1. Alankara Sarvasva Rajanaka Ruyyaka Sanjivini Vidya Vachaspati Chakravarti Ed. Ramachandra Chakravarti MLBD
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[ विचित्रम् ] संजीविनी-सहितम् २४७
यन्निम्बानां परिणतफलस्फीतिरास्वादनीया१ यच्चैतस्याः कवलनकलाकोविदः काकलोकः ॥१७६।। अन्रानभिरूपाणां निम्बानां काकानां च समागम आशंसितः२।
विरोधमूलं विचित्रं लक्षयति स्वविपरीतफलनिष्पत्तये प्रयत्नो विचित्रम् ॥।सू० ४७।। यस्य हेतोर्यत्फलं, तस्य यदा तद्विपरीतं भवति, तदा तद्विपरीतफल- निष्पत्त्यर्थं कस्यचित्प्रयत्न उत्साहो विचित्रालंकारः। आश्चर्यप्रती- तिहेतुत्वात्। न चायं प्रथमो विषमालंकारप्रकारः। स्वनिषेधमुखेन
की पकी हुई निबौलियां और इसके लिए (विधाता ने) कौओं का यह संसार रच दिया है जो निगलने की कला में निपुण है। १७६। यहां एक दूसरे से बेमेल नींम और कौओं के समागम की प्रशंस। की गई है। अनुरूपता के आधार पर (इस अलंकार की) सम संज्ञा रखी गई है। विरोधमूलक विचित्र का लक्षण दिया जाता है। अपने (हेतु से) विपरीत फल की प्राप्ति के लिए प्रयत्न 'विचित्र' है। सू० ४७ ॥ जिस हेतु का जो फल होता है वह यदि उसके विपरीत हो तो उस (हेतु) से विपरीत फल की सिद्धि के लिए किसी का प्रयत्न या उत्साह विचित्र अलंकार है। क्योंकि (यह) आश्चर्य की प्रतीति का हेतु होता है। यह विषमालंकार का प्रथम भेद नहीं है। क्योंकि इसमें विपरीतता का ज्ञान स्व (अर्थात् हेतु) के निषेध द्वारा होता है जबकि विपरीत-प्रतीति के द्वारा अपना (अर्थात् हेतु)
अत्रेति। द्वयोरनभिरूपत्वम् आनुरूप्यम्। सरूपयो: सङ्गटना समालंकार इष्यते। इलाध्याइलाध्यत्वयोगेन द्वौ भेदावस्य सम्मतौ।। विचित्राय सङ्गतिः-विरोधेति। सूत्रम्- "स्वविपरीतफलनिष्पत्तये प्रयत्नो विचित्रम्"। विपरीतफलाय प्रयत्नो विचित्रम्। व्याचष्टे- यस्येति। (तदा?) तद्विपरी- १. स्फा (?) ति-शा० ना०। २. प्रशंसित :- अ०। शंसितः- शा० ना० शा१। 3. अनुरूपत्वात्-ना० शा१।
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२४८ अलंकारसर्वस्वम् [विचित्रम् ]
वैपरीत्यप्रतीतेः। विपरीतप्रतीत्या तु स्वनिषेधस्तस्य विषयः। यथा 'तमालनीला शरदिन्दुपाण्डु यशस्त्रिलोकाभरणं प्रसूते' इत्यादि१। इह त्वन्यथा प्रतीतिः। यथा- घेत्तु' मुख्इ२ अहरो अण्णंतो वलइ पेक्खिउ दिट्ठी। घडिदुं विहडंति भुआ रआअ सुरअम्भि वीसामो॥१७७॥ [ग्रहीतुं मुच्यतेऽघरोऽन्यतो वलति प्रेक्षितुं दृष्टिः। घटितुं विघटेते भुजौ रताय सुरतेषु विश्रमः ॥] अत्र मोचनवलनविघटनविश्रमाणां यथाक्रमं ग्रहणप्रेक्षणघटनरमणानि विपरीतफलानि3 प्रयत्नविषयत्वेन निबद्धानि। यथा वा उन्नत्यै नमति प्रभुं प्रभुगृहान्द्रष्टुं बहिस्तिष्ठति स्वद्रव्यव्ययमातनोति जडधीरागामिवित्ताशया। निषेध उस (विषमालंकार) का स्वरूप है। जैसे -'तमाल की तरह नीली" शरत् के चन्द्रमा की भाँति पाण्डु तथा तीनों लोकों के आभूषणरूप यश को फैलाती है।" आदि में। पर इस (विचित्रालंकार) में तो दूसरे प्रकार की प्रतीति होती है। जैसे- पकड़ने के लिए, अधर छोड़ देते हैं (पुनः उन्हें) दूसरी ओर नजर मुड़ जाती है (पुनः) देखने के लिए, भुजाएं आर्लिंगन को छोड़ देती है आलिंगन करने के लिए; काम की क्रीड़ा में विश्राम होता है रति के लिए ॥१७७। यहां 'छोड़ने, मुड़ जाने, आलिंगन को छोड़ देने तथा विश्राम' के क्रमशः 'पकड़ना, देखना, आलिंगन करना तथा रति (इन) विपरीत फलों का वर्णन इस रूप में हुआ है कि वे प्रयत्न या उत्साह के विषय हैं। अथवा जैसे तृष्णा से अन्धा सेवक उन्नति के लिये स्वामी के सामने झुकता है, स्वामी के घर की देख भाल के लिए बाहर खड़ा रहता है। जड़बुद्धि (सेवक) भविष्य ततेति। तस्य विपरीतफलस्येत्यर्थः। निर्वक्ति-आश्चर्येति। विषभप्रकाराद् वैलक्षण्यायाह-न चायमिति। इह हि स्वनिषेधो वैपरीत्यं गमयति। विषमे तु व्यत्ययः । उदाहरणतो द्रढयति-तमालेति। अत्र त्वन्यथा। घेत्तुमिति- ग्रहीतुं मुच्यतेऽधरः अन्यतो वलते द्रष्टुं दृष्टिः। घटितुं विघटेते भुजौ रतस्य (? रताय) सुरते विश्रम: ॥ योजयति - अत्रेत्यादि। १. इत्यादौ-अ०। २. मुच्चइ-नि०। ३. रीताफलानि-ना० शा०।
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[अधिकम् ] संजीविनी-सहितम् २४९
प्राणान्प्राणितुमेव मुञ्जति रणे क्विश्नाति भोगेच्छया सर्वं तद्विपरीतमेव कुरुते तृष्णान्धटृक्सेवकः ॥१७८॥ अत्र विपरीतफलनिष्पादनप्रयत्न: सुज्ञानः। आश्रयाश्रयिणोरानुरूप्यमधिकम् ॥सू० ४८।। विरोधप्रस्तावादिह निर्देशः। अनानुरूप्यस्य विरोधोत्थापकत्वात्। तच्चानानुरूप्यमाश्रयस्य वैपुल्येऽप्याश्रितस्य परिमितत्वाद्वा भवति,२ यद्वा- श्रितस्य वैपुल्येऽप्याश्रयस्य परिमितत्वाद्वा स्यात्। क्रमेण यथा-
में धन पाने की आशा से अपना धन खर्च कर देता है। प्राणों के लिए ही रण में प्राण गंवा देता है, भोग की लिप्सा से ही कष्ट सहन करता है। इस प्रकार सब कुछ विपरीत ही करता रहता है ।१७८। इस (उदाहरण) में विपरीत फल की सिद्धि के लिए प्रयत्न सरलता से समझा जा सकता है। आश्रय और आश्रयी में अनुरूपता न होना 'अधिक' है। सू० ४८।। यहां (इसका) निरूपण विरोध के प्रसंग से हुआ है क्योंकि अनुरूपता का न होना-अनानुरूप्य विरोध को जन्म देता है। यह अननुरूपता आश्रय के विशाल होने पर भी आश्रित के परिमित होने से होती है अथवा आश्रित के होने पर भी आश्रय के परिमित होने से होगी। क्रमशः उदाहरण
उन्नत्यै इति। भोगेच्छया भोक्तुमित्यर्थः। योजनं स्कुटमित्याह -अत्रेति। प्रयत्नस्तु विचित्रं स्याद् विपरीतफलाप्तये। निषेधतो वैपरीत्याद् विषमालङकृतेभिदा।। अधिकार्थ सूत्रम्- "आश्रयाश्रयिणोरनानुरूप्यमधिकम्"। आश्रयाश्रयिणोरन्यथावत्त्वमधिकम्। ससङगतिकं व्याचष्टे विरोधेत्यादि। आश्रयाधिक्यादाश्रय्याधिक्याच्च द्वैविध्यमाह तच्चेत्यादि। दयौरत्रेति। दौः स्वर्गः। धरा पृथ्वी। जलाधाराः समुद्राः। तदवधिरिति निःशेषत्वोक्तिः । अहो कियत् इयत्तैव नास्तीत्यर्थः। पूरणं दूरेऽस्तु का पूरण- कथेत्यर्थः । यावता शून्यमिति नाम्नोऽपि नास्तंगतिः काचित्।
१. अत्रानु ना०। २. भवति, यद्वा-अ० नास्ति।
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२५० अलंकारसर्वस्वम् [अधिकम् ] दयौरत्र क्वचिदाश्रिता प्रविततं पातालमत्र क्वचि- त्क्ाप्यत्रैव धराधराधरजलाधारावधिर्वर्तते१। स्फीतस्फीतमहो नभः कियदिदं यस्येत्थमेवंविधै- र्दूरे पूरणमस्तु शून्यमिति यन्नामापि नास्तं गतम्।।१७९।। दोर्दण्डाञ्ञि्त चन्द्रशेखरधनुर्दण्डावभङ्गोद्यत-
द्राक्पर्यस्तकपालसंपुटमिलद्ब्रह्माण्डभाण्डोदर-3 भ्राम्यत्पिण्डितचण्डिमा कथमहो नाद्यापि विश्राम्यति॥१८०।। पूवत्र नभस आश्रयस्य वैपुल्येऽप्याश्रितानां द्युप्रभृतीनां पारिमित्यं* चारुत्वहेतुः। उत्तरत्र तु टंकारध्वनेराश्रितस्य महत्त्वेऽपि ब्रह्माण्डस्या- श्रयस्य स्तोकत्वम्। (आश्रयाधिक्यरूप अधिक) यहां किसी जगह स्वर्ग आश्रित है, यहां किसी जगह पाताल फैला हुआ है, यहीं कहीं पृथ्वी, पर्वत और समूद्रों का समूह है, अहा यह आकाश कितना फैला-फैला है पर जिसका इस प्रकार से भी, पूरण तो जाने दो, शून्य नाम भी समाप्त नहीं हुआ है ॥१७९॥ (आश्रिताधिक्यरूप अधिक) भुजदण्ड से चढ़ाए हुए शिव-धनुष के दण्ड के टूटने से उत्पन्न टंकार-ध्वनि आर्य (राम) के बालचरित की प्रस्तावना की डुग्गी है। तेजी से चक्कर लगाने से कपालसंपुट से संघटित होने वाला ब्रह्माण्ड-भाण्ड के मध्य में घूमने वाला पुंजीभूत पराक्रम, अहो आज तक भी क्यों विश्राम नहीं लेता है ? १८०॥ पहले (उदाहरण) में आश्रयभूत आकाश के विशाल होने पर भी आश्रित स्वर्ग आदि की परिमितता चारुता उत्पन्न करती है पर दूसरे (उदाहरण) में आश्रितरूप टंकार-ध्वनि के महान होने पर भी आश्रय ब्रह्माण्ड की लघुता (बताई गई) है।
दोर्दण्डेति। आञ्चितमायमितम्। न त्वञ्चितमिति पाठः। गतिपूजनयो- रनुपयोगात्। आज्जिरायामार्थो धातुः। भ्राम्यंश्च पिण्डितचण्डिमा च योजयति-पूर्वत्रेति। १. वलिर्वतते अ०। २. पर्यास०-नि०। ३. ०टलसद्०-अ०। ४. त्रस्यत्-शा० । ५. पारिमित्ये-शा० ना०।
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[अन्योन्यम् ] संजीविनी-सहितम् २५१
परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम् ॥। सू० ४६॥ इहापि विरोधप्रस्ताव एव निर्देशकारणम्। परस्परजननस्य विरु- द्धत्वात्। क्रियाद्वारकं यत्र परस्परोत्पादकत्वं, न स्वरूपनिबन्धनं, स्वरूपस्य तथात्वोक्तिविरोधात्, तत्रान्योन्याख्योऽलंकार। यथा- कण्ठस्य तस्या: स्तनबन्धुरस्य मुक्ताकलापस्य च' निस्तलस्य। अन्योन्यशोभाजननादवभूव साधारणो भूषणभूष्यभावः।।१८०।। अत्र शोभाक्रियाख्यापक परस्परजननम्।
क्रिया के परस्पर निष्पादन में अन्योन्य है। ॥ सू० ४९॥ यहां भी विरोध का प्रसंग ही (इस अलंकारके) निरूपण का कारण है। क्योंकि परस्पर उत्पादन विरोध भरा है। जहां परस्पर की जनकता (उत्पा- दकता या हेतुता) क्रिया के माध्यम से होती है, स्वरूप के आधार पर नहीं क्योंकि स्वरूप को इस प्रकार का (अर्थात् एक दूसरे का जनक) बताने में (अपरिहार्य) विरोध है वहां अन्योन्य नामक अलंकार होता है। जैसे- उस (पार्वती) के कण्ठ का तथा स्तनों में ऊंचे नीचे गोलाकार मुक्ताहार का, एक दूसरे की शोभा पैदा करने के कारण, अलंकार्य और अलंकार का सम्बन्ध समान था॥१८१। यहां शोभा क्रिया के द्वारा एक दूसरे की (शोभा की) निष्पादकता है।
अनानुरूप्यमधिकमाश्रयाश्रयिणोर्मतम्। आश्रयाश्रयिवैपुल्यवशतो द्विप्रभेदकम्॥ अन्योन्यार्थ सूत्रम्- "परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम्"। क्रियाव्यतिहारेऽन्योन्यालङ्गारः। ससङगतिकं व्याचष्टे-इहापीत्यादि। न स्वरूपेति। स्वरूपापेक्षया परस्परजननस्यासम्भवेन सम्यग् विरोधित्वात् क्रियाद्वारकमेवेह परस्परजननम्। कण्ठस्येति। तनुत्वरम्यत्वे देवीकण्ठस्यामोक्तृत्वे सामग्री मुक्ताकलापस्य च वृत्तत्वान्निस्तलत्वमामोचनीयत्वे। इत्थं द्वयोरपि सम्पन्नसामग्रीकत्वाद् भूषणभूष्य- भाव: साधारणः । योजयति अत्र शोभेति। क्रियामुखकं क्रियाद्वारकम्। "क्रियाजननमन्योन्यमन्योन्यालङकृतिर्मता"।
१. च-शा० नास्ति। २. त्रियामुखकं-अ० नि०।
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२५२ अलंकारसर्वस्वम् [ विशेषोऽ- अनाधारमाघेय मेकमनेकगोचरमशक्यवस्त्वन्तरकरणं१ वि- शेषः ॥।सू० ५०।। इहाधारमन्तरेणाधेयं न वर्तत इति स्थितावपि यस्तत्परिहारेणा- धेयस्योपनिबन्धः, स एको विशेषः। यच्चकं वस्तु परिमितं युगपदनेकधा१ वर्तमानं क्रियते, स द्वितीयो विशेषः। व्यच्च किचिदारभमाणस्या- संभाव्यवस्त्वन्तरकरणं, स तृतीयो विशेषः । आनुरूप्यपरिहाररूपविरोध- प्रस्तावादिहोक्ति:। क्रमेण यथा- दिवमप्युपयातानामाकल्पमनल्पगुणगणा येषाम्। रमयन्ति जगन्ति गिरः कथमिव कवयो न ते वन्याः ॥१८२। प्रासादे सा पथि पथि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यक्के सा 'दिशि दिशि च सा तद्वियोगातुरस्य।
आधेय का आधारहीन होना एक का अनेकगोचर होना तथा असम्भाव्य वस्त्वन्तर का निष्पादन 'विशेष' है॥ सू० ५०॥ आधार के बिना आधेय नहीं रहता, यह होने पर भी उस (आधार) को छोड़कर आधेय का वर्णन विशेष का प्रथम भेद है। और एक परिमित वस्तु को एकसाथ अनेकत्र वर्तमान बताना दूसरा विशेष है। तथा किसी का तो प्रारम्भ हो और निष्पादन हो किसी अन्य असंभाव्य वस्तु का, वह तीसरा विशेष है। अनुरूपता को छोड़ देने से जो विरोध होता है उसका प्रसंग होने के नाते, यहां (विशेष का) निरूपण हुआ है। क्रमशः उदाहरण- (आधारहीन आधेयरूप विशेषालंकार) जो स्वर्ग जा चुके हैं पर जिनकी अनन्य गुणगान वालो वाणी जगत् को आनन्द देती रहती है वे कवि भला क्यों न वन्दनीय हों ॥१८२॥ (एक का अनेकगोचर होना-दूसरा विशेष) प्रासाद पर वह और पथ-पथ पर वह, पीछे वह, आगे वह, पर्यंक पर वह विशेषार्थं सूत्रम् "अनाधारमाधेयमेकमनेकगोचरमशक्यवस्त्वन्तरकरणं च विशेषः"। दिवमपीति। दिवमुपयातानामपि गिरो जगन्ति रमयन्तीत्यनाधाराधेयता।
१. करणं च-अ० । २. नेकत्र-अ० । 3. च -शा१ नास्ति। ४. दिशि दिशि - ना०। ४. पथि पथि-ना० ।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २५३ हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः॥१८३॥ निमेषमपि यद्येकं क्षीणदोषे१ करिष्यसि। पदं चित्ते तदा शंभो कि न संपादयिष्यसि ॥१८४॥। अत्र कवीनामाधाराणामभावेऽप्याधेयानां गिरामवस्थितिरन्यत्रभावो विषयार्थ इति विषयत्वेन तेषामाधारत्वात्। एकस्या एव योषितः प्रासादादौ युगपदवस्थानम्, तथा चित्तविषये पदकरणे प्रस्तुतेऽपि भावि लोकोत्तरवस्तुसंपादनं क्रमेण ज्ञेयम्।
दिशा-दिशा में वह; उसके वियोग से आतुर मेरे लिए तो मनकी कोई दूसरी प्रकृति नहीं रह गई है, वह, वह, वह, वह, वह, वह सारे संसार में है, कैसा अपूर्व है अद्वैत का यह सिद्धान्त ।।१८३।।
(असम्भाव्य वस्त्वन्तर का निष्पादनरूप विशेष) यदि एक क्षण भी दोषमुक्त मन पर शिव ! तुमने अपना स्थान बन लिया तो भला क्या नहीं पूरा कर दोगे ? १८४॥ इन (उदाहरणों) में क्रमशः कवि-रूप आधारों के न रहने पर भी आधेय- वाणी-की अवस्थिति, अन्यत्र न रह पाना, विषयता को लेकर है अतः (कवि) विषयता के आधार पर उन (वाणी) के आधार हैं। (दूसरे उदाहरण में) एक ही रमणी की प्रासाद आदि में एक साथ (चित्त में) अवस्थिति है। (तीसरे उदाहरण में) 'मन पर स्थान बना लेना' (यह) प्रसंग रहने पर भी लोकोत्तर वस्तु का निष्पादन समझना चाहिए।
प्रासादे इति। अत्रकस्या अनेकगोचरता। निमेषमपीति। अत्र सर्वसम्पा- दनात्मनोऽशक्यवस्त्वन्तरस्य करणम्। त्रिष्वपि योजयति-अत्र कवीनामिति। येषामिति षष्ठीनिर्देशेऽपि न गीभि: सह सम्बन्धमात्रम् अपि तु विशिष्टः सम्बन्ध इत्याह-अनन्यत्रेत्यादि। भावि। लोकोत्तरेति। किंशब्देन नञ्ा चाक्षिप्तोरऽर्थः।
१. न दोषं करिष्यति-शा० । २. भावि°-नि०, शा (?) नास्ति।
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२५४ अलंकारसर्वस्वम् [ व्याघाता-
यथा साधितस्य तथैवान्येनान्यथाकरणं व्याघातः ॥सू० ५१।। कंचिदुपायविशेषमवलम्ब्य केनचिद्यन्निष्पादितं वस्तु, तत्ततो- डन्येन केनचित्तत्प्रतिद्वन्द्विना तेनैवोपायविशेषेण यदन्यथा क्रियते, स निष्पादितवस्तुव्याहतिहेतुत्वाद्वयाघातः। यथा- दृशा दुग्धं मनसिजं जीवयन्ति दृशैव याः। विरूपाक्षस्य जयिनीस्ताः स्तुवे 'चारुलोचनाः ॥१८५॥ "अत्र दृष्टिलक्षणेनोपायेन 'स्मरस्य हरेण दाहविषयत्वंनिष्पादितम्। मृगनयनाभि 'स्तेनैवोपायेन तस्य जीवनीयत्वं क्रियते। तच्च दाह- विषयत्वस्य प्रतिपक्षभूतम्। तेन व्याघाताख्योऽयमलंकारः। सोऽपि एक प्रकार से निष्पन्न हुए का उसी प्रकार से दूसरे द्वारा अन्यथा निष्पादन व्याघात है ॥।सू० ५१। जिस किसी उपाय-विशेष को लेकर किसी के द्वारा जो वस्तु सम्पादित है, उसका उससे भिन्न किसी दूसरे के द्वारा-जो उसका प्रतिद्वन्दी है-उसी उपाय- विशेष के सहारे जो अन्यथा निष्पादन है वह सम्पादित वस्तु की व्याहति के कारण व्याघात कहलाता है। जैसे नेत्र से भस्मीभूत काम को जो नेत्र से ही जिला देती हैं, विरूपाक्ष (शिव) को जीतने वालीं उन वाम-लोचनाओं की स्तुति करते हैं ॥१८५॥ यहाँ नेत्ररूप उपाय से काम को शंकर ने भस्मीभूत किया था। मृगांग- नाओं ने पुनः उसी उपाय से उसे जीवित कर दिया। यह जीवित होना- भस्मीभूत होने का विरोधी या प्रतिद्वन्दी है। अतः यह व्याघात नामक अलंकार अनाधारादिभेदेन विशेषोऽपि त्रिधा मतः। व्याघातार्थ सूत्रम्- "यथा साधितस्य तथैवान्येनान्यथाकरणं व्याघातः" । एकेन यद् यथा साधितं तस्य तर्थवान्यथाकरणं व्याघातः। व्याचष्टे-किश्व- दित्यादि। दृशेति। दृशा दग्धस्य दृशैव जीवनाच्चारुलोचना विरूपाक्षस्य जयिन्यः। योजयति-अत्र दृष्टीति। जीवनीयत्वं प्राणितव्यत्वं जीवनमित्यर्थः । १. यं कं-नि०। २. वस्तु-शा० ना० नास्ति। 3. स्तुमो-नि०। ४. वाम-नि०। ५. इति-ना०। ६. स्मरस्य-शा० नास्ति। ७. सम्पादितम्-ना० । - भिः पुनस्त°-अ० । ९. जीवनविषयत्वम्-अ०। जीवनीत्वम्-ना०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २५५ व्यतिरेकनिमित्तत्वेनात्रोक्त: । विरूपाक्षस्येति१ चारुलोचना2 इति 3च व्यतिरेकगर्भावेव वाचकौ। जयिनीरिति व्यतिरेकोक्तिः। पूर्ववदिह प्रकरणे४ लक्षणम्। प्रकारान्तरेणाप्ययं भवतीत्याह सौकर्येण कार्यविरुद्धक्रिया च।।सू० ५२।। वयाघात इत्येव। किंचित्कार्यं निष्पादयितुं संभाव्यमान: कारणविशेष- स्तत्कार्यविरुद्ध-परिनिष्पादकत्वेन यत्स सम्थ्यंते, सोऽपि संभाव्यमानकार्य- व्याहतिनिबन्धनत्वाद्वचाघातः। कार्यविरुद्धकार्यनिष्पत्तिश्च् कार्यापेक्षया है। इसका निबंधन भी व्यतिरेक को निमित्त बनाकर हुआ है। विरूपाक्ष तथा वामलोचना ये दोनों ही शब्द व्यतिरेकगर्भित हैं। 'जीतने वाली' यह भी व्यतिरेक का अभिधान है। पहले की भाँति इस (विरोध के) प्रकरण में (प्रस्तुत अलंकार का) स्वरूप बतलाया गया है। दूसरे प्रकार से भी यह (अलंकार) होता है, यह बताते हैं- सुकरता के साथ कार्य के विपरीत क्रिया भी (व्याघात है) ॥सू० ५२।। (यह भी) व्याघात ही है। किसी कार्य को साधने के लिये सम्भावित हेतु-विशेष का उस कार्य से विरुद्ध साधक के रूप में जो समर्थन किया जाए, वह भी संभावित कार्य की व्याहति को लेकर होने के कारण व्याघात है।
अयं चात्र व्यतिरेकहेतुरित्याह सोऽपीति। विरूपाक्षचारुलोचनाशब्दौ हि व्यतिरेकगभौं। जयेन च व्यतिरेक उक्तः। सङ्गतिमाह-पूर्ववदिति। अनानुरूप्यमिह लक्षणं प्रकरणस्य। यथा साधनमेकेन तर्थैवान्येन बाधनम्। व्याघातोऽथ विरुद्धस्य सौकर्येण क्रिया तथा॥ तत्र सूत्रान्तरम् "सौकर्येण कार्यविरुद्धक्रिया च"। कार्यापेक्षया सुकरस्य विरुद्धस्य करणं कार्यव्याहतिहेतुरिति व्याघातान्तरम्। १. इति-शा० ना० शा१ नास्ति। २ वाम°-नि०। 3. च-शा० ना० शा१ च व्यतिप्रकरे- नि० नास्ति। ४. रणम्-नि०। ५. च व्याघातः-नि०। ६. व्याघातारव्य इत्येव-शा१। 'व्याघात इत्येव' इयानंशो-नि० नास्ति। ७.परि°-उपसर्गः अ० नि० नास्ति। ८ कार्यविरुद्धनिष्पत्तिः-शा०।
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२५६ अलंकारसर्वस्वम् [ द्वितीय
सुकरा। तस्य कारणस्यात्यन्तं तदानुगुण्यात्। न त्वत्र कार्याभिमतस्य कार्यत्वाभावः। तद्विरुद्धस्यात्र सौकर्येण कार्यत्वात्। अत एव द्वितीया- द्विषमाद्गेदः। तत्र हि कार्यस्यानुत्पत्तिरनर्थस्य चोद्रमनम्। इह तु कार्य१ सुखकार्यमेव न भवति। तद्विरुद्धस्यानर्थस्य व्यतिरेकिणोऽप्यत्र सुष्ठ- कार्यत्वात्। ध्यथा हर्षचरिते राज्यवर्धनं प्रति श्रीहर्षोक्तिषु 'यदि बाल इति, सुतरामपरित्याज्योSस्मि। रक्षणीय इति, भवद्भुज- पञ्जरमेव रक्षास्थानम्' इत्यादि। (संभावित) कार्य के विरुद्ध (दूसरे) कार्य का साधन सुकर इसलिए होता है क्योंकि इस कारण की उस (दूसरे कार्य) से अत्यधिक अनुरूपता रहती है। इस (अलंकार) में कार्यरूप में अभीष्ट की कार्यता समाप्त नहीं होती है अपितु उससे विपरीत (कार्य) का सुकरता से सम्पादन हो जाता है। इसी आधार पर द्वितीय विषम से (इसका) भेद है। उसमें तो कार्य की उत्पत्ति नहीं होती और साथ ही अनर्थ उत्पन्न हो जाता है। पर इस (अलंकार) में न केवल कार्य साध्य होता है बल्कि उसके विरोधी अनर्थ रूप व्यतिरेक का भी सुकरता से साधन हो जाता है। जैसे कि हर्षचरित में राज्यवर्धन के प्रति हर्ष की उक्तियों में - अगर बालक हूँ, तो निश्चित ही (मुझे) छोड़ना नहीं चाहिए। रक्षणीय हूँ, अतः आप का भुजारूपी पिंजड़ा ही रक्षा का स्थान हो सकता है ......... इत्यादि।
व्याचष्टे व्याघात इत्यादि। अयं लक्ष्यपदानुषङ्ग। कार्यार्थं सम्भावितस्य कारणविशेषस्य तद्विरुद्धनिष्पादनं व्याघातः। विरुद्धनिष्पत्तिश्च सुकरा कारणस्य विशिष्टानुगुण्यात्। इत्थं च सत्यनर्थोत्पत्तिलक्षणाद् विषमाद् भेद इत्याह-न त्वत्रेति। न ह्यत्र कार्यमकार्यं किन्तु तद्विरुद्धं सुकरं कार्यम्। अतो द्वितीयविषमाद् भेदः। यतस्तत्र कार्यमकार्य, विरुद्धत्वेऽनर्थः। इहोभय- मपि कार्यमिति। यदि बाल इतीति। अत्र बाल्यं रक्ष्यत्वं चाप्रस्थाने हेतुत्वेन सम्भावितं प्रत्युत सौकर्येण प्रस्थानं साधयति।
१. कार्यमकार्यमेव°-नि० ना०, 'एव' अ० नास्ति। २.र ्र्थंव्य°-अ०। ३. 'यथा' स्थाने 'उदाहरणम्' अ०।
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[कारणमाला ] संजीविनी-सहितम् २५७
अत्र राज्यवर्धनेन® श्रीहर्षप्रस्थापने कार्ये बाल्यरक्षणीयत्वादि कारण- त्वेन यत्संभावितं, तत्प्रत्युताप्रस्थापनकारणत्वेन सुकरतया 'श्रीहर्षेण राज्यवर्धनस्य समर्थितमिति 'व्याघाताख्योऽलंकारः।
लक्ष्यन्ते। तत्र- एवं विरोधमूलानलंकारान्निर्णीय शृङ्गलाबन्धोपचिता अलंकारा
पूर्वस्य पूर्वस्योत्तरोत्तरहेतुत्वे कारणमाला ॥सू० ५३।। यदा पूर्वं पूर्व क्रमेणोत्तरमुत्तरं प्रति "हेतुत्वं भजते तदा कारण- मालाख्योऽयमलंकारः९। यथा-
यहाँ राज्यवर्धन ने श्रीहर्ष के प्रस्थान-कार्य के लिए शैशव, रक्षणीयता आदि जिनको कारण माना था, उन्हीं को श्रीहर्ष ने राज्यवर्धन के प्रस्थान न करने का कारण, सुकरता से, बना दिया है अतः व्याघात नामक अलंकार है। इस प्रकार विरोधमूलक अलंकारों का निर्णय करने के बाद शृंखलाबन्ध पर आश्रित अलंकारों का निरूपण किया जा रहा है। इनमें से- पूर्व-पूर्व के उत्तरोत्तर का हेतु होने पर कारणमाला होती है ॥सू० ५३। जब पूर्व-पूर्व क्रमशः उत्तर-उत्तर के लिए कारण बन जाता है तो कारणमाला नामक अलंकार होता है। जैसे-
सङ्गत्यन्तरायाह- एवमिति। तत्र कारणमालार्थं सूत्रम्- "पूर्वपूर्वस्योत्तरहेतुत्वं कारणमाला"। व्याचष्टे-यदा पूर्वमित्यादि।
१. नस्य-अ० शा० । २. प्रत्युत प्रस्थापन°-शा० ना० शा१। 3. प्रस्थापनलक्षणस्य विरुद्धस्य कारण°-अ० । ४. श्रीहर्षेण राज्यवर्धनस्य-इयानंशो अ० नास्ति। ५. व्याधातोऽलं°-अ०। ६. बन्धेन विचित्रिता :- अ०, शा (?)। बन्धोपचित्रिता-शा१। ७. पूर्वपूर्वस्यो० -अ० । =. हेतुतां-ना० शा १ । ९. खयोऽलंकार-ना० शा०। १७
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२५८ अलंकारसर्वस्वम् [ एका-
जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणप्रकर्षो विनयादवाप्यते। गुणप्रकर्षेण जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा हि संपद:।१८६।। कार्यकारणक्रम *एवात्र चारुत्वहेतुः। यथापूर्व परस्य विशेषसातया 3स्थापनापोहने एका- वली ॥।सू० ५४।। यत्र पूर्वं पूर्व प्रति क्रमेण परं परं विशेषणत्वमनुभवति स एका- वल्यलंकारः। विशेषणत्वं च स्थापनेन निवर्तनेन बा। स्थापनेन यथा- पुराणि यस्यां सवराङ्गनानि वराङ्गना रूपपुरस्कृताङ्गयः। रूपं समुन्मीलितसद्विलासमस्त्रं विलासा: कुसुमायुधस्य।।१८७। इन्द्रियों को जीत लेना विनय का कारण है, गुणों की वृद्धि विनय से प्राप्त होती है, गुणों की वृद्धि से प्रजा प्रेम करती है। और जनता के अनुराग से ही समृद्धियाँ पैदा होती हैं ॥१८६।। इसमें कारण तथा कार्य का क्रम ही सौन्दर्य का आधार है। प्रथम के अनुसार पर का विशेषणरूप में स्थापन या अपोहन एकावली है।सू० ५४॥। जहाँ पूर्व-पूर्व के लिए करमशः परवर्ती-परवर्ती विशेषण होने की प्रतीति करता है वह एकावली अलंकार है। स्थापन या निवर्तन (अपोहन) से विशेषणता होती हैं। स्थापन का उदाहरण- जहाँ नगर कामिनियों से भरे थे, कामनियों के अंग सौन्दर्य से भूषित थे, सौन्दर्य रमणीय विलास से उल्लसित था और विलास कामदेव का अस्त्र था॥१८७॥ जितेन्द्रियत्वमिति। जितेन्द्रियत्वाद् विनयः, विनयाद् गुणप्रकर्षः, ततो जनानुरागः। अत्र सारादिविच्छित्त्यन्तरसम्भवेऽपि नालङ्कारान्तरमित्याह- कार्यकारणेति। कार्यकारणमालायां प्राचः प्राचः परं परम्। एकावल्यै सूत्रम्- १. गुणाधिके पुन्सि जनो-शा१। २. एव चात्र-ना० शा०। ३. स्थापनेऽपोहने वा-अ० । ४. परं प्रति-शा० । ४. वल्याख्योलं°-ना०। ६. गृहाणि-अ० शा १ (?) ।
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वली ] संजीविनी-सहितम् २५९ अत्र वराङ्गनाः 'पुराणां विशेषणं स्थापनीयत्वेन स्थितम्। एवं वराङ्गनानां रूपमित्यादि ज्ञेयम्। निवर्तनेन यथा- न तज्जलं यन्न सुचारुपङ्कजं न पङ्कजं ्यन्न निलीनषट्पदम् न षट्पदोऽसौ न जुगुञ्ज यः कलं न गुञ्जितं तन्न जहार यन्मनः।।१८८।। अत्र जलस्य सुचारुपङ्कजत्वं विशेषणं निषेध्यत्वेन निबद्धम्३। एवं "पङ्कजादीनां निलीनषट्पदत्वादि" ज्ञेयम्। इसमें कामिनियां नगरों के स्थापनीयरूप में विशेषण हैं। इसी प्रकार कामनियों के सौन्दर्य आदि का भी (कमशः विशेषण बनना) समझ लेना चाहिए। निवर्तन (अपोहन) का उदाहरण- वह डाल नहीं जिसमें सुन्दर कमल न हो, वह कमल नहीं जिसमें भ्रमर न बैठा हो, वह भ्रमर नहीं जो मधुर गुंजार न करता हो और वह गुंजार नहीं जो मन न हर ले ॥१८८॥ इसमें जल का 'सुन्दर कमल' होना निषेध्य (निवर्तनीय) विशेषण के रूप में है। इसी प्रकार 'जिसमें भ्रमर न बैठा हो' आदि को कमलों का (निषेध्य विशेषण) समझ लेना चाहिए।
"यथापूर्व परस्य विशेषणतया स्थापनेऽपोहने वैकावली"। यदि पूर्वपूर्वस्य परं परं विशेषणतया स्थाप्यते सैका एकावली। यच्चा- पोह्यते सान्या। पुराणीति। अत्र पुराणां वराङ्गनाः, तासां रूपं, तस्य विलास: कुसुमा- युधस्य विशेषणतया स्थाप्यते। योजयति-अत्र वराङ्गना इति। न तज्जलमिति। अत्र जलादेः पूर्वपूर्वस्य पङ्डजाद्युत्तरोत्तरं विशेषण- मपोह्यतया स्थितम। एकावल्यां यथापूर्व भेदकं तूत्तरोत्तरम् । स्थाप्यते पोहयते चैव तेनेयं द्विविधा मता॥
१. गृहाणाम्-अ०, नगराणाम् (?) शा१। २. 'तद् यदलीनषट्पदत्वं-अ० नि० । 3. स्थितम्-नि०। ४. प ङ्कजानामलीनषट्पदत्वं-नि०।अलीन-अ०। ५. पदत्वनित्यादि - शा० ना०।
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२६० अलंकारसर्वस्वम् [मालादीपकम्] पूर्वस्य पूर्वस्योत्तरोत्तरगुणावहत्वे मालादीपकम् ॥।सू० ५५।। उत्तरोत्तरस्य पूर्व पूर्वं प्रत्युत्कर्षहेतुत्वे एकावली। पूर्वस्य पूर्वस्यो- त्तरोत्तरोत्कर्षनिबन्धनत्वे तु2 मालादीपकम्। मालात्वेन चारुत्वविशेष- माश्रित्य दीपकप्रस्तावोल्लड्घनेनेह लक्षणं कृतम्। गुणावहत्वमुत्कर्षहेतु- त्वम्। यथा- संग्रामाङ्गणसंगतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्णय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम्। कोदण्डेन शरा: शरैररिशिरस्तेनापि भूमण्डलम् तेन त्वं भवता च कीर्तिरमला'कीर्त्या च लोकत्रयम्*॥१८९।।
पूर्व-पूर्व द्वारा उत्तरोत्तर में गुणों का निबंधन होने पर मालादीपक होता है।सू० ५५॥। उत्तरोत्तर के पूर्व-पूर्व के प्रति श्रीवृद्धि का हेतु होने पर एकावली होती है तो पूर्व-पूर्व के उत्तरोत्तर के प्रति उत्कर्ष का कारण बनने पर मालादीपक होता है। माला के रूप में एक विशेष सौन्दर्य होता है जिसके आधार पर दीपक के प्रकरण को छोड़कर यहाँ (इसका) स्वरूप-निरूपण किया गया हैं। गुणों के निबन्धन का अर्थ है उत्कर्ष का कारण बनना। उदाहरण- युद्धस्थल में आप जब धनुष-बाण चढ़ा लेते हैं तो देव ! सुनो कौन-कौन क्या-क्या सहसा ही पा जाता है, धनुष बाण को, बाण शत्रुओं के सिर को, और वे (शिर) भूतल को और वह (भूतल) आपको और आप धवल यश को और यश तीनों लोकों को (पा जाता है) ॥१८९॥
मालादीपकार्थ सूत्रम्- "पूर्वपूर्वस्योत्तरोत्तरगुणावहत्वे मालादीपकम्" एकावल्यामुत्तरोत्तरस्य पूर्वपूर्वगुणावहत्वमिह तु व्यत्ययः। व्याचष्टे-उत्तर- स्येति। प्रस्तावोल्लंघने हेतुमाह-मालात्वेनेति। सङय्रामेति। अत्र कोदण्डादेः पूर्वपूर्वस्य शराद्युत्तरोत्तरसमासादनं दीप-
१. पूर्वपूर्व°-अ० । २. अत्रायं 'तु' अ० पुस्तके 'पूर्वस्य तूत्तर° इति स्थलेऽस्ति। ३.णमागतेन-नि० । ४. तुला-नि० । ५. पद्यमिदम् अ० पुस्तके किञ्चिद्द्वेदेनेत्थं प्राप्यते-
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] सार: ] संजीविनी-सहितम् २६१
अत्र कोदण्डादिभिः क्रमेण शरादीनामुत्कर्षो विहितः'। समासादन२- लक्षणक्रियानिबन्धनं च दीपकं, दीपनविषयाणामुत्तरोत्तराभिमतत्वेन कृतम्। उत्तरोत्तरमुत्कर्षः सारः"॥सू० ५६॥। पूर्वपूर्वापेक्षयोत्तरोत्तर स्योत्कृष्टत्वनिबन्धनं सारः। यथा- इसमें धनुष आदि से क्रमशः बाण आदि के उत्कर्ष का विधान है। 'पा जाना' के रूप में (एक) क्रिया द्वारा निबद्ध दीपक का प्रयोग, दीपन के कार्यों को उत्तरोत्तर अभिमत बनाकर, किया गया है। उत्तरोत्तर उत्कर्ष 'सार' है ॥सू० ५६॥ पूर्व-पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर में उत्कर्ष का ग्रथन सार (अलंकार) है। उदाहरण-
नेन गुणावहत्वम्। व्याचष्टे-अत्र कोदण्डादिभिरिति। मालादीपकमाद्याद्यस्योत्तरोत्तरदीपनम् । सारार्थं सूत्रम्- "उत्त रोत्तरमुत्कर्षः सारः" ब्याचष्टे-पूर्वपूवे ति। निबन्धनं ग्रथनम्। 'संग्रामाङ्कणसंगतेन भवता चापे समारोपिते सम्प्राप्ते परिपन्थियोधनिवहे साम्मुख्यमासादिताः । कोदण्डेन शरा: शरैररिशिरस्तेनापि भूमण्डलं तेन त्वं नृपते ! त्वया सितयशस्तेनापि लोकत्रयम् ।' १. अभिहित :- अ० । २. क्रियालक्षण° ३. दीपनम्-इति ना० पुस्तके स्खलिततया अशुद्धः पाठः। ४. क्रियाणा°-नि०। 4. सारालङ्कारोऽयं नि० पुस्तके 'उदार' नाम्ना व्यपदिष्टः । तत्रायं पाठ: 'उत्तरोत्तरम्त्कर्षणमुदारः ।' सारस्यवापराभिधानमुदार इति तत्रत्या टिप्पणी। किन्तु 'उदार'नामापेक्षया 'सार'नाम्न: स्वीकार एव प्रमाणवलाज्ज्यायान्। मया परीक्षितानामादर्शपुस्तकानाम्, अ० पुस्तकस्य, खसंज्ञकस्य च (यस्योपयोगः निर्णयसागरीयसर्वस्वसम्पा- दकेन कृतः) 'सार'इति नामस्वीकारे एकमत्यम्। जयरथोऽपि स्वव्याख्यायां प्रकृतालङ्कारबीजं किमिति निर्णीय स्वोक्तार्थ प्रमाणयितुं
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२६२ अलंकारसर्वस्वम् [सार: ]
'जये धरित्र्याः पुरमेव सारं पुरे गृहं सदनि चैकदेशः। तथापि शय्या शयने वराङ्गी2 रत्नोउज्वला राज्यसुखस्य सारम्॥१९०॥ राज्ये सारं वसुधा वसुंधरायां पुरं पुरे सौधम्। सौधे तल्पं तल्पे वराङ्गनानङ्गसर्वस्वम् ॥१९१।। ₹अत्र धरित्र्यपेक्षया पुरस्य सारत्वमेवं पुरापेक्षया तदेकदेशस्य गृह- स्येत्यादि योजनीयम्।
धरती की विजय में नगर ही सार है, नगर में भी घर और घर में भी इसका एक कोना, उसमें भी शय्या और शय्या में भी रत्न की भाँति उज्ज्वल सुन्दरी ही राज्य के सुख का सार है ॥१९०॥ राज्य का सार धरती और धरती का पुर, पुर का प्रासाद, प्रासाद का शय्या और शय्या का सार है काम का सर्वस्व-भूत सुन्दरी ॥१९१॥ इसमें धरती की अपेक्षा पुर को सार बताया गया है। इसी प्रकार पुर की अपेक्षा उसके एक अंश घर को, इस प्रकार से योजना कर लेनी चाहिए।
*राज्य इति। सारमित्यत्र वस्त्वित्याद्यध्याहर्तव्यम्। इतरथा लिङ्गा- सङ्गतिः। योजयति-अत्र राज्य इति। उत्तरोत्तरमुत्कर्षावहत्वे सार इष्यते। साराभिधस्यवालङ्कारस्य लक्षणान्तरमुपादत्ते-'यदुक्तम् -- उेत्तरोत्तर- मुत्कर्षो भवेत् सारः परावधिः।' अग्रेऽपि नाममात्रनवीकरणरसिकानां केषामपि मतमनङ्गीकुर्वन् 'सार'शब्देनैव प्रकृतमलङ्कारं स्मरति- 'न पुनरिदमन्तर्भूतं सारे परिमितविषये'-इत्यादिना। १. पद्यमिदं अ० शा१ नास्ति। २. वरा स्त्री-नि०। ३. 'अत्र धरित्र्यपेक्षया ...... योजनीयम्'-अयमंशः 'जये धरित्र्याः' इत्यादि- पद्यानन्तरमेव नि० पुस्तकेऽस्ति। 'राज्ये सार'मित्यादिपद्यानन्तरञ्च नि० पुस्तकेऽ्यमधिक: पाठ :- 'अत्र राज्यापेक्षया वसुन्धरायाः सारत्वमेवं वसुधापेक्षया तदेक- देशस्य पुरस्येत्यादि योजनीयम्'। अ० शा१ पुस्तकयोरप्ययमत्र पाठ :- 'अत्र राज्यापेक्षया वसुधायाः सारत्वं, वसुधापेक्षया पुरस्य'। * 'जये धरित्र्या' इत्यादिपद्यं सञ्जीविन्यां नोपात्तम्। अत्र केवलं 'राज्ये सार'मित्याद्येव वर्तते।
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[काव्यलिङ्गम् ] संजीविनी-सहितम् २६३
एवं शृङ्गलाविच्छित्यालंकाराः१ प्रतिपादिताः। अधुना तर्कन्याया- श्रयेणालंकारद्वयमुच्यते। तत्र- हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गम् ॥सू० ५७।। यत्र हेतुः कारणरूपो वाक्यार्थगत्या विशेषणद्वारेण वा पदार्थगत्या लिङ्गत्वेन निबदधचते, तत्काव्यलिङ्गम्। तर्कवैलक्षण्यार्थ काव्यग्रहणम्। न ह्यत्र व्याप्तिपक्षधर्मतोपसंहारादयः४ क्रियन्ते। वाक्यार्थगत्या च निबध्यमानो हेतुत्वेनैवोपनिबद्धव्यः, नोपनिबद्धस्य हेतुत्वम्। अन्यथा- र्थान्तरन्यासान्नास्यभेदः स्यात्"। 'क्रमेणोदाहरणम्-
इस प्रकार शृंखलाबन्ध की सुन्दरता द्वारा अलंकारों का प्रतिपादन हो गया। अब तर्कन्याय के आधार पर अलंकारों का निरूपण किया जाता है। इनमें से- हेतु के वाक्य या पद का अर्थ होने पर काव्यलिंग होता है॥सू० ५७॥ जहाँ कारणरूप हेतु का वाक्यार्थ के रूप में अथवा विशेषण के द्वारा पदार्थ के रूप में उपादान होता है, वह काव्यलिंग है। तर्क से भिन्नता बताने के लिए 'काव्य' का प्रयोग किया गया है क्योंकि इसमें व्याप्ति, पक्षधर्मता तथा उपसंहार आदि नहीं होते हैं। जहाँ वाक्यार्थ के माध्यम से (हेतु का) उपादान हो वहाँ हेतुरूप में ही निबन्धन होना चाहिए, उपनिबद्ध (वाक्यार्थ) को हेतु नहीं बनना चाहिए (अर्थात् हेतु का निबन्धन शाब्द होना चाहिए आर्थ नहीं), नहीं तो अर्थान्तरन्यास से इसका भेद नहीं किया जा सकेगा। क्रमशः उदाहरण-
सङ्गत्यन्तरायाह-एवं शृङ्गलेति। तत्र काव्यलिङ्गार्थ सूत्रम्- "हे तोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गम्"। वाक्यार्थपदार्थरूपे हेतौ द्विधा काव्यलिङ्गम्। व्याचष्टे-यत्र हेतुरिति। वैलक्षण्यं दर्शयति-न ह्यत्रेति। अनुपाधिकः सम्बन्धो व्याप्तिः। हेतोः पक्षे स्थितिः पक्षधर्मता। उपसंहारो निगमनम्। आदिशब्दादुपनयादि। वाक्यार्थत्वे विशेषमाह-वाक्यार्थगत्येति। अनेन हेतुत्वस्य शाब्दत्वनियम उक्तः। आर्थत्वेऽर्थन्तिरन्यासप्राप्तिरित्याह -अन्यथेति। अर्थान्तरन्यासे
१. °वृत्त्याल°-अ० । २. र्थता०-नि० ना०। ३. वा-ना० नास्ति। ४. धर्मोप°-ना० शा०। ५. भवेत्-शा० ना०। ६. क्रमेण यथा-नि० शा०।
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२६४ अलंकारसर्वस्वम् [ काव्य-
यत्त्वन्नेत्र समानकान्ति सलिले मग्नं तदिन्दीवरं मेधैरन्तरितः प्रिये तव मुखच्छायानुकारी शशी। येडपि त्वद्रमनानुसारिगतयस्ते राजहंसा गता- स्त्वत्सादृश्यविनोदमात्रमपि मे दैवेन न क्षम्यते ॥१९२। मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्यपेक्षास्तवागतिज्ञं समबोधयन्माम्। व्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिणस्यामुत्पक्ष्मराजीनि विलोचनानि ॥१९३॥ पूर्वत्र पादत्रयार्थोऽनेकवाक्याथरूपश्चतुर्थपादार्थे हेतुत्वेनोपन्यस्तः। उत्तरत्र तु' संबोधने 'व्यापारयन्त्यः' इति मृगीविशेषणत्वेनानेकः पदार्थो हेतुत्वेनोक्त: ।
(वाक्यार्थ काव्यलिंग) प्रेयसि ! वह नील कमल, जिसमें तुम्हारे नेत्र के समान कान्ति है, जल में डूबा हुआ है। तुम्हारी मुखशोभा का अनुकरण करने वाले चन्द्रमा को बादलों ने छिपा लिया है। और वे राजहंस भी चले गए हैं जिनकी गति में तुम्हारी गति का अनुसरण था। (मालूम पड़ता है कि) तुम्हारे सदृश के साथ विनोद भी मेरे लिए विधाता को मंजूर नहीं है ॥१९२॥ (पदार्थ काव्यलिंग) आम के अंकुरों से उदासीन, दक्षिण दिशा की ओर अपन निष्पलक नयनों से संकेत करने वाली हिरनियों ने तुम्हारे रास्ते से अनभिज्ञ मुझको संबोधित किया था॥१९३। पहले (उदाहरण) में प्रथम तीन चरणों से निकलने वाला अर्थ-जो अनेक वाक्यों का अर्थ है- चतुर्थ चरण के हेतुरूप में रखा गया है (अर्थात् प्रथम तीन चरण अन्तिम चरण के हेतु हैं)। दूसरे (उदाहरण) में संकेत करने वाली- (व्यापारयन्त्यः) इस रूप में हिरनी के विशेषणरूप में आने वाले अनेक पदार्थ को संबोधन के लिए हेतुरूप में रखा गया है।
ह्यर्थात् प्रकृतसमर्थनमिह तु शब्दत इति विभागः। यत् त्वन्नेत्रेति। नेत्र- रुचिसमानरुच इन्दीवरस्य सलिले निमज्जनं मुखच्छायानुकारस्य शशिनो मेघैः छादनं गमनानुसारिगतीनां हंसानां पलायनं चेति वाक्यार्थत्रयमेकवाक्यता- पन्नायां सादृश्यविनोदाक्षान्तौ हेतुः। मृग्य इति। दर्भनिर्व्यपेक्षत्वलोचनव्यापा- रणे सम्बोधने हेतुः। उभयत्र योजयति-पूर्वत्रेत्यादि। . तु -- ना० शा० नास्ति।
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लिङ्गम् ] संजीविनी-सहितम् २६५ एवमेकवाक्यार्थपदार्थगतत्वेन काव्यलिङ्गमुदाहियते। यथा- मनीषिताः सन्ति गृहेषु देवतास्तपः क्व वत्से क्व च तावकं वपुः। पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्त्रिणः ॥ १९४।। 18 यद्विस्मयस्तिमितमस्तमितान्यभाव- मानन्दमन्दममृतप्लवनादिवाभूत्। तत्संनिधौ तदधुना हृदयं मदीय- मङ्गारचुम्बितमिव वयथमानमास्ते ॥ १९५ ॥ पूर्वत्र वरप्राप्तिहेतुभूततपोनिषेधे४ 'मनीषिताः' इति वाक्यार्थ रूपो" हेतुनिर्दिष्टः। उत्तरत्र पुनः 'अस्तमितान्यभावम्' इत्यत्र विस्मयस्तिमित- मिति विशेषणद्वारेण पदार्थ:६।
इसी प्रकार (जैसे कि अनेक वाक्यार्थ और अनेक पदार्थ हेतु बन सकते हैं) एक वाक्यार्थ तथा (एक) पदार्थ में (हेतु के) रहने से काव्यलिंग का उदाहरण दिया जा रहा है। घर में मनचाहे देवता हैं। वत्से ! कहाँ तप और कहाँ तुम्हारा शरीर! शिरीष का कोमल फूल भौंरे के चरण को सहन भी कर ले पर पक्षी का (चरण-भार) सहन नहीं कर सकता है ॥१९४॥ । विस्मय में डूबा हुआ, दूसरे भावों को भुला देने वाला जो मेरा हृदय मानों सुधा की वर्षा से आनन्द से मन्थर बन जाता था वही मेरा हृदय आज उसके समीप में मानो अंगारों में लिपटा होने से जल रहा है ॥१९५॥ पहले में वर को पाने के लिए साधनभूत तप के निषेध का 'मनचाहे' इस वाक्यार्थ के रूप में हेतु का निर्देश है। और दूसरे में 'विस्मय में डूबा हुआ' यह पदार्थ 'दूसरे भावों को भुला देने वाला' इसका विशेषण के रूप में कारण है।
