नंगर और कसण रह में पाबा भाता है। सपा स्यावरण वानम्यवर्नन ने भुण निवेकन के मरवत में नहीं किया है। विन्मु सब्यग्य के फ्रवन से सपसर उवायरण दिया जा कता है। यवा इबं वानन्यपर्मन का 'सवम्यशान्ति पर इक्मा उागुरण दो स्ता ४ इत्मादि
ह इलाि
का तम स्वाचरण हे। बोचु
स्वरप - काब्य में रकने बाहे रड़ आदि रव रीम्य के कारण ककिस होते हैं। काः तम बौर वर्ष ने बाभिव रकने बाछे नौष्ि के व्यंदर बोंच भुण भोते है। भाथ की कि इनयोचरा बर न्पोक्ा में यह नीचि नामव सतम किवाई बेा है उसे नी 'बौमो' पुण से मुल्त यद दिया बाता है। बौर अथैवोप्तर में पल्यैक शब्द का वर्ष दुस्यष्ट दोता है बौर उसमें डम्ये सपास नहीं
१- क्माशरसननाजना नन्यल्म य नानुकरा ममुण: । व्यशश की वृद्ि
- गार स मुरः पर: इ्रल्वाकनी रह:। इम्द गा्ािय नार्मम प्तितिकति।।
सकी यह्नकि कनारिनय स मार की ४- लवण्य कान्तिपरिपूरित दि :- मुखेडस्मिन्टमेरेडधुना तब मुखेतरलायाकषि। क्षीन यदेति न मनागपि तेन भन्ये सुव्यक्तमेव जलराशिशय पयोि:। ६- रवा रीच्या उपची काब्यवर्सिन:। योगी व्यपस्यि् ।1 म्य. २16
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समुवोच्ता में अपवोकना के मिवरीस ब्रास कडोसवा बर बीका हिर
इणयोचा का कदानरण - यया कुड नीम की यह डानि
यहं इन्योचा बीपलासा एवं कपीस्वनि से निसे सिस में शीप्च्त का बनुनम बोने लनता है। बत: बह बौचु भुण है। वपयोका का उदाबरण-
री - पिा ड्रोण के हिस्लोन के अवाचार को बुलर कुड वश्कचाना की य वत - वी यः सरबं निनर्ति सवपुसुष्मय: पाच्यवीनां सुा यो नः मांषालयांत्रे सिहुरभितिममा नर्मतपूर्वा मतो ना।
योमान्यस्वस्य सस्य स्पयमिद कतामसफस्या समोड लु।। यशां बर्पवीय सर्पमा स्कूट कप हे की रा है। भयोकि अयील्ता तच्ट निर्षट बौर बस्पवाबा है न: कवं बोक गुण है।
पवाद
स्परप - हब् बोर वर्ष की स्वपकतर की 'प्रसाद मुष्' है। यह सनी रखाँ बर सभी रसनाखगों में श्वान कद हे रख्ता है। एवं मुल्य कम से व्यग्य की बपेसाड से की प्रकार की
न्यवरियि कोटा १- स्कडाहपरस्नानाड नवेसितडी कनाइरक: प्क् मनाचका निवेय:।व्मवमृ० २१९
H() क
सपसमन सानारमरम ्यव्यायपिकामेव मुल्काया व्यवरिकिता मन्तव्य: । (२) व्य० पू० मर। व्व० पृ० २॥२
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हवरा उावरण - इत्मादि दो यः शल्य निवर्ति है जिसनें अर्यवोय में धर्पपा स्कुका एवं सपण्छता है।
मान-दवमर के मुष् निपेशन से यब ल्मष्ड ही बासर है कि बनपमणी मुण की प्रवान रप से रस्पर्म स्वीकार करते हैं और गाण रप से अमप तब्दा के धर्म मनते हैं। रस कैवल मुण्ों की व्यवस्था कहते हैं नयोंकि माकुवािय भुणों की व्यवस्मा पिना रव के सम्मन नहीं है। य: मुण रक्ल भी हे और अबा : वर्म नी । अंजैप में आनन्यवर्मन के बनुवार भुण् का परिषिय एव जरार है- १- मुण रपर्म के दाथ नौण कम से या परम्परवा अबदार्य नर्न भी हैं। ₹- मुण बीन है- माचुय, बोबर बीर प्राद। *- पसाद पुण्र व्याप है, मापुव सथा बौकर स्करेशीय, क्योंकि उनमें ये मापुर्ष बैव युंगर तथा ब्ररण में रक्वा है बर बौचु रौड़ बवि ब्ीमच ररवों में ही।
बानम्यूपर्णी के स्य तक भार प्रमुष यानार्य - इण्डी, मामद, हमुट तमा नामन को पुके मे। इम आचायों ने थहंकार सम्बन्ी विस्यूस विवेकन निया था। बान-पवमी ब्यन्याक्रांक के फम् रवांत के प्रारम्म में ही का दिया कि काम् के बाच्यमान का पुर्व्व्तीं बाचायों ने बकुना व्वास्पान किया है ना: उसका पिष्ु- पेचण नहीं करेंने , बैव सपयोमानुवार उकशा बसुपदन मात्र करंने। काः बाननदवर्णन ने निष्मशिकित बठंगरों का की बस्लेस किया है- १- बां्डियोकि २- नलुडाच
१- वप्दर-्चाड 4- वारोप
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6- उत्पेता द- उपना १- सित्र १• सुल्योगिता ११- बीक १ निला ११- प्ेशटु १५- बगर १ट- कोलि" ११- विरोष २०- विडेयोकि २१- व्यविरेष २२- व्याकस्तृति र- मृंष्टि २१- कर २ लाडोलि
कमा प्रगार वानन्दपमनी ने प्रायः इम्यीं बलंकरों का डल्लेक किया है, जिलमें चयंग्यांस का स्वर्ष रस्वा हे।
ध्वनि काव्य में बार -्पोक्ता :- यह पके की कहा या तुला है कि ध्यनि- भाच्य के अनसमत ने की अंकार आते हैं जिसमें बाच्यार्म की केता व्यंग्वार्य में गासत्व की नात्रा बचिष ही। पूसर इष्मों में जौ स्वयं व्यंक अपना व्यंग्यान है। सकृष्ट हे विवार करने पर फूीस शोता है कि युछ अलंफर रैसे नी हैं जी विपरी नी सिह हाते हैं। उवातरणम - हुम्मर नस, डुकर विश्वन्म तभा मंगश्तेम। नंगर बर तममें मी विदकम्ण झुंगार यषि प्रमान रस की और उझमें बदि बतुप्ास- बोक्ता की बार तो उसके बहुत है मेद, अुंगार के अनैक मेवों के विरुद्ध सिद्व बोि, क्योंनि कपास का सराण है - 'र सन वणों का निकनम', वह बन्य किसी नी प्रसार के वर्णों का हो क्त्ा है। बदि फठौर वणों का बन्म होगा तौ गगर की अभिव्यकित मिकने के स्थान पर पतिरोय पैदा होना। बनि अंवार नंी न होवर न ही तम उनें फोर भी कुदास अपनावा या सता है। बनत के
लेमैर प्रॉेेट नानुडाव: फाख: ।। ध्य० २११४ और रसी वृदि।
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என்ச்ரன் எண்ண்எ்ரளானர்் रहने पर सनिम मी चहूम नहीं दौँची। विक्रमम्ण झंगार में और नी बजोत उुस्तर भाधि, इसमें तो यल बादि का विनिकत कनि नहीं होना पाहिएि। व्यन्तथ में बर विहेष रप से अयव्यग्य क्यनि के बसनी नरी बईशर मान्य हे निल्ली बौक्ला कहे सनम युषि की रसुमिका के बटना न पह़, जसी पिर बसिरिया फ्रकतन न करना पड़े। उनावरणार्य- कमोडे पवाडी कलइनिरािर मृचिता
युछ्ध: वन्हो इम्मस्तर्वति पाम्: समटीं प्रियो मन्युवतिस्तम निसुराि। नतुक्मु॥। इस पन क्री बोक्ा में कवि को चपनी रखुनिका से लैनात्र भी बठना எரீஜனர், எ:ரண்ண், कक आादि में रेया नहीं शोदा। सपर्च कनि को रसमुभिका के पुकट् कौना शी पढ़ता है,। बन्च बगरों की स्मिति बैदी नहीं बाती। बन्य बगर बारमवीगरी एर्वं दुधटे तम प्रवीत होते हैं ना सामाजिक उम पर ध्यान केता है। गंदि के जिए ने उसने ही बरख और स्वामाधिक होते हैं। क प्रतिनासम्यम्म गदि का निस स्लासिस बौसर हे सम ये बउफार स्कतः या बाते हैं। बे - गइम्वरी में यह एव दप चण्डानीड़ कानम्करी को दैल्ता है। और की -
विन्दक होती हैं, तम यह पमस्चार दैडती ही बन्ता है। यह उचिति मी है। नयौँकि रसमाध्यनिद्वेन्य हे की व्यपत होते हैें औौर डपक बादि बकार वाच्य के
相 三 風 江 国 す す 一
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के ही नम है। वक बदि बगर सच्ममत होते हैं, रस के छिए शब्म वाकुब आग ह बौर वर्ष अंतरंग। डपक आदि बपातंगर हैं बस: ने वर्म के साम, रस के अंरंग वर्ष बन सरती हैं तथा रस में अर्म के सी स्मान अनिवार्य रम से सी अपरिकित को नलों हैं। रनका रव में स्परिकि न दोना की बल्मामाकिक है। यप याबदि की स्यिति इब्द के सी स्नान नाकुन के क्योंति ने सम्मम हैं। बश कहीं मे र में पिशाई भी देते हैं नडा सनुषम सपकी इनकी अनुमति है ही बमिक नगल्सार प्रवीस रोता है, अः ने ही प्रमान ही जाते हें और रस को कमा देते हैं। यै सो बैचक रनाथ के अं नम सकते हैं, कयौति ये यनि के बविडियता करन हे निष्मन्म होसे है, सबी कन हे नहीं निल्े र निच्मम्म होता है। डप बादि वउफरवर्न की बलंशरवा तनी अवदि हे नम व्यनिताव्य में कर्हा सुगार न्यंग्य की रवा की हवरी योक्ा किेक के दाम लीफा करने की नई हो। वह सनीफार निष्मशिक्ित है।- १- इप बदि अगर कैम रवादि के दाथ बंगकम से की अपनिवन्यित किर नाएं। वपा- 'महपाना दृ्टिं' इत्यादि में सवमानखि चंगर है बौर नह पस्चुस अनितामसुंगर में ज बन रहा है। २- वे बरगर स्वयं प्रवान न बन बाएं। वमा - 'सतानिवात- हत्यादि पर में नवादौल बशर की प्रनान कन क्या है, विनकम्म रय बममान। अनादि बर्वा रवादि के साल्पर्व होने पर नी, क्वायोंक बगर की ही प्रामान्येग निवसार है। *- अंप के डपसियित कसते साम नी, उडण बनबर पर ही म्रहण हो। बपा-
दृवीयपरण में उपरियिता निया, जो नानी रय्यानिमतम्म के छिएु मार्णशोयर नन गवा बर पाकार्माक के अनान मानी घटना का सुप नी। ४- बीर उसका कनपर पर स्यान भी हो। यना- श्तेम व्यतिरेक के लिए उदाकृत एकसर्य कम ने पुरे पर में वियमान स्तैच की सतुष परण में व्यततरैक के छिए शोड़ किया है।
१- न• पृ० २२२ वोर बानन्दम की पृ० ४०६-८० - व्य. शब६ मृ० १२२ 1-५ व्य. पु. रस-२१
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१- अन्वरोमि ड्राकून थगर का नहीं तक निर्वारह किया नाय, कहां तम बवारी वानशयन्त्रा दो। आनशयस्ता न होने पर उकका स्थान कर दिया बाए। बया- 'शंवास् कोन', पन में कवि ने परय्म परण में यिस् कपत जो 'बाघुसकिणा' ए न्रगर क्मरियि किया है, उदे श्रेच बीन परणों में भी सतने का प्रकन चिवर से रेश नहीं। 4- निवारे हो बाने पर बामपूते औ रप में की इवना पाहिए। यना-'स्वाना- एपमे पस्िवरिणीपेशणे' सत्यादि में यवि ने उपनासंगर की बारम्म के सृतीय नरण का निवास बर बन्त में व्यतिदुक का भी पुट दे दिया, किन्तु भ्वने पर भी पवान्त किमम्ण झृंगार की दी है। नौ गमि बहंसारों का उपबुष रीवि से नियनमर करते हैं, उसके दारा निश्मय के स्वानिषयमत दोती है। बदि इपमा बतिमिमण सोवा के की रहनंन से बाता है। फिर नी बकुध है यदि है जो प्रकनम गौप्ता में र निगन्ध कै पृप वीमर कैवड बठनर बोचता में निस्व रिवाई देने हैं। ऐे कषषियों का बानन्दपर्जन नानोलीस नहीं करते। फैव इना ककते हैं- क महरमाबों में दाच इसठी काना की दच रिकाना है ।कत: एस बिद्ा में वचि विस्ार
हम गोचों से नमने के छिए अपय आादि अंशाररों की रच्यंगा का को रिान्त कनी कबर का नया है उसे बानार पर नो अपने व्यनिताब्य का निमाणि दरवा है, बसे महानू बाल्म छान शोता है। एर फ्रार कंगरों की रवामृहप बौक्षा' सम्मन्मी वानम्यवर्वन के विवारों के संगेर में कमर किर नर विश्लेचण के रम में बैवा का सन्ता है।
२- स्प० पृ० २२३
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ஊனரர்ளனர!ணைவீன்எ ர- அர, எ்ள்ண்ண்ஸண் ச '்ச்' : எஜின் ஸார்ரச சா 'எ்சி, எ்னீீர் ஊணைஎண்ண்ளர்ர்ள் पुर्णों पर बाभ्रित रक्ती हुई, रहाँ की व्यं है। यह अपने निव्त्रण बोर नियमन के जिए मुर्णों की बपेता रकनी हैं। यदि 'मापुय मुण दोना तौ अंपलना यदु बर' लावराजित' या 'बल्पाना' होनी। इपके विवरीत यदि बोबस
எாண்ரா் ூர்ர் எள
१- रुण बोर अंनर का हैकमर्यमेद), औौर मैद नानन पर को पपा अंगर हैं-
٢
1-(1) சாள சாண்சண்ரண :
(२) मुणानाकिय वि्ती यायुवनिोमणत्ति या खान्। व्य० मब ₹ै- का प निदलनं पुण्रनां संवटनावाशपैयय व्यविरैकी ना । व्यतिरैकैडनि कवी पति: । मुण्ानवा संपटना, संकटनानवा का पुण् इति।
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संफटना की भातति पुर्णा नीवनिययता का आंग-
ரணர்ளிணரஎண்எஸணீர் எணஎ்சின்ீர்ணன எ.ஸஹானணன்னரீர்! ந்ஸ்யண்ரஎணா்ர்
देशी बाती है। झंसर में चीचलासा, म -
(?) iratrt asafrafurroai? एरण्वनिम च्णनको कनमिई कं न सामपति।।
वि कोई यह कहे कि संघटनाभित भुण नहीं है तो भुण किसे बाखित है? रब पर कहते हैं - मुर्णों का रवानवत्म बौर उन्नानकतय सौ गुण विवेशन के எள்னஎஎன!
शन्दामि हैे सन ने अंवटना स्वप या संपटनामित मी ही बालें। क्योंकि पुण जो रवाभ्कि शोती हैं, ने (मुण) अंपरित समों के बाभिव नहीं की सरते। बयोंसि मुण के जो बाचर हैं ने रव कपूम विनानुनाय द्वारा संवकिस हो कर ही अर्षवितैण्
एम पर सिान्तमसी कत्ा है कि - रेख नहीं हे कयोकि स्वानदि का
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... बंबित वर्ण बौर पर के न्यम्यल्य प्रतिनाचिय की कुल है। बना र बादि को वान्वभमंग्य मान हैने पर कोर्ड नियस अंकटनर मुणों का बाचय नहीं शाची। कतः बनिकता ईंफटना बाहे इन्म की न्यंग्यनितेय के सनुलत बोंकर मुण के बान्ा हैं।
बनिक सटना बारे सष्मों के बावम पर आपाग -
हैं किन्यु बोचर का बनियत संफटना वाले इष्दों का बभकम केी सम्मम दोमा ? कयौंकि अलनादा संकटनर ननी नी बोब्ू का बजम नहीं बन लभ्ी। रस पर सिहान्सपसो मकता है कि बांासादा अंटनर नी बोंक का बाम नन्ती है। उकसा स्यावरण बौजी भुण् के अर्पभोच्ता के प्रतंने में- 'दो म: इरलं निनार्सि' सत्यादि दिया ना कुज है। उसमें सबुवयपमे फोर्ष अायतम எனீணஈணிர்ர்ரரண
बरनू संपटनर पुणमित बोती हुई खवों की ब्यंक है। वह बमने भिवन्तण बर क्यिन के छिए मुणों की बपेसर रकती है। सी बाचार पर अंकटना तीन करकार .- wt. t-TNT
संघटना के भिवान : ாரி், संबटना के नियामत वच्ता, नाच्य बौर विषय होते है, बैदा कक्ता चोया, बैा गध्वार्यं होमा कपा पेा विवय होना, मैदी ही अंकटना भी होगी।
१- हन्निका लुरोसियं नजूनच्ययो:।
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वह दोनों चकतर सरब और निर्स दोनों की करती हैं। इनमें नीर कँि या उसये दराज्यनिकद मात्र की नाचर में पियी भी फ्रगर की अंवटना को कल्ची हे । उजनें स्यांन्रत है। किन्यू नहां कक बरस अंनटमर का अच्यम्य है, यह सकोद पर नियर है। रस नायशासिक तमा प्रतिनायानिक बाते हैं। नायक और पीडन नामस कयायर स्वमाद के बीहोदास बटनि (नीखरिस बर नीरक्रान्त) के कदा है। कपनवर उनकी माचर बर मानमसरचना मी मिन्म-िन्म क्रगर की को आती है।
शच्य में प्रयुकत माच्यार्थ अक परसार का बाचा है - कहीं वह रह का ब रोदा है, कहीं रसानान के बुक्त, कहीं बभिैम वाँचर के, कहीं बलनिनेय, नयीं यह तल ऋ्ृति के मातों के दारा प्रतियाकित पोता हे, नहीं एवे निन्म नध्यन और नमम प्रवृति के नानों दवारा। कर शदि दा पविनियर नाज, जस नान रसिय होसे हैं, तम संरचना में स्यंत-्प्ा रक्ती है। किन्तु कर कवि या कविनियतनान एव नानादि है मुक्त होंने बौर व्यन्पार पस र्यग्य प्रशान शौमा तम संकटना निशयित की बलाडा बौर मव्यनलादा होनी। परुण बौर निकाम्य संगार में बलासा संफटना दोनी। कवैोंकि बोर्डूलाडा संकटना प्र्वान-र-जीति में व्यपमान उ्वरयि पस्ती है। विशेष रूप के नाठ्य में। बरुण बौर निनलम्म गुंगार कबन्त कुलार शोते हैं, नत: उन्हें दीर्ष बात के बोने बाडी वर्ष की बल्पच्ता बौर उसरे होने वाळी विकम्न के रकनुौधि वनिकि नी सदूम नहीं। बादि रौड़ रव ही बर नाका नीरौका तो मध्यमतनाबा मंफटना प्युक बोती है। बोर नहीं-हीं दीफलादा नी। किन्तु बोबलाडा अंगटनर नैवड वडां प्रतुकत दोँती है कां स्पोलित नमच्य नस्तु बीर्फूलाडा बंकना के पिना व्यत नहीं होती को बौर नहां उकती रकनीति में व्यपमान न ठोदा को। ली सटनाबों में एवं बी ररवां में समान रूम सै पवान मुण अपश्य व्याया रला गि। प्वाद का बर्ष हे - इन्म बौर वर्ष की स्पप्का। कम क्ान पुण के अनाथ
१- व्य० सर्ब की दृषि - डु०म्य. पृ० २२०-३२९ * सवांडू प कंसलनाष प्रवानाल्परे पुणी ब्यापी। य हि कवरक्ताबारण: सवसपतना- शनारणरसमुकय् - व्व. पृ० म२। १- ्य० २११० की वृष्ि पु० २१२।
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१०२ मैं, अल्लादा सटना नी कहण बौर विय्कम्म नूंवार की व्यनत करने में समर्य नहीं गोची। इकके निपरीत प्रवाद मुण के रले पर नव्यमताडा संफडना मी करण और विनम्म नंगर की चयक करने में सर्य होती है। काः फ्राद तुण का सनी अंटनाबों मैं रना बानश्यत है। रोड़ रस में नी कहां अलपाचा अंकटना रोवी हे बना कोर ஸரஎணம்னனர்ாஎனஎண है। यः वभम् रू की बनिव्यकित हो नाने पर बनासल्य नहीं दौता । भुण के
रच्पंक संघटना नुणाभिव ही है। ٠٠ विभयास्वित बोफिय मी संटंना का निय पुखा है। वह काच्य
इम्सल्णा, हर्मन्द, वभिनेवार्न, बाल्यानिशा, कया बादि के बाभार पर भी अंवठना कर कयम किया बासा है। एकर्में से परकन्ण की मांधि मुकषों में मी कनि डोन सुखय सलना
बपेशित रस्वी है, नः उनमें मध्यवादा बौर कौर्फलाडा वोनों की रबनाएं हो स्ती हैं। यह ने अंनितम आाकर प्रकण्ण में बाते हैं बरश ये स्वमं अ्माम रसे हैं, नतः एनमें इंफटना की बौक्ार पृक्म स्मिति के अनुरूप की होनी नाहिर। पयविबम्न्य मैं भी बपाडा बर मध्यनकादा इंवटना बोनी पाहिए , कमी कनी वर्ष के बौचित्या-
शो शोड दैना पाखिर। पर्किमा में स्नैणयदर को्ई नी संपटना की अस्ती है, क्योंककि उसमें इशिमुष मात्र रख्वा के, रनिविममन का हकमें कोई विश्ेय मसल्य नहीं होता है। प्रद्ृस में निवद सब्धरमा और समतरमा में सुलह बादि के नियन्म् में वाचिकम के कारण इकमें रीपल्ासा उंसनर होने पर कोर्ड विरोच नहीं। इनमें सही के अनुदार डभित नृरि या युगरण करता पाहिए। हिन्न् में बदि एव में सात्परवं हो, नम अंकटना
र- माच प्रोरों कर कर्ण बाचार्व वनितयमुयण्त ने कोचन में दिया है। सपर्य
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१०३ की यौक्ा र के बनुप बौनी पाखिर। ब्चमा संघलना में स्यम्भर थै। अभिनिैयार्य में शर्द या रह के नियन्न् में अभिनिवैत करना याहिए। यह नम परवान शव का विकेश हुया। सव-ममान-्वाम - बाल्माविमा बीर कया हैं। यम बे अपका अन्तर कैचड हनद को डैमर है। इमें संसटना नियानक तत्म पुनोसि्कित पननम के सनान ही माने गर हैं। बनाति मनमुक्त और माच्यन बौतित्य संपटना के निवानत हैं। *ी पस्छे कसा ना पुका हे, कपता के रकमायरसिय कोने पर रवामुहम इंसटनर बौनी शहिर। किम्यु बाल्याविका और कया कम दाँनों में परस्पर विषय के कारण मिन्नता है। बदि विचय पर ध्यान न दिवा नाम सौ बोनों में कोई बन्सर नहीं रखा। बास्वानिज में नव्यलाता बौर बोर्टलाथा बंकनार शेती हैं। प्योंकि यह किल्द बम्म के कारम्म विशेष बाना प्राथ्य कहता हे औौर ससी दरचर्म बाता है। कपा में नी विन्द बन्म पतुलनान में अपरम रक्ा है निन्यु उममें संपक्नर का पवन र पर दी निवर बोना पािए। कन्त में बाननमव्मने कहती हैं कि कर्म न (नम बीर नम में) स्ौकिय स्र शेमा केती हे नह: पर और नम योनों में संपहना रवानकप पुरी बासी हे किलल, इसमें विषयक्त बौभितयाकुसार कुछ मैर हो गाता है। नमा माल्याविमा कम भनमम्म में बीर्पलावा सवा नियकम्म भार बीर महण में शोमा नहीं केी। शवी फ्रार माटस बादि में अलाबर उंसटना बोनी पाहिए। किन्सु रोड़ बीर बदि वर्णन में समास बुल अंकनर बोनी पाहिए। क: बिययानुवार संपटना की भात्रा मठती पढ़ती है। की बास्यानिया में कयन्त अकनादा संगटना बौर नाटक में अवि- री्च लाडा पंकना नहीं होनी मािए। एह स्रार अंसटना के निवनों का बनुवरण करना गाहिरि। ध्वनि, में नृधि जाथ * काव्य
बानन्दरणी ने 'च्ववसार' को दृति का है। वह दो फ्रार की शाती है- १- इन्मृति बर ₹- अृति।
मूण्योड ममि पणडबे शावेड सिमिन मच्करगै ।। व्व० 11०
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वह सक्ाबरिण बदि दृषियां हैं। तमुनट ने बीन कुगर की स्च्य दुषियां नानी है- कबा, स्कानररिम बौर ्म्या। ह्हीं ही वानन्यवर्मी ने मममृषि नदर। बौर उसे रवादि के बनिवेस्िय नानी पुर, काब्य का बुणोनाणाय माना।
नहत ने बार फ्रकार की नाट्ब दुियां नानी - मासती, पैसिी,बारटी बर बरबवी। इन्दें ही आनम्यवर्णी ने वर्वदृत्ति कया। समा इन्द वृत्ति के अनान बर्यमृष्ि के दिए नी कहा - रव के बमुण से, वो बौनित्यनान् माच्यानित व्यनवार है यह कैसिती बादि दुचिवां हैं। इपसे नाटून में स्यूई जोमा बाती है। काः अंसष में नसा या कम्दा है- ल्फीसक इकृट बनि सी सरोसत है कि्यू रवादि का बौनीरकन्द कर्ष) दृषियों के बीपिसिक्त हैं। न: दृषियां रकृभि के साल्करईं के ब्निवेखित वींकर काच्य बर नाठब में बमूर्ष शोमा का कती है।
- वगनि पाच्य में बाच का विवेशन करनर व्यनिवार का कनोनीत विभय नहीं या क्वाडिर इनमोंने बौच के नवनू प्रमन की अपसयित न कर ससने हबी अरंत का ए्पई किया किसे इनका प्रवोम्त पूरा शीता था। बन्हें ध्यनि की स्थापा करनी थी कः इन्दनि भुणों के सी क्मान पौचोें के विषय में भी कहा कि को भुणों की व्यवस्ना रा पर निनर है, की की गौचों की बौँचता और बोमता की व्यवस्था दी रस पर की निर्वर है। ल्वीखिए ने पसते हैं- बाच काष्य के औरीर में रकती हैं, निन्तु बनते दानि या डान चिक्स रोत है यह सीर नहीं है, कर र है।
बौनित्याम्मख्ा स्वर पृस्वी डिविना: सिकिा: 1। म1स
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सपाार प्यनि प्ाम्ज प्रबनीच् व्यंग्य-रवादि के बाँम में सम्मारित निरोनों
पड़े नम एवं संरम्ण के बाम यहां सहा है।
रवरों का विरेन अविरेय विवार -
चंम्यार्द के निनिम नेों - मस्तू, नठर बीर रवादि में रवादि व्ंग्य का विहेष मक्ल्म है। उकती काय्य में विशेष माकरम बाता है। अ: व्यनि कार का क है कि महकनियों की बपने क्ोच्यशिलम में उसने खिए विवेचस: स्रकेत रहना पाहि। बचना भाण्य में सविरेनी तल्नों के ना बाने से नीस्कम का प्रारन र्परकि हे सता है। एस निम्मति के स्ान विरेनी सरचों के पृत्ति सिगनु भी आयमान रकने पर एक मी रलौक रसनय सम्यन्म न ही लँगा। कलौंलि रह बहूत कुलेनक तलय शोंडा के थौड़ा नी विरोनी ककणा नहीं कह कथा। यह अपनान फैस प्रकण काबद में ही नहीं, सुकतम भ्राच्य में और नी अपेशित है।
१- विरोनी रस की बामदो का उपावान २- रह के सम्बर नीरस नस्तु कर अतिनिस्तृत वर्णन
*- रव का बहय में पणला
१- विरोनी र की बामी का उनाचाम - बान पस्त रस से विरन् रस के
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विमाव बुनान या संारी नान को स्थान दिया बाला हे क उसते परस्कृत रस बयनी विवान्ति कहा नहीं बहर पाता। की शम्त रस के सिननों में, उझे उपते विमाण रूप से निंचित होने के बार सी नंगार यानि के विनान का वर्णन पर किया भाय शा शत् रस अपनी विश्राक्ति तक नहीं पहुँच पाएगा। नी प्रकार, निरोनी अारी नार्गों से भी निरोम सम्भर है। को - Tिव के प्रत्तवि कामियों के पृम्नयर्तब के पुप्ि होने पर भैराण्य के अपनेश द्वारा बनुमव चिया नाय। विरोमी रस के बतुपाय के परिमित् से भी रद विरेष सम्मम है। अ्यावरणाय- पृणवबुकत होने पर फ्रिया के प्रमन्म न कोने नी स्यिति में कहोप के वापेस से नियस नाक के रौड़ड के ब्युमानों का वर्णन करने पर। २- रह से इम्मह इन्म मस्टु का अतिनिस्कृत वर्णन -
कम गव कन्म वसुषों का, रस के पतन में अति विस्युस वर्णन करने अपता है, तब नी कुद न रस की कमृति में व्यपमान पकता है। मो - को्ई कषि निदी नादक के निदृम्म मंगार का नर्णन कर रद ही, तद समय यन बादि बठकारों के निकनन्त में रहल्ता के कारण वढ़ा-्पड़ा कर न्कती वषि का वर्णन कहने कये। ३- रव का बबमम में विमहेद -
का निवी एक पर ववि को रस का अपनिबन्यन करना बानश्यड हो निन्धु, तस स्थान पर रस का निकस्ा न पिया नाय, तम मी रानृद्ि में विष्म बाचा है। यया - नायक नाविजा के अल्यमित सुषण्ीय समानम के अनवर पर - मुंगार रव नशन परिषोच् की अवस्था पर कौ, बर उन दोनों को परस्पर स्सुराम नी निकित को नवा को, तम नी उनने अनामम के उपाय की चिन्सा के हतित ब्यनदार को बौडणर, दूवरे व्यनवार का वर्णन करने उना। ४- र का बान में पुगर-
रह के बहमम में इणशन वे मी रवानतृत्ि में व्यममान बाता है।
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उ्पाहरणाथं - क्राय के समृख ही रवे विविम बीरों के नात्र पाते कम में निकन्ण मंगर के बककन के बिना और पिना वकित कारण के राम की नैवा का नी झुंार कता मैं यह बाने का वर्णन करने उनमा। यर्श कैव स्वना कह देने से समाधान नहीं से सता कि नायक बँवी म्यानोड के रेवा कर रसा है। कयोंकि नाठ्म रपपार के எளன்தா்ளாளண: ஊீர்்ளிி का वर्णन रख्बं्म का उनाय नात्र हे। और यदि कनि इसियृस नात्र के लिए गाट्म रवना करता है सौ उच्का प्रकल्न बयुपानेय है। क्यीलिए यह कछा नया है कि उस श्रोय्ान कमी बाछौक को बालनी वाहा व्यकक्त वाच्यनामक कम नोपश्िता के पृव्ि बल्नवानू दोता है। बरि बाछोक ही नहीं तो बीचक चार्म हे और बदि काच्य में रन्दंग्य नहीं तो भो भी छिसा गया तब निस्फी है। रतियृद का ड्ामान्य होने पर रव्गंन की यब डुंटियां प्रायः कवियों के कौ बाबा करवी हैं, स्वांिए बन्न्ें कपेस करने के हिए एम अ्यम्याठक की रवना की नई है। वहाँ व्यनिकार ने स्मरण दिलाया है कि शैस ध्यननि की स्पापना नात्र सतु दी एव और पूण नहीं हुए हैं। बरनु मुश्य प्ुतिनाम नयी है कि अपमिण अपने भाव्य में रव्यन्द का विहेन ध्यान रें। हविवृत के सान एस के अभिनाम के पृत्ि सभा रकना पादिरि ।
रक्से का एक कारण यह नी है कि जौ रस पहम परििष्टावस्या को द्ाम को पूरण है सो, उसमर बार-बार उडीयन करना। रेख करने के उसमें कोई वानबंण नहीं रकसर उसकी स्यिति परिष्कान पुष्म के समान हौ बाती है।
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दृति कवाति व्नवर का दी कनोमित्य हे यह भी सवर्तन का हतु है। नदा - नाक्त के पुत्ि निदी नाविका कह के द्वारा बभित मी के निना स्वयं हम्मीन की इबया फ्रण्ड करना। बनवर मस्त की ड्रसिद कैसिटी बदि भुनी ரன எ ணா எண்டரசிஎ்ி अमाति बनिनय में निकन्यन मी रहर्ता का बतु है ।
स्वयं करें बौर कनवा परिवार कें। कुम्म समूष यद है कि यनि को अम ध्यान रस्ता भाखिए कि उसा प्रकस हपम रस है। उकते विषय में कस अज़मानी कौंनु चाहिए। न्योंकि को प्रणन का
विड रय बौर उनकी बोक्ा -
कर केना शक्त होना कि बिन किन रवों में परस्पर विरेष रक्ता है और उपयोन किष रूप में होना पाािए -
*- शन्त बर रांड
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बावस़ रव १- गीर बर झंगर र- नुंगर बर वास्य *- रोड़ बीर नंगर ४- बीर और नहु १- वीर बर रोड
• नंगर वर बुकस
रखोक्ा
ड्राब: विलद रवों के सवायस्यान हे मी को्र सोभ नहीं बाबा। वदि ए्म रिम्मशि्ित दो कपों में प्रस्तुस किया नाय । १- वाध्म रुप में 2ू बे रप में
१- बाष्य रुप में विशन रस की बोक्ा - नाध्य का अर्ष है दब बाना या बमिमन। बमाति कुल्य रस कर प्रतिन्ित को बार बर विसड रव बसे अभयित दो बार, तब बाच्य रम के वण्िति होने पर मी विरेषी रस, कुल्य रख का संचत कन बाता है। उवरणार्य- भवाचार्म सतपाण: का य एडं, पृवो डनि दृश्की था। गोचाणां पशाब मे युनवी कोनेडि का्न्सं कजनू । र्भिं कम सपसलचा: सनिव: स्वच्नडनि या डुठर
नहां किकम्म शृंगर क्ुमान रस है। इनमें निकललं औतयुनय हे, मति शरण के झंगर कै्य हे और मृत्ि पिन्सा के अभकिृत हुई, उसमें हुच् ज्रवीस
१- न० मृ० रू० *- निवशिते रे सचमपृतिक्े सु विरासिताम
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हो रही है। बौस्कुम्म स्मरन बौर बैन्य नी किन्ता में विहुना प्रीस को से
विसद प्रीत नहीं को हे, नयौंकि पांन एम विरेनी नानों के बमी की अये बुरन्त बाने तम नानों का निम्मण पकता गया है जो विश्रक्षम्म रृति के जं है, ண்ண்ரன்ண: ரிசிரசண शेवी परिडसिस की रही • : - को एम में विशद एर की बौका- अंगभाद का वर्ष है बयुवानमाय।
सदाक कप में, बमानवाम के उ्वस्यित किया नाय सर ओोरे रोभ नवीं हौा।
शरी की स्वानानिक कम के विलड रक दुसरे रख
தசயணர் ஹர்னீச: சணா!
कहं कहम रव की स्यिति - पककर, वाइलन, इुण्डा,अन्नार,
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خنط خد حصر اقحم هام المنصم ه حا:/
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११२ कः रव स्वमानत: विरेनी हो या बविरोनी, यह सनी बिरोषी सिद बोता है का यह फस्ु बीर मुल्य कप के विवसित रस की अपेस्षा बॉचि मात्रा में पम में बाता है। वर्ह कह विरुड्ड ररवां के अवावरण किए नर । कम बनिएक् रवों के उदापरण
एकवी रोविदि प्रिया ब्फ: ललूवीन्रो:।
एक बर प्रिया बकपर्ण नैद छिए कड़ी हे बर दुसरी बोर कालूवें का निवाय शे रवा है। ऐवी स्यिति में लेह और रणराम हे मट का पिस पोडायिस को रण है। यशं कुगार बौर बीर दोनों का परिषोम सुमान मात्रा में को रस है। यह दानों रा परम्मर अिरेनी मी हैं। वह मट' सच्य, यह वस्पष्ट को रवा है कि बीर र की प्रयानता हे बौर पत नी बुड का की है। य: वशं कुल्य रख पीर ही है, गुंगर बके साफया परियोम पाकर मी उस्णा अं नम नर की रियिस है। इपका एक दुसरा उवावरण - मण्हाविरया सनाययनिए करे वारनाननिती। ला
कूदा पर्यतनन्दं विययरपसिना मैलावा नुणेन।
शेवी इम्म्यास्का इक्रित पतुपविस्तत्र इष्टा तू बोड ब्यातु ।। एस्में फुंगर बौर दाल्य दी परसार बनिसद रह हैं। मषि ने दोनों कौ कान पोचक डानफी से पृण्ह किया है सयाधि रवि प्रवान को नाती है। दास्य सतनर नि परिुष्ट नवीं ही पासर कि जुंसर की बपेसा अचिक मन्थारी
उप्दुक विवेशन का बबार या एक माचम अपवा कोई एक पम ह9स अंदम में पुनम्म श्रब्द के बकार पर निवेशन भी उचित दोगा।
१- बनिरोनी विरोनी का र्ोडनिनि स्ानबरे । पररिषोचं न कैतव्यसमा स्वादविरोमिता।। वय० शस
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११३ प्प में रोत्ता
महाकाच्य वपमा नाटड बदि प्रम्मों में नाना ररवों का अपनिवम्मन कोने पर पी, भाब्य का उत्कर्म पाहने बाछे कवि की शैस एक रस का अंी कवैण निकन्दन करना पाबिरत्धम खवॉं का बु कमैण। रैवा कहने है अ कम से निवाक रस बी रह की अपकत नहीं कर पाती। उप अी र कौ भ्रम्म में बारमम ते स्या तक् नीम बीच में पुस्ट होरे नाना पासिर। के प्रषष्ण नात्त में की बारम्म वे अन्त तम व्याच होकर नियनान रकीं वाडा कार्ष - प्रवीच्त के बीच-बीद में अन्य कार्य भी उमस्कि होते हैं चिन्तु बनकी और बड़ा क्यान मुल्य मार्य के विरुड नहीं उरसा । मो क्र्पेक ववान्तरु कार्य बन्त में मुल्य कार्य हे या मिल्ता है और मुल्कता मुल्य कार्य में ही रख्सी है। एव फ्रार की योमा वे समुदम बामा मितों को बचिशम बाहशर निक्ा है।
या अविरोणी रस का परियोच्य न सो इसने छिए निमन्नकिसिय सथूष अगमेव हें- १- रव बदि अनिरमी की सो बकणा परिनीम कमनान नात्रा तक ही पिया बाय उससे बचिक नहीं। क्योंकि उतवर्च का दाम्य होने पर, रन दोगों का विरोय इम्मम नहीं। श्री - 'रस्तो रौमिति प्रिया' स्यादि में सुवार की बीर की मात्रा कर् ही पिष्ट किया नया है। हवी कार मण्डाकत्नानामाडा- यल्नामिव करे' अत्यादि में सज्य की झुंगार की मात्रा क। 7- र बदि बविरोची की सो बकने अंगारी नानों की मात्रा, मुल्य रख के अंवारी भारगों की नात्रा के अािक नहीं होनी पारहिए। बॉदि रेवा से नी नाम दो भह बकुत दैर तक म रके,सपर्थ ठीड़ सी परवान रस के संगारी नाव को सपसयित करना
१-अ०मस। रग०भस। -व्य. सस *- इंक्तां नमाकिये निचयये पल्वादा विलन प्रकतति। व्य. पृ० ३0 ६- स्व० पृ० २२ । 0- प्य. पृ० ३३।
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- मनंयु रस के परिषीय प्राम्त कर हेने पर नी, उसकी बं्ता क। इति कका रसा पाणि। बन्चमा रेशा न की कि यह अंी की वन बार। *- अंमु रस की नाना बी रस की बपेसा का ही रसी वाहिए ।री - बदि शन्द रू बरी से को बसे दाम नंगार की नाना कसनी ही रसनी गाशिए किकनी निवद को राम में पहिणात ना बुरान से बा्कित न पर दे। नरी नी सेी पररिस्मिति नी शैती के मिल्में स्वान्तर स्वमं परियोम या की हैं। उनमें खवान्बर। की नात्रा बाचिक न ही और ने बं की से सरें - एस सयूप के पृत्ति पगेत रकना पासिर कमर को रहों के अंनिमान की कर्मा कुई सै, उसनें 'एस-अंस्ता' के विय मैं यह अंग ही सन्ती है कि - ए, रवत्म को प्राप्त सनी बोता है या यह औी रक्ता हे। फूुखता रस का बनिवायं नर्म है। अंष ननती की रख, रस नहीं रह बाता। तम बंजण्त 'एवं की एव कैे नदा नाय ? रस की कता का वर्ष हे - किसे बंवदुत रस कका था रवा है नह रस नहीं, आाचतु रव क्रैी स्विति का पपुंना हुा स्वानी मान हे। प्मम्म में विरेनी र की बौज्ा के दपाय-
बनि प्रतुष रव के साथ ससी कृषन्म में असका विरोषी रस भी मस्तुत करमा हो तो यह दैलना परसिर कि विरेन किस कारण है। यि दोनों रवों का किसी सा बाबम- नावड ना एक की मात में रच्ा विरोचकात्र हो तो उन ररों को निम्म किम्म नातों में पिस्सा देना भाखि। की नीर और नवान र, एक की व्यचिस में नहीं विसवार ना कली। इन्में बलन व्यान व्यक्तियों में निल्लाया का सप्ता है। बीर को नाक में बर पमानक की प्रतिनायड में । इकसे सनका विरेय लान् बो बावा है।
*- सिदंणको वस्तु विरोनी स्वायिनो ननतु। ना विभिनामम: कार्यस्वलम पोभडभपरीमवा ।।
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शी-शौ बिहद खां का बाजरम एक की व्यक्ित हाहा है, कि्यु विरोन निरन्तरता के कारण सोसा निवाई पहुतर है। सैी स्यिति में ननि के साहिर कि हम दौनों के बीच में, कोई बीसरा रा का ने, जी योनों एरों का अनिरोनी हो। नामश्मम्म में कनि ने डन्फरव के भशनासु कम अुंगार रस की कनसियि बरना पाद तो बीम में ब्मुत रस की सपनिकिा कर दिया। बपतुत के स्वायी भाप 'विश्मय' के बारें की बीमक्वाइन की निर्वित्रणसा बन्तित को नई और नम महमपती का शसास्वार हुदा तम रति को उमयर्म का अपसर मिक गया। मैहनसर्ष के निराकरण के कारण विरोच का परिकार नेवड एक पात में की नहीं, ए मामम में भी ही बाबा कहता है। कवावरणार्य -
दर्व पर परम्पर मिरेनी झुंगार बौर बीमलस रस के नम्य में बीर र को डाबडु स्पस्कि निया नया है। बीरस रेवा एव हे जी उम् दौनों सों का निम्र
एव प्ुछार वनि की विरुड बीर बविसक रवों को बपे पक्य में अपवानपुररत निवन्कि करना पाहिर। नि्मु झुंगार रद में सकमा विवेष ब्यान र्ना नाहिए। क्याँकि, यह सव स्वानि नपुर बर इलाखन हैं। बर यह रृति का परिीय रम है, रवि नान का दुण नात्र बिहेधरे की पं सम्मव होता है। क: अुंार र का पौड़ा का नी विरेन अहतूम ही पाता है। एुक यि की एम रस की बोक्ा में बकुत बानक रसना बाौिए ।वयाचि इसमे पुमान होते की कवि की अपता परामाच्का पर महुंच बाती है। नी कनि रवादि के विरेन अनिरोच की डीक से सपक लेवक हे नहे काय्य- लिण में नहीं नी कोई व्यानोड नहीं रोता।
:- व्य. पृ० २4
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बाडे कारमों का भी डल्तेव किया है। ये क्ाम कमि और बमूरम दोगों को निली है। बवाने का आधम के कर कनि बपनी नाय्यनृष्टि में निल्य दुकन सवारं कक्ा रक्वू हे बर बमुदय निल्य नवीन सच्यायों का बास्वान जेा सखा है। न्त
सवादि व्यनि के किी एक बैंद के आानयण मात्र से तम सथूप में उभी क्गार पालल्य
नान-्यवमनी ने ध्यनि के भाय्त बोने बारी कामों का विल्युस -विवैशन निम्म-
எரானரகழரண்ஈன்ண ஜரகள்ைஎளளர் எண்சிரணச்ர मैं ज़ूा की पृष्टि के यह़ भवामों की बैतनोच औौर नैलन पवारयों की कह़ौंच अम मैं दरस्तुत मस्वर है। गैक में इचों के यह वर्म निवाखया हे की उमानुडालर या वभिनानोच में कुल् रोता है, कितु भाच्य में डब्द हे यह वर्म पस्तुत शोता है, दो मदि की विरवाकिस रख्वा है। कवी कारण् कि के बभिमेत वर्ष कौ अम्म के
शष्यृष्टि में बपना कु बहन की वेडिक्टुम रोसा हे।
१- अपरे काज्यपतारे कविरेक: प्रवापति:।
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.
सव्यार्य नैसा सन्मानुसासनम्म माज्य-वर्म तक बीमिति नहीं दावा ,पी ग्याप्ति बंम्वामं का होती है। की बंग्वान व्वनतताव्य का प्ाणपृत दा रसायू तत्न है। बंग्ार्य के प्मान होने पर व्वनतिरिाम्य होता हे बर बनवान होने नर भुणी
(प्यनि बर मुणीपृदचम्य) में रसस्वालम- ब्यंग्याम का बानवण् करते निय-दतन रचना कर उक्ता है। कि्यु मा सग्चार्म की अभिव्यनता कहने का बामचूर्ष न सौ क्रयेष सम्म में शेता है बौर न ही पूत्यैक कनि में। यह दामपुर्व सिन्दीं विस् खषों में की रस्ता डै, बौर यर चयंस्यारम नैस नवाचमियों की वाण्ी में ही स्टुरिव शोता है। नदी मशकनियों शी राजी का कंगर ी है। क: सिो महानकितन वकित करना की, उदे पाशि
पैडिक्टून ही नहीं। क्योंकि नह सदुतयों के मुषय ना बाल्वामन नहीं कर पाती।
कदा बाचा है नदवनि का मुल्य ककिल। यही वह दौक्ता है चिलें ज्रीयमान वर्ष
कन्त: कृयनितोयों तो इच्दायां नशाकने: ।। वही ।६
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.
हमार्पं की यर बौक्र अमन्त एस्फतिनर बौर नम्नीर स्ुल्नति की बैशा खही
•: दी हॉने बाच नहीं। एम तरह तष्ह है कि पुविना इम्कन्म मसावमियों के साच्योत्तम का कुष बिन्दु निनिय व्यंस्याजी मस्ू, बरलकहर एवं रवाबि) की है। श्वीछिए जी ऋषि पा पवव हो नाते हें, मिल्का कवि एर्मं परन परिनाज को प्रष्त को जाता है, उननें 'ध्वानि' के डतिरिमत अन्म कौई कुगर नहीं बाया बाता। यह निरियता सक्ु हे कि ध्यनि का बाँच हो नाने पर कनि नह सकी नियुण बौकरा करने कपते हैं सो भाभ्य னணைர்ராஎாகிரணர்ஜினண்
निहे। एम करण कनि में यादि प्रशिमा को सो ध्यननि के बाजय के यह बन्स विस्स
मैं रे सिही एक मी क्रगर का एमई यह कर करेी के सी उबी वाणी में नवरम था दाता है, के सी बांस पुरानी सो । वर्श तक कि जिस अठगर की काच्य का
(ख) "याये काच्यमवव्यस्वापने पिलाणे नाज्येव व्यनिव्यतिरिया: गाय- पुशर,कता परिनाकमतर्र कवीनई रवावितातपवीवरती व्यापार रव न शोम 7
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११६ बाड्य बसार नानर कद पर छौड़ किया बाता हे, ना नी व्यनि की ससया में बाही की पहांशवा की फ्राय्य के बाता है। इतना मातारम्य है व्वनि का! स्य्ुच नल्टू, वठसर एवं रमनन्यग्य में हे नी रादि ब्यग्य का विहेष भकतम है। पयॉकि कुषनिों के नापयंण का कुलण निष्वय 'र' बोधा है। जिस मवि नर कग पे रीन बपरा नीरस शेबा हे उे महानु बनमत निक्नता है। सवासिए नॉनि कौ रू पस्तंतर अवश्य बना माहिर। रवामि व्यंग्य की अपनाने से कवि की पयांच्य बशाकता निची है। उकी ननस्ना, बैड, और काड के मैद हे मिन्नवर हैहर अनसिक गोने बाडी बानी नी बचिन्न बपपा इमप्पर पतीस होने उती है। रानदि का पाँत स्बन्त निस्यृस है। रंड, पाय, नावानाड, नाकल बादि के प्रयेत निनान, बयुनान और व्यनिवारीमान का पुर्ण कम के बाजय डेने पर भाच्य में विकिक्ता का बाती है। ला कारण बानि उस्ला युक्तिपुत बुवरण किया बाद सी अन्त क्रसार की नाब्य सना से साच्ी है। रव के परिमिष् के नयि की पुरानी पानडी में नी उसी क्रसार का नकत्य या बासरा के चिस क्रकार मनुनासा के भुसतोें में। निध्मनिसित कसिषव कनावरणों ने तष्द है कि स्यनि के कियी एक मैद के संस्पर् मात्र से की भब्य में नवत्च का बाता है। यपा बैकरे लिनिरित्मं व महन्तो मुल: सिविरा:।
एया शक्ति ने रक्ते दुए मी निम्ननसिसित नाणभटट की इक्ति नवोन प्रतीत को रही t-
१- शरीरीवरणं बैवर्र माम्यलने न व्यपायितन्। रैSइंगरा परां शर्दा वान्तिवपंतां का: ।। प्य० शरू
- रहाना किक्नदा कोनिलयानुडारिणी ।
*- इुस्यानवाडनुक बी स्वादि नतु निस्वर:। निरीड म्नन्तां पाय्त: सज्यानो क्वालवाद् ।I की ४।३
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१२०
कयोंति दर्हा इम्ितमुलर बतुरणमम निवस्िता बरवाज्य व्यनि की यौच्ता है। हसमें ह्ैम' हम बर 'बरणीनारण'इब्द के डेचनाथ समा उने क गामणात पर पूती के रपे रलने की भात अभिच्यकता हो रही है । शी पुगर -
अचयुकस कयन के हक्नी हुए नी भाशिवाद के एवं वानिनी देवचर पाइे खिुरनोप्रयी। श्रीशाकपकाि नगवानार पापी।। एस कमन में कीनता है, क्यौंकि कर्हा देवचषि नारद द्वारा कार नर विवास- विषय स्पेत की भुलर कम्मामान के भारण मनकी पानती कमवलणना करने जीं। स प्रसार वहा माज्य-वर्द के साममुष के अमन्चिर - उम्दा कम व्यभिवारि- माव अनिव्यक्त हे रा है। एव प्रसार व्यंम्वारजं की प्रीति में कूप के सभिव हो नाने के कारण वर्श एपत: कम्पी अर्पडफ्युरनम व्तुस्वानोमनव्यंज्य म्यनि है। पूरोक्द कपर में हण्मा कर का प्रवीन किया नया है चिन्तु साछियाद ने लबी नथूप की ब्यंष्वार्ज द्वारा पतियाकित किया है। कवी कारण काकियास की उमित मैं पचुन हे। नही कुार - हुरनिक्सी पुमुरे सक्दा प्ादु्भन्ति लगीया:। रककानुरपडिया: सोप सल्ाससिसनि: ।। का नम के रस्ती हुए नी निम्मविकित पन में वचिक भाकत्म और नवीनता है।
१- वही
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वह मि प्रोडीनित के निम्यम है। इकत कसिमम उदरणरों के त्मष्ट है कि न्यग्य-वर्ष का ससमत कौते की पुरानी सबही में नी सीका या भावी हे और नह बाबी मकुवास के तुनों के समान नवबास थी प्तीस शोती है। कैक बग्यमोदों के बाभण के पतीं, पासिकि वर्ण, सर, भानम,कुम कम वयंक-मैदों के बाभयण् के भी पाच्यामों में नवीनता या बाती है। एव कार बंग्य -संकनाद के बनन्त प्रार सप्युण कोने पर नी ऋमि को रवादि कम अर्प वर्द के खिर सायमान रक्त्ा पािर । मयाँबक रड, नान, रवामाड़, माचामाय, कम बंम्य में बौर वरण, पर, नानम, रपना बौर प्रकन्म कम प्यंबों में अपवानयुनत पिस वाडे कमि का पूरा पाच्य बपुर्ष (नवीन) का बाता है। यपा- रामायण
नार्चों में दंग्राम का बार-वार वर्णन कोने पर भी रवान के भारण् उसमें निल्य नवीन पालतम मयनीदि होती है। प्तष्य माच्य में रादि व्यंन्य' का निहैन मकतम है क्योंकि एक बंगिमस रव का नाचम हैनर काच्य रना कहने पर एक और नर काब्यामों का डाम शेता हे बर दुसरी बौर प्रन्म ननिकय डोनाडुस को माता है। ज्वाकिए बलगर के बमान में नी, रव के अनुल्य वर्ष-विहेम का उपनिवनन करने पर गायय वासत्याविका युन्त को बाता है। यया -
बलांतू बौनियों में बैष्ड, मवल्ना अनसतम मुनि की का हो, बि्योंने सू इुल्टू में मल्दम बौर सणकर की पैसा।
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१२२ वदां बकुत रा है। एक की बुलू में विष्य मल्स्व और निष्व मबमू का पठ्ष लव எ்ப்சாஜரரகினசஎளான் ब्यॉक् के रही है, जो बसुच:ः बारपर्व की पाद हे। बूक सम्मन्मी यह महना
तयानि स्वानिकि बोने के कारण एवमें पासत्य ना नया है। नही बात चिना रव के हौष्द्रविदि के एम में नड़ी दाय की श्वर्मे कोर्ई पनरवार न दोना। रबी क्रवार
का प्ार का सिद्र है कि पृतिमामुण समष्म कनि व्यनि और पुणीक्अम्य का बाचम डैपर कन्स कांच्म रपना कर कज्ता है। इसरे बतिर्यित ब्यंग्य की कसा न रसने वाहे बाच्य का मी बानन्डय सोता பளரஎள்ணீஎசாரசீணகளள்
ー ー ー ー ー ー ー ー ー ー ー (ग) इपका एक डचम उवावरण है - झारसन्मर में पवती पार्गी का वर्णन। गरिराद ने पके फुपत बर्न में बनका दर्णन पिया, फिर दुवीय करा में सत्यलाद समान कर् में। कम फरप सर्ई में तनका वर्णन पढ़ते हैं सो रेवा ज्रीत होवा है कि दम रेवी कोई बास ड्ैन नहीं रह नर्ष है जिसे जिए पागी का पुनः वर्णन किया ஸ அணனரனஎரண்ணர்ள்ணிர்
उसे कहने के पिद अवासर नहीं। दच्तम बर्ई में विवाह के समय भ क्न्ं पुन:
कवानि ये तप वितन एक ही काच्य में सुडा के, किन्मु पुनसमत से नहीं सनते।
शारी रकती हे कम सपमय जी सियिधि रस्ती है नह उसमें सामनाय का बाविनायि
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१२३ बोते की बदड बाती हैं। इस समय उममे बनैंक कर्मों में विधित किया का आवरा है। उसमें नी युस विनीड होती है, यूड बपििोय। उनकी स्विति को और गचनिणणि चिदा बार तो बर्जे पुनसनक्ता कानि नहीं बाबी। लीदि
ये किा: पिवाणमर्वा वा भुभिवाणीनायु।। अपाति पियायों के किमू बौर सुनवि-्वाणी के वर्ष की अवनिरल्ाि) नहीं होवी और न ही के पुनरचता होते हैं। (ख) अस्मामेद का दुसरा फ्गुर तब सपय शौता है, कम बंगतन वस्तु का वर्णन बैतन रूष में किया भासा है। की विाकय या नंगा का वर्णन, इपका वर्णन अैसनह्म में रपरयित कहने पर ,एनमें यूछ बौर की वैशिब्टुन या बाता हे। स्सर पाण रे - पुारखम्यम में रियाशय का वर्णन । वति ने विनाख्य के वर्णन है की गच्य का पारष्ण किया, वह उस्मे स्थापर कम का वर्णन किया ।पुु: के कर मैं सब्तभिमण्दत की बाँच नियृसम-पाना के प्रूश में ततता वर्णन किवा, नदीं एक बनिराम या सुदभवी बीमानू के प में तदका मर्णन कहती हुए + पिखाया कि वह सन्चमियों का स्ामत कर रवा है, बनके समता किय बर बिव्ुर्ण् बातें कर रता है। बरद यह बमूर्ष की भामू पड़वा है। से रणन अरचनियों के माच्य में बहुछ: मिलती हैं। क्योंकि यह स्यवियों का परक्टि मार्न है। बानन्यवर्व ने विभमवाणतीता में यह तथूप कमिकों के मा्नेशी के डिर विस्तासुत प्रतियाकित किया है। बि सुकार बपेशन की जैसन कम में पस्तुत करने से नवीनता बाती है अभी पार हनकी बारम्म बदि भवरवायों के भैद से मी उनमें नीमता ना बाती है।
१- ग व राण नहर सवाँधी न द से रोष्ान्कि यह नि पुरुषा। मे रिक्का निवार्ज कपा ना मुलनाणीगुम् 11 कमनू० ४र (कीसंलवडाया ४- वही पृ० ४२-०
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हम बस्वादों का एम एक करने नर्णन किया बार सी क्पन्त नच्ारय को
सिसे सचाय नण्ड से उत्यन्म वाधयस्ता का स्वर पंदों कुल ने मष्य विमूुन सस्फम्म करता था, बब उडी बारणवड़ के कोन न्तांटुर कसने अचिल हुपर क रहे हैं कि इनते एपर्ों करने वाडी क्यठि के मुणाझन्य कफाकरहैं
तर प्रगर यहां वारणव् की निन्न-निम्न अवस्मावों का वर्णन है। बौर
रह प्जार बन्च नस्तुषों के अन्म उवतरण नी साने या सफती हैं। कनियोँ
(?) 出 ッ · キ イ す 了 · ー
बनेतनों में एक की पाडु का वर्णन एवन्दल चिक्ा बर एकस्क दैश की ठैनर पिवा बार तो बस नवीन उंकियां प्रस्तत हे कभ्ती हैं। कास पुष्पोमान
बोर नानर प्रकार के पीत होते हैं। मुच्य प्रामनात्ी के रुप में कैवा रक्ता है, नगरवाडी के रम में पैदा नहीं। काम्यपू, बारण्य यतु हे अर्पवा मिन्म सोवा हे। हबी ककर नार पसती, कबर से सर्पमा मिन्न होता है। न्सुच्य
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१२१ इनये सनार एवं ब्यापार (नार्य करने के अ) भि्ममिन्न होते हैं। तम अ विनिक्तानों का पार पाना बहममर है। सवानि कुनियना कपनी परिना के अलुचान बम कम की अ्पनिका करते की हैं। (३) फ्राडमेद से नीसा -
कवेसन पवार्थ चाकेद से नवीन प्रतीस होते हैं। असुखों के नर्वं परिकनि के नाम विहाएं, ब्ाकास, वाखम में को परिवर्तन एवं नवीनकता बाती हैं, बक ड्रक्ट ही है। पेतन पवार्म नी सतुबों के परिकान के द़ाच उधी बकारु, बन्दीं निश्ानों बर वशमों में शिली केसना में बसदुषय का बनुनत करते हैं। (४) स्वाउपयच्य से भपीन्ता -
अंर की शमलत पस्तूदों का जी अनमा स्काम हे नह स्वर्म भी पविनिण्ड मि्या सिर रक्ता है। स्वमानोकि पर बाबड यणि बनि इम पिण्ीय विशेचतानों का निक्ल बली हष्ति में कर दे सौ नही नणनावीत गच्यारय फि हे स्ता है। रम पर शोई की कि सनी वस्तुएं सामाम्य कम हे वाज्यमान की डाय्त हेवी है, न कि विहेन् कप हे। ननिक नी स्वयं अनूलस सुवानि और उनके कारणों के स्वाम को अन्मम बारोपि करते दुए भी तनका दानान्य कम से सपनिवननन कसते हैं। ने रि बोषियों की गौह कीत काना एवं यमान के स्वप का फचण करते हैं। एव प्रगार मानान्य रप थे की वस्तू का नियन्धन करने के कारण करनी एर प्रामीन कवियरं ने कद दिया है। उनवा पुनः पृतियाकन नणति वैविकृय मात्र है । इट पर विान्सपसी कह कलता है कि यदि पुपतसी यह मानता है कि भाच में शमन्य रप हे जी कनी वस्तुषों का परतियाकन कोने के कारण उपनें कोर्ईं सकत्र नहीं है। 5म ही मरवमियों दारा को गर काच्यादों के अतिरिका बन्य सचार्द में कोर्र नि्ला की नहीं दौनी। बौर वालोकि को छोड़ नर बन्य
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विवी को बनि संर के बनििरित मी नहीं किवा या सोगा। बादि कवि दारा बामा-यहन के सनी मस्मुबों की फ्ांकित किया या भुणा है।
नहीं है। गक् नाज्य निहेध के पृतियामम करने गाडे नमम को नक्ते हैं। भाच क बैंियुन ने सी बाच्य में पैबिटिस बासर के: कयोंरक माचन का माच्य के साथ ना माचा का नपब्य वर्ष के द्राम बमेन रस्तर है। स्यासिर एनिसिनैमिट्सानी की वाज्य मैं नी नैलियुत बिक डौपर स्नीकर कहना की कता है। (V) डॉलिवैनियुस के नवीकता-
एक ही पक्ब वादि मिन्न-मिन्न प्रकार से कया बार को वह कर् मुनर की बाखा है। बैसे कपना के माध्यम के कही नईं बास कम कपण के माच्यप हे नी बाजी है सो उकमें नी बैविकुम या बाता है। यही बात वादि श्ैम या सपनासतैम्ट के दारा नही बार को उस्में मी दाहतम या बाता है। यह पमत्कार भणिति बैभितुष का ही है। बदि हम पर ध्यान र कर माच्य-रपना की बार कौ कंडितिना का एक बीच हैन्ड्रों आवाबों पाछे एक विशास मुस् का रुम हे समता हे । (4) माचा वैबियूप से नवीनता-
मण्ति बैपिकृत कैक्ठ बंगर पर ही निर्मर नहीं रख्ा। उदरा एक बबार पाचा नी है। दो बात संसयृत में पती नर्ष हे नही माचानतर मैं की बाती है जो उसमें युछ बौर बी-मैलस वेशिण्टुम ना नाता है। तयापरणार्य-
सौर न कै नगडण गाबरी मौदि नणबी।। इसमें फुत 'नह नहं' - शब्द की एक बंसतृत हाथा दोनी ना नम अयति मैरा मैरा बर कुसरी होनी 'सटुल नमादि नीमृष्ण।
पिसे दृष्द का डेन अक्सामारणं काण बैचरं स्वसा गानि नह्शंकरासि, तेवरं नान: स्वाफस-्यनू, सन्म स्वानि स्वानि उपणान्येय।
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११ रप माना का एक अर्प यह सौना कि मैरा मैरा कसी भहम व्यचतित नरण कह पहंर पासा के सम नी डबे शीड नहीं नि्वी और नह का बार नी भावाबू का
ப்ண்ர்எணண்t!
