1. Alankara Sarvasva Rajanaka Ruyyaka Vimarshini Jayarath Ed. Rewa Prasada Dwivedi Chowkambha
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Barcode : 99999990077377 Title - Alamkara Sarvasva of Sri Rajanaka Ruyyaka amp Mankha Author - Dwivedi, Dr. Rewa Prasada Language - sanskrit Pages - 836 Publication Year - 1971 Barcode EAN.UCC-13
9 999999 007737"
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।। श्रीः।।
काशी संस्कृत ग्रन्थनाला २०६
अलक्गारसवलम जयर्थकृत 'विमर्शिनी' समुपेतम् एतनुभय-हिन्दी भाष्यानुवादभृषितं च
हिन्दीभाप्यानुवादकार: डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी एम. ए., पी-एच.डी., साहित्यशाख्राचार्य: काशीहिन्दू विषब विद्यालयस्य प्राच्यविद्याधमविज्ञानसंकाये साहित्य विभागाध्यक्षः
वोखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
१६७१
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प्रकाशक : चौराम्वा संस्कृत सोरीज आफिस, वाराणसी मुद्रक : विद्याविलास प्रेस, वाराणमी संस्करण : प्रथम, वि. सवत् २०२८ * भूल्य : २५-००
C चौखम्या संस्कृत सीरीज आफिस गोपाल मन्दिर लेन पो० बा. 5, वाराणसी-१ (भारतवर्प) फोन : ६३१४४
प्रधान शासा चौसम्बा विद्याभवन चौक, पो. बा० ६६, वाराणसी-१ फोन : ६३०७६
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THE KASHI SANSKRIT SERIES 206 ***** संश्कत
ALAMKARA SARVASVA
OF
ŚRĪ RĀJĀNAKA RUYYAKA & MAŃKHA
With the
Vimarlinī of Jayarath
And
with the translation and explanation of both in Hindt
By
DR. REWĀ PRASĀDA DWIVEDI M. A., Ph. D, Sahityncarya Head of the Department of Sahityavidya Banaras Hindu University Varanasi-5
THE CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE
VARANASI-1
1971
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C The Chowkhamba Sanskrit Series Office Gopal Mandir Lane, P, O. Chowkhamba, Post Box 8, Varanasi-1 ( India ) 1971 Phone : 63145
First Edition
1971
Price Rs. 25-00
Also can be had of THE CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
Publisbers und Oriental Book-Sellert Chowk, Post Box 69, Varanasi-1 ( India ) Phone : 63076
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भूमिका संर्कल
अलंकारोडस्ति सर्वस्वमिदं यस्य महेशितु: । शक्ति विमर्शिनीं तस्य वन्दे रत्नाकरोज्जवलाम्॥ 'अलंकारसर्वस्व' संस्कृत की साहित्यविद्या के प्रमुख अंग अलंकार पर आश्रित एक प्रतिनिधि सन्थ है। भरत से जगलाथ तक हुए अलंकार चिन्तन की यह नामि है। सिद्धान्तभूत प्राचीन चिन्तन तो इसमें अपने स्वस्थ तथा वैज्ञानिक रूप में निहित' है ही, परवर्ती अनुचीक्षा और समीक्षा के लिए भी यह मेरुदण्ड रहा है। इस प्रकार इस ग्रन्थ के अनुशीलन के बिना भारतीय अलंकार-बोध सुप्रतिष्ठ नहीं माना जा सकता।
[१ ]अ्न्थ स्वरूप अलंकारसर्वस्व ठीक वैसा ही नाम है जैसा 'वकोक्तिजीवित' या 'मुक्तवली'। कुन्तक का मूलग्रन्थ कारिकाबद् है और उसका नाम 'कान्पालड़ार' है। चक्रोकि जीविव संज्ञा उसकी व्यास्या को दी गई है। विश्वनाथ का न्यायग्रन्थ भी मूलतः कारिकात्मक है और उसका नाम 'कारिकावलि' है। मुक्तावलि उसकी वृत्ति का नाम है। किन्तु अ्रन्यप्रसिद्धि वृति के नाम से ही है। अलंकारसर्वस्व की भी यही स्थिति है। इसके तीन भाग हैं सून, वृत्ति और उदाहरण। इनमें सूत्र भाग का नाम है 'अलक्दार- सूभ' और शेप दोनों भागों का नाम है 'अलंकारसर्वस्व'। किन्तु स्थिति यह है कि वताहिदियों पहले से हम केवल 'अलंकारसवस्व' नाम से ही जानते आ रहे हैं।२ [२]अन्ध संस्करण मर्लकारसर्वेस्व अनेक बार प्रकाशित हो चुका है। इसके संस्करणों की तालिका यह हे- १. देखिए इसी भूमिका में दिया अलंकारों का इतिहास। रस आदि के लिए भी यह ग्रन्थ उत्तम सामग्री प्रस्तुत करता है। २. जयरथ, विद्याधर, विद्यानाथ, विश्वनाथ, भट्टगोपाल, मल्लिनाथ, कुमारस्वामी, अप्पमदीक्षित, वीरराधव आदि ने सूत और वृत्ति दोनों को अलंकारसर्वस्व नाम से सुकारा है। विशेष विवरण के लिए द्रषटव्य म० म० काणे तथा डॉ० सुचीलकुमार डे के History of sanskrit Poetics तथा डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी की अलंकार मीमांसा।
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प्रकाशक सस्करण सन् स्वरप सँपादक। संशोधक १. निर्णेयसागर, बम्बई प्रथम १८९३ विमर्शिनीसहित म म. दुर्गाप्रसाद द्विवेदी द्वितीय १९३६ पं० गिरिजाम्रसाद द्विवेदी
२. अनन्तशयन ग्रमा प्रथम १९१५ समुद्रबंधी टी.स. के. साम्बशिद शासी निवेन्द्रम केरल द्वितीय १९२६ 11 ३. शारदा ग्रपमाला, काशी प्रयम १९२६ मूउरमान्र प० गोरीनाथ पाठक ४. मोतीलाल बनारसीदास, प्रथम १९६५ हिन्दी अनुवाद डॉ. रामचन्द्र द्विवेदी काशी तथा संजोवनी ५ मेहरचन्द्र लक्ष्मणदास, प्रथम १९६५ संजीवनी सँपा० डॉ० कु० जानकी दिल्ली सगो० डा वे राघवन्
[ ३ ] ग्रन्थकार इन सभी संस्करणो मे निवेन्द्रमसंस्करण को छोड़ अन्य किसी संस्करण मे ग्रन्थकार का नाम नहीं मिलता। त्रिवेन्द्रम संस्करण मे इमे मंख की कृति बतलाया गया है। मंखुपरम्परा-निवेन्द्रम के इस संस्करण मे छपी टीका मे आरम्भ के मंगल पद्यो मे-
पदर्श्य रविवर्माणं प्रारथयन्त विपश्चित:॥ गम्मीरं नस्तितीपूंर्णा मह्खुकम्रन्थसागरम्। नौरस्तु भवतः प्रज्ञा स्थेयसी यदुनन्दन ॥। इस प्रकार मंख को ही ग्रन्थकार कहा गया है। ग्रन्थ के अन्त मे भी वृति की पुष्पिका मे- इति मंसुको वितेने कश्मीर सितिपसान्घिविप्रहिक:। सुक विमुसालद्कारं तदिदमछंकारसर्वस्वम्॥ इस प्रकार मंख को ही सवस्वकार बतलाया गया है, और समुद्रबन्ध की अपनी व्यास्या के अन्त मे भी- 'मड्खुक निबन्धविवृती विहितायामिद्द समुद्रयन्धेन। गुणलेशमात्र मित्रैभविरषाशादोपदर्शिभि: सद्धि ॥' इस प्रकार। इस सस्करण में वृत्यनुप्रास के लिए उदाहृत 'आटोपेन' पद्य [पृ० ६२] के पहले 'मदीये श्रोकण्ठचरिते' भी लिसा मिलता है। श्रीकष्ठचरित के रचमिता मंख हो है औोर उनके इस काव्य मे यह पद्य है [ द्र० सर्ग २ पद्य ४९ ]। १. इस संस्करण के आधार पर १९०८ ई० मे एच. जैकोवी ने अलंकारसर्वस्व का जमंनी भाया मे अनुवाद भी किया था।
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ग्रन्थारम्भ-मंगल-पद्य 'नमस्कृत्य' के उत्तराध में इस संस्करण में 'गुर्वलंकार०' पाठ हो अपनाया गया है, यद्यपि टोका में सुरुशव्द की व्पाख्या नहीं की गई है। स्मरणीय है जयरथ आदि ने यहाँ 'गुर्वलंकार' के स्थान पर 'निजालंकार०' पाठ माना है। इस प्रकार केरलीय पाठ के अनुसार अलंकारसवस्व के रचयिता मंखुक या मंख हैं। रुध्यक-रुचक-परम्परा-जयरथ ने विम्रिनी में 'गुर्वलंकार' के स्थान पर 'निजालंकार' पाठ माना है। उन्होंने काव्यप्रकावर्सकेतें [पृ० ३७२] और मलंकारा- नुसरिणी (११८, १९२, १९९) को ग्रन्थकार की अन्य कृति कहा है। काव्यप्रकाश- संकेत के आरम्भ में- 'जारवा श्रीतिलकात् सर्वालंकारोपनिपदरसमू। काव्यप्रकाशसंकेतो रुचकेनेह लिख्यते ॥ इस प्रकार रुचक को उसका कर्ता माना गया है और स्तुतिकुसुमांजलि ८११९ पद्म की टीका में रत्नकण्ठ ने अलंकारानुसारिणी को रचक की कृति कहा है। रूचक सप्यक का ही दूसरा नाम है। श्रीविद्याचकवत्ती ने अलंकारसर्वस्व पर जो संजीविनी टीका लिखी है उसमें- 'रुचका चार्यो पज्षे सेयमलंकारसर्वस्वे। संजी विनीति टीका श्रीविद्याचक्वर्तिना क्रियते॥' [ संजीविनीमंगल] 'हृत्थं भूग्ना रुचकवचसां विस्तरः कर्कशोऽ्यम्' [अन्त-मंगल] इस प्रकार रचक या वय्यक को हो अलंकारसवस्व का रचयिता माना है। पिशेल द्वारा संपादित सहृदयलीला में उसके रचयिता को- कृतिः श्रीविपश्चिद्वर-राजानक-तिलकात्मज-श्रीमदालंकारिक समाजाग्ररण्य- श्रीराजानक रख्यकस्य राजानक-रचकापर नाम्तोऽलह्कारसर्वस्वकृत:। इस प्रकार ्य्यक, रुचक और अलंकारसवस्वकार कहा गया है। उभयपरम्परा-अप्पयदीक्षित ने चित्रमीमांसा के उपमाप्रकरण में कलेप को अन्य अलंकारों का वाधक वतलाते हुए- 'उपमाप्रतिभानेऽपि तत्प्रतिभोतपत्तिहेतुः स्लेप एव, नोपमेति महूखकादिभिरन्युपेयते।४ इस प्रकार इस मत का उपस्थापक मंख को माना है। यह मत अलंकारसर्वस्व की वृत्ि में आता भी है। इसी के साथ अपहुति और व्याजोकि के अन्तर पर प्राचीन आचार्यों के मत उपस्थित करते हुए- १. काव्यप्रकाश संकेत के लिए द्रष्टव्य-डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी का काव्यप्रकाश अंग्रेजी अनुवाद-The Poeic Light'-भाग-२ परिशिष्ट-डी० । २. संजीविनी: डा० रामचन्द्रद्विवेदी तथा डॉ०जानकीद्वारा पृथक् पृथक् संपादित। ३. सहदयलीला नि० सा० पाठ के लिए देखिए इसी ग्रन्थ का परिशिष्ट-१। ४. चित्रमीमांसा सं० पं० कालिकाप्रसाद शुक्ल पृ० ५६। :-
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अग्रेदमपहतिकयनं ध्याजोकत्यलंकारं पृथगनद्गीवुर्वताम् उद्धरादीनां मनमनुसृसय। ये तु-'उद्विपवस्तुनिगद्नं ब्याजोफििरिति' ध्याओोकयलंकारं पृथगिददन्ति तेपा मिहापि व्याजोक्तिरेय नापछ्नुतिरिति रुचकादयः। इस प्रकार वे अलंकारसवंस्वकार को रूचक भी कहते हैं। स्पष्ट हो अलंकारसर्वस्व के कतृंत्व के वियय में रम्यक औौर मंस को छोड़ अन्य के नाम की परम्परा नहीं है। आगे आने वाले विवरण से स्पष्ट है कि रय्पक और मंख दोनो ही कश्मोर के निवासी है। प्रश्न उठता है कि सर्वस्व का लेखक इन दोनों मे से किसे स्वीकार किया जाए। उत्तर मे विचारकों के दो दल बन जाते हैं। एक उनका जो केवल रुम्यक को सूत और वृत्ति दोनों का रचमिता मानते हैं और दूसरा उनका जो मंख को। इन दोनों में प्रथम का प्रवर्सन निर्णपसागरीय संस्वरण से होता है और द्वितीय का निवेन्द्रमसंस्करण से। डॉ० काणे, डॉ०डे, डॉ. राघवन, सेठ कन्हैयालाल पोद्दार, डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी, डॉ० जानकी तथा अन्य अनेक विद्वान् रुय्यक के पक्ष मे हैं। मंस का पक्ष निवेन्द्रमसंस्करण के परचात् कदाचित पहली वार हमने हो 'लिया है अपने व्यक्तिविवेक और उसके व्यास्यान के हिन्दीभाष्य की भूमिका मे। इस प्रकार विद्वानो का बहुमत कुम्यक के पक्ष में है। रुय्यकवादी उक्त विद्वानों के भिन्न-भिन्न तर्कों का मूत्र आधार जयरथ है और सार है यह- स्थापना-कशमोरी और दक्षिणी गरम्परा मे कश्मीरी-परम्परा ही मान्य है पयोकि
१. अलंकारसवस्व व्याजोक्ति सूच-७७ पृ० ६५२: २. चित्र मोरमादा-पृ०२४२। आगे इस सूत पर युछ और भी निष्कर्षों की कल्पना की गई है। २. 'काणे' तथा 'ढे' History of Skt. Poetics, डॉ. राधवन्, कु० जानकी के वलंकारसवंस्व का Fornord, पोहार जी-संस्कृतसाहित्य का इतिहास भाग-१पृ० १७१, डॉ रामचन्द्र द्विवेदी अलंकारमीमास्ा-परिचयखण्ड तथा संजीविनी सहित छपे उनके अलंकारसर्वस्व की भूमिका, ड० कु० जानकी-सजीविनी सहित छपे उनके वलंगरसवंस्व की भूमिका पृ० ३1 इन मे से ग्रन्यकार के नाम की इस समस्या को पोद्दारजी ने बढी ही सफाई के साथ उपस्थित किया है किन्तु उन्होने मह भी लिस दिया है कि पण्डितराज जुगन्नाथ भी कम्यक का नाम लेते हैं, जबकि तथ्य यह है कि पण्डितराज केवल ग्रन्थ का नाम लेते हैं 'सवस्वकृत' अथवा 'अलषकारसवंस्वकृत्' आदि।
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तर्कं-(१) कश्मीरी परम्परा कश्मीर की है जहाँ ग्रन्थ लिखा गया (२) कश्मीरी; परम्परा पूर्ववर्ती है क्योंकि जयरथ समुद्रबन्ध से पूववर्त्ती हैं। (३) कश्मीरी परम्परा में मतभेद नहीं है, जब कि दक्षिणी परम्परा में मतभेद हैं। दक्षिण के ही विद्यानाथ, कुमारस्वामी, मल्लिनाथ आदि सवस्वकार के रूप में रुय्यक या रूचक का नाम उदृत करते हैं। इस प्रकार दक्षिणी विद्वानों में भी बहुमत रुय्यक का ही है। सिद्धान्त-कश्मीरी परम्परा में र्य्यक ही ग्रन्थकार के रूप मे प्रसिद्ध हैं, अतः रुय्यक को ही अलंकारसवंस्व का रचयिता माना जाना चाहिए। इन्हीं तरकों के समर्थन में इन विद्वानों ने सहृदयलीला की पूर्वोद्ृत पुप्पिका को भी उदधृत किया है। इसमें स्पष्ट ही रय्यक को अलंकारसर्वस्व का रचयिता माना गया है। वस्तुत: अलंकारसर्वस्व के कर्तृत्व के विषय में मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि रध्यक इसके कर्ता हैं या नहीं, क्योंकि उनके कतृत्व में विवाद नहीं है। मुख्य प्रश्न यह है कि इसके साथ मंख का नाम क्यों जुड़ा। सेठ कन्हैयालालजी, पोद्दार, डॉ० काणे और डॉ० द्विवेदी ने मंख के समर्थन में केवल इतना लिसा है कि मंख ने रुध्यक के बाद उनकी वृत्ति का परिषकार किया होगा और उसमें अपने श्रीकण्ठचरित के पद्य भी मिला दिए होंगे। इसी आधार पर उनकी प्रसिद्धि हो गई होगी। प्रसिद्धि भी केवल कोलम्वो के राजघराने में हुई, क्योंकि मंख भी राजमन्नी थे और समुद्रबन्ध भी। अश्य ही कश्मीर के राजपरिवार का दक्षिणी राजपरिवारों से संबन्ध रहा होगा। दमारा मत- वस्तुतः सूत्र के रचयिता रम्यक हैं और वृत्ति के मंख। इसमें प्रमाण हैं अप्पयदीक्षित के वे दोनों वाक्य जिनमें से एक में उन्होंने रुचक का उल्लेख किया है और दूसरे में मंख का। ध्यान देने की बात यह है कि जिस संदर्भ में य्यक का नाम लिया है उसमें सून भी दिया हुआ है और जिस संदर्भ में केवल मंख का नाम लिया है उसमें सून का उद्धरण नहीं है'। 'उद्धिन्नवस्तुनिगूहनं व्याजोकिः यह अलंकारसर्वर्व में ही १. छपी चित्रमीमांसा में 'रुचकादयः' पद 'नापस्नृतिरिति रुचकादयः' इस प्रकार अन्त में छपा है। इस प्रकार के पाठ से ऐसा लगने लगता है कि 'उद्विन्नवस्तु' सूघ रुचक का नहीं है जब कि यह मूत्र है सर्वस्व का ही। इसकी टीका सुधा सूत्र को सय्यक की ही कृति बतलाती है। प्रसंग भी ऐसा है जिसमें पहले उत्ट का मत दिया है और वाद में दण्डी का मत। सदनुसार 'ये तु रुचकादयः' पाठ ही जमता है। यदि 'रुचकादयः' अन्त में आए तब भी यह तो उससे सिद्ध हो ही जाता है कि अप्पयदीक्षित सूत्रकार को वृत्तिकार से भिन्न मानते हैं।
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१० आया सूय है। अतः दीक्षित जी को सून का उल्लेख करते समय रूचक का नाम लेना, जो आवश्यक दिखता है उसका रहस्य, और हो चया सकता है इसके अतिरिक्त कि सूभ के वतृंत्व मे संदेह न हो। श्लेप का विचार केवल वृति मे हुआ है और उसी मे इलेप को अन्य अलंकारो का वाधक माना गया है। दूसरे स्थल मे श्लेप की यह स्थिति उपस्थित करते समय दीक्षिन जी ने मंख का नाम लिया इसका भी एकमात्र यही अर्थ हो सकता है कि वे वृत्ति का निर्माता मंख को मानते है।'
डॉ० डे० और म० म० कापे ने दक्षिण भारत के कुछ पाष्ट्रुगन्थो का भी सदर्भ दिया है, जिनमे वृत्ति के मंगलपद्य के उत्तरार्ध के 'निजालंकारसूयाण।' पाठ के स्थान पर 'गु्वलंकारसूनामा' पाठ ही मिलता है, जैसा कि निवेन्द्रमसस्करण मे समुद्रबन्ध ने माना है।
श्रीविद्याचनवर्ती ने भी पुनरुक्तवदाभास के उदाहरणो को मंख का माना है। वृति मे मख के निम्नलिसित पद्य भी उदृत है २ा४९, ५२३, ६११६,७०, १०११० मद्रास राजकीय संस्कृतपाण्डुपन्थागार मे 'मंखुकसूनोद्ाहरण' नाम का एक स्वतन्त्र प्रन्थ भी रक्षित है । तुंगभद्र ने भी मंस को हो सर्वस्वकार स्वीकार किया है।" इस प्रकार मंख के पक्ष मे भी दक्षिणी विद्ानों का मत अल्पमत नहीं है। अनंकारसवंस्व के जो सून हैं उन्हें अवश्य ही प्रन्थकार ने पहले ही वना लिया है। वृत्ि लिखने के पूर्व उनको भी ग्रन्थकार ने अवश्य ही कोई नाम दिया होगा। यह नाम अलंकारमून ही होगा, क्योकि वृत्ति के मंगलपद्य मे 'अलंकारसूत' ही नाम आता है और स्वयं सूनवार अन्तिम सूत्र मे 'अन्दरकारा: सक्षेपतः सूत्रिताः' इस प्रकार 'अलंकार- सूच' नाम वा सकेन देते हैं। समुद्रबन्ध की जो टीका मंखुक का नाम लेकर चलती है वह भी पाठान्तर में 'समाप्तं चेदमलंकारसवंस्वम्, कृती राजानकश्रीरुचकस्य। दम्। इति मंमु" इस प्रकार मंखुक के साथ रचक का भी नाम प्रस्तुत करती है। अवश्य ही इसमे सूत्रकार रुप्यक को और वृत्तिकार मख को मानने का अभिप्राय निहित है।
१. 'ये तु उद्धि• र्चकादयः' का 'रचकादय"' शब्द 'ये तु रूचकादय" होना चाहिए। लिपिकार से यह शब्द छूट गया होगा और उससे इसे पाण्टुप्रति मे पाश्वभाग मे लिख रखा होगा। संपादक ने इसे यथास्थान नहीं रखा। यदि इसे स्वयं अप्पय ने हो इसी प्रकार लिसा हो तो उसमे भी स्पष्ट है कि वे वृत्तिकार को सूत्रकार से भिन्न मानते हैं। २. देखिए बलोक सूची, अथवा पृ० ६२, ३१७, ३२७, ३२७, ३२७। ३ पाण्टुप्रति क्र० २९७० द्र० कु० जानकी अलकारसर्वस्य भूमिका पृ० २। ४ द्र० संजीविनी सं० डॉ. द्विवेदी पृ० २४ भूमिका।
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जहां तक समुद्रबन्ध के समय का प्रश्न है वे भी उसी शती फे हैं जिसके जयरथ। दोनों में जयरय १३ वीं शवी के आरम्भ के हैं और समुद्रबन्ध उसके मध्य के । अतः समय का भी अन्तर बहुत नहीं पड़ता। जहाँ तक कश्मीर का सम्बन्ध है कश्मीरी प्रन्धों के विपय में उसी देश की परम्परा को महत्व देना अवश्य ही तर्कसंगत है, किन्तु यह तद संभव है जब कश्मीर के विद्वान् निष्पक्ष हों। उनमें परस्पर में अत्यन्त कलह है। जयरथ के पहले शोभाकर ने, जो कश्मीर के ही हैं, अपने बलंकार-रत्नाकर में अलंकारसवस्व को उसके सूत्र और वृत्ति दोनों रूपों में पदे पदे उद्धृत किया, किन्तु सन्थकार का नाम एक बार भूल से भी नहीं लिया। स्वयं जयरय ने रल्नाकर को पर्याप्त मात्रा में उद्धृत किया, किन्तु शोभाकर का या उनके ग्रन्थ रत्नाकर का नाम नहीं लिया। न केवल नाम का उल्लेख नहीं किया, आक्षेप भी किया है। कदाचित् उसी की छाप पण्डितराज पर पड़ी है और वे अप्पयदीक्षित पर बरसते दिसाई देते हैं। इन सबके परमगुरु अभिनव भी गाली देकर बात करते और पूर्व पक्ष के साथ ही नहीं, मुलग्रन्थ के साथ भी अन्याय करते हैं। कहीं उनकी बुद्धि उलट भी जाती है।9 कश्मीरी परम्परा से अधिक दाक्षिणात्म परंपरा ही मान्य है, क्योंकि दक्षिण में यह द्वेप नहीं था। कया कारण है कि महिमभट्ट का व्यक्तिविदेक कश्मीर में नहीं मिला और दक्षिण में ही मिला। वया कारण है कि साहित्यमीमांसा की पाण्डुप्रति भी दक्षिण भारत में ही मिली। क्या कारण है कि कश्मीर भट्टनायक के ध्वनिविरोधी ग्रन्थों की रक्षा नहीं सका। हृदयदर्पण, ध्वनिनिणय अवश्य ही नष्ट करा दिए गए। हृदय- दर्पण तो महिमभट्ट को भी नहीं मिला था, जो मम्मट के पहले के हैं। स्वयं मम्मद ने यह चेष्टा की है कि यह समझ में न आए कि उनने कुन्तक और महिमभट्ट से भी कुछ लिया है। जब कि उनका सप्तम उल्लास महिमभट्ट की ही देन है। कया यह कम स्वस्थ कम है। अवश्य ही कश्मीर में महिमभट्ट के व्यक्तिविवेक के द्वितीय विमर्श को मम्मट ने दफना दिया था। उसकी रक्षा का श्रेय दक्षिण को ही है। यह भी सोचने की बात है कि अलंकारों पर सवस्व, रत्नाकर और विमर्वनी में बिखरी सामग्री को लेकर कया कोई कार्य कश्मीर में नहीं हो सकता था, जिसे दक्षिणी आचार्य अप्पयदीक्षित ने पूरा किया जिनकी मूलविद्या मीमांसा थी। कइमीरी शैवशास्त्र की शुद्धपरम्परा भी दक्षिण में ही रक्षित मिलती है। श्रीविद्याचकवर्ती, त्रिपुरारहस्य के टीकाकार दीक्षित श्रीनिवासबुध दक्षिण के ही हैं। इस प्रकार परमपरा की हष्टि से कश्मीर की अपेक्षा दक्षिण ही जविक मान्य है। यह भी एक महत्व की बात है कि अप्पवदीक्षित की परम्परा केवल दक्षिणी परम्परा नहीं है। वे काशी में भी रहे थे। अतः उनके संस्कारों में अन्तर्वेदी की १. हमने अपने ग्रन्थ 'आनन्दवर्धन' में इन सब दोषों का प्रतिपादन किया है।
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मध्यदेक्षीय परम्परा के संस्कार भी मिश्रित हैं। फलतः अप्पयदीक्षित के उल्लेख को मध्यदेश से लेकर दक्षिण भारत तक का प्रतिनिधि माना जा सकता है। उधर कश्मीरी परम्परा मे सर्वाधिक महत्त्व जयरथ को दिया जा रहा है, किन्तु उन्हें सवस्व की पुस्तक बहुत ही अव्यवस्थित रूप में प्राप्त हुई थी। वे स्वयं लिखते हैं कि 'उन्हें मिली प्रति बहत अध्यवस्थित है'। कपा अव्यवस्थित आधार पर कोई निर्णय लिया जा सकता है। यह भी ध्यान देने कीबात है कि निणयसागरसंस्करण से लेकर डॉ. रामचन्द्र द्विवेदी और डॉ० जानकी के सुसमीक्षित संस्करणो तक रुम्यकपरम्परा के किसीभी संस्करण की पुष्पिका मे र्य्यक का नाम कयो नहीं है। अवश्य ही इन विद्वानो को रुय्यक के नाम की पुष्पिका बहुत ही कम पाण्दु्पत मे मिली है और वह भी अव्यवस्थित। पूना की शारदा लिपि की जिन दो प्रतियों मे रचक के नाम से पुष्पिका मिलती है उन दोनो मे भी पाठमेद है। वे दोनों पुष्पिकाएँ ये हैं- १- समापितमिदमलकार सर्वस्वमिति श्रेयः । कृतिस्तन्न मगवद्राज्ञान करव्य कस्येति। २-सम्पूर्णमिदमलंकारसर्वंस्वमिति श्रेयो भचनुर। हेसकपाठकयो। कृती राजानक्ख्य्यकस्येति। द्वितीय पाठ की प्रति भूजंपत्रप्रति है और प्राचीन है। उसमे रुय्यक का नाम अवद्य ही प्रतिलिपिकार ने जोडा है। एक महत्त्व की बात यह भी है कि प्रथम पुष्पिका वाली प्रति मे अलंकारसर्वस्व के सूयों को अलग से भी लिखा गया है और उनको नाम दिया गया है 'सर्वस्वालंकारमूवाणि"। अवद्य ही लेखक ने सवस्व को सूयग्रन्थ से भिन्न ग्रन्थ माना है। इससे भी मूतग्रन्थ के 'अलंकारसून' नाम से प्रसिद्ध होने का संकेत मिलता है। एकमात शारदालिपि की प्रतियो पर ही हम पूर्ण निर्भर नही रह सकते, व्योंकि दक्षिम भारत में जो प्रतियां बनी होगी उनका सूछ्र आधार भी अवध्य ही कश्मीरी लिपि की ही पुस्तकें रही होगी कयोकि कश्मीर मे बना मूत ग्रन्थ कशमीर की लिपि मे ही लिखा गया होगा। जहां तक सहृदयलीला की पुष्पिका क सम्बन्ध है उसमे अवश्य ही रूम्पक को अलंकारसरबस्व का प्रणेता वहा गया है परन्तु उससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि मंख स्वस्व के प्रणेना नही हैं। रम्यक अलकारसवंस्व के आधारभूत सूत्रो के प्रणेता होने से अलंकारसषंस्व के प्रणेता माने हो जा सकते है कयोकि यहा अलकारमर्वस्व शब्द का अर्थ है वह पूरी ग्रन्थसंहिता जो सूत्र, वृत्ति और उदाहरण से बनती है। कहा जा चुका है कि वकोकिजीवित नाम केवल वृत्ति का है, विन्तु वह प्रयुक्क होता है उसके काव्या- लंकार नामक मूल कारिकाग्रत्थ के िए भी। जहां सूत्र और वृत्ति मे मतभेद नही होता वहाँ सिद्धान्त को सूत्रकार के नाम पर ही व्यवहृत किया जाता है। १. द्र० पृ० २२४, २८९, ४६४। १२-३. डा० द्विवेदी की संजीविनीभूमिका।
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यह भी विचार करने की बात है कि पिशेलसंपादित सहुदयलीला की पुप्पिका में कुथ्यक को जो 'रूचकापरनामा' और 'अलंकारसर्वस्वक्ृत' विशेषण दिए गए हैं, ये र्वयं ब्रन्यकार ने दिए हैं या लिपिकार मे जोड़े हैं। निर्णयसागरसंस्करण में विशेषणरहित पुष्पिका भी [काव्यमा० ५]। इससे स्पष्ट है कि इसमें प्रतिलिपिकार ने भी कुछ अन्तर किया है। यह अन्तर पुष्पिका की प्रामाणिकता को संदेह में डाल देता है। वृतिकार ने साहित्यमीमांसा और व्यक्तिविवेकव्यास्यान को अपनी कृति कहा, उनमें भी किसी ग्रन्यकार का नाम नहीं है। ऐसा क्यों ?
ये सब तर्क अपने स्थान पर हैं। इनसे जो भी सिद्ध हो। परन्तु स्वयं सत्य के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि सूत्रकार भिन्न हैं और वृत्तिकार भिन्न। जो वृति अभी प्राप्त है वह सूनकार की नहीं कही जा सकती। प्रमाणार्थ 'पुनवकवदाभात' प्रकरण को लीजिए। यह शब्दालंकार प्रकरण में पठित है, किन्तु वृत्तिकार ने इसे अर्धालंकार माना है। जब कि स्वयं वृत्तिकार, संजीविनीकार और सभी संस्कर्तानों ने वर्यालंकारों का आरम्भ उपमा से माना है, क्योंकि प्रत्येक संस्करण में उपमा के आरम्भ में 'अर्धालङ्कारप्करणमिदम्' लिखा मिलता है। वृत्तिकार को यह भ्रम इसलिए हो गया कि सूत्र में इस अलंकार को अर्थपीनसवत्य पर आधित बतलाया गया है। वस्तुतः सूत्रकार का कहना यह है कि प्रतीत तो अर्थ ही होता है पुनः कषित रूप में, किन्तु उसका कारण है शब्द, अतः उसे माना जाना चाहिए शब्दालंकार ही, जैसा कि उसके प्रवर्तक उद्हट और उनके अनुयायी मम्मट ने माना है। पुनरुततवदाभास की इस स्थिति पर ध्यान देने से यह भी प्रतीत होता है कि आशयाशयिभाव और अन्वयव्यतिरेक के द्न्दु में सूत्रकार अवश्य हो अन्वयव्यतिरेक पक्ष के है। आाथमाश्नयिभाव केवल वृत्तिकार का पक्ष है। यदि सूभकार भी इस पक्ष के होते तो पुनरकवदाभास को अर्थालद्वारों में ही गिनते शब्दालद्वारों में नहीं, क्योंकि पौनसवत्य का आश्रम तो वस्तुतः अर्थ ही है, शब्द तो उसमें कारण है। इस प्रकार तो लाटानुप्रास को भी समया- लंकार मानकर किसी पृथक प्रकरण में रखना चाहिए था क्योंकि वह उभयाशित है। पुनरुकवदाभास बब्द को सून्रकार ने नपुसकलिंग में रखा है। वृत्तिकार उसका आशय नहीं समझ पाए। वे जो हेतु देते हैं वह वहुत ही अवज्ञानिक है। उनका कहना है कि इसे नटुंसकलिंग में इसलिए रखा है कि उससे लौकिक अलंकारों से काव्या- संकारों का अन्तर सिद्ध हो जाए। कया काव्यगत पदार्थों को लौंकिक पदार्थों से भिन्न दिसलाने के लिए नपुंसक बनाते हुए राम, युधिषिर और अपने आश्रयदाता जयसिंह को मंख नपुंसक लिस सकते हैं? यह भी कोई त्क है ? वस्तुतः सूप्रकार ने 'पोनरुकत्यम्' पद को दृष्टि में रखकर उसके अनुसार इस शब्द को बहुन्रीहि समास के द्वारा नमुंसकलिगान्त बनाया है। ऐसा ही उद्हट ने भी किया है। उन्होंने उसे पद का विशेषण माना है। पद शब्द नपुंसकलिंग ही है।
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सूत्रकार ने ध्वनि या गुणीभूतव्यग्य के लिए कोई सूत्र नहीं लिसा, जब कि पोनरुत्य के अनेक सूत लिसे भूमिका रूप में ही। वृत्तिकार बडी लम्वी भूमिका रचते और वह भी सभी अलकारो को चिनकाव्य वर्ग मे रखने के लिए। वस्तुत वे मम्मट के चर्मे से सूत्रो को देख रहे हैं। सच यह है कि चित्रकाव्य नाम का कोई काव्य होता ही नहीं। ध्वनिकार ने यही कहा है। वे केवल ध्वनि को काव्य कहते और उसके नीचे अप्रधान व्यंग्य वाली उक्ति को भी काव्य फोटि मे गिन लेते हैं गुणीभूतव्यंग्य नाम से। उसके बाद जो उकियां बच जाती हैं उन्हें वे अकाव्प कहते और उनमे काव्य जैसी स्थिति मानते हैं, काव्यत्व नहीं। सभी अलद़ारो को उन्होंने गुणीभूत- व्यग्य वर्ग मे ही अन्तर्भूत दिखलाया है। सूनकार अवश्य ही ध्वनिकार के इस पक्ष को जानते होंगे, इसलिए उन्होंने इस प्रकार के कोई भूमिका-मूय नहीं लिखे। सूभकार के समक्ष आनन्दवर्धन और मम्मट के मतभेद उपस्थित थे। वे मम्मट से आनन्दवर्धन की अधिक महत्व देते रहे होगे, कयोकि उन्होंने काव्यप्रकाश पर बहुत वडी टीका नहीं लिखी और जो लिसी उसमे भी मम्मट का खण्डन किया। यहाँ सूत्रो मे भी मम्मट के काव्यप्रकाश के साथ सिद्धान्तभेद है। इसके विरुद्ध वृत्तिकार मम्मट के ही भक्त प्रतीउ होते हैं। ८३ तथा ८४ वें सूभो का मूलरूप भी वे समझ नही पाए। इस प्रकार सून्रकार अवश्य ही इस वृत्ति के रचयिता से भिन्न हैं।
कदाचिन् इसीलिए अप्पयदीक्षित ने वृत्ति की सम्यक के नाम से प्रस्तुत नहीं किया। पण्डितराज जगलाथ 'अलङ्धारस्वस्व' की अपेक्षा 'सम्यक' या 'रचक' िसना अधिक सुकर समझते, यदि उन्हें ग्रन्थकार के नाम का निश्चय होना। शोभाकर तो ग्रन्थ का भी नाम नही लैवे। कदाचित् उन्हें उसमे भी संदेह था। इस प्रकार कश्मीर से दक्षिण- भारत तक एक परम्परा संदेह की भी दिसाई देवी है। इसे सरलता के साथ रम्यक के विरोध मे साधक प्रमाण माना जा सकता है।
हमे लगता है रम्यक ने भी कोई अत्यन्त सक्षिप्त वृत्ति अपने सूननो पर लिखी होगी जिसके मंगल पद्य मे 'निजालकार०' पाठ होगा। बाद मे मंख ने और विस्तृत वृत्ि लिसी होगी और उसमे 'मुवलंकार०' के पाठान्तर के साथ रय्यक का ही पद् अपना लिया होगा । प्रदीपकार ने काव्यप्रकाश पर नई वृति लिखी ही है। इधर ध्वन्यालोक पर भी दीविति नामक नई वृत्ि लिखी गई है। इस प्रकार मंस द्वारा नई वृत्ति का लिसा जाना अस्वाभाविक नही। इस दिशा मे मंगल पद्य का 'तात्पर्य'-शब्द हमारी सहायता करता है। संप्रति जो वृति प्राप्त है उसमे मूत्रो का तात्पयं ही नहीं है, उनके प्रतिपाद्यो पर विशद विवेचन भी है और उदाहरणो द्वारा उनका समर्थन भी। यह तो वस्तुतः व्याख्या है। जिस वृत्ति मे तात्पर्यमाय दिया गया होगा उसे या तो मंख ने अपनी वृत्ति मे अन्तभूत कर लिया होगा या उसका प्रचार मंख की वृत्ि के बाद
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समाप्त हो गया होगा। जयरथ को मिली प्रति में कुछ अंग रव्यक की वृत्ति का और कुछ अंज मंख का मिला होगा, क्योंकि उनकी मूल प्रति अत्यन्त अव्यवस्थित थी। इस प्रकार संप्रति प्राप्त वृति के रचयिता मंस ही है और सूत् के रचयिता उनके गुरु रु्यक। त्रिवेन्द्रम् संस्करण में भी सूनों को 'अर्लंकारसून' ही कहा गया है और उनका रचयिता रुप्यक को ही चतलाया गया है। वृत्त्यनुमास के उदाहरण 'आटोपेन पटीयसा०' पद्य के पूर्व इसीलिए 'मदीये श्रीकणउचरिते' पाठ विवेन्द्रम् की प्रति में मिलता है। इसीलिए मंस की कृति श्रीकण्ठचरित के ओर भी ४ पद्य दृति में उद्धृत हैं। श्रीकणडस्तव् के जो पद्य पुनरुक्तवदाभास में उदाहृत हैं उनके पहले भी 'मदीये श्रीकण्ठस्तवे' यह अवतरणिका इस संस्करण में है। संभवतः श्रीकण्ठस्तव भी स्वयं मंस की कृति रही हो। शिष्य और गुरु दोनों मिलकर कोई एक ग्रन्थ लिखते हैं तो लेखक के रूप में नाम गुरु का ही चलता है। पाणिनि का 'तद्विषयता' का सिद्धान्त इसके लिए प्रमाण है। डॉ० व्यामसुन्दरदास और आचार्य पद्मनारायण जी ने मिलकर भाषारहस्य लिखा, किन्तु नाम डॉo व्यामसुन्दरदास जी का ही चल रहा है। हमने स्वयं कालिदास- शव्दानुकम डॉ० वासुदेवशरण जी अप्रवाल के निर्देश में बनाया तो उसकी प्रसिद्धि नभी भी अग्वाल जी के ही नाम से है। वताब्दियों तक वनते रहने वाले भरत- नास्यशास्त्र, महाभारत और पुराण क्या किसी एक व्यक्ति की कृति हैं, किन्तु प्रसिद्ध केवल भरत और व्यास के नामसे है। 'प्राधान्येन व्यपदेशा भत्रन्ति' इसीलिए कहा गया है। इसलिए भी मंख की कृति रव्यक के नाम से प्रसिद्धि पा सकती है। [४ ] ग्रन्थकारपरिचय सूत्रकार का परिचय- सून्कार र्य्यक को श्रीकंठचरितमें मंख ने अपना गुरु और सभी विद्याओं में निष्णात कहा है [सर्ग २५]। साहित्यवास्तर रुव्यक ने अपने पिता राजानक तिलक से ही पढ़ा था, जिनने उद्नट के काव्यलंकारवार पर विवरण नामक कोई व्याख्या लिखी थी, जिसका उल्लेख जयरय कई वार करते हैं। मंख के अनुसार रुय्पक ने अनेक ग्रन्थ लिखे थे। इनमें से फेवल काव्यप्रकाशसंकेतर तथा सहृदयलीला ही इस समय इनके नाम से प्राप्त हैं। स्य्यक रुचक नाम से भी प्रसिद्ध हैं। सहुदयलीला में इसे इनका दूसरा नाम माना गया है। रूचक संस्कृतशब्द है और रय्यक देशी। रुचक का अ्थ अवफो होता है। स्य्यक के व्यक्तिगत जीवन के विपय में इससे अधिक विवरण प्राप्त नहीं होता। अप्राप्त ग्रन्थों में अलंकारानुसारिणी [ पृ० ११८, १९२, १९२, १९९ पर १-२. काव्यप्रकाशसंकेत : काव्यप्रकाश के डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी कृत अंग्रेजी अनुवाद The Poetic Light भाग-२ परिशिष्ट में पुनः प्रकाशित। ३. काव्यमाला ग्रन्थमाला में सुच्छक-५ तथा इसी ग्रन्थ परिशि० १ में।
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बिर्मशनी मे उदवृत ] जहण के सोमपालविलास की टीका मानी जाती है। रत्नकण्ठ ने स्नुतिकुसुमान्जलि की टोका मे इसे व्य्यक की कृति कहा है। अलंकारमव्जरी (वृत्ति में पृ० ३७) तथा 'अलंकारवातिक' (बिम० मे पृ० २३८) भी सवस्वकार की कृति माने गए है। दोनों अप्राप्त हैं। पता नहीं यह सूत्कार की कृनि हैं या वृत्तिकार की। वृत्तिकार का परिचय- वृतिकार मख (१) मंख (२) मंखक तथा ( ३) मंखुक नाम से पुकारे जाते हैं। अपने श्रीकण्ठचरित मे इन्होने स्वयं को मखक (३६३, ७२, ७८, २५ सर्गं) अधिक बार और यम तत्र मंस (२५।११२,१५२) भी कहा है। मखुक नाम कदाचित् दक्षिण के मृदुताप्रिय उच्चारण की देन है, कयोकि यह 'समुद्रबन्ध' की टीका मे ही मिलता है। शीकण्ठचरित' के अनुसार मे र््यक के शिष्य नथा कश्मीरनरेश जर्मासह के आाश्रित थे। राजतरंगिणी इन्हे जयसिह का सान्धिविग्रहिक भी कहती है। जयसिंह का समय ई० सं. ११२८-११४८ है, अत मख और रुथ्यक दोनों का समय १२ बी शवी सिद्ध होता है। भद्भार, भृङ्ग और अलंकार (लंकक) इनके बडे भाई थे। दिता थे श्रीविश्वाव्त तथा पितामह श्रीमन्मथ। सभी परम विद्वान् थे।
कृतिया- मंख की कृतियों मे श्रीकण्ठचरित २५ सर्गों का एक प्रातिभ महाकाव्य है जो काव्य- माला से छप चुका है। व्यक्तिविवेकव्याख्यान (विर्मार्शनी मे पृ० ३५ पर उद्घृत) का तीसरा सरकरण हमारे हिन्दी अनुवाद के साय ११६४ मे चौसम्भा से छप चुका है। इसके पहले भी यह चौखम्भा तथा त्रिवेन्द्रम से छपा था। साहित्यमीमांसा, नाटकर्मामांसा', वृद्दती, हर्पचरितवात्तिक अन्य ग्रन्थ है जो अप्राप्म है। १. श्रीकण्ठचरित ३।६६ तथा सर्ग २५। २ सान्धिविग्रहिको मेखकास्योऽलकारसोदर.। स मठस्याभवत् प्रष्ट, श्रीकण्डस्य प्रतिप्वया ॥६म३३५४ राज० । ३-५ श्रीकण्ठचरित सर्ग-३, सभी भाइयो मे मंख ने अलंकार की बडी प्रशंसा की है। ६ निवेन्द्रमुसस्कृतग्रन्थमाला से छपी साहित्यमीमासा मे 'अंगलेखा०' पद्य पर वह विवेचन नहीं मिलता जिसके लिए सर्वस्व पृ० २०१ मे वह चल्लिखित है, अत. डॉ० राघवन् आदि इमे मंख की कृति मे भिन्न मानते हैं। विमर्शिनी-४६७ मे भी साहित्यमीमांसा का उल्लेख है और व्यक्तिविवेकव्यासयान मे भी। ७-८ व्यक्तिविवेक्व्यास्यान में उद्वृत । ९. व्यक्तिषिवेरुव्याल्यान तथा सर्वस्व मे उद्घृत पृ० २०१।
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विवेन्द्रमसंस्करण में 'श्रीकण्ठस्तव' को भी मदीय और मंखीय कहा गया है। यह प्रथमनृत्तिकार सव्यक की भी कृति ही सकती है। विरुद्ध प्रमाण मिलने पर इन ग्रन्थों के निर्माता पर पुनर्वविचार किया जा सकता है।
मम्मट से परवर्ती- काव्यप्रदीपकार गोविन्द ठकुर और वामन झलकीकर आदि की यह धारणा है कि काव्यप्रकाश में श्लेप सम्बन्धी जो शास्त्रार्थ नवम उल्लास में मिलता है उसमें सण्डम सर्वस्व के मत का है। वस्तुतः सर्वस्व में काव्यप्रकाश की 'अलङ्कारोज्य वस्त्वेव' कारिका इलेष प्रकरण में उद्धत है, साथ ही विभावना तथा संसृष्टि प्रकरण में मम्मट की ओर संकेत किया गया है। इस कारण मम्मट ही पूववर्ती है। पण्डितराज के प्रत्यनीकालंकार से भी संकेत मिलता है कि वे सर्वस्वकार को मम्मट के बाद का मानते हैं।
[५] टीका तथा टीकाकार अभी तक स्वस्व की तीन टीकाएँ ही प्रकाश में आई है विर्मानी, समुद्रबन्धी तथा संजीविनी, यद्यषि इसकी और भी कुछ टीक्ाएँ थीं। इनमें (१) संजीविनी- श्रीविद्या-चकवरतीं की टीका है। कहा जा चुका है कि इसके १९६५ में दो संस्करण हुए हैं। श्रीविद्याचकवर्ती का पूरा नाम श्रीविद्याचकवर्ती ही है। श्रीचत्रवर्ती ने स्वयं को महान् विद्वान्, साधक और हासेल नरेश वल्लाल-३ का सभापण्डित कहा है। वल्लाल-३ का राज्यकाल १२९१-१३४२ ई० है। अतः श्रीचकवर्ती १४वीं शती के मध्यवर्त्ती सिद्ध होते हैं। श्रीचक्रवर्ती ने प्रत्येक अलङ्वार पर अन्त में संग्रहकारिका भी बनाई हैं। ये 'निष्कष्टार्थकारिका' नाम से अलग भी संगृहीत मिलती हैं। (२) समुद्रबन्धी- समुद्रबन्ध केरल प्रदेश के यदुवंशी महाराज रविवर्मा के सभापण्डित ये। रविबर्मा का समय १२६५ ई० है। अतः श्री समुद्रबन्ध को १३वीं शती के उत्तरार्ध का माना जाता है। ये उत्तम कवि थे। अपनी टीका, जिसका नाम कदाचित् विवरण है, के आरम्भ मैं इन्होंने जो मंगल पद्य दिए हैं उनसे लगता है कि इन्हें अभिव्यक्ति की उत्तम सूक्ष्मता, उत्तम सटीकता और उत्तम प्राम्जलता लगभग शिंग भूपाल के ही समान प्राप्त थी। (३) अलक- रत्नकण्ठ ने स्तुतिकुसुमांजलि की टीका में सर्वस्व के टीकाकार के रूप में अलकभट्ट का भी उल्लेख किया है। यह टीका प्राप्त नहीं होती अतः इसके रचयिता अलक के परिचय के विषय में इतना ही कहा जा सकता है कि ये काव्यप्रकाश के दशम २ अ० भृ०
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उल्लास के पूर्तिकर्ता अलरू से भिनन हैं, कयोकि इन्होंने काव्यप्रकाश पर टीका लिखने वाले रय्यक के इस ग्रन्थ पर टीका लिसी है। (४) विमर्शिनी- इसके रचयिता जयरथ हैं। विर्माशनी के अन्त मे जयरथ ने अपना सक्षिप्त परिचय दिया है। ये सतीसर के समीपवर्ती कशमीरनरेश राजराज के मन्न्री शृङ्गार के पुत्र थे। शृंगार का पूरा नाम शृगाररथ था। श्रीतन्त्रालोक की स्वरचित टीका के अन्त मे जयरथ ने अपनी र वशावली इस प्रकार दी है- १-पूर्णमनोरय [१३० ई० के कश्मीरनरेश मशस्कर के मन्त्री ] २-उत्पलरथ प्रथम ३-प्रकाशरथ ४-सूयरथ' [भाई धर्मरथ, उत्तमर्य, मनोरथ ] प-उत्मलसथ' द्वितीय [भाई अमृतरय अन्य दो भाई अनुख्विखितनामा, १०२८-१०६३ ई० तक के कश्मीरनरेश अनन्त के माश्रित ] ६-सम्मरय [भाई शिवरथ, शकरथ, नन्दिरथ, इनमे से शिवरथ विरक्त हुए] ७-गुणरय' [भाई देवरय] 5-राजानक गुड्गरय [भाई लङ्बरथ पत्नी सत्वदाशषी] १-प्रृङ्गाररथ' [शृद्धार के जन्म के बाद गुगरय का शरीर यौवन में ही छूः गया] १०-जयरय' [भाई जयद्रथ ] राजतरंगिणी मे प्राप्त कश्मीरी राजाओ की सूची मे राजराज नाम का कोई राजा नहीं मिलता, अत विद्वानों ने उसे राजदेव नामक राजा से अभिन्न माना है, जिसक। समय १२०३-१२२६ ई० है। उधर जयरय ने पृथिवीराजविजय का [पृ० २११ ] सल्लेख किया है जो ११९३ ई० मे दि्वगत अन्तिम भारतीय हिन्दू सम्राट् पृथिवीराज पर लिखा गया संस्कृत महाकाव्य है। फनतः जयरथ का समय १२वों बती के अन्त से लेकर १३वी पती के मध्य तक स्थिर होता है।
१. तन्त्रालोक आहिक २७ उपसंहार-द २-३. वही पद्य९, ४ वही पद्य १०, ५. वही पद्य ११, ६ वही पद्य १९, ७. वही पद्य २३, म. वही पद्य २५, ३६, ९ वही पद्य २६, १०. वही पद्य ३६,
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जयरथ के विद्यागुरु थे श्री शंखधर [ तन्व्रालोक प्रथमाह्निक अन्तिम पद्य ] तथा श्रीसंगरथ और दीक्षागुरु श्री सुभटरल, जो त्रिभुवनदत्त के पुत्र तथा श्री विश्वदत्त के पौत्र थे। सुभटरत इनके पिता श्रीशृङ्गाररथ के भी दीक्षागुरु थे। जयरध ने बहुत कुछ अपने पिता से पढ़ा था। वैवागम, कमदर्शन तथा कुलदर्शन के ये अद्वितीय विद्वान् औौर विशेवज्ञ थे, अन्य शास्त्रों में तो निष्णात थे ही। इन्होंने अभिनवगुप्त के आकरग्रन्थ श्रीतन्त्रालोक की व्यात्या लिखी है और अन्त में अपने परिचय में लिखा है- 'पदे वाक्ये माने निखिलशिवशासत्रोपनिषदि प्रतिष्ठा यातोऽहं यद्पि निरवह्य जयरथः। तथाप्यस्यामङ् कवचन भुवि नार्ति न्निकहशि, कमार्थे वा मतत सपदि कुशल कश्चिदपरः॥5 - यद्यापि में जयरथ, व्याकरण, मीमांसा और तर्कशास्त्र के साथ संपूर्ण शैवशास्त्र में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका हूँ तथापि तरिकदृष्टि और कमदर्शन में मुक्ष से अधिक कुशल पूरी पृथिवी में कोई नहीं है।' क्या ही प्रगाढ आत्मविश्वास प्रकट किया है इस विद्वान् ने अपने वैदुष्य के प्रति। कभी कभी यह घातक भी वन जाता है। विद्वानों की राय है कि तन्नालोक की व्याख्या में भी जयरथ ने अनेक स्थानों पर औ्ौढिवाद से काम लिया है और मूलविरुद्ध निष्कर्ष निकाले हैं। विर्माशनी में भी वे इसी प्रकार कहों से कहीं पहुंचते दिखाई देते हैं। किन्तु इसमें संदेह नहीं कि जयरथ एक महान् विद्वान् और परिश्रमो लेखक हैं। जयरब की दूसरी आलंकारिक कृति है अलंकारोदाहरण। इसका पाण्डुग्रन्य पूना में सुरक्षित हे और उसके आधार पर इसका विवरण डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी ने अलंकार- मीमांसा में प्रस्तुत कर दिया है। इस विवरण से स्पन्ट है कि जयरथ ने सर्वस्वकार और शोभाकर के झगड़े को निपटाते-निपटाते ठीक उसी प्रकार स्वयं भी एक अलंकार- शास्त्रीय ग्रन्थ लिख डाला जिस प्रकार काव्यप्रकाश की टीका लिखते-लिसते र्य्यक ने अलंकारसूत्र, विश्वनाथ ने साहित्यद्पण और पण्डितराज ने रगंगाधर।जयरय ने इस न्रन्थ में शोभाकर के मनेक अलंकार स्वीकार कर लिए हैं। क्रियातिपत्ति, वितर्क, विपयंय, उदाहरण, निश्चय, आदर, भृङ्गला, प्रसंग, समता, तुल्य, वैध्म्य, परभाग, उद्रेक, विधि, प्रतिप्रसब, तन्न्र, प्रत्यूह, विवेक-इनमें उल्लेखनीय हैं। कुछ अलंकारों की कल्पना जयरथ ने स्वयं को है। तात्पर्य, अंग, अनंग, अप्नत्यनीक, अभ्यास, अभीष्ट, ऐसे ही हैं। विमशनी का पूर्ण नाम अलंकारविमशिनी है। इसे टीका न कहकर भाष्य कहना चाहिए। सैकड़ों नवीन ललित और उपयुक्त काव्य-पद्यों को उद्धृत करते हुए ग्रन्थ के १. तन्त्रालोक ३७ मह्िक के अन्त के परिचयपद्य-४१ २-३. वही पद्य ३५ ४. वही पद् ४७
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सकेतात्मना निर्दिष्ट अंधो को सोदाहरण विगद करना कम प्ररिश्रम का कार्य नहीं है। विमशिनीकार इस दृष्टि से एक आश्चर्यकारिणी मेधा के धनी है। ग्रन्थ के उदाहरण मे जहाँ इन्हे मक्षमता दिखाई देती है वे तुरन्द अपनी ओर से कोई उदाहरण पद्य उपस्थित कर देते हैं। उन्हें साहित्य सप्रदाय का ज्ञान है, अतः दे मम्मट पर किए कटाक्षो को समझते और स्पष्टीकरण के लिए मम्मट का नाम प्रस्तुत करते हैं। विमर्शिनीकार को अपने व्यास्येय मूलग्रन्थ के प्रति आदरवुद्धि है [ अविघययोक्ति २२४-५ ] वे उसे प्रतिपक्ष के आक्रमणो से बचाते और अपने तरकों से प्रतिपक्ष का उत्तर देने मे पूरे संरम्भ के साथ जुटते हैं। विर्भाशनी का चिन्तन ही वह मूल है जिससे अप्पयदीक्षित को चिश्रमीमासा और कुवलयानन्द लिसने की प्रेरणा और ज्योति दोनो मिली तथा पण्डितराज जगनाथ को अपना अति प्रौढ़, रसगंगाधर। ये दोनो महान् विद्वान् सर्वस्व, विमर्शिनी और रतनाकर को पदे-पदे उद्धृत करते चले हैं। साहित्यशास्त्र बडा भाग्शालरी शास्त्र है जिसे इतने बडे विद्वानों ने अपनी चतुरस् विद्वता के निर्मल चतुप्पप पर चहुंओर दृष्टि फेलाकर अवधानपूर्वक बडे परिशम से सीचा। उद्धट, वामन, आनन्दवधंन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, महिमभट्ट, भोज, मम्मट, रम्यक, शोभाकर, जयरथ, अप्पयदीक्षित, पण्डितराज जगन्नाय-सभी शास्त्रो के अप्रतिम विद्वान् थे। विद्व के अन्य किसी वाड्मय में काव्यशास्त्र को कदाचित् ही इतने बडे विद्वानो का इतनी बडी संख्या मे इनने लम्वे समय तक योगदान प्राप्त हुआ होगा। विमर्शिनी ऐसी प्रासादिक रचना है कि अकेली यही अभ्यस्त हो जाए वो पाठक चनुरस्र पाण्डित्य का धनी बन सकता है। इसमे आए गम्भीर विवेचन यहाँ उद्धरण की अपेक्षा नही रखते। जहाँ वही पुस्तक खोली जाएगी यह विशेषता प्कट हो जाएगी। अलकारविमशिनी मे जयरथ ने अलकारभाय्य [११८, १५३ ] और अलंका रसार, [३६१, ७३७ ] नामक ऐसे दो ग्रन्थो को भी उद्धृत किया है जिनमैं अलंकारो का और भी विशद विवेचन था, किन्तु जो इस समय प्राप्त नही हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐमी कारिकायें भी उद्धृत की हैं [पृ० २५] जो ध्वनिविरोधी तथ्य प्रस्तुत करती हैं। 4 ये जिन ब्रन्थो की हैं वे अवश्य ही अवीव महत्त्व के ग्रन्थ रहे हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे पूर्वजो ने, विशेषस ध्वनिवादी आचार्यों और उनके अनुयायियो ने अपने विरोध को पनपने नही दिया। जो उदारतावादी थे उन्हे मर्यादावादी चिन्सको ने उत्पथगामी माना और अपने श्रद्धेप के विरुद् आदर देना उचित नहीं समझा। अन्य.टीका- जयबथ ने 'अन्ये' [पृ० ६०३] कहकर किसी आदरणीय या अन्य किन्हीं सम्मान्य विद्वानों की ओर भी सकेत किया है। अवश्य ही जयरथ के समय तक वे सवस्व पर अनेक कार्य हो चुके होगे।
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हमारा संस्करण हमारा यह संस्करण मुख्यतः निर्णयसागरीय संस्करण पर आधृत है। हमने इसमें मूल सर्वस्व [सूभ तथा वृत्ति] तथा उसकी टीका विमर्शिनी दोनों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मूल का हिन्दी अनुवाद डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी भी कर चुके थे, किन्तु विमशिनी का अनुवाद अभी तक नहीं हुआ था। टीक का अनुवाद मूल के अनुवाद के विना आधारहीन प्रतीत होता अतः हमने मूल का भी हिन्दी अनुबाद करना आवश्यक समझा। यह भी सरल कार्य न था। मनेक स्थलों में संविग्धता थी। हमने वहाँ पं० रामचन्द्र द्विवेदी का अनुवाद देखा। उससे कहों हमें सहायता मिली, कहीं उनके संदेह दूर हुए। अनुवाद के पहले विषय के अनुसार मूलपाठ का निर्धारण आवश्यक था। हमने यथासाध्य वह किया है और पाठक यह जानकर प्रसन्न होंगे कि उक्त पाँचों संस्करणों में जो संशोधन छूट गये थे उन्हें हमने छूटने नहीं दिया है। उदाहरणार्थ चौये सून्न को लीजिए। इसे निर्णयसागरीय, त्रिवेन्द्रमीय और वाराणसेय संस्करणों में वृत्तिरूप में छापा- गया या। १९६५ के दोनों नए संस्करणों में भी वह वृत्तिरूप में ही छपा रह गया। हमने उसे सूत्र रूप में ही छपवाया है, अब कि संजीविनी ने भौ इसे सूध ही माना है। ग्रन्थसंगति भी उसके बिना संभव न थी। ५ तथा ६ सूनों में शब्दपोनरलय के प्रथम भेद की चर्चा है। यदि उत्त सूच को सूत्र न माना जाए तो 'प्रथम' का अर्थ नहीं लगाया जा सकेगा। इसी प्रकार पर्यायालंकार के लिए निर्णयसागर तथा मोतीलालबनारसी- दास दोनों के संस्करणों में दो-दो सूत्र छपे हैं। वस्तुतः उनमें से द्वितीय सूय, सूत्र नहीं, दृत्ति है। हमने उसे वृत्ति रूप में ही छपवाया है। उसे डॉ० राघवन् ने भी वृत्ति ही माना है, किन्तु चतुर्थ सूत्र को भी दृति मान लेने से उनकी सूत संख्या ६६ ही रह गई है। डॉ० द्विवेदी के संस्करण में सून संख्या ८७ ही है, जो सही है, किन्तु वह संख्या पर्याय के लिए दो सूत्र मानने से आई है। अपने संस्करण में हमने इसे ठीक कर दिया है। निणयसागरीय संस्करण में व्याघात के द्वितीय सूत्र के लागे व्याघातः सूत्र में ही छपा हुआ है। वस्तुतः वह वृत्ति है और उसके आगे अनुवृत्तिसूचक 'इत्येव' अन्य संस्करणों में प्राप्त है। हमने उसे वृत्ति ही माना है। सारालंकार के सूत्र में सार के स्थान पर 'उदार' पाठ निर्णयसागरीय संस्करण में छपा हुआ है। पाठान्तर में वहाँ सार ही पाठ या। अन्य संस्करणों के ही समान हमने भी इसे सार ही माना है। वृत्ति में भी पर्याप्त संशोधन करना पड़ा है। निम्नलिखित तालिका से संशोधन का आभास मिल सकेगा- पृष्ठ निर्णयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ ८ द्विविधमपि ननिविधमपि ६ ९ प्राधान्यं च काव्यस्य प्राधान्यं च [काव्यस्य] २१
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पृष्ठ निर्णंमसागर संस्करण प्रस्तुत सस्करण पृष्ठ
१३ स्वरूपेण विदितत्वात् स्वरूपेण विचार्यत्वा २७
१५ लिद्धितया लिंगवया ३५
१९ शब्दस्याप्रवीता० चन्दस्य प्रतोतो ४४
इहेति शब्दप्रस्तावे इहशब्द प्रस्थाने ४४
२४ 'शब्दपोनववत्यं'-इत्यादि वृत्ति 'मब्द पौनसवत्य'-सुत्र ६० इति ट्वैविध्यमेव स्वरव्यन्जनसमुदायपौनरुवत्यं च इति द्वेविष्यमेव। ६०
२८ बुम-इत्यवेहि अवाव्जपतनयने नयने निमील्येत्यादी ब्रूम-इत्यवे-इत्यादो ७१
५२ आतुरम्य आत रस्म १३६
६० यदत् वस्तुतस्तद्वपताया. यन वस्तुत० १५८
६१ पुथुम्रसि गुरुवंचस्ति पृथुरुरसि १५९
७५ इत्यादायुदाहृतस् इत्यत्रोदहुते १९७
लोक्य मानास्ता लोप्यमानाज्ञा २०६
मन्र चाविशया अतश्चा २२९
११ •विवतित्वादु० निववितत्वादु २४३
१४ वस्तुतः शबदस्य वस्तुशब्दस्य २५५
१०६ भावोऽशोभनत्वम् भाव: शोभन० ३०६
11 च तदन्यनिवृत्ती चान्यनिनृसी ३०६
१०२ ततरच तच्च ३१५
भावात् त्रिधा भवत् मिधा ३१५ नायकनायिकास्यध मंर्विशिष्टयो ११० केशपाशान्तिवृन्देव केशपाशालिवृन्देन ३१७
१११ प्रिव किल विचिकल ३१७
११६ व्यापारविपयतो व्यापारविषयीकृतो ३२८ ११७ नायकत्व स्वरूपेण नामक स्वस्वरूपेण
१३४ कि मामालप कि मा नालप ३८४ १४८ सातिशयात् कोपजनकतवादि: सातिययो मरणशहोप० ४३० १७६ श्रीहपंप्रस्थापने शरीहर्पाप्रस्थाने ५१= २२३ अभिमानेन सा योकिर्जान अभिमाने च सा योज्या ६७४
प्राय यही स्थिति विमर्शिनी की रही है। उसमे भी पर्याप्त संशोधन करना पडा । इमके भी कुछ स्थल-
पं० पृष्ट निर्भयसागर प्रस्तुत संस्करण मृष्ट
नीचे से ५ २ विमर्पिणीकार: X
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पं० पृष्ठ निर्णयसागर प्रस्तुत संस्करण नीचे से १ २ तात्पयमुच्छत इति। अस्या- पृष्ठ 9तात्पयमुच्यत भिप्राय :- तथा च इत्यस्या-भिप्रायः । तथा च
९ इत्युपचारवकतादीनां इत्युपचारवक्ता आदि- पदेन करिया-वक्रता- दीनां २३ १० १४ ननिविवस्तथापि तेन०० त्रिविधस्तयापि [तेन००] मुख्यत्वेन मुख्यत्वेन ३२
२१ कार्याथेने कायार्थेन ५२
२ २३ उपमितार्थादिवादि उपमिसार्थादिवाचि ५६ तथात्वानुपपतेः तयात्वोपपतेः 9 नौचे से १ वारण-रणरणिका० वारण-रण-रणरणिका ३२ तत्सादृश्यत्व सदशत्व नोचे से १० ३६ उपमानत्वेनोपात्ता उपमानत्वेन नोपा ९२
९ ३९ कल्पिते नैव कल्पितेन तेनैव १००
४२ स्मतृंदशायमतीतत्वात AY
कतूं ११०
१० ४४ युक्तम् युक्तत्वम् ११६
११ अपह्ने ११ 13 अनपह्नवे ५-६ ५६ आन्तिसद्वाव भ्रान्तिमच्छब्द १५२
३ साहृश्य निमितं साहश्य निमित्तकत्वमेव १५३
६ ५९ स्वातन्तर्येण आखण्डयेन १६१
६१ विभावस्य विभागस्य नीचे से १ ६३ नापहतेहिं अपहुतेहिं १७१.
१ ६७ चन्द्रादेवृत्त्यभाचो चन्द्रादेरवृत्त्यभावाद् १७५
नीचे से म नयनुद ननु यद १७८
लक्ष्मीसीन्दर्या लक्ष्मीसोदर्था १७९
४ स्फुटत्वे तत्कान्ता स्फुट त्वेतत्कान्ता १७९ 37 नीने से ६ ६६ विशेपासत्सा मान्यवर्कोपि •विशेपातसं शयप्रकार- स्तर्क: १८४
पक्षान्तर-संस्पशं पक्षान्तरासंस्पक् १८४
१. मूल में संशोधन झूट गया है।
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नीचे से पं० पृष्ठ निणंयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण ृृष्ठ ४ 1 सशमो ह्यतिशयितोभया संशयो ह्वनियतोभया १३ ६९ निमित्तसामर्थ्यात् निमित्त तत्सा० १८६
१४ ॥ विषयप्रतीते दिपायप्रतीते:
१६ , विषये प्रतीति विपयिप्रती०
१२ ७० विषय दार्स्बेन विपर्यि दार्ढ्घैन
नीचे से ३ ८६ लडहत्वादीनामित्यादि- लडहत्वादीनामिति। शब्दाद्विव तनोच्छाया एव आदिशन्दाद् वर्तनच्छाया एवं २२७ न्नाथमिति। एवत्प्र० •नार्थमित्येतत्प्र० = १२ प्रस्तुतस्य विनान्येन प्रस्तुतस्य तु नान्येन २४४ विशेषाभिदित्मया EX पाठान्तर-विशेपानभिधितस्या विशेषा भिधित्सया २५६ ४ १६ वक्तृ प्रतिपत्त्रो २५७ वकतृप्रतिपत्त्यो: ५ ९६ तस्यापीति तस्यापीति [सामान्य- धमस्यापीत्यथ. ] २६४
नीचे से ३ ९८ प्रतिपाद्येन, प्रतिपाद्य तेन प्रातिपद्येन २७१ (पाठान्तर) ४-५ १०४ कार्यकारणयो. प्रति नियमस्य कार्यकारणयो प्रति- विपर्यंयस्तृत्यकालत्वा दिनोकतेः नियमस्य करमस्य (अथ प कार्यकारणवत्प्रति- विपयंयस्तुल्यकाल- नियमस्य कमस्य विपर्ययस्तु- त्वादिनोके। २१९ ल्यकालरवादिनोके। ६ तत्रेति निर्धारणे। मस्यामनु० तत्रेति निर्धारणे। [कार्यकारणपतिनियम- विपर्मभरूपेति ] अस्यामनु २९९ १२ विशेयणपरिहारेण विरेपपरिहारेण ३०२ नीचे से द ११२ समासोक्ताया मुपमाया ३२० १२६ उत्पापनमिति उस्थान मिति ३६१ दुवलत्वादा (भावान्नान्य) दुर्वलत्वादा- वाध्यत्व० वाध्यत्व ३६१ त्त् सवंजनविरुद्ध० तव स्ववचनविरुद्ध ३६२
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पृष्ठ निर्णयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण नीचे से ५ पृष्ठ १२७ वाोत्पत्ावपि वाघोत्पत्ति:, अपितु $60 नीचे से ४ पश्चाद्विरोधधीः पश्चादविरोधधी:
नीचे से १२१ असम्वदत्ा० सम्वनत्वा० ३७२ २ नायिकाख्शिनो: नायिकानिशयो: ४ १६१ नीचे से व्याजोको चत्वार: प्रकारा व्याजोक्तौ चोतर: विध्यन्ते प्रकारो विद्यते ३७४ नीचे से २ १३४ अप्रस्तुतात कारणात् प्रस्तुतस्य अप्रस्तुतात् कार्यात् कार्यस्य प्रस्तुतस्य कारणस्य ३८५ १ १३५ कार्ये प्रस्तुते कारणस्था० कारणे प्रस्तुते कार्यस्य २६६ १-२ १३७ सारूप्येण साधर्म्योदाह- साधर्म्येण सारूप्यो रणानां दाहरणानां ३८९ ३ 11 वाक्येनेति निश्चिनुमः वाक्येन [मतिदेवश] इति निश्चिनुम: नोचे से १४० संपद्धरण संपद्वरण ४०१ ح १४९ निपेधस्येव भासनाव् निषेधस्यावभासनात् ४३५ १७६ तन रूपाय विरोषविवक्षा तच पुनरुपायविशेप ५१९
प्रस्थापन प्रस्थान ५१९ 11 नीचे से विभावादीनां विभावनादीर्ना ५२५ 13 १७७ कारणमालानां कारणानां ५२५
४ १८१ आधिक्यमुक्तम् आविक्यमिति वर्धमानमुक्तम् तस्मादस्मिर्च वर्धमाने तस्माद-अस्मिश्च 11 सारोपान्तर्भावमेति न पुनरिदमन्त- वर्धमाने सारोन्नर्भाव- भूतं सारे परिमितविषये महाविपय मेति न पुनरिदमन्त- मित्याद्यकतमेवोंक्तम् भूसं सारे परिमितविषये महाविपयमित्या-
१८२ हवत्वाभासैव द्ययुक्तमेवोक्तम् ५३५ हकू स्वाभासेव ५४०
नीचे से १८२ तच्छव्दस्यापि तच्छान्दस्यापि ५४०
नौचे से १ १८३ वे चित्र्याव हत्वाच्छन्दस्यापि वैचित्यावहत्वाच्छा व्दस्यापि
७ १८४ त्रिरुपस्य साध्यस्य विरपस्य साधनस्य ५५२
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पं० पृष्ठ निर्णयमागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृ० ३ १८६ समर्पतया समथ्यतया ५५३ ४ १८८ मृतेर्दारात्मजा मतेर्दारात्मजा० ५५८ सूचितं वस्येव समुचितम्। तस्यैव ५६७ १९१ शब्दोपासदधति(२) ५७२ नीचे से१ १९१ तदिति नियमस्य वदिति विनिमयस्य ५७२ मतत्वासमत्वयोबिम्च प्रति० ,, ur २-३ १९३ कविप्रतिभानिरवततितत्वा- कवि प्रतिभानिर्वत्तितत्वा- भावाल्लोको० झोको० ५७९ ३ १९५ नियमविधि । नियनविवि। न पुनरनातजाo पुनरनातजा तेन नियमे ब्रीहि०० मित्वमेव तेन नियमे ब्रीही०० दलनादे० यित्वमेव न, दलनादे ४ २०० विकल्पोऽपि न भर्वत विकल्पोऽपि भवति ५९४ २०४ तत्कथ नववय:प्रभृ० तत्कर्थ न नववय प्रभृ० ६०३ २०६ निरासमानराकरणं निरायासमाननिराकरण ६०९ २ २०८ प्रतीपार्यमलंकारहवयं पुनः प्रतोपास्यमलंकारठयम्, न पुनः ६१८
४ ३११ घटपटवट्भेदो न घटपटवद भेदेन २ २१२ यत् मुमनोगुणत्वे० यत् समानगुणत्वे नीचे से ३-१ २१४ अननुदाहरणीय०, वननुदा- अननुहर०, अनमुहर०, हरणा०, अतिरिक्तत्व० अतिरिक्त०२ ६३८ नीचे से ४ २१९ लोकात्म चोगत्म ६५३
नीचे से २ तस्य हि यथायोजनमार्अरं लक्षणम् तस्य हि अन्यथायोज० ६५३ १ २२० वाक्याभिधेय मानेजर्थ नीचे से ६ प्रस्थान विशयेपतमा प्रस्थाननिषेवकतया ६५९ नोने से ५ २२१ मुख्यार्थंमुपादनमिति भेदान्तरमप्य- मुस्यार्थापादनमिति भेदा- वसानवाच्यम् न्तरमप्यस्मा न वाच्यम् " ५ २२४ इह हि केचिदर्या कविवचसि इह हि वाच्यवाचकयो. ६७२ सुस्पष्टमभिरूदाः वाच्यवाचक्यो:
१ महाँ मूल मे 'समुनित तस्येव' ऐसा ही रवा रह गया है। ₹. मूल मे अतिरिक्त ही छप गया है। ३ मूल में यथायोजनमात्र हो छप गया है।
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पं० भृष्ठ निर्णयसागर संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ २२५ भाविना भावना ६७३
+1 आदरश्च आदराच्च 11 नीचे से ३ योगविद्भूत० योगिवद्भूत० ६७५ प्रत्यक्षतयेव तदभावभासनं प्रत्यक्षतमैव [प्रतीतिस्तथापि ] 11 तदभाव [सं] भावनं ६७% २२६ परमाहवैतज्ञान. परमाद्वैतिज्ञान ६७५
19 जानामीति समानाधि जानामीत्यसामा० ६७६ नीने से ४ २२७ सौधेपु नीतं सीधेपु गीतं ६७८ २२६ स्वप्ने मोदित स्वप्नान्तोदित
४ २२९ कविसमर्पितधर्मंत्वं कविसम पितवर्माणां ६६२
२ २३१ अङ्जभूतस्य ६८९ तभ नायमलंकार: तदत्र नायमलंकार: नीचे से ५ २३२ रत्यात्मभाव: रत्यात्मा भाव: ६९३ १३ २३५ गुणीभावात् गुणीभावाभावात् ६९५ नीचे से २ २३६ पुष्णन्मुरारे: दृष्णद पुरारे: ७०३ नीचे से ९ २३८ रतेरभूत रतेरङ़भूत नीचे से ४ श ङासूयाधृतिस्मृत्यौरसुक्य शङ्गा सूया धृतिस्मृति- दन्योत्सुक्यानां दन्योत्सुक्यानां ७१६ नीचे से १ २४१ प्रकृतत्वाचचाए० प्रकृतान्चारु० ७१५
३ २४३ सामग्रादे: सामग्रचादेः ७१९ ११ बोधन्यायेन मानसबोधन्यायेन बोधन्यायेन [मानसवो- न्यायेन ] नीचे से ५ जिना हँसमर्यास्तथा जिनान् हेममयाँस्तथा ७२० व्यक्तमेवें विधीयते व्यक्तमेवं विधोऽयि से ७२० 13 २४४ इवेक्ष्यते इवेक्षिते तस्मादेपां विषयत्वं वस्मादेषा मविषयत्वं Lr नीचे से ५ पूव हाना च्चा रत्वा- भावाच्च
४ संसुष्टिसंकथने चलिते संसृष्टिसंकरयुगे दलिते रसताम् रमताम् २४५ निमित्तानिमितभावेन निमित्तनिमितिभावेन ७२६
५. २४६ अद्भृत्वे पुनरेषां संकरादी- अङ्गत्वे पुनरेपां नामङ्ा० संकरधीर्ना० ७२७
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पं० g8 निर्णयसार संस्करण प्रस्तुत संस्करण पृष्ठ ६ २४६ यम कानुप्रासयोनिमित्तनि- य मकानुप्रासयोनं मित्िभाव निमित्त० ७२७ शब्दव दुप कार्योपकारकत्व- शब्द वदुप कार्योपकारक- भावात् त्वाभावात् ७२७
१० इयमेद हि समृप्टिद्वंयो- इयमेव हि समृष्टियंदुद्वपो १४ दशदादिमा डिवाक्यवचनयो. दशदाडिमादिवाक्यवदनयो।, १५ द्वयोरपि समृदत्वात् द्वयोरपि संबद्धत्वात् नीचे से १ न चानायमालं० न चात्रोभयमप्य 11 २ न संकरो नापि न संकरोऽ्यापि २ शक्तियोगात् चशिभङ्गाव २४८ अध च न यथा ७३Y नोचे से १ तावद् व्याप्तिप्रदर्शन० नीचे से ५ २५२ समासा समासाना ७३८ २ २५३ संकरे शंकरे ७४१
नीचे से ३ रूप कोपक्रमे णोपमानिर्वा हो दुषट रूपको०र्वा । दुष्ट इति साम्यलाघवेन इति साम्यस्य लाप० ७४१ ३ २५४ उपमाया बाधकत्व प्रतिगम्भी० उपमाया वाधकत्वम् अतिग ७४१
नीचे से १ हेतुत्वेनव गता हेनुत्वेन बागता ७४३ 11 तस्या अनुत्यानान तस्यानुत्यानाव् ७४३ २५५ हतुः हन्तु वदने वचने २ २५६ शब्दार्थव त्यंलद्वारा वाकय 1
नीचे से ४ ·भयालङ्कारत्व ७५२ नचे से २ वणता वणिका २५७ ह्टिः शलेपाणामेवो० िश्लेषाणामेव ततकार्यमेव वत्कार्यत्वमेव इम तालिका से स्पष्ट है कि निणयसागरीय संस्करण मे भावात्मक वक्तव्य को अभावात्मक, अभावात्मक को भावात्मक, भावपूर्ण निर्देश को द्रव्यात्मक निर्देध कितनी हो बार छापा गया है। 'न्याय' के स्थान पर 'काल' और 'मरणधकोपजनकत्व' के स्थान पर 'कोपजनकत्व' का पाठ विपयय दुस्समाधेय विपयय है। पाठान्तर भी ऐसी जगह
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नहीं मिलते। 'लतासमत्व' से 'मतत्वासमत्व' की कल्पना सरल नहीं। विराम, विरामाभाव, अनुच्छेद, प्रघट्टकपरिवर्तन और ऐसे ही लेखधम भी कहीं-कहीं भ्रामक स्थिति में मिले और उनको विषयसंगति के आधार पर ठीक किया गया। संशोधन में हमने कल्पना को सबके वाद में स्थान दिया है, पहले रत्नाकर और रसगंगाधर के उद्धरणों को। जो उद्धरण विर्मशनी ने रत्नाकर से लिए हैं उन्हें रत्नाकर से मिलाकर ठीक किया, यद्यवि कहीं-कहीं स्वयं रत्नाकर में भी इस तुलना से संशोधन हुआ, और विमर्णिनी के जो उद्धरण पण्डितराज ने रसगंगाधर में दे रसे हैं उन्हें रसगंगाधर से मिलाकर। मूल का संशोधन भी पहले उद्धरणों के ही आधार पर किया है। १०१ पृ० का नायकतात्यधम पाठ रसगंगाधर से ही लिया गया है। ये सव निर्देश विमश-नामक टिप्पणी में पाठन्तर-शीर्पक देकर कर दिये गये हैं। यदयपि कहीं 'पाठन्तर'-शीषक छूट भी गया है। विमर्शिनी की प्राकृत गाथाओं की संस्कृतच्छाया अपने संशोधन के साथ रत्नाकर से ली गई है यद्यपि एक दो स्थल बिना छाया के छोड़ दिए गए हैं। वे समझ में नहीं आए। चिमशिनी के अनुवाद में पूर्वपक्ष को समझने हेतु रत्नाकर के संबद्ध सभी उद्धरण हमने आगे या पीछे प्रस्तुत कर दिए हैं और पूना से छपे संस्करण के संदर्भ भी दे दिए हैं। ये संदर्भ भी कठिनाई से तैयार किए जा सके कयोंकि कुछ उद्धरण ऐसे हैं जो जिस मलन्वार में दिए गए हैं उसमें न होकर रत्नाकर में किसी अन्य अलंकार के प्रकरण में रहे हैं। इनमें भी कुछ कारिकाएँ गद्यात्मक रूप में छपी हैं, अतः उन्हें खोजना कठिन रहा है। विमर्शिनी में 'प्रत्यक्षाद् विरलकरांगुलिप्रतीति' इत्यादि [५४० पृ० ] ऐसे भी कुछ स्थल हैं जिनके मूल संदर्भ खोजे नहीं जा सके हैं और इसीलिए जिनके अर्थज्ञान में संदेह रह गया है। दिण्डिकाराग: [पृ० ५३], वाहकेलि [१८४ पृ० ], वाह्याली [१६४ पृ०] भी ऐसे ही शब्द है। वाहयाली का प्रयोग राजतरंगिणी में वाहरी बरामदे के लिए हुआ है। प्रस्तुत प्रसंग में इसका यह अर्थ नहीं जमता था अतः हमने घुड़सवारी का मैदान अर्थ किया। इसका एक प्रयोग घुड़सवारी के लिए भी काव्यादश के पुना संस्करण [पृ० १म की ] टिप्पणी में मिळ गया। राजगंज [६२८ू पृ० ] भी ऐसा ही शब्द है। प्रत्येक अलंकार के अन्त में हमने भामह से लेकर विइवेश्वर तक चली परम्परा उद्दत कर दी है और प्रतमेक अलंकार का इतिहास दे दिया है। दण्डी को यत्र तब् ही अपनाया गया है। कश्मीरी अलंकार परम्परा उद्ट की परम्परा है और उन्नट भामह से ही प्रभावित है। उन्होने भामह के काव्यालंकार पर टीका भी लिसी थी जिसका उल्लेख जयरथ ने असकृत किया है। उस कारण भामह को ही हमने प्राधान्य दिया है यदयपि हमें यह निश्चय हो गया है कि भामह दण्डी के बाद के हैं तथापि
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हो सकता है हमने भी संस्कारवशात् कही भामह को पूर्ववर्ती लिख दिया हो। भोज के सरस्वतीकष्ठाभरण को भी हमने अधिक महत्व नही दिया है, कयोकि उसका प्रभाव भी कश्मीरी परम्परा पर कम है यदयपि जयरथ ने भोजदेव का भी [ पृष्ठ ४४३, ७२०] उल्लेष कर दिया है। इस प्रकार दण्डी से विश्वेश्वर तक की आवश्यक और ऐतिहासिक सामग्री प्रत्येक अलंकार के अन्त मे इस ग्रन्थ मे सुन्भ है। आक्षेप, काव्य- लिंग औोर ससृष्टि सकर के इतिहास पर गवेपक विद्वान् ध्यान दे सकते हैं। इतिहास के अन्त मे श्रीविद्याचकवरती की निष्कृष्टाथं कारिकाएं भी अनुवाद के साथ दे दी हैं।
अलद्वारो का क्रमिक विकास स्पष्ट समझ मे आ सके इसलिए हम दण्डी से सर्वस्व तक के अनद्वारो के इतिवृत्त पर दष्टि डाले- अलद्वारों का इतिवृत्त 'अलकार' -शब्द का पूर्वपद् 'अलम्' ऋषसहिता मे 'अरम्' के रूप मे मिलता है'। अरम् 'ऋ'-धानु से निष्पन्र शब्द है। 'ऋ' का अर्थ है गति। 'गति'-शब्द बोध, मुक्ति और गमनव्यापार का भी बोधक शब्द है। अर्थ यह कि ज्ञान, इच्छा और करिया इन तीन चक्तियो से बने विश्व की दो तिहाई तक व्याप्त है गति शब्द की शक्ति। वेद- विस्वान 'गति'-तत्व को 'प्राण' और 'अभि' कहतसथा उसे 'इन्द्र' से अभिन्न मानता है ऋवमहिता के ऋृषि वसिष्ठ इन्द्र से हो पूछते हैं 'का ते अस्त्यरङ्रकृतिः सूक्तै .= " 'है इन्द्र, सूक्तो मे ऐसी कौन सी अलंकृति, कौन सी प्राणवत्ता, कोन सी आपूर्ति, कोन सी उपलब्धि रहती है जो उनसे तुम्हें प्राप्त होती है।' अवश्य ही इस वाक्य मे सुक्तात्मक उक्ति के अन्तर्गत रहने वाले अविवाय-तत्व की जिज्ञासा प्रकट हो रही है। मानो ऋृषि यानी कवि, अलंकार्य से उसके उत्तिलम्य अलंकार के विषय मे प्रश्न कर रहा हैं। इस प्रकार ₹ agor-An Etymological note on the word Alamkara By Dr. G. C Tripathi in 'Principles of Literary Criticism in Sanskrta' Ed Prof. Dr R. C. Dwivedi, Udaipur University. २-३ द्र० (१) वैदिकविज्ञान और भारतीय संस्कृति म० म० पं० गिरिधर शर्मा चनुर्वेदी !1 (२) आतमविज्ञानोपनिषद् आर्दि : पं० मोतीलाल द्ास्त्री। () सहसाक्षरा वाकू : डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल। (४ ) विज्ञान विद्युत् · म० म० प० मधुमूदनओक्षा। (५) वेदिकवावयकोष -श्रीभगवदृत्त शास्त्री। ४ ऋ० ७|२९|३। 4
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ऋवसंहिता में अर्थात् मानव-इतिहास के प्रथम स्रन्थ या आदिकाव्य में हम परवर्ती अलंकार के लिए 'अरंकति' शब्द पाते हैं, किन्तु यहाँ यह शब्द उपमा आदि के लिए प्रयुक्त नहीं वतालाया जाता। दूसरी ओर
यास्क के निरुक् में हम 'उपमा' शब्द और उसकी वही व्यास्या पाते हैं जो हमें परवर्ती आलंकारिकों में मिलती है। गाथ का मत उद्धत करते हुए यास्क लिखते हैं-'उपमा अतवु तत्सहशमुऐ। यहीं उपमाओं की व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं- 'तदासां कर्म ज्यायसा वा गुणेन प्रस्याततमेन वा कनीयांसं वा प्रख्यातं वा उपमिमीते अथापि कनीयसा उयाय्यांसम्।' दुर्गाचार्य इसकी व्यास्या करसे और लिखते हैं- 'ज्यायसा उत्कृष्टेन गुणेन यो यत्मिन् दल्ये उत्कष्टो गुपस्तेन, कनीयांसस् मनुसषटं गुणम् उपमीयते, तदथा 'सिंहो माणवक' इति। सिहे शौर्यसुस्कृष्टम, माणवकमेतेन उपमिमीते सिंह इन माणवका विक्रान्त इति। म्रख्याततमेन वा अप्व्यातसुपमीयते। प्रख्यातश्न्दमा, अग्रर्यातो माणवक:, तं तेनोपमिमीते 'चन्द्र इच कान्तो माणवक' द्ति। अथापि क्वचित्, 'कनीयसा गुणेन ज्यायासमपि सन्तसुपमिमीते।' अर्थात्-'अनुत्कृष्ट की उत्कष्ट के साथ तुलना ही उपमा है'। वास्क ऐसी उपमाओं के १२ स्थर्ल प्रस्तुत करते और उनमें से कुछ स्थलों को कर्मोपमाडि भूतोपमा8 रूपोपमन सिद्धोपमा।लुप्तोपरमा अर्थोपमा भी कहते हैं। किन्तु इन्हें अलंकार नहीं कहते, वद्यपि इनमें भूतोपमां, रूपोपमा, सिद्धोपमा और लुप्तोपमा जिसका दूसरा नाम अर्थोपमा है एसी उपमाएँ हैं जिन्हें अलंकार कहा जा सकता है। "पाणिनि जी उपमा, साहश्य, सामान्य, उपमान, सहश, प्रतिरूप, उपमित ब्ञब्दों का
₹. (₹ ) History of Samskrit Poetics By. Dr. S. K. De. Page. 3. (२) निरुक : नैधण्ट्रककाण्ड पाद-३ आरम्भ, मोरसंस्करण भाग-२पृ० २६३। २. निरक प्रथम भाग पृष्ठ ३२४ मोरसंस्करण. ३-७. निरुक्त भाग-२ पृ० २९१-३०८ मोरसंस्करण. ८. उपमा (१) तुल्याथेरतुलोपमाभ्यां [२।३।७२], (२) चिदित्युपमार्ये प्रयुज्यमाने [=।२१०] औपम्य (१) जीविकोपनिषदावौपम्ये [१४७९], (२) ऊतरपदा दीपम्ये ४१।६९ संज्ञोपम्ययोश्च [६।२११३] सादृश्य (१) अव्ययं विभक्त० [२१।६] (२) यथाऽसादृश्ये [२१७] (३) सदवप्रतिरूपयोरच सादृश्ये [६।र११]
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असकृत् प्रयोग करते तथा 'पुरुपव्याघ्' आर्दि ऐसे स्थलो पर दष्टि रखते हैं जिनमे आई उपमा स्पष्ट रूप से अलंकार है, तयावि वे इन्हें उपमालंकार नहीं कहते, यद्यपि उन्हे सपने शास्त्र मे वैसा कहने का कोई अवसर भी नहीं था। पतन्जलि 'उपमान' शब्द का निर्वचन करते और कहते हैं-१ 'मानं द्ि नाम अनिजतज्ञानार्थम, उप आदीयते अनिर्जातमर्य इमस्यामीति। तरसमीपे यकात्यन्नाय निमिते तद् उपमानम्।' अर्थात्-'उप यानी पास मे अर्थात् अज्ञात वस्तु के, ले जाने वाला अथं उपमात। किन्तु वे इसे अलकारत्व से अस्पृष्ट रखते और इसके स्पष्टोकरण के लिए उदाहरण 'गवय गो जैसा' इस लोकवाक्य का देते हैं जिसमे उपमा तो है किन्तु चमत्कार नही, अतः जो अलंकार नहीं है। किन्तु पतज्जति के समय में ही 'अलंकारत्व' और 'उपमा' आदि दोनो-समानान्तर गंगा यमुना को मिळा दिया जाता है (गह काय भूरतमुनि करते हैं। वे 'उपमा, रूपक, दीपऊ सोर यमक' को अलंकार मानते और लक्षण नामक तत्व के रूप मे अन्य ३६ गुणो का भी निरपण करते हैं जिनसे अतकारो की दिशा मे निन्तन को विद्यदुगति पाप्त हो जाती है। और दण्ड़ी तक के अनेक मनोषी जस दिय्या मे लगभग सात सौ वर्षो तक निरन्तर चिन्तन करते हैं। इस महान् अन्तराल के पश्चात् हम दण्डी तक पहचते मोर उनमे अलंकारो की संस्या ३1 पाते हैं/। ये निम्नलिखित हैं-
सामान्य-( १) उपमानानि सामान्यवचनै: (२) उपमितं व्याघ्रादिभि: सामान्याप्रयोगे [२१५६] (३) नामन्निनिते समानाधिकरणे सामान्यवचनम् [८।१।७३]- उपमित-उपमितं व्याहादिभि० [ २।१।५६] उपमान-( १) उपमानानि सा० [२१५५ ] (>) उपमानादाचारे [३।११० ] (३) कतयुपमाने [३।२७९], (४) उपमाने कर्मण च [ ३।४।४X ], (x) उपमानादप्राणिपु [५४।९७] (६) उपमानच्च [५४१३७],(७) संज्ञायामुपमानम् [६।१।२०४], (८) तत्पुरुपे तुल्यार्थकतृतीयासप्तम्युपमाना० [६।२।२] (९) गोबिडालसिंह सैन्धवेपूपमाने [६।२७२ ], (१०) उपमान बब्दार्थं- प्रकृतावेव [६।२८] (११) चीरमुपमानम् [६।२१२७], (१२) सूपमानाव क [ ६।२।१४% ] (१३) निष्टोपमानादन्यतरस्याम् [६२।१६९] ₹ Dr. S. K. De. History of Skt. Poetics २. 'उपमा रूपके चैव दीपकं यमके तथा। अलंकारास्तु विज्ञेयाएचतवारो नाटकाथया ॥ भरतनाठ्यशास १७४३
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दण्डी [ ६६०-६८० ई० ] १. स्वभावोकि २. उपमा ३. रूपक ४. दीपक ५. आवृत्ति ६. आक्षेप ७. अर्थान्तरन्यास प. व्यतिरेक ९. विभावना १०. समासोकि ११. अतिशयोक्ति १२. उत्प्रेक्षा १३. हेतु १४. सूक्ष्म १५ लेश १६, कम १७, प्रेयः १६ रसवद् १९. ऊर्जस्वि २०. पर्यायोक्ति २१. समाहित २२. उदात्त २३. अपहुति २४. श्लेष २५. विशेपोकि २६. तुल्पयोगिता २७. विरोध २८. अप्रस्तुतप्रशंसा २९. व्याजस्तुति ३०. निदर्शना ३१. सहोकि ३२. परिवृत्ति ३३. आशीः ३४. संसृष्टि ३५. भाविक ३६. यमक तथा ३७. चिश्र। दण्डी ने दक्षिण भारत में जो अलंकारदर्शन प्रस्तुत किया वह उत्तर भारत के भामह को बहुत ही ोघ सुलभ हो गया। भले ही वह दण्डी के अपने ग्रन्थ के द्वारा सुलभ हुआ हो मथवा साक्षातु उसी माध्यम से जिससे ये तत्व दण्डी तक पहुंचे हों। स्वयं दण्डी के ग्रन्थ से ही भामह को अलंकार प्रेरणा का पक्ष अविक स्वस्य प्रतीत्ष होता है। ऐसा लगता है कि भामह किसी पक्ष को पूर्व पक्ष बना रहे हैं औौर उसे उसी की मूल पदाबली में उद्धुत कर रहे हैं। यह पदावली दण्डी से अक्षरशः मिलती है। ऐसी स्थिति में दण्डी को पूर्ववर्ती होने का श्रेय न देना तर्वविरुद्ध है- 1 १. (१) यहाँ आचार्यो के समय का आधार है डॉ० काणे (२) म० म० काणे आदि कहते हैं कि दण्डी के पूर्व भट्टिकाव्य में अलंकारों का विवेचन हुआ है। वस्तुतः उसमें अलद्कारों के प्रयोगमात्र हैं। अलद्धारों के नाम नहीं। नामों की कल्पना जय मंगलाकार ने की है, जो बहुत अंश में अशुद् है। 'बार्ता' को भामह के अनुसार अलक्वार बतलाना उसका प्रमाण है। देखिए यहीं आगे- २. ऐसे अनेक स्यल डॉ० डे०, म० म0 काणे, श्रीपोद्दार जी आदि ने उद्कृत किए हैं। इनमें प्रसिद्ध है हेतु सूक्ष्म आदि बलंकारों से सम्बद्ध स्थल। दण्डी कहते हैं- हेतुश्च सूक्ष्मलेशी च वाचामुत्तमभूपणम्' और इनका निरूपण ६७ कारिकाओं में करते हैं। वहाँ वे-"गतोइस्तमर्कों भातीन्दुर्यान्ति वासाय पचिणः। इतीदमपि साध्बेव कालावस्थानिवेदने।"-यह उदाहरण देते है। मामह कहते है-'हेतुश्च सूचमो लेशोऽथ नालकारतया मतः । समुद्ाग्राभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिधानतः। गतोऽस्तमर्को भातीन्दुर्यान्ति बासाय पचिण: इत्येवमादि किं काव्यं वात्तमतां प्रचनते॥ २८६-८७॥। जो इन कारिकाओं को भाषा की हष्टि से पढ़ेगा वह समझ जाएगा कि अवश्य ही दण्डी की कारिका पहले की है। दण्डी नाम लेते हैं तीन अलुद्वारों का किन्तु उनके लिए प्रयोग करते हैं 'भूपणम्' इस प्रकार एकवचन का। चाहिए था 'भूषणानि'। भामह इसका सुधार करते और 'मुतः' में एकवचन ही रसते हुए यह वतलाते हैं कि यदि 'भूषणम्' ही लिखना है तो 'सूक्ष्मलेशो' न लिखकर 'सूक्ष्मो सेशोऽय' इस प्रकार अलष अरुलिखना ३ अ० भृ० 7 -
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ोमद् [ ७००-७२५ ई० ] भामह ने अपने काव्यालद्वार मे दण्डी के कुछ अलद्वारो को माना, कुछ को नही और कुछ अलद्वारो को अपनी ओर से नवीन अलद्वारों के रूप मे प्रस्तुत किया। इनका विवरण- (१) अमान्य मलद्वार-आवृत्ति, हेनु, सुक्ष्म, लेश तथा चित्र 1S (२) मान्य मलद्वार- स्वभावोकति, उपमा, रुपऊ्, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तर- न्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिपायोक्ति, उत्प्रेक्षा, कम (ययासंख्य नाम से) प्रेय, रसवत, ऊर्जस्वि, पर्यायोक्त, समाहित, उदात्त, अपह्वृति, श्लेय, विशेषोकि, तुल्ययोगिता, विरोध, प्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निदशंना, सहोकि, परिवृति, आात्ती, संघृष्टि, भाविक तथा यमक।' (३) स्वकल्पित- (१) अनुप्रास उपमारपक (३) उत्प्रेक्षावयव (४) उपमेपोपमा (x ) सन्देह (६ ) अनन्वय-। इस प्रकार भामह तक कुल अलंकारो को संह्या ४३ हो जाती है। उनमे से भामह दण्डी के ३२ तथा अपने ६ इस प्रकार कुल व5 अलकार स्वीकार करते हैं। हेतु, चाहिए। यदि भामह स्वयं इसे लिसते तो 'हितु" सूभमर्च लेशशच-ऐसा लिखते। 'हतुश्च'-लिखना भी दण्डी की ही उक्ति को उद्धृत करना है। यहाँ- यह कहना कि दोनो ने किसी एक अन्य स्रोट से ये .. अश अपनाए हैं-संस्कृतभाषा की अभिव्यक्ति से अनभिज्ञता प्रकट करता है। आनन्दवर्धन मोर महिमभट्ट को नोंकझषोक पर उनका ध्यान जाना चाहिए। इतने पर भी डॉ० डे,पोदार, डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी आदि भामह को ही पूर्ववर्ती मानते हैं। म म० काणे ने हमारै इस भाषा सम्बन्धी तकं पर तो ध्यान नहीं दिमा है, परन्तु माना दण्डी को ही पू्वदर्ती है[ द0 History of Skt. Poetics M. M. Kane, P. 124, 1951. ] दण्डी का अलक्कारविवेचन भी बतलाता है कि वे उस समय के आचा्य हैं जब अलदवारों के विचेचन में अधिक सूक्ष्मता नहों थी। भामह इसके विरुद्व अधिक मूक्षमता के साथ अलद्वारो का निरूपण करते दिखाई देते हैं। क्या सूक्षमता स्थूळता को जन्म-देती है जो दण्डी को परवर्तो माना जाता है ? अवश्य ही भामह दण्डी के कणी है भले ही वे दण्डो का नाम न लें अलद्वार विमशिनी मे क्या रत्नाकर का नाम विमशिनीकार ने एक बार भी लिया? तो कया यह कह दिया जाए कि विमशिनी रत्नाकर से पहले की है और रत्नाकर ने ही विमाशनी से प्रेरणा पाई है? ₹. ( " ) S. K De. History of Sanskrit Poetics. P. 49-50 ( २ ) P.V .- Kane. 1951. P. 124.
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सूक्ष्म और लेश का तो भामह ने ख़ण्डन भी किया है। उनके संदेह औौर उपमेयोषमा दण्डी की संशयोपमा तथा अन्योन्योपमा की ही पौठिका पर माधुत है। दण्डी ने इन्हें उपमा से पृचक नहीं माना था। भामह ने इनमें पृथक अलंकारत्व देखा। उत्प्रेक्षावयव उत्प्ेक्षा तथा उपमारूपक रूपक के चिन्तन का ही आंशिक परिवर्तन है, जो पृथगलंकारत्व के लिए अपर्याप्त है औोर इसीलिए जिसे परबर्ती आचार्यों ने भान्यता नहीं दी। उन्जट [ ७५०-८०० ई० ] उन्धट ने अपनें काव्यालंकारसंग्रह में दण्डी की अपेक्षा भामह को अधिक महत्त्व दिया यद्यपि उन्होंने स्वतन्त्र चिन्तन से काम लिया। उन्होंने दण्डी और भामह दोनों के ३छ अलंकारों को अलंकार न मानते हुए अपनी ओर से भी कुछ अलंकारों की कल्पना की। उनके अनुसार अलंकारों का विवरण- (१) अमान्य (क) दण्डी के-आवुत्ति, हेतु, सूक्ष्म, लेश, आशी;, यमक तथा चिश्र (ख) भामह के-उपमारूपुक तथा उत्पेक्षानयन (२) (२ ) सान्य (क) दण्डी के उपमा, रूपक, दीपक, आकेप, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अर्तिशंयोक्ति, यथासंस्, उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, प्रेय, रसवत्, ऊर्जस्वि, पर्यायोत्त, समा- हित, उदास, शिलष्ट, अपहुति, विशेषोक्ति, विरोध, तुल्ययोगिता, अप्नस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निदर्शना [विदर्शना नाम से ], सहोक्ति, परिवृत्ति, संसृष्टि, तथा भाविक 4सतर) भामह के-अनुप्नास, उपमेयोषमा, सन्देह तथा मनन्वय (३) इतरकल्पित (१) पुनरुकवदाभास ( २ ) चेक्ानुप्रास्त ( ३) लाटानुप्रास्त (४) प्रतिवस्तूपमा (५) काव्यलिंग (६) दष्टान्त तथा (७) संकर। इन स्वकल्पित जलंकारों में सेVउद्धट की अत्यन्त भीलिकता केवल पुनरकतवदाभास में है। अनुप्रासों में कटानुप्रास भामह ने अनुप्रास के अन्तार्गत मान लिया था, उद्रट ने उसे केवल स्वतन्न्न अलंकार के रूप में गिन दिया है छेकानुप्रास उनकी भामह के ग्राम्ानुप्रास की कल्पना पर एक विरोधी क्पना है। ग्राम्य के विरुद्व छेक का अथ विदन्ध किया जाता है।ह प्रतिवस्तपमा को दण्डी उपमा के अनतर्गतगिना चुके ये/ काव्यलिंग भी हेतु के दो भेदों में से एक का स्वतन्द्रीकरण है, किन्तु यह अनुमान के अधिक समोप है ।दशन्त प्रतिवस्तुपमा की छाया पर एक स्वतन्त्र कल्पना है और संकर संमृ्टि की छाया पर [िीनों अनुपासों को एक अनुपरास के तीन भेड् न मानकर तीन स्वतन्त्र अलंकार मानता हुआ उद्नट को इसलिए माना जाता है कि उन्होंने प्रतयेक अळंकार के भेद उस सलंकार के कक्षण के बाद दिए हैं, वर्ग के आरम्भ में सबके नाम की तालिका में नहीं। अनुप्रास के भेद नाम-्तालिका में ही दे दिये हैं 5इस प्रकार दण्डी से लेकर उन्जट के समय तक अलक्कारों की संख्या ५० हो जाती
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है।' इनमे वे दण्डी के ३७ अलंकारो मे से केवल ३०, भामह के अनद्गारो स्वकल्पित ६ में से केवल ४ अपना कर केवल ३४ अलंकार प्राचीन आचार्यों से अपनाते हैं तथा ७ अलंकारों की कल्पना अपनी ओर से करते हैं। फलत. वे कुल ४१ अलंकार मानते है। वस्तुतः तोनों अनुप्रासो को एक अलद्वार मान लेने पर उद्ट को मान्य अलदारो की सहयां केवल ३९ रहती है। चामन [८०० ई० ] सम्रट के समकालीन आचार्य वामन ने भी अपनो"काव्यलद्टारसूनवृत्ति' में भामह को अधिक महत्त्व दिया। उनके अनुसार अलद्वारो का विवरण- (१) अमान्य (क) दण्डी के-स्वभावोकि, आवृत्ति, हेतु, सृक्ष्म, लेश, रसवत्, प्रेय, कजस्वि, पर्यायोक्ति, उद्दात्त, भाविक, आघी, चिन्न (स स) भामह के-उपमारूपक तथा उत्प्रेक्षावयव (२ ) मान्य '(क) दण्डी के-उपमा, समासोक्ति, अप्रस्तृनप्रशंसा, अपद्ुति, रूपक, श्लेप, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, विरोध, विभावना, परिवृति, कम, दीपक, निदर्शना, अर्यान्तरन्यास, व्यतिरेक, विशेपोक्ति, व्याजस्तुति, तुन्यमोगिता, आधेप, सहोक्ति, समाहित, समृष्टि तथा यमक। स) भामह के-सन्देह, यनन्वय, अनुप्रास तथा उपमेयोषमा। (३) म्वकल्पिन (१) बनोकि (२) व्याजोकि (ह) परतिव स्तूपमा इस प्रकार वामन तक अनद्धारो की संख्या ४३ हो जाती है। इनम से यामन स्वयं २ अनदारों की कल्पना करते हैं। वे ५ अलंकार भामह के तथा २४ अनद्वार दण्डी के अपनाते और इस प्रकार कुछ मिलाकर ३१ अलद्धार स्वीकार करते हैं। अर्थ यह हुआ कि दण्डी मे वामन तक अलद्ार, विवादास्पद थे। यदि उद्नट की स्वकल्पित वशोक्ति और व्याजोक्ति को नवीन मानकर इन विवादास्पद अलध्दारो मे अभी न गिने तो उनकी संख्या १९ बचती है।- रुद्रट [८२५ -= ७५ ई०] उमट और वामन के पश्चात् अलस्ारचिन्तन मे अविक स्वस्थता और अविक 7
वैज्ञानिकता आई। चिन्तकों ने अलध्धारो का वर्गोकरण संजातीयता तथा विजातीयता १ ड० राममूति तिपाठी ने 'चित्र' को गणना छोड दी है अना वे दण्डी से उद्भट तक अनद्ारो की संस्या ४१ बतगते है। दषटञ्य/डॉँ०यिपाठी-की काव्यालङ्कार सारसग्रह की भूर्मिका पृ० २८-२९ पतिवस्तूपमा की वल्पना उन्रट ने की है, अत वामन तक कुठ सलकारो की- संस्या ५२ ही होनी है, ५३ नहीं। यद्यपि डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी ने ५५ सख्या लिसदी है। देखिए-अलद्लारमीमासा पृo १५५।
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के आधार पर ठीक उसी प्रकार करना मारम्भ किया जिस प्रकार वैशेषिक सूजों में पदार्थों का वर्गीकरण महषि कणाद ने किया था। िह वर्गाकरण सबसे -पहले रुद्रट के 'काव्यालद्ार' में मिलता है।। लe रुद्रट ने अलद्गारों को पहले तो 'शब्द' और 'अर्थ' के दो खण्डों में विभाजित किया, फिर अर्थालङ्वारों को (१) वास्तव (२) औपम्य (३) अतिशय तथा (४) इलेष नामक चार वर्गो में E इन दोनों खण्डों और वर्गों में रुद्रट ने ६२ अलद्धारों का निरूपण किया। इनमें से रुद्रट ने पूववर्ती आचार्यों के केवल २७ अलक्कार ही लिए, शेप ३५ अलद्वारों की कल्पना स्वतन्त्र वलन्गार के रूप में उन्होंने स्वयं की है। इनमें से ५ अल्ारों को एक ही नाम से दो-दो वार गिनाया अतः कुछ विद्वानों ने उनके द्वारा निरूपित अलक्कारों की संख्या सत्तावन मानी है। इनका विवरण इस प्रकार है-
(१) अमान्य (क) दण्डी के-आवृत्ति, आाशीः, अतिवायोकि, तुल्ययोगिता, रसवत, 13. प्रेय, ऊर्जरिन, भाविक, पर्यायोक्त, समाहित, विशेषोकि, हेतु, संसृष्टि। (ख) भामह के-उपमेयोपमा, अनन्वय, उपमारूक, उत्प्रेक्षावयव। (ग) उद्वट के-पुनरुक्तवदाभास,छेकानुपास, लाढानुप्रास, प्रति- वस्तूपमा, काव्यलिंग, संकर [ पृथगलद्वार के रूप में ] घ) वामन की-वकोकि, व्याजोकि· (२) मान्य (क) दण्डी के-स्वभावोकि [जाति नाम से ], उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तरन्यास,व्यतिरेक, विभावना, समासोकि, उत्प्रेक्षा, 24 सूक्ष्म, लेश, क्रम [ययासंख्य नाम से], उदात्त [अवसर नाम से ], अपह्वति, क्लेप, विरोक, अप्रस्तुतप्रशंसा [अन्योक्ति नाम से J, व्याजस्तुति, निदर्शना, सहोक्ति, परिवृत्ति, यमक, चित्र स (खर) भामह के-अनुप्रास, सन्देह [ संशय नामे से] 4 (ग ) उद्ट के-दष्टान्त, [वामन से कुछ नहीं ]
१. अतिशयोकि नाम से रुद्रट ने कोई स्वतन्त्र अलक्वार नहीं माना। उसके प्रायः वे सभी भेद जो दण्डी ने माने ये रुद्रट ने अतिशय-चर्ग के अलद्धारों में गिन लिए हैं। २. सू्द्रट ने संकर पर विचार किया है, किन्तु उनके प्रतिपादन से यह स्पष्ट नहीं है कि वे उसे पृथक अरुद्वार मानते हैं। ३. रद्रट ने वकोक्ति नामक एक अल्कार माना है, किन्तु वह स्वरूपतः वामन की वकोकि से भिन्न है।
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(३) म्वकल्पित १-२. समुच्चय, ३ भाव, ४. पर्याय, ५ विषम, ६. अनुमान, ७ परिकर, ८ परिसंख्या, ९ हेतु [नवीन], १० कारणमाला, ११ अन्योन्य, १२-१३, त्तर, १४ सार, १५ मीलित, 35 १६ एकावली, १७. मत, १६ प्रतीप, १९ उभयन्यास, २० भ्रान्तिमान्, २१ प्रत्यनीक, २२-२३ पूर्व, २४ साम्य, २५ स्मरण, २६ विशेप, २७, वृद्गुण, २८. विहित, २९ असगति, ३० व्याघात, ३१. अहेत्ु, ३२. अधिक, ३३. वकोक्ति ३४ सहोक्ि, ३५. श्लेप [तीनो नवीन ]। इस प्रकार रुद्रट ने अलद्दारों की सख्या ६२ मानी है। इन सब अलद्ागे का वर्गीकरण सटुट ने इस प्रकाड से किया है- [क] शच्दालद्गार १. चक्रोकि, २. अनुप्रास, ३ यमक, चलेप, ५ चित्र । [ख]अर्थालंकार ्वास्तवव में सहोकति, समुच्चय, ३. जाति [स्वभावोक्ति ], ४. यथासंस्य, ५. भाव, ६ पर्याय, ७ विषम,,पअनुमान, १. दीपक, १० परिकर, ११ परिवृत्ति, १२ परिसंख्या, १३ हेनु, १४ कारणमाला, १५. व्यविरेक,१६ अन्योन्म, उत्तर, १८. सार, १९ सूष्ष्म, २०. लेश, २१. अवसर, २२ मीलित, २३ एकावली। ओपम्यवर्ग १. उपमा, २ उत्प्रक्षा, ३ रूपक, ४ अपह्वति, ५. संचय, ६. समासोकि, ७. मत, ६ उत्तर, १ अन्योक्ति, १० प्रतीप, ११. अर्थान्तरन्यास, १₹. उभयन्यास, '१्व= आन्तिमान, ४. आक्षेप, १५ प्रत्यनीक, १६. दष्टान्त, १प पू्व, १5र. सहोकि, ए समुच्चय, २० साम्य, २१ स्मरण। अतिरायदगँ पूर्व, २ विरेष, ३. उत्प्रेक्षा, ४ विभावना=५ तद्गुण, ६ अधिक, ७ विरोध, ८ विषम, ९. असगति,.पिहित, ११. व्याघात, १२ अहतु। ४. दलेयवर्ग, श्लेप
१ पोददार जी ने रुद्रट के अलंकारो की संख्या ५५ बतलाई है। वे अहेतु तथा वतोकिति की गणना करना भूल गए हैं। इन्होंने रुद्रट मे उदात्त का भी अभाव माना है, वम्तुत. रु्द्रट ने इसे 'अवसर' नाम से अपना िया है। पोददार जी ने अवसर की गणना कर ली है। द्रष्टव्य स्व० कन्हैालाल जी पोद्दार वा 'संम्टृतसाहित्य का इतिहास' पृ० ९३
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उक्त विवरण से स्पष्ट है कि रुद्रट ने सहोकि, समुच्चय, पूर्व, इ्लेप तथा उत्तर इन पांच की गणना दो-दो बार की है। उद्भट में अनुप्रासमेदों को स्वतंत्र अलक्गार माना गया है, अतः रुद्रट के अनुसार अलंकारों की संख्या ६३ ही मानी जानी चाहिए। उक्त विश्लेपण से यह भी स्पष्ट है कि अलङ्कारों की संख्या दण्डी से रुद्रट तक ८७ (सतासी) तक पहुंच जाती है ।। रुद्ट का महत्व हमें तब विदित होता है जब हम भोज के सरस्वतीकण्ठभरण और मम्मट के काव्यप्रकाश पर ध्यान देते हैं
भोज [१०००-१०५० ई० ] भोज ने अपने सरस्वतीकण्ठाभरण में अलंकारों का विभाजन शब्दालङ्वार, अर्था- लद्वार तथा उभयालद्वार के रूप में किया। उन्होंने प्रत्येक वर्ग के २४,२४ मलद्ार माने फलतः उनके अलदारों की संस्या ७२ हो जाती है तववरण- (१) अमान्य (क) दण्डी के-आवृत्ति प्रेय, रसव्नत, ऊर्जस्वि, पर्यायोक्त, उदास, व्याजस्तुति, आशो (ख) भामह के-उपमारूपक उत्प्रेक्षावयुन, उपमेयोपमा (उपमा में), अनन्वय (उपमा में ही), (ग) उ्धट के-पुनरुक्तवदाभास, घेकानुप्नास, लाटानुप्रास, प्रतिवस्तूपमा (उपमा में ), दृष्ट्रान्त (उपमा में), संकुर (संसृष्टि में) 2 (घ) वामन के-चकोकि, व्याजोक्ि, (ङ) रुद्रट केदरमयन्यास, प्रतीप (साम्य में), पत्यनीक, पुव, [दोनों] परिहित, सत, द्रिपम, वमघात, विशेष, सार, अधिक, सुसंगति, प्रकावलो, कारणमाला, हेतु, तदूण, पुरिसंख्या, सहोकि, १)
(२) मान्य उत्तर (१), समुच्चय (१) (क) दण्ड़ी के-यूमक, शलेप, चित्र, जाति, विभावना, हेतु (काव्य- लिंग सहित), सूक्ष्म विश्ेष, परिविृत्ति, निर्दाना, व्यतिरेक (भेद 30 नाम से), समाहित, इप्रमा, रूपूक, अपद्वुति, सम्रासोक्ति, उत्परेक्ष, अप्रस्तुतप्रशंसा, तुल्ययोगिता, लेग, सहोक्ति, आक्षेप, अर्थान्तुर- न्यास, विशेपोक्ति, दीपक, क्रम, अतिशयोक्ति, भाविक, संसृष्टि, A(ख) भामह के-अनुप्रास, सन्देह (संवय नाम से), (ग) उद्धट का-काव्यलिंग [हेतु में] (घ) रुद्रट के -अहेतु, उत्तर (१), अन्योन्य, भ्रान्ति, मीलित, भाव, स्मृति [ स्मरण], शब्दसलेप, अनुमान, साम्य, समुच्चय, परिकर,
(३) स्वकल्पित पर्याय, वकोकि [चाकोवाकय में ] १. जाति (शब्दालद्कार), २. गति, ३. रीति,४. वृत्ति,
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५ छाया, ६ मुद्रा, ७. उक्ति, = युक्ति, ९. भणिति, १०. गुम्फना, ११ शय्या, १२ पठिति, १३ वाकोवाक्य, १४ प्रहेलिका, १५. गूड, १६ प्रय्नोत्तर, १७ अध्येम, १८ श्रव्य, १९ प्रेक्ष्य, २०. अभिनीति, २१ सभव, २२ दितर्क, "३ प्रत्यक्ष, २४ आगम, २५. उपमान, २६ अर्थापति, २७ अभाव, २८. समाधि। इन अलद्वारो का वर्गीकरण शब्द, अर्थ तथा शब्दाथंयुम्म दोनों के तीन वर्गों मे भोजराज ने इस प्रकार किया है- (& शब्दवर्ग जाति, गति, रीति वृत्ति, छाया, मुद्रा, उक्ति, युक्ति, भणिति, गुम्फना, शय्या, पठिति, यमक, इ्लेप, अनुप्रास,र चित्र, वाकोवावय, प्रहेलिका, गूढ, प्रश्नोत्तर, अध्येय, श्रव्य, प्रेक्य, अभिनीति। (3 अर्थवर्ग जाति, विभावना, हेतु, अहेतु, सूक्ष्म, उत्तर, विरोध, सभव, अन्योन्य, परिवृत्ति, निदर्शना, भेद (व्यतिरेक), समाहित, भ्रान्ति, वितकं, मोलिन, स्मृति, भाव, प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्थापति, अभाव। (३) उभयवर्ग उपमा, रूपक, साम्य, सशय, अपह्वुति, समाधि, समासोक्ति, उत्प्रेक्षा, अप्रस्तुतप्रदंसा, तुल्ययोगिता, लेश, सहोक्ति, समुच्चय, आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, विशेपोकि, परिकर, दोपक, क्रम, पर्याय, अतिशायोक्ति, द्लेष, भाविक, समृष्टि। इनमे आति और लेष दो-दो बार आए हैं। इनमे से वलेप तो दो रूपो मे रुद्रट ने भी माना था, जाति का अर्थानद्वारगत रूप स्वभावोकि मे अभिन है। इस प्रकार केवल चब्दजाति की वल्पना भोज की अभिनव कल्पता ठहरती है। इस प्रकार भोजराज तक अनद्वारो की संख्या ११५ हो जाती है अर्थात् ८७ प्राचीन तथा २६ भोज के स्वोपन्ञ नवीन। इनमे से भोज ने दण्डी के परचात् रुद्रट से ही सबसे अविक आपूर्ति की है। रुद्रट के काव्यालकार से भोज ने १६ उदाहरणपद्य भी' लिए हैं। १. (१) सरस्वतीकृष्ठाभरण उदाहरण शाद, काव्याउकार उदाहरण ४।१९, -- (२) स. क. उ.३६६, का, ७।५५, (३) सू क उ ३१५२, का ७:५७, (४) स क न. ३।१५१, का ७६०, (५) स क उ.३९३, का ७।८७, (६) स क. उ ३५७, का ७९७, (७) स क उ ४२०४, का ७।११० (८) स क उ ४९, का. ८।६, (१) स क उ.४१,, का. ८।१८, (१०) स क उ ४।४, का ८२०, (११) स क उ.४११७, का. ६।३०, (१२) स क उ. ४।१८, का ८ा३१, (१३) स क उ ४३०; का. ८ा५०, (१४) स क उ ४।५६, का. म'शड, (१५) स. क. उ. ४६३, का ८1१०८, 1 (१६) स. क. उ. १।५९, का. ११।१३.
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यद्यपि भोजराज का अलंकारविवेचन अपने आप में एक विशाल विषय है तथापि उनकी स्थापनाएं अपनी मीलिकता में इतनी स्पष्ट हैं कि विचार केवल उनके द्वारा अमान्य मलंकारों के अन्तर्भाव या सवंथा प्रत्याख्यान के अनुसंधान में करना होता है। हुमने यहाँ जो विवरण दिया है उससे इस अनुसंधान में पर्याप्त सहायता मिल सकती है।
मम्मट [१०५०-११०० ई० ] मम्मट ने पूर्ववर्त्ती सभी आचार्यों से मधुकरी लो और काव्यप्रकाश में उन सबका समन्वय करना चाहा। यद्यपि यह भी सत्य है कि मम्मट बलक्कारचिन्तन में उतनी व्यवस्था नहीं ला सके हैं जितनी व्यवस्था वे रस, ध्वनि और दोपों के चिन्तन में लाते दिखाई देते हूँ। बलंकारों में वे लड़खड़ाते दिखाई देते हैं,' विशेषतः अर्थालंकारों में। इसका कारण उनका वाधकय या अस्वास्थ्य हो सकता है। यह तो प्रसिद्ध है कि वे 'परिकरालंकार' के आगे अर्थालकारों का विवेचन नहीं कर पाए थे। अवशिष्ट अंश की पुर्ति किसी मलक, मलट या अल्लट ने की है। मम्मट ने अलंकारों को भोज की ही नाई शब्द, अर्थ और दोनों के तीन वगों में विभक्त किया। विवरण- १. अमाव्य( क) दण्डी के-आवृत्ति, आशी, प्रेय, ऊजंस्वि, रसवत, हेतु, लेश, स) भामह के-उपमायक [भोज द्वारा खव्डित]. उत्प्रेक्षानयव [भोज द्वारा खण्डित] (x) (ग) उद्धट के-छेकानुप्रास, लाधनुप्रास [पृथक अलंकार के रूप में ] (i (घ) वामन- बकरोि (ङ ) रुद्रट के-भाव, हेतु, मत, उभयन्यास [भोज द्वारा खण्डित], क) पुवं [दोनों भेद अतिशयोक्ति में ], साम्म, महेतु, सहोकि (१) समुच्चय (१) [ दीपक में] (च) भोज के-जाति [शब्दगत ]गति, रीति, बृक्तकि छस्पा, मुक्ष, अक, युक्ति,भणिति, गुम्फना, शद्या, पठिति, वाकोवाक्य, प्रहेलिका, गुढ, प्रश्नोत्तर, अध्येय, श्रव्य, प्रेक्ष्य, अभिनीति, संभव, वित्क, प्रत्यक्ष, आगम, उपमान, अर्थापत्ति, सभान, समाधि १. इस पर सागरिका ९।२ में देखिए हमारा-'मम्मटाभिमतं लक्षणायाः पडिबधत्वं -हेत्वलंकारच्च' लेख, इसमें हमने सतलाया है कि हेत्वलंकार और काव्यलिंगालंकार में से हेतु ही अलंकार है तथा काव्यलिंग हो अलंकार नहीं है। २. मम्मट ने जिसे समाधि कहा है वह भोज के अनुसार समाहित है। भोज की समाधि मम्मट के सामान्य से मिलती है।
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२. मान्य (क) दण्डी के-स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तर- न्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिगयोक्ति, उत्प्रेक्षा सश्रम, यथासंस्य, पर्यायोक्त, समाहिका समाधि नाम से], उदात्त, अपह्वति, इ्लेफ विशेयोकि, तुल्ययोगिता, विरोध, अप्रस्तुतप्रशंस), व्याजस्तुति, निदशंना सहोकि परिवृति, भाविक, संसृषि, यमक, चित्र लख) भामह के अनुप्रासत [किन्तु उद्भट के ढंग पर], अनन्वय, उपमेयोंपमा, सन्देह । (ग) उद्भट के-[ घेकानुप्रास किन्तु अपृथक] पुनरक्तवदाभास, प्रति- वस्तूपमा, काव्यलिग, दष्टान्ठ, संकर। ()(घ) बामन की-व्याजोकि। (ङ) स्दट के- वकोकि, श्लेप [शब्दगत ], समुच्चय, पर्याम्र, विषय, अनुमान, पूरिकर, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य,उत्तस[दोना], सार, मीलित, एकावली, प्रतीप, भ्रान्तिमान्, प्रत्यनीक, स्मरण, विशेष, तद्गुण, पिहित [ सामान्य नाम से], असंगति, व्याघात, अधिक। ((च) भोज का-मालादीपक [दीपक से अलग कर ] ३ स्वकस्पित () १. विनोकि (२) सम (३) अतद्गुण। इस प्रकार मम्मट तक अलकारो की संख्या ११८ हो जाती है अर्यात ११५ भोज तक के तपा ३ स्वयं मम्मट के। इनमे से मम्मट ने केवी केअत्रकारो को अलकाररूप मे स्वीकार किया, शेष ५० को नहों। मार्मिक तथ्य यह है कि मम्मट ने भोज को सवंथा अमान्य कर दिया। जबकि रुद्रट से उन्होने २४ अलकार अपनाए। इन २४ अलकारो का अनुपुम भी प्राय कही है जो सट्रट मे पाया जाता है।' अनेक उदाहरण भी उन्होंने ज्यो के त्यो अपना लिए हैं। मउद्बलप तो सद्रट की पूर्ण प्रतिलिपि है। स्पष्ट ही मम्मट ने दण्डी और रुद्रट को अधिक महन्व दिया और उर्नके अलंकारों को दिपुर मार्यों में अपनाया। बीच के आचार्यों से भी उन्होंने ग्राह्य विच्छितियो का चयन किया। किन्तु यहाँ यह तथ्य स्पष्ट रूप से समझ लेना होगा कि मम्मट ने जो
१ अतद्गुण नाम से एक भेद भोज ने भी प्रस्तुत किया है, रिन्तु उसे उन्होंने मीलिन के अन्तर्गत गिना है और उसका जो नक्षण दिया है बह मम्मट के अतद्गुण से सवंथा भिन्न है।
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अलंकार दण्डी से लिए हैं उनके लक्षणरपी उस जल को उन्होंने अपने प्रातिभ पट से छान कर अपनाया है, जिसे भामह और उद्भट अपनी बुद्धिचालनी से छान चुके थे। मम्मट ने इन अलंकारों को निम्नलिखित वर्गों में निम्नलिखित क्रम से विभक्त किया- १. शब्दालंकारवर्ग चकोकि, अनुप्रास, यमक, श्लेप, चित्र, पुनरुकवदाभास। २. अर्धालंकारवर्ग उपमा, अनन्वय, उपमेयोपमा, उत्प्रेक्षा, संदेह, रुपक, मपहुति, इलेष, समासोक्ति, निदशंना, अप्रस्तुतप्रशंसा, अतिशयोक्ति, प्रति- वस्तुपभा, दष्टान्त, दीपक, मालादीपक, तुल्ययोगिता, व्यतिरेक, आक्षेप, विभावना, विशेषोक्ति, यथासंख्य, अर्थान्तरन्यास, विरोध, स्वभावोक्ति, व्याजस्तुति, सहोकि, विनोकि, परिवृत्ति, भाविक, काव्यलिंग, पर्यायोकत, उदात्त, समुच्चय, पर्याय, अनुमान, परिकर, व्याजोक्ति, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर, सूक्ष्म, सार, असंगति, समाधि, सम, विपम, अधिक, प्रत्यनीक, मीलित, एकावली, स्मरण, भ्रान्तिमान, प्रतीप, सामान्य, विशेय, तद्गुण, अतद्गुण, व्याधात, संसृष्टि, संकर। ३. उमयालंकार पुनरुक्तवदाभासने मम्मट के इस वर्गीकरण से र्पष्ट है कि उन्होंने रुद्रट के वास्तव, ओपम्य, अतिशाय औौर श्लेप इन वर्गों और उनके उक्त कम को महत्त्व नहीं दिया। केवल साहश्यमूलक अलंकारों को भी एक साथ नहीं गिनाया। उनमें गिने जाने योग्य स्मरण और भ्रान्ति- मानू को उल्लास समाप्त करते-करते याद किया। यदि उन्होंने परिकर तक ही दशम उल्लास का निर्माण किया हो, तव भी साहश्यमुलक अलंकारों के बाद वे १८ अलंकारों का निर्वचन करने का अवसर पाए हुए हैं। इतना अवसर स्मरण को स्मरण करने और भ्रान्तिमान के प्रति भ्रान्तिमान् न बनने के लिए पर्याप्त था। साहय्यमूलक अलंकारों में मम्मट ने सादृश्येतर-सम्बन्धमूलक विस्छित्तियों को मिश्रित कर दिया, इसलिए अति- शयोक्ति में कार्यकारणभाव के पीर्वािर्य के विपरयय से होने वाली अतिशयोक्ति को भी गिन लिया और प्रस्तुतान्यता तथा यद्यर्थोक्ति से होने बाली अतिशयोक्ति को भी। रुद्रट ने पूर्वनाम के दो अलंकार मानकर इस दिशा में साबधानी बरती थी, परन्तु मम्मद को
१. यद्यपि कहीं-कहीं मम्मट की बुद्धि चालनी सिद्ध हुई है औोर भामह तथा उद्भट की प्रतिभा ही पट। २. मम्मट ने स्द्रट औौर भोज की यह स्थापना स्वीकार की है कि अन्य अलंकार भी उभयालंकार हो सकते हैं। उनने इन्हें उभयालकारों में यह कहकर नहीं गिनाया कि प्राचीन आचार्यों [ भामह, उद्भट ] ने वैसा नहीं किया है।
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( ४४) दोनो अतिरय अभिन्न ही समक् मे आए, गोघृन और वनस्पति में उन्हे कोई फरक नहों लगा। १
रुय्यक [११००-११५० ई० ] र्य्यक या रुचक को यह और ऐसी ही अन्य कमिया खटकी। इनके परिहार के लिए उन्होने प्रस्तुत ग्रन्थ के सूत्रो का 'भलकारसूय' नाम से निर्माण किया। इनमें उन्होंने अलंकारो को उनकी सजातीयता के आधार पर यथाशक्य वर्गीकृत किया। पहले उन्होन मम्मट के ही अनुसार अलकारो को मुख्यतः शब्द और अर्थ के दो भागो मे बांटा, फिर उनमे से प्रत्येक भाग के जलकारो का वर्गीकरण किया। दण्डी से मम्मट तक ११८ बलंकारो मे से रुप्यक ने ७५ अलकार अपनाए और ७ अलकारों की कल्पना अपनी ओर से की। इनका विवरण यह है- (१) अमान्यधी क) दण्डी के-आवृत्ति हेतु, लेश, आशी:1 ्( ख) भामह के-उत्प्रेक्षावयूद, उपमारपक।/ ल)(म) वामन की-वमोकि। 3 (प) भोज के-अर्थापति और समाहित को छोड़कर ेप २५ सो। (इ) सद्रट के-भाष, हेकर मत, उभ्यास, पूवं-[दोनो ], अहेत्ु, सहोक्ति (१), उत्तर (१) समुच्चय (१) अर्थशलेष (२) मान्य (क) दण्डी के-स्वभावोकिि, उपमा, रूपक, दोपक, आशेप, अर्थान्तर- न्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोकत, अतिरायोकत (), वतिमयोक्ति (२), उद्प्रेक्षा, मूक्ष्म, घय (यथासंख्य), रसर्चेत्,प्रेय, x ऊजस्वी, समाहित (समावि), पर्यायाक्क उदात, अपृहंति, इलेप, विशेपोवित, तुल्मयोगिता, विरोव, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निदसुना, सहोवित, परिवृत्ति, संसृष्टि भाविक, यमक्र चिय।। ((स) भामह के-अनुपरास, उपमेयोषमा, अनन्वर्द, सदेह। --
ग) इन्भट के पुनरवतवदमास देकानुपास, लादनुपास, प्रति- वस्तूपमा, काव्यर्लिंग, इष्टरान्, सकृर। (((म) वामन की-व्याशोकि। (ड) रद्रट के-समुच्चंय, पर्यास, विषम, अनुमान, परिकर, परिसस्या, कारणमाला अन्योन्य, उत्तर, सार,मीलिव, एकावनी, प्रतीप, भ्रान्तिमान, प्रत्यनीक, स्मवण, विशेष, तद्गु्ण, पिहिस [सामान्य], असगृति, व्याधार्ट, अधिक, चनोकक्त।
१. हम यहाँ मम्मट के केवल उन्ही दोषो का उल्लैख कर रहै हैं जिनका परिहार अलंकारसवंस्वकार ने कर दिया है।
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(न) भोज की-अर्थापति (छ) मम्मट के- विनोिएसम, अतद्गुण, मालादीपक, समाहित [भावशान्त्यकतात्मक ]। (३) स्वकल्पित १. परिणाम, २. उल्लेख, ३. विचित्र, ४. विकल्प, ५. भावोदय, ६. भावसन्धि, ७. भावशवलता । इस प्रकार रय्यक तक अलंकारों की संख्या १२५ हो जाती है। इनमें से ४३ अलंकार छोड़कर शेप ८२ अलंकार स्य्यक ने स्वीकार किए। इनमें से रुद्रट के पूर्व- नामक अलंकार को यदि अतिशयेक्ति में गिन लें, जो उचित है, तो कुल अलंकारों की संस्या १२४ रहेगी और य्दि रुम्यक की दोनों अतिशयोक्तियों को मम्मट के समान एक अलंकार मान लिया जाए तो स्य्यक के द्वारा स्वीकृत अलंकारों की संख्या ८१ रह जाएगी। इनमें यदि भावोदय आदि तीन अलंकारों को घटा दिया जाए तो सम्यक द्वारा सूचित अलंकारों की संस्या ७८ रहेगी। वस्तुतः खय्यक को भी भावोदय आदि अलंकार रूप से अभीष्ट नहीं हैं। अतएव उनके लक्षण स्य्यक ने नहीं दिए और उत्हें 'पृथगलंकार' कहा अर्थात् इनमें अलंकारत्व रहता अवश्य है, किन्तु वह और ही ढंग का अलंकारत्व रहता है। वस्तुतः रसवत, प्रेय, ऊर्जस्वी और समाहित को भी र्थ्यक अलंकार रूप से मानते प्रतीत नहीं होते। हमें लगता है कि अन्त अन्त में जो ८३ और र४ सूध आए हैं उन्हें इस प्रकार पढ़ना
[सू० ८३] रसभावतदाभासुतत्पशमा र्ना निबन्धनेन चाहिए- रसवत प्रेयऊर्जस्विसमाहि वानि, भावोदयो भावसन्धिर्भावशञबलता च।। [ सू० ८४ ] एवे पृथगलंकारा:।। इसका अभिग्राय यह हुआ कि पुनरुकवदाभास से उदात्त तक जो अलंकार बतलाए गए वे ऐसे अलकार थे जो अपने आपमें परिपूर्ण थे। आगे जो संसृष्टि और संकर आने वाले हैं वे ऐसे न ह्रोकर अन्यसापेक्ष हैं, अर्थात् उनका स्वरूप अपने आप में कुछ नहीं है। वे जो कुछ हैं अन्य अलंकारों की चिन्धियों के जोड़ से बनी कपड़ी हैं। सूत्रों का जो पाठ काशी और त्रिवेन्द्रम् के संस्करणों में मिलता है उसमें 'एते' शब्द है भी। निर्णय- सागर, मोतीलाल तथा मेहरचन्द वाले संस्करणों में इसे किसी कारण छोड़ दिया गया है। हमारी भी दृष्टि इस ओर अव जाकर गई है। इस प्रकार के सूत्रपाठ से स्पष्ट होगा कि रुय्यक ने रसवत् से लेकर भावशवलता तक के ७ अलंकारों को अलंकार रग से प्रसिद्धि के कारण गिना भर दिया है, उन्हें वे उपमा आदि जस अलंकार मानने को तैयार नहीं हैं। वृततिकार की बुद्धि पर ओश्चय होता है कि वे ग्रन्थारम्भ की भूर्मिका में ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य को पृथक कर केवल चिन्नकाव्य के लिए सूनों का निर्माण बतलाते हैं और अन्त में रसवदादि को भी अलंकार मान बैठते हैं। ये भी सब गुणीभूतव्यंग्य ही हैं। अवश्य ही सूत्रकार से वृत्तिकार भिन्न हैं।
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इस प्रकार वस्तुत रुम्यक के मत मे ७५ अलंकार ही अलंकार रूप से मान्य हैं। उनमे से वे ७१ पचीन आचार्यों से लेते और ४ अपनी ओर से उपस्थित करते हैं। सूत्रकार कम्मक ने इन अलकारो को जिन (खणडो) वर्गों और अनुच्छेदो म विभाजित किया है उन्हें इस प्रकार स्पष्ट किया जाता है-
१. शुद्ध खण्ड चर्गे (१) शध्दालंकारघर्ग या पौनरुकत्यवर्ग-, पौनरुक्तयविच्छिति (१) अर्थपौनस्वत्य पुन एक्तव दाभास (२) व्यन्जन पौनरुवत्य छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास यमक (४) शब्दार्योभयपीन० लाटानुप्रास (५) स्थानविशेयश्लिष्टवर्णपौन चित्र वर्ग (२) अर्थालंकारवर्ग (१) सादृश्यविष्छिति (क) भेदाभेदतुल्यत्ामूलक उपमा, अनन्वय, उपमे- (स) अभेदप्राधान्यमूलक योपभा, स्मरण (अ) आरोपाश्रित रपक, परिणाम, सन्देह, भ्रान्तिमान, उल्लेस, अपह्नति (मा) अध्यवसायाश्रित उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति (१) (ग) गम्योपम्यमूलक तुल्ययोगिता, दीपक, प्रति-
(घ) भेदप्राध्यान्यमूलक वस्तूपमा, दृष्टान्त, निदशना व्यतिरेक, सहोवित (२) विशेषण विच्छिति (क) वेवन विरेषणविक्छिति समासोक्ति, परिकर (ख) सविरोष्य विदयेपणविष्छिति स्लेप (३) गम्याथंताविच्छिति पर्यायोक्त, व्याजस्तुति, आक्षेप (४) विरोधविच्छिति (क) शुद्धविरोध विरोध (ख) कार्यकारणभावाश्रित विभावना, अतिदयोक्ति(२) विरोधमूलक असगति, विथम, विचिय, व्याघात
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(ग) आशयाश्रयित्वमू० अषिक, विशेष (ध) व्यतिहा रमूलक अन्योन्य (५) शृद्धलाविच्छिति कारणमाला, एकावली, मालदीपक, सार (६) न्यायविच्छति काव्यलिंग, अनुमान यथासंस्य, पर्याय, परिदृत्ति, (क) वर्कन्यायमूलक परिसंख्या, स्त्रापिति, विकल्प (स) वाकपन्यायमूलक समुच्चय, समाधि (ग) लोकन्यायमूलक प्रत्यनीक, प्रतीप, मीलित, तद्गुण, भतद्गुण, उत्तर (७) गूढाथंपर ताविच्छिसि (क) शुद्ध सूक्ष्म, व्याजोकि, वकोकि,
(ख) स्फुटार्थंता स्वभावोकि भाविक (ग) उदात्ता उदात (घ) चित्तवृत्त्याश्रित रसवत्, प्रेय, ऊ्जस्वि, समा- हित, भावोदय, भावसन्धि, भावशबलता २. मिश्र खण्ड (१) संसृष्टि (क) शब्दालंकार संसृष्टि (ख) अर्थालकार संसृष्टि
(२) संकर. (ग) उभयालंकार संसृष्टि
शेप पांच में चार अलंकारों को वृत्तिकार ने इनमें से कुछ अलंकारों के बैपरीत्य के आधार पर तत तत् संदर्भों में प्रस्तुत बतलाया है। ये निम्नलिसित हैं- (१) विनोक्ति सहोक्ति-विपरीत (२) अप्रस्तुतप्रशंसा समासोक्ति-विपरीत (:) विशेषोक्ति विभावना-विपरीत (४) सम विपम-विपरीत शेप बचता है अर्थान्तरन्यास। इसको अप्रस्तुतप्रशंसा के सन्दर्भ में रसने का कारण वृत्तिकार ने सामान्यविशेषभाव और उस पर आश्रित समर्थ्यसमर्थकभाद माना है। इस प्रकार रुय्यक ने अलंकारों का विभाजन केवल दो खण्डों में किया (१) शब्द खण्ड और (२) अर्थ खण्ड। उन्होंने सब्दार्थोभय-खण्ड की कल्पना को उत्मेप तो
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दिया है परन्तु उसे मम्मट के ही समान अंकुरमात्रता तक सीमित रखा है, भोज के समान पल्लवित नही किया। ऐमा लगता है कि- जिन पत्रिकाओ पर अलंकार सूत्र लिसे गये थे उनमे से तुल्ययोगिता से लेरुर निदशना तक की पत्रिका व्यतिरेक और सहोकिकी पत्रिका के पहले रख दी गई। अन्यथा अभेदप्राधान्य के बाद भेदपाधान्य को स्थान दिए बिना गम्योपम्य को स्थान न दिया जाता4 उक्त वर्गोकरण मे समासोक्ति, प्रतीप, सामान्य और मीलित भी सादृश्यमूलक अलंकार हैं जिन्हें गम्योपम्य मे गिना जा सकता था, परन्तु समासोकि को परिकर और इ्लेप के साथ गिन दिया गया है, जिनमे शलेय तो सादृश्यमृलक माना जा सकता है परन्नु परिकर नहीं। विकत्पालकार भी सादृय्य की विच्छितति अपने गर्भ मे छिपाए है। अतिशयोक्ति के समान अप्रस्तुनप्रशसा को दो भागो मे विभक्त कर उसके सदृश्यमूनक भेद को भी स्य्यकाचार्य पृथक् रख सकतेथे, अन्योकि नाम से, जैसा कि पूर्वाचायों ने किया था, परन्तु उन्होने उस् पर कृपा नहीं की।9
अलंकारतत्व भारतीय चिन्तन ने काव्य को अकाव्य से धृथकू करने वाले जिन तत्त्वो का अनुसन्धान किया, संस्कृत के काव्यशास्त्र ने उनके नामकरण का शताब्दियो व्यापी एक रीचक इतिहास प्रस्तुत किया है। यह इतिहास वैज्ञानिक भी है। 'चिघ्र निरालम्वनमेव मन्ये प्रमेयसिद्ध प्रथमावतारम्।' कहने वाले अभिनवगुप्त ने साक्षात्कार की मानस प्रक्रिया में वस्तु के प्रथम प्रतिबिम्ब को जो पाश्वंवर्ती अन्य पदार्थों के प्रतिबिम्बो से अस्पृष्ट और 'स्व'-मात्र सीमित किन्तु परिपूर्ण या समय्र माना था, उसका ठीक उदाहरण हमारा उप्युक्त काव्य-चिन्तन है। हमने सबसे पहले भरतमुनि के शब्दों मे कहा 'रस काव्यार्थ'। काव्य की मूलभूत वस्तु रस है। दूसरे शब्दो मे काव्य ऐसी वस्तुओ को प्रस्तुत करता है जिनमे हमारा
१ अलकारो के वर्गीकरण पर द्रष्टव्य ग्रन्थ-पं० मधुमूदनजी का 'साहित्य- शास्त्रीय तत्वों का आधुर्निक समालोचनात्मक अध्यया' पृ० १२५-२८, डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी की 'अलंकारमीमासा' पृ०१८०-९६, श्रीकन्हैयालालपोद्दारकृत 'संस्कृतसाहित्य का इतिहास' भाग २, पृ० १०३, प०, पुरयोत्तमशर्मा चनुर्वेदी का 'अलकारो का क्रमिक विकास' पृ० १०९- ११६। इन सबमे महत्त्व सय्यक्सूत्रो को ही दिया गया है।
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चित्त रमता है, जो हमें प्रिय हैं और उनके द्वारा वह हमारे संवेदन को जगा देता है। हम हमारी प्रिय वस्तुओं का मानस और अभौतिक संभोग करने लगते हैं। कामशास्त्र के प्रणेता वात्स्यायन भी रस की बात करते हैं, किन्तु उनका रस काव्यरस से भिन्न है। उनका रस रति-परिणति में प्राप्त होने वाली वेदनामुक्ति है, जिसका अधिकांश परित्यागात्मक है। काव्यरस परिणति नहीं, उसके पहले की चर्वणा है। ताम्बूलवीटिका रसिक के मुख में छिपी बैठी रहती और किसी रस की सृष्टि करती रहती है। ऐसा नहीं कि उसका रस उसकी परिसमाप्ति की प्रतीक्षा करता हो। वस्तुप्रतिबिम्ब हमारी चेतना पर अंकित होता और विम्वगत असाधारण्य से मुक्त हो वह हमारे लिए एकमात्र प्रेयोविषय ही चनकर उपस्थित होता है। इस प्रियोविपयीभूत प्रतिबिम्ब-घन के सुदीर्घ अंकन को काव्य प्रस्तुत करता और हमें इन प्रतिबिम्तों को गोपिकाओं से रास करते रहने का उत्तम अवसर देता है। वस, इसी रास-रस के कारण वह अकाव्य से भिन्ष है। यह रस अपने भीतर उन भावों को भी समेटे रहता है जिन्हें लोक में रति, शोक, हास आदि कहा जाता है। अन्य समस्त सामग्री में इन भावों की सामग्री वरिष्ठ और श्रेष्ठ होती है। बाद में रसशब्द केवल इसी सामग्री तक सीमित हो जाता है। सौन्दर्यवाद-वामन 'रस'-शब्द को छोड़ते और 'सौन्दर्य'-शन्द को अपनाते हैं। वे काव्य को अकाव्य से भिन्न करने वाले तत्व को 'सौन्दर्य' की संज्ञा देते हैं। अवश्य ही सौन्दर्थ रसकी अपेक्षा एक व्यापक संज्ञा है। सीन्दर्य प्रमातृसापेक्ष होने की अपेक्षा प्रमेयसापेक्ष अधिक है। रस इसके विपरीत प्रमातृसापेक्ष अधिक था। इस प्रकार रसवाद के प्रमातृतट से काव्यचिन्तन की धारा सौन्दर्य तक आते-आते प्रमेय- तट की ओर अधिक झुक गई। फलतः कला के 'स्व' की मीमांसा ने जोर पकड़ा मौर उसका ग्रहीतृपक्ष दुर्बल हो गया। इस प्रकार रस और सौन्दर्य दोनों की उपलब्धिर्या एकाड्गी रहीं। चारुत्ववाद-आनन्दवधन ने रख और सौन्दर्य दोनों की अन्विति और उसके लिए एक मध्यम मार्ग की खोज की। उन्होंने 'चारुत्व' को स्वीकार किया। चारुत्व प्रमातृपक्ष और प्रमेयपक्ष के मध्य का बिन्दु है। वह जितना व्यक्तिसापेक्ष है उतना हो वस्तुसापेक्ष भी। न वह मायावाद है, न भूतवाद। वह परमशिववाद है। उसमें जिसना सत्य शिव है उतना हो यह संसारात्मक भैरव भी। दोनों एक ही हैं। चाहे इस छोर से देखा जाए चाहे उस छोर से। तथ्य एक ही है। 'चारुत्व' की इस समन्वय भूमिका में कला के 'स्व' का भी महत्त्व रक्षित था और प्रमाता के संवेदन का भी। इसमें रस की रक्षा भी थी और सौन्दर्य की भी। इसे कहा जाए तो 'सौन्दर्य-रस' या 'स्वसंवेदन' कहा जा सकता है। मानन्दवर्धन तक आते-आते काव्यरूपी पुष्पवीथिका के विषय में यह स्थिर हो गया कि उसका सर्वस्व चारुत्वरूपी 'सौरभ' है। मव केवल पुष्पों की गवेपणा शेष रह गई।
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यह भी कोई नई बात न थी। यह भी भरतमुनि से ही होनी दा रही थी। परवर्तीं आचार्यों ने उसी पर कुछ नए परिवेष मे विचार किया। यलह्वार-भरतमुनि ने अनुमचिता को प्रभावित करने वाले तत्वो के रूप में लक्षण और अलुद्वारों के नाम से पुकारी जाने वाली कुछ विभेपताओ की खोज की। इन विेष- ताओ मे अलद्धारो को अधिक महत्त्व दिया गया। दण्डी और भामह ने इस दिशा मे पर्याप्त चिन्तन किया। उन्होंने यरदारो की अनेक विस्छितियो को खोजा । अलह्दारो के ही साथ इन आचार्यों ने गुणनामक तत्व की भी खोज की औोर कुछ काव्यसैलियो को और भी ध्यान आावृए किया। वामन ने इन सैलियो को सर्वाधिक महत्व दिया सीर इन्हे 'रीनि' के नाम से पुकारकर काव्यात्मा स्वोकर किया। वामन ने दो कार्य और किए। एक तो गुणो को रीतिगत विशेष धर्म स्वीकार किया औोर दूसरे अलद्वार मज्ञा की दाल्यचिकित्या वैमे ही की जैसे परवरती आचार्य आनन्दवर्धन ने 'अर्थ'सज्ञा की। आनन्दवर्धन ने काव्यगत अर्थ को वाच्य और प्रतीयमान नामक दो भागो मे विभक्त माना। वामन ने भी मलद्वार तत्ब को सौन्दयं और उपमा आदि की विच्छित्ति के रूप मे प्रविभक्त बतलाया। इन दोनों भागो मे भी वामन ने 'सोन्दय' भाग को प्रधान माना। वस्तुतः इन्हे दो भाग न कहकर व्यड्ग्य और व्यन्जकु कहना चाहिए औौर मानना चाहिए कि आनन्दवर्धन को व्यग्जना की प्रेरणा वामन से ही मिनी। वामन भी वैयाकरण थे हो। सोन्दर्य की इस व्याप्ति और मीमा को वामन के समकालीन आचार्य उन्भद ने नही पहचाना। रनहोंने वेवल वि्छित्तिपक्ष की महत्त्व दिया और काव्याउद्वारसार- संग्रह नामक ग्रन्य मे रूपक आदि के रूप में ही अलद्कार को स्वीकार किया। ध्वनि-आनन्दवर्धन ने इन दोनो धाराओ में उत्ट की धारा को अतीव स्थूल और अकिंचन घोषित किया। वामन की सौन्दय-धारा को स्वीकार करके भी उन्होंने उसके लिए उपादान के रूप मे विविध प्रकार की सामग्री उपस्थित की। व्यब्जना की विद्युच्छत्ति का आधप ले उन्होंने एक नवीन लोक की ही मृष्टि कर डाली, जिसमें न रूपक आदि अलद्धारो का ही महत्त्व था, न गुणो का और न रीति या वृति का। उसमे महत्व बेवल चातत्वनिप्पत्ति वा या और था उसके लिए अपेक्षित उन सम्पूर्ण काव्य- 7
घटको का जो, गुण और अन्द्वार, रीति और वृत्ति भी ये मर उनसे परे भी । आनन्द- वर्धन ने गुण आदि मे परे व्यंग्यनामक एक प्रतीयमान अर्थ का अन्वेषण किया औोर प्रधानता के आधार पर उसे ध्वनिसंज्ञा दे काव्यात्मा स्वीकार किया। उन्होंने अनदारादि वो वाग्विततप कहा और उन्हें गुणोभूतव्यव्यनामक वाव्यभेद के अन्तर्गव वन्नभून माना। अलंकारों को आनन्दवर्धन ने बहुन ही उपेक्षापूर्ण दृष्टि से देखा। अभिनवगुप्त और सम्मट ने आनन्दवर्धन के इस पक्ष को तूक दिया और उन्हें काव्यत्व की निप्पसति के लिए वैकत्पिक महत्त्व का तत्त्व स्वीकार किया। इन आचार्यों ने अलंदार के साभ
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( ५१ ) --- ही अलंकार्य की भी कल्पना की और अलंकार्य के रूप में रस आदि को ही स्वीकार किया इनने यह भी स्वीकार किया कि अलंकार कभी कभी रसविरोधी भी बन --
बैठता है। वक्रोकि-इसी बीच एक और समर्थ आचार्य हुए-कुन्तक। इनने अलंकार पक्ष को व्यापक परिवेप में देखा और उसे वकोकि के अतीब विस्तृत क्षेत्र तक फैलाया। इस भंगिमा में उन्होंने ध्वनि, अलंकार, गुणों और रीतियों को वैसे ही समाविष्ट माना जैसे महोदधि में भिन्न तरंगों को अथवा मधुमास में पुष्पों को समाविष्ट माना जाता है। इस चिन्सन ने काव्य की उन गनेक विधाओं को भी अपनाने का अवसर दे दिया जो अन्य चिन्तनों में अपनाई नहीं गई थीं । कथन के उस प्रत्येक प्रकार को इस भाग ने अपने परिवेष में समेटा जिससे चमत्कार का अनुभव होता था और उक्ति में विच्छिति आती थी। बकोक्ि अपने आपमें एक अलंकार हो है। इस विवरण से स्पष्ट है कि उपादानमीमांसा में भी अलंकार को अधिक आचार्यों ने महत्त्व दिया। उसके ऊपर काव्यात्ममीमांसा में तो सौन्दर्य के रूप में अलंकार को स्थान मिल ही चुका था। इस प्रकार काव्यशास्त्र के चुनावी मैदान में जीत किसी की भी हो परन्तु इतना निश्चित है कि चिन्तन का वास्तविक बहुमत 'अलंकार' तत्त्व पर अधिक टिका था। अलंकारशब्द को रूढि से बाहर निकालकर और केवल उपमा-रूपक आदि तक निरुद्ध न मानकर यदि अपने विराट् रूप में देखा जाए तो लगेगा कि गवेषकों के अन्तर्मन में उसके प्रति जो एक समादर छिपा हुआ है, वह तथ्याधित और आदरणीय है। वस्तुतः जो अतिशय तत्त्व है वही 'अलं'-तत्त्व है। अतिशयन्शब्दआकारवृहत्त्व का अभिलापक न होकर 'विशेषता' का अभिलापक है। सामान्य को विशिष्ट बनानेवाला तत्त्व ही 'अतिशाय'-तत्व है। जो वाङ्मय लोक-साधारण और वत्तव्यमात्र तक, सूचनामान तक सीमित रहता है वही अविशय के आते ही रखनीयता, आस्वाद्यता और स्पृहणीयता तक पहुंच जाता है। रसनीयता, आस्वाद्यता या स्पृहणीयता ही हैं वे 'विशेप' जिनसे उक्ति में काव्यत्व का आधान होता है। इस प्रकार अतिवाय तत्त्व या विशेष तत्त्व काव्यत्व के उत्स हैं और ये ही हैं 'अलं'-तत्व। अलंभाव या 'मलंत्व' ही है अलंकार। हम इले संक्षिप्त के विस्तार और विस्तृत के संक्षेप में देख सकते हैं। बीज का शतगत शाखाओं वाले वृक्ष के रूप में परिणत होना यदि उसका अलंभाव है तो विशाल वनश्री का फोट या चिन्र में प्रतिविम्वनद्वारा संक्षेपीकरण भी अलंभाव है। अतिच्य दोनों में है। [द्र० हमारा लेख साहित्यतत्वविमशः ] इस प्रकार के अलंभाव को अलंकार मानकर क्या हम उसे काव्य का सर्वातिशायी तच्व नहीं कह सकते ? जहां तक उपमा-रूपक आदि विच्छित्तिओं का सम्बत्ध है और सम्बन्ध है तदितर समस्त काव्यत्वाधायक तत्वों का वे इस 'अतिवाय'-तत्य-रपी परिमल के लिए
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( ५२ ) विविध पुष्प माने जा सकते हैं। वायय में अतिशय का आधान यदि उपमा आदि के द्वारा होता है तो विभावादि की रससामग्ी के द्वारा भी होता ही है। वस्तुतः रससामग्री का संयोजन भी एक उत्तिधमं है। काव्यशास्त्रीय चिन्तको मे भोज आदि का मस्तिष्क इस ओर भी पहुंचा। वे बिभावादि योजना को 'रसोकि' कहते, गुणयोजना को स्वभावोक्ति और उपमा आदि की योजना को बनोकि। यानी बक्ति विशेष ही है काव्य, और उक्तिगत जो 'विशेष' है अर्थात् रस, गुण और स्वभावपद- वाच्य वदविरिक्त ेप सब, वे अलंकार हो है, कयोकि वे ही काव्यशोभा के जनक धम हैं। इस प्रकार वस्तुवादी दृष्टिकोण से या प्रमेयनिष्ठ चिन्तन से रस और गुण भी अलंभाव के जनक तत्व हो हैं और दूसरे शब्दों में अलंकार ही हैं। भरत के बाद दण्डी ही काव्यघास्त्र के प्रथम आचार्य है। उन्होंने इसी दृष्टिकोण को अपनाया है और रसो को अलकारो मे ही सननिविष्ट किया है। कया कला का कोई स्वगत धर्म नहीं माना जा सकता ? कला एक सरचना भी तो है, माना कि वह स्वयं के अन्तिम रूप मे विज्ञानघन मोर 'अनङ्ग' है। क्या अनङ्द अङ्गना [उत्तम अङ्गो वाली नारी मूति] की अपेक्षा नही रखता। अनङ्ग का स्थूल अङ्ग यानी शरीर भले ही न हो, स्वयं मे वह अत्यन्त नीरूप हो तथापि क्या उसका कोई मानस रूप नहीं होता। यदि होता है तो क्या उसे सवंथा अनुङ्ध कहा जा सकता है? क्या मन अङ्त नहीं है? आखिर सूक्ष्म शरीर भी तो शरीर ही है। अवश्य ही जो तत्त्व मनोभव है, जो मात्मभू है वह मनङ्ग होते हुए भी अन्गी है, शरीरी है और शरीरसापेक्ष है। उसका एक पक्ष शरीरपक्ष भी है। कला का विज्ञान विपयनिरपेक्ष नहीं। विषय का अस्तित्व भी यहां केवल प्रतिभास नही। उसका बहलाश यहाँ अपने आप मे भले हौ प्रतिबिम्बात्मक ओर इसीलिए प्रतिभासात्मक हो, वह लोकगत बिम्ब की अपेक्षा अवस्य ही रखता है। द्वैत- कला का तद दाम्पत्य ही यहाँ सर्वस्व है; और ऐक्य नहीं, साहित्य ही यहाँ की प्रधान विमूति है। साहित्य कया किसी एक छोर के असत्य होने पर सम्भव है। निश्चित ही कला का कोई 'स्व' भी है और सस स्व मे रहनेवाली उसको मदमुव विशेयतायें भी हैं। इन समस्त विशेयताओ की एक ही संज्ञा है 'अलंकार'। खजुराहो की अप्सरोमूत्तिया अङ्भप्रत्यद्गो मे जो संतुलित मासलता या उभार लिए हुए हैं, क्या वह उनका कोई 'अलंकार' नही है? कया वह उभार कोई प्रातिभाषििक धर्म है? वया उससे उत्थापित मानव शृभ्ध ही सब कुछ है? इसलिए कया उस उभार को प्रमातृनिष्ठ रस-मात्र कहकर चिन्तक स्वमं को कृतकृत्प मान सकता है? यदि उसे रसजनक कहा जाए तो रस के लिए उसकी उपादेयता स्वत सिद्ध है। तब यह सोचना होगा कियह सामथ्री जहाँ नहीं रहती वहाँ रसनीयता रपो नहीं आती?
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यदि वहां रसनीयता नहीं आ पाती और इस साममी के रहते ही वह माती है तो अवश्य ही यह सामग्री रस के प्रति कोई असाधारणता है और यदि असाधारणता है तो क्यों न उसे उसके आश्रय का 'अतिशय' माना जाए, उसे उसकी विशेपता स्व्रीकार किया जाए, और अन्ततः ससे व्यों न अलंभाव का जनक अलंकारतत्त्व स्वीकार किया जाए। सांकेतिक, पतीयमान, अप्ाकरणिक या अन्य अर्थ की विभूति, उसका इन्द्रगाल ध्वनि-शब्द से पुकार भले ही लिया जाए, किन्तु वस्तुपक्ष की दृष्टि से अवश्य हो वह भी कला की 'स्व'-गत विजञेषता भी है और इसलिए अन्वय तथा व्यतिरेक के आधार पर वह भी अतिरय और अलंभाव की सीमा के भीतर है। इसीलिए उसकी संज्ञा अलंकार की जा सकती है। आखिर अनेकार्थक शब्दों के प्रयोग में ध्वनि को शब्द- वक्त के खूटे से बंधा चं्चल वत्स माना ही जाता है। क्यों? शब्दशक्ति से उसे क्यों बाँधा जा रहा है ? इसीलिए न, कि वहाँ शन्द का 'अतिशय' मेटा नहीं जा सकता। उसे स्वीकार करने हेतु चिन्तक वाध्य है। आसिर ध्वनि का बृहद कू्माण्ड उस शव्दशक्ति की तन्वी लता में ही न अटका हुआ है, भले ही प्रमातृचेतना की छत भी उसे साधे हुए हो। कहना न होगा कि ध्वनि का घटोत्कच कितना ही विशाल क्यों न बन जाए वह है किसी हिडिम्बा का प्रसाद। वह उस माता का स्तनंधय वत्स है, उसके आँचल में मुँह लगाकर चुस्की दावता उसके उत्संग का मांगलिक अलंकार है। निश्चित ही ध्वनिभूमिका भी कला-क्षेत्र से आत्यन्तिक पृथवता नहीं रखती। वह उसमें 'अलंत्व' का निष्ादन करती और इसीलिए उसका अलंकार बनती है। औचित्य-कला जिन प्रतिबिम्बों को हमारी चेतना पर अंकित करती है, हम उन्हें अपनी रुचि और अपने संस्कारों के अनुरूप सजा हुआ देखना चाहते हैं। उनको इस सजावट के साथ प्रस्तुत करने का जो औचित्य है वह भी कला के 'स्व' का, उसके 'आपे' का अतिशय है। अवश्य ही वह वैसा न हो तो हमें रुचेगा नहीं और यह उसका दोप होगा। इस दोष की मुक्ति यदि दोषाभाव है अथवा परित्यक्त-परित्याग है तो औचित्य नामक तत्त्व दोपाभाव से अधिक कुछ नहीं है। इसे हम उपादेयता में कारण मानेगे ही, और अनुपादेयता में इसके अभाव को कारण मान इसे एक अस्तित्वसंपन्न वस्तु भी मानेंगे, और उस रूप में यह कला के स्वगत धर्मों में ही गिना जाएगा तथा 'अलंकार'-सीमा का उत्लंघन न कर सकेगा। इस प्रकार रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, बकोकि और औतित्य के परिक्षेत्रों में विभक्त काव्यचिन्तन मूलतः एक ही धुरी पर घूमता दिखाई देता है। वह है अतिशय की धुरी, अलंभाव की धुरी, अतएव अलंकृतितत्व की धुरी। एवं, अलंकृतितत्त्व एक सामान्य और व्यापक तत्व है काव्यात्मा का। काव्य एक कला है और क्योंकि वह स्वायम्भवी सृष्टि है, संकल्पयोनि, मनोभवा या प्रज्ञानघनीय सृष्टि है, प्रतिविम्बात्मिका है अतः वह उसकी समग्रता में वैसी है, आशिकता में नहीं। अभिप्राय
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यह कि दिम्ब में लगा तिलक भले ही बाह्य हो, विम्ब से भिन्न हो, किन्तु प्रतिबिम्ब मे लगा तिलक जिस प्रकार प्रतिबिम्वात्मा की सृष्टि, निमिति, अभिव्यक्ति, प्रतिभा या प्रज्ञप्ति के साथ ही कर्ण के साथ उसके कवचकुण्डल के समान निप्पन्न होता है उसी प्रकार लोकभूमि पर वस्तु और वस्तु के अतिघयाधायक तत्त्व भले ही भिन्न हो किन्तु कलाभूमि पर वस्तु और उसके अतिदयाधायक तत्त्व दैसे नही होते। ऐसा नही कि दर्पण मे वनमालाविभूषित श्रीकृप्ण [परमात्मा] प्रतिविम्बित हो तो उस प्रतिबिम्ब मे वे स्वयं ही प्रतिविम्बित होकर रह जायें, उनकी बनमाला प्रतिबिम्धित न हो और वह उनके प्रतिबिम्ब मे अलग से संयोजित की जाय। श्रीकष्ण का श्रीविग्रह और उनका अलकरण वनमाला, दोनो एक साथ प्रतिबिम्धित होते हैं। कला मे, प्रति- विम्ब मे, चित्र मे, अलंकाम और अलंकृति दोनो सहजात होते हैं, क्रमोत्पन्न नहीं। इस स्थिति मे यह कैसे कहा जा सकता है कि अलंकार अलंकार्य से भिन्न और उसकी घटकता से रहित रहते हैं।
अलकार की बाह्यता की भ्रान्ति शरीर के दष्टान्त के कारण हुई है। कटक कुण्डल आदि शरीर से अवद्य ही भिन्न रहते और माहार्यं हुआ करते हैं। शरीर मे वे अवश्य ही ऊपरी वस्तु हैं, शरीर स्वयं नही, उसकी आत्मा भी नही। किन्नु यह साहृ्य एक विकलाग सहश्य है। सोचना यह होगा कि भले ही सामान्य शरीर के घटक न हों अलकार, किन्तु कया सुन्दर शरीर के भी वे घटक नहीं होते? सौन्दय अपने उपादानो के बिना क्या सरीर मे आ सकेगा? यदि नही तो उसके उपादानो को उसकी निष्पत्ति के पूर्व शरीर मे मान ही लेना होगा। काव्य केवन चरीर नही, सुन्दर शरीर है। केवल शब्दार्ययुग्म काव्य नही, अपितु रमणीय यब्दार्थ काव्य है, सुन्दर शब्दार्थ काव्य है। निश्चित ही सब्दार्थ की आत्मा यदि सौन्दर्य के विना काव्यत्वशून्य है और सौन्दर्य वेवल शरीर से निमपस्र नहों, तो उसके उपादान काव्यत्व की निप्पत्ति के पहले से शब्दार्थ के रोम-रोम मे सनिविष्ट हैं। योवन के साथ शरीर, किसी के सौभाग्य का पात बनता है। ऐसा नहीं कि सौभाग्य पहले आकर बैठ जाए, योवन बाद मे आए। क्या सिन्दूरदान वाद मे होता और वधू कोहबर मे पहले हो पहूँच जाती है? अलंकार और अलंकार्य के बीच लोक मे भले ही संयोगसम्बन्ध हो, कन्गभूमिका पर तो उनके बीच एक ही संबन्ध संभव होगा-समवाय। इस प्रकार कला और काव्य का अलंकार, एक आन्तर, अवाह्य और आत्मीभूत धर्म है। धर्मी से उसका अभेद है। उसमे भेद हो एक प्रातिभासिक तथ्य है। ठीक हो कहा गया है 'सालकारस्य काव्यता, न पुनः काव्यस्यालंकारयोग' [कुन्तक १। ६ ]। उक्त 'आाधार पर अलकार अपने उपमा आदि के रूप मे भी काव्म की आत्मा है, काव्य है, काव्यनिष्ठ अन्यूनानतिरिक्त धर्मे है, इसीलिए और काव्यनिष्ठ अलकायता का अवच्छेदक भी है यानी काव्यत्वरूप ही है।
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हम अशोक का अर्थ कर लें केवल वृक्ष और फिर कहें कि उसकी आत्मा सौरभ है तो कह ही सकते हैं, किन्तु यह हमारा दोप होगा। व स्तुतः अशोक ऐसे एक समप्र व्यक्तित्व की संज्ञा है जिसका एक घटक तोरभ भी है। सौरभ उस व्यक्ित्व की विभूपा है, उसका अलंकार है, वद्यपि अशोक का बारा व्यत्तितव उसी के लिए उपादेय है। हमने काव्यात्मक अशोक को सीरभ से पृथक कर देसा कैसे? हम मनुष्य का अर्थ सच्योजात वच्चा कर लें और कहें कि वह तो अलंकारमान है, अलंकार्य है सुबासिनी और सोभान्यवती माँ का उत्संग जिसमें वह समाया रहता है तो ऐसा कह ही सकते हैं। किन्तु क्या सद्योजात शिशु मनुष्य नहीं होता। 'गो' का अर्थ गोचिन्र कर हम उसके यथार्थ को समझाते हुए 'गोभाता' के देवत विग्रह को भी गो-पद का अर्थ कहें सौर कहें कि यह हमारी नई सूझ है, वूतन स्थापना है तो हमारा मुंह कोई नहीं पकड़ेगा और ऐसा हम कह ही सकेंगे, परन्तु इन कथन में नूतनता की डींग कोरा दम्भ होगी। प्रथम दृष्टि गोमाता पर ही जानी चाहिए थी। हमने गोचित को 'गोमाता' समझ कैसे लिया ? यह हमारी हृष्टि का दोप है; न अशोक का, न मनुष्य का और न गोशब्द का। 'अलंकार' के विषय में भी हमारे चिन्तन और व्यपदेश-विधान की यहो स्थिति है। हमने बलद्वार-शन्द को उपमा आदि तक सीमित समझा ही क्यों? यदि समझा, तो यह भी समझना चाहिए था कि अलद्कारशब्द से अभिधेय समस्त तत्वों में कदाचित् उपमा आदि अधिक प्रभावी औोर अधिक चमत्कारी हैं। फिर हमें अन्य तत्वों की ओर जन्मुख न होना था। और यदि रुचिभेद के कारण हम उत्मुख हुए भी तो हमें अपने चिन्तन की स्वस्थता नहीं सोनी चाहिए थी, उसमें संतुलन बनाए रखना चाहिए था। इतिहास साक्षी है-'हुमने वैसा नहीं किया। प्रमातृनिष्ठ चिन्तन की प्रधानता ने हमें व्यक्तिवादी बना दिया, हमने वस्तुपक्ष से अपनी आखें वहुत दूर तक फेर लीं और हम असंतुलन के उपालम्भ में आ पड़े। आनन्दवर्धन का या यह प्रसाद। इस प्रकार हमने देखा कि काव्य की आत्मा अर्थात् काव्य को अकाव्य से पृथक् करने वाला तत्व या काव्य की उपादेयता, ग्राह्यता का बीज, एक ही है और उसका एक ही नाम है 'अलक्वार'। 'काव्यालद्वार'-नाम से जिनने ग्रन्थ लिखे उनमें भामह, उद्ट, वामन और स्द्रट ने अलक्वारों का विवेचन अवश्य प्रचुर मात्रा में किया परन्तु उनमें से किसी ने 'मलद्वार को काव्य की आत्मा' भी कहा हो ऐसी बात नहीं है। उक्त चारों आचार्यों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता। परवर्तती कुन्तक ने अपने ग्रन्य की कारिकाओं को काव्यालद्कार कहा और उनमें वकोकि को काव्यजीवातु स्वीकार किया, किन्तु यह स्वीकृति आनन्दवर्धन के बाद की थी औौर इसके आधार पर अलंकार को काव्यात्मा कहने का पक्ष समर्थन नहीं पाता, क्योंकि कुनतक ने वकोकि को काव्यात्मा स्वीकार किया, जो एक पृथक् संप्रदाय है, जिसकी काव्यात्मवाद में अलंकार संघ्रदाय से अलग गणना की जाती है।
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इस प्रकार (१) रस काव्यार्थ (२ ) रीतिरात्मा काव्यस्य (३) काव्यस्यात्मा ध्वनि: (४) वकोकित काव्यजीवितम् तथा (५) औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीविवम् के समान कोई वावय 'अलंकार' से सम्बन्धित नही मिलता, जिसमे अलकार को काव्या- त्मा या काव्यजोवातु कहा गया हो। वामन रीतिवादी आचार्य हैं। उन्होंने 'कार्व्य ग्ाह्ममलंकारात्, सोन्दयंमलंकार कहकर जिस 'अलकारतत्व' को कुछ महत्त्व दिया है उससे भी उपमा आदि की काव्यात्मता का कोई पक्ष सामने नही आता, क्योकि यहाँ जिसे अलंकार कहा गया वह उपमादि नहीं अवितु सौन्दर्य है। फिर वामन स्वय ही 'रीतिरात्मा काव्यस्य' कहकर अलकार-पक्ष से अलग हट जाते हैं। इस प्रकार यह जो प्रसिद्धि है कि साहित्यशास्त्र के ६ सप्रदाय हैं और उनमे एक संप्रदाय 'अलकार' को काव्य की आत्मा मानने वाला है न जाने इसका क्या आधार है। इसका आधार कदाचित् 'काव्यालंकार' इस प्रकार अलकार के नाम पर ग्रन्थो का नामकरण है। वस्तुत अलंकार को काव्यात्मा मानने की असिद्धि अलकार की उस छाप पर आश्रित है जो आलोचक या काव्यकनाविदु के अचेतन मन पर पडी हुई थो और जिस के अनुसार अलंकार परिभोगयोग्य परिधान नहीं, अपितु प्रणम्य देवतरूपाकित रत्न था। उदयन के अवरोध में अज्ञातवास कर रही या अग्निमिन् के अन्त पुर मे शापसेविका के क्षण व्यवीत कर रही दिव्यकन्या सागरिका और मालविका के समान अलंकृतितत्व का अविशम भी द्रष्टा को प्रभावित किए हुए या और वह मन ही मन सोच रहा था कि यह कोई असाधारण महत्त्व की वस्तु है, जिसे काव्यात्मा भी कहा जाए तो अनुचित नही। वस्तुस्थिति स्पष्ट होने पर अन्तत सागरिका और मालविका उदयन और अग्निमिन्र की राजरानी बन ही जाती हैं। चित्रकाव्य-यही कारण है कि आनन्दवर्धन ने वाकय के रस आदि से रहित और एकमात्र उक्तिवैचित्य से युक्त स्वरूप को काव्य न मानकर काव्यानुकार, काव्याभास या काव्य की नकल यानी काव्यचित्र माना था और कहा था कि वस्तुतः कोई अलंकार ऐसा नही होता जो गुणोभूतव्यंग्य वर्ग मे न गिना जा सके अथवा जिसे व्यग्यांश का अनुपह प्राप्त न हो। ये दोनो ऐसे वक्तव्य थे जो परस्पर विरोवी न होकर समन्वयमूत्र से सम्बद्ध थे। किन्तु परवर्ती मम्मट ने ध्वनि का पाठ दुहराते समय इस समन्वयसूत्र को तोड दिया और अलद्वार की प्रधानता से युक्त काव्य को चिन्न नामक काव्य मान लिया तथा व्यंग्यप्रधान या व्यड्ग्यवहु काव्य को अलग वर्ग में गिना दिया। यह कया हुआ? यह वस्तुत अनद्वार की प्रतिष्ठा हुई। अलंकार नाम से पुकारे गए उपमा आदि को भी स्वतन्त्र महत्त्व दिया गया और उनमे भी व्यंग्य के विना भी वान्यत्व का उत्स स्वीकारा गया। यह अपने आपमे जो भी हो, अलकार के महत्त्व की अभिस्वीकृति मे एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण है, परिपुष्ट साक्ष्य है और उसके द्वारा दिया गया साक्य है जो अलद्धारों को काव्यचरीर का अनिवारय
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(५७) नहीं, बैकल्पिक धर्म कहने की घृटता करता आ रहा था। अन्त में मम्मट ने भी ध्वनिकार मनन्दवर्धन की अनुभूति को आदर दिया और कहा कि अलंकार भी बिना रस आदि व्यग्यांश के निर्जीव होते हैं। अमिपाय यह कि अलंकार का उपमा आदि स्वरप भी वहनि से धूम के समान रस आदि व्यंग्यविभूति से ऐकान्तिक और अव्यभि- चरित सम्बन्ध रखता है। यानी इन्हें मिट्टी और पानी की नाई पृथक करके नहीं देखा जा सकता। जो जल अत्यन्त स्वच्छ है, अधामच्छद या पारदर्शी है, वह भी किसी कुप, तडाग, नदी या निर्झर के ऐसे स्रोत का एकांश है जो मिट्टी-मॉँ का आँचल पकड़े हुए है। क्या उसे अपायिव माना जा सकता है? क्या केवल वरसाती पानी ही पार्थिव कणों से मिश्रित कहा जा सकता है? केवल बरसाती जल को माटी से मिश्रित द्रव कहना हमारी दष्टि की स्थूलता होगी, दोप होगा। वस्तुतः उस द्रव में भी मिट्टी छिपी हुई है जिसे हम सवंया स्वच्छ कह रहे हैं, अत्यन्त निर्मल समझ रहे हैं। दार्दानिकों का पञ्चीकरण और औपनिषदों का तरिवृत्करण तो निर्मल जल के भूतपिण्ड की बरीकी में भी जलेतर तत्वों के अष्टमांश का वैज्ञानिक मिश्रण मानता है। अलक्कार का निर्मल जल भी व्यंग्य की मिट्टी का सोगन्व्य छिपाए हुए है। व्यंभ्य की सरस मिट्टी तो जल के स्वूल स्पर्श की तरलता स्वयं ही स्वीकार करती आ रही है। मम्मट का यह मानना कि अलहूार को काव्य से यदि हटाया जा सकता है तो उसके व्यक्त रूप में ही हटाया जा सकता है, अव्यक्त रूप में नहीं, उस रूप में वह काव्य का अविभाज्य, अयुतसिद्ध और समवायी धर्म है, इस दिज्ा में सटीकता की सूचना देता है। यही न वह विवशता है जिससे अलद्धारों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई और पूर्ववर्ती आलोचक जहाँ कोई वलद्धार नहीं देखता था परवर्ती ने वहाँ अनेक नवीन अलद्वारों की स्वस्थ खोज कर डाली और जिन स्थलों में पू्ववर्ती आचायों ने कोई एक अलक्कार माना या, परवर्ती आचार्यों ने उन्हीं स्थलों का विशकलन कर उनमें अनेक अलद्ूारों की प्रच्छन्न संसृष्टि और अव्यक्त संकीरणता प्रमाणित की। आनन्दवर्धन ने अलंकारों को वास्विकल्प कहकर अनन्त बतलाते हुए उनकी उपेक्षा का जो शापवाक्य बोला या वह दशरथ के लिए श्रवण-पिता के शापवाक्य के समान अनुग्रह मन्त्र वन गया और सपेक्षा के भीतर से आदर की समुद्रगा स्रोतस्विनी को जन्म मिल गया। अलंकार तत्व की गवेषणा परिपूति तक न पहुँच सकी, उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। स्वयं पण्डितराज ने लिखा तो ग्रन्थ 'रस' के नाम पर-'रसगंगावर' किन्तु उसका प्रधान अंश वन गया अलंकार ही। वह भी अपूर्ण हो रहा। वे उसे पूर्ण नहीं ही कर पाए। ठीक ही है। भला सभ्य भापा अलंकार से रहित हो ही कैसे सकती है।
इस प्रकार अलंकार काव्य का अयुतसिद, अपृयविस्यित और वैसा ही धर्म है जैसा पृथिवी का गन्ध, जल का रस, अग्नि का रूप, वायु का स्पर्श और आकाश का
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( ५ ) शद्द। काव्यरूपी पञचभूत का तन्मात्र अलकार ही है और अलंकार ही है काव्यरपी सक्षय्य और महान् वट वृक्ष का अणिष्ठ बीज। कहा जाता है अलकार को सब्दो मे समझा जा सकता है, यानी वह वाब्य हो सकता है और रस किसी भी स्थिति मे वाच्य नहीं हो सकता, क्योकि 'रस' या 'शृद्भार' आदि कहने मे रसात्मक आस्वाद अनुभव में नहीं आता। वह तभी अनुभव मे आता है जब विभावादि सामग्री का समुचित, ललित और चार संनिवेश उपस्थित ही। ठीक है। रस अवाच्य ही है, केवठ व्यव्य है, ध्वनि है। परन्तु अलंकार को वाच्य कैसे कहा जाता है ? क्या केवल 'इद' या 'जैसे' शब्द का प्रयोग करने से उपमा का अतंकारत्व या चमत्कार अनुभव मे आ सकता है? क्या उपमा को अलंकारभाव तक पहुंचाने के लिए उपमान आदि की सामग्री अपेक्षित नही। उपमान, उपमेय जौर साधारण धर्म के साथ क्या 'इच' आदि उपमापरतिपादक शब्दो का प्रयोग रहता ही है? तब लुप्तोपमा के भेदो की संख्या १९ क्यों मानी जाती है? क्या 'अभेद' या 'आरोप' कहने से रूपकालंकार या 'सभावना' या 'संशय' कह देने से सत्परेक्षा या संदेहालंकार का अनुभव संभव है। अवश्य ही अलंकार भी शब्दो में नही जकडा जा सकता। फिर रस भी तो ऊपर किए विवेचन के अनुसार अनंकार ही है। क्या जररी है कि अलकारत्व केवल उपमादि विच्छितियों की चितकबरी बकरियो के गले की घण्टी रहे। उस रसरूपी दिव्य रथ की सुवण-किकिणी भी कर्यों न माना जाए? इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि-'अलकार-तत्व काव्य का असाधारण तत्व है, वही काव्य की वास्तविक आत्मा है। 'तस्यैव मानामुपजीवन्ति सवें' उसी के किसी अंदा से वे सब तत्त्व निष्पस्न है जिन्हें रस आदि नामो से पुकारा जाता है। 'एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति'-उस एक तत्व को ही अनुशोलयिता जन अनेक रूपो मे विभक्त देखते और भिन्न-भिन्न नामो से पुकारते हैं। यदि यह विश्व किसी असीम ब्रह्मन्, मायातीत भूमन और अनन्त विराट पर लंकित है तो इस विश्व का चित्र भी, इसका प्रतिबिम्ब भी किसी तत्य पर यदि लंकित हो सकता है तो एकमात्र 'अलंकार'- तत्ब पर ही। सृष्टि मे जो ब्रह्मवत्व है काव्य में वही 'बल'-तत्व है। इस अतिशयित, जनन्त, भूमा और विराट रस को जो अपनीअपनी कटोरियों मे हमने समेटा वह हमारे यानी 'मिति' के भीतर ही अपनी संम्पू्ण इयता के द्ष्टा जीवो के जनुर्प ही है।' 'यो यो यं यमवास्तुयादवयवोदवेदां स्वृशन् पाणिना तत्तन्मान्नकमेव तन्न स स ते रूपं परं मन्यते। तञ्जारमन्धपुरे इहा करिपते नीतोऽसि दुर्बेधसा को नामान्र भवेद बताखिएभवन्माह्ात्म्यवेदी जनः॥।' के अनुमार 'अर्लभाव' को अनुवीक्षक के एवांगी हृष्टिकोण ने या कहना चाहिए कि स्थूड चिन्तन ने जिस-जिस रूप मे वाधा, जिस-जिस रूप मे आका वह अवश्य ही
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आंशिक तथ्यता लिए हु ए था, किन्तु उस तर्व की समयता और उसकी परिपूर्ति उनमें से किसी दृष्टिकोण और किसी चिन्तन में न थो। ब्रह्म से माया में उतरने पर वैषम्य और भेद का जो प्रतिभास होता है तदनुसार रस आदि से अलद्धार को भिन्न केवल उपमा आदि को लेकर किया जाएगा, किन्तु अलद्धार की महत्ता इतने पर भी घटेगी नहीं। क्योंकि रख यदि कहीं, रहता है तो दोनों केवल सामाजिक या प्रमाता में रहता है, काव्य में नहीं। कपा काव्य और प्रमाता एक है? काव्य में यदि कुछ रह सकता है तो उपमादि अलद्धार ही रह सकता है। शुण भी रसवाद के अनुसार रसधर्म हैं, अतः वे भी प्रमातृगत सिद्ध होते हैं, काव्यगत नहीं। दोपाभाव कोई Possitivity नहीं है। रसवादी के यहाँ रीति और वृत्ि का कोई पृथक अस्तित्व होता नहीं। इनके अतिरिक्त किसी काव्यधर्म की कल्पना रसवादियों ने की ही नहीं है। उनका काव्यलक्षण तो इतना पंगु है, विशेपतः मम्मट का, कि वह उन्हीं के अनुसार वस्तु से वस्तु की ध्वनि वाली उक्ति में लागू ही नहीं होता, क्योंकि न वहाँ अलस्र रहता, न गुण। यदि कहा जाए कि मम्मट के अनुसार वहां भी अस्फुट मलद्वार तो रहता ही है, तो उस ध्वनि को अलङ्कारमूलक कहना होगा। फिर मम्मट के द्वारा ही स्वतः संभवी वस्तु से वस्तु की ध्वति के लिए उदाहृत 'अलसशिरोमणि:०' इत्यादि गाया का व्यन्जक वाच्य अर्थ किस प्रकार के अलक्कार से युक्त है? क्या उसमें अस्फुट भी अलक्कार है ? स्फुट की तो बाब ही अलग है। तब कैसे जाएगा इस स्थल में काव्य लक्षण, यानी मम्मट द्वारा अभिमत काव्वलक्षण। हन्त। हैतदष्टि और रक्षवाद के अनुसार काव्य का 'स्व' उसका अपना रूप यानी प्रमाता से पृथक उसका प्रमेयरूप अवश्य ही रसहोन, गुणहीन, धवनिहीन और एकमात्र अलंकार-युक्त है। और कुछ उसमें माना जाए तो केवल दोपाभाव माना जा सकता है, जिसे काव्यत्व की उत्यान-भूमि कहा जाना चाहिएं। दूध यदि शुद्ध होगा तो उसकी खीर में इलायची की सुगन्ध तथा केसर-वर्ग भी सिलेंगे। इन दो विशेषताओं के अतिरिक द्वैतवादी दृष्टि से काव्य की अपनी काया में अन्य कोई धर्म कदापि नहीं स्वीकार किया जा सकता। इनमें भी दोषाभाव अभावात्मक ही है, वास्तविक केवल अलंकार ठहरता है। फलतः काव्यशरीर का वास्तविक धर्म और उसमें उपादेयता लाने वाली चारता, सुन्दरता, रमणीयता, चमरकारिता या असाधारणता का उत्स अलंकार ही ढहरता है। जहाँ कहीं अलंकार का उपमा आदि स्थूल रूप नहीं दिसाई देता और काव्यत्व माना जाता है वहाँ व्वनिवादी या ये हवैतवादी आलोचक दोपाभाव के अतिरिक्त काव्य शरीर में कोई धर्म सिद्ध नहीं कर सकते, फलतः दे अकाव्य से उस काव्य को अनुभवसिद्ध भिन्नता का कोई कारण नहीं वतला सकते, विशेपतः काव्यप्रकाश के रचयिता मम्मट।
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(६० ) निष्कर्प यह कि अद्वैत इृष्टि से काव्ययरीर के भीतर रस आदि भी अलंकार है और दवत दृष्टि से भी काव्यधरीर का एकमात्र धर्म अलंकार ही है, निदान काव्य को अकाव्य से पृथक करने वाला तत्त्व एकमाय अलकार है, इसलिए 'अलंकार ही काव्य की उपादेयता का प्रथम और चरम निदान है, अलंकार ही काव्य की आात्मा' है। प्रमातृपक्ष मे हम काव्य के परिणाम पर विचार करते हैं, जिसे काव्य से सम्बन्धित चस्तुजों का विचार कहा जा सकता है, स्वयं काव्य का विचार नहीं।
काव्यस्वरूप- प्रश्ष : काव्य को अकाव्य से भिन्न करने वाला स्वगत धर्म तो 'अलकार' हुआ। यह जो काव्य नामक धर्मी है यानी अलकार का जो आश्रय है, माने अलंकार जिसमे रहता है, वह कया है? उत्तर: कहा जाता है वह 'शब्द' और 'अर्थ' का जोडा है। ठीक है, किन्तु प्रश्न उपस्थित होता है कि शब्द और अर्थ काव्यरूप मे परिणत होते समय वया उसी रूप मे रहते हैं जिस रूप मे वे ससार मे दिखाई देते हैं या उससे भिन्न किसी अन्य रूप मे। प्रथम विकल्प स्वीकार करने पर एक बहुत ही भीषण आपत्ति सामने सुरसा बनकर सडी दिखाई देगी। वह आपति होगी अर्थ के विषय मे। कालिदास ने कुमारसभय के प्रथम पद्य मे 'हिमालय' कहा। क्या यह वही हिमालय है जिसके शिखर पर हम आज भी चढने का अभियान कर रहे हैं और जिससे बहकुर गंगा आज भी भूलोक का ब्रह्मदव बनी हुई है। हिमालय का वह स्थावर रूप जिसमे शिला, वृक्ष और जल के घन और तरल रूपो का संात है, जो पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा तक उत्तर दिया मे एक निश्चिन स्थान मे लेटा हुआ है, यदि कुमारसंभव काव्य का हिमालय यही हिमालय है तो उसे हम अन्यन सर्वंत कैसे भ्ाप्त करते हैं। कुमारसंभव तो विश्व के हर कोने मे पढ़ा जा रहा है। क्या उसमे अर्थरूप से मृहीत हिमालय वही है जो किसी एक भूखण्ड और किसी एक दिशा का शिलोच्चय है, शिलाभित्ति है, उन्नत प्राचीर है, सीमा प्रहरी है, दुर्ग है। यदि वही, तो वह यहाँ काशी में और इसी समय जिन अनेक स्थानों पर कुमारसभव पढा जा रहा होगा उन सभी स्थानो पर कैसे पहुच रहा है? यदि पहुँच रहा है तो क्यो नही हम उससे दब जाते और कयो नही वह अपने मूलस्थान पर अनुयस्थित मिलता। वह अपने स्थान पर उपस्थित रहता और एक ही रहता है किन्तु हम काव्य मे उसे सवंत अनेक स्थानों पर उपस्थित पाते हैं। क्या है यह बात ? निश्चित ही वह हिमालय काव्य का हिमालय नही है जो उत्तर दिशा मे भिति बन- कर पडा हुआ है। यही प्रश्न शब्द के विषय में उपस्थित होता है। कालिदास ने जिन शब्दो का उच्चारण किया होगा वे तो उच्चारण समाप्त होते ही समाप्त हो चुके होंगे। फिर हमे उनके शताब्दियो प्राचीन शब्द आज तक कैसे उपलब्ध हैं? 'लिपि या अनुकरण के द्वारा
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हम उन्हें जिलाए हुए हैं और वे सांकेतिक रूप में हमें प्राप्त होते जा रहे हैं' यह उत्तर ठीक है, किन्तु प्रश्न उपस्थित होता है उन शब्दों की बोधकता का। वे हमें अर्थ का ज्ञान कराते हैं। यदि वे शब्द अपने मूलरूप में ही काव्य हूं तो हमें किसी भी अज्ञात भाषा का काव्य अविदित प्रतीत नहों होना चाहिए, क्योंकि शन्द तो किसी भी भाषा मैं बदलते नहीं। वर्णमाला और ध्वनियां प्राकृतिक वस्तुएं हैं। उनका उपयोग और विनियोग हम जैसा चाहें कर सकते हैं, किन्तु उतने से उनके भौतिक और प्राकृतिक स्वरूप की हानि नहीं होती। शब्द यदि वही है जो लोक में प्राप्त है तो एक ही वाकय के अनेक और विविध अर्थ नहीं होने चाहिए, क्योंकि सूर्य किसी को भिन्न प्रतीत नहीं होता। चन्द्र और अग्ति या समस्त प्रपळ्च प्रत्येक बीद्धा को एक ही स्वरप में प्रतीत होते हैं। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो चन्द्र को अंधकार समझता हो या अंधकार को वस्त्र। रात सब के लिए रात है औौर दिन सब के लिए दिन ही। फिर एक ही वाक्य का अर्थ वोदधा के भेद से भिन्न कयों हो जाता है? शब्द और अर्थ के 'जोड़े' की बात भी अत्वाभाविक-सी है। शब्द हमारे मुखाकाश या श्रोाकाश में है और अर्थ यदि है तो सैंकड़ों कोस दूर। फिर ऐसे कितने अर्थ हैं जो वत्तमानकालिक हैं? युधिष्ठिर आदि अव कहां? कत्पितोपमा में चन्द्र सेसर्प के लटकने की कल्पना में चन्द्र और सप के सम्बन्ध की वात तो आत्यन्तिक रूप से असत्य है। उसका तद्वाचक शब्दों से सम्बन्ब कैसे होगा? सम्बन्ध के लिए अस्तित्व तो कम से कम, अपेक्षित होता ही है। चन्व्यापुन्र, शशमृङ्ध, खपुप्प, कच्छपीपय और अन्वकार आदि जो त्रिकालवाधित तथ्य हैं, क्या इनके साथ सम्बन्ध बन सकेगा? जब विद्यमान अर्थों के साथ भी शब्द का सम्बन्ध संभव नहीं, तव अविद्यमान और कल्पित अर्थो के साथ शब्द का सम्बन्ध संभव कैसे ? इस प्रकार शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध तोनों अपने भौतिक और वैज्ञानिक रूप में अनुपपन्न और असिद सिद्ध होते हैं। कया इसी उलटवांसी का नाम है काव्य? यदि असंगति ही काव्य है, तो दोष किसे कहा जाएगा? यदि उसी असंगति के पौछे शिष्ट और विशिष्ट सभी छुटे हुए हैं, समर्पित हैं, व्यामुग्ध हैं तो उनका और सिरफिरे व्यक्ति का अन्तर किस बात में है? तब असम्बद्ध प्रलाप और रामायण, गाली और महाभारत में फरक ही क्या? क्यों बैद को ही पूजा जाए, अवेद को भी क्यों नहीं। वस्तुतः न शब्द काव्य है, न र्य और न इन दोनों का युग्म 1 काव्य है शब्द के माध्यम से होने वाला अर्थज्ञान। अर्थज्ञान के लिए शब्द स्वरूपमात्र से कारण नहीं होता, उसके साथ अर्थ का एक बौद्ध संबन्ध अपेक्षित होता है। यह सम्बन्ध संकेतात्मक होता है। संकेत व्यक्तिसापेक्ष है, अतः उसमें अन्तर भी रहता है और भापाऐँ बदलती रहती हैं। शब्द भी अर्थ ही है अपने मूल और प्राकृतिक रूप में। मस्तिष्क के किसी कोने में हम शब्द का संस्कार विठाए रहते हैं और किसी कोने में तदितर वस्तुमों
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का। हम इन दोनो सस्कारो का एक सबन्धसून भी बना लेते हैं, व्यवहार के लिए तय कर लेते है कि सूर्य बहने से अमुक वस्तु का ज्ञान हो और चन्द्र कहने से अमुक वस्तु का। अर्थात् हम शब्दस्वरूप या ध्वनिसमुदाय के ज्ञान तथा थर्थ के ज्ञानो मे एक ज्ञान ही गाँठ बाँध लेते हैं। यह गांठ ही शक्तितत्व है, यही वृति है, यही व्यापार है, यही संकेत है और यही सम्बन्ध। अब हमारे मस्तिष्क के सम्बद्ध तन्तुओ मे से कोई एक झकृत होता है तो दूसरा भी झंकृत हो उठता है। हमारी बोधशकटी बरं चूँ करती आगे बढने लगती है। बाद मे उसमे गति य जाती है और वह सकटी हेमपर्णा हसिनी बनकर हमे न जाने किन-किन लोको की सैर कराती रहती है। सारा खेल, सारी लीला, सारा इन्द्रजाल हमारी बुद्धि का है। यही बुद्धि काव्य भी वन जाती है। शब्द और अथ उसमे सहायक ही बनते हैं। ये तो दो अरणियाँ हैं जो अपने सघर्य से काव्याग्नि को जगाती और उमे अभिव्यक्त करती हैं। इसीलिए हमने कला को सकल्प योनि और अनज्ग कहा है। इस भूमिका पर आरूद चिन्तन अवश्य ही पूर्वोक्त समस्याओ के समाधान की दिश्ा पा लेता है। उत्तर देने की आवश्यकता नही रहती। 'कुमारसभव' का 'हिमालय' अपने भौतिक रूप मे जहां का वहाँ है, वह अपने न्ञानम्प को शब्द के गरड पर बिठा देता है और वह देश तथा काल की परिधि को अतिकान्त कर सस्यातीत रूप मे एक लीलालोक मे प्रविष्ट हो जाता है। शीशमहत् सा यह लौलालोक, यह भावलोक, यह कल्पनालोक या बुद्धिलोक एक को अनेक मूर्तियो में अकित और प्रकाशित करता रहता है। कोई असंगति उपस्थित नहीं होती। क्यो न ऐसा हो? असंगति जिन स्थून प्रतिमानो की इयत्ताओ पर निर्भर है वे प्रतिमान अवनी स्थून्ता से भुक्त हो इयत्तातीत जो हो जाते हैं, मिति और माया की सीमा से ऊपर उठ ब्रह्मीभूत जो हो जाते हैं। पूर्वाद्ध की सीमा टट जाती है और परार्ध को निस्सीमता छा जावी है। मानो हमारे चन्द्र की सोलहवी कला शिव के मस्तिप्क पर जा ैठती है। अब अर्थ ही नहीं अर्थान्तर भी काव्यसीमा मे चले आते हैं और अर्थ का आयाम दीर्घ से दीघंतर और दीघंतर से दीघतम बनता जाता है। किन्तु 'रस' इन अर्थों का परिणाम हो रहता है, अर्थ नहीं। अलंकार इस कल्पनालोक और सविति के इस परमधाम मे वर्थ का हो धर्म रहता है। अलंकार ज्ञानात्मक होना है जब कि इस संवेदनात्मक, चर्वणाप्रसूत रसनात्मक। किन्नु हमे यह सब कहते हुए यह नही भूठना है कि रस की यह स्थिति, उसका अठंकार के साथ अन्तर प्रमाता के अन्तर्मन मे बैठकर किया गया चिन्तन है। प्रमेय के वस्तुपक्ष की दृष्टि से स्थिति भिन्न होगी। किन्तु स्यिति रस की ही भिन्न होगी, अलकार की नहीं। अलंकार दोनो भूमिकाओं में यथावद बना रहेगा। अलंवार यानी उपमादि। सौन्दर्यात्मक अनंकार की स्थिति तो मौर भी अच्छी रहेगी।
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उत्त परिकल्पना से हमने यह देखा कि काव्य एक ज्ञान है और इसलिए वह केवल प्रमेय नहीं, प्रमातृगत, प्रमातृचेतना में प्रतिविम्वित प्रमेय है यानी प्रमित है, बुद्ध है, प्रतिपक्ष है। फलतः हुमने वस्तु और व्यक्ति के दोनों पक्षों में समन्वय और सापेक्षता का अनुभव किया। किन्तु यह एक वस्तुस्थिति है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि प्रमेयपक्ष कुछ है ही नहीं। कारण कि ज्ञान-जगत भी हैतमुक्त नहीं रहता और उसमें भी दृन्ह, प्रपल्च, नवयव, खण्ड, अंश रहते हैं। हम उन्हीं अवयवों सौर अंधों का स्वगत वैशिष्टय आंकते मौर तदनुरूप प्रमेयव्यवस्था करते हैं। फलतः काव्य प्रमातृ- व्योम के बीध उड़ने वाला सुपर्ण होकर भी उस व्योम से अभिन्न नहीं, और 'उसके प्रत्येक पर्ण, उन पणों के प्रत्येक लोम उनमें से प्रत्येक की चित्रता' यह जो सब है यह भी स्वयं उसकी ही विभूति है व्योम की नहीं। कविता तो प्रमातृल्प दारयि के महल की सीता है। वह वहाँ आई है, पैदा नहीं हुई। जब चाहती है पुनः निकल जाती औौर अपनी भूल-भूमिका में विलीन हो जाती है। उसे कभी रावण भी चुरा ले जाता है किन्तु वह भी उसे प्रतिछित करता 'अशञोकवाटी' में ही है और वहां प्रतिषठित करके भी अपने दौरात्म्य से उसे तनिक भी प्रभावित नहीं कर पाता। वस्तुतः रावण को अपने यहाँ की अशोक-भूमिका की वास्तविकता का ज्ञान ही नहीं, किन्तु कविता की सीता उस भू्मिका से अलग कहीं रह सकती ही नहीं। वह तो ऐसी सकटी है जो केवल चके नहीं, मार्ग-भूमि भी अपने साथ लिए रहती है और चलती है तो केवल उसी मार्ग पर, नहीं तो चलती ही नहीं।
अ्षव हमें अपने चिन्तन के धरातल का ध्यान रखना है और प्रमाता या प्रमेय, किसी के भी धरातल से विचार करते समय अपने धरातल को छोड़ना या उससे भटकना नहीं है।
इस प्रकार अलस्ाररूपी जो धर्म है उसका धर्मी है ज्ञान। अर्थात् बलद्वार ज्ञान में रहता है। वह स्वयं भी ज्ञानात्मक है। इन दोनों ज्ञानों का धर्मधमिभाव ज्ञान और अनुव्यवसाय के धर्मधमिभाव सा माना जा सकता है। अनुव्यवसाय में विषयभूत ज्ञान धर्मरूप से निविष्ट रहता है अतः अनुव्यवसाय धर्मी होता है। इनमें सम्बन्ध विपयविपयिभावात्मक ही हो सकता है, या तो हो सकता है 'स्वरूपात्मक'। लीकिक अलद्वारों के समान इनका अपने धर्मी से संयोग सम्बन्ध मानना कविता के स्वरूप के विषय में अपना व्यामाह प्रकट करना है। कव्यात्मक ज्ञान को अनलंकृति कहना भी शब को विवाहयोग्य दुरूह कहना है अयवा कालिदास के शब्दों में मजानबूल को यज्ञयूप बनाना है। काव्य में अलद्वार का अस्तित्व उतना ही अनिवार्य है जितना किसी श्रोत्निय के कन्धे पर यज्ञोपवीत का अस्तित्व या किसी सुहागिन की मांग में सिन्दूर का।
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इन विचारो के साथ हमारा अलंकारसवंस्व साहित्यजगत की सेवा में प्रस्तुत है। इसके मुद्रण में अनेक दोप रह गए हैं। कुछ स्थलो के निर्देश हमने पीधे की संशोधन- तानिका में किए हैं। अन्य कुछ ये है-
पृछ्ठ पक्ति अशुद्ध शुद्ध कथनानव कथनेऽनव १४ 'भीम० इत्यादि इलोक कायस्य कामस्य १७ 'महिला' इत्पादि श्लोक अन्तीमा अमान्ती १७ विमर्शिनीको अन्तिम पं० सचमरकार सचमत्कारं २० विम० की प्रथम पंक्ति १८ पृष्ठ की विमर्रिनी के 'वामनेनतु-चामनेनेत्यादि साथ पढ़ें ५१ नीचे से प उत्तर अन्तर
५१ नीचे मे ९ नहों वही विम० ८ कवाटविभ्नममु० कवाटविभ्रमममु ६४ २२ रण रंग
७० ११ नहीं मिलता द्र० २।१७१ ७५ धीपक पञ्चालक्वार लाटानुप्रास १५७ शीपक उल्लेसालक्कार ३६७ शीपंक समासोवत्यलद्वार इलेपालद्वार
Y४= १४ मन्यते मन्दते
५२९ शीपक विशोषोनत्य० एकावल्य०
५३१ दीपक समालद्ार मालादीपका०
५४० नीचे से २ कण्ठागअ कण्ठागत
६५२ नीचे से ३ वस्य मथा तस्यान्यया०
७२० चन्द्रपादपान् जन्मपादपान
३०६, ३४४, ५३३ पर छपी सूनस० २८, २३,५० को कमशः ३१,३३,५७मानें।
१. 'तुल्यश्रतीनां भिन्नानामभिषेये: परस्परम् । वर्णाना यः पुनर्वादो ममव तन्निगद्यते। [काव्यालंकार २।१७] रुद्रढ ने इसी लक्षण को अपने रुक्षण का आधार बनाया है।
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अपेक्षाएँ-विभारनी तथा सवस्व में प्राप्त नवीन स्थापनाओं पर भूर्मिका में विचार करना आवश्यक है, किन्तु हम उसे छोड़ रहे हैं, कारण कि वह प्रायः मूल में ही अपने, स्थान पर किया जा चुका है। कुछ अवशिष्ट भी है। जैसे- •(क) वृत्तिकार का भट्टनायक के विपय में यह कहना कि वे ही व्यापार- प्राधान्यवादी हैं, जब कि व्यन्जनावादी भी उस क्षेत्र में गिना जा सकता है। जैसे- (ख) व्यञ्जनानामक अतिरिक्त शन्दव्यापार स्वीकार किया जाए या नहीं। लक्षणा को भी क्यों स्वीकार किया जाए। केवल बभिधा से ही पूर्ण बोध क्यों न मान- लिया जाए। अभिधा भी क्यों मानी जाए, क्योंकि शब्द तो मूलतः जड है औौर व्यापार चेतन में रहा करता है। (ग) 'स्वसिद्धये पराक्षेपः' आदि वाक्यों के जो प्रयोग मम्मट आदि में प्राप्त सन्दर्भो से हटकर भिन्न सन्दर्भों में यहाँ मिलते हैं उनके स्रोतों की गवेषणा। मादि ॥ इनमें से शब्द की जडता का परिहार हम इसी भूमिका में कर चुके हैं। व्यन्जना- खण्डन के लिए हमने 'साहित्यदशने तात्पर्यस्वरूपम्' नामक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ लिख दिया है। 'स्वसिद्वये' मदि वाक्यों के सन्दर्भ रत्नाकर से खोजकर यथास्थान मूल में ही दे दिए हैं। व्यापार-प्राधान्यवाद को भट्टनायक तक सीमित मानना या केवल सन्हीं के सिर पर पोपना भट्टनायक की स्थापनाओं में व्यापारों की बहुलता पर निर्भर है। भावकत्व और भोजकत्व दो ऐसे व्यापार हैं जिनकी कल्पना बब्दव्यापार के रूप में की गई हे औोर कदाचित् केवल भट्टनायक द्वारा ही की गई है। अधिक विचार स्वतन्त्र- रूप से किया जा सकता है। विर्मानी के पाठ-संघोधन में हमने पाण्ड्रगत्थों की सहायता लेनी चाही तो उसमें बहुत विवाद पाया। उदाहरणार्थ काशीहिन्दूविर्वर विद्यालय में विमशनी की दो धारदा प्रतियाँ हैं। उनमें और डॉ० रामचन्द्रद्विवेदी द्वारा देखी प्रत्रियों में वृत्तिके 'प्रणम्य०' इत्यादि मंगल पद्म की विमशिनी 'निजेति' प्रतीक से आारम्भ होती है। उसके पहळे की जो व्यास्या निर्णयसागरसंस्करण में छपी है वह उन्हें किसी एक प्रति में ही प्राप्त हुई है, किन्तु है मूल ही, क्योंकि ऐसा संभव नहीं कि टीकाकार मंगलपद् की व्याख्या उसके उत्तरार्ध से आरम्भ करे, वह भी तब जब पूर्वार्ध में 'परा वाणी' और उसके 'तरिविध विग्रह' की यूढ ग्रन्थि उपस्थित हो। फिर परावाणी तो काइमीरियों की सोमलता है। उसीके रस में बिभोर रह वे अपना चिन्तन स्थिर रखते हैं। जयरथ उसे कसे छोड़ सकते हैं ? तन्नापि इसकी जो व्याख्या यहां दी गई है उसकी गंभीरता, उसकी पदावली, उसकी प्रमाणसंपति काछागत वैदुष्य की अपेक्षा रखती है, वह जयरथ जैसे स्वश्ास्त्रवेत्ता के ही अनुरूप है। इसके अतिरिक्त 'देवी' शब्द की ऐसी ही व्याख्या जयरय ने तन्न्रालोक आदि की टीका में भी की है। फलतः एक प्रति में मिलने पर भी उसे प्रामाणिक मूल मानकर अपनाना उचित है। हमने अपना लिया भी है।
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सूभो का पाठ विमशिनी की काशी हिन्दूविश्वविद्यालय मे प्राप्त एक बारदा प्रति मे भी 'अलकारसूत्र' नाम से पृथक् दिया मिलता है, अतः हम भी उसे यहां पृथक् दे रहे हैं। जो चनुर्थ सूत्र वृति मान लिया गमा था इस प्रति भे वह भी सूनो मे ही पठित है, किन्तु उसमे आगे पठित सूत्रपाठ के र३, द४ तथा ८५ सूयो को एक ही मूय माना गया है। उसमे 'एते' शब्द नहीं है। सूनपाठ अधिकत' विमशिनी के अनुरूप ही दिया है, किन्तु जहां उचित लगा है उसके विपरीन नवीन पाठ भी अपनाया गमा है। यह काय मध्यप्रदेशशासन सेवा मे रहते हुए किया गया है। मैं उस घासन के प्रति आभारी हूँ। अन्त मे मैं काशी के विश्वविधुत प्रकाशनसस्थान चौसम्वा संस्कृत सोरीज आफिस तथा चौसम्बा विद्याभवन के अधिकारी थीमान् मोहनदास जी गुप्त तथा श्रीमान् बिट्ठलदास जो गुप्त को धन्यवाद देता हू, जिन्होंने इस वड़े कार्य को ल्ट्ीकार किया और साहित्यसेवियो के लिए सुलभ बनाया। मुझे दुःख है कि इस ग्रन्थ की पूर्ति के पूर्व ही इस महान् मंस्पान के कर्णधार थौमान सेठ जयकृष्णदास जी गुप्त तथा श्रीमान् सेठ श्रीकण्पदासजी गुप्त वुछ ही दिनो के अन्तर से असमय मे गोतोक सिधार गए। यदाकदा मैंने सदिध् अंगो पर अपने परमगुरु काशी-सुमेक्नीठाधीकवर शङ्राचाय अनन्तक्रीविभूषित श्रीमहेश्वरानन्द जी सरस्वती, उसी भूमिका के विदेहराज महामाहेश्वर आचार्य प० रामेश्वर जी झा तथा अपने पितृतुल्य गुरु पं० रामकुवेर जी मालवीय से परामदा किया है। उनको प्रणामाजनि अवति करता हूँ। - मैं इस दिश्या मे कार्य करने वाले अपने पूर्व सूरियो के प्रति भी कृतज्ञता अर्पित करता हूँ, जिनसे मेरे चिन्तन को बल मिला है। ; इस ग्रन्थ के वृतिगत उदाहरणो तथा विमशिनीपदयों की सूची विद्वह्वर शी सातकहि मुखोपाध्याय बङ्गीय ने बनाई है। वे एतदर्थ वतश सोधुवाद के पात् हैं। किमधिकेन। नम सुमेधसे तस्मे सुनेशाय च कोटिश.। 4 बोध शोध प्रबन्धरव सस्पर्धा यत्र जाग्रनि।।
शीगुरुपूणिमा, -रेवाप्रसाद द्विवेदी सं० २०२८, वाराणसी
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राजानक-श्रीरुय्यकस्य कृतिः अलङ्कारहृन्नष्
१ दहार्थषौनरुतत्यं शन्दपोनरुवत्यं शब्दार्थपोनरुक्त्यं चेति त्रयः पौनरुकत्यप्रकाराः । 3 तन्नार्थपोनरुवत्यं प्ररूढं दोप:। ३ आमुखावभासनं पुनः पुनरुकवदाभासम्। ४ शब्दरपोनरुपत्यं व्यव्जनमानपोनरुवत्यं स्वरव्यज्ञनसमुदाय-पौन- रुवत्यं च। ५ संख्यानियमे पूर्व छेकानुप्रासः। ६ अन्यथा तु वृत्यनुआास: । ७ स्वरव्यजनसमुदायपौरुक्त्यं यमकम् । ८ शब्दार्थपोनरुवत्यं प्ररूढं दोप:। ९ तात्पर्यभेदवत्तु लाटानुप्रास: । १० तदेवं पौनरुकत्ये पञ्चालंकारा: । ११ वर्णानां सङ्गाद्याकतिहेतुले चित्रम्। १२ उपमानोपमेययो: साधम्यें भेदाभेदतुल्यते उपमा।
इयोः पर्यायेण तस्मिभुपमेयोपमा। १५ सद्दशानुभवाद वस्त्वन्तरस्मृति: स्मरणम्। १६ अमेदप्राधान्ये आरोपे आरोपविषयानपह्गवे रूपकम्। १७ आरोप्यमाणस्य अछृतोपयोगिले परिणाम:। १८ विपयस्य सन्दित्यमानते सन्देहः।
१. अलङ्कारसूत्रमिति वृत्िरदितो सव्यकैकरचितः सूत्रमान्नात्मा स्वतन्त्री अन्थ: । २. इहदेति पद प्रतिसूत्रम् आग्नन्यमनुवर्तनीयन्।
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( ६= ) १९ सादृश्याद् वस्तन्तरप्रतीतिर्भ्रान्तिमान्। २० एकस्यापि निमित्तवशादनेकधा ग्रहणमुल्लेखः।
२२ अध्यवसाये व्यापारप्राधान्ये उत्पेक्षा। २३ अप्यवसितप्राधान्ये लवतिशयोक्ति:। २४ औपम्यस्य गम्यत्वे पदार्थगतत्वंन प्रस्तुतानामप्रस्तुताना वा समान- धर्माभिसम्बन्ध तुल्ययोगिता। २५ प्रस्तुताप्रस्तुताना तु दीपकम्। २६ वाक्यार्थगतलवेन सामान्यस्य वाक्यद्ये पृथडनिर्देशे प्रतिवस्तूपमा । २७ तस्यापि विम्वप्रतिविम्वभावतया निर्देशे दष्टान्तः। २८ समवताऽसभवता वा वस्तुसम्बन्धेन गम्यमानं प्रतिबिम्नकरण निदर्शना। २९ भेदप्राधान्ये उपमानादुपमेयस्याधिक्ये विपर्यये वा व्यतिरेक:। ३० उपमानोपमेययोरेकस्य प्राधान्यनिर्देशेऽपरस्य सहार्थसम्बन्धे सहोक्ि:। ३१ विना' किश्चिदन्यम्य सदस्त्याभावो विनोकि:। ३२ विशेषणाना साम्यादप्रस्नुतस्य गम्यत्वे समासोकि:। ३३ विशेपणसाभिप्रायत्वं परिकर:। ३४ विशेष्यस्यापि साम्ये द्वयोर्वोपादाने श्लेप:। ३५ अप्रस्तुतात् प्रस्तुतस्य सामान्यविशेपभावे कार्यकारणभावे वा सारूप्ये च प्रस्तुतप्रतीतावप्रस्तुतप्रशंसा । ३६ सामान्यविशेपकार्यकारणभावाभ्यां निर्दिष्टप्रकृतसमर्थनमर्थान्तर- न्यास :! २७ गम्यस्यापि भङ्ग्यन्तरेणाभिधान पर्यायोक्तम्।
३९ ३८ स्तुतिनिन्दाभ्या निन्दास्तुत्योर्गम्यत्वे व्याजस्तुतिः। उक्तवक्ष्यमाणयो: प्राकरणिकयोर्विशेपप्रतिपत्यर्थ निपेघाभास आक्षेप: ।
१-२. सूत्रयोरनयो. सस्ये मूलग्रन्ये क्रमेण २८,२३ इति मुद्रिते। सशोधयन्तु सकृपम्।
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४० अनिष्टविध्याभासरय। ४१ विरुद्धाभासत्वं विरोधः। ४२ कारणाभावे कार्यस्योत्पत्तिर्विभावना। ४३ कारणसामग्रये कार्यानुस्पत्तिर्विशेपोकिः। ४१ कार्यकारणयोः समकालत्े पोंचापर्यविपर्यये चातिशयोकि:। ४५ तयोस्तु भिन्रदेशलेऽसङगतिः। ४६ विरूपकार्यानर्थयोरुत्पत्तिर्विरूपसंघटना च् विपमम्। ४७ तद्विपर्येयः समम्। ४८ सविपरीतफलनिप्पत्तये प्रयत्नो विचित्रम्। ४९ अध्रयाश्रयिणोरनानुरूप्यम् अधिकम् । ५० परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम्।
५२ यथा साचितस्य तथैवान्यथाकरणं व्याघातः। ५३ सोंकर्षेण कार्यविरुद्धक्रिया च। ५४ पूर्वस्य पूर्वस्योत्तरोत्तरहे तुत्ये कारणमांला । ५५ यथापूर्व परस्य विशेषणतया स्थापनामोहने एकावली। ५६ पूर्वस्य पूर्वस्थोत्तरोत्तरगुणावहत्वे मालादीपकम्। ५७ १उत्तरोत्तरमुत्कर्ष: सारः। ५८ हेतोर्वाक्यपदार्थता काव्यलिह्म्। ५९ साध्यसाधननिर्देशोऽनुमानम्। ६० उद्दिष्टानामर्थानां क्रमेणानुनिर्देशो यथासंख्यम्। ६१ एकमनेकस्मिन्वनेकमेकस्मिन् क्रमेण पर्यायः। ६२ समन्यूनाधिकानां समाधिकन्यूनैर्विनिमय: परिवृत्तिः । ६३ एकस्यानेकप्राततावेक्कन्र नियमनं परिसंख्या। ६४ दण्डापूपिकया ऽर्थान्तरापतनमर्थापत्तिः। ६५ तुल्यवलविरोघो विकल्पः। -६६ गुणकिया-योगपयं समुचयः ।
१. सूचेडन भूलगरन्थे ५० इत्ति संख्या मुहिता । कृपया शोधयन्तु।
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(७0)
६७ एकस्य सिद्धिहेततुत्वेऽन्यस्य तत्करत्वं च। ६८ कारणान्तरयोगात् कार्यस्य सुकरत्वं समाधिः। ६९ प्रतिपक्षतिरस्काराशक्तौ तदीयस्य तिरस्कार : परत्यनीकम् उपमानस्पाक्षेप उपमेयताकल्पन वा प्रतीपम्। वस्तुना वस्त्वन्तरनिगूहन मीलितिम्। ७२ प्रम्तुतस्यान्यन गुणसाम्यादेवातम्य सामान्यम्।
७१ सति हेती तर्गुणाननुहारोऽतद्गुणः। उत्तरात् प्रश्नोनयनमसदसम्भाव्यमुत्तरं चोत्तरम्। ७६ सलक्षित सूक्ष्मार्थप्रकवशनं सूक्षमम्। ७ उद्विनवस्तुनिगूहन व्याजोकि:। ७८ अन्यथोकस्य चाम्यस्य काकुश्लेपाभ्यामन्यया योजनं वक्रोक्ति:। ७१ सूक्ष्मपस्तुस्मावयथानद्वर्णन स्वमावोकि:। अतीतानागतयो प्रत्यक्षायमाणत् भाविकम्। समृद्धिमद्-वस्तु-वर्णनमुदात्तम्। ८२ अङ्गभूतमहापुरुषचरित च ।
तानि। ८४ भातादयो भावसन्विर्मावशवलता च।' ८५ *एते पृथगलङ्गाराः। ८६ एपा तिलतण्डुलन्यायेन मिश्रत्वं संसृषिः। ८७ क्षीरनीर-न्यायेम तु सहरः। ८८ एवमेत शब्दार्थोमयालक्वारा: संक्षेपतः सृन्निताः। ॥ कृतिः श्रीराजानिकरुय्यकस्य ।।
सवृच्िमूलग्रन्ये सूनमिद पूर्ववर्निनि सूत्रेन्नर्भुकनतथा मुदितम्, तदानीमम्रति-
लिखितानि।
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विघयानुकम
पृ० नूमिका २४ व्यतिरेक. वन्दालंकार प्रकरणारम्भ 88 २५ सहोसि २९८ १ पुनरुक्तवदाभास. ४६ २६ विनोकि ३०६ .२ छेकानुप्रास ६० २७ समासोति ३१२ ३ वृत्यनुपास ६१ २८ परिकर ३४४ ४ यमक ६७ २९ वलेप ३५० ५ लाटनुप्रास ७१ ३० अप्रस्तुतप्रशंसा ३८१ ६ चिय ३१ अर्था्तरन्यास ३९९
८० ३२ पर्वायोक्त ४१०
७ उपमा E0 ३३ व्याजस्तुति ४१९
म अनन्वय ३४ आदेप ४२६
१ उपमेयोपमा १०३ ३५ विरोध ४५२
१० स्मरण १०८ ३६ विभावना ४६२
११ रूपक ११५ ३७ विरेषोक्ति ४७६
१२ परिणाम १३५ ३६ अविशयोकि (२) ४६३
१३ सन्देह १४० ३१ वसङ्ति
१४ भ्रान्तिमान- १५१ ४० विपम
१५ उल्लेख १५८ ४१ सम ४९४
१६ अपहृति- १६८ ४२ विचिन्न ४९८
१७ उत्प्रेक्षा १८२ ४३ अबिक ५०१
१ अतिवायोक्ति (१) २१९ ४४ अन्योव्य ५०५
१९ तुल्ययोगिता २३६ ४५ विशेय ५०८
२० दीपक! २४३ ४६ व्याघास (१) ५१४
२१ प्रतिवस्तुपमा/ २५५ व्याघात ( २) ५१७
२२ हश्टान्J २६३ ४७ कारणमाला ५२३ २३ निदशंना २६९ ४८ एकावली ५२६
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(७)
पृ० पृ०
४९ मालादीपक ५३० ६६ अवद्गुण ६१७
५० सार ५६३ ६७ उत्तर १४१
५१ काव्यलिङ्द ५३८ ६८ सूक्ष्म ५२ अनुमान ५४९ ६१ व्याजोकि ६X२
५३ यपासखूय ५५६ ७० बकोकि
५४ पर्याप ५६५ ७१ स्वभावोक्ति ६६४
५५ परिवृत्ति ५७१ ७२ भाविक ५६ परिसंख्या ५७७ ७३ उदास (१) ५७ अर्थापति उदात्त (२) ט15
५= विकल्प ५९१ ७४-७७ रसवत्, प्रेम, ऊर्जस्वी,
५१ समुच्चय ५९६ समाहित ११२
६० समाधि ६०६ ७८-८० भावोदय, भावसन्भि,
६१ प्रत्यनीक ६१२ भावराबलता
६२ प्रतीप ६१६ ८१ संमृष्टि ७१७
६३ मीलित ६२५ ८२ सकर ७१२ उपसंदारसूत्र ७५१ ६४ सामान्य ६३२ परिशिष्ट १ : सहदयलीला ६५ वद्पुण ६३५ २: रलोकानुकमणी ह V६१ 3
- हमस्व रूपगाड
लह दोगोडजलाकी
E
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। श्री:।।
अलङ्कारसवस्वम्
नमस्कृत्य परां वाचं देवीं त्रिविधविग्रहास्। गुर्वलंकारसूत्राणां वृच्या तात्पर्थमुच्यते।।
सविमर्श अनुवाद श्रद्ां मन्ये मातरं लोकमागे ता वै सर्वा ओषधीः संग्रसुते। आन्वीक्षिक्यां किन्तु मे भाववन्ध: सा ता एता नित्तुपाः संविधस। आद्यं गुरुं पितरमेव पुरा नतोपदमार्दा च लेखजननीं जननी मयि स्वान्। एक तयोस्तदनु वित्रहमद्वितीयं काश्यां महेद्वरवतीन्द्रकवि त्रितोडस्मि।। चन्नाम तत्तगुरुभिर्युरुमिर्गरायो ज्योतिमयि प्रतिनवं प्रकटीकृतं तद। कल्याणकोश्मुपजीव्य मया सटीक सवस्व-शोधन-विधी क्रियते प्रयत्नः॥ रुथ्यकसूनं, मह्ो: सर्वत्वाख्या च तन्र या वृत्ति: । से शोययते रत्नाकरो, विमर्शिनी तमपि। एर्ता्व्रिककृतमारगे दत्तघिया दीक्षितेन यद वत्मे। श्षुण्णं, क्षोदयते तत पण्टितराजो महारम्भ: ॥ विश्वेश्वर इति नामा विदन्मान्य: पराक्रमते। नव्यन्यायनदीप्णः पण्डितराजं निराकुर्लन्॥ सर्वानैतां विदुषां, परम्परां वीक्ष्य, वीक्ष्य दण्ड्यादीन्। जरतः काव्यालंकृतिकत न् रेवाप्रसादनामाहम् ॥ अनुवादेन समूद्धां व्याख्यां कुवे यथायर्थ विशदाम्। रुय्यकमट्खुकजयर थकान्यालड कृतिमुनित्रयीकृतिपु॥ 'सीन प्रकार के शरीर से युक्त भगवती परा वाणी को प्रणाम कर गुरुकृत अलंकारसूनों का तात्पर्यं वृत्ति द्वारा वतलाया जा रहा है।।1
मङलकामनया अन्धकृत्निजेष्टदेवताप्रणामपुरःसरभिधेयं तात्पर्य चैकेनेव वाक्येन परामशति-नमस्कृत्येति। परां वाढ्मयाधिदेव तां पराख्यां शब्दवहणोडपृथगभूतां शर्कि परां वार्च देवीं त्रिविधविध्रहां बहिरुन्विलासयिपया पश्यन्तीमव्यमावखरीरूपेण प्रकासत्रयेणा धिष्टितशरीरां नमस्कृत्य निर्विधचिकीरपितग्रन्धसमाक्षये तां प्रति कायवाड्मनोमि: प्रहीभूय
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अलङ्कारसवस्थम्
निजालकारसूव्रा वृत्या तात्र्यमुच्यन इति मन्लान्वययोजना। तथा चात्रोक्कलस्षणार्थ- घिस्नर :- 'येयं विमर्शरूपैच परमार्थचमस्कृति। सैघ सारं पदार्थानां परा वागभिधीयते॥ नादाख्या सर्वमृतेपु जीवरपेग संस्थिना। अनादिनिघना सैंघ सूक्मा वागनपायिनी॥ अनादिनिधनं व्रह्म शब्दतत्त्वं यदचरम्। विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥ वैसरी शब्दनिम्पत्तिर्मध्यमा स्मृतिगोचरा। दोतिकार्थस्य पश्यन्ती सूचमा व्रह्ैव केवलम्।।' इत्यादिशासत्रोकिकमेण सर्वत्र सदोदिताया सूचमाया: परायाः शब्दवह्यग, दक्तर्वहि- रुन्मिपन्त्या. प्रथमो विवर्तः पश्यन्ती नाम। तथा चोक्तम्- 'अविभागा तु पशयन्ती सर्वन सहतकमा। स्वरूपज्योनिरेवान्तःसूचमा वागनपायिनी॥' दति। अस्यार्थ-अविभागा स्थानकरणप्रयत्प्रकारेण वर्णानां विभागहीना अत एच सहतकमा तथवान्तास्वरूपज्योति स्वयंप्रकाशा र्वस्यात्मनो रूप ज्योतिश्व सवत्र हि सर्वविधायिनी शक्तिरेवेति वान्तसूक्ष्मवीजादहुरमिन वहिरुन्मिपन्ती किंचिदुच््ना पराया मध्यमायाधावस्था तटस्था पश्यतीति परपन्तीतयुच्यते। तत पर तु- 'जन्त संकल्परूपा या क्रमरपानुपासिनी। म्राणवृत्तिमतिक्र्य मव्यमा वासु प्रवर्तते।' पतत्कथयामीति विमर्शरूपा अन्तसंररपरूपा प्राणवृत्तिमतिकम्य श्रत्रम्राह्मवर्णा- भिन्यक्तिरहिता क्रम्पानुपातिनी मानसिक्वर्णोच्चारणक्मेण द्वितीयो विवर्तो मध्यमारुपो जायते। मध्यमा किल द्वयोर्वाग्विवर्तयी पश्यम्तीवसरीसंज्ञयोमध्ये वर्तनान्मध्यमे- स्युच्यते। सदनन्तरं च- 'स्थानेपु विवृते वायौ कृतवर्णपरिग्रहा। वैसरी वाकू प्रयोकनणां प्राणवृत्तिनिबन्धना।।'
दाव्यक्तगकारादिविला ससमुच्चयपदवाक्यारमरस्तृतीयो विवर्ती वैसरत्युच्यते। विशिष्टं खमाकाशं मुसरूपं राति गृवातीति विसरः ्राणवायुमंचारविशिष्टो वर्णोच्ारस्तेनाभिव्य का वैंसरीति। विसरे शरीरे भवा वैखरीति वा केचित्। सिद्धो मदलार्थ। तथा चात्र पूर्वारधं एव पुनरावृत्याभिधेयपदार्या्वययोजना-यथा परां वाचमुत्तमकाव्यरूपतया काव्यात्म- धयनिसंज्ञाम् अभिधा तात्पर्यलक्षणोत्तीणांमुस्कृष्टाम्। देवीम् 'दिवु क्रीडाविजिगीपाद्युनिस्तु- तिव्यवह्ारमोदमदकान्तिस्वप्नगतिपु' इनि यथायर्थ घात्वर्थानामनुस्मरणात् शक्तिमना क्वीनां श्रोतणा च स्वभावातस्वेच्छया समुच्छळन्तीं क्रीडन्तीम्। तथा देवीं विजिगीयु शद्दं तत्संकीर्तितं पार्थमुपसर्जनीकृत्य वर्तमानाम्। तथा देवीं द्ोतमाना द्योतनघ्वननयोः पर्यायत्वाद् ध्वनिसंज्ञाम। तथा देवीं स्तुत्यां सर्व: काव्या्सत्वादभिवन्द्याम्। तथा देवीं व्यवहरम्तीं सर्वत्र मचरितां न तु क्ापि स्सलिताम्। तथा देवीं मोदमाना शुतिमात्रेणैव परमानन्ददायिनीम। तथा देवा माधयन्तीं कबे सहृदयस्य च यथायर्यं करणाववोधान्यां कमप्यहंकारं जनयन्तीम्। तथा देवीं कमनीया सवैरमिलपणीयाम्। त्रिविधविग्रहां त्रिविघसित्रिमकारो विग्रहो व्यतिरेकेग ग्रहो व्यतिरेकमूल, प्रमाररणप्रकारो यस्यास्ताम। तथा हि 'गह्गायां घोप:' इत्यादिवाक्येपु घोपस्य यच्छत्यपावनत्वादिकं मतीयते तत्र नामिधा। गङ्गादिशव्दानां शैत्यादयर्थस्यावाचकरवात्। न तात्पर्यात्मा। तान्पर्यस्या ह्यापाराधेयभावावगमार्थ परस्परमन्वयमात्र एव, चीणवाद्। न रक्षणा। मुस्यार्थवाघा-
व्यापार इर्यादि सोयमेवाग्रे विभृष्यति। अथ च व्यद्यस्य शब्दार्थोभयमूललेन प्रसि-
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भूमिका ३
दस्निविधो वियहो विशेषगानां भेदानां ग्रहो यस्था इति वा। ए तादर्शी तां नमस्काय मङ्लाचर णरूपववेन मनागुदिश्य न नु सूत्वृत्तिम्यां तात्पर्यकथनादिल क्षण परीक्षाविस्तारेण निर्णीय निजालंकारसूघ्ाणां घृर्यया तात्पर्यसुच्यत इति। अस्याभिप्रायः-तथा च ध्वनेमं- नाबुदेशमात्रमेव करोति 'ह दि वाबन्द्ामह-इस्यादिना। तदेततावदास्ताम्। निजेति। परकीयाणां सूत्राणां तात्पर्यकथनानवचोधोऽपि स्यादिति भाचः। तथा न कैथ्रिदृपि परेरीदंशि सुमाणि कृतानीत्यपि ध्वनितम् । तात्पर्यमिति। संत्तिप्तार्थप्रकाशनमित्यर्थः। अन्यथा हि कथ नमेपां बहुनापि ग्रन्थेन पारं न वायात्। नतु- 'नादिनाक्ये ग्रयोकव्यमभिधेयप्रयोजने। ग्रतिपादयितुं शोतृप्रवाहोत्साहसिनुये ।।' इति नीत्या धरोतृप्रवृत्यर्थ सर्वत्रैवादिवाक्येऽभिधेयप्रयोजनाद्यभिधीयते तच्चेह नोकमिति कथमन्न श्रोतणां पवृत्ति: स्यात्। मैवमू। अलंकारा हान्राभिवेया। तेपामन्न साचादेवाभिधानात। तदभिधाय के चेदमलंकारसर्वस्वार्य प्रकरणमित्य भिघा नामिधेययोर्नि यमगर्भीकारेणार्थाचिसो वाच्यवाचकभावलक्षणः संबन्धः। नह्येवंविधमेतद्मिधायके प्रकरणान्तरमस्ति। तर्यान्विप्यमाणस्याप्युपलम्भयोग्यस्यानुपलम्भावू। अव एवात्रान्या- लंकार ग्रन्थवैलक्षण्योदोपगाय 'तात्पर्यमुच्यते' इत्याधकम्। अभिधेयाश्वान्नालंकारा: काव्या- लंकारा न लौकिका इत्येतेपां काव्योपस्कृतिद्वारेण पारम्पर्येण- 'काव्यं यशसेरऽर्यकृते व्यवहार विदे शिवेतरसतये। सद्ः पर निर्वृ तये कान्तासंमिततथोपदेशयुजे।
प्रयोजनम्। तयोश्च साध्यसाधनभावलक्षणः संबन्धः। इति स्थितमेवादिवावयस्य श्रोतृ- श्रवणश्रद्धाविर्भाघ निबन्धनत्वम्। सविमश अनुवाद चन्यकार मंगल करने की इच्छा से अपनी इष्देदी को प्रजाम करते हुए [अन्थ के] प्रतिपाद विषय का परामर्श भी एक ही वाक्य में करते हुए कहते हैं-नमस्कृत्य। 'परा अर्थाव वाहमयमात्र की अधिष्ात्री देवी और शब्द्रनह की उससे अपयक परानामक रक्ति जो बाहर उल्लसित होने की इच्छा से पदचन्ती, नव्यमा और वैखरी इन तीन शरीरों में अधिपित होती है, उसको नमस्कार कर विकीपित बन्ध की निर्विन्न परिसमाप्ति के लिए उसके प्रति काय, वचन और मन से नम्र होकर अपने [ गुरु रुव्यकाचार्य के] अलंकार सू्तरों का तात्पर्य वृत्ति दिस कर [मुझ मक्खु के द्वारा] बनलावा जा रहा है' यह हुई मंगलवाक्य की पदार्थयोजना। उत्त मंगल पद्य में आए पदार्थो का लक्षणसहित विस्तृत अर्थ इस प्रकार है-"यह जो विमर्श *रूप से ही विद्यमान परम अर्थ का चमत्कार है वही सभी पदार्थो का सार है। उसी को परा वाणी कड्ा आाता है।" "इसी (परा वागी) का नाम नाद है। वही सभी भूनों में जीव रूप से अवस्थित है। न उसका आदि हैं और न अन्त। वह अत्यन्त सूक्ष्म और अनध्र है।" "आदि और अन्त से परे जो अहा है वही शब्दतत्त्र है। उर्ती का नाम अक्षर है। अर्थतत्त्व इसी अक्षर तत्त्व का विव्तत है। यही संसार की विचिन्न रचना की जड़ है॥। "निग्पत्न शब्द (कायान्नि द्वारा प्रेरित प्रणवाबु का सूर्धा से टकराकर कण्ठद्ारा शन्दरुप से निकल जाना) वैखरी वाणी है [ जो क्गगोचर होती है], मध्यमा (कान से नहीं सुनाई देकर नेवल) स्मृति का विषय नती है। पश्चन्त्री अर्थ को बोतित करती है और जो अत्यन्न सूक्ष्म पर वाक है वह तो केवल ब्रह्मरूप ही है।"
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अलङ्गारसवस्वम् 20
-इत्यादि शास्त्रवचनों के अनुमार सर्वत्र और सदा उदित (कथिन अथवा उदय को प्राप्त) जो शब्दब्रह्म की सूक्ष्म परा वाणी नामक शक्ति है उमका वाहर उन्मिपित होने समय जो प्रथम विवर्त्त होना है उसे पयन्नी कहा जाना है। जमा कि कहा गया है-"पश्यन्नी अविभागा= विमागरहिन होती है, उसमें क्रम विल्कुल नही रहता। वह (पश्यन्नी) आत्मज्योति रूप ही है, अन्न सूक्ष्मा जौर अनपायिनी (अविनश्वर) है।" -इमका अर्थ हे-अविभागा = अर्थात् (कण्ठ तालु आदि) स्थान तथा इन्द्रियों के (आभ्यन्तर और बाह्य) प्रयत्नों मे वर्गों में जो भैद आ जाना है उसमे रहिन, और इसीलिए क्रमरहित, अन्नर्ज्योति स्वरूप अर्थात् म्वयप्रकाश, स्वरूप= अपना अर्थात आत्मा का जो रूप वही ज्योति अथव्ा मर्वत्र सर्वविरायिनी शक्ति, जिसका अन्तराल अत्यन्न सूक्ष्म रहता है ऐसे वीज मे अकुर के ममान बाहर उन्मिपित होती अर्थात कुछ- कुछ व्यक्तना की जोर उन्मुस होती तथा एक ओर परा और दूसरी ओर मध्यमा की स्थिति का तटस्थरूप से दर्शन करनी हुई जो वाणी है वही पश्यन्ती कही जाती है। इम पदयन्नी के बाद (आनी है मध्यमा, उमका लक्षण है) "जो वाणी अन्न सकतप रूप है, जिमनें क्रम और रूप (अर्थाव वर्ण भेद) रहते है किन्तु जो प्राणवृत्ति से परे रह्दनी है उसे मध्यमा वागी कह्ा जाना है।"इसका अर्थ है-"मै यह कटू" देमा जो मानस-विचार नत्म्वरूप और इ्मीलिए अन्न- मकल्यम्वरप, प्राणवृत्ति से परे अर्थात कानों से भुनाई पढने वाले बर्गों की अभिव्यक्ति से रहिन, क्रमरूपानुपातिनी =मानमिक जो वर्णोच्चारण उसके अनुमार विवर्ततित होन ाली वाणी मन्यमा कही जाती है। यह हुआ शब्द्र वक्ष का द्वितीय विवर्त। इसका नाम मध्यमा इसलएि है कि यह, वाणी के जो शेष दो विवते वैसरी और पश्यन्नी हैं इनके बीच रहती है। इमके पश्चान- "स्थानों में वायु के विवृत होने पर वर्णरूप से व्यक्त वाणी वैसरी वाणा होती है। यह उच्चार- यिना के प्राणव्यापार पर निर्भर रहती है।" -इम लक्षा के अनुमार स्थान और इन्द्रियों के प्रयत्न द्वारा क्रमपूर्वक व्यक्त होने वाली वाणी वैखरी वाणी होती है। यह कानों से सुनने योग्य दुन्दुभि, वीणा आदि के नाद के समान होनी है। इसमें गद्गदादि कम्पन रहने है और गकारादि वर्गों के द्वारा बनने वाले वर्ण, पद् तथा वाक्य भी। यह वाग्रस का तीमरा विवर्त होना है। इस वाणी के लिए प्रयुक्त होने वाले 'वैसरी'-शब्द की निरक्ति कुछ विद्वानों के अनुमार इम प्रकार है-'वि= विशिष्ट, स=मुसरूप आकाश को र=ग्रद्दण करने वाला हुआ-'विसर' अर्थात शरीर, उममें उत्पन्न होने वाली हुई-'वैसरी'। यह हुआ मगल पद्य का सतुनिपरक अर्थ। 4 इमी मंगलपद् के पूर्वार्थ के पदों की आवृत्ति करने पर वह तथ्य भी व्यक्त होना है जो प्रस्तुन अ्रन्थ में प्रतिपाद्य है। यथा-परावाणी=उत्तम काव्य की आत्मा व्वनि जो अनिधा, लक्षगा और नात्पर्य वृत्ति से परे रहनी है। देवी/ दिव धातुका अर्थ है करीटा, विजयेच्छा, धुनि, स्नुति, व्यवहार, मोद, मद, कान्नि, स्वप्न नथा गनि। देवी शब्द में इन सभी' खर्यों को योजना यथासभव की जा सकती है। करीटा अर्थ में देवी=शक्तिमान् कवियो तथा ओनाओं में स्व्माव मे स्वेच्छया समुच्छलिन होनी हुई अर्थात क्रीटा करती हुई, विजिगाप अर्थ मे देवौ = विजयेच्छा रगनी हई अर्थात शब्द और उमसे प्रकट अर्थको गौग बनाकर अनस्थिन। गतति अर्थ में देवी =दोतित अर्थात् ध्वनिन होनी हुर्ई, धोनन और ध्वनन दोनों के पर्यायवाचक होन मे धोतमान का अर्थ दुआ ध्वनिसज्क। स्तुति अर्थ में देवी=स्तुत्य, (ध्वनि रूपसे) काव्यात्मा होने के कारग स्भा महदर्या द्वारा अभिनन्दित। व्यवहार अर्थ में देनी= ममी क्षेत्र में चलने वाला, कही भी स्ललित न होने वाली। मोद अर्ध में देवी=सुनने मात्र से परम आनन्द देने वाली। मद अर्थ में देवी=कवि और सहृदय में क्रम से निर्माण और अनुशीरन द्वारा एक विचित्र अहंकार पेदा करने वाली, कान्नि अर्थ में देवी=सभी व्यक्तियों द्वारा अभिलपणीय
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भूमिका
कानित=इच्छा)। त्रिविधविधदा=ननिविध अर्थात तीन प्रकार का है निग्रह अर्धात व्यतिरेकीं व्रह् यानो व्यतिरेकद्वारा प्रमात्मक ज्ञान कराने का प्रकार जिसमें; जैसे "मंगा पर घोष है" इत्यादि वान्यों में घोष में जो शैंत्वपावनत्वादि धर्मों का ज्ञान होता है उसमें अभिषा कारण नहीं होती क्योंकि शैत्य आदि अर्थों में गंगाकव्द की वाचकता (संकेतग्रह) नहीं रहती, न तात्पर्यशक्ति ही न्योंकि नात्पर्वशकि गंगा और घोष आदि में आधारधयभाव आदि संबन्धमात्र का मान कराकर नष्ट हो जाती है, न लक्षगा हो, कयोंकि सक्षणा के हेतु मुख्यारयवाव आदि यहाँ नहीं रहते। फलतः अभिया, तात्पर्य और लक्षमा से भिन्न चतुर्थ कक्षा में निहिन व्यजनाव्यापार से नैतपावनत्वादि का आन हो पाता है। [इससे स्वयं विनशिनीकार ही आगे विचार करेंगे]। दूसरे प्रकार से (त्रिविधविघहा) नव्दनूलक, अर्थनूलक और उभयमूलक, अतः तीन प्रकार का है निग्रह अर्थात नि= विशेषणों भेदों का ग्रहजान जिसमें। ऐसी उस उत्तम काव्यरूपा परा (शकि) को नमस्कार करने का अर्थ है मंगलाचरण के माध्यम से सूत्रात्मक ढंग से कुछ निर्देश करना, न कि सूत्र द्वारा सात्पर्य कथन और वृत्ति द्वारा रक्षणपरीक्षा आदि के वित्तार के साथ। अपने अलंकारसूत्रों का तात्पर्य वृत्ति द्वारा वतलाने का अभिप्राय है कि यहाँ ध्वनि का तो केवल थोड़ा सा नामकथन मात्र रहेगा, नर्थात "वह हि ताबद् ामह०" इत्यादि द्वारा [ इस पर अधिक विचार नहीं होगा] इस विषय की चर्चा इतने में ही समाप् हो जावेगी।
निज= निज इसलिए कहा कि किसी को यह ज्ञान न हो कि किसी अन्य के बनाए सूत्रों का सात्पर्य वतलाया आ रहा है। इससे यह भी ध्वनित हुआ कि अन्य आचार्यों ने ऐसे सूत्र नहीं चनाए हैं। तात्पर्यस् =तात्पर्य=संक्षिम्त अर्थ का प्रकाशन। अन्यथा यदि इन अलंकारसूत्रों का तात्पर्य विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया जाए तो बहुत बड़ा त्न्थ रचकर भी उसका पार पाना संभव न होगा। शांका होती है कि-"आदि वात्य का प्रयोग अभिधेय और प्रयोजन का प्रतिपादन करने के लिए किया जाना चाहिए जिससे श्रताओं में उत्साह बना रहे-इस नियम के अनुसार ओोता की प्रवृत्ति के लिए सभी ग्रन्थों में प्रथम वाक्य में अभिधेय तथा प्रयोजन आदि का प्रतिपादन किया जाता है। यहाँ वह नहीं बतलाया गया। फलतः इसकी ओर श्रोताओ [या पाठकों] की प्रवृत्ति थसे होगी।" [उत्तर] ऐसा नहीं है। यहाँ अभिधेय है अलंकार, क्योंकि यहाँ उन्हीं का साक्षाव नामोल्लेख है। उनका अभिधायक है नन्थनाम-'अलंकारसनस्व'। अभिधान और अभिधेय का वाच्यवाचकभाच संबन्ध रहता ही है, अतः उसका ज्ञान अपने आप हो जाता है। इन [अलंकारो] का अभिधावक इस प्रकार का कोई और अन्थ नहीं हैं क्योंकि वह मिलता नहीं है। यदि [ ऐसा कोई अ्न्थ] होता तो खोजने पर मिलता है। इसीलिए अन्य अलंकार अ्रन्थों से इसके अन्तर की घोषणा करने के दिए कहा-'तात्पर्यमुच्यते'। अभिधेय हैं यहाँ अलंकार अर्थात कान्य के अलंकार न कि लौकिक अलंकार। इस प्रकार अलंकार शोभा बढ़ाते हैं काव्य की और-कान्य यश ग्राप्त कराता है, धन दिलाता है, न्यवहार का ज्ञान कराता है, अमंगल का ज्ञमन करता है, तत्काल परा शान्ति देता है तथा कान्तासम्मित[ माधुये-भूमिका द्वारा] उपदेश भी देता है।' [काव्यप्रकाश के ] इस वचन के 'अर्थ' शब्द से गृहीत [ धर्मे, अर्थ, काम और मोक्ष, इन] वारो पुरुपार्यों की जो प्राप्ति तदरूपी प्रयोजन सिद्ध करते हैं, क्योंकि अलंकार काव्य से पृथक नहीं होते। इन दोनों [ पुरुषार्थ रूपी म्योजन तथा अलंकार] का संबन्ध है साध्यसाधनभावात्मक। [अलंकार साधन हैं और पुरुषार्थ साध्य ] इस प्रकार आदि वाक्य में ओ्रीता में श्रवण के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने की क्षमता सिद्ध ही है।
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६ अलङ्गारसर्वस्वम्
विमर्शिनी ननु यदीहालंकारा अभिधे यास्तहि तदलर्क्योऽप्य-भिधेय.। 'अलंकारा अलंकार्याेक्षा.' इति नीतया स एवेपा को नाम यदुपर्कारकतवेनैतत्स्वरूपमभिधीयत इत्याराङ्कय तद्वत रणिकामेव वक्तमुपक्मते-दहत्यादिना। नका होनी है कि यदि इम अन्थ में जल्कारों का प्रतिपादन करना है तो उनमे जो तत्त्व जरृन होने हूँ उन अलकार्यों का भी प्रतिपादन होना चाहिए। जर्य यह कि 'अल्कार अलकार्यसापेक्ष होंने हूँ-इस नियम के अनुमार प्रव्न इम तत्त्व के विषय में है जिसका उपर्कार करने वाले तत्व के रूप में अरकार का निरूपण किया जा रहा है। इमके उत्तर मे कहने है- [सर्चस्व ] इह हि तायद् भामहोन्ज्टप्रभृतयध्िरंतनालंकारकारा: प्रतीयमानमर्थ वाच्योपरकारकतयालंकार पक्षनिक्षितं मन्यन्ते। तथाहि-पर्यायोक्ताप्स्तुत. प्रशंसासमासोक्त्याक्षेपव्याजस्तुत्युपमेयोपमानन्वयादी वस्तुमानं गम्यमान वाच्योपस्कारकत्वेन 'स्वसिद्धये पराक्षप. परार्थ म्वसमर्पणम्' इति यथायोगं द्विविधया भङ्ग्या प्रतिपादितं तैः। र्द्रटेनापि भावालंकारो द्विधोक:। रूपकर्दीपकापछृतितुत्ययोगितादा- घुपमाद्यलंकारो वाच्योपस्कारकत्वेनोक्त:। उत्ेक्षा तु स्वयमेव प्रतीयमाना कथिता। रसवत्यरेयःप्रभूती तु रसभावादिर्वाच्यशोभाहेतुत्वेनोक्त:। तदित्थं त्निविधमपि प्रतीयमानमलंकारतया ख्यापितमेव। इस (अलकारशास्त्र) में (ध्वनिवादी आचार्यो से) प्राचीन आचार्य भामह औौर उद्ट आदि के जो आरम्भिक सिद्धान्न हैं उनमें (ध्वनिवादी द्वारा प्रधानरूप से स्थापित) प्रनीवमान अर्थ वो वाच्य अर्थे का शोभाधायक अतए्व (अप्रधान) अटकार स्वरूप माना गया है। इन आचार्यो के अनुसार पर्यायोक्त, अपस्तुनप्शसा, समासोक्ति, आक्षेप, व्याजस्नुति, उपमेयोपमा और अनन्वय आदि अल्कारो में चम्तु की (व्यजना या अनुमान मे) प्रतीनि होनी है किन्तु वह वाच्यार्य की शोभाधायक होना है। इस नथ्य को उन्होंने दो प्रकार से स्पष्ट किया है (१) "अपनी सिद्धि के लिए (वाच्यार्थ द्वारा) दूसरे अर्थ का आक्षेप", (२) "दूसरे के प्रति (वाच्यार्भें द्वारा) अपना ममर्पन"। सदट ने भी (वस्तुध्वनि को वाच्य की शोभा वढाने वाला जनलने वाल) भावनामक अलकार माना है और उसके दो भेद बनलाए है। (इस वर्ग के आचार्यी ने) रूपक अपहुनि, तुल्ययोगिता आदि में उपमादि अल्कारों को वाच्यार्थे का उपस्कारक कहा है। (उज्ट ने तो) उत्प्रेक्षा (के एकमेद) को प्रतीयमान हो कहा है। (भामह और उद्दट ने) रमवत और प्रेय आदि सलकारों में रम और माव जादि को बाच्यार्थ • का शोमाहेतु इनराया है। इम प्रकार (वन्तु, अरकार और रस ये) तीनों ही प्रकार के प्रतीय- मान अर्थ को इन जाचार्यों ने अलकारस्वरप हो बनलाया है। विमर्शिनी प्रभृतिना दण्ड्वादय। तावच्छब्दो विप्नतिपत्यभावद्योतक। चिरंतनेत्यादि। धनि कारमसमेमिर्न दष्टमिति भाव- 1 प्रतीयमानमिति। वा्यव्यनिरिक्तवेन स्वमधेदनसिद्धमपी- त्यर्थ. । जथमिति। विश्रान्तिस्थानतया परमोपादेयतालक्षणम्। वाच्योप्कारकनयेनि। चाच्यो पस्कारकत्वं झलंकाराणामात्मभूतम्। अटकारपक्षनिक्षिपमिति। सममारकारान्तर्भूतं न
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भूमिका
पुनस्तद्वधतिरिकमित्यर्थः। मन्यन्त इति। तथालवेन सन्यन्ते न पुनस्तथा संभवतीत्यर्थ:। नह्यभिमननमात्रेणैव भावानामन्यथाभावो भवतीति भावः। एतदेव दर्शयति-तथाहीत्या- दिना। तेवस्तुमात्रं गम्यमानं चाध्योपस्कारकरवेन प्रतिपादितसिति संबन्धः।वस्तुमानं न पुनरलंकारा रसश्व। ससिद्धध इति। 'न्ताः प्रविशान्ति' इत्यादी कुन्तैरात्मनः मचेश- सिद्ध चर्थ स्वसंयोगिन: पुरुपा आतिप्यन्ते। तेबिना तेपां प्रवेशासिद्धेः। 'गङ्गायां घोपः' इत्यादी तुगह्वाशब्द: परत्र तटे वोषाधिकर णतासिद्धये स्वमानमर्पयति। स्वयं तस्य घोपा विकरणत्वासंभवात्। यथायोगमिति। क्वविद्धि वाच्चोऽर्थः लसिद्ये परं प्रतीयमानमर्थ- माचिपति। कचिच्च स्वयमनुपपद्यमान: सन्प्रतीयमान पवार्थे स्वं समर्पयति। तेन यन्न यादतन्र ताहगेव योज्यमित्यर्थः। प्रभृति शब्द से दण्डी आदि की ओर संकेत हैं। तावन्=आरन्मिक-शब्द द्वारा उन सिद्धान्तों नें विपरतिपत्ति न होना संकेतित किया गया। चिरंतन=प्राचीन कहकर यह बतलाया गया कि इन आचार्यो ने ध्वनिकार का मत नहीं देखा है। मतीयमान =वाच्य से भिन्न रूप से सवको अनुभव में आने वाला। अर्थ=उसी में तात्पर्य की विश्रान्ति रहती है अतः वही परमो- पादेय होता है। वाच्योपस्कारक= वाच्य की कोभा बढ़ाने वाला होना ही अलंकारों की नलंकारता है। अलंकारपक्ष निक्षिस्त - पूरे के पूरे को अलंकार के अन्तर्गत मानना, उससे भिन्न नहीं। मन्यन्ते=ऐसी उनकी मान्यता है, परन्तु ऐसा होता नहीं है। अर्य यह कि किसी की धारणानान से किसी वस्तु का बदल जाना संभव नहीं। वस्तुमान् = केवल वस्तु, अनंकार और रस नहीं। स्व्रसिदधये=अपनी सिद्धि के लिए। "भाले भीतर जा रहे है" (कुन्ताः प्रविशन्ति) इत्यादि वाक्यों में भाले आदि शब्द भीतर जाने रूपी किया में (जड होने के कारण असंभव) अपना कर्तृल सिद्ध करने के लिए स्वयं का धारण करने वाले (चेतन) पुरुमों का आक्षेप कर लेंत हैं। क्योंकि उन (पुरुपों) के बिना उन (भालों) का भीतर जाना संनव नहीं। (यह हुआ अपनी सिद्धि के लिए अपना अर्थ बिना छोड़े दूसरे अर्थों का ग्रहण) 'गंगा जी पर घोप' इत्यादि उदाहरणों में (स्थिति भिन्न है, यहाँ) गंगा का अर्थ है विशिष्ट जलप्रवाह, वह धोप का आश्य नहीं वन सकता, अतः उस-(आअयता) की सिद्धि के लिए गंगा शन्द पवाहरूपी अर्थ को सर्वथा छोड़ देता है और सटरप अर्थ को अपना लेता है क्योंकि वह घोष का आश्रय वन सकता है। यही उसका स्वसमर्पण कहलाता है। यथायोगम् अर्थात वाच्य अर्थ कहीं तो दूसरे प्रतीयमान अर्थ का आक्षेप अपनी सिद्धि के लिए करता है और कहीं अपने जाप असिद्ध रहने के कारण अपने आापका प्रतीयमान अर्थ को समर्षण कर देता है। अतः वा्य अर्थ की जहाँ जैसी स्थिति हो वहाँ वैसी ही स्थिति समझ लेनी चाहिए। चिसर्शिनी तन्र पर्यायोक्त यथा-
इति स्मार रपार्र त्वदरिवल्भीचित्रलिखित हनूमन्तें दन्तैवंशति कुपितो रानसगण:।' मत्र राजसगणवृत्तान्तो वाच्यः सन् स्वसिदये परं कारणरूपमरिपलायनाद्यानिपति। सत्पलाय नादयन्तरेण राक्षसवृत्तान्तस्वासंगतेः। अग्रस्तुतमशसा यथा- 'माणा श्रेम समर्पितास्तव कलावेन त्वसुत्थापितः स्कन्धे यस्य चिरं स्थितोसि विदधे यस्ते सपयासपि। वस्यास्य स्मितसात्रकेण जनयन्पाणामहारकरिया आ्रातः प्रतयुपकारिणां धुरि परं वेताललीलायसे॥'
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८ अलङ्कारसवस्वम्
अत्र वेतालचरितमप्रस्तुतं प्रकणादिवशेन स्वयमनुपपद्यमानं सत् प्रस्तुते कृतपनृत्तान्ते स्वं समपयति। समासोक्तियथा- 'दन्तचतानि करजैश्व विपाटितानि श्रोद्विनसान्द्रपुलके भवत शरीरे। दत्तानि रक्तमनसा मृग राजवध्या जातसपृहैर्मुनिभिरप्यवलोकितिानि ॥' क्षत्र बोधिसतवे नायकव्यचहारो न सभवतीति स्व्रसिद्धवर्थ नाय कत्वमात्तिपति । आज्षेपो यथा- कि भणिमो भग्गह कित्ि अघ कि वा डमेण भणिएण। भण्णिहिसि तहवि अहवा भगामि कि वा ण भणिकोमि॥' अन्र वदयमागविययो भगननिपेधो वाव्य सन् वक्तुमेवोपकान्तस्य निषेधानुपपनेः स्व्रयमविश्ाम्यन् स्वात्मसमर्पणन त्वां प्रति मरिष्यामि अथवा म्रिये यद्ा सृता याव- दद्दमिति विधिन्नयमर्थान्तरमाव्िपति। यत्वन्नान्य, 'वाच्योरऽर्थ स्वसिदुयेऽर्ान्तरमाचि पनि' इत्युक्त तद्युक्तमेव। तथात्वे हि निषेध एव पर्यवसितः स्यान्न निषेधाभास इत्या क्षेपालंकार एव न स्याद। 'आमुसावभासमानो हि निषेध' आय्षेपलत्षणम्। न च विधि- निषेधयो विरोघात्साध्यसाधनभावी युक्त । व्याजस्तुतिर्यया- 'इहिण पदुणोपहुणो पहुत्तणं कि चिरंतनपहण। गुणदोसा दोसगुणा एहि कआा पहु कआ तेहिं ।।' अन्र चिरंतनाना निन्दा वाच्या सती स्वयमनुपपद्यमाना स्तुतावामानमर्पयति। तहनवेन वस्तुदर्शिताया निन्दाया असंभवात्। एवमद्यतनानामपि स्तुतिर्निन्दायामा त्मानमर्पयति। तस्या अपि विपरीततया तद्वतत्वेनासभवाव्। यत्पुनरत्रान्य र्वसिदधये परात्षेपो व्याख्यातस्तदुपेदयमेव। यतोऽत्र चिरतनानां स्युत्यानेवेग निपिद्धा निन्दैव प्रतीयेत, अघ्यतनानां घ निन्दास्ेपेग निषिद्धा स्तुतिरेवेति वाक्यार्थविप्रलोप एव पर्यवसित: म्यादिति नैतद्यक्म्। किं च लत्तणायामपि रवसिद्धये पराक्षेपोन युक्त्। तथात्े हि क्णाया स्वरुपहानि: स्याद। वाच्यलत्षणस्येव स्वस्य सिद्धत्वान्मुख्यार्थवाधाभावाद्। न चैकदा एकस्य वाध. सिद्धिध्षेति वक्त युक्कम्। विप्रतिपिद्धं द्येतव। वाच्यस्येव मद्यर्व्नास- द्विस्नदभिधैव स्याच लक्षणा। तस्या हि मुरयार्थवाध पव जीवितम्। 'वुन्ता प्रविदान्ति' इध्यादी च कुन्ताना स्वयं प्रवेष्टमसंभवान्मुरयार्थबाध प्चेति परस्थ कुन्तवद्रपस्य लच्यस्थै- वार्थस्य प्राधान्यम्। अतश्व लक्षणायां वाघित सन्मुख्योऽर्य परत्र लच्य एव स्वं समर्प- यतीत्येव युकम। ननु यद्येवं तत्पर्यायोकादी वाच्यसिप्यर्थ परस्य लचयस्यानेप प्रतीयत इति तन्न किं प्रतिपत्तव्यम् । इद प्रतिपत्तव्यम्-अत्र हि लचगाया एव नाव- काश। तन्न हि कथमह् स्यामिति वाच्यं सत् कार्य तदविनाभावानपर कारणमातिपनी त्यानेपेणैय सिद्धेस्तस्या अनुपयोग। 'गोरनुबन्ध्य' इत्यत्र यथा कर्थ मे श्रुतिचोदिनम- नुबन्धनं स्यादिति जात्या व्यकन्यविनाभावाद्ववक्तिरात्तिप्यते न तु लच्यते तर्थेयात्रापि कार्यकारणयोज्ैयम्। एवं समासोक्तावपि नायकव्यव हारस्तद विनाभा वित्वादेव नायक- स्वमान्िपतीन्यत्रापि उक्तगामूलतवं नाशङ्वनीयम्। अ्रन्थकृता पुनरेतचिरंतनमतानुवादपर- नथोक्तम। अस्माभिस्तु प्रमभ्गाद्वस्तु पर्यालोचितमित्यलं बहुना। पर्यायो रूप लकार जैसे [कोई कवि अपने आश्रवदाना की स्तुनि में कह रहा है कि "हे देव] इमने हमारी ए्का को जला डाना, इसने समुद्र को भी पार कर लिया, इसने औषधि के वन मे से विशस्य नामक ओषधि लक्षमण के टिए लापहुँचाई-ऐमा स्मरण कर कर के कुेन हुए राक्स् लोग आपके शत्रुओं की वल्भी (चन्द्रशाल) में चित्रसिखिन हनूमान् को दाँतों से टँसने लगने है।"
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यहाँ अभिभावृत्ति से तो कथित है रामषसों का व्यवहार, पर वह व्यंजना से प्रतीत "राजा के वत्ुओं का भागना आदि" अर्थ के बिना संभव नहीं है, अतः वह (बाच्य राक्षस वृत्तान्त) उस (प्रतीव- नान शुत्ुपलायन आदि) का आक्षेप कर लेता है। उस (प्रतीयमान) का आक्षेप इसलिए संभव भी है कि वह उस (वाच्य) का कारण है (अर्थात स्ूयमान राजा के झबुराजाओं के भवनों में राक्षसों के रहना और चित्रलिखित हनूमान् जी को दाँतों से हँसना तब संभव है जब वे राजा भवन छोड़ कर भाव गए हो)। बिना राजाओं के भागे राक्षसों का चित्रित हनुमान् को डँसना आदि व्यापार संभव नहीं। अप्रस्तुत प्रशंसा जैसे-"हे भाई वेताल [ जगाया हुआ झब] केवल तुम्हीं प्रत्युपकारी व्यत्तियों में वरिष्ठ हो, क्योंकि सुमने उस व्यक्ति को भी केवल मुसकुराहट भर में निभ्माण कर दिया जिसने अपने उद्योग से तुन्हारे भीतर बलात प्राण डाले, [मृत पड़े ] तुन्हे [जगाकार] खड़ा किया, जिसके कन्धे पर भी तुम काफी समय तक चढ़े रहे और न केवल इतना ही, जिसने तुन्हारी पूजा भी की।" यहाँ वेताल का चरित [किसी भी व्यक्ति द्वारा वेताल को ऐसा उपालम्भ देना] अपने आपमें अनुपपन है, फलतः वह किसी कृतब्न के वृत्तान्त के रूप में पर्यवलित हो जाता है, और प्रतीत होता है कि चक्ता का लक्ष्य कोई कृतव्न व्यक्ति है। [अप्रस्तुत प्रझंसा में अभिधा द्वारा अप्रस्तुत और पस्तुत व्यंजना द्वारा प्रतिपादित होता है। यहाँ कृतव्न प्रस्तुत या वर्ण्य है किन्तु शब्दों द्वारा वर्णन किया जा रहा है तत्सदश वेताल का। अतः यद्द सादृस्यमूलक अप्रस्तुतप्रशंता है। मेताल को उपालन्भ देना इसलिए अव्यवहार्य है कि वेताल उपालन्भकर्ता को भी चट कर सकता है।] "रक्तचित्त (सिही=सतून की इच्छा, नायिका =अनुरागयुक्त चित्त से) सिंहिनी ने (हे बोधिसत्व) पर्वापमात्ना और सघनता के साथ उभरे पुलक से युक्त आपके शरीर में जो दन्ाक्षत और नखक्षन किए हैं उन्हें निःसृह मुनियों ने भी सस्ृह होकर देखा।" इस पद्य में (दो व्यवहार प्रतीत हो रहे हैं एक नायिका द्वारा अनुरक्तचित् से नायक के सात्त्विकभाव रोमांचादि से युक शरीर में दन्तनसमत की प्रमयलीला और दूसरा-रकपानेच्छु सिंहीद्वारा ोधिसत्त के बेदना से रोमांचित श्रीर पर दाँत तथा नखों से घाव करना। इनमें से जो) नायिका नावक व्यवहार है वह (वांतराग) वोधिसत्व में संभव नहीं अतः उसका आक्षेप करना पड़ता है। [ समासोक्ति के विषय में सामान्य मत यह है कि उसमें वाच्यार्थ के अनुपपन्न हुए बिना व्यंग्यार्थ की प्रतीति होती है। यहाँ यह नवीन तथ्य स्वीकार किया जा रहा है कि "वाच्यार्थ की अनुपपत्ति के कारण व्यंग्यार्थ की प्रतीति हो रही है।" जो बोधिसत्त्व है उसमें रति के सात्विक अनुभाव रोमांच आदि सचमुच संभव नहीं अतः उसमें नायकत्व का आक्षेप विबश होकर करना है।] आक्षेप जैसे-'कि भणाभो भण्यते कियादेवाथ कि वानेन मणितेन। मणिष्यते तथाप्यथवा भमाभि किवा न भणितोऽसि । 'क्या कहें? कहा भी कितना जाय ? कहने से भी लाभ क्या? तब भी कहा तो जाएगा ही। तन भी अन्ततः कहूँगी क्या, और [तुमसे ] कुछ कहा नहीं गया है क्या ?।' यहों उस वत्तव्य के कथन का निषेध अभिवाद्वारा वतलाया जा रहा है जो अभी कहा जाने वाला है, कहा गया नहीं है। परन्तु यह एक असंभव वात है कि जिसका अस्तित्व ही नहीं उसका अभाव बतलाया जाए, अतः यह निषेध संभव नहीं होता, फतः वह अपने आपको-'तुम्हारे लिए भर जाऊँगी, मर रही हूँ अथना यह मरी'-इन तीन प्रकार के विध्यर्थीं के रूप में ढालकर इन अर्थो
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का आक्षिप करना है। अन्य [आचार्य] का यह कहना अमान्य है कि 'यहाँ [ निपेधरूपी ] वाच्य अर्ध अपनी सिद्धि के लिए दूमरे अर्थ का आक्षेर करता है, क्योंकि ऐमा मानने पर वाच्यार्पसूप निषेन ही प्रशान रहता है, उसका आभाम नहीं। फउत आक्षेप अलकारता को ही प्रास्त नही होना, क्योंकि आक्षेपालकार का लक्षग है-'आरम्भ मात्र म भामिन होने वाला निषेन (मव)। विधि और निपेन परस्पर विरोवी होने है अन यह समत नहीं है कि इनमं परस्पर सान्यसाधनभाव हो। [ विमर्शनीकार का यह मन यहाँ अमान्य है कि विधिनियेध में माध्यमाधनभाव नहीं होना। "न्रम वार्मिक " आदि उदाहरणों में विधि मे निषेध और "गनानि न पुनस्नस्याधमस्यान्निके" आदि उदाहरग में निषेध से विधि का ज्ञान साहित्य में बहुत चर्चित है। जहाँ साध्यमाधनभाव माप्य झापकभावरूप होना है वहाँ विधिनिषेध का परस्पर विरोध उसका विरोी नहीं होना।] व्याजस्तुति जैमे -- "अधुना प्रभव प्रभव प्रनुत् कि चिरतनमभूगाम्। युगदोषा दोपगुणा एमि कृता न सन्् वृताग्ने ।।" "नाज के जो अनु है वे ही वन्तुन प्रभु कहने योग्य है, प्राचान प्रभुओं में प्रसुन्न काहेका। युगों को दोष और दोपों को गुग ये (नवान प्रनु) ही जो वना सके है, प्राचीन नहीं। यहाँ प्राचीनों की निन्दा अमिधा से कथिन है किन्तु वह अपने आप में अनुपपन्न हे और स्नुति के रून नें बदल जाती है। क्योंकि प्ाचानों में गुणों को दोप और दोर्षा को गुण न करने की जो बान कही गई है उमसे उनकी निन्दा निन्दा नहा रह पानी। इमी प्रकार आधुनिक या नवीनों की अभिगा मे कथिन स्ुनि निन्दा के रूप में परिणन हो जानी है क्योंकि गुगों को दोप औौर दोषों को गुण मिद्ध करने की वात स्नुति के विपरात है। यहाँ अनिधेयार्थ का न ददलना और अपनी मिद्धि के लिएि दूमरे सर्थ को अपना भर लेना जिन्हें मान्य है वे [ अलकाररत्नाकरकार आदि ] उपेक्षतीय है, क्योंकि वैमा मानने पर चिरतनों के प्रति स्तुनि से आक्षिप्त निन्दा ही मनीन होनी नौर नवीनों के प्रति निन्दा मे आक्षित्त स्तुनि ही। और ऐसा होने पर काव्यवाक्य का तात्पर्यभूत अर्थ (प्राचीनों की स्तुनि औौर नवीनों की निन्दा) निग्पन्न नहीं होना। अन 'स्वसिद्धये पराक्षप." मन यहाँ अमान्य ही है। एक यह भी आपत्ति है कि यहाँ लक्षणा द्वारा स्वसिदि के लिए दूमरे का आजञप होता है क्योंकि वैमा मानने पर लक्षण की नहीं दनती। क्योंकि वाच्यार्थ के वाच्चार्थ रू में दो बने रहने से उममें कोई आपत्ि नहीं उठनी जिससे लक्षा हो (अर्थात नवानों की स्तुति और प्राचीनों की निन्दा में कोर्ड आपचिन होने पर उन्हें बदलने जौर तदिपरानार्थ का आझ्षप कग्ने का प्रश्न ही नहीं उठ सकेगा।) यह भी नहीं कहा जा सकता कि वाच्य की सिद्धि होती है जन्न में और वाध होता है आरम्भ में अन वान भी अमसर नहीं फलन रक्षगा होना भी सभ है" क्योंकि यह मानना परस्र विरद्व है क्योंकि यदि अन्ननोगत्ा वाच्य की ही सिंदधि करनी है तो उसका वाध आरम्म में भी उपेक्षणीय हो होगा और नन् अभिवा ही वाच्य में नानी जाएगी रक्ष नहीं। जहाँ तक लक्षणा का सन्न्न है उसका बौज वान ही है। "भाले भीनर जाने है" आदि वाक्यों में (अचेनन) माले आदि का भीनर जाना समन नही अत- मुस् या अभिषेय अर्थ वावित ही रहता है और "मालेवाले पुम्प"-रुपी अर्थ वक्ष्य और प्रधान रहना है। इमलिए (व्याजम्लुति की) लक्षाा में सुर्य अर्व दाधित होकर अपने से भिन्न लक्ष्य अर्व में पने आपको मिन्ग देना है यही मानना उचित है। प्रदन उठता है यदि (व्याजस्तुति में) ऐमा है तो पर्यायोक्त आदि में भी जहाँ वाच्यार्थ की सिद्धि के लिए उममे मिन्न रज्य अर्य का आक्षेप होना हुआ प्रतीन होता है वहाँ क्या मानना होगा। यह मानना होगा=पर्गयोक्त में लक्षणा का कोई अनमर नहीं है। क्योंकि वहाँ वाच्य और
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त्यंग्य में कार्यकारणभाव रहता है अतः वाच्य "मैं वैसे निम्पन्न होऊें" ऐसा सोचकर अपने कारम न्यंन्न का आक्षेप या अनुनान कर लेता है और उर्सी से उस (वाच्य) की निष्पत्ति हो जाती है, फलनः (यहाँ पर्यायोक में) लक्षणा का को उपयोग ही नहीं रहता। जैसे "चैल का अनुबन्धन किवा जाय" एस श्रुति वाक्य में (गोत् जातिस्वरूप) अर्थ का वाचक बैल शच्द जातिरप अपने अर्थ का अनुबन्धन संभव हो इसलिए उससे नित्य सन्वद्ध व्वत्तिरुप (शर्राररूप) अर्य का आक्षेप कर लता है वैसे ही यहाँ (पर्यायोक के) कार्यकारणमाव रूपी संबन्ध में भी संभव जानना चाहिए। इसी प्रकार समासोति में भी नावक का व्यवहार नायक से कदापि सलग न होने वाले नायकत्न का भाक्षेप कर लेना है, अतः वहाँ भी 'लक्षणा से वह अर्भ प्रनात होता है' ऐसी शंका नहीं को जा रुकनी। सन्कार ने (स्वसिडये पराक्षेप) यह वात प्राचीन के मत का अनुवाद करने के लिए कह दी और हमने भी अवतर पाकर उसका आवश्यक पर्वालोचन कर दिया, अतः अधिक विस्तार आवश्यक नहीं। सन्वकार ने पर्यावोत्तादि में वस्तुध्नि को वाच्य का उपसकारक वतलाकर अन् मे "स्ततिदवे पराक्षेप:" और "पराय त्वसमर्पणन्" वे दो सुत्र दे दिए हैं जो कमशः उपादान लक्षगा और लक्षणलक्षणा के लक्षम बतलाए गए हैं। इससे सामान्यतः यह धरगा बनती है कि चन्धकार पर्याद्योक्त आदि सभी अलंकारों में रक्षणा मानते है, परन्तु वस्तुतः बात ऐसी नहीं हूँ। सन्धकार ने वे सूत्र केवल प्राचीन मर प्रस्तुत करने के लिए दे दिए है। उन्हें सभी अलंकारों में लक्षगा मान्य नहीं है। [ऐसा लगता है कि "स्वसिद्ये०" इत्यादि वाक्य प्रानीन आलंकारिकों में लक्षगालक्षम के रूूप में प्रचलित नहीं थे। केवत मन्मट ने काव्यप्रकाश में इन्हें लक्षणालक्षण के रूप में दे दिया है। मूल नन्व और टीका दोनों के रचचिता मन्मट के बाद हुए हैं अता यहाँ लक्षगा का विवेचनप्रस्तुत करना सावश्यक था। व्याजस्तुति में भी रोकाकार के अनुसार अन्यकार को लक्षणा नान्य नहीं है। सून अलंकारों में लक्षणा की सी प्रक्रिया प्रतोत होती है मतः लक्षणा का न्रम नहों होना चाहिए। इन अलंकारों में 'अन्य' शब्द से जिल आचार्ये का खण्डन किया गया है वे कदाचित अलंकाररत्नाकरकार शोभाकरनित् है। उद्धृत अलंकारों के आागे जा रहे प्रकरणों में उनयो मत देखे जा सकते हैं।] विमर्शिनी उपमेवोपमा यथा- 'रजोभि: स्वन्द्नोद्धुतैर्गजश्र घनसंनिभैः। सुनस्तलमित्र व्योम कुर्षन्क्योमेव भूतळम् ।1 अत्र हयो: परस्परसुपमानोपमेयर्त्व वाच्चं सत् स्वयमनुपपद्यमानसुपमानान्तरविरह लत्गे परत्र वसत्वन्तरे स्वरं समर्पयति। अनन्वयो यथा- 'भवानिव भवानेव भवेद् यद़ि परं भव । स्वप्षत्तिव्यूहलव्यृढन्नैलोक्यारम्भसंहृतिः॥' अन्नैकस्येवोपमानोपमेयभावो वाच्य: सन्दितीयसमसचार्यभावे परत्र वस्त्वन्तरे सवं समर्पचति। आदिशब्द: प्रकारे। तेनानिष्टविध्यामालाक्षेपादेयहणम्। सथा- 'भवतु विदितं व्यर्थालापेरल प्रिय गम्यतां तनुरपि न ते दोपोडस्नाकं विधिस्तु पराङ्सुखः। तब यदि तथा रर्ढं प्रेम अपस्नमिमां दर्शा प्रकृतितरले का नो बीडा गते हतजीविते।।' अत्र कान्तग्रस्थानविविर्वा्यः सत्िषेमेनोपकान्तत्य विधानानुपपत्तेः स्वयम- विश्रान्त: स्वसमर्पणेन निपेधमाचिपति। एवं द्विविधया भढचा गव्यमानं वस्तुमानं
तीत्यारङ्चाह-स्ट्रटेन त्यादि। द्विधेति। गुथीभूतागुणीभूतचस्तुविषय त्वेनेत्य्थ। यदाह-
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'यस्य विकारःप्रभवन्नप्रतिवद्धेन हेतुना येन। गमयति तदभिप्राय तग्प्रतिबन्धं च भावोडमौ।। ग्रामनरूण तरुण्या नवबक्षुलमज्ञरीसनाथकरम्। पश्यन्त्या भवति मुहुर्नितरा मलिना मुखच्छाया। अभिधेयमभिद्धान तदेव तद्सदशगुणदोपम्। अर्थान्तरमवगमयति सद्वाक्य सोडपरो भाव।। एकाकिनी यद्बला सरगी तथाहमस्मद्गृद्दे गृह्तपति सगतो विदेशम्। क याचसे तदिह वासमियं वराकी श्वथर्ममान्धवधिरा ननु मूढ पान्य ॥'इसि। यद्ा द्विधेति पूर्ववदेव लक्षगाह्वयाश्रयेण व्यारयेयम्। तेनादे स्वसिद्यै पराक्ेप, परत्र तु अपरारथ स्वसमर्पणम्। यत्वत्रान्यभाविनिवेदादिभिरुपलस्षितो वाच्यप्रतीयमान- रवेन द्विविधा भावालंकारो व्यारयातस्तदुत्सूत्रमेव। रुद्रटेन तथाव्वेन तस्याप्रतिपादनात्। तव्रापि च वस्तुमात्रस्य वाच्योपसकार वत्वाभिधानसमये वनतुमुचितत्वात्। तदेवं गुणीभू- तागुणीभूतत्वेन द्विप्रकारं चस्तु तावद्वाच्योपस्कारक्तवेन प्रतिपादितम्। उपनेयोपमा जैसे-"रथों से उडाई धूल और मेघोपम हाथियों से भूतल को आराग और आकाश को भूतल मा बनाना हुआ (रपु दिभ्विजय के लिए चन्न)।" यहाँ दोनों (भूनल्द और आकाश) की एक दूमरे के माथ की गह उपमा अभिषावृत्ति से प्रनिपादित है किन्तु यह अपने आापमें चमत्कारकारक नहीं वन पानी फल्त- तीसरे किमी अन्य उपमान के अभाव या निपंधं- रूपी अर्थ में अपना मम्पग कर देनी ह। [उपमेयोपमा में चमत्कार माना जाना है तृनीयमद्शव्यवच्छेद अर्थात किमी नूनीय समान वम्नु के निराकरण में। प्रस्तुन पद्य में भूतल और आकाश की करस्पर उपमा अपने आपमें नही वन्नी ऐसी बात नहीं है केवल परस्परोपमा में कोई चमत्कार नहा है, चमतकार तृनायमद्टशव्य- वच्छेद में है। अन हमने अनुपपद्यमान का जर्थ "अचमत्कारक" किया है।] अनन्वय जैमे = (हे भगवन्) अपनी शक्ति के व्यूह से तीनों लोकों का निर्माण और मदार का चक्र चलाने वाले आप यदि किमी के ममान हो सकते है तो केवल आपके हा समान।" यहाँ एक ही पदार्थ का उपमेय और उपमान होना वाच्य है किन्तु वह पर्यवसित होता है किमी दूमरे समान पदार्थ के अभाव में। [अनन्वय में चमत्कार का कारण किमी द्वितीय अन्य पदार्थ के अभाव की प्रतीति है। उपमानोपमेयभावरूपी अन्वय (मबन्ध) का (उमान और उपमेय दोनों एक ही पदार्थ के रहने मे) निभ्पन्न न होना (अनन्वय) इम प्रतीति को जन्म देना हू। यहाँ भी वाच्यार्थें के च्यग्यार्य (द्विनोयमट्शव्यवच्छेद) में पर्यवमिन होने का अर्थ हे चमत्कार के लिए उसका जाक्षे करना । ] आादि शब्द का अर्थ है प्रकार। उममे अनिष्ट विध्याभासात्मक [द्विनीय] जाक्षेर आदि लिए जा सकने है। यथा -- "हो जाय तो हो जाय विदन, हे प्रिय, व्यर्थे की बजवाम छोटो और जानी, इसमें आपका जरा भी दोप नही, विनाता तो हमारा हीन पराठमुस है। यदि तुन्दारा प्रर्द प्रेम इस दशा को प्राप्त हो गया है तो अच्छा है, चदि हमारे ये स्वभाव से चचल (अस्थिर) दुष प्राग निकल भी जाए तो लाज क्या।" यहाँ अनचाही "प्रियगमन"-रूनी वस्तु का विधान "जाओ" इस प्रकार किया गया है जो चन्तुन आमासात्मक ही है, पारमार्यिक नहा, अन वह निषेध्य का विधान समव न होने के कारण
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भूमिका १३
अपने आपमें उखड़ा हुआ सा लगता है, और इसलिए अपना पर्यवसान निषेय में कर उसका आक्षेप कराता है। इस प्रकार दोनों ही प्रकार से नम्यमान वस्तु वाच्य के प्रति उपस्कारक ही होती है ऐसा कहा। "ऐसा मानने पर अतीयमान अर्थ के लिए अलंकारवाले स्थलों से मिन्न स्वतन्त्र स्थल भी मिल जाते हैं, अतः उसका अलंकार में अन्तर्भाव सिद्ध नहीं होता-'ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं- रुदटेन इत्यादि। द्विधा=दो प्रकारका, एक वह जिसमें वस्तु अप्रधान [गुणाभूत] रहती है और दूसरा वह जिसमें वह प्रधान रहनी है। जैसा कि [ रुद्ट ने कान्यालंकार '३८ में] कहा है-"किसी व्यक्ति में कोई विकार [भाव या चित्तवृत्तिरूप कार्य] किसी ऐसे कारण से उत्पन्न हो जिसके साथ उस [कार्य] का [कार्यकारणमावल्प ] सवन्ध निक्चित न हो [ अतः जो कारण, कार्य के साथ अप्रतिबद्ध या अनैकान्तिक हो ]. फिर वह विकार एक ओर उससे युक्त व्यक्ति का कोई अभिभ्राय व्यक्त करे और दूसरां ओर अपने कारण के साथ अपना [कार्यकारगभाव] संन्ध निश्चित कर दे तो एक प्रकार का भावानंकार होता है। उदाहरणार्थ-'तरुणी जब वामतरण [गाँव के सवले तुन्दर और अपने प्रेनी युकक को मौलसिरो की ताजी मंजरी हाथ में लिए देखती है तो उसकी उसकी मुखकान्ति अत्यन्त मलिन हो जाती है।' [ दूसरा भावालंकार ] कोई वाक्य अपने शब्दों का अभिधेयार्थ वतलाने के पश्चात् अभिषेय से मिन्न प्रकार का दूसरा अर्थ [अर्थात अभिधेय यदि विधिरुप हो तो निमेधादिरूप ] व्यक करता है तो यह भी भावालंकार माना जाता है। उदाहरणार्थ-(कोई प्रोपितपतिका द्वारा- गत निवासार्थी तरुण पथिक से कह रही है] 'इस घर में मैं अकेली हूँ और अवला हूँ। इस घर का जो स्वामी है वह परदेश गया है। यह जो मेरी सास है उसे भी न आँसों से सूझता और न कानों से सुनाता। इसलिए हे पान्य तुम बास की याचना कर ही क्यों रहे हो। तुम सचमुच भोले और नासमझ हो।' अथवा (रुद्रट ने भावालंकार दो प्रकार का माना है-इस वाक्य में) "दो पकार"-का अर्थ उपादानलक्षणा और लक्षणलक्षणा नामक (त्वसिद्ये० इस प्रकार) पूर्वचर्चित दो लक्षणाओं के आाधार पर दो प्रकार का किया जाना चाहिए। इससे प्रथम उदाहरण में स्वसिद्धि के लिए पराक्षेप (उपादान लक्षगा) मानना होगा और दूसरे उदादरण में 'परार्थ स्वसमर्पण (लक्षणरक्षणा )। कुछ लोगों ने भावालंकार में भावश्द का अर्थ निर्वेदादि किया है और दो मेदों में एक में वाच्य को निर्वेदादि संचारी भावों से उपलक्षित माना है और दूसरे में पतीयमान को। किन्तु व्याख्या मूलविरुद्ध है, क्योंकि स्वयं रुट्रट ने भावालंकार का प्रतिपादन इस प्रकार से नहीं किया। रुदट यदि ऐसा प्रतिपादन करना भी चाहते तो उन्हें इसे वहाँ प्रतिपादित करना चाहिए था जहाँ उन्होंने केवल चस्तु का वाच्य के प्रति उपस्कारकत्व प्रतिपादित किया था। इसलिए वस्तुतः भावालंकार में द्ैविध्य का मानदण्ड व्यह्य की तुणीभूतता तथा प्रधानता ही मानी जाती चाहिए। इन दोनों मेदों में अप्रधान और प्रधान दो प्रकार की वस्तु व्यंग्य होकर भी वाच्य का सौन्दर्य वर्धन करती हुई बतलाई गई है। विमर्श-यहाँ भावालंकार के प्रथम उदाहरण में नायिका में सुखमालिन्यरूपी विकार उत्पन्न हुआ। उसका कारण है मौलसिरी की मंजरी को देखना उस देखने के साथ उस मालिन्य का कोई निश्चित कार्यकारणभावरूपी सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि उस मंजरी को देखने से सदा ही मुख- मालिन्य नहीं होता : यह मुखमालिन्य नायिका का भाव व्यक्त कर देता है। यह बतला देता है कि निश्चित ही नायिका ने तरुण को मौलसिरी के बगीचे में मिलने ुलाया था किन्तु अन्य कार्य में
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नग जाने से यह स्वय वहाँ नहीं पहुँच सकी किन्तु मौलिमिरी की नवीन मजरी हाथ में लेकर आने में तरग के विषय में उते यह विदिन हो गया कि वह मोलमिरा के वगीचे जा कर जा रहा है फन्न नादिका को यह सोचकर दुग हुआ कि 'मै सुस से वचित रह् गई"। ऐमा भा मन में नाने ही जो मुसमारिन्य हुआ उमका और मजरीदर्मन का कार्यकारणमाव भी निश्चित हो गया क्योंकि यदि वह मजरी न होनी नो कदाचित् नायिका का तम् के मोलमिरी उपवन जाने का निश्चय न होना। यहाँ वाच्य अर्प व्यग्यार्थ की अपेक्षा अधिक चमरकारा हूं अन काव्यमकाश- कार ने दमे गुगाभून वाहमय या मध्यमकाव्य का उदाहरण माना है। दिनीय पद्य में 'वाम की याचना क्यों करते हो" इम प्रकार के प्रनकाकु से वनन्या जा रहा है कि "याचना नहीं करनी चाहिए" परन्तु पूर वक्तव्य में स्थिति ऐेमी बततरे जा रही है कि पान्य को वाम करने के लिए याचना मा अनावश्यक है, उमे नो म्थिनि समझकर बिना पूछे टहर जाना चाहिए। यह है वाच्य और व्यग्य का मिन्न प्रकार का होना। इमीलिए यह भावानकार है, क्योंकि व्यग्यार्थ नायिका के हृदय का भाव है। यहाँ निपेधरूपी वाध्यार्थ से जो विनानरपी व्यग्यार्थ निकलता है वही अधिरु चनत्कारकारी हो तो इम काव्य को उत्तम काव्य माना जा सकता हे। विमार्गिनाकार ने माना भी है। हमें यहाँ व्यग्यार्थंगन वैचिन्य का अपेक्षा उतत्तिवैचिन्न्य में अधिक चमत्कार प्रनीन होना है अन वस्तुन वह उदाहरण भी गुणीभूत व्यग्य का ही उदाहरण होना चाहिए। विमर्शिनीकारका मन्नव्य केवल इनना हा है कि प्रथम उदाहरण गुगोभूतन्यन्य के उदाहरण के रूप में काव्यप्रकाश आदि में प्रसिद्ध है द्विताय उदाहरण का उमसे अन्नर करने के लिए उने ध्वनिकाव्य का उदाहरण मानना चाहिए। वदि "मकाकिनी" यह उदाहरण धवनिकाव्य न भी मिद् हो तो कोई दूमरा उदाहरण अपना लेना चाहिए। सर्वथा विमर्शिनीकार का चहना है अलकारमास्वकार के मत में न्ट्ट गुणाभूनव्यग्य और व्वनि दोनों को भावाहकार रूप मानते हैं। विमर्शिनी इदानीमलं कारस्यापि प्रतीय मानस्य वाच्योपरकार कर्वं प्रतिपाठयति-रूपकेन्यादिना। तत रुपकं पथा- भीमभ्रुकुटिपल्चगीफणभणि कायस्य चग्दं चिता- कुण्डं वुण्ड लितेन्दुनालव लयप्रभ्रंसि रक्तोरपरम् । घागस्फा टिक् मल्लिकापरि चिते मालाम्रशालाजिरे दीपा दीपशिसा शिवस्य नयन कार्शानवं पातु न.।।' लत् नयनादीना मगिपसृतीनां चोपमा वान्योपरकारायाचगम्यते। तां जिना सादश्या- मनिपसे। [जमी प्रनोयमान वस्तु की वाच्योसस्कारकता चनलाई] अव प्रनोयमान अलकार की भी वाच्योनत्कारकता बननगन हुए कहते है-'रूपकब'1 इसमें रूपक का उदाहरग मसे-"भगवान् शिव का सृनीय आग्नेय नेत्र हम सब्की रक्षा करे बो भ्रुटेल्पीभयकर नागिन की फगनगि है, काम का प्रचण्ट चिताकुण्न है, चन्द्रूपा [कमल] नानिमित गोल वलय में गिरा हुआ लालकमल पुद है, [या ] नासिकारूनी दायट से युक्त उनाटस्नी ऑगन में चमकती दीपशिखा है।" यहाँ नंत्रादि चीर मगि आदि की उपमा व्यंजनासे प्रनीर होती है और उसने वास्य (रूप) क उनस्कार होना हुआ विदिन होता है। क्योंकि (रूक साइस्यमूलक अटकार है और) सादश्य का मान उम (उपमा) के बिना समन नहीं।
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भूमिक्ता ६५