अथ वाक्यार्थपदार्थयोरेकैकयोहेतुत्वेनोदाजिहीर्षुराह-एवमेकेति। मनीषिता इति। अत्र तपोनिवारणे गृहेष्वपेक्षितदेवतास्द्ावात्मा वाक्यार्थो हेतुः। यद्विस्मयेति। अत्रानन्दमन्दत्वे विस्मयस्तिमितत्वं च पदार्थो हेतुः। योजयति- पूर्वत्रेत्यादि। १. एवमेव-ना० (?)। न्दसान्द्र-ना०। न्दमग्न-शा१। ३. क्वथमान°-अ०। ४ °धस्य-नि०। ५. भूतो०-अ० शा०। ६. पदार्थो हेतुनिर्दिष्टः-ना०।
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२६६ अलंकारसर्वस्वम् [अनुमान-
साध्य -साधननिर्देशोऽनुमानम्॥ सू० ५८ ॥ यत्र शब्दवृत्तेन पक्षधर्मान्वयव्यतिरेकवत्साधनं साध्यप्रतीतये निर्दिश्यते, सोऽनुमानालंकार:। विच्छित्तिविशेषश्चात्रार्थादाश्रयणीयः। अन्यथा तर्कानुमानात्किं वैलक्षण्यं स्यात्3। उदाहरणम्-
साध्य के लिए साधन का निर्देश अनुमान है॥सू० ५८॥ जहाँ अभिधान के माध्यम से पक्षधर्मी, अन्वयी अथवा व्यतिरेकी साधन४ (हेतु या लिंग) का निर्देश हो वह अनुमानालंकार है। इसका चमत्कारविशेष आर्थ या कविकल्पित होता है अन्यथा तार्किक अनुमान से क्या अन्तर होगा ? उदाहरण-
काव्यलिङ्गं तु हेतुत्वेनोक्तिर्वाक्यपदार्थयोः । नायमर्थान्तरन्यासो हेतोः शाब्दत्वसंश्रयात्॥ अनुमानाय सूत्रम्- "साध्यसाधननिर्देशोऽनुमानम"। साध्यसिद्धयै साधननिर्देशोऽनुमानम्। व्याचष्टे-यत्र शब्देत्यादि। शब्दवृत्तेन न त्वर्थस्य वस्तुतस्तथाभावेन। पक्षधर्मान्वयेति त्रैरूप्यमुक्तम्। तर्कानुमानवैलक्षण्यायाह-विच्छित्तीति। अर्थात् कविकल्पितवैचित्र्यात्।
१. साध्ये सा०-शा१। २. प्रवृत्तेन-शा० । प्रवृत्तेः-ना०। ३. स्यात्-अ० नि० नास्ति। ४. 'पर्वत वह्निमान् है धूम होने के कारण' इस अनुमान में धूम साधन है। उसका पर्वत (पक्ष) में पाया जाना या रहना पक्षधर्मिता है। जहाँ जहाँ धूम होता है वहाँ वहाँ वह्नि होती है यह व्याप्ति धूम का अन्वय- सम्बन्ध स्थापित करती है अतः हेतु अन्वयी कहलाता है। जहाँ जहाँ वह्नि का अभाव होता है वहाँ वहाँ धूम का अभाव होता है यह अभाव- व्याप्ति धूम को व्यतिरेकी बनाती है। किसी के रहने पर किसी का रहना अन्वय है किसी के अभाव में किसी का अभाव व्यतिरेक है। यत्सत्त्वे यत्सत्त्वमन्वयः। यदभावे यदभावो व्यतिरेकः ।
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मलंकार: ] संजीविनी-सहितम् २६७
यथा रन्धं व्योम्नश्चलजलद्धूमः स्थगयति स्फुलिङ्गानां रूपं दधति च यथा कीटमणयः।
स्तथा मन्ये लग्नः पथिकतरुषण्डे स्मरदवः॥१९६॥ अत्र धूमस्फुलिङ्गकपिलदिक्त्वानि वह्निलिङ्गानि त्रिरूपत्वाद्दवशब्द- प्रतिपादितं वहनिं गमयन्तीत्यनुमानम्। रूपकमू लत्वेनालंकारान्तरगर्भी२- कारेण विच्छित्याश्रयणात्तर्कानुमानवैलक्षण्यम्। क्वचित्तु शुद्धमपि भवति। यथा४-
चूँकि मंडराते बादलों के धंआ ने आकाश के पोर भर डाले हैं, और चूँकि जुगनू चिनगारियों की तरह बन गए हैं, और चूँकि दिशाएँ बिजली-ज्वाला की चमक से पिंगल हो गई हैं इससे मुझे लगता है कि पथिकरूपी वृक्ष-खण्ड में स्मर-दावाग्नि लग गई है ॥१९६॥ इस श्लोक में धुंआ, चिनगारी तथा पिंगल दिशा का स्वरूप वह्नि के लिंग (गमक) हैं, जो त्रिरूप (पक्षधर्मी, अन्वयी तथा व्यतिरेकी) होने से दव शब्द द्वारा व्णित वह्नि का अनुमान कराते हैं, अतः यहाँ अनुमान (अलंकार) है। रूपकमूलक होने से, दूसरे अलंकारों की भंगिमा होने के कारण तथा चमत्कार पर अवलम्बित होने के नाते (अनुमानालंकार का) तार्किक अनुमान से भेद होता है। और कभी यह अलंकार शुद्ध (दूसरे अलंकारों की छाया के विना) भी होता है। उदाहरण के लिए-
यथा रन्ध्रमिति। जलदधूमस्य व्योमस्थगनं खद्योतानां स्फुलिङ्गायमानता ककुभां विद्युज्ज्वालापिङ्गता च। पथिकतरुषण्डे स्मरदावानललग्नं लिङ्गम्। योजयति-अत्र धूमेत्यादि। रूपकमूलत्वमेवालङ्कारान्तरगर्भीकारः। अल-
१. लोल्लसन्० अ० ना०। २. खण्डे-नि० । 3. भङ्गी°-नि०। ४. यथा -शा१ नास्ति।
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२६८ अलंकारसर्वस्वम् [अनुमान-
यत्रैता लहरीचलान्लद्दशो® व्यापारयन्ति भ्रुवं यत्तत्रैव पतन्ति संततममी मर्मस्पृशो मार्गणाः । तच्चक्रीकृतचापमश्च्च्वितशर प्रेङ्गत्करः क्रोधनो घावत्यग्रत एव शासनधरः सत्यं सदासां स्मरः ॥१९७।। अत्र योषितां भ्रूव्यापारेण मार्गणपतनं स्मरपुरोगामित्वे साध्येऽनलं- कृतमेव साधनमिति शुद्धमनुमानम्। प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नार्थनिष्ठत्वेन च विच्छित्तिविशेषाश्रयणाच्चारुत्वम्। अयमत्र पिण्डार्थः-इहास्ति प्रत्याय्यप्रत्यायकभावः। अस्ति च समर्थ्यसमर्थकभावः। तत्राप्रतीतप्रत्यायने प्रत्याय्यप्रत्यायकभावः। प्रतीत- लहरियों की भाँति चलाचल नयनों वाली ये जहाँ भी भौहें चलाती हैं वहीं पर चूँकि हरवार (काम के) मर्मभेदी ये बाण गिरते हैं इससे लगता है कि धनुष पर प्रत्यंचा खींचता हुआ, बाणों पर बार-बार हाथ फड़काता हुआ, (प्रेमी जनों पर) गुस्सल, पर इन (युवतियों) का आज्ञापालक कामदेव सचमुच सदा इनके आगे ही आगे दौड़ा करता है॥१९७॥ इस उदाहरण में युवतियों द्वारा भौंह चलाने पर बाण का गिरना, कामदेव के आगे दौड़ना रूप साध्य का, किसी दूसरे अलंकार से अमिश्रित साधन है अतः शुद्ध अनुमान है। केवल प्रौढोक्ति (कविकल्पना) से सिद्ध अर्थ (न कि किसी दूसरे अलंकार की छाया) पर अवलम्बित होने से और एक विशेष प्रकार के (काव्यगत) सौन्दर्य पर निर्भर होने के नाते (इस अलंकार में) चारुता या चमत्कार होता है। निष्कर्ष यह कि यहां प्रत्याय्य-प्रत्यायक-भाव होता है साथ ही समर्थ्य- समर्थकभाव भी। प्रत्याय्यप्रत्यत्यायक-भाव वहां होता है जहां अप्रतीत (अज्ञात) का प्रत्यायन (ज्ञापन) हो। ज्ञात का यदि ज्ञापन होता है तो यत्रैता इति। लहरी- वच्चलाश्चलदृशो यासां ताः। यत्र भ्रूव्यापारः तत्रैव मागणपतनं स्मरस्याग्रगमने शुद्धतया लिङ्गम्। तदेतदाह- अत्रेति। अनलङ्- कृतमेव रूपकाद्यसंकीर्णमेव। तर्कानुमानवैलक्षण्यायाह-प्रौढोक्तीति। मात्रग्रहणादलङ्गारान्तरापोहः। चारुत्वं न तु तर्कानुमानवन्निश्चमत्कारता। अथानुमानकाव्यलिङ्गार्थान्तरन्यासानां विषयं विवेचयति-अयमत्रेत्यादि। । पिण्डार्थः-अवान्तरविशेषनिर्व्यपेक्षो निष्कृष्टार्थः। अप्रतीतः प्रत्याय्यते चेत् १. चलाचल°-नि०।
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मलंकार: ] संजीविनी-सहितम् २६९
प्रत्यायने तु समर्थ्यसमर्थकभावः। तत्र प्रत्याय्यप्रत्यायकभावेऽनुमानम्। समर्थ्यसमर्थकभावे तु यत्र पदार्थो हेतुस्तत्र हेतुत्वेनोपादाने 'नागेन्द्रहस्ता- स्त्वचि कर्कशत्वात्" इत्यादाविव न कश्चिदलंकारः। यत्र तूपात्तस्य हेतुत्वं यथोदाहते विषये 'मृग्यश्र दर्भाङ्कुरनिर्व्यपेक्षाः'१ इत्यादौ, तत्रैकं काव्यलिङ्गम्। यत्र तु वाक्यार्थो हेतुस्तत्रहेतुत्वप्रतिपादक- मन्तरेण हेतुत्वेनोपन्यासे काव्यलिङ्गमेव। तटस्थत्वेनोपन्यस्तस्य तु १हेतुत्वेऽर्थान्तरन्यासः। एवं चास्यां प्रक्रियायां कार्यकारणवाक्यार्थयो- हेतुत्वे काव्यलिङ्गमेव पर्यवस्यति। "समर्थ्यवाक्यार्थस्य सापेक्षत्वात्। समर्थ्यसमर्थकभाव होता है। समर्थ्यसमर्थकभाव में जहां पदार्थ हेतु (मात्र) हो वहां हेतु-रूप का उपादान१२ जैसे कि 'हाथी की सूंड़ की चमड़ी कठोर होने से' इस उदाहरण में कोई अलंकार नहीं है। पर जहाँ किसी उपात्त (पदार्थ) को हेतु बनाया जाए जैसे कि पूर्वोक्त उदाहरण 'हिरनियां दाभ से उदासीन थीं' आदि में, वहाँ काव्यलिंग (वाक्यार्थगत) ही है। और जहां तटस्थरूप में उपन्यस्त (वाक्यार्थ) हेतु बने वहां अर्थान्तरन्यास होता है। इस प्रक्रिया के अनुसार कार्यकारणभाव तथा वाक्यार्थ की हेतुता में काव्यलिंग ही होगा क्योंकि समर्थ्य वाक्यार्थ सापेक्ष होता है और (वाक्यार्थ में) ताटस्थ्य भी नहीं
प्रत्याय्यप्रत्यायकभावस्तदानुमानम्। प्रतीतः समर्थ्यते चेत् समर्थ्यसमर्थकभावः। तदा पदार्थस्य त्वतलादिशिरस्कतया हेतुत्वेनोपादाने न कश्चिदलङ्गारः। यथा नागेन्द्रहस्ता इत्यादौ कर्कशत्वादूर्वोरुपमानबाह्या इति हेतुहेतुमद्द्ावस्य लौकिकत्वात्। यदा त्वतलाद्यसंस्पर्शनोपात्तस्य पदार्थस्य हेतुत्वं तदा मृग्यश्च दर्भाङकुरेत्यादौ पदार्थनिबन्धनमेकं काव्यलिङ्गम्। यदा पुनर्वा्यार्थो हेतुत्व-
१. एकान्तशैत्यात् कदलीविशेषा :- इतिद्वितीयोऽपि पादः अ०पुस्तके निविष्टः । २. इत्यत्र न-नि० । ३. निर्व्यपेक्षा :- शा१ नास्ति। ४. तत्रैव-अ० नि० । ५. वाक्यार्थस्य-अ० ना०। ६. हेतुत्वम्-अ० ना०। ७. हेतुप्रतिपादक°-नि० । =. हेतुत्वायो०-नि० ना० शा१। ९. ०न्यस्तहेतु°-शा१। १०. हेतुत्वेनार्था°-शा० ना० शा१। ११. ०समर्थक°-ना०। १२. 'कठोर होने से' पंचमी विभक्ति का यह रूप कठोरता का हेतु-रूप में उपन्यास करता है।
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२७० अलंकारसर्वस्वम् [अनुमानम्] ताटस्थ्याभावात्। ततश्च सामान्यविशेषभावोरऽर्थान्तरन्यासस्य विषयः । यत्पुनरर्थान्तरन्यासस्य कार्यकारणगतत्वेन समर्थकत्वमुक्तम्, तदुक्तलक्षणं काव्यलिङ्गमनाश्रित्य तद्विषयत्वेन लक्षणान्तरस्यौद्धटैराश्रितत्वात्। उक्तलक्षणाश्रयणे१ तु यत्त्वन्नेत्रेत्यादिर्विविक्तो विषयः काव्यलिङ्ग- स्यार्थान्तरन्यासदर्शित इति कार्यकारणयोः समथ्यसमर्थकत्वमर्थान्तर- न्यासे पूर्व दर्शितमितीयं गमनिकाश्रयितव्या। रहता है। अत एव सामान्य-विशेषभाव अर्थान्तरन्यास का विषय होता है। अतः अर्थान्तरन्यास का कार्य तथा कारण के समर्थक (कार्य द्वारा कारण का तथा कारण द्वारा कार्य का समर्थन) रूप में उल्लेख, काव्यलिंग के उपर्युक्त लक्षण को छोड़कर किया गया था क्योंकि उद्भट ने कार्यकारणभाव को काव्यलिंग का विषय बताकर दूसरा लक्षणँ दिया है। पर यदि काव्यलिंग का उपर्युक्त स्वरूप (जिसके अनुसार काव्यलिंग में, तटस्थ न होने पर, वाक्यार्थ का हेतुरूप में उपचार होता है) मान लिया जाए तो 'यत्त्वन्नेत्र' (श्लोक १९२) आदि काव्यलिंग का, अर्थान्तरन्यास में बताए गए विषय से, स्वतन्त्र क्षेत्र होगा। कार्य तथा कारण का समर्थ्यसमर्थकभाव अर्थान्तरन्यास में होता है, यह पहले बताया जा चुका है। इस तरह की व्यवस्था (इन अलंकारों का विषय-विभाग समझने के लिए) अपनानी चाहिए।
प्रतिपादकयच्छब्दादिप्रयोगमन्तरेण हेतुत्वेनोपादीयते तदा वाक्यार्थनिबन्धनमन्यत् काव्यलिङ्गम्। यदा ताटस्थ्येनोपात्तस्य वाक्यार्थस्यार्थपर्यालोचनया हेतुत्वं तदा अर्थान्तरन्यासः। इत्थं च सति वाक्यार्थनिबन्धनं काव्यलिङ्गं कार्यकारण- भाव एव भवति। तथात्व एव ताटस्थ्यसम्भवात्। यत्पुनः कार्यकारण- गतत्वेनार्थान्तरस्य समर्थकत्वं तदुक्तलक्षणं काव्यलिङ्गमप्यपेक्ष्यैवाचार्यर्लक्षणान्तर-
१. श्रमेण-शा०। २. न्ेत्र समानकान्तीति-ना०।न्नेत्रेति-अ० । ३. ०न्यासाद्°-अ०। ४. °मितीयती-शा१ ना०। ५. श्रुतमेकं यदन्यत्र स्मृतेरनुभवस्य वा। हेतुतां प्रतिपद्येत काव्यलिंगं तदुच्यते।। -काव्यालंकारसंग्रह, ६।१४।
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[यथासंख्यम् ] संजीविनी-सहितम् २७१ एवं तर्कन्यायमूलमलंकारदवयं प्रतिपादितम्। अधुना वाक्यन्याय- मूला अलंकारा कथ्यन्ते२- उद्दिष्टानामर्थानां क्रमेणानुनिर्देशो® यथासंख्यम्।।सू० ५६॥। ऊध्व निर्दिष्टा उद्दिष्टाः। पश्चान्निर्देशोऽनुनिर्देशः४।स चार्थादर्थान्तर- इस प्रकार तर्कन्यायमूलक दो अलंकारों (काव्यलिंग तथा अनुमान) का विवेचन हो चुका है। अब वाक्य न्याय-मूलक अलंकारों का निरूपण कर रहे हैं। उद्दिष्ट अर्थों का क्रमशः अनुनिर्देश यथासंख्य है ॥सू० ५९॥ उद्दिष्ट का अर्थ है पहले बताए गए। अनुनिर्देश का अर्थ है बाद में बताना। यह (अनुनिर्देश) एक अर्थ से दूसरे अर्थ में होता है क्योंकि उद्दिष्ट का ही यदि करणात्। इत्थं च सत्युक्तलक्षणाश्रयणे यत् त्वन्नेत्रेत्यादौ अर्थान्तरन्यासविविक्तं काव्यलिङ्गमेव। कार्यकारणयोस्तु समर्थकत्वमर्थान्तरन्यासे दशितचरमिति गतिरियती विषयविभागायाश्रयितव्या। अनुमानं तु साध्याय साधनस्योपवर्णना।
अप्रतीतप्रतीतौ स्यादनुमानव्यवस्थितिः। पदार्थाद्वाथ वाक्यार्थान्निर्देशे सति हेतुतः ॥ समर्थनं प्रतीतस्य काव्यलिङ्गद्वयं मतम्। भवेदर्थान्तरन्यासस्ताटस्थ्ये हेतुभावतः । कार्यकारणभावे तु तस्योक्तं लक्षणान्तरम्। सङ्गत्यन्तरायाह-एवं तर्केति। तत्र यथासंरव्यार्थं सूत्रम्- "उद्दिष्टानामर्थानां करमेणानुनिर्देशो यथासंख्यम्"। प्राङनिर्दिष्टानां पश्चान्निर्दिष्टः क्रमेण सम्बन्धो यथासंख्यालङ्कारः। व्या- चष्टे-ऊर्ध्वमित्यादि। ऊर्ध्वं प्रागित्यर्थः। स चेति। अनुनिर्देशोऽर्थान्त- रगतो न तूद्दिष्टार्थगतः। सामर्थ्यात् उद्दिष्टानुनिर्देश्ययोः सापेक्षत्वलक्षणात्। १. द्वयमिह-नि० अ० । २. उच्यन्ते-अ० नि०। 3. Oणानूद्देशो-अ०।ण निर्देशः-शा०। ४. नूद्देशः-नि० ।
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२७२ अलंकारसर्वस्वम् [यथा-
गतः। संबन्धश्चात्र सामर्थ्यात्प्रतीयते। ऊर्ध्वं निर्दिष्टानामर्थानां पश्चान्नि- र्दिष्टैर्थैः क्रमेण संबन्धो यथासंख्यमिति वाक्यार्थः। अन्ये त्विममलंकार क्रमसंज्ञयाभिदधिरे। तच्च यथासंख्यं शाब्दमार्थं चेति द्विधा। शाब्दं यत्रासमस्तानां पदानामसमस्तैः पदैरर्थद्वारकः संबन्धः, तत्र क्रमसंबन्ध- स्यातिरोहितस्य प्रत्येयत्वात्। आर्थं तु यत्र समासः क्रियते, तत्र समुदा- यस्य समुदायेन सह संबन्धस्य शाब्दत्वादर्थानुगमपर्यालोचनेन3 त्वव- यवगतः क्रमसंबन्धः प्रतीयते 'तेनात्र यथासंख्यार्थत्वम्"। आद्यो यथा-
अनुनिर्देश हो तो पुनरुक्ति हो जाएगी। इन दोनों (अर्थात् पूर्व-निर्दिष्ट के अर्थ तथा उसके अनुनिर्देश के अर्थ का परस्पर) का सम्बन्ध सामर्थ्य के कारण ज्ञात होता है। पूर्वनिर्दिष्ट अर्थों का पश्चात् निर्दिष्ट अर्थों के साथ क्रमशः सम्बन्ध यथासंख्य है-यह हुआ वाक्यार्थ। दूसरे (आचार्य वामन) ने इस अलंकार का निरूपण क्रम नाम से किया था। यह यथासंख्य शाब्द तथा आर्थ दो प्रकार का है। शाब्द वहां होता है जहाँ असमस्त पदों का असमस्त पदों के साथ अर्थ द्वारा सम्बन्ध होता है। यहां क्रम का सम्बन्ध छिपा नहीं होता है अतः शीघ्र समझा जा सकता है। जहाँ समास हो वहां आर्थ (यथासंख्य) होता है। इसमें एक समुदाय का दूसरे समुदाय के साथ सम्बन्ध शाब्द होता है अतः (समुदाय के) अवयव में विद्यमान क्रम-सम्बन्ध का ज्ञान अर्थ का अनुसन्धान करने से हो पाता है। इसलिए ऐसे स्थलों में यथासंख्य आर्थ होता है। प्रथम का उदाहरण-
सम्बन्धप्रतीति निष्कर्षति-ऊर्ध्वनिर्दिष्टानामिति। वाक्यार्थः सूत्रात्मनो वाक्यस्यार्थः । अतः क्रमविशेषोऽयम्। अन्ये तु क्रम इत्येवाभिदधिरे। द्वैवि- ध्यमाह-तच्चेति। आद्यस्य लक्षणमाह-शाब्दं यत्रेति। व्यस्तानां व्यस्तैरर्थादभिसम्बन्धे शाब्दकरमावलम्बिनः सम्बन्धस्यातिरोधानप्रतीतिकत्वा- च्छाब्दता। द्वितीयं लक्षयति-आर्थं त्विति। समुदायस्य समुदायेन सम्बन्धे शाब्देऽर्थपर्यालोचनयाSवयवक्रमसम्बन्ध इत्यार्थता।
१. तैरेव-अ० । २. रथानुगुण्य-अ०। रथवगम°-नि०। 3. लोचनया-नि०। ४. तथात्र-नि०। ततोऽत्र-अ० । ५. संख्यया°-अ०। ६. आद्यस्योदाहरणम्-अ० नि० । ७. उपमेयोपमानानां क्रमसम्बन्धः क्रमः। काव्यालंकारसूत्रवृत्ति, ४।३।१७।
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संख्यम् ] संजीविनी-सहितम् २७३ लावण्यौकसि सप्रतापगरिमण्यग्रेसरे त्यागिनां१ देव त्वय्यवनीभरक्षमभुजे निष्पादिते वेधसा। इन्दुः किं घटितः किमेष विहितः पूषा किमुत्पादितं चिन्तारत्नमहो *मुधैव किममी सृष्टाः कुलक्ष्माभृतः ॥१९८॥ अत्र *लावण्यौक:प्रभृतीनामिन्द्वादिभिः क्रमसंबन्धस्याव्यवहितत्वेन प्रतीते: शाब्दं यथासंख्यम्। द्वितीयो' यथा- कज्जलहिमकनकरुच: सुपणवृषहंसवाहनाः शंवः। "जलनिधिगिरिकमलस्था हरिहरचतुरानना६ ददतु ॥१९९। देव ! जब विधाता ने सौन्दर्य के निधान, महनीय प्रतापी, त्यागियों में शिरोमणि, पृथ्वी के भार को ढोने में समर्थ भुजदण्ड वाले तुम्हें बना डाला फिर चन्द्रमा को क्यों गढ़ा ? यह सूरज क्यों बनाया ? इस चिन्तामणि को क्यों पैदा किया ? और इन कुलाचलों की भी व्यर्थ ही क्योंकर रचना की ? ॥१९८॥ इस उदाहरण में सौन्दर्य के निधान आदि का चन्द्रमा आदि के साथ क्रमशः सम्बन्ध निर्बाध रूप में प्रतीत होता है, अतः शाब्द यथासंख्य है। दूसरे (आर्थ यथासंख्य) का उदाहरण- काजल, हिम और सोने की कान्ति वाले, गरुड़, वृषभ और हंस के वाहन वाले, समुद्र, पर्वत तथा कमल पर रहने वाले विष्णु, शंकर तथा ब्रह्मा तुम लोगों का कल्याण करें ॥१९९॥
लावण्येति - लावण्यप्रभा त्यागावनीभरक्षमत्वशालिनि त्वयि सतीन्दुपूषा- चिन्तारत्नकुलक्ष्माभृतां नैरर्थक्यम्। योजयति-अत्र लावण्यौकस्त्वेत्यादि। कज्जलेति। अत्रार्थत्वं योजयति-कज्जलादीनामित्यादि। श्रुत्या शब्देन समुदायगतः सम्बन्धः । प्रागुक्तानामनुक्तैस्तु संबन्धः क्रमिको यदा। यथासंख्यं तदा शाब्दमार्थञ्चेति द्विधा मतम् ।
१. मानिनां-अ०शा१। २. वृथैव-नि०। १. ०कस्त्वप्र०-अ० । ४. द्वितीयस्य यथा-अ०। द्वितीये-शा०। केवलं 'यथा' नि०। ५. जलघिगिरिकमलासना-अ० शा० । ६. कमलासना-अ०नि०। ७. दधतु-शा१। १८
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२७४ अलंकारसर्वस्वम् [ पर्याया-
अत्र कज्जलादीनां सुपर्णादिभिः संबद्धानां जलनिध्यादिभिः सह संबन्धे हरिप्रभृतिभिः संबन्धः श्रुत्या समुदायनिष्ठः प्रतीयते। अर्था- २नुगमानुसारेण त्ववयवानां क्रमसंबन्धावगतिरित्यार्थं यथासंख्यम्। एकमनेकस्मिन्ननेकमेकस्मिन्® क्रमेण पर्यायः ॥सू० ६०॥। क्रमप्रस्तावादिदमुच्यते। एकमाधेयमनेकस्मिन्नाधारे यत्तिष्ठति स एकः पर्यायः। नन्वेकमनेकगोचरमिति प्रागुक्ेन" लक्षणेन विशेषालं- कारोऽत्रोक्तः। तत्किमर्थमिदमुच्यते इत्याशङ्कयोक्तम् - क्रमेणेति। इह
त्वम्। तथा च क्रमप्रतिपादनादर्थात्तत्र यौगपद्यप्रतीतिः। तेनास्य ततो विविक्तविषय-
इस उदाहरण में सुनने से (शब्दतः) गरुड़ आदि से सम्बद्ध काजल आदि का समुद्र आदि के साथ सम्बन्ध तथा विष्णु आदि के साथ सम्बन्ध समुदाय-गत प्रतीत होता है। अर्थ का अनुगमन करने पर अवयवों का क्रमशः सम्बन्ध ज्ञात होता है अतः यथासंख्य आर्थ है। एक का अनेक में और अनेक का एक में क्रमशः रहना पर्याय है॥सू० ६०॥ क्रम का प्रसंग होने से इस (अलंकार) का निरूपण किया जा रहा है। एक आधेय का अनेक आधार में रहना, यह प्रथम पर्याय है। पर 'एक का अनेक में पाया जाना' इस पूर्वोक्त लक्षण से तो यहाँ विशेषालंकार का ही प्रतिपादन होता है, फिर इस (नए अलंकार) को बताने की क्या आवश्यकता है ? इस शंका को ध्यान में रखकर ही (पर्याय के लक्षण में) 'कमशः' रखा गया है। यहाँ क्रम होता है, इससे स्पष्ट है कि विशेषोक्ति में यौगपद्य की प्रतीति होती है (कम का ज्ञान नहीं होता है)। अतएव (पर्याय अलंकार) का क्षेत्र उस (विशेषोक्ति) से स्वतन्त्र है। तथा- पर्यायार्थं सूत्रम् "एकमनेकस्मिन्ननेकमेकस्मिन् वा क्रमेण पर्यायः" । एकस्यानेकाधारत्व एक: पर्यायः। अनेकस्यैकाधारत्वे द्वितीयः। सस- ङ्गतिकं व्याचष्टे-क्रमप्रस्तावादित्यादि। क्रमग्रहणस्य प्रयोजनायाह-नन्वे- कमित्यादि। एकस्यानेकगोचरत्वलक्षणविशेषालङ्कारव्यावृत्त्यै क्रमग्रहणं १. सम्बन्धो-नि०। २. नुगति°-ना० शा१। ३. ०न् वा-अ० । ४. एक: सः-ना० । ५. प्राक्तनेन-नि०। ६. क्मोपादा°-नि० शा०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २७५ एकस्मिन्नाधारेऽनेकमाधेयं® स द्वितीयः ॥सू० ६१॥ पर्यायः। नन्वत्र समुच्चयालंकारो वक्ष्यते इत्येतदर्थमपि२ क्रमेणेति योज्यम्। अत एव 'गुणक्रियायौगपदयं समुच्यः' इति समुच्चयलक्षणे यौगपद्यग्रहणम्। अत एव क्रमाश्रयणात्पर्याय इत्यन्वर्थाभिधानम्४। विनिमयाभावात्परिवृत्तिवैलक्षण्यम्। तस्या हि विनिमयो लक्षण- त्वेन वक्ष्यते। तत्रानेकोऽसंहतरूपः संहतरूपश्चेति द्विविधः। तच्च एक आधार में अनेक आधेय का रहना द्वितीय (पर्याय) है ॥सू० ६१॥ चूंकि इस प्रकार की स्थिति में समुच्चय अलंकार निरूपित होगा इसलिए इस (लक्षण) में भी 'कमशः' (पद) का प्रयोग करना चाहिए। गुण तथा क्रिया का युगपद्भाव समुच्चय होता है। इस समुच्यय-लक्षण में इसीलिए युगपद्भाव (यौगपद्य) का प्रयोग किया गया है। अस्तु ! क्रम (परिपाटी) होने से पर्याय चरितार्थ संज्ञा है। विनिमय (अदला-बदली) न होने से परिवृत्ति (अलंकार) से (पर्याय अलंकार का) भेद है। उस (परिवृत्ति अलंकार) का स्वरूप तो विनिमय है, यह बताया जाएगा। इनमें से 'अनेक' असंघातरूप (पृथगवृत्ति) तथा संघातरूप इस प्रकार दो कृतमित्यर्थः। एवं तहि विशेषालङ्गारे यौगपद्यग्रहणं किं न कृतमित्यत आह- इह चेति। इह क्रमप्रतिपादनात् तत्र यौगपद्यं लक्षणत्वेनार्थात् सिध्यतीत्यर्थः । अतो विविक्तविषयता। द्वितीयमाह-तथा एकस्मिन्निति। अत्र क्रमग्रहः। क्रमग्रहणात् समुच्चयालङ्गारव्यावृत्तिरित्याह-नन्वत्रेति। वक्ष्यमाणे समुच्चये यौगपद्यं लक्षणत्वेन ग्रहीष्यत इत्याह-अत एव गुणेति। लक्ष्यपदं निर्वक्ति- अत एव क्रमेति। पर्यायस्य क्रमात्मकत्वात् परिवृत्त्यलङ्कारतो वैधर्म्या- याह-विनिमयेति। अस्य चातुर्विध्यं दर्शयति-तत्रानेक इति। इह योऽ- १. यत् सः-नि०। यत् तिष्ठति सः-अ०। अ० पुस्तके द्वितीयः पर्यायोऽयं न सूत्रतयोपात्तः। सूत्रत्वेनोपादाने 'पर्याय' इतिशब्दो नापेक्षितः। मया त्वत्र वृत्तिभागे निवेशितः । २. अपि-शा० ना० शा१ नास्ति। ३. समुच्चय :- शा१ नास्ति। ४. न्वर्थमभि°-अ० नि० । ५. तत्र -- अ० ना०।
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२७६ अलंकारसर्वस्वम् [ पर्याया-
द्वैविध्यमाधाराधेयगतमिति चत्वारोऽस्य१ भेदाः। क्रमेणोदाहरणानि- नन्वाश्रयस्थितिरियं किल कालकूट केनोत्तरोत्तरविशिष्टपदोपदिष्टा। प्रागर्णवस्य हृदये वृषलक्ष्मणोऽथ कण्ठेऽधुना वससि वाचि पुनः खलानाम्॥२००॥ 3विसृष्टरागादधरान्निवर्तितः स्तनाङ्गरागारुणिताच्च कन्दुकात्। कुशाङ्करादानपरिक्षताङ्गुलिः कृतोऽक्षसूत्रप्रणयी तया करः ॥२०१॥ तरह का होता है। ये दोनों भेद आधार (आश्रय) तथा आधेय (आश्रित) में रहते हैं अतः इस (अनेक) के चार भेद होते हैं।४ क्रमशः उदाहरण- रे हलाहल ! एक के बाद एक बढ़-चढ़कर ऊंचा स्थान पाना तुम्हें किसने सिखाया है ? क्योंकि पहले रहते थे समुद्र के पेट में, फिर शंकर के कण्ठ में और अब रहने लगे हो दुष्टों की जबान पर ॥२००॥ उस पार्वती ने विसृष्ट राग वाले अधरोष्ठ से और स्तनों के अंगराग से अरुणित गेंद से निवृत्त हाथ को-जिसकी उंगलियाँ कुश की नोकों से क्षतविक्षत हो चुकी थी-रुद्राक्षमाला का प्रेमी बना दिया ॥२०१।। यमनेकोऽर्थः स पृथगवृत्तिः संघातात्मा च। द्विविधोऽप्याधार आधेयश्चेति चत्वारो भेदाः । नन्वाश्रयेति। रे कालकूट तवाश्रयेषु वृत्तिरुत्तरोत्तरविशिष्टपदन्यासः केनोपदिष्टा। यतः प्राक् हृदये, तदपेक्षयोपरितने कण्ठेवात्सीः । सम्प्रति तु कण्ठादप्युर्पारतन्यां वाचि वससि। अत्रार्णवादिराधारोऽनेकः पृथगवृत्तिः। विसृष्टरागादिति। अत्राधरकन्दुकौ कराधारौ निवृत्तिक्रियां प्रत्यपादानत्वेन संहतौ। निवृत्तेरनेकत्वेनाविवक्षणात्। १. अस्य शा० ना० पुस्तकयोर्नास्ति। भार पुस्तकानुसारं 'तस्येति'। २. दाहरणम्-अ० । 3. निसर्ग°-शा० (?)। विमृष्ट शा१। निसृष्ट-अ० । ४. चार भेद :- क-असंहतरूप अनेक आधार ख-संहुतरूप अनेक आधार ग-असंहतरूप अनेक आधेय घ-संहतरूप अनेक आधेय
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २७७ निशासु भास्वत्कलनूपुराणां यः संचरोऽभूदभिसारिकाणाम्। नदन्मुखोल्काविचितामिषाभिः१ स वाह्यते राजपथः शिवाभिः ॥२०२। यत्रैव मुग्धेति कृशोदरीति प्रियेति कान्तेति महोत्सवोऽभूत्। तत्रैव दैवादूदने मदीये पत्नीति भार्येति गिरश्चरन्ति ॥२०३।। अत्र कालकूटमेकमनेकस्मिन्नसंहते 'आश्रये क्रमेण स्थितिमन्निबद्धम्। करश्चैकोऽनेकस्मिन्संहते क्रमवान्। अधरकन्दुकयोर्निवृत्त्य-पादानतया संहतत्वेन स्थितत्वात्। अभिसारिकाः शिवाश्चानेकस्वभावा असंहतरूपा एकस्मिन्नाश्रये राजपथे क्रमवर्तिन्यः। वदने चैकस्मिन्नाश्रये मुग्धत्वादि वर्गः पत्नीत्वादिवर्गश्च वर्गत्वादेव संहतरूपोऽनेकः क्रमवानुपनिबद्धः। नूपुरों की छमछम करने वाली अभिसारिकाएं जिस राजपथ पर रातों में घूमा करती थीं उस पर हू हू करते मुखों की लौ से मांस की तलाश में सिया- रिनें घूमा करती हैं ॥२०२॥ जहाँ मुग्धा, कृशोदरी, प्रिया, कान्ता इस रूप में (कहने का) महोत्सव चला करता था उसी मुंह से दैवात् पत्नी और भार्या की आवाजें निकला करती हैं ॥२०२॥ यहाँ (प्रथम उदाहरण में) एक हलाहल अनेक असंहत (पृथक्) आधारों (समुद्र का पेट, शंकर का कण्ठ तथा दुष्टों की जबान) में क्रमशः रहता हुआ बताया गया है। (दूसरे उदाहरण में) एक हाथ संहत (वर्ग या समुदाय में रहने वाले) अनेक में क्रमशः उपनिबद्ध है क्योंकि अधरोष्ठ तथा गेंद निवृत्ति के अपादान होने के रूप में संहत होकर (या एक समुदाय में स्थित) हैं। (तीसरे उदाहरण में ) अभिसारिकाएं तथा सियारिन भिन्न (अनेक) स्वभाव हैं, असंहत हैं, और एक आश्रय राजपथ पर क्रमशः रहती हैं। (अन्तिम उदाहरण में) मुग्धा आदि का वर्ग तथा पत्नी आदि का वर्ग, वर्ग होने के कारण ही, संहतरूप अनेक है जो मुखरूप एक आधार में क्रम से उपवर्णित है। निशास्विति। सञ्चरः सञ्चाराधिष्ठानम्। अत्राभिसारिकाशिवारूप- मनेकमाधेयं पृथग्वृत्तिः। यत्रैवेति। अत्र मुग्धत्वादिकं पत्नीत्वादिकं त्वनेकमाधेयं वर्गत्वावस्थायीति संघातवृत्ति। चतुर्ष्वपि योजयति-अत्र कालकूटमित्यादि। १. विशिता°-ना०। २. कारणे आश्रये-ना० । 3. निवृत्त्यु°-नि० ना०। ४. वचने-नि० ना०।
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२७८ अलंकारसर्वस्वम् [परिवृत्ति-
समन्यूनाधिकानां समाधिकन्यूनैर्विनिमयः परिवृत्तिः ॥सू० ६२। विनिमयोSत्र किंचित्यक्त्वा कस्यचिदादानम्। समेन तुल्यगुणेन १त्यज्यमानेन तादृशस्यैवादानम। तथाधिकेनोत्कृष्टगुणेन दीयमानेन न्यूनस्य हीनगुणस्य परिग्रहः३। एवं न्यूनेन हीनगुणेन त्यज्यमाने- नाधि कस्योत्कृष्टगुणस्य स्वीकारः। तदेषा त्रिप्रकारा परिवृत्तिः। क्रमप्रति- भाससंभवात्पर्यायानन्तरमस्या लक्षणम्। समपरिवृत्तिर्यथा- समान, न्यून या अधिकका समान, या अधिक न्यून से विनिमय परिवृत्ति है ॥।सू० ६२।। विनिमय से यहाँ अभिप्राय है एक को छोड़कर दूसरे का ग्रहण। समान को-समान गुण वाले को - छोड़कर उसी के समान का ही ग्रहण, तथा अधिक को-उत्कृष्ट-गुण को- देकर न्यून को-कमगुण वाले को-बदले में लेना, इसीप्रकार न्यून या हीन-गुण को छोड़ कर अधिक या उत्कृष्ट गुण वाले को स्वीकार करना, इस प्रकार परिवृत्ति तीन प्रकार की है।4 इस (अलंकार) का स्वरूप-निरूपण पर्याय के बाद किया गया है क्योंकि इसमें क्रम की अनुभूति होना सम्भव है। समपरिवृत्ति (समान का समान से विनिमय) का उदाहरण- पर्याय एकोऽनेकस्मिन्नेकत्रानेक इत्यपि। द्विधा क्रमवशादेतौ न विशेषसमुच्चयौ। नेयं विनिमयाभावात् परिवृत्तिर्भिदास्त्विह। चतस्रोऽनेकरूपस्य पृथक् संघातवर्तनात्।। पृथक् संघातवृत्तित्वादनेकोडर्यों द्विधा स च।
परिवृत्त्यर्थं सूत्रम् आधाराधेयभावस्थश्चतस्रोऽस्य भिदास्ततः ।।
"समन्यूनाधिकानां समाधिकन्यूनैविनिमयः परिवृत्तिः ।" समस्य समेन विनिमय एका परिवृत्तिः। न्यूनस्याधिकेन द्वितीया। अधिकस्य न्यूनेन तृतीया। व्याचष्टे-विनिमयोSत्रेति। सङ्गतिमाह- क्रमप्रतिभासेति। १. त्यज (?) मानेन-शा१। २. न्यूनस्य गुणहीनस्य-नि०। न्यूनस्य हीनगुणस्य-अ० । ३. परिग्रहणम्-अ०। शा० (?) । ४. अधिकगुणस्योत्कृष्टस्य-नि०। ५. (क) समान का समान से विनिमय। (ख) अधिक का न्यून से विनिमय। (ग) न्यून का अधिक से विनिमय।
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रलंकार: ] संजीविनी-सहितम् २७९ उरो दत्त्वामरारीणां येन युद्धेष्वगृहयत। हिरण्याक्षवधाद्येषु१ यशः साकं जयश्रिया॥२०४॥ अत्रोरोयशसोस्तुल्यगुणत्वम्। अधिकपरिवृत्तिर्यथा- किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृतं त्वया वार्धकशोभि वल्कलम्। वद प्रदोषेर ३्रफुटचन्द्रतारका विभावरी यद्यरुणाय कल्पते।।२०५॥
वृत्तिर्यथा- अत्रोत्कृष्टगुणैराभरणैर्न्यूनगुणस्य वल्कलस्य परिवृत्तिः। न्यूनपरि- तस्य 'च प्रवयसो जटायुषः स्वर्गिणः किमिव शोच्यते बुधैः। येन जर्जरकलेवरव्ययात्क्रीतमिन्दुकिरणोज्जवलं यशः ॥२०६।। जिसने हिरण्याक्ष आदि का वध करने में दैत्यों को हृदय देकर बदले में जयश्री के साथ कीर्ति ले ली ॥२०४॥ इस उदाहरण में हृदय और कीति समानगुण हैं। अधिक-परिवृत्ति (न्यून का अधिक से विनिमय) का उदाहरण- आखिरकार तुमने यौवन में आभूषण छोड़कर बुढ़ौती में अच्छे लगने वाले वल्कल क्यों पहिन रखे हैं ? तुम्ही बताओ कहीं प्रदोष में चन्द्रमा और नक्षत्रों से छिटकी रात अरुण का वरण करती है ॥२०५॥ इस उदाहरण में उत्कृष्ट गुण वाले आभूषणों का कम गुण वाले वल्कल से विनिमय है। न्यूनपरिवृत्ति (न्यून का अधिक से विनिमय) का उदाहरण- उस बढ़े जटायु की मृत्यु का समझदार लोगों को क्या अफ़सोस होगा जिसने अपना जर्जर शरीर देकर चन्द्रकिरण-सी धवल कीर्ति खरीद ली है ।२०६।। उरो दत्वेति। हिरण्याक्षवधाद्येषु युद्धेषूरो दत्त्वा दैत्यानां यशो गृहीतम्। योजयति-अत्र उर इति। किमितीति। अरुणाय न कल्पत इत्यर्थः। योजयति-अत्रोत्कृष्टेति। तस्य हीति। प्रवयस्त्वात् स्वर्गमुपेयुषो न शोच्यं किञ्चित्। योजयति- अत्र कलेवरेणेति। १. हे०-नि०। २. प्रदोषेषु-अ० । 3. विकीर्णतारका-अ०।तारके-शा१। ४. हि-अ० ।
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२८० अलंकारसर्वस्वम् [परिसंख्या-
अत्र 'कलेवरेण न्यूनगुणेन यशस उत्कृष्टगुणस्य विनिमयः। दत्वा दर्शनमेते मत्प्राणा वरतनु त्वया क्रीताः। किं त्वपहरसि मनो यहदासि रणरणकमेतदसत्।।२०७।। अत्राद्येऽर्धे समपरिवृच्तिः। ३द्वितीयेऽर्धे न्यूनपरिवृत्तिः। एकस्यानेकत्र 'प्राप्तावेकत्र"नियमनं परिसंख्या ॥सू० ६३।। एकानेकप्रस्तावादिह वचनम्। एकं वस्तु यदानेकत्र युगपत्संभा- व्यते, तदा तस्यैकत्रासंभाव्ये द्वितीयपरिहारेण नियमनं परिसंख्या।
यहां न्यूनगुण का उत्कृष्टगुण कीर्ति से विनिमय है। वरतनु ! दर्शन देकर तुमने मेरे प्राण खरीद लिए हैं। पर इस झूठी उत्कंठा को पैदा कर तुम मेरा मन ही खींचे लिए जा रही हो ॥२०७॥ इस (श्लोक) के प्रथमार्ध में समपरिवृत्ति है, और द्वितीयार्ध में न्यूनपरिवृत्ति। एक के अनेकत्र पाए जाने पर एकत्र नियमन परिसंख्या है ॥सू० ६३॥ एक और अनेक की चर्चा के कारण (इस अलंकार का) यहाँ निरूपण हो रहा है। जब एक वस्तु अनेकत्र एक साथ सम्भावित हो तो उसका एक स्थान
द्वैरूप्येणोदाहरति -दत्वेति। दर्शनप्राणयोः समता मनोव्यपेक्षया रण- रणकस्य न्यूनता। योजयति-अत्राद्य इति। परिवृत्तिविनिमयस्त्रिधा सेयं समादिभिः । परिसंख्यार्थं सूत्रम्- "एकस्यानेकत्र प्राप्तौ एकत्र नियमनं परिसंख्या॥" अनेकत्र प्राप्नुवत एकस्यैकत्र नियमनं परिसंख्या। एकतरत्र वर्जनेनान्य- तरत्र संख्यानात्। ससङ्गतिकं व्याचष्टे-एकानेकेत्यादि। असम्भाव्ये १. नि० पुस्तके इयमस्ति वाक्ययोजना-'हीनगुणेन कलेवरेणोत्कृष्टगुणस्य यशसो विनिमयः'। २. अत्र पूर्वार्धे-अ०। आद्येजर्धे- नि० । ३. उत्तरार्धे-अ०। द्वितीयार्धे-नि० । · °नेकप्रा°-नि० । ५. नेकप्रस्तावे एकत्र-ना०, शा०, शा१। जयरथटीकायां 'प्राप्तौ'- इति प्रतीकोपादानात्, अ० नि० पुस्तकानुरोधाच्च 'प्राप्तौ' इत्येव पाठो डत्र स्वीकृतः । ६. तस्यासम्भाव्ये एकत्र-इति क्रम: ना०, शा०, शा१।असम्भाव्ये- अ० नास्ति।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २८१
कस्यचित्परिवर्जनेन कुत्रचित्संख्यानं वर्णनीयत्वेन गणनं परिसंख्या। सा चैषा प्रश्नपूर्विका तदन्यथा वेति प्रथमं द्विविधा3। प्रत्येकं च वर्जनीय- त्वेऽस्य शाब्दत्वार्थत्वाभ्यां द्वैविध्यमिति चतुःप्रभेदा "परिसंख्या क्रमेण यथा- किं भूषणं सुदृढमत्र यशो न रत्नं किं कार्यमार्यचरितं सुकृतं न दोषः। किं चक्षुरप्रतिहतं धिषणा न नेत्रं जानाति कस्त्वदपरः सदसद्विवेकम् ।।२०८।। पर-असंभाव्य (कवि-प्रतिभाप्रसूत होने से लोकोत्तर) में- (किसी) दूसरे को छोड़कर नियमन परिसंख्या है। किसी एक का निराकरण कर किसी दूसरे का संख्यान-वर्णनीय रूप में गणना-परिसंख्या (कहलाती) है। और यह (परिसंख्या) प्रश्नपूर्वक हो सकती है और बिना प्रश्नपूर्वक भी। इस प्रकार प्रथमतः दो प्रकार की है। (दोनों में से) प्रत्येक के वर्जनीय (निषेध्य) शब्द और (वर्ज़नीय) अर्थ के रूप में दो-दो भेद होते हैं। इस प्रकार परिसंख्या के चार भेद होते हैं। क्रमशः उदाहरण- इस संसार में टिकाऊ गहना कौन है ? कीर्ति, न कि रत्न। क्या करना उचित है ? आर्यजनों के द्वारा आचरित अच्छा कार्य न कि बुरा। कौन सा नेत्र अबाधित है ? बुद्धि, न कि चर्मचक्षु। तुम्हें छोड़ कर अच्छाई और बुराई का भेद किसे मालूम है ॥२०८॥ स्थूलदृशा सम्भावयितुमशक्ये। निर्वक्ति- परीति। परीत्युपसर्गो वर्जन- वृत्तिरित्यर्थः । भेदानाह - सा चैषेति। प्रश्नपूर्विका शाब्दी, तथैवार्थी, अप्रश्नपूर्विका शाब्दी, तथैवार्थीति चतुर्धा। किं भूषणमिति। आर्येराचरितम्। इयं प्रश्नपूर्विका शब्दोपात्तवर्ज्या। १. कस्यचित्-अ० नास्ति। परिवर्जने कस्यचिद्वर्जने-शा१। कस्यचित् ...... परिसंख्या-ना० नास्ति। २. चेति-अ० ना। २. द्विधा-अ० नि० । ४. परिवर्जनीयस्य-अ० । ५. परिसंख्या-नि० नास्ति। ६. (क) प्रश्नपूर्विका शाब्दी परिसंख्या। (ख) प्रश्नपूर्विका आर्थी " (ग) अप्रश्नपूर्विका शाब्दी (ध) अप्रश्नपूर्विका आर्थी "1 1
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२८२ अलंकारसर्वस्वम् [ परिसंख्या- किमासेव्यं पुंसां सविधमनवद्यं दुसरितः किमेकान्ते 'ध्येयं चरणयुगलं कौस्तुभभृतः । २ किमाराध्यं पुण्यं किमभिलषणीयं च करुणा यदासक्त्या चेतो निरवधि विमुक्त्यै प्रभवति ॥२०९॥ भक्तिर्भवे न विभवे व्यसनं शास्त्रे न युवतिकामास्त्रे। चिन्ता यशसि न वपुषि प्रायः परिदृश्यते महताम्॥२१०॥ कौटिल्यं कचनिचये करचरणाधरदलेषु रागस्ते। काठिन्यं कुचयुगले तरलत्वं नयनयोर्वसति॥२११। ₹अत्रालौकिकं वस्तु गृहचमाणं वस्त्वन्तरव्यवच्छेदे४ पर्यवस्यतीति व्यवच्छेदं वस्त्वन्तरं *शाब्दमार्थ ध्वेति नियमाभावः। अलौकिकत्वा- भिप्रायेणैव क्वचित्प्रश्नपूर्वकं ग्रहणम्। यथा- मनुष्यों द्वारा सेव्य क्या है ? गंगा का पवित्र तट। एकान्त में किसका ध्यान करना चाहिए ? कौस्तुभधारी (विष्णु) के चरणयुगल का। आराधना के योग्य क्या है ? पुण्य। चाह किस (वस्तु) की करनी चाहिए ? करुणा की। इन्हीं (वस्तुओं) में रमने से मन को अनन्त मुक्ति मिल सकती है ॥२०९॥ महापुरुषों की भक्ति प्रायः शंकर में होती है, वैभव में नहीं। व्यसन शास्त्र में होता है, काम की अस्त्रभूत युवतियों में नहीं। चिन्ता कीर्ति की होती है, देह की नहीं ॥२१०॥ (प्रेयसि) तेरे केशपाश में कुटिलता, हाथ पैर और अधर में राग, कुचों में कड़ापन और आंखों में तरलता रहा करती है ॥२११॥ उपर्युक्त उदाहरणों में अलौकिक (चारु या कविकल्पित) वस्तु का ग्रहण दूसरी (सामान्य) वस्तु का परिणामतः निराकरण कर देता है। अतः जिस वस्तु का निषेध होता है वह शाब्द हो अथवा आर्थ इसका कोई नियम नहीं है। किमासेव्यमिति। यदासक्त्या द्युसरिदादिसमासङ्गेन। इयं प्रश्नपूर्विका अर्थाक्षिप्तवर्ज्या। भक्तिर्भव इति। युवतिरूपे कामास्त्रे। इयमप्रश्ना शाब्दवर्ज्या। कौटिल्यमिति। इयमप्रश्ना आर्थवर्ज्या। अत्र योजनस्य सुज्ञानत्वात् न्यायसञ्चारायाह-अन्रालौकिकमिति । अलौकिकग्रहो हि लौकिकं १. सेव्यं-अ० । २. किमापाद्यं-अ० । 3. अत्र चा°-अ० नि०। ४. परिच्छेदे-शा१। ५. वस्त्वन्तरशब्दमात्रं-नि०। ६. चेति-अ०, ना० ।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २८३
विलङ्ग्यन्ति श्रुतिवर्त्म यस्यां लीलावतीनां नयनोत्पलानि। विभर्ति यस्यामपि वक्रिमाणमेको महाकालजटार्धचन्द्रः ।।२१२।। 'तथा-'चित्रकर्मसु वर्णसंकरो, यतिषु दण्डग्रहणानि'२ इत्यादौर श्लेषसंपृक्तत्वमस्या अत्यन्तचारुत्वनिबन्धनम् । अत्र च नियमपरि- संख्ययोर्वाक्यवित्प्रसिद्धं लक्षणं नादरणीयमिति ख्यापनाय नियमनं परि-
चारुता के कारण ही प्रश्नपूर्वक (विधि) को एकत्र अपनाया गया है (प्रश्न- पूर्वक परिसंख्यान में सौन्दर्य होता है इसीलिए उसका भेद माना गया है)। (श्लिष्ट परिसंख्या का उदाहरण) जैसे - जिस (नगरी) में विलासिनी स्त्रियों के नयनकमल श्रुतिमार्ग (वेदमर्यादा तथा कर्णप्रान्त) का उल्लंघन करते हैं और जिसमें महाकाल के जटाजूट का अर्धचन्द्र भी टेढ़ापन धारण कर लेता है ॥२१२॥ तथा- '(इस नगरी में) चित्ररचनाओं में (ही) वर्ण (रंग) का संकर होता है (वर्णों- जातियों का संकर नहीं होता है) सन्यासियों द्वारा ही दण्डग्रहण होता है (राजदण्ड नहीं दिया जाता है) ... 'इत्यादि (उदाहरण) में श्लेष का योग इस (अलंकार) में अत्यधिक सौन्दर्य ला देता है। इस संदर्भ में नियम तथा परि- संख्या का मीमांसकों में प्रसिद्ध लक्षण लागू नहीं होता है४, यह बताने के
व्यवच्छिनत्त्येव विरोधात्। अतो व्यवच्छेद्यं शाब्दमार्थ वेति भेदद्वयोदयः। अलौकिकस्याप्रसिद्धे: (? स्य प्र) क्वचित् प्रश्नोन्यथा चेति चातुर्विध्यम्। श्लेष- भित्तिकतया दर्शयति-विलङ्गयन्तीति। श्रुतिवर्त्म कर्णोपकण्ठो वेदमार्गश्च। वक्रिमा अरालता दौश्शील्यं च। चित्रकर्मस्विति। गद्ये वर्णाः वलक्षादयो द्विजादयश्च। दण्डो यष्टिः शास्तिश्च। अत्र श्लेषः पूर्वमसिद्ध इति न बाधकः अपि तु चारुतावह इत्याह श्लेषसंपृक्तत्वमिति। अलौकिकतां दर्शयितुमाह - अत्र चेति। पाक्षिकत्वे नियमः, अनेकत्र युगपत्प्राप्तौ परि-