नवीकता बासी हे उतमर मुल्य हेतु बनका स्वामकम्म है म्योंसक निदी भी गच्ार्य में नब तक पासतम नहीं बासा, ना सड का स्वाम्कि नवीं दोचा । ल्योडिर
சாஜ்ம,னீன்ணீணிர்ீ்t
बवस्मादि नैद से एम ही मस्तू के नम सब वनैक वर्णन होने पर नी, रख की बन्चित के शरण उनमें परम्मर सम्पकतर की प्रतीकि दाँची रकी है।
भी तनमा बन्त नहीं निक्ा। नर्योकि साच्यायों का बवीन कोड़ है। एव कॉकि दी नहीं, बसडु मानस्पति मी बननी पूरी बबित कनबर कस पाच्यायों को बनिव्यनि देना बारें बौर उकके समपुण कौस की सनाम्या कर देना बाहं को नहीं कर कपती, ठीक नडी प्रसार की ससूनु-सबड प्ताण्ड-निष् निकार मी प्रृति के
٢
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संवार
बौर दनित में की ससी है। उसला कारण यह है कि कनि सि मस्सुवों को
कौकि समूनों की बौकार में कयनि के माच्यम से नमि नवीनतर खाने का फ्रकतन ٠ गनि कौच्दीं र कसुकिम्म का फिर बोना उसी कविता का साड बम कांदियों की सलाबों से निक्वा-पुआत खेन। नही के ककिदितिमार्जर।
() 冷 ア マ ー
के सार का मनाहण्मर परिल्यान कखा के।
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(२) वाडेल्याचारव् -
(३) इुल्लेरिगु -
द्वारा कय्यसु स्वान्य नहीं है। क्योकि बरीरी बन्म डरीर के सदुस नी बाकर
क्ता की फार्पो के बनिम्न होने नात्र से फिम्म भाचों को अभिन्म शी माना का
१- का रानिरमम मौष्की नम मच्तुरचा पुरावी।
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सो कदि को बपना बर सफक अमना गादिर। रमयता के रकी पर प्रामीन कार्च्यां की समर कनिलों को यहीजिस नरवीं कर शभ्वी। रम्यर का बामान पहने वाठा
रर प्रवार कुने को पाहिर कि यह निसी अन्म वदि की काव्यसण्यृति नान சாாி எள்ளன்ண்ாரனர் ஸ்ண்எண்ர்ணன்ர்ன एसा मुनिा पर बाक्ड रस्वा हे नौर एय पृति के करच्यमून कतता हे उदम ब्यान स्वरयं मतचती बरस्पी की रतता हे और यह मापती तह सुवने से सिए माब्योचि सबी स्वरयं पररिर्सि पक्षी सकवी है। नही से सरस्या प्रसान बौर सी की
विदानों के नम्म विदिसियतति का निष्यय कना हुवा था, डबे सतिच्सित पर किया।
एकु सिनिमित्ी्य दुविरमयुनिितीये।
में हर: करच्म: कविनित्के स्वनिचये।
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٠
अतेत का कई है- दो का निल्य बानरम्य । जैस पन में- सिन बौर डाँल का निब बमरस्य रन्वा है वमा कये सवारन कम परमजियरम कदा भादा है। कही मस्मशियतम की पाम्ि हैन नक्ने का बहम अमम माना गया है।
ये परे सुटट जानल्या, अकन्द एवं चिन्मय कदा नया है। परन्तु का मे बृष्टि
எரீஎண்ண்ரா
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प्ूयैक बीम में रहे पाठा सिव्न की बल्करम है। बह
क हो बाले। पत्नातमा की निस बक्ति का कूल्चि स्कुखा बादि शमा दारा नाक में बर्णन किया नासा है। इस शक्ि के बनन्त स्वशन हैं निन्स्ु
अभितुन्त का न है कि परमेश्वर में बितु डसि की प्ानता बोने से वह खिय नल्म कमणाता है, वानपसनित की प्यानता कोनि पर काशिकतत्म मशवाया हे, எ எரனள்என்ணணார்ள்நாண்எ் पृवनता होने पर नही पहैश्मर वियतत्म के नान के बननिसियि किया बाता है। पद्ि के हम नाषों स्वापों के सम्क्म जिप चपने दान सल् निश्व की
१- नरा झ्ेडिम சபி ரா் யளண ரா் சணததரை ரா்ன-
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मकत्सूर्ण तकूप यह है कि बिया वकि के सिप एका क्रसार के अह़ब्तु हैं। लबी शक्त ने सवारे सिप बफने में बई का गाँम क्राय् करते हैं। स्वारिर अंरापाय ने नी जा है कि -
परन्तु यह की अत्द है कि चिया जिप के अंित भी नहीं रर कली। हा दोगों में अगैर हे, धानासम्य है, शनरत्य है। सनी जिय पूर्ण रम में नस्मसिप तल्ब हें। परमशिकतन स्वतन्त्र किन्नय आजस्यम तना नुस्नाय हैं। उभ्ी कै बनी पार्य वाबकि होते हैं किर कबी में सीन हो याते हैं। बृष्टि को उनता हम्मील मात्र है। स्वंिट कडा गया है-
इम्मीडलु कवस्किसमेव इण्टीकरणन्।।
तीसरा तल्य काशियलन करशादा है। कदत निकास शिस्सृमिट के ही हुया है। या एम समिय में 'इन्मैथ्' होवर के, तम बृष्ष्ि शौती ह बोर का यह नांत युंद लेवी हे बम मस्तू का अप की बाता है। यह 'इन्मेच' और 'निमेच' बानि बर बुन्त हैं। जी इन्मेच के कारण 'आाशिकालय' की बनिष्यत शोती है। यह अभिततत्न का फृप्त बौर कस निमेश है। जो सस्यवतन मी कहो हैं। एवा अवसना में 'समवारशक' की कृपाफ्वा रकती कै, और 'अह' अंश उस्ते प्रधान रूप से आच्छकित किए रहता है क्यरं 'एर्म क बल्डूट रकेडा है। स्वाडर वमिमन् का प्रार प्रीवि शोती हे बयातू बातू का बच्ममत रूप में यहां मान बौचा है।
१- बापप जवरी ₹- सिवर प्रतयनिक्ा - १० २ हनरिवर प्रयनिद्रा विाक्षिी (मान-) पृच्ठरमनl।
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की पाला रखो है।
சாளன்னீரேண்ன்1
बर्नों को सुकाण्यमु बवादि बनुड मार्न मानर कया है। अवणा भ्रण या हे है
請 醫 지 書 福 :
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.
नैवपनाव कशने के कारण से परानिका भी कहा नवा है। यह य बारईं गई है, कयाँकि स्वरमं नस नैदनम बड़ कार्य पक्ी है। की मह मूल एर्ं स्याज़ है बौर सिपन्दंित के बभिन्म सैकर विश्व का यु् कारण मानी गह है। सजही जी बाकानी तरर्मों का विशान शौदा हे बर बही कपसा चिशन की अपन्न भसी है। यह नाका कम: सपमे सती निया हस्ी हे बर बीनों पाडों का क्म थी हवी नादा से शोदर है। लो कियोगिनो शन नी कखादा नया है, चिले पूर्ण प्सित किुवनित कर पुशव माच्याबित की भाता हे बौर बीपाल्ना े हग्यं नहीं कर पाठा। परिण के हैप विदान्त की गाा यदा पर नावा के सुए बयुड़- भो मैद परत्रीं फिर गर हैं। प्रयनिका-वरी में लपना नैवक तक शुए नम की स्वीकार विवा नया है बौर उकते सत्यन्म पांम सरब - सकर, निवा, रान, णड बोड़ किवति भी कर्शा झुए नाने पर हैं।
'बललि' लोरा, कती, पुर्ण, जिम, म्यास,
पिय, राम, शाक समा निवति नादा के पा आद्णों के एम में सपर्व अनिष्यन
मादा के इन्तीं नांम संपूरणों के सारण कुसत: पहनश्िय के अपर्युक् पुणी मैं नी अंैम सो बाबा हे ।वखिए कुड की कहने का दानमूर् दपुर की बानने का बानपूर्व, सूरणता का नौच, बनितयतन का बाँच समा संदुनित अभित का न्रान पुरुच को बपने में बोने अप्षा हे। प्रमनित्ाणफो में नादा बौर उकी नाण सत्नों को चहु भंड अं की भईं हें दोर का नया है कि एमी द्वारा नामुड डौकर बल्ना परिमित को भावी है। एम नरिमिय बास्ना सो बण्तु जंता दी नरह हे और तकत एब मंसुषों को
१- ह्लफोर (नान-4) पृ० १११-११७१- पही १ृ० १२ * सम्हर ब्म(नान-१) १० ४ः- /१- सनरक्मनिका विपहिी नाग- ृृ०
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हन्तीं मुंर्गों को बपरणरम में स्वीकार कर पुरुच अंगरी
विगनव नहीं है।
எணண்ண்எணனீார்ஜார்ரச்
उत्यधि मानी नई हैं । मे सल्मों का यह अतति बकिमा निवरण है। बदरं कुलम के समूछ सल्बों
यम एवं नाद ना मी प्रतिवामन बुचा बानशय हे कि शरे नक सूड़ से कुतत: कुल दल्म की और भाया है।
का विवार है। नदी 'प्रृति' बिसुद डोचर 'मायसत्च' में ब्ीन की बाती है। 'नादा के पाल प्रदुल पशनाकिय के सनी भुणों की संद्ुंचित कर बेते हैं। लवीलिए पुर नखर में बानर परनांिय की अकित संदुंनित को गाची है।
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इम तल्नों हे परे नह कुरकर तल्न में दाप प्रत कसता है नम पुरुच बनने की
சசணணர்ணயளீாசணா फूक बार नान शोता है। नही डनित बीर अभियनानु की सुसमृर्त्ि है। यह
यरशं पहुन कर वितायु नफी बशियत्म की परम- सि में डीन कर बेहा है। सरी सल्प पसमसिम में कीन सोकर निम्मय ही भारे हैं। कही भुच नदील सपा दती का महन अपम है।
அன்சியர்ஜரனஎஎ்னt!ஈ दोदों को गुई एवं तसरी किरणें, बन्मि एवं उचरी बर्षियां तमा बानर बोर उसरी तबरों के बुल औद वनिम्म कप नाना गया है। यै सिए की अनयिम एवं
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उमका की परिमित कम के, भी भंजों एवं पों से बापुष रवने के सरण वरने 台 市 請 專 現 さ 11 日 ル 4 日 子 選 理 ர்னார்ர்ராண்ச
भान्य सत्य के पृत्ि नाडीन दृष्टि सपकमा नाकि बोग। ٠
…i,t4mwtttmmnm き 액
कि तरह एक पूर्ण किाय मुर के सी क एवं नीआादि लों का किगर उसे अण्डे के शांदा हे और भूर के बण्छे में की नूर के अंग एवं संहें
ஈர்ணன்ணக்னி -
-்: Thee Te- so go m
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भरसा- प्रयमित्ञा कर्जन में समरकता के विदान्त का ए विशिष्ट स्थान है। सम्कर बन्त में जिया है की सभी ब ने निलार लरका को प्राम् बोधी हे बर ब्ुड तमा तस नही में निसी क्गार की नी पुकवा या मिल्ला नहीं रकती, उदी प्ुार का बरमा मस्नास्ना-्मातु को भ्रान्य वोकर पुर्णत: एक् शिन्द हे बाता है, इये 'सानरस्य' नकते हैं ।
नवदू) बान-सित में विवान्कि माने पर की योनी को अरक्ता की स्यिवि
नरक्ा की स्वति को पम्थ होते सी जिस में बेत के पृत्ि उन्मवीनान कात्रक शे बादा है कमवा पुर्ण बबेत को भ्रान्त को बाता है। थाम की बभिसुन्त के कहा हे लसखर के खुतानस्मा के, क्योंककि कद स्वित्ि में पुहुंच कर बौगी के फिर का डेन नहीं रखवा बौर नद वहन् नानन्कमर शियम को बाता है।
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क्योंकि सैवरीयोपनिचट् में डिवा है कि वानमय ी जरह है। वानम्म वे सी सास प्रणी सत्कम होते हे, अत्कमम सीमर बानन्ड ने की बीसे में सभा एम डोक के प्रस्नान करी दूए बन्त में नानमम में की परविष्ट हो याती हैं। हन्माशेन में बयुवरावस्मा के अनपतति नानम्म की प्रा्षि हाना जिया है बौर फशबा नवा है कि सिए की बिल शकत की बाम्द स का स्टरन भसी है। एम बानम स्हुरण करने पाडी शक्त की आनन्मन्यनित नहा मया है, भी डिम की प्रान पाच सनितयों में से एत हे और मिली द्वारा मुस्य में नाननद की मष्यस्पता या कटस्का दूर को नाती है। और उसे द्वारा व्यक्ित के मुखय में बानन्प-सम्फन होने जक्षा है। य्ृचनित्ानती में दिन को विवान-पयन पडा गया है और चिवान-्कय कम डिकन की भ्ि ही मोस की स्मि मानी नह है। अभिम मे सों के ल मान्दवादी निवारवारा को कमने साडिस्यिक पुष्वों में नी पुणति: स्मान पिवा
संज्रीय में अधिनततुम्त के सनुवार 'रत' पद अम्मारम और साहित्यिक उत्कर्म की मदान सम्मायवानों से सौचि हे। र का परियाम सातियामन्य-मवाभ के फिर वाकशयक शोमान के रम में है। एव और आमनड की स्मिडियां खवीपर हें। हम रोनों में रस की ब्तुन बर आामण्ड की कीर्योवर सुाअृति के म्म में बनुम मान रहतो हैं। गोगों के नम्म नप कम्यल्य अपन्त नपुर और सिनन है। बहि इन्हें सवयोनी बर पुसतु के कम में सीकार किया नाय बो बंसियोचित न बोनी।
•: सब्कर बर नामा्य बनततुन्त की सेप प्शानि दृष्ष्टि - जैन पतर के सैहान्किक बसा के निवैशन के अनन्तर यह विवारणीय है कि
लि भरणों हे कमा सतत्ब को कक नात्र जैप कजीन ने की सम्मन्भित मानने के शिए वाच्य होना कह़ता है।
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व्वनि काब्य का प्रागक्त साय - 'र
ஸண் ்ன்எண்எரீனேன தாசர்: எரி ன்ண்
का परिषय देते हैं नहि्कि अपने बारशनिय मृष्यों के व्याल्थान में नंगर बाभि राँ का हल्तेब करना नवीं पुण्ती।
मथबावास मातरी रव: 1 डौ० प० ५१-५२.
ஈராணரா: சோ:
ச் வன்னாயிரியா மணர் ன ரள்-
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- 출 대 N 호
सोदर हे। वियय, बाहमपरान् या बाल्नासवाद का नाच्य मात्र ासा हैलसती
नानन्कन ही है। भाब्य या बा्व के माच्यम के नानन्ड की अनिव्याित सुन वाभाचिक
मुम्त की खाजतुति पुन्िया को नानता होना। बभितसुमा के बयुसार र-्प्ृप्िया
नाट्यपडी बपमा माम्यकतर की वेंश में परच्म के विभाननाय द्वारा बुज
रत्यादि और काच्य द्वारा वर्षिति निवानुनान आादि के साम अाम बोंने अमर मै ஜ்ணீண்எண்
*ै- प्राता के जिस में अ्रुच्चावस्था में इंसर या वाजारं रकी ही कोई भी प्राण
पृमसर माता का चिव नागोकिय वाचा के निशिष्ट होता है। मे बाबारं कापि होती है। बासि, देस, गाड के व्यपनान होने पुर मी वाजाबों का प ना रकाहै
इंसकार वोसफनात इति- बाककी,५१-)वभिसुम ने का पंकित को डो. २१
बाकार(ना इससर) मखाबी है, ये ही विनायाकि दारा बानृव होने पर स्थायी
मुर्णस्पलम परा काच्छा केव म फानम।दैद से बगठे पृष्ठ पर
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शोता हे निलें प्रवावा नीवनिम्न चौकर प्ाद में निवनिक् ननना बीन ह बाचा है। यह स्यिदि हनारणीनरण की शोंची है। बानारणीकरण रवानुज की
तान सानास्म्य भ्रान्म करता है। इम सम्मकता में बोने वाठा रमांथ, बैनन्मर-
वर्म, बपीलन, दान बर मोस़ का पार्बि्का कुल कया्ड़ हे । सपईंस र-पक्रिया का विश्हेनण करने पर निम्मशिकित वनुप बामने बासी ١٠
बानन्द, परमनोन, पनचार, रसा, स्वाल्नविवान्वि यानि अष कनायि हें।
बपदा निव् के हम में अनिकमत अनर सकु ि भरी है।
बुवर सोती है ब्वाबि नेे मृष्ष्कि अनितिरण ना की इन्मैच है, जी मस्तु भचछे दी उभी की मात्र अिव्यन्ति बौँती है, कौई बाहर रकने वाडी नवीन वस्तु की
(1)- बढो शिवालमा कात्तारानरमवयि: - । डो० पु० मं - वुनानकिनानानमों मवाचहनैम सम्मवी मवनमुक्तवा सहिमाबानुमावो चित नितवृचि- माजापुरव्िल्मनिदान पर्वर्वम्ानोनरीडनी रवात्मा स्कृरति। शोनुल्
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उस्यद्ि नवीं शोती। ठबी फ्रार रवाुवृति के सनम फोर्ड नवीन वल्तूु नाबर ने எர்ள், எணணச்ணைரரனளர் स्वनान बाम्डू है कही की नान बनिव्यनित हाती है। उत्पत्ि,व्लुनिधि ना
சனர் சாண நராடவர எ पग्रिया को व्यापृत किया। विद क्रगार वानमन्ति में विभान्ति मान पर சர்ன்ணஎரன் ரா்ர், ரன் बामुस को भाता है, यानी पुर्ण अदेशस को प्राण्य की बाता कै, बडी फ़ार रातृत्ि के समय सदुचय प्रवासा की नी स्यित्ि सो बमती है। सतुनय पुतावर विशिष्कता विनावस ननणदेमतों के रसियि डंकर बानारणीपुस के भाता है। ள் எர்த ், எ்தஅர்ர்னண்ண்
निम्मतिवित सयुप भामने बाते हैं- सासमार का अनिरी मरबिय निस नाखा फवा दी को कचा हे कबी प्गार गव्यापुतिल के बम्बाड के नारण्म चिल्सा मर रपी कर्मण निक हो नया
वमिसतुन् का सुचय को भिनक पतिमासाडी कततो हेैं सो इपके सान डकडी हिए बंनिरी इबब्द का मी प्रयाम करती हैं। उपका अर्ष यह है कि समुखण की
इझमें नच्मार्म को कुषण करने की 'मानवी सासाल्फाराल्यिलाइननिस' रोती है। कपा शंत के सरा का पाच्म के विनाणादि का नानव-साजारर्कार करने में समर्य होता है। और नियानरनियों की नानकवमभुरवों के अपसा आकारतू नदित थाते हुए
है- हलपनि, सुमिति एर्वं मुकि नाको ना्डे बाचारव कुसः भटकोल्साट, नी अंतु एवं
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खानृति के शंक सर्मुण्म का बफक कौसा के रैवर महुनायम का भ के विम्तु बनिसुष्त की निम्यन पहति में सथ, रबू बर ननु का स्काम परिवर्सित ச்ப்ிணரஎளரீ்ளினிண்ரீன4 स्वीकर किया क्योंकि कारनीर डैवामन में से जम, प्िया वया नाना की ददुंचिस
எ்ண்ஒரண்ண'னண்எ
रानमृति के समय मी नही स्यिति शोती है - पिनाणानुनान के बहैचन के बगन्भार
औं - विवान, बुनाव, व्यनिदारि शादि के अंगीन से सतयादि स्याबीमान के fmaSiOtI रव की ब्न्पता को सने बामृस्युने परति्ित निया गया कि वाच्ार्य गर स्वाशुत्ि के बीम कोर्ई बाना नह विष्म नहीं स्वीकार किया नया। र
சா்சாா் எர் ர்: சார்: - சாிளா . &
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कियी कुगार के विष्य,हे नाभित नहीं शोता।
बाड, नाल्य बर पहत्न कम्बन्भी बन्म शानों के कर्पमा मुक्त को बाता है। पावा का प्रनेव से दूर्ण यादारम्य की नाता है। श्ही काम वानयमनियु का स्करण दोता है। तन्पवीमाप की स्यिति बार्मीकर की, बात्मस्वाद की सयतत है।
மரர் எணசர்னர ாள या एक कमन्त वहीफ़ स्वाशरण स्वायड हे। एम एक घट का फ्रयता कहती हैं। मट लारी फसूरीन्यिम पर ड्रविक विय कॉभर हारे मानव-मदड पर उनसििक னளிஎர்தய. ர்யளக
गाता है। विभय भी यह बात्माकारा परिणाति सें बम्पीनवन है। ए कगर எணரர்சணணஎளர்-னஎ்ணைீ் !எட के अदम में नाच्-वियय की समलम-दुष्याकार परिणति ही सन्मयीनान है। हम सम्मवीनान की सविदि में नो रवानति होती है नद थाठोकिक ननर्कार भ्राण हैं। बानन्यकरन ने भी माच्यमत सौन्दर्य की व्याल्या कको हुए डये भारसार रम नाना है। इपवर कपत हे कि समुनय की जिस् वस्तु के सम्बन्न में नवीन स्कुरण्
१- हद द पहो का स संनौति को5 प: ? नीव स्कुरणं सम्पाविष्ट: पसानाकन रर, किमयपाय् - रममंनाबर का सारत्रीय अ्यवन-मृ०२०२
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का प्रचम हो, बास्याकनम नान पड़े, तस बस्तु की रम्य कहा बाया है, बपातू विभनम्मरा में जो बौम्कर्ष है, विननी पुरा में नदी सरकार है। बौम्दर्व नस्तु नर् हे और पसमृति बासवाद नम। बनिस्लुन् ने की सरष के पस्कार की स्यम्बति पलनी है। ए साँ 'फमूसार' - दिलें पनस्' इन् बिल्लव माच हे बीर 'बार' बैलना की अम पिवात के नूूच ना या पुकिया का। कवाति भी कवारी कैनर की तल्दा निल्लाच कर हेता है। और दुबरी - 'फ्स्ू' की कृत्बतति' कमा' हे स्वीकार की नर्हं है , पिकश बर् हे नोम या बास्वाद अम वानम्म। अ: 'नसू'का वर्ष सुसा, नियी विवय का विवैच कर बौ-्दवर्यित ना सस्यारमक बासापमय नानन में इम्मव होना। बभितमुष्त ने दोनों कल्यरियों को स्ीपृति दी है। सनभी माला के बुवार पसकार स्वाल्पकिया्ति की स्मिति है। कह जैलरा की एक विशिष्ट बपस्पा है निकें निर्विष्य आस्वाम गाता है। प्रयनिक्रानश में सस्कार' कर का प्रवीन तमा मुछ्र नैसन सहभ के लिए किया गाता हे की बारमा का पैल की बड़ से नहम भखवा है। अभिसुम्य की 'परानिंहिग-किरन' के बुवार कसचार का सपदा बनान की कता है नौर सदुरबतर कसकार के बमेड, भानियय हे। इ्यांिए निस्मा बुडब प्रजानन्ड अपवा सव्यानम्द मे कान्त मान का बम्याषी है, दरी अशिकम पन्कार का स्वाद
र-(न) कफरो हि एति स्ाल का यादैस निन्णन। एवं अुंवानालन नतर्ईं, करद करौति संरममे कििवनि ना्यवानुनानति ।ि्ट् रवि
द्राितं एृषयं वस्मेन साताI Achals 1 ARAA P.73 पतिशय-
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का कही वभिाय हे।
எண்ர:பள்ாளர்எளளன்் चालना हैं। निमान्ति का वर्ष डे - बंाबिषु विशान्ति। रवी को बभित्सुच्य डाब: लनतविद-विभान्ति मी कहते हैं, और एस बंकिए विनान्ति का कृषरा ஈஎண்ச்'ணன்ளார்பா'
मनस्चारं' का कर्मे हे कियी अन्म की बपेस्ा न रहने वारें बपने ही बाहमस्कम में निवान ना बाना। वहा दृषियों का बष्िती बतुनाना साथ हो बादा
हम रनारकता कवरमा, भी पोहन कहा है। उमयुंचद समूरों के यह त्ब्ट है कि रवास्वान बौर प्राप्वाद में सापृश्य
१- कशयारो हि इवि स्वाल्मनि अन्यापेसे नियमेणन् ।एम मुंवानता समं फमर्म, सदेन करौदि सरममे, विवति न कपन सयुमावति -- - सदिति
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பச்தனர்னீரானஎறஜக் எண் विशल्ान वाषि बाबायों के कलन से बँती है। बापृश्य में साकर के काम
की लना। खालाद के प्रापवान ने भिम्न कोने के दाम की साथ,उससा
तेन नाश्य तमः व स्वाड दुडफी यौनिनिहि न: ।।
எள்ீர்னீர்ணன் நளணன नया है नश सकीति को 'दुल्ताविक्म' के मुन माना है। इसे बतिरिय योन एवं काच्य दोनों के आानन्य के स्मय में नी अन्सर शेता है। बोनी की करगर के होते हैं : नियोनी एवं परममोनी। नितयोनी का शान वटल्य एर्वं परसनेक्नाएमर पौँचा के, ल्वफिर उलमें स्वास्नस्वा नहीं दाची।
家 二 著
x- ute yo er-er बम० स२
बभिनयनासवी नान-र पु० २०
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. सवी प्र परनवोनी सी बिचयों के समरान के कल्य बौकर झुछ सल बाल्मर ननद को सकन इसता है, स्वखर यह नी बीमपर्वरजिय शेवा हे। स्वास्वाद
विनानादि दवारा रत्यादि स्नानी नाय के कम में असत दोती हैं।
• अनिकलासी नान-
va or A Jestaette
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स्वं्टिए रसानन्द की प्रतानर नहीं कलती भिन्तु, उसरे कमुशन सनीकार कही हैं।
無 を す ポ ( 酒 き 声 ) す 育 著
मध्यकती है, यर विचयानन्द की अपेस्ा बचि सुट एवं विन्मन हे और क्रतानन्य எணஞனண் !! वभक्तुम रव की वानमकम ह नानी हैं- एक डय नर रव का सुए
शी उनरा रुम हे समा बह पर्यम्र स्कय एर्वं फ्तस्लावी शौती हे बौर बानन्ड ாசனபனனண்ள்
मानी हुए, मादल्व की की दुःत का प्राण नानी हैं। स्वालान के सणा में सूल का सिह एकम बविधि में विलान्त शोवा है, शल बनी एव बापन- रम धोते हैं। वनिनतमुन्त ने सुचूय के मुल्य की स्पन्थन सक्तयुल्त माना है। यह सन्भ
*े वाहस्यूर का परिवार सेकर मुलय की की उपन्यान अवल्मा कोजी हे,उडी -
वानसकि: लोक्ता का: सदुसवो का: । - बन्ताडोक F।र.
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बैयक बकने बुनिकिय के जिए रवि डाफ बादि संस्फारॉर स्वाबीमानों) का ब्यापार
ना: परम सर में व्यपक तौक की प्रीति या फ्रयस् बुन नहीं ண், மணந்த ீர்ள்ிண बानकुल बारना का बासमाद शोता हे, दो सह नानभान है। काच्याराच ன்திராரச்ளரன !!
बाशास्कार नाननडक् स्वानतृति में प्रतुण कखा है, काः भाब्य में नाव के गैलिक स्वम्य का मलूप नहीं, नान की एकड (पहालम) बनिव्यनत का ही मसरद है, नो समूरय की व्यनिकक्त रा्नतेच सै कुल्त कर बात्मानन्य कम रह की 日 消 部 一 1 身 当 月 司 नो बारमा को पशम वानद रुम मानता है। बनिननमुन्त ने शी सरों का परवस्ान शान्य एव में सी माना हे, बस्ी
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எணாணண்்ளளீர்ான்ன்
होने पर फिर शन्क में सी जीन हो गाते हैं। स्वासिर ली सों की फरति शन्भ : நணாள்ஈர்ணண்
ாகலர்ணஎண்ர. बाकर का कह इकम हलकन्मम्मी सनान्म बारणा से बचिक उवास एमं मष्म है।
१- हम लंरर्ना सन्यपाम स्वास्मादो न विययेष्यां विवाकार. सन पुनिभितनाने सु शान्त ए परीकी ।। शोन्ृ० २र
सम्द्वकि को बाकर हे यह सौ कौफिक है केो स्वाबिष्ट नोयलन का बास्माद होने पर रक्ना बकित वानन्द दोता है निन्तु काच्य में जो वानन्दाकृत्ि
शरीर वो बृपतू गौबर है। न कफ डरौर में बार्मातम रख्वा है सनी तक हैम य बारे वृष् पर देशिक-
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சன் விாஎசர்்ன
बौबटू की सवणा का नौबर नानकर रसा की बलनिकका कर पतियाकन करती हुए खाक्द बीर आानन्द में सापृश्य स्यापित किया है। (t) o mל a rnr . yer f re t 1
(पख के प्ंगैचर होने पर नी उससा बनना बैशिब्ठन है।
ணார்ளர்ணர்ன்! (३) डान् सा क रवों का मुड है।
அணண்ணீனாாய் नाने पर बाल्मतम की ड्ेच रखा है। बह: बाल्मननित को यूस दोना नह
सी रेवा र हे चिलस स्वाबीमार बाल्मडुड, वाल्नानड, बात्मरवि दम चोता
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एपा प्रठार बभित्तुच्त ने पकछी बार रवाल्वान के अशतयत फ्रश्न की दुड् बाडींक पीडिता पान की। खास्वान को जैवावेब के बाचार नर कननननि
क आत्मेपरक सवा का नन्टि बस्मान किया, दुबरी बौर बते-विदान्त के
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अ्वन्यालोक के परिठ्रेशण में डोचन का मुल्यांग-
ववान्त कही के संत्र में स्वाल्पाता औराणार्य एवं रानामुन की भारंत हामित रेत् में आानार्य अभपयमुन्त भी कैक व्याल्परकार की नहीं, परतू मौडिक पिन्य नी हैं। इन्होंने व्यंत्चाडोड का अतिविस्तृत व्यास्यान करते हुए बान-यवर्मन के बिवारों का कया परिमान दिया है, चिलग प्रवाव परवती बचावों पर भुद्र- उकार से मी बनि पड़ा बौर नह निस्संगेय कहा जा सप्ता है कि परब्ती ध्यनि-हमपुदाव वभितितमुम्त के परति बर्मित निष्ावान् रहा, वानन्यववी के पृत्ति पम। वानन्यवर्मन की अपेक्षा बम्मिनगुप्त को बिकि परतिक्ठा मिक्ने का बृछ शरण उनकी अोमन डीचा ही है। वस्तुत: यश टीचा इतनी फौट एवं बैडुम्सुणं है कि अम्येता की रेश प्रतीत होता है कि कम्पूर्ण व्यनि-विदान्त की बटिक है। जिसे शरण उकमें रेही बारणा ही नन नई कि बिना 'शोमम' टीफा की बैे स्यन्याठोक के डीप वर्ष को कहीं सका ना सया। विन्तु यदि पैसुनी म्य्या- लोक का अध्ययन किया नाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यनि-सिवान्त में कोई जिखता नहीं है। वानन्यवर्वन का सिदान्स बर्पचा बरक एवं कधु है, पटिक स्वयं कोचन डीपा है। सयरनि बभिनवमुष्त नपनी कोचन डीका की डाधीता प्रतिवाचित करते हैं- रपिं होष पिना होको माति भन्दिक्या पि हि। तैनामिनशुक्तोSन शेपनोननील - - वयपि यह डल्य है कि 'शोनन ' बानीन' को माड्य बवाता है,सयाधि बपने हुद रूप में नहीं। क्योंकि बंहोनि बपनी अभिनिव वास मुच्ता अंग से री है।
१- सष्न्य - डा० मण्छिता प्रार शुवछ का जे :- # What Anandavardhana Meant By Dhvani? J.G.N.J.R.I. Alld. Vol.22, Nov.1965. - Feb. 1966 P.13-22.
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अवन्याछोड को बबार बनाकर तस पर जो चित्र बंकित किए भर, नसें ममुलत सुस उमके अपने हैं। बस: प्रस्तु अण्याय में,लोधन में स्थान-स्मान पर अंकित अतिन- भुम्स के स्पतंत्र नतों का पिवेयन वमीष्ट हे।
क क रल्ेब निवा हे और विवान मृल्त कोने के कारण तस् ध्यनि के समामम शो निःशन्दिम्य एवं पुवाणित एम से निवेनित नरने का संगशम किया हे शकत्तु स मुल्य विचय-्वनि स्वाम विवेधन' के पूर्व वृमिता कम में ध्वनि के प्रमान सरय 'प्रतीयमान-वर्ष' के स्वरूम एवं मश्ल्म के विवैयन में (ब्य० ११२ बे न्य० १११२ तक) पूर्ण बंस्न के साथ फ्रमृष होते हैं। अंगोल से ने दुसरी की कारिका के एस क्रकार का उपोद्पात कहते हैं कि वह प्राय: टीकाबारों एवं ामान्य पाठों के लिए प्रशाल हो शी बाता है। क्योंनि वानार्य वानन्यवर्णन ने व्य्थालीय में एक- ए्यह पर विभिन्न वर्यों में बल्मा कर का प्रयोन किया है। बाचार्य बभिसुम्त में मी 'बाल्मा' पर के बनैक वर्म फिए हैं निन्तु आनन्यरणी ने जिस वर्ष में पाहा है, वभतिनमुम्त उद अर्ष में उककी व्यास्पा करी-कनी नहीं शले ।परिणामा: व्िान् में मतमेर हो बाता है। वात्मा पद के विभिम्न वर्ष - "मन्यस्वास्मा ध्यनिः' में प्रतुण वात्मा पद का अर्य बारमुत बंद के अतिरिकता स्वमान, स्वप दा प्रगार भी है। (१) बदि 'बल्मा' पद का अर्प बार-बंत माना बाए तो बाब्यस्वाल्मा ध्यनि: का वर् दोना - व्यनि अयांसू नाव्यविहेन, कान्य बनातू काव्यवामान्य में बल्मा अमास् बारम्म शोता है। बसका सातपर्व वह है कि अ्वनि' विल्ना बाने
१- प्व० १११ र-नरणेम में मी कया गया हे-वास्मा कल्नो पृतिदुदि:स्वमायो इरत वर्च्य थ।
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ீ்ரரணபரள்ன்
पाता है। यही वात्दर्वं या 'कच्यास्वारना व्यनि:' बले का। ்னகணா்ளடர்' ேடரவஎ் हैना ?
சாக:எணாணப்ள.
भाच' गबय ही नहीं होना। नब्य का बिन नात्र एह वाला। लीझिए - (२) वह बात्ना' इब्म का स्वमान या स्वमय वर्ष भी माना या कम्ता है। कयादि 'कच्मस्वाल्ना -्यनि:' कवने का वाएपर्वं हेना कि कान्य का स्वमान था स्कम ध्यनि ही है। 'बात्ना' इब्म का स्वमान वर्ष में वानन्यवर्णने ने व्यम्पाओन में
इ मलान:) काज्यनिति न्यमनेडी नंक्मवाम्याड व्यनिरित्युत: स्यादि।
मैजे हुरसनमी पुकनित्ा सन्नी कदमं सनु:।
सोडनं सल्पार पनापविा मोम्बोडस्ु नब्चारनान् ।1 ब्य. पृ० ५४२
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() எடுச-ன்
पर का कर - पुाणमुत या रवसूत काम है। कर्परूव्यन-नाम भा-प्राजस सल्दहे। बवदि व्यनि भाब्य का डागमत तरन - सूरकाशाब्य, व्यंम्बाय ह। सा प्रगर 'सच्यस्वारमा व्वननिः' बर बौऽमः सुनमरसाध्यः भ्राब्या-
गगनामान्य का बारकष रक व्यनिनताब्यन्तिय हे कमना 'व्वनि' नाथ का र पुगर है। बर उह व्यनिन्नाथ का डाणमुव नतम नंमयार्मं है। वश बानन्दवर्गर का शिन्न हे।
भान्य शे बाता ध्यनि है। पुरः 'बोऽपं: सनूयरटाब्मर काज्मातमेति न्रिय-
४- कुकवा इगल्ानो ब्यंग्बोडयाँ म्यनेरारमा। नदी पृक १सह
सरन के बसिरयिता क्वान,स्कम या करकर मी होता है। सनी तो दे ध्यन्वा-
'भमसवातना व्यनि:' में शुण 'बालना कर का अर्ष- सार्त के बविर्यत स्वना स्वान दा नुसार मी ही कर्ता है- एस समून की बर उनका ब्यान नहीं है।
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/8 年 91 中 11 州 理 间 • 司 譯 दसे के विन्दन में विरेयानाय प्रवीस दोता है। कयोंकि बातना ती सा की
वास्मा व्यनि हे या ब्यष्चाम ? बन्तत: दोनों को पयान कम मान ही मैं और शवी रुम में हम दौनों को 'बोप' में रकते हैं। पसूख: बनियमुन् की डाचा डीर की खुला का कुछ भारण म्यनि और ज़रीय्मान-वर्ष में हैकव की प्राम्ति
ध्यनि बोर प्ीयमानार्थ का पाभी -
इह म्यनि भाच्य का पाणमु करम है। यह बाननयवर्मन का बीनान्ता श्िान्भ
...... w תe wfw ...... 'wwY u वनिनतुन्त का हहे हैं कि प्रोयमान नामत व्यनि स्वब का निल्मण बोँने पुर
'मार्नः इन्ो ना अमर्ष' सतयानि को क्वनि की परिमाकर प्रतिपादिय की नई है, म पुरूुका ही वाली, दुतमा हे बाने पर मी यदि दोनों भारिणाबों में प्रसुका समूप कमान हो धम फोरर आयति नहीं। फिन्तूु, दोनों कारिणायों में
१- स्यनिलस मे ज्रीयमानालपे निम्पक्िय्ये सयादि। शो० पु०१२
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प्रमुन्त तकूय फिन्न है। य: दोनों की ध्यन का स्पश्य मानना सर्पमा नईसा है प्लॉकि एक पस्तु की परियाचर का एक की स्वाप शौता है। चिन्म कि्म भहीं।
रवी दवान का बार नंत हे बर प्रतोयमानाथं स्वनताम्य का बत्मक ना रवबतूय- सत्न) है। तम एक प्रसार की झंगर का कोई अपवर की नहीं इसतर। वभिवनुन्त दो यह करी हैं- प्रतीयनान नामम व्यनि सकम सस्यादि नह सर्नदा प्ान्तिमान है। इदने 'एम व्यनिरैय ..... इम्यते" की ब्याल्मा ठीक नहीं की। वस्ुखः कम० ११र वे च्य० श१९२ तक का नान ध्यनि की परिनाच के पूर्व मुमिका नात्र है वो ब्वनने के पाणमूस स्यंम्वार्यं का परिच करा रा है। य: प० ११र हे प्य० ११९२ तक बरयप्चार्म का निवैन व्यनि एमप को कतिचित करने के चिए ही किया गया है। आनम्पवर्मने ने सवर्यं च्य० १११२ के बन्त में पुरिनान में कहा
(वर्ष स्- वाच्य से अतिरिक्त व्यह्रचार्य का सद्राव प्रतिपादित करके, "प्रकृत अर्थात् ध्वनि-स्वरूप में उसका उपयोग करते हुए कहते हैं।) 23 काः य निशिकता है कि ध्यनि बर प्रीयनान मि्म हैं। इपके स्वाम की परस्पर निकन नहीं दाहिए।
श्ीयानार्म ना ब्ंग्यार्य के जीर े है - (१) वसुष्यंग्य (२) बगर चंमय (३) रवादि च्यंच्य
(२) ज्रोयानी कतीमेड: ड्राकुपक्ि: - नही पृ० ४६४
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१५२ (प्प. ११५) 'भच्यसवात्ना व स्वार्म:' हतयादि का को व्वाल्यान अनिनय- मुभ्त नें किया है, उसनें कुछ कमहोंने बपनी और हे नी बोड़ा है। सपर्मं कोपन की निम्मकर्णां इष्टण है- र सोति प्ीकापाजेडनि क्ान्स दुवीन एप रम्पनिरिति नसन्मू ... तैन रस एम मस्सुख बाश्मा, मस्स्पततसथ्मनी तु सर्पमा एवं पृत्ि पमस्मेती भतति बाज्यापु्डृष्टी वानियनिट्रिायैण ध्यनि: पष्यस्वार्नेति बानाम्पेोजयु उपयुंक्त पंक्ितयों में अभिक्व्तुन्त मस्तू, बरजगर एर्म एव की 'स्वतिं' कम रवे
को नाच्य की बात्ना प्रत्िपाकित कहती हैं। नि्यु वानम्यनजी ने समपूर्ण चयन्चा- कौक में नहं नो 'बस्तु बडार एवं रसं की 'स्वन अंदा नहीं दी है। बत् ब्ंग्वार्य' संहा दी है। बर' नंग्वा्नं' की व्यनि काच्य की बरमा गानती हैं, रसव्वनि कौ नहीं। बसु रन्मग्य की माच्य का प्रमाननस त्रम माना है। श्रीकान के निषिम मेों में से नस्तु, थाठंशर एवं रवादि व्यम्य में हे रादियाग्य का व्यास्यान वभितमुम्त दुक चपने हंग हे करते हैं। स्वानिब्यंग्य का परिचद मेते हुए आनम्मममी कहती हैं- कर माच्य की आानमुष के वाभिम्त कीकर पणकित सोता है। वद बाकारतू इम-बादार का विनय नहीं है। बर्स नैक नृंनर बदि सच्ममाज प्रतुख्त हें बर वितावानि का पत्िनामन म हुदर सी, नर्वे थोड़ी नात्रा में नी र ज़रीति नहीं गोवी। और बनि स्न्य का बभिनान न की, हम नी जैक विशिष्ट चिवाव शदि हारा रानदि की ज्रीति दाँधी है। य: रवानि बनिलिवरबाच्य) की शममण हे की बात्तिय्य होते हैं, न कि बनिनेकतम(नाच्कम) ।- यह बागन्य- नपी का विहान्न हे। १- लो. १.८४ - 54 (ii) यहि अगन्दवर्धन केीं वस्तुध्वनि, अलद्रारद वनि या 'रसध्वनि ऐसा प्रयोग करते भी है तो वहा 'वस्तु, धनि वस्तुधनिः अल कारघ्वनिः रसध्वनि: जा'- इस प्रकार का ₹ () भनपाम ब सवार्यः ग: । पध्यमपदलोजी समाप् मारना चाहिए।
(३) बपे कु्ण क दाननपयमी में डा० रैापसाय शिवेदी ने या ल्ष्ट योचणा क दी है हि स्मन्माशोड के अ्येदानों के बारा बुरोय है हिगै ल कप ना बकला संत्र रुम ये करें। इसके डिए समाच्र लोपन पर निमर मे रॉ में सवयं एक एपक पर स्वािस बो गर हैं। मै जिसते हैं-
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माकम का कम प्रसार सततमरण करते हैं चिलों के स्वयं बननी की बात मुसवर
रवार्दि का मह्य - बंम्वार्म के प्रमरण में मसुब्मन्य एवं बणगर सम्य शी कपेसा रवादि स्यम्य की प्रान है। बाननयवर्पने स्पर्यं स्य० १/१त में नहती हैं- गव्यारना ह स्वार्म: सयादि। अवाति माब्य की बरना नही (रवादि) व्यंम्वार्य
बस्तु व्यंम्य बीर बहर न्यंम्य। बौर धामान्य कम के ब्ंग्वाई को अ्यनि काज्य
मैं पकते दी नहा या दुत है। वमानि व्व० ११५ में रल्नावादि को विवेय कम है उकी मलता के कारण प्रतियाखिह किया नया है। यणा-
इवरमें से को रसा नामक ध्यनिमैम है तम पर और बचिक ध्यान देना गाहिए। की व्यनियों में कही कर व्यनि है किसे नसुच: नाच्यारमा कहा दा लता है। सरयारि
नाननमवणने ने बल्चू, बगर बर रवादि को व्यन कर नेर नवीं बसनू च्यम्वार्य का मेद कता है। व्यनि के भेर ही अियशितदाण्य बोर
पास् नहीनि व्वनितिण्य में स्वब्यंग्य की परवानता पतिपाक्रित की है।
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पर रलाब का बनिदिरिाय स्वादि' ने है। दुसरे एय पर वानम्ययर्वी शक्षते हैं
गोती है, ए्सी बसुसार सौन रव बंष्य की भाज्य की वास्ना ना रे, य बानश्यड नतीं, कररीं कहीं नस्तु बौर बंगर न्नग्य नी काब्य की आल्मा को
श्रीयानय मा ्योवडी पि रसनाभ्द्रुमीनोन्तनं प्रायाम्यात्- எஜ்ஜாரா்ள்ண ஸராஈதா்
விர்சீர்சளண்ாண்ண்ட்் क प्रगार बोने पर नी सथा प्रवान होते हुए नी रस में ही पर्यपस्रित होने के कारण
श्वी प्ुगर बभनतुन्त का ना है कि नान व्यग्य बादि के परवान होने पर भी ये भाच्य की बरमा नहीं नन साती। अदैन रस के उपलासक बांकर की रह
नौर नर एक बीमा सक की पुमान नाने या काती हैं। बर बीमा हे- रकमाज बाच्यार्च से प्मान शौगा। बा: 'र सी पन्य का पवानमव तत्य है, तथा वस्तु एवं अजठार, रख में ही कववकित हो गाते है'- बभिनम के एस कपन से यह अंग ही सभ्ती है कि स्यान को एक भाच्य सुसार काना बोर उम व्यनि वाब्य की वास्मा ब्ंम्यारय मानता दमा च्यंग्यामं के तीम प्रसार - नल्तु, थर्हगर बॉर रवादि की मागने की कया सांति है ? पूशन बतवा है, वानन्यवर्मी ने सीमे-्सीजे एस को की काच्य
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समपूर्ण खुसा ए काच्य हे बर उस साच्य के अहन-वाहम पण भी काच्य तंतक को
ணயனர்சளரனண்ரரணன
पमान हो, वश ध्यनि माज्य शोता है। प्रमान व्यंष्यार्म - वस्तुष्यग्य नी ह सप्ता है, अठशरब्यंग्य नी बर सब्बंग्य नी । कि क्रगर 'खब्ग्य के प्रमान छोने எர்'னஎணர்ளி்ள்ண்ண்' होने पर नी स्वनि काव्य कहा का कस्ता है। यही कारण है कि बानन्यवर्मर को रस के साम मस्तू, वर्लहार न्यंग्य नी फल्ा अनीण्ड था। सपर्च इनदोंन अतिविसयृव स्ंत्र बा्री व्यनि' को काब्य अं दी। यह बाद खथ है कि वस्तु और बंगर की बपेसा सच्ग्य बचिक मकतमूर्ण है। तकरे कच्य में विहैन माहल्य बाता है। स्वीडिए वानन्पवर्म ने खब्ंग्य का महत्य स्यछसमह पर पतियाथित किया है। (१) काज्यस्वात्ना क (रस:) स्वार्च: -(ब्य०१।४) (२) खाकिमथयंग्यतातपपिवेचा कुजमिति कनोड सानिरारमो न व्यनि-
(३) वंग्दर्वकपाने सिनतििविये सम्मकयनि।
अलगर की निकसुस भनच्य मान के कर रवब्यंग्य की अपे सर्मा कह दिया ाय। दवांपे नानन्वर्पने ने उय० अर्ड बर शशर की दृत्ि में रस का प्रामान्य पृति-
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(२) रसमायाबिविधयनिवसा बिरके मति।
(३) वर्मिन् रवो ना नावो या साए्पवेण परशाख। सुंत्यामिडिय नण्तु काउंगर र ना ।। गवाम्मनि स्वनिर्थ्यम्मामा-्पैनिवया:।
ध्वनि की परिमामा या आाण -
परते हं - ध्यनि का सपण बानन्यवर्मन कस क्रार पृतियामित
नहां नाच्य वर्ष अपने (स्वहम) को तथा मादक शब्द बपने वाज्य अर्ष को गोण (बपमान) बनानैर, उस प्रीयान वपना व्यंज्य-वर्ष को परवान रुप से व्यसस करते है, विसदृक उस माच्य-विशेष की व्यनि कक्ते हैं। काच्यनिह्वेन की व्याल्या करते दुए अभनिवमुम् कहते हैं - भाग्यंय सहि- श्ेमशनाडी। काव्यस्म ना विहेनन:। अवाति माच्य बीर उसा विद्ेष लह प्रार (कर्मारव अनाद) या भाच्य का विशेष कस प्रकार चच्ी तत्पुरुष बमार दारा माज्यविहेष'की स्वष्ट करने का प्रवतन किया है। विन्तु एस व्यास्या में बम बर नवर्मं की अाति कैे बैड पाएनी, अभिनिवनुच्ध को इकी चिन्ता नहीं है। व्वनि के नाम वर्ष -
मैं बान-दवर्तन को नैस माथ्यनिेय को ही व्यनि कक्ना वीक है, किर मी (१११३ कारिणा के बडातु) ध्यनि के पांच वर्ष नियक्ततो हैं- १- कार्पः इब्दी का सम्मतुमषर्मीदुत स्वार्मी। ग्पयक्: शव्यवितेन: ह व्वनिरिति पूरिमि: ककत: ।। व्व.० १।११ ₹- निन्यु 'ख्िेन' इबर का कात बाने पर कस प्रसार का विनह प्रायः नहीं किया बादा। बनिनव ने नेवस अपनी व्वास्था की अति कैाने के छिए यह किकव किया है। ३- वो या उब्दो का व्यापारो ा । अर्यौडनि वाच्यो या ध्यनतीति,शब्दे
शासिया हु ड्रानान्येन सुदब रम माब्यनो मुलकतया व्यनिरिति पृति- पाकिमु। गो० पु०१०-०६।
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१- न्यंग्य वर्प
*- माज्य अर्च
इबाला सव्यनिति क्यमेश्वी नयंसमवाम्वा्ु व्यनिशिपुण:'
'வி எணிள,, ர'ன் எளர் ண்'்
वामल्सन्मिम:' में बीन जत्म हैं-
ரிவ: கர்வதர் ஜணசன்-ரிவன் ரா अंवसननेति चंम्याडनि व्यनि:। यः बनिल के बनुवार व्यंग्यार्य नी म्यानि है। इनाला की ब्वाल्वा कही दुए बभितकुमत ककती हैं - सथम सब: इमच्यापार: वभि स्वालयु: बौड नि नय्न व्यननि: कम प्रसार च्यं्ा ब्यापार नी ध्यने है १- इणाला = पंजा बानार - सवनिवि = व्वनि काव्य
e- STe T T aif The Dhvani Theory in Sanskrit Poetics. में पू० अन्न पर किताया है कि अभिक्तुम्त निय प्रकार व्यनि के एम पांच ब्यों की निलशी हैं। इनहोंने कड़े की बुनतिपुर्ष तम एकों को भी डीवा है वहां से शॉक नी डकित दारा को गर। व्यनि के उन पांष वर्मों की सम्माचगा को सक्ती ٠٠ ----
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. अभिस्ततुम् का यद बारा बाद विवान वनानशय विस्वार पृीस होता है। और हनती एमा बींधसानी के सुमुूयों को डडेग हौसा हे।
भाबय में इन्दों के साम धर्म भी होते हैं। अवीखिए बाननपवर्म तष्ट कम
बवादि इननारन स्थाम प़ाज्य में नाच्य नाचड का बासिय दोता है। ना: नपन्क वर्णन के इस नाकय को स्यित करनी कपणा धर्म नहीं निकाखना पाहिर बा्िि यह पूरा वाक्य साभिक्रिाय हे। विन्यु अमिनसुन्त ने लदणा सम्कत कढ़के, क््येत चद नर विश्सेषण करने पांच वर्ष निसने का फ्ूसन किया हैससमें उनये बनुचार सब्द, वर्म और बयुपाय को भाच्य कह मी दिया नाय, किर मी भरशम उत्ता हे नि कर्यों वभिकि मु्य
के बनुसार एपकर बेतु यह ही सम्ता है कि (म्य० 1२) में सकुष्यों द्वारा प्रांलीय बयंम्वाम को स्वष्त्ताथ्य की बात्ना कता नया हे तथा व्य० ११४ में सब्यंग्य को पिहेम रम के माथ्य का डाणमृुत कहा गगा है। इन्वीं कप कारणों के बभिनम मे ध्यनि से ब्यंग्वाम का पार्षकम न मान कर व्यंग्यार्ज को भी ध्यन ही कह उिया बौर, बभनिनुन्य च्यंगा ब्यादार की ध्यनि किस युन्ति से नह रहे हैं ? यह एक और कस्या है। आनन्मवपनर अपने स्यनि खिवान्त विरोषियों को स्यान में रकर नुणवृत्ि सवादि का तच्छन करते हैं- (१) बन्दे वं व्यनिवकित: कब्यात्ानं मुणमृविरितयाङ्ट: (म्य० पृ० रू)
मुनमृति का विरोन करी व्यंग्मृत्ति करना वाठ रहे हैं। अः वंवा-व्यापार को भी क्यनि कह दिया नान। नही बान कर डायर बमिनन ने वंबा-व्याचार
The Dhvani Theory In Sanskrit Poetics To =?