तिमर्श-यहाँ उपना तो व्यक्त होती है किन्तु वह उपमामाव है। अलंकार नहीं। वह अंकार तब होती जब उसमें चमकार होता। चमत्कार यहाँ रूपक नें ही है अतः वही यहाँ अलंकार है। विम्दिनीकार यहां जो रउपमालंकार को वाच्योपस्कारक वतलाना चाहते हैं उसके पीछे प्राहणभमण- न्याय छिया मानना चाहिए। न्राहाग जन तक शिखासू नादि से युक्त ब्राताण था जब तक वह शिखा- नूवादि विहीन श्रमग (जैन वा बौद्ध भिक्नु) नहीं था और जव शिवासूत्रादि को तोढ़ताड़कर यह स्रमग वन गया तब वह ब्राह्मग नहीं रहता, इसने पर भी क्योंकि वह पहले व्राहण था इसलिए श्रमण बने अन्य अत्राहण व्यक्तियों से उसका अन्तर वतलाने के लिए उसे "माह्मणअमण" कह दिया जाता है ठोक इसी प्रकार उपमा रूपक आदि जब व्यंग्य होते हैं तव सलंकार नहीं रहते कचोकि उनसे किस्षी अन्य की शोभा नहीं बड़ती फलतः वे अलकार्य हो जाते हैं और जह अलंकार रहने है तब व्वंग्य नहीं रहने, तथापि वाच्यादस्था में उपनादि अलंकार रहते हैं तत्सदृश कोई उपमादि व्यंग्य हो जाती है तो व्यंग्योपमादि को भी अलंकार न रहने पर भी अलंकारभृत वाच्योपमादि की नई उपमालंकारादि कह दिया जाता है। रुटट ने उससे वाच्य का उपस्कार माना है। विमर्शिनी दीपकं यथा- 'पाउअबंधं पढिउं बंधेउं तहभ कुजजकुसुमाइ। पोढमहिलं अ रमिउं विरलच्िअ के वि जाणन्ति।' अत्र मकृतवन्वपाठादेरपमा वाच्योपरकारायावगम्यते। प्रकृतस्व औडमहिकारमगाद:
'अवाप्तः प्रागत्म्यं परिणतलचः शैलतनये कलह्ो नैवायं विलसति शशाङ्कस्थ वपुषि। अषसुप्येयं मन्ये विगलदमृतत्यन्दशिशिरे रतिश्राम्ता शेते रजनिरमणी गाढसुरसि॥ अब् कलङ्स्य रजनिसाहश्यप्रतीतेर्पमा वाच्योपस्कारायावगम्यत एव। तुल्य चोगिता यथा- 'द्विगुणिताटुपधानभुजाच्छ्िरः पुलकितादुरसः स्तनमण्ढलम्। अधरमर्वसमर्पितमाननादु व्यवटयन्त कघंचन योपितः ॥ क्षत्र मुजादीनां साहस्यावगमादुपमा वान्योपस्कारायावगन्यते। तुल्ययोगिता- दावित्या दिशव्दा निदर्श ना देम्हणम्। उपमादीत्यादिशव्दादुपमेयोपमादीनाम। ततुबथा- प्रवातनीलोर पलनिर्चिरेपमधीर विप्रेतितमायताप्या। तया गृहीतं नु भृगाङ्नाभ्यस्ततो गृहीतं नु मृगाङनाभि:॥' अन्र ाच्याया निदर्शनाया उपस्कारत्वेनोपमेयोपमा गम्यते। तामन्तरेणासंभवद्वस्तु- संबन्धत्वेन वाच्यस्याविश्रान्तेः। अतव्वान्नालंकारो गम्यमान: स्थितो न वस्तुमान्रम्। तेन पूर्वन्न यदादिग्हणं सफलयितुमन्येरेतदुदाहतं तदयुक्तमेन। तब्र वस्तुमात्रस्य वाच्योपरकारकत्वेन प्रतिपिपाद यिपितत्वात्।वाच्योपरकार कत्वेनोशररेक्षा कथितेति ससन्वयः। सा तु- महिलासहत्सभरिए तुय हिनए सुहअ सा अमायन्ती। दिअहं अणण्णअम्मा अङ्गं तणुअं पि तणुएइ ।' इति। तदित्थमलंकारोऽपि प्रतीयमानो वाच्यशोभाहेतुववेनोक। दांपक यथा= "प्राकुत्वन्वं पठितुं वद्धुं तथा कुब्जकुसमानि। म्रौढमहिलां च रन्तुं विरला एव कैडपि जानन्ति।।" "प्राकृत बन्ध पढना, कुज (?) कुसमों को गूँथना तथा मौढमहिलाओं को भोगना बिरके हो कोई जानते हैं।" यहाँ भी प्राकृतवन्ध्र आदि की उपमा प्रतीत होती है और उससे वाक्य का
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६६ उपस्कारक होता है'. क्यांकि इम वाक्य में चर्गनीयत्वेन पकृत है प्रोढमहिला उमके अतिरिक्त प्राहटनवन्धादि अप्रस्तुत पदार्थो का जो उपादान किया गया है वह 'मोढमहिला' के माथ उनका सादृश्य बनलने के लिए। [दोपक में प्रकृत और अप्रकृर्ता का किसी एक धर्म या किमी एक क्रिया में सबन्ध दिसळाया जाना है जिसमे सदृस्य व्यक्त होना है।] अपह्युति जैसे-[भगवान् शिव पार्वतीजी से कह रहे है] "हे पार्वती' पर्यास मात्रा में सिला कान्नि के इम चन्द्रमा के शरीर में [ पिना की मोद में शिशु के ममान ] प्रगल्भता के साथ यह जो हे मो कचक विलभिन नहों हो रहा है, अपितु मैं ममझना हू कि इसके झरती अमृतधारा मे अत्यन्न शोतल वक्षस्थल पर इसकी प्रिया रान रति से श्रान्त होकर गहरी नीद में मो रह्दो है।" नहाँ कलफ का रात के साथ सादृश्य प्रतीन होना है वही उपमालकार है और उममे वाच्यार्थ अपछ्धनन का उपस्कार प्रतीत होता ही है। [ अप्वनि का अर्थ होता है हिपाना। इम अन्कार में चमत्कारकारी तत्व यही छिपाना है। प्रस्तुन पद्य में कलक का कल्कत्व "यह कलक नहीं है" इम निषेधोकति मे छिपाया जा रहा है। यह छिपाया जाना सादृश्य के आगार पर हो सभव है अनएव यहाँ माइश्य की व्यजना होनी है और सादृव्य ही है उपमालकार। उसके द्वारा वाच्य (शब्दत कथिन) अपहति अलकार का उपस्कार या पोषण होता है।] तुल्ययोगिना यथा = 'स्त्रियों ने विगुणिन उपधानभून मुजा से सिरको, पुलकित वक्षम्थल से सनों को, मुस मे अर्धसनर्पित अवर को किमी प्रकार चिनटित किया'१ यहाँ भुजा आदि का साहश्य प्रतीन होना है इममे उपमालकार प्रतीन होना है और उससे वाच्य (तुल्ययोगिना) का उपस्कार होना है। [ जहाँ एक ही धर्म में अनेक ऐसे पदार्थी का अन्वय हो जिनमें प्रत्येक प्रस्तुन ही हो या प्रत्येक अप्नस्तुन ही वहाँ तुल्ययोगिता होनी है। प्रस्तुन पद्य में नायिका के सभी अग प्रस्तुन है और एक विनटन किया में अन्वित होते हैं। एकधर्मान्वयित्वरूपी साधर्म्य के आधार पर उन सभी अगों में सादृश्य को प्रनीति होनी है। मादृश्य उपमालकाररूप है अन यहाँ उपमालकार की व्यंजना मानी जाएगी और क्योंकि उमसे वाच्य तुल्ययोगिना का उपस्कार होता है अन वह भी अल्कार हा है।] मूल में जो "तुज्ययोगिना आदि में" इम प्रकार आदि शम्द का प्रयोग किया गया है उसमे निदर्दनाळकार आदि किए जा सकते है और इसी प्रकार "उपमा आदि का" इम प्रकार जो आदि पद का अ्रहण किया गया है उसमे उपमेयोपमा आदि। उदाहरणार्थ (निदर्शना में उपमे- योपमा का उपस्कारकत्व) यथा-"पर्यात पवन वाले स्थान (प्रवात) में लगे हुए (अनण्व हबा की झंखोर में झुलते हुए) नील कमल में तनिक भी अन्तर न रसने वाली अधीर चितवन या तो उस विशान्नेन्रा (पार्वनी) ने हिरनियों से ती होगी या (वैसी ही विशाननेन्ना) हिरनियों ने उम (पावंनी) से।"यहाँ (पदार्थ) निदर्शना वाच्य है, उसका उपस्कारक के रूप में यहाँ उपमेयोपमा प्रतीयमान है, क्योंकि यदि उपमेयोपमा प्रनीत न हो तो वाच्य, जिसमें यहाँ पदार्थों का सबन्ध नहीं बनना, असंगन हो रहा आएगा। इसलिए इस पद्य में मी अलकार ही प्रनीयमान है, वस्तु नहीं। निदर्शना में वाच्यार्थ ऐमा रहना है जिसमें पदार्थो का सबन्ध समत नहों होना, बाद में उपमा द्वारा उसमें सगति लगाई जानी है। प्रस्तुन पद्य में सृगागनाओं को चितवन उन्ही मृगागनाओं के पाम है उसे पार्वती नहों ले मकनी और पार्वेनोजी की चिनवन पार्वतीजी के हां पाम है, उसे मृगागनाएँ नईीं ले मकनी, फलन एक दूसरे की चितवन का एक दूसरे द्वारा कड़ा जा राह आदान समव नहीं। 'बाद में ये दोनों ही इन दोनों के समान है। ऐसी सादृश्यप्रतीति होनी
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भूमिका
है तो उससे वाच्यार्थ संगत प्रतीत होता है। उपमेयोपना इसलिए न्यंग्य है कि यहॉँ यह भी प्रतीति होती है कि इन दो चितवनों के समान कोई तीसरा चितवन नहीं है फलतः इस प्रकार के पूर्व "उपमेयोपनानन्वयाद।" रस पद में जो आदि शब्द या है उसके उदाहरण के रूप में लोगों ने जो 'इस "प्रवातनीलो०" आदि पद्म को उद्वृत किया यह ठीक नहीं, क्योंकि उस प्रकरण में तो केवल वस्तुमान की व्यंजना का प्रतिपादन करना मभीष रहा है, अलंकार की ब्यंजना का नहीं। "वाच्योंपरकारकत्व"-इस विशेषण को आगे भी जोड़ना चाहिए। ऐसा करने पर इस प्रकार का अर्थ निकलगा-"उत्प्रेक्षा को जो वाच्योपस्कारक कहा गया ह" इत्वादि। वाच्योपरकारक उत्पेक्षा का उदाहरण है- "महिलासहस्रभरित तव हृदये सुभग! सा अन्तीमा। दिवसमनन्यकर्मा अवगं तनुकमपि तनूकरोति"॥ अर्थान "हे सुभग (जिसे कामिनियाँ चाहती हों) तुम्हारा हृदय सहस्र महिलाओं से भरा है अनः वह बेचारी उसमें वन नहीं पाती, फलतः दिन भर अन्य कोई कार्य नहीं करती, केवल पहले से ही दुबले अपने आँग को और दुर्बल बनाती जा रहीहै।" वहाँ काव्यलिंगालंकार वाच्य है क्योंकि हृबच में नायिका के न बनने का कारण वहा उक्त है। वह है हृदय का तहस महिलाओं से विरा होना। उससे उत्प्रेक्षा की व्यंजना होती है। वह इस प्रकार कि नायिका के नायक के चित्त नें न वन पाने का सूलकारण तो है नाविका के प्रति नायक की रागशून्यता, फिन्तु उससे भिन्न "महिलासहृत्त्रभरित्व' रूपी अन्य कारण वैसा होता बतलाया जा रहा है। यह हुई हेतुतप्रेक्षा। इससे वाच्य काव्यलिंग का उपस्कार होता है। इसप्रकार अलंकार भी प्रतीयमान होकर वाच्य का उपसकारक (नाच्यशोभाधायक) स्वीकार किया गया है। चिमर्शिनी अधुना रसस्थापि वाच्योपस्कार कत्वं दर्शयितुमाह-रसवदित्यादि। मभृतिशञव्दादूर्ज- स्व्यादयः । आदिशब्दान तदाभासाइयः। तत्र रसवदलंकारो यथा- 'कृच्छ्रे णो्युगं व्यतीत्य सुचिरं भ्रान्त्वा नितम्बस्थले मध्येऽस्यास्त्रिवलीतर दविपमे निस्पन्दतामागता। मद्दृष्टिस्तृपितेव संग्रति शनैराल्य्य तुझै स्तनौ साकाउनं मुहुरीम्षते जललब प्रस्यन्दिनी लोचने।।' मत्र वत्सराजस्य परस्परास्थावन्धरूपो रत्यास्यः स्थायिभावो विभावानुभावव्यभि चारिसंगोगाद रसीभूतः सन् वाच्योपस्कारका । तत्संवलितत्वेन वाच्यस्य सचमरकार प्रतिपत्तेः । अन रस को भी वाच्चार्थ का शोभावर्षक वतलाने के लिए लिखने हैं-रसवदित्यादि। प्रभृति शल्द से अर्जस्व्री आदि का ग्रहण अनिप्रेत है और आदि शब्द से उनके आमास आदि। उनमें से रसवदलंकार का उदाहरण है-"मेरी दृष्टि बड़ी कठिनाई से दोनों ऊस पार कर और नितम्ब- स्थल में चनकर साकर ज्योहा इस (सुन्दरी वासवदच्ा) के त्रिवलीतरंग से ऊबढ़ साबड़ मध्यभाग में पहुँची तो नित्पन्द हो गई। फिर जिस किसी प्रकार वह धीरे-धीरे करके उत्तुंग स्तनों पर चड़ी तो अब मानो पिवासी होकर जललव वहा रही आँखें वार-नार देख रही है।" यहाँ वत्स- राज का मरस्पर में प्रेमरमी रति नामक स्थायी भाव विभावानुभावच्चभिचारी के संयोग से रसरपता को प्राप्त होकर वाच्य की झोभा बड़ाता है, क्योंकि उतसे दुत्त होकर प्रतीत होने पर • ही वाच्य ने चमत्कार प्रतीत होता है। २ अ० सु०
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१८ अलङ्कारस्वस्वम्
चिमर्शिनी मेयोलंकारो यथा- तिष्ठेत्कोपव शा्प्रभावपिहिता दीर्घ न सा कृप्यति स्वर्गायोश्पतिता भवेन्सयि पुनर्भानार्ईमस्या मनः । तां हतुं वियुधद्विपोउपि न च मे शक्ता पुरोवतिर्नी सा चात्यन्तमगोचर नयनयोयोतेत कोऽयं विधि.।I' अन्न वितका्यो व्यभिचारिभावो वाच्यशोमाघायक एव । प्रेथोडलकार जैमे-(उवशी के श्नारूप से परिणन हो जाने पर पुरूरवा बितर्क करता है) हो सकता है वह (उर्वशी अपने) प्रभाव (देवी होने के कारण निरम्करिणा विद्या) मे कही छिर्पी हो, किन्तु वह अधिक देर तक तो कुपिन रहती नहीं। मभव है वह (अपने मूलस्थान) श्वर्ग के लिए टट गई हो, किन्तु उमका मन तो सानुराग है मुझ पर। मेरे देसते-देखने उमे राक्षम नोग भी नही हर मकने। इनने पर भी वह आँखों मे एकदम ओझल हो गई है। आसिर यह घटना क्या है।" यहाँ विनर्नामक सचारी भाव व्यजिन होकर वाच्य की शोभा बढाता है। विमर्शिनी ऊर्जस्थ्यलकारो यथा- हग्लीलासु सकौतुक यदि मनस्तन्मे दक्षा विशति- निसधौ परिरम्मणे रतिरथो दोर्मण्डली दृश्यताम्। परीतिश्वे्परिचुम्बने दशमुसी वैदेहि। सन्ञा पुर पौलसयस्य च राघवस्थ च महतपश्योपचारान्तरम्।।' अत्र सीतां ग्रनि रावणस्य रतिरमौचित्येन प्रवृत्तेति रसाभासो वाच्योपस्कारक: । अन्यत्त स्वयमन्सूद्यम। ऊर्जस्वी अलकार जमे-रावण की भगवती सीता के प्रति दुष्टोकि)-"ह मीता, यदि तरा मन आँसो की चेषाएँ पमन्द करना है तो मेरे पाम बीस आँसें है, यदि तुझे गाड आरलिगिन पसन्द है तो देख मैरी बीम भुजाएँ है और यदि तुझे चुम्बन पसन्द हो तो मके लिए भी मेरे पास दस मुस है। इम प्रकार तेरे उपचार की दृष्टि मे भी मेरे और राम के बीच, देख, कितना भारी अन्तर है।" यहाँ (अननुरकत परम्नरी) मीता के प्रति रावग का रतिनामक स्थायी- माव व्यजिन होता है फलन यह रसाभास हुआ और (क्योंकि) यह यहाँ वाच्यार्थ की शोभा - वढ़ा रहा है इमलिए ऊर्जम्वी अलकार हुआ। अन्य (समाहितादि अटकार) के उदाहरण ( कान्य- प्रकाश आदि में) स्वय सोने जा सकते हैं। विमर्शिनी एनदंवोपसंहरति-नदित्थमित्यादिना। निविधमिति। पर्यायोक्तादी चस्तु, रूपकाद्दान- लंकार: रसवदादौ रस। तदेव चिरंतन. अतीयमानस्थालकारान्तर्भाव एव ताबदुक । तदुपरकार्य पुनरात्मा कैश्चिदृपि नाम्युपगत। "तदित्थम्=तो इस प्रकार" इत्यादि द्वारा इम प्रकरण का उपमदार करते है। तीनों प्रकार का अर्थात (प्राचीनों ने) पर्यायोक्तादि में वस्तु, रूपकादि में अलकार और रसवदादि सहंकारों में रस (बाच्योपरकारक स्वीकार किय, हैे) इस प्रकार (वस्तु अल्कार और रस तीनो
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भूमिका १९
प्रकार का प्रतीयमान अर्थ) प्राचीनों ने अलंकार के ही बीच अन्तर्भूंत वतलाया है क्योंकि उनके मत में तीनों ही प्रकार का वह अर्थ (रूपक, उममादि के ही समान) वाच्य का शोभाधायक होता है। (ध्वनिवादी आचार्यों के समान) इन प्राचीन आचार्यों में से किसी ने भी वाच्य को उपस्कारक और प्रतीयमान को प्रधान (आत्मभूत) स्वीकार नहीं किया है। [अच्छा होता कि विमशिनीकार रसवत आदि के वे ही उदाहरण प्रस्तुत करते जो स्टट आदि ने दिए है जैसा कि उन्होंने भावालंकार के प्रकरषप में किया है। श्री रामचन्द्र द्विवेदी ने "स्ट्रटेन तु" इस प्रसंग पर एक टिप्पणी देते हुए लिसा है-"प्रतीयमान अर्थ वस्तु अलंकार तथा रसरूप से तीन प्रकार का होता है। प्रतीयमान वस्तु-रूप अर्थ कहीं गुणीभूत होता है और कहीं प्रधान। इन दोनों प्रकार के अर्थों का भावालंकार में, उपमा आदि प्रतीयमान अलंकार का रूपक दीपक आदि अलंकारों में तथा रस, भाव आदि का रसवत प्रेय आदि में अन्तर्भांव र्द्रट ने किया है।" इसमें "रुट्रट" के स्थान पर "हद्रटादि" पद चाहिए। रुद्रट ने केवल भावालंकार के दो भेद अव्य प्रस्तुत किए हैं किन्तु रस, भाव का रसवत प्रेय आदि में अन्तर्भाव नहीं दिखलाया। भामद और उद्धट ने अवश्य इनका प्रतिपादन किया है। वस्तुतः "इह् हि०" से लेकर "त्रिविधमपि प्रतीयमानतया (ख्यापितमेव )" यहाँ तक वत्तव्य और प्रघट्टक एक ही है। श्री दिवेदी ने 'सुद्रटेन' से उसमें अन्तर कर दिया है। उन्होंने पाठ भी इसलिएि स्वतन्त्र वाक्य के ही अनुरूप "र्ट्रटेन तु द्वियै योक:" ऐसा स्वीकार किया है।] वामन [ पूर्वोंक आचार्यों से कुछ आगे हैं उन्होने ] प्रतीयमान को अलंकार में अन्तर्भूत दिखलाते हुए भी उससे उपस्कारयें (अलंकार्वे) भृत एक आत्मा भी स्वीकार की है" इस तथ्य को स्पष्ट करते हुये आगे कहते हैं-"वामनेनेत्यादि"-
[सर्वस्व ] वामनेन तु सादृश्यनिवन्वनाया लक्षणाया वक्रोकत्यलंकारत्वं त्रुवता कश्षिद्ध्वनिभेदोऽलंकारतयैवोक्त। केवलं गुणविशिष्टपदरचनात्मिका रीतिः काव्यात्मकत्वेनोक्ता। उन्द्रटादिभिस्तु गुणालंकाराणां प्रायशः साम्यमेव सूचितम्। विषय- मात्रेण भेदप्रतिपाद्नात्। संघटनाधर्मत्वेन चेष्टेः। तदेवमलंकारा एव काव्ये प्रधानमिति प्राच्यारना मतम्। (काव्यालंकारसूत्रवृत्तिकार) वामन ने तो [ 'सादृश्याल्लक्षणा वकोकि:' इस प्रकार] सादृत्य- मूलक लक्षणा को वक्रोक्तिनामक अलंकार कहते हुए ध्वनि का एक [अविवक्षितवाच्य ] भेद [स्वीकार किया है किन्तु उसे भी उन्होंने ] अलंकाररूप ही बतलाया है क्योंकि वक्रोक् एक अलंकार ही है। काव्यकी आत्मा उन्होने गुणविशिष्ट-पदरचनास्वरूप रीति को ही कहा है। उद्भट ने छुण और अलंकारों का प्रायः साम्य ही बतलाया है[ उनके मत में दोनों ही, काव्य में समवायसन्बन्ध से ही रहते हैं, अलंकार संयोगसंबंध से और केवल गुण समवाय संवन्ध से नहीं, नह तो लौकिक पदार्थी की स्थिति है द्रष्टन्य=काव्यप्रकाशज्ल्लास ८] भेद उनमें केवल इसलिए माना गया है कि दोनों के विषय में भेद है और गुण संघटना का धर्म माना गया है। इस प्रकार माचीन आचार्यों के मत में काव्य में अलंकार ही प्रधान है।
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२० अलङ्गारसवस्वम्
विमर्शिनी
वामनेन प्रतीयमानस्यालकारान्तर्भावमभिद्धतापि तदुपस्कार्य आमा कश्रिदुक्त इत्याह-वामने नेत्यादि । तुशब्द' पूर्वेभ्यो व्यनिरेकद्योतरु। आत्मनोऽपि प्रतिपादकत्वान्। सुवतेति। यदाह-'साहरयालक्षणा बकोकि' इति। पतदेवोदाजहार च 'उन्मिमील कमलं सरसीना केरवं च निमिमीछ मुहुर्तम्' इति। कश्षिदर्ध्यानमेद इति। 'अविरवषित वाच्यादिः। केतमिति। यदि परमित्यर्थ। गुणेति। यदाह-'निशिष्टा पद- रचना रीति" इति। काव्यात्मकत्वेनेनि। यदाह-'हीतिरात्मा काव्यस्येति काव्यरवे म्युपगताया रीते. 'तद्तिशायहेतवरुचलंकारा.' इत्याययुकत्यान्नर्भाचितव्यनयोऽलकारा उपस्कार का इत्यतन्मतम्। यहाँ तु (तो) शब्द पूर्वाक्त आचार्यों मे अन्नर का दयोनक है। क्योंकि वामन ने काव्यात्मा का भी प्रनिपादन किया है। कहते हुए-जैमा कि कहा ह "सदृस्य मे होने वाली लक्षता वकोकि है। इसी पर उदाहरण भी दिया है-"त्लयों के कमल उन्मीबिन हो गए औौर कुमुद निमीतिन।" [यहाँ उन्मोटन और निमीलन लक्षणिक है] ध्वनि का एक कोई भेद =अवियक्षिनवाच्यरूप। केवल का अर्थ है यदि परम्-किन्तु। गुण इत्यादि जैमा कि कहा ह-"विशिष्ट पद रचना रीति है"। काव्यात्मरुरवेन-जेसा कि कहा है-'रांति काव्य की आत्मा है" इम प्रकार वामनका मन है कि "विश्िष्ट पदरचनारूप रोति काव्य की आन्मा है, और [गुणों से उत्पन्न ] काव्यशोभा में अनि- दाय लाने वाले ततर अरकार कहलाने है" इम प्रकार से लक्षित अलंकार उम (रीति) के उपरकारक (योभावर्षर) होते है"। विमर्शिनी
अन्येः पुनरेतदपि प्रत्युक्तमित्याह-उद्गादिभिरित्याडिना। मायश इदि। बाहुक्येने त्थर्थ: । विषयमात्रेगेनि। मिन्नकपयाणा झुपम्कार्योपस्कारकत्वस्यानुपपते. । तथात्वे चालंकारागमपि गुणोपस्कार्यतव प्रसन्यते। समानन्यायवात्। तद्गुणालंकारागा तुल्य- रवादिन एवोद्टा। इत्यमनेन वाच्याध्रयामामलंशराणा मव्य एुव ध्वनेरन्तर्भांघा दभिधाव्यापारगोचर एव ध्वनि, न पुनस्तद्वयतिरिक कव्चिदुध्वनिर्नामेति चिरंतनानां मनमित्युक्तम्। इदानीं यदप्यन्येरस्य मक्त्यन्तर्मूतत्वमुक्त तदपि दर्शयितुमाह-वकोक्तात्यादि। 'दूसरों ने तो इनना भी स्व्रीकार नहा किया हम वानको वतलाने के िए किसने ई-"उन्भर" आदि। प्रायश. अर्थात वढुधा। विषयमेदमाव्रेग विषयमात्र का भेद [गुणों का विषय है शोभा- जनकता जौर सल्कारों का शोभावर्धकता, किन्तु इन दोनों की प्रनीनि एक ही साथ होती है] अलग-अलग समय में प्रतीति होने पर [गुग ही उपस्कार्य औौर अलकार ही उपरकारक ऐमा] उपस्कार्योपस्कारकभाद सन्वन्ध नही वनेगा, वैसा मानने पर [गुण भी अल्कारों के उपरकारक और] अरंकार भी शुरे के उपम्कार्य माने जा मकेंगे। क्योंकि स्थिति दोनों में समान है [ अर्थात पूववर्ती जैसे परबत्तो का उपस्कारक माना जाना है वेसे ही परवर्त्ती भी पूर्यवर्त्ती का। उदाहरण यया गुणीभूनव्यग्य मे प्रतीयमान का वाच्यार्ये के मनि उपरकारक होना]। इम कारण जटानुयायी युग और जलकारों में समाना ही मानने है। इम प्रकार यहाँ तक के अ्रन्थ द्वारा यह प्रम्तन किया गया कि प्राचीन आाल्कारिक प्रतीयमान
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भूमिका संस्कत
अर्थ को अभिधावृत्ति का विषय ही मान लेते हैं, उससे भिन्न नहीं, क्योंकि उनके अनुसार उपमादि अन्य अलंकारों के ही समान ध्वनि भी सर्थ का ही एक अलंकार है। , जव "वक्रोकि"" इत्वादि अग्निम अ्रन्ध में आचार्यों ने जो प्रतीयमानार्थ को भक्ति (उपचार- वक्ता) में अन्तर्भून माना है उसे बतलाते हैं- [सर्वस्व ] चक्रोक्तिजीवितकार: पुन्वैदन्ध्यभद्गीभणितिस्वभावां बहुविधां चकोकि भेव प्राधान्यात्काव्यजीवितमुक्तवान्। व्यापारस्य प्राधान्यं च [ काव्यस्य] प्तिपेदे। अभिधानप्रकारविशेषा एव चालंकाराः। सत्यपि ननिभेने प्रतीय- माने व्यापाररूपा भणितिरेत कविसंरम्भगोचर:। उपचारचकतादिभि: समस्तो श्वनिप्रपश्चः स्वीकृत:। केवलमुत्तिवैचिन्वजीवितं कार्व्य, न व्यङ्गवार्थजीवितमिति नदीयं दर्शनं व्यवस्थितम्। वक्रोक्तिवीवितकार (कुन्तक) ने वक्रोकि को काव्य का जीवित माना है। वकोकि को उन्होंने "यैदग्व्यभद्गभगिति"-स्वरूप कहा है सौर उसके अनेक मेद वतलाए है। (वक्रोकि को काव्य का प्रधानतल मानने के लिम) उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया है कि काव्य में व्वापार तत्व भी प्रधानतर्व है। (उनके मत में) अलंकार अभिधान (कथन, उक्ति) के ही विशिष्ट-विचिष्ट भेद हैं (साथ ही) काव्य में (वस्तु, अलंकार और रस) ये तीनों प्रकार के प्रतोयमांन अर्थ रहते अवस्य है किन्तु कवि का संरम्भ (जर, अधिक ध्यान) व्यापारस्वल्प भिति (उत्ति) पर ही रहता है। व्वनि के अन्य अवान्तर भेनों को भी [उन्हांने] उपचारवक्रता के अन्तर्गत स्वीकार कर दिया है। [ इस प्रकार संक्षेप में] उन [वकोकितनीवितकार] का सिद्धान्त केवल इतना ही है कि "कान्य का प्राण (प्रधानताव) उततिवैचिन्य ही है, व्यंन्चार्थ नहीं।" चिसर्शिनी वेदन्व्येत्यनेन वक्रोत्ते स्वरूपमुक्तम्। यदाह-'वक्रोकतिरेव वैदग्धयभङ्गीभणितिरच्यते' इति। एवकारोऽन्यस्थ काव्यजीवितत्वव्धनच्छेदक:। काव्यजीवितमिति काव्यस्थानु- म्राणकम्। तां बिना काव्यमेव न स्वादित्यर्थः। यदाह-विचित्रो यत्र चक्रोतितिवैचित्यं जीवितायते' इति। व्यापारस्येति कविप्रतिभोलिखितत्य कर्मणः। कविप्रतिभानिवर्ति तत्वमन्तरेण हि वक्रोक्तिरेव न स्यादिति कस्य जीवितत्वं घटत इति तदनुपक्मेवान्ता- स्यान्र आाधान्यं विवनितम्। अतश्र हयोः प्राधान्यस्य दुर्योज्ञत्वमत्र नायङ्गनीयम्। "वेंदग्ध्यमङ्गीमणिति" यह वक्रोक्त का लक्ष है, जैसा कि (कुन्तक ने कारिका में) कहा है- "उभावेतावलंकार्यी तयोः पुनरलंकृति: । वकोत्तिरेव वैदन्ध्यभंगीभणितिरच्यते ।।" ११० कारिका । शब्द और सर्थ अलंकार्य हैं, और उन दोनों का अलंकार है केवल वकोकि जिसका स्वरूप है "वैदस्व्यभङ्गभणिति"-अर्थात वैद्व्व्य के कारण भंगिमा (वाकपन) के साथ वोलना। "केवल वक्रोलि" इस प्रकार केवल शब्द के प्रयोग का अर्थ है कि अन्य कोई तत्व काव्य का जीवातु नहीं हो सकता। काव्यजीनित वन्द का अर्थ है वह तत्तव जो काव्य को (अकाव्य से भिन्न कर) काव्यत मदान करे। फलतः आशय यह हुआ कि वक्राति के बिना काव्य काव्य ही नहीं हो सकेगा। जैसा कि (कारिका में कुन्तक ने) कहा भी है-"विचिन्न [मार्ग] वह है जिसमें वकरोकि की
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२२ अलङ्कारसवस्वम्
विचित्रता जीवन (या प्राग) का काम करती है।" [कारिका १४२] व्यापार अर्थात र्का- प्रतिभा से उल्िखित कर्म। वक्रोकि तब तक बकोकि हो नहीं हो सकनी जब तक वह कविप्रनिमा से निम्पन्न न हो और जब वह वक्रोक्ति ी सिद्ध नहीं दो सकेगी तव उसमें काव्यजीविनत्व कैमे समव होगा। इसलिए यहा जो व्यापार की प्रधानता की बान कही जा रही है वह बकोकि की प्रधानता को बात को ध्यान में रखकर ही कही गइ है, "इसलएि एक ही कान्य में दो की प्रधानता कठिन है"-ऐसी शका नहीं करनी चाहिए। T विमर्श-निर्गयसागर और मोतोदारबनारसीदाससन्करण में यह मूल छपा है "व्यापारस्य प्राधान्य च काव्यस्य प्रतिपेदे"। इसमें या तो "व्यापारप्राधान्य च काव्यस्य प्रतिपेदे" ऐसा पाठ होना चाहिए जैसा कि सजीविनीकार ने स्वीकार किया है, या फिर "व्यापारस्य प्राधान्य च प्रतिपेदे" ऐसा। अर्थांत या तो व्यापार शब्द से पष्टीविभक्ति हटाई जानी चाहिए या "काव्यस्थ" यह पद। विमर्शिनी में "व्यापारस्येति" ऐसा प्रतीक दिया हुआ है अन उमके अनुमार "काव्यस्य" शब्द ही अधिक है। इसलिए इमने उमे कोष्टक में डाल दिया है। वक्रोक्तिजीविनकार ने एक वार वकोकि को प्रधान बनलाया और एक वार व्यापार को। इसकी सगति लगाने हुए विमर्रिनीकार ने दिखा कि ह व्यापार का अर्थ कविप्रतिभागन व्यापार है। यदि वह न हो तो वक्ोक्ति में वक्रोकित्व ही निपन्न न हो क्योंकि कविप्रतिभा जिममें नही रद्दती उसकी उचि में वक्रता नही आनी। फलन साध्यमाधनमाव होने से दोनों की प्रधानता मानी जा सकनी है, वस्नुन रहती तो प्रधानता केवल वक्रोकि की ही है। इमारी समस में टीकाकार की ऐमी सगति निरापद नहीं। बकोकि 'उत्ति'रूप है और उक्ति कथन व्यापार है, फलन काव्य नें यदि वक्ोक्ति प्रधान है तो इमका निषेध नहीं किया जा सकना कि व्यापार भी प्रधान है। व्यत्तिविवेककार आदि के अनुसार वुन्नक को व्यापार का अर्थ अभिधावृत्ति जैसी वृत्ति ही यहाँ मान्य है। ममुद्रबन्ध ने भी भट्टनायक और बकोकतिजीविनकार को व्यापारप्ाधान्यवादी आचार्य माना है। यहाँ व्यापार को अभिधादिरूप व्यापार स्वीकार करने पर ही उसका सण्टन भी किया जा सकता है क्योंकि 'कविप्रतिमान्यापार' की प्रधानता काव्य में अस्वीकार नहं की जा सकनी। आनन्दवर्दवनाचार्य इमीलिए प्रनोयमान अर्थ की व्यजक पदावली (सरसवनी) में अलौकिक और विशिष्ट प्रतिभा का परिस्तरण स्वीकार करते है- मरस्वनी स्वादु तदर्थवस्तु निध्यन्दमाना मह्दता कबीनाम्। अलोकमामान्यमभिव्यनक्ति परिस्पुरन्न प्रतिभाविशेषन् ॥। उद्योन १। "प्रतिमा का उन्मेप ही विश्व का उन्मेप है"-ऐमा अभिनव गुप्त भी मानने है- 'यदुन्मीलनशकल्येव विश्वमुन्मीरति क्षणाद।' प्रत्येक आचार्य ने काव्य के प्रति प्रतिभा को प्रमान कारण माना ही है। विम्शिनीकार के मत में व्यापार शब्द का अभिधा अर्थ करने में जो आपत्ति है वह यही है कि कथनव्यापार कण्ठताल्वादि के अभिवान से होने वाला उच्चारणरूपी व्यापार है और वक्रोकि अलंकाररूप है। अलकार उच्चारणरूप नही है, फलन कथनव्यापार या उत्ति भी उन्हें नही कहा जा सकता। किन्तु अन्थकार अलकार को व्यापारस्वरूप और उततिरूपव्यापारस्वरूप ही दतल रहा है, फलनः उन्होंने व्यापार को कविप्रतिमाव्यापारपरक माना और शका को निर्मूल किया। परन्तु ऐेसा करने हुए वे यह भूल गये कि उन्हें पूर्वपक्ष पर विचार करना है जो सण्डनीय है। यहाँ यद भी विचारर्णीय है कि कुनतक ने सलकार को अभिवाव्यापार स्वरूप माना है या नहीं। इमें बकोकिनीबिन में एक भी पेमा स्थल नहीं मिला जहाँ भलकार को अभिषात्मक कहा
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भूमिका २३
गया हो। उन्हें अमिधेय अवश्य कहा गया है। किन्तु व्यक्तिविचेककार ने ध्वनिलक्षण का खण्डन करते हुए ध्वनिकारिका में शब्द और वर्थ के ही समान अभिधा को भी शब्दतः उपादेय बतलाया है और दिखा है- "किच यथा अभिषेयोडर्थः तद्पिशेषणं चोपानं तद्वदभिवाप्युपादानमहत्येव, अन्यया यत्र दपकानेरलंकारादलंकारान्तरस्योपमादे: प्रतीतिस्तन्र ध्वनित्वमिषटं न स्वात्, तल्लक्षणेनाव्यात्षे:। अलंकाराणो चाभिधात्मत्वसुपगतं तेपां भहांमणिति-भेदरूपत्वाद" [ हिन्दीव्यक्तिवियेक पृष्ठ २२] व्यक्तिविवेक के टीकाकार जो अलंकारसर्वस्वकार से अभिन्न हैं ने इस प्रकरण पर भी अलंकारों की अभिषात्मकता पर व्यंजनावादी की ओर से आक्षेप किया है। हमने चौखंभा से प्रकाशित अपने हिन्दी व्यत्तिविवेक नें यह अंश भलीभाँति स्पष्ट कर दिवा है। उसे नहीं से देख लेना चाहिए।
विमर्शिनी
अलंकारा इति। तेनोक्त इति शेषः । एव कारश्षिरं तनोक्त्व निप्रकार विशेषव्यवच्छेदक:। सत्यपीति। सदपि प्रतीयमानमनादत्येत्यर्थः। व्यापारसपंति वक्रत्वभावेत्यर्थः। भणति- रित्युक्ति:। कवरोति। तत्रैव कविः संर्ध इत्यर्थः। तत्संरम्भमन्तरेण हि वक्रोक्तिरेव न स्यास। नतु च प्रतीयमानस्यानादर: किमभावसुखेनान्यथा वा कृत इत्याशक्याह-उप- चारत्यादि। उपचारवक्रतादीनामेव मध्ये धवनिरन्तर्भृत इति तात्पर्यार्थः। यदाह- 'यत्न दूरन्तरेऽन्यस्मासानान्यसुपचर्यते। लेशेनापि भवेत्कर्तु किचिदुदिक्ततु चितास्। यन्नूला सरसोरलेखा रूपकादिरलंकृतिः। उपचारप्रघानासी वक्रता काचिदिप्य ते ॥' इति। पतामवोदाजहार च- 'गअण च मत्तमेहं धारादुकिअन्जुणाइं अ बणाइं। निरहंकार मिअङ्को हरन्ति नीलाओ अ िसाओ।1 अन्र मदनिरहंकारते औपचारिके इत्युपचारवक्रता। आदिपदेन क्रियावकतादीनामपि गहणम्। एवं सर्वोऽपि ध्वनिमपश्ो वकरोक्तिभिरेव स्वीकृत: सनस्थित एुव। यदि परं तस्य आधान्यमेव नास्तीत्याहकेवलमित्यादि। तदीयमिति। वक्रोक्तिजीवितकारसंबन्धी त्यर्थः। तदित्थं लक्षणामूलव क्रो किमध्यान्त्भवविाद्ध्वनेरेव तत्त्वं प्रतिपादितम्। भर्लंकार=वक्रोकिजी वितकार द्वारा प्रतिपादित अलंकार। "अलंकार अभिधारुप ही है" यहाँ "ही" शब्द द्वारा इसका खण्डन किया गया कि अलंकार भेदअरमेवरूप से ध्वनि में अन्तर्भूत हो सकते हैं। सत्यपि सर्थात भले ही तीनों ही प्रकारका प्रतीयमान अर्थ स्वीकार कर लिया तब भी कवि का आदर उसमें नहीं रहता है। व्यापाररूपा=वक्रस्वभावा। भणिति=उक्ति। कविसं०= अर्थ यह कि कवि मुख्यतः व्यापाररूप वक्रमणिति में ही प्रयत्नशील रहता है। क्योंकि कविसंरंभ के बिना कोई भी उकि वकरोत्ति ही नहीं वन सकती? प्रदन उठता है कि प्रतीयमान अर्थ का अनादर वक्रोक्तिकार ने किस प्रकार से किया है? उसका अमाद मानकर अथवा और किसी प्रकार से ? इस पर उत्तर देते हुए लिखते हैं-उपचार आदि। इसका तात्पर्य यह कि ध्वनि को उपचारवक्रता आदि में ही अन्तर्भुक्त मान लिया है। जैसा कि वक्रोकिकार ने कहा हे-"जहाँ (अन्य गुणों के कारण) अत्यन्त भिन्न (प्रस्तुत) पदार्थ में किसी भिन्न (अप्रस्तुत) पदार्थ का सामान्य (साधारण) धर्म भले ही वह़ बहुत ही छोंटा क्यों न हो, इसलिए प्रतिपादित किया जाता है कि उस वर्णनीय प्रस्तुत पदार्थे में अतिशय आ सके, उसे
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उपचारवक्रता कहा जाना है। अत्यन्त सरम रूपकादि अल्कार का मूल यहीं उपचारवक्रना होनी है।" [११३,१४ कारिका वक्रोफिजीविन ] और उदाहरण भी दिया ह- 'गगन च मत्तमेघ धारालुरिताजुंनानि च वनानि। निरह कारमृगाङ्गा इरन्ति नीलाश्च निशा अर्थाद मत्त मेनो से युकत आकाश, [मैधमुक्त ] अल्धाराओं से धुले अर्जुन वृक्षवाल वन, तथा अहंकारशून्य चन्द्रमावाली नीली निशाएँ भी चित्त आकष करती है।" [गउइवह] यहाँ मेनों में 'मद और चन्द्रमा में "अहकारमून्यना" उपचरित (अर्थाव मेप तथा चन्द्र में नशे मे युक्त औोर हतप्रभ व्यक्तियों के मादश्य के कारण प्रयुक्त) है। अन. यहाँ उपचारवकना (ई। आदि शब्द से क्रियानकना) आदि भेद लिए जा सकने है (क्रियावकता में भी कुन्तक ने 'उपचारम- नोशता-'नामक नेद वनलाया ह। (द्रष्टन्य-कोकिजीविन पृछ्ठ ६६ विववेश्वर सम्करण) दम प्रकार ध्वनि का सपूर्ग प्रपच मिन्न-भिन्न वक्रोक्तियों के नाम से अपना लिया गया है, परन्तु उसका माधान्यमात्र स्वीकार नदा किया गया है। इम तथ्य को कहने के लिए लिसा ="केवल" इन्यादि। तदीय=अर्थाव वकोफिन्ाविनकार का। इम प्रकार कुन्नक ने वनलाया तो ध्वनिन्नत्व ही किन्तु स्व्रतन्त्ररूप से नहीं अपिनु लक्षगामूल कवकोकिति के नेदों में अन्नर्भूत करके। विमर्श-विमशनी के निर्मेयसागर सस्करण में "मदनिरहकारत्वे औपचारिक दस्सुपचारवक्र- वादीनामपि ग्रहणम्"-ऐमा पक्तिछपा है। यहाँ "उपचारवकना" के पश्चात् "आदियदेन वकता दीनामपि ग्रहणम्" यह अश अवश्य ही रद्दा है। कदाचित मुदम में छूट गया है। उपचारवनता के बाद कुल्तर ने "विश्ेषगवकता" का निरुपण किया ह किन्तु उनमें उपचार (लक्षा) कान में नहीं आना। आगे क्रियाववता के "उपचारमनोझना" आदि मेदा में ही वह काम में आनी है अत हमने "वक्नादीना" की पूति 'क्रियावकनादीना' इम प्रकार कर दी है। इम विषय में मजीविनी से कोइ प्रकाश नहीं मिलना। विमर्शिनी के विद्प्यस्य वागाविषयत्वादलत्षणीयत्व मुक्तमित्याह-भट्टनाय केत्यादि। "कुछ आचार्यों ने ध्वनि को वाणी का अविषय अनिरवचनीय और इमलिए अरक्षणीय कहा है" उम विषय को प्रस्तुन करते हुए कहते है-भट्टनायक आदि। [सर्घस्व ] भट्टनायकन तु व्यङ्यव्यापारस्य प्रौदोक्त्याभ्युपगतस्य काव्यांशत्वं ववता न्यग्भावितशब्दार्थस्वरूपस्य व्यापारस्यैव मावान्यमुक्तम्। तन्रा- प्यभिधामावकत्वलक्षणव्यापारद्वयोतीणी रसचर्वणात्मा भोगापरपर्यायो व्यापार: प्राधान्येन विधान्तिस्थानतयात्रीकूत: । मट्टनायक ने व्यग्यव्यापार को स्नीकार तो किया है किन्तु उमका लक्षण नहीं किया और उने (स्वलपन: स्त्रीकार करके भी) काव्य का अश (ह) बनलाया है, (उन्हाने) प्राधान्य माना है व्यापार का ही तथा शब्द और अर्थ दोनों को उस (व्यापार) की अपेक्षा गुभृत और अप्रधान (दवा हुआ) वनलावा है। व्यापारों में भी (इन्होंने) अभिवा और भावकना नामक दो व्यापारों मे उनके आगे आने वाला भोगनामक रसचर्वशाम्वरूप व्यापार हो प्रनुन न्य से हृदयविश्रान्तिकारी माना है।
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भूमिका २५
विमर्शिनी प्रोढोकत्येति। न पुनर्लकणकरणेन। अत एवोके म्रौहत्वं यहन्षयितुमश्क्यस्तस्याप्यम्यु- पगमः। काव्यांशल्वनिति न पुनः काव्यात्सतस्। यदाह- 'ध्त निर्नामापरे योपि व्यापारो व्यक्षनात्मकः। तस्य सिद्धेऽपि भेदे स्यात्काव्यांशत्वं न रूपिता॥'इति। न्यापारस्येति। कविकर्मण। अन्यथा शब्दुप्रधानेम्यो वेदादिभ्योऽर्थप्रधानेभ्यश्चेति- हासादिभ्य: काव्यत्य वैलतण्व न स्यात्। यदुक्म्- 'शब्द प्राधान्यमाधित्य तत्र शासतरं पृथ्विदुः। अर्थतत्वेन युक्तं तु वदन्त्याख्यानमेतयोः॥ द्योर्गुणत्वे व्यापारमाधान्ये काव्यधीर्भवेत्'॥ इति। वनापीति। कविकर्मरुपत्य व्यापारस्य ग्राधान्ये सत्यपीत्यर्थः। 'असिधा भावना चान्या तन्होगीकृतिरेव च' इति काव्यं तावत् न्यंश तेनोक्म् । तन्रापि- 'अभिधाधामतां चाते शब्दार्थालंकती ततः। भावनाभाज्य एपोऽपि शङ्गासदिगणे मतः ॥' इरत्यंरद्यस्य विषयं प्रतिपाद्य 'तद्जोगीकृतिरूपेण व्याप्यते सिद्धिनालरः' इति तृती योऽसः सहृद्यगतस्तदंशद्दयचर्वणात्मा 'दृश्यसानाथवा मोके यात्यङ्त्वमियं ्फुटम्' इन्युक्त्या परव्रह्मास्व्ादसविधवर्ती विभ्ान्तिधामतमाभयुपगतः। तदेवं यद्यपि 'तात्पर्याशक्तिरमिधा लक्षणानुसिती, द्विघा। अर्थापत्ति: कवचित्तन्त्रं समासोक्त्याद्यलंककतिः॥' 'रसस्य कार्यता भोगो व्यापारान्तरवाधनस्। हाद शोष्यं ध्वनेरत्य स्थिता विमतिपत्तयः ॥।' इति नीत्या बहवो विप्रतिपत्तिप्रकारा: संभवन्ति, तथापि 'काव्यत्यात्मा ध्वनिरिति वुधैर्यः समास्नातपूर्व- स्वस्याभावं जगदुरपरे सात्तमाहुस्तमन्ये। केचिद्ाचां स्थितमविपये तस्तमूखुस्तदीयम्'- इ:्युरनीत्यव ध्वनेर्विमतिपत्तिप्रकात्न्नय मिह माधान्येनोक्तम्। मौढोकिद्वारा, न कि लक्षणनिर्वचन के द्वारा। इसलिए उि को मौढ़ कहा गया क्योंकि जिसका लक्षग नहीं किया जा सकता उसको भी त्वीकार किया जा रहा है। काव्यांशर, काव्यात्मत नहीं। जैसा कि (भट्टनावक ने) कह्ा भी है-"अनि नामक जो एक और वंजनात्नक व्यापार है, उसकी वदि (अभिवा भावना, भोग-इन तीन व्यापारों से) भिननता भी सिद्ध हो जाय तव भी उते काव्य का एक अंश ही माना जाएगा, माल्मतत्व नहीं।" व्यापारस्यैव के व्यापारशब्द का अर्थ है कविक्म। नहीं तो शब्दप्रधान वेद आदि से तथा अर्थप्रान पुराणआदि से काव्य की भिन्नता सिद्ध नहीं हो सकेगी, जेता कि कहा है-"शासतर (काव्यादि से) मिन्न होता है क्योंकि उसमें शन्दकी प्रधानता रहती है। (पुराण आदि) आख्यानों में अर्थ की प्रधानता रहती हू। ये दोनों (शब्द और अर्थ) काव्य तब कहलाते हैं जब ये दोनों अप्रधान रहते हैं और व्यापार प्रधान। तन्नापि उतमें भी अर्थात व्यापार की प्रधानता रहने पर भी। भट्टनायक काव्य के सीन अश माने हैं (१) अभिधा (२) भावना और (३) भोग। इनमें भी अभिषा का विपव
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माना है शन्द और अर्थो के अलकारों को तथा भावना का विषय माना है शृद्धारादि के साधारणी- करण को। इम (रस) की मोगीकृनि, भोग या भोजकत्व को सिद्धिमान् (सहृदय) जन के हृदय को व्याप कर देने वाला बनलाया है। इम प्रकार यह तृलीय व्यापार सहृदय में रहता है और इसमें पूर्वोक्त (अमिना अर्थात् उसके विषय अल्कार तथा भावना अर्थात उसका विषय साकरणी- भून विभावादि सामग्री) दोनों भी प्रतोन होने है। यह (भोगीकृनि) मोक्ष का भी अय वननी देसी जानी है (२) ।" इम प्रकार तृनीय व्यापार को ब्रझ्मारवादतुल्य माना गया है इमलिए कि इमने भी वैसा ही विश्राम मिलना है जमा ब्रझ्ञास्वाद में। दम प्रकार यदयपि (१) तात्पर्यादक्ति () अभिना (३ ) लकमा (४-५) (स्वार्थ और परार्मे डो प्रकार की) अनुमिति (६-७)-(श्ुनार्थापत्ति और अर्थापत्ति इम प्रकार) दी प्रकार की नर्धापति (८) नन्त्र (अनेकार्थक शब्द प्रयोग) (९) ममामोकि आदि सलकार (१०) - रम की कार्यता (११) रस का भोग (१) (व्यजनारन्य) अन्ग्ग व्यापार का दाथ 'हम प्रकार व्दनि पर बारह विप्रनिपसियों ह।' हम कथन के अनुसार और भा विप्रतिपत्तियाँ उठाई जा मकनी है नयापि उपयुक्त प्रसग नें केशल उन्ही तीन विप्रतिपत्तिओं को प्रस्तुन किया गया है जो निम्नलिसिन ध्वनिकारिका म प्रस्तुन की ह-"काव्यस्यात्मा" अर्भात 'जिम ध्वनि को अनेक विद्वानों ने मिलकर काव्य की आत्मा ठहराया उसके विषय में कुछ लोग यह कहत सुने गए हे कि वह 'ह ही नहीं', कुछ लोग उमे लक्षमास्वरूप मानत सुने जा रहे है और यह कि वद कोद न कोई नत्त्र है नो अवस्य किन्तु बाणी से परे है।' ये ही आपत्तियाँ वम्तुन प्रधान है। विमर्श-(9) भट्टनायक का मिद्धान्न उन्ही के शब्दों में यहाँ जिनना प्रम्तुत किया गया ई उनना लोचन और अमिनबमारती में भा नहा। इम प्रमग में "दृश्यमानाथवा मोक्षे" का अभिप्ाय पूर्वप्रनग के विना मदिव्व ह। भोगीकृति का देसा जाना और नब इमका मोक्ष में अग बनाना विचिन सी स्थापना है। लोचन और नमिन वभारनी में यह अभ उद्धृत नहीं है। सजीविनी टीका में इस धूरे ही प्रमग पर कोई विस्नुन विचार नहा है। 'भोगीकृति'-भी यदि कदमीरिओं के परमशिन का या सविद्भट्टारिका की कोई कत है तो उसका दर्शन न्पर्शरप या परामर्शरूप होगा तन दध्यमाना की अपेक्षा 'सत्यमाना' शब्द अधिक उपनुक्त होगा। मोक्ष का अर्थ यहाँ विभरूप समाधारसत्व मे छुटकारा नहीं किया जा मनता क्नोंकि असावारणत्व के निराकरण अर्थाव साशरमारुरण में अग अर्थात कारण नाना गया है भावनाव्यापार, भोगव्यापार नहीं। अग शब्द का अर्थ अंश किया जाय तो भावना ही भोग का अश मानी गया है, भावना का भोग नहीं। माक्ष का अर्थ चतुर्थपुरुषार्य सुक्ति हो यहाँ अभिपेत है यह तथ्य महाम्वाद की चर्चा से भी पुषट होना ई। (२) यहाँ जो वारह आपत्तियाँ धवनि के विपक्ष में उठाई गई है ये माहित्यनास्र में प्राय प्रमिद्ध है। तान्पर्यमक्ति दशरूक ४-प्रकाश, काव्यप्रकाश ५-उद्दवाम और लोचन में चर्चिन है, अनिधा और लक्षणा ध्वन्यालोक १,-३ उद्योन, काव्यप्रकाश-,५ उल्लाम, साहिन्यदर्पण आदि में, अनुमिनि और अर्धाननि व्यक्तिविवेक, धवन्यालोक, काव्यप्रकाश आदि में तन्त्र और अनकार उद्, कुन्नर आदि के ग्रन्थों में और रस की कार्यना लोहट के रक्षोत्पत्तित्रादमसग प्रस्तुन करने वाले लोचन, अभिनवमारनो, काव्यप्रकाश, माहित्यदर्पण आदि ग्रन्थों में, तथा मोग- रममीमासा वाले सभी ग्रन्थों में । भट्टनायक के मन के निरूपण में व्यजना का पृथक शब्दव्यापर न माना जाना उत्त सभी आपतियों का मूल है। यहाँ तन्त्र शब्द से शव्दालंकार और समासोकि आदि अर्थारकार में ध्वनि के अन्नर्माद का स्फेत है। इन्य वर्दाँ थनेकार्थक शब्दों का बदलना
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भूमिका २७,
संभव न हो शब्दाबंकार माना जाता है। शब्दशक्ति मूलक ध्वनि का उसी में अन्तभन दिखलाया जा तकता है। यद्यष उक्त सभी आपत्तियाँ सुविदित हैं तथापि द्वादशा दोप प्रस्तुत करने वाली "तात्पर्या शक्ति: हत्यादि कारिका पहिली वार यहाँ विमर्र्नी में ही मिली है अतः यह फिसकी है यह विनारणीच है। भहिममट्ट ने व्यक्तिविवरेक में ध्वनि पर जो दस दोप दिखलाएँ है उनकी संगह- कारिकाओं से यह कारिका सर्वथा भिन्न है। लोचन और अभिनवभारती में यह कारिका हमें नहीं मिली। संभवतः यह भी भट्टनायक की ही हो। भट्नायक का हृदयदर्पण या उसके अधिकांश संभवतः विमर्शिनीकार को उपलब्ध रहे। चिमर्शिनी एव मिदा नी मेत द्वि प्रतिप तिप्रकारत्यं निराकर्बन् धबने रेव काव्यात्मत्वं साधयति-ध्वनि- कार इत्यादिना। इस प्रकार उक्त तीनों विपतिनत्तियों का निराकरण करते हुए एवं ध्वनि को ही काव्य की आत्मा सिद्ध करते हुए लिखते हैं-ध्वनिकार इत्यादि- [सर्वस्व ] व्वनिकार: पुनरमिवातात्पर्यलक्षणाख्यव्यापारत्रयोत्तीर्णस्य ध्वनन- द्योतनादिशव्दाभिधेयस्य व्यश्ञनव्यापारस्यावश्याभ्युपगम्यत्वाद् व्यापारस्य च वास्यार्थत्वाभावाद् वाक्यार्थस्यैव च व्यङ्गयरूपस्य गुणालंकारोपस्कर्त- व्यत्वेन प्राधान्याद् विश्रान्तिवामत्वादात्मत्वं सिद्धान्तितवान्। व्यापारस्प विषयसुखेन स्वरुपप्रतिलम्भात् तत्माघ्ान्येव प्राघान्यात् स्व- रूपण विचार्यत्वाभावाद विपयस्यैव समग्रभरसहिप्णुत्वम्। तस्मादू विषय एव व्यङचनामा जीवितत्वेन वक्तव्य, यस्य गुणालंकारक्ृतचारुत्व- परित्रहसाम्राज्यम्। रसादयस्तु जीवितभूता नालंकारत्वेन वाच्या:। अलंकाराणामुपसकारकत्वाद, रसादीनां च प्राधान्येनोपस्कार्यत्वातू। तस्माद व्यङ्गघ एव वाक्यार्थीभूतः काव्यजीवितमित्येप एव पक्षो वाक्यार्थविदां सहद्यानामावर्जक:। व्यअ्ञनव्यापारस्य सर्वैरनपहतत्वात् तदाश्रयेण व
इन सब मर्तो के विरुद्ध ध्वनिकार (आनन्दवर्भनाचार्यें) ने यह सिद्धान्त स्थापित किया है कि कान्य का वाक्यार्थ (अन्तिम अतः तात्पर्यविपयीभूत प्रधान अर्थ) व्यंग्यरूप अर्थ ही ह क्योंकि उसी में विश्वान्ति (जिज्ञासा की शान्ति) होती है और गुण तथा अलंकार उसी अर्थ की शोभा कढ़ाते है अतः वही अर्थ प्रधान और (काव्य का) आत्मभूत अर्थ होता है। (इस अर्थ को उन्होंने व्यंग्य इसलिए कहा है कि इसकी प्रतीति अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा नामक तीनों व्यापारो से नहीं हो पाती, उसके लिए इन तीनों के वाद काम में आने वाला और ध्वनन, दोतन आदि शब्दों से पुकारा जाने वाला व्यंजनानामक एक सतिरिक व्यापार मानना पड़ता है, क्योंकि व्यंखना एक व्यापार है और व्यापार वाक्यार्थ नहीं हो सकता (वह अर्थप्रतीति का साधननात्र है) अतः उसके अर्थ व्यंग्य को ही वाक्यार्थं और प्रधान माना आता है।
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(और यह ठीक भी है क्योंकि) व्यापार को व्यापारता नभी प्राप्त होनी है जब वह अपने विश्य को निम्पन्न करता है अनपव उम (व्यापार) में प्रधानना भी उस (विषय) की प्रधानता के कारण (उपचार द्वारा) आती है। इम प्रकार बनोंकि व्यापार का विचार (विपर्यानर- पेक्षनया) केवन व्यापारर्प से नहीं किया जा सकता । विषयमापेक्षनया ही किया जा सकता हे) अन (विचार का) समस्त मार केवल विषय ही उठा नकता है। इमलिए (व्यजनान्यापार नहीं अपिनु उसका) व्यय्यनामक विषय ही (काव्य का) जीविन ( प्रधाननत्व) कहा जाना चाहिए और (पूर्वचार्यों द्वारा काव्यात्मरूप से सिद्धान्निन) गुा तथा अलकार जो शोभा उत्पन्न बरने है उसकी प्राप्ति का एकच्छन अधिकार भी उ्मी (विषयल्न व्यग्यार्थ) को है। व्यग्यार्य रमादित्वर्प होना है नन) जो अर्थ रमादिरूप में (काव्य की) आत्मा है (वह तो जन्दकार्य है) उसे जलकार नहीं कहा जा सकता। क्योंकि अलकार का धर्म है शोमा बढ़ाना और रमादि का धर्म है शोभिन होना, क्याकि वे प्रधान है। इमलिएि वानयार्थ को ममगने ाले महदयों को यही पक्ष रचना है कि "( स्वय व्यजना नही अपिन) व्यजना द्वारा प्रनिषाध (व्यग्य) अर्थ ही (काव्यवाज्य का) प्रधान प्रनिपाय अर्थ है और वहाँ काव्य की आत्मा है।" (व्यउना- विरोषीं) सबके सव (आचार्य) व्यक्षना का सण्डन नहीं कर सके और उम (च्यञ्ञना) के आधार पर दूमरा कोर्ट पक्ष प्रतिष्ठिन नहीं हो सकता (अर्थात व्यापार का नाम यदि व्वशना है तो तस्पतिपाद अर्थ को व्यग्य मे मिन्न कछ नहीं कहा जा सकना)। विमर्शिनी समयापेद्तार्यावगमशक्र मिघा। सामान्यानां परस्परान्वितत्वेन त्रिशेषार्थानवांधन-
ब्रयादुत्तीर्णस्य तदतिरिक्तस्येत्यर्थ.। तथा च 'गक्काया घोप,' इत्यत्र गङ्गाशब्दो घोप पव्दुश्च सामान्यात्मके जलप्रवाहे गृहनिकरम्वे च संकेतिती। सामान्य एवोद्योगातू। रिशेपस्य द्विसकेतकरणे आननत्यं व्यभिचारक्ष स्यात्। ततश्ाभिधया जलन्नव्नाहमात्ं गृहनिट्वरम्वमात्र च प्रतीतमित्येका कचया। एतत्प्रतिपाद्यान्यप्रतिपादनायाप्यमिधा न समर्था। 'विशेष्य नाभिया गच्हेत् तीणशकिर्पिशेपणे' इत्याययुक्तयुवत्या तत्या विरग्य व्यापारासभवात् । 'सामान्यान्यन्ययासिदेविशेषं गमयन्ति हि' इति न्यायात्तानपर्य- शसत्या सामान्यान्याघाराधेयभावेनावस्थितं विशिष्ट गद्नाघोपाद्यापूरयन्तीति ता पर्यण पर स्परान्यितत्वमानमेव प्रतीयत इति द्वितीया । जलमवाहस्य च घोपाधिकुरणत्यमयुक्त मिति प्रमाणान्तरवाधित मन् गद्गाशब्दस्तद्धिकरणयोग्यं तट लचयनीति तृतीया। तत्र शाबत् 'मुरयार्थवाधे तद्योगे रूदितोऽय प्रयोजनाद्। अन्योज्यों लच्यते सत् सा लक्षगाडरोपिता किया॥' इति नीत्या लक्षमा विनयसंनिघावेत भरति। तत्र मुस्यार्थबाधा 'तावअपतयक्षा दिप्माणा- तरसूलय। यश् सामीप्यादिसबन्ध स च प्रमागान्तरावगम्य एव। यदपुनरिद घोपस्य अेत्यपावनन्वादिलत्तण प्रयोजनं प्रतीयते तच्छव्दान्तरानुक्तं प्रमाशान्तराप्रतिपन्नं च कुन आगतम्। न नानस्पत्यनाहेव तत्पतीति: अस्मादंब शब्दादवगमासिद्दे। शब्दार्थे च तस्यापतृत्ते। ना्यनुमानात्। सामिप्येऽपि सैत्यपावनत्वाढेरसंभवादनैरान्तिक- आात्। न रमृनिः तदनुभवाभावात्। सत्यामपि वा तस्या नियतस्मरणं न स्यात्। अस्मादेव च शब्दादेतदेव वुध्यत इति को हेनु। तरमादस्यैव शब्दस्यंय व्यापारोड
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भूमिका २९
न्युपगन्तव्य: 1 निर्व्यापारस्यार्थप्रतीतिकारित्चाभावात। स तावनाभिधामा। समया- भावात्। न तातपयविमा। तत्यान्वयप्रतीताबेव परिचयात्। न लक्षणाामा। सुख्यार्थ-
यत्पर: शब्द:स शब्दार्थ इति यरवद्भिघाव्यापारमेव दीर्वदीर्घमिच्छतापि नैमित्ति- कार्थानुसारेग निमित्तानि कर्ण्यन्त इति निमित्तपरिकल्पनेऽपि सम्रेवेयं प्रक्रियानुसरणी- यैवत्युभवयापि सिद्ध एव् व्यअ्ञनव्यापारः। एतच्च गहनगहनमिति मनागेव सिद्धरस- न्यारयनेहोकतलू।
जा शक्ति [इस शब्द से यह अर्थ विदित हो ऐसे ] संकेत के सधे अर्थ का ज्ञान करातीं है उसे अिधा कहा जाता है। सामान्य (त्वस्व-) रूप से (अलग-अलग) उपस्थित अर्थों का (कर्तृषानलादिरुप से) परत्पर अन्वित स्थिति में विशेष (कर्तृत्वादि की आश्रयता आदि रूप) अर्थ का म्ान कराने वाली शक्ति तात्पर्य कहलाता है। रक्षणा वह वत्ति है जो सुख्य अर्थ के वोष आदि सहकारी कारणों के आधार पर अर्थ का ज्ञान कराती है। इन तीनों से उत्तीर्ण अर्थाद तीनों से मिनन। उदाहरणार्थ जैसे "गंगा पर घोप" यह वक्य। इसमें गंगाशब्द और घोपशब्द कमशः सामान्य (असंबद्) जल प्रवाह और गृहसमुदाय रूपी अर्थो में संकेतित है, क्योंकि शब्द की प्रवृत्ति सामान्य अर्थ की ही ओर होती है। यदि विशेष (संबद्ध) अर्थ में संकेत माना जाव तो अनन्त संकेत मानने होंगे (क्योंकि संदन्ध अनन्त होते हैं) और उतने संकेत मानने पर भा कुछ (नष, दूरस्थ और अनुत्पन्न) अर्थ अविदित ही रह जार्बेंग ( क्योंकि संकेत केवल सामने विद्यनान अर्थ में ही किया जा सकता है)। इस प्रकार अभिधा के द्वारा केवल जलप्रवाह और गृहतनुदाय का ज्ञान हुआ। यह हुई ज्ञान की प्रथम कक्षा। अभिया इतना अर्थ मतलाकर और कोई अर्थ नहीं वतला सकती। "अभिधा यदि विशेषण का ज्ञान करा देती है तो फिर वह विशेष्य का ज्ञान नहीं करा पाती क्योंकि (वह एक व्यापार है अतः) इसके एक वार रुक जाने के बाद उसकी पुनः प्रवृ्ति संभव नहीं।" सामान्य विशेष से रहित नहीं रहते अतः वे विशेष का ज्ञान कराते ही हैं।" यह एक माना हुआ सिद्धान्त है। इसके आधार पर (अभुंबद्ध और) साधारणरूप से उपस्थित गंगा और वोप आदि तालर्यशक्ति के द्वारा परस्पर में संवद्ध गंगा और घोप आदि का ज्ञान कराते हैं। यह हुई (संबद्ध अर्थो के ज्ञान की) दूसरी कक्षा, किन्तु (नंगा का अर्थ) जल- प्रवाह घोष का आधार वन नहीं सकता, यह प्रत्यक्षप्रमाण से वाधित है, इसलिए गंगाशब्द (वोप) के अधिकरण वनने योग्य तटरूपा अर्थ को लक्षणा द्वारा प्रस्तुत कराता है, यह हुई सीसरी कक्षा इनमें जो लक्षणा है वह "मुख्यार्थबाय, मुख्यार्थसंबन्ध तथा रूढि और प्रयोजन में से कोई एक, इस प्रकार तीन की सदायता से जो व्ति दूसरे अर्थ का ज्ञान कराती है उसे लक्षणा कहा जाता है यह वस्तुतः है तो मुख्यार्थ का व्यापार किन्तु माना जाती है मुर्यार्थवाचक शब्द में" (का्व्वमकाश २उ०)। इस नियम के अनुसार सुख्यार्थवाधादि तीनों के जुटने पर ही अर्थज्ञान कराती है। इन तीनों में जो मुख्यार्थनाथ है वह नब्दप्रमाण से मिन्न प्त्यक्षप्रमाण से प्रस है। इसीे प्रकार (गंगाप्रवाह और तट आदि का सामीप्यादि संबन्ध भी प्रत्यक्षादि प्रसाणा- न्तरों से ही जान लिया जाता है। किन्तु यह जो (गंगागत) शैत्यपावनत्व की घोष में प्रतीति होनी है वह न तो किसी शब्द से ही कही आा रही है और न किती अन्य प्रमाण से ही जानी जा सकती, अतः प्रदन उठता है कि उसकी प्रतीति कैसे होती है। प्रत्यक्ष से ही उसकी पतीति नहीं मानी जा सकती। क्योंकि यह नहीं माना जा सकेगा कि [ गंगा आदि ] से ही उसकी
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पनीति हो रही है [ जो कि अनुभव सिद्ध है]। साथ ही प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति शब्द प्रमाण से विदिन, होने वाले अर्थ में नहीं होती (क्योंकि शब्दपमाण से तभी अर्थशान कराया जाना है जब वह अन्य किमी प्रमाण से समव नहीं होता=अनन्यलभ्यो हि शव्दार्थ। उसकी प्रनीति अनुमान से भी नही होती क्योंकि गगापवाह का तट से या घोघ से जो सबन्ध है वह सामी्यरूपी सबन्ध है और मामीप्यसबन्ध मे गगाप्रवाह्गत उैत्यपात्रनत्व या तट या घोष में पहुचना सभन नहीं, जत तट, धोष और शैत्यपावनत्वादि में ऐकान्तिकता (व्याप्तिमनन्ध) नहीं है (फनन. अनुमान से शैत्यपावनत्वादि की प्रतीनि समव नहीं) धोप में मैत्यपावनत्वादि का स्मृति रूप ज्ञान भी नहीं है क्योंकि (स्मृति अनुभूनपदार्थ की होनी है और सुनने वाल व्यक्ति को घोप में) उस त्य- पावनत्व) का अनुभव नहीं रहता। यदि सेत्यपावनत्वादि का ज्ञान स्मृतिरूप भी होता तो कभी- कभी ऐमा भी होता है कि गगादिशब्दों को मनने से सैत्यपावनत्वादि का ज्ञान कभी नहीं भी होता (कर्योकि स्मृति सदा हो ही ऐसा नहां, वह कभी नहीं भी होती, जन कि सैत्यपावनत्वादि की प्तोनि नियमत होती ही है) फिर यह क्या बात है कि किसी शब्द से कोई ही अर्थ विदिन होना है (अर्थान गमाशब्द मे शैत्यपावनत्व ही और 'कुन्ना प्रविशन्नि'-में कुन्तशब्द से पुम्प में तीकष्गत्व ही)। इसलिए यही मानना उचिन है कि अत्यपावनत्वादिमयोजनीभूत अर्थ के ज्ञान मे गगादिशब्द ही कारण है और उन्ही के किमी व्यापार से उस अर्थ का ज्ञान होता है कर्योंकि शब्द बिना व्यापार के अर्थ का ज्ञान नहीं करा पाना। ( जहाँ तक उम व्यापार का सवन्न है) वह अमिरा नही कहा जा सकना क्योंकि (गगादि) शब्द का उम (अैत्यादि) अर्थ में सकेत नही रहता, न वह तात्पर्यरूप है क्योंकि तात्पर्ये केवल पदार्थमन्तन्ध का ज्ान कराना और उनने में ही समाप्त हो जाता है (आगे नहीं बडता)। न वह व्यापार क्षणारूप ही है क्योंकि इम अर्थ- ज्ञान में (लक्षणा के हेतु) मुख्यार्थंवाधादि नहीं होने। इमलिए (प्रयोजनस्वरूप यह अर्थ व्यन्य होता है और) अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा से भिन्न चततुर्थ कक्षा मे अवस्थिन (इस) व्दग्य अर्थ की प्रनीति कराने वाला व्यअ्ञनानामक व्यापार अभिहितान्वयवादी को अवद्य ही मानना पटना है [ उक्त क्रम के अनुसार जो पहले वाक्य के प्रत्येन शब्द से अभिषा द्वारा उसके अमबद्ध अर्थ का ज्ञान मानता है और वाद में नात्पर्यद्वारा उन सब अर्थो का सवन्य ]। जो अन्विता- मिधानवादी है (अर्थात पदार्थों का स्न्ध पहले और उनमें से प्रत्येक का अमिया द्वारा ज्ञान दाद में मानता है अर्थान जिसके मन में परस्पर सबद्ध अ्थों में ही अभिय। होती है फल्त जो वाक्य में अभिधा मानता और वाक्यार्थ को वाच्य अर्थ मानना है) उसे मी अभिहितान्वयवादियों के सण्टन में प्रस्तुन मारा आपत्ियाँ स्वीकार करनी होगी, (उनका उत्तर उसके पाम भी नहीं है, फलत उसे भी व्यअ्ञनानामक अतिरिक्त शब्दव्यापार मानना पड़ेगा। क्योंकि वह यह सिद्धान्त स्वीकार करता है कि अन्तिम अर्थ तक शब्द की (अभिधा क्षध्वसी नहीं, अपितु विवक्षिन अर्थ की प्रतीति के क्षम तक प्रवृत्त रहती है और वह दृष्ान्न देता है (किमा बनधवान् व्यक्ति के द्वारा रात पर छोडे गर उस) वा का जो अपनी एक हो गति में शत्रु के कवच का भेद, त्वचा का विदारण, हृदय का छेदन और प्राणों का हरण, ये सब कार्य करता है। उमे उपर्युक्त आपत्तियों इमलिम स्वीकार करनी होगी कि वह यह मानता है कि) "नैमित्िक के अनुमार निमित् की कल्पना की जाती है' (यहाँ नैमित्तिक हे यैत्यपावनत्वादि का ज्ञान, उसकी प्रनीति निश्चिन ही गगा शब्द से होती है और गगा शब्द तात्पर्य या अभिधा, कि्मा भी अन्य व्यापार के द्वारा उपर्युक्त कठिनाइयों के कारण उस सौत्यादि प्रयोजन का ज्ञान नही करा एकता फ्ठन. उसे तदर्थ नयञ्जना हा स्वाकार करनी पटती है।) इस प्रकार अभिहितान्वय की प्रक्रिया से शब्दबोध
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भूमिका
माना जाने या अन्विताभिधान की प्रक्रिया से, लक्षणा में प्रयोजनञ्ञान के लिए व्यअनान्यापार मानना हो पड़ता है। यह विषय (अर्थात व्यखना की सिद्धि) अत्यन्त ही गहन और गंभीर है- ठीक वैसे ही जैसे (आयुर्वेद में मारद आदि को मूच्छित कर उसका) रस वनाना (किन्तु जैसे कोई किसी अन्य के द्वारा वना चनाया रस किसी के लिए तुलभ करदे उसी पकार हमने भी यहाँ सरलता के साथ व्यअनासिद्धि की प्रक्रिया प्रस्तुत कर दो है, क्योंकि ध्वनिवादी आचार्यों (आनन्द- वर्दन, अभिनवगुप्त और मम्मट) ने इस विषय को पर्याप्त स्पष्ट कर दिया हू। विमर्श :- इस संपूर्ण अ्करण के लिए काव्यप्रकाश के द्वितीय तथा पंचम उल्लास देख लेन चाहिए। हमने इन्हीं के आधार पर कोषक में स्पर्ष्टीकरण कर दिया है। विमर्शिनी आदिशब्द्रा्मत्याय नाव गमनादीनामपि ग्रहणस्। अवस्येति। तेन विना व्यङ्कयस्थार्थ स्यासंग्रहणात्। व्यापारस्वेति। व्यक्षनात्मिकायाः करियाया इत्यर्थः। सा खल साध्यमान- त्वेन पूर्वापरीभृतावयवत्वान्न स्वरूपेणोपलभ्यत इति विचारपदचीमेव स्वयमुपारोढे नोत्सहत इति कर्थ नाम तस्या वाक्यार्थत्वं स्यादिति भावः1 यद् वचमति-'व्यापारस्य विषयमुखेन स्वरूपप्रतिलम्भाद तत्माधान्येन प्राधान्यात्स्वरूपेण विचार्यत्वाभावाद विषय स्यैव समग्रभरसहिप्णुखम्'इति। उपस्करतव्यत्वेनेति। तत्परतयावस्थानेनेत्यर्थः। यदुकम्- 'वाच्यवाचकचारतव हेतूनां विविधात्मनाम्। रसादिपरता यत्र स धवनेविपयो मतः ॥'इति। अत एन विश्रान्तिधामत्वावित्युक्तम्। आत्मत्वमिति। सारभूतत्व मित्यर्थः। अतश्र तेन विना काव्यं काव्यमेज न स्यादिति तात्पर्यस्। नहि निर्जीवं शरीरं काप्युपयुक्तम। ननु यद्यव सहिं 'गङ्गयां घोप:' इत्यवापि व्यङ्गचस्य सद्वावात् काव्यत्वं प्रसव्यते। नैतनू। दह यद्धदात्मनो व्यापकतारीरे घटानी वर्तमानत्वपि करणादिविशिष्टे शरीर एव जीवव्यवहारो न घटादौ, तहदस्यापि विविधसुणालंकार।चित्य चारुशव्दार्थशरीरगतत्वेने- वात्मत्वव्यवहारो नान्यत्रेति न कविद्दोपः। ननु च सर्वत्र कियाया एच प्राधान्यं प्रसिद्धम्, इह पुनर्विषयस्योक्तमिति किमेतदित्याराङ्मयाह-व्यापारत्येत्यादि। विपयमुखनोते। थथा होदनादेविक्ित्यादिमुखेन पाकादेः क्रियाया स्वरूपोपलम्भः । तत्परायान्येनेति। विषयप्रधानत्वनेत्यर्थः। तेन व्यापारस्य आधान्यसुपचरितमिति भाचः। त्वरपेणेति। स्वरूपं हिं तस्य साध्यमानत्वाद् विचारयितुमशक्यम। सिद्धस्य हि विचारो सवतीति भावः। एवकारो व्यक्षनव्यापारव्यवच्छ्ेदकः। समन्रति। समग्रस्थ भरस्थात्मेति व्यवहारादे: सहन शीलत्व मित्यर्थः। एतदेवो पर्सहरति-तस्मादित्यादिना। यस्येति। व्यङ्ग्- नाम्नो रसाद्यात्मनो विषयस्य। गुणालंकारकृतचारुत्वेवि । गुणानां- 'ये रसस्याङ्गिनो धर्माः शौर्यादय दृवात्मनः। उत्कर्महेततवस्ते स्युरचलस्थितयो गुणाः ॥'[का० प्र० ८] इत्यादिनीत्या साक्षादेव तदमखात। अलंकाराणामपि- 'उपकुर्वन्ति तं सम्त येञद्रह्वारेण जातुचिद्। हारादिव दुलंकारास्तेऽनुप्नालो पमादयः ॥'[ का० ग्र ८] इत्यादिनीत्या शब्दार्थलत्तणाङ्गातिशयह्वारेण तदुपस्कारकत्वाद् । अलंकाराणां च रसादिरूपं व्यङ्गयमर्थमलंकुवतां मुख्यया वृत्यालंकारत्वम्, अलंकार्यसन्ावनिबन्धन- **
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३२ रवत तस्य, रसाद्यात्मन एव च व्यतयस्यालकार्यल्षेन प्रतिष्टानात्। अत एव य यत्र स्फुट । व्यभ्वचार्थरहितत्वं तत्र 'गुनहृत्या पुनस्तेपं वृत्ति शब्दार्थयोर्मना' [कप्र०८] इस्यादिनीत्या शब्दार्थमात्रनिबन्धनत्वेनोकिवे चिन्यमाव्पर्यव सितत्वादपा गौणमलंकारत्वम्। यद्भि- प्रायणैव च चितरार यकाव्य मेद प्रकारत्वमरकारामा निस्पयिव्यते। अत पवानुप्ासादयो- इउंकाराक्षित्रमित्याद्यन्यरुक्तम्। म च प्रतीय मानो्यों यद्यपि वस्बलकाररसरेन त्रिविध, तथापि [तेन विना काव्यात्मन्याभावाद] सुर्यतेन रसस्यवात्मत्व युक्तम। अतश्ष वस््लंकारयोर्य दुलंकारपन्तनिनिस्त्वमन्यैकष्क्त नत्तायदास्ताम, काव्यात्मनो रसस्य पुनरलंकारत्वमत्यन्तमेवावाच्यमिन्याह-रमादय इत्यादि। आदिग्रहणाद भावतदाभासा- दीनां अह्दगम्। न वाच्या इति। चननुमयुक्ता एवेत्यर्थ.। अलकार्यस्यालकारत्वानुपपते। तस्य चालं कारख कथनेSल कार्यान्तरं प्रसज्यते। तेन विनालकाराणामनुपपत्ते। पतदवो- पमंहरति-वस्मादित्यादिना। व्यहथ इति रसादिरूफ। तस्यैयोपक्रान्ततवातू। वाक्यार्थीभून इनि। अवाक्यार्थीभूसस्तु रसादिरलकारोऽपि म्याद्। यदुक्तम्- 'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थ यब्राद्ग तु रसाद्य.। कान्ये तस्मिळलंकारो रसादिरिति मे मति. ॥'ददति। एनच्च रसवदादयलकारप्रस्ताव एव निर्णेध्याम। इतिशब्द: प्रमेयपरिसमासी। पतदेव युक्कमियाह-एप एवेत्यादि। सर्वरिति। अवाक्यार्थविद्विरसहृदयप्रायरित्यर्थः। पक्षानरम्येनि। तत्र तावदाच्यनाचकमावाधयिणामलंकाराणा मध्ये व्यन्खव्यक्रभाव- समाश्रयेग व्यवस्थितत्वादस्यान्नर्भावो न युक्त। यदुक्म्- व्यद्न यव्य अ्षकसबन्घ निबन्धनतया घ्वने । वाच्यवाचक चार्व हेत्वन्त पनिता कृत. ॥'इति। रद्षगायामप्यस्यान्तर्भावो न युक । नदसद्वावेस्य सद्वावान् तत्सद्वावे चास्यासद्वा वात्। यदुक्म्-'अतिव्याप्ेरथाव्याप्तेरन चामी उपयते तया' इति। नाप्यस्थालन्षगीयत्वं युक्तम- 'यत्रार्य शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीऊतस्वायी। व्य इक्त' काव्यविशेष' म ध्वनिरिति सूरिभि कथित. ॥'इि।
("वननदोननादि०" में जाए) आदि शन्द से ग्रत्ययायन, जवगमन आदि नाम दिए जा सकने है। अवध्य अर्थात् व्यजनव्यापार के बिना व्यग्य अर्थ का क्षान सम्भव नही। व्यापार (व्यापार नधन नहां हो मकता नर्थात) व्यजनारूप जो करिया ह (वद प्रधान नही हो सकता)। क्योंकि किना का अर्ध यहा मान्यमान क्रिया ह (पाकशन्दादिप्रनिपाय सिद्ध क्ञिया नहीं) और साध्य किया एक के बाद एक करके अनेक अश्यव होने है (जैसे पचन करिया में (१) आग जहाना (२) अन चूल्हें पर बढाना और (३) उनारना आदि) इमलिए इसको अपने आपमे डछ नही जा सकता, (अन्न दकता है इमलिए उमके आधार पर हुए सारर अचयन मनुदाय को पचन किया कहना ममन है) ऐमा म्थिति (अवादि विषयो से निरपेश होकर पाकादि किया) अपने आप में वाक्यार्थ केने कही जा सकती? इसी बान को यहीं कडेंगे भी कि व्यापार विषय के द्वारा स्वरूमलाम करता है, और उम [विषय] के प्रवाद होने पर हो प्रधानना प्राप्त करना है, अलग से उस [व्यापार] पर विचार
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भूमिका ३३
करना संभव नहीं होता, इसलिए सारा दारमदार विषय पर ही निर्भर रहता है।" उपरकर्तव्य = (व्यंग्य उपस्कार्य होता है और गुण तथा अलंकार उपस्कारक वहां) उपस्कार्य का अर्थ है गुण तथा अलंकारों का व्यंग्य के लिए होना जैसा कि (आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोककारिका में कहा है)-"ध्वनि वहां होती है जहां अर्थ और शब्द की सुन्दरता के (गुण अलंकार आादि) विविय हेतु इसके लिए होते है (न कि यह उनके लिए)। इसी लिए उस (व्यंन्य) अ्थे को ही विश्रान्तिधाम कहा। आत्मत्व=सारभूतत्व, और इसलिए निष्कर्ष यह निकला कि उस (व्यंग्य) नर्थ के बिना काव्य काव्य ही नहीं हो पाता। ऐसा कहीं नहीं देखा गया कि जीवात्मा से रहित शरीर का उपयोग (व्यक्ति के रूप में) किया जाता हो। अश्न यदि ऐसा है तो गंगा पर घोप" वाक्य भी काव्य होना चाहिए, क्योंकि यहां भी शैत्वपावनत्वादि व्यंग्यार्थ है। उत्तर= जी नहीं। जिस प्रकार धटादिरूप शरीर में आत्मा का अस्तित्व (माना जाता है क्योंकि आात्मा न्यापक है तथापि जीव केवल उसी शरीर को कहा जाता है जिसमें भात्मा के अतिरिक्त इन्द्रिय प्राण आदि भी हों, घट आदि को नहीं, उसी प्रकार व्यं्य भी (जीवात्मा के समान काव्य की) आान्मा तभी माना जाता है जब वह विविध गुण औोर अलंकार के मौचित्यपूर्ण, अत एव सुन्दर शब्दार्थरपी (काव्य) शरीर में प्राप्त हो, अन्यत्न (गुणादिशून्य 'गंगा में घोप आदि लौकिक वाक्यों में। नहीं। इसलिए (व्यंग्यार्थयुक्त लौकिक वाक्य और उसके अर्थ को भी कान्य मानने का कोई दोप नहीं आता। 'व्यापारत्य विषयमुखेन' इत्यादि = इस शंका के उत्तर में कहा जा रहा कि "व्याकरण शास्त्र आदि में सर्वत्र व्यापार का ही प्रधान माना जाना प्रसिद्ध है किन्तु यहां विषय की पधानता बतलाई जा रही है-"यह विपम मान्यता क्यों? विपयमुखेन जैसे पाकादि क्रिया पाकादि शब्द से तब पुकारी जाती है जब वह भात आदि विषय में विक्लित्ति (वह विकृति जिसमें चावल भात रूप प्राप्त करता है) उत्पन्न करता है। तत्प्राधान्य=उसका अर्थाद विषय का आधान्य। इससे यह सिद्ध होता है कि व्यापार की प्रधानता औपचारिक है। त्वरूपेण=व्यापार (क्रिया) का स्वरूप ती साव्यमान है, सिद्ध नहीं, अतः उस पर कोई निर्वचन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता? क्योंकि विचार सिद्ध वस्तु का होता है। "विषयस्यैव" में "एव" शब्द के द्वारा व्यंजना = व्यापार का निराकरण किया गया। समग्र०=सारा भार अर्थात आात्मा जीवित, जीवातु आदि सारे व्यवहारी को पचाने की क्षमता। इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं-तत्मात इत्यादि। यस्य अर्थात व्यंग्यनामक-रसादिरूप विषय का। गुणालंकार कृतचारुतव = गुण (काव्यप्रकाशकारिका ८-)"आत्मा के शौर्व आदि धर्मों के समान जो प्रधान रस के धर्म हैं, जो सदैव (रस में चमत्कार का) उत्कर्ष ही करते हैं और (रस को छोढ़) अन्यन्न नहीं रहते वे गुण कहलाते है इसके अनुसार साक्षात (न कि परम्परया) रसवर्म हैं। अलंकार भी (काव्यप्रकाशकारिका ८-) "रस यदि काव्यवाक्य से प्रतीत हो रहा हो तो जो (साक्षात नहीं अपितु) अंग (वाच्य आदि) के द्वारा उसका चमस्कार कदाचित (सदा नहीं) बढ़ाते हैं वे अनुप्रास उपम्ा आदि तत्व्र हार भादि के समान अरंकार कहलाते हैं-"के अनुसार शन्द और अर्थ रूपी अंगों में विशेपता लाकर उनके द्वारा (न कि साक्षात) रसका उपस्कार कहते हैं। अलंकार तभी अलंकार कहलाते हैं जब वे रस आदि व्यंग्य अर्थ की शोभा बढ़ाते हैं, क्योंकि अलंकारों का अलंकारत तभी संभव है जय कोई अलकार्य हो और अलंकार्य केवल रसादि व्यग्य अर्थ ही माने जाते हैं इसीलिए जहां कोई र्पष्ट न्यंग्य अर्थ नहीं रहता वहां अनुपास उपमा आदि शब्द और। अर्थ तक सीमित रहते हैं, इसलिए उनसे उत्ति में ही वैचित्य संपादित हो पाता है फलतः उनमें अदंकारत्व ठीक उसी प्रकार औपचारिक ही रहता है जिस प्रकार (काव्यप्रकाशकारिका २ अ० स०
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८ा ७१ "गुणवृश्या-इत्यादि के अनुमार) रसकधमें गुणों का नीरस काव्य में गुगत्व। और इसी अभिप्राय से अलकारों को चित्र नामक (अथम) काव्य का भेद बतलाया जावेगा। और अन्य (ध्वनिकार आदि) आचार्यो ने भी अनुप्रास आदि को "चित्र" कहा है। वह जो प्रनीयमान अर्थ है वह वस्तु, अलकार और रस इम प्रकार यद्यपि माना तो तीन प्रकार का गया है तथापि वस्तुन रस को ही काव्यात्मा मानना उचित है क्योंकि रस ही तोनों प्रतीयमाना में प्रमुख है। इसलिए वस्तु और अल्कार को जो अलकार कोटि में रसने का प्रयास अन्य आचार्यों ने किया है (है तो वह भी अनुचिन किन्तु यदि) उसे छोट भी दिया जाय नत भी रस को तो अलकार दिलकुल ही नहीं कहा जा मकता। इस अभिप्राय से कहते हैं= "रमादि" इत्यादि। आदि पद भाव और रसमास तथा भावामास आदि का सग्राइक है। न वाच्याः= वाच्य कहना अनुचिन है क्योंकि अलकार्य अलकार नहीं हो सकना। यदि उसे अलकार कह दिया जाय तो अटकार कोई और पदार्थ को मानना होगा, क्योंकि उसके बिना अलकार अलकार नहीं कहे जा सकेंगे। इसी का उपसदार करने कुछ कहते है-"तरमात्" इत्यादि। व्यग्य अर्थात रसानिरूप क्योंकि विचार उसी का चल रहा है। वाक्यार्थीभूत अर्थाव जो रस आदि वाक्यार्थीभूत नह्ीं होते वे कदाचित अल्कार भी हो सकने हैं जैसा कि (ध्वनिकारिका २14) कहा है-'जहा प्रधान और वाक्याथोंभून कोई अन्य तत्त्व हो और रस आदि अग या अप्रधान हो। हमारे मन में उस काव्य में रसादि को अलकार मानना उचित है।" इम विषय को इम रसवद् आदि अनकारों के प्रसग में तय करेंगे। इति-शब्द है प्रमेय (सिद्धान्त) तत्त्व की पूर्ना का घोनक। यही पक्ष ठीक है ऐेमा कहते हैं-'एप एव' इत्यादि द्वारा। सरबैं = सवों ने अर्थात् उन मवने जो वाक्यार्र का ज्ञान नहीं रसते अन जो प्राय महृदयताशून्य हैं। पक्षान्तरस्य दूसरे पक्ष (प्रतिष्ठिन नहीं हो पाने क्योंकि उन पक्षों) में प्रधानना है अल्कार की जो अर्थ और शब्द तक सीमिन रहते है जन्र कि व्यग्यपक्ष व्यग्यव्यजकमाव पर निर्भर है अन उनमें व्य्यपक्ष का अन्नर्माव समव नहीं। जमा कि (ध्वनिकारिका १। में) कहा है-"व्वनि व्यग्यव्यजकमदन्ध पर निर्मर है। उसका वाच्यावाचकों के शोभाधायक धर्म अलकार आदि में अन्तर्माँव हो कैसे सकता है।" लक्षणा में भी इनका अन्नर्माव मानना ठीक नहीं क्यांकि (रस आदि विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि में) दक्षगा नहीं रहती किन्तु ध्वनि रहनी है और (लावण्य आदि रूढिलक्षणावाले जिन स्थें में) लक्षणा रहती है वहा ध्नि नहीं रहनी। जैसा कि (धनिकारिका १। १४) में कहा है-"हक्षणा ध्वनि का क्षण भी नहीं हो सकती कर्योंकि वैमा मानने पर (उपर्युक्त ढग से) अनिव्यापि और अव्याप्ति दोप आने है।" किन्तु इमका यह अर्थ नहीं किया जाना चाहिए कि ध्वनि का लक्षण ही नहीं किया जा सकना क्योंकि (ध्निकार आनन्दवर्षन "जिममें शब्द द्वारा उसका लक्षण) उपसजेनी- कृतार्थ होकर तथा अर्थ उपसर्जनीकृत होकर उस प्रतीयमान अर्थ का प्रतिपाठन व्यजनापार से करते ह उम विशिष्ट काव्य को विद्वाञ्जनों ने ध्वनि कहा है।"-इम प्रकार (कर दिया गया है)। इम प्रकार इन तीनों (अर्थात ध्वनि का अभाव, उसका लक्षणा आदि में अन्नर्भाव और समकी अलक्षणोयता) अनुपपत्तियों का निराकरण प्रस्तुन किया गया है। विमर्शिनी इदानीमन्योऽपि य: कश्विद्विप्तिपत्तिपकार कैथिदुक्त सोऽपि नोपपद्यत इग्याह- यसत्त्यादि। अब और भी ओ विमतिपत्तिया अन्य आलकारिकों द्वारा प्रस्तुत की गई है वे भी सिद्ध नहीं होती इस तथ्य के प्रतिपादन के लिए अगला ग्रन्थ "यत्त" आदि प्रस्तुन करते है।
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भूमिका ३५
[सर्वस्व ] यन्तु व्यक्तिविवेककारो वाच्यस्य प्रतीयमानं प्रति लिङ्गतया व्य- जनस्थानुमानान्तर्भावमाख्यत तद् वाच्यस्य प्रतीयमानेन सह तादात्म्य- तद्ुत्पत्यभावादविचारिताभिधानम्। तदेतत्कुशाग्रधिषणैः क्षोदनीय- मतिगहनमिति नेह प्रतन्यते। व्यक्तिविवेककार (महिममट्ट) ने जो वाच्य अर्थ को हेतु और प्रतीयमान अर्थ को साध्य मानकर व्यंजनाव्यापार का अन्तर्ांव अनुमान में बसलाया है वह विचार कर कही गई बात नहीं है क्योंकि वाच्यका प्रतीयमान के साथ न तो तादात्म्य संबन्ध ही है और उत्पाद्योत्पादकभाव संबन्ध। इस विषय पर अत्यन्त सूक्ष्म प्रशा वाले सहृदयों को विचार करना चाहिए क्योंकि यह विषय अत्यन्त गहन है। इसी लिए हम इसका विस्तार यहाँ (जहां ध्वनि और उसके विरोध की आनुषंगिकमान्रहै) नहीं करते। विमर्शिनी ध्वनिकारानन्तरभादी व्यक्तिविवेककार इति तन्मतमिह पश्चान्निर्दिष्टम् यद्यपि बक्रोकि जीवितहृद्यदर्पणकारावपि ध्वनिकारान्तरभाविनावेव, तथापि तौ चिरन्तरमतानुथायि- नावेति सन्मतं पूर्वमेवोद्िष्टम्। अनेन पुनरेतत्स्वोपज्ञमेवोक्तम्। अनुमानान्तर्भावमिति। अनुमानरूपत्चमेवेत्यर्थः। आख्यदिति। वद्दाह- 'वाच्यस्तदनुमितो वा यत्रार्थोडर्थान्तरं प्रकाशयति। संवन्धतः कृतश्चित् सा काव्यानुमितिरित्युक्कता॥ इति। अविचारिताभिधानमिति: इह लिङ्गविद्ञिनोस्तादाव्यतदुत्पत्तिभ्यामेव तावत्प्रतिबन्धो निश्चीयते। तन्निश्चयेनव च साध्यसिद्धिः। अन्यथा हि साध्यसिद्धिर्न स्याद्व्यभिचारात्। तन्न तादाल्यं यथा कृतकत्वानित्यत्वयो:। तदुत्पत्तिर्यथा वहनिधूमयोः। वाच्यमतीय- मानयो: पुनस्तादाल्यतदुत्पत्ती न स्तः। तथाहि- 'निःशेपच्युतचन्दनं स्तनतटं निर्मृष्टरागोऽघरो नेत्रे दूरमनसने पुलकिता तन्वी तथेयं तनुः। सिध्यावादिनि दूति ब्ान्धवजनस्याज्ञातपीढागमा वापी स्नातुमितो गतासि न पुनस्तस्याधमस्यान्तिकम्।' इत्यन्न विधिना निपेधो निपेधेन वा विधि: पतीयते। न तस्य वाच्येन सह तादा र्यम्। विरुद्त्वात्। नह्यभावो भावात्मा भावोऽप्यभावात्मा। नापि तदुत्पत्तिः। अभावस्य जन्यजनकत्वानुपपत्तेः। नापि निःशेषच्युत्तचन्दुनादीनां विशेषणानां तदन्तिक गमनानुमापकत्वं युक्तम, तेषां स्नानादावपि सव्वावादनकान्तिकत्वात्। एतच् ध्वनि- कारेणादूपितत्वाद्ग्रन्थकृता स्वकण्ठेन दूक्तिम्। अत एवानेनान्या विप्रतिपत्तयो न दूपिताः । एतदिति। वाच्यस्य प्रतीयमानेन सादात्म्यतदुत्पत्यभावादि नेह प्रतन्यत इति व्यक्तिविवेकविचारे हि मयैवैतद्वितत्य निर्णीतमिति भावः। न्यक्तिविवेककार ध्वनिकार (मानन्दवर्धन) के बाद हुए हैं इसलिए उनका मत यहाँ (ध्वनि- कार के मत के) वाद में वतलाया जा रहा है। यद्यपि वकोकिजीवितकार (कुन्तक) तथा हृदय-
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दर्पणकार (भटटनायक) भी ध्वनिकार के बाद के ही हैं तथापि वे प्राचीन आलंकारिकों के मनों के ही अनुयायी है इसलिए उनके मत (ननिमन के) पहले ही बनला दिए गए। इन्होंने (व्यक्तिविवेककार ने) जो पूर्वोक्त मत प्रस्तुन किया है वह उनकी अपनी ही सुझ है। [ यदयपि ध्वन्यालोक के तृतीय उद्योन में भी अनुमान और व्यजना के अमेद की चर्चा है, तथापि स्वनन्त्र ग्रन्थ के रूप में पहिली बार प्रस्तुत करने के कारण व्यक्तिविवेककार ही इस मत के प्रवर्तक मान लिए जाते है] अनुमानान्तर्भाव=व्यजना को अनुमानरूप ही, भाख्यत्-बनलाया है जैमा कि कहा है- "वाच्य या उससे अनुमिन अर्थ वहा दूमरे अर्थ का अनुमान किमी भी सबन्ध से कराते ह उमे काव्यानुमिति कहने है।" (व्यक्तिविवेक-पृ० १११, चौसभा सस्करण-२)। अविचारिना- भिधानम् = विना विचार कही गई वात। हेतु और साध्य का जो व्यापितसबन्ध ह वह केवल दो ही सबन्धों से निर्णोत होता है (१) तादान्म्य और (२) उत्पाद्योत्पादकत्व। व्यापिनिश्चय से ह। साध्य की सिद्धि होती है। व्याप्तिनिश्चय के अभाव में साध्य की सिद्धि नहीं होती क्योंकि वहाँ जहाँ व्याप्तिनिश्चय नहीं रहता द्वेतु व्यमिचरित (साध्य से अमबद्ध भी) रदता है। दोनों सबन्धों में से तादातम्य जैमे-कृतकत्व (निर्मिनत्व) और अनित्यत्व का। (जो बनाया जाता है वह निश्चित ही अनित्य होता है जैमे घडा।। (और) उत्पाद्योत्पादकत्व जैसे-धूम और अग्नि में (धूम = उत्पाद, जन्य, कार्य और अग्नि उसका उत्पादक, जनक, कारण)। वाच्य और प्रतीयमान अर्थों में न तादाल्म्य है और न उत्पाद्योत्मादकभाव। जैमे-"ह दूत्ति तू झूठ बोलती है। तुझे अपने की पीर नहीं। तू उस अथम के पास थोटे ही गई थी। तू तो यहाँ से वावडी नहाने गई थी। देस नेरे ऑचरों के उतार का चन्दन पूरी तरह झट गया है, तरे अधर की गरू विलकुल पुछ गई हे, आसों का काजल आमपास से एकदम मिट गया है और तेरा पूरा-अग पुलकिन हो रहा है।' यहाँ इस (नायकमनुक्ता दूती के प्रति सिन्न नायिका की) उक्ति में (वापीसान के) विधान (रूपी वाच्य अर्थ) से निषेध और (नायक के पास जाने के) निपेध (रूमी वाच्य अर्थ) से विधान (व्यजना से) प्रतीन होता है। उस (व्यग्य निषेध या विधान) का वाच्य (विधान या निषेध) मे तादात्म्य नहीं है क्योंकि दोनों परस्पर विरुद्ध है। ऐमा थोडे ही होना है कि अमाव भावरूप हो जाय और भाव अभावरूप। न नो (वाच्य मे) उस (व्यव्य) की उत्पत्ति की होती (अत. उनका उत्पाद्योत्पादकत्व सबन्ध ही है। परस्पर विरुद्ध (अन्योन्याभाव वाले) पदार्थों में (उत्पाद्योत्पादकत्वरूप) अन्यजनकत्व नहीं रहता। न तो 'निशशेषच्युन- चन्दनत्वादि विशेषणों मे "नायकान्तिक गमन" आदि का अनुमान ही हो सकता क्योंकि वे विशेषण पदार्थ (नायकान्तिकगमनादि से भिन्न) वापीसान आदि से मी समव हैं अत (नायिकान्निक -- गमनादिसाध्यों से) ऐकान्निकरूप से सवद्ध नही है। परवर्चों होने से) इस मत को ध्वनिकार ने स्वय दूपित नहीं ठद्दराया था इमलिए अन्यकार ने अपनी ओर से उसे दूपित ठदराया। यह इसमे सिद्ध है कि अ्रन्थकार ने अन्य मनों पर अपनी ओर से दोप प्रस्तुन नहीं किए। एनद= वाच्य का प्रतीयमान के साथ तादात्म्यतदुत्पत्त्यादि सबन्धों पर यडाँ कोई विस्तार नही करते कर्योकि उसे दमने अपनी व्यक्तिविवेकटीका में विस्तारपूर्वक तय कर दिया है।' विमर्श-व्यक्तिविदेक पर सस्कृनटीका 'व्यक्तिविवेक्याख्यान' मिलती है जो अलंकारसर्व स्वकार की ही रचना है। त्रिवेन्द्रम् तथा चौसमा सेछपे व्यक्तिविवेकों में यह टीका दी दुई है। इमने व्यक्ति- विवेक के साथ इस टीका का भी विमर्िनी के ही समान हिन्दी अनुवाद कर दिया है। इममे व्यक्ति- विवेककार ने ध्वनितीपों का मन जहाँ-जहाँ सदोष बनलाया है वहाँ ध्वनिकार की ओर मे स्पष्टीकरण
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देते हुए न्यक्तिविवेककार के मत का खष्दन किया गया है। किन्तु यह टीका अपूर्ण ही छपी है। "वाच्यत्तदनुमितो वा" इत्यादि जो कारिका ऊपर उद्यृत है उस पर यह टीका प्राप्त नहीं है। बह प्रथम विमर्श में उसके पहिले ही खण्डित हो गई है। विमर्शिनी सदित्यं परपरिकत्पितसमारोपापसारप्रत्याखयानेन प्रप्तप्रतिष्ठानो ्वनिरित्याह- भस्तीप्यादि। इस प्रकार विरोधी आचार्यो द्वारा उपस्थित आरोपों का निराकरण होने से व्वनिसिद्धान्त प्रतिष्ठित हो जाता है' यह चतलाते हुए किखते हैं- [सर्वस्व ] अस्ति तावद् व्यङ्गयनिष्ठो व्यक्ञनव्यापार। तन्न व्यङ्यस्य प्राधान्याप्रा- धान्याभ्यां ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गयाख्यौ दवौ काव्यभेदौ । व्यक्यस्यास्फुटत्वे- लंकारवत्वेन चित्राख्य: काव्यभेदस्तृतीयः । तन्रोस्तमो व्वनिः। तस्य लक्षणाभिधामूलत्वेनाविवक्षित वाच्यविवक्षितान्यपरवाच्याख्य दा भेदौ। आद्यो ऽप्यर्थान्तरसंकमितवाच्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्यत्वेन द्विविधः। द्वितीयो- प्यसंलक्ष्यक्रमसंलक्ष्यक्रमव्यङयतया द्विविधः। लक्षणासूल: शब्दशक्ति मूलो वस्तुध्वनिः, असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयः अर्थशक्तिमूलो रसादिध्वनिः।
रसादिध्वनिरलंकारमक्जर्या दर्शित:, काव्यस्य शृङ्गारप्धानत्वात् । शिष्टस्तु यथावसरं तन्नैव विभक्तः। गुणीभूतव्यङ्गचो वाच्याऊृत्वादिमेदैर्यथासंभव समासोक्त्यादौ दर्शित: । यह मानने में अब कोंई सापत्ि नहीं कि व्वंजना (भी काव्य का एक त्वतन्त्र) व्यापार है जिसका प्रतिपाद विषय है (प्रतीयमान) ज्यंग्य अर्थ। यह जो व्यंग्य अर्थ है वह (-उसका चमत्कार कहीं) प्रधान होता है औौर (कहीं) अप्रधान फलतः (व्यंग्यार्थयुक्त) काव्य के दो भेद हो जाते हैं (प्रधान होने पर) ध्वनि और (अप्रधान होने पर) गुणीभूतव्यंग्य। जिस काव्य में व्यंग्य अस्फुट (चमत्कारशून्य) होता है वह एक तीसरा भैद भी होता है। उसे चित्र कहा जाता है क्योंकि उसमें अलंकार की ही छटा रहती है। इन तीनों में ध्वनिनामक काव्य उत्तमकाव्य होता है। उसके लक्षण और अमिया के आधार पर क्रमशः दो भेद होते हैं (लक्षणा के आधार पर) अविवक्षितवाच्य (जिसमें वाच्य अपने स्वरूप से उपयोगी नहीं रहता) और अभिषा यानी अभिधेयार्थ के आधार पर) विवक्षितान्यपरवाच्च (जिसमें वाच्य अर्थ वदलता तो नहीं किन्तु वह प्रधान नहीं रहता)। इनमें से दूसरा (विवक्षितान्यपरवाच्य नामक भेद) अतंलक्ष्य- क्मव्यंग्य (जिसमें वाच्य और व्यंग्य की प्रतीति होती तो एक के बाद एक करके है किन्तु लगती वैसी नहीं) और संलक्ष्यकयव्यंग्य (जिसमें वाच्य और व्यंग्य की प्रतीति एक के बाद एक होती हुई ही प्रतीत होती है) इस प्रकार दो प्रकार का होता है। (प्रथम : जो लक्षणामूलक ध्वनि है वह शब्दशक्तिमूलक ही होती है और उसमें ध्वनि वस्तुरूप ही रहती है (रस या अलंकाररूप नहीं)। (द्वितीय का अथम) असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य (नामक जो भेद है वह), अर्थशक्तिमूरुक
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होता है और (वहाँ ध्वन्यमान अर्थ रस आदि स्वरूप ही होता है, (तथा द्वि्तीय) सलक्ष्यक्रम- व्यग्य (नामक भेद) शब्दिशक्तिमूलक भी होता है और अर्थेदाक्तिमूलक भी तथा उसमें व्यग्यार्थ वस्तुरूप भी होता है और अरकाररूप भी। इनमें से रसादिध्वनि अलकारमज्जरी में दिसल दिया है क्योंकि काव्य में प्रधानता शृंगार की है। शेष (वस्तुध्वनि अलकारध्वनि मी) जहा-तह्ा वहीं विभक्त कर दिया है। (यह हुई ध्वनिनामक उत्तमकाव्य के मेदों की चर्चा, जहा तक) गुणीभू- तव्यग्य (का सबन्ध है उसके) 'वाच्याग' आदि (अनेक) भेद (होते ह उन्हें) समासोकि आदि (अर्थालकारों) में (ध्वनिकार आदि ने) समासोक्ति आदि में यथासभव दरसा दिया है।" चिमर्शिनी तावच्छब्दो विप्रतिपत्त्यभावध्योतक:। अस्येव भेदनिर्देशं कर्तुमाह-तन्रेत्यादि। व्यन्नच- निष्टे व्यक्षनव्यापारे सत्यपीत्यर्थ। प्राधान्यापाधान्येति । यदुकम्- 'तत्परानेव शब्दार्थी यत्र व्यक्ष्यं प्रति स्थितौ। ध्वने. स एव विषयो मन्तव्य: संकरोज्जित ।।' इति। तथा- 'परका रोऽन्यो गुणीभूतव्यङ्गयः काव्यस्य दृश्यते। तत्र व्यम्यान्वये वाच्यचासच स्यात् प्रकर्पवत्।' इसि। अस्फुटत्व इति। ध्यह्षचस्याविवसितत्वे सतीत्यर्थ । यदुकन- 'रसभावादिविषय विव सानिर हे सति। अलकार निवन्धो य' स चित्रविपयो मत, ।I' इति। तत्नेति। न्रयनिर्धारणे। तस्येति, उत्तमस्य घवने । आद्य इति अविवषितवाच्यः। न केवलं ध्वनिर्द्विविघ यावसत्प्रभेदोऽप्ययं द्विविध इत्यपिशन्दार्थ। यदुकम्- 'अर्धान्तरे संक्रमितमत्यन्तं वा तिरस्कृतम्। अविवतितवाच्यस्य ध्वनेर्वाच्यं द्विघा मतम् ॥'इति। 'तस्वद' शब्द विप्रतिपत्ति के अमाव का चोतक है। ध्वनि के ही भेद बनलाने के लिए कहते है-'तन्न' अर्थात व्यग्यनि् व्यजनाव्यापार के रहने पर भी। प्राधान्यापाधान्य=जहदा कि (धवनिकार ने) कहा है-"शब्द और अर्ध जदा व्यग्य के प्रति तत्पर होकर ही स्थित हो उसी (काव्य) को ध्वनि का शुद्ध स्थल माना जाना चाहिए।" (ध्वन्यालोक-संग्रह्कारिका उद्योन- १ पृ० १३१ चौखंमा सस्करण), तथा "काव्य का एक और भेद होता है जिसमें व्यंग्य (का चमत्कार) गुणीभूत रहता है और जहा व्यग्य के सबन्ध से वाच्य की चारता बढ जाया करती है।" [ धवन्यालोक ३1४० कारिका]। अस्फुटतव =अर्थात व्यग्य की विवक्षा का अभाव। जैसा कि कहा है-"रस, भाव आदि विषयों की विवक्षा न रख कर जहा अलकार का निवेश किया जाय? वह काव्य चित्रकाव्य कदलाता है। (४९७ पृ० ध्वन्यालोक संग्रह्कारिका)। तग्र यह पद काव्य के तीन भेदों के निर्धारण के लिए है। तस्य सर्थात उत्तम ध्वनि का। आद्य=प्रथम अर्थात् अविन- क्षितवाच्य। अपि (भी) शब्द का अर्थ है कि केवल ध्वनि ही दो प्रकार की नहीं है अपितु उसके प्रभेद (भेद के भेद) भी दो प्रकार के है। जैसा कि कहा है-"अविवक्षिनवाच्यनामक ध्वनि का वाच्यार्थ दो प्रकार का रहता है अर्थान्तरसक्मिन (उपादानलक्षणा द्वारा अपना रूप रक्षिन रसते हुए दूसरे अर्थ का परिग्ह करने वाला जैमे "कमल तो कमल ही है" वाक्य में दितीय कमल) और अत्यन्त तिरस्कृन (लक्षपलक्षणा द्वारा अपना स्वरूप बिलकुल छोडकर दूमरे का रूप अपना लेने वाला, जैसे युझ से कथित "तुमने मेरा बद्ठत उपकार किया"-वाक्य में उपकार,
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जो सपकार अर्थ में बदल जाता है। अथवा "निश्शी गम्यते। इति शब्दः ग्रमेय परिसमासौ। अन्ध शब्द का भर्थ"-धवन्यालोक-२।१)। पाप्यन्थतो योजयति-गुणीभूतेत्या-
विमर्शिनी द्वितीय इति विवक्षितान्यपरवाच्य:।यदुक्तम्- 'असंचच्यक्रमोद्दधोत: क्रमेण घोसितः पर:। निवत्िताभिधेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा मतः ॥ नस दुर्शयितु-
इति। अत्रैव वस्तुरसालंकाराणां ध्वन्यमानतवं दर्शयितुमाह-लक्षणेत्यादि। लक्षणा- मूल इत्यविवचितवाच्यः। शब्दशक्तिमूल इति न पुनरर्थशकिमूल: । यद्यपि शब्दशक्ति मूलेऽथंशक्तिरप्य स्ति तथापि तन्न तस्याः सहकारितया व्यवस्थानमिति प्रधान्याच्कव्द- शक्तिमूलत्वसुक्कम्। एमर्थशक्तिमूकत्चेऽपि ज्ञेयम्। वस्तुध्वनिरिति। रसालंकारव्यति- रित्स्य वस्तुमाव्नस्य ध्वन्यमानत्वात्। तवनार्थान्तरसंक्रमितवाच्यो वरतुध्वनिर्यथा- 'स्निग्वर्यामल कान्तिकिप्ववियतो वेललद्बलाका घना वाताः शीकरिण पयोदसुहृदामानन्दकेका: कलाः। कारमं सन्तु उदं कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्व सहे चदेही तु कथं अविष्यति हहा हा देवि धीरा भव ।।1 द्वितीब अर्थात निवक्षितान्वपरवाच्य। जेता कि कहा है-"विवक्षितवाच्य" ध्वनि का स्वरूप दो प्रकार का दिखाई देता है एक असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य और दूसरा संलक्ष्यक्रमन्यंग्य।" (ध्वन्यालोक २२)। यहीं वस्तु, रस और अलंकारों की ध्वन्यमानता वतलाने के लिए लिखते हैं-"लक्षणा" इत्यादि। लक्षणामूल= अर्थात अविवक्षितवाच्य। शब्दशक्तिमूलक अर्थात अर्थशक्तिभूलक नहीं। द्यपि यहां शव्दशक्ति से ध्वनि प्रतीति होती है नहां अर्थशक्ति भी रहती ही है तथापि वहां उस (अर्थ शक्ति) का सहयोगमान रहता है अतः प्रधान होती है शब्द शक्ति ही, फलतः नाम 'शव्दशक्तिमूलक' रखा गया है। यही स्थिति अरमेशव्दशक्तिमूलक ध्वनि के नामकरण में भी है (वहां शव्दशक्ति अप्रधान रहती है और नाम प्रधान के आधार पर दिया जाता है= "प्ाधान्येन व्यपदेशा भवन्ति"1) वस्तुध्वनि अर्थोत वहां रस और अलंकार की नहीं, केवल वस्तु की ही ध्वनि होती है। उनमें अर्थान्तरसंक्मितवाच्य वस्तुध्वनि यथा-(वियुक्त भगवान् राम प्रावृत् का मेघाडम्वर देख कर रहे है) "लिग्व मौर श्यामल कान्ति से आकाश को लीप रहे तथा वकसंकियों के नृत्य से युक्त (स्यामश्वेतवर्णयोग से सुहदावने) मेव उमड़ते आएँ, फुहार लेकर (शीतल। पवन वहें और मेवों के मित्र मयूरों की आनन्दपूर्ण सुन्दर केका (ध्वनि) उठे, उठती रहें, मैं तो अन्यत्य कठोर हृदय चाला हूँ, राम जो ठहरा, सब सहता जाऊँगा, सह लूगा, सह् ही रहा हूँ; परन्तु इस समय (सुकुमारचित) सीता की स्थिति क्या होगी। ह हा हा देवि, तुम धीरज रखना, (चल न बसना।।" यहां रामशब्द "राज्यनिर्वासन आदि असंख्य दुः्ख का पात्र होना" ध्वनित करता है जो (न रसरूप है और न अलंकाररूप सामान्य वात ( Statem- ent) ह मनः) वस्तुरूप है। चिमर्शिनी अत्र रामशब्दो राज्य निर्वासनाद्यसंख्येयदु:ःसभाजनत्व स्वरूपं वस्तु ध्वनति। अत्यन्त तिरस्कृतवाच्योऽपि यथा-
निःश्वासान्ध इवादर्शशन्द्रमा न/प्रकादते॥'
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होता है औौर (वहाँ धवन्यमान अर्व रस अदरशनसाध र णविच्छ्ायरवादिधर्मजातं वस्तुरुपं व्यंग्य (नामक भेद) शब्दिशक्तिमुद्गव तदाभासाइयः। तत्र रसध्यनिर्यथा- वस्तुरूप भी होता है और a दिया है क्योंकि काव्य णयकुपितां धातुरागै शिलाया- वहीं विभक्त कर मान ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्नुम। तव्यग्यरनाव मुहुरुपचित टप्टिरालिप्यते मे करस्त- स्मिळपि न सहते सगमं नौ कृतान्त.।' अत्र विभावानुभावव्यभिचारिभिरभिव्यक एव रस। अत्यन्नतिरस्कृतवाच्य यथा-(देमन्नवर्गन) चन्द्रमा, जिसने अपनी सुददावनी कान्ति मूर्य में डाळ दी है और जिसका मण्डल ओस से घिर गया है, ऐसा लग रहा है जैसे फूँक से अन्धा दर्पण।" अन्ध शब्द (का अर्थ है 'देख न सकना' और जहा यह रदता है वहा मखिनना भी रदती ही है फल्न ) अन्य शब्द (अपने अर्थ अदर्शन से लगी मलिनता और ऐमे ही अन्य धर्मों को ध्वनित करता है जो न रसरूप है और न अल्दाररूप अत.) वस्तुरूप है। रसादि = आदि शब्द से भाव, रसाभाम भावाभास भावशान्ति, भावसन्धि, भावशबलता और मावोदय की ओर सकेन है बननें से रसध्वनि जैमे-( यक्ष का मेघदूत में सदेश) "मैं तुन्हारो तो प्रणयकुपित मुद्रा गेरू आदि से शिन्दाखण्ड पर बना लेना हूँ किन्तु जब अपनी स्वय की चरणपतित मुद्रा वनाने चलता हूँ तो बार बार उमडते आँसू मेरी दृष्टि लीप देते है। विधाता इतना क्रर है कि चित्रलेस में भी वह हम दोनों का समागम नहीं सहता"। यहाँ (यक्ष नथा भावाहित यक्षी) विमाव, (चित्रलेख, अश्षुपात, विलाप) अनुभाव (क्ररशब्द से विधाना के प्रति व्यक्त अमर्ष आदि) व्यमिचारी मावो से रस अभिव्यक्त हुआ ही।
विमर्शिनी भावध्व निर्यया- 'जाने कोपपराषमुखी प्रियतमा स्वप्नेऽ्य्य दष्टा मया मा मा संस्पृश पाणिनेति रदती गन्तुं पृत्ता तत । नो यावत् परिरभ्य चाटुकशतैराश्ववासयामि प्रियां भ्रातस्तावदृदं शठेन विधिना निद्ादरिद्रीकृत।' अन्न विधि पत्यसूयास्यो व्यभिचारिभावः। रसाभासध्व निर्यथा- 'स्तुमः कं वामात्ि पणमपि बिना य न रमसे विलेमे क. प्राणान् रणमखमुसे य मृगयसे। सुछग्ने को जात शशिमुखि यमालिद्गसि बलादू तपःशी कस्येंपा मदननगरि ध्यायसि तु यम् ।' अव्नानेककामुकविपयोऽभिलाप इति रसाभास:। भावध्वनि यथा-"मुझे म्मरण आ रहा है, मैने सपने में प्रियनमा को देसा है वह कोप से मुँद फेरे हुए थी, वह बार बार मुझ्े हाथ मे रोक कर रोनी हुई कह रही थी मुझे न छूना, न छूना और ऐसा कहती हुई मेरे सामने से हटने एगी थी। उम समय मुझे उसे अपनी छाती से चिपका कर अनेक मोठी और पपरी वानों से मनाना था किन्तु वह कर ही नहीं पाया और शठ विधाता ने मेरी नांद छीन ली, उसमें स में दरिद्र ही रहा।' यहाँ विधाता के प्रति अस्या नामक संचारी (शठ- बद्द ये। यान हो मा से गय से
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भूमिका ४३
रसाभासध्वनि, यथा-(किसी पुंश्ली से कोई गम्यते। इति शब्दः ग्रमेथ परिसमाती। प्रशंसा करें जिसके बिना तेरा चित्त क्षण भर नहीं लगती।प्यन्यतो योजयति-गुणीभूतेत्या- हैं (जो यश में प्राणाहुति देता है वही इतना बड़भागी होता कि है) जिसे तू सोजती रहती है। अच्छी लग्न में किसका जन्म हुआ चन्द्रमुखि ! तू बलात करती है। हे कामनगरि ! किसकी इतनी तपोमहिमा ह. किया करती है।" यहाँ एक नायिका का अनेक नायकों के प्रति अनुराग व्यक् हो नं दर्शयितु- यहाँ (शृंगार) रसाभास है (क्योंकि यहाँ शरृद्ार शृद्गाररस जैसी स्थिति तक ही पहुँचता e; नहीं बन पाता। भावाभासध्वनि यथा-(परस्त्री पर आसक कामुक चिन्ता कर रहा है)-"वह (उसकी स्त्री) कितनी सुन्दर है। उसका चेहरा पूर्णिमा के चन्द्र की नांई सुडौल, गौर और दमदमाती कान्ति लिए है) उसकी आँसे चंचल हैं, मुसकुराते यौवन के अनेक विभ्रम उसके अंग अंग में तरंगित हो रहे हैं। तो क्या करूँ किस प्रकार उससे मैंत्री करूँ। वह कौन सा उपाय हो सकता है कि वह सुझे अपना ले।' यहाँ परस्त्रीनिषयक चिन्ता अनुचित है अतः यहाँ चिन्तारूपी भावामास ध्वनि है। विमर्शिनी भावाभासध्व निर्यथा- 'राकासुधाकरमुखी तरलायताक्षी सा स्मेरयौवनतरदतचित्रमाङ्गी। तर्टिंक करोमि विद्धे कथमन्न मैस्तीं तत्स्वीकृतिव्यतिकरे क इवाभ्युपायः॥' अन्रानीचित्यप्रवृत्ता चिन्तेति भावाभास: । भावप्रशमो यथा- 'एकस्मिञ्द्यने पराङमुखतया चीतोत्तरं ताम्य· तोरन्योन्यं हृदयस्थितेऽ्प्यनुनये संरघतोगोंरचस्। दंपत्योः शनकैरपाङवलनामिश्रीभवचनुपो- र्भंग्नो मानकलि: सहासरभसव्यावृत्तकण्ठग्रहः।।' अतसूयायाः प्रशम इति भावप्रशमध्वनिः। वस्तुध्वनिरलंकारव्वनिश्चेति। तन्न शब्द- शक्तिमूलो वस्तुध्वनिर्यथा- निर्वाणवैरदहनाः प्रशमादरीणाँ नन्दन्तु पाण्डुसनयाः सह माधवेन। रक्तप्रसाधितभुघः नतविग्रहाश्च स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुता: समृत्याः।।' अत्र कौरवाणां छतशरीरादिकत्वं वस्तुरूपं शब्दशक्त्यैव प्रतीयते। स एवार्थशक्ति मूलो यथा- 'अलससिरोमणि घुत्ताणँ अग्गिमो पुत्ति धणसभिद्धिमभो। इह भणिएण णअंगी पप्छुल्लविलोजण जाआा।।' अथार्थशक्त्या ममैवोपभोग्योऽयमिति वस्तु व्यज्यते। स एवोभयशक्तिमूलो यथा- 'पंथिअ ण एत्य सत्थरमत्थि मणं पत्थरत्थले गगामे। उन्गअपभोहरं पेकिखिकण जइ वससि ता बससु ।' मन्न यद्युपभोगतमोऽसि तदा आस्स्वेति वस्तु वकौचित्य माश्रित्य शब्दार्थशक्त्याभि- व्यज्यत हृत्युभयशक्तिमूलत्म्। भावग्रशम यथा-"एक ही शस्या पर एक दूसरे की ओर पीठ करके सो रहे, एक दूसरे का उत्तर देते हुए मुँह फुलाते जा रहे, साथ ही चित्त में दूसरे को मनाने की इच्छा रहने पर मी अपना
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होता है और (वशो ध्वन्यमान अर्थ रस लस टेटी कर धीरे मे एक दूसरे को देसना चाहा तो व्यग्य (नामक भेद) शब्दिशक्तिम मानकलद टूट गया और दोनों के तिरछे कण्ठ हँसी के वस्तुरूप भी होता है औद। समूया नामक सचारी भाव का प्रशम (अन्न) ध्वनित है अनः यह दिया है क्योंकि काव्एर णे है। बहीं विभक्त ककारै अलंकारध्वनि। दोनों में शब्दशक्तमूल्क वस्तुध्नि का उदाहरण तव्यग्य भी (कौरवों) के विकाश से वैराग्नि जिनकी शान्त हो गढ है ऐसे पाण्डव श्रीकृष्ण के जानन्द करें तथा कौरव पृथ्वी को रकम्रसाधित वना पतविग्रह हो अपने सभी भृत्यों के साथ स्वस्य हो जावें। (यहाँ रकतप्रसाधित, इषनविग्रह्द और स्वस्थ शब्द वर्थक है। [रक्त अर्थात खून से सँवार ली है पृथिवी जिन्होंने तथा अनुरूप और मजी सँवरी है पृथिनी जिनकी, क्षत है विग्रद्= बुद्ध या शरीर जिनका तथा स्वस्थ = स्वर्गस्थ या शरीर में ठीक) यहाँ शरीर की क्षति आदि अर्थ वस्तुरूप ही है और वे शव्दशक्ति मे ही प्रनीन हीने है (क्योंकि यहाँ शब्द वदले नहीं जा सकने)। अर्थशक्तिमूल्क वस्तुध्वनि यथा-
इति भगिनेन नतागी प्रफुल्लविटोचना जाता।।' अर्थान् (उपमाता ने जब लडकी से कहा कि) वह (तुम्हारे लिए निर्धारित लडका आलसियों में शिरोमणि है, धूर्तों (जुभाटी या धोखेवाजों) में अगुआ है और धनसमृद्धि से भरपूर है "तो इस कथन से उस ननामी की आखें सिल उठी।" यहाँ यह बात (वस्तु) ध्वनित होती है कि वह्द पुर्ष एकमात्र उसी ननागी तक सीमित रहेगा। उभयशक्तिमूलक वस्तुध्वनि यथा- 'पथिक नात्र स्स्तरमरिनि मनाकू प्रस्तरस्थले आरामे। उद्गतिपयोघर प्रेक्ष्य यदि वससि तद् वस ।।" अर्थात (सवय दूती की उक्ति) हे पथिक । यहाँ विछोना थोटा भी नहीं है और गाँव की जमीन भी पथरीली है। उठे पयोधरों को देखकर ठदरना चाहो तो टहर जाओ" यहाँ यह मान (वस्तु) ध्वनिन होती है कि 'यदि तुम (पथिक) उपमोगक्षम हा तो यहाँ ठद्रों "यह ध्वनि बोलने वाले के विषय में यह विदित होने से होती है कके वह चपल है और यहाँ न तो 'पयोषर' शब्द ददला जा सकता और न अन्य सभी अर्थ अन. यह ध्वनि शन्दार्योमयशक्तिमूलक है। विमर्शिनी शब्दशाकिमूलोऽलंकारध्प निर्यथा- 'उद्धतः प्रोहसद्धार कालागुरुमलीमसः। पयोधरमरस्तन्व्या कं न चक्रेऽमिळापिणम्।।' अत्र शब्दशक्त्या मेघलचणमर्थान्तरं प्रतीयते। प्रकृताप्रकृतयोकार्थयोरसंबद्धामिघा यित्वं मा प्रसाङ्कीदिति तयोरीपम्यं कल्प्यत इत्यलंकारध्वनि:। स एुवार्थशक्तिमूलो यया- 'तं ताण सिरिसहोअररअशाहरणम्मि हिअमेकरसं। विंवाहरे पिआणं णिघेसिअं कुसुमवाणेन ॥' अग्र कौस्तुभविभ्वाधरयो केवलयैवार्थशव्यौपम्यं ग्यत इत्यर्थश किमलोऽलंकार- ध्व निः1 उभयशक्तिमूलो यथा- 'जणहिभअविदारणए धारासलिललुलिए ण रमइ तहा। तब दिट्टी चिउरभरे पिआण जह वैरिखग्गम्मि ।।'
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भूमिका
अन्नोभयशकत्या चिकुरभरखड्गयोरौपम्य गम्यते। इति शब्दः प्रसेय परिसमाही। एवं वने: पभेदजातं प्रदुर्श्य क्रमप्रासं गुणीभूतव्यङ्गचस्याप्यन्यतो योजयति-गुणीभूतेत्या- दिना। दर्शित इति ध्वनिकारेण। यदाह- व्यङ्गस्य यत्रामाधान्यं वाच्यमात्रानुयायिन:। समासोकत्यादयस्तत्र वाच्यालंकतय: स्फुटाः॥ इति॥ मुर्व गुणीभृतव्यङ्गयस्याप्यन्यतो भेदजातं योजयित्वा चित्रस्यापि प्रभेदजातं दर्शयितु- माह-चित्रमित्यादि। शब्दशक्तिमूलक अलंकारध्वनि यथा-'उस तन्वरी के खूब उमरे पयोधरों ने किसे साभिलाप नहीं बना दिया। पयोधर उन्नत, प्रोल्लसद्वार और कालागुरुमलीमस जो है। (पयोघर= स्तन तथा मेव, प्रोल्लसद्ार=प्रोल्लसित हो रहे हैं हार जिनपर ऐसेस्तन, प्रोक्लसित हो रही हैं धाराएँ जिनमें ऐसे -मेघ; कालागुरु से कृण=स्तन, कालागुरुतुल्य कृष्ण =मेव। यहाँ स्तन प्रस्तुत है भैघ अप्रस्तुत और पयोधर आदि शब्द वदल देने पर मेघपक्ष की प्रतीति नहीं होती अतः यहाँ) शब्दशकत से [(ही) मेघरूप अप्स्तुत अर्थ की प्रतीति होती है और स्तन तथा मेघों में उपमानोपमेयभाव मानना पड़ता है अन्यथा दोनों अर्थ असंबद्ध पढ़े रह सकते हैं जिससे वाक्यभेदनामक दोप हो सकता है। वाच्यस्थिति में अलंकार माना जाने वाला यह) उपमानो- पमेयभाव व्यंजना द्वारा प्रधानरूप से ध्रवनित होता है अतः यहाँ भलंकारध्वनि है। अलंकारध्वनि ही जो अर्थशक्ति से ध्वनित होती है यथा- "तत तेषां श्रीसहोदरर नाहरणे हृदयमेकरसभ्। विम्वाघरे प्रियाणां निवेशितं कुसुमन्ाणेन ।।" अर्थात्="उन (राक्षसों) का (समुद्रमन्थन से उत्पन्न रत्नों में से) श्रीसहोदर (श्री= लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने से उसका सहोदर और सुन्दर होने से भी श्री=शोभामयी लक्ष्मी का सहोदर) रत्न (कौसतुभ) किसी भी प्रकार हड़प लेने में सर्वात्मना सन्नद्ध हृदय कुसुमनाण ने प्रियाओं के विम्वाघर पर लगा दिया।" यहाँ कौस्तुममणि और अधरोष्ठ का तुल्यता अपरिवर्तनीय अर्थ से प्रकट होती है अतः यहाँ अर्थश्ञक्तिमूलक ही अलंकारध्वनि है (शब्द तो यहाँ कोई भी रखे जा सकते है)। उभय-(शब्दार्थ) शक्तिमूरक यथा- 'जनहृदयविदारणके धारासलिललुलिते न रमते तथा। तव दृष्टिश्षिकुरभरे प्रिंयार्णा, यथा वैरिखहगे॥" अर्थात तुम्हारी दृष्टि जनो के हृदय विदारित करने वाले तथा धाराजल से लुलित (केश- पाशपक्ष में धारासलिल= नदी आदि की धारा का जल, खड्गपक्ष में-उसकी धार का पानी- प्रियाओ के केशपाशों में उतनी नहीं रमती जितनी बैंरिओं के खढगो में।" यहाँ (धारा. शब्द अपरिवर्ततनीय है, शेप बदले जा सकते हैं अतः) शब्द और अर्थ दोनों की सक्तियों से खड़ग तथा प्रियाकेशों की तुलना द्योतित होती है। इसके बाद जो इति शब्द है उसका अर्थ है प्रतिपाद तत्त्त्र के प्रतिपादन की समासि। इस प्रकार ध्वनि के प्रभेद दिखलाकर उसके वाद आने वाले गुणीभूतव्यंग्य के भी भेदों का अन्य अन्धों में संकेत देते हुए लिखते हैं-गुणीभूतव्यंग्य आदि। दशितः दिखला दिया है अर्थाव ध्वनिकार ने। जैसा कि (ध्वनिकार ने) कहा है-
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४४ अल ह्वारसवस्वम्
"जहाँ व्यग्य अप्रधान रहता है, अर्थात वह केवल वाच्य के पीछे चढता है वहाँ समासोकि आदिअर्थालकार ही होते है।" (ध्वन्या० सम्रहकारिका उद्योत-१ पृष्ठ० १३० चौ० स० १) इस प्रकार गुणीभूतव्यग्य के भेद भी अन्यन दिसला दिए। अब चित्रकाव्य के भेद भी दिखलाने के लिए लिखने है- [सर्वस्व ] चित्रं तु शब्दार्थालंकारस्वभावतया बहुतरप्रमेदम्।तथा हि- [सूत्रम् १] इहार्थपौ नरुवतयं शब्दपौनरुक्त्थं शब्दार्थपौनरुकत्यं न्ेति त्रयः पौनरुक्त्यप्रकारः ।। १ ।। आदौ पौनरुक्त्यप्रकारवचन वक्ष्यमाणालंकाराणां कक्षाविभागघटना- र्थंमू। अर्थापेक्षया शब्दस्य प्रतीतावन्तरद्गतवेऽपि प्रथममर्थगतधर्मनिर्देश- शिरंतनप्रसिद्धया पुनरुकवदामासस्य पूर्व लक्षणार्थः। इद्शब्द: प्रस्थाने। इतिशब्द: प्रकारे, निशब्दादेव संख्यापरिसमाप्िसिद्धेः। चित्रनामक जो काव्यभेद है वह तीन प्रकार का है शब्दालकारस्वरूप, अर्थालकारस्वरूप तथा उभयारकारस्वरूप। इमके पभेदों की सख्या बहुत अधिक है। जैमे- [सूत्र ] "यहाँ (काव्य में) मौनस्वत्य के तीन भेद होते हैं-(1) अर्थपीनरवन्य (२) शव्दपीनसकत्य तथा (३) शब्दार्थ (उभय) पौनरुक्य।। १ ।। [वृत्ति](अलंकारों के निरूपण के) आरम्भ में पौनम्कत्य के मेदों के निरूपण का प्रयोजन है- (इमके) आगे निरूपित किए जाने वाले (पुनरुक्तवदाभास आदि पाँच पौनरुकत्यमूलक) अटका्रों का कक्षाविमाग (अर्थ, शब्द और उभयगत रूप से विभाजन) करना है। प्रतीति में शब्द अर्थ की अपेक्षा अन्तरग है (काव्य में शब्द का ज्ञान पहिले होता ह और अर्ध का बाद में) इसचिएि शब्दगत पौनरुकत्य का उल्लेस पहिले होना चाहिए तथापि) अर्थगन धर्म (पौनस्कत्य) का (पहिले) निर्देश पाचीन (उद्भादि) आलकारिक आचार्यों के समान (अर्थगत पौनरुक्त्य पर निर्मर) पुनरुकवदाभास का लक्षग (शन्दाटकारों की अपेक्षा) पहिले करने के लिए किया गया है। इह्-(यहाँ-) शब्द (काव्य-) प्रस्थान के लिए प्रयुक्त है (क्योंकि अलकार काव्य के ही धर्म ह) । इति (इस प्रकार-) शब्द (समापिवाचक नही) प्रकार (भेद-) वाचक है, नर्याकि सख्या की समाप्ति (पूर्ति) नि-( तीन-) शब्द से ही चली आती है। विमर्शिनी तशब्द: काव्यप्रकारद्वयादस्य वैलत्ण्यद्योतका। अत एव बहुततरपभेदमित्युक्तम्। शब्दार्थत्येक शेप:। तेनोभयालंकाराणा मपि ग्रहणस्। तदेव दर्शयितुमाह-तथाहीत्यादि। चित्राख्य काव्यभेदनिरूपणावसरे कि पौनरूकत्यप्रकारवचनेनेत्याशकयाह-आदावित्यादि। वक्ष्यमाणालकारा पुनरुकवदामासा्य' पञ्च। शव्दमतीतिपुरःसरो कारणार्थप्तीतिरिति प्रथमं शब्दगत एव धर्मनिर्देशी न्याय्यो नार्थगत इत्याशङ्याह-अर्थेत्यादि। चिग्तन प्रसिद्धेति। न पुनर्युज्यमानलयेति भाव। 'पुनरुक्तवदाभास छेकानुप्रास एव च' इति चिरंतनग्रसिद्धि। अर्थाल कारतादर्थालंकारपकरणे पुनरस्य युन्यमानत्वम्। नन्वादी शब्दगतो, धर्मनिर्देशः कार्य- पश्चादर्थगत इति क्रमस्य न किचितमयोजनमुत्पश्याम दृति किं तेनेति यदन्यैरक्त
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भूमिका ४५
तद्युक्तम्। शव्दार्थयो: क्रमेणेव प्रतीताववभासनान्तथात्वेनैव धर्मनिर्देशस्योपपत्तेः किच 'वर्धमानोःकर्पाणि शास्त्राणि प्रथन्ते' इति नीक्या परिमितचमत्काराणामर्थालंकाराणां पश्चानिर्देशः कार्य इति सप्रयोजन एव क्रमः। चिरंतनमतानुल्लङ्नेन च वयं पवृत्ता इत्ययुक्तमपि अ्रन्थकृता तन्मतमाश्रितम्। अग्रेऽप्यनेनाशयेन तन्मताश्रयणं करिप्यत्येव। तेन वयं यच्चिरंतनमताश्रयणं व्यास्यास्यामस्तय्यकमेव। तुशब्द (ध्वनि और गुणीभूतव्यंन्य इन) दोनों काव्यप्रकारों से इस (चित्र काव्यगकार) की विलक्षमता (विशेता) का दयोतक है। इसीलिए कहा कि इस (चित्रकाव्ब) के भेदों की संख्या अधिक है। शब्दार्थंपौनसवत्य में 'शब्दार्थशब्द में एकशेय समास है [ अर्थात इसका विन्रद्ध इस प्रकार होगा शव्दशायरचेति शब्दार्थो, शब्दक्ष (तत्सहितः) अर्थशचेति शब्दार्थो, शब्दार्था च शब्दार्थी चेनि शब्दार्थी, अर्थात मकनार अलग अलग शब्दार्थ का समासमान्नगत जोड़ा- शब्दार्थों, दूसरी बार मिले हुए शब्दार्थ का जोड़ा, दोनों जोड़ों के वाचक दो "शब्दार्थशब्दों" का पुनः समास और उसमें एकमात्र का वचना] उस (एकशोप समास) से उमयालंकारों का ग्रहण भी हो जाता है। उसी को दिखलाने के लिए लिखना आरम्भ करने है "तथा हि= जैसे"- इत्यादि। (सूत्रकार ने तीन प्रकार के पौनरुक्त्य का निरुपण पहले किया उस पर प्रश्न उठा कि) प्रकरण तो या चित्ननामक काव्य के भेदौ के निरूपण का, उसमें पौनसुकत्य के मेदों की चर्चा क्यों? इस पर उत्तर देते हुए लिखते हैं आदौ =पहले, आरन्भ में इत्यादि। वच्यमाण अलंकार अर्थात् पुनरुततवदाभास आदि पाँच अलंकार। संका :- अर्थ की प्रतीत्ि शब्द की प्रतीति को आगे करके होती है इस लिए पहले शब्दगत धर्मों का ही निर्देश उचित था, न कि अर्धगत धर्मो का, उत्तर = अर्थ: इत्यादि। चिरंतनप्रसिद्धि=भाव यह कि प्राचीन आलंकारिकों में पुनरुकवदाभास का ही निरूपण पहले किया जाता रहा है इसलिए हम भी यहाँ उसी का निरूपण पहले पहल कर रहे है इसलिए नहीं कि उसी का निरूपण पहले किया जाना उचित है। निरंतनप्रसिद्धि के लिए (चन्तरट के काव्यालंकार-सारसंग्रह की प्रथम कारिका=) "पुनरुकत- वदाभार्स छेकानुप्रास एव च"' ठी जा सकती है)। वस्तुतः पुनरुकवदाभात अर्थ का अलंकार है इसकिम इसका निरूपण अर्याल्कारप्रकरण में होना उचित था। नुछ लोग ऐसा कहते हैं कि 'शब्द के धर्मों' का ही निर्वेश पहले होना चाहिए, अर्थ के धर्मों का बाद में, यह जो कम है यह निरर्थक है, जलटा करम भी अपनाया जा सकता है, उसमें भी कोई हानि नहीं दोखती। किन्तु उनका यह कहना तथ्यशून्य है। क्योंकि शब्द और अर्थ को प्रतीति क्रम से ही होती है (औौर उसमें शब्द की ही प्रतीति पहले होती है) अतः उसी क्रम से धर्मनिवेश करना ठीक रहता है। और क्रम सार्थकभी है क्योंकि "शासत वे प्रसिद्ध होते हैं जिनमें उत्कर्प पड़ता जाय" ( उत्तरोत्तर अधिक महत्तव का विवेचन पस्तुत करने वाले व्ञास्त्र बढ़ते मोर प्रसिद्ध होते है) इस व्यवहार के अनुसार अर्थालंकारों का ही निरूपण वाद में किया जाना चाहिए क्योंकि उन्ही में (अपेक्षाकृत अधिक) चमत्कार होता है। जहाँ तक हमारा संबन्ध है हम (अलंकारसर्वस्वकार) 'प्राचीन (उद्टादि) के मत का उल्लंघन बिना किए ही अपना अन्थ बना रहे हैँ"इस भावना से अन्थकार चुक्िविरुद्ध होने पर भी प्राचीनों का क्रम ही यहाँ दे रहे हैं। इसी भावना से घेरित हो वे आने भी प्राचीनों के मत अपना कर ही चलेंगे। इसलिए आगे भी हम जो प्राचीनों के मत के ही अनुसार व्याख्या मस्तुत करेंगे वह गलत नहीं होगा। विमर्शिनी एतदेव यधोद्देशं निर्णेतुमाह-तत्रेत्यादि। समें ] अब इसी (पौनरुकत्व) को नामनिर्देशक्रम से एक एक करके वतलाना आरन्भ कणे सारे
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४8 अलङ्गारसवस्वम्
[सर्वस्व] [सू० २] तन्रार्थपौनरुकत्यं प्ररूढं दोफ: ।। प्ररूढाप्ररूढत्वेन दैविध्यम्। प्रथमं ह्वेयवचनमुपादेये विश्नान्त्यर्थम्। तन्नेति घयनिर्धारणे। यथावभासनविश्ान्ति:प्रोछ्:। [सू. २]उन [तीनों पीनसकतय] मे परूढ अर्थपीनरुकत्य दोप होता है।। [वृत्ति]-'(अर्थपीनरूक्त्य) दो प्रकार का होता है प्ररद और अप्ररूद। [इनमें से] आरम्भ में त्याज्य [ढोपस्वरूप पररूठ पौनसुकत्य] का कवन उपादेय [अलकारस्वरूप अप्रस्द पौनसक्त्य ] से [ निरूपण की ] समाप्ति करने के लिए किया गया। 'तत्र'-शब्द तीन [पन- रुकत्य ] में से [एक प्ररूद के ] निर्धारण के लिए है। [पररुद में ] परोह का अर्थ है 'आरम्भिक प्रतीनि के समान ही अन्तिम प्रतीति का होना' [अर्थोत पदाधे और वाक्यार्थ दोनों की प्रती- तिओं का एकरूप होना ।। चिमर्शिनी किमलंकारप्रस्तावे दोपकथनेनेत्याशक्य्याह-प्रथममित्यादि। उपादेय इत्यलंकारस्व रूपे। ययेति। यथैव रष्टस्तसैव पर्यवसित हव्यर्थः। यथा- 'हरिणनयनां सारद्वारथी कुरदविलोचना कमलवदनां राजीचास्या सरोजपमाननाम् । चिलुहितिकचां चश्रत्केशीं चलज्तिकुरोकरा सुरतविरनी सभोगान्ते चिलोकय कामिनीम।।' अन्न सारद्रानीमित्यादिपु पुनर्वचनं प्ररदम्। गमर्दं पुनरलकार:। न चैतावतैन दोपाभावमात्रे गालकारखवमस्याराक्यम्, वच्यमागनीश्यालकारो चितस्थ विच्छित्तिविशेपस्यापि भाजात्। तदेवाह-आमुमोयादि। "अरकार के प्रसग में दोष (प्ररूद अर्थपौनरुसत्य) का कपन करों किया जा रहा है'- इस रका का उत्तर देने हुए कहते हैं-पथम=आरम्भ में हत्यादि। उपादय अर्थात अलकार। 'यथा "जैसा लगा वेसा ही ठहरा"। उदाहरण- भुरतपूर्ति और समोगसभाप्ति में कामिनी को देसो। उस समय वह इरिणन्नयना, सारगाक्षी और कुरंगविलोचना, कमळवदना, राजीवाम्या और मरोजसमानना नया विनुलितकचा, चचलेशी और चलच्चिकुरोत्करा प्रतीत होती हैं। [यहोँ हरिण, सारग और कुरंग, नयन, अक्षि और विलोचन, कमन, राजीव और सरोज, बदन, आस्य और आनन, वितुलित, चचत और चलतु तथा कच, केन्र और चिकुर शब्द मकार्थक है] यहाँ सारगाक्षी इत्यादि पदों में पौनस्कत्य प्ररूद [आरम से अन्त तक एक सा बना रहता ] है। जो पौनरूपत्य अपरूद रदता है वह अलकार माना जाता है। किन्तु इनके [अप्ररूढ होने ] मात मे यह नही भानना चाहिए कि "यह (अर्थपौनरुकत्य) दोपामावमात्र है और यही इसका अन्यकारत्व है" क्योंकि इसमें अल्कारोचिन विशिष्ट सौन्दर्य भी अभी यही बतलाया जाने वाला है। उसी को बतलाने ह- [सर्चस्व] न पुर अर्थालंका [सू० ३] आमुखाचभासनं पुनः पुनरुक्तवदाभासम् ॥ कार्य: पश्चाद-खग्रदणं पर्यवसानेऽन्यथात्वप्रतिपत्यर्थम्। लक्ष्यनिदेशे नापुंसक:
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पुनरुक्तवदाभास: संस्कारो लौकिकालंकारवैधर्म्येण काव्यालंकाराणामलंकार्यपारतन्त्रयध्वन- नार्थः। अर्थपौनरुक्त्यादेवार्थाथितत्वादर्थालंकारत्वं झेयम्। पभेदास्तु विस्तरभयान्ोच्यन्ते। उदाहरणं मदीये श्रीकण्ठस्तवे यथा-
शैलादिनन्दिचरितं क्षतकंदर्पदर्पकम् ॥ सृप पुंगवलक्ष्माणं शिखिपावकलोचनम्। ससर्वमफलं नौमि पार्वतीसखमीश्वरम्॥' 'दारुणः काछतो जातो मस्मभूतिकर: पर:। रक्तशोणार्चिरच्चण्ड: पातु वः पावक: शिर्खा।।' भुजंगकुण्डली व्यक्तशाशिशुभ्रांशुशीतगु:। जगन्त्यपि सदापायादव्याचेतोहर: शिवः।।' [सूत्र-३ ] किन्तु [केवल ] आरम्भ [मात्र] में भासित होने वाले [अर्थ-पौनरुनत्य- तो पुनरुकवदाभास [अलंकारभूत पुनरुक पद] हैं। [वृत्ति] [सूत्र में] आमुख शब्द का अ्रद्दण पर्यवसान [अन्त] में भिन्नता [पुनरत्त के अभाव] का ज्ञान कराने के लिए किया गया। लक्ष्य [पुनरुकवदाभास के नाम ] निर्देश में [पुनरुकवदाभासत्रब्द के साथ पुलिङ् न होकर] नपुंसकलिंग का प्रयोग इस तथ्य को वनित करने के लिए है कि काव्य के अलंकार अलंकार्य [ काव्य] से वधे होते हैं, लौकिक लंकार [हार मादि] के समान [अलंकार्य से स्वतन्त्र ] नहीं। यह अलंकार अर्थ के पौनरुक्त्य पर निर्भर है अतः स्वयं भी अर्थ पर निर्भर है और इसीलिए इस अलंकार को अर्थांकार समझना चाहिए। [इसके ] प्रभेद नहीं वतलाए जा रहे क्योंकि [हमें ] विस्तार में नहीं जाना है। उदाहरण जैसे मेरे श्रीकण्ठस्तव में-मैं भगवान् शंकर को प्रणाम करता हूँ जो यहीन [ अहि-सर्प, इन=स्वामी, अ-हीन =पुए] भुजगाधीश [बासुकिनाग ] के शरीर के वलय [मण्डलीकृत शरीरी का वंकण पहने हैं, जो शैलादिनन्दिचरित [शिलाद पुत्र =शैवादि अर्थाद नन्दी, शैलादि नन्दी, पुनरूच, शैकादि को नन्दित ग्रहृष्ट करने वाला चरित] जो क्षतकन्दर्प-दर्पक हैं-[ कन्दर्प और दर्भक= काम= पुन०, कन्दर्य का दर्प] जिनका निशान है वृप पुंगव [वृष - वैल नन्दी, पुंगव = बैल नन्दी, वृर्पो में पुंगव श्रेष्ठ ], जो शिखिपादक से बुक्त नेत्र वाले हैं शिसी=अनि और अति- पुन० शिखायुक्त अभि जो ससर्वमंगल और भार्वतीसहित हैं [ सर्वमंगला-पार्वती, उनसे युक, तथा सबके मंगल से युक ]। 'दारणः काठ से उत्पन्न [दारुण: = दारुण शब्द का पंचमी एकवचन, अतः दार से और काष् से = पुनरुकि: दारुण=क्रर ] भर्मभूतिकर [भस्म और भूति= भत्म पदा करने वाले, भस्म की भृति =हेर पैदा करने वाला] तथा रक्जोणाचि [रक्त=खून, शोण=खून, के सनान लमट वाले शोण = लाल ] शिखी [शिखा = लफट वाला अभि] उच्चण्ड पावक [अति और पवित्र करने वाला] आपकी रक्षा करे।' -ये स्थल है सुबन्त [नाम पदों] के मौनरुवत्य के। तिइन्त [क्रियापदो] का पीनलवत्य भी उसी प्रकार वहीं [ मेरे श्रीकण्ठस्तव में ]- भुजंगकुण्डली [ कुण्डली =सर्प, कुण्डल नाले, ] व्यकमशिशुम्रांशुशीतगु: [व्यक्त है, शक्षी = चन्द्र, शुभांशुचन्द्रशीतगु =चन्द्र जिसमें, रश =खरगोश़ से युक्त, शुन् किरणों वाला चन्द्र जिसमें] चेतोहर [चेतः चित्त को, हरः= शिव, चेतोहर चिस्त को हरण करने वाले] शंकर भगवान् सारे
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४८ Ic अलङ्कारसवस्वम्
ब्रह्माण्डा को सदापायात अव्यात [सदा पायाद=रक्षा करे, अव्याद=रक्षा करे "सदारपायाव= अपाव दानि से रक्षा करे ]"। [ यहा पायाव और अव्याव पुनरुकत मे लगने है]। विमर्शिनी अन्यथात्वति। यथावभातस्यार्थस्य पर्यवसाने तथाखेनैवाविध्ान्तिरित्यर्थः। अन्यथा झकनीत्या दोष स्यात्। ननु पुनरुकवदाभासशवदस्यालकारशब्दसामानाधिकरण्यादुप- मादिवदजह ल्लिद्गत्व योगाच्च पुंठिव्वरवे किमितीह नापुंसक संस्कार: कृत इत्याङ्याद- लक्ष्येत्यादि। लपयस्य लक्षणीयस्य पुनरुकवदाभासस्य पुनशब्दापेवया निर्देशो वघन- मित्यर्थं. । अल्कार्यपारतन्त्र्येनि। काव्यसामानाधिकरव्येन निर्देशात। लौकिका हारादयः। एपां हलंकार्येण सद्द सयोग संबन्ध। अत एवैपां तत्परतन्त्रतापि न स्याद् । काव्या- लंकाराणां पुनरलंकार्येण सह समवायः संबन्ध। अत एवपामयुतसिद्धस्वादलकार्य- पारतन्व्यमेवेति लौकिकालंकारवैधम्यमेव न्याय्यम्। आश्नयाश्रयिभावेनालंकार्यालंकरण- भावोपपत्ते. किमाश्रयमर्यालकारत्व मित्याशङ्चाह-अर्थत्यादि। एवकारः शब्दपीनर व्यावच्छेद्द्योतक:। अन्यथात्व=मिन्नना अर्थात् अर्थ का ज्ञान आरम में जैसा हुआ अन्त में उसका वैसा ही न रहरना, मेमा न होने से उपयुंक्त ढग से [ पौनसवत्य परद होकर ] दोष बन सकता है। प्रश्न उठना है कि 'पुनरकवदामाम-' शब्द [भूलत पुलिग शब्द है और वह ठीक उसी प्रकार ] अलकार का वाचक है जिस प्रकार अव्यकारशब्द और इसलए "उपमा" आदि शब्दों में ऐैसे लिंग नहीं बदलता उसमें भी रिंग नहीं बदल सकना फलत उसमें पुलिंग ही रहना चाहिम नव उसके साथ नपुमकलिंग का प्रयोग क्यों किया गया"-इस पर उत्तर देते हुए लिसा "लच्य"-आदि। लक्ष्य अर्थात् तक्षणीय यानी पुनरकवदामाम का पुनशब्द्रापेक्षया निर्देश अर्थात् कथन। अलंकार्यपारतन्व्य, अटकार्य=काव्य, उमके लिंग (नपुसक रिंग) के माथ निर्देग करने से [पुनरुकवदाभास शब्द में नरपुंसक लिंग का प्रयोग ] लौकिक [भल्कार ]- हार आदि। इनका अल्कार्य (शरीर) से सयोग सम्बन्ध रहता है। इसरिए ये शरीर के गुणधर्म अपनाने के लिए विवश नहीं रहने। काव्य के अल्कारों की स्थिति भिन्न है। [उट्गट आदि के अनुमार ] इनका अल्कार्य के साथ समवाय सबन्ध रहता है। इन्हें काव्य से अलग नही किया जा सकना इमीलिए इन्हें काव्य के (रिंग आदि) गुण धर्म अपनाने पहते है। अन इनका लौकिक अटंकारों से वैवर्म्य ठीक ही है। अब एक प्रदन यह उठता है कि अरंकार और भरंकार्य में आश्रयाययिमाव सबन्ध देखा गया है अन इन (उपमादि) अलकारों का भी कोई न कोई आश्रय होना ही चाहिए। वह कौन तत्त्व है।" इमका उत्तर देते हुए लिखते हैं-"अर्थपीनरकत्य" आदि । यहाँ एव (ही) शब्द से पौनरकत्य का ग्रहण नहीं होना। तिमर्श :- (१) आमासशव्द मस्कृन में पुल्लिंग शब्द है। "पुनरुकवदामास"-शब्द का अर्थ है "फिर से कहे गए जैमा लगना"। इस अर्थ में आमासशब्द स्वनन्त्रशब्द है किसी के लिए विशेषण शब्द नहीं, फलत. यहा इसका प्रयोग पुलिंग में ही होना चाहिए, किन्तु सूश्र में उमे नपुसकलिंग में रखा गया है "पुनरक्तवदाभामम्" इम प्रकार। यह क्यों १ वस्तुन इस शब्द का नपु सकलिगान्त प्रयोगपह्ली बार उद्गट ने किया है। उनकी कारिका विमर्शिनी में उद्भृत है [ पुनरुकवदामास छेका- नुप्रास एव च][दण्डी, भामइ और दामन में यह अलकार नहीं मिलता। ] वृत्तिकार ने यहा जो उत्तर दिया है उसका भी मूल कदाचित उड्ट के काव्यलकारसारमग्रह की लघुवृत्ति है। उसमें प्रतीहारेन्दुराज ने नपुमकलिगान्न पुनम्कवदामास शन्द में बहुवीदि प्रतिपादित किया है, और
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पुनरुक्तवदाभास: 5525 6 ४९
शब्द को काव्यपरक माना है अर्थात उन्होंने इस शब्द का अर्थ किया है ऐसा काव्य जिससे पुनरुक (पुनरुक्ति) जैसा आभास हो। पुनरुकवदाभास की उद्भटकृत परिभापा"पुनरुक्ता- मासन् अभभिन्नवस्तु इब उद्भासि भिन्नरूपं पदम्" "तस काव्य को पुनरुकवदाभासयुक्त काव्य माहते है जिसमें स्वरूपत: भिन्न पद अर्थतः अभिन्न लगते हों"-पर वृत्ति लिखते हुए प्रतीहारे- न्दुराज ने िखा-"पुनरुकाभासम् अत्र काव्यमलंकार्य निर्दिष्टम्, पुनरुक्तवद् आामासमाने च पदे तत्यालंकारः। अन्र अलंक्कार्य यत काव्यं तद्धमत्वेन पुनरुकवद् आभासमानयोः पदयो: अलंका- रत्वन् सक्ताम्, न तु स्वतन्त्रतया। फलं चैवमभिधानस्य पुनरुकवदाभासमानपदसमन्वयस्य अलंकार- ताख्यापनन्। अलंकारस्य खठ अलंकार्यपरतन्त्रतया निरूपणे क्रियमाणे सुष स्वरूपं निरूपितं मनति, स्वातमन्यवस्थितस्य तस्यानलंकारत्वात समुद्गकस्थितहार-केयूर-पारिहारयाद्यलंकारवद। अतः पुनरकवदाभासत्वस्य अलंकारताख्यापनाय कान्यपरतन्त्रतया निर्देशो युक्त एव ।" इस पूरे सन्दर्भ का कुल मिलाकर केवल इतना ही अर्थ है कि नपुंसकलिगान्त पुनरुत- वदामास में बहुन्रीहि है और उससे युक्त यह शब्द अलंकार का वाचक न होकर काव्य का वाचक है। और काव्यशन्द नपुंसकर्लिगान्त होता है। कान्यवाचकरूप से इस शब्द का प्रयोग इसलिए किया है कि काव्य में प्रयुक्त होने पर ही पुनरक जैले लगते पद अलंकार बनते हैं। यहां अलंकारसवस्वसूत्र के वृत्तिकार भी इसी बात को दोहरा रहे हैं। टीकाकार के अनुसार वृत्तिकार प्राचीन माचार्यो की मान्यता का अनुसरण कर रहे हैं। उनका खण्डन नहीं। फिन्तु इस तथ्य का इन दोनों वृत्तिकारों के पास उत्तर नहीं है कि उट्हट ने जहां पुनरुक- वदामास का उल्लेस- "पुनरुक्तवदाभासं छेकानुप्रास एव च। अनुप्रासस्त्रिधा लाटानुप्रासो रूपकं चतुः ॥ उपमा दीपकं चैव प्रतिवस्तूपमा तथा। दत्येत एवालंकारा वाचां कैबिदुदाहताः ॥" -- इस कारिका में किया है, वहाँ तो केवल सलंकारों का ही उल्लेख है। नहाँ तो काव्य के लिए इस शब्द का प्रयोग नहीं है। यदि 'पुनरुकवदाभास' शब्द काव्य के लिए है तो छेकानुप्रास आदि शब्दों को भी कान्य के लिए भी होना था, और इसीलिए उनमें भी नपुंसकलिंग होना चाहिए था। यहाँ 'पुनरुक्तवदाभास'-शब्द 'पद' के लिए प्रयुक्त माना जा सकता है। 'पद' नपुंसक- लिंग शब्द है। "नह्द पद जिसका वाभास पुनरुक सा हो"-काव्य का अलंकार होता है ऐसा अर्थ करने पर उपर्युक् कारिका में भी नपुंसकलिंग उचित सिद्ध होता है। अलंकाररलाकरकार ने सूत्र में 'आमुखैकार्थपद पुननकवदाभासम्' इस प्रकार 'पद'-शब्द का प्रयोग किया भी है। छेका- नुप्रास आदि पद के धर्मे नहीं, वृत्ति के धर्म हैं, अतः उन्हें स्वतन्त्ररूप से उनके अपने-अपने लिंगों में ही रखा उद्भट ने पुनरुजवदाभास का जो लक्षण किया है उसमें तो "पुनरुकामासं ... "पदम्" इस प्रकार पदशब्द का प्रयोग है ही। वस्तुतः अलंकार सवस्वकार ने अपने सन में उद्धट के शब्द को दोहरा दिया है। उसके अनुसार अर्थ यह होगा कि "जो पौनरुक्त्य भारम्भमात्र में प्रतीत होता है वह तो वही तत् है जिसे उद्भट मे पुनरुक्तवदाभासन् कहा है।" दोनों में अन्तर यह है कि उद्भट ने पुनरुक जैसे लग रहे 'पद'को अलं- कार कहा है और अलंकारसवंस्वकार ने पदगत 'पौनरुकत्य' को जो अधिक वैज्ञानिक है। पद
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५० अलद्गारसवस्वम्
तो काव्यशरोर का घटक है अलंकार नहीं। पदगत पौनरुक्त्य अंगगत इार आदि अथवा सुहौल- पन आदि के समान शोमाधायक अलकार माना जा सकता है। यह मी समावना की जा सकती है कि सूत्र में जिस प्रकार उद्देश्य में "आमुसावमासन" इस प्रकार अवभासन शब्द है उसी प्रकार विधेय में मी "पुनरुक्तवदाभासनम्" इस प्रकार "अव- भासन" शब्द रहा हो। 'अवभासन' शब्द नमुमकलिंग होता दी है। किन्तु देमा सोचना संभव नहीं, कारण कि वृत्तिकार सूत्रकार के शिष्य है, उन्हें मूल पाठ में इस प्रकार भ्रम नहीं हो सनता। यदि सूत्रकार और वृत्तिकार अभिन्न हैं तब तो पाठभेद का प्रश्न हो नही बठता। यह मी नहों माना जा सकना कि सूत्रकार ने छनुवृत्तिकार की मान्यता को दोहरा दिया हो, क्योंकि एक तो प्रतीहारेन्दुराज सुत्रकार से पहले के है यह निक्चित नहीं दूसरे प्रनीहारेन्दुराज का यह कथन कि "पुनरुकरदामासम्" पद काव्य के लिए है, पौनसुकत्य और काव्य में अमेद सिद्ध करता है, जो निरी भावुकना है। पौनरुकत्य काव्य धर्मे हो सकता है काव्य नहीं। इसीलिए हमें यहाँ भी वृत्तिकार और सूत्रकार उद्भट और प्रतिहारेन्दुराज के ही समान भिन्न लग रहे हैं। यह भी सोचा जा सकता है कि-"पौनरुक्त्य तीन प्रकार के होते है-अर्थगत, शब्दगन, उभय- गन, इनमें अर्थगत पौनरुक्त्य यदि मस्द हो जाय तो दोष माना जाता है, किन्तु यदि वह केवल आरम्ममान्न में प्रतीत हो, तो पुनरकवदामास होता है अर्थात इसमें पद पुनरक जैसे प्रतीन होते हैं। 'इस प्रकार सदर्म के क्रम से 'पुनरुकवदामास' शब्द पौनरुक्त्य के दिए बहुन्नीहि युक्त है, अतः नपुंसक्लिगान्त है।' किन्तु यह मी अवैश्ञानिक है, क्योंकि जब प्ररूद पौनरुकत्य दोष कहा जा रहा है तो अप्रसूट को दोपविरुद्ध अलकार कदना ही स्वाभाविक है, और निरूपण भी अटकारोंका ही करने जा रहे हैं। चट्रट ने पद को 'पुनरुक्नवदाभास' कहा और पद को ही अलकार माना। उनकी यह स्थापना स्थूल है अन कदाचित उनके इस दोष पर कटाक्ष करने के लिए सूत्रकार ने उनका पद उन्हीं के अनुसार प्रस्तुत कर दिया हो। सवंथा है यहाँ उद्गट के "पुनरुक्नवदामास"शब्द का अनुवाद। उद्ट के पश्चाव पुनरुत्तवदाभास का निरूपण मम्मट में मिलता है। रुद्रट ने इसे छोट दिया है। मम्मट का पुनरुकवदाभास विवे- चन इस प्रकार है- [का०] पुनरुक्तवदामासो विभिन्नाकारशब्दगा। एकार्थतेव्र शम्दस्य तथा शम्दारथंयोरयम् ॥। [९। ८६ काव्यप्रकाश] [वृ०] मिन्नरूप-'सार्थकानथंकशम्दनिष्ठमेकार्थत्वेन मुखे मासनं पुनरुकवदाभासः। स च- शब्दस्य समङ्रामहरूपकेवलशब्दनिष्ठ ।' अर्थात-भिन्न भिन्न आकार के सार्थक और निरर्थक शम्दो का आरम्म में एकार्थक भासिन होना पुनरुकवदामास दोता है। शब्द में वह समझ और अमम दोनों प्रकार के शब्दों में रहना है। (२) वृत्तिकार सूध्कार से भिन्न है यह तथ्य इससे भी प्रमाणित होता है कि सूत्रकार ने पुन- रुकवदाभास को अर्थालकार नहीं कहा। पुनरुक्तवदाभास में केवल पीनरकत्य को अर्थगन स्वीकार किया है। अर्थात् "अददीन" का अर्थ मी 'मर्पों का राजा' होना है और "भुजगाधीय" का भी। एक ही पद्य में दो वार एक ही अर्थ का कथन दोपतुल्य रगता है, पिल्तु 'अह्दीन' शब्द का अथे 'पुष्ट' है ऐसा समझ में आते ही अर्थ मिन्न हो जाते है। मौनरुक्त्य नहीं रदता। इम प्रकार नुलावे में टालना एक शब्दच्छल सिद्ध होता है जो विरोघाभास के समान चमत्कारी है। किन्तु अर्थ में
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पुनरुक्तवदाभास: ५१
मौनस्कत्य कदापि न आता यदि 'अहीन' शब्द के स्थान पर पुष् शब्द का प्रयोग किया गया होता। इसलिए पौनसकत्य अर्थ में भले ही हो किन्तु उसका प्रत्यायक है, पद । फलतः अलंकार पद मेंही है। काव्यप्रकाशकार ने इसीलिए अन्वयव्यतिरेक को गुण अलंकार और दोषों की शब्दार्थ- निष्ठता का मानदण्ड बतलाया है। यहाँ शब्द के रहने पर हो अलंकार रहता है। काव्यप्रकाशकार की इस स्थापना का पण्डितराज जगन्नाथने खण्डन किया है; किन्तु वह अवैज्ञानिक है। अलंकार- सर्वस्वकार ने अलंकारनिरूप का जो क्रम अपनाया है उससे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि वे पुनरुकवदाभास को शब्दालंकार मानते हैं। उन्होंने शब्दालंकारों के निरूपण के पश्चात्, मर्था- लंकारों का निरूपण किया है। फलतः सूत्रकार के अनुसार पुनरुकवदाभास शब्दालंकार ही है। उड्हट ने जो उपर्युक्त कारिकाओं में अलंकारों का नामो ल्लेख किया है उसमें से भी प्रतीदारे- न्दुराज ने पुनरुक्तवदाभास आदि प्रथम चार अलंकारों को शब्दालंकार कहा है और शेप चार को अर्थालंकार। "तत्र चादौ चलारः शब्दालंकारा निरुपिता रूपकादीनां तु चतुर्ण्णंमर्था- लंकारता"। यदयपि मम्मट ने पुनरुकवदामास को शब्दालंकार मानकर उभयालंकार भी माना है तथापि उन्होंने, शब्दालंकारों में ही गिनाया है। काव्यप्रकाश के नवम उल्लास में शब्दा लंकारों का ही निरूपण है। इसी प्रकार छिपरम्परितरूपक आादि को भी उमयालंकार मानते हैं किन्तु गिनाते अर्थालंकारों में ही। कारण देते हुए कहते हैं कि उन अलंकारों को प्रसिद्धि वैसी ही है। उभयालंकार नाम से वे प्रसिद्ध नही है। वस्तुतः पुनरुकवदाभास में अर्थ की अपेक्षा शब्द का अलंकार-निष्पादकत्व प्रधान है, और किष्टपरम्परितरूपक आदि में शब्द की अपेक्षा अर्थ का। फलतः उनकी प्रसिद्धि शब्दालंकार और अर्थालंकार के रूप में ही है। मम्मट ने इनमें यदि 1क एक की प्रधानता न देखी होती तो वे पुनरुक्तवदाभास, परम्परितरूपक आदि के लिए एकादश उल्लास लिखते और नवम में शब्दालंकार, दशम में अर्थालंकार का निरूपण कर उसमें उभयालंकार का निरूपण करते। वस्तुतः मम्मट को भी पुनरुकतवदाभास में शब्दालंकारत्व ही अधिक मान्य है। इस प्रकार यह सत्य है कि पुनरुक्तवदाभास में पौनरुकय अर्थगत ही है; किन्तु यह भी सत्य है कि अलंकार शब्दगत ही है। यहाँ मर्थ में पौनरुक्तय का दोष आता है। उसे उन्मेष मिलता है शब्द से। किन्तु शब्द का शिल्ष्प उसे आभासात्मक ठहरा देता है। अतः चमत्कार शब्द के शिल्प में है। फलतः पुनरुतवदाभास शब्द का ही अलंकार है। वृत्तिकार ने इसे अर्थालंकार कहा है और टीकाकार भी उसका समर्थन करेंगे। किन्तु यह सब मूलविरुद्ध हैं। (इ) मम्मट ने आनन्दवर्धन के अनुसार अलंकारों को काव्यांग का धर्म माना है, कान्या- त्मा का धर्म नहीं; और उन्होंने उसे हार आदि के समान कहा है। इससे इस भ्रम को जन्म मिलता है कि वे अलंकार और काव्य में सम्न्ध भी नहीं स्वीकार करते है जो हार और शरीर में स्वाकार किया जाता है अर्थात संयोग सम्बन्ध। किन्तु मम्मट ने ऐसा कहीं नहीं कहा। उन्होंने संयोग और समवाय के आधार पर गुण और अलंकार का उत्तर प्रस्तुत करनेवाले उद्भदादि के मत का खण्डन अवश्य किया है किन्तु उनका वह खण्डन यह सिद्ध करने के लिए नहीं है कि अलंकारों का संबन्ध काव्य में संयोगरूप ही है, और गुणों का समवायरूप ही। उनका खण्डन इस- लिए है कि वे गुण और अलंकारों में संयोग और समवाय को भेदक नहीं मानना चाहते। वे उनके साक्षाव और परम्परया उपस्कारकत्व को ही भेदक मानना चाहते हैं। यह मी इसलिए कि संयोग और समवाय दार्शनिक शब्द हैं और बे विवादास्पद हैं। समदाय के लिए सम्बन्ध का एक छोर (अनुयोगी) अवश्य ही भौतिक होना चाहिए। संयोग तो केवल भौतिक पदार्थों में ही होता है। काव्य इसके विरुद्ध सर्वथा समौतिक है। उसमें संयोगादि की चर्चा पररूद नहीं हो सकती।
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५२ अलङ्कारसवस्वम्
यह सिद्धान्त बिलकुल मान्य है कि जिस प्रकार काव्यगण काव्य से अलग करके नहीं पाए जा सकने उसी परकार काव्यालकार भी काव्य से अल्ग करके नहीं पाए जा मकने, जब कि ह्ार आदि पाप जा सकते है। निष्कर्ष यह कि गुर्णो को जो शौर्य आदि के समान कहा वह जिनना संगत है उतना अलकारों को जो हार आदि के समान कहा वह नहीं। उद्यादि की मयोग और समवाय आदि की चर्चा का यही सार है। टीकाकार ने जो "काव्यालकाराणा पुन अन्यकार्येण सद समवायः संन्ध"कहा उसमें समवाय का अर्थ 'अयुनसिद्त्' ही है। अयुन शम्द में यु धातु का अर्थ मिश्रण नहीं अमिय्रण है, अमिश्रण यानी पाथक्य। फलत उसका अर्थ है अपृथक। जो वस्तुएँ एक दूसरे से पृथक नहीं रहद सकनी उन्हें अयुतसिद्ध कहा जाना है। जैसे गुण और द्रव्य। यहा अलकार भी काव्य से पृथक नहीं मिलते। न्यायशास्त्र समवाय सबन्ध को द्रव्य में ही मानता है और काव्य द्रव्य नहीं है। अत समवाय का अर्थ वही नही लिया जा सकता जो न्यायशास्त्र में लिया जाता है। (४) टीका में यहा एक पक्ति है "लक्ष्यस्य दक्षणीयस्य पुनरूक्तवदाभामस्य पुन शब्दापेक्षया निर्देशो वचनमित्यर्थ"। इसमें निर्मयसागर सस्करण के अनुमार "पुन शब्दा०" ऐसा, और "निर्देशे" ऐेसा पाठ है। मुनत्शन्दापेक्षया का सकेत कदाचित सूत्रस्य 'पुन. पुनरक्त०" इम प्रकार आए प्रथम पुन शब्द की ओर है। निर्णयसागर सस्करण में यह सूत्र केवल "आमुसावभासन पुनरुकवदामासम्" इतना दी है। इसमें प्रथम 'पुन'-शब्द नहीं है। इसमें इमने टीका की इमी पचि के आधार पर 'पुन-' शब्द जोड़ दिया है यद्पि संजीविनीकार ने यहा 'तु' शब्द दिया है। प्ररूद पौनरवत्य से अप्ररद का अन्नर बनलाने समय व्यावसंकया वेलक्षण्यद्योतक ऐसे किसी शब्द का सूध में होना आवश्यक था। 'निदेश' यह ससमी अवश्य हो मुदादोप है। संगति= आगे आरही विमर्सिनी जिन विकल्पों का खण्डन कर रहा है वे अलंकाररत्ना करकार द्वारा प्रस्तुत किए गए है। एतदर्य अलकाररत्नाकर के प्रथम सूत्र की वृत्ति देस लेनी चााहेर। यहाँ धोडा सा अंभ आगे उद्धृत कर दिया गया है। चिमशिनी तेन शब्दरस्यापोनसवयान शच्दालंकारो नाप्युमयालंकारोऽयमित्यर्थः । पर्य- वसाने वस्तुतोऽर्थस्यासतवात् धर्म्यभावे च घर्मस्य निविधयर्वातपीनदवत्यं कस्य धर्म स्यादिति न वाच्यम्। आमुसेऽर्यस्यावमासमानरवेन सत्वाद र्मिघर्मभावस्य नवानिष्टेरर्थंगतयो सत्वासरव योरनुपयोगात्। आमुखावगतैव च प्रतीतिरलंकारवीजं न पार्यवसानिकी। तथात्वे सुपमारपकादीनामप्यविशेष' स्याद्। पर्यवसानेऽप्यर्थस्य 'दारण: काष्टतो जातः' इस्यादाविन्धनार्थस्य सत्वादनेकान्तिकत्वाभावाच्छतशङ्गवदभावो न वाच्यः । पर्यव सानेऽप्यत्रेन्धनार्थ सन्नपि नालंकारतव प्रयोजक इति 'अरिवधदेद्दशरीर" [काव्य प्रकाश १३८९] इत्यादावप्यसता कायार्थेनाविशेषातसमान'। कि च इतो न पर्य-
भवतीत्यविवादः। तद्वाघोरपत्तावपि तैमिरिकद्विचन्द्रपतीतिवत पुनरकतयाव भातस्यार्थ-
शुक्तिकायामिव रजतप्रत्ययस्य स्वरूपत एवाभावः। अत यवाभातपौमरुवयापि प्रतीतिर पौनरुक्त्य पर्यव सायिन्यस्य स्वरूपम्। एवमपि वस्तुत' कायाधर्थाभावस्तदवस्थ इति चेतु,
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पुनरुकवदाभास: ५३
सत्यम्। किंतु तथा वस्तुतो चहिरसंभवन्नपि द्वितीयश्चन्द्रः प्रतीतौ कंचन विशेषमाधातुं नोत्सहते तथेहापि वस्तुवृत्तेन कायादेरर्थस्यासंभवेऽपि प्रतीती न कश्चिद्विशेप इति दिण्डि- काराग एव वास्तवत्वान्वेपणम्। तत्मादन्नावभासमानत्वमेवार्थस्य सत्प्रतिष्ठापर्क प्रमाणम् । क्त्योंकि [पुनरुकतवदाभास में] पौनरुकत्य [अर्थ में रहता है] शब्द में नहीं रहता, इसलिए न तो यह शब्दारंकार है और न उभयालंकार। (शंका) "जिस अर्थ में पौनरुवत्य रहता है वह मिथ्या है क्योंकि वह अन्त में तो रहता नहीं है अतः पौनरुकत्य किसमें रहेना? इसलिए कि धर्म विना धर्मो के नहीं रह्द सकता" यह झंका नहीं करनी चाहिए; क्योंकि वह अर्थ आरम्भ में तो रहता ही है। अतः धर्मधर्मिभाव का कुछ नहीं विगड़ता [ यहाँ वस्तुतः "तेनेवष"" पाठ होना चाहिए, अर्थगत वास्तविकता और अवास्तविकता का यहाँ प्रतीतिपर- मार्थ काव्य में कोई उपयोग नहीं। यहाँ पुनपुनरुक्तवदाभास में आरम्भिक प्रतीति ही अलं- कार का बीज है, अन्तिम नहीं। यदि वैसा होता [अन्तिम प्रतीति को अलंकार-बीज माना जाता] तो उपमा और रूपक आदि में कोई अन्तर न होता [ क्योंकि अन्त में तो दोनों ही साद्वस्य में पर्यवसित होते है]।
[सच तो यह है कि ] अर्थ पर्यवसान में भी रहता ही है [ उदाहरणार्थ] "दारुणः काछतो जात:" में इन्धनरूपी अर्थ अन्त में भी (व्यंजना द्वारा) प्रतीत होता ही है। मतः जब उसकी सत्ता में संदेह नहीं ( अनैकान्तिकत्वाभाव) है तव उसका शशमृद् (खरगोश के सींग) के समान अत्यन्तामाव नहीं माना जा सकता। इतना है कि यहाँ इन्धनरूपी अर्थ पर्यवसान में भी प्रतीत तो होता है किन्तु वह अलंकारत्व का कारण नहीं वन पाता (उसमें आरम्भ के समान चमत्कार नहीं रहता) इसलिए "अरिवयदेह शरीर" [ शत्रु को वध देनेवाली अरिवधदा ईहा है जिनकी ऐसे शरा=वाण वाले वीरों को 'ईर' = प्रेरित करने वाला, काव्यप्रकाश में पुनरुक्वदाभात का उदा- हरण ] इत्यादि में [देह और शरीर दोनों का अर्थ ] कायरूपी मर्थ और इस (इन्धनरूपी) अर्थ को स्थिति एक सी है, दोनों में कोई भेद नहीं है। (यहाँ निर्णयसागर संस्करण में 'काय' की जगह 'कार्य' छप गया है)। वस्तुतः इन सब हेतुओं से भी पुनरुकवदाभास में अर्थ असत्य (अवास्तविक) नहीं रहृता। काव्य में सारा खेल प्रतीति का है अतः इसमें जो जैसा प्रतीत होता है वह निविवाद रूप से वैसा ही मान लिया जाता है। बाद में उसका बाथ भी हो जाता है तव भी जैसे तैमिरिक रोग से पीड़ित को एक की जगह दो चन्द्र दिखलई देते हैं, और उनमें से एक के वाधित होने पर भी दोनों का दिखाई देना वन्द नहीं होता उसी प्रकार पुनरुक अर्थ प्रतीत हो जाता है तो फिर प्रतीत होता ही रहता है। फलतः द्वितीय मसत्य अर्थ भी प्रतीति में सत्य ही रहता है। ऐसा नहीं हैं कि (दारुण: कापतः) में दारूण का अर्थ कर प्रतीत हो जाने पर काष्ठरूपी अर्थ की पतीति बन्द हो जाती हो या उसमें पौनरूकत्य की प्रतीति न होती हो। बाध होने से द्विचन्द्र पतीति के समान पुनरुकप्रतीति में केवल अनुपपद्यमानता असमर्थनीयता मात्र की प्रतीत्ति होती है, न कि सीपी में रजतज्ञान के समान उसका स्वरूपतः अभाव प्रतीत होता है। इसीलिए पुनरुत्तवदाभास का स्वरूप अपौनरुक्त्य में पर्यवसित होनेवाली वह प्रतीति है जिसमें आरम्म में पौनरुक्ल आमासित होता हो। (शंका) "किन्तु ऐसा मानने पर भी ("अरि- वधदेहशरीर" इत्यादि में) काय आदि अर्थ का अभाव बना हो रहता है, काय आदि वास्तनिक तो हो नहीं जाते" ऐसा कहना ठीक है किन्तु यहाँ वास्तविकता का अन्वेषण दिण्डिकाराग हो है, क्योंकि जिस प्रकार द्वितीय चन्द्रमा मौतिक रूप से वाहर उपलब्ध नहीं रहता तथामि उसके इस
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५४ अलङ्गारसर्वस्यम्
अमाव से द्विचन्द्रप्रतीति में कोई फरक नहीं पढ़ता, उसी प्रकार यहाँ काय आादि अर्थ के मौतिक रूप से वन्तुतः न रहने पर भी पुनरुकत्वेन हुई उनकी प्रतीति में कोई फरक नहीं पढता। इस- लिए यहाँ (काव्यक्षेत्र में) पदार्थ की सत्ता का प्रमापक उसकी प्रतीति या उसका अवभास ही है, (अर्थात जिसका आमास हो रहा हो चह काव्य में सत्य ही है, लोक में भले ही न हो।।
विमर्शिनी ननु अवभासमानरवं प्रमातृघर्म इति कथ तदाश्रयो धर्म. कान्यालंकार इति घेद, असदेत्तव्। अवभासमानत्वस्यावभास्यनिष्टतया प्रतीतेरर्थधर्मख्वात्। तथा दि केपाचन पतीतिवादिनां- तथाहि वेद्यना नाम भावस्येव निजं बपुः। वैत्रेण वेद्य वेभीति किं छत्र प्रतिभासते ।।' इत्याद्युक्युकत्या कौमारिलवस्रीलताया इव वेद्यताया अप्यर्थधर्मत्वमेवेष्टम्। इह च तदुपक्रम पवेति न वस्तुवादसस्पर्शी न्याय्य। आमुखतुत्यार्थत्वस्य घ शब्दधर्मववेन शब्दाधयरवात् शब्दालंकारत्वं यद्यर्योच्यते तथापि पर्यवसाने वस्तुतस्तुस्यार्थत्वस्यासंभ- बाद् शशशङ्गवद्दर्मघर्मिभावो दुष्ट स्यात्। स्त्वेऽपि दोष एवेत्यस्मत्पनोकसमग्रचोद्याव- काशः। अवरापि यध्ामुख पवं कार्थरचेनाव भासन समाधिस्तदासमन्पच्तेण किमपरादम्। एवं च विरोधऽपि वस्तुती विरुद्धस्यार्थस्यासंभवाद्वियद्वार्थत्वस्थ च शब्दधर्मरवात् शब्दालंकारतवं परसग्यते। अत्र विरु्द्धस्यार्थस्यासभवपि कर्त्रादिमिर्वाच्यतयाध्यवसाय, इह तु पौनरु वर्याश्रय स्यानन्वितत्वेन न वाच्यतेति चेत, नेंतत्, यत: 'दारण काषटनो जातः' इत्यादी तावत्पौनरुकत्याश्रयस्य काष्टादेरर्थस्य जातरवादिना सहान्यितत्वावगमादस्त्येव मुरयया वृच्या वाच्यरवम्। 'अरिवधदेद्शरीरः हत्यादो तु वस्तुनः कायादरवाच्येऽप्यवभातपी- नव्वन्याश्रयत्वादक्कत्निमार्थशोभापयंव सायित्वेन वाच्यतयास्यंव विवतितत्वम्। अत् द्यकृत्निमोर्ऽर्योऽलंकृतकृत्रिमार्थोपस्कृतो यथा चमतकारकृत न तथा तदुपस्कृततयोच्यमानः स्यात्। 'स्तरीणां हि कण्टाभरणानि द्वारा पयोधरानप्यमिभूपयन्ति' इरयादिदशा व हारस्य कण्टालंकारत्वेपि सामीप्यात्तावतिकोभातिशयाघायकरवाद्यया पयोघरादावप्य लंकारतं तर्थव कृत्रिमार्थाश्रयतवेऽ्यवभासमानस्य पीनरुक्तयस्याकृतिमार्थोंपस्कारक रवमपि प्रतीयत एवेति नामुभवापह्वयः कार्यः। एवं घ पौनरक्त्याधयस्यार्थस्य यत्रैप वाच्यखेन विवमितत्वं नववास्यालंकारखं नान्यव्र। 'अकृष्ण पप्ेन्दुमुखी वन्धुजीवाधरघुतिः। इयं विलासिनी कसय न नेत्रोसवकारिणी ।I' 1 वच्यमाणनामप्यलंकाराणां कतिविवसव स्वरूपप्रतिष्टापकं प्रमाण नेयम्। कि बहुना, सर्वेपामप्यलंकाराणामुपमितार्थत्वादेः शब्दधर्मत्वाच्छव्दालंकारसं स्यात्। तदर्थालंकार- रवमस्य ज्यायः, यावता झर्थरयामुस एव पुनरुकनयात्रभासोऽस्य जीवितम्। भत एव पुनरुकवदाभासमित्यम्बर्थसंज्ञा। अर्थस्य च पीनसवत्यप्रतीती न कस्यचिद्विवाद:, तामे- घाश्रित्य शब्दालंकारस्य भवसिरक्तवात्। एवं च प्रत्यासत्तेस्तदाशरयत्व मेवास्यालंकारत वं युकम्। अन्यथा तुल्यार्थशब्दुतापि वाक्यधर्म इति तदाश्योऽपि स्यादित्यनवस्थाप्सङ्गः।
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पुनरुकवदाभास: ५५
शंका होती है कि 'अवभासमानता तो वस्तुतः प्रमाता = अनुभविता (सहृदय सामाजिक) का धर्म है अतः उस (अनुभविता) में रहने वाले धर्म को काव्य का धर्मे अलंकार कैसे कह सकते हैं? उत्तर :- यह कथन गलत है। अवभासमानता धर्म है सवमास्य वस्तु का, अतः प्रतीति भी वस्तुतः अर्थ का हो धर्म है। जैसी कि कुछ प्रतीतिवादियों की "बेद्यता। झैयता) जो है सो पदार्थ का ही अपना रूप है, मैं जानता हूँ कि चैत्र को क्या विदित है" -- इस उत्ति में क्या भासित होता है? [अर्थात यहाँ वक्ता के ज्ञान में चैत्र का ज्ान ही विषय है, अतः वह यहाँ वस्तुरूम है।] इत्यादि युक्तियों से वेद्यता भी ठीक उसी प्रकार अर्थधर्म है जिस प्रकार कौमारिल संप्रदाय (भट्ट भत, पूर्वमामांसा) में नीलता (भट्टमत में नीलादि वस्तुओं में जिस प्रकार नीलता आदि रहती हैं उसी प्रकार वेद्यता-सातता भी)। यहाँ (पुनरुकतवदाभास में) वह (अवभासमानत-वेद्यत्व) आारम्भनात्र में रहता है (अन्त में नहीं) इसलिए यहाँ वस्तुवाद (वास्तविकता की चर्चो) का संस्पर्श भी करना उचित नहीं है। (शंका) "यह जो वारन्भ-आरम्भ में तुल्य (एक से दो) अर्थो की प्रतीति है इससे आसुस- तुत्यार्थत् (आमुख=आरन्म में है तुल्य=एक सा मर्थ जिसका =ऐसा शब्द, तदर्म, इस प्रकार से) धन शब्द में रहेगा और जब वह शब्द में रहेगा तब इस (पुनरुक्तवदाभास) को शब्दा- कंकार नाना आना चाहिए", ऐसी शंका क ठाई जा सकती है (सिन्तु क्योंकि यह शंका धर्मवमि- माव (आनुखतुल्यार्थत धर्म, शब्द धर्मी) के आधार पर की जा रही है और धर्मधर्मिभाव आरन्ममात में बनता है अन्त में नहीं, क्योंकि अन्त् में अर्थ नहीं रहता, अतः) इस शंका के धर्म- धर्मिभाम में जक्श्रंग के समान दोप आ जावेगा। (पूर्वपक्ष) यह और ऐसे सभी दोप तो सामके उस पक्ष में भी आवेंगे जिसमें अर्थ का प्रातिभासिक या प्रातीतिक अस्तित माना गया है। और यदि अपने पक्ष के उत्तर में आाप यह तर्क प्रस्तुत करते हों कि पुनरुक्तवदाभास में शब्द भारन्म में एकार्थक भासित होते हैं, तो हमारे पक्ष ने क्या अपराध किया है? ऐसे तो विरोध में भी विरुद्ध अर्थ वास्तविक नहीं होता और विरुद्वार्थता धर्म होता है शब्द का, अतः उसमें भी शब्दालंकारत को प्रात्ति होती है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि विरोध में विरुद्ध अर्थ मिध्या होते हुए भी कर्ता आदि से अन्वित रहने के कारण वाच्यरूप से स्वीकार किया जाता है (यद्यपि मिथ्या होने के कारण उसका नाच्यत्व मी रहता झूठा ही है(इसके विपरन्त पुनरुकवदाभास में पौनरनल्य का आश्रवीभूत अर्थ अन्वित नहीं रहता अतः वह वाच्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'दारूण: काष्ठतो जात:' इत्यादि स्थलों में पौनरकत्य के आश्रय काष्ठ आदि अर्थ का जातत आदि के साथ अन्वय प्रतीत होता है फलतः वह (पुनरुक्त सर्थ) भी यहाँ सच्चे अर्थो में वाच्य है। यद्यपि "अरिवधदेहशरीर" आदि में जहाँ पुनरक्त्यार्थकर व्द भंगइलेय द्वारा बना रहता है (यया शरीर- शब्द 'अरिणः ईरयति' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से बना है) वहाँ (पौनरुक्त्याश्य शरीर मादि शब्दों के) काय आदि अर्थ वाच्य नहीं होते (क्योंकि वहाँ वाचकशब्द का ही अस्तित्व अवास्तविक होता है) किन्तु पौनरुवत्य के आाभ्रयरूप से प्रतोत यह बनावटी अर्थ स्वाभाविक और मूलभूत अर्थ की शोभा वढ़ाता है अनः वह वाच्यरूप से अवश्य ही विवक्षित है। यहाँ जितना चमाकार अलंकृत और बनाबटी अर्थ के द्वारा स्वाभाविक अर्थ के उपस्कार से होता है उतना सस (कृत्रि- मार्थ) के द्वारा उपस्कृत रूप से इसके अभिधा द्वारा कथन से नहीं होता। "स्त्रियों के कण्ठाभरण हार कनों को भी भूपित करते है"-दम उति के अनुसार जैसे दार भमरण मे कण्ठ के होते हैं तब भी सोना सभीपव्ती (होने के कारण) स्तनों की भी बढ़ा दिया करते है दैसे ही पौन- रुकस्य रहता तो कृत्रिम अर्थ में ही है किन्दु वह अकृत्रिम (स्नाभाविक) अर्थ की भी शोमा
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५६ सलङ्कारसवस्चम्
चढाता ही है। यह अनुभवसिद्ध भी है अतः इसको छिपाया नही जा सकना। इस प्रकार पौन- रुकत्य का आशरम अर्थ जहाँ वाच्यरूप से विवक्षिन होता है वहीं यह अल्कार होता है, अन्यन्र नहीं। "अक्ृगपक्षेन्दुमुखो, बन्धुजीव के समान अधरकान्ति वाली यह विलासिनी किसकी आसो को आनन्द नहीं देती"। यहाँ ("अकारो वासुदेवे स्या", 'अक्षराणामकारो.सि्मि' इत्यादि वचनों के अनुमार 'अ का अर्थ है विष्णु और वह्ी कृष्ण का भी फलत.) "अकृष्ण" शब्द में पौनरुक्त हो सकता है तथाषि वह्द वाच्यत्वेन विवक्षिन नहीं है (कवि उसको बनलाना नहीं चाइता) सत. उसे (पुनरक्तवदा- भास) अलंकार नहीं कहा जा सकना। इसी प्रकार आगे कहे जाने वाले अलंकार मी तभी अलकार होंगे जब वे कवि को अलकाररूप से विक्षिन होंगे। अधिक से क्या? (रूपक दीपक आदि सादृश्यमूलक) सभी अलकार शन्दाटकार कहे जा सकते हैं क्योंकि उनके शब्दों में उप- मितार्थत' रहता है। इसलिए इस पुनरुकवदामास) को अर्थारकार मानना ही अधिक सच्छा है। क्योंकि वह अर्थ ही है जिसकी आरम्म में पुनरुकरूप से प्रतीति होने के कारण इस अल्कार में प्राभ आते हैं। इमीलिए, "पुनरुक्तददाभासम्" यह अथानुरूप नाम साथक सिद्ध होता है। सर्थ में जो पुनरुकि की प्रतीति है उममें तो किसी को विवाद है नहीं क्योंकि उसी के आधार पर आपने भी रस अटकार को शब्दालकार माना है। प्रतीति का निकटवरत्तीं है अर्थ ही अन उमी को सलंकार का आश्रय मानना ठीक है। यदि दूरस्थ (शब्दों को भी आप अल्काराशय मानना चाहें तो फिर वाक्य को भी अलकाराश्य मानिए क्योंकि वाक्य में भी तुल्यार्थकशव्दयुक्तता रद्दती ही है। इस प्रकार यदि दूरस्थ सम्बन्ध के आधार पर भी अटकार की आश्रयता का निश्चय किया जाने लगेगा तो अनवस्था दोष आएगा। चिमर्शिनी अथात शब्दस्वरूपवैशिष्ट्यनिघन्धनं चमरकारकारितव मिति तदलंकारखमिति चेठू, किं नाम शव्दस्य स्वरूप वैशिष्यम्। कि पौनस्क््यम्, उत पुनरुकार्थवाचित्वम्, उत सभह्गामङ्गपदेन रिष्टत्वम्। तत्र न तावदादय पच । शब्दस्य द्विवन्चारणाभायात्तयात्वा- प्रतिभासनात्। नापि द्वितीयः। वाच्यवाचकभावेनालंकार्यालंकरणभावात्तस्याश्रयाश्रययिभावे, नोपपत्ते। अत एव सर्वेपामेवार्थालंकाराणासुपमितार्थादिवाचित्वाच्छव्दुस्य तदलंकारखं स्यादिरयुक्तम्। नापि तृतीय। पुनरकवदाभासमित्यन्वर्थसंनाश्रयणाद्। पौनरवव्या्य धर्मप्रयोजकी का रेणालंकारस्योपक्रान्तत्वात् छिष्वत्वस्वेहानीपयिकरवात्। तव पुनरत्रा र्थपौनरुकत्यावगमे निमित्तमात्रम्। निमित्तनिमित्तभावश्च नालंकारत्वप्रयोजक इत्यवि- चाद। तरमादुर्याशयत्वापीनरुकयस्य तदलंकारत्वमेवेसि युकम्। एवं वक्तलंकारतापि निरस्ता। सर्वेपामपि वक्त्रतिशायरूपत्वात् तथात्वोपपत्ते.। यदि यह कहें कि "शब्द के स्वरूप में वह वैशिष्टथ है जिससे चमत्कार होता है अन अलकार को शब्दाभ्रित ही मानना ठीक है "तो इम पूछने है शब्द के स्वरूप में क्या वैश्विष्ट्य है? क्या वदद वैशिष्टय पौनरुक्त्यस्वरूप है, अथवा पुनरुकार्यवाचक स्वरूप, अथवा समंग और अमग रलेय से युक्त होना। इनमें से प्रथम पक्ष अमान्य है क्योंकि (पौनस्कत्य में शब्द का दूसरी बार उच्चारण आवश्यक होता है और शब्द का) दूसरी बार उच्चारण यहाँ होना नहीं है। दूमरा पक्ष मी मान्य नहीं, क्योंकि (यहाँ पुनरुक्तवदामास में) एक की अलकारता और दूसरे की अलकार्यना वाच्यवाचकमाव पर निर्भर है आश्रयाश्रयिभाव पर नहीं। (यदि पुतरुक्तवदामास श्दस्वरूपनिष्ठ
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पुनरुक्तवदाभास: ५७
माना जाय तो उसमें वाच्यार्थज्ञान के विना भी अलंकारत्व मानना पड़ेगा जो अनुभवविरुद्ध होगा। वस्तुतः जब अर्थों का ज्ञान होता है तब उनमें पौनसकत्य का ज्ञान होता है और तब चनत्कार इसीलिए स्वयं पूर्वपक्षी ने भी 'पुनरुकार्थवाचित्व' इस प्रकार वाच्यव्राचकभान को अपने पक्ष में प्रस्तुत किया है। इसीलिए, जैसा कि हमने पहले कहा है, अर्थ के (उपमा, रूपक, उतपेक्षा आदि) सभी अलंकार शब्दालंकार माने जा सकते हैं क्योंकि उपमितार्थवाचित्व (आरो- पितार्थवाचित्व, उत्प्रेक्षितार्थवाचित्व) इत्यादि धर्म श्ञब्द में रहते ही हैं। तीसरा पक्ष भी अमान्य है क्योंकि 'पुनरुक्तवदाभास' यह संज्ञा अन्वर्थ संघ्ञा है (इसमें स्वचं शब्द ही अपना प्रतिपाद्य अर्थ प्रतिपादित कर देता है क्योंकि वह यौगिक शब्द है) इसके अतिरिक्त यहाँ जो अलंकारों का विवेचन किया जा रहा है वे मौनरुपत्य जनित अलंकार ही हैं मतः यहाँ आगे आने वाले इलेप की चर्चा अप्रासंगिक और अनुपयुक्त है। वह (रेप) तो चहाँ एक निमित्त भर है जिससे अर्थपौनरुकत्य प्रवीत हो सके। और निमित्तनिमित्तिमान तो अलंकारत्व का प्रयोजक होता है नहीं। इस प्रकार (तीनों पक्ष अमान्य ठहरते हैं और पुनरुत्तवदाभास से 'शब्द्रत्वरपाभितत्व या शव्दालंकारत्न का ) कोई विवाद शेष नहीं रहता। उक्त हेतुओं से यही मानना उचित है कि पुनरुकवदाभास अर्थालंकार ही है क्योंकि यहाँ पौनरुक्त्य का आश्रय मर्थ ही है। इसी प्रकार (पुनरुतवदाभास) की वन्त्लंकारता (वक्का=कवि, तद्गत अलंकारता ?) भी निरस्त हो जाती है क्योंकि वक्त्रलंकार तो सभी अलंकारों को कहा जा सकता है क्योंकि वे सब वक्त्रतिशयस्वरूप होते हैं। [वन्नलंकार से संबन्धित यह पंक्ति रत्नाकर के पुनरक्त- बदामास प्रकरण की परिकर कारिका के बाद की पंक्ति पर निर्भर प्रतीत होती है, जिसमें अलंकार को कविप्रतीतिलप धर्म माना है] विमर्श-अलंकारसवंत्वकार के विरु्द् रत्नाकरकार ने पुनरमतवदाभास को शब्दालंकार माना है। उन्होंने इसके समर्थन में तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा है कि यहाँ जो अर्थ पुनरुक्त प्रतीत होता है वह अपने माप में असत है और उसका जो आमास होता है वह भी जसका धर्म न होकर प्रमाता का धर्म है जबकि अलंकार प्रमाता का धर्म नहीं हो सकता। संक्षेप में उनका मूलविवेचन इस प्रकार है- सू० आमुखैकार्थंपदं पुनरुक्तवदाभासन् ॥। १ ।। वृ०" *.... आमुखतुत्यार्थत्वस्य च शब्दधर्मत्वेन शब्दाअयत्वाच्छव्दालंकारोड्यम्!न त्वर्थपर्म:पौन- कक्त्यमलंकार इत्यर्थालंकारता वाच्या, अर्थस्याविद्यमानलात। ... न च वाच्यं पारमार्थिकत्वमर्थस्था- नुपयोगि, प्रतीतिमान्रसारत्वात काव्यस्येति, अवभासमानत्वमयि न शब्दस्यार्थरय वा धर्म:, किन्तु प्रमातु:, तत्य तथा संिंदुत्पत्तेः। .· न च प्रमाव्नाश्यो धर्मः काव्यस्वालंकारः। न च कृत्रिम- स्यार्थत्य पौनरुक्त्यादेरधर्मस्यार्थोपरकारकत्वं युक्तम्, अतत उपस्कारहेतुत्नासंभवाद। न चावभास- मानपौनरुतयालइकृतेन 'कृत्रि मेणार्ये नाकृन मस्य अरिवषदेहशरीर' इत्यादौ रिपुमृत्युप्रदचेष्टादेर- तिनय- कश्चिस प्रतीयते, येन तदुपस्कारकता स्यात। चमत्कारित्वं तु शब्दत्य रूपवैशिष्टच- निवन्धनम्।' अनन्वितत्वात कायादेर्वाच्यत्व न प्रकल्प्यते। मुख्यार्थवाधसंवन्धफलाभावान्न लक्ष्यता। अर्संवन्धाभिषायित्वम्रसंगाद् व्यंग्यतापि वा। अकृन्निमस्य चार्थस्य न धर्मः युनरुकता।
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५८ अलङ्कारसवस्वम्
पुनरुक्तोर्तप वा तत्वे स एव स्यादलकृति। 4 पौनरुक्त्यमनकारस्तेनार्थस्य न कस्यचित् ।। इति परिकरदलोका:। तस्याव सवत्र काव्यम्य वस्तुत, कविप्रतिपादनया वा, सभवी कश्षित तत्पतीतिरपो धर्मविरोष: शव्दागनोर्जगतो वाडलकारतया वाच्य। इद ल्वर्थालकारत्वे पूर्वोक्तनीत्या विरोधादिवत कवि- प्रतिपादनया वा न समवी कश्विदर्थगतोऽपि धर्मविशेष, इति 'अरिवधदेद्शरीरे'-त्यादौ कायादि- वाचकदेडशरी रादिशब्दसाधारण विशिष्ट रूपमेकार्थत्वेनावभाममान तद्धमंत्वेडल द्वार इति साधु। पदमत्र अर्थप्रनीतिकृत, न तु सुप्तिछन्तमेव। 'इस प्रकार रत्नाकरकार ने सभी प्रकार की पद सम्बन्धी मान्यता का भी सण्डन किया है। पद का अर्थ केवल अर्थ प्रतीति कराने वाला शब्द करते ह जन कि सर्वस्वकार ने पद को सुवन्न और तिउन्त शब्द में विभक्त किया था। विमर्शिनी विस्तरमयादिति। न तु चिन्नत्वाभावात्। नोच्यन्त इवि। वस्तुतस्तु संमवन्त्येवेर्यर्थ.। अतश्रायं प्रायो वाक्यार्थपदार्याप्रयत्वाय्यपथम द्विधाभनन् समस्तासमस्तपद्रवेन चतुर्विध। क्रमेण यथा-
हिमवानवतु सदा वो विश्वन समागत' ख्यातिम् ।।' 'नदीप्रकरमुन्निद्धि तवन्त मनोहरहस्तमन्यजन्तं च, सपर्याणा रचि वहन्तं सर्वत्र पूज- नीयं च, सकुम्मं सकलशचरन्त च, सदानदन्त मद्पर्याविलदशनं च, करट कमपि विभ्नतं कवाटविभ्रममुश्न्तं च, दुश्षराजिवर्धितरच वारणरणरणरणिकायुलितं च, राजमानवि- संधायिनं विराजमानं च, शारीभूतं मद्सलिलेन शवलीभूतं च, इति पुनरकाश्रयम' इस्य नद्लेखायां हस्तिवर्णने। 'बतहन्तामित. कालो गोविभावसुदीधितीः। चिपास्य रक्षावसितश्वेतराजयशोभय।।' असमस्तपद्ं तु अन्थकृतवोदाहृतम्। चिस्नरभयादिति=विस्तार के भय से, न कि चित्रत्व के अमाव से। नोच्यन्त इति=नहीं बनलाए जा रद्दे यद्यपि हो सकने हैं। भेद की दृष्टि से इस पुनरुक्तवदामासलकार को पहले दो मागों में वार्टों जा सकता है वाक्यार्थेगत और पदार्थगत। तदनन्तर प्रत्येक के समस्तपदगत और असमम्नपद्गन इस प्रकार दो दो भेद करके चार प्रकार का माना जा सकता है। इनमें से एक 1 एक के कमश उदाहरण (वाक्यार्थगत समस्नपदाश्रिन पुनरुक्तवनामास-) [इसमें पुनरुकार्य इस प्रकार है- सर्वदा और सदा, सर्वत्र और विश्वत्र (विश्वशब्द भी मर्ववाचक है) ख्यात. और ख्याति को समागत प्राप्त, तुहिनष्ितिमृद्=वर्फीली स्थली से युक्त और हिमवान् हिम से युक्त (पर्वतराज हिमालय) युप्मान् तुन्दारी और वः= तुम्दारी पाताल्-रक्षा करे और अवतु = रक्षा करे। परिद्दार= तुदिन=वर्क तथा क्षिति=पृथ्वी को धारण करने वाला, सवंत्र सवदा ख्यान= सर्व= सदकी त्र=रक्षा करने वाला, सर्वं=सब बुछ द=देने वाला आख्यात=कद्ा जाने वाला
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पुनरुक्तचदाभास: ५९
वः=(नाम प्रथमाक्षर भ्रहण करके) विष्णु स्वरूप, विश्वन्न =विश्व भर में सर्वनंन्र, सदा=सब कालों में ख्याति को प्राप्त समागत हिमवान्)= पर्वतराज हिमाचल सुष्मान् = तुम सबको पाताद= अय :- पतन से अवनु=वचावे। यहाँ पूर्वाई, और उत्तर्राोर्ध के वाक्यार्थ प्रथम पक्ष में मकार्यं है और 'सर्वन्र सर्वदा ख्वात में समास है वतः यह उदाहरण वाक्यार्थगत समरत पदाश्रित पुनरुतवदा- मास का हुआ। वाक्यार्थगत असमस्त पदश्नित पुनरुतवदाभास यथा अनंगलेखा में "नदी प्रकरमुलिंग- तवन्तन्" इत्यादि हस्तिवर्णन 1 इस में पुनरुकार्थ = दीप=चमकने हुए, कर=शुण्डादण्ड को न उसिलिगितवन्तम्=न छोड़ते हुए मनोहर= तन्दर हत=शुण्डादण्ड को अत्यजन्तम्=न छोढ़ते हुए (तो) सपर्याणां =सपर्थाओं =पूजाओं की रुचि शोभा को धारण किए हुए तथा सवत पूजा पा रहे, सकुल्म-कुल्म (मस्तक) से युक्त तभा सभ लश=कुन्म के साथ चरन्तं=चलने वाले सदान=दान=मदजल से युक्त दाँत वाले तथा मद=नदजल से पर्याविल=भीगे हुए हैं दशन दाँत जिसके कममि किसी एक करट= कौए को धारण किए हुए और कवाटवि कव = कुत्मितद्रव्य=मल आदि पर अट=घूमने वाला वि= पक्षी = कौथा, उसके भ्रम -घूमने को अमुंचन्तन्= न छोढ़ता हुआ (?), कुंजर =हाथी उसके साथ आजि = युद्ध उसमें बढ़ी है रुचि=इच्छा जिसकी ओर वारण=हाथी उसके साथ जा रण शुद्ध उसके लिए रणरणिका = इच्छा, ऐसे आकुलित, राजा के मान के विसंधायी =दूर करने वाला वि= विगत ह दूर है राज=राजकीय मान जिससे मदजल से शाराभूतः अनेक वर्णमव, और मावलीभूत = अनेक वर्णमय इस प्रकार पुनरुक के आश्रय हाथी को ... "। परिहार=नर्दी प्रकर = नदी समुदाय को उलिगितवन्तम्=पार करते हुए सकल व्यक्तियों का शं=कल्याण, चरन्तं करते हुए (हाथी का दर्दन शुभ माना जाता है)। सपर्याणां पर्याण = क्ुथ पाटकी या छौदे से युक्त, सदानदन्त=सदा नदन्तम्=चिवाढ़त, करटं= गण्ड को, कुआराजि कुओो की राजि पाँव, विराजमान=शोभित हो रहे, शवल (दलेप में स-श-के अमेद से)- सबछ = पळशाली। [यहाँ पूरे वाक्य में पुनरुकार्थता है किन्तु वैसे अर्थ प्रतिपादक पदों में समास नहीं है अतः यह वाक्यार्थगत जसमस्त पदाश्रित पुरुकवदाभास का उदाहरण हुआ ।] पदार्थगत समस्त पदाश्रित पुनरुकवदामास यथा-"वतहन्तादि" पद्यार्थ। पुनरुकतार्थ=वत=सेद, हन्त=खद, असित := कृष्ण वर्ण का काळ := कृष्ण वर्ण का, गो= किरण, विभा=किरण, वसु=किरण, दीधित=किरण; क्षिप=फैंको अस्य=फैको; रक्ष=रक्षा करो; सित = सफे, दवेत =सफेद; राजय=विराजित होय, शोभय=विराजित होओ। परिहार=दुःख की बात है कि असिन काल कृष्ण पक्ष गो = चन्द्रमा (गौ: स्वमे वृपभे रकमौ वकवे चन्द्रमसि स्मृतिः-विदव प्रकाश) और असित काल=दर्पा ऋतु अथवा दक्षिणानय सूर्य= (विभावसुर्दिनमणौ हारमेदे न पावके= विश्वप्रकाश) की दीघिति - किरणों को हन्ता = सूर्य समाप्त करता। है अभय अर रक्षा में अवहित - लने दवेतराज अस्थ=इसके यदा को क्षिप- हुटाआ।" यहाँ पदार्थमात्र में पुनरुक्ि है। और जिन पदार्थों में यह है उनके वाचक पदों में समास है अतः यहाँ पदार्थगत समस्तपदाश्रित पुनरुकवदाभास है।
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६० अलङ्कारसवस्वम्
पदार्थेगन असमस्तपदाश्रिन पुनरुकवदामास के उदाहरण स्वयं अ्रन्थकार ने ही प्रस्तुन कर दिए है। यहाँ तक अर्थगन पौनरुकत्य का विचार कर अब शब्दगत पौनरुक्त्य पर विचार करते है-
[सू०४] शब्दपौनरुक्च्यं व्यञ्जनमात्रपौनरुकत्यं स्वरव्यज्ञनसमु- [सर्वस्व ]
दायपीनरुवत्यं च।। अलंकारप्रस्तावे केवलं स्वरपीनरुकत्यमचायत्वान्न गण्यते इति द्वैविध्य मेव। [ सू० ४] शब्दपौनस्वत्य [केवल दो प्रकार का होता ] व्यजनमान्न का पीनस्वत्य तथा स्व्ररव्यंजन दोनों के समुदाय का पौनरकत्य।।" [वृ] अलकारपकरण में केवल स्वर का पौनरुकत्य चमत्कारकारी नहीं होना इमलिए दो ही भेद बनलाए। विमर्शिनी कैचलस्वरपौनस्वयं कि न गणितमित्याशङ्क्याह-अलकारेत्यादि। यथा- इंदीवरम्मि इंदम्मि इंदआलम्मि इदिअगणम्मि। इंदिदिरम्मि इंदमि जोङण्णो सरिससकप्पो ।।' अन्न स्वरपौनकत्यस्य चाल्वाभावालालकारत्वम्। तन्न केवळव्यअनस्वरव्य अनसमुदायान्नितमलकारदयं लक्षयति-मख्येत्यादिना। "केवल स्वर का पौनसुकत्य [एक तीसरा भेद हो सकता था उसे ] क्यों नहों मिना" इस दाका पर उत्तर देते हुए लिसा 'अलकार" इत्यादि। [केवल स्वर के पौनरुक्त्य का उदाहरण] यथा- इंदीवरम्मि ... " इत्यादि पद्य। यहाँ स्वर (इकार) का पौनरुक्त्य तो है किन्तु उससे कोई चम त्कार नहों हो रहा अत उसे अलकार नहीं कहा जा सकना [अल्कार है यहाँ तुत्ययोगिना या दीपक ]। उक्त दोनों शब्दपीनसवत्यों में से केवल व्यजनगत पीनरक्त्य और स्वरच्यजनगत पौनस्कत्य, इन दोनों में जो जो अलंकार होते हैं उनका रक्षण करते है- [सर्वस्व ] [सू० ५] संख्यानियमे पूर्व छेकानुप्रासः ॥ द्वयोरव्यक्षनसमुदाययो: परस्परमनेकधा सादश्यं संख्यानियमः। पूर्वै व्यज्जनसमुदायाश्रितं यथा- "कि नाम दर्दुर दुरध्यवसाय सायं का्यं निपीड्य निनदं कुरुपे रुपेव। पतानि केलिरसितानि सितच्छदाना- माकर्ण्य कर्णमधुराणि न लज्जितोऽसि ।।' अत्र सायंशब्देनास्यालंकारस्य यकारमानसाटश्यापेक्षया वृत्यनुपासेन सद्दैकाभिधानलक्षणः संकरः। छेका विद्ग्धाः।
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छेकानुप्रास: ६१
[सू०५]"संख्या यदि नियत हो तो प्रथम [व्यंजनपौनसुकाय ] छेकानुनास [कह- लाता ] ।" [वृ०]व्वंजनों के दो समुदायों में एकाधिक वार सादृश्य का होना संख्यानियम [या संख्या का निचत होना] है। प्रथम अर्थात व्यंजनससुदायाश्रित [ पौनसवत्य, उसका उदाहरण] यथा- "कि नाम दर्दुर०" इत्यादि संस्कृतपय। [इसका अर्थ इस प्रकार है] 'अरे नासमझ मेंढ़क ? ुत्सा सा होकर इस समय शाम को पूरा शरीर कँपा कर इतनी टरे-ट्र क्यों कर रहा है? इन उज्जवल पंख वाले हँसों की स्रुतिसुखद क्रीडामयी सरस वाणी सुनकर तुझे ल्जा नहीं आती ?' यहाँ [ दुर दुर और साय साय" इस प्रकार दो दो व्यंजनों की नियत संख्या में आवृत्ति है अतः छेकानुप्रास है, औौर 'सायं काय' इन दो पदों में केवल] यकार की आवृत्ति है अतः [यह वृत्त्यनुप्रास है फलतः ] साय शब्द में [ दुरव्यवसाय के साथ छेकानुपास और काय के साथ वृत्यनुपास होने से ] वृत्त्यतुपास के साथ [छेकानुप्रास्त का ] एकवचनानुप्रवेश संकर है। छेक का नर्थ है विदग्ध। विमर्श-प्रतीहारेन्दुराज ने छेक को धोसलों में रहने नाले पक्षिओों का भी वाचक माना है- छेकशब्देन कुलायाभिरतानां पक्षिणामभिधानम्, तदुक्तम्-'छेकान् गृहेग्वभिरतानुशन्ति नृगपक्षिण' इति। जो पक्षी घोसलों में रह्दते हैं वे दूसरों से सताए नहीं जाते, अतः उनकी वोली इसी अनुपास के समान स्मावतः मधुर होती है-'तेपां कुलायाभिरतत्वादन्येन केनचिद अनायास्यमानत्वमने- नानुपासेन सद्टशी मघुरा वागुच्चरति।' विमर्शिनी एकवचनस्य जात्या बहुत्वप्रसद्गादवहुवचनस्थ च न्यादीनां स्वयमेव बहुरवातसंख्या- नियमो द्वित्व एव संभवतीति इयोरित्युक्तम्। ह्योरप्येकधा सादृश्यं वृत्यनुप्रास एवे- त्याशङयाह-अनेकपेति। यकारमान्नेतयनेन इयोरेव साहश्यमस्य जीवितमिति ध्वनितम्। यद्यपि चायं व्यअञनमात्रपोनरुक्त्याख्यस्य सामान्यळत्तणस्थ संभवादनुगास एवान्यें रन्तर्भावितः तथाप्यस्य अ्रन्थकृता उच्जटमतानुरोधादिद्द लक्षणं कृतम्-अन्वयेत्यादि। दयो: इस प्रकार जो द्विवचन का प्रयोग किया गया उसका अर्थ यह है कि संख्यानियम केवल द्विवचन में ही संभव है, जहाँ तक एक वचन का संबन्ध है उसे जाति परक मानकर बहुत्व- परक मानना होगा और बहुवचन में बहुत्न के कारण संख्यानियम हो नहीं सकेगा। दो व्यश्न- समुदायों का सादृश्य भी यदि केवल एक बार ही घटित हो तो वह वृत्त्यनुप्रास होता है। इसी लिए हेकानुपाप्त मे "अनेकधा" शब्द का प्रयोग किया गया। चकारमान कहने का अभिपाय यह है कि छेकानुप्रास बिना दो व्यख्ञनों के सादृश्य के संभव नहीं (यहाँ केवल एक ही व्यज्नन का सादृव्य है)। i
यद्यपि यह छेकानुआस अन्य आचार्यों द्वारा सामान्य अनुप्रास में ही गिन लिया गया है क्योंकि इसमें सामान्य लक्षण व्यअनमात्र पौनसकत्य समन्तित हो जाता है, तथापि ्रन्थकार ने उद्भर के अनुसार यहां [देकानुप्रास का ] लक्षण अलग किया { इस तथ्य का निर्देश करते हुए अगला सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं-] [सर्वस्व ] [सू०६] अन्यथा तु वृत्त्यनुग्रासः ॥ केवलव्यअ्जनमात्रसाइडयमेकधा समुदायसादृश्यं ड्यादीनां च परस्पर- सादृश्यसन्यथाभावः। वृत्तिस्तु रसविपयो व्यापारः। तद्वती पुनर्वर्णरचनेह-
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वृत्तिः। सा व परुपकोमलमध्यमवर्णारब्धत्वात्त्रिया। तटुपलक्षितोऽयम- नुप्रासः। यथा- 'आटोपेन पटीयसा यदपि सा वाणी कवेरामुखे खेलन्ती प्रथते तथापि कुरते नो सन्मनोरज्नम्। न स्याद्यावद्मन्दसुन्दरगुणालंकारझांकारित: सपस्यन्दिलसद्रसायनरसासारानुसारी रसः।।'
यथा वा- 'सह्या: पन्नगफृत्कृतानलशिखा नाराचपाल्योऽपि वा राकेन्दोः किरणा विषद्रवमुचो वर्पासु या वायब:। न त्वेताः सरला: सितासित रुच: साचीकृता: सालसा: साकृता: समदा: फुरझकददशां मानानुविद्धा दशः।।' [सू० ६] और नहीं [ यदि संख्यानियम न हो] तो [ व्यज्ञनपौनरक्य] सृत्यनुपास [कहलाता है ]। श्ू० केवल [एक] व्यक्षनमान्न का सादृश्य, (२) केवल एकवार समुदायसादृश्य तथा (३) तीन [चार ] आदि [मख्या वाले व्यजनों का ] परस्पर सादृश्य यह है अन्यथाभाव [अर्थोत छेकानुप्रास की स्थिति से वृत्यनुपास की स्थिति का अन्तर ] [ वृत्त्यनुपास शब्द में] सृत्ि का [मूलभूत ] अर्थ तो है रमविषयक व्यापार किन्तु यहां वृत्ति है उस [ रस विषयक- व्यापार ] से युक्त वर्णरचना। वह [रचना ] परुप, कोमल और मध्यम इन तील प्रकार के वर्णों से युक्त होने के कारण तीन प्रकार की होती है। यह अनुपास उससे उपलक्षित होता है। उदाहरण है-"आटोपेन पटीयसा" इत्यादि [सस्कृत पद्य ]। [इसका अर्थ है] "बडे मारी आटोप से यद्यपि वह वाणी (वाग्देवी और कविता) कवि के आमुख (आरम्म और मुस में) सेलती रहती है औौर विस्तार को भी प्राप्त होती है किन्तु उतने पर भी मेरे चित्त को वह तब तक खुश नहीं कर पानी जब तक उज्ज्वल औौर सुन्दर गुणों तथा अलंकारों से झकन, एव छरसलाते रसायनरस की वौछार जैसा वह रस न हो।" अथवा जैसे-"सच्ाः पन्नगफूत्कना०" इत्यादि मम्कृनपथ। [इसका अर्थ है-] "सर्प की पुफकार से उत्पन्न अग्निशिखा हो या वाणों की पाने, पूर्णेचन्द्र की तरल गरल चुआनी किरणें दो या पवन के [विषतुल्य ] पानी की फुदार [विषद्रव ] लिए हुए वरसाती झौंके, सव सब्य है। किन्तु ये जो मृगनयनियों की मानसरी सरल श्वेतश्याम, तिरछी, अलसाई, भावभरी, और मदमाती चितवनें हैं ये कथमपि सघ् नहीं।" विमर्श-सजीविनीकार के अनुसार दोनों उदादरणों में से प्रथम के चारों चरणों में केबल व्यअ्जनसाम्य है। उसमें भी "अलकारझाकारिन" इसमें म्कवार समुदायसादृद्य है और "रसायन- रमासारानुमारी रस" में तीन व्यअ्न समुदायों का सादृश्य है। इसी प्रकार "आटोपेन पटीयसा" में गौडी रीति है, 'अमन्दसुन्दर' इत्यादि में वैदमीं रीति और "गुणाष्कारझाकारित" में पाचाली रांति है। इसका निर्णय उन-उन पदों से निकलने वाले अर्थो से होता है।
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वृत्त्यनुप्ास:
इसी प्रकार द्वितीय पद में संजीविनीकार के अनुसार केवल व्यअनपौनरुवत्य है। वृत्ति परुपा है क्योंकि यहां रोप का वर्णन है। संजीविनीकार ने ही 'सालस' और 'मानानुविद्ध' पर इस प्रकार टिप्पणी की हे- सालस पश्चात्तापपूर्वक लौटती हुई चितचनें, जैसा कि मावप्रकाश में [ चारदातनय] ने कहा है-'आालस्य वह भाव है जिसमें लत्वादि अभोष्ट विषयों से विमुखता आवे'= 'आलस्यं तदमी- पटार्थाद ब्रीडादेर्यन्निवर्तनम्।' मानानुविद्ध - रोपारुण, मान अर्थात देखे या सुने किसी अपराध से उत्पन्न रोप, उससे जलती हुई चितवने। "दृष्टश्ुतापराधजन्मा रोपो मान, तन समुच्छिताः ज्वलत्कल्पा इत्यर्थः।" इन दोनों मेदों को संजीविनीकार ने वर्णालंकार कहा है और आगे ाने वाले यमक को शब्दालंकार।
विमर्शिनी पलदेव भेदनिर्देशं कुर्वन्व्याचष्टे केवलेत्यादि। समुदायः पारिशेप्याद व्यअ्ञनहयरूपः। एकधेति चात्रैव संचद्धच्यम्। केवलस्य न्यादीनां चानेकधापि सादृश्यस्यानेन व्यास- रवात्। एतच्च समस्तासमस्ताक्षरत्वेन संभवतीत्यस्य प्रायः पट प्रकारः। क्रमेण यथा- 'यया यायाय्यया सूयं यो यो यं सेययायया। ययुयायि वयेथाय ययेयायाय याययुक।' मसमस्ताक्षरं तु अन्थकृतेवोदाहतम्। 'दीनादीनां ददौ दानं निननाद दिने दिने। निदिन्द नन्दनानन्दानदुनोदिननन्दनम्।।' रुच्यामि: प्रचुराभिस्तरुशिखरापाचिताभिरुचितामिः।
'ततः सोमसिते मासि सततं संमत सताम्। अतामसोत्तममतिः सती सुतमसूत सा।' 'कसलदृशः कमलामलकोमलरुमनीयकान्तिवपुरमलम्। कमलंकुरुते तावदकमलापतितोऽपि यो विमलः ॥'
'स ददातु वासवादिदेवतासंस्तवस्तुतः। सदा सहसत देव: सविता विततां सताम्।।' वर्णरचनेह वृत्तिरिति। उपचारादिति भावः। त्रिधेति । यदुकमू- 'शपाभ्यां रेफसंयोगैप्टवर्गेण च योजिता। परुषा नाम वृत्ति: स्याद्हहद्यादैक्ष संयुता।। सरूपसंयोगयुतां मूर्धवर्गान्त्ययोगिभि:। स्पयोर्चुंतां च मन्यन्ते उपनागरिकां सुधाः ॥ शेपवणयथायोगं रचितां कोमलाख्यया। ग्राम्यां वृत्ति प्रशंसन्ति का व्येप्वादतबुद्धयः॥[उत्व काव्या. सं. १४-६।
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६४ अलङ्कारसर्वस्वम्
यथा- निरर्गलवि निर्गलद्वलुलाकरालैंगलेरमी तडिति ताडितोड्ुमरडिण्डिमोड्डामरा:।
अन्न छकाराद्याघृत्या मव्यमत्वमिति वृत्तित्रैविध्यम्। [ऐेकानुमासक से वृत्त्यनुपास के ] इसी [अन्तर] की व्याख्या भेद का निर्देश करने हुए कहते है-केवल इत्यादि। समुदाय-अर्थात् दो व्यश्षनों का, क्योंकि वही शेप बचता है [ एक और तीन व्यजनों का सादृस्य यही आगे और पीछे वनला दिया गया है] 'एकधा=एकनार' इमका भी मंदन्ध इमी [ दो व्यजनों के ममुदाय से करना चाहिए। एक और तीन चार आदि [अर्थात दो से अधिक सब ] व्यजनों ला अनेकवार हुए सादृश्य भी इसी [वृत्तयनुपास] में आ जाते है। यह अनुप्राम समस्न (सभी) अक्षरो में औीर असमस्न (कतिपयमात्र) असषरों में दो सकना है इमलिए इसके [एकव्यञ्ञनगतानेकमादृश्य, हथभिकव्यअनगतानेकमादृश्य तथा व्यञन- द्यगनैकमादृश्य इन तीन भेदों को समसनाक्षर और और असमस्ताक्षर इस प्रकार दो-दो प्रभेदों में विमक्त करने से ] प्रायः छ भेद होते है। एकएकका कमस दाइरण यथा () एुकव्यक्षन समस्ताप्षर-"यया यायाय्यया०" इत्यादि पूर्ण पद् । (२) इसी के थसमस्ताक्षर का उदाहरण स्वय ग्रन्यकार द्वारा प्रस्तुत है। (३) व्यअनसमुदायद्मय समस्ताक्षर-"दोदादीना ददौ दानम्" इत्यादि पद्। [अर्थ है-उसके] दीन आदि को (मप्रदान में पह्ठी) दान दिया, प्रतिदिन निनाद किया, नन्दन (स्वर्गोद्यान) के आनन्दों की निन्दा की और इन-नन्दन=सूरयपुत्र = यम को दुसी किया"। (४) उसी में असमरनाक्षर= "कच्याभि प्रचुराभि." इत्यादिपघरत्न। [अर्थ है-रुचिर माना में प्रचुर, दाल की पकी, छक छककर साई हुई और रण में विजली के समान चिरा [ निर्णय- सागर सस्करण की टिप्पणी के अनुमार कश्मीर के खूवानि ] नामक फलों से चित्त बहुत दिनों से हक्ा है। (५ ) अनेक्ल्यञ्ञनगन समस्ताक्षर = "तत सीमसिते मासि०" इत्यादि पद्य। [अर्थ है- *उसके पश्चाद तामसीवृत्ति से रहित और उत्तम मति वाली उस सती ने झुक्ल भक्ष में सत्पुरुषों में समाहन सुन को जन्म दिया।"] (६) उसी का असमस्ताक्षर = "कमन्टशन्द्" इत्यादि पद्य। [अर्थ है-'विष्णु से भी अधिक मुन्दर मा भाग्यशाली ऐसा कौन सीमाग्य शाली पुरुष है जिसे कमलनयनी का निर्मल और कमता [ लक्ष्मी ] या कमल के समान अमल और कमनीय कान्ति वाला शरीर अल्कृत करता है? यहा केवल कमल' इन तीन व्यक्षनों का अनेकशर सादृश्य है] आदि शब्द मे चतुरक्षर आदि का मी ग्रहण किया जा सकता है उदाहरण यथा-"स ददानु"' पद्य [अर्थ-"इन्द्र आदि देवनाओों द्वारा संस्नवों में जिसकी स्तुति की गई है, वह सूर्यवेव सत्पुरुषों को सदा सद्वमनि प्रदान करे।" यहा 'द, स, व त' इन वर्ों की अनेकबार आवृत्ति है] वर्णरचनेह वृत्ति: शव्दातकारप्रकरण में वृत्ति का अर्थ वर्गरचना है अर्थात् = उपचार [दक्षगा ] से। त्निधा तीन प्रकार की, जैमा कि [उङ्ट ने ] कका है-"श, प, रेफ, सयोग, टवर्ग तथा ह, ह, व आदि से, युक्त [जी वर्ण विन्याम होता है उम] को परुषा वृत्ति कहा जाता है।" काव्याल० सा० म० १।४]
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वृत्यनुपास: ६५
[ क् क्, प् प् आदि ] 'सरूपवर्णों के संयोग से युक्त, तथा स्पर्श ('क' से लेकर 'म' तक के] वर्गों में ले प्रथम वर्ण के माथे पर अन्तिम वर्ण के संयोग से युक्त वृत्ति को विद्वय्न उपनागरिका कहते हैं।' [कान्यालं०, सा० सं० १।५] [उपर्युक्त दोनों वृत्तियों में उपयुक्त वर्णों से ] 'शेष [लकार आदि ] वर्गों से चथायोग रचित त्राम्या नामक वृत्ति को काज्यप्रेमी जन कोमलावृत्ति कहते हैं।' [ काव्यालं० सा० सं० १।६] [ इस तृतीय वृत्ति का उदाहरण] यथा "निरगेल-विनिर्गलद्०" इत्यादि पद्य। [ इसका अर्थ हैं-"अव, बेरुकावट पढ़ रहे और गड़-गढ़ आवाज कर रहे गड़ों के द्वारा तड़ा- तढ़ ताटित बहुत से विशाल डिंिमों के कारण हढ़बढ़ाए, मदजल के आचमन में निरत झुण्ड के झुण्ड मौरो से घिरे तथा परिणति [तिर्यन्दन्तपहार ] के क्षण [उललास] में पर्वत-तर्टों को टुक- टूक करने वाले ये हाथी हैं पण [ दुत पर चढ़ा धन ]।"' यहां लकार आदि वर्णों की आवृत्ति है अतः यहां की वृत्ति मध्यम है-इस प्रकार वृत्तियां तीन होती हैं। विमर्श-वृत्तयनुपास के लिए इन तीनों वृत्तियों के उदाहरण उद्धट ने इस प्रकार दिए है- (१) परुया= "तन्र तोयाशयाशेप व्यार्को/शतकुरेशया। चकाशे काश-किशारु-कपिशाशासुखा शरव॥" (२) [ उपनागरिका मध्यमा]= "सान्द्रारविन्दवृन्दोत्थमकरन्दान्वुविन्दुभिः। स्यन्द्रिभि: सुन्दरत्यन्द नन्दितेन्दिन्दिरा कचित्।।' (३) कोमला - "केलिलोललिमालानां कलैः कोलाहलै: क्वचिद।
संजीविनीकार ने अनुप्रास के उक्त विवेचन पर निन्नलिखित संग्रहकारिकाएँ बनाई हैं- १ -- 'प्रकुष्टो वर्णनिन्यासो रसादयनुगतस्तु यः। सोपनुपासः स च च्छेकवृत्त्युपाधिवशाद् दिया॥" २-'समुदायदयं यत्र विविधं साम्यमृच्छति। स च्छेकलालनाव प्राजे: छेकानुपास ईरितः ॥ ३-'व्यज्जनव्यापृतिर्वृत्तिर्वर्णानां रसगोचरा। तत्संयोगादियं वर्णरचना वृत्तिरिष्यते।। ४-'सा वैदभ्यादिमेदेन ननिवा पूवैनिरुपिता । तयोपलक्षितत्वाच्च वृत्तयनुप्रास इष्यते।' दृण्ढी-ने अनुपास का विवेचन माधुर्य गुण के प्रसंग में किया है। उन्होंने अनुपरास को विवेचन अत्यन्त मनोवैज्ञानिक पदति से इस प्रकार किया है- वर्गावृत्तिरनुप्ास: पादेपु न पदेषु च। पूर्वानुभवसंस्कारवोधिनी यद्यदूरता ॥ १।५५॥ अर्थाल पादों और पदों में वर्णों की ऐसी पुनरुति जिससे प्रथमोक वर्ण का संस्कार जाग सके अनुप्रास कहलाती है। यह तब होती है जब पादो या पदों में अदूरता रहती है। इस तथ्य का दण्डी ने एकवार पुनः दुहराते हुए लिसा-'अनुप्रासमिच्छन्ति नातिदूरान्तरक्षुतिन्।' इनके पाद- यमक में लाटानुप्रास का अन्तर्भाव हो सकता है। भामह-ने अनुग्रास का सामान्य दक्षण इस प्रकार किया है-'सरूपवर्णविन्यासमनुपासं प्रचक्षते।' भेदों को उन्होंने दो नाम दिए है-श्मानुपरास तथा लाटानुप्रास। ग्रामानुमास वह्दीहै। जिसे उलितानुप्रास या कोमलानुप्रास कहा जाता है। इनके सक्षण भामह ने नहीं बनाए केनल नामोल्लेख कर उदाहरणमान्र दिए है। वामन ने अनुपास को चर्ण-साम्यरूप माना है-"शेप: सरपोडनुप्रासः। शेप का अर्थ उन्होंने इस प्रकार किया है- 'पदमेकार्थमनेकार्थ न स्थानानियतं सद्धमक्षरं च शेपः। सरूपोऽन्येन, प्रयुक्तेन तुल्यरूपोडनुमास:।'
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सारूप्य को आवृत्ति से मिन्न बनलाते हुए भी उन्होंने लिसा है-'कात्त्न्येनैवावृत्ि, कात्स्देनैकदेशन्यां तु मारूप्यम्' अर्थात आवृत्ति में पूरे के पूरे पद को पुन कबना पडता है जब कि मारूप्य में इसके साथ उम पद के अंश का भी पुन कथन रहता है। अनुपाम के विश्य में अत्यन्त रचिपूर्ण टिन्पणी देवे हुए वामन लिसते है-'अनुल्वगो वर्णानुपास धेयान्' वर्णानुपास वह अच्छा होता है जो अधिक उत्कट नहीं होता। जो उत्कट होता है वह अच्छा नहीं 'उत्ासतु न भेयान्'। लाइनुपास का उल्लेख वामन में नहीं मिटता किन्तु उमका स्वरूप उनमें स्पष्ट है। वे उसे पादानुपास कहते हैं। ऐक और वृत्ति नाम भी वामन में नहीं मिन्ने। उन्नट-अनुपास का ेक, वृत्ति नथा लाट नामक अनुच्छेदों में प्रचरित वर्गोकरण प्रयमत उड्ट में मिलता है। इसील्एि वृततिकार ने लिसा कि-धेकानुमास प्राचीन आलकारिकों द्वारा सामान्य अनुभास में गिन लिया गया है।' टड्ट क विवेचन इम प्रकार है- 'ऐेकानुप्रामस्तु दयोईयो सुमनशोततिकती।' यथा 'गरिष्ठगोप्ठी०'। उनका वृत्त्यनुप्रास का विवेचन पिछले पृष्ठ पर दिया जा चुका है। लाटनुनाम पर उनका विवचन इम प्रकार है- 'स्वरूपार्थाविशेपेत्ि पुनरुत्ति फलान्तराद। शब्दाना वा पदाना वा ठटानुपास हग्यते।।' अर्थान्-शब्द अथवा पदों में, स्वरूप और अर्थ में अन्तर न रहने पर भी तात्पर्य में अन्तर हाने मात्र से कौ गई पुनरुत्ति लाशनुपाम मानी नानी है।' इसके भेद पाच माने हैं (१) स्वन्त्ररदानृत्ति, (२) परतन्त्रपदावृत्ति, (३) स्वनन्त्रपदावृत्ति, (४) परनन्त्रपादावृत्ति तथा ( ५) स्वतन्त्र-परतन्त्रोभयात्मकपदावृत्ति। उड्रट ने इनमें से प्रत्येक के उदाहरण मी दिए है। सवस्वकार ने 'काश काशा इव' पद्य उद्ट से ही लिया है। उन्होंने इंने स्वतन्त्रपदावृत्ति के उदाहरण के रूप में दिया था । सर्वस्वकार के सभी उदाहरण इसी एक भैद तक सौमित है। रुदट-ने अनुप्रास को केवल वृत्यनुप्रास तक सीमिन रगा है। उन्होंने हेकानुप्रास तथा लागनुपास को अपने काव्यारकार में स्थान नहीं दिया। अनुमाससामान्य का लक्षग इन्होंने इस प्रकार दिया है- 'एकनित्रान्नरित व्यजनमविवक्षिनस्वर बदुर। आवर्त्यन निरन्तरमथवा यदसावनुपास.॥२१८॥ यह्ा अनुपास का नाम ती वृत्त्यनुपाम नहीं मिलना, परन्तु इस सदर्भ में स्टट द्वारा किए गए पाच वृत्तियों के निरूपण से यह अमान्य नहीं रह जाता कि वे अनुप्रास को वृत्त्यनुप्रासात्मक दी नानते हैं। पाच वृत्तियों के नाम उन्होंने इस प्रकार दिए है- ''मधुरा, प्रोढा परपा, ललिता, मद्रेति वृत्तय* पञ्च। वर्णाना नानात्वादस्येति यथार्थनामफला.'॥३१९ ॥ इन सबके पृथक् पृथरु लक्षग बनाकर रुद्रट ने इनके उदाहरण भी दिए है। मम्मट-ने उद्ट के ही अनुसार 'होक, वृच्ि और लाट' इन भेदों में अनुप्रास का विमाजन करते हुए वृत्ि को व्यजनारूप माना है। उनका विवेचन इस प्रकार है- 'वर्णसाम्यमनुपास, ऐकवृत्तिगनो दिया। सोजनेकम्य सकृतपूर्व एकस्याप्यसक्ञव पर:। शाम्दरनु लायनुपासी भेदे वात्पर्यमानतः ॥ अर्यात 'वर्णसाम्य है अनुप्राम'। वह 'टेक और वृत्ति'-इस प्रकार दो भेदों में मेवळ वर्णगत रदता है। इनमें हेकानुनाम में अनेक वर्गों की मकवार आवृत्ि होती है और वृत्यनुपास में एक
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या अनेक वर्णों को अनेकवार। जो अनुप्रास शब्दगत होता है वह लाटनुप्रास कहलाता है। इसके पांच्र नेद होते हैं- 'पदानां स पदस्यापि वृत्तावन्यन तघ वा। नान्न: स वृत्तवृत्योक्ष तदेवं पंचघा स्मृततः ।' प्रथमतः यह दो मागों में विभक्त रहता है पदगत तथा नामगत या प्रातिपदिकगत। हनमें पद -: गत दी प्रकार का होता है अनेकपदगत और एकपदगत। नामगत तीन प्रकार का होता है एक समासगत, अनेकस्मासगन और एकानेकसमासगत। इस प्रकार कुल भेद पांच होते हैं। परवर्तीं आचार्यीं में रत्नाकरकार शोभाकरमिन ने अनुपास का विवेचन उक्त भेदों में ही इस प्रकार किया है -- १-'इयोईयो: समुदाययोः साम्य छेकानुमास: ।३। -अन्यथा तु वृत्यनुमासः ।४।
तीनो अनुपासों तथा यमक का अन्तर वसलाते हुए उन्होंने लिखा हे-'न्यंजनमात्रसमुदाय- मध्यगरतं स्व्ररव्यअ्नसमुदायसान्यमेकाक्षरव्यापि छेकानुमास: 1 शुद्धं वहक्षरमल्पाक्षरं वा नियतत्थानं यमकम् । अनेकद्विकाभावे नियतस्थानगतमपि वृत्त्यनुपास इति भेद: !' अप्पयदाक्षित, पण्टितराज तथा विश्वेशर ने शब्दालंकारों का निरूपण नहीं किया। विमर्शिनी एवं व्यक्ञनमात्राश्रयमलंकारद्वयं लक्षयित्वा स्वरव्यक्षनाश्रये चमकं लक्षयति- स्वरेत्यादि ! इस प्रकार व्यंजनमान पर निर्भर दोनों अलंकारो के लक्षण निम्चित किए। अ स्वरव्यजना- प्रित यमक का लक्षण करते हैं- [ सर्वस्व ] [चू० ७] नवरव्यञ्जनससुदायपौनरुकत्यं यमकम्। अन कचिद्धिन्वार्थत्वं कवचिद्भिन्नार्थत्वं कचिदेकस्यानर्थकत्वमपरस्य सार्थकत्वमिति संक्षेपतः प्रकारत्रयम् । यथा- यो यः पश्यति तन्नेत्रे रुचिरे वनजायते। तस्य तस्यान्यनेन्नेपु रुचिरेव न जायते।।' इदं सार्थकतवे। एचमन्यउज्ञेयम्। [सू० ७]"स्वर [और ] व्यंयजन [दोनों का] पौनस्वत्य यमक [कहलाता है]।", [वृत्ति] इसमें [पुनरुक प्दो के ] अर्थ कहीं भिन्न-भिन्न होते हैं, कहीं अभिन्न और कहीं एक [पद ] अर्थरहित रहता है तथा दूसरा सार्थक, इस प्रकार संक्षेप में तीन मेद होते हैं। उदाइरण जैसे-'यो यः पश्वति०' इत्यादि प्द्य। [अर्थ :- 'जो जो व्यक्ति तुम्हारे वनंज (कमल ) के समान विशाल और रुचिर नेत्र देखता है उस प्रत्येक में अन्य (भृग आदि भथवा अन्य नायिका) के नेत्रों पर कोई रुचि ही नहीं जागती। यहाँ ['रुचिरे बनजायते' पदों की पूर्वाद्धं और उत्तराई में अवृत्ति है और दोनों जगह प्रत्येक पद सार्थक है अतः यमक हुआ] सार्थक पदों में। इसी प्रकार अन्य [ यमक भीं] जान लेने चाहिए।
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विमशिनी एकस्येश्याय्युपलत्णपरम्। अतो घटूनां यमकानां करचिरसार्थकरवं निरर्थकर्वं च स्थतं संगृहीतमेतर । 'क्चित्सार्थकरवं करचित्निरर्थकरवम्' इति नु पाठे प्रथममेव भेदद्वयमुक्तं स्यान तृतीय: प्रकारः। अतश्न मेदनिर्देशप्रन्थो यथास्थित एव ज्यायान्। सक्षपत इनि। एनज काव्यारमभूतरसघव णापत्यूहदकारित्वायम्पञ्चयितु न योश्यमिति चिरंतनालंकारवद् विभज्य उचितमिति माव: । एवं चित्रेऽपि सषेयम्। अन्यदिति। प्रकारटयम्। तन्नानर्थके यथा- 'सरसमन्यरतामरसादरम्रमरसजलया नलिनी मघौ। जलघिदेवतया सदर्सी थ्रिय स्फुटतरागनरागरुचिर्दधी।।" अत्र तरागेत्यनर्थकम्। अनर्यकत्वसार्थकरव योयंया- 'साहार साहार सादारं मुणइ सजमाहारम। सं ताणं सताणं संतागं मोहसतागम्।' क्षत्र सनसाहारमित्यनर्थकम्। अन्यानि तु सार्यकानीति न कश्चिदोप:॥ इद घ स्थाननियममन्तरेण न भवति। यदुक्तम्-'पदमनेकार्थमप्र चावृत्त स्थान- नियमे यमकम् इति। अत एव स्थाननियमाद्यमक मित्यरयान्वर्थममिधानम्। स च स्थाननियमो ववचिको न वास्तवः। यथा- 'मधुपराजि पराजितमानिनीजनमन सुमन सुरभि श्रियम् । अमृत वारितवारिजचिप्लवां स्फुटितताम्रतताम्रवण जगत् ।।' अत्रापरद्वयानन्तरं यमकविन्यासातस्थानस्य नियतत्वम्। यथा वा- 'द्विन्यान्याति तव कार्तिकेयः शक्षी जितो येन स कार्तिके यः। उत्सातदन्तो गणनायकस्य स्वामी यदन्यो गणनाय क्स्य।।' अब्र चार्थदवये यमकदयमिति स्थाननियमो द्विधवेति नारयालकारस्य इति काचिद्। अतश्र- 'ध्रु'तरसिक सितरुकतर सिकलितरजाए ह रिजायहरणतमः। हरिणतमश्र ततस्तव ततस्तव स्याधशोराशि ॥' हत्यत्र सर्वेउपि स्वरव्यक्षनसमुदायपौनकयस्य स्थाननियमामावाद्यम काभासोडयं घृषयनुप्रासः। एक की अर्थरहितना उपलभ्षमात्र है। उससे बटुन से यमकों में जो किमी की सार्थकता और किमी की अर्थरहितता मिलती है उसका भी उपादान हो जाना है। रकवचित सार्थक और क्वचित निर्थक [यमक ]' इस पाठ में प्रारम्भ के दो ही भेद कहे ना मकते है [ क्योंकि तब् सार्थकता और निरर्थकता ये दो भेद उन्हीं के प्रभेद सिद्ध होंगे] तीमरा नहीं, अन भेदनिर्देश प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थाश का जैसा का तेसा मानना ही अधिक अच्छा है। संसेप-मंक्षिप्त रूप से, अमिप्राय यह कि यमक काव्यात्मा रम की च्वणा में विघ्न सत्पन्न करना है इसलिए इसका अधिक विस्तार करना उचित नही है इसलिए इमको प्राचीन अन्य अटकारों के समान भेद-प्रमेद करके नहीं वनलाया। चित्र (खड्गवन्धादि) के विषय में भी यही जनना चाहिए। अन्यत् अर्थाव शेष दो प्रकार। इनमें से अर्थरहित का उदाहरण यथा-'सरसमन्धर०' इत्यादि पद्य में 'तराग नराग' शब्द। वह अर्थरहित है [प्रथम तराग शब्द स्फुटतर के 'तर' और आगन के 'आग' के मिश्रण से बना है तथा द्वितीय तराग शब्द आगत के 'त' तथा 'राग' शब्द के १. पाठान्तर-शुनरसिक तरसिकलिनं तरुकिततर जालहरिणतम [नि.सा. सं.]
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यमकम्
मिलने से। वे सब शब्दांद हैं उनमें अभिवा नहीं, अतः उनका कोई अर्थ नहीं ]। [ इस पद्य का अर्थ है-'मधुनास में कमलिनी ने जलविदेवता-समुद्र की देवी के समान कोभा धारण की। वे दोनों 'सरसमन्धरतामरसादरन्नमरसज्जलया और स्फुतरागतरागरचि थीं। जलधिदेवता= सरस-मन्य-रत-अमर-सादर-अ्रम-रसज-जला (तृतीया एकव वन में '00जलया') थी अर्थात सरस= समुद्र का मन्थ= मन्थ अथवा सरस=प्लोभन में पड़े तथा मन्थ= मंथन में रत अमर=देवता, उनके द्वारा सादर=आदरपूर्वक (व्य्तिविवेक में पाठ है सोदर उसका अर्थ होगा देवताओं के माई - असुर) जो भ्रम=घुमाना उससे रसव=आवाज करता हुआ है जल जिसका उसकी तृतोचा का एकवचन: नलिनी=सरत-मन्थर-तामरस-आदर-अ्रमर-सज्ज-लया अर्थाद सरस= मकरन्द युक, मन्थर=सुछ-कुछ हिल रहे, तामरस=कमल पर है आदर जिसका ऐेसे भ्रमरों से, सज्ज = आया हुआ है, लय = राग जिसमें अथवा भ्रमरो में सज्ज हैं लय जिसके दारा। (सोदरपाठ होने पर अर्थ होगा तामरस के उदर में)। स्फुरतरागतरागरुचि [शब्द यहाँ और मूल हरविजय में प्रथमान्त है और व्यक्तिविवेक में द्वितीयान्त। द्वितीयान्त होने पर यह श्री का विशेषण बनता है तथापि विभक्तिविपर्यय द्वारा नलिनी तथा जलधिदेवता में भी अन्विरित हो सकता है] नलिनीपक्ष में स्फुटतर आगत है रागरुचि (ललोई) जिसमें जलधिदेवतापक में स्फुटतर आगत है राग (पझराग) रुचि जिनमें श्रीपक् में स्फुदतर आगत है राग (अनुराग, लालरंन की) रुचि जिसमें। अर्थरहित और सार्थक यनकों के योग का उदाहरण तथा-'साहारं साहारम्०' इत्वादि माऊृतगाथा [इसकी संस्कृतचछया निर्णयसागरीय संत्करण में भी नहों है। गाथा अन्चक् है] यहाँ 'सज्जसाहार' वह निरर्थक=अथरहित है और शेप सब्न सार्थक हैं अतः कोई दोप नहीं। यह स्थाननियम के बिना नहीं होता। जैसा कि [वामन ने] कहा है-'अनेकार्थक [मित्रार्थक] पदों या केवल सक्षरों की आवृत्ति चमक कहलाती है, यदि स्थाननियम हो-'[का० सू० ४१।१]। इसीलिए इस अलंकार का नाम भी यमक है क्योंकि इसमें स्थान (चरणों के आदि, मध्य, अन्त भाग] का नियम रहता है, यह अन्वर्थ संक्षा है। स्थान का यह नियम वास्तविक नहीं, विनक्षाधीन होता है। उदाहरणार्थ-([ हरविजय का ३२] 'मधुपराजि०' इत्वादि पद्य। [इसका अर्थ है- 'मधुपां की राजि (पाँतों) द्वारा पराजित कर दिए है मानिनी नायिकाओं के मन जिन्होंने ऐसे पुप्पो से सुरभि=सुगन्धित और खिले तथा ललवर्ण की विस्तृत अमराइओं से युक्त जगत ने कमल- चिप्लवों से मुक्त शोभा को धारण किया। ] यहाँ प्रत्येक चरण में प्रथम दो अक्षरों के बाद ही यमक रखा गया है। इस प्रकार यहाँ उसका स्थान निश्चित है। दूसरा उदाहरण जैसे 'छिन्याद भयात्ति० इत्यादि पद्य [इसका अर्थः-तुन्हारी भयात्ति (संमवतः भवार्ति) को वे कार्तिनेय भग- दान् नष्ट करें जिन्होंने कार्तिक का चन्द्रमा जीत लिया है और जिससे भिन्न ऐसा स्वामी किसकी गणना में आएगा जिसने गणनायक (गणेश) का दाँत उसाड़ लिया हो।'] इस पद्य में दो यमक हाँ (१कार्त्तिकेय: कार्त्तिकेयः तथा २ गगनायकस्य गणनायकत्व) दोनों में स्थाननियम भिन्न है [प्रथम सात बरणो के बाद आने वाला है और द्वितीय पाँच वर्गों के वाद] अतः [यह समझकर कि इस पद्य में एक हो यमक है] यह नहीं सोचना चाहिए कि यहाँ [ द्वितीय यमक में प्रथम से दो ] अक्षरों की कमी है। इसीलिए 'अुतरसि०' इत्वादि पद् में स्वरव्यंजनसमुदायपौनरुवत्व [श्रु-तरसिकलित- रुक-तरसिकलितरु, जालहरि-आलहरि, हरिणतम-हरिणतम, ततस्तव-ततस्तव' इस प्रकार प्रथम चमक एक अक्षर के वाद जाता है किन्तु अन्य सब विना व्यवधान के स्थित हैं। प्रथम ततस्तव के पहिले एक 'च' अवश्य है किन्तु बैसा कोई वर्ण द्वितीय 'ततस्तव' के पहिले नहीं है।
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इस प्रकार यहो [ आवृत्ति में ] स्थाननियम नहीं है यह यमक जैसा प्रतीत होने बाला वस्तुत वृत्त्यनुप्रास ह। [इस पद्य के पूर्वाद्ध का अर्थ स्वष्ट है, उत्तरार्थ का अर्थ है-इम कारण हे तत= विस्तृत, स्तव =रतुतिवाले, जिसकी स्तुति पुप्करमात्रा में हो रही है, आपका यशोराशि तालगा्म हरिण हो।] विमर्श-यमक दण्डी, भामह, वामन, उदमट, स्ट्ूट और मम्मट इन सभी साचार्यों में विवि धता के साथ मिन्ता है। इसका विस्तार भट्टिकाव्य आदि में भी द्रष्टज्य है। यह इनना व्यापक है कि इसके दिए उक्त आचार्यों के मूल ग्रन्थ ही देखना चाहिए। उकत आचायों के यमक सामान्य लक्षम ये है- दण्डी- आवृत्तिमेव सघातगोचरा यमक विद्दु। भामह-के काव्यालकार में यमकसामान्य का लक्षा नहा मिलना। वामन-पदमनेकार्थमक्षर वळततृत्त स्थाननियमे यमरुम्।३।।१। उल्लट-उद्भट ने यमक नामक किमी भी अनस्कार का निरूपण नहाँ किया । कदाचित वे यमक को लाटानुप्रास से अमिन्र मान बेठे हैं। रुदट-तुत्यश्षुतिक्माणाभन्यार्थाना मिथस्तु वर्णनाम्। पुनरावृत्तिर्यमकभ्। ३। काव्यालंकार ]। मम्मट-मर्ये सत्यर्थभिन्नाना वर्तना सा पुन क्षुति, यमकम्। [सर्वस्व ] [सू० ८ ] "श्दार्थपौनरुकत्यं प्ररुद्वं दोपः ।।" परुदग्रहणें वक्ष्यमाणप्रभेदवैलक्षण्यार्थम्। यदाहु :- 'शव्दार्थयोः पुनर्व
"[ सू०८] शब्द [और ] अर्थ [दोनों] का पहद पौनसवश्य दोप होता है।' [बृ०] परूद शब्द आगे कथित प्रभेद से [ इस पीनरुकत्य का] अन्नर बनलाने के लिए 14 अपनाया गया। जैसा कि [महामुनि अक्षपाद के सप्रदाय में ] कहा जाना है-'शब्द और अ का पुनः कथन पुनरुकाख्य दोष होता है अनुवाद को छोडकर।' + चिमर्शिनी प्रस्टमिति । यथाभासनं विश्रान्ते, । यथा- ''तदन्यये शुदूमति प्रसूत शुद्धिमच्तमः । दिलीप इति राजेन्दुरिन्दु: चीरनिघाविव।।' - अग्रेन्दुरिति।श्रनिनेम फीरो जम्मखवा दिन्दोदिरवाननेतत्मरुद मिति न कार्यम्', कषि समये तथात्वस्याप्रतीतेः। आहुरित्याचपादा। जन्यत्ानुवादादिति। अनुवादे हि शब्दार्थयो पुनर्वधन क्रियमाणं न दोपाय 1. अक्रियमाणं पुनर्दीपाय भवतीति भार। थथा- 'उद््ति रक्त' सविता रक एवास्नमेनि घ1 सपत्ती घ विपत्ी च महतामेकरूपता।' अ्ब रक हवि । 1
'शिर शार्व स्वर्गात्पशुपतिशिरस्वः प्ितिघरं 'महोभादुसद्वादपनिमवनेश्ापि जलधिम्। , अघोधो गद्धावदयमुपगता नूनमथवा विवेकभ्रष्टनां भवति विनिपातः पतमुसः॥
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लाटानुपास:
अव्रार्थपौनरवत्येपपि शब्दत्यापुनर्वचनं प्रतीत्यन्तरजनकरवाद्दोफ:। तदेबाप्ररुटमलंकार इत्याह-तात्पर्येत्यादि। मरूद अर्थात जैसा आरन्भ में प्रतीत हो बैसा ही अन्त में ी। उदाहरण [कालिदिास का पद्य ] लस (वैवस्यत मनु) के शुद्धियुक्त वंश में अत्यन्त शुद्धियुक्त दिलीप नामफ राजेन्द्र हुआ जैसे क्षीरसमुद्र में इन्दु। [ रघु० १]। यहाँ 'इन्दु' [ शब्द और उसका अर्थ दोनों ही पुनरुत हैं क्यों- कि उनमें आरन्म से अन्त तक एकरूपता बनी रहती है। इसे यह कहकार अप्ररू नहीं वतलाया जा सकता कि चन्द्रमा दो है, एक अन्निमुनि के नेम्र से उत्पन्न और दूसरा क्षीरसागर से उत्पन्न, क्योंकि कविसमय में चन्द्रमा एक ही प्रसिद्ध है दो नहीं। आहु: कहा है अर्थात अक्षपाद मुनि ने। अन्यवानुवादात=अनुवाद को छोड़कर; अर्यात् अनुवाद में यदि शब्द और अर्थ पुनः कहे जाएँ तो उसमें दोप नहीं: वहाँ पुनः न कहना ही दोप होता है। उदाहरणार्थ-'उदेति सविता इत्यादि पद्य में रकशब्द [पद् का अर्थ :- हय रकत हा उदित होता है और रक्त ही डूचता है। जो महान् होते हैं वे संपतति और विपत्ति दोनों में एक से रहत हैं।] 'स्वर्ग से भगवान् शंकर के सिर पर, पशुपति के सिर से पर्वंत (हिमाचल) पर, उत्तुन शैल (हिमालय) से प्रथिवी पर, पृथिवी से जलि में, इस प्रकार नीचे ही नीचे गंगा के समान हम पहुँचते गए, कारंण यह कि जो विनेक ष होत है उनका सेकढ़ों प्रकार से पतन होता है।' यहाँ सर्थ तो अवश्य दुवारा (एक ही शिव आदि सर्थ मूल में सर्व और पश्ुपति यादि तथा अनुवाद में संकर मौर पशुपति आादि इन शब्दों से) कहे गए है किन्त शब्द दुवारा नहीं कहे गए, उन्हें वदल दिया गया। इससे भारन्म में ऐसा कुछ लगता है कि जैते कोई दूस्तरा अर्ध बतलाया जा रहा है फल्तः यह दोप है। [अनुवाद का उद्देस्य अर्थ तो है ही किसी के शब्दो का अक्षरसः उच्चारण या अनुकरण भी है, किन्तु टीका- कार का उस और ध्यान नहीं गया। व्यत्ति विवेककार मे इस पर अच्छा विवेचन किया है, पतदर्थ देखिए हमारे हिन्दी अनुवाद के साथ व्वक्तिविवेक पृष्ठ १६, चौखम्वा संस्करण।] 'वही [शब्दार्थ पौनरकय ही] यदि अमलद होता है तो अलंकार बन जाता है' इसीका प्रतिपादन करते हैं- [ सर्वस्व ] [सू० ९]'तात्पर्यभेदवततु लाटानुप्रासः ॥' तात्पर्यमन्यपरत्वम् । तदेव मिद्यते, न शब्दार्थ-स्वरूपम्। यथा- ताला जाअंति गुणा जाला दे सहिअपहिं वेप्पति। रइकिरणाणुगाहिमाइँ होंति कमलाइँ कमलाइँ।' 'ब्रम: कियन्नय कर्थंचन कालमल्प- मन्नाव्जपन्ननयने नयने निमील्य। हेमाम्युजं तरुणि तत्तरसापहत्य देवद्विपोऽयमहमागत इत्यवेहि॥'
प्रासत्वमेव। १. हिन्दी का यह वाक्य मूर संस्कृत वाक्य की हाथा है अतः इसमें वे सब दोप है जो मूल में . पतीत होते हैं।
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७२ अलङ्गारसर्वस्वम्
'काशाः काशा श्वामान्ति सरासीव सरांसि च। चेतांस्याचिक्षिपुर्यूनां निम्नगा निम्नगा इव ।' इत्यादावनन्वयेन सहास्यैकाभिधानलक्षणो न संकर:। अन्योन्यापेक्षया रब्द्रार्थंगतत्वेनार्थमाननगतत्वेन च व्यवस्थितेर्मिन्नविपयत्वात्।
अस्मिस्तु लाटानुपासे साक्षादेव प्रयोजकम्।।' [सू० १० ] तदेवं पौनरुक्त्ये पश्चालंकारा: ।। निगद्व्याख्या तमेतत्। [सृ० ९] 'किन्तु तात्पर्य के भेद से युक्त [शब्दार्थ पौनरुक्य] लाटनुपरास [नामक अलंकार होता है ]। [पृ०] तात्पयें का अर्थ है अन्यपरता [यहाँ] भेद केवल उसी में रहता है, शब्दार्थ-स्वरूप में नहीं। यथा- 'तदा जायन्ने गुणा यदा ते सहदयैगुधन्ने। रविकिरणानुगृद्दीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि॥' '[गुण ] गुण तब होते हैं जब वे सहृदयों द्वारा माने जाते हैं। कमल कमल तब बन पाते हैं जब ने सूर्य-किरणों से अनुगृद्दीन होते हैं।' 'किनना कहें, हे कमलपनतुत्य नयन-वाली' तुम अपने नयन मौंच कर यही थोडा समय विताओो और यह समझो कि-हे तरुणि। देवों का रत में उस हेमाम्वुज को वलाद छिनाकर यह आया।' उत्यादि में [ ००नयने नयने आदि स्थलों में ] विभक्ति आदि का तो पौनरूकत्य नहीं है [ क्यों- कि प्रथम नयन बदुतीदि के कारण स्त्रीलिंग में है और सवोधन के कारण प्रथमा के एकवचन में जव कि द्वितीय नयन नपुसकलिंग द्वितीया के द्विवचन में है] तथापि शब्द [बिमक्ति आदि की मूल प्रकृति नयन ] तथा उनके अर्थो का अधिकांश पुनरुक ही है अनः यहाँ लाटानुपासत्व ही [ मान्य ] है। [शरत में] काश काश से ही ग रहे हैं और सरोवर सरोवर से। [ वर्षा में निम्नगाएँ [नदियाँ] निम्नगाओं [नीचों से लगी सरियों] के [ही] समान सुबकों के चित्त विगाठ रही थीं। इत्यादि में लाटानुपास का अनन्वय के साथ एकवाचकानुप्वेश सकर नहीं है क्योंकि दोनों के क्षेत्र भिन्नहै। लाटानुप्ाम का क्षेत्र है अन्योन्यापेक्षी शब्दार्थयुग्म और अनन्दय का क्षेत्र है केवल अर्थ । 'अनन्वय में जो शब्द की पुनरुक्ति होती है वह इसलिए कि उसके बिना अनन्वय समव नहीं, अत वहाँ शब्दपुनरुक्ति[अलकारत्वप्रयोजक, चमत्कारकारी नहीं] आनुपगिक है। जहाँ तक लाट- नुमासका मदन्ध है इसमें राम्द्पुनरुकि ही अलंकारत्व-प्रयोजक है।' [सू० १०] इस प्रकार पौनरकय में पाँच अलंकार होते हैं। [वृ०] सुननेमात्र से इम सूत् का अर्थ स्पष्ट है।
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पश्चालङ्गारा ७३
विमर्शिनी अन्यपरत्वमिति । पुकस्थ वाच्यविश्रान्तत्वेऽ्यस्य लचये व्यङ्गये वार्थे वाच्य- विश्रान्तिरित्यर्थः। सिद्यत इति पर्यवसाने। आमुखे हि शब्दवदर्थस्याप्येकतवेनेवाव- भास:। अत एवाह-न शन्दार्थसवरुपमिति। एवं च ना्यं द्योर्वाच्यविश्रानतव्वेऽनुवाद- मात्रमलंकार:। नहि दोपाभावमान्नमलंकारस्वरुपम्। एवं हि सत्यपशव्दाद्यभावस्याप्य- संकारत्वप्रसङ्ग: । यरपरमादावुक्तं तत्परमेव पुनर्नोच्यते इत्येव सामान्येन यद्यन्यपरत्- मुच्यसे तद्विरोधादिवत् 'उदेति रक्त सविता-' इत्यादौ दोपाभावमात्रत्वेप्यलंकारत्वो- चितस्यान्य परत्वास्यस्यातिशयस्यापि भावालंकारत्वप्रसङ्ग । न पैतावतैव कश्रिदतिशयः प्रतीयत इति यथोक्तमेव युक्तम्। एक: कमलशब्दो वाच्यपर्यनसितः अन्यश्ष लौरभबन्धु- रत्वाद्यनेकधर्मनिष्ठ इति सात्पर्यमेद:। अन्यपरत्व=अर्थाव एक शब्द के अर्थ की वाच्यरप में ही विधान्ति मौर दूसरे के अर्थ की लक्ष्य या व्यंग्य अर्थ में। मिद्यते = भिन्न होता है अर्थात पर्यवसान (अन्त) में। आरम्भ में तो शब्द के समान अर्थ भी एक से ही प्रतीत होते हैं। इसीलिए कहा 'न शब्दार्थस्व्ररूपम्'। इस प्रकार निप्कर्ष यह निकला कि यदि दोनों वाच्चार्थ में ही ठहर जाऍ तो वह अनुवादमात्र (उद्दे छ्यमात्र या पुनःकनमात्र) होता है अलंकार नहीं। [ वहाँ पुनः कथन न करना दोध होता है अतः पुनः कथन दोषाभावस्वरूप और] दोषाभावमात्र को अलंकार नहीं माना जा सकता। यदि दोषाभाव को ही सलंकार माना जाय तो अपशब्द आदि के सभाव को भी अलंकार मानना पड़ेगा। जो शब्द जिस अर्थ के लिए एक वार बोला जाता है वह दूसरी बार भी उसी जर्थ के लिए नहीं वोला जाता', इसी को यदि सामान्यतः अन्यपरता कड़ा जाता है तो विरोध आदि अलंकारों के समान 'उदेति रक सविता' इत्यादि स्थलों में पुनरुत्ति को दोपाभावमात्र मानने पर भी और उसमें अलंकारत्वनिम्पादक अन्यपरत्वरूप विशिष्ट तत्व का अस्तित्व मानने पर भी भावनामक अलंकार होगा, लावानुप्रास नहीं [ अतः रादानुपास में अन्यपरत्व के साथ शब्दार्थस्वरूप में अमेद भी रहना आवश्यक है]। केवल इतने [अन्यपरत्वमात्र ] से ही कोई अतिशय (वैशिष्य) प्रतीत नहीं होता अतः [अन्थकार ने ] जो कहा है [अन्यपरत्व और शब्दार्थस्वरूपाभेद ये दो विशेषताएँ लाटानुपास के लिए आवश्यक बतलाई हैं] वह [उसी रूप में] ठीक है। 'कमलनि कमलानि' में ] एक [ प्रथम ] कमलशब्द वाच्यरूप में ही पर्यवसित होता है और दूसरा [ द्वितीय ] सौरभ, सौन्दर्य या खिली पँखुड़ियों की उतार-चढावदार शोभा आदि वनेक धर्मों का प्रतिपादन करता है। अतः यहाँ दोनों कमलशब्दों के तात्पर्वमात में भेद है। [ इसीको ध्वनिवादियों ने अर्थान्तर संक्रमितवाच्यध्वनि कहा है]। विमर्श-इस प्रकरण में 'नमः कियतू०' इत्यादि पूर्ण पद्य मूल न मानकर डॉ० रामचन्द्र दिनेदी ने अनेक पाण्डम्न्थों के आधार पर इसके केवल द्वितीय चरण 'अन्रा्ज०' इत्यादि को ही मूल माना है। निर्गयसागरीय संस्करण में पूर्ण पद्य के साथ अन्त में यह द्वितीयचरण भी 'बमः-हम्'अन्रा ज्जपत्रनचने नयने निमात्य इत्यादौ-इस प्रकार दिया हुआ है। डॉ० द्विवेदी ने 'काशा: काशा रद4' इत्यादि पद्य का भी 'काज्ा: काशा इव' इतना ही अश मूल माना है। निर्णयसागरीय संस्करण में वह भी पूर्ण है किन्तु वहाँ भी पादटिप्पणो में एक अति में 'काशा: काशा इव' इतना ही मिलने का उल्लेख है। विमा्शनीकार ने 'बुम०' इत्यादि पद्य के चारों चरण नहीं तो कम से कम प्रथम दो चरण तो मूल अवश्य माने हैं क्योंकि उन्होंने प्रतीक दिया है अथम चरण का 'नमः कियदिति' इस प्रकार। हमने इसी टीका के अनुसार मूल रखकर निर्णयसागरीय संस्करण में पुनः आए द्वितीय चरण को हटा दिया है। वह आवद्यक था।
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यद्यपि लाटानुप्रास के लिए द्वितीय और तृतीय पद्य के उपादेय अंश केवल 'अम्जपशनयने नयने' और 'काशा काशा इव' ये ही है और ग्रन्थकार को भी केवल इनना ही पनिपादित करना है, माना जाय या नहीं, विशिष्टस्थिति में ाटानुपास तदर्य उनने से अधिक पूर्ण इलोकों की यावश्यकना नहीं है, तयापि काव्य के भीनर ाटानुपास किनना चमत्कार लाता यह जानने के लिए यहाँ पूर्ण पद्य ही उपादेय है। टीकाकार यदि उनकी व्याख्या न करें तो उससे मूल में पूर्ण पद्य का अमाव नहीं माना जा सकना। टोकाकार इलोक को व्याख्या भी कर यह आवश्यक नहाँ है। सजीविनी और विमर्शिनी दोनों में दलोकों की व्याख्या नहीं के बरावर है। वृत्तिकार ने अनन्वय और लाटानुप्राम के क्षेत्रमेद पर जो प्रश्न प्रस्तुन किया है उसका समापान इतना ही है कि अनन्वय में पदों की आवृत्तिमात्र आवश्यक है, यह नहीं कि दोनों पद एक साथ रखे जावें। 'काशा मान्ति यथा काशा' ऐसा कहने पर भी अनन्वय को निष्पत्ति समत है। लाटानुग्राम केवल तमी हो सकेगा जब दोनों काशपदों को एक सात रसा जाय। मनन्वय में यह आवश्यक नहीं है कि पुन कथिन पद में अनिशय भी प्रनीत हो। लाटानुप्रास में वही प्रभन है। उसके बिना लाटानुप्रास में अनयकारत्व नहीं आता। यनन्वय में चमत्कार का कारण है दिनीयमद्ृशव्यवच्छेद्। 'अमुक के समान अमुफ ही है' कहने से अनीन होना है फि उसके समान दूमरा कोई नहीं है। यही ह द्वितीयमटटशव्यवच्छेद। इसी को लेकर अनन्वय उपमा और उपमेयोपमा से अड्ग होता है। लाटानुमास में तात्र्यनेशनुगन पदपुनरुत्ति ही चनत्कारकारक होता है। 'काशा काशा इन' पद्य में लाटानुपास मानना चाहिए या अनन्वय इम प्रश्न का समाधान केवल यह देखकर करना उचित है कि क्या यहाँ द्वितीय काशादि शब्द उसी प्रकार अतिशययुक्त काशादि अर्थ के वाचक है जिम प्रकार 'कमलानि कमलानि' में द्वितीय कमल। यदि नहीं तो यहाँ अनन्वय ही है। दो दो काशा आदि पदों के एकसाथ प्रयुक्त हो जाने मान से यहाँ लाटानुमास समन नहीं है।
विमर्शिनी ब्रमः कियदिति। अग्र अब्जशब्दस्याप्यपौनरवत्यात् लाटानुम्रासरवमेवेति चिन्श्यम्। अन्र दि द्वयोरपि नयनदब्दयोर्वाच्यविभ्रान्तववादन्यपरत्ाभावाव्वास्ति तास्पर्यभेद:। स एव हस्य जीवितम। अभ्यथा हानुपासमावनत्वं स्थान्नालंकारत्वम्। अयापि केवलन- यनशब्दृस्य स्वार्थविश्रान्तिः संसर्गपद्वान्तर्गतस्य पुन स्वार्थमुपसर्जनीकृ्य संजञिनम- मिद्घतश्च स्वायंत्यागात्परारये च वृत्तिरस्येव लचयनिष्टत्वमिति चेस, नैतद्। लक्षणा- सामपयमावत्। अग्र हन्यपदार्थप्रधानत्वालयनशव्दुस्य गुणीभावः, न मुस्यार्थंवाघः। स्वार्थं एव विश्रांं्तेः न च गुणीभावसुस्यार्थयाघयोरेकरवम्। सतो हि सुख्यार्थश्य कंचिंदपेक्य गुणीभाव:। वाध पुन स्वस्मिन्नेवाविश्रान्तिरित्यनयोमहान् भेद1 नाप्यत्र किचित्मयोजनं न वा रूदिरिय मित्येततपीनसक्य मात्रम्। एवम्, 'सितकरकररुचिर विभा विभाकराकार घरणिधर कीर्नि। पौरुपकमला क्मला सापि तर्ववास्ति नान्यस्य।।' हत्यादावपि जेयम। चमरकारसव त्रानुप्रासह्तोऽन सेयः। नन्वनत्वयेऽपि शब्दपौन- रवत्यं दश्यत हति तम्रापि किमयमेवालंकाग: किमु स एनेव्याशकयाट-अनन्वय इत्यादि। आतुपदिकमिति। न पुनःसाक्षास्मयोजकुमित्यर्थ।शब्दर्क्य विनाप्यनन्वयस्य प्रतिपाद नातू। अब्र हि शब्दैक्यं कचिद किय मागमनीचित्यमावहति क्वचिम्नेति भाव। तत्त यथा-
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पश्चालह्कारा
'यच्चनुर्जगतां सहस्रकरवद्धाम्नां च धामार्कव- न्मोकद्वारभपावृतं च रविवद् ध्वान्तान्तकृत् सूर्यचत्। आत्मा सर्वदरीरिणां सवितृवत् निग्मांशुवत् कालकृत् साध्बी नः स गिर ददातु दिनकृद् योन्यैरतुल्योपमः।।' अन्र सहस्रकरादयोजनय इवाभासमाना अनन्वचप्रतीति विघ्नयनगीति शब्दैक्या
'स्थैर्याद मूर्व्यापकतवाद् वियदसिलजगत्म्राणभावातसस्त्ान् भास्वान् विश्वप्रकाशाद्युगपदपि सुधामूतिराहादनाच्च।
सत्यात्मत्वेऽपि यस्थ परभवतु भवर्ता सोऽएमूर्ति: शिवाय ।' अन्र निर्विघ्नमेवानन्वथस्य प्रतीते: शब्दैक्यभावो नानीचित्यावहः। तुशब्दो व्यति रेके। साक्षादिति। शव्देश्यं विनास्यानुत्थानात्।
दयस्रय: श्रव्दपोनरुत्याश्रयाः। लाटानुमासस्तुभवाश्रित इति पञ् पौनसक्याश्रिता अलं. कारा। यच्प्युक्के: शब्दार्थगतत्वेनोच्चरणाभिघानतया मदाव् सामान्याभावा् कत्य पञ्ञ प्रकारत्वं तथापि तस्या हयोरप्यनुगमादेकस्वेन मतीतेरुत्सामानयनिबन्धनसेव प्रकारि- प्रकारभाववचनम् । वच्चाथमेदेन शब्दस्यापि भिन्नसवं तदबास्तवम। प्रतीतावेकतयैवा वभासात्। अत एवाने कार्थवर्गादिप्वपि तथात्वेनैव व्यवहार:। 'ब्ुमः किदत' इस [ पद्य] में (सब्त वब्द मी पुनतत नहीं है अतः यहाँ अलंकार में) लाटनुप्रासत्व ही है' यह विचारणीय है। यहाँ दोनों ही नयन वब्द अन्ततक वाच्यार्थमात्र तक ही सीमित रहते हैं। उनमें तात्पर्वभेद नहीं है। मौर वही [ तात्र्च भेद] तो लादानुप्रास का आण है। उसके बिना वह' लाटानुप्रास) अनुपासमात्र होगा, असंकार नहीं। इतने पर भी वह कहा जा सकता है कि यहाँ जो नयनशब्द स्वतन्व्ररूप से (समास से अलग) प्रयुत्त है वह अपने वाच्च अर्थ तक ही सीमित रहता है, विन्तु जो नयनगब्द 'अब्जनयने' इस प्रकार बहुव्रीहि सनास में आए पद के साथ है उसमें उसका वाच्यार्थ अप्रधान है और प्रधान है (बहुब्रीहि का अन्य पुरुष) नायिकारूपी अर्थ। इस प्रकार यह नयनशब्द अपना अर्थ छोड़कर दूसरे नायिकारूपी अर्थ में पर्यवसित होता, फलतः इस नयनशब्द में तो [वाच्येतर] लक्ष्य अर्थ के प्रत्ति परावणता दिखलाई देती है। किन्तु यह कहना ठीक नहीं क्योंकि यहाँ लक्षणा के लिए अपेक्षित (मुख्यार्थ- वाध आदि कारण-) सममझी नहीं है। यहां बहुव्ोहि में अन्यपुरुष की प्रधानता रहती है इसलिए नयनशब्द अप्रधान अवश्य है किन्तु उसके वाच्य अर्थ का बाध नहीं हैं इसलिए वह (नयनशब्द) अपने (वाच्य) सर्थ में ही पर्वत्रसित होता है। ऐसा थोड़े ही है कि अपधानता और मुख्यार्थवाय अभिन्न हों। जो मुख्य अर्थ बदलता नहीं उसमें किसी अन्य अर्थ की अपेक्षा अप्रधानता आती है। बाघ कहलाता है उसका अपने अर्थ में पर्यवसित न होना (अमने अर्थ का वाक्यार्थबोध तक अपरिवर्तित न रहू सकना) इस प्रकार अप्रधानता और वाध में बहुत अन्तर है। फिर यहां न तो लक्षणा के लिए अपेक्षित प्रयोजन ही है और न रूदि ही। अतः 'नवने नयने' यह पौनरकत्यमात्र है (अलंकार नहीं)। यही बात 'हे विभाकर [सूर्य ] के समान, ह धरणियर सिसकर-कर-रुचिर-बिभा (सिंतकर = चन्द्र उसके कर = किरण उनके समान रुचिर= हन्दर निभा-कान्तिवाली] कोति तथा पौरुषकमला (पौरुप ही है कमल=वासस्थान जिस वे 'िएरर्सा)
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७६ अलद्कारसर्वस्वम्
कमला (लक्ष्मी) भी तुम्दारे ही पास है अन्य किमी के पाम नहीं।' इत्यादि स्थनों में भी है। यहा जो चमत्कार है उसका कारण अनुपाम हो मानना चाहिए। प्रश्न उठता कि 'शब्दपौनसवत्य अनन्वय में भी रहना है, वहाँ लाशनुपास मानना चाहिए सा अनन्वय 'इस पर उत्तर देने हुम कहा अनन्वय इत्यादि' आनुषगिक अर्थाद माक्षाव प्रयोजक नहीं। क्योंकि अनन्वय शम्द्रैक्य के बिना भी प्रतिपादित किया गया है। एम (अनन्वय) में कही तो शब्दैक्य न रखने से दोप आ जाना है कहीं नहीं। यथा 'वह दिनकत सूर्य इमें साधु- बागी प्रदान करे जो सहसकर (सूर्य) के ममान जगत का चश्रु है, अर्क (सूर्य) के समान भाम (मकारा, तेज) का धाम है, रवि (सूर्य) के समान खुन्ग हुआ मोकद्वार है, सूर्य के समान ध्वान्न (अन्धकार, अज्ञान) का अन्न करने बाल्ग है, सविना (सूर्य) के समान सभी श्रारधारियों के लिए आत्मा है [ और ] तिग्मानु [ नीक्षग किरणों वाले सूर्य ] के ममान काल [समय] का निर्माता है'। यहाँ [एक ही सूर्य के लिए] जो महस्रकर यादि (भिन्न-मिन्न) शष्दों का प्रयोग किया गया है, उममें ऐसा प्रतीत होना कि कदाचित उपमान और उरमेय मिन्न-मिन्न है फलन: वे अनन्वय के चमत्कार में विघ्न वन जान है, इमलिए यहाँ सब्दैक्य के अमाव से अनौचित्यभान् आाता है अनन्वय का अभाव नहीं। 'वे भगवान् अट्टमूचि [पंच महाभूत, सूर्य, चन्द्र तथा चैनन्य ] आपका कल्याण करें जिनके लिए स्वय उन्दीं की सातों मूर्चियाँ एकमाथ उपमान है, स्वैर्य के कारण पृथिवी (टनका उपमान है), व्यापकता के कारण आकाश, निसिल जगन के प्राण होने के कारण वायु, विश्वमान को प्रकाशिन करने के कारण सूर्य [ विश्वमान्न को ] आहादिन करने के कारण चन्द्रमा (सुधामूनि), महारक होने के कारण वदि और असिल जगत को आध्यायित करने के कारण जल।' यहाँ अनन्वय की प्नोति बिना विप के हो जाती है अत यहाँ शब्देक्य का अभाव दोपावइ नहां है। तु-शब्द मेदप्रत्यायक है। साधात् अर्थात इम [लाटानुप्रास ] का अलकारत्व ही सभैक्य के िना समन्र नहीं होना। इमांका उपमदार करते है-तदेवम् पुनरुकवदाभाम अर्धपौनम्कत्य पर निर्भर है और हेका- नुगाम आदि तीन [ आदि पद से वृत्त्यनुपाम और यमक ] शन्दपीनरुकत्य पर। लाटनुमास जो है मो दोनों (: न्दार्थोमय) के पौनर्कत्य पर निर्मर रहता है। इस प्रकार पीनरकत्य पर निर्भर रहने वाले पाँच अलकार हुए। यद्यपि [पुनमक्ति में जो ] उक्ति तस् [है वह ] शब्द में उच्चारणम्वरूप होता है और अर्थ में अमिधान-[ अभिवावृत्ति द्वारा प्रतिपादन]-स्वरूप, इमलिए दोनों में भेद रदता है, एकरूपना नहीं, इमलिए पाँचों स्वतन्त्र अलंकार हो सकते है[ किसी एक के पाँच भेद नहीं हो सकने ] तथापि उत्ति उचकित्वेन दोनों प्रकार की उक्िओं में ममान है अत उन दोनों उक्तियों म प्रनीति अभेद की ही होना है फलन यह जो प्रकारपकारिमाव [प्रकार-भेद, प्रकारी=भेदवाला ] सबन्ध है वह केवळ मामान्य उक्ति पर निर्मर है। यह जो कहा जाना है कि अर्थ में भेद होने से शब्द में भी भेद हो जाता है, अवास्तविक है, क्योंकि प्रतोति में तो एकरूपना ही भामिन होती है। इमीलिए कोषों के अनेकार्थ वर्ग आदि अशों में (अर्थ अनेक होने पर भी शष्द को) वैसा (एक और अनिन्न) ही मानने का प्रचलन है। विमर्श-'स्येर्याद भू०' इत्यादि पद् में टोकाकार ने जो अनन्वय माना है वह विचारणीय है। पद्य ने अष्टमूति भगवान् की मान मूर्त्तियों का उनकी अष्टममूर्ति के माथ उपमानोपमेयमाव दनलाया गया है। अन: अष्टममूर्तिस्वरूप शिव उपमेय मिद्ध होने है और अन्यमूर्तिस्वरूप शिव उपमान। इस प्रकार 'अनुहरति सुभग तस्या वामार्ध दक्षिाघंस्य'='उस सुन्दरो का वार्माग उमी के दक्षिगाग का अनुकरण करता है' इम पद् में जैने नायिका के एक हो होने पर भो अरगों में
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चित्रालङ्गार:
वामत्व और दक्षिणत्व का भेद हो जाने से उपमान और उपमेय दोनों में अमेद की प्रतीति नहीं होती और उससे अनन्यय सिद्ध नहीं हो पाता उसी प्रकार यहाँ भी शिव के अभिन्न होने पर भी उनकी मूर्तियों में परस्पर भेद होने से उपमान और उपमेय में अभेद की प्रतीति नहीं होती, फलतः यहाँ भी अनन्वय सिद्ध नहीं होता। यदि यह कहा जाय कि यहाँ अ्ष्टम यजमान या चैतन्यमृरत्ति उपनेय न होकर अष्टमूर्ति ही उपमेय है और प्रत्येक मूति उसकी ही एक-एक इकाई है, फलतः उनसे अभेद की प्रतीति और ततः अनन्नय असंभव नहीं, तब भी निर्वाह नहीं क्योंकि अष्टमूर्ति सामान्यस्वरूप का वाचक शब्द है और भू आदि विश्ेषत्वरूप के वाचक। सामान्य और विशेष अभिन्न अवश्य होते हँ किन्तु उनमें भेदप्रतीति नहीं होती ऐसा नहीं कहा जा सकता। यहाँ अनन्वय की ध्वनि कदाचित संभव है क्योंकि केवल सात मू्तियों में अपना-अपना औपन्य बतलाने से यह प्रतीति होता है कि भष्टम आत्ममूर्ति का कोई उपमान नहीं है। [सूक्ष्म विवेचन के लिए देखिए रसगंगाधर का अनन्वव प्रकरण]। सब कुछ के बाद यहाँ यदि अभेद- प्रतीति मान भी ली जाय तो यह तो नहीं माना जा सकता कि यहाँ भिन्न शब्द प्रयोग से जनितभेदप्रतीति अनन्वयनिष्पत्ति में वाधा नहीं डालती। 'आत्मा होने पर भू आदि ही उपमान बन पाते हैं' इस प्रकार आत्मत्व के प्रतिपादन से भेदप्रतीति अवदय ही दुर्बल हो जाती है। संजीविनीकार ने लावनुप्रास और अनन्वय का भेद इस प्रकार संगृहीत किया है- 'यत्र तादेव शब्दार्थी तात्पर्थ तु विभिद्यते। तत् मौनरुकत्यमाचार्येर्काटानुमास इन्बने॥ दोपापततिमयादेव शव्दैक्यं स्वादनन्त्रये। अत्मिस्तु लाटानुपासे साक्षादेव हि लक्षणन् ।।' अर्थात जहां शब्द और अर्थ वे ही हो किन्तु तात्पर्य में भेद हो उस पौनस्कत्य को आचार्य- गण लाटानुप्रास मानते हैं। अनन्वय में शब्द की एकता दोमापत्ति के भय से होती है, जबकि लाटानुपास में वह लक्षण ही है। संजीविनीकार ने 'अग्जपत्ननयने नयने' में प्रथम नयनशब्द को बहुव्रीहि के कारण अन्य पदार्थपरक मानकर लाटानुप्रास मान लिया है। [सर्वस्व] [ सू० ११ ] वर्णानां खङ्गाद्याकृतिहेतुत्वे चित्रम् । पौनरुतयप्रस्तावे स्थानषिशेपश्लिष्टवर्णपीनरुक्त्यात्मकं चित्रवचनम्। वद्यपि लिप्यक्षराणां खङ्गादिसंनिवेशविशिष्टत्वं तथापि श्रोताकाशसमवेत- वर्णात्मकशव्दाभेदेन तेर्षा लोके प्रतीतेर्वाचकशन्द्रालंकारोडयम्। आदि- ग्रह्णाद् यथाव्युत्पत्तिसंभवं पम्मबन्धादिपरिग्रद्यः। यथा- 'भासते प्रतिभासार रसाभाता हताविभा। भावितात्माशुभावादे देवाभा वत ते सभा।।' एपोऽपदलपझबन्धः। अत्र दिग्दलेपु निर्गमप्रवेशाभ्यां श्लिष्टाक्षर- सत्वम्। विदिग्दलेपु त्वन्यथा। कर्णिकाक्षरं तु हिलध्ट्मेव।
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अलङ्कारसचस्वम्
[सू० ११] 'जहाँ वर्ष सडग आदि के आकार को जन्म दें ,उमे चिन्न [अलंकार ] कहते है।' [घृ०] पीनसकच के प्रमग में [ उसके तुरत वाद ] चित्रारकार का निरूपण इसलिए किया जा रहा है कि इसमें भी [गजन, कपालिका, कृण्टिका आदि ] विशिष्ट-विशिष्ट म्थानों में हिलट् वर्गों का पौनरुवत्य रहना है। यद्यपि सद् आदि के आकार से तुकत केवल लिमे में लिख अक्षर होते हैं नथापि इम अलंकार को वाचक श्ब्दो का अलकार मान लिया जाता है कारण कि लिप्यक्षरों का ओग्ाकाश में समवेत [ समवाय सबन्ध मे विदमान ] वर्णात्मक शब्दों से अमेद प्रतीत होता है। आदि शब्द के महण से उसुर्पत्ति के अनुमार यथासंमव पद्मवन्धादि का मगह हो जाता है। यथा-'भामते प्रतिभासार०' इत्यादि पय अष्टदलममवन्ध का उदाहरण है।
उत्तर
त्मा
भा: 9 पूर्व
पशश्चिम ५
ता ति
3 दक्षिण
[रहोकार्थ] [ प्रतिमासार] प्तिमा ही है सार = ब जिसका ऐसे हे राजन् [ ते ] आापको सभा [दन ] भछी भाँति [ भासत ] मासिन हो रही है। वह [ रसामाता शृगार आदि रसों से मुशोमिन है, उसने [ इताडविमा ] अविमा= व्यामोह, को [ हत] दूर कर दिया है, [भावितात्मा] उसका स्वरप परिस्कृन है, वह [ वादे शुमा ] वादों में शुम है अत. [देवाभा ] देव [सभा ]
" यदा दिग्दलों में प्रवेशे नथा निगम के क्रम से अक्षर दिलट है। विदिग्दलों में स्थिति उसते तुल्य है।'
एटरी है। पर्णिकाशर सिसह हो है। न
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चिवालङ्कार: ७२
विमर्शिनी वर्णानामित्यादि। उच्चारणककाले स्थानविशेपरिलिष्टवर्गात्मकखङ्गादिसं निवेशस्याभावात् पौनरुत््यप्रतीतिननिति किमाश्रयोऽ्यसलंकार इत्याशङ्कयाह-यद्यपीत्यादि। लिप्यनराणां मपीबिन्दुरुपाणां अयमाणतासतत्व्रवर्णशव्दाभेदप्रतिपत्या औपचारिकोडयं शब्दालंकार इति तात्पर्यार्थ: । आदिग्रहणं सफलयितुं पद्मबन्धेनोदाहरति-भासतेत्यादि। खह्नन्धः पुनर्यथा- 'स पात्रीभविता मोषक्णलक्त्या भवारस। समस्तजनतायाससमुद्धाभिन्नताभिद्:।।' रिलप्टमेवेति। अषृद्विकमपि निर्गसप्वेशयोः। उच्चारण के समय विशिष्ट स्थानों में टिलट्ट जी वर्ण तत्स्वल सक् आदि के आकार का अभाव रहता है अतः यहाँ पौनरुकत्य की प्रतीति नहीं होती अतः यह जिश्ञासा होती है कि यह अलंकार किसके आसरे रहता है। [ इस जिज्ञासा और ] इस [के उत्तर] के लिए लिखा 'यद्यपि०' इत्यादि। तात्पर्य यह कि लिपि के अक्षर स्याही की बूंद होते हैं। उनके साथ सुनाई देने वाले बर्णो से अभिन्न शब्दों को अभेदप्रतीति होती है। उसी के आाधार पर इस [ चित्र] को लाक्षणिक रूंप से शब्दालंकार कहा जता है। आादिशब्द को सफल करने के लिए [ नीचे के] उदाहरण के रूप में पद्मबन्ध प्रस्तुत करते है 'भासते०' इत्यादि। सङ्गवन्ध का उदाहरण यह है 'स यात्रीभविता०॥
सता-
ल्न ता या 7स-मस्त-ज * पा त्री भ वि ता मो श ण ल कम्या भवार
[क्लोकार्थः =] [मवरस ] मव= [संसार, उस ] के रस से रहित [अरस] नह समस्तं जनता के आयासरूपी समुद्र की अभिन्ता तोड़ने वाली मोक्षक्षण की लक्ष्मी का पात्र बनेगा।' श्लिष्टमेव, अर्थाद आर्ठो दिशाओं में प्रवेश करते और निकलते समंय भी। .!
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८० भलङ्कारसवस्वम्
विमर्श-श्रीविद्याचकवर्त्ती ने सजीविनी में पम्मबन्ध और सहयन्धों का निष्कर्ष इम प्रकार दिया है- 'अघ्ाथ निष्कर्य - 'कर्गिकाया लिसेदेक दो दौ दिश्ु विदिक्ष च। प्रवेशनिर्गमी दिश् पन्मबन्धो भवेदयम्। आरोप्य लिपिवर्णाना साम्याद् वाचकवर्णतान्। सह्बन्धादिकु चित्र काव्यालकार इष्यते ।' इति।
अर्थात् = कर्णिका में प्रथम एक अक्षर लिसकर दिशाओं और विदिशाओं में दोन्दो अक्षर लिसे जायँ और प्रवेश तथा निर्गम केवल दिज्ाओं में रहें तो उमसे पद्मवन्ध बनता है। 'साम्य के आधार पर लिपिवर्णों के ऊपर वाचकवरगों का आरोप करने से काव्य में सहबन्ध आदि [चित्र] को अल्कार मान लिया जाता है। संजीविनीकार ने यहाँ तक के सभी अल्कारों को शब्दालकार कहा है। इम प्रकरण के अन्न में उन्होंने इम प्रकार की पुग्पिका दी है-'इति श्रीविद्याचकवर्त्तिन कूनी अलकारसवंस्वसंजीविन्या शव्दाळकारपकरणम्।' अगले प्रकरण का आरम्म उन्होने इन शब्दों से किया है 'अथ अर्थालकारा. ।' इममे स्पष्ट है कि सजोविनीकार पुनरक्तवदामास के भी शब्दाटकार हो मानन हैं। वृत्तिकार से पुनरुक्तवदा- भास को जहाँ अर्थालकार कहा है वहाँ सजीविनीकार ने उमपर कोई विचार नहीं किया है। कदाचित ने उसे उपेक्षगीय मानते है। इतिदास-चित्रबन्ध का सग्रह प्रथमन दण्डी ने किया है। इनके पश्चाद चित्रवन्ध स्द्रट और मम्मट में ही मिलने हैं। मध्यदर्नो भामह, वामन और उ्ट के काव्यालकारों में इनका अभाव है।
[सर्वस्व ] [सू० १२] उपमानोपमेययोः साधर्म्ये भेदाभेदतुल्यत्वे उपमा।। अर्थालंकारप्करणमिदम्। उपमानोपमेययोरित्यप्रतीतोपमानोपमेयनि- पेधार्थम्। साध्म्ये नयः प्रकाराः। भेदप्राधान्यं व्यतिरेकादिवत्। अभेदमा धान्यं रूपकादिवत्। द्वयोस्तुत्यत्वं यथास्याम्। यदाङ्ढु :- 'यत्र किंचित्सा- मान्यं कश्चिञ्च विशेष: स विपयः सदशतायाः इति । उपमैवानेकप्रकार- वैचित्येणानेकालंकारवीजभूतेति प्रथमं निर्दिष्टा। अस्याद्च पूर्णालुप्तात्य- भेदाशिरंतनैर्धहुविधत्वमुक्तम्। तत्नापि संधारणधर्मस्य कवचिद्नुगामितयैक रूप्येण निर्देश:, कचिद्वस्तुप्रतिवस्तुभावेन पृथङनिदॅशः। पृथङनि्देशे च संबन्धिभेदमात्रं प्रतिवस्तुपमावत्, विम्वप्रतिविम्यभावो या दशान्तवत्। क्रमेणोदाहरणम्- 'प्रमामहृत्या शिस्रयेव दीपस्त्रिमार्गयेव त्रिदिवस्य मार्ग: । संस्कारवत्येव गिरा मनीपी तया स पूतव्व विभूपितश्च ।।'
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उपमालङ्कार:
'यामया मुहुर्वलितकंधरमाननं तदावृत्तवृन्तशतपत्रतिभं वहन्त्या। दिग्धोडमृतेन च विपेण च पक्ष्मलाक्ष्या गाढं निम्वात इव में हृदये कढाक्षः।।' अत्र वलितत्वावृत्तत्वे संचन्धिमेदाद्भिने। ध्म्यमिप्नायेण तु विम्वम्नति- विम्बत्वमेव । 'पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्बहार क्लपाङ्गरागो हरिचन्दनैन। आभाति वालातपर क्तसानु: सनिर्झरोद्वार इवादिराज।।' अन्र हाराङरागयोनिर्झरवालातपौ प्रतिबिम्बत्वेन निर्दिष्टौ। [सू० १२] 'उपमान और उपमेय का समानधर्म के साथ ऐसा संबन्ध जिसमें भेद और
कहलाता है।' अभेद [प्रधान या अम्रधान न होकर] समान हो उपमा [नामक अलंकार ].