१. यथा-नि० (तथा-इति स्थाने) २. ग्रहणादौ श्लेष° -शा१। ३. इत्यादि-नि० । ४. मीमांसकों के अनुसार अत्यन्त अप्राप्त अर्थात् नियमेन अज्ञात में विधि, पक्षतः प्राप्त में नियम तथा एकत्र एवं अन्यत्र अर्थात् अनेकत्र युगपत् प्राप्ति में 'परिसंख्या' मानी जाती है।
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२८४ अलंकारसर्वस्वम् [परिसंख्या ]
संख्येति सामानाधिकरण्येनोक्तिः । अत एवात्र' पाक्षिक्यपि प्राप्तिः स्वीक्रियत इति युगपत्संभावनं प्रायिकम्।
लिए ही नियम तथा परिसंख्या का समानाधिकरण (एक विभक्ति) से निर्देश किया गया है। इस प्रकार पक्षतः प्राप्त (नियम) को भी इस अलंकार में स्वीकार किया जाता है। अतः 'युगपत् की संभावना' प्रायिक या सामान्य है (किन्तु निश्चित या नियत नहीं है)।
संख्येति हि वाक्यवित्प्रसिद्धं लक्षणम्। तद्वलक्षण्याय नियमनसामानाधिकरण्यं यत इत्थमतः पाक्षिकप्राप्तिरूपं नियमलक्षणमपि स्वीक्रियत इति यृगपत् सम्भावनात्मकं परिसंख्यालक्षणमिह प्रायिकम् । परिसंख्या त्वनेकत्र प्राप्तस्यैकत्र यन्त्रणम्। चतुर्धा प्रश्नवर्ज्योक्त्योर्भावाभावादियं मता॥ न परं युगपत् प्राप्तिः पक्षेऽपि प्राप्तिरिष्यते। परिसंख्यानियमयोरतोऽत्रालौकिकी स्थितिः॥ अर्थापत्त्यर्थ सूत्रम्-
विधिरत्यन्तमप्राप्तौ नियमः पाक्षिके सति। तत्र चान्यत्र च प्राप्तौ परिसंख्या निगद्यते॥ उदाहरण के लिए 'ब्रीहीनवहन्ति' में विधि है, क्योंकि यहाँ जौ के अवधात का विधान है। 'समे देशे यजेत्' में नियम है क्योंकि सम तथा विषम इन दो पक्षों में से एकत्र नियमन है। 'पंच पंच नखाः भक्ष्या:'-पाँच पाँच नखवालों को खाना चाहिए -इसमें परिसंख्या है क्योंकि यहाँ अर्थान्तर का निषेधमात्र अभीष्ट है। आलंकारिक नियम और परिसंख्या दोनों को ही एक अर्थ में ग्रहण करते हैं क्योंकि उनके अनुसार दोनों में ही किसी एक या अनेक का निषेध समान तत्त्व है। नियम में दो में से एक का निषेध होता है तो परिसंख्या में विधि नहीं अपितु निषेध अभीष्ट रहता है। १. अत्र-नि० नास्ति। २. पाक्षिकप्राप्तिरपि-अ० ।
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[अर्थापत्ति: ] संजीविनी-सहितम् २८५
दण्डापूपिकयार्थान्तरापतनमर्थापत्तिः ॥सू० ६४।। दण्डापूपयोर्भावो दण्डापूपिका। 'द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्र' (५-१-१३३) इति वुञ्। पृषोदरादित्वाच्च वृद्धयभावः। यथा अह्महमिकेत्यादा- विति केचित्। अन्ये तु दण्डापूपौ विद्येते यस्यां नीतौ' सा दण्डापूपिका नीतिः। एवमहं शक्तोऽहं शक्तोऽस्यामिति अहमहमिकेतिवन्मत्वर्थी- यष्ठन्नित्याहुः। अपरे तुर दण्डापूपाविव दण्डापूपिकेति 'इवे प्रतिकृतौ'४ (५-३-९६) इति कनं वर्णयन्ति। अत्र हि" मूषककर्तृकेण दण्डभक्षणेन
दण्डापूपिका से दूसरे अर्थ का आपादन (सिद्धि)अर्थापत्ति है ॥सू० ६४॥ दण्ड और अपूप (पुआ) में 'द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च' (५।१।१३३) से भाव में वुञ्न करने पर 'दण्डापूपिका' बनेगा। पृषोदरादि होने से इसमें वृद्धि नहीं होगी जैसे अहमहमिका आदि में, यह कुछ लोगों का मत है। दूसरे आचार्य कहते हैं कि दण्ड और अपूप जिस नीति (न्याय) में हो वह 'दण्डापूपिका नीति' कहलाती है। 'मैं समर्थ हूँ, मैं इसे करने में समर्थ हूँ' इस प्रकार अहमहमिका की भाँति मत्वर्थ ठन् प्रत्यय (दण्डापूपिका शब्द सिद्ध करने में) लगेगा। दूसरों का कहना है कि दण्डापूपिका 'दण्ड और अपूप की तरह' (इस समास से) इवे प्रतिकृतौ' (५, ३, ९६) सूत्र से कन् प्रत्यय होगा। चूहे के द्वारा डंडा खा लेने से उसके साथ बँधे पुआ का खा लेना अर्थतः सिद्ध होता है।
"दण्डापूपिकयार्थान्तरापतनमर्थापत्तिः ।।" यथा दण्डभक्षणेनापूपभक्षणं कैमुत्येनापतति तथार्थान्तरस्यापतनमर्थापत्तिः। व्याचष्टे-दण्डापूपयोरिति। "द्वन्द्वमनोज्ञेति" वुञ् सिद्धौ पृषोदरादित्वेन वृद्धयभावे अहमहमिकादिनयेन दण्डापूपिकेति केचित्। अन्ये तु मत्वर्थीये ठनि रूपसिद्धिमिच्छन्ति। स्वसम्मतिमाह-अपरे त्विति। अपरे पुन"रिवे प्रति- कृता"विति कनोपमार्थत्वेन वर्णयन्ति। निष्कर्षार्थमाह-अत्रेति। अनुमानशङ्गां
१. नीतौ-शा० ना० नास्ति। २. ०तिम°-अ०। ३. तु-नि० नास्ति। ४. इवे प्रतिकृतौ कन्-शा१। ५. हि-शा० ना० नास्ति। ६. दण्डापूपिका वह तर्कप्रणाली है जिसके अनुसार आधेयरूप वस्तु उसी प्रकार स्वतः सिद्ध मानी जा सकती है जिस प्रकार किसी डंडे के गायब हो जाने पर उसमे बँधे हुए मालपुए का गायब होना।
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२८६ अलंकारसर्वस्वम् [ अर्थापत्ति-
तत्सहभाव्यपूपभक्षणमर्थात्सिद्धम्। एष न्यायो दण्डापूपिकाश्देनोच्यते। ततश्च'यथा दण्डभक्षणादपूपभक्षणमर्थायातं तद्वत्कस्यचिदर्थस्य निष्पत्तौ सामर्थ्यात्समानन्यायत्वलक्षणात् यदर्थान्तरमापतति, सार्थापत्तिः। न चेद्मनुमानम्। समानन्यायस्यर संबन्धरूपत्वाभावात्। असंबन्धे चानुमानानुत्थानम्। अर्थापत्तिश्च वाक्यविदां न्याय इति तज्जातीय"- त्वेनेहाभिधानम्। इयं च द्विविधा। प्राकरणिकादप्राकरणिकस्यार्थस्या- इसी न्याय के लिए दण्डापूपिका शब्द है। अतः जिस प्रकार डंडा खा लेने से मालपुआ का खा लिया जाना (अर्थबल से) मालूम हो जाता है उसी प्रकार किसी अर्थ को सिद्ध करने में समर्थ होने से, तुल्य न्याय के आधार पर, दूसरे अर्थ की प्रतीति हो जाना ही अर्थापत्ति (अलंकार) है। यह अनुमान (अलंकार) से भिन्न है क्योंकि तुल्य न्याय में संबंध (नियत) नहीं होता है।9 और सम्बन्ध न रहने पर अनुमान का उदय नहीं हो सकता है। अर्थापत्ति मीमांसकों का न्याय है, उसी जाति की होने से यहाँ (वाक्य- न्यायमूलक अलंकारों के संदर्भ में इसका) निरूपण हुआ है। यह दो प्रकार
निराचष्टे-न चेदमिति। समानन्यायस्य दण्डापूपवृत्तस्य। सङ्गतिमाह- अर्थापत्तिश्चेति। त ज्ञाते न्न (? तज्जाती) येन तत्सम्बन्धितया।
१. तथा च -- ना० । २. र्थादापतितं-अ० । 3. समन्यायस्य-नि० । ४. नात्-नि० । ५. तन्नयेने०-अ० । तत्प्रतीयत्वेन°-शा० । ६. द्विधा-नि० । ७. दण्ड खा लेने से अपूप का खा लेना समान न्याय के कारण उचित अवश्य है पर निश्चित नहीं है। सम्भव है कि दण्ड को खा लेने पर भी अपूप के इधर उधर हट जाने से या और किसी कारण से अपूप का भक्षण न हो अतः तुल्य न्याय के उदाहरणों में आने वाली दो वस्तुओं में सम्बन्ध का होना निश्चित नहीं होता है पर अनुमान में एक अर्थ से दूसरे अर्थ का ज्ञान, दोनों में नियत सम्बन्ध होने के कारण, निश्चित रहता है।
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रलंकार: ] संजीविनी-सहितम् २८७ पतनमेकः प्रकारः। अप्राकरणिकात्प्राकरणिकस्यार्थापतनं द्वितीयः। आद्यो यथा- पशुपतिरपि तान्यहानि कृच्छादगमयदद्रिसुतासमागमोत्कः। कमपरमवर्श न विप्रकुर्युर्विभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावाः ।२१३।। अत्र विभुवृत्तान्त:१ प्राकरणिको लोकवृत्तान्तमप्रकारणिकमर्थादाक्षि४- पति। द्वितीयो यथा- धृतधनुषि बाहुशालिनि शैला न नमन्ति यत्तदाश्चर्यम्। रिपुसंज्ञकेषु गणना कैव" वराकेषु काकेषु ॥२१४।। की है। प्रकृत से अप्रकृत अर्थ की सिद्धि, एक भेद है। और अप्रकृत से प्रकृत अर्थ की सिद्धि दूसरा भेद है। प्रथम जैसे- पार्वती-समागम के लिये उत्कण्ठित शिव भी उन दिनों को बड़ी मुशकिल से बिता सके। भला कौन दूसरा है जिसे ये भाव (स्त्रियाँ आदि विषय) अधीर नहीं बना देंगे, जब कि उस विभु को भी नहीं छोड़ते हैं ॥२१३॥ यहाँ विभु का वृत्तान्त प्रकृत है, जो अप्रकृत लोकव्यवहार का अर्थबल से आक्षेप कर लेता है। दूसरा जैसे- भुजदण्ड से सुशोभित राजा के द्वारा धनुष धारण कर लेने पर पर्वत झुक नहीं जाते यही आश्चर्य है। शत्रु कहलाने वाले उन वराक कौओं की क्या गिनती ? २१४।
भेदायाह-इयं चेति। पशुपतिरिति। उत्क उन्मनाः। विप्रकुर्युः वाढं विकुर्युः। अमी भावा वनितादयः। अप्राकरणिकापातं दर्शयति-अत्र विभुमिति। धृतधनुषीति। स्थिरा अपि प्रह्वीभवन्ति, लोलेषु का कथा। अत्र प्राकरणिकार्थापातः। विच्छित्त्यन्तरायाह-क्कचित् त्विति।
१.पतने-अ०। °कस्यार्थाप°-नि०। २. पतनं द्वितीयः प्रकारः ।-नि० । ३.वृत्तः-नि० । ४. अर्थात्-शा० ना० शा१ नास्ति। ५. क इव-नि०।
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२८८ अलंकारसर्वस्वम् [अर्थापत्ति-
अत्र शैलवृत्तान्तोSप्राकरणिकः प्राकरणिकं रिपुवृत्तान्तमर्थादाक्षिपति। ३क्वचिन्न्यायसाम्ये' निमित्तं श्लेषेण *निर्दिश्यते- अलंकारः शङ्काकरनरकपालं परिजनो विशीर्णाङ्गो भृङ्गी वसु च वृष एको गतवयाः। अवस्थेयं स्थाणोरपि भवति सर्वामरगुरो- र्विधौ वक्रे मूर्ध्नि प्रभवति वयं के पुनरमी ॥२१५॥
णिकार्थापतनम्। अत्र विधौ वक्रे इति श्िष्टम्। अप्राकरणिकाच्च "स्थाणुवृत्तान्तात्प्राकर-
यहाँ पर्वतों का अप्रकृत वृत्तान्त शत्रुओं की हालत का अर्थबल से आक्षेप कर लेता है (जब पर्वत तक झुक जाते हैं तो फिर शत्रुओं का तो झुक जाना स्वतः सिद्ध है) । कभी कहीं समान न्याय होने का निमित्त श्लेष (श्लिष्ट अतिशयोक्ति) द्वारा निर्दिष्ट होता है। जिस शिव का आभूषण भयंकर कपाल है, जिसके भृंगी (नामक) परिजन के अंग शीर्ण हैं, जिसका धन (केवल) एक बूढ़ा बैल है; यदि (उस) महादेव के मस्तक पर स्थित विधु (चन्द्रमा) के टेढ़े हो जाने पर उसकी यह हालत हो जाती है तो फिर विधि (भाग्य) के टेढ़े होने पर हमलोगों का क्या होगा ? २१५॥ यहाँ 'विधौ वक्रे' यह (अंश) श्लिष्ट है, और महादेव के अप्रकृत वृत्तान्त से प्रकृत अर्थ की प्रतीति होती है।
अलङ्कार इति। शङ्काकरं किमयं सेव्य उत नेति शङ्गाजनकम्। विधुरिन्दुः, विधिर्दिष्टम्। शेषतः (? श्लेषेण) प्राकरणिकापातमाह-अत्र विधाविति। अर्थापत्तिस्तु कैमुत्येनान्यार्थापात इष्यते। प्रकृताप्रकृत (? ता) पातादियं च द्विविधा मता।
१. अप्राकरणिक :- ना० शा० नास्ति। २. रिपुवृत्तान्तं प्राकरिणकम्-अ० नि० पुस्तकयोर्वक्ययोजना। ३. क्वचिच्च-अ० । ४. साम्यस्य-अ० । ५. गम्यते-अ० नि० । ६. परिकरो-नि०। ७. बहुवयाः-अ० । =. °णिकस्थाणु°-नि०।
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[ विकल्पः ] संजीविनी-सहितम् २८९ तुल्यबलविरोधो विकल्पः ॥सू० ६५।। विरुद्धयोस्तुल्यप्रमाणविशिष्टत्वात्तुल्यबलयोरेकत्र युगपत्प्राप्तौ विरुद्ध- त्वादेव यौगपद्यासंभवे विकल्पः। औपम्यगर्भत्वाच्चात्र चारुत्वम्। यथा-'नमन्तु' शिरांसि धनूंषि वा, कर्णपूरीक्रियन्तामाज्ञा मौर्व्यो वा' इत्यादि। अत्र प्रतिराजकार्ये नमने शिरसां धनुषां च तुल्यप्रमाणविशि- ष्टत्वम्। संधिविग्रहौ चात्र क्रमेण 'तुल्यप्रमाणे," प्रतिराजविषयत्वेन स्पर्धया द्वयोरपि संभाव्यमानत्वात्। द्वौ चेमौ विरुद्धाविति नास्ति दो समान बलवालों का विरोध विकल्प है ॥सू० ६५॥ दो विरोधियों के-जो समान प्रमाण से विशिष्ट होने से समान बल वाले होते हैं-एकत्र पाए जाने पर(परस्पर)विरोध होने से एक साथ रह पाना(जहाँ) सम्भव न हो तो (वहाँ) विकल्प (अलंकार) होता है। औपम्यनिष्ठ होने के कारण इसमें चारुता होती है। जैसे-'सिर को झुकाओ या धनुष को, आज्ञा को कान का आभूषण बनाओ या प्रत्यंचा को' इत्यादि (उदाहरण) में प्रतिपक्षी राजा द्वारा कार्यरूप में धनुष या सिर का झुकाना यहाँ दोनों ही समानबल हैं। सन्धि या विग्रह (सिर झुकाना सन्धि के लिए और धनुष को झुकाना विग्रह के लिए) दोनों ही क्रमशः समान प्रमाण हैं क्योंकि प्रतिपक्षी राजा के साथ स्पर्धा के कारण दोनों (सन्धि एवं विग्रह) की संभावना विकल्पार्थं सूत्रम्- "तुल्यबलविरोधे विकल्पः ।" विरुद्धयोस्तुल्यबलयोर्यु गपत्प्राप्तौ विकल्पः। व्याचष्टे- विरुद्धयोरिति। तुल्यप्रमाणविशिष्टता तुल्यबलत्वे हेतुः। वैलक्षण्यं दर्शयति-औपम्यगर्भ- त्वादिति। लौकिकविकल्पस्यातथात्वात्। नमन्त्विति। सन्धौ शिरसां नतिः, विग्रहे धनुषाम्। एवमाज्ञामौर्व्योंः कर्णपूरीकरणमपि। व्याचष्टे -- अत्र प्रतिराजेति। नमनमिह प्रतिराजानां कार्य, तत्र शिरांसि धनूंषि च सन्धिविग्रहप्रमाणकतया तुल्यबलानि विरुद्धत्वाद् युगपत् प्राप्त्ययोगे प्राप्नुवन्ति। १. श्लिष्टत्वात्°-ना० शा० शा १। २. नमयन्तु-अ० । ३. श्लष्टत्वम्- नि० शा१। ४. तुल्ये प्र०-अ० । ५. °प्रमाणेन-ना० । ६. सम्भाव्यत्वात् -अ० । १९
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२९० अलंकारसर्वस्वम् [ विकल्पा-
तयोर्युगपत्प्रवृत्तिः। १प्राप्नुवतश्चात्र२ युगपत्प्रकारान्तरस्यानाशङ्कचत्वात्। ततश्च न्यायप्राप्तो विकल्पः। नमनकृतं च तयोः सादृश्यमित्यलंकारता। एवं कर्णपूरीक्रियन्तामित्यादौ योजनीयम्। औपम्यगर्भत्वाच्चात्र१ चारु- त्वम्। क्वचिच्छ लेषावष्टम्भेनाप्ययं दृश्यते। यथा- भक्तिप्रह्वविलोकनप्रणयिनी नीलोत्पलस्पर्धिनी ध्यानालम्बनतां समाधिनिरतैर्नीते हितप्राप्तये। लावण्यस्य महानिधी रसिकतां लक्ष्मीद्दशोस्तन्वती युष्माकं कुरुतां भवार्तिशमनं" नेत्रे तनुर्वा हरेः ॥२१६॥। की जा सकती है। ये दोनों परस्पर विरोधी है अतः इनकी एक साथ प्रबृत्ति नहीं हो सकती। और एक साथ प्राप्ति होने पर किसी दूसरे प्रकार (अलंकार भेद) की शंका नहीं की जा सकती है। अतः विकल्प न्यायतः प्राप्त है। चूँकि इन दोनों (सिर तथा धनुष) का सादृश्य 'झुकाना' (साधारण धर्म) से उत्पादित है, अतः इसमें अलंकारता है। इसी प्रकार 'कान का आभूषण बनाओ' इत्यादि में (अलंकार की) योजना कर लेनी चाहिए। सादृश्यगर्भता होने से इसमें चारुता है। कहीं यह (अलंकार) श्लेष के सहारे भी दिखाई देता है। जैसे- भक्ति से झुकी दृष्टि से प्यार करने वाले, नील कमल से होड़ लगाने वाले, अभिलषित प्राप्ति के लिए समाधिस्थ योगियों द्वारा ध्यान का अवलम्बन बने हुए, सौन्दर्य के खान, लक्ष्मी की आँखों में रसिकता का संचार करने वाले, विष्णु के नेत्र अथवा उनका शरीर (तनु) आप लोगों की सांसारिक व्यथा दूर करे ॥२१६॥ अतः साधनबाधनादिरूपगत्यन्तराभावाद् विकल्पः । वैधर्म्यं योजयति- नमनकृतमिति। एवं कर्णपूरीकरणेऽपि। वैचित्र्यान्तरायाह-औपम्येति। भक्तिप्रह्वेति। प्रणयिनी स्प्धिनीत्यादौ प्रथमाद्विवचनैकवचनयोर्नपुंसकस्त्री- लिङ्गन्योश्च श्लेषः । नीते हितेति, नीता ईहितेति च पदभङ्ग:। निधी इति निधिरिति च।
१. प्राप्नुवतः-इति स्थाने 'ततश्च'-ना०। २ तश्च युगपत् प्रवृत्तिम्-अ० । शा१ (?)। ३. अत्र- ना० शा० शा १ नास्ति। ४. वलम्बनेना°-नि०। ५. हरणम्-ना०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २९१ अत्र नेत्रे तनुर्वेति विकल्पः। उत्तमत्वाच्च 'तुल्यप्रमाणश्िष्ट- त्वम्। न चात्र समुच्चये वाशब्दः। संभवन्त्यामपि गतौ महाकवि- व्यवहारे तथा प्रयोगाभावात्। ननु विरोधनिमित्तको३ विकल्पः। कर्थं चात्र विरोधः। नैतत्। तनुमध्ये नेत्रयोः प्रविष्टत्वात्तयोः पृथगभि- धानमेव न कार्यम्। कृतं च 'तत्स्पर्धिभावमेव" गमयति। स्पर्धिभावाच्च विरुद्धत्वम्। नेत्रे अथवा समस्तमेव शरीरमित्यर्थावगमे विरोधस्य यहाँ नेत्र अथवा तनु में विकल्प है। (दोनों के ही)श्रेष्ठ होने से समान बल का श्लेष है। यहाँ अथवा का प्रयोग समुच्चय के लिए नहीं हुआ है। यद्यपि यह हो सकता है (अर्थात् 'वा' का समुच्चय अर्थ लिया जा सकता है) किन्तु महाकवियों की परिपाटी में इस प्रकार का प्रयोग नहीं देखा जाता है। यह शंका की जा सकती है कि विकल्प का हेतु विरोध है और इस उदाहरण में (जहाँ नेत्र और तनु का वर्णन है) विरोध किस प्रकार है ? यह (शंका उचित) नहीं है। शरीर में नेत्र भी शामिल हैं, अतः उन्हें पृथक् रूप से बताना ही नहीं चाहिए। यदि (पृथक्) बताया जाता है तो उन दोनों की स्पर्धा का ही परिचायक होता है। स्पर्धा का होना ही विरोध का होना है। 'नेत्र अथवा सारा शरीर' यह अर्थ समझ लेने पर विरोध स्पष्ट हो जाता है। यह विरोध, इस उदाहरण में योजयति-अत्र नेत्रे तनुरिति। समुच्चयभ्रमो मा भूदित्याह-न चेति। अनुशासनाद् गतिसम्भवेऽपि कविप्रयोगाभावान्न समुच्चयः। अप्रयुक्तदोषापत्तेः लक्षणे न्यूनतामाशङ्गते-नन्विति। परिहरति-नैतदिति। नेत्रे अथवेति १. तुल्यप्रमाणम्-नि०। तुल्यप्रमाणविशिष्टत्वम्-अ०। तुल्यप्रमाण- शिष्टत्वम्-शा१। २. तथा-अ० पुस्तके, शा (?) पुस्तके च नास्ति। ३. ०निमित्त :- नि० । ४. सत्-अ० । ५. भाव ग°-अ०। भावं ग°-नि०। ६. भावश्च-नि०। ७. श्लोक में पठित 'प्रणयिनी' 'स्पर्धिनी' आदि विशेषणपदों में श्लेष से 'नेत्र' पद के अनुसार नपुंसक लिंग, तथा प्रथमा विभक्ति का द्विवचन हैं और तनु शब्द के अनुरूप स्त्रीलिंग और प्रथमा विभिक्त का एक वचन हैं।
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२९२ अलंकारसर्वस्वम् [समुच्चया- सुप्रत्येयत्वात्'। स चात्र श्लेषाच्छ लिष्टः२, लिङ्गश्लेषस्य वचनश्लेषस्य चात्र दृष्टेः। तस्मात्समुच्चयप्रतिपक्षभूतो विकल्पाख्योऽलंकारः पूर्वैरकृतविवे- कोऽत्र दर्शित इत्यवधातव्यम्3। गुणक्रियायौगपद्यं समुच्चयः ॥सू० ६६।। गुणानां वैमल्यादीनां यौगपद्येनावस्थानम्, तथैव" क्रियाणां च समुच्चयोऽलंकारः। विकल्पप्रातिपक्ष्येणास्य स्थितिः। क्रमेण यथा- विदलितसकलारिकुलं तव बलमिदमभवदाशु विमलं च। प्रखलमुखानि नराधिप मलिनानि च तानि जातानि ॥।२१७।। श्लेष द्वारा होने से, श्लिष्ट है, क्योंकि यहां लिंग-श्लेष तथा वचनश्लेष दिखाई देता है। अस्तु, समुच्चय का प्रतिपक्षी विकल्प नामक अलंकार, जिसका विवे- चन पूर्वाचार्यों ने नहीं किया था, यहां (मेरे द्वारा) बताया गया है; यह ध्यान में रखना चाहिए। गुण तथा क्रिया का साथ-साथ रहना समुच्चय है ॥सू० ६६।। गुणों का-विमलता आदि का-और इसी प्रकार क्रियाओं का साथ-साथ रहना समुच्चय अलंकार है। इसकी स्थिति (अर्थात् यहाँ निरूपण) विकल्प के प्रतिपक्षी होने से है। क्रमशः उदाहरण- राजन् ! शत्रुओं के समग्र वंश को नष्ट करने वाली तुम्हारी सेना तो शीघ्र ही विमल हो गई थी। और (शत्रुओं के) वे दुर्दान्त मुख मलिन पड़ गए थे॥२१७। विकल्पस्वरूपोन्मीलनम्। श्लेषानुगममुद्घाटयति-स चात्रेति। निगमयति- तस्मादिति। स्वोपज्ञ इत्याह-पूर्वैरिति। विरोधे तुल्यबलयोविकल्पः सन्निपातिनोः।
समुच्चयार्थ सूत्रम् अश्लेषश्लेषभित्तित्वाद् द्विधायमुपवर्ण्यते।
"गुणत्रियायौगपद्यं समुच्चयः"। गुणानां क्रियाणां च यौगपद्यं समुच्चयः। व्याचष्ट-गुणानामिति। विकल्पेति सङ्गतिकथनम्। विग(द)लितेति। प्रखलमुखानि दुर्दान्तप्रचुराणि। १. सुप्रत्ययत्वात्-अ० । २. श्लेषाश्लिष्ट :- अ०। ३ इत्यवगन्तव्यम्-नि० : ४. ·स्थानेन-अ० । ५. च - अ० पुस्तकेऽ्धिकः । ६. प्रतिपक्षेण-नि०, ना०। ७. मिदमभवदद्य-अ०।मिदमाशु-नि०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २९३
अयमेकपदे तया वियोगः प्रियया १चोपनतोऽतिदुःसहो मे। नववारिधरोदयादहोभिर्भवितव्यं च निरातपत्वरम्यैः ॥२१८।। ३एतद्विभिन्नविषयत्वेनोदाहरणद्वयम्। एकाधिकरणत्वेनाप्ययमलं- कारो दृश्यते। यथा- बिभ्राणा हृदये त्वया विनिहितं प्रेमाभिधानं नवं शल्यं यद्विदधाति सा विधुरिता साधो तदाकर्ण्यंताम्। शेते शुष्यति ताम्यति प्रलपति प्रम्लायति भ्राम्यति प्रेङ्गत्युल्लिखति प्रणश्यति दलत्युन्मूछति "ब्रुख्यति ।।२१९।। एवं गुणसमुच्चयेऽप्युदाहार्यम्। केचित्पुनर्न केवलं गुणक्रियाणां व्यस्तत्वेन समुच्चयो, यावत्समस्तत्वेनापि भवतीति वर्णयन्ति। 'उदा- हरन्ति च-
इस प्रिया (उर्वशी) ने मेरे लिए यह अत्यन्त असह्य वियोग ला दिया है और साथ ही नवीन मेघों के घिर आने से ये दिन भी निरातप से रमणीय होने वाले हैं ॥२१८॥ ये दोनों उदाहरण भिन्न अधिकरण के आधार पर हैं। समान अधिकरण में भी यह अलंकार पाया जाता है। जैसे- हे सौम्य ! तुम्हारे द्वारा दिल में चुभोए हुए प्रेम नामक नए शल्य से बेहाल वह क्या-क्या करती है, यह सुनलो। वह शय्या पर पड़ी रहती है, सूखी जा रही है, चिन्ता में डूबी रहती है, बकने लग जाती है, फीकी पड़ती जा रही है, चक्कर खाने लग जाती है, कांपने लगती है, जमीन आदि को कुरेदने लगती है मरी जा रही है, गली जा रही है, बेहोश हो जाती है और टूटती चली ज. रही है ॥२१९। इसी प्रकार गुणों के समुच्चय का भी उदाहरण दिया जा सकता है। कुछ (आचार्य) गुण और क्रिया का पृथक् रूप (असमस्त) में ही नहीं अपितु समस्तरूप में भी समुच्चय होता है, यह मानते हैं और उदाहरण देते हैं-
अत्र वैमल्यमालिन्ययोः समुच्चयः । अयमिति। एकपदे युगपत्। भवितव्यं भूतमित्यर्थः। अत्रोपनतिभूतिक्रिययोः । वैचित्र्यान्तरायाह-एवमिति। एतद्विभिन्नेति। बिभ्राणेति। शल्यभरणं(?) शयनादिक्रियाहेतुः । अत्र शयना- १.°तः सुदुः°-शा० । २. निरातपार्धरम्यः-अ०। २. एतद्भिन्न°-अ० ना०। ४ भ्राम्य°-अ०। ४. त्रस्यति-अ० । ६. उदाहरन्ति च-शा० ना० पुस्तकयोर्नास्ति।
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२९४ अलंकारसर्वस्वम् [ समुच्चया-
न्यञ्रत्कुश्ितमु न्मुखं हसितवत्साकूतमाकेकरं व्यावृत्तं प्रसरत्प्रसादि मुकुलं सप्रेम कम्प्रं१ स्थिरम्। उद्भ्रु भ्रान्तमपाङ्गवृत्ति' विकचं मज्जत्तरङ्गोत्तरं चक्षुः साश्रु च वर्तते रसवशादेकैकमन्यक्रियम् ॥२२०॥ तिरछी, कुंचित, उन्मुख, उल्लसित, भावभरी, टेढ़ी बल खाई हुई, फैली हुई, सस्मित, अधमुंदी, प्यारभरी, कम्पित, स्थिर, उद्वतित (भौंहतनी), मतवाली, बिखरी, विकसित, गड़ी हुई, तरंगित और सजल चितवन एक है पर शृंगार रस में डूबी होने से उसके (गुण और) व्यापार अनेक हैं ॥२१९॥ दीनामेकाधिकरणतया समुच्चयः । गुणसमुच्चयोऽपि सुज्ञान इत्याह-एवमिति। गुणत्रिययोः संहतयोरपि सम्भवतीति दर्शयति केचिदिति। न्यञ्र्दिति। चक्षुरिह चक्षुविकारः। एकैकं चक्षुरन्यक्रियं भिन्नव्यापारं वर्तते। कुतो हेतो :- रसवशात। रस इह शृङ्गारः। दृग्विकाराणामेषां तदेकनिष्ठत्वात् कथं भिन्नक्रियं न्यञ्चत् न्यञ्चितमित्यर्थः, यदपाङ्ग न्यग्भवति। उक्तं मया भरतसंग्रहे- "स्यान्न्यञ्चितं न्यञ्चदपाङ्गभाग" इति। "अपाङ्गसङ्कोचि तु कुञ्चितं स्यात्"। उन्मुखमित्युदञ्चितस्य लक्षणम्। "उदज्चितं तूर्ध्वमपाङ्गसङ्गि निमेषशून्योल्लसितं विहासि। साकूतमाकाङक्षितभावगर्भमाकेकरं तिर्यगरालतारम् ।" व्यावृत्तं वलितम्। "तिर्यग् निवृत्तं वलितं विलोक्य प्रेम्णा सुदूरं परिवल्गदुल्कम्(?)"। प्रसादि प्रसन्नम् । "सभ्रविलासं स्मयते प्रसन्नं सम्मील्यमानं मुकुलं वदन्ति"। सप्रेम प्रेमगर्भम्। "स्यात् प्रेमगरभं मनसो द्रवाय"। कम्प्रम् उत्कम्पम्। "उत्कम्पमुत्कम्पितपक्ष्मतारम्। स्थिरं विद्ूरान्तरितार्थनिष्ठम्"। उद्भ्रु उद्दतितम्। "उद्वतितं तूर्ध्वविकम्पितभ्रु।" भ्रान्तं मदमन्थरम्। "विभ्रान्तरक्तं मदमन्थरं स्यात्"। अपाङ्गवृत्ति विक्षेपि। "विक्षेपि पाश्वे यदपाङ्गवृत्ति"। विकसत् विकासि। "विकासि दृश्ये सविशेषलक्षम्"। मज्जन्निहाञ्चितम्। "नासाग्रनिष्ठं तु निहञ्चिताख्यम्"। १. कम्पम्-नि० शा० ना०। २. वति-अ० ।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् २९५
अत्राकेकरादयो गुणशब्दा न्यञ्र्दित्यादयः क्रियाशब्दा इति 'साम- स्त्येन गुणक्रियायौगपद्यम्। प्रसादिसप्रेमेत्यादीनां समासकृत्तद्वितेषु संबन्धाभिधानमिति संबन्धस्य वाच्यत्वात्। तस्य च सिद्धधर्मरूपत्वेन गुणत्वाद् गुणशब्देन गुणयौगपद्यमत्र3 द्रष्टव्यम्। एवमयं त्रिधा समुच्चयः।
यहाँ पर 'टेड़ी' (आकेकर) आदि गुण-शब्द हैं, तिरछी (न्यंचत्) आदि क्रिया शब्द हैं, इस प्रकार समस्तरूप में गुण तथा क्रिया का सहभाव है। सस्मित (प्रसादि) तथा प्यारभरी (सप्रेम) आदि शब्द समास, कृदन्त तथा तद्धित (के रूपों) में (चितवन के साथ अपना) सम्बन्ध ही बतलाते हैं चूंकि वह सम्बन्ध साक्षात् प्रतीत (वाच्य) होता है और सिद्धरूप होने से गुणरूप होगा अतः गुण शब्द से अभिहित होने के कारण गुणों का यौगपद्य ही माना जाएगा।४ इस प्रकार यह समुच्चय तीन प्रकार का है।
तरङ्गोत्तरं तरङ्गितम्। "तरङ्गितं यद्द्युतिरुर्मिकल्पा"। साश्रु उत्कण्ठितम्। "उत्कण्ठितं रागनिबद्धवाष्पम्"। योजयति - अत्राकेकरेत्यादौ। नन्वाकूतप्रसादप्रेम्णां गुणवचनत्वेऽपि समासतद्धिताद्यर्थेस्तिरोधानमित्यत आह-प्रसादिसप्रेमेत्यादि। समासादयो हि सम्बन्धाभिधायिनः, सम्बन्धश्च सिद्धरूपो गुणात्मा न गुणवचनानां स्वभावं भिनत्ति। साकूतं सप्रेमेति समासः। प्रसादीति तद्धितः। निगमयति- एवमयमिति। व्यस्तत्वेनोभौ समस्तत्वेनैक इति त्रिधा। "गुणक्रियायौगपद्ये त्रिविधः स्यात् समुच्चयः।"
१. समस्तत्वेन-अ० । २. सिद्धरूपत्वेन-नि० । ३. मिति-नि०। अत्र-अ० नास्ति। ४. सम्बन्ध प्रधानतः दो प्रकार का होता है-सिद्ध तथा साध्य। सिद्ध सम्बन्ध गुणरूप होता है और साध्य सम्बन्ध क्रियारूप। समास, कृदन्त तथा तद्धित सम्बन्ध का अभिधान करते हैं, यह सम्बन्ध सिद्धरूप होने के कारण गुणरूप होगा अतः समास कृदन्त तथा तद्धित के शब्द गुण शब्द से अभिहित होंगे। इस प्रकार उपर्युक्त उदाहरण में सस्मित प्रसादि, सप्रेम आदि शब्द गुणरूप हैं।
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२९६ अलंकारसर्वस्वम् [ द्वितीयः
'एकं समुच्चयं त्रिप्रकारभिन्नं लक्षयित्वा द्वितीयं लक्षयति- एकस्य सिद्धिहेतुत्वेऽन्यस्य तत्करत्वं च ॥।सू० ६७।। समुच्चय इत्येव। यत्रैकः कस्यचित्कार्यस्य सिद्धिहेतुत्वेन प्रक्रान्त- स्तत्रान्योडपि यदि वतत्स्पर्धया तत्सिद्धिं करोति, तदायमपरः समुच्चयः। न चायं समाध्यलंकारेऽन्तर्भवति। तत्र हचेकस्य कार्यं प्रति पूर्ण साध- कत्वम्। अन्यस्तु 'तत्कार्यसौकर्याय काकतालीयेनापतति, तत्र समा- तीन भेद वाले एक समुच्चय का स्वरूपविश्लेषण करने के बाद द्वितीय समुच्चय का लक्षण प्रस्तुत कर रहे हैं- (किसी कार्य की सिद्धि में) एक (कारण) के साधक रहने पर (किसी) दूसरे कारण का भी उसी (कार्य) का साधक होना (द्वितीय समुच्चय है) ॥।सू० ६७॥ (यह भी) समुच्चय ही है। जहाँ एक कारण किसी कार्य की सिद्धि के लिए हेतु रूप में प्रकान्त हो वहां यदि दूसरा (कारण) भी स्पर्धा से उस (कार्य) की सिद्धि कर डाले तो वह द्वितीय समुच्चय कहलाता है। इसका समाधि अलंकार में अन्तर्भाव नहीं किया जा सकता है। उसमें तो एक कारण कार्य का पूर्ण- तया साधक होता है, दूसरा केवल काकतालीय न्याय4 से आ पड़ता है। ऐसी स्थिति में समाधि (अलंकार) का निरूपण होगा। पर जहाँ खलिहान में एक
समुच्चयान्तरायाह-एकमिति। सूत्रम्- "एकस्य सिद्धिहेतावन्यस्य तत्करत्वं च"। एकस्मिन् कस्यचित् सिद्धिहेतौ स्पर्धयान्यस्यापि तत्करत्वं समुच्चयः । व्याचष्टे-समुच्चय इत्यादि। इत्येवेत्यनुषङ्गकथनम्। समाधिवैधर्म्यायाह- न चायमिति। एक: पर्याप्तसाधकः, अन्यः काकतालीयवृत्त्या चेत् समाधिः। यथा खले कपोता: स्पर्धया प्रतिस्वमहमहमिकयावतरन्ति तथा भावे समुच्चय
१. एवं त्रिप्रकारभिन्नं समुच्चयं लक्षयित्वा-शा१। २. प्रकारत्रयभिन्नम्-अ० । 3. तत्-अ० नास्ति। ४. अन्यस्तु कार्याय - नि० शा१। अन्यस्तु सौकर्याय-अ०, शा (?)। ५. किसी घटना का केवल संयोगवश होना जैसे ताड़ के पेड़ के नीचे कौए के बैठते ही उसके ऊपर ताड़ के पके फल का चू पड़ना काकतालीय न्याय कहलाता है।
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समुच्चय:] संजीविनी-सहितम् २९७
धिर्वक्ष्यते। यत्र तु' खलेकपोतिकया बहूनामवतारस्तन्रायं समुच्चयः। अतश्चानयोः सुमहान्भेदः। 'स एव समुच्चयः सद्योगेसद्योगे सद्सद्योगे च भवतीति त्रिधा भिद्यते। सतः शोभनस्य सता शोभनेन४ समुच्चीयमानेन योगे यथा- कुलममलिनं भद्रा मूर्तिर्मतिः श्रुतिशालिनी भुजबलमलं स्फीता लक्ष्मीः प्रभुत्वमखण्डितम्। प्रकुतिसुभगा "हचेते भावा अमीभिरयं जनो व्रजति नितरां दर्प राजंस्त एव तवाङ्कुशाः ।।२२१।।
साथ कबूतर आ पड़ने की तरह बहुत से (कारण) जुट जाएं वहाँ यह (द्वितीय) समुच्चय होता है। इस प्रकार इन दोनों (अलंकारों) में बहुत बड़ा अन्तर है। यह समुच्चय सद्योग, असद्योग, तथा सत् एवं असत् के योग (सदसद्योग) में होता है इस प्रकार (इसके) तीन भेद हो जाते हैं। सत् अर्थात् शोभन का (दूसरे) सत् या शोभन से समुच्चय के रूप में योग (सद्योग) का उदाहरण- विमल कुल, सुन्दर शरीर, शास्त्राभ्यास से विशद बुद्धि, विपुल बाहुबल, अपार समृद्धि और अखण्ड प्रभुता-ये ही वे सहज सुन्दर पदार्थ हैं जिनसे कोई भी व्यक्ति अभिमान में चूर हो जाया करता है पर राजन् ! वे ही तुम्हारे लिए संयम (अंकुश) का कार्य करते हैं ।२२१॥ इति महान् भेदः। खले कपोता अस्यां सन्ति नीताविति खलेकपोतिका। मत्वर्थीयष्ठन्। ननु काकतालीयमिति कथमुच्यते, काकस्यागमनं यादृच्छिकं, यादृच्छि कं तालस्य च पातस्तेन च पतता काकस्य वधः। एवं देवदत्तस्यागमनं दस्यूनां चोपनिपातस्तैश्च तस्य वधः। तत्र देवदत्तदस्युसमागमः काकतालसमागम इवेत्येक उपमार्थः । तद्वध: काकवध इवेति द्वितीयः । आद्यः समासार्थः काकता- लमिति। द्वितीयस्तद्धितार्थ काकतालीयमिति। समासश्चायमस्मादेव ज्ञापकात् "समासाच्च तद्विषययात्" आकस्मिक इवार्थेच्छो भवतीति। तद्विषयवत् इवार्थ- विषयादित्यर्थः। एवमर्धजरतीयम्, अजाकृपाणीयं, घुणाक्षरीयमित्यादौ समास- तद्धितौ ज्ञेयौ। भेदानाह -- एष इति। कुलमिति। यैर्जनो दर्प व्रजति त एव तवाङकुशाः उन्मार्गनिवारकाः। १. तु-ना० नास्ति। २. अतः सुमहान् भेदोऽनयोः-इति नि० क्रमः । ३ · एष-सं० । ४. शोभनेन-अ० शा१ नास्ति। ५. हि-नि० नास्ति।
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२९८ अलंकारसर्वस्वम् [द्वितीयः अत्रामालिन्येन शोभनस्य कुलस्य मूर्त्यादिभिः शोभनैः समुच्चयः। एकैकं च दर्पहेतुतायोग्यं 'तत्स्पर्धया निबद्धम्। असतोऽशोभनस्यासताS- शोभनेन समुच्चीयमानेन योगे यथा- दुर्वाराः स्मरमार्गणाः प्रियतमो दूरे मनोऽत्युत्सुकं गाढं प्रेम नवं वयोऽतिकठिना: प्राणाः कुलं निर्मलम्। स्त्रीत्वं धैर्यविरोधि मन्मथसुहृत्कालः कृतान्तोऽक्षमो नो सख्यश्चतुराः कथं नु विरहः सोढव्य इत्थं शठः ॥२२२।। अत्र ₹स्मरमार्गणानां दुर्वारत्वेनाशोभनानां तादशैरेव "प्रियतमदूर- त्वादिभिः समुच्चयः । नयवयःप्रभृतीनां च' यद्यपि स्वतः शोभनत्वम्, तथापिविरह्विषयत्वेनाशोभनत्वं ज्ञेयम्। सद्सतः शोभनाशोभनस्य
यहाँ विमल होने से शोभन कुल का सुन्दर-शोभन-शरीर आदि के साथ समुच्चय है। यहाँ अभिमान पैदा करने में समर्थ हर एक का निबन्धन स्पर्धा से हुआ है। असत्(अशोभन)का असत् या अशोभन से समुच्चित होकर योग जैसे- कामदेव के बाणों का सहना कठिन है, प्रियतम दूर है, मन अत्यन्त उत्सुक है, प्रेम प्रगाढ़ है, नई जवानी है, प्राणों का निकलना दूभर है, कुल पवित्र है, स्त्री होना ही धैर्य का विरोधी है, समय (ऋतु) काम के सहचर वसन्त का है, मौत की भी कुछ चलती नहीं है और हमारी सखियाँ चतुर नहीं हैं कि वे प्रियतम से मुझे मिला सकें फिर भला इस छली विरह को कैसे सहा जाए ।।२२२।। यहाँ काम के बाण सहने में कठिन होने के कारण अशोभन हैं। इनका उसी प्रकार के (अर्थात् अशोभन) प्रियतम के दूर होने' आदि से समुच्चय है। नई जवानी आदि यद्यपि स्वतः शोभन होते हैं पर विरह के प्रसंग से उन्हें भी अशोभन समझा जाएगा। सत्-असत् का-शोभन-अशोभन का-उसी प्रकार
योजयति-अत्रामालिन्येति। अमालिन्यं शोभनत्वहेतुः। एककं चेत्यन्यस्य तत्करत्वं दर्शयति। दुर्वारा इति। मन्मथसुहृद् वसन्तादिः। शठो वञ्चकः। योजयति- अत्र स्मरेति। नववयःप्रभृतेः कथमशोभनत्वमित्यत आह-नववय इत्यादि। १. तत्-अ० शा० नास्ति। २. अशोभनेन-अ० शा१ नास्ति। ३. दुर्वारत्वेनाशोभनानां स्मरमार्गणानाम्-इति पाठक्रमो नि०। ४. प्रियतमादूर°-नि०। प्रियतमादि°-अ०। . च-शा० ना० नास्ति। ६. विषयेनात्रा०-नि०। विषयत्वेनात्रा-अ० ।
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समुच्चय: ] संजीविनी-सहितम् २९९
तादृशेन सदसता समुच्चीयमानेन योगे१ यथा- शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः । प्रभुर्धनपरायणः सततदुर्गतः२ सज्जनो नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्त शल्यानि मे ॥२२३।। अत्र शशिनः 'स्वतः शोभनस्यापि दिवसधूसरत्वादशोभनत्वेन" सद- सतस्तादृशैरेव कामिनीप्रभृतिभिः समुच्चयः। न त्वत्र कश्चित्समुच्चीय- मानः शोभनः, अन्यस्त्वशोभन इति सद्सद्योगो व्याख्येयः। ननु
सत्असत् से समुच्चित होकर योग का उदाहरण है- दिन का कान्तिहीन चन्द्रमा, गलितयौवना कामिनी, कमलों से रहित तलाब, सुन्दर सुडौल पुरुष का विद्याविहीन मुख, धन के लोभ में पड़ा हुआ स्वामी, सदा फटेहाल सज्जन, राजदरबार में रहने वाला दुष्ट पुरुष- ये मेरे दिल के सात घाव हैं।२२३। यहाँ चन्द्रमा का-जो स्वतः तो शोभन है पर दिन में कान्तिहीनता से अशोभन होने के कारण सत-असत् या शोभन-अशोभन है-उसी प्रकार की कामिनी आदि (शोभनाशोभन) के साथ समुच्चय है। यहाँ कुछ समुच्चीयमान (दिन का कान्तिहीन चन्द्रमा आदि) शोभन हैं और कुछ दूसरे (राजदरबार) का दुष्ट पुरुष) अशोभन है इस प्रकार सदसत् का योग है, यह व्याख्या करना ठीक नहीं है। यहाँ यह शंका की जा सकती है कि राजदरबार में रहने वाला
शशीत्यादि। शश्यादि विशष्यं शोभनं धूसरत्वादिविशेषणवशादशोभन- मिति विशिष्टस्य द्वैरूप्यं। तत्र तथाविधः कामिन्यादिभिः समुच्चीयते। योजयति-अत्र शशिन इत्यादि। अन्यथा तु न योजनीयमित्याह-न त्वत्रेति। न व्याख्येयस्तथा सदसद्योगाविवक्षणादिति शेषः । अत्राक्षिपति -ननु नृपेति। नृपाङ्गणखलयोद्वयोरप्यशोभनत्वादन्ये शोभना इति कथं
१ योगो-नि०। २. दूर्गतिः-अ० । 'ङण°-अ०। सर्वत्र 'ङ्ग' स्थाने 'ङ्ग'। ४. सत :- ना० । ५. त्वे सद°-शा० ना०।
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३०० अलंकारसर्वस्वम् द्वितीय: नृपाङ्गणगतः खल इत्यशोभनोऽन्ये तु शोभना इति कथ' समुच्चीयमा- नस्य सतस्तादृशेनासता योगः । नैतत्। 'नृपाङ्गणगतः खलः' इति प्रत्युत प्रक्रमभङ्गाद्दुष्टमेव। न तु सौन्दर्यनिमित्तमित्युपेक्ष्यमेवैतत्। अत एवा- न्यैरेवमादौ सहचरभिन्नोऽर्थ इति दुष्ट इत्युक्तम्। प्रकृते तु नृपाङ्गण- गतत्वेन शोभनत्वं खलत्वेनाशोभनत्वमिति समर्थनीयम्। एवमपि
दुष्ट पुरुष अशोभन है और दूसरे (शेष सभी) शोभन हैं फिर क्यों न समुच्चीय- मान शोभन (दिन का म्लान चन्द्रमादि) का उसी प्रकार के (अर्थात् समुच्चीयमान) अशोभन (राजदरबार के दुष्ट पुरुष) के साथ योग मान लिया जाए ? यह ठीक न होगा, क्योंकि 'राजदरबार का दुष्ट पुरुष' यह अंश तो प्रक्रमभंग (दोष) के कारण सदोष है अतः सौन्दर्य का प्रयोजक नहीं हो सकता है इसलिए यह (शंका या व्याख्या) अमान्य है।१ अत एव दूसरे (आचार्यों)
न तथा समुच्चयः ? परिहरति-नैतदिति। विशिष्टस्य द्वैरूप्यप्रक्रमे द्वयो- रशोभनत्वम्। प्रक्रमभेदो वाक्यदोषः । प्रक्रमभेदावलम्बेन चान्यैर्दोषान्तरमुद्द्रा- वितमित्याह-अत एवेति। विशेष्यान्तरं सहचरं शोभनं खलस्वरूपं
१. कथं न-अ० । २. दुष्टमेवेत्यु°-अ० । दुष्ट एवे०-नि० । ३. पूर्वपक्षी की बात मानकर शशी आदि प्रथम छह को शोभन और अन्तिम 'राजदरबार के दुष्ट पुरुष' को अशोभन मानने पर प्रक्रम-भंग दोष होगा क्योंकि शोभन का वर्णन प्रक्रान्त होकर अशोभन में अन्त होना प्रकरम का निर्वाह नहीं करता है। एक बात और है यदि शशी आदि शोभन है और केवल दुष्ट पुरुष ही अशोभन है तो एक ही घाव बताना चाहिए था। शल्य सात तो भी होंगे जब कि सभी में शोभन के साथ अशोभन का योग माना जाए। हाँ यह अन्तर अवश्य हैं कि शशी आदि में विशेषण अंश-दिन में कान्ति हीन होना-अशोभन है और राजदरबार के दुष्ट पुरुष में विशेष्यांश दुष्ट पुरुष अशोभन है। अतः इस दृष्टि से भी 'राजदरबार का दुष्ट पुरुष' यह अंश भग्नप्रक्रम (दोष) का उदाहरण है। प्रक्रम विशेषण को अशोभन और विशेष्य को शोभन बताने का था अन्त में उल्टा हो गया।
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समुच्चय: ] संजीविनी-सहितम् ३०१
विशेष्यस्य शोभनत्वं प्रक्रान्तम्, विशेषणस्य त्वशोभनत्वम्, इह त्वन्य- थेति न सर्वथा निरवद्यमेतत्'। ननु 'दुर्वाराः स्मरमार्गणाः' इत्य२- त्रोक्तोदाहरणवत्कथं न सदसद्योगः। नैतत्। इह शोभनस्य सतोऽशोभन- त्वमिति विवक्षा। तत्र त्वशोभनमेवैतदिति विवक्षितमित्यस्त्यनयो- र्भेदः। अत एवैकत्रोपसंहृतं 'मनसि सप्तशल्यानि' इति। सुन्दरत्वे-
ने इस प्रकार के उदाहरणों में सहचर-भिन्न (नामक) अर्थदोष माना है।4 और यदि प्रस्तुत उदाहरण में राजदरबार में रहने के नाते शोभन और दुष्ट होने के नाते अशोभन यह माना जाए तब भी विशेष्य का शोभन होना और विशेषण का अशोभन होना प्रकरणप्राप्त था पर इस अंश (राजदरबार का दुष्ट पुरुष) में उल्टी बात है अतः किसी भी प्रकार यह अंश निर्दोष नहीं है। यह प्रश्न हो सकता है कि 'काम के दुर्वार बाण' में भी उपर्युक्त उदाहरण (अंश) की तरह सदसद्योग क्यों न माना जाए ? नहीं। इस अंश (काम के दुर्वार बाण) में शोभन या सत् होने पर भी अशोभन कहना विवक्षित है। किन्तु दूसरे अंश (अर्थात् राजदरबार का दुष्ट पुरुष) में तो उसका अशोभन होना ही विवक्षित है इस प्रकार इन दोनों में अन्तर है। (पर सभी शोभन होकर व्यथाहेतु हैं) इसलिए एक जगह उपसंहार करते हुए कहा गया है 'दिल
त्वशोभनमिति सहचरभिन्नोऽर्थः। अतोऽत्रेत्थं विवक्षणीयमित्याह-प्रकृते त्विति। तथापि न दोषनिवृत्तिरित्याह-एवमपीति। पूर्वोंदाहरणे सद- सद्योगमाशङ्गते-ननु दुर्वारा इति। स्मरमार्गणादीनां शोभनत्वं दुर्वार- त्वादीनामशोभनत्वमिति प्रतीते: । परिहरति-नैतदिति। विवक्षाभेंदे गमकमाह-अत एवेति। सुन्दरत्वेनान्तः प्रविष्टानामपि शश्यादीनां धूसर-