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अमिननमुम्त ने तो ध्यनि के कमा नांगों वर्षों की दुष्ष् हषेतु नामयलीन हे प्ाण नी उपस्यि किर हैं। युछ नी ही, ध्यनि के कम बांष वर्षों के निचय मैं किर नी फिवेल है, कह सर्पया निमृडि एर्मं व्यर्म का फ्तत नातर के ।मां रिक बान-्दवपने ने व्यनि को साज्य मानने का फैस एम सारण किया है- 'चसाय सम्याय्' - दो न बयंग्य अर्ष में हे बौर ने ध्ंपा व्यापार में। वरयस सभ, वर्म हत्यादि को आकम्यवर्मने ने नहीं नी ध्यनि नहीं कया है। वत्ु य काप कौँ म्वन काच्य के न नात्र हैं। की मुच्य का एक पूरा शरीर शैता हे बौर उसमें हाय मैर, बांक,जान, नाफ आादि विभिन्न ंद कोते हैं दभी क्रार व्वनि वाथ्य रप शरीर ने ब्यंस वर्ष, व्यंक इब्द, व्यंदता ब्यापार वादि विभिन्न क हैं। न: व्यस उष्दाशन को ध्यने अंवा बेना के की बसस बोना की कि हाथ या डरीर के किसी एक बनबम की शरीर अंर देना। अनिबुच्ध के परवतीं माणायों ने अभतियमुम्या द्वारा प्रतियाित पर्वनि के नांम वर्षों को स्वीचार नी कर खिया। तन कोमों ने आनम्यवर्मनी से वचिक अभिनममुन्त को प्राण नाना बर एम पुसार वानन्पवर्तर के 'बादोन' को वनत- मुच्य के शोमन से पैह अपने बुद्ि कीचन के नहीं। व्यन्दाछोक के जितीय बगीत की बन्सिम भारिया (२11) में वानम्पवर्वन व्यनि का उपसंशर करते हुए नक्ती हैं- ली फ्ोदों में स्टुट रप से अंनिकृत व्यंम्य का अपासिव होना की ध्यने म पूर्ण भाण हे। पिम्यु वनिस्तुम का भरिम की व्यास्वा कड़े ही विभिन्न ज के कखते
नल्ालमिति। मानानमी इच्यानवनिति न्यायचालनं व्ंन्तू। व्यनि रार्ण पयरे: स्वर्मं पूर्णनू, दपमाजन या आम समष्यमेशर्ण प्राणं, तम्म
कृन्यग्वस्पा िवल सतपूर्ण म्यनिकत गमु।।(व्य. 1121)
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எ்ஜ-ண்னீன்சர்்ர்னனி
निःड्देह बभिक्तमुन्त का ठोकन ध्यनि विदान्त को स्ष् करने के स्थान எள்ன்க்'!
எண்ன்னனி
बानम्यवरी का व्यनि विरोधियों की सत्तर -
..... .V .. 'R! बिसुन्त एया बंड का व्याल्यान डीचन में करते हैं -...... संगपेण சசர்பாளண்ி க் - ணளரி !
पना ककर - वहीं पर फ्र्यैक कम की विययत करने अभितमुच्त आाकवार, नामवाड एवं बनिवतीक्ाबार का निदापरण भी करने जी।
ணயீர் ணபான் ஜ:'்ன: हेम अ वळे पृष्ठ पर
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में स्यने स्कन नि्वण के सन्तर अपला म्यनि विरोषियों का निरानरण दौगा।
ध्वनि विरोधियों ने व्यनतताच्य की काच्य की नियी र बिया में अन्समृत कहने या प्रास किया था नि्तु व्यनि के अवर्यं की अनन्त मेद हैं। आ:ः नह भाच्य की निवी ए. पिया में अन्तकृ नहीं को सचा।
विश्यान ने ध्यान नैदों की नणना कहने का भी कुंकल किया है।
कून इति कस्मति। करय्ताकियीर वाना स्यिमनिचय हवि परास्मति । हपयते5नैनेसि उसे आजम। कोण निम्मबन्ति उबन्ति,तेवा आाणशारेण
னர்ாரன் மாிரி ஜாரண்ண்் எ எ்:
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१७२ सारे येों के सम्यम्त में एक विहेष तथूप दस्छेकनीय है - विसुच्त पहले ही कह बार हैं कि स्यनि के सीन मैद हैं- वस्तुध्यनि, वर्अशरध्यनि बर रवानिष्वनि। किन्सतु आननयवर्णन के सर्पपत ध्वनि के सामान्यत: दो मेद का रहे है- वक्मकितनाज्य बौर निवकितामनरवाज्य। अल्य वभियमुच् वोड विवार में बुनवह यड नर कि' यम नैडी अथ्यवस्वा है ? यादि व्यनि के ये ही बानान्य मेद है, तो :फिस- वसृण्वनि, अगर्यनि बर रसव्वननि - म्याने के श्री मेर होंने ? अह: एककी अंति बैठाने के लिए नसूनी डिस्ते हैं- मस्तु, अंगर बर रस रम से तीन मेदों बाडा नी, वर ध्यनि इन्हीं दोगों मैं अंबीत शे बाता है। इतना ककने के यशनास् भी इन्न्हें अंच नहीं हुडा। बतः अं उपस्यित करते हैं- व्यनि नाम के भहात् एम नाम के रने का क्या डाम है ? पुन: एवमं साचान प्रस्तुत करते हैं - इन दोनों नामरों - (अविविशित- बहच्य और विवशशिवा मनरनान्य) सै धवनन रप ब्यापार में पृष्डितियाकित - बमिदा, बात्परव बौर उस्तणारम तीनों ब्यापारों से नपनता वर्ष की ज़रीति का बर पतिकता या आदा में रकने वाी प्रयोकर के वभिकाय रम विपसार का वक्तारित्य कहा है। एव ज्रार दौनों नामों से ध्वननि का स्वप ही प्ोज्लीकित
वस्तुत: अिनिययुक्त का वह व्वास्यान पानतियत्र है। उन्होंने क्रीयनान ध्वनि समझ लिया। यदि प्रतीयमान अर्थ को वर्ष को ध्यनि से पूपर नानते बौर ध्यन का जौ स्कप वनन्पवनी ने परिमाचिय कनिह किया है, बसे सनफरी सो यह दुद्ि व्यानोड न शेता बर न उतना व्यर्ष का कल करना पकता, निली बनकी व्वास्था नी बाटिड हो गई। वानन्यव्मी का विवान्त जवाना त्ष्द है कि नसे निसी व्वास्या की बावश्यनता नहीं। व्यनि के दो मैद हैं - बक्यिनिश्तवाज्य, नियणिता य्रवान्य। व्यंग्यार्य के तीन पैद -
१,२,३- हामान्यनेदि। बस्पररवारया हि त्रिमेदोडनि व्वक्ियाम्यानेवाम्या अनृरीत इति मात:। नतु तन्नामपुष्ठ रतन्मामनिवेश्तनस्य मिं कल्मु ? सम्को - कौम रि नानझेन व्यननारमनि ब्यापारे फूडािदा मियातारपर्ष-
उ्याबास विक्तरवा: इल्वारित्युल मिति ध्यनिल्कम नामम्यामेव -
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١ वस्तु, अलंकर बर रवादि। यह बास दुसरी है कि यै दोनों कम चिली तौ स्पष्ट विवेश के साथ, क्री बाना्यनम्मट ने उसे प्रस्तुस विया हे:
कि्तु, बनिन्तमुष् को तौ स्याने - स्यंग्य वर्ष के रम में ही वितेण
ध्वनि के दानान्यत: दा मैद कतार पर -
१- वपन्तरमदनतवाच्य बर २-व्यन्ततिर्मूयनान्य। ये दोनों मैद कहीं एम पर के परणाशित बोते हैं, भतीं बरगम पदरों हे। अनैंक पर्दों के पणारित बोने पर इन्दें वाकय के फरणाशित कधा नाता है। कय नुकर इनके बार मैद हो गह - १- करपूशाश्य कप्तरमृमितवाच्य म्यनि। 2- वानयपुकाश्य वपन्तिरमंडमित वाज्यम्यनि। * पदपुशाश्य अ्मनत्तिरततत माज्यष्वनि ।
हम सम का विकेवन तम द्ितीय कम्याय में ही कर बुछे हैं। पस्तुत प्रथन मैं केवछ पदपताश्य बौर वाक्य पवाश्य वपन्तरम्ड्रमतितवाच्यम्यनि के विचय में इ कला कीन् है।
म्याने के दोनों मदों अनिषमितवाच्य बौर विवशितानपरवाच्य के पवषकासत्य के विवेयन के प्रशं्त में आनन्यवर्णन करते हैं कि ध्वन को काच्यविवेम दा पुन है बत: क: उसी परनसारकता पर संगर कहते हुए कोई कह उनता
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'मनु व्यनि: वाज्यविरेन सचुक सतचर्यं तस्य पपणसा। काज्यकरिेष
सपर्युंक्त अंस का समामान करते हुए आाननमवर्मन शहते हैं 'समको - स्वादेन रोच: बाड मानम्म प्रवोर्ण व्यननिष्यमसारे स्वाट्।
अवति प्यनि स्कान किषण का प्रोक वंकल्म है, वानमाय नहीं। र्खदिर पदमाशल्य की बनुपमति का कोर्ड पृश्न नहीं उस्ता। चिव करर सहना के एक म में रिया बायुषण विशेच सम्पूर्ण शरीर को उद्दीक दस्ा है, सभी प्रगार भाब्य में पषों है कुई की बाकत्म ज्रीधि सम्पूर्ण काय्य में पाहता का देही है। क: काव्य में पदों के व्यंक होने पर मी व्वनिष्यरसार किया ना कक्कता है। स्वम्याशोक के सपर्युक्त वंड का अभिननुमा कोचन में अपने उं से व्याल्यान करते हुए कक्षते हें- मन्मिति। समुनाब एम ध्यनिरितयत्र पसे पोकीतय
इस पंसि में प्रमुत 'पमो पद ने स्मष्ट है कि अभिनयतुम्त पूर्व पृतति- पादित ध्यनि के पांम वर्षों में से समुनाय थाछे पदा पर आदोय की बात कर रहे हैं। निन्तू बानन्यवर्मन को ध्यनि के माम अर्ष अलीष्ट ही नहीं हैं। हनहोंने म्याने को मात्र एक माव्यविहेष के अर्ष में स्वत माना हे और परस्तुत पूसंप में भी वानन्यवमनी को यही वर्ष बनिमत हे। उप्युंषत संपर्म में एक सयूष अपमेव है - वानन्यवर्यनी ने 'मनु ध्यनि :..... से छेकर पनानां स्वहस मेनानानफवा तब पु्वषदा रा है। उसे बाद शिान्स परा । किन्यु अभिकव पुम्त पुवकस्त का बर बिस्तार करते हुए
₹- गोड पृo १०४-१०५ ३ श्रो. पृ० ३०९
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ननिः। कार्य्य मानावांपाप्रतिपरिकरि नानयं न पदमित्ि वमाद - स्ये्व,
उपरयुक्त समूप अभििनमुद्ध नें आन-्यव्मने के सिदान्त में अपनी बर के बौड़ा । बानदवनी तो नैद व्यन स्वमम निल्मन का प्रमोधत-वायलम को नतीं लि व्ंगतव को बाये हुए पपशात व्यनि का निशण कर ते हैं। हि्ू, निननतुम्त नैस स्युनाय को ही व्यने मानने बाडे मौमांड आदि के सिान्स ह मी परविनाकन कर रे हैं।
यरशं वभिननमुच्त सम्मापना कर रहे हैं - 'बदि परी कुमासू'- बह पूव पर है। एपती 'कार्च्य मानाषांस पृतिपरिकारि वाक्यं न पदमिति सम्राब' - सत्याददि पक्लि की पैसने के सष्ट है कि यर बभ्विाभिमान- बारियों का मत है। नयोकि, बनकितामिनानवादी बसिति नवायों कै ही बानया्म बाँच नानी हैं। कयातू अनिनवनुच् ने वहं नोमांकों का म रता है। जिमन्यु बर्वा एक अंजा शौती है - बदि यह न नीमांकों का है सो - 'बदि परौ कवास् - न नया सवानकम व्यन्यामाने देसस मिं बुक मार्च्य ध्यननि: । कार्चय मानाकांसय्रतिपर्िकारि वाययंन पदमिति' सत्यादि में निरन्तर ध्यानि को स्वीकार किया गया है। किम्यु नीमाल तो म्वनि को स्वीकार नहीं करे। अ: एस समपस्या के
या सो यह विदान्त निटी रेवे आनार्य का है जो नीमांसों के बरकतामिनानवाद का सनयी होने के साथ ही दाम ध्यन सार्य नी है। या किर बमिव युप्त ने 'बनि परौ कुवात्' नह नर, बाचांरय का नाम अभिहित नहीं किया, बर बण्डा अवर ना कर ध्यनिवादी बर नीमांख के विदान्न का मिमण किया है। और मीमासकों की बोर के सर्प उपररयि किया है, यो नयमुवाखवा को स्वीकार नहीं मखे।
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वाक्य कताश्य अप्तरतड्रभतनाच्य व्यनि -
आनन्ददर्वन ने लसरा निम्मनशिकित उवावरण पिया विचमयत: कैयामनि वैवननि प्रवात्यमनिमाणि: ।
कयांदू सपय निसी के सिर बिन का बाता है, किसी के तिए बडस, निही के हिर बिभ बीर बु दोनों और किसी के लिए न बिय और न बयु। यह बिन' बर बूष पर बारन्वार दाबृत फिर ना रे हैं किन्यु अपका मुल्बामे यशां नतीं श्ुक्त सुवर हे। बरनु फुस्त: पुःस बौर युव रप संमि वाच्य बाछे दिथ बर बृत रगों के ब्नसार को रवा है। एम क्रगर वद अर्मा- नतरकृंमि नाच्य का उ्याहरण हे। अभिततृन्त छोपन में श रत हैं.
यहां दर अमनेय है कि बदि बिष और अूत यद में निलद कर्णाा नानने तम व्यंसत्म क्री कौमा ? क्योंकि यह विदान्त के- 'अयंग्येम ररिता हडो बरिया तु प्रयोकी' बयांसु कडिमत मेनों में व्यंग्य के रर्िति तथा प्रवोकमुलत नेषों में ब्यंग्य के सरित दोती है। बनिननमुच्त के अनुवार बदि यहां बिभ और नमूत पद में निश्द अरणा मान डे तो इवर्में व्यंपलम केते सम्मम शेगा ?
विवशिताम्यपरवाध्य ध्यनि: -
नानन्मवर्जन ने इसका निम्मकिडित तवावरण दिया
खिरिणी का मु नान कियं्विर नियमिवानमठाननरोखु:। वरणि दैन स्वायस्वाटड कतति निम्यकडं सुणान:।। यहां नायक नािका की वाठणरि्या कर रवा है- नह वस्तु हप व्यंग्यार्य है।
₹- गो. पृ० २१४ ४- व्य. पृ० १र
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१७७ 'खिरिणी का नु नाम के प्रशन में डोचन में अभिियमुच् कलते हैं - सम्प है नि हुर शम के माध्यम के नायत को नाविका की पाहगारिया कर रवा है, यह मुल्यारम में बतसव को - कि सुणामड में नायड के अमान सुसलता कर्पवा अफम्मर है। ऐवी बाईल करके अभितियमुच्त दिक्े हैं-
वशं दीन ब्यापार हें - वनिना, दाल्प्व बर ब्यार। नर्योंकि गुलपानं- बीम बादि का बनाब बोने के बीड की कसा में बीबरी अामर वृषि वर्दा नहीं है। बपदा बारनररक (वह्म्मापित) ए्वं विशिष्ट हुए द्वारा तम करने के स्थान को हैनर प्रशमार्ज की उगपति न बने के कारण भुलयार्य नाय के हो बाने पर बादुरम वे बीम में अप्णा की काी है। उत्यादि। किम्मु, बानन्दकर्वन को नहा माच्याम में कोर्र भी अरजगति नहीं कनी। सभी दो दे वहा सिवररिणी का नू नान' को विव्स्िता्यरनान्य के इमानरणाय नदृबूत करते हैं। समा उसे निवनितान्यवरवान्य ध्यनि कहते हैं [नममें वाच्य विवाशित(नाज्य नाच डैसक अद से अपना अन्चयगोच्य) शौकर हुवा नी व्यंग्य- निष्छ है। क: नवा कुश्याथवाम की सम्मापता का फृश्न की नहीं उठ्ता। रेवा प्रतीत बोदा है कि अभिमव के मतानुवार करेते अविवशितवाम्य में करणा व्यापार व्यंम्चारम के हिए आयन्त यानश्यक है यमनि कैे नियभितान्य- नरनाच्य, व्यम्यारय उपाणा व्यापार नर बाभित नहीं रस्ता नि्तु सां कुणार्य- नान की बाकसयिक सम्मायना हो वहां सर्णा कर भी लाभी है। बनिसुच
विवस्िता परनाच्य व्यन के पूक्ा दो मेद हैं- १- वजयुन व्यं्य
१- गो. पु० ९४•
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नानन्दवर्वने ने असतरयमुनव्यंग्य के अन्य्मं स रवादि की भूरी दी है। उसें नैक रब, स्वामाब, मान, मानामाह, तवा माकपामिर=मदर।। का ही नामोस्तेस किया है। अभििवमुच्त ने बान्पमर्णनी द्वारा वकित का भेरों मैं शादि के स्थान पर - नानोकय, मानवन्यि, माचयपतता को भी बौड़ दिवा है। पि्मु वानन्यव्जने ने इनमें से एक का नी विवेषन नहीं पिया था।पसुस: वानन्दवर्पन का मुल्य परतिपाम कन एम में प्रतीयनामार्थ की पृपानता थी , बिले रकें प्याकिप बिद को सी। य: बनहोंने बपने उदैश्य की नुर्ष्ति में केवड बावश्यत सपूयों का ही परतिपादन किया, है। उनकी दृष्टि में भो बनामशयड ना नोण सपूष हे बम्न्ों मे शौक़ते नर हैं। रव बर नान के विषय में उमहोंने यूस मी प्रत्िपाचित नहीं किया। म सो उनहोंने यर मतडाबा कि रस का स्वरूप कया है औौर न यही वललाबा कि तकफी निव्यदि कहां वौर केे शाँती है। नाव के विषय में भी यै इ प्रणों पर कोई निवार नहीं प्रस्तृत करते यवदि परनरती वंकार शास्य में ये की प्रायः परयुय विभय मन नर। बभिकुच्त ने कम सनी पर्कें पर अ्चन्त विस्तृस व्याल्यान प्रस्तृत किया है। वहां एक फ्रशम उडता है कि बापार्य वानन्यपर्वन बभिनयमुम्त से पूर्ववर्ती बाबाई हैं, तमा ध्यन्याठोन में एस विषयक विवेयन के अनैक सथ बार कहां रवाकमृति बर रव पत्रिया का विपेशन वनन्यवर्णन कर सप्ती थे। उम्मोंने भर
बौर रहो कै ब:' ने मी वे बवश्य परिकित रवे होंने। तब कया कारण है कि बानन्दपपी रस विचयक कम विभिन्न प्रश्नों पर युड मी बुष्यवस्कि विवेशन नहीं किया। नवा नह रस को क्ूम की कौटि तक पहुंगाने के पस् में नहीं थे। नवा रस के नान विभिन्न नारजनिक प्रशनों के सम्मन्यित होने के कारण की इनदोने कय परा बैम को छौड़ किया ? फि्यु कोमन कें डाल्कित - 'सदुती गत्पे तु वर्म परनेश्वरावयं ऋ वसनम्दासारेग न न विदितं सत्चाछन्यम्यं विस्यनैतत्वास्तान' ( डी० पृ० 4) एस पंकति की दैशने से शाच
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श्री अन्पीशिया का नानने के लिए प्रतुष दती है कि कया बनन्यपणी ने वत्वाशन कृन्य में क्रा विधक रानगृत्ि या रकड़क्रिया के विषय में स कहा है ? यया बभिनतमुम्त ने आानन्यवर्मने के रस विभयत विवेयन को कहों हे कैकर कोपन और बननम माखवी में इरस्कृत किया है ? या किर नह सवासृति और रप़न्िया बभियुन्त की फैन है। किन्मु सत्याओ्न क्रष्य प्राम्य नहीं है,
बिन्यु व्यन्याशफ का क्वशल करने हे युछ ऐैसे यूव रप में नामम मिल्वती हैं बिन्ें देवने मे यह स्ष्ट हो बाता है कि वभिमुच्ा ने आान-्यवर्णन के रम दियय रिवान्ों का की हम्मुसयि, निमैशन किया है। ब: र के विभय मैं उनका ना नही था किो अष व्याल्याकार वभिनुप्त ने पस्तुत किया। बानन्यनर्पने राननान के जिए सनुनकम की की प्राण मानतो हैं - (१) कठिका क ि र्मत्यविद:, समुया रम हि काब्याना रका: ( *. दृ. kt :) (२) रखीन सनुडयापमु (व्य. पु० र0) रख की प्रीति या अनिव्यक्ति की स्वीकार कहते हैं-
ऋ्रीति (प्य. पू० थ२)
(३) तलाम्म तैवां बहिेंनल्म स्वानिष्यी (व्व. पृ० २२) एम वाक्यों के इतना सो विद हो जाता है कि जानम्यवर्मन सुदुषम में की सानिष्यक्ति मानते हैं। वान्यवर्णन ने व्वन्याछीन में रस का विवैवन भुष रुम में ही कमा बम किया है। वस्तुतः बानम्नवर्मन ने रवानमृति एवं रल्ड्प्रिया विनयक यन की इतना बाकशयक नहीं सपमा कि उसका मुकर रप से निपेयन विया नाम। सम्मकतः उसे कार्डनिक पछ्लू की सार्ित्य के क्षेत्र में डाना गांलीय नहीं मानते थे। इम्पम है रये मन शास्त्र का विभय सपक कर कोद रिवा से।
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वकतकुच्ध ने अपने रवरिदान्त की स्यानता के पूर्र मट्नामर, मटूडीलाट एवं नीडदुड बानि बाचायों के नहों को अपरिय पिया है। ल बाबायों के स्वरनित मष्य तौ सुनष्म हैं नि्मु वनिकसृम् कू कोचन एवं पासती टीफा के एम आमामों के विदान्तों का आान फाम्म दौका हे। यै ती्रों की बानार्म वानपवर्वने के परसतीं हैं। इवर्में से एम अय्यार्शन के डीफाफर कुनाया ही है। और दो - ग्टलोलट एवं नीर्शड नाएसास्न के टीफफार हैं। रेवा क्रीत हैता है कि सान्पवर्णन के रस के सम्य््य में, व्यंत्ाव्यापार के विरेष में दी हन बीनों ने बपने अपने विहान्त की स्वापर कहने का फ्रफल किया। वानदवर्वन ने दीम परसार के ब्यंम्याज कों हें - (१) बस्ु (२) बलंकर एवं (३) रानि। कन कीनों में से खवब्यंन्य सपरनिक महतयपुण हैं। अ: बानन्य- कली के शरी सब्यंग्य के विरेन में कोर्ई उे अस्कन्म (उपकित) मानता के, फाईं सलुमेद बौर कोर्ई मोज्य। अ: वे सी आषार्य मरत के रस सूत्र की वट में वानपपमी हारर प्रियाित 'रव के वयग्यम का की विरोष करते हैं। सभी च्यंका के बचिकार को हीन रहे हैं, और विरोमी याणैवार नन रहे हैं। पसुखः नैदा कपर कहा ना दुछ है बाचार्य वानन्कवर्णर ने उस्याकांक में रब के बलमृत्ि एवं प्ं्रिया पस पर पूकष् कम हे कुस नहीं लिया। निन्सु नमिनयमुच्ह ने न्म. २1३ में रव्लावादि का प्रहरण बाते ही बनवर पाकर रस के विचय में बनिस्तार निवेयन किया। डसे ही बाद में अभिनयमास्तरी में इन्होे सवंरम्म प्रयसित सियर। अमने कदी रव-विदान्त के कारण बमिनिव साक्तिय-प्ात में आाखृव हैं। गोचन में बमिमतगुन्द ने अर्पपपण मटुनामत के मह को रखा, सदनन्तर मटुशोल्तक एवं नीझुं के नह को। सम्पततः बनहोंने मटनायक के म को पक्छे
यां मटुनाक 'न फतीये और 'नानिष्यंन्कों' वे वानन्यवर्णन के ही रिान्त
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सपनिरि रहा हो नयोंकि महनायन व्यन्याकौत के डीककार ये। बी अन्म एवडं पर इनका महुनायत से बाम्य-मैनय्य पक्ता रस्ा है नेे ही रस के निचयय में उनकी मद्नायक है बाकारत् नाकफैक होती बोर ने बाछीन में तबा प्रान डीचा- गर क्पा ध्यननि-विरोनी का सम्न कर अत्तोम की बांस हे हैं। किर स- पक्रिया के प्रशन में परत-धूष के ऐेसे व्यवल्याकार नी सनकी सृत्ति में बाते हें मिल्ला स्वन्कर के खर्ब्मम्य मे प्थणा विरोष है। या: बन बाहरी बाजेम गर बाबानों का नी वहा विदान्दोरतेव पतते हैं। वभिनननासी में, कटुोल्कट श्री सप का, नाट्मशास्त्र के डीकाकार होने के भारण पक्के बक्तैस किया गया वहां मयनायन बार के आषार्य होने के कारण बान में स्थान पाते हैं। मी करण दोमों डीबारबों- डोमन और बनिकयनास्ी में एक-विदान्त के बाचावों के प्रति- पामन में फूम-मैद है। बद डोचन' के बसुवार कुम अपनाया गया है।
नाइसनिष्मधधि: का पक्ठे प्रोति की दृष्टि के और सल्मशपात् उबकी इन्रिया का बपने अुसार निक्मण किया है। पकते यह विनार कहते हैं नि र की ज़ीति परकत रुप से सोँती हे या स्य्स रूप हे। अदुनामल के विार के यानों पकों में से निसी को स्वीकार नहीं किया का लपतषा। क्याकि, रसको परमस - अपातू बतुमार्य या बनुनत में मानते हैं यो समषय एम सटल्य व्यक्ति हो बाता है। और यदि स्वम्त रम हे अवांति बबूबय में रस की मानती हैं, तब यर स्वीकार करना होना कि र बनुषय में उत्यन्न दोता है। विन्तु यह पद भी डाभारणी- करण के बनाव में ठीक नहीं है। क्याकि बीत्षा - सतुदूय या दानाकिक का विनाव नहीं हे और र व भी उत्यन्म होना तब विभाव से सी अत्यन्न दोना। समृबय के मिस में नाम तक यह माद है कि बीत्ा दाम की फल्नी है तब सक यह प्रीचा की राम वियय रकवि की नर्षणा क्री कर कता है? यदि बाभारण
१- 'समुक' मटुनायमेन - रवी कदा परपतवा प्रतीयते वर्षि वाटस्यूकनोम स्वाल्। न व रनवतपेन रामाकिवरितमवात्ता व्यायती कीयी । इत्वादि लो० पृ० १६७-
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शन्तारन की थाचना वहां मानते हैं तब मी जौ बीचर आादि में कुण्य बुद्ि के मक निशी क़ार सृंदण की रति का अद्बोम नहीं कोने देनी। दुसरे नह भी नहीं कि समुचम सल्बाड नंपनी फल्नी की स्मरण करने अप्ता है। ब: बानारणीपरण भी सर को नहीं स्वीकार पिया नान तौ - रान बाि थकौकिक पानों के बा कमा शदि ितार्नों का बानारणीनरण क्रे सौ कदा हे ? और बमुषम में रस-प्रतीति कैते सम्नम होभी है रन के उतत्पाद याषि के स्रण को बनि सामारणीनरण में सवायक मानते हैं तम मी पूर्व ब्नुमन के न होने के कारण स्वरण सम्पव नहीं है और फाच्यब शन्मद के बदि प्रीति मानते हें तम काँक में फयन नायक नाचिशा को दैव कर नी इष्टा को र सत्यन्म होना नािए। बम्लम वानाभिक में रव् निष्मधि मागने पर एक सनस्या वह भी है कि ककण रस के अयम्म होने पर दःडी बोने के भारण निही प्ार पुनः ऋग-ख की क्रेता में अृत न होंि। एम बनौक कारणों हे बदुषूणों में रस की उत्यति नहीं मानी का सही। ली क्रकार बन्मों र की दनिष्यानित मी नहीं होनी। क्याँकि झुंगर के स्वानीमान सयादिं जो वाझा या शक्दि के कम में समूदूयों के अन्त सरण में विषमान रस्ता है उझी बनिब्यनित में, विषय के अफर में, सनुन के अंड में - सासम्य की स्थिति लीफार करनी पढ्षेनी यह एम बाच है, दुवरा गौच यह है कि डनिव्यनित की परनत नाकी हैं या स्पप्स, यह कचड़ा तब भी रव बाका है। हस प्रसार कदुनावड काय्य में रस की प्ीति , उत्यतति एवं अनिव्यनित ह बीनों रिान्तों का इमन कहते दुए बनो मुलियाद की स्थापना कहते हुए
बन्द इब्दों के निकसण बोने के भारण काव्यात्मव इब्ब के अभियायाय, माकखह्म बर मोकाम यह तीन असत ब्यानार हैं। परम् अवविभयम व्यापार है, दूटरा रानि बिभय बौर जीसरा सुयनिचयत रव-ब्याबार है।
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माववल्य व्यापार काज्य के सवविभय विनावादि का बाबारणीकरण कर देता है। रस के मानित होने पर समृषय की नोमम ब्यानार है रा का मोन हेतर है। यह माँन बनुनम और स्नरण से विश्सणा, इतिविस्र चिशकाय, रवस्तमोविभिकुनानुनिडत पय, निल्स्याय, निदृत्ि ना नानकम परजाप्नान- रहोदर एवं विवान्ति ना किशश्वमेनान्तर स्थिति कम है।
फटुगोस्ट - सवनन्तर, गटडोल्छट का का उत्पसिमाम के माम के प्रसिदि है। इनके मत में विनान, बनुमाव एवं व्यनिवारि मार्नों के अंवोण के इछ्ः स्ाबीनार पररिुष्दामस्णा को भ्राम्त करने , बुकर्म रामादि में बी रस सत्यन्म दोका है।
ग्रीझुर, सटकोलट के मत कर सच्चन करते दुर कत़ते हेैं कि निस्ृति के प्रवाईर्ल होने के कारण एक विशवृत्ि का हुसरी विलवृत्ति के पररिमोय नहीं बन सता। दुसरे यह कि दिल्ल, डौक और क्रान आदि का फूम हे परिपाच नहीं दादा, ब: बुवार्य में रह नहीं को सम्ा।
बीमद श्ीझतु कुच्ता में एस को मानतो हैं। वर्भिननमुच्त ने डोचन में नीझंदुड के मह का बस्तेस लष्ट कम से नहीं किया है। वे नझती हैं- वनियत बनस्मा वासे स्वायी की उदैश्य करके, अंगोन क्राम्त कहती हुए विनावानुनानव्यनिवारिनानों के द्वारा बुल्ता नट को बाहम्यन करे जो स्वाबी श्री गाटता जीति हे नदी 'रह' है। नानाकिक बयुलता नट को देव कर बयुनान दारा बयुगर्व समादि के ससे बभम नान हेता है तमा न्दि में बामाजित रवा- स्वाद भ्राय् करता है। कम फ्रसर झंदुड ने बनुसार रस नट के आभिव है नुनारय
१- बभिक्ततुष्त में कोलन में कहछोल्तट का नामोल्तेत नहीं किया है। बभिनव- गारती एवं माब्यमूशत के बाधार पर यह मह मटलोल्ट का ही क्रीस सोवा है।
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आदि के नहीं। गुचत में नीझु के मह के अन्सर बभिनमुष्य ने बन्चे तु, बपरे. कैपि्तु, स्वरे, सत्यादि द्वारा बन्य बानायों के कों का भी बल्ेस किया हे जि्सु ये भत निन बानायों के हैं, एम विष्य में भुल भहीं भया।
अभिनयनुस - जन्त में, वभिनवमुच्या ने अपने वनिष्यन्त्वाद की स्वापा की है। बभिनवमुच्त ने बपने एस-विदान्स के लिए कुछ वयूप मटतायत हे भी जिए है। यलनि बनहोंनि महनायक के समान मानसरम बौर नोजाम द न ब्यापारों की कलपना नहीं की वस्त् बगिया तमा कसगर के अतिरिका कयंगा नामक सुवीय नने वानपपणी दारा प्रतियाकित व्यंका-दृधि को ही र प्रीति के छिर सूड माना। अभिन्तमुम्त का नह है कि रह क्रीयमान की बाते हें सभा निवष्ड प्रीति शी रला है। कह नाट्य ज्रीदि, शौंकिक बनुनान न्य क्रीति कै विशरण प्रीति है। गानाभि्ता स्वायीमान को की बमिनव ने रवानमृत्ि का निमिव काया है। बंदगर रप में रति आदि स्वाबीमान यानाकिक की बास्ना में निखित रको हैं। यह गनारणीकुत रूम के डपस्यित नियायादि बामडी के अभिष्यकत को कारे है। और तन्पवीमान के करण नैवान्वर सम्पर्त मु्य प्रास्वाड के कृछ परनानन्द रम में बलत साँते हैं। वह दरा कार्य बभिनततुम् का है कि्होंने महुनामक, भटसोलड औौर नोझंदुष के नतों की एकस करने, मस्न मे स्वछ्ण के परिटिश्म में पुवषम के रूप में तनके भतों को अपसिकित पिया, उनका वण्फन किया बौर वानन्यवर्वन के रविचय खिन्तों को को यस रप में असम्याओोन में पिसरे पड़े हैं इन्में एमम किया एवं हन्दें पाजनिक परियित में नांय कर पृणववा कँवासित के रंग में रंग दिया बौर तम पर बफरी मुवर कना दी।
1- गैंब पु० १८५-१८६ ₹- डो. पृ०१८६ नं० gुर १८७.
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वभिनियमुम्त का एक-विदान्स कुम अप में नाठ्यवाकम के आनार्य मरद द्वारा नार्तिक रप में बानन्मव्मने टारा एवं माच्य रम में अभिकममुम्त द्वारा प्रतिमायनित ह। 1
मावव्यंग - रस में किसने नानों का एक साम बुनम शौचा के अनकी मात्रा बराबर रख्ी है. अवांतू उसनें हे निसी नान कर बतुनम निदी नी बन्च भाच से बधिक नहीं होता बर न निही मान का अन्य मान से कम। वहाँ सनी भाव समान मान्रा में बुमन में बाते हैं, निन्तु कम का भार्गों में से किसी अंगारी नाव की मातरा बढ़ बादी हे बर उकमा बनुमर अधिक मात्रा में सोने अपतर है, नही बनुनव स्वतन्द कम है बपना एक विशिष्ट स्थान बना हेता है। वह बनुमम सवारमक बनुमव न रद नर, मानारम मनुमद ही बादा है। बौर बे एक विशिष्ट नाम दिया वाता है- 'नानब्यंग्य'। मावव्यंग्य का कराण केी हूए अभिनयनुम्त कहते हैं-
मवति, तदा मावम्यनि:। वशं अमिनननुम्त को मानध्यनि के स्थान पर नावव्यग्य प्रमुस्त करना भाहिर था। क्योँक बानयव्मन ने स्वच्छ रूप से यह दिया है- 'मुलु्य रुप से फालान 'व्यंग्य वर्ष' म्यनि का बास्मा है तमा अंगी रुप के भाय्मान व्वनि का बाल्मा रवादि (वंम्वाम) { रवादि में रद, भाव, रवानाच नाचाभाष, माकमुश, माचसान्सि वादि) वरसंतरकपुन रूप से व्यवस्यत है। यहाँ पर 'रसादि-व्यङ्गय' में प्रयुक्त 'आदि' पद के अन्तर्गत 'भाव' की गणना की गई है। अतः जिस प्रकार रसध्वनि की अपेक्षा रसव्यङ्गय पद प्रयोग उचित है उसी प्रकार भावध्वनि की अपेक्षा भावव्यङ्गय पद का बााबं - प्रयोग अधिक उपयुक्त है। ३ रव-व्वंग्य में को केन्द्रीय नान दोचा हे उसके बाम यादि किवी भी फमार के क्तोनित्य का ब्सुनम नानाजिक दो छोता हे तो ये की रखामास मकने हता हैं। श्री नानी रवण की डीवा के प्रति फनोंकि। वनियुच् मै नावाभात का पतिपादन नहीं किया है।
३- तदर्थ द्रष्टव्य यहीं पृ० १६२.
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मायफूल वादि मावप्रम में किध्ी मी व्यवभिवारिमान की निराषरण की स्यिति विभित की बासी है। मानोचय में किसी नाय की जवीयमाखा का पित्रण रक्ता हे, भानसन्मि में को मार्वों की मध्यस्यिति विभित सवी है। माकर्ता में अनैक भानों के युनत: उंित कोते भछे बाने का मर्णन रक्वा है। एम प्रार वनममवर्णने ने र्कत्ावादि के विभय में कुस भी विनानपुणत नहीं कहा है। विन्तु अनिनवमुमा ने क सम का व्याल्यान किया है।
(प्य. श११६ में) वाननमवर्मन - ध्यनि में रवाशिया बलगर का डप- पावन कसते हुए नहते हैं- म्यनि के दन्सनत बही थलकर माना गया है जिल्ा प्रयोन रवाभिया रप से चिया नया हो बौर जो बिना किसी क्म के पामा की
पिन्तु वभिनतमुन्त कव कारिका की ब्याल्या सपने अंग से करते हैं। सम पूप रात्तिया बरगरों के विभय मैं कक्षते हैं -
स्वान्ाछंकरो रमाने नान्यः। नानमपव्मने तौ राश्िया बलरों को व्यनितिाज्य के अनसमी मान रहे है नि्सु बमिनतमुच् सवात्तिया कशरों की रा का मार्ग ना रहे हैं। 'रच' तो म्यने कान्य का र की मात्र है। अभिनसमुन्त 'ध्यनि'पम के स्थान पर 'रव' पद का प्रवोन कयविवानी वर्ष में बड़ी सरक्ता के कर हेते हैं, जो अनुपयुकत है। इसने बाद 'तैन बीरापृनुवविशयेन्यनि' के ठैकर 'रति बामाम्येन नर्चति' तम दभिनिव का व्यास्नान पस्तुद काररिभिा से कोर्र सम्यम्य नवीं रका। वमिनव मुम्त की इम पंकियों का सम्बन्य कव० श१५ के अवश्य था। का दद कारिणा का व्वाल्मान दूरा हे नवा तम यदां फिर उसकी बात निष्यृमोज् करना, प्रांग के सरपवा प्रक्तित हे।
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१- शण्दनतमला. ₹- वर्ष सनितमुण। रम्मशक्तिमुकन ध्यनि में व्यंस्य वर्ष को करकार के होते हैं - वस्तुब्बंन्य और अलगरव्यंग्य। युछ्र ठोगों का यह है कि बान-यवर्मन अभ्यनितयृत कयनि के बन्त न नैंक अंगारम्यन्य की मानते हैं, मस्ुब्ंग्य नती। बनके बयधार कहा वष्तु
वहं फतन इतता है पि व्यनिकार त्मशनितमुकत नसुष्यन्य को नर्यों नहीं माने ? वानम्यदमी अंफार व्यग्य की इसासिए ल्मष्ट रम से स्वीकार करते हैं कि इममें किसी प्रगर की बापति की सम्माचना नहीं किन्तु वस्तु-वग्य का मान लेने पर स्तेम विचयक अनैम विपृतिपरियां उपरिकित कोने की सम्माया है। कः यह दजे सर में सा प्रशार क्रक्ती हां - 'मस्नाइडंशरो न मस्तुनान ..... ....... स्वादि।
पशित सोदा है। किन्सतू वहां नी अंग होती है कि यवि बान-्मवर्णनी नी बईगर के साय मस्तु ध्यंन्य मी अीब्द या बो 'मल्नाणडंकऱो' के बादं म' बर 'बषि' युक कनाते। कि्तु आनम्यवर्णन को तो फैकस अलंगर-व्यंग्य ही शच्द- शक्तिमुत्त में वगीण्ट हे। नानम्यवर्णन के परचर्ती बाबायों ने अम्मशक्तमुत् व्यनि में बर्हलर न्यंम्य के नाथ नस्तुष्यन्य को मी स्वीकार किया है।
१- बाईम्न सवाओंगर: इम्पत्पा प्रगस। पर्मि्ननुक: इब्देन सम्मझ्कूननी सि स: ।। *्य. २। २ मश्नापठंजारो न वल्ुनातं वारमु ना्जे सम्मझ्या प्रकाओ क इमहम पुनो व्यनिसियस्नानं निवास्तितय्। मस्तुकये न सब्सरत्था
... संगलानवीरयो: बु्यिमेव पौवनिकी। कव० पृ० ११९ ।
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शब्दअफत्युशुमद में अमिणा की बीमा -
कान्तर थान: द्वायो मशावाड:। न्यों बीन शर् अदत शोते हैं- १. ड्ानरणिक - ड्ीचमाड का वर्णन १. अयाकरणिक - कवानू ठिप का वर्णन बौर 4. बंग्य बयकार - डीच्लाड बौर मनवानू खिप में उपनानोैय माव की फल्पा। वहां पर ड्रीच्साड़ विभयक नो वर्ष है यह अभिमेय के और उपना बलंकार व्यंग्य है। परुन्तु ननवान् सिन विधयक पानरणिक वर्म के विषय में विभिन्न प्रार के न ह़ें। अप्ाकरणिक वर्द कर बौँच विद व्यापार के सोता वै- ए् विभय में बाचार्य अभिनवमुन्त ने ब्नैक मह उपस्यित दिए हैं। किन्तु वे नत निम बाचावों के है- हला उनहॉने उल्लेव नहीं निया । जैव 'बन्े तु, सके मू, ज्रे हू,' वह कर विभिन्न नरवों की सपस्यित किया है। एुम शोमों का नत है कि आमलपमी 'कव्ानरणिय वर्ष बाँच चिव व्यापार से डाँचा स विषय में जानपनमी माँन है। यह बात दूसरी है कि बान्यवर्न ने वमिमा के निवन की नर्वा नहीं की। 'इन्दुडिननणां विरम्य व्यापारानाय:'- ए विान्त को नहें बसा, किो परनती बाचावों ने परस्तुत लिया। निन्सु वप्ानरणिक अर्ष बौच के वियय में सो वमन्यवर्वन स्पष् रुप से कक्षो हैं-
यहं पर फुख 'सम्पपदा फगकनाने' स्पंच्छन से 'अम्मसमतथा ब्यज्चमाने' को ही शैक्त कर रद है। यदि बाकमवर्वन को अपायरणिक अर्ष के छिए अर्भिना व्यापार ही कला दोदा दी कहा इब्दडकथा अभिषीयमाने' कहते।
१- भ्व० डृ० सा। ₹- डो० पृ० र१-र ।ब्यलू० र।
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நy ம ர தாளரிா சர் எளின் ச்ளர்கிண1 अमानरषिकि को तो नह 'प्रणाव्मान स्वीकार करते हैं। बौर कहीं यह बात प्रकन
கராரன சசசணியாரகை ளிளள ड्राकरणिक वर्ष में उयमानोपमेकनाय की कल्ना कहनी पासि ।
रस है यह अभियेद हे। बर नो दुबरा वर्म नगवान् सिन विभयक है वह प्रकासमान
अर्पडव पुुम सुल्ानीष् व्यम्य ध्यनि - எண்ரணகண(ர்ன- एवं बानिति देवचो वारे सितुरयोजी। गेशनलागि नणवानास पार्यती।। यदां माच्याय विवासित हे तमा नही बाण्यारम संयमुनव्यंग्य की परीवि गरता है। या लें वाच्य वर्ष का बौँच होता है कि पावीत की कमतबठ भणना पहने कनीं तो हमें पुरव पररपन का स्मरण आता है नि मनची पायरी ने शिप बी के हिए सपस्वा की थी। कतः बब नारर की बारा डार नर विवास के अन्फेस
समलनठनणना 'रम्यानान' के वारण कहने कनीं। यहां उण्चामान रुम वस्तुव्यंग्य है। बाज्य-वर्ष के सामवर्ष के अपन्तर - अम्मा रम व्यभिवारिमान अनिन्यनत दो रव है। एस प्रकार व्यंग्य-वर्ष की प्रीति में सून के अश्ित होने के कारण
दरहं पर वह झंग हो सन्ती है नि- क व्यपिवारिमाय प्रमान रूप के सपन् शौतर मे तम यद मानव्यण्य का एमं शौता है। बर मावव्यंग् कौ बहस्ककूनव्दंग्य म्यनि के सम्सनत नाना नया है। परन्तु वहां पर व्यनिषारिनाय प्रवान रम हे व्यवत हो रसा है, किर नी से संमूमव्यंग्य कहा गया है। इसगा
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१६० कोमन का अनमानपूरणत बनुतीकम करने हे ना स्ष् हो बाता है कि सह एक पर संजा का समिक नी अपशाड नहीं। डारिक वनिनयनुच् का विवेशन वान्पवर्ण के सी विदान्त का सच्डीपरण कसा है- वानन्दवर्पन ने (न्व० २1२ में) बान की नगना बर्ससफुनभ्यम्य के बन्तर्न शी है किम्यु नहां पर व्पनिवारिान के कूम के प्रणासित होने के भारण अहे असतपयनव्यन्य व्यननि का विभय नहं मानी स्वीकिए बनिनमुन्त नही हैं कि ववनि रस मावादि सवैम प्रतीयमान ही होते हैं, वाच्य नहीं। समापि सद- (रसावादि) व्चमर का विनय नहीं छोते, अपा सु संचयनन नी होते हैं। कैे वहीं पर - पामी के इम्मारम व्यभिवारिनाय की ज्रीति में। वनि कालयन- भणनर तवा बनोमुकम बसुनानों बरा इम्माकम नान की क ढिति जरीति को बाती,हं ती यह अवशय बर्संनममडर व्जंतपपफ़त्ता के कारण मानव्यंग्य का नियय दन बाता। चिन्सु यश रेवा नहीं है, कयोंकि कपनणना तवा कवानुलम ववश्यक कई से नैवक सप्मा के की बनुमाम नतीं हैें। बरतू अभिकतमुन्त का कयर हैfि यै - कमपमणना तमा कमोमुसतथ तो स्नारियों में इम्मा के बविरियत शरणानर में नी हो काते हैं। बह: इनके बारा उप्भा की क डिति प्रोति नहीं होती। बाितिु नाकी के द्ारा अम्मु की पर रूप में प्राच्त करने हेतु की नहं सपस्या सवा नास्कमष विवादानि प्रवंत के आन के वनन्तर की सन्मा नाछे अर्ष का शन शोवा है। रस व्ययमान के बारण ही वर्शा सजपऩका के। इल्दा इम व्यनिवारिमान के क्वाछोयन के बनन्तर की रव की ज्रिवि
१- (१) कनि रमपापादिश्या क्यमान एम नवदि न वाच्य: कदाविवनि, तयाददि न कवोंडउपमशपरम विनयः (डो. प० सच) (२) वो स्ानिस्व: क स्वको कवीरममा में स्यनन: र दः। कृतत्यमि
- एस पत्रामि डुस्त कम व्यनिवारिसयामे पर्याछोच्यमाने माचीति तवपेशयाS-
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बाती है। कतः सन्मा तवा र क्रीति के मध्य तो कूम उचित न होने के भारण रस की दृष्टि से एवमें भी अरयम़ता नानी का कती है, रेव शोननकार का मत है निन्मु कममपठमणना , कमोमुकम तथा उन्जा का मम्यनर्तीं क्ूम संतरय है। दृदय स्वाएक इब्मा में विदान्ति नहीं पाता (बयात् मुषय की वैवा बानन्य नहीं मिना केा मसवमव्यग्य में अम्पा की प्रतीति से शेता) बरतु पूर्व क्ृान्त का स्रण कना पढ़ता से तब इन्मा नाव की ज्रीति शोती है। यहां पर वभिनिवमुम्त स्वष्ट कप के सम्भा माव रप वस्ुव्यग्य मक्तती हैं- 'एममर्वतमल्युष्मवो पिनेदी वस्तुमानल्य व्यंकीयल्ये वस्तुध्यनितपत्रया निकपितः" यषमि वननदवर्णन ने सम्मा मान को स्पष्ट इब्दों में वस्तुव्यंग्य नहीं कहा है। बानन्यव्मनी कैवल इतना की सकते हैं-
अनिवारिमावकतणं प्रणस्पति। (२) एक तु डामयुसि म्ाब्यभतिा रियुलेन रकीति।
अर्थव्वनरयुष्नन व्तुस्यानोपन व्यग्य के मेद -
अर्पसवा पुड्मवानुलनानोनन व्यं्य ध्यनि में जो व्यंक वर्ष कहा गया है उसने
१- रनि की अचवा कविनियलरपता की प्रोड उकमात्र से निष्पन्न 7- एपस : सम्पवी बानन्यवर्मन ने इसे को क्रसार स्पिर किए। विन्तु अभिनिनगुप्त ने ककिकित और कविनिवमनतासय प्रौड वनित की पूथर् पुथष् मान कर इसे तीन प्रकार कर दि मै। रंपधुक्त की मानों में विनवत स्यंच अर्ष पुनः पर और वाक्य की दो विनाय रतावों में विमवत हो बाते हैं। एम प्रसार इसने बार मेद हो बाते हैं।
1-न्य. पृ० मह ४- म्यसास बौर उसली वृदि पृ० २ - हैफी करो मेदा कवन्ति (को. पृ० २५) ६- इ० घ्य०३१ की दृधि।
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११२ अर्पहमल युशूमय के अलंकार व्यंग्य की दृष्टि से दो मे करते हैं। वे बोगों की व्यंक नेद पर निर्वर हैं। इनका एक व्यंकम होता है- वस्तु और दरा बहगर। इस प्रसार वर्वकमल्युड्मन के दो मेद और बने १- वसतू प्णश्य बलंकार व्यंग्य ₹- बलनर पणश्व नशरव्यंग्य वानन्पवर्णन कंशारपकाशय बपार न्म्य के प्रहंन में परक्षती हैं- 'सन्देहविभू पनारफा तिडयोक्तिना पुणस्मानत्यं प्वर्त्ितमित्यउंगरान्तर-
रद पर वमिनवमुच्त ककते हैं- अकरान्तरस्वति। बन्रासंशरोडच्यंशरानतरं ध्यनति तत्र वस्तुमातेणाउंारो
फ्वनों पस्िकनांरोडनि न्यन्य हत्येवका: फ्तत्वात्।' इत्यादि । वानम्यवर्वन ने तो वस्तुपताश्य वर्नारव्यंग्य बोर बतंशरपुताश्य बकारव्यंग्य की पुकर् नुसर माना हैं- बैवा बनी ऊपर कहा या दुया है। बर बंकारज़ाशय अंवारव्यंग्य' के प्रशंग में कहते हैं कि अउंकारा्तर का बठपारान्सतर में व्यंग्य होना यत्नपृविवाम नहीं है। कि्तु वभिनमुम्त 'अरवारपुणश्य अंतरव्यंग्य' के दाथ 'वस्तुप्काश्य अंपार ब्यंग्य' को मिठा केते हैं बौर उसमें वसष्माव्य दोच का रहे हैं। नो कर्पया बगत है। बानन्यवर्वन का विहान्त सर्वया सरठ एवं भडड है। उसमें पहीं भी रक्कन या बस्पचछता नहीं। बिन्तु अभिनवुम्त, वानन्यवर्णनी के बीमे तरठ विदान्स को कलनर वधिक उडका देते हैं कि वामारण बध्येता वानन्द- वर्णन के रिदान्स को यूछ बर इन्दीं की बातरों में उडका रव बावा है।
१- (१) बोनिल्यैन व्यंग्यतायामनि, अफराणां दयी गति: - कदा पिदस्तुमात्रेण म्यं्करी कहानिवततरेण। (ध्य० पृ० २०१) (२) इ० व्य० शर और शश० की वृचि मो । ₹- व्य. १ृ० सट २- गे० पृ० २४ :- 5• गहीं की टिप्पणी संचा १।
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उपयुक्त अनुस्वानोपनव्यंग्य ध्यनि, पेद प्रमेषों के अतिरिकत 'अनुस्वानोपन- के
च्यंम् ध्यनि' कमी कमी पृब्ध में भी भास्ित होता है। विन्तु वभिनवमुक्त परबन्द में समात्र रवादि की ही व्यंक्ा मानते हैं। पुबन्ध के व्यंगरय का निवन्धन -
वान पपर्णन का मत है कि प्रवन्म में विवशितान्यपरवाध्यध्यनि के दौनों ही मेर - अमतचयम़ाव्यंग्य बर संचक्रव्यंग्य( या अनुलानोमनव्यंन्य) मार्ित होते हैं। एप पूकन अससकयमुतव्यंग्यध्यनि का बोतन बताते हुए कक्तते हैं- क्वानीमर्फजृ्यंत्वो ध्वनि: प्रमन्मात्मा रामायणमशमारतादो पकाशमान: परक्दि एव ।(स्म० पृ० ३२०) स कस्कुतव्यग्यम्यनि का निबन्धन, प्रबन्ध में किय प्रकार करना गाहिट - रकका परतियादन सुतीय उपीस में १०वीं भारिका से ठेकर १४बीं
तवनन्तर, पष्मों में, विवशितानपनरवाज्य्यनि का दूसरा प्रमेद मी माकि होता है - इसका प्रतिपादन कसते हैं-
हैं- उम्दशक्तिमुतत बौर वभशन्ितमुठम वद मी नि्ही परबन्धों में बोतिति होते है। - मयुमयनविजय में पांचबन्य की वक्तयों में अपवा के- विषयवाण- श्रीठा में कामदेम के सक्पर के समानन के प्रतंन में। और बैदे -महाभारत में पोमायुयवाद वाबि प्रांन में।
१- सुस्वानोकनातमानि पुमेदो व उपकृत: । व्वनैरस्व प्रमन्मेन्ट माकते डोऽि वैजृचिस् ।। व्य० ३१४ २- पृवम्पेन कवानिवुरणमतपव्यंग्यो व्वनि: वास्ाश्ञवण्यतो व तु रवादिध्यनो
३- प्प० पृ० स
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उपयुक्त पंक्तयों में पृतिपावित - प्रष्षों में अनुस्वानोपनव्यंग्य व्यनि के भोतन की व्याल्या बम्लितमुम्त तव प्रवार करते हैं - 'प्रमम्ध में न नैवक वाप्ास्त् सव्यंन्य दौता हे वम्तिु परम्परा हे मी रवव्यंग्य शाता है, - यही प्व्व्ि करने के छिए, 'अुल्वानीप्ताल्नापि प्रेरो - य उदापृत:' सतयादि सृतीय उपात में १५ वीं कारिकिा का रकु्न किया गया है। और दृषि नाम बर कारिका नान की सगति कयाने का निदेश करते मैं - कि ३र। में प्रनन्धों में संपयक्म व्यंग्यध्यनि के बोतन की बात कही गई है, उसी क्य: ।।१ में कमित - 'बोल्योडडरपकन: नवनियु' से अगति है। और पृतिमाम के 'ब्रल्य -
हेम है- 'ससानिष्यनेः कसतल्य मासी व्यंसरयेति ह्ेन:। इस प्रकार वभिनव मुम्त ने भारिया बौर वृत्ति दोनों की संगति कनाने का निएंत किया है।" तवन्तर अपने क्यून का बार बसाते हैं सी- 'बास वह कही नई - पृबनद हे नरहीं मुरणनमश्यंग्य व्यनि दाजात व्यंक्त शाती है, वह रहानि में पर्यवसित हेती है।' और, क्यॉँकि व्य० शरर कारिका के पूर्व उ्य० १1१४ में असंडरयमर- व्यंग्यम्यननि का विवैयन किया गया है तथा व्य० ३९५ के बाद ्य० श१६ में मी वसत्पवनव्यंग्यध्यनि का विवेयन किया नया है। अत: वभिनमुम्त को यह असगत रम रह है कि करैे बीन (प्व० ३११४) में संतसममूमव्यंग्य का विवेधन हो गया ? रची पर यह कहते हैं- यनि स्पच्ट रप से व्याल्वान किया नाय तो पुवावर अळपयमर- विचय मृन्य के बीद में यह संयम्मनिमदम मृष्य अन होगा बर पांवबन्य
शिवेति। सुस्वानोपय: - इमकतियुकेपशनितमलशन, यो मवने: प्रमेद
वस्मेति रवानिम्यने: फस्तसम नासी व्यंससयेति रेम:। दृक््योड व्येवमेष वोज्य:। तम वानुल्वानोमम: रहसतित प्रमेद तवाकुती यः प्रवन्नेभ मासते बस्या। मोल्मोडइपयपुन: कवबय' इल्युवरशडोनेम नारियाकृथो: सति।
हू रवादिय्यनी कर्यवस्पतीति। - हो० पृ० र४
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मे रकत आदि का नीरखम करा बाने लना। इसके बाद वभििनवनुम्त - 'वर्ं रिकि्ना' स्यादि शकोब में किसे वानन्य- वर्णन ने संतत्मममव्यंग्य में अर्पहनितमुख्म मेद के तदावरणारथं बद्क्ुत विया के, उसमें शन्त रस काते हैं।
अभिननमुम्त के उपयुक्त व्वास्या में दुछ तथून बपयेन हैं - १- प्रबन्ध में न वैवक सापल् कस्सून वरन् परम्परा हे रच्यंग्य की बात। ₹- प्रकन्द में नहीं सुरणनरूमब्मन्य के सापात् व्यंकित होने पर रवादि में उचका पर्यकवान। :- 'वं रिकिर्मा सयादि श्ठोय में - किसे वानमयवर्णन ने सपवमूमव्यग्य में अर्गडकतमठन मेद के उनावरणाथं डन्क्ृत किया है जसनें अमतिक्तुप्त का शान्त रख नि्वेश। ४- पुवाव्तर सम्बन्ध में अठसपअ्मनिचयत विनेवन के मष्य संतच्यमूनवर्यम्य के विवेधन की कसमति । उपयुक्त चारों तपूपों का विश्वेषण - १- अभनतुप्त ने जो परम्परर से रसव्यंग्य की बात झुकरनी है, बह उनकी अपनी नई टक है। बिन्मु परम्परा के रवव्यंग्य की बास युछ सटकती है। नयोंकि रन्रतीति में कूम अंतिद नहीं दोता, रवीडिए इवमें अशतपत्रदलमेवन्याय माना नया है। बीर हवी कारण वाननयवर्वन ने रसव्यंग्य को अर्सतदयमुम व्यंभ्यव्यनि के बन्सनत पदा है। यनि रस््रीति में विशम्न हो गया, उसमें कूम संडशित हो नया, तम फिर यह शरी अधपयमव्यंग्यध्यनि हो बार ना । इसीछिए वानन्य- वर्णन ने व्यनि के मेव फ्रेवों का निरभायन स्पष्ट रूप से कर दिया है।
१- बदि सु स्पष्छमेव व्यास्याको ता मन्चस्य पुवाधिरस्याउपयमविभवस्य म्ये
₹-व पाभिकिायी व्यपत: शन्तरत: एव परिनिशिततां प्राय्तः। लो०पृ० W
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१६६ - असतरयनूनम व्यंग्य के अन्मत - रवानिव्यंग्य और संायमूाव्यंग्य के अन्तगत ोवड वस्तु और बलंफार व्यंग्य को कहा है। अत: संत्सयमनव्यंग्य के अन्सनव परम्परा के खन्यंग्य की बात कैी चिड बोनी ? वह एक नदिक फ्रशन है। इम्मता: वमिननगुम्त ने बौ-परम्मरा के रवव्यंग्य की बात सुकतनी है, उके मुक्र में पूर्व पतियादित - एवं बादिनी नैवची सपादि दवावरण ह। मिहे वानपवर्वन ने संर्पममव्यंग्यध्यननि के छिए सवाकृत किया है उसने कम्णा कय मस्तुव्यंग्य है विन्तु अभिनतमुम्त उसमें भी अपने ंग से रवतीति की बात करते हैं- 'रससचत्रापि डुस्त एम व्यपिविारिसयमे पवुछिचयनाने मातीति । सवपैदा-
यवां पर एक समुप अवणेय है कि जनन्यवर्मन ने संलरमजमव्यम्य के अमदुंकत उपावरण में सतना अवश्य वहा हे-
विन्मु अमितमुन्त की मांति दुर नाकर या परम्परा से रकय़रीति की बात नहीं कहते । वह अभिनवमुम्त की अपनी भू है। २. परमन्प में कहीं अुरणनपव्यंग्य वकास् व्यक्त को, यो उचगा रवादि में परयसान हो बाता है- यह अभििवनुप्त का मा है। बानन्यवर्णन का रेव आनूह नहीं है। यदि वानन्दवर्णन को रवादि में पर्यकतान की बात अीष्ट शेती, तो क प्रबन्ध में नुरणतपव्यग्यभ्वनि का विवेशन कर रसे थे तब इद सथूव का मी प्रतियादन करते। किन्तु बानमयवर्यन ने हेवा नहीं का है। ब: रव मैं पवकसान की बात अंनिकवमुप्त की की झुक है। बसतुतः ऊपर वो परम्परा वे स्वव्यंग्य की बात कही नई है बर रस में पर्यकसान की बात मुखतः एक डी है। बैमल उसे भिम्न्ण-भिन्न प्रकार से कहा गया है। कम्मा: वभिनमगुम्त ने को एस में पर्यवशान की बात कही है उसके नुछ् मैं यह तमून की कि- प्रब्प में कोई न कौई एक रस प्रवाम दोता है। बौर सब का पर्वसान कय बंगी रस् में की शोता है। यह समय सत्य अवश्य हे विन्तु आाथ ही वह मी विवारणीय है कि क्या प्रत्य में जो भी एष निबद किया बाय उचका पर्यपदान बंी रव में ही १ नवा वह नहं हो सस्ता कि निबखयम में नेवल 1. ध्. पृ. 2४८. 2. लो. पृ. २५०.