[वृ० ] यह प्रकरण अर्थालंकार का है। [साधम्य केवल उपमानोपमेय का ही होता है कार्यकारण आदि का नहीं तथापि सूत्र में उपमानोपमेय का शब्दतः कथन अप्रतीत उपमान और मैसे ही उपमेय के निषेध के लिए किया गया है। साधन्य में तीन भेद होते हैं [ एक वह ] जिसमें भेद की प्रधानता रहती है जैसे व्वततिरेक आदि में, [ दूसरा वह ] जिसमें अभेद की प्रधानता रहती है जैसे रूपकादि में [तीसरा वह] जिसमें दोनों की समानता रहती है जैसे इसी उपमा में। जैसा कि [भाष्यकार आदि ने! कहा है-'सदशता = उपमा का विषय [ स्थल] वह होता है जहां कुछ [सामान्य-] समानता [साधर्म्य अभेद ] और कुछ [विशेष-] असमानता [वैधर्न्य- भेद ] रहे।' [वद्यपि प्राचीन आचार्यों में भामह और उद्भट ने अर्थालंकार का निरूपण रूपक से आरम्भ किया है और रुद्रट ने सहोकि से तथापि] नंथ्कार ने (वामन के समान) उपमा का ही निरु- पण पहले किया यह इसलिए कि [ वामन के ही समान उन्होंने भी यह माना है कि] उपमा ही थोड़े थोड़े से अन्तर को लेकर अनेक अलंकारों में बीज का काम करती है। [ वामन, उद्भट और मम्मट] ने इसे पूर्ण और सुपा इन दो भागों में बाँटा है और उनके भी अनेक [उद्भट ने १७, मम्मट ने २५ ] भेद वतलाये हैं, [भामह और रुद्रट में ये भेद नहीं" है। तथापि [ कुछ और भीं मार्मिक भेद किए जा सकते हैं यथा] कहीं साधारण धर्म [एक शब्द से कहे जाने पर भी] अनुगामी (उपमेय और उपमान दोनों में वे-रुकावट लागू होने वाला) होता हैं अतः उसे एक ही रूप में [ एक ही शब्द से] प्रस्तुत किया जाता है किन्तु कहीं (वह अनुगामी नहीं होता एक शब्द से नहीं कहा जाता और) वस्तुप्रतिवस्तु-स्वरूप (एक होने पर भी भिन्न- भिन्न गब्दों से पृथक पृथक प्रतिपादित फलतः भिन्न प्रतीत होने वाला) रहता है अतः भिन्न- भिन्न रूपों में (पृथक पृथक शब्दों से) प्रस्तुत किया जाता है। जहाँ भिन्न-भिन्न रूपों में प्रति- पादित किया जाता है वहाँ भेद केवल सम्वन्धियों (उपमानोपमेयों) में रहता है (धर्म में नहीं) वा तो (वहाँ साधारणपर्म में) विन्वप्रतिविन्वभाव (भिन्न होने पर भी सादृश्व के कारण (अमेदश्ञान) रहना है। (दोनों के) एक-एक करके उदाहरण-(साधारण धर्म का उपमान और उपनेय दोनों के लिए एक ही वार उपयोग अर्थात् अनुगामी साधारण धर्म का उदाहरण)- "वह पर्वतराज (हिमाचल) उस (नवजात) कन्या (पार्वती) से ठीक उसी प्रकार पवित्र भी हुआ और विभूपित भी जिस प्रकार पर्याप्त प्रकाशवाली (अग्ति) शिंखा से दीप, (मन्दाकिनी)
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गंगा से स्वर्ग-मार्ग (अन्तरिक्ष) (अथवा) सस्कून भापा से विदान् (पवित्र और विभूषित होना है' (कमारसमत्र-१ सर्ग)। [यहों पूनत्व और विभूषितन्वर दोनॉ धर्म साधारण धर्म है। इन्हें इलोक में एक हो बार कहा गया है किन्तु ये उपमानभून दीपक, स्वर्गमार्ग और विज्ञान तथा उपमेयभूत हिमाचल दोनों में समन्विन हो जाने हैं अत. इन्हें अनुगाभी कढा जा सकता ह] [वस्तुप्रतिवस्तुरूप से पृथक पृथक शब्दों द्वारा पृथक पृथक रूप से प्रस्तुत अत. जननुगामी साधारणवर्म का उदाहरण ]- ['अत्र वह [ मालतीमाधद की नायिका मालनी] जा रही थी तो उसने अपनी भीवा के साथ अपना चेहरा (मैरी ओर) धुमाया। (उस समय) वह ऐमा लग रदा था जैसे वृन्त (इंठल) के साथ तिरछा किया गया सौ पंखुड़ी का कमलपु्त हो। उस स्थिति में धनी वरोनी वाला आसो से जो कटाक्ष किया मेरे ( माधव के) हृदय नें बहुत ही गहराई से गट गया है। ऐसा रगता है कि वह अमृत और विप दोनां से बझाया गया है।' (यहाँ अनुवाद में उपमान और उपमैय दोनों के लिए दो वाक्य हों गए हैं, मूल पद्य में वाक्य एक ही है वही होना भी चाहिए, अनुवाद में बैसा करने पर काव्यशिल्प मटियामेट हो आाता) यहा [चलितित्व ] धुमाव और आवृतत्व [तिरछापन ] केवल सबन्धियों [आनन = चेहरा और रतपत्र = कमल] के मिन्न होने से भिम्न है म्वत तो बे एक ही है] यदि इन धर्मों से युक्त [ आनन और भीवा तथा रानपत्र और वृन्त ] वस्तुओं को लेकर उपमा मानी जाय तो उनमें तो [ यहा भी बिम्द प्रतिबिम्दभाव। सादृश्य के आधार पर प्रातीनिक समेद ] ही मानना होगा। [भूलत भिन्न साधारण धर्म के अलग अलग शच्दों से अलग-अरग रूप में प्रस्तुन किय जाने पर मी साइ्य के आधार पर अमेद अर्थात विम्वप्रतिविम्यभाव का उदाद्दरण]- 'पाणण्डय देश का [विशालकाय ] यह राजा कन्धों पर हवार लटकाए हुए है और लाल. चन्दन का अंगराग (लेर) लगाम हुए है अत ऐसा सुशोमित हो रहा है जैसे कोई पर्वतराज हो जिमपर झरने वर रहे हों और जिसकी चोटियों पुर सबेरे की लाली आई हो।-(रयुवरा ६सग)। यहाँ [बिम्वभून ] दार और राग के लिए निर्झर वालातप प्रतिबिम्वरूप से प्रस्तुन किए गए है। [हार और निर्शर में रम्वायमानत्व तथा शुक्लत्व की समानता है अत-उनमें अभेद प्रनीत होता है। इसी प्रकार अगराग तथा बालानन में विरनृनत तथा रव्वर्गत्व की समानता है जिमसे इननें भी अभेद की प्रतोति होता है। इम प्रकार इस स्वगन साधारणधर्मों के कारण अभिन्न हुए हार +निर्र अगराग+वालातप राजा और पर्वन की उपमा में साधारणपर्म का काम कर देने है, अत. यहाँ विम्हम तिविम्वरमाव मान्य है]। चिमर्शिनी उपमानेत्यादि। अर्थेति। शन्दालंकार निर्णयानन्तरमयसरपाप्तमित्यर्थ,। ननूपमानोप- भेययोरेव साधम्य संभवति न कार्यकारणादिकयोरिति कि तदुपादानेनेत्याशदद्याह-उप- मानेत्यादि। तत्रोपमानस्याप्रतीतनवं लिप्नमेदादिना प्राच्यरुकम्। यथा- 'कटु कगन्तो मलदायका खलास्तुदन्त्यलं बन्धनशद्गला इव। मनस्तु साधुध्वनिभि' पदे पदे हरन्ति सन्तो मणिनूपुरा दब ।।' अत्र कवणनादेधमंस्योपमानेऽन्यतां करोतीति लिद्गभेदो दुष। यद्यपि साधारणधर्मस्यो अयसंबन्घसंभवेऽपि सिद्धखवाद्ुपमाने तरसंबन्घस्य स्वयमेवावगमात् तस्य न शाब्दता
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उपमालदार ८३
युक्तेत्युपमानपारतन्त्रयेण लिग्गादि विपरिणामो न कार्य इति न लिङ्ग्भेदादेर्दुष्टत्वम्, तथाप्यु- पमानवाक्यस्य साकाङ्त्वाप्रतीतिविश्रान्ते: शा्दस्तत्संबन्ध उपयुक्त एव। नहिं प्रभा- महत्यादावुपमानवाक्ये पूतत्वादिसंबन्ध बिना समन्वयधिशान्ति: स्यात्। केवलं समान- धर्मस्योपमेये विधीयमानत्वसुपमाने चानूघमानव्वमितीयानेव विशेषः। तदुभयव्रापि तद् संवन्धस्यावरयोपयोगादुपपद्यत एव समानवर्मस्यानुगामित्वम। तल्लिङ्रभेदादेरपि दुष्टवं युक्तम्। उपमेयस्याप्रतीतत्वमवर्णनीयस्यापि चर्णनीयत्वम्। यथा- 'गौर: सुपीवराभोगो रण्डाया सुण्डितो भगः ।
वत्र तन्वङ्गचा रूपवर्णने भगवर्णनमनौचित्यावहमित्युपमेयस्याप्रतीतत्वस्। उपमानेत्यादि। अथेति अभिप्राय यह है कि अर्थालंकार का निरूपण शब्दालंकार निरूपण के पश्चात अवसर प्राप्त है। शंकर=[मम्मट ने उपमा लक्षण में उपमानोपमेय का निवेशन कर कहा है कि ] साधम्य उपमान उपमेव में ही रहता है कार्यकारण आदि में नहीं [ इसलिए उन्होंने अपने उपमालक्षण "साधर्म्यमुषमा मेदे" में उपमान उपमेय का निवेश नहीं किया] तब यहाँ उनका उपादान क्यों किया जा रहा है। 'इसके उत्तर में कहते है'-उपमानेत्यादि। यहां जो रपमान का अमतीतत्व हे उसमें [वामन आदि] प्राचीनों ने लिगभेंद मादि को कारण माना है। यया- 'कट वोलते और कालिख लगाते खल लोग वन्धन मंसल के समान बहुत अभिक सताते हैं। इसके विरुद्ध सत्पुरुष मोठी वाणी से मणिनपुर के समान पद मद में चित्तको हर लेते हैं। "[कादम्वरी आमुख ]।2 यहाँ [उपमानभृत शूङ्गला स्ीलिंग है और पवणन्तः पुक्लिंग। इस प्रकार विशेषण निशेष्यों में] सिङ्गभेद है और वह कवणन आदि धर्म को उपमान में अन्वित नहीं होने देता इसलिए दोप भी है। यद्यपि साधारणपर्म का संबन्ध दोनों से होता है [ अतः उसमें एकमात्र से संदन्ध रसने वाला दोष नहीं होना चाहिए] किन्तु उपमान के साथ उस [साधारण धर्म] का संबन्ध स्वतः विदित हो जाता है क्योंकि उपमान में वह [ धर्म लोकप्रमाण से] सिद्ध रहता है। शङ्ुला आदि में कदुक्वणवादि धर्म लोकपसिद्ध है। निदान उसे शब्द द्वारा कहना युक्त या मावश्यक नहीं होता, फलतः उपमेवगत धर्म लिंग विपरिणाम द्वारा उपमान में भी लागू किया जाय यह भी आवश्यक नहीं है और इस स्थिति में लिंगभेद दोष नहीं उहरता, तथामि उपमानवाक्य उसके ज्ञान तक साकाक्ष रहता है इसलिए प्रतीति अटकी न रहे, वह शीघ्र पर्यवसित हो सके इसलिए साधारणव्मे का सम्बन्ध उपमान के साथ भी सब्दतः कथित ही होना चाहिए। "मनामहत्याः" हत्यादि प्दयों में नवतक उपमानवाक्य में पूतत्वादि के संब्रन्न प्रतीत नहीं हो जाते, समन्वच
१. 'स्तम्बेरमा नुखर शृहलकर्पिगस्ते' [रघु० ५] आदि में मह्गलशब्द भी है। अनेकार्थ संग्रह में हेमचन्द्र ने इसे लोहरज्जुवाचक माना है और नमुंसकलिद्गान्त। अमरकोप ने इसे पुरुष को करवनी का वाचक माना है किन्तु तीनों किंगों में। यद्यपि रघुवंश के उच्त पद में हेमाद्ि और मलिनाथ ने शृह्लशब्द को नपुंसकलिद्गान्त ही माना है तथापि लोहरज्जु के भी अर्थ में इसका प्रयोग पुंलिक्वान्त संभव है तभी वाणभट्ट ने विशेषणवाची शब्द में पुंल्लिंगीय शत्प्रत्वयदिया है अतः यहां लिंगमेद मिटाया भी जा सकता है।
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सलद्गारसर्वस्वम्
[पदार्थों का सबन्ध] तय नहीं हो पाता। अन्तर इतना ही रहता है कि साधारणधर्म उपमेय में विधेय रहता है और उपमान में उद्देश्य। इस प्रकार उपमान और [ उपमेय] दोनों के साथ उपयोग आवश्यक होने से साधारग धर्म का अनुगामी [उभयान्वयी ] होना उपयुक्त हो है। इसोलिए लिंगमेद आदि को दुष्ट मानना भी ठीक है। उपमेय तब भी अप्रनीन होना है जन किसी अवर्गनीय का भी वर्गन कर दिया जाय। यथा- 'शाँढ़ स्त्री का गोरा, चौडा चकला और मुण्टित भग [ योनिवेदिका ] मेरु के उस सुवर्ग तट के समान लगता है जिसकी घास सूर्य के घोड़ों ने चर ली हो।' यहाँ किसी तन्वगी के रूप का वर्णन करने करते उसके भग का वर्णन करना अनौचित्यकारी है इसलिए यदोँ उपमेय अप्रनीन है। [ सूत्रकार ने सूत्र में उपमान और उपमेय को स्थान देकर ऐमे उपमान उपमेय का परिदार आावश्यक माना है, अत उनका मूत्रमें इन दोनों का उपयोग करना उचित है] विमर्शिनी भेदाभेदतुल्यत्वं व्याख्यातुं साधर््यस्य विपयविभागेण व्यवस्थिति दर्शयति-साधर्म्य इश्यादिना। एनैरेव च त्रिभि पकारैः साधर्भ्याश्रय समय्र एवालंकारवर्ग.संगृह्दीत। तेन व्यतिरेकव दिरयनेन सहोदस्यादय: सगृहीता: रूपकवदित्यनेन परिणामाप्रेसादय:। किनु रूपको ्परेष्षयोरभेद प्राधान्यसव्वावेप्यारोपध्यवसायकृ एव विशेष। यद्वचयति-'आरो पादभेदेऽध्यवसाय प्रकृष्यते इति। अतश्ञाध्यवसायगर्भेप्वलकारेपु शुद्धाभेदरूपश्चतुर्थः प्रकारो न कष्विदाशङ्नीय. 1 तन्नाप्य भेद प्राधान्यस्यव भावात्। अनयाप्युपमेयोपमादय: संगृहीता. । सामान्यमित्यभेद्हेतुक्म्। विशेष इति भेदहेतकः। एवं च भेदाभेदतुल्यन्च विपये य सादृश्यप्रत्ययो जायते तस्योपमाविपयत्वमुक्कम्। ननुच सास्वप्यनेकेप्वर्था- लंकारेपु प्रयममियमेव किं निर्द्ष्टेम्याशङ्कयाह-उपमवेत्यादि। अनेकेऽलंकारा: साधर्भ्या- प्रया: तत्रेवास्य बीजखात्। उन्र्नमिति। 'माधर्म्यसुपमा भेदे पूर्णा लुक्ता व सामिमा। श्रत्यार्थी च भवेद् वाक्ये समासे तद्िते तथा ॥'इत्याहिना। अतश्च किमस्माकं तदाविष्करपोनेति भावः। एव च तेपां गणने तथा न वैचिन्य किचि- दिति सूचितम्। भेदाभेदनुत्यता की व्यास्या करने के लिए विषय विभाग द्वारा साधम्य की व्यवस्था दिसलने हुम लिस रहे है-'साधर्म्य' इत्यादि। इन्ही तीन भेदों में साधम्यातचिन सभी अलकारों का समह हो जाता है, इसलिए व्यतिरेक के समान ऐमा कदने मे सहोकि आदि का सग्रह हो जाता है और रूपक के समान कहने से परिणाम, उत्परक्षा आदि का। रूपक और उत्प्रेक्षा नें अभेद प्राधान्य रहने पर भी अन्तर आरोप [ रूपक ] और अध्यवसाय [उत्मेक्षा] को ऐेकर होता है। जैसा कि कहेंगे-अमेद में आरोप की अपेक्षा अध्यवसाय उत्कष्ट होता है। इसलिए अध्यवमायवाले अलकारों में 'शुद्ध अभेद' नामक किसी चतुर्थ भेद की सभावना नहीं की जानी चाहिए। वहाँ भी अभेद की हो प्रधानना रहती है। इस [उपमा] के द्वारा उपमेयोपमा आदि का मग्रह किया गया। सामान्य अभेद के आधार पर, विशेष भेद के आधार पर। इस प्रकार जहाँ भेद और अभेद दोनों की बरावरी रहती है वहों जो सादृश्य की प्रनीनि होती है उमे उपमा का विषय
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उपभालङ्कार:
माना गया। [ प्रश्न] "अर्थ के अलंकार तो और भी अनेक हैं, अर्थालंकार निलपण उनसे आरम्म न कर उपमा से ही आरम्भ बयों किया" इसपर उत्तर मेने हुए लिसा-उपमव इत्यादि। अनेक अलंकार कहने का सर्थ है वे अलंकार जो साधर्न्य पर लायि। हैं क्योंकि उपमा केवल उन्हीं में रीजभृत होती है। उक्तम् [पूर्णा तुप्ता आदि अनेक भेद कहे हैं] अर्थात "साधर्म्यसुपमा भेदे पूर्णा लुमा०"[काव्य- प्रकाश उ० २0] "भेद रहने पर समानपर्म का जो सम्वन्ध उसे उपमा कहा जाता है। वह दो प्रकार की होती है पूर्गा और लुम्ता। इनमें से प्रथम [ पूर्णा] वाभ्य, समास् तथा तद्धित में औरौती और आर्थी [इस प्रकार छ प्रकार की ] होती है। यहाँ से लेकर आगे सुपा के १९ मेदों के निरूपण तक। अभिपराय यह कि प्राचीन आचार्वी-द्वारा निरूपण कर दिए जाने से पुनः उनका निरूपण करना आवव्यक नहीं है। इससे यह भी ववनित हुआ कि प्राचीनों के इन भेदों में कोई चमरकार नहीं है [रसगंगाधरकार ने भी यही कहा है 'अस्याश्ोपमायाः प्राचामनुरोपेन केचिद् नेदा उदाहियन्ते पृ० न१३ निर्णयसा० सं० ६]
दिम्शिनी तनापीति । चिरंतनोकते पूर्णत्वादिभेदनिवेधे सत्यपोत्यर्थः। साधारणधमस्येसि। धर्म: पराश्नितः, तस्य च तद्तद्गामित्वात साधारणत्वम्। तदेव चोपमाद्यत्थाने निमित्तम् । स च चतुष्यी शब्दानां प्रवृत्तिः इति महाभाष्यप्रक्रियया जातिगुणक्रिया- द्व्यात्मकेषु धर्मिप्वेवंरूप एव भवति। न पैतद्विरष्यते। धर्मिधर्मभावस्य व वास्तवत्वम्। जात्याद्यात्मनो धर्मिणोऽपि कदाचिदन्याश्रितत्वे धर्मस्वान्। एवं तदतिरिक्तं धर्मसानमपि साधारण न किचिद्ाच्यम। चतुषटय्या पुव शव्दानां अ्रवृत्तेरुततवाव्। 'सदयं बुभुजे महाभुजः सहसोद्वेगमियं व्रञ्रेदिति। अचिरोपनतां स मेदिनी नवपाणिग्रहणां चघूमिव ।।' इत्यादाबुपमानादी क्रियारूपरवादेय।जयितुं शक्यत्वात् तस्य एव च समग्रविपयावगा- हनसहिप्णुत्वाद्। ननु जाते: साधारणधर्मले तजातीयरवाव तत्वं न स्याद, न सदशदव मिति कथमुपमाङ्गतवमस्याः स्यादिति चेत्, न। विम्नन्नतिचिम्त्रभानाध्येण तथात्ता- भावात्। तत्र ह्यसकृन्निर्देशाद् दयोहारादिकयोजतियोः श्वैत्याद्यमेदनिमित्तावलम्बनेनकत्व माश्रित्य साहश्यनिमितं साधारण्यं स्यात्। एतच्च सविस्तरसुपरिष्ठाद् वच्यामः । तन्नापि=तब भी अर्थाव प्राचीनों के द्वारा निर्दिष् पूर्णा आदि २५ भेदों के रहने पर भी। साधारणधर्मस्य=धर्म का अर्थ है जो दूसरे में रहे। वह जय दो भिन्न-भिन्न [तद् अतब्] वस्तुओं में रहता है तो साधारण कहलाता है। यही साधारण धर्म उपमादि अलंकारों के अलंकारत्व का कारण होता है। धर्मी चार प्रकार के होते हैं जाति, गुण, क्रिया मौर द्रव्य, जैसा कि महाभाष्यकार ने कहा है "चतुष्यी शब्दानां पवृत्तिः" । इन धर्मियों में ये ही चारो साधारण भ्मरूप भी होते हैं। [यह धर्मो का धर्मरू होना ] कोई विरुद्ध वात नहीं है, क्योंकि [काव्य में] धर्मधरमिंभाव [विवक्षाधीन अतः कालनिक, न कि भौतिक स्तर पर सत्य] आव्वाअविभावरन से रहता है। इलीलिए धर्मधर्मिभाव वास्तविक नहीं होता। जाति आदि धमों मा यदि अन्याभित [रूप से प्रतिपादित ] होते हैं तो पर्म मान लिए जाते हैं। इससे यह बात आती है कि इन [चार] के अतिरित्त अन्य किसी को भी साधारण धर्म नहीं नाना जा सकता क्योकि शब्दों के सर्थ केवळ चार ही (जाति आादि) बतलाए गए है"। "उस महावाहु (अज) ने तुरन्द प्राप्त
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८६ मलङ्गारसवस्वम्
पृथिवो का मोग नवोढा बधू के समान यह सोचकर दया के साथ किया कि कदीं यह उद्वेजित न हो जाए।" यहाँ उपमान आदि में क्रियालूपत्वादि की योजना को जा सकती है और वही [करिया ही] यहाँ समगविषयावगाइनसहित्णु है [ अर्थत किया ही यहाँ उमालकार निम्पादक है]। (प्रश्न) जाति उपमा का अग कैसे मानी जा सकती है क्योंकि न तो [उपमानोपमेयगन मिन्न-भिन्न ] वे [जातियाँ ] अमिन्न हो सकनी क्योंकि वे अधिक वे अधिक तज्जातीय ही हो सकती हैं और न उनमें परस्पर का साद्ृश्य ही रह सकता [ क्योंकि दोनों सवथा मिन्न होगी]। [उत्तर] ऐेसा नहीं। जातियों के भेद की पनीति दिन्वप्रतिविम्बभाव से मिट जानी है। 'पाण्डयोड- प्यामंसापितळम्वहारः' आदि में, उपमान और उपमेय के साथ [बार-चार कथिन द्वारत्वादि जातियों का श्रेत्य आदि के आधार पर ऐक्य हो जाएगा और उस [ शैत्यादिजनित ] मादृश्य के आधार पर उन [जानियों} का साधारणत्व भी निम्पन्न हो सकेगा। यह विषय और भी सधिक विस्तार में हम आगे बनलावेंग। चिमर्शिनी तत्र धर्मिणो जातयादिरूपता यथा- 'धनोदान च्ट्रायामिन मरपयाद, दावदहनाद तुपाराम्भोवापीमिव विपचिपाकादिय सुधाम्। पतृद्धादुन्मादाब प्रकृतिमिव निस्तार्यविरहा- ल्मेय स्वद्धकि निरुपमरसा शंकर कदा।।1 अ्षत्र च्छायाघापीसुघाप्रकृतीनामुपमानानां जातिगुणद्व्य कियात्म्। छायायास्तु जाति रुपतवाद गुणतवं नाशाहटनीयम्। उपमेयत्य पुनातत्स्वयमेवाम्यूह्यम्। जात्यादि की धर्मिरूपता का उदाहरण- "मरपथ से धनोधानछाया के समान, दावासि से शीतलअलवाप के समान, विधुविपाक से पधा के समान, प्रवृद्ध उन्माद से प्रकृरत [स्वस्थचिचता] के समान दुस्तर विरह से आपकी मर्ति को हे मगवान् शांकर मे कब पार्ऊँंगा।" यहाँ छाया, बापी, सुधा और प्रकृति क्रमशः जाति, गुण, द्रव्य और करिया रूप है (?)। छावा जातिरूप है। उसमें गुणत्व की शंका नहीं करना चाहिए। उपमेय में ये [जाति आदि] स्वयमेव समझ लेनी चाहिए। [इसी छोक में विरद्द औौर मक्ति उपमेय है इनमें विरह जातिवाचक चब्द हो सकता है क्योंकि वह अभाव पदार्थ है और विरह अनेक हो सकते है, जिनमें विरदृत्व जाति रह सकती है, भक्ति रागातमक भावतत्त्व है जो स्पष्टरूप से गुण है। द्रव्य के रूप में यहोँ संकर मगवान् को उपमेय माना जा सकता है। प्राप्तकरिया यदि छाया ादि प्रत्येक के साथ लग्" की जाय तो वह भी मक्ति के साथ उपमेय दन सकती है] विमर्शिनी घर्माणां तु यथा- वंदेहि पश्या मछयाद् विभक्त मल्मेतुना फेनिलमम्ुराशिम्। दायापयेनेव अब्र विभकमित्यस्य क्रियावं रामसेनुच्छायापथयोर्द्ंव्यरवं फेनतारकाणा जातित्वं प्रसादस्य च गुणत्वं दव्यामकराशाम्तुराशिगततवेनोपनिवद्म् । एवं प्रकृतामेव महामाध्यप्रक्ियामपहाय निनिमित्तमेव प्रकियानतरमाधित्य यद्न्यैषक्तं तदयुकमेवे-
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उपमालक्वार ८७
त्यलं बहुना। एवंविघस्य चास्य भावाभावरूपतया दवविध्यम् 1 एतच न तथा चैचित्यावहमिति ग्रन्थकृता नोक्तम्। धर्मों की जात्याविरूपता यथा- 'हे वैदेहि! देखो फेन से युक्त यह अम्वुराशि मेरे सेतु से मलयाचल पर्वन्त दो भागों में बँट गया है, ठीक उसी प्रकार जैसे आकाशगंगा से सुन्दरतारों भरा शरत्कालीन निर्मल आकाश ।' वहाँ विभक्त होना [ बेटना ] क्रियारूप है, रामसेतु और छायापथ (आकाशगंगा) द्रव्यरूय है, फेन और तारे जातिरूम हैं तथा प्रसन्नता (निर्मलता) गुणरूप। ये सब आकाश और अन्धुराशि में विद्यमान बतलाए गए है जो द्रव्यात्मक है। इस प्रकार महामाष्य की प्रकृत [प्रसिद्ध] प्रक्रिया को छोड़कर [उ्बट, मन्मट, और रलाकरकार] अन्य आचार्यों ने अकारण ही [ पूर्णा लुप्ता आदि की] जो, दूस्री प्रक्रियाएँ अपनाई है वह ठीक नहीं है। हम इस प्रसंग को यहीं समाप् करते हैं। इस प्रकार [चार प्रकार] का यह [साधारण धर्मे] भावात्मक मी होता है और अभावात्मक भी किन्तु इसमें कोई चमस्कार नहीं है इसलिए ग्रन्थकार ने इसका प्रतिपादन नहीं किया। चिमर्शिनी देकरूप्येगति। सकृत्। यद्व चयति-'तत सामान्यधर्मस्येवाद्युपादाने सकृन्निर्देश उपमा' इति। पृथडनिर्देश इति। असकृदित्यर्थः। यद्वचयति-'वस्तुप्रतिवस्तुभावेनासकृन्निदशेऽपि सैव' इति। साधारणधर्मस्येत्यन्रापि संबन्धनीयम्। वस्तुप्रतिवस्तुभावेऽपि ह्वैविध्य- मित्याह-प्रृथङ्निर्देश इत्यादि। सम्बन्धिभेदमात्रमिति। न पुनः स्वरूपभेदः कश्चिदित्यर्थः। य द्वच्यति-असकृन्निर्देशे शुद्धसामान्यरूपत्वं विन्वप्रतिविम्बभावो वा' इति। एतच् भेद- त्रयं प्रायः सर्वेपासेव साहश्याश्रयाणामलकाराणां जीवितभूत्तत्वेन संभवतीत्यग्रत एन सन्न तत्रोदाहरिप्यामः । क्रमेणेति यथोद्देशम्। सम्वन्धिभेदादिति। संवन्धिनोः कंवरावृन्तयो भैदाद। न तु हार निर्झरादिवत्त्वरूपतो भेदः। वस्तुत एकत्वाद्वलितत्व ावृत्तत्वयोरभेद्ः। ननु यदि वलितत्वावृत्तत्वास्यो धर्म आननशतपत्त्रयोः शुद्धसामान्यरूपतयोपात्तस्तदुर्ी कंधरावन्तरूप: पुनः किरुपतयेत्याशङ्गयाह-धम्यभिप्रायेगेत्यादि। एवकार: शुद्धसामान्य रूपतवव्यवच्छेदकः । कंधरावृन्तयोश्च यथोकते धर्मित्वेऽप्या ननशतपत्त्रापेक्षया धर्मत्वसेव युक्म्। आश्रयाश्रयिभावेन धर्मिधर्मभावस्य भावात्। अत एवास्यावास्तवत्वं पूर्वसुक्तम्। अतक्षाननशतपत्त्रापेक्षया इति न व्यास्येयम्। तयोरुपमानोपमेय भाववाचीयुक्तेरेव युक- त्वातू। एवं च सति कंधरावृन्तयो: स्वरूपमनभिमतं स्यात्। अनेनेव च विम्वप्रतिबिम्व- भावस्य स्वरूपे दर्शितेऽप्यसंकीर्णप्रकटनाशयेन पुनः 'पाण्डयोऽयम्' इत्यादयुदाहतम्। सकृत् एक बार [निर्देश ] जैसा कि कहेंगे-'उनमें सामान्यधर्म का, इवादि शब्दों का उपादान होने पर यदि एक ही वार निर्देश हो तो उसे उपमा कहा जाता है।' पृथक निर्देश अर्थात् अनेक वार निर्देश, जैसा कि कहेंगे-'वस्तुप्रतिवस्तुभावपूर्षक [साधारणवर्म का] एकाधिक वार निर्देश होने पर भी वही [ उपमा ही] होती है।' इस वाक्य में "साधारण धर्म का" इतना और जोड़ देना चाहिए [ हमने जोड़ दिया है]। वस्तुप्रतिवस्तु भाव जहाँ होता है वहां भी दो भेद होते है इस बात को पृथक निर्देश इत्यादि के द्वारा वतलाया। सन्वन्धिभेदमात्र न कि किसी प्रकार का स्वरूपभेद, जैसा कि कहेंगे-"[ साधारण के] अनेक बार कहे जाने पर या तो वद् शुद्ध सामान्यरूप रहता है या उसमें विन्वप्रतिविम्वभाव रहता है।' मे तीन भेद सादृश्यमूलक प्रायः सभी अलंकारों में प्राण का काम करते हैं इसलिए इन्हें जहाँ तहाँ शुरू शुरू में ही बत- लाते रहेंगे । क्रमेण=क्रम से अर्थात जिस क्रम से नामोल्लेख किया गया है। संबन्धिभेद से
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मबन्धियों अर्थात कन्धरा और वृन्त के भैद से। वस्तुत [वलितत्व और आवृत्तत्व में ] वैसा स्वरूपभेद नहीं है जैसा हार और निर्झर में है। भूलत एक होने से वनिितत्व और आवृत्तत्व [शब्दभेद दोने पर भी ] अभिन्न ही है। यदि वलिनत्व और आवृत्तन्व आानन तथा शनपत्र में शुद्धसामान्यरूप से उपात्त है तो प्रद्न उठता है कि उनके धर्मी कधरा (मीवा) और वृन्त (रबेट) किस रूप से उपात्तहै। इस पर उत्तर देत है-"धर्म्यमिन्ायेण" एव शब्द यहा शुद्ध- सामान्यरूपता का निवतक है। कन्धरा और वृन्त यहाँ उपर्युक्त क्रम से धर्मी ही है तथापि आनन और रतपत्र की अपेक्षा वे धर्मरूप भी हो सकते है। क्योंकि (काव्य में) भर्मधर्मिभाव आश्रया- श्रविभावरूप से व्यवस्थित होता है। इमीलिए [अमी वुछ ही] पहले इसे अवास्तविक भी कद्दा है। इसीलिए व्यास्या में "आनन और रतपत्र की अपेक्षा" ऐसा कहना भी ठोक नहीं है [ वस्तुत यह सशोधन वृत्ति द्वारा प्रम्तुत "धम्यपेक्षया"-म विचार पर है] उपमानोपमेय- भाव कौ वाचोयुक्ति की उनमें उपयुक्त और उचित हे।[ अरथात कन्धरा और वृन्त में उपमानोषमेय- माव ही मानना पर्याप्त तथा उचित है, विम्वप्रतिविम्वमाव द्वारा अभेद नहीं ] ऐमे। धर्मरूप मान लेने पर] तो कन्धरा और वृन्त के अपने स्वरूप अनमिमत [व्यर्थ] सिद्ध हो जानेगे। [इसलिए इनमें विम्वप्रतिविम्बमाव नहों मानना चाहिए] और दसी अभिपाय से "पाण्ड योऽयमसार्पितलम्व- हार:" यह पृथक उदाहरण प्रस्तुन किया गया है। इसमें केवल विम्वप्रतिविम्वमाव ही है वम्नुप्रति- वस्तुभाव नहीं। वस्तुप्रतिवस्तुभाव से सकीर्ण विम्वप्नतिविम्बमाव तो इसी "यान्त्या मुद " पद्य से [ कन्धरावृन्न में उपर्युक्त क्रम से विन्वप्नतिबिन्वभाव मानने के कारण ] स्पष्ट हो सकता था।
विमशिनी हाराइरागयोरिति। स्वरपयोरिति शेप। न चान् विम्वमतिविम्वभावस्य विपयान्तरं प्रदर्श्य वाक्यार्थगतामुपमामाराङ्गय गुणसाग्यनामा चतुर्थ प्रकारो वाच्यः। यावता हि साधारणधर्म निचन्धनसुपमास्वरुपम्, सचात्र धर्मो निर्दिष्निर्दिष्रवेन द्विविध। निर्देश- पक्चे चास्य नैविध्यमुक्तम्। अनिर्देशपते चास्य न वैचिन्यं किंचिदिति न तदाश्रयं भेद- जातमुक्तम्। अतश्चान्न निर्दिष्ट सोधारणधर्मा व्यवस्थित दति का नाम चतुर्थप्कार- करपना। वाक्यार्थोपमागन्धोइप्यत्र नास्ति। स हयनेवेथा धर्मिणां परस्परावच्छिन्नानां ताटरशोरेव धर्मिमि साम्ये भवति। यया- "जन यिन्या: कुलाल्याश् रक्षिम्या विदितोऽभवद्। ! रतनसूतेरमुजंग्या् प्रच्छन्न इय शोवधि.॥' क्त्न जनयिन्यादीनां रत्नसूत्यादीन्युपमानान्युपात्तानि। एतेपा घर्मित्व च स्फुटमेव। विम्वप्रतिबिम्वभाव पुनर्धर्मिविशेषप्रतिपादनोन्मुखानां धर्मागां भवति। परस्परात्रचिछ्- सत्वं यथाब्रेंव। अत्र हि हाराहरागयो. पाण्डवस्य वि्िष्टतापादनायेवोपादानम्। इन्दु मर्नी प्रति तस्य विशिष्टालम्बनविभावव्वेन विर्वाततत्वात्। अतश्च तयो. परस्परोनमुख- त्वारस्वा्मन्येवाविश्रान्तिरिति का कथोपमेयतायाः। एवं पाण्डयस्यादरिराजेन हारनिर्झरा दिधर्मनिमित्तवोपमा, तावन्मान्नेणैव सादृश्यपर्यवसानात्। तच्च हारादे साधारणवर्मस्य
-हारांगरागयो हार और अंगराग के अर्थात उनके स्वरूप के [न कि उनमें विद्यमान जाति के प्रनिविम्व ]1 [वामन ने 'पाण्डयोज्यममापिंत' पद्य में वाक्याथोषमा मानी है द्रष्टय ४।२३- काव्याकारसूववृत्ति, टीकाकार इसपर सशोधन करते हुए लिस रहे है-] "यह कहा जा सकता
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उपमालड्कार: ८९
है कि यहाँ विन्वप्रतिविम्वभाव का विचार विपयान्तर है, क्योंकि विचार प्रस्तुन है उपमा का, फल्तः यहाँ वाक्यार्थोपमा माननी चाहिए और उसे उपमा का गुण साम्यमूलक एक चौथा प्रकार स्वीकार कार लेना चाहिए।" किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, कारण कि उपमा का जो स्वरूप है वह निर्भर है साधारणवर्म के ऊपर, और जो साधारणघर्म है वह दो प्रकार का दोता है निर्दिष्ट और अनिर्दिष्ट। निर्देशपक्ष में उसके तीन प्रकार वतलाए हैं। अनिर्देशपक्ष में उसमें कोई चमत्कार नहीं रहता अतः उससे संभव भेदों का निरूपण नहीं किया है। इस प्रकार इस प्रसंग में क्योंकि केवल निर्दिष्ट साधारण धर्म का ही विचार किया गया है अतः (अनिर्दिष्ट साधारणधर्मरूप गुण- सान्यमूलक) चतुर्थ भेद का प्रश्न ही नहीं उठता। जहां तक वाक्यार्थोपमा का संबन्ध है यहां उसकी गन्थ भी नहीं है। वह तो तब होती है जब परस्पर संबद्ध अनेक धर्मियो का वैसे ही धर्मियों से सान्य दिखलाया जाता है। जैसे-'वह केवल जन्म देने वाली माँ और रक्षा करने वाली कुलाली= कुम्हारिन ही जानती थी उसी प्रकार जिसप्रकार छिपे हुए कोप को रत्नगर्भा पृथिवा और सर्पिंणी [ रत्नसूति = रत्न उपजानेवाली भूमि पर प्रायः सर्पिणी या सप रहते हैं]'1) यहाँ माँ आदि [ आदि पद से कुलाली और 'स' इस पद से कथित व्यक्ति के लिए रत्नसृति आदि [आदि- पद से भुजंगी और शेवधि या कोष ] उपमानरूप से अपनाए गए हैं। इनका धर्मित्व और परस्पर में संवद्धत्त्र स्पष्ट ही है। विन्वप्रतिविम्त्रत्व जो होता है वह उन धर्मो में होता है जो किसी विशिष्ट धर्मो का प्रतिपादन करने के लिए होते है। जैसे ूमा [ पाण्ड चीडयमंसा०] पद्य में ही। इसमें हार और अंगराग का जो उपादान है वह पाण्डयराज में विशेषता लाने के लिए ही। यह भी इस- लिए कि कवि उसे इन्दुमती के प्रति विशिष्ट [असामान्य] आलम्वन विभाव के रूप में चिन्नित करना चाहता है। इसीलिए वे [ हार और अंगराग ] परस्पर के प्रति उन्मुख है इसलिए वे अपने आप में विश्रान्त तक नहीं हो पाते, उनमें उपमेयता की बात ही कैसे की जा सकती है। इस प्रकार पाण्डय और अद्विराज की उपमा हार और निर्झर आदि धर्मों पर ही निर्भर है। उन दोनों में सादृश्य का वोध केवल इन्हों धर्मों से होता है। और वह [ साद्ृश्य ] ज्ञात होता है हार आदि धर्मा के विम्नप्तिविम्भाव से अतः इनमें दृष्टान्त जैसी स्थिति का वतलाया जाना उचित ही है।
चिमर्शिनी
ननु हारनिर्झरयोस्तदृतद्वामित्वाभावारकर्थं साधारणधर्मंतेति चेतु, उच्यते- अस्यास्तावद्धर्मस्य साधारण्यं जीवितम्। तच्च धर्मस्यकत्वे भवति। न च वस्तुतोऽ धर्मस्यैकत्वम्। नहि य एव सुखगतो लावण्यादिर्धर्मः स एव चन्द्रादौ, तस्यान्वयासंभ- वात्। अपि तु तज्जातीयो ऽत्रान्योडस्ति धर्सः। एवं धर्मयोमेदाव्साधारणस्त्ाभावादुपसायाः स्नरूपनिष्पत्तिरेव न स्यात्। अथ धमयोरपि सादृश्यमन्युपराज्यते तस्तन्ापि सादृश्य- निमित्तमन्यदन्वेप्यम् । तन्नाप्यन्यदित्यनवस्था स्यात्। ततश्र धर्मयोर्वस्तुतो भेदेडपि प्रतीतावेकतावसायाचेदेऽप्यभेद इत्येतन्निमितमेकरव माश्रयणीयम्। अन्यथा ह्यपमाया उत्थानमेव न स्यात्। एवमिहापि हारनिर्शरादीनां वस्तुप्रतिवस्तुतयोपात्तानां वस्तुतो भेदेऽप्यभेदविवन्ेत्येकत्वं ग्राहम्। अन्यथा ह्ोपां पाण्डयाद्विराजयोरैपम्वससुत्याने निमि- त्तत्वमेव न स्थात्। न चैपामौपस्यं युक्तमिति समनन्तरमेवोक्तम। अत मुवात्र बिम्न- प्रतििस्वभावव्यपदेशः। लोको हि दर्पणादौ विन्वातपतिविर्वत्य भेदेऽपि मदीयमेवात्र वदनं संक्रानतमित्य भेदेनासिमन्यते। अन्यथा हि प्रतिविन्वदर्शने कृशोऽह स्थूलोहमित्या- मिमानो नोदियात् भूपणविन्यासादौ च नायिका नादियेरन्। ग्राच्येरपि-
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२० अलङ्गारसर्वस्यम
'स सुनिर्लान्दिनो मौन्ज्या कृष्णाजिनपर्ट वहन्। व्यराजन्नीउजीमृतमागरिरष्ट इचांशुमान् ।।' इति, तथा-स पीतवामा प्रगृहीतशार्ङ्गी मनोज्भीमं वपुराप कृष्णः । शतहदेन्द्रा युध नान्निशायां ससृग्यमान, शशिनेव मेघ:।।' इत्यत्र मौजीतडितो. शङ्गशशिनोश्ष वस्तुतो भेदेऽप्यभेदविवत्तामेवाश्रित्य साधारण धर्मस्य हीनत्वमाधिक्यं चोकमू। अत एव चान्र पूर्व अ्रभ्यकृता चस्तुप्रतिवस्तुभाववद् वस्तु- द्वयस्थ प्राच्योक्तमेव व्यवहारं दर्शयितुं प्रतिवस्नूपमावद् दष्टान्तवच्चेति तदुक्कमेव दष्टान्त हय दत्तम्। एवं चाय्रामेदवित्स्व जीवितम्। प्रट्न उठना है कि [जिसमें (पाण्टय में) हार है उसमें निर्झर नहों और जिसमें (पर्वंत में) निर्झर है उसमें दार नहीं इस प्रकार] हार और निझर दोनों में से कोइ भी परस्पर भिन्न दोनों वस्तुओं [ पाण्डय और परव्रंत] में रहने वाला नहीं है [ दोनों ्कही एक में रदते है] अन. ये साधारण धर्म कैसे माने जा सकते है। उत्तर में कहा जाता है कि इम [ उपमा] का प्राण है धर्म का साधार णय। वह [साधारण्य ] समी होता है अब धर्म एक हो [ मिन्न नहों और धर्म यहाँ वस्तु एक नहीं है। ऐसा नही कि जो ावण्य आदि धर्म मुख [ आदि] मैं रहना है वही चन्द्र आदि में रहता हो क्योंकि उम [ मुसगन धर्म] का [चन्द्रादि से] सम्बन्ध [ही] समव नहीं। चन्द्रादि में जो धर्म रहता है यह मुसादिगन लावण्यादियर्म का सजातीय और उससे कोई मिन्न धर्म होता है। इम प्रकार धमो के भिन्न होने से साधारगता नहा बनेगी फठनः उपम। का स्वरूप हो नियन्न नहीं होगा। यदि धर्मों में भी अभेद के लिए सादृस्य स्वोकार किया जाता हो तो वह सादृश्य अपनी सिद्धि के लिए किमी सन्य साटृश्य की अपेक्षा रखेगा और वह [तीसरा मादृश्य] मी [अपनी सिद्धि के हिए] अन्य [किसी चौथे] साद्व्य की। इम प्रकार अनवस्था आ पटेगी। इसटए धर्मों में वस्तुन भेद रहने पर भी प्रतीति में एकता ही भासिन होती है अत "अत. भिन्नता होने पर मो समेद" इम तथ्य को निमित्त मानकर [चन्द्रादिगत और मुसादिगन] मिन्न मिन्न धर्मी में समेद मान लेना पड़ता है। ऐमा न मानने पर [मुग और चन्द्र सादि में ] उपमा सडी ही नदी हो मफेगी। इसी प्रकार यहाँ [पाण्डयोऽयममापिनय में ] भी हार और निर्शर आदि वस्नुप्रतिवस्ुरूप से (?) उपाच ई, इनमें वस्तुन मेद है तथापि विवक्षा अभेद की दै इसलिए मकता नान लेनी चाहिए। नहीं तो ये [ हार निर्झर ] पाण्डय तथा पवंत की उपमा में निमित्त हो नहीं वन सकेंग। इननें उपमा तो बननी ही नहीं [ क्योंकि ये नो परस्परोन्मुख रहते है, सात्मविशान्न नही ] ऐमा अमी कुल ही पहिले कहा है। इसीलिए यहाँ विन्वमनिविम्वभाव [शब्द] का व्यदहार होता है। कोई भी व्यक्ति विम्न से [ स्थानभेद आकारभेद आदि के कारण] प्रतिबिम्ब का भेद रहने पर भी "मेरा ही मुख दर्पप में सक्ान्त हुआ है" इम प्रकार दोनों में अभेद ही मानता है। नहीं तो प्रतिविम्ब देगकर "मे दुदला हूँ या मोटा हूँ' यह भाद उसमें उदित नहीं हो सरुता और स्त्रियाँ भी [दर्षण में देखकर अंग प्रत्यग में ] भूपमँं का विन्यास करने में मवृच नहीं हो सकतीं। म्राचान आलकारिकों ने मी-"मौजी मेखन बाँधे तथा कृयमृगचर्म पहने वे मुनि नाएमेष के डुकने से घिर मुर्य जैने लग रहे थे इस पद् में [वामन तथा मम्मट ने] नथा-'कृषण भनवान् पीताम्वर पहने थे और शाह् धनुप दिए दुए थे। उनका रवन का शरीर श्यामसुन्दर और विसाल था। इस प्रवार वे बिजली, इन्द्रधनुप और चन्द्रमा में युक हो रहे रात्रिकालेन नेव जैसे लग रहे थे"/ इस पद् में [मम्मट ने ] मौजी और विजली तथा शंस और
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उपमालट्कार: ११
चन्द्र का वस्तुतः भेद होने पर भी अभेद की विवक्षा को ही लेकर साधारणधर्मत्व माना है औौर उसमें हानता [प्रथम उपमा में तडित की ] और अभिकता [द्वितीय उपमा में चन्द्र की ] बतलाई है और इसी कारण यहाँ ग्न्थकार ने भी [उदाहरण देने के ] पहिले वस्तुतः वस्तुमतिन्रस्तुभाव से युक्त दो वस्तुओं में प्राचीन आाचार्यी द्वारा किया गया व्यवहार दिखलाने के उद्देश्य से दो सदाहरण दिए, एक प्रतिवस्तूपसा का और दूसरा दष्टान्त का । इस प्रकार यहाँ [ पाण्डर्चो० इत्यादि स्थलों को उपमा में ] अमेद की विवक्षा ही पाण है। विमर्श-टीकाकार ने इस मार्मिक विवेचन के अन्त में यहाँ तो विन्वप्रतिविन्वमाव को प्राची- भिमत बतलाकर "पाण्डचोऽयम" इत्यादि स्थलों की उपमा में वस्तुपतिवस्तुभाव को ही नन्यकाराभिनत वतलाया है, किन्तु पहिले उसी प्रकरण में वे इन स्थलों में कन्धरावृन्त आदि के बीच उपमा स्वोकार कर आए हैं और आागे भी विम्वप्रतिविन्दमाव ही स्वीकार करेंगे। उनके इस वौद्धिक पलायन में कोई ठोस आधार नहीं है। विन्वप्तिविम्बभाव और वस्तुप्रति- वस्तुमाव दोनों में एक तथ्य सामान्य है। वह है भेद और अभेद भी समष्टि। वस्तुप्रतिवस्तुमाव में शनधारा प्रातिभासिक भेद से पारमार्थिक अमेद की ओर बढ़ती है जब कि विम्त्नप्रतिविन्बभाव में पारमार्थिक भेद से प्रातिभासिक अभेद की ओर। इस प्रकार ज्ञानधारा की प्रवृ्त्ति भी दोनों एक ही है नेद से अभेद की औोर। अन्तर केवल भेद तथा अभेद में दोनों भावों की विपरीत स्थिति का है। इस प्रकार "यान््या नुहुर्तलित०" में कन्बरा और वृन्त दोनों 'पाण्डचोऽयम्०' के हार औौर निर्झर के समान ही वस्तुतः भिन्न और विवक्षया अमिन्न होने से विन्वप्रतिदिन्त्रमावयुक्त हा हैं। चाहे तो टीकाकार प्रथम पद्य में आवृत्तत्व और वलितत्व के वस्तुपतिवत्तुभाव को प्रधान मान सकते हैं और कन्वरावृन्न के विन्तप्रतिविन्वभाव को अप्रधान, किन्तु उसे वे अमान्य नहीं ठहरा सकते। परस्परोन्मुखता से बनका अर्थ नहीं वदल जाता जो उन्हें आत्मविश्रान्त न माना ना सके।
विमर्शिनी एपा च लच्ये सुप्रचुरेब। यथा- 'विद्युस्वन्त्रं ललितवनिता: सेन्द्रचापं सनित्रा संगीताय ग्रहतमुरजा: स्निग्धगम्भीरवोपम्। अन्तस्तोयं मणिमयभुवस्तुङ्गममरंलिहाग्रा: प्रासादासवां तुलयितृमलं यन्न तैस्तैविशेपैः॥' अन्न विदद्दनितादीनां मेघप्रासादविशिष्टताधाय कतया धर्मतेनवोपदानस्। अत एन तस्तैर्विशेपैरित्युक्तम्। तेपां सकन्निर्देशाभावान्नानुगासिता। एकार्थत्वाभावान्न शुद्धसा मान्यरूपत्वमिति पारिशेप्याद्विम्वप्रतिविम्वभाव एव। एतेपां चाभेदेनैव प्रतीतेः साधारण स्म्। एवं हारादेरपि जेयस्। अभेदप्रतीतिश्ात्र साह््यनिमित्ता। न चैतावतैवपासुप- मानोपमेयत्वं वाच्यम्। तथात्वाविवत्णात्। साहश्यत्व च सितत्वादिसुणयोगित्वं नाम निमित्तम्। एवममेदप्रतीतिमुसेनात्र ह्वारादे: समानधर्मतवस्। वर्वाचन्निमित्तान्तरेणाप्य भेदपती तिर्भवति। यथा- 'द्वेप्योऽपि संमत: शिष्टस्तस्थातंस्य सथौपधन्। त्याज्यो दुषटः प्रियोऽप्यासीदू दष्टोऽडगुष्ठ इचाहिना।' अत्रोत्तरार्धे दद्दुष्टयोर्दोपकारित्वा दिना एक कार्यकारित्वमभेदकारणमित्यलं बहुना।
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१२ अलङ्गारसर्वस्वम्
[ विन्वप्रतिबिम्वमावमूलक] यह [पमा] काव्यों में पर्याक्ष मात्रा में प्राप्त है। यथा-"है मेध। [अलका के] प्रासाद उन उन विशेषनाओं से तुम्हारी समानता मलीमाति कर सकते है। तुम्हारे पास विद्यद है उनमें लदिनवनितायं है, तुम रन्द्रचाप से युकत हो उनमें चित्र दने हैं, तुमनें ग्निग्ध और गम्भीर घोप है उनमें संगति के लिए मृदग बजने रहने है, तुम्हारे भीनर जल है वे मी मणिमय भूमि से युक्त है, तुम ददुन ऊँचे हो और उनके शिसर भी गगनचुवी है।' यहाँ विदुत और वनिना आदि का उपादान मेव और प्रासाद में विशिट्टता बाने वाले धर्म के रूप में ही किया गया है, इसीलिए [स्वय कबिने] 'उन-उन विशेषों द्वारा, इस प्रकार उन्हें विशेष सर्थात धर्म कहा है। किन्तु ये अनुगामी धर्म नहीं है क्योंकि उनका निरवश अलग-अलग किया गया है। न वे शुद्धसामान्य स्वरूप है क्योंकि उनमें एकार्यकता नहीं है। इमलिए अब उनमें विन्वम्रनिविम्यमाव ही शेप बधना है। इन्हें जा साधारण धर्म कहा है वह केवल इसलिए कि इनकी प्रनीति अभिन्नरू से होती है। इार आदि के विषय में भी यही समझना चाहिए। और अमेदे की जो प्रनीति है वह यहाँ साइश्यमूल्क है। किन्तु इनने भर से [सादृश्यमात्र होने से] इनमें उपमानोपमेयभाव नहीं माना जा सकता क्योंकि इनको उस रूप में यहों विवक्षा नहीं है। सादृस्य का निमिच [हार निर्नर आदि में ]फेदी रूपी गुण से युक होना है। इम प्रकार अमेद प्रतीति के द्वारा यहाँ हार आदि साधारण धर्म बन जाते है। कहा दूसरे निमित्तों से मौ अनेद प्रतीति होती है। यथा-"उस [ दिलीय] को क्वेध्य व्यक्ति भी यदि शिष्ट होता था तो मान्य होता था जैमे बीमार को औषधि। इसके विरुद्ध प्रिय व्य्ति भी यदि दुष्ट होता था तो त्याज्य होता था जैसे सर्पदष्ट अँगूठा।' [ रघुकश-१, रयुबश में चनुर्थेचरण 'अगुलीवोरगझ्षना' है। टीकाकार ने यह पाठ कदाचित् उपमानोपमेय में पूर्दोर्द के समान लिंगेक्य के लिए पमद किया या स्वयं बनाया हो] यहां [सपे] दष्ट [भग्रष ] जौर दुषट इनमें अमेद एक कार्यकारित्व के आधार पर है दोपकारित्वादि गुण दोनों में ही रहते हैं। अस्नु, अधिक विस्नार से लाभ नहीं। विमर्शिनी हयं च द्वयोरपि प्रकृतयोरप्रकृतपौक्चीपम्ये समुचिता भवति। क्रमेण सथा- 'सदय बुभुजे महाभुज"' इत्यादि। अत्र चधूमेदिन्योरचिरोपनततवात्प्रकृतव्वेन सद· योपभोगे ससुच्चिनत्वम् यथा- 'स्वरेण तस्याममृतमुतेव प्रजस्पितायामभिन्वातवाचि। अप्यन्यपुष्टा प्रतिसूलशब्दा श्रोतुवितन्द्रीरिय ताटयमाना।।' अत भगवत्य पेतयान्यपुश्टवितन्त्रयोरप्रकृनयो प्रतिन्ल शब्दरवे समुच्चितत्वम्। इयमेकदेशविवर्तिन्यपि। यथा- 'कमरद्हैरघरै रिव दुशनैरिन केसर विराजन्ते। अलिवलयेरलकैरिच कमलैवंदनैरिच नलिन्य:।।' अन्र नलिनीनां नायिका उपमानववेन नोपाता इस्येकदेशनिवर्तित्वम्। इय च सादश्य- दाढर्यार्थ कविप्रतिभाकविपिते साधम्ये कल्पिता भवति। तच्च ययचिदुपमेयगततनेन ववचि- दुपमानेनापि क्पितमिति द्विघात्वमस्या । यदुकम्- 'उपमेयस्थ वै शिष्टयमुपमानस्य वा ववचित्' इति। वैधर्म्येणापि साधर्म्यमिति तृतीयः प्रकार: पुनरस्या न वाच्य। अस्योपनायामेव संभवाह्मादर्यमतिपादनप्रतीतेश्।
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उपमालद्वार: ९३
यह [उपमा ] ऐसे दो पदार्थो के सावम्य में भी होती है जिनमें से दोनों ही प्रकृत होते हैं या दोनों ही अप्रकृत। क्रम से उदाहरण यथा [दोनों प्रकृत की उपमा ] "सदयं बुभुजे महाभुज:०" इत्वादि [पूर्वोदाहृत पद्य में] यहाँ वधू और मेदिनी दोनों ही अंचिरोपनत [तुरन्त पास झाई प्राप्त] हैं। अतः दोनों ही प्रकृत है फलतः सदय उपभोग में दोने का ही समुच्चय है। [अप्रकृतों की ही उपमा] यथा-"उस [पार्वती] की वाणी बह़ी ही अभिजात थी। जब वह बोलती थी तो उसका स्वर अनृत सा वरसाता था। तद कोकिला को कूक भी सुनने वाले को बैसे ही प्रतिकूल लगती थी जैसे [ वीणा की ] झनकारी गई कोई उलटी तन्त्री [ तार ]।[ कुमार-१]। यहाँ भगवती पार्वती [प्रकृत हैं, उन] की सपेक्षा कोयल और वितन्त्री दोनों ही अप्रकृत हैं। इन दोनों का एक ही प्रतिक्गल शब्दत्वरूपी धर्म में समुच्चय कर दिया गया है। यह [उपमा रूपक के समान ] एकदेशविवर्ततिनी भी होती है [ अर्थाव इसमें आरम्भ से अन्त तक उपमानोंपमेयभाव का निर्वाह शब्दतः करत करते किसी एक अंश में उसे आर्थ चनाकर छोढ़ दिया जाता है] उदाहरणार्थ-"अधर के समान कमल की पंसुडिओं से; दराँतों के समान केसरों से अलकों के समान अलकवलय से और केसरों के समान कमलपुष्पों से कमलिनी सुशोभित हो रही है।" इसमें कमसिनी के उपमान के रूप में [ विवक्षित होने पर भी] नायिका का उपादान शब्दतः नहीं किया गया[ उसे वाक्यार्थ सामर्थ्य से आक्षेप्य रहने दिया इसलिए यह एकदेश विवत्तिना है [ विवर्स का अर्थे पण्डितराज जगन्नाथ ने भी अभाव किया है। उसका स्रोत कदाचित विमर्शिनी का यही स्थल है। काव्यप्रकानकार की 'एकदेश में विशेषरूप से वर्णन रहना' इस पदावली में विशेषशब्द कवाचित् 'अन्तर या भिन्नता' का वाचक है। टीकाकारों ने उसे स्फुटता का वाचक माना है जो विरुद्ध है। अन्तर अर्थ करने पर अभाव अर्थ चला आता है, अभाव का अर्थ है सव्दानुपादान। यही उपमा तब कस्मित उपमा कहलाती है जब साटटश्य की दढ़ता के लिए साधर्न्य कनिप्रतिभाकल्पित होता है। वह साधर्म्य कहीं तो उपमेय में कत्पित किया जाता है और कहीं उपमान में, अतः यह [कल्पितोपमा ] दो प्रकार की हो जाती है। जैसा कि कहा है "कहीं उपमेव का वैशिष्ट्य वतलाया जाता है और कहीं उपमान का"॥ १॥ "बेधर्म्थ से साधर्न्य" नामक एक तृतीय भेद भी होता हैं ऐसा नहीं कहना चाहिए कर्योंकि यह भेद केवल सामान्य उपमा में ही हो सकता है और [ कल्पतोपमा में यह मेद" मानने पर उपर्युक्त] दढ़ता का अतिपादन नहीं हो सकता।
चिमर्शिनी
-क्रमेण यथा- तं णमह प्ाहिणलिनं हरिणो गअणङ्गगाहिरामर्स। छप्पअछन्पिअगत्तो मलो व्व चन्दम्मि जत्थ विही। अननोपमेयस्य पटपदाच्छादितरवं कल्पितम्। "आवर्जिंता किचिदिव स्तनान्यां वासो वसानाडतठणार्करागम्। संजातपुर्पस्तवकाभिनम्रा संचारिणी पल्लविनी लतेव।' अश्रोपमानगतरवेन संचारिणीत्वं कत्पितम्। न चास्था: पृथग्लक्षणं वाध्यम, हयो- रौपन्यप्रतीते:। सामान्यलणस्यान्नाप्यनुगमात्। अथान्न कल्पनास्तीति चेत, न। एवं हि प्रतिमेदं लक्षणकरणपसङ्ग:। समुच्चितरवादरेर्विशेषान्तरस्यापि भावात्। अयोपमानगुण
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९४ अलक्कारसर्वम्वम्
विशिष्टोपमेयवगमफलत्वेनो पमाया: प्तिभटभूनय सत्वन्तराभावप्रयोजनलवेन चास्या: पृथ गलंकारस्मिति चेत्, न ।अन्नोपमेयस्योपमानगुण विशिष्टतयैव प्रतीते: फलभेदाभावाव्। तथा हि 'आवर्जिता' इत्यादी भगवत्या उताया सादृश्यस्य संचारिणीतवेनाभावो मा प्रसाङचीदिति तयो. साधम्यंमेव ददयितुं कविना लसाया: संचारिणीत्वं कल्पितम्। नम्बत भगवत्या अन्यदुपमानं नास्नीति प्रतीयते। अनन्दयाद्िव दुपमानान्तर निपेधस्य वाक्यार्थत्वाद्। मैवम्। एवसुपमेयस्यापि वैशिष्ट्यकरपने उपमेयान्तरनिपेधफलरवं वाच्यम्। समानन्यायरनाद। तद्यथा दढारोपे रूपके विषयविपयिणोरमेदमेव दृदयितुं कस्य चिद्धर्मस्य हानिराधिक्यं या कल्प्यते, तथे हापि सामान्यदार्व्यायैव कक्पितत्वं जेयम्। अन्नाप्यभेदालकाराएयालकारान्तरख न वाच्यम्। रूपकेणैवास्या विच्छित्तेः सगृही- तरवात्। विषय विषयिणोरभेदो हि रूपकसतत्वम्। स एव चात्र दाढर्घेन प्रतीयत इति को नामास्य रूपकात्पृथगभावः। अमेदमान्नप्रतीती रूपकम्, नियतधर्मददानावन्यतः सर्वतोऽप्यभेदप्रतीतावभेद इति प्रतीतिभेदोऽप्यस्नीति चेत, न। एवं हस्ति तावदभेद- प्रतीतिरत्रानुगता। यस्तु विशेप, स पृथग्भेदतवे व्यवस्थापकोऽस्तु न पृथगलकारत्वे। नहि शावलेयतामात्रेण गोत्वमश्न्वव्यपदैश्य भवति। एव च- 'मृहीतविग्रह कामो वसन्त सार्वकालिक.। जहार हृदय कामी नित्यपूर्ग सुधाकर॥'
मालाचादिनानन्तमेदेति नद्ग्रन्थविस्तरभयान प्रपज्वितम्। क्रम से उदाहरण- 'तन्नमत नामिनलिन हरेर्गगनागनाभिरामस्य। पटुपदाच्छादितगात्रो मल इब चन्द्रे यत्र विधि ।।' 4गगनागम के समान अभिराम भगवान् विन्णु के उस नामिकमळ को प्रणाम कीजिए जिसमें अमूरों से ढँके महमाजी चन्द्र में कनक से प्रतीत होत हैं।" यहाँ उपमेय [ विधि नझ्ा] का भ्रमरों से ढँकना कल्पिन है। 'स्तनों से थोड़ी सी झुकी हुई तथा अनरुण [ वाल] सूर्य के समान वस्त्र धारण की हुई [पराबंती जी ] निकले पुण्प के स्नबकों मे झकी मल्लवों से ढँंकी और चलती फिरती लता सो [दिसलाई दी ।यहो उपमान [ लता ] ने सचारिणीत्व कर्पित है। ऐमा नहीं कि इसका लक्ष [सामान्य उपमा से ] अन्ग किया जाए क्योंकि अन्तनोगल्वा इसनें भी प्रतीति सादृध्य की ही [चमत्कारकारिणी ] होती है। अन* सामान्यलक्षग इसमें भी दागू होता है। यदि कदा जाय कि यहाँ कलपना [त् अधिक] है तो वह भी ठीक नह्दी, क्योंकि ऐसा करने पर प्रत्येक भेद का पृथरु पृथक लक्षम करना पद जायगा। क्योंकि ममुच्चितत आदि भी नदीन भेद है। यदि वहा जाय कि उपमा का फद है उपमान के मुगो का उपमेय में ज्ञान तथा इस [कर्पतोपमा ] का फल है अन्य किमी समान वस्तु के अमाद का ज्ञान। इस प्रकार फलमेद के कारण शम (कस्पितोपमा) का लक्षण अत्ग किया जाना चाहिए तो वह भी ठीके नहीं, क्योंकि यहाँ [कल्पितोपमा में ] भी उपमानगुणों का उपमेय में ज्ञान नियमन होना है। अन फछमेद मी नहीं है। स्पष्टीकरण के लिए "आावर्जिना" इत्यादि पद्य ही लीजिए। इसमें लना स्थावर है और मयवती पार्वती जगम [मंचारशील ] अन पार्वती में लता का मादृश्य [संचारिणीत्व को लेकर ] घटता नहीं है। ऐेसा न हो इसके लिए उनके साधर्म्य को दृढ करने हेतु कवि ने लश में भी सचारिणीतव की कत्पना की। शका =यहाँ [कल्पितोपमा में लना
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उपमालङ्कार:
को छोढ़] अन्य कोई वस्तु भगवती पार्वती का रपमान नहीं है यह प्रतीति भी होता है, क्योंकि यहाँ जो वाक्यार्थ है उसका स्वल्प अनन्वय आदि के समान ही अन्य उपमान का निमेध है। किन्तु ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि ऐते तो जहाँ उपमेव में वैशिष्टच की कल्पना की जाती है नहां भी अन्य उपमेय के निषेध की प्रतीति मानी जा सकती है, क्योंकि बात बराबर है। इसलिए जैसे दृढ़ारोप रूपक में विपय और विपयी के अमेद को दृढ करने के लिए फिसी धर्म की हानि या अधिकता की कल्पना की जाती है उसी प्रकार यहां [ कल्पितोपमा में] भी सामान्य [साध्न्य ] की दृढ़ता के लिए कल्यितत्व को जानना चाहिए। यहां [ कल्पित रूपक में] भी अभेदनामक भिन्न कोई अलंकार नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस विच्छित्ति का संग्रद भी रूपक में ही हो जाता है। रूपक का रूपकत्व है विषय और विभयी का अभेद। यहाँ वह केवल दृढ़ता के साथ प्रतांत होता है इसलिए इसे रूपक से पृथका कैसे माना जा सकता है। यदि यह कहा जाय कि रूपक वहाँ माना जाना चाहिए जहां केवल अमेद की प्रतीति होती हो और अभेद वहां जहां किसी निश्चित धर्म की हानि होने पर अन्य सबसे अभेद, इस प्रकार इन दोनों की प्रतीतिओों में भी मेद है तो वह भी ठोक नहीं, क्योंकि ऐेसा मानने पर भी अमेदप्रतीति तो अभेदालंकार में रहेगी ही और वही रूपक में भी रहेगी। अनः वह दोनों में ही रहता है। सामान्य रूपक से [कस्पित रूपक] का जो अन्तर है इसे रूपक का स्वतन्त्र भेद तो माना जा सकता है किन्तु पृथगलंकार नहीं, केवल चित्कवरेपन से गोत्व को अश्वत्व नाम से थोड़े ही पुकारा जाता है। यदि ऐसा मानों तो "वह कामी पुरुष शरीरधारी काम है, सर्वदा रहने वाला वसन्त है और सदा पूर्ण रहने वाला चन्द्रमा। उसने हृदय हर लिया है।" इत्यादि में नियत धर्मे मृहीतविग्रहृत्त्व आदि की अधिकता है। यहां भी भिन्न अलंकार की कल्पना करनी पढ़ जायगी। यह [उपमा] मालल, कल्पितत्व आदि के क्रम से इतने भेदवाली हो जा सकती है कि जिनका जन्त नहीं, सतः यन्थविस्तार के भय से उनका निरूपण विस्तारपूर्वक नहीं किया। विमर्श :- कल्पितोपमा भरतमुनिने भी दिखलाई है। "मतंगजा विराजन्ते जंगमा इन पर्वताः"- में जंगमपर्वत कविकल्पत है अतः उपमान के कविकल्पित होने से उपमा कल्पित है। विर्मानीकार की कल्पितोपमा का कदाचित यही मूल है। नामन ने भी मानी है। किन्तु उनकी कविरतोपमा विमर्शिनीकार की कक््पितोपमा से भिन्न है। विमर्शिनीकार ने भी इसमें कविकल्पना का अस्तित्व स्वीकार किया है किन्तु इनकी कचिकव्पना सादृश्य में आा रहे विन्न को दूर करने के लिए अनिवार्य है। वामन ने करपना को प्रसिद उपमानातिरिक उपमानकत्पना तक सीमित रखा है यथा "नारंगी कै,सी है ? जैसे मत्त हूण (पठान) की तुरंत सुड़ी दाढ़ी"। "शिरीप पुष्प कैसा है? जैसा तुरंत फूटा कुशाग्रभाग" स्पष्ट ही यहाँ सादृश्य में कोई विव्न नहीं आ रहा जिसका निवारण करने के लिए कवि ने प्रसिद्ध उपमानों को छोड़ नवीन उपमानों की चोजना की है। सृच्छकदिक में भी "मेघो जलाद्रमहिपोदरभृद्गनील:" 'मेव पानी से भीगे मैसे के पेट और भृंग सा नीला है" इत्यादि अनेक न्वान उपमान मिलते हैं। काव्यमीमांसा में "अभिनववधूरोपस्वादुः करापतनूनपात" इत्यादि पद्य इसका अच्छा उदाहरण है। इसमें भी कंडे की आग को ठंड के दिनो में नवोदा के कोप की उपमा दी गई है। नवीन उपमानों की कल्पना भवभूर्ति, राजशेखर और श्रीहर्प आदि परबत्तीं कवियों ने पर्यातत मात्रा में की है। उपमा के लक्षण पूर्ववर्त्ती आचार्यों में इस प्रकार मिलते हैं- भामह-'विरुद्वेनोपमानेन देशकालक्रियादिभिः। उपमेयस्य यत सान्यं गुणलेशेन सोपभा ॥२१२० ॥ -
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देश, काल, किया आदि [ अनेक तरवों] में परस्पर असमान रहने पर भी उपमान और उपमेय का जो किसी शुण में समान होना बतलाया जाता है वह उपमान है।' [देशकालक्रियादिभिः विरुद्वेन अममानेन उपमानेन देशकालक्रियादिमि विरुद्धस्य असमानस्य यव गुणलेशेन केनचिद् गुगैन साम्य समानत्व तदेव उपमा' इति भावार्थ ।'] घामन-'उपमानेनोपमेयस्य गुणलेश्न साम्यमुपमा' ॥४।२१ 'उपमान के साथ गुणलेश में जो उपमेय का साम्य वही उपभा' निश्चिन ही यह भामह के लक्षा का सशोधन है।
मियो विभिन्नकालादि शब्दयोरुपमा तु तव ॥११५ 'विभिन्नकालदिवाचक शब्दों द्वारा प्रतिपादिन उपमान तथा उपमेय का परसु्पर में जा चिचाकर्षक साधम्ये वही उपमा है।' रुट्रट= 'उभयो समानमेक गुणादि सिद्ध भवेद यथेकत। अर्थेडन्यन तथा तत्माध्यन इति सोपमा ॥८i॥ 'गुण आदि ऐसा कोई धर्म जो दो वस्तुओं में समानरूप से प्रसिद्ध हो नो [ दोनों वस्तुओं में मे] एक की ही भाँति दूमरे में भी जो उसकी सिद्धि की जानी है उसीको उपमा कहते है।' मम्मट= 'साधर्म्यनुपमा मेदे।' 'भेद रहते हुए जो समानधर्मसबन्ध उसीको उपमा कहा जाता है।' इस प्रकार स्पष्ट है कि अलकारमरवस्वकार ने उद्धट और मम्मट का अनुसरण किया है। साधन्यें और साद्ृस्य में प्राचीन आचार्यों ने [मम्मट के समान महिममट्ट ने भी ] उतना अन्नर नही देसा जिनना परवर्त्ती पण्टितराज आदि ने साधर्म्य और सादृश्य में, जो समाम के कारण "सा"-शब्द के रूप में परिणत समान शब्द है वह इन दोनों का एकमात्र वुद्धियर्मत्व सिद्ध करता है। जो कुछ भी ममानना या साम्य है वह द्रष्ट्सापेक्ष है. चस्तुसापेक्ष नहीं। 'समानो धर्मो- ययोम्नौ सधर्मो तयोरभाव माधर्म्यम्,' 'समाना टक [द्शन] ययोस्ती सदृशी तयोर्भांवः सादृश्यन्" इम प्रकार ्युत्पत्ति करने से दोनों हा प्रतीनितत्त्व पर निर्भर लगने हैं। वस्तुन. जो साम्य विषयगन दृष्टि से साधर्ग्य है वहा विपयिगन दृष्टि से सादृस्य है। प्रतीहारेन्दुराज की इस पच्ि से यह नय्य अधिक स्पष्ट है-"उपमानोपयमेययो" यत साधर्न्य समानी धर्म' तेन सबन्धो य- सा उपमानोपनेययो सादृश्यद्वारण सामीप्यपरिच्छेद्हेतुल्वादुपमा"-समानवर्म सबन्धरूप साधर्म्य वस्तु को सादृश्य के द्वारा महदय के पास पहुँचता है अर्थात साम्यश्ान में वस्तु को. उपादानरूप से प्रस्तुत करता है।" यह विचारमात्र का क्रम है। चमत्कारानुमन जो अलकार का बीज है प्रतीतिरुप ही है फलन महत्व साम्यप्रनीति को ही मिलना चाहिए। किपतोपमा का जो रून विमर्शिनीकार ने प्रम्तुन किया है और जिसका अनुमरण पडितराज जगन्नाथ ने किया है वह इम मान्यता में और भी सबल प्रमाण है। वहा तो उपमान या तद्गन धर्मे एकमात्र प्रातीतिक ही है। लना में सचारिणीत्व धर्म केवल वौद्धिक या प्रातीतिक है। रमीप्रकार "स्तनामोगे पतन् माति कपोलात कुटिलेड्डक: । शुशाकविम्दनो मेरी लम्बमान इचोरग ।।" रसगगा० ॥ सुन्दूरी का बुटिल अलक कपोल पर से होना हुआ विपुद स्तनों पर पडता हुआ ऐसा लग रहा है जैमे चन्नहिन्द मे मेरु पर लटका तुआ कोई सर्प ।'3 यहाँ चन्द्रबिम्द में सर्प का अस्तित्व उमके
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उपमालहार:
मेरु पर लडकने के ही समान काल्पनिक या प्रातीतिक है। इस तथ्य का विशदीकरण का श्ेय एकमात् विनर्शिनीकार जयरथ को है। व्यत्तिविषेककार महिमभट्ट ने लक्षणा के सण्डन में सादृव्य और साधर्म्यशब्दों का पर्यायशाच्दों के रूप में ही प्रयोग किया है- 'न हि अनुन्मत्तः करिचत कचित किचित वर्यंचित साधर्यम् अनुत्पश्यन्नेव अकत्माव तत्वमारी- पर्यतति' दसि परिज्ञीलितवकतृस्वरपः प्रतिपत्ता 'तत्त्वारोपनिमित्त साइश्यमान्रमेव पतिपत्तुमहृति। [द्रष्व्य= इसपर हमारा हिन्दीविमर्श पृ० ११४-१६] उपमान और उपमेव के लक्षण भी आचार्यों ने दिए है। वामन ने- "उपमीयते सादश्यमानीयने येनोत्कृष्टगुणेन अन्यव तदुपभानम्' "यदुपमीयते न्यृनगुणं तदुपमेयन्" अर्थात्-"उत्कष्ट गुणवाली जिल वस्तु से अन्य वस्तु सादृश्य को पहुँचाया जाता है वह उप- मान कहलाती है और न्यूनगुणवाली जो वस्तु उपमित होती है वह उपमेव कहलाती है"-इस प्रकार उपमान और उपमेय में तुणगत अधिकता और न्यूनता को भी महत्व दिया है। उद्भटकृत काव्यालंकारसारसंग्रह के टीकाकार प्रतीहारेन्दुराज ने इनका विवेचन इस प्रकार किया है- "सादृश्यसन्वन्थित्वेनोपादाचने यव प्राकरणिकं नव उपमेयन्।" जो प्राकरणिक पदार्थ सादृश्यसंबन्धीरूप से वाक्य में अपनाया जाता है वह उपभेय होता है। इसके स्पष्टीकरण में एक एक विशेपण पर वल् देने हुए उन्होंने अत्यन्त सहृदयता के साथ लिखा है- 'न खुद्ध माकरणिकस्यापि सादृश्यसम्वन्यित्वेन अनुपादीयमानस्य उपमेयता। यथा 'राज् पुरुषनानय' इत्यत पुरुपस्य। पुरुषो हि अन्र जानीयमानसेन चोदमानत्वात सत्यपि प्राकरणिकतवे
कहवं नास्ति तस्योपमानत्वन् न तूपमेयत्वमिति प्राकरगिकमित्युक्तन्। नदेवं सादृद्यसंत्रन्वित्वेनोपा दीयमानं यव पकरणिक तदुपमेयम्। तद्धि उपमानेन सादश्यप्रतिपादनद्वारेण समीपे क्षिप्यते तस्मादुपमेवन्। अप्राकरणिकं तु तथाविधमेत्रोपमानन्।' नो प्राकरणिक भी हो किन्तु सादृश्य सम्बन्धी के रूप से उपात्त न हो वह उपमेय नहीं होता। जैले 'राजा के आदमी को लाओ' में आदमी। आदमी जो है वह यहाँ आनीयमानरूप से कर्थित है न कि सादृश्यसम्बन्धिरूप से। अतः प्राकरणिक होने पर भी वह उपमेय नहीं है। इसी प्रकार सादृश्यसंबन्धिरूप से उपात्त होने पर जो प्राकरणिक नहीं होता वह उपमान होता है, उपमेय नहीं। इसलिए जो प्राकरणिक भी हो और सादृश्यसम्वन्धी भी वही उपभेय होता है। वह उपमान के द्वारा साटच्यप्रतिपादन द्वारा उप= समीय में फेंका जाता है [ मैय इसीलिए उपमेय नाम से दुकारा जाता है। जो अप्रकारणिक हो और सादृश्यसम्बन्धी भी वह उपमान कहलाता है। इस प्रकार प्रतीहारेन्दुराज उपमान और उपमेव में गुणगत न्यूनाधिकभार पर निभर न रह उनके प्राकरणिकत्व और अप्राकरधिकत्व पर वल देते है। सर्थालंकारों का विवेचन भिन्न भिन्न आचार्यी ने भिन्न भिन्न अलंकार से आरम्भ किया है। भरत नुनि ने उपमा से ही आरम्भ किया है। विष्णुधमोंत्तरपुराण ने रूपक से। भामह और उड्भट ने रूपक से आरम्भ किया है। रुद्रट ने अर्थालंकारों को चार व्गों में बाँदा है। इनमें प्रथम ह वास्तव, द्वितीय है औषम्य, तृतीय है अतिशय और चतुर्थ है इलेप। उपमा की गृणना औपम्य के अन्तर्गत की गई है। यद्यपि अपने इस वर्ग में प्रथम स्थान उपमा को ही दिया गया है, तथापि.
७ स० स०
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१८ अलङ्कारसर्वस्वम्
अर्थारकारों का विवेचन वास्तव वर्ग से कर और वाम्तव में प्रथम स्थान सहोति को हे उमे वाछित गौरव से दूर रखा है। दण्डी धामन और मम्मट ने उपमा मे ही अर्थालंकार का विवेचन आरम्म किया है, किन्तु दण्डी को ग्रन्थकार ने कम आदर दिया है। इस प्रकार अल्कारमर्वम्बकार ने मम्मट और वामन के अनुकरण पर उपमालंकार से अर्थानकारों का विवेचन किया है। मम्मट और अलकारसवंस्वकार ने उपमा के विवेचन मे वामन का अनुकरण करने हुए भी उन्हें आशिक महत्तव हो दिया है। वे उद्धट के अभकारमारसग्रह पर अधिक निर्मर रहे है। पण्टितराज जगन्नाथ ने अरकारमर्वस्व के उपमा लक्षा को अठूना छोट दिया- यह आश्चर्य की बात है। आक्षर्य की एक बात यह भी है कि वृत्ति और विमर्शिनी दोनों के रचयिताओं ने सृत में उलिसिन 'भेदाभेदतुल्यत्व' का एक भी उदाहरण नही दिया। विन्नप्निविम्वमाव औौर वस्नुपति- वस्तुमाव पर उन्होंने अधिक बल दिया। वस्तुन चमत्कार का कारणही अनकारो का विभाजक होता है। उपमा म वह मानर्न्य का माहृव्य है। व्यतिरेक आदि में व्यतिनेक आदि चमत्कार के कारण । अन भेदामेठनुत्चन् विशेषण छोडा जा सकता है। 'उपमानोपमेय' शब्द मी अधिक जानध्यक नहीं। साधर्म्य एकनान उपमानी- पमेय में ही होता है। इमीलि। मम्मट ने उन्हें लक्षग में स्थान नहीं दिया। अप्रनीनि या अवर्गनी- यना का निराकरण माधम्यगन चमत्कारकारित्व मे ही हो जाना है। ये दोप रहने हुए चमत्कार निग्पन्न नहीं होगा। "चमत्कारि माधर्म्यमुपमा" चमत्कारकारक साध्म्य उपमा है-इनना लक्षग ही उपमा के लिए पर्यात्त है। उपमावनि में चमत्कार व्वनि से होना है, अत पण्टिनराज द्वारा प्रदत्त विशेषण 'वाक्यारयोपस्कारत्व' भी व्यर्थ है। जहाँ केवल अव्नार्थ रहते है वहाँ उन्ही का रप- स्कार होता है। पण्टितराज जगन्नाथ के उनमा ल्क्षत में 'उपमालकृति' यह जो अल्वृति शब्द है यह मी अनपेक्षित है, क्योंकि प्रकरअलकार निरूपण का है। अत अलकारभून उपनका ही लक्षग होने से लोकिक अन्यकारभून उपमा का लक्षण प्राम ही नहीं होता। अम्तु, यह स्वनन्त विवेचन का विषय है। मजाविनीकार ने उपमा का वक्षा कारिकारूप में द्षम प्रकार प्रस्तुन किया है- मेदा भेदतुन्यवृत्ती साधर्म्यमुपमोच्यने।
[सर्वस्व]
वाच्यामिप्रायेण पूर्वरूपानुगम । पकम्य तु विरुद्धधर्मसंसरगी द्वितीय- सत्नह्चारिनितृत्त्यर्थ,। अत पवानन्वय इति योगोडप्यत् संभवति। यथा- 'युद्धेडर्सुनोऽर्जुन इव प्रधितप्रतापो भीमोऽपि भीम इव वैरिु भीमकर्मा। न्यग्रोधवर्तिनम याविपर्नि कुरुणा- मुत्यासनाथंमिव जग्मतुरादरेण ।।' 1 [सू० १३] 'एक ही [पदार्थ] का उपमान [और ] उपमेय [दोनो] होना अनन्वय [कहलाता है ] ।'
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अनन्वयालक्वार: : ९९
विमर्शिनी एकस्यैवेत्यादि। ननु सादृश्याश्रयाणामलकाराणं लक्षयितुं अस्तुतत्वात्साहश्यस्योभय- निषत्नेनेव संभवादेकस्य च तदभावाकथमिहातदाधयस्याप्यस्य वचनमित्याशङ्मयाह-
शंका होती है कि प्रकरण है सादड्यमूलक अलंकारों के लक्षण का और अनन्वय में सादृश्य- सूरूता है नहीं, क्योंकि सादृस्य दो भिन्न पदार्थों में रहता और अनन्वय पदार्थ केवल एक ही होता है, ऐसी स्थिति नें इसका लक्षण यहाँ क्यों किया जा रहा है। इसके उत्तर में कहते हैं- वाज्याभिप्रायेण आदि। [वृ०]नाच्य को लेकर [यहाँ) पूर्वरूप , सादृश्याश्रयत्व=उपमात्व) की प्रतीति होती है। वस्तुतः तो[ उपमानत्व और उपमेयस्व इन परर्पर ] विरुद्ध धर्मों का एक ही [पदार्थ] के साथ सन्बन्ध का प्रयोजन है [ व्यंग्य के रूप में ] द्वितीय उपमान की निवृत्ति। इसी [ विरद्ध, धर्मो के एक के साथ संबन्ध के कारण यह अनन्वय इस शब्द का] "मनन्वव"= [अन्वव = उपनानोयमेय- संबन्ध का अभाव] यह चोग [शत्तिलन्य अर्थ] भी यहाँ हो सकता है। उदाहरण- युद्ध नें प्रताप फैलाने में जो अर्जुन अर्जुन के ही समान है और गनुओं के बीच भवंकरता चरतने में भीम भीमके ही समान है, वे दोनों वट्वृक्ष के नीच बैठे कुरुओं के स्वामी [धृतराष्ट्र] के पास उसे मानों और भी अधिक लवित करने के लिए आदर पूर्वक पहुँचे।" चिमर्शिनी पूर्वरूपेति। सादृश्याश्रयत्वस्येत्यर्थः। असत्येव हवन्न शाब्दी साहश्यप्रतीतिः। मुखं चन्द्र इवेत्यादिव देवानोपसानोपमेयत्वस्य वाच्यतयोपनिबन्धनात्। अत एवाह-वाच्याभिप्रा- येणेति। न पुनर्वस्त्वभिभ्नायेणेत्यर्थः। वस्तुतो होकत्यव साध्यसिद्ध धर्मरूपर वासंभवादुप- मानोपमेयत्वेऽपि विरोध: स्याद्। इत्यं शब्दमेव साहश्यानुगममाधित्वेहास्य लन्तणम्। ननु चधेवमेकस्योपमानोपमेवत्वं विरुध्यते तर्रिक वस्तुविरुद्देन निपफलेन चैतेनेत्याश-
पूर्वरूप = सादृश्वाश्रयत्व =सादृश्यमूलरूप। यहाँ भी सादृश्य का ज्ञान शब्द से तो होना ही है। क्योंकि 'मुख चन्द्र के जैसा है' इत्यादि वाक्य के समान यहाँ मी उपमानोपमेयभाव वाच्च- रूप से उपनिवद्ध रहता है। इसीलिए कहा "वाच्य को लेकर"। सर्थ यह कि वास्तविकरूप से नहीं। वस्तिविक रूप से तो यह संभव नहीं कि एक ही वस्तु साध्य भी हो और सिद्ध भी। सतः एक ही वस्तु में उपमानत्व (साध्य) और उपमेवल (सिद्ध) का होना विरुद्ध है। इसलिए केवक शाब्दिक सादस्य की प्रतीत देसकर यहाँ (साधश्य के प्रकरण में) इस [अनन्वय] का लक्षण किया जा रहा है। शंका होतां है कि वदि एक ही पदार्थ का उपमान और उपमेय होना विरुद्ध है तो वात्तविक रूप से विरुद्ध होने के कारण [काव्य में] इस [ प्रकार के ] निरर्थक [ लिखने ] से क्या लाभ। इसपर उत्तर देते हुए [वृत्तिकार ] लिख रहे हं-'पकस्य इत्यादि'। विमर्शिनी एवं चास्थ द्वितीयसत्रह्मचारिनिवृत्तिरेवालंकारत्वप्रतिष्टापक प्रमाणसू। अन्यया ुनर्नास्यालकारत्वम्। यथा-
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१०० 4 'तस्याज्ञयैव परिपालपतः प्रजञा मे कर्णोंपकण्ठपलितंकरिणी जरेयम्। यद्गर्भरूपमिव मामनुशास्ति सोऽयमद्यापि तन्मयि गुरोर्गुरु्पक्षपातः।।' अन्न यर्थैव गर्भर्प मा गुरुरन्वशात्तर्थवाद्याप्यनुक्तास्तीति सत्यप्येकस्योपमानोपमे- - मिदसाव्यधर्मसमवालोपमानोपमेयन्वरूप विरु दुधर्मससर्ग। अत ्वेति। निरुद्धुधमें- संयोगात् । एकस्यैव सिद्धसाध्यरूपेणोपमानोपमेयरवेनाविद्यमानोSन्वय सबन्घो यत्र स तयोक्त 1 र्जुनादन्यो युद्धे अथितम्रतापो नास्तीति द्विनीय सन्ह्मचारिनिवृत्तिरत्र जीचितभूता पतीयत एव। अल एत्र कार्नवीर्यहिंससत्त्व योरुपमानरूपयोरप्रनीते. शुद्ध- मेव तदुदाहरणम्। 'इत्िअमेठम्मि जए सुन्दरमहिलासहस्सभरिअम्मि। अणुहरइ णवरँ तिस्मा, बामाईं दाहिणटूम्स।।' इत्यादो चानन्वयोदाहरणत्वं न वात्थम्। अत्रान्यार्धनान्यार्थस्योपमीयमानखवेनोप- माया अभिवीयमानरवात्। अस्य अपमानान्तर निषेध पर्यव साय्य भिधीयमान मे कस्यैवोप- मानोपमेयरव स्वरूपम्। न च सदत शव्देनाभिधीयतेऽपि तु व्यज्यत इति प्रतीयमानतंव युकतेति न चाच्पत्वमस्पेति वाच्यम्। एवं रलकारव्पनेर्विषयापहार: स्यात्। एवम 'गन्धेन मिन्पुरधुरधर वक मेत्त्रीमैरावणममृतयोऽपि न शिष्वितास्ते। तत्वं कचविनयनाचलरत्नभित्तिस्वीयप्रतिच्छुनिपु यूथपतित्व मेपि।'
यदि नाम चतत्प्रतीयेत तदप्यस्य प्रतीयमानन्व स्यान्न वाच्यत्म। यथोक्तन्यायात्। एवं च नदेकदेशेनाव्रसित मेदेन वेत्यपास्य उपमानतया कल्पितेन तेनैव सादश्यमनन्वय इत्येव त्वया सूत्रणीयम।
नाम यस्याभिनन्दृन्ति द्विपोउपि स पुमान्सुमान ।' इतयत्र पुंस पुरुवारोपादनन्वयरूपकमिति यदन्यरुक्त तद्युत्तम्। एकस्वैव विध्य
इस प्रकार द्विनीय समान की निवृत्ति हो इम [अनन्वय] का अनंकारत्व प्रतिष्ठापक प्रमाण है। इसके विना इसनें सल्कारत्व समत्र नही। यथा- "उमोकी आश्ञा से' प्रजा का परिपालन करते हुए मेरी यह जराचस्था आा गइ जिसने मैर कान के पास के केश पका दिए है। क्योंकि भाज भी मुझे नवजान शिक्षु के समान समझाने है, सन. गुरुजीका मेरे ऊपर वही महान् अनुमद है।" इसमें "जिम प्रकार गुरुजी मुझे तन समझाने थे जब में नवजान शिशु तुय अदोष या उर्मा प्रकार आज भी मुझे एमझाते है" इस वास्य में यद्यपि उपमान और उपमेय एक ही तत्व है तथापि यहाँ द्वितीय समान की निवृति नहां होता, अत यहाँ यह अल्कार नहीं होता। यदि अवम्यागत भेद हो तो एक ही वस्नु में सिद्धसाध्यभाव दन जाता है तब 'उपमानत्व' और 'उपमेयत्व' इन विरुद्धयर्मों का ससर्ग नहीं होता[दोनों पृथक-पृथक रहे आते है। एक दूमर से मिल नही पाने]। अतएव = इमीलिए अर्थात् विरद्ध धर्म मसन के कारण। एक ही वस्तु के सिंद्ध और साध्यरूप उपमानत्व और उपमेयत् रूपसे नही होना ह अन्नय = सबन्ध जिममें ऐेसा। 'अर्त्ुन से भिन्न अन्य कोई युद्ध से प्रथितप्रताप नहीं है' इस प्रकार द्वितीय ममान की निवृत्ति ही यहाँ प्राणस्वरूप
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प्रतीत होती है। इसलिए [अर्जु'न का अर्थ] कार्तवीर्य और [भीम शब्द का अर्थ] हिसक प्राणी उपभानरूप से यहाँ प्रतीत नहीं होते, फलतः यह [अनन्वव का] सवेश शुद्ध [निर्दोप] उदाहरण है। 'एतावन्माने जगति सुन्दरमहिलासहस्रभरितेऽपि। अनुहरति केवलं तस्या वामार्थ दक्षिगार्धस्य ।' 'यह संसार इतना बढ़ा है और सहसों सुन्दर महिलाभों से भरा हुआ है, तथापि उसका चामांग केवल उसीके दक्षिणांग की बनावट का है।' इत्यादि को अनन्वय का उदाहदरण नहीं मानना चाहिए [जैसाकि शोभाकर मिन्र ने अपने अलंकाररत्नाकर में माना है]। यह इसलिए कि यहाँ एक अंग से दूसरे अंग की उपमा हे और वह स्वयं अभिधाकृत्ति के द्वारा यहाँ प्रतिष्ठिन है [पर्यवसान में अभावात्मक सिद्ध नहीं होती ]। यह जो अनन्वय है इसका स्वरूप है एक ही वस्तु का अभिधा द्वारा प्रतिपादित ऐसा उपमानोपमेवभाव जो अन्य उपमान के अभाव में परिणत हो। शंका-वह अभाव यहाँ शब्द से नहीं कहा जाता। उसकी प्रतीति तो व्यंजना से होती है। इसलिए उसका व्यंग्य होना ही उचित है वाच्य होना नहीं। समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि ऐसा मानने से तो अलंकारध्वनि के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जायेगा। इसी प्रकार- "हे सिन्धुरघुरंधर [गजराज= गणेश ] तुन्हारे गन्ध के कारण ऐराकत आदि को भी तुम्हारे चेहरे की समानता पाने का अभ्यास नहीं है। इसलिए तुम कैलाश की दीस रत्नभित्तियों पर प्रति- फलित होती अपनी ही अनेक प्रतिच्छविभों के बीच यूथपतिपद प्राप्त करते हो।" यहाँ भी [शोभाकरने जी ] अनन्वय [माना है वह ] नहीं मानना चाहिए। पतिविम्व भले ही स्वयं के ही दो किन्तु उनके साथ साइश्य प्रतीत हो ही जाता है। अतः यहाँ उस [अनन्बय] की गन्ध भी नहीं है। यदि यह [अनन्वय ] यहाँ प्रतीत भी होता हो तो न्यंग्यरूप में ही होता होगा, वाच्यरूप में नहीं। हेतु ऊपर दिया जा चुका है। इसलिए [ शोभाकर मिन्नजीं आपको [ तेनेव तदेकवेशेनावसितभेदेन वा उपमानतया कस्पितेन अनन्वयः= एक ही पदार्थ या उसका एकदेश यदि उपमानरूप से करिपत किया जाय तो वह अनन्वय होता है'-ऐसा सू न बनाकर केवल "उपमानतया कल्पितेन तेनैव सादृश्यमनन्वय: = उममान रूप से कल्पित उसी ( उपमेयभूत) पदार्थ के साथ सादृश््य अनन्वय" इतना हो सूघ बनाना चाहिए। "समासदों द्वारा गौरवपूर्वक उच्चारित और मानों ओज को पीता हुआ सा जिसका नाम शुछु द्वारा भी अभिनन्दित हो वही पुरुष है।" यहाँ पुरुप पर पुरुषत्व के आरोप के कारण जो कुछ. लोगों ने अनन्वयरूपक माना हैं वह ठीक नहीं है। यहां आरोप नहीं हो सकता, क्योंकि यहां जो पदार्थ उद्देश्य है वही विधेय है।' विमर्श :- (१) निर्णयसागरीय संस्करण में 'वाच्याभिप्रायेण" इत्यादि वृत्त्यंश इस प्रकार का है-"वाच्याभिप्रायेण पूर्वरूपावगमः ।" विनशिनीकार ने "सादृश्यानुगममाश्रित्य" लिसा है अतः हमने सवगम को अनुगम वना दिया है। संजीविनी में भी यही पाठ है उस में 'अत्र'-शब्द और जुड़ा हुआ है "वाच्याभिप्रायेणान" इस ग्रकार। संजीविनीकार ने पूर्वरूप का अर्थ किया है, पूर्व = पूर्वतः सिद्ध उपमेय तदरूप और इसके आाधार पर उपमान को अपूर्व कहा है। "पूर्व रूपमुपमेयत्वम् अपूर्व रूपमुपमानत्वम्।' अनुगम का अर्थ किया है उपमेयत्व का अनुगम । (२) डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी ने 'निरुद्ध धर्म' का अर्थ किया है 'अपने से विरोधी धर्म!'
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इन दोनों के अनुसार यह मानना पड़ेगा कि उपमेय मिन्न उपमान से अन्वित होना है न कि एक ही पदार्थे [ अर्जुन आदि] का [ परस्पर विरुद्ध] उपमानत्व और उपमेयत्व से अन्वय होता है। (३) निर्णयसागरसंस्करण में "एकस्येव अवस्थानेदेन च सिद्ध-साध्यधर्मस्भवान्नोपमानोपमे- वत्वस्य विरुद्धधर्मभमर्ग."ऐसी पत्ति है [यहाँ पृष्ठ '०० पर पक्ति ४-५]। हमने अर्थ स्वारस्य की दृष्टि से पष्ठी के स्थान पर 'रूप' शब्द जोट दिया है। (४) अवस्थाभेद से व्यक्तिभेद होने पर मी शोभाकरमित्र ने अलकाररत्नाकर में अनन्वय माना है और उसके वे ही उदाहरण दिये हैं जो यहाँ विमर्शिनीकार ने। विमर्शिनीकार रत्नाकर का उपर्युक्त रूप भी उद्धृत करते और उसका परिप्कार करते हैं। रत्नाकर की इम मान्यता का खण्डन पण्डितराज जगनाथ ने भी किया है। वस्तुत शोभाकर ऐसे स्थलां पर अनन्वयध्वनि की और सकेन करने है जिसका अपलाप नहीं किया जा सकता। सजीविनीकार ने इस प्रकरण को इस प्रकार कारिकाबद्ध किया है- "विरुद्धधर्ममसर्गस्तुल्यान्तरनिवृत्तये। सतस्तदन्वयाभावाद भवेदयमनन्वय ।' विरुद्ध धर्म संमर्ग का अर्थ उन्होंने भी "एकम्यैवोपमानोममेयकलपि." एक हुर को उपमान और उपमेय बनाना, किया है। अन्य आचार्यों ने सनन्वय के लक्षण इस प्रकार किए है- भरतमुनि=मरतमुनि ने अनन्वय को 'सदृक्षी उपमा' नामक उपमाका भेद माना है। उनके यत्तयाय कृत कर्म परिचचानुरोधिना। सदृश तव तवैव स्यादिति मातुषकरमय ॥ [१६।५० नाटयशास्त्र वडौदा स. ] इम उदाहरण से वह तथ्य स्पष्ट है। अभिनवगुस ने इसका सदृशी के स्थान पर 'भसदृशी' नाम भी बनलाया है। असादृश्य और अनन्वय एक ही हैं। भामह तथा उद्नट = 'यत्र तेनैव तस्य स्यादुपमानोपमेयता। असाद्यविवक्षातरतरममित्याह्ुरनन्वयम् ।। ४।४५ काव्याल सादृश्य का अमाव बतलाने के लिए नहाँ जो उपमेय हो वही उपमान हो तो उमे अनन्वय कहते हैं।' वामन= विशोधप्रसगेनानन्वयं दर्शयितुमाइ-
अन्यासादृशयमेतेन प्रतिपद्यते। विरोध के प्रसंग में अनन्वय दिखलाते हुए लिखते हैं कि "एक ही पदार्थ यदि उपमान और उपमेय दोनों हो तो अनन्वय होना है।' इसमे अन्य के साथ उसका सादृश्य नहीं है ऐसा प्रतीत होता है। रुद्ट= स्ट्रट में अनन्वय नहीं मिलता। मम्मट = 'उपमानोपमेयत्वे एकस्यै रकवाज्यगे। अनन्दयः।' एक हो पदार्थ यदि एक ही वाक्य में उपमान और उपमेय दोनों ही हो तो उसे अनन्वय कहते है। शोभाकर= 'तेनैव तदेकदेशेनावसितमेदेन वोपमानतया कल्पिनेन अनन्वयः।' अर्य विमर्दिनी में किया जा चुका है।. 1
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उपमेयोपमालङ्कार: १०३
इससे स्पष् है कि अनन्वय में 'द्वितीयसदृश निवृत्ति' पर आचार्यी का ध्यान भरम्भ से ही था। निरोधमूलक कहकर वामन ने उसमें विरुद्ध धर्मसंसर्ग को भी ऑाँक लिया था। पण्डितराज जगन्नाथ ने प्चीन सभी अभिप्रायों को चालनीन्याय से वीन बटोर कर इस प्रकार प्रस्तुत किया है- "द्वितीयसदृशव्यवच्छेदवुद्धिफलकं वदेकोपमानीपमेयक सादृश्यं तदनन्वयः।" 'ऐसा सादृश्य अनन्वव होता है जिसनें उनमान और उपमेय दोनों एक ही पदार्थ हो तथा जिससे किसी संभावित द्वितीय सदृश का निराकरण फलित हो।' पण्डितराज जगन्नाथ ने जयरथ के इस मत पर कि 'एतन्मात्रे' तथा 'गन्धेन०' इत्यादि पद्यों में अनन्वव ध्वनि हो सकती है-आक्षेप करते हुए लिखा है कि द्वतीयसदृशन्यवच्छेदमात की ध्वनि को अनन्वय की ध्वनि नहीं कह सकते, क्योंकि वह कल्पितोपमा में भी होती है और अति- रायोकि में भी। असमालंकार में भी उलका अस्तित्व रहता है। कल्फितोपमा में बिमर्शनीकार भी इसे स्वीकार कर चुके है। वस्तुनः पण्डितराज जगन्नाथ ने विमर्शिनी को ठीक से नहीं देखा। पण्डितराज ने उसका मत इस प्रकार प्रस्तुत किया हैं- यद्यापि चालकारसर्वस्वकृता अनन्वयध्वनित्वमत्र भविप्यति, अन्यथाऽलंकारध्वनेर्निप यापहार: स्यात् इत्युक्तन् , तदभि तुच्छम्।' यहाँ एक तो उन्हें यह विदित नहीं है कि यह मत अलंकारसर्वस्वकार का नहीं विमाचचिनीकार का है, जिसका आधार अलंकारसर्वस्न के वाद बना अलंकाररत्नाकर है। दूसरे उन्हें यह विदित्न नहीं कि विमर्शनीकार भी दवी जवान से ही यहाँ अनन्वव्चनित्व की बात करते हैं। पण्डित- राज ने या तो केवल खण्डन के लिए ही इसे तूल दे दिया है या उन्हें पाण्डुलिपियाँ गळत मिली हैं। हो सका है रसगंगाधर को ही भाण्ट्रुप्रत्तियों में दोप रहा हो और संपादक उसे सुधार न पाए हों। [सर्वस्व ] [सू० १४ ] दयो: पर्यायेण तस्मिन्तुपमेयोपसा ॥ तच्छन्देनोपसानोपमेयत्वप्रत्यवमर्शः। पर्यायो यौगपद्याभावः। अत पवात्र वाक्यमेद:। इयं च धर्मस्य साधारण्ये वस्तुम्रतिवस्तुनिर्देशे च द्विधा। आद्ये चथा- 'समिव जलं जलमिव ं हंसश्चन्द्र इव हंस इव चन्द्रः। कुमुदाकारास्तारास्ताराकाराणि कुमुदानि ।।' द्वितीये यथा- सच्छायाम्भोजवदनाः सच्छायवद्नाम्युजा। वाप्योउङ्वना इवाभान्ति यत्र वाप्य इवासना: ॥। [सू० १४]दो का वह [ उपमानोपमेयभाव] यदि क्रम से हो तो उपमेयोपसा [कह लात्ा है ]।
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२०४ अलङ्कारसरवस्वम्
[वृ० ][तस्मिन् के ] तव=वह=शब्द से यहाँ उपमानोपमेयत्व का परामर्श किया गया है [सननिहित अनन्वय का नहीं ] । पर्याय=क्रम का अर्थ है एक साथ [होकर, न कि भिन्न भिन्न वाक्यों में एक के बाद एक इम क्रम से] होना। इसीलिए इममें वाक्य वदन् जाने है। यह दो प्रकार की होनी है एक जहाँ धर्म साधारण होता है और दूसरी जहाँ वम्तुप्रतिवस्तुनिर्देश होना है। प्रथम का उदाहरण- 'आकाश के समान जल है और आकाश जल के समान, इस चन्द्र के समान ह और चन्द्र इस के समान, तार कुमुद के समान है आर कुमुद तारों के समान।4 द्वितीय का उदाहरण- 'वापियाँ अगनाओं के समान प्रतीन होती है और अगनाएँ वापियों के समान। एक [वापियो] मुसनुत्य शोमायुक्त कमल वालो हैं और दूसरी [अगनाएँ] कमल तुत्य शोभायुक्त मुख वाली।' चिमशिनी इयोरित्यादि। दयारित्युपमानोपमेयथो, न पुनर्द्विसरयाकयो.1 तेन, 'कान्ताननस्य क्मलस्य सुधाकरस्य पूर्व परस्परमभ्दुपमानभाव'। सदो जरातुहिनराहुपराहतानामन्य परस्परमसावरस म्रसूत.।।' इस्यन्न त्रयाणामप्युपमानोपमेयत्व स्थिनमस्या एवाङ्म्। तच्छन्देनेति तस्मित्ित्य नेन। यौगपद्याभाव इति क्रमरूपत्वात। अत इति योगपद्याभावाद। सच वाक्यभेद शाब्द आर्थक्। तत्र शाब्दो यथा- 'रजोभि स्यन्वनोद्धूतैर्गजैश् घनसनिमै। भुवस्तलमिव ब्योम कुवन्व्योमेन भूतलम् ॥' अत्र भुवस्तलं व्योमेव कुवंतिति वाक्यपरिनिप्पते स्फुट एव शाब्दो वाक्यभेद्.। आर्थो यथा- 'भवत्पादाध्रयादेव गझ्ञा भकतिश्व शाश्वती। इवरे तरसाइर्यसुभगामेति बन्दताम्।I' अन्न स्फुटेऽपि शाब्दे एकवाकयत्वे गहा भकिवल् कि् गङ्गावद् बन्तेव्य म्तयेवार्थी वाक्य- भेद:। अस्याश्चोपमानान्तरतिरसकार एव फलम्। अत एवोपमेयेनोपमा इत्यस्या अन्वर्थाभिधानस्। यतर पुनरूपमानान्तर तिरस्कारो न प्रतीयते तत्र नायमलंकार। यथा- 'सचिता विधवति विघुरपि सवितरति तथा दिनन्ति यामिन्य. 1 यामिनयम्ति दिनानि च सुखदुःसवशीकृते मनसि ॥' न हयन्र विघुसविदादीनामुपमानान्तर तिरस्करणं विव्तितं कि तु सुसदुखवशीकृत- मनमामेव विपरीतं मवतीति। दो का अर्थ हैं उपमान और उपमेय। दो सख्याव्ाले नहीं। इसमे- 'कान्तानन, कमल और चन्द्र का पदले परस्पर में अपमानभाव सवन्ध था। बहुन शीन ही जरखस्था, ओोस तथा राडु से आकान्त इन सबनें फिर भी यह सबन्ध बन पडा है यधपि यद [प्रथन की अपेक्षा ] नीरस है।' यहाँ जो तीन पदार्थो में उपमानोपमेयमान है यह भी इसी [ उपमेयोपमा] का जग है। तत् शब्द अर्थात 'तरिमन्' इस पद की प्रकृति के रूप में आया तद् शम्द। यौगपदा-भाव
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उपमेयोपसालक्कार: १०५
साथ न होना अर्थाद कन के कारण असः अर्थात यौगपद्य के ही कारण वह वाञ्यमेद दो प्रकार का होता है सान और आर्थ। इनमें प्रथम श्ञाब्द यथा- 'ुयों से ऊपर उढ़ाई गई घूली से और मेघ के समान हाथियों से आकाश को पृथिवातल के समान और पथिव्ीतल को आकाश के समान बनाता हुआ रवु दिन्विजय के लिए पूर्व दिक्ा की ओर बढ़ा] यहाँ प्ृथिवीतल को आकाश के समान वनाता हुआ-इस प्रकार वाक्य की पूति हो जाने के कारण शाब्द वाक्यमेद स्पष्ट ही दिखाई देता है। आर्थ यथा- शंगा और शाश्यत भक्ति आपके चरणों के आश्रय से ही परत्पर सादृव्य से सुभग बन्यता को माप्त होती है।' यहाँ शब्दवः तो वाक्य में एकता हो प्रतीत होती है, कितु गंगा भत्ि के समान बन्ध है और क्ि गंगा के समान वन्ध है, इस प्रकार यहाँ अर्थतः वाक्यभेद हैं ही। इसका फल है उपमानान्तर [अन्य किसी उपमान] का निराकरण। उसलिए 'उपमेय से उपमा' इस प्रकार इसका नाम भी सार्थक है। जहां कहीं अन्य उपमान का निराकारण प्रतीत नहीं होता वहां यह अलंकार नहीं माना जाता। यथा- 'चित्त जब सुख और दुश्ख में इवा रहता है तव सूर्य चन्द्र सा लगता और चन्द्र सूर्य ता। इसी प्रकार रारतें भी दिन सी लगती हैं और दिन भी रात से ।' यहां कवि की सूर्य और चन्द्र अदि के अन्य उपमानों की संभावना निरस्त करने की कोई इच्छा नहीं है। केवल इतना ही बतलाने की इच्छा हू कि जिसका चित्त सुख और दुःख से भक्रान्त होता है उन्हें ऐेसी विपरीत अनुभूति होने रगती है। विमर्शिनी साधारण्य इति। एतन्व धर्मस्य निर्देशानिर्देशरुपपचद्यागूर करवेनोकस्। तन्र निर्देश- पच्तेसाधारण्यमस्नि तथाप्यत्र सकन्निरदेंशेनेवानुगतत्वात्तदुपलम्भः स्फुट इत्यत्र भावः। अनिदशपक्षे तु वास्तवमेव साधारण्यम्। यदनुसारं समिद जलमित्याद्यदाहतम्। धर्मस्या- नुगामित्वे तु यथा- 'कमलेव मतिर्मतिरिव कसला तनुरिव विभा विभेव तनुः। धरणीव घतिर्ष्वतिरिव धरणी सततं विभाति वत यस्य ।।' अत्र निभातीति सकृन्निर्दिष्टम्। वत्तुप्रतिवत्तनिर्देशश्च पूर्वदिहापि शुद्धसामान्य- रूपत्व विम्व प्रतिनिम्वभावास्या द्विघा । तन्न विन्वप्रतिविम्वभावो ग्रन्थकतैवोदाहृतः।
'तद्ववगुना युगपदुन्मिपितेन तावस्सद्यः परस्परतुलामधिरोहतां दवे। पस्पन्दमानपरुपेतरतारमन्तश्चप्ुस्तव प्रलचितत्रमरं व पद्मम्।।' (अत्र) प्रस्पन्दमानप्रचलितत्वेन शुद्धसामान्यरूपत्वम् । तारकन्नमरयोस्तु विम्ध प्रतिनिन्वभावः। उन्मेपाभिप्नायेण चानुगामितेति भेद त्रयस्याप्येतदुदाहरणम्। साधारण्य इति यह इस बात को बतलाने के लिए लिखा कि साधारण व्मे [यहाँ] दो प्रकार का होता है १-निर्दिष्ट और २-अनिर्दिष्ट। जहॉँ साधारण धर्मे का निर्वेध रहता है बहां को विशेषता यह रहती है कि उसका उल्लेख एक ही वार होत. है अतः वह अनुगामी रूप से ज्षात होता है। जहां निर्देश नहीं रहता वहाँ साधारण धर्म वास्तव= वस्तु से साक्षिप्त आर्थ होता है, जिसके अनुसार 'आकाश के समान जल' इत्यादि उदाहरण दिया। अनुगामी धर्म के लिए उदाहरण-
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"जिसको मनि लक्मी के समान प्रतीन होती है और लक्ष्मी मति के समान, शरीर के समान कान्नि प्रतात होती है और कान्नि क समान शरीर। इमी प्रकार जिसकी धृति धरणी के समान लगनी हे और धरणी धृति के समान।" यहाँ विमानि= लगतो या प्रतीत होनी है यह धर्म एक ही बार उस्लिसिन है। वम्तु पतिवस्तु का निर्देश भी पहले के ही समान यहाँ भी शुद्ध सामान्य स्वरूप तथा विम्ब- प्रतिविम्व्रभाव युक्त इम प्रकार दो प्रकार का होता है। इनमें से विन्वप्रतिबिन्दमाव का उदाहरण स्वय अ्रन्थकार ने हो दे दिया है। वहाँ कमल और मुस का विम्वनतिविम्वभाव है। शुद्धसामान्य स्वरूप का उ्दाहरण यह है- 'ये तुम्हारे नयन जिनमें रिनिम्ध कोमल पुनलियाँ चल। ये कमल जो कोप में बन्दी बनाए अमर चंघल । माम ही सुल आाएँ तो उपमान बैन जाएँ परस्पर।' [महादेवीजी] 'तो एक साथ सुन्दर उन्ने से दो चरतुएँ परस्पर तुला पर शीघ्र हो चढ जायें, एक तो भीतर ही भोतर किचित बूमनी और कोमल पुनली से युक्त तुम्दारा चक्षु और दूसरा भ्रमरसगर युक्त पझ्म।' यहाँ जो प्रस्पन्दमानता नर्थाद घूमना है वहाँ प्रचठितत्व अर्थात सचरण है। अत यहाँ वस्तुप्रनिवस्तुभाव शुद्धमामान्यस्वरूप ह। तारार और भ्रमर में यहाँ भी विम्वप्रतिबिम्वभाव है। उपर उन्मेप की दृष्टि से इसमें अनुगाभिधर्मेतव भी है। इस प्रकार यह पद्य तीनों भेदों का
विमर्श-उपमेयोपमा के प्राचीन लक्षण- भामइ = उमानोपमेयत्व यत्र पर्वायतो भवेव। उपमेयोपमा नाम सुवते ता कथोदिताम्॥३३७ ॥ 'जहाँ क्रम से [बारी बारी से] उपमानोतमेयत्व हो उसे अपने अर्थ के ही अनुरूप उपनेयो- • पमा कहने है।' वामन= क्रमेण एकम्येश्रोपमानोपमेयल उपमैयोपमा। 'एक ही पदार्थ यदि क्रम से [एक वाक्य में] उपमान और [एक वाक्य में ] उपनेय बनाकर प्रस्तुन किया जाए तो वहाँ उपमेयो- पमा होनी है। उड्ट = अन्योन्यमेव यन स्यदुपमानोपमेयता। उनेयोपमामादुस्तां पक्षान्तरहानिगाम्॥ जहों एक दूसरे के ही साथ दो के बीच उपमानोपमेयता हो उमे उपमेयोपमा कहने हैं। इमक नास्पये होता है पश्षान्तर [ अन्य के उपमाल्] का निराकम। सनट = में अपाप। भम्मट='विपर्योम उपनेयोपमा तयो.॥।' नयो, उपमानोपमेययो । परिवृत्ति [विनर्यास ] अर्थात वाक्यहये। इनरोपमानव्यवच्छेदपरा। उपमेयेन उपमा इनि उपमेयोपमा। i अनमान और अमेय का परंस्पर में एक दूमरे के रूप में आना। यह दो वाक्यों में ही संभन है। तभी इसका नाम है उपमेयोपमा अर्थात उपमेय के द्वारा [उसे उपमान बनाकर] पना।
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उपमेयोपमालक्कार: १०७
उपमानत्व उपभेवताि, उपनेवत्वामि उपमानतम् इति उपनेयोपमालंकार: स चोपमानान्तर- निपेघार्थे: । परसपर में उपमानोपनेय भाव अपमेयोपमा कहलाता है। यहाँ उपमान भी उपमेय बना दिया जाता है और उपनेय भी उपमान। इस अलंकार का प्रयोजन है अन्य किसी उपमान का निराकरण। इस पतेहासिक निवेचन से स्पष् है कि पनेयोपमालंकार के निव्नलितित चारो तलों पर मावीन सभी आचार्यों की दृष्टि थी = मिन्न भिन्न पढार्थो नें परत्पर उपमानोपमेवमाक २= पतदर्थ वाक्यभेद, ३=इसका उद्देश्य वात्त्योपात्तादार्थतिरित्त पदार्थे की उपमानता का निरास तथा ३ = इसकी अन्वर्थता। परवर्ती शोभाकर और पूर्ववर्ती वानन ने अलंकारसर्वस्वकार द्वारा उद्वृत्ष 'समिन जलन्' पद्य ही उदाहरणलप से प्रस्तुत किया है। शोभाकर ने मन्मट द्वारा अन्योन्योपमा के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत "सनिता विववति" पद्य को भी उपनेयोपना का उदाहरण नाना है। उन्होंने 'सूर्य और चन्द्र का परस्पर उपमानोपभेयमाव विरोष को लेकर माना है। सुख और दुःख में सूर्च के विरुद चन्द्र ही है और चन्द्रके निरुद सर्य। इस प्रकार दोनों नें परत्परविनुद्धत्वेन रप- मानोपनेयमाव माना है। वस्तुतः "चहाँ चिस के दुःी होने पर सुसकारी चन्द्र भी नूर्य सा संतापकारी वन जाता है और सुखी होने पर संतापकारी सूर्य भी चन्द्रमा सा सुखकारी बन जाता है। इस प्रकार सूर्य चन्द्र की उपमा में एक बार सुखकारिल और दूसरा वार दुसकारित सावारण धर्मे है। साधारण धर्म के भिन्न होने पर तृतीयसदव्यवच्छेद्दप्रनीति नहीं हो पाती। विमर्शिनीकार ने जो विवेचन किवा है वह बढ़ा ही हृद्य है। पण्टितरान ने भी उसे नान लिया है। पण्टितराज जगन्नाथ ने अलंकारसर्वस्त्रकार, अलंकाररत्ाकरकार तथा विमर्शिनीकार तीनों की उपमेयोपमाविपयक समस्त मान्यताओं का अक्षरण: खण्हन किया है। उनके खण्डन का केन्द्र केवल एक ही तत्त्व है। वह है उपमेयोपमा में वाक्य मिन्न हो जाने पर भी साधारण धर्म का म होना। उपमानान्तरनिषेय की प्रतीति साधारणर्म के दोनों वाक्यों में एक न होने से नहीं हो सकती। उन्होंने 'रजोमिः०' इत्यादि पद्य को 'सविता विध०' पद्य के ही समान अन्यो- न्योपमा का उदाहरण माना है। उनका कहना है कि वहाँ उपमानान्तरनिषेष की पतीति नहीं होसी। कारण कि यहाँ दोनों उपमाओ में साधारण धर्मे एक नहीं है। 'भूतल तुल्य ब्योम' इस उपमा में रजोरूप साधारण धर्म अनुनामी है किन्तु 'न्योमतुल्य भूतल' इस उपमा में वद् विन्यप्रति- विन्वात्नक है। वहाँ हाथी सौर मेधों का ऐक्य आकार और वर्ण के आवार पर भासित होता है।' हमारी समझ नें वदि 'रनोनज' और 'रजोमेव' ऐसे दो वर्ग चनाकर इनमें विन्वप्रतिविन्द और वस्तुप्रतिवस्तुभाव मानकर ऐक्य नान किया जाय तो धर्म में एकल हो सकता है, किन्तु तृतीय- सदशन्यवच्छेद की प्रतीति तब भी होगी या नहीं यह नहीं महा जा सकता। अलंकारकोस्तुम- कार निव्वेस्र पण्डित ने भी इसी प्रकार का तर्क प्रस्तुत किया है। द० अ० कौ० पृ० १७९ काव्य- माला इलोक ५)। पण्डितराज जगन्नाथ ने सर्वत्वकार के 'दयो: इस विशेषण पर आक्षेप करते हुए कहा कि वह न्यर्य है। उन्होंने कारण वह बतलावा है कि 'वाक्यभेद' शब्दर चपना लेने पर 'दयोः का कार्य हो जाता है। ठीक भी है। किन्तु पण्टितराज यह नहीं सोच पाए कि 'दयो: सूत्र का अंश है और 'वात्यभेद' सृत्ति का ।
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२०८ अलद्वारसर्वस्वम्
पण्टिनराज जगन्नाथ द्वारा उपमेयोपमा का लक्षण इम प्रकार किया गया ह-
परस्पर मुपमानो पमेयभावमापन्नयोरर्थयो साहश्य सुन्दरमुनमेयोपमा।' 'ऐसे पदार्थों का सुन्दर सा्ृन्य उपमेयोपमा होना है जो परस्पर में ऐसे उपमानोपमेयमान मे युक्त हो जिसके वर्गन का फल तृनीयसदशव्यवच्छेट हो।' वृत्ति द्वारा इमी का स्पष्टीकरण उन्होंने इम प्रकार किया ह-'एकेन धर्मेण एकप्रतियोगिके परानुयोगिके माइृव्ये निरूपिते अपरप्रतियोगिकम्य एकानुयोगिकस्यापि तेन धर्मेण सादन्यरय अर्थन सिद्धनया शब्देन पुनस्तदुकि स्वनेरर्थेक्यपरिद्वाराय तृनीयसटशव्यवच्छेदमाक्षिपति।' अर्थोत-एक हो धर्म के आधार पर किमी एक पदार्थ का किमी दूसरे पदार्थे में सादृश्य बनला देने पर उसी धर्म के आधार पर दूसरे पदार्थ का प्रथम पदार्थ में सादृन्य भी रवन ही विदित हो जाना हे, तथापि उमे जो पुन शब्दत कहा जाता है वह अपनी निरर्थकता के परिहार के लिए दोनों से मिन्न तृनीय सदृश के निराकरण का आक्षेप करता है। उपमेयोपमा में पण्डितराज ने जिस साधारणधमक्य पर दल दिया है उसकी ओर पहिली बार अप्पयदीक्षिन ते ध्यान दिया है। चिश्रमीमासा में उनका वाक्य है-"एकधर्माश्रयेण पर- स्परसाम्ये वर्ण्यमाने अनयोरस्मिन दिपये तृतीय सन्हचारी नास्नीवि फरति। कम्यचित् केनचित् साइय्ये र वाणने तस्याप्यन्येन सादृश्यमर्थसिद्धमपि मुखतो वर्ण्यमान तृनीयसदश्तव्यव- च्छेदार्थ भवनीति हि नत्फलकत्वे दीजम्।' अथे वही है जो पडितराज के उपर्युक्त वाक्य का है। इम प्रकार तुनायमटशव्यवच्छेद के लिए माधारणधर्म की कता भी उपमेयोपमा में अरेक्षित है। यहाँ एक बात यह ध्यान देने की है कि विमर्नीकार ने "कान्नाननस्य कमलस्य सुपाकरम्य, "यह जो उदाहरण दिया है इममें दो से अधिक पदार्थों का परस्पर में उपमानोपमयमान है। फलन पण्डितराज का 'तृनीयस टशव्यवच्छेद' यह विशेषण लक्षणा में अव्याप्ति दोष लाता है। सजीबिनोकार ने उपमेयोपमा का लक्ष कारिका में इस प्रकार प्रस्तुत किया हे- 'उपमानोपभेयत्वव्यत्वयो न क्रम बिना। उपमेयोपमा तेन वाक्यभेदे कगोचरा।।' -'उपमान और उपमेय में परिवर्तन हो किन्तु उसमें क्रम का अमाव न हो तो वह उप- मेयोपमा होती है। यह नियमत भिन्न वार्क्यो में हो होती है। मजाविनीकार के अनुमार यहाँ विम्बप्रनिविन्वमाव नहीं होता। इमका कारण उन्होने वाक्य- नेद दनहाया है। वाक्यभेद होने से विम्वप्रतिविम्वभाव का चमत्कार, उनकी दृष्टि से, प्रतोव नहीं दो पाता। [सर्वस्व्र ] [मू० १५ ] सदृशानुभवाद् वम्त्वन्तरम्मृति: स्मरणम् ॥ चम्त्वन्तरं सदशमेव। अविनामावाभावाल्ञानुमानम्। यथा- 'अतिशयितसुरासुरप्रभावं शिशुमवलोक्य तथैव तुल्यरूपम्। कुशिकसुतमखद्विपां प्रमाथे घृतघनुपं रघुनन्दनं समरामि ।।'
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स्मरणालक्कार: १०९
सादृष्यं विना तु स्सृतिर्नायमलंकारः। यथा- 'अन्ञानुगोदं सृगयानिव्ृत्तस्तरङ्गवातेन विनीतख्ेदः। रहस्त्वद्ुत्सङ्गनिपण्णमूर्धा स्नरामि वानीरगृहेपु सुहः ॥' अन्र च कर्तृविशेषणानां स्मर्तव्यदशाभावित्वे स्मतृदशाभावित्वम- समीर्चानम्। [सू० ९५]समान [चस्तु] के अनुभव से दूसरी वस्तु की स्मृति स्मरण नामक अलंकार कहलाती हैं! [वृ०] दूसरी वत्तु अर्थाव दूसरी सदश वस्तु हो। यह अनुनान नहीं है क्योंकि वहाँ व्यापि का अनाव है। [उत्तररामचरित में सारभि सुमन्त्र लव को लक्षित कर चन्द्रकेतु के प्रति] 'दव और दाननों के प्रभाव से मो अधिक प्रभाव वाले उन्हीं से [ राम के ही समान ] शरीर वाले तथा हमारी सेना पर धनुप ताने हुम इस विशु [ लब] को देखकर मुझे विश्वामिन्र के वक्ष के विनाशक राक्षलों को नष्ट करने लिए धनुप खौचे हुए राम का स्मरण हो रहा है।' जो स्मृति सादश्य के बिना होती है वह यह अलंकार नहीं दन पाती। चथा- [र्तुवंश में पुष्पकारत राम की मगवरती सीना से उक्ति ] मुझे स्मरण आ रहा है कि गोदावरी के किनारे इसी पंचवती में सृगया करके लौटता और वेतों के बने इन वरों के पकान्त स्थान नें तुन्हारी गोद में सिर रख कर लेटा करता था। उस समत नोदावरी की तरंगो से शीतल पवन द्वारा मेरो थकाबट दूर हाती थी।1 यहाँ एक [आानुपंगिक] वात यह भी ध्यान ढेने योग्य है कि [ मूल में स्मरण करिया के] भर्त्ता के जो विशेषण ह [नृगयानिवृत्त, विर्नातसेद, स्वदुत्संगनियषणमूर्धा, सूस] उन्हें उस दश्ा का विशेषण बनाना चाहिए जिसका त्मरण किया जा रहा है। अतः उन्हैं जो त्मरण कर्त्ता का विशेषण बनाकर प्रस्तुत किया गया वह ठोक नहीं। चिमर्शिनी सदशेति वसत्वन्तरमिति स्मर्यमाणम्। सदृशमेवेति। सादृश्यस्योभयनिष्ठत्वात। अतश्व स्मर्यमाणेनानुभूयमानस्य, अनुभूयमानेन वा स्मर्यमाणस्य साहश्यपरिकलपनमच मलंकार:। यदुकम्- यथा दरयेन जनिता साम्यघी: स्मर्यमाणगा। स्मर्यमाणकृताप्यदित सथेयं दृश्यगामिनी ॥'इति। तन्नाद्य: प्रकारो अ्रन्थक्ृदुदाहरणे। तत्र हि शिशोरेव रघुनन्दनेन साद्य्यं विवनतितम्। द्वितीयस्तु यथा- 'तस्यास्तीरे रचितशिखरः पेशलैरिन्द्रनीले: कीढाशैला कनककदलीवेष्टनप्रेक्षणीयः। महेहिन्या: प्रिय इति सखे चेतसा कातरेण प्रेच्योपानतस्फुरिततहितं त्वां तमेव स्मरामि।' अन्रानुभूयमानेन मेधेन स्मर्यमाणस्व कीढदोलस्य साश्यपरिकल्पनम्। एवं चात्र
ननु यध्येवं तत्परस्मात्परप्रतिपत्तेः कि ने दमनुमानमित्याशङ्गचाह-अविनामावेत्यादि। अविनाभावस्तादाल्यान्नित्यसाहचर्यादा। अनुभूयमानस्मर्यंमाणयोश्च तद्भावः। शिशु-
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११० अलङ्कारसर्वस्वम्
रघुनन्दनयो. सादृश्यपरिकवपने निर्दिष्ट । वम्तुप्रतिवस्तुभावेनापि धर्मस्यायं भवति। तब् शुद्धसामान्यरपत्वेन यया- 'सान्द्रां मुद यच्छतु नन्दको व सोक्लासलपमीप्रतिविम्बगर्म.। कुर्वन्नजसर यमुनाप्रवाहमलीटराधास्मरण भुरारे. ॥' अब्र सोल्लाससलीळत्व यो रेकरवम् । विम्वप्रतिविम्वभावेनापि यया - 'पूर्णेन्दुगा मेघलवाद्वितेन यां मुद्धिता सुन्दरि वीक्षमाण। घिवाहहोमानलधूमलेसामिलकपोलां भवर्ती स्मरामि।' अब् मेघलवघूमलेखादीना विम्वप्रतिबिम्बभावः। एतदेव सादृश्यनिमित्तत्वं ददयितुं प्रग्युदाहरति-साइश्यमित्यादिना। सदजानुभवाभावत्तमृतेने सादृश्यहेतुकरव्रम्। स्मर्नव्यदशामावित्व इति। समर्तव्यदशामावित्व वाच्य सदनाहृ्त्येत्यर्थ। अत एव वाच्य- स्यात्चनम्। र्मर्तृदशाभावित्वमित्यवाच्यस्य वचनम्। यद्यपि स्मतृंदक्षायामतीतावात्
वर्तमानकालावच्छिन्नक्य स्मर्तर्नरिशेपणभावेनोपनिबन्धासेपा सदर्ववचिन्नतेव प्रतीयत इति यथोक्तमेव दूपगद्वय युकतमिति सहृदया एव प्रमाणम्। सद्शेति। वस्त्न्तरम्= दूसरा वस्तु अर्थाद रमर्यमाण वस्तु। सदृक्षमेवेति=मद्श ही= क्योंकि सादृश्य दोनों में रहता है इसीलिए म्मर्यमाण [याद किये जा रहे] से अनुभूयमान का अथवा अनुभयमान से स्मर्यमाण का सादृश्य बोध होना यह अल्कार है। जसा कि कहा है- 'जिस प्रकार दृदय = दिसाई दे रही वस्तु से उत्पन्न साम्यज्ञान में स्मर्यमाण वस्तु भी विषय वनती है मी प्रकार म्मर्यमाण वस्तु से उत्पन्न इम [साम्यज्ञान] में दृश्य वस्तु (१)।' इनमें से प्रथम प्रकार [दृश्यसाम्य का रमर्यमाण तक पहॅुँचना] अन्थकार द्वारा प्रस्तुत उदाहरण से सष है। वहाँ शिशु (दब) का राम से सादृश्य विवक्षित है। दूमरा प्रकार [ मेनदून के ] इम पद्य में है- "[मेरे भवन में बनी] उम [ वापी] के तट पर सुवर्ण्कदली की वृति [मेरे] से अधिक दर्ग- नीय और लमावने इन्द्रनील सण्हो से रचित शिसर का क्रोडारो है। वह-मेरी गदिनी [=ठेठ घरवारी, यक्षी ] को प्रिय है। इसलिए है मिन्र [मेघ] आसपास चमकी विजली से युक्त तुम्हें देखकर कानर चित्त मे में उसी का स्मरण कर रहा है।' यहाँ अनुभूयमान मेन से समर्यमाण क्रीडारोल का सादृस्य बालाया गया है। यहाँ माहश्य का सम्बन्ध दोनों के साथ रहने पर मा मानना यही ठीक है कि अनुभूयमान से ही रमर्यमाग का [साद्ृव्य ] बोध होना है। यदि ऐसा है तो भिन्न पदार्थे में भिन्न पदार्थे का ज्ञान होने के कारण इमे अनुमान क्यों न माना जाय। इस गका पर उत्तर देते है-"अविनाभाव"=व्यासि। अविनाभाव=पृथस पृथक न रहना, या तो तादातम्य से होना है या नित्यसाहचर्य से। अनुभूयमान और र्नर्यमाग में ये (तादात्म्य या साह्चर्य) नहीं रहते। शिशु जौर खुनन्दन में जो सादृश्य की कलपना है उनमें 'अ्षतिशयितमुरामुरप्रभावल' आदि धर्म अनुगामी [समानरूप से उमयनिष्ठ] रूप से निर्दिष्ट है, किन्तु यह धर्म के वस्तुप्रतिवस्तुभावापन् होने पर भी होता है। उससे मो शुद्ध मामान्यरूप वस्तुप्रतिवस्नुभाव यथा- नन्दक [भगवान् विष्यु का खदग ] आपको घना आनन्द प्रदान करे, जिसके वीच उद्ास- युक्त लक्ष्मी का प्रतिबिम्द पटना है तो विषणु भगवान् को यमुना प्रवाह में लीलायुक्त राधिकाजी
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स्मरणालह्वार: १११
का त्मरण या जाता है। [विक्रमाकदेव चरित मनरपध ]। वहाँ सोल्ासत्व और सलीलल एक ही हैं। विन्तप्रतिबिन्दभाव के साथ मी वह होता है। यथा-'मेधखण्ड से अंकित पूर्णेन्दु ते घ्यो [अन्तरीक्ष ] को मुद्रित देख रहा हूँ तो हे सुन्दरि : विवाहहोमाग्नि की धमलेखा से स्ृष्ट कपाल बाली नुन्हारा स्मरण का रहा हूँ।?) : यहाँ नैघखण्ड और धूमलेखा आदि का बिम्ब- प्रतिविन्बभाव है[ वस्तुतः लब और लेखा में वस्तुप्रतिवस्तृुत्व ही है कयोंकि दोनों वरतुतः एक है]। सादृस्यनिमिच्तता को दृढ्ध करने के लिए इसी [ स्नरण] का प्रत्युवाहरग देते हैं-सादश्यम् [इस अन्नानुगोह पद्य में] सदशवस्तु का अनुभव नहीं है, अतः उसकी स्मृति सादस्य जनित नहीं है। स्मर्तव्यद्याभावि अर्थात (विश्ेषणों को) स्मरग की जा रही दशा के विशेषणरूप से प्रस्तुत करना रचित था। बैसा नहीं किया। इसीलिए वच्यावचन नामक दोप हुआ। [ वाच्या वचन के लिए दूष्टव्य व्यक्तिनिवेक विनर्श-२, पृष्ठ-३८७ हिन्दी अनुवाद ] रमनुंदक्षा के विशेषण- रूप से प्रस्तुत किया इससे अवाच्यवचन दोप हुआ[अवाच्यवचन के लिए दृष्टव्य व्यत्तिविवेक विमर्द-२ पृ० ४३६ हि. अ.] वद्यपि त्मरणकर्ता। राम] की दक्षा [गोद में सिर रखकर तोना आदि।] वीती दशारम हैं अतः [ स्मरग] कर्ता के सृगयनिवृत्त्व आदि सभी विशेषण भी दीते समय अर्थात भूनकाल के ही हैं, अतः इलोक में मी इन्हें पैसा ह बनलाया जाना चाहिए था, किन्तु [उन्हें रमरणकर्ता को वझ्ञा का विशेषण न बनाकर त्मरणकर्ता का ही विशेषण बनाया गया है और] स्मरणकर्त्ता अतोतकाल का नहीं, वर्ततमानकाल का ही है। अतः उसके विशेषणों मे मो वर्त्तमानकालिकया प्रतीत होती है। फलतः [हमारी दृष्टि से] वाच्यावचन तथा अवान्यव्चन दोनों टोप यहाँ ठीक ही हैं। आगे इस विषय में सहृदय ही प्रमाण हैं।
[सर्वस्त्र ] प्रेयोलंकारस्य तु सादश्यव्यतिरिक्तनिमित्तोत्थापिता स्सृतिर्विषयः। चथा 'अहो कोपेपषि कान्त सुखम्' इति। तत्रपि विभावाद्यागरितत्वरेन स्वशब्मात्रप्तिपाद्यत्वे यथा-'अगनुगोद्भ्' इत्यादि। गैरईप्रोऽसि तदा ललाटपतितप्रासमद्ारी युधि स्कोतासस्पुतिपाटलीकृतपुरोभाग: परान् पातयत्।
ज्वालालीम भात्वरे कमररिभवस्तं गत कौतुकम्।' इत्यादो सदशवस्त्वन्तरानुभवेSशवयवस्त्वन्तरकरणात्मा विशेषा- लंकार: करणस्य क्रियासानान्यात्मनो दर्शनऽपि संभवात्। मतान्तरे काव्य- लिज्मेतत्। तदेते सादृध्याश्येण भेदामेदतुल्यत्वेनालंकारा निर्णाताः। [वृत्ति] प्रेयोकंकार का विपय वह स्वृति है जो साद्व्य से भिन्न कारण से उत्पन्न होती है। चया-'अहो, कोप नें मी मुस कमनीय था किन्दु [सादृश्येतर निमित् से उत्पन्न होने पर] उस [स्वृत्ि] मैं निमावादि द्वारा व्यंग्यता रहनी चाहिए। कैवल [स्मरण आदि ] त्व [वाचक] नमात्र से कह देना नात्र नहीं; जैसा कि "सन्रानुगोदन्" आदि में कहा गया है]।
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'युद में आपके माल पर माले का प्रदार पटा। उमसे वह पडे पर्योत्त रक प्रवाह से आपका अगला भाग लाल हो गया। उस समय मी युद्ध में [ एक नहीं ] अनेक शयुजों को ढदाने हुए आप जिस किसी को भी दिसाई दिए उसका दुमह कामदरीर को जगने के लिए भ्यंकरता के के माथ उद्भूत नेत्राग्नि की ज्वालावली समुदाय से जगमगान कामान्तक भगवान् शंकर के विषय में जो कीनृहल था वह शान्न हो गया।' इन्वादि स्थनमों में [स्व ] भिन्न[किन्नु स्व ] समान किमी वम्तु के अनुभव से अन्य अशकय वस्तु का जो निर्मा है तद्रप विशेवालकार है। क्योंकि निर्माग=अर्थात करना [विशेषा नकार के एक्षा में 'करना' ही उपात्त एक सामान्य करिया[ जैमे भू और अम्] है अन वह दर्शनम्वरूप भी माना जा सकता है। दूमरे मन म यह का्यनिंग ह। नो इम प्रकार माइश्यमूलक किन्नु भेद नौर अमेद चोनों को वरावरी में दोने वाले अन्कारों का [ दक्षा ] निर्ग्य किया गया। विमर्शिनी म्रत्युदाहरणान्तरमपि दर्शयति-प्रेयोलकारस्वेत्यादिना। तुशव्दुश्ायें। सादश्यव्यति- रिक्तं सरकारादिनिमित्तम्। नत्रापीति। एवं स्थिनेऽपि सतीत्यर्थ। विभावाद्यागरितत्वे पेयोलकारस्य माहश्यव्यनिरिचनिमित्तनी ्थापिता स्मृतिर्विषयो न स्वशन्दमापरति- पाध्न्वे स्मृतिर्निषय इति सबन्ध। तत्र विभावद्यागृरितत्व स्मृतिर्यथा-अहो कोपेऽपि वान्त मुसम्' इति। स्त्रशब्दमात्रप्रतिपाद्यत्वे यथोदाहतम् 'अत्रानुगोदम्'-इत्यादौ। अब्र च यथा प्रेयोल कारो भावघ्वनेश्वास्त्र यथा मिन्नविपयत्व तथाग्र एव वच्यामः। एव न प्रश्युदाहरणद्वयस्यापि प्रयोजन भिन्नविषयतवात्।
इत्यादि। वस्वत्र जयापीडदर्शनम्। वर्वन्तरं तु भगवहनगम्। अत्र खवद्दर्शनममिलप्ता जनानां न स्वदर्दना वासतिरेवामूद्यावत्तेपामसभाव्यं भगवद्दर्शनमपि जातमित्यशक्य वसत्वन्तरकरणम्। विशेपाल कारस्य हाशकयय सत्यन्तरकरण रूपम, इद पुनरशयनसवन्तरदर्शनं स्थित- मिति कथमत्र विशेषालंकार इत्याशा्याह-करणस्येत्यादि। एनच्च गम्यगमरुभाव- माश्रित्यान्यैः काव्यलिव्रचेनाम्युपगनमिति दर्शयितुमाह-मनान्तर इत्यादि। पनद्िनि स्मरणम्। मतान्तर इत्यान्नटे। यदुक्म्- 'धुनमेकं यदन्यत्र समृतेरनुभवस्य वा। हेतुतां प्रतिपद्येत काव्यटित्र' तदुच्यते ।' इति। इह पुनर्गम्यगम रुभावादनुभूयमानरमर्यमाणव्यवहारोऽपि विशिष्यत ददनि पृथगलं कारणयेतदुकम : एतदुपसहरन्नन्यद्वतारयति-नदेत इत्यादि । पत इश्युपमाद्याक्ष स्वारोऽलकारा1 दूसरा प्रत्युदाहरण भी बनलाने है-प्रेयोलंकार दत्यादि। तुशब्द 'उ' व न्द के अर्थ= [ औोर या समुच्चय] में प्रयुक् है। साद्ध्य भिन्न अर्थात् सम्कारादि जनित। तत्रापि देना दोने पर भी [ 'प्रेयोलकारस्य-स्वशब्दप्रतिपायत्वे] इनने ग्रन्थ का अर्थ इस प्रकार है-विभावादि से व्दग्य होकर यदि स्मृति माहध्यातिरित्त निमित से हुई हो तो प्रेयोलकार बनती है, न कि केदल समगमि, रमरति, स्मरण आदि स्मृनिवाचक शब्दा द्वारा उसके उल्लेसमात्र से। इनमें
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से विभावानुभावव्यभिचारी से व्यंग्य स्मृति का उदाहरण दिया "अहो कोप में भी सुख की कमनी- यता"। सवशब्दमान्नपतिपाद्यता का उदाहरण दिया-"अत्रानुगोदम्"-यहां इन [दोनों में से प्रथम] में प्रेयोलंकार और मावध्वनि जिस प्रकार है यह आगे चलकर बतलारेंगे। इस प्रकार जो दो मत्युदाहरण दिये उन दोनों के विपय भिन्न भिन्न हैं[नहीं तो एक ही प्रत्युदाहरण पर्याप्त होता]। कहीं कहीं स्मृति सादृश्यमूटक होकर भी वाक्यार्धरूप न होने के कारण स्मरणालंकार नहीं वनती। इसी के लिए उदाहरण दिया = थैईप्ठोऽसि। यहाँ वस्तु है जयापीड का दर्शन, वस्त्वन्तर है भगवान् शिवरूप। यहाँ, तुम्हारा दर्शन चाहने वाले व्यक्तियों को केवल तुम्हारे ही दर्शन का * ,: लाम नहीं हुआ, अपितु जो सर्वथा असंमव था वह भगवान् शिव का दर्शन भी हो गया। इस प्रकार अशक्यवस्त्वन्तरकरण [अन्य अशक्य वस्तु का कर देना=बना देना] यहाँ हुआ [जो विशेषालंकार का लक्षण है।] विशेषालंकार जो है वह अशक्यव स्त्वन्तरकरणरूप है, और यहाँ ("येर्ट्रष्टोडसि" पद्य में) है सशक्यवस्त्वन्तर दर्शन। अतः यहाँ विशेषालंकार कैसे है इस शंका पर लिसते है-'करणस्य'। यहाँ गन्यगमकभाव मानकर कुछ आचार्यों ने काव्यलिंग माना है। इस बात को वतलाने के लिए कहा-'मतान्तर' इति। एतत्=यह= अर्थात स्मरण। मतान्तरे=सर्थात उद्भट के मत में, जैसा कि कहा है एक सुनी वस्तु-यदि स्मृति या अनुमव का हेतु बने तो उसे काव्यचिंग कहा जाता है' [उन्दट, काव्या. सा. सं. ६७ ]। यहाँ गभ्यगमकमाव से अनुभूयमान और स्मर्यमाण का व्यवहार भी विशेष्ता को प्राप् होता है, इसलिए इसे अलग अलंकाररूप से कहा। भव इसका उपसंहार करते हुए अन्य अलंकार की प्रस्तावना करते हैं सदेतद् इति। एते= ये अर्थाद उपमा आदि [ अनन्वय, उपमेयोपना और त्मरण ] चार अलंकार। विमर्श :- 'करण और दर्शन' को अभिन्ता पर संजीविनीकार ने अपनी प्योगदीपिका में निम्नलिखित विनेचन किया है- "तेडरत्यर्था धातवो हेया य उदासीनकरत काः । विकुर्वाणप्रयुञ्ानकर्तृका भूकभर्थकाः ॥" 'जिनके कर्ता उदासीन रहते हैं वे धातुऐं अस्ति धातु के अर्थ की होती हैं, जिनके कर्ता विकृति 'को प्राप्त होते हैं वे भूधातु के अर्थ की और जिनके कर्त्ता प्रयोग में आते हैं वे कृधातु के अर्थ की होती हैं।' दृशधातु का कर्ता प्रयुक्त होता है मतः यह कृधातु [करण शब्द की प्रकृति] से अमिन्न अर्थवाली है। उदासीन=जिसका प्रयोग अनिवार्य न हो। विकृति को प्राप्त=अवस्थामेद को प्राप्त। प्रसुंजान-जिसका प्योग अवश्य ही किया जाय। 'बेईपोऽसि' पद्य में स्मरणालंकार न होने पर संजीविनीकार का स्पष्टीकरण इस प्रकार ह- 'अन्न योऽयं सदशवस्त्वन्तरानुभवो यैईपोऽसीति निर्दिष्टः नातौ स्मररिपुस्मरणजननाव त्मरणा- संकार:, किन्तु अशक्यस्मररिपुदर्शनकौतुकास्तमयरूपार्थान्तरकरणात्मा विशेषालंकार:। एतद्दर्श- नेन तदपि सिद्धमिति प्रतीते: । -यहाँ जो यह सदृशवस्त्वन्तर का निर्देश "वैरवषोऽसि" इस प्रकार किया गया है यह स्मरणालंकार नहीं है यद्यपि उससे स्मरणीय (शंकर) रूपी वस्त्वन्तर का स्मरण होता है, अपितु यह विशेषालंकाररूप है, क्योंकि यहाँ अशक््य जो शंकर दर्शन के कौतुक का शमनरूप दूसरी वस्तु अ० स०
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है उसका किया जाना बनलाया जा रहा है जो विशेषालकार रूा है। क्योंकि यहाँ 'इसके दीसने में वह भी सिद्ध हो गया 'ऐसी पतीनि होती है। संजौविनीकार ने स्मरणारकार का विवेचन कारिकासप में इस पकार प्रस्नुत किया है- "स्मृति सा रमर्यने यत्र सद्शाव मदशान्तरम्। अमादश्यादवाच्यत्वादिन म्ेयान् विभियने॥" 'उसे स्मरणारकार कहते है जिसमें ममान वस्तु से ममान वस्तु का रनरण किया जाय। प्रेयोडलकार माव की अमधान व्यजना का नाम है। मातों में जिम प्रकार रतिनामक भाव प्रेयोऽलकार बनता है उसी प्रकार स्मृनिनामक माव भी वन सकता है, फिर स्मृति को प्रेयोजकार न भानकर स्मरणालंकार क्यों माना गया इसका उत्तर भी मजोविनीकार ने उक्त कारिका के उत्तरार्ध में इस प्रकार दिया है- इससे प्रेयोदंकार इमलिए भिन्न हो जाना है कि यह न नो सादृश्यमूलक होना और न वाच्य हो। स्मरणालंकार पर पूरवर्त्ती आचार्य भामह, वामन, उट्ट तथा रुद्रट ने इस अलकार का विवेचन नहीं किया है। इन आचार्यों ने कदाचित् स्मृति को मा भावालंकार नाना है इसीलिए अन्थकार ने उसका पक्ष पठाया और अन्तर किया है। मम्मट="यथानुमवमर्थस्य दृष्ठे तत्मदशे स्मृतिः स्मरणन्" सदश वस्तु के दिखाई देने पर अनुमव के यनुरूप सदृश वरतु की स्मृति स्मरणालकार।' उदाइरण = 'पूर्णेन्दुना मेन००' इत्यादि पद्य जो विमर्शिनी में उद्धून है। स्मरणालंकार, मावध्वनि प्रेयान् नामक मावालकार तथा स्नृतिनाथ में अन्र दिखलाने हुए पण्डितराज ने लिखा है- 'अय चालकारिकाणा सम्रदायो यव मादश्यमूलकत्वे स्नरणं निदर्शनादिवदलकार:, तस्यामावे व्दग्यनाया भाव: वयोरमावे तु वस्तुमात्रम्। भावस्य हि भावाचहताया प्रेयोडल द्वारलनम्। अर्थात आलंकारिक आचार्यो का यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि स्मृति यदि सादृश्यमूलक होनी है तो निदशंनादि के समान अलंकार होनी है, यदि नहीं [ माम्यमूटक नहीं होतीं] किन्तु यदि व्यग्य होनी है तो वह माव कहलाती है। यदि साइश्यमूलक और व्यग्य दोनों नही दोनी तो वस्तुमात्र कहलाना है। प्रेयोरकार वह माव होता है जो भावादि का अग बनकर आाना है। पण्टिनराज जगन्नाथ ने प्रेयोलद्धार और स्मरणाडलकार पर जो अन्नर अन्कारमर्वस्वकार ने प्रस्तुत किया है उसे प्रामाजिक माना है और अप्पय्यदीक्षित के सण्दन में उमे साक्ष्य- रप में प्रस्तुन किया है। गमरणाबकार के रक्षम में उन्होंने न केवल सवस्वकार अपितु रतनाकरकार का भी सग्हन किया है। उनका कहना है कि स्मरगालकार की न्यापति उस स्मृति नक भी है जिसका रमरग स्मर्यमाण सदृश वस्तु से होता है।, उदाहरण के रूप में उन्होने अपना यह पद प्रस्तुत किया है- 'सन्त्येवास्मिन् जगति वहद पक्षिशो रम्यरूपा- स्नेश मध्ये मम तु महती वासना चात केयु। यैरध्यक्षरय निजसख नीरद समारयद्कि स्मृत्यारूढ भवति किमपि मक्ष कृषणामिधानम्।'
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रूप कालक्कार: ११५
-'इस संसार में बहुत से सुन्दर सुन्दर पक्षी हैं किन्तु चातक उनमें मुझे सर्वाधिक प्रिय हैं, क्योंकि उन्हें देखते हो त्मरण आ जाता है उनके मिन्र मेधों का मर उनते स्नृति में मा जाता ै कोई एक कृष्ण नामक मह्म' यहीँ [ कृ्ण सदश ] चातक द्वारा सम्त्रन्वित्वेन स्मर्यमाण है। उससे ससदश ओकृष्ण का स्मरण साहव्य द्वारा होता है। पण्डितराज का कहना है कि 'सदशानुमव' शब्द के स्थान पर यहां 'सद्सजान'-गन्द अधिक उपयुक्कत है। इससे उपयुक्त स्थल में भी लक्षण संगत हो सकता है। मेष का अनुभव भले ही न हो ज्ान अवश्य हो रहा है। पण्डितराज ने स्वयं इसका लक्षण इस प्रकार किया है-
'सादृश्यश्न से जागे संरकार से जनित स्नरण त्मरणालद्कार कहलाता है।' पण्डितराज जगनाथ के आलोचक विश्वेश्वर पण्डित ने अपने अलंकारकौस्तुम में पण्डितराज के उपर्युक्त संशोधन को अक्षरशः स्वीकार किया है- 'सटशज्ञानोद्बुद्धसंस्कार मवा स्मृति: स्मरणन्' अनुभने व्यमिचारवारगाय भवान्तं ज्ञान- विशेषणम्। उद्बोधकान्तरसमवधानजन्यत्मरणवारगाय सटशनानेति। ज्ञानपदं च सृत्यनुभवो- मयसाधारणन्। अतः स्मरणस्यैवोद्बोधकलत्थले नाव्याति:।' अब अभेदप्राधान्य से होने वाले अलंकार कहे जा रहे है -- [सर्वस्व्र ] [ सू० १६ ] अभेदप्राधान्ये आरोपे आरोपविषयानपह्ववे रूपकम् । अभेदस्य प्राधान्यान्तेदस्य वस्तुतः सन्भावः। अन्यन्रान्यावाप आरोप:। तस्य विषयविषय्यवए्ब्वत्वाद्विपयस्यापह्नवेऽपहुतिः। अन्यथा तु विषयिणा विपयस्य रूपवतः करणाद्ुपकम्। साधर्म्य त्वतुगतमेव। यदाहु :- 'उपमैव तिरोभूतमेदा रूपकमिष्यते इति आरोपादमेवेडध्यवसायः प्रकृष्यते इति
[सू० १६] अभेद की अधानता होने पर आरोप हो किन्तु आरोपविषय छिपा न हो तो रूपक [होता है]। [वृo ] अभेद की प्रधानता कहने का अर्थ है कि इस अलंकार में भेद का भी अस्तित्व रहता है। आरोप कहलाता है दूसरे पर दूसरे का आवाप [अव्यास, थोपना ]। वह [आरोप ] विषय और विषयो से बंवा रहता है। तब यदि विषय [जिस पर आरोष किया जाता है] छिना दिया जाय [शब्दतः न कहा जाय] तो अपहुति अलंकार होता है। अन्यथा [यदि विषय छिपाया न साथ उसे शब्दतः कहा जाए तो] रूपक होता है। क्योंकि तब विषय विषयों के द्वारा [ उसके] रूप से युक्त बनाया जाता है। [ क्योंकि यह अलंकार साध्म्यमूलक अलंकारों के सन्दर्भ में बतलाया जा रहा है इसलिए] साधर्म्य तो [ इस अलंकार में प्रकरण से ही ] चल आता है। जैसा कि कहा है-"उपमा ही भेद को छिपाकर रूपक मानो जाती है"-[दण्डी काव्यादर्श-२६६] अभेद में आरोप की अपेक्षा अध्यवसाय अविक उत्कृष्ट होता है, इसलिए तन्मूलक [अध्यवसाय- मूलक] अलंकारों का विभाजन वाद में किया जायगा।
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विमशिनी संप्रतीति। भेदाभेदतुव्यरवाध्रयालंकारानन्तरमभेदप्रधानं लक्षयितुमुचिनत्वादवसर पाप्तावित्यर्थः । तत्र तावत्प्रथम रूपकं लक्षयति-अमेदप्राधान्य इत्यादि। वस्तुत इति। न तु प्रतीतितः । सद्भाव इति। प्रधानाप्रधानयो: संबन्धिशन्दरवात्। अन्यश्रान्याबाप आरोप इति। अन्यन्रेति पकृते मुखादी। अन्यस्पेत्यप्रकृतस्य चन्द्रादेः। स च सामानाधिकरण्येन वैयाधिकरण्येन घ निदेशे भवति। न तु सामानाधिकरण्येन निर्देश एव स1 एवं हि- 'याताः कणादरतां केचित्' इत्यादावारोपसन्भावेऽपि न सामानाधिकरण्यमस्तीत्यव्याति स्यात्। आर्थ सामानाधि करण्यमस्तीति नाव्याप्षिरिति चेतु, न। भिच्नयो: सामानाधिक रण्येन निर्देशो [अ० र० सू० २६] आरोपलत्षणम्। न घ तद्त्र निर्दिष्टम्। वैयधिकर्येन निर्देशापस्यार्थाबसेयरवाद्। अर्थावसायो निर्देशश्च नैकं रूपम्। विप्रतिपेधात्। नील मुश्पलमित्थादावपि गुणजाति रूपरवेन मिन्नयोर नीलोस्पलयो: सामानाधिकरण्येन निर्देशादा- रोप: परसज्यत इश्यतिव्यासि स्यात्। न चारोपे मिन्नयो. सामानाधिकरण्येन निर्देश उध्यत हत्यसभवोऽपि। इति न निरवद्यमेतदारोपलत्तणम्। यद्येवं तर्रिक शब्दे शब्दान्तर. भयें वार्थान्तरमारोप्यत हति चेदू यम.। तन्न न शब्दे शब्दान्तरारोप:। मुखशब्दादैशन्द- शब्दा दिरूपरवेनाप्रतीते रम्योन्यविविक्तरव विश्रान्तरूपोपलम्भादिति भवत्रिरेवोक्तावादू। कि स्वर्थेशर्यान्तरारोप। स च प्रयोजनपरतया तथा निरदिश्यते न आ्रनत्या। भत एव शुकिकायामिच रजतारोपो न मुसे चन्द्रारोप:। तस्य स्वरसत एवोत्थानेन भ्रमरुप- त्वात्। अत एव तत्रारोपविपयरयारोप्यमाणेनाच्छादितव्वेन प्रतीतिः। इछ पुनर्जानान एव कश्विपन्द्रविविक्तं मुखं तन्न प्रयोजनपरतया चन्द्रार्थमारोपयति। अत एवोकमारोपविप यानपह्वव इति। भवस्िरप्यनेनैवाशयेन 'प्रतिपादनभ्रमोऽ्यं न भ्रान्ता प्रतिपत्तिरित्या- घुकम्। तरयेयारोपस्य निषय प्रकृत. विपयी चाप्कृत। ताम्यामवष्टव्पत्व् युक्तग्बम्। यदुकम्-'सारोपान्या तु यत्रोकी विषयी विषयस्तथा' इति। संपति अर्थाद भेदाभेद की तुल्यता वाले अलकारों के निरूपण के पश्चात् अभेदप्रधान अलकारों का लक्ष्य करना उचित होने के कारण अवसर आ जाने पर। उनमें पहले रूपक का लक्षण करने हैं-अभेदप्राधान्य इत्यादि। वस्तुतः वास्तविक रूप से न कि केवल प्रतीतिमात्र मे। सद्वभाव इसलिए कि प्रधान और अप्रधान सम्वन्धिवाचक शब्द है। अन्यन्रान्यावाप आरोप अन्यन्र = दूसरे में अर्थात मुरा आदि प्रकन वस्तुओं में। अन्यस्य=दूसरे का अर्थात चन्द्र आदि नमकुन वस्तुओ का। यद आरोप दोनों ही प्रकार के निर्देशों से होना है सामनाधिकारण्यपूर्टक [मामानाधिकरण्य]- उपमानोपमेय या विषय विषयी के एक ही विभक्ति में रहने से और वैयधिकरण्यपूर्वक [वैयथ- करण्य ]= उनको मिन्न-भिन्न विभत्तियों में रहने से ऐसा नहीं कि केवल सामानाविकरण्यपूर्वक छो निर्वेश से यह हो [जैसा कि अनकाररत्नाकरकार ने माना है]। ऐमा मानने पर [कि केवल सामानाधिकरण्य में ही आरोप होता है] "कुछ लोग कगादता को प्राप हुए" इत्यादि में आरोप रहने पर भी सामानाधिकरण्य न होने से [ आारोप का लक्षण लागू नहीं होगा फलन ] अन्याति दोप आवेगा। 'अर्थगन सामानाधिकरण्य [एकार्थकल्] यहाँ है ही अन अभ्यातति नहीं होनी यदि ऐसा कहे यह भी ठीक नहीं, क्योंकि [अपने अलकाररनाकर में ] आरोप का रूप ही मिन्न-मिन्न अर्थो का सामानाधिकरण्यपूर्वक [एक विभाक के साथ] निहेग [बनलाया] ई। वद [सामानाधिकरण्य ] यहाँ [कणादता केचिद=कुछ कगादता को प्राप्त हुप में ] निदिष्ट नहीं है।
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रूपकालक्वार:
वैययिकारण्यपूर्वक निर्वेश होने पर उस [सामानाधिकरण्व] का ज्ञान अर्थतः होता है। अर्थतः शान होना और [शव्दतः] ये दोनों एक नहीं हैं। क्योंकि इननें परस्र विरोध है। [आपके आरोप लक्षण के अनन्र] "नील उत्पल" इत्यादि [विशेष्वविशेषणभाव के स्थलों] ने भी आरोप मानना होगा क्योंकि यहाँ एक [नील] गुणरूम है और दूसरा [ उत्पल] सातिरूप है, अतः दोनों मिन्न है और दोनों का सामानाधिकरण्यपूर्वक शब्दतः निर्देध भी है। इस प्रकार यहाँ [जो किआारोप का स्थल नहीं है मरोप का लक्षण लागू होगा अतः ] अतिव्यासि दोष होगा। आरोप में भिन्न-भिन्न वस्तुओं का [सामानाधिकरण्य तो शब्दतः कयित रहता है पर उनका सानानाधिकरण्यपूर्वक निर्देश शब्दतः कथित नहीं रहता [ किसी भी आरोप में आरोप लक्षम लागू नहीं होना ] अतः असंभव [नामक दोप ] भी [मारोप लक्षण में होगा]। इस प्रकार वरोप का [अलंकाररत्नाकर में] उक्त लक्षण निर्दोष नहीं है। वदि ऐेसा है तो क्या बब्द पर दूसरे शब्द का आरोप होता है या अर्थ पर दूसरे मर्य का ? बदि ऐसा पूछते हैं तो सुनिए हन कहते हैं-शब्द पर शब्द का आरोप नहीं होता क्योंकि रूपक या आरोप ऐसा प्रतीति नहीं होती कि सुख आदि शब्द चन्द्र आदि सब्द रूप हैं। उन [कष्दो] की प्रतीति प्कदम पृथक-पृथक रूप ते होती है और वे अनने साप तक ही सीमित हैं। यह आपने ही सयं कहा है। आरोप अर्थ पर अर्थ का होता है। और वह किसी प्रयोजन से होता है म्रान्ति से नहीं। इसीलिए सुख पर चन्द्र का मारोप तीप पर चाँदी के आरोप जैसा नहीं होता । क्योंकि वह सीप पर चाँदी का जरोप स्वमावत होता है अः उसे कहा भी, अम जाता है। इसीलिए यहाँ [सीप और चाँदी में ] भारोपनिषयीभृत वस्तु [सीप ] आरोप्य नाण [चांदी] से आच्छादित प्रतीत होता हैं। यहां [सुसचन्द्र नादि स्थलों में] तो कोई भी व्यक्ति जानते हुए कि नुख चन्द्र से मिन्न है उस [मुस] पर ग्रयोजनविशेष से चन्द्ररूपी सर्थ का आरोप करता है। इसीलिए कहा कि नारोप विपय का अनपहन=अरुवत, शब्दतः कथन रहना चाहिए। आप [शोभाकरमिन्न अर्थात अलंकाररत्नाकरकार ] ने भी इसी आाराय से-"यह अतिवादन का भ्रम है कि प्रवीति भ्रान्तिपूर्ण है" ऐसा कहा है। सस्य=उसका = अर्थोव भारोप का विषन=प्रस्तुत और निषयी - अप्रस्तुत वस्तु। उन दोनों से अवष्व्ध होना अर्थात युक होना। जेता कि [मन्म ने] कहा है-'वह लक्षमा सारोपा कहलाती है जहां विषय और विषयी दोनों कथित हो [ काव्यप्रकाश-]। विमर्शः-अलंकाररत्नाकरकार ने रूपक के निषय में जो लिसा है वह इस प्रकार है- 'आरोपो सपकम्। मिन्नयोः सामानाविकरप्यनिर्देश आरोप: । नलन्यत्रान्चारोप:। - नहमर्ये अर्थान्तरं चन्तुत आरोप्यते, नाषि प्रतीतित:। नह्यनुन्नचेन 'मुख चन्द्र' इत्यादौ गुकता इव रजतेन मुसत्व चन्द्रेणा्छादितत्वं प्रतीपसे, मुखत्व पृथशपातत्य त्वरूपेणेव नातमा- नतन्। नामि दिचन्द्रादिवद् वाष्यमानेव प्तीतिः, वाधोत्मसावमि तत तत्वा अनिवृत्ते:। इह स्व्गतचन्द्रविविकिमुखस्वरूपस्व निश्चितशुक्तिलत्येव ममातुन्द्रोमं रजतमितिवच्छतशो सयुन्धमाने न तदपतवा प्रतिपत्ति:। किन्तु नोलमुत्यलमित्वादिमव सामानाधिकरण्वदर्शनाव प्रति- पादनभनोशं न मान्ता प्रतिपत्तिः। दिचन्द्रादिन्द् वाध्यनानामा अपि नत्या अभावाद। नापि शब्दे
सस्माव तद्धमतवादिपतिपत्वर्थ: सानानाधिकरण्वनिर्देश सवारोप:।-आरोप रूपक कहलाता है। आरोप है को निन्न वस्तुओं का सामानाधिकरण्यनिर्वेश [यव्दः सामानाधिकरण्व मतलाना ]। न कि दूसरे पर दूसरे का आरोप। क्योंकि एक पदार्थ पर दूसरे पदार्थ का आरोप
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११८ अलह्कारसर्वस्वम्
न तो वस्तुन होता और न पतीतित ही। स्वस्थचित्त वाले किसी भी व्यक्ति को 'मुग चन्द्र' है इत्यादि में मुख का चन्द्र द्वारा वैसा सच्छादन प्रनीन नहीं होता जैसा शुक्तिका का रजन के द्वारा प्रनीत होता है। मुख तो अलग कथित रह्दता है [ जब कि शुक्तिका का वोधक कोई प्रभाग नहीं रहता ] अत उसका मान अपने रूप में ही होता है [ जन कि शुक्तिका का भान सर्वया रजतरूप से ही होता है] यह प्रनीति "दो चन्द्र"-इस प्रनीति के समान [उत्तरकाल में मिटने वाली अत. वाधित भी नहों है, क्योंकि वाध की प्रतीति हो जाने पर भी यह प्रतीति छटती नहीं [होती ही रहती है]। यहां जिस प्रमाता [ज्ञाना] को मुख की प्रनीति चन्द्रभिन्नत्देन हो जाती है उससे यदि सौ बार भी कहा जाय कि यह चन्द्र है तो तादरप्य की प्रनीति नहीं होनी ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार शुक्ि का शुकित्वेन ज्ञान हो जाने पर उमम रजत की प्रतीति। यह तो 'नील उत्पल' इत्यादि के समान सामानाधिकरण्य देसने मे हुआ प्रतिपादन भ्रम है, न कि म्रान्त प्रतिपत्ति। क्योंकि "दो चन्द्र" आदि के समान वह वाधिन नहा पाट जानी। न तो शब्द पर ही शब्द का आरोप होना क्योंकि सुखादि [शब्द] चन्द्रादि [शब्द ] रूप से प्रतीत नहीं होते। उनका [दोनों शब्दों का ] स्वरूप पररपर भिन्न रूप से प्रतीन होना है। वे [दोनों ] तो सपने तक ही सीमित रहदने है। इस डिए 'तद्धर्मत्' आदि की पतीति के रिए सामानाविकरण्यनिदेध ही आरोप होता है। स्पष्ट है कि विमरसिनीकार ने रत्नाकरकार की उपर्युंक्त पत्तियों को अक्षरमः उद्धृन किया है और रत्नाकरकार ने जिस 'अर्थ पर सर्थ के आरोप' का सण्डन किया है उसे ही उन्होंने सिद्धान्त बतलाया है। रत्नाकरकार का कहना इनना ही है कि जब तक दो वस्तुओं को शच्दन- कहकर उनमें से एक पर दूसरे को न थोपा जाय, आरोप नही होता। विमर्शिनी अन्ययेति। अनपह्गवे। एवमनेनापहुतिरुपकयोमेदोऽप्युक्त। आहुरिति दण्ड्यादयः।
'कंदर्पद्विपकणकम्वुम सितैर्दानाम्नु भिर्लान्छितं संग्नाज्ञनपुज्कालिमक्ल गण्डोपधानं रते.। ग्योमानोकहपुष्पगुच्छमलिभि' संदादयमानोदरं पश्येतच्छशिन: सुधासद्दचरं बिन्वं कलङ्ाङतम्।।' अत्र कलङ्स्य दानामवादिभि. प्रतिविम्वनम्। लान्छितत्वाक्कितत्वयो शुद्धसामान्य-
सादृश्यनिमित्त एवारोपो रूपकमित्युक्तं भवति। के्षांचिदपि सबन्यान्तरहेतुरप्यारोपो रूपकाप्तमेवेति मतम्। यदाहालकार भाष्यकार :- 'लक्षणापरमार्थ यात्रता रूपस्वरुपम्' इ्र्युपक्रम्य 'सारोपान्या घ सादश्याद्ा संवन्धान्तराङ्वा' इत्यादि। सतु यथा- 'अमृतकवलः शोभाराशि प्रमोदरसप्रपा सितिमशकटं बयोत्स्नानापी तुपारघर टिका। मनसिजनृसी शद्वारशीविमानमहदो नु भो निरवधिसुसश्रद्धा दष्टे कृती मृगकेतनः॥। अब्रेन्दुरुपे कारणे कार्यरूपाया, श्रद्धाया आरोप। ग्रम्थकृताप्यलंकारानुसारिण्या- मत्र श्रद्धहेतुत्वा रहुद्े'यभिघाय विशेपेणकरिमननेकव सवारोपान्मारुपकमि्यमि
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रूपकालङगार:
दूधतायमेव पक्ष: कटाचितः। नतु चाध्यवसायगर्भाणामप्यलंका राणामसेदपाधान्ये सति प्रथमारोपगर्भा अलंकारा किमिति कप्िता इत्याशङ्कचाह-आरोपादित्यादि । अन्यथा अर्थात अपह्ब होने पर। ऐेसा कहकर अन्यकार ने अपहति और रूपक का भेद भी वतला दिया। आहु := कहा है अर्धात दण्डी आदि ने। [ रूपक में] साधर्म्य का सदूभाव वतलाने से उस [ साधर्म्य] के साथ चलने वाले [ विम्वप्रतिविम्वभावमूलक वस्तुपतिवस्तुभाव, शुद्ध सामान्य रूप वस्तुप्रतिवस्तुभाव तथा अनुगानी ध्मे-इनके आधार पर होने नाले] तीनों भेद मी रूपक में आा जाते हैं। यथा- 'देसो यह चन्द्रमा का बिन्य, इसमें तुवासह्चरत्व [सुधायुक्त होना तथा सुधासद्श सफेद होना दोनों का एक ही शब्द से कथन होने के कारण अभेद है] भी है और कलंक भी इसलिए यह कामर्सी गन के कान का शुंस है जिस पर मटमले मदजल का धन्ना पढ़ गया है; यह रति का गण्डोपधान [गाल का तकिया ] है जिसनें काजल की कालिख लग गई है; यह 'आकाश- वृक्ष का पुष्पगुच्छ है जिसके पौँच मोरे मर गए हैं।' यहां [विन्बभूत ] कलंक के मदजल, काजल, भोरे प्रतिबिन्ब हैं। लंछितत्व = धव्वा पड़ना और अंकित होगा=लगना शुद्ध सामान्य वस्तु प्रतिवस्तु हैं और सुधासह्चरत्व अनुगत धर्म हे अतः यह अनुगामी साधारण धर्म हुआ। इससे यह निम्कर्ष निकला कि साइश्यमूलक आरोप ही रूपक होता है। कुछ लोगों का यह भी मत है कि [ सादृश्य से भिन्न ] अन्य संबन्ध से होने वाला आरोप भी रूपक का ही अंग होता है। जैसा कि अलंकारभाष्यकार ने कहा है-'रूपक का जो स्वरूप है उसमें सार है लक्षणा'-यहां से लेकर 'दूसरी जो सारोपा है वह या तो सादस्य से होती है या दूसरे सम्वन्ध से।' यहां तक ।' [सादृश्यभिन्नसम्वन्धमूलक] इस दूसरे रूपक का उदाहरण यह है- ["यह कृती चन्द्र अनृतयास है, शोभा की राशि है, प्रमोदरस की प्याऊ है, सफेदी का छवाड़ा है, ज्योत्स्ना की वाबड़ी है, तुपार की घट्टी है, काम की ासन हैं, शद्गारत्री का विमान है, भौर कितना कहें, निरवधि सुख की क्द्धा है।" [ सोमपाल विलास ) यहाँ चन्द्ररूपी कारण पर कार्यरूपी श्रद्धा का अरोप है। ग्रन्थकार ने भी 'अलंकारानुसारिणी' में उक्त कलोक की टीका में इस इलोक पर श्रद्धाह्ेतु होने से श्रद्धा" ऐसा कहकर यह कहते हुए कि 'सासकर एक में अनेक वस्तुओं के आरोप से यहाँ मालारूपक है' इसी पक्ष की ओोर संकेत किया है। विमर्श-अलंकाररत्नाकरकार ने भी साइडयातिरिकसम्वन्धमूलक आरोप को रूपक माना है। उन्होंने विस्वारपूर्वक लिखा है -- 'इह अन्ये सादृश्यनिमित्त एव आरोपो रूपक न सम्वन्धान्तरनिमिन्तकोडपि, तेन सम्बन्धान्तर- पूर्वक आरोपो वैचित्यमावं न त्वलङ्कार कवचदिति मन्यन्ते, तन्न नयनिपुणहृदयावर्जकम्। तथाहि दह दविविधा लक्षणा (:) प्रयोअनरहिता रूा, (न ) तद्युता च कार्या। तन रूढायां प्रचोजन- रूपव्यंन्यार्थामावाद् अभिषावद् वैचित्यचानवाविरहान्न सहदय-हृदयाहादकारितया रसपरिपोय- कत्वमिति नालंकारता । कार्या पुनस्तव्वैलसण्येन कान्यजीवितायमाना सरवथा कविमिरादरणीयेति सर्वेपां ध्यनिकारादीनामविप्रतिपत्तिः। न च तस्याः साइृश्ये सम्बन्धान्तरे वा कथिद विशेष: येनैकन् अलंकारता अपरत्न तदभाव इति स्यात। न च सन्वन्धान्तरनिभित्त आरोपोडलंकारतया लक्षितः,
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अलङ्कारसवस्चम्
नापि तद युज्यते। रूपकसाजात्येन वदन्वर्मावस्यवोचिनलान। अत एव 'आरोपो रूपकमिति समान्येनेवेद सुचितम्, न घ सादृश्यमित्यनुपकम्। सादृश्यमम्वन्धनिवन्धनाया अल्कृतितव यदि लक्षणाया। साम्येद्पि सर्वस्य परस्य हेनो सम्वन्यभेदेपि तयेव युक्ता ।।' इति सम्ह। 'यह कुछ आचार्यों की मान्यता है कि "माइश्यमूलक आरोप ही रूपक है, सम्बन्धान्तरनि- मित्तक नहीं। इसलिए सम्दन्धान्नरमूलक आरोप वेचित्र्यमात्र है कोई अलकार नही, जैसा कि कहते हं-'उपमेव तिरोभूनमैदा रूपकमिभ्यते" इत्यादि [अर्थ अभी आचुका है ]!" यह मत नीति- निपुग सज्जनों का हृदय आाकष नहीं कर पाना। क्योंकि लक्षगा दो प्रकार की होती है-(१) प्रयोजनरहित निल्दा और (२) प्रयोजनमहित कार्या। दोनों में निल्दा प्रयोजनरूप व्यायार्थ से रहिन रहती है अन. वह अभिधा जैसी ही होनी है, उसमें वेचिन्य तो रहना है पर उमकी चारता नहों रहती। इमलिए वह सहृदयहदयाहादकारी होकर रमपरिपोपक नहीं वन पानी अनः रमे अटकार नहीं माना जाता। कार्या रक्षाा उससे विनक्षण होती है अन वह काव्य का प्राण नानी जाती है। कवियों के लिए वह सरवेथा आदरणीय होती है। इस तथ्य में सब के सन खवनिवादी भी अविमद्ध है। वह साहश्यमूलक हो या मम्वन्धान्रमूलक उसमें कोई अन्तर नहीं आना जिमसे एक को अलकार माना जाए और दूसरी को नहीं। सम्बन्धान्तरमूलक आरोप को अल्काररूप मे जो लक्षित नहीं किया गया है वह मो अनुचिन है। जैसा रूपकत्व सादृश्यमूलक आरोप में रहना है वेमा ही सम्वन्धान्नर मूलक आरोप में, अत उसका भी रूपक में गिना जाना उचित है। इसीलिए [हमने] "आरोप रूपक कहलाना है" इम प्रकार सामान्य आरोप को ही रूपक लक्षण में रूपक कहा है। उसमें सादृव्य की अनुवृतति नहीं की। निष्कर्ष यह कि- यदि सादृश्यमम्व्रन्धमूलक लक्षणा को अलकार माना बाता है तो अन्य सब हेतुओं के समान- रूप से विद्यमान रहने पर केवल सम्बन्धभेदमात्र से [सादृश्वेतर-सम्बन्धमूलक आरोप को रूपक न मानना अनुचिन है उसमें ] मी अलकारता स्वाकार करना ही उचित है।' रुटद्रट ने इसे हेतु नामक अलंकार बवलाया है- 'हेतुमता सद् देतोरमिधानमभेदकृद् भवेद यत्र। सोऽल्ज्वारो हेतु: स्यादन्वेभ्य- पृथग्भूतः ।।"७८२॥ जहां कार्य के साथ कारण का इस प्कार का कथन हो जिससे उनमें समेद हो रहा हो तो रस अलंकार को हेतुनामक अलकार माना जाता है। यह अन्य सब अरकारों से भिन्न होना है।' उदाहरण दिया है- 'अविरलकमलविकास: सकलालिमदश् कोकिल्ान्द:। रम्योऽयमेति संप्रति लोकोत्कण्ठाकर काल ।।' 'भब वह ऐेसा रम्य समय भा रदा है जो लोगों में उत्ण्ठा जगाने वाला है, कमलों का घना विकास है, सभी भोरों का मद ह और कोयलो का आनन्द। एुदट के काव्यारकार के टीकाकार नमिसाधु ने इस उदादरण को उदाहरमों की दिय्या कहा है और उदाहरण के रूप में अपनी ओर से यह पद्य प्रस्तुन किया है- 'आयुधृत नदी पुण्य भय चौरः सुस प्रिया। वैर धनं गु्र्शन श्रेयो जाझयपूजनन्।।'
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रूपकालङ्कार: १२१
:-- 'धी आयु है, नदा पुण्य है, और भय चोर है, प्रिया सुख है, जुआ वेर है, गुरु ज्ञान है, ब्राह्मण पूजन सेय है।' मम्मट ने रुद्ट के इस मत का खण्डन किया है और 'हेतु को काव्यकिंगात्मक रूप से ही नान्य वतलाया है, तन्जिन्न उपर्युक रूप से उसमें कोई चमस्कार नहीं नाना। कहा है कि "अविरल" आदि पूद् में कान्वत्व का कारण कोमल अनुपरात है। भामह ने भी हेतु को अलंकारत्व योग्य नहीं माना है। उन्होंने- 'हेतुश्र सूक्ष्मो लेशोडय नालंकारतया मतः । सनुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिवानतः ॥। २८६॥ सर्धात् हेतु सूक्ष्म औोर लेश को अलंकार नहीं माना कारण कि इनमें वाक्यार्थ (समुदाया- भिधान) वकोकिशून्य होता है। भामह के मतत में वकोकि ही अलंकारों का नूल है। सैया सवत्र वकोकिरनयार्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्य: कोपलंकारोडनबा बिना ॥1 वद्यपि सूक्ष्म को नम्मट ने अलंकार मान लिया है। उद्ट ने भी हेतलंकार की चर्चा नहीं की। आचार्य दण्डी ने भामह के विनुद्ध हेतु सूक्ष्म और लेश इन तीनों को वाणी का भूपण ही नहीं उत्तम भूपण कहा है- हेतुशत्र सूक्ष्मलेशौ च वाचानुत्तमभूपगन् [२२३५ काज्यादर्श] उसके बहुत से भेद भी वतलाए हैं। किन्तु उनका हेतु स्ट्रट के हेतु से सवथा भिन्न है। शोभाकर, अप्पवदीक्षित और पण्डितराज ने अलंकाररलाकर, चित्रमीमांसा औौर रसगंगाघर में हेतु को अलंकार नहीं माना। वद्ययि पण्डितराज जगनाथ ने 'उल्लासः कुछ०' पद्य में हेत्वलद्वार की संभावना व्यत्त की है। प्र्न उठता है कार्यका रणभावादिसन्तरन्धमूलक आरोप को अलंकार माना जाय या नहीं। हनारो दृष्टि से अरंकार रत्नाकरकार का यह कथन संगत है कि इसे अलंकार न मानना सहदचता के साथ अन्नाय है। इसमें चमत्कार का अनुभव किसे नहीं होता। केवल ध्यान देने की बात इतनी है कि यहाँ चमत्कार का कारण न्या है। चदि घृत आदि कारण पर आबु आदि कार्य का आरोप चमस्कारकारी है तो यहाँ अवश्य ही रूपक होगा। किन्तु हमें यहाँ आरोप में नहीं अति- रब में चमतकारकारणता रुगती है। अतिशयोक्ति का एक भेद नन्मट ने भी कार्यकारणों के बीच सौर्यापर्य का बिमर्यय माना है और उसमें वे सादृस्य भी रवीकार नहीं करते। कार्यकारणके पौर्चापर्यविपयव के समान मम्मट को उनके अभेद में भी अतिशयोत्ति स्वीकार करनी चाहिए। कार्यकारण का अमेद भी वस्तुतः पीर्वापर्यविपर्यय ही है। क्योंकि कार्य और करण में कारण को पूर्ववर्त्तीं और कार्य को परवर्ती प्रत्येक दार्शनिक मानता है। रुद्रढ ने अहेतुनामक अलंकार को अतिकय वर्ग के नीतर गिना है वस्तुन: हेतु को अततिशय वर्ग में गिनना था। उन्होंने उसे वास्तव के भीतर गिना यही एक अरुचि का कार्य किया। अनुभवर के आधार पर कार्यकारणभावतम्वन्धयुक्त वस्तुओं का अभेद अतिशय को जन्म देता है और सादश्ययुक्त वस्तुओं का सनेद आरोप को अतः दोनों अलंकारों में भेद मानना भी उचित है। रलाकर के समान अमेद नहीं। वस्तुतः काव्यों में प्रयोग सादृव्यमूलक अभेद का हीं अभिक है, अतः उसी के आधार पर रूपक की व्याख्या तब ने की है। इस विषय पर देखिए हमारा लेस 'मन्मदाभिमतं रक्षणायाः पडिविमत्वं हेत्वलक्कारथ्'। [उदयपुरनिध्वनिदालय से १५६८ मे प्रकाशित]
इदं तु निरवयवं सावयवं परम्परितमिति तरिविधम्। आधं केवलं [ सर्वस्व ]
मालारूपकच्वेति द्विधा । द्वितीयं समस्तवस्तुविषयमेकदेशविवर्ति चेति
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१२२ अलङ्कारसर्वस्वम्
द्विधैव। तृतीयं श्लिष्टशब्दनिबन्धनत्वेन द्विविवं सत्पत्येकं केलमालारूप- कत्वाच्चतुर्विधम्। तदेचमष्टी रूपकमेदाः। अन्ये तु पत्येकं वाक्योक्तसमा- सोक्तादिमेदा: संभवन्ति तेन्यतो द्रष्टव्या। [वृचि]यह [ रूपक] निरवयय, सावयव तथा परपरित दस प्रकार तीन प्रकार का होता है। से ] प्रथम केवल्द [शुद्ध ] तथा मालारूपक इम प्रकार दो प्रकार का होना है। द्वितीय [भी] समस्तववस्तुदिपय और म्कदेशविवतति इस प्रकार दो ही प्रकार का होता है। तृतीय टिलट- [ इनमें शन्दमूलक और अरिन्ट शब्दमूलक होकर केवल और मालारूपक होने से चार प्रकार का होना हे। तो इम प्रकार रूपक के भेद आठ होते है। प्रत्येक में वाक्योकत समासोक्त आदि [जो] युछ सार भी भेद होते हे उन्हें अन्य ग्रन्थों में देसा जा सकता है। विमर्शिनी चशब्दोऽन्यालकारापेक्षया भेदसमुच्चयार्थ.। विपयद्योतकस्तुशब्द्.।अवयवेम्यो निष्कन्त आरोप्यमाणो मत्र तत्तथोक्तम्। सहावयवररोप्यमाणो वर्नते यत्र तत्तथोक्तम्। परग्पर यें कस्य माहालयादपरस्यारूपणत्वमायात यब्र सत्तथोकम। आद्यमिति निरवययम्। माला चैक्स्यानेकस्य वानेकरोपानवति। एव परम्परितरवेन मालारूपकं नेयम्। द्वितीय मिनि सावयवम्। समस्तमारोप्यमागात्मके वस्चभिघाया विषयो यत्र तत्तथोत्तत्। एकदेश आरोपविपयाणाम, अर्थस्तदात्मक पवारोप्यमाणप्रयोजनप्रतिपादनाय तदुपतया विवतते परिणमति यत्र तत्तथोक्तम। तृतीयमिति परम्परितम्। यद्यपि श्लेपनिबन्धनेS स्मिन्युणक्रियात्मन्धर्मनिबन्धनाय सादश्यस्यासंभव पव तथापि शब्दमात्रकृतमेवा भेदाध्यवसायतः सादृश्य ग्राह्यम् 1 अन्य इति एतच्वेदाष्टकव्यतिरिक्ता 1 सभवन्तीति चिरंतनालकारग्रन्थेप्वेव। न पुनर्लध्यन्त इनि भाव। तत दि तेपां तत्वेऽप्येतजेदाष्टक- कृतमेत्र वैचिन्यं प्रतीयते। तथा च- 'पाद कूर्मोऽम्र यष्टिभुजगपतिरयं भाजनं भूतघात्री तलापूरा समुद्रा कनकगिरिरयं वृत्तवर्तिपरोह'। अर्निश्वण्दांशुरुत्धर्गगनमलिनिमा कज्जलं दहमाना चैरिश्रेणी पनद्गा ज्वलति नरपते स्वत्प्रतापप्रद्वीप. ।' इत्यत्र सत्यपि वाक्यार्थोंक्त्वे समस्तत्र स्नुविषयकृतमेव वैचिन्यम। 'च' [और ]-शम्द अन्य अलंकारों के अभेद नेद का समुच्चायक है। 'तु' शन्द विपय का घोनक है [निरवयत = ] अवय्वों से नि'क्रान्त ह। आरोप्यमाण जिसमें ऐसा [सावयव ] जहाँ आरोप्यमाग अवयवो से युक दो। परम्परित = ] परम्परा अयात एक के प्रभाव से दूसरे का आरोपण समत्र हुआ हो जिसमें ऐमा। आद=प्रथम=निरबयब। माला एक या अनेक के आरोप से होता है। इम प्रकार का और परन्परितत्व से युक होने के कारण [रूपक को ] मालारूपक माना जा है। द्वितीय= अर्थात सावयव। [समस्तवस्तु विषय= ] समस्न आरोप्य- माणात्मक वस्तु जहाँ अभिना का विषय [शब्दन कथिन ] हो वैसा। [एकादेशविवति = ] एक- देश=अर्थात् आरोपविषयों का, जहाँ अर्थ सपने ही रूप में बना रहे और आरोप्यमाग का प्रयो- जन बनलने के लिए आरोष्यमा रूप से निवर्र्िन=अर्थाद परिणत हो। तृतीय सर्थान परम्परित। यद्यपि जहाँ यह इलेपमूल्क होना है वहाँ गुानिरात्मक सादृश्य ममन नही होना तथापि शब्दमात्र से जनित अमेदा-्यवसाय से वहाँ सादव्य बन जाता है। अन्य इन आठ भेदों
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रूपकालङ्गार:
से मिन्न। संभवन्ति=हो सकते। अर्थात् प्राचीन अलंकार ग्रन्यों में ही। हम उसका लक्षण नहीं करेंग। वहाँ उन भेदों के रहने पर भी इन आठ मेदों से होने वाला चनत्कार ही अनुभन में वाता है[ अतः चमत्का रकारण सिन न होने से उन भेदों से भिन्न नहीं माना जायना]। जैसे- :-- "हे राजनन् ! आपके प्रताप का प्रदीप जल रहा है, इसमे पाद कर्म है, मुजगपति = वेपनाग यषि है, पृथ्वी पात्र है, समुद्र तेल का भराव है, यह (मोने का अैत) समेरु गोलाकार बत्ती है, नूहें ऊची जच है, आकाश की नीलिमा काजल है, [तथा] दहमान वैरियों की पाँत है पतंग।" वद्यपि यहाँ रुूपक गक्यार्थ में व्यापत है तथापि यहाँ चमत्कार समस्तवस्तुविपयत्नकृत ही है। निमर्श :- समासगत और वाक्यगत भेद रुदरन ने चतलाए है। दण्डी और वाग्भट ने भी इसकी चर्चा की है। [सर्वस्व ] क्रमेण थथा- दासे कृतागसि भवत्युचितः प्रभूणां पादप्रहार इति सुन्दरि नास्मि दुये। उद्यत्कठोरपुलकाङ्करकण्ट कारम्रे- यंत्विद्यते तव पदं ननु सा व्यथा मे।।' 'पीयूपप्रसृतिरनवा मखत्रसुजां दानं तमोलूनये स्वर्गङ्गाविम नस्ककोकवद्नत्तस्ता सृणालीलता। द्विर्भाचः स्मरकार्मुकस्य किमपि प्राणेश्वरीसागसा- माशातन्तुरुदश्चति प्रतिपदि प्रालेयमानोस्तनुः॥' 'विस्तारशालिनि नमस्तलपत्त्रपान्ने कुन्दोज्जवलपभ भे संचयभूस्भक्तम्।
जम्वं मया नरपते कलिकालकर्ण.।।' 'आामाति ते क्षितिभृतः क्षणदाप्रभेयं निस्न्िशमां सलतमालवनान्तलेसा। इन्दुत्विपो युधि हठेन तवारिकीर्ती- रानीय यत्र रमते तरुण: प्रताप: ।।' क्षितिभृत इत्यत्र दलिएं पदम्। परम्परितम्- 'किं पन्नस्य रुचि न हम्ति नयनानव्द विधसे न वा वृद्धिं वा झपकेतनस्य कुरुते नालोकमान्रेण किस्। वक्नेन्दी तब सत्ययं यदपर: शीतांशुरम्युह्कतो दर्पः स्याद्मृतेन चेदिह तदप्यस्त्येव विभ्याधरे।'
'विद्वन्मानसहंस चैरिकमलासंकोचदीतद्युते दुर्गामार्गणनीललोहित समित्स्वीकारवैश्वानर।
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सत्यप्रीतिविधानदक्ष विजयप्राग्भावभीम मभो साम्राज्यं घरवीर वत्सरशतं बैरिश्चमुच्चैः करियाः॥ अ्रत्र त्यमेव हंस इत्यारोपणपूर्वको मानसमेव मानसमित्याद्यारोप इति शिलिषशव्दं मालापरम्परितम्। 'यामि मनोवाक्कायैः शरण करुणात्मरुं जगनाथम्। जन्मजरामरणार्णवतरणतरण्डं हराड्घरियुगम्।।' 'पर्यट्टो राजलक्ष्म्या हरितमणिमयः पौरुपाव्वेस्तरङ्गो
खङ्ग: क्षमासौविदल: समिति विजयते मालवाखण्डलस्य ।।' अन् क्षमासीविदल इति परम्परितमप्येकदेशविवर्ति। पवमाद्योऽनये- 5पि भेदा लेशतः सूचिता एव। [वृचि] कम से उदाहरण- [१= निरवयब शुद्ध ]-"अरध करने पर स्ामी का सेवक पर पदप्रहार उचित ही होना है' इसलिष हे सचरि।[ तुन्दारे मादपहार करने पर भी] मुझे कोई सेद नहीं है, व्यथा सुझे इसको है कि 'तुन्हारे मुकोमन चरय में मेरा कठोर 'रोमकण्टक' न टट गया हो।") [ यशों पूरे वाक्यार्थ में एकमान रोम पर एकमात्र कण्टक का आरोप है अन. उसमें अवयवायय- विभाव न होने से निरवयवत्व नथा शुद्धरूपत्व भी है, ]1 [ वृत्ति][₹=निरवयब मालास् यथा]-"प्रतिपद तिथि को शीनकिरण चनद्रमा का विन्व उदित हो रहा है। युह देखार्ओ के लिए नवीन अमनमरा पसी (अजति) है, अन्धकार काटने के लिए यह दाँवरा है, सवर्ग की गगा में उदास बहे चरवाक की चोच से टपको सृथाल लता है, काम का दूमरा पमुष है, और प्ागेश्षरी के प्रति सापराष वयुक्तियों के लिए यह आशा का जन्तुहै।" [यहाँ न तो आरोपविषय चन्द्र में उसके अग चन्द्रिका आदि का वर्गन है और न आरोष्य- नाग पायूषप्रसृति आदि में ही। अन यह निरवयव है। साथ ही यहाँ आरोप का विषय एक ही है चन्द्र। जब कि आरोप्यमाण अनेक हैं पीयूपप्रसृत्ति आदि, अत यह मालारून है। फलन- निरवयव मालारूपक यहाँ संगन है]। अनेक आरोपविषयों में से एक एक पर अनेक के आरोप का उदाहरण टीका मे देखिए ] [३ = सावयत्र समस्तवस्तुविषय रूपक यथा किसी भूल विद्वान् की सहायना के लिए राजा से दकि ]। हलसपी मसों या है।"
आरोप है। वे भी आकाश सम्था के अग है। अतः विपय और विपयी (आरोप्यमाण) दोनों T, गगानरग का
साग है और उनके समो अरगों का अनेद बउलाने से यहाँ समस्वम्तुविषय सावयत्र रूपक हुआ।] [४ = सावयव एकदेशविवर्त्ती रूपक =]
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रूपकालह्कार: 2२५
[वृति]'नाप क्षितिमृत [राजा, पर्वत] हैं। आप की जे तनवार है वह 'रावि तुल्य श्याम- कान्ति की मांसल (घनी) तमालहुमराजि है, जहाँ आपका तरुण प्रताप रुतुओं की चन्द्रतुल्यकान्ति वाली कीर्तिओं को बलात ले आता है और उनके साथ रमण करता है। यहाँ 'क्षितिमृद' वह पद रिलष्ट है। [ यहाँ राजा पर पवत का और राजा की तलवार पर पर्वत की तमालमाल का तो आरोप शाब्द है किन्तु शत्रुओं की कीर्ति पर मपहृत सुन्दरियों का आरोप शाब्द नहीं है वह अर्थतः प्रतीत होता है। अतः यहाँ एकदेशविवर्त्ती सावमय रूपक है। वस्तुतः यहाँ समासोकि है। सावयव रूपक केवल राजा और पर्वत तक सीमित है उसमें एकदेशविवरतिता नहीं है। जिस की्ति में वह है वह समासोकतित्थल है। 'तरुण' शब्द में दलेष समासोकि में शिथिलता ला देता है। उधर 'क्षणदा- प्रभा' और 'इन्दुत्विपः' में उपमा भी है। अतः यह उदाहरण संकरालंकार का माना जाना उचित है। विमर्शिनीकार ने इसीलिए सावयव एकदेशनिवत्तों रूपक के लिए नवीन उदाहरण दिया है-"भवर्संनित०"] [वृत्ति ][५=] परन्परित = "[ तुन्हारा सुखरुपी चन्द्र] क्या पद्म की कान्ति नष्ट नहीं करता और क्या भांखों को आनन्द। नहीं देता, या आलोक [दर्शन= प्रकाश] मात्र से कामदेव को नहीं बड़ा देता। जो तुन्हारे सुख- रूपी चन्द्रमा के रहुते हुए यह दूसरा चन्द्र रदित हो रहा है, यदि [ इसे] अमृत का दर्प हो तो वह मी तो विन्वफलतुल्य सधरयुक्त इस [ मुख] में है हो।"यहाँ मुख पर चन्द्र के रूपण [आरोप] के आधार पर अधरानृत पर पायूप का [अमृत-रस ] रिलष्ट पद द्वारा रूपण किया गया है। [यहाँ अमृत शब्द अधर का भी वाचक है ऐसा मानकर व्लेप स्वीकार किया गया है, किन्तु, कोपों में अमृत का अवर अर्थ नहीं मिलता। मुख पर चन्द्र का आरोप न होता तो मघर पर अमृत का आरोप न हो सकता, अतः एक रूपक दूसरे का कारण होने से यहाँ डिलष्ट परम्परित है किन्तु आरोष्यमाण की संख्या अनेक नहीं है अतः यहाँ केवल रिलट् परंमरित रूपक हुआ] [६= माल रिलस परम्परित = ]- [वृ० ]"ह प्रभो ! साप न्रह्ा के सौ वर्षों तक उच्च साम्राज्य करें। आप विद्दन्मानस के हंस हैं, वैरिकमलासंकोच के लिए सूर्च है, दुर्गामार्गण के लिए शंकर है, समित्स्वीकार के लिए अभि है। सत्यप्रीति में दक्ष है, विजयप्राम्भाव के लिए भीम हैं और उत्कृष्ट वीर हैं।" यहाँ 'तुन्ही हंस हो' इत्यादि जो आरोपण [आरोप, रूपक] है उन्हीं के आधार पर "मानस ही मानस है" इत्यादि आरोप होते है, अतः रिलष्ट शब्दों से युक्त माला-परमपररित [रूपक] है। [मानस= मन तथा मानस सरोवर; कमलार्सकोच=शन्ुपक्ष में कमला=लक्ष्मी का संकोच और सूर्य पक्ष में कमल का असंकोच । दुर्गामार्गण=राजपक्ष में दुर्गों का अमार्गण = न सोजना, शिवपक्ष में दुर्गा=सती का मार्गण खोजना, समिद=युद्ध और सभिधा; सत्यप्रीति =राज पक्ष में सत्य पर प्रीत्ति और दक्षपजापति के पक्ष में सती की अप्रीति; विजयप्राग्भाव=राज- पक्ष में = विजय = जीत उसका प्राम्भाव पहले से ही रहना; भोमलेन पक्ष में विजय = मर्जुन दससे पारभाद=आाकू पहले हुआ है भाव= उतपत्ति जिसकी, भीम अर्जुन से बड़ा था। इस प्रकार विद्वानों के चित्तरूपी मानस पर मानस-सरोवररूपी मानस का आरोप किया गया, तव राजा पर हुंस का आारोप हो सका। इसी प्रकार लैरियों की कमला का जो संकोच एतत्स्वरूप जो कमलासंकोच उस पर 'कमलों का असंकोच' एतत्स्वरूप कमलासंकोच का आरोप होने पर राजा पर सूर्य का आरोप हो सका, दुर्ग का अमार्गण एतत्स्वरूप दुर्गामार्गण पर दुर्गों का मार्गण एतत्त्वरूप दुर्गामार्गेण का आरोप
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१२६ अलङ्कारसवस्वम्
होनेमे राजा पर शिव का आरोप हुआ, युद्धरूपी समित पर समिधारूपी समित का आरोप करने पर राजा पर अग्नि का आरोप हुआ, 'सत्य पर प्रोति' एतत्स्वरूप मत्यप्रीति पर 'सता पर अमीनि' एनत््वरूप सत्यपीति का जारोप करने पर राजा पर दक्षपरजापति का आरोप हुआ तथा जीत रूपी विजय के ऊर अर्जुन रूपी विजय का आरोप होने से राजा पर भीम का आरोप सम्मन हुआ। इनमें हेतुभूत आरोपो में विषय और विषयी का सादश्य 'एकशम्द्रवाच्यत्व'-रूपी सागरण धर्म से हुआ। एकशब्दता का अर्थ है शब्दों की वर्गनुपूर्वा का अभिन्न होना। मानस, कमलासकोच दुर्गामार्गग, समिद, सत्यप्रीति, विजय ऐसे ही शब्द हैं जिननें 'म्+आ +न् + य +म् +अ' इस प्रकार वर्गानुपूर्वी एक है और जो चिछ् और तलावविशेष आदि ऊपर निर्दिष्ट विभिन्न अर्थों के वाचक है। एक ही शब्द जिन अनेक अर्थो का ज्ान कराता है उनमें एक वृन्न में लगे फलोें के ममान अथवा एक आवरण में छिपी दो दालें के समान अभेद माना जाता है। इम दलेप को एकवन्तगतफलद्यन्यायेन हुआ इलेप कहते है। वस्तुन एकवीजगतदलद्यन्यायेन दलेप कहा जाना चाहिए। यहाँ आरोप विषय एक ही है राजा, विन्तु आरोप के विपयी आरोप्यमाण अनेरु हैं दस, सूर्य आदि, अतः यह रूपक मालास्वरूप हुआ। पलत इसे मालारिलष्ट परम्परितरूपक कहना ठोक है] [७= अरलिष्ट =केवळ्व परम्परित = ]- [वूचि] 'मैं मन, दाणी और शरोर से मगवान् शकर के चरण युगल की करण में जाता हूँ जो कर्णात्मक है, जगव के प्रभु है और जन्म, जरा, मृत्यु रूपी समुद्र से पार उकरने वाले तरण्ट=नीका है।' [यहो जन्म जरा मृत्यु पर समुद्र का आरोप शिव चरणों पर नौका के आरोप का कारण है, आरोप को सख्या एक ही है और यहाँ इने्श नहीं है अतः अश्लष्ट केवल परम्परित हुआ] ८ = अदिन्ट मालापरम्परित =1- [वृत्ति ] "मालवेन्द्र का सट्ग युद्धम्थल में सर्वोत्कट है। वह राजलदमी का मरकत या हन्द्र- मणि का वना पल्ष है, पौरपसमुद्र का तरग है, नह सत्रुकुल पर विजय रूपी हाथी को [मद से] सरावोर कनपटी [दानास्तु पट्ट] है, युद्धभय से घरराप सुरल देश के स्वामो के यशरूपी इस के लिए नीलमेन है औौर पृथिवोस्मी पट रानी के लिए कचुकी है।' यहाँ "हमामीविदल्ल" पद में रूपक परम्परित होते हुए भी एकदेशविवर्नि है [क्षमा पर रानी का आरोप शास्द नहीं आर्य है] ऐमे और भा भेद अंसन सूचेन कर हा दिए गए है।" [ यह वधम्यें मे भी होना है, उमके उदाहरण आगे दिए जाएँग ]। चिमर्शिनी क्रमेपेनि यथोद्देशम्। द्विर्भाव: स्मरकार्मुकश्पेत्यत्र च वाक्यार्थपर्यालोचनयेन्दो. मरकार्मुरारोपप्रतीते, कुटिल वाद्यने कधर्मनिमित्त सादश्यमेव संबन्ध:। इन्दोश्चैरुस्य रहव आरोपा इनि मालारूपकम्। अनेकस्त तु यथा- 'वाह वालमृणालिके कुचतटी मागिक्यहर्म्य रते- मुकाशैलशिला नितम्बफलक हास सुवानिर्झर। वाच. कोकिलकजितानि चिकुराश्ेनोमवश्चामरं तस्यास्त्रस्तकुष्ङ्रपावकदृश कि कि न लोकोत्तरम्।।' अताने के पास ने कारोपादूपकमाला। इयं प श्लेपनिबन्ध नापिं दश्यते। यथा- 'नेत्रे पुष्करसोदूरे मधुमती वागी विपाशा मति- श्चेतो याति नदीनता कलयते शोणतवमस्याधर.।
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रूपकालह्कार: १२७
चारित्रं ननु पापसूदनमहो मामेष तीर्धाश्रयः स्नातुं वान्छति भूपतिः परमितीवोष्णोदकं वल्गति॥' अत्रानेकेर्षा र्लिष्टा अनेक आरोपिता इति रलिष्टार्थरूपकमाला। आभातीरयत्र समासोकिमन्ये मन्यन्त इस्युदाहरणान्तरेणोदाहियते। यथा-
भवोद्याने भक्त्या तब सह विशेपोल्लसितया विहृत्त व्यग्र: स्यामनुनतृतविवेक्प्रियसखः॥'
'पीयूपस्याधरामृतेन श्लिष्टशब्दरनिरूपगम्' इति लेखककल्पितोऽयमपपाठो जेयः। अघरामृतस्य हि पीयृषेण निरूपगमत्र स्थितम्। अतश्न 'अघरामृतस्य पीयूपेण श्लिष्ठ- शब्दनिरूपणम्' इति पाठो ग्राह्यः। क्त्र च पीयूपवदमृतशव्दस्याघररसावाचकत्वमन्ये मन्यन्त इत्युदाहरणान्तरमुदाहियते। यथा- 'अलौकिक महालोकपरकाशितजगस्त्य। स्तूयते देव सह्वंश मुक्तारत्नं न के भवान्।।' अन्र मुक्तारत्नमित्यारोपपूर्वको वंश एव वंश इत्यारोप इति श्लिष्टशब्दं केवल- परग्परितम्। विद्वदित्यादों हंसरूपगामाहाव्यान्मानसरूपेणेति परम्परितम्। एवमर्णवरुपणा तरण्डारोपस्य हेतुरिति परम्परितम्। पर्यङ्क इत्यत्रैकश्य वहव आरोपा इति मालापरम्परि- तम्। अनेकस्य तु यथा- 'श्री: श्रीघरोर स्थलखेन्दुलेखा श्रीकण्ठकण्ठाभ्रतडिच्च गौरी। शकात्तिपझ्माकरराजहंसी शची चवो यच्छतु मङलानि।' अत्र बहुनामने कारोपात्परम्परितमाला। एवमादय इति। परम्परितमप्येक्देशविवर्तीत्येवं प्रकारा:। सूचिता इति। एतव्दर्शनादेव। तवश्च सावयवं द्विविधमपि श्लिष्ट हृश्यते। तत्र समस्तवस्तुविपयं यथा- 'विह्ढन्तोठठदलउडं फुरन्तदन्ताकार वहलकेसरपअरन्। पहरिसचन्दालोए हसिअं कुमुएण सुरहिगन्धोग्गारम् ।।' [ सेतुबन्धे ४६] अन्न कुसुदस्य रिलष्टत्वम्। एकदेशविवर्ति चथा- 'यचारामौकिकार्घप्रकरपुलकितं चन्द्रिका चन्द्रनारभो- दिग्वं सप्तपिंहस्तस्थित करक पयोधौतमाकाश लिङ्ग्म् । तोयाधारे प्रतीचि च्युतवति दिनकृद्विन्वनिर्माल्य पद् मे तस्यार्चापुण्डरीकं व्यधित हिमकरं सत्व्रं मूध्नि काल:।' क्षत्र कालविपये पूजकादिरारोप्यमाणो न शाब्द हत्येकदेशविवर्तित्वम्। तोया धारस्य समुदनिर्मातयोद कुभाण्डचाचकत्वाच्छ्िलप्रख्वम्। क्रनेग=क्म से अर्थात जिस क्रम से नाम लिए गए हैं उसी क्रम से। "द्विर्भावः स्मरका सुंकस्य" = इस स्थल में वाक्यार्थ का विचार करने पर चन्द्रमा पर स्मरकार्मुकत्व के आरोप की प्रतीति होती है। उसमें बुटिलता आदि अनेक धर्मे पर भाव्रित सादृश्य ही संबन्ध है। और एक इन्दु पर अनेक का आरोप है इसललिए यह मालारूपक भी है। अनेक [ पर मनेक के आरोष] का उदाहरण चथा-"हरिण के डरे हुए छोने को सी आँखों वालो उस सन्दरी का क्या लोकोत्तर नहीं है-उसकी वाहे कोमल बाल मैणाल है, कुवस्थल रसे का माणित्यह:य है, नितम्ब सुकारोलरिल है, हाथ सुधानिर्झर है, चोली कोयल की कुक है औौर केश काम के चँवर है.।22 यहाँ सनेकों का अनेकों पर आरोप होने से इसे रूपकमाल कहना चाहिए। वह रूपकमाला कहों दलेपमूलक भी
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होनी है। यथा-"यह भूपति तोर्थीं [ पुण्यस्थान और गुरु, शास्त्र, प्राडिववाक आदि] का मश्रय है। इसके नेत्र पुक्ककर [पुष्करनाम तीर्ये और कमल] के महोदर है, इसकी वागी मधुमती [मभव है कश्मीर में इस नाम का कोई तीर्थ हो, सामान्य अर्य मिठासयुक्त ] रै, इमकी मति विपाशा [ इम नाम की नदी और पाश= उलझ या कुण्ठा से रान] है, चिच्त नदीनना [नदी का इन स्वामी =समुद्र तद्भाव तथा अदोनता को प्रात होता है, इसका अधर शोणत्व [शोगनद तदरूपता और ललाई] को धारण करता है, इसका चारित्र्य पापसूदन [पापनाशक] है। परन्तु आशचर्य है कि यह नहाने के लिए मेरे पास आ रहा है, केवल इमोलिए यह उष्ण जल निकल रद्दा है।" इसमें अनेक पर अनेक ्लिटों का आरोप है इसलिए यह डिवषार्थपकमारा है। 'आभाति ते' इस पद् में दूमरे लोग समासोकि मानते हैं। इमलिए इसके लिए दूसरा उदा- हरण प्रस्तुत किया जाता है-"ससाररूपी उद्यान में विवेकन्पी प्रियमित्र को साथ ले में नाना- विषयरूपो बनराजि में विकसित और अदवितीय आमोद [सुगन्ध तथा आनन्द] से मधुर आपकी सविदरूपी पुष्पश्री का चयन करते हुए मक्ति के सग विहार करने हेतु कब व्यग्र होऊँगा।" यहाँ भक्ति के कपर नायिका का आरोप शब्दत न हो कर अर्थत हुआ है। अन रूपक में यहाँ एक. देशविवर्तित्वर हुआ। ['अन्न वक्त्रेन्दु०' इत्यादि पकि में] 'पीयूपस्य अधरामूनेन रिलदश्दरनिरूपणम्' यह पाठ [इस ग्रन्थ के ] विपिकार ने अपने मन से गद लिया समझना चाहिए। यहाँ अपरामृत पर पीसूप [रूपी अमृत ] का निरूपण किया जा रहा है इसलिए, "अधरामृनस्य पोयूषेग रिवटशब्द- निरूपणम्" यह पाठ आाज् है। इस पद्य में कुछ लोग अमृत शब्द को पीयूध अर्थ का वाचक नो मानने हैं, परन्तु अधररस का वाचरु नहों। अन इम दूसरा उदाहरग देते हैं-"हे देव, आप सद्वशा [कुल और वॉम] के मुकामणि हैं और अलौकिक महान् आलोक से तीनों लोकों को प्रकाशिन करने वाले हैं। अतः आपकी स्तुति कौन नहीं करता।" यहाँ राजा पर सुक्तामणि का जो आरोप है उमसे 'कुरूपी वश ही वाँसरूपी वंश' इस प्रकार के वश पर वंश का आरोप ममन होना है, अन: यहाँ रिविष शब्दपूर्वक हुआ केवल [अमाला ] परम्परित रूपक है। 'विदन्मानसहंस' इत्यादि पद्य में इस के आरोप के माहात्य से [विद्वानों के चित्तरूपी मानस पर ] मानम का आरोप हुआ है, अन यहोँ मो परम्परितरूपक है [वस्तुन मानसरूपक कारण है और इंमरूपक कार्य रूपक है-उददेश्यविधेयमाव ऐसा मानने पर हो रक्षिन रह सकता है ] इमी प्रकार [याभि० इत्यादि पद्य में ] अरनत्र का आरोप [शकरचरणो पर] नरण्ट के आरोप का हेतु है, इमलिए वहाँ भी परम्परितल्पक है। 'पयङ्ो राजल्कम्या' पद्व में एक पर अनेक आरोप है, अन मालापरम्परिन हुआ। अनेक पर अनेक के आरोप का उदाहरण यथा-"विष्शु के वस्षरपी आकान की चन्द्रलेखा लक्ष्मी, शित्र के कण्डरूपी मेर की तडित गोरो तथा इन्द्र के नेवरूपा पद्म- सरोवर की राजहमी रचा अपका मंगल करे।" यहोँ अनेकु पर अनेक के आरोप से परम्परिन- माग हुई। एवमादय- अर्थात परन्परित भी एकवेश-विवची होता है, इम प्रकार के अन्यभेद। सूचिता अर्थात पूर्वोक्त भेदों को दिखलाने दिखलाते ही। इम प्रकार विचार करने पर दोनों प्रकार का सावयव रूपक मो श्विष होता है। दोनों में से समस्तवस्तुविषय यथा- [सेतुबन्ध में कुमुदवानर का वर्गन ४।६ }
प्रहूर्षचन्द्रालोके इसित कुसुदेन मुरभिगन्धोद्रारम्।।"
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रुपकालङ्कारा ६२९
पहर्प की चाँदनी में कुमुद हॅस पहा, उसके पंसुटियोरपी ओठ खुल गए, दन्त के आकार के वदुत से केसर (रेशे) साफ-साफ दिखाई देने लगे तथा सुगन्ध पूर्ण अलेला (उद्धार) भी दृष्टि- गौचर होने लगा।' यहाँ कुमुद शब्द रिलष है [ यहाँ कुमुदवानर के ऊपर कुमुदपुष्य का आरोप किया जा रहा है] एकवेशविवर्त्ती में शलेष- "तारारूपी मुक्तामय अर्व्ये से पुलकित, चांदनीरूपी चन्दनरस से लिस तथा सपर्पिमण्डल के हांथो में रसे करक (कमण्डल और ओले) के जल से धौत जो आकाशरूपी शिवललंग है उसपर कालने ने चन्द्ररुषी पूजापुण्डरीक चढाया जब सूर्यकपी निर्मात्यपभ पश्चिम दिशा में स्थित तोया- घार (समुद्र जलपात्र) में ना पड़ा। चहां कालरूपी विषय के ऊपर पूजा करने वाले आदि (?) का आरोप शब्दतः नहीं हुआा अतः यह एकवेशनिवर्त्ती हुआ। तोयाधार शब्द समृद्र और निर्माल्य के लिए निश्चित जलपात्र का वाचक होने से ल्ट है[ करक शब्द भी दिलप्ट है। करको दाटिमे पक्षिमेदे हस्ते कमण्डलौ! उख्वाकरंजवोमेंघोपले च'-अनेकार्थतंग्रह के इस वाक्य के अनुसार उसका अर्थ कमण्डद् भी है। इसी पद में हाथ के लिए हस्त शब्द का प्रयोग होने से करकका दूसरा अर्थ वर्षोपल =सर्थात भोले लेना होगा। तब करक शब्दवाच्यत्वेन अभिन 'कमण्डतु रूपी ओले के जल से' ऐसा अर्थ निकाला जावेगा ]। विमर्शिनी क्रचिच्चाभेदमेव दढयितुं विर्षायण निषेधपूर्वमारोप्यमाण्वेन तदीयस्ष्य वा भेद- हेतोधर्मंस्य हानिकल्पनेनाधिक्येन वा दडारोपतवेनापीद दश्यते। क्मेण चथा- 'क लिप्रिया शाश्रदपालिताज्ञावज्षां गुरुज्ञातिपु दर्शयन्ती। जाया निजा या ननु सैव कृत्या कृ:या न कृत्या सरलक्ष्य धार्मे:।।' अन्न कृत्या निपेधपूर्व जायायामारोपिता। तवविषेधेन हि जायाया कृत्यया दाडर्घेन साम्यं प्रतीयते। कृत्या तथा न स्वकरमणि व्याप्रियते यथेयं तक्कर्मणीति ह्रन्न वाक्यार्थः। अत्र च यदन्ये विशेपालंकारमाहुस्तद्मेदालंकारनिराकरणादेव निराकृतमिति न पुनराय- स्यते। हान्या यरथा- 'बनेचराणां व नितासखानां दरीगृह्योरसनिपक्तभासः। भवन्ति यत्रौपघयो रजन्याम्तेलपूराः सुरतप्रदीपा:॥' अन्नातिलपूरेग हानिकल्पनम्। आधिक्येन यथा- 'तुरीयो ह्वेप मेध्योऽग्निराम्नायः पञ्जमोऽपि वा। अपि वा जंगमं तीर्थ धर्मो वा मूर्तिसंचरः।' अत्र तुरीयत्वादेध्सस्याधिक्यम्। 'दढ तरनिबद्धसुष्टेः कोपनिषण्क्ष्य सहजमलिनस्य। कृपणस्य कृपापास्य व केवलमाकारतो भेद:॥' इत्यन्रापि दढारोपमेव रूपकं जेयम्। अन्न हि कृपाणस्येति समुच्चीयमानत्वेन
पत्तिः। सैव च रूपकसतत्व्रमिति पूर्वमेवोचम्। अन्येपि भेदा: स्व्यमेवान्यूद्योदाहार्याः। कहीं कहीं केवल अमेद की ही दढ़ करने के लिए विपयी का आरोप निषेधपूर्वक किया जाता है। कहीं कहीं उती विषयी के उस धर्मे की हानि या अधिकंता दिसलाकर आरोप किया जाता
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है जो [अभेद के विरुद्ध ] भेदक होता है। क्रम से उदाहरण यथा-सीधे और धर्मप्रिय व्यक्ति को कलहप्रनिय, कमी कभी आशा न पालने वाली, बडों की सदा अवशा करने वाळी अपनी जो सत्रीहो वही वस्तुन कृत्या है, कृत्या कृत्या नहीं। यहाँ जाया पर कृत्या का आरोप निषेधपुर्वक किया गया है। उमके निषेध मे जाया पर कृत्या का अमेद और अधिक दढना के माब प्रतोन होना है। इस पद्य का वाक्यार्थ है कि 'अपने कार्य में कृत्या उतनी तत्परता नहा दिन्लाती जितनी उमके कार्य में कर्कश्ा पत्नी। यहाँ [शोभाकर आदि] अन्य विद्वानों ने वो एक विशेष अलकार माना है उसका निराकरण हमने [उपमा के प्रकरण में] अभेदालकार के निराकरण द्वारा ही कर दिया है, अत अद पुन. परिश्रम नहों करते। [ भेदक धर्म की] इानि के द्वारा [ अभेदपुष्टि का प्ढाहरण ] यथा-"जिम [हिम- गिररे ] पर गुरागृह्दों की गोद में लगी रोशनी वाली ओषधियाँ ही मपत्नीक चनेचरों के लिश रति में तैलापेक्षारहित सुरतप्रदीप का काम किया करनी है।"यहाँ 'अनेलपूर' तेलपेक्षारहित कहकर हानि की कल्पना की गई है। नेदकधर्म की अधिकता के द्वारा [ अमेदपुष्टि का उदाहरण] यभा-"यह या तों चतुर्थ यश्ञाग्नि है, या पाँचवा वेद है, या फिर जगम तीर्थ है अथवा शरीर- धारी धर्म !" यहो चतुर्थत्व आदि विशोषणों की अधिकना बतलाकर अभेद दिसलाया गया है। "रूपण और कृपाण में केवल आकार [स्वरूप तथा 'आ' अक्षर ] मान का भेद रहता है, दोनों ही दृढतरनिवद्धमुष्टि [सुष्टि =मूठ, मुट्ठी ] होने है, कोपनिषण्ण [कोप= ग्यान, सनाना ] रहते है और स्वभावत: मलिन [ कृष्णवर्ण का, गन्दा] होने है।" यहाँ भी दृढ़ारोप रूपक ही है। यहाँ कृषाण का निर्देश समुचीयमान पदार्थ के रूपमें हुआा है, अत [कृपण पर] उसका आरोप शब्दतः प्रसीन नहीं होता, इनने पर भेद केवल आकार मात को लेकर वतलाया गया है अनः वाक्यार्थ की विवेचना करने पर दोनों का शेष सभी धर्मों मे युक्त होना प्रनीत होना है। इस प्रकार विषय- विषयी का सभेद अन्त में दृढना द्वारा ही होता है। यह अभेद प्रनाति दो वस्तुत रूपक का स्वरूप है यह पहले ही कह दिया गया है। ऐमे ही अन्य भेद भी स्वय ओंके जा सकते हैं। [व्यक्तिविवेककार ने इम पद्य में अभेद को अमभव ववळाया है, दभ्व्य दिन्दीव्यत्तिविवेक पृष्ठ-४३९, अवाच्यवचन दोप]। [ 'वनेचरागा0' तथा 'दृढतरनि०' में अछ० रत्नाकरकार ने अभेद नामक एक स्वतन्त्र जलकार माना था ]
इदं वैधर्म्येणापि दश्यते। यथा - [सर्वस्व ]
ज्योत्सनाऊष्णच तुर्दशी सरलतायोगश्वपुच्छच्छटा। यैरेवापि दुराशया कलियुगे राजावली सेविता तेपां शूलिनि भक्तिमाघ्रसुलमे सेवा कियत्कौशलम्।' अघ चारोप्यमाणस्य धर्मित्वादाबिप्लिट्संख्यात्वे5पि कचित्स्वतोSसंभ- वत्संख्यायोगम्यापि विषयसंस्यात्वम् प्रत्येकमारोपात्। यथा-'कचिजटा वल्कलावलम्बिन: कपिला दावामयः इत्यादौ। न हि कपिलमुनेरवहुत्वम्। 'भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूच्छी तमः शरीरसादम्। मरणं च जलदभुजगज प्रसह्य कुसते विष वियोगिनीनाम्॥' इत्यत्र नियतसंस्याककार्यविशेपोत्यापितो गरलार्थमभावितो विपशव्दे श्लेप एव। जलद्भुजगज्ञमिति रूपकसाधकमिति पूर्व सिद्धत्वाभावाल तधि- यन्वनं विषशन्दे श्लिष्टशब्दं परम्परितमिति श्लेप पवातेत्याङ्ग:।
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[वृत्ति] यह [रूपक ] वैधर्न्य से भी देखा जाता है। यथा-'जो सौजन्यरूपी जल के लिए नरुस्थली है, सुचरितरूपी चित्र के लिए आकवमित्ति है, गुणरूपी चन्द्रिका के लिए अँधेरे पार की चौदस है, [तथा ] सरलता [सीधेपन ] के लिए कुत्ते की पूँछ है ऐसी इस अत्यन्त दुष्ट चित्तवाली राजावली की मी कलियुग में जिन्होंने किसी भी दुरेषणा में पड़कर सेवा कर ली उनके लिए केवल मक्तिमात्र से सुलभ भगवान् शूली (शिन) की सेवा कितना बड़ा कौ झल है।' इस [रूपक] में आरोप्यमाण पदार्थ धर्मी होता है इस कारण उसमें [विषय का]लिंग और तंख्या अवध्य ही रखे जाने हैं किन्तु विषय की संख्या भी जो उसमें कभी-कभी स्वमावतः नहीं रहती, उसमें रखी जाती है क्योंकि आारोप करते सनय प्रत्येक धर्म का आरोप किया जाता है। जैसे 'कहीं जटावल्कल का अवलम्बन करने वाली दावाग्नियाँ कपिल हैं।'-इत्यादि स्थलों में। [ यहाँ 'कपिला:'-इस प्रकार ] कमिल [मुनि पक्ष] में जो बहुत्व है वह स्वाभाविक नहीं है। [वह केवल नियय दावान्नि के अनुरोध से लाया गया है] । "जलद-भुजग से उत्पन्न विष वियोगियों में भ्रम [ चकर ] अरुचि मालस्य, शून्यता (प्रलय), मू्च्छा, विपाद, शर्रारज्ैथिल्य तथा मृत्यु चरवश उत्पन्न कर रहा है।" -यहाँ उन उन गिने गिचाए कार्य [अमि आदि] से कुछ कुछ अतोति विषय बनाया गया तथा गरत अर्थ में अधिक प्रभावपूर्ण बनाया गया विपशब्द में जो रेप हैं उसमें 'जलद-सुजग'-में रूपक की सिद्धि होती है अतः [रूपक के क्लेप से] पहले न रहने के कारण यहाँ उस [रूपक ] के आधार पर विप शब्द में श्लिष्ट पद परम्परित रूपक नहीं माना जा सकता, अतः यहाँ शलेप ही है ऐसा कहा गया है। विमर्शिनी
वैधर्न्यगापीति। न केवलं साधर्म्येणेयर्थः । अस्य च विच्छ्ित्तिविशेपाम्तरं दर्शयितु- माह-अवेत्यादि। आ्ाविष्टलिङ्गत्वेऽपीत्यनेन धर्मिगः स्वरूपमात्रपर्यवसितत्वेऽपि धर्र्यन्त- रसंबन्धिन: संख्यात्मनो धर्मान्तरस्यापि स्त्रीकार इत्यावेदितम्। असंभवत्संख्यायोगस्येति। यद्यप्येकादिव्यव हारहेतुः संस्येति नी:िया एकस्मितपि दव्ये तदोग: संभवति तथाप्यनेक दृव्यवर्तित्वाद्यमिपायेणैतदुक्तम । प्रत्येकमारोगदिति अयमपनिः कविलोऽयमिः कपिल इश्येवंरूपात् अतश्षारोप्यमागस्य कपिलसुनेवरहुत्वायोगाद्विपयसंख्यत ्वम। रलिष्टतानि चन्धनस्य परम्परिवस्य श्लेपाहविलनणयं दयोतयितुमाह-अ्रमिमिति । प्रमाषित इति।' प्रथममेव प्रतीतिगाचरीकृत इव्यर्थः। वैधर्म्य से भी अर्धात केवल साधर्न्य से ही नहीं। इस [ रूपक ] के अन्य प्रकार दिखलाने के लिए कहते है-'अत्' इत्यादि। आविप्टलिङ्गववेऽपि ऐसा कहकर अन्थकार यह नेतलाना चाहते हैं कि [आरोप्यमाण ] धर्मी यद्यधि अपने ही रूप में रहता है तथापि उसमें दूसरे धर्मों से सम्बन्धित संख्याल्वी धर्म भीआ जाता है। असंभवत्संख्यायोगस्य 'संख्या एक दो आदि व्यवहार का हेतु धर्म है' इस नियम के अनुसार एक द्रव्य में भो संख्या रह सकती है तन भी अनेक द्रव्यों में रहने आदि के अभिप्राय से यह कहा। प्रत्येकमारोपात अर्थात 'यह अग्नि कपिल है' 'यह अग्नि कपिल है' इस प्रकार के आरोप से। इसी कारण आरोप्यमाण कपिलमुनि में बहुत्व न होने पर भी उसमें विषय (दवाग्नि) की संख्या लाकर वहुत्व दिखलाया गया। श्लेषमूलक परन्परित रूपकों का इनेप से मेद दिखाने के लिए कहते है-'भ्रमिमरतिम्'। प्रभावित अर्थात पहले ही प्रतीतिपथ में अवती्ण।
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विमर्शिनी पूर्व सिद्धत्वाभावादिति। स्पकस्व श्लेपहेतुत्वाद्। तन्निबन्धनमिति रूपक निबन्धनम्। इति शब्दो हेती। अतश् श्लेप एवात्रारंकारों न परम्परितं रूपकमित्यत्र तात्पर्यम्। चिन्त्यं चैतव। यतः श्लेपस्तावद्वान्य योर्हूँथोः प्रकृत मोरपछृनयो प्रदृताप्रटृतयोक्ष भवति। अत्र प न दयो: परकत्त्वं नाष्यप्रवृतत्वम।वर्षासमये जलदस्येव जलस्य वर्णनीयरचातु। प्रकृताप्नवृतयोक्ष विशेपणसाग्य एव श्टेयो भवति इद तु विशेष्यस्यापि साम्यमिति शब्दशकायुत्थितर्य ध्वनेरय विपयो न सलेपस्य। अतक्ष नात्र रलेपालकार। नापि ध्वनिः। जलद मुजगजमिति रूपक माहाल्याष्छव्दरवत्या गरलार्थस्यामिघानात्। एवमत्र श्लिषटशब्दनिबन्धनं [रूपकमेवालंकार ] जलदभुजगजमिति रूपकान्तरेणापि गरलार्थो यदि प्रतीयते तत्स ध्वनेविषयः स्यादित्युक्तम्। स्थिते तु जलदभुजगजमिति रूपके तन्माहाक्यादेव विपशव्दे शिलिष्टशन्दनिबन्धनं रूपकम्। अन्यथा हि जलद्भुजगजमिति रुपक व्यर्थ स्याद्। तेन बिना हि गरलार्थ पतीयत इत्यल बहुना। पूर्व सिद्धत्वाभावात = पहले से सिद्ध न होने के कारग अर्थात् क्योंकि यहाँ रूपक इलेयमूलक है। तविवं्धनमिति रूपकमूल्क। इति शब्द यहाँ हेत्वर्थक है। इसलिए तातपये यह हुआ कि यहाँ इलेष ही अलकार है, दिलट्टपरपरित रूपक नहीं। किन्तु यह मान्यता शोचनीय है, क्योंकि श्लेप होता है केवल दो वाच्य अर्यों में चाहे वे केवल प्रकृत हों या केवल अप्रकृत अथवा प्रकृताप्रकृत दोनों। इम [भ्रमिमरनि०] पद्य में न नो दोनों प्रकृत ही है न अप्रपृत हो, ग्योंकि वर्षा काल में जैसे बादलों का वर्शन किया जाता है वैमे ही पानी का भी [अतः यदि एक प्रकृत है तो दूसरा अप्रकृत और यदि एक अप्रकृन है तो दूसरा प्ररृन ] प्वृत और अप्रवृत दोनों का श्लेप केवल वहीं होता है जहाँ केवल विशेषतें ने समानना होती है[ यथा समासोक्ति में ] कितु इस पद्य में विशे्यों में भी समानना है। इसल्यि यद्द पद्य शन्दशक्ति मूल्क ध्वनि का स्थल [हो सकता जैसा कि मम्मट ने भी माना है] है, इलेष का नहीं। इसलिए यहा शनेपालकार नहीं है। [वस्तुत ] यहाँ ध्वनि भा नहीं है। इमलिए कि 'जल्द-मुजग-ज' पद में तो रूपक हुआ है ८सके दल से गरल-रूपी अर्थ शब्ददक्ति [ अभिषा] से शी प्रतात हो जाता है। इस प्रकार यहा रिवष् शन्दमूलक रूपक ही अल्कार है। हाँ यदि यहां 'नलद-मुजगज' के रूपक के द्वारा भी गरल रूपी अर्थ [अभिषा द्वारा कोवेन न छोकर] व्यजना द्वारा ही प्तान हो तो उसे ध्वनि का विषय कड़ा जा मयेगा। किन्तु जब यहा नलदभुजगम्र-पद में रुमक हो रहा है तब उसी के आधार पर विपशब्द में भी रिनपश्न्दमूटक रूपक ही मान्य होगा। ऐसा न मानने पर 'जद्दभुजगज' का रूपक निरथना ठठरेगा। कर्यों कि गरल- रूपी अर्थे को प्रनीति उस रपक के बिना मी [व्यबन, द्वारा] प्रनोन हो जनी है। अर्तु,-अधिक विवेचन से कोइ लाम नही। विमर्श-प्रकृताप्रकृतनिष्ठ दलेष भी नैषालंकार होता है यदि यह मान लिया जाय तो समामोकि का उच्छेद हो जाता है। उसी में केवल विरोपगों की उमवार्थकरा के कारम अमत सर्थ की प्रनीति होनी है। अमहनार्थ की प्रतीति भी विशेषणशब्द व्वजना द्वारा कराने हैं, अत वहाँ दोनों अर्थ वाच्य नहीं होने। इस प्रकार दो नाच्य जर्थो में ही इलय मानकर प्रकृतापकु- तोभय में भी एक साथ दलप मान लेना अममत है, क्योंकि अप्रनत अ वहाँ कभी भी वाच्य नहीं होगा जहाँ उसके साथ प्रकृत अर्थ रदेगा। वहाँ अभिना केवल प्रटत अर्थ में सीमित रहेगी। यदि दोनों अर्थो की मतोनि हो बाने पर प्रकृतल और अप्रकतव की प्रनीनि मानी जाय और प्रकृतत्व की प्रनीति को अप्रकृतार्थ की अमिधा में बाघक न माना जाय तो उस प्राथमिक प्रतीनि
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रूपकालक्वार: :१३३
में श्लेय तो माना जा सदोगा, किन्तु उसे अलंकार नहीं कहा जा सकेगा क्योंकि वहाँ चमत्कार समासोकि से ही होगा, अतः उसी में अलंकारत्व माना जायगा। टीकाकार ने प्रकृताप्रकृतोभय में कराचित श्लेपालंकार स्वीकार न कर केवल इलेप स्वीकार किया है। यदि ऐसा है तो नह मान्य है। दशरूपक के नोकाकार धनिक ने 'उद्दामोत्कलिकाम्' इत्वादि उपमापद्य में समासोति स्वीकार की है और अप्रस्तुतप्रशंता के "येनात्यम्युदितेन" पद्य में मन्मट ने भी। वहाँ समासोकिमद केवल तुत्यविशेषणमात्र के लिए प्रयुक्त किया गया माना जाता है। अलंकारत्व उपमा और अप्रस्तुतप्रशंसा में ही नाना जाता है। इसा प्रकार समासोकि में मो श्लेष का अर्थ यहाँ पूर्व- विश्लेपित कवन्तगतफलदयन्याचेन वचर्थकनामात्र या दोअ्थो का आपस में चिपटे रहना हो मानना होगा। प्राचीन माचार्यों ने इलेप को महत्त्व दिया है और अलंकारान्तर स्थलो में भी उसी को अलंकार माना है, किन्तु चह नहीं कहा जा सकता कि विमाशनींकार उन्हों के अनुसार विवेचन कर रहे हैं, क्योंकि प्ाचोनों के इस मत का मम्मट ने नवम उत्कास में भलोमाँति खण्डन कर दिया है और विम्शिनीकार उन्हीं के अनुचावी हैं, किन्तु आगे स्वयं अलंकार सवसककार ने भी प्रकृतापंकृतो- भयगत श्लेप स्वीकार किया है। टीकाकार ने उन्हों के अनुसार यहाँ श्लेपविवेचन किया है।
रुपक का इतिहास :- भरतमुनि="स्वविकल्पेन रचितं तुल्यावयवलक्षण्। किचित्सादृशय संपन्नं यद्रूप रूपके तु सत । १६।। ५६। अपने [ उपमान के] रूप से निरूमित जो उपमेय का रूप वहाँ रूपक होता है। उसके दो मेद होते हैं सांग [ तुल्यादयव ] और एकदेशविवर्ती[ किचित्सादृश्य]। उदाहरण="पद्माननास्ता: कुमुदपभासा विकाशनीलोतपलचारनेत्राः। वापीस्त्रियो हंसकुल: स्वनद्द्िर्दिरेजुरन्योन्यमिवालपन्त्ः ।।' भामह='उपमानेन यत तत्त्वमुपमेवस्य रुप्यते। गुगानां समतां दुष्ट्चा रूपके नाम तद्विदुः ॥।२।२१।। समस्तवसतुविषयमेकदेशविवरतति च। द्विया रूपकमुद्िष्टमेतव गुणों की समता देखकर उपनेय का जो उनमान के साथ अभेद या तादूष्य वसलाया जाता है उसे रूपक कहा गया है। यह दो प्रकार का होता है १-समस्त वस्तुविषय और २-एकदेश- विचर्त्ती वामन = उपमानेनोपमेयत्य गुणसाम्यात तत्वारोपो रुपकन् ।४।३।६। 'गुणों के सान्य से उपमेय का जो उपमान के साथ अभेद नही रूपक।' उन्नट = 'श्ुत्वा सन्वन्धविरहाव यद पदेन पदान्तरम्। गुणवृत्तिप्रधानेन युज्यते रूपकं तु तत ॥ १। ११।। अभिषाद्वारा सन्नन्ध न हो सकने पर लक्षणाद्वारा पद का दूसरे पद के जो संवन्धित होता हैं वही रूपक है। भेद = "वन्धस्तस्य यतः क्ुत्या अुत्वर्थाभ्यां चे तेन तद।
समस्तवस्तुविषर्य मालारूपकमुच्यते। यद् वैकदेशवृत्ति त्याद पररूपेण रूपणात्" ॥१३ !।
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यह या तो पूरा का पूरा शब्द द्वारा की प्रतिपादित रदता है या तो अशनः शब्द और अत: अर्थ द्वारा इम कारण इसके क्रमशः दो भेद हो जाने हैं। समलवस्तु विषय तथा एकदेशविरसी। समस्तवस्तुविषय को मालारूपक भी कहा जाता है। एकदेशविवती रूपक केवल एक स्थान में उपमान के स्पष्ट उल्लेस न होने से होता है। कारिका में आए "एकदेशवृत्ति"-शब्द का विग्रह प्रतोहारेन्दुराज ने इस प्रकार किया है-"एकदा अन्यदा ईश. प्रभविष्णुयोडमौ वाक्यार्थ तदवृत्तित्वं रूपकस्याभिमतम्।" अर्थाद एकदा= पकवार ईश प्रभावपूर्ण जो वाक्यार्थ उसमें वृत्ति= रद्दने वाला रूपक। यह एक विचित्र व्याख्या है। यदा ज गुणवृत्ति शब्द आया है उसका अर्थ गोणी सारोपा दक्षणा है। [ द० काव्यप्रवाश् उल्कास-२]। कन्ट= 'यत्र गुणानां साम्ये सत्युपमानोपमेययोरमिद्ा। अविवक्षितसामन्या कक्प्यत इति रूपकं प्रथमम्॥८।३८ ।। उपसर्जनोपमेय कृख्वा तु समासमेतयोरूमयो। यत्ु प्रयुग्यते तद् रूपकमन्यव समासोक्तम् ॥८1४0 ॥ सावयव निरयव मकीण चेति भिद्यते भून । दयमपि पुनर्दिधैतव ममस्तविषयेकदेशिनया ॥४१॥ जहाँ साम्य हो और उसके आधार पर उपमान तथा उपमेय का जातिनिरपेक्ष [अनिवक्षिन सामान्य] अभेद वही रूपक कहलाता है। जहाँ उपमान और अमेय दोनों का समास होना है और उसमें उपनेय अप्रधान रहता है वह रूपक समासरूपक कहलाता है। इसके नातयव, निरवयव और सकीर्ण ये तीन भेद होते है। यह दोनों प्रकार का रूपक समम्तवस्तुविषय और एकदेशी इस प्रकार से पुन दो दो प्रकार का होता है। मम्मट= 'तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययो.।' समस्तवस्नुविषय औता आरोपिता यदा ॥ ओता आर्थाय ते यरिमन्नेक देशविवत्ति तव। साक्षमेतन्निरग तु शुद्ध माला तु पूर्ववत ।। नियता रोपणोपाय स्यादारोप मरस्य यद। तत परम्परितं श्लिटे वाचके भेदमाजि वा 11 उपमान और उपमेय का अनेद रूपक होता है। वह तीन प्रकार का होना है साङ (सावयव), निरग (निरवयन) तथा परम्परित। इनमें से साग दो प्रकार का होता है ममस्नवसत विषय अर्थाद् जिसमें सभी आरोपित पदार्थ शब्दत कथिन होते हैं और एक रेशविवर्ती-अर्थात जिममें कुछ आरोपित पदार्थ शम्दन कथिन और कुछ अर्थत प्रनोतिगोचर होने है। यह निरग रूपक या तो मालारूप होता है या केवल या शुद्ध परम्परिन में एक आरोप दूसरे आरोप का कारण होता है। इसमें कहीं सो उनमान और उपमेय दोनों का कथन किसा एक ही श्लिष्ट पद से होता है, कहों कहीं दोनों का पृथक पृथक उत्लेख रदता है। दोनों प्रकार का यह या तो मालारूप होता है या केवल या शुद्ध। इस पकार रूपक आाठ प्रकार का होना है। शोभाकर का पकनिरूपण विमविनी में आाए आरोप के सदर्भ में दिया जा चुका है। इस प्रकार मम्मट और अलंकारसर्वंस्वकार दोनों का रूपकनिरूपण सिद्धान्नन एक और अभिन्न है। दण्डी की "उपमेव निरोभूतमैदा रूपकमिध्यत" यह एक पक्ति यहाँ किमी भी प्रकार से आा गई है। वैसे दण्डी का कोईं प्रमाव अटकारसर्वस्त्र में नहीं दिखता।
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संजीविनीकार ने रूपक का विवेचन सग्रहकारिकाओं में इस प्रकार उपनिवद्ध किया है- "यव त्वमेदप्रधानं त्याव साधर्म्य तद, द्विया मतन्। आरोपाध्यवसानाभ्यामारोपे रूपक भवेव॥ वस्तुतो भेदसद्भावाद शठ्क्या नातिशयोक्तिता। विपयस्यानपहुत्या न चैतव स्यादपहुतिः।। सतो विषयिरूपेण रूपवान् विपयो बतः। आरोपणेन कियते तेनैतद रूपकं मतम्॥ भेदस्तृतीयो यरत्वन्र परम्परितसंक्षक: । साधन्येणैव तत्सिद्धिनैधर््येणापि दृश्यते॥ िपय्यारोप्यते येन प्रतिस्वं विपयेपु तत। भवेद् विषयसंख्यात्वं संख्यामेदे निधानणः ।। रूपकं पूर्वसंसिद्धं श्लेपमुत्यापयेद् यदि। तदा रूपकमेव स्ादन्यथा इलेष इम्यते।," अभेदप्रधान साधम्य दो प्रकार से होता है आरोप और अध्यवसान से। इनमें से आरोप होने पर रूपक होता है। इसमें भेद वस्तुतः रहता है इसलिए इसे अतिशायोकि नहीं कहा जा सकता और न अपहुति ही, क्योंकि इसमें विषय छिपाया नहीं जाता। इसलिए क्योंकि इसमें विघयी विषय को आरोप के द्वारा अपने रूप से रुपित करता है अतः यह रूपक माना जाता है। इसका जो तीसरा भेद परम्परित रूपक है उसकी निष्पत्ति साध्न्यं के अतिरिक्त वैध्न्य से भी होती है। इसमें [विषयों में से एक-एक करके ] प्रत्येक विषय पर विषयी का आरोप होता है अतः उस [दिपयी] में विषय की मंख्या चली आती है और भिन्न धर्म से युक होने पर भी उस [ विपयी] मे विषय- सिद्गता का समावेश भी कर दिया जाता है। पहले से निष्पन्न छोकर यदि रूपक श्लेप की उद्भावना को जन्म दे तो वहां अलंकार रूपक ही माना जावे, इसके विपरीत इलेप ही अलंकार माना जाता है।
[सर्वस्व ] [सू० १७] आरोध्यमाणस्य प्रकृतोपयोगित्वे परिणाम:। आरोष्यमाणं रूपके प्रकृतोपयोगित्वाभावात्प्रकृतोपरअकत्वेनैव केव- लेनान्वयं भजते परिणामे तु मकंतात्मतया आरोप्यमाणस्योपयोग इति प्रकृतमारोप्यमाणरूपत्वेन परिणमति। आगमानुगमविगमख्यात्यभावात्सां- ख्यीयपरिणामवैलक्षण्यम्। तस्य सामानाधिकरण्यवैयधिकरण्यप्रयोगाद् द्वैविध्यम्। आद्यो यथा- 'तीर्त्बां भूतेशमौलिस्नजममरधुनीमात्मना सौ तृतीय स्तस्मै सौमित्रिमैत्रीमयमुपहतवानातरं नाविकाय। व्यामग्राह्यस्तनीभि: शवरयुवतिमिः कौतुकोदश्चदक्षं कुच्छ्रादन्वीयमानस्त्वरितमथ गिरि चिन्रकूटं प्रतस्थे।।'
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.१३६ अलङ्कारसर्वस्वम् अन्र सौमित्त्रिमैत्श्री पकता आरोष्यमाणसमानाधिकरणातररुपत्वेन परिणता। आतरस्य मैत्त्रीरूपतया प्रकृते उपयोगात्। तद्घ यथा समा- सोक्तावारोग्यमाणं प्रकृतोपयोगि तच्चारोपविषयात्मतया तत्र स्थितम्, अत पव तत्र तद्वयवहारसमारोप: पवमिदापि शेयम्, केवलं तत् विषयस्यैव प्रयोग:, विपयिणो गम्यमानत्वात्। इद तु दयोरप्यमिधानम्, तादात्म्यात् तु तयो: परिणामित्वम्। द्वितीयो यथा-
क्षितिभर्तुरूपायनं चकार प्रथम तत्परतस्तुरंगमाययैः॥' राजसंघटने तूपायनमुचितम्। तच्चाध वचोरूपमिति वचसां व्यधि- करणोपायनरूपत्वेन परिणाम: । [वृत्ि] रूपक में आरो्यमाण केवल प्रकुन अर्थ का उपरजक [शोमावर्षक ] दोता है, क्योंकि बइ भरुतोपयोगी नहीं होता। परिणाम में आरोप्यमाण का प्रकृतरूप से उपयोग भी होता है इसलिर प्रकृत यहाँ आरोप्यमाणरूप से परिणत होना है। साख्यशान्त्र के परिणाम मे यह [अलंकारभूत ] परिणाम मिन्न होता है, इसलिए कि इसमें आगम, अनुगम तथा विगम की स्याति [रान] का समाव रहता है। उम [परिणाम ] के दो भेद होने है। एक वह जिसनें सामानाधिकरण्व का उपयोग किया जाता है और दूसरा वह जिसमें वयधिकरण्य का। इनमें प्रथम का उदाहरण- [एक लक्ष्मण और दूमरी सीनाजी इनके अतिरिक्त ] तीसरे स्वय [भगवान् राम ] ने शकर- जी की मौलिमाला देवनदी [ गगा जी] को पार किया तथा नाविक [निपाद गुद ] को लक्ष्मण की भैन्री उतराई के रूप में दी। इसके पम्चाद वे अतिशीन चित्रकूट गिरि की ओर चलै। उस समय बनके पीछे वे कौनूहलवश मँसे उठाकर शबर प्मदार कठिनाई से चल रही थी जिनके स्तन दोनों भुजाएं फैलाने पर पूरी तरह से पकड़े जा मकने थे। [व्याम= व्यामी वाहो सकरयोस्नत- बोस्तियंगन्तरम् = अमरकोप', १जों सहित बाजू की ओर फैले हा्थों का फॉसला व्याम ]। यहाँ रक्षमण की मैत्री प्रकृत है और वह (आतरम् इस प्रकार) उमी की कारकविभकि [दितीया] के माथ प्रयुक्त तथा अभिनरूप से विवक्षिन आतर के रूप में परिणत हो रही है, क्योंकि आतर का प्रकृत में उपयोग मेत्रोरूप से ही हो सकता है। इस प्रकार जैसे समामोकि में आरोप्यभाग [अप्रकृत ] प्रकृतोपयोगी होता है और वह वहाँ आरोपविषयरूप से ही अवस्थित रहता है जिस कारण उम [आरोप्यमाग अप्रकृत] के केवल व्यवदार का ही [प्रकृत व्यवहार पर ] आरोप होता है यही स्थिति यहाँ भी समझनी चाहिए। [अन्तर ] केवन् [इतना ही रहता है कि] वहाँ [समामोकि में ] केवल विषयमात्र शब्दत [अभियावृत्ति से] कथिन होता है क्योंकि वहा विषयो व्यग्य [व्यंजनावृत्ि से कथिन ] रहता थै, और यहाँ [ परिगाम में] दोनों हो अभिग द्वारा ही कहे जाते है। परिणाम इननें इसलिए माना जाता कि इनमें तादात्म्य रह्दता है। दूसरा यया- 'इसके पश्ात पडले तो परिनाक को प्राप्त तथा सरस किन्तु चकरोकिपूर्ग वचनों से राजा का उपायन [उपहार ] किया उसके पश्ाव धोड़ों आदि से।'
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परिणामालह्कार: १३७
यहाँ राजा के मिलने पर उपायन [भेंट] देना आवश्यक [उचित ] होता है। यहां वह वचन- रूप है इसलिए यहां वचनों का भिन्नविभक्तिक उपायन के रूप से परिणाम है। चिमर्शिनी
व्याचष्टे-आरोप्यमाणमित्वादिना। प्रकृतोपर अकत्वेनेति। यदुक्तम्-विपयिणा विपयस्य रूपवतः करणादूपकमिति। प्रकृतात्मतयेति। प्रकृताङ्गतयेत्यर्थः। उपयोग इति। तेन विना प्रकृतार्थस्थानिप्पतः । परिगमतीति। प्रकृतमप्रकृतव्यवहारविशिष्टतयावतिष्ठते । प्क्रत- स्वरूपमात्रावस्थाने प्रकर णार्थानिप्पतेः। एवमत्र प्रकरणोपयोगित्वा भावादित्यारोप्यमाण- स्योपयोग इति चान्वयव्यतिरेकाभ्यां प्रकृतोपययोगित्व स्यासाधारणत्वं दर्शितम्। जला- धारणत्वस्य हि धर्मस्य तत्वव्यवस्थापकत्वाव्नक्षणत्वम्। अतश् नासत्येवालंकारानतरेपु प्रकृतोपयोगित्वम्। एवम्- 'आशास्यमन्यतपुनरुत्तभूतं श्रेयांसि सर्वा्यधिज्ामुपस्ते। पुन्नं लभस्वामगुणातुरूपं भवन्तमीडयं भवतः पितेव ।।' इत्यओ्रोपमायाम, 'अन्नानतरे सरस्वत्यवतरणवार्तामित कथयितुमवततार मध्यमं लोकमंशुमाली' इत्यादावुत्पेकायाम्,
मरगअसेवालो व रिणिगण्णतु हिकमीणचकाअसुअम ॥' दृत्यत्र च रूपके तथान्यालंकारेप्वीचित्य मेव नोपयोग: । औचित्यं हि सिद्धस्य सतः प्रकृतार्थोपलम्भकं भवति। उपयोगः पुनः सिद्धावेव पकतार्थहेतुतां भजते इत्यनयो- महान्मेदः । तथा हि- 'अनन्वये च शब्दैक्यमौचित्यादानुपङ्गिकम्। अस्मिस्तु लाटानुप्रासे साप्षादेव प्रयोजकमू॥' इत्यत्रैकस्यैव शब्दैक्यस्यौचित्योपयोगाभ्यां भेद उक्ता। अतश्रौचित्योपयोगयोर्भेंद- मजानद्वि: सर्वत्रैव प्रकृतोपयोगित्न मन्येंयंदुक्तं तदयुक्तम्। तस्माद्रपकादन्य एव परिणाम:। इह पुनः अप्रकृतार्थस्य पकृतार्थारोपमन्तरण सिद्धिरेव न भवतीति प्रकतोपयोगितैव जीवितम् । 'दाहोडम्भ: प्रवृतिपच: प्रचयवान् चाप्पः प्रणालोचितः श्वासा: प्रेद्ितदी प्रदीपलतिका: पाण्डिग्नि मग्नं वपुः। किं वान्यत्कथयामि रात्रिमखिलां स्वन्मार्गवातायने हस्तच्छस्त्रनिर्द् चन्द्रमहसस्तर्या स्थितिवंतते ॥1 अत्र हि चदत्त्रारोपमन्तरेण चन्द्रातपरोध एव न भवतीति तस्य प्रकृतोपयोगिव्वम्। अतक्ष प्रकृतमप्रकततया परिणमतीति परिणामः। ग्रद्येवं सहिं सांस्यीयपरिणामादस्य को विशेष इत्याशङ्जयाह-आगमेत्यादि। 'जहदुर्मान्तरं पूर्वमुपादत्ते यदा हायमू। तत्वादप्रच्युतो धर्मीं परिणामः स उच्यते।' इति सांख्योयपरिणामलत्तणम् । मैत्ीरूपतयेति। मैन्यातमतयेत्यर्थः। उपयोगादिति। आतरमन्तरेण तरणायोगाद्। अतश्र प्रकृते यत आतरस्योपयोगसततश्ष प्रकृताया एव
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१३८ अलद्कारसवस्वम्
त्यादिना। अन्नति परिणामे। समामोक्ी चारोप्यमाणस्य प्रकतोपयुक्तवम्। प्रकृत. सिद्ध धर्य मेवा्रकृतस्यानेपात्। आरोप्यमाणमपि तम प्रकृतावच्छेदकरवेन स्थितं न पुन- राच्छ्रादुकत्वेनेत्याह-तच्चेशयादि। अन एवेति। आरोपविषयारमकरवादेव। तन्नेति समासोक्ौ। एतदेव प्रकृते योजयति-एवमित्यादि। यध्येवं तहिं समासोकिपरिणामयो: को विशेष इत्याशङ््याह-केवळमित्यादि। तयोरियामधीयमानयोहवयोः। उचितमिनि। उपयुक्त्नयेति शेप.। आरोप्य-आरोपविषयत्वरूपी सम्बन्ध का साम्य रहने पर मी रूपक से मिन्नता दिसलाते हुए इसी [ परिणाम] की व्याख्या करते है= आरोप्यमाणम् आदि के द्वारा। प्रकतोपरक्षकष्व जैमा कि [सवय अन्थकार ने ही] कहा है-'विषयी के द्वारा विषय का अपने रूप से युक्त बनाए जाने के कारण रूपक कहलाता है।' पकृतान्मतया प्रकृत के अग के रूप से उपयोग क्योंकि उसके विना प्रकृत अर्थ की निग्पत्ति नही होनी। परिणमति पव्टत अप्रकृत के व्यवहार से विशिष्ट होकर प्रस्तुन होता है। यदि केवल पक्टनम्वरपमान्न से प्रस्तुत हो तो भाकरणिक अर्थ की निष्पत्ति न हो। इम प्रकार यहा 'प्रकरणोपयोगित्वाभाव' तथा 'आरोप्यमाणोपयोग' दो पदों के द्वारा अन्वयव्यनिरेक दिखनकर [ परिणाम में विषयी के] प्रकृतोपयोगित्व की [अरकारान्र से] असावारगता दिसलाई। यह इसलिए कि जो धर्मे अमावारण होता है वह वस्तु का मूलभून रूप [ तत्त्व ] न्थापित करने वाला होना है, अत. उमे उम वस्तु का लक्षण कहा जाता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि अन्य अलंकारों में प्रकनोपयोगित्व नहीं रहता। इस प्रकार-[कौत्स की रघु के मति उति=रघुकश मर्ग-4] 'सभी भरेय प्राप्त कर चुके आापके लिए अन्य कोई चाहने योग्य वस्तु [उसकी प्राप्ति का आशीर्यंद] निर्थर होगा। आप आत्मगुणों [आपके अपने गुण तथा राजा के व्यक्तित्व के लिए 'आत्ममम्पत' नाम से राजशास्त्रों में निर्दिष्ट गुण] के अनुरूप पुत्र उसी प्रकार पाऐँ जिस प्रकार आप के पिता ने आप जैसे स्तुत्य पुन्र को पाया है।' यहा उपमा में, "इम बीच सरस्वनी के अवतार को बात कहने के लिए मानों, सूर्य भगवान् मर्यलोक में अवतीगं हुए।"इत्यादि उत्प्रेक्षा में, तया-
'मन्दराचलस्पी मेव से क्षोमिन चन्द्रमारूपी राजहंस छोढचुका है जहरुपी गोद जिमका तथा मरकत [ हरितमगि ] रूपी भवाल पर बेठे हुए है चुपचार मीन और चक्रवाक के जोड़े जिसमें ।5हम रूपक में और इमी प्रकार अन्य अलकारों में भी भचित्यमान्र है उपयोग नहीं। औचित्य जो है वह उसी पदार्थ को प्रकृत पदार्थरूप बनाने में सदायक होना है जो पहले से सिद्ध रद्दता है [जिमे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पडनी] और जो उपयोग है वह तो प्रकृतपदार्थरुप बनने के लिए [अपरकृतपदार्थ की ] सिद्धि [ प्रकृत क्रियान्वय] में हेतु बनाता है। इस प्रकार इन दोनों में महान् नेद होता हू। जैसा कि पहले-"अन्वय में शब्दों की आवृति [ऐव्य ] भचित्य के [अर्थात होनी ही चाहिए इम ] कारण होनी है अन वह आनुपदिक होती है। टागनुपास मे वह स्वरूप निगपादिका होती है।"-इम स्थन् में एक हो शव्दैक्य में औवित्य तथा उपयोग के आधर पर भेद वतलाया गया है। इस कारण औचित्य और उपयोग का भेद न जानने वाले जिन लोगों ने सभी सथलों में जो प्रकृतोपयोग बनलाया गया है वह ठीक नहीं है। इसदिए परिमान रूपक से मिन ही है। यहाँ [परिणाम में] प्रकतार्थ पर [भप्रकृतार्य के] आरोप
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परिणामालद्वार: ६३९
के बिना अप्रकृत अर्थे की सिद्धि [मुख्यवाक्यार्थ में अन्बय] नहीं होती, अतः यहाँ प्रकृतीपचोगिता हो सर्वस्त्र है। "दाह इतना है कि पसो [ अंजलि ] मर पानी तक को सुखा दे, आँसू इतने उमढ रहे हैं कि पनाले से चहाए जा सके, सांते डोल रहे और टिमटिमाते दिए को दो वन गई है, सारी काया पीले- पन ने डृब गई है। और क्या कहूँ हाथ के छत्ते से चाँदनी रोक रोक कर तुन्हारे रास्ते की खिढ़की मे वह रात भर वैठीं ही रह जाती है।"-यहाँ छत्र के आरोप के बिना चाँदनी का निरोध बनता हो नहीं इसलिए वह प्रकृतोपयोगी है। सलिए इसे परिणाम कहा जाता है। क्योंकि इसमें पकृत अप्रकृत रूप से परिणत होता है।॥ "यदि ऐसा है तो सांख्यशासत्र के परिणाम से इस परिणाम का क्या अन्तर है"-ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं-आगम इत्यादि। सांख्यों के परिणाम का लक्षण यह है-"धर्मी जहाँ पूर्यवर्ती धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपना ले किन्तु उसका स्वरूप [तत्व ] नष्ट न हो तो उसे परिणाम कहा जाता हैं।" मैत्रीरुपतया मैत्री रूप से उपयोगात क्योंकि 'आतर' [ तरण शुल्क ] के बिना तरना [ पार करना संमव नहीं है। इस कारण क्योंकि प्रकृत में आतर उपयोग है इसलिए प्रकृत मैनी पर उतके उसके व्यवहार का आरोप हो रहा है कारण कि वह [ मैत्री ] उस [आतर] का कार्य कर रही है। इसी तथ्य को दृष्ठान्त के द्वारा भी वतलाते हैं-'तदू अत्र' इत्यादि द्वारा। अत्र=इसमें सर्थात परिणाम में समासोकि में भी आरोप्यमाण का प्रकृत में उपयोग होता है। क्योंकि अपकृ का आक्षेप प्रकत की सिद्धि के ही लिए किया जाता है "उसमें भी जो आरोष्यमाण होता है वह प्रकृत का अवच्छेदक [धर्म] होकर ही स्थित रहता है आच्छादक होकर नहीं" तथ्य को प्तिपादित करते हुए लिखते हैं-तच्च इत्यादि। अत एव इसा कारण अर्थात आरोप- विपयाल्मता के कारण। तन्न उसमें मर्थात समासोकि नें। इसी को प्रकृत प्ररुंग में सम्बन्धित करने के लिए कहा-एवस् इत्यादि। 'यादे ऐसा है तो समासोकि और परिणाम में अन्तर क्या होगा' इस संका पर लिखते हैं-'केवलम्' इत्यादि। तयोः= उनका अर्थात जो दो अभिधा द्वारा प्रतिपादित होते हैं उनका । उचितम् अर्थात् उपयुक्त रूप से। विमर्श :- विमर्ानीकार ने अन्य अन्य अलंकारों में अप्रकृत के प्रकृतरूप होने की जो बात कही है वही रताकरकार ने भी कही है किन्तु उन्होंने इसे दूसरों का मत कहा है। संभव है यह मत अलंकारभाष्यकार ने प्रस्तुत किया हो जो अम्राप्य हैं। इतिहास-पूर्ववर्तती आचार्यों में से भरत, मामह, दण्डी, नामन, जन्ट, रुद्रढ तथा मन्मट-इन सभी आचार्यो में परिणाम नामक अलंकार नहीं मिलता। उसका प्रतिपादन ही नहीं खण्डन भी इनके ग्रन्थों में नहीं है। स्पष्ट ही यह स्वयं अलंकारसवस्वकार की हो सूझ है। परवर्तों शोभाकर के ही समान पण्डितराज जगनाथने रसगंगाधर में परिणाम को अलंकार माना है, किन्तु उन्हों ने अलंकारसर्वस्वकार के परिणाम- निवचन में वाक्छित स्पष्टता की कमी बतलाई है। उन्होंने "आरोम्यनाणस्य प्रकृतोपयोगित्वे परिणाम:" इस सून से लेकर "प्रकृतमारो ्यमाणतया परिणमति" इस वृत्ति तक का अंक अविकलरूप से रद्त कर लिसा है कि "आरोष्यमाण के प्रकृतोपयोग" का अभिप्राय यदि पकृत कार्य में उपयोग हो तो अलंकारतर्वस्वकार द्वारा ही उद्वृत "दासे कृतागसि०" इस रूपक के जदाहरण में खेवरूपी प्रदृत कार्य के काँटों का उपयोग का ही स्थल मानना होगा और यदि 'प्रकृत = विषय तद्भ से उपयोग' ऐसा अभिपाय हो तो न्यधिकरण-परिणाम के उदाहरण के रूप में उद्धृत "अथ भनवमता" इस पद्य में परिणाम नहीं माना जा सकेगा। क्योंकि यहाँ वचन आरोप विषय है और उपायन आरोप्यमाण और वह आरोप्यमाण उपायन स्वरूप से
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ही राजा से भेट करने रुी अर्थ में उपयुक्त होना है, वचनरूप से परिणन होकर नहीं। बल्कि उल्टे वचनों का ही उपयोग तब समन हो पाता है जन वे उपायनरूप से विदित होते है। इस लिए इस "अथ पक्निमना0" पद्य को वस्तुन व्यविकरण रूपक का उदाहरण माना जाना चाहिप। पण्डिनराज जगन्नाय ने एक तथ्य को ओर आर ध्यान आकृष्ट किया है। वह यह कि परिणाम में यह मानना वास्तविकता के विरुद है और उसमे उलटे रूपक की सिद्धि होती है कि "परिणाम में प्रकृतपदार्थ अप्रकृतपदार्थ रूप से परिणत होता है।" उनके अनुमार माना यह जाना चाहिए कि परिणाम में अप्रकृत प्रकृतरूप से परिणत होता है। अन्कारसरस्वकार और विमर्रिनीकार दोनों ने प्रकन को ही अप्रकृत रप से परिणन होता हुआ माना है। दोनों के बीच हुए अ लकार- रक्षाकरकार ने 'प्रकृतमप्रकृतरूपनया परिणमनीति परिणामालद्वार"इस प्रकार प्रकृत को ही अम- कृनरूप से परिणन होता माना है। पण्डितराज का हो मत यहाँ मान्य है। हमारी दृष्टि से परिणाम अदकार नहीं दोप है। जिनका उपयोग न हो सके उससा काव्य- प्रयोग निर्थक होता है जो अपुष्टार्थंत्व दोप है। कदाचिन इसी कारण पूर्ववत्तो किसी भी आचार्य ने परिणाम नामका कोई भो अलकार नहीं माना। उन्हाने किमी अन्य नाम से भी इस या ऐमे अन्कार का निर्वंचन नहीं किया। मध्जोविनीकार ने परिणाम का पूर् विवेचन समइकारिकाओं में इस प्रकार प्रस्तुत किया है- 'आरोष्यमाण प्रकृते यदासावुपयुज्यते। परिणामस्वदा तन रूपकादस्य मिन्रता। रूपमात्रसमारोपाद् रूपके व्यस्षको ससी । व्यहारसमारोपादिह स्याद प्रवृतान्वय- ।। भवेदप्रस्नुनत्वेन रूपके प्रकृतस्थिनि. । परिणामम मामोकत्योर्श्नव्यो=समाद् विपयय।। उपादानानुपादानतो भेदस्तयोर्मिय. ।' आरोप्यनाण का प्रकृत में उतयोग हो तो यह पारिगाम होता है। इसोमे परिगाम रूपक से मिन्न होता है। रूपक में तो रूपमात्र का आरोप [अभिवात्रचिद्वारा] होता है जब कि परिणाम में व्यवहार का, और वह मी व्यंजना द्वारा। रूपक में प्रकन अमकृतरूप से रपित रहता है और परिणाम में समासोकि के समान इसके विपरीत प्रकृत अप्रहृतरूप से । उन दोनों [समासोकि और परिणाम] नें परस्पर में नेद यह है कि परिणाम में आरोभ्यमाण भी शब्दत कषित रहता है जब कि सनासोक्ति में नहीं।' [सर्वस्व ] [सू० १८] विषयस्य संदिह्यमानत्वे संदेहः। 'अमेदमाधान्ये आरोप इत्येव। विषयः प्रकृतोऽर्थः, यद्धित्तित्वेनाप्रकृतः संदिहते। अप्रकृते संदेहे विपयोऽपि संदिह्यत एव। तेन प्रकृताप्रकृतगत- स्वेन कविम्रतिभोत्यापिते संदेहे संदेदालंकार:। [सू० १८] 'विषय यदि संदेहरपद वतलाया जाय तो सदेह [नामक अर्थालंकार होता है ]।'
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सन्देहालङ्कार: १४१
[इृ०] 'आरोप जिसनें अमेद की प्रधानता हो' इतना यहाँ [रूपकलक्षण से] प्राप्त ही है विषय का अर्थ [वहाँ भी] प्रकृत अर्थ है जिसको भित्ति बनाकर अप्रकृत अर्थ का संबेह किया जाता है। अप्रकृत पर संदेह होने पर [प्रकृत ] विषय भी संदेह का विषय वन ही जाता है। इस प्रकार संदेहालंकार [का निष्कृष्ट लक्षण] है-"प्रवृत और अप्रकृत दोनों [ पदार्था] पर कविप्रतिमा द्वारा उद्वावित संदेह"। विमर्शिनी विषयत्येत्यादि। विपयविपयिणोः सबन्धिशब्दत्वाद्िपयस्योते विषयिणोऽप्याचेपादत् अहणम्। तेन विपयस्य विपयिणश्च संदेहप्रतीतिविपयत्वं सूअर्थः। नतु विपयशन्देन विषयिशब्दस्य संबन्धिश्दत्वादास्षेपेपि विना चचनमानेपमात्राद्दिपयिणः कथ संदिह्य- मानता लभ्यत इति चेव, न। अनियतोमयांशावलस्विनिमर्शरू पत्वाद्वि पयमात्रगततवेना- संभवातसंदेहस्थान्यथानुपपत्या विपयिणस्तत्संवन्धित्वं भ्यत एवेति यथासूनितमेव ज्यायः। एतदेव विभज्य व्याचष्टे-विषय इत्यादिना। यन्भित्तित्वेनेति। अन्यथा हमकतस्य निर्विपयत्वमप्नरतुसाभिधानलक्षणो वा दोप: स्यादिति भावः। तेन विषयभित्तितया विपयिणामेव तथाभावो भवतीत्याशङ्वाह-अप्रकृतत्यादि। विपयोऽपीति। न केवलं विप- यिण एव संदिह्मानत्वं याबद्विपयस्यापात्यपिशव्दाथः। तेन क्चिद्गिपतिणामेव संदिह- मानत्वे क्वचिन्त विषय विर्पायणोरप्यलंकारो भवेस। उभयत्रापि सामान्य लक्षणानुगमात्। अनियतोभयांशावलम्वी हि विमर्शः संशयः। स च विषर्यिणामेव सबति। विषय- विर्पायणोरेव संदिह्यमानत्वात्। अत एव च प्रकृताप्नकृतगत्वववेनेति यथासंभवं योज्यम्। पतिभोत्थापित इति। न पुनः स्वरसोत्थापितः, स्थाणुर्घा पुरुपो वेत्येवमादिरूप इत्वर्थः। विषयेत्यादि। निषय और विपयी दोनों शब्द परस्पर सम्वन्धित शब्द हैं, अनः केवल 'विषय' के कहने से विपयी का ज्ञान भी यहाँ अक्षेप से हो जाता है। इस कारण सून का अर्थ होगा 'विषय और विषयी दोनों का संदेहात्मक अ्तीति का विषय बनना।' यहाँ शंका होती है कि 'माना कि विषयिशब्द सम्बन्धिशब्द है, इसलिए विषयशब्द से उसका आक्षेपद्वारा लाभ संभव है तथापि बिना शब्दतः कहे केवल आक्षेपमान से प्रतीत विपयी का सव हविषय होना कैसे संभव है।' किन्तु ऐसी शंका ठीक नहीं। इसलिए कि संवेह सदा ही दो अनियत अंशों पर निर्भर ज्ञान का नाम है। सतः उसका केवल विपयमान्नगत होना संभव नहीं। इस कारण अन्यथानु- पपत्ति प्रमाण द्वारा विपयी की विषमसंवद्धता विदित हो ही जाती है। इस प्रकार ग्रन्थकार ने जैसा सून बनाया दैसा ही कहना अधिक उपयुक्त है। इसी तथ्य को पकट करने के हेतु सूत्र- गत अर्थो की विवेचना अलग अलग करते है-विषय इत्यादि। यद्वित्िव्वेन अर्थात् यदि विषय की भित्ि [आधार] न हो तो अप्रकृत अर्थ निराधर हो जाए अथवा अप्रस्तुतामिधान रूप दोप बहां चल आवे। 'वदि ऐसा है तो विषय की भित्ति पर विपयी ही वैसा (संदे हविषय] बनता है ऐसा ही क्यों न मान लिया जाय"-इस शंका पर कहते हैं-अप्रकृत इत्यादि। विषयोऽि विषय भी, अर्थात न केवल विपयी हो संदेहविषय वनता, विषय भी स्वेह्विपय बनता है यह है अपि = शब्द भी-दब्द का अभिप्राय, इससे निष्कर्म वह निकला कि कहीं तो केवल 'विपयी' के ही संदेह- विषय होने पर संदेहालंकार होता है और कहीं विषय और विपयी दोनों के ही संदेहविषय होने पर। कारण कि दोनों ही दशा में संदेह का सामान्य लक्षण लागू होता है। संक्षय जो है वह ऐसा ज्ञान है जो दो अनिश्चित मंशों पर निर्भर हो। यह ज्ञान केवल विपयी के बिषयमें ही होता है क्योंकि संदेह विषय विषय और विषयी दोनों ही होते है। और इसीलिए 'प्रकृतापकृतगत'
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का अर्थ जहाँ जैसा हो बैसा लगा लेना चाहिये। प्रतिमोर्यापित अर्थाव साधारणरूप मे उत्थापित नहीं। जैमा कि 'यह ठूँठ है या आदमी' में होता है। विमर्श .- मूत्र में केवल विपय का उल्नेख है। वृत्ति विपयो को भी जोटती है। टीकाकार विषय की अपेक्षा विपयो को ही अधिक महत्व्र दे रहे है। वृतिकार ने मदेह का दो दो वार 'अनियतोमयाशविषयक' निनर्ग=ज्ञान कहा है। पण्डितराज जगनाय ने इमके आधार पर "मादृश्यमूला भाममानविरोधका समदन् नानाकोटसवनाहिनी घी रमगीया ममदेशलतकृति"= अर्थान सादृदसमूळ ऐमे सुन्दर ध्ान को ममदेशनकार माना जाना है जिसमें विरोध भासिन सो रहा हो, जिमके विषय पकाधिक पदार्थ हा तथा उन सद पदार्थो में में किमी एक पर अधिक प्रुकाव न हो-इम प्रकार ममदेशलकार में विषय और निषयी को स्थान देकर ज्ञान में म्काषिक- विषयकनामान्न को स्थान दिया है। विचारता यह है कि इनमें मान्य क्या है। इम ऐम। मोचते है कि मदेह में म्त्ववूर्ण तत्त्व है अनिश्चय और उमका विषय एकमान्न वही होता है जिसका विचार चड़ता है अर्थान प्रस्तुन। इस प्रकार वस्तुन चमत्कार का कारण विषय का अनिश्चय है। अन्य पदार्थ उमपर विकश्वित रहते है। वे आगमापायी होने है। उनके व्ञानचक्र की पुरो प्रस्तुत या वर्ानीय पदार्थ ही होता है। अत अटकारसर्वस्वकार का सूत्र ही इस दिशा में अविक मान्य है। यह तथ्य और सत्य है कि मदेह में ज्वान नानाविषयक ही होता है और उममें भी ज्ञाना की सविचिधारा का मोड समावना के समान किसी एक दिशा में प्रवलता से नहीं होना, तथापि सदेहारकार से चमत्कार का कारण विषय का विषयत्वेन अनिश्चय हो होता है। अत उसी पर अधिक बल देना वैश्ञानिक और उचित है। [सर्वस्व्र ] स च त्रिविधः। शुद्धो निधयगर्भो निश्चयान्तथ्। शुद्धो यत्र संशय एव पर्यवसानम्। यथा- 'कि तावण्यतरोरियं रसमरोन्विना नवा वल्लरी लीलाप्रोच्छलिितस्य कि लहरिका लावण्यवारांनिये:। उद्गाढोत्कलिकावतां स्वसमयोपन्यासविस्र्रम्भिण. रकि साक्षादुपदेशयष्टिरथवा देवस्य नृद्गारिण ॥' निश्चयगर्भो य: संशयोपकमो निश्चयमध्य: संशयान्त्च। स यग्- 'अयं मार्तण्डः कि स खलु तुरगैः सतभिरितः कुशानुः किं साक्षात्मसरति दिशो नैप नियतम्। कृतान्तः कि साक्षान्मद्विपवहनोऽसाविति चिरात् समालोक्याजी रां विदधति विकल्पान्पतिभटा।।' निश्यान्तो यत्र संशय उपक्रमो निध्चये पर्यधसानम्। यथा- 'इन्दुः कि क् कलङ्ग: सरमिजमेतत्किमम्तु कुत् गतम्। ललित सविलासवचनैर्मुसमिति द्रिणाकषि निश्चितं परतः ॥' कचिदारोप्यमाणानां मिन्नाथ्रयत्वेन दृश्यते। यश- 'रक्षिता नु विविधास्तरशैला नामितं तु गगनं म्यगितं नु। पूरिता नु विपमेपु धरित्री संहता तु ककुभस्तिमिरेण ।'
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सन्देहालदवार: १४३
अन्नारोपघिपये तिमिरे रागादि तर्वादिभिन्नाथ्रयत्वेनारोपितम् । के चित्त्वध्यवसायाश्रयत्वेन संदेहप्रकारमाहः। अन्ये तु नुशव्दस्य संभा- चनाद्योतकत्वा दुत्प्रेक्षाप्रकारमिममाचक्षते। [वृत्ति] वह [संदेहालंकार] तीन प्रकार का होता है (१) शुद्ध (न) निश्चयगभ और (३ ) निक्षयान्त। [इनमें से ]-(१) शुद्ध वह होता है जिसका पर्यवसान संशय में ही हो जाता हो। यथा- 'यह क्या तारुण्यतर की पर्याप्त रस लेकर खिली नई मंजरी है? या लीला से उछलते लावण्य- जलनिधि की नन्हीं सी लहर या कि [उत्कण्ठित जनों में ] अपने अनुरूप प्रवृत्ति का सारम्भ देखने से आश्स्त शद्ारी देव [काम] के द्वारा देने के लिए गाढ़तम उत्कण्ठा (हुक) से भरे [कामि-] जनों को उपदेश देने के लिए गृहीत झड़ी? (२) निश्चयगर्भ संदेहालंकार वह होता है। जिसमें आरम्भ और अन्त दोनों में संजय रहे किन्तु मध्य में निश्चय हो। उसका उदाहरण- "यह क्या सूर्य है, किन्तु वह [ सूर्य] तो सदा सात घोड़ों से युक रद्दता है, क्या यह साक्षात अग्नि है, किन्तु वह एक एक कर के दिशाओं में योजनावद्धरूप से [ सव दिशाओं में एक ही साथ] नहीं फैलता; तो क्या यह साक्षात चमराज है, पर वह तो भैसें पर सवार रहता है-आपको युद्ध में सामने देखते हैं तो शत्रुयोद्ा ऐसे विकल्प करते हैं।" [ यहाँ सूर्य ादि के संशय का निराकरण हो जाता है उतने ही अंश में यहाँ निश्चय है अर्थात् यहाँ सूर्यादि के अभाव का निश्चय बीच बीच में आता गया है, निश्चयगभें का अर्थ यह नहीं इसमें चोच में विषय का निश्चय हो जाए।] (३) निश्चयान्त संदेहालंकार में वहाँ होता है जहाँ वारम्भ में संश्ञय हो और अन्त में निश्चय। उदाहरण- 'चन्द्रमा है क्या, पर कलंक कहाँ गया ? क्या कमल है परन्तु जल कहाँ गया? [ ऐसे कल्प- विकल्प करने के] पश्चात, हे नृगाक्षि! ललित और विलासपूर्ण वचनों से विदित हुआ कि यह मुख है।' कहीं कहीं आरोप्यमाण का आश्रय [आरोप विषय से ] भिन्न होने से भी [ यह अलंकार ] देखा जाता है। यथा-"अन्वकार ने विविध [ रंग के] वृक्ष और पर्वतों को रंग सा दिया; आसमान को झुका-सा या ढँक-सा दिया है, ऊबड़ सावड़ स्थलों पर पृथिवी को भरवा दिया है [और] दिशएँ [नीरक्षीरवत ] मिला-सी दी है।" यहाँ आरोप का विषय जो अन्धकार है उसपर राग आदि का आरोप किया तो नया किन्तु उन [राग आदि] को तरु आदि पर आश्रित वतलाया गवा है। कुछ लोग [इस स्थल में ] संदेह का अध्यवसायमूलक [न कि आरोपमूलक नवीन ] भेद मानते है और कुछ लोग इस स्थल को उत्प्रेक्षा का अंग मानते हैं, क्योंकि 'नु' = 'सा' या 'मानों' शब्द [उत्प्रेक्षा बीज ] संभावना का बोतक होता है। विभर्शिनी एतदेव भेदवयं विवृण्न्तुदाहरति-शुद्ध इत्यादि। अन्न प्रकृतायास्तन्व्या: संदेहप्रती- तिविषयत्वाभावाद्विपयिणां मक्जर्यादीनामेव संदेहः । विषयविषयिणोयथा- 'किं पह्कजं किमु सुधाकर विम्वमेतर्तिंक वा मुखं कलमहरं मदिरेक्षणायाः। यद्दृश्यते मधुकराभकुर द्रकान्तिनेब्रद्दयासुकृति कार्ष्ण्यममुप्य मध्ये॥ अत्र क्लमहरत्वादि: समानो धर्मोनुगामितवेनोपासः। क्वचिद्वस्तु प्रतिवस्तुभावेनापि भवति यधा- 'किमिदमसितालिकलितं कमलं कि वा मुखं सुनीलक चम्। इति संशेते लोकस््वयि सुतनु सरोवतीर्णायाम् ॥'
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२४४ अव्रासितत्वसुनीलत्वयो: शृवतसामान्यरूपत्यम् 1 अलिकचानां च विम्वप्रतिविम्न- भायः । एवं चास्य सादश्यनिमित्तरवातसमानघमनिकधर्मनिमित्तववेन द्विभेदृतवं न व्या-
भावाच्च। मिननाश्यत्वेनेति वैयधिकरण्येन। इन्हीं तीनॉ नेदों का मर्थ स्पष्ट करते हुए उदाहरण देने है-शुद्ध इत्यादि। यहाँ[ शुद्ध के उदादरण-"कि तारण्यतरो." में] तन्वी प्रकृत है किन्तु वह सदेह प्रीतति का विषय नहीं, अत यहाँ मसरी अदि जो विपयी, है उन्हीं का सदेह है। विषय और विपयी दोना के सदेह का उदाहरण-दुस दूर करने वाला क्या यह कमल है, या चन्द्र विम्वहै अथवा किसी मदिरेक्षणा का मुस, जिसमें भौरे से ममान, इरिण के तुखय और दो नेत्रों का अनुकरण करने वाली यह कालिमा दिसाई दे रही है।' [यहॉ चन्द्रमा रूपी विषय और अन्य सब विषयी है। इन दोनों का सन्देह किया जा रहा है। यहाँ, जो साधारण धर्म 'दुःस दूर करना है वह अनुगामी धर्म है'। कही वस्तुप्रतिवस्तुमावात्मक साधारण थर्मे से म [सदेहारकार निष्पन्न होता है। यथा-"हे सुननु जन तुम तालाव में उतरनी हो तो लोग यह सदेह करते है कि भसित भौरो से ढँका हुआ यह कमल है या सुनाल केशों से घिरा सुस।' [यहाँ भी मुस जो कि विषय है उसका और कमलरूपी विपयी का साथ-साथ सदेह हे] यहाँ 'अमि- तत्व और 'मुनीला' एक और अमिन्न है, अत. इनका यह जो माधारण धर्म है यह शुद्ध सामा न्यातमक वस्तुप्तिवस्तुभावापन्न साधारभधम है। और जो भौरों तथा केशों का साधारणत्व है वह बिम्वप्रतिदिम्वभाव से निम्पन्न होता है[ मोरे तथा केश दोनों कृष्णवर्ण-रूपी साधारण धर्म के कारण अभिन्न प्रनोन होने लगते है] इस प्रकार इस [सदेशटकार] में समान धर्म तथा अनेक धर्म, इस प्रकार धर्म के आधार पर दो भेद नहीं जाने चाहिए [ जेसा कि अलकाररलाकरकार ने दनलाया है क्योंकि यह अलकार एक सादृश्यमूलक अटकार है इसलिए उक्त दोनों भेद सादृश्यनिमित्तना में ही अन्तर्भूत हो जायेंगे। दूसरे इसमें चारत्व भी नहीं रहना जसे कि [रत्नाकरकार के ही अनुसार ] विप्रतिपत्ति-आदि अन्य निमित्तो में चारृत्व नहीं रहता। भिन्नाश्रयत्व का अर्थ है वैयधिररण्य। विमर्श-अल्काररत्नाकरकार ने सदेहानंकार के भेद बनलाने हुए लिसा है-'कमल या वदन वा इति वा्थमभन्ना प्रनीनि सदेह। स व यद्यपि ममानधमनिकथमे-विप्तिपत्युपलबन् व्यवन्थान हत्यनेकघोक: तथापि निमित्तान्तरोत्यापितिस्य तस्य चारुत्व मावात् समानधमनिकरमे निमित्तत्वेनेह दिविन एव।' अर्थान 'या तो कमन ह या मुख है'-इम प्रकार वा-(या)-शब्द के अर्थ से मिश्षिन प्रनीवि का नाम सदेह है। वह यद्यपि-समानधर्म, अनेकनमें, विप्रनिपत्ि, उपर ब्धि और अन्यवस्था इन तलों के आवार पर अनेक प्रकार का बतलाया गया है किन्तु अन्य तस्वों के आपार पर होने वाले सदेह में चारत्व नहीं होना। अन केवल उमे दो ही प्रकार का मानना चाहिए एक समान धर्मनिमित्तक नया दूसरा अनेकपर्मनिमित्तक।' इन दीनों मे से प्थम के रदाहरण के रूप में उन्होंने 'कि पङ्टजम्०" पद्य ही प्रस्तुन किया है तथा द्विनीय के उदाहरण के रूप में कालिदाम के विक्रमोवेद्यीय का "अस्या" सर्गविौ०" यहद प्रसिद्ध षद। प्रथम पद्य में सभी के दीच 'क्लमदरत्' यह एक ही समान धर्म है। दविनीय पद्य में कान्नि, शृद्गार आदि अनेक धर्म। विमशनीकार ने कहा है कि धर्म की सस्या में भेद होने से चमत्कार की अनुभूति नहीं होती 'अतः उक्त दो भेद भी पूर्जवर्ती आचार्यो द्वारा प्रतिपादित उर्युक्त अन्य भेदों के समान अमान्य है। अल्काररलाकर द्वारा प्रतिपादिन ये दो भेद भरन, मामह, दण्डी, चामन, उद्ट, रुद्रट तथा मम्मट में नहीं मिलने। कदाचित् 'अढकारमाभ्य' में ये भेद रदे हो]
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संदेहालङ्गार: १४५
विमर्शिनी अरव पणान्तरमाह-केचित्यादि। अनेन च संदेहस्याध्यवसायमूछतवसपि अन्थकृत- वोक्तम्। तेनाध्यवसायाश्रयोऽप्ययं स्वरूपहेतुफळानां संदिसमानत्वेन त्रिधा भवति। तन्न स्वरूपसंदेहो यथा-'रजिता' इत्यादयेव। यथा ना- एत्तर्कय कैरवक्लमहरे शङ्गारदीघागुरौ दिक्कान्तामुकुरे चकोरसुहृदि मौढे तुपारस्वपि। कर्पूरैः किमपूरि किं सलयजैरालेपि कि पारदे- रक्षाळि स्फटिकोपलै: किमघटि द्यावापृथिव्योर्वपुः।।' न्न कौमुदीघवलिम्नः कर्पूरपूरणादि नाध्यवसितर वादव्यव साय मूलतम्। हेतुसंदेहो यथा- 'देवि स्वचरणामुजरमृतिविधी गाढावधानस्परश्ां धत्यानां प्रसरन्ति संतततया ये वाप्पधाराभराः।
अत्राधुहेतोरानन्दस्य संसारविययोगो मुकिसांमुख्यं चेति हेतुद्वयमध्यवसितम्। फल- संदेहो यथा- 'नृत्तान्ते पारिजातं किमु विघटयितुं स्प्रष्टमाकाशगङ्गां किस्विद्वा चन्द्र सूर्यों किसु विदलयितुं श्वेतरकाव्जवुद्धया। लब्धुं नक्त्रमालाभरणभरमुत स्वर्गजं वामियोद्धुं दूरोदस्तः समस्तस्तव गणपतिना स्वरतये सोऽस्तु हस्तः॥' अत्र करिणो निष्पादनस्य विघटनादिफलमध्यवसितम्। अत्रवादिशब्दवन्तुशव्दस्य संभावनादयोतकस्वास्पव्वान्तरमपि दर्शयितुमाह-अन्य इत्यादि। अतश्व रक्षिता इवेत्यर्थ:। पूर्ववार्थ त सुशव्दो चितर्कमान्र एव व्यार्येयः। विभर्शिनी-इसी [ रजिता तु०] पर दूसरे पक्ष प्रस्तुत करते हुए लिसते हैं-'केचित'- 'कोई'-इत्यादि। इससे यह बात आई कि अन्थकार स्वयं संदेह को अध्यवसायमूलक भी मानते हैं। इस कारण [हम इसके भी भेद बतलाए देते हैं] मध्यवसायमूलक संदेह भी तीन प्रकार का होता है-(१) जिसमें स्वरूप का संन्देह होता है (२) जिसमें हेतु का संदेह होता है और (३) जिसमें संदेह होता है फल का। इनमें से प्रथम स्वरूपसंदेह यथा-'रजितानु' इत्यादि मूल में उद्धृत पद्म ही। अथवा-'कुमुम का क्लम हरने वाले, पद्गारदीक्षा के गुरु, दिशारूपी सुन्दरी के दर्पण, चकोरों के मित्र (इस) शीतरश्मि [चन्द्र] के औढ होने पर, थोड़ा यह तो सोचिए कि धावापृथिवी का संपूर्ण शरीर क्या कपूर से भर गया है, या धवल चन्दन से लिप गया है, या पारदरस (पारे) से थो दिया गया है या स्फटिकमणि से जढ़ दिया गया है।' यहाँ चाँदनी की धवलता [ का स्वरूप ही ] कर्पूरपूर आदि द्वारा अध्यवसित है [चाँदनी स्वशब्दतः अनुक्त है], अतः यह भेद अध्यवसायमूलक [स्वरूप संदेह का ] भेद हुआ।
हेसुसन्देह चथा- हहू भगवाति! आापके चरणारविन्द का ध्यान करने में गाढ़ समाधि तक पहुँचे धन्य महातमाओं में जो अविरल रूप से अनेकानेक अश्रुधाराएँ वह निकलती हैं वे चिरकाल तक सेवित संसार
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१४६ अलद्ारसवस्वम्
का प्रश्न न रहने के वेग से निकलती है अथवा मुकिरूपी चन्द्रमुसी के सदर्शन से प्राप्त आनन्द से। -यहाँ अश्षुपात का कारण आनन्द है। उस [ आानन्द] की उत्पति में दो हेतुओं का संदेह किया जा रहा है एक समार से छुट्टी और दूसरा मुक्ति का मिमुख्य। ये दोनों हेतु अध्यवसित हैं। [देखिए'-इस प्रकरण के अन्त का विमर्श] फलसंदेह यथा- 'गणपति जी का वह हाथ सपके लिए कल्याणकारो हो जिस पूर्ण हाथ को उन्होंन या तो इसलिए दूरतक फेलाया है कि उन्दें स्वगं का पारिजात उसाढ़ लाना है, या इसलिए कि उन्हें आकार में गगा का स्पर्श करना है, या इस लिए कि सफेद और लाल कमल समझ वे चन्द्र और औौर सूर्य को ले लेना चाहते है, या इसलिए कि वे नक्षत्र माला [ इकीस रनों या गुरियों की माला तथा ग्रद नक्षत्रों की माला] के आभूषण पह्दना चाहने हैं या तो वे स्वर्ग के हाथी से जूझना चाहते हैं।'-नयहों हाथी का जो निष्पादन (गणपति पर आरोप है) उसका फल विघट- नादि गणपतिगत विघटनादि से अध्यवसित है।
यहाँ [काव्य में ] इच-आदि, [आदिपद से मन्ये, शके, धुवन्, प्राय, नूनम् आदि] शब्द के ही समान 'नु'-शम्द भी [ उत्पेक्षाबाज ] सषभावना का धोतक होता है इसलिए [ रजिता नु०- पद्य में ] एक दूसरा भी पक्ष दिखलाते हैं-अन्य इत्यादि द्वारा। इम [उत्पेक्षा ] पक्ष में 'रजिता नु' का अर्थ हुआ 'रजिता इव' [ मानों रजित= रंगे हुए] पहले सर्थ में 'नु'-शब्द की व्याख्या केवल वितर्क ही की जाना चाहिए। विमरश-अध्यवसायमूलक प्रस्तुन तौनों भेदों में से प्रथम के उदाहरण 'एतद तर्कयब' में तो संदेह सादृश्यमूलक है, किन्तु दूसरे तथा तीसरे के उदाहरण सादश्यमूलक नहीं हैं, इनने पर भी इनमें सदेहारंकार माना जा रहा है। यह विचारणीय है। अलकाररताकरकार ने सादश्येतर- मूलक सदेह को मी उसी प्रकार अलकार माना है जिस प्रकार आयुर्धृनम्-'पृत्र आयु ह' आदि सादृश्येतरसम्बन्धमूषक रूपक को रूपकालंकार। उनकी पक्ति है- 'स्थाणुर्वा पुरुषा वेवि न स्वारसिक सदेहोडलंकार, अपि तु कविप्रतिमोत्थापित.। तन साधम्ये विद्ायापि निमिच्ान्तरमवलम्ध्य कविप्रतिमोत्यादित सदेहोडलकार एव। उदाहरणम्-"देवि त्वच्च रणारविन्द०"। अप्नाशुधारारूपस्य कार्यस्य ससारवियोगो मुकतिमाम्मुख्य चेति हेतुदयं संभयितम्।' 'रूँठ है या आदमी'-यह लौकिक [ स्वारसिक ] सदेह है । यह सदेदालकार नहीं हो भकता, क्योंकि वही सदेशलकार होना है जो कविप्रतिमोत्यापित होना है। यहाँ तक कि सदेह यदि कवि- प्रतिमोत्थापित हो और सादृश्यमूल्क न हो तब भी वह अलकार माना जा सकता है। उदाहरण -- 'देवि त्वचचरणारविन्द०' यद्य।वहों जो अशुधारारपी कार्य है उसके हेतुरूप से दो नथ्यों का संदेह किया गया है-एक ससारवियोग और दूमरा भुक्ति-साम्मुख्य।' निक्चित ही विमर्शिनीकार ने असाश्यनिमित्तक सदेह को भी संदेझालकार मान किया है जो मूलविरुद्ध है। मूलकार सादृश्यमूलक सद्ह को ही मदेदालकार मानते है। यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि "देवित्वचर" पद्य में अलकाररलाकरकार ने 'यभुधारारूप कार्य' के प्रति दो कारगों का सर्दे ह वतलाया है जब कि विमशिनीकार ने "अभ्रुद्देतो" आानन्दस्य ससारवियोगो मुक्तिसाम्मुख्य चेति०" इस प्रकार "अशु के कारण आानन्द को कार्य मान कर उसके प्रति दो हेतु का संदेह बनलाया है। वस्तुनः कथन अछकाररलाकरकार का ही 1
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संदेहालद्गार: १४७*