१. एतत्-अ० नि० नास्ति। २. अत्र-नि० नास्ति। ३. अस्ति भेदोऽनयोः-अ० शा० ना० क्रमः। ४. मे इति-ना० । ५. काव्यप्रकाश के अनुसार सहचरभिन्नत्व दोष वहाँ होता है जहाँ किसी ऐसे अर्थ का अभिधान हो जो अन्य सजातीय अर्थों में विजातीय प्रतीत होता है। देखिए-काव्यप्रकाश ७।२७९। 'दिन का कान्तिहीन चन्द्रमा' आदि में साथ में वर्णित शेष अर्थों में विशेष्यांश शोभन है और विशेषणांश अशोभन है पर 'राजदरबार का दुष्ट पुरुष' में इन सहचरों से भिन्न अर्थ है-विशेषणांश शोभन है और विशेष्यांश अशोभन।
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३०२ अलंकारसर्वस्वम् [ समाधि: ] नान्त:प्रविष्टानामपि व्यथाहेतुत्वात्। अपरत्र तु१ 'कथं सोढव्यः' इति सरवथा२ दुष्टत्वाभिप्रायेण१। तस्मादस्ति प्रकारत्रयस्य विविक्तविषयत्वम्य। कारणान्तरयोगात्कार्यस्य सुकरत्वं समाधिः ॥ सू० ६८॥ केनचिदारब्धस्य कार्यस्य कारणान्तरयोगाद्यत् सौकर्य, स सम्य- गाधानात्समाधिः। समुच्चयसादृश्यात्तदनन्तरमुपक्षेपः । तद्वैलक्षण्यं प्राक्प्रतिपादितमेव। उदाहरणम्- के सात घाव हैं' क्योंकि शोभन के रूप में दिल में रहने पर भी (ये सभी) व्यथा ही देते हैं। पर दूसरे स्थल (असद्योग के उदाहरण) में 'कैसे सहा जाए' यह सर्वथा अशोभन होने के अभिप्राय से ही कहा गया है। इस प्रकार तीनों भेदों का क्षेत्र अलग है। दूसरे कारणों के संयोग से किसी कार्य का सुकर हो जाना समाधि है।।सू० ६८।। किसी (कारण) द्वारा आरब्ध कार्य का दूसरे कारणों के संयोग से सुकर हो जाना, सम्यक आधान-सम्यक सम्पादन-हो जाने से समाधि (अलंकार) होता है। समुच्चय से समानता होने के कारण उसके बाद इस (अलंकार) का निरूपण शुरू हुआ है। उस अलंकार की (इससे) भिन्नता का प्रतिपादन पहले ही किया जा चुका है। उदाहरण-
त्वादिना वैयर्थ्यहेतुत्वमुपसंहृतम्। दुर्वारा इत्यत्र त्वित्थं शठः कथं सोढव्य इति सर्वथा कष्टत्वमेवोपसंहृतम्। निगमयति-तस्मादिति। एकक्रियायामन्यस्य क्रिया त्वन्यः समुच्चयः ।
समाध्यर्थं सूत्रम् सदसद्द्वैधयोगेन स त्रिधा संव्यवस्थित: ॥
"कारणान्तरयोगात् कार्यस्य सुकरत्वं समाधिः" ॥ आरब्धस्य कार्यस्य कारणान्तरयोगात् सम्यगाधानं समाधिः। व्याचष्टे-
१. तु०-ना० नास्ति। २. सर्वथा-अ० नास्ति। २. दुष्टाभिप्रायः-ना०। ४. यता-अ० । ५. सौकर्य यत्-अ० नि० क्रमः । ६. तु प्राक्-अ० नि० ।
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[प्रत्यनीकम् ] संजीविनी-सहितम् ३०३
मानमस्या निराकर्तु पादयोर्मे पतिष्यतः । उपकाराय दिष्टचेदमुदीर्णं घनगर्जिंतम् ॥।२२४।। माननिराकरणे कार्ये पादपतनं हेतुः । तत्सौकर्यार्थ१ घनगर्जितस्य कारणान्तरस्य प्रक्षेपः। सौकर्यं चोपकारायेत्यनेन२ प्रकाशितम्। एवं वाक्यन्यायाश्रयिणोSलंकारान्प्रतिपाद्याधुना लोकन्यायाश्रयिणोSलं- कारा उच्यन्ते। तत्र- प्रतिपक्षप्रतीकाराशक्तौ तदीयतिरस्कारः प्रत्यनीकम्॥सू० ६६।।
मैं (अपनी प्रियतमा का) मान दूर करने के लिए उसके पैरों पर गिरना चाहता था कि भाग्यवश मेरी सहायता करने के लिए बादलों की यह गड़गड़ाहट शुरू हो गई ॥२२४॥ 'मान दूर करना' कार्य का हेतु पैरों पर गिरना है। उस (कार्य) की अनायास सिद्धि के लिए दूसरे कारण-बादलों की गड़गड़ाहट-का उपन्यास किया गया है।' सहायता करने के लिए' यह (पद) सुकरता को व्यक्त करता है। इस प्रकार वाक्यन्यायमूलक अलंकारों का निरूपणकर अब लोकन्याय- मूलक अलंकारों का विवेचन किया जाएगा। इनमें से- प्रतिपक्ष (प्रधान प्रतियोगी) का प्रतीकार करने में समर्थ न होने पर उसके सम्बन्धी का तिरस्कार प्रत्यनीक (अलंकार) है ॥सू० ६९॥
केनचिदिति। समुच्चयेति सङ्गत्युक्तिः। समुच्चयवैध्म्यं स्मारयति- तद्वैलक्षण्यमिति। मानमिति। पादपतने कारणे गरजितं कारणान्तरम्। योजयति- माननिराकरण इति। उपकारेति सौकर्यप्रकाशनम्। समाधिः सम्यगाधानं कारणान्तरयोगतः । सङ्गत्यन्तरायाह-एवं वाक्येति। प्रत्यनीकार्थं सूत्रम्- "प्रतिपक्षप्रतीकाराशक्तौ तदीयतिरस्कारः प्रत्यनीकम्" ॥ बलवतस्तिरस्काराशक्तौ तदीयतिरस्कार: प्रत्यनीकवदिति प्रत्यनीकम्।
१. थं तु-अ० । २. इति पदे-नि०। इति चानेन-ना०।येति-अ० । ३. °प्रतिपक्षतिरस्काराशक्तौ तदीयस्य तिर°-नि० ।
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३०४ अलंकारसर्वस्वम् [प्रत्यनीकम्] यत्र बलवतः प्रतिपक्षस्य दुर्बलेन प्रतिपक्षेण प्रतीकार: कर्तु न शक्यत इति तत्संबन्धिनो दुर्बलस्य यत्2 तं बाधितुं तिरस्कार: क्रियते, तत्प्रत्यनीकम्। अनीकस्य सैन्यस्य प्रतिनिधि: प्रत्यनीकमुच्यते। तत्तु- ल्यत्वादिदमपि प्रत्यनीकमुच्यते। यथानीकेSभियोक्तव्ये तत्रासामर्थ्या- त्तत्प्रतिनिधिभूतमन्यदभियुज्यते, तद्वदिह प्रतिपक्षे विजेये तदीयस्य दुर्ब- लस्य तिरस्करणमित्यर्थः। प्रतिपक्षगतत्वेन बलवत्त्वख्यापनं प्रयोजनम्। यथा- यस्य किंचिदपकर्तुमक्षमः कायनिग्रहगृहीतविग्रहः। कान्तवक्त्रसदृशाकृतिं कृती राहुरिन्दुमधुनापि बाधते ॥२२५। जब दुर्बल प्रतिपक्ष बलवान् प्रतिपक्ष का प्रतीकार न कर सके अतः उसे (बलवान् प्रतिपक्ष) परेशान करने के लिए उससे संबंधित किसी दुर्बल का तिरस्कार करे तो वह प्रत्यनीक कहलाता है। अनीक अर्थात् सैन्य का प्रतिनिधि प्रत्यनीक कहलाता है। उसी की समानता से इस (अलंकार) को भी प्रत्यनीक कहा जाता है। जिस प्रकार सैन्य पर आक्रमण अभीष्ट हो पर उस पर (आक्रमण करने की) शक्ति न होने से उसके प्रतिनिधिभूत दूसरे प्रतिपक्ष पर आक्रमण किया जाता है उसी प्रकार इस (अलंकार) में जिस प्रतिपक्ष को जीतना है उसके सम्बन्धी दुर्बल (सहायक) का तिरस्कार अभिप्रेत रहता है; जिसका प्रयोजन है-प्रधान प्रतियोगी को अधिक समर्थ बताना। यथा-
सिर काटने के कारण वैर मोल लेने वाला राहु उस (चतुर कृष्ण) का तो कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है पर उसके सुन्दर मुख के समान आकार वाले चन्द्रमा को अभी भी परेशान किया करता है ॥२२५॥ व्याचष्टे-यत्र बलवदित्यादि। तत्सम्बन्धिनः बलवत्सम्बन्धिनः। तं बाधितुं बलवन्तं बाधितुम्। अत्र दृष्टान्तमाह-यथा अनीक इति। प्रयोजनमाह- प्रतिपक्षेति। यस्य किन्चिदिति। यस्य कृष्णस्य, विग्रहः कलहः, कान्तेन वक्त्रेण,
१. यत्-नि० नास्ति। २. उच्यते-अ० नास्ति। ३. अन्यमन्यद० -शा १।
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[ प्रतीपम् ] संजीविनी-सहितम् ३०५ अत्र राहो: 'कृष्णो बलवान्विपक्षः । तदीयः पुनर्वक्त्रसादृश्यमुखेन२ दुर्बलश्चन्द्रमाः३। 'तत्तिरस्काराद्गवतः प्रकर्षावगतिः"। उपमानस्याक्षेप उपमेयताकल्पनं वा प्रतीपम् ॥।सू० ७०।। उपमेयस्यैवोपमानभारोद्वहनसामर्थ्यात् यदुपमानस्य कैमर्थक्येनाक्षेप आलोचनं क्रियते, तदेकं प्रतीपम्। उपमानप्रतिकूलत्वादुपमयम्य प्रतीप- मिति व्यपदेशः। यदप्युपमानतया प्रसिद्धस्योपमानान्तरप्रतितिष्ठापयिष- यानादरणार्थमुपमेयत्वं कल्प्यते, तत्पूर्वोक्तगत्या द्वितीयं प्रतीपम्। क्रमेण यथा-
यहाँ राहु की अपेक्षा कृष्ण अधिक बलवान् प्रतिपक्ष है पर उनके मुख के समान होने से उनसे सम्बन्धित चन्द्रमा दुर्बल है, उसका तिरस्कार करने से भगवान् के प्रकर्ष का ज्ञान होता है। उपमान का आलोचन या (उसे) उपमेय बनाना प्रतीप है ॥सू० ७०॥ उपमेय द्वारा ही उपमान का कार्य कर लेने के नाते उपमान को अनुपयोगी समझ कर उसका आक्षेप अर्थात् आलोचन करना प्रतीप का प्रथम रूप है। चँकि उपमेय उपमान के प्रतिकूल रहता है अतः इसे प्रतीप कहा जाता है। इसी प्रकार उपमानरूप में प्रसिद्ध (चन्द्रादि) की उपमेयरूप में कल्पना, जो उपमानान्तर की प्रतिष्ठा तथा प्रसिद्ध उपमान का तिरस्कार करने के लिए होती है, पूर्वोक्त न्याय के अनुसार प्रतीप का दूसरा भेद कहलाती है। कमशः उदाहरण-
सदृशाकृतिम् (तिः)। योजयति-अत्र राहोरिति। तत्तिरस्कारादिति प्रयोजनोक्ति: । तदीयस्य तिरस्कार: प्रत्यनीकमशक्तितः । प्रतीपार्थं सूत्रम्-"उपमानस्याक्षेप उपमेयताकल्पनं वा प्रतीपम्"। उपमेयस्यैव पुष्कलगुणवत्त्वविवक्षणेनोपमानस्य कैमर्थक्यं प्रातिकूल्यादेकं १. सकाशाद् भगवान् बल°-नि०। राहोर्भगवान्-अ०। २. सदृशमत्त्वेन-शा०। सदृशत्वेन-ना० शा१। ३. चेन्द्र :- शा० ना० शा१। ४. तन्निराकरणाद्-अ० शा०। ५. गम :- शा० ना०। ६. मानोद्वहनभारसाम°-शा० शा१ । ७. यत-नि० शा१ नास्ति। स्याक्षेप कैमर्थक्येनालो०-अ०। = यद्युप°-नि० । ९. क्रमेणोदाहरणम्-अ० ना०। २०
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३०६ अलंकारसर्वस्वम् प्रतीपम
'यत्र च प्रमदानां चक्षुरेव सहजं मुण्डमालामण्डनं, भारस्तु कुवलय- दलमाल्यानि' इत्यादि। यथा वा- लावण्यौकसि सप्रतापगरिमण्यग्रेसरे त्यागिनां देव त्वय्यवनीभरक्षमभुजे निष्पादिते वेधसा। इन्दुः किं घटितः किमेष विहितः पूषा किमुत्पादितं चिन्तारत्नमहो मुधैव किममी सृष्टाः कुलक्ष्माभृतः ।।२२६।। अत्र यथासंख्यमप्यस्तीति प्राक्प्रतिपादितम्। ए एहि दाव सुंदरि कण्णं दाऊण सुणसु वअणिज्जं। सुज्झ मुहेण किसोअरि ! चंदो उअमिज्जइ2 जणेण ॥।२२७।। [अयि एहि तावत् सुन्दरि कर्ण दत्त्वा शृणुष्व वचनीयम्। तव मुखेन कृशोदरि चन्द्र उपमीयते जनेन ॥। ] जहाँ प्रमदाओं के नयन ही सहज शिरोमाल्य थे, कुवलयदल की मालाएँ तो बोझ थीं। अथवा जैसे- देव! जब विधाता ने सौन्दर्य के निधान, महनीय प्रतापी, त्यागियों में शिरोमणि, पृथ्वी के भार को ढोने में समर्थ भुजदण्ड वाले तुम्हें बना डाला फिर चन्द्रमा को क्यों गढ़ा? यह सूरज क्यों बनाया ? इस चिन्तामणि को क्यों पैदा किया? और इन कुलाचलों की भी व्यर्थ ही, क्योंकर रचना की ? ॥२२६॥ इस उदाहरण में यथासंख्य भी है यह पहले बताया जा चुका है। ए सुन्दरि ! आओ, आओ तो। कान देकर सुनों इस निन्दा को। कृशोदरी! लोग तुम्हारे मुख से चन्द्रमा की उपमा देने लगे हैं ॥२२७॥
प्रतीपम्। यच्चोपमानान्तरार्थं प्रसिद्धोपमानस्योपमेयत्वक्लृप्तिरनादराद् तद् द्वितीयम्। व्याचष्टे- उपमेयस्यैवेत्यादि। यत्र चेति। चक्षुष एव मुण्डमालात्वमिति कुवलयदाम्नो नैरर्थक्यम्। अलङ्कारान्तरसम्भेदेनापरमुदाहरति- लावण्येति। लावण्यौकस्त्वादिगुणानामु- पमेय एव पौष्कल्याद् इन्द्वाद्युपमानानां कैमर्थक्यम्। सम्भेदमनुस्मारयति- अत्र यथासंख्यमपीति। ए एहीति। ए इत्यामन्त्रणे। ए एहि तावत् सुन्दरि कर्ण दत्त्वा शृणु वचनीयम्। तव मुखेन कृशोदरि चन्द्र उपमीयते जनेन।। १. तु-अ० नास्ति। २. उवमि°-अ०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३०७ अत्रोपमानत्वेन प्रसिद्धस्य चन्द्रमसो निकर्षार्थमुपमेयत्वं कल्पितम्। वदनस्य चोपमानत्वविवक्षात्र प्रयोजिका। क्वचित् पुनर्निष्पत्रमे- वौपम्यमनादरकारणम्१। यथा- ४गर्वमसंवाहचमिमं लोचनयुगलेन" कि वहसि मुग्धे सन्तीदृशानि दिशि दिशि सरः्सु ननु नीलनलिनानि ॥२३७।। अत्रोत्कर्षभाज उपमानस्य® प्रादुर्भाव एव न्यक्कारकारणम्। यहाँ उपमान रूप में प्रसिद्ध चन्द्रमा का अपकर्ष दिखाने के लिए उपमेय के रूप में उद्धावन हुआ है। मुख का उपमान बताना ही (इस कल्पना का) प्रयोजक है। कहीं पर सिद्ध औपम्य१ भी (उपमान के) तिरस्कार का कारण बनता है। जैसे- मुग्धे ! तुम्हें अपने नयनयुगल का इतना अभिमान क्यों है ? इस तरह के नीलकमल तो हर तरफ सरोवरों में भरे पड़े हैं ॥२२७॥ यहाँ उत्कृष्ट उपमान (नेत्रयुगल) का प्रादुर्भाव ही (लोकप्रसिद्ध उपमान किन्तु उपमेय रूप में परिकल्पित नीलकमलों के) तिरस्कार का कारण है। चन्द्रस्योपमानत्वं वचनीयमिति कथनाच्चन्द्रस्य निकृष्टत्वेनोपमेयत्वं क्लृप्तम्। प्रयोजनं तु मुखस्योपमानता। योजयति-अत्रोपमानत्वेनेति। क्वचि- दुपमानस्य सत उपमानत्वमेव न्यक्करणादलङ्गारं समुत्थापयतीत्याह-क्वचित् पुनरिति। गर्वमिति। ईदृशानि नलिनानि सन्तीत्युपमानाविर्भाव एव निःसामान्यस्य लोचनयुगलस्य न्यककारः। योजयति- अत्रोत्कर्षेति। यथात्रोपमेयस्यो- १. चात्रोपमानत्वविवक्षा प्रयोजिका-शा० ना० क्रमः। 2. एव-शा० नास्ति। 3. निमित्तम्-ना० । ४. सम्भाव्य°-अ०। ५. ·युगेन-ना०। ६. वहसि किम्-ना०। 9. भद्रे-अ० नि० शा१। -. ननु-शा१ प्रमादाच्च्युतमस्ति। ९. मानप्रा°-अ० शा१। १० पहले उदाहरण में औपम्य की निष्पत्ति इसलिए नहीं है क्योंकि उपमेय मुख की अपेक्षा उपमान चन्द्र में सौन्दर्यादि गुणों की कमी है। औपम्य की अनिष्पत्ति ही 'वअणिज्जम्' (वचनीयम्) पद के द्वारा सूचित होती है।
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३०८ अलंकारसर्वस्वम् [मीलितम- अनेन १न्यायेनात्युत्कृष्टगुणत्वाद्यदुपमानभावमपि२ न सहते *तस्यैवोप- मानभावकल्पने प्रतीपमेव। यथा- अह्मेव गुरुः सुदारुणानामिति हालाहल तात मा स्म दृप्यः । ननु सन्ति भवादशानि भूयो भुवनेऽस्मिन्वचनानि दुर्जनानाम्।।२२९/
निबद्धम्। अत्र हालाहलत्वं 'प्रकृष्टदोषत्वादसंभाव्योपमानभावमप्युपमानत्वेन"
वस्तुना वस्त्वन्तरनिगूहनं मीलितम् ॥सू० ७१।। इसी रीति से जो वस्तु अत्यन्त उत्कृष्ट गुण के कारण उपमान नहीं बन सकती उसकी उपमान रूप में कल्पना करने पर भी प्रतीप (अलंकार) ही होता है। जैसे- अरे भई हलाहल ! 'मैं ही अत्यन्त भयंकर (वस्तुओं) का गुरु हूँ' यह अभिमान मत करो। इस संसार में दुर्जनों के तुझ सरीखे बहुत से वचन पाये जाते हैं ॥२२९॥ यहाँ हलाहल का, प्रकृष्ट दोष के कारण, उपमानभाव असम्भावित है पर फिर भी उसे उपमानरूप में दिखाया गया है। एक वस्तु द्वारा वस्त्वन्तर का तिरोधान मीलित है॥सू० ७१॥ पमानासहत्वं तथैवातिप्रकर्षादुपमानभूमिमप्यतिपतते। उपमानत्वक्लृप्तिः प्रतीपमित्याह-अनेनेति। अहमेवेति। दारुणत्वकाष्ठाप्राप्तस्य हालाहलस्य दुर्जनवचनोपमानता- क्लृप्तिर्न्यक्काराय। तदेतद् योजयति-अत्र हालाहलत्वमिति। उपमानस्य कैमर्थ्यादुपमेयत्वकल्पनात्। द्विधा प्रतीपं ववाप्येतदुपमानत्वतोऽपि च। निमीलितार्थ सूत्रम्-"वस्तुना वस्त्वन्तरनिगहनं निमीलितम्"॥ १. अति° नि० नास्ति। २. भावत्वमपि-ना० । ३. तस्योपमाभावत्वकल्पितम्-नि०। तस्योपमानत्वक°-अ० शा०। ४. भाव्यमानोपमेय°-नि०। ५. चोपमानभावेन-ना० । ६. निमीलितम्-अ०। समुद्रबन्धोऽपि प्रकृतालङ्कारं निमीलिताभिधानेनैव स्मरति। नास्माकमादर्शपुस्तकेषु क्वापि अभिधानमेतद् दृष्टम्। विमर्शनीकृदपि मीलितनाम्नैवालङ्कारं प्रकृतमभिधत्ते। सर्वस्वकारोऽपि तद्गुणसूत्रवृत्तौ मीलिताभिधानेनैव स्मरति।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३०९ सहजेनागन्तुकेन वा लक्ष्मणा '्यद्वस्त्वन्तरेण वस्त्वन्तरं निगूह्यते तदन्वर्थाभिधानं मीलितम्। न चायं सामान्यालंकार एव तस्य हि साधारणगुणयोगाद्भेदानुपलक्षणं रूपम्। अस्य तूत्कृष्टगुणेन निकृष्टगुणस्य तिरोधानमिति महाननयो्विशेषः३। सहजेन यथा- अपाङ्गतरले दशौ मधुरवक्रवर्णा गिरो विलासभरमन्थरा गतिरतीव कान्तं मुखम्। इति 'स्फुरितमङ्गकैर्मृगद्दशां" स्वतो लीलया घतदत्र न मदोदयः कृतपदोऽपि संलक्ष्यते ॥२३०॥ स्वाभाविक अथवा आगन्तुक (औपाधिक) चिह्न द्वारा यह जो किसी वस्तु से दूसरी वस्तु का निगूहन तिरोधान-है वह अन्वर्थसंज्ञक मीलित (अलंकार कहलाता) है। यह सामान्यालंकार मात्र नहीं है। इस (अलंकार) का तो सामान्यगुणों से योग के कारण (दो वस्तुओं में) भेद का न मालूम पड़ना स्वरूप है। पर इस (अलंकार) में उत्कृष्टगुण (वस्तु) द्वारा निकृष्ट गुण वाली वस्तु का तिरोधान होता है अतः इन दोनों (सामान्य तथा मीलित अलंकारों) में महान् भेद है। स्वाभाविक (चिह्न द्वारा वस्तु के तिरोधान) का उदाहरण- मृगनयनी के आँखों की कोर चपल हैं, वाणी में मीठे और बाँके वैन हैं, चाल विलास के भार से मन्थर है, मुख अत्यन्त कमनीय है। इस प्रकार (इस मृगनयनी के) अंगों में विलास स्वतः स्फुरित हो रहा है। अतएव इस में (मदिरापान से होने वाला) नशे होने पर भी दिखाई ही नहीं पड़ रहा है॥।२३०।।
वस्तु वस्त्वन्तरं सहजेन लक्ष्मणा यन्निगूहति (?) आगन्तुकेन वा तन्नि- गूहित्वान्निमीलितम्। व्याचष्टे सहजेनेत्यादि। सामान्यतो भेदमाह-न चायमिति। तस्य हि गुणसाधारण्यात् भेदानुपलक्षणं लक्षणम्। अस्य पुनरुत्कृष्टेन गुणेन निकृष्टगुणस्य स्थगनम् । १. 'अपरे तु वस्तुनो वस्त्वन्तरनिगूहनमिति पाठ इत्यभिदधते' समुद्रबन्धः स्वीयटीकायां पाठान्तरमिदं स्मरति। २. एव-अ० नि० नास्ति। . भेद :- शा० (?) । ४. 0३० के०-अ० ना०। ५. °दृश :- अलंकार रत्नाकरे। ६. यदत्र-नि० ।
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३१० अलंकारसर्वस्वम् [मीलितम् ]
अत्र दक्तारल्यादिना स्वाभाविकेन लक्ष्मणा मदोदयकृतं दक्तार- ल्यादि तिरोधीयते। आगन्तुकेन 'यथा- ये कन्दरासु निवसन्ति सदा हिमाद्रे- स्त्वत्पातशङ्कितधियो विवशा द्विषस्ते। अप्यङ्गमुत्पुलकमुद्वहतां सकम्पंर तेषामहो बत भिया न बुधोऽप्यभिज्ञः॥२३१॥ अत्र३ हिमाद्रे: कन्दरानिवासामर्थ्यात्४प्रतिपन्नेन" शैत्येन समुद्धावि- तावागन्तुकौ कम्परोमाञ्जौ भयकृतयोस्तयोस्तिरोधायकौ। तिरोधायकत्वा- देव च मीलितव्यपदेशः।
यहाँ चितवन की चंचलता आदि स्वाभाविक चिह्न से मदोदय से उत्पन्न चितवन की चंचलता आदि का तिरोधान हो गया है। आगन्तुक (चिह्न द्वारा तिरोधान) का उदाहरण- हे राजन् ! तुम्हारे आक्रमण से भयभीत तुम्हारे जो शत्रु लाचार होकर हिमालय की कन्दराओं में पड़े रहते हैं उनके कम्पित और रोमान्चित शरीर धारण करने पर भी उनके भय को बुद्धिमान व्यक्ति भी (सही अर्थ में) नहीं जान पाता है ॥२३०। यहाँ हिमालय की कन्दराओं में निवास करने की अर्थशक्ति से निश्चित शैत्य से उद्भावित आगन्तुक कम्प तथा रोमांच, ड़र के कारण उत्पन्न उन (कम्प तथा रोमांच) दोनों के तिरोधायक है। तिरोधान करने के कारण ही (इस अलंकार का) नाम मीलित है।
अपाङ्गेति। अङ्गके लीलया इति स्फुरितम्। इत्थं लीलया प्रससारे- त्यर्थ :! दृक्तारल्यादिना सहजेन लक्षणेन लीलामदोदयहेतुकं दृक्तारल्यादि तिरोदधाति। योजयति-अत्र दक्तारल्येति। ये कन्दरास्विति। त्वत्पातशङ्कितधियस्त्वदापातशङ्काचकिताः। अत्र हि मामागन्तुकलक्षणाम्यां कम्परोमाञ्चाभ्यां भयकृतौ कम्परोमाञ्चौ स्थगयति। योजयति- अत्र हिमाद्रीति।
१. च यथा-अ० । २. सवाष्पं-शा१। 3. हिमाद्रिकन्दरा°-अ० नि०। ४. सामर्थ्यप्रति°-नि० । . निष्पन्नेन- शा० ना० शा१।
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[सामान्यम् ] संजीविनी-सहितम् ३११ प्रस्तुतस्यान्येन 'गुणसाम्यादैकात्म्यं सामान्यम् ॥सू० ७२।। यत्र प्रस्तुतस्य वस्तुनोऽप्रस्तुतेन साधारणगुणयोगादैकात्म्यं 'भेदा- नध्यवसायादेकरूपत्वं निबध्यते, तत्समानगुणयोगात्सामान्यम्। न 3चेयमपह्नतिः। किचिन्निषिध्यह कस्यचिदप्रतिष्ठापनात्"। 'यथा- मलयजरजसविलिप्ततनवो नवहारलताविभूषिताः सिततरदन्तपत्रकृतवक्त्ररुचो रुचिरामलांशुकाः। शशभृति विततधाम्नि धवलयति धरामविभाव्यतां गताः प्रियवसतिं प्रयान्ति सुखमेव निरस्तभियोऽभिसारिकाः ॥२३२॥ प्रस्तुत की दूसरे (अप्रस्तुत) के साथ गुण-साम्य के कारण एकात्मता सामान्य है ॥।सू० ७२॥ जहाँ प्रस्तुत वस्तु की अप्रस्तुत के साथ सामान्य गुणों के योग के कारण एकात्मता का-भेद न रहने से एकरूपता का - वर्णन होता है वह समानगुणों के योग के कारण सामान्य (नामक अलंकार) कहलाता है। इसे अपह्नुति (अलंकार) नहीं (माना जा सकता) है क्योंकि यहाँ (सामान्यालंकार में) किसी एक का निषेधकर किसी दूसरे की स्थापना नहीं होती है। उदाहरण- चन्दनरस को शरीर में लगाए हुई, नवीन हार लता से विभूषित, हाथी दाँत के बने अत्यन्त शुभ्र दन्तपत्र से मुख को सजाए हुई, सुन्दर एवं स्वच्छ परिधान पहिने हुई, चाँदनी फैलाए हुए चन्द्रमा के द्वारा पृथिवी को धवलित कर देने पर दिखलाई न पड़ने वाली अभिसारिकाएं, निडर होकर, सुखपूर्वक प्रियतम के निवास स्थान पर जा रही हैं ॥२३२॥
निजेनागन्तुना वापि लक्षणेनान्यगोपनम्। निमीलिताख्योऽलङ्कारो द्विप्रकार: प्रकाशित:।। सामान्यार्थ सूत्रम्-"प्रस्तुतस्यान्येन गुणसाम्यादैकात्म्यं सामान्यम्" प्रस्तुतस्याप्रस्तुतेन गुणसाम्यादेकरूपत्वं सामान्ययोगात् सामान्यालङ्गार:। ब्याचष्टे-यत्र प्रस्तुतस्येत्यादि। अपहनुतेर्भेदायाह-न चेयमिति। अपहनुतौ हि प्रकृतनिषेधेनाप्रकृतप्रतिष्ठापनम्, इह तुन तथा। कि तहिं? १. गुणस्य-ना०। २. अभेदेनाध्य०- अ० शा०। ३. चेद०-अ० शा० । ४. निबध्य-नि० । ५. षठानात्- शा० ना० शा१। ६. उदाहरणम्-अ० । ७. विमुक्तभिय :- अ० ।
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३१२ अलंकारसर्वस्वम् [तद्गुणः ] १अत्र मलयजरसविलेपनादीनां चन्द्रप्रभया सह 'अविभाव्यतां गताः' इत्यभेदप्रतीतिर्दर्शिता।
यत्र परिमितगुणस्य वस्तुनः समीपवर्तिप्रकृष्टवस्तुगुणस्य" स्वीक- रणं, स तद्गुणः । तस्योत्कृष्टगुणस्य गुणा अस्मिन्निति कृत्वा। न चेदं मीलितम्। तत्र प्रकृतं वस्तु वस्त्वन्तरेणाच्छादितत्वेन प्रतीयते। इह त्वनपह्नतस्वरूपमेव प्रकृतं वस्तु वस्त्वन्तरगुणोपरक्ततया प्रतीयत इत्यस्त्यनयोर्भेदः।
यहाँ चन्दनरस के विलेपन आदि की चाँदनी के साथ 'दिखलाई न पड़ने वाली' इस (पद) से अभेदप्रतीति दिखाई गई है। अपने गुण को छोड़कर अधिक उत्कृष्ट गुण का स्वीकार तद्गुण है॥सू० ७३। जहाँ परिमित गुण वाली वस्तु समीपवर्ती उत्कृष्ट वस्तु के गुण को स्वीकार कर लेती है (तो) वह तद्गुण (नामक अलंकार) होता है। चूँकि तत् अर्थातू उत्कृष्टगुण (वस्तु) के गुण इस (परिमित गुण वाली वस्तु) में होते हैं (अतः तद्गुण कहलाता है) । यह मीलित (अलंकार) से भिन्न है। उसमें (मीलित अलंकार में) प्रस्तुत वस्तु वस्त्वन्तर से आच्छादित रूप में प्रतीत होती है। किन्तु इस (अलंकार) में प्रस्तुत का स्वरूप अपह् नुत (आच्छादित) न होकर वस्त्वन्तर के गुण से उपरंजित रूप में प्रतीत होता है अतः इन दोनों में भेद है।
ऐकात्म्यम्। मलयजरसेति। दन्तपत्रं करिदशनताटङ्कम्। अविभाव्यता- गतिरैकात्म्यम्। योजयति - अत्र मलयजेति। प्रस्तुतस्यान्यतादात्म्यं सामान्यं गुणसाम्यतः । तद्गुणार्थं सूत्रम्-"स्वगुणत्यागादत्युत्कृष्टगुणस्वीकारस्तद्गुणः।" व्याचष्टे-यत्रेति। निर्वक्ति तस्येति। निमीलितान्द्रेदमाह-न चेति। तत्र हि वस्त्वन्तरनिग्रूहनमिह त्वनिगूहितस्य तद्गुणेनोपरागः ।
१. अत्र च-ना० शा१। २. इति भेदाप्र०-ना० शा१। ३. ०दूत्कृष्ट°-ना० शा१। ४. प्रकृष्टगुणवस्तुगुणस्वीकरणम्- अ० शा१। ५. गुणस्वी°- ना०। ६. तत्र हि-अ० नि० । ७. वस्तु शा१ नास्ति।
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[ अतद्गुणः ] संजीविनी-सहितम् ३१३
१उदाहरणम्- विभिन्नवर्णा गरुडाग्रजेन सूर्यस्य रथ्याः परितः स्फुरन्त्या। रत्नैः पुनर्यत्र २रुचं रुचा स्वामानिन्यिरे वंशकरीरनीलैः ॥२३३। अत्र रविरथाश्वानामरुणवर्णस्वीकारः। तस्यापि गारुत्मतमणिप्रभा स्वीकार इति तद्गुणत्वम्। सति हेतौ तद्गुणाननुहारोऽतद्गुणः ॥स० ७४।। तद्गुणप्रस्तावात्तद्विपर्ययरूपोऽतद्गुण उच्यते। इह 'न्यूनगुणस्यो-
उदाहरण- जहाँ (जिस रैवतक पर्वत पर) अरुण (की लाली) से भिन्न रंग को प्राप्त हुए सूर्य के घोड़े बाँस की कोपल को भाँति हरित मरकत मणियों की चारों ओर फैलती हुई आभा से फिर अपनी (सहज हरित) कान्ति को प्राप्त करा दिए जाते हैं ॥२३३।। यहाँ सूर्य के घोड़ों द्वारा अरुण की लाली धारण करना और उस (लाली) के द्वारा पुनः मणियों की हरित-प्रभा धारण कर लेने से तद्गुण (अलंकार) है। कारण रहने पर भी उस (उत्कृष्टगुण प्रकृत अथवा अप्रकृत) के गुण का अंनुहरण न करना अतद्गुण है ॥।सू० ७४।। तद्गुण के प्रसंग से, उससे भिन्न स्वरूप वाले अतद्गुण का निरूपण किया
विभिन्नेति। अरुणेन वर्णभेदं नीता: रथवाहा यत्र वंशाङकुरनीलैर्मरकत- रत्नैः प्रभया पुनः स्वां प्रभा निन्यिरे। अश्वानामारुण्येन तद्गुणता, आरुण्यस्य च हारित्येन। योजयति अत्र रवीति। तद्गुणः स्वगुणत्यागादुत्कृष्टस्य गुणग्रहः। अतद्गुणार्थं सूत्रम्-"सति हेतौ तद्रूपाननुहारोऽतद्गुणः॥" ससङ्गतिकं व्याचष्टे तद्गुणेति। उत्कृष्टगुणवस्तुप्रत्यासत्तौ हि न्यून- गुणस्य तद्गुणस्वीकारो न्यायोपपन्नः । प्रत्यासत्तावप्यननुहरणमतद्गुणालङ्गारः। निर्वक्ति-तस्योत्कृष्टस्येति। यदि वेति निरुक्त्यन्तरम्। अनुहरणहेतौ सत्य-
१. यथा-नि०। २. रुचा रुचम्-इति शा१ पाठक्रमः । ३. मणिवर्ण०-ना० शा१। ४. विशिष्ट°-नि० ना० (उत्कृष्ट°-इति स्थाने) ।
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३१४ अलंकारसर्वस्वम् [अतद्गुणः ] त्कृष्टगुणपदार्थधर्मस्वीकारः प्रत्यासत्त्या न्याय्यः । यदा पुनरुत्कृष्टगुण- पदार्थसन्निधानाख्ये हेतौ सत्यपि, तद्रूपस्यो त्कृष्टगुणस्याननुहरणं न्यून- १गुणेनानुवर्तनं भवति सोऽतद्गुणः। तस्योत्कृष्टगुणस्यास्मिन्गुणा२ न सन्तीति कृत्वा१। यदि वा तस्याप्रकृतस्य रूपाननुहार: सत्यननुहरणहेतौ सोऽतद्गुणः । तस्याप्रकृतस्य "गुणा नास्मिन्सन्तीति कृत्वा। 'क्रमेणो- दाहरणम्- धवलो सि जइ वि सुन्दर तह वि तुए मज्झ रज्जिअं हिअअं। राअभरिए वि हिअए सुहअ णिहित्तो ण रत्तो सि ॥२३४॥ [धवलोऽसि यद्यपि सुन्दर तथापि त्वया मम रंजितं हृदयम्। रागभरितेऽपि हृदये सुभग निहितो न रक्तोऽसि॥] जा रहा है। न्यून गुण वाली वस्तु द्वारा अधिक उत्कृष्ट गुण वाली वस्तु के धर्म को प्रत्यासत्ति के नाते ग्रहण कर लेना उचित है। पर यदि उत्कृष्ट गुण वाली वस्तु के समीप रहने का कारण होने पर भी, उसके गुण (तद्गुण) अर्थात् उत्कृष्ट वस्तु के गुण को ग्रहण न करना, न्यून गुण द्वारा अनुवर्तन न करना, ही अतद्गुण होता है क्योंकि तत् अर्थात् उत्कृष्ट गुण के गुण इस (न्यूनगुण वस्तु) में नहीं होते हैं। अथवा तत् अर्थात् अप्रकृत के रूप के अनुहरण का कारण रहने पर भी (प्रकृत द्वारा) ग्रहण न करना भी अतद्गुण है क्योंकि तत् अर्थात् अप्रकृत के गुण इस (प्रकृत) में नहीं होते हैं। क्रमशः उदाहरण- अयि सुन्दर ! यद्यपि तुम धवल हो पर फिर भी तुमने मेरा हृदय रंग दिया है। पर राग भरे हृदय में रहने पर भी हे सुभग ! तुम रक्त (अनुरक्त, लाल) नहीं हो पाए हो ॥२३४॥
ननुहरणादतद्गुणः। अत्र विगृह्ाति-तस्याप्रकृतस्येति। इत्थमयं द्विधा। धवलोऽसीति।
· °गुणस्याननु'-शा० ना० शा१। २. गुणा अस्मिन् न-शा० ना० क्रमः । ₹. कृत्वा -अ० नि० नास्ति। ४. यद्वा-नि० ना०। ". अस्मिन् गुणा न सन्तीति -कमः शा० न० शा१। ६. क्रमेण यथा-नि०। क्रमेण-अ० शा० नास्ति। जह-नि०
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[अतद्गुणः ] संजीविनीसहितम् ३१५
गाङ्गमम्बु सितमङ्ग१ यामुनं कज्लाभमुभयत्र मज्जतः । राजहंस तव सैव शुभ्रता चीयते न च न चापचीयते ॥२३५॥ पूर्वत्र रक्तहृदयसंपर्कान्नायकस्य धवलशब्दवाच्यस्य प्राप्तमपि रक्तत्वं न निष्पन्नमित्यतद्गुणः। उत्तरत्र 3त्वप्रकृतस्य गाङ्गयामुनजलस्य संप- रकेडपि न तथा रूपत्वमित्ययमप्यतद्गुण' एव। धवलोऽसीति त्वतद्गुण एव। कार्यकारणभावस्य चात्राविवक्षणान्न विशेषोक्त्यलंकारावकाशः। गंगा का जल शुभ्र है और यमुना का जल काजल-जैसा है। (पर) अरे राजहंस ! दोनों जगह मज्जन करने पर भी तुम्हारी शुभ्रता वैसी ही है- न बढ़ती है और न घटती है ॥२३५॥ पहले उदाहरण में (अनु-) रक्त हृदय के सम्पर्क में आने से धवल शब्द से बताए गए नायक का (अनु-) रक्त हो जाना प्राप्त था पर फिर भी (अनु-) रक्त न बनने से अतद्गुण है। उत्तर (उदारहण) में प्रकृत से- गंगा तथा यमुना के जल से-सम्पर्क होने पर भी उस रूप का ग्रहण न होना, इस प्रकार यह भी अतद्गुण ही है। 'धवलोऽसीति' इस उदाहरण में तो अतद्गुण ही है। यहाँ कार्यकारण-भाव की विवक्षा न रहने से विशषोक्ति अलंकार के लिए कोई स्थान नहीं है।
धवलोऽसि यद्यपि सुन्दर तथापि त्वया (मम) रञ्जितं हृदयम्। रागभरितेऽपि हृदये सुभग निहितो न रक्तोऽसि। धवलो युवा, धवलश्च(?)। रागभरितहृदयनिधानेऽप्यरक्तत्वमतद्गुणः। गाङ्गमिति। अङ्गेति संबोधनम्। चीयते उपचीयते। अत्राप्रकृतरूपान- नुहारः। उभयत्र योजयति- पूर्वत्रेत्यादि। ननु प्रथमार्धे कोडलङ्गार इत्यत आह- धवलोऽसीति। धवलस्यापि रञ्जनेऽतद्गुणत्वं स्फुटमेव। यतः कार्य- कारणेति। विषमवैधर्म्यं व्यक्तम्। न तद्गुणेऽनुहारस्तु गुणताद्रूप्ययोद्विंधा। सितमम्बु-नि० ना०। २. अतिरक्त°-अ० नि० । s. तु-नि० ना० नास्ति। ४. अपि - ना० नास्ति। ४. एव-ना० नास्ति। ६. 'धवलोऽसीति ... एव' इयानंशो नि०ना० नास्ति। ७. च-अ० ना० शा० नास्ति। ८. विषमालङ्कारः।-अ०। विषमालङ्कारावकाशः । -शा१। विशे- षोक्तिः ।-शा०। 'विषमालङ्कारः ... इतिपाठस्तु पुस्तकान्तरेषु स्थितो- डप्यत्रायुक्त:' - वि० ।
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३१६ अलंकारसर्वस्वम् [ उत्तरम् ] उत्तरात्प्रश्नोन्नयनमसकृदसंभाव्यमुत्तरं चोत्तरम् ।।सू० ७५।। यत्रानुपनिबध्यमानोडपि प्रश्न१ उपनिबध्यमानादुत्तरादुन्नीयते, तदे- कमुत्तरम्। न चेदमनुमानम्। पक्षधर्मतादेरनिर्देशात्3। यत्रच प्रश्न- पूवकमसंभावनीयमुत्तरं, तच्च न सकृत्, तावन्मात्रेण चारुत्वाप्रतीतेः। अतश्चासकृन्निबन्धे द्वितीयमुत्तरम्। न चेयं परिसँख्या। व्यवच्छेद्यव्यव- च्छेदकपरत्वाभावात्। क्रमेण' यथा एकाकिनी यदबला तरुणी तथाह- मस्मद्गृहे गृहपतिश्च गतो विदेशम्। उत्तर से प्रश्न को कल्पना अथवा अनेक बार असम्भाव्य उत्तर देना उत्तर (अलंकार) है॥सू० ७५॥ ीजहाँ प्रश्न न होने पर भी उसकी कल्पना उपनिबध्यमान उत्तर से कर ली जाती है, वह प्रथम (प्रकार का) उत्तर है। यह अनुमान नहीं (माना जा सकता) है क्योंकि (उत्तरालंकार में) पक्ष-धर्मता आदि का निर्देश नहीं होता है। और जहाँ प्रश्न होने पर असम्भाव्य उत्तर, और वह भी एक बार नहीं क्योंकि उतने से (एक बार से) सौन्दर्य-प्रतीति नहीं होती है अतः अनेक बार दिया जाए वह द्वितीय (प्रकार का) उत्तर (अलकार) होता है। यह परि- संख्या (अलंकार) नहीं (माना जा सकता) है क्योंकि इसमें निषेध्यपरता तथा निषेधकपरता नहीं होती हैं। त्रमशः जैसे- मैं घर में अकेली हूँ और वह भी तरुणी अबला। घर का मालिक विदेश उत्तरार्थं सूत्रम्- "उत्तरात् प्रश्नोन्नयनमसकृदसम्भाव्यमुत्तरं चोत्तरम् ॥" प्रश्नानुपादानेऽप्युत्तरादुन्नयनमेकमुत्तरम्। उपात्तस्य च प्रश्नस्य यदसम्भाव्य- मसकृदुत्तरं तद् द्वितीयम्। व्याचष्टे-यत्रानुपनिबध्यमान इत्यादि। अति- व्याप्ति परिहरति-न चेयमिति। परिसंख्यायां व्यवच्छेद्यव्यवच्छेदकभावो विवक्ष्यः। अत्र त्वविवक्षा। एकाकिनीति। कं याचसे वासा (?सं) । १. निबद्धादु®-अ०। २. धर्मदे°-ना० शा१। धर्मत्वादे०-अ०। ३. रनुद्देशात् नि० । ४. चेदम्-अ० ना० (?) ५. क्रमेणोदाहरणम्-अ० शा१। ६. मस्मिन् गहे-अ० शा१। ७. विदूरम्-ना०।
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[ उत्तरम् ] संजीविनी-सहितम् ३१७
कं याचसे तदिह वासमियं वराकी श्वश्नूर्ममान्धबधिरा ननु मूढ पान्थ ॥।२३६।। का विसमा देवगई किं लद्र जं जणो गुणगगाही। किं सोक्खं सुकलत्तं किं दुक्खं जं खलो लोओ ॥२३७। [ का विषमा दैवगतिः कि लब्धं यज्जनो गुणग्राही। कि सौख्यं सुकलत्रं किं दुःखं यत्खलो लोकः॥ ] पूर्वत्र मम निवासो दीयतामिति प्रश्न उत्तरादुन्नीयते। उत्तरत्र दैव- गत्यादिनिगूढत्वादसंभाव्यमसकृत्प्रश्नपूर्वकमुत्तरं निबद्म्। इतः प्रभृति गूढार्थप्रतीतिपरालंकार लक्षणम्
चला गया है तो भला तुम किससे यहाँ (रात में) रहने के लिए याचना कर रहे हो। वेचारी यह मेरी सास सचमुच अंधी भी है और बहरी भी ॥२३६॥ दुर्ज्ञेय क्या है ? देव की गति। प्राप्तव्य क्या है ? यही कि गुण का ग्राहक व्यक्ति (पा लेना)। सुख क्या है ? उत्तम स्त्री। दुःख क्या है ? दुष्ट आदमी ॥२३७॥ पहले (उदाहण) में 'मुझे रहने की जगह दो' इस प्रश्न की उत्तर से कल्पना कर ली जाती है। परवर्ती (उदाहरण) में दैव की गति आदि अत्यन्त गूढ़ होने से असम्भाव्य उत्तर हैं जिनका प्रश्नपूर्वक अनेक बार उल्लेख हुआ है। इसके अनन्तर गूढार्थ-प्रतीतिपरक अलंकारों का स्वरूप बताया जाएगा।
वासयाचनेन किमित्यर्थः । का विसमेति। का विषमा दैवगतिः किं लभ्यं यज्जनो गुणग्राही। किं सौख्यं सुकलत्रं किं दुर्ग्राह्यं खलो लोकः ॥ अत्र दैवगत्यादि गूढत्वादप्रतिसम्भाव्यमुत्तरम्। योजयति-पूर्वंत्रेत्यादि। असकृदिति-नानात्वनियमोद्वाटनम्। प्रश्नोह उत्तरं तस्माद गूढं चासकृदुत्तरम्।
१. न श्रृणोति कश्चित् -- पाठान्तरम्। २. दव्वगई-अ० । ३. लद्धव्वं जणो-पाठान्तरम् । ४. सोऽत्र - अ ० ।
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३१८ अलंकारसर्वस्वम् [ सूक्ष्मम् । संलक्षित सूक्तमार्थप्रकाशनं सूच्मम् ॥सू० ७६।। इह सूक्ष्म: स्थूलमतिभिरसंलक्ष्यो योऽर्थः, स यदा कुशाग्रमतिभि- रिङ्गिताकाराभ्यां संलक्ष्यते, तदा तस्य संलक्षितस्य विदग्धं प्रति प्रकाशनं सूक्ष्मम्'। तत्रेङ्गिताद्यथा- संकेतकालमनसं विटं ज्ञात्वा विद्ग्धया। हसन्नेत्रार्पिताकूतं लीलापझं निमीलितम् ॥२३८।।
संलक्षित सूक्ष्म अर्थ का प्रकाशन सूक्ष्म (अलंकार) होता है ॥सू० ७६। जहाँ सूक्ष्म अर्थात् स्थूल बुद्धि द्वारा जो अर्थ असंलक्ष्य है उसे जब कुशाग्रबुद्धि चेष्टा या आकार से जान लेता है तो उस संलक्षित अर्थ का बुद्धिमान् (व्यक्ति) के प्रति प्रकाशित हो जाना सूक्ष्म (अलंकार) है। इनमें से चेष्टा द्वारा (सूक्ष्म अर्थ के प्रकाशन का) उदाहरण- सस्मित नयन से मन का भाव जताते हुए उपपति को एकान्तमिलन का समय जानने की इच्छा है, यह समझ कर विदग्धा (उपनायिका) ने अपने हाथ का लीलाकमल बन्द कर दिया ॥२३८॥
सङ्गत्यन्तरायाह-इतः प्रभृति। सूक्ष्मार्थ सूत्रम्- "संलक्षितसूक्ष्मार्थप्रकाशनं सूक्ष्मम् ।" इङ्गितादिभिः संलक्षितस्य सूक्ष्मार्थस्य विदग्धाय प्रकाशनं सूक्ष्मम्। व्याचष्टे-इह सूक्ष्म इत्यादि। कुशाग्रवत् तीक्ष्णा कुशाग्रीया। अत इद- मपीङ्गिताकाराभ्यां द्विधा। आकतव्यञ्जिताश्चेष्टा इ्गितं बुद्धिकारिताः। आकार: पुनराम्नातस्ता एवाबुद्धिकारिताः ॥। तथा- तारापुटभ्रूदृष्टयादेविकारानिङ्गितं विदुः। आकारा: सत्त्वजा भावा आद्या बुद्धया परेऽन्यथा। सङ्कतेति। कालमनसं कालं ज्ञातुमनसमित्यर्थः। नेत्रापिताकूतं नेत्राभि- व्यञ्जितभावमित्यर्थः। सङ्गेतकालमनसो ज्ञानं भ्रूकटाक्षादि। तदीयेङ्गितेन
१. सूक्ष्ममलङ्कारः-नि०।
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[ व्याजोक्ति: ] संजीविनी-सहितम् ३१९
अत्रसंकेतकालाभिप्रायो विटसंबन्धिना भ्रृक्षेपादिना इङ्गितेन लक्षितः रजनिकालभाविना लीलापद्मनिमीलनेन प्रकाशितः। आकारा- दयथा- वक्त्रस्यन्दिस्वेदबिन्दुप्रबन्धैद् ध्ट्वा भिन्नं कुङ्डुमं कापि कण्ठे। पुंस्त्वं तन्व्या व्यञ्जयन्ती वयस्या स्मित्वा पाणौ खङ्गलेखां लिलेख ॥।२३९।। अत्र रवेदकृतकुङ्डमभेदरूपेणाकारेण संलक्षितं पुरुषायितं पाणौ पुरुषोचितखङ्गलेखनेन प्रकाशितम्। उद्धिन्नवस्तुनिगूहनं व्याजोक्तिः ॥सू० ७७॥
यहाँ एकान्तमिलन का समय (जानने) का भाव उपपति के भ्रूविक्षेप आदि इशारे से पता चल जाता है जिसे रात्रिकाल के सूचक लीलाकमल के निमीलन से प्रकाशित कर दिया गया है। आकार से (सूक्ष्म अर्थ का प्रकाशन) जैसे- मुख पर से बहने वाली स्वेदबिन्दु की धारा से (नायिका के) कण्ठ में लगी हुई केसर को बिगड़ी हुई देखकर सुन्दरी की पुरुषायित रति को व्यक्त करने वाली किसी (सखी) ने (उस सुन्दरी की) हथेली पर तलवार का चित्र बना दिया ॥२३९॥ यहाँ स्वेद-बिन्दु के कारण बिगड़े हुए केसर के आकार से विज्ञात पुरुषायित (विपरीत रति) हथेली पर पुरुषोचित तलवार बनाने से प्रकाशित हो गई है। प्रकट हो जाने वाली किसी वस्तु का गोपन व्याजोक्ति (अलंकार) है॥सू० ७७॥
ज्ञात्वेति सूक्ष्मार्थसंलक्षणम्। पद्मनिमीलनं तु प्रकाशनम्। योजयति-अत्र सङ्केतेति। वक्त्रस्यन्दीति। स्वेद आकारस्तेन कुङकुमोद्रेदात् पुरुषायितज्ञानं सूक्ष्मार्थसंलक्षणम्। खड्गलेखस्तत्प्रकाशनम्। योजयति-अत्र स्वेदेति। सूक्ष्मं तु सूक्ष्मं संलक्ष्य विदग्धेषु प्रकाशनम् । इङ्गिताकारतः सूक्ष्मसंलक्षणमिति द्विधा॥ व्याजोक्त्यै सूत्रम् "उन्धिन्नवस्तुनिगूहनं व्याजोक्तिः" ॥। १. विटसम्बन्धी संकेत°-अ०। २. स्वेदबिन्दुकृतकुंकुमरूपभिन्नेनाकारेण-नि० । 1 3. खङ्गधारालिख°-नि० ।
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३२० अलंकारसर्वस्वम् व्याजोक्ति- यत्र निंगूढं वस्तु कुतश्चिन्निमित्तादुद्भिन्नं प्रकटतां प्राप्तं2, 3सद्स्त्व- न्तरप्रक्षेपेण निगूह्यते अपलप्यते, सा वस्त्वन्तरप्रक्षेपरूपस्य व्याजस्य वचनाद्वयाजोक्तिः। यथा-
द्रोमाञ्जादि विसंस्थुलाखिलविधिव्यासङ्गभङ्गाकुलः*। हा शैत्यं तुहिनाचलस्य करयोरित्यूचिवान्सस्मितं शैलान्तःपुरमातृमण्डलगणैर्ट ष्टोऽवताद्वः5 शिवः॥२४०।। अत्र रोमाञ्ादिनोद्धिन्नो रतिभावः शैत्यप्रक्षेपेणपलपितः । यद्यप्य- जहाँ किसी अत्यन्त गूढ़ वस्तु का, जो किसी कारण से उद्धिन्न या प्रकट हो जाती है, किसी दूसरी वस्तु के प्रक्षेप से (निमित्तान्तर से) निगूहन अर्थात् अपलाप होता है, वह निमित्तान्तर के उपन्यासरूप व्याज की उक्ति होने के नाते व्याजोक्ति (कहलाती) है। जैसे- हिमालय के द्वारा प्रदीयमान पार्वती के हाथ के स्पर्श से उद्भूत रोमांचादि के कारण (विवाह के) सारे अस्तव्यस्त क्रियाकलाप के गड़बड़ा जाने से घबराए हुए (और इस बात को छिपाने के लिए) 'ओह ! हिमालय के हाथ ठण्डे हैं' यह कहने वाले (पर शिव के बहाने को समझ लेने वाले) हिमालय के रनिवास (ब्राह्मी आदि), मातृमण्डल तथा (नन्दी आदि के) गणों द्वारा सस्मित देखे गए शिव तुम लोगों की रक्षा करें ॥२४०॥ यहाँ रोमांच (सात्त्विक भाव) आदि के कारण प्रकट हो जान वाले (पार्वती के प्रति शिव के) रतिभाव को शैत्य के बहाने से छिपा दिया गया है।