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वल्ु या अंवारव्यंग् स्कमम हां ? वमिवनुम्त के अनुसार रस में पयकशान की बात मान डैने पर सौ संखाम- अव्यंन्य का स्कान्त वस्तित्म की साप्त हो बाता है। बोर एस प्रकार को नश सदैन रख में ही पर्यवाित होने के कारण वसतत्षमव्यंग्यध्यननि का दी अनुवानी मा रहेना।
३'कं' रिकिल्या' सयादि शोक में अभिनयतुम्त ने शान्त रस का नि्के किया है। विन्तु आनन्डवर्वंन ने हबे बुस्वानोयनव्यंग्यलवनि के अर्पव वितमुत के दिए उद्कु किया है। बर यह प्रम्मपताश्वम्यत:सम्मव्ववनितमक वस्तु व्यन्य का स्यह है। क्योकि दूरा प्रारण माच्य रप में तो परस्तृत करता हे शास्त्रीय ज्ञान को, किन्तु उससे न्यंग्य को रहा है दोनों फूतोँ (मृद्र और भुमाड़) का वपता स्ाचं। मुड्र बर मुवाड की जो रकतिया यहां उपनियढ़ हैं वे स्कतः बौर बिना कल्पना के की तम रूप में खिए तथा सम्मम हैं। लपये जो अर्ष व्यच्षत को रद है, वह मी एक कमतब्य मात्र है, अलवार रूप नहीं है। एस प्रकार वशां पूरा परनरण ए्कत:सम्मवी वर्ष पुस्तृत करता है बौर उसये वस्तुव्यंग्य हो रह है। अतः यश मृद् औरभुगाड का स्वारथं, प्रबन्ध से प्रशासित, काक विद् वर्य से व्यवत दो रवा है। कः मशनारत का यद पुरा पारण पृव चशाश्वस्का: - ईध्मव्यपतकतमुडड वस्तु व्यंग्य का एक है। किन्तु अभिनवमुन्त एपर्में भी शान्स रख हंडते हैं। बाचार्य नम्मट ने मी एस उवावरण को उद्कृुत किया है यवधि इन्धोंने हसमे शन्तरव का नि्देत नवीं किया है। अभिनवमुम्त ने रव में पर्यसान वाले अपने सचूप की पुष्टि के दिए बी इय उ्वासरण में सान्तरव कताया है। क्योंकि नशाभारत में बंगी रव -शान्त है। व: बमतुम 'कं स्कित्वा' इत्यादि का कर्यकसान शान्त रख में देलती।हैं।
१. वभिनवमुन्त ने जो - पूवात्तर सथ्यन्य से अउपयम्माविभयक विवेशन के मम्म सतयमव्यन्य के विवेयन की अयगति की बात उठायी है- वह बुल्डम हो बाने के कारण ठीक नी है। वानन्यवर्णन पासे तो प्रश्प में अंशयम्मष्यंग्व के गोशन का बल्लेव वर्सलसकतमव्यन्य के पूर्व या नशनाल्ू कर सकते थे। चिन्लु,
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ववरे बानन्डवर्वन ने संठमयम्ुम का निवेयन असतपयमव्यंग्य के बीच में कर मी दिया तो इसका यह वर्ष नहीं कि अभिननमुम्ा अंठपयमून का भी पयकसान (वसंडरयनुन की माति) स्वव्बंग्य में ही मानने कं । वह तो अभिनतमुमा बपने म को आनन्यवमी के विदान्त पर बडातू बारौपि नर रे हैं। प्रकन्म में रवाविष्यंयड के अन्य हैसुखों के विवेधन के प्रवंन में आनम्यवर्णन कक्ते
प्न्म में रवादिव्यंक होने में अम्य मुल्य भारण है- मुष्र, इतियुक, नर्ग, जनमई निर्वहण नामक बन्ियों और उपरोय बापरि उने अरों का रवानिव्यित की अपेसा हे बौड़ना । वमा - रत्नाकी' नाटिग में। वमिननमुष्त, बानन्यवर्णने की उपयुक्त पंक्तियों की व्वाल्या के प्रसंग में बोर मुन्य विस्तार कहती हुए काय्य के फ्रवोक का बल्लेत करने कने - कि भाय्य के माध्यप से पतुर्व नर्रा, वर्य ,क्ाम बर मोभा का जो पार्यसिय मुल्य फक हे ख्वागन्द उचरी प्रर्ति नी होती है बोर कर्तच्य कार्तन्य का उपदेश मी बरड बीर सरब रीति है हो बाता है। सवजिर कहते हैं- 'इ प रस्मतुर्वनोनावकुपचिना तरीया विनाजा विसयोगकसावीपनत इत्येवं रयोविति चिनावापुवनिय्मे रवास्वाद वैदश्यमेव स्वर्याबिन्यां स्युल्पती प्रयोक्मिति श्रीशिरेव मुल्ने: प्रयोचित। डील्वात्ना व सवस्तदेश नाट्यं नाट्यमेव बेद
इसरे बाद 'क्यु्पि' बर 'कड्' जा उप्ण करने कगे। बला के बाज्यमत कार्यसम्पादनयोग्यता, प्रतिबन्धोपनिपातेनाश कयमानता उनार्यों की पांप अवस्वादों - स्कप, सपारिममियुज्तूता, निवृसयतिपरासा बायवामोन सुड़कसवर्म सता - को काते हुए बन्मि और सन्धयंगों के मेद प्रमेवरों का सविस्वार प्रतिनामन किया। वहां एक तयूप अनमैय है कि बानन्दवर्णन तो बैवठ प्रयन्यों में रदामिव्यनित की बपेसा के बन्मि और कचयंगों को बोड़ने की बात ख्ा रहे हैं, किन्तु अभिनवनुच् अनेक" अवान्तर चर्चाओं को भी सदी प्रशंग में प्रतियाचित करने डने - दो प्रस्तृद भुं्यमान कीो स्पष्ट करने में तिलमात्र भी उपयोगी नहीं है। यह सो अमिनमुम्त का समाद है कि स्थान-स्थान पर तनिक दा भी अनसर पाकर अप्ासंगि नात कह अमशन देते हैं, भाहे भसणा उस प्रशन में कोर्ई उपयोग न हो।
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पुत्यिंनममनका रण्समादादि के र पौक्षा-
प्य० श1१६ में आनन्मवर्णन ने सुदुतिंगयमनकारण्यमायानि से बछस अव्यंग्य के पोसन की बात कषी है।
अहरयमुनी ध्यनेरवतमा रवादि: बुष्मियों मे रि्विंवितेत्र पवन विरोष: सम्बन्द- विहेष: कारमयकतमि: बुद्ितेन स्वक्तमितेस: पवासशनेवि। पतब्ान्मियाती-
वभिनवमुच्त कोमन में एस कारिका की व्वाल्या करते हैं- वम स्विरकोतवनन्सर सवृतिनं ुष्यामहे। युवाविभि: बोडमुल्वरोपी
दोल्य:। क्तनिकनन नवनिविति पूर्वतारिकया यवह अंनीत्य अंगतिरिति। सवत हि युवाबी नाममिक्रायवितेचा मिन्पगाममेद । उवावरणे स त्यमिव्यकतो Sभिपाबो
डोचन के उपदुक्त अंड में निम्नमशिकित सथूष अयणेव हैं- (१) सुवादि से जो कपता के अभिदिान से अनुल्वानसृस व्यंग्य नारित होता है रचता पुनेद अधपयतमव्यग्य रूप से घोतन। (२) शारिम में प्रुव 'वियु' को केवर पूर्व कारिका के अति पिवाना। (३) बासासतू और परम्परा के रवब्यंग्य की बात। रुगदि द्वारा, वकता के वभिपाय से बनुस्वान कृत व्यंभ्य मासिक उसका पुनः असंलक्ष्यक्रम रूप से घोतन होता हैे यह बभिनियनुम्त का मत है। कयोंकि वानन्यवर्णन ने व्य० ३१६ में सयु बादि का अउपयनरमोतन इन्यत: प्रतिमामित किया है। इसके पूर्व कारिया (पर सरकु, पह्न्पों में बनुस्वानोप (वर्सतनपन) व्वम्य के बोडन की बात कही
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२०० नई है। अत: अभिनवमुमा पूर्व कारिया के साथ अति बैठाती हुए - सुवादि में अंतच्यअमव्यंग्य कह रहे हैं और फिर उस सुवादि संसयममव्यंग्य का असंतसक्र- व्यंग्पत्व का रे हैं।
'सुाविभि: बोड मुल्यानोमनो भाडी इवनिश्ियानिकय: अस्वादि युया दिनिर्व्यंत स्वानुस्वानोममत्यालमयमनव्यंग्यो पौल्य:।
यहां अधिनतमुम्त ने - 'सुमानि संउपपमन का असंत्यमुव्यंत्यत्य' यो काबा है- यह प्रस्तुत प्रयंग की और अधिक उसका देतें हैं। वमिनवमुप्त ने कारिका में प्रयुकत 'क्वित' की हैनर पुर्व भारिका से संगति दिवाई है यह ना्पस्ती की तींपातानी नात्र है। क्योंकि व्य० अरब का पूर्व की कारिया व्य० शरत से कोर्ई सम्बन्न नहीं है। व्य. स् की व्याल्वा करते हुए वभिनयमुक्त कोमन में कक्षी हैं 'समुक नवति - नणदिभि: पकम्यासे: वासादा सोडमिव्य्पते विमावा विकृतिपायनदारेण यदि या विभावाविव्यंकदारेण परम्पसवेति तत्र
यहां अभिनवमुच्त ने जो बापाातू और परम्परा से रवच्यंग्य की बात कही है वह अभिकयमुप्त की बपनी झुक है। वानन्यवर्धन मे व्वन्यालोय में कहीं भी वाप्ात् बर परम्परा वे रवव्यंग्य की बात नहीं कडी है। र्वन्ीति आापातु नहीं दोती। वह तो नणािस दोती है। और परम्परा से रस- प्रीति नहीं होती, उसमें प्रोति कनी शीक्रा से बोती है कि कम उचित नहीं होता। रसीखिए हसे नसंतरयमुन के बन्तगत रहा गया है। वनि क्ुम संगात्तित हो बाय, रस्जीति में विकम्य हो नाय तो वह संउपयम्ूुव्यंत्य का विषय हे बाता है। कैो एवं वाचिनी देवचो में।
₹- वढी पृo Wo
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बणोरं का एव पोतन -
ध्य० सर बीर अ1त में वानन्वर्णन बणों के रस नावन का उपवाकन करते गुए भक्ततो हैं- ह म रेके के दाव संदीन बर बौक बार प्रमुकत कर झंगार र के विरोनी होते हैं ब: बर्ण रस की प्रवाखिय कहने वाहे नहीं शोरे हैं, ि्सू नम दे सी ३ न रैंक आदि नीमल्स रस में निवेसित किर बाते हैं तब वे रख को दीप् कहते हैं अत: वर्ण रस के पौतक होते हैं। बाननदवर्वन के मह को स्पष्ट करते हुए वभिनवमुमा कक्ते हें- ययधि विमावानुवाद व्यनिवार्रि का संयोग ही रवास्मान में कारण होता है तमापि विमावादि में श्रुकत विशिष्ट वणों के रवास्माद हेता है। क्य प्रकार वर्ष की अपेसर न रसने वाले, रकमात्र नात द्वारा काक्य मृद्ध अथवा परन स्वमाद बाडे वर्ण रवास्वाद में सलारी होते हैं। वगों की सलारिया कै अभिमान के जिए ही वर्णी पर में निमित बच्नी है। बयाव् अभिकवनुम्त का वभिद्राय यह हे कि रवामिव्यक्त में बिमावादि का संमोन दोता है बौर वर्ण स्वानिव्यनिति में सहायम मात्र होते हैं।
संवटना का रवामिव्यंयलथ -
मायुवरंदि भुणों के बक्य से, संघटना के स्वामि- व्यंकाशम के प्रश्ंग में आानन्म्वर्णन कक्ते हैं - रव बादि को वामयच्यंग्य मान हेने पर कोई निक्त संफटना भुणों का बान्य नहीं होती है। स्वािर निनकी संघटनर निक्त नहीं है रेवे शब्द ही व्यंग्यवितेन के सनुल्त को नर मुगों के बान्र हैं। रव्ुस्त नात को न नानने बाहे पुवषकी का म है कि माचुर्ष के विषय मैं स पगर कया नाय तो हीक है निन्मु बौचल का नियत संघटना के रकिसि सम्ों का बानकम क्रैे सम्मय है कयोंकि वसनासा संघटना की बोय का बाज नहीं नन ससती।
2- व्य० पृ० ३१५.
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२०२ रिदान्तपपी कक्ता है- रोड़ बादि को फरणाक्ित कहने पांडी काव्य की रीचि 'डोक्सू' है। बह 'बौक्य' यदि असलादा संवटना में भी हो तो कोई गाच नहीं। उसमें बदुस्य दवारा सैन कोई बनाहंल्यनहीं 1, कः पुणूों के निका घंवटना के ररिसि, शब्दों के बाजव होने से कोई पाति नहीं। अ्वन्याशौक के उपयुक्त अंत की व्यास्या करते दुए वभिनयमुच्य कोनन में
'व्यं सू कः - वर्णसव्यंग्येडच्याबि रौडानिश्नमाने वर्णचानमेश्ा- कियां स्पदोन्पवननि न साहमु्यीडति सामभाक्तानि संकटना विंवानि न पुतानीति
अमिनयुख्त ने 'क्य तु कुस:' कह कर बपना नह रखा है और उसे पृषषिक नहा है। बानन्दवर्णन का नहा है- 'जिस्ली संघटना निय्त नहीं हे रेटे शष्ड शी व्यंस्यविहेच के अनुनव बोकर पुणों के आाज्रय होते हैं। वानपवर्वन के नत की वभिननमुच्त अपने उंग से व्यासृत करते हैं। अभिनयमुमा की व्याल्या से रंवा जीत दोता है कि बभमिवनुम्त, वानन्यवर्ण के विदान्त को उम परकार मक्षण नहीं करते हैं जिस प्रसार वानमव्णर उसे कलता बाह रहे हैं। अभिनवनुच् लोचन में कहता हैं- 'रोदाि स्वमान आवसु के वर्ण परव्यंन्य होने पर मी अफेठे वरण- परनों का अपना बोम्दर्य भी तब सक इन्मीपित नहीं होता बद तक ने वर्णपर म्रें सं्पटना के बंषिस नहीं किए नाते।। यानन्पवर्वन का यह अभिकाय नहीं है। बानन्यवर्यन ने तौ स्वयं संघटना में शी बणंपर के व्यंपलम की बात कही है, किन्तु 'वनियित संपटना' कहा है। बनाति यह यानश्यम नहीं है कि सुंार में अस्मासा संघटना ही हो बर रोंड बादि में दीर्प लासा संवटना। प्रायः इसने विपरीत स्थिति मी देडी वाती है। लीडिए 'बनियत संघटना' कर का प्रयोन आनन्यवर्णन ने किया है। एंगटना के नियमन में हेतु बकतु वाच्यकत बौनित्य के प्रशंग में वान्पवर्मन
२- गो० पृ० म 4
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२०३ 'बाच्य'- ध्यनि क्ाच्य के प्राणमुत सत्य- "स्व का अंग अपवा 'खवामाद' का अंग हो अता है, अभिनेवार्चं बपना वनमिनेयार्च उत्तम प्रतृति के बाभिव चपवा उससे उतर ने बभ्ति, बकुत प्रवार का को सम्ता है। रमा पर अभिनयमुक्त कोचन में पक्ते हैं - 'वाम्यमितिध्यपात्ना म्यनिल्लानो यो रस्तस्पांन व्ंसामित्यर्मः। अमिनैयो वापनस्वाशमैरानियुव बाफस्वास्ड्रायं नेवोडपों स्यंग्कूपो ध्यानने- स्यनानो वश्य सममिनेवार्ण माच्य, व एम साध्यारम सत्युष्यते । सन्चाठौष में 'ध्वन्यात्मरान' के प्रमुत 'बात्म' पद का बम्तियगुप्त 'स्ममाय' अर्ष कर रहे हैं और व्यनि एवं रस कौ लें,मान रहे हैं। निन्यू बानन्दपंगने को यह वर्ष अीष्ट नहीं है। वानन्यवर्ष न के अुवार यहां 'बातन' पर का वर्ष पाण है।
तात्पकलि -
व्यंदसल्य की स्थापना के प्रतंत में जनन्यवर्वन ने बाण्य-व्यंग्य शें पवार्य-मामवार्यन्याय का खण्डन किया है। कि्तु वानन्यवर्मने ने पवार्थ वानवार्थं का विवेशन करते हुए कदीं भी तातपवं शक्ति का नाम नहीं किया है। निन्मु वमिमसमुच्त 'शोचन' में सपयुक्त प्रसंत के प्रारष्म में, मृमिक रूप में कहते हैं-
इत्यादि। वलृत: तातपर्वां्ति की स्थापा अभिनवमुन्त की ही इट् है। वानन्यव्मनी केमल बीम शकियों को मानते हैं - वाचकल्य, मुणवृति बर व्यंकत्य ।उनहोे वात्पपहकि का नहीं हल्तेस नवीं किया है। विन्तु अभिननमुच्त ने पक्म बार बृवीय इनोड में सारपमतक्ति का विवेषण किया है। व्व० ११४ के उदावरण 'नम मनि्मिम' को नह व्याकृस करने के प्रपंग में पवाचों के परस्पर बन्मय की पृव्मति कहाने के छिए वात्परपरंि को मान रहे हैं- (९) म बायूतियन्मैडयये विरोषक्रीति: पतिपसिश्वान्वस्य नाभिवाशवत्या सस्वा: पवायस्तियचुनती गाया विरम्या व्यापारात् प्रत्ति वात्पयंतवत्येवान्वय- इतिमाि: ।
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(२) सिंसे माणवम: इत्यम विवीयनरणा निविचछतार पर्पतस्ि सर्मितान्यय
(1) तस्मावमिवात्ात्पकत्त गा व्तिरिक रमुषा5शी ब्याबाडर व्यननमोसन-
(v) वता विशेनकदे बाकयाये साह्पपतलि: परल्परामिये।
वनोषनसि स्वालपपतंकि: मुल्यार्मनामा निवतता बित्त। मंतिनाहतसि उसणा-
रहायार्यनातनपतति म्जीनव्यापार:, ह म द्रावमृवं व्यापारतं नयवपू परवानमतः मा ब्यात्मेत्याशेन नि्येमयसतना व प्रयोक्तविभयोपि निययविचय सयुकन्। उपयुक्त बहैरणों के यह निष्मय नियलता है कि बभतितमुच्तवास्पय- डांल' को प्विीय कस्ा निवेशी नान रहे हैं। दुनारिक मट् - बमिहिता- नययवादी हैं, जै वर्दों के अमत अर्द मेरे बौधन के छिए वाल्पवा्म को मानते हैं। 'वाल्पर्वं को शंसि अंा देने वाडे नवन्सकट् हैं, जो वानन्यवर्मन के परनती हैं। कः वात्परवत्ति को अभिनिवमुष्त ने अव्तमट से कैवर महां रा है कः परस्तुख प्रान में अवासि नाच्यरोत् में 'सातपर्वशत्त' की कल्पना - बमतिकतुम्त की बपरी इुक है। वनकतुम्त हे की पुशाकत शोंकर बाचार्य नम्मट ने बपने मृन्य पान्यमुनाड में -'सात्पवचिरडषि केब्ुचितु' कवा है। अंसकत: युए कोन यह नानने को बैयार नहीं हॉ कि-काज्पसाएव साल्पवाियार्श्रंकि की बुक वभतिवमुप्त की अपनी है। वद सौ अभिरिताम्मय- बादी नीमांकों बारा बुकावी नयी है। उस स्मिति में स्तभा तौ मानना
२- बडी पु० ६२ ४- नही पृ० 4२-4३
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२०४ शी पढ़ेना कि बभििननुम्त ने सात्पर्ववति की नोणांसकों से ठेयर नानपवमी के र्िदान्त में बोड़ा है। बानन्यवर्णन सातपर्वंल्ि को नहीं मानतो। बानन्द- वरणन केव तीन शब्द व्यापाररं के पदा में हैं-१- वाचमाय, २- मृणवृति• *- स्ंकलय। विन्तु अभिकतुम्त दृसरे स्थान पर सारपपतंकि की रकने हैं बौर सुर्प कसा निकती प्यंगा-व्यापार को नाना है। जाः कां का अम ब्यापारों का प्रशन है. वम्तियमुम्त वानन्यवर्णन मे, मैवर रसते हैं। २ शम्तरस- सनी बाचार्य वाठ रपों की निष्पन कप से स्वीकार कहते हैं निन्सु नवें शन्त रवं केविषेय में विद्वानों में ममेद है। विन्तु वानन्दवर्मन बर बभिवुपत शन्त रव की भी स्वीकार करते हैं। बाननयवर्वन के पूर्व भी आन्स रव कुक् बानायों दारा स्वीकार किया नया है निन्तु उसे पूर्ण पराकाक्का पर पहंपाने का जैव वभनिवमुच्त को ही है। वमनितुम्त के पुर्वकती आचारय बि्होंने शन्य रव का उल्लैस किया है यै हैं - सट्फ्ट, क्टट और बाचार्य वानन्डवर्यन पिन्सु कन आबायों ने शान्स रस का विवेशन उस रूप में नहीं किया, जिस्व रप में वाचार्य अभििवमुचा ने। बानन्द नर्षन बर बभतिवमुम्त के शान्त रव का सुछनाल्मय वष्ययन करने पर यह लभ्ट है कि अभिनयमुष्त ने शान्त रस का स्वन वाननमवर्यन से भिन्न रप में माना है।
१-() डा० मुकर माचय उर्ना भी इस तथूप से सलनता हें- Ānanda does not conceive of the tatparyasakti. He conceives tataparya as the intention of the Speaker in res- pect of the meaning of the santence. This tatparya is rele- gated even to the word and the meaning. Which are intent upon conveying the suggested sense. This tatparya is not concived by Ãnanda as a function of the words of the same status as that of abhidha, laksana or vyanjana -- The Dhvani Theory In Sanskrit Poetics. Page, 190 . "यहाँ अवधेय तथ्य यह है कि 'तात्पर्थवृत्ति' वाक्य की शक्ति है। इसीलिए आनन्दवर्धन ने शब्द-शक्तियों के साथ उसका विवेचन नहीं किया है। इस तथ्य की ओर हेमचन्द्र का ध्यान था, इसीलिए उन्होंने भी शब्दशक्तियों के प्रसङ्ग में तात्पर्यशक्ति की चर्चा करना-अप्रासंगिक समक कर छोड़ दिया- 'अभिधानन्तर च यधपि अन्वथप्रतिपत्तिनिमित्रं नात्पर्यशक्तिरप्यस्तित द्वविषयस्तात्पर्यलक्षणोडर्थः तथापि तौ वाक्यविषयावेवेति नात्रोकतौ २- बी राचकतु ने अपनी पुस्तक' Nunber of Rasaa' में शान्त रव विषय का नु. शा. ६.५z.
विभिन्न प्रशर्नों पर विवार किया है।
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वभिनयमुम्त ने खोचन की अपेका अमनियमारवी के चच्छ सध्याद में सकणा विवेयन अचिक विल्तृत रम में किया है। जिसमा बंक्षिप्त रूप कोचन में सहा है । वाट्यशास्त्र में उणकन्य शन्द रव के विभय में प्रावीन बाचायों में पयांचा मलमेद पावा बाता है। युए डन शान्त रव को नहीं नाने। युछ लोगों का का है कि हान्त रव हो भी सौ नाटच में उसका अभिषय नहीं पिया का सल्ता। म्वासर काव्य में के की शान्स रसा नान ठिया बार, नाडक में उकका नानना उपति नहीं है। यो डोन शान्त र को मानती हैं, उनमें उसके स्वायीमान के विचय में मतमेद पावा नाता है। अभिनवमारतीकार ने शान्त रव विभयक इन विभिन्न वैमल्यों का निवेवन करके, बन्त में विदान्स पदा की स्थापना की है।
शन्त रस का स्वायीमाय-
बाननदवर्णन से पुर्वकरती आाषायों में ने, नरत के नाट्यसाल्म में रपब्म ड्ान्त रव प्रवरण के विषय में युछ भी प्रामाणिक रूप सै पशना वसम्मम है। उद्यट के काब्याएंगर सार झुंब में शान्त रस का नामोसेस मात्र है। उसका स्वायीमाद नहीं बाया है, पतिवारेन्द्रराज ने लयुमृति में 'क' के स्थायीमाव माना है। उसके बाद बाचार्य स्यट ने काव्याअंगर में शम्त का स्थाबीमाद - सम्यग्ज्ान माना है। नमियापट ने स्वष्ट शब्दरों में कहा है कि कपट 'सम्यनवन' की स्वायीमान मानते हैं। वाननदवर्षन के पूर्व 'इम' बर 'सम्यन्जान' की शान्त का स्थाबीमाय महा दा पुषा ह था, बनन्पवर्णन ने तुष्णामायपुस' रूप शान्त रस की माना है। एद प्रकार प्रारम्म से शी शान्नत रव् के स्थामीमाव के विषय में विहणव्ल के मण्य मतेदय नहीं था। बाथ ही शान्त रव की स्थिति के विभय मैं नी कमेर या यह तो वानमवर्णन के 'प्रीयते एव से मी लशित होता है।
१- हम्यगतान ऋृति: तान्तो विनतेण्य्ायको मवति। सम्यम्जानं विचये वमत रामस्य मायममात् 11
कम्यण्जानं स्वाबीपाय: -नमिषायु 2- 'शान्त्ञ तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत एव' इत्यादि
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२०७ वत: हान्द रह- ड्न्त होते हुए मी, निइलय के मष्य असामत, वयात् विम विपरि का विषय बना हुया थो। अंगरानि ररषों के सत्यादि स्वायीनान शी मांति उसफा को्ड निरियत स्वानीमान नहीं था।
बानन्यवर्णन के समय तक अम और सम्यर ज्न शान्स रव के स्वायी माद कह दिर गर ये। वानन्दवर्थन ने शन्त रव का स्थायीनाव 'तुष्णामाय- घुन' माना है। अभिनदमुख्त वानन्दवर्थन के वृष्णादायमुड की 'नि्वेद' रप मानते हैं। :- तृष्णानां विभयाभिताबाणां य: राम: इकती निवृसपाँ निव:'
बरकर प्रनेशप- वानन्दवणन के समय भी बुछ लोन शान्स को पुसर रस स्वीकार करने के परा में नहीं थे। श्ान्त' को बीर के उन्सनत ही मानते हैं। कः बानन्दवर्णन शान्त को नीर से पूपरे करते हुए कहते हैं - 'वहंकारप्रशमेंक रूप शान्त रस' शोता है- 'बल्य म शन्द बर्हषारप्रशनेमपतया िको:' सोचनवार 'बहंकारष्सेक' रप के छिए 'निवृत्ि' पद प्रयुक्त करते हैं। बानन्दवर्पन और अमिकनमुम्त के अनुप्वक हेनवन्द् - बानन्दवमनी के -'तृष्णादाय'
'वृष्णारायाप: रमः स्वायिभाव: पर्वणां प्राप्तः शान्तो रसः
कुछ ोन सृष्णादायसुड को न मानकर, समस्त नितवृत्तियों के प्रक्न को ही शन्त रह का स्वामिमाव मानते हैं। अभिनवमुप्त कहते हैं कि समल्स विसवुदियों के पुत्र का अर्थ समी विशवृत्ियों का विरोषी निसमृतिवित्ेम है। २
२- बन्धे हू स्वकतिवृत्िमृतम सवास्व स्थायीति मन्चन्ते ।न्पासत, नावस्य परण्सपृतिजे कपत्ते कोवृतित्यामावेन मावत्वायोगात्। पयुदाखे सु बस्मरपस स्वायम् ।1 डो० पृ० २६०)
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निर्विटेम वितवृचि-
कूछ् शेन नेवल शान्स को मानते बुष कहते हैं - नान बपना निकति पाकर शन्त के प्रूष शोता है, परन्तु निमित के अय्ा होने पर शान्त में दी फ्रीन हो वाता है- ए्वं एवं निभित्मासात शान्तद्माव: प्रुकतते।, 11 एस प्रकार कतिपम बाचार्य भरत के नवट्यवास्त्र के इस वानय को पाणर्म उद्कत करते हुए, समी रस का सामान्य स्वनाम शान्त को करते हुए 'बनुपनावविहेषानतरवितवृत्ति' को शान्त का स्यायिनाव कक्ती हैं। अभिनमतुम्त का मत है कि सुष्णाराय सै 'सुपवातनितेषन्तर- विसमृत्ि' में वनिक का बन्तर है। 'अुपनातविर्ेषा चरनिववृष्ि' - तृष्णा का प्राम्माद है और सृष्णादाय मृष्णा का पष्वंतामान है। फिर नी अभिनयमुप्त इस पदा के जिए कली हैं- स्तन्द नातीवास्मपनड् डूसू'। निन्दु बाम की पुष्पंदामाद के पृति शी उनका बामृत है- 'पुलरय पृष्पत एव तृष्णानाम्'।
निवद -
पतिपय विशनक्न 'निवेद' को ही शाम्त रव का सथायीनाव मानते हुए कहते हैं- सरयश्षान से उत्कन निवद ही आान्त रस का स्वायीमाच है। कैा कि बाचार्य मख्व सम्तम अध्याय में कहते हैं-
१- हति मसवामयं वृच्दनन्स: परणवामान्यस्वमावं शान्तमापतरणर सुभमातनिहेशनतरं निस्दृखिकमं शन्तस्य स्वाविमावं मन्चन्ते ।छो० १
१- अनिकना - नायल्वाड ओरिरशहड बीरीव़ माग-र पृ० २५०
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२० बाचार्य मस्त निवेस ने अनैम कारण ने रहे हैं, जिन्सु तम सम में प्रूतुस एवं बैच्ड सर्मान है। किस्सु यहा स्वामानिक रुप से यह फ्रशन अतवा कै कि निके की नणना तो बाबा्य मस्त ने व्यनिवारिमायों में की है, तब या के व्यमिवारिमाय, और स्थाबीनाय दोनों होमा ? एससा लानान यह दो कता है कि नारि्किम या एच्टल् के वियमादि से सत्कम्म नियद व्यनि- गारिमाव रोता है। बिन्तु सरमान से स्कम्म निकद स्थवायीनाय होता है। वैवा वार्सनेब ने अंीतरतामर में का है - स्थायी स्वाडिमयेक्मेन सरचानोपुनवो यदि। पष्टानिच्डनियोनाियसु व्यपिनार्यी ।। इस प्रकार सत्यजञान से उत्यन्ण निवेद, न नैवल दारिकियादि से सत्पन्म निवेद से बैष्ठ रोता है, वाषितु बन्म समी स्वामिमादों बर व्यनिवारियायों हे कल होता है। बैसर कि निकद के पर्वन में अभियमुम भहते हैं - 'रत्यजञानकन निवद: स्वानुम्तरोन: । मानवेविकुसदिष्णुच्यो रत्वादिम्य: वः पसम: स्वावितीड: न् रय हि स्वायूय्चराणानुपमर्दः। बौर नही स्मत्ञानोल्य नियेद सामत रपका स्वायिनाय बर मोड़ा का शमन है। हमी से मस्त युनि ने व्यनिवारिमाों में उसको सम से पक्छे स्यान रिया है। यनि सत्यतानब्य निवेद, दारिकृय बन्य निवेद से भिन्न और मोस का बामन न बोता को भंगल की कानना करने वाछे मसमुनि ब्यमिसिारि मार्नों के बारम्म में निकद को नहीं रते। यहां नह फ्रशन स्वानानिक रप से बठता है कि निवेद तो बन्ध रवों में वयभिवारिमाय माना नया हे और मसमुनि ने स्वमं भी व्यनिवारिमानों में की उसकी नणना की हे सम रये स्वाभिमाम केे नह सरते हैं ? इपसा कमानान 'निवेद' सनपी बाचार्यल कस प्रकार देते हैं - एक रस का स्यायिनान दुसरे रव में व्यभिवारिमाद के सर्वा है, इस तबुष को वो मस्त मुनि में भी स्नीकार किया है। शधीिए उनहोंने यह कहा है कि अुंनार रख में जुगप्ता को व्यभिचारिभाव के रूप में अक्रित नहीं करना चाहिए। अन्यथा जुगुप्सा का भङ्गार रस
१* बामिः पा. नायल्वाड़ बरिएन्टड बीरीड़ मान- पृ० ३१४
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२१० में व्यािवारिमाय के रम में निभेष करना सगत नहीं होसा। इ्वशिए निवेद को व्यनिवारिमान बर स्वामिनाय दोनों मानने में कोर्ड हानि नहीं है। अ: सरवान कन्य निवन शान्त रस का स्मारथिनाय है। वभनिननुम्त उपर्युक्त ना का सण्डन कहते हैं, ने सरमवानवय निवद को शान्त- रस का स्वाविनान नहीं नानती। मयोंकि ऐवा मानने पर बो समामर सतयसान की उसका कारण शोना: बीर सरयान बैराम्य का कारण या बीम है। उम् वैराम्य कै मुलता सतकशान को मोड़ा का साकातू भारण नहीं माना का कता है। उपमें परम्यर्ति शारण मानकर यदि विमावत्य व्यपवार किया बारणा, तब उसमें अति- यापि दोच बरना। क: सल्यशाननय निवेद की स्वायिनाय नहीं मानना
दुचरा ततू यह है कि सपल्त विचयों के पृत्ि उपेसा बुद्धि कम 'नियेन' ही वैराम्य का कचणा है। बिरक पुरुम यह कलन करता है कि उसे सरचवान कौ नाय। नयौंकि सत्यसान से सी मोस प्राम्त शेता है। बतः पके वैराग्व(निवेद) गोता है, फिर सरपशान बौर सरमजञान हे मोडा। न कि पकले तरयजञान दो बाता है, उडके मान मैराम्य या निबेद, और निषे से मौभा। ब्योंकि निवेद या बैराण्य ससल्वदान का कारण रोता है, पार्य नहीं। क: सल्चतान से सत्पन्म 'निवेद' कौ शान्त रव का स्वाथिनाय कलना भगत नहीं है। सवस्ृच्ण ने नी कता है कि 'मैराम्य' हे की मोचा नहीं मिल्ता। कैवल जिस सापक को बैराण्य ने सरमान को बाता है उदे की मोदा निन्ता है। बोर किये वैरान्य के कपशान या बाल्मवासस्वार नहीं हुवा, बह प्ररुविकीन अवस्था की फ्ाय शोता हे। क्वीिए बांस्य में सरमसान के रकषिति नैनल नैराण्य को 'सवविडय' का करण कलाया है। कमा नर स्मानयय निवद की ही श्न्त रस का स्वायिनाय मानेन वाठा इफफिसी किर रंग कखा है वि - सरबानी को सर्वत दुख़्वर बेराग्य शाता देवा बाता है। नैवा कि पांबलि मुनि ने बोनवशनी में कता भी है। सरयशान को बाने पर मुणों के पृति जो कैतृष्णा
१- मैरहम्मातू पुसखय: - बांल्य कारिता ४४ । ₹- कपरं पुरु मस्वावमुणनितुण्ण् - योगपृत्र १।१८
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का मान होता है वर्ष 'परं वैराण्य' कछाता है। अ: सल्यान ब्च निवेद या वैराण्य की मोदा का कारण एवं शान्त रस का स्याबिनाय मानने में कोई दोभ नहीं है। रर पर करते हैं- नह ठीफ है, किन्तु तम क्रार का वैराम्य यौ बान की भरम बवस्था है। और सतयज्ञान की भुंडा दारा परिपोशमित बोने वाडा तत्यज्ञान की वह परं वैराग्य शोता है। स्वंिए निवेद स्वायिनाव नहीं है। वप्ति तत्यान ही ग्रान्त रव का स्वाबिमाय है। बाचार्थ पसत ने नाट्यव्वास्य के सम्तम वध्याय में जो तत्चशान है निवेद की इस्पत्ति की बात कही है, कह उनहोंे शान्त रव बर स्थवाविनाद की दृष्टि से नहीं कदी है, वरमु कह बानानयत: व्यनिवारिमाय रप निवेद की कहा है। और विश्ाड तम प्रान्ति के शारण विभयोपनोनादि की उपामैय बुद्धि को पुर कहने के बिर ही निवेद के कारण की सरयवान कहा है। जैसे - 'बृवा डुम्बोडनंवान्' हत्यादि में मोपा के सामस निवेद के पृति नहीं अचितु सेद कम निवेद के विभाष रूप में ही कहा है। य: सत्कान अच निवेद को श्ान्त रस का स्थायिभाव मानना सुमित है। हस पर सत्वजानब्य निवेद को की शान्त रख का स्थायिमाव मानने वाठा फिर कता है कि न्यायवशने में अदायपाद (नौतम मुनि) के दुःसान्यम्रृतियाय- पिवैवाश्ानानुनरानावेतवननतरापायामयमनः इस वुद्र के बमार पर तत्यज्ञान को बैराग्य का भारण खिह करने का मल्म किया नवा है। ( इस सृत्र का वर्य है- तत्यजान के पुर्व भियुवाज्ञान का नार दोता है, उस मियूवा ज्ञान के नात् बोने बे रान-टैस बादि दोचों का कनात बोता है। उसके बाद क्रम श्रवृत्ति अमाणि धर्म -अपम का नात दोता है बौर उससे नन्म का नाड होने पर दुःख का नाज् दवा है।) काः सर्कवान मे, मियुाज्ान नाड बीर उससे को दोच का नाक़ नदा है- रही से सतकवान को वैराण्य का भारण माना ना ल्ता है। ब्योंकि
१- कल्यैवु वाद्यं तु बैराण्यं ज्ञनस्येय परा क्राक्ठा ्ति पुर्णवियुवेषमनवताम्य- पहति। (बमिवनररती):
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२१२ मिशवाज्ञान का नाश रम सत्यसान हे और ोच भाड रप बैराण्य है। ब: तत्चश्ञान को वेराण्य का कारण मानना सर्पचा उचित की है। कपडिए सल्चान ब्य निमेद या बैराण्य की मोस्ा का कारण एवं शान्य रव का स्याबिमाय मानने में कोई दोम नहीं बाता। इनके बनुदार वैरान्य ही 'निवेद'है। ए्व पर विहान्नपली ककता है कि बैराण्य और निवद करामा चिन्न-भिन्म हैं। कयाँकि शेक प्रवास के प्रवार रुप निसवृत्ति विशेष शा नाम निवेद है, गह भाव रम हे औौर बैराण्य तो रामादि का पृष्पंत रुप है। अ: दोनों भिन्म हैं। चपना बदि बैराग्य को ही निरवेस आान नी ठिया बाय तो भिय्याज्ञान के नाश से उत्पन्म उम बोच्मान रम वैरान्य को मोदा रूप कठ की खिदि में कृनल्मानीकता बवात् हासालु भारण नहीं माना का क्ता है। बौर इसरा दोभ यह आता है कि सल्यजान से, निवेद की उत्यति डोती ी रेस कहने पर 'झम' की ही दूसरी अंदा निवेद हो बाती है। क: निव के स्थान पर का की ही शन्त रह का स्यायिमान मानना पाहिए । बहां यह दोच हुआ कि जम और शान्त तो पयाग हैं। इस पर कहते हैं कि शी शद को अपने समाना्थव हास्य का स्थायीमाव मानने में कोई वापति नहीं है, उबी प्रकार उम को उसरे अनानाथत शान्त रस का स्थायिमाय नानने में बोई बापति नहीं होनी पारिरि। का: निवेद शान्त रस का स्थायिमाय नहीं वपिमि कम ही शन्त रस का स्वायिमाद है।
रत्यादि बाठों में से कोर्ई भी हान्त रस का स्वायिाय
एव गोनों का मत है नि विलसाण रत्यादि बाठ प्रसार की विश्वृति- विहेन (स्वाविमाय), शान् रस के स्याविभाव अजेकस को सकते हैं। अपात् स्भ्री गुरु चादि रुप विभाषों से परिपौच्ित रति नां पुंवार रस की बाक शोती है नदां अध्यातम पर्वो आदि की विभार्वों से परिषोषित होकर वही रावि शान् रव की बनक हो बाती है। रसी प्रकार बन्य स्वायिभाव मी अपने पहछे कतो हुए विभारनों के बनाय इुतादि रुम बन्य विभावों के दवारा भिन्न परकार की सुपते के बान मी हो सपते हैं। इसकिए उन आठों स्थाबीमानों में से शौर्ई एक शान्त रव में स्थायिमान को सक्ता है।
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२१२ कतः रस मत के समयी बाबायों के अनुवार रत्यादि बाठों स्वामितायों का एक रप बपने बपने मुल्य रव की अनुमृति में काम बाता है और दूवरा रप मौदा विद्ि में उपयोमी होता के अपने कद मत के समर्वन के किए उनहोंने भरत मुनि को मी रत्यादि के विषिय स्वप का समयत सिद् करने का वहम किया है। हद उपयुक्त मत का सण्दन करते दुए मुं्ककार कहते हैं कि रत्यादि बाठों रवों के स्थायिमान को सन्तरव का स्थायिमाय मानने पर करमी रति, कमी शोकादि को शान्त र का स्थायिमाव हौनर बोगा, रेखा होने पर किशी एक के स्वायिमान होने पर, दूसरे के स्थायिभावत्य का सण्डन हो बारणा। उपायों कै मैद के कारण रति शोषादि का शान्स रव में स्याविमावत्य कहना बसुचित है। क्योंकि परत्येक पुरुच में भिन्न निम्म स्थायिमाव मानने पर, शान्त रख के मी अनन्त मेव होने लोने। इस दौच के निवारणारय यदि यह पहा नाय कि - स्थापिमावों में मैद रसने पर मी, एक मादा रूप कक के होने पर, रस अभिन्न ही रहेे- तब तौ बीर बौर रौड़ रव का मी एक माँदा रप वभिन्न कड होने से उनमा भी बमेद हो वाए्गा। जो ठीय नहीं। अः रत्यादि बाठों मैं से गोई मी एव वन्तस रस का स्थायिमान हो सकता हे यह मत असंगत है।
रत्ादि की समाष्टि-शामम-रस का स्थायिभाव-
इससे बाद एक दुसरा मत रखते हैं कि रत्यादि समस्त स्थायिनायों शी कमष्टि को शान्त रव का स्थायिनाव यह सपते हैं। कैसे उण्ाई वादि पानक दृव्यों का स्वाद मिह्र कर एक विचिन बस्याद को उत्कन्न करता है। कडी पुकार शान्त रव में रत्वादि अपस्त स्थायिनाव पानक रव-न्याय से मिर्वर एक विधिन प्रकार के शान्त रख के बस्वाद के बनक होते हैं। स म का मी तण्दहन करते हुए गुं्यार कहते हैं - कि रत्यादि विभयक बनैक पितयुसियों का एक दाथ होना सम्मम नहीं है तथा हास बौर क्ोय, बीर
१- न पैतन्युनन इम्ममू। वाकदेव हि विशिष्टान् मावान् परिषणवति रत्यादि इन्देन महव्देन य सत्य्रकानेद वन्चान् संगुदुणीते, तावदेव सवतिरिकालौकिक सूपमानां स्यादीनामनुबानाल्येव अपवर्नविचयल्चम्। बमि०मा० -६२१
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और नवानक वादि नितवृषियों में एक दुसरे की विरीय होने से यह मत ठीक नहीं है।
सिहान्सपस- सल्कान, वाल्सान, बात्पा-
उपयुक्त समस्त मतों का सण्डन हो जाने पर अभिनममुम्त अपने मत की स्यापा करते कुए ककत हैं- डान्स रस का स्थायिभाद, तलकतान है। बही मोदा का डामन हे अत: सत्यश्ञाम ही उसका स्थायी माव है। बर सत्यतान, बाल्मजान का ही नाम है। बौर हर्द्रवादि से भिन्न वाल्मा का ज्ञान ही बाल्मजान कलछाता है। वात्मा का ज्ञान बयमा वल्मवासास्वार बथवा सत्य- ज्ञान ही शान्तरव का स्थायिनाव है। इसके बाद पुनः अभिनवुप्त कह्ी है- ज्ञान, वानन्द आदि विदुद भर्मों से युक्त और परिकल्कि, विष्योपयोन बादि से र्षित वात्मा ही दान्तरव का स्वायिमान है। अन्य ररवों में वात्मा का स्यायीभावतण नहीं दोवा कयोकि ब्य रखों की स्थिति में उद प्रकार का वत्मासास्तरत्यारात्मक ज्ञान नहीं होता है नेा शम्तरत की स्थिति में दोता है। योनशास्म्र के अनुसार नेवल समाचिकाड में बात्मा का वाशास्वार होता है, समानि की स्यिति की झौड़पर अन्य रों में या बयुल्चानवाड़ में पृत्ति नुन्ित रूप में वात्मा का ज्ञान दोता है।अ: सत्याति के बनुमन काड में बात्मा के विद्द स्वरप का मान नहीं शोता है। श्वाकिर वहां 'दात्मा' को स्थायीमाय माना डवक्तैतन या स्ता। यदि वहां बात्मा का शासत्वार मान डिया दाब तो वह रत्यादि का पौच्चक न चापर विरोषी हो बारना। ब: कैक शन्तरत में ही 'बाल्मा' को स्थायीभाव माना गया है। रत्यादि के आास्वाम की अपेसा ज्न्तरव के आास्याम के विलदाण होने के भारण उसकी पुफर नणना की नई है। ठोक में वात्मा के स्कप की प्रीति नैंकक शान्त रख में की पूफष् रूप से शोती है अयात् कौषिक बुमवो के काड में विसिमृतियों का बाकष्य बोने से विदुद बात्मस्वूप की प्रीति नहीं होती है।
ह (अभिनवमारती पृ० ६२ ।)
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निर्विकल्म बाधि नाड में विदृद आत्मस्वूप की अनमृत्ि बोती है, परन्तु बुलचान क्राड में (अनाधि से उठने पर) फिर बृत्ति साकच्य अवति विसवृत्ियों से सुनित्त रूप में ही वाल्मा की प्रीति होती है। बृस्किन्य रूप में अठन प्रतीति नवीं शाँची है,पहिर स्थाबीमाव के रूप में बल्मा की गणना अहन नहीं की नहां है। कि्सु आन्तरद में वत्मा की पुकर करीति होती है। कत: शान्द र बम माना गया
वात्मा को आन्तरय का स्थायीनाव मानने कार्छे आाषार्य वनिनयमुम्त कत्ते हैं कि यनि उम वाल्मा का कम या निवेद शब्द से व्ययपेंश विया नाय, तो कोर्ई वापति नहीं। वास्मा का स्वकप संतयसञान या सपता कम है। विन्तु साथ ही यह भी कहते हैं कि 'अम' या निवेद मितवृत्ति मात्र है, अतः वात्मा ही शन्तरव का स्थायीमाव हे।
१- यदि सु य एव अम अब्देन व्यपदिश्यते निवद इब्देन या तन्म कशचिडु बाब: (बभिनवमारती पृ० ६२५) २- यहां एक सयुप बननेद है कि वममिवमुप्त वात्मा को शान्तरव का स्थायीभाय की गह रहे है? नयोंकि निसी मी रव का स्थायीभाव कोई माच डी की सक्ता है। बात्मा को माव नहीं है। ययमि खाथ की वभिवमुप्त बढ़ी भुलता थे वह भी कहते हैं कि- वात्मा को सम या निवेद से व्यगपेश करने से कोई दानि नहीं है सयापि वात्मा को सम बर निवेद के समानान्तर मानना दकित नहीं है। यदि यमितमुच्त,बानन्यवर्वन के शान्तरव के स्थायी माव को ठीक से सपक हेने तो प्रस्तृत एक पर कोई न्यूनता नहीं रक्ष्ी। वानन्पवर्धन ने मृष्णापायसुस कौ हान्त का स्थायीमान नाना है। "सपस्त तृष्णाएं बात्मा के ही कारण होती हैं। निवीन डरीर में, जिसमें बल्मतत्य ही नहीं होमा, उसमें वृष्णावों ना बनाद शेना ही। अः तृष्णाबों का मुछ्र बाल्मा है। तृष्णाबों का का राव ही बाता है तम बात्ना की श्रेम रह नाती है। इस वास्मा के पृत्ि थो समवी मामना है, नही है शान्तरव का स्थानीमाय। इसे पाहे वाल्मरति कहें दा बास्मानन्द या आल्मपुर - हनमें हे वाल्मरति स्वाधिक सटीक होगा। वषी बाननदवर्पने के सब्दरों में- वृष्णरनायपुस' है। घुद्र का फ्याय रति भी है। अतः यदि वामवनुप्त केव्ड वात्मा को स्थायीमाव कहने के स्वानपर वाल्मरति को ही शान्दरव का स्मामीमाद कह देते को उमके ऊपर वादोप का कोई बवसर नहीं बत
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अभिनवनु्त ने जम्पतरस का स्वमम इस प्रसार परतिपाकित किया है :-
पश्वरामुमुद बदि शन्तरस के 'विभाव' होते हैं, बम, नियम (अुभाव' बर गैकिस्वं कोनिक निस्वृत्तियों का सनुदाय व्यभिवारिमान से सर्यश्ञान रूप स्वाबीमान- डान्तरव कहशता है।
इव प्रसार यह सिद् है कि बाठ खखां के अतिरियता नर्वा आां्तरव भी है। उसकी पूकरु नणना न कहने का कारण अभिननमुप्त काते हैं - शान्तरत सम रों में कमान रुप से रक्ता है। सभी रस शान्त से उत्यन्म होते हैं और वन्त में शान्त में ही उनका रम शोता है। समी रर्वों का बस्वाम क्राय: श्ान्त के रप में ही हेता है। बन्तर मात्र इतना है कि बन्य खों की प्रवानता होने के शरण शन्त बन्ध वायनाबों ने उपसित रक्षता है। निन्सु, सम रखों के मुड में शन्त रव ही रक्ता है। इसके प्रमाणार्थ अभिकतमुप्त अपने मुरु भी उत्पवानार्य के प्रत्यमिक्ादशन से एक शशोक उमृत करते हैं- वन्दानामिह देवाना भूंगाराबीन प्रवरैद्।
कः मोद की प्राप््त के करण प्रतुच, सत्वज्ञान रुप हेतु के युक्त बार निःजीपय्ु रूप पहष से युक्त-दान्तरव को स्वीकार करना नाहिए।
यहां एक सथय विशेन्न कप से अपमेय है कि अभिनवगुप्त ज्ान्तरख के सवराथ नान रते हैं, तथा समी खरवोँं का उद्मव और कय मी आन्तरव को पता रहे हैं। इसके पीड़े ववश्य कोई रहस्य है। शान्त रख का प्रायान्य पति- भाषित करते पुए अभिनयमुष् मसते हैं-
१- यम-विं, कच, बस्तेय, पसपर्य, अपरिपृर। नियन- शाद, इन्दीय, तपदू, स्वाध्याय, सश्वसरणिमान ।योगपृत्र-२/१२-२२ र-भिननारती पृ० ६१२-4३० 1- वं म निभित्नादाय हान्तादुल्मकी रसः। पुवर्विनितमाये सु श्राम्त एव परळीयते 11 -गे. पृ० २१
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(१) मोदाम छ्पेम बायं परनपुत बामनिष वारवर्वसेन्य: (२) तब वर्वरशाना डान्सपाय स्वास्मादो
रस नयन के पीड़े, वमिनियमुप्त के स्वमाद में निरित युछ वाज्नि मृषि शी प्रतिध्यन्ति हो रही है। कयोँकि यह पक्के की प्रतियाचित किया का पुक है कि बनििवमुम्त जैम पशने के पु्वन्य नानार्य हैं। अत: उनके रव-विदान्त का यारजननिक मार्नरो से प्रमावित बोना सर्पवा स्वानानिक ही है। उनके काय्यतास्त्रीय एवं दाशनिक सिदान्तों का मंतुड समन्यय 'एव स्वहम विवेषन' में पूर्ण परिषवमा अदस्या पर हुदा है। अभिननगुम्त के अनुसार रख का वर्ष है - 'निर्विष्न बाल्म प्रीति बर यही इ की परिपाथा है। कः प्रत्येक रब का क्या्वान डान्स मैं होना स्वतः सिह हो जाता है। बभिनमुप्त का जानन्यवाद वास्मा की इस निर्विष्य प्रीति को दर्य बानन्यप मानता है। वस्तृतः वभिननुप्त के एक-व्िान्त की सवीकार कर हेने पर, - मावा: विवार रत्याया: सान्तसु पुतिनत:'। इस पर वदृतियत्ि का कोई अपशाड ही नहीं रव बाता। हसी प्रुकार वाचाय वमिनवमुप्त ग्रान्त रव की रराब मानते हैं। उनके बनुसार मोदा रम कछ देने वाछा शान्तरय तब रखों में प्रणान है। किन्तु रस की पृवानता के विधय में बानमपवर्णन बौर वभनिवमुण्ध में वैमल्य विवाई पक्षता है। क्योंकि बमिनयुन्त लोमन में 'श्ान्त' को प्रमान रस मान रहे हैं। वम कि बानन्य- बर्धन ने अुंवार-एवं की प्रयान कया है।
शंगार र में विशेष-वविरेष का निक्मण-
स्य. श में दुंनार विसद रस में उसके अंगों का स्प्श दृश्िस नहीं शोटा - रक वमूद का उल्लैस करते हुए वननदवर्णन कस्ते हैं-
२- बमिवनारवी पृ० ५२४ पवान्त: - व्य० पृ० २०