मान्य है। क्योंकि यहाँ "आासादितभकिचन्द्रवदनासंदर्शनानन्दतः" इस प्रकार जिस आनन्द को कारण बतलाया जा रहा है वह कार्य नहीं माना जा सकता है। दूसरे अलंकाररलाकरकार के पाठ से "चिरकालभावितमवापश्नक्रियावेगतः" का अर्थ 'चिरकाल तक भावित संसार पर विचार न करने या उसके छूटने के आनेग से' करना होगा तभी संसारवियोग में 'वियोग'-शब्द का स्वारस्य ठेक चैठेगा, नहीं तो संसारत्याग अर्थ करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त वाक्यार्थ की दृष्टि से भी यह अर्थ अधिक रुचिर है। इसलिए कि ऐसा मानने पर हेतु रूप से विरुद्ध पदार्थ गृह्दीत दोते हैं "आवेग और आनन्द।" फिर अश्ुपात होता भी आावेग या मानन्द से ही है। 'आदेग' अर्थ निकालने में पाठान्तर से भी सहायता मिलती है। यहाँ अलंकाररलाकर में "मावेशितः" पाठान्तर दिया गया है। उसे 'आवेशतः' होना चाहिए। संस्कृतयन्थों में आवेग औौर आवेश का यह हर फेर पाय: सार्वत्रिक ही है। संदेहालंकार का इतिहास- भामह :- 'उपमानेन तत्त्वं च भेदं च वदतः पुनः 1 ससन्देहं वचः स्तुत्यै ससन्देहँ विदुर्यथा ।। किमयं शज्ी न स दिवा विराजते कुसमायुधो न धनुरस्य कौसुभम्। इति विस्मयाद विमृश्नतोऽि मे मतिस्तवि वीक्षिते न लमतेर्निश्चयम्॥' -उपमान के साथ उपमेय का अमेद और तन्पयात भेद उपमेय की प्रशंसा के छिए जिन शब्दों में मतलाया जाय वे शब्द ससन्देह बब्द होते हैं। उसी को ससन्देहालंकार कहा जाता है। उदाहरण यथा-"तुन्हारे दिखाई देने पर क्या यह चन्द्रमा है, पर वह दिन में शोभित नहीं होता, क्या यह कुसुमायुष=काम है, किन्तु इसका धनुष कुसुम का नहीं है :- ऐसा मश्चर्यपूर्वक विचार करता रहता हूँ, किन्तु वास्तविकता का निश्चय नहीं कर पाता।" वामन="उपमानोपमेयसंशयः सन्देहः-।" ४।३११। उपमानोपमेययीरतिशयार्य यः मरियते संझय: स सन्देश । यथा- 'इदं कर्गोत्पलं चक्षरिद वेति विलासिनी। न निश्चिनोति हृदयं किन्तु दोलायते मनः ॥' -उपमानोपमेय का संश्य संदेह होता है। अर्यात उपमानोपमेय में अतिशय जतलाने के लिए जो संशय किया जाता है वह संदेहालंकार कहलाता है। यथा "हे विलासिनि। चित्त को कर्णोत्पळ है या चक्षु है" ऐसा निश्चय नहों हो पाता। चित्त केवल दोलायित ही रहा आता है। उद्हट :- उन्दटने संदेहालंकार के दो लक्षण दिए हैं। प्रथम में उन्होंने भामह की ऊपर उद्धृत. संदेहलक्षणकारिका ज्यों की त्यों अपना को है। केवल उसमें अन्तिम पद 'यथा' के स्थान पर 'बुधाः कर दिया है। दूसरा लक्षण इस प्रकार है- 'अळंकारान्तरच्छायां यत्कृत्वा धीपु बन्धनम्। असन्देहेऽपि संदेहरूपं संदेइनाम तव।।' -दूसरे किसी अलंकार की छाया (श़ोमा) चित्त में रखकर संवेह होने पर भी जो संदेद का निरूपण उसे भी संदेश कहा जाता है। यथा- 'नीलाब्दः किमयं नेरौ धूमोज्य प्रलयानले। इति यः शङून्यते श्याम: पक्षीन्द्रेऽकल्विपि स्थितः ॥ -'भगवान् स्वयं श्याम हैं और वे जिस पक्षिराज गरुद पर विराजमान हैं वह है सूर्यं के समान लाळ। अतः उन्हें देखकर संदेह होता कि क्या यह मेरु पर्वत पर कोई नील मेघ है या प्रलयान्नि पर धूम।' यहाँ उपमानोपमेयभाव को मन में रखकर संदेह प्रस्तुत किया गया है।
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रुद्रट :- (१)'वस्तुनि यत्रकरिमन्ननेकनिषयस्तु मवति सदेदः। प्रतिपत्तु सादृर्यादनिश्चयः सशय सइति॥८५९॥ उदाहरण ='किमिद नीलाबिकुल कमल किंवा मुस सुनीलकचम्। इति सशोने लोकसवयि सुननु सरोज्वतीर्णायाम्॥" (२) 'उपमेये सदसमवि विपरीतं था तथोपमानेधि। यत्र स निथ्वयगर्मस्ननोऽपरो निश्चयान्तोडन्य।। - नहाँ एक वस्तु में अनेक वस्तु का संदेह होता है, इसलिये कि ज्वाता सादृश्य के कारण निशय नहीं कर पाना उस सवेह को संदेहालकार कहा जाता है। उदाहरण विमर्रिनी में उद्धृन 'विमिदभ्०'। -जहां उपमेय में समज वस्तु भी असमन दतलाई जाए तथा असभन मौ संभव और इसी प्रकार उपमान में भी, तो वह भी मदेहच्कार होता है। वह बक सो निश्चयगमें होना है और दूसरा निश्चयान्त। उदाहरण उसी प्रकार के हैं जिस प्रकार के स्वय अ्रन्थकार ने प्रस्तुत किए हैं यद्यपि पद्य मिन है। मम्मट'='ससन्देहस्तु भेदोकौ तदनुक्तो च सदाय.।' संशय का नाम ससंदेहाटकार है। वह भेदोक्ति और मेदानुक्ति में होता है। मेदोक्ति का व्दाहरण - 'अयं मार्तण्ड"' तथा मेदानुकि का 'अस्या सर्गविधी०"। रलनाकरकार =अलंकाररल्षाकरकार शोमाकरने उक उदाइरणों के आधार पर सदेशलकार से मिन्न एक वितर्कालंकार मी सोज निकाला है। उनका रुदेहारकार का रक्षण इस प्रकार है- [सून ] "तस्यापि सदिघ्मानत्वे सदेह"।" [वृक्ति] विषयस्येत्येव वच्छव्देनारोप्यमाणनत्यवमर्श। 'कमद वा वदनं वा [इत्यादि पूर्वोद्धृन ]। -विषय के माथ साथ यदि विषयी भी सदेह का विषय वने तो सदेहालकार होता है। इसके पश्चाव उन्होंने सदेह के भेद इस प्रकार किए है। (१) सादृश्यमूलक तथा साहश्येतर सम्बन्ध भूटक। इनमें से साइश्यमूलक के भेद इस प्रकार किए हैं-१=विषय और विपयी दोनों का संदेह २= केवल विषयी का सदेह। इनमें से प्रथम आरोपगर्मित होना है और दूसरा दो प्रकार का १= जहाँ विषय का शब्दत कथन हो और २ = जहाँ न हो। इनमें से प्रथम, जिसमें विषय का चपादान रद्दता है- १ = जिसमें विषय का अपहब (छिपाव) रदता है और २= जिसमें नहीं रहता है। ये दोनों ही भेद आरोपग्मिंत हो छोठे ईै: दूसरा कहाँ विषय का शम्दत उपादान नहीं रक्ष्ता अध्य- वसायमूटक सदेह माना जाना है। उदाहरण- ₹ = आरोपगमिंत उमय संय-'कि पकजं किन्नु" स्वाहन। -यहाँ धर्म केवल एक है क्लमदरत्व। '२= क्षारोण्गर्मिन विषयिसंशय में विषय का उपादानपूर्वक अपह्व-"अस्या मर्गविधौ०"। इममें पुराणमुनि को उवशी महित्व से इटाया गया है यही उसका अपहब है। ₹= इसी में अपहवामाव यया- 'चिरं चित्तोद्याने चरसि च मुसाब्ज पिवसि च कणदेशाक्षीणं विरइनिषचेगं हरसि च। नृप सं मानादि दलयसि च कि कौतुककर: कुरह कि मृद्गो मरकतमणिः कि किमशनि"॥'
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-हे नृप ! तुम (१) चित्तोद्ान में चिरकाल तक विचरण करते हो (२) तुन्दरियों के मुस कमल का पान करते हो, (३) सुन्दरियों के विरहविपवेग को क्षणभर में दूर करते हो और मानादि का भेदन करते हो। इसलिए तुम क्या आश्चर्यकारी (१) कुरंग हो (२) क्या मृंग हो (३) क्या मरकतमणि हो या कि (४) वज्र हो।। इन दोनों पद्यों में धर्म सनेक हैं। प्रथममें शृंगार कान्ति आादि तथा द्वितीय में उद्यानचार पान आदि। ४ = विपय का उपादान करने पर विपयिसंदेह-'के तारुण्यतरो:0'। सादृश्येतर संबन्धमूलक का उदाइरण इस संदर्म में उदवृत किया जा चुका है-'देवि त्वचर णाविन्द०' इत्यादि। शोभाकर ने इसके पश्चात विततर्कालंकार का निरूपण इस प्रकार किया है- [सूत्र] 'सम्भावितसन्माव्यमानापोदो वितकै: ।' [वृत्ति] सामान्येन दृष्टे वस्तुनि माशक्वितस्य आशङयमानस्य वा विशेषस्य वाधकेनोत्पुंसनं चितर्कः । अतएव वाधकसद्भावाद साक-वाघक-प्रमाणाभावनिमित्ताव संदेहादस्य भेद:। किच तन सन्दिद्यमानानां 'वा'्-र्थसम्भिन्नेकपतीतिविपयीकृतलम्, इह पुनः अनेकचिकल्पेन सम्भावितस्य वाघ मेनो त पुंसितस्य अपरविकल्मोदयसमयेऽनुसन्धानामावाद भिन्नप्रत्ययगोचरत्वन्। -अर्थाव संभावित अथवा सन्माव्यमान का निराकरण वितर्क कहलाता है। अर्थाव सामान्य रूप से प्रतीत वस्तु में यदि विशेष की संभावना की जा चुकी हो या की जा रही हो और यदि उसका किसी नाक को बोच में लाकर निराकरण कर दिया जाय तो उसे वितक कहा जाता है। इसमें वाघक उपस्थित किया जाता है, इसलिए इसका संदेहालंकार से भेद है, कयोंकि संदेह में न तो साथक ही उपस्थित किया जाता, न वाधक ही। संदेह में एक विशेफता यह भी रहती है कि वहाँ जिन जिनका संदेह किया जाता है वे सद 'वा' अर्थात् "अथवा" शब्द के अर्थ की प्रतीति से मिश्रित प्रतीति में साथ साथ विपय बनते हैं, जवकि वितर्क में अनेक विकल्प रदते है और इसमें संभावित वस्तु का वाधक द्वारा निराकरण कर दिया जाता है। फलतः दूसरे विकव्प में होने वाले ज्ञान में वह सम्मिलित नहीं हो पाता, अतः प्रत्येक संभावित पदार्थ का क्षान अलग अलग पूर्वापरमाव के साथ होता है। इस पूरे विषय का संक्षेप शोमाकार ने इस अकार का दिया है- "अर्थद्योल्लेखवती मतिर्यां स संशयः, केवलवस्तुनिष्ठा। संमावना वाघकवाधनीया यत्र स्फुटस्तन् भवेद् वितर्क:।।" 'जिस ज्ञान में एकाधिक मदार्थ ासित हो वह संशय, और केवल एक पदार्थ को ऐसी संभावना वितर्क जो वाधक द्वारा वाध्य हो।' उन्होंने संदेह के प्रसिद्ध उदाहरण-'अर्यं मार्तण्डः किम्०' को वितर्क का उदाहरण वतलाया है। इनमें राजा या मार्तण्ड की संभावना की जाती है फिर उसका बाध प्रस्तुत कर दिया जाता है यह कह कर कि सूर्ये सात घोड़ों से युक्त रहता है और राजा वैसा नहीं है। इसके पश्चात दूसरा निकल्प किया जाता है अग्नि का और उसका भी वाध कर दिया जाता है। इसी प्रकार तीसरा विकल्प यमरान का किया जाता है और उसका भी बाध प्रस्तुत कर दिया जाता है। इस प्रकार अग्ति आदि की परवर्ती विकल्पदुद्धि में पूर्वनर्तती संसाचित पदार्थ मार्तण्ड आदि का समावेश नहीं रहता अर्थाद वे पूर्ववर्त्ती पदार्थ के ज्ञान के विषय नहीं बनते। उनमें परवर्ती ज्ञान की विषयता का अभाव रहता है। इसलिए वितर्क का लक्षण इसमें पूर्णरूप से लागू होता है। माश्चयँ है कि पण्डितराज जगननाय इस मार्मिक भीमांसा पर चुप हैं। न तो उन्होंने संदेह के प्रकरण में इसका खण्डन किया है न इसे स्वीकार ही।
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नहों तक इस अलकार के नाम का संबन्ध हे उदधृत लक्षणों के अनुसार इसे पूर्वेवसों भामह, इ्भट औोर मम्मट ने 'ससन्दे' नाम दिया ह तथा परवर्ती पण्डितराज जगनाथ ने भी इसका अनुकरण किया है। मामह के लक्षण से स्पष्ट है कि ससन्देहपद सन्देहप्रतिपादक पदों के हिए साया है। वे पद ही काव्य में अएंकार मान लिए जाएँ तो यह नाम अलंकार के लिए मो उपयुक्त माना जा सकता है। पण्टितराज ने पद को मदेद्युक्त न मानकर 'द्ञान' को संदेहयुक्त माना है। ससन्देह जैसा ही एक नाम 'भ्रान्तिमान्' मी है। इम सोचते हैं यदि सन्देहयुक्त अर्थ या आ्रान्तियुक्त सर्य या ज्ञान को अल्कार माना जाता है तो उपमा रूपक आदि में भी उपमा रूपक से युक्त अर्थ या ज्ञान को ही अलकार मानना चाहिए। और इसीलिए उन्हें मी 'उपमावान' 'रूपकवान्' ऐसे कुछ न म दिए जाने चाहिए। फिर यह एक अत्यन्न स्थूल तथ्य है कि सर्थ और अलंकार में अगाद़िमाव है। अभेद नहीं। पद को मसन्देदादि नाम देने पर अरंकार में शन्दा- संकारस्व मानना होगा जबकि हैं वे अर्थालंकार। ज्ञान को अटकार मानना कुछ समझ में आने की वात है किन्तु सदेह और भ्रान्ति भी अपने आप में ध्ान दी है। अत 'ज्ानवान् प्ान' कहने के ममान ससन्देह या आन्तिमान् कयन अन्योन्याश्रयत्व या पौनसकत्य दोष से युक्त ठदरता है। वस्तुन- विरोभाभास में जैसे विरोधज्ञान की आभासात्मकना अयवा प्रातिमासिक विरोधञ्ञान ही सटकार है और इसी कारण 'विशोध' को 'विरोधचान्' नाम नहीं दिया जाता वैसे ही सदेद्दारमक या आन्त्यास्मक ज्ञान ही वस्तुत. अलकार है, अत. उनका नाम भी समदेह या आन्ति- मानू न छोकर सन्देह तथा भ्रान्ति ही होना चाहिए। सबसे अधिक महत्व की बात यह है कि अटंकारों में नाम का निश्य चमत्कारकारी तत्तव के आाधार पर होता है। इसीलिए सादश्य की चारों विशेषताएँ रहने पर भी अनन्वय उपमेयोपमा और प्रतीप को मिन्न अरंकार माना जाता है। उदेक्षा, अपहुति, अतिशयोकि और रूपक में अभेद की समानता रहने पर मी भभावना, अपद, अतिशय तथा आरोप इन चमत्कार हेतुओं में भेद होने से उन अलंकारों में स्वरूपतः तथा नामतः भेद माना गया है। पस्तुत सन्देह में चमत्कार का कारण सन्देह ही है। इमी प्रकार भरान्तिमान् में भी भ्रान्ति ही। अत. इन अलकारों के नाम भी केवल सुदेह और भ्रान्ति ही छोने चाहिए । सृत्ति की अन्तिम पक्ति में 'नुशव्दस्य सभावनाघोतकत्वाव' के स्थान पर निर्णयसागरीय प्रति में 'नुशम्दस्य संमावनाधोतकसत्त्वाव' छपा है तथा संजीविनीसहित छपे सस्करण में डा० राम- चन्द्र दिवेदी ने 'नुशन्दस्य घोतकत्व मत्वा' पाठ दिया है। इमारा पाठ विमर्शिनी पर आधृत है और- "मन्ये शङ्के भुवं प्रायो नूनमित्येवमादिमि। 1-+ उतेक्षा व्यज्यते शब्देरिवशन्दोप्रपि ताट्: ॥"-२२३४ काव्यादर्श. '' इसमें आाए आदि पद के अनुसार 'नु'-शब्द उत्प्रेक्षा का वाचक माना मी जा सकता है। इसी प्रमाण के अनुसार 'इद' -- शब्द भी उत्प्रेक्षावाचक होता है। अत निर्णयसागरीय विमशिनी मैं 'अत्रेवादि' के स्थान पर छपा 'अन्नैवादि०'-पाठ असगन है। वहाँ इस अश का 'पाठान्तर' अन्ैव चेवादि भी दिया है। सजीविनीकार ने सन्देदालकार का कारिकाबद्ध निरूपण इस प्रकार किया है -- 'मन्देहोऽप्रकृतद्वारा प्रकृतं सस्परेद यदि। प्रतिमोत्यापित सोडय सन्देहालडकृतिमेत ।।' 'संदेह मनकृत के द्वारा यदि प्रकृत का स्पर्श करे और यदि वद सदेह प्रतिमोत्थापित हो तो वह सन्दहाळकृति माना बाता है।'
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१५१ [सर्वस्व ] [सू० १९ ] सादश्याद् वस्त्वन्तरप्रतीतिर्भ्रान्तिमान् ।
धर्मः स विद्यते यस्मिन्भणितिप्रकारे स भ्रा्तिमान्। सादश्यप्रयुक्ता च भ्रन्तिरस्य विषयः । यथा-
कर्णालंकृतिभाजि दाडिम फलभ्रान्त्या च शोणे मणी। निष्पत्या सकदुत्प लच्छद्ददशामात्तक्लमानां मरौ राजन्गूर्जरराजपक्षरशुकैः सद्यस्तृपा सू्च्छितम्।।' नाढमर्मप्रह्वारादिना तु भ्रान्तिर्नास्यालंकारस्य विपयः। यथा- 'दामोदरकराघातचूर्णिताशेषवक्षसा । दए्टं चाणूरमल्लेन शतचन्द्रं नभस्तलम् ।I' सादृश्य ह्वेतुकापि भ्रान्तिविच्छित्यर्थ कविप्रतिभोत्थपितैव गृह्यते, यथो- दाहतम्, न स्वरसोत्थापिता शुक्तिकारजतवत्। एवं स्थाणुर्वा स्यात्पुरुपो वा स्यादिति संशयेऽपि बोद्धव्यम् । [सूत्र १९] सादृस्य के कारण [एक वस्तु पर ] दूसरी वस्तु की प्रतीति भ्रान्तिमान् [भलंकार कहलाती है]। [वृत्ति ] सन्यक ज्ञान के अनाव की समानता के आधार पर संदेह के [ तुरन्त] पश्चार इसका लक्षण दिया जा रहा है। भ्रान्ति चित्त का एक धर्म है। वह रहता है जिस उत्ति प्रकार में वह होता है भ्रान्तिमान्। [ किन्तु ] इस भ्रान्तिमान् उच्तिप्रकार=सरंकार का क्षेत्र [केवल ] साद- वयमूटक भ्रान्ति है। जैसे- हे राजन् ! एकाएक ज्यों ही यह विदित हुआ [निष्पत्ति ] कि चै नीलकमल की पंखुडी से नेत्रों वाली थकी थकाई सुन्दरियाँ है तो [ निराश होकर ] गुर्जराज के पक्चरवद्ध शुक मरुस्थल में पिपासा से तत्काल मू्च्छित हो गए; क्योकि [इसके पहिले] वे [उन सुन्दरियों के] ओठों को बिन्वफल समक् बैठे थे, नीले केशों पर तो उन्हें परिपक् जामुन का आत्यन्तिक निश्चय ही हो गया था औौर कर्णकल के लाल (माणित्यमणि) को वे मान बैठे थे अनार।' इसके विरुद्ध जो भ्रान्ति [चकराना ] मर्मत्थान पर गह्दरी चोट आादि से होती है वह इस अलंकार का क्षेत्र नहीं होती। जैसे- 'शौकृष्ण की मुट्ठी की चोट से जिसकी पूरी छाती चूर चूर हो गई थी ऐसे चापूर नामक पहुलवान ने देखा कि आकाश में सैकड़ो चन्द्र निकले है।' [साथ ही] जो भ्रान्ति साहश्यमूलक भी होती है वह भी तभी अळंकार बनती है जन वह कचिकल्पित होती है, जैसा कि पूर्वदतत उदाहरण ['ओऐ०' इत्यादि] से स्पष्ट है न कि लौकिक भ्रान्ति यया छिपनी में चाँदी की भ्रान्ति। इसी प्रकार 'यातो यह ठूँठ होगा या आदमी होगा'-इत्यादि लौकिक संशय में भी समझना चाहिए [ कि वह कविकसपत न होने से अलंकार नहीं है]।
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१५२ मलह्कारसर्वस्चम्
चिमर्शिनी सादृश्यादित्यादि असम्यर्जञानववसाधम्यादिति न पुनरारोपगभव्वसाजान्यालचित- मिति माव. 1 आरोपो हि विपय विपयिणोर्युग पदेकप्रमात विषयीकृतत्वे भवतीति नारोप- गर्भो अमः कचिदृपि समवति, शुछिकादीना शुक्तिकादिरूपतयावगमे रजताद्यभिमाना- मावाद। ननु भ्रान्तिश्चितघर्म स यस्यास्ति स भ्रान्तिमानिति चक्तुं न्याय्यं ताकथमलंकारस्यै- तदनिधानमिन्याशङ्याह-आान्तिरित्यादि। स इनि भणितिप्कारः अतश्वालंकारे भ्रान्ति- मच्छ्द उपचरित इति भाष: 1 सादश्यम्रयुक्तेति। न तु 'का मशो कम योन्माद चौरस्व नाधपफ्छुताः। अभूतानपि परयम्ति पुरतोऽवस्थितानिव ।।' इत्याद्यमिहितावान्तरनिमित्तोतयापितेत्यर्थ.। अतश्च सादश्यनिमित्तेय भ्र्रान्तिरलंकार- विषय इति ताप्पर्यार्थ: । एवं प- 'पासादे सा पथि पथि च सा पृष्टन: सापुर सा पयक्के सा दिशि दिशि च सा तदियोगातुरस्य। हहो चेत. प्रकृतिरपरा नारिति ते कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्ैतवादा ।' इृस्यथैकस्या एव परिमिताया अपि योपितो गाढानुरागद्देतुकं तन्मयतानुसंानं प्रासादादावनेकत्र युगपरपतीती निमित्तमिति न आरन्तिमदळंकार:। स हि प्रासादादेवएछ मारूपर्वेन प्रतीतौ स्याद्। अन्यम्यान्यरूपरवेन सम्यगभिघानात्मा निश्चयो हि भ्रान्ति- मह्लक्षणम्। न च मासादादिवल्लभान्वेन प्रतीयत इति स्फुद पवाय विशेपालंकारस्य विषय। अथ प्रासादादावभूताया अपि वश्लमाया दर्शनाद् मन्तिरिति चेद, नैतम। पवं हाथर आान्तिमानं स्वास्ालंकार:। गाढानुरागात्मकनिमित्तसामर्थ्यास्व रसत एव प्रासादा दावसत्या अपि युवरयाः भतीतिसमुस्ळासा:। कविप्रतिभानिवर्तित्वाभावाल्। 'देवमपि हप पितृशोकविद्वलीकृतं थियं ज्ञाप इति महीं मदापातकमिति राज्य रोग इति भोगान्- मुजगा इति निलयं निरय इत्यादि मन्यमानम्' इत्यादावपि न भ्रन्तिमद्छंकारः।तन्न हि विपयानवगम एव निमित्तसामर्थ्यात्स्वरसत एव विषयभतीतिरुल्लसेव्। शुक्तिकादीनां
पुनर्विपयरूपा श्रियमवगम्यापि श्रीहर्षेण पितृशोकविह्वलीकृनरवाच्छापरचेन भाव्यत इति विपमालंकारो ज्यायान्। 'दातुं वान्द्ति दृषविणेऽपि नयने वामः कर' कजलं भौजंगं च भुजोउप्रदं धटयितुँ वामेउपि बामेतर:। द्रयं स्वं स्वमशिक्षितं भगवतोरघें वपु पश्पतोः साधारस्मितलान्छितं दिवतु नो वक्त्र मनोवान्छितम ।' हत्यव्रापि संस्कार एवालकारो न भ्रन्तिमान्। अघ हि भगवत्या नेतरद्यान्जनद्दान-
संस्कारस्यैव वाक्यायतनम्। अयात् संस्कारप्रवोर्ध विना तदभावादव्जनदान- संस्कारदेतुका अगवदर्धरय स्वाघतवेनाभिमानरूपा भगवन्या अान्तिरवेति चेवू- नतद्। प्ररयुतान हि नगरदर्घस्य तथातवेनेवावगमादव्जनदानसरकारो न परोह+
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सुपागत इति कारणस्यैव स्खलद्रतित्वात्तरकार्यस्य अ्रमस्योतपाद एवं न संभवतीति न भ्रान्तिमतोऽवकाशः । परुद एव हि संस्कारो भ्रमः। स्वात्ममान्नावस्यितस्त संस्कारा- लंकारः। अत एव दातुं वान्छतीत्युकमू। एवं चात्र नेत्रदयान्जनदानसतताम्यासहेतुकः संस्कार एव प्रतीयते न तु तन्निमित्तकोऽपि भ्रमः परसः। परमेश्ववार्धस्य तथातवेनबाव गमात्तदून्धस्याप्यभावात्। अत एवाशिक्षितं स्मितलान्छितं चेत्युकम्। अवान्तर एवा- नयोर्विशेपोऽलंकारभाष्य एवोक इति तत एवानुसर्तव्य इति। एवं च सादश्यनिमितैव आरान्तिरलंकार विपयो न निमित्तान्तरोत्थापितेति न लक्षणस्याव्यापकतवं वाच्यम। एवं सादृश्यनिमित्तकत्वादस्य साधारणधर्मस्यापि वयी गतिः। तन्नानुगामिता यथा- नीलोस्पलमिति भ्रान्त्या विकासितचिलोचनम्। अनुधावति मुग्धात्ति पश्य सुग्धो मघुवतः॥' अत्र विकासीत्यनुगामिश्वेन निर्दिष्टो धर्मः। शुद्धसामान्यरूपत्वं तु यया-
जलनिधिमकरे रुदीचथते द्वाङून वरुधिराहणमांसपिण्डलोभातू।I' अत्र तात्रत्वागत्वयोः शुखसामान्यरूपत्वम। विम्ब प्रतिविम्वभावो यथा- 'पुसिआा कण्णाहरणेन्दणीलकिरणाहआ ससिमऊहा। माणिणिवमणम्मि सकजलं सुसङ्गाए दइएण ।।'
चास्य दवयितुं प्रत्युदाहरति-गाढेत्यादिना। साहश्यनिमित्तकत्वेऽपि कविम्तिभोत्थापि- तैय आ्रान्तिरस्येव विपयो न पुनर्वास्तवोत्याह-साद्टश्येत्यादि। उदाहृतमिति। ओष्ठे विम्बफलाशयेत्यादि। पतदेव संदेहेपि योजयति-एवमित्यादि। संशय इते। अर्थादा रोपगर्भ एव। तत्रैव ह्यस्थ साहश्यं निमित्तम्। अध्यवसायमूले हि संदेहे साहश्यात्सन्व न्वान्तराद्ा विषयविषयिणो: संदिह्यमानत्वं स्यात् यथोदाहुतं प्राक्। एवमारोपगर्भतव एव सादश्यं विना नायमलंकार हृत्यवगन्तव्यम्। तस्मादविशेपेणेव साधर्म्य विहायापि निमित्तान्तरमवलम्व्य नास्यालंकारत्वं वाच्यम्। साहययेऽपि कविप्रतिभोत्थापितस्यैवा- लंकारतं न पुनः स्वारसिकस्येति। विमर्शिनी-असम्यग्ज्ञानत्व के साधर्म्य से न कि आरोपगर्भत्व के साथम्य से आ्रान्तिमान् का लक्षण संदेह के दाद तुरन्त किया। आरोप जो है तब होता है वह जव विषय और विपयी दोनों किसी एक ही ज्ञाता के ज्ञान का विषय बनें इसलिए भ्रम कभी भी आरोपाश्रित नहीं हो सकता क्यों कि सुकि मादि का ज्ञान यदि शुक्ति आदि के रूप में ही होता है तो उसमें रजत आदि का विपर्यं- यात्मक ज्ञान नहीं होता ! 'भ्रान्ति एक चित्त धर्म है सतः भ्रन्तिमान् जिसे भ्रान्ति हो उस व्यक्ति को कहा जाना चाहिए अलंकार को आ्रन्तिमान् क्यों कहा जा रहा है'-ऐसी शंका कर उसका उत्तर देने हेतु लिखते हैं- 'भ्रान्तिः' इत्यादि। 'स'-'वह' अर्थात भणितिपरकार। इस प्रकार अलंकार के लिए 'भ्रान्तिमान्' शब्द का प्रयोग लाक्षणिक है । मूळतः वाचक है वह प्रान्तियुक्त व्यक्ति का ]। साहश्यप्रयुक्त न कि-काम, शोक, भय, उन्माद चौर स्वप्न आदि से उद्विग्न व्यक्ति असत्य वस्तुओं को भी सामने उपस्थित सा देखते हैं-' इत्यादि वाक्यों में प्रतिपादित अन्य निमित्तों से प्रयुक्त। इसलिए तात्पर्यं यह निकला कि सादश्यनिमित्ता भ्रान्ति ही भ्रान्तिमदलंकार का विषय होती है। [अलंकाररल्षाकरकार ने सादच्येतरकारणमूलक भ्रान्ति को भी आ्रन्तिमदलंकार
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भाना है और 'प्रासादे सा०' 'आदि पद्य ही उदाइरणरूप से प्रस्तुत किया है। इसके सण्डन में विमर्शिनीकार लिखने हैं] इम प्रकार- 'उमके वियोग में आतुर मुझे प्रासाद में वही दिसाई देती है औौर रास्ते रास्ते में वही, पीछे बही, सामने वहा और दिशा दिशा में वही, अरे चित्त तुझे कुछ और सूझता ही नही। सपूर्ण विश्व में केवल वद वह वद वह। आसिर यह कैसा अदवनवाद है? -यहाँ नायिका एक ही है और उसकी अवस्थिति भी कहीं एक ही स्थान पर है तथापि प्रासाद आदि अनेक स्थानों में एक साथ उसकी प्रतीति हो रह्ी है। इम प्रतीति में कारण है गाढ़ अनुराग से जनित तन्भयना का बोध । अत यह भ्रान्ति आन्तिमदलकार नहीं है। वह तव होता जब प्रासाद आदि का ज्ञान वहमारूप से दोता क्योंकि ऐसे निश्वय को ही तो भ्रान्तिमान् माना जाता शै जिसमें मिन्र वस्तु का भिन्नरूप से कथन हो किन्तु वक्ता समझे कि वह ठीक कह रहा है। किन्तु यहों प्रासाद आदि का वह्मारप से प्रतीत नहीं हो रहे हैं इसलिए स्पष्ट रूप से यहाँ विद्यपाट कार है। यदि यह कहा जाय कि पसाद आदि में अविद्यमान होने पर मी वहमा के दिसाई देने से भ्रान्ति है नो वह मी निरर्थक है। क्योंकि ऐसा मानने पर यहाँ आन्तिमात्र सिद्ध दोगी भ्रान्ति- मदलंकार नहीं। ऐसा रसलिए कि यहाँ पासाद आदि में अविधमान होने पर मी वहमा की जो भ्रान्ति हो रही है वह कविप्रतिभापसून नहीं है। उसका कारण है गाढ मनुराग। अत. सह ठौकिक भ्रान्ति ही है। इसी प्रकार [रत्नाकरकार ने]'महाराज इर्ष भी पितृशोक से विहल छोकर श्री को शाप, मही को महापानक, राज्य को रोग भोगों को भुजग, प्रासाद को नरक आदि मान रहे थे।' -- [ इस स्थल में भी भ्रान्तिमदलकार माना है किन्तु] यहाँ और सन्य स्थलों में भी आन्तिमदटकार नहीं है। क्योंकि उस [भ्रान्ति] के [वास्तविक ] विषय [भ्रान्ति के आधार] की प्रतीति नहीं दोती [अपितु किसी ] निमिच [जिसे दोप कहा जाता है] के बल पर [अन्य किसी ] विषय की प्रतीति हो उठती है। यह अभी सभी कहा गया है कि 'धुक्ति आदि का शुक्ति आदि के रूप से ज्ञान हो जाने पर उसके ऊपर रजत आदि की आान्ति नहीं हो पानी। प्रस्तुत [देव, हूर्ष] बदाहरण में सी व्रिषय है और औदर्ष को पेसकी प्रवीति भी होती है। उसे वह शाप रूप इस कारण मानता है कि वद पितृशोक से विहल है। अन. यहाँ विषमालंकार ही अधिक प्रदल है। [ रसी प्रकार अल्काररत्नाकरकार मटशोमाकर ने-] 'वायों डाय दाहिनी आँख में भी काजल लगाने लगता है और दाहिना हाथ भी बाएँ हाय में सप- का कंकण पहनाने लगता है। इस प्रकार नवीन अभ्यास से रहित अपने-अपने अर्ध भाग को देखकर भगवान् शिव तथा पार्वती जी का एक साथ समानरूप [साधार=साधारण=समान] से या सकारण- स्मित युक्त हुआ मुस इमें इमारा मन चाहा लाम प्रदान करे।' यहा मी [भ्रान्तिमान् अलकार माना है किन्तु यशां भी। केवल मरकाराल्कार ही है आन्तिमान् अटकार नहों। यहोँ भगवती 7 पार्वना वो दोनों नेत्रों में अंजन लग.ने का नो सदा का सम्यास है उसी से उन्हें वाएँ नेत्र में भी काजल लगाने के दाद दाहिने नेत्र में भी काजल लगाने की वासना बाध्य कर देती है। इस कारण यहाँ सस्कार हो वाक्याषे और इमलिए प्रधान है। यदि कहा जाए कि 'सस्कार परवोष के बिना वेसा होना संमव न होने से शिवरूप अधेमाग को निजरूप अर्थ समझ बेठने की अजनरानाभ्यासमूलक भ्रान्ति ही भगवती पार्वनी को हुई तो यह ठीक नहीं है। वस्तुन स्थिति उल्दी है। यहाँ मगवता पा्वता द्वारा भगवान् शिवरूपी अर्धभाग को शिव- रूपी अर्धमाग ही समझा जा रहा है। इसीलिए अजनदानमंस्कार पूरा उमर नहीं पाता [ उमके उदित होते ही उसका बाथ भी हो जाना है। इसोलिए अंजन लगाने को मिथिव चेष्टा संरन्न नहीं हो पाती अतः उसके आधार पर सिद्ध डोने वाला म्रम भी उत्पन्न नहीं हो पाता अत. यहाँ
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आ्रान्तिमानलङ्गार: १५५
आ्रान्तिमान् नामक सलंकार संभव नहीं है। जो संत्कार प्रस्द हो जाता है वही अम होता है। यहाँ तो संस्कार अपने तक ही सीमित है अतः संस्कार नामक ही अलंकार है। इसीलिए स्वयं कवि ने भी कहा है-'देना चाहता है' [ न कि देता है]। इस प्रकार यहाँ दोनों आँखों में अअ्षन लगाने के सतत अव्यास से वना कैवल संस्कार ही प्रतीत होता है, न कि उस संस्कार से होने वाला भ्रम भी! न तो यह भ्रम यहाँ ऐकान्तिक रूप से न्रम ही सिद्ध हो पाता क्योंकि शिव का अर्धशरीर यहाँ उसी रूप में अर्थाव शिव के अर्घ शरीर के रूप में ही मासित होता है। इस कारण अ्रम का यहाँ गन्ध भी संभव नहीं है। इसीलिए क्लोक में भी 'अशिक्षित' और 'स्मितलाञ्छित' ये विशेषण रखे गए हैं। इस प्रकार इनमें थोड़ा सा ही अनर है। वह अलंकार- भाज्य में वतलाया जा चुका है, अतः उसे वहीं से समझ लेना चाहिए। इस प्रकार सादश्य निमित्ता भ्राम्ति हो भ्रान्तिमान् नामक अलंकार का विषय है, अन्य निमित् से हुई त्रान्ति नहीं। इसलिए [ सर्वस्व्रकार के भ्रान्तिमान् के िक्षण में अव्याप्ति दोप नहीं निकाला जा सकता। इसी पकार सादृश्यमूलक होने से इसमें भी साधारण धर्म तीन प्रकार का होता है। उसमें अनुगानी साधारण धम का उदाहरण यथा- 'हे सुन्धाक्षि! देख, तेरे खिले हुए नेत्र को नीले कमल समझकर अ्रम में पड़ा भोला मधुकर उसकी ओोर दौड़ रहा है।' यहाँ 'विकासी'= 'खिले हुए' यह धर्म अनुगामी धर्म के रूप में कथित है। शुद्ध सामान्यरूप धर्म का उदाहरण यया- 'कुपित वानर के मुख सा ताम्रवर्ण का यह प्रतीची में पहुँचा सूर्य समुद्र के घडियालों द्वारा मांस के रुधिराद्द्र नवीन पिण्ड के लोभ से बढ़ी तत्परता के साथ देखा जा रहा है।' -यहाँ तानल और अरुणत्व शुद्धसामान्य धर्म हैं। विन्वप्रतिबिम्दमाव का उदाहरण यर्था- 'प्रोक्छिता: कर्णामरणेन्द्रनीलकिरणाहृता: शशिमयुसाः । मानिनीबदने सकज्जलशुराङया दवितेन ।' 'करनफूल के नीलम की किरणों से चन्द्रकिरणों को प्रिय मे मानिनी के चेहरे से यह समझ कर पोंछ दिया कि ये कज्जलमिश्नित आँसू हैं।'] -यहाँ सकज्जलत्व [अर्थात कज्जल ] तथा 'इन्द्रनीलकिरणाइतस्व' [भर्थाव इन्द्रनीळमणि- किरण] में विम्वपतिविम्बभाव है। इसकी साधृश्यनिमितकता को ही और अधिक दृढ़ता से सिद्ध करने के लिए विपरीत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं-गाढ इत्यादि अन्यांश द्वारा। 'साट्टव्यनिमित्तक होने पर भी कनिकर्पित म्रान्ति ही भ्रान्तिमदलंकार का विषय बनती है, वास्तविक नहीं-इस तथ्य को स्पष्ट करते है- f साहृश्य इत्यादि द्वारा। उदाहृत अर्थात 'ओोऐ विम्वफलाशया' इत्यादि पद्य के रूप में। यही सिद्धान्त सन्देह में भी लागू कर ते हुए कहते हैं-एवम्०। संशथ=अर्थात आरोपगर्मित संशय ही। नहीं जो संशय का कारण सादृश्य वन पाता है। संदेह को यदि अध्यवसायमूलक भी मान किया जाए तो उसमें विषय तथा विपयी सादृव्य तथा तदितर अन्य सबन्ध से भी संनेह विषय बनने लगेंगे। जैसा कि पहले उदाहरण देकर बताया जा चुका है। इसी प्रकार यद्द भी जानना चाहिए कि आरोपगमिंत मी हो किन्दु यदि साइव्यमूलक न हो तो संदेह नहीं बनता। अतः इसी प्रकार म्रान्तिमान् को भी सादृव्य छोढ़कर अन्य कारण से जनित होने पर अलंकार नहीं मानना चाहिए। सादृश्यमूलक होने पर भी कविकल्पत होने पर ही यह अलंकार अरंकार होता है, न कि वास्तविक, लौकिक या स्वारसिक होने से।
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१५६ अलद्गारसर्वस्वम्
विमर्श :- अर काररज्ञाकरकार ने भ्रान्ति को साइृश्यमूठक न होने पर भी अलकार माना है, और 'प्रासादे सा०' 'देवमपि हर्पम्०' 'दातुं वान्ति०'-ये तीनों पद्य भी प्रस्तुत किए हैं। विमािनीकार ने उन्हें एक एक कर उद्धृत किया है और उनका सण्डन किया है। सण्डन में विशेषता यह है अटक ररलाकरकार की पदावली का किचिद हेर फेर के साथ उसी प्रकार प्रयोग किया गया है जिस प्रकार व्यक्तिविवेक में ध्वन्यालोक की पदावली का विमर्धिनीकार 'पासादे सा० पद्य में 'पासाद' आदि की प्रतीति वलमा के अधिकरण के रूप में मानते हैं और कहते हैं कि यदि प्रासाद आदि का पतीति वहमार्न मे होनी तो भ्रान्ति समन थी। रलाकर प्रासाद आदि में वलमारूपत्व ही मानते हैं। उनकी पकि है-'पामादे सा-अन्र गाढरागानुमवह्देतुक तन्मय- तानुमधान प्रासादादेवलमारूपत्वेन प्रतीती निमित्तम्।' विमर्शिनीकार ने अनुभव की दुहाई देकर इसका सण्डन इसी पदावली में जिस प्रकार किया है वह-'इत्यन्रकस्या एवं परमिताया अवि योपितो गाढानुरागहेतुक विशेषालकारस्य विषय'-इस पकि से स्पष्ट है। इसी प्रकार रक्षा- करकारने 'देवमपि हर्पम्' में माना है कि यहाँ 'श्री'-आदि का ज्ञान कविनिष्ठ ह और 'नाप' आदि का हर्पनिष्ठ। अत प्रमातभेद होने से यहाँ वे भ्रान्तिमान् स्वीकार करते हैं। उनकी पक्ति है-'श्रियम् इत्यादि हि कवेरुक्ि श्वाप-इत्यादि भ्रान्तस्य श्रीह्र्पस्य भ्रान्तिप्रनीत्यनुकग्णमिति भिन्नप्रमातृप्त्ययविपयीकृततवेनारोपसमवादध्यवसायमूल एव भ्रम ।पृ०५३। विमर्शिनीकार इसके विरुद्ध यहाँ 'श्री और शाप' दोनों का छाता केवल दर्ष को ही मानकर प्रमातृभेदाभाव के कारण भ्रान्तिमान् को असमत्र बतलाते और विपमालकार का अस्तित्व स्वीकार करते है। पक्ष विमर्मिनीकार का दी हद् है। इमी प्रकार निम्नलिखित पक्तिओं की पदावली भी विमर्शिनी पदाबली से तुलनीय है- १= एकपमानृविषयीकनत्वे विषयविषयिणोरारोपी मत। न चारोपगर्मो अम क्त्रचिदपि संभवति। शुक्तिकादीना शुक्तिक दिरूपतया वगमे रजतायमिमानानुदयाद। २ = "दातु वाळ्लति०" = इत्यय मतनाम्यासप्रवृद्धमस्कारहेतुका आन्तिरेव। सर्कारबोर्ष विना तब आन्त्यभावात। न च सस्कारस्य भवृद्धत्वे प्रवोधत्वे वा कक्िद् विशेषो भ्रान्ती। तेनेवमादौ आान्तिरेव । ३= यदि च "साहश्याद वस्तवनरप्रनीति आन्तिमान्" रत्यव्यापक लक्षण तहिं लक्षणान्तरं विधेयम्। सकाररल्नाकरकार का यह सिद्धान्त ध्यान देने योग्य है- "प्रतीतिमेदे हि अलंकार भेदो युक्को न निमिचमेहे, अलंकारानन्त्यप्रसंगाद। तद्भेदे तु कवि- प्रतिमोत्यापितविच्छत्तिसद्धावे अन्तर्मान एव न्याय्य।" -अर्थाव अटंकारों में भेद माना जाना चाहिए बोध में भेद न होने पर, न कि कारण में भेद होने पर, कारणमेद में अळकारभेद मानने पर तो अलकार इनने मानने पडेगे कि उनकी गिननी तक संभव न होगी। अत- कारण भेद रहने पर भी उसमें यदि कविप्रतिभो- स्थापित विष्छित्ि का सद्भाव हो तो उसको भी एक ही भेद में मगृहीत कर लेना चाहिए। भरान्तिमान् के विषय में उनका कहना है- 'सादृश्यव्यतिरिकन मित्तोत्यापिताया न म्रान्ती विष्छित्तिविशेपसंमवे कथ नाम अनलकारता।' जो भ्रान्ति सदस्यातिरिक निमिच से अनित हो यदि उसमें भी विच्छित्तिविरेष का सभ्ाव हो तो उसे अलंकारत्वद्दीन कैसे कहा जा सकता है। सपूर्ण विवेचन का सक्षेप अल्काररत्नाकरकार ने इस प्रकार किया है- 'संदेद्समावनयोयंभास्ति प्रवीतिभेद: स्फुट एव, तद्वव।
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उल्लेसालद्वार: १५७
सादृव्यहेत्वन्तरयोरभ्नमेयु न लेशतः कापि विशेषवुद्धि:॥। प्रतीतिभेदेन विना न वाज्य: कुत्राप्यलंकारगतश्च भेद:। निमित्तमेदेन च मिन्नतार्यां पसज्यते सा खल संशयादी।।' अर्थाव जैसे सन्देह और संभावना में प्रतीतिगत भेद स्पष्ट रूप से लक्षित होता है सादृस्य तथा तद्विन्न हेतु से होने वाली भ्रान्ति में बैसा लेशमात्र भी नहीं। जवतक प्रतीति में भेद न हो अलंकार में भेद नहीं मानना चाहिए। यदि निमित्त भेद से भी भेद माना जाने लगे तो फिर संशय आदि में भी अवान्तर भेदों को मिन्न भिन्न अलंकार मानने की नौवत आ खड़ी होगी।' भ्रान्तिमान् का इतिहास :- भामह :- + ++ + वामन :- + + उन्भट :- + + रुट्ट :- 'अर्थविशेषें पश्यन्वगच्छदन्यमेव तत्सदटशम्। निःसन्देहं यस्मिन् अतिपत्ता भ्रान्तिमान् स इति ।।2 ८ाटख। छाता यदि [ उपमेयरूप] पदार्थ विशेष को देखकर उसके सदृश किसी अन्य ही पदार्थ का निश्चच कर वैठे तो उसे भ्रान्तिमान् कहते हैं। उदाहरण- 'पालयति त्वयि वसुधां विविवाध्वरधूममालिनी: ककुमः । पश्यन्तो दूयन्ते धनसमयशक्धया हंसा: ॥'८/८८ 'आप के पृथ्वी की रक्षा करसे रहते दिशाएँ विविध यक् के धूम से युक्त रहती हैं। उन्हें देखकर हंसों का चित्त दुखता है क्योंकि वे उन्हें वादल समझकर बरसात आने के भ्रम में पढ़ जाते हैं।3 मम्मट :- 'आान्तिमानन्यसंवित तत्तुल्यदर्शने।' प्राकरणिक (उपमेय) के समान [अप्राकरणिक=उपमानभूत ] वस्तु के दिखाई देने से प्राकरणिक (उपमेय) में उसी समान वस्तु की प्रतीति न्रान्तिमान्। उदाहरण-'कपाले मार्जार: पय इति करॉल्लेढि रशिनः'।=कसोरे में पड़ रही चन्द्र-किरणों को विह्ली दूध समझकर चाटने लगती है।' इस विवरण से स्पछ है कि भ्रान्तिमान् के प्रवर्तक रुद्रट ही है। मम्मट ने मी कदाचित श्रान्तिमान् को अलंकारो में नहीं गिना, क्योंकि यह अलंकार परिकरालंकार के वाद के अलंकारों में है। ऐसी प्रसिद्धि है कि काव्यप्रकाश का निर्माण मम्मट ने परिकर तक ही किया है। शेषांश की पूर्ति हरविजय के टीकाकार अलक अथवा किसी अल्टनामक विद्वान ने को है। अन्तरंग प्रमाणों से वह तथ्य वास्तविक मी प्रतीत होता है। परिकर के वाद काव्यप्रकाश की पंक्ियों में वैसी कसावट नहीं है। दूसरा प्रमाण यह है कि काव्यप्रकाश में जैसा कि उद्धृत अ्रमाण से स्पष्ट है, आन्तिमान् को साइव्यमूलक अलंकार माना गया है किन्तु उसकी गणना फुटकल अलंकारों में बहुत आगे जाकर की गई हैं। आचार्य दण्डी ने भ्रान्तिमान् को उपमालंकार के अन्तर्गत मोहोपमा नाम से रवीकार किया है -- 'शशीत्युत्पेक्ष्य तन्वद्ि त्वनमुसं, लवम्मुख्ाशया। मोहोपमा स्मृता॥ २१२५ मैं तुन्हारे चेहरे को चन्द्रमा समझ पैठता हूँ, अतः तुन्हारे विरह में चन्द्र को चुन्हारा मुख समझ पकड़ने दौडता हूँ।
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अग्निपुराग में मोहोपमा को आन्तिमान कदा भी है- 'प्रतियोगिनमारोप्य तदभेदेन कीचनन्। उपमेयस्य यन्मोदोपमासी भ्रान्तिमद् वच ।।' लगमग १२ वीं शनी में हो हुए वाग्मट ने भ्रान्निमार स्वीकार किया है- 'वस्तुन्यन्यत्र कुश्रापि तत्तुत्यस्यान्यवस्तुन.। निश्चयो यत्र बायेन भ्रान्तिमान् स ससृतो यथा। ४।७३। हेमकमलमिति वदने नयने नीलोतपलमिति प्रसताक्षि। कुमुममिति तवइसिने निपतति भ्रमरागा श्रेणि ।' जहाँ अन्य वस्तु में तच्तुस्य अन्य किसी वस्तु का निशय हो जाय उसी को भ्रान्तिमान् कहा जाता है। यमा-'हे आयनाकि' मौरों की पॉन तुम्हारे चेहरे पर उसे हेमाम्योज समझकर टूट पढती है, नेत पर नीडकमल समझ तथा इँसी पर पुष्प समझकर।' सजोविनीकार ने इस अलंकार को सक्षितरूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया है- 'साइश्यो त्यापिता आरान्तियत्र स भ्रान्तिमान् मन. । अर्थात् आन्ति जहाँ साहश्यजनिन हो वह ्रान्तिमान्। [सर्वस्व ] [सू० २०] एकस्थापि निमित्तवशादनेकधा ग्रहणमुल्लेख: । यत्रैकं वस्त्वनेकधा गृहाते स रूपवाहुल्योल्लेपनादुल्लेसः। न चेदं
स्क्रियते। तत् रुच्यर्थित्वव्युत्पत्तयो यथायोगं प्रयोजिकाः। तदुकम्- 'यथावचि यथार्थित्वं यथाव्युत्पत्ति भिघते। आभासोऽप्यर्थ पकस्मिननुसंघानसाधिते॥' इति ॥ यथा-'यस्तपोवनमिति मुनिमिः कामायतनमिति वेध्याभिः संगीतक्ञा- लेवि लासकेः इत्यादि दर्पघरिते थीकण्ठास्यजनपद्वर्णने। अघ होक एव ओीकण्ठाख्यो अनपदस्त तद्गुणयोगाच पोवनाद्यनेकुरूपवया निरूपितः। रच्य- र्थित्वव्युत्पत्तयन् प्रायशः समस्तव्यस्ता योअयितुं शस्यन्ते। नग्वेतन्मव्ये 'ञ्चरस्रमिति शरणागतैरसुरविवरमिति वातिकैः' इत्यादौ रूपकालंकार- योग इति कथमयमुल्लेसालंकारविपय:। सत्यम्। अस्ति तावत् 'तपोधनम्' इत्यादौ रूपकषिविकोऽस्य विषयः। यन वस्तुतस्तदृपतायाः संभवः। यत्र तु रूपकं व्यघस्थितं तत्न चेदियमपि भद्ठि: संभाविनी तत्संकरोऽस्तु। न त्वेवावतास्याभाघ: शक्यते चक्तुम्। ततक्ष न दोप: कशित्। एवं दि वन् विपये भ्रान्तिमद्तंकारोSस्तु अतदरुपस्य तद्रपताप्रतीतिनिबन्धनत्वाद्। नैतव्।
स्य।संकरप्रतीतिस्त्यद्रीकृतैव। यद्येवम्, समेदे भेद इत्येवंर्रपातिशयोकिरत्रा- स्तु। नैप दोप:। प्रदीतृमेशास्येन विषय विमागेनानेकधात्वोट्टङ्गनात्तस्य च
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विच्छित्यन्तररूपत्वात् सर्वथा नास्यान्तर्भावः शक्यक्रिय इति निश्चयः। यथा वा- 'णाराभणो त्ति परिणअवआाहि सिखिल्लहो ति तरुणीहि। 'वालाहिं उण कोदूहलेण पमे अ सञ्चविधो॥' पवम 'गुरुर्वचसि पृथुरुरसि अर्जजुनो यशसि' इत्यादाववसेयम्। इर्यास्तु विशेप :- पूर्वत्र ग्रहीतृमेदेनानेकधात्वोल्लेख:, इह तु विषयभेदेन। नन्बने कधात्वोल्लेखने गुर्वादिरूपतया श्लेप इति कथमलंकाराम्तरमन्न स्थाप्यते। सत्यम्। अनेकधात्वनिमित्तं तु विच्छित्यन्तरमन्न दश्यते इति तत्प्रतिभो त्पत्तिहेतु: श्लेपोऽत्र स्यात्। न तु सवंथा तदभावः। अतश्वालरंकारान्तरं यदेवंविधे विषये श्लेपाभावेऽपि विच्छित्तिस्दावः। सर्मादेवमादातुल्लेख एव श्रेयान्। एवमलंकारानतरविच्छित्याश्येणाप्ययमलंकारो निदर्शनीय:। [सू० २०] कारणवशाद एक ही वसु का अनेक प्रकार से ज्ञान उल्लेख । [वृo] जहाँ मवा ही वस्तु अनेक प्रकार से जानी जाती है वह अलकार उल्लेस कहलाता है। उल्लेख इसलिए कि उसमें रूपवाहुत्त्य का उल्लेखन [अवगम ज्ञान] रहता है। यद यूं ही हो जाने वाला सामान्य त्लेखन नहीं होता, अपितु [यह सलंकाररूप होता है और ] इसका [यत्नपूर्वक] निष्पादन किया जाता है जिसमें उपाय बनता है [ पदार्थ की ] विविधधमंयुक्तता नामक तत्व्र। इस [विविववर्मयुक्कता ] में कारण बनते हैं (१) रुचि, ( २ ) अर्थिता तथा ( ३ ) ख्युरपत्ति, किन्तु योग्यता के अनुसार। जैसा कि [श्रीमान् उत्पणदेवाचार्य ने] कहा है-'पदार्य एक ही हो और उसका घान भी सत्न-पूर्वक ठीक ढॅंग से किया गया हो तथापि वह सान उसी रूप में बदल जाता है जैसी जाता की रुचि रहती है, जैसी उसकी गरज रहती है और जैसी व्युरपत्ति।' जैसे-हपंचरित के अन्तर्गत शीकण्ठ जनपद के वर्णन में [निर्णयसागरीय पृष्ठ ९७ पर ] 'निसे मुनिओं ने सपोवन, वेश्याओं ने कामायतन, नटों ने संगीतशाला [समजा]-" इत्यादि। यहां शकण्ठ नामक एक ही जनपद तपोवन आदि अनेक रूप से निरूपित है, क्योंकि उस [ जनपद] में उन [तमोवन आदि] के गुण थे। ये जो रुचि, अर्थित्व और व्युत्पत्ति हैं इनकी योजना एक साथ और पृथक पृथक भी की जा सकती है। इस [श्रीकण्ठ जनपद के वर्णन] में 'शरणागत व्यक्तिओं ने वज् का पिजरा, वार्तिकों [भूगर्म में छिपकर साधना करने नालों ] ने अमुरविवर [प्ताल माना ]' इत्यादि स्थलों में रूपकालकवार का पुट भी है तब यह उल्लेखालंकार का विषय कैसे हो सकता है? [उत्तर ] ठीक है [ किन्तु ] 'तपोदन' इत्यादि स्थलों में उल्लेख रूपक से पृथक भी विद्यमान है, जहां वस्तुतः तनूपता हैं। हाँ! जहां रपक होता है वहां यदि इस अलंकार की भी छाया आ जाए तो उसे संकरालंकार माना जा सकता हैं। किन्तु इतने [सांकर्य ] भर से इस [उल्लेख ] का अनाव नहीं माना जा सकता। इसलिए यहाँ कोई दोष नहीं आता। शंका होती है-कि 'यहां [तपोवनन् इत्यादि स्थल में यदि संकरालकार नहीं है तो] भ्रान्तिमदलंकार क्यों न माना जाए, क्योंकि यहां सलंकारत्व का मूल है मिन्न में भिन्न वस्तु के अभेद का ज्ञान [जो भ्रान्तिमान् का जनक है], [उत्तर ] मैसा नहीं [ अर्थोत् भ्रान्तिमान् नहीं माना आ सकता] क्योंकि [उसमें ] 'अनेक प्रकार से ग्रहण (ज्ञान)- रूनी नवीन और विचित्र विशेपता नहीं रहती और यह [उल्लेख] अलंकार इसी विशेषता पर, निर्भर रहता है। नहां तक सांकर्य की प्रतीति का मश्न है उसे तो स्वीकार कर ही लिया गया है।
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[शका] यदि ऐसा है [ यहाँ आ्रान्तिमान् और सकर नहीं मानना है] तो यहाँ 'अभेद में भेद'-नामक अतिरायोकि यहाँ मान की जाए [उल्लेख ही क्यों माना जा रहा है], [उत्तर] यह दोप भी नहीं ठदरता क्योंकि एक तो यहाँ [अनिवार्य रूप से] शाता अनेक होते हैं [ जब कि अविशयोकि में जाता की अनेकना अनिवार्य नहीं रक्षती। इसलिए इन दोनों के विषय भिन्न हो जाते है,] दूसरे यहाँ एक ही वस्तु का ज्ञान [नियमन ] अनेक प्रकार से होता है[ अतिशयोकि के समान केवल भिन्नरूपमान मे नहीं] जो एक स्वतन्त्र ही विष्छिति है [ अत वि्छित्ति में भी भेद पड जाता है]। सवथा, इस [उल्लेख] का अन्तर्माव करना समव नहीं है [ हमारा] यही निश्चय है। [ उस्लेखका ] अन्य उदादरण यथा- 'नारायण इति परिणतवयोभि- शरीवछ्म इति तरुणीमिः। बालाभि पुन कौतूइलेन शवमेव सत्यापित. ।।' - वीकृष्ण भगवान् को ] 'वृद्ध महिलाओं ने नारायण, युवतियों ने लक्ष्मीपति तथा वचिओं ने कुनूइलपूर्वक ऐसा ही समझा' इसी प्रकार-वाणी में गुरु [चृद्दस्पति तथा गमीर ] वक्ष स्थल में पृथु, [प्थुनामक राजा तथा विस्तीर्ण ], यद में अर्जुन [अर्जुननाम पाण्डव तथा धवल]' इत्यादि में भी जानना चाहिए। [इन दोनों में ] भेद इतना ही है कि प्रथम में ज्ातृगत अनेकता के कारण जेयगन अनेकता है और दूसरे में [ पृथु तथा अजुंन के आरोप के ] विषय [वक्ष' स्थल तथा यश] की अनेकता के कारण। [रका] यहा 'गुरु' [बृहस्पनि तथा गम्भीरता ] आदि रूप से [एक ही पुष्यभूति का] अनेक रूप से ज्ञान होने पर [यहाँ ] श्लेप मानना चाहिए, यहाँ दूसरा अलंकार [उल्लेख ] क्यों योपा जा रहा है। [उत्तर ] ठीक है [आप की शका फिन्तु ] यहाँ जो [ विषयगत] अनेकता का ाव है उससे एक नए चमत्कार को जन्म मिलता है, अन. [यहाँ एक नया उल्लेख नामक अरकार है, अधिक से अधिक ] स्लेप को यहाँ उस [उल्लेख] की झलक [ प्रतिमा ] मर शेष रहने देने वाला [ उसे दबा देने वाला मात्र] माना जा सकता है, यहाँ उस [उल्लेस] का सवंथा अमाव नहीं माना जा सकना। इसलिए भी यह एक भिन्न अठकार है कि इस प्रकार के [उपरिदत्त ] स्थलों में जहाँ इनेप नहीं भी रहना वहाँ भी यह विशिष्ट चमत्कार अनुमव में माना है। इस कारण ऐसे स्थलों में [श्लेप रहने पर भी] उल्लेख की मानना अधिक अच्छा है। इसी प्रकार अन्य अलकारों की विच्छित्ि के सदारे भी इस अलंकार की निष्पत्ति दिखलाई जा सकती है। विमर्शिनी एकस्यापीति। अनेकधा ग्द्दणमिति। न पुनरनेकधा कक्पनम् । ग्रहणं हि स्वारसि* क्यामुत्पादितार्यां च प्रतिपत्तौ संभवति न तु स्वारसिक्थामेव। यदाहु :- 'अतः शब्दानुसंधानवन्ध्यं तदनुबन्धि या। जात्यादिविषय ग्राहि सर्वं अ्त्यवमिष्यते ।' इति। कल्पनं पुनरुवाद प्रतिपत्येकगामीति स्वारसिक्यां प्रतिपती न समवती स्युभयन्रापि व्यापकत्वाद्ययासूत्रितमेवर युक्तम्। रूपवादुल्येति। अत एवामुसे वसत्वन्तर- प्रतीतिरसत्येय। अन्यथा हेकस्यानेकधाप्रहणमेव न स्यात्। अत एव चास्थ आ्रन्तिमद्दः नन्तरमेव छप्षणम्। एकस्य च न स्वातन्त्र्येगानेकघाग्रहणम्, अपि तु तत्तमयोजन वशादिश्याह-न चेदमित्यादि। एतदिति। अनेकधा भ्रह्णम् एकस्यैव नानाविधधर्मयोगिन
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उल्लेखालहार: १६१
आखण्डद्येन प्रतीतिगोघरी भावातकथमेकैकधर्मचिपयमनेकधाग्रहणं युक्तमित्याशकचाह- तन्नेत्यादि। तवेत्यनेकधाग्रहणे। स्वातन्त्र्येण विकल्पनं रुचि:1 अर्थकरियामिलापपरतवमर्थि त्वन्। वृद्नव्यवहारशरणता व्युत्पत्तिः। उक्कमिति श्रीपरत्यभिज्ञायाम्। तत्तद्गुणयोगा दिति विविक्व्वादिनानाविधधर्मसंयन्धात्। सुनीनां तपोननविपयमर्थित्वम्। ेदयानां प्व कामायतनविषयमथिरचम्। एवं लासकानां तु संगीतशालाविपया व्युत्पत्तिरर्थित्वं च। प्रायश इति, अनेन रुचिरत्र नास्तीति सूचितम्। ननु योऽयं श्रीकण्ठाख्यजनपदवर्णन- अन्थखष्ड उदाहरणतवेनानीतस्तवालंकारान्तर संवन्धोऽप्यस्तीति कथमेतदिपय एवेत्याह- नन्वित्यादिना। एतदेवाम्युपगम्थ प्रतिविधने-सत्यमित्यादिना। तावच्छच्दो रूपकाभाव विप्नतिपत्तिद्योतनार्थम्। तद्रपताया इति तपोबनादिरूपतायाः। अत्रापि यदन्येरवयवा- वयविभावसंबन्धात्सारोपाया लप्षणायाः सत्वाद्पकालंकारमाराङय विचिक्तत्वस्य चिन्त्य- त्वमुक्तं तद्युक्तम्। अवयवावयनिभावसंबन्धाभावावक्षणाया एवासत्तात्। न हि श्रीकण्ठास्ये जनपदे तपोवनमवयनन्यायेन कुत्राप्येकदेशेस्ति यत्तन्ावयविनि मुनिभिरा रोपितमू। कि तु तत्तद्गुणयोगिन: श्रीकृण्ठस्य विविक्ततवादितपोवनादिगुणमुखेन निज- निजवासनानुसारेणार्थित्वादिना मुनिप्रसृतीनानीदगाभासः। अधापि यद्यत्यवयवावय- विभावविवचा तल्नक्षणमात्रं न रूपकम्। तस्त लक्षमापरमार्धतवेपि विपयश्य रुपवतः करणाद्लंकारत्वम्। अन्यथा तु लक्षणामात्रमेव। नहि उप्णापि रूपकपरमार्था। इह च तपोवनाद्यारोपेजारोपविषयस्य नातिशयः कश्चित्। वस्तुत एव तद्पतायाः संभवात्। अतश्व स्थित एवात्र रूपकनिविकतोऽस्य विषयः । न केवलमन्यालंकार विविक्तोज्यमेवास्य विपयो यावद् यत्रापि रूपकालंकारयोगोऽस्ति तथाप्ययं संभवत्येवेति दर्शयितुमाह-यत्रे- स्यादि। इयमपि भङ्गिरिति एकस्यानेकधाग्रहणरूपा। एतावतेति रूपकप्रयोगमान्रेण। ततश्चेति रूपकोल्लेसयो: संकरात। ननु यत्र रूपकयोगो नार्ति तदलंकारान्तरयोग: संभवतीत्याह-एवं होत्यादि। अतद्रपस्येति। अतपोवनरूपस्यापि तपोवनरूपत्वोपनिवन्ध- नाव। अतस्मिस्तद्ग्रहो भ्रम इस्येतदेव हि त्रमसतखम्। अपूर्वस्येति त्रान्तिमद्संभ- विनः। तद्ेतुकत्वादिति अनेकधाग्रहणास्यातिशयनिमित्तकस्बात्। यदि चात्र आ्रान्ति· मांनप्यस्ति तत्तेन सहाश्य संकर एवास्तिवित्याह-संकरेत्यादि। यद्ेवमिति। भ्रान्तिमंतो- स्थ विशेषस्तेन सहास्य संकरो वेत्यर्थः। एप इति अतिशयोकिसनावः। तस्येति ग्रहीतृ- भेदास्यस्य विभागस्य। विच्छित्यन्तरत्व्रमेत्र हि सर्वेपामलंकाराणं भेदहेतुः। तदेवं तन्त- चछड्गानिरासपूवममुमेव सिद्धान्तीकृत्य पुनरप्युदाहरति-णाराअणो त्तीति। अत्र च नारा यणत्वाद्युवलेखने वृद्धाप्रतीनां यथाक्रमं व्युरप्यर्थित्वरुचयः। एतदेवान्यवापि योज यति-एवमित्यादि। विशेष इति पूर्वस्माव। विषयभेदेनेति वचनादिभिन्नत्वेन। मनेकथात्वो- ल्लेखे गुर्वादिरूपतया दलेप इति गुर्वादीनासुभयार्थवाचिरवात्। तक्ष्मतिमोत्पत्िहेतुरिति । शलेषमन्त रेणान्ोल्लेखानिप्पत्तेः। तदभाव इति, उच्लेखाभावः। अतक्ेति, श्लेपाभावेडप्ये- तद्विच्छित्तिसंभवात्। एवंविध इति विषयभेदरूपे। तत्त यथा- 'सवीदा दयितानने सकरुगा मातङ्गचर्माम्वरे सन्नासा भुजगे सविस्मयरसा चन्द्रेsमृतस्यन्दिनि। सेरप्या जहसुतावलोकनविधी दीना कपालोदरे पार्वस्या नवसंगमप्नमयिनी इष्टि शिवायास्तु वः।' अन्नैकंस्या एव दष्टेस्तत्तद्व्िपय भेदेन नानात्वोल्लेखनम्। एकस्यापि=एक का भी अनेकधा ग्रहण=अनेक प्रकार से ग्रहण न कि अनेक प्रकार से
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कल्पना करना [जैमा कि रत्नाकरकार ने माना है]। गदण जो है वह तभी मंमन है जब प्रतीति स्वारसिक [=लौकिक सामान्य] भी हो और [केवल कविद्वारा] उत्पादित भी। प्रतीनि केवल स्वा- रसिक =लोकिक हो तो वह समव नहीं दोता। जैसा कि कहा है-'समा प्रकार का प्रत्यक्ष जाति आदि [गुण, किया, सज्ञा] को विषय बनानेवाला माना जाता है, मने ही शम्दानुमधान से रहित हो या मिश्रित ।' कक्थना मौनरुकत्य आदि रूप है और वह एकमात्र जानात्मक ही है। इसलिए स्वारसिक=लौकिक प्रनीति में वह समव नहीं है। इमटिए [ उलेस का] जैसा लक्षण मूल-[सर्वस्व ] कार ने किया है वैसा ही ठीक है क्योंकि उसमें [भहण सब्द के प्रयोग से स्वारसिक तथा करपना] दोनों प्रकार के ज्ञान का संग्रह हो जाता है। अत. 'एकस्यानेकधा कल्पनमुन्लेस' इस प्रकार रत्नाकरकार द्वारा ग्रहण शब्द को बदल कर 'कल्पन'- शब्द का प्रयोग करना अनुचित है]। 1यहो यह जानव्य है कि रलाकरकार ने स्वारसिक तथा उत्पादित दोनों को परसपर निरपेक्षमाव मे उल्लेख का कारण बतलाया है। उन्होंने 'प्रथम का उदाहरण "नारायण इति०" यह पद्य माना है और दितीय का श्री कृष्ण को मट्ों ने पर्वतराज, दूसरों ने शिछु, मुन्दरिओं ने काम० समझा'-यह ]। रूपयाहुव्य इसीलिए आरम्म ने सन्य वस्तुओं की प्रतीति रहता ही है। देसा न हो तो एक का अनेक प्रकार से महण ही न हो। 'सीलिए इस अरकार का क्षण आान्तिमान् अरकार के तुरन्त पश्चात किया गया है। 'एक वस्तु का अनेक प्रकार से ग्र्ण ऐसे ही (स्वातन््येग) नहीं अवि नु प्रयोजन के साधार पर होता है-इस तथ्य पर रिसा-'न चेदम्०' इत्यादि। एतद अर्थात अनेक प्रकार से श्ञान। एक हो वस्नु में अनेक प्रकार के धर्मे होंगे तो केवल एक एक धर्म लेकर अनेक प्रकार से ज्ञान होना सभन कैसे होगा-'क्योंकि उस वस्तु का ज्ान तो अख़ण्डरूप से होगा-' इस दाका पर उचर देते हुए लिसते हैं -'तब्न' इत्यादि। तब=अर्थात यनेक प्रकार से ग्रहण में। रचि नाम है स्वनन्त्रतापूर्वक विकल्प करने का, समीष काम की इच्छा का नाम है अर्थित्व तथा न्युस्पत्ति नाम है वृद्ध व्यवहार का आश्रय होना। उक्तम्= कहा है अर्थोत उत्पलदेव ने श्रीप्रत्यमिश्ा में [दरष्टव्य =ईश्वरपत्यमिन्राविवृत्तिविमर्णिनो २३३ कारिका, यहाँ रुचि आदि के अर्थ अमि- नजगुप्त की विभर्िनी से दो लिए गम हैं। विमर्सिनी में इनका सर्थ है-'रुचि स्वानन्वर्य वा, अर्थक्रियापित्व वा वृद्धव्यवद्दारं वा, अनतिक्रम्य आभासा भिद्यन्त इति 'सूत्रार्थ. ।] तत्तद्गुण योग विविक्तत्व = एकान्तत्व आदि नाना प्रकार के धर्मो के सबन्ध से। भुनिओं में तपोबन विषयक अयित्व है, वेश्याओं को कामायतनविषयक अर्थित्व है और नटों को सगीतशालविषयक व्युत्पाचि भी है और अथित्व भी। प्रायशः इसमे यह सूचित किया कि यहाँ रुचि नहों है। [शका ] यह जो श्रीकण्ठ जनपद के वर्णन का अंश यहाँ उदभृत कर दिया है इसमें दूसरे अटंकार मी हो सकते है, केवल उल्लेस का ही विषय इसे क्यों माना जा रहा है'-इस पर [उत्तर देते हुए] कदते हैं-'ननु० इत्यादि। इसी का स्वीकार कर सण्टन करते हुए कहते है-'सत्यम्'-हत्यादि। 'ताब' -शब्द रूपकामावरुपी अनुपपत्ति का सूचक है। तनूपत्ता का का अर्थाद तमोबनादिरूपता का । इस स्थल में भी अन्य विद्ानों ने [शोभाकर ने नहीं] जो अवयवावयविभावसम्वन्ध से सारोपा लक्षणा का अस्तित्व स्वीकार कर रूपकालंकार माना है। और कहा है कि 'यहाँ केवल उल्लेख का अस्तित्व मानना ठोक नहीं है-वह अमान्य है। न यहाँ अवयवावयिमावसंबन्ध है और न कक्षगा ही। श्रीकण्ठजनपद में तपोवन का अस्नितव किसो एक मघ या अवयद में थोड़े ही है। जिससे मुनिओं ने उसे अवयवी मानकर उस पर पोवन का आरोप किया हो। यहाँ तो उन-उन गुगों से युक्त शीकण्ठजनपद में तपोवन आदि के पकान्तवा
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उल्लेसालड्कार: १६३
[विविकल्] मदिशुणों के द्वारा अपनी-अपनी वासना के अनुसार मुनि आदि को प्रयोजनवशाद ऐसा साभास हो रहा है। इतने पर भी यदि अवयवावयिभान की विवक्षा हो भी तब भी यहाँ लक्षणा मान्र हो सकती है, रूपक नहीं। क्योंकि यद्यि रूपक लक्षणा के बिना नहीं होता; वह नहीं अलंकार होता है जहां विषयी के द्वारा विषय को अपने रूप से रूपित किया जाता है। नहीँ ऐसा नहीं होता वहाँ रक्षणा भर होकर रह जाती है। ऐसा नहीं है कि लक्षणा रूपकपरमार्था हो अर्थात उसका स्वारस्य केवल रूपक में हो। फिर यहाँ तपोवन आदि के आरोप से आरोप के विषय (श्रीकण्ठननपद) में कोई सतिशय नहीं माता। क्योंकि यहां तद्रूपता वस्तुतः ही विद्यमान है (रूपक तो कल्पित या आहार्य तद्रूपता में होता है।) इसलिए यहाँ रूपक से सदया स्वतन्त्र ही है उल्लेस।
इस प्रकार 'इस (उल्लेख) का स्थल केवल वही नहीं होता जहाँ अन्य किसी अलंकार का स्पर्श नहीं रहता यथा यह तपोवनन् इत्वादि, अि तुउन स्थलों में भी यही अलंकार होता है जहाँ अन्य अलंकारों का स्पर्श भी रहता है'।-इसी तय्य के लिए किखते हैं-'एवं हि' इत्यादि। अतदूरुपस्य = जो तद्रूय अर्थाव तमोवनरूप नहीं है उसे भी तपोवनरूप से बतलाया गवा है।' भिन्न (अतद्) में भिन्न (तद्) रूप से बोध भ्रम होता है'-और यही भ्रम का सर्वमान्य रूप है। अपूर्व= नवीन अर्थाद जो भ्रान्तिमान् में नहीं होता। तद्धेतुकत्वात्=अनेकधा ग्रहण नामक जो अतिशय (विशेपता) तन्षिमित्तक। 'यदि यहाँ आन्तिमान् भी है तो उसके साथ हुए उत्लेख का संकर ही माना जय-इस शंका को मन में रखकर स्वीकारात्मक उत्तर देते हुए काहते हैं- 'संकर' इत्यादि। यद्येवस्=यदि ऐसा है नर्थाद यदि भ्रान्तिमान् से इसका अन्तर है जथवा उसके साथ इसका संकर है तो। एप=यह अर्थात अतिशयोकि का सद्भाव। तस्य=उसका मर्थात प्रहाता के भेद नामक विभाग का। सभी अलंकारों का भेदक विच्छित्तिगत भेद ही होता है। इस प्रकार विभिन्न शंकाओं का निराकरण करके फिर से उल्लेस का ही वदाहरण प्रस्तुत करते हैं- 'पाराअमो=नारायण' इत्यादि। यहां जो 'नारायणत्व' आदि का उल्लेख है उसमें वृद्धा आदि का क्रम से व्युत्पत्ति, अथ्ित्व और रुचि निहित हैं। इसो को दूसरे स्थलो में भी लागू करते हुए कहते हैं- वन्०'। विशेष=अन्तर अर्थात पहले से। विषयभेदेन सर्थाव वाणी आदि की भिन्नता से। 'अनेकातवोसलेख० इलेपः' गुरु आदि के रूप में अनेक प्रकार से उललेख होने पर रलेप होगा= कारण कि जुरू आदि शब्द अर्थदय के बाचक है। तत्पतिभोत्पत्तिहेतु: क्योंकि यहां इलेष के बिना उल्लेस की निष्पत्ति नहीं होती। तदभाव=उल्लेस का अभाव। अतश्च मर्याव रलेप के न होने पर भी इस उल्लेख की विक्छित्ति की निष्पत्ति समव होने से । एवंविध = ऐसे = विपय- मेदरूप स्थलों में। इसका उदाहरण-'पा्वती की शिवजी का नवीन समागन चाह रही (प्रणय := याच्जा) दृष्टि आप के शिव=केल्याण के लिए हो, जो (दृष्टि) भियमुख पर सलजज, बजचर्मे पर सकरूण सर्प पर समय, अमृतवर्पी चन्द्र पर सविस्मय, गंगा पर ईर्ष्यायुक्त कपाल पर दीन हो जाती है[अर्थात-वह उन-उन मावो को व्यक्त करने वाली मुद्रा से युक्त हो जाती हैं] यहां एक ही दृष्टि का (प्रियमुख आदि) विषयों के भेद से अनेकत उलिखित है। विमर्श :- 'एवंविधे विषये 'इस प्रकार के विषय में' इस मूल का अर्थ जयरथ और श्रविद्या- चनवर्ती इन दोनों टोकाकारों ने 'विषयमेदरूप विषय' किया है, किन्तु किया जाना चाहिए 'एक वस्तु के अनेक प्रकार से ज्ञान वाले स्थलों में'। इस पंत्ति के तुरन्त पूर्व 'विपयमेदरूप' उल्लेख भेद का ही निरूपण है किन्तु श्लेष का अभाव 'ग्रहीतमेद से अनेक प्रकार का ज्ञान-' इस भेद में मी होता ही है। खण्डन रलेपयुक्त विषयभेद वाले मंश का चल रहा है मतः 'एवंविध' का
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पराम्शविषय उसी को मानना चाहिए-यह तब मान्य होता जब 'तत्प्रतिभोत्पत्तिहेतु"-000 अनश्ालंकारान्तरम्'-इनने ग्रन्थ को अलग मान कर इसमें साध्यसाधकनाव माना जाता अर्थाव 'क्योंकि इलेप उल्लेख की झढक भर रहने देता है, उसका यहा अभाव नहीं हो जाना। इस अंश को हेतु मानकर 'इसलिए उल्नेस मिन्न ही अलकार ह'-इसे साध्य माना जाना। किन्तु ऐसा दोना समव नहीं है। 'अल्कारान्तरप्रतिमोरपत्तिदेतुत्व को अन्य भरकार के निराकरण का हेनु माना गया है न कि सिद्धि का। फिर 'अतश्च' में 'च'= 'और'-यह पदार्थ व्यर्थ हो जाता है। इमने इस ग्रन्थ की जैसी सगति गाई है उसमें ऐमा कोई दोप नहीं रहता। इम 'तसमादेवमादौ-भरेयान्' को पूरे विवेचन का उपमहारभून सिद्धान्त वाक्य मानते है। इसके पश्चात् जो 'एवमलद्वारा० निदशनीय कहा गया है यह इसलिए कि ऊपर केवल कुछ हो अलकारी का निराकरण किया गया है। एक यह तथ्य भी यहोँ ध्यान देने योग्य है कि उस्लेख में न केवल क्षेयगन अनेकस्व, अपितु स्ातृगन अनेकत्व मी अपेक्षिन होता है। चिमर्शिनी तद्यं द्विप्रकारोऽपि रूपकाद्याधयवदन्यालंकाराथ्रयोऽपि संभनतीत्याह-एवमल कारा- न्तरेत्यादि। तग्राद्य: प्रकार' संदेहाधयो यथा- कि मानु किमु चित्रभानुरिति य निश्चिन्वते चैरिण. कि चिन्तामणिरेप कल्पविटपी कि वेति चाशागता । किं पुप्पा कर एप युप्पविसिर किं वेति रामाजनः कि राम. किसु जामदग्न्य इति वा य धन्विनी मन्वते ॥'
'वज्रं सौराज्यसाच्ी परिकसितमहाः शकिमार्दपराघो
पाश पागावपर पन्ध्वजमपि वलवित कोपवेदी ग्दां च स्वाच्छन्धज्ञसिशुलं लिस्त्रति करतले देव चिम्राकृतेस्ते।।' अन्न सवमेवेन्द्र हत्याद्यतिशयोवत्या लोकपालाभेदो राज उपलम्यते हत्येकायानेक घात्वोद्टेखनम्। विषयभेदेन चं रूपकाशयो यथा- मृधयंद्रे धांतुरागस्तरुपु किसलयं विद्ुमोघ: समुद्रे दिडमात क्रोत्तमानवेप्वभिनव निहिति' सान्द्रसिन्दूररेणु। सीग्नि व्योग्नश् हेग्न: सुरशिसरिभुवी जायते य: प्रकाश' शोणिम्नासौँ सराशोरुपसि दिशतु व: शर्म रश्मिम्रतान ।।' 'अंब्रैकस्पैय विपरयमेदेन रुपकाश्य नानात्वम्। 'कारकान्तर' इत्यपपाठ। प्रकृते- कार कविच्व्रित्याधयस्यैवानुक्तवात्। अयं स्वरूपहेतुफलोवलेखनरप वास्त्रिया। तन्र सवरूपोल्टेस. समनन्तरमेवोदाहतः। हेनूल्लेखस्तु यथा- 'सगहेतो- सदा धर्म' स्थितिदंतोरपि प्रजाः। 4 द्विप संहारहेतोक्ष विदुसत्वा जातमात्मनः।।' अवैकस्यैव जन्मनो हेतूनामनेकथात्वोक्टेखनम् । फलोकटेखस्तु यथा- - 'धर्मायैव विदन्ति पार्थिव यथाशाखं प्रजाः पालिता अर्थायव च जानतेऽन्तरविद: कोपैरुदेशस्य ये।
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कामायव कृनार्थतामुपगता नार्यश्र निश्चिन्वते मोक्षायैव च वेद जन्म भवतः कश्षिद्विपश्चिज्जनः ॥ अन्ैकस्यैव जन्मनः फलानामनेकघात्वोल्लेखनम्। 'दोनो ही प्रकार का यह उल्लेख जिस प्रकार रूपक आदि उक्त अलंकारों के स्थलों में होता है ससी प्रकार अन्य अलंकारों के स्थलों में'-यही वतलते हैं-'एमलंकारान्तर०' इत्वादि द्वारा दोनों अकारों में प्रथम प्रकार [गृह्ीतृगतानेकत्वजनित अनेकविभ उल्लेख ] संदेह के स्थल में होता है, यथा-'जिसके निपय में बैरी लोग सोचते है-'यह सूर्य है क्या और यह अग्ति हे क्या? आस बाँध कर आाए लोग जिसके बारे में देखते है-'क्या यह चिन्तामणि है और क्या यह कर्पवृक्ष है? सुन्दरियाँ सोचती है-'क्या यह मधुमास है या कामदेव? और जिसे धनुषधारी लोग समझते हैं कि क्या यह राम है या परशुराम" यहाँ एक ही का अनेक प्रकार से संदेह- विषयरूप से ग्रहण किया जा रहा है। यही भेद अतिशयोकि पर आश्रित इस उदाहरण में देखिए- 'हे राजन! जव आपका चिन्न लिखा जाता है तो आपके राज्य में सुख समृद्धि देखने वाले आप के हथ में वज्र की रेखा बना देते हैं; तेज देखने वाले क्ति की रेखा; अपराधी दण्ड की रेखा; रिपुस्तिरियों का वलात हरण देखने वाले खह् की रेखाः कूप, वापी आदि देखने नाले पाश को रेखा; बलको जानने वाले धवज की रेखा; कोष जानने वाले गदा की रेखा और स्वच्छन्दता जानने वाले निशल की रेखा।' --- सहाँ 'तुम्हीं इन्द्र हो'-इत्यादि क्रम से लोकपालों का अभेद राजा पर प्रतीत होता है। इस प्रकार एक ही व्यक्ति का अनेक प्रकार से वक्लेख है। विषयभेद से होने वाला रूपकाश्रित उल्लेख यथा- 'भगवान सूर्य की किरणों का समुदाय सवेरे की ललोई में आपको भेय प्रदान करे, यह अपनी ललोई से पर्वत शिखर पर धातुराग लगता है, वृक्षों पर किसलय, समुद्र में मूगे का ढेर, दिम्ग्जों के माधे पर तुरत लगाई गई सिन्दूर की धूल और क्षितिज में सुदर्ण पर्वत [देवपर्वत सुमेरु] की स्थलियाँ ।' -यहाँ एक ही रश्मिप्रतान रूपी वस्तु पर (पर्वंत शृंग आदि) विषयभेद से रूपकान्रित उल्लख हैं। यहाँ [ अलंकारान्तरविच्छिति' में आाए अलंकारान्वर शब्द के स्थान पर] 'कारकान्तर' पाठ अशुद्ध पाठ है क्योंकि प्रकृत में कारककृन विच्छित्ति का कोई उल्लेख नहीं है। यह उल्लेस स्वरूपोक्लेख, हेतूल्लेव तथा फलोल्लेख इस प्रकार से तीन प्रकार का होता है। इनमें स्वरूपोल्लेख तो अभी-अभी वतला ही दिया गया, हेतूल्लेख का उदाहरण इस प्रकार है- 'हे प्रह्मन्, प्रजाएँ आपको सृष्टि तथा धर्मस्थिति के लिए स्वयं से उत्पन्न मानती है और शतुलोग संसार के लिए।' -न्यहाँ जन्म (उत्पत्ति) एक ही है किन्तु उसके हेतु अनेक वतलाए गए है [ सृष्टि, धमरक्षा तथा संहार)। फलोल्लेख का उदाहरण यया- 'हे राजन् शास्त्रानुसार पालित प्रजा आपका जन्म धर्मे के लिए ही मानती है, कोश का एक अंश जानने वाले अर्थ के ही लिए, कृतार्थता को प्राप्त नारियाँ केवल काम के ही लिए तथा कुछ विद्ान् केवल सोक्ष के ही लिए।'
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-यहां जन्म एक ही है औौर उसके फल अनेक वतलाए गए हैं। विमर्श-इतिदास -उस्लेस-'मामह, वामन, दण्डी, उद्ट, रुद्रट, मम्मट'-इन पूर्ववछी समी आलकारिकों में नहीं मिलता। प्राप्त ग्रन्थों में अल्कारसवस्व में ही यह पहली बार मिलता है। मदाचिव इस अलंकार का रदप्रथमता के साथ विवेनन अलकार सवसकार ने ही किया है। परवर्चती अप्पय्यदीक्षित ने चित्रमीमासा में और पण्टितराज जगन्नाय ने रसगंगाधर में उल्लेख में महोदृगन अनेफत्व पर भी उतना ही बल दिया है जितना एक ही वस्तु की ग्रदणगत मनेकता पर। ऐसा करने का उद्देश्य उन्हों ने मान्गरूपक से उल्लेख का अन्तर माना है। अप्पय्य- दीक्ित का लक्षण इस प्रकार है- "निमिस्नभेदादेकस्य वस्तुनो यदनेकधा। अल्लेखनमनेकेन तमुल्लेसं प्रचक्षते ।' यत्र नानाविधधर्मयोगि एक वस्तु तत्तद्धर्मरूपनिमिच्तमेदादनेकेन यहीन्रा अनेकषा उत्लिख्यते स उल्लेख. । 'कीचिंगंगा हिमकष्माभृदोज:सूर्योदयाचल। अभ्ुसेनान्धिमन्याद्विगुण रत्नैकरोइण ।' -इति मालारूपके पकस्य राशो यशन्वित्यादिधमेयोगरूपनिमित्तमेदाद तुपाराद्वित्वाघनेक प्रकारेणोबलेखनमस्तीति तत्रातिव्याप्तिनिरासायानेकेत्युक्तम्: तन्न भद्ीतृभेदनिवन्धन न भवत्यनेक- धोल्लेसनमिति नातिव्यासिः ।'[ चित्रमीमासा काशी सं० पृ० २२५] पण्टितराज जगन्नायकृत उद्लेखवक्षण इस प्रकार है- 'सकस्य वम्तुनो निमितवश्चाद् यद् अनेकप्रहोतृमिरनेवप्रकारक ग्रइण तदुक्लेख. ।' धर्मस्यात्मा मागधेय क्षमाया' इत्यादिमालारूपकेतिप्रसक्वारणायानेकम्रहीतमिरित्यविवक्षितबदत्वकं ग्रद्दण- विशेषगम्।' विषयभेदमूलक उल्लेख और मालारूपक में अन्तर मी विचारणीय है। इसी ग्रन्थ में माला- रूपक का उदाहरण दिया गया है "पीयूपपसृतिनेंवा मसभुजा दात्र तमोलूनये०" इत्यादि और विषयभेदमूलक उल्लेख का-"गुरुवचसि, पथुरुरसि०" इत्यादि। इन दोनों उदाददरणों में कोई अन्तर नहीं है। कारण कि उल्लेस के इस उदाहरण में किया 'दिखाई देता था, प्रतीत होता था' ऐसी कुछ न दोकर 'बभूव'-'था' यह अलनित्वमात्रवाचक (किया) ही है। ऐसी स्थिति में यहाँ भी 'बचनादि' को साधारणधम मानकर राजा पर 'गुरु' आदि का आरोप ही प्रतीत होता है और चमत्कार भी उसी आरोप में है, अनेक प्रकार से ज्ञान में नहीं। सर्य यह कि वहाँ अभेद के ज्ञान में चमत्कार है अनेकत्व के ज्ञान में नहीं। अनेकत्व यहाँ केवल मालात्व का जनक है। यदि केवल इनना भी कह दिया जाता कि 'प्रत्यपद्त पथुह्दयेपसावर्जुनी यशसि वाचि गुरुश्' 'यह राजा वक्स्थल में पृथु, यश में अर्जुन, वाणी में गुरु प्रवीन होता था' तो यहाँ ज्ञानगत अनेकत्व द्वारा चमतकार आ जाता और रूपक न होकर उल्लेस हो होता। यहाँ चाता की एकता या जनेकता का कोई मशन नहीं उठता क्योंकि वह शब्दन कथित नहीं है। ज्ञानगत अनेकत्व से चमत्कार की प्रतीति ही उल्लेस का प्राम है। मालारूपक में आरोपकृत चमत्कार ही प्रधान होता है, अनेकत्व उसका सदायकमात्र रहता है। इस कारण अन्थकार द्वारा 'म्रदीतृगत अनेकत्व' का अनुपादान हानिकर नहीं है। पण्डितराज और अप्यय्यदीक्षिनदारा उसका उपादान करना हो अनावश्यक है। अलकाररत्नाकर कार ने उक्लेख का लक्षण 'मकरयानेकया कस्पनमुक्लेख'-इस प्रकार किया है। 'करपन' का अर्थ करते हुए उन्होंने रिखा है-'कल्पन .. वैकल्पिकः अत्यय.'-अर्थात विकस्प पूर्ण शन का नाम 'कल्पन' है। इसे उन्होंने स्वारसिक=लौकिक त्था कक्पित दोनों प्रकार का
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उल्लेखालड्वार: संस्कल १६७ माना है किन्तु स्वारसिक को स्वतन्त्र मान कर कल्पित=उत्पाद्य को स्वारसिंक मिश्रित मान लिया है। विमर्शिनोकार केवल मिश्रित को ही उल्लेख जनक मानते हैं। मूल के 'ग्रहण' शब्द का वे यही अर्थ करते हैं। साचना यह है कि क्या वे दोनों विकव्प उत्लेख के प्रत्येक स्थल में वस्तुत: मिश्रित ही रहते हैं। उदाहरण से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है। 'णाराअगो0' उदाहरण में मलंका रसरव त्वकार के ही समान अलंकाररत्नाकरकार को मो उल्लेख मान्य है विमर्शिनीकार को मो इस उदाहरण में कोई आपत्ति नहीं है। इसमें वृद्ध जवान और नवेली स्ियों द्वारा एक ही कृष्ण का जिन जिन रूपों का ज्ञान किया गया है वे सब स्वारसिक ही हैं कल्पित नहीं। कृष्ण को किसने क्या माना इसे कविने सोचा तो स्वयं हो है, अतः इसमें कत्पना तो अवश्य है किन्तु यह कर्पना तो कान्यमात्र का असाधारण आधार है। देखना यह है कि करिपत वस्तु लौफिक है या केवल कल्पनाप्रसूत। केवल कल्पनाप्रसूत वस्तु 'गुरुवचसि, प्युरुरसि० है। यहाँ अंगभूत इलेपदारा राजा में वहस्पति आदि का बोष कौवल काल्पनिक है, जिसका आधार ाणी आादि का लाभ है। अप्पय्यदीक्षित और पणडितराज जगन्नाथ दोनों ने उन्लेखालंकार के विषय में अलंकार सर्वस्व, अलंकाररत्नाकर तथा विमर्शनी तोनों की समस्त उपस्थापनाए अपना ली हैं। उन्होंने शातृगत अनेकत्व को महत्व देकर उसको एकाङिता का भी अनुमन किया है। इसीलिए विषय- भेदमूलक उल्लेख का लक्षण अलग करना पड़ा है- 'महीवृभेदाभावेऽपि विषयाश्रयभेदतः । एकस्यानेकधोक्लेखमप्युल्लेखं प्रचक्षते ।।' चित्रमी० पृ० २३० काश्ी सं० १९६५ 'प्रकारान्तरेणाप्युककसो दृश्यते यत्रासत्यपि य्रहान्ननेकत्वे विपयाश्रयसामानाधिकरण्यादीनां
रसगं० पृ० ३६१ नि० सा० सं० ६, सें० १९४७ किन्तु अलंकारकौस्तुमकार विश्वेश्वर पण्डित उललेख को अतिशपोत्तिरूप ही मानते हैं, उसका अलग अस्तित्व नहीं। संजीविनीकार श्रीविद्याचकवरतीं ने अलंकारसर्वेस्व के उल्लेख सम्बन्धी संपूर्ण विवेचन का संक्षेप इस प्रकार किया है- 'नानाधर्मवलादेकें यदि नानैव गृहते। नाना रूपसमुल्ले सात् स उल्लेख इति स्मृतः ॥ १ ॥ यदेकं तद्धि नानेति गृह्ते रूपभेदतः । रच्यादिवश्तो लोके नानात्वं चेद्कृत्रिमम् ॥२ ।। अतदूपत्य ताद्रूप्यान्न झयसी प्रान्तिरिष्यते। न चाम्यतिशयोकि: स्यादमेदे मेदरूपिणी॥। ३॥ आद्ये नानेकवातव स्याज ज्ञातूभेदो न चान्तिमे। विषयज्ञातृमेदाभ्यां विना नोल्लेखसंभवः ॥४ ॥ यद्यपि लेपतो वाधो न तथाप्यस्य निह्ब:। अनपेक्ष्यापि यच्छलेपं तव्रैव स्थातुमर्हसि ॥५॥ धर्मगत अनेकता के कारण एक ही वस्तु जो अनेक प्रकार से भासित होती है वही उत्लेख नामक अलंकार है। यद्यपि एकत्व और अनेकत्व परस्पर विरोधी है तथापि रूपगत भेद को लेकर ने एक दो वस्तु में संभव हैं। रूपभेद होता हैं रुचि आदि के कारण। यहो अनेकत्व यदि लोक में होता है तो अकृत्रिम अनेकत्व कहलाअ है।
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१६८ अलङ्कारसर्वस्वम्
इसमें भिन्न वस्तु को भिन्न वस्तु के साथ नादात््यप्रतीति रद्ने मात्र से इसे भ्रान्ति नहीं कहा जा सकता और न अमेद में भेद प्रीति की झलक में अतिरायोकि ही। क्योंकि प्रथम (भ्रान्नि) में चमत्कार अनेकधात्व पर निर्भर नदा रहता और द्वितीय में जञातृगन अनेवना पर- जव कि उल्लेस में चमस्कार विषय या इयत्ता दानों में से किसी एक के अनेकत्व के विना सम्मन नहीं होता। यदयपि यह अलकार इलेष से वाधिन हो जाना है। तयाषि इमका अमाव नहीं माना जा सकता क्योंकि विना इनेष के भी यह अलकार तत तन स्थलों में अनुभवगोचर होता है। सूचना-इस अलकार के मूल और टीका दोनों को ही अनेक स्थलों में इमने ठीक किया है। मूल में 'विष्छित्यन्ररूपम्वात्। सर्दथा'-पक्ति निर्णयसागरीय संस्करण के ही समान मोनोलाल बनारसीदास ससकरण में भी 'विष्छित्यन्नररूपत्वामर्वया' इसी प्रकार छपी रह गई है। उसी प्रकार उक्त दोनों सस्करणों में 'गुरुवचसि' नहीं है। डॉ० रा० च० दिवेदी ने इस कमी पर ध्यान दिया है और 'प्रथुरुरति' के स्थान पर इमी पाठ को स्वीकार किया है तथापि छपा 'पथुरुरसि' ही है 'गुरुवंचसि' नहीं। इमने इन दोनों को स्वीकार कर लिया है कारण कि रह्नाकरकार ने और उनके अनुसरण पर अप्पय्यदीक्षित ने भी इन दोनों ही को अपनाया है। केवल दो की अपेशषा तीन का उक्लेख अधिक चमन्कारक मी होता है। [सर्वस्व्र ] [ सू० २१ ] विषयस्थापह्नघेऽपह्तिः। वस्त्यनतरप्रतीतिरित्येव। प्रक्रान्तापह्वयवैधर्म्येणेद मुच्यते। आरोपप्रस्ता-
घयी वन्वच्छाया, अपह्ववपूर्वक आरोप:, आरोपपूर्षकोSपह्षयः। छलादि- शब्देरसत्यत्व प्रतिपादकैर्वापह्वनिर्देशः। पूर्वोक्तमेददये वाक्यभेदः। तृतीय- मेदे त्वेकवाक्यत्वम्। याद्यो यथा- 'य देतच्चन्द्रान्तर्जलद्लवलीलां प्रकुरुते तदाचष्टे लोक: शशक इति नो मां प्रति तथा। अद्वं त्िन्दुं मन्ये त्वदरिविरहाक्रान्ततरुणी कढाक्षोलकापातव्न ण किण कलक्काद्गिततनुम्।' अग्नैन्द्वस्य शशस्यापह्ववे उपक्षिते शशकप्रतिवस्तुकिणवत इन्दोरारोपो नान्वयघटनां पुष्यतीति न निरवद्यम्। तत्तु यथा - 'पूर्णेन्दो: परिपोपकानतव पुपः स्फारप्भामास्वरं नेद मण्डलमभ्युद्ृेति गगनाभोगे जिगीपोर्जगद्। मारस्योच्छ्रितमातपप्रमधुना पाण्डमदोपश्रिया
द्वितीयो यथा-
न्यधिवसति सदा यः संयमाधकृतानि।
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न तु रुचिरकलापे वतते यो मयूरे वितरतु स कुमारो ब्रह्मचर्यश्षियं वः॥' तृतीयो यथा- 'उद् भ्रान्तोज्मित गेहगूजरवधूकम्पाकुलोच्चै:कुच-
सार्ध त्वद्रिपुभिस्त्वदीययशसां शून्ये मरौ धावतां भरषटं राजमृगाङ्क! कुन्दमुककुलस्धूलैः अ्रमाम्भ:कणैः॥' अन्न शून्य इत्यस्य स्थाने मन्येशव्दप्रयोगे सापह्ववोत्वेक्षा इत्यपि स्था पयिष्यते, 'अहं त्विन्दुं मन्ये' इति तु वाक्यभेदे मन्येशव्दप्रयोगेनोत्पेक्षेति च चक्ष्यते। पतस्मिन्नपि भेदोऽपहवारोपयोः पौर्वापर्यप्रयोगविपर्यये भेदद्यं सदपि न पूर्ववन्चवित्रतावहमिति न भेदत्वेन गणितम्। तत्रापहनवपूर्वके आरोपे निरन्तर मुदाहतम्। आरोपपूर्वके त्वपह्नबे यथा- 'ज्योत्साभत्मच्छुरणघवला विभ्रती तारकास्थी न्यन्तर्धानव्यसनरसिका रात्रिकापालिकीयम्। द्वीपादुद्वीपं भ्रमति दधती चन्द्रमुद्राकपाले न्यस्तं सिद्धास्तनपरिमल लाञ्छनस्य च्छलेन।।'
'अमुष्मिल्लावण्यामृतसरसि नूनं नृगदश: स्मर: शर्वप्लुए: पृथुजधनभागे निपतित:। यद्ङ्गाङ्वाराणां प्रामपिशुना नाभिकुहरे शिखा धूमस्येयं परिणमति रोमावलिवपु: ॥' इति। [सूत्र २९] विपय का अपह्वव हो तो [अलंकार ] अपह्ृति [कहलाता है]। [वृत्ति] [ सूत्र में-]-'भिन्न वस्तु की प्रतीति'-इतना [भ्रान्तिमाम् के लक्षण से ही ] चला आता है। प्रस्तुत का जो अपह्वब, तदूपी वैधर्म्य के कारण यह [अपहुतिलक्षण उत्लेख भ्राम्ति- मान् आदि से पृथषा] वतलाया जा रहा है। प्करम आरोप का है, अतः 'विषय' का मर्थ है आरोप का विषय। उसका अपहव [तिरोवान ] वतलाया जाय और आरोप्यमाण अर्थ का ज्ञान कराया जाय तो अलंकार का नाम अपहुति होता है। उस [ अपहुति ] का वाक्य विन्यास तीन प्रकार से होता है (।) जिसमें अपहब पूर्वक आरोप होता है,(।) जिसमें आरोपपूर्दक अपहब होता है और (III) जिसनें असत्यत्वप्रतिपादक 'छल'-आदि शब्दों मे अपहव का निर्देध रहता है। प्रथम दो भेदों में ! से प्रत्येक में ] वाक्य वदल जाते हैं [ एक वाक्य नहीं रहता ] किन्तु तृतीय भेद में वाक्य एक ही रहता है। पथम का उदाहरण यथा- 'यह जो चन्द्रमा के मध्य मेवखण्ड की लोला विव्वेर रहा है इसे लोग सरगोश कहते हैं परन्तु मुझे वैसा नहीं लगता। मैं तो चन्द्रमा को आपको शत्रुक्तयों के कटाक्ष की उल्का से दगा अत- एव पाव की कालिख से युक्त मानता हूँ।'
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किन्तु यह उदाहरण सवथा निर्दोप नहीं है, क्योंकि इसमें अपछष नो दो रहा है चन्द्र के खरगोश का और आक्षप किया जा रहा है खरगोश के समान कलक से युक्त चन्द्रमा का [जब कि किना जाना चाहिए था केवल कलक का ही] अत. इस वाक्य में अर्थसगति बैठती नही है। निर्शोष उद्ाहरण यह है- आकाश मण्डल में पर्यास्त मात्रा से विसरती ममा से चमचमाता यह परिमोष से कान्त शरोर के पूर्ग चन्द्र का बिन्व उदित नहां हो रहा, अनितु मान गर्वित व्यक्तियों का गर्व चूग करने का उदयम ही जिसकी प्रधान लीला है ऐमे सपूर्ण विव को जोनने के इच्युक कामदेव का प्रदोपउक्ष्मी (सध्याश्रा) से पीदा पडा अतपत्र [राजचिद्ध=श्वेतछत्र] फेलाया जा रह्दा है।' द्वितीय का उदादरण यथा- 'जो सविलास अप्मराओं के नेत्ररूपी नोलकमलों को अपने सयम से नीचा कर सदैव उन्ही पर बैठता है, न कि सन्दर विच्छ वाले मयूर पर वह कुमार [कार्तिकेय] आापको मद्चर्यंश्री पदान करे।' तृनीय का उदाहरण- 'हे राजेन्द्र' घर छोड़कर भागे गुर्जरदेशाधिपति की घवराई हुई बधुओं के काँपते हुए तथा तदम नदम उन्नत पयोधरों पर भूलती विमळ हारलताओं से टपकने मोतियों के वदाने आपके शुत्रुओं के साथ शू्य मरुस्थल में माग रहे आपके यशों से कुनदकली सी स्थूल, पसीने की बूँदे टपक रही थी।'
-हमी पद्य में 'शूल्य' शब्द के स्थान पर 'मन्ये-शब्द प्रयोग हो तो 'सापदव उत्पेक्षा'- होती है ऐसा तय किया जावेगा, किन्तु यह भो वनलाया जायेगा कि मले ही 'मन्ये'-शब्द का प्रयोग हो किन्तु यदि 'में तो चन्द्र को मानना हू'-इत्यादि [पूर्वोक्त कम से ] वाक्य वदल जाव तो उत्पेक्षा नहों होती । इस [तुनीय भेर] में मा दो भेद हो सकने हैं यदि अपहब और आरोप का पूर्वपश्चाद्भाव (आगे पीठे रखने) का जो प्रयोग होता है उसे उलट दिया जाए। किन्तु इन भेदों में पहल बतलाए भेदों के समान कोई चमतकीर नहीं रहता अत इन्हें भेदरूप से नहीं गिना। उदाइर्णार्थ इन [दोनों मेदों] में से अपङवपूर्वक आरोप का उदाहरण सभी यहीं दिया गया [ उदभ्ान्तो०] पद्य। आरोपपूर्क अपहन का उदावरण यह पघ हो सकता है- [काली कुच्च होने पर भी] 'वाँदनीरूपी मसमी पोन सफेद झकक बनी सारकरूपी अस्थियाँ लिए हुए [ तथा ] अन्वर्हित होने की भादत में हवी, यह रात्रि रूपी कापालिकी चन्द्र विम्बरूपी मुडाकपाल में सिद्धाब्जन का ऑजन लल्छन के बहाने धारण कर एक दीप से दूसरे दीप फिरा करनी है।' कहीं बही अमत्यत्व 'वपु' 'रीर' आदि शब्द के आधार पर प्रतिपादित किया जाता है, जो वस्तवन्नर के वाचक होते हैं। यया- 'शिवजी ने कामदेव के शरीर में आग लगाई तो निशिन ही वह [मृगाक्षी ] के इस विशाल जघन माग [तर्रेंट]-रूपी लवण्यामृत सरोवर में आ कूदा है। नामिकुदर में उमी के अग रूपी अंगारों के बुझाने की सूचना देने वाली यह धूमशिखा है जो रोमावळी के आाकार में मैं परिणत होती जा रही है।'
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विमर्शिनी विपयस्पेत्यादि। वस्त्वन्तरेति। भ्रान्तिमतीऽनुवर्तत इति हेपः। अत एव केचन मण्डूक- प्लुतिन्यायेनानुवर्तनस्यानुचितत्वाद् भ्रान्तिमदनन्तरमपह्नतिर्य्रन्थकृता लच्षिता उल्लेखश्रा तिय्यायोकत्यनन्तरमिति ग्रन्थं विपर्यासितवन्त्रः। न चैतत। यत उल्लेखस्तावदतिशयोकत्य- नन्तरं अन्धकृता न रच्ितः । यदद्यति-'एवमध्य वसायाश्रयेणालंकारहयमुक्त्वा गम्य- मानौपम्याश्या अलंकारा इदानीसुच्यन्ते। तन्नापि पदार्थवाक्यार्थगतत्वेन तेपां द्वू विध्ये- उपि पदार्थगतमलंकारद्वयं क्रमेणोच्यते' इति। तस्माद्वस्त्वन्तरप्रतीतेर्भावादभ्रान्तिमद- नन्तरमेवास्य ग्रन्थकृता लक्षणं कृतम्। अत एव चोल्लेखेपि तत्संभनाद्स्तवन्तरप्रतीते- निरन्तरमेवानुवर्तनादिहैवास्या लघ्षणसुचितमिति यथास्थित एव अ्रन्थः साघुः। यद्येनं तर्हयर्लेखापह्वत्योरिहैव विपर्ययेण कि न लक्षणं फृतमित्याशङ्टयाह-प्रक्रान्तेत्यादि। इद- मित्य पह्नतिलष्षणम्। तदेव व्याचष्टे-आरोपेत्यादिना । विषयस्यापह्नवे विषयिणोऽन्यस्य विधिरित्यर्थः। तेन 'न विषं विपसित्याहुर्वह्वस्वं विपमुच्यते। विपमेकाकिनं हन्ति ब्रह्मस्वं तु ससंततिम्।' इ्रत्यन्न विषस्य निषेधपूर्व व्ह्मस्वविषय आरोप्यमाणत्वाद् दृदारोपं रूपक- मेव नापहुतिः। अपहतेर्हि निषेध्यविषयभित्तितयैवान्यस्य विपयिणो विधानं लक्षणस्। अब्र तु निषेध्यस्यैव विपस्य व्रह्मस्वविषये आरोप्यमाणत्वादिधानम। अथ 'अत्र सुख्यस्य विपस्य नियेधे आरोप्यमाणतवात् ब्रह्मस्वविपस्य गौणस्य विधानम्'-अलंकाररत्नाकरे पृ. ४२] इति चेत, तन्र अ्रह्मस्वविपस्य गौणस्य विधानमिति मणितेः कोऽथः। कि ब्रह्म- स्वविषस्य विधानं, कि वा दन्दवपदार्थवद्व्हास्वस्य च विपस्य च, ब्रह्मस्वे वा विपस्येति। तन्न नाद: पद्तः। विपादिन्यायेन ब्रह्मस्वविपात्मनः कस्यचिद्वस्तुनो वहिरसंभवात्। तब्ना- प्यस्थ म्हमास्वं विषं चेति न भेदेनोकि: स्यात। नापि गौणता स्वार्थ एव पहत्ते: । अन्य- दन्यन्न वर्तमानं गौणमित्युच्यते। न चात्र म्रह्मस्वविपमन्यन्न कुत्रचिद्धतते येनास्य गौणता स्थात्। एवं द्वितीयेऽपि पक्ते न गौणत्ं युकम्। नाप्यत्रोभयविधि:।व्रह्मस्वविपये विपस्यैंव विघीयमानावात। तृतीयेऽपि न गौणस्य सतो विपस्य विधानम्। ब्रह्मस्ववृ्त्यभावान्सु- ख्यार्थवाधाद्गुणेषु वर्तनात विहितस्य सस्य गौणत्वा। एवं ब्रह्मस्वत्य दाउघेन विपसा न्य प्रती तिप्रतिपिपादयिपया तत्र निषेधपूर्व विषमारोपितमिति दढारोपमेव रूपकं युकम्। न ब्रह्मस्वं विषमदमिति पुनरच्यमानेऽपह्नतिःस्यात्। तस्माद 'सुख्यस्य वे'त्यपास्थ विपयस्या पह्नवेऽन्यविधिर पह्नतिरित्येव लक्षणं कार्यम्। 'वस्तन्तर'- इसकी अनुवृत्ति होती है अर्थात भ्रान्तिमान् अलंकार से। इस प्रकार यहाँ जो अनुवृत्ति है वह वीच के उल्लेख को छोड़कर हुई है जैसे ही जैसे भेढ़क की कूद होती है। कुछ टीकाकार ऐसी अनुवृत्ति को अनुचित मान टीका करते हैं कि अपहुति को ग्रन्थकार ने आ- न्तिमान् के वाद और उल्लेख को अतिशयोत्ति के बाद वतलाया है। और ऐसा मान उन्होंने ग्रन्थ में उलट फेर कर दिया है। किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि उल्लेख को अन्थकार ने अतिशयोकि के पश्चात नहीं बतलाया है। यह तथ्य उनकी अतिरायोकति के इस उपसंद्दार वाक्य से स्पष्ट है- -'एवमध्यवसायाश्रयेग-क्रमेणोच्यते-'। इसलिए [उक्लेस में भी] वत्त्वन्तरप्रतीति के रहने से यही मानना ठीक है कि ग्रन्थकार ने इसका लक्षणा न्रान्तिमान् के ही बाद किया है। इस प्रकार उल्लेख में वस्त्वन्तरप्रतीति का सदभाव सिद्ध हो जाने पर अनुवर्चन में कोई व्यवधान नहीं
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आता, अन" इसका लक्षा यहाँ ठीक है और इसलिए अन्थ जिस स्थिति में वहां है उसी स्थिति में उसका रहा आना ठीक है। (शंका) 'यदि ऐसा ह तो यहों मी अपहुति को ही उकलेस के बाद निरूषिन कर्या किया, क्यों नहीं [ इसके विपरीन ] उद्ेख को अपछुति के वाद निरूपित किया गया'-इस पर [सत्तर देन हुए] कहने है-'प्रकानन०' इत्यादि। इदम्= अर्थात अपहुति का लक्षन। उसा की व्यास्या करते है-आरोप इत्यादि द्वारा। अर्थ यह कि 'विषय का अपहब होने पर तहिन्न विषयी का विधान'-[यह अपसुति का निभ्ृष्ट लक्षण हुआ]। इमलिए- 'चिप को विप नहीं कहा जाता, दिप कहा जाता है ब्राह्मणधन को। विध केवल मकेने एक व्यक्ति को मारता है किन्तु बाझगधन व्यक्ति और उसकी सन्तान को मौ।' -यहाँ दढारोप रूपक ही है क्योंकि यहाँ मह्म्व-[बालगधन ] पर विषका निषेनपूर्वक आरोप किया जा रहा है, अपद्वति नहीं [ जैसा कि अल्काररत्नाकर ने माना है]। अपहु ति वहाँ होनी है जहाँ विधान विषया का होता है और वह भी दमी विषय पर जिमका निषेध किया गया हो। यहाँ जिस विप का निषेध किया जा रहा है उसीका आल्गधन पर आरोप किया गया है अत. उसीका विधान है [अर्थात दिष ही निषेध्य विषय है और विष ही बाहगनन पर आरोरित होने वाला विपयी ]। यदि [आप = अलकाररत्नाकरकार शोभाकर ] यह कहे कि- 'यहा निषेध विषशन्द के मुख्य अर्थे का किया जा रहा है और विधान उसके गौग सर्घ नाझविप का क्योंकि आरोप उसीका किया ना रहा है'-तो [बनलाइए कि आपके ] 'विपशम्द के गौण अर्थ महस्वविष का विधान किया जा रहा है'। इस कथन का क्या अर्थ है-यहाँ 'न्ह्मस्वविष' इस शब्द का अर्थ (१) 'बह्मस्वरूपी विपका विधान' यह है या (-) अह्षस्व का और विप का विधान जैसा कि बन्द समाम होने पर होना है अथवा (3) ममस्व पर विप का। इन तीनों में प्रथम पक्ष अमान्य है क्योंकि विषादि () न्याय से मदास्वनिपरूप किमी वस्तु की [कश्पना से ] पृथक उपलब्धि सभव नहीं। यदि ऐसा होता भा 'बहास्व विष है' इस प्रकार [बह्षस्व को विप से ] मिन्न करके नहीं कड़ा जा सका। यहाँ गोगता भी नहीं है, क्योंकि बदास्वशब्द और विपशन्द यहाँ अपने प्रथम अर्थ के ही वाचक वन रहे है। गोग तो अन्य अर्थ में प्रयुक्त अन्यार्थवाचक् को कहते है। मझषस्व-विष शब्द किमी भी अन्य अर्थ में प्रयुक्त नहीं है जिससे उसे गौग माना जाबे। इस प्रकार द्विवीय पक्ष में भी गोणता समन नहीं है] यहाँ [बह्स्व=ब्ाह्मण और ] दोनों का ही विधान हो ऐेसा भी नहीं, क्योंकि वहस्व को विषय बनाकर विप का ही यहाँ विधान किया जा रहा है। तृनीय पक्ष में भी यदि विष गौण है तो उसका विधान संभव नही है [ बक्षस्व में विपशब्द की ] वृत्ि [अमिवा ] नहीं है, अन [ दहँ विपशब्द का ] मुख्य अर्थ वाघित दो जाा है फलत वह [पानकत्व, भारकत्व आदि] गुशों का पतिपादक वन जाता है। और, इसलिर उसका अर्थ विधेय होने पर भी गोण होता है। इस प्रकार बह्त्व को दृढतापूर्वक विप के समान प्रतिपादित करने की इच्छा से उस [ विष ] पर निषेधपूर्वक विषका हो आरोप किया गया है, इमल्ए इमे दृढ़ारोप रूपक ही मानना उचिन है। अपहनि तत होती जब यह कहा जाता कि 'यद्द मझस्व नहीं, दिप है'। इम कारण 'मुख्यस्य वा' = अथवा मुख्य मर्थ का यह अझ हटाकर केवल 'विषयस्य= विषय का अपह्दद होने पर अर्थ का विधान अपहति'-केवल इतना ही लक्षण दनाया जाना चाहिए [ न कि अनंकाररत्नाकर के समान-'विपयस्य मुख्यस्य वा अपहवे अन्य-
विमसं -(१) पण्टितराज बगनाथ ने इस विषय में विमर्शिनाकार का अनुमोदन किया है और उनके मनको प्रमाशरूम से प्रस्तुत करत हुए यहाँ दृढारोपरूपक हा स्वीकार किया है।
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" (२) मूल में 'प्रकान्तापछ्नवैधर्म्येण'-के स्थान पर निर्णयसागरीयसंस्करण के पाठान्तर में 'विपयानमहववै०' यह पाठान्तर दिया है। श्रीविद्याचकवतों ने इसीको मूल पाठ माना है। तदनुसार डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी ने भी यही स्वीकार किया है। विमर्शिनी में इसपर कोई विवेचन नहीं है। हमें 'प्रक्रान्तापह्वव०' भी ठीक जँचता है। वैधर्म्य प्रकृत अलंकार में दिखाया जाना उचित है। अपहृति में अपहूब से ही रूपक, उल्लेस और भ्रान्तिमदलंकार का वैधर्म्य आता है। अन्य अलंकारों में अनपहव रहता है, इसलिए उनमे अपहृति का अथवा अपहुति में उनका वैधर्न्य रहता है ऐसा कहना तव संमव है जब अपहब का ज्ञान हो जाने; अतः जब अपहब का आाशय आावनवक ही है त उसी के आाधार पर सीधे-सीवे वैधर्न्य का प्रतिपादन कहीं अधिक अच्छा हू। (३) 'इदमुच्यते'-का सात्पर्य टीकाकारों ने अलग-अलग बतलाया है। मंजीविनीकार 'इदन्' को क्रियाविशेषण मानकर 'उच्यते' से अन्वित करते है और विमॉनीकार उसे 'रक्षण' के लिए प्रचुक्त मानते हैं। संजीविनीकार इस पंकि का अभिप्राय अपहुति का भ्रान्तिमान् से पार्थक्य दतलाना मानने हैं और विसाशनीकार उल्लेस तथा अपहुति में अपहुति का प्रतिपादन उल्लेख के पहि्ले न कर वाद में करने का कारण प्रतिपादन करना। वरतुतः संजीविनीकार का ही पक्ष अधिक सारपूर्ण है। उल्लेख और अपहुति के पौर्वापर्यमात्र की अपेक्षा अन्य अलंकारों से अपहुति का स्वतन्त्र अस्तित्व वतलाना अधिक महत्त्व रखता है। (४) अलंकाररत्नाकरकार ने अपह्वुति का विवेचन इस प्रकार किया है- [सू० ]'विषयस्य मुख्यस्य वाऽमह्ववे अन्यविधिरपहृतिः।' [तृ] 'आरोपविपयस्य निपेधे विषयिणो विधानमेका, मुख्यस्य चन्द्रादेरन्यस्य मुखचन्द्रादे- गौणस्य विधिरपरापहुति:। -[ सु० ] विपयका मथवा मुख्य का मपह्व हो और अन्य का विधान हो वहाँ अपहुति होती है। अर्थाव [इ० ]- 'आरोप विषय का नियेध हो और विषयी का विधान'-यह एक प्रकार की अपह्ृति होती है। इसके अतिरिक्त 'मुख्य [अभिधेयार्थ] चन्द्र आदि से भिन्न गौण मुख- चन्द्र आदि का विधान' दूसरी अपसुति। इनमें से प्रथम का उदाहरण तो काव्यपकाश आदि में प्रसिद्ध 'अवाप्तः प्रागत्म्यं परिणत०' इत्यादि पद्य माना है किन्तु द्वितीय का 'न वर्ष विषमू'य इत्यादि पद्य ही। इसी पर उनकी पंचि है-'अत्र मुख्यस्य निघस्य निपेधे ब्रह्मस्त-विषस्य विधानन जिसे विमर्शिनीकार ने उद्धृत किया है। यहां परिसंख्या सी प्रतीत होती है। वस्तुतः इस पद्य में दृढ़ारोप, अपहब, परिसंख्या तथा व्यतिरेक का सन्निपात है। (५) नि० सा० संरकरण में-अपहुतेरहि निषेध्य०' के स्थान पर 'नापहुतेहिं निषेध्य०' इंस इस प्रकार उस्टा पाठ छपा है। इसी प्रकार 'मुख्यस्व वेत्य०' के स्थान पर 'मुख्यस्वेवेत्य०'। विमर्शिनी तस्येत्य पह्नत्याख्यर्यालंकारत्य । वाक्यभेद इति एकवाक्यमिति चानेन यथासंभवं भेदुवयस्य स्वरूपनिर्देशः कृतः । न निरवद्यमिति। यथोकक्रमनिर्वाहाभावाद्। अत एवोदाहरणान्तरमाह-पूर्णेन्दोरित्यादि। मन्येशन्दस्य प्रयोग इति संभावना- दोतकर्वात्। नोलमेक्षेति। साध्यवसायाद्यत्मेमासामप्रयमावात्। वच्यत हति। उत्प्रेक्षयास्। तथा चात्या इवादिशब्द्वन्मन्येशव्दोऽपि प्रतिपादकः। किंतूटमेचा- सामग्रयभावे मन्येशव्दपयोगो वरितर्कमेव प्रतिपाद्यतीति । अतक्षात्र 'अवासः म्राग- सभ्यम्-हत्यादावपह्व्युदाहरणत्वमभिद्घतः समानेऽपि न्याये 'नो माँ प्रति तथा"
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हर्यनेन शशकपसस्य निराकृतत्वादन्यस्यान्यरूपतया संभावनाया अभावान् मन्य'- इूरयनेन किणपसस्येव निश्चितरवादतिशयोकिवमेवेति मन्यन्ते (अलंकाररतनारुर कारादय)। तेवां पूर्वापरविचारकुशलानां किमभिदध्मः । एवमन्यैरनान्यत्र चोदा हरणादौ घहुप्रकार स्सलितं तत् पुनर्ग्रन्थविस्तरमयाद्, अस्मदुदर्शनद सदूपणोसरणस्यैव प्रतिज्ञातत्वान्, आमाभि: प्रातिपध्ेन न दूपितम्। तस्य = उसका= अपहुति-अरकार का वाक्यभेद तथा एकवाक्य ऐसा कहकर तीनों भेदों का स्वरूप यथासमव बनलाया गया। 'न निरवधयम्' - 'निर्दोष नहीं है' इसलिए कि यथोक क्रम का निर्वाह नहीं हुआ [ निषेधविषय पर आरोपविषयमात्र का आरोप न कर उससे युकत पदार्थ का आरोप करने से ऐसा हुआ] इसीलिए एक अन्य वदाहरण दिया-'पूर्णेन्दो.'। 'मन्ये'-शब्दस्य प्रयोगे'='मनयेशन्द का प्रयोग होने पर' क्योकि ['मन्ये'शन्द ] समावना का घोनक होता है। नोलप्ेक्षा=उतेक्षा नहीं होती क्योंकि 'साध्यवसायत्व' आदि उत्मेक्षा- सामग्री का अभाव रहता है। 'वच्यते'= 'कहा जा रहा' अर्थात् उत्प्रेक्षा के प्रकरण में । अर्थ यह हुआ कि इ्व आदि शब्दों के समान उस [ अपहति ] का चाचक 'मन्ये'-शब्द भी-होता है। किन्तु यदि उत्प्रेक्षासामग्री का अभाव हो तो 'मन्ये'-शब्द का ही प्रतिपादक होता है। इसलिए 'अवास म्रागल्म्यन्'-इत्यादि पदों को जो [ अटकारत्नारुरकार आदि ] समाक्षक अपहुति का उदाइरण बतलाने हैं' वे ही 'यहेतचन्द्रा'. पद्य में स्थिति समान रहने पर भी अति शयोकि मानने है और कहने है कि यहा 'नो मा प्रति तथा' = 'मुझे ऐसा नहीं लगता'-यह कढकर 'शराक' का निराकरण कर दिया गया है और अन्यपदार्थ की अन्यपदार्थ के रूप से समावना न होने के कारण 'मन्ये= मानता हू'-ऐसा कदकर किग-पक्ष को ही निश्चित किया गया है। [द्० अलनारसवंस्व ] उत्प्रेक्षा प्रकरण का अन्त ये समीकषक सचमुच पूर्वापर विचार में बहुन कुशल हैं (न्यग्योकि) इनमे इम क्या कढें ? इसी प्रकार अन्य समीक्षकोंने भी यहा और अन्य अलंकारों में भी मनेक प्रकार की गलतिया की है किन्तु हम एक एक करके उन सब में दोप नहीं दिखग रहे है क्योंकि इमें अन्थ विस्नार का मय है और हमने केवल उन्हीं पद्यों पर विवार करने की प्रतिश्ञा की है जो हमारे दर्शन [अलकारसर्वस्व ] में आए हैं। विमर्श-अनकार रत्नाकरकार ने 'यदेनचन्द्रान्तर्गत'० इस पद्य में अतिायोकि मानने हुए जो विवेचन दिया है उसको विमशिनीकार ने-'नो भा प्रति तथा इत्यनेन-निश्चितत्वादतिरायो- कित्वमेव'-इन शब्दों में जैमा का तैसा उतार दिया है। निर्णयमागरीय सस्करण में 'अतिदायी क्ित्वमेवेति'-के स्थान पर 'अतिरयोकतिरेव' मूल मे छापा गया है और पाठान्तर में 'अतिश- योक्तिन' इस द्वितीयान्त पद का निर्देश कर दिया गया है। वस्तुत वह 'अतिशयोक्तितनम्' का ही अशुद्ध लेस है, क्योंकि द्वितीयान्त पद मानने पर या तो आगे प्रयुक्त 'इनि' इटानी पडती है क्योंकि उसके योग में कर्म में प्रथमा विमकि हो होती है या 'अतिशयोक्तिन्' की द्वितीया को प्रथमा बनाना पडता है, और निर्गेयासागरीय सस्करण के सपादक उसे वैसा बना दिया हो- अलंकाररलाकर जिसके सामने न हो वह प्रत्येक विद्ान् ऐसा ही कर सकता है। अवाप. प्रागत्म्य परितरुच' शैलतनये कलक्को नैवायं विलसति शश्ाकस्य वपुपि। अमुष्येयं मन्ये विगलदमृतस्यन्द्रशिक्षिरे रतिश्रान्ता शेते रजनिरमणी गाढमुरसि॥' -है प्वति। परिपक कान्तिवाले [ इस पूर्ण ] चन्द्र के शरीर में यह करक नहीं है। मुझे भगता है कि इसके अमृतसत्राबी अतरव शिशिर वस् पर इसकी रविश्रान्त प्रिया रात्रि गदरी
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अवहुत्यालङ्कार: १७५
नींद में सोई हुई है'।-इस त्थल में रत्नाकरकार ने अपहुति स्त्रीकार की है। विमर्शिनीकार का कथन है कि इस स्थल में मी अभिन्यक्ति वही है जो 'यदेतचन्द्रा०' स्थल में हैं। अर्थाद दोनों स्थलॉ में कलंक का निषेध किया गया है और उस पर तद्भिन [रात्रि तथा वणकिण] को 'मन्ये'- शब्द के प्रयोग के साथ प्रतिपादित किया गया हैं। रत्नाकरकार के अनुसार 'यदेतचन्द्रान्तर्गत' पद्य में संमावना का सर्वथा निराकरण कर दिया गया है 'भो मां प्रति तथा'-कहकर। [रनके अनुसार अपहुति में भी संभावना की पीठिका आवश्यक होती है] उनके इस कथन का अर्थ केवल इवना ही लगाया जा सकता है कि जहाँ संभावना का आत्यन्तिक निरास हो वहाँ उत्प्रेक्षा हो होती ही नहीं है अपहृति भी नहीं होती। 'यदेवचन्द्रान्तर्गत०' पद्य में विमाशनीकार के अनुसार चदि 'मवापः प्रागत्म्यन्' जैती ही स्थिति हो तो वहां भी अपहृति ही नाननी होगी। वस्तुतः संभावना की आवश्यकता पहति में रहती नहीं है। वहां निषेष द्वारा संभावना के वाध ते ही चमत्कार होता है। निषेध भी संभावना का नहीं अमितु संभावना के विषय [मुख आदि] रहता है। विमर्शिनी एतस्मिन्निति छुलादिशव्दपरतिपादे। संभवमात्रं पुनर्दर्शयितुमेतदुदाहतम्। वदतन्तर- रुपताभिवायाति। वपुःशव्दत्य शरीरार्थाभिघायिरवात्। अन्न पुनरुपमानस्योपमेयरूपता परिगतौ परिणाम इति परिणामालंकारत्वं यदन्यैरुकं तद्युक्तम। तच्दे हि धूमशिसान्य उभावे तत्परिणतिरूपरोमावलीपाधान्यं स्याद्। इृद्द पुनः शर्वप्ठुष्टमदननिपतनानु- मापकरवेन रोमावल्यपहवे धूमशिखाया एवं प्राधान्यं विवनितमिति न परिणाम: नापि
आरोपविषयानपह्नवे हि रूपकमिति पूर्वमेवोक्कम्। अथान्रापि भिलयो: सामानाधिकरण्या- योगादेकतरस्य निषेधमाप्तावारोप्यमाणस्य च निषेधासुपपत्तेरारोपविपयत्यव पर्यवसाने निषेध: प्रतीयत इति चेतू, नेतत्। अत्र हि सुस्रादौ चन्द्रादेरवृत्यभावाद वाधितः संश्नद्रार्थः स्वात्मसहचारिणो गुणाक्षन्तयति न तु सुसादेनिषयत्य निपेधा प्रतीयते। मुखशब्दाकेः स्वार्थ एव प्रतृत्ते:। पर्यवसाने ह्वन्न सुसादि चन्द्रादिगुणविशिष्टं प्रतीयते। न तु मुखादे र्वाधः। न सुखमित्येवमादे: पत्यवमर्शाभावाद। नापि निद्शना। संबन्धविघटनादयमाचादू। एतस्मिन् = इसमें अर्थात छलादिशब्द से प्रतिपादय [सपहन निर्देश] में। यह जो [यदेतचन्द्र०] उदाहरण दिया है वह केवल संभवमात्र दिखलाने के लिए। 'वस्त्वन्तररूप- ताभिधायी='अन्यवत्तुत्वरूंप होने का अभिधायक'= इसलिए कि वपुनशब्द शरीरार्थ का अभिवायक है। [अपहृति प्रसंग में अलंकाररत्नाकरकार ने 'अमुष्मल्लावण्यासृत०' पध में अपहन नहीं माना है। उन्होंने वहाँ परिणाम रूपक या निदशना स्वीकार करने का संकेत दिया है। इस पर विमार्शनीकार अपति देते (एलिसते हैं-]इस [अमुष्मलावण्यामृत पद्य ] में उपमान के उपमेयरूप से परिणत होने के कारण अन्य कुछ सब्जनों ने परिणाम माना है। वह युश्तियुक्त नहीं है। क्योंकि यदि वैसा होता [परिणाम होता] तो भूमशिखा अमवान हो जाती और सत्परिणति रूप रोमावली ही प्रधान रहती। किन्तु यहाँ रोमावलो शिवदग्ध कामदेव के डूबने का अनुमापक बतलाई गई है। यह तभी संभव है जब रोमावली रूप से उसका अपहब हो और उसमें धूमशिसाल त्वीकार किया जाय। इस प्रकार यहाँ भूंमशिखा ही प्रधान है अतः यहाँ परिणाम नहीं है।
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१७६ अलद्गारसर्वस्वम्
यहाँ रूपक भी नहीं है। यहाँ बपु शब्द व्याज-(वदाना) रूपी अर्थ का प्रतिपादक है। उसके आधार पर आरोप विषय [रोमावली] का अपहब [निषेध] हो जाता है और उसपर मरो- व्यमाण [धूमशिसा] की प्रनीति होती है। जबकि रूपक आरोपविषय का अपहव न होने पर ही होता है जैमा कि पहिले वतलाया जा चुका है। [अलकाररत्नाकरकार ने रूपक के विषय में जो यह कहा है कि]-'यहाँ [ रूपक में] भी मिन्न मिन्न दो वस्तुओं का ऐक्य प्रतिपादित तो रहता है परन्तु वास्तविकरूप से वह बनता नहीं है अत यहाँ भी किसी एक का निषेच आवश्यक होता है और क्योंकि आरोप्यमाण पदार्थ [विधेय होता है अत' उम] का निषेध संभव नहीं होना फलत वह आरोपविषय विषयक ही अनत में रदरता है-[द्र्टन्य क र अपद्वति प्रकरण पृ० ४' ]-यह भी ऐेसा नही है। यहों[ 'मुस चन्द्र ह'-इत्यादि रूपक में] चन्द्र आदि शब्दों की वृत्ति [अमिया ] सुख यादि पदार्थो में नहीं रहनी अन 'चन्द्र' आदि अर्थ वाघित हो जाते है। वाधित होकर वे अपने साथ के अन्य गुणों को लक्षित [लक्षण द्वारा प्रतिपादित] करते है। वह़ाँ मुखादि दिषयों का निषेध प्रनीत नहीं होता क्योंकि वहों के [ विषय वाचक ] मुस आदि शब्द अपने मुख्य अर्थो का ही बोध कराने हैं। अन्त में वाक्यार्थं बोध के समय प्रतीनि होती है कि-'मुख आदि चन्द्रादि के गुणा से युच है'। इसमें मुसादि [ भी प्रतीत होने रहते है, उन] का वाध प्रतीन नहीं होता। क्योंकि ऐसी कोई प्रतीति उस समय नहीं होनी कि-'यह मुख नईी है'। यहाँ निदशंना मी नहीं है क्योंकि सबन्य के अभाव आदि यहाँ नहीं है। विमर्श .- इम पूरे प्रमग का आधार अटंकाररत्नाकर का निम्नरिखित विवेचन है- 'अस्या सर्गविरधो०' इत्यादी० पुराणस्य प्रजापतेर० निपेधनर्यवसानादार्थ एवापहब । न तु 'अमुष्मिन् लावण्यामृतसरसि०'इत्यादौ वपुःशब्दसुखेन निषेधप्रनीत- आर्थोपह्षन इति वाच्यम्, वपुरादिशन्दतुत्यार्थ-मयादि (श्द) प्रथोगे 'वस्मे सौमित्रिमेत्रीमयमुपढतवानावर नाविकाय-' इत्यादावपहववप्रास्ी परिणामादाव्यपस्ुतिपसह्ञाद। सेनाज रूपक निदर्शना वा। रूपक च मिन- सपतया पसिद्धयो सामानाधिकरण्यायोगे एकतरस्थ निषेधमास्ती अर्थात आरोपविषयस्य पार्यव- सानिक: प्रतीयमानो निषेधोऽव्युपगन्तव्य। आरोप्यमाणस्य निषेधे आरोपवैयर्थ्यमसहाव। तद प्रतीयमाननिषेधनिमित्त रवमादाववहवभ्रमः। न च नियेधस्य शब्दस्वार्थत्वकृद मचापह निरूपक- योर्मेद, अपि रवस्या निषेधगर्भत्वादध्यवसायतुल्यत्वम्। [सल० रत्ना० अपहुति पृ० ४१] अर्यात्-'अस्या. सर्गनिषौ०' इत्यादि स्थलों में पुराण प्रजापति निषेध में पर्यबसिन होता है। अत वहाँ अपहब आर्थ है। किन्तु 'अमुन्मिन् ला0' में अपहब आर्य नहीं है क्योंकि यहाँ 'दपुःशब्द' के द्वारा निषेध का ज्ञान करा दिया जाना है [ अतः यहाँ निषेध शाष्द हो जाता है]। यदि यहाँ भी आर्थ अपक्षव मान लिया गया तो 'तरमे सौमिश्रिमेत्रोमयमुपहृतवानातर नाविकाय'= 'उस नाविक को लक्ष्मगमत्रोरूप उतराई दो-इत्यादि स्थलों में भी अपदव माना जाने लगेगा क्योंकि यहाँ भी वपुमब्द का समानार्थक 'मय'-शब्द प्रयुक्त है और तब परिणामालकार के समी स्थलों में अवह ति अनकार मानने की बात उठ खडी होगी। इमलिए यहाँ[ अमुष्मिन् पव में] रूपक या निदशना माननी चाहिए। रूपक जो है वह मी मरोप विषय का पार्यवसानिक निषेध ही है क्योंकि उसमें जो मिन्न मिन्न हो पदार्थों का सामानाधिकरण्य-[सभेदात्मक ] निर्देश रहता है वर वस्तुन बनता नहीं। फउत. [आरोपविषय और आरोष्यमान दोनों में से] किसी एक का निषेध होता ही है। यह निषेध यदि आरोष्यमाण का हो तो भारोप ही व्यर्थ हो जाए। इस प्रकार प्रतीयमान निषेध को लेकर ही यहाँ [अमुष्मिल्ा० में] अपहव का भ्रम दो
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अपहुत्यलंकार: १७s
गया है। ऐसा नहीं है कि सपहुति और रूपक में निषेध के शब्दत्व और आार्यत्मात्र का अन्तर हो। यहाँ अपरुति में निषेध गर्मित रहने से आरोप अध्यवसायतुत्य हो जाता है। विम्शिनीकार ने रूपक में आरोप विषय में निषेध प्रतीति स्वीकार नहीं की। उन्होंने वहाँ आरोपविपय को सर्वथा अविकृत स्वीकार किया है। साथ ही आरोप्यमाण को हो बदलता हुआ वतलाया। उन्होंने आरोप्यमाण चन्द्र आदि के शब्दों को लाक्षणिक माना और उन्हें समान- गुणपर्चवसायी नतलाया। चहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म तत्व पर ध्यान देना आवश्यक है। विमर्शिनीकार ने लिखा है कि 'चन्द्र आदि आरोप्यमाण पदार्थ वाित होकर अपने साथ रहने वाले गुणों को लक्षित करते है।' यहाँ 'लक्षित'-शब्द का अर्थ निश्ित ही लक्षणाद्वारा प्रतिपादित करना अभिप्रेत है। फलतः यह अर्थ निकलता है कि लक्षणा का आरम्म शब्द से नहीं अर्थ से होता है। यह तथ्य मम्मटाचार्य को भी मान्य है। उन्होंने भी 'लक्षणारोपिता क्रिया'-कहकर लक्षणा को अर्थनिष्ट ही स्वीकार किया है। कुमारिलमट्ट, मुकुलभट्ट तथा परबत्ती वयाकरणों का भी वह्ी सिद्धानन हैँ। किन्तु सुख्यार्थ के साथ रहने वाले गुणो में लक्षणा मानना विचारणीय है। असा- धारण धर्म मुखत्व और चन्द्रल को छोढ़ने पर- मुर चन्द्र सुन्दरत्व सन्दरल -- इस प्रकार आरोपविषय और आरोप्यभाग के पक्षों में जो दो दो घटक हैं उनमें से सारो- प्यमाण चेन्द्र को लक्षण का विषय नहीं माना जा सकता, उससे तो लक्षणा का आरम्म होता है। शेष तान में से एक एक में लक्षणा मानने पर तीन ही पक्ष प्रस्तुत होते हैं। मम्मट के अनुसार इन्हें इस प्रकार कहा जा सकता है -- = चनदू शब्द की लक्षणा अपने चन्द्रत्व के साथ रहने वाले सुन्दरत्व में अथवा- २= मुस के मुसत्व के साथ रहने वाले सुन्दरत्व में, अथवा- ३= सुन्दरत्वादि साधारण धर्मों के आधार पर स्वयं मुख में। यह तथ्य निम्न चित्र से स्पंष है-
सुख चन्द्र लक्षणा-३
-लक्षण-१
लक्षणा-2
सुन्दरत्व सधारण गुण सुन्दरत्व मुखत्व सहचारी सन्द्रल सहचारी
इनमें से प्रथम और द्वितीय की अमान्य और तृत्तीय को सिद्धान्त रूप में त्वीकार किया जाता है। निदर्शना का अर्थ यहाँ पदार्थनिदर्शना हो सकता है। उसीमें दूसरे का धर्म दूसरे में स्थित वतलाया जाता है। उदाहरणार्थ-'रैवतक गिरि गजराज की शोमा धारण करता है'-यह १२ अ० स०
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अलक्कारसवस्यम् स्थल। इसमें गजराज की शोमा गजराज में ही रह सकती है और पर्यत की केवल पर्दत में। फलतः उकत कथन का अर्थ निकलता है-'गिरि गज की शोमा जैसी शोमा को धारण करना है।' यहाँ पर्वतशोभा का गिरि के साथ संबन्ध समद न होने पर सादश्ययोजना द्वारा उसे सभव बनाया जाता है। इसीलिए निद्शना का लक्षण है-'अभवन् वस्तुसबन्ध उपमापरिकत्पक'। प्रस्तुत 'रोमावदिवपु धूमशिखा' में यह सभव नहीं कि धूमशिसा रोमावली का शरीर अपना ले। वह तत्सदश शरीर ही अपना सकती है। अतः पदार्थनिदर्शना समव है। विमर्दिनीकार यहोँ निदर्शना का अर्धोशमान स्वीकार करते हैं। वे सादृश्य तो मान लेते हैं किन्तु शेप अर्धोर 'संबन्धीमाव' स्वाकार नहीं करते। उन्हें 'अमुर्षि्मितावण्यामृत०' में ऐसा अनुभव नहीं होता कि यहाँ एक के शरीर का दूसरे में अस्तितव बतलाया जा रहा है। उनका पक्ष कुछ दूर तक ठीक भी है। 'किस अलकार में किन किन तत्वों की प्रतीति समन है'-यह न सोचकर अलंकार निर्णय के लिए सोचना यह चाहिए कि उन तत्वों में चमत्कार का जनक नसन कौननसा है। उसी के साधार पर अलकार को नाम दिया जाना चाहिए। इमारी दूष्टि से 'अमुग्मिछावण्यामून०' पद्य में अपदब दो चमत्कारकारी है। अत यहाँ अपदुति दी मानी जानी चाहिए। चिमर्शिनी आादि शब्दाच्च तृनीययापि कविदसत्यसय प्रतिपायते। यया- *मद्दाहवो व्यवदार सुशतु लता कण्ठस्थले ताब के मा कार्थीर तिसाइसं मियतमे दासस्तव प्राणिति। नीता वृद्धिममी रवमैव कुसुमैर्बापपायमाणा दुमा मृदधन्सि पुरिकामिवालिपटलव्याजेन पाशच्छिदे।' अत्र कुसुमेरिति तृतीययापह्ववनिवन्धनम। आरोपगर्भत्वाच्चेय साहश्याद्वा भवति संबन्धान्तराद्ा। सादृश्येऽप्यस्या. माधारणघर्मश्य त्रयी गतिः। तम्रानुगामिता यथा- 'तरुणतमालकोमलमलीमसमेतदयं कलयति चन्द्रमा किल कलकमिति सुबते। तदनृतमेव निर्द्यनिधुतुद्दन्तपद्वणविवरोपदर्शितमिद् हि विभाति नभ।।' अब्र तमालमलीमसत्वमनुगामिरवेनोपातम्। शुद्धसामान्यरूपवं यथा- 'अय सुरेन्द्रोपवनादरित्रीं स पारिजातो हरिणोपनीत.।
'न ज्योरस्नाभरण नभो न मिलितच्छायापथो बासुदो नो तारापकरो न चेदममृतज्योतिप्मतो मण्डलम्। धीरपोममयोऽव्यपांनिधिरसी नेत्राहिना मन्दर: पृक्कोऽयं मणिपूग एप कलशश्ाय सुधानिशर:।।'
'देलोदज्वन्मलय पव नाड़म्वरेणाकुलामु प्रेङ्डाकोल कमपि भजतां घृतशाखाछतासु। वाचालवं ननु यद्भरव् कानने कोकिलानां मौनित्व तत्पथिरुहरिणीलोचनाना ववरग।।' अब्र कोकिलवाचाळत्वस्य कारणस्य निपेवे पथिकतोमौनित्वस्य कार्यस्य विघि:। युवमारोपगर्मेयं सप्रपतं दर्शिता। अध्यवसायगरभा पुनर्दश्यते मथा-
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'न उचमीसौदर्यान्न व सुरशरण्यीकृतसुरा सुधादिज्येष्टरान्न मुक्टमणितवाद्गवतः । यदेवं वालेन्दोदिंशि विदिशि वन्धत्वमुदितं
अम्र वन्दात्वस्य प्रभावादिहेतकर्वे निगीर्यं हेत्वन्तरमध्यवसितम्। यथा वा- 'कलाभिस्तृप्तयर्थ सुरपितृनृणां पञ्चदशभिः सुधासूतिर्देवः प्रतिदिनमुदेतीत्यसदिदम्। परिभ्रान्यत्येप प्रतिफलनमासाद्य भवती- कपोलान्तयुंकत्या त्वदघरसुधासंग्रह्परः॥' अन्नोदयादी तत्दाश्युपभोगलक्षणं निमित्त निगीर्य सत्फलमूतं निमिचानतरमध्य चसितम! ['वस्त्वन्तररूपताभिधायिवपुःशब्दादिनिवन्धनम्-' पद में प्रयुक्त] आदि-शब्द से कहीं तृतीया के द्वारा भी असत्यता का प्रतिपादन होता है। यथा-[लतापान से फाँसी लगाकर' आणान्त का प्रयल कर रही नायिका से नायक कह रहा है-] 'हे प्रियतमे ! लत्ा तुम्हारे कण्ठस्थल में वह कार्य न करे जो मेरी भुजाएँ करती है, अतिसाहस न करो, यह तुम्हारा दास जीवित है। पुष्पों से आँसू वहा रहे ये वृक्ष भी स्रमरावली के बहाने तुन्हारी फांस काटने हेतु छुरी सी लिए हुए हैं। इन्हें तुम्हीं ने जो बढ़ाया है।' यहां 'कुसुमै :- पुष्पों से' इस तृतीया निमक्ति के द्वारा अपहृब-[निषेध] का उपनिबन्धन किया गया है। यह अलंकार आरोपगर्मित अलंकार है इसलिए या तो यह सादश्यमूलक होता है या सादृश्ये- तरसम्बन्धमूलक भी। सादृश्य में भी इसमें [ पूर्वचर्चित ] तीनों प्रकार की स्थिति रह्दती है। त्ीनों में से [सादृश्य की ] अनुगामिता का उदाहरण यथा- -'यह चन्द्रमा जरठ तमालपन के समान कोमल तथा कृष्णवर्ण की यह जो वस्तु लिए हुए है इसे लोग 'कलङ़' कहते है। वह सवथा मिथ्या है। यह तो निर्दय विधुन्तुद [ राह] के दाँत के धाव से बने विवर में से दिखाई देता आकाश है।' -यहां तमामलोमसत्व अनुगामी धर्म के रूप में उपयुक्त है। शुद्धसामान्य [वस्तुमति- वस्तुमावरूप ] साद्ृश्य का उदाहरण यथा - 'इन्द्र के नन्दनवन से यह पारिजात श्ीकृष्ण द्वारा पृथ्वी पर नहीं लाया गया है, यह तो पुष्प का प्रवह है जिसे कश्मीरदेश में उत्पन्न होने के अभिमान को प्राप्त करा दिया गया है।' -- यहां लाना तथा प्राप्त कराना शुद्ध वस्तुमतिवस्तुभाव है। विम्त्रमतिविम्वभाव का उदाहरण यथा- 'न तो यह चाँदनी से अर्लकृत आकाश है, न तो आकाशगंगा से संस्पृष्ट मेवखण्ड है, न नक्षत्रों का पुञ्च है और न चन्द्रमा का मण्डल। यह तो तरंगित दूध वाला समुद है, औौर यह नेती बने सर्पराज ने मन्दर को लपेट रखा है, यह रत्नों का समुदाय है और यह अमृतसावी सुधाकलश है।' -- यहां ज्योत्स्नाभरणत्व=चाँदनी से विभूषित होने के लिए क्षीरक्षोममयत्व=तरंगित दूध वाला होना पतिविम्वरूप से निर्दिष्ट है। दूसरे [ सादश्येतर ] संबन्ध के आधार पर होने वाला-यथा-
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१८० अलङ्कारसवस्वम्
'लीलापूर्वक गतिशील मलयपवन के आडम्बर से आाकुलित आध्रशाखालताओं में अतिमनोश् प्रेस्वाकेलि [शूलझूलना ] कर रहे कोकिलों में जो वाचालता आई वह पथिक-[पुरुपों की] वनिताओं के लोचनों में मौन का जागना था।' -- यहा कोकिन्वाचालता कारण है और पधिकवनिताओं का मौन काय। इनमें से कारण का निषेध कर कार्य का विधान किया गया है। यह आरोपगर्मा अपहृति दिखलाई गई। अब अध्यवसायगर्मा अपह्गति दिखलाते है - 'प्रत्येक दिशा और प्रत्येक विदिशा में जो यह बालेन्दु को प्रणाम किया जाता है यह इसलिए नहीं कि यह लक्ष्मीजी का सगा भाई (सोदर्य) ह, न इसलिए कि देव तथा दानवों द्वारा अपनाई सरा और सुधा आदि का बहा माई है और न इसलिए कि यह भगवान् शाकर का मुकुटमणि है। रपष्टरूप में यह वन्दत्व केवल इसलिए है कि यह कान्तामुसकमल की गुलामी करता है।' -यहा वन्धना के वास्तविक हेतु प्रभाव [या प्रभा ] आदि का निगरण [अनुक्ति ] कर उस पर अन्य हेतु [ताइृश दास्य ] का अध्यवसाय किया गया है। दूसरा उदाहरण यथा- 'सुधानिषि देव [चन्द्र ] प्रतिदिन इसलिए उदित होते हैं कि-'उनहैं देवों, पितरों और मनुष्यों को तृप्त करना होना है-' यह असत्य है। ये तो तुम्हारे अधर की सुधा वटोरने के लिए घूम रहे हैं और उसके लिए इन्होंने युक्ति सोची है दुम्हारे कपोल पर प्रतिबिम्वित होना।' -यहा उदय आदि में हेतु है उन-उन [ मेष वृष आदि] राशियों का जो उपभोग उसे निगल कर [शब्दन न कहकर ] अन्य निमित्त अध्यवसिन किया गया है जो वस्तुत पूर्शेक्त कारण का फट है। विमर्श-अपह्नुति का इतिहास= भामह-अपहृतिरभीष्टा व किचिदन्तर्गनोपमा। भूतार्थोपह्वादस्याः करियते चाभिना यथा॥ नेवं विरोति मृह्ाली मदेन मुखरा मुद्ु। अयमाकृष्यमाणस्य कन्दर्पधनुपो ध्वनिः ।' ३।२१,२२ ॥ -उपमा यदि कुछ-कुछ छिपाई जावे ता अपहुति अरकार मानी जाती है। tसर अपह्वतिनाम इसलिए रगा जाता है कि इसमें भूतार्थ=वास्तविक अर्थ का अपहन=छिपाब रहता है। उदाइरण= 'मद से सुसर यह भृद्ाली नहों वोल रही। यह तो काम के खीचे जा रहे धनुष की ध्वनि है।' वामन-[ सूत्र ] समेन वस्तुनाइन्यापलापोऽपहुनि ।४।३।५। [शृचि] समेन तुल्येन वस्तुना वाश्यार्थेनान्यम्य वाक्यार्थस्यापलापो निह्ववो यस्त- क्वाध्यारोपणाय मसावपह्ुति । यथा- 'न केतकौना विलसन्ति सूचय प्रवासिनो इन्न हसन्यय विधि. 1 तहिलनेय न चकास्ति चल्ळा पुर, रमरज्योतिरिद दिवर्तते॥' वाक्यार्थयोस्तारपर्यात ताद्रूप्यमिति न रूपकम् ।' -समान वस्तु से अन्य का अपलाप-अपक्षुति। सम =तुस्य वस्तु=वाक्यार्थ से अन्य = वाक्यार्थ का जो अपलाप= निद्व= छिपाव, जिमका उद्देश्य तत्त्व का आरोप हो अपहुति कहलाता है। उदादरण यथा-"[ वर्षा में] ये केवड के पुष्प की नोक दिखाई नहीं दे रहीं यह तो विधाता प्रवासिओं पर इँस रहा है। सामने यह चचल बिनली नहीं चमक रही यह तो
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अपहत्यलङ्कार १८१
काम की ज्योति प्तिफलित हो रही है। यहाँ रूपक नहीं क्योंकि यहाँ दो वाक्यायों में अभेद चेतळाया गया है[ रूपक पदार्थों के अभेद में होता है]। उद्भट= अपहुतिर मीष्टा च किचिदन्तर्गतोपमा। भूतार्थापह्मवेनास्या निवन्धः कियते घुषैः ॥ -[प्रतोहारेन्दुराज कृत लव्ु निवृत्ति-]-यत्र भूतं विद्यमानम् उपमेयलक्षणन् अर्थम् अपहुत्य उपमान रूपारोपेण उपमानोपमेयभावो [ड्वगम्यते सोपहुति- ] तिरलंकारः। अत्र च०० अस्फुटेन रूपेणोपमानोपमेयमावश्चकास्ति । -'वहाँ भूत = विदमान उपमेयस्वरूप वस्तु को छिपाकर उपमानस्वरूप का भरोप करने से उपमानोपमेयभाव प्रतिपादित हो उसे अपहुति अलंकार कहते हैं। इसमें ..... उपमानोपमेच- माव अस्फुट रूप से प्रतीत होता है।'-यहाँ मूलकारिका भामह को है। वृत्ति में प्रतिहारेन्दुराज ने भूनार्थ-शब्द का अर्थ विद्यमान अर्थ किया है यही एक नवीन तथ्य है। 'भूतार्थव्याहतिः सा ज्ञ न स्तुति: परमेप्टिन: [र १०] कथयामि ते भूतार्थम्, इन प्रयोगों में भूतार्थ शब्द का अर्थ सत्यार्थ या वास्तविक अर्थ होता है। मीमांसा में जो तीन सर्थवाद माने जाते हैं उनमें से एक का नाम 'भूतार्थवाद' ही है। 'किचिदन्तर्गतोपमा' -शब्द का अर्थ पतीहारेन्दुराज ने अपेक्षाकृत अच्छा चतलाया है। रुदट'अतिसाम्यादुपमेयं यत्यामसदेव कथ्यते सदपि। उपमानमेव सदिति च विक्षेपापह्ुति: सेयन् । ८।५७ -जिसमें अत्यन्त सान्य के कारण उपभेय का सद्भाव होने पर भी उसे असद्भावात्मक चिचित किया जावे और उपमान को सद्भावात्मक उसे अपहति कहते है। उदाहरण- 'नवनिस किसलय कोमलसकलावयवा विलासिनी नेषा। आनन्दयति जनानां नवनानि सितांशुलेखैव ।। ८।५८ ।। -नवीन दिसांकुर के समान सपूर्ण अवयदों में कोमल यह विलासिनी नहीं है जो जनों के नेत्रों को आनन्दित कर रही है, यह तो चन्द्रलेखा ही है। निर्णयसागरीय संस्करण में 'नैपा' का 'सेथा' तथा 'लेखैव' का 'लेखेन' छप गया है। मम्मट-'प्रकृतं सन्निपिध्यान्यव साध्यते सा स्वपह्गतिः ।' उपमेयमसत्यं कृत्वोपमानं सत्यतया यद स्थाप्यते सा तुअपहुतिः । उदाहरण-'अवाप्तः प्रागव्भ्यम्। -उपमेय को मसत्य बतलाकर उपमान का सत्यरूप से जो स्थापन उसी का नाम है अपहति० । उदाहरण-अवासः प्रागल्स्यमू । इससे स्पषट है कि सभी आचार्यी ने अपहुति को साइश्यमूलक अलंकार माना है और उममें उपमेय का छिपाया जाना अनिवार्य स्वाकार किया है। वामन ने उसका रूपक से भेद भी वतलाना चाहा है। वस्तुतः भेदकतत्व चमत्कार है। अपसुति में अमहब का ही चमत्कार होता है। संजीविनीकार श्री अीविद्याचकव्तीं ने अपहुति के संपूर्ण निरूपण को इस प्रकार कारिकावद किया है- 'रकृतं यन्निषिध्यान्यव साध्यते सा त्वपहुतिः। नवा छलादिशव्दैध्य सा नन्दान्तरतस्त्रिधा।। स्याद् भेदाभेदतुलया विच्छित्तिरुपमादिका। रुपकादिस्त्यमेदांशे मुख्ये त्वारोपर्सययाव।
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-प्रकृत का निषेध कर अप्रकृन उपमान का विधान अपकुति कहलाता है। यह तीन प्रकार की होती है (₹) 'जो नम्-' द्वारा प्रतिपादित हो, (२) जो धलादि शब्दों से प्रतिपादित हो और (३) जो अन्य 'वपु' आदि शब्दों से प्रतिपादित्त हो। -'उपमादि वहां होते हैं जहा भेद और अभेद दोनों बरावर होते हैं। रूपकादि वहां होते है जहा आरोप के आधार पर अनेदाश प्रधान हो। उत्प्रेक्षादि वदा होगे जहाँ अभेद होगा किन्तु उसमें अध्यवसाय रहेगा।' श्री थ्रीविदयाचकवतों के इस संग्रह से विदित है कि उन्होंने मम्मट के अपहुतिलक्षण को अधिक महत्व दिया है। पण्डितराज जगसाथ ने अपछुति का लक्षण इस प्रकार किया है-
[मुखखव आदि ] उपमेय धर्म का निषेध दिसनाते हुए उपमान के तादात्म्य का आरोप अपछुति कहलाता है। विमर्शिनी
इस [अभेदप्रधान भलकारों के ]प्रकरण का उपसदार करते दुए अन्य प्रकरण का आरम्म करते हैं- [सर्वस्व ] एवमभेदपाधान्ये सारोपगर्भानलंकाराँल्क्षयित्वा अध्यवसायगर्भा- लक्षयति- तन् [ सू० २२ ] अध्यवसाये व्यापारग्राधान्ये उत्प्रेक्षा। विषयनिगरणेनाभेद प्रतिपत्तिविपयिणोऽव्यवसायः। - [वृत्ति ] इस प्रकार अभेद की प्रधानता होने पर होने वाले आरोपगर्मिन मलंकारों के लक्षण किम, अब अध्यवसायगमित अलकारों के लक्षण करते हैं। उनमें- [सुत्र] अध्यवसाय में यदि व्यापार की प्रधानता हो तो उत्मेषा [अलंकार होता है।। [वृचि][ विषय के ] निगरण द्वारा विषय के साथ विषयी का अमेदबोध अध्यवास होता है। विमर्शिनी आरोपगर्मानिति। अन्नाध्यवसायगर्भत्वस्यापि विद्यमानरवान्मव्वग्राम इत्यादि- षदारोपगभंश्य प्राधान्यादेवं व्यपदेश। तत्र तावदुस्नेष्षा लक्षयति-अध्यवसाय इत्यादि। 'आरोपगमं'-कथन प्रसिद्ध मल के नाम पर गाँव को मल्लगाँव कहने के समान आरोप की प्रधानता पर निर्भर है, वस्तुन, अध्यवसाय भी इनमें रहता है। अध्यवसायगमित भलंकारों में उत्प्रेक्षा का लक्षण करते है अध्यवसाय रति- विमर्श: अलंकारसर्वस्व के इस उत्प्रेक्षालक्षण को अरंकाररत्नावरकार शोभाकरमित्र के
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उत्पेक्षालङ्गार: १८३
सदोप ठह्दराया है और विमर्शिनीकार जयरथ ने शोभाकर का खण्डन कर उसका समर्थन किया है। शोमाकर का विवेचन इस प्रकार है- [सूत्र ] दिपयित्वेन संभावनमुत्मेक्षा। [वृत्ति ] विषचित्वेन अर्थाद् विषयस्य सम्भावनं='भवितव्यमनेन स्वाणुना' इत्यादि अनिश्वयात्मक चितर्कादि-शन्दाभिधेय-संभावनाप्रत्ययविपर्याकृतत्वन् उत्प्रेक्षा। अतश्ानिश्रयात्मकतया संभवानायाः मंदेह्मूललम्, न त्वध्यव सायगर्भता।यत्रापि [धमोत्प्रेक्षायां धर्मरूपविययस्य शब्दतोऽनुपादाने 'लिन्पतीद तमोडद्ञानि'-इत्वादी ] अंशेनाध्यवसायस्तत्रापि सन्देहानिवृत्तिः। तथादि संदेदनिश्चयरूपत्वेन प्रत्य- यानां द्वेविष्यन्। निश्यश्र यथार्थोडव्यभिचारी सम्यवप्रत्ययः, व्यमिचारी त्वसम्यक। तन तावदुत्प्रेक्षा न सन्यकत्म्, अर्थाव्यभिचारामावात। नाप्यसग्यकप्रत्ययरूपो विपर्योस, तस्य निश्वयरूपत्ाव। अस्वां च शाल्देनापि वृत्तेन भ्रान्तिमदतिशयोकत्यादिवद् विपविणो निश्चयाभावाद। अनिश्चिते च संदिग्धमेवेत्यविवाद: । अत एवं नाध्यवसायमूळतमस्याः । तस्य विपयनिगरणं विषयिनिश्चयशच त्वरूपन्। न चात्रैकमपि संभवति विपयोपादानाव निश्वयाभावाच्च। तेन 'अध्यवसाये व्यापार- प्राान्ये उयेक्षा-इति लक्षणमपर्यालोचिताभिधानमेव । [ उत्पेक्षा पृ० ४७ पूना संस्करण- १९४२ ]। [ सूत्र ] विषय विपयीरूप से संभावन उत्प्रेक्षा। [वृत्ति ] विपयीरूप से विषय का संभावन अर्थात 'इसे स्थागु (हँठ) होना चाहिए'-इत्यादि अनिश्रयात्मक तथा चितर्क आदि शब्दों से पुकारा जाने वाला जो संभावनात्मक ज्ञान उसका विषय बनाया जाना उत्प्रेक्षा कहलाता है। और इसलिए अनिश्यात्मक होने के कारण संभावना संदेह- मूळक होती है, अध्यवासगर्मित नहीं। जहाँ [धर्मोत्प्रेक्षा में विपयभूत धर्म का शब्दरतः कथन नहीं रहता जैसे 'अन्धकार अंग-अंग को लीपता-सा जा रहा है'-यहाँ अन्धकार के फैलने का मांशिक अध्यवसाय भी होता है वहाँ ही संदेह हट नहीं जाता। क्योंकि ज्ञान दो प्रकार के होते हैं संदेहात्मक तथा निश्वयात्मक । इनमें से निश्चय सन्यग्कान=ठीका ज्ञान का नाम है जो यथार्थ अर्थाव पदार्थ के वास्तविक रूप के ही आकार का होता है, तद्विरुद्ध नहीं। जो वैसा नहीं होता उसे असन्यक ज्ञान = अयधार्थ = गलत ज्ञान कहा जाता है। इनमें से उत्प्रेक्षा सम्यक ज्ञान नहीं हो तकती, क्योंकि इसमें ज्ञान-स्रूम वैसा ही नहीं रहता जैसा पदार्थस्वरूप रहता है। न तो यह असम्यवज्ञानस्वरूप विपर्यय=विपरीतज्ञान ही है क्योंकि यह [विपरीतज्ञान या विपर्यय] निश्चयरूप होता है [ रज्जु में सर्प का निश्चय ही भ्रान्ति है वही विपर्यय है] इस [उत्परक्षा] में भ्रान्तिमान् अतिशयोकति आदि के समान विषयी का निश्चय शब्दतः भी नहीं होता [वाक्यार्थबोध में उसके निश्चय की बात तो बहुत दूर है] और यह सर्वमान्य है कि अनिश्चित पदार्थ संदिग्ध ही माना जाता है। इसीलिए इस [उतप्रेक्ष] को अध्यवसायमूलक नहीं माना जा सकता। क्योंकि उस [अध्यवसाय] का स्वरूप है विषय का निगला जाना और निपची का निक्षय होना। यहाँ [उत्प्रेक्षा में ] इन दोनों में एक भी संभव नहीं है क्योंकि यहां विपय का शब्दतः कथन रहता है [ सब्दतः अकयनरूप निगला जाना नहीं ] तथा निश्चय नहीं रहता। इस कारण 'अध्यवसाये व्यपारप्राधान्य उत्मेक्षा'=अध्यवसाय में व्यापार की प्रधानता होने पर 'उत्परक्षा' यह [ अलंकारसर्वस्वकार द्वारा निर्मिंत] लक्षण निषट पर्यालोचनशूल्य उच्ति है। विमर्शिनीकार इसका खण्डन करते हुए लिखते हैं- विमर्शिनी अध्यवसाय इति न पुनः संदेह इति। इह हि निश्चयानिश्वयरूपरवेन प्रत्ययानां हेविध्यम्। निश्रयश्चार्थाव्यभिचारी सम्यक, अन्यथा त्वसम्यगिति
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भेदो न माहय. १ प्रतीतिवृत्तिमान्नस्यैवेह विचारयितुमुपक्रान्तरवाद्। तत्य घ प्रामाण्यविचारे उपयोगात्। अनिश्चयश्च सरयतर्करूपरवेन द्विविध:। अतश्वानिश्चितं च संदिग्धमेवेति न वाच्यम्। वर्कात्मन' समावनाप्त्ययस्याप्यनिध्वयार्मकत्वे सदिग्धमवा- भावाव। उत्परेक्षा सभाव नादिशब्दाभिधेयतर्कप्रतीतिमूलेति नास्या: सदेदमूदवम्। तस्य भिनछचतणरवात। अथानवधारणज्ञान सशय हत्यनवधारणज्ञानस्वाविशेपारमश्यान्नार्था- न्तराभावप्तर्कस्येत्यस्या. सदयमूलस्वमिति चेत्, नैतत्। अनवधारणज्ञानत्वाविशेपेऽपि सरयतर्कयोर्भिन्नरपरवाद्। तथाहि -स्थाणुर्वा पुरुषो वैति सामान्येन पषद्वयोल्लेस: संशय । पुरुपेशानेन भवितव्य मित्येकतरपचानुकूलकारणदर्शनेन पत्षान्तरवाधनमिव तर्क.। पुरुष एवायमिति पछानतरासस्पर्शोनैकतरपचनिर्णयो निश्चय इव्यस्ति महदय- साधिक सस्ययानां त्रैविध्यम्। याढमसयेव प्रश्ययाना त्ैविध्यम्, कि रवनवधारणज्ञानव्वाविशेपात् सशायप्रकारस्तर्क इति चेत्, नैतद्। एवं हसम्यगज्ञानवाविशेषाद् अ्रमोऽपि संशयप्रकार: स्थाद। अर्थ- निक्चयानिश्चयस्वभावत्वादिना असत्यनयोविशेष इृति चेत्, इह पुनर्नास्यय्र कि ग्रमागम्। सशयो हनियतोभयाशावलम्वित्वनोदेति, तर्क पुनरंशान्तर वाधनेनेव वाह केलिदर्शनाध्यनु- कूलकारणचित्याद शान्तरावलम्वनेन चवेत्यस्यनयोर्विशोप । देशान्तते हि यथा स्पर्धमान एव स्थाशुपच आस्ते न तथा वाहकेलिभूमी, अपि तु शिथिलीमवति, सभवस्पमानुत्वाच्च सर्वारमना न निवर्तत इति अत एव निश्चयः साधरुप्रमागाभावेऽप्यसयोपपत्त। नहि प्रतिपच चाघादेव निश्चयो मचति। साधकवाघकप्रमाणसल्वावेन तदुश्यादानू। तेनानियतो मयपशबलम्बी किंस्त्रिदिति विमर्श सदेहः। एकतर पच्तावलम्यी तु तर्क इति। अथ 'काइस्य फलस्योपायविशेष' इत्येक्तरपपावलम्बेनापि सदेह सभवतीति चेद, नैतव। किमर्थनानियतपचान्तर स्वीका रादेकतरपमावलम्बनस्य प्रतिष्ठानात्। वा्घाली दर्शनाच्च यथा पुरुपविशेषा, स्मरणपर्थ समवतरन्ति न तथा स्थाणुविशेषा इत्युभयविशोप- स्मरणजन्मनः सवेहादेकतर विशेषस्मरणजम्मा विशिष्यते तर्क इस्याद्यवन्तरमतिगहनमन- मोरस्ति भेदसाधन ततपुन प्रकृतानुपयोगादिह नोक्तम्। तेन सदेद्दनिक्चयान्तरालवर्ती तालक्षण सभावनाप्रत्यय सिरङ्वुरिव लम्बमानोवश्याम्युपगन्तव्य। अध्यसाय न कि मदेह। यहा, जो है सो, समस्न ज्ञान दो वर्गों में बटि जाते है (१) निश्चय तथा (२) अनिश्चय। इनमें निश्षयश्ञान दो प्रकार का होना है (१) सम्यक् और (२) असम्यकू। इन दोनों का अन्तर यह है कि मम्यक निश्चय अर्थाव्यमिचारी अर्थाव पदार्थ के स्वरूप के विरुद्ध ननहीं होता और असम्यक ठीक इसके विपरीन अर्धव्यमिचारी अर्थाद पदार्थस्वरूप के विरुद्ध। किन्तु यह अन्नर लोकिक अन्तर है। यद्ा [काव्यक्षेत्र की अलंकारमीमासा में] इसे नहीं अपनाया जाना चाहिए। क्योंकि यहाँ तो केवल प्रतीतिवृत्ति [प्रतीति रूप वृत्ति=अन्त करण वृत्ति, जिसे कश्मोरीदर्शन सवि्ति कहते हैं3 पर ही विचार किया जा रहा है। उप्युक्त जो भेद बतलाया गया है उसका उपयोग केवल प्रामाण्यविचार में होता है [ जहाँ वास्तविकता अथवा अवास्तविकना का न्याय किया जाता है]। जहाँ तक अनिश्वयश्ान का सबन्ध है वह दो प्रकार का होता है सशयात्मक और तर्कात्मक। १सीसिए 'अनिश्चित जो है वह संदिग्य ही होना है' ऐेसा नहीं कहना चाहिए। तर्कात्मक जो समावनाज्ञान होना है उसे भी अनिश्यात्मक कहा जा सकता है, जब कि वह संदेहात्मक नहीं होता। उन्प्रेक्षा जो है यह समावना-आदि शब्दों मे कही जाने वाली सर्कात्मक प्रतोति पर निर्मर है, अत इसे सदेहमूलक नहीं कहा जा सकता। उस [संदेष] का स्वरूप और ही प्रकार का होता है।
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उत्प्रेक्षालङ्कारः १८५
और-'अनिश्चयात्मक ज्ञान संशय होता है, तथा यह अनिश्वयात्मकता तर्क में भी रहती है अतः वह संराय से भिन्न नहीं है, फलतः उतप्रेक्षा संझय मूलक मानी जा सकती है'-यदि ऐेसा कहें तो चह भी ठीक नहों है, क्योंकि अनिश्चयात्मकता से युकत होने पर भी तको और संशय में अन्तर है। अन्तर इस प्रकार है कि 'हूरु है या पुरुष' इस प्रकार दोनों पक्षों का समानरूप से ज्ञान संशय कहलाता है जब कि तर्क कहलाता है-'यह पुरुष होना चाहिए'-यह, जिसमें किसी एक ही पक्ष की और झुकाव दिखलाकर दूसरे पक्ष का मौन निराकरण-सा रहता है। निश्चयज्ञान वह ज्ञान कहलाता है जिसने 'यद पुरुम ही है'-इस प्रकार दूसरे पक्ष का स्पर्श मी नहीं रहता और केवल एक ही पक्ष का निर्णय कर लिया जाता है। इस प्रकार धानों के तीन वर्ग होते हैं। इसमें साक्षी हैं सहृदय जन। यदि यह कहें कि-'ज्ञान के ये मीनों प्रकार, है तो अनुमवसिद्ध' किन्तु इनमें जो तका है वद संशय का ही एक भेद है, क्योंकि संशय और तर्क दोनों में ही ज्ान की अनिश्वयात्मकता समान रूप से रहती है।'-तो यह भी ठीक नहीं, तब तो भ्रम को भी संशय का भेद कहा जा लकता है क्योंकि ज्ञान की असन्यक्ता (अचयार्थता) मंज्ञय के ही समान भ्रम में भी रहती है। यदि कहॅ कि श्रम में पदार्थ का निश्चय रदता है और संश्य में अनिश्वय, इस प्रकार दोनों में अन्तर है तो इसमें क्या प्रमाण है कि ऐसा अन्तर संशय और तर्क में नहीं है। संशय जो है उसमें विषय बनते है ऐसे दो भंश जो दोनों ही अनिश्चित, रहते हैं जब कि तर्क में एक अंक का वाघ- सा रहता है और वाइकेलि [ संभवतः घुड़ सवारी का क्षेत्र=Race ground ] आदि के दिखाई देने आदिअनुकूल (साधक) कारणों के औचित्य से दूसरे अंश का साधन। इस प्रकार अन्तर इन दोनों में मी है ही। अन्य स्थानों में जिस प्रकार स्वाणुपक्ष का ज्ञान बराबरी के साथ होता रहता है उस प्रकार वाहकेलि भूमि [ घुड़सवारी के मैदान] में नहीं, वहाँ बइ शिथिल ही जाता है, किन्तु जन तक उसमें प्रमाद की संभावना रहनी है वह सर्वात्मना हट नहीं जाता। इसीलिए यह ज्ञान निश्वयस्वरूप है क्योंकि यह [निश्चय] साधक-प्रमाण के अभाव में भी माना जा सकता है। [वाहकेलि भूमि आदि एकता पक्ष के समर्येक सान तो हैं किन्तु उसे सर्वथा सिद्ध ही कर देने बाले नहीं है अरः वे साधक-प्रमाण नहीं हैं]। ऐसा नहीं कि प्रतिपक्ष (Counterpart) का सर्वथा वाध होने पर ही निश्चय माना जाता हो, वह साधक और वाधक दोनों प्रकार के प्रमाणों के रहने पर भी माना जा सकता है। इसलिए संवेह दो अनिश्चित पक्षों पर निर्भर ज्ञान का नाम है जिसमें 'ऐसा है या कि ऐसा'-इस प्रकार के विकल्प का बोध होता है, और तर्क किसी एक पक्ष पर निर्मर ज्ञान का, जिसे शिथिल निश्चयात्मक कहा जा सकता है। यद्पि भ्रान्ति में निश्चय रहता है किन्तु उसमें निश्चय दृढ़ रहता है क्योंकि उसमें पक्षान्तर का ज्ञान नहीं रहता। संदेह में दृढ़ या शिथिल किसी भी प्रकार का निश्चय नहीं रहता इसलिए उसे संदेह हो माना जाता है और इसीलिए तर्क उससे प्रतीित: भिन्न है। यदि यह कहें कि-संदेह भी एकतरपक्ष पर निर्भर होता है जैसे [ अनेक कारणों में से किसी एक कारण की विशिष्ट कारणता का निश्चय कर चुका व्यक्ति कह-]'आखिर इस कार्य -का विशिष्ठ कारण कया है' [ इस कथन में विश्षिष्ट कारणता पर प्रश्न है अतः है तो वह संदिग्ध किन्तु वका किसी एक कारणभूत पदार्थ की विशिष्ट कारणता को मन में रख कर प्रश्न कर रहा है इसलिए उसका झुकाव उसी की ओर है अतः यह एकतर पक्षावलम्बी संशय है], तो चह नी ठीक नहीं, क्योंकि इस वाक्य में जो 'कः' इस प्रकार किमर्थक= 'कौन' अर्थे का वाचक पद है उससे एकतरपक्ष का अपनाया जाना सिद्ध नहीं हो पाता। और वाह्याली [ बुड़सवारी का
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मैदान अथवा वाहरी राजपय] देखने से जैसे पुरुषविशेष याद आते है वैसे स्थाणुविशेष नहीं, अत दोनों विशिष्ट वस्तुओं के स्मरण से जो सदेद हुआ उसकी अपेक्षा किसी एक विशिष्ट के स्मरण से हुआ तर्क अवन्य ही मिन्न है'-इत्यादि और भी बहुत मे ततत्व इन दोनों में अन्नर सिद्ध करते है जो अत्यन्त गहन है। उन सबको चर्चा प्रस्तुत प्रकरण में निरर्थक है अत उन्हें यहा नहीं दनलाया जा रहा। निष्कर्ष यह कि उक्त हेतुओं से मदेह और निश्चय के बीच का किन्तु इन दोनों से मिन्न [इन दोनों के बीच] मिसकु के समान लटका हुआ सभावनात्मक वोध अवश्य ही स्वीकार करना चाहिए।
विमर्शिनी एवमप्प निश्चयात्मकसंभावनापत्य यमू लत्वादुरपेघाय :: तस्य हि विपयनिगरण विषयिनिश्वयक्च स्वरूपम्। न चात्रैकमपि सभवति। विषयो- पादानाननिश्वयाभावाच्चेति। अगोच्यते-इह द्विघास्त्यध्यवसाय-स्वारसिक उरपादि- तक्। तन्र स्वारसिके विधयानवगम एव निमित्तम् तत्सामर्थ्यातस्वरसत एव विपयि प्रतीतेरुव्वासात्। न दयवगतशुक्तिकास्वरुपाय प्रमातुः कदाचिदपि रजतमिदमिति प्रत्य योतपाद स्यात्। इतस्त्र तु विषयमवगम्यापि तद्षम्त.कारेण प्रतिपत्ती स्वात्मपर- तन्त्नचिकत्पवलाद् विपयिप्रतिपत्तिमुर्पाद्येत्। जानान एव हि विपयिविचिक्तं विपयं तत्र प्रयोजनपरतया विपयिणमध्यवस्येत्। तत्राद्यो भ्रन्तिमदादिविषय । तत्र हि प्रमान्नन्तरगता स्वारसिक्षेव तथाविधा प्रतिपतिर्ववत्रानूद्यते न तूरपाद्यते। मदाहु .- 'प्रमानन्तरधीर्धान्तिरूपा यस्मिलनूदयते। स भ्रन्तिमान्' इति। स्वारसिक्सवं पुनरत् कविप्रतिभानिर्वतितमेचेएम्। अन्यथा दिभ्रान्तिमावं स्यादिति पूर्वमेवोक्कम। दतर- स्तूप्रेथाविषय । सच द्विविघ-सिद्ध: साध्यक्ष। सिद्धो यत्र विपयस्यानुपात्ततया निगीर्णत्वाद्ध्य वसितप्राधान्यम्। साध्यो यत्रेवाद्यपादानावसंभावनाप्रत्ययातमकवादविषयस्य निगीरयंमागत्वादध्यवसायक्रियाया एव प्राधान्यम्। अत एवाह-'व्यापारपाधान्य' इनि। अत एव चात कचिद्विपयानुपादानम् । वाच्योपयोग्यध्यवसायस्य साध्यमान वेनोप- क्रान्तरवात्। कचिच् विपयरयानुपादानेऽपि न सिदूखम्। दवाययपादानाव्विगीयमाण- तायाः प्राधान्यारसंभावनाप्रत्ययस्यैवोद्रेकाय। अ्षत एव चाय विषयस्य निगीर्यमाण स्वादारोपगर्भव्व न वाच्यम्। तम्न विपयस्य विपयितया प्रतीतिः ।इछ पुनविपयस्य निगीर्थमाणत्वेन विघमिण एव प्रतीति। ननु विषयनिगरणमध्यवसायरय लचषणम्। इद पुनर्विषयस्य निगीर्यमाणतेति कथमन्नाध्यवसायतेति चेतु, नैतत्। 'विषययन्त,कृतेऽन्य- स्मिन् सा स्यारसाध्यवसानिका' इत्याद्यवत्याध्यवसायस्य विपयिणा विषयस्यान्तकरणं उक्षणम्। तच्च विपयर्य निगरणेन निगीर्यमाणरवेन वा भवतीति न कश्विद्दि शेष । निगीयंमाणरवमपि पूर्वोक्तनीव्या विषयस्योपात्तस्यानुपात्तस्य वा मघतीत्यपि न कश्विद्विरेष । एव मिद्धेऽध्यवसायेऽ्यवमितप्राधान्यं साध्ये घ स्वरूपमाधान्यमिति सिद्धम्। एतच ग्रन्थक्देव विभज्यामे वष्यतीति तत एवावधायम्। यदेव साध्यव. सायस्य माध्यत्वं तदेव संभावनात्मकरवरम्। संभावना होकतरपक्षशिथिलीकारेण पचान्तर- दाडबॅन च प्रादुर्भरतीत्यस्या साध्याध्यव सायतुत्यकतत्वम्। तस्यापि विपयशिथिलीकारेण विषयि दाडघेन चोरपत्ते। अत एव विषयिगोऽपि शाब्देन वृत्तेन सत्यत्वम्। विपयिदाढयें नैव साध्याष्यवसायस्वरूपप्रादुर्भावाद। यदु्क मरन्विरेव 'संभावनाय च संभाव्यमानस्य दावर्याद्परस्य च शैषिक्यात्' इति। इछ संभाव्यमानस्य विपयिणो दाढर्यादय्न संशया-
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उत्प्रेक्षालङ्कार: १८७
हैलवण्यम् 1 तस्य ह्यनियतोभयांशावलम्बी किसिवििति विमर्शो लक्षणम् संभावना विषयस्थ च शैथिल्यानिश्वयादपि भेद:। विषये हि वाधकसव्वावादेकस्य शैथिल्येन वा साघकसव्भावाच्च पत्तान्तरस्य सिद्धि: स्यात्। अतिशयोकिव्व निश्चयात्मिकेति सतोऽस्या भेद:। यत्तु 'साध्यो यत्र विपयिणोऽसव्यतया प्रतीतिः' इृत्यादि अ्रन्धकृद्वच्यति तद् वस्तु- वृत्ताभि प्रायेणावगन्तव्यम्। सदेवं विषयस्य निगीर्यमाणत्वादिपविणश्र निश्यात्सिद्धमध्य वसाय मूळत्वमस्या इति यथोकमेव लक्षणं पर्यालोचिताभिधानम्। तस्माव 'इवादौ निश्वयाभावद्विपयर्य परिग्रहाद। क्वचविदध्यवसायेन नोतप्ेष्षापि तु संशयात ।' इस्याययुक्तमयुक्तमेवेत्यलं बहुना। [शंका] 'ऐसा होने पर भी [संभावना को संदेह से भिन्न मान लेने पर मी] उत्प्रेक्षा होती तो अनिश्चयात्मक संमावना-प्रतीति पर ही निर्भर, उसे अध्यवसायसूलक [अध्यवसाय पर निर्भर] क्यों वतलाया जा रहा है'। उस [अध्यवसाय] का स्वरूप तो 'विषय का निगरण= निगला जाना [ शब्दतः अकपन ] तथा [उसका ] विषयीरूप से निश्रय' होता है। यहाँ [उत्प्रेक्षा में ] इन दोनों में से एक मी नहीं है। यहाँ तो चलटे विषय का उपादान ही है और [विषयीरूप से उसके ] निश्चय का सभाव।'-[ समाधान] मस पर हमारा कहना है-'यहाँ अध्यवसाय दो प्रकार का होता है (१) स्वारसिक तथा (२) उत्पादित। इनमें से स्नारसिक अध्यवसाय में कारण रहता है विषय का सम्ञान ही कयोंकि उस [अक्षान] के आधार पर निपची की प्रतीवि स्वाभा- चिकरूप से ही हो जाती है। [ यथा शुक्ति में रजत की प्रतीति]। ऐसा नहीं देखा जाता कि जिस व्यक्ति को शुक्ति [सीप, छिपनी] का शुक्तिरूप से ज्ञान होता रहता हो उसे उसमें कभी भी यह प्रतीति होती हो कि 'यह रजत है'। किन्तु द्वितीय [उत्पादित ] अध्यवसाय में व्यक्ति विषय को जानता ही रहता है तब भो उसे छिपा देना चाहता है [ = अन्तःकार] और उस पर [वाह्य कारण के बिना भी ] केवल अपनी इच्छा से जनित विकल्प के द्वारा विपयी की प्रतीति ैदा करता है। वह विपय को निषयी से भिन्न समझता रहता है तथापि प्रयोजनविशेष से उस पर विपयी को अध्यवसित कर देता है। इनमें से प्रथम अध्यवसाय भ्रान्तिमान् आदि में होता है। उनमें [ पञ्चु-पक्षी जादि ] मन्य प्रमात व्यक्तियों में स्वभावतः हो रही वैसी [भ्रमपूर्ण] प्रतीति का नक्ता अनुवादमात्र करता है उसे उत्पन्न नहीं करता। जैसा कि कहा है-'अन्य प्रमाता का भ्रान्तिरुप ज्ान जहाँ अनूदित किया जाता है वह है आ्रान्तिमान्'[ ]।किन्तु यहाँ ओ स्वारसिकत्व है वह मो कवि- प्रतिमासंपादितत्वरूप ही है क्योंकि ऐसा न मानने पर [अर्थात स्वारसिकत्व को शुक्तिरजत दृषान के समान केवल लौकिक मानने पर] भ्रान्ति केवल त्रान्ति ही हो सकेगी भ्रान्तिमास् अलंकार नहीं। यह तथ्य पहिले हो स्पष्ट किया जा चुका है। दूसरा जो [उत्पादित] अध्यवसाय है वह उदपक्षा में होता है। वह भी दो प्रकार का होता है (१) सिद्ध तथा (२) साध्य। सिद्ध वह होता है जिसमें विषय उपात्त नहीं रहता, निगीर्ण (Under-stood) रहता है फलनः जिसने अभ्यवसित अर्ध (विधयी) ही प्रधान रहता है। इसके अतिरिक साध्य नहाँ होता है जहाँ 'इन' 'यथा' [अथवा मा्नो] आदि शब्द रहते हैं सतःज्ञान संभावनात्मक रहता है अतः विषय [शब्दतः उपात्त रहने पर भी] निगीर्ण ही रहता है और इसलिए जहाँ अध्यवसाय क्रिया की प्रधानता रहती है। इसीलिए लक्षण में ग्रन्धकार ने मी फेहा - 'व्यापार, की प्रधानता रहने पर'। [अभिनाय यह कि जहाँ विषय का उपादान रहता है इसलिए 'व' आदि
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शब्दों के प्रयोग के कारण बुद्धिधारा वहाँ अध्यवसायात्मक शन की ओर बहनी तो है किन्तु वह अध्यवसायात्मक ज्ञान में परिणत नहों हो पानी । अध्यवसायप्यत्नमात्र तक मीमिन रह जानी है। ] और इसीलिए कहीं कहों विषय का उपादान नहीं भी रहता। यह इसलिए कि यहाँ उमी अध्यवमाय को साध्यरूप मे प्रस्तुत किया जाता है जो वाच्योपयोगा होना है। किन्तु जहाँ कही विषय का उपादान नहीं मी रहना वहाँ अध्यवसाय सिद्ध अध्यवसाय नहीं होता क्योंकि वहाँ 'इव'-'मानो' आदि शब्दों का उपादान रहता है इमलिए निगीर्यमाणता प्रधान हो जानी है और समावनात्मक ज्ञान ही उद्रिक हो जाता है। और इमालिए क्योंकि यहाँ विषय नि्गार्यमाग रहता है उत्प्रेक्ष आरोपगर्मिन नहीं होती[ अनकाररत्ना ने आरोगर्मा ही माना है द० पृ० ४८]। आारोप में विषय की प्रतीनि विषयी रूप से होनी है। अध्यवसाय में विषय निगीर्यमाण होता है इमलिए केवल विषयी की ही प्रनोति होती है। यहाँ यह झका की जा सकनी है कि 'अध्यवसाय का स्वरप है विषय का निगरण [ अर्थात इसनें निगरण की ही प्रधानना रददती है। और यहाँ वनलायी जा रही है विषय की निगीये मागना [जिसमें निगरण अप्रधान है प्रधानना विषय की है] अत' इमे अध्यवमाय रूप कैसे माना जाय।' किन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि अध्यवसाय का स्वरूप है विषयी के द्वारा विषय का अपने मोनर छिपा लेना जैसा कि [ मम्मटभट्ट ने काव्यप्रराश द्वितीय प्रकाश में] कहा है 'साध्यनमाना लक्षगा वह होती है जिसमें विषय विषयी के द्वारा अन्तवन [=अपने मीतर छिपा हुआ] रहता है।' यह अन्न कृति चाहे विषय के निगरण से हा या विषय की निगौयमाना मे उसमें कोई अन्नर नहीं आना। निमीर्यमाणता भी उपाच विषय की भी होती है और अनुपात्त विषय की भी। इमलिए मनें भी कोई फरक नहीं पडना। इम प्रकार यह सिद्ध हुआ कि मिद्ध अध्यवसाय में प्रधानता अध्नवसिन (विषय) का रद्दनी है और साध्य अध्यवमाय में स्वय अध्यवमाय की ही। इसे स्वय ग्रन्थकार ही सलग-अलग करके ागे मलामाँनि बतलाऐंगे। अत इमे वहीं से समझ लेना चाहिए। हा। यहाँ जो अध्यवसाय की माव्यता है वही सभावनात्मकता होती है। संमावना जो है वह किसी एक पक्ष को शिथिन् करके और अन्य पक्ष को दृढ्ट करके ही हदोती है अन यह साध्य अध्यवमाय के बराबर होनी है। क्योंकि साध्य अध्यवमाय भी विषय को शिथिल कर विषयी की दृढता से निष्पन्न होता है। इसलिए विषयां भी शाब्दबोध में सत्य ही रदता है क्योंकि साध्य अध्यवसाय विषयी की दृढता से ही निपन होता है। जसा कि आपने भी [सलकाररत्नाकर के पृ० ४८ पर उलेक्षा प्रकरण में ही] कहा है-'संभावना में समाव्यमान [विषयी] की दृढना रहती है और विषय की शिथिलता।' यहाँ समाव्यमान विषयी की दृढता रहती है अनः यहों सशय से भिन्नता रहनी है। कर्योकि J सशय दो अनिश्चित अश पर निर्मर रहता है जिसका स्वरूप 'क्या'-'अथवा' इम प्रकार का विम्श होना है। इसी प्रकार मसावना-विषय को सिविलता के कारण यह विश्य से भी मिन्न रहता है। जहाँ निश्चय होता है वहाँ एक ओोर तो एक पक्ष हट जाता था शिथिल हो जाना है क्योंकि वाबक उनस्थित रहता है और दूमरी और दूसरे पक्ष की सिद्धि हो जाती है क्योंकि साथक मी टपरियन रहा करता है। अतिशयोकि निश्धवात्मिका होनो है इसलिए उससे मो यह [उन्पेक्षा ] मिन्न है। ग्रन्थकार जो यह कहेंगे कि 'वह साध्य होता है जिसमें विषयी की प्रनीति असत्य रूप से होनी है' वह वास्तविक स्थिति को मन में रखकर [न कि काश्पनिक अथवा प्रानिम स्थिति को ] येसा समझना चाहिए।
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इस प्रकार विषय के निगीयंमाण दोने तथा विषया का निश्चय होने से यही सिद्ध होता है कि यह उत्पेक्षा आध्यवसायमूलक है, इसतिए अ्न्थकारोक्त लक्षण ही सोच-समझकर चनाया गया लक्षण है- [पर्यालोचिताभिधान]। इस कारण अधिक क्या इतना कहना पर्याप है कि- 'उत्प्रेक्षा सर्वत्र संशय से ही होती है, अध्यवसाय से कही भी नहीं, क्योंकि इसमें 'इव'-आदि का प्रयोग रहता है, अतः निश्रय नहीं रहता तथा विषय का उपादान शब्दतः रहता है'- [अलंकाररन्ना० पृ० ५१] -- इत्यादि कथन सर्वथा युक्तिशून्य है। विमर्श :- विमर्शिनी के अनुपदोक्त विवेचन का आधार अलंकाररत्नाकर का पूर्वाद्धृत विवेचन से लगातार आगे का यह विवेचन है- 'न च 'एपा स्थली' इत्यादावशब्दत्वादेः मीनित्वादिना अध्यवसितत्वाद् निमित्तविषयोऽध्य वसाय' इति वाच्यम्। सर्वत निमित्तविपये अध्यवसायस्य सिद्धत्वेन साध्यत्वाभावानिमित्तापेक्षया चाध्यवसायाद्वीकारे उपमादीनामध्यवसाय एव लक्षण स्याद, तेन आरोपगर्भवेयम्। कचित्तु विघया तुपादान आरोपगभत्वाभावान्निश्वयरूपांशभावे अध्यवसायगभोत्पेक्षेति वाचोयुत्तिरुचितैव तद्गर्भ- सन्देह्वत्। विधयनिगरणाख्यस्य मुख्यस्य तदंशस्य सिद्धत्वास। संभावनायां च संभाव्यमानस्य दार्ढ्यांत अपरस्य च शैथिल्याद इह संभाव्यमानस्य विषयिणः शाब्देन वृत्तेन सत्यत्वं न त्वितरस्य। वस्तुतस्तु विषयिण: सत्यवातिशयोक्ती अपि नास्तीति तन्रापि विपयिण: सत्यतेति न वाच्य स्यान। अत एव सापहवायां विषयस्यैवासत्यत्वास् अपह्ववः अन्यथेतरस्यैव स्याद। इयं च धर्मी वा धर्म्यन्त- रत्वेनोत्रक्ष्यत धर्मो वा धर्मान्तरत्वेनेति प्रथमं दविभेदा। आदा शाव्दत्वार्थत्वनेदाद आरोपस्य द्विविभैव। द्वितीयामि धर्मरूपविषयोपादाने आरोपगर्भा। अन्र च प्रधानभूतधर्म्युमसर्जनात्मकविशेष- णीमूतानां वर्माणां परस्पर विशेष्यविश्येषणभावानुपपत्तौ सामानाधिकरण्याभावादार्थ एवारोपः। अनुपादाने तु अध्यवसायगर्मा। आरोपगर्मे तु भैदनये विपयापह्ववानपह्वाम्यां हैविध्यम्'। 'इवादौ निश्याभावाद विषयस्य परिग्रहात्। कचिदध्यवसायेन नोत्मेक्षापि तु संशयाद् ।' -इति संग्रह्दः । -ऐसा नहीं कह सकते कि 'एपा स्थली' पद्य में अशब्दत्व आदि मौनित्व आदि के द्वारा अध्यवसित हैं अतः यहाँ निमित्तविषयक अध्यवसाय है, क्योंकि एक तो जहाँजहाँ निमित के ऊपर अध्यवसाय होता है वहाँ अध्यवसाय सदा सिद्ध ही होता है, साध्य नहीं; दूसरे यदि निमित्त को लेकर अध्ययसाय मान लिया आवे तो उपमा आदि में भी अध्यवसाय को ही लक्षण मानना होगा। इस कारण उत्प्रेक्षा को आरोप से ही युक मानना चाहिए। हाँ, कहीं-कहीं जब विषय का कथन नहीं रहता वहाँ उत्प्रेक्षा को आरोप से युक्त नहीं माना जा सकता, साथ ही वहां निश्चयांश मी रहता है अतः वहीँ उत्प्रेक्षा को अध्यवसाय से युक्त माना जा सकता है, जैसे कि उसे संवेह से युक माना जाता है। यह इसलिए कि ऐसे स्थल में 'विषयनिगरण'- रूप उस [अध्यवसाय ] का मुख्य अंश सिद्धरूप से विद्यमान रहता है। किन्तु संभावना में संभाव्यमान ही दृढ़ बनाया जाता है और दूसरे को शिथिल कर दिया जाता है फळतः इसमें संभाव्यमान विषयी ही शब्दतः सत्य पनीत होता है, न कि दूसरा [विपय]। परमार्थतः तो सच यह है कि विपयी की सत्यता स्वयं अतिशयोक्ति में ही नहीं रहती [ जिसका प्राण ही है अध्यवसाय] इसलिए उप्रेक्षा में भी विषयी की सत्यता रहती है ऐसा नहीं कहना चाहिए। इसीलिए सापहवा उत्प्रेक्षा में विषय ही असत्य माना जाता है और उसी का अपहब स्वीकार किया जाता है। ऐसा न हो तो दूसरे [ विष्यी] का ही अपहब स्वीकार किया जाने लगे।
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१९० अलङ्कारसवेस्वम् यह [उत्मेक्षा] प्रधानरूप से दो प्रकार की दोती है। एक तो वड जिसमें धर्मी किसी अन्य धर्मों के रूप में उत्प्रेक्षित रहता है औौर दूसरी वह जिसमें धर्म किमी अन्य धर्म के रूप में। इनमें से प्रथम दो प्रकार की होनी है शाम्द और थारथ, क्योंकि सारोप भो दो ही प्रकार का होता है। दूसरो जो है वह भी धर्म का उपादान होने पर तो आरोपयुक होती है सौर यह आरोन आर्य ही होता है क्योंकि इममें प्रधान रहता है धमों और धर्मो में से सब उसी धर्मों के विशेषण के रूप में प्रयुक्त रहने है फत उनका परस्पर में देक्य नहीं हो पाता। और यदि विषय का दपादान नहीं रहता तो यही उत्पेक्षा अध्यवसाय से युक मान को जाती है। जो भेद आरोप से युकत होने हैं वे मी दो प्रकार के होत है सापहव तथा निरपदत। इस मपूर्ण विवेचन का सार यह है कि- 'उत्प्रेश्ष सवंत्र सरय से हो होती है, अध्यवसाय से कहीं भी नहीं, क्योंकि इसमें 'रत'-'मानों' आदि का प्रभोग रहता है। अत निश्चय नहीं रद पाता और विषय का उपादान सब्दव रहा करना है।' [अल० रत्ना० पृ० ४८, ५']। [सर्वस्व ] स च द्विविय-साध्य: सिद्धय्। साध्यो यत्र विपयिणोऽसत्यतया प्रतीतिः। असत्यत्वं व विषयिगतस्य धर्मस्य विषय उपनिवन्धे विपयि- संभवित्वेन विषयासंभवित्वेन च प्रतीतेः। धर्मो, गुणक्रियारूपः तस्य मंभ- चासंमवप्रतीती संमवाधयस्य तत्रापरमार्थतया असत्यत्वं प्रतीयते, इतरस्य तु परमार्थतया सत्यत्वम्। यम्यासत्यत्वं, तस्य सत्यत्वप्तीतावध्यवसायः साध्य:। अवव्व व्यापारमाधान्यम्। सिद्धो यध विषयिणो वस्तुतोऽसत्य- स्यापि सत्यवापतीतिः। सत्यत्वं व पूर्वकस्यासत्यत्वनिमिस्तस्याभावाव्। अतथ्ाध्यवसितपाधान्यम्। तत्र साध्यत्वप्रतीती व्यापारमाधान्येऽध्यव साय: संभावनमभिमानस्तर्क ऊछ उत्पेक्षेत्यादिशन्दैरच्यते। तदेवमप्कृतगत- गुणक्ियामिसंबन्वाद प्रकृतत्वेन प्रकृतस्य संभावनमुरमेक्षा। सा च चाच्या इवादिमि: प्रदश्यते। प्रतीयमानायां पुनरिवाद्यप्रयोगः। सा च जानिक्रिया- गुणद्ध्याणाम प्रकृतानामध्यवसेयत्वेन चतुर्ग। प्रकृतस्येतन्वेदयोगेऽपि न वैिज्यमिति न ने गणिताः। प्रत्येकं व भायामावाभिमानरूपतया दवैविध्येऽष- वितत्वम्। भेदाष्टकस्य च प्रत्येकं निमित्तस्य गुणकियारूपत्वे पोडश भेदाः। तेयां न प्रत्येकं निमितस्योपादानानुपादानास्यां छ्वार्मिशत्मेद, तेपुच प्रत्येकं द्वेतुस्वरूपफलोत्येक्षणरुपत्वेन षण्णवतिर्भेदाः । पपा गतिर्वा च्योत्प्रेक्षाया. 1 तव्नापि दव्यस्य प्रायः स्वरूपोत्पेक्षणमेवेवि हेतुफलो- त्पेक्षामेदास्नत, पातनीयाः। प्रतीयमानायास्तु यद्यप्युद्देशत पतावन्तो मेदा:, तथापि निमित्तस्यानुपादानं तस्या न संभवतीति तैभेदे-यूनो5यं प्रकार। इवादयनुपादाने निमित्तस्य चाकीर्तने उत्प्रेक्षणस्य निष्पमाण स्वाद्। प्रायश्च स्वरूपोत्प्रेक्षाया यथासंभवं भेदनिर्देशः।
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उत्प्रेक्षालङ्कार: १९१
पषा चार्थाप्रयापि धर्मविषये श्लिष्टशन्दद्वेतुका कनित्पदार्थान्वयवेला-
पारोपारोहकमे णोत्प्रेक्षायां पयवस्यति। क्वचिच्छलादिशब्दप्रयोगे साप-
[ वृo] वह [अध्यवसाय] दो प्रकार का होता है (१) सिद्ध और (२) साध्य । साध्य वह जिसमें विषयी असत्यरूप से भासित होता है। असत्यता इसलिए कि विषय में अस्तित्व दिखलाने पर विषयिगत धर्म की ऐसी प्रतीति होती है जिसमें वह विपयी में तो संभव प्रतीत होता है किन्तु विषय में असंभव। धर्म होता है गुणरूप और क्ियारूप। इसकी जो संभवात्मक और मसंभवात्मक प्रतीति होती है। उसमें संभवात्मक में धर्म अपारमार्यिक सर्थाद कात्पनिक और इसीलिए ससत्य प्रतीत होता है। ठक इसी प्रकार दूसरा पारमाथिक= वास्तविक और सत्य। अब जो असत्य होता है उसकी सत्यरूप से प्रतीति हो तो अध्यवसाय साध्य होता है। इसीलिए उसमें प्रधानता व्यापार की मानी जाती है। सिद्ध अध्यवसाय वह होता है जिसमें विषयी होता तो वस्तुतः असत्य है किन्तु उसमें प्रतीति होती है सत्यता की। यहाँ सत्यता का अर्थ है पूर्वपतीत असत्यलव प्रतिपादक हेतु का अभाव। इसीलिए इसमें प्रधानता मध्यवसित [ विषयी] की रद्ती है। इनमें जिस अध्यवसाय में साध्यता और व्यापारपधानता रहती है उसमें संभावनातत्व का कथन तर्क, ऊह, उत्पेक्षा आदि शब्दों से होता है। इस प्रकार अप्रकृतगत गुण और क्रिया के संबन्ध से अप्रकृतरूप से प्रकृत की संभावना उत्पेक्षा कहलाती है। यह जन वाच्य रहती है तब इवादि शब्दों का प्रयोग रहता है औौर जब प्रतीयमान तव इवादि का प्रयोग नहीं रहता। यह उत्प्रेक्षा चार प्रकार की होती है क्योकि इसमें जाति, किया, गुण और द्रव्य ये चार अप्रकृत अर्थ अध्यवसेय [संभाव्य] होते हैं। ये चारों भेद प्रकृत पदार्थ में भी हो सकते हैं किन्तु उनमें कोइं चमत्कार नहीं होता इसलिए उन्हें छोड़ दिया गया है। उत्प्रक्षा के ये चारों भेद भावरूप होते हैं और अमावरूप भी। अतः इनकी संख्या आठ हो जाती है। इन आठों भेदों में निमित्त गुणरूप होता है या क्रियारूप अतः सोलह हो जाते है। इन सभी भेदों में निमित्त दो प्रकार का होता है (१) उपात्त और (२, अनुपात्त। अतः ये दी १६ भेद ३२ हो जाने हैं। इन बत्तीसों नेदों में उप्रेक्षणीय पदार्थ के हेतुरूप, स्वरूप रूप तथा फलरूप होने से भेदों की संख्या छियान्नवे हो जाती है। यह संपूर्ण प्रपंच वाच्य उत्प्रेक्ष का है। इन मेदों में भी जो द्रव्योत्मेक्षा है उसमें उत्प्रेक्षा केवल स्वरूप की ही होती है, अतः उसमें से शेष दो हेतूतप्रेक्षा तथा फलोत्ेक्षा पर आशित भेद घटा दिए जाने चाहिए। परतीयमानोसेक्षा नें भी इतने भेद होते हैं किन्तु केवल नामतः क्योंकि उसमें निमित्त का उपादान नहीं रहता। अतः उत्प्रेक्षा के इस प्रकार में उतने मेदों की कमी आ जाती है क्योंकि 'इन' आदि का उपादान न होने तथा निमित्त का भी उल्लेख न रहने से उत्प्रेक्षा माननेका कोई आवार शेप नहीं रह जाता। इसके अतिरिक्त प्रायः इस उत्प्रेक्षा में स्वरूपोत्प्रेक्षा संभव नहीं होती इस प्रकार प्रतीयमान उत्प्रेक्षा के वे ही भेद वतलाए जाने चाहिए जो संभव हों। [ आागे उपसंहार विमर्श में ये सब भेद स्पष्ट कर दिए गए है।। यह [उत्प्रेक्षा] है तो अर्थालंकार अतः होना तो चाहिए इसका आधार केवल अर्थ ही तथापि इसमें जब कभी धर्म विपय दनता है तब इसका आधार श्लिष्ट शब्द मी बन जाता है। कहीं-कहीं साटटव्य का शब्दतः कथन रहता है अतः आरम्म में जहाँ पदार्थो का परस्पर में संबन्ध होता है वहाँ उपमा की ही प्रतीति होती है तथापि पर्ववसान उत्प्रेक्षा में ही होता है,
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कारण कि वाक्यार्थं का तात्पयें उसी में रहता है और इसका बोध होता दै यका [अभिमन्ता] की मानस प्रवृत्ि [व्यापार] की अन्तिम सीड़ी पर [बोदा के चिध्व द्वारा] चढने पर [उपारोह करने पर ]। कहीं यही उत्प्रेक्षा अपहब से भी युक होनी है जहाँ छल आदि शुब्दों का प्रयोग रहता है। इन कारणों से पूर्वोंक तथा आगे बड़े जाने वाले भेदों के आधार पर इस [उत्प्रेक्षा] के भेदों की सख्या अनन्त हो जाती है। चिमशिनी एनदेव व्याचष-विषयेत्यादिना। अभेदप्रतिपत्तिरिति विपयान्तकरणात्। संभावना प्रत्ययात्मकत्वेऽपि साध्याध्यवसायस्य वसवमिप्रायेण तह्लप्र्ण्य प्रदुर्शयितुमाह-साध्य इत्यादि। विषयपरिशोधनदवारेण प्रमाणनु्राहकतवावसंभावनाप्रत्ययश्य पुरुषेशानेन मचितव्य मित्यत्र वस्तुवृतेन पुरुपस्य सत्यध्वम्। इद पुनस्तत्र तस्य प्रयोजनपरतयाध्य वसीयमानरवात्सभाव नाविपये सभाध्यमानस्य वस्तुतो न सत्यत्वमित्याह-असत्यत्या प्रतीतिरिनि। अव्रैव निमित्तमाह-असत्यत्वं चेत्यादि। विषय उपनिबन्ध इति। तकतधर्मा- मेदेनाध्यवसित इत्यर्थः। अनेन सप्योजनख्वमेवोपोदलिनम्। धर्म इति विपयिगतः।स एव चोत्परेक्षणे निमित्तम्। नस्येति ध्मस्य।सभावनाश्रयस्येति विपयिण। तश्रेति संभाव- नाश्ये विपये। इतरस्येति असमवाश्रयस्य विषयस्य। वस्थेति विपयिण:। अतर्क्षेति। अध्यवसायस्य साध्यमानत्वात्। असत्यस्यापीति। वस्तुतो विषयिगस्तग्रासभवाद्। सत्य- ताप्रतीतिरिति। निश्चयस्वभावत्वादतिशयोमेः। असत्यत्वनिमित्तस्वरंति धर्मसचारादेः। अनक्वेति धर्मसारािगीयमाण्ताया प्राधान्याभावाद। अध्यवसितप्राधान्यमिति। विषय- रय निगीर्णत्वाद्विपयिण एव प्राधान्यमित्यर्थ। साध्यत्वमिद्धखवयोक्र समनन्नरमेव शवरुपमुपपादितमितीह न पुनरायसतम्। तंत्रेति दयनिर्धारणे। अध्यवसाय इश्यादि- शद्दरच्यत इति सबन्ध। पतदेवोपसंहरति-तदेवमित्यादि। मदाहु .- 'विपयिरवेन संभावनमुश्रेक्षा' द्दति। प्रनीयमानायामिति । इचाधयप्रयोगच्छव्दवानुक्ततवादुद्यायां न व्य
एवं वाच्या प्रतीयमाना चोस्पेक्षा भवतीत्यनुवादह्वारेण विधि। सा चेति । वैचित्र्यमिति। तस्य निगीर्यमाणववेनाप्राधान्यात्। प्रत्येकमिति जात्यादीनाम्। निमित्तस्येति धर्मस्य।
जीवितभूतमिति तदेव विश्वान्तिधामतया पश्चादुदिष्टम्। जात्यादिभेदगणनं पुनरवैचिन्या- वद्मपि चिरंतनानुरोधारकृतम्। अत एव ग्रम्थकृता प्रातिपद्येन नोदाहतम्। अस्माभिश्व नोदाहरिष्यते। एपेति। समनन्तरोका। तन्नापीति। सत्यामपि समनन्तरोदिष्टाया भेद- गणनायाम्। प्राय.शब्देन च हेतुफलयोः कुश्ापि समवोऽसतीति दर्शितम्। अन प्या- लंकारानुमारिण्यां ग्रन्थकृतानयोरपि संभवो दर्शिन। तदेव दव्यस्य हैतुफलयोः मभवे प्रागुक्तव सखया ज्यायसी। अन्थथा सवेतद्भेद्पोडशकस्याभावादशीतिर्मेदाः। अस्याश्व वध्यमागनीरया हेतुफलयोनिमित्तानुपादानासंभवाच्यतु पष्टिरेव मेदा समचरिति। एतादन्त इति पग्णवति। अय प्रकार इति। मतीयमानोतपेशलसणः। प्राय इति। वाच्या यथा स्वरूपोत्मेय लद्षेपु प्रचुरा तथेय न भवर्तात्यय। न पुनरत्यन्तमेवास्या अभारो व्याएपेय. । क्रचिदपि लचपेडस्या दष्टे। यथासंमवमिति लघये भेदनिर्देशा कार्यः। तस्या- शाष्टचरवारिशद्भेदा: संभवन्ति। तदुकमलंकारानुसारिण्याम्-'मतीय मानोममेदामेद्दा
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उत्प्रेक्षालह्वार: १९३
अष्टचत्वारिशत इति। अर्थाययापीति। अर्थाशयस्य यद्यपि शब्दहेतु करवं न क्वाप्युपयुक्तं तथापि श्लिष्टशब्दहेतकत्वमस्था: कचिह् चित्यमावहतीत्यर्थः। उपमा उत्पेष्षायां पर्यवस्य- तीति संबन्धः। आनन्त्यमिति बहुप्रकारतम्।
इसी [ उत्प्रेक्षासूत्र] की व्याख्या करते है-विषय-[निगरणेन ] इत्यादि के द्वारा। अभेदप्रतिपत्ति = अभेदप्रतीति क्योंकि विषय [ िपयी के ] भीतर छिप जाता है। (सिद्ध, अध्यवसाय के ही समान) साध्य अध्यवसाय भी संभावनाज्ञानात्मक होता है तयापि वस्तु ज्ञान के विषय की दृष्टि से उस [सिद्ध अध्यवसाय ] से इस [साध्यअध्य०] का भेद बतलाने के लिए लिखा-'साध्य' इत्यादि। जो संभावनाज्ञान प्रमाण=यथार्थज्ञान के कारण को [ यथार्थ- ज्ञान कराने में! सहायता देता है उस्षमें [स्भावना के ] विषय का विनेक निहित रहता है। िनेक का स्वरूप रहता है-[ पुरोवर्त्ती ] इस पदार्थ को [स्थाणु नहीं] पुरुप होना चाहिए यह। इसमें पुरुप की सत्यता वास्तविक होती है। [जहाँ तक साध्य अध्यवसाय का सम्बन्ध है] इसमें उस [पुरोवर्ती पदार्थ] पर इस [पुरुष] का मध्यवसाय प्रयोजनवशास् प्रतिपादित किया जाता है इसलिए संभावना के विषय पर संभाव्यमान वस्तु की वस्तुतः सत्यता नहीं रहती। इसी का प्रतिपादन करते हु लिखा-'असर्यतया' प्रतीतिः='असत्यरम से प्रतीति' इत्यादि। मसत्यता में कारण वतलाते हुए िन-'असत्यत्वं च'= 'और असत्यत्व'-इत्यादि। 'विषय उप- निवन्धः' = 'विषय में उपनिबन्ध' = अस्तित्व दिखलाना=अर्थात विपयगत धर्म का अभेद कर अध्यवसित करना। इससे सप्रयोजनत्व की पुष्टि की गई। धर्म अर्थात विर्षागत ध्में। उत्प्रेक्षा में निमित्त वहा चनता है। 'तत्य-उसका' अर्थात धर्म का। संमावनाशवस्व=रंभावना के नाश्रय अर्थाव विपयी का । तत्न = उसमें अर्थाव संभावनाश्रय विपय में। इतरस्य =अन्य का अर्थात असंभवाश्चय विषय का। यस्य=जिसका अर्थाद विपयी का। अतश्च=और इसलिए= क्योंकि अध्यवसाय साध्य है इसलिए। असत्यस्यापि वस्तुनः=व्तु के असत्य होने पर भी-क्योंकि विषया का अत्तित्व वहाँ वास्तविक नहीं कैवल कालपनिक होता है। सत्यत्षा- प्रतीति =क्योंकि अतिशयोकि निश्चय पर निर्भर रहती है। असत्यत्वनिमितस्य=असत्यत्व पर निर्भर=इसलिए कि इसमें [ अन्य के] धर्म का [अन्य में] संचार रहता है। अतश्व=और इसलिए=धर्मसंचार के कारण निगीर्यमाणता की प्रधानता न रहने के कारण 'अध्यवसित- प्राधान्यम्=अध्यवसित की प्रबानता= अर्थ यह कि विषय के निगीर्यमाण रहने से म्राधान्य विषयी का हो रहता है। साध्यत्व और सिद्धत्व का भेद अभी-अभी बतला ाए हैं, इसलिए अन्थकार ने उसके लिए पुनः यहाँ आयास नहीं किया। 'तम्र= उनमें' यह दोनों के क्षेत्र भलग- अलग करने के लिए लिखा। इसका संदन्ध है 'मध्यवास०00 इत्यादि शब्दों से कहा जाता है' इस अंश से। इसी का उपरुहार करते हुए लिखा-'तदेवम्-तो इस प्रकार'। जैसा कि कहा है 'विप- यित्वरूप से संभावन उत्दरक्षा-[अलंकाररत्नाकर]। 'प्रतीयमानायासू=प्रतीयमान उत्पेक्षा में' इवादि का प्रयोग न रहने से शब्दतः कथन न रहने के कारण उह्य= [अझा=तर्क =तदविपय] में, न कि व्यंग्य में, क्योंकि यहां प्रतिपादन अमीष्ट है अलंकारों के भेदों का, अतः यदि प्रतीवमान का अर्थ व्दंग्य किया गया तो वह अप्रस्तुत होगा। इस प्रकार 'उत्पेक्षा वाच्य और पतीयमान होती है-इस प्रकार उत्पेक्षा के वाच्यत्व और प्रतीयमानत्व का विधान इवादि के प्रयोगामयोग के विधान के द्वारा किया गया। 'सा च= और वह'। 'न वेचिन्यन्'='कोई वैचिनन्य=चमत्कार नहीं होता' क्योंकि वह [ विषय] निगीर्यमाण होने से अप्रधान रद्दता है। 'प्रत्येकन्-प्रत्येक का = जाति आदि में से प्रत्येक का। 'निमित्तस्य=निमित्त का' = धर्म का क्योंकि उसी के आधार १३ म० स०
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१९४ पर प्रकृत पर अप्कृत का उपनिबन्ध रहता है। 'हेतु, स्वरूप तथा फल' ये ही नीन नेद इस [उत्परेक्षा] के प्रधान मेद है इमलिए वे हो विशा न्निस्थान= वाश्यार्थपर्यनमान विषय है, अन पुन जो भेद किए उननें इन्दा तीन भेदों को दोहराया गया। चमत्कार तो जत्यादि भेदों की गगना में भी नहीं है तथापि प्राचीन आरकारिकों ने इनकी गगना की है इसलिए इन्दें यहाँ बनलाया गया है। इमीलिए ग्रन्थकार ने उनने में प्रत्येक का उदाहरण नहीं दिया, और इम मा प्रत्येक का उदाइरण नहीं देंगे। 'पथा= यह= अमी अमी कथित उत्पेक्षा। 'तनापिननने पर भी'-अर्थात अपरोक मेनगगना के रहने पर भी। पाय शम्द के प्रयोग से यह बनलाया कि उत्पेक्षा के इस प्रकार में हेनूतपेक्षा तथा फलेसपरेक्षा भी कहीं समव होती है। इसीहिए 'अलंकारानुमारिणी' में सन्थकार ने इन दोनों नेदों का भी सभव दिखलाया है। तो इम प्रकार द्रेव्योत्प्रेक्षा में भी हेतु और फन के समत्र होने मे वही मखया अधिक उपयुक्त है जो समी-अमी बतलाई गा है। नहीं तो उन सोलह भेदों की कमी हो जाने से उत्मेक्ष की कुल भेदगगना केवल अस्मी तक पहुँच सकेगो। इम उत्परेक्षा के सेवन चौसर भेद होते है क्योंकि इसमें होने वाली हेनुत्प्रेक्षा और फलीमेक्षा में, जैसा कि आगे बनलाया जाने वाला है, निमिच्तानुपादान समय नहीं होता। 'एनावन्त एव = इनने ही' हियानवे हा। 'अयं प्रकार =यह प्रकार' = प्रतीयमानो प्रेक्षारप प्रकार। 'ग्रायः'=अर्थ यह कि जिस प्रकार वाच्य स्वरूपोलमेक्षा के स्थल अधिक मिलने है उनने इम [प्रतोयमाना] के नहीं। यह नहीं कि इसके स्थल विलकुल ही नहीं मिलने। क्योंकि कहीं कहीं यह भी दिम्वाई देवी है। 'अथा- संभवम्=यथासमव = अर्याद लक्ष्य में जितने भेद हो सके उनने ही भेदों का निर्देश किया जाना चाहिए। मेसा करने पर इसके केवल ४८ भेद ही हाने हैं। जैसा कि 'अलकारानुसारिणी'- में कहा है-'प्रतीयमान उत्प्रक्षा के भैद ४८ ही होने हैं।' 'अर्थाशयापि= अर्ये पर आबित होने पर भी = जो सर्य पर आित था निर्मर रहता है उसमें शम्द्देतुकता कहों मी दवयुक्त नहों तथापि रसमें दिर्थ्शम्दहेतुकता भी कही कहीं चमत्कारकारिणी होती है। 'उपमा उल्पेक्षा में पर्यचसिन हो जाती है'-इस प्रकार की पदाथेयोजना यहाँ [ वचित पदार्थान्वय ० वाक्य में] विवक्षित है। 'आनन्यम् = अनन्नना' = प्रकारों की बहुनायन। [सर्चम्तर ] सामतं स्वियं दि्ावेणोदाहियते। तन् जात्युत्मरेक्षा यथा-
म्मरारेर्यो मूर्ध्नि ज्वलनकपिशो भाति निहधित। स्वन्मन्दाकिन्या: पतिदिवससिक्तेन पयसा कपालेनोन्मुक्त: स्फटिकधचलेनाङ्कर इघ ।।' अत्राद्गरशनवस्य जाति शब्दत्वाज्ातियत् पेक्ष्यते। [तृ०] अब इम [उतप्रेक्षा ] के दिन्दर्शन के लिए कनिषय उदाहरण प्रस्तुन किर जाते हैं। पहिले उक्त भेदों में से जात्युम्मेक्ष का उदाहरण, यथा- 'आपकी रक्षा वह चन्द करे, नवीन कमलककटी [बिसलना ] को नोंक सा कुटिल, कामारि [शिव] के माथे पर निदिन, अत एव [तृनीय-नेत्र की ] अग्नि से पीला होने से जो ऐमा लगना है जैसे [शिव के ही] निरन्नर वहनी मन्दाकिनी से प्रतिदिन सिक्त स्फटिकवल लबाट [कशल, न कि सप्पर ] से फूट पडा को्ई अंदुर हो।'
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-यहाँ अंकुरशब्द्र जातिवाचक शब्द है इसलिए उत्प्रेक्षा नाति की ही हो रही है। विमर्श :- संजीविनी के अनुसार यहाँ कुटिलतारूपी गुण कारण है। अंकुरशब्द जाति का वाचक है। इसलिर यह उत्प्रेक्षा उपात्तगुिमित्ता भावामिमानरपिंणी जात्युत्परेक्षा हुई। यहाँ स्वरपमात्र की उत्प्रेक्षा है, न हेतु की सौर न फल की, जब कि भेद प्रतिपादन में पहले हेतु की इतपेक्षा चतलाई गई है उसके बाद स्वरून की। इस प्रकार यहाँ गणनाक्रम का निरोध है। इससे चह सिद्ध होता है कि अन्य दो भेदों के वहाहरण देना अन्थकार को अभाष्ट नहीं है। यहाँ 'अलनकपिशों' के स्थान पर नि० सा० संस्करण और मोतीलाल वना संस्करण में 'स्चलनकपिशे छरा है। वामन की काव्यालंकारसूनवृत्ति तथा चित्रमोमासा में भी यही पाठ मिलता है। इस पाठ में इस विशेपण की 'मूर्धा' का विशेपण माना गया है। किन्तु 'चन्द्रकला' को अंहररूप से प्रतिपादित करने के लिए रसी में पीलापन वतलाया जाना उचित है। भाल के पीलेमन का यहाँ कोई उपयोग नहीं है। अतः हमने इसे 'अलनकपिशो' बना दिया है। इसी परकार 'कपाल़' का अर्थ शिव के गले को मुण्डमाला का कपाल या खप्पर करना भी गलत है क्योंकि गंगा द्वारा अभिषेक शिव के ललाट का ही प्रतिद्ध है, अन्य कपाल का नहीं। फिर सिर पर स्थित चन्दमा पर अंकुर की कल्पना करने के लिए उसका उत्पत्तिस्थान सिर के पास का ललाट ही माना जा सकता है गले में पड़ा मुण्ड अथवा हाथ में रखा खप्पर नहीं। यहाँ अंकुर के तीन धर्म, चन्द्रकला में बतलाए गए हैं-सफेदी, पीलापन तथा टेढापन। इसमें के सफेदी और टेड़ेपन के लिए उड़े कमलिनी की जढ़ से मिलाया गया है और पीलेपन के लिए ज्वलनकपिक चतलाया गया है। अंकुर मी सफेदा, पीलेपन तथा टेढ़ेपन से बुक रदता है। यहाँ निहित का अर्थ गड़ा हुआ करना व्यर्थे है। वद्यपि निहित, निधान, निमि आदि शब्द मूलतः गड़े हुए पदार्थ के ही ग्रतिपादक शब्द है। यहाँ निहित के स्थान पर विधृत भी कहा जा सकता है। बिस का अर्थ कमल की नाल नहीं कमल की जड़ होता है। डॉ वासुदेवशरणजी ने 'कादम्वरी : एक संस्कृतिक अव्ययन' में कमलककड़ी सर्वया उचित कहा है। नाल तो हरी होती है। इसी प्रकार अंकुर शब्द फल औौर पुष्प के हो उद्ेद के लिए प्रयु होता है, न कि नवीन पत्ते के लिए। तदर्थ 'किसलय' शब्द का प्रयोग होता है। फिर चन्द्रमा की सोलहबीं कला कोंपल के समान हो भी नहीं सकती। किसलय मी ललोई के लिए प्रसिद्ध होता है पोलेपन के लिए नहीं। इसमें वक्रता भी नहीं रहती। अंकुर सामान्यतः पीलेपन के लिए हो पसिद्ध होता है। सलोई के लिए बहुत कम। उसमें वकता भी अप्रसिद्ध नहीं। [सर्वस्व ] क्रियोत्प्रेक्षा यथा- 'लिम्पतीव तमोङ्गनि वर्षतीवाखनं नभः ॥' अत्र लैपनवर्षणक्रिये तमोनभोगतत्वेनोत्प्रेक्ष्येते। उत्तरार्धे तु असत्पुरुपसेवेव दप्टिर्निष्फलतां गता।।' इत्यन्रोपमैव नोतमेक्षा। गुणोत्पेक्षा यथा- 'सैपा स्थली यत्र विचिन्वता त्वां भ्रएटं मया नू पुरसेकमुर्व्याम्। अदृश्यत त्वच्चरणारविनद्विश्लेषदुःखादिव बद्धमौनम्।।' *
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१९६ अलद्कारसरवस्वम्
द्रव्योत्प्रेक्षा यधा- पातालमेत्तन्नय नोत्सचेन वितोक्य शून्यं मृगलाञ्छनेन। इहाङ्गनामि. स्वमुखच्छलेन कृताम्धरे चन्द्रमयीय सृष्टिः॥' अघ्र चन्द्रस्यैकत्वाद् दव्यत्यम्। पतानि भावाभिमाने उदाहरणानि। [वृत्ति ] क्रियोतमेक्षा यथा- 'अन्धकार अग अग को तीप सा रहा है। [आकाश कम्जलवृष्टि सो कर रहा ह।'-मृ्टकटिक ] -यहाँ तम और नभ [ रूपी धर्मी] में क्रेमश लेपनकिया तथा वर्षणक्रिया [रूी धर्म] की उत्मेक्षा की जा रही है। [इस पद्य के ]- 'दृष्टि यसत पुरुष की सेवा की नाई विफल हूो गर्य है।'- -इम उत्तरार्य में उपमा ही है, उत्पेक्षा नहीं। [ सामान्यन क्रियापद के साथ प्रयुक 'रव' पद उत्प्रेक्षावाचक होना है। उत्तरार्ध में वैसा नहीं है। वस्तुत 'र्पतीवाअन नभ'-में मी द्रव्यो- तप्रेक्षा ही है क्योंकि वहाँ कनर की ही उत्प्रेक्षा में कर्विसरम्म है।। गुगोत्म्रेक्षा यथा- "[ दे वैदेदि।] यह वद स्थल है जहाँ तुम्हें सोजने हुए मुझे भूमि पर पद्टा [दम्हारा] एक नूपुर दिसा था जो मानों तुम्हारे चरणारविन्द के वियोग के दुस से चुषी साधे था।' [रघुवद-११] -यहाँ [ जिसका उत्परेक्षा हो रही ह वह ] दुस गुण है। द्रव्योतमेदा यथा- 'इस पाताल को नेश्रोत्सन मृगाक से वान्य देख सुन्दर वनिताओं ने यहाँ अपने मुखों के वहाने आफाश में मानों चन्द्र ही चन्द्र की सृष्टि कर डाती है।'[श्रीरामचन्द्र दविवेदी ने इसके अनुवाद में एक तो आकाश को छोड दिया है दूसरे उनके अनुवाद में समावना का विषय सृष्टि मिद्ध होनी है, चन्द्र नहीं फलम वह क्रियोश्ेक्षा सिद्ध होनी ह दव्योत्तरेक्षा नही। -'यहाँ चन्द्रशब्द् इव्यनाचक है क्योंकि चन्द्रमा केवल एक ही होता है।' ये सब उदाहरण है मातात्मक [Fositive पदा्थों की ] उत्पेक्षा के। चिमर्शिनी सांप्रतमिति प्राप्तावसरम्। दिव्मात्रेणेति। अनेन जात्यादिभेदानामनवकत्तिर्ध्वनिता। व्रमोगतत्वेनेति। तमोगतव्यापनादिधर्मनिगर णेनेव्यर्थ। अव दि तममो धर्मिगोऽन्यधर्म- धर्मित्वं निगीर्यान्यधर्मधर्मित्वमनस्थापितमित्यम्र पन वद्याम। द्व्योत्प्रेक्षेनि। दव्यस्ष्य स्वरूपेणोमेपणम्। तस्यैव दि हेतूधेका यथा- 'जयति शिशिरतायाः कारणं साहिमा दे स्त्रपुरहरकिरीदादापतन्ती घुसिन्धु:। सतनसहनिवामी चीरसिन्धो: प्रसूतो दिमकर दय हेतु: शवत्यदैश्यस्य यस्या:।'
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उत्पेक्षालङ्कार:
अग्रेन्दोर्दव्यस्य हेर खेनोप्रेक्षणम्। फलोत्मेत्षा यथा- 'मध्येसलिळमादित्यसं मुखं धू लिघूसराः। कुमुदिन्यस्तपस्यन्ति चन्द्रायेव दिने दिने॥' अत्र चन्दुस्य दष्यरवम्। सुपामेव भावाभिमानोददाहर गत्वसतिदिशति-एता नीत्यादिना।
साम्प्रतम्= अव अवसर आ जाने पर। दिङ्मान्रेण=दिन्दर्शनमात्र, इससे यह संकेत दे दिया गया कि जाति आदि नेदों के अवान्तर भेदों के उदाहरण नहीं दिए जायेंगे। तमोग तत्वेन = तम में= अर्थ यह कि तमोगत व्यापन आदि धर्म के निगरण के द्वारा। हम यह अमी आगे चलकर चतलारेंगे कि तमरूपो धर्मी में अन्य भर्मे से युक्त होना छिपाकर [ निगीग कर] जन्य धर्म से युक्त होना ठहराया गया है। दव्योत्प्रेक्षा द्रव्य की अपने रूप से उत्परक्षा [स्रपो- तपेक्षा]। द्रन्य की ही हेतुरूप से उत्वेक्षा का उदाहरण- 'हिमादि में जो शिशिरता है उसका कारण है शिव के शिर से गिरती गंगा, जो [गंगा] मानों चन्द्रमा की सफेदी और शीतलता से सफेद और शीतल है क्योंकि वह चन्द्र सदा गंगा के समीप ही [हरजदाजूट में ] रहता है। वह [ स्व्यं सफेद इसलिए है कि वह] कीरसागर से उत्पप् हुआ है, उसकी किरणें शीवल होती हैं। - यहाँ जो द्रव्यरुप चन्द्रमा है उसकी हेतुलूप से उत्पेक्षा की जा रही है। द्रन्य की ही फल- रूप से उत्पेक्षा का उदाहरण यथा- 'कुमुदिनियाँ जो प्रतिदिन सूर्य की ओर मुँह करके और धूलि [-पराग-] धूसर होकर -पानी के वीच तप करती हैँ वह मानो चन्द्रमा के ही लिए। -चह चन्द्रमा द्रव्य है[ और उसे फलरूप से वतलाया गया है ]। इन्हीं उदाहरणों को भावाभिमान के उदाहरण बतलाते हुए लिखते है-एतानि। [सर्वस्व ] अभावाभिमाने यथा- 'कपोलफलकावस्याः कप्ं भूत्वा तथाविधौ। अपठ्यन्ताविवान्योन्यमीदक्षा क्षामता गतौ।।' अन्नापश्यन्ताविति क्रियाया अभावाभिमानः। एवं जात्यादावप्यूह्यम्। गुणस्य निमित्तत्वं यथा-'नवबिसलताकोटिकुटिलः इत्यत्रीदाहते फुटिलत्वस्य। क्रियाया यथा-'ईदक्षां सामतां गतौ' इत्यत्र क्षामतागम- नस्य। निमित्तोपादानस्यैते उदाहरणे। अनुपादाने 'लिम्पतीव तमोड़द्गानि' इत्यादयदाहरणम्। हेतूत्मेक्षा यथा- 'विश्लेपदुःखादि वद्धमौनम्' इत्यादौ। स्वरूपोत्मेक्षा यथा- 'कुबेरेसुछा दिशमुष्णरश्मौ गन्तुं प्रवृत्ते समयं विलङ्घ्य। दिग दक्षिणा गन्ववहं मुखेन व्यलीकनिःश्वासमिवोत्ससर्ज।'
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१९८ अलङ्कारसर्वस्वम्
फलोत्प्रेक्षा यथा- 'चोलस्य यन्द्रीतिपलायितस्य भालत्वचं कण्टफिनो वनान्ताः। अद्यापि किं धानुभविष्यतीति व्यपाटयन्द्रष्ट्रमिवाक्षराणि।' एवं वाच्योत्पेक्षाया उदाह्रणदिग दच्ता। प्रतीयमानोत्प्रेक्षा यथा- 'महिलासद्म्सभरिम तुद् दिअए सुद्दम सा समामंती। अणुदिणमणण्णअम्मा अंग तणुअवि तणुप ।'
एवं भेदान्तरेग्वपि घेयम्। [वृत्ि] अभाव [Negative पदार्थो की ] उत्परेक्षा यथा-'बटे मेद की बात है कि इस [पार्वती ] के वे, वेसे कपोल इस, ऐमी क्षामता [दुवलना] को प्राप्त हो गए। ऐमा कदाचिव इस लिए हुआ कि ये एक दूसरे को देख नहीं पा रहे है [ जैमे दो महांदर माई परस्पर के आत्यन्तिक वियोग से प्रेमवश सूख जाते है]। -यहाँ 'अपश्यन्तीन देस पाने'-इस प्रकार [दर्शन=] करिया के अभाव की उत्मेक्षा है। इमी प्रकार जाति आदि [की उत्प्रक्षाओं] में भी [अभाव के उदाहरण] समझे जा सकते हैं। [रतपरेक्षा का] निमित्त जहाँ गुण्रूप होता है ऐसा स्थल यथा-[ 'सव पाया- दिन्दु:०' पघ के-] 'ननविसलवाकोटिदुटिल नवीन कमल्ककटी की नौक सा कुटिल'- इस [अश्र] में [अमी अभी ] निर्दिष्ट कुरिलना। निमिच जहाँ क्रियारूप होता है चया-'इदक्षा क्षामना गनौ =ऐसी कशना को प्राप्त'-इस अंश में कृशता को भाप होना। उक्त दोनों ऐसे उदाहरण है जिनमें निमित्त का उपादान [ राम्दत, कथन] है। [ निमित्त के] अनुपादान के उदादरण है 'तम अग-अ्ग को लीप सा रहा है'-हत्यादि। हेतूत्येक्षा यथा-['सेपा स्थली यत्र०'-पद्य में-] "मानों वियोगदुग से चुप्पी साये'-इत्यादि में। 11 स्वरूपोरपेक्षा यथा-[ शिव के तपोधन में सहसा वसन्त ऋतु के आरम्भ होने गने पर] सूर्ये, जत्र समय [दक्षिणायन काल तथा निश्चित मिलनकाल] का उतलवन कर कुदेरसेविन [नतर] दिशा की ओर चलने रगा तो दक्षिणदिय्ा ने अपने मुख [ दिगन्नभाग तथा सुँहू ] से
संभव सगे-३] मठयभारत छोटना गुरू किया, मानों वह उसकी विपियजनित उसॉम हो। [कुमार'
फलोतमेक्षा यथा- 'जिसके मय से भागे चोलदेशाधिप के माल की त्चा को कॉरेदार जगल मानो यह देखने के लिए फाड रद थे कि 'अव इसे और क्या भोगना है'। इस प्रकार वाच्य उत्प्रेक्षा के उदादरणों का दिग्दर्शन किया।
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उत्प्ेक्षालङ्कार: १९९
प्रतीयमान उत्प्रेक्षा के उदाहरण ये है- 'महिलासहत्त्रभरिते तव हृदये सुभग सा अमान्ती। अनुदिनमनन्यकर्मा अङ्ग तनकमपि तनयति॥' -'हे सुभग [सन्दरियों के प्रेमपात्र]! वह बेचारी सहस्रों महिलाओं से भरे सुम्हार हृदय में जगह नहीं पा सक रही है, अतः वह औौर कुछ नहीं करती, केवल अपनी स्वमावतः दुबली काया को और भी दुबली बनाती जा रही है।' यहाँ 'जगह नहीं पा सक रही है' इसे काया को दुबली बनाने में हेतुरूप से उत्प्रेक्षित किया जा रहा है अर्थोव 'मानो सुन्हारे हृदय में स्थान न पा सकने से वह अपनी स्वतः दुबली काया को और भी दुबली करती जा रही हैं।' इसी प्रकार अन्य मेदों में भी समकझ लेना चाहिए' चिमर्शिनी अभ्यूह्यमिति अभावामिमानोदाहरणम्। निमित्तोपादानस्येति। कुटिलत्वस्य घामता गमनत्य च साक्षाननिर्देशात। अनुपादान इति। तिरोधायकत्वादेनिमितरय गम्यमान- दवात्। भेदानतरेप्विति स्वरूपफलादिकेपु। नेयमिति प्रतीयमानरवाद। तन्न स्वरूपो- छेक्षा यथा-
विध्याइह चलकिसलजकराहि साहाहि महुलच्छी॥' अत्र मधुलचमीमतरवेन चलकिसल्य करतादि निगीर्य व्याहरणक्रिया स्वरूपेणोलेप्षि ता। तदौंनमुख्योतपाद कत्वादि च निमित्तमनुपात्तम। यत्पुनरुद्देशे प्रतीयमानोत्प्रेत्षायां नि- मित्तानुपादानं न संभवतीत्युक्तं तन्र आ्रयस्तरयाः स्वरूपोतप्रेक्षणस्यासंभवो निमित्तम्। अन्थकृतो हि प्रतीयमानोहोत्षा हेतुफलरूपैव भवतीत्यभिन्ाय:। हेतुफलोहोक्षणयोक्ष चध्यमाणनीत्या निमित्तानुपादानं न संभवतीणशयेनैतटुककम। तेन प्रतीयमानापि स्व- रूपोत्प्रंका निमित्तोपादानानुपादानान्यामेव भवति। तत्र निमित्तानुपादाने उदाहता। उपादाने तु यधा- 'प्रसारि सर्वतो विश्वं तिरोदधदिदं तमः। सर्वाङ्ग लिम्पति जनं सान्द्रैरसृतकूर्चक:॥' अत्र प्रसारित्वादि निगीर्य तमागतत्वेन लेपनक्रिया स्वरूपेणोत्प्रेक्षिता तिरोधाय- कत्वादि च निमित्तम्। 'तुरीयो ह्वेप मेप्योऽग्निराग्नायः पञ्जमोऽपि वा। अपि वा जक्षमं तीर्ध धर्मो वा सूर्तिसंचरा।।' इत्यादो तु वामनमते विशेषोकि :- 'भूतलकातिकेयः' इतिवव। ग्रन्थकन्मते तु दृढा- रोपं रूपकम् । यद्वचयति-या व्वेकहानिकत्पनायां साम्यदाढर्य विशेषोकिरिति विशेषोकिर्ळक्षिता सास्मदर्शने रूपकभेद एवेति। अत पनान्र तत्सामग्रयभावा- दुमेशोदाहरणत्वं न वाच्यम् । एवंम् 'अपरः पाकशासनो राजा' दृत्यनापि दृढारोपमेव रूपकमू। एतच्चालंकारा मुसारिण्यामुतेत्षाविचारे अन्थकृतैव दर्शितम्। फलोपेक्षा यथा- 'गिज्जते मगलगाहिआहि वरगोत्तदत्तकण्णाए। सोतुं विणिमाओ उअह होतबहुआहि रोमंचो।' अन्न श्रोतुमित्रेति फलमुपप्रेक्षितम।
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२०० सलद्वारसर्वस्यम्
'सम्यूद्यम् = समझ लेना कलपना का लेना चाहिए'-अर्थात् ममावातमक उत्प्रेक्ष की। 'निमित्तोपादानस्य निमित्त के उनादान के' [उदाहरण, इमलिए कि=उक्त उदाइरणों में] बुटिरता सौर क्षामता को प्राप्त होना इन दोनों का सालाद शम्दत निर्दश है, 'अनुपादान= निमित्त का उपादान न रहने पर क्योंकि, लिम्पनीन तमोडानि० आदि में ] निनितभन जो निरोधायकत्वादि धर्म हैं वे प्रतीयमान है। 'मेदान्तरेषु = अन्य मेदों में' = स्वरूपोशरेक्षा फलोतपरेक्षा आदि भेदों में। 'शेयम् = जानना चाहिए'-क्योंकि उनमें भी उन्नेक्षा मतीयमान ही होनी है। इनमें स्वरूपोतप्रेक्षा यथा- 'मळयसमीर सनागम-मनोष-पाठचराभि सवंत्र । विन्याहरति चलकिमन्यरुरामि शामाभिर्मेुलक्ष्मी ॥ -'मधुलक्ष्मी मलयपवन के समागम के सनोप को खुरा लेने वाला किमलयों के चचल हाथों वाली शाखाओं से जहाँ तहाँ, सब कहीं बोल रही है।' -यहाँ मधुलक्ष्मी में चलकिमळ्यकरत्व का निगरण कर व्याहरण=वोटना=क्रिया के स्वरूप की उत्पेक्षा है। इसमें कारग है तमकी ओर उन्मुसता वस्पन्न करना आदि। वड़ अनुपास है। उतपेक्षा गिनाते समय यह जो कहा है कि 'पतीयमान उत्पेक्षा में निमित्त का अनुपादान संभव नहीं होता' इसका कारण यह है कि इस प्रतीयमान उतप्रेक्षा में प्राय स्वरूप की उत्पेक्षा समव नहीं होती। ग्रन्थकार का अभिप्राय यह है कि मतीयमान उत्क्षा केवल हेनुतप्रेक्ारूप और फलो- सप्रेक्षारूप हो होती है। अर्थात उक्त कथन का अभिप्राय यह है कि हेतुत्प्रेक्षा और फलोहेक्षा में भागे वतलाए क्रम से निमित्त का अनुपादान समव नहीं छोता। इसका निष्कर्य यह निकला कि स्वरूपोध्पेक्षा प्रतीयमान दोने पर मी दो प्रकार की होती है। एक वह जिसमें निमित्त का उपादान रददता है और दूसरी वह जिसमें नहीं रइता। दोनों में से निमिच के अनुपादान से होने वाली स्वरूपोधेक्षा का उदाहरण दे दिया गया है। उपादान में होने वाली स्वरूपोत्पेक्षा का उवाहरण यह है- 'यह अन्धकार सब और फैल रहा है और विशव भर को छिपाता जा रहा है। यह म्रत्येक व्यक्ति के अंग अग को अमृत की मनी कूचियों से लीपता जा रहा है। -नयहाँ प्रसारित्व= फैलने वाला होना निगल कर लेपन किया के स्रूप की अन्धकार के अपर उत्प्रेक्षा की जा रही है। उसमें निमित है तिरोवायकत्वादि [जो कि शब्दतः कथषिन = उपाच है]। 'यद [आवइनीय, दीक्षणीय तथा गाईपत्य इन तोन यशाग्नियों से भिन्न ] वतुर्थ यज्ञाग्नि है अथवा पाँचवा वेद है, अथदा चनता फिरता तीर्थ है या तो मूर्त्तिमान् होकर घूमना फिरता धर्म है।' -इत्यादि में [काव्यालंकार सुत्रकार ] वामन के अनुमार विशेषोक्ति अलकार है जैमे 'भूत- रका ततिंकेय = पृथिवी पर उतरा स्कं्द या कार्त्तिकमास अथवा कार्चिक पूर्णिमा का चन्द्र-'इम स्थष में माना जाता है। ग्रन्थकार के मन में यहाँ दूढारोप रूपक ही है। जैसा कि आगे चल्कर कहेंगे- 'विशेषोति का 'एक [शुग की ] हानि कव्तत कर साम्य की दृढ़ता विशेधोकि होनी है'-यह जो वक्षा [ वामन ने ] किया है, यह हमारे अनुसार मक का ही एक भेद है। इमीलिए इसे उत्प्ेक्षा का उदाहरण नहीं माना जा सकता क्योंकि यहाँ उत्परेक्षा की सामग्री नहीं है। इसी प्रकार 'यह राजा दूसरा इन्द्र है'-यहाँ मी दृढारोप रूपक ही मान्य है। यह सब अल्कारानुसारिणी में उत्प्रेक्षा पर विचार करने समय स्वय अन्थकार ने ही प्रतिभादित किया है।
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उत्प्रेक्षालहार: २०१
फलोसप्रेक्षा वथा-
श्रोतुं विनिर्गत: पश्यत मविष्यद्वस्तरा दि रोभांच: ॥ गृहकर्म के वाद मंगलग्राहिकाओं द्वारा लिए गये वर के नाम पर दत्तकर्णा भविष्य वधू का रोमांच देसो जो मा्नो [उसी नाम को] सुनने के लिए निकली है। -- यहाँ 'मानो सुनने से लिए' इस प्रकार फल की उत्प्रेक्षा की गई है। [ सर्वस्व ]
'अनन्यसामान्यतया प्रसिद्धत्त्यागीति गीतो जगतीतले यः । अभूद हंपूर्विकया गतानामतीव भूमि: स्मरमार्गणानाम्।' अत्र धर्मविपये मार्गणशच्द: श्लिए्:। [वृत्ति ] रिलष्टशन्दहेतुक [उत्प्रेक्षा ] यथा- "अन्य [त्यागियों ] जैसा [कुद्र ] न होने से 'प्रसिद्ध त्यागी, प्रसिद्ध त्यागी' इस प्रकार गाया जाने वाला जो काम के होढ़ लगाकर पहुँचने वाले मागणे [ बाण तथा याचकों] का बहुत ही अधिक लक्ष्य बना हुआ था।" -यहाँ [वर्णनीय व्यक्ति में मार्गण अर्थोव याचकस्वरूप कामवाणों का विषय वनना ] धर्मे उत्प्रेक्षित किया जा रहा है तद्वाचकशब्द 'मार्गण' यहाँ [याचक तथा चाण इन दो अर्थो का प्रतिपादक होने से ] रलिष है। विमर्शिनी स्लिष्ट इत्यथिशरवाचकर्वात्। हिलष्ट इसलिए कि वह [मार्गण शब्द् ] याचक तथा वाण दोनों अर्थो का वाचक है। [सर्वेस्व ] उपमोपक्रमोव्मेक्षा यथा- 'कस्तूरीतिलकन्ति भालफलके देव्या मुखाम्मोरुहे रोलम्वन्ति तमालवालमुकुलोत्तसन्तिशौलावपि। या: कर्णे विकचोत्पलन्ति कुचयोरक्के च कालागुरु- स्थासन्ति प्रथयन्तु तास्तव शिवं श्रीकण्ठकण्ठत्विषः ।' अन्र यद्यपि 'सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विप' इत्युपमानात्किन्निघायामुखे उप- माप्रतीतिस्तथाप्युपमानस्य प्रकृते संभवौचित्यात्संभावनोत्थाने उत्पेक्षायां पर्यवसानम्। यथा वा विरहवणंने 'केयूरायितमङ्गदैः' इत्यादौ। पपापि समस्तोपमाप्रतिपादकविपयेऽपि हर्पचरितवार्तिक साहित्यमीमांसार्या प्ेपु तेपु प्रदेशेपदाहता, इद्ध तु ग्रन्थविस्तरभयान प्रपश्चिता। [वृ० ] ऐसी उत्ग्रेक्षा का उदाहरण जिसके आरम्भ में उपमा प्रतीत हो-'नीलकण्ठ भगवान् शिव के कण्ठ की वे किरणें आपकी कल्याणवृद्धि करे जो भगवती पार्वती के ललाट पट्ट पर कस्तूरी
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२०२ मलङ्भारसवस्थम्
तिल्क का काम करती है, उनके मुग कमल पर अमर का, सिर पर तमाल को नन्ही नन्ही फटियों के उत्तस का, कान में सिले हुए नीलकमल का और ओचर के ऊपर काले अगर के यापे का।' -यहाँ यद्यवि आरम्मिक वाक्यार्थप्रतीति में प्रतोत होती है उपमाः क्योंकि कस्तुरीतिळकन्ति आदि नामधातु पदों में प्रकृतिरूप से प्रयुक्त 'कस्तूरीतिलक' आदि नामनव्द तमी करियाशब्द बनने है जब वे उपमानारथेंक होते हैं, एदर्थ पाणिनिव्याकरण के नियम 'सभो मातिपदिकों से किप [वार्तिक ३१।११] के अनुसार उनमें किपू प्रत्यय लगता है और वह लगना है केवल उपमानार्थिक शब्द के साथ ही, तथापि अन्निम वाक्यार्थ प्रतीति में प्रतीन होनो है उत्प्रक्षा ही, क्योंकि [इस वाक्यार्थे में आए] कसूरीतिलक आदि उपमानों का इमी प्रसग में वर्णित ललाट आदि में होना भी समन है, अन यहाँ [उत्पेक्षा का बीज] संभावना उढ सही होती है। [अलकाररत्नाकरकारने यहाँ परिणामगर्मोपमा मानी है] और जैसे विरदवर्गन में 'अंगर्दो ने केयूर का काम किया' इत्यादि स्थलों में [ देखा जाता है।। [उन्प्रेक्षा के आरम्भ में प्रतीत होने वाली] यह उपमोपकमोतप्रेक्षा वहाँ भी होनी है जहां उपमा का प्रतिपादक शब्द भी विद्यमान रहता है किन्तु समास में। इसके उदाहरण दर्षचरित वार्चिक और साहित्यमीमामा में तो उन उन स्थनों में अनेक बार प्रस्तुन किए है, किन्तु यहाँ विस्तारपूर्वक विवेचन नहीं किया केवल ग्रन्थविस्तार के भय से [टीकाकार ने उदादरण दे दिया है ]। विमर्शिनी आमुख इनि न पुन पर्यचसाने। उपमापनीतिरिति। तदर्थमेव कविप प्रृत्ते। अत पुवाव वाधकाभावाघ्योतपेक्षार्वमिति न वाच्यम्। नहि वाचकसमवासभवमात्रमेवालका- राणा भावाभावप्रयोजकम्। एवं हि व्याजस्तुती निन्दादेवा्यरवेऽ्यवाच्यस्य स्तु्यादे परनीतिरलंकारवपर्यंवसायिनी न स्यात। तरमाद्ववयार्थ एन पररुदोऽलंक्ाराणा सवरूप- प्रतिष्टापकं प्रमाणम्। वाक्यार्थस्य च पदार्थान्वयवेलातोऽवैव प्रतिपत्ति। ममवौचित्या- दिति। कस्तूरीतिल कादेविषयिणो भालफलकादी संभवे यथीचित्यं न तथा कण्डश्विढादे- विपयस्येरयथः। अत एवाश्रेपमाया प्रकनस्थाप्नवृतकस्तूरीतिल कादिरूपतया परिणामा- स्परिणामगर्भतवं यदन्यैरु्वतं तत्तेषा परिणामस्वरूमानमिज्ञत्वम्। न व्ीचित्यमेव तस्य स्वरूपं कि तु ययोक्तं प्रकृतोपयोगिस्वम। औचित्यं घ नोक्ेपाया विरुदम। तस्य सवं- स्रैव भावात। उत्प्रक्षार्यां पर्यवसानमिति'। कण्टव्वियामेव कसतूरीतिलकश्वादिप्रतीतेविप- यिणो विपयनिगरणैनाभेदुप्रतिपते साहरयावगमाभान्नात। साहरयं हाभयनिष्टम्। न * चात्र प्रकुताप्न: तयो: संश्पधितया भतीति। यथा वैर्यनेनास्या लचये प्राचुर्य दशितम। समस्तोपमाप्नतिपादकविपये हश्यमाना। सा तु यया- स दण्डपादो भवदण्डपादमुत्खण्डयन्रप्ततु चक्टिकाया.। यस्येन्दुलेखा पुरत' स्फुरन्ती तु्यत्तुलाकोटितुद्ामुपेति। अम्र सत्यपि तुलाशब्दे चन्द्रलेखाया एव तुलाकोटिर्व पतीतेरेक्षास्म। आमुख =आरम्भ में अर्थात पर्यव्मान=अम्त में नहीं। उपमामतीति क्योंकि किप प्रत्यय होता है उसी अर्थ में है। इसलिए यह कथन कि 'यहाँ वाचक नहीं है अत. उन्दक्षा नहीं हो सफती, ठीक नहीं। वाचक का होना था न होना मात्र अळ्कारों के होने या न होने में कारण
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उत्प्रेक्षालह्कार: २०३
नहीं माना जाता। चदि ऐसा माना जाय तो व्यानस्तुति में निन्दा या स्तुति के किसी एक पक्ष के वाच्च रहने पर भी तद्विरुद्ध रतुति या निन्दा का द्वितीय पक्ष अवाच्य रहता है और उस [द्वितीय पक्ष] का कान दी वहाँ अलंकाररूप में पर्यवसित होता हुआ माना जाता है, वह संमव न होगा। इसलिए निम्यन्न वाक्यार्थ को ही अलंकारों के स्वरूप का प्रतिष्ठापक प्रमाण मानना सचित है। जहाँ तक वात्यार्थद्ञान का सन्वन्ध है उसका स्वरूप पदार्थों के सग्बन्ध के समय होने वाले ज्वान से भिन्न ही होता है। संभवौचित्यात् अर्थ यह कि जितना औचित्व कस्तूरीतिलक आदि विषयी के ललाटपट्ट आदि में संभव होने में है उतना कण्ठकान्ति मयादि विषय के संमन्न दोन में नहीं। और इसीलिए [अलंकाररत्नाकरकार आदि ] अन्य आलकारिकों ने जो इस पद्म में उपमा मानी है और उसे मी जो प्रकृत कण्ठकान्ति को अप्रकृत कस्तूरातिलक आदि रुप से परिणत मान परिणामगमिंत उपमा वतलाई है वह उनने अपना परिणाम के सरूप का अज्ञान ही जाहिर किया है। केबल औौचित्य से ही परिणामालंकार निप्पन्न नहीं होता, उसकी निष्पत्ति प्रकृतोपयोग से होती है। और केवल मचित्य उत्प्रेक्षा में विरोधी नहीं होता, क्योंकि वह तो समत्र हो रहता है। उत्परेवायां पयवसानम्=उत्प्रेक्षा में पर्यवसान अर्थात वहां कण्ठकान्ति कस्तूरीतिलक आदि के अमिन्न प्रतीत होती है; इसलिए क्योंकि यहां विषया विषय से अभिववरूप से प्रतीत होता है लर्थात वह विषय को अपने आप में निगले रहता है फलतः [उपमा का बीज] सादश्व यहाँ पर्यवसान में प्रतीत नहीं होना। सादृश्य जो है वह सदा दो में रहता है और इस पद्य में प्रकृत और नप्रकृत अलग मलग बरावरी के साथ प्रतीत नहीं हो रहे है। [दोनों में समेद प्रतीत हो रहा है। दोनों अलग प्रतीन होते तो उनमें सादृशय बनता ]। [यहां अदंकाररत्नाकरकार ने परिणाममुखी उपना की सिदधि कर सपटन 'रुपक्लुखी उत्प्रेक्षा का किया है, उपमामुखी उतपेक्षा का नहीं। कदाचित अ रत्नाकरकार को सर्वस्व की कोई ऐसी प्रति मिली होगी जिसमें उपमा की जगह रूपक पाठ होगा।] 'यथा बा= और जैसे' इस प्रकार एक और वदाहरण देकर यह बतलाया कि यह उपमानुखी उत्प्रेक्षा कान्यों में पर्यास्त मात्रा में मिलती है। एपा = यह अर्थात समस्तोपनाप्रतिपादक विषय में अर्थात ऐसे स्थलों में जहां उपमा का प्रतिपादक शब्द रहता है और समास में रहता है, दिखाई देने वाली। वदाहरण- उसका उदाहरण-'मगवान् शंकर के दण्दपाद [नृत्य में पीछे पीठ की ओर से जाकर सि की और ऊपर उठाए गए पैर] से बाजी मार ले जाने बाला मगवती पार्वती का दण्डपाद [हम सवकी ] रक्षा करे जिसके सामने चनकनी [भगवती पार्वती के जूड़े पर बेधी ] चन्द्रलेखा दट्ते नुपुर की तुलना प्राप्त कर लेती है'। इस पद्य में [उपना के प्रतिपादक] 'तुला'-शब्द का [समास के भीतर ] प्रयोग है तब भी चन्द्रलेखा में नूपुरत्व की संभावनामूलक प्रतीति होने के कारण यहाँ उपेक्षा है। [सर्वस्त्र ] सापह्नवोत्प्रेक्षा यथा- 'गतासु तीरं तिमिघट्टनेन ससंभ्रमं पौरविलासिनीपु। यत्रोल्लसत्फेनततिच्छलेन मुक्ताद्टहासेव विभाति सिप्ना।,' अनेवशन्दमादात्म्यात्संभावनं छलशब्दप्रयोगाच्चापहवो गम्यते। पवं
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२०४ अलङ्गारसर्वस्वम्
छद्मादिशब्दप्तयोगेऽपि झेयम्। 'अपर इव पाकशासनः इत्यादावपरशव्दा- प्रयोगे उपमैवेयम्। तत्प्रयोगे तु प्रकृतम्य राज्ञ: पाकशासनत्वप्रतीतावध्य- वसायसंभवादिवशव्देन च तम्य साध्यत्वप्रतीतेसत्मेक्षैवेयम। इवशन्दा- प्रयोगे सिद्धत्वाद्ध्यवसायस्यातिशयोक्ति:। इयापरशव्दयोरप्रयोगे तु रूपकम्। तदेवं प्रकारवेचित्र्येणावस्थिताया उत्प्रेक्षाया हेतूत्प्रेक्षायां यस्य प्रकृतसबन्धिनो धर्मम्य द्वेतुरुम्प्रेक्ष्यते स धर्मोऽध्यवसायवशादभिन्न उत्प्रेक्षायां निमित्तत्वेनाथीयते। स च वाच्य एव नियमेन भवति। अभ्यथा कं प्रति ह्वेतु: म्यात्। यथा-'अपद्यन्ताविवान्योन्यम्' इत्यादौ। अन्न कपो- लयोः प्रकृतयो: संघन्धित्वेनोपात्तस्य क्षामतागमनस्य हेतुरदशनमुत्प्ेक्षि- तम्। द्वेतुफलटं च क्षामतागमनं तत्न निमित्तम्। एवम् 'अदृश्यत त्वच्चरणार- बिनदविश्लेषटु.खादिव बद्धमौनम्' इत्यन्न नू पुरगतस्य मौनित्वस्य ह्वेतु- र्दुःखित्वम्। तदुत्मेक्षणे मौनित्वमेव निमितं श्षेयम्। एवं सर्वत्र। 'अपछ्षव से युक्त उत्प्रेक्षा यया- 'बदा उछलती फेनराजि के बहाने सिप्रा अटटदाम विसेरती-सी प्रतीत होती है जब नगर- बनिताँ [स्नान के समय ] मछली के टकरा जाने से घवराकर किनारे पर पहुंचनी है।' यहां 'हव = सी' शब्द का प्रयोग है इसलिए समावना और 'छल' शब्द का प्रयोग है इसलिए, अप्ह्ृति की प्रनोति होती है। इसी प्रकार 'छम्' आदि शब्दों के प्रयोग रहने पर भी [ उत्प्रेक्षा होती है ऐसा ] जानना चाहिए।
'दूसरा मा इन्द्र' इत्यादि स्थलों में यदि 'अपर=दूसरा' शब्द का प्रयोग न होता तो यदाँ उपमा ही होती, उमका प्रयोग हो जाने से प्रकन राजा में इन्द्रत्व की प्रतीति होने लगी फलतः यहाँ अध्यवसाय होना समव हो गया और 'इव=सा' शब्द द्वारा उस [अध्यवसाय] में साध्यत्व की प्रतीति करा दी, इसलिए यहाँ उद्प्रेक्षा ही हुई। यदि इव शब्द का प्रयोग न होता तो यहाँ सिद्ध अध्यवमाय प्रतीत होता और तब अनिशयोक्ति होती। और यदि, न इव शब्दर का प्रयोग होता और न अपर शब्द का तो यदा रूपक होता। इम प्रकार उत्पेक्षा के भेदों में अनेक विचिन्रताएँ मिलती है, अन इसका जो हेनूत््ेक्षाभेद है इसमें प्टन के जिस धर्म का हेनु उत्परेक्षिन किया जाता है वह धर्मे [ अमसत के धर्म से ] अध्य- वसाय के आधार पर अभिन्न प्रतीन होना है और वही उत्पेक्षा का निमित्त स्वीकार किया जाना है। और वह सदेव केवल वाच्य ही रहता है। ऐसा [ वाच्य] न हो तो उत्प्रेक्षित हेतु किमके प्रति हेतु सिद्ध होगा। यथा-'मानों एक दूमरे को न देसने हुए' इत्यादि [ पूर्वद्धृत ] स्थल में। यह्ा प्रकृन है कपोल। उनमें धर्मरूप मे दुर्धलना वनलाई जा रही है और उम [ दुर्बलता] में हेतु वनलया जा रहा है अदशन-न दिसाई देना। इम प्रकार इम [दतप्रेक्षा] में निमित्त है [ न दिसाई देने रूप ] हेतु का फल = दुर्बल होना। इसी प्रकार-[राम की सीता के प्रति उकि- तुम्हारा नूपुर] 'मानों तुम्हारे चरणारविन्द मे विठुडने से चुम्पी साधे दिखाई दिया था'- इत्यादि स्थलों में नृपूरगन मौनित्व=सुप्पी का हेतु है दु सित्व। उसकी उत्प्रेक्षा में निमिच माना जाना चाहिए मौनित्व ही और इसी प्रकार [हेनूत्पेक्षा के ] सभी स्थलों में जानना चाहिए।
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चिमर्शिनी छुदशब्द प्रयोगेण यथा- स्वेदोद विन्दुसंदोहच्छदुमना तव राजते। समरेणावैग्यनर्घापि दत्तार्घेव कुचस्थली।' अस्याक्ष तत्तस्छुद्दप्रयोगाप्रयोगाभ्यां प्रतीतिभेदादलंकारे: सह विभागं दर्शयितुभाइ- अपर इत्यादि। तत्प्रयोग इत्यपरशब्दप्रयोगे। इूचशन्दुस्य संभावनाद्योतकस्याग्रयोगाव्ष सिद्धरवमू। अत एव चात् विषयस्यानुपादानमेव। तदुपादाने हि दढारोपं रूपकमिति समनन्तरमेवोक्तम। अन्यत्र पुनः सर्वत्र विपयोपादानमेव न्याय्यम्। तदित्थं भेदवैचिन्येणावस्थिताया उत्परेक्षाया हेतुत्वरूपफलानां यथासंभवं स्वरूपं दर्शयति-तदेवमित्यादिना। स धर्म इति यं अ्त्येव हेतुरूत्म्रेचयते। अध्यवसायनशादिति भेदेऽप्यमेदाश्यणात्। अभिन इत्यपकतसंबन्धिना धर्मेण। स दृति निमित्तववेनाश्ितो धर्मः। नियमेनेति। अवाच्यः पुनर्न कदाचिद्वव तीत्यर्थः। अन्यथेति अवात्यत्वे। कं प्रति- हेतुरिति। तस्येव फलरूपत्वात्। नहि य प्रश्येव हे रुतमाचयते तस्येवावाच्यत्वं चुकम्।. साध्यमन्तरेण साधनत्त् निविषयत्वापत्ते: । चदि चात्य निमित्तमात्रत्वमेव स्यात दाच्यत्वमवाच्यत्व स्याब्। एवमेक एव धर्मो हेतोसतप्रेचयमाणस्थ निमितं फलं चेति सिदम। एतनंघ दर्शयति-अपच्यन्तावित्यादिना। तन्ेति हेतृतप्रेष्षणे । निमित्त- मिति तदिनोमेषणस्थानिप्पते। द्विविवमन्र सामतागमन तपोजनितमदर्शनजनितं च। तयोर्यवसायवशादभिन्नत्वेनाश्रयणन। अतश्र हेतोरैंक एव धर्मो निमिन्नं फलं चावस्तुतस्तु तपोजनितस्य निमित्तत्वमन्यस्य तु हेतुफलरूपसमू। अत पुव नेतरेत- रात्रयदोप:। द्वयोरपि भिन्नखानू। मौनितवमेवेति। स पनरन्यत्किंचिदित्यर्थः। अतश्र निश्चरुत्वादिजनितम्य दुःजनितस्य च मौनिश्वस्यामेदेनाश्रयणम्। सर्वनेश्यनेन समस्त
एवं हेतूतेकया यथासंभवं स्वरूपं प्रदुर्श्य स्वरूपोतप्रेकषाया अपि दर्शयति- स्वरूपोत्प्रेक्षायामित्या दिना। छस शब्द का प्रयोग होने पर यथा-'तुम्हारी कुचस्थली है तो सन् [ अमूल्य ] तभापि मैं सोचता हूँ कि कामदेव ने पसीने की पुँजीभूत वूंदों के बहाने इसे अर्धयुक्त [अर्व=पूजा में जलार्व तथा मूल्य से युक] सा बना दिया है।' इस उत्प्रेक्षा में उननन शब्दों के प्रयोग रहने और न रहने के कारण अन्य अलंकारों का भ्रम होने लगता है, अतः अन्य अलंकारों से भेद दिखलाने के लिये अन्थकार लिखते हैं- ततप्रयोग-उस अपरशब्द का प्रयोग [अध्यवसाय की ] सिद्धता इसलिए कि संभावनाच्योतक इब शब्द का प्रयोग नहीं रहता, और इसीलिए यहाँ सर्वेदा विपय का अनुपादान ही रहता है। उपादान हो जाने पर दढारोप रूपक हो जाता है जैसा कि यहीं कुछ भागे कहा गया है। अन्य सभी स्थलों में विषय का उपादान दी उचित है। इस प्रकार अनेक प्रकार के भेदों से युक इस उत्प्रेक्षा के हेतु, स्वरूप तथा फल नामक मुख्य यर्गों में संभावित मेदों के स्वरूप वतलाते हुए लिखते हैं-तदेवमू इत्यादि। स धर्मः= वह धर्म अर्थात जिसके लिए हेतु की उत्प्रेक्षा की जाती है। अध्यवसायवशात्=अध्यवसाय के कारण अर्थाव भेद रहने पर भी समेद मानने से। अभिन नर्याद अप्रकृत से संवन्धित धर्म से। स= वह अर्थात निमित्तरूप से आाशित धर्म । नियमेन = नियमतः सदा ही =अर्थात वह अवाच्य
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कमी भी नही होना। अन्यथा वाच्य न होने पर। कं प्रति हेतु := हेतु किमका होगा क्योंकि वही फल्रूर रहना ह। ऐसा ठीक नहीं कि जिसके लिए हतु की उत्पेक्षा की जा रही है वही नवाच्य हो क्योंकि नत्र साध्य के अभाव में साधन निरथंक हो जाएगा। यदि यह कैवल निमिच्त दी होना तो यह वाच्य और अवाच्य दोनों हो मकता था। इम प्रकार यह मिद्ध हुआ कि एक ही धर्म उत्प्रेष्यमाा हेतु का निमित्त भी होगा और फड मी। इसी तथ्य को उदाहरण द्वारा मझ्ञान है-अपव्यन्ती० न देसते हुए। तत्र हनूतप्रेक्षा में। निर्मित्न क्योंकि उमके विना उत्प्रेक्षा की निष्पत्ति नहीं होती। यहाँ दुरवएना दो प्रकार से आती ह तपस्या से अर अदर्शन से। इन दोनां को अध्यवसाय के आधार पर अभिन्नरूप से अपनाए गए है। इसोलिए एक ही धरमें देतु का निमित्त भी है और फल मी। वस्तुन तपोजनिन दुर्वलता निमिच है और दूसरी दुर्बलता इतुफनरूप। इसलिए यहाँ अन्योन्याश्रय दोष नहीं है क्योंकि दोनों ही भिन्न है। मौनित्वम्-अन्य कुछ नहीं। इसीटिए यहाँ निश्चलता आदि से अनित तथा इुस से अनित मोनिल अमिन मान लिए गए है। सबंत्र ऐमा कइकर हेतूतमेक्षा के कविन स्वरूप का समस्त लइयों में अविरोध वनल्या। इम प्रकार हेनूरमेक्षा का स्वरूप यथाममन दिखन्या। मत्र स्वरूपोतप्रेकषा का स्वरूप भी बनलाने हैं -- [सर्वस्व ] स्वरूपोत्मेक्षायां यत्र धर्मी धर्म्यन्तरगतत्वेनोत्प्रकषयते नत्रापि निमित्त- भूतो धर्मः क्वचिनिर्दिश्यते। यथा-'स वः पायादिन्दु.' इत्यादौ। अत्र कुटिलत्वादि निर्दिष्टमेव । 'वेलेव रागसागरस्य' इत्यादौ संक्षोमकारित्वादि गम्यमानम। यत्र च धर्म एव धर्मिंगतत्वेनोत्प्रेक्ष्यते तन्रापि निमित्तस्यो- पादानानुपादानाम्यां द्वैविध्यम्। उपादाने यथा- 'प्राप्यामिपेकमेतस्मिन्प्रतितिष्ठासति द्विपाम्। चकम्पे लोप्यमानाज्ञा भयविह्वलितेव भू:॥' मत्र भूगतत्वेन भयविह्वलितत्वास्यधर्मोत्म्ेक्षायां कम्पादिनिमिस्- मुपात्तम। अनुपादाने यथा-'लिम्पतीय तमोऽप्गानि' इत्याद। अन्न तमो- गतत्वेन लेपनक्रियाकर्तत्वोपेक्षायां व्यापनादि निमित्तं गम्यमानम्। ब्याप- नादौ तूत्प्रेक्षाविपये निमित्तमन्यद्न्वेष्यं स्यात्। न च विपयस्य गम्यमानत्वं युक्तम्। तस्योत्प्रेक्षिताधारत्वेन प्रस्तुनस्याभिवातुमुचितत्वान्। तस्मादू यथोक्तमेव साधु। स्वरूनोरप्रेक्षा में जहाँ धर्मा दूसरे धर्मों के भीतर उत्पेक्षित होना है वहाँ भी निमित्तभूत धर्म कही निर्दिष्ट रहता है; यथा-'वह चन्द्र आप की रक्षा करे० इत्यादि में, यहाँ कुटिलत्वादि निर्दिष्ट ही है। 'रागसमुद्र की वेला = तटभूमि सी'-में वह गम्यमान अर्थात अनिर्दिष्ट है। जहां कही धर्म ही धमों के मौतर उत्प्रेक्षिन होता है वहों भी दो विधाय रद्दती हैं क्योंकि वहाँ निमित्त का कही उपादान रहता है और कहीं अनुपादान। उपादान यया- अभिषेक प्राप्त कर जय यह सपनी प्रतिश्ठ चाहने लगा तो शत्रुओं की भूमि जिस पर [शयुओों की ] भाता लुस होने वाली थी मानों भयविहल डोकर काँप उठी।
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-- यहाँ भूमिलपी धर्मी के भीतर भयविहलतारपी धर्म की उत्प्रेक्षा की जा रही है और उसमें कम्प आदि का निमित्तरूप से उपादान किया गया है। अनुपादान यथा-'अन्वकार अगों को मानो लोप रहा है'-इत्यादि में। यहाँ जो तम के भीतर लेपन-किया के कर्तृत्व की उत्प्रेक्षा है उसका निमित्त है न्यापन और वह गम्यमान=अनुपात्त है। यदि व्यापनादि को उत्ेक्षा का विषय माना जाय तो उसमें निमित्त कोई और ही खोजना होगा [ यह एक दोप होगा और दूसरा दोष यह दोगा कि यहाँ] विषय [ज्यापन] गभ्यमान है जो अनुचित है क्योंकि विपय ही तो प्रस्तुत होकर उत्प्रक्षा का आधार होता है अतः उसका शब्दतः कथन आवश्यक होता है। इसलिए पहले जो [ तम में लेपन] की उत्प्रेक्षा की जा रही है वही ठीक है। चिमर्शिनी यद्यप्युद्देशत एवतत्स्व रूपोतमे पषायां निमित्तोपादानत्वानुपादानत्वमवगम्यते तथापि हेतूत्मरेतायां यथा निमितोपादानमेव संभवति तथान्नापि न संभाव्यमित्याशवेन पुनरिहै- तटुक्म्। सदा चाब धर्मो धर्म्यन्तरगतत्वेनोक पयते तदा त निमित्तस्य कीटयुपत्वं भवतीव्या शङ्गवाह-यन्नेत्यादि। धर्म एवेति। न पुनर्धर्मीं धर्मिगतत्वेनेति। धर्मिभित्तितयेत्यर्थः । क्षत्र हि धर्मिणोऽन्यधर्मधमिखं निगीर्यान्यघर्मघसित्वमवस्थाप्यते। अत एवात्र धर्मी भित्तिभूततया विपयः। धर्मिण बिना केवलस्यैव धर्मस्य व्यवस्थापयितुमशक्यत्वाूयब- स्था्यमानत्वे वा घमितवमेव स्याद्। वस्तुतस्त् धर्म एवोतेप्षाविषयः । यन्निगरणे नाभेदप्रतिपत्तिरविपयिणोऽवसीयते। स च निगीर्यमाणो धर्मः क्वचिदुपात्तो भवति कचि- चचानुपात:। 'प्राप्याभिपेकम्' इृत्यादावन्ये हेतूतप्रेक्षात्वं-मन्यन्ते इत्युदाहरणान्तरेणोदाहियते- नवरोसद लिन-घणनिर वलंब-संघडिभ-तडिकडप्पव्व। नरहरिणो जअइ कढारकेसरे कंधरावंधो।' अन्न कन्धरावंधघर्मिणि सकेसरत्वं निगीर्य सतडित्कटप्रत्वसुस्मेन्ितम्। कढारत्वं च निमित्तसुपात्तम्। निगीर्थमाणश्च धर्मो धर्मिगतत्वेनोपातः। लेपनक्रियाकर्तृत्वोत्प्रेक्षाया- मिति, अर्थादाशह्वितायाम्। एवं हि तमोलेपनमिवेति प्रतीतिः स्थ्त्। न चात्र तथेत्या शङ्चाह-न्यापनादावित्यादि। निमित्तमन्यदिति तिरोधायकत्वादि। तेन तमसि धर्मिणि व्यापनादिधमं निगीर्य लेपनकियाकर्तृतवरूपो धर्म उत्पेक्षित इत्यर्थः। यदाह श्रीमम्मटः- 'व्यापनादि लेपनादिरूपतया संभावितम्' इति। यत्र च धर्मान्तरनिगरणेन धर्म एव धर्मिभित्तित यो तोचयते तन्न भित्तिभूतत्वादविपयरूपस्य धर्मिंगः समनन्तरोक्नीत्या गम्य मानस्वं न युज्यत इत्याह-न चेत्यादि। विषयस्येति। निगीर्यमाणोसोदयमाणयोर्धमंयो- भित्तिभूतस्य धर्मिण इत्यथः। न तु निगीयंमाणस्येति व्याखयेयम। तस्य स्रुपादानानु- पादानाभ्यां हैविध्यं भवतीति समनन्तरमेवोक्तम। तच्नोदाहतम्। यथा वा- यरपुण्डरीक इय पार्वण एव वेन्दराविन्दीवरद्यमिवोदितमेकनालमू। तत्पझरागनिधिमूलमिवाधिगम्य सम्यग्जितं नयनयोर्मम भाग्यशकत्या।' अन्र मुखादीनामुपरेन्ताविपयाणामनुपादानाहग्यमानर्वम् । तस्येति धर्मिरूपस्य विपयस्य। उत्प्रेक्षितावारत्वेनेति। उत्प्रेषवितस्य लेपनादेधर्मस्थ न्यापनादिघर्मंनिगरणे नोतमेक्ताविपयीकृतस्याधारत्वेन भित्तिभूततयेत्यर्थः । धर्मिणमन्त्ररेण धर्मस्याविश्रान्तेः। प्रस्तुतस्येति । अवश्यामिधेयस्वेत्यर्थः।
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धर्मंफलरवं चाध्यवसीयते। अतथ म धर्मी वाच्य एव भवति। यथोकोपपते। निगीर्य माग: पुनर्धमं एवोपादानानुपादानाम्यां दिषा। तत्तु यथा-एपा स्थलीस्यादि। अ्त्र नूपुरस्य धर्मिणो वद्दमौनरे निश्वलवादि धर्मदेतुकखवं निगीर्यमाणश्ानुपासी धमः। उपा- सस्तु यथा- मृणलसूच निजवक्ल माया' समुतसुकुश्वादुपु चक्रवाक। अन्योन्य विश्लेष णयन्त्रसूत्रभ्रानतपेव चञ्तुस्यितमाचकर्ष ।।' अन्र चमवाकर याकपणे चाटुससुरसु कहेनुत्ं निगीर्य आ्रन्तिहे तुस मध्यव सिनम् । निगीयंमाणक्च धर्म उपात । अनुपातसतु यथा- 'कुमुदिन्य प्रमोदिन्यस्नद्वानीमुदमीमिलन्।
अत्र कुमुदिनीनामुन्मीलने चन्द्रोदयहेतुकत्व निगीर्य दशनं फलरवेनोष्मेसितम। निगीयंमाणक्च धर्मोऽनुपासत । तदेव हेनुस्वरूपयोर्यथासंभव स्वरूप दर्शपित्वा फलोधेघाया अपि दर्शयति- फठोलमेक्षा यामित्यादिना। यदपि स्वरूपोत्मरेक्षा में निभिच के उपादान और अनुपादान दोनों हो सवन प्रनिपादित हो जाते हैं क्योंकि जहों ये नेर गिनाय गए है वहाँ निमित के उपादान अनुपादान की चर्चा की जा चुकी है तथापि यहाँ इम विषय का उल्लेस जो पुन किया गया उमका तात्र्य यह है कि जैसे द्ेतत्प्रेक्षा में सवत्र निमित्त का उपादान ही रद्दना है अनुभदान नहीं देसे म्वरूपोत्प्रेक्षा में नहीं रदता [ अर्थाव यहाँ निमित्त का अनुपादान भी समत्र होता है]। शका होनी हू कि जब कोई धर्म किमी अन्य धर्मी के भीनर उत्प्रेक्षिन होता है तव निमित्त कैसा होता है [ ज्यात्त अथवा अनुपात]। इस पर उत्तर देने हैं -- यत्न शत्यादि। धर्म पव = धर्मे ही न कि धर्मी भी ध्मी के भौनर । धर्मिगत अर्थात धर्मा को मित्ति बनाकर। यहाँ धर्मी में अन्य धर्म से आने वाला धरमित्व छिनाकर अन्य ही धर्मे से आने वाला धर्मित्व स्थापित किया जाता है। इसलिए यहाँ धर्मी मित्ति के रूप में उपस्थिन रहता है इसलिए वही विषय होना है, क्योंकि धर्मो के बिना केवल धर्म की स्थापना सभव नहीं होती, और यदि उरुकी स्थापना की भी जाय तो वह़ाँ धर्मित्व ही सिद्ध होता है, जबकि उत्प्रेक्षा का विषय वस्तुन धम ही होता है। जिस [धर्म] के निगरण [छिपाने] से विषयी में अभेद प्रतीति होती है। वह जो निगीर्थमाय [छिराया जाने बाळा ] धर्म है वह कहीं उपाच होता है और कहों अनुपात्त। 'प्राप्यामिपेक०' इत्यादि पद में कुछ लोग हेनुत्प्रेक्षा मानते हैं इसलिए इम इसके लिए दूसरा उदाइरण प्रस्तुन करने हैं-
नरहरेर्जयति कडारकेसर: यहाँ कन्धरावन्ध है धमीं। ऐसमें सकेसरत्व को छिथाकर सवटितनडित्कटप्रत्व की उप्रेक्षा की कन्धराबन्ध ।।"
गई है। इसमें निमित्त है कडारत्व, जो उपात्त है। और निगीर्यमाण (छिपाया जा रहा) धर्म धर्मों के मीनर प्रतिपादिन किया गया है। लेपन क्रिया कर्तृस्वोष्मेपायाम्='लेपनरूप किया के कर्तृत्व को उत्प्रेक्षा भी यहाँ मानी जा सकती है। तब 'नम का लेपन सा' ऐसी प्रतीति होगी। किन्तु यहाँ ऐसा नहीं है'-ऐसी शका
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कर समाधान प्रस्तुत करते हैं -- न्यापनादौ। निमित्तमन्य्=अन्य निमित्त अर्थाद तिरोषायकत्व आदि। इस पक्ष में तम को धर्मी माना गया और उसमें व्यापनादि धर्म को छिपाकर लेपन- क्रियाकर्तृत्वरूप धर्म की उत्प्रेक्षा की गई। जैसा कि श्री मम्मट ने कहा है -- 'ध्यापन आदि लेपन आदि रूप से उत्प्रेक्षित किया गया।' 'जहाँ कहीं दूसरे धर्म को छिपाकर किसी दूसरे धर्म की ही धमों के ऊपर उत्प्रेक्षा की जाती है वहाँ आधारभूत धर्मी का गम्यमान होना= शब्दतः न कहा जाना उक्त रीति से ठीक नहीं होता'-इस अभिप्राय से लिखते हैं-'न च' इत्यादि। विषयस्य=विषय का मर्थात् निगीर्यमाण [छिपाया जाता] तथा उत्प्रेक्ष्यमाण [ जिसकी उत्प्रेक्षा की जा रही है] इन दोनों धर्मो की भित्ति बने हुए धमीं का। न कि निगीर्थमाण का। क्योंकि निगार्थमाण के विपय में कहा जा चुका है कि कहीं उसका उपादान रहता है और कहीं अनुपादान। इस प्रकार वह दो प्रकार का होता है। और उसके उदाहरण भी दिए जा चुके हैं। यह भी उसका एक उदाहरण है -- 'पुण्डरीक [श्वेतपश्] अथवा पूर्णिमा के चन्द्रमण्डल ' चेहरे) के वीच मानों पम्मरागमणि की निधि (अधर) से निकल कर जो एक ही नाल (नासिका) में दो नीलकमल (नेत्र) निकले हुए है उन्हें पाकर मेरे नेत्रों की भाग्यशक्ति सब से बढ़ गई'। यहाँ मुख आदि उत्प्रेक्षा के विषय हैं किन्तु ने गम्यमान अर्थात शब्दतः अनुपात्त हैं। सन्य=उसके अर्थात् धमिरूप विषय के 1 उत्प्रेक्षाधारतवेन= उत्प्रेक्षा के आधार के रूप से अर्थात व्यापनादि धर्म को छिपाकर उत्प्रेक्षा की वस्तु बनाए गए लेपनादि धर्म के साधार के रूप से अर्थान मित्तिरूप से। ऐसा इसलिए कि धर्मी के बिना धर्म की विश्रान्ति नहीं होती। मस्तुतस्य = प्रस्तुत अर्थात मवश्य अभियेय का। इस प्रकार हेतूलेक्षा और फलोलेक्षा में मी अन्यधर्महेतुकता को छिपाकर अन्य- धर्महेतुकता का अध्यवसाय धर्मी के भीतर किया जाता है। इसी कारण वह धर्मों नियमतः वाच्य ही होता है। कारण ऊपर बतलाया जा चुका है। निगीर्यमाण अर्थाद छिपाया जाने वाला होता है केवल धर्म, और वद मो उपादान तथा अनुपादान के आधार पर दो प्रकार का होता है। यथा-'एपा स्थली' इत्यादि। इस पद् में नूपुररूपी धर्मी में जो बदू- मौनत्वरूपी धर्म है उसका वास्तविक कारण है निश्नलत्व किन्तु उसे छिपा दिया गया है और उसके स्थान पर कारणरूप से दुःहेतुकत्व की उत्पेक्षा की गई है। इस प्रकार यहाँ जो निगीर्यंमाण है वह अनुपात है और वह धमे ही है [धर्मी नहीं]। उपात्तथम यथा-'चाङक में समुत्सुक, चक्रधाक ने अपनी प्रिया की चोंच में रखे मृणालसूत्र को मानों एक दूसरे के वियाग के जनक यन्त्र के सूत्र के ज्रम से खींच लिया [ विक्रमांकदेवचरित। ]' यहाँ चक्रवाक द्वारा किए गए सृणालसूत के खीननेरूपी कार्य में, है तो हेतु चाडसमुत्सुकता, किन्तु उसे उस रूप से प्रस्तुत न कर यहाँ भ्रान्ति को हेतुरूप से उत्प्रेक्षित किया गया। और जो धर्म निर्गार्यमाण है अर्थात कारण होने पर भी कारणरूप से प्रस्तुत नहीं किया जा रहा वह [चाटसमुत्सकता ] यहां उपात्त ही है। अनुपास धर्म यथा- 'उस (चन्द्रोदय के) समय प्रसन्न कुमुदिनी मानो कमलिनी की प्रिय (सूर्य) के विरद से उत्पन्न म्लानि को देखने के लिए खिल डठी।' -यहाँ कुमुदिनी के खिलने में चन्द्रोदय हेतु है किन्तु उसे हेतुरूप से प्रस्तुत ने कर दर्शन- क्रिया को हेतुरूप से प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार कुमुदिनी को विकास में चन्द्रोदयहतुकल्- रूपी वास्तविक धर्म को छिपा दिया गया है और उसे शब्दतः कहा भी नहीं गया है। १४ अ० स० सप
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इस प्रकार (तस्प्रेक्षा के दो भेद) हेनुतपेक्षा और फछोतरेक्षा के स्वरूप यथासंमव वतला दिए गए। भब फलोरेक्षा का सरूप 'फलोरपेक्षायाम्' इत्यादि अगले अन्थ द्वारा बतलाने है- [ सर्वस्व ] फलोत्प्रेक्षायां यदेव तस्य कारणं तदेव निमित्तम्। तस्यानुपादाने कस्य तत्फलत्वेनोकं स्यात्। तस्मात्त् तस्य निमित्तस्योपादानमेव न प्रकारा -: न्तरम्। यथा- 'रथस्थितानां परिवर्तनाय पुरातनानामिव वाहनानाम्। उत्पत्तिभूमी तुरगोत्तमानां दिशि प्रतस्थे रवियत्तरस्याम्।।' अत्राश्वपरिवर्तनस्य फलस्योत्तरदिग्गमनं कारणमेव निमित्तमुपात्तम्। फलोत्प्रेक्षा में उस (फल) का जो कारण होता है वही उसका निमित्त होता ई। यदि उस (निमित्त) का उपादान न किया जाय तो वह (फल) किमका फल सिद्ध होगा १ इम कारण फठोसेक्षा में फल के निमित्त का उपादान ही होता है, अन्य अनुपादान नहों। यथा- "[वसन्त के समय ] सूर्य, मानों रथ में जुते पुराने घाटों को बदलने के लिए उत्तरदिश्ा की ओर चला जहां उत्तम घोटे उत्पन्न होते हैं [ 'विक्रमांकदेवचरित' ]। -- यहाँ घोड़ों का वदलना फल है और उसका कारण है उत्तरदिशा में जाना। यहाँ यहाँ निमित्तरूप से उपात्त है। विमर्शिनो सस्येति फलस्य । एतच हेतू प्रेक्षाविचारमन्थविद्यृतेरवगतार्यमिति अन्थविस्तरभयान्न पुनरायस्यते। तदेवं ग्रन्थकवदात्मन रलाघा कटावयन्नेतदुपसंहरति- तस्य=उसका अर्थात फल का । यह सब विचार हमारी टीका में हेनूतप्रेक्षा पर किए गए विचार से गतार्थ हो जाता है अत ग्रन्थविस्तार के मय से अव पुन विचार नहीं करते। इस प्रकार विवेचन कर अन्थकार अपनी प्रशमा व्यक्त करने हुए उत्प्रेक्षा प्रकरण का अनमदार करते हैं। [सर्वस्व्र ] तद्सावुत्पेक्षाया: कक्ष्याविभाग: प्रथुर्तया स्थितोऽपि लक्ष्ये दुरवधा- रत्वादिह न प्रपश्चितः। तस््याश्वेवादिशब्दवन्म-येशव्डोऽपि प्रतिपादक:। कि तूत्प्रेक्षासामप्रथभावे मन्येशव्दप्रयोगो वितकमव प्रतिपाद्यति। यथो- दाहतं पाकू 'अहं त्बिन्दुं मन्ये त्वदरिविरद्द' इन्यादि। तो इस प्रकार उत्प्रेक्षा का वर्गोकरण प्रचुररूप से किया जा सकता है, तथापि (उदाहरण- रूप) एक्ष्यों में इनका समझा जाना कठिन है फबत [ इमने वर्गीकरण को ] समगरूप से प्रस्तुत नहीं किया। इस [उत्प्रेक्षा] का प्रतिपादन जैसे इवादि शब्दों द्वारा होता है उसी प्रकार 'मन्ये'-शम्द द्वारा भी, किन्तु यदि उत्प्रेक्षा की साममी नहीं रहती तो 'मन्ये'-शब्द का प्रयोग केवल वितर्क- मात्र का हो प्रतिपादन कर पाता है। जैसा कि पदले (अपहुति प्रकरण में) उदाहरण दिया जा चुका है-'मैं तो चन्द्रमा को मानवा हूँ तुम्हारे शत्रुओं के विरद०'-इत्यादि।
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विमर्शिनी सदसावित्यादि। अस्याश्व वाचकव्यवस्थां दर्शयति-तस्याश्चेत्यादि। उत्मेवासाममय्य. भाघ इति संभाव नामत्ययात्मकर्वाभावाद्। आगिति, अपहती। एव मिवशन्दोऽपि क्चिद्वितर्कमेव प्रतिपादयति। यथा- 'वृत्तानुपूर्ने च न चातिदीघे जद्से शुभे सृष्टवतस्तदीये। शेपाङ्गनिर्माणविधी विधाहर्ळावण्य उत्पाद्य हवास यरनः।।' इयं च भेदेश्भेद इत्याद्यतियायोक्तिभेदमय्यपि दश्यते। तत्र भेदेज्भेदो यथा-पृथ्वी- राजविजये- गृद्न्दिः परया भक्त्या बागलिस्परम्परा । अनमदेव थत्सैन्यैर्निरमीयत नर्मदा।' अत्र नर्मदाया भमेदेऽपि भेद:। संबन्धेऽसंबन्धो यथा- अद्ैतं तन्वतु भवतां संविद हवैतपुष्टये चमासृत्युत्रीपरिवृढरमाकान्तदेहदयस्य। यन्नाकारप््य निज इव विदन्दक्षिगार्धप्रभामिर्देहैऽ्येपामपि पुररिपु: कार्ष्ण्यमन्तः प्रमार्षि॥' अत्र काप््यसंबन्धेऽप्यसंबन्धः। जसंबन्धे संबन्धो यथा- तीरनालित चन्द्रेव नीली पौताम्बरेव च। टह्होल्षिखित सूर्येच वसन्तश्रीरजम्भत ॥I' अत्र तीर सालितत्वाय्यसंवन्धेऽपि संबन्धः। कार्यकारणयोस्तुल्यकालत्वे यथा- यशसेव सहोद्भूतः श्रियेव सह वर्षितः। तेजसेव सहोद्भूतसत्यागेनेव सहोत्यित:।'
शरा: पुरस्तादिव निष्पतन्ति कोदण्डमारोपयतीच पश्चात्। अन्वकमद्दारा इच संघटन्ते प्राणान्दिप: पूर्वमिव स्यजन्ति ।।' कार्यकारणयोर्विषर्ययेऽपीयं दश्यते यथा- 'सेयं संततवरतंमानभगवडागार्चनै काय्रताव्य प्रोपान्तकताविसुक्त कुसुमा चन्द्रपसूतिर्नदी। यस्या: पाण्हुरपुण्डरोकपट उष्याजेन तीर दवये शश्वत्पावणचन्द्रमण्डलशता नी व प्रसुते जलम्।।'
दश्यते यथा- असर्न गर्वस्मितदन्तुरेण विराजमानोऽघर पल्लवेन। समुत्थितः तीरविपाण्दुराणि पीत्वेव सचो द्विपतां वशांसि।।' अत्र समुत्यानानम्तरभाविनो यशपानस्य पूवनिर्दशा्कमिकविपर्ययः। अत्रैव 'पिन्निवोच्चैः' हति पाठे त क्रमिकयो: समकालभाविश्बम्। इस [उत्प्रेक्षा ] के वाचक पदों की व्यवस्था पर प्रकाश डालते हैं-'सस्याश्'= इसका उत्प्रेष्षासामग्रयभाव=अर्थात ज्ञान का संभावनार्मक न होना। प्राकपहले र्थात् अपहुति प्रकरण में। [जिस प्रकार मन्ये शब्द वितर्कमान का प्रतिपादन करता है] इसी प्रकार इव शब्द भी वितर्कमात्र का प्रतिपादक होकर रह्द जाता है। यथा- 'उस [ भगवती पार्वती] की शुभ, ऊपर से नीचे तक वर्तुलाकार तथा मनधिक लम्बी पिढ़- रियाँ बना लेने पर अन्य अंगों का निर्माण विवाता ने कदाचित नवीन लावण्य इकट्ठा कर किया होगा [ कुमार-१ ]।
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[यहाँ नवौन लावण्य की कर्पना मात्र की गई है। उसका किसी पर संभावनात्मक आरोप नहीं किया जैसे 'मेरी समझ में तो मुख चन्द्र है'-इत्यादि उक्तिमों में किया जाता है]। यह उत्प्रेक्षा भेद और अभेद इत्यादि अतिशयोक्ति के जो भेद हैं उनसे भी युक्त रहती है। यथा भेद में अभेद का उदाहरण पृथ्वीराजविजय कान्य में- जिसके अत्यन्त भक्ति के साथ बाग-ठिंङ्गों [भगवान् शकर के लिह्गों कदाचित् वाणासुर द्वारा स्थापित शिवलिंगों] का स्पर्श कर रहे सैनिकों ने नर्मद्ा को अनर्मदा सा बना दिया। -यहाँ न्मदा एक ही है तथापि उसमें भेद की कर्पना की गई है। संबन्ध में असम्बन्ध का उदाहरण यथा- भगवान् ग्िव तथा भगवास् विष्णु के दो (कमश गौर तथा श्याम) शरीरों का अद्वैत हमारी अद्वैत बुद्धि का पोषक हो, जिस (देहदयाद्वेत) में (विष्णुरूप) दाहिने देदार्थ की (श्याम) कान्ति को अपने शरीर में कालौच समझ मगवान् शकर (न केवल उसे ही र्पोछन हैं अपितु) अन्य लोगों (भक्तों) की मानस कालाच भी पोछ देते हैं।' -यहाँ कालीच का शिव से सबन्ध न होने पर भी सवन्ध प्रतिपादित किया गया है। अमवन्ध में सम्बन्ध का उदाहरण यथा- 'वसन्त श्री अगडाई ले रही थी, उसका चन्द्रमण्डल मानों दूध से धो दिया गया था, आकार मानों नील से नइल दिया गया था और सूयमण्डल मानो टक (छेनी) से झुनौल बना दिया गया था।' -यहाँ दूध से धोना आदि चन्द्रमण्डल आदि में नहीं था तथापि उसकी वहाँ कश्पना कर ली गई है।' कार्यकारण का एक साथ उतपन्र होना यथा- 'मानों यश के साथ उत्पन्न हुआ, मानो भी के साथ वृद्धिंगत हुआ, मानों नेज के साथ जनमा, मानो त्याग के साथ उठा।' -- [ यहाँ वक्तव्य यह है कि वर्ण्यमान व्यक्ति के जन्म, वृद्धि, उत्थान यद आदि के कारण हुए, किन्तु वे इनने शीन हो गए कि कारण और कार्य में कालक्रम प्रतीत नहीं हुआ] आर्यकारण के पोर्वापय में वेपरीत्य यया- 'वाग पहिले ही निकल पडते हैं [ यह वीर ] मानो धनुष बाद में चढाता है, [और बाणों के) प्रहार बाद में होते हैं शब्ु प्राण पहिले ही छोड देवे हैं।' कारण का कार्य औौर कार्य का कारण बनना यथा- ' -- यह है वद चन्द्रमा से उत्पन्न होने वाली नदी [ नर्मदाजी] जो तीर उताओं से पुष्प दरसा बरसा कर मदा ही भगवान शिव के लिंग की पूजा में एकाग्रचित् रहे आने में व्यग्र है औौर जिसका जळ दोनों तटों पर निकले दवेत पद्मों के बहाने मानों सदा ही पूर्गिमा के मैकर्डो चन्द्रमण्डल पेदा किया करता है।' -यहों नर्मदा से चन्द्रमा की उत्पति प्रतीत होनी है इसलिए कार्य कारण में विपर्यय हुआ [कयोंकि कार्य=नर्मदाजी से उनके कारण=चन्द्र की उत्पत्ति बतलाई गई।] क्रमिक वस्तुओं में क्रम का वैपरीत्य होने पर भी यह [ उत्प्रेक्षा ] दोती है, '[विक्रमांकदेवचरित, १५० में विधाना की चुल् से एक अद्भुम पुरुष उत्पन्न हुआ] जो अरयन्त ग्वीले रिमन से उ्ासिन अधर से विराजमान था मेत- मानो तत्काल शघ्ुओं का दुग्धधवल यश पीकर पेदा हुआ था।'
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-न्यहाँ यश का पान उत्पन्न होने के बाद संमव है किन्तु उसका वर्णन उत्पन्न होने के पूर्व कर दिया गया। इसलिए यहाँ [कमिक वस्तुओं में विद्यमान स्व्रामाविक ] क्रम का विपर्यय हुआ। चदि इसी पद्य में 'पोत्वेव सघः' के स्थान पर 'पिवननिवोच्चैः'-'पीता हुआ सा' पाठ कर दिया जाय तो यही उदाहरग क्रमिक पदार्थों की एक साथ उत्पत्ति का उदाइरण बन सकता है। विमर्श-उत्प्रेक्ष का पूर्वेतिहास- भामह -अविवक्षितसामान्या किंचिच्चोपमया सह!