कुतश्चिन्निमित्तात् प्रकाशितस्य गूढवस्तुनो व्याजवचसा निगूहनं व्याजोक्तिः। व्याचष्टे-यत्र निगूढमित्यादि। वस्त्वन्तरप्रक्षेपेति निरुक्तिः । शैलेन्द्रेति। प्रतिपाद्यमाना दीयमाना। विधिव्यासङ्ग: क्रियासक्तिः। शैलान्तःपुरेण मातृमण्डलेन गणैश्च दृष्टः। योजयति-अत्र रोमाञ्चेति। १. निगूहनम्-शा०। निगृहितम्-ना०। २. गतम्-अ० । ३. तद्-शा०। ४. गूढोच्छलद्-शा० । ५. लोखिलविधिव्यासङ्गतो व्याकुल :- अ० । ६. °न् :- शा१। ७. दिना तन्िन्नो-शा० । °प्रक्षेपणेनाप०-नि० शा१।
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रलंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३२१ पह्नतोऽपि 'सस्मितत्वख्यापनेन पुनरप्युद्धिन्नत्वेन प्रकाशितः २तथा- व्यपलापमात्रचिन्तयास्यालंकारस्योल्लेखः। नन्वपह्नतिग्रन्थे 'यथार साट- श्याय योऽपह्नवः सापह्ृतिः, तथापह्नवायापि" यत्सादृशयं साप्यपह्नतिः' इति स्थापितम्। व्याजोक्तौ चोत्तरः प्रकारो विद्यते, तत्कथमिय- मलंकारान्तरेण कथ्यते। सत्यम्। "उद्भटसिद्धान्ताश्रयेण 'तत्तत्रोक्तम्। न हि तन्मते व्याजोक्त्याख्यमलंकरणमस्ति। इह तु तस्य संभवात्तद्वयति- रिक्तापह्तिरिति पृथगयमलंकारो निर्दिष्टः। यद्यपि छिपाने के बाद भी पुनः मुस्कराहट के वर्णन से (उस रति-भाव को) प्रकट कर दिया गया है तथापि केवल अपलाप के विचार से ही (प्रस्तुत उदाहरण में) इस (व्याजोक्ति) अलंकार का निरूपण है। यह शंका की जा सकती है कि अपह्नुति-ग्रन्थ (अपह्नुति अलंकार का निरूपण करने वाले प्रस्तुत ग्रन्थ के भाग) में जिस प्रकार सादृश्य के लिए जो अपह्नव हो वह अपह्नुति है, उसी प्रकार अपह्नव करने के लिए भी जो सादृश्य होता है वह भी अपह्नुति है, यह स्थापना की जा चुकी है; व्याजोक्ति में (अपह्नुति का) परवर्ती भेद प्राप्त होता है अतः इसे भिन्न अलंकार क्यों बताया जा रहा है ? -ठीक है। उद्भट के सिद्धान्त के अनुसार उस जगह पर वैसा (अर्थात् अपह्नव के लिये सादृश्य भी अपह्नुति अलंकार होता है) कहा गया था क्योंकि उनके मत में व्याजोक्ति नामक अलंकार है ही नहीं। पर चूँकि यहाँ (हमारे मत में) यह (व्याजोक्ति अलंकार) संभव है अतः अपह्नुति इससे भिन्न है। अपह्नुति केवल अपह्नव करने के लिए सादृश्य में मानी जाएगी। अस्तु ! इस (व्याजोक्ति अलंकार) का पृथक् उल्लेख किया गया है। असामञ्जस्यं शमयितुमाह-यद्यपीत्यादि। अपलापमात्रचिन्तयेति। सस्मि- तत्वकथनात् पुनः प्रकाशनं लक्षणतया न चिन्तनीयमिति भावः। उल्लेख उटटङ्गनम्। अव्याप्तिमाशङ्गते-नन्वपह्नतीति। उत्तरः प्रकार: अपह्रवाय सादृश्यमित्येवमात्मकम्। परिहरति-सत्यमिति। तत्र तथोक्तिरु,द्ट- १. त्वाख्या°-शा१। २. तस्याप्य०-ना०। ३. यथा-अ० नास्ति। ४. अपि -- अ० शा१ नास्ति। ५. श्रयणेन तत्रोक्तम् -- अ०। श्रयेणोत्तरत्रोक्तम्-ना०। ६. तत्-अ० नि० पुस्तकयोर्नास्ति। २१
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३२२ अलंकारसर्वस्वम् [वक्रोक्ति- अन्यथोक्तस्य वाक्यस्य काकुश्लेषाभ्यामन्यथा योजनं वक्रोक्तिः ॥सू० ७८।। उक्तिव्यपदेशसाम्याद्वचाजोक्त्यनन्तरं१ वचनम्। यद्वाक्यं केन- चिदन्यथान्याभिप्रायेणोक्तं सदपरेण वक्त्रा काकुप्रयोगेण शलेषमुखेन वान्यथान्यार्थघटनया योज्यते, 'तदुक्तिर्वक्रोक्तिः। काकुप्रयोगेण यथा- गुरुपरतन्त्रतया बत दूरतरं देशमुद्यतो गन्तुम्। अलिकुलकोकिलललिते नैष्यति सखि सुरभिसमयेऽसौ ॥२४१॥ अन्यार्थक वाक्य को काकु से या श्लेष से अन्य अर्थ में लगा देना वक्रोक्ति है।सू० ७८॥ उक्ति संज्ञा से साम्य होने के कारण व्याजोक्ति के बाद (वकोक्ति का) निरूपण हो रहा है। जो वाक्य कोई किसी अभिप्राय से कहे पर दूसरा वक्ता काकु के प्रयोग से अथवा श्लेष के आधार पर दूसरा अर्थ घटा कर लगा दे तो उस उक्ति को वक्रोक्ति कहते हैं। काकु के प्रयोग का उदाहरण- गुरुजन (माता पिता आदि) के वश में होने से यह (मेरा प्रियतम) सुदूर देश जाने को तैयार हो गया है। सखि ! अलिकुल तथा कोकिलों से कमनीय वसन्तकाल में यह नहीं लौटेगा ॥२४१। सिद्धान्ताश्रयेण। तन्मते व्याजोक्त्यनुपवर्णनात् तथापहनुतिसम्भवः। इह व्याजोक्त्युपवर्णनात् सोऽपहनुतिप्रकार एव नास्तीत्येकैवापहनुतिः। अत इयं व्याजोक्तिरेव। व्याजोक्तिर्व्याजवचनेनोद्ध्िन्नस्य निगूहनम्। अपह्लवाय सादृश्य इष्टा नापहनुतिर्यतः ॥ वक्रोक्त्यर्थ सूत्रम्- "अन्यथोक्तस्य वाक्यस्य काकुश्लेषाभ्यामन्यथायोजनं वक्रोक्तिः ।।" एकाभिप्रायेणोक्तस्य वाक्यस्य काकुश्लेषाभ्यामन्यथाभिप्रायेण योजनं वक्रोक्तिः । ससङ्गतिकं व्याचष्टे-उक्तिव्यपदेशेति। गुरुपरतन्त्रेति। दूरतरं गन्तु- मुद्त इति नायिकोक्तिरसौ, गुरुपर तन्त्रतया असौ गुरुपरता, समयेडस्मिन् नैष्यति १. रमस्या लक्षणम्-नि०।०रं कथनम् ।-अ० । २. थाभि°-नि। 3. श्लेषप्रयोगेण-नि० शा० । ४. तदुक्तिः सा-नि०।
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रलंकार: संजीविनी-सहितम् ३२३ अत्रैतद्वाक्यं नायिकया आगमननिषेधपरत्वेनोक्तम्। तत्सख्या काकुप्रयोगेण विधिपर्यन्ततां प्रापितम्। काकुवशाद्विधिनिषेधयोर्विपरी तार्थसंक्रान्ति:। श्लेषोऽभङ्गसभङ्गत्वेनोभयमयत्वेन च त्रिविधः। तत्राभङ्गश्लेष- मुखेन यथा- अहो केनेदशी बुद्धिर्दारुणा तव निर्मिता। त्रिगुणा श्रूयते बुद्धिर्न तु दारुमयी क्वचित् ॥२४२।। अत्र दारुणेति प्रथमान्तं प्रक्रान्तं श्लेषभङ्गया तृतीयान्ततया संपादि- तम्। सभङ्गश्लेषमुखेन यथा- यहाँ यह (प्रस्तुत) वाक्य नायिका ने (नायक के) न लौटने के अर्थ में कहा है। उसकी सखी (इस वाक्य को) काकु का प्रयोग कर विधिपरक अर्थ में लगा देती है। काकु (कण्ठध्वनि के विकार) के कारण विधि और निषेध (अपने से) विपरीत अर्थ को देने लगते हैं। श्लेष अभंग, सभंग, तथा उभयरूप तीन प्रकार का है। इनमें से अभंगश्लेष के द्वारा (वक्रोक्ति का) उदाहरण- ओह ! तुम्हारी ऐसी 'दारुण' (दारुणा-कठोर तथा काठ से) बुद्धि किसने बनाई है ? बुद्धि को त्रिगुणात्मिका (सत्त्व रज तथा तमोरूप) सुना जाता है पर काठ से बनी हुई तो कहीं नहीं (सुना जाता है) ॥२४२॥ यहाँ 'दारुणा' (कठोर) इस प्रथमान्त प्रयोग को श्लेष की भंगिमा से तृतीयान्त के रूप में बना दिया गया है। सभंग-श्लेष के माध्यम से (वक्रोक्ति) जसे-
न नेष्यतीति काकुगर्भा सख्युक्तिः। योजयति-एतद्वाक्यमिति। ननु गमनविधिनिषेधौ शाब्दौ कथमागमननिषेधविधौ योजितौ। अत आह- काकुवशेति। ईदृशि विषये काकोनिषेधद्योतकत्वाद् विपरीतार्थसङकान्तिः। अहो केनेति। दारुणा घोरा, काष्ठेन च। योजयति-अत्रेति। १. अत्र-अ० शा० ना० नास्ति। २. गमन°-ना०। ३. विधिपरतां-नि० । ४. तत्र श्लेषो०-नि०। ५. श्लेषोजभङ्गसभङ्गत्वेन द्विविधः-अ० ।
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३२४ अलंकारसर्वस्वम् [ वकोक्ति-
त्वं हालाहलभृत्करोषि मनसो मूर्च्छां 'ममालिङ्गितो हालां नैव बिभर्मि नैव च हलं मुग्धे क्थ हालिक:। सत्यं हालिकतैव ते समुचिता सक्तस्य गोवाहने वक्रोक्त्येति जितो हिमाद्रिसुतया स्मेरोऽवताद्वः शिवः ॥२४३।। उभयमुखेन यथा- विजये कुशलस्त्र्यक्षो न क्रीडितुमहमनेन सह शक्ता। विजये कुशलोडस्मि न तु त्र्यक्षोऽक्षद्वयमिदं पाणौ ॥२४४॥ किं मे दुरोदरेण प्रयातु य्यदि गणपतिर्न तेडभिमतः। कः "प्रद्वेष्टि विनायकमहिलोकं" किं न जानासि ॥२४५॥ हालाहल (कालकूट विष, सुरा और हल) धारण करने वाले तुम (हे शिव !) मेरे मन को आलिंगन से मूर्छित कर देते हो। मुग्धे ! (पार्वती !) न मैं सुरा धारण करता हूँ और न हल फिर मैं हरवाहा कैसे हूँ ? वृषभ-वाहन के अनुरागी आप (शिव) का हरवाहा होना ही उचित है इस प्रकार पार्वती द्वारा विजित सस्मित शंकर तुम्हारा कल्याण करे ॥२४३॥ उभयरूप (सभंग एवं अभंग-श्लेष द्वारा वक्रोक्ति) जैसे (पार्वती तथा शंकर की वकरोक्तिपूर्ण उक्ति-प्रयुक्ति)-शंकर (त्र्यक्ष) जीतने में (विजयी) कुशल हैं, मैं इनके साथ नहीं खेल सकती हूँ। विजये, (पार्वति !) मैं चतुर तो हूँ पर मेरे पास तीन पाँसा (त्र्यक्ष) नहीं हैं, (केवल) ये दो पांसे हैं ॥२४४॥ (पार्वती-) मुझे जुआ (दुरोदर) से क्या काम ? (शंकर)-अगर मेरा गणपति (दुरोदर) तुम्हें पसन्द नहीं है तो वह चला जाए। (पार्वती-) विनायक (गणेश तथा गरुड़) से कौन द्वेष करता है ? (शंकर)-सर्पलोक को क्या तुम नहीं जानती हो ॥२४५॥ त्वं हालाह्लेति। हालाहलवन्मूच्छां करोषीति देवी। देवस्तु हालां सुरां न बिभरम नापि च हलं सीरं, किं हलवत्तया हालिकोऽस्मीति। पुनर्देवी- गोवाहने सक्तस्य हालिकतैव सत्यमिति। अत्र हालाहलेति सभङ्गश्लेषः । विजये इति। कुलकात्मकं वाक्यम्। विजये इति देवीकर्तृकं विजया- सम्बोधनम्। देवस्योक्तौ जित्वरतायां शक्तोऽस्मि, न त्र्यक्षोऽहम्, अक्षद्वयस्द्ा- १. समा०-नि०, शा० (?) । २. मुग्धेऽस्मि कि-अ० । 3. गणपतिर्यदि-शा० ना० शा१ क्रमः । ४. क इह द्वेष्टि-अ० शा०। ५. लोक :-- ना० शा१।
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रलंकार: ] संजीवनी-सहितम् ३२५
चन्द्रग्रहणेन विना नास्मि रमे किं प्रतारयस्येवम्। देव्यै यदि रुचितमिदं नन्दिन्नाहूयतां राहुः॥२४॥ हा राहौ 'शितदंष्ट्रे भयकृति निकटस्थिते रतिः कस्य। यदि नेच्छसि ₹संत्यक्तः संप्रत्येषैव हाराहिः॥२४७॥ वसुरहितेन क्रीडा भवता सह कीदृशी न जिह्वेषि। किं वसुभिर्नमतो Sमून्सुरासुरान्नैव" पश्य पुरः ॥२४८॥ आरोपयसि मुधा किं नाहमभिज्ञा किल त्वदङ्कस्य। दिव्यं वर्षसहस्त्रं स्थित्वेति न युक्तमभिधातुम् ।।२४९।। (पार्वती ) चन्द्रमा की बाजी के बिना (चन्द्रग्रहणेन विना) मैं नहीं खेलती। मुझे इस तरह क्यों ठग रहे हो ? (शंकर-) यदि देवी को यही (चन्द्रग्रहण) अभीष्ट है तो नन्दिन् ! (जाओ) राहु को बुला लाओ ॥२४६॥ (पार्वती -) ओफ ! तीक्ष्ण दांढ़ वाले, भयंकर राहु के पास (हा राहौ) रहने पर किसे खुशी होगी? (शंकर-)अगर तुम हाराहि हाररूपी सर्प- को नहीं चाहती हो तो इसे अभी छोड़ देता हूँ ॥२४७॥ (पार्वती ) वसु-रहित (धनहीन) आपके साथ खेलना कैसा ? क्या तुम्हें (वसुहीन होने पर) लज्जा नहीं आती है ? (शंकर-) (आठ) वसुओं के साथ प्रणाम करते हुए सुरासुरों को क्या तुम सामने नहीं देख रही हो ? ॥२४८॥ (पार्वती-) क्यों व्यर्थ आरोप लगा रहे हो मैं तुम्हारी छलना (अंक) से परिचित नहीं हूँ। (शंकर-) हजार दिव्य वर्ष तक अंक (गोद) में रहकर भी यह कहना (कि तुम्हारे अंक से मैं परिचित नहीं हूँ) उचित नहीं है ॥२४९।
वादिति। अक्षशब्दः पाशवचनः। किं मे इति-देव्याह। दुरोदरेण मे किम्। देव आह-मे दुरोदरेण लम्बोदरेण नार्थश्चेद् गणपतिरपसरतु। देव्याह-को द्वेष्टि विनायकम्। देव आह-अहिलोक इति। इह विनायको गरुडः। चन्द्रेति। चन्द्रग्रहणेन इन्दुपणेन विना न रमे इति देवी। देवस्तु-चन्द्रग्रहणापेक्षा चेत् राहुराहूयताम्। हा राहाविति। राहौ स्थिते हा कस्य रतिरिति देवी। देवस्तु हारोरगोऽपनीयतामिति। वसुरहितेनेति। १. सित° - अ०, शा, ना० (?) । २. कस्या :- अ० । ३. तत् त्यक्तः अ०। ४. नमितो०-अ०। • नेव-अ० ना०। ६. पश्यसि-नि० ना० ।
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३२६ अलंकारसर्वस्वम् [स्वभावोक्ति- इति 'कृतपशुपतिपेशलपाशकलीला प्रयु क्तवक्रोक्ति२। हर्षवशतरलतारकमाननमव्याद्गवान्या 3वः॥२५०।। वक्रोक्तिशब्दश्चालंकारसामान्यवचनोSपीहालंकारविशेषे संज्ञितः। "सूक्ष्मवस्तुस्वभावयथावद्वर्णनं स्वभावोक्तिः॥सू० ७६।। इह वस्तुस्वभाववर्णनमात्र नालंकारः। तत्त्वे सति सर्वं काव्यमलं- कारि स्यात्। न हि तत्काव्यमस्ति यत्र' वस्तुस्वभाववर्णनं न विद्यते। तदर्थं सूक्ष्मग्रहणम्। सूक्ष्मः कवित्वमात्रस्य गम्यः । अत एव तन्निर्मित
इस प्रकार पशुपति द्वारा द्यूत के अभिराम खेल में वक्रोक्ति का प्रयोग करने वाली पार्वती का हर्ष के कारण तरल तारिकाओं वाला मुख तुम्हारी रक्षा करे ॥२५०॥ यद्यपि वकोक्ति शब्द अलंकारसामान्य का भी अभिधायक है पर यहाँ अलंकारविशेष का वाचक है। सूक्ष्म वस्तु के स्वभाव का यथावत् वर्णन स्वभावोक्ति है ॥सू० ७९॥ यहाँ (अर्थात् काव्य में ) वस्तु के स्वभाव का वर्णनमात्र अलंकार नहीं होता है। ऐसा होने पर समग्र काव्य सालंकार कहलाएगा। कोई भी काव्य ऐसा नहीं है जिसमें वस्तु के स्वभाव का वर्णन न पाया जाता हो। इसीलिए 'सूक्ष्म' ( पद) का प्रयोग किया गया है। सूक्ष्म का अर्थ है केवल कवित्व का विषय बनने वाला। अतएव तन्निमित (कवित्व
वसु द्रविणम्। अष्टौ वसवश्च। आरोपयसीति। अङ्ग: अङ्गनम्, छलनम् उत्संगश्च। इति (कृत-) पशुपतीति। पाशकाः अक्षाः काः। ननु विच्छित्तिरूपत्वात् सर्व एवालङ्गारो वक्रोक्तिरित्यत आह-वक्रोक्तीति। अन्यथायोजनं वाक्ये वक्रोक्तिरभिधीयते। द्विप्रकारा च विज्ञेया काकुश्लेषसमाश्रयात्।। स्वभावोक्त्यर्थ सूत्रम्- "सूक्ष्मवस्तुस्वभावयथावद्वर्णनं स्वभावोक्तिः"। व्याचष्टे-इह वस्त्विति। अत एवेति। कविमात्रगम्यत्वात् कविना १. पाशकलील कलहप्रयुक्त-अ०।पशुपतिपेलवपाशक°-नि० । २. वक्रोक्ते-नि०। ३. न :- शा१। ४. षसंज्ञितः-अ० । ५. स्वभावस्य-अ० । ६. मात्रे-ना० । ७. कार :- ना० शा१। C यत्र न वस्तुस्वभाववर्णनम्-नि० शा१। ९. कवयितमात्रस्य-अ० ।
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रलंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३२७
इव१ यो वस्तुस्वभावस्तस्य यथावदन्यूनानतिरिक्तत्वेन वर्णनं स्वभावो- क्तिरलंकार:। 2उक्तिवाचोयुक्तिप्रस्तावादिह लक्षणम्। भाविकरसवद- लंकाराभ्यामस्य भेदो भाविकप्रसङ्गे निर्णेष्यते। यथा-
स्तन्व्या: कुन्तलकौतुकव्यतिकरे" सीत्कारसीमन्तितः। पृष्ठश्लिष्यद वाम नस्तनभरोत्सेधाङ्कपालीसुधा-६ से काके करलोचनस्य कृतिनः कर्णावतंसीभवेत् ।।२५१।।
से सृष्ट) सा जो वस्तु-स्वभाव होता है उसका यथावत् - न घटा कर न बढ़ा कर-वर्णन करना स्वभावोक्ति अलंकार है। उक्ति और उसकी संघटना (अथवा वक्रोक्ति) का सन्दर्भ होने से यहाँ (स्वभावोक्ति अलंकार का) निरूपण किया जा रहा है। भाविक तथा रसवत् अलंकारों से इस (अलंकार) के भेद का निर्णय भाविक के प्रकरण में किया जाएगा। (स्वभावोक्ति) जैसे- (प्रियतम के) चंचुपुट के समान नखाग्र के घट्टे से उट्टंकित तथा (नायिका द्वारा) केश की खुजली मिटाते समय सीत्कार से सुशोभित, सुन्दरी का हुंकार, पीठ में रगड़ खाने वाले विशाल एवं उन्नत स्तनों वाली अंकपाली के अमृत- सिंचन से अंधमुंदे नयन वाले सौभाग्यशाली (प्रियतम) का कर्णाभरण बने ॥२५१॥
निर्मित इवोवितिर्वचनम् उक्तिशब्दः । अनेन सङ्गतिः। वैधर्म्यं वर्णयिष्यत इत्याह-भाविकेति। हुंकार इति। कुन्तलगतकण्डूव्यपनयने तन्व्या हुङ्कारः कृतिनः कर्णाव- तंसीभवेत्। कीदृशः, चञ्चुपुटाकारया नखकोटया यद् व्याघटटनं तेनोट्टङ्गितः सीत्कारोपशोभी च। कीदृशस्य, पृष्ठश्लिष्यत्कुचाङ्गपालीसुखेनाकेकरदृशः। स्वभावोकि्तिर्बुधर्नेय (? धोन्नेय) वस्तुस्वाभाव्यवर्णनम् ।। अथ प्रतीतिवैचित्र्यतारतम्यनिरूपणैः । भाविकं दूरदुर्लक्षं व्यक्तं व्याक्कियतेतमाम्।
१. एव-नि० शा०। २. वचनप्रस्तावादिहास्या-अ० । 3. उदाहरणम् -- अ० शा०। ४. क्रेङ्कारो-नि० शा० शा१। ५. कण्डकव्य°-अ० शा०। ६. सेव्याङ्कपा°-नि० ।
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३२८ अलंकारसर्वस्वम् [भाविकम-
अतीतानागतयोः प्रत्यक्षायमाणत्वं भाविकम् ॥सू० ८०।। अतीतानागतयोभूँतभाविनोरर्थयोरलौकिक त्वेनात्यद्भुतत्वाद्रयस्तसंबन्ध- रहितशब्दसंदर्भसमर्पितत्वाच्च प्रत्यक्षायमाणत्वं भाविकम्। कविगतो भाव आशयः श्रोतरि प्रतिबिम्बत्वेनास्तीति, भावो२ भावना वा पुनः पुनश्चेतसि शनिवेशनं सोऽत्रास्तीति। न चेयं४ भ्रान्तिः। भूत- "भाविनोर्भूतभावितयैव प्रकाशनात्। नापि रामोSभूदितिवद्वस्तुवृत्तमात्रम्।
अतीत तथा अनागत की प्रत्यक्षायमाणता भाविक है ॥सू० ८०॥ अतीत और अनागत-भूत और भावी पदार्थों का, अलौकिक होने के कारण अत्यन्त अद्भुत होने से तथा आकुल (उलझे हुए) सम्बन्ध से रहित (अर्थात् प्रसन्न) शब्द-रचना से समर्पित होने के कारण, प्रत्यक्ष-सा हो जाना भाविक है। कविगत भाव अर्थात् आशय श्रोता में प्रतिबिम्बरूप में होता है अतः, अथवा भावना अर्थात् (किसी वस्तु या भाव का) बारम्बार मन में अनुसन्धान इस (अलंकार) में होता है अतः (इसे भाविक कहा जाता है) । यह (प्रत्यक्षायमाणता) भ्रान्ति नहीं है क्योंकि भूत तथा भावी (वस्तु)) का भूत और भावी के रूप में ही प्रकाशन होता है। और न राम था इस तरह काइ तिवृत्तमात्र है क्योंकि भूत
तत्र सूत्रम्- "अतीतानागतयोः प्रत्यक्षायमाणत्वं भाविकम्" ॥ व्याचष्टे-अतीतेत्यादि। निर्वक्ति-कविगत इति। कविभावस्य श्रोतरि प्रतिबिम्बतापत्तिर्भाविकमित्यर्थः । भावो वेति। भाविभाविकस्य भावनकप्राणत्वात्। निरुक्त्यन्तरं, सोऽन्रास्तीति। भाविकमित्यनुषङ्ग। ननु मुनिर्जयतीत्युदाहरिष्यमाणे भूतभाविनोः प्रत्यक्षत्वाद् भ्रान्तिः कि नेत्यत आह-न चेयमिति। भूतभाविनोर्भूतभावित्वेनैव प्रत्यक्षीभावे का भ्रान्तिरिति भावः। ननु भूतभाविनोर्भूतभावित्वेन प्रकाशने वस्तुवृत्तमात्रमित्यत आह-नापि रामोडभूदित्यादि। रामोऽभूदिति वस्तु-
१. व्यत्यस्त°-अ०। २. भावो वा-अ० शा०। ३. विनिवेशनं-अ० । ४. चेदं भ्रांतिमान्-अ० । ५. भाविनां°-शा० ना० शा१। ६. वृत्त°-नि० नास्ति ।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३२९
भूतभाविगतस्य प्रत्यक्षत्वाख्यस्य१ धर्मस्य स्फुटस्याधिकस्य प्रतिलम्भात्। नापीयमतिशयोक्ति:२। अन्यस्यान्यतयाध्यवसायाभावात्। न हि भूत- ₹भाव्यभूतभावित्वेनाध्यवसीयते,४ अभूतभावि" वा भूतभावित्वेन। नापि प्रत्यक्षमप्रत्यक्षत्वेन, अप्रत्यक्षमपि® वा प्रत्यक्षत्वेन। न हि प्रत्यक्षत्वं केवलं वस्तुधर्मः। प्रतिपत्त्रपेक्षयैव' वस्तुनि तथा-
और भावी से सम्बद्ध प्रत्यक्ष नामक तत्त्व स्फुट और अधिक होता है। यह अतिशयोक्ति भी नहीं है क्योंकि (इसमें) किसी का किसी दूसरे के रूप में अध्यवसाय नहीं होता है। न तो भूत (वस्तु) तथा भावी (वस्तु) का अभूत और अभावी के रूप में अध्यवसाय होता है और न अभूत और अभावी का भूत और भावी के रूप में; और न प्रत्यक्ष का अप्रत्यक्ष के रूप में अथवा अप्रत्यक्ष का प्रत्यक्ष के रूप में (अध्यवसाय होता है)। प्रत्यक्षता केवल वस्तु का ही धर्म नहीं होती है क्योंकि प्रमाता की अपेक्षा
वृत्तमात्रे हि न प्रत्यक्षायमाणता। इह तु स्फुटस्य प्रत्यक्षत्वस्योपलम्भः । तहि प्रत्यक्षत्वेनाध्यवसायात् अतिशयोक्तिरि (रस्त्वि) त्यत आह नापीयमिति। तत्र हेतु :- अन्यस्यान्यतयेति। अतिशयोक्तौ ह्यन्यदन्यतयाध्यवसीयते इह तु न तथा। भूते भाविनि प्रत्यक्षत्वे चान्यथाध्यवसायाभावात्। एतदुपदर्शयति-न हि भूतभावीति। भूतमभूतत्वेन भावि वा अभावित्वेन नात्राध्यवसीयते। एतद्विप- र्ययोऽपि नास्तीत्याह-अभूतभावि वेति। यच्चात्र प्रत्यक्षत्वं तदपि नान्य- थाध्यवसीयत इत्याह-न चापीति। विपर्ययोऽपि नास्तीत्याह-(अ)प्रत्यक्षं चेति। ननु भूतभाविनोरप्रत्यक्षयोः प्रत्यक्षायमाणत्वमन्यथाध्यवसाय इत्यत आह- न हि प्रत्यक्षत्वमिति। यदि प्रत्यक्षत्वं केवलवस्तुधर्मस्तदा भूतभावितो-
१. प्रत्यक्षत्वादिगतस्य-नि०। २. नापीदम°-अ० शा१। ३. भाविनावभूत°-अ० । ४. सीयेते-अ० । ५. अभूतभाविनौ-अ०। ६. क्षगतत्वेन' नि० शा१। ७. अप्रत्यक्ष° वा' अ०।क्षं प्र°-नि० । =. प्रत्यक्षं-अ० शा१। ९. प्रतिपत्त्यपे०-नि०।
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३३० अलंकारसर्वस्वम् [भाविकम- भावात्। यदाहु :- 'तत्र यो'ज्ञानप्रतिभासमात्मनोऽन्वयव्यतिरेकावनु- कारयति स प्रत्यक्षः' इति। केवलवस्तुप्रत्यक्षत्वे प्रतिपत्तुः सामग्री उपयुज्यते। सा च लोकयात्रायां चक्षुरादीन्द्रियस्वभावा, योगिनामती- न्द्रियार्थदर्शने भावनारूपा। काव्यार्थविदां च भावनास्वभावैव। सा च भावना वस्तुगत्यात्यद्भुतत्वप्रयुक्ता। अत्यद्भुतानां वस्तूनामादर- प्रत्ययेन हृदि संधार्यमाणत्वात्।
रखकर ही वस्तु प्रत्यक्ष हो पाती है। जैसा कि कहा भी है-"जो प्रतिपत्ता के ज्ञानप्रतिभास (प्रकाश) के साथ अपना अन्वय एवं व्यतिरेक स्थापित करता है वह प्रत्यक्ष है"।' वस्तुमात्र का प्रत्यक्ष करने के लिए प्रमाता की (इन्द्रियरूप) सामग्री उपयोगी है। यह (सामग्री) लोकव्यवहार में चक्षु आदि इन्द्रियस्वरूप है और योगिओं द्वारा अतीन्द्रिय पदार्थ का प्रत्यक्ष करने के लिए भावनारूप है। काव्यमर्मज्ञों के लिए भी (यह सामग्री) भावनारूप ही है। और यह भावना वस्तुतः (वस्तु के) अत्यन्त अद्भुत होने से पैदा होती है। क्योंकि अत्यन्त अद्भुत वस्तुओं को आदरबुद्धि से हृदय में धारण किया जाता है। रप्रत्यक्षता, वर्तमानस्य तु प्रत्यक्षत्वमिति भवेद व्यवस्था। न हि प्रत्यक्षत्वं केवलवस्तुधर्मः। किं तहि ? प्रतिपत्त्रपेक्षयैव प्रत्यक्षत्वस्य वस्तुधर्मता। न हि प्रतिपत्तारमनपेक्ष्य वस्तुनि प्रत्यक्षता नाम काचित्। अत्र प्रामाणिकसंवादा- याह-यदाहुरित्यादि। यो ह्यर्थः स्वग्राहकं प्रतिपत्तुर्ज्ञानप्रकाशं स्वान्वय- व्यतिरेकावनुकारयति। स्वयमस्ति चेद् ज्ञानप्रतिभासोऽस्ति। नास्ति चेन्नास्तीति व्यवस्थापयति स प्रत्यक्ष इत्यर्थः । अतः प्रत्यक्षत्वं न केवलं वस्तुधर्मः प्रतिपत्तुस्तु सामग्री तत्रोपयुज्यत इत्याह-केवलमिति। असामग्रीके प्रतिपत्तिरिह (?) वस्तु प्रत्यक्षीभवतीत्येतावद् वक्तुं शक्यते न तु प्रतिपत्त्रनपेक्षेति भावः। तां सामग्रीं विवेचयति- सा चेति। लोकयात्रायां श्रौति(लौकि)कार्थप्रत्यक्षीकरणे देशकाला- दिव्यवधानादतीन्द्रियेऽर्थे योगिनामैकाग्रचात्मकभावनारूपा साक्षात्करणसामग्री। काव्यार्थसाक्षात्करणे काव्यतत्त्वविदामपि भावनास्वभावैव। तां च भावनां काव्यवस्तुगतमत्यद्भुतत्वं प्रयोजयति। अत्यद्भुतानि हि वस्तूनि आदरप्रत्ययेन १. भासनात्मनो-नि०। भासमानो-ना०। २. ज्ञान के प्रकाश के साथ वस्तु द्वारा अपना अन्वय-व्यतिरेक स्थापित करना प्रत्यक्ष है इसका अर्थ है वस्तु है तो ज्ञान का स्फुरण होता है वस्तु नहीं है तो ज्ञान का स्फुरण भी नहीं है-संजीविनी।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३३१
नापि भूतभाविनामप्रत्यक्षाणां प्रत्यक्षतयैव प्रतीतेरिवार्थगर्भीकारेणेयं१ प्रतीयमानोत्प्रेक्षा। तस्या अभिमान रूपाख्याध्यवसायस्वभावत्वात्। न ह्यप्रत्यक्षं प्रत्यक्षत्वेनाध्यवसीयते, किं तर्हि काव्यार्थविद्धि: प्रत्यक्षत्वेन दृश्यते इति। नापि वस्तुगत इवार्थ:२ "उत्प्रेक्षाप्रयोजकः। तस्या अभि- मानरूपायाः प्रतिपत्तृधर्मत्वात्। यदाहुः-'अभिमाने च "सा धयोज्या भूत तथा भावी अर्थात् प्रत्यक्ष से भिन्न (परोक्ष) पदार्थों की प्रत्यक्ष-जैसी प्रतीति के कारण 'इव' का अर्थ गर्भित होने से (इसे) प्रतीयमानोत्प्रेक्षा भी नहीं (माना जा सकता) है क्योंकि उसका स्वभाव सम्भावनारूप (साध्य) अध्यवसाय का है पर यहाँ अप्रत्यक्ष की प्रत्यक्ष के रूप में सम्भावना नहीं होती है अपितु काव्यमर्मज्ञ को (अप्रत्यक्ष का) प्रत्यक्षरूप में दर्शन होता है। पुनश्च (प्रत्यक्षदर्शन की अनुभूति होने पर भी वस्तु के परमार्थतः प्रत्यक्ष न होने से वस्तु प्रत्यक्ष-जैसी है इस प्रकार वस्तु का 'इव' अर्थ के साथ सम्बन्ध उत्प्रेक्षा के सिद्ध करने हेतु होगा-इस दृष्टि से) वस्तुगत 'इव' अर्थ को उत्प्रेक्षा का प्रयोजक नहीं माना जा सकता है। क्योंकि उस (उत्प्रेक्षा) का स्वरूप सम्भावना का है जो प्रमाता का धर्म है। कहा भी है-"सुखादि की भाँति ज्ञान
हृदि संधार्यमाणानि तथा भावनां प्रयोजयन्ति। इत्थं च सति लोक- यात्रायां वर्तमानार्थसाक्षात्करणसामग्री चक्षुरादि। योगिनां काव्यतत्त्वविदां चातीतानागतार्थसाक्षात्करणे भावना। अतो योगिवत् काव्यतत्त्वविदामतीता- नागतार्थसाक्षात्कारो नान्यथाध्यवसाय इति नातिशयोक्तिः शङ्गया। ननु प्रत्यक्षतयेव प्रतीयन्ते भूतभाविन इति प्रतीयमानोत्प्रेक्षा कि न स्यादित्यत आह नापि भूतभाविनामिति। तत्र हेतु :- तस्या अभिमानेति। अभि- मान: सम्भावनं, तद्रूपः साध्योऽध्यवसाय उत्प्रेक्षाया लक्षणम्। न ह्यत्राप्रत्यक्षत्वं प्रत्यक्षतया सम्भाव्यते, किं तहि ? प्रत्यक्षं दृश्यते। अतो नोत्प्रेक्षा। अनुत्प्रेक्षात्वे गमकान्तरमाह-नापि वस्त्विति। पदार्थगतो हि इवार्थ उपमायाः प्रयोजको नोत्प्रेक्षायाः। तत्र हेतु :- तस्या अभिमानेति। उत्प्रेक्षा ह्यभिमानरूपा प्रतिपत्तृ धर्मः। तस्मादभिमानगोचर एवेवार्थ: उत्प्रेक्षाप्रयोजक इति भावः। अत्र संवादा- याह - यदाहुरित्यादि। सुखादिवज्ज्ञानधर्मेडभिमानेऽध्यवसायोक्तिरित्यर्थः । १. णायं-नि०। २. रूपाध्य°-अ०। ३ 'इवार्थाः', 'प्रयोजकाः', इति बहुवचनग्रहणं नि० शा० । ४. उत्प्रेक्षायाः-अ०। ५. अभिमानेन सा-नि०।ना० शा१। ६. योक्ति:°-नि० शा।
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३३२ अलंकारसर्वस्वम् [भाविकम-
ज्ञानधर्मे सुखादिवत्' इति। काव्यविषये च प्रयोक्तापि प्रतिपत्तैव। -नाप्यद्भुतपदार्थदर्शनादतीतानागतयोः२ प्रत्यक्षत्वप्रतीतेः काव्यलिङ्ग- मिदम्। लिङ्गलिङ्गिभावेन प्रतीत्यभावात्। योगिवत्प्रत्यक्षतया प्रतीतेः । नाप्ययं “पुरःस्फुरद्रूपतया सचमत्कारं प्रतीते रसवदलंकारः। रत्यादिचित्तवृत्तीनां तद्नुषक्ततया विभावादीनामपि साधारण्येन हृदय-
की (न कि वस्तु की) धर्मभूत सम्भावना के साथ उस (उत्प्रेक्षा) का सम्बन्ध समझना चाहिए"। काव्य-क्षेत्र में प्रयोक्ता (कवि) भी प्रमाता (सहृदय) ही है। अद्भुत पदार्थ के दर्शन से अतीत और अनागत (पदार्थों) की प्रत्यक्षरूप प्रतीति से काव्यलिंग भी नहीं (कहा जा सकता) है क्योंकि (अद्भुतपदार्थ और अतीत-अनागत में परस्पर) साधक और साध्य का सम्बन्ध ज्ञात नहीं होता है, अपितु योगिओं की भाँति प्रत्यक्षता की अनुभूति होती है। "सामने खड़ा-सा है" इस रूप में चमत्कारमयी (मूर्त) अनुभूति के आधार पर यह रसवदलंकार भी नहीं (माना जा सकता) है। क्योंकि रति आदि चित्तवृत्ति (स्थायी भावों) तथा उनसे सम्पृक्त होने से विभावादि का भी साधा-
ननु यदि प्रतिपत्तृधर्मोऽध्यवसायस्ताि प्रयोक्तुः कवेरन स्यादित्यत आह- काव्यविषये चेति। कविरपि खलु काव्ये सहृदय एव अतो नेयमुत्प्रेक्षा। नन्व- द्भुतदर्शनात् प्रत्यक्षत्वमिहेति काव्यलिङ्गमित्यत आह-नाप्यत्यद्भुतेति । अत्यद्भुतपदार्थसाक्षात्कारो हि प्रत्यक्षायमाणत्वे हेतुः। अकाव्यलिङ्गत्वे हेतुमाह -लिङ्गलिङ्गीति। हेतुत्वे सत्यपि लिङ्गलिङ्गिभावेन नेह प्रतीतिः। तथात्वे पारोक्ष्यं प्रसजेदिति भावः । कथं तहि प्रतीतिरित्यत आह-योगिवदिति। नन्वद्भुतत्वहेतुका सचमत्कारा प्रतीतिरिह पुरः स्फुरतीव अतो भावध्वनावद्भुत- रसोऽङ्गमिति रसवदाद्यलङ्कार इत्यत आह-नाप्ययमिति। तत्र हेतु-रत्या- दीति। यद्यपि सचमत्कारप्रतीते: पुरःस्फुरत्ता असाधारणी अथापि न भाविक-
१. इति च-नि० शा१। २. पदार्थ°-नि० शा० नास्ति।
४. लिडन्ग्यभावेन -नि० । ५. परिस्फ° - अ०। ६. सचमत्कारप्रतिपत्तः-अ० शा०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३३३
संवादितया परमाद्वतज्ञानिवत्प्रतीतौ तस्य भावात्। इह तु ताट- स्थ्येन भूतभाविनां स्फुटत्वेन भिन्नसर्वज्ञवत्प्रतीतेः। ₹स्फुटप्रतीत्युत्तर- कालं तु साधारण्यप्रतीतौ ४स्फुटप्रतीतिनिमित्तक औत्तरकालिको रस- वदलंकार: स्यात्।
रणरूप में हृदयसम्वाद से परमाद्वत के ज्ञानी के समान" अनुभूति होने पर ही वह (रसवदलंकार) होता है। पर इस (अलंकार) में भूत तथा भावी (पदार्थों) की तटस्थरूप में प्रतीति उसी प्रकार की होती ह जैसी कि द्वैत के सर्वज्ञ की। यदि स्फुट प्रतीति के पश्चात्काल में अभेदानुभूति होती है तो वह स्फुट प्रतीति के निमित्त से उत्पन्न उत्तरकालीन रसवदलंकार का हेतु बनेगी।७
रसवतोरभेदः । कुतः ? रतिहासादिचित्तवृत्तीनां तदनुरञ्जितत्वेन विभावानुभाव- व्यभिचारिणां च यदा परमाद्वतज्ञानिवद् ममैव शत्रोरेवेत्यादिविशेषपरिहारात् साधारण्येन हृदयसंवादिनी प्रतीतिस्तदैव रसवतो भावः। विभावादीन् रसवत्- प्रस्तुतौ विवेचयिष्यामः। इह तु भूतभाविनां प्रतीतिर्न साधारण्येन, अपि तु प्रतिपत्तुस्ताटस्थ्येन, स्फुटतया ताटस्थ्यं हि भेदः। यथा सांख्यादिसिद्धान्तानां भेदेन सर्व जानतां प्रतीतिः। ननु ताटस्थ्येन प्रतीतावतीतादिस्फुटत्वं हेतुः, स्फुट प्रतीतिश्च प्रमुखे, निष्पत्तौ तु साधारण्यप्रतीतिरेव। अतः कथं भाविक- मित्यत आह-स्फुट प्रतिपत्तीति। स्फुटप्रतिपत्तिनिमित्तकः स्फुटप्रतीत्युत्था- पितभाविकहेतुक इत्यर्थः । "मुनिर्जयती"त्यादौ हि कुम्भसम्भवादिवृत्तमादौ ताटस्थ्येनातीतादिरूपतया प्रतीयते तदैव भाविकसिद्धिः। अथोत्तरकालं प्रतिपत्तृप्रतीतेस्ताद्रूप्यापत्त्या विभावादीनां साधारण्ये अद्भुतो रसवान् भाविक- हेतुः स्यात्। न चैतावता भाविकापलापः शक्यत इति यावत्।
१. तस्याभा°-ना०। २. च-शा० ना० शा१। ४. °प्रतिपत्तिनि°-अ० । ५. जिस प्रकार शिवाद्वैती समग्र विश्व को शिवरूप समझता है। ६. संसार के समग्र पदार्थों को आत्मा से भिन्न मानकर उनका प्रत्यक्ष करने वाला द्वैत का सर्वज्ञ है। 9. भाविक अलंकार में पदार्थों की प्रतीति तटस्थ या स्फुट रूप में होती है। यदि इस स्फुट-प्रतीति अर्थात् भाविक अलंकार की प्रतीति के अनन्तर अभेदानुभूति या साधारण-प्रतीत होती है तो वह स्फुट प्रतीतिरूप भाविक अलंकार रसवदलंकार का साधक हेतु बन जाएगा।
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३३४ अलंकारसर्वस्वम् [भाविकम-
नापीयं 'सूक्ष्मवस्तुस्वभाववर्णनात्स्वभावोक्तिः। तस्यां लौकिकवस्तु- गतसूक्ष्मधर्मवर्णने साधारण्येन हृदयसंवादसंभवात्। इह च२ लोकोत्त- राणां वस्तूनां स्फुटतया ताटस्थ्येन प्रतीते:१। क्वचित्तु लौकिकानामपि वस्तूनां स्फुटत्वेन प्रतीतौ भाविकस्वभावोक्त्योः समावेशः स्यात्। न च हृदयसंवाद्मात्रेण स्वभावोक्तिरसवदलंकारयोरभेदः। वस्तुसंवाद- वस्तु के सूक्ष्म धर्म का वर्णन होने से यह स्वभावोक्ति भी नहीं (माना जा सकता) है क्योंकि उसमें लौकिक वस्तु में विद्यमान सूक्ष्म धर्म का वर्णन करने पर साधारणरूप में (देशकालादि के नियमन से रहित) हृदय-संवाद (अभेदा- नुभव) हो सकता है। पर इस (भाविकालंकार) में वस्तुओं की स्फुट रूप से, तटस्थ रूप से प्रतीति होती है। लौकिक वस्तुओं की स्फुट-प्रतीति होने पर भाविक तथा स्वभावोक्ति दोनों का किसी स्थल में (एक साथ) समावेश हो सकता है। पर केवल (दूसरे की चित्तवृत्ति के साथ अपनी चित्तवृत्ति की एकतारूप) हृदयसंवाद के आधार पर स्वभावोक्ति और रसवत् को अभिन्न नहीं माना जा सकता है। क्योंकि स्वभावोक्ति में वस्तुसम्वाद (यह वस्तु इसी
नन्विह सुन्दरवस्तुस्वभावश्चेन्न व्ण्येत न तदा प्रत्यक्षायमाणता। अतः स्वभा- वोक्तिरित्यत आह-नापीयमिति। तत्र हेतुः तस्यां लौकिकेति। स्वभा- वोक्तेहिं लौकिकानामेव वस्तूनां यः सूक्ष्मो धर्मः प्रेक्षावत्प्रतिभैकसमधिगम्यस्तस्य वर्णने हृदयसंवादः साधारण्येन। इह पुनरत्यद्भुतत्वेनालौकिकानां वस्तूनां प्रतीति- स्तटस्थतया। अतो हृदयसंवादातिरिक्तानामंशानां वैलक्षण्यम्। ननु लौकिक- वस्तुप्रतीतिसाधारण्ये स्वभावोवितः, अलौकिकवस्तुप्रतीतिस्फुटत्वे तु भाविकमिति व्यवस्था। यदि लौकिकवस्तुप्रतीते: स्फुटत्वं तदा किं स्यादित्यत आह- क्वचित् त्विति। लौकिकवस्तुबलात् स्वभावोक्तिः, स्फुटत्वप्रतीतिबलाद्द्ा- विकम्। अतः सङ्करः। हृदयसंवादसाधारण्यात् स्वभावोक्तिरसवतोर्योऽयमभेदः प्रसङ्गात् प्रतीतस्तत्र विवेचयति-न च हृदयसंवादेति। स्वभावोक्तौ रसवति च यद्यपि साधारण्येन हृदयसंवादः सचेतसां, तथापि नानयोरभेदः।-
. सुन्दरवस्तु° - ना० शा१। २. च तु-ना०। च-अ० नास्ति। ३. च प्रतीते :- अ० । ४. वस्तुस्वभावसंवाद°-अ० ।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३३५ रूपत्वात्स्वभावोक्ते१। चित्तवृत्तिरूपत्वाच्च रसवदलंकारस्य। उभय- संवादसंभवे३ तु समावेशोऽपि घटते। यत्र वस्तुगतसूक्ष्मधर्मवर्णनं स्यात्तत्र स्वभावोक्ति:, अन्यत्र तु रसवदलंकार एव। नाप्ययं शब्दानाकुलत्व हेतुको" ६झगित्यर्थसमर्पणात्प्रसादाख्यो गुणः। प्रकार की ह इस प्रकार का वस्तु के साथ अभेदानुभव)होता है और रसवदलंकार में चित्तवृत्तियों का संवाद (अभेदानुभव) होता है। जहाँ दोनों (वस्तु तथा चित्तवृत्ति) का संवाद हो वहाँ (दोनों अलंकारों का एकत्र) समावेश भी माना जाएगा। जहाँ वस्तुनिष्ठ सूक्ष्म धर्म का वर्णन हो वहाँ स्वभावोक्ति होगी और अन्यत्र (चित्तवृत्ति के संवाद की स्थिति में) रसवदलंकार ही होगा। (भाविकालंकार को) शब्दों की अनाकुलता के कारण होने वाला, झटिति अर्थ का ज्ञान कराने से, प्रसाद नामक गुण नहीं (माना जा सकता) है। क्योंकि तत्र हेतुः- वस्तुस्वभावेति। सत्यपि साधारण्ये वस्तुस्वभावस्य संवादः स्वाभावोक्तौ, रसवति तु चित्तप्रवृत्तेः। वस्तुस्वभावचित्तप्रवृत्तिरूपत्वादनयोः । असंपाते तु सङ्कर इत्याह-उभयसंवादेति। समावेशः सङ्करः। समावेशघटने लिङ्गमाह- यत्र वस्तुगतेति। यत्र चित्तवृत्तिसंवादवति विषये संवादवती वस्तुगतसूक्ष्मधर्मवर्णना स्यादित्यर्थः। अन्यत्र त्विति। सूक्ष्मवस्तुधर्म- वर्णनाविरहिणि चित्तवृत्तिसंवादमात्रशालिनि विषये रसवानेव। ननु व्यस्त- संबन्धरहितसन्दर्भसमर्पितत्वमिह लक्षणं तथात्वे च प्रसादाख्यो गुण एवेत्यत आह-नाप्ययं शब्देत्यादि। इह यद्यपि झटित्यर्थ समर्पणं शब्दानाकुलत्व- हेतुकमथापि नायं प्रसादः। तत्र हेतु :- तस्य हि स्फुटास्फुटेत्यादि। स्फुटोडस्तु वाक्यार्थ: अस्फुटो वा तदुभयगतत्वेन झटिति समर्पणं प्रसादस्वरूपम्। यदाह- "शुष्केन्धनाग्निवत् स्वच्छजलवत्सहसैव यत्। व्याप्नोत्यन्यत् प्रसादोऽसौ सर्वत्र विहितस्थितिः" ॥ इति। अत्र शुष्केन्धनाग्निवदित्यस्फुट वाक्यार्थ प्रत्युपमानोक्तिः स्वच्छ- जलवदिति स्फुटं प्रति। अतः सर्वत्र विहितस्थितित्वेन झटिति समर्पणं रूपं १. स्वभावोक्तिः-शा१। २. चित्तवृत्तिसमाधिरू°-नि० शा१। ३. संवाददर्शनेऽपि-नि० ना०। ४. वर्णना-अ० । ५. हेतुकात्-नि० । ६. झटि°-अ०। ७. ०समर्पण रूप :- अ० शा०।
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३३६ अलंकारसर्वस्वम् [भाविकम-
तस्य हि स्फुटास्फुटोभयवाच्यार्थगतत्वेन१ झटिति समर्पणं रूपम्। अस्य तु' झटिति" समर्पकस्य सतः स्फुटत्वेन प्रतीतौ स्वरूपप्रतिलम्भः। तस्मा- दयं सर्वोत्तीर्ण एवालंकारः। लक्ष्ये चायं प्रचुरप्रयोगो दृश्यते। यथा- मुनिर्जयति योगीन्द्रो महात्मा कुम्भसंभवः। येनैकचुलुके दष्टौ दिव्यौ तौ मत्स्यकच्छपौ ।२५२।
उस (प्रसादगुण) का स्फुट तथा अस्फुट दोनों प्रकार के अर्थों का शीघ्र बोध कराना स्वरूप है पर इस (अलंकार) का स्वरूप तभी बनता है जबकि शीघ्र बोध कराने वाले (शब्दार्थ) के रहने पर स्फुट रूप में (अर्थ की) प्रतीति हो। अत एव यह अलंकार सभी (इतिवृत्त, अलंकार तथा गुणादि) से भिन्न है; काव्य (लक्ष्य) में इसका प्रचुर प्रयोग भी दिखाई पड़ता है। जैसे- योगिराज, सन्त अगस्त्य ऋषि सबसे उत्कृष्ट हैं, जिन्होंने (समुद्र का आच- मन करते समय अपने) एक चुल्लू में उन दोनों दिव्य मत्स्य तथा कच्छप (मत्स्यावतार तथा कूर्मावतार) का दर्शन किया था ॥२५२॥
प्रसादस्य। अस्य तु प्रसादेन झटिति समर्पितस्य स्फुटत्वेन प्रतीतौ सत्यां समनन्तरं स्वरूपप्रतिलम्भः । स्वरूपं ह्यस्य श्रोतरि कविगतभावप्रतिबिम्बनं पौन:पुन्येन चेतसि विनिवेशस्वभावभावनात्मकं वा। तथाविधस्य तु प्रतिबिम्बनं स्फुटप्रतीत्युत्तरकालमेव। अतः प्रसादोऽस्याङ्गत्वेन प्राकसिद्धिकः। अयन्तु तदुपकृतः समनन्तरसिद्धिकः। ततोऽन्य एव। अतो न कुत्रचिदन्तर्भाव इति निगमयति- तस्मादयमिति। सर्वोत्तीर्णः भ्रान्त्यादिषु प्रसादगुणान्तेषु शङ्गिते- व्वेकतरत्रापि नान्तर्भावयितुं शक्य इत्यर्थः । इत्थं लक्षणतोऽस्य नानुपपत्ति: काचित्। लक्ष्यतोऽपि प्राचुर्यमित्याह-लक्ष्ये चायमिति। मुनिर्जयतीति। मननान्मुनिः। योगीन्द्रत्वान्महात्मा। स्वयं तु कुम्भसम्भवः। तथाविधेन येनैकस्मिन्नेव चुलुके पिपासोद्वृतनिरवशेषार्णवाम्भसि प्रसृतिगर्ते दिव्यौ अमानुषानुभावातिशयौ तौ विष्णोर्दशस्ववतारेषु प्रसिद्धावदानौ मत्स्यकच्छपौ यदृच्छया चुलुकान्तर्भावात् पर्याकुलं लुठन्तौ दृष्टौ। अत्रा- तीतवृत्तोऽपि मुनिरलौकिकत्वेनात्यद्भुतः सन्नादरप्रत्ययेन हृदि संधार्यमाण-
२. झगिति-शा० ना०। २. समर्पित-ना० । ४. तु-शा १ पुस्तके नास्ति। 4. झगिति-शा० ना० शा१। ६. समर्पितस्य स्फुटत्वेन -- अ० । समर्पितस्य सतः-ग।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३३७ यथा वा-हर्षचरितप्रारम्भे ब्रह्मसदसि वेदस्वरूपवर्णने। तत्र हि प्रत्यक्षमेव स्फुटत्वेन तदीयं रूपं दृश्यते। एवं तत्रैव 'मुनिक्रोधवर्णने,२ पुलिन्दवर्णनादौ ज्ञेयम्।
अथवा जैसे-हर्षचरित के प्रारम्भ में ब्रह्मसभा में वेदों का स्वरूप-वर्णन करते समय वहाँ उन (वेदों) का स्वरूप स्फुटरूप में प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है। इसी प्रकार उसी (हर्षचरित) में मुनि के क्रोध का वर्णन करते समय (करुद्ध वेदों का स्वरूप प्रत्यक्ष व्णित हुआ है), एवं पुलिन्द आदि के वर्णन में (भाविकालंकार) समझ लेना चाहिए।
त्वादनाकुलसन्दर्भसमपितत्वाच्च प्रत्यक्षायमाणस्तथाविधं कविभावं प्रतिपत्तृषु प्रतिबिम्बयति पौनःपुन्येन चेतसि भावनां विनिवेशयतीति भाविकत्वम्। प्राचुर्यार्थमुदाहरणान्तराणि। यथा वा हर्षचरितेत्यादिना। हर्षचरितप्रारम्भे हि देवीं सरस्वतीमभिशप्तवते क्रोधमुनये क्रुद्धानां वेदानां स्वरूपमुपर्वण-