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नृंगर के विशद एरसाँ में, नुंगार के अरों का जी ए्प्ई है, वह न नैवल अविरद् रराणों का यो होने पर बदुच्ित रक्ता है, बहिकि श्िष्यों को बन्युष करने के हिए बपवा बाव्य की शोमा के छिट, किया बाने पर नी डशिद नवीं होसा। इस प्रसार वनन्दवर्जन में उपयुक्त कारिया में बा' पद का प्रयोग 'अपा' वर्ष में किया है। बर दी तपषों की पृकट्-पुपट कहा है- (१) तिय्यों की इन्युस करने के छिए, चपपा (२) गाव्य शोना के लिए। हम दोनों को अहन- वहन दृष्ि में स्पष्ट भी किया है- (१) 'विनैयानुन्युवीन्सु' को स्पष्ट करते पुए कक्षते हैं-
सवाचारोपवेशना हि नाटबादिमोण्डी विनैशयनसितिानीय मुनिनिर्व- दाखिया (२)'माव्यशोमार्थ' को स्वष्ट करते हुए कक्ते हैं- 'रचिं न इृंगारस्य मकमनोतरा निरामत्वाहयंमक्मार्वेत: भाच्ये डोमा- तिश्यं पुक्क्ीरयनोनानि प्रकारेण विरोमिनी रसे श्ुंमरांगसमावेशो न विरोषी'। विन्तु अभिनवमुख्त 'विनेयानुन्युवीकं बर नाष्योमार्य' को पुणर पृण् न मान कर दोनों को मिठाकर एस प्रकार वर्ष करते हैं - श्िष्यों को इन्दुव करने के छिए की काव्य की शोना है हत्यादि। और या यह शी व्वाल्या करते हुए कक्ते हैं- 'वामृहणेन पशान्तरमुष्यते। तदेद व्यायष्ट - न वेकडमिति। माशव्दस्येस्वास्थानन् । - विनैयानुन्युडीकई या काव्यशोमा सवयमचि वा विसुडयनावेश: न फैवर्सं पुवाकि: प्रकार:, न सु भाव्यशोना विनेयोण्युणी- नरणमन्तरेणासी, व्ययमानाव्ययवाने नापि उम्येते क्वान्धेव्यरियाते।' इति
१- स्व. 11१ २- वही पृ० २८-१६६ ४- ठो० पृ० मूद
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२१६ इस प्रकार अभिनवगुप्त ने आनन्दवर्घन के मन्तव्य को उस रूप में व्याकृत नहीं किया जिस अभिप्राय से आनन्दवर्घन ने उसे यहां रखा था। अतः अभिनव का ३।३० की लोचन व्याख्या आनन्दवर्धन के अभिप्राय को स्पष्ट नहीं करती। अभिनवगुप्त ने उसे अपनी ही फोंक में कुछ अटपटे ढंग से पस्तुत किया है।
कक्कु से अर्थान्तर प्रतीति के स्थल में गुणीमतव्यंग्यत्व -
आनन्दवर्धन ने काकु का विवेचन ध्व०३।वदवीं कारिका में किया है। आनन्दवर्घन काकु को रखखससेखखेखखसखशरखखस गुणीमतव्यंग्य के अन्तगत मानते हैं। क्योंकि काकु से जो अथन्तिर की प्रतीति देखी जाती है, उसमें व्यंग्य अर्थ का गुणीभाव हो जाता है। और, यह सिद्धान्त है कि को व्यंग्य से विशिष्ट वाच्य का पृधान रूप से अभिघान करने वाला काव्य गुणीभतव्यंग्य है।' तदनन्तर, गुणीभाव को दिखाने के लिए शब्द की स्पष्टता को सिद्ध करते हुए आनन्दवर्घन कहते हैं कि अर्थ विशेष की प्रतिपत्ति का हेतु काकुमात्र ही नहीं है। वरन् शब्दशक्ति अपने अभिधेय की सामर्थर्य से आक्िप्त काकु की सहायता से अर्थ विशेष की प्रतिपत्ति कराती है। और वह अर्थ सामर्थर्य से प्राप्त होता है, इस लिए व्यंग्य रूप ही है। किन्तु जब उस व्यंग्य विशिष्ट वाच्य की प्रतीति, वाचकत्व के अनुगमन से होती है,तब उस प्रकार के व्यंग्य हर्थ का दोतन करने वाले काव्य को गुणीभूतव्यंग्य कहा जाता है। इसका उदाहरण देते हैं - 'स्वस्था भवन्ति मयि जीवति घार्तराष्ट्राः। वेणीसंहार का सत्रधार कहता है घृतराष्ट्र पुत्र स्वस्थ हो'। इसे सुनकर भीमसेन कुद्ध होकर कहता है -मेरे जीते जी घृतराष्ट्र पुत्र स्वस्थ हो सकते हैं ? भीमसेन की इस उक्ति से स्पष्ट है कि वह कौरवों को स्वस्थ नहीं देखना चाहता। उसके इस कथन से यह भी स्पष्ट है कि पाण्डवों के साथ कौरवों ने पर्याप्त अत्याचा
१- अथान्तिरगतिः काक्वा या चेषा परिदृश्यते । सा व्यंग्यस्य गुणीभावे परकारमिममाश्रिता ॥ घ्व० ३।३८ २- दृ० घ्व०पृ० ४७७-४८० ।
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२२० किए है। किन्तु मे तम वर्ष स्पच्छत: कातु स्वर से निक रहे हैं। अ: बर्श गुणीमृतव्पंग् है।
मानन्यवर्णन ने साकांज बर निराकांक कानू का प्रतिपादन नहीं विया रे किन्यु, वमिनवमुम्त ने मस्त के नाठ्यशाल्त के बानार पर डचन में दानांस और निराणांस पायु के दो नेद माने हैं। और वानन्यवर्यन द्वारा उड्चू उवावरणों कीं व्वाल्मा के जिए बानांद और निराणांन कात्ु का प्रयान नी किया हे। अभिनियनुच्त कोमन में कलते हैं - 'इन्ये त्वाड: - नंग्वस्व मुणीमावेजं प्रवार: अन्यवा तु वनादि व्यनित्व-
मावाह , गमुर्ति इन्मरपैद करमिय्नसतेग स्ृष्टरं 'यौष्यैमं नक्ति: सलेक्' ऋति
नदं अमिनिममुप्त दो बासें कह्ना भाड रें हैं- (१) पकका सथय यह है कि यो बाचार्य यह मानते हैं कि बाट्डु के व्यंग्य का पुणी- नान होने पर की मुणीमुतव्यंग्य दोता है अनपणा व्यंग्य का गुणीभाव न होने पर काड्ु में व्यनित्व मी सम्मम है - वह मत ठीक नहों। (२) दूसरा सकय यह हैनिल फेवस शब्द का ही वर्म है। काकु
(१) बर्सा अमिनियमुख्त बच्छे किससे छिए नह रहे हैं ? इनहोे निद्री का नामो- स्तेत नहीं किया हेपन्ट्िणयि टीबाकारों का की मत रवा होना। बाचार्य वानदवर्णा ने नी बाड्ु का उल्हेव नैवस मुम्बस मुणीमततव्यंग्य के ही अन्तर्नल किया है। बाचारव नम्मट कातु को आायी व्ंबार के बन्सनत भी मानते हैं बौर मुणीन्ृाचंन्य शब्द के अन्सर्मा भी । 'सथासतां दृष्टवा नृपसव्रस' इत्यादि उदाहरण को कात्ु के कारणं हुई वर्णतनितमुतम ध्यनि का उवाहरण माना है।
१-छो. पृ० ४७० *- गल० पु० ८२
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समनन्तर वृत्ि में दिकते हैं- 'यशं मेरे ऊपर रोम करना रचत नहीं है।
कौरों पर रोच करना कचिति है, यह काट्ू से प्रकाशित दोता है। यहां पर यह संसर नहीं कहनी बाहिर कि. वर्क काटूं - बाच्य की विद्ि का बंग है। स्वलिए मुणीस्तव्यंग्य मान्य है। क्यॉनि, नह पशनमात्र में डी काटु की वियान्ति भे बाती है। रसे स्यंग्यार्थ बाभिम्त नहीं शेवा। मुणीनृतव्यंग्य के अन्समत भायवातितय का उदाहरण -मगुनानि कौरमसस- सरें न शौपास: दिवा है। यदां डंग होती है कि बानार्य लानन्दवर्णन ने मी मम्मटमवार्य की ही बरर नाट्ट की व्यनिमाच्य के अनतर्नत वारची बवंगनर नवहं नहीं कहा ? केवड गुणोमतबंग्यताव्य के दी कसमत माना ? (२) यवनि वानन्यपर ने बाब्ु का सल्लेस नैवड मुणीमृतव्यंग्य के की अन्त्नध पिवा है विन्तु उहे नैेवक अब्म का ही नर्म नुवीं कहा है नंरू शब्म ब्यावार जे उपाक्ड शैवर जी अर्वतामपूर्ष इम्म नदा है। निन्मु अभिनवमुम्त - पाप्ट को शब्द का की न्म मानते हुए कहती हैं-माबुर्षि अष्यर्येग कशियिममर्मः।
ध्वनि-सभ्मिण - न्यंन्य वर्ष के प्रमान और पुणीनाव के कारण भाच्य दौ नार होते हैं - ध्वनिताथ्य, बौर मुणीमव्यंग्यवाब्य । निन्तु करी -पनी वह ध्यनि बपने फादों है, मुणीपतव्यंग्य हे बर माच्य अलंकारों के संतर बर संपृष्टि रूपेपे व्ययस्थित की होने पर उपय में बकुत प्रमेदों वाडा बेवा बाता है। यचा- म्यनि बकरे प्रमेद से संगैर्ण, बर वपने प्रमेद से अृष्ट, मुणीक्ृव्यंग्य रे सीर्ण, पुणीमुतव्यंग्य के संृष्ट, वाच्य वंरान्तर हे संतीर्ण, वाच्य अलगरान्तर से अृष्ट, संदृष्ट बठशर से संत्रीर्णं बीर संमृष्ट अलगर से संमृष्ट- एस स्रकर बहुत क्रुकार के व्वनि प्रलाखित होती है।
२- ग०्प० पृ० २१० * समाम: मायुनिशेम सतायतव्व्यापारौपारडौSव्यर्ववामवुर्वतम्य इति व्यंग्य एव।
4- वडी पृo ४०
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२२२ यहां पर इन्हीं मेवों का इल्तेत करंने, जिसनें अभिनवनुप्त ने युछ नया बमल्कार दिखाया दोना। गृण्ीमत व्यंग्यपंत्री गातय -
बाननदव्पने ने ध्यनि और मुणीमृतव्यग्य के मितण का उदावरण दिया है- कता सण्खानां सुन्वतरणोदीपन: बोडमिनानी। मृष्णानेशोवरीय व्यपनयनपट: पाण्डवा मस्य दासा: । राजा दुःशल्ादेड सुनतस्यांमराजस्य मित्र कवासी दुर्याषोडसी पपक न रचा इष्टुमम्यागती स्पः ।। यद बाकयामक वलन्यनमव्यग्य क्ी 'व्यंग्यविशिष्ट वाच्य का अभिमान करने वाछे पदों के नाम बभ्मिमणता है। बर रयीछिए मुणीक्ृव्यंग्य के नानित होने में बर ध्यनि के वाक्याभित होने में अंतीणसंता होने पर भी बपने अन् प्रमेद क्री भांति विरोष नहीं है। वभिनियनुप्त ने एस पम में ध्यनि बर मुणीमृतव्यंन्य के विश्रण पर बौर मी अनैक प्रकार से प्रकाश डाडा है। और पहा है- दोनों उवावरणों-न्यकारी स्ययमेद्र मे नवरय: हत्यादि में बौर कता पतक्ताना इत्यादि में, उुडाद्वानु- गाझमानर से, इम्पेश्योग से और एक व्यंकानुप्पैश से यवासम्मव योज्ता कर हेनी
दाय्याईंकर संशर्गस-
ध्यान का वाच्य अंगरों हे जो निनण बोता है यह बलर्यमंव्यन्य के तन उदावरणों में तो बकुत ही सब्ट रप से सुलम है जिसमें रख भी रक्ता हे और कंगार मी। को वानन्यवर्यन का निष्मणिकित पप
१- हत दृ. ५०४ 2-सप. gृo ४०ा ..
जये यौक्मा। कोच पृ० इण्ड
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२२३ या व्यापारकती रखानु रिुं कानित्मवीनां नवा इृष्ट्टयां परिनिक्मतामतिभयोन्म्ेमर व बैपरिकी। ते है अच्यकळम्व्य विव्वमननितं निवध्यन्तो वयं
वर्श विरोचार्ओंर हे अ्पतरणंडमतवाकम(नामत) ध्वन के पुमेद का संकर है। अधिवकमुम्त ने एस पम के पश्येक पद का कूष नर कर माजनिक दृष्टि से विवेयन किा है।
माध्याकंशर की अ्पृष्टि पर् करी अपेकर से सी होती है। क्योंकि इसमें युष पर माच्य बठंगर मुकत बोते हैं और यु ध्यनि पृमेद्युक्त। बपा - बीर्मींपुनि पट् मवकसं बृक्िं बारसानां
विश्ावातः प्रिकन हम प्रार्थनावास्कार: ।। यहा मैत्री पर में वभिषिभिततवाच्य ध्यनि है। कयौकि मैत्री पद बादा- गिक कद है। उसका कर्म है नियता । वह नेतन का नर्म है। पवन क है। नतः यह नर्म पवन में अहम्मम होने के कारण रसे इस वर्म की झोडना पक़ता है और नश्न इम्पय रपी दुवरर वर्ष बपनाना होता है। फस्त: मैत्री पर अत्यन्ततिरसृतनाणयध्यनि का स्यछ है। दूसरे पवन को अब्यत: प्रिकाम की उपा दे दी नई है। बतः य्हं बन्च बलार भी सम्मव हैं। वहां ए बोर म्यनि हे दुबरी बर बंगार हैं। हबी कारण वह वाच्याउंकर बर व्वनि
२- सदर्च इृष्टव्य डो० पृ० ५००-५९•
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अभिनिवनुया ने इस पम की अचन्त विस्तार के व्वाल्या की है बौर इपमें उत्प्रेता, एकनावोकि, रपकोपा को भी कुम के लवीकार किया है।
व्वनि संवृष्छाउंकार मिमण *
यषा-
गेस पवारिनिवाणं म्यव मोखन्दाणं ।। 'छोचन' के अनुसार इसकी संस्कृत शबर दो फ्रकार की दोगी - (१) वभिय-पृयोग-रविेस् पवितमानिरेस्ट विबसास। शैमी प्रासितम्ीवाण क्नं सूरुन्पानाम्।। इम वभिन्य के प्रयोन से सरब दिनों में या पकिक नर सांनादिक का कार्य कहते हैं तो भवुरों की टोडियों का प्ीवा केठा केसा कर नृत करना वड़ा ही सुधाचना छता है। (२) अभिव-पयाय - राजिेम् पति-श्यामावितेभ् विवेय। शैमी प्रवारितनीतानां नर्वनं नुरुन्दानानु ।। नह-नए बानों की नठनड़ाक्ट से नरे (बरच) पचिकों के लिए स्वामा रात्रि का कार्य कर रहे तन दिनों में नयूरों की टौखियों का बौर-नोर के नाकर नायना बड़ा की मुवावना कन रवा है। यहां पचिकों पर खानाजिक का वारोप हपे की ना रहा है तथा पचिकों के छिए निवयों का श्यामा राति के समान बापरण करना उपमालंकर को। स्पी क्ार निवाणं क -'डीवा' तथा 'नीस - इन दो अर्यों कौ दै रश है, इसमें स्हेच है। तवा प्रापृत शब्दों - 'अहिणय' बर 'रख्यिद' मैं प्रात: बम्लिय एवं अमिनव तथा रतिेबू एवं रक्ितैभ् शब्द मुये हुए हैं।
1
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इसमें भी श्ेच है। इस कारण उनसे निवकते एक वर्म पर दूसरे वर्म का बारोय मी हो रहा है। फन्त: इसमें एक रूपक कौ पृतिक्का मिठ रवी है। ए्म करकर प्रस्तुत पम में उपना भी है और रपक भी है। वानन्यवर्मी बन दोनों अडफारों में परस्परनिरपेतता देलते हैं। ब: ने से अृष्टि का एक स्वरकार कहते हैं। इनसे नपुर बर नर्व्षों का दाम्य अुरणमहम व्यंम्यवरव के रप में प्रस्ट को रवा है बोर पोचण नी पा रवा है। कस्तः वर्हा ध्यनि को अृष्ट अकवारों से अृष्ट मानना दोना। वभिमनमुम्त ने पसतुत पष में संतेणर्सिंगरसंगीगल्य बर सीणसिंगरगृष्टत्य माना है अयाए उोननकार के बनुबार वदा पणिक सामाजिक और पति-श्वानायित- शब्दों को देने वाले पह्यिवानाइस्डू शब्म में सपना और कपक का सन्देल्संगर है। शसी फ्रकार शडी अंत को लेवर 'बह्णननताब' हे जो वर्ष व्यत हो रव है, वह इन दोनों के अ्पेसयंकर से संेण है। फन्त: यह संत्रीणीउंकारवंोर्ण व्यनि का एक है । तमनन्तर, अममिनुम्त सीणरविंकरमृच्ठतय पस्तुत करते हुए अत्यधिक नस्पष्ट एवं इकका बुदा विवेधन करते हैं-
अब्द से उदुनन ही रहा है सथा प्रवाखितिनीतानां एवं प्रवारितत्रीवाणा कापवार्रि- अनिवाण' इन्य से उपयन हो रहा है, इन दोनों अर्षों में अंवगमात्र है, सुद्राभूपा- नदाल नाद नहीं । मशिकतानाशच्ट्' इस पर में संतीण तन सपना और रपक से शब्दशकतिमक पर्यनि का संकर एववयंकसानुफ्रेस दे है। इस प्रार,सीणिंगर संदृष्ट और बंगेण से सरंगेण है। वस्तु इम दोनों मेदों को भी स्वीकारन बारिए। वर्दा काइसां वादि पद सन्मपरिकृत अलत्य हैं बतः हम्हें इन्दशक्तमलन मानना होना।
१- डा० रेवा प्रवान द्विवेदी ने यरष समाशौकित अलकार तुफवा है। और कहा है- बलूतः यदां सनासोनित अगर है। मयरवृन्द इस विशेचयानय यद मैं सेच नहीं है। श्ेच सभी परदों में रृहैच है। ककत: वनिक्य का मयर-नृक्ष आनन्दवर्धन पर बरीम ज़ीस होवा के।, पृ० २२४।
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इप विवेयन से स्पष्ट है कि ध्यनि की स्थिति मिल्िित भी रहती है। र प्रवार ध्यननि के मेव-यृमेद असस्य हैं, गणनातीत हैं।
ध्वन मैद संस्पा -
वहां तम ध्यनि के मेदों की संस्पर का परश्न है वाननदवर्यन कैवल इतना कहते हैं * एवं ध्यनै: प्रमेदा: प्रमेदनेवाश्य कैन अपयागो।, अंत्यातु विद्वानं तेवइनियनुक भरनानि: ।। विन्तु कनयमुन्त बड़े कन से ध्वनि मेदों की नणना करते हुए जिसते हैं- ध्याने के अपने मेदों के साथ, मुणीमृतष्यग्य के साथ, बंगारों के साथ पताश्वि शोता है, यह सीन मेद हुए। बंसर के भी तीन प्रकार हैं - अुम्रास्यापु- श्रकत नाव के, क्पेशल्म होने के और एमपपानुपुवेश से। एय. प्रकार बारक भेद हुए बौर पक्की को पैत्रीस़ मेद कही ना पुते हैं ये गुण्ीपुतव्यंग्य के नी नानने पाहिर। मे पैतीस बपने फ्रोय बलकार में मी, एस प्रकार सफक्तर मेद हुए। वर्ह तीन अंगर बर मदृषष्टि में मुणन करने पर र मेद हुए। उनके साथ पैंतीड़ मुल्य मेवों का भूणन करने पर ७२0 से अधिक होंने। तथा बलगरों के नम्त्य से ध्यनिमेद अर्सल्य ही जाता है। बानन्दवणनी ने सम्पूर्ण व्वन्यालोज में कहीं भी ध्यनि मेद, प्रमेषों की कोह निरििकित संस्चर का निवेश नहीं किया है।
१- व्य० शपाप
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छोचन व्याल्यान में बर हुए मानक, वाना प्रमृति बाचायों के न कौ दृष्टि में रकारे हुर विश्वेषण
नाचार्य वानन्यवर्वन ने पुक उवात की सुवीय कारिया में पतिका कर की है पि-'सव्याल्मत सूपवरताध्य अदम :- बर्थ के वाच्यांड का विस्वृत विवैषन नहीं करेंने, कयँकि उपमादि प्रसिदि मवारों का पुववतीं आषायों ने बहुमा
सुलन मात्र के व्याल्यान किया है। अत: उपयोनानुवार अवात् ध्यनि स्थापना के प्रपंग में उनका
निन्यूु, बाचार्य वमिनवमुम्त कहीं कंहों अक्सर पाकर, पूर्व के आचायों के मुन्यों हे कह़े भनौयोन के साम, बोदावरण उरण बांट-सांट कर बपने व्यास्यान को स्पमा व्यनिकार के की बनुवार प्रस्तुत करने का प्रकल्न करते हैं। रेडा कहने पर डायः ध्यनकर के मत की दुष्टि हो बाती. है। कि्सू, की की ध्वनि- कार के मत की दुष्ि होने की बपेसा, उस्टे पुवानामों के कयन का मूल्य घट भी बाता है। तदर्ष नामह, उद्पट, नाममादि के कपन, जो कौवन में यम्र तब् विषीण हैं, इन्तें दृष्टि में रकते हुए विश्केषण करेंने। :१: परथ्म उयात में ध्यनिविराची बनाववाद को पर्वपण के रूप में प्रस्तुत करते हुए बाननयवमर कझ्ते हैं- 'समकत बाकत्यसतु बुद्राशादि और अर्यमतवारत्वहेतु उपमादि है और संघटना- नम मायुयादि भुण हें। इम पुणालंकर हे अभिन्न रकने वाडी बृचियां बौर रीतिया है, यो निलल्दीं बाबायों दवार उपनामरिकादि और बैदर्मी बादि नामों दारा कही भ है ।
१- हत्र वाच्य: पसिदो या पकारयनादिभि: । बहुचा व्यानृत: बोडम्पे :-
- सतो नेह न्कते।। कैवखमनूफती पुनर्वषोपयोनमिति। व्य० १।२ १- ड्व. बृ. ११-२०
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वानन्दवर्धन ने पुवपक के रूप में हसमा की परतिपाम्रित किया है, किन्तु अभिनवमुषत यह मी काना पाहते हैं कि जे बाचार्यं कोन हैं, जिन्लोंने तुणारगर वे बनिम्म उपनानरिमादि बृशियां और बैदर्नी बादि रीतियां पतियादित की हैं। कतः 'व्रैर दृतिरीदीनां तदृथ्यवतिरिकत्वं खिबनु' इस विवान्त की डिव कर इहकी पुष्टि हेतु नकती हैं - अतुड़ापादि से भृषियों के पूकर न होने के कारग की मामह ने पृत्ियों का दूकर् व्यनवार नहीं किया है। उद्मटादि ने भूषियों का व्यवकार किया है निन्तु, कुप्ाशादि से बभिन्न रूप में ही। सवर्च अभिनव कय्षट के काच्वानंतारवारक्स का प्रमाण देते हैं- सपव्यंकन्यासं तिदृण्ेताषट पृरिष्।,
नागरिा, उक्ाबरिका बर प्राम्या - इन तीनों बृषियों में सनातीय व्यंशों के उपनिवं्य द्वारा पृफट-पुप्ट बुपाच होते हैं। दवा नह वृष्ि नानरिका कलछाती है, जो परु्च बण्ों से युक्त होने के कारण परु चानु- द्रादा होती है। मृण(स्नन्य) वर्णों के झुद्राद वाडी वृत्ि उपनानरिया महडाती है। इसे कड़िता भी कहते हैं। नध्यना अंतक सुतीया मृति ्राम्या महठाती है, करयोंकि ड्राम्य वनिता श्ी नातत वह मी तैदग्वविद्ीन होती है, एकमें न कारता ही बोती है बर न परु चता ही। मट्रौडफट के अनुसार म्राध्यावृद्ि की बद़ अर्ष में कोमता अंता भी है। ए् क्रार फबानुद्ाख - नानरिका, शृणानुदाय- उपनसनरिका बर कोनलानुप्राय क्राम्यावृत्ति होने के कारण की दृतियों को बनुपास की नातियां की कहा गया है। इसडिए ये अुदराच के पुपट् नशीं रल्ती। हव प्रार कयषि उम्मटादि बाबावों द्वारा दृषियों का विवेवन किया नया है किन्सु कोननकार उड्नट के विनेशन को नमष्य मानते हुए, आनन्दवर्णन के
२- बाज्यासंशसवारमं १८ *- यूरे: नदा कोमकसंद्र व भट्ोटूमटीरर पर्शिता (वाडप्रिया पृ० १८)
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'मता: कवणनोबरमिति' एव बंत के अभिपाय से नहते हैं - अट्मटावि दारा दृषियों के प्युक्त सोने पर भी कोई बचिक अर्ष सुनयनण पर अवतीण नहों हाता'- बभलिव के इस प्रकार कह्ने पर एक तो उद्मट के व्यास्यान का महत्य घटता है। बोर दृसरा, यदि बन्स में अभिनिव को उद्मट के नमम को महत्वहीन ही बना या तब फिर इनहोंने क्यों भृत्तियों को अनुदास की जातियां सिह करने के छिए उद्मट की ही शरण की ? का बपने कयन की पुष्टि के जिए कोई बाचार्य नहीं मिश तो उद्यट के नमन को उकृत कर दिया, अपता प्रीक विद को नाने पर वन्त में यह दिया-'मृत्ियों के पयुक्त होने पर मी कोई अधिक अर्य सूरयपथ अवतोणे पर नहीं दोता।' यदि रेव ही या तो आाननदवर्णन के अमान अभिनव मी 'उद्भट' का नाम न लेते। :२: हह्ी प्रकार ध्यनिविरोषी माकवाद के विवेयन के प्रपंत में बानन्यवमनी ने किवी माळवादी बनार्य का नामोल्ेस नहीं किया है। निन्तु अभिनवनुच्त वह सोब निशाखते हैं नि वानम्यवर्णन की ु्द् में कौन से बाणार्य हैं जो समुल्य वृति कम द्ारा काव्य में व्यवहार करते हैं और व्यनिमान का विंचितु स्पर्श कर रहे हैं बैद । बमिनय ने इपसे दिए मट्ीदुमट और वामन के कपन की उबूस बिया है। मट्रोड्मट वामनापिना। नानतेनोल -इब्ाशट योनियानाणा: इति बभिवानस्य सब्दादृमेद व्याल्यानुं
बामनोडमिं बपृशयालतणा कोलि:' इति। यशं पर अभिियमुम्त वलंतरवादियों को ही मात्वादी, बना रे है। बानन्यवर्णन की दृष्टि में न थाने कौम माकवादी वाचार्य थे। बर फिर हमहोंने स्मष्ट रुप से यह नी दिया है- परिकल्पैवमुर्तम् - माऊमाशुस्तमन्ये इति। यहाँ पर अभिनव का स्पष्टतः आनन्दवर्धन पर स्वाभिमतारोप है। १- गो० पु० २१
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२३० :३: वसंगरों में (अपात् वाच्य वापम नाव में) ही व्वनि का अन्तमनि करने वाछे अलकस्पानियों को, व्य० ५1३ की वृद्धि में बतर देते हुए बानन्डवमी कक्षी हैं- कग्य-व्यंदर माव पर बानित, ध्यनि का बाच्य-मादक के चाकरम नेतुचों में अन्समांम नहीं हो चपता। क्योंकि, नसां बाच्य वर्ष बपने कौ भुणी- पस करके, व्यंम्यार्य को प्रणानत: बभिष्यक पस्ता है- वह ध्वननि का विचय है। अपाँ तु व्यंग्यार्य की पृणानता होने पर की म्यानि होती है। कंभरों में व्यंग्य के प्रामान्य का बनाव होता है। का: प्रणानता माच्य की ही होतो है। उनमें व्यंग्य वर्ष का कोई मह्त्य नहों होता। काः वह ध्यनि का विषय नहीं हो सनता। रह तयूय की पुन्टि के किए - सनायोकित, आदोप, शुरूनिमित- विशेयोति, क्याबोत्त, वर्दृति, दोमन, संतरासंतारादि रेे बंगरों का विवेधन किया गया है - कहां व्यंग्य वर्ष रक्ते हुए नी प्रयानता माज्य की रक्ती है। आनन्दवर्णन मे इम अंवारों का अपण नहीं दिया है, कयोंकि उन्होंने पहे (प्य. ११२ में) ही निश्चय कर छिया है कि 'उपमानि बलरों का बन्य बाचाबों ने बहुचा व्यास्यान किया है। अमः उनका प्रतिपामन नहीं क करेंने। उपयोगानुसार उनका अनुवदनयात्र कर देंगे।' किन्तु केवड, अमिनवनुक्त ने 'बाछौक' में बार समी बऊगारों का सपाण बर उनावरण पुर्नवतीं बाषायों के मृन्यों से नेवर अपने डोमन क स्यन्मण किया है। बसरी कोचन के स्वप में मी बभिमिृत्ि को नईं है। :३ क: वानम्पवव ने एर्म पूक् सपायोकि का उवावरण दिया है-
उपोठरानेण विशोलताएवं तथा मुहीतं सक्षिता निहानणन्। यवा कमसं तिभिरांङुत तवाडपुरी पि रानायूनखितं न उक्षितम्।।
इसमें न्यंग्य वे बनुक्त वाच्य की प्रमान रूप से प्रतीत को रहा है, औौर यहां निता बौर वत्ि ही कुल्य वाक्वार्य हैं। प्रवान वाकयार्य-निजाजत्ि, पर शी नायर नाथिका के ज्यनसार का वारोप किया गया है। काः यह ध्वनि का विषय नहीं है- वह बानदवर्णन का अभिक्राय है।
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अभ्निननुम् बान-्दवर्वन के मन्तव्य का स्पष्हीकरण करते हुए वर्ष परमम 'उपोठरानेण क मुणीमृतव्यंग्य का सथक का रहे हैं बर फिर बवान्तर बरवा करते हुए नानह के समायोकि के सपाण की उमतत करते हैं-
बयांतू कषां प्रस्तुत ने बबिस्यत अन्य बनाति अवस्तुत वर्म समान विशेषणो मे प्रतीत शोता है, उसे विदान कोन बंति कार्थ होने से समासोकि कक्ते हैं। वमिशव द्वारा बदूत, मामड के इस अपाण में, बानन्यवण द्वारा कय्ति - 'व्यवहार लारोन' की बात नहीं है। जा: बभिषव दरा उसूत, मामड के कपन में आनन्दव्णनी का सम्पूर्ण बभिदिराय बभिव्यकत नहीं होता। नामह, उद्मट दण्डी बौर नामन में से निली ने नी व्यनवार क्मारोप की बात स्पच्छत: नहीं कही है। द्ही ने युछ विस्तृस मर्षा ववश्य की है जिन्तु उनसे मी अभिक व्यवस्थि विवेवन 'अर्लशारवर्पस्नमार' आाचार्म क्यूपत ने जो खानन्यवर्वन के परवती है किया है। पुम्पका: 'व्यववार सवारोन की प्रेरणा अयूपक की बानन्दवर्णन हे ही मिठ्री है। वभनियगुष्त, आनन्यनर्थन के मतानुवार उपोतरानैण की व्याल्या करते हैं- वहं व्यंग्य की प्रतीति होने पर भी उसका प्रायाम्य नहीं है, क्योंकि व्यंस्यारद (नावक नाविका का व्यपहर) अुंगार रस के विभाव रप में वणितति - इन मिहा बीर सत्ि को ही बनदत करते हुए,स्वयं बछंारूप ही रह बाता है। इस प्रवार विभावकण वाच्यार्थ- व्ितासति द्ारा ही बाहत्य की प्रतीति को रवी है।
१- मामक २, ७६ २- (१) वुता विषणविवित्यामेणाउंगरद्यमुयो। तत्रादी विशेषण-
(२) विशेषणवाम्यादि प्रतीयमानमपस्तुतं पस्तुतावमोयपरयेम प्रीक्त।
स्ववच्छा दितरयेम प्रसृतस्प तद्तक पित्वाद्डममेव । (वही पृ० १४१-१४२)
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इससे अनन्तर अमिनननुच्त 'वस्तु व्यापष्टे' द्वारा बपने किली पुववती व्याल्याता के मत में दौच-पशन करते हुए कहते हैं - 'सवा' अवाति निश्वा-मह कलुकर हे और क्योंकि अकेतन रात्रि में नमूल्य नहीं हो सर्ता, ब्ाः रम निश्ा- शररि इन्दों द्वारा नाकननामिका ब्यरवार यहां उल्मेशित या करयत होने के शरण वाज्यार्य रूप है, व्यंग्य नहीं। बर स्वीडिए, यह आधोलि है। इस व्वाल्यादा ने भृत्यांत ने 'ब्यंग्येशनुक्तम्' पर ध्यान नहीं दिया है। बर, उद पूर्ववती व्यास्था के अनुवार 'व्यष्येनानुनतम्' की उपेसा करने नावक न्नायिशा के व्यवहार की अभिषेय मानने पर एक दूसरा वोच बभलिवमृच्त यह भी काते हैं कि - यह एकमेशनविर्तिकमम दोमा, बदोकि नहीं ।वयांि वमियेय रम से नायकन्नायिजा का वर्म करने पर तिभिरांडुत'पद में तिभिर कम गसुंड कस प्रसार उपक अमाड करना पहेना, जो एकदेडनिवर्ति रपक होना। क्योंकि फिर विभिरांयुत पद में दौ वर्ष नन्दरर्मियों से किकनिक अंनकार बीर दुवरा वर्ष नवोडा बन के योग्य नीड वर्ण की बोसनी - यह दोनों वर्ष नहीं हो खनि। फिर उसमें समादोकि नहीं हो सोनी। की - 'रावश्ेरीज्यन्त शरदैम बरौ- नूना: में दुल्य विश्वेषणों के अमाव के कारण, स्मायोकि नहीं है। एवदेश- विवर्सित्य है। बममिय' मानोकि' के पदा की पुष्टि के किए कहते हैं कि समायोकि के रराण में वनिणा ब्यापार के निराकरण के लिए 'मम्यते' पर प्रमु्त है। कः वहां नायक ्नायिका परा को बभिषैव मानना युक्ि संगत नहीं। अ: नाषिक का नायक के पृति जी व्यवहार है वह निशा में समारोपिति किया नया बर नामिका के पृति नायय का व्यनवार सज्ति में समारोपित है। असः 'सारोकितना विवानायाव्यवशारयो:' इम कृत्याश में नायिका बर नायक में रहेम (समात) का फरशन ही नहीं उठवा। ( वयषि व्यावरण के 'पुमान्- रिवा' नियम के बनुवार स्वेम हो सक्ता था।) दह तत्य है कि यहां एकडेम नियम की उपेसा वे बनायोलि का बो
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शौनदर्य बम पड़ा है उसे अमिनम की सल्चा मिनिवेठीपृल्फृष्टि की पलड़ सी है। नम कि पंहितराय बान्नाथ एस स्थक पर स्वलिति हो नर, उमहोंने वदां एकोभ यह ही दिया है। निनम्यु इ्रसतुस ए्वक पर आानन्यवर्थन बाहा वित पुरपंत् कौ दृष्टि में रकते हर-'वस्तु व्यशब्ें से केवर नैशोचपरूस: तक का कोचन व्यवासयान व्यर्ष का विस्तार मात प्रवीस रेता है। क्योंकि वर्हा पर बानन्यवर्णन बैसानक थर्डकार का परम फैदक 'व्यंग्येनानुक्त वाच्य की ही परुमान प्रीति' दिकाने के छिए प्रारम्य किया है। न कि वसंकार विभयय विभिन्न उस्याओों के साधान हेु। किन्स्ु अमिनननुम्त यह बान कर कि उनकी अमनी बात मी कहीं अवधित न रव जाय, जवां तनिक मी अनशाड मिल्ता है, अपनी बात नंक देते हैं। बर का उसी सगति नहीं ैठती, तो प्राबः इल्यलनवान्तरेण बहुना कह कर बपने व्याश्यान की बाने गढ़ाते हैं। :३ खः यापाप बलकार के प्रसंन में मी बानन्यवर्णन वेव इतना ही करते हैं- तनौ- पाइट, विशेन वभिवान की हर्चा से, जो परतिपेम रूप बासेय है, नदी वाच्यारय व्यंग्यविदेष की व्यक्त करता हुवा, मुल्बाव्य सरीर है। बर प्रामान््यतः बान्वार्ज वायोपोसि की सानपूर्य से ही बाना बाता है। अ: व्यंग्यविशेम का बालोपड करने वाहे, वाठवार्य का ही माहत्वोलन् के कारण प्रायान्थ होता है। बाच्य बौर न्यंग्य के प्रामान्य की वियदार माडल्योल्य के ही बबार पर होती है : इनकी पुष्टि हेतु वाननपवर्धन उवावरण देते हैं - सुरागपती सन्च्या बिक्सस्तल्पुरसर: । नही वैवनति: बीडुलयाषि न समागम: ।। वरहं मायक जनाबिया के अवमानमविभयष व्यंग्यार्य की ज्रीति होने पर मी बाच्यायंश की माहत्योलय होने के कारण, रसी का प्राणान्य है। बानन्दवर्णन इसके बतिरकता हा प्रशर्नों पर विवार नहीं कहते कि तक उवावरण में समायोकि
१- है. बृ० ११०-९११ १- उ्व० पृ० १११-९१४ :- व्य. पृ० ११४ ४- व्य० पु० ११४
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है अपवा बादोप बलार। विन्तु, अभिनदनुप्त कड़े विधिविधानपुरक इन प्रशनों पर विवार करते हैं- कि लुरागकी बन्ध्या में वामन के अभिषाय से बासोय हे और नामह के अभिप्राय रे आरोकि, सी शरण पं्यवड़ ने द्युकत दोनों - बाद्ोव बौर लायोदि था एक हो उदाहरण दे दिया है। इसके हिए मामह और वामन के मष्यों के आायोष का अणु बर उ्वावरण भी देते हैं। मामह के काच्याउंकर से बायोप का अराण क बेने के बाद, बारेय के दो मेदों - (९) नरस्नाणविभयवादोय बर (२) उक विषय वारोद में हे परथम का उनावरण वई त्वां यदि नैदेय इत्यादि मामह के काव्याइंगर से दिया है बिन्तु दूसरे मेद का उदावरण मामड से नहीं खिया, बरू बृह् अभिमन का स्वरनित पम - मो मो : निं निमाण्ड एव पसितस्त्यं मान्य हत्यादि हैं। इसके बाद अभतव, ामन के काच्याहंगुरपुन्र हे भी आपोयि का करण बौर उदावरण अपने व्याल्यान में उत्तार हेत हैं। बिन्यु 'हेन्डं - भु: पाष्मूरक्योगरेण' हत्यादि उवापरण, किसे नामन ने 'उप्मास्वादोष:' के छिए उकृत किया है, उसमें अभिवमुम्त समायोकि बाते हुए कक्ते हैं-
त्वेचा सू समाशोकिरेव । वस्तुत: पस्तुत प्रशंग में बानन्दवर्यन के अभिप्ाय को माठत्योषय निवन्धा हि राच्यच्यंग्ययो: पाणा्चविवतता को दृष्टि में रखते हुए, यशां पर मामक बौर नामन के आयोग-वसंवार का उप्तण बर उवावरण देने का कोई विश्ेष प्रयोवन नहीं और वामन के वापोय के उवासरण में समानोकि है या कोर्ई बन्य
२-३. मामह- बाब्याडंहर - २।६, २६६ 1- शोेब मृ० ११२ ४- बा०ृ० ४, ३,२७. ६- शे. पृ० १९३-९१४ ु- लो. पृ.११४
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२३५ बठगार - एम अस्वातों को कहने का अवसर नी नहीं। विन्तु, बभिमुच्द इन विभिन्न सपवों के क्दायोह में व्यस्त हैं। 'मुरागवती स्पया' हपादि में नामन के अनुसार बायोम है और मामह के अनुवार 'बमासोकि' - इतना की ककते हैं, त्वाभि निष्मर्ण रूप में उनके अनुवार कौन बहार है मह न बका कर बाननदवर्णन के मन्तव्द को भी अपने बसुसार मोँड़ो हुए ककते हैं - कृं्यार ने वशां दोनों बकारों का एक की उनावरण किया है। बर अन्त में, यह मी महते हैं- 'यहं बारे आरोष हो या बपासोसि, इसे कां क्या प्रोष्त। हारा बाथ्य तो बंकारों में व्यंग्यार्य का वाच्यार्म के पृत्ति भुणीमाय काना है। उपयुक्त ठंग हे सरब करने पर, मामह और नामन के कमन की लोचन में रसने का क्या मक्ल्य रह गया,बर दूसरे ना वभमितनुप्त को यह नहीपांति जात है कि यहां नर्या माय्ये है, तब मी यह व्यर्म की अवान्तर कर्वा करने अपने व्यास्यान को उडका देते हैं। और जब उनका व्याल्यान बहुत अधिक उडकने कनता है या दस्त कवानसर नर्दा होने लती है, तम बन्त में प्राय: 'इस्पलंममपुनर' या 'एषापि समासो किर्वाडस्तु आक्षेपो वा, किमनेनास्माकम्' वार नः साध्यनितयनाशवाडन म्येडए्मस मिर्निडपित: - इस फ्रार कह कर बाननदवर्धन के मन्सब्द को एक पंक्ति में स्पष्ट कर, बपने व्याल्यान में नति डाते हैं। ३ग: व्य० १११३ की वृति में बानन्दवर्यन 'माहत्योक्षय' निबन्ध' के बाबार पर बाच्य और व्यंग्य में से निषी एक के प्रामान्य के विवेशन के प्रशंग में कक्षते हैं - विसकी प्रामान्येन प्रतीति दोती है रभी के नाम से उसे अभिसित किया बाता है। की, दोपस अनन्मृंति वादि में व्यंग्यल्पेन उपना की क्रीति हो। पर नी पुनानतया उसकी विकसा न होने के वारण, उबे उपना संता से बभिकित नहीं किया बाता। यशां पर अभिस्यमुप्त मामह के काव्याउकर शस वे बौक अंकार का सरण देते हँ-
१- शो. मृ० ११४
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२३६ ददका उवावरण सेते है- 'मणि: हाणोलीड़: लरनिकयी हेलिपित:' बौर बन्स में कैवल स्सना मकते हैं- 'हत्यम बीपननुलमेव पाहल्चन' कम वभिनवनुच्य नामह के काच्याछंगर शरू के की बीमत का अत्तण दे रहे मे, तम बसमें काच्यासंकार २१२६ की यह पंचित मीं का देते है।ं-
कस पंकित से बानन्यवर्णन के - प्रामान्येन निवसित्मात् सवा व्यपेशः के वभिदाय की निंभिकड् पुष्टि की बाती। :३घ: हवी प्रार अपन्दृति के विषय में मी अभिनवमुम्त नामह के काव्याउंर भर स बनन्तुति ने अराण की परक पंविति - अपन्युविरमीण्टा व निंधिदन्तर्म- चौफना - नैकर कहती हैं- 'तत्रापनयू्यैम शोमा' बर उकासरण देते हैं- 'मैवं विरौति मृंझाळी गेन मुडरा झु:ः । वयवापृब्लाणस्य कम्परपमुषी ब्यनि: ।। स।२२ वमिनिनमुन्त का कराण देत है तो, न बाने कर्यों पुर्ववर्ती बाषायों के मुन्यों सै एक पंं्ति सतार हेो हैं बर दुसरी पकिति कोड़ देते हैं। यदि दूसरी मंनिस व्यर्य दोँती दो उबे शोड देते। किन्तु, नम उद पंकत से वाननयवर्णन के मन्यथ्य की पुष्टि होती है तम भी उद्ध उपयोगी पंनित की उपेकर करते हैं। बास्तव में तो डोनन व्याल्यान उनहोंने वानन्दवर्यन के बाछीक' के स्पष्टीकरण के छिए किया है। तयापि अकसर पाकर ने अवान्तर नर्षों कर अपनी बात स्पष्ट कर देते हैं, किन्तु बानन्दवर्णन के कमय को छोड़ देते हैं। उवाकूरणाथं दीपक बलकार के प्रशंग इसे देखा जा सकता है।इसी प्रकार अपस्रुति के प्रसङ्ग में में भी बमिवयमुमता मानड के साब्याउंवार हे वपन्दुति बलंबार का दपुर्ण उत्तण उदूव करते हैं। मामड ने स्पष्ट रूप से अपन्तुत्ि के व्ययवेश का कारण बताते हुए वपदुृति का क्दाण तस प्ुकार दिया है-
सार्वािदवादस्या: प्रिको भामिया यया ।। २।२ किम्यु वनिनवमुप्त मात्र पक्ठी पंक्ति की उदव करते हैं। बर कैवल इतना पहते हैं- 'नमाय-भूत्पेकसोमा'। विन्तु यरदां पर काष्याईंकर ३1२९ की दूसरी पंि का मी नहल्य है क्योंकि प्रस्तुत सव पर - वानन्यवर्णन का मन्तव्य है - प्रापाम्येन
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विदसा बनुवार अंफाररं का व्यमनदेश बोता है। 'उप्ा' का यश प्राणाम्म न होने के शारण इनकी उपना अंता नही है। मस्त: दीम बर बनन्दुति का प्रामान्य है, व: दीपक और अनन्तृति अंा है। :३उ. इसजे बाद वान्मवर्णन बनुक निमिता विहेषोकि का उवावरण येते हैं- 'वाबृतोड वि सहाये:' इत्यादि। रेव प्रतीस दोता है कि आनन्यवर्मन में नह उदाहरण हट्मट से खिया, मामह हे नहीं। भयोंकि नानव ने जो पिरेषकि का आपण दिया है, वह बक्ु स्ष्ट नहीं है, बौर न ही हमहोंने विहेमलि क श्ारों का निवेधुन किया है, यम कि सट्मट 'काव्याउंशारसारकड' में विरेषोसि का स्पष्ट सराण देते हुए उसके दो मैद बलासे हैं- १- तक निमिव, - कलुक निमिस इ दोनों में से सतुल निमित में व्यग्य का सममाव होने के कारण बानपवर्मन में अ्पका वल्लेब किया है। बिन्मु, वभियगुफ्त अपने 'शोमन में उद्मट का विशेषीखि बलगर का हलण न देकर, मामह का की विवेनोकि बगर का कदण देते हैं- एममेशस्य पिनमे ना भुणान्तरसंस्यिति: । विहेमप्रक्ावाडी विशेकोशिमंता कया ॥। ३२३ तवा विहेयोलि के वे तीन क्रकार स्पिर कहते हैं - अनिन्त्यनिमिता, इ्क निमिता बौर सुर निमिता । यवधि नामह ने हम प्रवारों का उल्हेत नहीं पिया है। इसके बाद ने उदावरण देते हैं-
१- व्य० पृ० ११७ - मल्नाम्नेवि सलीना कडानु पधिवनम् । विशेष स्वामिवि वातस्व्रितेयो शिरणपते।। काo्वoाक्यं० ४।४ (४५) ।- यािी निमितेन निमितायकीन न। दसय नम्मो डिना उच्ये दृश्के ठड्ितिाल्थक: ।1 वही ४।४(४५) *- को० पृ० ११५-११७।
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म सलीणि कपति कान्ति अलुायु: ।
यह उदाहरण मानह ने मत्न 'निैमोफि बलगर' के लिए वदृत किया
और कहते हैं, एवमें व्यग्य का बदुमाय नहीं है। स्पी प्रसार तक निभिवाचिके- मौति में नी वस्तु के स्वसमात्र में अठार का पर्यकचान हो नाने के कारण, सस्यें भी व्यंग्य के सदुमाव की अंग नहीं करनी पाहिए। बभिवनुच्त द्वारा दिवा गया इसका उवावरण इ्ृष्टव्य है- कूर इव दन्चीऽपि रसिनान्यों को कौ। नमोड स्यवार्यनीयवि तस्म सुनवन्यने ।। यहं पर सनितमान कानवेन का हेतु अवायतीय डस है। विशेयोकि के सृतीय क्रवार - 'सुक निमितामिरेयोकि को वानमयवर्ण मै व्यंग्य के सपुमाव के कहरणा पस्तुत किया है। और इथका उवावरण क्य प्रसार दिया है-
नन्सुपता वषि पचिक: अंशोमं नैव शिवि्यति।। इसके अनम्पर बानन्दवर्णन वृति नान में कहते हैं कि उपयुक्त उवावरण में प्रमरण के सानपूर्य हे व्यग्य की विंविद् जरीति हो बाती है। निन्तु दय प्रीति से चोई पा्ता नहीं बाती। काः यहां व्यंग्य का प्रावान्य नहीं है। वनििकुन्त उपयुक्त उनावरण का व्याल्यान करते हुए बक्ते मैं - 'वहां मट्ोइुनट के अनुसार - न बठने का कारण, शीस है'। 'म रंियों मे यह निभित कं्कित चिया है कि - 'नमन की अपेदा स्वय्न को प्रिया-लाल का ब्युतर उपाव डफसर पित निद्ानन के विवार से खिनड्ा पड़ा है- रकियों दारा दिए नर एस निमिस को आलंकारियों मे वाकल्म बेतु
१- नही पृ० ११७ ३- वही *- वमवमुम्या ने रसिये:' दवरा सम्मकत: वृकवदर्षणकार मटुनायक या निस्ी बन्य बाचार्य पर फटारा किया है।
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नहीं स्वीकार पिया, वाच्तु वनिब्ेज्यमान निमित- (स्यब्न में कान्साज्ञानन की बासा बपना शीसमृस नष्ट) से नउत विहेषोसि - (संगैमं नैव विचिलवति) में ही यहं पनल्सार है। बन्चवा यरह विशेनोवित बंकार ही नहीं होगा।- हतना कब नर वभिनममुम्त ककते हैं : बानपवर्मन ने वर्हा -'न तु तल्ज़ीतिनिमित शदिमत्वनिषति' - लद दृतयनंत की कमूष्ट और रखिक दोनों के बकिििाय से
वादि वान पवर्वन ने बमुफट और रकियों के अभिद्राय के दृत्यांस की ख्विा शेता, तो वानपवर्णन निःन्देह उटुफ्ट और रकिकों का उस्लेक कर देते , बैदा कि प्रायः बौक सवशों पर वानन्यवर्मन ने किया है। यशां पर के ही अभिनियनुख्त युश मी अिदाय निकासे, किन्सु वानन्मवर्णन के समदा यर्वां पस्तुत मुल्य प्रृतिपाद विषय है- शुस निमिता बिशेयोंकि बादि बरों में व्यं्यार्य के रक्षी पर भी, उसरे माण्यार्म का की माहतयोकर्म होने के बारण, व्यंग्य का बप़ान का नर बाब्य का ड्रामान्य प्रतिपाकित करना'। बर , यदि वह मान मी डिया बार कि वानम्पवर्पन ने डदुफट और रक्षिकों के अभिदाय से दुचिनान जिसा है, तम बभतिनुम्त बपने कोचन में नर्मोँं मानव का की कपाण देते हैं ? तद्मट का कर्यों नशीं केते ? सध्मकः अमिनवमृम्त के सनना उस समम मामड के माच्याछंकर पर उड्मट विशवत 'मानड-विवरण रस दी - बिलें - 'बाहृतो5पि' स्त्यादि उवावरण इनूमट ने दिया हो और उसी बबार पर बमिनव ने मामह के अनुसार विशेषोकि शा अराण देवर, 'बाहुसोड नि' की व्याल्या की हो। :३ च: कयविरक्जि बरकार के प्रम में वानम्यवर्यन कह्षती हैं - 'वनि पवांबौस् में व्यंग्य की प्रमान्येन क्रिति दौनी, तम व्वनि में दी उचका बन्तमान को वालना, न कि प्यने का पयायौक कंगर में। कयौँकि ध्वननि का पेत्र व्यापक है और व्यनि बंी मी है। बर, पुरननसतु या नान्म मुंकरे इत्यादि पवांयौत्त का मामह मै नौ उवाकरण खिया के उसमें वाच्यार्य का उपववंीमाय विवशित न होने के भारण व्यंग्द का प्रामाम्य नहीं बीस् पक्षता ।
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वानन्दवर्थन इतना ही कहतो हैं। निन्मु अभिनयतुम्य बृतिमान क्ीउपर्युरधीन बार पंकतियों की निस्यृत व्याल्या करते हैं। सर्वपुषण उद्यट के काच्याउंरवार- कंब' से पर्वांयौक्त का अपाण एस प्रकार उद्धृत करते हैं- 'क्वायोस वपन्येन प्रणरेणानिनीको।
उवावरणार्य - मम्लेनदुरेण्दल मुमल्पयनामिन:। रामस्यानेन सुचर देशिया परिक्रा।। इसमें नीज्म का प्रमाव, मा्नव अर्यात परहुराम के प्रमाव को अभिकत नरने बाठा है- यह व्यंग्य प्रीत होता है। फिर मी एय व्यंग्य से बाज्यार्य -पेलिता कविश्ा' वाध्यार्ज ही बहूत की रता है। तरनन्तर, तक हदुमट के पवायौत्त के अर्तण में बार हुर प्रजारेणाि नौको' और 'अवननारमना' का विश्लेचण कवा प्रवार करते हैं- 'पवावैण प्रकारान्तरेणायननारमना व्यंग्येनोचशितं रपयमिवीयते तवमि- बीकमानमुलमेव अपवधयोत्ति नित्यभियीकत हति कपाणपाम्, भर्वामौक् मित्ि डचयपममू, नवाछिंका रपंतामा-्यतरार्ज नेति बर्म पुण्यती'। रम एक पर उदुफट की मानने बाछे यह कह सपते हैं कि अभिनकमुप्त ने बपने परा की पुष्टि बेतू एस क्रसार का व्याल्यान किया है। चाब ही रस फरवार की अंा भी कह ककते हैं कि यम अगनमालमना है तब 'प्रवारेणामिन्रींकों का 'प्रतीयते मद अर्ष नरषों नहीं किया नया ? किन्सु हसने पूर्व ही वभिनवमुप्त कक्ते हैं- वदि स्वमिनीयत हत्यस्य मशाकवास्याननमिवीयती फ्रीक्ते प्रवानतवेति, उनावरणं प 'नम बम्मि सत्यादि। तवाउंारल्योन दुरे सम्पन्ममारमतायां पर्यवतानादू। कवर पाठंशास्मव्ये नणना न बार्बा ।'
१- को. बृ० ११७ ४- वही
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अयातु यदि 'वमिनीयते' का प्रवानतया 'प्रतीयते' अर्य करेंने तब पववरत्ति n