किशुकव्यपदेशेन तरुमारुह सर्वतः। दग्धादग्धमरण्यान्या: पश्वतीव विभावसुः ॥२९२॥ -'जिसमें सादृश्य वतलाना अमीष् न हो तथापि उपमा की आंशिक सामग्री हो साथ हो अतिशय द्वारा भिन्न वस्तु के गुग और करिया रूप धर्मो का संबन्ध भिन्न वम्तु में वतलाबा वह उत्प्रेक्षा होती है। यथा -- फूले टेसू के बहाने मार्नो अग्ति वृक्ष पर चढ़ कर जंगल के जले-अनजले स्थान देख रहा है।'
[ वृच्ि] अतद्रूपस्य अतत्समावस्य, अन्यथा तत्तभावतया अध्यवसानमव्यवसाय, न पुनरध्यारोपो लक्षणा वा, अतिशयार्थमिति भ्रान्तिज्ञाननिवृत्त्यर्थम्। सादश्यादियमुत्मेक्षेति। -- जिस वस्तु का [गुण करियादि रूप जो स्वभाव है उसे छिपाकर उसमें ] जैसा नहीं है उसमें वैसे स्वमान का अध्यवसाय=ज्ञान कराना है उत्पेक्षा। इसनें आरोप या लक्षणा नहीं होती। इसमें अतिशय रहता है भ्रान्ति नहीं। यह अलंकार साइृश्यमूचक होता है। उदाहरण-
उन्भट = 'सान्यरूपाविवक्षायां वाच्येवाद्यात्मभि: पदैः। सतद्गुणक्रिया योगादुत्मेक्षातिशयान्विता ॥ ३।३ ।। लोकातिक्रान्तविपया मावाभानाभिमानतः । संमावनेयमुतपेक्षा वाच्येवादिमिरिष्यते ॥३४॥ - अलंकारसारसंग्रह। -- यत्रेवादिपदनिवन्त: साम्यस्य च रूपं न विवस्वते तत्रोत्ेक्षाख्योलक्वार:। ०००0। मत्र मसः अप्रकृतो योऽर्थस्तस्य ये गुगक्रिया: तद्योगाव साम्यरूपाविव्क्षावामपि इवादिशन्दप्रवृत्तिरव- रुड्ा 10000। तेन अतद्गुणक्रियायोगादस्या इवादिवाच्यलम्। ००००। पुराणप्रजापतिविहित- रूपविपर्यासेन कविवेधसा पदार्थस्य शुगातिशयविवक्षया रूपान्तरमप्यासठक्तुं शक्यते। इयं चोटेक्षा वदिरसंभवतः पदार्थस्य संभवद्रूपतयोपवर्णनाल्लोकातिक्रान्तविषया संभावना।'- छवुवृत्तिः । -जहां इवादि शब्द तो प्रयुक्त रहते हैं। परन्तु उपमा की विवक्षा नहीं रहती अर्थात प्रकृत से मिन्न जो अप्रकृत अर्थ उसके धर्म गुण क्रिया का प्रकृत में अस्तित्व वतलाए जाने से इवादि उपमा वाचक पदों का प्रयोग तो होता है किन्तु उपमा तात्पर्यविषयीभूत नहीं रहती। इस लिए यह इवादि पदों से वाच्य होती है। मिन्न वस्तु के गुण भिन्न वस्तु में भले ही विधाता को सृष्टि में न जा सकें किन्तु कवि की सृष्टि में यह असंभव नहीं है। इसलिए यह उत्प्रेक्षा जिन विषयों को लेकर चलती है वह प्रायः अलौफिक=लोकभूमिका से ऊपर उठे हुए होते है अत एव वे संमाननाश्रित होते हैं। यह सम्भावना भावात्मक पदार्थो की भी होती है और अमावा- त्मक पदारथों को भी। इसी प्रकार जब 'इद' आदि शब्दों का प्रयोग रहता है तो, यह वाच्य होती है।2
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उदाहरण यथा मावात्मक विषय की समावना- "मस्या" सदार्कविम्वस्थष्टिपीतातपैजपे:। श्यामिकाद्वेन पतित मुसे चन्द्रभ्मादिव॥ १ !। -- 'पवती जो ने जो जप किया उसमें वे सदा ही सूर्यविम्न पर दृष्टि लगाए रही और नेत्रों द्वारा सूर्यातप का पान करती रही, [और चन्द्रमण्डल मी ऐेसा ही करता है] इसलिए उनके मुखमण्डल पर जो साँवलापन आया है सो चन्दके भ्रम से मानो [ चन्द्रमण्डल गत ] कलक यहों ना पहुँचा है।' अमावात्मक विषय की सभावना -- 'कपोक्षफलकावस्था. कष्ट भूखवा तथाविधौ। अपृश्यन्ताविवान्योन्यमोदृक्षा क्षामता गठो ॥३ ॥ रद्रट= (१) अतिसारूप्यादैक्य विषाय सिद्धोपमानसद्भावम्। आरोप्यते च तरिमन्रतद्गुणादीति सोत्प्ेक्षा।। 'चम्पकतरशिखरमिद कुसुमसमूइच्छलेन मदनशिखी। अयमुच्चैरास्ट पशयति पथिकान् दिधशुरिव ॥८ा३३॥। (२) सान्येत्युपमेयगत यस्या समाव्यनेऽन्यदुपमेयम्। उपमानप्रतिवद्धापरोपमानस्य तत्वेन।। ८।३४ ।। आपाण्डुगण्ट पाली विरचितमृगनामिपनरूपेण । रशिशाहयेव पतिन लाञ्छनमस्या मुखे सुतनो. ।। ८।३५ ।! (३) यत्र विशिष्टे वस्तुनि सत्यसदारीप्यते सम तस्य । वरत्वन्तरभुपपत्या समाव्य सापरोत्प्रेक्षा ॥। ८।३६॥ अतिषनमुङ्गमरागा पुर पताकेव दृश्यते सन्ध्या। उदयतटान्तरितर्य प्रथयत्यासन्नता भानो ।'८३७।। -- (१) जहाँ पहले तो उपमान तथा उपमेय का अत्यन्त सादृश्य के आधार पर ममेद बतलाया जाय फिर उपमान का सद्भाव सिद्ध बतला कर उपमेय में उपमान [गुणक्किया रूप] धर्मों का आरोप किया जाए-वहाँ वत्पेक्षा होती है।' यथा- 'कामरूपी अग्नि फूलों के बह़ाने चम्पक तरु की चोटी पर चढकर पथिकों को देस रह्दा है मानों बंद उन्हें जळाना चाहता है।' (२) दूसरी उत्प्रेक्ष वह होती है जहाँ प्रसिद्ध उपमेय में एक अन्य उपमेय की करपना की जाय और इस कल्पित उपमेय में प्रसिद्ध उपमान पर आरोपित एक अन्य उपमान के अभेद की संभावना की जाय। यया- *पीले कपोलों पर बनी कस्तूरी की पत्रलेसा के रूप से इस सुतनु के मुखमण्डल के मीतर चन्द्रमा की शंका से मानों लाञ्छन आ पटा है। [-सपष्ट हो दोनों लक्षण और दोनों उदाइरण भामह तथा उड्भट के लक्षण और उदाहरण के भावानुवादमात्र है। ] (६) एक उत्प्रेक्षा वह भी होती है जिसमें शोमनत्व अशोमनत्व आदिगुगों से युक्त वास्त- विक पदार्थ में उसी जैसे किसी अवास्विक पदार्थ की युक्कि के आधार पर समावना की जाती है। यथा- मेरों पर मना कुकुमराग लिए दुए यह मात सन्ध्या दूर से दिखाई दे रही मानों पवाका है, जो वतला रही है कि सूर्य [का रथ] वदयगिरि के पीछे छिपा है और उसका उदय आसम है।
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[- यहाँ रागविशिष्ट संध्यारूपी वास्तविक पदार्थ पर पताकारूपी एक अत्यन्त कल्पित' पदार्थ ललोई की समानता पर संभावित किया गया। पताका की संभावना युत्तियुक्त है क्योंकि रवि यदि आ रहा है तो उसके साथ रथ का होना आवश्यक है और रथ है तो उसके ऊपर पताका। नमिसाधु ने भी उतमरेक्षा के कुछ भेद प्रस्तुत किए हैं] रुद्रट ने अतिशयनामक वर्ग में भी एक उत्प्रेक्षा स्वीकार की है। उसका लक्षण उन्होंने इस प्रकार किया है- यत्राततितथाभूते संभाव्येत संभूतमतद्वति वा विज्ञेया सेयमुतप्रेक्षा। ९११। अन्यनिमित्तवशाद यद यथा भवेद् वस्त तस्य तु तथात्वे। हेत्वन्तर मतदीयं यन्नारोप्येत सान्येयम् । २१४ ॥ अर्थात-किसी पदार्थ में असंभाव्य किया आदि की संभावना करना अथवा किसी पदार्थ में अपरंभूत करियादि को संभूत वतलाना। यथा चाँदनी अंग अंग को लीप सी रह्ी है और राज- प्रासाद नीलमणि के फर्श पर पड़वी चाँदनी से पहवित और प्रतिविम्वित तारों से पुष्पित था। -- अर्थात वस्तु की निष्पत्ति में प्रसिद्ध कारण को छोड़ अन्य ही कोई कारण वतलाया जाना। यथा-चरसा में जब तालाब पानी से खूब मर गया तब मार्नो नील हंस के विछोह से दुःखी होकर कमलिनी पानी में हूब गई। मम्मट= 'संभावन मथोत्मेक्षा प्रकृतस्व समेन यत्'। -- उपमेय का उपमानरूप से संभावन उत्परेक्षा है। यहाँ सम्मट ने संभावन-शब्द मलंकारिक- परम्परा से अपनाया है किन्तु टीकाकारों ने उसे अपने मन से इस प्रकार स्पष्ट किया है -- 'उत्कवेपमानैककोटिक: संशय: संभावनन् अर्थात उस संशय को संभावन कहते हैं जिसमें उपमान की और बुद्धि का झुकाव अधिक हो। 'दिष्व्या धूमाकुलितदृष्टेरपि यजमानस्याहुतिरग्नावेन पतिता ॥' शोभाकर = अलंकाररत्नाकरकार शोभाकर मिश्र का उत्पेक्षा लक्षण पहले ही उद्धृत किया जा चुका है।
प्रकृतं दि भवेत प्राज्ञास्तामुखेक्षां प्रचक्षते। -- जहाँ प्रकृत (उपमेय) अपने से भिन्न पदार्थ (उपमान) के धर्मो के संबन्ध से तद्रूप से तर्कित किया जाय वहाँ उतप्रेक्षा होती है। [ यहाँ संभावन के स्थान पर उपतकिंत शब्द महत्व- पूर्ण है] इसी प्रकार- रसगंगाधरकार पण्डितराज जगन्नाध-'तन्व्रिव्त्वेन तद्भाववत्वेन वा प्रमितस्य पदार्थस्य रम-
इस लक्षण में धर्मी तथा धर्म इन दोनों की उत्पेक्षा के लक्षण मिला दिए गए हैं। उनके पृथक रूप ये हैं -- धर्मी= 'सुन्दर साधारण धर्म के आधार पर भिन्न पदार्थ की अभेदसंभावना उत्प्रेक्षा होती है। धर्म='अपने साथ रहने वाले सुन्दर साधारण वर्म के आधार किसी ऐसे धर्म की किसी पदार्थ में संभावना उत्प्रेक्षा होती है जो धर्म उस पदार्थ में वस्तुतः न रहता हो।' 1 इस प्रकार उत्प्रेक्षा प्रत्येक आलंकारिक को मलंकाररूप से तो मान्य है किन्तु उसके स्वरूप में उनकी मान्यताएँ भिन्न है। भामह और वामन इसे अतिशय और अध्यवसाय पर निर्मर मानते हैं। उन्भढ इसमें पहिली बार अतिशय के साथ संभावना को भी स्थान देते हैं। रुदद
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अनिशय को छोड समावना के साथ आरोप को अपनाते हैं। यधपि उनका आरोप अतिरय से भिन्न प्रतीन नहीं होता किन्तु वे ऐतिदासिक अतिशय शब्द को छोट देने हैं। मम्मट अतिरय और आरोप दोनों को छोड एकमात्र समावना को उश्प्रेक्षा मानते हैं। अलकारसर्व स्वकार अपने पूर्ववर्त्ती माचार्यों में से मामह और वामन को मान्यता प्रदान करने और अव्यवसाय को उत्प्रेक्षाबीज मानते हैं। शोमाकर मिन्न इसके विरुद्ध उड्भट द्वारा प्रवर्त्तित, रुद्रट द्वारा अनुमोदित तथा ममट द्वारा सिद्धान्तित एकमात्र सभावना को उत्प्रेक्षाबीज मानन है। विशेषना यह है कि सर्वस्वकार समावना पक्ष का सण्डन नहीं करते जब कि रत्नाकरकार शोभाकर अनिशय अथवा अध्यवसायपक्ष का स्पष्टन खण्डन करते है। विमर्शिनीकार जयरथ रत्नाकरकार को उत्तर देने और सवस्व का समर्थन करते हैं। अप्मय्यदीक्षित लक्षण में तो समावना या अध्यवसाय शब्द को छोड उपतर्क शब्द को स्थान देते हैं किन्तु वे वृत्ति में 'तर्क समावनामान्नम्, न लवन- धारणम, तदीयधर्मों हि तत्तादात्यसमावनामाश्रहेतु, न व्यापिपक्षधर्मनावहि द्ववद् अवधारणेतु- अर्थाद्-'तर्क का अर्थ यहोँ केवळ समावनामान है, निश्चय नहीं। मक में दूसरे के धर्मे का अस्तित्व दोनों को अमिन्नता की समावनामात कराता है, व्याति और पक्षधर्मनाम्युक्त हेतु के समान निश्चय नहीं । -- इस प्रकार तर्क को संभावनारूप मान समावनापक्ष के अनुयायी हैं। कदूट के आरोपपक्ष का समर्थन कोई नहीं करता, अन प्रथम और अन्तिमरप मे यह पक स्द्रट तक ही सीमित है। इस प्रकार उत्प्रेक्षालक्ष में दो ही प्रधान पक्ष उदरते हैं एक अध्यवसाय या अतिशय का और दूसरा समावना का। पण्डितराज जगनाथ के उत्प्रेक्षाविवेचन से इन दोनों पक्षों का ठीक से समन्वय हो जाता है। उन्होंने ठीक उसो प्रकार उत्प्रेक्षा में विषयभृत धर्म का अध्यवसाय माना है जिस प्रकार विमर्शिनीकार तथा भूल सवस्वकार ने। 'लिम्पतीव तमोज्ानि' इसका उत्तम उदाहरण है। यहाँ 'न्यापन'-अनुक्त है अन. निपीण है। यही दूसरे शब्दों में व्यापन का मध्यवसाय है। विमर्सनिनीकार ने उक्त धर्मे को मी अध्यवमित माना है और अध्यासाय का अर्थ केवल इतना ही किया है कि उस धर्म पर अन्य धर्म की समावना न कर उस धर्म से युक धर्मों पर उस धर्मे की समावना करना। उदाहरण के रूप में उन्होंने 'मृणालसूत्र निजवल्व- आाया '-इत्यादि पद प्रस्तुत किया है। यह अध्यवसाय समावना का अग बन जाता है, अत. दोनों में कोई विरोध नहीं होता। पण्डितराज जगन्नाथ ने भी रसमगाधर में-"तनयमनाक- गवेषण-लम्बीकृन्-जलधिजठर-प्रविष्ट-हिमगिरिभुजायमानाया भगवत्या मागीरय्या सखी"-'पुत्र मैनाक की खोज के लिए फेलाई अत एव समुद्र में प्रविष्ट हिमाचल की भुदा सी जो मगवती भागी रथी उसकी सखी यमुना'-इस उदाहरण में विषयी भुजा की लम्बाई और समुद्रपवेश के द्वारा गगारूपी विषय की स्वामाविक लम्वाई और समुद्र प्रवेश को 'अभेदाध्यवसानातिशयोकि' द्वारा अमिन्न मानकर उमय साधारण बतलाया है। -- 'एवं च विषयि-गतताटरगवेपणफलक-सम्बरवजल-
योकस्या साधारण्यसपत्तो निमितता'-पृ० २७७ निर्णयसागरीय सस्करण-६]। उनके उत्मेक्षा- प्रकरण से ऐसे अनेक उद्ग्ण चुने जा सकते है। प्रश्न यह है कि उत्प्रेक्षाबोध में वस्तुत प्रधानता किम तत्त्व की है अतिशयतत्त्व की अथवा सभावनतत्त्व की । अतिशयनत्व बुद्धिधारा को अभेद की ओर ले जाता है और समावननरवर सशय की ओर। मैं तो मुख को चन्द्र मानवा हूँ'-यह बोध वक्ा के" -- मुस और चन्द्र' दोनों मिन्न है अथवा अभिन्न"-इस मेदाभेदविषयक सशय पर भी निर्भर माना जा सकता है और "यह सुख ह अथवा चन्द्र" इस सदाय पर भी। इसी प्रकार 'चन्द्रमा कौन सा है यह (मुख) अथवा यह (चन्द्र) :- इस सशय पर भी। इन सब सदार्यों में मूछ प्रश्न एक
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ही है अभेद का। किन्तु चमत्कार अभेद प्रतीति में नहीं है। चमत्कार अभेद के संशय में मुख पक्ष को मवल वताने में है। इसलिए प्रश्न अभेद से उठता और संशय में पर्यवसित हो संशय को ही प्रधान बना देता है। यदि अभेद ही प्रधान हो चमत्कार का कारण बन जाता तो यहाँ अलंकार रूपक होता है। संशय चमत्कारकारी है इसलिए यहाँ ससन्देद्दालंकार की भी झंका की ना सकती है, किन्तु वह भी यहाँ नहीं हो सकता क्योंकि ससंदेहालंकार के सदेह वोध में दोनों पक्ष बराबर रहते हैं अर्थात वहाँ चमत्कार संदेह या संदेहविषयीभृत पदार्थो के बोध की बराबरी पर निर्भर रहता है, जब कि उत्प्रेक्षा में उपमानपक्ष की प्रवलता पर। अध्यवसाय, अतिशय या निगरण का अर्थ है साध्यवसाना गौणी लक्षणा द्वारा और रत्नाकरकार के अनुसार केवल साध्यवसाना लक्षणा द्वारा किसी पदार्थ का अन्य पदार्थ के रूप में प्रतिपादन। अर्थ यह कि उस पदार्थ में अपना असाधारण धर्मे मासित न कराकर अन्य पदार्थ का असाधारण धर्म भासित करना। ऐसा करने के लिए उस पदार्थ को उसके अपने वाचक शब्द से न कहकर जिस पदार्थ का असाधारण धर्म उसमें भासित कराना होता है उसके वाचक शब्द से कह देना। यथा 'चन्दः'। वसकाया जा रहा है मुख, किन्तु शब्द वोला जा रहा है चन्द्र। परिणाम यह कि व्यक्तिलप से भासित हो रहा है मुख, किन्तु उसमें धर्म प्रतिपादित हो रहा है 'चन्द्रत्व', मुखत् नहीं। मुख़ल तब भासित होता जव मुख के लिए मुख शब्द का ही प्रयोग होता। इस प्रकार मुख का चन्द्रत्व- धर्मे के साथ ज्ञान हो अध्यवसाय या अतिशय है। क्योंकि यहाँ मुखत् को चन्द्रत्व ने दवा दिया है इसलिए उसे चन्द्रत्व के द्वारा निगला हुआ= निगो कह दिया जाता है। यही है निगरण। उत्प्रेक्षावोध में 'मुख' आदि का मुखत्व आदि भी भासित होता रहता है क्योंकि यदाँ मुख आदि का 'मुख' आदि शब्दों से भी बोध होता रहता है। उनमें चन्द्रत्व के विधान से मुखत्व छोड़ा जाता सा प्रतीत होता है। इतने भर से उसे पूरी तरह अध्यवसित नहीं कहा जा सकता। ऐसा भांशिक अध्यवसाय तो अपहृति आादि में मी रहता है। किन्तु उनका अर्थबोध अतिशयोकि सा नहीं रह़ता। ग्रन्थकार ने अध्यवसाय को साध्य और सिद्ध इन दो भागों में निमक्त कर उत्प्रेक्षा को साध्य अध्यवसाय पर निर्भर बतला उसे अतिशयोक्ति से भिन्न सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। किन्तु यदि उनके अनुसार उत्प्रेक्षा में भी चमत्कार अतिशय पर ही आनित है तो साध्यत्व या सिद्धल केवल अवान्तरतामान्र के साथक होंगे अलंकारान्तरता के नहीं। अलंकार में मिन्नता चमत्कारक- तत्त्व के भेद से आती है। वह तो साध्य तथा सिद्ध दोनों ही स्थितियों में एक ही है अविशय।
लिया है। वस्तुतः उपतर्के या नितर्क की ओोर ले जाकर अप्पय्यदीक्षित ने अधिक स्पष्टता से काम
उत्पेक्षा के जो भेद स्वस्वकार ने प्रस्तुत किए हैं उन्हें चितन्नमीमांसा में अप्पय्यदीक्षित ने अधिक स्पष्ट किया है। उनके अनुसार वाच्य उत्पेक्षा के संभावित भेद ये हैं-
जाति जात्यमाव गुण गुणाभाव करिया क्रियाभाव द्रव्य द्रव्याभान-इन आाठ की 1 - -
उपात्तगुणनिमित्तक अनुपात्तगुणनिभित्तक उपात्तक्रियानिमित्तक अनुपात्तरकरियानिमि त्तक-इन चार से १६् २४
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६४ १६ स्वरूप् . म -इन तीन रूपों में ९६ उतपेक्षा। the फल
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२१८ अलङ्कारसर्वस्वम्
इन के नाम 'उपात्तगुणनिमित्तक जातिस्व रूपो:प्रेक्षा, उपाचगुणनिमित्तकजात्यमावस्वरूपोप्रेक्षा'- इत्यादि बनाए जा सकते हैं। इन ९६ समावित भेदों का एक सूत्र सस्कृत में इस प्रकार बनाया
ररूपहेतुफलान्यनमोत्पेक्षा इन समावित भेदों में से राक्यता के आधार पर कुछ भेद कम दो जाने है। यथा द्रव्योत्पेक्षा और द्रव्याभावोत्पेक्षा स्वरूपात्मक ही होती है, हेतुफलात्मक नहदीं। इम प्रकार उसके २४ मेदों में से १६ भेद कम हो जाते हैं, केवल आठ ही भेद शेप रहते हैं। जात्यादि ६ तत्त्वों की उत्पेक्षा में निमित्त का अनुपादान समव नहीं होता । फलत उनके केवल २४ ही भेद शेष रहेंगे। इम प्रकार स्वरूपोत्प्रेक्षा में तो ३२ के ३२ ही प्रकार रहेंगे किन्तु हेतु और फळ की उत्पेक्षा में केवल १२, २ भेद होंगे। फलत, उन दोनों के प्रकार मिल्कर २४ होंगे । और इस प्रकार स्वरूप, हेतु तथा फल तीनों की उत्प्रेक्षाओं के कुल मिलाकर ५६ प्रकार दोंगे। किन्तु ये प्रकार केवल वाच्य उक्ेक्षा में हो होंगे। प्रतीयमान उत्प्रेक्षा में निमिच का अनुनादान स्वरूपोत्परेक्षा में भी नहीं होगा। फन स्वूपोत्कषा २ ेदों में से केवल १६ भेद ही बचेंगे । इस प्रकार १६ स्वरूपोत्पेक्षा, १२ हेनुतप्रेक्षा और १२ फलोत्पेक्षा मिलकर प्रतीयमानोत्ेश के कुल ४० इी भेद होंगे। वाच्य उत्प्रेक्षा के ५६ भेदों में मरनीयमान उत्मेक्ष के ४0 भेद मिला देने पर पुन उत्प्रेक्षासामान्य के भेद ९६ ही हो जाते हैं। पण्डिनराज जगनाथ ने एक ऐसा उदाहरण मी बता दिया जिसमें द्रव्य की भी देतुरूप से उत्प्रेक्षा निकल आती है। वह उदाहरण है- 'वराका यं राकारमग इति वतान्नि सदसा सर स्वच्छ मन्ये मिलदमृतमेतन्मखमुजाम्। अमुष्मिन् या कापि द्युतिरतिघना भाति मिपतामिय नीलच्छायादुपरि निरपायाद् गगनत ।।' -जिसे नासमझ लोग चन्द्र कहते हैं मैं इसे देवताओं का अमृतपूर्ग सरोवर मानता हूँ, और इसके बीच में जो अस्यन्न घनी नीली छाया दिसाई दे रह्दी है इसे कपर के आकाश़ा की छाया।' -यहाँ अमृन सरोवर रूप से उत्पेक्षित चन्द्रमा में विधमान किन्तु यहाँ शब्दत अकथित जो कलक है उसका कारण आकार बनलाया जा रहा है। आाकान एक द्रव्य ही है, जाति, गुण, क्रिया नहीं अन उसकी हेतुरूप से प्रेक्षा द्रव्यद्वेनुतप्रेक्षा का अस्तित्व सिद्ध कर देती है। किन्दु यह पण्डितराज जगननाय ने अपना सामय्य मात्र दिखलाया है। वे स्वयं मानते हैं कि ऐसे उदा हरण सामान्यत मिलते नहों है। इसीलिए उन्होंने स्वयं फलोतपेक्षा के मरुंग में द्रव्याफलोप्रेक्षा नही दिसलाई। और यह कह दिया कि जात्यादि भेद में कोई चमत्कार नहीं है। चमत्कार केवल स्वरूप, दंतु तथा फल भेद में ही है। मम्मट ने तो इन भेदों को मी छोढ दिया। स्वरूपादि भेदों की ककपना पहिली बार अलकारसवरव में ही मिटती है। गमन ने एक उत्प्रेक्षावयव नामक अलकार भी माना है और उसका लक्षण-'उत्प्रेक्षाहेतुरत्पेक्षा- वयद'-ऐसा किया है, किन्तु इसका हनूत्मेक्षा से कोई सम्बन्ध नहों है। सजीविनाकार औीविदयाचकवत्तीं ने उत्प्रेक्षा के सपूर्ण विवेचन का सग्रह इस प्रकार किया है -- 'गुगक्रियाभिसम्वन्धाव प्रकृतेष्यकृतात्मना। समावन स्यादत्प्रेक्षा वाच्येवाधै परान्यया।। जानिक्रियागुणद्रव्योत्प्रेक्षान सा चनुर्विधा। भावाभावाभिमानत्वे जात्यादे. साष्टया ुन।। शुाक्ियानिमित्तत्वे शेया पोहशधा तथा। दारनिरच्च निमित्तस्योपादानादन्यथा स्थिने॥ देतौ स्वरूपे चोत्प्रेक्ष्ये फले पण्गवति पुन। द्रव्ये हेतुफलात्मत्वासम्मनात तदि्मदा च्युत्ि॥ तथा प्रतीयमानाया निमित्तस्यानुपग्रः । नापि स्वरूपं कैर्मेंदेस्तरमान्न्यूना भवेदियम्। कचिच्छुलेषेण धर्माशिगतेनेषा न बाध्यते। उपभोषकमाप्येषा मवेत सापहवापि च ॥
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अतिशयोकत्यलङ्कार: २१९
--- गुण या क्रिया के सम्बन्ध से प्रकृत में अमकृत की संभावना उत्ेक्षा होती है। यह त वाच्य होती है जब इव आदि का प्रयोग रहता है जब नहीं रहता तब प्रतीयमान। उत्मेक्षा जाति, गुण, क्रिया और द्रव्य की होती है अतः उसके चार भेद हो जाते हैं। ये चारों माना- त्मक तथा अमावात्मक होते हैं, अतः उक्त चार भेद आठ हो जाते हैं। ये आठों भेद गुण को निमित्त बनाकर होते हैं अथवा क्रिया को अतः सोलह हो जाते हैं। ये सोलह भेद निमित् के उपादान और अनुपादान के आधार पर बत्तीस हो जाते है। ये बत्तीसों भेद स्वरूप, हेतु और फल रुप होते हैं अतः ९६ हो जाते हैं। किन्तु द्रव्योरप्रेक्षा हेतु तथा फल रूप नहीं होती अतः उनके भेदों की कमी हो जाती है। इसी प्रकार प्रतीयमाना वत्प्रक्षा में निमित्त का सनुपादान नहीं रहता न स्वरूपोत्ेक्षा ही, अतः उतने मेद और कम हो जाते हैं। उत्पेक्षा में कहीं कहीं धर्माश में क्लेय रहता है किन्तु उससे यह वाधित नहीं होती। यह उपनोपकमा तथा अपहबोपक्रमा भी होती है।'
-इस प्रकार स्पष्ट है कि संजीविनीकार ने उत्पेक्षा को संभावनस्वरूप माना अध्यवसाय- स्वरूप नहीं, जो मम्मटादि के मनुरूप होने पर भी मूलग्रन्थ सर्वस्व के विरुद्ध है। स्वरूप हेतु और फल तीनों में ठीक वैसा अन्तर है जैसा गौणी लक्षणा और शुद्ध लक्षणा में होता है। संस्कृत के मालंकारिक आचार्यो की विशेषता है कि वे भेद करते समय किसी विशिष्ट भेद को एक नाम दे देते हैं। और शेप बचे सामान्य भेदों को शुद्ध भेद कह देते हैं। उत्प्रेक्षा में मी हेतु और फल की उत्मक्षाओ को हेतुत्व और फलत्व के आधार पर विशिष्ट नाम दे दिया और जिस नेद में कोई असाधारण विशेषता नहीं देखी उसे अलग गिना दिया। किन्तु यहाँ उसे गुदोदेक्षा न कइकर स्वरूयोरप्रेक्षा कह दिया। कुछ आचार्यों ने इसी को वस्तुतमेक्षा कहा है। जो 'वस्तु, अटंकार और रस' इस प्रकार पसिद्ध भेदप्रत्रिया के अनुसार ठीक है। स्वरूपोत्मेक्षा जहाँ द्रव्यगत होती है वहाँ वह ध्म्युतपेक्षा कहलाती है क्योंकि द्रव्य धर्म से युक्त होता है, इसीलिए रगंगाघरकार ने उसका लक्षण स्वतन्त्र रूप से दरसाया है। किन्तु वह सदैव धर्मिगत ही नहीं होती धर्मगत भो होती है और रसगंगाघरकार ने 'धर्मस्वरूपोत्पेक्षा' शीर्पक से उसका उदाहरण स्वतन्त्र रूम से अलग दिया है। इस प्रकार कुछ लोग स्वरूपोत्प्रेक्षा को केवल धर्न्यु- स्प्रक्षा नान बैठते हैं वद भ्रम है। उत्प्रेक्षा के विकास में जो जो अंग जिस क्रम से छुड़े हैं वह क्रम कपर वद्धृत सभी आाचार्यो के उत्प्रेक्षा लक्षणों से स्पष्ट है। [सर्वस्त्र]
लक्षयति- एवमध्यवसायस्य साध्यतायामुत्मेक्षां निर्णाय सिद्धत्वेऽतिशयोक्ति
[ सू० २३ ] अध्यवसितप्राधान्ये त्वतिशयोकि:। अध्यवसाने न्यं संभवति-स्वरूपं विपयो विषयी च। विपयस्य हि विषयिणा-तर्निगीर्णत्वेऽध्यवसायस्य स्वरूपोत्थानम्। तन्न साध्यत्वे स्व- रूपमाधाग्यम्। सिद्धत्वे त्वध्यवमितम्राधान्यम्। विषयमाधान्यमध्यव- साये नैव संभवति। अध्यवसितप्राधान्ये चातिशयोकि:। अस्यान्च पञ्ञ प्रकाराः। भेदेऽभेदः। अमेदे मेद:। संबन्धेऽसंबन्धः। असंबन्धे संबन्धः। कार्यकारणपौर्या पर्यविध्वंसञ्च।
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२२० मलङ्गारसर्वस्यम् [वचि]. स प्रकार [उपर्युक्त क्रम से] अध्यवमाय के साध्य होने पर भमव उत्पेक्षा का निर्गय किया मत्र [उस अध्यवसाय के] साध्य होने पर सम अतिशयोकि का लक्षण करने हैं- [सूत् ] किन्तु [अध्यवसाय में] अध्यवसित की प्रधानता हो तो अतिशयोकि [ नाम अलंकार होता है] । २३॥ [वृचि] अध्यवसान में तीन पदार्थ रहने है, स्वर्प, विषय और विपयी। अध्यवसाय के स्वरूप की निष्पत्ति होती है तव जत विषय विपयी के द्वारा उसके अपने भीतर निगल लिया जाता है। इस [निगलने ] में यदि साध्यना रद्दती है तो प्रवान रहता है स्वरूप [निगल्ना= अध्यवसाय ही] और यदि मिद्धवा तो प्रवान होता है सभ्यवसिन [विषयी]। विषय की प्रधानना अध्यवसाय में हो ही नहीं सकती। वच अध्यवसिन [विषयी] की प्रधानता नो वह अतिश- योकि रूप से मान्य ही है। इस [ अनिशयोक्ति] के पाच भेद होते हैं। () भेद में अभेद (२ ) अभेद में भेद (३) सम्बन्ध में अमन्बन्ध ( x ) असम्वन्ध में सम्न्ध तथा (५) कारग तथा कार्य के पूर्वापरत्व रूप कम का टलटना। विमर्शिनी
एवमित्यादि। तामेव लव्यिम्माह-अध्यवसितेत्यादि। एतदेव व्याखयातुमध्यवस- यस्य ताव धथासंमवं स्वरूप दर्शयति-अध्यवसान इति। परस्परमिष्टम्यानुपपततेरध्यव- सायश्य कि विषयचिषयिम्यामितयाशङ्याह-विषयस्य हीत्यादि। विषयविषविभ्या मन्तरेणाध्यवसाय एव न भवतीत्यर्य । एपामेव विषयविभागं दर्शयति-तप्रेश्यादिना। तश्रेति त्रयनिर्धारणे। स्वरूपप्राधान्यमिति अध्यवसायप्राधान्यम्। अध्यवसितप्राघान्य मिति विधयिप्राधान्यम्। साध्यत्वं सिद्धरवं चोश्मे पायामेत निर्गातम्। नैव संभवतीति- अध्यवसायस्वरूपानुदयात्। तदेवं विपयिग, प्राधान्यविवस्ायामलंकारो मवतीस्या- अध्य वसितेर्यादि। उकं चान्यव-
तरिसिद्ताप्रतीती तु मवेदतिशयोक्किघीः ॥'इति। पञ्चेति न्यूनाधिक संमानिरासार्थम् । अत एद कार्यकारणपौर्वापर्यचि ध्वसश्य चतुपभेदान्तर्भावो न वाच्य । एतं हि भेदान्तराणामपि तदन्तर्माव एव स्याव। अमेदाद्यसंबन्धेऽपि संवन्धोपनिबन्धनात्। अय भवस्वेतदिति चेतू। न। अ्षत्र च यद्यपि सर्वत्र भेदेऽमेदादौ वस्तुनोऽसबन्धे सवन्घ एव वर्णयितुं शक्यते तथाप्य- वान्तरभेद्विववयान्यलक्वितरवादिवित्तसयासंबन्धे संवन्धस्व दर्शितावाच विभागेन निर्देश: कृळ इति मवलिरेवोकछवात्। तरक्षमानन्यायरवारकयमर्यापि चतुर्थमेदा न्तर्मावो न्याय्य। अथ 'यदि कार्यकारणयोः पीर्वापर्यविध्वसारसमान कालताय्यमा वेऽपि तथोपनिबन्धे पञ्ञमोऽय प्रकार इप्यते तद्देशकालयो. पदार्थसबनधे विशेषाभावाजिन- देशरवामानेऽपि तथोपनिबन्धे पष्टोपि भैदः परिगमनीय इति निर्विषयर्वादसंगतेरभावः प्रसग्यत' इति चेद् । नैतत्। थस्मादनिशयो क्ाव तिशयाज्य प्रयोजनप्रतिपिपादयिपया विषय निगरणेन विषमिप्राधान्य वितसितम, असगतौ तु विरुदत्वप्रायायनाय कार्यकारण योमिन्नदेशस्वमित्युभयश्राप्यहित तात् सवि्विवादो लक्षणभेद:। कार्यकार गपौर्चा पर्यविध्वंसे व चश्मकतृंकसय हृदयाधिष्ठानस्य कारणस्य स्मरकर्तृकश्य प कार्यस्य पूर्वापरीभाव नि- गीर्यं 'रवद्र्शनेनैव विपयान्तरवैसुखयेन खवदमिलापपरैष जातेश्यवि यप्रयोजन प्रतिपाद्-
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अतिशयोक्त्यलङ्गारः २२१
नार्थमन्यथात्वमध्यव सितमित्य तिशयोकिभेदरवमेवास्य न्याय्यं न त्वसंगतिभेदर्वम्। तन्न हि- 'वबन्ध धम्मिक्टमधीरदष्टे: चमानाय कध्म्पकमाठिकामिः। चित्तेधु मन्यु: स्थिरतां जगाम विपक्षसारङ्चिलोचनानाम।।' इत्यादी धम्मिसले बन्धश्चितेपु च मन्युस्यैरयमिति कार्यकारणयोर्भिन्नदेशसम्। थनैव बन्धस्तत्रैव तत्कार्यस्य स्वैयस्योपपत्तेविरुद्धत्वप्रत्यायकम्। विरोधस्य चाय्राभासमान-
अव्ययस्योल्लासा। न च वाधोदयेऽपि विरोधाप्रतीतिः। द्विचन्द्रमतोतिवदनुपपद्यमानत- या स्लल्द्वतिव्वेन तम्मतीतेरवस्थानात्। न चातिशयोकी सखलद्गतित्वम्। निश्चय- स्वभावत्वादस्या अनुपपद्यमानत्वरहाया अध्यभावात्। नहि कार्यकारणयोः पौर्वापर्य- विध्वंस उपपद्यत इत्यत्र विवनित कित्वेवं फलमेतदिति। जत एवासंगतेरतिशय।केश त्व रूप भेदोऽपीति कार्यकारणयोः पौर्वा पर्य विष्वं से नासंग तिर्भिनदेशतवेन चातिशयोकिरिति यथोक्तमेव युक्तम्। अत एव च पीर्चापर्य विपर्याससमकालस मुह वौ । कार्यकारणयोयों तो विरोधाभासपल्लवी।।' इत्यादयपि यदन्यैरुकं तद्युक्तमेवेति न न्यूनप्रकाररम्। केघिव् सर्वालंकाराणामप्यतिशयोक्ेरेव प्रभेदतवादस्या बहुप्रकारतामाचचते। तथा ह्यपमायामप्य स्त्येतन्वेदश्वस। न्यूनगुणस्य सुखादेरघिकगुणेन चन्द्रादिना साम्येऽति- शयानतिपाताव, अतिशयं विना च गौरिव गवय इत्यादावनलंकाररवात् । अतश्वा तिशयस्येव सर्वालंकारवीजभूतत्वाद् 'एकैवातिशयोकिश्र काव्यस्यार्लंकृतिर्मता' इत्युक्तम। नैतत्। इछ ह्यतिशयस्य हयी गतिः यदयं कविप्रतिभानिवर्तितः सामान्यात्मा भवत्ति, भेदेऽ्यभेद हस्येवमादिरूपो विशेपारमा वा । तनाधः सवेंरेवालकारवीजतयान्युपगतः। अन्यथा हिगौरिव सवय इत्यादावलंकारतवं स्याद। तावता पुनरेततप्रभेदतवं सर्वालंका- राणां न युकम। तच्चे हि विशेषोकायुल्लेखादीनामपि तम्मरसङ्ग । सर्वालंकाराणामपि विशे- पोवय्युल्लेखरूपत्वात्। अथ द्वितीयपक्षाश्रयेणेतदुच्यते तदप्ययुक्तम। अस्या हाध्यवसित- प्राधान्यं लक्षणम्। तच्चालंकाराणं न संभवति। तथात्वानवगमातू। अतर्श्चेपामसंभवत्त वसामान्यर्वात्कर्थं तद्विक्षेपत्वमिति बहुपकारत्वमस्या निरस्तम्। (१) इस [ उत्प्रेक्षा-प्रकरण] का उपसंहार करते और अव दूसरे [प्रकरण] का आरम्म करते हुए लिखते हैं-'एवम्'-आादि। (र ) उसी [अतिशयोक्ति ] का लक्षण करते हुए लिखते हैं-'अध्य वसित' आदि। (३ ) इस [लक्षण] की व्याख्या करने के लिए पहले अध्यवसाय का संभावित स्वरूप नतलाते हुए लिसते है-'अध्यवसान' आदि। (५) 'अध्यवसाय [ एकमात्र विपयी के ही रहने पर होता है अतः उस ] में 'परस्पर [ विषय और विपयी दोनों ] के बींच संभव ही नहीं होता, तव, विषयनिषयी की चर्चा निरर्थक है -- ऐसी शंका की कत्पना कर उत्तर में लिखते है -- 'विषयस्थ हि'। अर्थ यह कि विषय विषयिभाव के बिना अध्यवसाय ही निष्पन्न नहीं होता। (६) इन [स्वरूप, विषय तथा विपयी] का क्षेत्रविभाग दिखलाते हुए लिखा-'तन्न'-आंदि। 'तन्न'= इनमें-यह तीनों का रूप अलग अलग बतलाने के उद्देश्य से लिखा। स्वरूपप्राधान्य = अध्यवसाय की प्रधानता। अध्यवसितम्राधाल्य=विषयी को प्रधानता। अध्यवसाय में साध्यत्व
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और सिद्धत्व क्या है। इसका निर्णय अन्यकार ने उतपेक्षा के आरम्म में ही कर दिया है। 'नैच संभवति= हो ही नहों सकती इसलिए कि वैसा होने पर अध्यवसाय का स्वरू ही निम्पन्न नहीं को सकेगा। इस प्रकार जब विषयी की प्रधानना रहती है तमा यद [अतिशयोकि ] अलकार होता है; इस निष्कर्ष को स्पष्ट करते हुर लिसते है-'अध्यवसित.' आदि। दूसरे ग्रन्थ में कद भी गया है-'यह [उत्प्रेक्षा ] वहाँ मानी जाती है जहाँ अध्यवसाय में साध्यता की प्रतीति रहती है। उसमें यदि प्रतीति सिद्धता की हो तो अनिशयोकति का बोध होता है।' पाँच=पाँच ही कहकर सख्या में कमी या वृद्धि को अमभावित उद्दराया। इमीलिए 'कार्यकारणपूर्वा परत्वविपर्यय'-इस शँचवे भेद का चतुर्थ भेद में अन्तर्माव नहीं बवलाया जाना चाहिए-[जैसा कि अलकाररत्नाकरकार ने बनलाया है पृ० ५८,५९] क्योंकि वैमे तो अन्य भेद भी उसी भेद के भीतर अन्नभूत वनलाए जा सकते हैं, क्योंकि उन भेदो में भी अमेद आदि का कोई मबन्ध न रहने पर भी सम्बन्ध जोडा जाता है। यदि कहें कि 'उन मेदों का भी अन्तर्भाव चतुर्थ भैद में ही दो जाय-'तो यह ठीक नही, क्योंकि आपने हो कहा है- " 'मेद में अभेद आदि अन्य भेदों में मी यद्यपि 'असम्बन्ध' में सम्बन्ध वतलाया जा मकता है तथापि [इस 'असम्वन्ध' में सबन्ध'-नामक भेद में 'भेद में अभेद सम्बन्ध' आदि] अवान्तर भेद मानने हो पढेंगे इसलिए अन्य आाचार्यो [अटकारसरवंस्वकारादि ] ने ये [ भेद में सभेद आदि] भेद [उतसर्गापवादन्याय से] अलग गिना दिए है और अन्त में [जत अन्य अवान्तर भेद मभव न हुक तब] 'असबन्ध में सम्बन्ध नामक भेद [स्वनन्त्ररूप मे ] गिना दिया है, और इम [अलंकाररत्नाकरकार] ने भी उन्हीं के अनुकरण पर यहाँ अन्य भेदों को 'अमम्बन्ध में सम्बन्ध नामक चतुर्थ भेद से अलग करके गिना दिया है-" [अछ० रत्ना० अतिशायोकि की अुन्तिम पंकिपृ० ६१] इस प्रकार उक्त हेतु से यदि आप प्रथम तीन भेदों का चतुर्थ भेद में अन्तर्माव नहीं मानने तो उसी हेतु के रहते हुए केवल पंचम भेद का अन्तर्माँव कैसे मान सकते हैं, और यदि मान मी लें तो उसे उचित मिद्ध कैसे कर सकते हैं। और यदि [आप अलकाररत्नाकार] यहाँ यह आपति प्रस्तुत करें कि-'कारण और कार्य में [उत्पचिगन ] समानकालता [एकसाय उत्पन्न दोना ] आदि [धर्म ] वस्तुत. नही रहते तथापि यदि [कालगन ] पौवापरयं क्रम को तोड उन्हें समानकालिक आदि रूपमें चित्रिन कर अविशयोक्ति का यह पाँचवा भेद माना जाता है नो [कार्यं कारण के] देशगत अभेद [जहों काये रहता है वहों कारग के रहने] का नियम तोड़कर अतिशयोकति का एक छठा भेद भी माना जाना आवश्यक होगा, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ के साथ जिस प्रकार काल का सबन्ध रहता है उसी प्रकार देश का भी । दोनों में कोई अन्तर नईी है। और वद छठा भेद मान लेन पर असंगति सटकार का एक भी स्थल शेप नहीं रह पाएगा, वह उच्छिन्न हो जाएगी [अल० रत्ना पृ० ५९] तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अतिशयोककि औौर असगति दोनों के लक्षण अत्यन्त मिनन है। अतिशयोकति में विषय को छिराकर विषयी की प्रधानवा प्रतिपादित की जानी है और उसका प्रयोजन रहना है अतिशय का प्रतिपादन, क्योंकि अतिरायोकि में प्रयोजनीभून अतिशय ही रहता है, जब कि अमगति में प्रतिपादित किया जाना है कार्य और कारण में देश भेद [दोनों का एक स्थान में न रहकर अठग अलग रहना] और इसका प्रयोजन रहता है [परतिभासिक ] विरोध की प्रतीति। कार्यकारण के काळगत पौवोपर्य क्रम के तोहने से जो पाँचवीं अविशयोकि निष्पन्न होती है उस [-'हृदयमषिषठितम्' इत्यादि जो उदाहरण
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आगे दिया गया है उस में कारण है मालती के हृदय में 'वल्लम का अभिष्ठित होना 'और कार्य है 'काम का अधिष्ठित होना'। उनका जो स्वामाविक कारूगत पौर्वापर्य कम है उसे छिपा दिया गया है और उस पर उससे उलटा पौर्यांपर्यक्रम अध्यवसित किया गया है और इसका प्रयोजन है [ नायक के समक्ष दूती द्वारा ] इस अतिराय का पतिपादन कि 'तुन्हारे देखनेनात्र से मालती ने अन्य सब बातें छोड़ पकमात्र तुम्हें हो चाहते रहना शुरू कर रखा है। इस कारण इस स्थल को अतिशबोकि का हो भेद मानना उचित है, न कि असंगति का। असंगति का जो उदाहरण आप [ अलं० रत्ना० कार] ने दिया है उसका तात्पर्य है विरोध की ही प्रतीति में 1 उदाहरण है-'विक्रमदेव ने चम्पक मालाओं से वाँधा तो चन्दलदेवी के जूड़े को किन्तु निश्चळता को प्राप्त हुआ सौतों के चित्तो में कोप' [ विक्रमांकदेव चरित-१०५६]। इसमें 'बन्ध जूड़े में और कोप को स्थिरता चित्तों में-इस प्रकार कार्य और कारण को मलग अलन स्थान पर चित्रित किया गया। इससे विरोध की प्रतीति हुई, क्योंकि सामान्यतः यहाँ स्थिरवारूपी कार्य को वहों वतलाया जाना चाहिए था जहाँ उसका कारण वन्ध वतलाया गया था। विरोध का भी यहाँ आभास-मात्र होता है, [वह परुद नहीं हो पाता ] कयोंकि यकं विरोध का वाधक ज्वान भी उदित होता है। यह ज्ञान है 'जूडे के बन्धन और कोपकी स्थिरता के वीच वात्तनिक कार्टकारणभाव के अभाव का ज्ञान। किन्तु ऐसा नहीं होता कि वापकम्ान के होने पर विरोध द्ञान न होता हो, क्योंकि उसकी प्रतीति उसी प्रकार वाधित रूप में अन्त तक वनी रहती है जिस प्रकार एक चन्द्र में दो चन्द्रों की प्रतीति। ज्ञान के बाधित होने की यह बात अतिशयोकि में नहीं रहती। क्योंकि यह होती है निश्चयरूप ज्ञान पर निर्भर। फलतः इसमें जानके वाधित होने का सन्देह होना भी संभव है। अतिशयोकि में यह बतलाना थोड़े ही अभीष्ट रदता है कि 'कारण और कार्य का कालनत पौर्चापर्य का "्वंस संभव होता है'। यहाँ तो कैवल इतना चतलाना अमीष्ट रहता है कि 'इस पौर्वापर्य ध्बंस का फल यह है'। और इसी कारण [ न केवल प्रयोजनों में अपितु ] अतिशयोक्ति तथा असंगति के स्वरूपों में भी मिन्नता है। इसलिए यही मानना रचित है कि; अतिशायोक्ति वहां होती हैं जहाँ कार्यकारण के कालगत पीर्वापर्य क्म का अभाव वतलाया जाता है और असंगति वहाँ जहाँ कार्यकारण के देसगत एकत्व का अभाव।' और इसी कारण किन्ही अन्य आचार्य का यह कथन भी अमान्य है कि- 'कार्य तथा कारण के (१ पौर्दांपर्य का विपर्यास' तथा (२) 'उनकी एकसाथ उत्पत्ति'- ये जो दो तथ्य हैं ये ही है विरोभाभास तथा पलष (१)। इस प्रतिपादन से सिद्ध हुआ कि अतिशयोकि के [ पाँच ] भेदो में कमी नहीं की जा सकती। कुछ आचार्य [ भामह, मानन्दवर्धन, मम्मट ] सभी अलंकारों को अतिनयोकि का ही भेद मानते हैं और कहते हैं कि अतिशयोति के भेद [केवळ पाँच नहीं ] बहुत अधिक संभव हैं। जैसे उपमा भी अतिशयोक्ति का भेद है, क्योंकि उसमें भी कम गुणवाले सुख मादि का अथिक गुण वाले चन्द्र आदि से जो सान्य बतलाया जाता है उसमें अतिशय टूटता नहीं है। इसी अतिशय के अभाव में 'गवय गौ के समान'-इत्यादि उपमिति नामक प्रमाण के वाक्र्य में [ सान्य रहने पर मी उपमान ] अनं्कारत्व नहीं रहता। इसीलिए यही देखकर कि अतिशय हो सभी अरंकारों का बीज है कहा गया है-'एक अकेली अतिरयोति ही काव्य का अलंकार नान्य है। किन्तु यह ठीक नहीं है। अतिशाय जो है वह दो प्रकार का होता है (१) सामान्य (२) विशेष । विशेष यथा भेद में अमेद । ये दोनों की मेद कविप्रतिया प्रसूत होते हैं। इनमें से प्रथम ही भेद सभी आचार्यों द्वारा अलंकारों का बीज स्वीकार किया गया है। इसे नहीं माने तो
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'गवय गौ सा'-आदि वाक्य में भी अटकारत्व माना जाने लगेगा। केवल इतने से समी अलंकारों को इसी अतिशयोकि का पभेद मानना ठीक नहीं, क्योंकि सर्वालकार बोजत्व की यह वान विरेषोकि, उत्लेख आदि में भी लागू होगी, क्योकि सभी अनंकार विशेषोक्तिरूप और उब्लेख रूप होन हैं। दूसरा जो विशेषरूप है उमके आधार पर सभी अरंकारों की निपत्ति मानने का द्विनीय पक्ष भी अमान्य है, क्योंकि अतिशयोक्ि में मूलभूत विशेषता है अध्यवसित की प्रधानना। वह अन्य अलकारों में नहीं मिलती न मिल ही सकती। क्योंकि उनमें अध्यवसित के प्राधान्य का ज्ञान नहीं होना, इसलिए इन अलकारों में जब अतिशायोकि का सामान्य लक्षण लागू नहीं होना तो इन्हें अतिशयोकि के भेइ मानना समन ही कैमे है। इस प्रकार अति- योकि के भेदों की सख्या बदुत अधिक मानने की बात टिक नहीं पानी। विमर्श-विमर्शिनीकार ने यहाँ सलकाररत्नाकर के जिन अर्थो का खण्डन किया है ने ये हँ- शर्न सू० ] अध्यवमानमनिशयोकि ।वृ० दय च मेदेडभेद., अभेदे मेद, सबन्धेजमम्बन्ध, असन्दन्ये सम्न्ध इति चतुर्षा । कार्यकारणयो पौर्वावर्यविध्वसस्य चतुर्थमेदान्तर्भावात पद्चपेति न वाच्यन्, तत्रापि समानकालताधमम् धेपि (१) विध्वसपौर्वपर्यसम्वन्वस्व तत्सम्बन्धोपनि दन्धात, अन्यथा देशान्तरेणासम्वन्वेञपि तयोपनिबन्धे पछठस्यापि मेदस्य परिगणनीयतायाम् असङ- तर्निविभ्यत्वपसशाद, न हि देशकालयां पदार्थसम्बन्धे कथिद विशेष, येनेकत्र मेदत्वेन कथन- मन्यत्र तदभाव इति स्याद। [अलकाररत्नाकर पृ० ५८-५९]। २ = 'अन्न से यद्यपि-निर्देश" कृत' यह अश विर्मानीकार ने अक्षरश उदृत कर ही दिया है। इन दोनों अश्ञों के अर्थ विमर्शिनी मे ही स्पष्ट हैं। विमर्िनी में पथम 'समानकाल ताघमाव' के स्थान पर निर्णयसागरीय प्रति में 'समानन्यायतायभाव' छापा है। [सर्वस्व ] तत्र भेदेडमेदो यथा- 'कमलमनम्भसि कमले च कुवलये तानि कनकलतिकायाम्। सा च सुकुमारसुभगेत्युत्पातपरम्परा केयम्।।' अत्र मुस्रादीनां कमलाहैर्मेदेडभेद.॥ इन [भेदों ] में [से प्रथम ] 'भेद में अभेद' [नामक भैद का उदाहरण ] यथा-[सन्दरी को वक्ष्य कर ]- 'अरे कमल [चेहरा ], सो मी पानी के बिना और कमल के बीच दो नील कमल [आँसें ] और ये तीनों सोने की छटी में, [ सुन्दरी की गोरी अगवतिका में ] और वह [ छटी ] भी मुक्ुमार तथा सन्दर। भरे ये उत्पान पर उत्पान कैसा।' -- यहाँ मुख आदि का कमल आदि से है तो भेद, किन्तु बतलाया जा रहा है अभेद। विमर्शिनी मुखादीनामिति। न तु वास्तवस्य सौन्दर्यस्य कमलादैरिति। न तु कविसमर्पितेन सौन्द्येंग। अ्वत एव छ, 'अग्नातिशयाख्यमिरया दि:'तद्मिप्नायेणेवाध्यवसितप्राधान्यम्'- हतयन्तश्रोत्तर कालिको अन्थ: स्वमतिजाड्यालेनकैरन्यथा लिखित इति निश्चिनुम । अयं दि अ्भ्थकृत· पश्चारकेश्िद्िपश्चिद्ि: पत्रिकाभिलिखित इग्यवगीता मसिद्धिः। तवक्ष तैरनवधा
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अतिशयोक्त्यलङ्कार: २२५ इति। न पुनरेकत्रैव तदेव सुखादीनां कमलाद्यैर्भेंदेडप्यभेद इत्युवत्वापि 'न तु बदनादीनां कमला दिमिरमेदाध्यवसायो योजनीय' हश्यादि वचनं पूर्वापर पराहतमश्य वैदुप्यशालिनो अन्थकारस्य संभाव्यम्। [ यहाँ अभेद ] सुखादीनाम्=मुस आदि का [प्रतिपाध है] न कि वास्तविक सौन्दर्य का, कमलाधे := कमल आदि से, न कि कविकदिपत सौन्दर्य से। [ इन दोनों प्रतीकों को मिलाकर यह अर्थ निकाळा जाना अमोष्ट है-'ममेद मुख और कमलरूपी दो धर्मिओों का अमीष्ट है न कि उनके भीतर रहने वाले सौन्दर्वरूपी धर्मों का, मुख में सौन्दर्य वास्तविक है औौर कमळ में कवि- कर््पित]। अरन्थकार के ऐसा कहने से इमारा निश्चय है कि अन्थ की प्रतिलिपि करने वालोने आगे का 'अन् अतिशयाख्यम्' यहों से आरम्म होने वाला और 'तदमिग्रायेणेवाध्यवसितप्रापान्यम्'-यहाँ समाप्त होने वाला अन्यांश यहाँ नालमझी से लिख दिया है। यह पसिद्धि भी है कि यह अंश अन्यकार के बाद कुछ विद्ानों ने 'पत्निकाओं' में लिसा था। इसलिए निश्चित ही यहाँ अरसंगत यह अ्न्यखण्ड [मूल्कार की प्रति से नहीं, अपितु ] अन्य की पत्रावलो से यहाँ लिस लिया है। ऐसा इसलिए कि इस ग्रन्थांश का प्रसङ् यहाँ नहीं, अन्यव है, यहाँ यह अनुपयुक्त है। इस ग्रन्थ का विद्ान् रचयिता पक ही स्थान पर उसी समय तो यह कहे कि 'मुखादि का कमलादि से भेंद रहने पर मी नभेद है और उसी समय इसके चिरुद्ध यह भी कहे कि 'मुखादि के साथ कमलादि का अमेदाध्यवसाय नहीं जोड़ना चाहिए-ऐसा संमव नहीं। [सर्वस्व्र ] अमेदे भेदो यथा- 'अप्णं लडहत्तणअं अण्णाविअ कावि वत्तणच्छाआ। सामा सामण्णपमावइणो रहच्चिभ ण होइ॥ अत्र लडहत्वादीनामभेदेडप्यम्यत्वेन भेदः । यथा वा- 'मग्गिअलद्धम्मि वलामोडिअचुंबिएँ अप्पणा अ उवणमिप। पककम्मि पिमाहरष अण्णोण्णा हौति रसमेआा।' अन्नाभिन्नस्यापि प्रियाधररसस्य विषयविभागेन भेदेनोपनिबन्ध: । संबन्धेडसंबन्धो यथा- 'लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान्स्वीकृतः स्वच्छन्दं चरतो जनस्य हृद्षये चिन्ताज्वरो निर्मितः। पपापि स्वगुणानुरूपरमणाभावाद् वराकी हता कोडर्थश्चेतसि बेधसा विनिहितस्तन्व्यास्ततुं तन्वता।।' अत्र लावण्यद्रविणस्य व्ययसंचन्धेऽप्यसवन्वस्तन्वीलावण्यप्रकर्षप्रति- पाद्नार्थ निवद्धा। यथा वा- 'अस्या सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चनद्रो तु कान्तिप्रद्: शम्तारैकरसः स्वयं नु मदनो मासो तु पुष्पाकर:। वेदाभ्यासजड: कथं तु विषयव्यावृत्तकौतूदलो निर्मातं प्रभवेन्मनोहरमिद रूपं पुराणो सुनिः।।'
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२२६ अलङ्गारसर्वस्वम्
ससंबन्धे संन्धो यथा- 'पुष्पं प्रवालोपह्दितं यदि स्यान्मुक्ताफलं वा स्फुटविद्ुमस्थम्। ततोऽनुफुर्याद् विशदस्य तत्याम्ताम्रीष्ठपर्यस्तरुच: स्मितस्य ।।' मत्र संभावनया संबन्ध:। यथा वा- 'दाद्ोडम्म:पखृर्तिपचः प्रचयवान् वाप्प प्रणालोचितः श्वासा प्रेद्ितदीप्रदीपकलिका: पाण्डिग्नि मग्नं वपु. । कि चान्यत्कथयामि रात्रिमखिलां त्वम्मार्गवातायने
अन्न दाहादीनामम्भःप्रसृत्याद्यैरसंयन्धेऽपि संबन्ध: सिद्धत्वेनोक। 'अन्यत सौन्दयंमन्याि च कावि वर्तनच्छाया। श्यामा सामान्यप्रजापते रेखैव न संमवति॥' ( इम सुन्दरी का] सौन्दर्य कुछ और ही है और चेदरे की शोभा भी कुछ और हो। यह घोडशी सामान्य प्रजापति की रेखा भी नहीं हो सकती।' -यहोँ छटभतव अर्थाव सौन्दर्य आादि में कोई भेद नहीं है तथापि 'कुछ और ही' कइकर उसमें भेद वतलाया गया है। इमो मेद का दूसरा उदाहरण यथा- 'मागितलब्धे बलात्कारचुम्दिते आत्मना चोपनीते। एकस्मिन्नपि प्रियाधरेऽन्येडन्ये भवन्ति रसमेदाः।' -'सोजने या मँगने से पराप्त, बलाव चुम्विन अथवा स्वय उपहृत एक ही प्रियाधर में और और दी रस आाता है।' यहोँ प्रिया के अधर का एक डी रस विषयभेद से भिन्नरूप में चित्िन किया गया। सबन्य में असम्बन्ध यथा- 'लादण्य की संपति का व्यय भी नहीं गिना, महान् नलेश भी उठाया, और स्वेच्छाचारी प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में चिन्ता की आग सुरूगा दी। इवर इस बेचारी को मी अपनी सुन्दरता के अनुरूप वर न देकर नष्ट कर दिया। अन्तत. विधाता का ध्येय क्या था इस सुन्दरी की सम्दर काया गढने में।' -यहोँ छावण्य की संपति के व्यय [की गणना] के साथ संबन्ध के रहने पर भी उसका अभाव तन्त्री के छावण्य के प्रकष प्रतिपादन के लिए बतछाया गया। इसी का दूसरा उदाहरण यथा- *इस [उरवशी ] के निर्माण में प्रजापति तो कान्तिप्रद चन्द्र रहा होगा, या एकमात्र शृंगार हो जिसका रस है ऐसा स्वय काम ही अथवा पुष्पों का आकर मास चैत्र अर्थाद वसन्त ऋतु। वेद को रटने रटते जिसकी मति जह हो गई जिसका कुतूहल विषयों से इट चुका है ऐसा बूढ़ा [नारायण ] मुनि [न कि बझ्मा ] इसका निर्माण कैसे कर सकता है।' -यहाँ निर्माग के साथ पुराण प्रजापति [नारायग ऋषि न कि मक्षा ] का सबन्ध है सब मी उसका अमाव बतलाया गया। डॉ० रामचन्द्र दिवेदी ने यहाँ पुराण मुनि का अर्थ बझा किया है जब कि स्वय संजीविनीकार ने उसका अर्थ 'पुरागो मुनिर्नरसख' ऐसा किया है। दिवेटी ने पाठ भी 'पुराणो विधि' ऐेमा
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मान लिया है जो निर्णयसागर की प्रति में भी पाठान्तर में दिया हुआ है। 'पुराण प्रजापति'= इस वृत्ति का अर्थ भी उन्होंने बुड्ढा महा किया है।' असंबन्ध में संबन्ध का उदारण यथा- [कोई सफेद ] पुष्प यदि कोपलों के बीच सिले या मोतो निखरे मूँगों के वीच रखा जाय तो कदाचिव वह उस [ पार्वती] के लाल ओढों पर बिखरी उज्जल स्मिति का अनुकरण कर सकता है। [ कुमारसंभव-१]। -यहाँ [ यदि शब्द पाद का ] संमावना द्वारा [पुष्प और प्रवाल आदि का ] संबन्ध प्रति पादित किया गया है। [ क्यें कि वृक्ष में जम फूल आते हैं तव उसके पत्ते कोपल नहीं रह जाते। वे हरे होकर जरठ पल्लव वन जाते है (संजीविनी) शोमाकर ने यहाँ क्रियातिपत्ति नामक अरंकार माना है]। इसी भेद का दूसरा रदाहरण वया- 'दाह इतना है कि पसो [ प्रसृति, अंजलि] मर पानी तक सखा देवा है। माँसू इतने उमड़ रहे हैं कि वदि कोई भारी नाली=(प्रणाळ) हो तो उसमें ठीक से वह सकते हैं। साँस इतनो लम्बी हैं कि उनमे जलते दीपक की लो हिल उठती है। सारा शरीर पीलेपन में डूब गया है। और क्या कहूँ, आनकल उस [ सालती) की वे ठक तुन्हरे मार्ग की ओर का झरोखा हो बना हुआ है। चहाँ वह पूरी पूरी रातें हाथ के छत्ते से चाँदनी का प्रकाश रोकती औौर बैठी रह जाती है। -यहाँ पानी की पसो आदि से दाह आदि का सम्बन्ध नहीं हैं असंबन्त ही है, तथापि सेबन्ध सिद्ध रूप से वतलाया गया है। विमर्शिनी लम्हत्वादीनामिति, आदिशव्दाद वर्तनच्छायाया एव गहणम्। तत्नैवाभेदेऽपि भेद- विवशणात् । उत्तरार्धे हि संवन्धेऽप्यसंबन्धः । 'लावण्यद्रविणव्ययो न गमितः इत्यस्य पादनयी तन्वीलावण्यप्रकर्षप्रतिपादनार्थमित्येतत्प्रयोजनदर्शन सर्वोदाहर गोपलच्षमपरम्। संभावनयेति। नतु वस्तुताः। अत एव संबन्धस्यात्रास्तवर्वादुदाहरणान्तरमाह-दाहोडम्म इत्यादि। चाशब्दः समुच्चयार्थ: । उदहत्वादीनाम्=यहाँ आदि शब्द के द्वारा वर्त्तनच्छाया=मुखकान्ति का ही ग्रहण करना समोष्ट है। क्योंकि अभेद होने पर भी मेद की विवक्षा ससी में है। इस पद्य के उत्तरार्ध में तो 'सम्बन्ध में असम्बन्ध' है। 'लाचण्चद्रविणव्ययो न गणितः'-इस पद के तीनों चरण का 'नायिका के लावण्य का उत्कर्ष बतलाने के लिए है'-यह जो प्रयोजन दिखलाया गया है। यह सभी उदाहरणों पर लागू होता है। १सलिए यहाँ अन्य पद्यों में प्रयोजन की करपना स्वयं ही कर लेनी चाहिए। संभावनया= संमावना द्वारा सर्थात वस्तुतः नहीं। संबन्ध के अवास्तविक होने से ही एक दूसरा भी उदाहरण दिया-'दाहोडम्मः' इत्यादि। यहाँ[ 'यथा वा-का] 'वा'-शब्द समुचयार्थक है।
कार्यकारणपौर्वा पर्यवि्ध्वंसः पौर्या पर्यविपर्ययात्तुल्य कालत्वाद्वा। विपर्ययो [सर्वस्व ]
न्यथा- 'हृदय मधिष्ठितमादौ मालत्या: कुसुमचापवाणेन । चरमं रमणीवल्लभ ! लोचनविषयं, त्वया. भजता ।I'
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२१८: अलङ्गारसर्वस्वम्
:'तुल्यकात्त्वं यथा-
अयमायातः कालो ह्न्त हता पयिकगेहिन्यः।।' कार्य औौर कारण के [कालगन] पौर्वापर्य का मिटना दो प्रकार से समव है (१) पीवोवर्य में विपरीतता आने [कार्य के कारण से पइल होने ] से और (२) [कार्य और कारग की उत्पत्तिगन ] समानकासिकता से। दोनों में से विपरीतता का उदाहरण यथा- 'सुम जब नेत्रों के विषय बने तो दे रमणीवह्लम। माल्ती के हृदय में पुष्प के ही धनुप और पुष्प के दो बाण वाले [कामदेव ] ने पहदिले दी घर कर ठिया, तुमने बाद में ।' समानकालिकता का उदाहरण यया- इन्त ! यह काल [समय= वर्षा ऋत्तु और मृत्यु ] जिसमें घने मैघ उमड़ते आ रहे हैं और कुरया [कुटज ] कोहा [ = अर्जुन ], तथा कदम्व [= नीप] से बनवात सुरमिन है, इघर आया है और [उसी के साथ ] इधर पथिकों की घरवाली प्राण छोड रही हैं।' विभर्शिनी अत्र च कार्यकारणपौर्वापर्यविध्वंस डूश्यनेन प्रसिद्धयो कार्यकारणयोविध्वंसो विपर्ययस्तथा पौर्वापर्यस्थादिपश्चाकालभाविव्वेन अमिदृस्य क्रमाय विध्वंसो व्यश्ययः सदभावो वेर्यपि भेदव्रयं तन्त्रेगोकतम्। एव घ कार्यकारणविध्वंसस्यापि पञ्च प्रकारा:। अवान्तरप्रकारखवारपुनरेपां पञ्ञप्कारं नियमगर्भीकारेण पूर्व व्यास्यातम्। तत्र कार्यकार णयोविपर्ययो यथा- पुअसं अवभन्तं सकोअअरं मिभककांतीहूँ। सहस्सपं अरहंदशस कारण भणड़ सरस्स॥। अग्रेन्दुकान्ते. संकोचे विपययण शतपमस्य कारणत्वमध्यवसितम्। अन्न भेदेडभेद इस्येवंरूपातिशयोचिहेतुरवेन स्थिता। उत्तरे त्वर्षे सैव श्लिष्शव्दनियन्धना हेतुः। तथामाचोपनिवन्घक्षात्र वश्वस्य लावण्यप्रकर्पप्रतिपादनार्थम्। क्रमविपर्ययो यथा-'कुपि- तस्य प्रथममन्घकारी भवति विद्या ततो भ्रुकुकि, आदाविन्दिरियाणि रागः समासकन्दति, चरमं पनु', आरम्भे तपो गलति पश्चातह्वेद्सलिलम, पूर्वमयशः स्फुरत्यनन्तरमघर' इति। अत कोपकाये विद्यासुकुटयादीनामन्धकारीमवनादो कम निगीयं तदविपर्ययो घ्यवसितः । तस्यैव सदभावो यथा- 'रद्भवणाहि परिभषो मसण मगिमेहलाणिअंवाहिं। एजजा हिअआहि समोसरति सम ससिमुह्ीणस्।' अग्र परिजनादीनामपसरणे क्रमिकरवेऽपि समकालत्वमव्यवसितम् । एवमेण सर्वे- पामेव भेदानां लोकासमचद्विपयर् दर्शयितुभाद- यहाँ 'कार्यकारण-पौर्धापये-विध्वस'-इसी एक ही शब्द से- '(१) कार्य और कारणरूप मे प्रसिद्ध पदार्थो में [कार्यकारणभाव का] विछंस अर्थाद उलटाव=कार्य का कारण बनना और कारण का कार्य, [ = अर्थात कार्यकारणविष्वंस ]। - (२) कार्य और कारण क्रमनः बाद में और पहले होने का जो प्रमिद्ध पौर्दाप ये [कारण की उत्पत्ति पहले होने और कार्य की वाद में का] कम है उसका विध्वंस= उलटा दिया जाना अथवा-
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(३ ) दोनों की सहोत्पत्ति - -ये तीनों भेद बतला दिए गए है। इसके अतिरिक्त यह जो कार्यकारण के पौयापर्य के विपरयय का भेद है इसमें [ अतिशयोकि के मेद में अभेद आदि ] पाँचों भेद भी आ जाते हैं किन्तु ये भेद अवान्तर भेद हैं [ अर्थाव प्रमेद हैं] इसलिए [अतिशयोक्ति के ] इन सब [भेदों] के पाँच पाँच भेद अतिशयोकि के नियम को चिस्त में रखकर [उत्प्रेक्षाअकरण के अन्त में] पहिले ही [इमनें] स्पष्ट कर दिए है। इन [ तीनों ] भेदों में से [ प्रथम मेद ] कार्यकारण के विषर्यय=उलटाव का उदाहरण, यथा- 'एतावदबदाते संकोचकरं मृगाङकान्तीनाम्। सहत्रपत्रकमरविन्दस्य कारणं सवति सरसः ॥ १ ॥ -- 'तालाव से निकले अरविन्द की इतनी उज्जवक हजार मँसुढिएं चन्द्रमा की कान्ति में संकोच का कारण कही जा रही हैं।' -यहाँ चन्द्रमा की कान्ति के प्रति उलटे कमल को संकोच का कारण बतला दिया गया है [जब कि चन्द्रकान्ति ही कमलसंकोच का कारण मानी जाती है]। उसमें कारण है अति- शयोक्ति का प्रथम मेद 'भेद में अभेद'। उत्तराध में भी वही शब्द इलेप-द्वारा निष्पन्न होकर कारण बना है। इस प्रकार के वर्णन का उद्देश्य है नायिका के चेहरे की लनाई में प्रकर्ष जतलाना। क्रम के उलटने का उदाहरण यथा- 'जो कुद्ध होता है उसकी विद्या पहिले मलिन होती है त्रुकुटी बाद में, राग उसकी इन्द्रियों को पहिले दवोचता है नेतों को बाद में, उसका तप पहिले गिरता है पसीना वाद में, अपयश पहले फरफराता है अघर बाद में।' -- यहाँ विद्याभ्रुकुटि आदि का मलिन होना कोपज कार्य हैं तथापि उनके [ उत्पत्ति-] कम में विपरीतता अध्यवसित की गई है। कार्य-कारण-पोर्वापर्य-धंस में सहभाव यथा- 'रतिमवने्यः परिजनो मसृणं मणिमेखला नितम्वेभ्य: । लज्जा हृदयेभ्यः सममपसरन्ति समं शशिमुखीनाम्।' -'चन्द्रमुखी सुन्दरियों के रतिभवनों से परिजन, नितम्वों से मणिमेखला और ह्ृदयों से न्ज्जा एकसाथ चुपके से खिसक रही हैं।' -यहाँ परिजन आदि का निःसरण=खिसकना होता तो एक के बाद एक करके है किन्तु उसमें अध्यवसित किया गया है समकालत्व। अब इन सब भेदों के विषय में वतलाते हैं कि ये लोकभूमिका पर संभव नहीं हैं, [केवंळ काव्य या कनिकर्म की भूमिका पर दो संभव हैं ]- [सवस्व] एपु पञ्चसु भेदेपु भेदेडमेदादिवचन लोकातिकान्तगोचरम्। अतश्चा- चातिशयाख्यं यत्फलं प्रयोजकत्वान्निमित्तं तव्राभेदाध्यवसायः। तथा हि 'कमलमनम्भसि' इत्यादौ वदनादीनां कमलावैर्भैदेऽपि वास्तवं सौन्दर्य कविसमपितेन सौ-दर्येणाभे देनाध्यवसितं भेदे5भेदवचनस्य निमित्तम्। तभर च सिद्धोऽध्यवसाय इत्यध्यवसितप्राधान्यम्। न तु बदनादीनां कमलादि- मिरभेदाध्यवसायो योजनीय:, अभेदे भेद इत्यादिपु प्रकारेष्वव्याप्तेः। तभ्
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हि 'अपणं लडहत्तणअं' इत्यादौ सातिशयं लडद्ृ्त्वं निमित्तभूतममेदेनाध्य- वसितम्। पवमन्यप्रापि घेयम्। तदमिग्नायेणैवाध्यवसित प्राधान्यम्। मका- रपञ्चकमध्यतकार्यकारणभावेन या प्रकार: स कार्यकारणताथयालंकार- प्रस्तावे भपञ्चायं लक्षयिष्यते। इन पार्चों भेदों में 'भेद में अभेद' आदि कवन लोकोचर [कविप्रतिमा की ] भूमिका पर निर्मर रहता है। और इसी कारण इन्में जो-'अतिरय' नामक फल है जो [अतिशयोकि का] निष्पादक होने से निमित भी है उसमें अभेदाध्यवसाय का प्रतिक्ा मानो गई। उदाहरणार्थ- 'कमल बिना पानी के'-आदि स्थर्ला में [ नायिका ]-मुस आदि का कमल आदि से भेद रहने पर भी वास्तविक सौन्दर्य को जो कविसम्पित मौन्दर्य से अमिन्न प्रतिपादिन किया गया वह निमित् बना [इस विधा को ] 'मेद में अभेद' [-विधा] नाम देने का। और यहाँ जो अध्यवसाय हुआ वह सिद्ध अध्यवसाय है। रसलमि प्रधानता हुई अन्यवसित [ बिषयो, कमलादि] की। यहाँ 'मुस आदि से कमल आदि का अमेदाध्यवसाय है' ऐसी योजना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वैसा करने पर 'अभेद में भेद-आदि प्रकारों में लक्षा नही जाएगा। क्योंकि उनमे 'बुछ और ही है सौन्दर्य इत्यादि में अनिवययुक्त सौन्दर्य ही निभित्त होकर अव्यबसित हुआ है और इसी प्रकार अन्य भेदों में भी। उसीके अभिप्राय से कहा कि 'प्रधानना अध्यनमिन का रहषती है'। पाँचों मेदों में जो भेद कार्यकारणमावमूच्क है कार्यकारणभावमूलक अन्कारों के प्रकरण में उसका लक्षण एक बार और बनलाया जाएगा किन्तु वह केवल विस्तार या स्पष्टीकरण की दृष्टि से। विमर्शिनी पध्वित्यादि। पव्विति विषयसक्षमी। एप चाव यव निर्देश । लोकातिकाननेति। कवि- प्रतिभानिमितमेव सातिशय वसयेयाँ विषय इर्यर्थ। अन्नेति भेदपझके। पशब्दः प्रमे- यान्तरसमुच्चयार्थः । फलमिति। तस्पैव प्रतिपिपाद्यिपितत्वात। तन्रेति। ब्रा।तवस्प सौन्दर्यस्य कविसमर्पितेन सौन्दर्येणाभेदवचने। नमषु चात्र वदनादीनां कमलाद्व्यद सायः परतीयत इति कथमेतदुककमित्याशङ्टयाह-न लित्यादि। कुतश्व तेथ्वन्यासिरित्या शइयाह-तन्र होत्यादि। कमलमनम्भसीत्यम्न हि यदि वदनादीनां धमिणाममेदाध्यव साययोजनं कियते ततत्य धमिगतवेनैवैष्ेरिह धर्माणों न स्यादव्याहिः। अतश्र पूर्वत्र धर्माणामेवाध्य वसायो योजनीयो येन सवत्रैक एव पक्ष: स्यादिति तात्पर्यार्य । उपच्चयं चैततु। यावता हाध्यवसित प्राधान्यमस्या लक्षणम्। तच्च धर्मिणामस्तु धर्माणा वेति को विशेषो येनाउ्यापि स्याद्। प्रत्युत धर्मयोरभेदा्यत्रसायाग्युपगमे उपमाद्गीनामप्यति- दायोकिय्रसम्ग: स्याद। तम्रापि धर्माणामेव भेदेडमेदविवचणात्। एव च विज्ञानीयतवेन भेदे धर्मयोरप्यध्यासि. प्रसज्यत इश्यलमसूदृतग्रन्यार्धोदीश्णेन। प्रपन्राथमिति। न तु निर्णयार्थम्। इहैच सस्य निश्चितरवाव। प्रपतवश् तत्नेव दर्शविष्यते। पधु-इनमें यहाँ सप्तमी विषय अर्थ में है। और [ इनमें के] 'इन' का अर्थ है अवयन। लोकातिक्रान्त=कविप्रतिमानिमित एतएव अतिशय से युक्त वस्तु ही इन मेर्दा का विषय है। अम्र= इनमें मर्थात् पा्चो भेदों में। 'च= और प्रयोजन है-अन्य प्रमेय [ अर्थ] का रुमइ। फलम्-क्योकि फळ ही का प्रतिपादन अमीष्ट रहता है। 'तत्र-यहाँ) अर्थात वास्विक सौन्दर्य के कविसमपिंत सौन्दर्र के साथ मभेद के कथन में।-शंका होती है कि "यर्श प्रवीति होती है
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अतिशयोक्त्यलङ्गार: २३१
सुख आदि पर कमल आदि के अध्यवसाय की और कहा जा रहा है कि 'प्रतोत होता है अध्यव- सित', यह कैसे"-इसके उत्तर में लिखते हैं-तन्र ह। तात्पर्य यह कि 'कमल बिना पानी के- यहाँ यदि सुसादि धर्मों का अभेदाध्ययसाय किया जाय तो वह केवल धर्मियों में हो रहेगा, धर्मो में नहीं होगा इसलिए अव्याप्ति होगी ? इस कारण पहिले अमेदाध्यवसाय धर्मों में ही मान किया जाना उचित है जिससे सभी भेदों में एक ही योजना रहे। [कुछ लोगों का कहना है कि ] यह तो उपलक्ष्यमात्र है क्योंकि इस अतिशयोक्ति का लक्षण है 'अध्यवसित की प्रधानता, वह अध्यवसान ध्मों का हो सथवा धर्म का, कोई मन्तर नहीं पड़ता इसलिए अव्याप्ि की वात नहीं बनती। बल्कि धर्मों में अभेदाध्यवसाय मानने पर उपमा में अतिशयोकित्व जाने का भय रहेगा, क्योंकि वहां भी धर्मों में भेद के रहते हुए भी अभेद की विवक्षा रहती है।' [ किन्तु] ऐसे तो धर्मों में लक्षण लागू न होगा क्योंकि उनमें भी भेद रहता है क्योंकि वे परस्पर में विजातीय होते हैं। इसलिए उत्ा क्रम से [ 'उपलक्ष्य' कहकर] जो मूल अरन्थ की व्याख्या की गई है वह असद्ृत है, उसकी चर्चा से विराम लेना ही अच्छा। [यह कवाचित अलंकाररत्नाकरकार के 'अध्यवसाने च सर्वत्र'-से लेकर 'निर्विषयत्वप्रसंगादित्यकं बहुना' यहाँ तक पृष्ठ ५९ [U.B.A. Poona १९४२] पर विद्यमान विवेचन का सांकेतिक खण्डन हैं। प्रपज्ञार्थ न कि निर्णयार्थ। क्योंकि निर्णय तो यहीं किया जा चुका है। गपंच [विस्तार मात्र शेप है सो वह आगे [ विशेषोति औौर असंगति के वीच] बतला दिया जायेगा। विमर्श :- सतिशयोकि का पूर्वेतिहास = भामह = 'निमिचतो बचो यत्तु लोकातिक्रान्तगोचरम्। मन्यन्तेडतिशयोकति तामलक्गारतया यथा॥ स्वपुष्पच्छविद्दारिण्या चन्द्रभासा तिरोहिता। अन्नमीयन्त मृङ्गालिवाचा सप्तच्छददुमा:॥ अपां यदि त्वक शिथिका च्युता स्यात फणिनामिव। तदा शुक्लांशुकानि स्युरजप्वन्भसि योषिताम्।। इत्येवमादिरुदिता गुणातिशययोगतः । सवनातिशयोकिस्तु तर्कयेव तां चथागमन्। सेपा सवैंव वकोकिरनवार्थो विभाव्यते। यत्नोडस्यां कविना कार्य: कोडलद्कारोडनया. बिना॥' [२८१-८५] -किसी निमित से कथित जो लोकोत्तर [२८-८५] उक्ति वही अतिशयोकि और उसी को अलंकार मानते हैं [ ८१ ] उदाहरण [१]= अपने पुष्पों की कान्ति चुराने वाली चाँदनी में छिपे सप्तपर्ण [छवितवन ] वृक्ष भौरों की गूँज से अनुमानित किए गए [८२] औोर [२] यदि पानी से कोई झीनी तवचा निकले जैसे सापों से निकलती है [ कैसुल ] दो उससे जलकोडा निरत सुन्दरियों के आँग पर [पारदर्शी ] भावरण वस्त्र बनाया जा सकता [ ८३] [जिससे अंग छिपें नहीं, स्मरणीय कालिदास का 'संदष्टवसम्नवलानितम्वेपु०' १६ सर्ग ]। -इन और ऐसे ही अन्य स्थकों में अतिशयोकति मानी जाती है। यहाँ गुणों में अतिशाय जो ला दिया जाता है[ ८४]। यह जो अतिरायोति है यही पूरो की पूरी वक्रोक्ति है। सामान्य अर्थ में इसी के द्वारा विभावन-[ रसनीयता, चमत्कार]-शक्ति आती है। मत्येक कवि को इस दिशा में सचेष्ट रहना चाहिए। इसके बिना कोई भी अवंकार निष्पन्न नहीं होता[ ८५]। अलंकारसर्वस्वकारने 'लोकातिकान्तगोचर' -शब्द और निमित्त शब्द मामइ से ही लिए हैं।"
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मामह का प्रथम उदाहरण मीलित या सामान्य का उदादरण हो सकता और द्वितीय उत्तरालंकार का । किन्तु द्वितीय में 'यदि'-से निष्पन्न होनेवाली अतिशपौकि मी हो सकनी है। वामन= उत्पेक्षेवातिशयोक्तिरिति केचित, तन्निरासार्पमाह-
[ पृ०] समाव्यस्य धर्मस्य तदुस्कर्पस्य च कत्पनातिश्वयोकि:। यथा- 'उभौ यदि व्योम्नि पृथक प्रवाहावाकाय्यगङ्गापयसः पतेताम्। तेनोपमोयेत तमालनीलमामुक्तमुकताळतमस्य वक्षः॥ माघ ॥ यभा वा- मलयजरसविल प्तनवो०'। -कुछ आचार्यो का कहना है कि 'उत्पेक्षा ही अतिशयोकि है।' इमका निराकरण करने के लिए [उत्प्रेक्षानिरूपण के तुरन्न पथ्चाव अतिशयोकि का लक्षण दिया-] [सूत्र ] संाव्य धर्मे और उसके उत्कर्प की कवरना अतिशयोकि। [वृष्ति] यथा='भौकिक की माला की दो एडियों से विभूषित भगवान् कृष्ण के तमाल नील वक्ष की तुलना आकाश से की जा सकती है, यदि उसमें आकाशगँगा के जल के दो पृथक् प्रवाह ऊपर से नोचे की ओर बहने लगें।' और- 'श्वेत प्रसाधनों से युक्त ्वेतामिसारिकाएँ चाँदनी में अलग समझ नहीं पहती अत निर्भय छोकर वे अपने प्रिय के स्थान तक पदुँच जानी हैं। निश्चित हो दोनों उदाइरण मामह के उदाहरणों के समानाथंक उदाहरण है। उद्धट= 'निमित्ततो बचो यत्तु लोकाति कान्तगांचरम्ं। मन्यन्ते5्रतिशयोकि तामलकारतया धुधा.॥। श११।। मेवेजनन्यत्वमन्यत्र नानातं यत्र बध्यते।
कार्यकारणयोयंत् आशुमावं समालम्भ्य वध्यने सोडपि पूर्ववद । र।१३।। उदाहरणानि- तपसनेजसपुरितया निज्ळावण्यसंपदा। कृशामप्यकृशामेव दृदय मानामसरायम।। अचिन्तयच्च भगवानहो नु रमणीयता। तपसास्या: कृतान्यत्वं कौमाराद् येन लक्ष्यते।। पतेद् यदि शशिदयोतच्छटा पञ्मे विकासिनि। मुकतफलाक्षमालाया: करेडस्या: स्याद तदोपमा।। मन्ये व निपनन्त्यस्या कटाकषा दिश्ु पृष्ठत:। प्रायेणाग्रे तु गच्छन्ति स्मरवागपरम्पराः॥ -[भगवती पार्वती ] तप से उत्पन्न नेज से चमचमानी अपनो लावण्यसंपत्ति से कृश होने पर मा निश्चित मकश लगती थीं। -- [ पार्वतीजी को देखकर ] भगवान् ने सोचा थोहो किननी अहून है इसका सौन्दर्य। दष ने इसे कुमारी से मिन्न [झुवती ] बना दिया है। -[पावतीजी के] हाथ में रखी मुक्तानिरमित जरनाला की उपमा सब हो सकती है मत चन्द्रमा की कान्नि कमल में पढे।
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अतिशयोक्त्य लङ्गार: २३३
-[ कदाचिव पार्वती जी का ही वर्णन ] और मुझे कुछ ऐसा लगता है कि इसके कटाक्ष चाद में गिरते हैं काम के वाणों का तोता प्रायः पहिले ही लग जाता है। इनमें प्रथम उदाहरण भेद में अभेद का, द्वितीय अभेद में भेद का, तीसरा असम्बन्ध में संबन्ध का तथा चौथा कार्यकारण के पौबांपर्य के उलटने का उदाहरण है। इससे स्पष्ट है उद्भढ ने 'संबन्ध में असम्बन्ध' नामक भेद नहीं माना है। किन्तु कार्यकारण पौर्वापर्य-विपर्यय को अवश्य स्वतन्त्रभेद वतलाया है। वह भी स्पष्ट हो है उल्ह्ट का आाधार भामह का ही अतिशयोक्ति विवेचन है। रुदट=रुदट ने अतिशयोक्ति नाम से एक कोई स्वतन्त्र अलंकार नहीं बतलाया। सलंकारों के एक वर्ग को अतिशय नाम दिया है ठोक उसी प्रकार जिस प्रकार एक वर्ग को ास्तव और एक वर्ग को भपम्य। अतिश्यवर्ग में उन्होंने (१) पूर्व (२) विशेष (३) उत्प्रेक्षा (४) विभावना (५) तद्गुण (६) अधिक (७) विरोध (८) विषम (९) असंगति (१०) पिहित ( ११) ज्याघात तथा (१२) अह्ेतु ये १२ अलंकार माने हैं। इनमें प्रथम 'पूर्व' अलंकार कारणकार्य- विपयय नामक भेद का ही दूसरा नाम है। उसका लक्षण- 'यत्रातिप्रनळतया विवक्यते पूर्वमेव जन्यस्य। मादुर्भाव: पश्चाज्जनकस्य तु तद् भवेत पूर्वभ् ।' -जहाँ अतिपवलता मर्याद कारण के द्वारा विना व्यापार के ही कार्योत्पत्ति बतलाने की इच्छा से कार्य की उत्पत्ति कारण की उत्पत्ति से पहिले ही वतला दी जाती है वह है पूर्वम्। थथा- 'जनमसुलभमभिलपतामादौ दन्दह्यते मनो यूनाम्। गुरुरनिवारप्रसर: पश्चान्मदनानलो ज्वलति ॥' -- असुलम व्यक्ति को चाहने वाले युवकों का मन पहले ही जलता है भयंकर और अप्श- मनीय मदनानल बाद में सुलगता है। अतिशयसामान्य का लक्षण स्ट्रट ने इस पकार दिया है- "यन्नार्थधर्मनियमः प्रसिद्धिवाघाद् विपर्ययं याति। कश्चित कचिदतिलोकं स स्वादित्यतिशयत्तस्य ।। ९१ ।।" - भाव यह कि जहाँ पदार्थ सौर उसके धर्मे की पकतिक व्यवस्था प्रसिद्धि के विरुद्ध सलटी प्रतिमादित की जाती है वहाँ उसकी यही अतिलोकता अर्थात् लोकातीतता अतिशाय कदलाने लगती है। ठीक ऐसा ही एक अन्य 'पूर्व' नामक अलंकार रुद्ट ने औपम्यबर्ग में भी गिनाया है- 'यत्रैकविधावर्थी जायेते चौ तयोरपूर्वस्य। भभिधानं भाग्मवतः सतोऽभिवीयेत तत पूर्वम् ॥८ा९७॥ -अर्थात् उपमानोपमेय किसी एक कार्य से युक्त हो रहे है उनमें से उपमेयभूत पदार्थ भले ही उपमानसदृश वर्णित कार्य से युक्त साथ साथ या वाद में हो रहा हो परन्त यदि उसे उपमान की अपेक्षा पहिले ही नैसे कार्य से सुक वतला दिया जाए तो नहां पूर्व नामक अछंकार होता है। यथा- 'काळे जदकुला कुलद शदिशि पूर्व वियोगिनीवदनम्। गलद विरलसलिलभर पश्चादुपजञायसे गगनन्।। ८।९ ७। -मेघकुलों से दशों दिशाओं को आकुल करने वाला समय अर्थात वर्षाऋतु जव आती है तो वियोगिनीवदन अविरलजलस्रावी पहले हो जाता है, आकाश वाद में ।।'
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२३४ मलङ्गारसवस्वम्
-उपर्युक्त उदादरण तथा इस लक्षण से यह तो स्पष्ट होता है कि रुदट के मन में अनि- शयोकि का पूर्वाचार्य प्रतिपादित रूप है किन्तु वे मामह या उद्भट के अनुसार इसको स्वतन्त्र अमंकार नहीं मानने। यहाँ एक यह भी ध्यान देने योग्य नध्य है कि वामनाचार्य ने उत्प्रेक्षा को अतिघ्ययोकित से अमिन्र मानने बालों का स्पष्ट खण्डन किया है और उनके परवची रुद्रट स्पष्ट रूप से वैसा मानते हैं। निश्चित ही वामन के पूर्व अरकार-संप्रदाय की कोई और मी कड़ी रद्दी दोगी जो अब अनुपलम्ध है किन्तु रुद्रट को उपलब्ध थी। मम्मट='निगीर्याध्यवसानं तु प्रकृतस्य परेण यद। प्रस्तुतस्य यदन्यत्न यधथोंक्ती च कस्पनम्।। कार्यकारणयोयंश् पौर्वापर्येविपर्यय विज्ञेयातिनयोकि मा। -(१) उपमान द्वारा उपमेय का निगरण, (२) प्रसतृत की अन्यरूपता, (३) यदि शब्द के अर्थे की उकि द्वारा अममावितार्थ की कल्पना तथा (४) कार्ये और कारण के पौर्वापर्य का विपरयय यह सव अतिशयोक्ति अलकार है। इममें से मम्मट ने प्रथम का उदाहरण 'कमल- मनम्मसि', द्वितीय का 'अण्ण लडहत्तणअम्' तथा चतुर्थ का 'हृदयमधिष्टिनम्' ही दिया है। तृतीय का अवद्य-
तस्या मुख वदा साम्यपराभवमवाप्नुयाव।।' -पूर्णिमा में चन्द्रबिम्व यदि कल्करहित हो तो उसका सुख साम्य का तिरस्कार वठा सकता है, यह नया उदाहरण दिया है। • इम प्रकार मम्मट ने मी अतिशयोक्ति के चार ही भेद माने हैं। सबन्ध में असबन्ध नामक भेद उद्भट के ही समान उनके विवेचन में नहीं मिलता। शोमाकर- ने अतिशायोकि के यघर्थ अर्थाद असवन्ध में सबन्ध भेद के किए-यद्यर्थोक्ताव- संभाव्यमग्नस्य क्रियातिपत्ति ='यदि' आदि शब्दों के अर्थ के द्वारा जहाँ अ्सभाम्यमान पदार्थे की कल्पना की जाय वह़ क्रियातिपत्ति',-इस प्रकार क्रियातिपत्ति नामक एक स्वतन्त्र अलकार माना है और उसका उदाहरण 'पुष्प प्रवाळोपहितम्' पद् ही दिया है। उनका अतिशयोकि सम्बन्धी शेष विवेचन पहले आा ही चुका है। इन्होंने एक अतिशय नामक अटकार और माना है, किन्तु उसका अतिशयोकि से कोई संबन्ध नहीं है। अप्पय्यदीघित=परवर्ती अप्पय्यदाक्षित कुवलयानन्द में तो (१) रूपकातिशयोकिन (२) सापङवातिशयोवित (३) भेदकातिनयोक्ति (४) सन्वन्धातिशयोंकिन (५) असम्बन्यातिदायोकित् (६) अक्कमातिशयोक्ति (७) चपलातिशयोकति तथा अत्यन्नातिशयोकनि नामक सान भेद मानते और अन्तिम तीन भेदों में कार्यकारणपौर्वापर्यविपययमूलक अतिरायोकनि मो रवीकार करते है, साथ हो अपनी ओर से स्वनन्त वत्तन उदाहरण भी देने है, किन्तु चित्रमीमामा में वे केवल चार भेद ही प्रतिपादिन करते ईै मेरेडमेन, अमेदेडमेदे, सुम्वन्धेसम्बन्ध और असम्बब्धे सम्बन्द। कार्यकारणगेवोपर्यविपयय को वे छोड देने है। चित्रमीमांसा में उनने अतिशयोक्ति का रूक्षण इस प्रकार किया है- विषय स्यानुपादानाद विषय्युपनिवध्यते। यत्र सातिशयोति: स्याद कविप्रौढोति निमिदा।।'
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अतिशयो कत्य लंकार: २५
पण्टितराज जगनाय :- लक्षण-'विपचिणा विषयस्य निगरणमतिशयः तत्योकिः। अर्थाव-विषयी द्वारा विपयका निगरण होता है अतिशय और उसकी उक्ति =अतिशयोकि। पण्डितराज ने जो उदाहरण दिए है उन में उन्होंने सर्वस्वकार द्वारा प्रतिपादित पाँचों भेद नामोल्ेखपूर्वक घटाए है। और अन्त में उन्होंनें इन सभी भेदों के उया लक्षण के समन्तय का प्रचत्न किया है। एतदर्थ उन्होंनें प्राचीनों के अनुसार 'एतद्भेदपज्जकान्यतमत्वम्'='इन पाँचों भेदों में से कोई' -- यह सामान्य लक्षण किया है। किन्तु उन्होंने नव्यों के अनुसार केवल प्रथम - निगरण मूलक भेद को ही अतिरयोकति वतलाया है और अन्य मेदों को अन्य कोई अलंकार, किन्तु उन अलंकारों का नाम नहीं बतलाया। 'भेद में अभेद का, अमेद में मेदका, सम्बन्ध में असन्न्रन्धका, असम्बन्ध मे सम्बन्ध का और कार्यकारण के कमविपर्यय में वास्तविक क्रम का निगरण' माना जा सकता है, किन्तु यह निगरण वैसा निगरण नहीं होगा जैसा 'कमलमनम्मसि' आदि में विषयी द्वारा विषय के निगरण में होता है जहाँ विषय का जान उसके अपने धर्म के साथ नहीं होता। [उसमें विषयी के धर्म का ही ज्ञान होता है] क्योंकि प्रथम भेद के अतिरिक्त अन्य सब भेदों में विषय का ज्ञान भी होता ही रहता है। इसी अभिनाय से पण्डितराज ने चद्द एंकि लिसी है-'नतु प्रस्तुतान्यत्वमेदे भेदेनाभेदस्य, असम्बन्धे सम्बन्ध इति मेदे संबन्धेना- सम्बन्धस्थ, सन्यन्धेऽसम्बन्ध इति भेदे असंत्न्धेन सम्बन्धत्य कार्यकारणपौर्दापर्यनिधर्यये च तेनै- वानुपूर्व्यस्य च निगरणं रत्नाकर-विमार्शिनीकारायुक्ककमेण संभवतीति चेव न, अन्यत्वादिभि: [सार्धन् ] अनन्यवस्तु-प्रतीतेरेव चमत्कारिलम्, न रवनन्यत्वादिभि: [केवलै:], तेपाम- नुमवासङ्गतेः । पूर्वोंक्त 'अन्यतमत्व' द्वारा संभव निर्वाद पर भी ने कटाक्ष करते हुए नव्यों की ओर से लिखते हैं-'न चान्यतमत्वमनुगतमिति शक्यते वक्तुम्, विच्छित्तिवेलक्षण्ये सनि अन्यतमत्वस्या- प्रयोजकत्वाद ।'-'अन्यतमत्व पॉचों भेदों में लागू नो हो जाता है किन्तु वह पाँचों मेदों को एक अलंकार सिद्ध नहीं करा पासा, क्योंकि पाँचों में जो चमत्कार है उस में अन्तर है। पण्डितराज के इस विवेचन की जड़ में जो दुर्वलता है वह वहीं पकड़ में आ जाती है जहाँ वे द्वितीय से लेकर पाँचवे भेद तक के चार भेदों को अलंकारान्तर तो करार देते हैं किन्तु उनका नाम नहीं ले पाते। सच यह है कि इन सब भेदों में सामान्य धर्म है 'लोकातिकान्तगोचरता'। और इसे पूर्षवर्ती समी आचार्यों ने स्वीकार किया है। यहाँ इसी से चमत्कार होता है इसलिए अन्य अलंकारों में इसके रहने पर भी वन्हें अतिशयोकि नहीं कहा जाता, क्योंकि वहाँ चमतकार के दूसरे दूसरे कारण रहते हैं। पण्डितराज ने 'सम्बन्ध में असंबन्ध और 'असम्बन्ध में सबन्ध' दोनों मेदों को कुछ आचा्यों द्वारा अनभिमत वतलाया है। ये आचार्य कौन हैं यह एक गवेषणीय तथ्य है। संजीविनीकार ने अतिदायोकि विवेचन का सारसंग्रह इस प्रकार किया है- 'अमेदाव्यवसायो हि फलेतिशयनामनि। न. पुनः फलिनोत्तनाभेदे मेदो न सिद्धयति ।' 'अमेदाध्यवसाय अतिशापनामक फल में होता है, फलवानों में नहीं क्योंकि इस पक्ष में 'अमेद मैं भेद' की सिद्धि नहीं हो पाती।' विमर्शिनी
अव इस [प्रकरण] का उपसहार करते हुए अन्य [प्रकरण] का आरन्म करते हैं-
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[ सर्वस्व ] एव मध्यव सायाथ्रयमतंकारदयमुकत्वा गम्यमानौपस्याध्रया अलंकारा इदानीमुच्यन्ते। तत्रापि पदार्थवाक्यार्थगतत्वेन तेपां द्वैविध्ये पदार्थगतम- तंकारद्वयं क्मेणोच्यते- [सृ० २४] औपम्यस्य गम्पत्वे पदार्थगतत्वेन प्रस्तुता- नाम प्रस्तुतानां वा समानधर्मामिसंबन्धे तुल्ययोगिता। इवाद्यप्रयोगे ह्यौपम्यस्य गम्यत्वम्। तत्र पराकरणिकानामपाकरणिकार्ना चार्थानां समानगुणक्रिया संबन्धे अन्वितार्था तुत्ययोगिता। यथा- 'सज्जातपत्रपकाराश्चिनानि समुद्हन्ति स्फुटपाटलत्यम्। विकस्वराण्यर्ककर प्रभावाद्दिनानि पद्मानि च वृद्धिमीयु:" अन्न ऋतुवर्णनस्य प्रक्रान्तत्वाहिनानां पद्मानां च प्रकृतत्वाद्ू वृद्धिगमनं किया। एवं गुणेऽपि। यथा- 'योगपट्टो जटाजालं तारवी त्वछ्मृगाजिनम्। उचितानि तवाद्गेपु यद्यमूनि तदुच्यताम्। उचितत्वं गुणः । अम्राकरणिकार्ना यथा - 'घावस्वद्श्पृतनापतितं मुखेऽस्य निनिंद्नीलनलिनच्छद्द कोमलाडया। भग्नस्य गूर्जरनृपस्य रजः कयापि तन््या तवासिलतया च यश: प्रमृष्टम् ।' अन्न गूर्जरं प्रति नायिकासिलवयोरप्राकरणिकत्वे मार्जनं किया। गुणो यथा- 'स्वदङ्गमार्दवं द्रषुः फस्य चित्ते न भासते। मालतीशशभृल्लेखाकदलीनां कठोरता।। कठोरत्वं गुण. । एवमेपा चतुर्विधा व्याख्याता। [सृ० ] इस प्रकार अध्यवसाय पर निर्मर दो अलकारों का निरवेचन किया। अब ऐसे असकारों का निर्वचन किया जाता है जिनमें सादृश्य गम्यमान रहता है। उनमें भी दो विधाएँ रहती हैं (१) पदार्थगत और (२) वाक्यार्थंगत। इनमें से क्रम से पदार्थगत दो अ्लंकारों का निर्वचन [पहले] करते है-[विमशिनीकार ने अपहुति के आरम्भ में यहाँ के 'एवमध्य० क्रमेणोच्यते'- इम अन्थाश को उद्धृत किया है। वहाँ 'क्रमेगोच्यने' पाठ है, अतः यहों मी इमने बैसा हो पाठ चना दिया है ]- विमशिनी [सू०]'सादृश्य यदि गग्य [शब्दतः अकथित] हो और [केवल] प्रस्तुतों अथवा [केवल] अप्रस्तुतों का पदार्थस्तर पर समानधर्म-मम्बन्ध हो तो तुक्ययोगिता [होती है ] । २४ ।।
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तुल्ययोगितालक्कार: २३७
[वृ०] सादृस्य गम्य होता है जव इवादि [सादव्यवाचक पदों] का प्रयोग नहीं रहता। इस स्थिति में केवल प्राकरणिक अथवा केवल अप्राकरणिक सर्थो का ही गुण क्रिया आदि रूप समान धमों से संबन्ध हो तो उसे अर्धानुरूप तुत्ययोगिताशब्द से पुकारा जाता है। यथा- [शीष्म में ] दिन और षद्म दोनों वृद्धि को प्राप्त हुए। दोनों सज्जातिपत्रमकरांचित ये, दोनों पाटलता [ललोई ] धारण किए हुए थे मर दोनों ही विकस्वर [विकासशील] थे। [दिन पक्ष में = सज्ज = सन्नद्ध जो आतपन्र -छाते उनके अकर =समुदाय से अंचित = युक्त, पझ्म पक्ष में = सद = अच्छे नात=उत्पन्न हुए जो पन्न= पत्ते उनके प्रकर =समुदाय से अंचित = सुर्शोभित ]।. -यहां प्रस्तुत है ऋतुवर्णन, अतः उसमें दिन और पद्म दोनों हो प्रस्तुत हैं और दोनों में 'वृद्धि को प्राप्त होना'= किया अन्वित होती है। इसी प्रकार गुण के भी उभयान्वयी होने पर भी यथा- 'योगपट्ट, जटाएँ, वृक्ष की छाल, मृगचर्म, ये सब तुम्ही बतलाभ यदि तुम्हारे शरीर के लिए उचित हो।' -- यहाँ उचितत्व गुण है। [अलंकाररत्नाकरकार के अनुसार चचित शब्द नमुसकलिंग बहु- वचनान्त होने से योगपट्ट आदि अत्येक में अन्वित नहीं होता, यह एक दोप है] अमाकरणिकों का [ एक धर्मे में अन्वय ] यथा- -'नष्ट गुर्जरेश के चेहरे पर आपकी दौड़ती हुई अश्वसेना की पड़ी हुई धूल को उसकी खिले हुए नीलकमल के समान कोमल मंग वाली प्रिया ने भोछा और उसकी कीति को आपकी [वैसी ही] नसिलता ने।' -यहाँ वर्णन है गुर्जरेश का अतः उसकी स्त्री औौर भसिळता दोनों ही अप्रस्तुत है। और उनमें मार्जन= पोंछना-रूपी करिया का अन्वय हो रहा है। [अप्रकरणिकों में ] गुण का अन्वय यथा- 'तुम्हारे शरीर की मृदुता को देखने वाले किस व्यक्ति के चित्त में मालती, रशिकला और कदली की कठोरता का मास नहीं हो जाता। -यहाँ कठेरता गुण है। इस प्रकार यह बार प्रकार की होती है और उसकी व्याख्या की गई। चिमर्शिनी एवमित्यादिना। गन्यमानौपम्याश्चया इति हवायप्रयोगात्। पदार्थमिति । वाक्यार्था- पेक्षया पदार्थप्रतीतेरन्तरङस्वाद। तत्र प्रथमं तुकष्य योगितामाह-औपम्येत्यादि। एतदेव न्याचष्टे-इवेत्यादिना। सत्रेत्यौपग्यस्थ गम्यस्वे सति। प्राकरणिकानामिति द्वयो: समान- धमसंचन्धस्य संभवादेव ग्रहणसिद्धेबहुवचननिर्देशो बहना ब्रहणार्थम्। जत एव च बहूनामौपम्यग्रहणायेति न वाच्यम्। वच्यमाणोदाहर णेपु हयोरौपम्यस्योदासमानखबाद्। एवं दीपकेऽरपि जेयम्। अन्वितार्थेति। समानधर्मसंबन्धिनामत्र मावाद्। अनेनैव चास्था: पकृतानामप्नकृतानं च गुणकरियात्मकधमयोगाद् ह्वेविध्येन चतुष्प्रकारत्वमध्युक्तम्। न चास्यातिश यो किर नुमाणकतया वाच्या। तां विनापि वच्यमाणोदाहरणेव्वस्या: संभवाद्। औपम्याभावेऽपि गुणसाम्योदाहरणहयं आच्योदाहततत्वाद्ग्रन्थकवृतोदाहृतम्। यत्र पुनरी- पम्यं प्रतीयते तदुदाहियते यथा- ईर्ष्याविकारावसरे तवोचितमिदं पिये। स्सल्द्धतित्वं चचसां लीलाचट्क्रमणस्य च।
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२३८ अलङ्कारसर्वस्तरम्
अग्रोचितत्व गुण। अप्रकृतयोस्तु यथा- भूमारोद्दहनव्यग्रे सुचिरं त्वयि तिष्ठति। देवाद्य फणिनामग्रय: फूर्मश्च सुखिनी परम्।' अत्र सुखित्व गुण:। केचिच्च नायिकामिितियोः प्राकरणिकत्वं मन्यन्त इसयुदाहरणान्तरेणोदाहियते यथा-'शंभोर्यन्नखरश्मिमिः प्रणमतश्यूढामणिरवे स्थिता गह्ा चन्द्रकला च सर्वजगता बन्दतवमापादिता। युक्काया: परतापदावविपद: कन्यापितृणामसौ दूरोकार्यहिमालया कथमुमापादहयी प्राप्यते।।' अत भगवतीपाद्द्यरयैव वर्णनीयर्वाद् गह्माचन्द्रकलयोरप्रकृवततवम्। आपादनं च किया। विम्बप्नतिविम्वभावेनापीय भवति। यथा- 'छिपन्त्य चिन्तयानि पदानि हेखया स्वराजहंसानधिरद्य च स्थिता। कवीन्द्वकत्रेषु व यत्र शारदा सहस्रपत्रेवु रमा व रज्यति।' अन ववत्रपद्मयोर्विम्व प्रतिबिम्वभाव।अनेनैव चाशयेना वालंकारवार्तिके प्रन्थकृता वैशिष्टपमस्या दर्शितम्। शुद्धसामान्यरूपरवेन यथा- आस्तां बालस्य सनद्धे दे धान्यी तस्य वृदधये। एका पयप्रस्नविणी सर्वसंपरमसू: परा।' अत्र प्रस्नवणस्य शुद्ध सामान्यरुपर वम्। एवम् इत्यादिना। गम्यमानोपम्याप्रया= गम्यमान सादृश्य पर आश्रित अर्थाव इवादि का प्रयोग न होने से। पदार्थम् क्योंकि पदार्थ की प्रतीति वाक्यार्थ की प्रतीति की अपेक्षा अन्तरग [ पूर्वव्ती ] होती है। पदार्थगत इस वर्ग के सटकार में पहले तुत्ययोगिता का लक्षण करते हैं- 'औपम्य। इसी की व्याख्या करते हैं-इव। तग्=प्राक्रणिकानाम्=प्राकरणिकों का। यहाँ बहुवचन का प्रयोग दो से अधिक अप्राकरणिकों के सग्रह के लिए किया गया है, वैसे तुल्य योगिना केवल दो अपाकरणिकों में हुए समानधम सम्बन्ध से मी समव है। इसीलिए यह कहा जाना ठीक नहीं कि 'बङुतों का औपम्य अपनाने के लिए-'[यह अल्काररत्नाकरने नहीं कदा ह]। क्योंकि आगे कहे जाने वाले उदाहरणों में केवल दो दो के मी सादृश्य उपनिबद्ध है। यह्दी स्थिति दोपक में भी मान्य है। अन्वितार्य =क्योंकि इस [तुन्ययोगिना] में समानधर्म से सम्वन्धित पदार्थों का अस्तिस्वर है। इसीसे यह चार प्रकार की होती है क्योंकि इसमें आकरणिक और अप्राकरणिक का गुण और करिया रूप दो धर्मों से अन्वय होता है। अतिशयोक्ति को इसका साधक नहीं मानना चाहिए- क्योंकि यह अतिशयोककति के बिना भी आगे प्रदर्शिन उदाहरणों में पाई जाता है। ग्रन्थकारने यहाँ जो गुणसाम्य के दो ऐसे उदाहरण दिए हैं जिनमें भपम्य=सादृश्य नहीं है वह केवल इसलिए कि उन्हें प्राचीन आलंकारिकों के उदाहरण रूप से प्रस्तुत किया था। भपम्ययुक्त स्थल ये ह- 'ह परिये! ईर््याविकार के समय तुम्हारे लिए यह उचित है कि तुन्हारी वाणी और लीलापूर्ण गतिमें रखलन माद।'-यहाँ उचिनर गु है। [यहाँ दोनों प्रकृत हैं ]। दोनों के अप्रकृन होने पर- 'हे देव [राजन् ] आप पृ्थिती का भार ढोने में निरत है इसलिए आजकल शेपनाग और आदि कूर्म दोनों बडे सुखी हैं।-यहोँ सुसित्व गुग है [ और वर्णन राजा कार है अनः शेष म
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तुल्ययोगितालङ्कार: २३९
कूर्म दोनों अप्रकृत है]। कुछ लोग दो नायिकायुक्त पदार्थो में प्राकरणिकता मानते हैं अतः दम दूसरा उदाहरण देते हैं- 'भगवती पावती की ऐसी चरणारविन्ददयी कैसे प्राप्त की जा सकती है जिसने प्रणाम कर रहे भगवान् शिव के सिर पर विद्यमान गंगा और चन्द्रकला दोनों को अपनी नखरदिमओं से संसार भर के लिए बन्ध बना दिया है तथा जिसने [ अपने पिता ] हिमालय को कन्षा के पिताओं के हृदय में लगी अत्यन्त ताप रूपी दवाग्नि की विपत्ति से दूर कर दिया है।' -यहाँ भगवती पावती के चरण ही वर्णनीय है अतः 'गंगा' और 'चन्द्रकला' ये दोनों अप्राकरणिक है। उनमें एक [जगद्बन्धता विषयक ] 'आपादन = प्राप्ति' क्रिया का अन्वय है। यह तुल्ययोगिता विम्वप्रतिविन्त्रभाव से भी निष्पन्न होती है। यया- 'जहाँ कवीन्द्रवक्त्रों में शारदा और कमलों में लक्ष्मी प्रेमपूर्वक रहती हैं, जो दोनों कभी तो अचिन्त्व पदों [सरस्वतीपक्ष में =काव्यघटनानुरूप मदावली, लक्ष्मीपक्षमें = पदचाप] को लोलपूर्वक विखेरती और घरती रहती हैं और कभी अपने राजहंसों [ सरस्व्रतीपक्ष में हंसविशेष तथा लक्ष्मी- पक्ष में राजारूपी इंस या हंसतुल्य विवेकी राजा] पर सवारी किए हुए रहती है।' यहाँ वक्त और कमल इन दोनों में विन्वपतिविम्वभाव है। इसी आशय से अन्थकार ने अपने अवंकारवार्ततिक नामक ग्रन्थ में [ तुल्ययोगिता के ] इस भेदको एक विशिष्ट भेद चतलाया है। शुद्ध सामान्यरूप से निष्पन्न तुल्ययोगिता, यथा - 'इस वालक की वृद्धि के लिए दो मानी [धाई और पृथिवी ] सदा तत्पर थीं एक धात्री जो दुग्धदात्री [घाई] थी और दूसरी धात्री सर्वसन्पत्ति उत्पन्न कर नेवाली [पृथिवी ]।' -यहाँ [ पय:]-'प्रस्वण= [दूध] देना शुद्ध सामान्यरूप किया है। विमर्श :- तुत्ययोगिता का पूर्वेतिदास- भामह = 'न्यूनस्याि विशिष्टेन गुणसान्यविवक्षया- तुन्यकायंक्रियायोगादित्युक्ता तुल्ययोगिता ।' यथा -- 'शेपो हिमगिरिरत्वं च महान्तो गुरवः स्थिताः । चदलद्वितमर्यादां चलन्ती विभृथ क्षितिम् ।'[३२७-२८] -कम गुणवाले पदार्थ का विशिष्टगुण वाले पदार्थ से गुणगत साम्य बतलाने के लिए समान कार्य करना प्रतिपादित किया जाय तो तुत्ययोगिता होती है। यथा-रोपनाग, हिमाचल, और हे राजन् आप अत्यन्त गरिमामय हैं जो मर्यादा की रक्षा कर डोलती पृथिवी को धारण करते रहते हैं। वामन='विशिष्टेन साम्यार्थमेककालक्रियायोगस्तुल्ययोगिता। विशिष्ट से न्वून की समता वतलाने के लिए एककालिक करिया में दोनों का अन्वय तुल्ययोगिता कहलाता है [ अतः यह व्याजोकि से दिया है]। यथा-'जलनिधिरशनामिमां धरित्रीं वद्दति मुजंगविभुभवद्भुजश्च।' *स समुदमेखला पृथिनी को शेपनाग या आपका भुजदण्ड धारण करता है। 'वहन=धारण' क्रिया में शेष और भुजदण्ड का अन्वय है।
साम्याभिधायि प्रस्तावमाग्मिर्वा तुल्ययोगिता।। ५।।। जिनमें उपमानोपमेयभाव कथित न हो ऐसे केवल अग्रस्तुतों अथवा केबल प्रस्तुतों का सान्य- प्रत्यायक कथन तुल्ययोगिता। यथा=तदज्मादचम्० हत्यादि तथा 'योगपट्टो जटांजालम्' इत्यादि.। .. .
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२४० अलद्कारसर्वस्वम्
रढ = + + + + + सम्मटनियतानां सकद् धर्म सा पुनस्तुव्ययोगिता॥ नियताना पराकरणिकानामेवाप्राकरणिकानामेव वा। यथा = पाण्डुश्ामम्, केवल प्राकरणिकों या केवल अप्राकरणिकों में किसी एक धर्मे का असििस्व तुत्ययोगिता। यथा = 'हत्यादि, 'पाण्डु क्षाम वदन हृदय सरसं तवालस च वपु'। आवेद्यति नितान्तं क्षेत्रियरोग सखिव हदन्त:।।' -दे ससि, तुम्हारा पीला और दुर्बल चेहरा, आार्द्र हृदय तथा आलस्ययुक्त शरीर किसी हदयस्थ प्रधान रोग की सूचना देते है। यहाँ सभी प्ाररणिक है। 'कुमुदकमलनी एनीर जालिलितविलास जुपोईशो: पुरः का। अमृतममृतररिमरम्युजन्म प्रतिइनमेकपदे तवाननस्य।।' -कुमुद, कमल, नीळोत्पल तुम्दारी दलितिविलास युक्त आँखों के सामने हैं ही क्या, और अमृत, चन्द्र, कमल तुम्हारे मुसविम्ब के समक्ष एक साथ व्वस्त हैं।' यदाँ केवल नायिका वर्ण्यमान अतः प्रस्तुत हैं। शेष सब अप्रस्तुत है और उन में 'है दी क्या' और 'ध्वस्त' घढों द्वारा व्यक तुच्छल रूपी एकथमे का अन्वय हो रहा है। -इस संदर्भ से रपष्ट है कि रुद्ढ तुल्ययोगिता को दीपक से मिन्र नहीं मानते। मामह ने दीपक को आदि, मध्य तथा अन्त में स्थित किसी एक धर्म के साथ अनेक पदार्थो के अन्वय के आधार पर तीन मागों में वाँटा है आदि दीपक, मध्यदोपक तथा अन्त दीपक। उन्हीं क अनुकरण पर रुद्रट ने भी दीपक के ये तीनों भेद किए है। किन्तु उन्होंने दीपकगत अनेक पदार्थों के प्रस्तुततव या अप्रस्तुतलव पर ध्यान नहीं दिया है, अतः उनके यहाँ तुत्ययोगिता के दीपक से भिन होने का प्रशन ही नहीं उठता। भामइ और उनके अनुकरण पर वामन ने तुन्ययोगिना को दीपक से अलग अवश्य प्रस्तुत किया है किन्तु उस में प्रस्तुत या अप्रस्तृत की ऐकान्तिकता अयवा समष्टि का उन्होने कोई प्रनिबन्ध नहीं लगाया। उनके उदाइरण से स्पष्ट है कि वे तुल्ययोगिता में प्रस्तुन और भग्रस्तुत शोनों का ही अन्वय मानते है क्योंकि उनके उदाहरण में स्तूयमान राजा की भुजा प्रस्तुन है और शेषनाग अप्रस्तुन । इन दोनों का एक वहन=धारण' क्रिया मे अन्वय बतलाया गया है। भामइ औौर वामन ने यहाँ उपमानोपमेय में होनाधिकगुणश्व पर ध्यान दिया जिसमे तुश्ययोगिता उपमा से मिन्न सिद्ध नहीं होती। आगे दीपक के प्रकाश में उद्धृत उनके लक्षण तथा उदाहरणों से इस दिना में और अधिक प्रकाश पदेगा कदाचित इसी छिए रुद्रद ने तुन्ययोगिवा को स्ववन्त्र अलंकार की सान्यता नहीं दी। निश्चिन ही सर्वस्वकार ने मम्मट के ही समान तुल्ययोगिता के िए उन्दट को प्रमाण माना है। उन्होंने तो उदाहरण मी उद्दट के ही प्रस्तुत किए है। परव्ती मालकारिकों में- अलकारत्नाकरकारने तुन्ययोगिता का लक्षण-'सकृद धर्मस्य निर्देश्ेप्रस्तुताना प्रस्तुताना वा तुल्ययोगिता-अर्थाद अप्रस्तुत या प्रस्तुनों के धर्मे का एक ही बार निर्देश तुल्ययोगिता कहलाता है-इस प्रकार का 'त्वदगमार्दव'पदको उदादरण-स्वरूप प्रस्तुत किया है। उन्होंने यहाँ एक धर्मान्वयी पदार्थी में से किसी एक में उपमानता या उपमेयता मानना असमव बतठा कर परस्पर में उपमानोपमेयमाव बनलाया है। अप्पययदीद्वित की-चित्रमीमासा में दीपक और तुल्ययोगिता दोनों ही अटकार छूट गए है विल्तु उनके कुवलयानन्द में उन्होंने चन्द्रालोक से मिन्न- 'वर्ण्यानाभिवरेषां वा धर्मेक्यं तुल्ययोगिवा'
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तुल्ययोगितालङ्कार: संस्कल २४१
'-अर्थात् वर्णनीय=प्रस्तुत अथवा अप्रस्तुत का धर्मक्य तुत्ययोगिता'-यह लक्षण कर उदाहरण रूप से सर्वस्वकार द्वारा प्रदत्त 'तवव्ङ्गमार्दवम्' तथा 'संजावपत्रमकरान्वितानि' पद्य प्रस्तुत किए हैं। पण्टितराज जगन्नाथ='प्रकृतानामेवाप्रकृतान।मेव वा गुणक्रियादि रूपककधर्मान्वय स्तुल्ययोगिता।' -- 'अर्थाद केवल प्रकृतों अथवा केवल अप्रकृतों का गुण किया आदि रूप किसी एक धर्म में अन्त्रय तुत्योगिता-इस प्रकार तुल्ययोगिता के लक्षण में गुण और किया के अतिरिक्त अन्य समाद आादि तत्वों को भी अनेकान्वयी वस्तु के रूप में स्वीकार कर सर्वस्वकार और कुनलयानन्दकार के 'गुणक्रियमात्र' तक सीमित पक्ष को उपलक्षणमात्र दतलाया है। उन्होंने तुल्ययोगिता के सदाहरण पूर्वाचार्यों से प्रायः मिलते-जुलते ही गढ़े हैं। कार कतुक्ययो गिता: पण्डितराज जगनाथ ने एक कारकतुल्ययोगिता भी स्वीकार की है। उसका कक्षण -- वन्र च प्रकृतानामेवापकृतानामेव वा क्रियाणामेककारकान्वयः सा कारकतुल्ययोगिता'- सर्थात-'जहाँ केवल प्रकृत अथवा केवल अप्रकृत ही क्रियाओं का किसी एक कारक में अन्वय हो तो वह कारकतुल्ययोगिता कहलाती है' -- इस प्रकार किया है और उदाहरण के रूप में- 'वसु दातुं यशो धातुं विधातुमरिमर्दनन्। नातुं च सकलां पृथ्वीमतीव निपुणो भवान् ॥' -- 'धन देने, यश लेने, शत्रुओं को मसलने और सारी पृथिवी की रक्षा करने में आप बहुत ही निपुण है।'-यह पद्य प्रस्तुत किया है। इसमें दान, धान, विधान और न्ाण ये सभी क्रियाएँ प्रस्तुत हैं औौर उन सब का एक स्तूयमान राजा रूपी कारक के साथ अन्वय है। पण्डित- राज ने इसे अर्थान्तरन्यास से भी अन्वित बतलाया है। संजीनिनीकार ने तुल्ययोगितासंग्रह इस प्रकार किया है -- 'पकृतेष्वथनान्येपु ज्वातव्या तुल्ययोगिता। गुणक्रियाभिसम्वन्धात समानादन्वितार्थिका ॥' -- प्रकृत मथवा अप्रकृतों में गुण अथवा क्रिया के समान सम्बन्ध से तुल्ययोगिता यह अन्वर्थ- नामक अलंकार होता है। उद्भट, वामन और मम्मट ने तुल्ययोगिता को दीपक के वाद रखा है जम कि, अलंकारसर्व- स्वकार, अलंकार रलाकरकार, कुवलयानन्द्रकार तथा रसगंगाधरकार ने दीपक के पहिले। परवर्त्ती माचार्यों ने यह क्रम प्रकृत और मपकृत के शुद्ध स्थल और दोनों के मिश्रित स्थल को दृष्टि में रखकर स्वीकार किया किन्तु तुल्ययोगिता और दीपक दोनों में एक वस्तु के अनेक वस्तु के साथ अन्वय की ही कला चमरकारभूमि है, साथ ही आदि मुनि भरत से लेकर पण्डितराज जगननाथ तक सभी आचार्यों ने दीपक को अलंकार माना है इसलिए वस्तुतः दीपक को ही प्रथम स्थान दिया जाना चाहिए। दीपक का ही सूक्ष्मरूप तुल्ययोगिता है। इसके विरुद्ध पण्डितराज ने दीपक- प्रकरण में तुल्ययोगिता से दीपक के पृथक्करण पर आपति उठाई है और कहा है-'अनेदं वोध्यम्- तुल्यनोगितातो दीपकं न पृथम्मावमहृति धर्मसकृद्वृत्तिमूलाया विच्छितरविशेषात् विच्छित्तवैल- क्षण्यस्य चालंकारविभागहेतुत्वाव । 0000। तस्मात तुत्ययोगिताया एव नैविध्यमुचितम्, प्रकृता- नामेन धर्मस्य सकृत वृत्ति:, अप्रकृतानामेव, प्रकृताप्नकृतानां चेति। एवं च पाचीनानां तुल्ययो- गितातो दीपकस्य पृथगलक्षारतामाचक्षाणाना दुरामद्दमान्मिति नव्याः।'-'यहाँ यह समझ लेना १६ म० स०
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आवश्य है कि दीपक को तुन्ययोगिता से अषग नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि एक धर्म के बनेक से सबन्ध पर निर्भर चमत्कार दोनों में बराबर या एकसा हो है, और अलंकारों में भेद केवल चमत्कार में भेद के आधार पर हो किया जाता ह। ०० इसलिए तुव्ययोगिता के ही तीन भेद मान लेना उचित है(१) प्रकनों का हो किसी एक धर्म से सबन्ध, (३) अप्रकृतों का ही और (३) प्रकृत तथा अप्रकृन दोनों का। इस प्रकार नम्यों के अनुसार प्राचीनों ने जो दीपक को तुल्ययोगिता से पृथक एक स्वतन्त्र अलकार बत्रचाया है वह उनका दुराग्रहमान्र है।' आगे दीपक के प्रकरण में विमर्शिनीकार भी यही वात कहते दिखाई देते हैं [ द्रष्टव्य-'न चैनाव- सेवानयो: पृथक लक्षण युक्तम्-चिरन्तनानुरोभाव कृतम्' दीपक पर आरम्मिक विमसिनी ]। किन्तु सच यह है कि हरामद नवीनों का ही है। सामान्य माषा में नवानों का जो एकघर्मान्वय है वही प्ाचीनों की सलकारिक मापा में दीपक है। नवीनों ने स्वय कहा है कि जैसे दीपक उद्देश्यभूत वस्तु को तो दिखलाता ही है अन्य वस्तु को भी दिखला दिया करता है, उसी प्रकार कोई एक धर्म किसी एक प्राकरणिरु में तो अन्वित होता हो है अपाकरणिक में मो अन्तिरित हो जाता है और इस प्रकार वद धर्मे पूरे वाक्यार्थ की शोभा बढा देता है। फलतः दीपक के समान होने से उसे दीपक कहा जाता है। दष्व्य-(१) 'एकस्थर्येत्र समस्तवाक्यदीपनाद् दोपकम्'-मम्मट । (२) प्रस्तुतैकनिष्ठः समानो धर्म प्रसहादन्यनोपकरोति प्रासादार्थमारोपितो दोप इव रथ्यायाम् इति दीपसाम्याद दीपकम्, 'संघाया च' [ वा० २४५८]इतीवाये कन्पत्यय ।-अप्पव्यदीक्षित, कुकलयानन्द। (३) दीपयत्ति प्रकाशयति सुन्दरोकरोति दोपकम्, यद् वा दीप इव दोपकम्, सचार्या कन दोपसादृश्य च प्रक्ृताप्नकतप्रकाशकत्वेन बोध्यम्-प० जगननाथ, दीपकालंकार। (४) दीप हव दीपकम्, सशार्या कन्, दीपस्येकस्येव सकलप्रकाशकत्ववदेकत्वस्यैव सरवं. समन्वय- वोधजनकत्वेन तत्साधर्म्याद। दीपयतीति दीपकमिस्यन्येI-अठकारकीस्तुम दोपकप्करण। इस प्रकार यदि नव्य तुत्ययोगिता में दोपक को अन्तर्भूत करना चाहते हैं तो प्राचीन दौपक में तुव्ययोगिता का अम्तर्माव वत्तला सकते हैं। भरतमुनि ने भी दीपक का जो उदाहरण दिया है [ आगे दीपक के प्रकरण में उद्भृत ] उसमें समी पदार्थ प्राकरणिक है। दीपक को संप्रदीपक कइ उन्होंने दीपक शब्द के प्रयोग के मूछ में दीप के सादृश्य को मूल माना है। प्राकरणिकत्वा- प्राकरणिकत्व को नहीं। अतः हृदयसाक्ष्य, भत्युत, दीपक के ही पक्ष में अधिक है, क्योंकि चमत्कार की अतिभूमि प्रस्तुत के साथ अप्रस्तुतविधान में ही अनुभव में आती है, केवळ प्रस्तुतों अथवा केवल मप्नस्तुतों के उपनिबन्ध में नहीं। उसमें प्रतिभा का कोई चमत्कार नहीं रहता। केवळ एक धर्मान्य की कामात्र का अभिव्यक्तिगत क्षीग प्रकाश वहों रहता है। फलता हृदयसास्य अपस्तुत विधान की प्रतिमा और पतिझासिक मान्यता के आधार पर तुल्ययोगिता का ही दीपक में अन्तर्माव अधिक समुचित है। असंकारकोस्तुमकार बिशवेश्र पण्डित ने भी पण्टितराज के उक्त आक्षेप को उदृत कर उस पर यही उतर दिया है कि क्योंकि दीपक मरतमुनि से माना जाना आ रहा है मत. उसी में सुत्ययोगिता का अन्तर्भाव अधिक उचित है। [द्रव दीपकप्करणान्त] और यदि दोनों को दो स्वतन्त्र सहकार भो मानना हो तो प्रयमन दीपक का निर्वेचन ही उचित है। विमर्शिनी एत दुप संहर धन्यदवतारयति- द इस [प्रकरण] का उपसदार करवे और दूसरा [प्करण] आरम्म करने के छिए कहते हैं- 4
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दीपकालङ्कार: २४३ [सर्वस्व ] प्रस्तुतापस्तुतयोव्यस्तत्वे तुल्ययोगितां प्रतिपाद्य समस्ततवे दींपक- मुच्यते- [सू० २५] प्रस्तुताप्रस्तुताना तु दीपकम्। औपम्यम्य गम्यत्व इत्याद्यनुव्तते। प्राकरणिकामाकरणिकयोरमध्या- वेकत निर्दिए्टः समानो धर्मः प्रसङ्गेनान्यत्रोपकारादीपनाद्दीपसाटश्येन दीप- काख्यालंकारोत्थापकः। तन्नेवाद्यप्रयोगाटुपमानोपमेयभावो गम्यमानः।स च वास्तव एव । पूर्वत्र शुद्धप्राकरणिकत्वे शुद्धाप्राकरणिकत्वे वा वैवक्षिक:,
दौचित्यात्पदार्थत्वोकिः । वस्तुतस्तु वाक्यार्थत्वे मादिमध्यान्तवाक्यग तत्वेन धर्मस्य वृत्तावादिमध्यान्तदीपकाख्यास्त्रयोऽस्य भेदा:। [वृ० ] प्रस्तुत और अप्रस्तुत के अलग अलग रहने पर संभव तुत्ययोगिता का प्रतिपादन किया। अब दोनों की मिलित स्ित्ति में संभव दीपक का प्रतिपादन करते हैं -- [ सू० २५] [सादृश्य यदि गम्य= शब्दतः अकथित हो और समान धर्म में ] पस्तुत तथा अप्रस्तुत दोनों का [एक साथ पदार्यान्तर पर संवन्ध ] हो तो दीपक [नामक. अलंकार होता है ]॥ २५॥ [इृ०] यहाँ 'सादृस्य यदि गन्य हो' इत्यादि शेपांश की अनुवृत्ति [तुस्ययोगिता से ] होती है। प्राकरणिक और अप्राकरणिक दोनों में से किसी एक के साथ निर्दिष् समान धर्म प्रसंग के आधार पर दूसरे का भी उपकार करता है [ तथा उसमें] दीह्ि लाता है [ अतः ] दीप का साद्डय होन से वह दीपक नामक अलंकार का जन्मदाता बनता है। उसमें 'इव' आदि का प्रयोग नहीं रद़ता इसलिए वहाँ उपमानोपमेयमाव गम्यमान रहता है। किन्तु वह रहता वास्तविक ही है. जव कि पूर्योक्त अलंकार में केवल प्राकरणिक भथवा केवळ अप्राकरणिक के रहने पर वह [ उपमा- मानोपमेयभाव ] विवसाधीन = ऐच्छिक होता है, [क्योंकि वहाँ जहाँ केवक प्राकरणिकत्व रहता है वहाँ उपमानत्व अवास्तविक होता है। अतः उसे विवक्षा द्वारा निष्पन्न करना पढ़ता है और जहाँ केवल सम्राकरणिकत्व रहता है वहाँ उपमेयत्व अवास्तनिक रह्दता है कयोंकि उसे भी वहाँ विवक्षा द्वारा निष्पन्न करना होता है। इस प्रकार उपमानोपमेयभाव आंशिकरूप से ही रहता है] क्योंकि उसकी निष्पत्ति प्राकरणिकत्व और अप्राकरणिकत्व पर निर्भर रहती है [ प्राकरणिकत्व पर उपमेयत्व की और अप्नाकरणिकत पर उपमानत्व की । अनेक का एक किया से संबन्ध रहता है इसलिए औचित्यन: [दीपक में] पदार्थगतत्व वतलाया गया है [ तुल्ययोगिता की अवतरणिका में] वस्तुतः तो यह वाक्यार्थगत ही रहता है, तभी इसके आदि-दीपक, मध्यदीपक और अन्तदीपक नामक भेद होते हैं, क्योंकि इसका धर्म जिसके आदि, मध्य तथा में अन्त में रहता है वह चान्य ही है। तिमर्शिनी प्रस्तृताप्रस्तुतानामिति। एकत्रेति प्राकरणिकेप्राकर णिके वा। अन्यन्नेति पाकरणिकादौ दीपकेति 'संज्ञायाम्' इत्यनेन कनू। सादश्येन समुदायगग्याया: संज्ञाया अभावाच्।
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अलङ्गारसवस्वम्
तत्रेवि दीपके। वास्तव इत्ि। प्रकृताप्कृतयोरुपमानोपमेयरूपरवाव्। पूर्वत्रति तुल्य- योगितायाम। इयानेव व दीपकतुत्ययोगितयोविशेपोऽस्तीरयप्यनेन दुर्शितम्। न चैता- वतैवानयोः पृथम्लपणं युक्तम्। औपम्यगर्मरवाड्यस्य सामान्यस्य दयोरप्यनुगमात्। एवं च समुधितोपमादेरपि पृथम्लच्णं स्यात्। अन्यकृता पुनश्विरन्तनानुरोधारकृतम्। वैवक्षिक इति। यग्रव वक्तुरुपमानत्वसुपमेयरवं वा वक्तुमिष्ट तत्रव प्रकरणादिवलादा- अ्रयणोयमितयर्थः। अतश्न 'प्रस्तुतस्य सु नान्येन व्यभिचारस्य दर्शनात' इति नीव्या प्रस्तुताम्स्तुतत्वमान्ननिबन्धन एवोपमानोपमेयभावी न भव्तीति माव:। एव 'प्रसिद्धेना- प्रसिदूस्य साडश्यमुपमा मता' इत्यादिध्शा प्रसिद्धाप्रसिद्धत्वमात्रनियन्धनोपयुपमानो- पमेयभावो न वाच्य:। 'समिघ जल जलमिव सम्' इत्यादी द्वयोरपि तुल्यरवात् प्रमिद्ध- गुमस्वाद्यभावेऽप्युपमानोपमेयभावस्येप्टेव्यभिचारस्य दर्शनाव। ननु चात्र साधग्य वा क्यारथंगतत्येनव प्रतीयत इति कथं तस्य पदार्थगतखवमुकतमित्याशङ्टयाह-अनेकस्येत्यादि। एवं पूर्वत्रापि झेयम्। प्रस्तुताप्स्तुतयोः इति। दसी का लक्षण वतलाते हैं-प्रस्तुवाप्रस्तुतानाम् इति। पक्य= एक में, प्राकरणिक अथवा अप्राकरणिक में। अन्यत्र= प्राकरणिक आदि में। दीपर='सचाया [च' वार्चिक] द्वारा [साहस्यार्थ में] कन् प्रत्यय, क्योंकि सादृश्य के आधार पर सचा समुदायगम्या नहीं हो सकती। तत्र= वदा दीपक में। वास्तव = वास्नविरु, क्योंकि प्रकृत और अप्रकृत कमदः उपमेयरूप तथा उपमानरूप होते है। पूवत्र = पूर्वोंक्त तृन्ययोगिना में। इससे यह भी बनला दिया कि दीपक और तृत्ययोगिता में इतना ही भेद है। इसलिए केवल इनने से अन्नर के आधार पर इन दोनों का लक्षण अलग-अलग बतलाना ठोक नहीं है। क्योंकि साइडयनटित दोना दोनों का साधारण धर्म है और वह दोनों में ही अनुगन है। इसी प्रकार समुचितोपमा आदि का लक्षण भी अलग नहीं किया जाना चाहिए। अन्थकार ने जो इन्हें पृथक पृथक वतलाया है वद केवल प्राचीन सालकारिकों के अनुरोष पर। वैबचिक-तुन्ययोगिता में प्रसग के आधार पर केवल वहीं उपमानोपमेयमाच स्वीकार - किया जा सकता है जड़ाँ वह वका को अमीष्ट हो। इससे सात्पयं यह निकला कि उपमानोपमेय- भाव केवल प्रस्तुतत्वाप्रस्नुतत्वमात्र पर निर्भर नहीं रहता है' जैसा कि [अलंकाररत्नाकर में] कदा गया है-'[ साहृस्य] प्रस्नुत का अप्रस्तुत से नहीं भाना जाना चाहिए क्योंकि अनेक स्थलों में उसको टव्टा भी देखा जाता है।' और इसलिए उपमानोपमेयाव को केवल प्रसिद्धत्व और अप्रसिद्धत्व मात्र पर आश्रित नहीं मानाजा सकता जेसा कि ['अलंकाररत्नाकरकार ने] का है- 'पसिद्ध से अप्रसिद्ध का सादृद्य उपमा मानी जाती है।' [अर्वकाररत्नाकर में ये दोनों अर्धालियां इक ही श्लोक की हैं। इस प्रकार- सादृश्यमुपमामता । प्रस्तुतस्य तु नान्येन, व्यमिचारस्य दशनाव।' सर्थात् प्रसिद्ध का अप्रसिद्ध से सादृश्य उपमा मानी जाती हैन कि प्रकृत का अप्रक्त से, क्योकि मनेक स्थानों पर ऐसा नहीं देखा जाता यथा] 'आकाश के समान जल और जल के समान माकाश'-इत्यादि स्थलों में दोनों ही एक से है अनः व्यमिचार दिखलाई देता है इमलिए कि प्रसिद्ध गुणत्व और अप्रसिद्धगुगत के अमाव में भी उपमानोपमेयमाव देखा जाता है। शका होती है कि 'दौदक में साधम्य वाक्यायंगतरूप से ही प्रतीत होता दै तो इसे पदार्थगन क्यों दतलाया जा रहा है-इस पर वचर देते है-अनेकस्य। इसी प्रकार पूर्ववत्ती [तुस्ययोगिता ] सटंकार में भो [ वाक्यागवता ] समझनी चाहिए।
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[सर्वस्व ] कमेणोदाहरणम्- 'रहइ मिहिरेण णहं रसेण कव्चं सरेण जोव्वणअं। अमपण घुणीधवओ तुमए गरणाह भुवणमिणं।' 'संचारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निलयाय गन्तुम्। मचकमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्च घेतुः।' 'किवणाण धर्ण णाआणँ फणमणी केसराई सीहाणं। कुलवालिआण थणआ कुत्तो छेप्पंति अमुआणं।।' एवमेकक्रियं दीपकनयं निर्णीतम्। अन्न व यथानेककारकगतत्वेनैक- करिया दीपकं तथानेककियागतत्वेनैककार कमपि दीपकम्। न्यथा- 'साधूनामुपकर्तु लक्ष्मों धर्तु विद्यायसा गन्तुम्। न कुतूहलि कस्य मनश्चरितं च महात्मनां श्रोतुम्।।' अत्रोपकरणाद्य नेकक्रिया कर्तृत्वेन कुतूहलविशि मनो निर्दिष्टम्।छाया: न्तरेण तु मालादीपकं प्रस्तावान्तरे ल्क्षाय्यते। क्रम से उदाहरण- [आादिदापंक] 'राजते मिहिरेण नभो रसेन कार्व्य सरेण [स्मरेण ] यौवनमूं। अनृतेन धुंनीधवस्त्यां नरनाथ! सुवनमिदम् ॥' -- शोभितं होता है सूर्य से आकाश, रस से काव्य, सर=दार से अथवा स्मर-कामे से योचन= स्तन, अमृत से समुद्र और हे नरनाथ तुमसे यह भुवन ।' [ यहां 'शोभित होना' यह क्ञियापद वाक्यारम्भ में प्रयुक्त है और प्रकृत मूतल तथा अप्रकृत आकाश आदि से अन्नित होता है ]। [मन्यदीपक]- 'दिगन्तरालों को अपने संचार से पवित्र कर दिनान्त होने पर निलय को जाना आरम्म किया, पछवराग सी तामिया, सूर्य की प्रभा ने और मुनि की धेतु [नन्दिनी ] ने ॥'[ यहाँ 'भारम्म करना' क्रिया वाक्य के मध्य में प्रयुक्त है और उसका अन्वय प्रकृत प्रमा तथा अप्रकृत धेनु से है] [अन्तदीपक ]- 'कृपणानां घनं नागानां फगमणि: केसरा: सिंहानान्। कुलवालिकानां स्तनाः कुतः स्पृश्यन्तेडमृतानाम्॥' 'कृपणों का धन, सर्पों की फणामणि, सिंह के शिरःकेश (अयाल) और कुलवालिकाओ के स्तन कैसे छुए जा सकते हैं यदि ये मृत न हों।' [यहाँ 'स्पर्श' क्रिया अन्त में प्रयुक्क है और उसका अन्वय यदि कपण पदार्थ प्रकृत हो तो उससे और कुलवाला प्रकृत हो तो उससे होने के साथ ही शेप सभी अपरकृतो से भी हो रहा है ]। - इस प्रकार एक क्रिया के [प्रकृताप्नकृतों में अन्वय से निष्पन्न] तीनों दीपक निश्चित हुए। जैसे [ उपर्युक्त ] इन दीपकों में अनेक कारक में अन्वित होने वाली एक क्रिया की दीर्पके होता ै वैसे ही मनेक क्रियाओ से गन्वित होने वोले एक कारके की भौ दैपपके होती है। बना-
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-'साधु पुरुषों का उपकार करने, दौलत समेटने, आकाश से उहने और महात्माओं के चरित्र झुनने में किस का मन कुनुहलयुक्त नहीं होता।' -यहाँ 'उपकार' आदि अनेक कियाओं के कर्ता के रूप में एक अकेले कुूहलयुक्त मन का निर्देश किया गया है। इसी प्रकार एक मालादीपक भी होता है। उसका मौन्दर्य निराळा ही होता है अत उसे दूसरे भसंग में बतलाया जाएगा। विमर्शिनी भेनुसंध्ययो. प्रकृतत्वादयान्ये तुकष्ययोगिनां मन्यन्त इश्युदाहरणान्तरेणोदाहियते- 'धम्मजजणेग काण वि काणव अथजणेण बोलेई। कामज्जणेण काण वि काण वि एमेश मसारो।' एकक्रिय मित्य नेनैकगुण मपि दीपकं स्वयमेवोदाहार्यमिति सूचितम्। तन यथा- *फणासदसमृदधो दिवि नेत्रसद्ससृव। अद्वितीय. पृथिव्यां च भवाझामसहस्त्रमृत् ।।1 अद्वितीयरवं गुणः। एव मेकां क्रियां गुर्ण वानेककारक्गतत्वेनाभिधाय तदेव च इटान्ती- कृशयै क कार कमध्यनेक क्रियागतरवंन दीपक भवतीतयाह-अत्रेत्यादि। अब्र चोच्छ वासवर्ण- नीयं भैरवाचार्यादिसकमुप कार करणादिवविशेपरुपं प्रस्तुत औतृनवबोधयितुं कविकतृक- मिदं साधूपकारकरणादीनां सामान्यानामप्रस्तुताना प्रशंसनम्। तेषा छ सामान्यानां परस्परमोपग्य प्रतीते रेक कार कगततवेनेयं कारकतुत्ययोगिता। अतक्य नेदं कारकदीपक- रयोदाहरणम्। तत्त यथा- सालिद्ितुं पाशिमुखीं च सुधां न पातु की्ति च साघपितुमर्जमितुंच लप्तमीस। रल्नकिमननुवरसा हृदये प कतुं मन्दादर जनमहं पशुमेव जाने।' अन्नालिङ्ग नाध्यने कक्रिया कतृंखेनेक एव जनो निर्दिष्ट। प्रस्तुताप्रस्तुत स्फुटमेव। [संचारपूनानि'-पद्य में ] कुछ लोगों [ अंकार रत्नाकरकार] के अनुसार धेनु और सध्या दोनों हो प्रकृत है अन. तुन्ययोगिना है इसलिए इम इसका एक दूसरा उदाइरण दिए देते हैं- धम्मोजैनेन केषामवि केषामप्यर्योनंनेन व्यत्येति। कामार्जेनेन केषामपि केषामप्येवमेव संसार ।', 'किन्हीं का समार धर्माजन में बोतता है, किसी का अर्थार्जन में, किसी का कामार्जन में और किसी का ऐसे हो।' 'एककिय-एक क्रिया का', अर्थ यह कि एक गुण का भी दीपक हो सकता है, उसे स्वय खोज लेना चाहिए। उसका स्थल, यथा- 'नीचे [पाताल में ] हजार फन धारण करने वाठा [शेषनाग ] अद्वितीय है, स्वर्ग में हजार नेत्र धारण करने वाला [इन्द्र ] और पृथिवी पर सइस नाम धारण करने वाले आप।' -यहाँ अदितोयल गुग है। इस प्रकार एक क्रिया या एक गुण को अनेक कारकों में अन्वित क्षेता बतलया, अब उसी के दृष्ान्त पर एक कारक में अनेक कियाओं के अन्वय से निपन्र होने वाला दीपक भी सम्मव वतलाते हुए लिखने हैं-'अत्'। [इर्षचरित के] इम ['साधूनामुपकतु'म्'- पच] में आगे पूरे उच्छवास द्वारा वर्णनीय मेरवाचार्य का एक विशिष्ट उपकार करना आदि प्रस्तुत है। इसे सोताओं [ अथवा पाठकों] को सुचिन करने के लिए कवि ने सामान्यरूप से साुओं का उपकार करना आदि जिन पदार्थों को प्रस्तुत किया है वे सब अपस्तुत है। इस सामान्यरूफ
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[अप्रस्तुत ] पदार्थों में परस्पर में सादृश्य की प्रतीति होती है तथा इन सबका एक [मन-रुपी] कारक में अन्वय है, अतः यहाँ कारकतुव्ययोगिता है। इस कारण यह [पद्य] कारकदीपक का उदाहरण नहीं हो सकता। कारक दीपक का उदाहरण यह होगा- 'चन्द्रमुखी का आलिद्न करने सुधा का पान करने की्ति की प्राप्ति करने, लक्ष्मी का अर्जन करने और आपकी अदभुत आनन्द देने वाली भक्ति को हृदय में लाने में जो जन मंदादर [ उत्तुक नहीं ] होता है उसे मैं पशु ही समझता हूं।' -यहां आलिह्न आदि अनैक क्रियाओं के रूप में 'उन' शब्द से एक ही निर्दिष् है साथ ही यहां जो प्रस्तुत है [ मगवद्मक्ति] और जो-जो अप्रर्तुत [चद्रहुखी आदि ] वह स्पष्ट हो है। विमर्श-(१) 'साधूनामुपकर्टुम्'-पद्य हर्पचरित के तृतीय उच्छवास के आरम्भ में आता है। तृत्षीय उचछ्वास में हर्पवर्धन के पूर्टपुरुष पुध्यभूति का वर्णन है। वह भैरवाचार्य नामक योगी की सहायता करता है जिससे वह योगी यक्षदेह धारण कर आकाश में उड़ जाता है। संस्कृत साहित्य में महात्मा शब्द महासत्त्व व्यक्ति के लिए चलता है अतः पुष्यभूति और मैरवाचार्य दोनों ही महात्मा हैं। उनका चरित्र तृतीय उच्छवास की कथावस्तु है। इस पद्य द्वारा उसकी पूर्वसूचना दी जा रही है। यहाँ अन्थकार ने कारकदीपक माना है और टीकाकार ने कारकतुल्ययोगिता। कदाचित अन्धकार की दृष्टि अन्थ के प्रसंग पर है और टीकाकार की वृतीय उच्छवास की मावी कथावस्तु पर। हर्ष स्वयं महासत्त्व और महात्मा है उसका चरित अ्ंथविषय होने से आकरणिक है, इसलिए उक्र पद्य की 'चरितं च महात्मनां श्रोतुन्' यह चतुर्थचरगगत 'श्रवण' क्रिया प्रस्तुत है, शेप-'उपकार, धारण, गमन' क्रियायें आगामी कथावस्तु के अंत में ही प्रस्तुत हो सकती हैं भारम्म में वे अप्रस्तुत ही है। फलतः प्रस्तुत और अप्रव्तुत क्रियाओं का एक 'मन' के साथ अन्वय होने से अन्धकार के अनुसार यहाँ कारकदीपक है। टीकाकार के अनुसार आगामी मेरवाचार्यरूपी महात्मा के चरित का अवण, आरन्म में अप्रस्तुत ही है अतः सभी क्रियायें एक-सी हो जाने से कारकतुत्ययोगिता है। वस्तुतः, प्रथम दो उच्छवासों में हुर्प का चरित न कहकर बाण ने अपने पूर्वपुरुषों का वर्णन किया है। अतः तृतीय उच्छवास के आरम्म में ये ओताओं अथवा पाठकों का ध्यान काव्य के प्रधान वर्ण्य 'हर्ष के चरित' की ओर आकृष्ट रखने हेतु 'चरितं च महात्मानां श्रोतुस्' कह रहे हैं। यह अलग बात है कि उनके इस कथन का लक्ष्य परवतों कथापुरुषों का चरित भी बना रहा है। उनमें केवल मैरवाचार्य ही नहीं, अभाकरवर्षन, यशोवती, राज्यवर्धन, दिवाकरमित्र, राज्यश्री और स्वयं हर्पवर्घन भी आते हैं। अतः 'चरित- श्रवण को प्रस्तृत मानना ही अधिक उचित है। टीकाकार के अनुसार यदि सभो क्रियायों को अपस्तुत मान लें तो उनका यह कथन मसंगत होगा कि भैरवाचार्य का वर्णन प्रस्तुत है, न्योंकि वद तो आगामी है। यदि कवि के चित् में उपस्थित होने से उसे प्रस्तुत माना जाए तो सारी क्रियाएं प्रस्तुत हो कही जानी चाहिए। फिर विचार तो सहृदय की अनुभूति को लेकर किया जाता है। तृतोय उच्छवास की कथावस्तु से अपरिचित सहृदय के लिए सारी कियायें अप्रस्तुत ही है। यदि सारो क्रियायें अप्रस्तुत है तो टीकाकार के अनुसार यहाँ प्रस्तुत मैरवाचार्य आादि विशेष व्यक्तियों के लिए अप्रस्तुत सामान्य का कथन होने से अप्रस्तुतप्रशंसा होनी चाहिये और यदि एक-सी अनेक क्रिया के एक कारक में अन्वय होने का शिर्प भी यहां है तो उन्हें यहां अप्रसतुतप्रशंसा के साथ तु्ययोगिता का सकर मानना चाहिए। (२) टीकाकार ने अ्रन्थकार के उक उदाहरण को अमान्य ठहरा, कारकदीपत् का जो
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उदाइरण ['आलिंगितुम्' ] अपनी और से प्रस्तुत किया है उस पर पण्डितराज जगन्नाय ने निम्नलिखित मापत्तियों प्रस्तुत की हैं- (१) उक्त पद्य में किसी एक व्यक्ति को पशु कहने की अपेक्षा एकाधिक व्यक्तियों को पशु कहना अधिक चमत्कारी है अत 'जन'शम्द को यहाँ जात्यर्थक एकबचन में प्रयुक मान अनेक व्यक्तिपरक मानना चाहिए। तब विमर्शिनीकार का यह कथन असंगत होगा कि 'आलिंगन आादि अनेक क्रियाओं का कर्चा केवल एक 'जन' ही है।' (२ ) यहाँ चमत्कार का कारण पग्रिमुखी, सृपा, को्ति, ल्ष्मी तथा भगवद्मक्ति का विम्ब- प्रतिबिम्वमाव है अनः विमर्ानोकार का यह कपन अमान्य है कि यहीं अनेक क्रिया का, एक- कारकान्वयित्वरूपी साधारण धर्म के आधार पर निष्पन्न साहश्य चमत्कारी है। (३) उक्त पद् में कारकदोपकत्व केवल 'मन्दादरत्व' को लेकर माना जा सकता है, क्योंकि उस्षका अन्वय प्रत्येक तुमुनन्त किया के साथ अन्वित कर्ता के धर्म के रूप में होता है। किन्तु पण्डितराज यदि मन्दादर के मन्दादरश्व को लेकर कार कदीपक सिद्ध करना चाहते हैं ो 'जन'-के जनत्व को लेकर वेसा क्यों नहीं करते। तब उनको कारकनदुस्त की काश्पनिक आपचि कट चाएगी। अलकाररहनाकरकार ने प्रस्तुन पद्य देकर कारकशीपक में यह एक दोष बनलाया है कि कारक करिया का धर्म नहीं होता नब कि समान धर्मपुबन्ध को दीपक का बनक माना गया है- इसका परिदार भी करते हुए उन्होंने कदा है कि कम से कम इस पघ में मन्दादरत्वविसिट्ट कारक की योजना है जो अपने आाप में चमतकारकारी है, अत चमत्कार होने से यहाँ दीपक सटंकार मान लिया जारगा। उक्त दोपनिवारग के छिए लसग को पदावछो में भोडा अन्तर किया जा सकता है। विमर्शिनी स्विद्यति कूणति वैद्वति विवलति निमिपति विलोकयति तिर्यक। अन्तर्नन्दति चुम्वितुमिच्द्ृति नवपरिणीता वधू: दयने'॥ इरयत्र सु स्वेदनादिक्रियाणां प्रस्तुतानामे काघारगतरवेन समुचीयमानरवाथ समुचपा संकारो न तु कारकदीपकम्। तद्धि प्रस्तुताप्रस्तुतारना क्रियाणामीपम्यसन्नावे भवनि। एवं सवं कियाणां प्रस्ततरवेऽपि समुच्चयस्योपम्याभावादेव तुकष्ययागितातोऽपि भेद:। औपम्य- सन्वावेऽपि तुषययो गितेव 1 यथा- चकार दुर्वलार्ना यः समामागरिवनामपि। जहे निरपराघानामपि यश्च थलीयसाम्।' क्षत्र करणहरणयो: प्रकृतावम्। इयोरपि राजगतमवेन वर्णनीयर्वात्। 'नवोदा बघु [प्रथम रात्रि में पत्ि के साथ ] गस्या पर पसीना-पसीना होती, सिकुडती, करवट लेती, चितपुट होती, आँख मोंचनी, कनसौ से देखती, मन ही मन हरखाती और चूमना चारती है।' यहाँ [काव्यपकाश्रकार ने कारकरोपक माना है किन्तु ] स्वेदन आदि सभी कियाऐं एक तो प्रस्तुन हैं और दूसरे इन्हें एक हो आधार में इकट्ठा स्थिन बतलाया गया है, अत. यहों समुच्चयालद्वार है, न कि कारकदीपक। वह [कार कदोपक] तो तब होता है जब किना्ए अनेक हो, उनमें कोई प्रम्तुत और कोई अप्रस्तुत हों, साथ हो उनमें सादृश्य प्रतीत हो। इसी प्रकार सभी क्रियाओं के प्रस्तुत होने पर भी यहाँ तुक्ययोगिता नहीं है, क्योंकि यहाँ उन क्रियाओं में परस्पर सादृश्य नहीं है। फलत- यहोँ समुच्चयालंकार ही है। यदि साहृश्य होता तो यहाँ सुल्ययोगिता शी दोती 1+ मैसे-
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'जिसने अपराधी होने पर भी जो दुर्वल थे उन्हें क्षमा किया और जो अपराधी नहीं थे किन्तु सचल थे उनकी क्षमा [पृथित्री ] को हर लिया'। -वहाँ करना और हरना दोनों करियाएं प्रकृत हैं क्योकि दोनों ही प्रस्तुत राजा के भीतर प्रतिपादित की जा रही हैं। बिमर्श :- टोकाकारमहोदय यहाँ क्रियाओं का सादृश्य वतलाते समय चुप्पी सा गए हैं। वस्तुतः ओपन्य या सादृश्य की वात तुल्ययोगिता या दोपफ के क्रियागत भेद में परम सवै- जानिक है। अलंकाररत्नाकरकार ने भी तुल्ययोगिता तथा समुच्चय को औपन्य के आधार पर ही पृथक करिया है- 'प्रकृतानां क्रियाणामेककारकसंबन्धे यदीपन्य- पतोतिस्तनुत्ययोगिता, तदमावे तु समुच्चयालंकार: ।' -[ दोपकप्रकरणान्त ]। रसगंगापरकार ने भी यह तथ्य स्वीकार किया है- (१) औपम्यम्०० अत्र गम्यम्= [तुल्ययोगितालक्षणवृत्िः ] (२) अन्रोपम्यस्य गम्यत्म् = [दी पकलक्षणवृतति: ] (३) दीपकतुल्ययोगितादी गम्यमानमीपम्यं जीवातुरिति सर्वेपां संमतम्-[दापकपकरण- पृ० ४३४ नि० सा० सं. ६] रसगंगाधरकार ने भो काव्यप्रकाश्नकार के उपर्युक्त 'स्विद्यति०' आदि उदाहरण पर विमर्शिनी- कार के ही समान आपचि प्रस्तुत करते हुए कहा है- इस पद्य में सभी करिया प्राकरणिक है। ००0। और उनके भी परस्पर सादृस्य में कवि का कोई संरम्म नहीं है। इसलिए इसमें समुच्चयालंकार की हो छाया मानना ठीक है। यदि स्वेदन आदि क्रियाओं के बीच परस्पर में साइस्स की प्रतीति मानी जा सके तो यहाँ कारकतुस्य- योगिता मानी जा सकती है, कारकदीपक नहीं, क्योंकि सभी कियाएं प्रस्तुत हैं। [रसगंगाधर दीपकप्रकरण पृ० ४३४-५, नि० सा० ६] वस्तुत: काव्यप्रकाश्चकार ने कारकदोपक का जो लक्षण किया है उसमें क्रियागत साम्य की पतीति की कोई बात नहीं है। उनका लक्षण है -
सैव क्रियास दहीपु कारकस्येति दीपकन्।' -अर्थाव एक दीपक वह होता है जिसमें अनेक प्रकृत और अप्कृत पदार्थों में किसी एक धर्म का अस्तित्व रदता है और दूसरा वह जिसमें किसी एक कारक का अनेक करियाओं में [ अस्तित्व रहता है]। उन्होंने- 'मालादीपकमादं चेद ययोत्त रगुणावह्न्।' -- इस प्रकार एक मालादौपक भी माना है जिसका उदाहरण 'संवामाङणभागतेनo' इत्यादि मदार्थ है, जिसमें कहा गया है 'राजन् ! आपके संग्राम में आते ही जिस जिसने जोन्जो वस्तु अप- नाई उसे सुनिम-धनुष ने बाण अपनाए, वाणों ने शतुओों के सिर, उनने भूमण्डल, भूमण्डल ने आपको, आपने कीर्ति को और कीर्ति ने तीनों लोकों को।' यहाँ प्रस्तुत है राजा का वर्णन। उसके प्रसंग में तत्सम्वद्ध सभी पदार्थ प्रकृत ही है। अतः यहां भी तुल्ययोगिता मानी जानी चाहिए। किन्तु काव्यप्काशकार के अनुसार यहाँ केवल मालात्व और आसांदनरूपी धर्मगत पकता के बावार पर यहा मालादीपक है। इतने पर भी 'मनुष, बाण, शत्ुसिर, भूमण्डल, राजा,
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कीति और बैलोक्य में परस्पर किसी हृदयदारी सादृश्य की प्रतीति नहीं होती। आसादन- कनृंत्व को साधारण धर्म मानकर यदि धनुष आदि में साम्य सिद्ध भी किया जाय तो यह सिद्ध नहीं होना कि कवि को किमी साग्य के आधार पर इन सबका स्मरण आया है, जैसा कि 'सचार- पूतानि' = आदि स्थलों में देखा जाता है। यहां तो केवल सम्बद्धत्वमात्र के आधार पर धनुप आदि को प्रस्तुत किया गया है। उतने में ही चमरकार है और इसीलिए यहा दीपकत्व है। इस प्रकार कारकदीपक और मालादीपक में कवि को साम्य की विवक्षा रहती है ऐसा काव्य- प्रकाशकार का आगह नहीं है। पण्टितराज मी इस तथ्य को समझते हैं। उन्होंने स्वकस्पित कारकतुत्ययोगिता के समर्थन में इस तथ्य को पूर्वपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया है और िखा है- 'न च कियाण प्रकृताप्कृतात्मताविर ह्ेषपि शुद्धप्रकृतत्वे शुद्धाप्रकृतत्वेध् वा कारकस्य सकृद्वृसे- दीपकत्वम्, क्रियामित्राना तु प्रकतापकतात्मतायामेव क्रियावेध मस्येति वलक्षण्याव्- ['सकृद्वृत्तिस्तु धर्मत्य प्रदृताप्रकृतात्मनाम्। सेव क्रियास दहीयु कारकस्येति दीपकम् इति]
-अर्थात 'दीपक के दो लक्षण हुए अन्तर के आधार पर किए हैं कि प्रथम में कारकों के बीच प्रकृनाप्व्ृतत्व सपेक्षिन है, किन्तु द्वितीय में क्रियाओं के वीच नहीं, किन्तु ऐेसा मानने पर कारकतुस्ययोगिता का उच्छेद होने लगता है।' पण्डितराज की इस आपत्ि का उत्तर इम तुत्ययोगिता के प्रकरण में यह कह कर दे चुके है कि-'तुत्ययोगिता का दीपक में अन्दर्माँव होना दोष नहीं है। नव्यों के अनुसार उन्दोंने तुरपयोगिता में दीपक का अन्तर्माव माना है। प्राचीनों के अनुमार तुव्ययोगिता का दीपक में अन्तर्मान माना जा सकता है। और वही अधिक वैज्ञानिक है।' निष्कर्ष यह कि कारकदीपक में न नो प्रकताप्रकृतत्व में कोई चमत्कार रहता और न साम्य में। उसमें चमत्कार रहता है केवल एक कारक में अनेक क्रियाओं के अन्वय का। समुच्चयालकार में एक कारक में अनेक क्रियाओं के अन्वय का चमत्कार नहीं रहता। वहाँ चमत्कार रहता है किसी भी प्रकार के ऐसे अनेक पदार्थों की आकस्मिक एकत्र उपस्थिति में बिनमें किसी एक कार्य की सिद्धि के प्रति साधकता हो। अतः 'स्विद्यति० आदि पद्य में रत्नाकर- कार, विमधिनीकार तथा रसगगाधरकार का समुच्चय मानना अनुभूविविरुद्ध है। विमर्शिनी, इदं विम्बप्नतिविभ्बभाव नापि भवति। यया- मणि शाणोस्वीढ: समरविजयी हतिनिहतः कलाशेपश्चन्द्र, सुरतमृदिता बाललना। मदवीणो नागः शरदि सरिदाश्यानपुछिना तनिस्ना शोमन्ते गलितविभव्ा्चार्थिपु जना:।। अन्र शाणोस्वीढसवादीना विम्वप्रतिबिम्बभाव: । शुद्धसामान्यरूपतवं यथा- फणर अणरा इअंगो भुअंगणदो घरं समुग्हद। णहृदप्पणोवसोहिनसिहो अ तुह पाह मुअदडो।। अत्न राजितत्व शोभितत्वयो: शुद्धसामान्यरूपवम्। नन्वेतदनन्तरमेव 'माछादीपक मन्यलंचितं तदिहापि कि न उच्यत हत्याराङया-छायेत्यादि। दायान्तरेणेति शङ्धळा- रूपेण। प्रंस्नावान्तर इति। शद्वलावन्घोपचितरूपरवाव। यद [दोपक ] विन्वप्रतिबिन्वमावमूटक भी होता है। यया -- 'शाणचढी मणि, शुर््रक्षत समरविजेता, कलारैप चन्द्र, सुरतमृदित वालवधू, मदकीण हाथी,
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शारस्कालीन सूखोवाली-वाली नदी तथा याचकों को वाँट वॉँट कर नहीन वने दाता तनुता [ दुबलेपन ] से शोमित होते हैं।' -यहाँ शागोत्लीढल=ज्ान पर चढ़ना आदि में विन्त्रप्रतिविन्बभाव है।
शुद्ध सामान्यरप [दीपक] का उदाहरण यथा- 'फणरत्नराजिताङ्गो मुजकनायो भरां समुदवहति। नसदर्पणोपशोभितशिखश्च तब नाथ भुजदण्ठ: ।।' -'स्वामिन् ! परथिवी को धारण करता है फणरत्न से विराजित अंग वाला नागराज शेप, और नखलपी दर्पण से शोभित शिखा वाला आप का भुजदण्ड।' -यहाँ राजितत्व और शोभितत्व शुद्ध सामान्यरूप है। [उनमें व्तुपतिवस्तुभाव है, यद्यपि, फण तथा उँगली, मणि तथा नख में यहाँ भी विन्वप्रतिविन्वभाव है।] प्रश्न-'दौमक के ही तुरन्त पश्चाद [मम्मद आदि ] अन्य आचार्यो ने एक मालादीपक भी दतलाया है, उसे यहाँ क्यों नहीं बतलाया जा रहा है?' उत्तर देते हैं-'छाया' आादि। छायान्तर= मृदलास्वरूप मिन्न शिल्प के द्वारा। अस्तावान्तर दूसरे प्रसंग में [ अर्थात महकामूलक अरुंकारों के पसंग में ] क्योंकि वह [ मालादपक] भी श्हल द्वारा निग्पन्न होता है। दीपक का पूर्वेतिहास- भरत मुनि :-- 'नानाधिकरणस्थानां शब्दानां संप्दीपकन्। एकवाक्येन तयोगं तद् दीपकमिदोच्यते ॥' १६।५३ ना्यशा चथा- 'सरांसि हंसै: कुसुमैश्च वृक्षा मत्तैदिरेफैश्र सरोरुददाणि। गोष्ठीभिरदयानवनानि चैव तस्मिन्नशून्यानि सदा करियन्ते॥ 'तालाव हंसों से, वृक्ष पुष्पों से, कमल मत्त मौरो से तथा बन-उपवन गोष्िओं से वहाँ सदा ही भरे रहते हैं।' यहाँ कारिका का अर्थ उदाहरण के आधार पर मनचाहा लगावा जा सकता है। उदाहरण में अनेक कारकों का एक 'अशुन्यीकरण' करिया में अन्वय है। किन्तु यहाँ दीपक का प्राणभूत तर्तक आकरणिकापकर णिकत्वमिश्रण नहीं है, तालाब सादि सभी पदार्थ प्राकरणिक हैं। भामह-आादिमध्यान्तविषयं त्रिधा दीपकमिश्यते। एकस्ैव त्यवस्थत्वादिति तद् मिद्यते तरिषा।
(१) मदो जनयति प्रीर्ति साइनडगं मानभङ्गुरन्। स प्रियासङ्गमोत्कण्ठां साइसह्यां मनसः शुचन्॥ (२ ) मालिनी रंशुमृत: स्त्रियोऽळङ्ुरते मधु: । हारीतशुकवाचश्र भूधराणामुपत्यकाः।। (३) चीरीमतीररण्यानी: सरितः शुष्यदन्मसः । प्रवासिनां च चेतांसि शुचिरन्तं निनीषति॥। -- दीपक तीन प्रकार का माना जाता है आदिदीपक, मध्यदीपक तथा अन्तदीपक, क्योंकि इसमें एक ही वस्तु तीन [आादि मध्य अन्त] स्थानों में रहती है। एक ही के [आदि मध्य मन्त में] अवस्थित होकर वाक्यार्थ में प्रकाश लाने के कारण इसकी संका सार्थक हो जाती है।
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[भामह के इस लक्षण में 'एक'-शब्द का अर्थ अस्पष है। परवर्ती आचार्यों ने उसका क्रमशः सपष्टीकरण किया है] एक एक का क्रमश उदादरण- (') मद [नशा] पीति को उत्पन्न करता है, प्रोति मानमङ्गपट्ठ काम को, काम प्रिया के सगम की उत्कण्ठा को और वह [उत्कण्ठा ] असह्य मानस बेदना को।' [यहाँ वाक्य के आरम्म में : युक्त 'उत्पन्न करना' मद, प्रीति, काम सत्कण्ठा के साथ अन्वित होता है। इसलिए यहाँ आदिदीपक है। साथ ही यहाँ शद्धलाक्म भी है जिससे परवर्तो आचार्यों ने माला- दीपक माना है ]। (२ ) मालिनी, और झीनाअंशुकपह्दिनी स्त्रियों को वसन्त अलंकृन करता है और हारीत तथा झुक को वाणी एव पर्वतों की उपत्यकाओं को भी।' [यहाँ 'अलकृत करना' वाक्य के मध्य में प्रयुक्त है और मालिनी आदि अनेक कर्मों से अन्वित हो रहा है, अतः यह मध्य- दौपक हुआ। । (३) झींगुर झाकार वाले धोर जगल, सूख रहे पानी वाली नदियों और प्रवासियों के चिचों को मीम्म समाप्त करना चाहता है। [यहों ग्रीष्म वाक्य के मन्न में पयुक ह और उसका जंगल आादि अनेक कर्मो से अन्वय है अतः यह अन्तदीपक हुआ]। वामन = [ सू० ] 'उपमानोपमेयवाक्येष्वेका करिया दीपकम्।' तस्न्रविधम्, आदिमध्यान्तवाक्यवृत्तिभेदावू।।' -उपमानवाक्य और उपमेयवाक्यों में प्रसहवशात या सामर्थ्यवश्याद लागू होने वाली एक क्रिया दोपक कहळाती है। दोपक तीन प्रकार का होता है, उस कियापद के वाक्य के आदि, भध्य और अन्त में रहने के कारण। उदाहरण- 'भूष्यन्ते प्रमदवनानि वालपुष्पे: कामिन्यो मधुमदमासलैविलासै। ज्क्माण श्ुतिगदिते: क्रियाकलापे राजानो विरलितवैरिमि प्रवाप: ।' -प्रमदबन वालपुष्पा (कलिओं) से भूषित होते हैं, कामिनियाँ आसवजनित नये से मांसल विलामों से, ब्राक्मण श्ुतिओं द्वारा प्रोक्त क्रियाकलाओं से और राजा लोग यत्रुओं को नष्ट कर चुके अपने प्रतापों से।' यहाँ एक ही 'भूष्यन्ते=भूषित होते हैं' क्रिया का प्रमदवनादि कारकों से अन्वय हो रहा है और वह वाक्य के भारम्म में प्रयुक्त है अत यह आदिदोपक हुआ। इसी प्रकार अन्य दो उदाहरणों में वामन ने केवल किया को अनेक कारकगत बनलाया है और उसे वाक्य के मध्य तथा अन्त से प्रयुक्त दिखलाकर वहाँ मध्यदीपक तथा अन्तदीपक की स्थापना की है। किन्तु वामन कारकों को प्राकरणिकता या अभाकरणिकना का वस्लेख नहीं करते। यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि दीपक में उपमानोपमेयमाव का निवेश वामन ही पहिले पहल कर रहे हैं। इन्होंने भामइ के अस्पषार्थ 'एक'-शष्द का अर्थ क्रिया कर दिया है।
अन्तर्गतोपमा धर्मा यत्र तद् दीपक विदु: ।।' 'जहाँ धर्म प्राधान्य तथा अप्राधान्य से युक्त वा वेसे पदार्थों से संबद्ध वाक्य के आादि, मध्य तथा अन्न में स्थिन तथा उपमागर्मित हो वह दीपक माना गया है।' यहाँ प्राधान्यामाधान्य करा अर्थं प्रतो हारेन्दुराज ने उपमेयत्व और उपमानत्व करिया है। उदादरण- 'सजदार शरत्काल कदम्बकुसुमयियः। प्रेयोवियोगिनीनो च निःशीषसंभसुम्पद: ॥।1
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-'शरत्काल ने कदम्नों की कुसुम-शोमा तथा पियवियुक्त वनिताओं की समस्त सुखसम्पत्ि समाप्त कर दो।-यहाँ मूल श्लोक में 'समाप्त करना' क्रिया वाक्यारम्भ में प्रयुत्त है अतः आदि- दीपक हुआ। इसी प्रकार मध्यदीपक तथा अन्तदीपक के भी उदाहरण च्हट ने दिए हैं। उन्हट भामह के ही समान कैवल क्रिया को अनेकान्वयी नहीं बतलाते। भामह के अस्पषट 'एक'-शब्द के स्थान पर वे स्पष्टतः धर्म का उल्लेख करते हैं। साथ ही वे उपमानोपमेयमावमान पर जोर देते हैं पकर णिकाप्राकरणिकत्व पर नहीं। यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इन तीनों आचार्यों का मालादीपक पर कोई ध्यान नहीं है। रुदट-यनैकमनेकेषां वात््यार्थानां क्रियापद भर्वांि। तद्वत कारकपदमपि तदेतदिति दीपक देया ।७।६४॥ आदो मध्येडन्ते वा वाक्ये ततसंस्थितं च दीपयति। वाक्यार्थानिति भूयस्तिषैतदेवं नवेत घोढा ॥७।६५॥! -जहाँ अनेक वाक्याथों में एक क्रियापद होता है और इसी प्रकार अनेक क्रियात्मक वाक्यारथों में एक ही कारकमद वह दो प्रकार का दीपक भाना जाता है। यह [क्रियापद अथवा कारकपद ] वाक्य के आदि, मध्य और अन्त में स्थित होकर वाक्यार्थों को दीप् करता है अतः छ प्रकार का होता है। उदाहरण- 'कान्ता ददाति मदनं मदनः संतापमसममनुपशमन्। संतापो मरणमद्यो तथापि शरणं नृर्णा सैव ।' -कान्ता काम प्रदान करती है, काम अतुल्य और सनुपशमनीय संताप मर संताप मरण, किन्तु आश्षर्य यह है कि इतना होने पर भी मनुष्चों के लिए शरण= रक्ष करने वाली वह कान्ता ही है। यहाँ 'दान करिया' वाक्य के आरम्म में प्रयुक्त है अतः आादि करिया दीपक है। 'निद्राऽमददरति जागरमुपशमयति मदनदहद्नसंतापम्। अनयति कान्तासंगमसुखं च कोऽन्यस्ततो वन्धुः। -'निद्रा से वड़ा वन्धु कौन है, वह जागर [उन्निद्रता के रोग] को दूर फर देती है, मदनानि के संताप को व्रान्त कर देती है और भियामिलन का सुख भी दे देती है।'-यहाँ एक निद्वा में भनेक क्रियाओं का अन्वय वतलाया गया। निद्रा वाक्य के आरम्म में प्रयुक्त है अतः यह आादि- कारकदीपक हुआ। रुद्रट ने करिया औौर कारक के शेष चार लन्य दीपकों के भी उदाहरण दिए है। किन्तु उन्होंने भामह द्वारा प्रस्तुत उदाहरण में विद्यमान उस विशेषता पर भी ध्यान दिया है जिससे मालादीपक को विकास मिका है। यदपि उन्होंने मालादीपक नाम से किसी 1 नवीन दीपक को प्रस्तुत नहीं किया है। इसके अतिरिक कारकदीपक की कत्पना भी पहिली बार रुद्रट में ही दिसाई देती है। किन्तु रूद्रट ने वामन के समान केवल किया को ही अनेक. का रकान्यी धर्म बतलाया। वस्तुतः यह धारणा भामह से ही चल पड़ी थी क्योंकि मामह के सभी उदाहरणों में एक ही एक क्रिया का प्रयोग है। मम्मट-'सकृद्वृत्िस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्। सैव क्रियासु बह्लीयु कारकस्येति दीपकम्॥ मालादीपकमाधं चेद यथोत्तरगुणावह्म्।। इनका अर्थ अमी-अमो स्पष्ट किया जा चुका है। इनके लक्षण में दीपक की आदि, मध्य तथा अन्त में धर्मादि के प्रयोग को लेकर होने वाली विशेषताएँ छोड़ दी गई हैं। पण्डितराज जगनाथ ने इसका कारण चमत्कार का अभाव वतलाया है अर्थाद वाक्य के भारम्भ आदि में किसी पद
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के उपयुक होने से चमत्कार में कोई अतिशय नहीं आता। 'धर्मस्यादिमध्यान्तगतत्वेऽवि चमरकार- वैलभुण्यामावाद् त्रेविध्योक्तिरापातमात्रम्।'अन्वित होने वाला पदार्थ मी यहाँ धर्मरूप बतलाया गया है केवल करियारूप नहीं। अनेक क्रियाओं में एक कारक के अन्वय का भी स्वतन्त्र स्थान है औौर माळदीपक का भौ। प्राकरणिकत्व और अप्राकरणित्व का भी स्पष्ट उल्लेख है। साहृश्य का महत्व स्पष्ट शब्दों में स्वीकार नहीं किया गया है। इस प्रकार मम्मट का दीपकन्क्षण प्राचीन लक्षणों के आधार पर निर्मिन एक सुविचारित लक्षण है। परवर्त्ती आचार्यों में- शोभाकर ने अडकाररत्नाकर में दीपक का लक्षण इस प्रकार किया है-"[सकद् धर्मस्य निर्देशेषपस्तुवाना प्रस्तुनाना वा आर्धमोपम्य तुल्ययोगिता-]' 'मिश्राणां दीपक्म्।' अर्थात [धमे वा एक बार निर्देश होने पर केवल अप्रकृत अथवा केदल प्रकृत पदार्थी का आर्थ औषम्य तुत्ययोगिना होती है और ] 'मिश्रित पदार्थों का दीपक।' यथा- 'दूरे परिच्छेदकथा हि सत्यमेतद्गुणानामुदधेरपा च।' 'हम [साइसांक] के गुणों और समुद्र के जलों की इयचा पाना बहुत दूर की वान है।' शोभाकर ने 'सचारपूनानि०' पथ में प्रमा और धेनु दोनों को प्रस्तुत मान तुल्ययोगिना स्वीकार की है, दीपक नहीं, जब कि व्वकिविवेककार आदि ने दीपक स्वीकार किया है। अप्पयदीक्ित ने कुवलयानन्द में दीपक का निरूपण इस प्रकार किया है- 'वदन्ति वर्ण्यावर्ण्याना धर्मक्यं दीपक दुधाः। मदेन भाति कलम प्रतापेन महोपति॥४८॥ -वष्यं=प्रस्तुन = प्राकरणिक और भवर्ण्य= अप्स्तुत = अप्राकरणिक का धर्मक्य दीपक, यथा हाथी मद से सुशोमित होता है और राजा प्रताप से। तथा-'मणि. शाणोल्लीढ'-पद। पण्ढितराज जगसाथ ने इसी का निरूपण इस प्रकार किया है- 'प्रकृतानामप्रक्ृताना चकसाधारणधर्मान्वयो दीपकम्।' प्रकृत तथा अप्रकृनों का एक साधारण धर्म में अन्वय दीपक होना है। पण्टितराज जगनाथ दीपक के मालादोपक भैद को दीपक का भेद न मान शंसलामूढक अलकार एकादर्ली का नेद मानना उचित मानने हैं। उनका कहना है कि मालादीपक में साहश्य का समाव रहता है। वस्तुन. कारकदीपक में भी कविप्रतिभा-साटृटश्य से प्रवृच नहीं होती, अत सादृस्य दीपक का अनिवार्य हेतु नहीं है। एकावली में एकान्वयित्व का अमाव रहता है जो दीपक का प्राग है। अलंकारसर्वस्वकार ने दीपक के इस मेद को गिनाया तो शृसलामूलक भेदों में हे करिन्तु नाम मालादीपक ही रखा है। विश्वेध्वर पण्डित ने दीपक का निरूपण इस प्रकार किया है- १. '[ सूत्र ] प्रकृताप्रवृतानां यद्येकान्वयित्ास्नि दीपक तत स्याव ।' [वृ०] यन्नोषमानोपमेयभूवाना प्रकरणिकाप्राकरणिकानामेकपदोपाचेन गुणक्रियादिना
-जहा उपमानोपमेयरूप प्राकरणिकों तथा अम्राकरणिकों का एक शब्द से कथिन गुणक्रिया आदि धर्म के साथ अन्वय हो वह दीपक। २. [सू० ] यत्रेकमेत्र कारकमन्वयमेति क्रियास वहीयु। [वृ०] यत्रकमेव कारकमनेकक्रियास्वन्वितं तदषि दीपकम्।
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जहां एक ही कारक अनेक क्रियाओं में अन्वित हो वह मो एक दीपक होता है। विश्वेश्वर मण्डित ने कर्ता से लेकर अधिकरण तक के सभी कारकों के मनेक किया में अन्वय के उदाहरण दिए हैं। ३. [ सू०] माळ तु पूर्वपूर्ते विध्यन्तरेणोत्तरान्वयिनि ॥ [इृ०] तस्थां क्रियाणां रूपान्तरेणान्वितत्य पुनत्तत्यामेव रूपान्तरेणान्व्रये मालादीपकन्। -एक ही कारके एक ही करिया में मिन्न-भिन्न रूप से अन्वित हो तो मालादीपक। वदाहरण पूर्वाचार्यप्रदत्त उ्दाहरण जैसे ही दिए है। किन्तु उन्होंने मालादीपक को एकाचली मानने के सुझाव पर पण्डितराज का खण्डन नहीं किया, न तो उसमें स्वयं सादृश्य की सिद्धि की। संजोविनीकार विद्याचकवत्तीं ने दोपकविवेचन का सार-संब्नह इस प्रकार किया है- 'दीपर्क वास्तवीपम्यं प्रकृताप्रकृताधयन्।
अस्तुत और अपस्तुत का परस्पर वास्तविक किन्तु [वस्तुलप वाभ्य से ] गन्य [ =वास्तव ] सादृश्य दोपक होता है। क्रियादीपक और कारकदौपक दो प्रकारों का वह [अनेकान्वयी धर्म के] वाक्य के आरम्भ, मध्य और अन्त में प्रयुक्त होने से पुनः तीन प्रकार का हो छ प्रकार का माना नाता है। वस्तुतः संजीविनीकार की वह संग्रह्कारिका अटंकारसर्वस्वकार के दोपकनिरूपण का आकलन समग्रूप से नहीं करती। [सर्वस्व ] [सू० २६] वाक्पार्थगतत्वेन सामान्यस्य वाक्यद्ये पृथङ्निर्देशे प्रतिवस्तूपमा । पदार्थार्धो वाक्यार्थं इति पदार्थगतालंकाराननतरं वाक्यार्थगतालंकार- प्रस्ताव:। तत्र सामान्यधर्मस्येवादयुपादाने सकत्निर्देशे उपमा। वस्तुमति- वस्तुभावेनासकृन्निर्देशेऽपि सैव। इवादयनुपादाने सकृत्निर्देशे उपमा । वस्तु प्रतिवस्तुभावेनासकृन्निदेशे तु शुद्धसामान्यरूपत्वं विम्बप्रतिविम्बभावो वा। आद्य: प्रकार: प्रतिवस्तूपमा। वस्तु-शन्दृत्य वाक्यार्थवाचित्वे प्रतिघा- वाक्यार्थमुपमा साम्यसित्यन्वर्थाश्रयणाद्। केवलं काव्यसमयात्पर्यायान्त- रेण पृथजनिर्देशः। द्वितीय प्रकाराश्रयेण दष्टान्तो चक्ष्यते। तदेवमौपम्याश्रये- गैव प्रतिवस्तूपमा । यथा- 'वकोर्य एव चतुराश्न्द्रिकाचामकमणि। आवन्त्य एव निपुणा: सुडशो रतनर्मणि॥' अन्न चतुरत्वं साधारणो धर्म उपमानवाक्ये, उपमेयवाक्ये तु निपुण पदेन निर्दिछ:। न केवलमियं साधर्म्येण यावद् वैध्म्येणापि। यथात्रैवोत्तर- स्थाने 'विनावन्तीन निपुणा: सुदृशो रतनर्मणि' इति पाठे। [सू०][यदि उपमा ] वाक्यार्थों में [ हो और तदर्थ] साधारण धर्म का दो वाक्यों में भिन्न-भिन्न शब्दों से निर्देश किया गया हो तो [वह उपसा] प्रतिनस्तूपमा [कहलाती है]। २६ ।
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[कृ०] वाभ्यार्य पदार्थ से निम्पन्न होता है, इस कारण वाक्यार्यगत सलंकारों का प्रकरण पदार्थगत अलंकारों के बाद प्रस्तृत किया जा रहा है। यहा जो यह सामान्य या साधारण धर्म है इसका निर्देश यदि केवल एक बार किया जाय तो वहा तो उपमालकार होता ही है, वहा मो उपमा- रंकार हो दोता है, अहा साधारण धर्म का निर्देस् एकाधिक बार वसनुप्रतिवम्नुभाव से किया जाना है, किन्तु यदि 'हव'-मदि शब्दों का उपादान नही रहवा वहा यदि साधारणवर्म का निर्देश केवल सकबार हो तो दोपक या तुत्ययोगित होते है, और यदि रसका निर्दश एकाधिक वार हो तो वदा या तो वह [साधारमधमें] शुद्ध सामान्यल् ही रदता दे या वहा विन्दमतिविम्वभाव रहता है। इन्दरों दो स्थितिओं में से जो प्रथम स्थिति है उसमें उपमा को [उपमा न कहकर ] प्रति- वसूपमा कड़ा जाता है, इमलिप कि ऐेसा कहने से उसका अर्थ अपने समगरूप में स्पष्ट हो जाना है, क्योंकि 'वस्तु-'शब्द का अर्थ है 'वाक्यार्य', अत" 'प्रतिवस्तु'शम्द का सर्थ हुआ 'वाक्यारथे वाक्यार्थ में' और 'उपमा' शब्द का अर्थ तो साम्य है ही। [ इस प्रकार प्रतिनस्नपमा का अर्थ हुआ वाक्यार्थ का वाक्यार्य से साम्य ] यहं साधारण धर्मे को मिन्न मिन्न शब्दों से कहे जाने की जो प्रविशा हे वह केवल इसलिए कि काव्यकला में सौन्दर्य की रक्षा वेसा हो करने से होतीं है [ शब्द न बदलने से अभिव्यत्ति में हदयसपसिंता कम दो जाती है। इसीदिए काव्यश्ास्त्र =काव्य समय में एक हो शम्द के पुनः प्रयोग में 'कयितपदत्व' दोष माना गया है]। ठक दो स्थितियों में विन्वप्रतिविम्वमाव को जो दितीय स्थिति है उससे जो अलकार निग्पम्न होठा है उसे दृष्टान यहा जाता है, उसका निरुपण इस अलकार के बाद किया नाएगा। इस प्रकार प्रतिवस्नूपमा सादृश्य पर की निर्भर रहने वाला अर्लंकार है। यथा- 'चन्द्रिका के आचमन को कचा में चकोरियाँ हो चत्ुर होती हैं [ और ] मुरतकेटि में नियुग सवन्तोजनपद की सुन्दरियां = मालविकायें की हुआ करती है।' -यदा साधारण धर्म है चनुरता, उसे उपमानवाक्य में चारशव् और उपनेयवाक्य में निपु शब्द से निर्दिष्ट किया गया है। यह प्रतिवस्तपमा केवळ साधम्य के आवार पर नहीं, वेष्े के आघार पर मो दोती है। यया इसी पद्य के उत्तरारध में 'अवन्तीजनपद की सुन्दरियों को छोड अन्य सुन्दरिया सरतकेलि में निपुण नहों होती।' ऐेसा पाठ मान हेने पर। विमर्शिनी वाक्यार्येत्यादि। एनदेव व्याद्यातुमलंकारान्वरः सहास्या विभागं दर्शयति-तन्रे- स्यादिना। 'तया स पृतश्र विभूपितश्न' हर्यश्रोपमायां सकृन्निर्देशः। 'पाण्ड्योऽयमंसार्पित- लम्वहारः' इश्यादावपि चासकषनिर्देशः। तदेवमिवाद्युपादाने साधारणघर्मस्य यथासंभव स्वरूपं निरुप्येवाद्यनुपादानेऽपि निरूपयति-इवादीत्यादिना। यद्पि दीपकसुश्ययोगि- तयो: सामान्यस्यासकृविदेश्ोऽपि संभवति, तथापि सकत्िदेंशं बिना तयोरनुस्थानातदे- वेह प्राधान्येनोकम्। असकृविदशय्य द्विया भवतीरयाह-असकृदिस्यादि। आघ प्रकार इति शुद्धसामान्यरूपरवम्। यदि चात्र सामान्यस्यकरूपवमेवास्ति तर्वक पर्यायान्तरेण प्टयह् निर्देश: क्रियत इस्याराङयाद-केवलमित्यादि। यदुकम्-'नैकंपदं द्वि: प्रयोज्यं भायेण' इति । विम्वप्रतिविम्वभावो द्वितीय प्रकार। एवमेतदुपसंदवरन् प्रकृतमेव सिद्धान्तयति-चदेवमित्यादिना। औपम्याययेोरति। एत- दभिदघता अ्न्यककता प्रतिवस्तूपमाया दष्टान्तान्वेदो दर्शितः । यतोऽस्याः प्रकृतार्थस्य विशेषामिधितसया साहर्यार्थमप्रकृतमर्थान्तरसुपादीयते, अत एव चात्न प्कृताप्रक्कवयो-
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रुपमानोपमेयभावः । दृष्टान्ते पुनरेतादशो वृत्तान्तोऽन्यन्रादि स्थित इति प्रककतस्थार्थ- स्याविस्पष्टा प्रतीतिर्मा कृदिति प्रतीतिविशदीकरणार्थमर्थान्तरसुपादोयते। अत एवात्रार्थान्तरोपादानं म्कृतस्य न काप्युपयुक्तमपि तु प्रतिपत्ः प्रकतार्थप्रतीतेरविस्पष्ठ- सानिरासात् । केचिच्च दष्टानते हयोः समर््यसमर्थकभावेनानयोभेदमाहु:। तदसत्। यतः सरुपयोविरोपयोः समव्यसमर्पकभावो न भवति। वस्त्वन्तरेण वर्त्व- न्तरसिद्धनुपपत्तेः। स हि सामान्यविशेषयोरेव भवति। सामान्यस्य नियमेन विशेषनिष्ठ स्वाद्विशोपस्य च नियमेन सामान्याश्रयत्वान्। यदि चात्र समर्व्यसमर्धकभादः स्यादर्थान्तर- न्यासानृस्य पुयगलंकारता न स्थान। सम्ध्यसमर्थकमावात्मनः सामान्यत्योभयत्राप्यनु- गमाव। अन्ये पुनरुभयवाप्यार्थनौपम्यमाधित्य सामान्यस्य शुद्दसामानयरूपत्वबिन्द- प्रतिविग्बभावाभ्यां व्यवस्तितेर नयोर भेदमाहु:।तदप्यसव। एतावतेनीपम्यास्यत्य सामा न्यलक्षणस्यानुगतत्वादुपमानेदवदनयोः पृथगलंकार त्वानुपपत्तेः। सदेवं वाक्यनैरपेपयेऽपि वकपतिपर्तोरेव विशेपादनयोर्भेद: सिदू: । वैधम्येणपीति। भवतीति शेष। वाक्यार्ष इत्यादि, इसी की व्याख्या करने के लिए अन्य अलंकारों से इसका विषयविभाग करते हुर लिखते हैं-तत्। 'प्रमामहत्या-तया स पूतश्र विभूषितश्र' [कुमारसं० १]-पद्य में आई उपमा में सावारणधर्म का निर्देध केवल एक बार किया नया है और 'पाण्डचोऽयमंसापिंत०' [रघु० ६] पद्य में साषारण धर्म [विम्वप्रतिविम्बभाव से हार आदि] का निर्देश पकाधिक बार किया गया है। इस प्रकार 'इन' आदि का उपादान रहने पर साधारणधर्म का जैसा कुछ रूप संभव था उसका निरुपण किया। अव शवादि का उपादान न रहने पर समव स्वल्प पर विचार करते हैं-'इचादि' इत्यादि अन्थ द्वारा। ययपि दीपक और तुत्ययोगिता में साधारण- धर्म का एकाधिक बार भी निर्देश रह सकता है तथापि ये दोनों, बिना केवल एक वार निर्देश के निग्पन्न नहीं हो सकते इस कारण एक वार निर्देश ही प्रधान है अतः उतीका उल्लेख किया गया। 'एकाधिक चार निर्वेद दो प्रकार से संमव है'-यह वतलाते हुए दिसते है-असकृद इत्यादि।. आघयः प्रकार :- प्रथम प्रकार जिसमें साधारणवर्म शुद्ध सामान्वरूप रहता है। [साधारणवर्म के मिन्न-भिन्न शब्दों से निर्देश पर ] प्रश्न उठ सकता है कि 'यदि प्रतिवस्तूपमा में मिन्न-भिन्न वाच्यों में केवल एक ही साधारणपमे चतलाना होता है तो उसका मिन्नमिन्न पर्यार्यों से ही बतलाया जाना क्यो आवश्यक है' । इस पर उत्तर देते हैं 'केवलं काव्यसमयः' इत्यादि। जैसा कि [वामनाचार्य ने 'काव्यसमय' नामक प्रकरण में] कहा है-'नैक पद द्विः प्रयोज्य प्रायेण' [का० सू० ५।११]-'प्रायः एक ही पद एक ही झलोक में दो बार म्रयुक नहीं किया जाना चाहिए। द्वितीय: प्रकार := द्वितीय प्रकार अथात विन्वमतिविन्वभावात्मक्। इस प्रकार इस विस्तार का उपसंहार करने हुए प्रकृत प्रतिवस्तूपमा पर निष्कृष्ट सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं-'तदेवम्' इत्यादि द्वारा। औमभ्याअ्रत्ेण=सादृडस पर माित कहकर चन्धकार ने प्रतिवस्तूपमा का दृष्टान्त से मेद दिखका दिया। इस [प्रतिबस्तूंपभा] में अग्रकृत अर्थ इसलिए अपनाया जाता है कि उसके साथ सादृश्य सिद्ध हो जाने से पकत अर्थ और अषिक सुन्दर हो सके इस कारण इसमें प्रकृत और अप्रकवृत अर्थो के बीच उपमानोपमेयभाव रहता है। दृष्टान्त में अप्रकुत अर्थ का उपावान दूसरे उद्देश्य से किया जाता है। वह है प्रकृत अर्थ की विशदतया प्रवोति क्योंकि दृप्टान्त-वास्यार्थ में प्रकृतरप से उपास्त गर्थ के विश्य में दृष्यंत देने के पूर्व ऐेसा भाव नहीं होता है कि उस जैसी स्थिति अन्यन्न सन्मद नहीं है, अतः उसके विमय में कही गई वात चित्तमे ठीक जम नहीं पाती। दृष्टांतरूप से अन्य वाक्यार्थें प्रस्तुत कर देने पर वह जम जाती है। इसलिए दृष्टात में दूसरे अर्थ का उपादान प्रकृत अर्थ के लिए उपयोगी न श अ० सु०
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रेकर प्रतिपत्ता=बोद्धा =महृदय पाठक के लिए उपयोगी होता है, क्योंकि वह प्रकन अर्थ के विषय में वनी धूमिल, अमरूद प्रतीति को उसके चित्त में विस्पष्ट और प्रूद बना देता है। [इस पर पण्डितराज जगन्नाथ का कहना है कि जब प्रकृन और अप्रकृत ओ प्रतिवस्तू- पमा के ही समान दृष्टान्त में भी रहत है तो यह कदना युक्तिदीन है कि प्रतिवस्नूपमा में सादृश्य की प्रतीति होती है और दृष्टान्त में नहीं। किसी एक में सादृश्य मानने पर उलटे, दृष्टान्त में ही मादृश्य मान कर प्रतिवस्तूपमा में उमका अभाव बनवाया जा सकता है। इमके अतिरिक्त अप्र- कृतार्थ द्वारा प्रकृतार्थ का विशदीकरण सादृश्य से भिन्न कुछ नहीं हो सकना। द्रष्टव्य रमगगाधर दृष्टान्तप्रकरण ।] दुछ विद्वान् इन दोनों को [दृष्टान्त में ] समर्थ्यसमर्थकमाव [ मान उस ] के आधार पर मिन्न दतळाते हैं, किन्तु वह ठीक नहीं, क्योंकि समथ्यसमर्थकमाब एक से ही एक से दो विशेषों में नहीं होता। क्योंकि मिन्न वस्तु से मिन्नवस्तु का समर्थन संमव नहीं होता [विशेष-विशेष परस्वर मिन्न ही रहते हैं ]। वह केवल सामान्य और विशेष के ही बीच होता है, क्योंकि सामान्य नियमत विशेष से अमिन्न रहता है और विशेष मी नियमत सामान्य से। यदि दृष्टान्त में ममर््यसमर्थकभाव दोवा तो इसे अर्थान्तरन्यास से भरग अलकार मानना समव न होता। कयोंकि समर्थ्यसमर्थकमाव- रूपी विशेषता दोनों में ही समानरूप से रहती है। कुछ विद्ान् इन दोनों में विधमान आर्थ सादृश्य के धरातल पर इनका भेद करते है क्योंकि प्रतिवस्नूपमा में साधारणध्म वस्तुप्रतिवस्तुमावापत्र शुद्ध सामान्यरूप साधारणवर्म रदता है और दृष्टान्त में विम्वप्रतिविम्बभावापन्न। किन्तु वह भी ठीक नहीं, क्योंकि इस आधार पर ये दोनों दो विशेष प्रकार की उपमा ही सिद्ध होगे क्योंकि मादृश्यनर्व दोनों में उपमा जैसा ही रहेगा। [यद स्वयं सवस्वकार का ही सण्डन है]। इस प्रकार इनका भेद वाक्य से समव नहीं होता। वक्ता और बोद्धा की मानस सवित्ति को दी लेकर इनका भेद ठीक ठदरता है। वैंधर्म्येणापि=वैधर्म्य से भी इसमें होता है-इतना जोटना शेप है। विमर्श-प्रतिवस्तूपमा का पूर्वेतिहास- भामह और वामन ने प्रतिबसतूपमा को उपमा का ही भेद माना है। यथा-
भामद- *समानवस्तुन्यासेन प्रतिवस्नूपमोच्यते। ययेवानमिधानेषि गुगमाम्यप्रतीतित। कियन्त सन्ति गुणिन सापुमाधारणत्रिय । स्ादुपाकफलानम्रा. कियन्ती वा्यशासिन॥ साकुमाधारणत्वादिगुणोऽत्र व्यतिरिच्यने। स साम्यमापादयति विरोधनि तयोर्येत । -२३४-३६ ॥। -यथा इव आादि का शब्दत कथन न रहने पर भी ममान वस्तुनों [वाक्यार्थो] को उरस्थिन करने से [ उपमा ही] प्रतितस्नूषमा करो जानी है क्योंकि वहाँ गुणसाम्य की प्रतीति होती है। यथा-'ऐमे गुभी किनने हाने है जिनकी सपत्ति साधुजनों के लिए सुलम रदती है, या परिपशव फलों से झुके ऐमे किनने वृक्ष होते हैं जो रास्ते पर लंग रदने हैं।' यहाँ पूर्वाद्ध और उत्तराथं की वस्तुष भिन्न भिन्न है तथापि सामुसावारणत्व आदि गुण यहाँ दोनों अर्थ के वाक्यार्थों में साम्य की प्तीति करा देना है यद्यवि वह पूर्वादधं में माधुमावारण शब्द से कवित है और उत्तरार्थं में उमसे मिन्न मार्गस्थिन शब्द मे [ क्योंकि 'मार्गस्थित' शब्द से ठीक रास्ते चलने वाला अर्थ भी निककता है जिसका विरोधार्थी शब्द 'उन्मार्गपवृत्त' है]।
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इस विवेचन से न्पष्ट है कि मामह प्रतिवसतूपना की प्रायः संपूर्ण सामग्री प्रस्तुत कर देते हैं। चामन :- संमत्युपभाप्रपञ्जी विचार्यत [सू०] प्रतिचस्तुषभृतिः उपभाप्रपज्जः ॥४।३१। वाक्यार्योपमायाः प्रतिवस्तुनो भेदं दर्शचितुमाह- [सू०] उपमेयस्योक्तौ समानवग्तुन्वास: प्रतिवस्तु॥ [तृo] समानं वस्तु वाक्या्थ: तत्य न्यास: समानवस्तुन्यास :- उपमेवस्यार्थांद् वाक्यार्थस्योत्तौ सत्यामिति। अन्न हो वाक्यार्थी, एको वाक्याथोपमायामिति भेद:। वदया- देवीमावं गमिता परिवारपद कर्य भनत्वेपा। न खळ परिभोगयोग्यं दैवतरूपांकितं रत्नम्।।' -अव उपमा के प्रमंच पर विचार करते हैं- [ सू०] प्रतिवस्तूपमा आदि उपमा का प्रपंच है। वाच्यार्थोपमा ['पाण्डयोऽयमंसापिंत०' आदि पधों के पूरे वाक्यार्थ में रहने वाली उपमा] से प्रतिवस्तु की उपना का भेद वतलाने के लिए लिखा- [ सू०]उपमेय को कहकर समान वस्तु प्रस्तृत करना [ है] प्रतिचस्तूपमा। [इृ०] समान जो वस्तु अर्थाव वाक्यार्थ, उसका न्यास =अर्धाव प्रस्तुतीकारण हुआ समान- वस्तुन्यास, किन्तु तब, अब उपमेय अर्थात वाक्यार्थरूप ही उपमेय पहिले प्रस्तुत किया जा नुका है। इस प्रकार इस [ प्रतिवस्तूपमा ] में दो वाक्यार्थ रहते हैं जब कि [ 'पाण्डयोऽ्यम्०'-इत्यादि पद्म के पूरे वाक्यार्थ में रहने से ] वाक्यार्थोपमा [कही जाने वाली उपमा] में केवल एक ही वाकयार्थ रहता है। यंथा- 'यह् रत्नावली अव जब महारानी हो गई तो यह परिवार [नौकर चाकर जो लासपास घिरे रहते हैं] पद पर कौसे रह सकती है। सिस रत्न पर देवप्रतिमा उकेर दी जाय वह परिभोग के योग्य हो ऐसा नहीं होता॥ नामन के इस विवेचन से स्पष्ट है कि वे प्रतिनस्तूपमा को बपमा ही मानते हैं। यह मी लष्ट है कि प्रतिवस्तूपमालक्षग की समग्रता यहीँ निष्पन्न हो जाती है। उन्द= उद्भट ने भी प्रतिवस्तूपना को उपमा के ही प्रसक में प्रस्तुत किया है- 'उपमानसनिवाने च सान्यवान्युच्यते युधैयंत्र। उपमेवत्य च कविभिः सा प्रतिवस्तूपमा गदिता ॥। लमते । सपमानतवं चापर इत्युपमावाचिशून्यत्वन्। -कविजन, जहाँ सान्य [सावारणधम] वाची शब्द का प्रयोग उपमान के साथ भी करते हैं और उपमेय के साथ मी उसे प्रतिवस्तूष्मा कहा गया है। --- यहाँ एक अर्थ प्राकरणिकत्व के आधार पर उपमेय सिद्ध हो जाता है और दूसरा उपमान हसलिए उपमावाचक शब्द का प्रयोग नहीं रहता। यथा- उस [पार्वती] जैसी सौन्दर्य और शील दोनों से सनृद्ध युवतियाँ कम ही होती हैं। ऐसी रातें कितनी होती हैं जिनमें वर्षा भी हो और पूर्ण चन्द्रविन्द मी। -स्ाष्ट ही यहाँ उड् ने भामह तथा चामन से आगे बड़कर उपमावाचक शब्द के अभाव तथा साधारण धर्म के उपमान और उपमेय के साथ कलग-अलग प्रयोग पर वल दिया। किन्तु उनका 'सान्यबाची' शब्द भ्रामक है। सदय :- रुदद ने प्रतियसतूपभा को उभयन्यास नामक औपन्यमूलक अलंकार माना हैं- 'सामान्यावप्यर्थं स्फुटसुपमायाः स्वरूपतोऽपेतौ। निर्दिश्येते यस्मिन्नुमयन्यास: स विज्ञेय:॥
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जयां दो सामान्य प्रतीन होने वाले अर्थ कहे तो स्पष्ट रूप से जायें किन्तु वे उपमा के स्वरूप से रहित हों उसे उमयन्याम समझना चाहिये।' न्पष्ट ही रुद्रट की यह कारिका अर्थ की समगना का वहन नहीं कर पाती। उपमा के स्वरूप में रहित कहने का अर्थ उपमावाचक इवादि के प्रयोग का अमाव ही हो सकता है। भामह और वामन ने 'समाननस्तुन्यास' शब्द का प्रयोग किया था और एक अर्थान्तरन्यास नाम का अलकार भी माना था। रुद्रट ने उसी 'अर्थान्तरन्यास' शब्द का अनुकरण कर प्रतिबस्नूपमा के लिए 'उमयन्यास' शब्द वना लिया। अधिक अच्छा होता यदि वे समानन्यास शब्द चलाने क्योंकि उमय शब्द 'वस्तु' या 'प्रतिवस्तु' शब्द के ही समान असमानदय तक व्यापी है। सरवथा स्ट्रट ने प्रतिवस्तूपमा को उपमा से अमिन्न या उपमा का ही एक भेद न मानकर उसे कुछ दूर सोचिना चाहा है जिसका अनुकरण मम्मट में देसा जाना है और कदाचिव प्रथमत सर्वस्वकार ने ही इनका करम ठीक किया है। स्ट्रट ने उमयन्यास नाम से प्रतिवस्तृपमा का लक्षण कर जो पदाहरण दिया है वह ठीक मामह के उदाहरण का भावार्थ है- 'सकलजगत्साधारणविभवा मुवि साधवोजधुना विरला। सन्ति कियन्तस्तरव सुसवादुगन्धिचारफला ।।' -'हम समय ऐसे साधुपुरुष विरल ही है जिनका वैमव सारे रुसार के लिए उपयोगी हो। ऐसे वृक्ष कितने होते है जो उत्तम स्वाद से युक्त, सुगन्धी तथा सुन्दर होते हैं। यहा मामद के उदाहरग में उपलब्ध 'मार्गस्थता' को छोड रुद्रट उपमानवाक्यार्य में साधारणध्मे की स्थापना नही कर सके। कदाचित वे साधारण धर्म के दो बार भिन्नशब्द के निर्देध् को अनावश्यक मानते हों और कदाचित उनके मनमें वस्तुप्रतिवस्तुभाव का अमिग्राय वह़ी जमा हो जो परवर्ती टीकाकारों में मिलता है। वे 'एकस्येव धर्मस्य पृथवछव्दाभ्यामुपादानं वस्तुप्रतिचस्तुभाव'-'एक हौ धर्म का मिन्न भिन्न शब्दों से उपादान वस्तुप्रतिवस्तुभाव है'-[ नागेश-रसगगाधर प्रतिवस्नूपमा ] इम प्रकार वस्तुप्रतिमाव को वाक्यार्थपरक न वनाकर साधारणपर्मपरक बनाते है। रसगंगाधरकार के आगे उद्धृत किम जाने चाले लक्षण से यह वथ्य स्पष्ट है। इसीलिए स्ट्ूट ने कदाचिव प्रति- वस्तूपमा शब्द को भी हटा दिया है। यहा तक कि टीकाकार नमिसाधु ने भी यहां इस शब्द को स्मरण नहीं किया। मम्मट :- सू०] प्रविवस्तूपमा तु सा, सामान्यस्य दविरेकस्य यत्र वाक्यदये स्थिति:। [ वृ०] साधारणो धर्मे उपमेयवाक्य उपमानवाक्ये च कथितपदस्य दुष्टतयाभिदितखवाव शब्द- मेदेन यद्रपादीयते सा वस्तुनो वाक्यार्थस्योपमानत्वाव प्रतिवस्तूपमा।-यथा 'देवीमाव०'। [ सू०] प्रतिवरतूपमा बह जहाँ एक सामान्य दो वाक्यों में दो बार स्थिन हो। [ृ० ][सामान्य=]स्राधारण धर्मकी उपमेयवाक्य और उपमानवाक्य में, कथितपदत्वदोप के परिहार के हेतु जो मिन्न भिन्न शब्दों से कदा जाना है उसीको वस्तु अर्थात वाक्यार्थ के उपमान होने से प्रतिवस्नूपमा कहा जाता है। -मम्मट की पदावली वृत्ति में स्पष्ट रूप से साधारण धर्म के भिन्न शब्द से अपकृव कथन की और अधिक उन्मुख है, कदाचित् वे प्रतिवस्तृपमा में चमत्कार का बीज इमी को मानते हो। उन्होंने वस्तु का अर्थ वाक्यार्थ तो किया है किन्तु उसमें जुडे 'प्रति'-शब्द की ओर ध्यान नहों दिया। वामन ने उसे ठीफ से पकडा है। ममत है मम्मट ने साधारण धर्मे की दिरत्ति पर इस लिए अधिक वल दिया हो, कि रुद्रट ने उसकी सवथा उपेक्षा कर दी थी। किन्तु उनके इस क्रम से प्रतिवस्तूपमा की तुला में साधारणधर्म दविरुक्ति का पलडा वाक्यार्थेगन साम्यप्रतिपचि के
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पलड़े से भारा पड़ गया। वस्तुतः प्रतिवस्तूपमा का प्राण उपमा है और उसमें यहाँ प्राण है उसकी वाक्यार्थवृच्तिता तथा गम्यता। साधारणवर्म की भिन्नशब्दा दविरुत्ति और इवादि उपमावाचकों की सनुक्ति तो इनमें साधन हैं। मामह, वामन, उन्ट और रद्रट ने मालाप्रतिवस्तूपमा का उल्लेख नहीं किया न तो वैधन्यं- मूलक प्रतिवस्तूपमा का ही। अलंकारसर्वस्वकार ने यद्यपि वैध्न्यमूलक प्रतिवस्तुपमा को जोड़ा किन्तु मालाप्रतिवस्तूपमा उनसे भी छूट गई। भरन्तु वस्तुतः प्रतिवस्तूपमा में मालात्व से उतना अतिशय नहीं आता जितना वैधन्यें से आाता है। फिर मालात्व उपमा आदि में प्रतिपादित मी किया जा चुका है। उसे यहाँ स्वयं मी जाना जा सकता है। वैधन्यमूळकता अवश्य ही एक उल्लेखनीय विशेपता थी। शोभाकर :- [ सूत्र ] वाक्यद्वयेडसकृद् [धर्मत्य निर्वेशेपस्तुतानां प्रस्तुतानां चार्धमौपम्य] प्रतिवस्तूपमा ॥१६ ॥ [वृत्त] वाक्यार्थयोरपमानोपमेयभावस्यार्थत्वे साधारणधर्मस्यासकृदुपादाने प्रतिवस्तूपमा। कथित पदस्य दुष्टत्वाद वाक्यदये शब्दमेदेन पृथङ निर्देश:। -[ सूत्र] 'दो वाक्यों में साधारण धर्म का यदि पकाधिक वार निर्देश हो और प्रस्तुताप्रस्तुतों में आर्थ सौपन्य हो तो प्तिवस्तुपमा ।' [ वृ]-'दो वाक्यार्थों का सादृश्य आर्थ हो और साधारण धर्म का उपादान पकाधिक वार किया गया हो तो प्रतिवस्तृपमा होती है। कथितपदत्व =अर्थात एक ही वाक्य या पद्य में एक बार आए शब्द को दूसरी वार प्रयुक्त करना दोष है अतः दोनों वाक्यों में साधारण धर्म का वाचक शब्द मिन्न भिन्न शब्दों द्वारा प्रस्तुत किया जाना चाहिए।'' रत्नाकरकार शोभाकर ने वाक्यार्थों के (१) शुद्ध प्रकृत, (२) शुद्ध अप्रकृत और (३) मिश्र ये तीन वर्ग बनाकर प्रतिवस्तूपमा को तीन प्रकार का बतलाया है। यह उनका अलंकार- सर्वस्वकार से आगे ढढ़कर प्रतिवस्तूपमा में किया गया योगदान है। रत्नाकरकार ने इसे वैधन्यमूलक भी माना है और उदाहरण के रूप में अलंकारसर्वस्वकार द्वारा प्स्तुत 'चकोय० बिनावन्तीरन०' पय्य ही दिया है। किन्तु उन्होंने यहों एक भार्मिक विचार भी प्रस्तुत किया है।- 'अन्र यद्यपि चातुर्यस्य न निपुणा इत्यनेनाभावप्रतिपादनाद् एकस्य धर्मत्यासकन्निर्देशाभाव- स्तथापि वैधर्म्यत्य साधम्यक्षिपकत्वाद् अवन्तीनां रते निपुणत्वेन प्रतीतेरर्थाच्ातर्यस्यासकृन्निर्देश॥ 'चकोर्य एव०' पद्य में उपमानवाक्य में 'चातुथ'-शब्द से जिस साधारण धर्म का निर्देश किया गया है उपमेयवाक्र्य में 'न. निपुणाः' ='निपुण नहीं है'-इस प्रकार उसी साधारण धर्म का समाव बतलाया गया है, फलतः साधारण धर्म का असकुछ निर्देश यहाँ नहीं हुआ तथामि यह दोष नहीं है क्योंकि 'अवन्ती की स्त्रियों को छोड़कर अन्य कोई निपुण नहीं है' ऐसा कहने से 'ेवल अवन्ती की हो खि्रियाँ निपुण हैं'-यह तव्य निकल आता है और इसमें साधारणधर्म का दूसरी बार वैसे ही निर्देश हो जाता है जैसे सीधे साधर्म्य वाक्य के प्रयोग से साधम्यमूलक पति- वस्तूपमा में होतषा है। रत्नाकरकार ने वैधम्य शब्द के विषय में लिखा है-"अमिहितविपरीतो हर्थो विधर्मा, तस्य मावो वैधम्येम्। यथा-'वकोर्य' इत्यन्न चकोरीणां प्रतिपादितत्वय चातुर्यत्य विपरोतोऽर्थ: तदमान उपमानवाक्ये चकोरीतुल्यावन्तीव्यतिरिका अन्या युवत्यो न निषुणाः हत्य- मिहितः। न चात्र नआदिप्रयोगमान्नाद् वैध्म्यमिति वकव्यम्, 'स्थितो देवदत्तो न गतः' रत्यन्न
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-- 'जो अथ कथित अर्थ के विपरीत हो वह अर्थ कहलाएगा विधर्मा और उसका भाव होगा वैधर्म्य। यथा 'चकोर्य' पद् में पूर्वार्द्धं में जो चकोरियों की चतुरता बनलाई गई है उत्तरार्ध के उपमान में उससे उलटा 'चकोरीनुल्य अवन्ती युवतियों से मिन्न युवतियॉ निपुण नहीं होतों'- यह अर्थ कहा गया है। ऐसा नहीं समझना चाहिए कि प्रतिबस्नूपमा में केवल 'न' के प्रयोग मात्र से वैधम्य की प्रतीति दो जाती ै, क्योंकि 'देवदत्त अमी बेठा है, गया नहीं है' इस वाक्य में भी, जहा केवल पर्याय मात्र का प्रयोग होता है, वैधर्म्य मानने की विवशता उठ पढेगी। 'वेधम्ये' पर सूक्ष्म विवेचन करने पर भी अलकाररत्नाकरकार मालाप्रतिवस्तूपमा पर सर्वस्वकार के छा समान चुप हैं। अप्पयदीपषित की चित्रमीमांसा में प्रतिदस्नूपमा का विवेचन रह गया है किन्तु कुवलयानन्द में वद इस प्रकार है- 'वाक्ययोरेकसामान्ये प्रतिवस्तपमा मता। तापेन भाजते सूर: शरश्वापेन राजते।।' -- 'दो वाक्यों में यदि एक ही साधारग धर्म हो तो प्रतिवस्तुपमा होती है यथा-'सूर्यं ताप से सशोमित होता है, भूर चाप से विराजता है।' [वृत्ति ]= 'यत्रोपमानोपमेयपरवाक्ययो रेकः समानो धर्मः पृथळ् निर्दिश्यते सा प्रतिबरपूपमा । प्रतिवस्तु प्रतिवाक्यार्थम् उपमा समानधमोडस्या- मिति व्युत्पत्ते. ।' जदां उपमान और उपमेय के वाक्यों में एक ही समान धर्म पृथक निरदिष्ट हो वह होगी प्रतिवस्तूपमा क्योंकि प्रतिवस्नपभा शब्द की व्युत्पत्ति है-'प्रनिवस्तु प्रतिवावयार्थ उपमा =समान चर्म हो जिसमें।' अप्पयदीस्षिन ने प्रस्तुतापस्तुतत्व का मिश्रण और वेधम्यंमूलकना इन दोनों पर ध्यान दिया है किन्तु मालाप्रतिवस्तपमा के विषय में वे भी मौन हैं। पण्ढितराज जगन्नाथ ने प्रतिवस्तूपमा पर पर्याप्त सूक्ष्मता से विचार किया है और इस प्रकार लक्षण स्पिर किया है .- वस्तु विवसमावापच्साधारणधर्मकवाक्यार्थेयो रवथेमौपम्य पतिवस्तपमा। -'जिसमें साधारणधर्म वस्तुप्रतिवस्तुभाव से युक हो ऐसे दो वाक्यार्थों का अर्थ सादृश्य पतिवस्ुपमा।' पण्डितराज ने वरतुप्रतिवस्तमाव को धर्मे से जोडकर 'प्रतिवस्नपमा' शन्द के परम्परागद अर्थ को बदळ दिया है। माळामतिवस्तूपमा पण्डितराज ने भी छोट दी है। विश्वेशवर पण्डित ने उसे भो अपना टिया है। दधटान्त से प्रतिवस्तुपमा का भेद विमर्िनीकार ने जिस बिन्दु पर किया है उसमें स्वयं सर्वस्वकार का भत कट गया है। सर्वस्वकार ने वस्तुप्रतिवस्तूपमा को विम्त्र प्रतिविम्वमावमूलक दृष्टान्त से मिन्न किया है। विमश्निनोकार इन दोनों भावों को अतिवस्तपमा और पृष्टान्त को परस्पर में भेदक तो मान लेते हैं किन्तु वे कहते हैं कि इनके आधार पर इन दोनों का उपमा से मेद सिद्ध नहीं होता अत उनका तर्क ही मानना उचित है। किन्तु आर्चय इस वान का है कि सर्वस्व्रकार प्रतिवस्तपमा और दृष्टान्त को उपमा से भिन्न मानते हो नहीं, तन इसे विमर्शिनी- कार उनके मन के विरोध में आपत्तिरूप से प्रस्तुत कैसे कर रहे हैं। अथापि इस विषय में तर्क निर्माशनीकार के ही मान्य है। संजीविनी कार श्री विदाचकवत्तों ने प्रतिवस्नूपमा का सार सक्षेप्र इस प्रकार किया है- 'असकृदधमेनिर्देश इवादेरनुपगह। प्रतिवस्तपमा केया प्रविवाक्यार्थसाम्यन.।
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-यदि साधारण धर्म का निर्देश अनेक वार हो और इवादि-उपमावाचकों का उपादान न रहे तो वाक्यार्थ के साथ होने वाली वाक्यार्थ को सपमा प्रतिवस्तूपमा होती है। [सर्वस्व] [सू० २७] तस्यापि विम्बप्रतिविम्वभावतया निर्देशे दष्टान्तः। तस्यापीति न केवलसुपमानोपमेययोः। तच्छव्देन सामान्यधर्मः प्रत्यव- मृष्टः। अयमपि साधर्म्यवैध्म्यभ्यां द्विविधः। आद्यो यथा- 'अध्धिर्लंह्वित पव वानरभटैः किं त्वस्य गम्भीरता- मापातालनिमग्नपीवरतनुर्जानाति मन्थाचलः। देवीं वाचमुपासते दि बहवः सारं तु सारस्वतं जानीते नितरामसौ गुरुकुलक्लिप्ो मुरारि कविः॥' अन् यद्यपि ज्ञानाख्य पको धर्मा निर्दिष्टस्तथापि न तन्निबन्धनमौपम्यं विवक्षितम्। यन्निवन्धनं व विवक्षितं तत्राव्धिलङ्गनादावस्त्येव दिव्य वागुपासनादिना प्रतिविम्बनम्। द्वितीयो यथा- 'कृतं च गर्वभिमुखं मनस्त्वया किमन्यदेवं निहताश्च नोऽरयः। तमांसि तिष्ठन्ति हि तावदंशुमान्न यावदायात्युद्याद्रिमौलिताम्।' अत्र निहतत्वादेः स्थानादिना वैधर्म्येण प्रतिबिम्बनम्। [सूत्र] यदि उस [साधारण धर्म] का भी निर्देश विग्वप्रतिबिग्बभाव से हो तो [वही उपमा ] दष्टान्त [कहलाती है ]।२७।। [ वृत्ति०] 'उसका भी-का मर्य यह हुआ कि केवल उपमान और उपभेय का ही नहीं। यहाँ 'उस'-शब्द का प्रयोग सामान्य धर्मे के लिए है। यह [दष्टान्त] भी साधर्न्य और वैधम्यें भेद से दो प्रकार का होता है। इनमें से प्रथम यथा- 'वानरवोरों ने समुद्र लाँध तो लिया किन्तु इसकी जो गन्मीरता है उसे केवल मन्याचल हो जानता है जिसका विशाल शरीर उसमें पाताल-पर्यन्त निमम्न है। ऐसे बहुत लोग हैं जो बाग्देवी की उपासना करते हैं किन्तु इसमें जो सारभूत तत्त्व है उसे केवल मुरारि कवि ही जानता ह-जिसने गुरुकुल नें कठोर तय किया है।' [इस पद्य में 'देवी वाचम्' के स्थान पर 'दैवी वाचम् पाठ छपा हुआा मिलता है उसके आषार पर इस शब्द का अर्थ 'सुरभारती = संस्कृत भाषा कर लिया जाता है किन्तु 'सारं तु सारस्वतं' के 'सारस्वत'-पदार्थ से अभिन्न सिद्ध करने के लिए वहाँ 'वान्देवी'-का अर्थ देने वाला 'देवीं वाचं' पाठ ही माना जाना चाहिए। 'संस्कृत भाषा' को तो बहुत लोग पढ़ते हैं किन्तु सरस्वती का सार मुरारि ही जानता है यह कथन उसी प्रकार असंगत है जिस प्रकार 'कान्य- प्रकाश तो बहुत लोग पढ़ते हैं पर साहित्य का सार मैं ही जनता हूँ-'यह कहना। क्योंकि बक्ता को काव्यप्रकाश के ज्ञान में अन्यों से निव का अतिरेक दिखलना है अतः 'किन्तु सका सार मैं ही जानता हूँ यह कहना है।] -- यहाँ यद्याि पूर्वाद्धे के उपमान वाक्य तथा उत्तरार्य के उपमेय वाक्य में ज्ञानार्थक एक ही 'जा' धातु के जानाति = जानता है और 'जानीते'= जानता है-इन दो रूपों द्वारा ] साधारण
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ध्म तो एक ही [अर्थात एक हो शब्द द्वारा] दिखलाया गया है सौर वह है ज्ञान, तथापि [यहा प्रतिरम्नूपमा नहीं है क्योंकि] सादृश्य को उस पर नि्भर नहीं रगा गया है, और साङ्ृय्य को जिम पर निर्मर रसा गया ह वह है समुदल्घन यादि, और उसमें [ विम्वभूत] वाग्तेवी की उपासना का प्रनिबिम्वन है ही।' [रस पद में विम्तभूत मुरारि कवि का प्रतिविम्त्र है-मन्याचल और बहुन शब्द से कथिन विद्वानों का प्रतिविम्ब है वानरवीरों का समुदाय। ये दोनों धर्मी-धर्मों के विम्वप्रतिबिम्वभाव है। इनके अतिरिक्त यहाँ विम्वभूत सरकृत की उपासना का समुद्लघन और बैसे ही गुरुकुल्लेश का पानालपर्यन्त हूबना प्रतिबिम्ब है। ये दोनों हैं धर्मगत। विम्वप्रतिबिम्बमाव का अर्थ है भिन्न पदार्थों का सादृश्यमूलक ऐक्य। उक्त पदार्थो में वह औचित्यसिद्ध है, अतः यहाँ दृषटान्न की दी अलकारता मान्य है]। दूसरा [वैधम्यंमूटक ] यथा- 'आपने ज्यों ही आपका चित् गर्व की ओर घुमाया कि, और क्या, हमारे सारे शद नष्ट हो गए। अंधकार तमी तक ठहरता है जब तक भगवान् सूर्य उदयाचल से शद् पर नहीं पहुँचते। -यहाँ 'नष्ट होना' इसका प्रतिबिम्ब है 'पहुँचना' किन्तु वैधर्म्य से। [अर्थाद 'पहुँचना' आक्षेप द्वारा 'मागने' की सौंच लाता है और तब उसके साम नष्ट होने का विम्वमतिविम्वभाव बन जाता है ]। विमर्शिनी
रित्यथा। अतक्ष धर्माणां धर्मिगां व विम्वप्रतिविम्बभावेन निर्देशोऽयमलंकारः। पदुछ- अन्यम्रापि-'दष्टांत, पुनरेतेपां सर्वेपा प्रतिविम्बनम्' इति। उपमानोपमेययोरिति व स्वाथं एव न व्यारयेयम्, अर्थान्तरस्य प्रकृतद्वार्व्यायोपादानातसाइश्याविवच्तगात्। आघ इति साधम्येण। यथा वा- 'स्थानेषु शिष्य निवहै- प्रतिपायमाना विद्या गुरं हि गुणव तरमातनोति। आदाय शुक्तिपु बलाहकविप्रकीणे रतनाकरो भवति वारिभिरम्तुराशि.।। अग्रस्थानादीनां शुक्त्यादिमि: प्रतिविभ्वनम्। यन्निबन्धन चेति। अर्थोळंकारतं न पुनरौपा्यम्। तस्य च समनन्तरोक्तयुक्त्यासंभवादू। तस्यापि=उसका (सर्थाद् साधारण धर्म का) भी। उपमानोपमेययो =उपमान और और उपमेय का सर्थाद के प्रकृत और अप्रकृत ध्मोंका। इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि धर्म और धर्मी दोनों के दिम्दमतिबिम्बभाव से निर्देश ही यह अरकार है। जैसा कि अन्यन्न [काव्यप्रकाश में] कहा गया है-'इन सभी का प्रतिविम्वन दृषटान 'होता है'। उपमानोपमेययो = उपमान- उपमेय का', इसमें जो उपमान और उपमेय शब्द है इन्हें इन्हीं के अर्थ नक भीमिन नहीं समझना चाहिए क्योंकि यहाँ जो दूसरा अर्थ अपनाया जाता है उसका उद्देश्य केवल प्रकृत अर्थ की पुष्टि करना रदता है, सादृश्य की सिद्धि करना नहीं। आद्य=प्रयम साधर्म्यमूलक। [रत्नाकरकार ने इम पद्य में प्रतिवस्तूपमा का सकर बनलाया है अत - इसका दूसरा उदादरण यह हो सरता है- 'शिष्यगण जब स्थानों पर [ठीक शिष्यों में ] विद्या प्रदान करने लगने हैं तो उससे गुरु मर अिक गुणो सिद्ध होने हैं। [समुद्र से ] जल लेकर मेघ जब उसे सोपों में बरसाने है तो उससे जलराशि समुद्र रतनाकर कहलाने लगता है।'-यहाँ 'स्थान' आददि का 'सीप'आदि से प्रतिविम्बन किया गया है। [आादि पद से शिप्य के प्रतिबिम्न मेघ, गुरु का प्रतिबिम्व समुद्र, विद्या का
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प्रतिविन्त जल, शुगवत्तरता का प्रतिविन्व रत्नाकर] 'यसिबन्धनं च=जिसके आवार पर, चह औपन्य के लिए नहीं, अर्थालक्वारत्व के लिए कहा गया है। क्योंकि औपन्य तो अभी अभी प्रतिपादित युक्ति मे यहाँ संमव हो नहीं होता। [युक्ति है-'प्रकृत अर्थ की पुष्टिमात्र के लिए अग्रकृत अर्थ का प्रस्तुतीकरण, न कि सादृस्य या औषम्य को तात्पर्य रूप से प्रतिपादित करने के लिए, इसी तथ्य को प्रतिवस्तृपमा प्रकरण में अप्रक्ृतार्थ द्वारा प्रकृतार्थ का विशर्दीकरण कहा है]। चिमर्श :- (१) टीकाकार का कथन है कि यहाँ प्रकृत-अप्रव्ृत केवल प्रकृत-अप्रकृत ही रहते हैं उपसेय और उपमान नहीं बन पाते क्योंकि द्ान में अम्कृत अर्य केवल प्रकृत अर्थ की युष्टि के लिए आता है, सादृश्य-सिद्धि के लिए नहीं, अतः सर्वस्वकार ने जो 'उपमानोपनेच'-सब्द दिया है उसका अर्थ केवल प्रकृताप्कृत दो किया जाना चाहिए। किन्तु यहाँ प्रकृताप्रकृत उपमानो- पनेय नहीं वन पाते यह कथन अनुमव विरुद्ध है। विन्वा तिविन्वमाव एक साधन है साधारण धर्मे की निष्पत्ति का, और साधारण धर्म की निष्पत्ति का एक फल वदि प्रकृतार्य की पुष्टि है तो दूसरा उपमानोपमेयमाव की निष्पत्ति मी है। यह अलग बात है कि उपमानोपमेयमाव यहाँ प्रकृतार्थ पुष्टि के पीछे रहता है, स्यं प्रधान नहीं बनता। सच तो यह है कि उपमालकार में भी प्रकृत अर्थ की पुष्टि के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन नहीं रहता सपकृत अर्थ की उपस्थिति का। जैसा कि प्रतिवस्तपमाप्रकरण में बतलाया जा चुका है विमशिनीकार की इस मान्यता का -सण्डन दृष्टान्त के ही प्रकरण में पण्डितराज जगनाथ ने मो प्रायः इन्हीं तकों द्वारा बहुत ही संरम्भ के साथ किया है और विश्वेश्वर पण्डित ने उनके खण्डन का समर्थन किया है। [द्र० दषान्ता- कंकारान्त, अलं० कौस्तुम ]: (२) टीकाकार ने 'यन्निबन्धन' का अर्थ 'अर्थालंकारत्वनिवन्धनं' करना चाहा है किन्तु वह भी भूल के चिरुद्ध है। मूल में 'औपम्य, विवक्षितम्, यन्निदन्धनें च विवक्षितन्' इस मानुपूर्वो से उपस्थित नान्य के 'यद' शब्द का अर्थ औपन्य को छोड़ मौर कुछ किया ही क्या जा सकता है। फिर प्रतिवस्तुपमा की भूमिका से ही अ्न्थकार दृष्टान्त को उपमा वतलाता आा रहा है। यहों आाकर वह उसमें उपमा का अमाव सिद्ध करना चाहता है यह कैक्षे मान्य। टीकाकार यदि दृष्टान्त और प्रतिवस्तपमा में अन्तर सिद्ध करने के लिए दृष्टान्त में प्रकृतार्थपुष्टि वतलाना चाहत हैं तो उसमें उफ्मानोपमेयमाव वाधक नहीं है, अतः उसका निराकरण भी आवश्यक नहीं है। यदि निराकरण भी करना हो तो उन्हें अपनी और से करना चाहिए। उसे अन्थकार या उसके अन्थ पर नहीं थोपना चाहिए। विमर्शिनीकार की सर्वनाम के अर्थ पर इस मनमानी का उत्तर पण्डितराज ने और भी समर्थ सब्दों में दिया है। उन्होंने कहा है- 'न चैत्रार्थस् मोदन: पक्क, यदर्थ च पक्क: स मैः' इत्यादी द्वितीयपक्वादिशब्दानाम् अध्याहत- शाकादिपरत्वे असंगते: स्फुटत्याव।' -- 'भात चेत्र के लिए नहीं पकाया गया है, जिसके लिए पकाया गया है वह है मैन'-इस उक्ति में जो द्वितीय वाक्य का 'पकाया गया' शब्द है वह पूर्वोक्त मात को छोड़ ऊपर से लाए गए श्ञाकादि के लिए नहीं माना जा सकता। द्रष्टव्य-दृष्टान्तपकरण, रसगंगापर। (:) विमर्शिननी की 'उपमानोपभेययोरिति तु रवार्थ एव न व्यास्चेम्' यह पंक्ि कदाचित 'उप०य रिति त्वाययोरेवेति व्याख्येयन्' ऐसी होगी। 'न' निर्गयसागरीय संसकरग में (न) इस प्रकार जोढ़ा गया है। दृष्टान्त का पूर्वेतिहास :- मामह और वामन में दष्टान्त नहीं मिलता। उन्हट :- ष्टत्यार्थस्य वित्पष्ट-प्रतिविन्धनिदर्शनम्। वधेवादिमदैः शूत्यं दुधैदेष्ठान्त उच्यते॥ ६८ ॥
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यथा-'कि चान बड्ुनोकेन व्रज मर्त्तारमाघ्नुदि। उदन्वन्तमनामाद्य महान किमासने ॥ ६९॥ -प्रनिपाद अर्थ का बिलकुल स्पष्ट प्रतिबिन्व अर्थात सवृस अर्य साहृश्यवाचक आदि शब्दों के प्रयोग के बिना उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना दृष्टान्त नामक विदन्मान्य अलंकार है। यथा- -[ पार्वतीजी के प्रति उसके पिता हिमाचल की उक्ति] अधिक कहने से क्या जाओ और अपना पति प्राप्त कर लो। महानदियाँ कया बिना समुद को पाद रुकती है? रइट-'अर्थविशेप पूर्व यादृछ न्यस्नो विवक्षिनेतरयो। तादशमन्य न्यस्येद् यम पुन मोडव दृष्टान्त ।। ८।९४।। यथा-'तयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनो मनोमवज्वलितम्। आलोके दि सिर्ताशोविकसति कुमुद कुमुद्वत्याः। ८।९५॥ -विवक्षित-अर्थात प्रस्तुत और उससे भिन्न अर्थो में से पहिले जैमा अर्थाद जिम प्रकार के गुणधर्म से युक्त अर्थ पहले प्रस्तुत किया गया हो वाद में उमी जैसा अन्य अर्थ यदि प्रस्तुत किया नाय तो वह काव्यकला का दृषन्त माना जाता है। यथा-'तुम्हारे दिखाई देते ही उसका काम- दग्ध चित्त शान्न हो जाता है। ठोक ही है, कुमुद्वनी का पुष्प कुमुदउज्ज्वल किरणों वाले चन्द्रमा के प्रकाश से ही न खिळता है ।' [यहाँ नायिकाचित्तरूपी जो पदार्थ पूर्वार्द्ध में प्रतिपादित किया गया उसमें प्रियदर्शनजन्य निवृति = शान्ति rehief रूपी धर्म बनलाया गया। उत्तरार्ध में ठोक वैसा ही दूसरा अर्थ प्रतिपादित किया गया = चन्द्र के दर्शन से कुमुद का विकसित होना ] इन दोनों वाक्यार्थों में नायिका और कुमुदकती, मन और कुमुद, दर्दन और प्रकाश तथा निर्वाण और विकास के बीच परर्पर बिम्व- प्रतिबिम्दभाव है अर्थाव दोनों निहित साम्य द्वारा अभिन्न से पतीत होते हैं]। मम्मद-'दृष्टान्त: पुनरेतेषां सर्वेषा प्रतिबिम्वनम्।' यथा-'तवयि टृट ००००० सुधाशो००० कुसुमं कुमुदवत्या।' कारिका का अर्थ विमर्रिनी में अमी अमी स्पष्ट हो चुका है और उदाहरण का ऊपर प्रदस सट्रट के उदाहरण में। परवर्ता आचार्यो में- शोभारुर-I सृ० ]-प्रतिबिम्देन दृष्टान्त ॥ १७। [वृ०]-वाक्यदये धर्मस्य प्रतिबिन्वने=विम्वप्रतिबिम्वमावेनावस्थाने आर्थमोपम्यं दृषटान्त. ।- दो वाक्यों में धर्म के विन्वप्रतिविम्बमाव से स्थित होने पर जो आर्य औौपम्य होना है उमे दृष्टान्न कहा जाता है। शोभाकर ने अल्कारसर्वस्वकार द्वारा उदाहन 'अब्निलंहिन एव-इम पद्य में आपत्ति उठाते हुए कहा है कि इसमें वस्तुप्रतिवरतुभाव भी है क्योंकि इस पद्य में ज्ानरूपी धर्म 'जञानाति' और 'जानीन' इम प्रकार दो अभिन्नधातुक क्रियापर्दो से ही कथित है, दोनों करियापदों की प्रह्ति एक ही है ज्ञानार्थिक 'का' धातु। कदाचित इसीलिए विभसिनीकर ने इसका दूसरा भी उदाहरण प्रस्तुन कर दिया है। परन्तु वह मी कोई अच्छा उदाहरण नहीं है। अप यदीक्ित :- 'स्याद विन्वप्निविम्वत्व दृष्टान्तस्दलकृति। स्वमेवर कीर्तिमान् राजन् विधुरेव दि कान्तिमान् ॥ ५२॥
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- यदि विम्वप्रतिविम्वत्व हो तो दृषटान्तालंकार होता है। यथा हे राजन् ! कीर्तिमानू केपल: तुम हो हो। कान्तिमान् केवल चन्द्र होता है। द्वितीय उदाहरण-'देवी वाचमुपासते०। इस पद्य में शोभाकर द्वारा दर्शित प्रतिवस्तूपमा के संस्पर्श का अप्पयदीक्षित प्रतिवाद करते और अलंकारसवंस्वकार के दृष्टान्तपक्ष का समर्थन करते हुए लिखते हैं- नन्वन्न उपमानोपमेयवाक्ययोर्श्ोनमेक एव धर्म इति प्रतिवस्तूपमा युक्ता, मैवम, अचेतने मन्थाचले ज्ञानस्य वाधितत्वेन तत्र जानातीत्यनेन सागराघस्तलावधिसस्पर्शमानत्य विवक्षितत्वाव।' -'यहाँ उपमानवाक्य और उपमेय वाक्य दोनों में 'श्ञान' रूपी एक ही धर्म [ एक ही शब्द से कथित ] है अतः यहाँ प्रतिवस्तपमा माना जाना उचित है [ यह जो अलंकाररत्नाकर-कार का पक्ष है वह आपततः तो ठीक लगता है] किन्तु तथ्य वैसा नहीं है। मन्याचल मचेतन है, अतः उसमें ज्ान अपने वास्तविक अर्थ में वाधित है, अतः उसके साथ ज्ञान का विवक्षित सर्थ यहाँ समुद्र का तलस्पर्शमात्र है।' वस्तुतः अलंकाररत्नाकर द्वारा प्रस्तुत आपत्ति अपरिदार्य है अतः इसका कोई प्रतिबाद नहीं किया जाना चाहिये। स्थिति यह है कि दृष्टान्तलंकार का ऐसा उदाहरण जिसमें वस्तुप्रतिवस्तुभाव का संस्पश सवया न हो, मिलना कठिन है। झोभाकर ने भी आपत्ति प्रतिवस्तुपमा के संस्पर्श पर नहीं की है। उन्होंने आपत्ति की है प्रतिवस्तपमा के 'प्रचुरतर' संस्पर्श पर। उनकी पंक्ति है- 'देवीं वाचम्0' इत्यादौ प्रतिवस्तुपभया सहास्य प्रचुरतर: सङ्करः।' प्रतिवस्तूपमा के सामान्य स्पर्श: से तो न शोभाकर के ही दष्टान्तोदाहरण मुक्त हैँ और न स्वयं अप्पयदीक्षित के। स्वयं विमर्शिनी- कार ने जो नवीन उदाहरण 'स्थानेषु शिष्य०' आदि दिया है उसमें भी 'प्रतिपाद्यमानत्व' और विप्रकीर्णन अर्थतः एक ही धर्म है। अप्पयदीक्षित भी 'जानाति'को लाक्षणिक भले ही बतला दें किन्तु लक्षणा द्वारा 'तरस्पर्श' अर्थ लाकर मी वे 'ज्ञानरूपी' अर्थ को सवथा दूर नहीं रख सकते,- तट को गंगाशब्द से कहने पर तट में गंगात्व प्रतीत होता ही है। पण्टितराज जगनाथ-[सूत्र ] 'प्रकृतवाक्यार्थघटकानामुपमानादीना साधारणधर्मस्य चविम्ब- प्रतिनिन्बभावे दृशन्तः' । [वृच्ति ]'अस्य चार्लकारस्य प्रतिवस्तुपमया भेदकमेतदेव यद सस्यां धर्मो न प्रतिविन्धितः कि तु शुद्धसामान्यात्मनैव स्थितः, इह तु प्रतिविम्वित: ।' [ सू०] प्रकृत वाक्यार्थ के [उपमेय आदि] सभी अह् उपमान आदि साधारण धर्म इन सवका विम्वप्रतिविम्वभाव हो तो दृष्टान्त होता है। [वृच्ति ] इस अलंकार का प्रतिवस्तुपमा से भेद केवल यही है कि उसमें धर्म प्रतिविम्ब नहीं चनता, वह शुद्ध सामान्यरूप ही रहता है जन कि इस [दृष्षान्त] में वह [धर्म] भी प्रतिविम्वित होता है। विश्वेश्वरपण्डित-[का०] साधारणस्य साम्यप्रतियोग्यनुयोगिनोयत्र। निर्देश: स्याद् विम्वप्रतिविम्वतया स दृष्टान्तः॥ [वृत्षि] विन्व्प्रतिविम्वभावेनैव यत्र साधारणवर्मर्योपमानोपमेयदिशि उपादानम्, नं त्वेकत्वम् , स दृष्टानतः। प्रतिवस्तुममार्या तु एकस्मैव वारहूयं प्रयोगानातिव्याप्ति:। [का]- साधरण धर्मे और सादृश्य के प्रतियोगी [ उपमान ] तथा अनुयोगी [उपमेय] इन सवका विम्बप्तिविम्वमाव से निर्देश हो वह द्वष्टान्त।
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[वृति ] जहाँ साधारणवर्म का उपादान मी उपमान और उपमेय के समान विम्वमति- विम्वभाव से हो, न कि वह एक ही हो, वह दृष्टान्त। प्रतिवस्तूपमा में एक ही साधारण धर्म का दो बार प्रयोग होता है अतः इटन्त का लक्षण उसमें लागू होने से बच जाता है। विदबेशवरपण्डित ने दृष्टान्त शब्द को व्युत्या्त्त भी इस प्रकार दे दी है- -'दृष्टो धातप्रामाण्यक अन्नो दाष्टान्निकवाक्यार्थनिश्चयो यत्रेति व्युत्पत्या प्रकृतवाक्यार्थे प्रतिपाचकार्यकारणभावे आ्राय्ये तदयाहकीभूतान्वयव्यतिरेकयोयंत्रोत्तरवाक्यार्थो दृष्टान्ततवेन परयव- स्यति स इत्यर्थ-।। -जहाँ दृष्ट हो अर्थात जिसका प्रामाण्य जाना जा चुका हो ऐसा अन्न = अन्तिम दार्शे न्तिक=प्रस्तुत = उपमेयभूत वाक्यारये हो जिमनें वद दृष्टान्त । इस व्युत्पत्ति के साधार पर अर्थ यह निकन् कि दृष्टान्न में प्रकृत वाक्यार्थ में विवक्षित कार्यक्कारणमाव साध्य रहता है और उसके साधक जो अन्वय-व्यतिरेक होने हैं उनकी पुष्टि टृष्टान्तरूप उत्रवाक्यार्थ से होती है। काव्यप्रदीपकार महदामह्दोपाध्याय गोविन्द ठक्कुर ने दृष्ान्न शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है- 'दधेपन्तो निश्चय उपमानिर्वाहकोडवालक्कार इति। -दिसा गया अन्त अर्थात निश्चय अर्थाव उपमानिर्वाइक हो यहाँ अलकार है।' काव्यप्रदीप के टोकाकार नागेश ने अपने उद्योत में प्रदोप की उक्त पक्कति का जो स्पषीकरण दिया है उसे व्यवस्थित रूप वामन झलकीकर न इस प्रकार दिया है- 'यत्र दृष्टान्नवाक्येन दार्टान्तिकवाक्याधनिशयत्य प्रामाण्यप्रहो सवति स दृष्टान्तनामालक्वार।' -'नहों दृषन्त वाक्य के द्वारा दार्शन्तिक वाक्यार्थ के ज्ञान में प्रामाण्य वुद्धि जागती है वह होता है दृष्टान्त नामक अलङ्कार।' काव्यप्रकाश की एक अन्य टीका विवरण के रवयिता ने भी-दृष्टान्त शम्दपर यह निरुक्ि दो है- 'निश्चय प्रस्तुतम्यायस्य निसदेहा पतीति, सोदाहरणवाक्येन प्रतिपायमानो सर्थो हैत्वा- काकानिवृत्या असंशयमेव प्रतीयते। तदिय सभा योगरूदिः। [ काव्यमकाश्कार ने दृष्टान्त को 'दृषटोऽन्नो निश्चयो यत्र स वृष्टान्तः'-यह जो व्युतति दी है इमके ] निश्चय शब्द का अर्थ है प्रस्तुन अर्थ की सन्देह रहित अर्थात प्रामाण्यपूर्ण भतीवि। वान यह है कि जो विषय सोदादरण वाक्य द्वारा प्रतिपादित किया जाता है उसकी प्रनीति में कोई समय नहीं रहता, क्योंकि उदाहरण देने से हेतु [क्यों] की जिश्ासा शान्त हो जाती है। इस प्रकार अलंकार अर्थ में 'प्रष्टान्त'-सक्ा योगरढ है। हमे कुछ ऐसा लगता है कि इृष्टान्त- शब्द में अन्न शब्द ठीक वैसे सौन्दर्य का वाचक है जैसे वनान्त में और दृष्ट शब्द का अर्थ है अनुभूत वस्तु । किमी अनुभूत वस्तु में साम्य के कारण सौन्दर्य या जाता है। इम प्रकार दृषान्त का सीधा अर्थ प्रस्तुन अर्थ जैमी होने से सुन्दर कोई अन्य वस्तु। इस प्रकार एक स्थापना जहाँ विलकुल उमी जैसी किमी अन्य अनुमूत घटना के विशिष्ट प्रस्तुनीकरण द्वारा पुष्ट की जानी है, वो वहाँ अलकार को 'दष्टान्न'-शब्द द्वारा अमिहित करना उचित ही है। सरीविद्याचकवत्तीं ने इसका सारसक्षेप इस प्रकार किया है- 'विम्ानुनिम्वन्यायेन निर्देशे धर्मधर्मिणाम्। दृष्टानालसकृतिरशेया मिन्नवाक्यार्थसश्रया।।'
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निदर्शनालह्ार: २६९ -धर्म और धर्मों दोनों का निर्देश यदि विन्वन्रतिबिन्वन्याय से हो तो अलंकार दृष्टान्त कहा जाता है। यह दो भिन्न मिन्न वाक्यार्थो पर निर्भर रहता है। बिन्द और प्रतिषिन्व दोनों भिन्न होते हैं क्योंकि उनके अधिकरण मिन्न होते हैं जैसे शरीर गत नुस और उसका दर्पणगत प्रतिबिन्द। एक का अधिकरण है शरीर और दूसरे का दर्पण। अभिन्न वस्तु एक साथ दो भिन्न भिन्न अभिकरणों में नहीं रह सकती। किन्तु-मिन्न होने पर भी विन्द का प्रतिविन्ब में हतना सादृश्य रहता है कि उन्हें आपाततः अभिन हो कहा जाता है। सुख के प्रतिविन्ब को प्रत्येक व्यक्ति 'मेरा मुख' ही कहता है। वस्तुतः विन्बप्रतिविम्बभाव समान- धर्मसंबन्ध, या सादृश्य का ही एक विशिष्ट रूप है जिसमें एक सादृय्य दूसरे सादृस्य का निम्यावक होता है, और निव्वादक साद्य्य निष्पाद सादृश्य की निष्पत्ति साक्षास न कर अपने से विशिष्ट पदार्थों में प्रातीतिक जभेद निप्पन् करा परन्परया कराता है। इस प्रकार निष्पाध सादृश्य में साधारण धर्म बने पदार्थ भी निष्पादक सादृश्यरूपी धर्मे स युकत होकर तो धर्मी बन ही जाते है, उनमें स्वगत अन्य असाधारण विशेषताओं का भी अस्तित्व प्रतीत होता रहता ह अतः उनकी दृष्टि से भी वे धर्मी ही होते हैं। यदि यह कहा जाय तो कदाचित दृष्टान्त का रहस्यभूत तत्व अधिक निकट से परखा जा सवेगा कि दृष्टान्त में साधारण धर्म भी धर्मोरुप ही रहता है। इसमें उपमावाचक पद का प्रयोग नहीं रह्दता साथ ही उपमानोपमेयमाव के अनुयोगी प्रतियोगी वाक्यार्थ ही रहते हैं। [सर्वस्व्र ] [सू २८] संभवताऽसंभवता वा वस्तुसंबन्धेन गम्यमार्न प्रति- विम्नकरणं निदर्शना। प्रतिविम्वकरणप्रस्तावेनास्या लक्षणम्। तन्र कचित्संभवन्नेव वस्तु- संबन्ध: स्वसामर्थ्याद्विम्यप्रतिबिम्बभावं कल्पयति। कचित्पुनरत्वयवाधाद- संभवता वस्तुसंवन्धेन प्रतिविम्बनमाक्षिप्यते। तत्र संभवद्वस्तुसंबन्वा यथा- 'चूडामणिपदे धत्ते यो देवं रविमागतम्। सर्तां कार्यातिथेयीति बोधयन् गृहमेविनः॥' अत्र बोधयत्निति णिचम्तत्समर्थाचरणे प्रयोगात्संभवति वस्तुसंन्धः। असंभवद्वस्तु संवन्धा यथा- 'अव्यात्स वो यस्य निसगवकः स्पृशत्यधिज्यस्मरचापलीलाम्। जटापिनद्धोरगराजरल्नमरीचिलीढो भय को टिरिट: अन स्सरचापसंबन्धिन्या लोलाया परत्वन्वरभूतेनेनुना स्पर्शनमसंभ वह्लीला सटशी लीलामवगमचतीत्य दूरविप्रकर्पात्प्रतिविम्बकल्पनमुक्तम्। [सूत्] वस्तुओं [ पदार्थो अथवा वाक्याथी] के [बीच उनके] संभव जववा असंभव संबन्ध से प्रतीयमान प्रतिविम्बन निदर्शना [नामक अलंकार कहलाता है ।। २८ । [दृत्ति] इसका लक्षण चहाँ इसलिए किया गया क्योंकि यहाँ प्रतिविम्ब का प्रकरण चला हुआ है। यहाँ कहीं तो पदार्थों का संबन्ध संभव रहता है और वह अपनी शक्ति से विन्ब-प्रतिबिम्ब-
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भाव को निष्पन्न करता है। किन्तु कहीं कहीं अन्वय वाबित हो जाने मे वह वस्तुसबन्ध असंमव होता हुआ प्रनिबिम्बन का आक्षेप करता है। दोनों में से प्रथम का उदादरण जिसमें वरतुसबन्ध मंभव होना ै-'जो [पर्वत ] अविधि के समान आए हुए भगवान् सूर्य को चूडामणि के स्थान पर भारण करता है, गृहस्यों को यह बनलाते हुए कि सत्पुरुषों का आतिष्य करना ही चाहिए।' -'यहाँ वोधयन्=दतलाता हुआ' यह जो गिच= हेत्वयंक म्रत्यय है इमका प्रयोग वैसा करने में सशायक होने अर्थ में हुआ है, अन वस्तुसम्बन्ध संभव है।' [मुवलयानन्द चन्द्रिकाकार के अनुसार समर्थाधरण=सामर्थ्योत्पादन, पर्वन गृदस्यों में आतिथ्य धर्मे के बोध के सामर्थ्य की उत्पति में सहायक हो हो सकता है, अत 'बोधयन्' द्वारा श्ञापित बोध सामर्थ्योत्पादन में सहायकता पवेत में संमव ही है। दूसरो का उदाहरण जिसमें वस्तुसम्वन् असमत्र रहता है-'वे भगवान् शकर आप की रक्षा करें जिनका निसगंबक [स्वमावन टेढा ] तथा जटाजूट में बचे नागराज की फणामणि की किरणों से स्पृष्ट दोनों नोंक वाला चन्द्र कामदेव के प्रत्यंचा चढे धनुष की शोमा को किचिव धारण करता है।' [कल्पना कीजिए कि टेढी चन्द्रकला और नागराज का फण दोनों जटाजूड़ के बीच बरावरी वरावरी पर स्थिन हैं और नागराज की फगामणि से निकलता और टेढी होकर सीधी फैलती किरणें चन्द्रकला की दोनों नोंकें छूनी है। इस प्रकार चन्द्रकला का वाँस के समान गोलाकार नँवा विम्ववृत्त बनुष वन जाता है। बडा ही बिम्वयाही चित्रण है।] -इम पद्यार्थ में तक कामचाय की शोमा का कामचाप से मिन्न [ वस्त्वन्तर ] चन्द्रमा द्वारा किंचिद् भी धारण किया जाना समतर नही है। [जिसका धमे उसी के ही पास रहेगा, उसे उससे मिन्न न्यकि नहीं अपना सकना] अन. यहाँ यह अर्थ निकलता है कि चन्द्रमा कामचाप की शोभा के समान शोभा को धारण करता है। इन दोनों की शोभाओं में अधिक दूरी नहीं है अत [ निदशन लक्षग में ] प्रतिबिम्व कल्पना की वान कही गई है। विमर्शिनी
पचारान्। एवं चात्र निदरशनाया सादश्याविनाभाव। तेन- प्रमाते पृच्छन्नीर नुरहसवृतं सहचरीर्नवोढा न बीडामुकुितमुसीयं कथयति। लिसन्तीनां पबाहरमनिशमस्यास्तु कुचयोक्षमरकारो गूढ़ करजपदमासां प्रथयनि।' इत्यादी समवन्यपि वस्तुमंबन्धे प्रथनस्यीवम्याभावास निद्शनालंकारखम्। अने- नैव वस्तुसंबन्धस्य समवासभवाम्यामस्या भेददयमप्युक्म्। तद्ेवोदाहरति-चूद्दानगी- त्याेना । तन्समर्थाचरणे प्रयोगादिति 'कारीपोऽघ्यापयति' इत्यादिवन्। अम्बागतस्य रवेर्गिरिणा शिरसा धारणं त समर्थाचरणम्। अत मुषात्र बोधयन्निति शिघस्तत्समर्था घरणे प्रयोगान्मयंत्र मवदिभरप्यतिथिसपर्या कार्येति संभवत्सबन्घमूलमत्रार्थमीपम्यम्।
मानोपेश। नापि रमृत्यलकार। गृहमेधिना पत्रतकर्तृकश्य सदविपयातिष्यबोधस्त्वस्य वाक्यार्थत्वात्। तत् दि मदशदर्शनादस्त्वन्तरश्य स्मृतिर्भवति। नचान्र गृद्दमेघिनां रघि- दर्शनाद तिथिरमृती कर्तृतम् । तेपां सदातिथ्य कर्मव्यनाया वोष्यत्वान्। नाप्यन्र रविणा तिधेरतिथिना वा रवेः साम्यं विवसितम्। अपि तु मयेत गृहमेविभिरपि सतामातिप्यं कार्यमिति। अत एव नाव्र वसत्वन्तरकरगा ्मापि विशेपालंकारः। तपनावगमेतिय्या देरसंभाव्यस्यावगमो जात इर्येवमात्मिकायाः प्रतिपचेरभावाद। अतश्ञ सत्यस्ति वा
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निदर्शनालङ्कार: २७१ संवन्धे निदशनेति वाच्यस्। तेन यथोकमेव भेददयं स्या। असंभवदिति। धर्म्यन्तरसं- चन्धिनो धर्मस्य ध्न्यन्तरेऽन्वयायोगात्। अदूरविप्कर्ादिति। धर्ममुखेन साह्यस्य किंचि सप्रश्याससत्वास्। यथा वा- अझे पुलअं अहरं सवेपिअं जंपिअं ससिककार। सर्ष्वं सिसिरेण कअं जं काअव्वं पिभसमेण।। अत्र वल्लभकार्यस्य पुलकार्देरधर्मस्य वस्तन्तरमूतेन शिशिरेण करणमसंभवत्तस्य साम्यमवगमयतीति शिशिरस्य बल्कमतुत्यताप्रतीतेरौपम्यस्। अवश्वात्र धर्साणामसंबन्धाद् निदशनत्युकरवा प्रतिमालकारत्वं न वास्यम्। प्रतिमायाश्रान्थोदाहरणेप्वलंकारान्तरा वियोग: स्फुट एेति न पृथगलंकारत्वं वाच्यम्। एचमन्येपामपि समग्राणामभिनवा लंकाराणां पान्यैरभ्यालंकारयोगो योजयितुं शक्य पवेति अ्रन्थविस्तरमयादस्मददर्शने तद्दू- पणोद्धारस्यैव व प्रतिज्ञातत्वादस्माभि: प्रातिपद्येन न दूपितम्। न पुनरेतावतैव परमत- ममतिपित मनुमतमेवेति दशा एपामपि पृथगलंकारतवं युक्तं सन्तव्यस्। संभवता-इत्यादि। विम्बप्रतिविग्वभावम्=विम्वप्नतिबिम्व्माव को अर्थाद उपमानोपमेय- भाव को ऐसा इसलिए कि धर्म और धर्मों में औपचारिक अमेद माना आता है। और इस प्रकार सिद्ध हुआ कि निदशन में सादृश्य रहता ही है। इसलिए[ अलंकाररत्नाकरकार का यह कथन मान्य है कि-] -[प्रथम मधुयामिनी बीतने पर ] सवेरे जब सहचरिया = सखियाँ एकान्त [शयनागार] की बातें पूछती है तो नवोता का चेहरा = मुखमण्डल लाज से मुकुलित हो जाता है औौर वह कुछ भी कहद नहीं माती किन्तु प्रतिदिन पत्रावली चनाने के कारण इसके उरोजों से परिचित वे सखियों आज इसके उन्हीं वरोजों में चमस्कार [फूलापन ] देखती है वो उससे उन्हें विदित हो जाता है आाज प्रिय ने उन पर नखक्षत किए हैं जो चोली में दबे है।' -- यहाँ और ऐसे अन् स्थलों में मले ही 'प्रथन'='विदित कराना'=[चमत्कार आादि] संभव हो तथापि, जैसा कि अलंकाररत्नाकरकार ने भो कहा है वहाँ सादृश्य नहीं है अतः निदश- नालंकार नहीं है। इसी वत्तव्य से इस अलंकार के वे दो भेद भी ग्रन्थकार ने वतला दिए जिनमें से एक में वस्तुसन्बन्ध संमव होता है और दूसरे में नहीं। इन्हीं को उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं-घडामणि इत्यादि। 'तत्समर्थाचरणे प्रयोगात्=वैसा कर सकने सथदा वैसा करने में समर्थ आवरण अर्थ में प्रयोग'। यह ठीक वैसे होगा जैसे 'कण्डे की आग पढ़वा रही हैं'-प्रयोग में होता है[ सर्थात दोनों स्थलों में पर्वत तथा अग्नि इन दोनो अचेतन कर्ताओं में बोधन तथा अध्यापन का कार्य लक्षणया उपपन्न होता है]। पर्वत में समर्थ आाचरण है अन्यागत रवि का सिर पर धारण करना। [ समर्याचरण' की व्या्या आगे दिए बद्भट के निवरशना निरूपण में देखिए] इसोलिए अर्थात 'बोधयन्= बतलाता हुआ'- इसमें आए शिच्= प्रयोनकार्थक प्रत्यय का प्रयोग होने से यहाँ यह एक आर्थ सादृश्य निकलता है कि 'मेरे ही समान आप सबको भी अतिथि सत्कार करना चाहिए, इसमे वस्तुसम्वन्व संभव है अर्थात वन सकता है, अतंभव या वाधित नहीं है। और इसीलिए यहाँ प्रतीयमान उत्पेक्षा नहीं है क्योंकि वह तव होती जव प्वत त्वयं वोधन क्रिया का कर्त्ता बन न सकता और तदर्थ उस पर उसकी अधिष्टानी देवता का आरोप किया जाता [ जैसे वेद में 'नदियाँ बोलीं' कहे जाने पर जड़ नदियों की देवियों का आारोप कर लिया जाता है जिन्हें नय्यधिषात्री देवता कहा जाता है]। क्योंकि पर्वत बोधन-किया का कर्त्ता वन सकता है अतः उस पर उसकी अधिषात्री देवता का आरोप नहीं हो पाता यहाँ
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२७२ अलङ्कारसवस्वम् [अलकाररत्नाकरकार ने प्रतीयमान स्मरणालकार का रपर्श बतलया है और कहा है क्योंकि यह सलोक सुनते शी जीवन में कभी अतिथि-सत्कार कर चुके व्यक्ति को अपने किये हुए अनिथि- सत्कार का स्मरण आ जाता हे किन्तु वह ] स्मरणालकार मो नहीं है क्योंकि यहाँ पघवाक्य का मुख्न प्रतिपाद्य है 'पर्वत द्वारा गुहदमेषियों' की गृदागत सत्पुरुष के आतिथ्य का वोध कराना, जब कि स्मग्णा लकार में जो स्मृति होती है वह समान वस्तु के दिसाई पटने से याद आई किमी अन्य की वस्तु की होनी है। [आप बनला रहे है कि गृहन्यों को उनके द्वारा किए गए आतिथ्य का म्मरण आ रहा हे किन्तु ] यहाँ गृहम्यों को सूर्यदर्शन में संमव अतिथि मत्कार का कर्ता नहीं बनलाया जा रहा यहाँ तो उन्हें सत्पुम्प के आनिथ्य का सोध्य बनलाया जा रहा है। न तो यहाँ सूय के माथ अनिधि का या अनिथि के साथ सूर्य का कोर साम्य ही विवक्षित है। जो विवक्षिन है वह केवळ इनना ही कि 'मेरे समान गृहम्यों को मी मत्पुरुषों का आतिथ्य करना चाहिए।' इमीलिए यहाँ [एक वस्तु का निर्माग करने-करने] 'दूसरी वस्तु का भी निर्माग-' एतद्रप जो विशेंपालद्कार है वह मी सम्मन नहीं है क्योंकि यहाँ यह बोध नहां होना कि सूर्य का ज्ञान होते ही अनिथि आदि अममाव्य व्यक्ति का मी ज्ञान हो गया'। इस लिए यही कहना उचित है कि सम्बन्ध के समव या असमव होने से निदशंना ही है। इसलिए निदशंना के केवल दो ही भेद होंगे जैसा कि कहा गया है। 'अर्संभवद्=वस्तु के साथ सम्बन्ध के न वनने मे'। इसलिए कि दूसरे धर्मी के धर्म का सबन्ध दूसरे धर्मी से बन ही नहीं सकता। अदूरबिप्रकर्यात्=दूरी कम होने से-'धर्म के द्वारा समन सादृश्य के कुछ पास रहने से। अथवा दूसरा उदाहरण- 'अङ्ग पुनकम् अपरः सवेपितो अश्पित समीत्कारम्। सर्वे शिशिरेण कृन यत कर्तव्य प्रियजनेन।I' -'शरौर में रोमाच है, अघर में कम्पन है, और बोनने में सीत्कार है। इस प्रकार शिशिर ने दह सब कार्य कर दिया हे जो प्रिय के द्वारा किया जाना चाहिए।' -यहाँ पुलक आदि धर्म प्रिय के कार्य है उन्हें नि्पन्न दोता हुआ वतलाया जा रहा है प्रिय से मिन्न शिशिर के द्वारा वह असमव है अतः वह प्रियकार्य जैसे कार्य का ज्ञान कराता है और तब प्तोति होती है कि 'शि्चिर प्रिय के समान है'। इसलिए यहाँ वाक्यार्थं साङृश्य में पर्यवसित होना है। [इस गाया = अगे पुटरुम्' में अलकाररत्नाकरकार ने प्रतिमानामक एक नवीन अलकार माना है। उसका लक्षण है 'अन्यधर्मयोगाद् आर्थम् भपम्य प्तिमा' = एक वस्तु का दूसरी वस्तु से आर्थ-साम्य दो उस वर्तु के धर्म के इस वस्तु में सबन्ध होने से, तो वह साम्य प्रतिमा होता है'। इस गाथा के वाक्यार्थ की स्थिति ऐमी हा है अत. यशा प्रतिमालकार समव है। विम्सिनीकार इसका प्रतिवाद करते और कहते है] क्योंकि उक्त कम से इस गाया में निद्शना है इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि 'यहाँ प्रतिमालद्वार है निदर्शना नहीं और निदरंना का अमाव बतलाने के लिये यह हेतु नहीं दिया जा सकता कि निदर्शना में एक केन्द्र धर्म का [ दूसरे में ] सबन्ध नहीं रहता जब कि यहाँ[ प्रिय के धर्म का शिश्षिर में सबन् ] है-'[धर्मागा मसम्बन्धाभावान्न निदशना' अळकाररत्नाकर, प्रतिमालकार की आर्राम्मर वृत्ि] कारण कि प्रतिमा कोई स्वतन्त्र भलकार नहीं है। उसके [ आपने ] जो और दूसरे उदाहरण दिए है उनमें भी स्पष्ट ही अन्यान्य सलंकारों का अमाव नहीं है। अय हमारे द्वारा प्रस्तुन इस क्रम से दूसरे समीक्षक [अलकाररत्नाकरकार द्वारा स्थापित ] अन्य सभी नवीन अलकारों में भी दूसरे प्राचीन
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निदर्शनालङ्कार: २७३
अलंकारों का अस्तित्व दतला सकते हैं इसलिए ह्म एक-एक कर, उन सब पर अपनी ओर से दोष नहीं दिखला रहे हैं। ऐसा करने में अ्रन्थ के विस्तार का मय है और इमने प्रतिश्या भी केवल यही की है कि हम उनके हमारी सीमा में आाए दोपों का ही निराकरण करेंगे। किन्तु हम दोप नहीं दे रहे हैं इसलिए 'दूसरे का दूसरे को मत मान्य है यदि उसने उसका खण्डन नहीं किया है' इस सामान्य धारण के आधार पर [मलकाररत्नाकरकार द्वारा प्रतिपादित] प्रतिमातिरिक्त अन्य नवीन अलंकार हमें स्वतंत्र अलंकार के रूप में मान्य है ऐसा मान बैठना ठीक नहीं होगा।
एपापि पदार्थवाक्यार्थवृत्तिमेदादू द्विविधा पदार्थतृत्ति: समनन्तरसुदा- [सर्वस्व्र ]
यदलक्तकमार्जनम्। इदं श्रीखण्डलेपेन पाण्डुरीकरणं विधो:।।' केचिन दष्टान्तालंकारोऽयमित्याहुस्तद्सत्। निरपेक्षयोर्वंक्यार्थयोहि विम्बप्नतिविम्बभावो दृष्टान्तः । यत्र च प्रकृते वाक्यार्थे वाक्यार्थान्तर- मारोप्यते सामानाधिकरण्येन तन्र संवन्धानुपपत्तिमूला निदर्शनैव युक्का, न दष्टन्तः । एवं च- 'शुद्धान्तदुर्लभमिर्द वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य। दूरीकृता: खद्ु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः।' इत्यत्र दष्टान्तवुद्धिन कार्या। उक्तन्यायेन निदर्शनाप्रात्े:। 'यह [भसंभवद्वस्तुसंवन्धा निदर्शना] भी दो प्रकार की होती है पदार्थगता तथा वाक्यार्थगता। दोनों में से पदार्थगता का उदाहरण ममी दिया। [अ्याव स व:] वाक्यार्थेगता का उदाहरण यह है- 'तुन्हारे पैर के [पझमराग या पुष्पराग ] मणियों के समान [लाल लाल ] नासूनों का अलते से जो रँगा जाना है यह सफेद चन्दन का लेप कर चन्द्रमा का सफेद किया जाना है। कुछ विद्वानों ने कहा है कि यहाँ दृष्टान्तालंकार है। किन्तु वह ठीक नहीं है। दृष्टान्त वहाँ होता है जहाँ दो निरपेक्ष वाक्यार्थों में विम्वप्रतिबिम्बमाव रदता है। जहाँ प्रकृत वाक्यार्थ पर अन्य वाक्यार्थ [सोडहम् आदि के समान] सामानाधिकरण्य [नखमारजन विधुलेपन है-इस प्रकार अभिनरूपता ] द्वारा आरोपित किया जाता है वहाँ संबन्ध संभव नहीं होता । अतः तन्मूलक [सादृस्य में पर्यवसित होने वाली ] निदर्शना ही यहाँ मान्य है दृष्टान्त नहीं। इसी प्रकार- [ शकुन्तला को देख दुष्यन्त की स्वगत उकि ] 'हमारे अन्तःपुर में दुर्लभ यह शरीर यदि आाअमवासी जन का पप्त है तव तो उद्यानछताओं को वनलताओं ने अपने गुणो से ओझल कर दिया।' [शाकुन्तल ] -- यहाँ दृषटान्त नहीं समझ पैठना चाहिए क्योंकि उक्त हेतु से यदाँ भी निदशना ही प्राप्त है। विमर्शिनी एपेक्यसंभवद्वस्तुसंबन्धनिवन्धना। न वेवलं निदर्शना यावतद्मेदोऽप्ययं द्विविध इत्यपिशन्दार्थ:। उदाहृतेति 'अग्याव्स वः' इत्यादिना। केचिदिति श्रीमम्मटादयः। १८ अ० स०
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२७४ अलङ्कारसर्वस्वम् तदिति दष्टान्वालकारवचनम्। एतदन्यश्रापि योजयति-एवमित्यादिना। उक्तन्यायेनेति, प्रकृतवाक्यार्ये वाक्यार्थान्तरस्य सामानाधिकरण्येनाध्यारोप्यमाणस्वात्। अतश्यान्येविया- पंयो: सामानाधिकरण्य निद्शाच्त्री तारोपसद्ावेन वाक्यार्थरूपक यदुक तत्तावदास्ताम, यरपुनः प्रतिवस्तूपमोदाहरणत्वमुक्क तद्युक्तमेव। निरपेथ्वयोरवक्यार्थयोघर्मस्य शुद्ध- सामान्यरूपत्वे प्रतिवस्तूपमा। न चान्रेकमपि समवति। वाक्यार्थयो सापेप्षत्वाच्छुद्ध- सामान्य रूपत्वाभावाच्च अर्थापत्युदाहरणवमप्यत्रायुक्तम्। 'जाअत. कमलावलप्र्मी यज्जग्राह तदद्भुत्तम्। पादद्वन्द्वस्य मत्तेभगतिस्तेये तु का स्तूतिः ।' हत्यत्र तु प्रतिबध्नूपमोदाहरणत्वं पापापापीयः। अत्र दि वात्यार्थयो: परस्परं सादश्य मात्रमपि नास्तीति का कथा प्रतिवस्नूपमाया । एवंविघमेव चान्यत्र सर्वालंकारोदाद- रगेप्वासमअ्जस्यं संभवदपि समनन्तरोकहेतुद्रयाय् दर्शितम्। तथा च- 'आज्ञाघर पञ्चशरः पुरस्तारसुधा पुन कर्मकरी मुखस्य। स चापि सौन्द यंविशेपवन्दी यत्रेन्दुरिन्दीवरलोचनानाम्।'
तम्न पातिशयोकिश्वमेव नारतीति कि कार्यकारणभाव पूर्व करव निदर्शनेनेत्यलं बहुना। असंभवद्वस्तुसंबन्धनिवन्धनायाय यद्यवि वस्तुसंबन्धस्याविशोपेग समय उक्कयापि सम नन्तरोक्तोदा हर णेयु य योपमानसंबन्धी धर्म उपमेयगतत्वेनैव संभवति तथैवोपमेयसवन्धी
'पृपा= यह' = असमनद्वस्तुसंबन्धमूला निदर्शना। 'भी' का अर्थ यह है कि केवल निदझंना सामान्य हो दो प्रकार की नहीं होती, उसका यह एक भेद मीं दो प्रकार का होता है। 'उदा- हता= जिसका उदादरण दिया जा चुका है'= 'अव्यात् स ब" हत्यादि। 'केचित-कुछ' श्रीमम्भट आदि [मम्मट के काव्यप्रकाश में 'सुद्धान्नदुर्टम' पद कहीं भी उदाहन नहीं है]। 'तत् = वह' अर्थाद यह कथन कि यहाँ दृष्टान्तालकार है [अमान्य है]। इसी तथ्य को दूसरे पद् में भी प्रतिपादित करते हैं और कहते है-'एवं च'। उकन्यायेन उक्त हेतु से =प्रकृत वाकयार्थ में भग्रकृन वाक्यार्थ के सामानाधिकरण्य द्वारा अध्यारोपित किए जाने से। इसलिए दो वाक्यार्थो के सामानाधिकरण्य का निर्देश देख एक अन्य सजन ने थौत =शब्दत कथिन आरोप के आधार पर निष्पन्न जो वाक्यार्थरूपक माना है वह तो बहुन दूर है, कुछ लोगों [ अलकाररतनाकरकार] ने जो इसे प्रतिवस्नूपमा का उदाहरण मान रसा है वह भी वेनुका है। क्योंकि प्रतिवरनूपमा वहों होती है जहाँ दो निरपेक्ष वाक्यार्थों में कोई एक शुद्ध सामान्यरूप साधारण धर्म रहना है। यहाँ इनमें से एक भी नही है। यहाँ दोनों वाक्यार्थ सापेक्ष हैं और धर्म भी शुद्धसामान्यरूप नहें है। [अवकाररत्नाकरकार ने-'दण्डापूषिकयायंस्यापतनमर्यापचि =अर्थाव जैसे यदि चूहे दण्ड को कुनर दें तो उससे उस पर टंगे मालपूओं का चूदों द्वारा खाया जाना भी सिद्ध हो जाता है तो उसे अर्थापत्ति कह ते हैं वैसे ही किसी एक अर्थ के सिद्ध हो जाने पर जब कोई दूसरा सवं सिद्ध हो जाए तो उसे भी अर्यापत्ति अठकार कहेंगे'-इस प्रकार अर्भापत्ि का सक्षण कर उसके ४८ भेद किस थे और उदाहरण के रूप में 'शुद्धान्तदुररम0' पद् प्रस्तुतकर लिखा था कि यहाँ शरीर के वृत्तान्त से उसी जैसी लता का वृत्तान्त लाया गया है अत शरीर में लोकोत्तरता सिद्ध करने पर छताओं में मौ वह अपने आप सिद्ध हो जाती है अत यहाँ अर्थापत्ति है। विमर्शिनी- कार इसका खण्डन करने हुए कहते हैं-] इस पद्य को अर्थापत्ति का उदाहरण भी नहीं माना जा सकता। [ क्योंकि यहां वाक्यारथं दयगत सापेक्षता होने और शुद्ध सामान्य धर्म का प्रयोग
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निदर्शनालक्कार:
न होने से निदशना है, अथवा अर्थापत्ति एक नवीन और कल्वित अलंकार है जो अमान्य है अथवा आप जब इसमें प्रतिवस्तूपमा मानते है तो अर्थापत्ति कैसे भान सकते हैं। ] फिर- [उसके] दोनों पैरों ने जागत हुए [ अतयव सावधान] कमल से [ उसकी] श्री छीन ली इसमें है आश्चर्य, मदमत्त [अतपत्र असावधान] हाथी की गति चुरा लेने में उसकी कोई चढ़ाई नहीं। -इस पद्य में [ अलंकाररत्नाकरकार ने] जो प्रतिवत्तूपमा मानी है [ और कदा है कि यहाँ 'ग्रहण करना' 'छीन लेना' साधारण धर्म है, उसे उत्तर वाक्य में 'स्तेय = चुराना' शब्द से कहा गया है, इधर केवल कान्ता प्रकृत है, पद्म और मत्तगज दोनों अप्रस्तुत'-दष्टन्य प्रतिचस्तूपमा- प्रकरण ] वह तो बद से वदतर है। यहाँ जो वाक्यार्थ है उनमें सादृश्य तक तो है नहीं, [ अलंकार- रल्ाकरकारके] प्रतिवस्तूपमा की कथा ही कया ? अन्य सभी अलंकारों के उदाहरणों में मी ऐसा ही असामजस्य है किन्तुअन्थविस्तारभय तथा केवळ अपने ऊपर दिए गए दोषों के निवारण की प्रतिय्वा इन अमी अभी] कथित दो कारणों से उसे हम नहीं दिखला रहे हैं। जैसे एक स्थल और लीजिए- -
-'सहाँ कामदेव उत्पलाक्षियों=नीलकमलसी आँखोवाली वालाओं के मुखमण्डल का आाजाकारी है जो अपने पाँचों वाणों के साथ सदा सामने खड़ा रहता है, सुधा कमकरनी=चेटी है और चन्द्रमा उस [ मुख-मण्डल] के अनोसे सौन्दय का बैतालिक है।' -- यहाँ विषय और विषयी दोनों का टपादान है अतः स्पष्ट ही यहाँ रूपकालकार है तथापि [अलंकाररत्नाकरकार ने ] इस पद्य को अतिशयोक्ति का उदाहरण माना है[ और कहा है कि 'यहाँ अतिशयोक्ति कार्यकारणमावमूला है। यहाँ 'एककार्यकारित्व'-रूपी संवन्ध के आधार पर पहले कामदेव से सवथा असंबद्ध आज्ञाकारित्व का कामदेव से संबन्ध हो जाता है अर्याद असंबन्ध पर संबन्ध का अध्यवसायबोध हो जाता है, फिर कारणरूप आझ्याधरत्व का उसकी कार्यभूत काम- विकारोत्पत्ति से अमेद बोध हो जाता है] किन्तु यहाँ अतिशयोकित ही नहीं, उसके कार्य- कारणमूलकत्व की और नदर्थ इस पद्य को उदाहरणरूप से प्रस्तुत करने की तो वात ही क्या। इस प्रकार यह वदाहरण मसंगत है। अब हम और अधिक उदाहरण देते वैठे यह ठीक नहीं। 'असंभवद्वस्तुसम्न्नन्धसूलक निदर्शना के जिस वसतु-संबन्ध का अभी ['अव्याद सः'-यद्य में] संमन्न प्रतिपादित किया गया है उसमें कोई विशेषता प्रतिपादित नहीं की गई थी, [वहाँ प्रतिपादित वस्तुसम्बन्ध सामान्यरूप से प्रतिपादित किया गया था] तथापि [उसमें विशेषताऍ भी हूँदी जा सकती हैं-जैसषे] अभी दिए उदाहरणों में जिस प्रकार एकमात्र उपमानगत धर्म का उपमेय में पहुँचना संभव प्रतिपादित किया उसी प्रकार उपमेयगत धर्म का उपमान में पहुँचना भी संमव प्रतिपादित किया जा सकता है'-इस तथ्य का प्रतिपादन करने हेतु लिखते हैं- [ सर्वस्व ] इयं वोपेमेय उपमानवृत्तस्यासंभवात्प्रतिपादिता पूर्वैः वस्तुतस्तूपमेय- वृत्तस्योपमानेऽसंसवादृपि भवति। उभयन्रापि संबन्धविघटनस्य विद्यमान- त्वात्। तद्यथा- 'वियोगे गौडनारीणां यो गण्डतलपाण्डिमा । अलक्ष्यत स
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अत्र गण्डततं प्रकृतम्। तद्धर्मस्य पाण्डिस: खर्जूरीरेशुष्वसंभवादीपम्य- प्रतीतिः। एप च प्रकार:शृह्धलान्यायेनापि भवति। यथा - 'मुण्डसिरे बोरफलं बोरोवरि वोरमं दिरं धरसि। विग्गुच्छाअइ अप्पा गालिमछेआा छलिज्न्ति।' [यद जो असंभवद्स्तुसम्बन्धमूला निदशेना है] इसका पतिपादन [मम्मट आदि] प्राचीन आाचा्यों ने केवल ऐमा किया था जिसमें कैवल उपमेय में उपमान के धर्मे का असमत प्रतिपादित होता था, किन्तु सत्य यह है कि [निदर्शना की ] यह [ विधा] ऐेसी भी होनी है जिसमें उपमेय के ध्मे उपमान में अप्तमव प्रतिपादित रहता है, क्योंकि सबन्ध का अभाव इन दोनों में ही समान रूप से विधमान रहता है। इस [द्वितीय विषा] का उदाहरण-[जिसमें उपमेय धर्मे उपमान में ससंभव प्रतिपादित रहता है, यह है-] 'गौड देश की वियुक्त वनितारभ के कपोलतलों की पीत्षिमा [वमन्न ऋतु में ] सजूरमजरी के पराग में दिखाई पडी।' -- यहाँ कपोलतल प्रकृत [वर्णनीय] है [अत उपमेय है और] उसका धर्म पीतिमा [पीलेशन में कपोलतल के उपमानभूत ] सर्जूरपराग में अमभव से अत [वाक्यार्थ का पर्यवसान उपमानो- पमेयमाव में होता है और अन्त में ] भपम्य की प्रनीति होती है-[ कि कपोन्पीतिमा सदृश- पीतिमायुक्त खजूरपराग, खर्जूरपरगगत न कि पीतिमा के समान पीतिमा से युक्त कपोलतल]। यह [उपमेय धर्म का तपमान में असभवरूप अथवा अक्षभवद्वस्तुसम्बन्धमूलक] जो प्रकार हे यह मृखला क्रम से भो होता है। यथा- 'मुण्डशिरसि बदरफलं बदरोपरि बदर स्थिर धारयसि। नागरिक च्छेकारछर्यन्ते॥' 'तुम जो चतुर नागरिकों को छलना चाह रहे हो, यह एक प्रकार से मुँडे सिर पर बैर (बदरीफल) और उस बेर पर एक और बेर [थिराना] चाह रद्दे हो, अपने आपको घृणास्पद बना रहे हो। विमर्शिनी उभयत्रेश्युपमेये उपमाने वा। वसन्तवर्णनस्थ प्रकान्ततवाद् हुयो: प्रकृतत्वेऽपि गण्ड- तळस्योपमेयरवम्। सद्गतावैनव पाण्डिम्नः मिसाधयिपितरवात्। सिद्धमाध्यधर्मरवमेव घोपमानोपमेयव्वम्। यथा वा- 'रवदकशलावण्यमिद मृगाधि संलचय ते पतयुरपि चपाया:। कथ खवनेनाहृतमेतद्द्य कलावर्ता वा किमसाध्यमरित।।' अत्र चाटुपु नायिकाया प्रस्तुतत्वाद्वक्व्रमुपमेयम्। तद्र्मस्य व लावण्यस्योपमाने रशिन्यसंभवः। पुप इति असंभवद्वस्तुसंबन्धनिवन्धनो वा वाप्यः । उभयत्र =दोनों में = अपमेय में और उपमान में। [वियोगेयु पद्य में] वसन्न का वर्णन किया जा रहा है अत- उसमें दोनों ही पकृत हैं [ वियोगिनीकपोल भी और खनूरमपरी मी ] तथावि उपमेय है कपोष्तल ही, कयोंकि पीतिमा उसर के भीतर सिद्ध करना अमी है, क्योंकि सिद्ध धर्मवाला हो पदार्थ उपमान बनना है और साध्य धर्मवाला उपमेय। अथवा दूसराउदाइरण लीजिए- 'हे मृगाक्षि ! तुम्हारे चेदरे की तुनाई चन्द्र में भी दिखाई दे रही है। इसने इसे कैमे हडपा होगा १ अथवा जो कलावान् होते हैं उनके दिए मसाव्य दो क्या रहता है।'
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-यहां नायक नायिका का चाड कर रहा है अतः यहां नायिका का चेहरा प्रस्तुत है और इसीलिए उपमेय भी। उसका जो लावण्यरूपी धर्म है उसका चन्द्रमा में मसंमव है। 'पूप= यद'= प्रकार [संभव है ], इसका दूसरा अर्थ असंभवद्वस्तु संवन्धमूलक निदर्शना मो किया जा सकता है। [ सर्वस्व ] इयसपि क्वचिम्मालयापि भवन्ती दश्यते। यथा- 'अरण्यरुदितं कृतं शवशरीरमुद्ध्तितं स्थलेऽव्जमवरोपितं सुचिरमूषरे वर्षितम्। शवपुच्छमवनामितं वधिरकर्णजाप: कृतः धृतोऽन्धमुखदर्पणो यद्युधो जनः सेवितः॥' क्वचित्पुनर्निषेधसामर्थ्यादाक्षिप्तायाः प्रात्तेः संबन्धानुपपत्यावि भवति। यथा- 'उत्कोपे त्वयि किंचिदेव चलति द्राग्गूरजरक्ष्मामृता -r सुक्ता भूर्न परं भयाम्मरुजुषां यावत्तदेणीदशाम्। पद्भ्यो हंसगतिमुखेन शशिन: कान्ति: कुचाम्यामपि क्षामाम्यां सहसैव वन्यकरिणां गण्डस्थलीविभ्रम:॥' अन्र मुक्तति निषेधपर्द तदन्यथानुपपच्या पायोहसगतिपाप्तिरा क्षिप्यते। सा च तयोरनुपपन्ना साहसयं गमयतीति असंभवद्स्तुसंव- न्धनिवन्धना निदर्शना। यह [निदर्शना सामान्य ] कहीं मालारूप में भी मिलती है। यथा- 'मूर्ख व्यक्ति की चाकरो जो कि वह निर्जेन जंगल में रोया गया, मृत शरीर में उबदन संगाया गया, मिट्टी पत्थर पर कमल रोपा गया, काफी देर तक ऊपर में वरसा गया, कुचे की पूंछ सीधी की गई, दहिरे के कान में जप किया गया और [दोनों माँखों के] अन्धे के सामने दर्पण रखा गया। [निपेध प्राप्तिपूर्वक होता है इस कारण] कहों कहीं निषेध से आक्षिप् प्राप्ति का संबन्ध नं चनने से भी [ यह निदर्शना ] होती है। यथा- आापके कुद होकर [ युद्धार्थ] थोड़े से चलते ही भय से गुर्जर के राजा ने पूथिवी ही नहीं छोड़ी, अपितु मरुत्थल में भटकती उसकी सुन्दरियों के पैरो ने इंसगति, मुखों ने चन्द्रकान्ति, दुर्वल स्तनों ने संगर्ला हाथियों के गण्डस्थली का विभ्रम मो एकाएक छोड़ दिया। - यहाँ 'मुक्त = जोड़ दिया' यह निषेधवाचक पद पहिले पेरा द्वारा हंसगति की प्राप्ति करने का आक्षेप करता है, क्योंकि विना उस [प्राप्ति] के वह निषेध वनता ही नहीं है। और वह [हंस गत्ि की] उन [मैरों] में संभव नहीं है अतः 'उस जैस्ी गति' का ज्ञान कराती है। इसटिए यहाँ असंभवद्वस्तुसन्बन्धमूला निदर्शना हुई। विमर्शिनी आक्षिसाया इति। प्राप्ति पूर्वकत्वान्निपेघस्य। सेति प्राप्तिः। सादृव्यमिति पादयोहंसगति सुच्याया गते: प्रतीते:।
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२७८ अलङ्गारसवस्वम् इयं प सामान्यस्यानुगामितया। यथा-अव्या्स व इत्यादि। अत्र निसर्गवक्रना- चयधमस्यानुगामित्वम्। शुद्ध सामान्यरूपर्वेन यथा- दारेणामलकस्थूल मुक्केमा मुक्तकुन्तछः फणीन्द्रबद्जूटस्य श्रियमाप स धूर्जटे॥ अन्नामुक्तवदयो शुद मामान्यरूपरवम्। विम्वप्रतिबिम्बभावेन यथा- 'उह सरसदतमदलकपोलपडिमागओ मअच्छीद। अंते सिंदूरिअससवत्तकरणि वहद चद्दो ॥'
'आषिप्ताया := आक्षिप्त' इसलिए कि निषेध प्राप्तिपूर्वक होता है। 'मा= वद' = प्राप्ि। 'सादृश्यम्'= क्योंकि पेरों में हसगति तुन्य गति की प्रतीति होती है। यह [निदशंना ] साधारण धर्म के अनुगामी होने पर भी होती है यथा-'अव्यात् स व' इत्यादि में। यहाँ 'निसर्गवकता'-नामक धर्म अनुगामी है। इसमें धर्म कहीं शुद्धसामान्यस्वरूप भी होता है। यया- -'आँवळे जैसे स्थूल मोतियों के द्वार से उसके केश कमे हुए थे। अन वह भगवान् शिव की शोमा प्राप्त कर रहा था जिनका जटाजूट शेयनाग [जो अपने चवल वर्ण के लिए प्रसिद्ध है] से नँधा रहता है। यहाँ 'आमुक्तत्व' और 'आवद्ृत्व' दोनों शुद्ध सामान्यरूप हैं। बिन्दप्रतििम्बभावमूलक, यथा- पश्य सरसदन्तमण्डठकपोलप्रतिमागतो मृगा्या"। अन्ते सिन्दूरितशङ्ावचंकरणी [करियां] वहति चन्द्र ।।' -- देखो, [ताम्बूलरस से ] सरस दंतमंडल [ऊपर नीचे की दोनों पक्ति ] वाले कपोलों पर प्रतिबिम्वित यह चन्द्रमा नीचे [[ मुखभाग में ] सिन्दूर से रँग हुए शम के आवतं [अजलि, कटोरी धोते समय जिसमें पानी भरा जाता ै, या जिसमें ऊँगलियों के अम्रपर्च फंसाकर शख को पकडा जाता है और यदि यह शंख के दाहिनी ओर होना है तो दाख को दक्षिणावर्त्त कहा जाना है, सामान्यत. यह राख के वाँई ओर ही होता। वस्तुत. केले कुण्डरित पत्ते जैसी एक परत होती है जो मीतर ही भीतर कुण्डलित होती जाती है इसलिए इसे आवर्च= भौर कहा जाता है।] को करनी [ क्रिया] धारण कर रहा है।' ·यहाँ 'दन्तमण्डल' और 'सिन्दूरितत्व' इन दोनों में विन्वप्रतिबिम्वमाव है।' विमशं-निदर्शना का पूर्व इतिदाम- :मामह: = 'क्रिययैव विशिष्टस्य तदर्थस्योपदशनाव्। ज्ेया निदशंना नाम ययेववतिमिर्विना॥ ३।३३॥ यथा · अ्यं मन्दधुतिर्मास्वानस्तं प्रति यियामति। उदय: पतनायेति श्रीमतो बोधयन् नरान् ॥ २३४ ।। -- 'निदशना इमटिम कहलाती है कि इसमें करिया के द्वारा ही विशिष्ट सर्थ प्रदवित किया खाता है औौर यथा, इव, वति आदि उपभावाचर्कों का प्रयोग नहीं रहता।' यथा= 'यह प्रकाशराशि सूर्य तजोहीन होकर अस्त की ओर जाना चाह रहा है, श्रीमान् लोगों को यह बतलाना हुआ सा कि 'उदय का अन्न पतन होना है।' ,र्पष् है कि मामह में सभवद्वस्तुसंबन्धा निदर्शना का ही निरूपण हुआ है। इन्हों के अनुकरण पर वामन मौ केवल निदर्शना का निरूपण करते है-
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निदर्शनालङ्गार: २७१
वामन=' सृ०] क्िययैव स्वतदर्थान्वयख्यापनं निवशनम्।' [वृ०] क्रियवैव शुद्धया स्वस्यात्मनः तदर्थस्य चान्वयस्य संबन्धत्य ख्यापनम्, संतुलित-
[ सू० ] स्वयं और उसके प्रयोजन के अन्वय का कथन ही निदर्शन। हेतुदृष्टान्तविभागदर्शनाव निदर्शनम्।