दोलाप्रेड्डोलितब्रह्मलोकः सोमरसमिव स्वेदविसरव्याजेन स्रवन्धिरग्निहोत्र- पवित्रभस्मस्मेरललाटपट्टकुशतन्तुचीवरिभिराषाढिभिः प्रहरणीकृतदण्डकमण्डल- मण्डलैर्मूतैश्चतुभिर्वेदैरिति"। योजनायाह-अत्र(?तत्र) हि प्रत्यक्षमिवेति । कोधमुनिवर्णनं पुनर्दृष्टवा तुतां तथा हसन्तीं स मुनिः-"आ: पापे दुर्गृही- तविद्यालवावलेपदुविदग्धे मामुपहससीत्युक्त्वा शिरःकम्पविशीर्यमाणबन्धन- विशशारोरुन्मिषत्तटित्पिङ्गलिम्नो जटासञ्चयस्य रोचिषा सिञ्चन्निव रोष- दहनद्रवेण दश दिशः कृतकालसन्निधानामिवान्धकारितललाटाष्टापदामन्तक- मण्डनपत्रभङ्गमकरिकां भ्रुकुटीमाबध्नन्नन्तर्लोहितेन चक्षुषा स्वरुधिरोपहारमि- वामर्षदेवताये प्रयच्छन् निर्दयदष्टदशनच्छदो दन्तांशुच्छलेन भयपलायमानां वाचमिव निरुन्धन् अंसस्त्रंसिनः शापशासनपट्टस्यव ग्रन्थनग्रन्थिमन्यथा कृष्णा- जिनस्ये"त्यादि। पुलिन्दवर्णनं तु "शरभकेतोः सूनुर्व्याघ्रकेतुर्नाम कुतोऽपि कज्जलश्यामलं श्यामलतावलयेनाधिललाटमुच्चैः कृतमौलिबन्धमन्धकारिणी- मकारणभुवा भ्रुकुटिबन्धेन त्रिशिखेन त्रियामामिव साहससहवाससञ्चारिणीं ललाटस्थलीं सदा समुद्वहन्त"मित्यादि। कुद्धे मुनि°-ना० शा१। २. क्ुद्धमुनि वर्णनपुलिन्द°-अ० । २२
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३३८ अलंकारसर्वस्वम् [भाविकम-
अयं त्वत्र विचारलेशः संभवति-इह क्वचिद्वर्णनीयस्य वर्णनावशादेव प्रत्यक्षायमाणत्वम्, क्वचित्प्रत्यक्षायमाणस्यैव वर्णनम्। 'आद्यो यथो- दाहतं प्राक्। रद्वितीयो यथा- अनातपत्रोऽप्ययमत्र लक्ष्यते सितातपत्रैरिव सर्वतो वृतः। अचामरोऽप्येष *सदैव वीज्यते विलासबालव्यजनेन कोडप्ययम् ॥२५३॥ ४इति। तत्र प्रथमप्रकारविषयोऽयमलंकारो न प्रकारान्तरगोचरः। कवि-
भाविकालंकार के सन्दर्भ में थोड़ा सा यह तत्त्वनिर्णय करलेना उचित है कि कहीं तो वर्ण्य (वस्तु) की वर्णना (कवि द्वारा समर्थ वर्णन) के कारण प्रत्यक्षायमाणता होती है और कहीं प्रत्यक्षसी (वस्तु) का वर्णन होता है। प्रथम का उदाहरण पहले दिया जा चुका है। दूसरे (प्रकार) का उदाहरण निम्नलिखित है- छत्र के विना भी यह यहाँ ऐसा दिखाई पड़ रहा है कि मानो इसके चारों ओर श्वेत छत्र लगे हों। चंवर के विना भी लगता है कि इस अद्भुत व्यक्ति पर विलास के चंवर झूल रहे हैं ॥२५३॥ इन (दो भेदों) में से यह (भाविक) अलंकार प्रथम भेद का ही विषय बनता है दूसरे भेद (प्रत्यक्ष-सी वस्तु के वर्णन) का (विषय) नहीं होता है ननु वर्णनावशात् प्रत्यक्षायमाणत्वं किं भाविकविषय आहोस्विदनुभाव- विशेषात् प्रत्यक्षायमाणस्य सतो वर्णनमित्यत आह-अयं त्वत्रेत्यादिना। लेश इत्यल्पावशिष्टतामाह-वर्णनावशादिति। भणितिमाहात्म्यमाविष्क- रोति। प्रत्यक्षायमाणस्यैवेति। भणितिमाहात्म्यनैरपेक्ष्येण निजानुभाव- विशेषादेव प्रत्यक्षायमाणत्वमनुसन्धत्ते। अनातपत्रोऽपीति। अत्रानातपत्रस्यापि सितातपत्रैरिव वृतत्वमचामरस्य च बालव्यञ्जनेनेनोपलक्षितत्वम्। अनुभावविशेषादेव प्रत्यक्षायमाणत्वं वर्ण्यते न तु वर्णनावशात् प्रत्यक्षायमाणता। इत्थं विषयद्वयेऽवस्थिते भाविकमेकत्रैवे- त्याह-अत्र प्रथमप्रकारेति। न प्रकारान्तरगोचर इति यदुक्तं तत्र हेतु:
१. आद्यं-अ० शा०। २. द्वितीयं-अ० शा०। ३. सतेव-शा१। ४. इति-ना० नास्ति। ५. अत्र -- अ० नि० सं० । ६. न च-ना०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३३९
समर्पितानां धर्माणां 'ह्यलंकारत्वात्। न हिमांशुलावण्यादीनामिव वस्तु- सन्निवेशिनाम्। अपि च 'शब्दानाकुलता चेति तस्य हेतून्प्रचक्षते' इति भामहीये, 'वाचामनाकुल्येन१ भाविकम्' इति 'चौद्धटे लक्षणे *वयस्तसंबन्धरहितशब्दसन्दर्भसमर्पितत्वं प्रत्यक्षायमाणत्वप्रतिपादकं कथं प्रयोजकीभवेत्, यदिवस्तुसन्निवेशिधर्मगतत्वेनापि भाविकं स्यात्। तस्माद्वास्तवमेव महत्त्वमुत्तरप्रकारविषये वर्णितमिति नायमलंकारः।
क्योंकि कवि द्वारा समर्पपत धर्मों में ही अलंकारत्व होता है। चन्द्रमा के सौन्दर्य के समान वस्तुगत में अलकारत्व नहीं होता है। पुनश्च यदि वस्तुनिष्ठ धर्म के आधार से भी भाविक हो सकता है तो "शब्दों की अनाकुलता आदि को उस (भाविकालंकार) का हेतु कहा जाता है" भामह के इस लक्षण में तथा उद्भट के "शब्दों की अनाकुलता से भाविक होता है" इस लक्षण में उलझे (आकुल या ·व्यस्त) सम्बन्ध से रहित शब्दरचना से समर्पित होना प्रत्यक्षायमाणता का किस प्रकार घटक तत्त्व हो सकेगा ? अतः (यह मानना चाहिए कि) दूसरे भेद के उदाहरण (श्लोक २५२) में वास्तविक (वस्तुनिष्ठ) महत्त्व का ही वर्णन हुआ है
कविसमर्पितानामिति। ये हि कविना प्रतिभया समर्प्यन्ते मुखादौ चन्द्रत्व- कमलत्वादयो धर्मास्तेषामेवालङ्गारत्वं न तु परमार्थतः सन्निविष्टानां हिमांशु- लावण्यादीनाम्। अतो द्वितीयप्रकारे प्रत्यक्षायमाणत्वं वस्तुसन्निवेश्नीति न भाविकालङ्कारः। युक्त्यन्तरेणापि द्रढयितुमाह-अपि च शब्दानाकुलते- त्यादि। चकाराद्भूतभावित्वादयः समुच्चीयन्ते। भूतभावित्वादयः शब्दाना- कुलता चेति हेतवो भामहानुशासने। उं्धटलक्षणे चानाकुलत्वरूपं यदेतद् व्यस्तसंबन्धरहितशब्दसमपितत्वं प्रत्यक्षायमाणत्वप्रतिपादकमुक्तं तत् कथं प्रयोजकीभवेत्। वस्तुसन्निवेशिधर्मगतत्वेनापि भाविकसम्भवे निष्प्रयोजनमेव स्यात्। अतो न द्वितीयप्रकारे भाविकमिति निगमयति-तस्माद् वास्तव- मेवेत्यादि। अत्रोत्तरप्रकारे। ननु वास्तवेऽपि सौन्दर्ये लौकिकतया मा भूद् विच्छित्तिः, कवेः कविनिबद्धस्य वा वक्तुनिबन्धवशादस्त्येव सकलव्यवहर्तृ- -गोचरीभूतत्वाद् दुरपह्ववा विच्छित्तिः। तत्र कुतो न भाविकमित्यत आह १. हि-अ० ना० शा० नास्ति। २. वस्तुनिवेशि°-ना० । ३. मनाकुलत्वेनापि-नि० । ४. चोन्द्टलक्षणे-अ० शा०। ४. व्यत्यस्त° वस्तुसम्बन्ध°-ना०। ६. °वेश°-नि०। ७. मुत्तरत्र° नि०। =. विषयो०-ना०।
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३४० अलंकारसर्वस्वम् [भाविकम ]
यदि तु वास्तवमपि सौन्दर्य कविनिबदं, कविनिबद्धवक्तृनिबद्धं वा सकलवक्तृगोचरीभूतं स्वभावोक्तिवदलंकारतया२ श्वर्ण्यंते, तदायमपि प्रकारो नातीव दुःश्लिष्टः। अत एव 'प्रत्यक्षा इव 'यत्रार्थाः क्रियन्ते भूतभाविनः । तद्भाविकम्' "इत्येवमन्यैर्भाविकलक्षणमकारि। स्वभा- वोक्त्या किंचित्सादृश्यात्तदनन्तरमस्य लक्षणं कृतम्।
अतः इसमें अलंकार नहीं है। पर यदि वास्तविक सौन्दर्य का भी, वह कवि द्वारा व्णित हो अथवा कवि-निबद्ध वक्ता के द्वारा व्णित हो, स्वभावोक्ति की भाँति सभी पाठकों की अनुभूति का विषय बन कर वर्णन होता है तो इस (दूसरे) भेद का भी (भाविक के रूप में) निबन्धन अधिक कठिन नहीं है। इसीलिए दूसरे (आचार्य मम्मट) ने "अतीत और अनागत पदार्थ जब प्रत्यक्ष से कराये जाते हैं उसको भाविक कहते हैं" यह लक्षण भाविक का किया है। स्व- भावोक्ति के साथ थोड़ी सी समानता होने से उसके बाद इस (अलंकार) का स्वरूप-निरूपण किया गया है।
यदि तु वास्तवमपीत्यादिना। यदि वस्तुसन्निवेश्यपि सौन्दर्यनिबन्धवशात् सविच्छित्तिकं प्राञ्च आचार्याः स्वभावोक्तिवदलङ्कारतया वर्णयेयुस्तदायमपि वास्तवसौन्दर्यविषयतया समाशङ्कितो भाविकप्रकारो नातीव दुःश्लिष्टः, सुश्लिष्ट एव सत्यां सामग्रयाम्। अयमिहाशयः यथा हि स्वभावोक्तिर्वास्तवसौन्दर्या- वलम्बिनी वस्तुस्वभावसौक्ष्म्यात् साधारण्येन सचेतनसंवादाच्च विच्छित्तिमतीव वणिता तथैव वास्तवसौन्दर्यावलम्बितया निबन्धादिविच्छित्तिविशेषोऽयमलड्का- रतया वर्णनीय एव। तथा च सति भूतभावित्वादिसामग्रीसन्ड्गावेऽन्यकल्पन- गौरवादयमपि भाविकप्रकार इत्युन्मीलनं योग्यतया सुशकमेव। उन्मीलिताश्चो- ल्लेखभावोदयसन्धिशबलत्वादयः। अतिप्रथनस्वातन्त्र्ये चिरन्तनसमयव्यतिक्रमः स्यादिति। अमुमेवाशयमाविश्चिकीर्षुरभियुक्तसंवादायाह-अत एवेत्यादि। भूतभाविनः प्रत्यक्षा इव यत्र क्रियन्ते इत्येतावदेव भाविकलक्षणमकारि यैर्न खलु तैः शब्दानाकुलत्वादि लक्षणत्वेनोक्तं, नापि वा वस्तुसन्निवेशिनः सौन्दर्यस्य निबन्वादिविच्छित्तिस्स्वभावोक्तितुल्यनयशालिन्यलङ्कारत्वेन प्रसञ्जिता। अतो
१. मेवात्र- नि० शा०। २. कार उपवर्ण्यते-ना० । ३. वर्ण्यते-अ०। ४. य्द्रावा :- ना०। 4. एतावदेवान्यः-अ०।
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[उदात्तम् ] संजीविनी-सहितम् ३४१
समृद्धिमद्वस्तुवर्णनमुदात्तम् ॥सू० ८१।।
समृद्धि से युक्त वस्तु का वर्णन उदात्त (अलंकार) है॥सू० ८१॥ भूतभाविप्रत्यक्षवद््ावलक्षणस्य भाविकस्य शब्दानाकुलत्ववद् वास्तवसौन्दर्या- वलम्बेनापि भाविकप्रभेदोऽभ्यनुज्ञायते। यत इत्थं स्वभावोक्तिप्रतियोगिकतया मीमांसा प्रवर्तयितव्या अतः सम्प्रति सङ्गतिमाह-स्वभावोक्त्या किञ्चिदिति। वास्तवसौन्दर्यविषयत्वं सादृश्यम्। तच्च लौकिकत्वालौकिकत्वसूक्ष्मत्वस्फुटत्व- साधारण्यताटस्थ्यप्रतीत्यादिवैधर्म्यप्राचुर्यादल्पक इत्यभिसंधायोक्तम्। किन्च- दिति। यद्यपि सादृश्यं किञ्चिन्मात्रमथापि न्यायसञ्चारायेहास्माभिर्लक्षणमस्य कृतम्। योऽयं तद्द्रावबिम्बनाच्चित्ते विनिवेशाच्च भाविकम् ॥ नाविपर्ययतो भ्रान्तिः साक्षात्वान्नेतिवृत्तकम् । अन्यत्वानध्यवसितेर्न न चात्रातिशयोक्तिता।। न परं वर्तमानार्थधर्मः प्रत्यक्षतेष्यते। प्रतिपत्त्रनपेक्षायां प्रत्यक्षत्वपरिक्षयात् ॥ प्रत्यक्षत्वे च सामग्री *भवनाद् भूत वस्तुजा। प्रत्यक्षत्वं न सम्भाव्यमिह नोत्प्रेक्षणं ततः ॥ अलिङ्गलिङ्गिभावाच्च काव्यलिङ्गं न चेष्यते। ताटस्थ्यात्स्फुटसंवित्तेर्न तदा रसवद्भ्रमः॥ पश्चात् साधारणीभावे रसवांस्तन्निमित्तकः । स्फुटत्वान्न स्वभावोवितिर्लोकोत्तीर्णस्य वस्तुनः ॥ स्वभावोक्ते रसवतो भेदः संवादभेदतः । न प्रसादगुणश्चैतद् यस्मादौत्तरकालिकम् । वास्तवेऽपि च सौन्दर्ये योग्यत्वादस्य सम्भवः । चिरन्तनानु रोधात्तु तथा व्यक्तं न कीतितम्।। भाविके बुद्धिसंवादो मया स्याद् यदि कस्यचित्। व्याख्याशिल्पस्य निकष: स मे धीमान् भविष्यति। उदात्ताय सूत्रम् -- "समृद्धिमद्वस्तुवर्णनमुदात्तम्"। *अशुद्धोऽयं पाठः । एतत्स्थाने 'भावनाद्भुतवस्तुजा' इति पाठः स्वीकार्यः ।
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३४२ अलंकारसर्वस्वम् [उदात्तम् ]'
स्वभावोक्तौ भाविके च 'यथावद्वस्तुवर्णनम्। तद्विपक्षत्वेनारोपित- 2वस्तुवर्णनात्मन उदात्तस्यावसरः। तत्रासंभाव्यमानविभूतियुक्तस्य3 वस्तुनो वर्णनं कविप्रतिभोत्थापितमैश्व्र्यलक्षणमुदात्तम्। यथा- मुक्ता: केलिविसूत्रहारगलिता: संमार्जनीभिहताः प्रातःप्राङ्गणसीम्नि मन्थरचलद्वालाङघ्रिलाक्षारुणाः। दूरा द्दाडिमबीजशङ्कितधियः कर्षन्ति केलीशुका यद्विद्वद्गवनेषु भोजनृपतेस्तत्त्यागलीलायितम् ।।२५४।।
स्वभावोक्ति तथा भाविक में यथास्थित (लौकिक) वस्तु का वर्णन होता है। उनसे भिन्न होने के कारण (यह) अवसर उदात्त (अलंकार के निरूपण) का है जिसका स्वरूप आरोपित (कविकल्पित) वस्तु का वर्णन करना है। इस प्रकरण में (तत्र) लोकोत्तर समृद्धि से युक्त वस्तु का कविप्रतिभा से प्रसूत ऐश्वर्य से सम्पन्न वर्णन उदात्त (अलंकार) कहलाता है। जैसे- विद्वानों के घरों में, रतिलीला में टूटे हार से गिरे हुए और प्रातः काल आंगन में झाडू से बुहार कर इकट्ठे किए हुए और अवश चाल से चलतीं हुई युवतियों के महावर से लाल-लाल दिखाई पड़ने वाले मोतियों को क्रीडाशुक अनार के दाने समझ कर यह जो खींच रहे हैं वह राजा भोज के दान की ही लीला है॥२५४।
समृद्धिमतो वस्तुनः कतिप्रतिभोत्थापितैश्वर्यवर्णनमुदात्तालङ्गारः। ससङ्ग- तिकं व्याचष्टे-स्वभावोक्तावित्यादि। यथावस्थितत्वं लौकिकत्वम्। आरोपितत्वं कविकल्पितत्वम्। अवतारः प्राप्तिः। ऐश्वर्यलक्षितमिति लक्ष्यपदनिरुक्तिः । मुक्ता: केलीति। विसून्नता छित्रसूत्रता। सम्मार्जनीभिः प्राङ्गणसीम्नि कृताः। यत् कर्षन्तीति वाक्यार्थपरामर्शः। यदेतत् कर्षणं तत् त्यागलीलायित- मित्यर्थः । उदात्तं तु समृद्धस्य वस्तुनः कविवर्णनम्। १. यथास्थितवस्तु°-अ०ना०। २. वस्त्वात्मनः शा१। ३. °नभूति°-अ० । ४. लक्षित° -शा० ना० । ५. 'यथा'- स्थाने 'उदाहरणम्'-अ० ना० । ६. कृता :-- अ० शा० शा१। ७. प्रा ङ्कण°-अ० । =. आराद्-अ० ।
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[ उदात्तम् ] संजीविनी-सहितम् ३४३
अङ्गभूतमहापुरुषचरितं' च ॥सू० ८२॥ उदात्तशब्दसाम्यादिहाभिधानम्। महापुरुषाणामुदात्तचरितानाम- २ ङ्गिभूतवस्त्वन्तराङ्गभावेनोपनिबध्यमानं3 चरितं चोदात्तम्। महापुरुष- चरितस्योदात्तत्वात्। यथा- तदिदमरण्यं यस्मिन्दशरथवचनानुपालनव्यसनी। विचरन्बाहुसहायश्चकार रक्ष:क्षयं रामः ।।२५५।। "अत्रारण्ये वर्णनीये रामचरितमङ्गत्वेन वर्णितम्।
महापुरुषों का (किसी के प्रति) अंगभूत चरित भी (उदात्त नाम का ही एक दूसरा अलंकार है) ॥सू० ८२॥ उदात्त शब्द से सादृश्य के कारण यहाँ (उदात्तनाम के दूसरे अलंकार का) निरूपण किया जा रहा है। उदात्त चरित वाले महापुरुषों का चरित प्रधान- भूत (किसी) वस्त्वन्तर के अंगरूप में उपनिबद्ध होने पर उदात्त (नामक द्वितीय अलंकार) कहलाता है क्योंकि महापुरुषों का चरित उदात्त होता है (अतः इस अलंकार का नाम उदात्त रखा गया है)। उदाहरण- यही वह (दण्डक) बन है जहाँ निवास करते हुए दशरथ की आज्ञा के पालन में दत्तचित्त राम ने (केवल अपने) भुजबल की सहायता से (खर- दूषणादि) राक्षसों का विनाश किया था ॥२५५॥ यहाँ (दण्डक) वन का वर्णन(प्रधान) होने पर राम के चरित को अंग बना दिया गया है।
उदात्तान्तराय सूत्रम्- "अङ्गभूतमहापुरुषचरितं च"। पूर्वमैश्वर्ययोग उदात्तत्वम्। इह पुनश्चरितस्योदार(?त्त)त्वम्। अतः शब्द- सामान्यात् सङ्गतिः। तदेतदाह-उदात्तशब्देत्यादि । तदिदमिति। अत्रारण्यं वृत्तान्तःपातार्दा्गि, यद्वृत्तान्तःपाताद्रामचरित- मङ्गम्। तदेतदाह-अन्नारण्य इति। अस्य चेह कीर्तनं दर्शनान्तरानुसारेण। ध्वनिदर्शनेन तु द्वितीयोदात्तविषये रसवदादय एव। विवेचयिष्यते चैतत्। अङ्गयन्तरेऽङ्गतापन्नं महच्चरितलक्षणम्। द्वितीयोदात्तविषयो व्याप्तो रसवदादिभिः ॥ १. चरितवर्णनं°-अ० शा०। २. मङ्गी०-अ०। ३. ०निबद्धं-अ० । ४. निवसन्-नि० । ५. अत्र वर्णनीयेऽरण्ये-इति ना० पाठक्मः ।
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३४४ अलंकारसर्वस्वम् [ रसवदादयो-
रसभावतदाभासतत्प्रशमानां निबन्धे1 रसवत्प्रेयऊर्जस्वि- समाहितानि ॥सू० ८३।। उदाच्ते महापुरुषचरितस्य चित्तवृत्तिरूपत्वाच्चित्तवृत्तिविशेषस्वभाव- त्वाच्च रसादीनामिह तद्वदलंकाराणां प्रस्तावः। अतएव चत्वारोऽलंकारा युगपल्लक्षिताः। तत्र विभावानुभावव्यभिचारिभिः प्रकाशितो रत्यादि-
रस, भाव, तदाभास (रसाभास एवं भावाभास) तथा तत्प्रशम (भावप्रशम) का निबन्धन होने पर रसवत्, प्रेयः, ऊर्जस्वी तथा समाहित (अलंकार) होते हैं ॥सू० ८३। उदात्त (अलंकार) में महापुरुष का चरित चित्तवृत्तिरूप होता है और रसादि विशिष्ट चित्तवृत्तिस्वरूप होते हैं अतः रसादिमान् अलंकारों का यहाँ प्रकरण है। इसीलिए चारों अलंकारों को एक साथ निरूपित किया गया है। इनमें से विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से प्रकाशित रत्यादि (स्थायी
रसवदाद्यर्थं सूत्रम्- "रसभावतदाभासतत्प्रशमानां निबन्धे रसवत्प्रेयऊर्जस्विसमाहितानि।" विभावादिभिरभिव्यञ्जितो रत्यादिर्भावो रसः। तथा विभावानुभाव- सूचिता व्यभिचारिणः। देवतादिविषया रतिश्च भावः। तावेवाविषयप्रवृत्ता- वाभासौ। प्रयास्यदवस्था तु प्रशमः। एषां चतुर्णामुपनिबन्धे परिपाट्या रसवान् प्रेयः ऊर्जस्वी समाहितमित्यलङ्गारा इति सूत्रार्थः। ससङ्गतिकं व्याचष्टे-उदात्ते महापुरुषस्येत्यादिना। तदलङ्गाराणां चित्तवृत्तिविच्छि- त्यात्मनामलङ्काराणामित्यर्थः । अत एव चेति। यतश्चत्वारोऽपि चित्तवृत्त्या- त्मानोऽतः समानयोगक्षेमतया युगपदेकसूत्रकरोडीकारेण लक्षिताः। रसस्वरूपं विवेचयति-तत्र विभावेति। रतिहासशोकादीनां वा समानात्मनां स्थायि- भावानां यानि लोके कार्यकारणसहकारीणि तानि काव्ये संदृब्धानि नाटये चाभि- नीतानि गुणालङ्गारमहिम्ना चतुरविधाभिनयमहिम्ना च विभावनादनुभावनाद्वि- शिष्याभिमुख्यचरणाच्च विभावानुभावव्यभिचारिण उच्यन्ते। तैः प्रकाशितो व्यञ्जितो रत्यादिः सामाजिकचित्तवृत्तिविशेष: शृङ्गारादिको रस इति दिक्। विशेष: सम्प्रदायप्रकाशिन्यादौ ज्ञेयः। इहानुपयोगान्न प्रपञच्यते। १. निबन्धनेन-नि०। मनिबन्धे-शा१। २. वृत्तेः वि°-ना०। ३. इहालङ्कारा-ना०। तदलङ्कारा-शा१।
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डलंकारा: ] संजीविनी-सहितम् ३४५
श्चित्तवृत्तिविशेषो रसः। भावो विभावानुभावाभ्यां सूचितो निर्वेदा- दिस्त्रयस्त्रिंशद्वेदः। 'देवतादिविषयश्च' रत्यादिर्भावः। तदाभासो रसा- भासो भावाभासश्च। आभासत्वमविषयप्रवृत्त्यानौचित्यात्। तत्प्रशम उक्तप्रकाराणां निवर्तमानत्वेन प्रशाम्यद्वस्था। तत्रापि रसस्य परविश्रा- न्तिरूपत्वात्सा न संभवति इति परिशिष्टभेदविषयो द्रष्टव्यः। एषामुप-
भाव) रस है जो एक विशिष्ट चित्तवृत्ति है। विभाव तथा अनुभाव से सूचित निर्वेद आदि भाव कहलाता है जिसके तैंतीस भेद हैं। तथा देवताविषयक रत्यादि (स्थायी भाव) भी भाव कहलाता है। तदाभास का अर्थ है रसाभास एवं भावाभास। आभासता का अर्थ है अनुचित विषय में प्रवृत्ति से होने वाला अनौचित्य। तत्प्रशम (फ्द) का अभिप्राय है-उपर्युक्त भेदों की निवृत्ति के कारण प्रशान्तोन्मुखी अवस्था। इन (भेदों) में से परमविश्रान्तिरूप होने के कारण रस की वह (प्रशान्तोन्मुखी) अवस्था सम्भव नहीं है अतः अन्तिम भेद में ही प्रशमन होता है। इन (रस, भाव, तदाभास तथा भावप्रशम) क।
भावस्वरूपमाह-भावो विभावेत्यादि। विभावानुभावाभ्यामिति। व्यभिचारिव्यञ्जने व्यभिचार्यन्तराभावाद(?) द्योतितो विभावानुभावाभ्यां व्यञ्जितो व्यभिचारी वाक्यार्थीभावदशायां भाव उच्यते। सोऽपि त्रयस्त्रिश्द्गेदो निर्वेदग्लान्यादिरूपतया। तथा कान्ताव्यतिरिक्ते देवतादिविषये व्यञ्जितो रत्यादिरपि भाव:। तस्माद् व्यभिचारिस्थाय्यात्मकतया भावो द्विजातीयो- डवगन्तव्यः । यदाह-"रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाञ्जितः" । भाव इति। आभासयो: स्वरूपमाह-तदाभासो रसेत्यादि। तच्छब्देन रसभावप्रत्यव- मर्शः। आभासीभावस्त्वविषयप्रवृत्त्यनौचित्याभ्याम्। भावप्रशमस्वरूपमाह तत्प्रशम उक्तेत्यादि। उक्तभावप्रकाराणां निवृत्तौ प्रयास्यदवस्था भावप्रशम उच्यते। ननु रसेऽपि प्रशमः किं नोच्यत इत्यत आह-तत्रापीत्यादि। रसस्य ह्यखण्डनिरन्तरायप्रतीतिचर्वणीयस्य परमविश्रान्तिरूपत्वान्मध्ये प्रयास्यदवस्था दुर्लक्ष्येति रसव्यतिरिक्तपरिशिष्टभेदविषयोऽयं प्रशमो द्रष्टव्यः। एषां च रस-
१. देवादि°-नि०। २. विषयाच्च रत्यादिभावः । शा०।विषयाच्च रत्यादि।-ना० । °विषया च रतिः ।-शा१। 3. °चित्यम्-नि० शा०। ४. अपि-अ० नास्ति।
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३४६ अलंकारसर्वस्वम् [ रसवदादयो-
निबन्धे क्रमेण रसवदादयोऽलंकाराः। रसो विद्यते यत्र निबन्धने व्यापारात्मनि तद्रसवत्। प्रियतरं प्रेयो निबन्धनमेव द्रष्टव्यम्। एवमूर्जो बलं विद्यते यत्र, तदपि निबन्धनमेव। अनौचित्यप्रवृत्तत्वादत्र' बलयोगः। समाहितः' परिहारः । स 'च प्रकृतत्वादुक्तभेदविषयः प्रशमापरपर्यायः-। तत्र यस्मिन्दर्शने वाक्यार्थीभूता रसादयो रसवदाद्यलंकारा, तत्राङ्गभूत-
निबन्धन होने पर क्रमशः रसवत् आदि अलंकार होते हैं। जिस निबन्धन, वर्णन-व्यापार, में रस विद्यमान रहता है वह रसवत् कहलाता है। निबन्धन का ही प्रियतर होना प्रेयः समझा जाना चाहिए। इसी प्रकार ऊर्ज अर्थात् बल जिसमें विद्यमान हो वह निबन्धन ही (ऊर्जस्वी) कहलाएगा। समाहित का अर्थ परिहार है। वह प्रकरण के अनुसार उपर्युक्त (भाव) का ही भेद है, इसी का दूसरा पर्याय प्रशम है। (काव्यात्मा एवं अलंकार्य रस को अलंकार कहना किस प्रकार संगत है इस समस्या के सम्बन्ध में विभिन्न सिद्धान्त हैं, उनमें से) जिस (उद्भटादि के) सिद्धान्त के अनुसार वाक्यार्थ-भूत रसादि
भावादीनामुपनिबन्धे परिपाटया रसवदादयोऽलङ्काराः। चत्वार्यपि लक्ष्य- पदानि निर्वक्ति-रसो विद्यत इत्यादिना। यत्र हि व्यञ्जनोपस्कृतेऽ्भिधा- दिव्यापारात्मनि निबन्धे रसोऽस्ति तद्रसवत्। प्रियतरं निबन्धनमेव प्रेयो ज्ञयम्। ऊर्जो बलम्। तद्योगि निबन्धनमेवोर्जस्वि। ननु निबन्धने बलं नाम किमिति ? अत आह-अनौचित्येति। रसस्यानौचित्येन प्रवृत्तत्वाद् दौर्बल्यं, निबन्धने तु तदुपकृते बलयोगः। समाहितं परिहारः। तस्य प्रकृतत्वादुक्तस्य भावभेदस्य, यस्य प्रशम इत्यपि पर्यायः । ननु रसवदादीनां द्वितीयोदात्तस्य च का कक्ष्येत्यत आह-तत्र यस्मिन्नित्यादि। यत्र हि भामहादिदर्शने वाक्यार्थीभावात् प्रधानभूता एव रसादयो रसवदाद्यलङ्कारास्तत्राङ्गभूतरसादि-
१. नधक्र° -नि०। २. वदल ङ्कारादयो®-शा१। ३. द्रष्टव्यं- अ० नास्ति। ४. त्वाच्च तत्र-अ०, शा० (?) । ५. शमाहितः-शा०। ६. चाप्र-नि० । ७. विषयप्र०-ना०। 5 प्रशमपर्याय :- अ०, शा०। ९ यहाँ निबन्ध या निबन्धन शब्द का प्रयोग रचना के अर्थ में न होकर निबन्धन क्रिया अर्थात् अभिधा व्यापार द्वारा वर्णन के अर्थ में हुआ है।
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डलंकारा: ] संजीविनी-सहितम् ३४७
रसादिविषये द्वितीय उदात्तालंकारः । यन्मते त्वङ्गभूते रसादिविषये रस- वदाद्यलंकारा: अन्यस्य रसादिध्वनिनाव्याप्तत्वात्तत्रोदात्तालंकारस्य विषयो नावशिष्यते, तद्विषयस्य रसवदादिना व्याप्तत्वात्। तत्र रसवत उदाहरणम्- कि हास्येन न मे प्रयास्यसि पुनः प्राप्तश्चिराद्दर्शनं केयं निष्करुण प्रवासरुचिता केनासि दूरीकृतः ।
रसवदादि अलंकार (माने जाते) है वहाँ अंगभूत रसादि को उदात्तालंकार माना जाता है। पर जिस मत में (आनन्दवर्धन आदि के अनुसार) अंगभूत रसादि रसवदादि अलंकार हैं उसके अनुसार वाक्यार्थभूत रसादि के रसादिध्वनि में समाहित होने से उदात्तालंकार के लिए स्थान नहीं रह जाता है क्योंकि इस (उदात्तालंकार) का विषय रसवदादि (अलंकार) में समाहित है। इन (अलंकारों) में से रसवत् का उदाहरण (स्वप्न में देखा हुआ नायक स्पप्न- दर्शन की बातें छिपाना चाहता है, यह समझकर रिपुस्त्री-नायिका की उक्ति)- "मखौल करने से क्या लाभ ? (मुझे मालूम है कि-) चिरकाल के बाद मिलने पर भी तुम पुनः मुझसे दूर हो जाओगे। निर्दय ! (मिलने के साथ ही) विदेश चले जाने की तुम्हारी यह चाह कैसी है ? तुम्हें (मुझसे) किसने
विषय उपपद्यते कल्पो द्वितीय उदात्तालङ्कारः। यस्मिस्तु रसवदादिरलङ्कारोऽ- ङ्भूतरसादिविषय एव, अङ्गिनस्तु रसादेरलङ्कार्यभावापन्नस्य रसभावादिध्वनि- रूपतया व्याप्तत्वात्। तत्र ध्वनिदर्शने द्वितीयस्याङ्गभूतमहापुरुषचरितलक्षण- स्योदात्तालङ्कारस्य विषयो नावशिष्यते। कुत इत्यत आह-तद्विषयस्येति। इयमिह प्रक्रिया - यत्र रसादयो वाक्यार्थीभूतास्तत्र रसवदादयोऽलङ्गारा इत्य- लङ्कारमात्ररसिकानां भामहादीनां दर्शने। यदा त्ववाक्यार्थीभावादङ्गभूतो रसा- दिस्तदाङ्गभूतमहापुरुषचरितलक्षणो द्वितीयोदात्त उपपद्यते नाम। ध्वनिदर्शने तु काव्यात्मनो रसादेः प्राधान्यदशायामलङ्कार्यत्वादलङ्गारभावानुपपत्तावङ्गभूता रसादयो रसवदाद्यलङ्काराः। तथा च सति रसभावादिनायकमहापुरुषचरिता- विर्भावोऽपि रसभावाद्यङ्गभावानतिरेकी व्यङ्गव्यञ्जकसम्बन्धात्। व्यञ्जकं हि महापुरुषचरितं, व्यङ्गयं रसभावादि। व्यङ्यभावाविनाभूताङ्गभावो रसवदाद्य- लङ्कारस्यैव विषयः व्यञ्जकमात्राविश्रान्तानामनवगाढधियां द्वितीयोदात्तभ्रम १. त्वात्तत्र द्वितीयोदा°-अ० शा०।
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३४८ अलंकारसर्वस्वम् [रसवदादयो-
स्वप्नान्तेष्विति वोवदन्प्रियतमव्यासक्तकण्ठग्रहो बुद्ध्वा रोदिति रिक्तबाहुवलयस्तारं रिपुस्त्रीजनः ॥२५६।। एतन्मतद्वयेऽप्युदाहरणम्। वाक्यार्थीभूतोत्र करुणो रसः। अङ्ग- भूतस्तु विप्रलम्भशृङ्गारः। एवं रसान्तरेष्वप्युदाहार्यम्2। प्रेयोSलंकारा- दौ विशेषमनपेक्ष्योदाहियते। 'प्रेयोलंकारो यथा-
दूर कर दिया था ?" स्वप्न समाप्त होने पर इस प्रकार से प्रलाप करने वाला, प्रियतम के द्वारा गलवहियाँ डाले हुए, तुम्हारे शत्रुओं का स्त्रीगण अपने बाहु- बलय को खाली पाकर जोर से रोने लग जाता है ॥२५६॥ दोनों ही मतों के अनुसार यह उदाहरण है। इसमें करुण रस वाक्यार्थ के रूप में है। और विप्रलम्भ शृंगार अंगभूत है। इसी प्रकार दूसरे रसों का भी उदाहरण दिया जा सकता है। प्रेयोऽलंकार आदि के उदाहरण (दोनों मतों के अंगागिभाव-रूप) भेद को दृष्टि में न रख कर दिए जाएगें। प्रेयोऽलंकार जैसे-
इति। कि हास्येनेति। स्वप्नदृष्टं नायकं स्वरूपसन्दर्शननिह्नवपरिहासप्रवृत्तं मन्यमानस्य रिपुस्त्रीजनस्योक्तिवर्णनम्। 'किं हास्येन चिरात् प्राप्तः सन् पुनर्मे दर्शनं न प्रयास्यसि निष्करुणता तवेयं प्राप्तिसमकालमेव प्रवासरुचिता इत्यु- दीरयन् तमदृष्ट्वा केनासि दूरीकृत' इति वदन् व्यासक्तकण्ठग्रहो बुद्धवा रिक्तबाहुवलयस्तारं रोदितीति। अत्राङ्गाङ्गिनौ द्वावपि रसौ। अङ्गी रसो रसवान् मतान्तरे। स्वमते त्वङ्गभूतो रसवान्। अत उदाहरणमेतन्मत- द्वयार्हम्। तदेतदभिसन्धायाह-एतन्मतद्वयेऽपीति। तदेतद् विभज्य दर्शयितु- माह-अत्र वाक्यार्थीभूत इति। वाक्यार्थीभावात् करुणो रसवान्, मतान्तर इति शेष: । एवंविधे हि विषये वाक्यार्थीभावादङ्ङ्गिनं रसं रसवन्तमन्ये प्रतिपेदिरे। अङ्गभूतं तु द्वितीयोदात्तम्। ध्वनिदर्शनविदस्तु अ्गिनोऽ- लङ्कार्यतामङ्गभूतस्य रसवदादिरूपतां द्वितीयोदात्तासम्भवं च सिद्धान्तितवन्तः। इयं च प्रक्रिया रसान्तरेष्वपि ज्ञेयेत्याह-एवं रसान्तरेष्विति। उदाहार्यम् उदाहर्तु शक्यमरह (शक्यं), प्राप्तकालता चोदाहरणस्य। अहे शक्ये प्राप्तकालतायां च कृत्यः । इत्थं रसवदलङ्कारे मतद्वयं कक्ष्याविभागेनोदाहृतम्। प्रेयोऽ- लङ्गारादौ तु विशेषांशस्तु ज्ञात इति साधारण्येनोदाजिहीर्बुराह-प्रेयोSलङ्कारा- दाविति। १. ते-अ०। २ तत्र वा-अ०। ३. अपि -अ० ना०शा१ नास्ति। ४. तत्र प्रेयो०-शा०। प्रेयोलङ्कारो यथा-अयमंशो अ० ना० नास्ति।
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डलंकारा: ] संजीविनी-सहितम् ३४९
गाढालिङ्गनवामनीकृत कुच प्रोद्विन्नरोमोद्रमा१ सान्द्रस्नेहरसातिरेकविगलच्छ्रीमन्नितम्बाम्बरा। मा मा मानद माति मामलमिति क्षामाक्षरोल्लापिनी सुप्ता कि नु मृता नु किं मनसि मे लीना विलीना तु किम् ॥२५७।। अत्र नायिकायां हर्षाख्यो व्यभिचारिभावः। यथा वा- तद्वक्त्रामृतपानदुर्ललितया दृष्टचा क्व विश्रम्यतां तद्वाक्यश्रवणाभियोगपरयोः श्राव्यं कुतः श्रोत्रयोः3। एभिस्तत्परिरम्भनिर्भरभरैरङ्गै:6 कथं स्थीयतां कष्टं तद्विरहेण संप्रति वयं कृच्छ्रामवस्थां गताः ।।२५८।।
गाढ़ आलिंगन से जिसके स्तन दब गए हैं, जो (आनन्दातिरेक से) रोमांचित है, अत्यधिक स्नेह-रस से जिसके सुन्दर नितम्बों से वस्त्रु खिसका जा रहा है, 'मानद! (मान खण्डन करने वाले प्रियतम !) नहीं, नहीं, अब और नहीं, बसं अब मुझे छोड़ दो' इस प्रकार लड़खड़ा कर बोलने वाली वह (मेरी प्रियतमा) क्या सो गई है ? कहीं सदा के लिए तो नहीं सो गई है ? अथवा मेरे मन में छुप गई है ? और कहीं (मेरे मन में) घुलमिल तो नहीं गई है।२५७।। यहाँ नायिका का हर्ष नामक संचारी भाव (व्णित) है। अथवा जैसे- उस मुख का अमृतपान करने से दुर्ललित (लाड़-प्यार से बिगड़ी हुई मेरी दृष्टि कहाँ ठहरे ? (प्रिये!) तुम्हारी बातें सुनने के लालची (मेरे) कानों को सुनने लायक बातें कहाँ मिलेंगी? और अपूर्व आर्लिंगन से आप्यायित ये अंग किस प्रकार थिर रह सकेंगें? ओह ! उसके वियोग में अब मेरी हालत ही नाजुक हो गई है ॥२५८॥
गाढालिंङ्गनेति-मानद मानखण्डन, मा मेत्यर्धोक्या भावावसानहर्ष: प्रत्याय्यते। लक्ष्ययोजनायाह-अत्र नायिकाया इति। इह हर्षाख्यो व्यभिचारिभावः सम्भोगशृङ्गारं प्रति गुणत्वात् प्रेयोऽलङ्कार इति शेषः । व्यभिचार्यन्तरायोदाहरति-तद्वक्त्रेति। अत्र चिन्तालक्षणो व्यभिचारी
१. प्रोद्भूत°-अ० ना० शा०। २. वा-शा१ नास्ति। ३. कर्णयोः-नि० । . ४. रतरैर°-ना० शा१।
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३५० अलंकारसर्वस्वम् [ रसवदादयो-
अत्र चिन्ताख्यो व्यभिचारिभाव। एष एव च भावालंकार:। भावस्य चात्र स्थितिरूपतया वर्णनम्। शान्त्युदयावस्थे तु वक्ष्येते। ऊर्जस्वी यथा- दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते श्रुति चेतः कालकलामपि प्रकुरुते नावस्थितिं तां विना। एतैराकुलितस्य विक्षततरैर ङ्गैरनङ्गातुरैः४ संपद्येत कदा* तदाप्तिसुखमित्येतन्न वेद्यि स्फुटम् ॥२५९॥
यहाँ चिन्तानामकसं चारी भाव (वणित) है। इसी (प्रेयः) को भावा- लंकार कहा जाता है। इस (अलंकार) में भाव की स्थितिरूपता का वर्णन होता है। भाव की शान्ति तथा उदय की अवस्थाओं का वर्णन आगे होगा। ऊर्जस्वी का उदाहरण- उसका नाम सुनते ही मुझको लगता है कि जैसे दूर खींच ले जाने का मोहमन्त्र हो। उसके बिना (मेरा) मन थोड़ी देर के लिए भो स्थिर न हीं रह पाता है। पर (मुझे) यह ठीक से नहीं पता है कि काम से पीड़ित तथा क्षीणतर इन अंगों से आकुल मुझको उससे मिलने का सुख कब मिलेगा ? ॥२५९॥
विप्रलम्भशृङ्गाराङ्गतया प्रेयान्। तदेतदाह-अत्र चिन्ताख्य इति। अलङ्कारान्तरभ्रमो मा भूदिति पर्यायमस्याह-एष एव चेति। प्रेयान भावालङ्कारश्चेति पर्यायौ। भावशान्त्युदयादिभ्योऽस्य भेदमाह-भावस्य चात्रेति। स्थितिरूपतायां भावालङ्गारः। शान्त्युदयाद्यवस्था तु पृथगलङ्कारा इति भाव:। कौ तौ शान्त्युदयावित्यत आह-शान्त्युद्येति। शान्त्यवस्था ऊर्जस्वी समनन्तरं समाहितत्वेन वक्ष्यते। उदयावस्था तु सन्धिशबलताभ्यां सह पृथगलङ्गारत्वेनेत्यर्थः। दूराकर्षणेति। कालकलामपि नावस्थिति प्रकुरुते। अत्र विप्रलम्भशृङ्गारोऽनौचित्येन प्रवृत्तो देव्या: सीताया अविषय- त्वात्। अतो रसं गुणीकृत्य निबन्धनमेव बलादित्यूर्जस्वी। औत्सुक्यव्य- भिचारिणोऽप्यनौचित्यात् प्रेयोऽलङ्गारसङ्कर:।
१. एव-ना० नास्ति। २. वर्तनम्-अ० । ३. ०स्वि-ना०। ४. कुलै :- अ० । ५. कथम् -- अ० ।
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डलंकारा: ] संजीविनी-सहितम् ३५१
अत्र रावणस्याभिलाषको 'विप्रलम्भशृङ्गार औत्सुक्यं च व्यभि- चारिभावोऽनौचित्येन२ प्रवृत्तौ। समाहितं यथा- अक्ष्णोः स्फुटाश्रुकलुषोऽरुणिमा निलीन:२ शान्तं च सार्धमधरस्फुरणं भ्र कुख्या। भावान्तरस्य तव चण्डि गतोऽपि रोषो नो दाढवासनतया6 प्रसरं ददाति ॥२६०।। अत्र कोपस्य प्रशमः । एवमन्यत्राप्युदाहार्यम्।
इस (उदाहरण) में रावण के अभिलाषरूप वियोग शृंगार की तथा औत्सुक्य (नामक) व्यभिचारी भाव की अनुचितरूप में प्रवृत्ति (वणित) है। समाहित का उदाहरण- आँसुओं से कलुषित लालिमा (अब) आँखों में नहीं रह गई है। होठ का फड़फड़ाना, भौंह (की तनावट) के साथ शान्त हो गया है। यद्यपि तुम्हारा कोध समाप्त हो गया है तथापि वह (अपने) गम्भीर संस्कार के कारण (प्रेम के) दूसरे भाव भी नहीं बढ़ने देता है ॥२६०॥ यहाँ कोध का शान्त होना वर्णित है। इसी प्रकार दूसरे (व्यभिचारी भावों के प्रशमन) के भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। तदेतदभिप्रेत्याह-अत्र रावणस्येत्यादि। शान्त्यवस्था वक्ष्यत इति प्रति- ज्ञातमुदाजिहीर्षुराह-समाहितं यथेति। अक्ष्णोरिति। उत्क्षुभितेनाश्रुणा पर्याविलोऽरुणिमा चक्षुषोरपगत इत्यादिना रोषापगमः कटाक्षविलासतारकातार- ल्याद्यनाविर्भावाद् भावान्तरप्रसराप्रदानम्। अतः प्रशाम्यदवस्था कोपस्येत्याह- अत्र कोपस्येति। इत्थं व्यभिचार्यन्तरेऽपि प्रशमो ज्ञेय इत्याह-एवमन्य- त्रापीति। १. लाषको -नि०।षशृङ्गार°-अ०। २. चित्यप्रवृत्तौ-शा१। ३. विलीन: -अ० । ४. नो गाढ° -ना०। ". एतदनन्तरम् अ० पुस्तके पद्यद्वयमधिकमस्ति-
किं वक्षरचरणानतिव्यतिकरव्याजेन गोपाय्यते। इत्युक्ते क्व तदित्युदीर्य सहसा तत् सम्प्रमाष्टु मया, साश्लिष्टा रभसेन तत्सुखवशात् तन्व्यापि तद् विस्मृतम् । एकस्मिन् शयने पराङमुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो-
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३५२ अलंकारसर्वस्वम् [ भावोदयाद्य-
भावोदयसंधिशबलताश्च पृथगलंकाराः ॥।सू०८४।। भावस्योक्तरूपस्योदय उद्रमावस्था, संधि: द्वयोर्विरुद्धयोः *स्पर्धिभावे- नोपनिबन्धः, शबलता बहूनां पूर्वपूर्वोपमर्देनोपनिबन्धः । एते च पृथग्रसवदादिभ्यो भिन्नत्वेनालंकारा:।
भाव का उदय, सन्धि तथा शबलता पृथक् अलंकार हैं ॥सू० ८४॥। उपर्युक्त स्वरूप वाले भाव की उद्मावस्था को उदय कहते हैं। दो विरोधी (भावों) का स्पर्धापूर्वक सन्निवेश सन्धि है। अनेक भावों का पूर्व-पूर्व (भावों) का मर्दन करते हुए वर्णन शबलता है। ये अलंकार रसवदादि से पृथक् या भिन्न अलंकार हैं।
रसभावगुणीभावादनौचित्यप्रवृत्तितः । रसवत्प्रेयऊर्जस्विसमाहितचतुष्टयम् । रसवत्त्वप्रियत्वाभ्यामूर्ज: प्रशमयोगतः । निबन्धनं रसवदाद्याख्यां संप्रतिपद्यते।। भावोदयाद्यर्थ सूत्रम्- "भावोदयसन्धिशबलताश्च पृथगलङ्काराः"॥ उक्तसर्वालङ्कारान्यत्वात् सर्वालङ्ारशेषतयतत्त्रितयोक्तिः। पृथग् रसवदादिविविक्तविषयतयेत्यर्थः । व्याचष्टे भावस्याङ्कुररपेत्यादि। अङ्कुररूपस्योद्गमदशा उदयः । विरुद्धयोस्तुल्यकक्ष्यतया विनिवेशनं सन्धिः । पूर्वपूर्वोपमर्देन बहूनामुत्तरोत्तरनिबन्धः शबलता। पृथक् प्रतिपादने हेतुमाह
रन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोरगौ रवम् । दम्पत्योः शनकैरपाङ्गवलनामिश्रीभवच्चक्षुषो- र्भग्नो मानकलि: सहासरभसव्यासक्तकण्ठग्रहः । अत्रेर्ष्याक्रोधात्मनो मानस्य प्रशमः । एवमन्यत्राप्युदाहार्यम् ॥" १. भावोदयो भावसन्धिर्भावशबलता च पृथगलङ्कारः नि०। २. चैते -अ० ना। 3. स्पधित्वेनो०-नि० शा१। ४. च - नि० पुस्तकेऽधिकः । ". बहूनाम्-शा१ नास्ति। ६. मर्दनेनो०-अ० शा१। s. भिन्ना अलङ्काराः।-शा१। भिन्नालङ्काराः।-नि० ।
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लंकारा: ] संजीविनी-सहितम् ३५३ एतत्प्रतिपादनं चोद्धटादिभिरेषां पृथगलंकारत्वेन निर्दिष्टत्वात्। अथ च संकरसंसृष्टिवलक्षण्येनैते सर्वालंकारा: पृथक्केवलत्वेनालंकारा इति सर्वालंकारशेषत्वेनोक्तम्। संसृष्टिसंकरयोर्हि 'संपृक्ततयालंकाराणां २स्थिति- स्तद्वैलक्षण्यप्रतिपादनमेतत्। तत्र भावोदयो यथा- एकस्मिञ्छयने विपक्षरमणीनामग्रहे मुग्धया सदय: कोपपरिग्रहग्लपितया® चाटूनि कुर्न्नपि। आवेगादवधीरितः प्रियतमस्तूष्णीं स्थितस्तत्क्षणं" माभूत्सुप्त इवेत्यमन्द्वलितग्रीवं पुनर्वीक्षितः।।२६१।। अत्रौत्सुक्यस्योदयः । भावसंधियथा- यह प्रतिपादन (अर्थात् भावोदयादि अलंकार भिन्न या पृथक् हैं इस बात का विशेष रूप से उल्लेख), उद्भटादि (आचार्यों) द्वारा इन अलंकारों का पृथक् रूप में निर्देश करने के नाते, किया गया है। पुनश्च संकर तथा संसृष्टि (अलंकारों) को छोड़कर ये सभी (पुनरुक्तवदाभास से लेकर भावसन्धि तक के) अलंकार पृथक या केवल रूप में (अर्थात् दूसरे अलंकारों से मिश्रित न होकर शुद्ध रूप में) अलंकार हैं, यह सभी अलंकारों के लिए चरितार्थ है। किन्तु संसृष्टि तथा संकर में (विभिन्न) अलंकार मिश्रित होकर रहते हैं। उनसे भिन्नता के लिए यह (पृथक् होने का) उल्लेख किया गया है। भावोदय का उदाहरण- एक साथ लेटने पर (नायक द्वारा) उपनायिका का नाम ले लेने से तुरन्त रूठो हुई मुग्धा ने खुशामद करते हुए प्रियतम को भी आवेश में आकर फटकार दिया। वह चुपचाप हो गया। पर 'कहीं यह सो न गया हो' यह सोचकर वह (मुग्धा नायिका) झट से गर्दन मोड़कर फिर से उसे देखने लगी।२६१।। यहां औत्सुक्य का उदय (वणित) है। भावसन्धि का उदाहरण- एतत्प्रतिपादनं चेति। केवलालङ्गारत्वात् संसृष्टिसंकरवैलक्षण्यम्। तयो: संवृत्तत्वं (? संपृक्तत्वं ) स्वरूपमित्याह-संसृष्टिसंकरयोर्हीति। एकस्मिन् शयन इति। विपक्षनामग्रहणं ग्लपितत्वे, ग्लपितत्वमावेगे। आवेगोऽवधीरणम्, अवधीरणं प्रियतमतृष्णीम्भावे, तृष्णोम्भावस्तु पुनर्वीक्षणे हेतुः। अत्रौत्सुक्य- भावस्योदयः । तस्य च गुणभाव इह विवक्षणीयः । १. संपृक्ततया सिद्धानामलं°-अ०। २. पृथक्तया-ना०। ३. पराङमुखग्ल° नि०। ४. संवे०-अ० । ४. तत्क्षणान्-नि० ना०। २३
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३५४ अलंकारसर्वस्वम् [भावोदयाद्य-
वामेन नारीनयनाश्रुधारां कृपाणधारामथ दक्षिणेन। उत्पुंसयन्नेकतरः करेण कर्तव्यमूढः सुभटो बभूव ॥२६२॥ अत्र स्नेहाख्यरतिभावरणौत्सुक्ययोः संधिः। भावशबलता यथा- क्वाकार्यं शशलक्ष्मण: क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम्। किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधिय: स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यमुपेहि कः खलु युवा धन्योऽधर -पास्यति ॥२६३॥ प्रियतमा की आँखों से आँसुओं की धारा को बाएँ हाथ से पोंछता हुआ और दाहिने हाथ से तलवार की धार को पैनी करता हुआ वीर योद्धा समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या करे ॥२६२॥ यहाँ स्नेह नामक (शृंगार रस के स्थायी) रतिभाव की तथा युद्ध के लिए औत्सुक्य (नामक संचारी भाव) की सन्धि है। भावशबलता का उदाहरण- कहाँ (यह) अनुचित कार्य और कहाँ चन्द्रवंश ? (वितर्क), वह फिर से दिखाई दे जाए (औत्सुक्य), दोषों का शमन करने के लिए मैंने लिखा-पढ़ा है (मति), ओह ! कोध में भी उसका मुख कितना सुन्दर लगता था (स्मरण), (इस प्रकार के आचरण के लिए) निष्पाप विवेकी जन (मुझे) क्या कहेंगे ? (शंका), उससे स्वप्न में भी मिलना दुर्लभ हो गया है (दैन्य), रे मन ! धीरज रखो (धृति), न जाने (वह) कौन सौभाग्यशाली युवक है जो (उसके) अधरा- मृत का पान करेगा (चिंता। ॥२६३।। वामेन नारीति। वामेन करेण प्रियतमाया नयनाश्रुधारां दक्षिणेन कृपाणधारां प्रमार्जयन् कर्तव्यमूढोऽभूदित्यत्र रतिभावरणौत्सुक्ययोः सन्धिः। तद्देतदाह-अत्र स्नेहाख्येति। स्नेहग्रहणाद् रतेः शृङ्गारस्थायितामाह -- भावस्थायित्वे तु रतिः, (अन्यथा) प्रीतिमात्रम् । क्वाकार्यमिति। अत्र क्वाकार्य क्व च शशलक्ष्मणः कुलमिति वितर्कः । भूयोऽपि दृश्येत सेत्यौत्सुक्यम्। श्रुतं दोषप्रशमायेति मतिः। अहो कोपेऽपि मुखं कान्तमिति स्मृतिः। किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषा इति शङ्का। स्वप्नेऽपि दुर्लभेति दैन्यम्। चेतः स्वास्थ्यमुपेहीति धृतिः। को धन्योऽधरं पास्यतीति चिन्ता। अत्रोत्तरेषां पूर्वपूर्वोपमर्देनावस्थानात् शबलता। तदेतदाह-अत्र