की नणमा बठकारों में न होनी । रसना बातना में पर्वकशान हो बारा। यहां तक तपुय अममेव है कि आानन्यवर्मन तो व्यंग्य के प्रायान्य के अनसर पर पवाचांक वंफार का ध्वनि में अन्सनानि कता रे हैं। बिम्तु, वभिनितमुम्त ध्वनि पद के स्थान पर भार्ना यद का प्रयोन करते हुए 'ध्वान में पयक्सान' के स्थान पर बात्मा में पववदान कहते हैं। रेवा यीस शाता है कि बभिियमुम्त यवा वात्मा पद का प्रयोन व्यनि पद के पयांच के रम में कर रहे हैं। या किर 'काज्यसवात्मा व्वनि:' के बाचार पर बम्तियगुप्त रेवा प्रान कर रहे हैं। बदि अभतियमुम्त का वदा बाल्मर पर से अभकाय स्वमाद या प्रसार है है, तन सो ठीफ है, निन्सु यादि बाल्मा पर का वर्ष 'बीवितिम्त या प्राणततल्प है है, तम तो ध्यानि काव्य का वात्मा-व्यंग्य वर्ष है तम व्यंग्यार्य में पर्यक्व्ञान की बास क्ैंी बैठेगी ? हारे विवार हे बममितमुष्त वहा पर बात्मा कर का प्रवान व्यनि के पथयिषप में कर रे है। :३ टः बारेष बलंकर के पव् में, दृष्टान्त रूप से अपन्ुति और बीपक असंकार का विवेशन को मुसा है। विन्दु, अभिनयमुष्त पुनः प्रतिपामन बेतुर उपस्थित करते ह- उव्रकपुरणाव मुम्यासूरवां योवमि पुरप्युक्तम्'र बमाते वानन्दवर्पन ने समासोसि, वारोय, सतुल निमवविरेयोकि, क्यायोभ, अपन्दृति, बीप, अंगराठंगरादि - रस पूम से अरों को गिनाया था, जिरमें प्रतीयमान वर्ष बस्कुट ज्रीति होने के कारण उन्हें ध्वनि का विषय नहीं माना गया। बडफरों के एद अम में व्युलफ को बाने के कारण ही अभिनवमुम कक्तते हैं- मुन्य में बार परदों की सगति बैठाने के छिए बाननदवर्णन ने पुनः प्रकारान्तर के यहां रीप और नपन्दृति का बक्लेस करते हुए व्यंग्य के अद्ावान्य के कारण उनमें ध्यनि
१- (१) बलमतावां पयक्तानात् - को० पृ० १९ं (२) बारममतमिवाल्मैवादी नाडंवारस्यावित्यर्ष: - लो० पृ० ११६ 7- डों० पु० १२० *- वही पृo ९०८
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का निराकरण किया है। - परस्तुत एक पर अमिनतमुप्त का इतना कहना ही पर्वाम्ता था। किन्सु, इसके बतिरिक वभिमुप्त उपने व्याल्यान में डयूफट के मामह निवरण में सचित 'दीपक बलंकार का सर्पन तपना से अन््कित न होने का विनेयन कहने कने। यवायि इस विचय में अमिनष का उद्षट के अस मत में बाम्य नहीं है, अभियमुष्त स्वर्ष कक्षते हैं- 'वमु निनरणप्त - बीपास्य सर्वन्रोप्ताम्ययो नासतीति बहुतोदाहरण- यृफोन विवास्वांसतयनुपयोनि निश्वारं कुतियोषं न i' इसी हिए ने दो उवावरण मी केती है- (१) मदो न्यति ड्रीतिं बानम मानमंगय्।
यरदा वषध पुर्व-पुर्व के उतरीयर( मद से प्रीक्ति)त्पन्म हो रहा है सवापि उनमें परस्पर उपमानोपेयनाय पडयित पिया जा सस्ता है। क्याँकि, वद कोड नियम नहीं है पि - कृमिक वस्तुबों में उममानोभोयनाय नहीं होता। (२) राम हम महरणोडमयरम कम रुरवोडपि खुफखः,। वम एम रवळीयमडसयिमं रामस्य कीलिरियम् ।। इम उद्राबरण में भी भरस्पर राम और वशरम हत्यादि में, कम धाते हुए भी उपनानोपमेय मान दी है। वत: पृमिस्ता वपना ससप्रानरणिक्ता से उपा कवरद हाँती है- वह कहना ठीक नहीं। क्तना कहने के अनन्सर अचिम कक्ते
कगमि अनतिततुम्त को यह शाद है कि मामह विवरणकार रट्पट' के विरुद क्पुंक नी व्यास्यान किया गवा है। उसरा प्रस्तुत सथ पर कोई सकयोन नहीं है। तमादि अभितयतुप्त ने उसका विवेयन करकेव्पर्ण का विस्तारमान्र किया है।
₹- शो. पृ० १२० ₹- बही पृ० १२०-१२१ ३- नही मृ० १२९ ४- पढ़ी
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:३ ज. संकराडगर *
संर बंकार के प्रांग में नी आनन्यवमने अपने पुर्व निश्मय के बुसार इसके मेदों को नहीं मिनासे निन्मु अभिनयमुम्त अपने स्वमानानुवार बाचाय कयूम का शुवरण करते हुए संगरांगर के मेदों की बलाती हुए बपने व्याल्थान को सम्पन्य करते इै- सवपप् अनन्देव संसर का कराण इनदोंने सपसियत किया है* विम्दाफनपोललेते कर्म सम्तुत्यसपये। १
बाचार्य बदूमट ने अपने क्राष्याअंग सवारमह में ब्देश-संडर का ककाण रयी प्रकार दिया हे, अन्सर नेवल इसना के कि विल्दासंक्रियोसतरे के स्थान पर क्टफ्ट मे - 'झोनइग्रियोस्ी' ना है। इपकर उवाचरण अभिियनुप्त का स्वरचित नम है-
एवर्में श्री एवं पशनं बस्वा का अशियमना' रेखा सलाच करने से रपक और 'वडियय् कपर्न वस्पा:' - वव सार मानने से उपना बोती है। चिम्तु बोनों का एक साथ होना असम्यय है, अतः उपमा और रमक दोनों में से कया माना नाए - इसका कोर्ई निणाय प्ाण न होने के कारण वहां तम्सुछ बन्देब संसर बडफर है। इसके बाद बमिनवमुम्त अपने पदा के डाम सन्देड संगर की अगतति बैठाने के लिए ककते हैं- का यह निश्मय की नहीं है कि कौन अंगर वाच्य के और कौन अंकार व्यंग्य तम उसमें ध्यनि की सम्मायना क्या की जाय।
१- को० पृ० १२९ ₹- बनेवाइग्ियोलतोरो एमं सम्दुृत्चत ममे। एकंस्य म गुहे नयायवी च्यमाये व संकर:
*- गैं० डृ० १२९ ४- यही
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संबर का दो दूसरा प्रकार - एक्वाचफ़ानुप्रपेस है, उसमें सब्दाअंगर बोर नपिंकारों की एक ब्ाथ सतर होती है। यषा - 'स्मर स्मरनिय प्रिय रवसे यमा ठिंगनाय्। शृद्ति में रपर-समर मदावृत्ति हे यमक रूम सब्बाएंकार बर स्मरमिनर' में सपना अवासिंर का एकवामकानुक़ेस अंगर है। वशं भी क्रीयमान की अंगा का अपवर नहीं। संर के सुतीय प्रसार में - कहा एक की वानबांस में अनैक अवालंकर काँ, वहां भी दोनों में बाण्य रूप ब्राम्य होने से, व्यंग्य की सम्मामना नहीं हो सपनी।
सुल्योदयावदानतचादनतेडएवं पृति मास्वति । वाताय वासर: कान्तो विश्तीय वमोनुवाय्।। इवि इद पम कर मामह ने बपने बाव्यासंकर २४८ में उत्प्रेशावयय के लिए उदृत किया हे विन्तु अभिनियनुप्त रसे संतराऊगर के दृचीय प्रकार के उदावरणारय पस्तुव कर रहे हैं। रक्त पद में स्वामि-निवति के समय सुनित यतमृष््ण के छिए परकलशीड खीन पुत्र का कपण समानुदान' पर में सयत एकदैशनिवर्ति कपक कर रहा है। इसके अतिरिकत 'बद' तब् के दारा उत्प्रेस्ता भी है। विन्तु यहां रपक बोर इल्पेसर दोनों के स्मान रूप से बाच्य होने के कारंण, डोनों में से निवी को व्यंग्य कहा ही नवीं का चक्ता। कुछ लोन संकर के उपरयुक्त दूसरे और तीवरे पुकार की नठम-अलन नहीं माके। विन्तु वभििकमुम्त उम दोमों का विवेयन करने के बाद उनका आाण देसे ैं- शन्दार्थवरथनंगरा नाक्य एवम वर्स्सिन:।
यह अपण मी अभनतमुख्त ने उद्मट से की लिया है। यमपि दोनों मैं किंविद पाठमेद है। उद्मट के शपम माशिन: के स्थान पर अभिनव ने एक बर्र्सि: ना है।
१- ठो. पृ० १२१ ।
कaoध. ११-२(५३) पृ० र-रव ।
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इसके बाद अंडराझगर का वतु्च प्रकार कुड़ाकुनानुड्राकमान कढ्ते हैं - नहां बगरों में परल्पर कुड़रसून-अुलादनामर अवाति बपनी विभवति- बाजा में पसुदानेसिरय) को वहं यह मेद होता है। यपा-
यहां भुगाननादों की दृष्टि के स्नान पाकी की दृष्टि है- यह अपपा यनमि न्यंग्य है, तयाधि नह 'ठपना म्देवाहंगर रम माज्य की ही उत्पन्न कर अुनुबीत करती है। का: उचना स्वयं मुण्ीमुत दी नाती है, क्यॉंकि उचगा पर्यकसान इन्देह की पुष्टि में ही को रश है। इससे छिए सद््ट के प्राच्याऊंगर- बारणुंत' वे 'बुताकुयानुड्ालपर्ण का कप्ण वकृत करते हैं- नहां बौक बठनर परल्पर उपवारक मान के रिक हो, इन्में स्कांत्र रम के बाल्महान न को. वरह मी (अंरानिमाच) संकर शोसा है। बानदवणी द्वारा कांका -सरांगरेडपि' पर अभिनमुच् ने अंगरायंगर का - स्वम्प मेदों स्ति उनके उनावरण बर अण सनी प्रस्तृत नर दिया है। रेा प्रीत होता है कि वभिनवमुम्,बानन्दवर्णनी द्वारा होड़े गर रिक # स्थानों की पूर्ति करा रे हैं। वभनवमुद्ध ने तदार-यवासंवार सत्यरनि से ठेकर तत्र कयनेशस्य प्रामान्यं तीस्ना ता का दो प्याल्यान है, वह बानन्पवर्जन के अभमिाय को महुत ही स्टीय एवं व्यवस्कित रूप से पस्ुल करता है। वानम्यवर्णन ने यूम से अंगराऊंशर के मेदों को नहीं कहा है ।सर्पप्रथम 'बया- अंरोडउंगरानारमयबामनु द्वाति द्वारा कुडाझानुट्राक मान को का है। 'अरठकारड्यस्मायनायां तु वाच्यव्यम्पवोः एं प्रामान्यम् द्वारा इन्देव संगर को और 'रम नाज्योपवरमीमानेन व्म्बस्य तत्रावश्यानम्' इत्यादि द्वारा अुप्ास्वा- भुशाल नान के दूसरे पक को कहा है। वानन्यवर्जन के हम अभिपाय को सवासणत
१- परस्परोपकारेण कवाजलय: रिक्का:। स्वांतंत्रुपेणातमठार्म न उमन्ते बौडपि- ० १२२ ३- वही पृ० १२३-९२।
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शमारणत: ककना कठिन शोता है, निन्मु अभिनतनुभ्त क्री पुरेस्तिया वानन्दवर्णन के मन्तव्य को सस स्मक पर सने में सपठ हुई है।
मपुस्तृतन्रतंडा के विवेयन के अवसर पर बभिमुम् इ्वशा कदाण पेते है- वचितरायपेतस्य वस्तूनोडन्मस्व या सुषि: । कपूस्तृतनतंदर या त्रिविया पररिकी तिवा ।। इसकी परथ पंक्िति तो मामक बर उद्मट की की पदावडी में ससी रप में दमिनव ने र दी है, निन्तु दुसरी नंचित में अभिनवमुष्त नें विंधिद् परिवतन किया है। शोपनवार के 'निनिया परिली विंता' के स्थान पर मामुक के बनुसार 'बैव सदूकती कया है। और ब्टूमट के बलुसार 'प्रसतृतायनुवन्चिनी, है। वभवमुन्त ने इस परिमामर में जानन्यवर्णन के बभिद्राय को नी बोड़नो का प्रमत्म करते हुए - 'त्रिविया परिकी सिवा' नया है। बानन्यवर्णन के पु्ववरती बाचायों में हे निसी ने नी अपस्तुतफतंता के मोदरें का इल्लेड नहीं किया। जानन्यवर्यन के सनकतीं बचार्य कुन्सक ने अपसूखपठंदा की और सेस करते हुए नहा था - 'बवां बाम्य का सदारा डेवर अपना नार्यकारण नाव वादि अम सम्बम्धों का सवारा कैवर प्रस्तुत के सोन््म को प्रभाश्ित करने वाका अपसुतपरक वर्णन किया नया हो - वहां यह अ्कर होता है'। किन्तु, वानन्यवर्गन दी पक्के बाचारय हैं, जिन्होंने बढस्तूतमतंदा को नर रूप में परस्तुस किया। वानन्यवर्वन ने अपस्तुतप्रसंवा के मेदों की निशिचिये नहीं बलाई है। विन्तु वभिनयतुषा ने उनके व्याल्थान के बाबार पर इसके तीन मेदों की निकाखकर, नामह के द्वारा दिर गद -
१ै- बितारायनेतस्य वस्तुनोडम्वस्य या सुति: । कयुस्तृतन्रसतेति का नैन कमूको कया ।। मामह काष्याउंकार ३२ह पृo ७ ₹- बचितारायनेवस्य नस्तुनीड वस्व या सुति: । अयस्तुतड्कोनं पस्तृतथनिबन्धिती। उद्मट काव्याउंरबारर = (vE)
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कस्ततपतंवर के कराण में अंदोचन करये - मरिविया परिणीशिंता अपनी बौर से बौड़ दिया और उपके तीन प्रकार रय फ्रगार कार -
वप्लिद ने इम बनी का बौदाहरण विवैयन करते हुए बानन्पवर्धन के स्तब्य को निष्नन्रसार वे स्वष्ट करने का फ्रमतन किया है।
यह दो प्रछार का ोता है- (९) एक तो यह है, यन सामान्य बपस्तृत होता है और माच्य द्वारा का बाता है, त्या उससे परस्तृत विशेष का बायोष (व्यंग्य) होता है। यपा-
अशे निस्निसनरम पुरन्ता नत्यी विये:।। यह 'सर्वन दैन का की प्रावान्य है'- यह अपस्तुत दामान्य सब्द प्रतिपाच शेसर निसी निनष्ट हुए प्रस्तृत निशेष का बासोय कर रवा है। (२) बर, कहां विशेष कसुत माच्य दोकर, प्रस्तुत नामान्य का वायोष (व्यंग्य) करता है। नहां सामा्यविशेयभाव का क्वितीय प्रकार दोता है।वया- सातस्य मुवारिकिेस्फमठिनीपने कर्ण पाचशी इन्मुलमणिरित्यनंस क नह: शृष्यमवस्नावपि। .
स्वम्रोड्हीय मतरो इतैल्युदिनं निदाति नान्त: हुा ।। वह सुकति स्थान में महत्व की सम्माचना रुप परस्तुत सामान्य रप व्यंग्य है, तथा कबिन्दु में मुक्ामणित्य सम्मावना रष'- अपस्तुत विशेषरुम वाच्य है। दर्ह ग्ामान्य और विशेष का समप्राणान्य होने पर भी कोई विरोच नहीं क्योंति समान्यविहेध का व्यायव्याय्य सम्मन्य होता है।
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सेद
रसके मी दो पवार है- (१) कमी बदसृत कारण वाच्य होकर परस्तुत रप कार्य का आरोम(व्यग्य) कस्ता है। बपा- ये वान्तमम्युपये भ्रीतिं नौज्यप्ति व्ययीभ् न । से बान्यवासती सुतुनो लोय: स्वाथरीऽपर: ।। यशां अपस्तुत सुदुरनाययपता निमतिकनेण नाच्य झोकर नैमिसिक रप परस्तुत - सुदुर बाम्म्यम के अजेमयममत्म को व्ययत कर रहा है। यशां काकम व्यंग्ब की ज्रीति होने पर नी, कारणकम वाच्य ही प्रवान है, क्योंकि यद माच्यार्थ ही व्यंस्वाय रम कार्य का बनुप्राणक है। का: यरहां व्वम्य बोर व्यंक का उव्ाणान्य है। (२) कमी कार्ककम बपस्ुत के वर्णन द्वारा, कारण रम प्रस्तृत का बायोष होता है। यषा -
सुनरामि महणपुरवी कुदबन्दं म हरकानब्माख।। वरश पर बाझमवानु के शौस्सुमनणि बौर कपनी से रक्षित हरि के वदास्य वादि के स्मरण रूप बप्स्तृत कार्य (नैमितिक) के वणन दवारा, निमिवत्त पस्तुत इनकी यूदवेचिता, निरंनीवितर, व्यवदारुत्तता वादि को उनके मन्िल्य में . उनानेव है- को व्यवत कर रवा है। यहां पर नी उपयुक्त उवावरण की मांति वाच्य बर व्यंग्य का सम- ड्ामान्य है, कयोँचि व्यंग्यारय स्वयं तो प्रवान था ही, वाज्य को भी तुन्दर पना रवा है।
१- बैम् व्यंग्यार्य की फ्रीति हो बाने मात्र से ही व्वनि नहीं होती, परन् व्यंग्यारयं के प्ावान्य के साम वाध्यार्य का गुणीमाद मी होना चाहिर। किन्तू यशं बाज्यार्ज-दपसत निमिर, क्रियमान पसतुत नैमिसिक का अनुद्ाणक होने के शरण मुणीम्त न वोनर प्रथान हो रहा है। एव प्रवार वहां व्यंग्य बार व्यंक का अतामान्य है।
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इसके मी दो पकार है- (१) कमी अपस्तुत वाच्य के नमल्वार शोता है, बर प्रस्तुत व्यंग्य वाच्य का मुवामेली शोतर है। यमा- वभनिननुम्त के युह मटेन्दुराज का यह श्कांच - प्राणा बेन सवपपित्ासम महानेन ल्यमुल्यापित: ए्क्दे मस्म बिर स्विताडि नियमैयसी समयनिनि सस्वास्व सनितमानेण कापु ड्राणपशरप्रिा परतः कयुक्वारिणां पुरि पह कैवाड डीडाये।। वरशं वषमि बादृश्य के दारा पस्तुत सिद्री बन्य पुसष्म पुरुष का आदोष हो रह है, स्वामि बदर बपस्तुत माच्यमं वैतालयुतान्ड में की नमत्चार है। (२) बपस्तृत के वर्णन की बपेशा, बाभि ध्यमाण प्रसतुत के वधिक पारत्यपूर्ण शोने पर, यह वस्तु व्यंग्य का उदावरण हो बारणा। वषा-, मानदास कान्बाल उदयान्याइन. बमप्पतय् पती मिविविया निरारमवृषमं प्रष्डान चंड्रीडे।
वदां अपेतन इन्द्रमादि अपस्तुत वाण्य के वर्णन की अपेक्षा वाक्िच्यमाण प्रस्तुत में वधिक ननरचार है, नयोंकि सनूसनम्मन्य कोन नह से मी अधिक पापी हैं- यह वस्तु-च्यण्य है। कर माच्य की केस्ा व्यंन्य का प्रामान्य होना, तब व्वनि में ही उक्ा कन्तमादि हो नालना, बन्चया वह बनृस्तूतफउंत अलंकार की रहेगा। उ्य० १११२ की दुशिमान में अनायोकि, बादोय, बुक निमितवितेयोखि पयबौत्ति, बदन्हुति, बोफ, सतर - हने बगरों को निनाया था। बानन्द- नमने ने इन समस्त अशरों का विवेशन करने के सीतत बाद, अपस्तूतप्रसंता को नी बोड़ा है। किन्मु ,अभिनमुप्त ने अलगरों की संल्या में अभिवृद्धि की तथा व्यावस्तृति और नावासंर-तम दो अन्य कलगरों को भी बोड़ दिया। वभ्िगुप्त, क बभी तब सनी अंवारों का कपाण देते बाए है, वैसे
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व्यापसृति का ठराण नहीं देते नैवक उदावरण केते हैं- रभिं कृशन्ते: परगुल्तो: निन्तु नारई सार्य- सृष्णीं स्वामं पृतयुतरी वात्तिणात्यसनायः । नैहे मेरे विपणिभट समा पत्नरे पानगोच्ठा- मुमतेन प्रमति पकतो बल्खमा एन्स पीर्स्थि: ।। मर्श रादा की फ्रतरंशा कम जो व्यंण्या्य निक्क रवा है, बकी माज्यायं दी वनदत को रख है। इसे बाद अभिनन ने एक और व्यायसृति का उवावरण दिया है- वाबीन्माय फितानडी तम नहीं .... ' स्त्यादि यो सम्मकतः उमने निव्ी पुर्वपर्ती बाचारब का हे या किसी पुषरकती ध्यन्याशोंक के टीकाकार का। अभिनम ने जकमें शम्यल्व दोम बाया हे बौर उम उवावरण की बपेसा भी की है। सवनन्तर अमतिम एदट के बनुवार मानालंकार का अदाण बौर उदावरण देते हैं। तपट ने नावाईंगर के को क्रगार बाए़ हैं। वभिक ने, तप्ट के इन दौनेई फ्रारों में से , फूफ का लैवक क्रणा खिया और दूसरे का केवस उवाहरण । बौर लोमन में एष कुकार सा - वस्य विवार: पुकन्नपृतिषन्यन्तु कना बे। गनवति तमभिदायं वर्पृतिबन्दं व मावी थी ।। इसकी व्याक्या करे हुए अभिनम ककी हैं-
डर जाडयाँ नानार्छार:'। यपा-
१- एपट गब्याओंगर पृ० ६२-३ २- शे. पृ० १२६-९१० ३- छोमन में- पृकवननपृतिनम्वस्तु पाठ मिल्ता है, बिन्तु सपट के काब्पाउंकार मैं 'स्रृमन्नयृतिकदेन' पाठ है। *- 'सपृतिबन्पो निकतः के स्थान पर बपुतिमडो निय्तर: पाठ बधिक उपयुक्त है।
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सालिी कचा वहणी व्वाइरियिमुरे मुकतिश्य कहो निकैशु । में यामसे सदिह वापमियं मराणी स्वप््नाम्यवनिरा नु पुद्र नान्य।। बमिनव के अनुबार कहा एक एक पष से जो ब्यंम्ार्मं निक्क रवा है, नड गच्यार्यं को बी समस कर रहा है। ब: वर्हा नाण्मार्मं की प्रान है। बदि बयंस्वामं का प्ामान्य शेता तो नर बहंगर की सोरटि में नहीं बाला
वमिनव कम आानम्दवर्पन दारा कार नर बठगरों के बतिरिका बकारों की बवा करने कने तम सत्चह बयुनर'कम कर पुनः प्राशंनिक नर्षा प्रारम्म करते हैं। वभिनय को स्थान स्थान पर 'बचह बचुना' कल्ना पक़ता हे। निन्स्ु बानन्य- नर्वन को इस प्रसार के प्रमोन का कहीं घनसर की नहीं, कयोंकि उनका विवेश प्रवाश्य एवं तरक हे, बसें कहीं अलनच्तर, तककन या बनान्सर मर्वा नहीं है :४: रवादि बर्मर - कमनि अन्म बानायों ने रक्पडकंश्ार का बस्लेस किया था विन्यु वानमपवमी ने उससे विभय में नवीन वियान्त पस्कृ किवा और नद 'किव नाच्य में बन्म वर्ष प्रमान रूप से मानवार्थ की बर उपमें जी रवादि अं हॉं ने साधि अर के निभय हैं। को कि पाटू के विषय में प्रवाडअंार' के मुल्य वाक्वार्च होने पर नी रहानि अंगमूस देते बाते हें।
१- डा० बुरेशबन्द पाण्येय के मह में - 'दूसरे प्रकार के मावाउंकार के लर्तण मैं हपट ने कपन्तिर का बकामन कह कर विहुद व्यंका का दी पकारान्तर हे बलेस किया है बौर उनके उपावरण में सो दाथी व्यंपा की स्ष्ट कल मिती है। शोक्सार ने बडी उदवरण में व्यंग्य को वाच्यो पसकारी किशाने की वेच्दा की है निन्तु लारी दृष्टि में नब मुणीमृतव्यंत का उवावरण समतकमोतलितय न छोकर विहृव व्यनि का उदावरण प्रती
२-(१) अन्यू. १६१-९१२ (२) यहा एक समय अवयेय है- वानन्यवर्पन ने रसादि बकार पद का पुयोन किया है निन्तु येनिनवनुच्त एसें स्नपसंगर संता से अभिकित करते का
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२५२ वानन्दवर्धन ने रसावि-अवार के प्रसंग में जो प्रयोसकार को उवावरणाय रसा है उस पर वादोप करते हुए कहते हैं क्यांकि मामह के सुचार - 'गुरू, वैव्ला, नूप एवं पुत्र के विषय में प्रीति का व्णनु प्रयोछंकार है अतः उनदे अनुसार प्रेयोडऊंकार का विमुद एस प्रसार होगा- 'तत् प्रेयानउंारो मत्र स प्रयोसकारोडअंगरणीय इवोक:' इस प्रकार प्रस्तुत प्रसंग में प्रयोऽअंकार के मुल्य वाक्यार्य होने के कारण यह वलंकार नहीं बाुत स्वयं अंकरणीय है। शवचिए यहां पर कवार का वाक्याथत्य ठीक नहीं है। चिन्तु, उड्मट के मतवलमशी इसका वाक्यमेद करके व्यास्यान करते हैं बतः उनके अनुसार यदां रस्वद्-अलंगार का विभय मी है और प्रयोठंकार का मी है। यह तात्पर्य अपि शब्द के प्रयोग से प्रतीत होता है। अतः यहां रवादि अलंकार से रसक्त्, प्रेय:, ऊबस्वि और समाकत अठकार उपउचित को रहे हैं। :5: वानन्दन्थन (व्य०३।३६ में) कहते हैं बाच्याउवारों में व्यंग्यात् का अनुगमन होने पर अतिश्य शोमा ना बाती है। कैो - दीपक, समासोकि आदि बलंवारों में प्राय: व्यंग्य अकरान्तर बर वस्त्यन्तर का स्पर्श करने वाले देले जाते हैं। क्योंकि सभी अकारों में अतिशयोलि नर्मता हो सकती है,वार महाववियों द्वारा योज्ति होने पर तो निश्चय की उसमें सपरव शोमा वा जाती है। जैा मामक ने मी अतिशयोलि के उदण में कहा है- बेचा सनद कड़ोकि सथायां जिाव्पते। यल्नोडस्यां वविना कार्य: कोडउंरोऽनयाचिना ।।
१- बक अं० पृ० ११२ २-'न त्वउंकारस्य वाक्याथत्यं युल्तम् - वही पृ० ११२ ३- जहां मी रवादि शब्द का प्रयोग के उससे रस के चाथ माव, तदामास तथा मावशान्त्यादि गृहीत होते हैं। ये रवाददि जिसी के अंग के रूप में होने पर पुमशः रसात्, प्रेयः, ऊजीस्वि और समारित अठगर कशलाते हैं। ४- ्व०्पृ० १७-४६४ ४- मामह - काव्याउंगर शब
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२५३ अभिनयगुप्त, आानन्यवर्णन दारा ककत- समी ककारों में अतिशयोति गनता पर ,और उसकी पुष्टि हेतु उदत मामह हे कथन पर शंका करते हुए कहते हैं- 'नन्पतिश्योत्ति: सलंवारेज व्यंग्क्तया तवीनिवास्त इति बुल तत्चप् । यत भामशSतिश्योदि सवाउंका रवामान्यइपामवादीत्। न न सामान्यं सष्दावितेष: प्रतीते: पृथणमुततया पश्चासनल्वैन नवासतीति कयमस्य व्यंग्यतवनित्यासंकयाह-मामलैति मामहैनामि बुक तत्रायमेवाचाडवनन्तव्य इति दरेण सम्बन्य: । अथात् वतिश्योकि सभी बऊारों में व्यंग्यकाप से अन्तर्लीन रक्ती है - वह पदा वैसे सध्मय होना ? क्योंकि मामह अतिशयोकि को सभी बलंगारों का सामान्य रूप कहते हैं। सामान्य शब्द से वितेष की प्रीति नहीं होती। क: इसका डवंशकत व्यंग्यत्य कैसे होना ? - इतना कहने के बाद अभिनवनुप्त इसका एक समाचान देते है- मामह ने जो कहा है, वहां यह सपफना बाहिए कि यह दूर से सम्बन्ध है, इसका कोई व्राप्तात् सम्बन्ध नहीं है। पस्तुत स्क पर दूर से सम्बन्ध वाली बात वस्तुत: अस्पष्ट है। बर मामह के कथन में जो संका अभिनवमुप्त ने उठाई है उसका समाचान भी नहीं किया है। :6: संघटना- आनन्दवर्णन - नुणाभित संघटना मानते हैं। अभिनवगुप्त मट्टौद्मट के निम्व कयन को - उदृत करते हुए वसते हैं- बापेयपुतानिति। इंटनाया वर्मा गुणा इति मट्टौदूमटादय:, चमारय मध्यानिता इति पृविडो मार्न: एस पुकार मट्टोट्मट के कयन से यह भुष्ट कर रहे हैं कि जानन्दवर्धन बर मट्ोडमट में गुणानित संघटना के विभय में पतैक्य है। उपयुक्त विवेषन से स्पष्ट है कि वानन्दवर्थन ने अपनी प्रतिज्ञा अनुसार पूर्ववरती बचार्यो द्वारा प्रतिपाकित नाव्य के वाच्य-मान का विस्तृत विवेवन नहीं किया है। उपयोगानुवार उनका अनुवबन-मात्र किया है। फिन्तु आपार्य अभिननगुप्त ने
१- शो० पृ० ४६-५ २- वढी पृ० १० ३- प्य०१।३
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अनसर पाकर समो का विस्तृत विवेवन किया है। व्यन्याछन के व्याल्यान के प्रयंग में अभिनवगुप्त का यह प्रयत्न निःसन्देह स्तृत्य है। इस से फ्रीत होता है कि उनके हृदय में पूर्ववर्ती वाचारयों के पृति आल्पा है। हसीछिए अनसर बाने पर उनका स्मरण अवश्य कर हरी हैं। विन्सु ना ने पूर्ववर्ती बाबायों के अउंकारों कै उत्तण का विश्वेषण करते हुए उसमें वोषवर्शन कराने उनते हैं, तम वह व्यर्य कर विस्तार मात्र प्रतीत होता है।
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२४५
कारिण बर वृधिकार
अ्य्याठोष के कारिया मान एवं वृषिमान के रपयिता मिन्न-भिन्न व्यक्ति हैं अयवा एक सी, क्स विचय में विदानों में मतमेद है। इस प्रसार के विदानों के दो वल को जाते हैं- (१) पकले वह दो कारिका और वृत्तिमान के वर्ता को भिन्न मानते हैं। तथा (२) दूसरे, वह जो कारिका और वृतिमान के कर्ता को बपिन्न मानते हैं। मिन्नकाकत्य विभया समस्या का प्रारम्भ सर्वपृषम डा० व्यृक्कर ने कश्मीर- रिपोर्ट में किया था। तदनन्तर, भवमतोपाध्याय श्री पी०ी० काणे ने अपने इूप्रसिद अंकार-ताहित्य के इतिदास में भिन्नववकत्य की समस्या उठाई बौर बनेक प्रनाणों के बाबार पर मिन्नवमृकल्व के पपा को उपस्थित किया। इस मिन्नव- कल्य के समर्थक आचायों में डा० धुनीऊपुार है, प्रो० शिनपरवाद मट्टाचार्य बादि अनेक विदान हैं। एपये निपरीत, कारिकामान एवं वृत्तिमान के लिए अभिन्मकवत्य के साथी विद्ानों का एक दूसरा दड भी था। जिसनें महामहोपाध्याय कुम्पुस्वामी शास्त्री, डा० सातकरी मुकर्जी, डा० संगरनू, डा० कान्सिबनद पाण्हेय, डा० कृष्णमृर्ति बदि विदान हैं। उप्युक्त विवेशन से यह स्पष्ट है कि वारिकामान और ियतनृनतत वृतिमान कै निन्नकवूरत्च एवं अभिन्नवयुकत्य विभयक पृश्न विदानों के मध्य बमुवर्णित विषय रहा है। कः ए विभय में युछ मी कहना पिष्टये चण ही होगा। तथापि रोमन के मुल्यांन के पुदंग में इस तथूय पर मी कुछ कहना बनिवाय है।
t- "From Abhinavagupta's tika it appears that verses (VIT(T) are the composition of some older writer, whose name is not given, but it is remarkable that
they contain no भशवरण (पृ० ६५ श्री विष्णुपाद मट्टाचार्य के ध्वन्यालोंड़ पर introduction ये उदृत)।
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२५4 (१) मिन्नगलय -
पिम्नयकत्य विचयक समस्या के द्ात का मुछ्र आचार्य बमलिय- मुप्त का शोमन ही है। वमिनवमुम्त स्थ-ए्थ पर कारिकाकार बौर दृशिकार का पूफू-पूकर् नि्देश करते हैं। इसके प्रमाणायं डोप्ल' के निष्मणिक्ित एक इृषय है- १- ध्यन्यालोन के तीन प्रकार के ध्वनि विरोधी कहे नह हैं - बनाववादी, वन्तमववादी एवं अनिवनीयताबादी। इनमें से प्रथम उभात में परथम दो का विवेयन तो मिलता है किन्तु तृतीय का निरपण केवठ वृतत्ति में मिल्ता है। इस असगति और पूर्ति पर पथम उचात में शोचन में वभिनवमुक्त जिल्ते हैं- 'एवं त्रिपकारममाववाडं, मकत्यन्समतरतां क निराकुवता अलता णीयत्यमेतन्म्ये निराजमेद। कए्य पुख्वारिया वपासतम्मिरावरणाया न बकी। वृतिवृत निराकतमधि पमेवसय्यापूरणाय वण्देन सत्पदामनुम निराकरोति। सवनन्तर परथव उपात के वन्त में कसते हैं- 'तत्र पम्मोदयोते उवने: सामान्यतद गमेव कारिवाकारेण पुतम्। द्वितीयोदयरेती कारिकानारीSयान्सरविमानं विशेयउत्णं व विवयनुवायमुरेन मुठविमानं द्विविवं सुक्तिवान्। तवाश्यानुवारेण तु पृसयियत्रेमोदयोते मूलविमानमवोकत् 'स व विविष:'
२- ध्वन्यालक के प्वितीय उपात में ध्यान मेदों का विवेधन किया नया है, विन्तु प्रकम उभोत में मी ध्वनि के सामान्यतः दो मेद बतडा दिए गए थे- वदिवद्ितवाच्य और विवितान्यपरवाच्य। काः द्वितीय उचोत के प्रारम्म मैं उस परवोविसित परवंग का स्परण बिलाते हुए कहा गया है- 'स्मविवदितवाध्यवविदिता मपरवाच्य्वेन ध्वनिदधिपकार: परकाशितः ।
१-गो० पृ० १५२-१५३ २- वही पृ० १५३।
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बधान्तर संत्रमितमत्यन्तं वा तिरसृतम्। अनिवदितवाच्यस्य धयनेवच्यं दिवा मतम् ।। इद पर अभिवियगुप्त जिसते हैं- (१) दुरिकार: अतिमुवात्तस्य पुवणि उकनते स्वमित्यादि। (२) प्रकाशित इति मया पृतिवारेण सनेति माय:। (३) न वैतन्मयोत्यृमुकम्, अपि तु वार्णिातारामिष्रावेणेत्याड सत्रेति। तत्र व्विप्रकारपुणओ वृतिकारते । यन्भिमितं बीकतमिति सम्बन्यः । (४) यदिवा तप्रेति पुकीच: , तत्र प्रथनोनाते वृततिकारेण प्रकाशित: अविवधित-
(v) तदवानतरमेवपृतिपादनदारेणैव वानुवादसरेणा विवासतवाच्यस्य यः प्रमेव: विवचितानयपरवाध्यात् पभम्मत्वं तत्पृतिपादनायेवमुकी, मवति मुक्को
३- द्वितीय स्थात में अनिवदितवाच्य बर विवदितान्यवरवाध्य नामत उपयध्यनि मेदों को ध्यन्धामासों से पुपर करने, बन्त में वह कारिया दिशी - यत: सवैच्येव प्रमेवेस स्कुटत्येमावमासनम्। यद् व्यंग्यस्यागियतस्य तत् पूर्ण व्वनिलद्तणम् ।। ३
बन्तिम कारिका की संगति उगाने के छिए वृतिकार ने य् पद का प्रयोग किया। इस का: पर अोचनकार जिसते हैं-
'रक्त मेव ध्वनिस्कयं तदामासनिवेवतेतृतया कारिवानारोडनुक्दति इत्यमि- प्रायेण वृतिकृदुपस्कारं दवाति यत् इति'। ४. तृतीय उभात के प्रारम्म में कका गया है- एवं व्यंग्यपुसेनैव म्यने: प्रवाशिी सपमेदे स्वपे पुनर्व्यकायवेनेतत्पुकाश्यते
१- म्व० पृ० १५४ २- डो० पृ० १६५-९६६ ३- प्व० पृ० रब ४- गे० पृo रूर्प V- ध्य० पृ० २ू०-२म
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इस प्रुशार अभिनवगुप्त आपति करते हैं- पर
वस्तु व्यावष्टे - व्यंग्याना वस्त्चलंकाररवाना मुखेन कति व एवं परृष्टव्य: लद् ताकु त्रिमेदत्मं न कारिकाकारेण पुतम् , वृत्तिकारेण सु द्क्षिाम्, न बेवानीं वृति- नारो मेपष्टनं करौति, सवश्य इवं कुतमिव क्रियत इति बसुमैदे का संगति: ? न वैताक्ा वामाकनम्यगति: पुता स्वति।
व्यंगशों के मेदों का प्रतिपादन करते हुए कारिया में कहा गया है- 'म म रैंफ संयोगयुक्त अनेक दुकार भृंगार के विरोषी होते हैं विन्तु वे ही बीमत्सादि के छिए अन्कल होते हैं। इसमें पहे अमाव दिसलाया नया है और पीछ़े सद्माव। बृगिमाग में कहा गया है- कारिवायों के द्वारा - अन्कय व्यतिरेक परस्तुत करते हुए वर्गो की व्यंजसता का विवेशन किया गया है। यहां बन्दय का उल्लेस पक्ले पिया गया और व्यतिरेष का बाद में। अन्चय= सद्माद और व्यतिरेक= बमाव है। इस प्रकार शारिका क्रम वृत्ति में उठट गया।- इस पर अभिनय गुप्त जिक्कते हैं- 'भारिशाकारेण पूर्व व्यतिरेत: उत्त: पश्चावन्यय: दुतिकारेण ू ..... अन्प्यय: पूर्वनुपाठः। . ,%
4- शरिणा में कहा नया कि 'रस आदि के बधार पर बनाया गया वाय्य अनतता को प्राप्त हो जाता है फिर छिसा नयामधुमास में बृत्तों से समान दृष्टपूर्व अर्थ मी नर्वीन फरतीत होने उगते हैं। सपरियिद के भण। इन दोनों के बीम सम्पन्न प्रतियाकित करते हुए वृतिकार ने छिका है कि दूसरा बनतव्य पृथम वक्तव्य के सम्यन के लिए है। रस पर ठोगनकार ने लिव्वा - 'यवष्यपनिन्त्यमात्रे लवुतिकारेणोक्त:, तथामि कारिकावारेण नोक्त इति भाव:
१- गो. पृ० २ु६-२६० २- व्व० ३३ और स४ पृ० ३०३ ३- वही पृ० ३०३ ४- लो० पृ० ३० ५- शो० पृ०
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२V६ अमिनिवमुप्त के उपर्युक्त कमनों को देसने से यह सिद्ध हो जाता है कि कारिका बौर वृत्ति में मिन्न्नकुशल्य की समस्या का बाबान करने का सम्पूर्ण दायित्य वभनिवमुप्त पर ही है। दाथ ही, मिन्ननसल्य स्वीकर करने पर दोनों मासतों के भृन्य नाम एवं क्ता नाम विषयक अनैक अगत समस्यावों का उद्भव होता है। क: फिन्वुकल्य वाठा पदा ठीक नहीं है।
२. वभिम्मकारतय -
अभिन्नवतुकत्थ वाडा पदा ठीक है। वस्तुत: कारिकाकार और वृतिषार भिन्न नहीं उपते । वर्योि - वमिनवनुप्त ने सदृवयानामानन्दो मनति सपता पृतिष्ठा की व्यास्या करते हुए 'वानन्द' का वर्ष तो वानन्यवर्मन किया विन्सु सदुदय का वर्थ तन्नामक कोई व्यक्ति नहीं किया, परत्युत यदी कह कि इस मुन्य के स्वयिता (ानन्दवर्शन) सदृदयममवती हैं क्योंकि उनका मन.अतिस्यत है। बमतिवमुप्त ने यशां वानन्दवर्धन को ही फ्फूस कहा है। यह तथुष उनकी इन पंकतियोँ ये स्पष्ट है- (१)'आनन्द इति व मुन्फकती नाम। तेन स आाननयवर्वनाचार्य स्तभ्वास्त्रवारेण सहृदयद्पयैभ् प्रतिष्ां मण्दस्विति भायः। (२)'तथा मनृति परतिष्ठा रवंवियमस्य मनः, सहृवयममकतीसिल्वयं मुन्यृत इति बाक्ू इससे स्पष्ट है कि अभिनवनुम्त वानन्दवर्यन को ही समृषय यह रहे हैं। वदि वनन्दवयन पृतिमान के स्पयिता है तो ऐसी कौनसी कलावट थी जो उनधोंनि 'समृपय शब्द की व्यास्था में यह स्पष्ट नहीं छिस्ा कि यह कारिकाकार का नाम है।
१- व्य० पृ० ३ - वही पृ० ४१ ३- बढी पृ०४१
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२५० वस्तुतः कारिकाकार एवं पृतिकार वभिन्न हैं फिर मी वभिनवुप्त उन्न्हें फिन्न मान रहे हैं। सम्मकता: बमतिवमुप्त वाहते हां कि कारिकाकार एवं बविकार पुकर पुथ्त र कर देहें बाएं। अभिनवमुप्त अगेद जानते हुए मी मेद करने बोझने दे बादि हैं। बदि व्वन्चालोक मृन्य दूसरे आवार्य का बनाया हुव होता तो आनन्यपर्वन बपने कपर सम्पूर्ण मृन्य का न्रेव कर्यों हेते ? वानन्दवर्णन स्वयं कसते हैं -
वल्पं मनस्पु परिपववमियां यवाजीत्।
रानन्दवर्पन इति पृकिकिाभिवान: ।।
यदि मुहमून्य वानन्यवर्णन का न होता तो वानन्यवर्मन उसने विषय में युछ् न एुस अवश्य संनेत करते। एक बाचार्य के पप् में इस प्रकार दोनों मार्गों- शारिया बौर वृत्ति में नेव मानना सर्वधा अन्याय है। वस्तत: उस समय की यह सेी ही थी। वामन ने स्वयं सुत्र जिसा और उस पर वृत्ति जिसी। उस्ी प्रकार वानन्दवर्पन ने भी कारिका और वृत्ति जिही बः यहां विपृतिपति का तनिक मी अवकास नहीं। निम्मर्म यह है कि ध्वन्यालोक की कारिवाों के स्वयिता बोर उसकी वृति के रपकिता वे वमिम्न हैं। मेद की दिशा वभिनननुप्त की देन है।
निव्चर्ष -
स्वन्यालोक के परिफरेत्य में लोचन का अध्ययन करने पर निम्नलिकित स्वतन्त्र तथुय सामने वाते हैं :- १. विभिन्न सवलों पर प्रयुक्त 'आत्ना' पद का अर्थ वमिनवगुप्त अपने अनुसार करते हैं।
१- व्य० पृ० १४२-५५२
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२. व्यंग्यार्थ के त्रिविध मेद- वस्तु, अलंकार एवं रस को व्यंग्य का मेद न कह कर ध्वनि का फे मानते हैं। ३. ध्वनि के पांच वर्ष करते हैं - व्यंग्य वर्य, वानब्शन्द वाच्य वर्थ, भ्यंजा व्यापार बर सुबाय रप काब्य। ४. ध्यनि के उपमेषों में नहां ववश्यकता पढ़ी अपने बनुवार चोड़ा बकुत परिकतत कर औ हैं। ५, वमिया, उप्तणा एवं व्यंवा के अतिरिक्त तात्पर्यं शक्ति को भी मानते हैं। 4. शान्तरव का स्वम्प और उसके स्थायीमाव का पतिपादन अमिनिवगुप्त ने बिठुल स्वतन्त्र रूप से किया है। और श्ान्त रस को रखराज माना है। ७. और सशधिक महत्यपूर्ण है - वमिनिकतुप्त का रसतिदान्त। किे उन्होंने शैवादेत के रंग में रंग दिया। 5. अभिनयमुप्त के लोचन में अलंकार के परसंग में विशेन रूप से मामड, उद्यट, वामन वादि को बमूत किया है, जिससे उनकी व्यात्या सम्पन्न हो नई है बौर बानन्द- वर्धन का सन्तव्य मी स्पष्ट हो गया है। विन्तु नमी-नणी व्यर्य का विस्तार या फ्रतीत होने उपता है। ६. व्वन्याछोड़ की कारिया एवं वृतिमान के स्वयिता आनन्दवर्यन ही हैं विन्तु अभिनवगुप्त ने शधन में कारिका और वृत्ति माग के वर्ता को भिन्न-मिन्न माना है।
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पंचम - वध्याय
डोव का परवर्ती ध्वनि-सम्पृदाव पर प्रमाव
पिके अध्याय में लोचन के विवेशन एवं विश्वेषण से स्पष्ट है कि अभिनव गुप्त ने वानन्दवर्यन के सिद्ान्त में अपने अभिनव मतों को मुप्त उंग से सन्निवेशित बिया है, मिस्वा प्रमाव परवर्ती ध्वनि-सष्पदाय पर स्पष्टतः परित्ित होता है। अतः निकले अध्याय में अभिनवनुप्त के जिन नवीन तथूयों को सोजा गया है, उम्हीं तथयों के परिपरष्म में परवर्ती ध्वनि-सम्प्रवाय के प्रमुस वाचायों के मतों का विश्लेषण करेंने।
व्यंग्य वर्ष और ध्वनि में रेक्य की श्रान्ति :-
व्यंग्य के तीन नैद हैं - वस्तुव्यंग्य, अलंकार-व्यंग्य एवं रसादिव्यंग्य । चिन्तु अभिनननुप्त हन्हें वस्तुष्यनि, बलकार ध्यनि एवं रसाविध्यनि संज्ञा से बभि्ित करते हैं, जिससे व्यंग्य अर्थ एवं क्वनि के स्वक्प में रेकय की प्रान्ति होती है। वस्तुतः ध्यनि एवं व्यंग्य अर्थ सर्वधा भिन्न-मिन्न हैं विन्तु अमनिवगुप्त की व्यास्या से तन दोनों में ऐक्य की प्रतीति होती है। परक्ती आचायों में से कुछ नै अपनी सृष्म दृष्टि से इन दोनों के पार्थक्य को सपफ छिया, िन्तु कुछ ऐेसे मी है जो अमिनवगुप्त का दी अनुकरण करते हैं। बाचार्य मम्मट की दृष्टि तत्व का बन्वेषण' करने में बड़ी पैनी है। वह अमिनिवमुप्त के मन को उस्ी स्थान पर बपनाते हैं, जहां उनहोंने कोर्ई विरेष बात कही हो,उन्यया वह वानन्दवर्यन का ही अनुकरण करते हैं। व्यंग्यार्थ का पति- पादन ध्यनि के साथ करते मी हैं, तो बड़े विषेक के साथ। यथा- 'अं्कनेन पुनरस्य ध्वनेस्त्रमो मेदा:, व्यंग्यस्य करिपत्वात्। तथाद्ि
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सली विंधिदाच्यतां सकते निंनित्वं्यया। तत्र वाज्यतावत्मविचित्र विचित्न पेद। अभिचित्रं वस्तुमात, विचित्न त्वउंभारपम। ..... रवाविकतणसपर्वः स्च्े पि न वाच्य: । इम पंकतयों में 'अस्य अवनेस्पयो मेवा:' - पर अमिनत्रनुक्त का कोई पमाव नहीं है, झो ध्यनि के तीन नैद: वस्तुध्यनि, अंफरथ्यनि एवं रवाविध्यनिमानते है। आनन्दवर्धन के अनुसार
बाचार्य मम्मट, एस प्रकार कहां ह- ने जो
संकलनेन पुनरस्य ध्ववेस्त्रयो भेदा: व्यंग्यस्य त्रिरूपलातू। इसका तात्पर्य यह है कि-ध्वनि तो वनन्त मेदों बाठा है, उसें किन्तु
वस्तु, अलंकार एवं रवादि त्रिविम रूप से व्यंग्य होते रकषते हैं। हेमचन्द काव्यानुवासन में अयंग्यारय का उप्तण एस प्रकार देने हैं- 'मुख्या व्पतिरिल: प्रतोय्मान व्यंग्यो ध्वनि:"। बौर इस्की व्यास्या करते हुए कसतते हैं- 'मुल्यगोणउत्यार्थव्यतिरिकत: प्रीतिविभर्यों व्यंग्योऽयें:। व व ध्यन्धते पोल्यते इति व्वनिरिति पूर्वानाये: बंितः। अ्यं व वसत्चउंकाररसादिमेदा लिका। हेमनन्द्र अतिदुक्ता से वस्त्चलंकार एवं रवादि का प्रतिपावन कर रहे हैं। विन्शतु यदि वर्यं म वस्त्यलंशाररवाविमेवास्त्रिया इस पंक्ति की व्यंग्योऽर्थ: के ठीक बाद रक देते तो यह स्पष्ट हो जाता कि यह त्रिविम मेद व्यंग्यार्थ के िए ही कहे नह हैं, 'ध्वननि के छिए नहीं। श्री विपायर एकावजी के प्रथम उन्मे में ध्वनि की स्थापना के पुसंग में ध्यनि और व्यंग्यतय को बड़े विबेक के साथ प्रस्तुत करते हैं - 'तस्मादस्ति ध्वनिः । व्यं म वस्त्चउंाररसादि रपतया मवन्न न्रेविध्यमतिकतते। किन्तु वभिनवगुप्त के पुभाव से बकते नहीं रह पाते। उप्युक्त पंक्तियों के साथ कतना और वह देते हैं - वस्तुध्वनिरउंारध्वनि: रवाविध्वनिश्वेति ।
१- बाव्यपुकाश पृ० २११-२१७ २- पाव्यानुशासन पृ० ३० ३- शाव्यानुशालन, पृ० र ४- एकवली पृ० ५२-५३ ५- ए्वावळी पु० ५२-५३
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यदि इसी तथूय को एकावजीकार इस प्रकार ककते- 'तस्मादस्ति ध्यनिः । अर्यं व बस्त्वलंकाररया विल्पतया(व्यंग्य) भवन्न त्रैविष्यमतिवतती। वस्तुष्यंग्य बलंवारव्यंग्य, रवादिव्यंग्यशपेति । तो अधिक उपयुक्त होता। क्याँकि वस्तु, बलंकार एवं रवादिरपेण व्यंग्य होता हुवा ध्वनिवास्य अ्न्त प्रकार का हो जाता है। वस्तुध्वनि, अंशारध्वनि एवं रसादिध्यनि ककने पर ये ध्वनि के मेव प्रतीत होने लगते हैं वस्तुतः यह ध्यनि के मेद नहीं, व्यंग्यारथ से मैद हैं। बाचार्य विश्वनाथ मी ध्वनि एवं व्यंस्थार्थ के पार्थक्य को नहीं सपक पार। उन्हें मी दोनों में ऐक्य की म्रान्ति हो ही गई , इसी कारण वे कलते हैं- 'यहु ध्यनिकारेणोकतम्- काव्यस्यात्मा ध्यनि: इति तरिकिे बस्त्वहंगार रसादितत गल्किपो ध्वनि: बाव्यस्वात्मा, उत रवाकिपमात्रो या ?..... ननु यदि रवानिरूपमात्रो ध्यनि: काव्यस्यात्मा, तवा -' वता एत्य गिमन्ब एत्प वह दिनसं पठोरहि। मा पहिचि एत्तिवन्यित क नेज्वार मह णिमव्यहिषि। इल्यादो वस्तुमात्रस्य व्यंग्यत्पे क्यं माज्यव्यववार इति केत् ? इत्यादि। वस्तृत: ध्वनिकार आनार्य वानम्यवर्णन का सिदान्त इतना सरल है कि उसमें निस्ी प्रकार की संगा का आशार नहीं है। बिन्तु फिर मी बाचार्य विश्वनाथ अ्वनिकार पर बयोप कर रहे हैं। यदि अवधानपूर्वक विवार किया जाय तो यह स्पष्ट हो बारणा कि अभिनरमुप्त की लोवन टीक्षा के ही कारण साहित्यपर्पण- भर उपयुक्त संगा कर रहे हैं। क्योंकि आचार्य अभिनवमुप्त वस्तु, बलकार एवं रवादि रूप त्रिविम व्यंग्यार्य को अपश्ः वस्तुध्वनि, अंशारध्वनि एवं रवादिध्वनि कहते हैं, जिसे कारण वह ध्वनि के मेद प्रीत होने उनते हैं। रसी कारण बानार्य विश्वनाथ काव्यस्यात्मा ध्यनि: पर हस प्रकार संा करते हैं कि - 'वस्तु, अंकार एवं रसध्यनि तीनों को नाकय की आात्मा माना बाए अपवा केवउ रस्यनि को। यदि रसध्यनि मात्र को काव्य की वाल्मा माना बाएगा तो
१- साहित्यवर्पण पृ० १७
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- २4Y वस्तु एवं बलंसारध्यनि बैटे शाच्य की वाल्मा बनेने ?' वस्तुतः वाचार्य विश्वनाय ने ध्वनि एवं व्यंग्यार्थ के वास्तविष स्व्प को य वानन्दवर्धन के अनुवार नहीं सपका है। उनका ध्यान वमिनयगुप्त की व्वास्पा की और बचिक है, इसी कारण उनहों इस प्रकार की अंग की है। उपयुक्त विवेवन से स्पच्छत: परिठमित होता है कि वकां तक ध्यनि एवं व्यंग्यार्थ के स्वर्प के पार्थकय का सम्मन्ध है, कगमग समी परवर्ती बचार्य,बानन्य- वर्णन की अपेल्ा वमिनवमुप्त से अचिक प्रमाक्ति पुर हैं। कविकणंपूरनोस्वामी ने अपने मून्य कंकरवीस्तुन में अभिनिवगुप्त द्वारा परतिपादित ध्यनि के पांप अर्था - व्यंग्यवर्च, वायकशब्द, वाज्य अर्प, व्यंज्ञा- व्यापार वर समुदाय रूप काच्य पर आपोम करते हुए कक्षते हैं- 'न तू ध्यननं व्वनिरिति माक्सावनं, तथा अति ध्वन्पर्यविम्ययव्वानेपि ध्यनि: व्यवहारापते:। न या ध्वन्यतेऽनेनैति परणवावनं, तथा तति ध्यनिवरणे काळ्ये5षि'ध्यनि' व्यववारापतेः। न वा धवन्यतेऽसमिन्मित्यचिकरणडायनं, रसारथ्यध्यनेरन्ये ध्यनयस्तु प्राणा, रवारव्यस्ृ ध्वनिरात्पेत्योम: "