[वृ०]'शुद्ध [अन्य निरपेक्ष] क्रिया के द्वारा अपना और अपने प्रयोजन के संबन्ध का प्रतिपादन निदशना कहलाता है, क्योंकि इसमें हेतु और दृष्टान्त का अन्तर तिरोहित रहदा है।' उदाहरण-'अत्युच्चपदाध्यासः पतनायेत्यर्थशालिनां शंसव। आपाण्डु पतति पत्र तरोरिदं बन्धनग्रन्थे:॥' -'वृक्ष का यह पीला पत्ता श्रीमन्त लोगों से यह कहता हुआ बन्धनग्रन्थि से गिर रहा है कि अत्यन्त ऊँचे मद पर पहुँच जाना पतनकारी ही होता है।' यहाँ 'गिर रहा है'-यह किया है, उसका प्रयोजन है 'अति उच्च पद पर महुँचना पतनकारी होता है' यह, और इसका कथन हुआ है 'श्रीमन्त लोगों से कहता हुआ' इस प्रकार। उद्भट :- उद्धटाचार्यने निदशना को विदशना कह नाम में भी परिवर्तन कर दिया है और लक्षण में भी इस प्रकार परिष्कार किया है- 'अमवन् वस्तुसम्बन्धो भवन् वा यत्र कल्पयेव। उपमानोपमेयल्वं कथ्यते सा विदर्शना ॥ ५१० ॥ वदाहरण-विनोचितेन पत्या च रूपवायपि कामिनी। विधुवन्ध्यविभावर्याः प्रविभत्ति विशोभवान्॥ असंभव या सभव वस्तुरुबन्ध जहाँ उपमानोपमेय भाव की कल्पना कराए उसे विदर्शना कहा जाता है। विदर्शना शब्द की व्युत्पत्ति स्पष्ट करते हुए प्रतीहारेन्दुराज ने लिखा है-'वि= विशिष्ट अर्थ=उपमानोपमेयभाव, उसका दर्शन=प्रतिपादन=उससे युक्त 'विदर्शना'। निदशन शब्द उपमा से कुछ दूर दो दष्टान्तपरक हो जाता है। उदाहरण 'उचित पति के बिना कोई मी सुन्दरी चन्द्रदीन रात्रि को शोभाशन्यता धारण करती है। इस उदाइरण में रात्रि की शोभाशन्यता का सुन्दरी से संबन्ध संभन नहीं होता अतः उसका अर्थ तत्तव्य अन्य शोभाशून्यता में परिणत हो जाता है। इस प्रकार यह उदाहरण असंभवद्वस्तु- संवन्धमूला निदर्शना का है। द्वितीय का उदाहरण उद्भट ने नहीं दिया। अतः उद्धट के काव्यालंकारसारसंग्रह की टीका लयुविवृति के रचयिता प्रतीहारेन्दुराज ने अपनी ओर से मामह का 'अयं मन्ददुति' पद्य उद्दृत कर उसका विश्लेषण इस प्रकार किया है- -'यहाँ उदित होकर अस्त होता सूर्य प्रयोजककर्ता है और प्रयोज्यकर्ता है उदयशाली श्रीमन्त जन । सूर्य उन्हें यह बोध करा रहा है कि 'उदय का अन्त पतन होता है' इसलिए इस 'वोवन'-करिया में वह हेतु है। किन्तु सूर्य जढ़ है अ्रतः उसमें प्रयोजक हेतुत्व केवल 'बोध में समर्थ आचरण करने' तक सीमित है जैसे [ठंड में आग जलाकर पढ़ते छात्र की-] 'कारीष= कंडो की मशि अध्ययन करवा रह्दी है' इस उचि में। इस प्रकार श्रीमन्तों और सूर्य के बीन वह जो प्रयोज्यप्रयोजक भाव है यह वस्तुतः संभव नहीं होता। फळतः यह उपमानोपमेयमाव का आऐेप कराता है, अर्यात, इस प्रयोज्यप्रयोजकभाव का पर्यंवसान 'हे श्रीमन्त सज्जनो! जिस प्रकार मेरा उदय, पतन में
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२८० अलङ्कारसर्चस्वम् परिणत दो रहा है उसी प्रकार आप का भौ उदय पतन में परिणन होगा-ऐमा आप लोग समक लें' इस प्रकार के उपमानोपमेयमाव में होता है। यहाँ 'समर्थाचरण शब्द का प्रयोग स्वय अलकारसर्वस्वकार, प्रनीदारेन्दुराज, विमर्िनीकार रत्नाकरकार, अप्पयदीक्षित तथा पण्टितराज-इन सबने किया है किन्तु इसका मर्य कुवलयानन्द के टीकाकार वैधनाथ तत्मत तो बडी ही सफाई के साथ सक्षेत में इस प्रकार किया है-'समर्थाचरणे समर्थकरणे सामर्थ्योत्पादन इति यावत मातमाधान्यात।' समर्थोचरण अर्थात समर्थ वनाना अर्यात् सामर्थ्य उत्पन्न करना।' इस प्रकार प्रयोजककर्त्ता भले ही बड हो वह चेतन के मीनर होने वाली ज्ञानोत्पचि में आलम्वन नो बन ही सकता है। जट की यह आलम्वनता न्यायशास की मापा में विषय का जान के प्रति कारण होना माना जा सकता है। व्याकरण की भाषा में हमे ही व्ानोत्पत्यनुकूलना कहा जा सकता है। और यह तो जड में समव ही है। प्र्तुत पदार्थ में सूर्य मले ही जड है, वह श्रीमान् व्यक्ति अर्थात चेतन व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाले 'उदय पनन में बदलता है'-इस ज्ञान के प्रति सहा- यक तो दो ही सकता है। यही सहायकना उमकी प्रयोबकर्नृना है और यह सूयं में ममत्र ही है। 'चूड़ामगगिपदे०' इस गन्थकार के उदाहरण में इसी प्रकार यह प्रयोजकना पर्वन में सम्भव है। वस्तुतः यह भी एक औपचारिक प्रयोजकता ही है वास्तविक नहीं। इसौलिए रसगगाधरकार ने यहां न्यायशासत्र के अनुसार व्यग्य उत्प्रेक्षा स्वीकार की है। सत्य यह है कि इस निदशना का ठीक निरूप वामन ने ही किया है। वस्तुसम्बन्ध के समत्र होने की वान डालकर सट्रट ने उममें एक विचार-सघर्षे पैदा कर दिया। बनट .= स्ट्रट के काव्यालकार में निदशंना नहीं मिलती। मग्मटः= 'अमवन् वस्तुमम्बन्ध उपभापरिकल्पक। स्वस्व हेत्वन्वयस्योकि क्रिययैव च सापरा ॥ -चस्तु सम्बन्ध न समन होकर यदि उपमा की कलपना कराप तो निदर्शना, अथवा कोई कार्य स्दय का स्त्रय के कारण के साथ सम्बन्ध बनलाना हुआ प्रतिपादित हो तो निदचना। नम्मट ने प्रथम के दो उदाहरण दिए है-उनमें से प्रथम की अभिव्यक्ति सर्वस्वकार के 'त्वत्पाद- नस०' और 'शुद्धान्तदुर्यन' की अमिव्यक्ति से और दूसरे की अमिव्यक्ति अभ्यान सवो' की अभिव्यक्ति से सवथा मिलती है। दविनीय निदशना का उदाहरण उन्होंने ठीक वैसा हा दिया है जैसा-सवंस्व- कार ने 'चूटामगिपदे'। किन्तु विरोयता यह है कि काव्यप्रकाशकार ने इस भेद में वस्तुसम्बन्ध के समत होने की बात नहीं कदी है। शोमाकर- सरकाररल्ाकरकार ने मो निदर्शंनालक्षग में वस्तुमम्बन्ध के समद होने की वान छोड दी ह- [सूत्र ] 'असति सम्बन्धे निदशंना ॥८।। [इृ.] असति अमुमवनि सम्बन्धे आर्थमौपम्यं निदशंना। -सम्बन्ध समतर न हो तो निदशंना दोनी है यदि उपमानोपमेयमाच की प्रनीति अर्थनःहो। इसी तथ्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है- 'सवन्यवाध सति वसगातो यत्रोपमाया प्रतिर्पात्तरर्ति। निदशना तभ् यदा तु किब्रिद् वम्तेव लकष्येन तदा परे स्यु ।!' -जर्हा सम्न्ध का वाध हो जाने पर लक्षगा के द्वारा उपमा का ज्ञान हो वहाँ निदर्शना, और जहाँ किसी वस्तु का हो लक्षणा द्वारा ज्ान हो वहाँ दूसरे सलकार होते हैं। उदाहरण के रूप में उन्होंने 'अशिव शिव की भहिमा धारण करता है'-यह वाक््यार्थे प्रस्तुत किया है।
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संभवद्वस्तुसन्बन्धमूला निदर्शना तो अलंकाररत्नाकरकार ने मानी नहीं है तथापि उन्होंने उसके उदाहरण देने की अस्पष्ट और असफल चेन्ा की है। 'तत्मादनखरत्नानाम्' पद्य में रत्नाकरकार ने वाक्यार्थरूपक मानते हुए कहा है कि 'नखों को अलते से लाल करना चन्द्रन। को सफेद चन्दन से सफेद करना है' वहां प्रथम वाक्यार्थ पर द्वितीय वाक्यार्थ का आरोप उसी प्रकार है जिस प्रकार 'मुख चन्द्र है'-यहाँ प्रथम पदार्थ पर दवितीय पदार्थ का। रूपक से निदशना का विषयभेद बतलाते हुए उन्होने दिसा है कि 'जहों आरोप भौत=शब्दतः कथित नहीं हो और अर्थ संबन्ध न बनता हो वहाँ निदर्शना होती है और जहाँ ऐसा न हो वहाँ रूपक होता है। अलंकाररलाकर के इस प्रति- पादन का पण्डितराज ने अनुकरण किया है। और अलंकाररत्नाकर की हो पदावली का प्रयोग करते हुए उन्होंने इस उदाहरण में रूपक ही माना है। निदर्शना मानने के लिए इस पद्य में उन्होंने इस प्रकार परिवर्तन आवश्यक बतलाया है- 'त्वत्मादनसरत्नानि यो रक्षयति वावकैः। इन्हुं चन्दनलेपेन पाणडरीकुरते हि सः॥' -जो तुम्हारे पैर के नखों को अलते से रंगता है वह चन्द्रमा को चन्दन के लेप द्वारा सफेद करता है। यहां 'यव इदन् इस प्रकार उद्देश्यविधेय वाक्यार्थों को अभिन्न वतलाने वाले सर्वनामपदों का प्रयोग नहीं है। पण्टितराज ने रूपक और निदर्शना में अन्तर अमेद के उद्देश्य- विधेभाव पर निर्भर नाना है। रूपक में वह उद्देश्यविधेयभाव से युक रहता है और निदशंना नें नहीं। दोनों के उदाहरणों से यह तथ्य स्पष्ट भी है। अष्पयदीच्षित = अप्पयदीक्षित की चित्रमीमांसा में निदशना नहीं है किन्तु इसका निरूपण उन्होंने सुवलयानन्द नें बड़ी ही सफाई से इस प्रकार किवा है- 'वाक्यार्थया: सदृशवोरैक्वारोपो निदर्शना। या दातु: सौन्यता सेयं पूर्णेन्दोरकलंकता॥ -दो सदशवाक्थार्थी में ऐक्य का आरोप निवर्शना होती है। यया 'दाता की जो सौन्यता है वह पूर्णेन्दु की अकलंकता है 'जो''वह'-इन दो सर्वनामो से यहाँ दो वाक्यार्थों में ऐक्य वतला जा रहा है। रत्नाकरकार के अनुसार यह रूपक है, अतः दीक्षितजो ने उदाहरण के रूप में सर्वत्वकारद्वारा उद्भृत 'अरण्यरदितं कृतम्' पद्म भी प्रस्तुत किया है]। पदार्थनिदर्शना के सर्वस्वकारद्वारा प्रतिपादित दोनों भेद भी उन्होंने दतलाए हैं। उपमान धर्म के उपमेय में सबन्ध के लिए 'त्वन्नेन्नबुगलं धत्ते लीलां नीलाम्ुजन्मनीः'= तुन्हारे नेव्र नील- कमल की शोमा धारग कर से है-यह उदाहरण और 'उपमेवधर्म' के उपमान में संबन्ध के लिए सर्वस्वकार द्वारा प्रदत्त 'वियोग गौड०' पद ही प्रस्तुत किया है। इस द्वितीय उदाहरण में उन्होंने पदार्वनिदर्शना हो मानी है, सर्वत्वकार के अनुसार वाक्यार्थ निदशना नहीं, और वाक्यार्थ निदर्शना से पदार्थ निदशना का भेद यह कहते हुए किया है कि जहाँ उपमानोपमेव में से एक के धर्मे का दूतरे में भारोप हो वहाँ पदार्थनिदर्शना तथा जहां दोनों के धर्मों में से एक धमं का दूसरे पर मारोप हो वहाँ वाक्यार्थनिदरशना माननी चाहिए। तीसरी 'संभवदवस्तुसम्बन्धा' नाम से सर्वलकार द्वारा प्रतिपादित निदर्शना को कुत्रळया- नन्दकार ने 'बोधननिदर्शना' नाम दिया है। 'अपरां बोधनं प्राद्युः क्रियया सदसदर्थयोः।'
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२८२ अलङ्कारसर्वस्वम् करिया के द्वारा अच्छे या तुरे अर्थ का बोधन तीमरी निदशंना। उदाहरण के रूप में अन्य उदाइरणों के अतिरिक्त 'चूहामणिपदे०' पद भी दिया है। इमके स्पष्टीकरण में उन्होंने दिसा है- 'वोधयन् गृद्मेघिन' इत्यादौ हि 'कारोषोडग्निरच्यापयती' तिवन समर्थाचरणे शिच. प्रयोग:। ततश् यशा कारीषोपग्नि श्ञीनापनयनेन दटून् अध्ययनसमथोन् करोति एव वर्ण्यमान. भर्वत. स्वय- सुपमानभावेन गृहमेधिन उक्तवोधनसमर्थान् कतूँ क्षमते।' --- 'योधयन्= वनलाना हुआ इत्यादि स्थलों में 'णियू' = प्रयोजक प्रत्यय का प्रयोग ठौक उमी प्रकार समर्थाचरण अर्थ में है जिस प्रकार 'कण्डों की आग पढवा रह्ी है' इत्यादि प्रयोगों में। जैसे कटे की आग ठड दूर कर बदओं को अध्ययनसमर्थ बनाती है दैसे ही पर्वत स्वय उपमान बनकर गृदस्यों को आतिथ्य के उक्त बोध में समर्थ करने में सक्षम है। चन्द्रिकाकार ने समर्थाचरण का अर्थ 'समर्थ करना' किया है जैसा कि पीछे बनलाया जा चुका है। अप्पय्यदीक्षिन ने 'समवद्वस्तु्मबन्ध' और 'अप्तमवद्वस्तुसबन्ध' नामों से निर्दशना का वर्गी- करण नहीं किया। केवल अन्त में अन्थों के नाम से इनका निर्देद्यमान कर दिया है। पण्डितराज जगचाथ- सामान्य= 'विम्वप्रतिविम्यमावानापन्नयोरपात्तयोररथेयोरार्थाभेद औपम्यपर्येवसायी निदशेना।' विशिष्ट (१) व्यवहरद्यवद्धम्यभेदपतिपादनाक्षिसी व्यवहारद्वयाभेदो वाक्यार्थनिदशना।
(३) उपमानोपमेयधर्मयोरभेदाध्यवसायमूठ उपमेय उपमानधर्मसम्वन्ध पदार्थनिदर्शना।
-'विग्यप्रतिषिम्ब्रमाव से रहित और शब्दत' कथित अर्थों का सादृश्य में पर्यवक्षित होने वाला ममेद निदरशना कशलाता है।1 अभनापि- -'दो व्यवदारों से युक्त दो व्यवदारियों का अभेद बतलाने से व्यवदारों का जो अभेद फलिन होता है वह वाक्यार्थनिदर्शना कदलाता है' और- -- 'उपमान तथा उपमेय के धर्मों के अभेदाध्यवसाय के धार पर उपमेय में उपमान के धर्म का सम्बन्ध पदार्थ निदर्शना।' इससे ह्पष्ट है कि पण्टिनराज ने उपमान में उपमेय के धर्म का संबन्ध स्वीकार नहीं किया है फल्तः उनके मंत में 'वियोगे गौड०' पद् में मवंस्वकारद्वारा दर्शित यह प्रकार अमान्य है। पण्टितराज ने अलकारसवस्वकार के निदशनालकण को अपयास उदराते हुए कहा है कि वह रूपक तथा अतिशयोक्ति में भी लागू हो जाता है। 'मुख चन्द्र है' इत्यादि रूपक में औपम्य गम्यमान है ही और मुस को केवल 'चन्द्र' कडने से निष्पन्न अतिशरोकि में भो दोनों का उपमा- नोपमेयमाव गम्य रहता है। स्वयं पण्डितराज ने टपत्तन्व' तथा आयंत्तवर का निवेशकर अि. शयोकि तथा रूपक से इमे पृथक करने का प्रयत्न किया है। अतिशयांकि में विषय उपास नहीं रहना अदकि निदशंना में रहता है। पदार्थनिदशना में भी वे एका 'शोमा' आदि शब्द का उपमान तथा उपमेय दोनों की शोभा का वाचक मानने हैं क्योंकि 'शोमात्व' धर्म उन दोनों में एक हो रहता है। रूपक में दोनों ही अ्थ उपाच रहते हैं और अभेद मी रहता है किन्तु वह अमेद वाक्यारथं की प्राथमिक प्रवीति में ही मासित हो जाता हे जब कि निदशना में पहले दोनों वाक्यों अथवा पदों से अपने स्वनन्त्र अर्थ निकलते है, फिर असम्दद्धता हटाने के लिए उन में अभेद्द
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लाया जाता है अतः वह बाद में प्रतीत होता है। रूपक और अतिशयोकि से निदर्शना का दूसरा भेदक सभेदगत अन्य वैशिष्स्य भी ै। रूपक तथा अतिशयोकि में उपमान का अभेद उपमेय में प्रतीत होता है जब कि निदर्शना में किसी एक का किसी दूसरे में अर्थाव दोनों का परस्पर में अमेद। -"कि वास्या शरीर तादशपदार्थयोः परस्परामेदमानन् उमयत्र विश्रान्तम्, रूपकर्य तु उपमेयगत उपमाना मेद: अतिशयोक्तुकष । [ नि० सं० प्र० ४६०) विश्वेश्वर पण्डित ने निदर्शना का विवेचन अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट किया है- [का०] उपमापर्यवसन्नो यत्रार्थोडन्योन्यमन्वयानहः। यच्च करियया कारणकार्यान्वयधीनिदर्शना सोका ।।
पमेयभावं कत्पयित्वैवान्वयबोधपर्यवसानं सा निदर्शना। (२) यत्र व कार्यकारणयो: करियया हेतुहेतुमद्भावे प्रतिपादिते उत्तरवाक्यार्थेः पूर्ववाक्यार्थ प्रतिपादय सामान्यकार्यकारणमावे दृष्टानततया पर्यवस्तति सा द्वितीया निदर्शना। जहाँ परस्पर में अर्थ परस्पर में अन्वययोग्य न होने से उपमानोपमेय रूप ठहरते हैं वह, और जहाँ किया द्वारा कारण तथा उसके कार्य का सम्बन्ध ज्ञात हो वह निदरशना। प्रथम निदर्शना का स्पष्ट रूप होगा- -जहाँ विभिन्न पदार्थ या विभिन्न वाक्यार्थ अपने आप अपना बोध परस्पर में मिलित रूप से न करा रहे हो फलतः जहाँ उनका वैसा ज्ञान उनमें उपमानोपमेयभाव की कल्पना करने से बुन पाता हो वह एक प्रकार की निदर्शना होगी। -द्वितीय निदशना वद होगी जिसमें पूर्ववाक्यार्थ में किया द्वारा प्रतिपादित सामान्य कार्यकारणभाव के लिए उत्तरवाक्यार्थ[में प्रतिपादित कोई विशिष्ट कार्यकारणभाव ] दृष्टन्त दने। द्वितीय निदर्शना के उदाहरण के रूप में इन्होंने मम्मटभट्ट द्वारा प्रदत्त और- 'उन्नतं पदमवाप्य यो लघुहेलयैव स पतेदिति धुवम्। शैलशेखरगतो दृपत्कणइचारुमारृतपुतः पतत्यघ: ॥' -जो क्षुद्र हो और उन्नत पद पा जाए तो यह निश्चित है कि वह गिरता ही है। पर्वत की चोटी पर रखी मंकरी हवा के इलके झोके से भी नीचे आा पड़ती है। विश्वेश्वर ने इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है- 'अत्र लाघवे सत्युन्नतपदप्राश्तित्वं कारणतावच्छेदकम्। पतनं कायतावच्छेदकम्' इति कार्य- कारणभाव: पूर्वाधंप्रतिपायः। तन दृध्टानततयोत्तरारोपादानम्। तन 'लाघवे सत्युन्वपदपात्ति पातहेतु :- यथा दषत्कणस्येति वृष्टान्तपर्यवसानानिदर्शैनाल्वम्।' -इस पद्यार्थ में 'जो जो कषुद्र होते हुए उन्नत पद पाता है वह प्रत्येक गिरता है' इस प्रकार पूर्वाध्ध के द्वारा 'सुद्धता के साथ उन्नत पद की पाप्ति' कारण रूप से प्रस्तुत की गई है और 'पतन' कार्यरूप से। इस कार्यकारणभाव में उत्तरार्थ का वाक्यार्थ दृष्टान्तरूप से प्रस्तुत किया गया है। इसलिए पूर्णवावयार्थ-'क्षुद्रता के साथ उन्नत पद की प्राप्ति पतन का कारण होती है जैसे दूषरकण= कंकरी की' कुद्रता के साथ उन्नत पर की प्राप्ति] इस प्रकार दृष्टान्त में परिणत्र होता है अतः यहाँ निदशना है। मम्मट ने इस पद्य में 'धुवम्' के स्थान पर 'बुदन् पाठ माना था, जो पूर्व आचार्यो की परम्परा को रक्षा के लिए आवश्यक था। वामनाचार्य ने करिया के द्वारा कार्यकारणभाव के 'ख्यापन' को आवश्यक वतलाया था। सम्मट ने भी उस 'ख्यापन' के लिए अपने लक्षण में
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२८४ अलङ्गारसर्वस्वम् 'उक्ति' शब्द दिया है। इमो प्रकार प्राचान आचार्यों के 'अन्वय'रद्द को भी उन्होंने अपनाया है। 'बुवन्' पाठ होने पर पतन किया का कर्त्ता दपत्कग 'कुद्रता के साथ उननपदप्राति पननकारक होनी है' यह तथ्य कहता हुआ चित्रित होता है अत वहाँ ख्यापन की अमिसन्धि पूर्ण होती है। पण्डितराज यहाँ 'धवम्' पाठ है ऐमा भ्रमवश समझ बेठे हैं। 'बुचन्' पाठ होने पर जद दूषत्कण में पूर्वोक्त 'समर्याचरण' की कठिनाई उपम्थित दोतो। धारणामात्र पर हुए इम गंोर पाठमेद पर विश्वेश्वर पण्टित और रमगगाधर के नागेश, मजुनाथ तथा पुरुषोत्तमशचर्मा-इन टीकाकारों का भी ध्यान नहीं गया है। आश्चर्यं की बान यह है कुवलयानन्द में 'बुवन्' पाठ ही है और उसका अर्थ 'बोधयन्' मी किया गया है। पण्डितराज का उमपर भी ध्यान नहीं है। अथवा उन्होंने यह पाठ अपनी ओर से स्वय गढ लिया होगा। निरशंना का सर्थान्तरन्यास से भेद समथ्यंसमर्थक वाक्याथों के धर्मे में रहने वाले अमेर और भेद को लेकर होता है। निदशन में अभेद रहना है और अर्थान्तरन्याम में भेद। इसी तथ्य को विश्वेश्वर ने इम प्रकार स्पष्ट किया है-'समर्यनीयवाक्या थंप्रतिपाद्यकार्यंकारणभावान्तगंन का यंनावच्छेदक कारणतवच्छेदक्मयो
स्वर्यान्तरन्यासः।' निद्शना का दृष्टन्त से भेद है इनके वाक्याथीं में स्वसिद्धि के लिए अन्योन्यनिरपेक्षता तथा सापेक्षना को लेकर। दृषान्न में पूर्ववाक्यार्य उत्तर वाक्यार्थ के बिना मी सिद्ध रहता है जबकि निदशंना में पूर्ववाकयारयं अपनी सिद्धि के लिए उत्तर वाक्यार्थ की अपेक्षा रखना है। विश्वेश्वर पण्डित ने इमे भी इस प्रकार स्पष्ट किया है 'पूववाक्यार्थंप्रतिपाधकार्यंकारणभावे उत्तरवाक्यार्यप्रनिपाद्यकार्यकारणभावस्य यत्र ग्राहकत्व्र तत्र निदर्शना। 'तयि दृष्ट' इत्यादी [दष्टान्यस्थले] तु उत्तराधीय कार्यकारणमात्रो न पूर्वाषोयकार्यकारणमावस्य आहृत्य ग्ाहक.।' [निदशंना प्रकरण ]। इमी प्रकार- (२) यत्र पूर्वकार्यकारणभावे साहादेवोत्तरकार्यका रणमावोपु कू कस्तन निदर्शना, यत्र तु पूर्व- कार्यकारणमावग्र।इक एवोत्तर कार्यंकारणमावोडनुकूलस्तत्र दृष्टान्. ।'[निदर्शनाप्करण ]। सजीविनीकार विद्याचकवतों ने इस अठकार पर हुए अलंकारससंस्वकार के विवेचन को इस प्कार श्लोकवदध किया है- 'सभव्रन् वस्तुसम्वन्धोष्मम्भवन् वाऽवबोषयेद्। प्रतिदिम्ब यदि तदा निर्शतव्या निद्शना।। विम्यानुविम्वार्थनया वाक्ययो प्रकृतान्ययो। स्यान्नैरपेक्ष्ये दृष्टान्तः सापेक्षत्वे निदशना।।' -सभव अथवा अममव वस्तुसम्बन्ध यदि प्रतिविम्ध का बोधन कराए तो निदशना होना है। -पकृत और अप्रकृत वाक्य में विग्प्रतिशिम्वना हो सौर दोनों निरपेक्ष हो तो दृषान्न, किन्तु यदि सापेक्ष हो तो निदशंना। दस्तुन: निदशंना और दृष्टान्त दोनों का भेदक तत्त्व साधारण धर्म का विम्वप्रतिबिम्वमाव है। दृष्टान्न में चमत्कार का अस्नित्व उसी पर निर्भर रहता है जब कि निदशना में अक्षम्बद्ध वाक्यार्थी के आर्य उपमानोपमेयभाव में। अर्थ यह कि निदर्शना में चमतकृनि फगधिन ह और दृषन्त में कलायिन। लठिवालप्वर- अप्य्यदीक्षित ने कुवलयानन्द में ललिताउकार नामक एक नवोन सलंकार की उद्भावना की है। इसका लक्षम उन्होंने इस प्रकर दिया है-'वण्ये स्याद वण्यषृचान्तप्रतिविम्वस्य वर्गनम्
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ठलितम्।'-अर्थात वर्णनीय=प्रस्तुत पदार्थ के वृत्तान्त=धर्म का वर्णन न कर उस वृत्तान्त के प्रतिविन्बभूत किसी वत्तान्त का वर्णन करना ललिति कहलाता है। अलंकारकौस्तुम में यही लक्षण इस प्रकार उद्धृत है-'प्रस्तुते वर्ण्यवृत्तान्ते प्रतिबिम्बम्य वर्णनन्।' अधिक उपयुक्त यही पाठ है। उदाहरण दिया है-'निगत नीरे सेतुमेपा चिकीपति'-'पानी निकल जाने पर यह बाँध दनाना चाह रही है।' यह किसी एक ऐसी सखी के प्रति किसी सखी की उकि है जिसका प्रि आकर लोट गया हो और उसके बाद वह उसे पाने का यत्न कर रही हो। इस उति में नायिका के व्यापार का नहीं अपितु उस जैसे गत-जल-सेतु-दन्वरूपी व्यापार का वर्णन हैं। यहॉँ अप्रस्तुतप्रशंसा नहीं है क्योंकि इसमें प्रस्तृत पदाथ=नायिका का ही वर्णन है। समासोकि भी नहीं क्योंकि उसमें प्रस्तुत व्यवहार हो कथित होता है। निदर्शना मी नहीं मानी जा सकती क्योकि उसमें प्स्तुत और अप्रस्तुत दोनों के धर्म शब्दतः कथित रहते हैं और उनमें पेक्च फलित होता है। इस प्रकार मन्मट का 'क सूर्यपमवो०' यह निदरशना का व्दाहरण ललित का उदाहरण सिद्ध होता है, कर्योंकि इसमें 'मैं तुच्छ मति से सूर्यवंश का वर्णन करना चाहता हूँ। इस प्रस्तुतवृत्तान्त का उल्लेख नहीं है। उल्लेख केवल उस जैसे 'होंगे से समुद्र को पार कराने' का है। अप्पयदीक्षित के अनुकरण पर पण्डितराज जगनाथ ने भी ललितालंकार का लक्षण इस प्रकार किया है- 'प्रकृतधर्मिणि उलितालंकार: 1 -- प्रकृत धर्मों में प्रकृत व्यवदार का उत्लेख न कर उसमें अप्रकृत व्यवहार के संबन्ध का निरूपण ललित अलंकार'। यह सत्य है कि ललित के स्थलों में निदशना के स्थलों के समान प्रकृत न्यवहार का उल्लेख नहीं रहता तथापि उपमा में जैसे लप्तोपमा वर्ग के अन्तर्गत किसी किसी धर्म का अभाव रद्दता है तब भी उसे उपमा से भिन्न नहीं कहा जाता क्योंकि वहाँ सब भेदों में चमत्कार का एक ही कारण रदता है साश्य, दैसे ही प्रकृत धर्म के रहने और न रहने दोनों स्थलों में चमत्कार यदि जसंबद्ध अर्थों के सादृश्य मर्यवसान में है तो अलंकार भी एक ही मानना होगा निदशना या ललित । निदर्शना पूर्वाचार्यों को मान्य है अतः रचित का ही उसमें चन्तर्भाव करना उचित है। इसी अभिप्राय से विश्वेश्वर पण्डित ने ललित का निदशनापकरण में खण्डन किया है। स्वयं पण्ितराज ने भी ललित के प्रकरण में ललित को न मानने बालों की मोर से भी वर्क प्रस्तुत कर उसका निदर्शना में अन्तर्भाव दिखलाया है। [ सर्वस्व ] [सू० २९] भेदप्राधान्ये उपमानादुपमेयस्याधिक्ये विपर्यये या व्यतिरेक: । अधुना भेदमाधान्येनालंकारकथनम्। भेदो वैलक्षण्यम् । स च द्विवा भवति, उपमानादुपमेयस्याधिकसुणत्वे विपयये वा भावाद्। विपर्ययो न्यूनगुणत्वम्। [ सूत्र २९] [सादृश्य में] प्रधानता भेद की हो और यदि उपमान की अपेक्षा उपमेय में [गुणों की ] अधिकता अथवा न्यूनता प्रतिपादित हो तो [अलंकार] व्यतिरेक [कहलाता है ]।
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[वृ०] अब भेर की प्रधानना वाले अनंकारों का निर्वचन हो रहा है। भेद का अर्थ है विलक्षणता= मिन्नना। और यह दो प्रकार का होता है उपमान की अपेक्षा उपनेय में गुणों को अधिकता होने में सथवा इमके विपरीन। विपरौनना यानी गुणों की कभी। विमर्शिनी भेदप्राधान्य इत्यादि। अवुनेति प्राप्तावसरम्। भेदस्य चात्र प्राधान्यादभेदश्य वस्तुनः सद्दावः। सादृश्य पुत्र पर्यवसानात। अत एव साहश्यव्यतिरेकेग संभनअपि भेदो नाश्य विषय:। यथा- 'दिव्योत्तरीयमृति कौह्तुभरलभाजि देवे परे द्धतु लु्चधियोनुबन्धम्। रूपं दिगम्यरमसण्ठनमुण्डचूट भावरकमेव तु वतेश मम स्वृदायें।।' अत्र वैष्णवेम्य: स्वात्मनि वि्णोर्वा परमेश्वरे भेदमात विववित न तुकेनपि कय चिदौपम्यम्। स इति भेदा। तस्याधिक्यनिपर्ययाम्यां वैविध्याद्वयतिरेकोउपि द्विविय:। तदाश्रयरवादस्य। भेदप्राधान्य इत्यादि। अधुना = अब अर्यात् अभेदप्रवान सलकारों का निरूपण हो जाने पर भेदप्रधान अरकारों का अमर आने पर । भेर की प्रधानता का अर्थ यह कि यहाँ[अम्रधान रूप से] मनेद भी रहता ही है क्योंकि इस अळकार का पर्यवसान साहस्य में हो जाना है। इमोलिए जहाँ भेद साइश्यमूल्क नहीं होता वहाँ यह अलकार नहीं माना जाता। जैसे इस पद्याथे में- 'हे मगवन् [ श्िव] जिन्हें कुछ चाहिए वे उस देवता के पीछे पडे जो दिव्य उत्तरीय [पीताम्वर ] धारण किए हुए है और कौस्तुममणि से अ्कृत है, क्योंकि वह भी उत्कृष्ट है। मुझे तो केवळ आप के दी इस दिगम्वर [विवस्र, नग्न] और सिर पर असण्डित नरकपाल से सुशोमिन रूप की स्पृदा है।' -यहाँ सिव मक्त में विष्णु भक्त से अथवा मगवान् शिव में विष्मु भगवान् से भेद मात्र दतलाया जाना अमोष्ट है। किमी का किमी से सादृश्य नहीं। स=वह= भेद। [सर्वस्व] क्रमेणोदाहरणम्- 'दिद्कवः पक्षमलताविलासमकणं सद्दस्नस्य मनोहरं ते। चापीपु नीलोत्पलिनी-विक्रासरम्यासु नन्दन्ति न पटूपदौघाः।।' 'क्षीणः क्षीणोऽपि शशी भूयो भूयो विवर्वते सत्यम्। विरम प्रसीद सुन्दरि यौधनमनिवर्ति यातं तु।।' अन्र विकस्वरनीलोरपलिन्यपेक्षया अक्षिसहत्त्स्य पक्षमलवया अ विकगुणत्वम्। चन्द्रापेक्षया च यौघनस्य न्यूनगुणत्वम् । शशिवैलक्ष• व्येन तस्यापुनरागमात्। कम से एक एक का उदाहरण-[उपमान से उपमेद में गुभाधित्य का ] मौरे आप के सहस नेत्रों की पदमलता की छवि देखना चाहते हैं, अनः वे नीले कमलों के विकास से रम्य बावडियों में नहीं रमते।'[ रपमान से उपमेय में न्यूनगुगग का-]
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'चन्द्रमा, सचमुच, घट घट कर फिर भी बढ़ जाता है, परन्तु सुन्दरि, मान जा, अधिक न रूठ, यह यौवन है, वीत गया तो फिर नहीं लौटने का।' -इन [दोनों उदाहरणों में से प्रथम] में खिले नील कमल की अपेक्षा नेत्रों में 'पक्ष्मलता' रूपो गुण को लेकर अधिकता है। द्वितीय में) चन्द्र की अपेक्षा यौवन में न्यूनगुणता है केयोंकि उसमें पुनः न लौटना बतलाया गया है, जो चन्द्रमा में नहीं रहता। चिमर्शिनी चन्द्रापेक्षयेति। रशियौवनयोर्हि समानेऽपि गत्वरत्वे शशिनः पुनरगमनमपि संभवति न सु यौव नस्येति ततोडस्य न्यूनगुणवरम्। नन्वत्र विपर्ययमेवेति सुतितं भेदान्तरमयुक्तम्। उपमानादुपमेयस्य न्यूनगुणवे वास्तवत्वात, तत्वे चालंकारत्वानुपपत्तेः । यौवनस्य चात्रास्थिर्े पतिपा्ये चन्द्रापेक्षया धिकगुणत्रमेव वितक्षितम्। यदेतच्न्द्रवद्यातं सन्न पुनरायातीति। असदेत्तव। यतोऽत चन्द्रवद् गतं सद् यौवनं यदि पुनरण्यागच्छेत त् प्नियं प्रति चिरमीर्प्यानुचन्धो युज्येत। कालान्तरेऽपि ह्यस्य तदवलोकनादिना सफलीकार: स्याद। इदं पुनर्हृतयौवनं यातं सत्पु- नर्नागच्छतीतीर्प्या्यन्तरायपरिहारेण निरन्तरतयेव प्रियेण सह सफळयितव्यमिति धिगी- प्याम, त्यज प्रियं प्रति मध्युम, कुरु प्रसादमित्यस्मिन् प्रियवयस्योपदेशे प्रियं प्रति कोपोपशमाय चन्द्रापेपया योवनस्यापुनरागमन न्यूनगुणत्वेनेव विवषितमिति वाकयार्थ विद एव ग्रमाणम्। न चेतदू वास्तवसुपसेयस्य न्यूनगुणरम्। सत्यैव सातिशयरवेन प्रतिपाधर्वात्। प्रकृतार्थोपरञ्ञकत्वे हि सवंथा कवे: संरम्भ:। तकाधिकगुणमुखेन भवतु, इतरथा वा को विशेष:। तरमादयुक्तमेव विपर्यये वेति सूत्नितम्। प्रत्युत् प्रतिकूलतवं ेति सून्रितमयुक्तम्। उपमानादुपमेयस्याधिक्ये इत्येतावतैव लक्षणेनास्थ व्यापस्वाद्। यतः 'स्वरेण तस्या अमृतस्तुतेव' इत्यादावन्यपुष्टालापस्य प्रतिकलत्वो के: कर्णकट्ुकत्बादिना न्यूनत्वानगतेरपमेयभूताया भगवत्या: संबन्धिन: स्वरस्यामृतस्ततेवेत्यभिधानादानन्दा तिशयदायित्वादेश्वाधिक्यमेवावगन्यत हृरयलं बहुना। अस्यापि सादृश्याश्रयत्वातसामा- न्यस्य नयी गतिः। तत्रानुगामिता सधा- नागेन्द्रहस्ताक्त्वचि कर्कशत्वादेकान्तशेत्यात्कद्दली विशेपाः। लव्ध्वापि लोकें परिणाहि रूपं जातारतदूर्चोरुपमानबाहया:॥ अन्र परिणाहिरूपत्वस्यानुगामित्वम्। वस्तुपतिवस्तुभावे पुनर्मन्थकतैवोदाहतम्- दिदृक्षन इत्यादि। अन्र मनोहरत्वरम्यत्वयोः शुद्सामान्यरूपत्वम्। पचमलताविलासचिक स्वरयोश्च निश्चप्रतिविम्वभावः। चन्द्रापेक्षया=चन्द्रमा की अपेक्षा। अर्थ यह कि क्षीण होना या जाना चन्द्रमा और चौवन दोनों का ही स्वमाव है, किन्तु चन्द्रमा का पुनः पुष्ट होना या लौट माना भी संमव रहता है, यौवन में नहीं। इसलिए यौवन में चन्द्रमा की अपेक्षा गुण की कमी है। [सलंकार रत्नाकरकार ने उपमान की अपेक्षा उपमेय के न्यूनगुणत्व के आधार पर व्यतिरेक मानना असंमव बतलाते हुए कहा है- 'उपमानत्यान्यस्मादाधिकर्यं हि स्वमावतः सिद्धम्। तर्वे तेन न युक्तो न्यतिरेक श्वारुताविरहात।।' -अर्थात् 'उपमान उपमेय की अपेक्षा अपने आप अधिक गुणशाली होता है अतः उसकी अपेक्षा उपमेय में न्यूनगुणता दिखलाने में कोई चमत्कार नहीं रहता। फलतः वहाँ व्यतिरेक तो हो सकता है, परन्तु व्यतिरेकनामक अलंकार नहीं हो सकता। नहाँ मधिक से अधिक उपमा-
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हकार ही माना जा सकता है।' इसीलिए अलकारसवस्वकार के 'विषर्यय' को छोड अलकार रत्नाकरकार ने उसके स्थान पर 'प्रतिकूलता' को सूत्र में स्थान दिया है-'उपमेयादन्यस्य न्यूनत्व प्रतिकूलत्व वा व्यतिरेक। 'क्षीण: क्षीणोऽपि०' पद्य में उन्होंने उपमान मे उपमेय की अधिकगुणता ही मानी हे न्यूनगुणता नहीं। उनका कहना है कि इस पद्य में न्यूनाधिकभाव की विवशा चन्द्र और योवन में नहीं अपितु उनकी अस्थिरता में है। उपमेय = यीवन की अस्थिरता उपमान चन्द्र की अस्थिरता से बडी है अत यहाँ उपमेय ही अधिकगुणशाली है। फलनः यह पद्य प्रथम व्यनिरेक का ही उदाहरण है। इम प्रकार रत्नाकरकार ने सर्वस्वकार के 'विपर्यय्य'- पक्ष को अमान्य ठदराया है। विमर्सिनीकार इसका खण्डन और सवस्वकार के मत का समर्थन करते हुए कहने हैं] राका='विपयय' कदकर सूत्र में जो द्वितीय [उपमान से उपमेय की न्यून गुगता का ] भेद प्रस्तुत किया गया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि उपमान की अपेक्षा उपमेय में न्यूनगुगना [ स्वभाव सिद्ध अर्थोव ] वास्तविक ही होती है [कविकक्पित नही] अन उपमेय के न्यूनगुथ होने से कोई मल्कार सिद्ध नहीं हो सकता। [क्षीग क्षीणोड्पि पद्य में तो] 'यह यीवन चन्द्र के समान चला तो जाता है परन्तु जैमे चन्द्र पुन लौट आता है वैसे लौटता नही।' उपमेय = योवन में ही उपमान = चन्द्र की अपेक्षा अधिकगुणत्व है क्योंकि इस पद् में प्रनिपाथ है योवनगन अस्थिरता ही। समाधान यद कथन अमान्य है। क्योंकि यह [प्रिय मे रूठी नायिका के प्रति उमकी] मरियससी का सपदेश है। इसका उद्देश्य है रूठी सखो के रोप की शान्ति। वह तमी समव है बद चन्द्र की अपेक्षा योवन में 'पुनः न छौटना' कमी के रूप में ही प्रतिपाद्य माना जाय। सखी इमी कमी को इस प्रकार प्रतिपादित कर रही है-'चन्द्रमा जैसे जाकर पुनः लोट आाता है वैसे ही यदि यौवन भी लोटने वाला होना तो प्रिय के प्रति देर तक रूठे रहना टीक होना, भ्योंकि तब प्रिय को और कभी भी देख लिया बाता और इस योवन को सफल बना लिया बाता। किन्तु यह इत [ मुआ] योवन, ऐसा है कि एक बार निकल जाने पर लौटता ही नहीं, इमलिए प्रिय से एक मी क्षम भलग न होना चाहिए और इसे सफल बना लेना चाहिए, ई्ष्या आदि सव इसमें विझ्न है, इन्हें ताक में रस देना चाहिए। अत मार इस ईर्ष्या को छोड इस पनियके प्रति अपनाए कोप को और अपना अपने प्रिय को खुशी से।' इमारा यह कथन कहाँ तक सगत है इसे वाक्यार्थवेता ही वतला सकते हैं। इसके अतिरिक्त अस्थिरता को लेकर यह जो पमेयभूत यीवन में कमी बतलायी गई है वह वास्तविक = लौकिक कमी जैसी मी नहीं है, क्योंकि उसमें अतिशय प्रतिपाद है। कवि जो है वह सदा ही प्रकृत पदार्थ को शोमाशाली वनाने में प्रयत्नशञोल रहता है। वह चाहे किसी प्रकार हो, गुशाविकर्य के प्रतिपादन से या गुणगतन्यूनता के प्रतिपादन से। उसमें कोई अन्तर नहीं पढता। इसलिए ग्रन्थकार ने सूत्र में जो 'विपरयये वा' कहकर उपमान से उपमेय की गुणन्यूनना का जो पक्ष प्रस्तुन किया है वह ठीक ही है। बल्कि [ अलकाररल्ञाकरकार ने ही] सूत्र में 'प्रतिकूलत्व वा' इस प्रकार प्रतिकूल्ता को स्थान दिया है वहो अमान्य है। क्योंकि प्रतिकूलता की बात नो सूत्र के 'उपमानादुपमेयस्याधिक्ये'='उपमान से उपमेय की अधिकना' इनने ही अंश से गनार्थ दो जानी हैऔर इतना हो लक्षण अलंकाररलाकरद्वारा प्रदस प्रतिकूलत्व के उदाहरण में भी लागू दो जाता है, क्योंकि प्रतिकूलता के लिए अनंकाररलाकरकार ने जो- 'स्वरेण तस्थाममृतसुनेव प्रज्नस्पितायाममिज्ञातवाचि। अप्यन्यपुष्टा प्रतिकूलशन्दा श्रोतुवितन्त्रीरिव ताटयमाना । कुमार सण
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व्यतिरेकालक्कार: २८९
-'भगवती पार्वती की वाणा अत्यन्त अभिजात थी और सवर अमृत-सा बरसाता था। वे जब कभी बोलती थों तो कोयल की कृक ओ्रोता को बीणा के विरुद्ध तार की झनकार प्रतीत होती थी।' [ कु. १४५] -वह उदाहरण दिया है [ और कहा है कि 'यहाँ केवल यह प्रतीति होती है कि कोयल का स्वर पार्वती जी के स्वर के प्रतिकूल है। फलतः यहाँ उपमेय उपमान के केवल विरुद्ध है, उससे न्यूनगुण नहीं', किन्तु) इसमें कोचल की वोली को प्रतिकल कहने से उसमें कर्णकदत्व की प्रतीति होती है और इस प्रकार उसमें उपमेय पार्वतीस्वर की अपेक्षा न्यूनगुणता की प्रतीति होती है, इसी प्रकार उपमेयभूत जो भगवती पार्वती जी है उनके स्वर को अमृतस्त्रावी-सा कहने से उसमें अत्यन्त आनन्ददायित्व आदि अधिक गुणों की प्रतीति होती है। फलनः यहाँ भी उममेय में उपमान को अपेक्षा गुणाधिन्य ही प्रतीत होता है। इस विषय में और अधिक क्या कहें इतना ही पर्याप्त है। यह [ व्यतिरेक] मी सादृश्य पर आश्रित अलंकार है। अतः इसमें भी धर्म=साधारणधमं तीन प्रकार का रद्षता है। तीनों में से अनुगामी साधारणधर्म का उदाहरण होगा-[अलंकाररत्ना- करकार द्वारा उद्धृत कुमारसभव का 'नागेन्द्रहस्ता' इत्यादि पद् का यह अर्थ-] -- 'हाथी की सूँड़ की चमड़ी कठोर होती है और कदलीस्तम्भ एकदम शीतल होते हैं। इस कारण ये दोनों संसार में पर्यास प्रसिद्ध और सुन्दर आकार पाकर भी पार्वती के अरुदय के उपमान नहीं हो सके।' [कु० २३६] -- यहाँ 'आकार की सुनदरता या प्रसिद्धि' [उमान तथा उपमेय दोनों में समानरूप से अन्दित होने वाला धर्म है अतः] अनुगामो धर्म है। वस्तुपतिवस्तुभाव से युक साधारण धर्म का उदाहरण स्नयं अन्यकार का ही 'दिद्क्षवः' यह उदाहरण है। यहाँ मनोहरत्व और रम्यत्व शुद्ध सामान्यरूप है अर्थात वस्तुतः ये दोनां एक हैं, केवल शब्दों में भेद है। इसी पद्य में जो भक्ष्मलता विलास और निकस्वरता = विकास है इनमें विम्वन्नतिविम्त्रभाव [मिन्न होने पर मी सादृश्य] मूलक अभेद है। चिमर्श-ध्यतिरेक का पूर्व इतिहास- भामह-उपमानवतोडर्थस्य यद् विशेपनिदर्शनम्। व्यतिरेकं तमिच्छन्ति विशेषापादनाद् यथा ॥ २७५ ॥ सितासिते पक्ष्मवती नेत्रे ते तान्नराजिनी। एकान्तशुभरयामे तु पुण्टरीकासितोतमळे ॥ २७६ ॥ -उपमान के साथ उपमेय का उल्केख हो और इसमें पमान की अपेक्षा वैशिष्य दिखलाया जाए उसे व्यतिरेक कहते है कयोंकि इसमें वैशिष्च का संपादन किया जाता है। यथा- -तुम्हारे नेन उवेत भी है और दयाम भी, इनमे पक्ष्म भी है और ताम्रवर्ण की रेखाऍ भी [ इस प्रकार ये रवेत, व्याम और रक्त इन तीनों रंगों से शबलित हैं जबकि ] पुण्डरीक [ सफेद कमल] केवल श्वेत ही होता है और नीलोत्पळ केवल नील। स्पष्ट ही यहां उपमानभूत शचेत कमल और नीलोत्पल की अपेक्षा, उपमेयभृत नेत्र में अधिक रंगों और उनसे जनित अधिक वैचित्य का प्रतिपादन है। इस प्रकार भामह केवल एक ही प्रकार का व्यतिरेक मानते हैं जिसमें उपमान से उपमेय का माधिक्य रहता है। वामन= [सृ०] उपमेयस्य गुणातिरेकित्वं व्यतिरेकः । ४३।२२। [वृ०] उपमेयस्य गुणातिरेकित्वं गुणाधिक्यं यद्, अर्थाद उपमानाद स व्यतिरेकः।
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-'उपनेय' के गुणों का सतिरेक व्यतिरेक। उपमेय के गुणों का जो अतिरेक अर्थात् आधिकय सर्थाद् उपमान की अपेक्षा वही व्यतिरेक।' [ स्पष्ट ही मामह ने व्यतिरेक शब्द के 'वि' उपसर्ग पर ध्यान दिया था और उसकी सार्थकना बनलाई थी जब कि वामन उसके 'अतिरेक'-नब्द पर ध्यान दे रहे हैं।] उदाहरण .- 'सत्य हरिणशावाश्या प्रसन्नमुभग मुसम्। समान शुशिन किन्तु स कलहविदम्यित ।1 -यह सच है कि मृगलौने की आँखों-सी आँसो वाली इस सुन्दरी का मुस प्रसन्न भी है और सुन्दर भी इसलिए यह चन्द्रमा के समान है किन्तु चन्द्रमा कलक से दूषित है।' वामन ने व्यतिरेक में उत्कर्षापकर्पहेतु गुणों को प्रतीयमान मी माना है। 'तुम्हारी चतुर और ललित चिनवन ने नीलोत्पल का कोह स्थान नहीं रहने दिया' = 'चतुरललितैस्नवार्ध- विलोकिन कुवलयवन प्रत्यास्यानम्'-यहा उपमेयभूत चिनवन में तो उत्कर्पहेतु गुण चनुरता ललितना है, किन्तु उपमान में उनका अस्तित्व शब्दत कथित नहीं है अत वहाँ वे गम्य या प्रनीयमान है। वामन ने उपमेय के न्यूनगुणत्व का व्यतिरेकजनक नहीं बनलाया है। उद्धट ने भी केवल उपमान से उपमेय के गुणाबिक्य में ही व्यतिरेक माना न्यूनगुगना में नहीं। किन्तु उन्ोंने व्यतिरेक में वामन के गम्यमान गुण नामक अमिनव भेद को भो अपनाया है और पमानोपमेयमाव के गम्यत्व तथा वाच्यत्व के आवार पर व्यतिरेक के दो वर्ग दना उनमें रिलष्ट तथा शुद्ध शब्दों पर आश्रिन [उत्कर्षापकर्ष के ] निमित्तों के उपादान तथा अनुपादान के अनुच्छेदों द्वारा कुल मिलाकर आठ भेद प्रतिपादित किए है। यथा गम्य उपमानोपमेय- मात्र में :- (१) अनुपास्निमित्तक शुद्ध शब्दमूलक व्यतिरेक- तप से कृश पार्वती ने राहु मे निपीन पमा वाले चन्द्र को जीत रखा था। यहों उपमेय पावंती है, उपमान चन्द्र है, साधारण धर्म है 'सुन्दर होने पर भी कारणवश आया फीकापन' जो शब्दत. कथित नहां है और न अपमावाचक 'हव' आादि ही यहा उपलब्ध है। 'जीत'-शब्द मे उपमानभून चन्द्र की अपेक्षा उपमेयभून पावंती में उत्कर्ष प्रतिपादिन हुआ । इस उत्कर्ष का कारण है पावती जी का अधिक कृश होना और इसका कारण है तप में राड्ड की अपेक्षा अधिक तोक्ष्णना। ये दोनों दी कारण यहां शब्दत कयिन नहीं है। इस प्रकार यहाँ उपमेय के वैशिष्टय के निमित अनुपाच होने से यह व्यतिरेक अनुपात्निमित्तक हुआ। दलेष भी किमी भी शब्द में नहीं है अन यह व्यतिरेक शुद्धसब्दमूलक हुआ। (२) उपाचनिमित्तक शुद्धसय्द मूलक व्यतिरेक 'पावती का मुसमण्डल रात्रिदिव कान्तिमान रदता था अन वद रात में श्रीविद्दीन हो जाने वाले पद्म को नीचा दिखला रहा था और दिन में दैसे ही हो जाने वाले चन्द्र को भी ।' -यहां उपमान हैं चन्द्र और पद्म, उपनेय है पावतीमुख। साधारण धर्म है कान्निमत्त्व, वह कथिन नहीं है और 'व' आदि उपमावाच्का का भौ यहा उपादान नहीं है। 'मुख ने चन्द्र और पद्म को नीचा दिखलाया' इस कथ्न से सुख का उत्कर्ष और चन्द्र तथा पम का अपकर्प व्यक्त हुआ। उत्कर्ष तथा अपकर्षे के निमित भी यहाँ उपाच है। वे हैं मुख में राव्रिंदिव 'कान्तिमान् रहना' और चन्द्र तथा पद्म का 'केवल रात्रि या केवल दिन में।' शब्द समी श्टेपरहित हैं। इमलिए यह उपात्त निमित्तक, शुद्धशब्दमूलक व्यतिरेक हुआ।
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इन दोनों ही उदाहरणों में उपमा के बाचक 'इव' आदि शब्दों का अमाव है अतः ये दोनों भेद गन्यौपन्य वर्ग के हुए। यदि इन्दी में रवादि का प्रयोग कर दिया जाय तो ये ही वाच्यौपन्य वर्ग में आ सकते हैं। वद्यपि उस्ट ने उनके उदाहरण पृथक् दिए हैं। इस प्रकार चार भेद शुद्ध- शब्दनूलक गन्य-औपम्य वर्ग के हुए। इन्हीं में यदि दलेप का उपयोग कर दिया जाए तो ये ही चार इलेपनूलक हो सकते हैं। इलेपमूलक न्यतिरेक आने मम्मट ने भी माना है, किन्तु वद्ट के समान नहीं। उड्गट ने व्यतिरेक में एक ही क्यर्थक शब्द का उपमान तथा उपमेय दोनों के साथ दो वार पृथक- पृथकू प्रयोग करना आवश्यक माना है। उदाहरण दिया है संस्कृत के 'तपस्' शब्द को लेकर। तपस् का एक तो तपश्चर्या अर्थ प्रसिद्ध है दूसरा अर्थ नाघमास भी है। माघ शिशिर ऋतु का महीना होता है। उद्भट ने अपने स्वनिर्मित कुमारसंभव में इस शब्द का प्रयोग करते हुए लिसा- 'या चैशिरी श्रीत्तपसा मासेनैकेन विश्वुता। तपसा तां सुदीर्घेण दूराद विदधतीमयः॥ -'शिशिर की जो श्री केवल एक महिने के तप से प्रसिद्ध थी वसे जगदम्बा पार्वती अपने सुदीर्य अनेक वर्षज्यापी तप से बहुत ही निम्न सिद्ध कर रही थीं।'-इस पद् में 'तपः'- शब्दर को योजना द्वारा व्यतिरेक साधा गया है अतः वह रिलष्टशब्दमूलक है। इन आठों मेदों का वृक्ष इस प्रकार बनाया जा सकता है। न्यतिरेम -
वाच्योपन्यक गम्योपच्चक २
रिलष्शब्दमूलक शुद्धशन्दमूलक-४
उपातनिमित्तक अनुपात्तनिमित्तक-८ यहां ध्यान देने की बात यह है कि वामन ने निमित्त के अनुपादान में मम्मट के समान तीन भेद न मानकर केवल एक भेद माना है। मन्मट ने (१) उपमानापकर्पनिमित्तानुपादान, (२) उप- मेयोत्कर्पनिमित्तानुपादान तथा (३) 'उभयातुपादान' इस प्रकार निमित्तानुपादान के वीन भेद किए हैं। निमित्त के ठपादान का अर्थ दोनों में एक ही है अर्यात वपमानापकर्प तथा उपमेयोत्कर्ष इन दोनों के दोनों निमित्तों का उपादान। सट्ट का मूलविवेचन इस प्रकार है- 'विशेषापादनं यत् स्वादुपमानोपमेययो:। निमित्तादृष्टिदृष्टिभ्यां व्यतिरेको द्विधा तु सः॥ यो वैधर्म्येण दृष्टान्तो चयेवादिसमन्वितः । व्यतिरेकोऽन सोडमोष्टो विशेषापादनान्वयाद। स्लिष्टोकियोग्यशब्दस्य पृथक पृथगुदाहतौ। विशेषापादनं यत् स्याद् व्यतिरेक: स च स्मृतः ॥२।७, ८।।
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रुनट-सवस्वकार के व्यतिरेक का आधार वस्तुतः रुद्ट का व्यतिरैक-निरूपण है। सद्रट ने व्यतिरेक के- [क)-[१] उपमेय में गुणोकि तथा उपमान में दोपोकि। [२] शेवल उपभेय में गुणोकि तथा [३] केवल उपमान में दोपोकि। [स]-[१] अपमेय में दोपोक्ति वथा उपमान में गुणोक्ति। -इस प्रकार नेवल चार भेद माने हैं। दोप गुणों की उकि और अनुक्ति स्द्रट की मापा में निमिच उपादान और अनुपादान है। सःट न टहट से आगे बढरूर निभिचानुपादान के दो भेद तो किए किन्तु परवर्ती मम्मट द्वारा लक्षिन उमयानुपाद्ान पर उनकी दृष्टि नहीं गई। वाच्यना और गम्यता, शुद्धता या दिस्ष्टता पर मो वे ध्यान नहीं देने। उनका मूल विवेचन इस प्रकार है- (१) यो गुभ उपनेये स्यात नत्प्रतिपन्थी च दोप उपमाने। व्यस्तममस्तन्यस्ती तो व्यतिरेक त्रिया कुरत॥ (२) यो गुण उपमाने स्यात तत्प्रतिपक्षी च दोष उपमेये। भवतो यत्र समस्नी स व्यतिरेको्यमन्यसु। -उपमेय में गुण बतळाया जाय और उपमान में उसके विरुद्ध दोप तो असकार व्यतिरेक होता है। कही मुग और दोष दोनों कथित रद्ते हैं और कहीं दोनों में से कोई एक। इस प्रकार सन्मूलक व्यतिरेक तीन प्रकार का हो जाता है। -इसके विरुद्ध जब उपमान में गुण बतलाया जाता है और उपमेय में दोप तो वह मी एक व्यतिरेक होता है । [जिसे मामइ, वामन और उद्भट ने छोड दिया है]। इममें विशेषता यह है कि उसमें गुण और दोध दोनों में से केदल िसी एक का टक्लेख नहीं होता। नियमतः दोनों का हो सल्लेसा रहता है, अन. इसका एक ही नेद होना है। क्रम से उदाहरण- (१) तुम्हारी उपमा हर (नाशक शिव) से कैमे हो सकती है तुम अमुजग [ 'भुजगो विट- सपयो' के अनुसार भुजग= विट अमुजग= अविद या विटरदित, संयमी] हो [नव कि श्िन भुजग=सर्प से युक्त समुर्ज हैं] औौर समनयन [सबको बरावर मानने वाले] जो दो [ जब कि शिव विपमनयन= त्रिनयन है]-'अनुजग. समनयन' कथमुपमेयो हरेणासि।' () दोघाकर [दोषा=रात्रि का कर= निर्माता और दोषों का आकर] = चन्द्र तुम्हारा उपमान कैसे बन सकता है। वह तो कलकी [काले घब्बे-पृथ्वी की छाया से सुक और बद [-अल, जलरूप] जो है [जब कि तुम निष्कलंक और चेतन हो ]। -'सकलट्गेन जडेन च साम्य दोषाकरेल कीहकु ते।' (३) तुम्हारे नेत्र तरल हैं और नोटकमल निश्वल। मला इनकी उपमा बैसे हो सकती है। इसी प्रकार तुम्हारा चेहरा विमल है और चदमा कलंक-मलिन। वह तुम्हारे चेदरे का उपमान कैमे बन सकता है। -'तरळं लोचनयुगल कुबल्यमचर किनेतयो. साम्यम्। बिमलं मटिनेन मुख शदिना कथमेतदुपमेयम्।1 (४) 'क्षीग: छीणोपि०'। मम्मट ने व्यविरेक के भेदों की संख्या चौबौस तक पहुँचा दी है। इन्हें व्यतिरेक का एक ही पक्ष मान्य है जिसमें उपमेय का उत्पे बतलाया जाता है। उपमेय के अपकर्ष के व्यतिरेक की
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संभावना का उन्होंने खण्डन किया है। उनका व्यतिरेकलक्षण इस प्रकार है- 'उपमानाद यदन्यत्य व्यतिरेक: स एव सः।' -अन्यस्योपमेयस्य व्यतिरेक आधिक्यम्। -'उपमान की अपेक्षा उपमेय का आधिक्यरू्प व्यतिरे ही व्यतिरेकालंकार कहलाता है।' इस लक्षण में ममाट ने व्यतिरेक शब्द के अंश अतिरेकमान्र पर ध्यान दिया। 'वि' उपसषगें की पूर्वांचार्य-प्रतिपादित सार्थकता को उन्होंने स्थान नहीं दिया। रुद्रट के उपनेयगत अपकर्प से संभाविन व्यततिरेक पक्ष का खण्डन करते हुए उन्होंने कदा 'क्षीणः क्षीणोडभि"' "इत्यादि में एक किसी ने उपमेय से उपमान की अधिकता वतलाई है किन्तु वह गरुत है, क्योंकि यहाँ चीवन में अस्थैर्स की अधिकता ही बतलाना कवि को अमीष्ट है।" यहाँ मम्मट ने रदट का नाम नहीं लिया इसलिए काव्यप्रकाश के कुछ टीकाकारों ने इस मत को उन्ट और अलका रसर्वंस्वकार का मत वतला दिया है। वामन झलकोकर ने इसे अलंकारसर्वस्वकार का ही बतलाया है जब कि अलंकारसवस्वकार मन्मट से बाद के हैं। भेदों की गणना में मम्मट ने उद्धट की सभी विधाएँ अपना की हैं केवछ प्रतीयमान सादृश्यमूलक भेद के साथ ही उन्होंने आक्षिप्त-सादश्यमूलक भेद की भी करपना कर ली है। इसके अतिरिकत उन्होंने निमित्त के अनुपादान को केवल एक भेद न मानकर तीन भेदों में विमक्त किया है। उनका भेदक्म इस प्रकार है- 'हेलोरुक्तावनुक्तीना नये साम्ये निवेदिते। शब्दार्थाभ्यामथाक्षित्ते शिलष्े तद्वत विरष तद ।।' अर्थात्- व्यतिरेक:
१ हेतूकि [उपमानापकर्पहेतु तथा उपमेयोत्कर्महेतु दोनों की उक्ति] हेखनुक्ि १ १. उपमेयोत्कयानुकि उपमानापकपानुक्ति उभयानुकि २ म्थोत ३ अर्थात ४ 1 उपमानापक्क्ष मात्रोक्ति: उपमेयोत्क पमानोक्ति 1
श्रीतसान्य-४
1 हिलष पदगत-१२ शुद्धपदगत-१२ ( +१२=२४)
1 २४ आक्षिप्तसाम्य का उदाहरण मम्मट ने यह दिया है- 'हयं सुनयना दासीकततामरसमनिया। आननेनाकलङ्केन जयतीन्दुं कलक्किनम्॥
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-- यह सुन्दराक्षी कमलशी को दासी बना ऐेने वाले अपने अकल्क मुस से कलंकी चन्द्र को जीत रही है।' यहाँ 'जयति = जीत रही है' इस कथन से साम्य का आक्षेप होता है। ऐसे उदा- हरण उद्धट ने भी दिए है किन्तु उन्हें मग्योपग्य में गिना दिया है। मम्मद ने उसके भी आर्थ तथा आक्षिप्त ये दो भेद कर दिए है। परव्ती आचार्यों में- शोभाकर-के व्यनिरेक का निरूपण सामान्यत पूर्वपक्ष के रूप में विमर्शिनी के अनुवाद में दिया जा चुका है। अप्पयदीसषित-ने कुवव्यानन्द में व्यतिरेक का विवेचन अति सक्षेप में किया है। उन्होंने उपमेयापकर्ष को भी व्यतिरेक का एक भेद मानकर सबस्वकार के ही समान रुद्रट की परम्परा का अनुमोदन किया है। उनका विवेचन इस प्रकार है-'व्यतिरेकी विशेषशचेदुपमानोपमेपयो.। -यदि उपमान तथा उपमेय में से विसी एक की अपेक्षा दूसरे में विशेषता दिसलाई जाए तो व्यतिरेक। स्पष्ट ही यहाँ व्यतिरेक शब्द की व्युश्पत्ति पर विभेष ध्यान नहीं दिया गया है। उदादुरण- [१) उपमान से उत्कर्ष का उदाहरण यथा-"शोला हवोन्नता. सन्त किन्तु प्रकृतिकोमला। सन्त लोग पर्त्रतों के समान उन्नत तो होते हैं परन्तु स्वमाव से कोमल रहते हैं। यदों उपमेयभूत सन्त प्रकृतिकोमलता में उपमानभूत कठोर पवतों से वत्कृष्ट प्रतिपादित हैं। [२ ] उपमेय के अपकर्पे का उदाइग्ण-'सर्व तुल्यमशोक बेवलमद घात्रा सद्योक:कृनः'। -हे अशोक, तुम्हारी और मेरी और सब वातें नो समान हैं, केवल इनना ही अन्तर है कि देववर तुम अशोक दो और में सशोक। दीक्षित जी के अनुमार यहाँ वक्ता ने अर्थात उपमानभूत अशोक ने स्वय को सोकामाद में छोटा प्रतिपादित किया है। ध्वनिकार तथा पण्डितराज जगन्नाथ ने यहाँ उपमादूरीकरण को वारपर्यविषयीभूत माना है। जो जँचता है। () अनुमयपर्यवसायी [ न तो किसी के अपकर्ष में पर्यवसिन होने वाला और न किसी के उत्कर्ष में ] यथा- 'दृढतर निबद्मुष्े: कोशनिषण्णर्य सहजमलिनस्य। कृपणस्य कृपाणस्थ च केवलमाकारतो भेद-॥ -कृषण और कपाग में भेद केवल 'आाकार'[ 'या' अक्षर तया आकृति] को लेकर है। वैसे दोनों ही बद्धमुष्टि होते हैं [ कृपाण में सुष्टि =मूठ-(सरु, कृपण में खर्च न करना] दोनों ही कोर स्थित [कोश =म्यान, सजाना ] रहते हैं और दोनों ही स्वमावत. मलिन [ मळिनता= मदगी, र्यामता 1 होते हैं।' यहाँ कृपण और कृपाण में मेतमात्र प्रतिपादित किया गया है किसी का किसी से उत्कर्ष या अपकर्ष नहीं। व्यक्तिविवेककार ने इस पद्य के वाक्यार्थ पर आपति दो है। उनका तर्क है कि 'आकार' का अर्थ है 'या' अक्षर। से लेकर दोनों अथो का अन्तर प्रति- पादित नहीं किया ना सकना किन्तु उन्होंने माना यहाँ व्यतिरेक ही है। यदपि इस संदर्भ में ऐकान्तिक रूप से यह नहीं वहा जा सकता कि उनका व्यतिरेक शब्द अलंकार के लिए ही प्रयुक है। दण्टितराज जगननाथ ने भी इसे दूषित ठहराया है और इसमें केवल इलेपमूल्क उपमा ही स्वीकार की है। उनका कथन है कि यहाँ केवळ दीर्घाक्षर मात्र में अन्तर प्रतिपादित करने का वात्पर्य है सवया साम्य। क्योंकि अक्षरमात्र के अन्तर से मर्थगत कोर्ई वास्तविक अन्तर सिद्ध नहीं हेता। उनका कहना ठीक भी है, किन्तु कुक्ळयानन्द को टीका चन्द्रिका के रचयिता दैधनाय ने
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पण्ठितराज की इस मीमांसा को अत्यन्त तुच्छ बतलाया है और यहाँ तक कहा है कि 'यह इतनी तुच्छ है कि इसे उद्भृत भी करना अनुचित है।' यह उनकी मूलभक्ति ही है। पव्दितराज जगलाथ-'उपमानाद् उपमेयस्य गुणविशेषवत्त्वेनोत्कर्षो न्यतिरेकः।' -उपमान से उपमेय का गुणविशेष के आधार पर उत्कर्य व्यतिरेक। इस लक्षण के अनुसार पण्डितराज उपमेयापकर्प से व्यतिरेक की निष्पत्ति स्वीकार नहीं करने। वे उसका खण्डन भी करते है। उद्धढ की व्यतिरेककारिका में वैधर्म्य शब्द भाया है। उससे भ्रम होता है कि कदाचिव व्यतिरेक साधर्म्य के साथ ही वैधर्म्य से भी निष्पन होता है। पण्डितराज जगनाथ उसका स्पष्टी- करण कर देते हैं। वे वैधर्म्य को व्यतिरे कानुभूति में वि्न प्रनिपादित करते है। सच भी है। व्यतिरेकोध के लिए अपेक्षित साध्म्य यदि दृष्टान्त दि जैसे वैध्म्य द्वारा प्रस्तुत हो तो कान्य पहेली बन जाएगा। आक्षिप्त अथवा आर्ये सादस्य में मानस बोध सीधे सादृश्य से टकराता है, जब कि वैधर्म्य में सादृश्य के अभाव से। इस प्रकार यहाँ व्यतिरेक बोध की भूमिका तिमँनली न बैठनी है। उद्भट के वैधर्म्य शब्द का अर्थ विपरात धर्म नहीं, 'मिन्न धर्म है, और इस अर्थ में स्वयं पण्डिनराज ने भी वैधर्म्य शब्द का प्रयोग इस प्रकरण में किया है। पण्टितराज ने व्यततिरेक शब्द के दोनों अवयवों पर भी ध्यान दिया है-'वि'-उपसर्ग पर भी और 'अतिरेक' शब्द पर मौ। 'वि' उपसर्ग को उन्होंने विशेषार्थक मानकर उसका अर्थ गुणविशेम किया तथा अतिरेक का उत्कम। यह केवल इसलिए कि यह शब्द चल चुका है, परम्परागत है। अन्यया 'अतिरक'- शब्दमात्र पर्यास्त था। अतिरेक बिना विशेषता के संभव नहीं, अतः विशेषता का अपने आप आक्षेप संभव या। पण्डितराज ने व्यतिरेक के नौबीस भेद मम्मट के ही अनुसार सवीकार कर लिए हैं किन्दु इ्लेपमूकक व्यतिरेक मे कहीं उभयानुपादान को असंभव प्रतिपादित किया है। यथा- 'भवान् सहस्रैः समुपारयमान: कर्थ समानस्विदशाधिपेन'। -- 'आपकी तुलना इन्द्र से कैसे की जा सकनी है। आप की सेवा सहतों करते हैं अतः झाप सहस्राधिप है जब कि इन्द्र केवल त्रिदशाधिप।' यहाँ 'तिदशाषिप' शब्द के दो सर्थ है(१) निदश = देवता तथा (२) तीन गुणा दश़ तीस सथा तीन और दश =तेरह। इस प्रकार व्यतिरेकी अर्थ यह निकला कि जो तरिदशाषिप अर्थात केवल तीस अथवा तेरह का स्वामी है वह सइसो के स्वामी का उपमान कैसे वन सकता है। यहाँ यदि तरिदशाभिपत्व तथा सहसाधिपत्व ये विभिन्न धर्म हटा दिए जाएँ तो वाक्यार्थ ही निष्पन्न नहीं होगा, क्योंकि व्यतिरेकसिदि तो दूर की वस्तु है 'इन्द्र से राजा की तुलना अनुचित है' यह स्थापना निर्मूल रही आएगी। पण्डितराज के इस तर्क को नागेश ने भी प्रदीपोद्योत में स्वीकार किया है। किन्तु यह तर्के वहीं तक सीमित है जहाँ इलेप न्यतिरेकसाधक विशेपणो में ही हो। दलेप जहाँ केवल साम्यसाक विशेषों में रहता है और व्यतिरेक की सिद्धि अन्य विशेषणों से होती हैं वहाँ तीनों अनुपादान संभव हैं और अलंकार कौस्तुभकार विश्वेश्वर पण्डित ने भी मम्मट के ही समान कलेप में भी इस प्रकार के तीनों अनुपादानों के यथावद उदाहरण दिए हैं। आगे अलंकारकौस्तुमकार के प्रकरण में इन्हें देखा जा सकता है। संख्यानियम पर दूसरी वात पण्डितराज ने यह भी कही है कि व्यतिरेक सादृश्य मूलक होता है अतः साटृय्य के जो २५ भेद उपमा में हुए हैं वे सब यहाँ भी संभव हैं जिससे व्यतिरेक की भेदसंख्या बढ़ भी सकती है। पण्हितराज जगनाथ ने सर्वस्वकार द्वारा 'क्षीणः क्षीणोडपि0' पद्य में प्रतिपादित उपभेयापकर्ष- मूलक व्यतिरेक का मम्मट तथा सोभाकर के ही तर्कों में खण्डन किया है। विशेषता यह है कि
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२९६ उन्होंने विमर्शिनीकार द्वारा कि गए इसके मण्डन का अक्षरक्ष अनुवाद किया और उमपर भी निम्नलिखित आपत्तियाँ दी है-भले ही यह उ्ति नायिका की हिनेच्दु किमी प्रियसखी की हो तब भा इसमें उपभेयभूत चोवन में उपमानभूत चन्द्र की अपेक्षा गुणाधधिक्र्य ही विवक्ित है, गुगल नहीं। इससे विवक्षिनाय को पुष्टि अधिक होनी है क्योंकि इस क्ति से सिद्ध होना है कि चन्द्र पुन पुन लोट आना द अन सुन्भ है अत उसका उनना माहात्म्य नहीं है। चौवन कदापि नहीं लौटना इसलिए दुर्मभ है और इसीलिए वह अधिक उत्कृष्ट है। उमे मान आदि विन्न भून कार्यों से अमफल नहीं होने देना चाहिए जहाँ कहों उनमेयगन अपकर्ष भा प्रनिपादिन रहता है वहाँ मा वह अपकर्म वस्तुन उत्कर्ष में हा परिणन हाने वाला होना है। जैम 'चन्द्र ही भला है सो क्षीग होकर पुन पुष्ट हो जाता है, इम यीवन को विकार है जो क्षाण हाकर पुनः नहीं लाटता।' यहाँ बिक्कार द्वारा मान के परति आकोस न्यक्त किया गया है और वह आकोश योवन के लाभ के मनि क्षगमर भी उदामोन न रहने का सफेन देना है। विश्वेश्वर पण्डित ने अलकार कौस्तुम में केवल उपमेयोत्कर्य मे ही व्यनिरेक स्वाकार किया है, उपमेयापकर्य में नहीं-'उभयो. साम्यप्रोक्ती विशेष उपमेयगे व्यतिरेक।' -दोनों के साम्य प्रतिपादित हो तव यदि उपमेय में वेशिष्य बनलाया जाय तो व्यतिरेक होता है। व्यतिरेक शब्द की व्युत्पत्ति में विश्वेश्वर ने परम्परा को तोड दिया है। उन्होंने व्यनिरेक का अर्थ व्यादर्तन = अलगान किया है-'न्यतिरिच्यते उपमानाद् व्यावत्यतडनेन उपमेयमिति व्युत्पत्ते [व्यतिरेक]'=उपमान से उपमेय जिसके द्वारा टा लिया जाय। व्यतिरेक में 'क्षीण क्षीग'-पद्य द्वारा प्रथमत रुद्रट द्वारा प्रतिपादिन और प्रथम सर्वस्वकार द्वारा अनुमोदित उवमेयापकर्षजनितत्व का जैसा खण्डन प्रथमत मम्मट ने किया है और उस सण्डन का पण्डितराज ने जैसा अनुमोदन किया है विश्वेश्वर ने भी उमे उसी रूप में स्वीकार कर लिया है। वे लिसने हैं- 'न चन्द्रयौवनयोरूपमानोवमेयमावो विवक्षित, किन्तु चन्द्रयीवनक्षययोरेव, तत्र चन्द्रक्षयस्य वृद्धिमागमावसमकालीनरवेन न्यूनत्वन्, यौवनश्यम्य चाय्रे तच्छरारावच्छेदेन यौवनामावात समानाधिकर थयी वनपाग भावस मानकालीनत्व नास्तीत्याभिकयम्। एवं च विवक्षितस्य मानत्याग-
-यहाँ उपमानोपमेयभाव चन्द्र औौर यीवन का नहीं अपितु उनके क्षयों का प्रतिपात् है। दोनों क्षयों में चन्द्र का क्षय तब तक ही रहता है नव तक चन्द्र की वृद्धि शुरू नहीं होनी अनः वह क्षय क्षणिक है अतएव न्यून है, यौवन का क्षय किसी अन्य योवन के पहले तक रहने वाला नहीं क्योंकि एक शरीर में दूसरा यौवन नहीं आता, इसलिए वह स्थायी है और इमीलिए अधिक है। इस प्रकार मानत्याग की आवश्यकना सिद्ध होनी है।' व्यतिरेक के भेद भी विश्वेश्वर ने मम्मट के ही अनुसार चौतीस माने हैं- शानिप्रकर्षहेत्वोरुकी व्रेषा च तदनुक्ती। राथ्दाथक्षिपोत्ये साम्ये दलेे च दिग्युगमित स॥ -'उरकर्ष और अपकर्ष' इन दोनों की उक्ति, एक-एक और एक साथ दोनों की तीन अनुक्ि जहाँ शब्द, आर्य और आक्षेपलम्य साम्य होने पर अथवा द्लेप होने पर हो तो व्यतिरेक युग= दो तथा उस पर दिक-चार अर्थात २४ भेद होने है। पण्टिनराज ने इलेष में विविध अनुशादान की जो अशक्यता ध्वनित की थी, उसका मौन उत्तर देने हुए विश्वेश्वर ने इ्लेपमूलक तीनों अनुपादानों के तीन टदाइरण दे दिए है। वे ये हैं-
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व्यतिरेकालङ्कार: २९७
दोनों हेतुओं की अनुकि- 'अतिनिविटस्य छनाखिलदर्दनयलेस्तमोबजस्येव। धम्मिल्कत्य न तेऽसिर्यामलता तेजसा नाइया।' -तुम्हारा केशपाश व्वान्संघाद के ही समान अत्यन्त घना और प्रत्येक की समय्र दर्शनशक्ति नष करने वाला है। किन्स इसकी अतितुल्य व्यामता प्रकाशनाव्य नहीं है। यह्दॉ व्यतिरेक है 'श्वामता' के प्रकाशनात्यत्व में और इलेप है अतिघनत्व आदि विशेषण- वाचक शब्डों में। उत्कर्पनेखव नुकि- 'सकललोचनमानसहारिगोडनिशयितां दधतः सुकुमारतान्। नव मुसस्य रुचिन परिष्छिदा मजति मास्दधीनसरोजवय॥ -तुम्हारा चेहरा प्रत्येक व्यक्ति के नेत्र औौर चित्त दोनों को आकृष्ट कर लेता है और अत्यन्त सुकुमारता लिए है। इसकी छषि सूर्य के अधीन कमल की छवि-सी परिच्छिन्न नहीं है।' यहाँ कमल की छवि की परिच्छिन्नता में हेतु है सूर्यापीनता, वह कथित है। मुख की छवि की अपरिच्छिनता का हेतु कथित नहीं है। इस प्रकार अपरिच्छन्नतारुपी उत्कर्पे के हेतु की यहाँ अनुक्ति हैं। इलेप है 'सकल' इत्यादि निशेपणार्थी में।
व शचं मावयती निखिलजनोतलासनाहेतीः। अपचयरहितस्य तवाननसय नेन्दरोरिव द्ुतेर्हानिः। -'तुम्हारा चेदरा और चन्द्र दोनों ही उज्जकल वर्ण के हैं और दोनों ही प्रत्येक व्यक्ति को उल्लसित कर देते हैं, किन्तु तुम्हारा चेहरा चन्द्र की नाई घटता वढ़ता नहीं है बतः इसकी छवि में चन्द्र की छवि-सी हानि नहीं है।' यहाँ चन्द्र की छवि में अपकर्ष का हेतु हानियुक्तत्व कथित नहीं है। विश्वेश्वर के उदाहरणों की अपेक्षा मम्मट के उदाहरण अधिक अच्छे हैं। मम्मट का उदादरण है- 'जतेन्द्रियतया सम्यग विद्यावृद्धनिषेदिग:। अतिगाढगुणस्यास्य नान्जबद् महुरा गुणाः।।' -यह जितेन्द्रिय है, विद्यावृद्ों की सेवा करता रहता है और इसके गुण अत्यन्त गाढ़ हैं इसलिए इसके गुण कमल के समान भहुर नहीं हैं।' यहाँ गुण शब्द में उसी प्रकार कलेप है जिस प्रकार जन्हट के वदाहरण में 'तपस्' शब्द में। कमल के गुण महुर है और वर्णनीय पुरुष के गाढ़। इस प्रकार उपमानभूत कमल के गुणों में अपकर्ष का हेतु भङ्गरत्व शब्दतः कथित है और उपमेयभूत पुरुप के गुणों में उत्कर्ष का हेतु गादत्व । यदि इनमें से एक बार एक एक का उपादान किया जाय और दूसरी वार दोनों को छोड़ दिया जाय तब भी गुण शब्द में इलेप रहेगा और तीनों अनुपादान वन जाएँगे। वस्तुतः साम्य की वाच्यता और अवाच्यता से चमत्कार में कोई अधिक अन्तर नहीं आाता फतः प्राचीन आलंकारिकों द्वारा प्रतिपादित भेदक्म ही अधिक उपयुक्त है। इस प्रकार प्यःसभी आचार्यों में केवल रुद्रट, सवस्वकार तथा अ्पय्यदीक्षित ही ऐसे आचार्य है जो वपमेयगत् अपकर्ष में भी व्यतिरेक मानते हैं। मामह, वामन, उद्ट, मम्मट, शोमाकर, पण्डितराज तथा विशवेश्वर केवल उपमेयगत उत्कर्ष में ही व्यतिरेक प्रतिपादित करते हैं।
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२९८ सजीविनीकार यविदाचकवनीं ने व्यतिरेक के स्वस्वकारकन सपूर् प्रतिपादन का सक्षेप इस प्रकार किया है- 'मेदप्रचाने साधम्ये व्यतिरेको विधीयने। आभिक्यादुप मेयस्य न्यूनत्ाद् वोपमाना ।' --- साधर्म्य में यदि भेद की प्रधानता हो तो उपमान को अपक्षा उपमेय के उत्कर्ष सथवा अपकर्प से व्यतिरेक होता है। [सर्वस्व ] [सू० ३०] उपमानोपमेययोरेकस्य प्राधान्यनिर्देशेऽपरस्य सहार्थेसंबन्धे सहोकि:। मदप्राधाग्य इत्येव। गुणप्रधानभावनिमित्तकमत्र मेदप्राधान्यम्। सहार्थपयुक्तश्च गुणप्रधानभावः। उपमानोपमेयत्वं चात्र धैवक्षिरम्, द्वयोरपि प्राककरणिकत्वादप्राकरणिकत्वाद्वा। सद्ार्थसामर्थ्यादि तयोः तुत्यकक्षत्यम्। तभ् तृतीयान्तस्य नियमेन गुणत्वादुपमानत्वम्। अर्थाच्च परिशिश्टस्य प्रधानत्वादुपनेयत्वम्। शब्द्यात्र गुणप्रधानभावः। वस्तुतस्तु विपर्ययोऽपि स्यात् । तन्न नियमेनातिशयोकिमूल्त्वमस्याः। सा च कार्यकारणप्रतिनियमविपर्ययरूपा अभेदाध्यवसायरूपा च। अमेदाध्यवसायश्च नेपभित्तिकोऽन्यथा वा। साहित्यं चात्त कर्षादिनानामेदें क्षेयम् । तत्र न् कार्यकारणपतिनियमविपर्ययरूपा यथा- 'भवद्पराधै सार्घ संतापो वर्षतेतरामस्या'।' अन्नापराधानां संतापं प्रति हेतुत्वेऽपि तुल्य कालत्वेनोपनिबन्ध । श्लेपमित्तिकाभेदाव्यव सायरूपा यथा- 'अस्तं भास्वान्प्रयातः सद्व रिपुभिरयं संहियन्तां बलानि।' अन्नास्त गमनं श्लिष्टम्। अस्तमित्यस्योभयार्थत्वात् ।। [सृ० ३०][भेद की प्रधानता रहने पर] यदि उपमान और उपमेय में मे 1 एक की मधानता बतलाई गई हो और दूसरे में 'साथ'-वाचक किसी शब्द से प्रतिपादित अर्थ का [अप्नधानताघोतक ] सबन्ध हो तो [अलंकार] सदोकि [कहलाता है]। [ वृ० ][यह] 'ेद की प्रधानता' इतना पहले से ही प्राप्त है। [ किम्तु] यहाँ भेद की प्रधानता निर्मर रदती है अप्रधानता तथा प्रधानता पर और अप्रधानना नया प्रधानता निष्पन्न होता है 'मह= साथ' शब्द के सर्थ के कारण। यहाँ को उपमानत्व और उपमेयत है वे विनकाधोन रहते है। यह इसलिए कि या तो दोनों अर्थ प्राकरणिक हो रहते हैं या अन्नाकरगिक हा। [उपमानोपमेयमाव के लिए अपेक्षिम ] साम्य उनमें 'सद=साथ' शब्द के अर्थ से माता है। उनमें भी जिसको वृतीयाविभक्ि [संस्कृत व्याररण के अनुसार 'सद' शम्द के प्रयोग दोने पर अप्रधान सर्थ के वाचक शब्द के साथ प्रयुक होने वाली विभक्ति ] जिसके साथ लगती है उस
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सद्दोक्त्यलद्कारः
शम्द का अर्थ नियमत: अपधान रहता है अतः वही उपमान माना जाता है, शेप वचा प्रथमा- विमत्ति से युक्क शब्द का सर्थ तो वह प्रधान होता है अतः वह अपने ही उपमेय सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार यहें प्रधानता अप्रधानना का निर्धारण केवल शब्दस्थिति [और तकनिव वोव] पर निर्भर रहता है, अर्थस्यति ते विपरीत मी हो सकती है। इसका आधार सदा ही अतिशयोति वनती है। अतिरयोकि भी दो प्रकार की ( १) कार्य- कारणभाव के पौर्वापर्य के विपर्यय से होने वाली और (२) अमेदाध्यवतानमूलक। इनमें से अमेदाध्यवसाय यहाँ दोनों ही प्रकार का हो सकता है (१) दलेपमूलक भी और (२) सुद [ इलेषरहित ] भी। चहाँ जो साहित्य =सहार्थक शब्दों से प्रतिपादित सम्बन्ध रहता है वह कर्ता, कर्म आदि कारकों में होता है, अतः वह अनेक प्रकार का होता है। इनमें से- कार्रकारणमान के विपर्येय से निष्पन्न अतिशयोति पर निर्भर सहोकि यथा-'आपके अपराधों के साथ इसका संताप बढ़ता ही चला जा रहा है।' -यहाँ [नावक के द्वारा किए गण] अपराध संताप के प्रति कारण है तयापि उनको एक
सहोकि यया- साथ उत्पन्न होता वतलाया गया है। दलपमूलक अमेदाध्यवताय रूप अविशयोकि से निम्पन्न
'यह सूर्य शमुओं के शी साथ अस्त को प्राप्त हा गया है। अब सेनाऐँ बवटीर ली जाँए।' -यहाँ 'अस्त को प्राप्त होना' दिलह है क्योंकि 'अस्त'-शब्द उमयार्थक [डूषना, नष्ट होना इन दो अर्थों में प्रशुक ] है। चिमशिनी उपमानेत्यादि। किंहेतुकं चात्र भेदप्राधान्यमित्याशङ््याह-गुणेत्यादि। गुणप्रधान- भावोऽपि किहतुक इत्याह-सहार्थेत्यादि । एकस्य प्रधानभूतविभक्तिनिदशादन्यस्य च विधिविभक्तिनिदेशात। वैवसिकमिति न पुनर्वास्तवम्। उपमानोपमेयावं हि दयोस्तु- त्यकततत्वे भनति तचात्र किनिमित्तकमित्याशङ्चाह-सहार्थेत्यादि। परिशिष्टत्येति गय- मान्तस्य। शान्द इति न पुनरार्थ: वर्तुतो चिपर्ययस्यापि संभवाद्। एवं गुणप्रधान भावनिमित्तकं भेदप्राधान्यमपि शब्दमेवान्न जेयम्। वस्तुतो हि साहस्यत्येव पयंबसा- माहेदाभेद्योगसुन्यतेनैव प्रतीतिः। तस्माच्छाब्दमेव भेदप्राधान्यमाशित्येहात्या वचनमू। निपचंच इति। प्रधानविभवत्या निदिष्टस्याप्राधान्यं गुणविभक्तया च निर्दिषत्य आाधान्यम्। नियमेनेति। अनेनातिशयोवत्यनुम्नाणनमन्तरेणालंकारत्वमेवास्या न भवतीति ध्वनितम्। सेव्यतिशयोकि। कार्यकारणयोः प्रतिनियमस्य मस्य विपर्ययस्तृत्यकालत्वादिनोवतेः। अन्यथेति अश्लेपरुपः।तदेव मम्या अतिशयोकिभेदचतुष्टयमनुप्राणकभ्। कर्त्नादीति आदि- शव्दाल् कर्मदयः। तश्रेति निर्धारणे।[कार्यकारणपरतिनियमविपर्ययरुपेति]। अस्य्ा मनुपाणकत्चेन स्थितेति शेप:। अन्रापराधानां शाब्दो गुणभावः। वस्तूतत्तु आ्धान्यं तेपामेव, प्रतिपाद्यत्वात्। पवमन्यन्न जयम्। 'क्षयमेति सा बराकी स्वेहन सम त्वदीचेन' हत्यस्यार्धम्। 'कुर्वन्त्वासा हताना रणशिरसि जना वह्िसाद् देहभारानश्रुन्मिधं कर्थाचद्- वतु जलममी बान्धवा बान्धवेम्यः । मार्गन्ता कातिदेहान् हतनरगहने खष्दितान्गृभ्र कह।'हत्यस्याचं पादवयस् । उपमान इत्यादि। 'यहाँ भेद की प्रधानता का आधार कया है' इस शंका पर उत्तर देते हैं- 'गुण०' अग्रधानता'। 'गुणप्रधानसाव=अमधानता औौर प्रधानता किस पर निर्भर है' इस शंका पर उपर है-'सहार्थ०" ऐसा इसलिए कि एक में रहती है प्धानभूत विमत्ति और
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३०० अलङ्कारसर्यम्यम्
दूमरे में विधि [अप्रधानभूत ] विभकि का निर्दध रहता है। वैवषिक=विवक्ापीन अर्थात् वास्तविक नहीं। 'उपमानोपमेयभाव होन' है तव जब दो पदानो में समानना रहती है। यह ममनता यहाँ कैमे नि्नन होती है-हम गका पर उत्तर देने हैं-'सहार्थमा'1 परिशिष्ट= शेप अर्थान् प्रथमा विभत्ति में युल् पद का अर्थ। शाहद =शृब्दजनिन दोध पर निर्भर, न कि अर्थ पर निर्मर। क्याकि वास्तनिक स्थिति विपरात भी हो सकता है। इस कथन से निष्कर्ष यह निरुन कि माचान्यायवान्य मे जनिन भेद का प्रवनना भी सदोति में शब्दजनित बोध पर निर्मर रद्देगी। और, मत्य ना यह हे कि यहाँ अन्त में प्रनीत होत है सादृश्य ही, अत यहाँ 'मेद और अभेट' इन दोनों को प्रनीनि ममान रूप से हो होनी है। इसलिए शब्द- अनित बोध पर निर्भर नेदप्रयानना वो हा लेका यहाँ इम भेदप्रधान अलकारों के प्रकरण में सहोकि क रखा गया ई। विपयय = विपरीनम्थिति=प्रधान बिभकि [ प्रथमा] से निदिट भी अप्नधान हो सकता दे जौर अमरान विर्माक्त [ तृतिया] मे निर्दिष भी प्रमान। नियमेन= नियमन मदा ही। ऐमा कडकर यह मनेन किया कि महोक्ति अनिशयोकि की सहायता के बिना चनकार हो नहीं वनती। सा= वद -अतिरय कि। कार्य और कारन का प्रतिनियम=क्रम= नियमत बाद में और पहले उत्पन्न होना, इसका उल जाना अर्थार टोनों का एक साथ उत्पन्न होता हुआ वनलाया जाना या कार्य को पहले तथा कारण को बाद में। अन्यया=दूसरे प्रकार का इलेपरहित। तो इस प्रकार चार प्रकार को अतिरायोकि से यहाँ सहोकि को सदायता मिस्ती है। कर्सा आदि, आदि पद से कर्म आदि भी। तब् -उनमें यह परस्पर में अन्तर वतलाने के लिए कदा जा रहा है।कार्यकार गप्नतिनियमचिपर्यंथरूपा= ] सर्थात यह अतिशयोकि जहाँ अनुप्राणक= सहायक रूप मे स्थित रहनी है वह भेद। यहाँ ['मबदपराधे ' में] अपराधो की अप्रधानता केवल इसलिए है कि यहाँ उसके वाचक पद =अपराध में तृनीया विभक्ति जोड़ी गई है, वस्तुनः प्रधान वे ही है क्योंकि यहाँ प्रतिपाद्य वे ही है। इमी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी बानने रहना चाहिए। इस [ 'भवदपराये' पद्य] का उत्तरार्य यह है-'हयमेति सा बराकी स्नेहेन सम त्वदीयेन'= वह वेवारी तुम्हारी प्रीति के ही साथ क्षय को प्राप्त होती जा रही है। इस ['अस्त भास्वान्०' पद् ] के प्रथम तीन चरण ये हैं- 'कुमन्तवापा हताना रणशिरसि जना वहिसाद् देइमागा- नशून्मिश्र कश्विद् ददतु जलममी बान्धवा बान्यवेम्य। मार्गन्ता जातिेद्ान् इतनरगदने सण्दितान् गृधकङ्कै- -- अब जो आप है वे लोग युद्धस्थन में भृन लोगों की अनत्येषटि करें, ये लगे हैं उनकी लाशों को ढेर, ये [ चारों औोर रोते विलखने ] भाई बन्ध अपने भाई बन्बों को अभन्मित् [ओसुओं से" मिश्रिन] पानी जैसे तैसे दे लें, [जिन्हें अभी तक सपने माई बन्धुओं की दारे नहीं मिली है वे] अपने भाई वन्धुओं की लाशें फिर से खोजे, वहोँ खोजे जहाँ आदमियों की लाशों के पुराने ढेर लगे मैं, उन्हें काने औौर सफेद गिद्धों ने विक्ञन कर दिया होगा-[उनके नाक कान आँख नोंच खाई शेगी ]।-वेगीसंदार ५३६। [ सर्वस्वर ] तद्न्यथारूपा यथा- 'कुसुदयनैः सद्द संप्रति विघटन्ते चक्रयाकुमियुनानि।' अत विघटनें संबन्धिमेदाद्वियं न तु झलिएम्।'
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सहोकत्यलद्वारः पतद्िशेपपरिहारेण सहोकिमान नालंकार:।यथा- 'मनेन सार्धे चिहमम्चुराशेस्तीरेपु तालीवनमर्मरेपु' इत्यादी। पतान्येव कर्तसाहित्ये उदाहरणानि। कर्मसाहित्ये यथा- घुजनो सृत्युना सार्व सस्याजी तारकामये। चक्े चक्राभिधानेन प्रेष्येणातमनोरथः।' अत् करोतिक्ियापेक्षया घुजनस्य मृत्योश्च कर्मत्वम्। मपा च साल्यापि भवन्ती दृश्यते। यथा- 'उति्क्षितं सह कोशिकस्य पुलरैः साधें सुखैनामितं भूपानां जनकस्प संशयधिया साकं समास्फालितम्। चैदेह्या मनसा सम च सहसाकएं ततो भार्गय- घौढाहंकृतिकम्द्लेम च सभं तदू भग्नमैशं धनुः।।' शुद अतिशयोकि पर निर्भर सहोकि यया- -'कुमुदयनों के साथ हस समय चकषाकों के जोड़े भी भरुम-अलग हो रहे है।' -यहाँ 'अरताय' में श्लेप नहीं है[ क्योंकि वह मूछतः अनेकायक नहीं है] वह सम्बन्धी [सुमुर, चक्रवाक] के मेद से मिननरूप बन जाता है । कुमुद के साथ सिठने =मंखुडियों के अल- मलग होने रूप में, चन्वाक के साथ विछुढ़ने रुप में]। विशेपता [अतिशयोकि की सहायता ] के विना केवळ 'सह=साथ' शब्द या इसके समानार्थक सब्द का प्रयोग करने पर [सहोकि नस्तुमात्र दोती है उसमें] अलंकारत् नहीं माता । यथा- -'इसके साथ समुद्र के तदों पर विहार करो, जहाँ सालीवन लगा होगा और उसमें म्मर- ध्वति हो रही होगी।' [ इन्दुमती स्वयंवर-रघुवंश]।-इत्यादि में। [ अतिशयोकि से निष्पन्न सहोकि की सहायता के लिए दिए गए] ये जी उदाहरण है,[इनमें जिन-जिन अर्यों का 'साथ' पतिपादित है वे= अपराध और संताप, सूर्य और सेनाएँ, कुमुदवन और चक्रवाक-सभी कतों के रूप प्रस्तुत हैं अतः ] ये सभी [ उदाहरण ] कर्तसाहित्य के उद्दाहरण है। कर्म-[के साथ कर्मे के )-साहित्य का उदाहरण। यथा- 'जिसके चक नामक प्रष्य= [भेजने योग्य सेबक ] ने युद्ध के बीच, मृत्यु के ही साथ देवताओं को सी तारकासुररूपी बीमारी के विपय में पूर्णेच्छ कर दिया।1
दोनों कर्म है। [यहाँ 'तारकक्षये' पाठ अधिक अच्छा रहता]।-यहाँ 'करनाकिया में देवता और मृत्यु
यह [सहोकि] माला रूप में भी दिखाई देती है। कया- -'भगवान् राम ने भगवान् शिव का धनुप विभामिन के रोमांच के साथ खड़ा किया, राजाओं के सुखों के साथ नँवाया, जनक जी की संदेहवुद्धि के साथ आस्फालित किया [ प्रत्यंचा चढ़ाकर दो-चार वार उसे भंगूठा औौर तर्जनी से कुछ कुछ खींचकर छोड़ा, बुद्धिपक्ष में आस्फालन उभाड़ना, उछाउना-द्र० 'आास्फालितं यव प्रमदाकरायरै०' रघुवंश-१६ ] जानकीनी के हृदय के साथ खीधा औौर परशुराम के मौद सहंकार के साथ ट्ूफ-टूक कर डाला।'
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३०२ अलद्कारसर्वस्वम्
विमरश :- यहों 'अस्त'-शब्द में शझुपक्ष में लक्षणा थी और सूर्य पक्ष में अमिया। 'अरगाव' में दोनों पक्षों में अमिना हो है"-यह भी एक भैदक तथ्य दिसाई देता है। किन्तु यहाँ अर्थदलेप, जिसे उपमा आदि में साधारण धर्मों के बीच माना जाता है, अस्वी- कार नही किया जा सकना । इम प्रश्न पर मजीविनीकार के ही साथ विमसिनीकार और विश्वेश्वर पण्दित भी चुप हैं। किन्तु पण्डितराज जगननाथ ने इस ग्रन्थि को खोलने और सुलझाने का अमफल प्रयत्त किया है। उन्होंने कदा है-इलेय वहाँ होता है जहाँ प्रनिपाद अर्थों को मिन्न-मिन्न धर्म मासिन होते हों। जैसे 'शचुवधुओं के नेत्र दिनों के ही साथ वर्षित हो रहे हैं। यहाँ दिवमपश में वर्ष का अर्थ है सवत्सर और नेध्रपक्ष में हे वरसना, आँसू बहाना। 'पद्मपत्रों के साथ उन्मीलित छोती सूयें- रश्मियाँ' = इस स्थल में उन्मीठनरूपी अर्थ दोनों पक्षों में एक ही ह अत- वहाँ श्लेप नहीं है। वस्तुन यह पक्ष पण्हिनराज की ही मान्यता के विरुद्ध है। पण्डिनराज ने भी रूपक में 'विद्न्मान- सहस' इस स्थल में प्रयुक्त 'मानस' शब्द में शलेप माना है जब कि उससे प्रतीत 'सरोवर तथा चित्त' इन दो मिन्न अर्थों में एक ह। 'मानसत्व' धर्म भासिन होता है। सस्कृत में सण्डित करने और देने अर्थ में कर्मदाच्य में एक ही शब्द निष्पन्न होता = 'दीयते'। पण्डितराज ने 'विषद्धि सद दीयन्ने सपद इम प्रयोग द्वारा उस पद में इलेप स्वीकार किया है। वहाँ प्रतिपादित अर्थो में एक ही धर्मे मासित होता है 'दान' अथवा 'दानाशयत्व'। सत्य यद है कि यदि यहाँ इलेप नहीं माना जाता तो अर्थेदलेय उच्छिन हो जायगा। कहा केवल इतना जा सकता था कि अतिशयोकि में कहीं भगरलेष होता है और कहीं समगरलेप। इनेप के ये सब उदाहरण इन्दीं दो कोटिओं में आते हैं। इन दोनों उदाहूरणों में एक के अस्त पर दूसरे के अस्त और एक के अलगाव पर दूसरे के अलगाव का अमेदाव्यवसान है क्योंकि दोनों अ्थों के वाचक के रूप में एक्पक शब्द का ही प्रयोग किया गया है। विमर्शिनी 'सह कमलैललनानां मानः संकोचमायाति' इस्यस्याधंम्। पतदिशेषपरिह्ारेणेति अतिश योकत्यनुमाणनमन्तरेग। 'द्वीपान्तरानीतलवडपुप्पेर पाकृतर्वेदुलचा मरद्ि.' इति द्वितीयमधंम्। एनानीति समनन्तरोकानि। यमापेवया वजनसयानन्तरमासमनोर- यश्वमिति आदिपश्राद्भावेन कमिकयोस्तुत्यकालत्वेनोकि। यया वा- *भाग्यीः सम समुत्पन्न प्रजाभि: सद लालितम्। वर्धितं सुकतैः सार्धमर्गोराजमसून सा ।' अन् समुत्पत्यननतर तह्ाग्यानामुशपचतिरिति क्रमिकयो समकालश्वम्। अस्याय्र शुद्ध- सामान्यरूपरवं यथा- मलआणिलेण सद सोरहवासिएण दहआणं। वड्ढन्ति वहलसोमालपरिमला सासणिठरंचा॥ अत सौरभपरिमलमो. शुद्धसामान्यरूपरवम्। विम्नप्रति बिम्बभावो थया- 1 दिनअरअरगिउरंया कगआअलकढअरेणुविष्फुरिआ। विभसति परिमल्भरोब्भडेहिं कमलकिरहिं समें॥। क्षत्र निर्दिष्टम । कनकाचल कढकरेणुविच्तुरितरवस्य परिमलभरोन्रशव विन्वप्रतिविम्वखेन 'कुमुदबने०' का उत्तरार्थ है 'सद कमलैर्ललनाना मान सकोवमायाति'='कमलवनों के साथ [दिन भर की रूठी ] तलनाओं का मान संकुचित हो रहा है'। पतदुविशेपपरिदारेण=इस्र विशेषना के विना अर्थात अतिशयोकि की सहायता के विना। 'अनेन०' का उचरार्यें है-
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सदोक्त्यलङ्गार: ३०३
'द्ोपाननरानीतलवर पुपैरपाकृत त्वेदलवा मरुलिः'="यहाँ तुन्हारे [अमजनित] स्वेदकण हुवा के झोके दूर करते रहेंगे, जो पार के दीम से लबंग पुप्प उड़ा-उड़ाकर आ रहे होंगे।" [ रयुवंश-६ ]। एतानि= ये= नमी-अभी कथित। [करम साहित्य के उदाहरण 'धुजनो०' में] यम की अपेक्षा देवताओं की मनोरथसिद्धि वाद में होती ई [ कर्योंकि उनमें कार्यकारणभाव है] इस प्रकार में पूर्ववत्तित्व और परवत्तित्व [आदिपश्चाद्भाव] होने के कारण क्रम है, क्योंकि यहाँ क्रमिक होने पर दोनों मनोरय सिद्धियों की निम्पत्ति एक साथ वतला दी गई इसलिए यहाँ कार्यकारण-पौर्वापर्य विपर्ययात्मिका अतिशयोकि है। दूसरा उदाहरण यथा- 'उसने भाग्यों के साथ उत्पन, प्रजाओों के साथ लालित, पुण्यों के साथ वर्षित अर्णोराज को जन्म दिया।' -नान्यों की उत्पत्ति व्यक्ति की उत्पत्ति के बाद होती है किन्तु दोनों की उत्पत्ति एक साथ वतला दी गई है इसलिए यहाँ क्रमिक वस्तुओं में समकालिकता [ से निष्पन्न अतिशयोकि ] हुई। यह शुद्धतामान्यरूप भी होती है। यथा- 'मलयानिलेन सद सीरमवासितेन दयितानाम्। वर्धन्ते वहलतुकुमारपरिमला श्वासनिकुरम्बाः॥' -नौरम से वासित मलयानिल नो साथ प्रियाजनों के पर्याप्त सुकुमार सुगन्ध से युक श्वासपुंज नढते जा रहे हँ।' यहां सौरम और परिमल =सुगन्ध शुद्धसामान्यस्वरूप हैं। विम्नप्रतिविम्वभाव का उदा- हरण यह है- 'दिनकरकर-निकुरम्ाः कनकाचल-कटक-रेणु-विस्फुरिताः । विकसन्ति परिमलभरोदमटैः कमलाकरैः सार्धन् ॥' --- सुवर्ण गिरि सुमेर के नृद्ों की धूल में सनी सूर्य की सहस्-सहस् किरणें परागपुंज से छद्टट कमलों के साथ विकसित हो रही हैँ।' -यहाँ सुदर्णगिरि के शरृंगों की धूछ में सनना [ कनकाचलकटकरेणुविच्छुरितत्व ] और परागपुंज से उद्वट होना [ परिमलमरोद्मटत्व] इनका निर्देश विम्वन्रतिविन्दभाव के -साथ है[ कर्योकि इन में वर्णगत सादृश्य है ]। विमर्श :- सहोकि का पूर्व इतिहास :- भामह ='तुत्यकाले क्िये यत्र वस्तुद्वयसमाश्रये। मदेनेकेन कथ्येते सा सहोकिमंता सताम्॥ -जहाँ एक पद के द्वारा ऐसी दो करियाऐ कही जाँय जो दो भिन्न वस्तुओं में रहती हों और समानकालिक हो वहाँ सदोकि होती है। उदाहरण = वृद्धिमायान्ति यामिन्य: कामिनां प्रीतिमि: सह। --- [ ठंढ में ] रात्रियां कामिजनों की प्राति के साथ बढ़ती जा रही हैं।' यहां रात्रि और प्रीति दोनों की वृद्धि एक साथ होती है और उसे एक ही क्रियापद से कहा जा रहा है। वामन-[ सूत्र ] वस्तुद्दयक्रिययोस्तुल्यकालयोरेकपदामिधानं सहोि:। [ वृत्ति] वस्तुदयत्य क्रिययोस्तुल्यकालयोरेकेन पदेनाभिधानं सहार्थसामर्थ्यात सहोकि। -दो पदार्थों की समानकालिक क्रियाओं का यदि एक ही शब्द के द्वारा 'सह' शब्द के अर्थ के बल पर हो तो सह्दोकि। उदाहरण-'अस्तं भास्वान् प्रयातः सह रिपुमिरयम्०।'
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३०४ अलङ्गारसर्वस्वम्
इम प्रकार वामन ने भामद की ही सहाकिकारिका को सुत्र रूप दे दिया है इतना अवश्य है कि वृत्ति में उन्होंने सहोकिशन्द की सार्थकना बनलाने के लिए 'सहोकिसाम्थ्य' का भौ उल्लेख कर दिया है। अरकारसननंस्वकार ने इलेयमूक अभेदाध्यवसाय से निम्पन्न महोक्ति के लिए वामन के ही इम उदाहरण को प्रस्तन किया है। उन्ट-उद्ट ने भी वामन के ही समान भामह की दो सहोकिकारिका को- 'तुल्यकाले किये यत्र वस्तुदयसमायिते। पदेनैकेन कथ्येंन सा सहोकिर्मना सनाभ्।। -इस प्रकार प्राय ज्यों का क्यों अपना दिया है। उद्ाहरण के रूप में उम्होंने अल्कार- सर्वर्वकार द्वारा नमें भाहित्य के उदाहरण के रूप में अपनाया गया पद् 'अुजनो०' ही दिया है। रदट-मामह से उद्ट तक सहोकि उपमानोपमेयमाव की चर्चा नहीं थी। न तो उसमें नेद ही किए गए थे। रुद्ट ने उसमें अधिक सरम्म दिखलाया, और सहोकि को निम्नलिसिन रुपों में प्रस्तुन किया- वास्तव वर्गीय- [१]-'भवति यथारूपोञ्र्थ कुर्बन्नेवापर तथाभूतम्। टक्तिस्तस्य समाना नेन सम या सहोकि सा ।७।१३ -- एक अर्थ अपने जैसे किसी दूसरे अर्थ का वस्तुत हो तो निर्माता [कारण ] किन्तु उन दोनों की उत्पत्ति समान रूप से एक साथ बनला दी जाय नो सहोकि।' यथा क्षं ससे। क याम सकन् जगन्मन्मथेन सद नत्यम:। प्रतिदिनमुपैति वृद्धि कुचकलशनिनम्वमित्तिमर: । -मित्र! बड़ा कष है। आसिर कहाँ बाय१ उसके कुचकुम्म और नितम्वमिति रोज रोज दढते जा रहे है और मकेले नहीं सारे ससार को मय डालने वाले मन्नय के साथ।' -- यहाँ नायिका के अर्गों को वृद्धि कामवृद्धि का कारण है किन्तु उनकी उत्पत्ति साथ होती हुई बतनाई गई है। [२]'यो या यैन कियने तथैव भवता च नेन तस्थापि। अमिधान यव कियते समानमन्या सरोकि: सा॥ श१५॥ -साधारण्यमेयुक कार्यकारण की सदोत्पति वतनाना भी एक अन्य सदोकि होती है। यथा-'भरदूपराधे सार्धम्'-पूर्णपथ- [३]अन्योन्यं निरपेक्षी यावर्थविककालमेकविषौ। मवनस्तत्कपनं यव सापि सहोति किलेत्यारे॥' -अन्य आचार्य [भामह, वामन, उन्भट] उसे भी सहोकि मानने है जिसमें दो ऐसे अर्थ तो[ पूर्व उदाहरणों में आए अर्थो के समान परस्पर कार्यकारणभाव आदि से सबद्ध न होकर सवंधा] निरपेक्ष दोते और एक ही समय में किसी एक किया में अन्वित होते है। उदाइरण- 'कुमुदद लै:०' पूर्गपद। इन्हीं नोन मेदों में से प्रथम दो भेदों में सवस्वकार ने कार्यकारणपीयपरयविषययातिमका अनिशयोकि पर निर्मर सदोकिमानी है और तृनीय में शुद्धाभेदाध्यवसानातिमका अवघयोकि पर निर्मर सहोकि। प्रथम और दितीय पद्य में उन्हें कोईं विशेष अन्तर नहों दिखाई दिया- कदाचिव इसीलिए उन्होंने उसे छोड शेष दोनों भेवों के उदाहरण भी रुद्रढ से अपना लिए।
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सहोक्त्यलद्ठारः ३०५
यह सन है कि सुद्रट ने जो लक्षणकारिकाएं बनाई हैं वे पहले जैसी मव्यक्तार्य और दुरूह हो मई है। [२] औपम्यवर्गीय - [१]'सा हि सह्ोकिर्येत्यां प्रसिद्धदूराधिककियो योडर्यः। तत्य समानकिय इति कथ्येतान्य: समं तेन ।।' ८।९९ '-जहाँ अधिक सामथ्येवान् वस्तु को उससे कम सामर्थ्य वाली वस्तु के साथ-साथ समान दतलाया जाय वह सद्दोकि।' यथा- 'सपदि मधो निजसदनं मनसा सह यान्त्यमी पथिकाः !' -वसन्त में ये पथिक मनके साथ अपने घर की और चल पड़े हैं। यहां गमनक्रिया में मन और पथिकों का साथ-साथ सम्बन्ध वतलाया जा रहा है जब कि मन तीनगति के लिए अनुपम होता है। [२] यतैककर्त का स्वादनेककर्माभिता करिया तत्र। कच्येतापरसहितं कर्मैकं सेयमन्या स्यात् ॥ ८।०१। -जहाँ किसी क्रिया का कर्ता एक हो किन्तु कर्म अनेक, और अनेक कर्मों में भी अन्य कर्मों को किरसी एक प्रधान कर्मे के साथ बतलाया जाय वह भी एक सह्ोकि होती है।' यषा- 'स लां विभतति हृदये गुरुभिरसंख्यै मनोरयै: सार्थन्॥।3 -'सखि! वह तुझे अनेक बड़े-बड़े मनोरथों के साथ हृदय में धारण किये हुए है।' यदा 'धारण करना' किया में कर्ता तो एक ही है किन्तु कर्म नायिका और मनोरय है। उनमें भी मनो- रथों को नायिका के साथ लगाकर प्रस्तुत किया है। नमिसाधु ने वास्तववर्गीय सदोकि का औपम्यवर्गीय सहोति से भेद करते हुए कहा है कि वास्तववर्नीय में सादृश्य नहीं रदता और औपम्यवर्गीय में कार्यकारणभाव। सर्वस्वकार ने सद के तब भेदों को औपन्यमूलक मान किया है। स्पष्ट है कि सर्वस्वकार का सहोक्तिविवेचन शतशः स्ट्रट के अतिशयोकिविवेचन पर निर्मर है। मम्मट रुद्रट का यह विश्लेपण ठीक से नहीं अपना सके। सम्मट :- 'सा सहोकि: सहार्थस्य वलादेकं द्विवाचकम्। -'सहोकि वह जहाँ सहार्थसह शब्द के अर्थ के दल पर एक पद दो पदार्थों का प्रतियादक हो।' यथा- 'सद् दिवसनिशीषेदीर्घा: श्वासदण्डाः । रवासदण्ड दिन और रात के साथ लम्बे बनते जा रहे हैं। मम्मट के सद्दोकि लक्षण में रुद्रट की विघिधता तो नहीं है किन्तु उसमें पूर्ववर्तती सभी आचार्यों कोससी कभी भी नहीं है। प्राचीन आचार्यों ने लक्षण में 'सह'-'साथ' शब्द नहीं दिए थे। उसके बिना वे सहोकि को दीपक आदि से भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते। 'सह' = 'साथ' शब्द के भर्थ के द्वारा जो अर्थो में प्रधानता और अप्- घानता आती है वही वस्तुतः सहोकि का अन्य तत्तदृश अलंकारों से भेदक है। यह एक ध्यान देने की बात है कि मम्मट ने सहोकि को सादृश्यमूलक नहीं वतलाया है। परवर्ती आचार्यों में- शोभाकर ने-'सहार्थबलादेकस्यानेकसंबन्धे सहोकि:"-यह लक्षण कर मम्मद का ठीक अनुसरण किया है। इन्होंने सहोकि को न केवल अतिययोकिपर ही अपितु तुत्य- योगिता पर भी निर्भेर बतलाया है। मम्मट के सहोकि उदाहरण में उन्होंने विनोकि का संस्पर्श बतलाया है।
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३०६ अलङ्कारसवस्वम्
अप्पवदीषषित-ने चित्रमीमोसा में तो महोकि पर वरिवार नहं हो किया, कुबलया- नन्द में भी उस पर अत्यन्त ही थोडा विचार किया है- 'सहोकि: सदमावश्चेद् मासते जनरजनः। दिगन्तमगमत नत्य कीर्ति प्रत्ययिमि सद।। -सहोकि वह जिसमें सुन्दर सहमाव मासित हो। यथा-आपकी कीर्ति आपके शत्रुओं के साथ दिगन्त चली गई है। पण्दितराज ने अवश्य रुद्रट और सवस्वकार के पश्चाद पहिली बार सहोकि पर सरम्भ दिखलाया है। उनका विवेचन इम प्रकार है-
-प्रषानता तथा अप्रधानता से युक्त सह शब्द के अर्थ से सम्वन्ध का नाम सह्ोकि। यह एक प्रकार से सर्वस्त्र के ही लक्षण का परिष्कार है। पण्डितराज ने सदोकि को सर्वस्वकार के ही समान अतिशयोकिमूलक माना है। उसमें कर्तसारित्य और कर्मसाहित्य का भी प्रतिपादन किया है। सददोकि को शब्द भी माना है किन्तु आर्य मी बवलया है। किन्तु आर्य कहकर उन्हें वैयाकरणों से झगटना पडा है जिसमें उन्होंने अपनी सहज स्वच्छन्दता दिखलाई है और इसीलिए उन्हें अपने वैयाकरण टीकाकार नागेश के दश सहने पडे हैं। पण्डितराज ने एक नवीन प्रश्न उठाया है और कहा है कि सहोकि अविशयोंकि में दी अन्तर्भूत कर दो जानी चाहिए। उनहोंने कारणकार्यविपययमूलक मतिशवयोकि से युक गुणप्रवान- भाव में चमत्कार का कारण अतिशयोकि को हो माना है। इसका पामाण्य सहृदय की अनुभूति पर निर्मर है। कदाचिन इसीलिए विश्वेशवर ने ऐेसा कोई प्रदन नहीं उठाया है। स्वस्वकार ने सरोळििलक्षण में उपमानोपमेयभाव को स्थान देकर उसमें सादृश्य को मनावश्यक रूप से सोंचना चाहा है। वह वस्तुन अमान्य है। संजीविनीकार ने सहोकि का सक्षेप इस प्रकार किया है- 'गुणप्रधानमावी य. शाब्दरनेन मिदोस्कटा। सश्नितातिशयोकि च सहोकि: समयोमेंता।।1 -यदि पधानता और अपधानता का घोतन शब्द द्वारा हो फलत उसमे जिसमें भेद की प्रधानता सिद्ध हो, ऐसी अतिशयोक्ति पर आश्रित यह दो समान पदार्थो की सद-शब्दार्थ द्वारा की गई उक्ति सहोकि कइलाती है। [सर्वस्व] सहोक्तिप्रतिभटभूतां विनोकि लक्षयति- [ सू. २८] बिना किचिदन्यस्य सदसच्चामावो विनोक्ति: । सत्वस्य शोभनत्वस्याभावोऽशोभनत्वम्। एवमसत्वस्याशोभनत्वस्या भावा शोभनत्वम्। ते द्वे सत्वासत्वे यत् कस्यचिद्संनियानान्नियध्येते सा द्विधा बिनोकि:। अन्र व शोभनत्वाशोभनत्वसत्तायामेव वक्तव्यायामसच्ता. मुसेनामिधानमन्यनिवृत्तिप्रयुक्ता तन्नितृत्तिरिति स्यापनार्थम्। एवं चान्या- निवृत्ती विधिरेव प्रकाशितो भवति। आदया यथा- 'विनयेन बिना का श्रीः का निशा शशिना बिना। रदिता सत्कवित्वेन कीशी वाग्विदग्धता।।'
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विनोक्त्यलङ्कार: ३०७
[वृत्ति] मव सहोक्ति से उलटी विनोकि का रक्षण करते हैं- [सू० ३१]*किसी [अन्य] के बिना [ किसी] अन्य में सच्च या असत्व का अभाव [बतलाया जाना चमत्कारी हो तो ] विनोकि। [वृत्ति] सत्न= शोभनता, उसका अमाव = मशोभनता। इसी प्रकार असत्त्व =अशोभनता - अमान = शोमनता। [ विनोकि में] से दोनों सत्व और असत्व किसो [अन्य] के असननिधान से उत्मन्न बतलाए जाते हैं अतः यह विनोकि दो प्रकार की होती है। यहां प्रतिषाद्य तो रहता है शोमनत्व और मशोभनत्व का सद्वाव ही तथापि उसका प्रतिपादन अभाव के माध्यम से किया जाता है, यह इसलिए कि यह प्रतीति हो सकें कि उसका अभाव किसी अन्य के कारण है, सवतः नहीं। और इस प्रकार यदि किसी अन्य का अभाव प्तीत न हो तो अन्य का सद्भाव मी प्रतिपादित हो जाता है। इन्में से प्रथम विनोकि यथा- 'नननता के बिना थी कैसी? चन्द्रमा के विना रात्रि कैसी? सत्कवित्व के बिना वाणी की विदग्धता कैसी ?॥ -यहाँ विनय आदि के समाव के कारण सी आदि का अमाव चतलाया गया और इस प्रकार [श्री आदि में ] मशोमनता का प्रतिमादन किया गया। विमर्शिनी प्रतिभटभूतामिति प्रतिपच्भूताम् । अत एवैतदनन्तरमेतल्लप्षगम्। तदेवाह-विना- किचिदित्यादि। एतदेव व्याचष्टे-सत्त्वत्येत्यादिना। कत्यचिदिति यत्र यादशो विवष्षितस्तस्येति। नतु चात्र सत्वासरव्रदोर्विधि मुखेनैव वाच्यत्वे किमिति पतीतिवैपम्पदायिना निषेधमुखेन निर्देशः कृछ इत्याश- प्वचाह-अत्र चेत्यादि। तच्छव्देन सत्वासत्वयोः प्रत्यवमर्शः। अन्यनिवृत्तिप्युक्ेन तत्षितृत्तिषयापनेनापि कि भवतीत्याशङ््याह - एवं चेत्यादिना। अन्यस्य कस्यचिदनिवृत्ती सत्वमसत्वमेव वा भवतीत्यर्षः। आद्येति असत्वनिव- न्धनोकि:।का श्रीर्न काविच्छीरिति थ्रियो विरहोसदवावः । विनयासन्नावेऽपि त्रियोड सन्वावोऽस्तीत्येतद भिधानं प्ियोऽपत्वे पर्यवस्यतीति विनयनिवृत्तिप्रयुक्तं त्रियोऽसत्- मुकतम्। एवं विनयस्यानिवृत्ती प्रियः सत्त एव विधि: प्रकाशितो भवतीति विनय एुव भग्वन्धः कार्यः। एवमन्यव्रापि ज्ञेयम्। अन्ये ात्र वारतवतवं मन्यमाना :- 'तस्थाः शेत्यं बिना ज्योक्स्ना पुप्पद्िः सीरभं बिना। विनोष्णतवं च हुतभुक्तवां विना अतिभासते।' इत्यत्र विनोक्त्यलंकारतवमाहुः। अत्रहि उपोत्तादीना सैत्यादिना नित्यमविनाभावेपि विनाभाव उपनिबद्ध: । यदाहालंकार भाष्यकार :- "निश्यसंवद्धानामसंबन्धवचन विनोक्ति' हति विनोकिरूपसंख्यास्यते" इति। ग्रन्थव्वता पुनरियं चिरंतनलक्षितख्ा- ललचषिता। प्रतिमटभूता = उलटी=विरुद्ध। इसी कारण इस [सहोकि] के लक्षग के बाद इस [चिनोकि] का लक्षण रखा जा रहा है। यह लक्षग वतलाते है-'बिना किचि३०। इसी की व्याख्या करते हैं सत्वत्य इत्यादि के द्वारा। कस्यचित=किसी के=जो अर्थ जहाँ जिस प्कार का विवक्षित हो उसके। चहां प्रश्न उठता है-यदि वहां सत और अवत्व का प्रतिपादन सङ्ा
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०८ अल््रङ्कारसर्वस्त्रम्
यात्मिक रूप से ही विवक्षिन है तो फिर प्रतीति में विपरीनना लाने वाले निषेध के द्वारा इसकी प्रवोति क्यों कराई जाती है, इमके उत्तर में कहते है-'अन्न च'-इत्यादि। 'तब = तन्निवृत्ति-' में आाया तव शब्द सत्वासत्व के लिए है। शका होती है कि भने ही किमी वस्तु का सभाव अन्य किसी वम्तु के अभाव के माध्यम से प्रतिपादित किया जाय, उसमे लाम कया है। इस पर उपर देते है-'एव च= इस पकार।' अन्य की निवृति न होने पर शोभनता या अश्ञोभनता को जैमी रहती है उसकी उसी रूप में प्रनीति होती है। आद्या= प्रथम=ऐसी बिनोकि जिसमे अशोभनता प्रतीत होती छो। ['विनयेन विना'-पघ में] 'का थ्रीः= श्री कैसी'-का अर्थ निकलता है 'किसी भी प्रकार की शी नहीं'। इस प्रकार थ का अभाव प्रतीन हुआ जो मनोमन है। 'विनय न होने पर भी भी का अमाव ही रहता है। ऐसा कहने से 'श्री' की अशोमनना निकलती है। इस प्रकार श्री की अशोमनना विनय के अभाव में प्रतिपादिन की गई। यदि विनय का अभाव न हो तो थी में निषेधात्मक सशोभनता से उलटी विध्यात्मक शोमनता हो प्रतीत होती है। इस प्रकार श्री की शोमनता अशोमनता का मारा भार विनय के अस्निलव अनस्तित्व पर निर्भर है। अन्य स्थलों में भी ऐमी ही योजना करनी चाहिए। [अवंकाररत्नाकरकार आदि ] युछ आचार्ये विनोकि को वास्नविकना पर भी निर्मर मानते हे और वे- 'तुम्हारे बिना इस [बेचारी] को चाँदनी बिना शौतलता की मनीति होनी दै, पुष्पसमुदाय [थयवा वसन्त ] बिना सुगन्ध का, और अग्नि बिना ऊष्मा की।' -ऐसे स्थलों में विनोकि को अरंकार मानते हैं। चाँदनी आदि शीतलना आदि मे कभी भी अलग नहीं रहती तयापि यहाँ सन्हें उनसे अलग बतलाया गया है। जैसा कि अलकार* भाष्यकार ने [भी] वहा है-'नित्यसम्वद्वानामसम्वन्धवचन बिनोकि:' ='नित्य सम्बद्ध पदार्थो में सम्वन्ध का अमाव वतलना बिनोकि कहलाता है'। यह विनोकि मौ भागे बतलानेंगे। अन्यकार ने नो यह [ 'विनयेन०' आदि पद में ऊपर निर्दिष्ट] विनौकि मर यहाँ बनलाई है यइ इसलिए कि पचीन आाचार्ये [मम्मट] ने इसी भेद को विनोकि के रूप में प्रस्तुन किया है। [सर्चस्व ] अन्न विनाशव्द्मन्तरेणापि विनार्थविवक्षा यथाकर्धचिन्निमित्तीभवति यथा सद्दोकौ सहार्थविवक्षा।एवं च- 'मिरर्थक जम्म गरत नलिन्या यया न हष्ट तुदिनांशुविम्बम्। उत्पचिरिन्दोरपि निष्फलैव न येन दष्टा नलिनी प्रयुद्धा।' इत्यादौ विनोक्ितरेय । तुदिनांशुदर्शनं नलिनीजन्मनो5शोभनत्वपतीते:। इयं च परस्परविनोकिमकथा चमत्कारातिशयकत्। यथोदाहते घिपये। यहाँ बिना शब्द के अमाव में भी बिना शब्द के सर्थ की विक्या भी ठोक उमी प्रकार दिस किसी प्रकार कारण बन घाती है जिस प्रकार महोकि में [ सह शब्द के अभाव में भी] सहसम्द के अर्थ की विवशा। और इम पकार- 'उस कमलिनी का जन्म निप्फल ही वीत गया जिमने चन्द्रमा का विम्व नहीं देख। और चन्द्रमा का जन्म मी निफल ही रहा जिसने प्रयुद्ध कमलिती को नहीं देखा।' -हत्यादि स्थलों में बिनोकि दी सल्कार माना जारगा। बिनोकि तब अधिक चमत्कारक होती है नब उसमें दो पदार्थों में एक दूसरे के अमाव से पर- रपर में शोभनत्व और अगोमनत्व मतर्नया जात है। ैसे उदाइत [निरर्भक०] पद के स्थक में।
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विमर्शिनी चथाकर्थचिदिति। यद्यपि यधा सहशर्ब्द विनापि सहाये तृतीयार्ति तथा चिनाशव्द विनापि द्वितीचादीनां विनार्थे सज्वावोडस्ति, तथापि वाक्यार्थपर्यालोचनसामर्व्यात्तदर्थ: पर्यवस्थतीत्यस्य भावः। सहशब्दं विनापि सहार्थविवता यथा- 'विवृण्वता सौरभरोरदोषं बन्दिवतं वर्णगुणैः स्पशनथा। विकस्वरे कस्य न कर्णिकारे घ्राणेन दष्टेववृधे विवाद:॥' अन्न व्ाणेन सहेति तरप्रयोगं बिना तर्मतीतावेव विश्रान्ते। एवं चेवि। यस्माद विनाशब्दं विनापि तदर्थविवका भवतीत्यर्थः। यथोदाहृत इति निरथकमित्यादी। यथा वा- हंसाण सरेहिं विणा सराण सोहाविणा ण इंसेहिं। अण्णोष्णं चिन एए अप्पाण पवरं गरूपंति।।' यथाकरथंचित् = जिस किसी प्रकार अर्थाव यद्यपि जैसे सदशन्द के विना भी सद सर्थ में तृतीया हो जाती है वैसे हो बिना शब्द के बिना भो बिना के अर्थ में द्वितीया आदि होती हैं तथापि उनका सर्थं वाक्यार्थे के पर्यालोचन के दल पर निकलता है। सहशव्द के बिना मी सहशब्द के अर्थ की विवक्षा का उदाहरण यथा- 'कणिकार [अमलताश] के फूक उठने पर ऐसा कौन व्यक्ति या जिसकी दृष्टि का उसकी नासिका से विवाद न हो रहा हो। दृष्टि उसके सुवर्णोपम वर्णे की बन्दी चनी हुई थी सौर नासिका उसमें गन्ध का दारिद्रय बतला रही थी।' [ मंखकृत श्रोकष्ठ- चरित, इसी पद्य पर मह को 'कर्णिकार मेख' नाम दिया गया था] -- यहाँ चद्यमि 'सह' शब्द का प्रयोग नहीं है तथापि प्राणपद में प्रयुत्त तृतीया विभक्ति उसी अर्थ में पर्यवसित होती है। एवंच=औौर इस प्रकार अर्थात जन कि बिना शब्द के अर्थ की विवक्षा बिना शब्द के बिना मी संभव होती है तब। यथा उदाहृत = 'निरर्थकं' पद्यार्थ में। दूसरा उदादरण यह हो सकता है- 'इंसानां सरोभिविना सरसां शोमा बिना च हंसैः। अन्योन्यं चैवेते भात्मानं केवलं गरयन्ति॥1 -इंसों की कोमा सरोबरों के बिना नहीं होती और न तो सरोवरों की ही शोभा हंसों के बिना। ये दोनों केवल आपस में एक दूसरे को समृद् बनाते हैं। [सर्वस्व ] द्वितीया यथा- 'मृगलोचनया विना विचिन्रव्यवहारप्नतिभाप्रभामगल्मः। अमृतद्युतिसुन्दराशयोऽयं सुहदा तेन विना नरेन्द्रसूनु:।' अव्ाशोभनत्वाभाव: शोभनपदार्थप्रक्षेपभङ्गयोक्त:। सैपा द्विषा विनोकि:। द्वितीय [बिनोकि ] यथा -- 'यह राजकुमार उस सन्दरो के बिना माँति माँति के व्यवदार की प्रतिभा की प्रभा से प्रगश्म रहता है। इसी प्रकार उस मिन्र के चिना यह हृदय से चन्द्रमा के समान उज्जवल रहा आता है।'-यहाँ अशोमनत्व का अभाव शोनन पदार्थ की उत्ति के द्वारा वतलाया गया है। इस प्रकार वह विनोकि दो प्रकार की हुई।
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३१० अलद्कारसवस्वम्
विमर्शिनी द्वितीयेति शोभनत्वनिवन्धनोकि:। द्िवीय विनोकि=शोमनता में पर्यवसित होने वाली विनोकि। विमशं .- विनोकि का पूर्व इतिहास-विनोकि का प्रतिपादन प्रथम बार मम्मट ने ही किया है। मामह, वामन, उद्र, रदरट तथा मोज के ग्रन्थों में यह नहीं मिलती। मम्मट ने इसका निरूपण इस प्रकार किया है- "चिनोकि सा विनान्मेन यतान्य सन्न नेतर:। -नहाँ अन्य के विना अन्य शोमन न हो अथवा अशोमन न हो वह़ विनोकि। मशोभनत का चदाहरण- अरुचिनिरया बिना पशी पशिना सापि विना महत्तम,। उमयेन विना मनोभवसपुरित नेव चकास्नि कामिनोः॥' -- राभि के विना चन्द्रमा में कोई सौन्दर्य नहीं रहता और रानि मी चन्द्रमा के विना धोर सम मिद्ध होतो है। इन दोनों के बिना कामिजनों में काम का स्पुरण नहीं रुचता । मम्मट का यह उदाहरण अन्योन्य विनोक्ति का स्थल माना जा सकता है। दूसरा शोभनस का उदाहरण-'मृगलोचनया०' पद्य। परवर्त्ती आचार्यों में अलंकाररव्ना करकार ने विनोविति को सदोवित के पहिले रखा है और उसका लक्षण यह किया है- [सूत्र ] 'विना कचित सदसतवे बिनोकि।।४१। [सूचि] केनचिद् बिना कस्यचिद् असन्निधानेरऽर्यान्तरस्य सख शोभनतम् असस्वमश्ञोमनतवं वा बिनोकि:। -- किसी के बिना अर्थात किसी के असन्निधान में अन्य किसी अर्थे का सतत्व =शोमनत्व या असत्व = अश्योभनत्व दिनोकि। रस्नाकरकार ने विनोकि को शान्द और र्थे दो भागों बाँटा है। प्रथम के उदाहरण के रूप में शोमनत्व के लिए तो रत्नाकरकार ने भी 'मृगलोचनया0' पद् ही प्रस्तुत किया है किन्तु द्वितीय के लिए- 'स्वामी पिशुनतिमुक्तो मात्सयरहित कविस्नया लोके। विषधरशूत्योऽि निि: माध्यते पूर्णपुण्ये।।' -चुगठखोरों से रहित स्वामी, मात्सर्य से रदित कचि और स्प से रदित निधि पूरे पुण्यों से प्राप्त होते है।'-यह उदाहरण दिया है जिसमें विनोकिन का आधार ठीक उसी प्रकार वास्तविकता है जिस प्रकार 'तस्या- स्षैत्य बिना ज्योत्स्ना' इस स्थल में। विक्रमाकदेवचरित का ४।१२०-पत्यवनं मधुनेव' पद्य रस्नाकरकार ने बिना शब्द के अभाव के व्दाहरण के रूप में दिया है। यह पद सर्वस्व की भी कुछ पाण्टुपनियों में मिलनता है किन्तु नयरय और विद्या चकव्नी इसका कोई उल्लेस नहीं करने। कदाचिद रत्नाकर के तुलनात्मक अध्ययन में कगे किसी विद्वान ने अपनी हसतलखित प्रति में उसे जोड लिया होगा। रस्नाकरकार ने विनोकति को सम, विषम और प्रतिवस्नूष्मा अरकारों पर निर्भर माना है। विनोक्ति को अप्पदादीक्षित ने केवल कुण्वयानन्द में हो बतलाया है किन्तु खाश नहीं। पण्टितराज ने विनोक्ति का लक्षण 'विनारशसम्बन्ध'-माच किया है, भर्यात उसमें विनाऊन वस्तु की रमणीयता या अरमणीयता का निवेश नहीं किया और दीपक, प्रतिवस्ूप्मा तथा इलेपमूसक
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विनोकत्यलह्कारः ३११
उपमा को सहायक वतलाते हुए, 'निर्थक जन्म' पद्य में विनोकित की छवनि मानी है। इस पद्य का चतुर्थ चरण इनके रसगंगाधर में ऐसा है-'कृता विनिद्रा नलिनीन येन'। कोशतभकार विश्वेशर ने विनोकि का लक्षण पूर्ववर्त्ती आचार्यों के ही अनुसार इस प्रकार किया है- 'वत्रान्येन विनान्योडसाधु: सन् वा बिनोकि: सा।' -जहाँ अन्य के बिना अन्य शोभन या मशोभन हो वहाँ विनोकि। मलंकारभाव्य का जो वचन विमर्दिनीकार ने उद्भृत किया है उसको पण्हितराज तथा विश्वेम्र पण्टित ने भी उद्धुत किया है और वहीं अरुचि व्यक्त की है जो स्वयं विमर्शिनीकार ने की है। इन तीनों ने वास्तविकता पर निर्भर विनोवित को अरंकार मानना अवेश्ानिक वतलाया है। प्राचीन आलंकारिकों द्वारा विनोक्ति को अलंकाररूप से न गिनने में हेतु सोचते हुए रत्नाकर- कार ने कहा था कि-'इसमें चमस्कार स्वतः का नहीं अन्य अलंकारों का रहता है'-ऐेसा मानकर ही कदाचित अन्य आचार्य इसे स्वतन्त्र अलंकार नहीं मानने। वस्तुतः इसमें चमरकार 'विनामान' से निप्पन्न होता है इसलिए इसे अन्य अलंकारों में अन्तर्भूत मानना अनुमवविरुद्ध है। पण्ढितराज जगन्नाथ ने भी कदाचित इन्हीं त्कों पर विनोषित की स्वतन्त्रता का मौन समर्धन किया है। उन्होने लिखा है- 'अलक्कारान्तर समालिङ्गनाविर्भृतमेवास्या हृद्यत्वन्, न रवतः, तेनालक्कारान्तरत्वमपि शिथिल- मेवेत्यपि वदन्ति।' - सर्थात्- 'इसमें चमत्कार दूसरे अलंकारों के योग से ही आता है, सवतः नहीं, इस कारण इसे स्वतन्त्र अटंकार मानना भी शिमिल ही है-'ऐसा भी कुछ लोग कहते है।' सष्ट ही उन्होंने-'कुछ लोग' कइकर मपनी असमति व्यक्त कर दी है। विनोक्ति पर हुए इस आक्षेप के पति उनकी असंमति इससे भी स्पष् ई कि यह पक्ष उन्होंने विनोक्ति के उपसंहार में सूचित किया है वह भी अलंकार- भाष्य के उपर्युक्त मत के पश्चात। असंकारकौस्तुमकार ने भी इस पक्ष को अमान्य वसलाया है। स्पष्ट ही विनोक्ति में 'विनाभाव'-का एक स्वतन्त्र चमत्कार रहता है इसलिए इसे सम, वियम, दीपक, प्रतिवस्तृपमा, उपमा या पर्यायोक्त आदि में अन्तर्भूत करना उचित नहीं है। इस प्रकार सर्वस्वकार ने भेद की प्रधानता पर निर्मर व्यतिरिक, सहोक्ति और विनोषित इन तीन अलंकारों का निरूपण किया। वस्तुतः इनमें प्रथम दो ही भेद प्रधान माने है। विनोक्ति तो केवल इसलिए बतला दी गई है कि वह सदोकित से ठीक उलटी किन्तु चमत्ारक अमिव्यक्ति है। संजीविनीकार ने विनोकित के सर्वस्वकारकृत इस संपूर्ण निवेचन का सारसक्षेप इस प्रकार किया है- 'सदसतनिवृ चिश्रेनिवृत्त्यान्यस्य व्ण्यते। तदा द्विया मिनोकिति: स्याद विधिरन फलुं भवेद ।।' '-अन्य की निवृत्ति से यदि अन्य के शोभनत्व और अशोभनत्व की निवृत्ति बतलाई आए तो वह दो प्रकार की विनोषित होती है। इसमें फल रहता है विधि।' [सर्वस्व] अधुना विशेषणविच्छित्याश्रयेणालंकारद्वयसुच्यते। तवादौ विशेषण साम्यावप्टम्भेन समासोकिमाह-
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[सू० ३२] विशेषणानां साम्यादप्रस्तुतस्य गम्यत्वे समामोक्ति:। इद्द प्रम्तुतामस्तुतानां क्चिद् वाच्यत्वं क्वचिद् गम्यत्वमिति द्वैविध्यम्। वाव्यत्वं च श्लेपनिर्देशभद्गया पृथगुपादानेन वेत्यपि द्वैविष्यम्। पतद् द्विभेद्मपि श्लेपालंकारस्य विषयः। गम्यत्वं तु प्रस्तुतनिष्ठमप्रस्तुतप्रशंसा- विपयः अप्रस्तुतनिष्ठं तु समासोकतिविपयः। तत्र च निमित्तं विशेषण साम्यम्। विशेष्यस्यापि साम्ये श्लेपपाप्तेः। विशेषणसाम्याद्दि प्रतीय- मानप्रस्तुतं प्रस्तुतावच्छेद्कत्वेन प्रतीयते। अवच्छेदकत्वं व व्यवारसमा- रोपः। रुपसमारोपे त्ववच्छादितत्वेन प्रकृतस्य तद्वपरुपित्वाद् रूपकमेव। [भेदप्रधान अलकारों का निरूपण करने के पश्चात ] अर ['समासोकि और परिकर' इन ] दो अल्कारों का विवेचन करते है जिननें चमत्कार [ समास और साभिप्राय ] विशेषणों पर निर्भर रदता है। इन दोनों में विशेषगगत समानना [दोनों पक्षों में अन्वित होने की क्षमता अतः रिवटता] को लेकर निष्पन्न होने वाले [और इमीलिए परिकर की अपेक्षा अधिक चमतकारक ] समासोक्ति का निरूपण पदले करते हैं- [ सूत्र २२][केवल ] विशेषणों के साम्य [=श्लेप] से यदि अप्रस्तुन गम्म हो तो समासोछि॥ [सृचि ] यहां [ अलंकारो में ] प्रस्तुत और अपस्तुन का निर्देश दो प्रकार से किया जाता है (१) वाच्यरूप से और (२) गम्यरूप से। जो निर्देश वाच्यरूप से किया जाता है वह भी दो प्रकार का होता है (१) इनप द्वारा और (२) अलग अलग शम्दों द्वारा। ये दोनों ही प्रकार के वाच्य निर्देकों में अलं्कार इलैप हो माना जाता है। किन्तु जहाँ निर्देश गम्यरूम से रदता है वहौँ यदि वह प्रस्तुत विषयक हो [ सर्थात् प्रस्तुत अर्थ गम्यरूप से प्रतीन हो] तो अलकार होता है-अप्रस्तुतप्रशंसा। और यदि अप्रस्तुतविष्यक हो [अर्थाव अप्रस्तुत अर्थ गन्यरूप से प्रतोत हो] तो अलंकार को समासोक्ति कहा जाता है। इसका निमिच होती है केवल विशेषणों की समानता क्योंकि यदि विशेष्य भी [ प्रकृतापट्टनोमय-] समान हो वो वहों श्लेष हो जाना है। अप्रस्तुन अर्थ जा विशेषग की समानना से गम्रूप में प्रतीत होता है तब वह प्रस्तुन का अवच्छेदक होकर प्रतोत होता है। अवच्छेदक होने का अर्थ है व्यवहार का आरोप, रूप का आरोप नहीं। रूप का आरोप मानने पर तो प्रकृत अर्थ अप्रकृत अर्थ से अवच्छादित हो जपगा और तब वहाँ रूपक होगा। क्योंकि [अपरकृतरूप से अवच्छादित] प्रकृन वहाँ वस्तुन. अप्रकृत के रूप से रूपिन ही होगा। विमर्शिनी तप्ेत्यलारद्यमध्याद। आदाविति मधानतया। अरया हि विशेषणमान्रावष्टरभा- स्परिकराद्विशेपणसाम्यावश्वसतवेन विशिष्टख्वम् । विशेषणेत्यादि। अस्याश्वालंक्ारान्त रेभ्यो विभागं दर्शयितसुपकमते-हददेत्यादिना। वाच्यरवं चात्र दमोः प्रस्तुतयोरपस्तुतयोः प्रस्तुसाप्स्सृतयोश्च भवति । गम्पर्वं पुन' क्रचिश्प्रस्तुतस्य कषिच्चाप्रस्तुतस्य। प्रश्तुताप्रस्तु· नयोह्त न अवति। तादरृप्येण वस्तुसद्भावाभावाद। इलेपनिर्देशभह्गयेति। प्रश्मुतयोरप्रशतुस योश्च । पृथगुपादानेनेति। प्रस्तुतयोरपस्तुतयो. प्रस्तुताप्रस्तुतयोश्चैतद्िति वाच्यम्। अम्र चाप्रस्तुतस्थ किंहेतुकं गम्यवमिष्यसयाह-तत्र चेत्यादि। तन्नेति अप्नस्तुनरय गम्यरे। विशेषयानां चात बहुतमेव विवत्तितमिति न वाच्यम्।
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समासोकत्यलद्कार: ३१३
· 'वसनविपमा रानिज्योरसा तरद्वितविभ्रमा शशिमणिसुवो वाप्याथन्तेनिमीलति पद्मिनी। उपपिततमोमोहा भूमिर्व्यनकि विवर्णतां सदिति गहने दर्श दर्या कर्थं सखि जीव्यते।' हतयत्र विशेषणबहुत्वामावउपि समासोके सल्ावात्। अतश्च विशेषणानां साभ्या दीति न सूत्रणीयम्। अबहुरचे सस्याव्यास्े:। विशेषणला्यमनि कस्मादन्न हेतुखं मजत हत्याशसचाह-विशेपेणेत्यादि। अप्रस्तुनमिति न पुनरप्रस्तुतसर्सां एव। महान्यवर्मिसंब- न्धिनो धर्मा: स्वधमिणमन्तरेणान्यप्रावतिषन्ते। नह्यनाचके नायकधर्माणामम्बययो सुज्यते। अन्यधर्माणामन्यत्रान्वयासंभवाद। अत पवान्यशेप्यमाणोऽ्यवहारोड्यत्न न संमवतीति सदविना मावात्वम्यव हारिगमावरिप तीत्याविप्य माणेनाप्रस्तुतेन धर्मिणेव प्रस्तुतो धर्म्य- वच्छिद्यते न पुनराच्छायते। तथाे हाप्रस्तुतेन प्रस्तुतस्य रुपरूपितत्वादपसमा रोप: स्यान व्यनहारसमारोपः। अस एवाह-प्रस्तुतावच्छेदकतवेनेति। अत एवाप्रस्तुतस्य गभ्यत्वे इति सूव्रितम्। एवं समासोको व्यवहार समारोपादमस्तुतेन प्रस्तुतस्य वेशिट्टय लक्षण मवच्छेदफावं विघ्ीयते। रूपके तु रूपसमारोपादूपरू पितत्वास्यमाच्छादकत्वमित्य- नयोर्मेक्:। तेन 'विशेषणानां साम्यादपस्तुतघर्मावच्छेद' हत्यपास्यार्मखक्षमतुगु्येनैव विशेषणसान्यादप्रस्तुताचच्छेदः समासोफिरि्येव सूत्रणीयम्। अतिशयोकायाशक्ठा पुनरत्र 1 तत्- उन दोनों अलंकारों में से। आएी= पहले, पहले इसलिए कि दोनों में यही प्रधान है। समासोवित जो है, वह परिकर से अधिक महत्व की है कयोंकि परिकर में विशेषण केवल सामिप्राय रहते हैं जब कि समासोत्त में प्रस्तुत के समान अप्रस्तुत अर्थ में मी अन्वित होने योन्य। 'विशेषण'-इत्यादि [तून है]। भव इसका अन्य भलंकारो से भन्तर दिखलाने के किये कहते हूं-'इह=यहाँ-अलंकारों में' हत्यादि। यहाँ वाच्यता तो ऐसे भी दो पदार्थो की होती ह जो केवल प्रस्तुत है, ऐसे भी दो की होती है जो दो केवल अप्रस्तुत हो और ऐेसों की भी जिनमें एक प्रस्तुत हो मौर दूसरा अप्रस्तुत। किन्तु गन्यता कहीं केवल प्रस्तुत की होती है और कही केवल अप्रस्तुत की। प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों एक साथ गम्य नहीं होते। इसलिए ऐसा होना कहीं संभव हो नहीं। इलेपनिर्देशभनचा= इलेप द्वारा निर्देश अर्थात केवल प्रस्तृतों का ही या कवल अगस्तुतों का ही। पृथकउपादान=अलग अवग कथन अर्थाव केवल प्रस्तुतों का, केवल अग्रस्तुतों का या प्रस्तुत और अप्स्तुत दोनों का। 'इस समासोक्ति में जो अप्रस्तुत गम्य रहता है इसका कारण क्या होता है' -- इस पर उतर देते हैं-'तन च'। तन्न =उसमें = अपस्तुत के नन्य होने में। यहाँ यह कोई वाध्यता नहीं है कि विशेषण बहुत ही हों क्योंकि- 'रात समीर से विषम है, चाँदनी तरंग के विभ्रम से बुक है। चन्द्रकान्तमणि की भूमियँ आँसू वहा रही हैं, कमलिनी मुँद रही है, तम की अँधियारी बढ़ जाने से भूमि भी अब विघर्ग होती जा रही है-यह सब जंगल में देख देखकर, है ससित जिस किती प्रकार जिया जा रहा है।' वहाँ आादि में एक एक ही विशेमण है तथापि उनमें [ नायिकाल आदि प्रतीत होने से] समासोकि है। इसलिए [ सर्वसकार और रलाकरकार दोनोंको ] 'विशेषणों की की समानता इस प्रकार सूत्र में विशेषण शब्द के साथ बहुवचन नहीं जोढ़ना चाहिए। इसे जोढ़ने से उस समासोकि में लक्षण लागू नहीं होगा जिसमें विशेषण अनेक नहीं होते। विशेषणसान्य भी यहाँ हेत्र किस कारण बन जाता है-'इस संका पर उत्तर देते हैं- 'विशेषण-'इत्यादि। अ्मस्तुत = अप्रस्तुत भी, न कि अप्रस्तुत के धर्म हो। ब्योंकि जो धर्म किसी अन्य धर्मी में रहते हैँ वे अपने धर्मो को छोड़कर अन्य किसी धर्मीं में नहीं
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पहुँचते। अनायक में नायक के धर्मों का सम्बन्ध ठोक होता मी नहीं। फिर वस्तुस्थिति यह हे कि अन्य के धर्मों का अन्य में सबन्ध सभव भी नहीं है। इस कारण सिद्धान्त यह मानना होता है कि जब मन्य का व्यवहार अन्य में समन नहीं होता तब यदि वह अन्य पर आरोपित किया बाना है तो यह अपने व्यवहारी धमी अर्थात जिसमे यह कभी भी अलग नहीं होता, का भाक्षेप कर लेता है और तब आक्षेप द्वारा प्राप्त यह अप्रस्तुत व्यवदारी=धर्मी प्रश्तुत बयवदारी=धर्मी में निविष्ट होता है; ऐसा नहीं कि प्रस्तुत धर्मों अप्रस्तुत धर्मो से अवच्छादित किया जाता है। क्योंकि अवच्छादिन किए जाने पर तो प्रस्तुन अप्रस्तुन के स्वरूप से रूपित हो जाएगा फलतः वह रूपका आरोप मानना होगा व्यवहार का नहीं। इसी विषय को मनमे रखकर कहते है- 'प्रस्तुतावच्छेदकत्वेन'०। इसोलिम सूत्र में 'अप्रस्तुत गम्य हो तो' ऐसा कहा गया है। इस प्रकार समासोकि में व्यवहार का समारोप हो जाने पर प्रस्तुत धर्मी अप्नस्तुन धर्मी से विशिष्ट वन जाता है, इसे ही अप्रस्तुत के प्रति अवकलेदक वनना कहा जाता है। रूपक में समारोप होता है रूपका, अत, वहाँ प्रकृत को अप्रकृत से अवच्छारित माना जाता है कर्योंकि अवच्छादितत्व रूपरूपितत्व का ही दूसरा नाम है। यह है अवच्छेदकत्व और अनच्छादितत्व का पररपर में अन्तर [इसलिए अप्रस्तुव न्मो के प्रस्तुत धर्मी में अवच्छेदक बनने में अव काररत्नाकरकारने जो रूपक की शका प्रस्तुत की है वद निर्मूल हो जाती है] और इसीलिए [अलकाररत्नाकरकार को मी] समासोक्ति रक्षण के लिए-विशेषणों की समानता के कारण अप्रस्तुत के धर्म से [प्रस्तुत का ] अवच्छेद' ऐमा सूत्र न बनाकर हमारे लक्षण के अनुरूप केवल 'विशेषणों की समा- नता रहने से अप्रस्तुत का अवच्छेद' ऐसा ही सूत्र बनाना चाहिए। और [ अल्काररत्नाकर- कार ने प्रस्तुत धर्मी पर अप्रस्तुत धर्मी के अवच्छेद का सण्डन करते हुए] जो अतिशयोक्ति होने की शंका प्रस्तुत की है वह मी बिलकुल निर्मूल है क्योंकि यहा उपादान विषय का डी रहता है और अनुपादान विषयो का ही [जब कि अतिशयोकि होती है विषय के अनुपादान तथा विषयी के उपादान होने पर ]। विमर्श :- अलकाररत्नाकरकार ने समासोचिका लक्षण अलंकारसवंस्ककार से भिन्न किया था और उसका कारण सर्बस्वकार के लक्षण में रूपक या अतिशयोकति की सुमावना वतलाया या। विमर्शिनीकार ने उसी का खण्डन ऊपर के विवेचन द्वारा किया है। अलंकाररत्नाकर का सम्बन्धित विवेचन इस प्रकार हैं- [सूत्र ] 'विशेषणानां साम्यादप्रस्तुतपर्मावच्छेद समासोकि.'। [वृत्ति] (क) समानविशेषणमहिम्ना यम प्रस्तुनस्यार्थस्यामस्तुनगतगुणकियादिरूप- धर्भविच्छेद प्रतीयते सा समासोकि:। ततक्षाप्रस्तुतव्यवद्दारसमारोप, न रूपसमारोष।पृ.७१ (स) अत्र विशेषणमात्रसाम्याद प्रस्तुनवर्तुसम्वन्धिनो धर्मा ए्व प्रतीयन्त, न तु धर्म्यपि; धर्मिगोधपी प्रतीती रूपसमारोपाद रूपकम् अतिशयोक्तिवां स्याद्, न तु समासोकि, अत एव ना- प्रस्तुसस्य गम्यत्वम्, अपितु तद्धर्माणामेव । तेन 'अप्रस्तुतस्य गम्यत्व' इस्याघरक्षणमेव। [सू०] विशेषणों की समानता के कारण अप्रस्तुन के धर्म का [प्रस्तुन में ] अवच्छेद समासोकि। [वृच्ति] (क) समान विशेषणों के वल पर जहां प्रस्तुत अर्थ में अप्रस्तुन अर्थ के गुण क्रिया आदि रूप धर्मों का अवच्छेद पतीत हो यह समासोकि। इस प्रकार यहाँ अप्रस्तुन के व्यवहार का हो आरोप होता है रूपका नहीं। (स) यहाँ विशेषणमात्र का साम्य रद्दता है अत यहाँ अप्रस्तुत वस्तु के धर्मों की ही प्रतीति होती है, धर्मों की नहीं। धर्मी की भी प्रतीति हो तो आरोप रूप का होगा। तव या तो
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समासोक्त्यलंकार: ३१५
रूपक होगा या अतिशायोकि; समासोकि नहीं। इसीलिए गन्यता अपस्तुत की मानना ठीक नहीं है, अप्ररतुत के धर्मों की ही गम्यता मानना ठीक है। इस कारण [ सर्वस्वकार का] 'अमस्तुत गम्य दो तो'-इत्यादि समासोफि लक्षण ठीक लक्षण नहीं है। पण्डितराज जगनाय ने भी सवस्वकार के 'विशेषणसाम्याद्धि-प्रकृतलपरूपित्ादू रूपकमेद स्याद'-इस अंश को उद्धृत किया है और 'तदेतदुक्तिमात्रमणीयम्-कहकर इसका खण्डन किया है और तदर्थ प्रायः रत्नाकरकार द्वारा प्रस्तुत तर्क ही उपस्थित किए हैं। किन्तु विमर्शिनीकार द्वारा प्रस्तृत समाधान से वे सहमत है। पण्डितराज ने प्रस्तुत धर्मी पर अप्रस्तुत धर्मी का आरोप तो स्वीकार नहीं किया, किन्तु वे उन दोनों धर्मियों के अभेद को जस्वीकार नहीं कर सके। उनकी पंक्ति है- (क) विशेषणसाम्यमहिम्ना प्रतीतोछट तवाक्यार्थ: रवानुगुण नायिका दिमर्थमाक्षिप्य तेन परि- पूर्णविशिषशरीर: सन् प्रकृतवाक्यार्ये स्वायवतादात्म्यापन्नतदवयवोडभेदेनावितिष्ठते । स च परिणाम इव प्रकृतात्मनैव कार्योपयोगी, स्वात्मना च रसाधुपयोगी। (ख) अप्रकृतामित्नतया व्यवसितः प्रकृतव्यवहारः स्वविशेष्ये सदिशेष्याभिन्नतयाऽवस्थिते भासते। -- [क] विशेषणसाम्य के बल पर प्रतीत हुआ वाक्यार्थ अपने अनुरूप नायिका आदि धर्मी का आक्षेप कर लेता है, और उसके द्वारा उस जगस्तुत वाक्यार्थ का शरीर पूर्ण हो जाता है। तब वह प्रकृतवाक्यारय में अभेद सम्वन्ध से सम्वन्धितप्रतीत होता है, इस अभेद में कारण होता है दोनों वाक्याथों के अवयवों का परस्पर में अमेद। अपकृत अर्थ कार्योपयोगी होता है प्रकृतरूप से ही। अपने आप के रूप में वह रसोपयोगी बनता है। [स] पकृत न्यवहार अमने अप्रकृत धर्मो से अभिन्नरूप से प्रतीत हो रहे-धर्मी में भप्नकृत न्यवहार से अमिनरप से भासित होता है। पण्डितराज ने कुवलयानन्दकार अप्पयदीक्षित को सर्वस्वकार की आश्ञा का मतुवर्ती कहा है और उनका विभिन्न साव तर्कों द्वारा ख्डन किया है। [सर्वस्व्र ] तच्च विशेषणसाम्यं श्लिष्ठतया साधारण्येनौपव्यगर्भत्वेन च भवत् चनिया भवति तत श्लिष्ठतया यथा- 'उपोढरागेण विलोलतारकं तथा गृहीतं शशिना निशामुखम्। यथा समस्तं तिमिरांशुकं तया पुरोऽपि रागाहलितं न लक्षितम् ।' अत्र निशाशशिनो: रिलिप्रविशेषणमहिम्ना नायकव्यवह्ारप्तिपत्ति:। अपरित्यकतस्व रूपयो निशाशशिनोर्न्यकताख्यधर्मविशिएयो: प्रतीतेः। सावा ग्येन यथा- 'तन्बी मनोरमा वाला लोलाक्षी पुप्पदासिनी। विकासमेति सुभग भवदर्शनमान्रतः।'
च लतैकगामिविकासाख्यधर्मसमारोप: कारणम्। अन्यथा विशेषणसाम्य मात्रेण नियतलताव्यवहारस्याप्रतीतेः। विकासन्च प्रकृते उपचरितो जेयः। पर्वं च कार्यसमारोपेडपि जेया। इय च समासोकि: पूर्वापेक्षयाSस्पश।
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यह जो विदेषर साम्य है यद (१) डिलट रूप से (२) साधारणरूप से और (३) उपमा- गर्मितरूप मे होता है, अत. तीन प्रकार का होना है। इन तोनों में से पथम रिलष विशेषणसाम्य का उदाइरण है। 'राग लिए चन्द्र ने निश्वा का चंचल ताराओं वाला मुस इम प्रकार पकड़ा कि उसने राग के कारण सामने से ही सारे के सारे सिसके अधकाररूपी अशुक को मी नहीं जाना।' -यहाँ जो निशा और शशो के विशेषण है वे रिलष् है। उनके आधार पर यहाँ नायक तथा नायिका के व्यवहार की प्रतीति होनी है, कयोंकि यहाँ निशा और रशी अपना स्वरूप विना छोड़े नायकता [नायिकात्व तथा नायकत्व] नामक धर्म से युक्त प्रनीत होते हैं। साधारणधर्मरूप से (विशेषगसान्य), यथा-' सुभग! तुम्हें देखने भर से वह तन्वी, मनोरमा, वाला और पुष्पदासिनी चचलाक्षी खिल उठनी है।' -- यहाँ 'तन्वी' आदि विशेषणों के साम्य से चचलाक्षी शम्द से कथिन नायिका में लना के व्यवहार की प्रतीति होनी है। इसमें कारण है विकास नामक धर्म का समारोन जो एकमात्र लता का ही धर्म है। उमके बिना अन्य विशेषयों के समान होने पर भी उतने मर से लता के व्यवहार की प्रसोति निश्चिनरूप से न होती। प्रस्तुत अर्थ [ नायिका] में विकास को लाक्षणिक समझना चाहिए। [ इम उदाहरण से] यह भी जान लेना चाहिए कि [ न कैवल व्यवहार या धर्मे के ही समारोप से अपितु] कार्य के समारोप से भी समासोकि होती है [क्योंकि इस मद्य में 'विकसिन होना'= 'खिलना' एक करिया है]। यह जो [ क्रिया के समारोप से समय] समामोकि है पूर्ववती समामोकि की अपेक्षा कुछ कम स्पष्ट है। विमर्शिनी सदिति अ्प्रस्तुतस्य गम्यर्वे निमित्म्। तत्रेति निर्धारगे। नाथकेनि सरुपयोरेकशेय। अपरित्यक्तस्वरूपयोरिति। रपरूपितरवे दि परित्यक स्वश्वरूपं स्याद्। तन्नेति। छता- व्यवहार प्रनीतौ। ननु यदि ववतैकगाग्पेव विकासाक्यो धर्मतरकर्ष भकने संगच्छृत इतयाराङ्क्याह-विकास इत्यादि। एवदेवान्यध्ापि योजयति-एवमित्यादिना। तदेवं साधा- रणयन समामोरकेर्विरोप मसाम्ये सत्यप्यप्रकृतसबन्धि धर्मकार्यसमारोपमन्तरेण तद्दयव हार- प्रतीतिन भवनीति सिद्धम। तव= वह विशेषगमाम्य अर्थाद वह विरोषगस्ताम्य जो अप्नसतुत को गन्यता में कारण वनना है। तन्र=इनने, यह निर्धारणार्थक है। नायक=शब्द में एकसेष समास्त है क्योंकि नायक और नायिका ये दोनों शब्द समान रूप वाले हैं। 'अपरित्य कस्वरूपयो.'='अपना स्वरूर विना छोड़े= जब रूप का आरोप होता है तब [ बारोप के विषय निय्ा सकी आदि का]अपना स्वरूप छृट जाता है। तत्र=इसमें अर्थात् उताव्यवहारप्रतीति में। 'यदि विकास धर्म केवल लनामात्र में मन्वित दोने वाला है तो फिर वह प्रन नायिका में अन्विन कैसे होगा' ऐसी शका कर उत्तर देते हैं-'विकाम' इत्यादि। इसी विषय में से एक नवीन तथ्य का निर्देध करते हुए कहते है-'रवन्"। इस प्रकार यह निद्ध हुआ कि सावारण्य से निग्पन्न समामोकि में विशेषगों का साम्य रहता है तथापि अप्रकृन से सवन्धिन धर्मे अथवा कार्य के समारोप के बिना उस [कपजन] के व्यवहार को प्रनीति नहीं होनी। [नीचे दिए विवेचन में पण्डितराज ने मूल का सण्डन करते हुर विम्शिनी के इस अश को निरस्त कर दिया है। पण्डिनराज जगनाथ ने 'तन्ती मनोहरा'-हम पद में व्वग्यरूपक मानना उचिन बतलाया है, और अलकारसवंस्वकार का खुण्डन करते हुए समासोकि को अमान्य ठहराया है। उनका प्रधान तक यह है कि इस पद्य में
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अन्य सर्थ की प्रतीति एक मात्र साधारण धर्म के आधार पर न होकर 'विकास'-रूपो असापारण धर्मे के आधार पर हो रही है। समासोकि केल नहीं मानी जा सकती है जहाँ सभी विशेषण साधारण हों। उन्होंने सर्वस्वकार पर यह भी दोप लगाया है कि उनकी यह मान्यता उन्हीं के सूध के विरुद्ध है। सूब में विशेषणों की साधारणता को अन्यार्थ की प्रतीति में कारण वतलाया गया है जन कि यहाँ असाधारणता को। पण्ठितराज का कथन अधिक संगत प्रतीत होता है। [द० रसगंगाधर पृ० ५०९-१०, नि. सा. सं. ६ ]
औपम्यगर्भत्वेन यथा- [सर्वस्व्र ]
'दन्तप्रभापुष्पचिता पाणिपल्लवशोभिनी। केशपाशालिवृन्देन सुचेपा हरिणेक्षणा।।' अत्र दन्तप्रभा पुष्पाणीवेति सुवेपत्ववशादुपमागभतवेन कृते समासे पश्चादृदन्तप्रभासदशैः पुष्पेश्चितेति समासान्तराश्रयणेन समानविशेपणमा हात्म्याहताव्यवहारप्रतीतिः। अत्ैन 'परीता हरिणेक्षणा' इति पाठे उपमा रूपसाधकवाधकाभावात् संकरसमाश्रयेण कृते चोजने पश्चात् पूर्ववत् समासान्तरमहिम्ता लताप्रतीतिक्ेया। रुपकगभत्वेन तु समासान्तराश्रय- णात् समानविशेषणत्वं भवद्पि न समासोक्े प्रयोजकम्। एकदेशविवर्ति- रूपकमुखेनैवार्थान्तरप्रतीतेस्तस्या वैयर्थ्यात्। नच पूर्वदर्शितोपमासंकर- विपये एष न्यायः। उपमासंकरयोरेकदेशविवर्तिनोरभावात्। तच्चैकदेश विवर्तिरूप कमश्लैपेण श्लेवेण च भवतीति द्विविधम्। अश्लिएं यथा- 'निशाक्ष्य विद्युभयनैः पयोदो मुखं निशायाममिसारिकायाः। धारानिपातैः सह किं तु वान्तखन्द्रोऽयमित्यार्तंतरं रपास ।I' अन् निरीक्षणानुमुण्याद्विद्युननयनैरित रुपके पयोदस्य दष्टपुरुप- निरूपणमाततर ररासेत्यत्र प्रतीयमानोत्वेक्षाया निमित्ततवं भजते। शिलिपं यथा- 'मद्नगणनास्थाने लेख्यपपश्चमुद्श्चयन्
कुटिललिपिभि: कं कायस्थं न नाम विसूत्रयन् व्यधित विरदविमाणेष्वायन्ययावधिकं मधुः।' [श्री० च० ६७० ] अन्न द्ि पत्नलिपिकायस्थशव्देपु श्तेपगर्भे रूपक द्विरेफमपीलवैरि त्येतनपकनिसित्तम्। अस्य व प्रचुर प्रयोगविषय इति न समासोक्ति सुद्धि: कार्या। उपमागर्मिंत विशेषणसान्य का उदादरण यथा-ददन्तप्रभापुप्प से सचित, पाणिपल्लव से सशोभित और केशपानभ्रमराली से सुबेध। है यह सृगाक्षी ।'
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३१८ मलङ्कारसर्वस्वम्
-- यहाँ [नायिका में लनाव्यवहार की प्रतीति होती है किन्तु] सुवेषस् [केवल नािका का धर्म ह अत उस] के कारण [सभी विशेषणों को नायिकापक्ष में अन्वित करने देतु ] पहिळे *दन्तप्रमा पुष्प के समान' ऐसा उपमागमित [उपमिन-] समास करना होता है, तत्पश्राठ् [उन्हीं विशेषणों को उनापक्ष में अन्वित करने हेतु] 'दन्तप्रभामदृश पुष्व' इस प्रकार एक दूसरा [मध्यमपदलोपी या विशेषण ] समास अपनाना पडता है तब कहीं विशेषणों की समानवा बनती और उताव्यवहार की प्रतीनि होती है। यहीं यदि 'परीता=घिरी हुई है मृगाक्षी' ऐसा पाठ होता [अर्थात केवल नायिका में ही अन्वित होने वाला सुवेषत्व जैसा कोई विशेषण न रदता] तो न तो यहाँ उपमा का साधक प्रमाण रहता और न रूपक का बाधक। तन [विशह्वाक्रय में] दोनों का सकर मानकर पदार्थ योजना की जानी [ किन्तु तब भी नायिका पक्ष प्रथम पक्ष है अन. उसके अनुरूप विशेषणयोजना में महायक उपमितिसमासमूल्क विग्रह पहले किया जाता और] तत्पश्ात पूर्ववत अन्य समास [मध्यमपदलोपी या विशेषण समास] के आधार पर लना पनीति होती हुई मानी जानी। यदि [यहाँ विशेषण में सीधे सीधे] रूपक ही माना जाय और तदर्थ अन्य समास [मध्यमपद्लोपी या विशेषण ] ही यहाँ [प्रथमत] अपनाया जाय तो यहाँ विशेषणों में समानता [ उमयपक्ष में अन्व्रय की योग्यता] तो आ आाएगी, विन्तु उसमे समासोकि की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि तव दूमरे अर्थ [ लता] का बोध एकदेशविवत्ता रूपक से ही हो जायगा फलन उस [इस समासोकि का कोई प्रयोजन नहीं रहेगा] वह व्यर्थ पट जाएगी। यह स्थिति पूर्व- दर्शित उपमा तथा संकर के विषय में लागू न होगी क्योंकि उपमा और संकर एक देशविवती नहीं होने। [स्नस्व के 'भपम्यगमत्वेन' इस अग्र से लेकर उपमा सकरयोरेकदेशविवर्तिनोरभावात'- इम अंश तरु स्पष्टीकरण पण्डितराज जगनाथ ने अपनी भाषा में इस प्रकार किया है-'भौपग्यगर्भ- र्वेनापि विशेषणसाम्ये समवति। यथा - 'दन्त-क्षणा' अत्र दरिगेश्षगामानवृत्ते सुवेषत्वस्य महिम्ना दन्तप्मासदृश्ानि पृपाणीत्यादि योजना विदाय दन्तप्रमा पुत्रपाणीवेत्यादयुपमितसमासाश्रयेग कृते योजने प्रकृताथसिद्धी मर्त्या वृत्त्यन्तरेण त्यकनाया अपि योजनाया पुनरुजीवने पुष्पपल्मवालिवन्दे- रूपनेये राक्षिपाया लताया. प्रत्ययादन्न तद्व्यवहारारोप:। एवं सवपेत्यपहाय परौतेति कृत उमा रूपकसाधक वाधकप्रमाणाभावाव तदुमयसशयरूपसकराश्रयेण कुते योजने पश्चाद पूर्वोक्तरीत्या लता- प्रतीते: समासोकिरेव। समासमेदनार्थ मेहैवि शग्दक्यमादाय रिलष्टमूलायामिन विशेषणसाम्य वोध्यम्। आादावन्ते वा रूपकाश्येग दन्तप्रभा एव मुष्पाणीति योजने कुने तु हरिणेक्षणारे आक्षिप्त- लतातादात्म्य के नैकदेश विवत्तिरूप के णैवाप कृतार्थप्रत्ययोत्पचेनार्थ समासोकेरत्र। -विशेषणसाम्य भपन्यगमित भी होता है। यथा-'दन्न प्रमा०' पद्यार्थ में। इरिणेक्षगामान्न के विशेषण के सुवेषत्व के बल पर 'दन्तप्रमासदश पुष्प' हत्यादि योजना को छोटकर दन्तप्रमा पुष्पों के समान इत्यादि उपमित समास की योजना करनी पढती है। तब प्रकन (हरिणेकणापक्ीय) अर्थ की सिद्धि होती है। इसके पश्चात् व्यंजना द्वारा छोडी हुई समसयोज्ञना वो पुनः जिलाया नाता है। तव पुष्प, पल्लव और अलिवृन्द रूपी उपमेयों से लनारूपी उपमेय की प्रतीति आक्षेप से होती है फलत उसके व्यवदार का आरोप नहीं हो पाता [ जिससे यहां रूपक हो सके] किन्तु 'सुवेष" इस पद को छोडकर 'परीता' यह पद अपना लिया जाए तो न तो यहा उपमा का साधक कोई प्रमाग रहेगा और न रूपक का वाधक। इसलिए इन दोनों का सदेह सकर होगा । इस संकर की पनीनि पहजे होगो, तब पूर्वोकरोति से लना को प्रतोनि होने पर यहाँ समासोकि दी होगी। ययनि समास वहलते हो अर्थ बदल जाएगा तगनि नम्द नहीं वरलेंे इसलिए जैसे इनेनमूा समासोकि में विरेषगमाम्य होगा बैने हो यहाँ मो हो जायगा। किन्दु
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समासोकत्यलङ्गार: ३१९ चदि आरन्म या अन्त में रूपक के अनुरूप 'दन्तप्रमा की युष्य' ऐसी योजना की गई तो इरिणेक्षण रूपी मर्थ पर आक्षिप लता रूपी अर्थ का सादाल्य भासित होगा फलतः यहाँ एकदेशवर्त्तो रूपक हो जाएगा। औौर तब अपकृत अर्थ की प्रतोति उसीसे ही जाएगी, निदान यहाँ समासोकि कर कोई प्रयोजन ही न रहेगा।] यह एकनेशविवर्त्ती रूपक कहीं श्लेपरदित होता है और कहीं इलेपसहित। दोनों में से [प्रथम] श्लेपरहित का उदाह्दरण यथा- 'मेव विद्युनयनों से रात में अभिसारिका का मुख देखकर कदाचित यह सोचकर अधिक आर्तता के साथ नाद करता है कि क्या गिरती धाराओं के साथ यह चन्द्र गिर पढ़ा है?' -यहाँ निरीक्षण [ रूपोकार्य नवनों में संभव है और उसका अन्वय नयनों के साथ तब संभव है जब समास में उन्हीं की प्रधानता हो और ऐसा समाल बड़ी समास दोगा जिससे रूपक की निष्पत्ति होती है, इस प्रकार निरीक्षण रूपक का] सापक है फलतः 'विद्युन्नयन'शन्द में [ 'विद्युदरूपी नयन' इस प्रकार ] रूपक सिद्ध दो जाता है। उससे मेघ में द्श पुरुष का निरूपण होता है। वह 'अधिक मार्तता के साथ नाद करना है'-इस प्रकार की प्रतीयमान उत्प्रेक्षा में कारण चनता है। इलेपसहित का उदाहरण यथा- 'मदन [रूपी राजा ] के गणनास्थान में बिचकिलवृक्षों के विशाल पत्तों [रूपी पन्नों] पर न्यत्त स्रमररूपी मसीबिन्दुओं से लेखा जोखा का प्रपंच फैलाते हुए, मधु ने विरहियोंके प्राथो काा आयव्यय अधिक बढ़ा दिवा। इस प्रकार उसने कुदिल [और कूट] लिपि के लिए प्रसिद्ध [उपलक्षण में तृतीया ] किस कायस्थ [काय =शरीर में स्थ=स्थित=आत्मा तथा काय = राज्याधिकरण में स्थ= स्थित - लेखपाल आदि अधिकारी] को न्यथित नहीं किया। यहाँ जो है सो, पत्र, लिपि और कायस्य शब्दों में दलेपमूलक रूपक है। यह रूपक दिरेफ मपोलब शब्द से प्रतिपादित [मौरों पर स्याही की बूंदों के] रूपक का निष्पादक है। इस एकदेशविवर्ती रूपक का प्रयोग बहुत अधिक होता है। यह समझे रहना चाहिए और वहाँ समासोकि नहीं समझ बैठना चाहिए।
विमर्शिनी सुवेपतर्व प्रकृतार्थ एवानुसुणमित्युपमाया साघकम अतश्ष तत्स्षमासाश्रयः। समासान्त- राश्रयणेनेति। यघण्यत्रोपमासमास एव स्थितस्तथाप्युपमानोपमेययोव्यरययादेव समासान्तरत्वमुक्तम्। पूर्वाेक्षयास्यान्यथात्वात्। अन्रैवेति दन्तप्रभेव्यादी। उपमारूपक- साधकवाधकामावादिति। परीतावस्य हि प्रकृताप्नकृतयोस्तथा नानुगुण्यमिति साधक- रवासावः। तथा चन विगुणत्वमिति वाधकत्वाभावः। अतथचैकूपत्ताशयामात्ादुपमारू पकयोः संनेहसंकरः । तस्य समाश्रय उभयसमासग्रहणम्। सच्घैकस्मिन्नेव वाक्ये न संभवतीति कामपारेण तयोग्रहणसू। संकर समाश्र येणान्युपमासमासयोजने कृते यद्ददय मेवालंकारस्त ववन्न्रपकसमासयो ज मेड पि किमयमेव किसुतालंकारानतरमित्याशङ्याह-रूपकेत्यादि। पतच्च साचादपि रुपकगमे समासे योज्यम्, समानन्यायरवाद्। यधेवं तर्ह्यपमासमाश्रयेऽयेकदेश-
रुपकोक। अभावादिति उद्भटमतेन । यदाहु :- 'नघ रदटस्येवोजटस्थेकदेशनिवर्ति
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३२० रपकवदुपमासकरावेक्कदेशिनौ हतः। अतश्चैतत्तन्मतामिन्रायेणोक्म्। ग्रन्थकृम्मते हि वच्यमाणनीर्या तयो. समय। ननु यदि तयोर्ग्रन्थकृम्मते सभवस्तदौपम्यगर्भविशेषमो- स्थापितः समामोत्तिप्रकारस्तहि न सभवति। तस्यै कदेश विवतिरूपकव दैक्देपविवर्तिभ्या मुपमासकराम्यामेवार्थान्तरप्रतीतिसिदेवयर्थ्यान। नैतत। यतोऽसयेव तावदौपम्यगर्भ- विशेषणहेतुक्वं समासोके: 1 किरवेतदन्यभेदसहत्रितमेवारया निमित्तता मजते न पुनः वेवलम्। तथारने हि विशेषणानामीपम्यगर्भरवे एकदेशविवर्तिन्या उपमायाः भाषि।
'परिपिक्जरितासिताम्बर निबिडै कंन हरन्ति दारिमि। अथि सायमिमा, पयोघरैः सफुटरागाश्रलतारका दिश:॥' अन्र 'स्फुटसंध्यातपकुष्टमै.' इति पाठे सध्यातपउदुमैरियपम्यगम विशेषणम्। साधारण्यसहचरितं यथा- 'तम्बी मनोरमा वाला लोळाघी स्तवकस्तनी। विकासमेवि सुभग भवदर्शनमान्रत.।।' अन्न स्तब कर्तनीरयोपम्यगर्भ विशेषणम्। शुवकार्यसमारोपसइचरित यया- 'समाहरोहोपरिपादपानां लुलोठ पुष्पोत्कर रेणुपुमजे। लताप्रसूनांशुकमाचकर्ष फ्रीडन्वने कि न चकार चैत्र।'
यथा- 'वभौ लोलाघरदलस्फुरद्दशनकेसरम। भ्रविलासालिवलयं सछितं सलनामुखम्॥' अम्र लटिता्व मुपमासाधकम्। समासान्तराश्रयात् समानविशेषणत्व अवद्पि नात्र समासोके: प्रयोजकम्। एकदेशविवायुंपमामुसेनेवार्यान्तर प्रतीतेस्तरया वैयव्यात्। एवं दन्तप्रमेशयादावपि जेयम्। दन्तप्रभा पुप्पाणीवेयेव समासे कृते उपमानभूताया छवाया: प्रतीनिसिदे: समासान्तराथयेणागतायास्तय्प्रतीतेध्यपरवाद। अप्रकृतागूरणे हि कबे: संरम्भ तच्चानयव सिदमिति कि समासोवतया। चिरंतनानुरोघाव पुनरव्न अन्थकृता समासो किरका। यत्तु 'यत्र समासोछायामुपमार्या समासान्तरेण विशेषणसाम्यं योजमिसुं सश्य तत्रौप्यगर्भविशेषणप्रभानिता समासोकिसका' इति वचयति तदपि चिरतनानु- रोघपरमेव। अन्थथा हि समानन्यायत्वादेकदेवविवर्तिनि रूपकेपि यम्र समानविशेषण्वं योजयितु शक्य तव्रापि समासोक्तिरिति कि नोकम्। यत् नोक्तं तघ्युकम्। रूपक- माहारम्याव प्रथममेत्र तम्प्रतीतिमिद्ेरनन्तरं समासोंकिसुसेनाप्रकृतप्रतीतेवैपर्थ्यासष।
मनान्घकारध म्मिझ्ा राजते गगनस्थली ।।' दत्यादौ पुनदपमायाः साधकाभावादेकदेशविवर्ति रूपकमेवेति न समासोकिश्रमः कार्यः। न चवमादावुपमारूपकयोः सदेहसंकरो न्याययः। तरयाल्कारसार कारादिमिनि रावृतत्वाय्। समासोकिलप्षणावसरे कि रूपक निरूपणेनेश् याश्वाह-अस्या इत्यादि। 'सुवेपत्व' के प्रकृत अर्थ [नायिका पक्ष] मैं शी अन्वित होता है इसलिए वह उपमा का ही साथक है, अत. उस् पक्ष में [विशेषणों के किए] उसी [उपमा] का समास अपनाया जाता है।
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श्लेपालट्गार:
-[ शिवपरक अर्थ]-'जिन्होंने काम को ध्वस्त किया है, निन्होंने एक वार (त्रिपुरवय के समय) विष्णु के शरीर को अषत्र बनाया था, जो फनफनाते सपों के हार और कंकण पहने रहते है, जिन्होंने ( त्वर्ग से गिरती) गंगा को धारण किया था, देवगण जिनके सिर को चन्द्रमा से युक्त कहते, तथा जिनका 'हर' यह स्तुत्य नाम पुकारते हैं ऐसे अन्घकासर के निदन्ता पा्वती पिय स्वयं भगवान् शंकर आपकी रक्षा करे।' [विष्णुपरक] 'जो अजन्मा है और जिन्होंने शकटासुर को ध्वस्त किया है, जिन्होंने अपना पलि को जीतने वाला शर्रार [अमृत दांहते समय मोहिनी अवतार में ] त्ी शरीर बना दिया था, जिन्होंने फनफनावे [ कालिय ] सर्पे का दमन किया, जो चक्र को धारण किए हैं, जिन्होंने [गोवर्धन] पर्वत और [पाताल गई ] परथिनी को धारण किया, देवलोग जिसका 'राहुशिरोभंजक' यह स्तुत्य नाम लेते हैं वे सन्धकवंश को [दारकामें] बसाने वाले और उसके विनाश करने वाले, सर्वस्वदाता स्वयं भगवान् विष्णु आपकी रक्षा करें। [ये दोनों अर्थ इस पद्य के शब्दों को तोड़ने से निकलते हैं। यथा शिवपक्ष में ध्वस्तमनोभव ध्वस्त किया मनोभव कामको जिसने, विष्णुपक्ष में ध्वस्तन् अनः अभवेन=जिसने अन=शकट = शकगाकर को ध्वस्त किया है तथा जो अजन्मा है। वलिजित्काय=वलिजित=विष्णु, बलिको जीतने वाला शरार, पुरास्त्रीकृत= शिवपक्ष में पुरा असीकृत, चि० प० में पुरा स्रीकृत, उद्यृत्त भुजंग हारवलच :- शि० प० में-उद्वृत्त भुजंगों के हार और वलयवाले अथवा अ =विष्णु उनका रत= नाम उसमें तय है जिनका, वि० प० में =उद्वृत्त भुजंग के छा-'मारक', अरवलय=चक तद्चान्, शिवपक्ष में =नंगां गगाको विष्णुपक्ष में अर्ग गा=पर्वत तथा पृथिवी को, शशषि- मच्छिरोदर= शि० प० में-शशिमान् शिर वाले, तथा हर इस नाम वाले, वि० प० में-शशी को मथने= मसनेवाले राहु का शिर हरने वाले, अन्यकक्षयकर = शि० प० में-मन्धकासुर का क्षय विनाश करने वाले, वि० प्र० में-अन्धकवंश के लिए क्षय निवासस्थान उसका वनाने वाले तथा उसका क्षय = विनाश करने वाले, सर्वदोमाधव=शि० प० में सवंदा उमाघवउमा के पति शिव, वि० प० में-सर्वंदः= सवकुछ देने वाला, माघव मा =लक्ष्मी के धव=पति = विष्णु।] [दोनो अमाकरणिक अर्थ यथा ]- 'नीतानामाकुलीभादम्' यह पद्य । [ इसमें दो अर्थ निकलते हैं १-पझमपरक, २-हरिणपरक। पथम के पक्ष में श्लोक अर्थ होगा-] 'उसके नेत्र अनेक लुब्ध मौरों से आाकुल औषर पानी में उग कर बढ़े कमलों के समान हैं।' दूसरा पक्ष-उसके नेत्र अनेक वाण बाले वह्देहियों द्वारा भाकुल हुए जंगली हिरणों [ के नेत्रों ] के समान हैं। [ कमल पक्ष = लुष्ध = लोभी, शिलीमुख=भ्रमर, वन= जल, कमक=रझ। इरिणपक्ष =तुब्ध- वषेलिया, शिकीमुख=वाण, वन=जंगल, कमल = हिरन-] [एक प्राकरणिक और एक क्षप्राकरणिक अर्थ, तथा विशेषण और विशेष्य दोनों का शब्दतः कथन-यथा]-'स्वेच्छोप0' पथ का यह अर्थ- 'सेद की पात है कि नासमझ स्वामी काम के समान होता है जो स्वेच्छोपजातविषय [प्रभु = सपनी इच्छा मर विषय= वनधान्यादि, कामअपनी इच्छा के अनुसार विषयस्री आदि] पाकर मी मा्गणशत के द्वारा [परभु=सैकढ़ों याचकों द्वारा]'देदीति' [प्रभु= देहि =दीजिए, इति ऐसा ] कढा नहीं जाता, औौर दुःख देता है[ काम भी मागणशत-सकड़ों वाणो के द्वारा दुःख देता है और देद्ीति =देड़ी=शरीरी मात्मा नहीं कहा जाता] और मोह से [ मभु नासमझी से, २३ अ० स०
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३५४ अल्गारसवस्वम्
काम = मूच्छों से ] जीवित को [प्रमु-जीविका को, काम=प्राणों को] मी एकाएक नष्ट कर देता है।' -इन [ तीनो पद्यों में मे प्रथम पद्य] में शिव और विष्नु दोनों प्राकरणिक हैं, [द्विवीय पद्य में] पद्म और भृग दोनों उपमान है इसलिए अपावरणिक हैं [ और नीमरे पच में ] स्वामी प्राकरणिक है औौर काम अप्राकरणिक। यह शष्द, अर्थ और दोनों में रददता है, इसलिए तीन प्रकार का होता है। इनमें शब्द का दलेप वह होता है जिसमें उदाच आदि स्वर का अन्नर पढ जाता है फळत [उच्चारण के] प्रयत्न में अन्नर आा जाता है अन शब्द भी बदल जाता है। यहाँ प्राय शब्द टूटता है। अ्थे इलेष वहां होता है जहा स्वर आदि का भेद नहीं होना। इसीलिए इसमें शब्दों में मह (टूढ) नहीं रदता। उमयश्लेग होना है इन दोनों के एकत्रीकरण से। यथा- पक्च ठीक वैसे ही सुशोमित हो रहे थे जैसे श्रमग। क्योंकि वे लाल वर्ण के छद (पखुदी) भारण किये हुए थे [ थमण भी लाल वर्ण का छद = कन्या धारण करते है], वे विकच [सिले दुए ये, श्रमण भी कच =केशों से रहित - विकच=मुण्डित सिर होते हैं], जलों में सगत = डूबी नाथ को धारण किर दुप मे और श्रमण भी जइ् व्यक्तियों का अधिक साथ नहीं करते= [जलेपु- नडेपु अलम्- अधिक, सगतम् =साइचर्य न आदधाना ][अन्य] पुष्पों की सपूर्ण रुचि निरस्त कर चुके ये। [अमय भी पुष्प = स्त्री या पुष्पधन्वा काम की सपूर् रुचि =चाह समाप्त कर देते हैं ]। -यहाँ 'रकच्छरत्व' आदि [आदि पद से विकचत्व, पुष्परुचिनिरसन] में अर्थश्लेष है और "नाल आदि [आदि शब्द] में [ नाल तथा न अलम्; जल तथा जढ इम शब्दभेद होने से ] शब्द्रदलेप है। क्योंकि यहाँ दोनों एक ही वाक्य में मिलिन हैं इसलिर यहाँ उमयश्ले हुआ। तोनों के उदाइरण भलगअल्ग नहीं दिए ग्रन्थ कचेवर बढने के मय मे। चिमर्शिनी एष दति त्रिविघोऽपि रलैपा। तत्रेति त्रयनिर्धारणे। यत्रेति शब्दश्लेपे। अत एवेति स्वरादिभेदामावान्। सकलनयेति समक्ताममङ्गपद्समेळनया। पृषगिति मैदेन। तम्न श्जदश्नेपो यथा- 'ते गच्छन्ति महापरद मुचि, परामूति:समुरपद्यते तेर्पा, तै·समलकृतं निजकुलं, तैरेव छग्घा सितिः। तेषां द्वारि नदम्ति वाजिनिवद्ास्ते भूपिता: प्रत्यहं ये छष्टा: परमेश्वरेण भवता सुष्टेन रुष्टेन वा।।' अत्र पदानां समङत्वं स्पष्टम । अर्थश्लेपो यपा- 'इच्दन्ती चित्रुकाग्रचुम्बनमयो शैथिक्यशटोज्सिती नेविदधेन परस्परस्य न मनाक केनापि लग्धान्तरौ। धन्यो तो तरुगीम्तनाविव न यौ स्वप्नेऽपि विश्लिम्यतो विश्लेपं विपमं विषद्य भवतो नाघो मुखौ जातु था।' अत्र पदानामसभदृत्वं स्पष्टम्। संकलनया सु ग्रन्थरतवोदाहतम्। अस्य च शब्दा.
एप = यह अर्थात तीनों प्रकार का शलेष। तम् - दीनों में। यत्र= जहों अर्थाद शब्दशलेप में। अत एव = रसीटिए अर्थात सवरादि का भेद न होने से। संकलनया= एकत्रोकरण अर्थात समक
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श्लेपालद्कार: ३५५
पद एवं अभह् पद के मिश्रण से। पृथक = अलग-अलग = मर्यात प्रत्येक का वदाहरण भिन्न करके । मिन्न उदाहरग इस प्रकार है- 'आप परमेस्वर हैं। आप जिस पर प्रसन्न या रुष होते हैं वे महापद [ मदान उच्च पद, महा आपद् आपत्ति] को प्राप्त होते हैं, परयिवीमण्डल पर उनकी पराभूति [ परा = उत्कृष्ट भूति - मैंमत्र, पराभूति= परामव] होती है, वे अपने कुल को समलंकृत [सन् =सब प्रकार से अलंकृत शीमित, समल = मलसहित कलंकित] कर देते हैं, वे ही क्षिति [पृथिवी, क्षय] को पा लेते हैं, उनके दरबाजे वाजिनिवद [वाजि= घोड़ों के निवह समुदाय, वा = या भाजि = युद्ध=निवह ] गरजते हैं, और वे ही प्रतिदिन भूषित [ मलंकृत, भू = पृथ्वी पर सित = पड़े हुए ] रहते हैं।' यहाँ पदों में मह्ग है। अर्थक्लेप चथा 'वे [दन्पती ] धन्य हैं तरणीस्तनों के समान जो सदा ही चित्ुकान [ठुड्डो के अग्रभाग] का चुग्वन करना चाहते हैं, जिनमें शिधिलता की शंका नहीं रहती, परस्पर में इसने ने [ सटे] रहते हैं कि अन्य किसी को वीच में जनह नहीं मिलती, जो स्वप्न में भी अलग नहीं होते और अलन होते भी है तब भी कभी अधोमुख नहीं होते।' -यहाँ पदों में भङ्ग नहीं है यह स्पह है। दोनों का मिलित वदाहरण स्वयं अ्न्थकार ही [ 'रकच्छदत्व' यह ] दे चुके हैं। यह शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित है, इसलिये इसको दोनों का अलंकार बतलाते हुए कहते हैं- [ सर्वस्व ] अलंकार्यालंकरणभावस्य लोकवदाश्रयाश्रयिभाचेनोपपतेः 'रक्तच्छदत्वम्' इत्यादावर्थद्वयाश्ितत्वादयमर्थालंकार: 'नालम्' इत्यादौ तु शब्दद्वयाश्रित- त्वाच्छव्द्रालंकारोSयम् । यधप्यर्थमेदाच्छव्द्भेद इति दर्शने 'रक्तच्छदत्वम्' इत्यादावपि श्दाश्रितोऽयं तथाप्यौपपत्तिकत्वादत्र शव्दभेदस्य प्रतीतेरेक तावसायान्नास्ति शब्दभेद:। 'नालम्' इत्यादौ तु प्रयत्नादिभेदात् प्रातीतिक एव सब्दभेद:। अतश्च पूर्वत्रकवृन्तगतफलहयन्यायेनार्थन्नयस्य शब्दशिलि पत्वम्, अपरत्र जतुकाष्ठन्यायेन स्वयमेव श्लिप्टत्वम्। पूर्वन्रान्वयव्यति- रेका्भ्यों शब्द्हेतुकत्वाच्छव्दालंकारत्वमिति चेत्, न आश्रयाश्रयिभावेना लंकारत्वस्य लोकवद् व्यवस्थानाल्। अलंकार्यालंकरणभाव [काव्य में भी ] आश्रयाश्रविभाव के आधार ही ठीक उसी प्रकार संभव होता है जिस प्रकार लोक में, मतः 'रकच्छदतम्' इत्यादि पद्य में यह [ कलेप ] दो अर्थो पर आश्रित् रहने से नर्थ का अलंकार है। इसके विपरीत 'नालं' इत्यादि स्थल में दो शब्दों पर माश्रित रहने से यही शब्द का अलंकार है। यद्यपि 'अर्थ मिन हो तो शब्द भी भिन्न होता है' इस सिद्धांत के अनुसार 'रकच्छदत्वम्' इत्यादि में भी यह [ शलेप ] शब्दाश्चित ही माना जा सकता है तथापि यह शब्दभेद सिद्ध करने पर सिद्ध होता है, प्रतीति तो होती है एक रूप से ही। इस कारण चहाँ [काव्य में प्क्षीति का सारा खेल हैं अतः इसकी दृष्टि से ] शब्दमेद नहीं है। और एसीलिए प्रथम इलेष में दो अर्थों का [एक ] शब्द में क्लेप= जोड़ उसी प्रकार है जिस अकार एक वृन्त में दो फकों का होता है, जद कि दूसरे क्लेध में स्वयं शब्दों का ी इलेष - जोढ़ रहता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार जतु = लाक्षा औौर काछ=लकड़ी का। [ मम्मट का ] यह कहना ठीक नहीं है कि 'पथम
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[ समग ] भैद में भी [पलेष ] शब्द का ही अलकार है कयोंकि उसका रद्ना न रहना शब्द के रहने न रहने पर निर्भर है इसलिए उसके प्रति शन्द ही हेतु है, और अलकार की शब्दार्थंगन- स्वेन व्यवस्था हेतुहेतुमद्माव के आघार पर दोनी चाहिए, क्योंकि वस्तुत काव्यालंकार भी लौकिक अल्कारों के समान ही मशयाअयिमाव वो लेकर ठदराय जा मको हैं [ हेतुद्वेतुमद- भाव को लेकर नहीं ]।
विमर्शिनी
ननु छ 'यावन्त एवमर्पाः रयु. शब्दास्तावन्त पव हि' दश्याय्युवत्या रक्च्छदश्वमित्या
एकनावसायादिति। रत्तच्छदरवादे. मयरनादिभेद विना साहश्यनार्थंद्वयामिद्यानाव्। अत. क्रेति। अर्थंद्याय शब्ददयस्थ व रिटष्टरवात्। पुर्वत्रेति। रकच्छृदत्वमिरयादौ शष्दस्य वृन्तस्थानीयर्वात्। अपरव्रेति नावमिरयादी। जतुकाउन्यायेनेति परस्पर संचलितावान्। पूर्वत्रेत्ि रचच्छृदशवमिर्यादी। अन्वयव्यतिरेकाभ्यामिति। रकच्छदत्वमित्येय शब्दे स्थिते स्लेप. शब्दुपरिवर्तने स वृते न श्लेय हृत्यव्रापि शब्दहेतुक्शवात्तदलकारखमेवेश्य्थ। आश्रयाश्यिमावेनेति। न पुनरन्वयव्यतिरेकाम्याम्। ताम्यां दि यस्य यद्ेक्षुकरवं तस्य तरकायंर्वं रयाख पुनस्तदलकारतम्। सोकवदिति। होके हि यया कर्माध्रित, कुण्डलादि कर्णालंकार उच्यते न पुनः सुवरणकारणहेतुकरवात्तदूलकार। 'शन्द उतने ही होते हैं जितने अर्थ' इत्यादि वाक्यों के अनुसार 'रकच्छदत्वम्' इत्यादि में भौ यह स्लेप शब्द का ही अटकार है क्योंकि वहों भी यह दो शुब्दों पर आश्रित है। फिर आप इसके विपरीत इसे [अर्थाश्रित] क्यों वतला रहे है'-इस शंका पर उत्तर देते हैं- 'यद्यपि-' सतयादि। 'एकतावसायात्'='प्रतीति में एकता का ज्ञान'-इसलिए कि 'रकच्छदृत्व' आदि शम्दों में प्रयत्न आदि के भेद के बिना मकरूपता (साइृद्य) के आधार पर दो अर्थो का कयन होता है। 'अतश्न=और इसीलिए' - अर्यात दो अर्य और दो शब्दों के स्लिष्ट= जुढे हुए होने से। पूर्वत्र= प्रथम में -रचच्छवत्व इत्यादि में क्योंकि वहों शम्द रहता है वृम्ततुत्य। सपरनन दूसरे में'नालम्' इत्यादि में। 'जतुकाष्टन्यावेन'= लाख और कराठ्ठ के समान एक दूसरे में चिपके रहने से । पूर्वत्र= प्रथम में'रकच्छदत्व' हत्यादि में।अन्ययव्यति रेकाम्याम 'एक के रहने पर दूसरे का रहना और न रहने पर न रहना'- 'रकतच्उदस' इसी शब्द के रहने पर दलेष रहता है, इस शब्द के बदर देने पर दलेप नहीं रहता। इस प्रकार यहाँ पर भी रहेप शब्दमूटक है अतः उसे शब्दारकार हो मानना पढेगा। आश्रयाध्रयिमावेन=माश्रया- अविभाव से, न कि अन्वयव्यतिरेक से। इन [अन्वयष्यनिरेक ] के द्वारा यह सिद्ध दो सकता है कि जो जिसते पेदा होना है यह उसका कार्य है, यह नहीं कि व उसका अलंकार है। छोकबद् - छोक के समान-' ठोक में जिस प्रकार कान में पहना कुण्टल आदि भलकार कान का दो अरकार [शोमावर्षक ] कहा जाता है न कि सवर्ण रूपी कारण से उत्पन्न होने के कारण सवर्ग का अलंकार [शोभावर्षक]। विभर्श-दवेप शम्द का प्रमुख अर्प है जुटना, चिरकना, और अलकार शब्द का अर्थ है शोमावर्धक तत्त अथवा अप्रधान रूप से चमत्कारजनक तत्व। प्रश्न उठता है स्लेप में अटकायें कौन है। इलेप स्वयं हुआ अलंकार, अत अर्वकाये शब्द या अर्थ इन दो में से कोई मक दो सकना है।
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उद्जट और सर्वस्वकार समंग और अभग हम दोनों शलेषों को अर्थालंकारों के प्रकरण में रखते हैं अतः सामान्यतः यही सिद्ध होता है कि दोनों ही प्रकार का शलेष अर्थोलंकार ही है। उधर उद्भट ने समंग इेप को झब्दालंकार कहा है अतः मम्मट ने उसके अर्थालंकारों के बीच रखे जाने पर आपत्ति उठाई है-'शब्द्रालंकार इति चोच्यते, अर्थालंकारमध्ये च गण्यत इति कोयं नयः [ ननम उल्लास] रुदद के अनुकरण पर मम्मट ने स्वयं शब्दशलेप को नदम उत्लास में शब्दालंकारों के बीच रखा है औौर मर्थश्लेप को अर्थालंकारों के वीच दशम उल्लास में। सर्वस्त्रकार ने अतिशयोक्ति को तो दो अलग-अलम प्रकरणों में रखर वर्गोकरण को महत्व दिया, किन्तु यहाँ उन्होंने पैसा नहीं किया और समंग इलेप को शब्दालंकार कहकर भी उसे अर्थालंकारों के चीच रखा। विचिन्नता यह है कि मम्मट द्वारा इलेप पर उठाई गई अन्य आपत्तियों का उत्तर देते हुए भी दे इस आपति पर मौन है। वस्तुतः यह उनकी शिथिलता ही है। इस प्रकार सभंग इलेष में अलंकार्य शब्द ही मान्य है। अर्थ यह कि सभंग श्लेय शब्दाकंकार ही है। अमंग सटेप में अलंकार्य के निर्णय की समस्या जटिल है। जटिलता इसलिए है कि निर्णायक बिन्दु पर आचार्यों का मत एक नहीं है। उडट के अनुसार निर्णायक है आघ्रयाअयिभाव। इस मत में इलेष का आश्य ही इलेप का अलंकार्य है। समंग इलेष में दो शब्दों का जोड़ रदता है और वह लाख और लकड़ी के जोड़ के समान स्पषट दिखाई देता है। अतः वहाँ शब्द ही इलेप का माश्रय और अलंकार्य मान लिया जाता है। किन्तु मभंगशलेष में आश्रय का निर्णय करना कठिन है। अभंग शलेष में अर्थ दो होते हैं इसलिए अर्थ के जोड़ में कोई मतभेद नहीं उठता। जहाँ तक शब्द का संबन्ध है इसके विषय में दो मत है। एक के अनुसार अभंग श्लेष में यदपि शब्दों में भेद नहीं रहता अतः उनका वैसा जोड़ नहीं रहता जैसा सभंग श्लेष में रदता है, तथापि एक दूसरे प्रकार का जोड़ अवश्य रहता है। वह है गाय और भैंस के दो भिन्न दूर्धों के मिश्रण जैसा जोढ़। फलतः उसमें जोड़ की प्रतीति नहों हो पाती। पतीति न होने पर भी शब्दों में जोड़ इसलिए माना जाता है कि अर्थ बदलते ही शब्द भी वदल जाता है। जैसे मानस शब्द के दो अर्थ होते हैं, एक मानसरोवर तालाब और दूसरा चित। यद्यपि 'म्, आा, न्, अ, स, अ' ये वर्ण उस्ी क्रम से तालववाचक मानस शब्द में आते हैं जिस क्रम से चित्तशचक मानस शब्द में, जिससे दोनों मानस शब्दो के उच्चारण में प्रवलभेद नहीं होता, अतः दोनों शब्दों में एकता की प्रतीति होती है तथापि मे दो भिन्न शब्द है क्योंकि अर्थों में भेद है। जैसा कि कहा जाता है-'अत्यर्थ शब्दा भिधन्ते।' इस सिद्धान्त के अनुसार जोड़ या इलेष का आश्रय शब्द है इसलिए दलेपरूपी अरंकार का अलंकार्य शब्द हो है। इस मत के प्रवर्त्तक आाचार्य हैं नम्मट। उनकी पंक्ति है- [का०] 'वाच्यभेदेन मिन्ना यद् युगपद्भाषणसशः। रिलभ्यन्ति शब्दा: इलेपोइसौ ........ ॥' [ प०]'अर्थमेदेन शब्दभेद इति द्शने वाच्यमेदेन मिन्ना अपि शब्दा यद् युगपदुर्बारणेन रिलष्यन्ति = भिन्नं सवरूपमपहुनते स इलेस:। [काव्यप्रकाश उ० ९]। -'अर्थमेद में शब्दभेद' इस सिद्धान्त के अनुसार अर्थभेद से भिन्न हुप भी शब्द एक साथ उच्चारण के कारग अपना भिन्न रूप छिपा लेते हैं तो उसे शब्दश्लेप कहा जाता है। अर्थभेद से शब्दभेद का सिद्धान्त मम्मट के पूर्व उङ्जट ने भी माना था और कहा था- 'एक प्रयत्नोचार्याणां तच्छायां चेव भिभ्रताम्। स्वरितादिगुणैभिन्नैर्वन्य: विलश्न् ।४।९। अर्थात
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-एक ही प्रयत्न से उच्चार्य अत एव समान प्रनीत होते शब्दों का बन्ध रिसष्=जुडा हुआ=जोड से युक्त कहलाता है। 'समान प्रतीत होने' इस कथन का आषार 'अर्थनेद में शब्दभेद' सिद्धान्त ही है। उद्भट के काव्यालकारसारसग्रह की टीका उघुपृत्ति में प्रनोहार- न्दुराज ने भी लिखा है- 'अर्थभेदेन तावच्छन्दा मिदन्न इति मटोद्मटस्व सिद्धान्न।' किन्तु उद्टट ने ऐमे शब्दों के स्टैष का अलकार्य चम्द को न मान अर्थ को मान लिया- 'पदे, दविविषेरथंशन्दोकिविशिष्ट तद' -पद दो प्रकार के होते है-(१) एकोच्चारग वाले और (२) भिन्न उच्चारण वाले। इन दो प्रकार के पदों से कलेष मो दो प्रकार का होता है अरथदेष और शन्ददनेष पकप्रयत्नो- च्चारये शब्दसळेष दूसरे शब्दों में अमगशलेष ही है। इस पर मम्मट ने आपत्ति उठाई और कदा जब दलेष शब्द में माना [अर्थात् श्लेष का आश्रय शम्द को माना ] तब अल्कार्य अर्थ वैसे माना जा सकता है। रहे इलेप किसी में और अलकृन करे किसी को यह वान तर्कशुद्ध नहीं कदी ना सकनी। और इसीलिए अमग इलेष को अर्थोलकार नहीं माना जा सकता। वह शब्दा- हंकार ही है। एक प्रद्न और उपस्थित हुआ। यह कि अभग इनेष में अर्थमेद से शन्दभेद मानना और फिर शब्द में ही श्लेष स्वीकार करना कड़ों तक वास्तविक है। यह केवल शास्त्रमक्ति हो है, या इसमें कोई यथार्थ भी है। इसका उत्तर मम्मट ने तर्कशाख की दुहाई देकर दिया। उनहोंने कहा भभंगरलेप में इलेप का आशय कौन है यह तथ्य अन्वय और व्यतिरेक की कसौटी से परसा जा सकता है। यदि शब्द के हटा दिए जाने से श्लेष न छंटे तो वह अवश्य ही शब्द् का इलेप न होगा, अर्थ का हो इलेप होगा। 'रकच्छदत्व'-मादि अभग इलेष के स्वलें में स्थिति ऐमी नहीं है। यहाँ यदि 'रकच्छर' शब्द के स्थान पर 'रक्तपत्र' शब्द दे दिया जाय तो इस शब्द का अर्थ समग पक्ष में लागू नहीं होगा, फलतः सलेप नष्ट हो जाएगा। विकच शब्द मी नहीं हटाया जा सकना। 'विकेश' या 'विकसित' कहने पर एकान्दयी अर्थ ही निकलता है अन इनेप नष्ट हो जाता है। इस प्रकार श्लेप का आश्रय अभग श्लेप में भी शब्द ही होता है। असंकारसवंस्वकार और जयरय ने मम्मट की इस तार्किकना को सहदयता मे काटने की कोशिश की। अन्वयव्यतिरेक को इन दोनों ने कार्यकारणमाव का नियामक माना, अलकार का नहीं 1 अलंकार को इन्होंने आययाश्रविभाव पर हो निर्भर मानने का पक्ष प्रस्तुन किया है। यह इनके अभी आए ग्रन्थाश से ही स्पष्ट है। लोक में जैसे केयूर का कारण सुवर्ण छोदा है किन्तु बद अरकार होना है भुआा का, इसलिए केयूर के अन्वयव्यतिरेक सुवर्ग के साथ रहते हैं, सुवर्ग के न रदने पर बेयूर नहीं रहता और रहने पर रहता है, जब कि अलंकार्यालकारमाव भुजा के साथ, जो केयूर का आशय है। फल्त अलकार्यानकारमाच आश्रयात्रविमाव पर निर्भर माना जाना चाहिए। अमंगदरेप में नहाँ तक आश्रय का सम्वन्ध है इसका निर्णय कटिपन शास्तसिद्वान्त पर नहीं, अनुमव और सविति पर किया जाना चाहिए, बयोंकि यह क्षेत्र काव्द का क्षेत्र है। सविति में ममगरलेपसथल में द्वेत अर्थगन ही मासिन होता है, शब्दगन नहीं। फलत शब्द एक वृन्त बंदल है, जिसमें दो अर्थ के दो फल एगे हुए है। फल दो हो तो पृन्त को मी दो मानने की नासमझी कोई नहीं करता। इन्त के एक होने से उसमें ्लेप या जोड का कोई प्रदन ही नहीं उठता। प्रश्न फल में ही उठ सकता है क्योंकि द्वेत वह़ो हैं। फसतः दलैप मर्थों में हो है। अर्थ हो शलेप के आश्रय है। अर्थ ही इ्टेप के अलंकार्य हैं।
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शलेप सर्थ का ही अलंकार है। औौर सच भी है। बहू और वेटे यदि आदलेप करें तो उसे अलंकार सात ससूर का नहीं माना जा सकता। निक्चित ही इन आचार्यो के तर्के सुन्दर और समर्थ हैं। प्रातीतिक भेद मानकर शब्द में इलेप की सिद्धि अवश्य हो शाव्मक्ति है। नन्मट के अन्वयन्यतिरेक पक्ष का पुनर्वीक्षण करने पर कुछ और मी विवशताप सामने आाती है। अन्वयन्यतिरेक अंकार्यालंकारभाव के लिए मी अत्यन्त उपेक्षगीय नहीं है। यह नवश्व ही एक विचारणीय तथ्य है कि शब्द के बदल देने पर अमंगरलेप क्यों समाप् हो जाता है। आशया- अयिनाववादी उक्त दोनों सचार्य इसका उत्तर यह देंगे कि शब्द के साथ इलेम का कारणकार्य- माव संबन्ध है। अर्यों का श्लेष संभव नहीं होता जब तक रक्व्ददृत्व सादि उभवान्वयी शुब्द का प्रचोग नहीं होता। फकतः द्धर्थक शब्द ही विभिन्न गर्यों के इलेष का कारण है। अर्थ वह कि स्लेप अर्थों में ही रहता है तयापि वह तब तक संमन नहीं होता जय तक विशिष्ट रम्द का प्रयोग स हो। इस प्रकार अन्नवन्चतिरेक से अमंग द्लेंप में कारण तो शब्द दी सिद्ध होता है तथापि वषेम रह्ता अर्थो में ही है। सुमित्रा के गर्भ में वक्ष्मण और सशुन्न जुड़े हुए मे। समिना एक ही थी। शबु्न के लिए दूसरी और लक्ष्मण के लिए दूसरी नहीं। इसीलिए इलेष-डोड़ केवल सक्ष्मण और सन्नुव्न नें हो था, कारणभूत सुमित्रा में नहीं। अन्वयव्यतिरकवादों की ओर से यह कहा का सकता है कि दो विभिन्न अर्यों में इलेष उत्पन्न करने की जो क्षमता 'रकच्छदत्न' आदि दचर्थक शब्दों में रह्ती है वह क्षमता अपने आप में कोई विशिष्ट धर्म है या नहीं। उबसे कोई चमस्कार काव्य में आाता है या नहीं। अवश्य ही वह चमस्कार में अंशतः प्रयोनक है। इसके अतिरिक्त अमिन्नानुपूर्वीक अतएव एकप्रबत्नीच्चार्य शब्दों में यदि वास्तविक भेद नहीं रहता औोर उनका दलेंष एक प्रातिमासिक या कब्मित रलेष है तो ऐसे शब्द से अतीत दो अर्यों का इलेष वास्तविक है इसमें भी क्या प्रमाश। एकशम्दवाच्य होने से उनमें सहता भेद लक्षित नहीं होत्षा बेवल इतना ही अनुमवतिद्ध है। दोनों शब्द ुड़े रहते है यह नहीं। और यदि ऐसा कोई इलेप अभंगइलेप के अर्थो में रहता है तो वह सभंग स्लेष के गथों में भी रहता ही है। तब सभंग इलेषको उमयालंकार क्यों नहीं माना जाता। यदि यह नहा जाय कि सभंग इलेप में शब्दों के सतुकास्वव जोड़ के कारण सर्यों में जोड़ रहता, अर्यों का नोड़ वहां स्वावीन नहीं छोता तो यही चात अमंग इलेव में कही जा सकती है। वहाँ भी अर्थरलेप शब्दश्लेष पर निर्मर है केवल जतुकाष्ठवत शब्दों में शलेप ही वहाँ लक्षित नहीं होता। तब यदि शब्द के कारण होने से सभंगरलेघ में दलेप शब्द का अलंकार है तो अभंगशलेप में भी कारण होने से इलेप को झब्द का ही अलंकार क्यों नहीं माना जा सकता। एक दात और। यह कि अलंकार्य अलंकार का 1. ाश्रय हो हो यह आवश्यक नहीं है। चदि वाक्यार्थ में आावादि सामगी नहीं हो तो उसमें आाए रूपक आदि सलंकार नहीं साने जाते। मावादि सामन्ी अलंकारानय नहीं होती । अलंकारा- अय अर्थ होता है और वह उससे व्यक् होती है। इस प्रकार जब सलकारये अलंकाराशय से मिन्न सिद्ध होता है तम जिसमें उतेप हो उसी को इलेप का अलंकार्य और उसी के प्रति इलेप को कलंकार मानना होक नहीं है। फलतः भमंग इलेप में भले हो श्लेष कर्थो में हो तयापि भर्थ ही इसय का अलंकार्य हो यह नहीं माना जा सकता। सलकार्य वह होता है जिसमें शोमा का आधान हो। और अमंग इलेच में मी सोमा का आघन समंग इलेष के ही समान शब्द में ही होता है। वहाँ सर्थद्यवाचकता से शोभा माती है अतः वह शब्द में ही रहती है। दूसरे शब्दों में इलेप- प्रतिपादकता शब्द में होने ते शष्द ही अलंकार्य माना जा सकता है, अर्थ नहीं, इसे शास्त्रकारों ने 'तन्त्र' शब्द से पुकारा है। तन्त्र का अर्थ एकाधिक सर्थों का प्रतिपादक शब्द माना जाता है।
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फलत अधिक अच्छा हो कि मम्मड और अल्कारसबैंस्र्रकार अपने पूववर्त्ती मचार्य उद्ट और अर्थभेद् से शुब्दभेद मानने वाले अन्य दाशानिकों का मुलाहिजा न कर अभंग इलेष के स्थान पर 'तन्म्नालंकार' नामक एक स्वतन्त्र अ्टकार को स्वीकार करें। पणिहितराज जगनाथ तथा विश्वेशर ने इन मनभेदों का उन उन आचार्यों के नाम के साथ अनुवादमात्र कर दिया है। इन पर अपनो और से कोई टिप्पणी नहीं है। विमर्शिनी तन्, एव रूपस्यास्य 'निरवकाशा दि विधय सावकाशान्विघीन्वाधन्ते' इति नीर्या निरव का शस्वासर्वाछकारापवादकश्य कचिदाहुरित्याद-एष चेस्यादि। 'जो विधि निरवकाश होतो हैं वे सावकाय विधियों को वाधित कर उनके स्थान पर चरि- तार्थ मानी जाती है' इस सिद्धान्न के अनुसार उक्त प्रकार के इम श्नेष को निरवराश् मानरूर कुछ [चद्भर आदि ] आावार्य अन्य सव अलकारों का अपवाद या बाधक मानते हैं। अन्थकार इमी तथ्य को प्रस्तुत करते हुए टिसते हं- [सर्वस्व] एष च नामापेप्वलंकारान्त रेग्वारम्यमाणस्तद्वाबकर्वेन तर्पतिमोत्पत्ति- द्वेतुरिति केचित्। 'येन ध्वस्तमनोभवेन घलिजित्काय: पुरास्त्रीकृतः' इत्यादो विविक्ोऽस्य विषय इति निस्वकाशत्वामावाज्तान्यवाघकत्वमित्यन्येः सद्द संकर:, दुर्बलत्वाद्वा वाध्यत्वमित्यन्ये। तन्न पूर्वेपामयमभिपायः।इद पाक्र- रणिका प्राकरणिकोभयरूपानेक्कार्थरगोचरत्वेन तावत्म तिष्ठि तो ऽयमलंकार । तत्रारदं प्रकारद्वयं तुल्ययोगिताया विषयः । तृतीये तु प्रकारे दीपकं भवतीति तावदलंकारद्वयमिदं श्लेपविषयं व्याप्तया व्यवविष्ते। तत्पृण्डे चालंकारान्त- गणामुत्थानमिति नास्ति विविक्तोऽस्य विपयः। अत पवालंकारान्तराणां वाधितत्वात्प्रतिमानमात्रेणावस्थानम्। 'येन ध्वस्तमनोभवेन' इत्यादी च प्राकरणिकत्वादर्थद्वयस्य तुल्ययोगितायाः प्रतिमानम्। एवं च 'सकलकलं पुरमेतज्ञातं संपति सुधांशुविम्यमिय' इत्यादौ न गुणक्रियासाम्यवच्छन्द साम्यमुपमामयोजकम् अपि तूपमाप्रतिभोत्पत्तिदेतु: श्लेप पवावसेय:। श्लेप. गर्में तु रूपके रूपकद्वेतुकस्य श्लपस्य तृतीयकसार्या रूपक एव विश्रान्तिरिति रूपकेण श्लेपो वाध्यते : श्लिष्टविशेषणनिबन्धनार्या व समास्षोकौ विशेष्य- स्यापि गम्यत्वाच्छलेपस्य वाधिका समासोकि:। [उसट आादि] कुछ आचार्यों की मान्यता है कि यह [इलेष] जहाँजहां होना है वहाँ अन्य कोई अटकार अवस्य हो उपस्थित रहता है [ न अप्रास= इसमें सार दो निषेव आवश्यकत्व के वाचक हैं] इसलिए यह अन्य अनंकार का वापक होता है, फलत वहोँ शलेष के कारण अन्य भटंकारों का आाभासमात्र [पतिमा] हो पाना है। अन्य अरकार मटकारखवेन प्ररुद्ध नहीं हो पाति]। इसके विरुद्ध [मम्मट आदि] अन्य आचार्यों का मन है कि 'इलेष 'येन ध्वस्त.' आदि स्थलों में अन्य अलकारों की वाधा मे रहित है, अन सतेष निरवकाश नहीं है फल्त. यह अन्य अर्लकारों का बाधक नहीं है। निदान अन्य अनंकारों के साथ इसका मकर= मित्रग हो सकता हे अधवा दुर्बल होने के कारण अन्य भलकारीं के द्वारा यही वापित माना या सकता है।'
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इत्ेपालङ्कार:
इनमें से प्रथम आचार्यों का अभिप्राय यह है-'यह तो सर्वमान्य है कि यह (इलेप) अलंकार प्राकरणिक, अप्राकरणिक अथवा उभयरूप नो अनेक अर्थ होते हैं उनको लेकर प्रतिष्ठित होता है I, इनमें से प्रथम दो प्रकार के अर्थ तु्ययोगिता का विषय है और तीसरा प्रकार दोपक का। इस प्रकार ये दो अलंकार श्लेप के संपूर्ण क्षेत्र को व्यास किए रहते हैं। इनके पीछे [ रपमा आदि ] अन्य सलंकार भी उठते दिखाई देते हैं। इसलिए इस [इलेप] का ऐसा कोई स्थल नहीं है जिसमें केवल श्लेप माना जा सके। इसीलिए अन्य अलंकारों को इलेप से वाघित मानता पढ़ता है और इचेपस्थल में उनके अस्तित्व का आभासमान्र स्वीकार करना पढ़ता है। [विविक्त विषय के रूप में जो उदाहरण प्रस्तुत किया गया है उस] 'वेन ध्स्तमनोभवेनo' में भी दोनों अर्थ प्राकरणिक हैं अतः तुव्ययोगिता का आमास होता ही है। इस प्रकार गुण और करिया के साम्य के ही समान सकलकल [कलकल शब्द-सहित] यह नगर इस समय चन्द्रविम्व सा [सकलकल = सकल कला से युक्त ] हो गया है' इस स्थल में [मम्मट ने जो] शब्द के साम्य को भी उपमा का प्रयोजक [माना है वह] नहीं माना जा सकता, अपितु यहाँ [उस अंश में] इ्लेव माना जाना चाहिए जिससे उपमा का तो आमासमात्र रह जाता है। ['विदन्मानस' आदि परम्परित रूपक में ] रूनक जहाँ श्लेप से युक माना गया है वहाँ रूपक इ्लेम से इसलिए वाधित नहीं होता कि वहो [ पहले राजा पर इंस के रूपक की अतीति होती है तब वद ] रूपक [मानस में ] शलेप को जन्म देता है तदनन्तर [वाक्यार्थ की ] तीसरी कक्षा में रूपक की प्रतोति में [वाक्यार्थ की] विशान्ति होती है। किन्त समासोकि जहाँ इ्लेपयुक्त विशेषणों से युक्त होती है नहाँ विशेष्य के [शब्दतः कथित न होकर ] गम्य होने से समासोकि ही क्लेप की याधिका होती है। और- विमर्शिनी केविदिति, उन्ददादयः । केचितपुनर्विषयवेविवत्यस्य संभवात्तिरवकाशत्वाभावाल्ञास्य सर्वालंकारापचाडकत्वमभ्युपयन्तीत्याह-येनेत्यादि। अन्यया इति माहशा:। विविकोऽस्य विषय इति तुक्य योगिताया अन्राभावाय। साहि द्पोरपि प्रकृतयोर प्रकृतयोर्ष विशेष्ययोः पृथगुपादाने औपभ्यश्य च गम्यव्वे भवति। हुह तु तदभावः। विशेष्ययो: पृथगनुपादानाव औपन्यस्य प रम्पत्वाभावास्। न हन्रोमाघवस्य साधनेन तेन वा सस्य सादश्यं विन- सितम्। एकेनैव शब्देन रिलष्टतयार्थहयस्य प्रतिपिपादयिपितत्वा्। अम्र द्वि परस्परनैर पेचयास् तयोक्षमाधववाक्यार्थपरामर्शवेलायां साधवव्याकयार्थपरामर्शमात्रमपि नास्तीति को नामोपम्यस्यावसर:। तस्मादेवमादावलं कारान्तर विषिक्क चिष परवाचछ लिष्टता याश्ोदुधुर कं घरीभावेन प्रतीतेन निरवकाशः रवेषः। अन्येः सह सेकर इति द्वयोरपि सुक्यकक्षता प्रतीतेः। वाध्यस्वमिति। शलेषस्य युवलत्वाद्लंकारान्तराणां व बलबत्वात्। एतघ अन्थ- कृदेवाग्रे दर्शयिष्यतीति नेहायस्तम्। तदेव मस्य सर्वाछकारापवादकावं न युक्म्। अन्या- लंकार वदेव वाध्यवाधकमापादिदर्शनात। एतथालकारसारकता सम्पत्ञमुक्तमितीह ग्रन्थ- विस्तरभयाष तथा नोक्तम्। पूर्वेषामिति, उद्वदाष्टीनाम्। अविप्रतिपत्ति-चोतकस्ताच च्छब्दः। व्याप्त्येति। सर्वलचयव्यापकर्वेन, सर्वत्रेवास्य नरिरूपत्वात्। तत्पृद्न इति सुक्य- योगिताद्ीपकोपरि। अलंकारान्तराणामिति उपसादीनाम् उत्थानमिति। तुष्ष्ममोगितादी- पकाभ्यामपि सम्प्तीतेयट्रेकाद। अत एवेति। तस्य विनिक्विषयत्वासंभवात्। पविमान- मिति आाभासमान्नम्। न पुनस्तवैव विश्रान्तिरित्यर्थः। एतव् गथा नोपपदते तथा सम. नन्तरमेदोक्कम्। तदेवं स्वमतोपोद्लनाय पूर्वमन्धान्यैः सह संकरो दुर्घकस्वादावाध्य
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३६२ अलह्कारसर्वस्वम् समिति यदु्क तदेव प्रपश्यित्ुमेतरकतृरुं तावदन्यारलंकारवाध्यतवं वर्शथति-स्लेपेत्या दिना। तनीयकक्षायामिति। प्रथमकपार्या दिरूपकपतीतिरेव। द्वितीय कथार्या तु श्लेप पतीवि:। श्लैपस्य सर्वातंका रपवानुश्य मिच्छ द्भिर प्यौज्वटैयदन्यालकार वाध्यत्व मेत्ा्यो क तत् स्ववचनविरुद प्रायमेवेपामिति घ्वनयितु तदुकतमेव रूपकसमासोक्तिवाध्यशवमेनस्य अ्भ्यकृतेह् दशिनम्। वाध्यन इति चिद्धन्मानसहमे:यादी। बाधकेति उपोढरागेेश्यादौ। केचित् = कुछ उद्भयादि आचार्य। किन्तु [मम्मट आदि] कुछ [आचार्य] इसे अन्य सव सख्कारों का अपवादक नहीं मानते क्योंकि वे इसे निरवकाश नहीं मानते, मनदर्य वे इसका स्वनन्त्र [सर्वारकार रहित] विषय वतलाते हैं। इस तथ्य को लिसने हुए कहते हैं-'येन व्वस्त०' इत्यादि। अन्ये=अन्य मुझ जैने [अर्थात स्वय ग्रन्थकार जैसे ]। 'विविसोऽत्य विषय := 'इस सटेय का अवकारान्तरशून्य विषय' क्योंकि यहाँ ['मेन अवस्त'-पद् में] तुन्ययोगिता नहीं है। वह तम होती है जब केवल प्रकृत या केवल अप्रकून विशोष्यों का पृथव पृथक उपादान दो सथा सादृक्य गम्य हो। उस [येन ध्वस ] पच में रस [ तुश्ययोगिता ] का अभाद है क्योंकि यहाँ विशेष्यों का उपादान पृथक नहीं हुआ है तथा साश्य गन्य नहीं है। ऐसा नहीं है कि इस पद्य में उमाघव [शकर] का माधव से या माधन का उमाधव से सातश्य विवक्षित दो। यहाँ तो दोनों नर्यों का एक हौ गम्द के द्वारा दिल्टरूप से पतिपादन अमोष् है। यहाँ तो उन [दोनों पक्षों] मैं परस्पर निरपेक्षता होने से जब अमाधव-सम्बन्धित वाक्यार्थ की प्रनीति होती है तब माधववाक्यार्थ का परामर्शमात्र तक नहीं रहना। तब यहाँ सादृद्य का अवसर ही क्या हो सकता है। इस कारण ऐमे स्थलों में दनमेष अन्य सलकारों के स्पर्श से रहित रहकर विघमान है, तथा यहां रिलष्टता प्रमुख रूप से परिलक्षित दिखाई दे रही है फलतः इसे निरवकान नहीं कहा ना सकना। अन्मे: सह संकर-मन्यों के साथ सकर'-क्योंकि दोनों समानरूप से प्रतीन होने हैं। बाध्यरवम् - बाघ्य होना' = क्योंकि इलेष दुर्बल होता है और अन्य अलंकार पबल। इसे स्वयं अन्यकार ही आगे दिखलायगे इसलिए इसके विवेचन पर यहां श्रम नहीं किया जा रहा। तो इस पकार इस [ दलेष] का सभी अलंकारों की बाधिन कर उनका अपवाद माना जाना ठीक नेहीं है। क्योंकि [ तपमा और रूपक आदि ] अन्य [स्वतन्न्न] अल्कारों के ही समान वाध्यबाधक- माव [तथा स्वतन्त्र विषयता ] आदि दिखाई देवे हैं। इसका विस्तून विवेचन अलकारसारकार ने कर रसा है। इसलिए उतने विस्तार के साथ यहाँ विवेचन नहीं किया जा रहा। इससे अरन् विस्तार का भी भय था [इससे स्पष्ट है कि विमर्शिनीकार मूल के विरुद्ध मम्मट के समर्थक है ] पूर्वेयाम = प्राचीन सटट आदि। तावव-शन्द इस बात का धयोतक है कि इस विषय में विपक्षी को भी आ्पाति नहीं है। व्यासया= व्याप कर = सक्ष्य के सर्वदेश में व्याप होने से क्योंकि तीन रूपका यह [ रळेष या अर्थ] सवंन किसी न किसी रूप में दिखाई देता है। ततपृष्ठे= उसके पीछे अर्थाव तुक्ययोगिता और दीपक के ऊपर। अलकारान्तराणाम्=अन्य मलवारों का अर्थात् उपमा मादि का। उत्थानमिति क्योकि उन [ अन्य अढकारों] की प्रतीति तुख्य- योगिता और दीपक से हौ उठती है। अतमुव = इसीलिए अर्थात विविक्तविषयता=स्वनन्त्र- क्षेत्र न हेने से। पतिमानम्= आमासमान्न। अर्थ यह कि विश्रान्ति रसी में नहीं होती। किन्तु वह तथ्य िस प्रकार सिद्ध नहीं होता यह अभी अमी कहा जा चुका है। इस प्रकार अपने मन के समर्थन के टिए पहल जो करा है कि-'इसका अन्य अलकारों के साथ या तो संकर रहता है या फिर दुरजल रहने पर अन्य सलंकारों से बाभित, इसी को और अधिक विस्तार में पविपादित करने के लिए अब यह बवन्गते हैं कि यह अलंकार अन्य अलंकारों को बाघ देवा है-श्लेष-
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इत्यादि के द्वारा। 'तृतीय कपायाम्-तृतीय कक्षा में'=प्रथम कक्षा में रूपक की ही प्रतीति होती है। इलेप की प्रतीति होती है द्वितीय कक्षा में। 'उद्धटानुयायी आचार्य एक ओर तो इहेप को सभी अलंकारों का वाधक बतलाते हैं और दूसरी ओर वे ही कुछ भलंकारों से उसे वाघित होता हुआ मी बतलाते हैं, यह उनके द्वारा अपनी मान्यता का ही विरोध है'-इस तथ्य को ध्वनित करने के लिए उन्हीं [ उन्हट आदि] के द्वारा प्रतिपादित इलेप का रूपक और समासोति से नाधित होना अन्यकार ने यहाँ दिखलाया। वाध्यते=वाधित होता है-'विदन्मानसहंस' इत्यादि [ स्लिष्ट परम्परित रूपक ] में। वाधिका = 'उपोढरागेण' इत्यादि पद्मों में। विमर्श-'नाप्रामे'= का मूल 'बेन नाप्रासे य आरभ्यते स तस्य वाघक:'-यद है। इसमें सेन की तृत्ीया का अर्थ हैं कर्तृत्व, प्रतिषेषद्वय का अर्थ है आवशयकत्व, क मत्यय का भर्थ है भाव। इस प्रकार न्याय की भाषा में इस वाक्य का अर्थ निकलेगा- 'यत्कर्सकावश्यप्राप्ती य आरभ्यने स तस्य बाघकः। पुनः येन के 'यद' -शब्द का अर्थ है न्यापकत्व और यः इसके यव शब्द का अर्थ है व्याप्यत्व। अतः न्याय की भाषा में मर्थ होगा- 'व्यापकस्यैव सर्वत्र प्राप्ती निरवकाशो व्याप्यस्तं [व्यापकं] वाधते। इन्हीं तथ्यों को अन्धकार ने 'नापा प्रेपु आरभ्यनाण:' तथा 'न्यापत्या'-इन अंशों द्वारा सूचित किया था। पण्टितराज ने इलेष पर उद्धट का मत इसी प्रकार स्पषट किया है-मनाहुरुन्टाचार्या :- 'येन नाप्रासे य आरभ्यते स तस्य वाधक: इति न्यायेनालंकारन्तरविषय पवायमारभ्यमागोड़ल- का रान्तरं बाधते।' यह उन्भट के मत का अलंकार सर्वस्व पर आश्नित भावानुवाद मात्र है। उद्गद की चक्ति इस विषय पर ऐसी है- 'डिकटन, भटंकारान्तरगतां प्रतिमा जनयत0 1४।९, ६०। -रिलष अलंकारान्तर की प्रतिमा सत्पन करता है। उद्भट ने इस विषय में इससे अधिक कुछ नहीं लिसा । केवल उदाहरणमाघ प्रस्तुत कर दिए है-
-पार्वती प्रमात सन्ध्या के समान ्थी-अस्वापफललुबधेहितप्रदा= [पावती-न, सु आप फल - दुर्लम फल पर सु्घको ईहित=अमीष फल देने वाली तथा प्रभात 'सन्ध्यास्वापफल= निद्ाफल अमपरिदार पर सुब्धस्वाप फल तुब्ध, तद्िन्न अरनापफललु्ध उसमें हित=हितकारी अटृष्ट उत्पन्न करने वाली ] इसी प्रकार- 'अविन्दुसुन्दरी नितयं गलल्लाव्रण्यविन्दुका' -पार्वती अविन्दुसुन्दरो भो थी और उनसे लावण्यविन्दु झरते रहते ये [ विरोष], [परि- हारार्थ-1 अप् = जल उसमें प्रतिविन्वित जो इन्दु=चन्द्र उससी सुन्दरी। प्रथम में उपमा और द्वितीय में बिरोधालंकार है। उन्तट के अनुसार उनका अस्तित्व प्रातिभासिक मात है। नारतविक सत्ता कलेप की ही है। परन्तु उद्गट ने अपनी इस मान्यता को पुष्टि में कोई हेतु नहीं दिया। आानन्दवर्धनाचार्य ने इसे इसी रूप में स्वीकार कर लिया। उन्होंने धवन्यालोक के द्वितीय उद्योत में इलेप को उपमा व्यतिरेक, विरोष आदि जलंकारों से पुष्ट होता हुआ कहा है और वहीं 'येन ध्वस्तo' पद्य प्रस्तुत कर यह मी कह दिया है कि इलेष वहाँ होता है नहाँ दोनों अर्थ अमिषा द्वारा कथित होते है साथ ही वहाँ यदि अन्य कोई अलंकार भी वाच्य होता हो तो वहाँ दरेप ही माना जाना चाहिए-'वस्तुदये शव्दशकत्वा प्रकाशमाने इ्लेपः, तथा-यन शव्दशकत्या साक्षादलंकारान्तर वाच्य सव प्रतिभासते स सर्वः शलेपविषयः । [ पृ० २२५-३६
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३६४ अलङ्कारसवस्वम्
नौ०सें० २९९७]। आनन्दवर्घनाचार्य के दी समान मदिमभट्ट ने भी उद्ट के मत को स्वीकार कर टिया। उन्होंने व्यिविवेक के द्वितीय विमर्श में अरकारों की सीमा निर्धारित करते हुए और अनेक अलकारों में वाच्यावचन दोष बनलाने हुए लिसा है- "यत् हि यदलं कारप्रतिभानुगुणशब्दोपरचित इलेषः तत्र तदलंकारनिवन्ध तमेव श्केषममि- व्यनक्ति, न तु तस्य विषयमतिक्ामति।' [पृ० ३९५ चौ० स० २०२५] इदो जिस अलकार का आामास मात कराने के लिए की गई पदरचना से शलेष बनता है, वहाँ वह अलकार उसी शलेप को अमिध्यक्त करता है, उस [श्नेष] क क्षेत्र में वह स्वयं नहीं धमकता।' इसी तथ्य को कारिकारूप में उपनिबद्ध करते हुए उन्होंने लिखा- 'यद्कारव्यवत्ये ये शम्द्रालदितरोप्रपि तेरेव। व्यज्येनाग्पतरैयंदि तदसी सृद्येत साघवान्नान्य ।।* व्युक्िविवेक की टीक्ष में मी अल्कारसबस्वकार ने दलेष को निरवकाश मानकर अन्य सलंकारों का वाधक ही माना है-'उमोत्यापिते इलेष नोपमा श्लेप वाघते, तस्य विविकविषयदवा- मावात, दलेपस्सु सो बाघते इति युकम॥[दरषव्य-पृ० ३१६ च० स० नवीन संस्करण ]। मानन्दवपंनाचार्य ने सलेघ के विचार के पूर्व अस्स्ष स्वर में दलेन को अलकारान्वर से पृथक दतळाया था। सम्मट ने उसे पकड लिया। और वद्मट के मत के विरुद्ध इलेर को अन्य भडकारों द्वारा वाध्य बतलाने हेतु अपेक्षित अलंकारान्तर से रचेप का पार्थक्य बनलाते हुए उन्होंने- देद ! त्वमेव पानालमाश्ानी सं निबनधनम्। सवं चामरमरुद्भूमिरेकी लोकनयात्मक।' -यह पद उद्धृन किया। इसका अर्थ है-हे राजन् ! आप लोकवयात्मक हैं, आप दी 'पाताल्म्' [पानाल= नागलोक तथा पाता अलम्=पर्यात्त रक्षक] हैं, आप ही ाशानिबन्दन [= आशा=दिया उनके आधार पृथ्वोलोक, आधा = इच्छाएँ उनके आधार ] है, आप हो 'चामर- मरुदभूमि' [च= और ममरमरुत्=देवनण तथा पवन की भूमि =स्वर्ग तवा नामर-चँवर की मरुद-दवा की भूमि=भास्पद= विश्व जिसार चँवर ढुले जाते हैं]।' परन्तु यहाँ राजा पर तीनों छोकों का आरोप है तथा 'अन्य राबा नहाँ कोई एक कार्य करने तक सोमित है वहा यह राजा अन्य सव कार्य मी करता है अन यह उनसे उत्कष्ट है,इस व्यतिरेक का भी अस्वित है। अन- यह स्थल शुद्ध देलेप का स्थल नहीं माना ना सकना। पण्डिवराज ने भी रसगंगाधर में इम पद्च में रूपकमतीति मान मम्मट का खण्डन किया है। वसतुतः स्वयं मम्मट ने भी इस सथल में रूपक व्यनिरेक का स्पर्य अनुमव किया था। यह तथ्य उन्हीं के इस पूद् के बाद के ग्न्थाथ से सढकता- है। इलेष की अरकारान्तररहितता के लिए अलकारसवंस्वकार ने आनन्दवर्धनाचार्य द्वारा प्रस्तुत 'येन ध्वस्त०' पद्य चुना। इससे मम्मट की स्थापना को वल मिला। मम्मट ने उद्ट के मत का खण्डन करते हुए अन्य तर्क भी दिए थे। उन्होंने कहा था 'पूर्णोपमा' में साधारण धर्म को निष्पति नियमन स्लेष से ही होगी, वहाँ यदि दलेष को ही अस्कार माना सयगा तो पूर्गोष्मा कहीं होगी ही नही-'पूर्गोपमाया विषयापहार एव स्थान्'। इसी प्रकार वन्दोंने व्यतिरेक, विरोध, रूपक आदि अन्य भलकारों में मी दलेप को निभ्वादक और व्यनिरेक आदि को ही निम्नाधरुप से प्रधान अलंकार माना है। पण्डिनराज जगन्नाथ ने इन दोनों पक्षों को अवनी माषा में स्ष्टाकरण के साथ उद्ृनमात कर दिया है। उनका संपूर्ण विवेचन सर्वस्वकार तथा विमर्िनीकार के मनों पर आधृत है। सई- स्वकार उड्ट और धवनिकार के भनुयायीं के और विमर्शिनोकार मम्मट के। उन्होंने 'येन घल'
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श्लेपालद्ार: ३६५
पथ में तुन्ययोगिता का अभाव बढ़ी वारीकी से सिद्ध किया है। पण्डितराज ने उसे स्वीकार कर लिया है। वस्तुतः 'येन ध्वस्त' पद्य में तुत्ययोगिता के समाव की यात अलंकाररत्नाकर से लो गई है। अलंकाररत्नाकरकार ने सर्वस्वकार के-'ह प्राकरणिका-तुल्ययोगितायाः प्रति- मानम्'-इस कथन का माचार्थ स्पष्ट कर उसका निराकरण करते हुए कहा है -- -'येन स्वस्तमनोभवेने'-त्यादौ यत्र प्रकृतयोरप्रकृतयोर्वा विशेष्ययोः सकृदुपादानं तन्र तुल्ययोगितायाः अभावाव। -- [नर्वस्वकार का उक्त कथन अमान्य है] क्योंकि तुल्ययोगिता में प्रकृत या भप्रकृत विशेष्यों का अनेक बार कथन रहता है, एक वार कथन रहने पर तुल्ययोगिता नहीं होती। 'येन ध्वस्तo' पथ्य में विशोष्यों का कथन एक बार ही है अतः यहाँ तुल्ययोगिता नहीं है।1 आगे कोटि प्रकोटि चलाते हुए उन्होंने लिसा कि यदि आावृत्ति के द्वारा विशेष्यों का असकृत उपादान मान लिया जाय तो धर्मो का उपादान मी उसी प्रकार आवृत्ति के द्वारा एकाधिक बार मानना पड़ेगा। उससे धर्मों में अनेकता चली आएगी। तुक्ययोगिता या दीपक केवल धर्म की पकता में ही होते हैं। मतः आवृत्ति द्वारा विशेष्य की अनेकता मानने पर भी तुळ्ययोगिता सिद्ध न होगो । इस प्रकार मम्मट, शोभाकर और जयरथ स्लेप की वाय्यता स्वीकार करते हैं जबकि उद्धट आनन्दवर्धन तथा अलंका रसवस्कार अलंकारान्तर की। एकतर पक्ष के निर्णय के लिए एकमात्र चमत्कारपयोजकता को कसौटी माना जा सकता है। सहदर्यों के अनुभव से चमत्कार निष्पत्ति श्लेप या दलेवेतर जिससे सिद्ध होती हो उसीको अलंकार माना जाएगा। तब निरवकाशत्व और सावकाशत्व के झ्रासतय जल्प अर्किनित्कर सिद्ध होने। जहाँ पकाध शल विशेषण से उपमादि निम्पन्न होते हो वहाँ उपमादि का ही चमत्कार माना जा सकता है और जहाँ 'उद्दामोस्कलिका' आदि स्थलों में अनेक विशेषणों में श्लेय हो वहां निश्चित ही चमत्कार श्लेपयोजना से होगा। फलतः वर्हाँ इलेष ही मानना उचित होगा। अलंकाररत्नाकरकार शोमाकरमिन्र ने इस तथ्य को स्वीकार किया है और शलेप को पांच स्थिति में मिलता वतलाया है- 'प्रधानभूतालंकारवियोगात सावकाशता। कुत्रचित प्रतिमोत्पत्तिद्वेतत्वं कचिदङ्गता ॥। कचिद परोहविरद्दाव प्रातिमत्वं परत्र च। अनुप्राणकतास्येति क्लेपोडयं पञ्भूमिक: ।।' इलेप पांच भूमिकाओं में निष्पन्न होता है- (१) सतन्त्र भूमिका, जई। अन्य किसी अलंकार का इसके साथ मिश्रण नहीं होता। [यया-'येन ध्वस्त'-पद्य में ]। (२) अन्य अलंकारों की सत्ता प्राततिभासिक सिद्ध कर रहने की भूमिका। [यथा-'सकल- कळम् इत्यादि पद्य में ]। (३) क्प्रधानता की भूमिका, [यथा-'विष्णुका वक्षस्वल समुद्रतद के समान वनमाळामरण है' इस वरन्य में 'वनमालाभरण' शब्द में वनमाला एक माला, वनमाला=तटवर्ची जंगल की पात यहां इलेप उपमा का अंग है]। (४) आभासात्मकता की भूमिका [चथा-'अविन्दुसन्दरी०' स्थल में विरोध की प्रधानता होने से श्लेष की मामासात्मकता ]। (५) अनुआाणकता की भूमिका, [ यथा-समासोकि में ]।
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विमर्शिनी एव श्लेपसयालंकाराणां व पररुपरं वाध्यवाघकमावं प्रकाश्यान्यै: सहान्य संकरीरणदवं दर्शयति-हह सित्यादिना। इम प्रकार [उपर्युक्त ग्रन्थ द्वारा] रलेष और अन्य अलकारों का परस्वर में वाध्यवाषक मात्र दिसलाया। अव इलेष का अन्य अलंकारों के साथ साकयं दिखलाने हुए लिखने हैं-
[सर्वस्व ]
इद तु- 'धयीमयोऽपि प्रथितो जगत्सु यद्वावणी प्रत्यगमद् विवस्वान्। मन्येडस्तरालात् पतितोऽत एव विवेश शुध्धै वडवाग्निमध्यम्।।' इति शलोके विवस्वतो वस्तुवृत्तसंभवि अधाप्रदेशसंयोगलक्षणं यत्प. तितत्वं यञ्च घडयाग्निमध्यप्रवेशस्ते द्वे अपि प्रयीमयत्वसंबन्धिवारुणी
मूलया अमेदेनाध्यवसिते । सोऽयमेककियायोग:। तज्जेतुका च मध्ये 'अत पव शुद्धये' इत्युत्परेक्षा । मपात पचेति परामृष्टो घिरोधालंकारालंकृतोऽथों द्ेतुत्येनोत्प्रेक्ष्यते। शुद्धये इति घ फलरवेन। ततथ् ह्वेतुफलयोद्वयोर्यत्रो तपेक्षा। विरोधालंकारस्य व विरोधाभासत्वं लक्षणम्। अतो विरोधाभासन- समय पव ह्वेतुफलोत्मेक्षयोकत्थानम् । उत्तरकालं तु विरोधसमाधि:। श्लेयस्य व सर्वालंकारापवादत्वादू विरोधप्रतिभोरपत्तिह्वेतुरयं श्लेप:। "[वेद्-] श्रयीमय रूप से तैलोक्य में प्रसिद्ध होने पर भी सूर्य वारुणी [पश्षिम दिया तथा मदिरा] की ओर जो गया मैं सोचता हूँ कदाचित इसी से [ पतिन होकर औीर ] भस्ताचल से गिरकर शुद्धि के लिए वदवाग्नि में प्रवेश कर रहा है। इस पद्यार्थ में अघ: प्रदेश से सयुक्त होना रूपी वो वास्तविक पतितत्व=गिरना है औौर जो वड्याग्नि में प्रवेश करना है ये-दोनों वेदवयीमय होने पर मी वारुणीगमन करने रूपी विरुद्ध आाचरण से जनित जो पतिनत्व तथा अग्निम्रवेश है उनके द्वारा इलेषमूलक अतिश्नयोकि के माधार पर अमिन्न रूप से अभ्यबसतिन हैं और यह दुआ [समासोक्ति का जनक सूर्य तथा धार्मिक पुरुपरूपी दो विमिन्न व्यक्तियों का अग्निम्रवेश रूपी ] एक क्रिया में अन्वित दोना। इसके आधार पर निष्पन्न होती है 'मैं समझना हूँ कि इसीसे शुद्धि के लिए'- यह [हेतु-फलोतप्रेक्षारूपी ] उत्पेक्षा इस [ उत्प्रेक्षाश] में इसीमे [ अर्थात विरुद्ध आचरण करने से ] इस प्रकार परामृष्ट जो विरोधाछंकार हेउममे अलकृत मर्थ हेतुरूप से उतप्रेक्षिन हो रहा है और [उसीमें] 'ुद्धि के लिए' यद अद फलरूप मे। इस प्रकार यहां हेतु और फल दोनों की उत्प्ेक्षा हो रही है। और जो विरोधा- लकार है उसका लक्षम है विरोधाभासत्व, अत देतु और फल की उत्प्रक्षाओं का उत्यान उसी समय होना है जब विरोध का आमासात्मक ज्ञान होता रहता है। बाद में सो विरोय का ममा- धान (परिार) हो जाता है। इघर श्लेप जो है वह समी अलंकारों का अपवादक है अन" इस पथ में कलेष विरोधपतिमोत्पस्तिहेतु डोकर स्वय प्रधान अलक्कार है।
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समासोक्त्यलङ्कार: ३६७
विमर्शिनी
वहनाग्निमध्यप्रवेशेपि वस्तुवृत्तसंमवीति विशेपणं लिङ्गविपरिणामाद योधयम।
न्यथाभूताम्या ताभ्यामभेदेनाध्यवसायः । तव्वतुकेति तच्छन्देन तक्ियायोगपरामर्शः। फलत्वेनेति उत्पेष्यत इत्य्रनापि संबन्ध:। ततश्चेति द्वेतुफल्योहगयोरुमेपयमाणवाद्। 'वस्तुवृत्तसंमवि'= 'वास्तविक' यह नो विशेषण है इसे लिंगपरिणाम [नपुंसकलिंग को पुंलिक्ष में 'वस्तुवृत्तसंभवी' इस प्रकार वदल ] कर अन्वित करना चाहिए। ते द्े = वे दोनों अर्थाद वडवाग्नि में प्रवेश और पतितत्व। 'पतितरवाग्नि प्रचेशाभ्याम-'वतितत्व और अग्निप्रवेश' जो दाहाण्य = ब्रह्षवृत्ति से च्युत होने का प्रायक्चित्त है। 'सोडयम्' = यह अर्थात मूलतः भिन्न रूप के पतितत्व और अग्निप्रवेश मिन्न रूप के उन्हीं पतितत्व और अग्निप्रवेश द्वारा अमिन्र रूप से मध्यवसाय तद्देतुका=इसमें सव शब्द से उपर्युक्त [प्रवेश] क्रिया में [दो मिन्न व्यत्तियों के] अन्नय का परामरश है। फलत्वेन = फल रूप से= इसमें मी उत्प्रेक्ष्यते=उत्प्रक्षा की जाती है=इसका संबन्ध है। तत्=इस प्रकार=हेतु औौर फल इन दोनों की उत्मेक्षा हो रही है इस कारण। चिमशिनी
ननु विशेधालंकारस्य विरोध एव रूपं तस्य दुष्टवात् कृते व समाधाने विरोध एव नास्तीति विरोधालंकृतोऽर्थः कथमन्नो प्रेष्षार्या हेतुतवं भजत इत्याश्कवाविरोे्य यदुचयति-'विरोधाभासत्वं विरोध:' इति। अत एव व विरोधस्याभासमात्रसारत्वाद् यधावभासं विश्रान्त्यमावाप्ष प्ररोहो नापि वाघोस्पत्तिः, अपिक्षु पैततिक्वलत्स्तम्भतैमिरिक. चन्द्र द्वयावभासवदहिति प्रस्यय इति नात्र पूर्व चिरोधयोध: पश्चादविरोधधीरिति वाक्य स्यावस्थातयम्। ननु वाध्यनिपेधपरो नैतदेवमिति प्रत्यय रूपो बाधो वाष्यं च तथैव प्रतीयते चेतु कि तेन कृतं स्यादिति चेत, र्खलद्गतित्वमिति न्रमः। तथाहि शुक्तिकारजतमरीचिका
नेन चाघकत्वमुदेति, वाघोदयेपि पैचतिकजवलत्स्तम्मतैमिरिक चन्द्रइयावभासवद् विरुद्ध- प्रतिभासानिवृत्ते। केवलसन्न तह्वशादेवानुपपद्यमानताकारा स्वधतितैवावगभ्यते। स्वलध्धतिरचे च प्रतिपत्तव्यव्रह्ारं प्रति निमितत्वानुपपत्तिः। न हि पैत्तिक: स्वपित्तविका राजजवलततम्भदर्शनं मन्यमानरतत्र दाहपाकादयर्थितया पवतते। तिमिरदो्षं या जानान-
सुपगन्तुसुर्सह ते। यतोऽनुपपद्यमानत्वेन स्खलद्धतित्व मुपपद्यमानत्वेन च व्यवहार निमित्त रवमिति परस्परवियदत्वादनुभवविरोघाच्च तयोः कथमेकत्र समावेशषो घटते। अतक्षाने- नैवाभिप्रायेणाह-अत हत्यादि। विरोधाभासनसमय एवेति, न तु बाघकोदयसमय इस्यर्थः। वाघोदयाननतरं विरोधस्योत्प्रेक्षाहेतुवं न युज्यते इयुपपादित स्थितं चोेष हेतुत्वं विरोघस्येति वाघोदयाययागेवान्यथानुपपत्या निक्षीयते। वाघस्य च स्वारसिकत्व- वस्तुवृत्ते: पर्यालोचनालम्यत्वेन द्विविधस्थापि सर्वत्रोप्तरकालमेवोल्लास: संभवतति । तस्य च वाध्यनिष्त्वाद्वाध्यस्य च पूर्वकालभाविरवात्। अन्यथा हि निर्विपयो बाघ: स्याद्। अतश्रोत्तरकार्ले तु विरोधसमाधिरिति अणितेरथंमजानानेनायमर्थोडवेपणीयः। यदि हि
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३६८ थलङ्कारसर्वस्म् घाध: परागप्युत्पेष्वाया स्वाधिकारवशेन स्वरसत पवोकसेत तदुफनीत्या उप्ेपोानमेव न श्वादित्ययाधित एव विरोध उत्परेक्षाया निमित्तमितयुक्त्मुत्तरकालं विो सिरिवि। स च समाधिरत्र दिगाधर्याविगमादवदुष्यत इति विरोघस्य एळेपोऽङ्रम्। सब्गशाद्वा- स्थोत्यानास्। तथा छात्रानयो: सकीणखवमात्रमेव न पुनः संकराळंकार:। स तु यथा- 'सज्ञातपम्रमकराखितानि समुद्इन्ति स्फुटपाटलश्म्। विकस्वराण्य कंकर प्रभावाद दिनानि पद्मानि ववृद्धिमीयु ॥' अग्र श्लेपनुसययोगितयोरेकवाचकानुप्रवेशेन सकरः। प्राध्याना मते पुनरेतस्मति- मोरपतिहेत. स्लेपोऽयमिश्याह-इेपस्ये्यादि। तेनाथ. पद. श्वामिप्रापेण अन्यकृतोक्कः। यदच्यर्येतच्छलोक विचार एव संकरालकारे। अश्व प्रथमेडधे विरोधप्रतिभोतपतिहेतुः श्लेप.। दर्शंनान्तरे तु विरोधश्लेषी हावलकाराविति। प्रश्न = विरोधालकार का स्वरूप विरोध ही है और वह अपने आाप में दोष रूप है, फलठ. उसका समापान [परिहार ] किया जाता है, और जब परिदार हो जाता है तब विरोध का अस्नित्व ही नहीं रहता। इस प्रकार विरोध से कोई अर्थ अलंकृत हो कैमे होगा जो उत्प्रेक्षा में देतु बनेगा।' इस पर उत्तर देते हुए लिखते है-'विरोध' इत्यादि। जेसा कि बागे कहेंगे 'विरोधा- भासत्व विरोध' है। [ अलकाररत्नाकरकार ने 'शरयीमयोि' वद्य और उसपर अलकारसर्वस्त्रकार का मत उद्धृत कर उसका खण्डन करते हुए लिखा था-विरोभ में समाधान शब्दलम्य न होकर, सामानिक की मानस अनुभूति से सम्य होता है जो पर्योलोचनरूपा होती है। विरोप का बाप हो जाने पर भी शब्द से तो विरुद्ध भर्थ का ही ज्ञान होता रहता है। इसलिए विरोध का परिदार वाक्यार्थ का अग कभी भी नहीं बनता, इसलिए यहां उत्प्रेक्षापरतीति के बाद परिहार का वाक्यार्थ में मानना ठीक नहीं। अन्त में विरोधपरिदार का अर्थ केवल इतना ही है कि विरोष प्रातीतिक है, वास्तविक नहीं। अन्त में परिदार का अर्थ यह नहीं है कि आरम्म में विरोध वस्तुत रदता है और अन्त में उसका परिदार हो जाता है (द्र० पृ० ९२, ९३ पूना संस्करण)। इसीको स्वीकार करते हुए किन्तु अलंकारसवंस्वकार के मत का सम्यन (खण्डन नहीं) करने हुए विमर्शिनीकार कहते हैं-] और इसीलिए [ग्रन्थकार के मत में ] विरोध के अमासमान्नरूप होने से उसकी प्रतीति पर्यवसान में आरम्म जैसी नहीं होती, फलत न तो वह प्रसद ही दो पाता मौर न उसका परिदार की होता अपितु यहाँ पितरोग से पीडित को जैसे जळते अम्निस्तम्म दिखाई देते हैं नथवा तिमिररोग से पीडित को दो चन्द्र, वैसे ही दो अर्पों को प्रतीति मात्र होती है। इसलिए न तो यहां पट्ले विरोष का [आभास रूप में द्ञान न होकर विरोध रूप में हो] य्ञान होता और न बाद में अविरोष का ज्ञान होता, जिससे वाक्यार्थ को दो मागों में विभक्त किया जा सके [पश्न ] माथ 'यह ऐसा नहीं है' इस 'प्रकार के ज्ञान का नाम है। इससे नाध्य अर्थ का निषे कुमा करता है। यदि यहाँ बाद और वाध्य दोनों की हो वैसी [ दविचन्द्र आादि जैसी] प्रतीति मान की आय तो उससे क्या होगा ? [ उत्तर=]इससे विरोध का ज्ञान केवल अ्रभासा- हमकमात्र सिद्ध होगा । [विरोष पूर्णत" कट नहीं बाएगा ] विरोपालंकार के विरोध के परिह्ार में जो वायकता होती है वह पहले से हो रहे वामासात्मक विर्म ज्ञान रुपी नाम्य की उखाद कर नहीं रेती जैसी कि युक्ति में हो रहो है या मरुमरीचिका में होती जल को आन्ति में। यहा तो वाप की प्रतीति हो आाने पर भी विरोधामासरूपी नाध्य अर्थ इटता नहीं है नैसे पिच्नव्याषिवाले के समाने से मसत्य रूप से विरिव होने पर भी अग्निस्तम्भ नहीं रटता या तिमिररोग वाले के सामने से चन्द्रदेव। यहां केवक इतना होता है विरोष में अनुपपथमानवा [ परुद न हो
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समासोक्त्यलङ्कार: ३३७
-इस अर्थ में सरःशरी में नाविकात्व की प्रतीति का जहाँ तक संवन्ध है वह समासोकि से नहीं होती क्योंकि यहाँ विशेपणों का साम्य [उभयान्वयित्व] नहीं है। इसलिए यहाँ नायिका उपमानरूप से ही प्रतीत होती है न कि नायिकात्व की प्रतीति सरः्क्ी के धर्म के रूप में, इसलिए यहाँ एकदेशविवत्तो उपमा ही स्वीकार की जानी चाहिए। दूसरी कोरई गति [सरंकार] है मी नहीं। एकदेशविवर्त्ती उपमा का जिन्होंने लक्षण नहीं किया है उन्हें भी इसका संग्रह करना ही चाहिए। जहाँ कहों 'केसपाशालि०' आदि पद्यों में उपमा [उपमित ] समास के द्वारा कथित रहती है, साथ हो अन्य समास के द्वारा विशेषणसाम्य की योजना भी संभव रहती है वहाँ 'औपभ्यगर्म विशेषण' से निष्पन्न समासोति हो रहती है। इस प्रकार [इन दोनों का परस्पर में ] कोई विरोष नहीं है।
विमशिनी अविप्रतिपत्तिद्योतनार्थस्ताचच्छव्दः । कुतरत्येति। किमस्या निमित्तमिति भावः। तदा नुगुण्यादिति। शरदो नायिकात्वप्रतीत्यनुगुणावाव्। तयोरिति रविशशिनो:। कथमिति। अग्नकृतार्थाननुगुणत्वात् साम्यायोगात। कथमन्न व्यवस्थेति। विशेषणसान्मायोगात् समा सोकेरप्राप्ेरेकदेश विवतिन्या उपमाया अनुकतवाद। सामान्यलक्षणेति। उपमानोपमेययो: साधर्ये भेदाभेदतुवष्यत्वे उपसेति। एवमेकदेशविवरर्युपमासामप्यदिवात्र नायकत्व प्रतीति. रिति भावः। अथेति पषान्तरे। यदि चात्र पूर्वोक्तयुक्त्यैवानुगुण्याद्द रविशशिनो: समा सोकिमुखेन नायकत्वप्रतीतिस्तदार्दनखप्षताभमिति विशेषण कथं साम्येन योजयितुं शक्यमित्याशइयाह-तदनरेत्यादि। एतदेव शास्त्रानतरप्रसिद्ध रधन्तमुखेन हृदयंगमीक रेति-वयेश्यादिना। अग्निहोत्रं जुहुयादित्यनेनोत्पत्ति विधिवाकयेन हि होमो विहितः। तस्य च पुनर्विधानमद्ब्घद्हनन्यावेन यावदपासतं तावद् विधेविपय इत्यम्युपगमास युज्यस इति तन्नायुकरवादुपपदे दृध्नि संचार्यत इत्यर्थः। उपमानुमाणितेति। औपम्यगर्भ-
कारान्तरम्। येरितयुद्धटादिभिः। यत्र व्वत्यादेर्मन्स्य पूर्वमेवास्माभिरभिपराय उक्क:। 'सावद्'-'तो'-शब्द सूचना देता है अविप्रतिपत्ति की [ अर्थाव 'ऐेन्द्र धतुः' पद्य में नायकत्व की प्रतीति रविमशी में होती है इसमें किसी को आपत्ि नहीं है]। 'कुतसत्या'=" रविशशी में नायकत्य की पतीति ] हो कैसे रही है'=सर्थात इस प्रतीति का मूल क्या है। तदानुगुण्यात्- उसके अनुरूप होने से = शरद् में हो रही नायिकात्व की प्रतीति के अनुरूप होने से। कथम् = कैसे ['आर्द्रनसक्षतानम्०' यह निक्षेपण] [नायिकारूपी] अप्रकृत अर्थ के अनुरूप नहीं है[क्योंकि नायिका में नखक्षत के समान इन्द्रचाम नहीं अभितु इन्द्रचाप के समान नखक्षत ही संभव है, अतः उक्त विशेषण में ] साम्य [उमयान्वयित्व] वन नहीं पाता। 'कथमन्न अ्यवस्था' = 'यहदो व्यवस्था कैसे दी जाए = क्योंकि विशेषणसाम्य न होने से समासोकि हो नहीं सकती और एक- देशविव्ती उपमा कहीं नहीं गई है। 'सामान्यलक्षण०'-[उपमा का ] सामान्य लक्षण = 'उप- मान और उपसेय का समान धर्म के साथ पसा संबन्ध जिसमें भेद और अभेद [ प्रधान या अप्रधान न होकर ] समान हों उपमा [ नामक अलंकार ] कहलाता है, यह। इस प्रकार यहाँ नायकत्व की प्रतीति एकदेशविवर्त्ती उपमा से ही हो जाती है। 'अथ=इसके अतिरिक'-इस प्रकार दूसरा पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। 'यहाँ यदि पूर्वोक्त युक्ति से ही अर्ात [ शरद् के प्रति ] अनुरूप होने से दी रवि और शशी में समासोकि के द्वारा नायकतव की प्रतीति मान ली जाए तो 'आार्द्रनख- क्षताभम्' यह विशेषण [दोनों पक्षों में ] समानरूप से कैसे अन्वित किया जा सकेगा ऐसी शंका कर २२ अ० स०
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३३८ अलङ्गारसर्वस्थम् उत्तर देने हैं-तदत् हत्यादि। इसी तथ्य को दूसरे शास [मीर्मासा] में प्रसिद्ध द्ृश्टन्न द्वारा हृदयंगम कराने हुए कहने हैं-'यथा'-इत्यादि। 'अग्निरेत्र जुनयाद' = 'अग्निषेत्न के टिए हवन करे' यह पक विधि वास्य है। इसमे दवन की उत्पत्ति का विधान होना है। फलत इससे हवन का भी विधान हो जाता है। उसी हवन का विधान पुन ['दध्ना जुहाति = दही से हवन करता है' हम वाक््य के द्वारा] किया जाय यह ठीक नहीं क्योंकि नियम यह है कि विधान उनने का ही होना है जिनना पूर्वत प्राप्त नहीं रहना जैमे [अभ्रक आदि की भर्म बनाने में जो द्वितीय तृनीय पुढ दिए जाते हैं उननें। भाग दमी को जन्मती है जो पहले से दग्य नहीं रहता । इमाललए उस [इवन] में [विधान के ] अयुक होने से उसका जो उपपद दद्दी है उसमें विधान का संक्मण माना जाता है। उपमानुमाणिता =अर्थाक्ष [यहाँ] औपम्यगर्भ विशेषण से निष्पन्र समासोकि[ मानना उचिन है] 'समासोकिरेव'= 'समासोकि ही' = अर्थात एकदेशविवर्ती उपमा नहीं। 'गायन्तर'= 'अन्य गति' अर्थात् अन्य अलकार नईीं है। ये := जिनने अर्थात उद्भट आदि ने। यम् तु इत्यादि नो पक्ति है इसका अभिमाय इम पहले ही [ इम अलकार के आरम्भ में] बनला चुके हैं। विमशं .- [क]'अथान्-नायकत्वप्रतीति' इम पक्ति के कुछ अशों में पाठान्तर हैं। उनका विवरण इस प्रकार है- १ अयात्र = यदप्यत्र-निर्णेयसागर पाठान्तर। २ नोपमानत्वेन =उपमानत्वेन-निणेयसागर पाठान्नर। ३ नायक: स्वस्वरूपेग = नायकत्व स्वरूपेण-निर्णयसागर, नाथकत्वन्-अनन्तरयन, मेहरचन्द्र * नायसत्वप्रनीति. =नायकव्यवहारपरतीति -निर्णयसागर मूळ नायकत्वप्रतीति -निर्गयसागर पाठान्तर, मोतोलाल श्ारदापति, नायकत्वव्यवद्ारपतीति मोतीलाल, अनन्तशयन, मैहरचन्द्र समासोकि में अप्रकृतार्थ की प्रनीति प्रकृतार्य से निरपेक्ष अर्थान स्वतन्त्र रूप से नहीं होती, उपमा में अप्नकृतार्थं प्रकृतार्थनिरपेक्ष होकर हो प्रतोत होता है भने ही वह वाच्य दोया अन्ाच्य। इस स्थिति में 'न्द्र धनु,' पद्य में अप्रकृत नायक और उसके व्यवहार की प्रतीति को प्रकृत रविनाशी तवा उनके व्यवहार की प्रतीति से निरपेक्ष नहीं माना जा सकना, फलत. 'नायक स्वस्वरूपेण' और 'नायकत्वपतीति' पाठ ही ठीक बैठता है। नायकत्व और नायकव्यवद्दार सत्त्वतः एक है इसकिए 'नायकलव्यवदार' पाठ में एक ही तत्व का कथन भाववाचक 'त्'-प्रत्यय से तथा 'व्यवहार' शम्द से होने के कारण पुनरुक्ति दोष है। सजीविनीकार ने 'रविशशिनोरेव नायकत्व- व्यतदारे पतीति' ऐसा कह 'नायकत्वव्यचहारप्रतीति' को ही मूल माना है। इनकी इम पक्ति का अर्थ 'नायकत्वरूपी व्यवदार किया जाय या 'नायकरवानुरूप व्यवदार', 'खव' और 'व्यवहार दोनों में से कोई एक व्यर्थ ठहरता है। नायकत्वानुरूप व्यवहार के स्थान पर 'नायकानुरूप' व्यवदार भी करा जा सरता है। [स]अन्यकार ने जोधनुप को उपमान बनाकर नसमुन को उपमेय बनाने का विकल्प प्रस्तुत किया है यह केवल नायिकापक्ष को दृष्टि से संगत है। नायिका नखपत हो धारण कर सकती है जिस प्रकार शरद इन्द्रधनुष हो । इस विशेषण को नायिकेकगामी बनाने पर 'तन्वी' इन्यादि पद्य के 'विकास'-धर्म के समान इस विशेषण को एक्मात्र अप्रकृतपक्षीय विश्वेषण मानना छोगा। किन्तु यह सब अत्यन्त अवेज्ञानिक है। कदा जाए 'नरमत के समान धनुप' और अर्थ निकाला जाए 'धनुप के समान नखसन' यह संमव ही कैमे है। वहाँ तक 'दब्ना जुदोति' का संबन्न
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समासोकत्यलंकार: ३३९
है उसमें 'विधान' जुदोति से इटकर दधि नें संक्ानत कर किया जा सकता है। उद्देश्यविधेयभाव व्याकरण पर निर्भर नहीं रहता अतः उसे विवक्षा के अनुरूप सींचा-ताना जा सकता है। यहाँ नखक्षत का उपमानत 'आर्द्रनखक्षताम' इस प्रकार समास में आए आमा शब्द पर निर्भर है। चह दलोक में धनुप के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। इस प्रकार वह केवल शरदू का ही विशेषण बनता है और इससे धनुष उपमेय ही प्तीत होता है उपमान नहीं। निदान इस विशेषण में उपमा हो मान्य है। शरद में नायिकात्व और रवि तथा सकी में नायकत्व स्वतन्त्ररूप से प्रतीत्ष नहीं होते, इसलिए उतने अंश में समासोक्ति मानी जा सकती है। पूर्ण वाक्यार्थ में चमत्कार उपभानुपराणित समासोक्ति से हो माना जा सकता है किन्तु अनुमाहानुग्राहकभावमूलक तंकर की रीति से, न कि औपम्यगर्मित समासोकि की रीति से। यहाँ चन्धकार सर्पसुचुन्दरन्याय का शिकार हो गया है। पहले तो उसने उद्गट आदि के अनुकरण पर अथवा समासोकि पर अधिक मोह के कारण एकनेशनिवर्ती उपमा नहीं मानी। जद यहाँ समासोकि का निर्वाह कठिन दिखाई दिया तो उसे राजनीतिक चाल चलकर मान लिया, किन्तु उसे समासोकि की निर्वाध स्थिति का मोह सताने लगा और उसने उपमानत्व का भवन ? धनुप में करना शुरू कर दिया। इसीलिए इनकी इस व्यवस्था का अनुमोदन न पण्डितराज ने किया है और न विश्वेशवर ने ही। अप्पय्यदीक्षित के ही समान ये दोनों आचार्य भी इस विषय पर चुप हैं। [सर्वस्व ] साच समासोफतिरर्थान्तरन्यासे कचित्समर्थ्यगतत्वेन क्वचित्समर्थक- गतरवेन च भवति । क्रमेण यथा- 'अथोपगूढे शरदा शशाक्के प्रावृड ययौ शान्ततडित्कटाक्षा।
'असमापजिगीपस्य स्त्रीचिन्ता का मनस्विनः । अनाक्रम्य जगत् सर्व नो संध्यां भजते रवि:॥' अन्रोपगूढत्वेन ज्ञान्ततडिस्कटाक्षत्वेन न शशाङ्कशरदोर्नायकव्यवहार- प्रतीतो समासो कत्यालिद्ित पवार्थो विशेषरूप: सामान्वाश्चयेणार्थान्तरन्या- सेन समर्थ्यते। सामान्यस्य चान्र श्लेषवशादुत्थानम्। शान्ततडिर्कटाक्षे त्योपम्यगर्भ विशेषणं समासान्तराश्रयेणात्र समानम्। असमातेत्यादौ तु स्त्रीशन्दस्य सामान्येन स्त्रीत्वमांत्राभिधानात् सामान्यरूपोर्डर्यो लिहविशेष निर्देशगर्मेण कार्योपनिबन्धनैनोत्थापितया समासोकत्या समारोपितनायक- व्यवद्वारेण रविसंध्यावृत्तान्लेन विशेपरूपेण समर्थ्यते।
मन्थव्यथाव्युपशमार्थमिवाशु यस्य मन्दाकिनी चिरमवेष्ठत पादमूले।।' अत्र निर्मोकपट्टापह्नवेन समारोपिताया मन्दाकिन्या यहस्तुवृत्तेन पाद- मूले वेष्टनं तच्चरणमूले वेष्टनत्वेन श्लेषमूलयातिशयोकत्याध्यवसीयते। तत्
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३४० अलङ्गारसर्वस्वम्
तथाध्यवसितं मन्थव्यथाव्युपशमार्थमिवेत्युत्मेक्षामुत्थापयति। सोत्थाप्य- मानैवाम्युराशिमन्दाकिन्योः पतिपत्नीव्यव हाराश्रयां समासोसि गर्भी करोति। एवं चोत्मेक्षासमासोक्त्योरेक: कालः। एवं 'नसक्षतानीय वनम्थलीनाम्' इत्यवापि वनस्थलीनां नायिका वयवद्ार उत्प्रेक्षान्तरानुप्रविष्टसमासोक्तिमूल एव। पवमियं समासोकिरनन्तप्रपश्चेत्यनया दिशा म्वयमुत्प्रेक्ष्या। यह समासोकि अर्थान्तरन्यास में भी होती है, कमी समर्थ्य अश में और कमी समर्थक अय में। [दोनों के]नम सै उदादरण यथा- 'अब, जब चन्द्र का आम्गि्गिन शरद् ने कर रिया तो चर्षा अपना तडित्टाक्ष शान्त कर चली गई। पयोघर नष दो जाने पर बिन सित्रियों का सौमाग्यगुण नष्ट नहा हो जाता। 'जब तक विजयेच्छा समाप् नहीं हो जाती विसी मी मनस्वी को स्त्रोकी चिन्ता कैने हो सकती है। सपूर्णे जगत पर आक्मण पर लेने के पूर्व सूर्य सन्ध्या को नहीं भजता।' इनमें [ से प्रथम में] आरिंगन और नदित्वटाक्ष की शान्ति [इन दो विशेषणो ] से चन्द्रमा और शरद में नायक तथा नायिका के व्यवदार की प्रनीति होती है। इम पकार यहाँ जो विशेपरूप अर्थ है वद समासोकि से युक्त है और उसी रूप में उमका सामान्यरूप [अगनाशब्द से कथिन ] अन्य सर्य के उपन्यास से उत्पन्न अर्थोन्तरन्यासालकार से समर्थन झेता है। [अन प्रथम पद्य में समासोकि समर्थ्य अश्य में है ]। यहाँ [समर्थक] सामान्याश की निम्पत्ति दनेष से हुई है 4
[करयोंकि पयोधर शब्द में मैध तथा स्तन अर्थ का दरेम है इसी प्रकार समर्थ्य विशेषांश में ] 'शान्ततित्काक्षा-'-यह विशेषण ['तढितरूपी कटाक्ष' इस समास के अतिरिक्त 'तहित के के समान कटाक्ष'-इस] एक अन्य समास के मानने पर [उमयपक्ष में] समान बनता है। 'असमास०' इत्यादि पघ् में [समर्थ्य वाक्य में आया] स्ीशब्द [स्त्री-]-सामान्य का वाचक है। इसडिए [उससे उपस्थन ] सामान्यरूपी अर्थ [समर्थ्य है उस] का रविसन्व्यावृत्तान्तरूपी विशेष मर्थ से समर्दन को रहा है, जिस पर समासोक्ति के द्वारा नायक तथा नायिका के वृस्ान्त का आरोप हो रहा है। यह समासोक्ति निष्पन्न हो रही है [समान ] कार्य के निर्देश से, जिसमें विशिष्ट लिंगों [सोटिंग तथा पुहिद्] का योग है। [इस प्रकार इस पथ में समासोकि समर्थक अंश में है]। "[समुदमन्धन के समय] सिंचाव के जोर से शेषनाग के [धवल] शरीर का [धबल] निर्मोकपटट [केचुल की पट्टी ] निकल कर गोछ गोल सिपट जाने के कारण जिस [मन्दराचल] के पाद-[प्रत्यन्तपवत और चरण ] मूल को मानों समुद्र के मन्थन की व्यया शोघ्र शान्न करने के हेतु बट्ठुन देर नक मन्दराकिनी एपेटे रहती थी।' [हरविजय *७ ] -वर्श ['यह निर्मोकपट नहीं है अपि तु मन्दाकिनी है' इस विवशा द्वारा ] निर्मोकप्ट्ट का अपहद कर उस पर मन्दाकिनी का आरोप किया गया है और उस [ मन्दाकिनी] का जो पवंत- कटक के मूल में वास्तविकर्प से लिपटना है उसे उसके चरण के मूल में टिपटने के रूप में इनेप- मूलक अविशयोक्ति द्वारा प्रस्तुन किया जा रहा है। [यह हुआ चरणमूल में लिपटनेरूपी अर्थ के द्वारा फटकमूल में लिपटनेरुपी अर्थे का अध्यवसाय ]। इम प्रकार प्ररतुत [अध्यवसिन] वह 'मानों मन्यन की व्यया शान्त करने के हेतु' [किया गया] इस प्रकार उलेक्षा को निग्पन्न करता है। वह [उत्प्रेक्षा] निप्पन्न होने लगती है तो समुद्र तथा मन्दाकिनी के पति पत्नी व्यवदार से ननित
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समासोकत्यलङ्गार: ३४१
समासोकि को अपने भोतर ले लेती है। इस प्रकार उत्प्रेक्षा और समासोकि दोनों ही एक साथ निष्पन्र होती हैं। इसी प्रकार [कुमारसंभव के तृतीयसर्ग के वालेन्दुवकाणि0 इस पद्य के ] 'वनस्थली के नखक्षतों से' इस अंश में भी जो नाविका के व्यन्हार की प्रतीति होती है वह उत्पेक्षा के भीतर निविष्ठ समासोक्ति से ही होती है। इस प्रकार यह सोचकर कि इस समासोकि के फेलाव का अन्त नहीं है उपरिनिर्दिष् पद्धति से इसके अन्य भेहों को कलपना स्वयमेत्र कर लेनी चाहिए। विमर्शिनी सैत्युत्तप्रपक्षा। सामान्यस्वेव्यङ्गनाशबुस्य सीवमा त्रामिवानात्। इेवशिति पघोधराणां हि शिछष्टतवस। लिङ्रविशेपेति, रविसंध्ययो: पुंसत्रोरुपेग कार्य भजनाख्यम्। एनमन्यालंकार संमिश्ना्वमप्यस्था दर्शयति-आकृष्टीत्यादिना। सेत्युरेक्षा। एक काल इति। झप्ती समासोकिगर्भीका रेणेवोसप्रेपाया उस्थानात्। एवमिति। यथो कपत्येत्यर्थः। 'सा= वह अर्थात यह अर्थात यह समासोक्ति जिसका विस्तृत विवेचन किया जा चुका है। सामान्यस्य=सामान्य का अभिवायक इसलिए कि अंगनाशब्द सत्ोखमात्र का अभिधान करता है। श्लेपवशास्इलेपद्वारा अर्धात् पयोधरों के अनेकार्थक होने से। लिगविशेप=रवि और संध्या में पुंलिंग तथा स्रीलिंग और उनका कार्य भजनकिया कथित भजन=सेवन। इसी प्रकार इसका अन्य अलकारों के साथ भी मिश्रग रहता है, उसे दिखलाते हैं-'आकृष्टि' इत्यादि उद्रणों द्वारा। सा= वह= उत्प्रेक्षा। एका कालः= एक ही समय में प्रतीति होती है अर्थात बोध में वत्पेक्षा समासोकि को अपने भीतर लेकर ही निष्पन्न प्रतोत होती है। एवस् =उक्त क्रम से। चिमर्श :- (१) कुमारसंमन् का 'वालेन्दुवक्राणि०' पद्य पूरा इस प्रकार है- 'वाहेन्दुन काण्यविकासमाबाद् वभुः पलाशान्यतिलोहितानि। सदो वसन्तेन समागतानां नसक्षतानीव चनस्थलीनानू ॥२२९॥ 'पलाश [टेसू] के अनखिले पुष्प [प्रतिपद् के ] वालेन्दु के समान ढेढ़े मौर लालचट्ट ये इसलिए ने ऐसे लग रहे थे मानों वसन्त से तत्काल मिली वनस्थलियों के नखक्षत हो।' (२) मन्दाकिनी का अर्थ अन्थकार के अनुसार भागीरथी गंगा प्रतीत होती है। इस अर्थ नें पद्य का अभिनाय यह माना जाएगा कि जैसे कोई सपली अरने पति की रक्षा के लिए आकान्ता के चरण से लिपट जाती है उसी प्रकार मन्दाकिनी मी अपने पति ससुद को मन्थन व्यथा से बचाने के लिए मन्दर के कदकों में लिपद गई। (३) तनासोकि का इतिहास-
सा समासोततिरुहिष्टा संक्षिप्तार्थतया वभा॥ स्रन्पवानृजुरव्याल: स्थिरोऽनेकमहाफल: । जातस्तरयं चोच्चैः पातितश्र नमत्वता ॥२७९, ८०॥ -जहाँ एक के कहने पर उसी जैता समान विशेषण वाला दूसरा अर्थ प्रतीत हो तो उसे समासोक्ति कहा जाता है क्योंकि इसमें अधिक मर्य थोड़े में कह दिया जाता है। यया- -इस स्कन्धों से युक्त, सीधे, सापो से रहित, और दृढ वृक्ष नें ज्यों ही बड़े बड़े फल लगे, इसे मँधी ने गिरा दिया।
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३४२ मलङ्कारसवं स्वम्
वामन=[सूत्र] 'अनुक्ती समासोकि: १४३।३ [वृच्ति] उपमेयस्यानुक्ती समानवस्तुन्यास, समासोकि, सक्षेपवचनाव समासोकतिरित्यारया। -उपमेय को निना कहे समान वातु का विन्यास समासोकि कदलाता है। [स्रमास का अर्थ ह सक्षेप ] सक्षेप में कथन रहने से समासोक्ति यह नाम पडा। यथा- 'दलाच्या ध्वस्ताध्नगगलाने करौरस्य मरौ स्थिति.।
-- पेट करील का ही हो और मले ही वह मरुभूमि में ही जमा हो तब मी वह़ दलाव्य है क्योंकि वह रास्तागीरें को ग्लानि (थकावट) दूर करना रहता है। इसके विरुद्ध याचकों की हच्छा ण न करने वाला वत्पवृक्ष ही क्यों न हो और सुवर्ग के पर्वत समेरु पर हो क्यों न ढमा हो, उसे घिककार है। स्पष्ट ही समासोकि के नाम से वामन ने जिस अलकार को प्रस्तुन किया परवर्ती आचार्यों के अनुसार वह अप्रस्नुत्तप्रशसा ही है। उन्दद= पप्रकृतार्येन वाकयेन तत्समानेविस्ेपणै.। अप्रस्तुतार्थंकथनं समासोकिरदाहना ॥२।१०।। -- वाक्य प्रवृतार्थक हो किन्तु उसके विशेषण इस प्रकार समान हो कि उनसे अप्रस्तुन अर्ध का कथन होता हो तो उसे समासोकि कहा जाता है। उदाइरण-पूर्वोद्पृन 'दन्तप्रभासुमनम' = पद्य। -- स्पष्ट दो उद्ट भी एक देशविवसी रूपक में समासोकि समझ बैठे। रुदट= रुद्ट ने समासोक्ति का निवचन भामद के अनुरुरण पर इस प्रकार किया है- 'सकससमानविदोषगमेक यमामिषीयमानं सद 1 उपमानमेव गमयेद्पमैय सा समासोकि ।८।६७। यथा-'फलमनिकतमलचीयो लघुपरिणति जायतम्य सुस्वादु। प्रीणितसक मणविप्रणतस्य सदुन्नने सुनरो. ॥८।६८।। -जदों केवल उपमेय ही कहा जाय और वह सभी विशेषणां की समानना के आधार पर उपमान की प्रतीति व्यजना द्वारा कराए तो हां समासे कि होनी है। यथा- -'सभी याचक और प्रगत व्यक्तियों को प्रसन्न करने वाले अच्छे बढ़े हुए इस सुन्दर वृक्ष का फल कमी चूकता नहीं, आकार में बहुत दहा होना है, नीम्र परिणत (पक) हो जाता है और बडा ही रवादु रहता है।' [ यहां वृक्ष हो प्ररतुत है अत. उपभेय है। उससे उस जैसे सत्पुरुप की प्रनीति समान विशेषों के आधार पर होती है। अत यहां समासोकि है। नमिसाधु ने वामन के अनुमार यहाँ 'उपमान से उपमेय की प्रतीति' ऐेसा अर्थ कर दिया है, बिन्तु यह उदादरण से मेद नहीं खाना। उदाइरण में वृक्ष का 'इम' = इस प्रकार ऐमे सर्वनाम द्वारा निर्देश किया ना रहा है जिससे यह प्रतीत होता है कि यृक्ष सामने लगा है। फलत वह पस्तुत है। यूँ तो खीचनान कर दूसरा अर्थ मी लगाया जा सकता है किन्तु जब उपयुक्त अर्थ निकाला जा सकता है तब अनुपयुक्त अर्थ का मामह करना उचित नहीं कहा जा सकता । कदाचित् मम्मट को स्ट्रट के इम द्वितीय मर्थ से ही समासोकि का निग्नतिखित लक्षण बनाने की प्रेरणा मिटी होगी। मम्मट='परोकिमेंदकै: रिटहै. समासोकि:। शटिष्ट विशेषणों द्वारा अन्य सर्थ की प्रतीति समासोकि कहलाती है। -पू्ववर्ती आचार्यों ने विशेषण के उमयार्थक होने की बात तो कही थी किन्तु विशेष्य के नमयार्थक होने वा प्रविदेध नहीं किया था। मम्मट ने उक्त लक्षण की वृत्ति द्वारा उस भी स्पष्ट
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समासोक्त्यलट्टार: ३४३
कहा-'प्रकृताथप्रतिपादकवाकवेन रिलट्विशेषगमाहात्म्याव, न तु विशेष्यस्य सामथ्यादयि यद, अप्रकृतस्यारथत्यामिधानं सा समासेन संक्षेपेणार्थद्वयकथनाव समासोकि :- प्रकृत अर्थ का प्रतिपादक वाक्य यदि केवल दलष्ट विशेषणो के बल पर, न कि विशेष्य के भी वल पर अप्रकृत सर्य का प्रति- पादन करे तो वह समासोकि कहलाती है, समास अर्थाद संक्षेप के द्वारा दो अर्थो का इतिपादन करने से !' परवत्तों आचार्यों में- शोभाकर ने अलंकारसर्वत्वकार के समासोतिलक्षण पर जो आपत्तियाँ उठाई है उन्हें पहले ही प्रस्तुन किया जा चुका है। अप्पयदीश्वित-ने उनके कुयलयानान्द में चन्द्रालोक के 'समासोकि: परिस्फृर्ति: प्रस्तुते प्रस्तुनस्य चेत।'-इस समासोकि लक्षण की वृत्ति लिखते हुए कहा है- 'यत्र अस्तुतवृत्तान्ते वर्ष्टनाने विशेषणसाम्यवलाद अप्रत्तुतमस्तान्तत्यापि परिस्फृति: तव समासोकिर लंकार: ।' -जहाँ वर्णन किया जा रहा हो प्रस्तुतवृत्तान्त का किन्तु विशेषणसाग्य के वल पर अप्रस्तुत- वृत्तान्त भी निकल रहा हो तो अलंकार का नाम समासोकि होता है। पव्वितराज जगन्नाथ ने समासोकि का लक्षण और भी अधिक संरम्भ के साथ इस प्रकार किया है- 'यन्न प्रस्तुतधर्मिंको व्यवहार: साधारणविशेषणमात्रोपस्थापिताप्रस्तुतधर्मिकव्यवद्दाराभेदैन भासते सा समासोकि:।' जहाँ प्रस्तुत धर्मी का व्यवहार साधारणविशेपणमान के द्वारा उपस्यापित अप्रस्तुत धर्मों के व्यवहार से अभिन्न भासित होता हो वह समासोकि है। विश्वेश्वर ने समासोकि का लक्षण इस प्रकार किया है- 'यत्र प्रकारवा चकपदमात्रं व्यख््यवाच्यसामान्यभ्। तच्छत्तेर पकृतार्थोकि: सोका समासोि:।' -जहाँ केवल विशेषणवाचक पद हो वाच्य और व्यडग्य दोनों अर्थों में समान हों और उनकी शक्ति से अप्रकृतार्थ का कथन हो तो उसे समासोकि कहा जाता है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि केवल वामन को छोड़ समासोकि के विषय में सभी आरलं- कारिक एकमत हैं और समासोकि के मेद-प्रमेशों की कस्पना का श्रेय अर्लकारसर्वस्वकार को ही है। सलंकाररत्नाकरकार ने यहाँ समासोकि, दलेष और शव्दकत्तिमूलक ध्वनि का अन्तर भी स्पष्ट किया है। इम इसे इलेपप्रकरण के पद्चात प्रस्तुत करेंगे। संजोविनीकार ने समासोकि के संपूर्ण विवेचन का सारसक्षेप इन कारिकाओं में किया है- [१] अप्रस्तुतं भतीतं चेद भेदकांशैकसान्यतः। व्यवहारं स्वमारोप्य प्रस्तुते न्यग्भवत्यय॥ [: ] तेनापस्तुतवृत्तान्तारोपेण प्रस्तुतं स्वयम्। संक्षेपेणोच्यते तस्माव समासोकिरियं भता ॥ [ ३ ] त्याद् विशेष्यांशसाम्यं चेतु प्रस्तुताकाररूपितम्। भवेदप्रस्तुतं मेधें रूपकालडकृतिस्तदा ॥
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३४४ अलङ्गारसवंस्चम्
गम्यना। समाक्षोक्तिमंता येन संक्षिप्यापोडमिीयते।। [५]शुद्धकायसमारोपे साम्य स्थादीपचारिकन्। व्यवहारममारोप. साक्षादस्या प्रयोजक: ॥ [६]स्याद विशेषणसाम्य चेव ममासान्नरमश्रयास्। उपमा नाधते [७] दृस्यतेऽर्यान्तरन्यासे समथ्ये च समर्यके। उत्प्रेक्षायोगिनी चेषा वचित ग्यादेककालगा॥ [१]अप्रस्तुत यदि केवल विशेषणों के साम्य के आषार पर प्रत्ञीन हो और वह प्रस्तुन पर अरना व्यवहार आरोपित कर अप्रधान रहा आए [२] तो यह समासोकि अनकार माना जाना है क्योंकि यहाँ अप्रस्तुत वृत्तान्न के आरोप के साथ प्रस्तुन मक्षेप में कहा जाता है। [ ३ ] यदि विशेष्यांश का साम्य भी हो और अप्नस्तुन विशेगय प्रस्तुत के रूप में रूपिन दो तो वहा रूपकालंकार होता है। [४] यदि विशेष्णांश का साम्य हो और उमसे अप्रस्तुन अर्थ गम्य हो तो समासोकि मानी नाती है। समासोकि नाम इसलिए कि इममें सक्षिप्त रूप से अर्थों का कथन रहवा है। [५] इसमें बहाँ केवल कार्य का समारोन रहता है तो साम्य औपचारिक माना जाता है, वस्तुन इमका साक्षाथ प्रयोजक व्यवदार का समारोप रहता है। [ ६] विशेषण का साम्य यदि अन्य समाम के सहारे हो तो समामोकि को मकरेशविवर्तिनी उपमा नहीं बापनी। [७] यह अर्थान्तरन्यास में भी कमी समर्ध्यगन और कमी समर्थकगन रहती है। कहीं यह उतपेक्षा में मिली रहती है, और कहीं उत्पेक्षा के साथ साथ प्नीन होती है। [सर्वस्व ] [सू० २३] विशेषणसामिप्रायत्वं परिकर:। विशेषणवैचित्यप्रस्तावावस्येद्व निर्देशः। विशेषणाना साभिम्रायत्वं प्रती- यमानार्थगर्भीकार। अत एव प्रसनगम्भीरपद्त्यान्नार्य घवनेविषय:। पवं च प्रतीयमानांशस्य वाच्योन्मुस्त्रत्वात्परिकर इति सार्थकं नाम। 'राज्ो मानधनस्य कार्मुकमृतो दुर्योधनस्पाग्रतः मत्यक्षं कुरुबान्धवम्य मिपतः कर्णस्य शल्यस्य च। पीतं सस्य मयाय पाण्डवयधूकेशाम्वराकर्पिण: कोष्णं जीवत पव तीक्ष्णकरजक्षुण्णादद्तग्वस्षसः।।' अतर राज्ष इत्यादी सोत्मासत्यपर प्रसनगम्मीरपदृत्वम्। एवम्- 'अद्गराज सेनापते राजवल्लम शोणोपद्ासिन कर्ण, सांप्रतं रक्षैनं भीमादू दुः्शासनम्' इत्यादी घेयम्।
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परिकरालह्कार: ३४५
[सू० ३३] विशेषणों की साभिग्रायता परिकर [कहलाती है]। [वृ०] प्रकरण विशेषण के वैचिन्य का है इसलिए इसे यहाँ रखा जा रहा है। विशेषणों की सामिप्रायता अर्थात उनका पतीयमानार्थे से गमित रहना [ इसका अर्थ केवल इतना ही है कि ] यहाँ विशेषण प्रसन्न के साथ गम्मीर भी रहते हैं [ अर्थात् प्रधानता बन्हीं की रहती है] मतः इसे ध्वनि का विषय नहीं माना जा सकता। रसीलिए इसका परिकर नाम मी सार्थक है क्योंकि इसमें प्रतीयमान अर्थ वाच्य अर्थ के प्रति [परिकर=सामयी, दाल की नाई] उन्मुख रहता है। चथा- "स राजा, मानधनी और [निहत्ये नहीं, इाथ में ] धनुष लिए दुर्योषन के सामने, इसी प्रकार कौरों के वन्धु बने कर्ग और शव्य के अपनी आँखों से देखते-देखते मैंने आज उस, पाण्डवों की वधु [द्रीपदी] के केश और वख खींचने वाले [ दुश्सासन) के तीसे नाखूनों से विदारित वक्ष से निकला खून उसके जीते जी पी लिया। [वेणीसंहार] -यहाँ 'राजा' आदि [विशेषण] में उपदास-[सोलासत्व ]-परक प्रसननगमीरपदत्व है। इसी प्रकार 'अरे अह्गदेश के राजा अरे [ कौरव ] सेना के पति, भरे राजा के प्रिय, भरे द्रोण का उपहास करने वाले कर्ण, अव बचा इस दुश्सासन को मीम से, [वेणीसहार ] इत्यादि स्थलो में भो जानना चाहिए। विमर्शिनी विशेषणेत्यादि। इदेति समासोक्त्यनन्तरम्। विशेपणानां चात्र बहुस्वमेव विवचितम्। अन्यया ह्षुष्टार्थस्य दोपरवाभिधानात् तवषिराकरणेन स्वीक्कतस्य पुष्टार्थस्यायं विपय: स्यात्। एव मेवंविधानेकविशेषणोपन्यासव्वारेण वैचित्यातिशायः संभवतीत्यस्थालकारस्म्। अतीयमानार्थस्य वाच्योन्सुखल्वेन माधान्याभावाद्र्भौंकारस्तदन्ताकृतत्वम्। अत पवेति अतीयमानार्थस्य प्राधान्यामावाद्। परससत्वं वाच्यस्यैव प्राधाम्येन निर्देशान। गम्भीरखव पतीयमानस्याप्यर्थस्य गुणीभावेन गर्भीकाराद्। यतच प्रतीयमान प्रति उपसर्जनीक्ृसस्वा धंयो: शब्दार्धयोरवस्थानं स धनेर्विषय इति ध्वनिविदः। चदाहु :- 'तत्परावेव शब्दार्थौं यत्र व्यङ्गवं पति स्थितीं। घयनेः स एत विषय: इति। सम च न तथात्वमित्युककत नार्य अवनेविषय इति। अत पूव नामाप्यस्य यौगिकमित्याह-एवं वेत्यादि। सोत्पासत्त्वपर- मिति। तथा च राजो जगद रवितव्यमस्य पुनरनुजमायरकणासिेरन्यदेव नाममान्नेण राजत्वमित्युपहासपरत्म्। एवमन्येवासपि स्वय मे वैतद्यगन्तव्यम् । आदिशव्देन 'यस्यकर्वव दोप्णं जयति दशशती सान्वयो द्वारि रुद् कारागारे सुराणां पतिरपि च शची चामरव्यग्रहस्ता। कन्या तत्येयनेका रजनिचरपतेरेप युछधान्तमेको वालो निःशङ्कमस्याः प्रविशति च नमस्तेमसे वैष्णवाय ।।' इस्यादावपि विशेषणानां मसनगम्भीरत्वं जेयम्। विशेषण इत्यादि। इछ-यहाँ अर्थात् समासोकिवाद। यहाँ विशेषणों का अनेक ही होना अपेक्षित है। नहों तो, 'अपुष्टार्थक [विशेषण पद] को दोष कहा गया है, उसके निराकरण से आाई पुषार्थकता का यह विषय होगा। इसके विरुद्ध ऐसे ही [ पुष्टार्थक] विशेषणों की संख्या अधिक रहती है सो उससे [ वाक्यार्थ में ] अतिशय विचिन्रता निप्पन्न होने रगती है, अतः यह अलकार का विषय बन जाता है। प्रतीयमान अर्थ वाच्य के प्रति उन्मुख रहता है, अतः उसका पाधान्य नहीं रहता, अतः उसका जो गर्भीकार है वह वाच्य के भीतर दया रहता है। 'अतएव = इसीलिए अर्धात् प्रतीयमान अर्थ की प्रधानता न रहने से । प्रसनत्व इसलिए कि वाच्य का