१. नः-नि० । २. धास्यति-अ० ना० शा१।
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लंकारा: ] संजीविनी-सहितम् ३५५ अत्र वितर्कौत्सुक्यमतिस्मरणशङ्कादैन्यधृतिचिन्तानां 'शबलता। तदेते चित्तवृत्तिगतत्वेनालंकारा *दर्शिताः । अधुनैषां सर्वेषामलंकाराणां संश्लेषसमुत्थापितमलंकारद्वयमुच्यते। तत्र संश्लेषः संयोगन्यायेन समवायन्यायेन च१ द्विधा। संयोगन्यायो यत्र भेदस्योत्कटतया स्थितिः। समवायन्यायो यत्र तस्यैवानुत्कटत्वेना"- वस्थानम्। तत्रोत्कटत्वेन स्थितौ तिलतण्डुलन्यायः। इतरत्र तु क्षीरनीर- सादृश्यम्। क्रमेण तदुच्यते-
यहाँ वितर्क, औत्सुक्य, मति, स्मरण, शंका, दैन्य, धृति तथा चिन्ता की शबलता है। इन अलंकारों के चित्तवृत्तिमलक होने का प्रतिपादन किया जा चुका है (अथवा इसके साथ ही चितवृत्तिमूलक अलंकारों का निरूपण समाप्त होता है)। अब इन सभी अलंकारों के मिश्रण से उत्थापित दो अलंकारों का निरूपण किया जा रहा है। मिश्रण दो तरह का होता है। संयोग की तरह या समवाय की तरह। संयोग की तरह (मिश्रण) वह है जहां भेद उत्कट रूप में वर्तमान हो। समवायन्याय वहाँ होता है जहाँ उस (भेद) की स्थिति उत्कट- रूप में नहीं होती है। उत्कट रूप में रहना तिल और चावल के मिलने की तरह होता है। और दूसरी स्थिति (अनुत्कटरूप में रहना) दूध और पानी के (मिलने के) समान होती है। क्रमशः इन (दो अलंकारों) का निरूपण किया जा रहा है। वितर्केत्यादि। तानिमान् निगमयति-तदेत इत्यादि। स्थितिप्रशमवत् भावस्योदयः सन्धिरेव च। शाबल्यं तु गुणीभावे पृथक् पृथगलंक्रियाः । सङ्करसंसृष्टी प्रतुष्टूषुराह-अधुनैषामिति। संश्लेषः संबन्धः। तस्य द्वविध्यमाह-तत्र संश्लेष इत्यादि। भेदकोटेरुत्कटतायां संयोगन्यायः, अनुत्कटत्वे तु समवायन्यायः। दृष्टान्तेन न्यायभेदमवस्थापयति -- तिलतण्डुल- न्यायः क्षीरनीरसादृश्यमिति च। उभयमपि परिपाटया सूत्रयितुमाह- क्रमेणेति। १. भावानां शब°-ना०। २. लक्षिता :- अ० । 3. वेति-अ०। चेति-ना०। ४. द्विविध :- नि० शा१। ५. त्वेन वर्तनम्-अ० ना० शा१। ६. णंत०-नि० शा१।
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३५६ अलंकारसर्वस्वम् [ संसृष्टि-
एषां तिलतण्डुलन्यायेन 'मिश्रत्वे संसृष्टिः ॥॥सू० ८५॥ उक्तालंकाराणां यथासंभवं यदि क्वचिद्युगपद्वचनं स्यात्, तदा ते किं ४पृथक्त्व एव पर्यवसिताः, "उत तदलंकारान्तरमेव किंचिदिति विचा- र्यंते-तत्र यथा बाहचालंकाराणां सौवर्णमणिमयप्रभृतीनां पृथक्चारुत्व- हेतुत्वेऽपि संघटनाकृतं चारुत्वान्तरं जायते,तद्वत्प्रकृतालंकाराणामपि संयोजने चारुत्वान्तरमुपलभ्यते। तेनालंकारान्तरप्रादुर्भावो न 'पृथ- क्पर्यवसानमिति निर्णयः। इन (अलंकारों) के तिल और चावल की भाँति मिलने पर संसृष्टि होती है॥सू० ८५।। यदि कहीं उपर्युक्त (पुनरुक्तवदाभासादि) अलंकारों का एक साथ यथा- संभव सन्निवेश हो तो उन अलंकारों को पृथक् ही माना जाए या (अलंकारों के एकत्र सन्निवेश को) कोई दूसरा अलंकार माना जाए इस सम्बन्ध में विचार करते हैं। जिस प्रकार सोने, मणि आदि से निर्मित लौकिक आभूषणों में, जो पृथक रूप में रह कर सौन्दर्य के हेतु तो होते ही हैं, संघटना के द्वारा नया सौन्दर्य पैदा हो जाता है। उसी प्रकार प्रस्तुत अलंकारों (काव्यालंकारों) में भी मिश्रण होने पर नये सौन्दर्य का अनुभव होता है। अतः यही निष्कर्ष है कि (अलंकारों का मिश्रण होने पर) एक नया अलंकार उत्पन्न होता है; (उन अलंकारों का) अवसान पृथक् रूप में नही होता है। "एषां तिलतण्डुलन्यायेन मिश्रत्वे संसष्टिः" । व्याचष्टे-उक्तालङ्काराणामित्यादि। य एतेऽनुप्रासादयो भावशबलता- पर्यन्ताः पृथगुक्तास्तेषां सम्भवानुसारेण यदि कुत्रचिद्विषये सहभावस्तदैते कि पृथक् पृथगेवालद्गारा उत सहभाववैचित्र्यमलङ्कारान्तरमेवेति चिन्ता। (तां)सिद्धान्त- यितुमाह- तत्र यथेत्यादि। सौवर्णानां मणिमयानां वा पृथक् चारुत्वहेतुत्वेऽपि संश्लेषतो यथा चारुत्वान्तरं तथानुप्रासादीनामपीत्यलङ्गारान्तरत्वमेव। १. मिश्रत्वे शा० नास्ति। मिश्रत्वं नि० शा१। २. तथा०-शा१॥ ३. 'युगपत्' नि० नास्ति। युगपत् संघटना अ०। युगपत् घटनम् -- ना०। ४। पृथकत्वेन-नि० शा०। ५ उत - शा१ नास्ति। ६. चारुता -अ० ना०। ७. तद्यत्कविकृताल°-ना०। = भावेन -- ना० । ९. पृथकृत्वे-शा१।
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रलंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३५७
अलंकारान्तरत्वे१ च संयोगन्यायेन स्फुटावगमो भेद:, समवायन्यायेन वास्फुटत्वावगम इति द्वैतम्२। पूर्वत्र संसृष्टिः, उत्तरत्र तुर संकरः। अत एव तिलतण्डुलन्यायः, क्षीरनीरन्यायश्च तयोर्यथार्थता-मवगमयतः। तत्र तिलतण्डुलन्यायेन भवन्ती संसृष्टिस्त्रिविधा"। शब्दालंकारगतत्वेन, अर्थालंकारगतत्वेन, उभयालंकारगतत्वेन च।सङ्करस्तु प्रभेदयुक्तो वक्ष्यते। तत्र शब्दालंकारसंसृष्टियंथा 'कुसुमसौर भलोभपरिभ्रमद्धमरसंभ्रमसंभृतशोभया। चलितया विद्धे कलमेखलाकलकलोऽलकलोलदृशान्यया॥२६४।। इस नयी अलंकारता के दो रूप हैं-दो वस्तुओं में संयोग संबंध की भाँति (अलंकारों के) भेद का स्फुट हो जाना या जाति तथा व्यक्ति में समवाय सम्बन्ध की भाँति अस्फुट रहना। प्रथम स्थिति में संसृष्टि (अलंकार) होता है और दूसरी स्थिति में संकर (अलंकार) होता है। वस्तुतः तिल-चावल की तरह मिलने का दृष्टान्त तथा दूध और पानी के मिलने का दृष्टान्त इन दोनों (अलंकारों) के वास्तविक स्वरूप की पहिचान करा देते हैं। तिलतण्डुलन्याय से होने वाली संसृष्टि शब्दालंकार, अर्थालंकार तथा उभयालंकार में होने के कारण तीन प्रकार की है। इनमें से शब्दालंकार-संसृष्टि का उदाहरण- कुसुम की सुगन्धि के लोभ से मंडराते हुए भौरों के आतंक से अत्यधिक सुन्दर लगने वाली, बलों (के मुख पर आ जाने) से चपल नयन वाली एक और सुन्दरी के (भौरों से घबड़ाकर) चलने पर मनोहर करधनी से कलकल (मधुर शब्द) होने लगा ॥२६४।। संश्लेषेऽपि भेदांशस्फुटत्वास्फुटत्वाभ्यां विच्छित्तिद्वयमाह-अलङ्गारान्तरत्वे चेति। तत्र सङ्करसंसृष्टी व्यवस्थापयति-पूर्वत्रेत्यादि। यतो भेद उत्कटो- डनुत्कटश्च अतो दृष्टान्तौ समञ्जसावित्याह-अत एव चेत्यादि। उत्कटा- नुत्कटत्वे भेदस्य यथार्थता। संसृष्टिस्त्रिधेत्याह -तत्र तिलतण्डुलेत्यादि। सङ्कर: सप्रभेदं जिज्ञासितोडपि संसृष्टयनन्तरं वक्ष्यत इत्याह-सङ्करस्त्विति। कुसुमसौरभेति। अलकैर्व्याकुलैर्लोलदृशा। अत्र पूर्वार्धे भकारापेक्षया १. त्वेऽपि-नि०। २ द्वैधम्-अ०नि०। 3. तु-नि० शा१ नास्ति। ४. मेवावगमयत :- अ० शा०। " त्रिधा-नि० शा०। ६. उभयगत° -ना०। ७. सङ्करस्तु ... वक्ष्यते-नि० नास्ति। = वदनसौ०- नि०। ९. वनितया-अ०शा१।
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३५८ अलंकारसर्वस्वम् [संसृष्टि- अन्नानुप्रासयमकयोविजातीययोः संसृष्टिः। अत्रैव "लकलोलकलोल" इति, तथा 'कलोलकलोल' इति सजातीययोः३ संसृष्टिः। अर्थालंकार- संसृष्टिर्यथा- देवि क्षपा गलति चक्षुरमन्दतार- मुन्मीलयाशु नलिनीव सभृङ्गमब्जम्। एष त्वदाननरुचेव विलुण्ठ्यमानः पश्याम्बरं त्यजति निष्प्रतिभ: शशाङ्क: ॥२६५॥ अत्र 'सजातीययोरुपमयोः संसृष्टिः। लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः । असत्पुरुषसेवेव र्दा्ट्टि्निष्फलतां "गता ॥२६६।।
यहाँ अनुप्रास तथा यमक दो विजातीय (अलंकारों) की संसृष्टि है। और इसी उदाहरण के 'लकलोलकलो' तथा 'कलोलकलोल' इन अंशों में सजातीय दो (यमकों) की संसृष्टि है। अर्थालंकार-संसृष्टि का उदाहरण देवि ! रात बीती जा रही है। आँख की पुतली थिर नहीं है। नलिनी की भाँति भौरों वाले कमल को झटपट खोलो। देखों लगता है कि तुम्हारे मुख की कान्ति के समान यह कान्तिहीन चन्द्रमा लुढ़कता-पुढ़कता आकाश को छोड़े जा रहा है ।२६५।। यहाँ (नलिनी की भाँति तथा मुखकान्ति के समान इन पदों में) सजातीय दो उपमाओं की संसृष्टि है। अन्धकार अंगों को लोप-सा रहा है, आकाश मानो काजल बरसा रहा है, दुर्जन की सेवा की भाँति दृष्टि विफल हो गई ॥२६६॥
उत्तरार्धे च लकारापेक्षया वृत्त्यनुप्रासः। लकलोलकलो इत्यादौ यमकमिति विजातीययो: संसृष्टिः। तथा लकलोलकलो इति कलोलकलोल इति च सजा- तीययोर्यमकयोरपि। तदेतदाह- अन्रानुप्रासेत्यादि। देवि क्षपेति। अत्र नलिनीव रुचेवेत्युपमाद्वयं सजातीयं संसृष्टम्। तदे- तदाह-अत्र सजातीययोरिति। लिम्पतीवेत्यत्र तु विजातीयसंसृटि: स्फुटा। १. अलकलोलकलोल-नि०। अलकलोल-शा१। २. इति तथा-अ० नास्ति। ३. सजातीययोर्यमकयोः-अ० नि०। ४. विजातीययोरुपमोत्प्रेक्षयोः ससृष्टिः-नि० अ० ना०। ५. विफलतां-पाठान्तरम्।
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रलंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३५९
अत्रोत्प्रेक्षयोः सजातीययोः संसृष्टिः। उभयसंसृष्टिर्यथा- आनन्दमन्थरपुरंदरमुक्तमाल्यं मौलो हठेन निहितं महिषासुरस्य। पादाम्बुजं भवतु मे विजयाय मञ्जु- मश्जीर शिन्जितमनोहरमम्बिकायाः ॥२६७।। अत्रोपमानुप्रासयोः संसृष्टिः। पादाम्बुजमित्यत्र3 हचुपमाया' मखजीर- शिञ्जितयोगो व्यवस्थापकं प्रमाणम्। स हि रूपके प्रतिकूलः "पारिशे- ष्यादुपमां प्रसाधयति। "तदेषा संसृष्टिस्त्रिधा निर्णीता। यहाँ दो सजातीय उत्प्रेक्षाओं की संसृष्टि है। उभय-संसृष्टि (शब्दा- लंकार तथा अर्थालंकार की संसृष्टि) का उदाहरण- जिस पर आनन्द से उल्लसित इन्द्र माला का अर्पण करता है, जो महिषासुर के सिर पर बलात् रखा जाता है तथा जो नूपुर की मधुर झंकार से युक्त है पार्वती का वह चरणकमल हमें विजय प्रदान करे ॥२६७॥ यहाँ उपमा तथा अनुप्रास की संसृष्टि है। नूपुर की झंकार का चरणकमल के साथ सम्बन्ध उपमा का यहाँ निर्णायक आधार है, क्योंकि यह (सम्बन्ध) रूपक के प्रतिकूल है अतः परिशेषरूप में उपमा का साधक बन जाता है। इस प्रकार संसृष्टि के तीन भेदों का निर्णय हो चुका। आनन्दमन्थरेति। मन्थरो मन्दक्रियः। हठेन बलेन। अत्रोपमावृत्त्य- नुप्रासयोरुभय।लङ्कारयोः संसृष्टिः। नन्वत्रोपमाव्यवस्था कुत इत्यत आह-पादा- म्बुजमितीति। पादाम्बुजमिवेत्युपमाया मञ्जीरशिञ्जितयोगो व्यवस्थापकः । पाद एवाम्बुजमिति रूपकपक्षे स प्रतिकूलः। अम्बुजे तदयोगात्। अतः शिञ्जितयोगोऽयं पारिशेष्यादुपमां प्रसाधयति। निगमयति-तदेवमिति। १. अत्रोपमोत्प्रेक्षयोर्विजातीययोः संसृष्टिः- नि०। अत्रोत्प्रेक्षयोः सजा- तीययोरुत्प्रेक्षोपमयोरविजातीययोश्च संसृष्टिः- अ० । २. वो-अ० । ३. अत्र-शा० नास्ति। ४. यां-अ० शा०। ४. परिशेषात्-शा० १। ६. प्रतिपादयतति-ना०। प्रसादयति-शा१। 9. तदेवमेषा-ना०। तदेवं सं°-नि०। तदेषा त्रिविधा संसृ- ष्टिर्नि०-अ०। 5 संजीविनी के अनुसार इस श्लोक में दो विजातीय (उपमा तथा उत्प्रेक्षा) की संसृष्टि है।
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३६० अलंकारसर्वस्वम् [ संकरोऽ- अधुना क्षीरनीरन्यायेन' संकर उच्यते- क्षीरनीरन्यायेन 3तु संकरः ॥सू० ८६।। मिश्रत्व४ इत्येव। *अनुत्कटभेदत्वमिश्रत्वं संकरः। तच्च मिश्रत्व- मङ्गाङ्गिभावेन, संशयेन, एकवाचकानुप्रवेशेन चत्रिधा भवत्संकर त्रिभेद- मुत्थापयति। क्रमेण® यथा- अङ्गुलीभिरिव केशसंचयं संनियम्य तिमिरं मरीचिभिः। कुड्मलीकृतसरोजलोचनं चुम्बतीव रजनीमुखं शशी॥२६८॥
अब क्षीरनीरन्याय से होने वाले संकर का निरूपण किया जा रहा है। क्षीर-नीर न्याय से तो संकर होता है ॥सू० ८६॥। 'संमिश्रण होने पर ही' (इस पद की प्रथम सूत्र से अनुवृत्ति है)। वह मिश्रण जिसमें भेद स्फुट नहीं होता है संकर (अलंकार) कहलाता है। यह मिश्रण अंगांगिभाव, संदेह तथा एकवाचकानुप्रवेश इन तीन रूपों का होने से तीन प्रकार के संकर को जन्म देता है। कमशः उदाहरण- चन्द्रमा अपनी किरणों से अन्धकार को पकड़कर मुकुलित कमलनयन वाले रजनीमुख को ऐसे चूम रहा है जैसे वह अंगुलियों से केशपाश को पकड़कर कमल के समान मुकुलित नयन वाले (रजनी-) मुख को चूम रहा हो ।२६८॥
तिलतण्डुलनीत्या संश्लेष: संसृष्टिरिष्यते। सा शब्दार्थोभयगतैरलङ्कारैस्त्रिधा मता॥ सङ्गरमुपक्षिपति-अधुनेत्यादि। "क्षीरनीरन्यायेन तु सङ्करः"। अधिकारमनुस्मारयति-मिश्रकमेवेति। चचितं सङ्करस्वरूपमनुस्मार- यति-अनुत्कटेति। तत्र त्रैविध्यायाह-तच्चेति। अङ्गाङ्गिभावात्, संश- यादेकवाचकानुप्रवेशाच्च त्रिधा सङ्करोत्थानम्। अङ्गुलीभिरिवेति। अत्राङ्गुलीभिरिवेत्युपमा। सरोजं लोचनमिवास्या १. न्यायाश्रयेण तु-अ० । २. संकरलक्षणमुच्यते-अ० । 3. तु-शा१ नास्ति। ४. मिश्रत्वमित्यव-शा१। ४. तत्रोत्कटभेदमनुत्कटभेदं च मिश्रत्वम्। तत्रोत्कटभेदा संसृष्टिरुक्ता। अनुत्कटभेदः संकरः। -अ०। अनुत्कटभेदमुत्कटभेदं च मिश्रत्वं संकर :- ना०। उत्कटभेद च-शा१। अनुत्कटभेदत्वमुत्कटभेदत्वं च संकरः ।-नि०। ६. त्रिभेदं संकरम्-ना० पाठक्रमः। ७. °णोदाहरणम्-अ० । = सन्निगृह्य-अ० शा १ ।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३६१ अत्राङ्गुलीभिरिवेत्युपमा१। सैव सरोजलोचनमित्यस्या उपमायाः प्रसाधिका। रजनीमुखमिति श्लेषमूलातिशयोक्तिः। प्रारम्भवदनाख्य- योर्मुख्ययोरभेदाध्यवसायात्2। अत एव₹ तयोरङ्गाङ्गिभावः। 'एवं च वाक्योक्तसमासोक्तिः। उपमाश्लेषानुगृहीता चातिशयोक्तिरुत्प्रेक्षाया 'चुम्बतीव' इति प्रकाशिताया अनुग्राहिका। तदूलेन तस्याः समुत्थानात्। सा च समुत्थापिता समुत्थापकानां चमत्कारितानिबन्धनमित्यस्त्यङ्गाङ्गि- भावः। यथा वा-
यहाँ 'जैसे अंगुलियों से' इस (अंश) में उपमा है। यही 'कमलनयन' में उपमा की साधक है। रजनी में श्लेषमूलक अतिशयोक्ति है क्योंकि (मुख शब्द से निकलने वाले) आरम्भ तथा वदन नामक दो मुख्य अर्थों का अभेदा- ध्यवसाय है। और इस प्रकार इन दो (उपमा तथा श्लिष्ट अतिशयोक्ति का परस्पर सम्बन्ध अंग तथा अंगी का है। तथा इसी प्रकार ('जैसे अंगुली से' इस) वाक्य में तथा (कमल-नयन) समास में आई हुई उपमाएँ तथा श्लेष से उपस्कृत अतिशयोक्ति, 'मानो चूम रहा है' इस (पद) से प्रकाशित उत्प्रेक्षा की साधक हैं क्योंकि इसका उदय उन्हीं (उपमा तथा अतिशयोक्ति अलंकारों) के सहारे होता है। इस (उत्प्रेक्षा) का उदय अनुग्राहक (अलंकारों) में सौन्दर्य का आधान करता है। इसप्रकार (इन अलंकारों में परस्पर) अंग तथा अंगी का सम्बन्ध है। अथवा जैसे (अंगांगिभाव-संकर का दूसरा उदाहरण)-
इत्युपमां साधयति। रूपकापोहनं साधने प्रकर्षः । मुखशब्देन प्रारम्भवदनयोर- भिधानाच्छलेषः। मुखयोरभेदाध्यवसायाच्छ्लेषमूलातिशयोक्तिः। अतोऽनयो- रड्गाङ्गिभावः। एवं च सति अङगुलीभिरिवेति या वाक्येनोक्ता या च सरोज- लोचनमिति समासेन ताभ्यामुपमाभ्यां श्लेषेण चानुग्रहीता मुखमित्यतिशयोवित- शचुम्बतीवेत्युत्प्रेक्षाया अनुग्राहिका। तेषां बलेन समुत्यानात् उत्थिता चोत्या- पकानां चमत्कारकत्वहेतुरित्य ङ्गाङ्गिता। १. इव ना० नास्ति। २. रभेदातिशयात् -नि०। मखयोर°-अ०। मुखयोर"-अ० । ३. एवानयोर° ना०। एव च - अ० । ४. एवं च ...... मित्यस्त्यङ्गाङ्गिभावः-इयानंशो शा१ पुस्तके न दृश्यते। ५. समासोक्ते उपमे श्लेषा°-अ०, ना० (?)। ६• सापि-अ० ।
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३६२ अलंका रसर्वस्वम् [ संकरो-
त्रयीमयोऽपि प्रथितो जगत्सु यद्वारुणीं प्रत्यगमद्विवस्वान्। मन्येऽस्तशैलात्पतितोऽत एव विवेश शुद्ध्यै वडवाग्निमध्यम् ।२६९।। अत्र प्रथमार्धे विरोधोत्पत्तिहेतुः श्लैषः। दर्शनान्तरे तु विरोधश्लेषौ द्वावलंकारौ। तदनुगृहीता१ द्वितीयेऽर्धे मन्येपदप्रकाशितोत्प्रेक्षा२। अत- श्राङ्गाङ्गिभाव:३। तथा ह्यत्र यत्कारणमुत्प्रेक्ष्यते, तत्र विरोधश्लेषानु- प्रवेशः। यच्चात्र कार्यमुत्प्रेक्षानिमित्तं, तत्र पतितत्वाग्निप्रवेशौ वस्तुस्थित्या अन्यथा स्थितावपि अन्यथाभूताभ्यां ताभ्यामभेदेनाध्यवसितौ ज्ञेयौ। (तीनों) लोकों में श्रुतिरूा प्रसिद्ध होने पर भी सूर्य वारुणी (पश्चिम दिशा तथा मदिरा) के पास चला गया था, मुझे लगता है कि यही कारण है कि अस्ताचल से पतित (गिरकर तथा अपवित्र) होकर वह (अपनी शुद्धि करने के लिए) बडवाग्नि में प्रवेश कर रहा था ।२६९॥ इस (श्लोक) के प्रथमाध में श्लेष विरोध का उत्पादक हेतु है। किन्तु दूसरे सिद्धान्त के अनुसार (यहाँ) विरोध तथा श्लेष दो (स्वतन्त्र) अलंकार हैं। (श्लोक के) द्वितीयार्ध में इस (श्लेषमूलक विरोधालकार) से उपस्कृत 'मैं समझता हूँ' इस (पद) से प्रकाशित उत्प्रेक्षा है और इस प्रकार (इन श्लेष तथा उत्प्रेक्षा अलंकारों में परस्पर) अंगांगिभाव है क्योंकि यहाँ (वारुणीगमन- रूप) जिस कारण की (मैं समझता हूँ पतित हो गया है, इसरूप मं हेतुरूप) उत्प्रेक्षा की गई हैं उनमें विरोध तथा श्लेष की स्थिति है और यहाँ (पतन तथा अग्निप्रवेशरूप) जो कार्य (अपने को शुद्ध करने के लिए प्रवेश कर रहा था' इस रूप में फलरूप) उत्प्रेक्षा का निमित्त है उस (कार्य) का वस्तुदृष्टि से भिन्न स्वरूप वाले पतन तथा अग्निप्रवेश के साथ अभेदाध्यवसाय है। इस अतोऽङ्गाङ्गिभावे मिथोऽप्युपकारप्रथनायोदाहरणान्तरम्-त्रयीमयोऽपीति। वारुणी पश्चिमा दिक् सुरा च। पतनमवतरणमुपहतिश्च। व्याचष्टे-अत्र प्रथम इत्यादिना। अत्र वारुणीति श्लेषस्त्रयीमयोऽप्यगमदिति विरोध- प्रतिभोत्थापकस्तद्वाधकरच। इ्लेषस्य निरवकाशत्वानङ्गीकारिणां मते द्वावपि। तदनुग्राहाच्च मन्ये पतित इति शुद्धि प्रति हेतूत्प्रेक्षा। शुद्धयै विवेशेति फलोत्प्रेक्षा। अतोऽङ्गाङ्गिभावः । एतद्विशिष्योपपादयति-तथा हीत्यादि।
१. च- अ० पुस्तकेऽधिकः । २. शिता द्वितय्युत्प्रेक्षा-अ० ॥ ३. अतर्चात्राङ्गा-अ०। अतश्चाङ्गिभावः-शा१।
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लंकार:] संजीविनी-सहितम् ३६३
तेनात्राङ्गाङ्गिभावसंकरः१। न च विरोधोत्पत्तिहेतौ श्लेषे श्लेषस्य विरोधेन सहाङ्गाङ्गिभावः' संकरः, उत्प्रेक्षाया वा निमित्तगतातिशयोक्त्या सहायं१ संकरः, ताभ्यां विना तयोरनुत्थानात्। अतश्च निरवकाशत्वाद्वाधक- त्वम्। न च मन्तव्यं विरोधमन्तरेणापि श्लेषो दृश्यत इति श्लेषस्य सावकाशत्वमिति। यतो न ब्र मो विरोधमन्तरेणापि१ श्लेषो न भवतीति। किं तर्ह्यलंकारान्तरविविक्ता विषयः श्लेषस्य नास्तीति निरवकाशत्वा-
प्रकार यहाँ (हेतूत्प्रेक्षा तथा फलोत्प्रेक्षा के साथ श्लेष का परस्पर) अंगांगिभाव संकर है। (इस उदाहरण में) श्लेष के विरोध (अलकार) का उत्पादक होने से उसका विरोध के साथ अंगांगिभाव संकर अथवा उत्प्रेक्षा के निमित्तरूप में विद्यमान अतिशयोक्ति के साथ संकर नहीं मानना चाहिए क्योंकि उन (विरोघ और अतिशयोक्ति) के विना इस (श्लेष तथा उत्प्रेक्षा) का उदय ही नहीं हो सकता है। अतः निरवकाश होने से (श्लेष और उत्प्रेक्षालंकार) बाधक ही होंगे। इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि विरोध (अलंकार) के न रहने पर भी श्लेष होता है, अतः श्लेष सावकाश है। क्योंकि यह तो हम भी नहीं कहते हैं कि विरोध (अलंकार) न हो तो श्लेष होता ही नहीं है। अपितु (हमारा तो यही कहना है कि) श्लेष के लिए दूसरे अलंकारों से विविक्त
वारुणोगमनं पातादिकारणमुत्प्रेक्षितं तत्र विरोधश्लेषावनुप्रविष्टौ। यच्च कारणोत्प्रेक्षानिमित्तं पातादिकार्य तत्र पाताग्निप्रवेशावुपहतिहेतुकपाताग्निप्रवेशा- भ्यामभेदेनाध्यवसितौ, तेन श्लेषेण सह हेतुफलोत्प्रेक्षयोरङ्गाङ्गिता। ननु विरोधश्लेषयोरतिशयोक्त्युत्प्रेक्षयोश्च कुतो नाङ्गाङ्गिभाव इत्यत आह-न च विरोधेत्यादि। यद्यपि श्लेषो विरोधप्रतिभोत्पतिहेतुर्यद्यपि चातिशयोक्ति- रुत्प्रेक्षानिमितं तथापि नानयो: इनेषोत्प्रेक्षाभ्यां सहाङ्गाङ्गिभावस्तत्र हेतु :- ताभ्यां विनेति। विरोधातिशयोक्तीभ्यां विना श्लेषोत्प्रेक्षयोरनुत्थानात्। अतो निरवकाशयोः श्लेषोत्प्रेक्षयोर्बधिकत्वमेव। नन्वभेदाध्यवसायमन्तरेणानुत्था- नादुत्प्रेक्षाया मा भूदतिशयोक्तिविविक्तो विषयः श्लेषस्य तु विविक्तोऽस्त्ये- वेत्यत आह -न च मन्तव्यमित्यादि। १. ङ्ङ्गिसंकर :- शा० ना० शा१। भावः संकरः-नि० । 2. सहा्गाङ्गिसंकरः अ० । 3. अपि-ना० शा१ नास्ति। ४. न श्लेषस्य विषयोऽस्तीति-अ० शा० ना० क्रमः ।
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३६४ अलंकारसर्वस्वम् [संकरो- त्तेषां बाधः । तन्मध्ये च विरोधोऽनुप्रविष्ट इति सोऽपि तेन बाध्यत इति न कश्चिद्दोषः। (असंकीर्ण) विषय नहीं हैं (अर्थात् श्लेष जब भी होता है तब दूसरे अलंकार भी हैं) अतः निरवकाश होने के कारण (श्लेष द्वारा) दूसरे अलंकारों का बाध हो जाता है। और चूँकि विरोध भी उन्हीं (दूसरे अलंकारों) में से एक है अतः यह भी उस (श्लेष) के द्वारा बाधित होता है। इस प्रकार (विरोध के बाधित होने में) कोई दोष नहीं है।१ अलङ्गारान्तरविविक्तश्लेषविषयो नास्तीति इ्लेषविवेचने वितत्योक्तम् । १. उपर्युक्त श्लोक (त्रयीमयोऽपि) में रुय्यक के अनुसार हेतु एवं फल की उत्प्रेक्षा है तथा उसका श्लेष के साथ अंगागिभाव संकर है। 'मन्ये पतितः' अंश हेतूत्प्रेक्षा का है, और 'शुद्धयै विवेश' फलोत्प्रेक्षा का अंश है। हेतु-फलोत्प्रेक्षा में वाक्यार्थ का चमत्कार होने के कारण यह अलंकार अंगी है। और 'वारुणीं प्रत्यगमत्' से उपस्थित श्लेष अंग है। उदाहरण के प्रथमार्थ में श्लेष के साथ ही ('त्रयीमयोऽपि '.वारुणीं प्रत्यगमत्' में) विरोधालंकार भी है पर यहां श्लेष और विरोध का अंगांगिभाव संकर नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि श्लेष तो जहाँ कहीं भी होगा वहाँ कोई दूसरा अलंकार अवश्य होगा। अलंकारान्तर से असम्पृक्त श्लेष का मिलना सम्भव नहीं है अतः श्लेष को दूसरे अलंकार का बाधक मानना चाहिए। उदाहरण के द्वितीयार्ध में वास्तविक 'पतन' और 'अग्नि- प्रवेश' एवं सूर्य के 'पतन' और 'अग्निप्रवेश' को अभिन्न माना गया है। यह अभेदाध्यव्यवसाय अतिशयोक्ति अलंकार कहलाता है। इस अभेदा- ध्यवसाय के मूल में भी श्लेष है। पतन तथा अग्निप्रवेश दोनों के ही दो अर्थ हैं। उदाहरण के लिए 'पतन' का एक अर्थ है -- पापी पुरुष का मर्यादा के मार्ग से च्युत होना। तथा सूर्य की दृष्टि से दूसरा अर्थ है- 'ढल जाना' या 'अस्तोन्मुख हो जाना'। जिस प्रकार प्रथमार्ध में श्लेष के विरोधालंकार का बाधक होने से श्लेष और विरोध का अंगांगिभाव संकर नहीं माना गया था उसी प्रकार यहाँ भी श्लेष के बाधक होने के कारण अतिशयोक्ति और उत्प्रेक्षा का अंगांगिभाव संकर न मानकर (अतिशयोक्ति के बाधक) श्लेषालंकार और उत्प्रेक्षा में ही अंग और अंगी का सम्बन्ध माना जाएगा।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३६५
१एवमर्थालंकारसंकर उदाहृतः । शब्दालंकारसंकरस्तु कैश्रिदुदाहृतो यथा- राजति तटीयमभिहतदानवरासातिपातिसारावनदा। गजता च यूथमविरतदानवरा३ सातिपाति सारा वनदा॥२७०। अत्र यमकानुलोमप्रतिलोमयोः शब्दालंकारयोः परस्परापेक्षत्वेना- ङ्राङ्गिसंकर इति। एतत्तु न सम्यगावर्जकम्। शब्दालंकारयोश्च" शब्द- इस प्रकार अर्थालंकारों के संकर का उदाहरण समाप्त हुआ। शब्दालंकारों के संकर का किसी आचार्य (मम्मट) ने उदाहरण दिया है जैसे कि- यही वह पर्वत को प्रान्तभूमि (तटी) है जिसमें दानवों का रास-करीड़ा अथवा सिंहनाद-समाप्त हो गया है (अभिहतदानवरासा), जिसमें कलकल करता हुआ नद वेग से बहा करता है, जिसमें निरन्तर प्रवाहित होने वाले मदजल से शोभित (अविरतदानवरा), बलशालिनी (सारा) तथा बनों का विनाश करने वाली (वनदा) हाथियों की टोली (गजता) अपने झुण्ड की पूरी रक्षा करती रहती है (यूथमतिपाति) ॥।२७०॥ इसमें ('दानवरासातिपातिसारावनदा' इस पाद की चतुर्थ पाद में आवृत्ति होने से) यमक तथा (इन्हीं पादों को आदि या अन्त से उलटे-सीधे दोनों तरह पढ़ने पर वही पाठ बन जाता है इसलिए) अनुलोम-प्रतिलोम (रूप चित्रा- लंकार) इन दो शब्दालंकारों का परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा होने से अंगांगि- संकर है। पर यह (उदाहरण तथा मत) उचित नहीं लगता है। दो
अतः श्लेषेणास्य बाध इति तन्मध्यानुप्रविष्टो विरोधोऽपि बाध्य एव। अर्थालङ्गार- सङ्करं निगमयति एवमर्थेति। शब्दालङ्कारेति। कैश्चिदित्यवधीरणा। राजतीति। दानवानां रास आक्रोशः। तदतिपातिनः सारावनादा यत्र सेयमद्रेस्तटी राजति। गजता गजसमूहः। सा च यूथमतिपाति-अतितरां रक्षति। कीदृशी? अविरतेन दानेन वरा उत्कृष्टा। सा प्रसिद्धा। सारा बलवती वनदा वनस्य खण्डयित्री। योजनायाह-अत्र यमकेत्यादि। पादावृत्तिलक्षणं यमकम्। आदितोऽन्ततश्च पाठे सन्दभक्यादनुलोमप्रतिलोमता
१. अत एवा०-अ०। एव चार्था-शा१। २. उक्तः- नि० शा१। 3. °रति°-शा१। ४. ङङिभावसंकर-अ० । ५. योश्चात्र-शा१। च अ० नि० नास्ति।
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३६६ अलंकारसर्वस्वम् [ संकरो-
वदुपकार्योपकारकत्वाभावेनाङ्गाङ्गिभावाभावात्'। शब्दालंकारसंसृष्टि स्त्वत्र श्रेयसी। यथोदाहृतं पूर्वम्2। यद्वा अत्र शब्दालंकारद्वयमेकवाच- कानुप्रविष्टमिति तृतीयः संकरो ज्ञेयः । एवमेकः प्रकारश्चर्चितः३। द्वितीयः प्रकारस्तु संदेहसंकराख्यः। 'यत्रान्यतरपरिग्रहे साधकं प्रमाणं नास्ति बाधकं वा प्रमाणं न विद्यते तत्र न्यायप्राप्तः संशय इति संदेहसंकरस्तत्र विज्ञेयः । यथा -
शब्दालंकारों में (दो) शब्दों की भांति (आपस में) उपस्कारक और उपस्कार्य का सम्बन्ध न होने से अंग और अंगी का सम्बन्ध नहीं हो सकता है। इस (उदाहरण) में शब्दालंकारों की संसृप्टि मानना अधिक उचित है। जैसा कि उदाहरण (श्लोक २६३ में) पहिले दिया जा चुका है। अथवा यहाँ दो शब्दालंकारों के एक वाचक (पद) में प्रविष्ट होने के कारण एकवाचका- नुप्रवेश (नामक) तीसरा संकर (संकर का तीसरा भेद) माना जा सकता है। इस प्रकार प्रथम भेद (अंगांगिभाव संकर) की चर्चा समाप्त हुई। सन्देह- संकर नाम से (संकरालंकार का) दूसरा भेद है। जहाँ दो में से एक को स्वीकार करने का साधक प्रमाण न हो और न बाधक प्रमाण उपस्थित हो वहाँ न्यायतः संशय होता है। इसलिये ऐसे स्थलों में सन्देह-संकर समझना चाहिए। जैसे-
च। तदेतदुभयं सापेक्षमिति शब्दालङ्गारसङ्करः। तदेतद् दूषयति एतत् त्विति। अनावर्जकत्वे हेतुमाह-शब्दालङ्कारयोरिति। यथा हि शब्दयो- मिथो नोपकारस्तथा शब्दालङ्कारयोरपि। कस्तह ईदृशि विषये प्रकार इत्यत आह-शब्दालङ्कारेति। मिथोऽनुपकारान्नैरपेक्ष्यम्। अतः संसृष्टिः श्रेयसी। सङ्करत्वे चैकवाचकानुप्रवेशः स्यादित्याह-यद्वति। अतः शब्दा- लङ्गारपरिहारेणाङ्गाङ्गिभाव इति निर्णयति-एवमेष इति। सन्देहसङ्गरं विवेचयति-द्वितीय इति। सन्देहं दर्शयति-यत्रोभयोरित्यादि।
१. ०झङ्गभावात् शा१। २. प्राक-अ० शा१। ३. दशित :- नि० । ४. यत्रोभयोरेकतरस्य-अ० । ५. प्रमाणं न विद्यते-अ० नास्ति। ६. संकराख्यालंकार :- अ० ।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३६७
यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते ॥।२७१।। अत्र विभावनाविशेषोक्त्योः संदेहसंकरः२। तथा ह्युत्कण्ठाकरणाभावे उत्कण्ठाया उत्पत्तौ विभावना। स च कारणाभावो 'यः कौमारहरः' इत्यादिना कारणविरुद्मुखेन प्रतिपादितः। तथा च१ 'यः कौमारहरः' इत्याद्यनुत्कण्ठाकारणसद्गावेऽपि अनुत्कण्ठाया अनुत्पत्तौ विशेषोक्ति:। सा चानुत्पत्तिः 'समुत्कण्ठते' इति विरोधोत्पत्तिमुखेनोक्ता। अत एव जिसने (मेरे) कुमारीपन का हरण किया था वही पति है, वे ही चैत की रातें हैं, खिली हुई चमेली की तरह सुगंधित और संपुष्ट कदम्ब की उन्मादक हवाएँ भी वे ही हैं, और मैं भी वहीं हूँ पर फिर भी (न जाने क्यों आज) उसी रेवा नदी के तट पर वेतसी-तरु के नीचे काम की लीलाओं के लिए मन उत्कण्ठित हो उठा है ॥२७१॥ यहाँ विभावना तथा विशेषोक्ति का संदेह-संकर है। उदाहरण के लिए (यहाँ) उत्कण्ठा का कारण न रहने पर भी उत्कण्ठा की उत्पत्ति हुई है अतः विभावना है। कारण के इस अभाव का प्रतिपादन, 'जिसने कुमारीपन का हरण किया था' इत्यादि के द्वारा कारण का विरोध करते हुए हुआ है। साथ ही 'जिसने कुमारीपन का हरण किया था' इत्यादि से (व्यक्त) अनुत्कण्ठा का कारण रहने पर भी अनुत्कण्ठा की उत्पत्ति न होने से विशेषोक्ति भी है। और (अनुत्कण्ठा की) इस अनुत्पत्ति का अभिधान, 'उत्कण्ठित हो रहा है' इस (पद) से विरोधी कार्य की उत्पत्ति द्वारा किया गया है। अतएव दूसरी दृष्टि से
यः कौमारहरेति। प्रथमसम्भोगेन कौमारं हृतवान्। मालतीवत् सुरभयो मालतीसुरभयः। कदम्ब इह वसन्तभूः। व्याख्यातं प्राक्। योजयति-अत्र विभावनेत्यादि। अन्यत्र काव्यप्रकाशादौ। इत्थमुपमा-
१. चौरसुरत°-शा० ना०। चौर्यसुरत°-शा१। २. सन्देह° -- अ० नास्ति। ३. च-अ० ना० नास्ति। ४. इत्यादावनु°-अ० ।
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३६८ अलंकारसर्वस्वम् [संकरो-
द्वयोरप्यस्फुटत्वमन्यत्रोक्तम्२। न चानयोः प्रत्येकं साधकबाधकप्रमाण- योग इति संदेहसंकरोडयम्। यथा वा- यद्वक्त्रचन्द्रे नवयौवनेन शमश्रुच्छलेनोल्लिखितश्चकास्ति3। उद्दामरामादृढमानमुद्राविद्रावणो मन्त्र इव स्मरस्य ।।२७२।। अत्र वक्त्रं चन्द्र इवेति किमुपमा, उत वक्त्रमेव चन्द्र इति रूपक- मिति संशयः। "उभयथापि समासस्य भावात्। 'उपमितं व्याघ्रादिभिः' इति 'ह्युपमासमासः, व्याघ्रादीनामाकृतिगणत्वात्। मयूरव्यंसकादित्वाद्" दोनों अलंकारों का स्फुट न होना अन्यत्र (काव्यप्रकाश में) बताया गया है। इन दोनों (अलंकारों) में से किसी के लिए भी साधक या बाधक प्रमाण उपस्थित नहीं हैं। अतः (इस उदाहरण में) यह (उपर्युक्त) सन्देहसंकर (अलकार) है। अथवा जैसे- जिसके मुखचन्द्र पर डाढ़ो-मूछ के बहाने नवीन यौवन द्वारा लिखा हुआ, उद्दाम युवती की प्रगाढ़ मान-मुद्रा को नष्ट करने वाला, कामदेव का मन्त्र-सा शोभित हो रहा है ॥२७२। यहाँ 'चन्द्र के समान मुख' इस रूप में उपमा है ? अथवा 'मुख ही चन्द्र है' इस रूप में रूपक है यह संशय होता है क्योंकि समास दोनों ही तरह से (वक्त्रं चन्द्र इव, तथा वक्त्रमेव चन्द्रः) होता है। 'उपमितं व्याघ्रादिभिः (सामान्याप्रयोगे २।१।५६ इस सूत्र) से (मुखचन्द्र में) उपमासमास होता है क्योंकि व्याघ्र आदि (शब्द) आकृतिगण हैं-। (मुखमेव चन्द्रः में) मयूर-
रूपकयो: सन्देहं दर्शयितुमाह-यथा चेति। यद्वक्त्रचन्द्र इति। रमश्रुच्छ- लान्नवयौवनोल्लिखितो मन्त्रश्चकास्तीव । योजयति-अत्र वक्त्रेत्यादि। संशयस्य हेतुमाह-समासस्योभयथापीति। व्याघ्रादीनामाकृतिगणत्वाद् विशिष्टगुणानां चन्द्रादीनामप्युपसंग्रह इति : मुखं चन्द्र इवेत्युपमासमासः। १. अपि-अ० नास्ति। २. अन्यत्र ज्ञेयम्-ना०। अत्रो (?) क्तम्-शा१। ३. छलादु° - नि० । ४. इति किं-शा० । ५. समासस्योभयथापि भावात् - अ० शा० ना० कमः । ६. हि - नि० नास्ति। ७. ०त्वात्तु°-शा०। - जब उपमित (उपमेय) और उपमान साथ-साथ आएँ, उपमा का शब्द उत्तर (द्वितीय) हो, साधारण धर्म का निर्देश न हो तो पुरुषव्याघ्र की तरह समास उपमा-समास या उपमित समास कहलाता है। जहाँ
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३६९
रूपकसमासः, मयूरव्यंसकादीनामाकृतिगणत्वात्। नात्र१ क्वचित्साधक- बाधकप्रमाणसद्भाव इति संदेहसंकर:। यत्र तु कस्यचित्परिग्रहे साधकं बाधकं वा प्रमाणं विद्यते, तत्र नियतपरिग्रहः२। तत्रानुकूल्यं साधकत्वम्,१ प्रातिकूल्यं४ बाधकत्वम्। तत्र साधकत्वं यथा- प्रसरद्विन्दुनादाय शुद्धामृतमयात्मने। नमोSनन्तप्रकाशाय शंकरक्षीरसिन्धवे ।।२७३।। व्यंसकादि होने से रूपकसमास होता है क्योंकि मयूरव्यंसक आदि (शब्द) आकृतिगण हैं। ऐसे स्थलों में (अत्र) किसी के पक्ष में (क्वचित्) साधक या बाधक प्रमाण न होने से सन्देहसंकर होता है। किन्तु जहाँ किसी एक को स्वीकार करने का साधक या बाधक प्रमाण वर्तमान हो वहाँ (प्रमाण से) निश्चित का (ही) ग्रहण होता है। साधक होने का अर्थ है अनुकूलता और बाधक होना प्रतिकूलता है। इनमें से साधक का उदाहरण है- बिन्दु एवं नाद का प्रसार करने वाले, शुद्ध अमृतस्वरूप, अनन्त प्रकाश, शंकर-क्षीरसागर को नमस्कार है ॥२७३॥ यहाँ अमृत (शब्द) 'शंकर ही क्षीरसिन्धु है' इस रूपक का साधक है अपिहितलक्षणस्तत्पुरुषो मयूरव्यंसकादिषु द्रष्टव्य इति नीत्या मयूरव्यंसकादी- नामाकृतिगणत्वान्मुखमेव चन्द्र इति रूपकसमासश्च। साधकबाधकप्रमाणविरहा- दनयो: सन्देहः। साधकबाधकान्यतरसन्ड्ावे तु नियतपरिग्रह इत्याह-यत्र त्विति। साधकबाधकस्वरूपं विवेचयति-तत्रानुकूलत्वमिति। प्रसरद्बिन्दिति। बिन्दुः शुद्धाध्वोपादानं महामायानादोऽनाहतस्तौ प्रसरतो यस्मात् सिसृक्षोस्तस्म। शुद्धं मम तन्निकृष्टं चेत्यन्यम्(?)। तन्मयात्मने। अनन्तो दिक्कालाद्यनवच्छिन्नः प्रकाशो यश्च तस्मै। अन्यदा तु बिन्दवः शीकराः। नादो लहरीघोषः। अमृतं सुधा। अनन्तः शेषो मथनादौ शेषीभूतस्तेन प्रकाश: प्रथितः । इह शङ्कर एव क्षीरसिन्धुरिति रूपके साधकं दर्शयति-अत्र मयूरव्यंसक की भाँति मुखचन्द्र का समास होता है वहाँ ऐसे रूपक- समास को मयूरव्यंसकादि समास कहा जाता है। १. न चात्र-नि० । २. नियमपरि° - ना०। ३. साधकम्-नि०। ४. बाधकम्-नि०। ४. प्रातिकूल्यं बाधकत्वम्-शा१ न दृश्यते।
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३७० अलंकारसर्वस्वम् [ संकरो-
अत्र शंकर एव क्षीरसिन्धुरिति रूपकस्यामृतमयत्वं साधकम्। तस्य शंकरापेक्षया क्षीरसिन्धावनुकूलत्वात्। उपमायास्तु न बाधकम्। संकरेऽप्युपचरितस्य तस्य संभवात्। यथा वा- एतान्यवन्तीश्वरपारिजातजातानि तारापतिपाण्डुराणि। संप्रत्यहं" पश्यत दिग्वधूनां यशःप्रसूनान्यवतंसयामि ।।२७४।। अत्रावतंसनं प्रसूनेष्वनुगुणमिति रूपकपरिग्रहे साधकं प्रमाणम्। बाधकत्वं यथा- शरदीव प्रसर्पन्त्यां तस्य कोदण्डटंकृतौ। विनिद्रजुम्भितहरिर्विन्ध्योदधिरजायत ।।२७।। क्योंकि शंकर की अपेक्षा वह क्षीर-सिन्धु से (अधिक) अनुकूल है, किन्तु उपमा के प्रतिकूल भी नहीं है क्योंकि उपचरित अर्थ में (अमृत शब्द) शंकर के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है। अथवा जैसे१- उज्जयिनीश्वररूप हरसिंगार से उत्पन्न, चन्द्रमा द्वारा पाण्डुर इन कीर्ति- कुसुमों को अभी मैं दिशा-वधुओं का आभूषण बनाने जा रहा हूँ ॥२७४॥ यहाँ आभूषण का विधान कुसुमों के अनुकूल है। अतः (कीर्तिकुसुम पद में) रूपक मानने का साधक प्रमाण है। बाधक (प्रमाण) का उदाहरण- उसके धनुष की टंकार फैलने पर निद्रा से उठकर जँभाई लेते हुए 'हरि' (सिंह, विष्णु) से युक्त विन्ध्य-समुद्र शरत्काल का सा हो गया ॥२७५॥ शङ्कर एवेत्यादि। अमृतशब्दो हि सुधायां प्रचुरप्रसिद्धिकः। क्षीरसिन्धा- वनुकूलतर इति रूपक एव समासोडयम्। अमृतमयत्वं च नोपमां प्रति बाधकमित्याह-उपमायास्त्विति। न बाधकमिति किन्तु तटस्थमिति भावः । तत्र हेतु :- शङ्करेऽप्युपचरितस्येति। शङ्करत्वेनोपचरितस्य हि सिन्धो रूपकसमाससिद्धिः। अत उपमोत्थापिते रूपके विश्रान्तिरिति यावत्। उदाहरणान्तरेणापि न्यायमिमं दरढयितुमाह-यथा वेति। एतान्यवन्तीति। अवन्तीश्वररूपात् पारिजाताज्जातानि यशोरूपाणि प्रसूनानि दिगरूपाणां वधूनामवतंसयामि पश्यत। अत्राप्युपमाबाधवैमुख्येन रूपकसाधकं दर्शयति १. रूपकस्य साधकं शुद्धामृतमयत्वम्-अ०। रूपकस्योभयत्वम्-शा०, शा १ (?)। २. शङ्करापेक्षया तस्य-ना०। ३. शङ्करेऽपि तस्योपचरितस्य सम्भवात्-नि० पाठक्रमः । ४. ताराधिपपाण्डराणि-अ०। ५. त्यहो-ना०। ६. ग्रहेण-नि० । ७. बाधकम्-अ० नि० शा१।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३७१ अत्र विन्ध्य उदधिरिवेत्युपमापरिग्रहे विनिद्रजृम्भितहरिरिति साधारणं विशेषणं बाधकं प्रमाणम्। 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामा- न्याप्रयोगे' (२-१-५६) इति वचनादुपमासमासे प्रतिकूलत्वात्। अतश्च पारिशेष्याद्रूपकपरिग्रहः । न तु शरदीवेत्युपमात्रोपमासाधकत्वेन विज्ञेया। नहचौपम्येन कदाचिदर्थसिद्धिः। न हचेकेनालंकारेणोपक्रान्तेन यहाँ समुद्र के समान विन्ध्य इस उपमा को स्वीकार करने में 'निद्रा से उठकर जंभाई लेते हुए हरि से युक्त' यह साधारण विशेषण बाधक प्रमाण है क्योंकि वह 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे'-साधारण धर्म का निर्देश न होने पर व्याघ्र आदि के साथ उपमित होना-इस वचन के अनुसार उपमा-समास का बाधक होता है। अतः परिशेषरूप में (उपमाहो नहीं सकती है रूपक ही वचता है अतः अगत्या) रूपक ही मानना पड़ेगा। 'शरत्काल का सा' यह उपमा (विन्ध्य-समुद्र में) उपमा की साधक नहीं मानी जा सकती है। उपमा से ही अर्थ की सिद्धि सर्वदा नहीं होती है। न यह १ पहले उदाहरण में अमृतत्व साधक है पर साथ ही बाधक भी नहीं है अतः दूसरा उदाहरण दिया जा रहा है। राजाज्ञा है कि जिस किसी एक अलंकार से प्रारम्भ हो उसी में अन्त भी हो। अत्रावतंसनमिति। बाधकार्थमुदाहरति-शरदीवेति। हरिः सिंहो विष्णुश्च । उपमाबाधकं दर्शयितुमाह-अत्र विन्ध्य इत्यादि। विनिद्रजृम्भितहरित्वं हि साधारणमुपमासमासं बाधते। "उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोग' इति वचनात्। ननु रूपकसिद्धिः साधकाभावे कथमित्यत आह- अतश्च पारिशे- ष्यादिति। ननु शरदीवेति समभिव्याहृतेयमुपमा कथं नोपमासाधिकेत्यत आह ननु (?नतु) शरदीवेति। न्यायतो वाक्यार्थीभूतं रूपकमाभासत एकदेशविवर्तिन्युपमा नहि बाधितुमीष्टे। यावता स्वयमप्याभासीभवतीति भावः। [अत्रोपहासायाह -* न हि चाषेणेति। चाषाणां समहश्चाषमिति स्थितौ पञ्चाशच्छब्दे शषयोरभेदाश्रयेणाव्युत्पन्नप्रतीता येयं चाषश्रुतिर्न खलु तन्निबन्धना पञ्चाशद्रूपसमूहसिद्धिः । ] नन्वितरथालङ्गारप्रक्रमभेदः १. परिशेषात्-शा१। २. हि-अ० । ३. न हि चाशेषेण पश्चात् सिद्धिः, ना०। न हि चान ??? मत्(?) सिद्धिः शा१। 'न हि चाषेण पन्चाशतरूपसमूहसिद्धिः' संजीविनीपाठः प्रतिभाति। ४. ह्यौपम्याल°-अ० नि०। * एतत्प्रतीकपर: पाठस्तु मूले नास्तीत्येष भागः कोष्ठके निवेशितः।