१- आानन्दवर्धन के अनुसार ध्वनि एवं व्यंग्यार्थ के पार्थक्य का विस्तृत विवेवन पक्षछे किया जा दुका है। आनन्दवर्धन के अनुसार ध्यनि एकं बाय्य प्रकार है और उस् ध्वनि काव्य का प्राणमुत तल्व त्रिविम 'व्यंग्यार्य'है। अथवा इस प्रकार मी कहा या सन्ता है कि वाय्य सामान्य का वात्मा ध्वनि काव्य विवेष है और उद् ध्यनिकाव्य का रवस्यमत सत्य त्रिविम व्यंग्यार्य है। २- वर्यों या हब्दो या व्यावारो वा। अरपोऽपि वाज्यों वा ध्वनलाति, शबS- व्येवु। व्यंग्यो वा ध्यन्यत इति। व्यापारो वा शव्ार्थयोकपननमिति। वारिक्या तु प्रामाम्येन समुदाय एव काव्यपो मुख्यतया ध्वनिरिति परतिपादित तेन वाच्योऽपि ध्यनि: वापकोऽपि शब्दी ख्ननि:, द्योरमि व्यंरयं ध्वन- तीति फुल्या। अभ्मिक्कते विभाषानुमावसंवउनयेति व्यंग्योSयि ध्वनि:, स्वन्यत इति कुल्या ।शब्न शब्द: सवर्नतडतनननप्ननियनलनवेनक्फकसअेसर्सट असवसिलवतव शब्यव्यापार:, न नासायभिवाविरप: अपि स्वाल्ममतः, सोऽपि ध्वनिः । काव्यमितिव्यपदेश्वशन योऽर्थः सोऽपि ध्यनिः । उसपकार ध्वनि-
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ऋविवरणपूरमोस्तामी ने डव्ासलित ध्वनन ध्वनि:' 'ध्वन्पतेऽनैनेति ध्वनि: एवं ध्वन्पतेऽस्मिन् इति ध्वनि:' का निराकरण करते दुए, केवस ध्वन्यते साबिति ध्वनि:' - एस प्रकार ध्यनि इन्द की व्युस्पत्ति स्वीकार की है। और एक नईं स्मावना मी इनहोंने की है - वे 'रस' की वात्मा बर ध्वनि' को पृाण कहते हैं। इनकी यह एूक बढ़ी विचित्न है। रेवा प्रतीत होता है कि यह प्राण वौर वात्मा के माध्यम से बानन्दवर्धन के योऽर्थ :समपमशठाध्य: क्राष्या- त्मेति व्यवस्थित:' और बाव्यस्यात्मा व स्वा्थंः' में प्रयुक्त 'बात्मा' पद के अर्थ को स्पष्ट करना बाह रहे हैं। क्योंकि पकी कारिका में वस्तु अलंकार एवं रसादि व्यंग्यार्थ को काव्य की आत्मा कहा गया और स्व० ११४ में रसव्यंग्य' का ध्वनि- बाव्य में प्रामान्य बताया गया है। इसी दृष्टि से कविवणपुरणोस्वामी रसादि को ध्वनिकाव्य का प्राण वर रख को ध्वननि की वात्मा कह रहे हैं। एससे कुछ हद तक वानन्दवर्वन का मन्तव्य स्पष्ट होता है किन्तु उनकी सव्दावली में वस्पष्टता है। 'रसारव्यध्यनेत्ये ध्वनवस्तु प्राणा - इस पंक्ति द्वारा कविवणपुरणोस्वामी पर मी अमिनिवनुप्त का प्रमाव स्पष्ट रूप से परिकमित हो रहा है। क्योंकि यह भी 'रवारव्यध्यनि' पद का प्रयोन कर रहे हैं।
रब - पत्रिया -
वमिनिवमुप्त के रव-विदान्स का परन्ती आाबायों पर इतना नहरा प्रपाव पड़ा कि समी ने अभिनवमुप्त की दुशारई वेवर रस प्रक्रिया को स्वीकार किया। यह बात दूसरी है कि एुक आचायों ने एकाम स्थान पर थोड़ा बहु्त शास्त्रीय मेद उपस्थि किया, और बुछ ने अभिनव की यवावत् स्वीकार कर छिया है। रस-प्रक्रिया को
ध्वनि विरोधी आचार्य चनजय चनिक एवं मकतिमि भद जहां एक और ध्वनि का विरोग करते हैं वहीं वे दूसरी औोर रस का समर्थन करना नहीं मुलते। यथा- चनंजय और यनिक ने रस की स्थिति समूपयमत ही मानी है बर यह स्वीकार किया है कि विभाव, अनुमाव, वाल्यिक तथा व्यभिवारी मार्नों द्रा सह्दयगत
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स्थायी पराव ही रसत्य की फ्राप्त होता है। फिन्तु वे व्यंजा-वृत्ति को स्वीकद नहीं करते। अतः वे काव्य अथवा उपमें वा ति विमावादि के साथ रस का, अमिनवगुप्त के समान व्यंग्य-व्यंजा सम्बन्ध म मानवर मटनायक की मांति माज्य- माकक सम्बन्ध मानते हैं। परिणामत: उनके मतानुवारविमावानुमावव्यमिवारि संयोनादवनिष्परति:' इस सृत्र में प्रयुक्त संयोग' का वर्य माच्य-माचक सम्बन्य' है और 'निष्पतति' का वर्य 'मक्ति होना'है। महिममट् ने 'रस' को काव्य की आत्मा माना। उनहोंे यह मी स्वीकार किया कि उसकी स्थिति सहृदयनत होती है। सहृदय ही स्थायीमावों का रख रूप में बास्वादन करता है, विन्तु मे स्थायीमाव वासना रूप में समृषय के चित में विधमान नहीं होते वरन् रंगमंदर पर नट द्वारा प्रपर्श्ित स्थायीनावों के प्रतिबिधि- कल्प होते हैं : 'तैरेव कारणाविमि: दृत्रिमैर्मिनावाचमिवानेरसन्त एव रत्यामय: पतिबिध्काल्पा: स्थायीमावव्यपदेशनाय: कविमि :- पतिफाफ्ती तिपयुपनीयनाना हृदयसंवादावास्वायल्यनुपवन्त: सन्तो रवा इत्युष्यन्ते'। 5 उसका मावार्थ यह है कि रत्यादि की वास्तविष स्थिति पुमाता में नहीं होती, जे केवल रंगमं पर प्रयर्तित या काव्य में वर्णित स्थायीमार्षों के प्रतिबिम्ब होते हैं। कवि वृत्रिम कारण रम विभावादि के दारा इन्हें पमाता की फ्रीति का विषय बनाता है बोर तब उसकी समृदयता के कारण आस्वाम चोकर ये प्रतिबिम्माल्म स्थायीमाव ही रस संता को प्राप्त हो बाते हैं। विन्तु इस परप्रिया का बबार व्यंजा नहीं है, रख वनुमान से की सिद् हो
१- (१) श्रीहता मृष्णयैवदय्वाउना दिरयाविभि: । स्वोत्साड: स्वदते तक्म्दोतृणामर्ुनाविमि: ।। दशरूपक ४१४१,४२ (२) विमावैरनुमावेश्य सात्विकेव्यमिवारिमि: । जानीयमान: स्वामल्वं स्थायी मावो रंबः स्मृतः ।। वही ४।१, २- अतो न रवादीना काव्येन वह व्यंग्यव्यंकपाय:, मिं तर्हि भाव्यमायक सम्बन्य:। काव्यं हि माकतं माज्या रवादय: ।(दरपवावलोंक पृo १ ५०) ४- व्यक्तिविवेद - पृ० ७६
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जाता है, विनावादि गमक हैं और रत्यादि माव, जो वनन्सत: रव कप हो बाते हैं, नम्य हैं। १
कः मश्निमट् के अनुसार निम्मतति का अर्थ हुवा अनुमिति बार संयोग का वर्थ हुवा अुमाय्य-अनुनापक सम्बन्य। इस प्रसार रस के स्वमप के विषय में महिमिभद् का मत जहां अभितवमुप्त के अनुकूल है, वहां पक्रिया के विषय में ये झंसुक से की सर्पत हैं। मम्मट ने मटलोरछट, श्ीशुर एवं मद्नायत के मतों का पूर्वपक्ष करते हुए बन्च में के रूप में उल्लेख
वमिनयनुप्त के ही मत पर अपनी आस्था प्रकट की है। मम्मट का स्पष्ट उद्देश्य काव्यसा- स्त्र की रचना करना था, अतः उनकी भाव्य के विवेशन पर ही कैन्द्रित रही है - दरझले का उपयोग मी उमहनि यथांस्थान किया है विन्तु उसकी सुरमतावों मैं वे कहीं नहीं उडमे। छतः उनके मुन्य में विशेष मोछिम स्थापना नहीं हैं- उनहोंने अपने उंग से, स्वच्छता के साथ निन्तु संगरेप में- वाडनिक बटिल्ताओों से बयकर वभिनवगुप्त के मल के परकाव में रस-निम्पत्ति का बाल्पान मात्र कर दिया है। 'संयोग का अर्थ वही व्यंग्य-व्यंका सम्बन् है और निम्पर्त्ति का वर्ष बनिव्यति है।
मम्मट का गुन्य इतना अवप्रिय हुवा कि अभिनरमुप्त के मुड सिद्धान्तों को भी उसने बाच्डादित कर उिया और रस-परसंग कमसः अपने वाचारमत दशन सैवाद्रेत से बिककिन्न हेता नया। उपर भारत में शांकर वेदान् का प्रवार और प्रवार बढ रहा था जिसका प्रभाव साहित्य तथा सहित्यशास्त्र पर मी पड़ा। फजतः रस-विदानत पर सेवाजेत का प्रमाव वम और शांकरापेत का रंग नवरा होने उ। इस परिव्तन के संकेत थोड़े बकुत विशवनाथ में भी मिउ बाते हैं,यवपि विश्वनाय दार्व्निक की अपेदर साहित्य-रसिव ही वचिक थे, किन्तु
१- त एव हि डीकिश विभावादयो हेतुषार्यमक्वारिकया गमवाः । स एव म रत्यादयोSवस्थाविशेचररपा मावा नम्या: ।
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बरम पर्णति मिल्रती है पण्छितराज नन्नाथ में जिछोे अभिनव के रस- 'विवान्त को नव्य-न्थाय के परिपुष्ट शंकर वेवान्त में सपमा निमणिकत कर दिया। विश्नाथ ने अभिनवमुप्त के स्वर में ही कहा : विमावेनानुपावेन व्यकतः संवारिणा तथा।, रक्ामेति रत्यादि स्वायिनाव: बनेतबाय।। नयांति समूषय पुरुषों के मृदय में स्थित वाक्ार्य रति आदि स्थायिभाव ही विभाव,बनुभाव बर बंभारी भावों के दारा अमिव्यक्त होकर रस के स्वप को प्राप्त होते हैं। यहां एक तथूय अवमेय है: कि बाचार्य विश्वनाच यह नहों मानते कि जिस प्रकार दीपक से घट व्यक्त होता है उनी प्रुकार विमावादिकों से रस व्यक्त होता है, बल्कि उन्होनि 'व्यवस:' का वर्य किया - दृष से पह़ी बादि की तरब दुसरे कम में परिणत होना। कहने का अभिपाय यह है कि 'निध्वारि' का वास्तविक अर्व विश्वनाय 'परिणाति' ही मानते हैं,ययपि 'व्यक्ति' या 'वमिव्यक्ति' शब्द का प्रयोग वे बराबर करते हैं बर अभिनव के उंबरण से की अपने मन्तव्य की पुष्टि करते हैं : तडुक्तं डोचनवारे: रवा: फ्रीयन्त इति स्वोदनं पक्तीतिन्डु व्यपवार:। रति। थाने कलतर विश्वनाय रस का स्कप वर्णन करते हैं :
१- वाहयदर्पण २र २- व्यवतो दष्याविन्यायेन कयान्तर परिणंतो व्यक्तिकत एव रखः। न त्ु दीपेम घट एम पूर्वविदो व्यन्तो। वही पृ० ४० ३- बही पृ० ४७ . ४-५, वही ६० ३ह,१र, पृ० ४८-४६
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२७० जो अण्ड स्वयंप्रकारप, वानन्दमय, निन्मय, अन्य ज्ञान के स्पर्श से सून्य एवं कत्ास्वाद के अत्यन्त समपदा हैं और कोकोतर चमल्कार जिसा बाई है, ऐेसे रव का कोर्ड (पुष्यवान्) वासनाल्य संस्कार से युक्त सनृदय व्यक्ति स्वानारक्त् वमिन्नल्येन बस्वादन करता है। बहने की वावश्यकता नहीं कि यह मूजः भटनायत की ही सब्पाकी है- अत्योदकल्तपकाजानदमय .. परक्ास्वापसविधेन मोगैन परं मुण्यत इति- जिसमें अ्मिनव के विदान्त के प्रकाश में संशोधन कर दिया गया है। ये अंशोधन सल्योद्ेन की व्या्या में तथा स्वाकारकत् एवं अभिन्नत्वेन पदों के प्रयोग में निहित है। मट्टनायक जरदा रस की स्थिति में रवागुण और तमोगुण का अनुबन्ध मी स्वीकार करते हैं, वहां विश्वनाथ 'रवस्तमाम्यामस्वृष्ट मनः' को अनिवार्य मानते हैं। इसी प्रकार रस का बस्यायन आाल्मा के निजी रप के ास्थायन से वभिम्न है- वपाँ वु रवास्वाद वल्मास्वाद का की रप है। ये दोनों अंोमन अभिनव के मतानुवार की लिए गर हैं, इसमें अन्देह नहीं। एक स्पष्ट मेद और मी है - 'बमल्कार' का वर्ष विश्वनाथ ने 'विस्मय' किया है जो अधिकृत है वोर पृतागृह का परिणाम मात्र है। विश्वनाथ में अभिनव की अब्दावली को छोड़ कर सामान्य वेदान्ती सब्वावली का ही प्रयोग किया है। रस-परसंग में अन्तिम प्रत्िद्ध नाम पध्किराज जान्नाथ का है। पण्छितराज नै रब गंगाबर के प्रप्म वानन में एस-विषयक ग्यारह मरतों का उल्लेव एवं विवेधन किया है उनकी विवेषना से स्पष्ट है कि अभिनवमुप्त के मत में उनकी पूर्ण बास्था है। अमिनव का रस-विदान्त अदेत पर बाभित है, परन्तु यह पुल्ष- मिशादड में पतिपादित सैवाहेत है जो बत्मतत्व के साथ-साथ उसकी बामारप प्रकृति को मी अत्य एवं वानन्यमय मानता है। पण्छितराज ने अमिनव के वत बौर उसे परिणानी आनन्य-विदान्स को तो यथावत् गृहण किया है, किन्तु उसे रंग किया शांकर वेवान्स के रंग में। इसं वन्तर को स्वयं उनहोंने ही बड़े स्पष्ट शब्दों में रस प्रकार व्ययत किया है : अभिनवमुप्त तथा नम्मट आदि के मुन्यों के अनुसार अज्ञानकप बवरण
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२७१ से मुक्त, शुद्ध नैतन्य का विषय का हुआ रति बदि स्थायी माव रस है फिन्सू 'रसो के सः' इत्यादि कुति के अनुसार वस्तुतः रति बादि स्थायी-माद िके विषय होँ, ऐेसे आवरण मुक्त शूद नैतन्य को ही रख कहना चाहिए न कि मैतन्यविभविक्त रत्यादि को।
वहां तक रब के स्वम्प का सम्बन्ध है, दोनों में कोर्ई मूछ बन्तर नहीं है। दोनों ही मतों में रस की नित्यता बोर स्वपणाश्यता सिद्ध है। वन्तर केवल इतमा ही है कि अभिनत के मत में नैतन्थ विशेषण और स्थायी माव विशेष्ध है, ज कि पण्छितराज के मत में स्थायीमाव विशेषण बर नैतन्थ विशेष्य है। वर यी सवाजेत या शांकराद्ेत में मेद है- शैवाउत में प्रवृति के वंश रत्यादि स्थायीमाजों में मी, नैतन्थ के प्रतिमास होने के कारण बानन्द की स्थिति मान्य है। किन्सु सुद(शांकर) वद्रेत सिदान्त केवल नैतन्य को ही वानन्यरूप मानता है। इस प्रकार डसिकड पच्छितराज ने अभिनव के मत को तल्य रूप में स्वीकार तो किया है बिन्तु उसकी व्याल्या में वेदान्त के अनुसार संशोधन कर दिया है।
अभिनव के मत ्नें के बतिरिकत पण्छितराज ने दो अन्य मतों को मो रता है। जिनके पति उनकी वस्था स्पष्ट है, ययपि उमहोने कहीं इस फरार का स्रेत नहीं दिया है, फिर मी जिस बागूह के साथ उनन्होंने इसनन मण्डन किया है उक्से विदानों ने यही निष्मय निवाडा है कि ये नवीन मत विशेष कर इनमें से प्रथम मत पण्डितराज का अपना मत है। यह मत इस प्रकार है:
'काव्ये नाट्ये म, कविना नटेन न परकाश्ितेष् विभावाविध, व्यंजन- व्यापारेण दुष्यनतादी अुन्सादिरती गृवीतायामनप्तरं न सहृदयोल्ा सितस्य मायनाविशेषद्रपस्थ दोघस्य महिष्या, कल्फितदुष्यन्सत्यावळडापिते स्वात्मन्य-
रत्यादि: स्थायी मावो रव इति स्यितम्। वस्तुसस्तु वदयमाण पुतिस्वारस्येन रत्याययक्तिन्ना मग्नावरणा विदेव रसः । - रब गंगाचर पृ० १७
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२७२ ज्ञानावजिहिन्ने इुक्तिवाखड इम रमतण्ड: समुत्यमनानो निर्वतीय: बाक्ति- मास्य-उुन्तडाविविच यारत्या दिरेव रबः'। वभिषाय यह है कि- (१) स्थायीमाव ही रव रूप में आस्वादित होता है। (२) व्यंजा ब्यापार की सहाका से की समृदय को विनावाषि के द्वारा स्थायी माद की जनगति होती है। ये दोनों तथूप अभिनयमुप्त के मत के बनुकुल ही हैं। (३) एक वर नाव्य के गुणों वर दूसरी बर उसके अपने समृषय के गुणों के शरण प्रमाता के पित में एक विशेष मावना -प दोभ का प्रार्पुमवि हो जाता है जिससे पृमाववत उसकी वास्मा बल्कित दुष्यनतत्य से वाच्डादित हो बाती है, अयातू बाशय के साय उचका तानात्म्य हो बाा है ।यकां दो नवीन तथूय थामने आाते हैं : (स) मावना रूप दोच की कल्पना। बोर (ख) बाजय के साय तावाल्म्य की कल्पना। (क) भावना रूप दोच की वल्पना का बचार है- नव्यन्याय द्वारा पुष्ट. वेदान्त। अपने को दुष्यन्त सपफने की भावना वस्तुतः वयार्थ नहीं है, हसीलिए इसे दोच कहा नया है। यह मावना वास्तव में बायुनिक वालो- चमा शस्त्र की सानृमृति के निकट है जिसमें कल्पना और अमृति दोनों का संयोग रक्ता है- हसे केवक कल्पमा कहना पयांप्त नहीं आगा क्योकि इ्पला बाबार माव है। मनोविज्ान के अनुवार यह यथार्थ है, मुम नहीं है। विन्तु भायाबादी डांकरनेदान्त तो वस्मानुपृति में से केवल आल्मन् को ही अत्य मानता है, बनुमृति को नहीं। इसके अनुसार ना पल्य बागरित अमृति मी पारमार्मि दृष्टि से सश्ती म्रम है, तो कल्पित रत्यादि की अनुमृत्ि की अययायता में तो सन्देह ही क्या दो साता है ? नव्य मत के अनुसार भाब्य का अलुमव वल्फित माव का अुमय है जो विषमान न होने से अत्ततू बर ब्लुुपमान होने से सत् - का: अनिवमतीय है वौर स्वप्रमाण्य
१- रव मंगाबर, पृष्ठ २१०
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. . २७३ से सुलमय हे। वास्तविक अनुमृति औोर काव्यानुमृति दोनों ही एस वर्शन के आवार वज्ञान-हप हैं। मेद केैवड मात्रा का है क्योषि क दूसरे में अज्ञान का वावरण बंशत: सट जाता है। इनमें सन्देह नहीं कि वर्शन समी बिनावों का बाचार है बौर वशनों में भी शांकर वेवान्स सरवाधिक सृषण-मकन एवं बुद्धि सम्मत है। फिन्सु कैवड बृद्धि का बंचक पकड़े रहने से साित्य एवं बातियतास्त्र की क्या दुरनति हो ख्ती है, इकता प्राण पण्छितराज नैे रव्त का यह वारजनिक रस-विवेयन जो काम से कम बमुदय का परितोय नहीं कर सकतता। उपयुकत दोनों व्यात्पातों क बाबार पर निम्पत्ति के दो अर्ष सामने आते हैं। पकठा वर्ष है अमिनिव वथवा मम्मट दारा परतिपाप्ति वभिव्यकत या व्यक्ति। व्यक्ति का वर्ष पण्छितराज के अनुसार व्यंजना नहीं है, व्यक्ति का वर्ष है बावरण से मुक्त वैतन्य का प्रभाशन। जव स्थायीमाय कसी शृद्र नैतन्य का विषय बन बाता है तो र निष्मन्न हो जाता है। इस प्रकार 'निम्मत्ति' का वर्य हुवा ववरण मुक्त युद नेतन्य का विषय होना'। बहने की वावश्यकता नहीं कि यह वर्ष बामान्य काव्यतास्त्रीय कर्यों से भिन्न, शुद्ध वाशनिक मुमिका पर पृतिक्ित है। नजीन मत के बवार पर रस-निम्पत्ति की प्रक्रिया के को अंग हैं : एक तो व्यंज्ा-व्यापार के दारा विमावादि से वाउम्यन के पृति बाक्य के स्थायीमाव का ज्ञान दु्न्तः इदृन्तलाविषयनरतिमान् अवात् दुष्यन्स सटुन्सा से प्रेम बस्ता है और दूसरा भावना दोच के उदय से वल्यित दुष्यन्तत्य से आभ्यादित सतृदय की वात्मा द्वारा शुन्तला विभयय रति का बस्वादन जो काव्यगुण आदि के कारण बंज्ा: वावरणमुक्त हो जाती है। रस प्रकार व्यंजता दवारा पक्ते तो वात्रयनत स्थायीमाव परक्ट होता है और फिर सावात्मपुत समृदय की आाल्मा द्वारा वास्यादित होकर रस रूप में परिणत हो जाता है। यहा मी 'निष्पत्ति' के मौखिक अर्ष में कोई मेद नहीं है- यहां भी वह व्यक्ति की ही वाचक है जिसका अर्थ चित् शक्ति का विषय होना' केवड पत्रिया की वाशननिक व्याल्या में ही मेद हो गया है।
१- व्यक्श्य नग्मावरणा पित् - रडगंगाबर, पृ० 2० २- र-वि्दान्सत पु० १७-१८३ ।
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इस प्रकार ध्वनि-सम्पृदाय के प्रमुस वाचार्य - मम्मट, विश्वनाय, एवं पी अराज कान्नाथ के रस-सिदान्त के परिवीज् से वह त्ष्ट है कि बाचार्य जमिनवमुप्त ने रव को दार्त्निक पीठिका पर वासीन करके जिस्व नवीन परम्परा का भी नणेश किया था, उससे परक्ती ध्यनिनसस्पराय बकु्त दूर तक पुवानित डूवा हे।
रस संस्या -
जहां तक ररवों की सं्या का पश्न है - इस विभय में वानन्दवर्धन और वमिनिवमुप्त में मतैक्य है दोनों ही काव्य में नौ रस मानते हैं। इनके परव्ती बाचायों ने मी नाव्य में नौ रख माने हैं। दुख आचार्यों ने मक्तिरत बर वात्सल्व रस का मी सल्लेत किया है। बिन्तु नी रस स्वसम्पत हैं :- १- झार २- हास्य
४- रोड ५- बीर 4- मयानक ७- बीमत्स 5- बदुपुत तथा
दकत रखों में से आचार्य वानन्यवर्णन ने क्र्येक का पूर्ण विवरण नहीं दिया केवड दो रसों शृंगार और शान्त के विषय में उनहोंने पर्याप्त उदारता मिहाई है और उनके विषय में अवान्तर तथुय परस्तुत निए हैं। टीककर होने के कारण बमिनवगुप्त ने भी बन्य रसों की वपेत्षा इन्हीं दोनों का विस्तृत विवेयन किया है। और बन दोनों में से मी श्ान्त के प्रति उनमें अभिक नहा है। रस समूय की पुष्टि अमिनवमारती के श्ान्त-रस विवेवन से होती है।
१- इपका विस्तृत विवेशन पूर्व अध्याय में किया जा चुका है।
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. २०५ शन्स रस-
परव्ती आाचायों में से चनंतय और चनिक ने नाट्य में शान्त रख का जम कर विरोध किया है। चनंजय के मत में नाट्य में सुंवार, वीर, बीम्ड, रोड़, दास, उद्पूत, म्यानक तथा करुण ये बाठ की रख बोते हैं। श्रान्त रस के स्थाबीमाद तम का अभिनय नहीं शो सक्ता क्योंकि उम में व्यक्ति की समस्त कौजिक मृक्रियानों का लोप हो बाता है बौर एक बीतराम, समाधिकसा इसमें पाई जाती है। एस प्रकार की दशा का अभिनय करना वसम्मम है। कतः वमिनय की अक्षयता के कारण ही वनंजय नाटवादि में शान्त रख की स्थिति स्वीकार नहीं करते। जो आपार्य शाम्त रस को स्वीकार करते मी हैं उनमें उसचे स्थायी-नाव के विचय में वैमत्य है। मौव 'सरस्वीकष्ठामरण' में पृति को शान्त रव का स्थाबीभाव मानते हैं- मृतिस्थायीमाद: वस्तृतत्थालोवनाविमि: व्यपिवारियाये: बानारध्यादिभि- सुबज्यान: निष्पन्नः श्रान्त हत्यमिनीयते।' • 'अन्चे पुनस्य शमं प्रतृतिमामनन्ति, स त्ु युलेरेव विशेष मवति१' पृति का वर्य मोज के अनुसार 'सन्सुष्टि' है। यथा-'सवा: सम्फ्तयस्तस्य संतुष्टं वस्य मानसू। उपानवगुटमावस्य मनु वमास्तृतैव मुः ।।' बी, राकान्ू के अनुसार मोब की 'स्सुष्टि तृष्णापाययुत अपवा सम के ही निकट है। अन्ध बचार्यों की ही मांति मोज मी शम को मानते हैं चिन्सतु उनके बनुसार 'रम' वृति के ही अन्तनत बाता है। क्योकि नाट्यशास्त्र में ४६ व्यपिवा- रियों में शम की नणना नहीं की नई है, वृति की गणना की नई है इसीलिए वे वृति के अन्समत शम को मानते हैं। कहीं-कहीं पर मोब शम को मतिविशेष के व्यभिवारी क रूप में परस्तुत करते हैं। 'मति' - सत्यतान का ही प्रकार है जो शम से भिन्न नहीं है। बिन्तु शृंगरपुणज् में मोज धृति को छोड़ कर रम को शन्तरव का स्थायीमाय मानते हैं।
१- सरस्वीमष्डामरण पृ०.४१४-५१५ । २- मतिवितेय: सों यया-पही पृ०५२३
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डाव्यपृकासार बाचार्य मम्मट व्ान्त रव का स्थायीमाय निवेय मानते हैं। निर्वेद को शान्त रस का स्थायीमाय मानने पर इसकी विविय स्थिति का बाती है। एक और यह व्यमिवारि-माद है बर दूसरी और शान्त रव् का स्वायीमाव मी। कर्योंकि इसकी नणना स्थायीमानों के तुरन्त बान बर व्यभिवारिमावोँं की सूषी में सब से पहले की नई है अत: इसनी स्थिति द्वार की बेक्ली पर कीप की भांति है जो अपने दोनों भागों में स्मान रूप से प्रवास पस्तुत करता है। ल्वावलीकार वियायर निवेद को शान्त रस का स्थायीमाव मानते हुए यह त्कं उपस्थित करते हैं कि बाचार्य मरत को मी शान्त रस का स्थायीमाय निवेद ही मान्य है, वौर वयोकि निवेद श्ान्त रस का स्थायीभाव मी है बौर व्यमि- नारिमिशम भी,इसीलिए उनहुनि स्थायीमायों और व्यभिवारिमावों के मध्य में इसका नामोल्ेव किया है। वमिनवमुप्त की ही मांति विभावर मी शान्त रस को अपवर्ग रूप फड देने वाडा मानते हैं और उखका उत्तण एव प्रकार देते हैं :- मवमंगुस्ता विभावना विविभाय: पुवननिस्तरंन्वाधनुमावो मृत्याविव्यमि- बारी निवेद: शान्तः।. ततस्थिकात्मिकपुततिवमनिपरीतनिवृतियमार्म- पव्नकउ: शन्त: ।
१- बाचार्य मम्मट शान्त का उत्तण करते हुए कहते हैं-
स्थायिताS मिधानार्थन्। तेन- निवेदस्था विभावौडसि श्ॉन्तोडि नक्मो रबः ।' यहं तथय विवारणीय हे-वानार्य मम्मट का निवेद को 'कंगउप्राय' कक्षना उचित नहीं फ्रीत होता है क्योंकि निवेद की उत्यतति तत्यजान से होती है, जो सरवधा मंगलरूप है। इस तचूय करी पुष्टि भटट गोपा5 के क्थन से मी होती है।- तत्यनिंतायां तु निवेदस्य न निंबितमंगऊपाय्य्, परत्टुत मंगउप्रायत्यमिल्याह। T8 The Numher ot Rasas. P-fg ३- निर्वेदस्य शान्तरसस्था पित्यपरण्ाशनायेव मूनिना व्यमिवारिय पष्म निर्दिष्ट- २- वही
ल्वात । .... इति स्था यिव्यमिवा रिमय्येSस्व पठनाडुमवपत्यमस्या भिमतमिति मुनेराशयस्य उत्यमाणत्वाच्य। एवावडी पृ० ६७-६८ ४- वही पृo ६६
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. . 2७० साह्ित्यवर्पंणवार बाचार्य विश्यनाय के अनुसार शान्त-रव का स्वाबीमाव 'रम' है। संसार की असारता का ज्ञान वाउम्वन-विभाव है, बाजम, पक्वि तीवे- स्थान, रमण्ीय रवाम्तयम तथा महात्माओों का अंग बादि उद्ीपन-विमाव है। रोमांच बादि इसके अुमाव हैं। निवेद, हम, स्परण, मति, प्राणियों पर दया बादि इसके संभारी माव हैं। पण्कितराज कन्नाथ के मतानुवार 'निवेन श्ञान्त रस का 'स्थायीभाव' है।सम्पूर्ण भरमंपरप संखार बाउम्मन है। सब पदार्थों में साम्य का माच 'अुमाव' है। मति आदि 'संवारीमाव' है। एस प्रकार शन्त रस के स्थायीमाव के सम्बन्ध में अभिनवमुप्त के परवर्ती आचा्यों का बनुसीउन करने से वह निच्मण निकलता है कि रम और निवेद को शान्स-रव के स्थायीमाद के रूप में विशेष रूप से स्वीकार किया गया है। यदि निर्वेद का अन्तमि सम में कर ठिया जाय तो अन्य रवों की मांति शान्स रस ना मी रमात्र स्थायीमाव सम को साता है।
आबायों में शान्त रस के स्थायीमाव के विषय में वैमल्य होते हुए मी यह निःसन्देह कहा जा सकता है कि जानन्दवर्शन वर अभिननगुप्त से प्रभाथित होकर प्रायः सभी परवर्ती बाबारयों नें मुक्त कष् से शम्त रस का सपर्यन किया है। और काव्य में नौ रस माने है।
शब्द शक्दियां -
शब्द शक्तियों के प्रसं्ग में अभिनवगुप्त से परव्ती बाचार्य कहां तक प्रमाकित हुए हैं - इस का परीषाण करने पर निम्नलिकित तथूय सामने आाते हैं-
अभिवासक्ति - वानन्दवर्वन ने अमिणा के नियमन की बर्षा कहीं नहीं की है। विन्तु वभिनयमुक्त ने दो सकों पर विशेष रुप से उल्लेस किया है।
१- साशियदर्पण पृ० १२९ २- दृ० रगंगाबर पृ० १३६ ३- बही पु० १५4
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..
(१) ' प्र वार्मिय' इत्यादि की व्यास्या के प्रांग में। . (२) उब्द शक्तिमुळ्रा- कुरणनप- व्यंग्य में प्रायरणिक बर कडाकणिक अर्ष के विवेधन के प्रसन में। (१) अम्तिवमुप्त ने 'क्रम वार्मिक' की व्याल्या कहते हुए कहा है कि इसमें 'पूमो' इस विभि रप वर्ष के बाद ही 'न पुनो' यह जो निबेच रूप अर्ष क्री प्रीति शो रही है, वे दोनों विधि-निषेय रूप वर्ष परस्पर विरद्ध हैं। विरुद्ध होने के कारण दोनों की युगपत्(एक सय में) बाच्यता नहीं है। क्याकि वभिया कब एक विधि रूप अर्थ को कता बुकी तब उसकी प्रवृति पुनः निषेच रूप वर्ष में नहीं होनी। - यह निय्म है कि अमिया के चिस्त हो जाने पर उचका पुनः व्यापार नहीं होता। विश्ेष्यं नामिया नम्तेतु कीणयकतिवितेषणे ।'
(२) ध्वनि के मेद - अब्दशक्तमुठा वुरणनमप व्यंग्य में प्रांकरणिक और वपावरणिय वर्ष का विवेवन आाया है। इसमें पृथ्म प्रापरणिय अर्ष अभिषेय है। अतः अमिमा एक अर्थ वेकर विस्त व्यापारा हो बाती है, फिर दूबरा वप्ाकरणिए अर्थ अभिया से नहीं निकन्ता, वह व्यंज्य व्यापार से निकाा है। यहां पर बानन्दपर्वन ने अमिया के नियमन की पर्षा नहीं की है, फेक्ड एतना कहा है-
क्वाति अपाकरणिक अपन्तिर के सव्दशक्ति दवारा प्रकाशित होने पर यह बात प्रसकत न हो कि वाक्य वसम्यद वर्य का वमिमान करने वाछा है, स्सचिए अफाकरणित और प्राकरणिक वर्ष में उपमानोपेयनाव की कल्पना करनी पाहिए। इल्यादि।
१- (१) तत्र माक्तममावयोविरोवाद् कयोस्तायन्न युगपवाच्यता, न क्रेण, विरम्य व्यापारामाबात्। विशोष्यं ना मिया मम्हतु कत्यायिना मिवा- व्यापारस्य विरम्य व्यापारासंमवाभिवानात्। जे० पृ० ४३ (२) ..... नाभिवाशवथा, तस्या: पदार्थ-पृतिपत्युपभीणावा विरम्या- व्यापारात्। वही पृo ५ २- व्य० पृ० रु४ ।
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विन्दु वभिनवनु्त ने वत्यन्त स्पष्ट शब्दों में अभिषा के नियमन की बात, एक उदाहरण के माध्यम से स्ष्ट की है। अमा-सरे डुसमवयुनमुमसंतरन्मयु्यत क्री म्ामिधान: कुलमल्किनाचनठाद्- शबो महाबाठ:'। इसरमें महवाड प्रमृति शब्दों से प्रानरणिक क्रीम्म कत्तु विषयक अर्ष का बोच अमिषा-शक्ति वे को रवा है। इसके साय अपानरणिक- दिय - विचया वर्ष मी निक्ल रहा है। उसली ज्रीति व्यंजा-व्यापार दारा ही होनी । क्योंकि अमिया का एकार्च में नियमत्रण हो जाने पर उसका पुनः व्यापार नहीं होता। परवर्ती बाचार्य मम्मट ने मी अमिनवगुप्त के ही स्वर में स्वर मिशा कर कहा - शब्दरक्तमठा व्यंजना में अमिवा का संयोनादि द्वारा स्वार्य में निक्त्रण हो जाने पर, अनिषेय नो दूसरा वर्ष ज्रीत दोता दे, उतका बर उचने बाय उपमादि अंसार का व्यंग्यत्य निविवाद है। हसी पसन में श्री विभावर मी बपिया के नियंतन की नर्ा करते हुए कह्षते हैं- जहां संयोनादि के दारा बमिया की शक्ति संज्ित (अयात् पत्ताथ में -. नियन्ध्रित) होने के कारण अन्यार्थ को देने में बुच्छित हो जाती है, वहां जयन्तिर का अवगमन कराने में व्यंजता ही सपर्य होती है।
१- व्य० पृ० २४८
वतीयसी इति न्यायमपाटुवन्तो महानावपमृतन: सब्दा एमेवायमभिवाय -
३- शब्दशक्तिमठे तु अभिवाया निवन्त्रणनानमिधेवस्याथन्तिस्य तेन सहपिमायरजार- स्य य निरविवादं व्यंग्यल्वम्। काध्यपुपास पृ० सद ४- संयोगा विभिरमिया संजिता वत्र कण्छवानेति। क्यन्तरावनमने व्यंनमेव दार्म तत् ।। ..... हल्चं सं्योभाविभिरमिवायां नियमितायां यपनेकार्थस्य श्व्यस्यायन्तिरमति यत्र नयमन फ्रती तिनोभरीमवरति तत्र व्यंजनाव्यापार एव पुनल्पते। इ० खवावजी पृ०
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२८० यष - ग
युदीषच को मुदि न विश्मयते नगेक्ु।। यहं महाववि माच ने रैक्तक पर्यत का वर्णन किया है। नमेत्मु प्रमृति शर्ब्ों से प्राकरणिक रेवतक पर्वत विचयन वर्ष का बाच अमिषा संकित से हो रव है। किन्लु साथ ही उपावरणिक शिव-विभयक वर्ष मी निक्स रवा है किये बोचित कराने में अपिषा शक्ति वत्मर्थ है। क्योंतकि वह प्रावरणिक वर्ष देकर विस्त-व्यापारा हो नई है। वभिना के अतिरिय्त उस अर्थ को तात्पर्य और काणा मी देने में अस्मर्य है। बः रस वयावरतिक-शिम-विषया अर्थ की प्रीति कराने में व्यंवावृति ही समर्थ है। बाचार्य विश्वनाय ने भी व्यंज्ता की स्थापना के प्रसंग में अभिणा के नियनन की करवा करते हुए कहा है :- 'शब्दबुदिमगां विरम्य व्यापारामाय: इस न्याय से अभिषा, अणा बौरं तात्पर्य नामक तीनों दृत्तियों की वर्यनोधन-अनिति के उपनीण हो बाने पर जिसके गरा बन्य अर्व वोषित दोता है, वह सब्यनिक् वर्यनिष्ठ, प्रतिनिष्ठ,फ्रत्ययनिष् तथा उपसर्गावितिष्ट व्यंजता-शक्ति कहठाती है। इसे व्यंज, ध्यनन, गमन, प्रत्यायन .. वादि अनैक नाम हैं। सवनन्तर अभिवामठा व्यंप्ता के विषय में कहते हैं कि अंयोगादि के द्वारा अमिया का एकार्थ में नियन्त्रण दो जाने पर, जिसे द्वारा अन्य वर्ष की प्रीति
१- (१) का ताबन्म रेम: । ..... ... सव्यमिवातात्पपंठत णारपव्यापार त्रितया- तिवती ध्यननवोतन व्यंजपत्यायतावगमना विव्यवदेशनिक पितश्नतुर्था व्यापारी
नगेशं नगेशमिवेत्यत्रोपमाउंर: प्रीक्ते। 5० ए्वावळी पृ० 4०-६१ (२) इ० वची• पृ० ११९ २- इ० यातित्यदर्पण पृ० ४० ।
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होती है', यह अभिवामुठा व्यंज्ता कचछाती है। यपा -
प्रोष्डायलो मृवीवनरिया विष्यण्यृतो मोनिभि: । नदा ऋेश्ोत्ष णो गिरिुर नाठां हरनिं बारव मामाकृष्य विमृतिमृत्िततन् राज्युवावल्टमः ।। यह परम उमा नामक महारानी के पति राजा मानुवेव की फरतंषा में जिका गया है। अस्य पकरण के दारा उमावलन: शब्द का उमा नामक महादेवी के बल्म मानुदेवनुपति' - रस अनिवेय अर्थ का बाच दोता है। विन्तु तब्य रचना कव पुकार की है जिससे गोरीवल्डन -अंगर परच वर्व मी व्यंद्ावृत्ति दारा फ्रीत होता है। बौर बन्स्य में हम दोनों (राजा और श्विष) का उपमानोयनेय माव कडिस होता
उद्त णाशनित -
गब्यूवाड के व्वितीय उल्लास में बाचारयं मम्मट ने व्यंजना से उप्षण का मेद ध्वन्यालीक १११७ के लोनन के अनुसार किया है। विन्तु उपाणा के मेदों की संल्या के विषय में अभिनवमुमा बर मम्मट में निंविद मेद है। अभिनय गुप्त कहते हैं- 6 वनया उसणवा पंमवियया विश्वमेत्र व्यायम्। जिन्तु वाचार्य मम्मट करते हैं - उत्तणा तेन बहुविया। संमव्त: बाचार्य मम्मट ने उत्तणा के डः मेदों का निकपण अभिवानृष्तिमातृका के बबार पर किया हो। क्योंकि उत्तणा का 5: प्रकार का विभाम मलतः मुकुछनट् ने किया है। माहितयापंणवार विश्वनाय ने अपणा. कै हः मेदों के स्थान पर सोछ मेर किए हैं। वे बोसह मेद एस फ्रार हैं - पहछे कडि-लाणा तथा प्रयोकाक्ी
१- (१) ० याहित्य वर्पमा पृ० ४०-५३ (२) दु० वही पृ० १३४ ३- माव्यपूकास -पृ० 4६
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२८२ उत्तणा ये दो मेद हुए । फिर उन दोनों के उपादान-बप्णा तथा उण- उत्तणा के मेद सै, दोनदो मेद होकर बार मेद हुए। फिर उन चारों मेों के बरोपा तथा साध्यपसाना रूप से दो-दो मेद लोकर कुछ बाठ मेव हुए। फिर उन बाठों पेदों के हुदा तथा गौणी मेद से कोनमो मेद होकर एु खाडह मेव हुए। मुक्लमदर और नम्मट ने शैवल हः मेद ही किए हैं। इस मेद का कारण यह है कि मम्मट और कषट ने उपावान-तदाणा और उत्तण-कराणा ये दोनेई मेद कैवल नुदा के माने हैं, गोणी के नहीं। विश्वनाथ ने गौणी के मी ये दोनों मेद माने हैं। उनको मम्मट के छः मेदों में मिलाखव देने पर आठ मेद बन जाते हैं। विश्वनाथ नै इनके कद़ि तथा प्रयोवन से दो मेद करके खोछत मेव बनायें हैं। मुक मद बौर मम्मट ने ये मैद नहीं किए हैं कयी लिए कप्षणा-मेर की संल्या में अन्तर हो नया है।
तात्पयतनित -
अभितिननुप्त ने व्यंजना की स्थापना के प्रशंग में व्यंज्ता-विरोषी - अभिष्वितान्ययवादी मीमांसको के सात्पयर्पि का तण्डन करते हुए तात्पयार्चि बाँच के छिए तात्पयशकत का प्रयोग किया है। काष्यशास्त्र के क्ंत्र में वभतितगुप्त पकले जाचार्य हैं जिहोंने तात्पपशनित- रप संजा का प्रयोग किया है। वानन्दवर्यन ने वक्ता के ताल्पर्य को व्यंग्य मानते हुए,तात्पर्य पद का प्रयोग ववश्य किया है, विन्तु तात्पयशक्ति का नहीं उल्लेत नहीं किया है। विन्तु अभिनवगुमा ने पृथम और सृतीय उचात में सात्परपशनित का विवेशन कही हुए हसे अभिया, उंणा बोर व्यंकना से भिन्न तात्पयल्या शक्ति माना है। इसका परमाव सभी परव्ती
१- वमिा, उपाणा वोर व्यंक्ा - तो शब्द की शक्तियां हैं विन्तु तात्पर्य वाकय की शक्ति है। इसीलिए वनन्मवर्थन ने सव्मशकतयों के साथ तात्पर्यशनिति को नहीं रहा है। किन्तु अभिनवमुप्त ने लोचन में वनेक स्पतों पर वमिषा, उरणा बौर व्यंजना के मध्य सात्पयल्या-व्कति की भी गणना की है बर उसे र्विोय कचा निविष्ट माना है। एवं व्यंजना शक्ति को चतुर्च कच्था में रखा है। जो आनन्यवर्यन के मृत से विलुल साध्य नहीं रक्ता। क्योंकि वानन्दनर्थन शब्दशक्तियों की बैवल तीन कोटियां मानते है- अभिवारकाणा और व्यंजा।
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२८३ आचायों पर पड़ा। मम्मट, विभागर, विश्वनाय वादि सनी ने अमिवा, उराणा वीर व्यंता के साथ सात्पवशक्ति का भी उल्लेत किया है। अभिनवमुच्त के डींक परवर्ती बाचार्य चनंय औीर धनिक ने तो व्यंजनावृत्ति का मुक्त: अण्डन कहते हुए, रकमात्र सात्पयार्मि को ही माना। ययपि वनजव-्यनिक ध्वनि विरोधी वाचा्य हैं तथापि उनके दरा विवेनित सात्पवर्षि को दृष्टि में रकते हुए, यहांउनका नी विवेवन करना ववश्यक प्रतीत होता है। व्ंजा विरोषी चनंकय तथा धनिक एममात्र तात्पगाथ के ही पता में हैं। उनके मतानुसार विभावादि तथा स्थायीमाव, रब के पतिपामक हैं और रव-माव उनके पृतिपाम। काव्यूप वाक्य का एक ही कार्य अथवा प्रयोक है - सनृषम के पिस में आानन्योकवृति करना। यह आनन्दीद्मृत्ि विभावादि से युक्त स्वायीनाव के की कारण होती है ।एस प्रकार काव्यपयुक्त बाक्य की प्रतिपादमकनित (तात्पर्य- शव्ति) काव्य के प्रतिभाम तत्तु रब के द्वारा बाडृष्ट होती है, कार्य रम रख उस शक्ति को क्रियमाण होने को बाध्य करता है.। स्विए वाक्य की पृतिपाचक तात्पर्य-शक्ति को रस रूप स्वार्थ की प्रीति करतने के छिए वियावादि बन्य साचनों की आवश्यकता होती है, तथा उन विभावादि के पतिपायन के द्वारा ही सात्पयशक्त रव-द्रीति बरा के पर्यवसित होती है। बः संदोप में रद- प्रतीति की अरणि में वाव्यपयुक्त पदार्थ - विभावादि हैं, तथा इन विभावादि ये संदृष्ट रत्यादि स्थायीमाद काव्य का वाक्यार्थ है। आएव स्थायीमाव तथा रब की ज्रीति व्यंग्य न होकर वाच्यू का वाक्यार्थ है और वह व्यंजना-सक्ति का विषय न होकर,ताल्पयशनत का, है। रस ने को वाक्यार्य रप में निकपित कर देने पर, केवल अमिया, तराणा एवं ताल्पशिकत गरा सस्त अयाज अयमाण पदार्थ की प्रतीति हो बाती है इसठिर व्यंजा शक्ति की कल्पना व्यर्य का प्रफत्न है। क्योकि काव्य में प्रतीयमान वर्ष का समावेश तात्पयार्य में ही हो नाता है। यहां दक्ता का तात्पर्य भकमाण नहीं है, उसका काव्य में सापात् प्रयोग नहीं हुवा है, ऐेसे स्क पर मी बनुत- पदार्थ में सात्पयार्चि ही मानते हैं। क्योंकि सात्पर्यशकति का पर्यवसान वक्ता के
१- इ० रकपणावलोक- पृ० २७-२६ २- वही पृ० स०-२४६।
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२८४ * प्रयोजम(कार्य) तब रस्ता है । जलां तक वनता का कार्य प्रसारिति होगा वहीं तक सात्पयशकति का कोत्र होना । वया 'म्रम वार्मिक' इत्यादि में वैक्ता का परयोकत 'निबयप है। अतः यहां पर तात्पयशक्ति की सीमा निषेषार्य तक मानी बाल्नी। उसका बाच कहाने के बाद ही तात्पयडक्ति कीण दोनी। एस प्रकार ध्यनि विरोधी की यह बपीड़ है कि यम क्यमाणपर-निजेषाय को ध्यनिवादी मी बक्ता का सात्पर्य मानते हैं तब उसे वाकयार्य ही मानना वाहिए, व्यंग्यारथ नहीं। ध्वनिवादी का मत है- नहं भाव्य में स्वाय( अयाति वाक्य का तात्पयराचि एक बार विभान्त हो गया हो, तथा वाक्य किश्ी दूसरे तात्पवर्षि मिन्न प्रतीय्मान वर्ष का बकय के। वहां ध्यनि होनी। को मूम-वार्मिक' हत्यादि में ताल्पया्चि विष्यर्य में ही विनान्त हो जाता है, तदनन्तर निभेय रूप व्यंग्यार्य की ज्रीति व्यंग्ावृति दरा होती है। इस प्रकार वाक्य में स्वारथ- विभान्ति की बीमा तक की तात्पर्य माना बारगा। कम बात से ध्यनि विरोमी सहमत नहीं हैं। मनिक का कली है कि किश्ी मी वाकय के सात्पवार्मि की विभान्ति बीमा का निर्वा रण करना असम्यम है। वह बक्ता के प्रयोकत पर की बाकर वित्रान्त होता है। अः तात्पर्व को किसी तराड्ट पर रकपर नहीं कहा जा कत्ता है जाना तात्पर्य है, बाकी इन्य वस्तु नदां तक वकता का कार्य पुसारिति होना वहां तक सात्पवाच भी शोगा, क: बनता के तात्पर्य के छिए व्यंग्यर्था को मानने की आवश्यक्ता नहीं ह। इस स्थल पर एक तथूय अवपैय है कि जनन्दवर्धन ने सात्पर्यशक्ति का नाम नहीं किया है। विन्तु वभिनवगुप्त ने लचन में सात्पयशक्ति का उल्लेश किया है।हथीडिए ननिक ने व्यंग्तावृत्ति का तण्डन करते हुए कहा है वि ध्वनिवादी वम सात्पवर्ि बौर तात्परयशक्ति को स्वीकार कर ही रहे हैं तब उससे अतिरिकत
१- वशमतावोक पृ० र६-२५० ।
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संजावृत्ति को मानने से बोरई साम नहीं। क्यौँकि वो अर्ष व्यंश्तावृत्ति, से निकठता है यह सात्पयशक्ति दरा की मिकर बाता है। बाचार्य मम्मट ने भी शष्दार्थ-स्वप का निक्पण करते हुए सात्पयर्रि का नक्तेस किया है। विन्तु उनकी शब्दावडी के परिकत्ित होता है कि वाच्याच, उपचार्थ बौर व्यंग्यारथ के पृतिपादक माचक, अ्रपाम बौर व्यंक रूप नरिमिय सन्दारथ सभी ध्यनिवाषियों को निविवाद रूप से मान्य हैं। निन्तु युछ आचार्य वाच्य, हद्य और व्यंग्य-वर्य के अतिरियत तात्पयार्चि को भी मानते हैं। वस्तुतः यह तात्पयचि अमिश्ितानचयवादी भीमांसकों का है, जिनके अनुसार सर्व पूथ्म पदों से केवउ अनन्यित पदार्थ उफसस्यित होते हैं, उसने बाद पर्षों की बाकांदा, योग्यता तथा बन्मिधि के बल से सात्पयरमि द्वरा उन पवाथों के परस्पर सम्बन्ध रुप वाक्यार्थ का बोम होता है। वे व्यगनावृत्ति के बिना ही बाक्यार्थ द्वारा ही बारा वर्ष निवाला पाहते हैं। ताल्पयार्ि का विपेवन करते हुए, वाचार्य मम्मट ने बड़ी सुककता से रप तथय की और मी स्ोत कर दिया है कि जो आाचार्य काव्य में सात्पयरथि को मानते हैं वे मात्र अभिशितान्ययवादी मोमांसरकों के शृण्णी हैं क्योकि ये ही पदाथन्चिव के छिए तात्पर्यवृत्ति को स्वीकार करते हैं। बन्कितामिवानवादी परमाकर मीमांसकों के इृण्ी इसलिए नहीं हैं क्योकि वे बन्कत पदार्षों में ही शक्ति मानने के कारण वन्नय की फणाशिया तात्पयशक्ति को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार पूरा वाक्यार्य अमिया द्वारा विष्पन्न होने के कारण वाच्यार्थ ही है। कपी प्रशंग में रस तथूप का भी उल्लेत कर देना आवश्यक है कि व्यंजा की स्थापना के प्रसन में बाचार्य मम्मट ने अपना मीमांसा और न्याय-विषयन
१- सात्पयनितिरेशाच्य व्यंशीवस्य न ध्वनि :- वशूपतायलोय पृ० स४६
वाच्यादवस्तवर्था: स्यु: तात्प्यमिपि केन्ृचित् ।। काव्यपकास २।६०७-३५ ३-वाध्य एव वाक्यार्म हत्यन्विता मिवानवादिन: - काव्यपुकाश- पृ० २०
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ज्ञन का परिचिय काव्यपुकास् के पंगम-उल्वास में दे दिया है। उनकन निभिति- कानुवारेण निमिलानि वल्प्यन्ते, सडयमिमोरिव बीर्घ-दीर्ध व्यापवर: और वत्पर: सब्द: व सब्दार्य: ब्वन्यालोय के 'मम चम्मिय के लोचन पर बमृत है। अउंशा रस्वस्यकर कयुयक ने भी सात्फ्यार्रि का डल्लैस किया है- 'ध्वनिपार: पुरनिया -तात्पयवत्त गाल्यव्यापारन्नयोत्तीगस्य ध्यननभोतना- दिशव्ाभिनेयस्य व्यंजनव्यापारस्यावश्याम्युयम्यया व्यापारस्य व वाक्या्थ- स्यामावादाकवार्थस्यैग व व्यंग्यापस्य गुणाउंतरोपस्व्तव्यल्येन प्रावान्ादि- श्रान्तियामत्वारमत्वं विश्ान्तिवान्'। यहां वाचार्य डयूयक पर मी अभिनवगुम्त का प्रमाव स्पष्टत: पड़ा है क्योंकि ने भी अमिया, ऊाणा बर व्यंजा के मध्य तात्पर्य-व्यापार का नामोल्ेव कर रहे हैं। यशां एक तथूय विशेषसः अवयेय है कि बाचार्य कयूयक नै ध्वनिकार(आनन्दवर्षन) की दुशाई देकर अमिषा, तात्पर्य वौर कस्तणा रूप व्यापारक्र्य से भिम्म सतुर्प- व्यंज-व्यापार की स्थापना की है, वह सर्पचा वसगत है। क्योंकि व्यनिकार-वानन्दवरषन ने तात्पर्य को अनिवा कराणा और व्यंजना रूप शब्-व्यापार के मध्य नहीं रता है। यह अमिननमुक्त की इफ है। एवावशीकार शी विवावर ने मी सात्पयवृत्ति का उल्लेस किया है विन्तु बाचार्य मम्मट के ही अनुसार बड़ी इसलता से अभिमावृत्ति के विवेषन के परसंग में कसते हैं- 'अनुषाचानामयाना विषेवायपरत्यं तात्पर्यमिति व्यापारान्तरं परेरम्युपनसम्'। यवा -