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२४६ अलद्गारसवस्वम्
ही निर्देश प्रधान रूप से रहता है। गम्भीरतव इसलिम कि प्रतीयमान अर्थ मी [बाच्य में] अप्रधान झोकर छिता रहता है। इसके विपरीत जहाँ प्रनीयमान अर्थ के प्रति शब्द और अर्थ अप्रधान वनकर रहे वहाँ व्वनि मानी जाती है-ऐमा ध्वनिवादी आचार्यों का मत है। जैसा कि [आानन्दवर्धनाचार्य ने] कहा है- व्वनि का विषय वही माना जाना चाहिए जहाँ शब्द और अर्थ व्यक्षार्य के प्रति तत्पर होकर ही स्थिन हों।' 'इसी कारण इस [अलंकार] का नाम भी यौगिक है'-यह कहते हए सिसते हैं-'एवं च' इत्यादि। सोत्म्रासत्वपरम =[शारदालिपि की प्रति में यही पाठ है]-उपहासपरक ='जो राजा हो उसे तो रक्षा पूरे जगत की करनी चाहिए, यह तुच्छ ऐमा है कि अपने ही छोट माई की रक्षा करने में मसफल है, इसका राजस्व तो और दो कुछ है, केवल नाममान का राजत है'-इस प्रकार उपहासपरक है यह। इसी प्रकार अन्य विशेषण भी उपहासपरक है। उनकी उपहासपरकना स्वय जान लेनी चाहिए। आदि शब्द से- 'जिस [ सहस्रवाद ] की अपनी ही हजार भुजाएँ उत्टध्टमम पराक्रम से युक्त है, जिसके द्वार पर भगवान् रुद्र अपने पूरे परिवार के साथ खडे रहते हैं, जिसके कारागार में देवों का पति इन्द्र बिठा है औौर [ उसकी पत्नी] राची दाय में चमर लेकर जिसके कपर डुलाती है, उसी रामस राज की यह एक हो कन्या हे और उसके शुद्धान्त (रनिवास) में यह एक अकेला नालक नि'शक प्रवेश करता जा रहा है। सचमुच मगवाम् विष्णु के तेज को नमन है।' -हत्यादि में विशेषणों की प्रसन्नता और गम्भीरता जाननी चाहिए। विमश-परिकर का निरूपण पहिली बार रुदट के काव्यालद्वार में मिट्ता है। भामद, दण्डी, वामन और उद्भट में इसकी कोई चर्चा नहीं है। रुद्ट ने परिकर का लक्षण इस प्रकार किया है- 'सामिपाय. सम्यग्विरोपणैवर्तु यद् विशिष्येन। द्रव्यादिभेदभिन्नं चतुर्विध परिकर स इति॥ शछर -द्रव्य, गुण, क्रिया तथा जाति रूप चार वस्तु जत सामिप्राय विशेषणों से टीक-ठीक विशिष्ट की आए तो [ चार वस्तुओं में से एक-एक वस्तु के आधार पर] चार प्रकार के परिकर होते है। चदाहरण- द्रव्यपरिकर-'उचितपरिणामरम्ये स्वादु सुगन्धि स्वय करे पतिनम्। फलमुस्सज्य वदानी ताम्यसि सुग्धे मुघेदानीम्।। -उचित परिणाम (पाक) से रग्य, स्वादु, सुगन्धि अपने आप हाय में आ गिरे फल को छोढकर है सुग्धे। तू वृथा ही व्यथित हो रही है।' (यहाँ फल के विशेषण सनेक हैं औौर सामि- प्राय है। फल द्रव्य है अन यह द्रव्यपरिकर हुआ)। नमिसाधु ने फल को जातिवाचक मान वेगीसंदार का 'कर्त्ता द्यूतच्छलना' पद्य उदाहरण के रूप में प्स्तुत किया है। सरवस्वकार का 'राशो मानधनस्य' पद्य उसका ठीक समानार्थी पद्य है। इसमें दुर्योधन एक व्यक्ति है अन. उसका वाचक शब्द द्रव्यवाचक शब्द है। उसके विशेषण द्रव्य के विशेषण होने से यहाँ द्रव्यपरिकर हुआ। गुगपरिकर-कार्येपु विध्नितेच्छ विहितमहीयोऽपराघर्सवरणम्। अस्माकमपन्यानामार्जवमपि दुलभं जातम्। -कार्यों में इच्छा विष्नित करने वाला, वडे से बडे अपराध का मी संवरण करने वाला आर्जव (सीधापन) मी हमारे दुर्भाग्य से दुरलम हो गया।' यहाँ आजंव गुण है और उसमें अनैक सामिप्राय विशेषण जोडे गए हैं।
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परिकरालङ्कार: २४७
गतनिद्रमविशासं जवति राजा जिगीपुरयन्।। -यह विजयेच्छु राजा सदा ही अशान्त चित्त हो सहसों आयासों के संकट से क्लेश में पढ़ा पजागरव्यथित हो, बिना किसी का विध्वास किए जीता है।' यहाँ 'जीना' किया के अशान्त चित्तता आदि अनेक साभिप्राय विशेषण है अतः यहाँ परिकर क्रियापरिकर हुआ।
एकं सकले जगति स्पृद्दणीयं जन्म केस्षरिणान् ॥ -केवल सिंहो का ही जन्म एक ऐसा जन्म है जो स्हणीय है, जो अत्यन्त असदनदकि, अत्यन्त बलशाली और अपराधीन रहते है।' यहाँ सिंह जातिवाचक मान्द है अतः यहाँ जाति- परिकर हुमा। नमिसाधु ने यहाँ भतृंहरि का 'कृशः काग खन्जः पद भी उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अत्यन्त उपयुक्त है। र्द्रट के इतने महत्वपूर्ण और विशद विवेचन को मम्मट ने संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया- मम्मट= 'निशेषणैर्दव साकृतेरुस्ति: परिकरस्तु सः ॥' अनेक साभिप्राय विशेषणों के साथ विश्वेष्य का कथन परिकर कहलाता है। उदाहरण के रूप में दिया है किरातार्जुनीय का- 'महोजसी मानधना धनार्चिता धनुर्भृतः संयति लब्घकीर्तंयः । न संूतास्तस्थ न भिन्नवृत्तय: प्रियाणि वाल्हन््यसुमि: समीहितुम्।'-यह पद्य यहाँ धनुर्धर वीरों को महान् ओजस्वी आदि अनेक विशेषणों से युक्त वतलाया गया है। अन्त में मम्मट ने अपुष्टार्थत्व दोय के अमाव में परिकर के अन्तर्मान की संभावना कर उसका परिहार इस प्रकार किया है- 'यद्यप्यपुष्टार्थस्य दोपताभिघानात तननिराकरणेन पुषटार्यस्त्रीकार: कृतः तथाप्येकनिष्ठलवेन बहूनां विशेषणानामेवसुपन्यासे वैचित्यमित्यलंकारभध्ये गणितः। विमशिनीकार ने इन्हीं पंकियों को तनिक से रूपान्तर के साथ परिकर-विमशिनी के प्ारम्भ में उद्धृत कर मम्मट के इस सिद्धान्त को मान लिया है कि साभिप्राय विशञोषणों की अनेकता दोपाभाव से आगे आवंकारिक चमतकार तक व्याप वस्तु है। निक्चित ही अलंकारसर्वस्वकार ने रुद्रट और मन्मट के केवल सामिप्रायत्व का व्यंग्यार्थ से r संबन्ध जोड़ मौर परिकर शब्द की अन्वर्थता की सिद्धि कर परिकर-विचार को पर्याप्त पुष्ि दो है। शोभाकर अलंकाररत्नाकरकार ने सर्वस्वकार का मत ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया है। उनका विवेचन इस प्रकार है- [ सूत्र=विशेषणानां ] साभिप्रायत्वं परिकर: । [वृति=] सामिप्रायत्वं परतीयमानार्थगर्भता। तस्य च प्रतीयमानस्य वाच्यं प्रत्युपस्कार कत्वाद् गुणीभूतत्वेनालक्कार्यत्वाभावाद् अलंकारता। वाध्यस्वैवोपस्कार्यतेन प्राधान्यादल्तंकार्यता। यत्र तु वाच्यस्य व्यकग्यार्थपर्यवसायितया व्यड्व्यस्य प्राधान्यं न व्यड्ग्यगर्भता स घ्वने विषय:। -- विशेषणों की साभिपायता परिकर। सामिप्रायता अर्थात प्रतीयमानार्थ से गर्मित होना। यह पतीयमान अर्थ वाच्य के प्रत्ति गुणीभून होता है क्योंकि वह वाच्य का उपस्कारक होता है, और इसीलिए अलंकार्य नहीं होता फलतः अलंकार कहलाता है। उमस्कार्य चाच्यार्थ ही होता है
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अलङ्कारसर्वस्वम्
इसलिए वह अलकार्य होना है। जहाँ वाच्य व्यड्म्य के प्रति समर्पित रहता है वहाँ वयंग्य प्रनान रहता है न कि वाच्य में गर्मित, वर्शो ध्वनि होती है। पष्दितराप अगनाथ ने शोभाकरऊञन परिकर हो परिकर के लक्षम के रूप में अपना लिया है 'विशेषणाना सामिप्रायवं परिकर।' सामिनायत्त का अर्थ भी उन्होंने-'प्रकृतार्योषपादकचम- रकारिव्यसग्यकत्व* किया है। सप्पव्यदीस्षित ने परिकर का कोर स्वनन्त्र लक्षग नदीं दिया है। चन्द्रालोक का 'अठकारः परिकर सामिनये विशेषगे यह पूर्वचारयों के परिकर लश्म का समाना्यी लक्षग हो उनहोंने स्वीकार कर लिया है। किन्तु दोक्षित जा ने एक नवीन प्रश्न उठाया है। बह यह कि जहा मम्मट और विमर्मिनीकार ने स्पष्टहूर से तथा रुदड, सर्वस्वकार तथा झोमाकर ने अस्पट्ट रूप परिकर में विशेषणों की अनेकता पर बल दिया था वहाँ अध्यय्यदोक्षेत ने इमके विरुद् केवन एक विशेषण की साभिनायना में भी परिकर को अलकार मानने को पहल की है। उनका आधार चन्द्रालोक के उक्त लक्षण में आया विश्ेषण शब्द का मकवचन है। इस पक्ष का प्रतिपादन करते दुए दीक्षिन बी ने कुवल्यानन्द में लिखा है- 'अनेकविदेषणोपन्यास स्व परिकर इति न नियम । इलेपयमकानिपु 0०0 एकम्यापि विशे- घगस्य सामिप्रायस्य विन्यासे विच्छित्िविशेषसद्भावान परिकरतोपपते ।' 'अपि च एकपदार्रदेनुकं का व्यल ह्मलकार इति सर्वसम्मतभ्, तददेकस्यापि विशेषणस्य सामिपायस्यालकारतं युक्तमे'। -यह मवश्यक नहीं कि अनेक विशेषगों के आने पर हो परिका अल्कार माना खाय। सामिश्राय विशेषण केवल एक भी हो किन्तु उसमे चमत्कार प्रतीति हो रही हो तो वहाँ भी परिकरालकार माना जा सकता है। इलेप, यमक आदि में वैमी प्रतीति होनी भी है। एक तथ्य यह भी ध्यान देने योग्य है कि केवल एक पदार्थ के हेतु होने पर काव्यलिंग को सर्वसमति से अरंकार माना जाता है। इसी प्रकार एक सामिनाय विशेषग से परिकर को भा अन्कार मानना ठौक ही है। पण्टितराज जगननाय ने भी अम्पय्यदोक्षित के इम मन को मान लिया है। उन्होंने किसरा है- 'विशेषणानेक वं हि व्यकग्याधिक्याधायकनवाद् वैचिन्यविशोषाधायरमस्तु नाम, न तु प्रक्ृता- एकारशरीर तदेवेति शक्य वक्तुम्, एकस्यापि विशेषस्य चमत्कारिताया अनपह्बनीयलाद।' -'विशेषण की अनेकता से व्यडग्य की भात्ा वढ् जानी है अत वह वेचिन्य में अधिकना भने हो लादे, यह नहीं कि वह परिकर का शरीर मानी जाने लगे 1 क्योंकि केवल एक विदेषण में भी चमस्कार रहना है इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।' ऐमा मानने पर पुष्टारनारूप दीपामान से परिकर को दृथक करना कठिन हो जाता है। पण्टितराज ने इम पर ये सुक्तियाँ प्रस्तुत की हैं- ['पुष्टार्थतारूपेग दोपाभावेन परिकराल्ट्वारत्य विपयविभागो दुश्शक इति प्रापे नमः]-'सुन्दरतवे सतयुपस्कार कत्वमल द्वारत्वम्, चमरकारापकर्दकाभावत्त च दोया भावत्म्। तदेतन् व्मेकय निविक्त विषय यदि देवादेकरिमन् विषयविशेषे समाविशेव तदा का हानि. स्यात, उपधेयस्षकरेडय्युपाध्य- संकराव । यथा बाह्यणस्य मूर्सतवं दोष, विद्या तु दोपामावश्च सवति गुणश् तयेहाप्युपपत्ति। न च दोषा मवतया प्राप्तस्यापि परिकरम्य किमित्यत्कारेपु गगनागीरवमिति वाच्यम्, उभयात्मरत्वे- नेतरवैलक्ण्यचापनारधनया गगनोपपत्ते यथा गुगीभृतव्यह्ग्यभेदनया सगृहीनारि समास्षोकिर- एकारगगनारया पुनर्गण्यने, यथा वा प्ामादवासिपु गणितोऽन्युमयवासी भूवासियगनाया पुनर्गाण्यते तधेह्ारीति न कशिद् दोष। अन्यथा प्राचा काव्यलिह मप्यरकारो न स्याद, तरयापि निर्देतुरू- दोषाभावात्मकत्वाद्।
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परिकरालङ्कार: ३४९
-अलंकारत्व है सुन्दरता के साथ उपस्कारकता और दोपाभाव है चमत्कार के अपकर्षकत्तत्वों का अभाव। अलग अलग क्षेत्र के ये दोनों तत्त्व यदि एक दी क्षेत्र में आा जाएँ तो कोई दानि नहीं। क्योंकि इनके मिलने पर भी इनकी विशेषताएँ भिन्न ही होगी। उदाहरण वो रूप में जैसे म्राह्मण के लिए मूर्खता दोप है और विद्या नूखतादोष का अमाव भी और गुण भी। बैसा ही यहाँ मी माना जा सकता है। परिकर दोषाभाव के साथ ही गलंकारत्वरूप उसी प्रकार है जिस प्रकार समासोकि सुणोभूतन्यंग्य भी और अलंकार भी, अथवा जैसे भवन और भूमि दोनों में रदने वाला भवन निवासी भी माना जाता है औौर भूमि निवासी भी। ऐसा न मानने पर माबीन मालंकारिकों दारा अलंकाररूप से मान्य काव्यलिंग भी अलंकार नहीं होगा, क्योंकि उसका भी सन्तर्माव निर्हेतुत्वदोप के अभाव में कर लिया जावेगा। विश्वेख्वर ने अलंकारकोस्तुभ में मम्मट और जयरथ, अप्ययदीक्षित और पण्टितराज जगनाथ सब के उक्त मतों को प्रस्तुत किया है। पदार्थहेतुक काव्यलिंग से परिकर को पण्डितराज ने न्यंग्यांश की लेकर मिन्न किया है। काव्यलिंग में चमरकार, वस्तु के हेतुत्वेन प्रस्तुतीकरण पर निरमेर रहता है नब कि परिकर में उसके व्यंग्यगर्मितत्व पर। केवल एक साभिपाय विशेषण से निष्पन्न परिकर का उदाहरण चन्द्रालोककार ने यह दिया है- 'सुधांशुक लिती रंसस्ताएं हरतु वः शिव: ।' -'चन्द्रचूट शिव आपका संताप दूर करें।' यहाँ चन्द्रचूढत्व से शीतता व्यक्त होती है जो तापदरण में सहायक है। संजीविनीकार ने परिकर-विवेचना का संक्षेप इस प्रकार किया है- 'निश्षेषणाना न्यंग्यार्थगर्मीकर णलक्षण। सोत्मासता परिकरो व्यड्ग्य: परिकरो मतः ॥' -अनेक विशेषणों की व्यंग्यार्थ को अपने गर्भ में लिए रद्दने रूप सोतासता परिकर कहलाती है क्योंकि इसमें व्यंग्यार्थ परिकर [सेवक, सामग्री ] के रूप में विद्यमान रहता है। परिकरांकुर-चन्द्रालोककार जयदेव तथा कुवलयानन्दकार अप्पय्यदीक्षित ने विशेष्य के साभिप्राय होनेपर एक परिकराक्र नामक भलंकार भी माना है।- 'साभिप्राये विशेष्ये तु भवेत परिकराक्कुरः इसका वदाहरण माना है-'चतुर्ण्णो पुरुषार्थोर्ना दाता देवश्चतुर्मुजः।' चतुर्भुज देव चार पुरुषार्थों का दाता है। यहां पुरुषार्थ चार हैं और मुजाएँ भी चार इसलिए एक एक हाथ से एक एक पुरुपार्थ देने का तथ्य व्यक्त होता है। विश्वेशर मण्डित के कथनानुसार उनके सबसे छोटे माई उमापति पण्डित इसे परिकर में ही अन्तर्भूत मानते हैं। उनके कथनानुसार-'चतुर्मुन' शब्द भगवान् विष्णु के अर्थ में रूढ है अतः 'चार भुजाए' यह अर्थ यहां विष्णु का विशेषण छोकर ही भासित होता है और चमर्कार उसी में है इसलिए यहां परिकरालंकार ही है। 'वचिद् विशेपणं साक्षादेव प्रकृतोपकारकम्, कनिवत्तु प्रकृतोपकारकमर्थान्तरमाक्षिप्येति०0 विशे- व्यविशेषणोमयस्षाभिप्रायत्वेऽपि परिकर पवेति त्वस्माकं यविष्ठभ्रातुरुमापते: पक्षः । -विशेषण कहीं साक्षात् ही प्रकृतार्थ का उपकारक होता है और कहीं प्रकृतोपकारक्षम किसी अन्य नर्थ का आक्षेप कर, इसलिए दोनों ही सथलों पर परिकर ही होता है जहां विशेषण सामिपाय रदता है नहां और जदां विशेष्य साभिपाय रहता है वहां सी।
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२५० अलङ्कारसवस्वम् [सर्वस्व ] [ सू० ३४ ] विशेष्यस्यापि साम्ये द्वयोर्वोंपादाने श्रेप: । केवलविशेषणसाम्यं समासोक्तवुक्ाम। विशेष्ययुक्तविशेषण साम्यं त्वधिकृत्येदमुच्यते। तत्र द्वयोः प्राकरणिकयोरप्राकरणिकयो. प्राकरणिका प्राररणिरुयोर्या शिलिध्टपदोपनिवन्धे श्लेपः। तवाद्यं प्रकारवूयं विशेषणविशे व्यसाम्य एव भवति। तृतीयस्तु प्रकारो विशेषणमाम्य एव भवति। विशे- व्यसाम्ये त्वर्थमकरणादिना चाच्यार्थनियमेऽर्ान्तरगतध्वनेर्विषय: स्यान्। आधे तु प्रकारदवये द्वयो्यर्थयोर्वाच्यत्वम्। अत पवात्र-'दयोर्बो- पादाने' इति तृतीयप्रकारविषयत्वेनोक्तम्। 'विशेष्यम्यापि साम्ये' इति तु शिष्टपकारद्वयघिषयम्। [सूत्र ३४] धिशेषगों के साथ] यदि विशेष्य का भी साम्य हो अथवा [समान विशेषण वाले दोनों [व्रिशेष्यों] का शबदृतः कथन दो तो [अलंकार को] श्लैप [कहषा जाता है ] । [ दृक्षि] रेदल विशेषणों का साम्य समासोकि में बवलाया गया, उससे मिश्न विशेष्य से शुक विशेषगों के साम्य को टेकर बतलाया जा रहा है यह। ऐसे दो अथो का श्लिष्ट पदों द्वारा कथन शल्ेष कहलाता है जिनमें से दोनों ही अर्थ प्राकरणिक हो अथना दोनों ही अप्राकरणिक और एक प्राकरणिव तथा एक अप्राकरणिक। इन तीनों प्रकारों में से जो प्रथम दो प्रकार हैं वे ती होते हैं वब विदयेषण और विशेष्य इन दोनों का ही साम्य [दयर्थेकना ] को इसके विरुद्ध जो तीसरा प्रकार है वद बेवल विशेषण के हो साम्य में होता है। यदि विशेष्य का भी साम्य हो तो वह अन्य सर्थे का वोष कराने वाली ध्वनि का विषय बन आएगा क्योंकि वहाँ अर्थगत वाच्यना प्रयोजन, प्रकरण आदि से नियमित हो जाम्भी [फलतः वाच्यरहित अन्य अर्थ का ज्ञान व्वनि से होगा]। प्रथम दो प्रकारों में दोनों ही अर्थ वाच्य होते हैं। इसीलिए यहां 'दयोवोंपादाने'-'अथवा दोनों का शुम्दतः कथन यह तृतीय प्रकार के लिए कहा गया है और 'विशेग्य में भी साम्य दो'- यह तो शेष बचे [ प्रथम] दो प्रकारों के लिए।
विमर्शिनी
विशेष्यस्यापीस्यादि। इदमिति श्ेपळमृणम्। आधमिदि। प्राकरणिरुगतरवेनाभाकर मिकमतरवेन प। सवकारथातर मिलकसो मटण्ः। तेन प्रकातकयमेवेडि ध्यारवेपन्। अतश्व तृतीयः प्रकारो विशेषणसाम्य एव भवतीति व्यवच्छेदफलम्। अन्यथा हि प्रकार- दयस्थास्य विशेष्पसाग्याभावेऽपि दर्शनादव्यासि: स्यात्। तद्या 'संचारपूतानि दिगन्त राणि' ह यादि। अत्न प्रभाधेन्वोहयो: प्रक्ृनयोर्विशेष्ययो. साम्या मावः। आावाहुन्वतमण्टल्ामचयः संनदव पार्या: सोप्माणो नणिनो विपवह्द्यशेन्मायिन: ककशाः। उरसप्टाम्बरदष्ट विग्रहमरा यस्य रमराग्रेसरा योषा देव वधूर्तनाथ्य न दघु: चोभं स वोडम्याज्जिन:।।'
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मलेपालक्वारा ३५१
अत् स्तनयोधयोरप्रकृतयोविशेष्ययो: साम्याभावः । विशेषणसान्य सवेति न पुन विरोष्यसाम्ये। पतदृषि विशेषयसाम्ये कि न भवतीत्याशस्याह-विशेन्यसाम्ये तिविरयादि। यथा- 'रंकालआ्ण पुत्तक वसंतमासम्मि लद पसरागम्। आपीक्षलोहिकाणं वीहेड जणो पलासणस् ।' अब्र पलाशानामिति विशेष्यस्यापि छिसखम।प्रकरणवशाच दृषविशेषणमेव वाच्य त्वनियमातप्स्तुतत्येन निशाघराणामप्रस्तुतानां व्यक्धत्यसू। अत्र चोफमाया सुव व्यस्चक्षं युकं नातिशयोकेरिति प्रकृतानुपयोगाविद नोक्तम्। नतु च यथैवार्थ धवनेर्षिपयसववाच् मपि भेदहयं कि न भवतीत्याशख्याह-आय हसयादि। वाच्यत्वमिति, अत एव न वनेदि पय: 1 तस्य वाच्यातिरिक्त्व रूपर्वास्। तृतीय प्रकारनिपयत्वेनति माधान्यायुक्तन। आघ स्यापि पकारदूयस्य द्वयोरुपादानलंभबातू। विशेष्यस्यापि। इदम्= यह अर्यात शलेष का लक्षण। आद्यम् प्राकरमिक गत तथा चम्रा करणिकगत। 'एव= हो' कदा गया है सान्य के वाद किन्तु इसे प्रकारदय के साथ लगाना चाहिए [ 'ये दो प्रकार हा' इस प्रकार] ऐेसा करने पर ही तृतीय प्रकार विशेषग के ही सान्य में होता है यह व्यवच्छेद सार्थक सिद्ध होगा। 'एव-ही' को 'सान्य' से मलग कर यदि 'प्रकारदय' के साथ नहीं रखा गया तो प्रथम दो उन स्थलों में नहीं माने जा सकेंगे जिनमें विशेष्य का साम्प नहीं रदता चथा-'संचार पूतानि दिगन्तराणि' यह [दोपक प्रकरण में आया रघुवेश का पद्य] यहां प्रभा और धेनु दोनों विशेष्य प्राकरणिक और इन्हें कलट शब्द से न कहकर स्ववाचक पृथकू शब्द से कहा गया है। 'वह जिन आपकी रक्षा करे, काम के अग्रगामी वीर और अप्सराओं के स्तम्म जिसमें क्षोम टत्पन्न नहीं कर सके, जो दोनों भुजाओं तथा फैले मण्डल [मेरा चीर पक्ष में धनुप का घेरा] से सुशो मत थे, जिन्हें वक्षःस्थल को सन्नद्ध [कवचादि से बद्ध, परिपूर्ण ] कर रखा या, जो गरम [वीर पक्ष में ओज, गर्व] से भरे थे जिन पर व्रण [धाव, रतनपक्ष में नसझत ] बने ये, जो विपक्ष [वौरपक्ष=शत्रुपक्ष, स्तनपक्ष में-सपत्नी] के हृदय के दहलने वाले थे जो कर्कश थे, और जो उत्सष्टन्वर दृष्टविद्यद्द भी [वीर पक्ष में-खुले आकाश में दिखाई दे रहा है विग्रह=युद्ध जिनका या मरने पर बीर गतति प्राप्त होने के कारण आाकाश में दिखाई दे रहैं, विगद शरौर जिनके, स्तनपक्ष में-उत्तरीय छोड़ अपना पूरा शरीर दिखळा रहे] ये।' [का० अ० सू० वृ० में वामन के द्वारा उद्धृत ]। -यहां [प्रकृत है जिन अतः ] वीर और स्तन दोनों अप्रकृत हैं और इन्हें किसी श्लट्टशब्दद्वारा नहीं कहा गया है। [ वस्तुतः इन स्थलों में इलेप नहीं है। अलंकार है तुख्ययोगिता या दीपक ]। विशेषगसाभ्य ए =केवल विशेषणों के ही साम्य में यद प्रकार कर्यों नहीं होता? इस प्श्न पर सत्तर देते हैं-'विशष्यसाम्ये तु'-'यदि विशेष्य का भी साम्य हो तो' इत्यादि। जैसे- 'ळंकालयानां पुत्रक ! चसन्तमासे लब्यप्रसराणान्। आपीतलोहितानां विमेति जनः पलाशानान्॥ -- 'हे पुत्र ! लंका के वसन्त में लब्चप्रसर तथा लाळ-पीले पलाशों से लोग डर रहे हैं।' यहां पलाश'-यह विशेष्य मो दिलष है परन्तु भकरण के आधार पर वाच्यता केवल वृक्ष- विशेष (टेसू) में ही नियमित हो जाती है, क्योंकि वही प्रस्तुत है, अतः अम्रस्तुत निक्षाचर (पल=
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३५२ अलक्कारसर्वस्वम् मांस, अर-खाने वाले) यहां व्यजना द्वारा प्रतीत होने हैं। फलतः यह ध्वनि का उदाहरण है यहा उपमा को हौ व्यव्य मानना उचित है, अतिशयोक्ति को नहीं, यह विचार प्रकनोपयोगी नहीं है इखरिए इसका प्रतिपादन नहीं किया गया। प्रश्न-जिम पकार यह (तृतीय भैद विशोष्य के साम्य में) ध्वनि का विषय मान रिया नाता है उसी प्रकार प्रथम दो भेदों को ध्वनि का विषय क्यों नहीं मान लिया जाना। इस पर उत्तर देने हुए लिखा-'आद'। इत्यादि। चाब्यत्व इसीलिये यह ध्वनि का विषय नहीं होना। क्योंकि उमका स्वरूप वाच्य से मिन्न होना है। नृतीयप्रकारविपयरवेन=(दोनों का शम्दन कथन' यह केवल) तृतीय प्रकार के लिए ही कहा गया है' यह केवल प्राधान्य को लेकर वडा गया है क्योंकि प्रथम दोनों प्रकारों में भी दोनों का पृथक उपादान समन्र है। [सर्वस्व ] क्रमेण यथा- 'येन ध्वस्तमनोभवेन वलिजित्काय: पुरास्त्रीकृतो यश्चोद्वृत्तभुजंगद्दारवलयो गङ्गां च योऽधारयत्। यस्याहु: शशिमच्छिरोद्र इति स्तुत्यं च नामामराः पायार्स स्वयमन्धकक्षयकरसत्वां सर्वदोमाधय: ।।'
सटशे वनवृद्धानां कमलानां तदीक्षणे।।' 'स्वेच्छोपजातविपयोऽपि न याति घक्तुं देदीति मार्गणशतैश्च ददाति दुःखम्। मोदात्समाकिपति जीवितमप्यकाण्डे कर्षं मनोभव इघेश्वरदुर्विदुग्धः।।' अत्र हरिद्वरयोर्द्वयोरपि प्राकरणिकत्यम्। पदमानां मृगाणां चोपमान बाद- प्राकरणिकत्वम्। ईश्वरमनोभययोः प्राकरणिकामाकरणिकत्वम्। एवं च
शब्दान्यत्वे शब्दश्लेपः । यत्र मायेण पदमक्गो भवति। अर्थश्लेपस्तु यत्र स्वरादिभेदो नास्ति। यत एव न तन्न समङपदत्वम्। संकलनया तूभय श्लेपः। यथा- 'रक्तच्छदत्वं विकचा वद्न्तो नालं जलैः संगत माद्धानाः। निरस्य पुष्पेपु रुचि समग्रां पद्मा विरेज्जः श्रमणा यथैव।' मत्र स्कच्छदत्वमित्यादावर्थश्लेषः। नालमित्यादौ शब्दश्लेपः। उभय- घटनाया मुभयशज्ेप:। अ्रन्थगौरवभयात्तु पृथद्नोदाहतम्। क्रम से [ एक एक के उदाहरण ] यथा-(दोनों प्राकरणिक अर्थ)- संस्कृत का 'येन ध्वस्त०' यह पद्। (इसमें दो समानान्तर अर्थ निकलते हैं, एक शिवपरक और दूसरा विषुपरक। दोनों में से प्रथम शिवपरक अर्थ इस प्रकार है-
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श्लेपालङ्कार: ३५३
-[शिवपरक अर्थ ]-'िन्होने काम को ध्वस्त किया है, निन्धोंने एक बार (त्रिपुरवम के समय) विष्णु के शरीर को अस्त्र बनाया था, जो फनफनाते सपो के दार और कंकण पहने रह्दते है, जिन्होंने (स्वर्ग से गिरती) गंगा को धारण किया था, देवगण जिनके सिर को चन्द्रमा से युक कहते, तथा जिनका 'हर' यह स्तुत्य नाम पुकारते है ऐसे अन्यकासुर के निदन्ता पार्वती प्रिय स्वयं भगवान् शंकर आपकी रक्षा करे।' [ विष्णुपरक] 'जो अजन्मा हैं और जिन्होने शकटासुर को ध्वस्त किया है, जिन्होंने अपना बसि को जीतने वाला शरीर [अमृत वोटते समय मोहिनी अवतार में ] सतरी शरीर बना दिया था, जिन्होंने फनफनाते [ कालिय ] सर्प का दमन किया, जो चक्र को धारण किए है, जिन्होंने [गोवर्धन] पर्वत और [ पाताल गई] पृथिवी को धारण किया, देवलोग जिसका 'रादटशिरोभंजक' यह स्तुत्य नाम लेते हैं वे अन्धकवंश को [द्वारकामे] बसाने वाले और उसके विनाश करने वाले, सर्वस्वदाता स्वयं भगवान् विष्णु आपकी रक्षा करें। [ये दोनों अर्थ इस पद के शब्दों को तोढ़ने से निकलते है। यथा शिवपक्ष में ध्वस्तमनोभव = ध्वस्त किया मनोभव कामको जिसने, विष्णुपक्ष में ध्वस्तन् अनः अमवेन =जिसने अन=शुकट= शकटासुर को ध्वस्त किया है तथा जो अजन्मा है। चलिजित्काय =बलिजिद=विष्णु, बलिको जीतने वाला शरीर, पुरास्त्रीकृत = शिवपक्ष में पुरा अखीकृत, वि०प० में पुरा स्ीकृत, उद्यृत्त मुजंगहारवलयः- शि० प० में-उद्वृत्त भुजंगों के हार और वलयवाले गथवा भ = विष्णु उनका रव= नाम उसमें लय है जिनका, वि० प० में = उद्वृत्त भुजंग के छा-'मारक', अरवकय=चक्र तद्कान्, शिवपक्ष मेंगंगा गगाको विष्णुपक्ष में अर्ग गां= पर्वत तथा पृथिवी को, शशि- मच्छिरोहर= शि० प० में-शशिमान् शिर वाले, तथा हर इस नाम वाले, वि० प० में-शशी को मथने- म्रसनेवाले राहु का शिर इरने वाले, अन्धकक्षयकर= शि० प० में-अन्धकासुर का क्ष विनाश करने वाले, वि० प्र० में अन्यकवश के लिए क्षय निवासस्थान उसका बनाने वाले तथा उसका क्षय = विनाश करने वाले, सर्वंदोमाधव शि० प० में सवदा समापवउमा के पति शिव, वि० प० में-सर्वद := सचकुछ देने वाला, माधव मा = लक्ष्मी के धव=पति - दिष्णु।] [ दोनों अप्राकरणिक अर्थ यथा ]- 'नीतानाम।कुलीभावम्' यह मद्य। [इसमें दो अर्थ निकलते ऐै १-पचपरक, २-इरिणपरक। अयम के पक्ष में श्लोक अर्थ होगा-] 'उसके नेन अनेक सुब्ध मोरों से आाकुल औौर पानी में उग कर बढ़े कमलों के समान हैं।' दूसरा पक्ष-उसके नेत्र अनेक नाण वाले वद्देलियों द्वारा आकुल हुए जंगकी हिरणों [ के 2 नेत्रों ] के समान है। [ कमळ पक्ष = लुन्म= लोमी, शिलीमुख=भ्रमर, वन = जल, कमलमपद्। हरिणपक्ष = लु्प= वहेलिया, शिलीमुख=वाण, वन = जंगल, कमल= हिरन-] [ एक प्राकरणिक और एक अप्ाकरणिक नर्ये, तथा विशेषण और विशेष्य दोनों का शब्दतः कथन-यथा]-'सवेचछोप0' पद्य का यह अर्थ- 'सेद की बात है कि नासमझ स्वामी काम के समान होता है जो स्वेच्छोपजावविषय [पमु = अपनी इच्छा भर विषय= घनमान्यादि, काममअपनी शच्छा के अनुसार विषय = सी आदि] पाकर मी मार्गणशत के द्वारा [प्रभु=सैकढ़ों पाचकों द्वारा] 'देहौति' [परभु =देदि = दीजिम, इति ऐसा] कहा नहीं जाता, और दुःख देता है[ काम मी मार्गणशत=सैकड़ों वाणों के द्वारा दुःख देता है और देदीति = देढ़ी= शरीरी आत्मा नहीं कडा आता] और मोह से [ अभु नासमझी से, २३ अ० स०
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३५४ अल्कारसवस्यम्
काम = मूर्च्छा से] जीविन को [ प्रमुजीविका को, काम=पाणों को] भी एकापक नष्ट कर देता है।' -इन [नीनों पद्यों में से प्रथम पथ] में शिव और विष्यु दोनों प्राकरगिक है, [द्वितीय पद्य में] पभ और मृग दोनों उपमान हैं इमलिए अपाकरणिक हैं [ और तीक्षरे पद में] स्वामी प्राकरणिक है और काम अमाकरणिक । यह शम्द, अर्थ और दोनों में रहता है, इसलिए तीन प्रकार का होता है। इनमें शब्द का सलेप वह होता है जिसमें उदाच आदि स्वर का अन्तर पढ जाता है फलत [उच्चारण के] प्रयत्न में अन्वर आ जाता है अत शम्द भी वदल जाता है। यहाँ पायः शब्द टूटना है। अर्थ इलेष वेहो होना है जडा स्वर आदि का भेद नहीं होता। इसीलिए इसमें शम्दों में भङ्ग (हूट) नहों रहता। उमयश्लेष होता है इन दोनों के पकतरीकरण से। यथा- पझ्म ठीक बैसे दी सुशोमिन हो रहे थे जैसे श्रमण। क्योंकि वे लाल वर्ण के छद (पसुढी) धारण किये हुए थे [ समग भी लाल वर्ण का एदकन्था धारण करने हैं], वे विकच [खिले हुए ये, श्रमग भी कच = केशों से रदित - विकय= मुण्टित सिर दोते हैं], जलों में सगन = डूबी नाल को धारण किए हुए थे और ग्रमश मी जड व्यक्तियों का अधिक साथ नहीं करते = [जलेपु= जडेपु अलम् अधिक, सगतभ्=साहच्य न आदयाना ] [ अन्य ] पुष्पों की सपूर्ण रुचि निरस्त कर चुके मे। [श्रमण भी पुष्प= स्त्री या पुत्पधन्वा काम की सपूर्ण रुचिचाह समात कर देने है ]। -यहाँ 'रकच्छदत्त' आदि [आदि पद से विकचत्व, पुष्परुनिनिरसन] में अर्थशकेप है और 'नालं आदि [आदि शब्द] में [नाल तथा न अलम् : जल तथा जढ़ इस शब्द्मेद होने से] शाष्दशलेप है। क्योंकि यहाँ दोनों एक ही वाक्य में मिलित हैं इसलिए यहाँ उमयश्केष हुआ। तीनों के उदाहरण अल्ग-अलग नहीं दिए ग्रन्थ कछेवर वढने के मय से। विमर्शिनी ष दति प्रिविघोऽषि रचेप:। तनेति ब्रपनिर्धारणे। यत्रेति सम्दश्लेपे। अन एवेति रवरादिभेदामावाद्। संकळनयेति समझसमङ्गपदमंमेलनया। पृथगिति मेदेन। तत्र दाग्दश्टेपो यथा- 'ते गच्छन्ति मद्ापर्द मुवि, परामूतिः समुरपद्यते तेपों, तैः समलंकृतं निजकुलं, तैरेव छब्घा सिनि:। तेपां द्वारि नदन्ति वाजिनिवद्वास्ते भूपिता: प्रश्यहं ये इष्टा: परमेश्वरेण भवता तुऐटेन रुष्टेन वा।।' कत् पदानां समहखवं स्पष्टम। अर्थश्केपो यथा-
नैविट्धेन भरस्परस्य न मनाक केनापि लध्धान्वरौ। धन्यो तो तवगीश्तनाविव न यौ स्वप्नेऽपि विश्लिप्यतो विश्लेपं विधमं विषद्य भवतो नाघोमुखी जातु वा।' अन्र पदानामसभह्ावं स्पट्टम्। संकलनया सु अन्यकृतवोदाहनम्। अस्य च शबडा एप - यह अर्थाव तीनों प्रकार का श्लेष। तग्न तीनों में। यग्र=जहाँ अर्थाव शम्दशलेप में। अत एव= इसीलिए अर्योव स्वरादि का भेद न होने से। संकउनमा = एकत्रीकरण अर्थात समा
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स्लेपालद्वार: ३५५
पद एवं अभग पद के मिश्नन से। पृथक = अलग-अल्ा = अर्थाव प्रत्येक का उदाहरण भिन्न करके। भिन्न उदाहरग इस प्रकार है- 'आप पर मेश्वर हैं। आप जिस पर प्रसन्न या रुष होते हैं वे महापद [ मदान् उन्म पद, नहा आपद् आपति] को प्राप्त होते है, पृथिवीमण्टल पर उनकी पराभूति [परा = उत्कृष्ट भूति वैभव, पराभृति= परामय ] होती है, वे अपने कुल को समलंकृत [सम् = सब प्रकार से अलंकृत = शोभित, समलं= गलसहिन कलंकित] कर देते है, वे ही क्षिति [पृथिवी, क्षय ] को पा लेते हैं, उनके दरवाजे वाजिनिवह [दाजि = पोड़ों के निवह समुदाय, वा = या आजि = बुद्ध=निवह] गरजते हैं, और वे ही प्रतिदिन भूषित [ अलंकृत, भू=पृथ्वी पर सित = पड़े हुए] रहते हैं।' चह्ाँ पदों में मझ है। अर्थक्लेप चथा - 'े [दम्पती ] धन्य हैं तरुणीस्तनों के समान जो सदा दो चियुकाम [कुद्ठी के अग्रभाग] का चुन्दन करना चाहते हैं, जिननें शिथिलता की शंका नहीं रहती, परस्पर में इतने घने [ सटे] रहते है कि अन्य किसी को बोच में जगह नहीं मिलती, जो स्वप्न में भी अलग नहीं होते और अलग होते भी हैं तब भी कभी अधोमुख नहीं होते।'-यहाँ पदों में मह नहीं है यह स्पछ है। दोनों का मिलित उदाहरण स्वयं चन्यकार हो [ 'रकल्हदत्वं' यह] दे चुके हैं। यह शुद्द और अर्थ दोनों पर आश्ित है, इसलिये इससे दोनों का अलंकार वतलाने हुए चाहते हैं- [सर्वस्व ] अलंकार्यालंकरणभावस्य लोकवदाअ्रयाश्यिभावेनोपपततेः 'रकच्छदत्वम्' इत्यादानर्थंद्वयाश्रितत्वादयमर्थालंकार: 'नालम्' इत्यादौ तु शब्दद्वयाश्रित- स्वाच्डव्दालंकारोऽयम् । यञ्प्यर्थमेदाच्छव्दमेद इति दर्शने 'रकच्छदत्वम्' इत्यादावपि शव्दाश्रितोडयं तथाप्योपपत्तिकत्वादत्र श्दमेदस्य प्रतीतेरेक- तावसायान्नास्ति शब्दमेदः। 'नालम्' इत्यादी तु प्रयत्नादिमेदात् प्रातीतिक एव शब्दभेदः। अतश्च पूर्वतरैकचृन्तगतफलदयन्यायेनार्थद्वयस्य शब्दशिलि- पत्वम्, अपरन्न जतुकाष्ठन्यायेन स्वयमेव रिलष्ठत्वम्। पूर्वत्रन्वयव्यति- रेकाग्यां शब्दहेतुकत्वाच्छ दवालंका रत्वमिति चेत्, न आश्रयाश्रयिभावेना- लंकारत्वस्य लोकवद् व्यवस्थानाद्। अलंकार्यालंकरणभाव [कान्य में भी] आश्रयाधविभाव के आधार ही ठोक उसी प्रकार संभव होता है जिस प्रकार लोक में, सतः 'रकच्छदत्वम्' इत्यादि पद्य में यद [ कलेंप ] दो अर्धों पर आश्रित रहने से अर्थ का अलंकार है। इसके विपरीत 'नाले' इत्यादि स्थल में दो शब्दों पर आश्नित रदने से यही शब्द का अलंकार है। यद्यपि 'अर्थ मिन्न हो तो शब्द भी भिन्न होता है' इस सिद्धांत के अनुसार 'रकतच्छदत्वन्' इत्यादि में भी यह [ इलेष ] शब्दाश्रित ही माना जा सकता है तथापि वह शब्दमेद सिद्ध करने पर सिद्ध होता है, प्रनीति तो होती है एक रूप से ही। इस कारण चहाँ [काव्य में प्रतीति का सारा खेल हैं अतः इसकी दृष्टि से] शब्दभेद नहीं है। औौर इसीलिए प्रथम सव्देष में दो अर्थो का [ पक] शब्द में इलेप=जोड़ उसी प्रकार है जिस प्रकार एक वृन्त में दो फलों का होता है, जब कि दूसरे इलेष में स्नयं शब्दों का ही दलेप=जोढ़ रहता है, ठौक उसी प्रकार जिस प्रकार जतु = लाक्षा और काष्ठ= लकड़ी का। [मम्मट का ] यह कहना ठीक नहीं है कि 'प्रथम
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[अभग ] भेद में भी [सलेष ] शम्द का ही अलकार है क्योंकि उसका रहना न रहना शब्द के रहने न रहने पर निर्भर है इसलिप उसके प्रति श्म्द ही हेतु है, और अरकार की शब्दार्थगत- त्वेन व्यवस्था ह्ेतुद्वेतुमद्भाव के आधार पर होनी चाहिय, क्योंकि वस्तुत काव्यालंकार मौ लौकिक अलकारों के समान ही आाश्रयाश्रविभाव को टेकर उदराय जा सकने है [ हेतुद्वेतुमद- भाव को लेकर नहीं ]।
विमर्शिनी
ननु च 'यावन्त एव मर्था: स्युः शब्दाहतावन्त एव हि' इश्यायुकया रक्तच्छदावमित्या-
एकनावसायदिति। रकच्छद्रवादे- पयतनादिभेद बिना साहश्येनायंद्रयाभिषानात्। अत- श्रेत। अर्थट्रयश्य शब्दद्यर्य प रिछष्टयात्। पूर्वश्रेति। रकच्छदश्यमित्यादी शव्दस्य वृन्तस्थानीयवात्। अपरन्रेति नाळमिरयादी। जतुकाव्वन्यायेनेति परस्पर संवलितरवादू। पूवत्रति रफच्छदखवमित्याद्ी। अन्वयव्यतिरेकाभ्यामिति। रकन्द्दरवमित्येव शन्दे स्थिते श्लेप शध्दपरिवर्तने त वृते न श्लेप हृश्यग्रापि शबदहेतुक्खात्तदलकारखमेवेश्यर्थ.। आश्रयाश्रयिभावेनेति। न पुनरम्वयव्यतिरेकाम्पाम्। ताम्यां हि यस्य यद्वेतुकरव तस्य तर्कार्यरवं म्यान पुनस्तदलकारखम्। लोकवदिति। लोके हि यथा कर्णाश्रित, कुण्डलादि: कर्णलंकार उच्यते न पुनः सुवर्णकारणहेतुकरचा तदलंकार:। 'शब्द उतने ही होते है जितने सर्थ' इत्यादि वाक्यों के अनुसार 'रकच्छदत्वम्' हत्याि में भी यह दलेप शब्द का ही अरकार हे क्योंकि वहाँ भी यह दो शब्दों पर आश्रित है। फिर आप इसके विपरीत इसे [अर्थाश्रित] क्यों बतला रहे हैं'-इस शंका पर उत्तर देते हैं- 'य दपि-' रस्यादि। 'एकतावसायाव्' -'पतीति में एकता का ज्ञान'-इसलिए कि 'रकच्छदत्व' आदि शब्दों में प्रयत्न आदि के भेद के बिना एकरूपता (साटृश्य) के आधार पर दो सर्थों का कथन होता है। 'अतश्न =और इसीलिए'- अर्यात दो अर्थ और दो शम्दों के दिलष्ट =जुडे हुए होने से। पूर्वश्र- प्रथम में - रचच्छवृत्व हत्यादि में क्योंकि वहोँ शब्द रहता है वन्ततुल्य। अ्परत दूसरे में ='नालम्' इत्यादि में। 'जतुकाष्टन्यायेन' = लाख भोर काछ के समान एक दूसरे में चिपके रहने से। पूर्वत्र= प्रथम में 'रकच्छदत्व' इत्यादि में।अन्वयव्यतिरेकाम्याम= 'एक के रहने पर दूसरे का रहना और न रहने पर न रहना'- 'रकक्छरख' इसी शब्द के रहने पर ददेष रहता है, इस शब्द के बदरु देने पर शलेध नहीं रहता। इस प्रकार यहाँ पर भी. इळेप चन्दमूहक है अतः उसे शब्दारकार शी मानना पडेगा। आश्रयाश्रयिभावेन=आश्षया अयिमाव से, न कि अन्वयव्यतिरेक से। इन [अन्वयग्यतिरेक ] के द्वारा यह सिद्ध हो सकता है कि जो जिससे पैदा होना है वह उसका कार्य है, यह नहीं कि वह उसका अलंकार है। लोकषद् - लोक के समान-' लोक में जिस प्रकार कान में पहना कुण्डल आादि मलेकार कान का हो अलकार [सोभावर्धक ] कहा जाता है न कि सुनर्ण रूपी कारण से उत्पन्न होने के कारण सवर्ण का अलकार [चोमावर्षक]। विमर्श :- इटेप शब्द का प्रमुख अर्य है जुटना, चिपकना, और अलंकार शब्द का अर्थ है शो मावर्यक तस अथवा अप्रधान रूप से चमत्कारजनक तत्त्व। प्रश्न उठता है इलेष में अलकार्य कौन है। इटेष स्वयं हुआ अलकार, अत. अर्षटकार्य शब्द या अर्थ इन दो में से कोई एक हो सकता है।
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श्लेपालक्कार: ३५७
इन्रट और सर्वस्वकार सभंग और अभंग हम दोनों इलेयों को अर्थालंकारों के प्रकरण में रखते हैं अतः सामान्यतः यही सिद्ध होता है कि दोनों ही पकार का इलेष अर्थालंकार ही है। उधर उभ्ूट ने समंग शलेप को शब्दालंकार कहा है अतः मम्मट ने उसके अर्थालंकारों के बीच रखे जाने पर आपत्ि उठाई है-'शब्दालंकार इति चोच्यते, अर्थालंकारमध्ये च गण्यत इति कोय नयः' [नवम उल्लास ] रुद्ट के अनुकरण पर मम्मट ने स्वयं शब्दशलेष को नवम उल्लास्ष में शब्दालंकारों के चोच रखा है और मर्थश्लेप को अर्थालंकारों के वीच दशम उल्कास में। सबस्वकार ने अतिशचोक्ि को तो दो अलग-अलग प्रकरणों में रखकर वर्गीकरण को महत्व दिया, किन्तु यहाँ उन्होंने वेसा नदीं किया और सभंग वलेप को शब्दालंकार कदकर भी उसे अर्थालंकारों के बीच रखा। विचिन्रता यह है कि सम्मड द्वारा सलैप पर बठाई गई अन्य आपत्ियों का उत्तर देते हुए मी वे इस सापति पर मीन है। वस्तुतः यह उनकी शियिलता हो है। इस पकार सभग श्लेष में अलंकार्य शब्द ही मान्य है। अर्थ यह कि समंग इलेप शब्दाळंकार ही है। अभंग इलेष में अलंकार्य के निर्णय की समस्या जटिल है। जटिलता इसलिए है कि निर्णायक बिन्दु पर आचार्यों का मत एक नहीं है। उद्भट के अनुसार निर्णायक है आवयाश्रयिभान। इस मत में इलेश का आश्रय ही इलेव का अलंकार्य है। समंग श्लेप में दो शब्दों का जोड़ रहता है और वह लाख़ और लकड़ी के जोड़ के समान स्पष्ट दिखाई देता है। अतः नहाँ शब्द ही इलेप का आाश्य और अलंकार्य मान लिया जाता है। किन्तु अरभगश्लेष में आश्रय का निर्णय करना कठिन है। लभंग इलेप में अर्थ दो होते हैं इसलिए अर्थ के जोड़ में कोई मतभेद नहीं चठता। जहाँ तक शब्द का संवन्ध है इसके विषय में दो मत हैं। एक के अनुसार अभंग इलेप में यद्यपि शब्दों में भेद नहीं रहता अतः उनका वैसा जोढ़ नदीं रहता जैसा सभंग श्लेप में रहता है, तथापि एक दूसरे प्रकार का ओड़ अवश्य रहता है। वह है गाय और भैंस के दो भिन्न दूर्धों के मिश्रग जैसा जोड़। फलतः उसमें सोड़ की प्रतीति नहीं हो पाती। प्रतीति न होने पर भी शब्दों में जोड़ इसलिए माना जाता है कि सर्थ बदलते ही शब्द मी बदल जाता है। जैसे मानस शब्द के दो अर्थ होते हैं, एक मानसरोवर तालाव और दूक्षरा चित्त। यद्पि 'म्, आ, नू, अ, त्, अ' ये वर्ण उसी क्रम से तालाववाचक मानस शब्द में आाते हैं जिस कम से चित्तवाचक मानस शब्द में, जिससे दोनों मानस शब्दों के उच्चारण में प्रवलमेद नहीं होता, अतः दोनों शब्दों में एकता की प्रतीति होती है तथापि वे दो भिन्न शब्द हैं क्योंकि मर्धों में भेद है। जैसा कि कहा जाता है-'प्रत्यर्य शब्दा मिधन्से।' इस सिद्धान्त के अनुसार जोड़ या श्लेप का आश्य शब्द है इसलिए इलेपरूपी अलंकार का अलंकार्य शब्द ही है। इस मत के प्रवत्तक आचार्य है मम्मट। उनकी पक्ति है- [का०]'वाच्यभेदेन भिन्ना बद् युगपद्माषणसूशः। दिल प्यन्ति शब्दा: इलेपोडसौ [पृ०]'अर्थमेदेन शब्दमेद इति दर्शने वाच्यमेदेन भिन्ना अवि शब्दा यद युगपदुच्चारणेन दिल्यन्ति - भिन्नं सरूपमपहुवते स इतेष: 1[ काव्यपकाश उ० ९]। -- 'अर्थमेद में सब्दमेद' इस सिद्धान्त के अनुसार मर्थभेद से भिन्न हुए भी शब्द एक साथ उच्चारण के कारग अपना भिन्न रूप छिपा लेते हैं तो उसे शब्दशलेष कहा जाता है।' सर्थभेद से शब्दभेद का सिद्धान्त मम्मट के पूर्व उद्धट ने भी माना था और कहा था- 'एक प्रयल्नोचार्याणां तच्छार्यां चेव विभ्रताम्। स्वरिता दिगुणैर्मिन्नैवन्ध: विलष्टस्। ४।९॥ अर्यात्
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-एक ही प्रयत्न से उच्चार्य अत एवं ममान प्रतीत होते शब्दों का बन्न रिटष = जुडा हुआ = जोड से युक्त कदलाता है। 'ममान प्रतीत दोने' इस कथन का आधार 'अर्थभेद में शब्दभेद' सिद्धान्न ही है। उद्भट के काव्याल्कारसारसग्र की टीका लयुतत्ति में प्रनीहारे- नदुराज ने मी लिखा है- 'अर्थभेदेन तावच्छम्दा मिदन्त इति मटोद्मटस्य सिद्धान्त. ।' किन्तु उट्रट ने ऐेसे शष्दों के इनेष का भरकार्य शब्द को न मान अर्थ को मान टिया- 'पदै', द्विविधेत्थंशब्दोकतिविशिषं नव' -पद दो प्रकार के होते हैं-(१) ए्कोच्चारण वाले और (२) भिन्न उच्चारण बाले। इन दो प्रकार के पदों से इलेप मी दो प्रकार का होता है अरथरनेप और शज्त्रइलेप एकप्रथतनी च्वाय शन्दरळेप दूसरे शब्दों में अमगस्लेष ही है। इस पर मम्मट ने सापति उठाई और कहा जब इलेष शब्द में माना [अर्थाद श्लेष का आश्रय शब्द को माना ] तब अल्कार्य मर्थ कैसे माना जा सकता है। रहे श्लेप किसी में और अलकृत करे किसी को यह वान तवशुद्ध नहीं कही जा सकती। और इसीलिए अभग दलेष को अर्थालकार नहीं माना जा सकता। वढ शम्दा संकार ही है। एक प्रश्न और उपस्थित हुआ। यह कि अभंग शलेघ में अर्थभेद से शब्दमेद मानना और फिर शब्द में ही इलेप रवीकार करना कहा वक वास्तविक है। यह केवल शास्त्रमक्ति ही है, या इसमें कोई यथार्थ भी है। इसका उत्तर भम्मट ने तर्कशाख की दुहाई देकर दिया। उन्होंने कदा अमंगर्लेप में दलेष का आश्रय कौन है यह तथ्य अन्वय और स्यतिरेक की कसौटी से परसा जा सकना है। यदि शब्द के हटा दिए जाने से श्लेप न हूटे तो वह अवश्य ही शब्द का श्लेप न होगा, अर्थ का ही श्लेप होगा। 'रकच्छदत्व'-आदि अभग इनेष के स्थगने में स्थिति ऐमी नहीं है। यहाँ यदि 'रकच्छर' शब्द के स्थान पर 'रकपत्र' शब्द दे दिया जाय तो इस शब्द का सर्थे स्रंमण पक्ष में लागू नहीं होगा, फलत, इेप नष्ट हो जाएगा। विक शब्द भी नहीं हटाया जा सकता। 'विकेश' या 'विकसिन' कहने पर एकान्वयी अर्थ ही निकलता है अतः इलेप नष्ट हो जाता है। इस प्रकार स्लेय का आश्रय समग इलेप में मी शब्द ही होना है। अटकारसदंस्वकार और जयरथ ने मम्मट की इस तार्किकना को सहदयता से काटने की कोशिश की। अन्वयव्यतिरेंक को इन दोनों ने कार्यकारणमाव का नियामक माना, अलंकार का नहीं। अलकार को इन्होंने आशयाश्रयिमान पर हो निर्मर मानने का पक्ष प्रस्तुन किया है। यह उनके मी आए ग्रन्थाश से हो स्पष्ट है। लोक में जैसे केयूर का कारण सुबरण होता है किन्तु वह अलंकार होता है भुजा का, इसलिए केयूर के अन्वयव्यतिरेक सुवर्ण के साथ रहने हैं, सुवर्ण के न रहने पर कैयूर नहीं रहता और रहने पर रहता है, जब कि अलकार्याटेंकारभाव भुजा के साथ, ओो केयूर का आध्रय है। फल्तः अलवार्यारंकारमाव आधयाश्रविभाव पर निर्भर माना जाना चाहिए। अमंगदलेष में जहों तक आश्रय का सम्न्ध है इसका निर्भय वल्पित चासतसिद्वानन पर नहीं, अनुमव और सवित्ति पर किया जाना चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्र काव्य का क्षेत्र है। सविति में अर्भगरनेपस्पल में द्वेत अर्थगत ही मासित होता है, शम्दगन नहीं। फलनशब्द एक वृन्त हंठल है, जिसमें दो अर्ध के दो फल एगे हुए है। फल दो हो तो वृन्त को भी दो मानने की नासमझी फोई नहीं करता। वृन्न के एक होने से उसमें दलेप या जोड़ का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। प्रश्न फल में हो उठ सकता है क्योंकि देव वहीं है। फलतः स्लेप सरथों में ही है। अर्थ की शलेप के आभय है। अर्थ ही श्टेप के अलंकार्य हैं।
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इलेप अर्थ का दी अलंकार है। और सच भी है। यहू और बेंट यदि साशलेप करें तो उसे अलंकार सास ससर का नहीं माना जा सकता। निश्चित ही इन आचार्यों के तर्क सन्दर और समर्थ हैं। प्रतीतिक भेद मानकर शब्द में इलेप को सिद्धि अवश्य शी शाखमक्ति है। मन्मट के अन्वयव्यतिरेक पक्ष का पुनर्वीक्षण करने पर कुछ और भी विवशताएँ सामने आाती हैं। अन्वयन्यतिरेक अलंकार्वालंकारभाव के लिए भी अस्थस्त उपेक्षणीय नहीं है। यह अवश्य ही एक विचारणीय तथ्य है कि शब्द के बदल देने पर अमंगद्लेष क्यों समाप हो जाता है। आध्रया- सविभाववादी उक्त दोनों आपारय इसका उत्तर यह देंगे कि शब्द के साथ शलेय का कारणकार्य- माघ संबन्ध है। अर्थो का रलेप संभव नहीं होता जय तक रकच्छदस्व आदि समयान्वयी शब्द का पयोग नहीं होता। फलतः द्वयर्थक सम्द ही विभिन्न भर्यी के इलेप का कारण है। अर्थ यह कि श्लेम अर्घों में ही रहता है तयापि यह तब तक संभव नहीं दोता जब तक विशिष्ट शम्द का प्रयोग न हो। इस प्रकार अन्वयन्यतिरेक से अमंग कलेष में कारण तो शब्द ही सिद्ध होता है तथापि दलेप रहता अर्यो में ही है। सुमिन्रा के गर्भ में लक्ष्मण और शत्रुन्न जुड़े हुए थे। सुमिना एक ही थी। सबुव्न के लिए दूसरी और लक्ष्मण के लिए दूसरी नहीं। इसीलिए दलेष-जोड़ केवल लक्ष्मण और रातुव्न में ही था, कारणभूत सुमिता में नहीं। अन्ववव्यतिरेकवादी की ओर से यह कहा जा सकता है कि दो विभिन्न अर्यो में इलेप उत्पन्न करने की जो क्षमता 'रकच्छदत्व' आादि द्वचर्थक सब्दों में रहती है वह क्षमता अपने आाप में कोई विशिष्ट थर्म है या नहीं। उससे कोई चमत्कार कान्द में आता है या नहीं। अवश्य ही वह चमत्कार में अंशतः प्रयोजक है। इसके अतिरिक्त अमिन्नातुपू्वोंक अतएव पकप्रयत्नीच्चार्य शब्दों में यदि वास्तविक भेद नहीं रहता और उनका इ्लेय एक प्रातिमासिक या करिपत श्लेय है तो ऐसे शब्द से प्रतीत दो अर्थो का श्लेय वास्तचिक है इसमें भी क्या प्रमाण। एकशब्दवाच्य होने से उनमें सहसा भेद लक्षित नहीं होता केवल इतना ही अनुभवासद्ध है। दोनों शब्द जुड़े रहते हैं यह नहीं। और यदि ऐसा कोई कलेप ममंगरलेप के अर्थों में रहता है तो वह सभंग इलेष के अथों में भी रहता ही है। तब सभंग दलेमको उमयालंकार क्यों नहीं माना जाता। यदि यह कहा जाय कि सभंग श्ेष में शब्दों के जतुकाषवत जोड़ के कारण अर्थों में जोड़ रहता, अर्यो का जोड़ वहां स्वाधीन नहीं. होता तो यही चात भमंग इलेष में कही जा सकती है। वहाँ मी अर्थशलेप शब्दश्लेश पर निर्भर है केवल जतुकाप्वव शब्दों में शलेप ही वहों लक्षित नहीं होता। तव यदि शब्द के कारण होने से समंगदलेप में इलेष शब्द का अलंकार है तो अभंगशलेप में भी कारण दोने से श्लेप को शब्द .का ही अलंकार क्यों नहीं माना जा सकता। एक बात और। यह कि मलंकार्य सलंकार का आश्रय ही हो यह आवश्यक नहीं है। यदि वाक्यार्थे में आवादि सामग्री नदीं हो तो उसमें मए रूपक आदि अलंकार नहीं माने जाते। मावादि सामश्री अलंकाराश्रय नहीं होती। अलंकारा- अय सर्थ होता है और वह उससे व्यक्त होती है। इस प्रकार जब अलंकार्य अलंकाराश्रय से मिन्न सिद्ध होता है तय जिसमें इलेय हो उसी को दलेष का अलंकार्य और उसी के प्रति इलेप को अ्लंकार मानना ठौक नहीं है। फल्तः अभंग दलेप में मलें ही श्लेय अर्थो में हो तथापि मर्थ हो इचेष का अलंकार्य हो यह नहीं माना जा सकता। मलंकार्य वह होता है जिसमें शोमा का आवान हो। और अभंग इकेव में भी शोमा का आधान सभंग द्लेश के ही समान शब्द में ही होता है। वहाँ अर्धदयनाचकता से शोभा आती है अतः वह शब्द में ही रहती है। दूसरे शम्दों में श्लेप- पतिपादवता शब्द में होने से शब्द हो अरंकार्य माना जा सकता है, अथे नहीं, इसे शास्रकारों से 'तन्त्' अब्ह से पकारा है। तन्त्र का अर्थ एकाधिक सर्थों का प्रतिपादक शब्द माना जाता है।
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फलत अधिक अच्छा हो कि मम्मट और अलकारसवेंस्वकार अपने पूर्ववर्त्ती आचार्य उन्द्ट और अर्यभेद से शब्दभेद मानने वाले अन्य दादानिकों का मुलादिजा न कर भमग श्लेष के स्थान पर 'तन्म्रालंकार' नामक एक स्वनन्त्र अटकार को स्वीकार करें। पपिहतराज मगन्नाथ तथा विश्वेवर ने इन मनभेदों का उन उन आचारयो के नाम के साथ अनुवादमान्र कर दिया है। इन पर अपनी ओर से कोई टिप्पजी नहीं है। विमशिनी तद्, एव रूपस्यारय 'निरवकाशा दि विधय सावकाशान्विधीन्याधन्ते' इनि नौत्या निरव का शर्वारसर्वालकारा पवादकरवं कविदाहु रित्याद-एव चेस्यादि। 'जो विधि निरवकाश होनी हैं वे मावकाश विधियों को बाधित कर उनके स्थान पर चरि- तार्थ मानी जाती है' इस सिद्धान्त के अनुमार तक प्रकार के इस इलेष को निरवकाश मानकर कुछ [उद्धट आदि ] आचार्य अन्य सब अलकारों का अपवाद या वापक मानते हैं। बन्थकार इसो तथ्य को प्रस्तुन करते हुए लिसवे हैं- [सर्वस्व ] एप च नामासेम्वलंकारान्त रेग्वारभ्यमाणस्तद्वाबकरवेन तत्प्रतिमोतपत्ति- द्वेतुरिति केचित्। 'येन ध्वस्तमनोमचेन बलिजित्काय: पुरास्धीकतः' इत्यादौ विविकोऽस्य विषय इति निरवकाशत्वामावाध्यान्यबाधकत्वमित्यन्यैः सद्द संकर:, दुर्वलत्वाद्वा वाध्यत्वमित्यन्ये। तत्र पूर्वेपामयमभिभायः।इछ मार- रणिका पराकरणिकोभयरूपाने क्कार्थगोस्तरत्वेन तन्नादं प्रकाषद्वयं तुत्ययोगिताया विपय:। तृतीये तु प्रकारे दीपक भवतीति तावदलंकारद्वयमिदं श्लेपविषयं व्याप्तया व्यवतिप्ठते। तत्पृष्ठे चालंकारान्त- राणामुत्थानमिति नास्ति विविकोऽस्य विषयः। अत पवालंकारान्तराणां याधितत्वात्प्रतिमानमान्रेणावस्थानम्। 'येन ध्वस्तमनोभवेन' इत्यादौ च प्राकरणिकत्वादर्थनयस्य तुत्ययोगिताया: प्रतिमानम्। एवंच 'सकलकूलं पुरमेतज्ातं संमति सुांशुविम्यमिव' इस्यादी न गुणक्रियासाम्यवच्छन्द. साम्यमुपमापयोजकम् अपि तूपमाप्रतिभोत्पत्ति देतु: श्लेष पवावसेय:। श्लेप. गभें तु रूपके रूपकद्वेतुकस्थ श्लेपस्य तृतीयकक्षार्यां रूपक पव विश्ान्तिरिति. रूपकेण श्लेपो वाध्यते। शिलिष्टविशेषणनिबन्धनार्यां व समासोक्ती विशेष्य- स्यापि गम्यत्वाच्छलेपस्य वाधिका समासोकि:। [उद् आदि ] कुछ आचार्यों की मान्यता है कि यह [शलेष] जदोँ-जहाँ होता है नहाँ अन्य कोई अलकार अवश्य हो उपस्थित रहता है[ न अप्राप्त = इसमें आए दो निषेध आवश्यकत्व के वाचक है] इसलिए यद अन्य अलंकार का वाधक होता है, फलतः वहाँ इलेप के कारण अन्य अरकारों का आमासमान्र [पतिमा] हो पाता है [ अन्य अलकार अलकारतवेन परु्द नहीं हो पाते]। इसके विरुद्ध [मम्मट आदि] अन्य आचार्यों का मत है कि 'इलेप 'येन ध्वस्त' आदि स्थलों में अन्य अल्कारों की बाधा से रहित है, अव शलेप निरवकाश नहीं है फलतः यह अन्य अलकारों का दापक नहीं है। निदान अन्य अनकारों के साम इसका सकर मिश्रण हो सकता है अथवा दुर्बल होने के कारण अन्य मलंकारों के द्वारा यही वाधित माना जा सकता है।'
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इनर्मे से प्रथम माचार्यों का अमिपाय यह है-'यह तो सर्वमान्य है कि यह (इलेष) सलंकार प्राकरणिक, अभाकरणिक अथवा उमयरप को भनेक अर्थे होते हैं उनको लेकर प्रतिछठित होता है।, इनमें से प्रथम दो प्रकार के अर्थ तुक्ययोगिता का विषय हैं और तोसरा प्रकार दोपक का। इस प्रकार मे दो अलंकार दलेप के संपूर्ण क्षेत्र को व्याप किए रहते हैं। इनके पीछे [उपमा आदि ] अन्य अलंकार मी उठते दिसाई देते हैं। इसलिए इस [कलेप] का पेसा कोह स्थल नहीं है जिसमें केवल दलेप माना जा सके। इसीलिए अन्य अलंकारों को इलेष से वाषित मानना पढ़ता है और इलेयस्थल में उनके अस्तित्व का आभासमान्न स्वीकार करना पढ़ता है। [विविक् विषय के रूप में जो उदाहरण प्रस्तुत किया गया है उस] 'येन ध्वस्तमनोभवेन०' में भी दोनों अर्थ पाकरणिक है अतः तुत्ययोगिता का आमास होता ही है। इस प्रकार गुण और क्रिया के साम्ब के हो समान सकलकल [ कलकल शब्द-सहित] यह नगर इस समय चन्द्रबिम्ब सा [सकलकक = सकल कला से युक हो गया है' इस स्थल में [ मन्मट ने जो] शब्द के सान्य को भी चपमा का परयोजक [माना है वह] नहीं माना जा सकतर, अपितु यहाँ [उस अंक्ञ में इलेप माना जाना चाहिए जिससे उपमा का तो आामासमान्र रह जाता है। ['विद्वन्मानस' आादि परम्परित रूपक में] रूक जहाँ रलेप से युकत माना गया है वहाँ रपक इलेप से इसलिए वाधित नहीं होता कि वहाँ [ पहले राजा पर इंस के रूपक की प्रतीति होती है तब वह ] रूपक [ मानस में ] रलेर को अन्म देता है तदनन्तर [वाक्यार्थ की ] तीसरी कक्षा में रूपक की प्तीति में [वाक्यार्थ की] विश्रान्ति होती है। किन्तु समासोकि नहं श्लेषयुकत विशेपणों से युक्त होती है वहाँ विशेष्य के [शब्दतः कमित न होकर] गम्प होने से समासोकि दी इलेप की वाधिका होती है। और- विमर्श्िनी केनिदिति, उद्टादयः । केचितपुनर्विषयवैविक्त्यस्थ संभवाव्ितवक्ाशत्वामा्ान्ञास्य सर्वालंकारापवादकत्वमम्युपयन्तीययाइ-येनेत्यादि। अन्यथा रति माहशाः। विविक्ोडस्य विषय इति तुक्य योगिताया अन्राभावास्। सा हि इपोरपि प्रकृतयोर प्रकृतयोर्बा विशेष्ययोः पृथगुपाहाने औपभ्यश्य प गम्परवे भवति। इह तु तदभावः। विशेष्ययो: पृथगसुपादानाव औपम्यस्य व गम्यसवाभाबाद। न स्त्रोमाघवस्य माघवेन तेन वा तत्य साहश्य वि पितम्। एकेनेच शव्देन श्लिष्टतयाथंद्वयस्य प्रतिपिपादयिवितावातू।अघ्र हि परस्परनैर' पेषयाद तयोरुमावव वाकयार्थपरामर्शवेलार्या माधव वाकयार्थपरामशमानमपि नास्तीति को ध्ररीभावेन परतीत्ेन निस्वकाशः सलेपः। अन्येःसद संकर इृति द्वयोरपि वक्यकक्षता- पतो हेः। वाध्यलमिति। श्लेषस्य दुर्बलत्वाट्लंकारसन्तताणा च चलवरवाद। एतच अन्थ- कदेवाये दर्पयिप्यतीति नेहायस्तम्। तदेव मस्य सर्वाककारापवादकरवं न युक्म्। अन्या लंकारवदेव वाध्यवाधकभावादिदर्शनाव। एतयालंकारसारम्वता समपज्रमुक्तमितीह अ्रन्थ- विस्तरभयाए तथा नोफस् । पूर्वेपामिति, उद्धदाद्ीनाम्। अविप्रतिपत्ति-धोतकस्ताच पछनदः। व्याप्वेति। सर्वलश्यन्प्रापकरवेन, सर्वजैवास्य त्रिरुपत्वास्। तत्पप्ठ इति सुक्ष्य- योगिताष्टीपकोपरि। अलंकारान्तराणामिति उपभाद्टीनाम् उत्यानमिति। तुष्ष्ययोगितादी पकाम्यामपि सम्प्रतीतेचद्रेकात। अह रवेहि। सस्य विविक्तविषयस्वासंभवाद। प्रतिमान- मिति आाभासमान्रम 1 न पुनस्तवैव विश्रान्तिरिय्यर्थ:। एतच यमा नोपपद्यते तथा सम नन्तरमेवोक्कम्। सदैेव स्वमतोपोहलनाय पूर्वसन्यान्येः स संकरो दुर्षकर्वादावाधय
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३६२ अलङ्कारसर्वस्वम् खमिवि यदु तदेव प्रपक्वमितमेतरकतृरूं ताबदन्यालंक्ारयाध्यरवं दर्शयति-नदेपेस्या- दिना। तृनोयकस्ायामिति: पथमकपार्या दिरूपरुमतीनिरेव। द्वितीय कचार्या तु श्लेय-
तत् स्वचपनतिषद् पायमेतेपामिति ध्वनयितुं तदुकमेव रूपकसमासोकियाम्म समेतस्प अन्यहतेह दर्शितम्। बाध्यत इनि विद्दन्मानसहँसेरयादौ। बाधकेति उपोढरागेगेशयादौ। केचित्= कुछ उद्भरादि आचार्य। किन्तु [मम्मट आदि ] कुछ [आयाये] इमे अन्य सब अरकारों का अपवादक नहीं मानते क्योंकि वे इसे निरवकाश नहीं मानने, एनदर्भ वे इमका स्त्रनन्त्र [सवोरकार रहित] विषय बनलाते है। इम तथ्य को लिसने दुम कहने हैं-'वेन स्वस्त०' इत्यादि। अम्ये=अन्य मुझ जेम [अथोव स्वय अ्यकार जैमे]। 'विविक्ोऽ्य विषय: 'इस श्लेप का अलकारान्तरमूल्य विषय' क्योंकि यहाँ ['यैन स्वन'-पद्य में] तुल्ययोगिता नहीं है। यह तम होती है जब केवल प्रकन या केवळ क्षप्रकृत विभेष्यों का पृथव पृथक उपादान हो तुधा सातस्य गम्थ सो। एम [ येन स्वस् ] पद में वस [सु्ययोगिता] का अभाव है क्योंकि यहों विशेष्यों का उपादान पृथक नहीं हुआ है तथा साहश्य मम्य नहीं है। ऐसा नहीं है कि पध में उमायव [घकर] का साधव से या माधव का उमापव से सादृडय विवक्षिन हो। यहो तो दोनों अर्यों का एक ही शब्द के द्वारा हिल्दरूप से प्रतिपादन अमोष्ट है। यहाँ तो उन [दोनों पक्षों] में परस्पर निरपेक्षता होने से जब समापत्-सम्वन्धिन वाक्यार्थे की प्रनीति होनी है तब मधववाकयार्थ का परामशमात तक नहीं रहता। तब यहाँ सादस्य का भवमर ही क्या हो सकता है। इस कारण ऐमे स्थलों में इलेष अन्य अलकारों के स्पर्श से रहित रहकर विद्यमान है, तभा यहां शिलष्टता प्रमुख रूप से परिलक्षिन दिखाई दे रही है फटन: इमे निरवकाश नहीं कहा ना सकता। अन्यः सह संकर :- अन्यों के साथ सकर"-क्योंकि दरनों समानरूप से प्रनीत होते हैं। चाध्यरवम् = राध्य होना = क्योंकि स्चेष दुर्वल होता है और अन्य अलकार प्रवल। इमे स्वय अन्थकार ही आगे दिसनादंगे रसटिए इसके विवेधन पर यहा श्रम नहीं किया जा रहा। तो इस प्रकार इस [लैप ] का सभी अहंकारों को बाधित कर उनका अपवाद माना जाना हीक नहीं है। क्योंकि [ उपमा और रूपक आदि ] अन्य [स्वतन्त्र] अबंकारों के ही समान बाध्यवाचक माय [ तथा स्वतन्त्र विषयता ] आदि दिखाई देवे हैं। इसका विस्तृत विवेचन अलंकारसारकार ने कर रखा है। इसटिए उतने विस्तार के साथ यहाँ विवेचन नहीं किया जा रहा। इससे मन्थ विम्नार का भी मय था [इमसे स्पष्ट है कि विमर्रिनीकार मूल के विरुद्ध मम्मट के समर्थन ईै ] पूर्वेंपाम् =प्राचीन एड्ट आदि। तावसू-शब्द इस बात का घोतक है कि इस विषय मे विपक्षी को भी आप्ति नहीं है। व्यापमा=व्यास कर=रक्ष्य के सर्वदेश में व्याप्त होने से क्योंवि वॉन रूपका यह [दलेष या अर्थ] सर्वत किसी न फिमी रूप में दिसाई देवा है। तरटृफ्ठे = उसके पीछे अर्भाव तुस्ययोगिता और दीपक के ऊपर। अलंकारान्तरागाम्=अन्य सरवकार का जर्यात उपमा आदि का। उ्यानमिति = क्योकि उन [भन्य अरकारों ] की मनौति तुस्य योगिता और दोपक से ही उठनी है। अतपुव= इसीलिए अर्यात विविकविषयता=सवनन्त्र क्षेत्र न होने से। प्रतिमानम्= आमासमान। बर्थ यह कि विभान्ति उसी में नहीं होती। किम नह तथ्य शिस प्रकार सिद्ध नहीं होता वह अभी ममी कहा जा चुका है। इस प्रकार अपने म के समर्थन के िप पहले जो कहा है कि-'इसका अन्य अटछारों के साथ था तो संकर रहना। या फिर दुर्वळ रहने पर अन्य अनंकारों से वाघिन, इसौ को और अधिक विस्तार में प्रतिपादि करने के दिए भद यह पतलाते हैं कि यह अरेंकार सन्य अलकारों को बाप देवा है-रलेप-
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श्लेपालल्वार: ३६३ इत्यादि के द्वारा। 'सृतीय कशयामू-तृत्षीय कक्षा में = प्रथम कक्षा में रूपक की ही प्रतीति छोसी है। इलैप की प्रतोति होती है द्वितीय कक्षा में। 'उद्धटानुयायी आचार्य एक और तो दलेप को सभी अरंकारों का दाधक बतलाते है और दूसरी और वे दी कुछ अनंकारों से उसे वाचित होता हुआ भी चतलाते है, यह उनके द्वारा अपनी मान्यता का ही विरोप है-इस तथ्य को ध्वनित करने के लिए उन्हीं [ इन्भट आदि] के द्वारा प्रतिपादित कलेष का रूपक औौर समासोकि से दामित होना अन्यकार ने यहाँ दिखलाया। याध्यते=वाधित होता है-'विदन्मानसहंस' सत्यादि [रिलष् परम्परित रूपक] में । साधिका ='उपोदरागेण' इत्यादि पद्यों में। विमर्स-'नामामे'= का मूर 'ेन नामासे य आरभ्यते स तत्य वाधक :- यह है। इसमें चेन को तृतीया का अर्थ है कतृत्व, प्रतिषेषद्वय का अर्थ है आवश्यकत्व, क प्रत्यय का अर्थ है माव। इस प्रकार न्याय की मापा में इस वाक्य का सार्थ निकलेगा- 'वत्कतृंक्ावश्यप्रासौ य आरम्यने स तत्य वाधक2। पुनः येन के 'यव'-शब्द का नर्षे है व्यापकत्व और यः इसके यत शब्द का भर्य है व्याप्यत्व। अतः न्याय की माषा में सर्थ होगा- 'ज्यापकस्थैच सर्वत्र पराम्ती निरवकाशो व्याप्यरत [ व्यापक] बाधते।'- इन्हों तथ्यों को अन्थकार ने 'नापा सेवु आरभ्यमाण:' तथा 'व्यापत्या'-इन अंशों द्वारा सूचित किया था। पण्डितराज ने ्लेप पर उ्धट का मत इसी प्रकार स्पष्ट किया है-अाहुर्द्ट्टाचार्या :- येन नामासे व आरम्यते स तस्य वाधक: इति न्यावेनालंकारान्तरविषय पवायमारन्यमागोडलं कारन्वरं वायते।' यह उद्ट के मत का अलंकारसवैस्व पर आयित मावानुवाद मात्र है। उद्धय की उक्ति इस विषय पर ऐसी है- शटषन्, अलंकारान्तरगर्ता प्रतिमो जनयत्०'१४।९, ई०। -रिटट अलंकाशन्तर की प्रतिमा वत्पन्न करता है। उनूट ने इस विषय में इससे अधिक कुछ नहीं लिखा। वेवल सदाहरणमात्र प्रस्तुत कर दिर हैं-
-पावती प्रभात सबया के समान थी-अस्वापफलळब्मेहितप्रदा = [पावती-न, सु आप फल दुर्लभ फल पर लुब्बको पहित=अमीद फल देने वाली तथा प्रमात 'सन्ध्यास्वापफल निदाफल अमपरिदवार पर सुष्पस्वाप फल तुब्ध, त्गिम अस्वापफललुच्य उसमें हित हितकारी मदृष्ट उत्पनन करने वाली] इसी प्रकार- 'भविन्दुसुन्दरी नित्यं गलल्लावण्यविन्दुका' -पवती अचिन्दुतुं्दरो भी थी और उनसे लावण्यविन्दु झरते रह्ते थे[ विरोध], [ परि- दारायं-1अप्= जल इसमें प्रतिविन्वित जो हन्दु =चन्द्र उससी सुन्दरी। प्रथम में उपमा और द्वितीय में विरोधालंकार है। उद्वर के अनुसार उनका मस्तित्व प्रातिभासिक मात्र है। वासतविक सत्ता रेप की ही है। परन्तु उस्ट ने अपनी इस सान्यता की पुष्टि में कोई हेतु नहीं दिया। आानन्दवर्धनाचार्य ने इते इसी रूप में स्वीकर कर लिया। उन्होंने ब्वन्यालोक के द्वितीय उद्योत में इलेप को उपमा व्यतिरेक, विरोध आदि अलंकारों से पुष्ट होता हुआ कहा है और वहीं 'बेन स्वस्त"' पद्य प्रस्तुत कर यह मी कह दिया है कि इलेर यहाँ होता है जहाँ दोनों भर्थ अमिधा द्वारा कथित होते हैं साथ ही वशे यदि अन्य कोह अलंकार भी वाच्छ होता हो तो वहाँ रहेप ह माना जाना चाहिए-'वस्तुदये शब्दशवत्या प्रकाशमाने इलेप तथा-यब् शन्दरावया साक्षादलंकारातर वाच्य सत मतिमासते स सर्व: श्लेपविपय [पृ २५-६
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ची. स० १९९७]। आनन्दवर्धनाचार्य के ही समान महिममट्ट ने भी उद्ट के मत को स्वीकार कर लिया। उन्होंने व्यक्तिविवेक के द्वितीय विमशं में अस्कारों की सीमा निर्धारित करते हुए औोर अनेक भटकारों में वाच्यावचन दोष बतलाते हुए लिखा है- 'यत्र हि यदलंकारप्रतिमानुगुणशब्दोपरचिनः द्लेषः तम्र तदलंकारनिदन्धः तमेव् इलेपममि- व्यनक्ति, न तु तस्य विषयमतिक्ामति। [पृ० ३९५ चौ० स० २०२५] 'जहा जिस अलकार का आमास मात्र कराने के लिए की गई पदरचना से श्लेष बनता है, नहाँ वह अलकार उसी श्लेन को अभिव्यक करता है, उस [वलेप ] के क्षेत्र में वह स्वय नहीं धमकता।' इसो तथ्य को कारिकारूप में उपनिबद्ध करते दुए उन्होंने लिखा- 'यदलकारव्यकर्ये ये शष्दास्तदितरोऽ्रपि तैरेव। व्यज्येतास्पतरैयदि तदसी गृद्येन लाधवान्नान्य.।।' व्यकिविवेक की टोका में भी अलकारससस्बकार ने इलेन को निरवकाश मानकर अन्य सलकारों का वाधक हो माना है-'उपमोत्यापिते दलेप नोपमा इलेप बाधते, तस्य विविकविषयत्वा- मानाव, श्लेषस्तु तो बाघते इति सुकम्।' [ द्रष्टव्य-पृ० ३१६ च० स० नवीन सस्करण]। आनन्दवर्षनाचारय ने ददेष के विचार के पूर्व अस्पष् स्वर में शलेष को मलंकारान्तर से पृथक बतलाया था। मम्मट ने उसे पकड लिया। और उद्मद के मन के विरुद्ध इे को अन्य सलंकारों द्वारा बाध्य बतलाने हेतु अपेक्षिन अलंकारान्तर से शलेष का पार्थक्य बनलाने हुए उन्होंने- 'देव 1 खमेव पातालमाश्ानां त्व निवन्धनम्। सं चामरमरद्भूमिरेको लोकत्रयात्मक:।।' -यह पथ उद्धृन किया। इसका अर्थ है- हे राजन्। आप लोकप्रयातमक है, आप ही 'पातालम्' [पाताल= नागलोक तथा पाता अदम् =पर्यात रक्षर] है, आप हो आश्ानिवलन [= आश्ा=दिशा उनके आधार पृथ्वीलोक, भद्या= इच्छाएँ उनके आधार] ईै, आप ही 'चामर- मरुद्भूमि' [च= और अमरमरुत्=देवगग तथा पवन की भूमि= स्वर्ग तथा चामर-चँवर की मरुतन्दवा की भूमि=आस्पद= विषय जिसपर चँवर दुले जाते हैं]"' परन्तु यहाँ राजा पर तोनों सोकों का आरोप है तथा 'अन्य राजा जहाँ कोई एक कार्य करने सक सोमित है यहां यह राजा अन्य सब कार्य भी करता हे अत. यह उनसे उत्कृष्ट है,' इस व्यतिरेक का भी अस्विन्द है। अन: यह स्थन शुद्ध दलेष का स्पल नहीं माना ना सकता। पण्डितराज ने भी रक्षगगाधर में इस पद् में रूपकप्रतीति मान मम्मट का सण्डन किया है। वस्तुत, स्वय मम्मट ने भी इम स्थल में रूपक व्यतिरेक का स्पर्श अनुमव किया था। यह तथ्य उन्हीं के इस पघ के बाद के ग्रन्याश से सरकता है। इलेप की अवंकारान्तर रहिविता के लिए अलंकारसवस्वकार ने आनन्दवर्षनावार्य द्वारा प्रस्तुत 'पेन व्वस्त०' पद्य चुना। इसमे मम्मद की स्थापना को वल मिठा। मम्मट ने उद्रट के मत का खण्बन करते हुए अन्य तर्क भी दिए थे। उन्होंने कहा था 'पूर्णोपमा' में साधारण धर्म की निम्पत्ति नियभन श्लेप से हो होगी, वहाँ यदि शलेब को ही अलंकार माना बायगा तो पूर्णोपमा कहीं होगी ही नहीं-'पूर्गोपमाया विषयापहार पत स्यान'। इसी प्रकार उन्होंने व्यतिरेक, विरोध, रूपक आदि अन्य भरकारों में मी दलेप को निष्नादक और न्यतिरेक ादि को ही निम्पाघरूप से प्रधान सलकार माना है। पण्डिनराज जगन्नाय ने इन दोनों पक्षों को अरनी भाषा में स्परष्ाकरण के साथ उद्यृन्मात्र कर दिया है। उनका संपूर्ण विवेचन सर्वस्वकार तथा विमाशनीकार के मतों पर आपृत है। सव- स्वकार उद्धट और ध्वनिकार के अनुयायी है और विमर्शिनीकार मम्मट के। उन्होंने 'येन ध्वसत'
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मद्य में तुल्ययोगिता का अभाव बड़ी वारीकी से सिद्ध किया है। मण्टितराज ने उसे स्वीकार कर िया है। वस्तुतः 'चेन ध्वस्त' पद्य में तुक्ययोगिता के अभाव की बात मलंकार रत्नाकर से ली गई है। अलंकाररत्नाकरकार ने स्तरस्वकार के-'ह प्राकरणिका-तुत्ययोगितायः प्रति- मानम्'-इस कथन का भावार्थ स्पष्ट कर उसका निराकरण करते हुए कहा है- -'येन ध्वस्तमनोभवेने-त्यादो यतर प्रकृतयोरमकृतयोर्वां विशेष्ययोः सवृदुपादान तन तुन्ययोगितायाः ममानाव। -[ सर्वस्वकार का उक्त कथन समान्य है] क्योंकि तुश्ययोगिता में प्रकृत या अप्रकृत विशेष्यों का अनेक वार कपन रदता है, एक बार कथन रहने पर तुत्ययोगिता नहीं होती। 'येन ध्वस्त पद्य में विशेष्यों का कथन एक बार ही है अतः यहाँ तुत्ययोगिता नहीं है। मागे कोटि प्रकोटि चलते हुए उन्होंने लिखा कि यदि आवृत्ति के द्वारा विशेष्यों का असकृत उपादान मान लिया जाय तो धर्मों का उपादान भी उसी प्रकार आवृत्ति के द्वारा एकाधिक बार मानना पड़ेगा। उससे धर्मों में अनेकता चली आएगी। तुक्ययोगिता या दीपक केवल धर्म की एकता में हो होते हैं। अतः आवृत्ति द्वारा विशेष्य की अनेकता मानने पर भी तुल्ययोगिता सिद्ध न होगी। इस प्रकार मम्मट, शोभाकर और जयरथ श्लेष की वाप्यता स्वीकार करते हैं ज्वक उद्ट मानन्दवर्यन तथा मलंका रसवस्वकार अलंकारान्तर की। एकतर पक्ष के निर्णय के लिए एकमात्र चमत्कारप्रयोअकता को कसौही माना जा सकता है। सहदर्यों के अनुभव से चमत्कारनिष्पत्ति श्लेप या इ्लेपेतर जिससे सिद्ध होती हो उसीको अलंकार माना आएगा। तब निरवकाशत्व और सावकाशत्व के शास्त्रीय जत्प अर्किचित्कर सिद्ध होगे। जहाँ पकाध दिलष विशेषण से उपमादि निष्पन्न होते हों वह़ाँ उपमादि का ही चमत्कार माना जा सकता है और जहाँ 'उद्दामोसकलिका' आदि स्पलों में अनेक विशेषणों में श्लेप हो वदां निश्चित ही चमत्कार इलेपयोजना से होगा। फलतः यहां श्लेष ही मानना उचित होगा। अलंकाररत्नाकरकार शोभाकरमिन्र ने इस तथ्य को स्वीकार किया है और श्लेप को पाँच स्थिति में मिलता वतलाया है- 'पधानभूतालंकारविद्योगाव साकाशता । कुन्रचिव मतिमोत्पत्तिहेतुत्वं कचिदङगता ॥ कचिद प्रोहविरहाव प्रातिभत्वं परत्र च। अनुप्ाणकतास्येति श्लेपोडयं पद्मभूमिक: ॥2' इलेप पांच भूमिकाओं में निष्पन्न होता है- (१) स्वतन्त्र भूमिका, जईा अन्य किसी अलंकार का इसके साथ मिश्नण नहीं होता। [यथा-'येन ध्वस्त०'-पद्य में ]। (१) अन्य अलंकारों की सत्ता प्रातिभासिक सिद्ध कर रहने की भूमिका। [यथा-'सकल- कलम' इत्यादि पद्य में ]। (इ) अप्धानता की भूर्मिका, [यथा-'विष्णका वक्षस्थल समुद्रतद के समान वनमालामरण ३ै'इस वाक्य में 'बनमालामरण' शब्द में वनमाला एक माला, बनमाला=तटवत्तो जंगल की पात यहा इलेप उपमा का मंग है ]। (४) आाभासात्मकता की भूमिका [ यथा-'अबिन्दुसन्दरो"' स्थल में विरोध की प्रधानता होने से श्लेष की आमासात्मकता ]। (५) अनुप्राणकता की भूमिका, [यथा-समासोकि में ]।
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३६६ विमर्शिनी एत श्लेपस्यालंकारागां घ परस्वरं साध्यवाघकभावं प्रकाश्यान्यैः सददास्य संकरीणखं दर्शयति-६ लिग्याड़िना। एम प्रकार [उपर्युक्त अन्थ द्वारा ] रहेप और अन्य भर्लकारों का परस्र में वाध्यववफ- माव दिसलाया। अन शलेय का अन्य मलंकारों के साथ सांकयें दिसकान हुए लिसने ह- [सर्वस्य] इद तु- 'धर्थामयोऽपि पथितो जगत्सु यद्याठणी प्रत्यगमद् चिवस्थान्। मनथेडस्तशैलास् पतितोऽत एव विवेश शुध्धे घडवाग्निमध्यम्॥ दति कलो के विवस्यतो वस्तुतृचसंमवि अधाप्रद्ेशसंयोगलक्षणं यत्प तितत्वं यञ्च घडवाग्निमध्यप्रवेशस्ते द्वे अपि घयीमपत्वसंचन्विवादणी
मूळया अमेदेनाध्ययसिते। सो 5यमेकुकियायोग:। वद्धेतुका व मध्ये 'अत पघ शुद्धूध्धै' रत्युरमेक्षा। अत्रात पचेति परामृथो घिरोधालंका रालंकृतोSयो हेतुत्वेनोरप्रेक्षयते। शुद्धथे इति घ फलत्वेन। ततथ देतुफलपो्ठयो्वो सपेक्षा। विरोधालंकारस्य व विरोधामसतवं लक्षणम्। अनो चिरोधाभासन. समय एव द्वेतुफलोत्मेक्षयोयत्यानम्। उत्तरकालं तु विरोघसमाधि:। श्लेपस्य व सर्वालरकारायवादत्वाद विरोधप्रतिभोत्पत्तिद्वेतुरयं श्लेप:। नेद-] नयीमय रूप से वेदोक्य में प्रसिट् होने पर मी सूर्य वारुगी [पश्चिम दिशा तथा मदिरा] की ओर जो गया मैं सोचता हैँ कदाचित इसी से [पतिव दोकर और ] मस्ताचल से गिरकर शुद्धि के लिए वद्वाग्ति में प्रवेश कर रहा है। हम पदार्थ में अवः प्रदेश से मयुकत होना रूपी को वास्तविक पतितत्व=गिरना हे और शी वश्वाग्ति में प्रवेश करना है ये-्दोनों वेदवयीमय होने पर भी वारणीगमन करने रूपी विरुद्ध भावरण से जनिन जो वतिनत्व तथा अग्निप्रवेश है उनके द्वारा इ्लेघमूलक अतिरयोकि के भाधार पर अभिन्न रूप से अध्यवसित है और यह हुआा[ममास्ोकि का जनक सूर्य तया भार्मिक पुरुपरूपी दो विभिन्न व्यकियों का अन्तिप्रवेस रूपी ] एक क्रिया में धम्विन होना। इसके आपार पर निष्पन्न होनी है 'मैं समझता है कि इसीसे शुद्धि के लिए-यह [ हेतु फलोमेक्षारूपी] उत्पेक्ष स [उत्प्रेमाय] में रसीमे [ अर्थाव विरुद्ध आचरण करने मे ] इस प्रकार परामृष्ट जो विरोधालंकार है उसमें अलकृन अर्थ हेतुरूप से उत्प्रेक्षित हो रहा है और [ उसीमें] 'युद्धि के लिए' यह मर फकरूप से। इम प्रकार यहा हेतु औौर फल दोनों को उत्प्रेक्षा हो रही है। और जी विरोषा- सकार है उसका लक्षग है विरोधामासत, अन हेतु और फल की उदपरक्षाओं का उस्थान उसी सम्य होता है अन विरोप का आमासात्मक कान होता रहता है। वाद में तो विरोध का समा- पान (परिकषार) हो जाता है। इवर कटेप जो है वह सभी अकंकारों का अपवादक है अतः इस पद्य में इलेय विरोधप्रविमोत्पस्िहेतु होकर स्वय प्रधान सद्वार है।
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विमर्शिनी चस्वाग्निमध्यप्रवेशेऽपि वस्तुवृत्तसंभनीति विशेषणं लिङ्गविपरिणामाद योग्यम।
न्यथाभूतार्म्या ताभ्याममेदेनाध्यवसायः । तमतुकेति तच्छव्देन तस्क्रियायोगपरामश। फलत्वेनेति उम्परेपयत इस्यसापि संबन्ध:। ततश्नेति हेतुफलयोहयोहुपरेचयमाणस्बाद। 'वस्तयृत्तसंभवि'-'वास्तविक' वह नो विशेषण है इसे लिंगपरिणाम [नपुंसकलिंग को पुंछिक्व में 'वस्तुवृत्तरुंभवी' इस प्रकार वदल] कर अन्वित करना चाहिए। ते द्े=वे दोनों अर्थात मधवारिनि में प्रवेश और पतितन्व। 'पतितरवाग्निप्रवेशाभ्याम'= 'पतितत्व और अग्निप्रवेश' जो बाह्ाण्य = मह्षवृत्ति से न्युत होने का प्रायश्षित्त है। 'सोडयम्' =यह अर्थात मूलतः मिन्न रूप के पतितत्व और अग्निप्रवेश मिन्न रूप के उन्हीं पतितत्व और अग्निप्रवेश द्वारा अभिन् रूप से अध्यवसाय तद्वेतुका=इसमें तव शब्द से उपर्युक्त [प्रवेश ] किया में [दो भिन व्यक्तियों के] अन्वय का परामर्श है। फलखंन-फल रूप से= इसमें भी उत्प्रेक्ष्यते =उत्प्रेक्षा की जाती है=इसका संबन्ध है। ततश्र=इस प्रकार= हेतु भीर फल इन दोनों की उत्पेक्षा हो रही है इस कारण। विमर्शिनी ननु विशोधालंकारस्य विरोध एव रूपं तत्य दुष्टतात हृते च समाघाने विरोध एव नास्तीति विरोधालंकृतोऽर्थः कथमन्नोपेष्षार्या हेतुं मजत इत्याशकयाह-विरोधे्यादि। यह्च्यति-'विरोधाभासत्व विरोधः' इति। अत एव व विरोधस्याभासमान्रसारत्वाद् यथावभासं विश्रानय मावास प्ररोहो नापि वाघोतपत्तिः, अपितु पैत्तिकज्व लत्स्तम्भतैमिरिक चन्द्रद्वयावभासवदर्ति प्रत्यय इति नात्र पूर्व विरोघवोध: पश्रादविरोधधीरिति वाक्य स्यावस्थाट्टयम्। ननु वाध्यनिषेधपरो नैतदेवमिति प्रत्ययरूपो वाधो वाध्यंच तथेव प्रतीयते चेव कि तेन कृतं स्यादिति चेत, र्खळ्द्ृतित्वमिति नुमः। तधाहि शुक्तिकारजतमरीचिका सलिलादिविभ्रान्तिष्विव नान्र प्रथमप्वृत्तवियद्ध प्रतिभासस्व माववाध्य विज्ञानसमुझुंस- नेन चाघकत्वसुदेति, बाघोदयेपि पैस्तिकज्तलरस्तम्मतेमिरिकचनद्रद्व्याव भासवद् वियद प्रतिभासानिवृत्ते:। केवलसन्न तद्वशादेवानुपपद्यमानताकारा स्खळ्दृतितैवावगम्यते। स्सलद्ृतिरवे व प्रतिपततव्यवहारं प्रति निमित्तत्वानुपपत्तिः। न हि पैत्तिक: स्वपित्तविका राजनलततम्भदुर्शनं मन्यमानरतत्र दाहपाकायर्थितया प्रवर्तते। तिमिरदोषं वा नानान- स्खल्गतित्वेन अतीयमानोऽपि विरोधो न प्रतिपत्त्रपेप्षोतमेकषणलक्षणम्यवहार निमित्तभाव सुपगन्तुसुरसहते। यतोइनुपपद्यमानत्वेव स्खलद्धतित्व सुपपद्यमानत्वेन च व्यवहारनिमित्त र्वमिति पररपरविरुद्धत्वादनुभवविरोधाच्च तयोः कथमेकत्र समावेशो घटते। अतश्राने नवाभिप्रायेणाइ-अत इत्यादि। विरोधाभासनसमय एवेति, न तु वाघकोदयसभय हुस्यर्थ:। वाघोदयानन्तरं विरोधस्योसोप्षाहे तुश्वं न युज्यते हर्युपपादितं स्थितं चोोषा हेतुत्वं विरोधस्येति वाघोदययामागेवान्यथानुपपत्या निश्चीयते। वाघस्य च स्वारलिकान- चस्तुवृत्ते: पर्यालोचनालभ्यतवेन द्विविघस्यापि सर्वत्रोप्तरकालमेवोदलास संभवति। तस्य च वाच्यनिष्ठावाद्ाध्यस्य च पूर्वकालभावित्वात्। अन्यथा हि निर्विषयो बाघ: स्यात्। अतश्रोत्तरकालं तु विरोधसमाधिरिति भणितेरथमजानानेनाथमर्थोSवेपणीयः। यदि हि
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३६८ अलङ्गारसर्चस्वम्
वाघ: पागप्यु्प्रेम्याया स्वाधिकारवशेन स्वरसत पवोतसेव तदुककनीव्या उ्पेसोानमेव न श्यादित्यवाधित एव विरोध उत्पेषाया निमित्तमित्युकमुत्तर कालं विरोधसमाघिगिति । स च समाधिरत्न दिगायर्थाधिगमादववुष्यत दति विरोधस्य स्लेपोऽङ्रम्। तत्शाह्वा स्थोरयानाव। तथा चात्रानयो: सकीर्णस्वमान्नमेव न पुनः संकराळंकारः। सतु पथा- 'सभ्जातपत्रपकराध्ितानि समुद्हन्ति स्फुटपाटलरवम्। विकश्व राण्यर्ककरप्भावाद् दिनानि पद्मानि व बृदिमीयु:॥' अ्ग्न रषेपतुष्ययोगितयोरेकवाचकानुमवेशेन संकर। प्राध्यानां मते पुनरेततमति मोरपत्तिहेत श्लेपोऽयमित्याह-इनेपस्येरयादि। तेनादय: पद: स्वामिप्रावेण अन्थक्वतोक.। यहूच्य स्येतच्वलोकविचार एव संकरालकारे। अत्र प्रथमेऽये विरोधपतिभोषतिहेतुः रलेपाः। दर्शनान्तरे तु विरोधश्लेषी द्वावलकाराविति। प्रश्न=विरोपालकार का स्वरूप विरोध ही है और वह अपने आप में दोष रूप है, फलतः उसका समाधान [परिहार] किया जाता है, और जब परिदार हो जाता है तब विरोध का अस्नित्व ही नहीं रहवा। इम प्रकार विरोध से कोई अर्थ भलकृत ही कैमे होगा ज उत्प्रेक्षा में हेतु बनेगा।' इस पर उत्तर देते दुए लिखने है-'विरोध०' इत्यादि। जेसा कि आगे कहेंगे 'विशोषा- भासत्व विरोध है।। भलंकाररत्नाकरकार ने 'त्रयोमयोऽपि' पद और उसपर अलकारसवस्वकार का मत उद्धृत कर उसका खण्ठन करते हुए लिखा था-विरोध में समाचान सम्दलम्य न होवर, सामानिक की मानस अनुभूति से सम्य होता है जो पर्यालोचनरूपा होती है। विरोध का बाध दो जाने पर भी शब्द से तो विरुद्ध अर्थ का ही थान होता रहता है। इमलिए विरोध का परिहार वाक्यार्थ का अग कभी भी नहीं बनता, इसलिए यहां उत्प्रेक्षापतीति के बाद परिहार का वाक्यार्थ में मानना ठीक नहीं। अन्त में विरोधपरिदार का अर्थ केवळ इतना ही है कि विरोष प्रातीतिक है, वास्तविक नहीं। अन्त में परिदार का अर्थ यह नहीं है कि आरम्म में विशोष वस्तुतः रद्ता है और अम्त में उसका परिहार हो जाता है (द्र० पृ० ९२, ९३ पूना संस्करण)। इसीको स्वीकार करते हुए किन्नु अलंकारसवंस्वकार के मत का समर्थन (खण्डन नहीं) करते हुए विमर्शिनीकार कहते हैं- ] और इसीलिए [अन्थकार के मत में] विरोध के अभासमात्ररूप होने से उसकी प्रनोति पर्यवसान में आारम्म जैसी नही होती, फलत न तो वह प्ररद ही हो पाना और न उसका परिहार दी होता अपितु यहाँ पिचरोग से पीटित को जैसे जलते अग्निस्तम्म दिखाई देते हैं मयवा तिमिररोग से पीहित को दो चन्द्र, वैसे ही दो अर्षों को प्रतीति मात होती है। इसलिए न तो यहां पहले विरोध का [भामास रूप में घ्ञान न होकर विरोध रूप में ही] यान होता और न बाद में अविरोध का ज्ञान दोता, जिससे वाक्यार्थ को दो मागों में बिभक किया जा सके [प्रश्न ] शाय 'यह ऐसा नहीं है' इस प्रकार के ज्ञान का नाम है। इससे नाष्य अर्थ का निमेन हुआ करना है। यदि यहों बाय और वाथ्य दोनों की हो वैसी [ दविचन्द्र आदि जैसी ] प्रवीवि मान की बाय को उससे क्या होगा १ [ उत्तर= ] इससे विरोध का ज्ञान केवल अभासा- त्मकमान सिद्ध होगा। [विरोव पूरणत कट नहीं जाएगा ] विरोधालकार के विरोध के परिवार में जो नाधकता होती है वह पडले से हो रहे आाभासात्मक विरद् ज्ञान रूपी बाथ्य को उखाड कर नहीं होती जैसी कि युक्ि में दो रही है या मरुमरीचिका में रोवी वछ की आन्ति में। यहां तो नाप की प्रतीति रो नाने पर भी विरोधामासरूपी वाध्य अर्थ हटता नहीं है नैसे पिस्टव्याभिवाळे के समाने से भसत्य रूप से विदिव होने पर भी अग्निस्तम्म नहीं इटता या विमिररोग वाळे के सामने से चन्द्रद्त। यह केवल इतना हेता है विरो में अनुपपममानवा [पर्द न ऐो
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शलेपालङ्गार: ३६९
पाना] आा जाती है वह भी इसलिए कि केवल-[ परिहार, समाधान ] की उपस्थिति के कारण ही। इस आभासास्मकता, रसलद्गतिता या अनुपपधमानता से लाभ यह है कि विरोधश्ञान बोद्धा की प्रवृत्ति का कारण नहीं बन पाता। ऐसा थोड़े ही है कि पित्त का रोगी यह जानते हुम कि उसे जो अग्निस्तम्म दिखाई दे रहा है वह विकार के कारण दिखाई मर दे रहा है उसका वास्तविक अस्तित्व नहीं है, उस अग्निस्तम्म में कुछ जलाने या कुछ पकाने पहुँच जाता हो अथवा तिमिर रोग का रोगी तिमिर-विकार को जानते हुए भी [ अपनी अभासात्मक दिचन्द्र प्रतीति से] बाहर मी दो चन्द्रों का अस्तिरव जतलाता फिरता हो। इस प्रकार वाघ [ परिहार] उत्पन्न हो जाने के कारण विरोध वास्तविक सिद्ध नहीं हो पाता। वह अभासात्मकमात्र सिद्ध होता है। और इस रूप में प्रतीत होता रहने पर भी विरोध बोद्धा के मानस में उत्प्रेक्षारूप व्यवहार का कारण नहीं वन सकता। बात यह है कि अवास्तविकता सिद्ध हो जाने पर आभासात्मकता, उर्पन्न होती है व्यवहारनिमित्तता [नहीं, वह ] सिंद्ध होती है वास्तविकता सिद्ध होने पर 1 इस प्रकार [अभासा- त्मकता तथा व्यवहारनिमित्तता] ये दोनों धर्म परस्पर में विरुद्ध हैं और अनुमव में भी ये विरुद्ध ही प्रतीत होते हैं, अतः इन दोनों का एक ही स्थान पर समावेश कैसे हो सकता है। इसी आपत्ति के कारण इस सब अभिप्राय से ग्रन्थकार ने लिखा-असः [विरोधामासनसमय] १त्यरदि। 'विरोधाभासनसमय एव =विरोध के आभासात्मक ज्ञान के समय तक ही'न कि वाधक [परिहार] के ज्ञान के समय तक। नाधोदय के पश्चाव विरोध उत्प्रेक्षा की जन्म नहीं दे सकेगा और अनुमव में आ रहा है कि विरोध उत्प्रक्षा को जन्म दे रहा है, अतः अन्यथा- नुपपत्ि रूप अर्थापत्ति के आधार पर यहां वाधेदय के पहले ही विरोध को उत्प्रेक्षाहेतु मान केना होगा। और [अलंकाररलाकरकार के द्वारा प्रतिपादित ] जो दो प्रकार का बाध है (१) वास्तविक और (२) वोडा की पर्यालोचना से प्राप्य, दोनों हो प्रकार का वह [वाघ] प्रत्येक स्थल में विरोध की प्रवीति के बाद ही हो सकता है क्योंकि वह निर्भर है वाध्य पर, फलतः वाच्य को पहले से विदयमान होना चाहिए। और वह पहले से रहा भी माता है। ऐसा न हो तो वाध हो ही किसका ? इसलिए [अलंकाररताकरकार ने सर्वस्वकार के] 'वाद में तो विरोष का परिहार ही हो जाता है'- इस कथन का [हमारे द्वारा प्रतिपादित] उक्त सर्थ नहीं समझा। [अतः इसका खण्डन किया है] अतः उन्हें [उनके अनुयायियों को ] यहां ऐसा ही अर्थ निकलना चाहिए। 'यदि परिहार अपने आप उत्प्रेक्षा के पहले हो जाए तो रक क्रम से उतेक्षा का उत्थान ही न हो, अतः विरोध परिहार के पूर्व हो उत्प्रेक्षा का निमित वनता हुआ माना जाना चाहिए'-यह है अभिप्राय 'वाद में तो विरोध का परिहार हो जाता है'-इस कथन का। यह जो परिदवार है यह [ वारुणी का ] दिशा यादि रप अर्थ समझने पर विदित होता है इसलिए इलेप विरोध का अंग है। क्योंकि उस [ श्लेष] के ही आधार पर इस [ विरोध] की निष्पत्ति होती है। तो रस्ष प्रकार [त्रयीमयोऽपि ] इस पध्य में इन दोनों [विरोध और इलेय] में संकरमात्र है, संकरालंकार नही। वह [संकरालंकार] तो [यहीं तुक्ययोगिता के प्रकरण में उद्वृत] 'सज्नातपत्रपकरा0 इस पद् के अर्थ में है। क्योंकि इस पद्यार्थं में श्लेष और तुल्ययोगिता का एकवाचका नुप्रवेश संकर है। प्राचीन आचार्यो ने इलेप को विरोध का बाधक [प्रतिमोत्पन्तिहेतु] माना है, इस तथ्य को चतलासे हुए लिखते हैं-शलेपस्य इत्यादि। अन्थकार ने अपने मत के रूप में प्रथम पक्ष हो प्रस्तुत किया है, जैसा कि संकरालंकार पर निचार करते समय आगे कहेंगे। इस [त्रयीमयो पद्य] में पूर्वारद में विरोध को ददाकर कलेप ही अलंकार है। दूसरे सिद्धान्तों के अनुसार यहाँ विरोप मौर इलेष दोनों हो मलंकार हैँ। २४ अ० स०
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३७० अलङ्गारसर्वस्वम् चिमशिनी तदेवं स्वमतामिप्रायेशास्यालकारान्तरवदन्यालंकारै सद वाध्यवाधकमार्न संकीर्णवं घ प्रकाश्य शब्दशकत्युद्धवाद् यनेर्विशेष प्रतिपाठ्यति-यत्र त्वत्यादिना। इस प्रकार अन्य भलकारों के समान इस अलकार का वाध्यवाधकभाव तथा सककिये अपने मन के अनुमार प्रकाशित किया। मत शक्दशत्तिमूलक ध्वनि से इस [ इलेष] का अन्तर दनलाने के टिए लिखते हैं-
[सर्वस्व ] य त्र तु प्रम्तुनाभिवेधपरत्वेऽपि वाक्यम्य शिवएपद्महिम्ना वक्ष्यमाणा र्थनिष्ठमुपक्षेपापराभिधानं सूचकत्वं तत किं श्लेप उत शब्दशक्तिमूल ध्वनिरिति विचार्यते - तत न तावच्छ्लेपा।, अर्थदयस्यानन्वित त्वेनामिधेयतया वन्तुमनिष्टेः। नापि ध्वनिः, उपक्षेप्यस्यार्थेस्य संयद्धत्वाभावात् तेन सहोप- मानोपमेयत्वम्यावितकणात्। न चान्या गतिरस्ति। तदत कि कर्नव्यम्। उच्यने-श्लेषम्योक्तनयेनापतृ सेध्वनेरेवार्यं विषय इति निधिनुमः। तथादि शम्दशक्तिमूले ध्यनावर्थान्तरस्यासंवद्धत्वात् संबन्धार्थमौपम्यं कल्प्यते। स च संबन्ध प्रकाराग्तरेणपम्यपरिद्वारेण यद्यपपादयितुं शक्य: स्यात् तत् कोऽयमभिनिवेशस्तन् ? उपमाध्यनी वस्तुध्वनिरपि संबन्धान्तरेण समीचीन: स्यात्। अत एव- 'अलंकारोऽथ चम्तवेय शब्दादु यम्रावभासतें। प्रधानत्वेन स देय: शब्दशक्त्युद्भवो द्विघा।।' इति न्यायभवनवन्धेन द्विधा शब्दशकत्युद्धव उक्तः। एवं मरुतेऽपि यत्र सूचनाव्यापारोऽस्ति तत्र शब्दशक्तिमूलो वस्तुध्यनिर्वाद्धव्यः। यथा-
त्यकतवा घूसरकान्तिचल्कलघरी राजास्तरौल ययी। तरकान्ताप्यथ सान्वयन्त्यलिकुलध्यानै: समुलासिभि: फन्दन्वं कुमु दाकरं सुतमिय क्षिमं प्रतस्थे निशा ॥' इति।
चन्ट्रे रोदिना ्वाख्यतनयसहितया उश्ीनर्यो वध्चा युत्तस्य हरिश्चन्द्स्य राक्षो विश्वामित्व संपादितोपद्ववशात् प्रात म्वरायं त्यकावा चाराणसी प्रति गमनं सूचितं म्यात्। तथा च कौशिकश=्दः प्ररते इन्द्रोलृक्योर्यतेते। सूचनीयार्थविषयश्वेन तु विश्वामित्ववृत्तिः। वक्कलसुतास्या त्वौपम्यं सूचनीयार्थनैरपेक्ष्येण सादृश्यसंभवमात्रेण विश्रमणीयम्। अवध प्ररुतेन सूचनीयस्य संबन्धाच्छव्द्शषक्तिमूलो वस्तुध्वनिरयम्।
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'जरदा [नाटक आदि में] वान्य, प्रस्तुत होने के कारण केवल अभिभावृत्ति से प्रतिपाद सर्थे द्ी प्रधानतया वतलाता रहता है तथाषि शब्दों में इलेप [ अनेकार्थकता ] होने के कारण भागे कदे जाने वाले अर्थ की भी सूचना दे देता है जिसे [ नाव्यशास्त्र की भापा में 'वीजन्यास उपक्षेपः' इस सूत्र के अनुसार] उपक्षेप भी कहा जाता है वहाँ इलेय होता है कि शब्दशक्तिमूलक ध्वनि इस पर विचार करते हैं- वहां इलेष तो होता ही नहीं, क्योंकि वहां दोनों अर्थ परस्पर में असम्वद्ध रूप में वतलाना अभीष्ट नहों रहता, ध्वनि भी नहीं होती क्योंकि [वहां भी] उपक्षेप्य [सूच्य ] मर्थ प्रकृत सर्थे से सम्बद्ध नहीं रहता अतः उसके साथ उपमानोपमेयमाव की विवक्षा नहीं रहती। तीसरी कोई गति है नहों। अतः यहां क्या करना चाहिए। इस पर हमारा कहना है- वहां कलेप उत्त [सर्थो में असंबद्धता न होने रूप ] हेतु से पहुँच नहीं सकता इसलिए इसे हम ध्वनि का ही विषय निश्चित करते हैं। यह इसलिए कि शब्दशक्तिमूलक ध्वनि में तो दूसरा अर्थ असम्बद्ध ही रहता है, फलतः संबन्ध के लिए उपमानोपमेयभाव की कक्पना करनी पड़ती है। इतना अवश्य है कि यदि वह सम्बन्ध उपमानोपमेसमावसन्ब्रन्ध को छोड़कर अन्य किसी प्रकार से उपपन्न किया जा सके तब उस [उपमानोघमेयभावसंबन्ध ] पर ही यह अभिनिवेश कैसा? [ यहां] उपमाध्वनि के स्थान पर वस्तुवनि भी किसी अन्य सम्बन्ध से समीचीन होगी। इसीलिए (काव्यप्रकाशकार ने)-'अकंकार या वस्तु जहां प्रधानरूप से शब्द के द्वारा मासित हो रही हो तो उसे दो प्रकार की शब्दशत्तिमूलक ध्वनि माना जाता है।' -- [ काव्यप्रकाश ४३८, ३९] -इस प्रकार शव्दशत्तिमूलक ध्वनि को दो प्रकार का कहा है क्योंकि वहाँ [ शब्दों का ] यन्व [जमान ऐसा रहता है जिस] में दोनों भथों के सूचक हेतु [ न्याय] रहते हैं [ भवन =स्थान ]। प्रकृत में भी इसी प्रकार जहाँ सूचनाव्यापार हो वहाँ शब्दशततिमूलक वस्तुच्वनि जानना चाहिए। यथा इरिश्वन्द्रचरित [ नामक नाटक]के- 'को शिकदिग्विजम्भण [ कौशिक = इन्द्र, उसकी दिक्र=दिशा =पूर्वदिशा, उसका विजम्मण= प्रमात तथा कौशिक=उल्लू, उनका दिशाओं में विजम्मण = भागदौढ़ उस] के कारण आाकाझ- राष्ट्र [आाकाशरूपी राष्ट्र तथा आकाश राष्ट्र के समान ] की [रसात = ] स्वेच्छया छोड़कर मलिन- कान्तिवल्फल [मळिनिकान्तिरूपी मलिन वल्कल तथा मिनकान्ति वस्कल के समान ] धारण किए हुए राजा [राजा तथा चन्द्रमा ] अतिरीत्र अस्तशैल [अस्त वैभवह्दीनता शैल के समान तथा अस्तगिरि ] को प्राप्त हो गया तो उठते म्रमरझांकार से रो रहे कुमुदाकर को पुत्र जैसे सान्खना देती हुई उसकी कान्ता [राजमहिपीरूपी ] निशा ने भी [ वहाँ से ] प्रस्थान कर दिया।' -- इस पद्यार्थ में अकरण प्रभातवर्णन का है इस कारण 'राजा'-शब्द से पहले तो अभिषा द्वारा अर्थ निकलता है चन्द्रमा, ज अस्त हो रहा है, फिर उसी 'राजा'-शब्द से महाराज हरिश्रन्द्र [का ज्ञान होता है और उन] के रोहिताश् पुत्र को लेकर पत्नी उशीनरी के साथ प्रातःकाल अपना देश छोड़कर वाराणसी की और प्रस्थान की सूचना मिलती है। यह इसलिए कि 'कौशिक'- शब्द का अर्थ [प्रभात के] इस प्रसंग में इन्दर हो सकता है या उल्लू, किन्तु [नाटक के भावी] सूचनीय [कथावस्तु-] पक्ष में उसका अर्थ होगा विश्वामित्र। जहाँ तक वत्कल और पुत्र का संबन्ध है उनके साथ [प्रकृत मलिनकान्ति तथा कुमुदसमूह की ] उषमा मान लेना चाहिए क्योंकि [ यहाँ ] सादच्य बन जाता है किन्तु उस उपमा को सूचनीय अर्थ से असंदद् रखना होगा [क्योंकि उस पक्ष में भूसरकान्तिवत्कत का अर्थ ममैला वक्कल करना होगा औौर 'कुमुदाकरं
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सुतमिन' को 'सुत कुमुदाकर मिव' के रूप में लाकर 'कुमुदसमूह के जैसे पुत्र को' यह अथे करना होगा फछत, प्रथम में तो उपमा बनेगी ही नहीं, दूसरे में बनेगी भी तो उसमें चन्द्रपक्ष का उपमान उपमेय वन जाएगा और उपमेय उपमान] इसी [ शब्दों की आशिक द्वयर्थकना नया आंशिक साम्ययोजना के कारण[ तथा दोनों अयों के केवल प्रकृत अथवा केवल अप्रकृत न होकर एक के प्रकुन तथा दूसरे के अप्रकृन होने साथ ही दोनों के परस्पर में मसम्बद्ध न छोकर ] प्रकृत के साथ सूचनीय [अम्रकूृत ] अर्थ के मम्बद होने से यदा [ श्लेप न होकर ] यह शब्दशक्तिमूलक वस्तु ध्वनि हुई। चिमर्शिनी
उक्तनवैनेति अर्थद्यस्यान्वितर्वेनाभिधेयतया वक्तुमनिष्टेरिय्यनेन। सबन्धार्थमिति संगत्यर पेम्। यथा- 'अतन्द्रचन्द्राभरणा समुद्दीपितमन्मया। सारकातरला श्यामा सानन्दं न करोति कमू॥' अम्र प्रकृताप्रकृतयोरसंबद्धार्यत्वं मा प्रसाइसीदिति नाथयका मिशयोतैषयं क्पनीयम्। संबन्धान्तरेपेति यम् याद्दशेन विवधितेन। तन्नेति शब्दशकिमूले धवनौ। अन वेति। औपग्यं विनापि प्रकृताप्नकृतयो. प्रकारान्तरेण संबन्धसयोपपादयितु शक्यखात्। उक्क इति काध्य प्रकाशकृता । चन्द्र इति वर्ण्यमान इति शेपः। सूचितमिति शब्दशकथा। वामेव विभन्य दर्शयति-तथा चेत्यादिना। अतश्रेति, इर्येव शव्दशर्केर्भावाद्। अन्न व यद्यपि सुतादिरूपाधशकिरप्यस्तीति वस्तुध्वनेवमयशक्तिमूलस्वमेव तथापि शब्दशक्तिरय्र स्फुटा स्थितेति तन्मूलख्वमेव ग्रन्थकृतासयोक्तम्। शुद्धस्तु शष्दशक्तिमूलो वस्तृष्यनियंथा- 'न महानय न ध विभर्ति गुणसमतया प्रधानताम्। रस्य कथयति चिराय पृया्जनतां जगत्यनमिमानतां दधसू।।' अग्र केवलयेच शब्दरावत्या सांख्यपुरुपरूपं वसत्वभिग्यक्तम्। यत्तु काव्यप्रकाशसकेते प्रन्यकृता व स्तुध्वने: शब्दशक्तिमूदत्वं विन्श्यमुक्क्तं तदुदाइरणाभिप्रायेणैवोन्नेयम्। तन्न हि 'पन्धिअ ण हा्थ सरथर' इश्यायुदाहरणमुभयशचिमूल शब्दरशकिमूलश्य वस्तुध्बने: श्रीमममटेनोपात्तम्। हछ सु पथासंभवमेव विचारितम्। एवं स्वमतेन श्लेपस्य यथोपपत्ति श्वरूपं प्रतिपाद्यापि म्राच्यातुरोबाव पुनरपि तदीय- मेव मत दर्शयितुमाह-६६ चेत्यादि। सम्बदत्वाभावाद् = (उपक्षेप्य अर्थ प्रकृत से) सम्बद्ध नहीं रदता क्योंकि उपक्षेप्य अर्थ वहा वर्भनीय [अत. प्रकुन ] नहीं रहता [विमर्शिनी के निर्णय मा० संस्करण में यह पक्ति असम्वर्यस्य वर्ण० इस प्रकार छपी है]। अन्या=अन्य [तीसरी] गति= इलैप और ध्वनि को छोड। उछ् नयेन = उक्त हेतु से=दोनों अथो के परस्पर में सम्बद्ध होने नथा दोनों को अभिधेयरूप से फह्दना अमीष न होने से। सम्वन्धार्यम्=सगति के लिए। यथा- 'अनन्द्र चन्द्र [चन्द्रमा, कर्पूर ] से अलंकृन, समुदीप् मन्मथवाली, और चंचल तारका [ तारे और माँख की पुवली] वाली व्यामा [रात्रि, पोढशी ] किमे आानन्दित नहीं कर देती।' 1 -यहां प्रकृत [रात्रि] और अप्रकृत [नायिका] में असम्बद्धता न था जाए इस हेतु नार्यिका और निशा में उपमानोपमेयभाव की केरपना करनी होती है।
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सम्बन्धान्तरेण= अन्य सम्बन्ध=जहाँ जो विवक्षित हो। तत्र=वहां अर्थोत शब्दशक्तिमूलक ध्वनि में [अमिनिवेश कैसा]। अत एव =इसीलिए, अर्थात् उपमानोपमेयमाव के बिना भी प्रकृत और अप्रकृत का संबन्ध दूसरे प्रकार से भी सिद्ध किया जा सकता है इस कारण। 'उकः= कहा है' = अर्थात काव्यप्रकाशकार ने। चन्द्रे=चन्द्र अर्थात जो पस्तुत प्रसंग में वर्णन का विषय नना हुआ है। सूचित=शब्दशक्ति के द्वारा। उसी शब्दशक्ति को [अर्थशक्ति से] गलग कर नतलाते हुए लिखते हैं-तथा च-इत्यादि अतश्=इसी कारण अर्थाद उपयुंक इस शब्दशक्ति के रहने से। यहां यदयपि सुतादिरूप मर्थी की भी शकति [झन्यार्थ की सूचक] है इस कारण वस्तुध्वनि उभयशक्तिमूलक ही है तयापि यहाँ शव्दशक्ति अधिक स्पष्टरूप से स्थित है इसलिए ग्रन्थकार ने इसे शब्दशक्तिमूलक ध्वनि नाम ही दिया। केवल शब्दशक्तिमूलक वस्तुष्वनि,यह है- 'न तो यह [श्रीकृष्ण ] महान् [उच, बुद्धितत्त्व ] है और न गुण [शीलसौन्दर्यादि, सत्त- रजस्तम ]-गत समता के अभाव में यह प्रधानता [प्रमुखता, प्रकृतिरूपतता ] ही धारण करता। यह तो संसार में निरमिमान होकर पथग्जन [तुच्छ व्यक्ति, प्रकृति और बुद्धितत्व के नीचे की विकृतियों से पृथक पुरुपरूप ] सिद्ध होता है। [शिशुपालवध १५।२ प्क्षिप्त ] -- यहाँ केवल शव्दशति के ही द्वारा सांख्यपुरुषरूपी वस्तु व्यक होती है। गन्थकार ने काव्य- प्रकाश-[पर स्वरचित ]-संकेत-[नामक टीका] में [काव्यपकाशकार द्वारा 'पन्थिअ ण इत्य० मध में प्रतिपादित शब्दशक्तिमूलक] वस्तुव्वनि का श्ब्दसक्तिमूलकत्व अमान्य बतलाया था वह केवल उन्हीं के [ उक्त] उदाहरण को लेकर बतलाया गया मानना चाहिए। वहां [ शब्दशकि- मूलक वस्तुध्वनि के] उदाहरण रूप में प्रस्तुत 'पंयिमण हत्थ सत्थरम्'-इस पद्म में उभयशचति मूलकत्ता है तथापि वस्तुध्वनि को श्रीमम्मट ने केवल शब्दशकिमूरक बतलाया है। यहां [ 'सभः कौशिक' पद्य में] नो विचार किया गया है वह केवल अंशिक संभावना को लेकर [इस पद्य में आंशिकरूप से शब्दशकति है और आंशिकरूप से ही मर्थशक्ति मी ]। इस प्रकार अपने मत के अनुसार शलेप का स्वरूप तर्क और युक्तियों द्वारा प्रतिपादित कर दिया तब भी प्राचीन आचार्यों की मान्यताओं के अनुसार रलेप पर फिर से विचार करते और अव केवल उन्हीं प्राचीनों का मत प्रस्तुत करने के लिए लिखना आरम्म करते हैं- [ सर्वस्व] इह च- 'आऊष्यादावमन्दग्रहमलकंचयं वक्त्रमासज्य वक्तरे कपठे लग्नः सुकण्ठः प्रभवति कुचयोरदत्तगाढाङ्गसङ्ग:। बद्धासक्िर्नितम्बे पतति चरणयोर्यः स ताढक प्रियो से वाले! लजा निरस्ता, नहि नहि सरले! चोलका कि त्रपाकत्।।' इत्यलंकारान्तरविविक्तोऽयं श्लेपस्य विषय इति नाशङ्कनीयम्, अपह- तेरत्र विद्यमानत्वात्। वस्तुतोऽपह्लवस्य सादश्याथमत्र प्वृत्तेनायमपहुत्य- लंकार इति चेत्, न। उभयथाव्यपह्ुतिसंभवात, सादव्यपर्यचसा- यिना वापहवेनापह्रवपर्यचसायिना वा सादक्येन, भूतार्थापह्ववस्योभयन्र विद्यमानत्वात्। 'सादश्यव्यकथे यत्रापह्वोऽसावपहनुतिः । अपह्नवाय साहश्यं यत्राप्येषाऽप्यपहुतिः।।'
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३७४ अलङ्कारसवस्यम् इति संक्षेप:। आद्या स्वप्रस्ताव यवोदाहता, द्वितीया तु संघनति दर्शिता। तेनालंकाराम्तरविविक्तो नास्य विषयोऽस्तीति सर्वालंकारापवादोड- पमिति स्थितम्। और यह- 'जो पइले तो केशों को जोरों से पकसकर सीचता है, [फिर] मुँह से मुँह मटा देग है, जिसका स्वय का कण्ठ बढ़ा ही अच्छा होना है और जो कण्ठ से चिपक जाता है, जो अग अग का गाढ आलिगन कर कुचों पर प्रभुत् जमा लेता है, इसी प्रवार जो नितम्ों से सटवर पेरों पर पडा रहता है दसा वह मेरा प्रिय है। [सुनवर दूसरी ससी कहती है-वह इतना सब कर डालना है तो बया] वाले' तुझे भप लाज नहीं आाती ? [ प्रस्युस्तर में पूर्वसखी कहती ह] नहीं, नहीं। तू वही मोली है, [मेरा अमिप्राय समझी नहीं] भरे कही चोलक [चोली, चोल देश के दुवक ] से भी लाज आती है।' -इस पद्यार्थे में ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए कि यह सहेप का स्थल है जिसमें अन्य कोई अरंकार नहीं है, क्योंकि यहाँ अपहुनि विदमान है। 'यर्हा वास्नविक स्थिति यह है कि यहाँ जो अपट्व [छिपाद] अपनाया गया है उसका उद्देश्य है साटृश्य की निष्पत्ति, अत. यहां भपद्गुति [साधनमातर है वह] अकार नहीं हो सकती' यदि ऐसा कहें तो वह ठीक नहीं, क्योंकि अपदुति दोनों ही प्रकार से हो सकती है, क्योंकि जहां अपहब [छिपाय] सादृव्य में पर्यवसित होता है या जहां सादृश्य अपह्षव [छिपाब] में पर्यवसित होना है वह। दोनों ही जगह वास्तविक वस्तु का अपदव रहता हो है। सक्षेप में- 'सादृश्य को व्यंजित करने के लिए वहां अपहब होता है अथोध किमी वस्तु को छपाया जाता है वह तो अपहुति होती ही है, अपद्दति वह भी होती है वहाँ अपह्वव को व्यक करने के लिए सादृश्यविधान किया जाता है।' [इनमें से] प्रथम का उदाहरण तो [अपद्वति के ] अपने प्रकरण में ही दे दिया है, द्ितीय का उदाहरण यही [आाकृभ्या०] पद्य है। इस प्रकार सिद्धान्त यह निकला कि इम [शचेष] का ऐसा कोई स्थल नहीं है जिममें मन्य अलंकार न हो, फलत, यह सभी अलकारों का अपवाद है।
चिमर्शिनी भूतार्थों वास्तवः। संक्षेप इति प्रमेयसंचवाद। आघ्येत्यादि सादृश्य पर्यवसाय्यपह्नव. स्वरूपा। स्वम्सताव इत्युपह्वतिलक्षणे। उदाहतेति पूर्णेन्दोरित्यादिना। द्वितीयेति अपह्ृतिपर्यव सायिसादश्यरूपा। प्रदशितेति आकृप्यादावित्यादिना। क्रम्र च ग्रन्थकृता श्टेप: सर्वांकारापचादक हृति न केवलं मच्यमतानुसारमुकम यातदयहबपर्यवसा विसादश्य रूपोऽहृविभेदोऽपि तम्मतानुसारमेघोफ। यद्वपयनि-न्याजोसी चोत्तरः पकारो विदव दर्युपमग्योद्तसिद्धान्ताश्रयेण तत्तत्रोक्मिति। अतशाम ग्रन्थकृम्मते वद्यमाणसाहरया श्लेपमूछा नयानोकि:। ततया एव वाक्यार्थीमूतरवेन विश्रान्ते.। भूवार्थ= वास्नविक। सक्षेप = प्रतिपाध का एकत्र सयोजन होने से सक्षेप कह्ा [ न कि प्रति- पाघ को सूत्ररूप में प्रसतुत करने से ] क्योंकि कारिका मी अपने आपमें काफी वही है]। आद्या=प्रथम अर्थाव सादृश्य में पर्यवसित होने वाले अपह्व की अपसुति। 'स्वप्रस्ताव एव
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श्लेपालह्कार: ३७५
अपने प्रकरण में ही' अर्थात अपहृति के प्रकरण में ही। उदाहता= उदाहरण दिया जा चुका है-'पूर्णेन्दो: इत्यादि पद। हितीयादूसरी अपहुति अर्थात अवहब में पर्यवसित होने वाले सादृय्य से दनी। प्रदर्शिता= 'आकृष्यादौ०' इत्यादि पद्य के द्वारा। यहां अ्न्दकार ने केवल इलेप को ही प्राचीन आलंकारिकों के मत के अनुसार प्रस्तुत नहीं किया अ्षपितु अपसति के द्वितीय भेद 'अपहब में पर्यवसित होने वाले सादृश्य से बनने वाली अपछुति' को भी प्राचीनों के मत के अनुसार पस्तुत किया है। जैसा कि भागे [ न्यानोकि प्रकरण में ] कहेंगे-'व्याजोकि में [अपहृति का ] दूसरा प्रकार विद्यमान है' यहां से आरम्म कर 'वहो बढ़ जद्घट के मत के अनुसार कहा है' यहाँ तक के अन्थांश द्वारा। इसलिए उक्त [भाछृष्या०] पद्य में अपने मत में नो वक्यमाणसाइड्या इलेपसूला व्याजोकि ही मटंकार है। क्योंकि वहो यहां प्रधान वाक्यार्थ के रूप में पर्यवसित होती है।
श्लेप का पूर्वेतिहास- भामह-मामह ने दलेष को किलष्ट कहा है और दल्ेय का वही एक मेद चतलाया है जिते 'दोनों का उपादान' कहकर सर्दस्वकार ने तृतीय भेद के रूप में लक्षित किया है। मामद के अनुसार केवल विशेषणों की ही उमयान्वयिता मात्र दलेप है। मामद में दोनों का उपादान सद्- भाव और उपमानोपमेयनाव के द्वारा होता हुआ बतलाया है। इस प्रकार उनका इलेप अलंकारा- तरशुन्य नहीं ठहरता। भामह कलेप का लक्षण रूपक के लक्षण से भिन्न नहीं चना सके हैं। रूपक का लक्षण ही कलेप में संगत मानकर मामद ने रूपक से इलेप का भेद भी बतलाते हुए कहा है-रूपक में उपमान तथा उपमेय के विशेषण अलग-अलग रदते हैं जैसे 'जलद-दन्ती शीकराम्भोमद चुआ रहे हैं।' इलेप में ऐसा न कइकर कहा जाएगा 'मागहुमा: महान्तश्व छायावन्तः'=मार्गद्रुम और वड़े लोग छाया [छछ और कान्ति] वाले होते हैं। इसी प्रकार-'अच्छे राजा मेघों के समान उन्नत होते है, और आप रत्नशाली और अगाघ होने से समुद के सदश है'। इन तीनों स्थलों में प्रथम 'हुम और महा- जन' दोनों का छायाशोलता साहचर्य होने से भामह के अनुसार कलेप सहोकि से अनु- प्राणित है, द्वितीय में उसी प्रकार उपमा से और तृतीय में भी उपमा से ही अनुपाणित है किन्तु उसमें हेतुदेतुमद्भाव कथित है जो द्वितीय में नहीं है। इस प्रकार भामह के अनुसार क्लेप के तीन भेद हुए सहोकियुक्त उपमायुक्त हेतुयुक्त। मामह की यह भेदकल्पना अत्यन्त स्थूल है। ऐसे तो 'रववाले होने से आप समुद्र हैं' ऐसा कह दिया जाए तो तृतीय भेद रूपकानु- प्राणित इलेम कहा जा सकता है और इसी प्रकार उत्तिभेद से दलेप के अनेक भेद किए जा सकते हैं। शलेप नें इलेय= जोड़ किसका होता है यह प्रश्न मी मामह के मस्तिष्क से टकराया था। इस पर भी उन्होंने उत्तर दिया है किन्तु वह मी अस्पष्ट है। उन्होंने कहा है-'इलेपादेवार्थवचसोः"' इस कलेप में कलेप दोनों में रहता है मर्थ में भी और शब्द में की। इस प्रकार मामह का इलेपविनेचन ही परवर्ती आचार्यो में तीन प्रश्नों को अन्म देता है। शब्ददलप और अर्थव्लेध का परस्पर नैद सोनों के अलंकार्य और जन्य अलंकारों से क्लेप की मिश्रित स्थिति में अन्य भलंकारों का दलेप द्वारा अपनाद। मामह का विवेचन अपने मूलरूप में इस प्रकार है- उपमानेन यत तत्वमुपमेयत्व साध्यते। गुणक्रियाम्यां नान्ना च सिएं तदभिधीयते।
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३७६ अलङ्कारसवस्वम्
लक्षणं रूपकेऽपीद स्श्यते काममत्र तु। इए प्रयोगो सुगपदुपमानोपमैययो॥ जलद्दन्तिनः । इत्यत्र मेघकरि्णा निर्देश क्रियते समभू॥ इलेपादेवार्थवचसोरस्य च क्रियते मिद्रा। सत्स दोक्त्युपमाहेतुनिर्देशाव त्रिविष यथा॥ छापावन्तो गतव्याला: स्वारोदा फलदायिन:। मागदुमा महान्तश्च परेषामेव भूनयै॥ उन्नता लोकदायता मदान्त म्राज्यवर्पिण:। शमयन्ति स्षिनेस्ताप सराजानी घना हव॥ रत्नवस्वादगाधत्वात सदशस्त्वमुदन्वना ।। श1१४-४०॥ मामह के तोनों उदाहरणों से स्पष्ट है कि उपभा आदि मन्य अलकारों में भी अनेक टिष्ठ विशेषणों का एक स्वतन्त्र महत्व है, उनमें कविकर्म की एक नवीन विषा और वेचिध्य की भसा- धारण उदग्रता अवश्य हो निहित है। वामन-दऐेष का रूपक से जो अन्तर मामह ने बनलाया था उसी का अनुवाद करते दुए वामन ने लिखा- [सूत्र ] 'स धर्मेपु तन्त्रप्रयोगे श्लेष [४१३७ ] [वृत्ति] उपमानेनोपमेयस्य धर्मेपु गुणकरियाशव्दरुपेपु स तत्वाध्यारोपस्तन्त्रप्रयोगे नन्त्रेणो- च्चारणे सति दलेप । यथा-'आउष्टामलमण्डलाग्र'। [रूपक के ही समान] उपमान का उपमेय पर समान गुणक्रिया आदि धर्मो के आधार पर ततत्वारोप हो और यदि तन्त्र [ अनेकार्यशब्द ] प्रयोग हो तो [रूपक हो] इलेप कदलाने लगता है। उदाहरण यपा- [विमर्शिनी में उदधृत ] 'भाकृष०' यह [ पूर्ण ] पद। वामन ने भामद में प्राप्त भन्य भलकारों से इलेप के पार्थक्य या ऐक्य का विवाद नहीं अपनाया। उस पर पहिसी वार काव्या- बंकारसारसंगरद्द में उद्भट ने विचार किया जिसका अधिकांश पूर्वपरकरणों में उद्धृत किया जा चुका है। उन्ट-उन्भट का पूर्ण श्लेषविवेचन इस प्रकार है- 'एकपयतोच्चार्याणां तच्छार्या चैव विभ्रताम्। स्वरितादिगुणैमिन्नैबेघ. विषममिददोच्यते। अलंकारान्वरगर्ता प्रतिमा जनयद पदे:। विविधेरथंशम्दोकिविशिष्ट तत प्रतीयताम्॥४९१०॥ इस विवेचन में 'एकप्रयत्नोच्चाय' पद अन्य कुछ नहीं वामनाचारये 'तन्त्र'-शब्द की व्याख्या है। लतुविवृतिकार प्रतीहारेन्दुराज ने लिखा भी-'ये तन्त्रेणोच्चारयितु वक्यन्ते ते पकप्रयत्नो- च्चार्या:।' तन्त्र का अर्थ करते हुए उन्होंने सूत्र भी 'सावारण मवेत तन्त्रम्' यह उ्दषृत किया है। उद्भट की तक्क प्रथम कारिका अपना पूरा भर्थ देने में असमर्थ है, अत. इसका भावार्थ मम्मटा- चाय ने इस प्रकार स्पष्ट किया है-
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श्लेपालट्कार: ३७७
-स्वरित आदि गुणों के भिन्न होने से भिन्न प्रयल्नों के द्वारा उच्चारण करने योग् तथा उसके अभाव [स्वरितादि गुणों में भेद न होने] के कारण अभिन् प्रयत्न के द्वारा उच्चारण योग्य सो शब्द उनका वन्ध०।' [काव्यपकाश उलास-९]। सट्टट ने जो पूर्वोद्धृत उदाहरण दिए है उनमें प्रतीदारेन्दुराज ने स्वरितादि स्वरों का अन्तर भी दिसलाया और तदनुसार अर्थमेद भी उसी प्रकार स्पष्ट किया है जिस प्रकार 'इन्द्रशत्रु' ादि वैदिक शब्दों में किया जाता है। किन्तु उनका यह विश्लेषण छान्दससंस्कृत से मिन्न लौकिक संस्कृत की प्रवृत्ति से मेल नहीं खाता। अतः मन्मट ने 'काव्यमागे स्रो न गण्यते= काव्य में स्वर की गणना नहीं की जाती' कहकर उसे छोड़ दिया। हम भी उसका विवेचन आवश्यक नहीं समझते।
रुदट-मामह, वामन और उद्भट ने इलेप को शब्दगत मानते हुए उसे अर्थालंकारों में गिनाया था। उटट ने उसे अलग-अलग मागों में निमक्त किया और शब्दश्लेप के वे आाठो मेद काव्या- लंकार के चतुर्थ अध्याय में उन्होंने बतलाए जो मम्मट ने काव्यप्रकाश के नवम उदलास में दिख- लाए है। इस विषय में मम्मट ने रुद्रढ के ही विवेचन का सारसंक्षेप कर दिया है। केवल उदाहरण नवीन दिए हैं। उन्होंने एक नवम दलेष भी माना है जिसे अमहश्लेप कहा जा सकता है। पूर्वव्त्तों आठ भेद की गपना में मम्मट ने रुटट की-
अन्नायं मतिमद्मिविधीयमानोडषवा मचति॥' इस कारिका को सी रूप में-'स च वर्गपदर लिंग मामाप्रकृतिप्रत्ययविमत्तिव चनानां मेदादषया' इस प्रकार उद्वृत कर दिया है। रुद्रट ने अर्थद्लेष को स्वतन्त्ररूप से दश्म अध्याय में रखा है और उसमें श्लेध को एक अलंकार नहीं अपितु एक वर्ग माना है जिसके मन्तर्गत इन दस भेदों के नाम गिनाए है-अविशेष, विरोध, अधिक, वक्त, व्याज, उक्ति, असंभव, अवयन, तत्न तथा विरोधामास। इनमें से प्रत्येक के उदादरण देकर अन्त में इन भेदों के संकर तथा संसृष्टि से निष्पन्न भेदों का संकेत भी किया। संकर और संतृष्टि में भी व्यततत्व और अन्यरक्व दोदो भेद किए है। स्पष ही वे रलेप को स्वतन्न अलंकार नहीं वतला सके और कदाचित वे भी उट्भट के ही समान रलेप को अन्य अलंकारों का अपवाद मानते हैं। इन दसो भेदों में एक सटकने वाला तथ्य यह है कि रुदट ने जो उदाहरण दिय हैं उनमें से अनेक ऐसे हैं जिन्हें मम्मट के मनुसार शब्दहलेप का उदाहरण ही माना जा सकता है यथा 'दुर्योधनोऽपि युविष्ठिरः यहाँ न तो दुर्योधन शब्द ही वदला जा सकता और न सुधिष्ठिर शब्द ही, अतः उन्हीं के साथ अन्वयव्यतिरेक होने से श्लेप शब्दगत ही माना जाना चाहिए। [द्रष्व्य: रुद्रटपरगीत काव्यालंकार, चौखंमा संस्करण तथा दिल्ली से छपा चौधरी संस्करण ]। सम्मट-मम्मटाचार्य ने शलेप की तोनों समस्याओं की ठीक व्यवस्था कर सिद्धान्त स्थिर किया कि सभंग औौर अभंग दोनों ही इलेप शब्द के ही अलंकार है और उन्हें शब्दालंकारों में ही गिनाया। साथ ही भामह, उद्भट और रुद्रट की नाई इलेष को अन्य अलंकारों का अपवाद मानने की भूल उन्होंने नहीं की। उन्होंने इलेप की स्वतन्त्रता का अनुभव किया, भले ह्ी ने उसका वदाहरण ठीक नहीं दे सके। उनका विवेचन तत तंद पसङगों में ययास्थान उद्धृत किया ना चुका है।
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२७८ अलङ्कारसवस्वम्
सवरववार ने लेप का जो विवेचन किया है उसका झुकाव उद्दट की ओर अधिक है। यदपि विमशिनीकार यह सिद्ध करने का प्रयत्न करने रहे हैं कि सबसवकार ने उद्ट का मत युत्ि यों द्वारा स्पष्ट कर उद्धृतमात्र किया है, उसे अपना स्वय का मत नहीं माना है; तथापि सन्थकार की प्रवृत्ति वेसी नहीं दिसाई देती। अन्वयव्यतिरेक को काटकर आभयाश्रयिमाव को निर्णायक मान अमगरलैष को अर्थश्लेष सिद्ध करते समय सवसवकार ने उद्भट का अनुसरण किया हो ऐमा नहीं लगना। 'येन स्वस्त' पद्य में तुल्ययागिता सिद्ध करने में सबर्वकार उसी प्रकार विफन हैं जिस प्रकार काव्यप्रकाशकार मम्मट 'देव ह्वमेव' पद्य में शुद्ध दलेघ। इसलिए मम्मट द्वारा प्रस्थापित इलेष की स्वतन्त्रता भले हो उनके स्व्रय के उदाहरण से सिद्ध न होती हो, इनके विरोधी आचार्य सवस्वकार के उदाइरण से अवश्य ही सिद्ध हो जाती है। फलत इनेष निर- वकाश नहीं रह पाता। किन्तु अन्य मनदकारों में जईां दलप की माता अधिक रहदेगी वहा मी इलेप को ही वाध्य मानने की ऐकान्तिकता भी अनुभवविरुद्ध होगी। फलन 'उदामोत्कलिकाम्' आादि पद्यों में मम्मट को पुनर्विचार करना होगा। मम्मट के पूर्ववर्तता आचार्य महिममट ने मी दलेघ का विद्लेषग विस्तार पूर्वक किया है। यह भी उदधृन किया जा चुका है। मडिममट्ट ने सपष्टरूप से उद्गट का मत स्वोकार कर लिया है। सर्वस्वकार के परवत्ती आचार्यो में से शोमाकर, अध्ययदीक्षित और पण्टिनराज के मत उद्धृत किर जा चुके हैं। उनके मामान्यल क्षग ये हैं- शोमाकर-'विशेष्यस्यापि साम्ये द्वयोदाच्यतवे इसेप।' -विशेषण के साथ विशेष्य भी यदि उमयार्थेक हो और यदि उससे निकाकने दोनों भर्ध वाच्य होते हो नो अल्कार इलेप होता है। अप्पयश्रीछ्छित- 'अनेकार्यशब्दविन्यास शलेष। म ननिविध प्रकृतानेकविषय अप्रकृतानेक विशय, प्रकृताप्रकृतानेकविषयक्ष। -'अनेकार्थक शब्दों का विन्यास इनेप कहलाना है। वह तीन प्रकार का होता है, प्रथम- जिसमें अनेक अर्षो में से सभी प्रकृत होते हैं, दवितीय-जिसमें सभी अपकुत और तृनीय-जिसमें दोनों होने है।' दीक्षितजी ने इनके उदाहरण भी अलग अलग दिए हैं। हम 'येन ध्वस्तo' पद्य को प्रथम दो का तथा सृतीय का उदाहूरण विमर्शिनीकार द्वारा उद्भृत 'अतन्द्रचन्द्रामरणा-सानन्द न करोति कम् पद्य माना जा सकता है। तृतीय में शव्दशक्तिमूलक ध्वनि का अर्तित्व दीक्षितजी ने दूसरे प्रकार से साधा है। उसे आगे स्पष्ट करेंगे। पण्टितराज-[सृ०] 'भुत्यैकयानेकार्यप्रविपादनं सलेष।' [६ू०]'तच्च देषा, अनेकधर्मपुरस्कारेण, एकवर्मंपुर स्कारेण च। आयं देवा अनेकशम्दमति- मानदारा एकशन्द्रप्रतिमानद्वारा चेनि त्रिविध. । तत्राय समङ् दितीयो लमह' इति वदन्ति। तृनोयस्तु शुद्ध । एवं त्रिविषोऽप्यय प्रव्ृतमात्रापकृतमात्रमकृतापट्टवोभया्रितववेन पुनस्त्रिविष। सभ्नाये भेदे द्वितीये न विशेष्यस्य रिनटटतार्या कामचार, तृनीय मेदे तु विदोषणवाचकम्येव क्िव्वितम्, न विशाष्यवाचकस्य, तथात्वे तु शब्दशति मूलकव्बनेरुच्छेद एव स्याव'। -- 'सक शब्द के द्वारा अनेक अर्थो का प्रतिपादन दलेय। वह दो प्रकार का होता है। एक वद जिसमे अनेक धर्मों का ज्ञान होता है और दूसरा वह जिसमें एक धर्म का। इनमें से प्रथम दो प्रकार का होना है (१) जिसमें अनेक शब्दों का मान होता है और (२) जिसमें केवछ एक शब्द का। कुछ आचार्य दोनों में प्रथम को समझ और द्वितीय को अभंग नाम मे पुकारते हैं। तृनीय शुद्धू [अर्थात अर्थगत] होता है। ये तीनों श्लेप पुन. तीन प्रकार के होते हैं प्रव्टताश्रित, अप्रवृताश्रित्
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श्लेपालद्कार: ३७९
और उमयान्रित। इनमें से प्रथम और द्वितीय भेद में विशे्यवाचक पद दचर्थक हो या न हो किन्तु तृताय में केवल विशेषणवाचक पदों में ही दूसर्थकता होती है विश्ेष्यवाचक पदों में नहीं। यदि विशेष्यवाचक में मी दचर्थक हो तो शब्दशक्तिमूलक ध्वनि का कोई स्थान ही नहीं रहेगा।'
दोनों विशेष्यों नें अन्वित मर्यो की एक शब्द के द्वारा उक्ति शलेप कहळाती है। समालोकि, दलेप और शब्दशक्तिमूलक ध्वनि इन त्ीनों अनेकार्थक शब्दों द्वारा अनेक अर्थो की योजना रहती है, किन्तु समासोकि में अनेकार्थकता केवल विशेषणवाचक शब्दों में दी रहती है जब कि श्लेप और ध्वनि में विशेष्यवाचक शब्दों में भी। इस कारण समासोकि का द्वितीय अर्थ विश्ेष्यांश में पंशु रहता है। इसी प्रकार समासोकि और झ० श० व्वनि में एक अर्थ प्रस्तुत और अमिया द्वारा कथित रहता है तथा द्वितीय नर्थ अप्रस्तुन और व्यंजना द्वारा प्रतीत, इसमें भी प्रस्तृत अभिषेय अर्थ ही नियमतः पहले प्रतीत्ष होता है, मपस्तुत व्यंन्य अर्थ नियमतः पश्चात, साथ ही द्वतीय अर्थ प्रथम अर्थ पर निर्भर रहता है। अतः दोनों में असम्बद्धता न रहकर सबम्ध ही रहता है। कलेप में विशेष्य और विशेषण दोनों मे वाचक शब्दों में हुयर्थकता या अनेकार्थकता रहने पर भी दोनों ही या सभी अर्थ द्लेप के प्रथम दो भेदों में या तो केवल प्रस्तुत होते हैं या केवल अप्रस्तुत, फलतः दोनों ही अर्थों का ज्ञान केवल एक ही वृत्ति से होता है, अमिधा से। इसके अतिरिक्त दोनों या समी अर्थो की प्रतीति सभंग पदों का प्रयोग होने पर एक साथ हो जाती है और सभंग पदों का प्रयोग होने पर क्रम से, किन्तु इस क्रम से किसी भी अर्थ की प्रतीति पहले और किसी की भी बाद में मानी जा सकती है क्योंकि इन अ्थों में संदन्ध या सापेक्षता का अभाव रहता है। गाय के सिर पर निकले मझ्गों के समान ये अर्थ परस्पर में निरपेक्ष रहते हैं। तृतीय भेद में एक अर्थ पकत और दूसरा अप्रृत माना जाता है तथामि उसमें समासोक्ि के समान विशेष्यां में क्लेष नहीं रहता, उपमा रूपक आदि के समान विशेष्यों का कथन पूथकपृथकू शब्दों से होता है। अन्तर केबल स्लिप्ट विशेषणों की अनेकता या अयिकता और मकता या न्यूनता का रहता है। उपमादि में कलष्ट विशेषण केवल कुछ ही रहते हैं जय कि कलेप में उन्हीं की सरमार रद्दती है। फलतः चमत्कार, उन्हीं का पधान हो जाता है। यद्यपि सवसकार एक भी हिलाविशेषण दो तो इ्लेय ही मान लेते हैं। अलंकाररत्नाकरकार ने समासोकति प्रकरण में यही भेद इस प्रकार दलोकबङ् किया है- 'प्कृतस्याथवान्यस्य विशेष्यस्याभिधायकम्। समानं यत्र नो तन समासोकिर, ध्वनिदि स:॥ विशेषणानां तुत्यत्वे विशेष्याणामपि कचिद। अनेकार्थाभिषायिस्वे क्लेप: स्यादिति निर्णयः।।' अलंकार रत्नाकरकार ने विशेष्य की निळष्धता में भी जो इतेपालंकार माना है वह इ्लेप कर वही तीसरा भेद है जिसमें सवस्वकार ने पूर्वांचार्यों के अनुकरण पर दोनों विशेष्यों का पृथकू उपादान आवश्यक माना है। अप्पयदीक्षित ने एक डग और मरी और इस तीसरे भेद में भी इलेपप्रसिद्धि के लिए दोनों का पृथक पृथक उपादान आवश्यक मान, इस भेद में भी विशेष्य को शिलट त्वीकार कर किया। तव न्दशतिसूलक ध्वनि से क्हेप का अन्तर करने का प्रश्न दठा तो उत्तर में लिखा- 'यदन प्रकृताप्रकृत: ते पोदाहरणे शब्दरुसति मूलथ्यनिमिच्छन्ति प्रक्वः तव प्रकृताप्रकृतामिधान- मूलकस्योपमादेरवंकारत्य व्व्श्यत्वामिप्रायवम्, न तु अप्रकृतार्थस्येव व्यतन्यत्वाभिप्रायकन्,
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३८० अलङ्गारसर्वस्वम्
अप्रकृतार्थंस्यापि शब्दशवत्या प्रतिपाद्यस्यामियेयत्वावश्यमावेन व्यकयनपेश्षणाव। यदपि प्कृतेडथें प्रकरगवलाज्झटिति बुद्धिस्ये सत्येव पश्चाव तत्तद्विषयकशयन्तरोन्मेपपूर्वकमप्रस्तुतार्थ: स्कुरेद, न चैतावता तस्य व्यग्यत्वम्, शकत्या मतिपाधमाने सर्वधेव व्यकयनपेक्षणाद।' -प्राचीन आल्कारिक प्रक्नाप्कृतोभयाधित श्लेप के उदादरण में जो शव्दशकतिमूलक ध्वनि मानने हैं वह अमिया द्वारा कथिन प्रहत और अप्रकृत दोनों की व्यक्ष्य उपमादि [अलकारों] के अमिप्राय से, न कि अप्रकृन अर्थ को व्यउग्य मानकर; क्योंकि अप्रन अर्थ अमिषा द्वारा प्रविपादित होता है अत उसे अभिधेय मानना आवश्यक है, फलत उसको व्यअ्ना की कोई अपेक्षा नहीं है। यद्यपि पकृत अर्य के साथ प्रकरण रदता है इस कारण उसका ज्ञान अविलन्द हो जाना है और अग्रकृन का ज्ञान उसके पदचाद होता है जब उसके विषय की दूसरी अमिधा का उत्थान होता है तथापि इतने भर से उसे व्यदूग्य नहीं कहा जा सकता । जहाँ प्रतीति अभिधा से होती है वहाँ व्यजना की कोई अपेक्षा नहीं रहनी।' रसगंगाधर के द्वितीय आनन के आरम्म में दवितीय अर्थ की प्रतीति में प्रत्यायक शक्ति का निमय करने समय पण्टितराज जगनाथ ने अप्पयदीक्षित के इस मत को अपने शम्दों में अनेक विकश्पों और विविध कह्ापोडों द्वारा प्रस्तुत किया है। उनके उस लम्बे विवेचन का निष्कर्ष इनना ही है कि-'(१) नानायंक शब्द के सुनाई देने हो समी अर्थो का ज्ञान तत्काल अभिाशक्ति के द्वारा ही हो जाता है, क्योंकि सकेन सभी अर्यो में गृहीत रहता है, (२) इसके पश्चात यह संदेह होता है कि इस शब्द का तात्प्ये किस अर्थ में है, अर्थात् इन सभी अर्थो में से वाक्यार्थ के लिए उपयुक्त अर्थ कौन है, (३ ) जिसका निर्णय प्रकरणादि से हो जाता है, तदनन्तर (*) दो में कोई एक बोध होता है या तो एकार्थेमात्रविषयक पुनर्वोध या उसके बिना ही सौधे-मीे वाक्यारथदोध। इस प्रकार दोनों हो अ्षरथो का ज्ञान पहले से ही अमिधा द्वारा हुआ रहता है, दूसरे अर्थे में व्यक्षना मानना ठीक नहीं है।' पुनर्वोध मानने का संकेन अप्पयदीक्षित ने भी किया है जहाँ उन्होंने [ यहीं उद्धृन अश में] दूसरी पक्ति के उन्नेप को दान कही है। वस्तुत जब सभी अर्थो का बोध पहले ही दो चुका है तब किमी एक अर्थ का पुनर्वोध न झोकर पइले मे ज्ञात उस एक अर्थ के भीतर वेक्यारथोंपयोगिरव- मान का नवीन बोध होता है, इसलिए पण्डितराज ने द्वितीय पक्ष को प्रथम पक्ष के संशोधन के रूप में प्रस्तत किया है। मम्मट आदि सभी आचार्य पुनर्बोधवादी हैं। अप्पयदीक्षित और पण्टित- राज का कहना है कि पुनर्षोध हो या सीधा वाक्याथरीय, ये दोनों प्रश्न अनेक अर्थो में से किमी एक सर्थ से संबन्धित है। जदाँ तक द्वितीय अर्य का संबन्ध है उसका ध्ान भमिषा द्वारा पहले ही हो चुका रहता है अत उसमें व्यंजना मानना आवश्यक नहीं है। हाँ अमिषा द्वारा विदित दोनों अर्थों के संबन्ध में अवश्य व्यंजना मानी जा सकती है। मम्मट आदि द्वितीय सर्थ का ज्ञान मो व्यजना द्वारा मानने हैं। तदर्थ वे ऐेमा उदाहरण देते हैं जिसमें प्रकरण का प्ान पहले से रक्षता है। उनका कहना है कि वहाँ अभिधा प्रकरणोपयोगो अर्थ की ही ओर प्रवृत् हो पाती है। वाक्यार्थ बोध होने के पश्चाद अप्राकरगिक अर्थ का ज्ञान भी होने लगता है किन्तु उसमें अमिवा कियान्वित नहीं होती क्योंकि वह प्रकरण द्वारा नियन्त्रित हो जानी है। सवखकार मी ऐसा ही उदादरण देवे है। 'सघ' कौश्षिक०' पद्य का इरिश्चन्द्रपरक अर्थ पूरा नाटक पढ़ लेने के पश्ात पद् को पुन पढने अथवा नाटक की कथावस्तु प्रसिद्ध होती दे इसलिए उसका पहले से ध्यान रहने के कारण होता है। पण्टितराज का कथन है कि प्रकरण ज्ञान रहने पर मी यदि द्वयर्यक शब्द उपस्थित है तो उसते दूसरा अर्थ भलग शक्ति से निकलना माना जाना ठीक नहीं है। पकरण या इससे उत्पन्न तास्पर्यनिणंय अमिया का नियन्त्रम नहों करते, वे किसी एक अर्थ का निणेय करा-
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३८१ कर वाक्यार्वबोध में सहायकमात्र बनते हैं। इस विषय पर हमारा अपना मत हमने हमारे हिन्दी व्यत्तिविवेक की भूमिका में स्पष् कर दिया है। इस विषय में हमें व्यक्िविनेक्कार महिमभट्ट का सिद्धान्त ही स्वीकार है। व्यंजना का शष्द्रवृत्तित्व तत्वचिन्तन से परे एक निरी भावुकता है। न्यंजना के शब्दवृत्तित्व का खण्डन इमने अपने एक अन्य लेख 'साहित्य-संप्रदाये तात्पर्यत्वरूपम्' में भी किया है। देखिए सारस्वती सपमा २४1३ अंक। संजीविनीकार श्री विद्याचकवर्त्ती ने सर्वस्वकार के संपूर्ण विवेचन का संक्षेप इस प्रकार किया है- 'शब्दसाम्यं मवेच्छलेषो विशेषणविशेष्ययोः। यधेकोडपकृतोडर्थद्चेद् भेघांशे मिन्नशब्दता।। सर्वालक्काराधकः । पूर्वसिद्धस्य नेदङं तदा न्यायेन वाध्यते।।' -'शन्द्साम्य [शब्दों की अनेक पक्षों में समानार्थकता] इलेप कहलाता है, किन्तु यह साम्य विशेषण और विशेष्य दोनों में रहता है। अनेक अर्थो में से यदि कोई अर्थ प्रकरणिक हो तो विशेष्यांश अलग-अलग शब्दों से कथित रहते हैं। -यह [ दलेष] शब्द में रहता है और अर्थों में मी तथा यह [अन्य] सभी अलंकारों का वाधक है। [हां, यदि कोई मलंकार पहले से सिद्ध हो तो श्लेष उस] से वाघित हो जाता है यदि [ च्लेष ] उस [ पूर्वसिद्ध अलंकार ] का अंग हो।' संजीविनीकार ने सारसक्षेप की इन कारिकाओं के तुरन्त वाद अपना विरोध भी प्रकट कर दिया है और अपना मत मम्मट के पक्ष में दे दिया है। मापाशास्त्र भी दलेप पर विचार करता है किन्तु उसकी विचारभूमिका अर्थपरिवर्तन के कारणों से संत्रन्धित है, अलंकारशास्त्र उससे मिन्न परिवर्त्तित अर्थों अथवा विकसित अर्थी की चमरकार-भूमिका से विचार आरम्म करता है। इस प्रकार भाषा एक सुन्दरी है। भापाशाखत उसके वंश पर विचार करता है और अलंकारशास उसके सौन्दर्य पर। कविता एक लता है और मापाशासत्र वनस्पतिशास्त्र जो लता के निष्पादक तत्वों की गवेषणा करता है। अंकारशाख मन:शास्त्र है जो यह खोजता है कि लता अपने किस अंग के सौन्दर्य से दर्शक को आष्ट और आनन्द-विभोर कर रह्ी है। [सर्वस्व ] प्रस्तुताद्प्रस्तुतप्रतीती समासोक्तिरुका। अधुना तद्वैपरीत्येनाप्नस्तुतात् प्रस्तुत प्रतीतावप्रस्तुतपशंसोच्यते- [सू० ३५] अग्रस्तुतात् सामान्यविशेषभावे कार्यकारणभावे सारूप्ये च अ्रस्तुतग्रतीतावप्सतुतप्रशंसा। इहाप्रस्तुतस्य वर्णनमेवायुक्तम्, अप्रस्तुतत्वात्। प्रस्तुतपरत्वे तु कदा- चित् तद युकं स्यात्। न चापस्तुतादसंबन्धे प्रस्तुतमतीति:, अतिप्रसक्भात्। संबन्धे तु भवन्ती न त्रिविधं संवन्धमतिवरतते, तस्यैवार्धान्तरप्रतीतिद्वेतु- त्वोपपत्तेः। त्रिविधश्च संबन्ध :- सामान्यविशेषभावः कार्यकारणभावः सारूप्यं चेति। सामान्यविशेषभावे सामान्याद विशेषस्य विशेपाद वा सामान्यस्य प्रतीतौ दवैविध्यम्, कार्यकारणभावेडव्यनयैव भक्षया
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व्विघात्वम्, सारूप्ये त्वेको भेद इत्यस्या: पश्य प्रकारा:। तमापि सारू- व्यद्वेतुके भेदे साधम्यवधर्म्याम्यां द्वैविध्यम्। वाच्यस्य संभवासंभवो- भयरूपताभिस्त्रया प्रकारा:। शिलप्शव्दपयोगे त्वर्यान्तरस्यावाच्यत्वाच्छले. पादू विशेप:। श्लेपे हनेकस्यार्थस्य वाच्यत्वमित्युक्तम्। प्रस्तुत से अप्रस्तुत की पनीति होने पर समासोकि होती है और उमके [ठीक ] विपरीत अप्रस्तुन से प्रस्तुन की प्रतीति होने पर अप्रस्तुतप्रशसा। समासोकि का निवचन किया जा चुका है। अपस्तुवपशसा का निरवचन मत्र आरम्भ करते हैं- [सूत् ३५] अमश्तुत से सामान्य विशेषभाव, कार्यकारणभाव अथवा सादश्य सबन्ध होने पर प्रस्तुत की पनीति हो तो [अठकार की संक्ञा] अ्प्रस्तुतप्दंसा [होनी है ] । [वृत्ति] यरश [अप्रस्तुन से प्रस्तुन की प्रतीति की जो यह बात है इसमें] अप्रस्तुन का वर्णन [सामान्यन ] अनुचित ही होता है। यदि वह [अप्रसतुत ] प्रस्तुतपरक दो तो कदाचित [उमका वर्णन] उचित हो सकता है। इधर अप्रस्तुन से प्रस्तुन की प्रनीति तब तक सभव नहीं जब तक [उनका] को् सम्बन्ध न हो क्योंकि बिना संबन्ध के प्रतीति मानने पर किसी मे भी किसी की भी प्रतीति समन होगी। सबन्ध से होने पर भी [उक्त] तीन प्रकार के सम्बन्ध को छोट अन्य किमी सम्बन्ध से वह मंभव नहीं होनी, क्योंकि वही [तीन प्रकार का ही सम्बन्ध] अन्य अर्थ की प्रतीति कराने में समये [हेतु] बन पाता है। तीन प्रकार का समन्य है [१] सामान्यविशैषभाव [२] कार्यकारणमाव तथा [३] सादृन्य। सामान्यविशेषभाव संबन्ध में या तो सामान्य से विशेष की प्रतीति होती है या विशेष से सामान्य की, इसलिए यह दो प्रकार का हो जाना है। कार्यकारणभाव में मी इसी प्रकार दो प्रकार होते हैं [ कारण से कार्य की प्रनीति या कार्य से कारण की प्रतीति ]। सादृश्य में केवल एक ही प्रकार होना है। इम प्रकार इस [ अप्रस्तुनपशंसा] के [मूल ] भेद [केवल ] पाँच होने हैं। इनमें भी जो भेद साद्ृडय- मूढक होना है उसमें भी दो भेद होने हैं माधम्यमूलक और वैधम्यमूढक। [इसमें ] वाच्य अर्थे भी तौन प्रकार का होता है [ १] संभव, [२] असम्मव और [ ३] उमयरूप। [ इसमें सहों कहों] रिवष शब्दों का प्रयोग होता है वहाँ दूसरा अर्थ वाच्य नहीं होना अत यह स्लेष से मिन्र है। उत्पे्प में, जो है सो, पूरा का पूरा अर्थ वाच्य हो होता है जैसा कि[दतेपप्रकरण में अभी-अमी] कहा जा चुका है। चिमर्शिनी उनेति समनन्तरम्। यत्त समासोकत्यनन्तरं परिकरश्लेपयोर्वचन तद् विशेषणसा- म्यादिना प्रसङ्गागनम्। तामेवाह-अप्रस्तुनादित्यादि। नन्विद्वापस्ुतस्य वर्णनमेवायुक्क मिति क्रथ सम्मादपि प्रस्तुतस्य प्रनीतिर्भवतीव्याशपयाह-हदेत्यादि। सविति, अभरतुन- वर्णनम। अतिप्रसम्ादिति सर्वरमाद् सर्वप्रतिपत्यारमन । तस्यैवेति वविविधष्य संबन्ध- रय। सामान्यस्य विशेषाभ्रयावाद् विश्ेषस्य व सामान्यनिष्ठतवाय सामान्यविशेषयोः पस्परमागूरणे संघन्यः। प्वं घ कार्यस्य कारणपरतन्त्रर्वादन्त्याचस्वस्य कारणस्य कार्योन्मुस्ा कार्थकारणयोरवि सबन्ध। इत्यमेतव संबन्धदूयं वास्तवम्। साह्प्य पुनः प्रानीतिकमेध। प्रनीतावेज सद्रोन वसत्वन्नरेण सदसस्य वस्त्वन्तरस्व प्रतीतिसिदेः। वरतुख्े हि वरवन्नरमनीतया वस्वन्तरप्रतीतिन स्थाद्। अनमैव भङ्गपेति कारणात्
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अप्रस्तुतप्शंसालङ्वार ३८३
कार्यस्य कार्याद् वा कारणस्य पतीती। तन्नापीति सत्यपि पञ्ञप्रकारत्वे। विषशव्दप्रयोग इति। श्लिष्टशब्दनिवन्धनाप्यप्रस्तुतपशंसा भवतीत्यनुवादाद् विधिः। अत एवास्य बहुपकार स्वमुक्तम। उत्त्ता-समासोकि का निर्वचन किया जा चुका है अर्थाव अभी-अमो। समासोकि के बाद [तुरन्त पश्चाछ अप्रत्तृतम्शंसा का निर्वचन न कर बीच में] परिकर और इलैप का जो निर्वेचन किया गया है वह विशेपणसान्य आदि के कारण आनुपङ्गिक रूप से किया गया है। उत्ती [अप्रस्तुतप्रशंसा] का लक्षण सूचरूप में प्रस्तुत करते हैं-अप्रस्तुतात् इत्यादि। [प्रकन ]-जव यहाँ [काव्य में] अप्रस्तुत का वर्णन संभव ही नहीं है तव उससे प्रत्तुत की भी प्रतीति कैसे होगी इस पर उत्तर देते हुए कहते हैं इछ इत्यादि। तव् - वह अर्थात् अप्रस्तुत का वर्णन । अतिमसङ्ग=सभी से सभी अर्थो की जो प्रतीति तत्स्वरूप। तरयेव =वही = त्रिविध सम्बन्ध। सामान्य और विशेष का परत्पर की व्वंजना में सम्बन्ध रहता है क्योंकि सामान्य विशेष पर आभित रहता है और विशेष सामान्य पर। इसी प्रकार कार्य भी कारण के बिना निष्पन्न नहीं होता और कारण भी अपनी अन्तिम [परिणति की] अवस्था में कार्यरूप में परिणत होने वाला होता है अतः इनका मी परस्पर नें सम्बन्ध है। इस प्रकार ये जो दो सम्बन्ध हैं ये दोनों वास्तविक हैं। किन्तु सालप्य= सादृश्य काल्पनिक ही होता है, क्योंकि समानवस्तु की प्रतीति होने पर ही तत्समान अन्य वस्तु की प्रतीति होती है। यदि यह वास्तविक हो तो अन्य वस्तु की प्रतीति से अन्य वस्तु की प्रतीति न हो। 'अनयेव भङ्गया=इसी प्रकार' अर्थात कारण से कार्य की और कार्य से कारण की प्रतीति होने से। 'तन्नापि = इनमें मी' सर्थात ये पाँच मूल भेद होने पर भी। 'श्लिष्टशव्द् प्रयोगे= रिलष्शब्द का प्रयोग होने पर' इस अनुवादात्मक [दद्देश्यभावपूर्ण ] कथन से यह विधि निकलती है कि अप्रस्तुतप्रस्ंसा इ्लेपमूलक भी होती है। और इस कारण इसके और मी अनेक प्रकार संभव बतलाए हैं। [ सर्वस्व ] तन्न सामान्याद् विशेषस्य प्रतीती यथा- 'तण्णात्थि किपि पहणो पकप्पिअ जं ण णिअइघरणीय। अणवरअगअणसीलस्स कालपहिअर्स पाहिज्जं।।' अत्र प्रहस्तवधे विशेषे प्रस्तुते सामान्यमभिहितम्। उक्त भेदों में से सामान्य से विशेष की प्रतीति का उदाहरण- 'तन्नार्ति किमपि पत्युः पकत्पितं यन्न नियतिगेहिन्या। कालपथिकस्य पाथेयम् ॥। 'ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे नियनिरवी गेहिनी ने अपने अनवरत गतिशील कालपथिकरूपी पति वे लिए पाथेय (रास्ते का कलेवा) न बना दिया हो।' यहाँ प्रहस्तवधरूपी विशेष अर्थ प्रस्तुत है और कहा गया है सामान्य अर्थ। चिमर्शिनी प्रस्तुत इति। म्रहस्तवधवर्णनत्यैव प्रकान्तववाद्। अत्र वाक्यान्तरोपासे विशेषात्मनि भहतुने प्रहस्तवधे नियतिकर्मलक्ष्ण सामान्यासिधाननर्थान्तर्यास इृत्यन्ये मन्यन्त इयुदा हरणान्तरेणोदाहिय से। यथा- 'दुर्जनदू पितमनसां पुंसां सुजनेऽपि नासत विश्वास:। बाल: पायसदग्धो दध्यपि फकृत्य मनयति॥'
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३८४ अलङ्कारसर्वस्वम्
अन्न केनापि दुर्जनेन विभलव्धस्य कस्यचित् सुजनविशेपे विस्तन्भो न जायते तस्य सुजनर्पेय विशेपे प्रस्तुते सामान्योकि:। प्रस्तुत क्योंकि प्रकरण प्रहस्त के वष का ही चल रहा है। इस पद्य में अन्य आचार्ये [अलंकाररत्नाकरकार ] यह मानने है कि 'यहाँ विशेषरूप और प्रस्तुत प्रइस्तवध अन्य वाक्यों से कथित है इस कारण नियतिकर्मरूप सामान्य अर्थ का कथन अर्था्तरन्यास ही है'। इसी कारण वे अप्रस्तुवप्रश्यभा के इस भेद पर यह एक दूसरा उदाहरण देते हैं- 'जिन पुरुषों का मन दुर्जनों से दूपित को जाता है वे सुजनों का म विश्वास नहीं करते।" दूध से जला बालक दड़ी को भी फूँककर खाता है।' वहाँ विशेष प्रस्तुन है और तदर्थ यह अप्रस्तुत सामान्य की उक्ति है क्योंकि यह किसी दुर्जन द्वारा ठगे गण अतपव किमी सूबन पर भी विश्वाम न कर रहे व्यक्ति के प्रति उसी सुजन की उक्ति है। [वस्तुत अप्रस्तुनप्रशसा इसी पघ में नहों है, इसमें रूपकानुप्राणित दृष्टान्तालकार है दुर्जन, सुजन और साधारण व्यक्ति का गरम दूध, दददी और वाल्क के साथ सामान्यविशेषभाव नदीं है। विम्वप्रनिविम्वभाव ही हो सकता है। अन यहों अर्धान्तरन्यास भी नहीं है। 'तननारि्ति' पद्य अपने नायमें अप्रस्तुनप्रशसा हो सकती है। विशेष अर्थ का द्ान इस वाक्य से नहीं होवा, अन्य वाक्यों से होने पर मी उसका प्रमाद इस पर नहीं पढता क्योंकि विशेष का ज्ञान जिस किसी प्रकार तो पहले से रहना अपेक्षिन ही है वह चाहे वाक्यान्तर से हो या प्रत्यक्ष, प्रकरण आदि से ] [सर्वस्व ] विशेपात् सामान्यप्रतीती यथा- 'पतत् सस्य मुसात् कियत् कमलििनीपत्न्ने करणं चारिणो यन्मुक्तामणिरित्यमंस्त स जडः शृण्वन्यदस्मादपि।
स्तभोड्डीय गतो दद्देत्यनुदिनं निद्राति नान्त शुचा।।' अम्न जडानामस्थान एवोदम इति सामान्ये पहतुते विशेपोडभिद्दितः। कारणाव कार्यपतीती यथा- 'पक्ष्यामः किमियं प्रपद्यत इति स्थैय मयालम्वितं कि मां नालपतीत्ययं खलु शठ. कोपस्तयाप्याश्रित:। इत्यम्योन्यविलक्षदष्टिचतुरे तस्मिन्नवस्थान्तर सव्याजं दसितं मया धृतिद्वरो वाष्पस्तु मुक्तस्तया ।।'
भिद्दितम्। अध धाराधिरूढो मान: कथं नितृत्त इति कायें प्रस्तुते निधृत्तिकारणम-
कार्यात् कारणप्रतीती यथा- इन्दुर्लििप्त इवासनेन जडिता टष्टिमृगीणामिव अम्लानारुणिमेव विट्ुमरचि: श्यामेव हेमप्रभा। कार्कश्यं कलयामि कोकिल्टवधूकण्डेग्िव प्रस्तुतं सीताया: पुरत् हन्त शिव्षिना वर्हाः सगर्दा इव।।'
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तरो वदनादिगतः सौन्दर्यातिशयः कारणरूपः प्रस्तुतः प्रतीयते। तेनैयम- प्रस्तुतप्रशंसा। [ अप्रस्तुत ] विशेष से [प्रस्तुत ] सामान्य की प्रतीति यथा- 'उसके मुख से इतना जो तुमने सुना है कि वह जढ़ [ मूर्खव्यकि] कमलपुत्र पर पढ़ी पानी की बूँद को मुक्तामणि मान बैठा' यह कौन बढ़ी बात है, इससे भी बड़ी वास [ एक और है उसे] सुनो कि[ एक दूसरा जड़। उसे उठाने लगा किन्तु जर्योदी [उसने] उंगली के अग्रभाग से भी और बड़ी ही वारीकी के साथ भी उसे छुआा वह [ बूँद पत्ते पर से सुड़क कर पानी में मिल गई और इस प्रकार ] लुप्त हो गई। इसका उसे इतना शोक है कि कितने ही दिनों से ससे नींद नहीं आ रही है। वह मन ही मन हाथ हाय कर रहा है कि मेरा मोती उड़ गया।' -- इस पद्यार्थ में वक्तव्य तो है यह सामान्य वस्तु कि जो जढ़ या नासमझ होते हैं वे कहीं भी कुछ भी करने लगते हूं किन्तु कथन [किसी व्यक्ति ] विशेष का किया गया है। [यही पद्य काव्यप्रकाशकार ने भी दिया है किन्तु वहाँ 'तत्र' के स्थान पर 'कुत्र=कहाँ उढ़ गया' यह पाठ है। 'शृ्वन्यदस्मादपि' का पदच्छेद 'शणु अन्यत् अस्मादि' भी किया जा सकता है और 'मृण्वन् बद अत्मादपि= कि इससे सुनते हुए भी' द्वितीय पदच्छेद में 'मी-अपि' व्यर्थ होगा और भी अनेक दोष आ जाएंगे।] [अप्रस्तुत ] कारण से [प्रस्तुत] कार्य की प्रतीति होने पर यथा- मैं तो यह सोचकर झूठे हो गम्मीर हो गया कि देखूं यह क्या करती है, और वह भी यद सोचकर कुपित हो गई कि एक तो यह छिपकर दूसरी से मिला और ऊपर से बातचीत मी वन्द किए बैठा है। इस विनशीस स्थिति में हम दोनों [कुछ देर तक तो ] झुकी निगाहों से [ एक दूसरे को ] बड़ी ही सफाई के साथ देखते रहे, बाद में, मैं, किसी वहाने हंस पढ़ा और ससका भी धीरज टूट गया और आँसू वह निकले।' - यहाँ [जिशासा तो थी]'देर तक प्रवृत्त मान हट गया?' इस प्रकार कार्य [के विषय में अतः ] कार्य [ही] प्रस्तुत था किन्तु कहा गया है 'हट जाने' का कारण। [अप्रस्तुत] कार्य से [ प्रस्तुत ] कारण की प्रतीति, यथा- 'सीता के समक्ष चन्द्रमा मानो काजल से पुता हुआ है, सृगियों की दृष्टि मानों स्तब्ध है, मूंगे की कान्ति की अरुणता मानों कुम्हला गई है, सुवर्ण की कान्ति मानों काली पढ़ गई है, कोयल की कूक में कर्कशता दिखाई देती है, क्या कहें, अब मोरंगे [ मयूरपिच्छ] निन्दास्पद प्रतीत हो रहे हैं।' wf यहाँ चन्द्रमा आदि में जिन क्जलिसत्व आदि की संभावना की जा रही है वे कार्य- रूप हैं और अप्रस्तुत हैं। इनसे इनका कारण सीताजी के मुख आदि का लोकोत्तर और अतिशायी सौन्दर्य जो वर्णनीय होने से प्रस्तुत है, प्रतीत होता है। इस कारण यहाँ अप्स्तुतः प्रशंसा है [ उत्प्रेक्षा नहां ]। विमर्शिनी तेनेति। अप्रस्तुतात कार्यत् प्रस्तुतस्व कारणश्य प्रतीतेः। यथा वा- अनेन सार्ध सरयूवनान्ते कूनन्मयूरीमुखरे विहृत्य। विलासवातायनसेवनेन क्राध्यामयोध्यां नगरी विघेहि॥
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३८६ :अलक्कारसर्वस्वम्
अत्र स्व्रपंव रासये कारणे प्रस्तुते कार्यम्याभिधानम्। ननु चाघ कार्यात् कारणस्य प्रतीता यदि अस्तुतप्रशंसा स्थान तद् वच्यमाणस्य पर्थायोकालंकारस्य को विषम इश्याह-नन्ित्यादि। 'सेन=इम कारण' क्योंकि यहां अप्रस्तुन कार्य सें प्रस्तुन कारण की प्रनीति हो रही है। अथना दूसरा उदाहरण- 'सगि! तुम मोरनियों को पोली मे मुसर सरयू तट के बन उपवनो में [स्नयबर में नाए] इस [राम के वशघर कुमार] के साथ विहार करने के पश्ात विलास वातायन [ विन्दासार्थ निर्मिंन भवन की सिदकी] का सेवन करके अयोध्यापुरी को इलव्य बनाओ।' [ निकमोरुदेव नरित १९> ]। यह़ाँ स्वयवररूपी कारण प्रस्तुम ह किन्तु कथन किया गया है [ उससे होने वाले विदारादि] कार्य का[यह उदादरण विमशिनीकार ने गएकारत्नाकर से लिया है 'अघ स्वय- कार्यस्यामिधानम्' यह पूर्र पक्ति अलंकाररत्नासर से उद्भृन पकि है निणय सागर सम्करण में इस पद् के पहले और 'ननेति' के बाद आई पकि तथा इम पक्ति में कारण शब्द के स्थान कार्य शम्द हपा है, तथा कार्यशब्द के स्थान पर कारण शब्द जो सरथा सर्स्गन है।] यदि 'इस कार्य से कारण की पनीनि' भेद में [ भनकार ] होगी अप्रस्तुतमशस्ता तो भागे कहे जाने वाला पर्यायोकालकार कहा होगा'-स दाका पर उत्तर देंते हुए कहने हैं [सर्वस्व ] ननु कार्यात् कारणे गम्यमानेडग्रम्तुम्रशंसायामिष्यमाणायाम्- 'येन तम्बालक सास्त्र: कराघानारुणस्तनः। अफारि भग्नवल्यो गजासुरवधूजनः। रति, तपा- 'चक्रामिघातम्रसभाशयँव चकार यो राहुवधजनस्य आलििङ्गनोद्दामविलासशून्यं रतोत्सवं चुम्बनमानशेषम्।।' इत्यादी सपसिद्धे पर्यायोक्तविपयेऽपम्तुतम्रशंसायोगः। अन्न हि गजा. सुश्धूगतेन तम्यालफत्वादिना कार्येण कारणमृतो गजासुरयधः मतीयते। तथा राहुवधूगतंन यिशिप्टेन रतोत्सवेन राहुशिरश्छेद कारणरूपो गम्यते। पयमन्यन्नापि पर्यायोक्तविपये सेयम्। तम्मादप्रस्तुतप्रशंसाधिपयत्यान् पर्या योकस्य निवितयत्वप्रसङग। नैप दोपः। इछ यत्र कार्यात् कारणं मनीयते। तत कार्य प्रस्तुतमप्रम्तुतं चेति हयी गति.। तघ यम प्रस्तुतत्वं कार्यस्य कारण वत् तम्यापि वर्णनीयत्वात् त कार्यमुखेन कारणं पर्यापोक्तमिति पर्यायो- कालंकाए। सघ दि कारणापेक्षया कार्यम्यातिशयेन सौन्दर्यमिति तदेव वर्णितम। यथोक्तोदाहरणद्वये। गजासुरवधूतृत्ताम्तोऽपि भगवत्प्रभावजन्य- व्वात् प्रस्तुत एय। पवं राहुवधूवृत्तान्नेऽपि नेयम। ततश्ञ नाममप्रस्तुन- प्रशंसाधिपयः: यम वुन कारणस्य प्रस्तुतत्वे कार्यमप्रस्तुतं यर्ण्यते
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३८७ तन्र रपष्टैयापस्तुतप्शंसा। यथा-'इन्दुर्लिप इवाखनेन' इत्यादौ। अन्न हि इन्हादया स्फुटमेवाशाकरणिका:। तत्प्रतिच्छन्दभूतानां सुखादीनां प्राक- रणिक वान्। तेनाचेन्द्वादिगतेनाअञनलिप्नत्वादिना अप्नस्तुतेन कार्येण प्रस्तुतं सुस्न्नादिगतं सौन्दर्य सहदयाहकवादकारि गम्यते इत्यनापस्तुतप्रशंसा। एवं च यत्र वाच्योडर्थोऽर्थान्तरं ताहशमेव स्वोपस्कारकत्वेनागुरयति तभ पर्या योकम्, यत्र पुनः स्वात्मानमेवाप्रस्तुतत्वात् प्रस्तुतमर्थान्तवं प्रति समर्प यति तमाप्स्तुतप्रशंसेति निर्णय:। ततश्चानया प्रक्रियया 'राजन् राजसुता न पाठयति मां देव्योऽषि तूप्णी स्थिताः कुब्जे भोजय मां कुसार सचिवैर्नाद्यापि संभुज्यते। इत्थं राजशुकस्तचारिभवने नुक्तोध्वगैः पञ्ञरा- चित्रम्धानवलोक्य शून्यवलभावेकैकमाभापते। इत्यत्र पर्यायोक्तमेव वोध्यम्। अन्ये तु 'दण्डयात्रोदयतं त्वां बुद्ध्वा त्वदरयः पलाव्य गता इति कारणरूपत्यैवार्थस्य प्रस्तुतत्वात् कार्यरूपो 5र्थोपप्रस्तुत एव राजशुकतत्तान्तस्यापस्तुतत्वात् प्रस्तुतार्थ प्रति स्वात्मानं समपयतीत्यपसतुतप्रशंलवात्र न्याय्येति वर्णयन्ति। सर्वथा पर्यायोक्ता प्रस्तुतप्रशंसयोविपयविभाग: सुनिरूपित पनेति स्थितम्। पवानि साध- म्यादाहरणानि। संका-यदि कार्य से कारण की [व्यअना द्वारा] प्रतोति होने पर अप्स्तुतपशंसा मभोष्ट है तो -जिस [शिव ] ने गनासुर की स्र्रियों के केश लटका दिए, आँसू बड़ा दिए, स्तन इयेलियों के आघातो से लाल कर दिए औौर चूड़ियाँ तुड़वा दी।1 इस तवा- -- जिस [विष्णु ] ने [अपने ] चक [ सुदर्शन] को आाघात की एकापक आश्या देकर ही राहु की स्तिरयों के रतोर्सव को मलिगन के उद्दाम विलास से शून्य और केवल चुम्वनमात्र तक सीमित कर दिया। इस जैसे पर्यायोक्कतालंकार के सुपरसिद्ध स्थलों में भी अप्रस्तुतप्रशंस्ा कका व्यवहार होने लगेगा। यहाँ मो गजासुर ीगत केश लटकने आदि कार्य से उसके कारण गजासुर-बध की प्रतीति होती है। उसी प्रकार राष्ु्रवधूगत विशिष्ट रतोत्सव [रूपी कार्यं] से कारणरूप राहुशिरक्छेद की प्रतीति होती है। यही स्थिति पर्यायोक्त अलंकार के अन्य उदाइरणों में भी जानी जा सकती है। इस प्रकार [कार्य से कारण की तीतषि वाले स्थलों को] अप्रस्तुनप्रशंसा का विषय मानने पर पर्यायोकालंकार का कोई स्थल ही नहीं रह पायगा। उत्तर = यह दोप नहीं आता। यहाँ [ इन दोनों अलंकारो में] जहाँ कार्य से कारण की प्रतीति होती है वहाँ कार्य दो प्रकार का होता है प्रस्तुत या अप्रस्तुत। उन [दोनों] मे से जदाँ कारण के समान कार्य मी वर्णनीय होना है अतः कार्य प्रस्तुन रहता है वहाँ पर्यायोक्ता- लंकार होता है क्योंकि वहाँ कारण का प्रकारान्तर से अर्थात कार्य के द्वारा कथन रद्दता है, साथ हो वहाँ कारण की अपेक्षा कार्य का सौन्दर्य सानिशय होता है इसलिए उसी का वर्णन किया जाता है, जैसे पर्यायोक के] उक दोनों रदाहरणों में। इन [ उदाइरणों में से मयम उदाहरण]
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में गजासुर की खियों की दशा भी [ वर्णनीय अन एव ] प्रस्तुन ही है, क्योंकि वह मी भगवान् [शिव] के ही प्रभाव से जनित है। इसी प्रकार राङु खियों की दद्या भी [प्रस्तुत हो ] समझी जानी चाहिए। इसी कारण ये स्थल अप्रस्तुतपशसा के नहीं माने जा सकने। जहाँ कहीं फारण प्रस्तुत रहता है और कार्य अप्रस्तुन, साथ ही वर्णन अप्रस्तुत कार्य का किया जाता है वहाँ स्पष्ट ही अप्रस्तुनप्रकसा रहती है [ उसमें पर्यायोक्त की समावना कथमपि नहीं रहती] जैसे 'हन्दु' इत्यादि पद में। इम पद में स्पष्ट ही इन्दु आदि अप्रस्तुत है क्योंकि उनके प्रतिपक्षी मुस आदि हो यहों प्रस्तुत [वर्श्नीय] है। इसलिए यहाँ इन्दु आदि में वर्णिन अजन- लिसत्व [काजल से लिया हुआ होना ] आदि जो अप्रस्तुत कार्य हैं उनमे मुखादि के मीतर [कारणरप] सौ दर्य प्रतीत होता है। औौर बडी सहृदय-हृदय में आनन्दानुभूति गाता है। इसलिए यहां अप्रस्तुतपशसा है। इम प्रकार निर्णय यह दुआ कि पर्यापोक्त वहों होता है जहाँ वाच्य अर्ध अपने ही जेसे [ वाच्यरूप से प्रतीत ] अन्य अर्थ को अपनी शोमा बढ़ाने वाले अर्थ के रूप में व्यजित करना है, किन्तु जहाँ वह [ वाच्य अ्थं] मभ्रस्तुत होने के कारण रवय को ही [व्यजना से प्रतीत] प्रस्तुत अर्थ के प्रति समर्पित कर देता हे वहाँ अप्रस्तुतप्रशसा होती है। और इस प्रक्रिया के अनुसार- रास्तागीरों द्वारा पिजरे से उदाया रायसुआ आपके शशुओं के भवनों में शून्य छज्जे पर लिखिन पक एक के पास जाकर कहा करता है-'राजन्, राजकुमारी मुझे पढा नहीं रही, रानियाँ भो सुप है, अरी कुवडी । खिला मुज, कुमार ! मित्रों के साथ अमी तक मोबन नहीं हो रहा। -'इस वाक्यार्थ में पर्यायोकत ही समझना चाहिए। [काव्यप्रकाशकार आदि ] अन्य [आल० कारिक ] इसके विरुद्ध यह कहते हैं कि यहाँ प्रस्तुन है-'आपको युद्ध यात्रा के लिए उघत जान आपके शज्ु भाग गम ह: यह कारण रूप अथे [उक्त राजशुकवृतान्तात्मक] कार्य रूपी अर्थ अप्ररतुत है, क्योंकि रायसुप की स्थिति का जे वर्णन है वह अप्रस्तुत है [ वण्ये या मुख्य प्रविषाध नहीं है ], अतः वह प्रस्तुत अर्थ के प्रति अपना समर्पण कर देता है, फलत यहां अभ्रस्तुन- प्रशसा हो मानना उचित है। जो हो उक्त निरूपण से यह भसीमाति निक्चित हो चुका है कि पर्यायोक और अपतुनप्रशांसा के विषय मिन्न हैं। अमी जो उदाहरण दिए गए है ये सब साध्म्ये के वदाहरण हैं। चिमशिनी सुपसिद इति सर्वालंकार कारामिभते। तन्नेति द्वयनिर्धारणे। तदेव वणितमिति कार्य मेवोनम्, काग्णत्य गग्यमानरवाव। सतश्चेति हयोरवि कार्यकारणयोः प्रस्तुतर्वान। स्पष्टैवेति। अप्रस्तुतस्यैव कार्यव्य प्रशंसितरवात्। अतश्च द्वयोरपि प्रस्तुनत्वे पर्यायोकमू, मस्तताप्रस्तुतत्वे स्वप्रस्तुतमशांसिति विषयविभाग। अतश सामान्यविशेषयो: प्रस्तुतश्वार्मं मवात् कार्यकारणयो: प्रातुतववेपि कार्यात् कारणप्रतीतिवत् कारणात् कार्यमतीतेव- चिग्यामावाच्च। पर्यायर्वे कार्यहेरवोर्भेंद सामान्ययोस्तथा। अप्रस्तुतप्रशसारया सरुपर्यैव गग्यता।'
यद्येवं तदन पर्यायोकाप्रस्ततपशसयोः प्रस्तुताप्नस्तृतरूपं कार्य प्रस्तुतं कारणं कथमाः गूरयतीत्याशङ्डयाह्ट-एवं चेत्यादि। तारशमेवेति वाच्यम्। स्वोपस्कारकतवेनेति, स्वसिदूबर्थ परश्यानेपात्। समपयतीति वाच्योड्यं। हरयं च 'स्वसिद्ये परातेपः परार्ध स्वसमर्पंणम्। उपाशन लक्षणं घ' इत्युक्त्या छचणाइ्वयाधरितसवादनपोरवान्तरोडप विषयमेदोऽसतीय्य्र
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तात्पयम्। ततश्चेति अनयोर्भिन्नविषयरवात। अन्य इति काग्यपकाशकारादयः। सर्वयेति, तत्र पर्यायो कमप्रस्तुतमशंसा वास्िवत्यमिग्रायः। हइ च साधन्यण सारुप्योदाहरणानां पूर्वमनुद्दिष्ानामपि 'एतानि साधर्म्योदाहरण नी'क्मनेनातिदेशवाक्येन [अतिदेश ] इति निश्चिनुमः। अर्यं हि ग्रन्थो अ्रन्थकृतः पश्चात्. कैरपि पर्त्रिकाभिलिखित इति प्रसिद्धिः। तेश्वानवधानादुदाहरणपस्त्रिका न लिखिता। अतिदेश वाक्य व पत्विनिकानतराल्निखितरितमिति अन्धस्यासंगतर्वम्। बहुनि पुनरुदाहरणानि सारुप्य हेतुकस्य भेदस्य, लचपे प्राचुर्यदर्शनार्थम्। एवं 'ाच्यस्य संभवे उक्तान्येवोदाहरणा
'पराथें यः पीढामनुभवति भङ्गेपि मधुरो यदीयः सर्वेपामिह सलु विकारोऽप्यमिमतः। न संप्राप्तो वृद्धिं यदि स सशमनेत्रपतितः किमिछोर्दोपोड्सी न पुनरगुणाया रुमुबः ।' तथा- 'पातः पूष्णो भवति महते नोपतापाय यसमातू कालेनास्तं क हच न गता यान्ति यास्यन्ति चान्ये। एतावन्त व्यययति यदालोकवाहेसतमोभि- स्तस्मिलेव प्रकृतिमहति व्योनि लब्घोऽवकाशः ॥' तथा- 'पथि निपतितां शून्ये लब्छ्ा निरावरणाननां ननु दधिघर्टी गर्वोन्नद: समुद्धुरकंधरः। निजससुचितास्तारताश्र्ेश विकारशताकुलो यहि न कुर्ते काण काक: कश नु करिप्यति॥' हत्युदाहरणान्यत् मध्पे लेसिवतव्यानि येन ग्रन्थस्य संगतावं स्यासू। अत्र च सारूप्यं साधम्य वाच्यसंभवश्र स्फुट एव । सुप्रसिद्ध=[आनन्दवर्थन आादि ] सभी आलद्वारिकों को मान्य। तन्न = उनमें से अर्थात उन दोनों में से। तदेव वर्णितम्=उसी का वर्णन किया जाता है= उसी का सर्याद कार्य का, वर्णन = शब्दतः कथन, क्योंकि कारण [शब्दतः कभित न होकर ] प्रतीयमान रहता है। ततश्= इसी कारण=अर्थात कार्य और कारण इन दोनों के ही प्रस्तुत होने के कारण। स्पष्टैव =क्योंकि यहाँ अप्रस्तुत कार्य हो शब्दतः कथित है। इस प्रकार 'दोनों ही प्रस्तुत हो तो पर्यायोक होता है, एक प्रस्तुत और एक अप्रस्तुत तो अप्रस्तुतप्रशंसा' यह हुआ [ इन दोनों का ] विषयविभाग। इसलिए 'कार्य सौर कारण तथा सामान्य और विशेष ये दोनों भेद पर्यायोक्त के अन्तर्गत आ जाते हैं अतः अप्रस्तुतपशंसा में केवल सारूम्य ही गम्य होता है।' -इत्यादि जो [ किसी आचार्य ने, अलंकार रत्नाकरकार ने नहीं] कहा है वह ठीक नहीं है, क्योंकि सामान्य और विशेष [दोनों एक साथ] प्रस्तुत बन नहीं पाते, जो बन पाते हैं उन कार्यकारण में भी [अ्रस्तुत ] कारण से [ प्रस्तुत] कार्य की अ्रतीति में वैसा कोई चमत्कार नर्हीं होता जैसा [ प्रस्तुत] कार्य से [ प्रस्तुत ] कारण की प्रतीति में होता है। यदि ऐसा है तो वतलाइए कि पर्यायोक्त में प्रस्तुत मौर अप्नस्तुत-प्रशंसा में अन्रस्तुत कार्य [दोनों में ही] प्रस्तुत कारण को किस रूप में न्यंजित करते हैं [ अर्थाव इन दोनों के कारणांश में भी कोई भेद है चथदा नहीं ] इस [ प्रश्न ] पर [उत्तर ] देते हुए लिखते हैं-एवं च। सादश- मेव=वैसे ही अर्थात वाच्य ही। स्वोपरकारकरवेन=अपनी शोभा बढ़ाने वाले अर्थ के रूप में इसलिए कि इसमें दूसरे जर्थ का आक्षेप अपनी सिद्धि के लिए होता है। समपयति =समपिंत कर देता है अर्थात वाच्य अर्थ समपित कर देता है। इस प्रकार तास्पर्य यह कि [काव्यप्रकान्कार द्वारा कथित] 'अपनी सिद्धि के लिए दूसरे का आक्षेप उपादान कहलाता है और दूसरे अर्थ
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३१० को अपना समर्पण [सर्थात् स्वस्वरूप का सर्वया स्याग ] लक्षगा'-ये जो दो लक्षणाएँ हैं, तक् दोनों अल्कार इन पर नि्मेर रहते है[ पर्यायोक्त उपादान पर और अप्रस्तुनप्रशंसा दक्षण पर] और इनका यह भी एक नवीन विभाजक तत्त्व है। ततश् और [रस कारण ]= इन दोनों में विषय विभाग हो जाने से। अन्य=काव्यप्रकाशकार आदि। सवथा=जो हो, अर्थाव 'राजन् राजसता न' पद् में पर्यायोक्त हो या अप्रस्तुतपरसा। यहाँ इम इस निश्चय पर पहुँचते हैं कि 'ये सब साधम्य के उदाहरण है' इस अतिदेशवाक्य द्वारा साधम्यमूलक सारूप्यवनित अप्नस्तुतप्रशसा के भेदों का अतिदेश भी हो जाता है यद्यपि ये भेद अमी तक दवलाए नहीं गए हैं। बात यह है कि यह अन्थ अ्रन्थकार के पश्चात अन्य कुछ व्यक्तियों ने [ताल आदि की] पष्ठियों पर िसा था, [पनिलिपि की थी ] ऐसी प्रसिद्धि है। उन व्यक्तियों ने भूछ से बदाहरणाश की पपची तैयार नहीं की। और उक्त अतिदेशवास्य सन्य पत्तियों पर से उतार लिया। इसालए गन्थ की सगति टूट गई। नहों तक अप्रस्तुतपकसा के सारूप्यमूलक भेद के उदाहरणों का सम्बन्ध है इसके उदाहरण [अन्यकार ने या मम्मदादि अन्य साचा्यों ने] जो अनेक पदयों द्वारा प्रस्तुत किए वद केवल यह दिखलाने के लिए कि कान्य में यही मेद प्रचुर माता में मिलता है। उक [ लखक-प्रमाद की] बात [समी यहीं आगे आाने वाले] 'बाच्य जहाँ सभव होना है उसके सदाहरण भी ये ही है'-इस अन्थाश के विषय में भी लागू होता माननी चाहिए। इमलिए यहाँ बीच में- 'नो दूसरों के हिए पीडा का अनुभव करता है [ मेरा जाता है], रोडा नाने पर मी जो मधुर ही रहता है, जिसका विकार [गुट्ध-दरकरा आदि ] भी सबको प्रिय होता है, ऐसा इक [ईस, गन्ना, साँटा] यदि विपरीत भूमि में रोप दिया जाय औोर पनप न पाए तो क्या यह उस इध्ु का दोष होगा ! ऊबर मरुभूमि का नहीं ? तथा- 'सूर्यं नारायग डूब जाने हैं इसका तो अधिक दुख नहीं होता, क्योंकि समय आने पर कौन व्यक्ति नहीं हृवा, कौन नहीं दूदता और कौन नहीं टूबेगा, व्यथा इसकी है कि उसी प्रकृति- महान् साकाश में आठोकविरोषी अन्धकार ने घर कर दिया।' तथा- 'मूत्य पथ में सुले मुँह पही दद्दी की मटकी पाकर यदि काना कौआ ग्व से फूल्कर गरदन उठा उठाकर और सेकहो विकारों से भरकर अपने अनुरूप तत तद चेष्टऐँं न करे तो फिर कब करेगा।' -ये उदादरण लिस दिए जाने चाहिए, जिसमे अ्रन्थ [ में विषय] की संगति वन सके। इनमें सासय्य, साध्म्य और वाच्यार्थ की सभवता स्पष्ट रूप से विद्यमान है। चिमर्श-मूछ ग्रन्थ की 'सनिरूपिन पवेति स्थितम्' पंकि के पथान डॉ० राघवन् ने अपने संस्करण में 'सारूये यथा' यह अंच और दे दिया है। इसके आागे उदाहरण वन्होंने भी नहीं दिए हैं। इस प्रकार सारूप्यमूल्क भेद के उदाहरण की कमी सर्वस्त्र के मी संस्करणों में विद्यमान है। यह कमी विमारिनीकार के समय मे ही है जैसा कि उनके उक्त विवेचन से स्पष्ट ह। समुद्र- बन्ध ने भी इस कमी को परखा है और अपनी और से उदाहरण जोडकर ग्रन्थ पूरा कर दिया है। किन्तु संजीविनीकार का ध्यान इस और नहीं गया है। वस्तुन इन दोनों सस्करणों में यहों की सजीविनी अव्यवस्थित है। दोनों ही मंभ्करणों में यहोँ यह पक्ति दी हुई है-'एतानि साथर्म्य इति, वषम्धे तून्नेयानि: मारूध्यहेतुरुं तु नेदमनया नौत्या साधर्म्येण सुज्ञानत्वाद वैधम्ये- जोदाहरति धन्या इति ।' :इम अंश में 'सारूप्य यथा पंत्ति का कोई प्रतोक नहीं मिलना। उसकी
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आव्यकत्ता भी नहीं है। यदि प्रतिलिपिकार ने यह लिसा होता सो वह सदाहरण लिखना न भूलता। इस अंश पर विमशिनी भी धुमित है। उसमें 'वाक्येनातिदेश इति' के स्थान पर 'वाक्येनेति'-इतना ही लिसा मिलता है। 'वाक्येनातिदेश-' योजना इमने सपने मन से की है। इसी प्रकार 'महनि पुनरदा-प्राचुर्यदर्शनार्थन्' पंकिका स्वारत्य इमने सचतानकर निकाला है। स्पष्ट हो अलंकारसर्वस्व की अतियां उसके निर्माण के कुछ ही वर्षो वाद अव्यवस्थित हो गई थी और मूल प्रति नष्ट हो गई थी। [सर्वस्व ] वैधर्म्येण यथा- धधन्याः खलु बने वाताः कहारस्पर्शशीतला। राममिन्दीवरश्यामं ये स्पृशन्त्यनिवारिताः।।'
प्रतीयते। अत्र चाता धन्या इत्यप्रस्तुतादुर्थादहमधन्य इति वैधर्म्यैण प्रस्तुतोऽर्थ
वाच्यस्य संभव उक्तान्येवोदाहरणानि। असंभवे यथा- 'करत्वं भो: कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि साधु विदितं कम्मादिदं कथ्यते। वामेनात वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवन न च्छायापि परोपकारकृतये मार्गस्थितस्यापि मे॥' अत्राचेतनेन सह प्रशोत्तरिका नोपपन्नेति वाच्यस्यासंभव पव। प्रस्तुतं प्रति तात्पर्यात् प्रमुख पव तदध्यारोपेण प्रतीतिरिति युन्यत पवैतल्। उमयरूपत्वे यथा- 'अन्तश्छिद्राणि भूर्यासि कण्टका वद्दवो चहिः। कथं कमलनालस्य मा भूबन् मङ्गुरा गुणा:।' अत्र वाच्येऽर्थे कण्टकानां भंगुरीकरणे हेतुत्वं संभवि छिद्रारणां त्वसंभ- घौत्युभयरूपचम्। प्रस्तुतस्य तात्पर्येण पतीतेस्तद्ध्यारोपात् तन्र संगत मेवैतदिति नासमीचीनं किबित्। एतवेव च श्लेपगर्भायामस्यासुदाहरणम्। वैधम्यभूलक यथा- 'रककमल के स्पर्श से शीतल वनवायु बडी ही धन्य है जो नीवकमल के समान श्याम भगवान् राम को निर्वाधरूप से कृन रहती हैं।' यहाँ 'वायु बन्य हैं' इस प्रकार के अप्रस्तुत अर्थ से 'मैं अधन्य हूँ' यह प्रस्तुत अर्थ वैधम्य के द्वारा प्रतीत होता है। जहाँ वाच्चार्थ संभव होता है उसके उदाहरण पूर्वोक्त वदाहरण ही हैं। वाच्य जहाँ असंभव होता है उसका उदाहरण यह है- 'दुम कौन हो, भाई ! बतलाता हूँ, मुझे भाग्य का मारा शासोटक समझो। तुम तो ऐेसे दोल रहे हो जैसे विरच हो। अपने ठीक समझा। ऐेसा क्यों! बतलाता हूँ। यहां जो वोईे ओर बढ़
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का पेड है, रास्तागीर इसका सेवन सब प्रकार से करते है, मै तो रास्ते पर हो कगा हूँ किन्दु मेरी छाया तक दूसरों का लाम नहीं कर पाती।' -- यहाँ अचेतन के साथ प्रश्नोत्तर नहीं हो सकते इसलिए चाच्यार्थ असंमव हो है। वह प्रसतुन के प्रति तत्पर है, अत पहले उस [प्रशतुत] का आरोप हो जाता है तम [ वाक्यार्थ की] प्रतीति होती है, फलत यह [प्रश्नोत्र ] समव हो जाता है। उमयरूप [समव और अस्मव वाच्य] का उदाहरण यथा-
कैसे न हो।' भीतर बहुन से छिद्र हैं और बादर बहुन मे कटि। मला कमल नाल के गुण [ तन्तु] मगुर
यहा [ तन्तुओं के ]भह्गरत्व में कांटों की कारणता समव है [काटो में उलझ कर बागे, सूत्र, कपड़े फट ही जाते है] किन्तु छिद्रों की कारणना समय नहीं है [ तन्तुनिमित वस्त्रादि में छिद तो रहते ही हैं, उनसे वख नष्ट नहीं होता] इसलिए [यहां बाच्याय] उमयरूप है [ समव मी है और मसंमव मी]। प्रस्तुत की प्रतीति सात्पर्यविषयोभून मर्य के रूप में होनी है अत उस [प्रस्तुत ] का [अप्रस्तुत पर ] आरोप हो जाता है। फलत" यह [अप्रस्तुत भी] यरहां स्गत हो है। फलत यशा कोई दोष नहीं आता। इटेपगर्मित इस [अप्रस्तुतपशसा] का उदाहरण भी यही है। विमर्शिनी तदभ्यारोपणेवि प्रस्तुतारोपेग। पतदिति अचेतनैन सह प्रश्नोत्तरकरणम। एतच्छ सामान्मादिमेदुपछकं वाच्य सदर्थान्तरन्यासदशन्तयोविषयो सवति। अन्यथा पुनरसया श्वेति दर्शयितुमाह-तत्रेत्यादिना। सदध्यारोपेग= उसके अध्यारोप के द्वारा= प्रस्तुन के आध्यारोप के द्वारा। पुतव्= यह अर्थाद अचेवन के साथ मद्नोत्र। 'ये जो सामान्यादि पांच मेद है ये यदि वाच्य [मात्र] होते हैं तो अर्थान्तरन्यास और दृष्टान्त के विषय बनते हैं, नहीं तो इसी [अप्रस्तुतप्रशसा ] के'- यह दिखलाने के लिए कहते हैं- [सर्वस्व ] वदन सामान्यविशेषत्वेन कार्यकारणरचेन सारुप्येण च यदू भेदपञ्च कमुहिएं तथ वयो: सामान्यविशेषयो: कार्यकारणयोश्च यदा वाच्यत्वं भवति तदार्पा- न्तरन्यासाविर्भाष। सरूपयोस्तु वाच्यत्वे दष्टान्तः। अमस्तुतस्य घाच्यतचे- पस्नुतस्य गम्यवे सर्वप्स्तुतप्शंसेति निर्णयः। यहाँ यह निक्कर्ष निकलता है कि ये जो सामान्यविशेषमूलषक कार्यकारणमानरमूलक तथा साटृव्यमूटक पांच भेद बतलाए गए हैं इनमें जब [आदिम ] दो [मेदों] में सामान्य और विशेष तथा कार्यें और कारण [ये दोनों ही अर्थ] वाच्य होते हैं तो [अलकार] निपन्न होता है अर्थान्तर यास, और जब [सादृश्यमूलक भेद के] दोनों समान सथे वाच्य होने हैं तो दृष्टान्न। किन्नु वहाँ सवंधा अप्रस्तुतप्रशंसा ही होती है जहां अप्रस्तुत वाच्य होता है और प्रस्तृत गम्य । विमर्शिनी सर्वधेरय ने नत् पणस्थाध्य मिचार उच।
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सर्वथा कइ कर यह संकेत किया कि अप्रस्तुतप्रशंसा का जो लक्षण बनाया गया है वह दूसरे अलंकारों में संक्रान्त नहीं होता। विमर्श-यहाँ एक ध्यान देने की बात यह है कि कार्य से कारण की प्रतीति चाले भेद में मग्स्तुतप्रशंसा से पर्यायोक का अन्तर ग्रन्थकार ने वही कहकर किया है जो कहकर अप्रस्तुतप्रशंसा से अर्थान्तर न्यास का अन्तर कर रहे हैं। उन्होंने पर्यायोक में भी कार्य को प्रस्तुत ही वतलाया है कैसा कि यहाँ अर्थान्तरन्यास में भी बतला रहे है। फलतः पर्यायोक और अर्थान्तरन्वास के बीच भेदक तत्त्व का विचार करना है। ग्रन्थकार ने इस विषय पर यहां और इन दोनों सलंकारों के प्रकरण में भी कुछ नहीं लिखा। विमर्शिनीकार भी चुप हैं। इसलिए कि अन्तर स्पष्ट है। यह कि अर्थान्तरन्यास में कारण दोनों वाच्य रहते है जन कि पर्यायोत में केवल कार्य ही वाच्य होता है। इसीलिए अर्थान्तरन्यास में समर्थ्यसमर्थकमाव बन जाता है, पर्यायोक में नहीं। अम्रस्तुतप्रशंसा का पूर्वेतिहास-
मिलता है- भामह-मामह् में अप्रस्तुतप्रशंसा के भेद नहीं मिलते। सामान्य लक्षणमान इस प्रकार
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्व या स्तुतिः। श्रपस्तुतप्रशंसेति सा चैव कथ्यते यथा॥ १२९॥ प्रीणितप्रणयि स्वादु काले परिणतं बहु। विना पुरुपकारेण फलं पचयत शाखिनाम् ॥३६३० ॥। -अधिकार = [अकरण ] से अलग [अप्राकरणिक ] किसी अन्य पदार्थ की जो स्तुति उसे 'अप्रस्तुतप्रशंसा' इस नाम से कहा जाता है। यथा- -- याचकों को संतुष्ट करने वाले, सवाद, समय पर फले तथा विशाल फल, देखो तो, वृक्षों में चिना ही पुरुषार्थे के लंग गए हैं।' यहाँ मामद ने प्रशंसा शब्द का अर्थ स्तुति किया है। वस्तुतः प्रशंसा का अर्थ केवल कथनमात्र है। परवर्सी आचार्यो ने यही अर्थ माना है। वामन :- वामन के यहा अप्रस्तुतप्रशंसा का स्वरूप अत्यन्त सूमिल और अस्पष् है। उसका अन्तर्माव अतिशयोक्ति के निमीर्याध्यवसान भेन में हो जाता है। वामन का अप्रशंसाविवेचन यह है- [सूत्र ] [ उपमेयस्य ] किचिदुक्तावप्रस्तुतप्रशंसा। [वृत्ति] उपमेयस्व किचिल्लिह्गमात्रेणोक्ती समानवस्तुन्यासोऽप्रस्तृतप्रशंसा। यथा- 'लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शश्षिना सह संप्लवन्ते। उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलिकाण्डनृणालदण्डा: ।।1 अ्प्स्तुतस्यार्थस्य प्रशंसनमप्रस्तुतपसंसा । -अपमेय का सकितिकरूपमात्र से ही उल्लेस हो और पधानरूप से उत्लेख हो तत्समान पदार्थ का तो अप्रस्तुतप्रशंसा होती है। जैसे [ किसी युवती के वर्णन में कथित यह वक्ति ]-'यह तो कोई एक मिन्न ही लावण्यसिन्धु है जिसमें कमल [ नेत्र ] चन्द्रमा [सुखमण्डल] के साथ तैर रहे है। साथ ही जहाँ हाथी के कुम्म [गतन] उमर रह्े हैं और जहाँ कोई दूसरे ही कदली के काण्ड तथा मृणाल के दण्ड भी विद्यमान हैं।' अप्रस्तृत की प्रशंसा होने से यह अप्रस्तुतप्रशंसा नाम से पुकारी जाती है।'
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३९४ अलङ्गारसर्वस्वम्' स्पष्ट हो भामह और वामन केबछ सारूप्यमूलक भेद को दी अपरतुतपशमा बतला रहे हैं। वामन इसीलिए इसे उपमा का अवान्तररूप बतलाते हैं उनका उदाहरण स्पष्टरूप से अतिशयोकि का ही उदाहरण है। उन्भट= अद्रट ने भामद के लक्षण की प्राय ज्यों का त्यों अपना लिया है- 'अधिकाराद्पेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तृति। अप्रस्तुनप्रशत्ेय प्रस्तुतार्थानुबन्धिनी।' -- अधिकार [प्रकरण ] से दूर किसी अन्य अर्थ की ऐसी स्तुति जो प्रकृत अर्थ से सबन्ध रखती है अप्रस्तुनप्रशसा कदलाती है। स्पष्ट ही उ्ट ने मामइ से आगे बढकर एक ही बात कही। वह है अप्रस्तुन का प्रस्सुत से सबद्ध रहना। उन्होंने उदाहरण दिया- यान्ति स्वदेहेषु फलपुन्पर्द्िमा जोड्रपि दुर्गदेदवनग्रिय ।।' -दुगम स्थान की वनशी फल और फूल की समृद्धि से युक्त होने पर भी उपमोक्ता न मिन्ने से अपने देह में ही जरा को प्राप्त हो जानी है।' यह वाक्य अविवाहित और अस्ृश्य या अभ्युच्च वश की सुन्दरी को लक्ष्य कर कहा गया है। अनः यह अप्रस्तुतप्रशसा का सारूप्य- मूषक भेद है। इसके अतिरिक अन्य भेद उद्ट में मामद और वामन के ही समान नहीं मिलते। अप्रस्तुनप्रशमा नाम के विषय में मामह और उद्धट का मत एक ही है। सुद्र्ट=स्ट्रट के काव्यालकार में अपस्तुतप्रशंसानाम से कोई अहकार नहीं मिलता। अन्योकि नाम से जो अलंकार मिलता है उसे साप्यमूलक अप्रस्तुतप्रशस्ता माना जा सकता है। अन्योंकि का निरूपण स्ट्रट ने इम प्रकार किया है- असमानविश्वेपणमवि यत्र समानेतिवृत्तमुपमेयम्। सक्तेन गम्यते परमुपमानेनेति सान्योति-॥। रा७ ॥i यथा- मुकत्वा सलोळइम विकसितकमलोज्ज्वल सर सरसम्। बकलुलितअल पल्वलमभिलषम सखे। न हसोडसि ॥' -जश़ो केवल उपमान ही कहा जाए और उपमेय विशेषणों की उमयार्थकता न रहने पर मौ केवल इतिवृत्त की समानतामात्र से आक्षिप्त हो वह [अनकार] अन्योकि कहलाता है। यया- -'मित्र! इसों की लीला से युक्त, खिले कमलों से उद्भासित तथा सरस जलवाले सरोवर को छोटकर बगुलों से गदे गढढे को चाह रहे हो, तुम हम नहीं हो।' यहाँ विदग्धगोष्ठी को छोड उपनों के गिरोह में जा रहे किमी शिष्ट मिप ने उपलम्म किया है। सारूप्यमूलक अप्रस्तुत- पशसा का यह एक उत्तम उदाइरण है। भामइ, वामन और उद्टट के उदाइरणों की अपेक्षा यही इमका वास्तविक बदाहरण माना जा सकना है। मम्मट=अप्रसतुतप्रशंमा का जी निरूपण अदंकारसवस्वकार ने किया है उमका आधार मम्मट का अपरतुन प्रशसाविवेचन है। मम्मट ने उक्त पाँचों भेद स्वीकार किए हैं, और मारूप्यमूलक भेद के सनेक बदाहरण दिए है। 'करल मो ' मथय मम्मट ने भी उद्यृत किया है और उस पर चेननारोप की बान आनन्दवर्न के ही समान कही है। 'पनव वस्य' पद्य मी मम्मट ने वद्भृत किया है। 'राजन् राजसुना' पद्य में उन्दोंने अप्रस्तुतमरासा ही मानी है जिसपर सवेस्वकार नै अपनी विमति व्यक्त की है। मम्मट का अप्रस्तुतप्रशस्ा निरूपग इस प्रकार है-
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[लक्षण= ] 'अपरस्तुतप्रशंसा या सा सैव प्रस्तुताश्रया। [भेद =] कार्ये निमित्ते सामान्ये विशेषे प्रस्तुते सति। तदन्यत्य वचस्तुत्ये तुल्यस्ेति च पख्ा। लक्षण पर वृत्ति लिखते हुए मम्मट ने अप्रस्तुतप्रशंसा नाम पर अपना मामद तथा चन्द्र के मत से भिन्न मत संकेतित किया है-'अप्राकरणिकस्याभिधानेन प्राकरणिकस्याक्षेपोऽपस्तुत प्झंसा "' अर्थाद- [भमस्तुत = ] अप्नाकरणिक [अर्थ) की [प्रशंस्षा=] अभिषा द्वारा उत्ति से प्राकरणिक अर्थ का आक्षेप होने के कारण अदकार का नाम अप्ररतुतप्रशंसा पढ़ता है। लक्षण में भी मम्मद ने अप्रस्तुतप्रशंसा शब्द को यौगिक शब्द के रूप में अपनाया है और उद्भट के 'मस्तुसार्थानु- बन्धिनी' पद का अर्थ अपनाकर 'पस्तुताश्रया' कहते हुए उन्होंने लक्षण के रूप में अम्रस्तुतप्रशंसा शब्द को ही पर्ताप बतला दिया है। उनकी लक्षपकारिका का अनुवाद होता- 'प्रस्तुताश्रित जो अप्रस्तुतप्रशंसा वही अप्रस्तुतप्रशंस।'। विमर्धनिनीकार ने सादृश्यमूलक भेद के जो अनेक मेदों का संकेत दिया है उसका मूल मम्मद का विनेचन ही है। मम्मट ने लिसा है- 'तुल्ये प्रस्तु ते तुल्याभिधाने नयः प्रकारा, इ्लेपः, समासोकि, सादृश्यमानं वा तुल्यात तुत्यस्य साक्षेपे हेतु: ।'- -अर्थात् प्रस्तुत तुल्य के अप्रस्तुत तुल्य से आक्षेप में तीन भेद होते हैं, क्योंकि तुल्य से तुल्य के आक्षेप में दलेप, समासोकि और सादृड्यमात्र ये तीन हेतु होते हैं। यहाँ दलेप का अर्थ दवर्यतामाय्र है। इसी प्रकार समासोकि का अर्थ भी संक्षेप में अनेकार्यानु- रुप शब्दयोजना है। इलेपालंकार या समासोकिअलंकार नहीं। इन तीनों के एक एक उदाहरण देने के पश्ात मन्मट ने यह भी स्पष किया है कि अप्रस्तुतप्रशंसा में कही चेतन का अध्यारोप अपेक्षित नहीं होता, कहीं अपेक्षित भी होता है तो या तो सर्वात्मना या फिर अंशतः। 'कर्त्वं भो:' पद को उन्होंने सर्वात्मना अध्यारोप का उदाहरण माना है। मम्मट ने साधर्म्य-वैधर्म्य की चर्चा नहीं की है, न तो पर्यायोक, दष्टान्त तथा अर्थान्तरन्यास के साय सान्यवैपम्य ही उन्होंने वतलाए। सवंस्वकार का अप्रस्तुतप्रशंस्षा में यही ऐसा योगदान है जिसे मन्मट से आगे वढ़ा हुआ कहा जा सकता है। शोभाकर-परवर्ती शोमाकर ने अप्रस्तुत में एक नवीन विचार छेड़ा है। वह है द्वितीय सर्थ की प्रतीति करानेवाली शब्दवृत्ति का। आनन्दवर्धनाचार्य ने अप्रस्तुतम्रसंसा में द्वितीय र्थे की प्तीति व्यंजना द्वारा मानी थी । मम्मट ने उसका विरोध नहीं किया। शोमाकर का कहना है कि यहां द्वितीयार्थ की प्रतीति व्यंजना से न होकर लक्षणा से होती है। उनका कहना है कि- 'अप्रस्तुत अर्थ प्रस्ताव अर्थात प्रकरण के द्वारा वाषित हो जाता है, सतः उसकी सादृश्य आदि सम्बन्ध के आधार पर प्रकरणानुरुप अर्थ में रक्षणा हो जाती है। इसका प्रयोजन होता है प्रस्तुत अर्थे का प्रतिपादन छिपाकर करना। इस प्रकार इसमें लक्षणा के मुख्यार्थवाष, मुख्यार्थसम्वन्ध तथा प्रयोजन ये तीनों हेतु विद्यमान रहते हैं। व्यंजना वहां होती है जहां वाच्यार्य वामित नहीं रहता।' शोभाकर ने इस विषय में किस अशात आचार्य की एक कारिका भी उद्वृत की है- 'मुख्यार्थवाधादिसमस्तहे तुयोगादसी लक्षणदव सुक्ता।' दिमशिनीकार ने कदाचिद दसी धारणा पर उपादान और लक्षणरक्षणा की चर्चा चलाई है। रत्नाकरकार ने यहां जिन लक्षणामेदों का नाम दिया है नें इनसे मिन्न हैं।
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रत्नाकरकार यहां लक्षगा के कौन से भेद मानना चाहते हैं यह उनके लेख से स्ष्ट नहीं होना। यघपि पर्यायोकालंकार में आए इसी प्रकार से लगता है कि वे अप्रस्तुतप्रशंसा में भी उपादानलसणा ही मानते हैं। यद्यपि सर्वस्वकार ने भी 'यत्र वाच्योञ्योडर्यान्तर स्वोपस्कारकत्वे- नागूरयनि नत्र पर्यापोक्तम्' तथा 'यत्र पुन स्वात्मानमेवाप्रस्तुनत्वाद प्रस्तुनमर्थान्तरं प्रति समण्यति तन्रा प्रस्तुनप्रशसा' इन पक्ियों के द्वारा मम्मट की 'स्वसिद्धये पराक्षेप' तथा 'परार्ये स्वसमर्थनम्' इस लक्षमानिरूपक कारिका की पदावली से मिलनी जुलती पदावली में पर्यायोक्त से अप्रस्तुत प्रशसा का भेद दिखलाया है तथापि उनमें उनका प्रतिपाध लक्षगा नहीं है। उनके उक्त कथन का अर्थ केवन इनना ही है कि पर्यायोक में व्यग्यायें वाच्यार्थ की शोमा बढाता है और अप्रस्तुत- प्रशंसा में उससे उळटे वाच्या्ये हो व्यग्यार्थे की भौ। आगूरण शब्द को मम्मट ने व्यंजना का पर्याय माना है [ द्वितीय व्लासान्न]। पण्टितराज ने सी अप्रस्तुतप्रयसारयो प्ररतुन व्यव्यमिति निरवि- वादम्' [अप्रस्तुनप्ररसाप्रकरण का अत] इस प्रकार अद्रस्तुनप्नरास्ता में प्रस्तुतार्य को व्यंजनालम्य हो माना है। वहा अनिशयोकति से अन्तर करने हुए उन्होंने अप्रस्तुतप्रशंसा में सकणा का खण्डन मी किया है। लक्षणा मानने से अप्रस्तुतप्रशस्ा के साहश्यमूक्षक भेद का अतिशयोकति से अन्तर नहीं किया जा सकेगा। अन्य भेदों में कार्य की कार ण में अथवा कारण की कार्य में क्षणा माननी दोगी, जो असंगत होगी मयोंकि कार्यकारण के बीच हुई लक्षणा का प्रयोजन कार्य और कारण के बीच अमेद सिद्ध करना ही होता है जैसा कि 'घृन आयु है' आदि प्रयोगों में देखा लाता है। अप्रस्तुनप्रशसा में अभेद की विवश नहीं रहती। केवछ छिपाकर कहने की विवश्ा करती है। इसीलिए पण्डितराज नगन्नाथ ने भी अप्रस्तुतप्रशंसा में दोनों अर्थो में भेद हो माना है और इसी तर्क पर लक्षगा का सण्डन किया है। दरष्टन्य-'वाच्यार्थताटस्थ्य नैव व्यछग्यप्रतीतेः सर्वसदृदय- सम्मतलवाद' [ अप्रस्तुतप्रशसाप्रकरणान्न] फलन. विमसिनीकार के द्वारा मो इस प्रकरण में लक्षणा का अस्तित्व मानना रस्नाकरकार आदि की सवस्व की इन पक्तियोंके विषय में वनी अन्यया धारणा का प्रमाव मानना दोगा। शोभाकर का अप्रस्तुनपशसालक्षगारम प्रकार है-
-अप्रस्तुन से अन्य की प्रतीति अप्नस्तुमन्सा ।' अप्रस्तुतप्रशसा का प्रवाह अप्पयदीक्षिन तक आकर समुद में गिरती गगा के प्रवाह के समान बहुमुखी दो गयी। समासोकि में प्रस्तुन से अप्रस्तुन को व्यंजना होती थी और अप्रस्तुनप्रशंसा में अप्रस्तुन से प्रस्तुन की। एक स्थल ऐमा मिला जिसमें प्रतीत होने वाला द्वितीय अर्थ भी प्रस्नुत ही रहता है और पनोति कराने वाला प्रथम अर्थ भो। अध्ययदीक्षित ने उसे एक पृथक अतकार बतलाया और उसे परिकरांकुर के समान प्रस्तुनांकुर नाम दिया। उसका निरूपण इस प्कार किया- 'पस्तु नेन प्रस्तुतस्प घोतने प्रस्तुताङुर,। [ यथा-] कि मृह ! सत्यो मालत्या केतक्या कण्टकेदवा। -प्रस्तुन से प्रस्तुत का [ हो] दोतन हो तो अलकार प्रस्तुतांकुर होगा। यथा- -अरे मृद् ! मालती के रद्दते हुए कटीली केतको से क्या। अप्पयदोक्षित के अनुमार यह उक्ति नायक के साथ उद्यानविदार कर रही नायिका की है, फलत-यदां मृङगपक्ष भी प्रस्तुत ही है और सन्दर कुलवधू को छोट करूर वेश्या के प्रति आाकृष्ट होने वाले नायक का पक्ष भी पस्तुत ही है। इसी प्रकार 'करत्वें भो: कथयामि०' पद्य में भौ भप्पय- दीक्षित ने प्रस्तुतांकुर ही माना है। उनका करना है कि अचेतन के साथ भी माउचीत संभव है
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अप्रस्तुतमर सालद्कार: ३९७
असंभव नहीं, मोलेपन में या अधिक माधुकता में ऊपर भृद्ध के प्रति नायिका की वक्ति के समान शाखोटक के साथ भी पथिक की उक्ति वन सकती है। पण्डितराज जगन्नाथ ने ऐसे स्थलों में अप्रस्तुतप्रशंसा ही मानी है। उनका कहना है कि 'अप्रस्तुतमशंसा में अप्रस्तुत शब्द का अर्थ है वह अर्थ जो मुख्यतात्पर्यविषय न हो।'-'अप्रस्तुत श ्देन हि मुख्यतात्पर्यविषयीभृतार्थातिरिक्तोर्डयों विनक्षितः [द्रष्व्य ररुगंगाघर ५४२ निर्णय० संस्क० ६] भृंग के प्रति नायिका की उपर्युक्त उक्ति में नारयिका का मुख्य तात्पर्य नायक की चपलता की ओर इंगित करना है। मृद्गचेष्टा तो वहां माध्यम मात्र है। आगे चलकर पण्डितराज भी वदक गए हैं। उन्होंने एक प्रश्न उठाया कि यदि ऐसा कोई स्थल हो जिसमें विशेषणगत इ्लेष न हो किन्तु प्रस्तुत से अपरतुत की प्रतीति हो रही हो वहां समासोक्ति मानी नहीं जा सकेगी क्योंकि समासोकि विशेषण इलेप पर निर्भर रहुती है। अस्तुत- प्रशंसा इसलिए नहीं होगी कि वदां प्रस्तुत से अप्रसतुत की व्यंजना रहती है। तव वहां कौन सा अलंकार माना जाएगा। उदाहरण के रूप में उन्होंने निम्नलिखित पद्य बनाया- 'आापेदिरेडम्बर पर्थ परितो विछ्ङ्ा मृक्गा रसालमुकुलानि समाययन्त। संकोचमज्जति सरस्त्वयि दीनदीनो मोनो नु हन्त कतर्मा गतिभम्युपैतु॥ -हे सरोवर! तुम चिलकुल सूखने लगे तो पंख वाले पखेरू आकाश में उड़ गए, मौँरे काम्रमंजरी पर जा बैठे। परन्तु यह अत्यन्त दीन मीन कहा जाए।' -- यहां सरोवृत्तान्त हो प्रस्तुत हो और राज्यनाशोन्मुख राजा अथवा संपततिनाशेन्मुख आश्रयदाता अप्रस्तुत तो सामान्यतः न तो समासोकि मानी ना सकेगी क्योंकि विशेषणों में द्वयर्थकता नहीं है, और अप्स्तुतमशंसा मी नहीं मानी जा सकेगी क्योंकि यहां वाच्यार्थ प्रस्तुत है अप्रस्तुत नहीं। पण्डितराज इसका उत्तर न दे सके। उन्होंने यहाँ अपरतुतप्रशंसा को ही मान्य ठइरादिया। उन्होंने कहा कि अपस्तुतपशंसाशब्द का अर्थ अप्रस्तुत की प्रशंसा करने के साथ ही अप्रस्तुत से मशंसा भी किया जा सकता है। अर्थात् अप्रस्तृतप्रशंसा शब्द में पछीतत्पुरुप के साथ तृतीया तत्पुरुप भी माना जा सकता है। द्वितीय अर्थ के अनुसार उक्त पद्यार्थ में भी अप्रस्तुप्शंसा मानी जा सकेगी । पण्डितराज की पंक्तियां हैं- 'अप्रस्तुत प्रशंसेवान्नालंकारः 1 अप्रस्तुतस्य प्रशंसेति न तदर्थः कि त्वप्रस्तुतेनेति। सा चार्थात प्रस्तुतस्येव। एवं च वाच्येन व्यत्तेन वा अप्रस्तुतेन वाच्य व्यकं वा प्रस्तुतं यत्र सादश्यान्यक्षम- प्रकारेण प्रशस्यते साऽप्रस्तुतप्रशंसेति, न तु वाच्येनेव व्यव्यमेवेति। -उक्त स्थिति में भी अलंकार अप्रस्तुतप्रशंसा ह होगी। वहाँ उसका अर्थ अप्रस्तुत की प्रशंक्षा न होगा अपि 'अप्नस्तुत से प्रशंसा' होगा। अर्थोत प्रस्तुत की प्रशंसा। इस प्रकार अग्रस्तुत- प्रशंसा का लक्षण होगा कि 'वाच्य या व्यकग्य अप्रस्तुत के द्वारा वाच्य या व्यंग्य प्रस्तुत की प्रशंसा जहाँ सादृश्यादि पांच प्रकारों में से किसी एक प्रकार से हो वह अप्रस्तुतप्रशंसा' न कि वाच्य के ही दारा व्यंग्य की ही प्रशंसा हो तो।' पण्डितराज ने अग्रस्तुतमशंसा का लक्षण इस संशोधन के बहले इस प्रकार किया था- 'अप्स्तुतेन न्यवहारेण सादृय्यादिवक्ष्यमाणप्रकारान्यतमप्रकारेण प्रस्तुतव्यवदारो यत्र प्रशस्यते- साडप्रस्तुतप्रशंसा ।'
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-जहाँ अप्रस्तुत व्यवदार से सादृश्यादि [पाँच] प्रकारों में से किसी प्रकार के द्वारा पस्तुत व्यवहार का प्रशस्तीकरण हो वह अप्रस्तुनप्रपासा प्रशसा का अर्थ करते हुए उन्होंने स्पष्ट लिया-'प्रशसन च वर्णनमात्र, न तु स्तुति, विक नान्म्योन्नवर्ता सस्य च्छायापि नोपकाराय'- रत्यादावव्याप्त्यापत्ते।' अर्थात् 'प्रदासा का सर्थ यहाँ केवल वर्गन है, स्तुति नहों, क्योंकि 'ताभ की उचना को विकार है जिसकी छाया तक उपकार में नहीं अनो'-इत्यादि अप्रस्तुतप्रशसाओं में ल्कषण सगन न होगा। इम लक्षण में पण्टितराज ने प्राचीन आचार्यों का मुलाहिजा तोडकर नवौन व्यवस्था प्रस्तुन को थी। प्राचीनों ने अप्रस्तुन का शब्दत, कपन चमत्कारदेतु माना था और अप्रस्नुतप्रशमा शष्द्र की वैसी ही व्यारया की थी। पण्डितराज ने यहाँ चमत्कारदेतु नाना अप्रस्तुन द्वारा प्रस्तुन के वर्गन को। वर्गन शब्द का अर्थ उन्होंने नान मात्र माना है क्योंकि भेद करते हुए लिन्ा है 'इयं च पक्चता अप्रस्तुतेन प्रस्तुन गम्यते यस्यामित्येका'। परवर्ची समोधिन लक्षण में उन्होंने 'प्रशस्यने= प्रशस्तीकरण' का अर्थ स्पष्ट नहीं किया। किन्तु वे यहों प्रशसा का अर्थ प्रस्तुन की शोमादृद्वि को छोढ़कर और कुछ कर हो नहीं सकने। क्योंकि अन्य कोई अर्थ 'आपेदिर' पद्यार्थ जैमे पद्यार्थ में लागू नहीं होगा। औीर शोभावृद्धि अर्थ का वे समासोकि से अप्रस्तुवनरासा को मिन्न नहीं कर मकने। ममासोकि में अप्रस्तुत के द्वारा प्रस्तुत की शोभा दढाई ही जानी है। नागेश ने यह आपति उठाई ही और 'आपेदिरे०' पद्य में इसी कारण समासोकि ही मानी। शोमा बढाने की दान कार्यकारणमाव और मामान्यविशेषभाव में कट जाएगी। वहाँ आपम में किमी की किमी से शोमा नहीं बढती, केवल 'छिराव' की बरा द्वारा वाक्यार्थ की शोमा बढाई जाती है। जहाँ तक समासोकि शब्द के अर्थ का सबन्ध है उसका जो अर्थ विशेषगशलेष द्वारा संक्षेप में दो मिन्न मिन्र पदार्थो की उत्ति किया जाता है वह 'आपेदिरे' पद्यार्थ में अवश्य नहीं है क्योंकि वहाँ स्लेप नहीं है तथापि समामोकि शब्द को इनेष मे न बांध कर उसका अर्थ किमी मी प्रकार 'रक्षेप में अधिक अर्थ की उक्ति' कर लिया नाय तो वैसी कोई आपति नहीं उठनी। वस्तुनः प्रस्तुन के स्थान पर अप्रसतुत के कथन को ही अप्रसनुनप्रशसा का चमत्कारकेन्द्र मान कर हम अलकार को अन्य अलकारों से मिन्न किया जा सकता है। पण्टितराज ने प्रश्न नो मार्मिक रठाया किन्तु समामोकि को केवल विशेषणश्लेष से जकडकर वे समापान ठोक नहीं दे पाए। पण्डितराज की इस पलायनवृत्ि पर विश्वेशर चुप रह गए यह आश्चर्य का विषय है। उन्होंने उक्त अन्य सत विषयों पर विचार किया किन्तु पण्टितराज द्वारा 'आपेदिरे' पद्य पर अरनाए नए पय की और देसा नक नही। विद्याचकवत्तों ने अप्रस्तुनप्रशमा का भारसक्षेप इस प्रकार किया है- अप्रस्नुतप्रपसा तु मा सामान्यविशेषादिविच्छित्या पक्चषा मना ॥ भवेत् साधर्म्यवैधम्ययोगत सा पुनतिया। ममवे:समने दैपे वाच्यस्याव पुनस्त्िधा॥ प्रस्तुनस्यावगम्यत्वात् पर्यायोक्ताद विमिद्यन।
-अप्रस्नुनप्रशसा रह है जिमने प्रस्तुत का ज्ञान अन्य [अप्रस्तुत] से हो। वह मामान्य विशेष आदि प्रकारों मे पाच प्रकार की मानी गई है। -वह साध्म्ये तथा वैधर्म्य के द्वारा पुन दो प्रकार की होती है। इसी प्रकार वाच्य के समत्र, असमव तथा दोनों प्रकार के हाने से बही तीन प्रकार की भी हो जाती है।
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-यहाँ प्रस्तुत सर्थ प्रतीयमान होता है इस कारण यह पर्यायोक से मिन्न सिद्ध होती है और इसी कारण अर्थान्तरन्यास तथा दृष्टान्त से भी।
[सर्वस्व ] उत्तन्यायेन प्रापावसरमर्थान्तरन्यासमाद- [सू० ३६] सामान्यविश्येषकार्यकारणमावा्या निर्दिष्टप्रकृत- समर्थनमर्थान्तरन्यासः । निर्दिष्टस्याभिहितस्य समर्थनार्हस्य महतस्य समर्थकात् पूर्वे पश्चाद्वा निर्दिषटग्य यत् समर्थनमुपपादनम्, न त्वपूर्वत्वेन प्रतीतिरनुमानरूपा सोड- र्थान्तरन्यासः। तन सामान्यं विशेपस्य विशेषो वा सामान्यस्य समर्थक इति द्वो मेदौ। तथा कार्य कारणस्य कारणं वा कार्यस्य समर्थकमिस्यपि द्वौ भेदौ। त भेदचतुष्टये प्रत्येकं साधर्म्यवैधम्या्यां मेद्दयेडप्टी भेदाः।
भेदान्तरसंभवेऽपि न तद्गणना सहृदयहृद्यहारिणी, वैचिन्यस्याभावात्।
उक्र हेतु [सामान्य विशेष तथा कार्यकारण दोनों के वाच्य होने] से [ अर्थान्तरन्यास निष्पन्र होता है अतः अप्ररतुतप्रशंसा के पश्ाद उसका ] अवसर प्राप्त है फलतः अव अर्थान्तरन्यास का विचार करते हैं- [सू० ३६] किसी निर्दिष्ट [ शब्दतः कथित] प्रकृत अर्थ का समर्थन सामान्यविशेष- भाव या कार्यकारणमान सम्बन्ध के द्वारा हो तो [अलंकार का नाम ] अर्थान्तर न्यास [होगा] । [वृत्ति ] निर्दिष्ट अर्थोव अभिवावृत्ति के द्वारा कयित। समर्थन की अपेक्षा रखने वाले प्रकृत [वर्णनीय ] अर्थ का समर्थन करने वाले अर्थ के पहले या उसके पश्चातू शब्दतः निर्देश करके जो समर्बन अर्थात उपपादन किया जाता है वह अर्थान्तरन्यास कहलाता है, बिना निर्देश के पहदले से अशात प्रस्तुत का समर्थन अर्थान्तरन्यास नहीं कहला सकता क्योंकि इस प्रकार का ज्ञान अनुमान का विषय बनता है क्योंकि वहां सामान्य से विशेप या विशेष से सामान्य का अनुमान आ पहुँचता है, इसी प्रकार कार्य से कारण का भी। इनके दो भेद होते है- एक वह जिसमें सामान्य विशेष का समर्थक बनता है और दूसरा वह जिसमें विशेष सामान्य का। इसी प्रकार जहां कार्य से कारण का तथा कारण से कार्य का समर्थन होता है, इसके वे भी दो भेद होते हैं। इन चारो भेदों में से प्रत्येक भेद साधर्म्यमूलक तथा वैध्म्यमूलक होकर दो प्रकार के होते हैं। फलतः इसके भाठ भेद हो जाते हैं। [उद्धट के अनुसार] इसके और भी भेद संमव हैं। जैसे कहीं इसका 'हि'-क्योंकि [आदि] श्भ्दों के द्वारा अभिधान रहता है और कहीं नहीं। कहीं इसमें समर्थनीय अर्थ का समर्थक अर्थ के पदले निर्देश रहता है और कहीं बाद में, किन्तु ये भेद सहदयों के चिस्त आकृष्ट नहीं कर पाते क्योंकि इनमें कोई बमत्कार नहीं रहगा, इस कारण यहाँ आठ ही भेदों का उस्लेख किया गया है। --
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विमर्शिनी उत्तन्यायेनेति अप्रस्तृतपशांसामेदानामेव वाच्यरवकथनाद। आद्देति सामान्येरयादिना। समर्थनाईस्येति, साकाङच्वादुपपादनापेदावात्। उपपादनमिति, एव मेवैतदिति नैराकाछू पयोत्पाइ मलतणम् । 'उळन्यायेन' = उक्त हेतु मे अर्थाव [अप्स्नुतप्रशसाध्करण के अन्न में ] 'अप्रस्तुनप्रशंसा के रूप में परिणत होने वाले वाक्यार्थ ही अर्थान्तरन्यास रूप में परिणत होते बतलाए गए हैं यदि उनमें दोनों ही अर्थ वर्च्य दा लाएँ इस हेतु से। 'आह=विचार करते हैं-सामान्य इत्यादि सून- वाक्य से आरम्म कर लिसे गए ग्रन्थ द्वारा। समर्मनाई-साकाक्ष होने के कारण उपपादन की अपेक्षा करने के कारण। उपपादनम् 'ऐसा ही है यह' इस प्रकार की निराकाह्क प्रतीति को जो उत्पन्न करना तत्सवरूप। [ सर्वस्य ] क्रमेण यथा- 'अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य ह्विमं न सौमाग्यविलोपि जातम्। पको दि दोपो गुणसंनिपाते निमज्जतीम्दो: किरणेष्चिवाङ्क: ।।' 'लोकोत्तरं चरितमरपयति प्रतिष्ठां पुसां कुलं नदि निमित्तमुदात्तताया। वातापितापनमुने: कलशात्मसूति लीलायतं पुनरमुद्समुद्रपानम्। 'सहसा विद्धीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्। वृणते द्ि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेव संपद् ॥' अत्र सदसाविधानाभावस्य विसृश्य कारित्वरूपस्य चकारणस्य सं पद्वरणं कार्ये साधर्म्येण समर्थकम्। तस्यैवैतत्कार्यविरुद्धमापत्पदत्वम् सद्दसावि धानाभावविरुद्धाविवेककार्य वैध्भ्येण समर्थकम्। 'पृथ्चि स्थिरा भय भुजंगम धारयैनां त्वं कूर्मगज तदिदं द्वितयं दधीथा। दिककुस्तरा: कुर्त तन्तिरितये दिधीर्पो देवः करोति हरकार्मुक्माततज्यम्।' अश हरकार्मुकाततज्यीकरर्ण पृथ्वीस्थैर्यादिपवर्तकत्वे कारणं समर्थ- कत्येनोक्तम्। क्रम से उदादरण यथा- 'जो [हिमालय] अनन्त रत्नों को उत्पन्न करता रहना है, इसलिए एक अकेला हिम उसके महत्व का नाशक नहीं बन सका। ऐसा इसलिए कि जहाँ गुणों का जमघढ रदता है वहाँ एक आध दोष दूब बापा करता है, जैसे चन्द्रमा को किरणों में कल्क [ कुमार० १][ यहाँ उत्तराये की शुप और दोष रूपी सामान्य पदार्थों की उकि से पूर्वाधं की रत्न तथा हिमरूपी विशेष पदार्थों की उक्ति का समर्थन ह ]।
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'प्रनिष्ठा दिलाता है लोकोत्तर चरित, कुल व्यक्तिर्यों की उदात्तता का कारण नहीं बनता। वातापी राक्षस को नष्ट करने वाले मुनि अगस्त्य की उत्पत्ति घड़े से हुई थी, किन्तु महत्व मिला निःसीम समुद्र के पान का।' [यहाँ पूर्वार्थ में कथित् व्यक्ति सामान्य तथा चरितसामान्य का उत्तरार्थ में कथित अगस्त्यल्पी व्यक्िविशेष तथा समुद्रपानरूपी चरितविशेप के द्वारा समर्थन किया गया है]। -- कोई कार्य पकापक न कर, अविवेक मारी विपत्ति का आस्पद होता है। विचारपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति को गुणों पर लुच्ध संपत्तियाँ स्वयं ही वरण कर लेती हैं। [ किरातार्जुनीय-] यहाँ सहमा कार्य न करना तथा विचार कर कार्य करना ये दो कारण है, इनका समर्थन हो रहा है संपत्तिओों द्वारा वरण करने रूपी कार्य से। यह समर्थन साधर्न्यमूलक है। [ इसी प्रकार] उसा [कारण] का समर्यन इस [संपद्रणरूप] कार्य से विरुद्ध विपत्ति का आत्पद होने से भी हो रहा है, जो एकाएक कार्य न करने के विरुद्ध चिना विचारे कार्ये करने का कार्य है। किन्तु यह समर्थन वैधम्यमूलक है। -पृथ्वि! स्थिर हो जा, नागराज ! तुम इसे सम्हाले रहो, कूर्मराज! तुम इन दोनों को सम्हाले रहो, और दिग्गजो तुम लोग इन तीनों को धारण किए रहने में लगे रहो [ क्योंकि] देव [ राम ] शिव धनुप पर प्रत्यंचा चढ़ाने जा रहे हैं। -यहाँ पृथ्वी आादि से स्थिर होने आदि की बात कहने में कारण है शिवधनुष पर अत्यंचा का चढ़ाया जाना। यह यहाँ समर्थक रूप से कहा गया है। विमर्शिनी कार्यकारणभावाश्रयस्य भेदवयस्य काव्यलिङ्गन्व ग्रन्थकृदेव वषयतीति सामान्य विशेषभावाश्रयमेव भेददयमाधयणीयम्। विशेषेणापि सामान्यसमर्थन यत्र सामान्यवाक्य स्योपपादनापेदठत्वं तन्नायसेवालंकार। नहि विशेषात्मकावस्यवृत्तान्तोपादानं विना सुंसां कुलवै लक्षण्येन चरितमात्रमेव प्रतिष्ठानिनिक्षमिति सामान्यात्मा प्रकृतोऽर्थः सिद्धुयेत्। यत्र पुनः स्वतःसिद्धस्येव प्रतीतिविशदीकरणार्थ तदेकदेशभूतो विशेष उपश्ियते तब्रोदा हरणालंकारः । गुणसंनिपाते दोपनिमज्नारमनः सामान्वस्य नैराकाङवयेण सिद्धश्येन्दोः किर णेप्नियाह दृति तनेकदेशभूतो विशेपस्तत्र प्रतीतिविशदीकरणार्थमुपातः।अतक् 'विशेषस्यान्येन समर्थनमर्थान्तरन्यास' इत्यत विशेषेणापि सामान्यस्य समर्थनमिति सूत्र णीयम्। अन्यथा हाध्यासि: स्यात् । तस्येवेति सहसाविधानाभावस्य। एतत्कार्यविरुद्ध-
कार्यकारणमावमूलक जो दो भेद हैं ने काव्यलिंग के मेद सिद्ध होते है यह स्वयं अन्यकार हो आागे बतलाने वाले है, इसलिए यहाँ सामान्यविशेषभावमूलक दो नेदों को ही गिना जाना चाहिए। इन दो भेदों में भी विशेष से सामान्य के समर्थन का जो भेद है उसमें भी जब सामान्यार्थ-प्रति- पदक वाक्य समर्थन की अपेक्षा रखता है तव तो यही [ अर्थोन्तरन्यास ] अलंकार होता है, ऐसा नहीं है कि अगसत्यवृत्तानतरूपी विशेष अर्थ के उपादान के विना, 'कुलनिरपेक्ष चरितमान्र ही व्यक्तियों की प्रतिष्ठा का निमित्त होता है' यह सामान्य भर्थ सिद्ध हो जाए। किन्तु नहाँ वह [ सामान्य अर्थ] स्वसःसिद्ध रहता है और उसके एक अशरविशेष का उपादान केवल इसलिए किया जाता है कि उस सानान्य अर्थ की प्रतीति और स्पष्ट हो जाए वहाँ अलंकार चदाहरण होता है। गुणों के समुदाय में दोष के इबने रूपी सामान्य अर्थ की प्रतीति अन्य किसी [ समर्थक] अर्थ की अपेक्षा के विना जपने आप भी सिद्ध हो जाती है इसलिए 'चन्द्रमा की किरणों में कलंक' यहद जो उसी का
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विशेषरूप एक अश है इमका उादान उस [ सामान्य] अर्थ की प्रतीति में स्पष्टता लाने मात्र के लिए है। [इस कारण 'अनन्तरत्न' पद्य में उदाहरणालकार हा मान्य है] इसीलिए [अकार- रत्नाकरकार को चाहिए कि वे] 'विशेष का सामान्य के द्वारा समर्थन अर्थान्तरन्याम'-रस सूत्र में 'विशेष के द्वारा भी सामान्य का समर्थन' इनना अश और जोटें। नहीं तो उनका लक्षग अर्थान्तरन्यास के एक [विशेष से विशेषणमापेक्ष सामान्य के समर्थन मे निष्पन्न] भेद में लागू नहीं हो पाएगा। सश्यैय=उसी का= एकाएक कार्य न करने का। पनरकार्यचिरुदवम् रस कार्य के विर्द्= सपति द्वारा वरण किए नानेरूपी कार्य के विरुद्ध। [सर्वस्व ] वैधम्येंण सामान्यविशेषभावो यया- 'अहो द्वि मे वह्नपराद्वमायुपा यदप्रियं वाच्यमिदं मयेहशम्। त पव धन्या सुहर्दा परामवं जगत्यददए्वैव द्वि ये क्षयं गताः ।।' अत्रायु:कर्तृकापराद्वत्वाक्षिपस्याघन्य त्वस्यायुर्विरुद्धक्षयगति प्रयुक्तं धन्यत्वं विरुद्धं सामान्यरूपतया समर्थकत्वेनोक्तम्। कार्यकारणतायां वैधम्यॅ- णोदाहतम्। दिशन्दामिहितत्वानभिद्दितत्वादिभेदा: स्वयमेव योद्धब्या, चावत्वाविशयाभावान्नेद प्रदर्शिताः। वैधम्यंमूलक सामान्यविशेषमाव का उदाहरण यथा- ' हो हो ! मेरी इस आयु ने बहुत बढा अपराध किया कि मुझे ऐेसी अप्रिय बान कहनौ पड रही है। वे ही जन धन्य है जो समार में मित्रों का परामव देखे विना ही चल बमने हैं।1 सहों 'आायु के द्वारा अपराध किए जाने की बात से आक्षिप अधन्यता' के प्रति इसके विरुद्ध 'आयु की उलटे, चल दसने रूपी कार्य से जनिन जो सामान्यरूप धन्यता' है उसे समर्भकरूप से कहा गया है। कार्य कारणमाव में जो वैधम्यंमूलकता होती है उसका उदाहरण [सइसा विदधीन०] द्वारा दे ही दिया है। इसके अतिरिक्त 'दि=कयोंकि' शब्द के द्वारा अर्थान्तरन्यास के अमिया द्वारा कथित होने और कथित न होने से जो भेद होते हैं उनका अनुसधान स्वयं दो कर लेना चाहिए। उनमें कोई विशिष्ट चमत्कार नहीं रदता अन. उन्हें यहाँ नहीं दिखलाया गया। विमशिनी विरुदं सामान्यरूपतयेध्यनेन वैधर्ग्येंण विशेष: .सामान्येन समर्पित इयुक्तम्। सामान्यं सु विशेषेश समथ्यते यथा- 'गुणानामेव दौरा्याद्चुरि धुर्यो नियुश्यते। असंज्ञात किणसरं्धः सुखं स्वपिति गौगटी । अन्नापि सम््यसमर्यंक मानसमर्थनादुबादरणरवं वाच्यम्। उदाहनमिति 'सइसा विद्- धीत-'इश्यादिना॥ 'विरद्धं सामान्यसपतया' इत्यादि द्वारा यह बवलाया कि यहाँ वैधम्ये के द्वारा सामान्य मे विशैष का समर्थन हुआ। नहं तक विशेष से सामान्य के समर्थन का सबन्ध है उसका उदाहरण यह है-
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'वह गुणों की ही दुरात्मता है कि धुर्य [ वोझा होने में अधिक सक्षम दैल] बोक्ष ढोने के लिए जोता जाता है। गलियार वैल के गले में घट्टा तक नहीं पड़ता और मजे में सोता रहता है।' सम्ध्यक्षमर्थकभाव इसमें भी है हसलिए इसे मी [अर्थोन्तरन्यास का] उदादरण कहा जा सकता है [महंकाररत्नाकरकार के अनुसार आर्य उदाहरणालंकार नहीं ]। उदाहृतम= 'सहसा विद- पीत-पद्य द्वारा। विमर्श-अर्था-तरन्वास का पूर्देतिहास- भामह, वामन तथा उन्भड में अर्थान्रन्यात के सामान्यविशेषभाव की चर्चा नहीं मिळती। इसकी चर्वा रुदट से आरम्भ होती है। मम्मट उसका अनुसरग करते हैं। किन्तु कार्यकारणमाव की योजना प्रथम और अन्तिम वार केवल सवस्रकार करते हैं। रत्नाकर, बिमर्शिनी, कुबलया- नन्द तथा रसगंगाधर में उसको मान्यता नहीं मिली है। मामह ने 'हि'-शब्द के उपादान से आाने वाली सष्टता को अर्थान्तरन्यास में प्ररट किया था। उन्दट ने उसके आगे समर्थ्य वस्तु के समर्थक वस्तु के पहले तथा पश्चात् उपादान की भी चर्चों की। स्ट्रट ने पहिली वार साधम्ये तथा वैंधर्म्य की भी चर्वा की। इसके पहले के आचार्य इस विषय में भी चुप थे। इस प्रकार अर्थान्तर- न्यास का जो सर्वसंमत स्वरूप मान्य है उसे स्थिर करने का क्षेय स्ट्ूट को है। पूर्वाचार्यों के अर्थ- न्तरन्यास विवेचन इस प्रकार हं- भामह- *उपन्यसनमन्यस्य झेयः सोडर्थान्तरन्यास: पूर्वार्थानुगतो यथा। परानीकानि सीमानि निविक्षोर्न च ते व्यया। साधु वासाधु वागामि पुंसामात्मैव शंसति॥ हिशव्देनापि अयमर्थान्तरन्यासः सुतरां व्यज्यते यथा॥ वहन्ति गिरयो मैवानम्युपेतान् गुरूनपि। गरीयानेव हि गुरून् विभत्ति प्रणयागतान्॥ २७१-४।। -जब कोई एक बात कही जाय और फिर उससे मिलती-जुलती दूसरी बात तो उसी का नाम अर्थान्तरन्यास हो जाता है। [अर्भन्तर=अन्य भर्थ का न्यास उपस्थिति ]। यथा- -शत्रु की भयंकर सेना में आप प्रवेश करना चाह रहे है और आपको तनिक भी व्यया नहीं हो रही। होने वाले भले या दुरे की सूचना व्यक्ति को उसको आत्मा ही दे देती है। हेत्वर्थ का स्पष्टीकरण करने के लिए जब हि=क्योंकि शब्द का प्रयोग रहता है तव यह अर्थान्तरन्यास अधिक स्पष्ट हो जाता है। जैसे- -पर्वत अपने पास आए बड़े से बड़े मेघों को भी अपना लेते हैं। इच्छा लेकर आए बढ़ों को बड़े लोग ही वहन करते हैं।। वामन= [सू०] उक्तसिङ्धयै वस्तुनोरजर्यानतरस्यैव न्यसनमर्थान्तरन्यासः ॥-कथित वास्यार्थ की सिद्धि के लिए अन्य वाक्यार्थ की उपस्थिति मर्थान्तरन्यास ।' यथा- प्रियेण संग्रथ्य विपक्षसननिधावुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने। स्ननं न काचित विजहौ जला विलां वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुपु। -'प्रिय ने सयं गूंथकर सौतों के सामने पीवरस्तन वक्ष पर पहनाई माला को किसी सुन्दरी ने त्यागा नहीं यद्यपि वह माला पानी से भीगी हुई थी। वात यह है कि महत्व प्रेम का होता है वस्तु का नहीं।'
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४०४ अलङ्गारसवस्वम्
स्पष्ट ही वामन अर्थान्तरन्यास के आर्य भेद से शाब्द भेद के अन्तर पर मामइ के समान ध्यान नहीं देते। इतना मवश्य है कि वे समर्थक अर्थ का वाक्यार्थरूप होना आवश्यक मानते है। पदार्थ रूप होने पर वे अर्थान्तरन्यास की निष्पत्ति सवीकार नहीं करने। स्पष्ट ही वामन का वक्षण भामद के लक्षण की छाया है। उन्नट= 'समर्थकरय पूर्व यद् वचोडन्यश्य च पृछ्ठत 1 विपर्ययेण वा यव स्याद्विशष्दोकत्याऽन्यथापि वा॥।
अप्रस्तुतप्रशंसाया दृष्टान्ताच्च पृथक स्थिति ॥। २४५॥ -समर्थक का कथन पहले हो और समर्थनीय वाद में, अथवा इससे टलटा हो, और यह "हिव्योंकि शब्द के साथ हो अथवा उससे रहित तो इसे अर्थान्नरन्यास समझना चाहिए। इसमें प्रकृत अर्थ का समर्दन रहता है। इसलिए यह अप्ररतृतप्रदासा और दृष्टान्त से भिन्न हो घाता है। सद्धट के अनुसार अर्थान्तरन्यास के चार भेद हुए। उनके नाम इस प्रकार रसे जा सकने है (१) हेतुवाचकपदोचि पूर्वकस मर्थक पूर्वो पन्यासात्मक अर्थान्तर न्यास । ( २) हेतुवाचकपदोति- - पन्यासात्मक अर्थान्तरन्याम तथा (४) देतुवाचकपदोतिरदितसमर्थनीयपूर्तोपन्यामात्मक अर्थान्तरन्यास । 'रमर्यवपश्ादुपन्यासारमक'-इत्यादि योजना के द्वारा मी ये चारों नाम बनाथ जा सकते हैं। इन चारों के उदाहरण उद्बट ने दिए हैं किन्तु वे रवतः सोचे जा सकते हैं। मामह ने जिसे 'पूर्वायानुगति' कहा था और वामन ने 'उत्तसाधन', उसी सम्वन्धतत्व को उद्गट ने पदली बार 'समर्थन'-शब्द से कहा। भगे यही शब्द अपना लिया गया। रद्ट-'धर्मिणमर्थविशेष सामान्यं वामिषाय तत्सिद्षटे। यत्र सधर्मिकमिनर न्यस्बेव सोधर्यान्तरन्यास. 11 पूर्ववदमिधायेक विशेषसामान्ययोदितीय तु। तत्सिद्ध ये भिदध्याद निपरीनं यत्र सोडन्योन्यम् ।। साधग्यमूलक्-'जहाँ विषेप या सामान्य रूप मिसी धर्मी को बहकर उसकी सिद्धि के लिए उसी से मिल्ने जुरते किसी अन्य धर्मी को रपस्थित किया जाय वह अर्थान्तरन्याम कइलाता है। वैधम्यंमृटय-इसी प्रकार विदेष या सामान्य में से किमी एक को वहकर उसकी सिद्धि के टिए उनके विपरीत किसी अन्य वस्तु का कथन दूसरा अर्थान्तरन्यास होता है। विशेष के सामान्य द्वारा साधर्म्दमूल्क समर्थन का उदाहरण इनके अनुसार यह है- 'तुदा नामपि मेवा रैलानामुपरि चिदधन छायाम्। उपकर्तुँ द्ि समर्था मवन्ति महता महीयाम. ॥। -मेध उच्े-उचे पर्वनों पर भी छाया कर देते हैं। ठीक है वहों का उपकार बड़े ही कर पाते है। रुद्रट का यह व्वादरण स्वस्व और वान्यप्रकाश के उदादरणों से इस भैद के लिए अच्छा है। सुट्रट ने सनय तीनों वे भेदों दे उदाइरण भी बचछे दिए है। इन चारों में 'हि तथादि' आदि हेतुवाचक पदो का रप्योग है, ऊम आ्य अर्दान्तरन्यास वा रदाहरण उनमें नहीं है।
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रुद्रट के लक्षण में 'धर्मी' शब्द का प्रयोग विशेषतः विचार्य है। इसका अर्थ नामिसाधु ने उपमेय किया है। विशेष और सामान्य समान गुणों से युक्त होते हुए भी उपमानोपमेयभाव से सुकत नहीं होते। उपमानोपमेय वे वनते हैं जो परस्पर में भिन्न भी होते हैं और समान मी, इसीलिए अनन्वय को उपमाभिन्न माना जाता है। सामान्य और विशेष समान तो है, भिन्न नहीं होते। वस्तुतः वामन ने वस्तु शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया था रुद्रट उसी अर्थ में धर्मी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। साध्यसाधकमाव यदि पदार्थगत हुआ तो से अर्थान्तरन्यास मानना संभव न होगा। वामन ने इसका उदाहरण देकर निराकरण भी किया है-'वस्तुमइणाठ पदार्थत्य हेतोनयसनं नार्थान्तरन्यास:, यथा हह नातिदूरगोचर मरिति सरः कमल सौगन्ध्याव-इति-यदि हेतु पदार्थरूर हुआ तो वहां अर्थान्तरन्यास न होगा यथा-'यहां से तालय अधिक्र दूर नहीं दिखाई देता है, कमल सुगन्ध से'-यहां। मम्मट-'सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समथ्यते। चत्तु सोऽर्थोन्तरन्यास: साधर्म्येणेतरेण वा।!' [वृत्ति] साधर्म्येण वैध्म्येण वा सामान्यं विशेषेण यत समथ्यत विशेषो वा सामान्येन सोध्थान्तरन्यास:।' -साधर्म्य या वैधर्म्य के द्वारा सामान्य अर्थ से विशेष का समर्थन किया जाय या विशेष अर्थ से सामान्य अर्थ का तो वह अर्थान्तरन्यास होता है। सामान्य से विशेष के साध्म्येमूलक समर्थन का व्दाहरण मम्मट ने यद दिया है- 'नि जदोषावृतमनसामतितुन्दरमेव भाति विपरीतन्। पश्यति पित्तोपहतः दशिशुभं शतमपि पीतन्॥ -स्वयं सदोष व्यक्ति को सर्वथा अदोप वस्तु भी विपरीत दिखलाई देती है। पीलिया का रोगी चन्द्र मे शुभ शंख को भी पीला ही देखता है। मन्मट ने विशेष के सामान्य द्वारा साधर्म्यमूलक समर्थन का जो उदाहरण दिया है वई सुट्रट के ऊपर उद्वृत उदाहरण द्वारा तथा सवसकार के 'लोकोत्तरं चरितन्"' पद्य के दारा गताये है। वैधर्न्य का एक व्दाहरण मम्मट ने 'गुगानामेव0' यह पद्य दिया है जिसे विमर्शिनीकार ने उद्धृत किया है और दूसरा 'अहो हि"' यह पद नो स्वयं मूल में ही उद्घृत है। अर्थान्तरन्यास औौर का्यलिंग :- उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि सर्वस्वकार के पहले तक अर्यन्तरन्यास में कार्यकारणभाव का समावेश नहीं हुआ था। परवर्ती आलंकारिकों ने इसका खण्डन किया। झोमांकर ने इसे हेत्वलंकार का विषय माना। हेतलंकार शब्द शोमाकर ने कानमलिंगालंकार के लिए अपनाया है मम्मट ने भी हेत्लंकार को काव्यलिंग से अभिन्न बतलाया था। इस प्रकार विमर्शिनीकार ने जो कार्यकारणभावमूलक भेहों को काव्यलिह्ग में अन्तर्भूत वतलाया उसका मूल रत्नाकरहीहै। रत्नाकरकार ने हेत्बलद्वार के उदाहरण के रूप में विह्ण कवि की- 'वक्षःस्थली रक्षतु सा अगन्ति जगत्पसूतेर्गलढप्नवस्य।' -'अगद के पित्रा विष्णु भगवान् की वक्षःस्थली जगत की रक्षा करे' यह उत्ि दो है। इसमें जगद् रक्षा के लिए जगत्पितृत्व कारण है। पिता अरने स्ष पर संनान की रक्षा करता है। यहाँ हेतु पदार्थात्मक है अतः यह निश्चित हो पदार्थकाव्यलिअञलक्वर है। स्वस्व्कार द्वारा अर्धान्तरन्यास के लिए उद्घृन कार्यकारणमावसूलक मेदों में जो हेतु हैं वे वाक्यार्थात्मक हैं, इसलिए
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उनका पदार्यकाव्यलिंग या पदार्व्हेतु में अन्तर्माव नहीं हो सकना। वाक्याहेतुक काव्यविङ्ग का वदाहरण मम्मट ने यह दिया है- 'वपु परादुर्भावादनुमितमिद नन्मनि पुरा पुरारे। न प्रायः वचिदपि मवन्न प्रणनवान्।' -'हे भगवान् शकर। इस शरीर में पुनर्जन्म से यह अनुमान है कि गनजन्म में मैने आप को कभी भी प्रणम नहीं करने का अपराध किया है।' इम स्थल में प्रणाम न करना अपराध के प्रति हेतु है। यह हेतु वाक्य के द्वारा प्रतिपादित है, अन यह वाक्यार्थ हेतुक काव्यडिंग हुमा। अद यह सोचना है कि सवस्वकार द्वारा दिए उदाहरणे की स्थिति इस रदूरण की स्थिति से मिन्न है अथवा अभिन्न। 'पृ्वि सियिर मव' पत में तो स्थिनि मर्बया अमिन्न है। 'मगवान् राम के द्वारा शिवधनुर्ष का चढाया जाना' वास्यार्ये कारण है पृथिवी आदि को स्थिर आदि होने की हिदायत करने में। यहा अवश्य ही कारण मर्योन्तर है और उसका उपस्यापन न्यास, अतः अर्थान्तरन्यासत्व यहाँ है, किन्तु सोचना यद है अलकार भी यहो है अथवा अन्य कोई । स्पष्ट ही यही चमत्वार हेतुकथन में है, या तो उमसे हो रही भगवान् राम के शौर्याविशय की व्यंज्ना में। इस कारण यहाँ अलकारत्व देतूति में है, हेनुगन अर्थान्तर- तव में नहीं। दूसरी बात यह है कि जिस प्रकार 'बपुपदुर्मावाद०' पद्य में अपराध की सिद्धि बिना नमनाभाव के नहीं होती उसी प्रकार 'पृथ्वि । स्थिरा०' पद्म में भी पृथिवी आदि को आदेश देने या सावधान करने की बात शिवधनुष के चढाए जाने रूप कारण के बिना मिद्ध नहीं होनी। इस प्रकार इन दोनों पद्यों के अर्थ अधिकांस में समान है। जहाँ तक 'सहसा विदधीन0' पद् का प्रद्न है, इस पघ में पूर्वार्ध तथ उत्तराधं में एक की वात कही गई है कि 'बिना विचारे काम न करे' और इसकी पुष्टि अनुरूप और प्रतिरूप दो फलभतियों द्वारा की गई है विना विचारे काम करने से सिर पर आफत आती है औौर विचार के काम करने से सम्पत्ति मिलनी है। इम प्रकार यहाँ सामान्यविद्येषभाव नहीं है क्योंकि दो विशेष दी विशेष वकव्य यहो दिए गए हैं। कार्यकारणभाव अवश्य है। ।सलिए यहाँ वस्तुतः एक ही अर्थ का न्यास है-भर्यान्नर का नहीं। इमी प्रकार चमकार भी देतु कथन में है फलत इमे भी काव्यलिंग का स्थल मानना ही उचित है। रना अवश्य है कि रत्नाकरकार ने 'प्रजाना विनयाषनाव सपिता, प्रजा के पिता दिलीप ही थे क्योंकि वे उन्हें शिक्षा देवे थे' इस स्थल में हेतु का कथन स्पष्ट होने से उसमें चमत्कार का अभाव माना हे और उसे फाव्यर्टिंगालकार या हेखटकार मानना उचिन नहीं माना है। ठोक ऐैसी ही स्थिति 'सइसा' पध की है। किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ कोई अरंकार नहीं है द्योंकि इस पघ में चमत्कारकल का रपष्ट ही अरितत्व है। इस प्रकार कायकारणमावमूलक अर्थान्तरन्यास के स्थल काव्यलिंग या हेतु के स्थषों से अमिव्यक्तिगत आक्विक भेदरखने पर भी सौन्दर्यवोघगन भेद नहीं रखते अत. भिन्न नहीं कहे जा सकने। सवस्ककार को इन भेदों के ममत्व ने इसलिएि सताया होगा कि मामइ ने 'हेतुहेतुमद्नाव' का अरितित्व अर्थान्तरन्यास में बतढाया था। और सामान्यविशेष के समर्थ्यसमथकमान में मौ हेतुद्ेतुमन्भाव रहता ही है। वस्तुतः अर्थान्तरन्यास का प्राणतलव समथ्यंसमर्थकों को मौसिक एकता है। वैधम्ममूटक अर्थान्तर में भी अनुरूप सर्यान्तर का आक्षेप होने के पश्ाद हो समर्थ्यसमदंकमाव चरिवार्थ होता है। शुद्ध कार्यकारणमाव में यह घवता नहीं रहती। फटत. एक्नापन्न अर्थान्तर का न्यास ही अर्थान्नर- न्यास की स्ववन्य अटकारता का बीज है। ऐसे तो अर्थान्नर वा न्यास उपमा में भी उपमान- रूप से रहवा ही है।
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अर्थान्तरन्यास और उदाहरणलंकार :- जिस प्रकार कार्यकारणभावमूलक अर्थान्तरन्यास पर विवाद था उसी प्रकार 'विशेष से सामान्य के समर्थन वाले भेद में भी विवाद है। रत्नाकरकार ने इस भेद को भी अर्थान्तरन्यास से हटा दिया है। उन्होंने अर्थान्तरन्यास का लक्षण केवल इतना ही किया है- 'विशेष त्यान्येन समर्थनमर्थान्तरन्यासः'। -विशेष का अन्य [सामान्य] से समर्थन अर्थान्तरन्यास होता है। विमर्शिनीकार ने इसी का खण्डन करते हुए 'विशेष के द्वारा भी सामान्य का समर्थन' सूत्र में संनिविष्ट करने की बात कही है। रत्नाकरकार ने सामान्य द्वारा विशेष के समर्थन में उदाहर पालंकार माना है। उनका त्के यह है कि इस भेद को मी अर्थान्तरन्यास का भेद मानने पर अर्थान्तरन्यास के लक्षण में एकरूपता नहीं आती। कारण यह दिया है कि सामान्य के द्वारा विशेष के समर्थन में व्याम्यव्यापकमाव का अनुभव होता है। विशेष व्याप्य रहता है और सामान्य व्यापक। यदि विशेष से सामान्य का समर्थन माना जाय तो यह व्याप्यव्यापकमाव अनुभव में नहीं आता। इस प्रकार सामान्य द्वारा विशेष के समर्थन में व्याप्यव्यापकभाव दर्शित रहेगा और विशेष द्वारा सामान्य के समर्थन में हेतुहेतुमन्नावमान। कोई सामान्य सम्बन्ध नहीं वन पाएगा । विमर्लिनीकार ने इसका खण्डन करते हुए कहा कि विशेष से सामान्य का समर्थन दो स्थितियों में होता है मक तो तब जन समर्थनीय सामान्य वाकयार्थ समर्थकरूप से प्रस्तुत विशेष वाक्यार्थ के समर्थन के बिना प्रतिष्ठित नहीं हो पाता अतः उसकी अपेक्षा रखता है, इस प्रकार जहां समर्थनीय अर्थ की सिद्धि समर्थन पर निर्भर रहती है। दूसरी स्थिति वह होती है जिसमें समर्थनीय अर्थ समर्थन की अपेक्षा नहीं रखता, स्वतः ही सिद्ध हो जाता है। इनमें से समर्थनसापेक्ष सामान्य अर्थान्तर- न्यास के अन्तर्गत आता है और समर्थननिरपेक्ष सामान्य उदाहरणालंकार के अन्तर्गंत। ऐेक्षा अन्तर कर विमर्शिनीकार ने 'लोकोत्तरं चरितम्' पद्य को अर्थान्तरन्यास का उदाहरण माना था, किन्तु 'अनन्त रत्न०' पद्य को उदाहरणालद्कार का ही उदाहरण स्वीकार किया था। रत्नाकर- कार द्वारा उठाई आपति का उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। वस्तुतः अर्यान्तरन्यास में प्राणभूत तत्व सामान्य विशेव का परस्पर समर्थ्यसमर्यकमाव है, न्याप्यव्यापकमाव नहीं। वहाँ तक समर्थ्यसमर्थकमाव का सम्बन्ध है यह विशेष द्वारा सामान्य के समर्धन में भी रहता है। इसके अतिरिक्त व्याप्यव्यापकमाद भी नहीं रहता ऐसी बात नहीं। सामान्य से विशेष के समर्थन में वह व्याप्याभिमुखी है और विशेप से सामान्य के समर्थन में व्यापकामिमुखी इतना ही अन्तर रहता है। इाथी देखकर उसके पदचिद्व का मी अनुमान किया जा सकता है औौर पदचिह् देखकर हाथी का भी । व्याप्यव्यापकभाव दोनों ही और बन जाता है। पण्डितराज जगन्नाथ ने विमशिनीकार द्वारा प्रस्तुत समर्थनसापेक्षता और समर्थननिरपेक्षता के तर्को द्वारा अर्थान्तरन्यास और उदाहरणलंकार का भेद न मान अन्य प्रकार से माना है। विमर्शिनीकार का इस विषय में उल्लेखपूवंक खण्टन करते हुए उन्होंने लिखा है-'मन्मट द्वारा दिय गए 'निजदोषावृत्त' पद्य में समर्थनीय वाक्यार्थ की सिद्धि समर्थन पर निर्भर नहीं है। वह स्वतः निष्पन्न हो जाती है। 'दोष से भ्रम होता है इस तथ्य में गँवार भी संदेह नहीं करता।' [द्र० रसगंगाघर-निर्णयसागर संस्करण-६ पृ० ६३९] ठक्त अलंकारों के भेद के विषय में उन्होंने जो तर्क दिए हैं ने ये है- 'सामान्यार्थसमर्थक विशेष अर्थ दो प्रकार का होता है। एक वह जिसमें अपना स्वतन्त्र विधेय नहीं रहता और दूसरा वह जिसमें रहता है। इनमें से प्रथम में उदाहरणालंकार होता है और द्वितीय में अर्थान्तरन्यास। उदाहरण- 'उपकारमेव कुरुते विषद्गतः सज्जनो नितराम्। मूच्छीं गतो नृतो वा निदर्शनं पारदोऽन रसः।
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४०८ अलङ्कारसवस्वम्
-सत्पुरुष अत्यन्त विपद्यस्न हो जाने पर भी एकमात्र उपकार हो करता है, इसमें दृष्टान्त हे मू्च्छिन हुआ अयवा मरा हुआ पारा। अर्थान्नरन्यास- 'उपकारमेव कुरुते विपद्गन मजनी नितराम्। मून्छी गनो मृतो वा रोगानपहरति पारद सकलान् ॥' -सतपुरुष अत्यन्न विनद्यस्त हो जाने पर मो उनकार हो करते है। मच्छित या मृन हुआ पारा ममो रोगों को दूर करता है। स्पष्ष ही प्रथम पद्यार्थ में विषेयभून करिया एक हो है 'उपकार करना' जन कि दविनीय पदार्थ में उत्तरार्थं की क्रिया स्वतन्त्र है 'दूर करना'। इनमें से प्रथम पधार्य में बो दो वाक्यार्थे कहे हैं उनमें से प्रथम सर्थ सतयवी है और दूसरा उमी का अवयय। इस प्रकार यहाँ अनयनावयविमाव का निरूपण है। उदाहरणालकार का भाग अवयवाजयविमाव का निरलग हो होता है। पण्टितराज ने इसका दक्षण रसी प्रकार का बनाया है- -'सामान्येन निरूपितस्यार्थस्य सुसप्रतिपचये तदैरुदेशं निरू्य तयोरवयवावयविभाव उध्यमान ददाइरणम् !' -सामान्यरूप से निरपित वास्यार्थ की प्रनोति सुखसंक हो सके एनदर्य उमी वातगर्य के किमी एक अंश का निरूषण कर उन दोनों का अवयवावयतिमाव शब्द से कहना उदाहरण नामक अलंकार कहलाना है। अर्थान्नरन्यास में सामान्य और विनेष मी परस्पर में अवयवावयविभाव से युक रहने हैं। उनमें सामान्य अवयवी होना है और विदेष अववय। किन्तु इनका यह अवयवावयविमाव शब्द मे कहा नहीं जाता। उदाइरणालंकार में इस भाव के वाचक शब्द होने हैं 'इत, यथा, निदर्शन, द्षटान्न'आदि। उपर्युक पद्य में निद्शन शब्द प्रयुक्त है। सर्थान्तरन्यास वाे पत में ऐसे किमी भी शब्द का स्पष्ट हो ममाद है। इस प्रकार उदाइरणालकार में चमत्कार का कारण अनयनावय- विभाव रहता है। इमी माव को लेकर, यह उपमा मे मिन्न रहता है। उपमा में उपमान नथा उपमेय के वीच अवयवाजयविभाव की विवक्षा नहीं रह्ती। एस प्रकार उदाहरणानंकार पन्टिनराज के अनुसार नियमत शाब्द या वाच्य ही होना है। रत्नाकरकार ने इने वार्य भो माना है। पण्टिनराज ने इसका उत्तर उद्दाहरगलकार के प्रकरण में देवे हुए लिखा है कि अवयवाचयविभाव आर्य होगा इमका अथे इनना ही है कि उसके वाचक शब्द का प्रयोग न होकर उमके प्रतिवादक शब्द का प्रयोग होगा। अर्थ यह कि ईों आर्ये होगा वहों मी उसका सम्पत प्रतिपादन रहगा ही-माकाळ कथनमात्र नहीं रहेगा। इम प्रकार यह आयों उपमा के समान ही आर्थ कहा जा सबगा। अर्थान्तरन्यासालकार के प्रसग में भी रत्नाकर के इस पक्ष को पण्टितराज ने उठाया है। बह़ा उन्होंने इसका खण्डन तो नहीं किया किन्तु इसके उत्तर में समर्थ्यसमर्थक वाक्यों में विधेयगत उपपुक्त एकता का एक स्वत्न्त्र तर्क प्रम्तुन कर अर्थान्तरनयाम से उदाहरण का भेद स्पष्ट कर दिया। इम तर्क में अवयवायविमात की सिद्धि ही प्रमुख है। उसका वात्पय यह निकालना चाहिए कि जहा चमत्कार का कारण अवयवावयविमाव या उसके द्वारा किया गया समर्थन हो वहाँ उदादरणालकार होता है। अर्थोवरन्यास में चमतकार का कारण सामान्यविशेषभाव या नतृत समर्थन रहता है इसकिए इसमे टदाहर गाटकार मिन्न ठहरता है। इस प्रकार अवयदादविमात का वाच्य या वाच्चेतर रूप मे प्रनिपाइन तथा उसका ही चमतकारजनक होना उदाइरणाबंकार का प्रधान भेदक ततव उदरता है।
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पण्डितराज ने वह भी कहा है कि मम्मट आदि प्राचीन आर्लंकारिक उदादरणालंकार को उपमा से अमिव मानते हैं। उनके मनुसार जब उदाहरण नाम का कोई स्वतन्प्र अलंकार होता ही नहीं है तब 'विशेष से सामान्य के समर्थन' से निष्पन्न भेद को अर्थान्तर के अतिरिक्त अन्य किस में अन्तर्भूत किया जा सकेगा अलंकारसर्वस्वकार ने मी उदाहरण को स्वतन्त्र अलंकार नहीं माना है। अतः उन्होंने 'अनन्तरत्न०' पद्य को अर्थान्तरन्वास का ही अंग माना है। इस प्रकार जैसे सर्वस्वकार का यह मत अमान्य ठहरता है कि अर्थान्तरन्यास में कार्य- कारणभादमूलक भेद मी होते हैं उसी प्रकार अलंकार रत्नाकरकार का यह मत भी अमान्य ही ठदरता है कि विशेष से सामान्य का समर्थन' अर्थोन्तरन्यास न होकर उदाहरणालंकार होता है। फलतः अर्थान्तरन्यास के केवल एक या चार भेद मान्य न होकर केवल दो भेद हो मान्य उदरते हैं। और इस प्रकार अर्थान्तरन्यास पर रुद्ट का सिद्धान्त ही मान्य सिद्दान्त उददरता है। कार्यकारणभावमूलक भेदों की गणना में हिचकिचाइट तो सर्वस्वकार को भी थी कर्योंकि इन्होंने भेदों की गणना दो-दो करके ही है। एक साथ चार करके नहीं। विकस्वरालकार- जयदेव ने चन्द्रालोक में समर्थ्यसमर्थकमाव को लेकर एक नवीन कल्पना की है। उन्होंने एक ऐसा समर्थक सोज निकला है जिसमें तीन अंश रहते हैं-मारम्म में (१) विशेषांश, भध्य में (२) सामान्यांश, अन्त में पुनः (३) विशेषांश। इसका निरूपण उन्होंने इस प्रकार किया है- 'यस्मिन् विशेषसामान्यविशेषा: स विकस्वरः। स न जिग्ये महान्तो दि दुर्धर्षोः सागरा इद॥' -जिसमें पहले विशेष फिर सामान्य तथा तत्पदचात पुनः विशेष का उल्लेस हो वह चिकस्वर नामक बलंकार माना जाना चाहिए। सदाहरण-'उसे [ उस राजा को] जीता नहीं जा सका क्योंकि जो महान् होते हैं वे बड़े दुधर्प होते हैं। जैसे सागर।' यहाँ व्यक्तिविशेष के अपराभव का महान् वयक्तियों की दुर्वरपता से समर्थन किया गया पुनः उसकी पुष्टि के लिए सागररूपी विशेष पदार्थ की उपमा पस्तुत कर दी गई। इस प्रकार यहाँ विशेष का सामान्य से और सामान्य का पुनः विशेष से समर्थन किया गया। ठीक यही स्थिति 'अनन्तररत्नप्रभव' पद्य में है। अपपयदीक्षित ने स्पष्ट उदाहरण के रूप में इसी पद्य को अस्तुन किया है। इस पद्य में हिमाचल के सौमाग्यलेप के सभाव का समर्थन गुणसश्निपान में एक दोप के छिप नाने की उकति के द्वारा और इस समर्थक वाक्यार्थ का समर्थन चन्द्रकिरणों में छिपे कलंक के द्वारा किया गया है। पण्डितराज जनन्नाथ और उन्हीं के अनुयायी विश्वेशवर पण्डित ने यहाँ क्षप्पयदीक्षित का खण्डन करते हुए लिखा है कि यहाँ उदाहरणालंकार और अर्थान्तरव्यास अथवा अर्थान्तरन्यास के ही भेदों की संसृषि मान लेना अधिक उपयुक्त है। पाठानतर :- 'सहसा विदधीत०' पद्य के तुरन्त बाद की जो पत्ति है उसका निर्णयसागरीय रूप ही इमने स्वीकार्य माना है। त्रिवेन्द्रमसंस्करण में उसमें 'च' नहीं है। डॉ० राघवन् तथा डॉ दिवेही ने सपने संस्करणों ने निवेन्द्म् वाला पाठ ही अपनाया है। 'सोचे बिना काम न करना' तथा 'तोच समझ कर काम करना' दो भिन्न तत्त्व हैं, अभिन्न नहीं। एक अभावात्मक है और दूसरा
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४१० अलह्गारसर्वस्वम् भावात्मक । यह आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति 'बिना बिचारे काम नहीं करता वह विचार कर काम करे ही। ममव है कोई ऐसा व्यक्ति हो जो चाहता तो हो बिना विचारे काम न करना, किन्नु सोच विचार न कर पाता हो अत निष्किय बेठा रहता हो। इस प्रकार 'सइसा विधानामाव' तथा 'विमृश्यकारित्व' को अमिन्न मानकर मूल पंक्ति से समुच्चायक 'च' को इटाना ठीक नहीं है। मूल की परवर्त्ती पक्ति की स्थिति से भी यह तथ्य प्रमाणित होता है। उममें 'महसाविवानामावविरुद्धाविवेककार्यम्' पद से अर्थ निकलता है कि अविषेक सद्दसा कार्य करने का विरोधी तत्व है। अविवेक विरोधी है तो विवेक को अविरोवी या अनुकूल ही कहा जा सकता है। यदि विवेक सदसाविधानाभाव से अभिन्न होता तो अविवेक की उससे भिन्न करा खाना विरुद्ध नहीं। निर्णेयसागर सस्करण में इन पक्तियों में को पाठान्तर मी नहीं है। दर्शन का सिर्द्धान भी यह नहीं है कि अमावाभाव नियमन मावस्वरूप शो ही। इसीलिए काव्यप्रकाशकार ने 'म. कौमारहर'0' पध में विमावना और विशेषोकि को अस्पष्ट माना है क्यों कि उनमें अपेक्षित कारणमाद तथा कार्याभाव अमावामावमुसेन कथित है स्वरूप से नहीं। उत्कण्ठा का कारण वदीपव गन नवत्व होता है। उसका अभाव यहाँ नवत्वामावरूप से न करा जाकर ततपद द्वारा परामृष् प्राचीनत्व रूप से कहा गया है। इमी प्रकार प्राचीनत्व का कार्य उ्वठा का अभाव यहां उत्कठारूप से कहा गया है जो अनुत्कंठाभाव या वरकण्ठाभावामाव के गर्म से निष्पन्न होने वाला अर्थ है। अभावाभाव यदि सर्वात्मना मावरूप दोता तो अस्पष्टता का यह द्वध यहां न आता। फलत सइसाविधानामाव और विमृश्य- कारिस्व को मिन्न मानना और तदनुसार पक्ति में परिवर्तन न करना ही ठीक है। संजीविनीकार विध्या चक्रवत्ती ने अर्थान्तरन्यास का समह कारिका में इस प्रकार किया है- *समथ्यखवेन निर्दिष्ट प्रक्तो यत समय्यते। सोडयमर्थान्रन्यास: सामान्यादिमिरषटया।।' -- समर्थनीय रूप से निर्दिष्ट प्रकृत अर्थ का जो समर्थन वह अर्थान्तरन्यास सामान्यादि प्रकारो से भाठ प्रकार का होता है। विमर्शिनी एनदुपसंह रघन्यद वतारयति-एवमित्यादिना। इस [अर्थान्तरन्यास प्रकरण] का उपसदार करते और मन्य प्रकरण का भारम्भ करते हुए कहते हैं- [सर्वस्व ]