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३७२ अलंकारसर्वस्वम् [संकरो-
निर्वाहः कर्तव्य इति राजाज्ञैषा। नापि धर्मसूत्रकारवचनम्। नाप्येष न्यायः। उत्तरोत्तरसाम्यप्रकर्षविवक्षणे प्रक्रान्तोपमापरित्यागेन रूपक- निर्वाहस्योचित्तत्वात्2। विपर्ययस्तु दुष्ट एव। यथा-'येनेन्दुर्दहनोह विषं मलयजो हारः कुठारायते' 2इति। तस्मात्प्रकृते सामान्यप्रयोगे उपमा- परिग्रहे बाधक इति 'मयूरव्यंसकादेराकृतिगएत्वाद्रपकसमासाश्रयेण" और न किसी धमँसूत्रकार का ही वचन है। और न यह न्याय (उचित) ही है। जहाँ उत्तरोत्तर साम्य का प्रकर्ष बताना अभीप्सित हो वहाँ प्रारम्भ की हुई उपमा को छोड़कर रूपक का निर्वाह उचित होता है। हाँ व्यतिकरम अवश्य दोषपूर्ण होता है जैसे-"जिससे चन्द्रमा अग्नि, चन्दन विष और हार कुठार के समान बन जाता है"।2 इस (उदाहरण) में (कम का विपर्यय, रूपक से प्रारम्भकर उपमा में अन्त, दोषपूर्ण है)। अस्तु, प्रकृत (उदाहरण 'शरदीव' आदि) में साधारण (विशेषण) का प्रयोग होना उपमा को स्वीकार करने में बाधक है अतः मयुरव्यंसक आदि (शब्दों) के आकृतिगण का होने से रूपक- स्यादित्यत आह-न ह्येकेनेति। प्रक्रान्तेनैकेनैव निर्वहणीयमिति नैषा राजाज्ञा यल्लङ्गनेन दृष्टबाधः स्यात्। नाप्येतन्मन्वादिधर्मसूत्रकारवचनम्। यल्लङ्घनेनादृष्टबाधः स्यात्। ननु दृष्टादृष्टयोरद्वयोरपि बाधः स्याद्यतो न्यायोऽयमित्यत आह-नाप्येष इति। प्रकरान्तेन निर्वहणीयमिति न सार्वत्रिको न्यायः किन्तु विशेषाविवक्षायामेव। इह तूत्तरोत्तर प्रकर्षविवक्षेत्युपमापेक्षया रूपके साम्यप्रकर्षः। अतोऽवयवगतोपभापरित्यागेन वाक्यार्थीभूतरूपकपरिग्रह एवोचितः। विपर्ययस्तु साम्यनिकर्षाद दुष्ट एव। तदेतद् प्रत्युदाहरणेन द्रढयति-येनेन्दुरिति। अत्रेन्दुमलयजयो- र्दहनविषयत्वरूपणात् साम्यप्रकर्षः प्रकरान्तो हारः कुठारायत इति तूपमया निष्कर्ष नीतः। चर्चा निगमयति-तस्मात् प्रकृत इति। सामान्यप्रयोग उपमा- बाधक इति न्यायोपपन्नो रूपकप्रकम एव निर्वहणीय इति यावत्। न्यायोड- १. रूपके -- शा१। २. निर्वाेणोचितत्वात्-ना०। 3. दहनम्-नि० शा१। ४. मलयजम्-नि० ना० ५. इति-शा१ नास्ति। ६. मयूरव्यंसकेनाकृ०-शा १। ७. समाश्रयेण-नि० । ८· यह प्रत्युदाहरण इस विचार को स्पष्ट करने के लिए दिया गया है कि साम्य का प्रकर्ष अभीप्सित होने पर उपमा से प्रारम्भ और रूपक में
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लं कार: ] संजीविनी-सहितम् २७३
रूपकमेव बोद्धव्यम्। एवं 'भाष्याब्धिः क्वातिगम्भीरः' इत्यादौ द्रष्टव्यम्। साधकबाधकाभावे१ तु संदेहसंकरः। यथोदाहृतम्२। तृतीयस्तु प्रकार एकवाचकानुप्रवेशलक्षणः। यत्रैकस्मिन्वाचकेऽने- कालंकारानुप्रवेशः, न च3 संदेहः'। यथा- मुरारिनिर्गता नूनं नरकप्रतिपन्थिनी। 6तवापि मूर्ध्नि गङ्गेव चक्रधारा पतिष्यति ॥२७६।।
समास के आधार पर रूपक ही मानना चाहिए। इसी प्रकार "कहाँ अत्यन्त गम्भीर भाष्य-समुद्र" इत्यादि (उदाहरणों) में (रूपक) समझ लेना चाहिए। पर जहाँ साधक या बाधक प्रमाण न हो वहां सन्देहसंकर ही होगा जिसका उदाहरण दिया जा चुका है। (संकरालंकार के) तीसरे भेद का स्वरूप एक वाचकानुप्रवेश का है। जहाँ एक वाचक (शब्द) में अनेक अलंकार अनुप्रविष्ट हों और सन्देह न हो (वही एकवाचकानुप्रवेश कहलाता है)। जैसे- (मुर नामक असुर का विनाश करने वाले) विष्णु से निकली हुई, नरक (नरकासुर तथा नरक) को नष्ट करने वाली, गंगा की भाँति चक्रधारा तुम्हारे सिर पर भी गिरेगी ॥२७६॥
यमन्यत्रापि ज्ञेय इत्याह-भाष्यान्धिरिति। गाम्भीर्यसाधारण्यादुपमाबाधे रूपकमेव द्रष्टव्यम्। साधकबाधकाभावे तु सन्देह इत्युक्तमनुस्मारयति- साधकबाधकेति। इत्थमङ्गाङ्गिभावसन्देहरूपं प्रकारद्वयं विवेच्य तृतीयं प्रकारं विवेचयति-तृतीयस्त्विति। तं विशदयति-यत्रैकस्मिन्निति। मुरारिनिर्गतति। नरकोऽसुरो निरयश्च। गङ्गवेति सद्गतिप्राप्ति- अन्त सर्वथा उचित क्रम है, ऐसा न करना दोष है जैसे कि उपर्युक्त उदाहरण में चन्द्रमा तथा चन्दन का क्रमशः अग्नि और विष के साथ रूपण है पर अन्त में 'हार कुठार के समान बन जाता है' यहाँ उपमा का प्रयोग है; यह अनुचित है क्योंकि यह साम्य का प्रकर्ष न होकर निकर्ष है। १. बाधकप्रमाणाभावे-ना०। २. हृतः-शा१। ३. च-शा१ नास्ति। ४. सन्देहो नाप्यङ्गाङ्गिभावः-अ० । ५. प्रतिबन्धिनी-अ०। प्रतिपत्ति(?)नी -- शा० । ६. तथापि-शा१ ।
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३७४ अलंकारसर्वस्वम् [संकरो-
अत्र मुरारिनिर्गतति साधारणविशेषणहेतुका उपमा, नरकप्रतिप- न्थिनीति श्लिष्टविशेषणसमुत्थापितोपमाप्रतिभोत्पत्तिहेतुः' श्लेषश्चैकस्मि- २न्नेव शब्देऽनुप्रविष्टौर, तस्योभयोपकारित्वात्। अत्र च यथार्थश्लेषेण सहोपमायाः संकरस्तथा शब्दश्लेषेणापि सह दृश्यते। यथा- "सत्पुष्कर द्योतितरङ्गशोभिन्यमन्दमारब्धमृदङ्गवाद्ये। उद्यानवापीपयसीव यस्मामेणीदृशो नाट्यगृहे रमन्ते।।२७७।।
यहाँ 'विष्णु से निकली हुई' इस (गंगा तथा चक्रधारा के) साधारण विशेषण के कारण होने वाली उपमा तथा नरकप्रतिपन्थिनी (नरकासुर तथा नरक को नष्ट करने वाली) इस श्लिष्ट विशेषण से उत्थापित श्लेष (अलंकार), जो उपमा की प्रतीति का भी उत्पादक हेतु है, एक ही शब्द में अनुप्रविष्ट हैं। यह शब्द दोनों ही (अलंकारों) का उपकार कर रहा है। यहाँ जिस प्रकार अर्थश्लेष के साथ उपमा का संकर है उसी प्रकार शब्दश्लेष के साथ भी दिखाई देता है। जैसे- जहाँ सुन्दर मृदंग से शोभित, नाटय से अलंकृत एवं सुन्दर कमलों से शोभायमान लहरियों से सुशोभित, मृदंग की अमन्द ध्वनि से एवं मृदंग की भाँति जलास्फालन की ध्वनि से पूर्ण उद्यान-वापी के जल की भाँति नाट्यगृह में स्त्रियाँ रमण करती हैं ।२७७॥ यहाँ जल के समान नाट्यगृह में रमण करती है इतने से ही समुचित
हेतुता। योजयति-अत्र मुरारीति। गङ्गवेत्युपमा मुरारिनिर्गतेत्यर्थभदा- भावात् साधारणेन विशेषणेन समुत्थापिता। नरकेति श्लिष्टविशेषणोत्थोऽर्थ- इलेषश्चोपमाप्रतिपत्तिहेतुरेकत्रैव नरकशब्देऽनुप्रविष्टौ श्लिष्टशब्देनोभयोपकारात्। शब्दश्लेषेणाप्युपमासङ्गरार्थमाह-अत्र च यथेत्यादि। सत्पुष्करेति। पुष्करं वाद्यभाण्डमुखं, पद्मं च। द्योतिनस्तरङ्गाः, द्योतितो रङ्गश्च। रज्यन्तेऽस्मिन् सामाजिकमनांसीति रङ्गो नाट्यारम्भक्रिया। मृदङ्गसदृशं जलास्फालनवाद्यं मृदङ्गवाद्यं च। योजयति-अत्र पयसीवेत्यादि।
१. समुत्थोपमा प्रतिभो०-अ० शा१। समुत्थरचोपमा°-नि० । २. °त्निव-शा० ना०। ३. शब्दे-शा१ नास्ति। ४. सह -- ना० नास्ति। ५. सत्पूरुष°-नि०।
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लंकार: ] संजीविनी-सहितम् ३७५
अत्र "पयसीव नाट्यगृहे रमन्ते' इत्येतावतैव समुचितोपमा निष्पन्ना 'सत्पुष्करद्योतितरङ्ग' इति शब्दश्लेषेण सहैकस्मिन्नेव शब्दे सङ्कीर्णा। शब्दालंकारयोः पुनरेकवाचकानुप्रवेशेन संकरः पूर्वमुदाहृतो 'राजति तटीयम्' इत्यादिना। एकवाचकानुप्रवेशेनेव चात्र संकीर्त्वम्। अत एव वयवस्थितमन्यानुभाषितमप्रयोजकम्। तुल्यजातीययोरप्यलंकार-५
उपमा (रमणरूप साधारण धर्म के आधार पर स्वतन्त्र रूप में) सिद्ध हो जाती है। इस उपमा का 'सत्पुष्करद्योतितरंग'- इस (सभंग) शब्दश्लेष के साथ एक ही शब्द में संकर है। और दो शब्दालंकारों के एक वाचक में अनुप्रवेश द्वारा होने वाले संकर का उदाहरण पहले ही 'राजति तटीयम्' इत्यादि (श्लोक २७०) में दिया जा चुका है। इस (उदाहरण) में एकवाचकानुप्रवेश के द्वारा ही (न कि अंगांगिभाव एवं सन्देह का) संकर हुआ है। अतएव यह निश्चित हो गया कि दूसरे आचार्य (मम्मट) का कथन (-कि विजातीय शब्दालंकार का ही एकवाचकानुप्रवेश संकर होता है) अर्थहीन है क्योंकि सजातीय दो अलंकारों (शब्दालंकार अथवा अर्थालंकार) का भी, एक वाचक में अनुप्रवेश सम्भव है।5 भट्टोन्ड्रट ने शब्द तथा अर्थ में रहने वाले अलंकारों के जिस
रमन्त इति साधारणो धर्मः। अतः सामग्रीयोगात् संपन्ना द्योतितरङ्गशोभिनी- त्येकस्मित्नेव शब्दे सभङ्गपदत्वात् शब्दश्लेषण सङ्कोर्णा। शब्दालङ्गारयोरेकवाच- कानुप्रवेशमुदाहृतचरमनुस्मारयति शब्दालङ्कारयोः पुनरित्यादि। विजातीय- योरेवैकवाचकानुप्रवेशव्यवस्थेति यदाद्यरुक्तं तदप्रयोजकमित्याह- एकवाचके- त्यादि। अन्न राजति तटीयमित्यादौ एवकारेणाङ्गाङ्गिभावसन्देहसङ्गराव- पोहति। शब्दालङ्कारत्वं तुल्यजातीयता। उन्टप्रकाशितस्तु प्रकारान्तरगोचर: १. वापीपय°-ना०। २. °न्निव-शा० ना०। ३. संकीर्ण-शा१ नास्ति। ४. पर्यवस्थितमन्या०-अ०। व्यवस्थितत्वम्-नि० । ५. ०रेकवाच्यवाच°-शा१। ६. मम्मट के अनुसार एकवाचकानुप्रवेश संकर केवल शब्दालंकारों अथवा केवल अर्थालंकारों का ही होता है किन्तु रुय्यक के अनुसार विजातीय अलंकारों अर्थात् शब्दालंकार का अर्थालंकार तथा अर्थालंकार का शब्दालंकार के साथ भी संकर हो सकता है। राजति तटीयम् (श्लोक २७०) उदाहरण दो सजातीय शब्दालंकारों के एकवाचकानु- प्रवेश संकर का ही है।
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३७६ अलंकारसर्वस्वम् [ उपसंहार-
योरेकवाचकानुप्रवेशसंभवात्'। शब्दार्थवर्त्यलंकारसंकरस्तु भट्टोद्ट- प्रकाशितः संसृष्टावन्तर्भावित इति त्रिप्रकार एव संकर इहोक्तः २। इदानी- मुपसंहारसूत्रम्- एवमेते शब्दार्थोभयालंकारा: संक्षेपतः सूत्रिताः ॥सू० ८७।। एवमिति पूर्वोक्तप्रकारपरामर्शः । 'एते' इति प्रक्रान्तस्वरूपनिर्देशः । सूत्रिता इति" अलंकारसूत्रैः सूचिताः संक्षेपतः प्रतिपादिताः। संकर का निरूपण किया है उसका अन्तर्भाव संसृष्टि में होता है।9 इस प्रकार संकर तीन प्रकार का ही होता है, उसी का यहाँ प्रतिपादन हुआ है। अब (विषयवस्तु का) उपसंहार करने वाला सूत्र (प्रस्तुत) है। इस प्रकार इन शब्दालंकार, अर्थालंकार तथा उभयालंकारों का संक्षेप में सूत्रण कर दिया गया है॥सू० ८७॥ 'इस प्रकार' यह (पद) पूर्वोक्त भेदों का परामर्श करता है। 'इन' (एते) शब्द से प्रस्तुत (अलंकारों) के स्वरूप का निर्देश हुआ है। 'सूत्रण कर दिया
शब्दालङ्कारसङ्कर: संसृष्टावन्तर्भावित इति तस्य सङ्करत्वमङ्गाङ्गिभाव एवोक्तमित्याह-शब्दालङ्कारेत्यादि। अङ्गाङ्गिभावात् सन्देहात् प्रवेशादेकवाचके। त्रिधा तु सङ्कर: शब्दालङ्कृत्योरेकवाचके।: प्रकरणमुपसञ्जिहीर्षुराह-इदानीमिति। तत्र सूत्रम् "एवमेते शब्दार्थोभयालङ्गाराः संक्षेपतः सूत्रिताः ।" व्याचष्टे-एवमितीति। तत्र पुनरुक्तवदाभासोऽर्थस्य पौनरुक्त्ये, छेक- वृत्त्यनुप्रासौ व्यञ्जनमात्रस्य, यमकः स्वरव्यञ्जनसमुदायस्य, लाटानुप्रासः शब्दा- र्थयोरिति पौनरुक्त्ये पंचकम्। स्थानविशेषश्लिष्टवर्णपौनरुक्त्ये चित्रम्। १. शे सं°-ना० शा०। २ वृत्त्यलङ्कारस्तु भट्टोन्डटेन प्रकाशितः-अ०शा०। २. इह दशितः - शा१। इह प्रदशितः-नि० । ४. संक्षेपेण-ना०। विमशिन्यनुसारमपि अयमेव पाठः । ५. इति-नि० नास्ति। ६. प्रकाशिता :- नि० । ७. उद्भट के अनुसार शब्द तथा अर्थ पर आश्रित अलंकार जहाँ एक स्थान पर वाक्य में वर्तमान हो वहाँ संकर होता है। देखिए-काव्यालंकार संग्रह, ५।२२। किन्तु रुय्यक के अनुसार शब्दालंकार तथा अर्थालंकार का मिश्रण स्फुट होने के नाते ऐसे स्थलों में संसृष्टि अलंकार होगा।
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सूत्रम् ] संजीविनी-सहितम् ३७७
तत्र शब्दालंकारा यमकादयः। अर्थालंकारा उपमादयः । उभया- लंकारा लाटानुप्रासादयः। संसृष्टिसंकरप्रकारयोरपि कयोश्चित्तद्रूप- त्वात्२।
गया है (सूत्रिताः) का अभिप्राय है अलंकारसूत्रों द्वारा (अलंकारों का स्वरूप) सूचित कर दिया है या संक्षेप में बता दिया गया है। इनमें से यमक आदि शब्दालंकार हैं। उपमा आदि अर्थालंकार हैं। लाटानुप्रास आदि उभयालंकार हैं। संसृष्टि और संकर ये दो (मिश्ररूप अलंकारों के) भेद भी तद्रूप अर्थात् उभयालंकार होते है (इसीलिये उभया- लंकार में बहुवचन का प्रयोग विवक्षित है) ।
अथ सादृश्यविच्छित्तौ भेदाभेदतुल्यतायामुपमानन्वयोपमेयोपमास्मरणानि, अभेद- प्राधान्य आरोपाश्रयतया रूपकपरिणामसन्देहभ्रान्तिमदुल्लेखापह्नुतयः, अध्यव- सायाश्रयेणोत्प्रेक्षातिशयोक्ती, गम्यमानौपम्याश्रयेण तुल्ययोगितादीपकप्रतिवस्तू- पमादृष्टान्तनिदर्शनाव्यतिरेकसहोक्तिविनोक्तयः, विशेषणविच्छित्त्या समासोक्ति- परिकरौ, विशेषणविशेष्यविच्छित्त्या श्लेषः, अप्रस्तुतात् प्रस्तुतावगतावप्रस्तुत- प्रशंसा, सामान्यविशेषभावादिना निर्दिष्टप्रकृतसमर्थनेऽर्थान्तरन्यासः, गम्यस्य भङ्गयन्तरोक्तौ पर्यायोक्तं, स्तुत्या निन्दया वा स्तुतेर्गम्यत्वे व्याजस्तुतिः, प्राक- रणिकयोविशेषार्थ निषेधाभासेऽनिष्टविध्याभासे चाक्षेपः, विरोधगर्भतया विरो-
व्याघातद्वयानि। शृङ्लावैचित्र्येण कारणमालैकावलीमालादीपकसाराः, तर्क- न्यायेन काव्यलिङ्गानुमाने, वाक्यन्यायेन यथासंख्यपर्यायपरिवृत्तिपरिसंख्यार्था- पत्तिविकल्पसमुच्चयद्वयसमाधयः, लोकन्यायेन प्रत्यनीकप्रतीपनिमीलितसामान्य- तद्गुणातदगुणोत्तराणि। गूढार्थपरत्वे सूक्ष्मव्याजोक्तिवक्रोक्तिस्वभावोक्तयः, स्फुटार्थत्वे भाविकम्, औदात्त्येनोदात्तदवयं, चित्तवृत्त्यालम्बेन रसवत्प्रेयऊर्जस्वि- समाहितभावोदयसन्धिशबलत्वानीति शुद्धाः। मिश्रतया तु संसृष्टिसङ्गरौ। तदिदमभिसन्धायाह-एवमिति। पूर्वोक्तप्रकारपरामर्शः । एत इति । प्रक्रान्त- स्वरूपनिर्देश इति शब्दार्थोभयालङ्गारान् वर्गशो विविनक्ति-तत्र शब्दालङ्कारा इत्यादि। लाटानुप्रासादय इत्यादि। शब्दपरामृश्यानुद्धाटयति-संसृष्टिसङ्करेति। १. संकरप्रकारौ कौचिदल ङ्कारौ। तद्रूपत्वात्-अ०। संकरयोरपि°- शा०। संकरयोश्चित्ररूपत्वात्-ना०। २. तद्रूपात् - शा१।
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३७८ अलंकारसर्वस्वम् [ उप-
लोकवदाश्रयाश्रयिभावश्च 'तत्तदलंकारत्वनिबन्धनम्2। अन्वय- व्यतिरेकौ तु तत्कार्यत्वे प्रयोजकौ, न तदलंकारत्वे।३ तदलंकारत्वप्रयो- जकत्वे ४तु श्रौतोपमादेरपि शब्दालंकारत्वप्रसङ्गात्। तस्मादाश्रयाश्रयि- भावेनैव4 चिरंतनमतानुसृतिः।१
लोक के समान (काव्य में भी) आश्रय और आश्रयी का सम्बन्ध ही अलंकारों की विभिन्नता (शब्दालंकारता, अर्थालंकारता तथा उभयालंकारता) का नियामक है। (शब्दादि का) अन्वय या व्यतिरेक उनकी कार्यता (शब्दादि का रहना या न रहना शब्दालंकार आदि के साथ कारण-कार्य-सम्बन्ध) के प्रयोजक हैं न कि विशिष्ट अलंकारता के। विशिष्ट अलंकारता का (अन्वय- व्यतिरेक को) कारण मान लेने पर तो श्रौतोपमा आदि को भी शब्दालंकार
ननु चान्वयव्यतिरेकाभ्यामुक्तव्यवस्थाभङ्ग इत्यत आह-लोकवदाश्रया- श्रयौत्यादि। तदलङ्कारेति। तच्छब्देन शब्दार्थोभयपरामर्शः। चर्चितं चैतच्छलेषप्रस्तावे। तर्ह्यन्वयव्यतिरेकौ कुत्र निबन्धनमित्यत आह-अन्वय- व्यतिरेकौ त्विति। अलङ्काराणां शब्दादिकार्यत्वे शब्दाशब्दान्वयव्यतिरेकौ निबन्धनम्। ननु शब्दाद्यलङ्गारत्वेऽर्था (?) को दोष इत्यत आह-तद्लङ्गारत्व- प्रयोजकत्व इति। श्रौतोपमादेः शब्दान्वयव्यतिरेकानुविधानात् शब्दालङ्गारत्वं प्रसजेत्। निगमयति-तस्मादाश्रयाश्रयीति। चिरन्तनमते ह्युक्तार्थे संवाद- समुद्धाटनम्। शब्दन्यासो विषमविषमो दुर्घटार्थव्यवस्था व्याप्त्यव्याप्तिप्रकटनपरं न्यायचर्चो गभीर:। इत्थं भूम्ना रुचकवचसां विस्तर: कर्कशोऽयं टीकास्माभि: समुपचरिता [?रचिता] तेन सञ्जीविनीयम् ।। सूक्ष्मामव्याकुलामत्र शास्त्रयुक्त्युपबृंहिताम् । मीमांसामुपजीवन्तु कृतिनः काव्यतान्त्रिकाः ।। १. तत्-अ० शा१ नास्ति। २. कारनिबन्धनम्-नि०। ₹. कारयोग°-ना०। कारप्रयोग°-नि०। ४. तु-शा० शा१ नास्ति। ४. एव-अ० ना० शा१ नास्ति। ६. नुस्मृतिः-अ० ना०। नुसृतिरिति भद्रम्-नि० । चिरन्तनमतानुसृतिरितिग्रन्थानन्तरमेकं मङखुककर्त कत्वख्यापकं पद्यं
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संहार: ] संजीविनी-सहितम् ३७९
4इति संपूर्णमिदमलंकारसर्वस्वम्। मानना पड़ जाएगा। अतः आश्रय और आश्रयी का सम्बन्ध मानने से ही चिरन्तन सिद्धान्त का अनुसरण होता है।२ ।। इस प्रकार यह अलंकारसर्वस्व समाप्त हुआ ।
काव्यप्रकाशेऽलङ्कारसर्वस्वे च सचेतसाम्। येनादरो महांस्तेन व्याख्यातमुभयं सह॥ [अत्यादराज्जगत्यस्मिन् व्याख्यातमुभयं ततः]
मर्थालङ्कारप्रकरणं समाप्तम्॥ ॥ समाप्ता चेयं सञ्जीविन्याख्यालङ्कारसर्वस्वटीकेति॥*
केवलम् अ० पुस्तके उपलभ्यते। तच्चेदमस्ति 'इति मङखुको वितेने काश्मीरक्षितिपसान्धिविग्रहिकः । सुकविमुखाल द्वारं तदिदमल ङ्कारसर्वस्वम् ॥ १. समापितमिदमलंकारसर्वस्वमिति श्रेयः। कृतिस्तत्र भगवद्राजानकरुय्य- कस्येति। शा०। समापितमिदमलंकारसर्वस्वाख्यमलंकारशास्त्रम्। इदमलंकारशास्त्रं समापितं नीतमिति भद्रम् ना०। संपूर्णमिदमलंकारसर्वस्वमिति श्रेयो भवतु लेखकपाठकयोः। कृती राजानकरुय्यकस्येति। शा१। समाप्तं चेदमलंकारसर्वस्वम् ।-अ० । शारदादिलिपिप्राप्तहस्तलेख विमर्शनैः । सञ्जीविनीयुतमिदं सर्वस्वं शोधितं मया। २. किसी के रहने पर किसी दूसरे का रहना अन्वय तथा किसी के न रहने पर किसी का न रहना व्यतिरेक कहलाता है। रुय्यक के अनुसार शब्द के अर्थ के या दोनों के रहने या न रहने का अलंकार के साथ कारण और कार्य जैसा संबंध है। उदाहरण के लिए श्रौतोपमा में
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३८० अलंकारसर्वस्वम् [उपसंहार:]
इव शब्द का रहना यही बताता है कि इव कारणरूप है और श्रोतौपमा कार्य-रूप है। किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि श्रौतोपमा शब्दालंकार है। 'इव' का अन्वय होने पर भी श्रोतौपमा या वाच्यो- त्प्रेक्षा को अर्थालंकार इसी लिए माना जाता है क्योंकि ये दोनों अलं- कार अर्थ पर आश्रित हैं। किन्तु कोई अलंकार शब्द का है या अर्थ का या दोनों का इसका निर्णय तो आश्रय और आश्रित के सम्बन्ध से ही जाना जा सकता है। जो अलंकार शब्द पर आश्रित होगा वह शब्दालंकार, जो अर्थ पर आश्रित होगा वह अर्थालंकार, तथा जो शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित होगा वह उभयालंकार कहलाएगा। लौकिक अलंकारों में भी यही व्यवस्था पाई जाती है। कुण्डल का आश्रयभूत कर्ण के साथ आश्रित का सम्बन्ध है इसीलिए उसे कर्णालंकार कहा जाता है। सुवर्ण कुण्डल का उपादान कारण है इस कारणता को लेकर कुण्डल को हम कर्णालंकार नहीं कहते हैं अपितु कर्ण पर आश्रित होने के सम्बन्ध को ही लेकर उसे कर्णालंकार कहा जाता है। जिस प्रकार सुवर्ण कार्यता का नियामक भले ही हो पर उसे कर्णालंकार कहे जाने का नियामक नही है ठीक उसी प्रकार किसी शब्द या अर्थ का रहना या न रहना अलंकार की कार्यता का भले ही प्रयोजक हो पर अलंकार की शाब्दता आदि का प्रयोजक नहीं माना जा सकता है। इस सन्दर्भ में जयरथ की विमर्शिनी से अंशतः उद्धरण देना आवश्यक होगा। 'लोके हि योऽलंकारो यदाश्रितः स तदलंकारतयोच्यते, यथा कुण्डलादि: कर्णाद्याश्रितस्तदलंकारः । -वि० पृ० २५७ ताभ्यां (अन्व- यव्यतिरेकाभ्यां) हि यस्य यद्धेतुकत्वं तस्य तत्कार्यत्वं स्यान्न पुनस्तदलं- कारत्वम्। लोके हि यथा कर्णाश्रित. कुण्डलादि: कर्णालंकार उच्यते न पुनः सुवर्णकारणहेतुत्वात् तदलंकारः।' *शिवम्। ग्रन्थसंख्या च पञ्चशतोत्तरं त्रिसहस्रमेव ।।
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परिशिष्टम्-१ अलङ्कारसर्वस्वस्थश्लोकाद्यनुक्रमणिका
उदाहरणादि आकारनिर्देश: पृष्ठाङ्क:
अ
अक्ष्णो: स्फुटा ३५१
अङ्गराज वेणीसंहारे ३।४७ १६९
अङ्गलेखाम काव्याल ड्वारसङग्रहे २/२० २३२
अङगुलीभिरिव कुमारसम्भवे ८।६३ ३६०
अण्णं लडह काव्यप्रकाश १०।४५० १०४
अतिशयित उत्तररामचरिते ५।४ ४७.
अत्रानुगोदं रघुवंशे १३।१५ ४८
अत्राब्ज ३५
अथ पक्त्रिम ६४
अथोपगढे सूक्तिमुक्तावलौ १६५
अनन्तरत्न कुमारसम्भवे १।३ २०२
अनन्यसामान्य ९३
अनन्वय च रुय्यकस्य ३७
अनातपत्रो नवसाहसा ङ्कचरिते ४।३१ ३३८
अनुरूपो हर्षचरिते २१७ अनेन साध रघुवंशे ६।५७ १३५
अन्तर्छिद्राणि भल्लटशतके १९९
अपर इव कादम्बर्या ९६
अपाङ्गतरले काव्यप्रकाश १०।५४७ ३०९
अब्धिलघित मुरारे: १२१
अभिमाने च ३३० अमुष्मिल्लावण्या सुभाषितावलौ रामस्य ८१ अयं मार्तण्ड: काव्यप्रकाशे १०।२६७ ६६ अयं वारामेको भल्लटशतके १०८ २२७
अयमेकपदे विक्रमोरवशीये ४।३ २९३
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३८२ अलंकारसर्वस्वम्
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाङक: अरण्यरुदितं सुभाषितावलौ भर्तृहरे: १२७
अरण्यानी नवसाहसाङ्कचरिते ५।८२ २४४
अलङ्कार: काव्यप्रकाशे ९।३६९ २८८ अलड्कारोथ तत्रैव, चतुर्थोल्लासे १८४
अविरल काव्यालङ्कारे (रुद्रटस्य) १०८
अव्यात्स नवसाहसाङ्गचरिते १।१ १२३
असमाप्त राजतर्राङ्गण्यां ४।४४१ १६५
असम्भृतं कुमारसम्भवे १।३१ २३१ अस्तं भास्वान् काव्याल ङ्कासूत्रवृत्तौ ४।३।२८ १३४
अस्या: सर्ग विक्रमोर्वशीये १।१० १०६
अहमेव गुरु: काव्यप्रकाशे १०।५५७ ३०८
अहीनभुजागा श्रीकण्ठस्तवे २६
अहो केनदृशी काव्यप्रकाशे ९।३५३ ३२३
अहो कोपेऽपि ४८
अहो हि मे काव्यप्रकाशे १०।४८१ २०४
आ
आकृष्टिवेग हरविजये ४। १६६
आकृष्यादा सुभाषितावलौ १८७
आटोपेन श्रीकण्ठकरिते २/४९ ३१
आनन्दमन्थर पञ्चस्तव्याम् ३५९
आभाति ते ५४ आरोपयसिं सूभाषितावलौ मयूरस्य ३२५
आहूतोऽपि सूक्तिमुक्तावलौ २३५
इ
इति कृतपशुपति सुभाषितावलौ मयू रस्य ३२६
इन्दुः किं काव्यप्रकाशे १०।४१९ ६७
इन्दुर्लिप्त बालरामायणे १।४२ १९२
इन्दोर्लक्ष्म सुभाषितावलौ राजशेखरस्य २०८
इवे प्रतिकृतौ पाणिनिसूत्रं ५।३।९६ २८५
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अलंकारसर्वस्वस्थश्लोकाद्यनुकरमणिका ३८३
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाङ्क:
उ उत्कोपे त्वयि १२८ उत्क्षिप्तं सह १३५ उद्भ्रान्तोज्झित ७९ उन्नत्य नमति सुभाषितावलौ गोविन्दभट्टस्य २४८
उपमितं पाणिनिसूत्रं २।१।५६ ३७१ उपमैव काव्यादर्श २/६६ ५१ उपोढरागेण सूक्तिमुक्तावलौ, पाणिने: १४३
उरो दत्त्वा काव्याल ड्वारसङ्ग्रहे ५।३२ २७९
ए
ए एहि काव्यप्रकाश १०।५५५ ३०६ एकगुणहानि काव्याल ड्ारसूत्र ४।३।२३ २३८ एकस्मिञ्छयने विपक्ष अमरुशतके ३५३ एकाकिनी काव्यालड्कारे ७/४१ ३१६
एतत् तस्य भल्लटशत के १९१
एतान्यवन्ती नवसाहसा ङ्कचरिते १।१६ ३७०
ऐ ऐन्द्रं धनु: सुभाषितावलौ पाणिने: १६१
ओ ओष्ठे बिम्ब ६ ९
क
कज्जलहिम काव्यालक्वारे ७/३६ २७३
कण्ठस्य तस्या: कुमारसम्भवे २।४२ २५१
कपोलफलका काव्याल ङ्कारसङग्रहे ३।७ ९०
कमलमनम्भसि सूक्तिमुक्तावलौ शंकरगणस्य १०४ कर्पूर इव बालरामायण ३।११ २३५ कस्तूरीतिलकन्ति ९४
करस्त्वं भो: ध्वन्यालोके तृतीयोद्योते १९८
का विसमा काव्यप्रकाश १०।५३० ३१७
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३८४ अलंकारसर्वस्वम्
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाङ्क: काशा काशा काव्यालङ्कारसङग्रहे १।१९ ३६ किं तारुण्य सुभाषितावलौ बन्धोः ६६ किं नाम सूक्तिमुक्तावलौ २९ कि पद्मस्य रत्नावल्यां ५५ किं भूषणं सुभाषितावलौ बकस्य २८१ कि मे दुरो सुभाषितावलौ मयूरस्य ३२४ किं वृत्तान्तैः लोचने २०९ किं हास्येन स्वप्नसिद्धे नाटके ३४७ किमासेव्यं काभ्यप्रकाशे १०।५२२ २८२ किमित्यपास्या कुमारसम्भवे ५।४४ २७९ किवणाण काव्यप्रकाश १०।४५७ ११६ कुपतिमपि कादम्बर्या २२८ कुबे रजुष्टां कुमारसम्भवे ३।२५ ९२ कुमुदवनैः काव्यालङ्कारे ७।१८ १३४ कुलममलिनं सरस्वतीकण्ठाभरणे २९७ कुसुमसौरभ शिशुपालवधे ६।१४ ३५७ कृतं च गर्वा काव्यप्रकाशे ४।१०९ १२२ केयूरायित ९५ केवलं बाल हर्षचरिते २१७ कौरिल्यं कच काव्यालड्कारे ७।८१ २८२ क्वचिज्जटा हर्षचरिते ५९ क्वाकार्य ध्वन्यालोके ३५४ क्षीण: क्षीणोऽपि काव्यालड्कारे ७/९० १३०
ख
रवमिव जलं काव्यालङ्कारसूत्रवृत्तौ ४।३।१५ ४६
ग
गच्छ गच्छसि काव्यादर्शे २।१४२ २२३ गणिकासु २२० गण्डान्ते १५७
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३८५
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाङ्ग:
गतासु तीरं नवसाहसा ङ्कचरिते ९५
गर्वसम्बाह्य काव्यालङ्वारे ८।७८ ३०७
गाङ्गमम्बु काव्यप्रकाश १०।५६६ ३१५
गाढालिङ्गन अमरुशतके ४० ३४९
गुरुपरतन्त्र काव्यप्रकाशे ९।३५४ ३२२ गृह्हन्तु सर्वे विक्रमा ङ्कदेवचरिते १।१२ २१९ घ घेत्तुं मुञ्चइ २४८
च चकोर्य एव बालरामायणे १०।८२ ११९ चक्राभिघात ध्वन्यालोके १९३ चन्द्रग्रहणेन सुभाषितावलौ मयूरस्य ३२५ चित्रकर्मसु कांदम्बर्या २८३ चित्रं चित्रं काव्यप्रकाश १०।५३७ २४६ चूडामणिपदे १२३ चोलस्य यन्द्ीति विक्रमाङ्कदेवचरिते १।११६ ९२
ज जये धरित्र्या: बृहत्संहितायां २६२
जितेन्द्रियत्वं सुभाषितावलौ भारवे: २५८ ज्योत्स्ना तम: २१५
ज्योत्स्ना भस्म काव्यप्रकाश १०।४२१ ८०
ण णाराअणोत्ति ७३
त
तण्णत्थि ११०
तत्र यो ३३०
तदिदमरण्यं काव्याल ङ्वारे ७।१०४ ३४३ तदिष्टस्य रुय्यकस्य 7२१८ तद्वक्त्रामृत २५
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३८६ अलंकारसर्वस्वम्
उदाहरणादि आकरनिर्देश पृष्ठाङ्क:
तन्वी मनोरमा १४४
तमालनीला २४८ तस्य च प्रवयसो २७९ ताला जाअन्ति आनन्दवर्घनस्य विषमबाणलीलायां ३५
तीर्त्वा भूतेश अनर्घराघवे ५।२ ६२ तीर्थान्तरेषु २४४
त्रयीमयोऽपि ९८१,३६२
त्वं हालाहल वक्रोक्तिपञ्चाशिकायां ३२४
त्वत्पादनख विकमाङ्कदेवचरिते ८।९ १२४ त्वदङ्गमार्दवं काव्याल ङ्कारसडग्रहे ५।१२ ११३ त्वमेवं सौन्दर्या काव्याल ड्कारसूत्रवृत्तौ ३।२।१२ २४६
द् दत्त्वा दर्शन काव्यालङ्कारे ७/७९ २८०
दन्तप्रभापुष्प काव्यालङ्कारसडग्रहे २।२२ १४५ दामोदरकरा ६९
दारुण: काष्ठतो श्रीकण्ठस्तवे २७ दासे कृतागसि सूक्तिमुक्तावलौ ५३
दाहोडम्भ: विद्धशालभन्जिकायां १०७
दिदृक्षवः पक्ष्म १३०
दिवमप्युप काव्यालङ्कारे ९।६ २५२
दुर्वारा: स्मर शार्ङ्गधरपद्धतौ भट्टशङ्कुकस्य २९८
दूराकर्षण लोचने ३५०
दृशा दग्धं विद्धशालभज्जिकायां २५४ देया शिलापट्ट विक्माङ्कदेवचरिते ७/९ २१९
देवि क्षपा २५८ दोर्दण्डाज्चित महावीरचरिते १।७४ २५२
द्यामालिलिङ्ग श्रीकण्ठ चरिते ५।२३ १५३
द्युजनो मृत्युना काव्याल ङ्वारसङ्ग्रहे ५/३२ १३५
दौरत्र क्वचिदाश्रिता २५०
द्वन्दवभगेज्ञादिभ्यर्च पाणिनिसूत्रं ५।१।१३३ २८५
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अलंकारसर्वस्वस्थश्लोकाद्यनुकरमणिका ३८७
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाङ्क:
ध
धन्या: खलु १९७
धवलोऽसि गाथासप्तशत्यां ७।६३ ३१४
धावत्त्वदर्व ११२
धृतघनुषि सुभाषितावलौ २८७
न
न तज्जल भट्टिकाव्ये २।१९ .२५९ नन्वाश्रयस्थिति मल्लटशतके ४ २७६
नमत्तु २८९
नमस्कृत्य परां रुय्यकस्य १
नागेन्द्रहस्ता कुमारसम्भवे १।३६ २६९ निमेषमपि २५३
निरर्थकं जन्म सुभाषितावलौ १३९ निरीक्ष्य विद्युन्नयनैः सूक्तिमुक्तावलौ १४७
निर्लूनान्यलकानि १५२
निशासु भास्वत् २७७ नीतानामाकुली १७२
नेत्रैरिवोत्पलै: १६३
नो कि्चित् २२४
न्यञ्चत्कुन्चित् बालरामायणे २।१९ २९४
प
पथि पथि काव्यप्रकाशे ४।१०० २४०
परहिअअं २४५ परिच्छेदातीतः मालतीमाधवे १।३३ २२७
पर्यड्गो राज ५७
पशुपतिरपि कुमारसम्भवे ६।९५ २८७
पश्यत्सूद्गत २३९
पश्यन्ती :१५९
पश्याम: किमियं सुभाषितावलौ
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३८८ अलंकारसर्वस्वम्
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाङ्क:
पाण्ड्योऽय रघुवंशे ६।६० ४४
पातालमेतन्न नवसाहसा ङ्गचरिते १४।२३ ८९
पीयूषप्रसृतिः ५३
पुराणि यस्याँ नवसाहसाङ्कचरिते १।२२ २५८
पुष्पं प्रवालोप कुमारसम्भवे १।४४ १०७
पूर्णेन्दोः ७८
पृथ्वि स्थिरा भव बालरामायणे १।४८ २०३
पृथुरुरसि हर्षचरिते तृतीयोच्छ्वासे ७४
प्रभामहत्या कुमारसम्भवे १।२८ ४३
प्रसरद् बिन्दु ३६९
प्रसर्पत्तात्पय १५७
प्रसीदेति २१४
प्राप्याभिषेक ९९
प्रायः पथ्य २४१
प्रासादे सा अमरुशतके १०२ २५२
ब
बाणेन हत्वा विकमाङ्कदेवचरिते ७।१० २१९
बालअ णाहं २१३
बिभ्राणा हृदये २९३
भ
भक्तिप्रह्व सुभाषिताबलौ भागवतामृतवर्धनस्य २९०
भक्तिर्भवे काव्यप्रकाशे १०।५२५ २८२
भवदपराधै: काव्यालड्कारे ७१६ १३३
भासते प्रतिभा काव्यप्रकाशे ९।३८७ ३८
भुजङ्गकुण्डली: श्रीकण्ठस्तवे २७
भ्रमिमरति ध्वन्यालोके द्वितीयोद्योते ५९
म
सग्गिअ १०५
मदनगणना श्रीकण्ठचरिते ६।७० १४८
मनीषिता: सन्ति कुमारसम्भवे ५।४ २६५
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अलंकारसर्वस्वस्थशलीकाद्यनुक्रमणिका ३८९
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाङ: -मन्दमग्नि १५६ मलयजरस काव्याल ङ्कारसूत्रवृत्तौ ४।३।१० ३११ महिलासहस्स गाथासप्तशत्यां २।८२ ९३ मानमस्या काव्यादर्श २।२९९ ३०३ मुक्ता: केलि काव्यप्रकाशे १०५०५ ३४२ मुण्डसिरे १२७ मुनिर्जयति ध्वन्यालोके चतुर्थोद्योते ३३६ मुरारिनिर्गता प्रतिहारेन्दुराजवृत्तौ ५।११ ३७३ मृगलोचनया काव्यप्रकाशे १०।४९७ १३९ मृग्यश्च रघुवंशे २६४
य
यः कौमार सूक्तिमुक्तावलौ २३७ शिलाभट्टारिकाया: ३६७ यत्र किञ्चित् ४० यत्त्वन्नेत्र सुवृत्ततिलके यशोवर्मण: मत्रता लहरी २६४ काव्यप्रकाशे १०।५१९ २६८ यत्रैव मुग्धेति २७७ यथा रन्धं सूक्तिमुक्तावली भट्टबाणस्य यथारुचि २६७
७१ यदेतच्चन्द्रा सुभाषितावलौ श्रीहर्षचौरयोः ७७ यद्वक्त्रचन्द्रे ३६८ यद्वा मृषा विक्रमा ङ्कदेवचरिते ७।११ २१९ यद्विस्मय मालतीमाधवे १।१९ २६५ यस्तपोवन हर्षचरिते तृतीयोच्छवासे ७१ यस्य किन्चिदप ३०४ यत््या मुहु मालतीमाधवे १।२९ ४३ यामि मनो ५७ यामीति न हर्ष चरिते तृतीयोच्छासे २१७ युद्धेऽजुंनो ४५
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३९० अलंकारसर्वस्वम्
उदाहरणादि आकर निर्देश: पृष्ठाङ्क:
य कन्दरासु काव्यप्रकाशे १०।५४८ ३१०
येन ध्वस्तं सुभाषितावलौ चन्द्रकस्य १७१
येन लम्बालक: काव्यालङ्कारसङ ग्रहे ४।१२ १९३
येनेन्दुर्दहनो ३७२
यैरेकरूप १५४
यैदृष्टोऽसि ४०
योगपट्टो काव्यालङ्कारसङ ग्रहे ५।१३ ११२
यो यः पश्यति सुभाषितावलौ र
रक्तच्छदत्व सुभाषितावलौ १७४
रञ्जिता नु किरातार्जुनीये ९।१५ ६७
रथस्थितानां विक्रमाङ्कदेवचरिते ७/६ १०१
राजति तटी हरविजये ५।१३७ ३६५
राजन् राज काव्यप्रकाशे १०।४४० १९६
राज्ञो मान वेगीसंहारे ४।२ १६९.
राज्य सारं काव्यालंकारे ७।९७ २६२
रेहइ मिहिरेण ११५
ल
लावण्यद्रविण औचित्यविचारचर्चायां धर्मकीर्ते: १०५
लावण्यौकसि खण्डप्रशस्तौ ३०६,२७३
लिम्पतींव मृच्छकटिके १।१३२ ८८,३५८
लोकोत्तरं बालरामायणे २।५१ २०२
व
वक्त्रस्यन्दि काव्यप्रकाशे १०।५३१ २१९.
वज्नपञ्जर हर्षचरिते ३ ७१
वसुरहिते सूर्यशत के ३२५
वाचामनाकुल काव्याल ड्कारसंग्रहे ६।१२ ३३९
वामेन नारी ३५४
विजय फुशल: सुभाषितावलौ मयूरस्य ३२४
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अबंकारसवंस्वस्थश्लोकाद्यनुकमणिका ३९१
उदाहरणादि आकरनिर्देश: पृष्ठाकू:
विदलित काव्यालङ्कारे ७।२८ २९२
विद्वन्मानस काव्यप्रकाशे १०।४२५ ५६
विनयेन भामहालक्क्ारे १।१४ १३८
बिनावन्तीर्न विभिन्नवर्णा शिशुपालवधे ४।१४ ३१३
वियोगे गौड १२६
विलङ्धयन्ति नवसाहसाकचरिते १।४६ २८३
विलसदमर ७८
विलिखति १५१
विशेष प्रतिषेधे विसमअओ ध्वन्यालोके ३
विसृष्टरागा कुमारसम्भवे ५।११ २७६
विस्तारशालिनि ५४
वृषपुङ्गब श्रीकण्ठस्तवे २६
वेलेव हर्षचरिते १ ९९
शब्दानाकुलता ३३९
शरदीव नवसाहसा ङ्कचरिते२।२६ ६७०
शशी दिवस नीतिशत के ४५ २९९
शुद्धान्तदुर्लभ शाकुन्तले १।१७ १२५
शैलेन्द्र प्रति काव्यप्रकाशे १०।५२१ ३२०
स
सं एकस्त्रीणि भामहालक्कारे ३।२४ २३५
सकलकर काव्यप्रकाशे ९ १७९
सङ्कतकाल ध्वन्यालोके द्वितीयोद्योते ३१८
सङग्रामाङ्गण सदुक्तिकर्णामृते २६०
सच्छायाम्भोज ४६
सज्जातपत्र १११
सञ्चारपूतानि रघुवंशे २।१५ ११६
सत्पुण्कर नवसाहसाङ्कचरिते १।५४ ३७४
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३९२ अलंकार सर्वस्वम्
उदाहरणादि अकारनिर्देश: पष्ठाङू:
सद्य: करस्पर्श e नवसाहसा ङ्कचरिते १।६२ २४३
सद्यः कौशिक ४1० हरिश्चन्द्रचरिते नाटके १८५
सन्निहित ॥हर्षचरिते १ 2८८
सर्वप्रातिपदिकेभ्यः वार्तिकम् (पाणिनि ३।१।११)
स वः पाया ४काव्याल ङ्वारसूत्र ४।३।९ स वस्तुमखिलान् ध्वन्यालोके द्वितीयोद्योते २२१
सहसा विदधीत किरातार्जुनीये १।३० २०३
सहया: पन्नग सादृश्यव्यक्तये परिकरश्लोक: १८८
साधूनामुप ११७
सा बाला अमरुशतके सुभाषितावलौ च ३४२
साहित्यपाथो विक्रमा ङकदेवचरिते १।११ २१८
सीमानं न १५५
सुहअ गाथासप्तशत्यां २१४
सेषा स्थली रघुवंशे १३।२० ८९
सौजन्याम्बु ५८
स्पृष्टास्ता हयग्रीववधे २०६
स्वपक्षलीला श्रीकण्ठचरिते ६।१६ १५६
स्वसिद्धय काव्यप्रकाशे द्वितीयोल्लासे स्वेच्छोपजात '१७३
ह
हाराहौ सुभाषितावलौ मयूरस्य ३२५
हुङ्कारो नख २२७
हृदयमधि कुट्टिनीमंते १०८
हे हेलाजित पुञ्जराजस्य (वाक्यपदीयटीकायाम्) २०८
RE
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परिशिष्टम् २ सञ्जीविनोस्थश्लोकादि सूची
श्लोकादि पृष्ठाङ्क: श्लोकादि पृष्ठाङ्क
अणिवारिओ २२ क्वणद्द्विरेफार्वलि
अद्य स्वप्नं १९ गिरिकुञ्जरेवु अद्यापि लोके २१ चत्वारि वाक अनलङकृती पुनः ९ तर्राङ्गतं २९५
अपाङ्गसङ्कोचि २९४ तारापुटभ्रू ३१८
अभिघेयमभिदधानं ६ ताल्वोष्ठ
अविदितगुणापि तिर्यगनिवृत्तं २९४
अविभागेन २ तेऽस्त्यर्था: ५०
आकणितोत्तम १८ तौ सम्मुखं २०
आकृतव्यन्जिता ३१८ त्वं रावण ३४
आधातुर्भुवन १८ दृप्यत्सूकर १८
आलस्यं २२ दृष्टिः कातरता २१
आ: पापे ३३७ दृष्टिर्निष्ठुर २१
इवादिशब्द: ९५ ध्वनिदर्शनानु १
उत्कण्ठितं २९५ नान्त: प्रवेश १७
उत्कम्पम् २९४ नासाग्रनिष्ठं २९४
उत्तमप्रकृति १९ नेत्रे जिह्म २०
उदञ्चितं २९४ पइमरण १७
उदाहरणशेषो १ पुष्पोन्द्रेद १७
उद्वर्तितं २९४ प्राप्याधर २१
उपोढरागण ९ प्रारम्भे श्रुति १५
एके भूतवदासते १५ बीजन्यास उपक्षेप: १८३
काव्यप्रकाश ३७९ भम धम्मिअ ३
काष्ठाप्राप्ति १९ मध्यमा बुद्धयुपा २
कि विस्तरेण १ मध्य सखीजन २०
केलितल्पगत १९ मा भषीः १८
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३९४ अलंकारसर्वस्वम्
इ्लोकादि पृष्ठाङ्क: श्लोकादि पृष्ठाङ्ग:
माया संख्या १५४ शरभकेतोः ३३७ यथोद्देशस्तथैव २५ शुष्केन्धनाग्निवत् ३३५ यस्य विकार: शून्ये त्वद्रिपु २२ ये रसस्याङ्गिनो शैवं विष्णु ६२
रतिर्देवादिविषया ३४५ सभ्रूविलासं २९४ रसो रागे विषे ३२ संसारा्त्या 7.१९
रीतिरात्मा ८ साकूतमाक २९४
रुचकाचार्योपज्ञे साख्यं वेश्मनि ६२ रोषविमुक्त ३३७ साहित्यलक्षण १७ विकासि दृश्ये २९४ सूक्ष्मामव्याकुलाम् ३७८ विक्षेपिपार्श्वे २९४ स्फुरन्मुखामोद विभावानुभाव १५८ स्यान्न्यञ्चितं २९४ विभ्रान्तरक्तं २९४ स्यात्प्रेमगर्भ ह २९४ विश्वं प्रकाशयति स्वरूपज्योतिः शब्दन्यासो ३७८ स्वात्मानन्दं
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परिशिष्टम्-३ अलङ्कारानुक्रमणी
अलङ्कार: *पृष्ठाङ्क: अलङ्कारः पृष्ठाङ्क:
अतद्गुण: ३१३; ३१५ कारणमाला २५७; २५८
अतिशयोक्ति: १०२: ११० काव्यलिङ्गम् २६३; २६६
अतिशयोक्तिः (द्वितीया) २३८; २४० चित्रम् ३७; २९
अधिकम् २४९; २५१ छेकानुप्रास: २८; ३२
अनन्वय: ४४; ४५ तद्गुण: ३१२; ३१३
अनुमानम् २६६; २७१ तुल्ययोगिता १११; ११३
अन्योन्यम् २५१ दीपकम् ११४; ११७
अषह नुति: ७६; ८१ दृष्टान्त: १२०; १२२
अप्रस्तुतप्रशंसा १८९; २०० निदर्शना १२२; १२९
अर्थान्तरन्यास: २०१; २०५ परिकर: १६८; १६९
अर्थापति: २८५; २८८ परिणाम: ६०; ६४-५
असंगतिः २४१; २४३ परिवत्ति: २७८; २८०
आक्षेप: २१०; २२२ परिसंख्या २८०; २८४
आक्षेप: (द्वितीयः) २२२; २२५ पर्यायः २७४; २७८
उत्तरम् ३१६; ३१७ पर्यायः (द्वितीयः) २७५
उत्प्रेक्षा ८२; ८९, १०२ पर्यायोक्तम् २०५; २०७
उदात्तम् ३४१; ३४२ पुनरुक्तवदाभासम् २५; २८
उदात्तम् (द्वितीयम्) ३४३ प्रतिवस्तूपमा ११८; १२०
उपमा ३९; ४४ प्रतीपम् ३०५; ३०८
उपमेयोपमा ४५; ४७ प्रत्यनीकम् ३०३; ३०५
उल्लेख: ७०; ७५-६ भाविकम् ३२८; ३४१
एकावली २५८; २५९ भावोदयादि: ३५२; ३५५
- प्राक् अलङ्कारसर्वस्वसूत्रस्य पृष्ठाङ्कनिर्देशः; पश्चाच्च निष्कृष्टार्थकारि- कायाः। तथाहि-अतद्गुणसूत्रं ३१३ पृष्ठाङ्केऽस्ति तदर्थं श्रीविद्या- चक्रवत कारिका ३१५ पृष्ठाङ्गे।
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३९६ अलंकारसर्वस्वम्
अलङ्कार: पृष्ठाङ्ग: अलङ्कारः पृष्ठाङ्क:
भ्रान्तिमान् ६८; ७० व्याघातः (द्वितीय:) २५५
मालादीपकम् २६०; २६१ व्याजस्तुतिः २०७ ; १०९ मीलितम् ३०८; ३११ व्याजोक्ति: ३१९; ३२२
यथासख्यम् २७१; २७३ श्लेष: १७०; १८०, १८८
यमकम् ३३ संकर: ३६०; ३७६
रसवदादि: ३४४; ३५२ संसृष्टिः ३५६; ३६०
रूपकम् ५०; ६० सन्देहः ६५; ६८
लाटानुप्रास: ३४; ३७ समम् २४५; २४७
वकोक्ति: ३२२; ३२६ समाधि ३०२; ३०३
विकल्प: २८९; २९२ समासोक्ति: १४०; १४२, १४९- विचित्रम् २४७; २४९ ५०, १६८ विनोक्ति: १३६; १४० समुच्चय: २९२; २९५ विभावना २२९; २३४ समुच्चयः (द्वितीयः) २९६; ३०२ विरोध: २२६; २२९ सहोक्ति: १३१; १३६ विशेष: २५२; २५४ सामान्यम् ३११; ३११ विशेषोक्ति: २३४; २३८ सार: २६१; २६२ विषमम् २४४; २४३ सूक्ष्मम् ३१८; ३१९
वृत्त्यनुप्रास: ३०; ३२ स्मरणम् ४७; ५० व्यतिरेक: १२९; १३१ स्वभावोक्ति: ३२६; ३२७
व्याघातः २५४; २५५