हत्यन दश्निल्य पत्ु:करणक्बाव्यमिवारातट्रपावानं तविेषणार्थ सदेव नात्र विपेयं तत्परत्यमेव सात्पर्यम्।
१- इ. वाव्यपुणऊ- पृ० २२६-२१ २- इ० लोवन पृ० ६४-4६ ३- वलंका रववस्वम्- पृ०-११ ४-स्वाकडी प० v
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२८७. सब्दशक्तिमला अनुरणन रूप व्यंग्य के पसंग में भी विद्याघर ने तात्पुर्यवृत्ति- . का उल्लेख किया है - 'इत्यमिघातात्पर्यलक्ष णारपव्यापा रत्रितया तिवती ध्वननदोतन व्यंजन- पत्यायनावगमना दिव्यपदेशनिरु पितश्चनुर्थो व्यापारो दुरपड्नव एव। एकावली को उपयुक्त पंक्ति के साथ लोचन को पंक्ति- तस्मादषिघा- तात्पर्यलक्षणा व्यतिरिक्तश्चतुर्थोडसौ व्यापारो ध्वननदोतन व्यंजनप्रत्यायनावगमना- दिसोदर व्यपदेश निरु पितोsम्युपगन्तव्यः । के साथ तुलना करने पर यह निःसन्देह कड़ा जा सकता है कि विद्याघर की उपर्युक्त पंक्ति लोचन पर आधृत है। आचार्य विश्वनीथ ने मी साहित्यदर्पण में तात्पर्यशक्ति का उल्लेख किया है। जब वे त्रिविघ वाच्य, लक्ष्य और व्यंग्य-अर्थ की कमशः अभिषा, उक्षणा और व्यंजना- वृत्तियों का विवेचन कर चुकते हैं, तव तात्पर्यशक्ति के विषय में कहते हैं -
तात्पयरि्यां वृत्तिमाहुः पदार्थान्वियवांघने। तात्पयार्थ तदर्थ च काव्यं तद्बोधकं परे।। ३
आचार्य िश्वनाथ ने शब्द-शब्तियों से पृथक् तात्पर्य-शक्ति का विवेचन किया है। इससे यह पतीत होता है कि इस तथय के प्रति सजग हैं कि तात्पर्य वावय को शक्ति है और अभिधा,लन्रणा तथा व्यंजना शव्द को खर्सखबद शक्तियां है। किन्तु व्यंजना की स्थापना के पसंग में वे अन्य आचार्यों की ही भांति तात्पर्यवृत्ति की भी गणना अभिघा,लक्तणा और व्यंजना के मध्य करते हैं - वृतीनां विश्रान्तेरमिघातात्पर्यलक्ष णाख्यानाम् । अंगीकार्या तुर्या वृत्तिबाधे रसादीनाम्।। ४
तात्पर्य से व्यंजना का भेद बतातें हुए उन्होंने अपने पर्ववर्तो समस्त आचार्यो के मतों को समेटने का पयत्न किया है। यहां तक कि तात्पयार्थ को मानने वाले अन्विताषिधानवादी मीमांसकों का भी खण्डन किया है। इस पकार साहित्य-
१ - एकावली पृ० -६१ २- लोचन पृ० ६१-६२ ३- साहित्यदर्पण पृ० ४६ ४- वही पृ० १५६
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दर्पण में व्यंज्ता-विरोमी नीमांसयों को निम्नािसित तीन मागों में वियामित करके उनका सच्कन किया है-' १- अमिशितान्ययवादियों की तारपर्य-वक्ति का, २- वभियान्वकत का व्यापार नाण के बनान बीर्यपीशर नानने वाले बन्किता- सिमाननम्पन्हे भिमानवादियों का, *- बर, सात्पर्य वे न्पतिरियत व्यंग्यार्य को न मानने वाले धनिक के याकतकार्य- परवारित्याचालपर्य न सुठानतन, कह 'शृब्दबुदिवर्मणां विरम्य व्यापारामावः' रस न्याय से सण्डन किया है। उपर्युकत न्याय को नहीं मानने वाडे मोमांसकों को उत्तर देते हैं - यदि अमिषा के एस बीर्ध-दीर्घ व्यापार से ही अयंग्यार्थ को बोच मानते हो तो कज्तणाव्नति के मानने की मी कया आवश्यकता है, उसे भी छोड़ दौ। बपने बीधदर्य तर वमिना व्यापार से ही अपचार्य बौर व्यंग्याय दोनों वर्षों को निशाल हेना। विन्तु मीमांसक उद्णाशन्ति को मानते में सवलिए उन्नें स्यंप्ा शकित मी माननी पढ़ेनी। बतः उनका वमिमा के नीर्घ-नीणवर व्यापार से व्यंग्यार्म का बोच मानना ठीम नहीं है। वानायं विश्वनाय, कपर: त्ब्द: व तष्ार्मः इस न्याय को मानने वाले मीमांसों का सण्झन करने के पुर्व उनसे प्रश्न करते हैं कि जिसमें श्ब्द का तात्पर्व हो बषी शष्मार्थ है - वहां प्रृष्टव्य है कि तत्परत्य कया वस्तु है? क्या ताल्पर्य का मणडम सदथल्म है ? वपवा ताल्पर्य नामक वृत्ति से.वौचित होना यदि पस्ठा पदा मानों तो कोई विवान ही नहीं। क्योंकि व्यंग्य हेने पर मी सदथत्य का अपाय नहीं होता। तदयत्य का मतउप है, उस पद का वर्ष होना। इससे यह तो निललता ही नहीं कि कौन बी वृत्ति से यह जर्य होना पाहिए। बाहे किसी मी वृत्ति से निकठा कुवा वर्य उस शब्द का सवर्थ कक्ष्ा सक्ता है। रसउिर व्यंज्ा-शक्ति के दारा प्रीस तुवा निरतिश्यानन्द मी यदि तदर्थ महठार तो कोई पाति नहीं, क्योंकि इससे ध्वनिवादियों की मानी हु्ई व्यंक्षा- वृति का इण्न नहीं हो स्ा, बत: रस पद में हें विवाद करने की मी कोई बावश्यमता नहीं। यादि दूसरा परा मानते हैं तो यह बतछाएं कि यह तात्पय नामक वृत्रि कौन सी है? क्या अमिहितान्वयवादी शीमांसकों की मानी हुई
१- इ० ब्ाशियवर्पण पृ० १५७ ।
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मानते हैं तो इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि तात्पर्यवृत्ति से पदार्थों का सम्बन्धमात्र बोधन हो, है। उसके बाद वह परिक्षीण हो जाती है, अतः उससे, फिर व्यङ्रथ-अथे का बोध कराना सम्भव नहीं। यदि उससे अतिरिक्त वृत्ति मानकर उसका नाम 'तात्पर्यवृत्ति' रखते हैं तो नाममात्र में विवाद रहा। पूर्वसभ्भत अभिधा, लक्षणा और तात्पर्य के अतिरिकत पाषी वृद्ति तो सुम्हारे मत में भी सिद्ध हो ही नई। मेद केवउ इतना है कि एम चौची वृत्ति की व्यंजता ककते हैं और तुम तीसरी तवा बाँची योनों को तात्पर्ववृचि कक्षते हो। अमिरितान्ययवादियों की सम्मत तातपयशक्त से की पार्यों का परस्पर सध्न्म(विमावादि का संपर्ग) और रसादि का ज्ञान यदि एक साथ ही परकाशित हो जाय तो क्या हानि है ? रम प्रकार नाँधी वृत्ति मी नहीं माननी पढ़ेगी और काम मी वल बाए्गा। केवल तात्पर्यशक्ति से ही दोनों का परकाश्ा मान लेने ।' उप्युक्त मत का सण्डन करते हुए कहते हैं कि विमावादि के संघर्ग को रस का कारण माना नया है औौर रकान को विनावादि ज्ञान का कार्य माना गया है ( नार्य और कारण की एक साद हो नहीं अन्ते। कारण पल्े होता है और कार्य उडने पीड़े, कः एक वृत्ति से कम दोनों का एव साथ ज्ञान नहीं हो सता। इम दोनों का कार्य-वारण नाव मरतमुनि ने कहा है- विभावानुमाव बर व्यनिवारी नाव के संयोग से कयात् इन कारणों से रब की निष्यत्ति कयांतु रखप कार्य की बिद्धि होती है। पहले सिद् किया है कि रस कार्य नहीं होता, वत: यहां पौवपिर्य के भारण उन श्ब्दों का लार्ताणिक प्रयोग किया गया है, अथवा ववरण मंग के वारण को उपवार से रह का कारण वह दिया है। यदि विभावादि ज्ञान बौर र-्शान या सहमाय(एक ही काल में उत्पन्न होना * माना जाय तो कार्यकारण माव नहीं बन कत्ता। एक साथ निकले हुए किसी पत्ठु के बारं बर यासिने बींम एक दूसरे के कार्य बोर
१- तम् पृष्टव्म् - विभिदं सत्परत्वं नाम , तद्यत्व वा, तात्पवकया सद्बोचतल्वं या ? बाये न विवाड:, व्यंग्यवेडपि तदकतानपायास्। प्विीये तु - वेयं साल्पपरि्या वृतिः १ अमिक्ितान्यववाविभिरनीक्षता, तदन्य दा ? बाजे एतमेवोत्तरय्। ज्वितीये तु नाममात्रे विवाद:। तम्मतेऽरपि दुरीयनृधिसिद्े: ।(बावित्य वर्पण पृ० १५-१४६)
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.. २६० बर कारण नहीं हुआ करते। का सोवषिर्य हो वहीं कार्य-कारण माव होता है। उसके विपयय में नहीं। इससे यह सिद हुआ कि सात्पर्ववृत्ति से व्यंग्यार्य कर बोष नहीं हो क्षा'। इम प्रकार सरपी ने सात्पर्य के जिए सात्पर्य-पक्त का प्रयोग अभिववमुष्त अर्द
से प्रमाकत छोकर किया है।
व्यवा-व्यापार- ध्वन्याोन के बबार पर व्यंजा की परिमाचा इस परकार है- 'शब्द-प्रयोक्ता कभी वाच्य रूप से वर्य को प्रलारित करना बाह्ता है और कमी प्रयोक् की अपेसा से ससिकी कनभिमेय कप से वर्य प्रशासत करना पालता है। विन्तु पतिमाशाजी वक्ता या वनि का जो पार्यन्तिय प्रयोजन होता है उसी वक्गति वह नोता को वमिमेय रूप से कमी नहीं कराना पाझता। पयोकर को अभियेय बना कर तो बारा पनल्बार या बैविभुय की नष्ट हो जाता है। फज्त: यह सपवसदेद उस प्रयोक्त क्रीति को समण्ीय रूप देने के छिए अनमिमेय की रक्ता है-। ऐेसी बवस्था में उसे उस अनमिनेय अभिक्रम- विशेष की सणीय फ्रत्यायना जिय शक्ति से होती है उसे ग्यंज्ा-शकति कहते हैं। व्यंजा -्कति के विषय में आनन्दप्यन और अमिनवमुप्त में मलैकय है। परवर्ती आबायों ने मी व्यंजना का स्वूप आनन्दवर्णन के ही अनुसार पृतिपाकित किया है। वाचार्य मम्मट ने काव्यपकाड में व्यंशावृतति का विश्व निरपण किया है। व्यंजना के मुकतः दो मेद हैं - शब्यनिक्ठ तथा वर्थनिक। इन्हीं को सुमशः शाब्बी व्यंजना और वार्षी व्यंज्ा मी कहते हैं। शाब्ी क्यंबना के पुनः दो मे है-
१- प्रयोक्ता हि कदा मित स्वश्चव्देन वर्य प्रवाशकतिं बनीसते कदा विल्स्वत व्न मियेयत्वैन प्रयोव्तापेदाया क्या चित् - व्य० पृ० ४४६-४० २- सारकतो एव्व:स्वसन्दाननियेयल्यपेम फ्राजित: सुरामेव शोमानावडति, परतिद्धिश्ये- यमस्त्येव विवण्यनिक्चरियत्यु वदमिकातरं वस्तु व्यंग्यल्वेन प्रकाश्यते न बाप्ा-
३- इ० ध्वनि विहान्त: विरोधी सम्युवायः उनकी मान्यताएं पृ० ७१।
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२६१ अभिवामुठा तथा उत्तणामूठा । नम्मट में सर्पप्रपम अराणा के विवेधन के प्रमंग में प्रयोजन की निष्पत्ति कराने वाडी उक्षणामृठा व्यंजना का यह उप्तण'किया है- वस्य प्रतीतिमाचातुं उद्तणा बनुपास्यते । कडे शब्देक्नम्येडम व्यंगान्मापरा पिया।। १
परयोक्तपृतिविवाननिभया वत्र अपाणवा अष्पयोनस्तम नान्यस्तय्नी तिरमिद्ु तस्मादेव शब्दातू, न बात्र व्यंज्ादृतेडन्यो व्यापार:। 'मंगाया घोच:' में सेत्थपावनतादि प्रयोकन्त विषय के बोचन में उाणा शक्ति के पीण हो ाने पर वमिया, तात्पर्य तथा उपाणा से व्यतिरिका एक चतुर्थ-व्यापार ववश्य मानना पढ़ेना बर वही है व्यंजना- व्यापार जिसके चोतन ध्यनन आदि नपर फर्याय हैं।
अभिवामठा शन्दी व्यंक्ा - अनेशाथी श्ष्दों ने स्व में संयोलषिपयोनावि वमिया नियामकों द्वारा वमिवा क नियमन हो आाने पर नी समूषयों को पुविमा वडातू जो बन्य अर्थ की प्रतीति होनी है,उस कनभिमेव वन्वर्ष का बीच कराने वाछे व्यापार को व्यंजना- व्यापार कक्षतो हैं। यवा- मटार्मनो दुरधिरोक्तनो निजाअवंशोनमते कृससिलीमुवसंगवस्यं। वस्यानुक्तृतनने: परवारणस्व दानामयुलेनयुमन:खातंगरोडम।।
१-का०ु० २११४ ३- वाचार्य मम्मट ने व्पंजा-व्यापार को कतुर्च कसचा-निवेशी माना है- यह अमिनवगुप्त का पमाव है। ४- तटादी ये विशेषा: पाय्नत्वाट्यस्ते चाभिधा-तात्पर्य-लक्षणान्यो व्यापारानरेण गभ्या तच्च व्यक्न- ध्वनन- घोतनादिशब्दवाच्यमवश्यमेषितव्यम्। ४- संयोगो वियृवोगरय वाश्यया विरोधिता। काव्यप्रकाश ७६. वर्थः पकरर्ण डिंगं शब्दस्यान्यल्य सन्मिषि:।। सामयूर्यनौ मिती देठकालो व्यत्ति:स्वरायय: ।
६- तनेवार्थस्वशव्यस्व इब्दस्य नानमत्वे निवन्िनिते। संयोगा परणाच्यार्थनिवृद् व्यापृतिरंयम् ।। काव्यपतत २।१६
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1 २६२ इसमें अनि किस्ी राजा का व्णन कर रहा है। फ्मरणिक होने के कारण राजादीय वर्ष भी ही एमम फ्रीति होती है। यशी वाज्य अर्प है। इसे अनन्तर प्रतीत होने वाडा नयसीय वर्ष व्पंजाव्यापार के द्वारा बोपित हेना क्योंचि पमरणवशात् वमिषा का नियमन तो रायपस वर्य में हो चुण बर एक वर्ष दे देंने के बाद बमिवा पुनहन्वीकित नहीं ही अभ्ती। यदि यहां पर प्रकरण बनात रस्वा तो अमिया अन्यिन्मित की रस्ती फल्तः गोनों ही वर्ष वाच्य हो जाते बौर एा परवार यह शेथ बठनर का विभय हो बाता। इस्तिवणन रुप वपावरणिक व्यंग्य वर्ष की प्ावरण्िक राजपसीय वाच्य वर्य के साथ असम्यक्ता के निरमार्थ दोनों वर्यों में उपमानोपनेय नाव की बल्पना कर की बाती है। फचत: वदा पर उपमा वनहर मी व्यंग्य होगा। बाचार्य मम्मट शब्दी ज्यंजता की परिषाचा में शब्द की बनेवार्य ता तो स्वीकार करते हैं किन्तु सब्यश्कैच के प्रहंन में वाच्यमेद के कारण शव्यभिन्नता ही मानते हैं। एक शब्द के अनैक वाच्यार्थ नहीं स्वीकर करने। वहाँ पर अर्थनिदेन - शब्दमेद:'रस मत के पोचक बन बाते हैं। उनके इन दोनों मों पर परस्पर विरोष पड़ता है। आ: व्यनेदेन शब्दमेद:' इस सिद्ान्त के बाबार पर पवपसी महाल्यन: नादि उपमाध्यनि के स्पकों में यक संका उठा सकता है- 'क्यनेदेन शब्दमेद:' एस न्याय से यहां पर मी दो वाचक शब्य माने बाय। एक डब्ब के द्वारा राजा वाठे वर्ष का अभिवान होने पर अभिया का नियमन हो गया तवनन्र दूसरे शब्यद से दूसरे वाभी वाले अर्ष का बौँद हो बाएना कयोकि दुसरे शब्द की अमिषा का तो निकन हुवा नहीं, रवछिए व्यंजना नामक कृत्यन्तर की बल्पना ठीक नहीं है। रस संपा का समामान विश्वनाथ ने 'काव्यपुवाश्ययण' में किया है। वे कक्ते हैं कि 'बाद दशां पर सब्दक्य की कल्पना करोने तो फत्त वर्ष की फ्रष्म प्रीति कैसे होनी, क्योंकि दोनों ही वर्पों को अभिनेय मानने पर दोनों की सकराता हो बाशनी बर उनमें पुर्वपश्वाष्माय की निकता असम्मव हो बाएगी। क: दूसरे अर्थ को बाज्य न मान कर व्यंग्य मानना ही ठीक दोना बर पितीय वर्ष के बोचन के छिए एक दूसरे वाचक शब्द की कल्पता करने की अपेसा उसी शब्द में
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व्यापारान्तर की ही कल्पना करना नेवस्सर होना। वस्तुतः वहां पर पार्यन्तिन उपमा अनकार स्यंग्य है। 'मम' विषयक वर्ष को ही पार्यन्तिय व्यंग्य मानने में एक आपति है, यह यह कि दौनों वर्षों की परस्मर अम्यक रूप से प्रतीति होने पर बाक्य में अपनति हो बाएनी। शसी डिए बाचार्ब वानन्यवर्णन वस्तुदय की प्रीति को ध्यनि का विषय न मान कर कैवक शडैच का की विभय मानते हैं। ये सन्दशकमला ध्यनि वहीं पर मानते हैं नहां नि अन्म ामवुर्षव से वरअशरान्तर वशिस हो, वस्तु नात्र नहीं। आाचार्य मम्मट का इस विषय में स्वनिकार से मतमेद दिसाई देता है क्योंचि ने स्शक्तिमतम वस्तुव्यंग्य को भी स्वीकार करते हैं और निम्नसिशित उवावरण प्रस्तुत करते हैं- पंचिम का एतय अ्यसमतथि मण पल्चरत्वे नामे।
मम्र यनुमोनकमौइति तदा बास्स्मेति न्यम्पो ।। (गा०पृ० पृ० १३) शब्द शक्तिमक्रा वस्तुष्यग्य के मी ल्वीकर्त्ा होने के कारण मम्मट के अनुसार 'मदात्मन:' सतयादि शकोब में अवानरणिक नयपलीय वर्ष को बानुथनिक रप से वस्तुव्यंग्य मान कपती हैं बिन्तु पार्यन्तिक व्यंग्य तो उपना ही है। वस्तुत: मम्मट यहां पर ननपपीय अर्ष को व्यंग्य रूप की मानते हैं। ध्यनित्येन परीक्ाण करने पर तो यह भी उपमा अंनार व्यंग्य का ही उवावरण होना, वस्तु व्यंग्य का नहीं, क्योंकि यहां पर व्यंग्य रूप ननशीय अर्ष की प्रायान्येग विवशा नहीं है। ववि का मुल्य वदेश्यववां नय क्री प्रतीति कराना नहीं है, वपितु उपमांनोपमेवमाव श्री क्रीति ही उदका परमान उथ है। युवान व्यंग्य को ही ध्यनि कहते हैं अ: यशं अठंनारव्यंग्य है, वस्तुष्यंग्य नहीं।
२- वाशिय स्वाउंगर: इन्रत्या प्रशवो।
वस्मादूळंवारों न वस्तुमाओं वरमि् भाब्ये संबरपत्था प्रकासी व शब्दशवल्यु्मयो ध्यननिरियसानं निवशसितमं नस्तुडये न अब्दंवत्या फुणाअ्ने शवेम :- व्व०पु०- -२३५ ३- ध्यनि-विहान्त: विरोमी.सम्परराय: उनकी मान्यताएं पृ० ७-१
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२६४ पंडितराज गम्माथ नियन्तितप्रानरणिक अर्य वाडे नानाकी सर्ब्दो के ए्म मैं अपावरणिक अर् को व्यंवनानम्य नहीं मानते। रस विचय में उन्हरोने 'रव- गंनाबर के प्वितीय बानन के वारम्म में ही पयाप्त विवेवन कर मम्मटादि आापायों के मत का सण्डन किया है और बन्त में एस निम्मर्ण पर पछुंचते हैं-
प्रतिमाति। पण्छितराज कान्माय ने सव्मशक्तिमुक्म वस्तु व्यंग्य अथात् अपावरण्िक अर्थ के लिए एक नई उद्मायना की है। उनकी दृष्टि में अपावरणिक वर्य की प्रतीति व्यंग्षा-व्यापार से उन्हीं एकों पर दोनी वहां पर योगरढ शबों के प्रयोगों में अमिया के दवारा एड वर्ष निकलेना तथा यौनिक वर्ष के जिए वमिया के अदामपूर्व के कारण व्यंजनावृत्ति का दी आानय उेना पड़ेना ।इबा वे निध्मितित उवावरण प्रस्तुत करते हैं- वक्ानां जियं कृतया वारिवारे: बवानिगु। तिकन्ति वपठा का व काउ: सुपरयि: ।। यशां पर पपठा, अगडा तथा बारिवाह योनरड शम्म हैं। इनका अभि- वैवार्थ युपतः 'विफु, स्त्री तथा मेथ' है। प्रावरणिक अर्थ के निष्मन्न होने के बनन्तर एक दूसरा वर्ष भी फांक्ता रस्ता है जिस दूसरे वर्ष में उक्त शब्मों का ग्रपत: 'पुंश्नली, अक्काः तमा कवाहक पुरुष' वह वर्प निक्रता है। बब यदि कोई कहे कि तन दूसरे वर्षों को मी अभिषेव मान डिया जाय तो यह असम्मय है क्योंकि अभिवा दो रुढ़ वर्य को ही देगी -'योगाडटिर्बडीयसी'- र न्याय के अनुसार। अ: इन दूसरे यौभिक वर्यों का बोच कराने के छि व्यंजा' के बतिरिक्त बन्ध कोई मति ही नहीं है। पण्छित राम की इस मोखिक उद्मावना के कारण बानन्दवर्धन तथा मम्घट इन दोनों आबायों की म्यांदाबों का कयमिंत निर्वाह हो जाता है। आानन्द- वर्धन ने नानाथी शब्दों के स्पछ में वमिषा के नियस्त्रण की कहीं पर मी वर्षा नहीं की, कः पण्छितरान ने इक्त शव्दशक्तिमतत व्यंग्य के सम्बन्ध में मी अमिदा के नियन्पत्रण की कोई बावश्यकता नहीं समफी, क्योंकि तम यह नहीं १- रखगनाघर, द्वितीय वानन
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२६४ वह सपते कि श्मिषा तो चफठा शब्द का विद्ुतु अर्ष देवर निवन्धित हो बी, इषछिए दूसरा 'पुंश्बडी' वाला अर्ष नहीं दे खाती, कारण कि बमिधा के दारा तो चपता का हस प्रसंग में विकुतु अर्थ ही निकलेना क्योंकि वर्य में शब् तद़ है। वदि 'पुंरकळी' इस यौनिक अर्प को भी अभिधेय माना जाय तो फिर'पंस्य का बैवार' (शैवाड) अर्थ मी अभिषेय ही मानना पहेगा। अभिधा के नियमन वाडे सिदान्त के विरोधी लोग अमिया का पुरन्चीयन मी मान उेंने क: अमिवा नियमन की बर्वा ही न की जाय 'हिन्मे मूछे नैव पत्र न साता:'। योगसड़ सबमों के स्पऊ में वस्तुव्यंग्यता मान कर मम्मट के मत का समर्थन दा हो गया, यवपि एस संबं मैं दोनों के विदान्त में मौडिक मेव है। पच्छितराय का सष्प्श समुनन व्यंग्य का विदान्त बापातत: ठीम बंस्ता है। विन्तु इपका ोचनकार के विदान्त से वाल्यन्तिक विरोम पक्षता है। अचनकॉर प्रकरणादि को इतना बडबानु तात्पर्य निणावय मानते हैं कि उचके बारण कहीं-नहीं 'बोनाइिकीयसी' इस न्याय का तपाकरण मी हो बाता है। जैंसे क्ीजमतु के वर्णन के प्रकरण में बार हुए 'महावाउ' उब्बद का 'मढ़ान् वासी शाउश्न' इद कुत्पति से निकाठा यौनिक वर्ष ही अभियेय मानना पक़ता है बोर जो इसका योगरुड वर्य है 'संपर', उसे अभिेय न मानकर व्यंग्य ही मानना पढ़ता है।
वार्ची व्यंज्ा - वार्थी व्यंज्ा की मम्मट ने यह परिमाणा दी है:
यो5रबस्यान्यापवीहेतुव्यापारो व्यक्तिरेय बा ।। दक्ता तथा बौषव्य आदि के वैठयाम्य के कारण प्रतिमावान् सदुदय बनों को बाध्याय से पिम्मन वर्ष की प्रीति कहाने वाडे वर्थव्यापार को व्यंजा कहते हैं।
१- काव्यपूकाड, २।२२
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11 बाचार्य,मम्मट ने व्यंजतना के दो मुख्य वश्का स्तित्यों अयना प्रवोकशों की स्पष्ट निवंश किया है। वे यो असवारी हैं - विषय की दृष्टि से वक्ता बादि का वैडिष्ट्रय तवा प्रतिनता की दृष्टि से पृतिमा की बपेसा। ब्यंग्यार्य की ज्रीति केवल प्रतिमाचान् प्रतिक्ता को ही होती है, इम विषय में दो म नहीं को सकते। व्यनिवार स्पष्ट शष्दों में कहते हैं कि व्यंग्याम तो केक गाज्यालया द्ारा ही बाना ना का्ता है। आचार्य वभिननमुप्त के सन्दों में व्यंपाश्नित पतिपतृप्रतिमर है। वनता आादि की विसनाणता का ज्ञान मी व्यंजा का मुल्य सहाया &
प्रयोदक है। मम्मट ने देवव वार्थी व्यंक्ा में ही कक्ा आदिवेशिष्टुव को सलकारी माना है। शाब्दी व्यंजा में सववा बनपेदित हो, वद बात नहीं है, कयोंकि मोबन के परकरण में कहे नए पुरभिमांस नवान् सुंकते ' एम वाप के नो 'गोमांसमद गर्म' पितीय वर्य की व्यंजना शे रही है उसमें वकता का बैशिष्ट्य मी प्रयाक है। मम्मट के द्वारा दिए नर सममशक्तमुकन व्यंय के निम्म्मलिखित उवावरण में वनयुणोयय्य का बैशिष्टुय व्यंजता में सवाया है- पंचिय णा एत्प स्चरमत्थि मर्ण फ्यसपे नामे ।,- रण्णबपलोहरं पेसयिकण वई नसाद्रि ता पसु।। अवात् पचिक। ए्व नमरीडै ग्राम(पिझ्ड़ी बस्ती) में विशेना(शास्त्र) नहीं है,उठे पयोबर को देख नर यदि रसना वाल्ते हो तो रहा। यहां बदि 'उपमागपामोडसि तथा बाल्स्व' एस व्यंग्य की प्रतीति तो उभ्ी सम् दय को रेनी जिसने एस उनित भी बस्ता स्त्री के दुछ्टाल्म बर इुःवीतत्य का तथा इसने बोमन्य बन के पमुकदनांपुरत्य बा्ले माव का ठीक-ठीक अववारण कर ठिया हो। शबी संका के युछ एपक रेते मी हैं वहां पर वकता बादि बैशिष्ट्य का व्यंजना में बोई बाहायूष नहीं होता के - 'महात्मन' हत्यादि शडोक में।
सवायार्यनातन्तितम्कन व्यापार: - डो० पृ० ६२-६३ (२) प्रतिकृषतिमासलतारित्यं स्वस्मानिवातनस्य पाणत्मेनोक्तम् - ठो० पृoव २- पाज्यमुसाड पृ० १४०
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२१० बझुतः बार्यीप्यंका में जो. सणीकता है वह विवृद शब्ी ध्पैप्ा में नेहीं मिश्ती। 'मदारमनः' आनि विशुद शाब्जी व्यंगताबों में प्रत्येक शब्द के समय सेत के छिए अनियानशोशों का ज्ञान पृतियता के छिए परम ववश्यक है।उनके बिना वपापरणिक अर्ष की परतीति असम्मंण है। कवि को भी ऐसे व्यांच अमों की यौक्ता में पूकर प्रवास करना पक़ता है। रत्री परिस्मिति के व्यंग्य अर्ष की प्रीति उतनी वहम नहीं होती जिसी की वार्षी व्यंगावों में दोती है। बौर का तत्वाथदर शिनी वुद्धि में व्यंग्य वर्ष का क टितति अवनादन नहीं हो तो उच्ा बमल्कार कम हो ही जाता है क्योंकि व्यंग्यार्थ को तो सुरन्त माखित होना बाहिए। का परतिपता को अनिधानकोश का ज्ञान अपेकिक ही है तो फिर उनके दिए वह व्यंक शब्द मी कतससायं वाचक शब्द के सुलू्य ही तो हुा। सुम्मकत: ऐपी वरुनि का विवार कर पण्कितराज तथा अच्यकीदित बादि कुछ बाचायों ने ऐेसे उदरणों का रकेम-अनर में की अन्तमणि किया है पर्योकि वशां च्वितीय वर्ष को देने में भी सोतसहाया बच्िमाशक्त ही इतिपृकत शेनर समर्थ होती है। शं, रेवे एवशों में प्रावरणिक बौर बपावरणिक अपों के बीच उपमानोपमेयमाय में रमणीयता अवश्य है। अत: कद अंशरांस की व्यंग्कता को शी शचायों ने स्वीकार पिया है।
ध्वनिषाव्य मेद -
इस तचूय का पकके इल्छेत किया जा दुछ है कि नागन्यवर्णन मे ध्वनि-मरदों की निरटिकत संल्या नहीं बाई है। किन्म अभिनवुप्त ने ध्वनि मेदों की बणना करने इनकी संल्या ७४२0 मानी है। अभिनवगुप्त ने ध्यनि-मेद
१- ध्यनि सि्दान्त: विरोपी सम्यराय : उनकी माम्यताएं पृ० -द २- वमनियनुप्त ने ध्वनिमेदों की सं्या ७8२0 मानी है उसमें ुटि है- शोननकार जिने ध्यनि के नेव (३५) मानतें हैं उतने की मुणीमतव्यंग्य के मी (३)। बंगरों के बनन्त होने के बारण 'अंशारत्थावचिकनन' ध्यनि का एक ही मेर मानते हैं। एव प्रसार सुछ अ१ मेद हुए। अब इनकी त्रिविय संबर तथा एक कृसार की शाष्टि के बाथ योच्ता होने के भारण ४ से गुणा करने परस मेव निकलते है। म स गंीर्ण मेदों की सु ३५ मेदों के साथ मी योक्ा होने के शारण मुणनकड रK १५= ६१४0 बाता हे(ठो०ृ०्५०१-५०२) विन्दु कम मुणनकड को अोचनवार पुटिवशात ७२. मानते हैं- ध्वनि-रि्दान्त विरोषी सम्यरदाय : उनकी मान्यताएं-
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नणना की जो परम्परा बलाई, डसे परवती बनी आबारयों ने बल्मवानु कर डिया और अपने-जपने मतानुसार ध्वनि मेवों की सं्या का निदेश किया।- आाचार्य नम्मट ने ध्यनि के प१ शुद मेव माने हैं। एस तरब अचनकार से मम्मट ने १६ मेद अचिक बतार हैं। अधियशित्तवाच्य के मेदों में तो आनन्यवर्षन, वभिनव- मुप्त तथा मम्मट में समानता है। ससपली नेवस नियशितानपवरवाचय के मेदों की नणना में ही बनतर है। मम्मट ने असंतपयुम व्यंग्य के नैद माने हैं- चद, वाक्य, पवेकनेश, रवना, वर्ण तथा प्रबन्ध वन कि लोचनकार पवैकदेश को भिम्न न मानने के कारण ४ ही मेद मानतहैं। इस प्रसार मम्मट के अनुसार १ मेद अचिक होता है। पदेकदेश का निर्देश तो व्वनिकार ने काविभ् में बार हुए 'बदि' पद के द्ारा ही कर दिया था वोर लोमनकांर ने मी आाबि' बद के वारा फपैकदेश पबक्ितय का म्रृहण करना ही अमीष्ट कताया, किन्तु व्यनिमेम करते समय पद में की पदकदेश पवक्ियादि का अनतमवि मान ठिया। का: बानन्दवर्यन तपा अोचनकार के अनुसार 'पद, फ्वैकनेश पयव्ितय वाद़ि का उपलराण माना गया। मम्मट ने यद से पवैकदेश की सवधा पृपर बरके अंत्यमृमव्यंग्य में एव मेड की वृद्धि पर दी। मम्मट ने अब्दशक्तिमठ में वस्तुव्यंग्य को माना और उस्े मी पदपकाजस तथा वाक्यपवाश्य होने पर दो मेद माने हैं। इस प्रकार अोननकार तथा बानन्द- वर्धन की अपेक्षा नम्मट के अव्दशक्तिमड् में दो मेद खधित हुए। अर्पशकतमुक में पदपकारकता तथा वाक्यपुवश्यता के अतिरयत प्रबन्धपवाशयता को मान कर नम्मट ने १२ मेदों की वृद्धि की है। पृबन्धपवाश्क्ता मानने के नाते: मम्मट बानन्द वर्धन के ही सब्ये अनुवायी हैं, ठोचनकार के नहीं, मयानि अचनकार अथसक्तिमुठ के उपमेदों में पृबन्वपवारक्ता को स्वीकार नहीं करते। बिन्डु वानन्यवर्णन शब्य- शक्तिमुठ में मी पबन्धपरणशवता स्वीकार करते हैं ना कि मम्मट सब्दशक्तिमुठ में मेवळ वाक्य तथा पदपताशकता की मानते हैं। अचनकार मी बही मानते हैं। नम्मट ने शब्दशनितमुठ तथा अपशनितिमुर अंत्पयममव्यंग्य के अतिरिकत अन्यायोमय- अक्तिमठ नान का एक नया मेद मिना कर १ मेंद की वृद्ि की है। इस प्रकार १-मेदास्तकेल्पवास्तु- वाक्मृ० १सप् वदि शुर्णदन पदेकदेश पवकतियामीना वणम- ठो० पु०३० ३- सन्वामामयमरेय : - काळ्य १४६ । वाचार्य नम्मट को सम्ायगियश्क्तिमठ ध्वन को मानने की पेरणा स्व्यालोंक्ार के एस वाकय से मिली है- शब्द- अत्या अर्पडपत्या उन्मायसमल्या वाश्ि य्तोडवि व्यंग्योडर्य: कविना पुनः यत्र स्वोमत्था पुकाजीप्रिक्ते - व्व० पृ० २४र ।
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मम्मट ने लोचनकार से सुछ १६ मेद अधिक मानकर ध्यनि के पर मेद बताए हैं। ١
इन ५१ मेदों के बरस्पर भिभित होने पर पर + पर २६०९ मेद होते हैं। तवनन्तर इनकी योक्ता निविम संहर तथा एक प्रकार की संबुं्टि के न्राय होने पर २६०-४=१॥० मेद होते हैं। अम इन संतर तथा अष्िकृत ध्वनि मेों के साथ ५१ शुदध ध्यनि मेवों को बोड़ने पर १००+४१= १७४५ व्वनिमेद हो जाते हैं। राबडीवार विवावर ने अविवाितवाच्य तथा सयमुव्यंग्य ध्यनि के मेदों की गणना में मम्मट का ही अनुकरण किया है। अन्तर केवल इतना है कि वर्थ- शक्तिमुड के ३4 मेर गिनाने के अनन्तर पुबपनत ११ प्रकार के अन्य मेदों का मी नि्देश किया है। :
वसंतपशकम रवादि ध्यनि के 5 प्रसार माने हैं - रह, भाव, रबामास, भाबाास, नावोदय, माकसन्यि, बर मायतपकता। रब प्रकार वे रसादिध्यनि के मेरदों की नणना मम्मटादि किसी बाचार्य ने नहीं की हे अप्ति पापकारकता, वाक्यपुकाश्कता, खनापकाश्यता के बचार पर दी की नई है। रवादि ध्वनि की पदयताश्कता वादि के विचय में स्वाबडीकार मान हैं। उनके ध्यनि मेदों, का बंधिय्स आकलन एस पुसार है- ४ वविवदितवाच्य + = वसततयप़ध्यनि + 1६ अगशक्तिमठ + ४शम्दक्तिपुठन १ उमयशक्तिमठ = ५३ मे। साहित्यद्यणकार विश्वनाथ ने मम्मट का ही अनुवरण किया है।उहोंने मी ध्यनि के पर मेद माते हैं ।
१- तैचां मान्या्यवाजी संकरेण निपेण संदृष्दुवा बैकपया वैदवाव्धिविय्पन्डा (१०७) वद मै: वह - अेमूयुरसेन्दव: (१d ४४) - काव्यपवार :- प.१८७ २- रवनपरेय्व्मतिवतिमतत्य ध्यनेरेवावतपृबपपाशयमेवा: परतन्धान्तरेभ् इष्टव्या :- स्वापळी पृ० १२
क्ारा: - एकाबळी पृ० दर्म ४- सदेवनेशपंताजड् मेवास्तस्यध्यनेगता: - सालतितयवर्पण ४।११
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३०० पण्डितराज सम्नाव ने रकगंनाघर के पथम नानन में उत्तमोत्तम ध्यनि बाष्य को असंल्य मेदों वाडा माना है, बिन्तु सामान्यतः उनके पांव मेव मानते-हैं। ध्वनि
अभिवामुड 1
रंसादिध्यनि वस्तुध्वनि अकार्यनि वपन्तरसंकृम्तिवाच्य वत्यन्ततिरसतवान्य प्रथम जनन में रसादि ध्यनि का ही सांगोपां विवेयन किया गया है। द्वितीय वानन में रवादि के अतिरिक्त प्रेष सभी अभिवामृत ध्वनियों का मेवपृतिपादन संउपययसध्यनि के बन्तनत किया नया है। यहां पर रवादि का केवड वर्ण, पद बदि की व्यंजाता के नाते निर्देह किया गया है। वसंकयककूमव्वंग्य के अनन्तर उत्तणामुड ध्यनि के मेदों का विचार किया गया है। ध्वनि मेद के सम्बन् में पण्छितराज बनन्नाय, ज्ानन्यवर्वन तथा मम्मट दोनों से परभावित हैं। जानन्दवर्वन के ही अनुकरण पर उन्होंने कविप्रोटोनिस तथा स्वत:संपवी इन दो परकार के व्यंजा ररपों को ही स्वीकार किया । कबिनिकसनुप्रोटोनिति का कविप्रोठोकिति में ही अन्समबिरिया है। अष्मशक्तिमुत में वस्तुच्यंग्य को स्वीकार कर मम्मट का ही अनुवर्तन किया है। १,२- तत्र ध्यनेकततमोत्तमस्यासं्यमेवस्यापि सामान्यत: केवि मेवा निकय्यन्ते तानेव- ध्वनिकामान्यमेदान् निक्यवति - द्विविय: ध्यनि:, अभिमामठो उद्तणामउश्न। तत्रायस्त्रिविष: - रस्वस्त्य-
मावशान्ति-मायोदय-मावनन्थि-पार्ववउल्यानाम् गृहणाम। दितीयश्न दविविच: -कथन्तरतड्रमितवाध्योऽस्यन्ततिरस्कतवाच्यश्न। एवं पंवाल्मये ध्यना परम- रमणीयता रसध्यनेस्तवात्मा। रवगनाचर-पृष्ठ इधू-दई ३- पण्वितराज नन्नाव ने वस्तुष्वनि,वउकारध्वनि एवं रध्वनि - इसर प्रकार का प्रयोग अभिमवनुक्त से पमाकत होबर किया है। यदि वस्तुव्यंग्य, बऊकारव्यंग्य एवं रवव्यंग्य कम प्रकार वलते हैं तो अधिक उपयुक्त होता। ४- ध्वनि रियान्त: विरोषी सम्पृदाय: उनकी मान्यताएं - पृ० १६७-१७४
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प- आामन्दवर्पन ने समी दृष्टियों से मीमांधा कर व्यंग्य अर्ष की परवान तथा नौण दो प्रकार की स्थितियों के अनुसार न्पसः बाव्य के दो फ्रार निकपित किए - ध्वनिवाज्य बर गुणीमृतब्यंग्याथ्य। ह दो, बतिर्यत विश्ञाथ्य को उनहोंनि वसतुस: काव्य माना की नहीं। उसे काव्यानुकृति वपना भाव्यवित् मात्र यह कर ओोड़ दिया। एस विषय में आचार्य अभिनयमुप्त ने वानन्दवर्णर का ही अनुकरण किया, कोर्ड नई उद्मावना नहीं की है। बाचार्य मम्मट ने काव्य की तीन कोटियां मानी हैं। व्यनिताज्य को उत्तम, गुणीमुतव्यंग्य को मध्यम तथा चित्र को अवर(अमम) काव्य कहा है। परवर्ती सनी जानायों ने का व्यपुपेद निकपण काव्य-परकासं के की बभार पर किया है। किन्तु विश्वनाय तथा पण्डितराव बान्नाथ कां एस विषवयु में युक्र नैनत्य रकते हैं। विश्यनाय काव्य के को मेव स्वीचार करते हैं - ध्वनि वाब्य बर गुणीमृत- व्यंग्यशाव्य। वे विश्ाव्य की नणना काव्य कोटि में नहीं करते। एस विषय में ये आनन्दवर्धन का ही अनुकरण करते हैं। क्योंकि बैवा ऊपर कहा जा दुका है वानन्दवर्पन ने वितवास्य को व्यंग्य रकिति होने के शारण काज्यानुपृति मात्र माता है, काव्य नहीं। पण्डितराय जगन्नाथ काव्य के बार मेद करते हैं - इसमोतम, उगम, मध्यम तथा बम्म। उनके सतमोतम काष्य का उप्तण ध्यनि वाव्य के उप्ण से साम्य रक्ता है। उत्तम नाय्य ध्यनिकार सम्पत गुणीकृतव्यंग्य से साम्य रक्ता हुव मी उससे कुव मिन्न है। साम्य नैवड इस कारण है कि दोनों (सत्तम काव्य और गुणी- मतव्बंग्य) में व्यंग्य माच्य की वपेत्षा अप्धान रक्ता हुव, वाज्य का उर
१- इवमुरममतिशयिनि न्यंग्ये वाब्याडु ध्यनिक्नि: वकत:। कान्यपुकाश् २।४ कताड्डी मुर्णम्तब्बंग्यं व्यंग्ये तु मध्यल्। इमनितं वाध्यनिशमव्यग्यं त्ववरं स्मतम् ।। नही १।४ पृ० ३१-३२ २- नाच्य ध्यन्तुणीवृतव्यंग्यं नेति दिया कम् - दाक्त्यवर्पण ४।१
४- हमायों का भुणी मा विताल्मानी कमप्यव मिव्यंत सवाच् - वही पृ० ३६ ५- वम व्यंग्यमप्धानमेव सम्यमतचारवारणं तदज्षितीय् - वही पृ० 44
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उत्यणदाया होने के कारण पाहत्य हेतु बता है। मिन्न्ता स्यछिए है क्योंकि ध्वनिकार ने वान्य तथा व्यंग्य के अप्रामान्य होने पर बयमा संनिग्य-प्रावामयं होने पर मी गुणीमुत व्यंग्यता मानी है। कि्तु रवगंनावरकार उत्तम काव्य में केवड व्यंग्य का अपायान्य मानते हैं, न संविन्यपामान्य औीर न मुल्क्दानान्य। हर भारण पण्छिाराज का उतमान्य मुणीमृव्यंग्य वान्य के सनपदा नहीं ठदरता । भाव्य का तृतीय मेद मध्यम वाब्य है। नहां पर व्यंग्य का पमर्वार वाज्य- नमल्चार से असनानाभितिरण हो, वह मध्यम बाणा है। अवमानाधिकरण का अर्थ है -'बस्फुटतया बोष्य'। अतः बीमा वर्ष यह हुवा नि मध्यम काज्य वह है का व्यंग्य का कनत्वार अस्कुट हो और वाच्य का बनत्चार उत्डष्ट हो। ए प्रवार परिकिाराम के उततम तथा मध्यमन दोनों काब्य-प्रसार मिझार मुणीमृतव्यंग्य की बराबरी करते हैं।२ काव्य का कुर्ष मेद अथम नाव्य माना गया है। नवं पर शब्द का नमत्कार प्रधान हो और वर्ष का भनत्वार उसका उपल्कार दो, वह नमम नाय् है। प्कितराज कन्नाथ को सुर्विष काव्य-परवारों की प्रेरणा सम्मकत: पूर्विती आचार्य केविकरणपूर गोस्वामी से मिठी हो क्योंि उनहोे मी अपने अठंकारकोस्तुम में इसी प्रकार काव्यमेदों का उल्लेत निया है। निव्वर्बतः यह कहा ना सता है कि व्यापरण, दर्शन सातिय बदि शस्त्र में परस्पर युछ न युछ सम्बन्ध ववश्य रक्षता है। जम एक आांस्त्र दूसरे शास्त्र से बहवा नहीं रह पाता, कहीं न कहीं अपने से उतर शास्त्र का बाजय के ही आेत ३ै, तब एक की शास्त्र-परम्परा में लिसे मर मुन्यों का एक दूसरे से प्रमाकित हुए बिना रह समा सर्वमा असम्यम है। को साहित्यशास्म गर ही व्य्यासरेड,
2- तवसनाना विवरणत्वं वास्कुखाया बोध्यम् - नानेश(ममपवाज्) पृ० ७६ ३- यत्रारमनमप युपस््ता इष्मनमस्पृति: प्रवानं, सदयम बतुरच - रबगंगाचर, प०८ ४- वअगर कौस्सुन ।
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म्रक्स, विवाधर, विश्वनाय बादि वाचार्य यह यावा नहीं कर काते कि यो मम्मट 103
हमने कहा है यह किसी ने नहीं कहा है। सभी ने एक, ही बात कही है अन्तरमात्रं इतना है कि सब के परतिपादन की रेी मिन्म है। सौभाग्य से किस्ी बाचार्य पर मगवती सरस्वती की रेसी कुपा हो बाती है कि वह अर्पंचार कूकन समुप बाच निशाजता है, तदनन्तर अनैक वाचार्य उब्ी पथ का अनुसरण कहते हुए अपने-अपने मुन्यों की रपना करते हैं, अनुक्बन मात्र करते हुए मी उन्हें प्यांप्त यस मिठ बाता है। यया- मनवती की कृपा से ही वाचार्य वानन्दवर्मन ने अमतपूर्व ध्यनि-विान्त की स्थापना की। तदनम्तर उसका अनुवदन करने नाले सवपुख आपार्य उन्हीं के टीकाकार बभिनवनुप्त हुए। उनके बाद - मम्मट, विवावर, विश्वनाय, पण्छितराय वादि सपी ने उब्री तथ्य को मात्र दुहरा दिया है। एक ही कड़ी में मुये होने के कारण उन पर अपने- उपने पूर्ववर्ती बाचार्य का प्रमाव पढ़ना स्वानादिक दी है।
उपसदार- पूर्व विवेषित तथयों के बाचार पर वह निःबन्देह कडा जा मयत सता है कि परवर्ती ध्यनि-सष्प्रवाय वानन्दवर्णन की अपेक्ा वभिनयमुप्त के लोचन से वचिक प्रगाकित रह है। अभ्िकमुप्त ने कोरई मौडिक नृन्य नहीं जिता है। उनकी दो साहित्यशास्त्रीय कृतियां हैं - डोचन और अभिनवमासती - दोनों ही टीकाएं हैं, तथापि अभिनियमुप्त 'बानार्य'पम से बमिधिक है। यह वमिनवमुच्त की अपनी एव विशेषता है। बमिनवमुच्त ने दार्जननिक होते दुए नी सातित्य-मृतियों पर अपनी जेखवनी उठाई और उसमें युव दम तक सफड मी हुए। चिन्तु, उन्होंने वानन्दवजन के सिदान्त में जो मुप्त हंग से परियनि किए उचसे आानम्यवर्णन का सरठ एवं भतु विहान्त मी इतना अचिक उडक नया कि वह वष्येतानों के लिए दु्गम दुर्न बन गया। उद्ध पर वभिनवमुच्त ने नुहर नी उ बी - किं डोषनं विनिाशोकी भाति इत्यादि। निष्यम दृष्टि से विवार किया नाय तो यह कहना अनुपपु्त न होमा कि यदि वभििवनुम्त ने लोनन टीचा नहीं छिसी होती तो ध्वन्यालोज सम्दय ननों के जिए वचिक सरड, कुल और म्राक्य होता।
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महाय -मन्चापडी
मुन्य और सचकार अभिनवमुस् : ध्वन्याशक-अोचन, जु. कान्नाव पाठा, यौदम्या विवानयन, वाराणबी,११६४ : वतवसारती, नायल्वाड़ ओोरिएण्टड बीरीव़ मानर,१२४५ मान-२, ११३ : हिन्दी वभतिवमारती, अु. बाबविश्नेश्वर, हिन्दी शुस्धान, अनुसन्धान परिषद, दिल्ली विश्वनिवाउय, दिल्ली १६६० : तन्पाछोक, काश्मीर संस्यूस बीरीज् : हशरपुत्य मित्रा निवृतििमज्िनी, काश्मीर संस्कू बीरीड ११३८ (1. 57 वि.वि.) अमरसिंह : कनरणोच, निर्णय सानर प्रेत्र, वं्बई : ध्व्याशड, नमु०्कन्नाथ पाठड, बौस्दा बिवामयन, वाहणबी,६६ :ध्वन्यालोक, दीधिति टीका (चौ. सं. सि. द्वि. संस्करण १६५३), बालपिया टीका :धन्यालोक (६.) लोचन (लो-) और पस्थि, काजी इंब्कूर बीरीन,१८४० उड्मट बोर : बाब्याउंरगारमुड, एवं स्पुवृति की व्यात्या, व्यास्याकार- पतिहारेन्द्रराव : डा० राममृर्ति तिवाठी, हिन्दी वाकिय सम्मेल, प्र्यान १६44 [ का अ. सा. स.)
: वमिलिानशाकुतत्,मेघवृतमू और सुवार सम्मझु। कविकणंपुर- गोस्ामी : अवार कौरसुन, बरेन्द रिवर्म बोडाएटी ११२६ : कयोकितनीकित, हिन्दी, अनु० बा० विश्वेश्वर, बाल्माराम एण्ट् बन्द बिल्ली १२४४ दामैन्ड : बौनित्य विवार नर्षा, भौकम्या संस्यू बीरीज़, १६३३ क्षेमराज :स्वच्छन्दतन्त्रभ्, प्रत्यभिज्ञाहदयम्
र्पा्डितराव : रननाबर, उु० करीनाथ का और नवनमोल् का, योकम्या विवामयन, वाराणडी,१६४४, दण्डी : गब्यारद्ज - मौहम्या संस्यू स बीरीड़ मनजय, यनिकि : पश्हपड, यौतम्या विवामनन, बाराणबी नरेन्द्रयनृदि : बलर महोदनि, नायकवाड़ बोरिरण्टड बीरीड़, ११४२ नानेड : मप्रशड (रकांगाबर की नानेश कृत व्यात्या)- काय्यमाशा : नाट्यहाल्त्र, गावकवाड़ ओरिएण्टल सीरीड़, मान-१,१६५६ मान-२, १११४
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मतूवरि : वाक्यप्रदीप (बनारब) मामइ : काव्याउर, झ० देवेन्दरनाथ सर्ां, बिहार राष्ट्रभाजा - परिबद, पटना १६६२ मम्मट : गड्यकनर, सृ. बा० विश्वेश्वर, न्ानमण्क ड्रिमिटैड, - वाराणबी काव्यप्रकाश -बालबोधिनी सहित षष्ठ संस्करण महमिमट् : व्यक्तिविकेक, अनु. डा० रेवापवाद दविवेदी, यौकम्या विषामयन- -"
वाराणडी,११६४ । : अमिवावृतिमातृषा, निर्णय सागर प्रेस्, बम्बई, १६१4 : अउकारसर्वस्य- संजीवनी, अुवादक एवं संपादक- डा० रामपन्द - विनेदी- मोतीलाड बनारबीदास राजेतर : बाच्य नीमांदा : हिन्दी झु० केदारनाम अर्ा, बारस्क - बिहार राष्ट्रमाचा परिचद, पटना,१६४४ इ्डट : गाव्याओर- निर्णय सामर प्रेत्र, बम्बई, ११२८ वामन : काज्याउंशरपन्रवृति - वोरिएप्टड एुकर एजैन्सी, १२२0 वाबस्पति मिन्र : सांल्यतत्पंतरोमुदी-परमा, व्यास्यरकार डा० बाभापवाद मिश्न प्रेम प्रवाशन, शाहाबाद, ११६६ विश्वनाथ : वाहित्य वर्मण, विषठा टीका, साउलाम सस्त्ी - मोतीशाड - बनारसीवास।
वियाभर : स्थाकी, श्रीमल्किनाचसातरवास्वाटीक्याफोता। इमवई संस्ूत- बीरीड, ११०३ हेमपन्द : काव्यानुशासन, काष्यमाठा म्ीहनं : रत्नाकी योगसूत्र (यो. स्) व्यासभाष्य सहित हिन्दी
गान्तिपन्त- पाण्डेय : स्वतन्त्तरकाशास्त्र, यौडम्या संस्मृत सीरीड़ वाराणमी वि० सं० २०२४
रण्णपुार-
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कृष्णप्ुार सर्मी : ध्वनि रिदान्स का काव्यशास्त्रीय ब्ोन्दर्यशास्नीय और स्ाय मनोवेत्ा निक अध्ययन। डा० पण्डिगा- प्रसाद तुस : नैचथ परिशीगन नगेन्दर : रब रिहान्त, नेशनल पक्किसिंग दाऊड, दिल्ली १६५४ निर्मंद मैन : रस विवान्त और सोन्दयशास्त्र, नेशन प्क्सिंग हारूस - दिल्ली, १६६७ पी०वी लाणे : संसतृत काव्यशास्त्र का इतिशास - मोतीछाउ बनारबीदास प्रेमस्वरप गुप्त : रनंनाबर का शास्त्रीय अ्ययन, भारत प्रगाज् मन्िर,
चिन्मयी माहेश्वरी : रवगंगाबर का सभीक्षांत्क अध्ययम बउदेव उपाध्याय : संसत बाठोचमा, हिन्दी. समिति, शिंवा - विनान,
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मंकुछा जायसवाल : काउिदास के काव्य में ध्यनि सलय रेवा प्रसाद पिवेदी : वानन्दवर्वन, मध्य प्रदेश हिन्दी मृन्य कादमी, मोपाड ११७२ राजवंज सदाय हीरा : भारतीय साहित्य सास्त्र कोश्त रामगोपाठ- मण्डारकर : वैष्णव, शैप औोर बन्य वार्मिष मा, भारतीय विया प्रकाशन वाराणबी, १६५७ युरेशबन्द पाण्डेय: ध्वनि सिंद्धान्त विरेधी सम्प्रदाय: उनकी मान्यताएँ शिपनाथ पाण्हेग : ध्वनि सम्प्रदाव का विकास
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