पर्यायोक्तमुच्यते- [सू० ३७] गम्यस्थापि भङ्गचन्तरेगाभिधानं पर्यायोक्तम्। यदेय गम्यते तस्यैवामिधाने पर्यायोक्तम्। गग्यस्य सतः कथमि धानमिति चेत, गम्यापेक्षया प्रकारान्तरेणाभिद्यानस्य भावात्। नदि तस्यैय तदैध तयैव विच्छित्या गम्यत्वं वाच्यत्वं च संभवति, अतः कार्यादिद्वारेणा- मिधानम्, कार्यादेरपि तन् प्रस्तुतत्वेन वर्णनाहत्वात्। अत पवाप्रस्तुत-
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पर्यायोक्तालद्वार: ४११
पशंसातो भेदः। पतञ् वितत्याप्रस्तुतमशंसाप्रस्तावे निर्णीतमिति तत पवा- वघार्यभ्: उदाहरणम्- 'स्पृष्टास्ता नन्दने शच्या केशसंभोगलालिताः। साचकं पारिजातस्य मश्षर्या यस्य सैनिकैः।' अत्र हयग्रीवस्य कार्यमुखेन स्वर्गविजयो चर्णितः । प्रभावातिशय- प्रतिपादनं च कारणादिव कार्यादपीति कार्यमपि वर्णनीयमेवेति पर्यायो. कस्यार्यं विषया। इस प्रकार [समासोकि दक्षण से प्राप्त अर्थान्तर और उसी गम्यता, इन दो त्त्वों में से प्रयम अर्थान्तर का निरुपण] अग्रस्तुतप्रशंसा [में किया और उसी] से लगे-लगे अर्थानतरन्यास का [भी ] निरूषण किया, अय गम्यता के प्रस्षग से प्राप्त पर्यायोक्त का निरूपण करते हैं- [सूत्र ३७] गभ्य [अर्थ] का भी प्रकारान्तर से अमिधान पर्यायोक [नामक अलंकार कहलाता है ]। [वृच्ि] जिसकी प्तीति व्यंजना से हो रही हो उसी को यदि अभिया से भी कहा जा रहा हो तो [अलंकार ] पर्यायोक्त [कदलाता है]। जो अर्थ व्यंजना से प्रतीत हो रद्दा होगा उसका कभिधान [स्भिधा से कथन ] संभव ही कैसे ? [ जिस रूप से व्यंग्य होगा बस ] से भिन्न रूप से अभिधान होने से। ऐसा नहीं कि बही [ अर्थ] उसी समय उसी रूप में व्यंग्य और वाच्य दोनों हो, अतः अभिधान [जो होता है वह ] कार्य आदि के द्वारा होता है क्योंकि कार्य आदि मी प्रस्तुत ही होते हैं अतः वर्णनयोग्य होते हैं। इसीलिए [ इस मलंकार का] अप्रस्तुतप्रशंसा से भेद है। वह [भेद ] विस्तारपूर्वक अपस्तुतप्रशंसाप्रकरण में तय कर दिया है अतः इसे वहीं से जान लेना चाहिए। वदाहरण- 'शची के केशसमोग से लालित वे पारिजातमंजरियाँ नन्दनवन में जिसके सैनिकों ने व्वजापूर्वक छुई।' यहों कार्य के द्वारा हयगीव का स्वर्गजय वतलाया गया। प्रभावातिशय का प्रतिपादन कारण के समान कार्य से भी संभव होता है अतः कार्य भी वर्णित किया जा सकता है, अतः यह स्थळ पर्यायोकत का विषय है। चिमर्शिनी तदेवाह-गम्यस्यापीत्यादि। ननु कथमेकस्य वैकस्मिन् काले गम्यरवं वाच्यत्वंच संभवती- स्याह-तिम्यस्यैवेत्यादि। प्रकाशन्तरेणे कार्याविव्वारेण। अत इति। एकस्यै वैंकरिमन् काले गम्य- त्ववाच्यतवासंभवात्। कार्यादिदारेणेसि, आदिशव्दः प्रकारे। अभिधीयमानं हि कार्य तदवि- नाभावित्वात् स्व्रसिद्धये कारणमाचिपतीति गम्यमवि तद् वाच्यायमानसिति यदेव गम्यते सस्येव भह्ग यन्तरेणाभिघानम्। अतश्व 'स्वभ्यस्तदुर्नयजयस्तनयरतदीयः चमामाररक्ष जयवाइननामघेययः।
इत्यादावलंकारप्रकारवं न वाच्यम, बहुधाजयद् इति हि क्रियमाणे 'गतोऽसतमकों भातीन्दु:' इत्यादिवदेत्तदकाव्यमेव स्याद। न घ दोपाभावमात्रसलंकारत्वमिति बहुशः आागुकमू। यक्ष स्वप्नावशेषप्रिय दर्शनात्मककार्यरूपेणार्थेन स्व्रसिद बर्थ कारणरूपस्तदघ
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आत्िप्यते तदितरप्रकारान्तरं पृथग्ववतु न युक्तमिति निर्वीजैव पर्यायोकान्तरवाचोयुक्ति:। अन रवेति। द्योरपि कार्यकारणयो प्रस्तुतरवात्। कार्यमुसेनेति। पारिजातमस्रीसपर्ष द्वारेणेश्यर्थ. । स्वगंविजय इति कारणरूपः। वर्णनीयमिति, प्रस्तुतमेवेश्य्थेः। उमी को कहते हैं 'गम्यस्यापि'- इत्यादि के द्वारा। 'एक ही वस्तु एक ही समय में गम्य और वाच्य दोनों कैमे हो सकती है'-इस शका पर समाधान देते हुए कहने हैं गन्यसयैव। 'प्रकारा- नतरेण= दूसरे प्रकार, दूसरे रूप से'= कार्य आदि रूप से। 'अतः= [सलिए' अर्थाद एक ही का एक ही समय में गम्य औौर वाच्य दोनों होना समव नहीं होता इसलिए। कार्यादि द्वारेण= इसनें आया आदि शब्द प्रकारवाचक है, अर्थात कार्य आदि के रूप से। कार्य को अिषा से बड़ा जाना दै तो वह अपनी सिद्धि के लिए कारण का आक्षेप पर लेना है क्योंकि यह कारण से अलग नहीं रहता। इस प्रकार कारण गम्य होने पर भी [वाच्यसिद्धि का कारण होने से] वाच्य जैमा हो हो जाता है। इस प्रकार जो अर्थ व्यजना से प्रतीन होता है, दूसरे रूप में अभिया द्वारा कथन मी उसी का होता रहता है। और इमी कारण [ अनकाररत्नाकरकार ने जो-'सापेक्षत्वा' दुमादानेनान्यप्रतीति, भङ्गयन्तरेण वाभिनान पर्यायोक्तम्'-'सापेक्ष होने के कारण उपादान लक्षभा द्वारा अन्य अर्थ को प्रनोदि अथवा दूसरे रूप से अमिरान वर्यायोक होना है'-इस प्रकार पर्यायोक्त के दो अलग-अलग नेद माने और-] 'अयवाइन नाम का उसका दु्नोवि को जीतने में सूत अभ्यस्त पुत्र पृथ्वी की रक्षा करने लगा, जिसने दुर्जेय शत्रुओं की सुन्दर वनिताओं के लिए उनके प्रिय का दरशन केवल स्वप्न तक सौमित कर दिया।' --- इस पद्यार्थे को द्वितीय पर्यायोक का उदाहरण माना है, यह नहीं मानना चाहिए। यदि यहाँ केवल इतना हो कहा जाय कि 'जयवाहन ने ददुत सी विजयों को माप्त किया' तो यह कथन 'सूर्य अस्त हो गया है, चन्द्र चमक रहा है'-इत्यादि कथनों के समान अकाव्य ही सिद्ध होगा और इम पीछे यह कई बार कह चुके हैं कि दोपामावमात्र अल्कार नहीं होता, और क्योंकि यहाँ भी 'प्रियदर्शन का स्वप्नावरेष होना' यह जो कार्यरूप अर्थ है यह अपनी मिद्धि के लिए सपने कारण शनुकध का आक्षेप करता है। अतः यहाँ भी कारणरूप अर्थ वाच्य सिद्धि का कारग है] फलत इसे पर्यायोक का [पेसा ८क] दूसरा प्रकार मानना ठीक नहीं है [ जिममें बाच्यार्थ की सिद्धि व्यग्यार्ध का अपेक्षा नहीं रखनी]। अतएव =कार्य और कारण दोनों के ही प्रस्तुन होने से। कार्यमुखेन=कार्य के द्वारा अर्थात पारिजानमबरो के स्प्श के द्वारा । स्वर्ग जय अर्थात् कारणरूप सवर्गजय । वर्णनीय = अर्थास प्रस्तुन॥ विमर्श-पर्यायोक्त का पूर्वेतिदास- भामह :- 'पर्यायोकं यदन्येन प्रकारणाभिनीयनै। उवाच रत्नाहरणे चैथ शाङ्गंधनुर्यया॥ गृईष्वध्दमु वा नान मुज्महे यदधीतिन। न भुअतं द्विजास्तच्च रसदानविवृर्तये'॥३८९॥ -पर्यायोक्त वह जिमनें अन्य प्रकार से अभिवान होना है। जैमे रत्नाहरग नामक [अनुप- लम्न ] कान्य में श्री कृष्ण ने शिशुपाल से कद्ा- 'दम रास्ते में मोनन नह करने और घरो में भा वह भोजन नहीं करने जिने बेदवाठी मशणों ने न किया हो'-
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यह जो कहा है यह केवल विपदान का परिदार करने के लिए। यहां मन की वात न कहकर बातें बनाने का नाम हो पर्यायोकत है। वामन में पर्यायोक्त का निरुषण नहीं मिळता। उन्धर-टट्वट ने पर्यायोक का निरुषण भामह से ले लिया है किन्तु उसमें 'अन्य प्रकार' का अर्थ मी जोड़ दिया है- 'पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयने।
'वाच्यवृत्ति = लक्षणा तथा वाचकवृत्ति अभिधा से मिन्न व्यजनावृत्ति के द्वारा मन्य प्रकार से कथन पर्यायोकत कहलाता है।' अमिनवगुप्त ने लोचन में इसे उद्भृत किया है और इसकी व्याख्या इस प्रकार की है- 'पर्यायेण प्रकारान्तरेण अवगमात्मना व्यव्ग्येनोपलक्षितं सद् यद् अभिधीयते तदभिषीयमान- मुकतमेव सत पर्यायो कमित्यभिधीयते। -- पर्वाच का अर्थ है प्रकारान्तर, प्रकृत में उसका अर्थ होगा व्यंजना, अतः पर्यायोकत का अर्थ होगा व्यङ्ग्यत्व से युक्त होकर कथित। [ध्वन्यालोक ११३ वृत्ति ] आनन्दवर्धनाचार्य के लेख से ऐसा विदित होता है कि वे उड्ट का मत ही सवीकार करते हैं। एक नहत्त्रपूर्ण तथ्य यहाँ यह है कि उन्भट की इस कारिका में न्यंजनावृत्ति का अस्तित्व रवीकार कर लिया गया है। इस प्रकार व्यंजनावृत्ति का अस्तित्व आनन्दवर्षन के पूर्व ही आचार्यों के अनुभद में आ चुका था। अभिनवगुप्त ने इस कारिका को उद्धृत कर उदादरण के रूप में निम्नलिखित पद्म प्रस्तुत किया था- 'शत्तुच्छेददृढेच्छस्य मुनेरत्पथगामिन: । रामस्यानेन धनुषा देशिता धर्मदेशना।- -अर्थाव शत्रुच्छेद की दृढ़ इच्छा वाले मतएव विपरीत पक्ष में ले सुनि परशुराम को [भीष्म के ] इस धनुप ने धर्मेशिक्षा दे दी है।' यहाँ कहना तो है परशुराम के प्रभाव को दवा देने वाले भौष्म के प्भाव को, किन्तु कहा गया है धनुप द्वारा धर्मोपदेश की वात को। स्दट-स्द्रट ने पर्यायोक तथा पर्यायालंकार को 'पर्याय' नामक एक ही शीर्षक में प्रति- पादित किया है उनका लक्षण रस प्रकार है- 'वस्तु विवक्षितवस्तुप्रतिपादनशक्तमसद्शं तस्ष्य। यदजनकमजन्यंवा तत्कथनं यव स पर्यायः ॥ ७४२॥ -- ऐसी वस्तु जो विवक्षित वस्तु का प्रतिपादन करने में समर्थ तो हो किन्तु न उसके समान हो, न उसकी कारण हो और न कार्य, तो उसका जो कथन वह होता है पर्याय नामक अलद्ार।' उदाहरण- 'राजन् I जहासि निद्रां रिपुवन्दीनिवद्धनिगडशब्देन। तनैव चदन्तरितः स कलकलो वन्दिवृन्दस्य॥। -- राजन् ! आपकी नींद बन्दी वनाए शत्रुओों की वेड़ियों के तुमुल शब्द से खुलती है। नौंद खुलाने के लिए बैसालिकों का जो कलकल होता था वह उसी में छिप गया है। नमिसाधु का कहना है कि-'यह उक्ति राजा की चापलूसी नें कही गई है। इसमें बन्दियों की चेढियों के शब्द से नींद सुलना हो तात्पर्थ नहीं है, अपितु यह भी तात्पर्य है कि
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आपने शत्रुओो को जीन लिया है और इनकी सियों को बन्दी बना लिया है। इस पकार सभी रातुओं को जीत देना भी यहां प्रकारन्तर से व्यक्त होना है।' रुट्रट ने जो व्यग्यार्थ में सादृश्य का व्यवच्छेद करने के ही माथ कार्यकारणमात्र का भो व्यत्- च्छेद किया वह दिए उदाहरण की वस्तुस्थिति के विपरीन है। इम उद्ाहरण में सत्रुजय कारण है उनके या उनकी सियों के बन्दी बनाए जाने का। अन यहा कार्यकारणमाव का अभाव नहीं है। मम्मट-मम्मट ने पर्यायोक्त का जो लक्षग बनाया है वह अपने आप में पर्यायोक का उदाहरण बन गया है। वे जो कहना चाहते हैं वह अर्थ उनकी कारिका से बडी कठिनाहं से निकलता है- 'पर्यायोक्त विना वाच्यवाचकत्वेन यद वच । इमका अर्थ मम्मट ने हो वृत्ति में ठोत् वही किया है-जो उद्ट ने अरनी कारिका द्वारा स्पष्ट किया था। वह ह- 'वाच्यवाचकमावव्यतिरिकेनावगमनव्यापारेण यत प्रतिपादन तत पर्यायेग मन्चन्तरेण कथनान् पर्यायोकतम्। अर्थात् वाच्यवाचकमात्र से मित्र व्यस्यवजकभाव के द्वारा जो प्रतिपादन वही पर्याय अर्थाव भिन्न प्रकार से कथन होने के कारण पर्यायोक।' यहाँ इनना सवव्य है कि वडट ने जो 'वृत्तिम्यान्' कहा था और दिववन का प्रयोग किया था उसकी सार्थकता सिद्ध करने के अनावश्यक प्रयास से मम्मट ने पाठक्र को बचा लिया है। इम अलकारपर मम्मट का उदाहरण ध्वन्यालोककार के 'चक्रामिनानo' पद के समान ही सडीक उतरा है- 'यं प्रक्य िरमढापि निवासप्रीतिरुज्झिता। महेनैरावणमुखे [मानेन हृदये हरेः।' -जिस [हयग्रीव] को देसकर मद ने ऐरावन के मुख में और मान ने इन्द्र के हृदय में चिर- रूद निवासप्रीति को छोट दिया। इस पर मम्मट ने लिखा है- 'अत्र ऐरावणशकौ मरमानमुक्ती जाताविति व्यतग्यमपि शष्हेनोच्यते। तेन यदेवोच्यने तदेव व्यङ्ग्यम्, यमातु व्यय्ण्यं न तथोष्यते। यहां व्यह्णय निकलता है कि 'ऐरावत और रन्द्र मद तथा मान से रहित हो गए' किन्तु इसे शब्द से भी कहा जा रहा है। इस प्रकार यह तय हुआ कि जो बात अभिया से कही जा रही है वही वान व्यडग्य मी हो रही है, किन्तु जिस प्रकार से व्यंग्य हो रहो है शब्दत कथन इस प्रकार से नहीं हो रहा।' मम्मट के अनुसार प्रकार का अर्थ विशेभ्यविशेषणभाव भी है। उक्त पच में विशेष्यविरेषग का क्रम वाच्यरूप में इस प्रकार का है-'मदमानकतृकेरवनमुसेन्द्रहृदयाधिकरणकचिरसवनिवास प्रौतिकर्मक यत्पद्वाच्यशयमीवप्रेक्षणपरयोज्यमुज्नम्' अर्थात उक्त वाक्य में छोडना किया में मद और मान का अम्वय कर्ना के रूप में हो रहा है, परावन के मुख तथा इन्द्र के हृदय का अधिकरग के रूप में तथा चिररूढ निवामप्रनीति का अन्वय कर्मरूप में ।' व्यग्यार्थे यदि 'ेरावव तथा हन्द्र नथा इन्द्र मद तथा मान से मुक्त हो गए' यह हो तो इसका विशेष्य विशेष मात्र होगा-'ऐेरावनशकौ मदमानकर्मकमुरत्याथयी' अर्थात् इसमे छोडना किया में ऐरावन तथा इन्द्र का अन्वय कनों के रूप में तथा मर तथा मान का अन्वय कर्म के रूप में
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हो रहा है। व्यंग्य का कोई अन्य रूप हो सकता है। वह निश्चित नहीं इसप्रकार विशेग्यविशेषणमाव दोनों ही अर्थों में मिन्न हैं किन्तु वकव्यार्थ एक ही है। मन्मट ने इसे समझाने के लिए सविकत्पकद्ञान तथा निर्विकश्पकश्ञान का उदाहरण दिया है। निर्िकत्पक ज्ञान नें व्यक्ति तथा जाति, अलग-अलग भासित होते हैं। निर्विकल्पक ज्वान यदि घट का हो रहा है तो उसमें शन तो घट और घटत्व दोनों का होगा किन्तु यह ज्ञान न होगा कि घटत घट में रह रहा है। सविकल्पक ज्ञान में पटल वट में रहता हुआ विदित होता है। इस प्रकार प्ञान दोनों ज्ञनों में अभिन या एक ही विषय का होता है किन्तु एक में विषय अलग-अलग भासित होते हैं, अन्य नें संसष्ट, सम्दद्ध और अन्वित रूप में। वह केवल विशेषगविशे्यभाव मात्र का भेद हुआ। इस प्रकार मम्मट के अनुसार पर्याय का अर्थ प्रकार हुआ और प्रकार का अर्थ हुआ विशेषण विशेष्वमाव, मामहाभिसत 'तचि का ढंग' नहीं। इसी प्रकार मम्मट के अनुसार पर्यावोकत में वाच्य के समान व्यंग्य भी दोनों ही होते हैं, धर्म भी और धर्मी मी। सप्पयदीक्षित-जयदेव ने सर्वस्वकार के ही आधार पर पर्यायोक्त का लक्षण यह किया था-'कार्यायैः प्रत्तुतैरके पर्यायोकि प्रचक्षते'-प्रस्तुत कार्यादि उचि से वतव्य मर्थ का कथन पर्वायोकति कहलाता है। अम्पयदीक्षित ने इसे स्बीकार नहों किया। उन्होंने मन्मद के लक्षण को आधार माना है। उन्होंने मम्मट के उक्त मत को जैता का तैसा मान लिया है। उन्होंने चन्द्रालोक के लक्षण के स्थान पर- 'पर्यायोकं तु गन्वस्य वचो मह्चन्तरात्रयम्। नमस्तरमै कतौ येन सुधा राहुवधूकुचौ।।' -दूसरे प्रकार से गर्म्बार्य का अभिधान पर्यायोक। यथा उसको नमस्कार है जिसने राहुबधुओों के कुचों को व्यर्थ दिया।'-यह लक्षण बना कर लिखा कि यहाँ भगवान् विष्यु अपने असाधारण रूप से गन्य है (व्यग्य नहीं) और वे ही राहुववकुचवैयव्यकारित्व रूप से वाच्य भी है। पण्डितराज ने मम्मट की इस मान्यता का खण्डन किया है और धर्मी को व्यंग्य न नानकर केवल वाच्च माना है। वाच्यता और व्यंग्यता दोनों को एक साथ केवल धर्म में स्वीकार किया है। 'यो व्यंग्यांगः स न कदाि रूपान्तरपुस्कारेणाभिवीयते, यश्चानिघीयते धर्मी स तु वदानीममिधाभयत्वाद् व्यअनव्यापारानाश्रय एवेति व्यङ्गथस्य प्रकारान्तरेणाभिवानमसंगतनेव [ पृ० "४९ रस० ]। अन्ततः पण्डितराज ने अलंकारसवस्वकार के मत को ही सिद्धान्तित करते हुए इन्हीं पंक्तियों के तुरन्त वाद लिखा है- 'तस्माव कार्यादिमुखेनोक्तमिव पर्याचोक्तम्। तेनाक्षिप्मित्येवार्थः ।'[ पृ० ५४९ रस० ]। -इसलिए पर्यायोक्त का अर्थ होना चाहिए कार्थ आदि के द्वारा कहा हुआ सा सर्थाव आक्षिप्त 1 अलंका रसर्वस्वकार का मत उन्हीं के शब्दों में पण्डितराज ने इस प्रकार उद्धत किया है- 'अलंका रसर्वत्वकारस्तु-"भ्यास्यापि मह्यन्तरेणामिधानं पर्यायोक्तन्। गन्यत्येव सतः कथमभि- घानमिति चेव कर्यादिद्वारेण' इत्याहू। [ पृ० ५४८ रस० ]। इसका तात्पर्य भी उन्होंने यही तब किया है कि 'चक्रामिदात०' पद्य में 'यः= जो' पद के द्वारा विष्युमगनान् कथित हैं, अतः व्यंजना के द्वारा उनके मीतर 'राइशिरश्छेततृल्व'-रूपी धर्न ही
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भासित दोता है। इसी राहुशिरश्तेतृत्व को वाच्यरूप में कवि ने 'राहुवधूजनसम्वन्धिचुम्बनमात्रा- विशिट्टरतोत्सवनिर्मातृत्व' रूप से कहा है। इस प्रकार पण्डितराज के अनुसार मग्मट व्यंग्याश में धर्मी या विशेभ्य को मी सनिविष्ट मानते है और अलंकारसर्वस्वकार वेवल धर्म को। इन दोनों में से पण्डिराज सनस्वकार का मत स्वीकार करते हैं। वस्तुन असकारसर्वस्कार व्यग्याश को न तो धर्मी-अश में वाच्य मानते और धर्मे-अश में। उनके मत में वाच्य होने हैं कार्य आदि और व्यग्य होते हैं कारण आदि। इस प्रकार वे मामह द्वारा प्रतिपादित पर्यायोक्त को मान्यता देते हैं। यदपि 'आदि' शब्द से विमर्शनीकारने 'विशेषण' को मी सर्वस्व के मत में छाने का यतत किया है तथापि यह उनको मम्मटमत्ति ही है। कारण कि स्वस्वकार ने बमा कोई उदादरण नहीं दिया। पण्टितराज-पण्टितराज ने स्वय पर्यायोक्त का लक्षण इस प्रकार वनाया है- [सू०] विवश्वितस्यार्यस्य भङ्ग्यन्तरेण प्रतिपादनं पर्यायोक्तम्। [वृ०] येन रूपेण विवक्षिनो उर्थस्तदतिरिकः प्रकारो मह्श्यन्नरम्। आशेपो वा। -विवक्षित अर्थ का दूमरी भद्िमा से प्रतिपादन पर्यायोक। मदग्यन्तर= दूसरी भगिमा का मर्थ है जिम रूप से अर्थ की विचका हो उसमे भिन्न प्रकार 'या तो आक्षेप।' यहां अन्नर इनना हो है कि प्रकारन्तर का अस्तित्व अन्य आचार्यों ने व्य्यांकष में बतलया था। पण्टिनराज उमे वाच्याश में बतठा रहे है। मन पण्डितराज का ही मान्य है, क्योंकि प्रथम अर्थ वही सव रहना है, जिसे बाद में कवि दूसरा रूप देकर अभिया में सजोता है। विश्वेश्वर-विश्वेश्वर पण्टिन ने पण्डितराज अगपाय के विरुद्ध मम्मट के मन का समर्थन किया है। उनका लक्षण इम प्रकार हैं- [करिका ]-'पयायोकत कथितं वाच्यस्येवान्यमह्योकिः।' [ वृचि ] वाच्य एवार्थो यत्र व्यवग्यनयोच्यते तन् पर्यवस्यति। एवं च व्यन्यम्रकारसमानाधिक रणपक्ारान्नरेगाभिधान तदिवि मर्यवस्यति। -वाच्यार्थे की हो अन्य प्रकार से उत्ति को पर्यायोक कहा गया है। अर्थात पर्यायोक्त वढ है जहाँ वाच्य अर्थ हो व्यहयरूप से कहा जाता है। निकर्ष यह कि किसी वस्तु का एक साथ व्यग्य और वाच्य दो प्रकारों के साथ कथन। विश्वेशवर ने वक्ता की मनस्थिति के विपरीन व्यवस्था दी है। बचा कहना नो चाहता है उसे अपने मूलरूप में न कहकर मिन्न रूप में कहता है, किन्तु इम प्रकार कहता है कि मूखभूत अर्थ विना निकले नहीं रहता। इसी उक्तिप्रक्रिया को पर्यायोक कदा जाता है। इसके अनुसार न्यंग्यार्य का वाच्य वनना मान्य है, वाच्य का व्यग्य बनना नहीं। इस प्रकार भामह, सद्ट, रुद्रट, * सम्मट, सवसकार, शोमाकर, जयदेव, अप्ययदीक्षित तथा पण्टितराज का ही क्रम वैद्यानिक क्रम है। उपर्युक्त विवेचन से निष्वष यह मिहलता है कि सभी आचार्यों ने पर्यायोकत के विषय में मूलम्थापना तो भामह की दो मान रखी है, अर्थात मामइ ने जो 'अन्य प्रकार से अभिधान' को पर्यायोक्त कहा था, परवर्ती प्रत्येक आचार्य ने इस 'अन्य-प्रकार से अभिवान' की बात को अपना रखा है, छिन्तु 'अन्य प्रकार' का स्वरूप निर्धारित करने में साचायों में तीन मत है। एक उनका जो प्रकार का सर्ब राम्ट्रवृत्ति करते है, इसके प्रवर्चक है उझ्द। दूसरा चनका जो प्रकार का सर्य रम्दवृष्ति के माथ दी विशेषण भी करते हैं। इसके प्रवर्सक है मम्मट।
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और तीसरा उनका जो प्रकार का अर्थ शब्दवृत्ति तो करते हैं किन्तु उसका अर्थ विशेषण न कर कार्य आदि सन्वन्धित वस्तु अर्घ करते हैं। इसके पवर्तक है सर्वस्वकार। इस प्रकार यदि प्रथम मत को द्वितीय वृतीय मत में अन्तर्लीन मान लिया जव अथवा दितीय और तृतय मत को उक्त प्रथम मत का परिवर्धन या विकास मान लिया जाय तो बेवल दो ही मत शेष बचेगे। एक मम्मट का और दूसरा सर्वस्वकार का। दोनों के अनुसार विवक्षित अर्थ व्यंजना से ही प्रतीत होगा किन्तु वाच्य अर्थ सम्मट के अनुसार व्यंन्य धर्मी का कोई अन्य धर्म या घटक होगा - सौर सर्वन्वकार के अनुसार व्यंग्य धर्म का धर्म या घटक न होकर उससे संबन्धित कार्य आदि होगा। अप्पवदीक्षित ने कुवलयानन्द में 'व्याज से इष्टसिद्धि' को भी पर्यायोक्तमेद माना है-
यामि चूतलर्ता द्रष्टं युनाभ्यामास्यतामिह।। -उसे भी पर्यायोक्त हो कहा गया है जिसमें व्याज द्वारा इष्ट साधन कथित हो। यथा मैं आत्र की व्हनियां देखने जा रही हूँ आप दोनों वही रहे। यहाँ दूती नायक नायिका को मिलाकर हट रही है, वस्तुतः यह भामह के उदाहरण जैसा ही उदाहरण है। इसमें अलंकारत्व की मनौती मनःपूत नहीं है। लक्षणा= पर्यायोक्त में द्वितीय अर्थ की प्रतीति उद्धद, आनन्दवर्धन, अभिनवगुद्त, मम्मट, पण्डितराज और विश्वेध्र स्पष्टरूप से व्यंजना द्वारा मानते हैं। सर्वस्वकार ने व्यंजना शाष्द का तो किसी भी रूप में प्रयोग नहीं किया है किन्तु वे व्यंजना का खण्डन नहीं करते अतः उन्हें भी पर्यायोकत में अपरार्थ की प्रतीति व्यंजना द्वारा मानने वाला माना जा सकता है। रत्नाकरकार मिनका पर्यायोक्तलक्षण पहले दिया जा चुका है [शोभाकर-] को इस पर आपति है। जैसा कि अप्रस्तुतप्रशंसापकरण में पह्ले मतलाया गया है कि रंत्नाकरकार ने पर्यायोकत में बाच्यार्थ को अपरार्थतापेक्ष माना है और अपरार्थनिरपेक्ष मी। इनमें से अपरार्थनिरपेक्ष को उन्होंने ध्वनिरूप माना है, किन्तु अपरार्थसापेक्ष वाच्य वाले मेद में वे अपरार्थ की प्रतीति में व्यंजना न मानकर लक्षणा ही मानते हैं। उनका त्के यह है कि यदि यहाँ भी व्यंजना ही मान ली गई तो उपादान लक्षणा के सभी स्थलों में व्यंजना ही मानी जाने लगेगी। फलतः उपादानलक्षणा का विलोप हो जाएगा। उनकी पंचि है- 'सापेक्षत्वे तु कुन्ताः प्रविशन्तीतिवत अर्थपतीतिर्लक्षणया, न तु व्यजनेन, उपादानलक्षणाया
वाच्यम्। [अस: ]- मुख्यार्थसाकालक्षतया प्रतीतिराक्षेपतोऽर्स्य हि लक्षणैद। व्यडग्यत्वगन्धोडपि न विद्यतेश्न् ध्वनित्वशङ्कापि न ते न कार्यो॥' इस प्रकार रत्नाकरकार अप्रस्तुतप्रशंत्षा के ही समान पर्यायोकत में भी अवाच्यार्थ की प्रतीति लक्षणा द्वारा मानते हैं। व्यंजना द्वारा नहीं। पण्डितराज जगनाथ ने इसका स्पष्ट विरोध किया है। उनका कथन है- 'न हि 'चक्रामिघातमसभाशयव' इति पद्ये चुमनमात्रयेपरतोत्सवाशे वाघोडस्ति, येन लक्षणा स्थात। सवमप्रस्तृतप्रशंसाय।मप्यप्रस्तुतस्य प्रस्तुने न लक्षणा कि तु व्यजनवेति सर्वेसम्मतस्। अन्यथा पर्यायोकें वाच्यस्य प्राधान्यम्, अमस्तुतप्रशंसाचां व गम्यस्वेति सिद्धान्तस्य मझ: स्याद। लक्षणायां हि लक्य स्यैव प्राधान्य स्यात, न वाच्यस्व।2[ पृ० ५५५]।
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४१८ अलङ्कारसर्चस्म्
[पर्यायोक्त के मसिद्ध उदाइरग] 'वकामिनान' पघय में चुमननमायशेपरतोतसवरूी अद्ञ में कोई बाष नहीं है जिससे यहाँ उक्षगा माना जा सके। इमा प्रकार अपस्ुतमश्स्ता में भी अनसतुव का प्रस्तुत में रक्षमा नही अितु कबना हो होता है यहा समा की नान्य है। ऐमा न होना तो पर्यायोक्त में वाच्त की और अनस्तुवप्रशसा ने गम्य अर्थ की प्रधानना रहती है यह सिगन्त कर जारगा क्योंकि लक्षगा मानने पर प्धानना लक्य की हो होगा वाच्य की नहीं।' पण्डिनराज का यह मत इमें मी मान्य दे जैसा कि इम शोभाकर के मत के निरूपण में अप्रस्तुनप्रश्चसा प्रकरण में ववला आर है। पाठान्तर-(१) सर्वस्व के पर्यायो क्रमूत्र में निगयस्ागर प्रति में मशम्यन्नर शब्द के स्थान पर 'पर्यायान्तर' श्द पाठान्तर के रूप में दिसलया गया है। डॉ० रामवन्द्र दिवेदी ने उसी को मूल मान लिया है और भठग्यन्तर शम्द को पाठान्तर में डाक दिया है। श जानकी ने इसके विपरीत मडम्यन्तर को हो मूल माना है। त्रिवेन्द्रम सस्करण में भी महग्यन्तर को मूल माना गया है। वस्ुत" 'अग्यन्तर'-पाठ ही मूल पाठ है। विमर्सिनी में इसी पद का प्रयोग मिल्वा है यद्यपि यह प्रयोग प्रतीकभून पद के रूप में नहीं किया गया है। सजीविनी में प्रनीकरूप से सग्यन्वर को ही उद्धृन किया गया है। सूत्र मो उसमें भग्यन्तर-पद्घटित हो बनळाया गया है- 'तन सूत्रन्= गम्यस्यापि मकयन्तरणामिधानं पर्यायोकतमिति'। इनके अतिरिक्त सवस्वकार का पर्यायोक्त सूत्र मष्ययदीक्षित, पण्टिनराज तया विद्वेशर ने भी उद्पृत्र किया है। उनके उद्धाणों में 'मझयन्र'-पाठ ही मिलता है। अप्ययदाचित-'अलकारससस्विक नापि पर्यायोकतम्य समरयागनमिदनेवर लइगमज्ञीकृतम्- "ान्य स्यापि म्यन्त्रेणाभिवान पर्यायोत्तमिति। [द० कवलयानन्द पर्यापोक] पग्टितराज-का दद्धरण पहले दिया जा चुका है। विश्वेश्वर-'सर्वम्वकारस्ु- 'गम्यस्वेव मअयन्तरेणाभिनार्न पर्यामोकन्' इति [कौस्तुम, पर्थायोक प्रकरण ]। इन दोनों के अपने पर्यायोक्मूत्रों में मो मह्गी और भछभन्नर शब्द का उपयोग किया गया है। रत्नाकरकार ने भी अपने पर्यायोकमूत्र में मठूग्यन्तर शब्द हो अपभाया है। उद्घृन वचन से स्पष्ट है कि मम्मर ने भी वृत्ति में मसूव्यन्तर वब्द का प्रयोग किया है। पर्याययब्द को मुळ मानने का उद्देश्य पर्यायोव शब्द की उयुत्पति हो सकनी है। किन्तु पर्यायगम्द का कुछ मेमा दुर्भाग्य रहा है कि अभिनवगुप्त को छोड उमका उच्डेसपूरक स्वषेकरण किसी ने नहीं किया। पण्डितराज ने तो सलरे महग्यन्तर शम्द की हो व्याख्या करना उचित ममझा। इस प्रकार पर्याय रा शा सथ है प्रकारान्नर और मझायन्तर। किन्तु मझ्यन्तर शम्द का प्रयोग ही पू्व और पर के कूलकारिकों में सर्वस्व के नाम से प्रसिद्ध है सता उसे इटाकर वास्तविक इकदार पर्याय शब्द को मूछ्ष मूत्र में स्थान देना समत्र नहीं हो थी रहा है। यद्यति सर्वसवकार ने मव्यन्तर शृब्द का धूचि में एक बार मो प्रयोग नहीं किया है। (२) स3 के पश्चात् की प्रथम पक्ति में मी पाठ/न्तर की समस्या टकरानी है। वहाँ निर्गय- सागर संस्करण में 'यदेव गम्यत्वं तत्यैवामिषाने छरा है और इस पर पाठान्र के रूप में कुछ नहीं दरसाया गया है। डॉ जानको ने निर्गयसागर की इम पक्ति में 'अभिराने' के स्थान पर 'अमिषान' भर ददला है। पाठान्तर में उन्होंने भी कोई अन्य पाठ नहीं दिसचाया है। विनशिनी और संजोविनी में इम पकि के प्रत्येक राष्द को प्रतीयरूप नें उदतृत नहीं किया गया है। अतः उन के आवार पर मी मूलभूव पाठ की योजन नहीं को जा सकजा। सजोविनों में इस पकि का
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व्याजस्तुत्यलङ्कार: ४१९
प्रथम 'चदेव' पद मतीक के रूप में दिया हुआ है। उपर विमर्शिनी में 'गम्यमपि तद् वाच्याय- मानमिति वदेव गन्यते तस्वैव मत्त्यन्तरेणाभिधानम्' इस पंक्ति में 'यदेव गम्यते' पद से रगता है कि मूल पंन्ति नें गम्यत्वं के स्थान पर 'गम्यते' रहा होगा। इस कारण मने यही पाठ मान लिया है। वद्यपि ढॉ० रामचन्द्र द्विवेदी ने 'यदेव गम्य तर्यैवामिधानं पर्यायोक्तम् गम्यस्य सत०' इस प्रकार जो पंक्ति बनाई है, वह 'गम्यस्य सतः' इस पंक्ति से मिलती-जुलती पंकि है अतः अधिक साफ है तथापि इसके अनुसार 'गम्यत्वं'-का सवत्र अव्यभिचारी प्रयोग लिपिदोप न सिद्ध होकर विषवदोप सिद्ध हो जाता है। 'गन्यते'-रूप मानने पर विपयदोष हट जाता है। 'गम्यस्य० सतः' के साथ इस पाठ का भी कोई अधिक वैपम्य नहीं रहता। पर्यायोक्त के संपूर्ण विवेचन को संजीविनीकार ने इस प्रकार कारिकाबद किया है- 'दर्यायोके तु कार्योविद्वारा गम्यस्य वर्णनम्। अप्रस्तुतप्रशंसातो वाच्यस्य प्रस्तुते मिदा। -कार्यादि के द्वारा गम्य अर्थ का वर्णन पर्यायोक्त कहलाता है। इसमें वाग्य प्रस्तुत रहता है इसलिए इसका अन्रस्तुनप्रशंसा से भेद रहता है। [सर्वस्व] गम्यत्वविच्छित्तिप्रस्तावाद् व्याजस्तुतिमाह- [सू० ३८]स्तुतिनिन्दाम्यां निन्दास्तुत्योर्गम्पत्वे व्याजस्तुतिः। यध स्तुतिरमिधीयमानापि प्रमाणान्तराद् वाधितस्वरूपा निन्दारयां पर्य- वस्यति तत्रासत्यत्वाद् व्याजरूप स्तुतिरित्यनुगमेन तावदेका व्याजस्तुतिः। यत्रापि निन्दाशव्देन प्रतिपाद्यमाना पूर्ववद् चाघितरूपा स्तुतौ पर्यवसिता भंति सा द्वितीया व्याजस्तुतिः। व्याजेन निन्दामुखेन स्तुतिरिति कृत्या। स्तुतिनिनदारूपत्वस्य विच्छित्तिविशेपस्य भावाद्पस्तुतप्नशंसातो भेद:। गम्यत्वजनित चमत्कार के मसंग में मब व्याजस्तुति का निरूपण करते हैं- [सूत्र ३८] सतुति और निन्दा से निन्दा और स्तुति गम्य हो तो [अलंकार की संज्ञा ] व्याजस्तुति [होती है]। [वृत्ति ] जहाँ अनिषा द्वारा स्तुति ही प्रत्तुत की जा रही है किन्तु अन्य प्रमाण से उसका स्तुसिरूप वाधित हो रहा हो फळतः वह निन्दा में परिणत हो रही हो वहाँ, असत्य होने से 'न्याजरप स्तुति' इस प्रकार की व्युत्पत्ति के द्वारा एक प्रकार की व्याजस्तुति होती है। इसी प्रकार जहाँ शन्द से निन्दा कही जाती हो किन्तु पूर्ववत उसका स्वरूप वाधित हो रहा हो और वह स्तुरति में परिणत हो रही हो तो नह दूसरी व्याजस्तुति होती है-'न्याज भर्थाद निन्दा के बहाने रतुति' इस व्युत्पत्ति के आधार पर। इसमें स्तुति और निन्दाहप विशिष्ट प्रकार की उकि रहती है इसलिए इसका अप्रस्तुतप्रशंसा से भेद है: विमर्शिनी आहेति स्तुतिनिन्दाभ्यामित्यादिया। प्रमाणन्तरादिति वक्तृवाच्य प्रकरणदिपर्यालोच- नातमनः । ऋराषितत्वरूपेति। आमुख एव प्रखळद्वपेश्यथ:। अत एवास्या घइने ्मेदः। स हि विश्रानते वाक्यार्थे वक्तृवाच्यौचित्यपर्यालोचनावलादवगग्यते। इद पुनः ममा-
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४२० अलङ्गारसर्वस्वम्
णान्तराद्ाघितः सन् वातयार्थ: ह्वयमनुपपद्यमानरवात् परत्र निन्दाशी एवं समपयति। तत्रैव महतवाक्यार्थत्य विश्रानते:। एवम्- 'अह सज्नाण मग्गो सुद्दन सए च्चेअ पवरँ जिम्यूढो। इषि्हि अप्ण हिनए अण्णं वाभाहू लोआस।' इरयादौ विश्रान्ते वाश्यायें वततृचाच्योचित्यपर्यालोघनावलाव्िन्दाया. प्रतीतिरिति ध्वनिविषयश्वमेव युरम्। पूर्ववदिति प्रमागान्तरात्। एका दितीया चेश्य भिद्धता दवे पवात्र व्याजातुनी न पुनरेकैव द्विविधा व्याजस्तुतिरिति सूचितम्। भकारप्रकारिभावो दि सामान्यलप्तणासद्वावे न सवति। असभवत्तरसामान्यर्य तद्विशोपतवाभावादु। शब्द नियन्धनं छ सामान्यमाधित्य दयोरयामिधानम्। एव स्तृतिनिन्दाभ्यामप्रस्तुनाम्या निन्दास्तुरयो. प्रस्तुतयोरगव्यस्वमित्यत्र सिद्धम। यद्ेव तत्किमियमप्रस्तुतप्रशसैव न भवतीशयाशक्कयाह-स्तुवीत्यादि। तत्र दि सामान्यविशेपादीना गम्परवमुक्तम। आह=निरूपण करते है= 'स्तुतिनिन्दाम्याम्' स्यादि अगले मन्थ के द्वारा। प्रमाणान्तराव= अन्य प्रमाण से वत्ा, वाच्य, प्रकरण आदि के पर्यालोचनरूपी प्रमाय से । वाधितश्वरूप= मारम्म में ही उसका अपना रूप प्रस्सकित होने लगता है। इसीलिए इसका ध्वनि से भेद है। ध्वनि वहाँ होती है जहाँ वाक्यार्थ में कोई आपति नहीं रही अर्थात वह विश्रान्त हो जाना है। तदनन्तर वत्ता, वाच्य और औचित्य आदि के पर्यालेचन से अन्य अर्थ विदित होना है: इसके विपरीत यहोँ वाक्यार्थ प्रमाणान्तर से वाधित हो जाता है। अत अपने आप में वह अनुपपत्र रहता है अतः स्वय को निन्दा आदि अन्य गर्थों में परिणत कर देता है। क्योंकि पकृत वाक्यार्य की विभान्ति उन्हीं अर्थो में होनी है। इस प्रकार- 'हह सब्जनानां मार्ग सुहसया चैव केवलं निव्यूंद.। इदानीमन्यद्धृदयमन्यद् वचनानि लोकस्य ।!1 -'अभौ तक तो सज्जनों का मार्ग केवल सौहाद के कारण निभता रहा है। अब तो लोगों के हृदय मिन्न और वचन मिन्न हो गए है।" -इत्यादि स्थलों में वाक्यार्थ ठीक उतर जाता है, तब बक्ा, वाच्य और औचित्य पर ध्यान देने से निन्दा को प्रतीति होती है, इसलिए यहाँ ध्वनि हो मानना ठीक है। [वस्तुत यहों निन्दा भी उत्तरार्ध से स्फुट है अतः हो तो, यहाँ केवल गुणोभूतव्यंग्यता हो सकती है, किन्तु यह तय है कि यहाँ व्याजस्तुति नहीं है]। पूर्ववत =अन्य प्रमाणों से। एक और दूसरी ऐैमा कड़ने से यह सूचिन किया ये दोनों व्याजम्तुति दो अलग-अलग अर्थात् स्वनन्त्र व्याजस्तुति है, एक व्याजस्नुनि के दो भेद नहीं है। किसी का कोई भेद सिद्ध नहीं होता यदि कोई सामान्य लक्षण न हो। क्योंकि भेद का अर्थ होता है विशेष और किसी का सामान्य धर्म किसी में नहीं रदे तो वह उसका विशेष नहीं माना जाना। यहाँ जो दोनों व्याजस्ुतियों को एक साथ कहा गया है वह नाम-सान्यमात्र के आधार पर। इस प्रकार यह सिद्ध दुआ कि यहा शब्दतः कथित सुनि और निन्दा अप्रकुत रदती हैं और उनसे गम्य निम्दा म्नुनि प्रकृत। 'यदि ऐमा है तो यह अप्रस्टुनप्रशसा हो क्यों नहीं मान ली जाय'-इस यङ्का पर उत्तर देने हैं-'स्तुति'उत्यादि। वहां अप्रस्तुनप्रशसा में जो है सो गम्य होते है सामान्य विशेष, [ न कि स्तुति निन्दा]।
कमेण यया- [सर्वस्व् ] 'ददे हेलाजितबोधिसत्व वचसां कि विम्नरैस्तोयधे नास्ति स्वत्सटशः पर: परद्दिताधाने गृद्दीतवतः।
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व्याजस्तुत्यलङ्कार: ४२१
भारप्रोवहने करोषि कृपया साहायकं यन्मरो:॥' अश्र विपरीतलक्षणया वाच्यवैपरीन्यप्तीतिः। 'इन्दोर्लक्ष्म त्रिपुरजयिन: कण्ठपीठी सुरारि- दिडनागानां मदजलमपीभाजि गण्डस्थलानि। अद्याप्युर्वीकलयतिलक श्यामलिम्नानुलिता न्युन्वासन्ते वद धवलितं कि यशोभिस्त्वदीयैः॥' अन् धवलताहेतुयशोविपयानवकलृत्तिप्रतिपादनेन 'विशेषप्रतिषेधे शेषा भ्यनुज्ञानम्' इति न्यायात्कृतिपयपदार्थवर्ज समस्तवस्तुधवलताकारित्वं नृपयशसः प्रतीयने। कि वृत्तान्तैः परगृद्दगतैः किं तु नाहं समर्थ- स्तूष्णी स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः। गेहे गेहे विपणिपु तथा चत्वरे पानगोष्ठया- मुन्मत्तेव स्रसति भवतो वछभा हन्त फीर्तिः॥ इत्यन्न प्रक्ान्तापि स्तुतिपर्यवसायिनी निन्दा हन्त कीर्तिरिति भणित्या उन्मूलितेति न प्ररोहं गमितेति स्लिएमेतटुदाहरणम्। क्रम से [उदाहरण ] यथा -- [ स्तुति से निन्दा ]- 'हे जलनिधे, हे [गंभीरता की ] मुद्रा में बोधिसत्त्व को जीत लेने वाले ! अधिक क्या कहें, दूसरों का हित करने का न्त धारण करने वाला तुम्हारे जैसा कोई दूसरा नहीं है। प्यासे पथिकों के उपकार से विमुख होने की अपकीति के भार को ढोने में मरुस्थल की जो तुम सहायता. करते हो।' -- यहाँ विपरीत लक्षणा के द्वारा वाच्य के विपरीत अर्थ की प्रतीति होती है। [निन्दा से स्तुति यथा-] 'हे पृथ्वीमण्डल के तिलक! चन्द्रमा का कलेक, शिवजी का कण्ठ, विष्णु भगवान्, दिग्गजों के मदजल को स्याही से लिस गण्डस्थल अभी तक सांवलेपन से लिस दिखाई दे रहे हैं [ तब] वतलाइए आापके यशों ने किसे धवल बनाया।' -यहाँ धवलता के जनक यश की विषयों में अपर्यापि का प्रतिपादन करने के कारण 'विशेष [किसी एक] के निषेध से शेप का विधान' इस नीति से कुछ पदार्थों को छोड़ शेष सब पदार्थो को धवल करने का गुण राजा के यश में प्रतीत होता है। [किन्तु-] 'दूसरे की घरेळू वातों से करना ही क्या है, परन्तु चुप बैठ नहीं पा रहा हूँ, बोलने की आदत पढ़ गई है, दक्षिणियों जैंसा स्वभाव दो गया है। घर-घर में, वाजार-बवाजार में, चौरास्तों पर, मासदगोष्ठियों में उन्मत्त जैसी घूमती फिर रही है। [ कौन] आापकी वत्लमा। [कौन] हन्त कीतिं । -यहाँ स्तुति में पर्यवसित होने वाली निन्दा आरम्म तो की गई किन्तु 'हन्त कीति' इस कथन से ह उखाड़-सी दी गई, जमने नहीं दी गई, अतः [अभिनवगुप्त द्वारा लोचन के प्रथम उद्योत में व्याजस्तुति के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत ] यह उदाहरण [एक प्रकार से ] वलेप का
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हो रदाहरण है। उैसे दोनों मर्थ दतेष में समिया द्वारा साफ साफ वह दिए जाते है वैसे ही वे यहाँ भी कथित ही हैं।। विमर्शिनी विपरीनलक्षणयेति। सनिमित्ताथ वात्यवैपरीत्यप्रतीतिरिति माव। अन्यथा दि सरव- रमात् सर्वप्रतिपत्ति: श्याम। छष्षणा घ मुख्यार्थवाधपूर्विकेव भवतीयमिधीयमानाया:
अश्याश्र निन्दास्त्रयोर्वा्या्वे सतृतिनिन्द्योयंदा गम्यतवमेव अवति तदैवाएंकारतं नान्यदति दर्शयिह माह-कि वृत्तान्तैरित्यादि। उन्मूलिनति। ससुतिरेच वाच्यरवेनोसेश्यर्थः। रिषधमिति। अददाहरणमेवैतदिि तारपर्थम्। अतश्ात्य लोघनर्कारण यहयाजरतायुद्दा- हरण्वमुक्तं तदयुक्तमेवेति भाव। विपरीतलक्षण विपरोतल्दाण के द्वारा, माच यह कि यहाँ वाच्य के विपरीन अर्थ की जो प्रतीति होती है वह महेतुक है। ऐेसा न होता तो सभी से समी अर्थो की पतीति दोने रगती। और लक्षण सदा मुखय अर्थ का बाध होने पर ही दोती है, इसलिए भभिधा द्वारा कह़ी ज रही [अतएव मुख्यार्यभूत ] स्तूनि का अपना स्वरूप यहाँ बाधित हो बनलाया गया है। 'यह [व्याजस्तुति] तभी अलकार होती है जन वाच्य निदा और वाच्य रतुति से [ वनकी उलटी ] रतुति और निन्दा गम्य हो हो। नहीं तो नहीं।'-इस तथ्य को बतलाने के लिए कदते हैँ-'कि वचान्त "'। उन्मूलिता= रखार सी दी गई= अर्थ यह कि स्तुति को हो वाच्यरूप से वह दिया। रिलष्टम्=इसका तात्पर्य यह कि यह पद्य व्याजस्तुति के मघ के रूप में उदाहरणीय नहीं है। और इसलिए लोचनकार ने इमे की व्याजस्तुति का सदाहरण कहा है वह गलत हो ई [पण्टितराज जगन्नाथ ने इस पदय में सभासोकिगर्मिन व्याजस्तुति मानी है और सर्वस्वकार तथा विम्मिनीवार का वद्धरणपूर्वक खण्डन कर लोचनकार का समर्थन किया है [द० रक्ष० · पृ० ५६० ] व्याजस्तुवि का पूर्वेतिहास- व्याजस्तुति के जो रूप यहाँ सर्वस्वकार ने प्स्तुत किये हैं उसकी स्थापना पद्ली वार स्ट्रट ने की थी। सम्मट ने उन्हें सवस्कार के ही समान ज्यों का त्यों अपना लिया है। मामह औौर वामन में व्याजस्तृति की झल्क तो पाई बाती है परन्तु उनकी दृष्टि इम विषय में स्फीत नहीं है। उद्र की दृष्टि स्कीत अवद्य है किन्तु वह दकाङ़ी है। निम्नलिखित उटरणों से यह सुथ्य स्पट् ह- मागह-'दूराधिकगुणम्नोनव्यपवेशेन तुल्यतान्। किचिदू विवित्सोर्या निन्दा व्याजस्तुनिरसौ यथा। राम: सप्तामिनव सालान् गिरि क्रोञ्च मृगूचम: । शर्नाशिनापि मतता कि तयो सदसं कृतम्। ३३२,३२ -अत्यधिक गुणशाली व्यक्ति की स्ुतति के वहाने उमकी समानना वतलना चाहने वाले के द्वारा [अन्य किमा व्यक्ति की ] सो मिन्दा की बाती है वद व्याजस्तुति होती है। यथा- -राम ने साक् वृक्षों वो वेषा, भरशुराम ने कराच पर्वत को। उनके समान अपने शनार भी क्या किया ।' इसका अर्थे यद निकलता है कि मनुष्य जो कर सकता है वद आाप कर चुहे, केवस देवों का पौरष दी भाप में शेप है।
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व्याजस्तुत्यलङ्कार: ४२३
वामन-वामन ने मामह के अनुकरण पर ही व्याजस्तुति का निरूपण किया है। वामन का न्याजस्तुतिनिरूपण मामह का रपषटीकरण है। उनका निरूपण इस प्रकार है- [सृ०] 'संभाव्यविशिष्टकर्माकरणान्निन्दा स्तोवार्या व्याजस्तुति:। [वृ] मत्यन्तगुणाधिको विशिष्टः, तस्य च कर्म विशिष्टकर्म, तत्य संभाव्यत्य कर्त शवयस्या- करणानिन्दा विशिष्टसान्यसंपादनेन सतोघार्या व्याजस्तुतिः। यथा- 'वदन्ध सेतुं गिरिचकवालेविभेद समकदरेण तालान्। पवंविधं कर्म नतान रामसत्वया कृतं तन्न सुघैव गर्व: ।।' 'गुणों में अत्यन्त बड़े अतएव किसी विश्विष्ट व्यच्ति का किया कार्ये किया तो जा सकता हो किन्तु उसे फिसी ने किया न दो तो उसकी निन्दा व्याजस्तृति कहलाती है क्योंकि उससे विशिष्ट व्यक्ति के साथ निन्दा वाले व्वक्ति की समानता झलकने लगती है फलतः वह निन्दा स्तुति में पर्यवसित हो जाती है। यथा- 'पहाड़ों का पुल वाँध डाला, एक वाण से सात तालों को वेध दिया। राम ने ऐसा कार्य किया। तुमने वैसा कार्य नहीं किया है, अतः गर्व व्यर्य है।' स्पष्ट हो वामन का लक्षण उसका स्पषोकरण और उदाहरण मक्षरदः मामह के व्याजस्तुति निरूपण का स्पछ अनुवाद है। हमें तो इन दोनों आनार्यों के उक्त विवेचन में पर्यायोक की छाया दीखती है। आचार्यों के अनुसार यहां कवि को कहना यह है कि 'तुम राम के समान हो'। इसी को वह निन्दासुखेन प्रतिपादित कर रहा है। सान्य का प्रतिपादन यहां अत्यन्त क्षीण है अतः स्तुति का कोई स्पष्ट भाव लागता नहीं। एकमात्र साम्य तक सीमित रख कर भी उक आचार्यो ने व्याजस्तुति की व्यापक अभिव्यक्ति का अविकांश छोढ़ दिया है। मन्दट-उन्भट की धारण नामह और वामन से मिलती-जुलती ही है किन्तु उनका निरुपण मत्यन्त मांजल है- 'शब्दशकिस्वमावेन यत्र निन्देद गम्यते। वस्तुतस्तु स्तुतिः श्रेष्ठा व्याजस्तुतिरसौ मता ।।' यथा-धिगनन्योपमामेतां तावर्कीं रूपसम्पद्म्! न्ैलोक्येध्वनुरूपो यद् वरस्तव न लभ्यते।। -शन्दशक्ति के स्वभाव से [अभिया द्वारा] जहां विदित तो होती है निन्दा-सी किन्तु वास्तविकरूप में रहती हो उत्कृष्टतम स्तुति तो उसे व्याजस्तुति कहेंगे। यथा-[तप कर रही पार्वती के प्रति उनकी सखी की उत्ति ]- -तुन्दारी इस अतुलनीय रूपसंपत्ति को धिक्कार है, जिसके अनुरूप वर तीनों लोकों में नहीं मिल रहा है।1 यहां भगवती पार्वती को अतुलनीय रूप से युक्त बतलाकर उनकी प्रशंसा की जा रही है। न्याजपूर्ण स्तुति से निंदा की पतीति का दूसरा व्याजोक्तिभेद मामह और वामन के समान उड्भट की दृष्टि में नहीं आया। इसके अतिरिक उन्होंने अपने व्याजस्तुतिभेद का जो उदाहरण दिया उसमें स्तुतियक्ष एकमात्र गम्यन छोकर वाच्य भी होगया है। 'अनन्योपमा' विशेषण द्वारा पार्वती- रूपसम्पत्ति की अतुलनीचता को शब्दतः मी कह दिया गया है। सर्वत्वकार के अनुसार यह वदाहरण भी 'कि वृत्ान्तैं:'० पच के समान ही व्याजस्तुति का उदाहरण नहीं माना जा सकता। सन्ट-रुद्रट ने व्याजस्तुति को व्याजस्लेप नाम दिया गया है और इसे अर्थश्लेष के प्रकरण में रखा है। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्तुति से निन्दा की व्यंजना वाले भेद को भी इसके अन्तर्गत गिना है। उनका निरूपण भी सवथा स्पष्ट है-
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४२४ अलद्कारसरवस्वम्
'यम्मिन्निन्दा स्नुतितो निन्दाया वा स्तुतिः प्रतीयेत। अन्या विवक्षिनाया व्याजशलेष: स विजेय:॥२११॥ -'जहं राब्दत कही जा रही स्तुति या निन्दा से तद्विन्न [निन्दा या स्नुति] की प्रतीनि हो रही हो उसे व्याजइलेप समझना चाहिए।' यहा यह एक विशेष रूप से ध्यान देने योग्य तथ्य है कि रुदट ने स्तृति से व्यक्त होने वाली निन्दा को प्रथम स्थान दिया है। निश्चित हो यह उनका पूर्वाचार्यो में इसके अभाव और अपने द्वारा इसके इदप्रथमनया प्रतिपादन की ओर सकेन है। रुद्रट ने दोनों के जो उदाहरण दिय है उनमें शब्दगन इलेष भी है और उनमें शुद्ध व्याजस्तृति नहीं है, अन्य आलकारिक विधाओं का मो रपर्श है, अतः मम्मट ने रुदट का लक्षामान् अपनाकर व्याजस्नुति का निरूपण इस प्रकार किया है- मम्मट-'व्याजस्तुतिमुगे निन्दा स्तुतिरवा रूढिरन्यया।' - 'व्याजस्तुति वह जिसमें आरम्म में भासित हो निन्दा या स्तुति और अन्त में सिद्ध दो उससे उलटी स्तुति या निन्दा।' स्तुति से निन्दा का वदाहरण वन्दोंने 'हे हेला०' पद ही दिया है। व्यावस्तुति शब्द की संगति उन्होंने 'व्याजरूपा व्याजेन वा स्तुति' 'व्याजरूप सनुति या व्याज से स्तुति' यही दी थी। इम प्रकार व्याजस्सुति का स्वरूप तो मम्मट तथा सरघस्वकार ने स्ट्रट से ही अपनाया, किन्तु उसका नाम उन्होने परम्परा से ही टिया। रुद्रट ने व्याजस्तुनि में जो इलेप का अस्तित्व माना या उसमे उसे अलग करने का श्रेय मम्मट को जाना है। सर्वस्वकार ने जो 'कि वृतान्ते'' पद के पश्चाव 'रिलटमेनेतत' कहा है इसका स्रोत कदाचिन रुद्रट द्वारा ब्याजोकि में इलेप का अस्तत्व मानना ही है। इस कारण सजीविनीकार द्वारा दिन्ष शब्द के किए क्लिष् शब्द की पाठान्तर- करपना उचित प्रतीन नहीं होती। सजीविनी तथा विमर्रिनी द्वारा इस श्म्द पर चुप्पी साधना मो वैसा ही है। शोभाकर-परवर्त्ती शोभाकर ने भी व्याजस्तुति के ये दोनों भेद माने हैं। उनका सूत् है- [सू० ] स्तुतिनिन्दाम्याम् [अन्यमनीति. ]व्याजस्तुति । [वृ०] स्तुत्या निन्दा, निन्दया वा स्तुतियंत्र भवति सा व्याज्स्तुति । -सतुवि और निन्दा से अन्य [निन्दा और स्तुति ] की प्रनीति व्याजस्तुति कहलाती है। सबरवकार के ही समान रत्नाकरकार ने भी व्याजस्तुति में अन्य अर्थ की प्नीति दक्षगा द्वारा मानी है। विमर्सिनोकार ने व्याजस्तुति के विषय में एक महत्व की वात यह कहो थी कि व्याजस्तुति नाम से जिन दो भेदों की गगना की गई है ये दोनों भेद वस्तुत दो स्वनन्त्र व्याजस्तुतियों हैं किसी एक व्याजस्तुति के भेद नहीं। परवर्जी सजीविनीकार ने भी यह तथ्य रवीकार किया रै इस दि्ा में स्वमं सवस्वकार तथा रत्नाकरकार का मी ध्यान नहीं गया था न तो उनके पूर्ववर्ती मम्मट आदि आवार्यो का ह। परवत्ती आचार्यो में कुवलयानन्दकार अ्पयदीक्षित पण्टितराज जगन्नाय नवा विश्वेश्वर से भी यह तथ्य छूटा रह गया है। जयदेव का 'उक्तिव्याज स्नुतिनिन्दास्तुतिर्भ्या स्तुतिनिन्दयो '-निन्दा और स्तुति के द्वारा स्तुति और निन्दा कौ उकि का नाम है व्याजस्तुति'। यह लक्षण मानकर अप्पयदीक्षित ने व्याजोकि के चार नेद वतलाए है। दो भेद तो वपर्सुक्त भेद
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ही है। दो अन्य भेद वे हैं जिनमें जिसकी निन्दा या स्तुति कथित होती है गन्य स्तुति या निन्दा उससे भिन्न की प्रतीत होती है। अन्य की निन्दा से अन्य की स्तुति का उदाहरण उन्होंने वह दिया है- अप्पयदीव्षित='कत्लवं वानर ! रामराजमव्रने लेखार्थसंवाहको यातः कुन पुरागतः स इनुमान् निर्दन्धलङ्गापुरः। वद्धो राक्षससूनुनेति कपिभि: संताडितस्र्जितः स न्रौडात्पराभवो वनमृग: कुनेति न शबते ।। [लंका में अंगद से किसी राक्षस की उकि] 'अरे वानर तू कौन-सा बानर है, [उत्तर ] राम के राजमन में डाकिया का काम करने वाला। [प्रश्न] वह जो एक हतुमान् नामक वानर पहले चहोँ झाया था और लंका को जला गया था वह कहाँ गया। [उत्तर ] यह जानकर कि उसे राक्षस के लड़के ने वाँध लिया था, उसे वानरों ने मारा पीठा और दुस्कारा, तो ताज के मारे वह जंगली वानर कहाँ चला गया पता नहीं। -यहाँ निन्दा दनुमानूजी की की गई है और स्तुति व्यक हो रही है उनसे मिन्न वानरों की। इसी प्रकार अप्पवदीक्षित ने स्तुति से निन्दा की प्रतीति का भी ऐसा ही उदाहरण मी दिया है। इन दो मेदों की कत्पना रत्नाकरकार के मस्तिषक में भी आई थी, किन्तु उन्होंने इन्हें अति- शयोकि और अप्रस्तुतप्रशंसा में गतार्थ वतलाया था। अतिशयोतति में तब जय पर्यवसित होने वाली निन्दा चा स्तुति में अतिशय की विवक्षा दो यथा 'इन्दुलिप्' इत्यादि उद्धृत पद्य में। यदि अतिशय की िवक्षा नहीं रहती तो इन भेदों का अनर्भान अप्रस्तुतप्शंसा में ही होता है। चथा पूर्वेद्भृत 'धन्याः खलु बने वाताः' पद में। अन्त में रत्नाकरकार ने कहा है कि 'यस्यैव स्तुतिनिन्दे तत्यैव निन्दास्तुतिप्रतोती स्वतिशयविवक्षायां व्यावस्तुतिः' व्याजस्तुति वहाँ होती है जहाँ जिसकी निन्दा और स्तुति कही जाय पर्यवतान भी उसी स्तुति या निन्दा में हो और उस पर्यवरसित में असिशाय की विनका हो। पण्डितराज्-पण्डितराज ने भी इन दो नवीन भेदों को समान्य ठहराते हुए तर्क दिया है कि अन्य की निन्दा से अन्य की स्तुति व्यक्त होने पर निन्दा का स्तुति में भर्यवसान होने की वात नहीं चनेगी। व्याजोकि में निन्दा या स्तुति ही स्तुति या निन्दा में परिणत होती हैं। अन्य की स्तुति या निन्दा स्तुति या निन्दा रूप ही रही आएंगी। इस प्रकार यहाँ 'व्याजत्व' ही उच्छिन्न हो जाएा । पण्डितराज का कथन है- 'इयं न्याजस्तुतियत्यैव वस्तुनः खुतिनिन्दे प्रथमसुषक्रम्बेते तत्यैव नेननिन्दास्तुत्योः पर्यवसानं भवेत् तदा सवति। नैवधिकरण्ये तु न। [ पृ० ५६१] इन मेदों का खण्डन करते हुए पण्टितराज रत्नाकर का उल्लेस नहीं करते। पण्टितराज ने स्वयं व्याजस्तृति का लक्षण इस प्रकार किया है- 'आमुखप्रतीतान्यां निन्दास्तुविम्यां स्तुतिनिन्दयोः क्रमेण पर्यवसानं व्याजस्तुतिः। -आरन्भ में पतीत या निन्दा स्तुवि के द्वारा पर्यवसान में क्रम से स्तुति या निन्दा का वोष न्याजस्तुति । पंडितराज ने भी व्याजस्तुति में अपरार्थ की प्रतीति में लक्षणा को ही कारण माना है। विश्वेश्वर-विद्वेश्वर ने भी व्याजस्तुति के रुद्रगाभिमत भेद ही माने हैं। अप्पचदीक्षित के चार मेदों का विवेचन भी उन्होंने किया है और उनका अपनी मोर से कोई खण्डन नहीं किया
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४२६ किन्नु प्राचीनों की ओर से नवीन दो भेदों को अप्रस्तुतप्रशंसा में गतार्थ बतलाया है। विश्वेश्वर का व्याजस्नुत लक्षण इस प्रकार है-
-पस्तुति [निन्दा ] और स्तुति का उलटा पयवसान व्याजस्तुति कहलाना है। निन्दा और अस्तुति अभिन्न नहों कही जा सकती। अस्तृति स्तुति का अभाव दोनी है। निन्दा अमावात्मक नही होकर भावात्मक होनी है। इस प्रकार तो स्तुति को भी निन्दा का समाव कहा जा सकता है।
पाठान्तर=व्याजस्तुति की अन्तिम पक्ति में डॉ० जानकी ने उन्मूसिता के स्थान पर 'टन्मीलिता' पाठ माना है और दिन्द के स्थान पर 'बिलष'। 'उन्मीलिना' पाठ के अनुसार 'निन्दा उन्मीलिता' यह अन्वय होगा और अर्थ निकनेगा-'निन्दा को उद्धाटित कर दिया गया' जद कि निन्दा 'कि वृत्तान्त''द में वाच्य है अ दाटित ही है। दूसरा अर्थ निकाला बारगा 'उसका रहस्य सोल दिया गया'। यह दूरगामी कर्पना होगी। वस्तुन पण्डितराज ने इक्ष पक्ति को 'गमिता' तक सद्धृन किया है। उसमें 'उन्मूलिता' पाठ ही है-[दषत्व-व्याजस्तुति प्रकरण पृ० '६० ] रिलष्ट और क्लष्ट का विचार इम यहीं रुद्ट के प्रसग में कर आए हैं। श्रीविदयाचकवत्ती ने अपनी सनीविनी में व्याजस्तुति का मग्रह कारिका द्वारा इस प्रकार किया है- 'व्याजेन व्याजरूपा वा स्तुतिर्भ्याजस्तुतिद्वयम्। अप्रस्ुतपश्सात स्तुतिनिन्दातमका मिदा।।' -- 'ध्यान से स्तुति और व्याजरूप स्तुति ये दो व्याजस्तुति होती हैं। स्तुतिनिन्दा होने से ये अप्रम्नुतिप्रशंसा से मिन्न हो जाती है।' [सर्चस्व ] गम्यत्वमेव प्रकृतं विशेषविषयत्वेनोररीकृत्याक्षेपालंकार उच्यते- [सू० ३९] उक्तवक्ष्यमाणयोः प्राकरजिकयोचिशेपप्रतिषत्यर्थ निपेधाभास आक्षेप: । इछ प्राकरणिकोऽर्थः प्रारुरणिकत्वादेव वकतुमिष्यते तथाविधस्य विधा- नार्हस्य निषेध: कर्तु न युज्यते। स कृतोऽपि वावितस्वरूपत्वान्निषेधायत इति निषेधाभास: संपन्ना। तस्यैतस्थ करणं प्रकृतगततवेन विशेषप्रतिप स्थर्थम्। अन्यथा गजस्ानतुल्यं स्यात्। स चामासमानोऽपि निषेधस्न- प्रोक्तस्य वा स्यात् आसूत्रिताभिघत्वेन वक्ष्यमाणस्य वा स्यादित्याक्षेपसय दयी गति। तनोक्तविषयत्वेन कैमर्थक्यपरमालोचनमाक्षेपः। चक्ष्यमाण
क्षेपाविति वदन्ति। तत्रोक्तविपये यस्यैवेष्ठस्य विशेषस्तस्यैवाक्षेप,। चदय माणविपये त्विष्टस्य विशेष, इष्टसंबन्धिनस्त्यन्यस्थ सामान्यरूपस्य निषेघ:। तेनात्र लक्षणमेदः। विशेषस्य चात्र रा्दानुपासत्वाद् गव्यत्वम्। तश्रोक
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आक्षेपालक्कार: ४२७
विषय आक्षेपे क्वचतििद्वस्तु निषिध्यते कचि द्स्तुकथनमिति हो भेदी। वक्ष्यमाण विपये तु वस्तुकथनमेव निविध्यते। तथ् सामान्यप्रतिपायां कचिद्विशेष- निष्ठत्वेन निषिध्यते कवचित् पुनरंशोक्तावंश्ञातरगतत्वेनेत्यन्ापि दौ भेदौ। तदेवमस्य चर्वारो मेदाः। शब्दसाम्यनिबन्धनं सामान्यविशेषभावमवलम्बय चात्र प्रकारिमकारभावप्रकल्पनम् । गम्यता का प्रकरण चला आ रहा है और आक्षेप में 'विशेप' की गम्यता रहती है इस कारण सी को लेकर अव आक्षपालंकार का निरूपण करते हैं- [सूत ३९] चिशेषता की प्रतीति कराने के लिए उक्त [ कह जा चुके ] अथवा चचय- माण [कहे जाने वाले ] प्रकरणिक के निषेध का आभास आप्षेप [नामक अलंकार कहलाता है] [ वृत्ति ] यहाँ [अत्येक वाङ्मय में] जो अर्थ प्राकरणिक होता है प्राकरणिक होने के कारण ही उसका कथन अमीष होता है। ऐसा सर्थ बिधानाई होता है अतः उसका निषेध करना उचित नहीं होता। यदि वह [ निषेध ] किया भी जाता है तो उसका स्वरूप वाषित हो जाता है, अतः वह निषेध जैसा रहता है फलतः वह निषेधाभास वन जाता है। इस प्रकार के इस [निषेध] का जो विधान होता है उसका उद्देश्य [वक्त्यार्थ] में वैशिष्व्य [जोर] लाना होता है। ऐसा न हो तो यह गजसनान के समान [ किया न किया बरावर] हो जाए। यह जो मामासमान निषेध है वह नी या तो ऐसे अर्थ का होता है जिसे कह चुका जाता है या फिर ऐसे अर्थ का जिसके कथन की भूमिक्ामात्र वनी रहती है; और जिसे स्पषटरूप से आगे कहना शेष रहता हैं, इल कारण भाक्षेप भी [उक्तविषयक और वक्ष्यमाणविषयक, इस प्रकार] दो प्रकार का हो जाता है। इन [दोनों] में [प्रथम में ] विषय टक्त रहता है तो [ निपेधरूप ] आक्षेप ऐसा ज्ञान सिद्ध होता है जिसमें अन्ततः [ कथित अर्थ के विषय में ] किमर्थकता ='इस सब के कहने से क्या' इस अभिप्राय की प्रतीति होती है, [और द्विवीय आक्षेप में ] विषय वक्ष्यमाण रहता है तो [यही निषेपरूप] आक्षेप [अकथित अर्थ को अर्थवलात्] 'ले आने'-रूप व्यंजना सिद्ध होता है। इस प्रकार आक्षेप शब्द का अर्थ बदल जाने से [ मामद मादि ] कुछ माचार्य यह कहते हैं कि आक्षेपा- लंकार [मलग-अल्षग ] दो होते हैं। इन [दोनों आक्षिपों] में से [श्रथम] उत्तविषय [नामक आक्षेप] में उसी का आक्षेप [निषेधाभास] रहता है जिसमें विशेषता का प्रतिपादन अमीष रहता है जब कि [द्वितीय] वक्ष्यमाणविषय [नामक वक्षेप] में विशेषता अमीष्ट अर्थ में ही प्रतांत छोती है, किन्दु निषेध उस अमीष्ट सर्थ से सम्बन्धित अन्य रूप का होता है जो सामान्यात्मक रद़ता है। इस कारण इन दोनों भेदों में लक्षण वदल जाता है। विशेपता यहां गम्य होती है क्योंकि उसके वाचक शब्द का प्रयोग नहीं रहता। उत्तविषय (नामक) आक्षेप में कहीं तो निषेध रदता है स्वयं वस्तु का, और कहीं वस्तु के कथन का; इस प्रकार उसके दो भेद हो जाते हैं, परन्तु वक्ष्यमाणविषय (नामक) आक्षेप में केवल वस्तुकयन का ही निषेध रहता है। उस [कथन] में भी यदि सामान्य का कथन रहता है तो निषेष विशेष का हुआ करता है और कथन आशिकरूप से होता है तो [ निषेष] अन्य अंश ना [हुआ करता है] इस प्रकार इस भेद में भी दो भेद हो जाते है। इस प्रकार आछेप के चार भेद होते हैं। [सभी आक्षेपों का वाचक वक्षेम ] शब्द एक ही है इस कारण सामान्यविशेषमाव मानकर और प्रकारप्रकारिभाव [प्रकार=विशेष, प्रकारी=सामान्य] की करपना की है।
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४२८ अलङ्गारसवस्वम् विमर्शिनी उररीकृष्येति आश्नित्य। तमेवाह-उत्तवकष्यमागयोरित्यादि। तथाविधशयेति वकतु- मिष्टस्य। अत एव विधानार्हस्येत्युकम्। स इति निपेध:। वाधितम्वरूपत्ादिति। ग्राक. रणिके विधानाहे नस्यासमवाद्। यद्येव तह्यसावकार्य पवेशयादाट्पाद-तरयेत्यादि। अन्यथति, विशेष प्रतिपत्तिरन स्याद। तस्य च त्रिपयं दर्शयति-स चेत्यादिना। उक्कर्येति वस्तृत कथनरूपाय। आसूतितामिधरवेनेति सामान्यमुवेनाशोकिमुसेन वा। अन्यया दि सरवत् विवसितार्थरय निषेधमात्रादेव प्रतीतिप्रसङ्ग। कैमर्थक्येति, किमर्थमेतदिति पर्य- नुयोगरूप हरयर्थ. । पवमिति। केमर्थवयपर्यालोचनानयन रुपागूर ण रूपर वाद्। वदन्तीनि प्राच्या:। य दाह ामह-
एकरूपतया शेपा निदिश्यन्ते यथाक्रमम्।'इति। तेनारमाकमेनस मतमिति मावः। वच्यमाणविपये हि कथनरपैय निपेध्यत्त्राप कथ्यत इति कमर्थक्यपरमालोचन मेव प्रतीयते इश्यैक पुवाचेपशव्द्धयार्थं इति मेदामाबाद् छावासेपाविति न युक्तम्। तक्किमेक एवाक्षेपो भवन्मते युक्त इश्याशङ्कपाह-तत्रत्यादि। आानेप इति विशेष। कार्यकारणयोरभेदोपचारात्। इष्टायेनि विशेषार्मन. 1 अन्यस्पेति विशेषान्। एवं निषेधविशेषयोरभेंदेनावस्थितेर्नान सामान्यलस्षगसभबोउस्तीनि ता्पर्यम्। ननु सर्वविशेषार्णं सामान्यानुमाणितावादेकशपि कृतो निषेधादिरपरशावश्यमेव पर्यव- स्यतीति कथमत्र निषेधविशेपयोभित्नविषयत्वमुककम्। सत्यम्। यद्यप्येवं तथाप्पेतनन शब्दार्थम्। अर्थवशेन तम तथात्वाचगते। इद व शाव्मंवेतदासेपाह नार्थवशायातम्। तथार्वे द्ि रूपकादी नामप्युपमाएव स्यात्। तेवामप्यार्थस्य सादश्यस्य मावाम। पतचोद्रट- विचारे राजानकतिलकेनैव सप्रपञ्मुन्तमिति 'न तथारमाभिराविष्कृतम्। नेनेति। निषेध- विशेषयो रेव भिनन विषयरवादाक्षेपशब्द स्यार्थे भेदानू। यशवत्र विशेष स किं वाच्य किसुत गम्य हश्याशकयाह-विशेषस्येत्यादि। कथनमेवेति, न पुन. सासाद् वस्त । तदिति कयनम्। सामान्यप्रतिशयेति। सामान्यमेवाश्रित्येश्यर्थ। विशेषनिष्ठत्वेनेनि। साभान्यध्य विशेषाविना भावित्वाद्। निपिध्यत इति, अन्र, उत्तसत्न प सवन्धनीयम्। अंग्यान्वरगनलेनेति। सामान्य- प्तिज्ञयेश्ययपि संबन्धः। अवरापि झपराशोक्ति सामान्यमुसेनव निषिध्यते। विशेषस्य हि साचादय् निषेधी न भवति। निषेघानन्तर तरपरतीतेर्भाविनो निपेधाममवात्। न झको निषेध शब्दासमर्पिते ताकालमप्रतीयमाने च विपये समत्रति। अस्येयान्ेपस्य। ननु दपोरान्ेपयोध्चखवारो भेदा- संभवन्तीति कथमेकार्यवोकता इतयासङ्कयाद-शम्देत्यादि। प्रकश्पनमिति। न पुनर्वस्तुतः सद्वान डूरयर्य। उरशेकृष्य=टेकर= इक्षी को आवार बनाकर। उमो को कहने है-वकवचयमाणयोः हत्यादि द्वारा तथाविधाय =ऐसा अर्थ= वितरक्षिन, वत्तव्य। इसीलिए विधानाई। सः= वह निषेध। बाधितस्वरूपर्वात= उमका स्वरूप वाषित रहता है इमलिए=अर्थात् जो अर्य प्राकरणिक होता वह विधानाई होता है अत उसका संभन नहीं होता इसलिए। 'यदि यह ममव नहीं होता तो फिर इमका विधान ही नहीं किया जाना चाहिए'-इम शका पर उच्तर देते हैं-तस्य हत्यादि। अन्यथा यदि देमा न हो अर्थान् विशेष अर्थ का ज्ञान न हो। उम [निषेध] का विषय [प्रतियोगी, जिसका निषेष होता है वह विषय] वतलते हैं-'स च' इत्यादि के द्वारा। उक्तस्य - कधित का = किन्तु वस्तुनः कथनरषप का। आसूत्रिताभिधश्य-जिसके कथन की भूमिका-
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आक्षेपालद्कार: ४२१
मात्र वनी रहती है। अर्थाद या तो सामान्यात्मक रूप से या फिर अंशमात्र के कथन के रूप से। यदि ऐसा न हो तो फिर विवक्षित अर्थ की प्रतीति सभी स्थलों में निषेध के द्वारा ही होने लगे । कमर्थक्य='इससे क्या' इस प्रकार का अर्थात पर्यनुयोगरुप। एवस् =इस प्रकार अर्थाव कैमर्थक्यपर्यालोचन और 'मनयन=ले माना'-रूप जो आगूरण तदूप। वदन्ति=कह्षते हैं अर्थाद प्राचीन आचार्य। जैसा कि मामह ने कहा है- 'उन [आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोकि और अतिशायोक्ति :- इन छ अलंकारों] में से केवल आक्षेप 'वक्ष्यमाणविषय और उक्तविषय' इस प्रकार दो प्रकार का, और शेप सब एक ही एक प्रकार के कमशः बनलाए जाऐंगे। [ कान्यालंकार श६६-६७]। इसका अर्थ यह कि हमें [ सर्वस्वकार का] यह मान्य नहीं है। वस्तुतः वक्ष्यमाणविषय नामक आक्षेप में भी निषेध किया जाता है कथन का ही। अतः वहाँ भी ज्ञान में 'ऐसा किस लिए [अर्थात् निरर्थक ]' इस प्रकार का बोध होता है इसलिए [ दोनों ही भेदों में] आक्षप शब्द का अर्थ एक ही रहता है। इस प्रकार [दोनों मेदों में ] भेद नहीं रहता, फलतः 'भाक्षेप दो ह' ऐसा कइना ठीक नहीं है। 'तो क्या आपने मन में झषाक्षेप एक ही प्रकार का मान्य है'-इस प्रश्न पर तत्तर देते हुए कहते है-तन्र इत्यादि। आढेप मर्थात विशेष, कार्य और कारण में औपचारिक अभेद मानकर। ३ स्य = अमीष् सर्थ सर्थात् विशेषरूप। अन्यस्य =अन्य मिन्न अर्थात् विशे- पात्मक अर्थ से मिन्न [सामान्य जर्थ]। इस प्रकार तात्पर्य यह निकला कि निषेध और विशेष ये दोनों भलग-अलग रहते हैं, इस कारण इसमें सामान्य लक्षण का होना संमव नहीं है। [शक्का ] 'सभी विशेष सामान्य से अनुषाणित रहते हैं इसलिए एक का निपेध अपने आप अवश्य ही अन्य का निषेध बन जाता है, तन यहाँ निषेध और विशेष को अलग-अरग वैसे कहा गया'। [उत्तर] ठीक है। यदपि दोता ऐसा दी है तथापि यह अर्थ शब्द से नहीं निकलता। ऐसा प्रसीत होता है अर्थसंगति से। प्रकृत में जिस आक्षेप का विचार चल रहा है वह शाब्द वक्षेप का ही अंग है, अर्थवसाद् आया दुआ नहीं है। वैसा मानने पर तो रूपकादि भी उपमादि स्वरूप सिद्ध होंगे। वर्योकि अर्थवलात् सदृजञ्य तो उनमें भी रहता ही है। यह सव नन्ट विचार में राजानक तिलक ने ही विस्तारपूर्वक कह दिया है इस कारण उतने विस्तार में कमने इसका विचार नहीं किया। तेन=इस कारण= निपेध औौर विशेष दोनों के भिन्नविपयक हो जाने से माक्षेप शब्द के अर्थ में भेद हो जाने के कारण। अब 'जो यहाँ विशेष रहता है वह वाच्य होता है या गम्य' ऐसी शब्का का उत्तर देते हैं-विशेषस्थ इत्यादि । कथनमेव=कथन ही न कि स्वयं वस्तु। तत् = वह् =कथन। सामान्यप्रतिज्ञया=सामान्य का ही आश्रय लेकर [कथन होने से]। विशेषनिष्टर्वेन=विशेषपरक होने से=सामान्य विशेष से पृथक् नहीं रहता इसकिए। निविध्य ते = निषेध किया जाता है इसका संबन्ध यहाँ और आगे भी जोड़ना चादिए। 'अंशान्तरगतरवेन=अत्य किसी अंश का [निषेध ] इसका संवन्ध 'सामान्यप्रतिज्ञया=सामान्य- मात्र का कथन रहता है'-इससे भी करना चाहिए क्योंकि यहां भी अन्य अंश का निपेध सामान्य रूप के हो माध्यम से हुआ करता है। सीधे-सीधे विशेष का निषेष नहीं होता। क्योंकि उसकी प्रतीति निषेध के वाद होती है, तब [ वक्ष्यमाण] भावी का निषेध नहीं हो पाएगा। जो निषेध कहा जाता है वह शब्दत: सकथित या पतीयमान विषय का नहीं हो सकता। अस्य=इसके=आक्षेप के। 'चार भेद दो आक्षेपों के होते हैं, तब एक ही आक्षेप के चार भेद कैसे वतलाए जा रहे हैं' इस शंका पर कहते हैं-शब्द इत्यादि। प्रकरप नम्=करपना की है=मर्थ यह कि इसका वास्तविक सद्भाव नहीं है।
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[सर्वश्व] क्रमेण यथा- 'बालअ णाहं दुई तीए पिओ सि त्ति ममहवावारो। सा मरइ तुग्हा अयसो परअं धम्मस्वरं भणिमो।।' प्रसीदेति दयामिद्मसति कोपे न घदते करिष्याम्येवं नो पुनरिति भवेदभ्युपगमः। न मे दोपोडस्तीति त्वमिद्मपि दि पास्यसि मृपा किमेतम्मिन्यक्तु क्षममिति न वेद्षि पियतमे।।' 'सुहअ चिलंयसु थोअं जाय इमं विरद्वकासरं हियअं। संटविऊप भणिस्सं महवा चोलेसु कि भणिमो।' 'ज्योस्ना तम पिकवचः ककचस्तुपार: क्षारो मृणालवलयानि कृतान्तदन्ता:। सर्व दुरन्तमिदमद्य शिरीपसृद्धी सा नूनमा: किमथया हृतजल्पितेन ।I' आद्ये उताहरणदये यथाक्म वस्तुनिपेधेन भणितिनिवेधेन चोकविषय आक्षपः। तम चोक्तस्य दुर्तीत्वम्य धस्तुनो निवेधमुखेनेव वास्तवत्वादि- विशेष। तथा भण्यमानस्य प्रसादस्य निवेधमुसेनैच कोपोपरागनिवर्तनेना- वश्यस्वीकार्यत्वं विशेष:। उत्तरस्मिन पुनष्दाहरणह्वये यधाकमं सामान्य द्वारेपेएस्याक्षो क्तावप्पंशन्तरस्य स्वरूपेण च भजितितिषेधे वक्ष्यमाणविषय आक्षेपः। नथ व वक्ष्यमाणस्प्रेष्टस्य भणिस्समितिप्रतिव्ञातस्य सातिशयो मरणगद्गोपज्नफत्वादिर्विेप:। तथा चाशोकार्वंशान्तरस्य स्रियत इति प्रतिपाद्यस्थाशकयवधनीयत्वादिविशेष:। एवं च आक्षेपे इषोर्थ: तस्पैव निवेध:, निषेधस्यानुपपद्यमानत्वादसत्यत्वम्, विशेषप्रतिपादनं चेति वतुए यमुपयुज्यते। नेन न निवेधविधि: न विद्ितनिषेध:। कि तु निषेधेन विधेराक्षेप.। निषेधस्यासत्यत्वाद् विधिपर्यवसानातु। विधिना तु निषेधोडस्य भेदत्वेन वक्ष्पने। ततद्च दवर्पचरिते-'अनुरूपो देव इत्यात्मसंभावना- इत्यादी, तथा 'यामीति न स्नेहसटशम् इत्यादाबुक्तविषय आसेप:। क्रम से उदाहरण थथा- 'बाहक! नाद दूनौ तस्या प्रिथोडमीनि नारमद्व्यापार। सा प्रियत्रे तवायश दतद् धर्मासरं मगाम: ।' [१]-[दूती की नायक्र के अति उक्ति ] 'बाठक । तुम उम [मेरी सस्ी ] के प्रिय हो हस फिर मुंझ दूनी न ममझ बैटना, इम नोग यह काम नहीं करनी। इम दो 'वह मर जाएगी और तुम्हारा भयर होगा' यह परम की वान मर कहने भई हैं।'
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[२]- 'यदि कहूँ कि प्रसन्न हो जाओ' तो यह जमता नहीं, क्योंकि तुम गुस्सा [तो] हो नहीं, 'ऐसा पुनः न करुँगा' यह कहूँ तो यह अपना दोष सीकार करना है, कहूँ कि 'दोप मेरा नहों है' तो इसे तुम झूठ समझोगी। हे पियतमे! मैं नहीं समझ पा रहा कि इस विषम स्थिति में क्या कहना उचित है।' सुमग विलम्स्त्र स्तोकें यावविदं विरइकातर हृदयम्। संस्थाप्य मणिन्यान्ययवापक्ञाम कि मगाम: ।। [३]-'सुभग ! भोढ़ा ठदरो। अपने विरहकातर हृदय को स्थिर तक कहूँगी, या जाओ चलें जाओ। कहे हो क्या ?' [४ ]-चाँदनी अधियारी हो गई है, कोकिल की कूक आरा वन गई है, भोस की सूदे क्षार और मृणालपुंज चम की दँतौड़ी प्रतीत हो रहे हैं। इस प्रकार इस समय ये सभी दुखदायी वन रेठे हैं। शिरोपकीमल अवेली वह निश्चित ही, किन्तु आाः इस सब वेकाम मापग से क्या लाभ। [इन चार स्थकों में से] प्रथम दो स्थलों में कम से (प्रयम में) वस्तुनिषेषात्मक तथा [ द्वितीय में] कपननिपेधात्मक आक्षेप है। यद आक्षेप उक्तविषय आक्षेप है। इन्मे से [प्रथम में] दूतीत्वरूपी वत्तु कही जा चुकी है। उसका निषेध किया गया है। उसी से उसमें वास्तविकता आदि रूप विशेषता का ज्ञान होता है। इसी प्रकार [द्वितीय में] पसन्न होने की जो बात कही जा रही है उसमें 'कोप [ रूपी राहु] का ग्रहण हटाकर अवश्य स्वीकार किये जाने योग्य होने' की विशेपता विदित होती है। यह विशेषता निषेष के द्वारा ही निकलती है। परवर्ती जो दो उदादरण है। उनमें क्रमशः [पथम में] विवक्षित अर्थ सामान्य रूप से कह दिया गया है अतः उसका आंशिक कथन हो चुका है तदनन्तर अन्य अंश और स्वयं कथन का मी निषेध होता है। अतः यहां वक््यमाणविषय [नामक ] आक्षेप है। इसमें 'कहूँगी'-शब्द्र के द्वारा जिस वस्तु के कहने को बात कही गई है उस अभीष् वस्तु में जो वैशिष्व्य प्रतीत होता है वह है- 'अत्यधिक मात्रा में मरणशंका उत्पन्न करना"। इसी प्रकार [ अन्तिम स्थल में ] प्रतिपाद्य वस्तु का कुछ अंश कह दिया नया है और कुछ अंश जिसका प्रतिपादन 'मरने वाली ६ै' इस प्रकार किया जाना शेष है उसमें [ निषेध के द्वारा] 'उसका कहा जाना संभव नहीं है' आदि विशेषताएँ प्रतीत होती हैं। इस प्रकार आक्षेप में (१) अमोष्ट अर्थ, (२) उसी अर्थ का निषेध, (३) निपेध का सिद्ध, न होना और (४) विशेपता का प्रतिपादन इन चार तत्वों का उपयोग होता है। इस लिए न तो यहाँ निषेध का विधान होता औौर न विहित का निषेश ही। यहां तो निषेध से विधि का आक्षेप होता है। यह इसलिए कि निषेध असत्य होता है अतः उसका विवि में ही पर्यदसान हो जाता है। विधि से जो निषेष प्रवीत होता है उते तो दम इसी [ आाक्षेप ] का एक भेद बतलाने वाले हैं। इस लिए हपचरित में भई [प्रथम उच्छवास्ष में दापीच की दूती मालती द्वारा सरस्वती के प्रत्ि कथित इमारे] मालिक आपके अनुरूप है यह स्वयं की बढ़ाई करना है'-[३६ पृ० नि० सा० सं. ७] हत्वादि उत्ि में, तथा-[तृतीय उच्छूवास में दक्षरूप में परिणत भैरवाचार्य के राजा पुष्यभूति के प्रति कथित] 'जाता हूँ' यह कहना रनेह के अवरूष न होगा [पृ० ११६ वही] इत्यादि वाक्यों में उक्तविषय आक्षेप है। विमर्शिनी चस्तुनो नियेधमुखेन िशेष इस्यनेन यस्यैव निषेधस्तस्वैव विशेष हृत्युकं निर्वाहितम्।
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४३२ अलङ्कारसवंस्वम्
'दूरपवामे सँमुह्दो सि सुहभ आलिंगर्ग सण कुरुसु। क्षह्वा छा दि दमिणा गमणम्मि विलयआारेण।' हरयन्र पुनरसायालिवना्य निषेधो चिधी तारपर्यामानास निषेधाभासतामियादि श्येतदुदाहरण न वाच्यम्। यतोऽत विछम्यनकारिण आदिम नर्यैय निषेधेन गमनविधि- स्द्रेषित। सच विधिरनुपपद्यमानरवादपस्थानलक्षण निषेध लचयति। अत्रघ गमन- स्यावर्यपरिहार्यवादिर्विशेष प्रयोजनम्। समालिक्वनमाध्रस्येय चेष्टखवे गमनस्य विधिरेव पर्यवस्येध निपेध इति विवसितवाषयार्थचिप्रलोप एव स्यात्। अतश्रकविपये विदिन नियेधेप्याप्ेपस्तमन्यत्र निषेघो्यत्र वियोषद्रेति न वाच्यम्। 'वस्तुनो निपेधमुखेन विशेष-वस्तु के निषेध से उसकी विशेषता' इस कथन का तातपये यह निकम्ण कि 'विशेषता उसी में प्रतीत होगी जिसका निषे होगा।' [अतः मलकाररत्नाकरकार को उद विषय भाक्षेप के लिए] 'दूर-प्रवामे समुसोडसि सुभग। आालिगन क्षण कुरुष्व। अपवा छलमेनेन गमने विलम्बकारिणा॥' -'सभम' दूर देश जाने को उचत हो। आमो, एक क्षण छाती से एग लो [भालिंगन बर लो] अथवा रहने दो। इससे जाने में विलम्न हो जाएगा।' इसे उदादरण नहीं बनलाना चाहिए। क्योंकि इसमें उक [वह दिए गए ] आलिगन का जो निषेध किया गया है उसका तात्प्य [अपने ] विधान में नहीं है अत वह निषेषामास नहीं बन पाता। ऐसा इसलिए होता है कि इस पद्य में [पूर्वविहित] 'अलिगन करो' शब्द के द्वारा विदम् कारी मार्लिंगन का ही [पदचात् 'रहने दो इसे' इम प्रकार] निपेध कर गमनविधि का समर्थन किया गया है। यह विधि अपने आप में बांधित है [क्यों कि वक्ता को अनमीष्ट है] अत इसकी 'अप्रस्थान'- [गमनामाव, गमन निषेध ]-रूपी निषेध में रक्षणा हो जाती है और इस लक्षगा का प्रयोजन ठहरता है गमन में इस वेशिष्ट्य की प्रतीति कि वह अवर्यमेव परिहारय है। [ इस प्रकार निषेध किया गया आर्लिंगिनरूपी अन्य अर्थ का और विशेषना प्रतीति हुर्द, गमनरूपी अन्य सर्थ में]। [वस्नुत- इम पद्यार्थ में गमनविधि के द्वारा पतिपादित गमननिषेध ही भमीष् अर्य है] यदि यह। क्षगालिंगनमात्र अभीष्ट दोता तो गमन का विधान [वाधित न होकर विधान रूप में ] हो अन्त तक प्रतीन= [पर्यवसित ] होता, निषेध नहों, और इस प्रकार वाक्य से जो अर्थ विर्वाक्षन [= अमोष्ट ] है वही अर्थ सदेया छूट जाएगा। और इसी कारण [अरकाररत्नाकरकार को] यर भी नहीं कहना चाहिए कि 'उकविषय आक्षेप वहों मी होता हे जहाँ विदित का निषेध दोता है और वहा भी जहाँ निषेध अन्यन्न होता है औौर विशेषता की पतीनि अन्यष। 7 विमश-विमर्शिनी का यह अश रतनाकर की सवस्वविरोपी मान्यताओं का उत्तर है। रस्नाकर में शोमावरमित्र ने 'दूरप्रवासे० पद् में उक्तविषय नामक आक्षेप का वस्तुनिपेध नामक भेद माना है। उनके अनुमार इस पद्य में क्षगालिंगन ही वक्ता का अभीष्ट अर्थ है। उसके निषेध से वे गमन में 'आवश्यकत्व' और 'अपरिारयंत्व' इन विशेषनाओं की प्रतीति मानते हैं। इस प्रकार शोमाकर के अनुसार निषेध आर्टिंगन का होने पर मी विशेषता की प्रतीति गमन में होती है। सर्वस्वकार का सिद्धान्त है कि निषेध और विशेष दोनों एक ही वस्तु के होने हैं। रत्नाकर इसका उश्लेसयूवक खण्टन करते और इस पद्यार्थ के आधार पर कहते हैं-'एव चैवमादावालिगनारैनिपेये प्यन्यविशोष प्रती ते.''यस्यैव निपेधरतस्येव विशेष' इत्याघसकृतम्, अन्यापकत्वात्'-'टक्त पघ् के अर्थ में निषेध आ्लिंगन का हो रहा है, ओर विशेषता गमन में प्रतीत हो रही है इस कारण
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[सर्वत्कार का] 'जिसका निषेध हो विशेषता मी उसी में प्रतीत हो' यह कयन असंगत है। यह आक्षेप के सभी भेदों को व्याप् नहीं करता।' सर्वस्वकार ने कहा है 'चिहित का निधेध नहीं होता'। रत्नाकरकार इसके मी विरोष में स्पष्ट- रूप से कहते हैं-'मत्रालिंगनत्य विहितिस्यापि निषेधे आक्षेपतंभवाद 'विहितत्य निषेधो नाक्षेप' इति न वाच्यन्' = अर्यात् इस पघ में जो मालिगन बिहित है उसी का निषेध हुआ है। यहां आक्षेप संभव है तो [ सर्वस्वकार को] 'विहित का निषेध अक्षेप नहीं होता' यह नहीं कहना चाहिए। विमशिनीकार इस पद्य में गमन का निषेव विवक्षित [या वक्ता को अमीष] मानते हैं और उसी में अवश्यपरिहार्यल रूपी विशेषता की प्रतीति त्वीकार करते हैं। इस प्रकार उनके अनुसार यहा निपेध और विशेषता दोनों का आधार एक ही ठहरता है। इतने पर भी ने इस पद् को आक्षेप का उदाहरण नहीं मानते, क्योंकि यहां न तो गमन का विधान ही कथित है और न उसका निषेष ही। दोनों विमर्शिनीकार के हमनुसार शब्दरशक्ति से भासित न होकर अर्थशक्ति से भासित होते हैं। गमन का विधान भासित होता है उसमें विलन्ब करने वाले आलिंगन के निषेध से न्यंजना द्वारा, और उसका निषेध भासित होता है लक्षणा द्वारा। रत्नाकरकार के अनुसार यदि गमन में प्रतीत होने वाली विशेषता यी अवश्य अपरिहारयता तो विमर्शिनीकार के अनुसार उसके निषेध में प्रतीत होने वाली विशेषता हुई अवच्य परिदायता। फलतः निर्णयसागर संत्करण में रत्नाकर की ही पंकि के समान विमर्शिनी में मी जो 'अवश्यापरिहार्यत्व' छपा है वह स्वया विपरीत है। वस्तुतः 'दूरप्रवासे' पध वाच्य आक्षेप का उदाहरण न छोकर व्यंग्य भक्षेप का उदाहरण है। निषेध सौर विशेष दोनों जो यहां शब्द वाच्य न होकर व्यंग्य हैं। वयंग्य होने पर भी यह ध्वनिरप म होकर गुणीभूतव्यंग्यरूप है क्योंकि इसमें गमन शब्दतः कथित है। म्वनित्व उसी व्यंग्य में संभव होता है जो किसी भी भंश में वाच्य न हो। विमर्शिनीकार के मत में एक विचिन्न तथ्य यह है कि वे आक्षिप्त या वर्यन्य अर्थ में मी लक्षगा का उत्यान मानते हैं। गमन शब्द से गमनविधि का आाक्षेप होता है, वह वक्ता को समीष् नहीं है अतः उसका पर्यवसान निषेध में हो जाता है। विमशि नीकार इस पर्यवसान में कारण मानते हैं विपरीत लक्षणा। लक्षणा तो शब्द से कथित अतरन मुख्य या वाच्य अर्थ के बाघ से उत्थान पाती है, वाच्य या मुख्य अर्थ से माने वाले अर्थ के वाध से नहीं। विमशिनी प्रसा स्पेति वस्तुतो न, वयामिति ताकथनस्येव निषेध। सामान्यद्वारेणेति। मणिष्या- मीति भणनसामान्य माभित्येत्यर्थाः। तन तत्तदपराघोदीरणपरमेवेति तस्य विशेषागूरकतवम्। इष्टस्पेति काकापषिन्यायेन योज्यम। अंशोकाविति सर्व दुरन्तमित्यादिना। अंशान्तरस्येति स्रियते इत्यादेः किमथवा हतजल्पितेनेति सामान्यरूपरयेव निपेक्ष। एकमप्यस्य विभज्य स्वरूपं प्रतिपाद्य ति-एवं चेत्यादिना। उपयुन्यत इति। एतचतुष्ट्यमन्तरेणाप्षेप एव न भवतीत्यर्थः । तदेवाह-तेनेत्यादिना। निपेधबिधिर्नाक्षेप इति संचन्धः। एतदुत्तरन्ापि योज्यम् । यशाहु :- 'विहितस्य निपेधेन न निषेषविधौ भवेत्। निपेधेन विधियंन्न तव्रान्ेप प्रकीर्तित: ।'इति। तन्न निषेधविधिर्यथा- 'एप चीरोदजन्मा कुमुदकुलपतिः सेयमाकाशगङ्गा ब्राह्मं शीर्ष तदेतत्तदिदमनिमियं नेत्रमग्नेरगारम्। २८ स० स०
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सैपा दालाहउश्रीबंल विततनवो नागराजास्त पते कक्ाल का लियारेरिदमपि तदलं भावितैशो नमरते॥' अभ्लमिति निपेघस्येव विधि:। अतक्ष न तत्यासत्यरवम्। सदभावाच्च न विधिपर्य वसानमित्याक्षेपोपयोगिन्या: सामपया अभाव इति नायमशलंकार:1 स हि चतुष्टय संनिधावेव भवति। विद्वितनिषेधस्तु यथा- 'महम्य: शिवमर्तु वस्तु तिततं किषिद् वय ममहे है सन्तः शणुनावधत एतो युप्मासु सेवञ्जहि:। पद्वा किं विनयोकिभिमंम गिर्रां यधस्ति सूकामृनं माधयन्ति स्वयमेव तरसुमनसो याच्जा परं दैन्यभू:।' अम् विहितानां विनयोकीनां निषेध इति विदितनिपेध:। पूर्वयखात् नातेपा लंकारा। निपेधैन विधिस्तु मन्थकृतवोदाहतः। प्रसाइस्य-पसाद का निषेध, वस्तुत प्रसादरूपी वस्तु का नहीं, अपित्वु उसके जूयाम् कहूँ इस प्रकार शम्द से कथिन कथन का ही निषेध किया गया है। 'सामान्यद्वारेण = मामान्य द्वारा, सामान्यरूप से गर्योत् 'मनिम्यामि = कहूंगी' इस प्रकार शभ्द से कथिन कथन सामान्य को लेकर। और यह [कथनमामान्य] नायक के उन-उन अपराधों की ओर सकेन करने के दिर ही दै, इसलिए वह विशेषता का व्यजक है। इृषटस्य क अभीष्ट इसका अन्वय कौए की [एक ] आँस का [दोनों ] गोलकों के समान दोनों [अस और अँश्ान्तर] में करना चाहिए। अंशषोकी - अंग्त उक्ति- आशिक कथन, अर्थोर 'सर्व दुरन्तम्=सभी दुखदायी' इत्यादि के द्वारा। 'अंशा- न्तरस्थ =अन्य अंश का' 'म्रियते=मर रहा है' इत्यादि का। 'किमथवा हतजस्पतेन = अथना इस व्यर्थ माषण से क्या' इस प्रकार सामान्यरूप से कथिन का ही निषेध किया जा रहा है। इस प्रकार आक्षेप का विवेचन अलग-अलग भेरों में किया सब भी भेदों का प्रतिपादन पुनः करते हुए कहते हैं-'एवं प्र' इत्यादि। उपयुड्यते = उपयोग होता है- अर्थ यह कि इन चार्ह भेदों के बिना आक्षेप की निष्पति ही नहीं हो पानी। इसी तथ्य को पुन- कहते हैं-'तेन= अन: इसलिए'-इत्यादि के द्वारा यहाँ इस प्रकार अन्वय करना चाहिए-'निषेघविषि भाक्षेप नहीं है' इसी प्रकार परवर्ती वाक्य में मी-'विद्वितनिषैध आक्षेप नहीं है। जैसा कि कहा गया है- 'आक्षेप न तो विहित के निषेध में होता और न निषेध के विधान में, अपितु जहाँ निषेध से विषि का माक्षेप होता है वहों आक्षेप माना गया है।' इनमें से निषेध का विषान यथा- 'यह तो क्षीरमागर से उत्यन्न चन्द्रमा, यह आकाशगगा, यह पक्ा का सिर, यह अभ्नि का निवासगृह नि्निमेष तीसरा नेत्र, यह वह दालाइछ की नील छटा, शरीर को घेरे हुए ये वे नाग राज, यह वद कालियारि का कंकाल, अधिक पाहने से क्या, मगवन् आपको 'मों नमगे। यहाँ 'अलम्= अधिक कहने से क्या' इस प्रकार निषेय का ही विधान विवक्षिन है। इसीलिप इस निषेध में असत्यता नहीं है। असत्यता न होने से उसका पर्यवसान बिधि में नहीं होता। इस प्रकार यहाँ आक्षेपोपयोगी सामग्री ही नहीं है। फलन यहां यह [ आक्षेप ] अलंकार नहीं है। वह तो चारों अंगों के रहने पर हो होता है। विद्ित का निषेध यथा- 'म्राक्गों का कल्याण हो। इम अत्यन्त विस्तीण वस्तु को संक्षेप में कहने जा रहे हैं। है सरपुरुषो! आप सब इसे सनें और समझे। आप की सेवा में हमारी यह अंबति है [ इम हाय
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जोड़त है।। अथवा ये विनयपूर्ण वचन कहने से क्या। यदि मेरी वाणी में थोड़ा-बहुत सुभा पितरूपी अमृत होगा तो सुचेता जन स्वयं ही प्रसन्न होंगे। याचना में तो दीनता रह्दती है। यदां विनयोति का विधान हो चुका है। तदनन्तर उनका निषेध किया गया है इस कारण चह विदितनिषेध हुआ। प्रथम उदाहरण के समान यहां भी आक्षेपालंकार नहीं है। निषेध से विधि का जो उदाहरग हो सकता है वह स्वयं अन्कार ने ही दे दिया है। विमर्शिनी अश्न छ निषेध: स्व्रयमनुपपद्यमानत्वादविश्राम्यन् स्वास्मानं विध्यर्थ समर्पयतीति 'परार्थ स्वसमर्पणम्' इत्येवंरूपलक्षणासूलत्वमश्य सिदम्। यदुक्तमन्यन्न- 'यम्र स्वयमविश्रान्तेः परार्थ स्वसमर्पणम्। कुरुतेऽसी स आनेपो निपेपस्यावभासनावू।। हति। निषेधविधी विहितनिषेधे च पुनरभिधेयः। न पुनः 'स्वसिद्धये परानेप' इत्येवं लत्षणामूलत्वमत्र वाच्यम। मुख्यार्थस्येव विश्रान्तेर्मुपयाथंवाघाद्यभावात्। अवश्रान्ेः 'स्वसिद्ये परावेपः प्रतिषेवस्य यत्र हि। आत्ेपस्तन्र नैवेष्ट: प्रतिषेघस्य भासनात्।।' दस्याध्ययुक्तमेवोक्तम्। यधपि उक्षणाया 'स्वरसिद्ये परावेपस्य आागभाव एव प्राशुक्तस्तथाप्येतरपक्षाश्रयेपि म्राच्यानामपर्यालोचिताभिधान मित्येवंपरमेतदुक्कम्। ननु च यद्येवं निषेधसयासायत्वाद् विधिपर्यवसाने आल्ेप उस्तद्वदेव विधेर्निपेघपर्य वसाने को नामालंकार इस्याकङ्कपाह-विधिनेत्यादिना। अस्पेति आक्षेपस्य। शब्दसाभ्य निबन्धनं सामान्यभावमाश्रित्य चात्र प्रकारप्कारिभाव: कष्पितो न तु वास्तवः। विधि- निषेधयोर्निषेधविध्यागूरकखवादनयो: सामान्यवत्षणायोगात्। ततश्ेत निषेघस्य विधि पर्यवसानाद्। अस्य चालंकारान्तराध्रयाद् वेलक्षण्यं दर्शयति-केवलमित्यादिना। इसमें निपेध अपने आप में बनता नहीं है वाधित हो जाता है अतः अपने आप को विधि अर्थ में सम्मित कर देता है। इस कारण यह 'दूसरे अर्थ के लिए भपना समर्पण इस प्रकार की जो [लक्षणकक्षणा या जदत्स्वार्था नामक] लक्षणा होती है तन्मूलक सिद्ध होता है। जैसा कि अत्यन्र कहा गया है-'जहां स्वयं में असिद्ध रहने से वाच्यार्थ अपना समर्पण दूसरे अर्थ को कर देता है उसे आक्षेप कहा जाता है क्योंकि उसमें निषेध का आमासमात्र होता है।' निषेष- विधि या विवितनिषेध में आक्षेप अभिधेय होता है। इन स्थलों में उत्त 'अपनी सिद्धि के लिए अन्य अर्थ का आक्षेप'-इस प्रकार की [उपादान] लक्षणा से उसका ज्ञान नहीं होता। वहां [उपादान लक्षणा में ] तो मुख्य अर्थ अन्त तक बना ही रहता है, अतः लक्षणा के लिए अपेक्षित मुख्यार्थ याधादि सामग्री का सभाव रहता है। इसीलिए किन्हीं अन्य आचार्य ने - -'जहां निपेध अपनी सिद्धि के लिए दूसरे अर्थ का आक्षेप करता है, वदां आझेप नहीं होता, क्योंकि वहां तो निपेध का मान ही होता रहता है।' -इत्यादि अमान्य बातें ही कही हैं। यद्यपि इमने [चपादान लक्षणा नाम से केवल लक्षण का खण्डन करते हुए] वाक्यार्थ द्वारा अपनी सिद्धि के लिए दूसरे अर्यं का आक्षेप हुआ करता ही नहीं यह अभी-अभी कहा है तथापि [उपादान लक्षणा को न मानने वाले अतः हमारे ही पक्ष के ही होने पर भी] एक आचार्य के मत का हमने सभी-अभी जो यह खण्डन किया है चह यह चतलाने के लिए कि यदि प्राचीन आचार्य यह [ उपादान लक्षणा का ] पक्ष भी अपनाएँ तब भी
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४३६ अलङ्कारसर्वस्वम् उनका [विदितनिषेध और निषेधनिषि से समव अक्षेपासकार के पक्ष का] प्रतिपादन मशा पूर्ण नहीं होगा।' 'यदि ऐेसा है वो [यह बतन्नहए कि ] निषेध के मसत्य हो आाने से उसके विधि में पर्यवकित होने पर जैसे भाक्षेप बनलाया गया, वेसे हो विधि के निषेध में पर्यवसित होने पर कौन सा अटंकार होगा' ऐसी संका कर उच्र देते हैं-'विधिना' हत्यादि के द्वारा। अश्य-इसका आासेप का। [भाकेप शम्द दोनों के लिए प्रयुक होता है। इस] शब्दसाम्य के आधार पर निपन्न सामान्य माव को लेकर यहाँ प्रकारमकारिभाव की कलपना की गई है, यह प्रकारप्रकारिभाव वास्तविक नहें है। यह इसलिए कि विधि और निषेध से [उनमे उलटे ] निषेध और विधि का म्ञान होना है, फलत दोनों भेदों में कोई सामान्य लक्षम समन नहीं हो सकता। ततश्-इसलिए अर्वात् निषेध का विधि में पर्यवसान होने से। यह [निषेध का विधि में पर्यवसान] अन्य अल्कारों में भी रहता है अत. उनसे अनर मनसाने है- [ सर्वस्च ] 'केवलं वाल इति सुनरामपरित्याज्योऽस्मि, रक्षणीय इति भवस्भुजपक्जरमेव रक्षास्थानम्' इत्यादावाक्षेपतुद्धिन कार्या, वालत्वादेवकस्य निषेध्यत्वेना विवक्षितत्वात्। प्रत्युतान वाल्यादि: परित्यागनिषेधकत्वेन प्रतीयते। तेन नायमाक्षे:। कस्तहर्य विच्छित्तिप्रकारोऽलंकार इति चेत्, व्याघाताख्य- स्पालंफारस्यायं द्वितीयो भदो वक्ष्यते।
सौकर्येणान्यकृतये न निषेधकता पुनः।।' इति पिण्डार्थ: । इह तु- 'साहित्य पाथोनिधिमन्यनोत्थं कर्णामृतं रक्षत हे कबीन्द्वाः। यद्म्य देत्या इब लुण्ठनाय काव्यार्थचौरा: प्रगुणीभवन्ति॥ गृद्न्तु सवें यदि वा यथेच्छं नास्ति कतिः कापि कवीश्वराणाम्। रत्नेपु लुप्तेपु यहुष्यमत्यदद्यापि रत्नाकर पव सिन्धुः।' इति। तथा- देया शिलापट्टकवाटमुद्रा थीसण्डरीलस्य दरीगृरद्वेपु। वियोगिनीकण्टक एप वायुः कारागृहस्यास्तु चिरादमिय्ष:॥ वाणेन हृत्वा सृगमस्य यात्रा निवार्यतां दक्षिणमारतस्य। इत्यर्थनीय: शवराधिराज: श्रीखण्डपृथ्वीधरकन्दरस्थः। यदा ृषा तिश्वतु दैन्यमेतननेच्छन्ति वैरं मरता किराताः। केलिपसङ्गे शयराहनानां स दि म्मरग्लानिमपाकरोति।' इति
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नाक्षेपवुद्धि: कार्या। विद्वितनिषेधो ह्ययम्। न चासावाक्षेपः। निषेध विवौ तस्य भावादित्युक्तत्वाद्। चमत्कारोडव्यप्र निषेधह्ेतुक पवेति न
[मालवराज पर आक्मण करने जाते समय राज्यवर्धन से स्वयं को भी ले जाने के लिए हर्थवर्भन की उकि- ] 'केवल दालक हूँ' [ ऐसा समझकर न ले जा रहे हो] तव तो और भी अनरित्याज्य [साथ के चलने योग्य ] हूँ, रक्षणीय हूँ [ऐसा समझकर न ले जा रहे हो] तब भी रक्षास्थान आपका भुजपंजर है।' [-हर्पचरित उच्छ वासष, नि.सा. पृ० १८४] इत्यादि स्थलों में आक्षेप नहीं समझ लेना चाहिए, न्योंकि यहाँ कवित वालत्वादि निषेष्यरूप से विवक्षित नहीं है। वाललादि तो उलटे, छोड़ जाने के निषेधक प्रतीत होते हैं। इसलिए [ यहाँ] यह आक्षेप नहीं है [ प्रश्न] तव कौन सा अलंकार है क्योंकि उकि तो वैचिनयपूर्ण है? [उत्तर] आागे वतलाया जाएगा कि यह व्याघात नामक अलंकार का दूसरा भेद है। इस प्रकार सार यह है कि- [अलंकार को] आक्षेप कहने में कारण अमीष्ट मर्थ की निषेष्यता [चतलाना ] है, न कि अन्य [अग्नस्तुत] कार्य के पति सौकर्य से अन्य [प्रस्तुत] कार्य के प्रति [अन्य अप्रस्तुत कार्य में] निषेधकता [बतलाना ]। [आगे कहे जा रहे) इन पद्मों में भी आक्षेप नहीं समझ बैठना चाहिए- 'हे कवीन्द्रो ! [ अ्रव्यदृश््यात्मक काव्यरूपी ] साहित्य-समुद्र के मन्थन से निकले कर्णामृत [ इस महाकाव्यरूपी शव्यकाव्यविद्या] की रखवाली रखो क्योंकि काव्यार्थचौर लोग इसे सूटने के लिये दैत्यों के समान समुदत रहते है।' 'अपवा ऐसे जितने लोग हैं वे सब [ इसे ] यथेच्छ चुराते चलें [ इससे ] जो कवीश्वर हैं बनकी कोई क्षति संभव नहीं है। देवताओं ने बद्ुत से रत्न निकाल लिए तथापि समुद्र अमी तक रत्नाकर ही है।' इसी प्रकार- 'मलयगिरि की गुफागृहों में चट्टानों के किवाड़ वन्द कर देने चाहिए [ जिससे ] वियोगिनियों के लिए काँटा वना यह [ मलय ]-पवन काफी देर तक कारागृह्द का मजा चख़े।' मलयगिरि के शवरपति से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि इस दक्षिणापवन के [चाहन ] मृग को वाण से मार डालो और इसे इघर माने से रोक दो।' 'अथवा यह फिजूल को [याचनागत] दीनता रहे, किरात लोग वायु से वैर नहीं करना चाहुते। केलिप्रसंग में शवराइनाओं की स्मरग्लानि को यही वायु जो दूर करता है।' यह तो विहितनिषेध है। यह आक्षेप नहीं है। क्योंक यह कहा ना चुका है कि वह वहाँ- होता है। जहाँ निषेध की विधि होती है। यहाँ चमत्कार भी निषेध से ही हो रहा है [ न कि निषेधजनित विधि से]। इसलिए केवल आक्षेप से मिलती-जुल्ती स्थितिमात्र को देखकर [जहीं कहीं भी ] आक्षेप नहीं समझ बैठना चाहिए। चिमर्शिनी अत्र राज्य वर्धनोक्ती वाशवादेवकवम्। श्रहर्पदेवोक्ती तु निषेधाविवचा। मत्युतेति। न केवलं वात याद्यत्रानिपेध्यखवेन विवनतितम्, यावदेतदेवान्यनिषेधक्वेनापी्यर्थ। तेनेति वालरवादेनिपेष्य रवेना विवचितरवादू। वक्ष्यत इति, सौकर्येग कार्यविषदा किया चेस्याहिना।
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४३८ अलङ्गारसवस्वम्
पतदेव सारार्थतया पिण्डीकृत्यापि प्रतिपाद्यति- तदिष्टरदेत्यादिना। अन्यकृतय हति निषेधार्यम्। अस्य घ यथा विधिसनुसेन प्रतीतिस्तया निषेधमुसेनेति सौकरयम्। एवं घ निषेधकतैवासेपोपेने नियन्धनमिति विहितनिषेधादावेत्तन्नमो न विधेय इत्याद- त्वित्यादि। तस्पेत्याक्षेपस्य। तद्द्रावमान्रेणेति। फेवलेनव चमरकार सभ्वावेने ्यर्थे:। यहां राज्यवर्धन की उक्ति [बाल, रक्षणीय इति] में बालत्वादि उक्त है और श्री दर्पदेव को उचि [सुतरामपरित्याज्योडस्मि०] में [उनके ] निषध की विवक्षा नहीं है। प्ररयुत = उलटे = अर्थ यह कि यहां बालत्वादि न केवल अविषेध्यरूप से विवक्षिन है, अपि सु ये ही अन्य के निषेधक के रूप में भी विवक्षित हैं। तेन इस कारण - अर्थात् बालत्वादि के निषेध्यरूप से विवक्षित न होने के कारण। वचयते=कहा जाएगा 'सौकर्येण कार्यविरुक्धा क्रिया प' इत्यादि के द्वारा इमी तथ्य को साररूप से बटोर कर प्रतिपादिम करते हुए लिखने हैं-'तदिषस्य' इत्यादि कारिका द्वारा। अन्यकृतये=अर्थात निषेध के लिए। इसकी प्रतीति जैमे विधि के द्ारा होती है ैसे हो निषेध के द्वारा भी यही है सौकये। 'इम कारण केवल निषेधकना ही आक्षेप संजा में कारण नहीं बनती, इमलिए विितनिवंधादि में इसका भ्रम नहीं करना चाहिए-'इस तथ्य को बताते हुए लिसने है-'६ तु' इत्यादि। तशय उमक आक्षेप का। तद्भावमात्रेण=उसके भावमात् से चमत्कार के सन्भावमान से [इसकी भपेक्षा हमारा अर्थ अधिक अच्छा है।। [सर्वस्व ] अयं चाक्षेपो घ्वन्यमानोऽपि भवति । यथा- 'गणिकासु विधेयो न विभ्वासो वल्लभ त्वया। कि कि न कुर्वतेऽनर्थमिमा धनपरायणा:॥' अप्र द्वि गणिकाया उक्ती वद्दोपोक्तिपस्ताये नाहं गणिकेति प्रतीयते। न चासी निषेध पथ। गणिकात्वेनावस्थितयैय गणिकात्वस्य निषेधात। सोडयं प्रम्सलद्गृपो निषेधाभासरूपो घक्या गणिकाया: शुद्धस्नेद्दनियन्धन- त्वेन धनविमुखत्वादौ विशेष पर्यवस्यतीत्युक्तविषय आक्षेपध्वनिरयम्। न सु- 'स वक्तुमखिलाल्शक्तो हयग्रीयाश्ितान् गुणान्। योऽम्युकुम्भै: परिच्छेदं धातुं शक्तो महोदुघेः॥' इत्याक्षेपध्वनावुद्दाह्ार्यम्। निषेधस्यैचान्र गम्यमानत्वात्। न निपे- घामासस्य। गुणानां वक्तुमशक्यत्व पवाघ् तात्पर्यम्। तननिमित्तक पवात्र चमत्कारो न निषेधाभासद्वेतुक इति नाक्षेप्वनिधीरध कार्या। सर्वधेष् निषेधाभासस्य विध्युन्मुखस्याक्षेपत्वमिति स्थितम्। यह आक्षेप ध्वन्यमान मी होता है। यथा- '्रिय । तुम्हे गणिकाओं पर विद्वास नहीं करना चाहिए। धनपरायण ये क्या-क्या अनर्थ नह्दी करठीं।
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-यह उकति गणिका है। इसमें स्वयं के दोप की वात कही जा रही है अतः प्रतीत होता है कि [बोलनेवाली गणिका यह दतलाना चाहती है कि] मैं गणिका नहीं हूँ। किन्तु यह निषेध हो हो ऐसा नहीं, क्योंकि यहाँ [गणिका ने ] गणिकात्व को गणिकात्वरूप से रखते हुए ही उसका निषेध किया है, अतः इस निषेष का स्वरूप वाधित हो जाता है। इसलिए यह निघेभा- मासरूप सिद्ध होता है और बोठने वाली जो गणिका है उसके शुद्धत्नेहमूलक धनविमुखता- रुपी वैशिद्थ में पर्यवसित हो जाता है। इसलिए वह उक्त विपय [नामक] आाक्षेप की घनि हुई। [आनन्दवर्घनाचार्य को-] 'हयग्रीव के पूरे गुणों को गिनने में समर्थ बड़ी हो सकता है जो महोदधि को इयता पानी के घड़ों से जान सकता हो।' -इस पद्यार्थ को आक्षेप का उदाहरण नहीं बतलाना चाहिए क्योंकि यहाँ निषेध ही गम्य है, निषेषामास नहीं। गुणों की अवचनीयता में ही यहाँ तात्पर्य है। उसी को लेकर यहाँ चमत्कार है न कि निषेधाभास को लेकर। इस कारण यहाँ आक्षेपध्वनि नहीं समझनी चाहिए। इस प्रकार तय यह रहा कि 'विधानोन्मुख इ्टनिपेधाभास ही सर्वधा आक्षेपरूप सिद्ध होता है।' [ पण्डितराज ने इस पद्य में ध्वनिकार का समर्थन और सवस्वकार का नामोब्लेखपूर्वक खण्डन किया है। उनका कहना है कि 'निपेध का आभास ही आक्षेप नहीं है। इसलिए इस पद् में निषेध- मात्र भी आक्षेप हो सकता है। इसके अतिरिक उन्होंने ध्वनिकार के आप्तत्व की भी डहाई देकर सवस्वकार का खण्डन करना चाहा है [द्र० रसगंगाधर आक्षेप प्रकरण] वस्तुतः स्व्यं स्वनिकार ने जाक्षेप का वही लक्षण स्वीकार किया है जो भामह और चन्दट ने प्रस्तुत किया है 'विरेषणामिधाने-छया प्रतिपेध: माक्षेप: ['उद्योत० १] फल्तः उन्हें निषेध की मामासात्मकत्ता ही मान्य है। इस कारण पण्डितराज का सर्वस्वकार पर आकोय व्यत् करना अद्धामान्र है ध्निकार के प्रति। विमर्शिनी प्रतीयत इति गम्यते, नाहं गणिकेति निषेशस्य शव्दानुपात्ततवादू विशेषमान्नस्य गम्यत्वे आक्षेपालंकारो चाच्य एव, निषेधाभासरयापि गम्यरवे म्वन्य इत्यनेन दशि- सम्। अन्यथा ह्वासय ध्वन्यमानोदाहरणत्वमयुकतं स्याद। तस्येहानुपक्ान्तत्वाद। इतयं प निवेधाभासस्यव रग्यत्वेश्यं ध्वन्यमानो भवति न निषेधमात्रस्यैवेति दर्कयितुमाद- नत्वित्यादि। सतश्व ध्वनिकृता यदेतदाजे पध्वनायुदाहतं तदयुक्कमेवेति भावः 1 एवं चार्य यथोपपादितं स्वरूपमुपसंहारभद्रयापि प्रतिपाद्यति-सर्वथेत्यादिना। सर्वंथेत्यनेन कुत्रा- व्यश्य व्यभिचारो नास्तीति दशितम्। पततदुपसंहरत्नम्यद्वताश्यति-शवमित्वादिना। ग्रतीयते =प्रतीत होता है= गन्य= व्यग्य होता है कयोंकि 'मै गणिका नहीं हूँ' यह निषेध शब्दतः कथित नहीं है। ऐसा कहकर अन्थकार ने यह सिद्धानत वतलाया कि 'विशेषमात्र के गन्य होने पर आझेपालंकार वाच्य होता है और विशेष के साथसाथ निषेधामास भी गम्य हो तो [गम्य और प्रधानरूप से गम्य अर्थात] व्वन्य। यदि ऐसा सिद्धान्त न निकाला जाय तो इस [आक्षेप] की व्वन्यमानता का उदादूरण देना ही ठीक नहीं होगा क्योंकि [ाच्यालंकारों के लिए रचे जा रहे] इस गंभ में ध्वन्यमानता का कोई प्संग नहीं है। इसी प्रकार यह बतलाने
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के लिए कि यह [माक्षेर] वही गम्य होना है जहाँ निषेचामास ही व्यंग्य ो, केवल निषेध नहीं' लिखने है-न तु इत्यादि। इसका भाव यह हुआ कि अन्यकार यद कहना चाहते हैं कि उक कारणों से स्वनिकार ने [स वक्तु] इस पघ को बो अक्षेपधनि का उदाहरण माना यह अमान्य ही है। इस प्रकार इस आस्षंप का अभी तक जो [एक] भैद प्रतिपादित किया उसका उसदार करने दुए मी सरना एक सिदधान्त बमला देत हैं-'सपया' इत्यादि लिखकर। स्वया कहकर यद दिखलाया कि इम सिद्धान्त या लक्षण का व्यमिचार कहीं नहीं होता। अद इस भेद के विवेचन का उपसहार करते हैं और अन्य भेद का उपक्रम करते हुए कहते हैं- [सर्वस्व ] एवमिष्टनिपेधे नाक्षेपमुकत्वा समानन्यायत्वादनिष्टविधिनाक्षेपमाद- [सू० ४० ] अनिष्टविध्याभासय। यथेष्टस्येष्टत्वादेव निपेधोऽनुपपन पवमनिष्ठस्याप्यनिष्ठरवादेव विधानं नोपपदते। तत् क्रियमाणं प्रस्सलन्पत्वान्निषेधे पर्ययस्यति। ततञ्ञ विधि- रुपकरणीभूतो निषेधे, इति विधिनायं निषेधोऽनिष्टविशेषपर्यवसायी निषेधा- गूरणादाक्षेप:। यथा- 'गच्छ गच्छसि चेत् कान्त पम्थान: सन्तु ते शिवा। ममापि जन्म तत्रैव भूयाद यत्र गतो भवान् ।। अभ कयाचित् कान्तस्य प्रस्थानमात्मनोSनिष्टमप्यनिराकरणमुखेन विधीयते। न चास्य विधिर्युक्ता। अनिष्टत्वात्। सोडयं प्रस्सलदूपत्वेन निषेधमागूश्यति। फलं चाघानिष्टस्य प्रस्थानस्यासंविज्ञानपदनिबन्धन- मत्यन्तपरिद्वार्यत्वप्रतिपादनम्। इदं व ममापि जन्म तत्रैचेत्याशीःप्रति- पादनेनानिष्टपर्यंवसायिना व्यक्तितम्। यथा वा- 'नो किंचित् कथनीयमस्ति सुभग मौढा: परं त्वादृशाः पन्थान: कुशला भवन्तु मवतः को माइशामाग्रह्द.। किं त्वेतव् कथयामि संतनरतक्कान्तिच्छिदस्तासत्वया स्मर्तव्या: शिशिरा: सहमरुचयो गोदावरीवीचयः।।' अन्नानभिप्नेनमपि कान्तपस्थानं यदा प्रमुख पवाम्युपगग्यमानं प्रती- यते, तदायमनिष्टविधिरामासमानमासेपाङ्रम्। स्मर्तव्या इत्यनेन गमन निवृत्तिरेवोपोद्धलिता। तरुमाद्यमपि प्रकार थक्ेपस्य समानन्यायतया- भिनवन्वेनोक: ! इस प्रकार इट्ट के निषेध के द्वारा निष्पन्न आक्षेप का निवचन किया अव ससी प्रकार अनिष्ट की विषि से निम्पन्न आक्षेप का निर्वेचन करते है- [सू० ४०] तथा अनमीष्ट [अप्राकरगिक] के विधान का आभास [भी]।
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[इ०] जिस प्रकार इछ पदार्थ के इष होने से ही उसका निपेध नहीं बनता इसी प्रकार अनमीष्ट पदार्थ के अनभीष्ट होने से ही उसका विधान भी नहीं वन पाता। नह यदि किया जाता है तो वाचित होकर निषेध में परिणत हो जाता है। फलतः यहाँ विधि-निषेध का साधन [शापक हेतु] है। इस प्रकार क्योंकि निषेध का घ्ञान विधि से होता है अतः इस [निपेध] का फल होता है अनभीष्ट पदार्थ में वैशिष्टय का ज्ञान कराना। [ इस प्रकार क्योंकि इस भेद में ] निषेध की ऊपर से लाया जाता है[ जिसे प्रथम दो भेदों के निर्वचन में आनयनरूप आगूरण कहा गया है] फलतः [यह] आक्षेप कहलाता है [और इसीलिए यह केवल वक्ष्यमाणविषय तथा सगूरणात्मक ही होता है]। उदाहरण यथा- 'कान्त! यदि जा ही रहे हो तो जाओ। तुम्हारे पय मंगलमय हो। मेरा भी जन्म वहीं हो जाए जहाँ आप पहुँचे हुए हों।' यहां किसी नायिका द्वारा सपने प्रिय के प्रस्थान का जो उसे अमोष नहीं है, निराकरण न कर विधान किया ज रहा है। किन्तु उसका विधान संभव नहीं है, क्योंकि वद अनमीट है। ऐसा यह विधान वाधित हो जाता है और [ लक्षणा द्वारा ] निषेध का ज्ञान कराता है। इस [लक्षणा] का फल [प्रयोजन ] है यहां इस मनमीष्ट प्रस्थान की असंविज्ञान[अनभिधायक तथा वक्ता की विवशता और तन्मूलक तदस्यता के द्योतक ]-पद [चेव=यदि] के प्रयोग से प्रतीत अत्यन्त सपरिहार्यता का शापन। यह [फल ] व्यंजनावृत्ति से प्रतीत होता है जिसमें [ उपर्युक् तरस्थता घोतक असविज्ञान पदपरयोग के अतिरिक] अमंगळ [मृत्यु ] रूपी मर्थ देने वाली मेरा भी जन्म वहीं हो जाए' इत्यादि इच्छा [ भी एक ] कारण है। एक उदाहरण और- 'कुछ कहना नहीं है सभग! तुम जैसे तो स्वयं ही काफी समझदार होते हैं। [ तुन्हारे ] पथ संगलमय हों। तुमसे मुझ जैसी का आगह ही क्या हो सकता है? तब भी इतना कदती हूँ कि तुम गोदावरी की वे निरन्तर सूरत से उत्पन्न थकावट हटाने वाली, पर्याप्त शोतल और इंस-संचार से सुन्दर तरंगें याद करते रहना।' -- यहाँ आरम्भ में ही सही किन्तु जब प्रिय का प्रस्थान अनमीष् होने पर मो स्वीकार किया जा रहा प्रतीत होता है तव तक तो यह अनमीष् विधान ठहरता है, किन्दु वाद में कारण [ संग] बन जाता है आक्षेप का, क्योंकि [तब यह वास्तविक न ठदर कर] अभापात्मक ठहरता है। [ऐसा इसलिए भी कि यहाँ ] 'स्मर्तव्या := याद किया करना' इस कथन के द्वारा गमननिवृत्ति पर ही बल दिया गया है। इसी कारण [अभिव्यक्ति के ] इस प्रकार को भी स्थितिसाम्य के आधार पर आक्षेप का एक नया प्रकार बतलाया है। विमर्शिनी समानन्यायत्वादिति। यथात्रेष्टस्य निषेधो वाचितरवाद विधौ पर्यवस्मति तथैवेहाप्यनि- एृस्य विधिनिषेधे हत्येवंरुपास्। एवसेतावन्मात्रमस्याघ्यस्य चानेपस्य साजाध्यम्, न पुनः सामान्यलक्षणसंमव इति भाव: 1 सदेवाह-अनिष्टेत्यादि। एतदेव हद्ानतद्वारकं ष्याघष्टे- य्ययेत्यादिना। तदिति विधानम्। प्रस्खळद्रपावादिति स्वार्थवाधात्। पर्यवस्यतीति। एवात्मसमर्पणेन निषेधं लक्षयतीध्यर्थः। ततक्षेति। विधेनिषेधलज्णातू। उपकरणीभूत इत्वि। स्वार्थबाधादुपसर्जनीभूत दत्यर्थः। निष्ठविशेपेति, अनेन प्रयोजनमत्रोक्तम्। अभ्यथा हि रजस्नानतृत्तयरवं स्यात्। निषेधागूरणादिति निपेधस्यात्र लचयमाणाबात्। सर्वत्रैध दि लक्षणायां लापणिकेनेव लच्योऽर्य आागूर्यते। तस्मान्तप्रतिपत्तेः।
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समानन्यायधवाल्-उसी प्रकार अ्यात् जिस प्रकार अमोष्ट पदार्थ का निषेध वाघित होकर विधि में पर्यवसित दोता है उसी प्रकार इस भेद में भी अनभीष्ट की विधि निषेष में पर्यवसित होती है। माव यह कि इम और इसके पूर्वर प्रतिपादित आक्षेप में इननी सजानीयता भर है, इनमें कोई सामान्य लकग समब नहीं है। उसी को [सूत्र के द्वारा] कहते हैं-अनिष्ट इत्यादि। इसी को दधन्त के द्वारा स्पष्ट करते हैं-'यथा'-इत्यादि के द्वारा तन्-वह अर्थात् विधान। प्रस्खलद्रूप रवाद्। अर्थात् स्वार्यं का वाघ हो जाने से। पर्यवस्यति=पर्यवसित होता है अर्थाप अपना समपंग कर के निषेध को एका द्वारा वतलाया है। ततथ्= इस कारण= विधि से निषेध की रक्षणा द्वारा प्रतीत होने के कारण। उपकरणीभूतः = उपकरण=देतु बना हुआ अर्थात् स्वार्थ का बाय हो जाने से अप्रधान बना हुआ। अनिष्ट विशेष- इमके द्वारा लक्षणा का प्रयोजन बनलाया गया। अन्यया गजस्नान के समान लक्षया का होना न होना बराबर दो जाता [ हाथी नहाने के बाद अपने कपर धूल उद्याल देता है अत उसका नहदाना न नहाना बराबर हो जाना है। निषेधागूरणान्= निषेध को लक्षणा के दारा लाया जाता है। लक्षणा में सवंत लाक्षणिक शब्द के द्वारा हो लइ्य अर्थ लाया जाना है क्योंकि उस [सक्ष्य] की मतीति उसी [लक्षणिक ] से होतो है।
विमश-अलंकाररत्नाकरकार ने आक्षेप के इस भेद को विध्यामास नाम दिया है और सव स्वकार के खण्डन में लिखा है-
[सू2 ] अनिष्टविधान विध्यामास, [वृo]000। न चायमाक्षेपस्य भेद इति वाच्यम् आसेपपदार्थस्य पर्यनुयोगरयाभावाव। विधिना निषेधरयोपादानरूपादावाक्षेपत्वे कथ्यमाने व्याज- स्तुत्यादावचि आशेपभेदत्वप्रसङ्ग, तव्नापि निन्दादिना स्तुत्याधाक्षेपसंनवात्। ००। तेनाल- हुारान्नरमेव। 'आक्षिप्यतेञत्र विधिना न यतो निषेष, रवार्थ विधावपि न पर्यनुयोगदुद्धि। तरमादनिष्टविधिरेष विलक्षणत्वाप्नाश्वेपमध्यपतितोपि तु भिन्न एव।। इति सम्द। -अनभीष्ट का विधान विध्यामास [कहलाना है], ०। यह आक्षेप का [ ही एक ] भेद है ऐसा नहीं कडना चाहिए क्योंकि यहां आक्षेप शब्द का जो अर्थ है-पयंनुयोग [ इससे क्या छाम, किमथंकना रूप], वह नहीं है। यदि विधि से निषेष के उपादान आदि को आक्षेप सका दी जाए तो व्याजस्तुनि आदि भी आक्षेप के ही भेद कहे नाने लगेंगे क्योंकि उनमें मौ निन्दा आदि के द्वारा स्तुति आदि का आक्षेप [उपादान ] होना है। ०००००। इसलिए यह एक भिन्न ही भलकार है। संक्षेप में "स [अनिशविधानरूपी विध्याास नामक अलवार] में न तो विधि से निषेध का आक्षेप होता और न विधि में हो स्वार्थ के प्रति पर्यतुयोग [किमथकना] की बुद्धि होती। इम कारण अनमोष्ट का यह विधान विलक्षण होने से आक्षेर में अन्नभूंत नहां होता। यह सवया मिन्न है।'
विमशिनीकार इम खण्टन का खण्डन करने और कहते हैं-
चिमर्शिनी
तच्चार्थान्तरागूरण 'र्वसित्ये पराक्षेप'इत्येवं लक्षणाप्रकारतय पूर्व निरस्तर्वान स्वा- रमसमर्पणेनव मवतीति ययोक्तमेव युक्कम्। श्रत पवास्यान्वर्याभिघश्वम्। पर्यत्ुयोग वशादागूरणमपि सास्ेपशब्दस्यायः। व्याजस्तुरयादी तु ग्याजेन स्तुतेरविवदवितरवाव् तत्र सश्वमेव युक नापेक्षस्वम्। 'हद दि प्रधानेन व्यपदेशा सवन्ति' इति न्यायाद यदेव यध्
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प्रधानतया विवस्यते तदेव तन्न व्यपदेशनिमित्तम। न तु पज्ञातिशयचतां 'आज्ञा वस्तुनि युध्यन्ति न त सामयिके ध्वनी' इति नीव्या नामि विवादो युक। तस्माव 'आधिष्यतेऽत्र विधिना न यतो निपेध: स्वार्थो विशावपि न पर्यनुयोगवुद्धिः। तस्मादनिष्टविधिरेप विलस्गसवान्ताक्षेपमध्यपतितोऽपि तु भिन्न पव। इश्यादि न वाच्यम्। अनिराकरणमुखेनेति। प्रवृत्तक्रियावात् कान्तस्यानुमोदनावू। ननु विधिमुखेनास्य किमागूरणं स्वयं निपेध एवक्रियतामि याशङ्कयाह-फलमित्यादि। एतचचेति विधेनिपेधागूरकरवम्। यथा वेत्यनेनास्य उचये माचुर्य दर्शितम् । प्रमुख एवेति। न पुनः पर्यवसान इत्यर्थ:। एतदेवोपसंहरति-तस्मादित्यादिना। अभिनवतवेनेति दण्डपाद्यपेक्या। तेन हासी 'हश्याशीर्वेचनातेपो यदशीर्वादवर्त्मना। स्वावस्थां सूचयन्त्येवं मिययात्रा निषिध्यते।।' इत्युककेरसंभवतापि लक्षणेन लक्षितः। न पुनर्गम्थकृदुपज्ञवेनैतव्याखपेयम्। 'विधि- निषेधाम्यां प्रतिपेधविष्युक्तिरक्षेपः' इतीरगेव हि श्रीभोजदेवेनाप्यस्य लक्षणं कृतम्। और जो यह अन्य अर्थ का लक्षणा द्वारा लाया जाना है यह वाक्यार्थ के समर्पण के [अर्थाद लक्षणलक्षणा के] द्वारा हो सभव होता है, न कि 'अपनी सिद्धि के लिए दूसरे के आक्षेप [ अर्थात उपादानलक्षणा ]' के द्वारा, क्योंकि लक्षणा के इस [उपादान नामक ] भेद का निराकरण किया जा चुका है, अतः [ सर्वस्वकार ने] जो कहा है वही ठीक है इसीलिए [ अलंकार का आाक्षेप यह ] नाम भी सार्थक ठहरता है क्योंकि आक्षेप शब्द का अर्थ [पूर्वोक्त] पर्यंतुयोग के कारण आगूरण [अन्य अर्थ का लक्षणा द्वारा लाया जाना] मी है। व्याजस्तुति आादि में व्याज से स्तुति का किया जाना अभीषट रहता है वतः उसमें भी तदूपता [लक्षणलक्षणाजन्य ऐक्य ] ही मानना ठोक है [भिन्न रहकर अन्य अर्थ की ] अपेक्षा करना नहीं। जहां तक नाम का सम्बन्ध है वह जहां जो भेद प्रधान होता है उसी के नाम पर पढ़ता है। कहा भी जाता है 'नाम प्रधान का लिया जाता है'। सच यह है कि समझ के घनी लोगों को नाम पर विवाद नहीं करना चाहिए, जैसा कि कहा जाता है-'प्राच्न जन पदार्थ पर लड़ते हैं [ समय = शास्त्र, सामयिक=] शास्त्रीय [अ्वनि ] शब्द [नाम] पर नहीं। इसलिए [ पूर्वोक्त] 'भाक्षिप्यते' इत्यादि कहना ठीक नहीं है। अनिराकरण मुखेन=निराकरण न कर अर्थात कान्त जा ही रहा था अतः उसका अनुमोदन कर । प्ररखळदरूपरवेन = स्वार्थ के बाधित हो जाने से। आगूरयति=दूसरे अर्थ को लाता है अर्थात् अपने अर्थ का उसे समर्पण [सर्वथा त्थाग ] कर। [ शंका] 'इस प्रकार विवान के द्वारा निषेध का आगूरण क्यों, स्वयं निषेध ही कर दिया जाना चाहिए-ऐसी आशंका कर कहते हैं- फलम् इत्यादि। एत्त=विधान में निषेध का जो आगरकत्व है वह। सया वा इस उदाहरणा- न्तर के द्वारा यह बतलाया कि यह द्विवीय भेद मी काव्यों में खूब मिलता है। प्रमुख एव = आरम्भ में ही अर्थांत् अन्त में नहीं। अब इस भेद का उपसंदार करते हैं-तस्मात इत्यादि के द्वारा। अभिनवरवेन=नवीन प्रकार अर्थात् दण्डी आदि के मत में। दण्डी ने [काव्यादर्श में श१४१ पद्य के रूप में गच्छ गच्छसि० पद्य दैकर] इस आक्षिप का-'यह आक्षेप आशीनेचनाक्षेप है क्योंकि इसमें आशीर्वाद के माध्यम से अपनी अवस्था की सूचना दे रहो प्रिया द्वारा पिययात्रा का निषेध किया जा रहा है'- [काव्यादश २।१४२] इस प्रकार चक्षण बनाया था जो वसतुतः संभव नहीं है। इस [अभिनवत्त्र] की व्याख्या यह नहीं करनी चाहिए कि इस आक्षेप को पहले- पहल अ्रन्यकार [सर्वस्वकार] ने ही प्रस्तुत किया है। ठीक ऐसा ही लक्षण मोजदेव ने भी विधि या निषेध से निषध या विधि की उत्ति आक्षेप'-इस प्रकार बनाया है। [भोज की मूलकारिका इस प्रकार है-
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'विधिनाथ निपेेन प्रतिषेणेकित्त्र या। शुद्धा मिश्रा च साक्षेपः ॥ सरस्वलीकण्ठामरण, ४६४।। इसनें विधि और निषेध दोनों से केवल निषेध की ही बकि को आक्षेर कहा गया है, विधि की उकि को नही। भोज ने भी उदाहरण के रूप में 'गच्छ०' पद दिया है।] विमर्ग-इतिहास-[१] प्रथम आक्षेशलकार एक स्पष्ट अल्कार है। इसका स्वरूप भामह-पइले पइल मामह ने ही स्पष्ट कर दिया है। उनका आक्षेप लक्षण इस प्रकार है- 'प्रविषेध श्वेष्टस्य यो विशेषाभिषित्सया। आक्षेप इनि त सन्न शसन्नि द्विविधमृ० । २६८ -वेशिष्ट्थप्रतिपादन के लिए अमीष्टपदार्थ का जो निषेध जैसा किया जाता है नसे विशज्जन आक्षेप कहते हैं। वह दो प्रकार का होता है। मामह ने इन दोनों प्रकारों के जो नाम दिए ये परवनों आचार्य सन्हें ही दुहराने गए हैं। ये नाम हैं वक्ष्यमागविषय तथा ठक्तविषय। इन पर मामह की कारिका विमशिनीकार ने इम अलकार के विवेचन के आरम्म में हौ उद्धृत कर दी है-'वश्यमाणोकविषयस्नत्रास्ेपो दिया मन। २।६७ दण्डी-दण्डी ने आक्षेप को प्रतिपेधोकि वहा है-
प्रतिपेधोक्ति का अर्य उनके उदाहरणों से 'किमी मी वस्तु का निषेध कथन' निकलता है। इस निषेष का न तो आमासात्मक ही होना आवश्यक है और न निषेध्य वस्तु में विशेषना का ज्ञान । यह तथ्य निम्नलिखित एक उदाहरण से स्ष्ट दो जाता है- 'कुनः कुशलय कर्गे करोपि कलभाविणि ! किमपाङ्गम पर्याप्तमस्मिन् कमणि मन्यसे॥ २१-३॥ कलमापिणि' कान में नील्कमक्ष [का कर्णपूर] क्यों पदन रही हो? क्या अने अपाद [नेत्र] को इस कार्य में अपर्याप मानती हो। इस पर स्पष्टीकरण देवे हुए दण्डी ने स्वयं लिखा- 'स वर्नमानासेपोडयं कुवत्येवासिनोत्पलम्। करगे काचिव प्रियेगव चाटुकारेण रुध्यते । २॥३४ । -इसमें, कान में नीलोत्पल पहन रही कोई उसके चाडकार प्रिय के द्वारा रोकी जा रही है, अतः यइ आक्षेत है।' स्पषट है कि इस आक्षेप में न तो निषेध आभासात्मक है और निेध्य नोळोश्पल में हो कोई विशेषता का ज्ञान होता। हाँ नोलोत्पल की अपेक्षा सन्दरी के नेत्रों में अवश्य विशोपता प्रतीत होती है। मामद में आक्षे्य की कालजनिन विशेषताएँ दो ी र्थी, वश्यमागविषय में भविभ्यद्विषय- कता और उक्तविपन में भूनविषयकता दण्डी ने इन दोनों के अतिरिक्त वततमानविषयता को भी ग्वीकार किया है। इसका उदाहरण ऊपर दिया पद्य दो दिया है। उसमें पहने जारहे नीलोतळ का निषेध है, अत उमे वत्तमानासेप कहा है। दण्टो ने इम प्रकार के चीबीस माक्षेप गिनार हैं और इमकी सस्या आक्षेन्य वस्तु को सख्या पर निर्मर बनलाकर अनन्न बतला दी है। किन्तु जो बौबीस उदाइरण दिए हैं उनमें ऐेसा एक मौ उदाइरण नहीं कै जिसमें भामदोक्त माक्षेप के ममान किसी कही हुई अथवा कहने के लिए उपकान्त वस्तु को न कहने की भगिमा भाई हो।
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आक्षेपालङ्कार:
इस प्रकार दण्डी का आक्षप केवल निषधोक्तिमान है। फबतः इसका अन्तर्भाव प्रतीप, व्यति- रेक आदि अन्य अलंकारों में हो जाता है। वामन-वामन ने आक्षेप को उपमानोपमेयमाव तक सीमित रखा है। उन्होंने इसके मी दो भेद किए हैं एक उपमान की निरर्थकता से जनित प्रतिभेपरूप वक्षेप और दूसरा उपमान की आर्थी प्रतीति से अनित आक्षेप। इनमें से प्रथम भेद में नाक्षेप शब्द का अर्थ होगा अधिक्षेप। यह तथ्य दिये उदाहरण से स्पष्ट है। उदाहरण है- 'तस्याश्चेन्मुखमस्ति सौम्यसुभगं कि पार्वणेनेन्दुचा'। -यदि उस सुन्दरी का सौम्य सुभग मुख है तो फिर पूर्णिमा के चन्द्र से क्या ? दूसरे का उदाहरण समासोकि में सर्वस्वकार द्वारा उद्धृत 'ऐन्द्र धनुः' पद्य है। इसमें शरद् ऋतु, चन्द्रमा और रवि के उपमान क्रमशः वे्या, नायक तथा प्रसिनायक का ज्ञान ऊपर से होता है। स्पष्ट ही वामन का प्रथम आाक्षेप प्रतीप में तथा द्वितीय समासोकि में अन्तर्भूत दो जाता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि दण्डी का उपर्युक्त वर्ततमानाक्षेप तथा वामन का उपमानाधिक्षेपरूप प्रथम आक्षेप सवंथा अमिन्न हैं। द्वितीय आक्षेप में मी बहुचर्चित आगूरण की स्थिति है यद्यपि यहाँ आगूरण का चिमर्शिनीकाराभिमत लक्षणारूपी अर्थ नहीं हो सकता। वामन का मूलभूत सूत्र है-'उपमानाक्षेपश्राक्षेपः ।' उन्हों की वृत्ति में इसके अर्थ हैं- (१) उपमानस्याक्षेपः प्रतिषेध:। तुल्यकार्यार्थस्य नैरथक्यविवक्षायामाक्षेप:1 (२) उयमानत्या- क्षेप:, आक्षपतः प्रतिपत्तिरित्यपि सूत्राथ: । उन्भट-उद्द्ूट ने आक्षेप का पूरा लक्षण मामह से े लिया है। उन्होंने भेद भी मामह के शब्दों में ही प्रस्तुत किए हैं- 'प्रतिषेय इवेषस्व यो विशेषाभिधित्सया। आक्षेप इति नं सन्तः शंसन्ति कवय: सदा ॥२२॥ वक्ष्यमाणोक्तविषयः स च द्विविध इुष्यते। निषेधेनेव तद्बन्धो विधेयस्य च कीतितः ॥ र३ ॥। -'विशेषता वतलाने के लिए सभीष अर्थे का जो निषेषामास उसे विद्ान् कवि आक्षेप कहते है। वह दो प्रकार का माना जाता है वक्ष्यमाणविपय तथा उक्तविषय । दूसरे शब्दों में उस [ आक्षेप] का निर्माण विषेय के निपेधाभास से भी बतलाया गया है॥ रा२, ३। रुदट-रुद्रट का आक्षेप कथनाक्षेप है। इसे दूसरे शब्दों में उक्तविषय भी कह सकते हैं। आक्षेप का अर्थ निषेध ही है। रुद्रट ने इसके कारण दो वतलाए हैं प्रसिद्धि और विपरीतता। रुद्रट के अनुसार आक्षेप केवल प्रतिषेध तक सीमित नहीं है। उसमें निषेध का दृष्ान्त द्वारा प्रमाणित किया जाना भी अपेक्षित है। इस प्रकार रुदरट के अनुसार आक्षेप के दो भाग है एक कथन निषेध और दूसरा उसकी पुष्टि में तत्समान पदार्थ का उपन्यास। रक्षण है- 'वस्तु असिद्धमिति यद् विरुद्धमिति वास्य नचनमाक्षिप्य। अन्यत् तथात्वसिद्ध्ये यत्र त्रयात स आेप:॥८८॥ -वस्तु के असिद्ध होने या विरुद्ध होने के कारण उसका कथन रोककर, उसकी प्रसिद्धता या विरुद्धता की सिद्धि लिए के अन्य किसी पदार्थ का कथन आक्षेम, उदाहरण- (१) 'जनयति संतापमसी चन्द्रकला कोमलापि मे चिन्रम्। अथवा किमन्र चित्रं दहति हिमानी हि भूमिरुदः॥ ८10॥।
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४४६ अलङ्कारसर्वस्वम्
-कोमल होते हुए मी यह चन्द्रकला मुझे समाप दे रही है, यह आश्रय की बात है। अथवा इसमें क्या आश्चय। पाला पेडों को जला देता है।' (र) 'तब राजयामि गुगानहमलमथतासत्प्रठापि्नी चिस्मामू । क खलु कुम्मेरम्मो मातुमल जलनिधेर सिनम् ।८i९१ ।। -मे तुम्हारे गुण गिनती रहनी हूँ। नहीं, नहीं में उलटा वोल बैठी, मुझे पिक्कार है। ऐसा कौन होगा जो घड़े मरमरकर समुद्र का पूरा पानी नाप सके।' इन दोनों में से प्रथम में पाले और पेढ़ का उदाहरण देकर आश्चर्य में प्रसिद्धता सिद्ध कौ गई है और तत्प्रयुक्त अकथनीयता की। द्वितीय में गुणगगना में अनुचितत्त्र या विपरोयता प्रति- पादित कर उसकी अकयनीयना बनलाई गई है। उक्त प्रतिपादन से स्वष्ट है कि कथनाक्षेप को आक्षेप का रूप पहले पहल सुद्ट से मिरा है। सवस्वकार ने इसको प्रेरणा सद्रट से ही पाई होगी। सुदट के प्रतिपादन में दोप यह है कि उन्होंने आक्षेन शब्द का अर्थ नहीं दिया। किन्तु प्राचीन आचार्यो ने आक्षेप का प्रतिषेष या निषेध नाम से जो अर्थ किया था रुदट को वही मान्य है। वामन ने जो अधिक्षेप अर्थ किया था रद्ट के उक्त विवेचन से वह उन्हें मान्य प्रनोन नहीं होना। सुट्रट ने आक्षेप के वश्यमाणविषय तथा उक्विषय नाम से भेद नहीं किए, किन्तु लगता है कि इन्हें वक्ष्यमागविषय भेद सनया अमान्य है यद्यपि उसका उन्होंने सण्टन नहीं किया है। इसी प्रकार उक्तविषय उन्हें मान्य है यद्यपि उसका भी उन्होंने नामोलेस नहीं किया है। सवथा रुद्रट का आक्षेप पूववरत्ती आचार्यो से गृहीत न शेकर स्वत् कशपन प्रतीन होता है। मम्मट-मम्मट का आक्षेप मामह के माझेप से उद्रट के ही आक्षेप के समान सवया अमिन्न है। उन्होंने सट्ट के समान मामह की कारिका उद्धृन कर दी है किन्तु तमका अनावन्यक अंश इटा दिया है- प्रतिषेध इवेषस्य यो विशेषाभिषित्सया। वक्ष्यमाणोक्तविषय. स आल्षेपो दिया मतः॥' अर्थ स्पष्ट है। इस कारिका का यही रूप भामह के नाम से लोचन में उद्भृत आशेपकारिका में मी मिलता है। यदि इस कारिका को काव्यप्रकाश के संस्कार पर परवर्ती पण्डितों ने सुधारा नहीं है वो कारिका के परिष्कार का श्रेय मम्मट को नहीं अमिनवगुप्त को ही दै [ द्रव्य लोचन प्रथम उध्योन ]। [-] द्वितीय आक्षेप की उद्भावना प्रयमन दण्डी में ही मिलनी है। भोज में दण्डी का ही अनुकरण है। दोनों आचार्यों के मत कपर दिए जा चुके हैं। उपयुक्त इतिदास से स्पष्ट है कि प्रथम आक्षेप के विषय में सवस्वकार के पहले तक निम्न- लिसित तीन मत बन चुके थे- १- विशेषाभिधान के लिप हष्टप्रतिपेघाभास। इसके प्रवर्तक हैं भामद और अनुयायी हैं उद्रर, मटूट, आानन्दवर्भन, अमिनवगुप्त तथा मम्मूट। -वेवल प्रतिषेधोकि। इसके पवतंक हैं दण्डी और अनुयायौ मोजदेव। तथा- ३-उपमानाक्षेप। इसके प्रवततेक हैं वामन और अनुयाया कोई नहीं। इन मनों में से तृतीय मत के भाक्षेप का स्वतन्त्र अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। इसका प्रथम भेद प्रनीप और द्वितीय भेद समासोक्ति में अन्तभूत हो नाना है। अमिनदगुप्त ने यामन का मत वद्षृत
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आक्षेपालक्कार:
कर 'ऐन्द्रं धनुः' पद में आक्षेप को समासोति से अभिन्न ही बसलाया है। कहा है 'एषा तु समा- सोकिरेव' [ वन्यालोकलोचन उद्योत-१] प्रथम भेद का उदाहरण उन्दोंने चदल दिया है और उसका प्रतीप में अन्तर्भाव नहीं दिखलाया है तथापि यह अन्तर्भाव तकशुद्ध है। आगे होने वाले प्रतीप के विवेचन से यह तथ्य स्वयं ही स्पष्ट हो जाएगा। मण्दितराज जगनाथ ने सर्वर्व कार का मत स्पछ करते हुए उपमान के अधिक्षेप को प्रतीप का भेद बतलाया भी है। अलंकार- कौरतुभकार ने मी इसे काव्यप्रकाशकारादि के चनुसार पतीप ही बतलाया है। इस प्रकार वामन का आक्षेपमत निरस्त हो जाने पर दो ही मद शेप बचते हैं। प्रथम दो मतों में से द्वितीय मत में आक्षेप का लक्षण अपूर्ण है। एक तो उसमें विशेषाभि- धानेच्छा को स्यान देना आवश्यक है। क्योंकि 'च्छ गच्छसि'-पद्य में भी विशेष का अस्तित्व है ही। दण्टी ने इसमें मी आशीर्वचनाक्षेप माना है। दूसरे आशीर्वचनाक्षेप में आक्षेप का अर्थ यदि निषेध हो तो रक्षण में एकमात्र व्यंग्यदशा का ही समावेश रहता है, वाच्यदशा के लिए पुनः कोई निवंचन अपेक्षित रहता है। इसीलिए सर्वस्वकार ने 'अनिष्टविध्यामास' को लक्षण माना है। उक्त आशीर्वच्नाक्षेप में वाच्य विध्यामास ही है। दण्डी के लक्षण के ही अनुसार मामह के लक्षण में भी पकाडिता चली आती है। यदि रत्नाकर के अनुसार द्वितीय आक्षेप को स्वतन्त्र अलंकार मान लिया जाय तो मामह का आक्षेप- लक्षण निर्दोष अवश्य रह सकता है किन्तु यदि सर्वस्वकार और विमर्शिनीकार के अनुसार उसे आक्षेप का ही एक मन्य रूप मान लिया जाता है तो इस द्वितीय रूप के समावेश के लिए मामद के लक्षण में संशोधन या संवर्धन की आवश्यकता था पढ़ती है। उन्होंने तो केवल प्रतिपेषाभास को हो लक्षण में स्थान दिया है। सवस्वकार ने इन दोनों मर्तों को आदर देना चाहा किन्तु वे दोनों में अन्वित होने योग्य कोई एक लक्षण नहीं बना सके। दोनों को अलग-अलग हो रखना हो सो रत्नाकर का दोनों को दो स्वतन्त्र अलंकार मान लेना क्या बुरा है। परवर्ची अप्पयदीक्षित और पण्डितराज ने भौ इन दोनों मतों का कोई समन्विरित रक्षण नहीं दिया है। पण्डितराज ने जहाँ प्त्येक अलंकार का एक त्वाभिमत स्वतन्त्र लक्षण दिया है वहाँ वे आाक्षेप के लिए विभिन्न मतों को उपस्थित कर संतुष्ट हो गए हैं। पण्टितराज का निषेधमात्रमाक्षेप:' कथन सामान्य लक्षण के लिए पर्यास्ष है। हमारी दृष्टि में-
-अर्थाव 'विशेषता के प्रतिपादन के लिए इष्टपदार्थ के विधान और निषेध में से किसी एक का आामास आक्षेप।' यहाँ यह कहना अधिक आवश्यक नहीं कि विशेषता का ज्ञान निषेध्य वस्तु अथवा निषेध में ही होना चाहिए। शोभाकर-सर्वस्वकार के बाद के आचार्यो में शाभाकर का मत आक्षेप के विषय में इस प्रकार है- [सूत्र ] 'विशेषावगमायेष्टनिपेध माक्षेप:' [वृत्ति] इष्टत्योक्तस्य वक्ष्यमाणस्य वा विशेषावगमाय निषेषामास आक्षेप:। -विशेषता के ज्ञान के लिए इष्टनिषेय सक्षेप। इष पदार्थ जो उक होगा या वक्यमाण, का निपेधाभास आक्षेप कहलाता है। इसी विषय को रत्नाकरकार ने कारिफा द्वारा भी विशद किया है- 'विदितेडरमें निषेधस्य स्याच्चेदाभासमानता। मक्षेपोडसौ।
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मलङ्गारसर्वस्वम्
-विहित अर्थ का निषेध हो अतः वह आमासमात्र सिद्ध हो रहा दो तो वह आकेप कहलाता है। इस प्रकार प्रथम आक्षेप ही रत्नाकरकार को आक्षेपरूप में मान्य है। द्वितीय को उन्होंने जिस प्रकार विध्यामास नामक स्वतन्त्र अलंकार बतलाया है वह स्पष्ट हो ही चुका है। अष्पयदीचित-अध्पयदीक्षित ने उक्त तीनों मतों का पृथक पूथक उल्लेस मात्र किया है। कोई स्वतन्त्र लक्षण नहीं दिया। सर्वस्वकार ने विडिननिषेध के टिए उद्धृन 'साहित्यपायोनिविय' आदि जिन पषों में आक्षेप नहीं माना था अप्पयदीक्षित ने उनमे भी आक्षेप स्वीकार किया। पतदर्थ उन्होंने यह लक्षण बनाया है- आक्षेपः स्वयमुकतस्य प्रतिषेषी विचारणात्। स्वय के द्वारा कथिन अर्थ का, विवार करने पर प्रतिपेध आक्षेप कइनाता है। वक पथों में काव्याथचौरों से रखवाली की मर्थना की गई है किन्तु बाद में अपने सूकिरत्नों की अक्षय्यता का ध्यान आने ही रसवाली का निषेध कर दिया गया है। उन्होंने सवस्वकार का मत इस पकार प्रस्तुत किया है- (२) निषेधामाममाक्षेप तुधा केवन मन्यते। -'कुछ विदान् निषेधाभास को वक्षेप मानते हैं।' वृत्ि में 'कुछ'-शब्द के स्पशोकरण में उन्होंने अटकारसर्वस्वकार का ही उपटेस किया है-चेचिट्टकारस्वसकाराय। स्पटटन. वे मामह से प्रवृस् इस परम्परा की अन्निम कटी सर्वस्वकार पर अधिक आस्थावान् हैं। इसके उदाहरण में उन्दोंने 'बालक नाह दूती' पद्य का रूपान्तर रख दिया है। (३) 'आाक्षेपोऽन्यो विधौ व्यत्ते निषेये च तिरोहिते।' तीसरा आक्षेप वह होता है जिसमें विधान ोता है वाब्य किन्तु उससे व्यजित होता है प्रतिषंध 1 इसके उदाहरण के लिए उन्होने 'गच्छ गव्छसि०' पघ का दो सक्षर कर दिया है। पव्दितराप-पण्डितराज जगनाय ने आक्षेप पर विविध मत इस प्रकार प्रस्तुत किए ई- (१) 'उपमेय स्योपमा नसम्बन्धिसकलप्रयोजननिषपादनक्षमत्वादुपमानकमर्थ्यसुप मानाधिश्ेपरूप माक्षेप: इति केचिदाद। कुछ कहते हैं कि उपमेय में उपमान से होने वाले समी कार्यों को निष्पक्न करने की क्षमता होने से उपमान की निरथंकला आक्षेप कहलाती है जिसका अर्थ उपमान का अनादर होता है। स्पष्ट ही वह वामन का मत हेउदाहरण के लिए 'तस्यास्तनमुखमरिति०' पद् के भाव पर एक दूसरा पध पण्टितराज ने बना दिया है। (२) अपरे तु-पूर्वोषन्यस्तसवार्थस्य पक्षान्तरावळम्वनप्रयुक्तो निषेध माक्षेप= इत्याद्ध। दूसरे आाचार्य-'पूर्वकथित पदार्थ का अन्य पक्ष के आधार पर किया गया निषेध आक्षेप है, ऐसा कहते है।' स्पष हो ये 'साहित्यपाथोनिषि० आदि पघममुदाय में आक्षेप मानने वाले अम्पयदीक्षित है। कुछ ऐमे दी विचार रुद्रट के भी प्रतीत होते है। (३ ) तोमरे मन के लिए पण्डितराज ने मम्मट की 'निषेधो वस्तुमिष्टस्य' कारिका उद्धृन की है। किन्तु सन्दोंने मम्मट का नाम नहीं किया है। वदाचिन वे भी इस कारिका का मूल अमिनवगुम के पूर्व उदधृन लोचन में पाने है और इसके सिद्धान्त का मूल मामह में। इसी प्रसंग में वे सबस्वकार के संपूर्ग आक्षेपर विवेचन का सार मी अत्यन्त सलझी भाषा में (अप्पयदीक्षिन को नाई संकोच के साथ नही) सवोंगीगना के साथ प्रखुत करते है। इसमें उन्होंने आक्षेप के दोनों
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दी पक्ष उपस्थित किए हैं निषेपाभासात्मक तथा विध्याभासात्मक । किन्तु वे विध्याभासात्मक आक्षेप के लिए उसके मूल प्रवर्तेक दण्डी का उल्लेख नहीं करते। (४) चतुर्थमत में पण्डितराज ने उक्त सभी मत्ों का समादार करने का यतन किया है। इसके लिए उन्होंने लिखा है- 'चमत्कारिनिपेधमाघमाक्षेपः। वे सभी निषेध आक्षेप है जिनमें चमत्कार निषेधगत रहता है।' पण्हितराज का कहना है कि उक्त सभी पक्षों में निषेध का चमरकार रहता है, अतः उनका इस चतुर्थ मत में समाहार हो जाता है। ऐसा लगता है कि यह उनका अउना पक्ष है किन्तु वे इसमें अपना नाम जोड़ने का साहस नहीं कर सके कारण यह है कि इतनी उदारता बरतने पर उन्हें प्रतीपालंकार से हाथ धो लेना पढ़ता। एक बार वे प्रतोप और उपमेयोपमा का उपमा में भी अन्तर्माव मान बैठे थे[ द्र० रसग० उपमा विवेचन का आरम्भ ]। विश्वेधवर-विश्वेक्षर पण्डित ने आक्षेप पर उकत सभी मत पण्डितराज के ही समान उपस्थित किए हैं किन्तु उन्होंने अपनी मूल कारिका 'निपेधामास' पक्ष पर ही बनाई है अतः उन्होंने अपना मत मामहादि के पक्ष में खुलकर दे दिया है। पण्डितराज के समान सपने मत को छिपाए रखने का प्रयत्न उन्होंने नहीं किया है। उन्होंने कदाचित् पण्डितराज के समाहारपक्ष का खण्न मीं किया था, किन्तु उनके अलंकारकीस्तुम का यह अंश खण्डित हो गया है। विद्वेध्वर की आक्षेपकारिका इस प्रकार है- ष्टस्याप्यमिधातुं योडर्थस्य विशेषवोधाय। स्वयमेव प्रतिपेध: स वक्यमाणोक्तविपय आक्षेप:।I' इससे अच्छी कारिका तो स्वयं मम्मट की ही थी। उसी को दे देना उचित था। सिद्धान्त तो उनका है ही। सबस्वकार का मत भी विश्वेश्वर उतनी सफाई के साथ नहीं दे सके जितनी सफाई के साथ उसे पण्डितराज ने दिया था। इस प्रकार पूर्व और पश्चात के आचार्यों के मतपरीक्षण से सिद्ध यह होता है कि आक्षेप पर जो सिद्धान्त सर्वस्वकार ने दिया है वही सर्वमान्य है। लक्षणा-आाक्षेप में वाच्य निमेध या विधि में विमर्शिनीकार ने विपरीतलक्षणा स्वीकार की है और रत्नाकरकार ने उपादानलक्षणा, किन्तु सर्वस्वकार ने संपूर्ण आक्षेपविवेचन में लक्षणा का नाम एक बार भी नहों लिया है। उन्होंने विधि औौर निषेध को वाच्यरूप में केवल बाधित होता हुआ कहा है। उनका शब्द है 'निपेधत्यानुपपद्यमानत्वादसत्यत्वम्'। यहाँ असत्यता का मर्व यह नहीं है कि निमेध की लक्षणा असत्यता में हो जाती है। असत्यता का ज्ञान यहाँ ठीक वैसे ही होता है जैसे 'धार्मिक। गोदावरीतट पर रह रहे शेर ने उस कुते की मार हाला है जो तुम्हें वहाँ सताता रहता था, अब प्रेम से वहाँ घूमना' इस वाक्य में भ्रमणनिप्ेध का ज्ञान होता है। यहाँ निक्ित ही स्रमणनियेध का ज्ञान लक्षणा से न डोकर व्यंजना या अनुमान से होता है। यह इसलिए कि यहाँ भ्रमण की विधि सबथा अशक्य नहीं है। एक कठिनाई, लक्षणा मानने पर, यह भी आती है कि आक्षेप में निषेध को लक्षणा निषेधाभाव में ही की जा सकती है। यह निपेघाभास अभावात्मकमान सिद्ध होता है फलतः यहों ऐसा कोई अर्थ नहीं आता जैसा व्याजस्तुति में स्तुति को लक्षणा से निन्दा या निन्दा की लक्षणा से स्तुतिरूपी विपरीत अर्थ आता था। निन्दा या रतुति था निन्दा का एकमात्र अभाव नहीं है वे अपने आपमें अरितलवशाली भावात्मक तत्व भी है । आक्षेप में ऐसा कोई अतिरिक अर्थ भासित नहीं होता। यह
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निषेष तो ठौक वैसा ही आमासात्मक निषेध है जैसा आमासात्मक सरील्ष कपड़ों की दूकानों पर खडी स्रीमूति में रहता है। उसमें सीत का विधान तो रहता है किन्तु बह एकमात्र आमासात्मक हो रहता है। सच यह है कि इष्ट के निषेष से या अनिष के विधान से हष में अनिष्टत्व और अनिष्टतव में रषत्व का ज्ञान होता है, तत्पश्ाद तात्पर्य जिश्ञासा द्वारा अनिष्टरूप से प्रनिपादित इष् या सष्रूप से प्रतिपादित अनिष्ट में विशेषता का ज्ञान होता है। इस प्रकार निषेध या विधि अनापयंविपयीभूतमान सिद्ध होते हैं, उनका बाघ नहीं होना। रष् या अनिष्ट में अनिष्टत्व या र्षत्व का प्रतिपादन उनमें बाप उत्पन्न नहीं करता। फमतः आक्षेप के इम अज् में भी लक्षणा का मानना अवैद्ञानिक है। सर्वस्वकार के अनुसार आक्षेप वृक्ष इस प्रकार का दोगा-
मासेप
रष्टनि षेधा भासात्मक अनिषटविध्यामासात्मक
वक्ष्यमाणमनतिविषय उक्तविषय वक्यमाणविषय ५
-4 पदा्धनि पेधारमक पदार्थेकथन निषेधात्मक
उक्तसामान्याक्षित विशेपनिषेधारमक उक्तविशेषा सिप्तविदयेषान्तरनिषेधात्मक Y इस प्रकार आक्षेप के पाँच भेद सिद्ध होते हैं। सजीविनीकार ने सवस्वकार के सपूर्ण आक्षेपविवेचन का सक्षेप कारिकाओं में इम प्रकार किया है- प्रथम आन्षेप- 'निषेधामास आक्षेप. प्रक्ृनस्येष्टसिद्धये। स उक्तविषये वस्तुतदुकत्योर्वारणात्मक: ।। वक्ष्यमागे पुनरत्वन्यो ज्ेय आगरणात्मक। सामान्यतो विशेषोऽशार्वशश्चेत्येष च दविया।।
चतुष्टयमिदं वेय संभू याक्षेरकारणम्॥ 7
द्वितीय आसेप-'अनुक्तत्य नियेघस्य विध्यामासेन सूचनम्। साक्षेपो वक्ष्यमाणेकविषयरवेप समग' ॥' पाठान्तर-आक्षेप विवेचन का सर्वस्व और विमर्सिनी दोनों में अभी तक छपे सस्करणों में काफी पाठमेद है। मूल में ये पाठभेद प्रधान हैं- (१) 'सुदम०' पद्य की वृत्ि में 'सानिशयो मरणरङ्ोपजनकत्वादि' के स्थान पर निर्णय सागर सस्करण में 'साविघ्रयात कोपजनकत्वादि: छपा है। डॉ० दिवेदी ने इसके स्थान पर 'साविशययोतकोपजन्कत्वादि:' पाठ बना लिया है। डो० राघवन् ने यहाँ मूल में वो 'सातिशयको-
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आक्षेपालङ्कार: ४५१
एजनकतादि:' पाठ बनाया है। परन्तु पाठान्तर में 'सातिशयकोपजनकत्वम्' पाठ रख छोड़ा है। अनन्तशयन (त्रिवेन्द्न्) संस्करण तथा काशी के शारदा अ्न्थमाला संस्करण में क्रमशः 'सातिशयो मरणशङ्कोपजनकत्वादि:' तया 'सातिशयान्मरणशङ्गोपजनकत्वादि"' पाठ को सूल पाठ माना गया है। इनमें प्रधान समस्या 'मरणशक्ट्रोपजनकत्वादि' और 'कोषजनकत्वादि:' की है। इसके नीचे माई पंकि में 'म्रियते' इस प्कार मरण की वात को प्रतिपादय वतलाया गया है। अतः हम अधिक पाण्डुपतियों में अन्य पाठ मिलने पर भी मूल पाठ में 'मरण'-शब्द को आवश्यक समझते हैं। 'शश्होपजनकत्व' और 'कोपजनकत्व' के विषय में औचित्य से निर्णय किया जा सकता है। यहाँ गुसु्से की बात हो मला क्या है? प्रिय के प्रवास का दुःखपूर्ण मवसर है। यहाँ कोप नहीं, विषाद या दैन्य ही अधिक संभव हैं। कोप तो लौटने में विलम्ब करने पर संभव है। (२) 'अनुरूपो देव इत्यात्मसंमावना'-इस पंक्ति में समी संस्करणों में देव की जगह 'देव्या' छपा है। प्रसंग है हर्पचरित में दाघीच की दूती मालती के द्वारा शोणतट पर रुकी सरस्वती के प्रति उसके अनुराग की व्यंजना का। माळती ने पहले दाघीच की दक्ा का वर्णन किया है। तदनन्तर उसके विषय में अपनी इच्छा व्यक्त की है। इसमें उसका यही प्रथम वाक्य है। इसमें कुमार का परामर्श किया जाना अत्यन्त आवश्यक और वक्ता की वाक्प्रवृत्ति के भनुरूप है। निर्णय- सागर संस्करण में छपा मी दिव' ही है। राघवन् सा० ने इसका संदर्भ तो हँढ निकाला है परन्तु संशोधन नहीं किया। इसी प्रकार 'केवलम्' को सभी ने उद्धरण का अंग मान रखा है। वह न तो वास्यार्थ के अनुरूप है और न मूल में ही प्राप्त है। (३) 'चमत्कारोप्यत्र निषेधह्वेतुक एवेति न तन्भावमात्रेण' पंक्ति के 'न तन्भाव' के स्थान पर डॉ० द्विवेदी और डॉ० राघवन् ने 'न तत्सद्भाव' पाठ को महत्व दिया है। हमारी दृष्टि में यह पंतति 'ततश्च हर्पचरिते' से आरन्म होने वाले पूरे प्रघट्टटक के उपसंहार के लिए आई पंक्ि है। अतः इमने 'तद्भाव' का अर्थ 'आक्षेप जैसा आशय' या माक्षेप से मिलता-जुल्ता करना उचित समझा है। 'तत्सन्भाव'-पाठ मानने पर अर्थ होता है चमस्कार का अस्तितव ! इससे पक्ति का महत्त्व केवल 'साहित्यपाधो०' से आरम्म होने वाले प्रकरण तक सीमित रह जाता है। क्योंकि निषेधमूलक चमत्कार इन्हीं पद्यों में है। हर्पचरित के वाक्यों में चमत्कार सौकर्यमूलक है। बिमाश- नीकार ने मी यहाँ 'ततत' शब्द को चमत्कार का हो परामर्शक माना है। उन्होंने 'तद्भाव' का 'चमत्कारसन्भ्ाव' शब्द के द्वारा स्पष्टीकरण किया है। इसमें सन्वान शब्द से उनके मस्तिष्क में भी 'तत्सद्वाव' पाठ ही मान्य होने की संभावना झलकती है किन्तु वह अत्यन्त ठीक है। फिर उन्हें मूल की प्रतियाँ बहुत अशुद्ध मिली थीं। समुद्रबन्ध ने यहाँ 'तत्सद्माव' पाठ ही माना है किन्तु उसका अर्थ उन्होंने 'तत्सद्भावो निषेषसद्भावः' इस प्रकार निषेधपरक किया है। निमर्शिनी में भी अुद्धियों की मरमार है। उसमें जैसे अवश्यपरिहार्यत् के स्थान पर अवश्या- परिहार्यत्व छपा है वैसे ही 'विहितस्य निषेध न' के स्थान पर 'विहितस्य निषेधेन', 'निषेधस्याव- भासनाव' के स्थान पर 'निषेधस्यैव भासनाव', 'शब्दानुपाततत्वाळ्। विशेप० के स्थान पर 'शब्दा नुपातत्वादूविशेष' तथा 'अनिराकरणमुखेनेति' के स्थान पर 'निराकरणमुखेनेति'। चिमर्शिनी हदानीं विरोधस्य लयक्षण मुपक्रमते-आक्षेप इत्यादिना। अब् विरोध का लक्षण मारम्भ करते हैं -- [सर्वस्त्र ] आक्षेपे इष्टनिषेधेऽनिष्टविधी चानुपपद्यमानत्वाद विरुद्धत्वमप्रविष्टम्।
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४५२ गलद्वारसर्यस्वम् पततम्रस्तावेन विरोधगर्मोऽलंकारवर्ग: मकियते। तथापि विरोधालंकार स्तायलृक्ष्यते- [ सूत्र ४१] विरुद्धाभासत्वं विरोध:। इह जात्यादीनां चतुर्णो पदार्यानां प्रत्येकं तन्मष्य एव सजञातीयचिजा तीयाम्यां विरोधिम्यां संयन्धे विरोधः। स व समाधानें चिना परुदो दोप:। सति तु समाधाने प्रमुष एवाभासमानत्याद्विरोघामासः। तभ जाति विरोघस्य जात्यादिभि: सद्द चत्वारो मेदा । गुणस्य गुणादिभि: सह भ्रयः। कियाया: कियादव्याभ्यां सद्द डा भेदा। द्रव्यस्य द्रव्येण सहैकः। तदेवं दश विरोधमेदा: । आछेप में, इष्टनिपंथ और अनिष्टविधि के वाषित होने के कारण [ इनके ] बीच विरोष आा गदा है। इसी [विरोध] कै प्रसंग से अब विरोधमूषक अहंकार आरग्भ किए जा रहे हैं। ततापि [मूस्भूत ] विरोषालकार का एभग पहले दिया जा रहा है- [सूय ४। ] विरुद्ता का आमास विरोध [नामक कहंकार कहलाना है]। यहोँ जानि आदि [ गुग, किया और यद्च्छा =द्रव्य ] चार पदार्थो में से प्रत्येक के उन्हीं के मीच के सजानीय और विजानीय विरोधियों के साथ सम्बन्ध का नाम है विरोध । वइ, यदि समाधान न हो और अन्त तक बना रहे सो दोध होता है, और यदि समाधान हो बाए तो [होता है] विशोधामास [नामक अष्टकार ] क्योंकि तव वह केवल आरम्भ में दी मासिन हुआ करता है। इनमें मो जाति विरोध जाति आदि चारों के साप होता है, इमलिए उसके चार भेद होते है। गुन का विरोध गुणादि तीन के साथ होता है अतः उसके भेद केवल तोन होते है। क्रिया का विरोध क्रिया और द्रव्य इन दो के दी माथ होता है इसलिए इसके दो भेद होते हैं। दव्य का विरोष केवल द्रव्य के साथ होता है, अन यह केवल एक हो प्रकार का होना है। इस प्रछार विरोध के दस भेद होते हैं। विमर्शिनी एनाप्रनावेनेति। विरुदाश्वानुप्रवेशानुगुण्येनेश्यर्थः। तत्रापीति। विरोधगर्भोलंकारोप कमेऽपीर्यथ:। तावदित्युपकमे। तत्र दि विरुदुगभरवस्य प्राधान्यम्। तदेवाह-विरु- देत्यादि। तन्मव्य पवेति। आत्यादीना शुमादय एव विज्ञातीया, गुणाद्वीनामपि जाशयाद्य- एव विजानीया माझ्याय न पुनरन्ये यहस्डावय इश्यर्थः। ननु विरोधस्य दोपरवं वाच्यं मरयुत, अम्य कथनमलंकारत्वमुच्यत इस्याशाष्त्याह-स चेत्यादि। समापानमिति। वस्तु- वृक्त पर्याछो चनालम्पो विरोध प्रतीत्यनन्तरभावी नैतदेवमिति प्रत्ययरूप चाघ:। प्रमुख प्वेति न पुनः पर्यवसाने। तेनामुखावमतो विरोध: पर्यवसाने न तथा मरोद्दमेतीति भाव:। पतच्च र्लेष एव वित्वश्य प्रतिपादितमितीह न पुनरायहनम्। एवं व सायपि समाघाने दोषामावमात्रमेवास्य स्वस्पं नाराइनीयम्। अलंकारवपर्यव सायिनो विच्छि सिविशेपर्यापि समचात्। जातेर्गुणेन सह विरोधे उक्ते 'घिरोधोऽन्योन्यवाधनम्' इति दश्ा तेनेव सुगस्यापि जात्या सद् विरोध: सिद्धः। अत एव गुणस्य जातिवर्ज त्रयो भेदा:। एवमन्पमापि शेयम्।
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'पतम्प्रस्तावेनेति-इसी प्रसंग से' = अर्थात विरोध का प्रवेश दोनों अलंकारों में समानरूप से रहता दे इस अनुकूता के कारण। तन्नापि=विरोधमूलक अलंकारों के निरूपण के आरम्भ में भी। तावद=आरम्भ में। इसलिए कि इसमें विरोध ही प्रधानरूम से चमत्कारकारी होता है। यही [विरोध का लक्षण सूत्र द्वारा ] प्रस्तुत करते हुए कहते हैं-'विरुन्न'इत्यादि 'तन्मध्य एव= उन्हीं के बीच' अर्थाव जाति आदि के प्रति [ स्वयं सजातीय और शेष दचे] गुण आदि [तीन ] दी विजातीय मानने होंगे, इसी प्रकार गुण आदि के प्ति भी [स्वयं सजातीय और शेप बचे ] जाति आदि [ तीन] ही विजातीय होगे। न कि इन [चारो से] मिन्न नामशब्द आदि, [अर्थात् जाति गुण और किया ये तीनों द्रव्य के वास्तविक धर्म माने जाते हैं और नामशब्द काल्पनिक। इस प्रकार वास्तविक होने से जाति आदि को परस्पर में सजानीय मानकर नामशब्द को काल्प- निक होने से विजातीय माना जा सकता है, किन्तु यह उक्त चारों से मिन्न पाँचवा तत्त्व है। 'तन्मध्य एव' कइकर अन्यकार सजातीय विजतीय का निर्ण्य इसको लेकर नहीं मानते]। [शंका ]-विरोध को तो उलठा दोप कहा जाना चाहिए, इसे अलंकार कैसे कहा जा रहा है" ऐसी झंका का उत्तर देते हैं-स च। समाधानम्=समाधान का अर्थ है [ विरोध का ] वाघ मर्थात् 'यद वस्तु ऐसी नहीं है' इस प्रकार का ज्ञान, जो विरोष प्रतीति के वाद वास्तविक स्थिति का अनुशीलन करने पर होता है। 'प्रमुख एव =आरम्भ में ही'। न कि अन्तिम पर्यवसान में भी इससे तथ्य यह निकला कि विरोध केवल वाक्यार्थप्रतीति के आरम्भ में ही भासित होता है, वाक्यार्थप्रतीति के अन्त में यह वैसा नहीं रहता। यद विषय इलेपालंकार में ही विस्तारपूर्वक प्रतिपादित किया जा चुका है अतः यहाँ उसके लिये पुनः आयास नहीं किया गया। इसी प्रकार समाधान हो जाने पर विरोध दोपामावरूप भर नहीं रहता, इसमें वह विशेषता मी रहती है को [किसी भी रफि में ] अलंकारत्व में पर्यवसित होती है। जाति का गुण के साथ विरोध वतला देने पर 'विरोध का अर्थ है परस्पर में एक दूसरे को बाधित करना' इस दृष्टि से गुण का जाति के साथ विरोध भी स्वयं दी हों अवगत हो जाता है, इसीलिए अन्यकार ने गुण के विरोध के केवल तीन ही भेद बतलाए हैं। जाति के साथ विरोव को छोड़ दिया है। अन्य क्रिया आदि में भी इसी प्रकार [पूर्वभेदों से स्वतः अवगत मेदों को छोड़ कर शेप मेद वतलाने का क्रम] अपनाया गया जानना चाहिए। [सर्वस्व ] तन्न दिङ्मान्ेणोदाहरणं चथा- 'परिच्छेदार्वीतः सकलववनानामविषयः पुनर्जन्मन्यस्मिन्ननुभवपर्थ यो न गतवान्।
विकार: को Sव्यन्तर्जडयति च तापं च कुरते ॥' जडीकरणतापकरणयोः क्रिययोविरोधो वस्तुसौन्दर्येणापाप्ति- पर्यवसानेन परिह्ियते। तथा- 'अर्यं वारामेको निलय इति रताकर इति
क एवं जानीते निजकरपुटीकोटरगतं क्षणादेनं ताम्यत्तिमिमकरमापास्यति सुनिः ।'
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अघ् जलनिधि: पीत इति द्व्यक्रिययोर्विरोधी मुनिगतेन महाप्रभावरवेन समाधीयते । पवमन्यद्पि ज्ञेयम्। विविक्तविषयत्वेन घास्य दऐे: श्लेषगर्भत्वे विरोधप्रतिभोत्पच्तिद्वेतुः श्लेप सौज्मटानाम्। दर्शनाग्तरे तु संकरालंकार:। यथा-'संनिद्धित- घालान्यकारा भास्वन्मूतिश्च' इत्यादौ विरोधिनोद्वयोरपि दिलषृत्वे। एकस्य तु शिलिष्टत्वे 'कुपतिमपि कलन्नवल्लभम्' इत्यादौ। एकविप- यत्वे चायमिष्यते। विपयमेदे त्वसंगतिप्रभ्ृतिर्वंक््यते। इन [दस भेदों ] में से [प्रत्येक का उदाहरण देकर ] कुछ के उदाइरण दिए जा रहे हैं, जो इस प्रकार हे- इनके कतिपय उदाहरण यथा-[विरड्ी माधव की उक्ति-] 'जो इयत्ा से परे है, जो किसी मी प्रकार के शब्दों का विषय नहीं बनता, इस जन्म में जो पुनः कभी अनुभव में नहीं आया, विवेक के सातिशय ध्वस से प्रमृद्ध महामोह के कारण जो अन्यन् निविद है ऐसा कोई [चेनो-] विकार हृदय को शीवल मो बना रहा है और तपा भी रहा है। -यहां शीतल वनाना और तपाना इन दो क्रियाओं का विशोध है। यह वस्तु [पदार्थ] के सौन्दर्य के द्वारा इटा दिया जाता है। [यह सौन्दर्य अभिलाष शगार में पर्यवसित होता है।] इसी प्रकार- 'यह जलसमूह का एकमात निलय है [ समी जल इसी में आकर समाने हैं], यह रत्नों का मण्टार है' यह सोच तृष्गातुर चित्र वाले हम लोगों ने जलनिधि का आसरा लिया था, यह कौन नानता था कि तिलमिलसे समस्त सिमि मकरों से व्याप इसे अपनी अंजलि की खोद में समेट कर अगस्न मुनि एक क्षग में ही पूरा का पूरा पी जाएंगे।' -यहाँ 'समुद्र' [जलनिधि] और 'पीना' इन दो द्रव्य और क्रिया का विरोध है। इसका समाधान मुनि के पमाव की महचा से हो जाता है। अन्य [भेदों के उदाइरण] मी ऐसे ही जानना चाहिए। यह [ विरोध श्लेपरडित अत.] स्वनन्त्र सथलों में भी देखा जाता है अत वहां कही यह सलेघनूलक होता है वहाँ उक्रटाचार्य के अनुयायी इ्लेप को विरोध का वाघक मानते हैं अन्य मत में यहाँ संकरालंकार माना जाता है। उदाहरणार्थ- 'जो [सरस्वती ] सन्निदितवाळान्धकारा [जिसके बाल= केशों में वाल अन्धकार कालिमा सन्निदित है] और भास्वन्मूति [सूयरूप, प्रकाशित ] है।' इत्यादि [दषंचरित-१ पृ० २७] में जहाँ विरोधिओं में से दोनों ही [के वाचक पद] शळेय युक्त है। जहाँ केवल एक के [वाचक पद में] दलेष होता है उसका उदाहरण यह है- कुपति [ कुत्सित पति और कु पृविवी का पति ] होने पर जो प्रियाओं को प्रिय था। यह [संकर] वहाँ माना जाता है जहां [ विरोध और इलेष ] दोनों एक ह स्थान [पद] में रहते हैं। जहाँ कहों अलग अलग रदते हैं वहाँ अरंगति आदि अन्य अल्कार वतलाए सायेंगे।
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विमर्शिनी दिह्मान्रणेति। अनेनेषाँ लचये तथा वैचित्याभावादनवक्तृप्तिध्वनिता। अत पुवा- स्माभिरप्येते नोदाहताः। अन्यदिति। अनेनेह चिरंतनैरतुक्ता अपि वैचित्याधायिनो भेदा अनुस्तन्या इत्यपि सूचितम्। तेन मावयोरभावयोक्च विरुद्धत्वोपनिबन्धे विरोधो ज्ञेय हति। तत भावयोर्यन्थकृतैवोदाहतम्। अभावयोस्तु यथा- 'तं वीचय वेपथुमती सरसाङय प्टिर्नित्षेप एव पदमुद्दषटतमुद्धहन्ती। मार्गा चलव्यतिकरकुलितेव सिन्धु: श्रैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ।।' अन्नाभावरूपयो: क्रिययोविरोध:। भावाभावयोस्तु यथानदलेखायां राजवणने 'विदर्भाइनाजनमपि दर्भगर्मकरमकरोत्, पञ्चतां जनयननपि पज्ञाळस्य वैमुखयम- पुष्मात्, पारसीकरणमप्यपारसीकरणं चकार, मागधानपि विमागधान् व्यधाव, चोलकान्ता अप्यधोलकानता: समपाद्यत, कुन्तलालसान ्यकुन्तलालसांश्र निर्ममे
अस्यापि मतभेदेन श्लेषेण सह व्यवस्थिर्ति दर्शधितुमाह-विविकेत्यादिना। 'जडयति घ तापं च कुपते इत्यन्नास्य विविक्तविषयत्वम्। दर्शनान्तर इति अन्थकदमिमते संकर- शब्द्धात्र संकीर्णतवमान्ने वरतते 1 तेनाव संकरेण संकीर्णरेन व रेपमिश्रतवेनालंकारो विरोधाभाल इति व्यात्पेयम। अलंकारशव्देन पात्र विरोधाभास एवाभिधीयते। तसयै- वेह प्रस्तुतत्वात्। अत्र हि श्लेषो विरोधोत्पती हेतुत्वं भजते। तेन विना तस्थानुत्थानासू। संकर्श सवहेतुवलाइलव्घसत्ताकयोरलंकारयोरभवति। तेन यो यस्य हेतुत्वं भजते तेन सह तस्य संकरो न युक। यहचयति-'न च विरोधो्पत्तिहेतौ शलेपे श्लेषशय विरो धेन सहाङ्गाद्विसंकरः' इति। दयोरेकस्येत्यनेन श्लेपमिश्रत्वस्यापि वैचिव्यं दशितम्। अस्य च वचय माणादविरोधगर्भाद्लंकाराद् वैलस्षण्यं दर्शयति-एकेत्यादिना। जडीकरण तापकरणयोर्विकार योर्विकारिगतत्वेनास्थैकविपयखवम । विषयभेद इति। कार्यकारणदी नामेक विप यत्वोपपत्तावपि भिन्नदेशस्वाय्युपनिवन्घनादू। दिह्सात्रेण=कुछ ऐसा कहकर। व्यक किया कि इन भेदों के नो स्थल होते हैं उनमें चमस्कारगत अन्तर नहीं रहता। इसी कारण हमने भी इनके उदाहरण नहीं दिए। अव्यत्= मन्य, इसके द्वारा यह भी सूचित किया कि विरोध के जो भेद प्राचीन आचार्यों ने नहीं भी वतलाए है किन्तु यदि उनमें कोई वंचित्य हो तो उन्हें भी गिन लेना चाहिए। इसके अनुसार वहाँ मी विरोध माना जा सकता है जहाँ केवल भाव माव का विरोध बतलाया जाता है या केवक अमाव अभाव का या भाव और अमाव का। इनमें से केवल भाव भाव के विरोध का उदा- हरण स्वयं अन्यकार ने ही दे दिया है। अभाव अभाव के विरोध का उदाहरण यह है- [ नहचारी का वेष छोड़कर अपने रूप में आय और पार्वती को पकड़ कर जाने से रोक रहे ] उन [भगवान् शंकर ] को देखकर पार्वती काँपने लर्गी, उनकी शरीरयष्टि सस्वेद हो नई और वे आगे रखने के लिए उठाए पैर को उठार हुए ही थीं। इस प्रकार मार्ग में पर्वंत [सामान्य पहाड़ और प्रकृत प्रसंग में हिमाचल] के आ जाने से आकुलित नदी के समान पर्चतराज की पुत्री न तो जा ही सकीं और न रुक सकीं। -- यहाँ समावात्मक क्रिवाओं का विरोध है। माव और अभाव के विरोध का उदाहरण अनहलेसा में राजा के इस वर्णन में मिलता है- 'जिसने विदर्भ [दर्म कुश-रहिति तथा विदम जनपद की] सुन्दरियों को दर्भपूर्ण हाय वाली [विधवा अतएव तपस्विनी बना दिया, पञ्चता उत्पन्न करता हुआ [मृत्यु को प्राप्त करता
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हुआ] भी जो पक्चाल की विसुखता में वृद्धि कर रहा था, पारसीकों के रण को अ-पारसीक-रण [अपार= सीकरण= सीकरता] के रूप में मदल दिया, मागषों को जिसने विमागय [मागय- त्वविरुद्ध, मागव= वैतालिकों से रहित] बना दिया, चोल की कान्ताओं को जिसने अचोछ का-ता [चोल की कान्ता से उलदा, चोरकान्न सुन्दर चोली से रहित ] कर दिया, कुन्तल में सब प्रकार से शोमिन होने वालों को अ-कुन्तलालस [ कुन्तल देश में सब प्रकार की शोमा से से रहित कुन्तल = केश से रहित अर्थाद सुण्डित और अलस=आलस्य युक्त ] बना दिया, भरसेनों को भी अदुरसेन [कायरसेना वाला ] प्रमाणित कर दिया।'-इत्यादि। इम [विरोध] को मी इलेप के साथ मिन्नर मिन्न मतों में जो मिन्ननमन्न स्थितियां हैं सन्हें दिसनाने के लिए लिखने है-'विविक०। 'शीतळ करठा है और तपाता मी है' यह इस [ विरोध ] का स्वतन्त्र [श्लेषमुक्त ] स्थल है। दर्शनान्तर =अन्य मत में अर्थाद अन्वकार को मान्य मत में। यह [संकराल्कारशब्द में ] सकर शब्द का प्रयोग सको्णतामात्र के लिए किया गया है। इस यहाँ [सकरालकारगष् की ] सकर और सकोणत्व दोनों हो प्रकार से इलेप का मिश्रण दोने पर निष्पन्न होने वाला अलंकार अर्थाव विरोषामास ऐसी व्यारया करनी चाहिए। [संकरालंकार शब्द में जो अठकार शब्द [ है उस ] से यहाँ विरोधामास का हो कथन हो रहा है। क्योंकि यहाँ वही प्रस्तुत है। यहां जो है सो द्लेष विरोध की उत्पत्ति में कारण चनता है। क्योंकि उस [दरेष] के बिना वह [विरोध] खडा नहीं हो पाना। सकर योउन अलकारो का होना है जो अपने अपने हेतुओं से निष्पम् हो चुके रहते हैं। इसलिए जो जिसका हेतु होना है उसके साथ उसका सकर मानना ठीक नहीं है। जैसा कि स्वय अ्न्य- कार ही [ सकरालकार से प्रकरण में ] कहेंगे-'ऐसा नदीं कि श्लेष यदि विरोध की निम्पत्ति का हेतु हो तो इलेष का विरोध के साथ अंगागिभावसकर माना जाए। 'हयोः एकश्य'=दोनों या एक' ऐमा कहकर गरन्थकार ने यह बनलाया कि जहां विरोध दरलेयमिश्रित रहता है वह भी इसके अनेक भेद होते हैं। इस [ विरोष] का आगे कहे जाने वाले विरोधमूलक अलकारों से भेद दिखलाते हैं-'एक' इत्यादि कहकर। 'जठीकरण=शीतकरण और तापकरण= चपाना इन दोनों विकारों का आश्रय एक ही हे अव वश विरोध को एक दी स्थान में रहना माना जा सकना है। 'विषयभेद=अलग-अलग रहने पर' अर्थात कार्य और कारण आदि का विषय एक होने पर भी स्थान में मिन्नता आदि के बतशने से। विमर्श :- पूर्व इतिहास- विरोपालकर के उपयुंक्त दस भेदों का निर्देश पहले पहल रुद्रट ने किया है। रुद्रट के पूर्व उद्भर, वामन और मामह ने विरोध का जो निर्वचन किया है उससे विरोध का मूलभूत रूप निखरवा नहीं है। भामह-मामह ने विरोध का निरूपण इस प्रकार दिया है- गुणस्य वा क्रियाया वा विरुद्धान्यक्रियामिया। या विशेषाभिधानाय विरोधं त विदुर्बुधा ॥ यया-
विदूरदेशानपि व' सन्तापयति विदिप:।। -विशेषता बतलाने के लिए गुण या क्रिया के विरुद्ध अन्य क्रिया का जो उल्लेख उसे विद्ञान् सोग विरोध कडते है। यथा-
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पास में दी लगे उपवनों की काया के समान शीतल होने पर भी आपकी बह धुरी [राज्यभार ] सदूर देश में भी रह रहे शधुओं को तपा रही है।' यदाँ एक ही राज्यभार- रूपी पदार्थ में शीतलतारूपी गुण के साथ उसके विरुद्ध संतापकिया वतला दो गई है। मामह् के इस निल्पण में गुग और क्रिया की जो चर्वा है वही है परवर्ती दस मेदों की कत्पना का स्त्रोत । इतने पर भी मामह का निरूपण अपूर्ण है। वामन-वामन ने विरोध का ममे समझ लिया था किन्तु वे उसकी असंगति से मिन नहीं कर सके थे। उनका निरूपण इस प्रकार है- [ सू०] विरुद्धाभासत्वं विरोष:। [वृ० ] अर्थस्य विरुद्धस्येवाभासत्वं विरुद्धामासत्वम्। यथा-(१) 'पीतं पानमिदं त्वयादय दयिते। मत्तं ममेद मनः०। (२) 'सा वाला वयमप्रगत्भमनसः सा स्री वर्यं कातरा:। -विरुद्धाभासस्व्र विरोध। विरुद्धाभासवत्व का अर्थ है किसी पदार्थ में विरुद्धता-सी प्रतीत होना। यथा- (१) 'हे प्रिये! आसव पिया है तुमने, किन्तु नझ्ा चढ़ा है हमारे चित्तको। (२ ) वाला है वह, अप्रोद़ मन वाले हो रहे हैं एम, स्त्री है वह फिन्तु कातर हो रहे हैं हम०। स्पष्ट ही वामन का विरोधसूत्र सवस्वकार तथा रत्नाकरकार ने ज्यों का त्यों अपना लिया है, किन्तु वामन ने जो उदाहरण दिए हैं वे असंगति के उदाहरण है, अतः उक्त आाचार्यों ने उन्हें छोड़ दिया है। बन्दट-उद्धटाचार्य ने विरोध पर मामद की हो पदावली को इस प्रकार उतार दिया है- 'गुणस्य वा क्रियाया वा विरुद्धान्यक्रियाबच:। वदिवशेषाभिघानाय विरोधं तं प्रचक्षते॥' उदाहरण भामह का ठीक था किन्तु उद्धट ने उसे छोड़ अपना एक ऐसा पद्य दिया है जो स्पष्टतः विषभालंकार का उदाहरण है- 'मवत्याः क्वायमाकार: क्वेदं तपसि पाटवम्' 'आपकी यह आकृति कहाँ और कहाँ यह सपस्या में तत्परता।' कालिदास की 'तपः कव वत्से ! कव प तावक नपुः-' यह उत्ति हो उक्त पदार्ष में ढाल ली गई है। स्पष्ट है कि उक्त दोनों माचार्यो ने भामह के ही समान जातिविरोध आदि अवान्तर भेदों की ओर ध्यान नहीं दिया। न तो इन आचार्यों ने विरोध में इ्लेष का अस्तित्व ही वतलाया है। सद्रट-रुद्रट ने विरोधलंकार का दो अलग-अलग प्रकरणों में प्रतिपादन किया है। एक अतिशय प्रकरण में और दूसरा इलेप प्रकरण में। इलेप प्रकरण के विरोध को उन्होंने ठीक उसी प्रकार विरोधशलेप नाम दिया है जिस प्रकार व्याजस्तुति को व्याजरलेप। इस प्रकरण में रुद्ट ने विरोधाभास नामक एक स्वतन्त्र अलंकार भी माना है। इस प्रकार स्पषटरूप से रुद्रट ने विरोध में श्लेष का अस्तित्व भी स्वीकार किया है। रुद्रट का विरोध निरुपण इस प्रकार है- लक्षण- 'यरि्मिन् द्रव्यादीनां परस्पर सर्वथा विरुद्धानाम्। एकतावस्थानं समकालं भवति स विरोष: ।।' ९।३०।।
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४५८ अलद्गारसवस्वम्
-जहों परस्पर में सरवया विरुद्ध द्रव्य भादि का एक हो स्थान में एकसाथ अरितिरव दिखलाया जाय वह विरोध [नामक अलकार] होता है।' इस लक्षण से स्पष्ट है कि स्द्ूट के मन में विरोध और असगति का वह भेदक तत्व मी स्पष्ट या जिसे सर्वस्वकार ने विरोध-प्रकरण के अन्त में विषयैक्य औौर विषयमेद नाम से दिया है। रुद्रट के लक्षण में अधिकरणेक्य के साथ ही समयेक्य का मी सन्निवेश है जो अत्यन्त अपेक्षिन है। विरुद्ध वस्तुओं का अधिकरणेक्य यदि मिन्न-मिन्न समय में बदलाया जाए तो उसमे विरोध मुसर नहीं हो पाना। भेदों के विषय में रुद्रट की धारणा मम्मट, सवस्वकार आदि परवर्ती आचार्यों को प्रमावित करती हुई मी अशत. भिन्न है। इन्होंने केवल नौ ही भेद स्वीकार किए हैं। दशम जातिद्रव्यविरोध भेद का खण्डन किया है। रुद्रट की भेदगगना भी बदुम स्पष्ट है। वह इस प्रकार है- अस्य सजातीयानां विधीयमानस्य सम्ति चत्वार.। भेदास्तन्नामान पक्च त्वन्ये सदन्येषाम् ।। जातिद्वव्यविरोधो न समवत्येव तेन न षहेने। ३१, २२ ।। -जय यह विरोध सजाशीय पदार्थो का [भर्थात द्रव्य का द्रव्य केसाथ, जाति का जाति के साथ गुण का गुग के साथ तथा क्रिया का क्रिया के साथ] होता है तो इमके उन्हीं नामों के चार भेद होते हैं। इनसे मिन्न [ विजावीयों] के साथ जो विरोध होता है उससे पाँच ही भेद होते दै [ नानि गुण, जातिक्रिया, गुगक्रिया, गुणद्व्य, क्रियाद्रव्य-के विरोध]। जानि और द्रव्य का विरोध दो ही नहीं सकना, अन ये [ विजातीय] भेद छ नहीं माने जा सकते । उक्त जात्यादि के विरोध के सभावों के भेदों की जो चर्चा विमर्सिनी में मिलती है उमका भी स्नोत रुद्रट ही है। उन्होंने लिसा है- 'यवावश्यमावी ययो. सजातीययोभंवेदेक.। एकन विरोधवतोस्तयोरभावोऽयमन्यस्तु । १३३॥ -'जहों ऐसे दो सजानीय पदार्थ जो परस्पर में विरुद्ध हो, और जिन दो में से किसी एक का [भभाव रहने से दूसरे का ] अस्तित्व अवश्यभावी हो, तथापि यदि दोनों का ही अमाव दिखलाया घावे तो वह भी पक [चार सजातीयों के बधार पर चार ] प्रकार का विरोष होता है।7 रुद्रट ने उक्त ममी मेदों के उदाइरण दिए हैं। क्रिया से क्रिया के और करिया से द्रव्य के विरोध के उदाहरण सर्वस्ककार ने सुटट से ही लिए हैं। इनमें से प्रथम में सनानीय विरोध है और द्वितीय में विभातीय विरोध 1 शोष के उदाइरण स्ट्रट से इस प्रकार लिए जा सकते हैं- द्रव्य से द्रव्य का विरोध :- अत्ेन्द्रनोलमित्तियु गुदास शैले सदा मुवेलाख्ये। अन्योन्यानमिभूते तजस्नमसी प्रदर्त्तेते॥' -'यहोँ सुवेल नामक गिरि पर जो इन्द्रनील मणि को मित्तियों से बनी गुफाऐँ है उनमें तेज और तम दोनों परस्पर से अभिभूत हुए बिना पैलते रहते हैं'। यहाँ तम और तेज दोनों पद द्रव्यवाचकु पद है, अनः यहाँ विरोध द्रव्यगन हुआ। गुग से गुग का विरोध- मे 'बरह्मन् ! परमसि विमलो वितताध्वरघूममटिनोऽपि'। 'हे महादेव ! तुम यश्तधूम से मलिन होवे हुए भी अत्यन्त निर्मल हो।' यहाँ मलिनत्व और निर्मलखव उगों का विरोध है। किया से किया के विरोध का उदाइरण रुद्रट ने भी 'जव्यति च सवापयति च'-इसी पदावली के पददारा दिया है। जानि से जाति के विरोध का उदादरण-
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विरोधालङ्कार: ४५९
'एकस्यामेव तनौ विर्मात्त युगपन्नरत्वसिहत्वे। मनुजत्ववराइत्वे तथव यो विसुरसौ जयति।' -- 'जो परमेश्वर एक ही शरीर में एक साथ नरत्व और सिहत् को धारण करता है, इसी प्रकार मनु्यत्व और वराइत्व को, वह प्रणम्य है।' यहाँ नरत्व जाति का पशुत् व्याप्य जाति सिहत्व और वराहृत्व के साथ विरोध है। विनातीय मेदों में- द्रव्यगुणविरोष- 'तेजस्विना गृदीतं मारदचमुपयाति पद्य लोहमपि'! -'तेजस्वी [अव्नि ] द्वारा गृद्दीत लोहा भी कोमळता को प्राप्त हो रहा है।' यहाँ लोह द्रव्य है कठिन किन्तु बतलाया जा रहा है कोमल।
'सा कोमलापि दलयति मम हृदयम्।' 'कोमल होते हुए भी वह सुन्दरी मेरा हृदय दल रह्दी है। जाति क्रिया विरोष- 'म्नासि येन नितरामवलापि वलन्मनो यूनाम्।' -सुन्दरि! तेरा चरित्र अद्भुत है। अवळा होते हुए भी तू सभी युवकों का चित्त वलाद मय रही है।' यहाँ अवलात्व जाति है। मन्थनकिया उसके विरुद्ध है। सभाव के चार उदाहरण इस. प्रकार है- दन्य-द्रव्य के अभाव का विरोध- 'अविवेकितया स्थानं जातं न जलं न च स्थलं तस्याः।' -'अविवेक के कारण न तो उसके लिए जल में ही नगह रह गई है और न स्थल में।' यहाँ बल और सथल द्रव्य हैं। सामान्यतः किसी को यदि जल में जगह न मिले तो स्थल में अवश्य ही मिल जानी चाहिए, इसी प्रकार यदि स्थल में अगह न मिले तो जल में मिळ जानी चाहिए। यहाँ दोनों में ही उसका अभाव वतलाया जा रहा है। गुण-गुण के अभाव का निरोध- 'न मृद्ु न कठिनमिद मे इतहृदयं पश्य मन्दपुण्यायाः। यद विरहानलतम न विलयमुपयाति न च दाडर्यन्।1 -'सुझ सभागिन का यह मृत हृदय न तो मृदु ही है और न कठिन ही। क्योंकि विरहानल में तप कर यह न तो विलय को ही माप्त होता और न तो दृढता को ही। यहाँ हृदय को भृदु न होने पर कठिन होना चाहिए, परन्तु उसमें दोनों का अभाव बतलाया गया है। क्रिया-क्रिया के अभाव का विरोष- 'नास्ते न याति हंसक पश्यन् गगनं धनवयामम्। चिरपरिचिंतां च नलिनी स्वयमुप भुक्तातिरिक्तरसाम्।!9 -'आाकाश को मेधों से नीळ तथा चिरपरिचित कमलिनी को स्वयं उपभुाशेष रस से युकत देखकर हंस न तो ठदरता ही है और न जाता ही।' यह ठीक 'न ययौ न तस्यौ' की अमिन्यक्ति का अनुकरण है। जाति-जाति के अभाव का विरोध- 'न सत्री न चायमखी जातः कुलपांसनो जनो यत्र। कथमिव तव पातालं न यातु कुलमनवलम्वितया।।'
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४६० अलह्कारसर्वस्वम्
-'जिसमें ऐेमा कुनकनं की पुरुष पैदा हो गया हो जो न तो स्त्रो हो हो और न अखी सो वद कुछ निसाषम्ब होकर रकषानल को प्राप्त कर्यों नहीं हो।यहाँ 'अस्ी' शुष्द में स्रीविरद्ध मखी और अस््र वाला इस प्रकार रनेप माना जा सकता है। जो न तो को दो और न गूर वह नपुसक अवदय दो कुल दुवाने वाला छोगा। इलेपमूचक विरोष का निर्वचन कुटूट ने इस पकार किया ह-
-'जदी पसग प्राप्त अर्थ दूसरा हो किन्तु विरेषण ऐमे हो जिनसे विपरेत अर्थ मी निकलता हो तो ऐमे वाक्यश्लेप को विरोध [रलेप] कहा जाता है। उदाहरण-
सकलारिदार-रसिकोऽप्यनभिमत पराइनामङ, -'दह सवर्पित कमल[सवर्थित किया ह कमल को जिसने वह तथा सव्धित किया है कमला थी को जिसने वह ] होते हुए मी अवदलिननालिक [अवदलित नष्ट किया है नालिक=कमल को जिसने तथा नालिक- मूर्स को जिसने ऐमा। था। इसी प्रकार सकलारिदाररसिक [सकन्= सभी अरि= रत्ुओं के दार=खियों का रसिक= रस लेने वाला, मरुल शमुओं का दार = दारण करने का रसिक] होने पर मी परखीसङ् से विमुख था।' यहाँ संवर्मितकमल तथा भरिदार रसिक शब्द प्रकरणविरुद्ध प्रथम अर्थ भी प्रस्तुत करते हैं। विरोपाभास- 'स इति विरोधामासो यरिमत्रर्थदयं पृथग्भूतम्। अन्यद् वाक्य गमयेदविरुद्ध सद् विरुद्धमिन।' १०२२॥ -'जहाँ एक सी वाक्य ऐसे दो मिन्न मिन्न अर्थो को अवगन कराए जो वस्तुतः अविरुद रह्दने पर भी विरुद्ध जैसे प्रतीत हो। यथा- 'तब दक्षिगोऽपि वामो बलमदोपि मलम्ब एप भुज"। दुर्योघनोञि राजन् युधिष्विरोडस्तीत्यहो चित्रम्॥' -सुम्दारा बादु दक्षिग होने पर मो वाम [दक्षिगेतर तवा सन्दर ] है, चढमद्र [बदराम, वल्र से सुन्दर] होने पर मी पवलम [प्रलम्वासुर, आजानुलम्वो] है। दुर्योघन [कौरवाधिम या धृतराष्ट्र का प्रथम पुत्र और जिमके माथ मुशन से लहा जा सके ऐसा ] होने पर मौ सुषिष्िर [ पाण्डुपुत्र धर्मराज तथा युद्ध में स्थिर ] है। यह आश्चर्य की बात है।' इम स्थल की अपेक्षा पूर्वोद्धृत स्थलों में अन्तर केवल इना है कि इस भेद में स्व्रय विशेभ्यपद रिलष्ट है और उनके दितीय विरुद्ध सर्थ भी निकलता है जब कि पूर्वोद्धून स्थचों में विशेषणाश में ही इलेप और विरोध है। यह भेद अर्फिचरकर है अत अमान्य है। सट्रट के इस विवेचन में उनना ही विस्तार है मितना पाचीन तोनों आचार्यी के विवेचन में संक्षेर था। परवर्ती आचार्यों में सुद्रट के विरोधसवन्धी विकौण तथ्यों का मंकनन और संक्षेप दिखाई देता है। मम्मट-सम्मयचार्य ने विरोध का दशवाँ भेद भी मान लिया है किन्दु अमाव तभा इलेष और आमास के आधार पर किए भेदों को अलग नहीं गिनाया है। मम्मट इनसब मेदों को व्रिरोध का हो अंग मानते है। मम्मट के अनुसार विरोध का लक्षण इम प्रकार है- 'विरोष सोडविरोधेपि विरुद्त्वेन यद् वच।'
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चिरोधालङ्कार: ४६१
-'विरोष वह जिसमें विरोप न रहने पर मी बात ऐसी कही जाय कि विरोष मभासित हो।' इसके भेद गिनाते हुए मम्मट ने लिखा- 'आतिश्वतुमिर्जात्यायैविरुद्धा स्याद् गुणसितिरिमिः । करिया दान्यामथ द्रव्यं द्न्येणैवेति ते दश।' -'नाति का विरोध जाति आदि चारों से होता है, गुण का गुण आादि तीन से, किया का करिया और द्रव्य दो से तथा द्रव्य का केवल द्रव्य से ही एस प्रकार विरोध के दस भेद होते है।' इस प्रकार मन्मट ने जाति का द्रव्य के साथ निरोध माना किन्तु रद्रट का खण्टन नहीं किया है। उन्होंने इसका उदाहरण यह दिया है- सुजति च जगदि-दमवति संहरति च हेलमैव यो नियतन्। अवसरवशतः झफरो जनार्दन: सोऽपि चित्रभिदन्॥ -- 'जो परमेश्वर, इस संसार को खेल-खल में बनाता, पालता और मिटाया करता है वह भी सवसर आाने पर मछली बना यह आश्रर्य की बात है।' यहाँ मगवान् विष्णु एक हैं अतः दम्यरूप हैं। मछली का वाचक शफर शब्द जातिवाचक है क्योंकि मछलियाँ अनेक होती है। विष्णु भगवान् में शफरत्व जाति का रहना स्थितिविरुद्ध है मतः यहाँ जातिद्रव्यविरोध है। सर्वस्वकार ने 'परिच्छेदातीतःa' तथा 'अयं वारामेक:' पद्य भी मम्मट के विरोधोदाइरणों में से ही लिए है। मम्मट ने भी इन पद्यों में क्रियाक्रियाविरोध तथा क्रियाहन्यविरोध माना है। उपर्चुंक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जहाँ रुद्रट के अभावमूलक विरोषों को मम्मट ने नहीं अपनाया वहाँ मन्मट द्वारा अपनाए दस भेदों को सर्वस्वकार ने आदर नहीं दिया। परवर्ती - श्ञोभाकर-शोमाकर मिन्र ने अलंकाररत्नाकर में जाति, तुण, करिया, धर्ममान, द्रव्य तथा अभाव इनमें पूर्व पूर्व के पदार्थों का बाद-वाद के पदार्थों के साथ विरोध मानकर जाति विरोध के छ, गुणविरोध के पाँच, क्रियाविरोध के चार, धर्मविरोष के तीन, द्रव्यविरोध के दो तभा अमाव- विरोष का एक भेद मान विरोध के भेद ग्यारह के स्थान पर इकीस माने हैं। प्रत्येक का उदाहरण उन्होंने भी उसी प्रकार नहीं दिया जिस प्रकार सवस्वकार ने। अभावविरोध के लिए जो 'तं नीक्ष्य०' उदाहरण विमर्शिनीकार ने दिया है वह उन्होंने रत्नाकर से ही लिया है। विरोध का दक्षण उन्होंने भी सर्वस्वकार के ही समान वामन से लिया है-'विरुद्धाभासत्वं विरोधः।' अष्पयदीक्षित-कुवलयाननदकार ने विरोधालंकार पर कोई विशेष विवेचन नहीं किया है। उन्होंने-चन्द्रालोक का ही- 'आमासत्वे विरोधस्य विरोधाभास इष्यते'। -'विरोध यदि आभासरूप हो तो विरोाभास माना जाता है-'यह लक्षण देकर- 'विनापि तन्ति द्वरिण वक्षोजी तव हवारिणौ'- े तुन्दरि ! तेरे उरोज बिना हार के भी हारी [ हार वाले, आकर्षक ] ह।-यह उदाहरण दे दिया है। पण्टितराज-पण्डितराज जगननाथ ने विरोध का लक्षण दो विकल्पों में पस्तुत किया है-
करणासम्बद्धत्वमान वा विरोध: । यद्वा- (२) 'रकाधिकर णासंबद्धत्वेन प्रसिद्धयो रेकाधिकरण -संवद्धत्वेन प्रतिपादनं सः ।'
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४६२
-'एक हो अधिकरण में सबन्धितरूप से प्रतिपादित अर्थो का एक अधिकरण में संबन्धित न होने का आभास सथवा एक अधिकरण में संबन्धिन न होने का मान विरोध कदलाना है। सथवा [ इसका उलटा] एक अ्धिकरण में सवन्धित न होने वाले रूप से प्रसिद्ध अर्थो का एक अधिकरण में सर्बन्धितरूप मे प्रतिपादन विरोध होना है। स्पष्ट ही रुट्रट की प्रथम विरोध-्परिभाष का यह नव्यन्यायमूलक विरादीकरण है। तब भी इसमें एककालत्व को छोड दिया गया है। पण्वित- राज ने 'आमास' का अर्थ किया है 'कुछ-कुछ भासित होने वाल'= 'सा = ईपड भासत इत्या- भास'। इन्दोंने इकीस भेदों को न मान दस भेदों को ही स्वोकार किया है। यद्यपि अभावमूलक मेदों का निरूपण भी कर दिया है। विशेषता यह दे कि पण्डितराज ने धर्ममान तथा अभाव को जात्यादि के मीतर ही अन्तर्भूत मान लिया है। उनका कहना है-'जात्यादिरिति धर्मेमार्नन विवक्षितम्, उपलक्षगपरत्वात, नेन 'य. बालकोडपि पुरागपुरुष. अगोदार कोऽपि नागोद्वारकः' इत्यादो सखण्डोपाधेरमावस्य च परिग्रद. ।' -'जात्यादि का अर्थ है धर्ममात्र। अनः जो 'वालक होते हुए भी पुराणपुरुष है, जो अगो- द्वारक [वृक्ष का उद्धारकर्ता ] होते हुए भी नागोसारक [वृक्ष का उद्धार न करने वाला, नाग= कुवलयापीद हायी का उद्ारक]है- इत्यादि स्थलों में उपलब्ध पुराणपुरुषत्व आदि खण्डोपाधि तथा अमाद का सग्रह भी हो जाता है।' पण्डितराज ने उक दस भेदों को भी सवस्वकार के ही समान महय माना है औौर कहा है- 'वस्तुतो जात्यादिभेदानामहययत्वान्युद्ृत्वश्लेयमूषत्वाम्यां द्विविधो शेय.।' -- 'सत्य यह है कि जात्यादि भेदों में कोई चमरकार नहीं दै अतः विरोष के शुद्ध और रिलष्ट इस प्रकार केवछ दो ही प्रकार का मानना चाहिए।' [ रसगगाघर विरोधप्रकरण ]। विश्वेश्वर-विश्वेश्वर ने मी मम्मट से ही मिलनी पदावली में- 'अविरोधेद्रपि विरोधो यत्रोक्त स्याद् विरोष सः। स्याज्जातेर्गुमकरमंद्रव्याणा स्वस्वपर योगाव।।' इस प्रकार विरोध का लक्षण तथा उसके दम ही भेद र्वीकार किए हैं। मजीविनीकार श्रीविद्याचक्रवर्त्ती ने विरोध के सवस्वकारऊत संपूर्ण विवेचन का सार समद इस प्रकार किया है- 'विरोधस्तु तदामासो जात्याचर्यसरमाथय.। तद्वेचित्र्याद दश्विधो विषयक्ये व्यवस्थितः।।' -विरोध कहलाता ह विरोध का आभास। यह जाति आदि पर निर्भर रदता है और इनकी विशेषता से दस पकार का होता है। यह वहीं होना है जहाँ विषयैक्य रहता है।' [सर्वस्व ] एवं विरोधमुकत्वा विरोधमूला अलंकारा. म्रदर्श्यन्ते। तधापि कार्य- कारणमावमूलत्वे विभावना तावदाह- [ सू० ४२] कारणामावे कार्यस्योत्पत्तिर्धिमावना। इद्द कारणान्वयव्यतिरेकानुविधानात् कार्यस्य कारणमन्तरेणासंमवः। अन्यथा विरोधो दुष्परिद्दर: स्यात्। यदि तु कयाचिद् मङ्तया तथाभाव
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विभावनालङ्कार: ४६३
उपनिवध्यते तदा विभावनाख्योऽलंकार:। विशिष्टतया कार्यस्य भावनात्। साच भहिर्विशिष्टकारणाभावे कार्योपनिबन्धः। अप्रस्तुतं कारणं वस्तुतोऽ स्तीति विरोधपरिहारः। कारणाभावेन चोपक्रान्तत्वाद बलवता कार्यमेव वाध्यमानत्वेन प्रतीयते, न तु तेन कारणाभाव इत्यन्योन्यवाधकत्वातु. प्राणिवाद् विरोधालंकारादू भेद:। एवं विशेषोक्तौ कार्याभावेन कारणसत्ताया पच वाध्यमानत्वमुन्नेथभ्। येन सापि विरोधाद् भिन्ना स्यात्। इद्द च लक्षणे यद्यप्यन्येः कारणपदस्थाने क्रियाग्रह्णं कृतं तथापीह कारणपदमेव विहितम् । नहि सर्वः क्रियाफलमेव कार्यमम्युपगम्यते। वैयाकरणैरेव तथाम्युपगमात्। अतो विशेषमनपेक्ष्य सामान्येन कारण- पदमेवेह निरदिष्टम। इस प्रकार विरोध का निर्वचन किया। अव चिरोधमूलक अलंकार वतलाए जा रहे हैं। उनमें भी कार्यकारणभावमूलक मलंकारों में प्रथमतः विभावना का निर्वचन करते हैं- [सू० ४२] कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति [चतलाई जाए तो अलंकार की संज्ञा] त्रिभावना [होती है ]। [वृ०] यहाँ कारण के होने न होने पर कार्य का होना न होना निर्भर रहता है इसलिए कारण के विना कार्य की निष्पत्ति संमव ही नहीं होती। ऐसा न हो तो विरोध का परिहार रना संमव न हो। इतने पर मी यदि किसी प्रकार वैसा [ कारण के िना कार्य की उत्पत्ति का] णैन किया नाता है तो वहाँ अलंकार विभावना नामक होता है, क्योंकि इसमें 'वि= विशिष्ट रूप से कार्य का भावन=उत्पादन यह व्युत्पत्ति लागू होती है। वह प्रकार है विशिष्ट [प्सिद्ध] कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति चतलाना। यहाँ थाने वाला विरोध 'अप्रस्तुत कारण वस्तुतः विद्यमान है' इस ज्ञान से हट जाता है। यहाँ कथन का आरम्म कारणाभाव के प्रतिपादन से होता है अतः वही बलवान् होता है, फलतः उसके द्वारा कार्य ही वाधित होता-सा प्रतीत होता है, न कि उस [कार्य] के द्वारा कारणाभाव [वाधित होता है], फलतः अन्योभ्यवाधकत्व पर निर्भर विरोध नामक अलंकार से [ इस अलंकार का] अन्तर हो जाता है। इसी प्रकार विशेपोक्ति में कार्याभाव के द्वारा कारणसन्दाव बाधित होता प्रतीत होता हुआ जानना चाहिए। फलतः वह भी विरोष से भिन्न सिद्ध होती है। यद्यपि यहाँ लक्षण में [भामह, वामन, उद्धद और मम्मट इन ] अन्य आचार्यो ने कारण- शब्द के स्थान पर किवाशब्द अपनाया है तथापि [ग्रन्थकार ने ] यहाँ कारणशब्द का ही विधान किया, क्योंकि ऐसा नहीं है कि कार्य को क्रिया का ही फन सभी [ दार्शनिक] मानते हों। वैसी मान्यता तो केवल वैयाकरणों की ही है। इस कारण विशिष्ट [केवल वैवाकरण को अभिमत पदावली ] को छोड़ यहाँ [विभावनालक्षण को] सामान्य [सर्वमान्य] पनाने के लिए कारण पद का उपयोग किया। विमर्शिनी तावदिति प्रथमम्। कारणा माचे कार्योस्पत्तेरत्यन्तं विरुद्धत्वासू। आद्देति। कारणाभाव इत्यादिना। तत्र तावत् कार्यस्य कारणपरतन्त्रर्ता दर्शयति-इहेत्यादिना। बदुक्तम्- 'यो हि थेन विना नारिति यस्मिश्व विधते क्रिया। तदेव कारणं तस्य नान्यत् कारणमुच्यते।।' इति।
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अन्यधेनि। यवि कारणं निनापि कार्यस्य संभय उपनिय्यत हर्यरय। ननु यधेवं तर्कर्थ कारणामाये कार्योरपसिरूपा विभावना भवतीतयावाड्याद-यदि स्वत्यादि। तयाभाव इनि कारणामाने कार्योपत्तिः। अत एूव कार्यस्य वितितम्। सेनि। यया भगया कारण विनापि कार्यसमय उपनियध्यत इत्वर्थ:1 विधिषेति प्रसिदुम।विरोध- परिदार इनि। अम्रसिदस्य वारणान्तराय प्रस्तुतरवात्। ननु यधेवं तस्कयमय विरोध पूव न मवती ्यादासथाइ-कारणेत्यादि। तैनैति कार्येण। यदुकम्- 'करणश्य निपेधेन वाध्यमान, फलोदयः।
असो दूरविभेदोअया विरोधेन व्यवस्थित ।'इति। एनदेव परसग्गाद-विशेषोक्तेरप्याह-एवमित्यादि। ए थकक विपतक्षायमपपाठा। तथा हि- 'हर नापि तनु वस्य' इर्यादी वलाहरणेन कार्यभावेन तनुहरणरूप कारणं न वाध्यते अपि न सत्यपि तनुदरणगये सामप्रये कथ न यछ हतमिनि कार्यामावरमैय याष्यर्वेन प्रमीति:। तस्मात् 'एव विशेषोसी कारणसत्तया कार्यामायस्यैय वाध्यमानत्वसुन्नेयम्' दवति पाठो ग्राह्यः। एनदेव राजानकनिलकनाप्युकक्म्-'कारगसामप्रमिद याधकरवेनैव प्रतीयते का- र्यानुष्पतिस्तु वाध्यरवेन' इनि। म्र्थकृस प्रायस्तन्मतानुवर्र्येव। तदुकतसमानन्यायोड- समाभि: पाठो सचितः । येनेति। पकस्यैय वाध्यदवेन प्रस्ीते.। ननु छ 'क्रियाया: प्रतिषेधे5पि यसकलस्य विभावनम्। नेया विभावना-' इसयादिनोद्टादिमिरेतक्लक्षणे व्याग्रहणं कृतमिति कर्थमिद् तदुकलद्वनेम कारणग्रहण कृतमिरपाशप्याह-हद्देत्यादि। सवैरिति बौद्धादिमि:। अन इति। वैयाररणैरेव क्रियाफलस्य कार्यस्याम्युपगमाव्। सामान्येनेति। सर्वचादिसाधारणतयेश्यर्थः। सर्ववादिसाघारणोडय ग्रन्थः। सावव प्रथमन। इसलिए कारण के अमाव में कार्य की उत्पत्ति अत्यन्न विरुद्ध होती है। आह-निर्वचन करते हैं, 'कारणामाव0' इत्यादि के द्वारा। यहीं पहले कार्य को कारण पर निर्मर वतमाने है-'इह०' हयादि के द्वारा। जैसा कि कहा है-'जो जिसके बिना [समव] नहीं होता तथा जिसमें किया रहनी है वही उस [कार्य] का कारण होता है। अन्य किसी को कारण नहीं कहा जाता। अन्यथा= अर्थात यदि कारण के बिना भी कार्य की निष्पत्ति बतलाई जाती है। यदि ऐमा है तो कारण के अमाव में कार्योतपत्तिरूपी विमावना कैसे मानी जाती है- ऐसी झका कर कहते है-यदि तु। तथाभाव := वैसा वर्गन अर्थात कारण के समाद में कार्य की उत्पत्ति का वर्णन। इसीलिए यहाँ कार्य विशिष्ट [असामान्य] हुआ। सा= जिस प्रकार से क्वारण के बिना भी कार्य की उत्पत्ति बतलाई जाती है। विशिष्ट = प्रसिद्ध। विरोधपरिद्वार क्योंकि वहाँ अन्य कोई अप्रसिद्ध कारण उपस्थित रहता है। यदि ऐसा है तो यह [बिभावना] विरोन ही क्यों नहीं मान की जानी इस शंका पर उत्तर देने है-कारण इत्यादि। तैन उससे=का्ये से। जैसा कहा है-'विभावना में कारणाभाव से कार्योतपत्ति का बाप प्रतीत होता है, जन कि विरोध में एक दूसरे से एक दूसरे का बाथ। इसलिए विरोध से इस [विभावना] का पर्यात भन्नर दै।' इमी ममंग में विशेयोक्ति से भी विरोप का भेद वनलाते हुप रिसते है-एवम इत्यादि के द्वारा। वस्तृत पकति का यह रूप किमी प्रतितिपिकार की कम्पना है, जो गलत है। क्योंकि [आगे दिए जाने थाले] 'इरतापि तनुम्' पघ में और ऐमे ही अन्य स्थलों में 'वछ के न हरे जाने-' रूद कार्योतप्ि से 'शरौर का दरा जाना' रूप कारण वाधित नहीं होता। प्रत्युत 'शरीर- #
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चिभावनालङ्कार: ४६५
हरणरूप कारण के रहने पर भी बल का हरण क्यों नहीं हुआ' इस मानसविकल्प के द्वारा कार्य का अभाव ही वाधित प्रतीत होता है। इसलिए यहाँ मूल पाठ यह मानना चाहिए- 'एवं विशेपोक्तौ०'= 'इसी प्रकार विशेपोकि में कारणसभ्गाव के द्वारा कार्याभाव वाधित होता समझा जाना चाहिए'। राजानक तिलक ने भी यही कहा है-'यहाँ कारणो की समम्रता वाघक रूप से ही प्रतीत होती है और कार्य की अनुत्पत्ति वाध्यरूप से । ग्रन्यकार प्राय्यः उनके मत का अनुसरग ही करते हैं। अतः इमने उनके [ इस उद्धृत] कथन से मिलता हुमा ही पाठ प्रस्तुत किया है। वेन = जिससे अर्थात् किसा एक के ही वाध्यरूप से प्रतीत होने के कारण। शंका-किया का अभाव रहने पर भी फल की जो विशिष्ट उत्पत्ति उसीको विभावना खानना चाहिए-इत्यादि कदकर उन्भट आदि ने इसके लक्षण में क्रियाशब्द अपनाया है। आपने उसका उल्लंघन कर कारणसब्द का ग्हण क्यों किया है ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं- 'इह'0- हत्यादि। सवः= बौद्ध आदि के द्वारा। अतः= वैयाकरणों ही ने कार्य को क्रिया का फल स्वीकार किया है। सामान्येन=सामान्यरूप से अर्थात सभी दार्शनिकों को अमिमतरूप से। [कारण शब्द दे देने से अव] यह अन्थ सर्वमान्य हो गया। [सर्वस्व्र ] यथा- 'असंभूतं मण्डनमसयप्टेरनालवाख्यं करणं मदस्य। कामस्य पुष्पव्यतिरिक्तमस्त्रं वाल्यात् परं साथ वयः प्रपेदे।' अन द्वितीये पादे मदस्य प्रसिद्धं यदासवाख्यं करणं तद्भावेऽपि
यादेकत्वमतिशयोकत्या। सा चास्यामव्यभिचारिणीति न तद्वाघेनास्या उत्थानम् , अपि तु तद्तुपाणितत्वेन । इयं व विशेपोक्तिव दुक्तानुक्तनिमिच्तभेदाद व्विविधैव। तत्रोक्तनिमित्तोदा हता। अनुक्तनिमित्ता यथा-
अनालक्तकताम्राभामोप्ठलेखां च विभ्रतीम् ॥।' अत्र सहजत्वं निसित्तं गम्यमानम्। असंभृत मण्डनमिति, कामस्य पुष्पव्यतिरिक्तमस्त्रमिति चात्र विवदन्त-इयमेव विभावनेति केवित्। संभरणस्य पुम्पाणां च मण्डनमस्त्रं प्रत्यकारणत्वादू वाङात्रमेतत्। एक- गुणहानी विशेपोकतिरित्यन्ये। रूपकमेवाधिरोपित वैशिष्ठ्यमिति त्वपरे। आरो- प्यमाणस्य प्रकते संभवात् परिणाम हत्यद्यतनाः । [(उक्निमित्ता) विभावना का उदाहरण ] यया- 'अब वह [ पार्वती ] अंगयष्टि का साजसज्जारहित अलंकरण, आासवनामरहित मद का कारण, क्राम का पुष्पभिन्न अस्त्र जो बाल्य के बाद का बय [योवनारम्भ] उसमें पहुँची। [ कुमारसं० १] यहाँ द्वितीय चरण में नशे का जो आसवनामफ प्रसिद्ध कारण है उसके अभाव में भी मद की योवन से उत्पन्ति बतलाई गई है। वस्तुतः [ आवसननित औौर यौवन- जनित] मद दो अलग-अलग प्रकार के है तथापि [एकशब्दवाच्यतामूलक] अतिशयोकि के ३0 अ० स०
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द्वारा अनेदाध्यवसाय होने से [यहाँ] दानों एक है। यद [अतिशयोकि ] यहाँ [विभावना में] नियमत रहेगी की अनः इस [विभावना ] की निम्पति उस [अतिशयोकि] के बाध से नहीं होती, अपितु उससे अनुप्राणित छोकर होती है। विशेषोकि के [ही] समान यह [बिभावना ] दो प्रकार की होती है उकनिमिता तथा अनुकनिमितता। इनमें से उक्तनिमित्ता का उदाइरण [ अ्वर्संमृतम् ] दिया जा चुका है। अनुक्त निमित्ा का उदाहरण यह है- 'अगलेखा [अगयष्टि] जो केशर रस के लेप के बिना हो पीत वर्ण की थी तथा ओछलेखा जो बिना आलकक के ताम्रवर्ण की थी, को धारण की हुर्ई [ पार्वती ]। -यहो अपने आप उत्पन्न दोना रूपी कारण [ शब्दत कषित नहीं है, अत. ] गम्य है।] 'सानसब्जारहित मण्डन' यह, भोर 'काम का पुष्पमिन्न अख' यह [जो अंश है] इस पर कुछ विचारक [हमारे] विरुद्ध मान्यना प्रस्तुत करते और कहते है '[वस्नुतः ] विभावना यही [अथवा यह विभावना ही ] है', [किन्तु सत्य यह है कि ] यह वकिमात्र है [चकिवेचित्र्यरूप अलकार नहीं], क्योंकि साजसन्जा और पुष्प क्रमन मण्डन और असत्र के प्रति कारण नहीं हैं। अन्य आाचाय [यामन भादि] यहाँ [वैचिव्य का अनुमत्र करते और] एक गुण की हानि से होने वाली विशेषोकि मानते है। दूसरे [उद्भयादि ] आचार्य वेश्िष्ट्य के आरोप से युक्त रूपक मानते हैं। यहा आरोप्यमाण [मण्डन, अष्त्र ] प्रकृत [वय] में समव है अत आधुनिक विचारक यशां परिणाम स्वीकार करते हैं। चिमर्शिनी द्वितीय इति। अन्यपादयोनं विभावनेश्यर्थः। यौवनहेनुकत्वेनेति। समाधानायापसिदं कारणमाधित्पेश्यय:। अन्यया हि विरोधपरिद्वारो न स्याद्। ननु चासव ननितोऽन्य एव मदो यौवन हेतुकक्षान्य पवेत्यत्र यौवनहेतु एवं विवषित इति कर्थ कारणामावे
अव्यमिचारिणीति। अतिशयोकि विनास्या अनुत्यानाय। अत पवेयमतिशयोकयनुपनाणि तैव भवतीति सिद्धम। तदेवाह-तदनुप्राणितववेनेति। यदुकमन्यन्रापि-'आश्िष्टाति पायोक्तिक्व सर्वचेव विभावना हति। 'निरुपादानसंभारममित्तावेव तन्वते। जग चिरय्र नमस्तरमे ककारवाध्याप शूिने।।' हायत्र तु जगत उपादानादिविरहेणैव भगवर्कार्यस्य वास्तवर्वाद् विभावनैव नास्नीति कस्यातिशयोवश्यनुप्राशितश्व स्यास्। पूवम्- 'ण अ रुवं ण क्ष शदी णावि कुछं ण अ सुणा ण विण्णाणं। पमे भ तह वि करस विको विअ्रणो बहदो छोइ।' इस्यादावपि जेयम। अतश्र कचिच्दुद्धस्यापि संभवात् सवध्रास्यातिश योकमनु- प्राणितर्वमिति न वाध्यमिति यदुक तद्युक्तम्। विशेषोकिवदिति। विशेषोकौ माच्यैयंथो- कमित्यर्थ:ः। अग्न चाघ उदाहरणे द्विवीयपाद एव विभावना व्यासयेया न पुनरन्वैपथोफ्तमि रयाह-असंभृतमित्यादि। केचिदिति विवदन्त इति संबन्ध:। अकारणवादिति। संभरणदि हिमण्डनादे: स्वरूपम् । यघेवं तसग्रान्य: कोऽलंकार इर्पाशक्रयाह-एकेत्यादिना।
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विभावनालङ्वास: ४६७
अन्य इति वामनीया:। अपर इस्यौनटाः। तृतीयस्तु पक्षो न ग्राह्यः' लेखकपरिकिपत वाद्। तथाह्यारोप्यमाणस्य प्रकृते संभव इति न परिणामलहणम्। आरोष्यमाणस्य प्रकृत उपयोग इति तस्य लक्षितावास। संभवोषयोगयोश्च नैक्वस्। भिस्वतवाद। ग्रन्थ कतापि साहित्यमीमांसायामेतच्छलोकविवृतौ पपद्वयमेशोककमू। लैसकेश्ास्य ग्रन्थस्य प्रतिपद्मेव विपर्यासः कृतः। तथा चात्रैवासंसृतमित्यादिको ग्रन्थस्तदनुपाणितत्वेनेश्य स्य पश्चाह्गुपपन्नोऽपि गभ्यमानमित्यस्य पश्राहनिखितः। एतच्च न तथा दूपणमित्यस्मा भिर्यथास्थित एव अन्थो व्याख्यातः । द्वितीय - द्वितीय चरण करने का अर्थ यह है कि अन्य दो [ प्रथम तथा तृतीय ] चरणों में विभावना नहीं है। 'योवनहेतुकत्वेन' 'यौवन से जनित अर्थाव समाधान के लिए मपसिद्ध कारण को अपना कर। अन्यया विरोध का परिहार न होता। [शंका] आसवजनित मद अन्य दी है और यौवनजनित अन्य ही, यहां यौवनजनित सद ही विवक्षित है तद कारण विद्यमान ही है उस] के अभाव में कार्य को उत्पत्ति कैसे वतलाई जा रही है' ऐसी शंका कर वत्तर देते है-मदस्य। द्वैविध्य=क्षीवता [नश्ञा] रूप और दर्प रूप। सा= वह= अविशयोकि। अध्यभिचारिणी = अतिशयोकि के बिना इस [विमावना] की निष्पत्ति नहीं होती इसलिए सिद्ध यह हुआ कि यह [ विभावना] अतिशयोक्ति से सदा ही अनुप्राणित रदती है। इसी को कहते हैं-तदनुप्राणितर्वेन। जैसा कि अन्यत्र भी कहा गया है-'विभावना सदा श्तिशयोकि का आर्लिंगन किए रहती है।' 'विना उपादान सामय्री के और बिना मित्ति के नगत रूपी चित्र बनाने वाले वतः श्लाव्य कला वाले भगवान् शंकर को नमस्कार है। -यहां तो जगत् उपादान के विना ही वास्तनिकरूप से भगवान् का कार्य सिद्ध होता है अतः यहां [ अलंकार रत्नाकरकार द्वारा स्वीकार की गई] विभावना ही नहीं है फलतः सति शयोकि से अनुपाणित किसे माना जाय। इसी प्रकार- र्ाकरकार द्वारा विभावना के लिए उद्धृत ]- 'न च रूपं न ऋद्धिर्नापि कुलं न च गुणा न विज्वानम्। एवमेव तथापि कस्यापि कोपि जनो वल्लभो मवति॥' -'न तो रूप ही रहता, न ऋद्धि [धन] न कुल, न छुण औौर शिल्प [विज्ञान ] ही। तथापि, ऐसे ही किसी के लिए कोई जन प्रिय होता है।'-इस और ऐसे ही अन्य स्थलों में भी जानना चाहिए। [प्ीतति जिस प्रकार सहेतुक होती है उसी प्रकार अहेतुक प्रीति भी होती है, अतः यहाँ वस्तुकयनमात्र है अलंकार नहीं] और इसीलिए [ अलंकारररनाकरकार ने 'निरुपादान' पद्य में अतिशयोक्तिरहित शुद्ध विभावना मानकर सर्वस्वकार की 'विभावना सदैव अतिशयोक्ति से अनुपराणित रहती है'-इस मान्यता का निराकरण करते हुए जो-] 'कही शुद्ध [अतिरायोतिरहित ] विभावना मी संभव है अतः यह सर्वत्र अतिशयोक्ति से अनुपाणित रहती है ऐसा नहीं कहना चाहिए'-यह कहा है [ अवंकाररत्नाकर पृ० ९४] वह ठीक नहीं है। वह 'विशेपोकिवत'= विशेषोकि के समान-अर्थाद प्राचीन आाचार्यी ने सो भेद केवल विशेषोक्ति में बतलाए हैं, वे इस विभावना में मी सभव हैं। यहाँ जो पहला [ असंमृत्रभू०] वदाहरण है उसमें विमावना केवल दूसरे ही चरग में है ऐसी व्याख्या करनी चाहिए न कि अन्य लोगों ने (?) जैसा कहा है। यही कहने के लिए लिखते हैं-असंभृतं रत्यादि०। 'केचित्'= इसका संबन्ध 'विवदन्ते' से है। अकारणत्वात्= कारण न होने से-अर्थाव संमरण= साजसज्जा आदि तो मण्डन स्वरूप हो हैं, उनसे मिन्न नहीं, जो कारण
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है। 'यदि ऐसा है सो यहाँ दूसरा कौन अरकार है'-ऐसी कका उठाकर दिखने हैं-पुकo इत्यादि। अन्ये=अन्य अर्याव वामनानुयायी। अपरे=दूसरे अर्थात उद्भटानुयायी। तृतीय [परिणामपक्ष ] अग्राम्म है क्योंकि वह प्रतिलिपिकार द्वारा जोडा गया है। इसलिए कि परिणाम का 'आारोप्यमाण का प्रकृत में समव'-यह लक्षण नहीं है। इसका लक्षण तो मन्यकार ने 'मारोष्यमाण का प्रकृत में उपयोग' ऐमा दिया है। समव और उपयोग दोनों मक नहीं हो सकते। वे मिन्न हैं। मन्थकार ने साहित्यमीमासा में जहां इस पध की व्यास्या की है वहाँ [विशेषोक्ति और रूपक के ] दो ही पक्ष प्रस्तृत कि हैं[ परिणाम पक्ष नहीं]। यह तो स्पष्ट है कि लिविकारों ने इस ग्रन्थ में पदे पदे टल्ट फेर किए है। यहीं 'अरुभृनम्' इत्यादि [अर्थात 'असभृतम्-अघ्यतनाः' इस अन्तिम ] ग्रन्याश को रखना उचित था 'तदनुमाणिनत्वेन' के पश्चात्, किन्तु उमे रखा है 'गम्यमानम्' इसके पश्चात्। यह उतना सदोष नहीं था, इस कारण इमने ग्रन्थ स्थिति को सधारे बिना दो व्याख्या कर दी है। [विमशनीकार का सुझाव ठीक है। दक्षिमी पोषियों में ऐसा पाठ मिलता भी है]। विमर्श-सवश्वकार ने 'अरुभृतं०' पद्म में विभावना इमलिए मानी कि उद्ट ने 'अगरे सा' पूध में विभावना मानी थी। उद्भट के तस दुमारसभव के इस पद पर कालिदाम के कुमार समन के सपर्युक्त 'अरुमृतम्' पद की स्पष्ट हो छाया है। समानभाव वाला होने से सनरवकार ने 'अगटेसा' पघ को ोड 'अर्मृत' पथ्य को अपनाया यदपि उन्हें इस पद् में अरुचि मी है। वस्तुत. उनकी अरुचि निमल है। उनका कहना है कि इस पद् में केवल द्वितीय चरण में दी विभावना है। प्रथम तथा तृतीय चरण में नहीं। इसका कारण उन्होने यह माना है कि पथा/ तथा तृतीय चरणों में जिसके अमाव में जिसकी उत्पत्ति बनलाई गई है उनमें परस्पर में काय कारणभाव नहीं है। अर्थात् प्रथम चरण में जो ममरण और मण्टन है वे एक दूसरे के कारण नहीं हैं। वे परत्पर में अमिन्न हैं अर्थाव जो सभरण है वही मण्डन ह तथा जो मण्डन वड़ी संभरण। इसी प्रकार पुष्प भी काम के वाणों के कारण नहीं खय वाण दी है। वरतुत संमरण का अर्थं सर्वस्ककार ने ठीक नहीं समझा। वे उसे क्रिया रूप या क्रियाफल समझ गए। कवि की विकक्षा उससे मिन्न है। वह कहना चाहता है कि योवन के आते ही बिना अलंकरण सामग्री के शरीसयष्टि का रोम रोम अवंकृत हो गया। अस्भृत शब्द का अर्थ 'समरण या सामभी के बिना' है। कालिदास के ही इस पथ से यह तथ्य स्पष्ट है- 'मथ मधु वनितारना नेवनिर्वेशयनीय मनमिजतरु पुन्व रागबन्धप्रवालम्। शकृतक विधिसर्वाद्गीणमाकव्पकजात विर्लरसनपदमाध् योवन स प्रपेदे ।' [रघु० १८।५२] सग्निवर्ण यौवन में पहुँचा। थौवन कया था, चनिताओं के द्वारा आसों से पिया जाने वाला मधु था, कामवृक्ष का रागबन्धरूपी प्रवाल से मण्डित पुष्प था, बिना बनावट के अग अंग का अंकरण या और विलास का घर था।' यहाँ 'अकृतकविधि' शम्द से निकल्ते कृतकशब्द द्वारा कृत्रिमता और कृषिमता द्वारा मण्डन के ऊपरी साजसज्जा से बनाए जाने का तथ्य स्पष्ट है। स्त्री और पुरुष के मण्डन में जिन जिन वस्तुयों की आवश्यवमा होती थी काविदास ने उनका भी उक्लेख राज्याभिषेक के पूर्व हुए अतिषि के अल्करण में [रखु० १८२२-२५], तथा शिव और पावती के विवाह के प्रकरण [कुमारस ७]में एक एक करके कर दिया है। 'समार शब्द का प्रयोग भी वे सामग्री के लिए मरते है। रघुवंश में भगवान् राम के यत् का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं- मवदृते मस. । आासन् यम्र क्रियानित्ा राश्सा एव रक्षिण । १५/६२।।
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विभावनालङ्गास: ४६९
'यश् आरम्म हुआ, जिसमें संमार विधिसे अधिक था और जिसमें यक्षप्वंसक राक्षस ही रक्षक ये' इस पद्य में विधि से अधिक संभार का अर्थ यह है कि यञ विधान में जितनी सामग्री अपेक्षित थी उससे मी अधिक साममी वहाँ थी। कालिदास श्रद्धा और विषि के साथ वित्त भी यज्ञ के लिए अपेक्षित मानते हैं- 'श्रद्धा विचं विधिश्चेति तरिवयं तत् समागतम्' -- [ शाकुन्तल ७] 'शकुन्तला, सर्वदमन तथा दुष्यन्त तीनों का मिलन एक प्रकार से श्रद्ा वित्त और विधि का मिलन है।' इस प्रकार 'असंभृतम् का अर्थ साममी रदित करना ही ठीक है। सामग्री और मण्डन में कार्यकारणभाव सिद्ध ही है। फलतः प्रथम चरण में भी विभावना मानी जा सकती है। तृतीय चरण में मो विभावना मानी जा सकती हैं क्योंकि काम के बाण के प्रत्ति पुष्प कारण रूप से पसिद्ध है। कालिदास स्वयं लिखते हैं- 'समःप्रवालोद्गमचारुपत्रे नीते समार्सति नवचूतवाणे। निवेशयामास मधुर्दविरेफान् नामाक्षराणीव मनोभवस्य।' [कु० ३।२७] - नवीन भाम्रपुष्प रूपी वाण तत्काल निकली कोंपलों के लाल लाल पत्तों से युक्त होकर जब पूरा बन चुका तब वसन्त ने उसपर मानों मौरों को कामदेव के नामाक्षर के रूप में जड़ा स्पछ्ट है कि पुष्प मृत्तिकास्थानीय है और वाण घटस्थानीय। दूसरे शब्दों में वृक्ष मानो बाँस है, पुष्प वाँस की पतली शाखा अथवा कटी और हँटी डण्डी। वाण नहीं। वाण वह तब बनती है जब उसमें पीछे पंस लग जाएँ। पंख है पत्ते। रति विलाप कर ते हुए वसन्त के लिए एक विशेषण प्रयुक्त करती है-'कुमृमाचोजितकार्मुकु:'- 'इ्व नु से हृदयंगमः सखा कुसुमायोजितकारमुको मधुः । [ कु० ४२४ ] 'तुम्हारा प्रिय मित्र वसन्त कहा है जो पुष्पों से तुम्हारा धतुष बनाया करता था।' इससे स्पष्ट है कि एक पुष्प न तो वाण हो बनता और न चाप ही। वाण और चाप की योजना सुष्पों को गूँथ गूँथ कर की जा सकती है। इसीसिए उपर्युक्त पद्य में आग्रमञ्ञरो को वाण कहा है। मजरी विशिष्ट आकार के पुष्प समुदाय का ही नाम होता है। संस्कृत के अन्य कवियों में भी यह अभि- आथ पर्यास मात्रा में मिलता है। इस प्रकार 'काम का वाण और 'पुष्प' इनमें मी कार्य कारणभाव सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार सर्वस्वकार का यह कथन कत्रिसभत नहीं कि पुष्प और बाण में कार्य कारणमाव नहीं है। हाँ वे इतना कह सकते थे कि तृतीय चरण में प्रसिद्ध कारण का अभाव प्रतिपादित नहीं है, अपितु अप्रसिद्ध कारण का प्रतिपादन विवक्षित है-'पुष्प न्यतिरिक्त वाण कहने का यही अभिप्राय हो सकता है। इस कारण यहाँ विभावना के एक संश कारणभाव का अमाव है फलतः विभावना संमव नहीं। हो तो वह व्यग्यमात्र हो सकती है, क्योंकि पुष्पव्यतिरित्त कहने से पुष्प के सभाव में भी वाणनिष्पत्ति को गूँज सुनाई देती है। इस प्रकार प्रथम चरग में तो विभावना निश्चित रूप से विद्यमान है हो सृतीय चरण में विभावना मले ही सिद्ध न हो सर्वस्वकार द्वारा उसके अमाव के लिए दिया हेतु सगत सिद्ध नहीं होता। पण्दितराज जगनाथ ने मी असंभृतन्-'पद्य पर सवस्वकार के उद्वृत तर्कों का खण्डन किया है। उनका कहना है कि -'यहाँ यौन में दो तत्व प्रतिपादित किए जा रहे हैं एक तो आसद- मिन्नता और दूसरा मदकारणता। इनके प्रतिपादन से विभावना की निष्पत्ति संभव नहीं। वह तब संमव होती जब मद रूपी कार्य की निष्पत्ति बतलाई जाती और बतलाया जाता आसब का अमाव, साथ ही अन्य किसी कारण का अस्तित्व न वतलाया जाता। यहाँ तो चौवन रूपी
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कारण का अस्तित्व ही बतलाया या रहा है मस. विभावना के लिए अपेक्षित कारणमाव रूपी एक अंग यह नहीं है। यौवन मी भासव के ही समान मद का कारण है। [ द्र० रसगगाधर ५८४ पृ०] अन्ततोगत्वा पण्डितराज ने यहाँ प्रथम और तृतीय चरण में न्यूनामेद रूपक मानने की संभावना व्यक की हे और द्वितीयचरण में प्रतीयमान उत्पेक्षा। वस्तुत इस पद्य में 'असंभून मण्टनम्' इस प्रथम चरण में दी हमारे द्वारा प्रतिपादित अर्थ के अनुसार शुद्धतम विमावना संमव है। शेष चरण विवादारपद है। विभावना का इतिहास- मामर, दण्डी, वामन, सद्रट, रुद्रट, मम्मट और सवस्वकार के विभावनाविवेचनों से विदित होता है कि विभावना का मूछभूत तस्व कारण के अभाव में कार्योसत्ति का वर्गन है। यह व्ण्न अनैक प्रकार से किया नाता है अत उकत आचार्यों में से रुद्ट तथा दण्डी ने विभा- वना के पकाधिक प्रवार बनलाने का प्रयत्न किया है। उपर्युक्त आचार्यों का कालकम पूर्व प्रदध भलंकारों के इतिहास में स्पष्ट है अत यहाँ इनके विभावना लक्षण उपजीव्यउपजीवक माव के भवार पर दिय जाते हैं- भामह-तथा 'क्रियाया" पतिपेधे या तत्फलस्य विभावना। व्ेया।विभावनैवासौ समाधी सुलमे सति॥ -'[कारणभूत ] क्रिया के समाव में उसके फल की विमावना [असमव सी उत्पत्ति] हो विभावना [नामक अलकार ] चहलाती है करिन्तु यदि समाधान सुर्म दो। उदाहरण- मामह = 'अपीतमश्ता शिखिन'= पक्षी विना मधुपानके मच थे।' उन्नट= सवस्वकार द्वारा उदाहव 'अगरेखाम०' पद। वामन-[सूत्र ] क्रियाप्त्िपैधे प्रसिद्धतत्फलव्यक्िविभावना।।' [वृत्ति] क्रियायाः प्रतिपेधे तस्या एव कियाया फलरय प्रसिद्धस्य व्यक्तिविमावना । -क्रिया की निषेधोक्ति के साथ साथ उसके फल के [प्रसिद्ध =सिद्ध = ] निग्पन्न होने की [ व्यक्ति] उक्ति विभावना कहलाती है। उदाहरण = अक्षालित विशयुद्ध हृदय। स्पष्ट है कि भामह के लक्षण की पदावली में वामन ने अपनी मोर से नेदल दो नए रब्द जोड दिए है एक प्रसिद्ध औौर दूसरा व्यक्ति। ये दोनो शब्द व्याख्यासापेक्ष है। सस्कृत में प्रसिद्ध शब्द का प्रयोग सिद्ध अर्थ में भी होता है [द इमारा लेख-'कालिदास के तम्द'-नागरी प्रचारिणी पत्रिका २०१९] य्यक्ति का अर्य नीचे दिए मम्मट के लक्षण तथा उसकी वृत्ति के अनुसार प्रकाशन है अत एव इमने इसे 'उक्ति' शब्द से अनुदित किया है। मम्मट का लक्षण नामन के लक्षण का अधिक विशाद और सारसक्षेप ह- मम्मट= [सृ० ] 'क्रियाया प्रतिषेधेत्रि फलव्यत्तिविभावना'। [ वृत्ति]'हेतुरूपक्रियाया निषेषेदि तत्फल प्रकाशन विभावना। -हेतुरूप करियाया का समाव [अमादोकि] रहने पर भी उसके फल की उत्पत्ति [उत्पत्ति कथन विभावना कहलाती है।' वदाहरण= 'वह वियोगिनी अमरपक्ति द्वारा न काटने पर भी लोटनपोट हो रहौ घी' [ मटिकुलेरदषापि परिवर्सते रम सा]
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इस प्रकार उक चार आचार्यों में विभावना का स्वरूप प्रायः एक ही पदावली में स्पष्ट किया हुआ मिलता है। इनके उदाहरणों में मी अभिव्यत्ति की एकरूपता मिलती है। सब में विभावना के दोनों अंग स्पष्ट है (१) कारण का सभाव और (२) कार्य की उत्पत्ति। दण्डी और रुद्रट ने इन अभिन्यक्तियों में विभावना का समर्थन किया किन्तु इन्होंने अन्य अमिव्यत्तियों पर भी विचार किया। इनके विवेचन इस प्रकार हैं :- दण्डो= [ १] 'प्रसिद्धहेतुव्यावृत्त्या यर्त्किचिव कारणान्तरम्। [२] यब स्वाभावाविकत्वं वा विमाव्यं सा विभावना ॥। -प्रसिद्ध हेतु को अलग का जहां कोई अन्य हेतु अथवा स्वामाविकता प्रकाशित की जाए उसे विभावना कहते हैं।' उदाइरण- १= 'अपीतक्षीवकादम्वं जगत' = शरत्काल में संसार कुछ ऐसा था जिसमें कादम्व [नीळे हंस ] दिना मदपान के मत्त थे। २ = 'अकारणरिपुश्चन्द्रः'= चन्द्रमा विना कारण के शत्रु है। इनमें से प्रथम में मत्तता का पसिद्ध हेतु मद्यपान हटाकर सन्य द्ेतु मद्यपानामान बतलाया गया है। द्वितीय में चन्द्र को अकारण अर्थाव स्वमावतः रिपु बतलाया गया है। अतः काव्यादर्शकार दण्डी के अनुसार दोनों स्थलों में क्मशः पूर्वोक्त दोनों विभावनाएं हैं। वस्तुतः मघपान का सभाव जन्य कोई कारण नहीं, अपितु प्रसिद्ध कारण मघपान का अभावही है। इसका ठीक वदादरण उपरि उद्धृत 'मरूंमृत' इत्यादि पूर्ण पद्य है। उसमें यौवनरूमी नवीन कारण प्रस्तुत किया गया है। रुद्रट द्वारा आगे जो तीसरी विभावना बतलाई जाने वाली है उसका उदाहरण 'मदहेतुर- नासवो लक्ष्मी:' मी इसके लिए उपयुक्त उदावरण कहा जा सकता है। भामह और दण्डी दोनों के उदादरणों में समानार्थकता विचारणीय है। द्वितीय विभावना में एक सूक्ष्म अन्तर है। यह कि विमावना में प्रायः कारण विशेष का उल्लेख कर ससका अभाव वतलाया जाता है। उपर्युक्त सभी उदाहरणों में मयपान, क्षालन, केसर तथा भ्रमरदंश ऐसे ही कारण हैं जिनका अमाव वतलाकर उनके कार्य का सव्जाव वतलाया गया है। 'अकारणरिपुश्चन्द्रः' में ऐसे किसी विशेष कारण का अभाव नहीं बतलाया गया। इस कारण इस उतत में उसका आक्षेप द्वारा जान होता है। ज्ञान होता है कि 'चन्द्रमा का वैसा कोई अहित वियोगो ने नहीं किया जैसा कि राहु आदि के द्वारा किया जाता है, अधापि चन्द्रमा उन बेचारों का बैरी बना हुआ है। इस प्रकार यहां बिभावना वन तो जाती है परन्तु वह अस्पष्ट या व्यकग्य रहती है। रद्रट= सुद्रट ने कारण के अभाव के कार्य की उत्पत्ति के साथ साथ दो अन्य प्रकारों से भी विभादना कानी है विन्दु दनके ये दोनों प्रवार प्रथम 3 कार में ही कन्तर्भृत हो जाते हैं तीनों प्रकार क्रमशः इस प्रकार हैं- १ = 'ेयं विभावनाख्या यस्यासुपल्यमानमभिषेयम्। अभिधीयते यतः स्याद तत्कारणमन्तरेणैव ।।' -'जहां कोई पदार्थ बिना उसके कारण के आप होता हुआ बतलाया जा रहा हो उसे विभावना कहते हैं।' उदादरण = 'शंवो दिश्यादू दिनकदतैळपूरो जगदीप:।'-'वह सूर्य आपका कल्याण करे जो बिना तैल भरे पूरे जगव में उजाला करने वाला दीपक है।' २ = यस्यां यथा विकारस्तत्कारणमन्तरेणैव सुव्यस्त । प्रभवति वस्तु विशेषे विमावना सेयमन्या तु।'
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-जहों कोई विकार अपने कारण के बिना ही किसी वस्तु में व्यक्त दिखलाया जाय तो वह एक अन्य विभावना होती है। यया- 'जाता ते ससि सामतमअमपरिमन्वरा गति: किमियम्। कसमादमवदकरमावियममधुमदालसा दृष्टि ॥' -हे सखि। तेरी यह गति बिना श्रम के मन्थर क्यों हो गई है और यह दृष्टि मघुमद के बिना अकम्मान् ही अलसाई क्यों हो गई।' ३- 'यस्य यथात्व लोके प्रसिद्धमर्थस्य विघ्यने तरमाव। अन्यस्यापि तवातत्र यस्यामुच्येत सान्येयम्।।' कोई विशेषता किसी पक वस्तु में ही प्रसिद्ध हो किन्तु यदि उसे अन्य वस्तु में मी बनला दिया घाए तो वह मी एक प्रकार की विभावना होती है। यथा-'मरदेतुरनासवो लक्ष्मीः- लक्षमी आसव नहीं है और मद का हेतु है।' यहा मदजनकनारूपी गुग है तो प्रसिद्ध कवल आसन में, किन्तु बनलाया जा रहा है वह लक्षमी में मी।' वस्तुत यही वह उदाहरण है जिसके लिए दण्डी का प्रथम लक्षण उपयुक्त ठदर सकता है। उक्त अध्ययन से स्पष्ट है कि पूर्ववर्ती किसी भी आचार्य ने विमावना में उत्तहेतुत्व और अनुकहेतुत्व की कस्पना नहीं की। इमका श्रेय प्रथमत सर्वस्वकार को दी प्राप्त है। यदयषि यह भी स्पष्ट है कि प्राचीनों के उदाहरणों में ये दोनों वर्ग बनाए जा सकते हैं। 'अपीतक्षीवता' आदि में अनुक्तनिमिचता और 'लक्ष्मी अनासव्र मदहेतु है' में उक्तनिमितना अप्रयासलब्य है। उक्त अध्ययन से यह मी स्पछ् है कि विभावना निर्वचन में स्वोकार मामह की परम्परा के अनुयायी है। दण्डी और रुद्रट के नवीन विकस्ों में वे भी मौलिकना नहीं पाते। परवर्त्ती आचार्यों में- चोभाकर-'हेत्वमावे फलोत्पत्तिविभावना'- देतु के अमाव में फल की उत्पत्ति विभावना' इस प्रकार सर्वस्वकार का अनुमरण हो करते हैं। वे क्रियाशब्द को छोड सवस्वकार द्वारा सुझाए कारण शब्द को दी लक्षण में स्थान देते हैं। इसी प्रकार निषेध और व्यक्ति शब्द की उलझञन से बचने के लिए अलकारसवंस्वकार ने जो अमाव तथा उत्पत्ति शष्द दिए ये रत्नाकरकार उन्दें भी भपना लेते हैं। इतना अवश्य है कि पाचीन आचार्यों के समान वे प्रसिद्धि और अप्रसिद्धि को भी लक्षण में स्थान देते हैं। जहाँ सवंस्वकार कारण में प्रस्तुतत्व और अपस्तुतत्व का निवेश करते हैं वहाँ रत्नाकरकार प्रसिद्धि मर भम्सिद्धि का निवेश करते हुम लिखते है- 'प्रसिद्धस्य देतोरभावे फकोत्पततिविभावना। वरतुतरित्वहाप्रसिद्ध कारणमस्त्येत्र, अन्यथा विरोधो दुष्परिह्दर पव स्यात्।' -प्रसिद्ध हेतु के ममाव में फल की उत्पत्ति विभावना कहलाती है। यहाँ, सच यह है कि, अगसिद्ध कारण रहजा ही है, नहीं तो विरोय का परिदार ही नहीं दो यादगा। रत्नाकरकार का स्वस्वकार से जिनने अश में विरोध है उसे विमर्सिनीकार प्रस्तुन कर चुके है। अप्पयदीदितने विभावना के छ प्रकार बनलाए हैं- १-कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति, उदाहरण= 'अपातक्षीव०'। २-असमग्र हेतु से कार्योसत्ि=उदा० काम अतोक्ष्ण वागों से जगन को जीत लेता है। ३-प्रतिबन्धक के रहने पर भी कार्य की उत्पत्ति=उदा०-आपका अमिमर्ष नरेन्द्रों [ राजा तथा विषवधों] को ही डसता है। सर्पदंश में विषवेध प्रतिबन्धक-साधक होता है।
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४-अन्य के कार्य की उत्पत्ति अन्य से यया- यह 'शद् से बीणानाद दो रहा है' यहां गा रही सुन्दरी के कण्ठ के लिए शह तथा उसके गान के लिए वीणा निनाद का प्रयोग है। ५ -- विरद्ध वस्तु से विरुद्ध वस्तु के कार्य की निम्पत्ति यथा-'उसे शीतांशु की किरणें तपा रही हैं।' ६्-कार्य से कारण का जन्म =यथा- तुन्हारे कर कल्पतरु से बशरूपी पयोराशि उत्पन्न हुमा।' सामान्यतः कत्पवृक्ष हो उत्पन्न होता है समुद्र से। इनमें से वस्तुतः प्रथम भेद को छोड़ शेप पांचों में विरोधालंकार के भेद हैं। पण्डितराज ने भी इसका प्रतिपद खण्डन किया है। पण्हितराज जगन्नाथ-'कारणव्यतिरेकसामानाधिकरण्येन ,प्रतिपाद्माना कार्योत्पत्ति: विमावना'- 'कारण के अभाव के साथ-साथ कार्य को उत्पत्ति का वतलाना विभावना'। पण्डितराज ने अपने इस लक्षण के लिए प्रमाणरप से मम्मट का लक्षग प्रस्तुत किया है-'तदुकम्'कियाया प्रतिपेधेरि फलव्यत्तिरनिभावना' इति। मम्मट को प्रामाणिक मानते हुए भी करिया और कारण के विकरप में पण्डितराज ने सर्वस्वकार को ही अधिक आादर दिया है। 'निरुपादान' पद में पण्डितराज ने रत्नाकरकार का ही समर्यन किया है। उन्होंने कहा है कि मले हो संसार के मति असेले भगनान् की ही कारणता संभव हो किन्तु संतार रूपी चित्र को प्रति तो भगवान् अकेले कारण नहीं हो सकते। उसके लिए तो मणि आदि की आवश्यकता है हो। नगनान् में तो कोई वर्ण या रंग है नहीं। इस कारण इस पद्य में विभावना सिद्ध हो जाने पर यह भी सिद्ध हो जाता है कि विभावना में अतिशयोत्ति की सहायता अनिवार्य है क्योंकि इस पदार्थ में अतिशयोकि नहीं है। पण्टितराज ने कार्याद्य में अतिशयोकिति के मतिरिक्त रूपक या माहायें अभेद बुद्धि को भी कहों-कहीं सहायक माना है। 'जगचिचित्र' में वह है। अतिशयोकि या रूपक की अनिवार्यता का उद्देश्य 'सल लोग अकारण ही वेरी वन जाते हैं' इत्यादि सामान्य वाक्यों में विभावना का परिहार है। यहां बैररूपी कार्य में न तो अतिरयोकि है और न रूपक। 'सल लोग अभरण ही संताप देते हैं इस वाक्य में कार्योश संताप में अतिशय है, क्योंकि अ्नि आदि का संताप भिन्न होता है और खन्जनित संजाप भिन्न रहने पर मो यहाँ पण्डितराज ने विमावना स्व्रीकार नहीं की है। उनका कहना है, जैसा कि हम भी सुटट के 'अकारणरिपुञ्वन्द' उदाहरण पर कह आए हैं, कि कारण विशेषरूप से उपस्थित रहना चाहिए। यदि 'सुलजन बिना ही आग के जलाने रहते हैं' ऐसी योजना हो तो इसमें विमावना मानी जा सकती है। वे यह भी कहते हैं कि जिसका अमान बतलाया जा रहा हो उस वस्तु को अतिशय या आरोप से चुत् कार्ये के अध्यवस्षायी या आरोष्यमाग अंश के प्रति कारण भी होना चाहिए। अन्यथा विभावना नहीं होगी। उदाइरणार्थ 'सलजन बिना ही अनराध के जलाते रहने हैं' -- इस वाक्य में कार्य है नलाना। इसमें अग्नि के द्वारा होने वाली जलन के द्वारा खल के द्वारा होने वाली पीड़ा का अभ्यवसाय है। किन्तु मध्यवसायी जलन के प्रति, जिसका अभाव प्रतिमादित है वह अपराध कारण नहीं है। उसके प्रति कारण एकमात्र अभ्नि हो सकती है। फलतः अमाव बतलाया जाना चाहिए उस वस्तु का जो कार्य शरीर के विपयीरूपी अंश के प्रति कारण हो। इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि विभावना में एक और जहाँ कार्योश में अतिशय या -- आरोप अपेक्षित है नहों कारणामवांश में कारणरूप से उक्ति उस वस्तु की होनी चाहिए जो कार्य
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शरीर के विषयी-अश के प्रति कारण हो अर्थात जो कायशरीर के उस संश के प्रति कारण हो जो अद विषयी हो, आरोपित किया जा रहा हो या अध्यवसित। पण्डितराज ने इस तथ्य का स्पष्टीकरण नव्यन्याय की भाषा में इस प्रकार किया है- 'अथ 'लुष्धकधीवरपिशुना निष्कारणवेरिणो जगति' इत्यत्र विभावनापति [ततः] कारणता- वच्छेदवरूपावच्छिन्नप्रतियोगिकश्वेन कारणामावी विशेषणीय: ""सला विनवापरायं भवन्ति सत वैरिण इत्यत्रातिव्यापनाव् कार्याशोऽतिरायोकत्यावीढत्वेनामेदनिश्चयालीदशवेन वा विशेषणीय। 'सत् विनेवापरावं ददन्ति खल सज्जनान्' इत्यादावतिव्यापिवारणाय च कार्योरे यद विषयिता- वच्छेदक तदबद्छित्र'-कार्यतानिरूपिताया कारणताया अवच्छेदकमिह आ्ध्यम्, दाइत्व चेद विषयितावच्छेदकम्, तदव्छिन्नमिनत्वे पीडाया अव्यवसानाद। न दि दाहत्वावच्छिन्नकार्यता निरूपितकारणताया अवष्छोदकमपराधत्वम्, अपितु दाह तवावच्छिन्नामिन्नत्वेनाव्यवसिता या पीडा तन्निष्टकायतानिरूपित कारणनाया., इति तदचच्छिन्नप्रतियोगिताकामावसामानाधिकरण्यैन कार्योतपि वर्णनेरजप नाम विभावनाप्रसङ। यदि तु 'खल् विनेव ददन दददन्ति बगतीतलम्' इति कियते तदा मवत्येव विभावना।" [विभावनान्त, रसगंगापर] पण्डितराज के इस विवेचन से विभावना का लक्षण उन्ही की इस पदावली में ऐसा होगा- -'उत्पत्तिवर्णनविषयों भूत कारयश रोघट की भूत विषयितावच्छेर कावच्छिन कार्यनानि रूपितकारण- तावचछेदकरूपावच्छिन्नप्रनियोगिका माववर्णन विभावना। विश्चेश्वर-पण्डितराज के इस प्रकार के सृक्ष्म विवेचन पर विश्वेश्वर ने आपत्त उठाई है। उन्होने कहा है कि कारण का विशेषरूप से उपस्थिन रोना आवश्यक नहीं है और उदाहरण के रूप में पसिद्द 'निरुपादान०' पव दिया है। यहां उपादान संमार के बिना जगचित्र के निर्माण को उकि में विभावना है और मषी आदि कारणों का मषीत्व आदि रूप से उदनेख नहीं है। उपादान शध्द से हो उत्लेस है। इस पद्य में सवयं पण्डितराज भी विभावना मान चुके हैं। इस प्रकार विद्वेश्वर द्वारा स्वयं पण्डितराज ही अपनी मान्यता के विरुद्ध सिद्धान्त उपस्थित करते हुए प्रति- पादित किए गए है। चिन्तन से सूझता है कि 'अकारण वेरी' इस उकि और निरुपादान 'इस उकि में अन्तर स्ष्ट है। कारण का उल्लैख दोनों ही स्थलों में सामान्य रूप से भी है तथापि उसमें अन्तर है। यह अन्तर 'कारण तथा 'उपादानस्मार'-शम्द से ही सपष्ट है। चिन्न का कारण तो परमात्मा भी है परन्तु वह चित्र का उपादान नहीं है। उपादान है रग। इस प्रकार 'उपादानसमार' शन्द से चित्र के विशिष्ट कारण का बहुत कुछ स्पषीकरण हो जाता है। यद्यपि कारणनावच्छेदकरूप से तो यहाँ मणित्द आदि की उपस्पिति नहीं होती तयापि पणडतराज को मान्यता का उद्देश्य उसमे खण्डित नही होना क्योंकि उनका उद्देश्य जिस किमी प्रकार कारणगन वैशिष्टय का ज्ान हो जाना है। वह 'उपादान संमार' शब्द से हो जाता है। इसके अतिरिक्क 'अमिता वेव' पद के द्वारा तो मिच्ित्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव उपस्थित है ही। 'तन्वते' में भाई 'तनु क्रिया' का सर्थ विस्तार या फैलाव है। उसके लिए मित्ति प्रमुख कारण है। फलतः उसका विशेष रूप से उल्लेख हो जाने पर इस अन् में विभावना अधिक स्पष्ट हो जाती है फलत 'निरुप- दान० अश में भी आंशिक अस्पष्टता प्रतिबन्धक नहीं बनती। पप्रिटतराज की पंकि दै- 'अन्न हि भगवत. सकाशात केक्छस्य जगत उत्पत्तिन कवेरमिश्रेता .. किन्तु जगदुरूपस्य चिनस्य।चित्रम्य च कैवलरयोपादानारना मषी-हरितालदीनामाधारस्य मिस्यादेश्चामावे केवला- कारे जागत्वेवोत्मचेरसंभव ।' [पृ० ५८०-१० रसगजाघर ] सस्य यह है कि 'निरुपादान' पद्य में विमावना नहीं व्यतिरेक भलकार है। सामान्य शिल्पी
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से शिव रूपी शित्पी का अतर और उत्कर्ष ही यहाँ चमरकार का कारण है। विश्वेश्वर का विभा- पनालक्षण इस प्रकार है- 'हेतुं विनापि काय यत्रोक्तं स्याद् विभावना सा तु।' विश्वेश्वर ने 'असंभृत' पद्य में अलंकार- सर्वस्वकार का समर्दन और पण्डितराज जगनाथ द्वारा उनके खण्डन का विरोध किया है। उरन्होंने यीवन को ऐसा कारण बतलाया है जिसमें मद के प्रति कारणता पडली वार वतलाई जा रही है जब कि आसव परसिद्ध कारण है। अतः विश्वेर के अनुसार प्रसिद्ध कारण के अभाव में यहां विभावना स्वीकार्य हो है भले अमसिद्ध कारण यौवन का यहाँ अस्तित्व रहा भाए। विश्वेश्वर पण्टित ने यहाँ चमत्कार की भी सहायता ली है। कहा है कि क्योंकि इस पद्य में चमरकार है अतः इसमें विभावना को अनंकार मानना ही होगा। इस प्रकार मतमतान्तरों के वीच विभावना अलंकार का वदी स्वरूप सवमान्य उदरता है जो मामह की परम्परा के आचार्य वामन, उद्ट, रुद्रट और मम्मट की भावक प्रतिमाओं से निष्कृष्ट होकर सर्वस्वकार तक आया था। सर्वस्व के टीकाकार थ्ीविद्या चक्रवर्त्ती ने इसका संक्षेप कारिका में इस प्रकार सपनिवद्ध करिया है- 'प्रसिद्धकारणाभावे कार्योत्पादन्वैशिष्ट्याद् द्विया चेयं निमित्ततः ।' चकवर्त्तों ने विभावना औौर विशेोक्ति के संदेहसंकर के लिए भी मिन्न लिखित कारिका दी है- 'कार्यौशस्य यदा भावाभावौ वक्तुमपेक्षिती। सन्देहसहुरः ॥' -'जव कार्योश के भाव अभाव विवक्षित हो तो विभावना विशेषोकि का सन्देहसङ्कर होता है।' पाठान्तर= विभावना का जो मूल सर्वस्त के निर्णयसागर संस्करण में मिलता है उसपर स्वयं विमर्शिनीकार ने ही आपत्ति व्यक्त कर रखी है। संजीविनीकार ने 'अंगलेखा०' पथ के वाद की 'अन्र सहजत्वं निमित्तं गम्यमानम्' इस पंत्ति के वाद 'इय च मालयापि मवन्ती दृश्यते यथा- अनिद्रो दुःस्वप्नः प्रपतनमनद्रि द्वुमतरं जरादीनः कम्पस्तिमिररहितवाससमयः। अनाघातं दुःखं विगतनिगडा वन्धनधृति: सजीवं जन्तूनां मरणमवनीश्याधयरसः ॥' -इतना अंश और जोड़ा है तथा इसे मूल माना है। कु जानकी तथा डॉ० राघवन् के सहसंशोधन में निकले मेहरचन्द संस्करण में यह अंश इसी स्थान पर मूल में सुद्रित भी है। अनन्तशयन से प्रकाशित समुद्रबन्धी अति में यह पाठ विभावना निरूपण के अन्त में है। इसी के साथ 'अर्सभृतं मण्डनम्-0000 हत्यद्यतना"' यह अन्तिम अंश उसमें विमर्शिनी के सुझाव के ही अनुसार 'अपितु तदनुप्राणितत्वेन' के वाद ही सुद्धित है। हमारे मत में 'इय च मालयमापि भदन्ती दृश्यते यथा अनिद्रो०' इत्यादि मालाविमानना का प्रतिपादक अंश वश्य ही प्रक्षेप है। कारण यह है कि मालाविभावना रत्नाकर, विमर्शिनी, अप्पयदीक्षित, पण्डितराज तथा विश्वेश्वर किसी में नहीं मिलती। 'सर्वस्व में होती तो सभी साचार्यों में उसके प्रति मौन न मिलता। समूल होने पर भी हमारी ृष्टि में इसका उपर्युक्त स्थान विभावना का अन्त है न कि मध्य। इसी प्रकार 'अन्न विवदन्ते' का सम्वन्ध 'केचिछ' के साथ वतलाते हुम विमशिनीकार ने 'अन्ये', 'अपरे' और 'अद्यतना के साथ अन्वय से उसे
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रोक दिया है। इमने मी उन्हीं का अनुसरण किया है। यह उचित भी है क्योंकि अन्यकार ने समो मतों को केवल उद्धृत मर कर दिया है जब कि प्रथम 'केचित्'-के मद का खण्डन मी किया है। बीच में खण्डनांश आ जाने से 'विवदनते' की 'व्याप्ति' खण्डित हो जाती है। 'अघ्यतना.' वाले पक्ष पर विर्माशनीकार की आपति यथार्थे हो है कि यह किमी पाठक ने अपनो प्रति में स्वय ओड दिया है। सपादकों अथवा परवर्ती िपिकों ने उसे मूछ में मिनरा दिया होगा। विमर्गिनीकार ने इस प्रसग में अन्यकार के अन्य अ्रन्थ 'साहित्यमोमांसा' की चर्चा की है। त्रिवेन्द्रम् से सन् १९१४ में छपी साहित्यमीमासा में यद विपय नहीं मिळता। [सर्वस्व ] विभावनां लक्षयित्वा तद्विपर्ययस्वरूपां विशेषोकि लक्षयति- [मू० ४२] कारणसामग्रथे कार्यानुत्पत्तिविशेपोक्ति:। इद् समग्राणि कारणानि नियमेन कार्यमुत्पादयन्तीति प्रसिद्धम्। अन्यया समप्रत्वस्यैवाभावपसन्नत्। यत्तु सत्यपि सामप्रये न जनयति कार्य सा कंबिविशेषममिव्यड्क्कुं प्रयुज्यमाना विशेषोकि:। सा च द्विविधा-उक्तनिमित्तानुक्तनिमित्ता च । अविन्त्यनिमित्ता त्वनुक्तनिमित्तैव। अनुकस्य च चिन्त्याचिन्त्यत्वेन सवैविध्यात्। क्रमेण यथा- 'कर्पूर इव दग्धोऽपि शक्तिमान् यो जने जने। तस्मै कुसुमधन्वने।' 'आाहूतोऽपि सहायैरेमीत्युक्तवा विमुकनिद्रोऽपि। गन्तुमना दपि पथिक: संकोचं नैत्र शिथिलयति ॥' 'स पकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः। हरतापि वतुं यस्य शंभुना न हतं घलम्।' अत्र सत्यपि दाहलक्षणेऽचिकले कारणेSशकत्वाख्यस्य कार्यस्यानुत्पत्ति: शक्तिस्वरूपेणाचिरुद्वेन धर्मेणोपनियद्धा। अवार्यचीर्यत्वं चात्रोक्तं निमित्तम्। तथाद्वानादय: संकोचशिथिलीकारहवेतव इति तेपु सत्स्वपि तस्यानुत्पती प्रियतमास्वप्नममागमाद्यनुक्त सचिन्त्यं निमित्तम्। तथा तनुद्दरणकारणे सत्यपि वलह्रणस्य कार्यस्थानुत्पत्ती निमित्तमनुक्तमप्यचिन्त्यमेव, प्रतीत्य- गोवरत्वात्। कार्यानुत्पचिश्वात्र कचित्कार्यविरद्धोत्पत्या नियध्यते। एवं विभावनायामपि कारणामाव: कारणचिरुद्धमुखेन क्वचित्मतिपाचने। तथा च सति, 'यः कौमारददर स पव दि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोनमीलितमालनीसुरभय: म्ौढा. कदम्यानिलाः। सा चैवाम्मि तथापि चौर्य-सुरतव्यापारलीलाविधी रेवारोघसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते।।'
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विशेषोक्त्यलङ्कार:
इत्यश्न विभावनाविशेपोक्तयो: संदेहसंकर:। तथा हुत्कष्ठाकारणचिरुद्धं 'यः कौमारहर' इत्यादि निवद्धमिति विभावना। तथा 'यः कौमारहर' इत्यादेः कारणस्य कार्य विरुद्धं 'चेतः समुत्कण्ठत' इत्युत्कण्ठाख्यं निचद्धमिति विशे- पोक्ति:। विरुद्धमुखेनोपनिवन्धात्केवलमस्पप्टत्वम्। साधकवाधकपमाणमा- वाच्यान्न संदेहसंकरः या तु 'एकगुणह्वानिकल्पनायां साम्यदादयं विशेषोकि:' इति विशेषोक्ति लक्षिता सास्मिन्दर्शन रूपकभेद पवेति पृथङ् न वाच्या। विमावना का लक्षण बनाया अब उससे ठीक उलटे स्वरूप की विशेषोकि का लक्षण बनाते हैं- [सू० ४३ ] 'कारण की समगता रहने पर भी कार्य की अनुस्पत्ति [बतलाई जाप तो अलंकार की संज्ञा ] विशेपोकि [होती है] । यहाँ यह निश्चित तथ्य है कि सब कारण इकट्ठे होते ही कार्य को निश्चित ही उत्पन्न कर ते हैं, ऐसा न हो तो उनकी समघता [ समग्ता] ही नहीं हो। परन्तु समग्रता के रहने पर भा जो उसे कार्य उत्पन्न करती हुई नहीं बतलाया जाता वह विशेपोकि होती है। इसका प्रयोग ६ सी विशेष तथ्य की क्यंजना के लिए होता है। वह दो प्रकार की होती है [ १] उक निमित्ा तथा [२] अनुकनिमित्ता [मम्मद द्वारा प्रतिपादित] अचिन्त्यनिमित्ता तो अनुक्त निमित्ा हो है। क्योंकि अनुकत [निमित्त] दो प्रकार का होता है [ १ ] चिन्त्य और [ २] अचिन्त्य। क्रम से इन के उदाहरण यथा-[ वकनिमित्ता ]- कर्पूर के समान जल जाने पर भी जो जन जन में शकिमान्, है ऐसे सप्तिदत पौरुप वाले किन्तु पुष्प के ही धनुप वाले काम को नमस्कार है।' [ अनुक्तनिमित्ता में चिन्त्यनिभित्ा-] 'सायियों द्वारा पुकारे जाने पर मी, 'मा रदा हूँ ऐसा कह कर भी, नींद खुल जाने पर मी और जाने की इच्छा रहने पर भी पयिक [मपना] संकोच शिथिल नहीं कर रहा।' [ अनुक- निमित्ता में अचिन्त्यनिमित्ता-] 'वइ कुसुमायुध सकेला ही तीनों लोकों को जीत लेता है, शंकर ने शरीर हीन कर भी जिसका मल नहीं छीना।' इन [तीनों ] में [ से प्रथम में ] दाह रूपी अविकल कारण के उपस्थित रहने पर मी अशत्तिल्पी कार्य की अनुत्पत्ति [शक्तिमान् कहकर] शक्तिरुपी धर्म के द्वारा प्रस्तुत की गई है जो [शक्ति ] उस [ अशक्ति की अनुत्पत्ति ] के अविरुद्ध है। इसका कारण मवार्यवीर्यत्व यहाँ कथित है। [ दूसरे पद् में ] इसी प्रकार पुकारना आदि संकोच के शिधिलीकरण में कारण हैं। वे सब विद्यमान हैं तब मी उस [ संकोच के शिथिलीकरण] की जो अनुत्पत्ति बतलाई जा रही है उसके कारण स्वम्न में प्रियतमा के समागम आदि हैं जो सकथित अवश्य हैं किन्तु उनकी कक्पना की जा सकती है। [तृतीय पद्य में ] उसी प्रकार 'शरीर का हरग' यह कारण विद्यमान रदने पर भी बल- दरण-रूपी कार्य की [ जो] अनुत्पत्ति [बतकाई गई है उस] का कारण अकथित भी है और अचिन्त्य [अकल्पनीय] भी। क्योंकि वह समझ में आता नहीं है। इस [ अलंकार] में कार्य की अनुरपत्ति कहीं कार्य से विरुद्ध वस्तु की उत्पत्ति के द्वारा वतलाई जाती है। इसी प्रकार विभावना में भी कहीं कारणाभाव कारणविरुद्ध व्तु के [सद्भाव के द्वारा प्रतिपादित किया जाता ऐै । इस प्रकार-
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२७८ मलद्गारसवस्यम्
'वही वर है जिसने कौमार्य दूर किया, वे ही वसन्त की रातें है, खिको माळती मे सुगम्िन और [घूली] कदम्य से मिथिन वे ही हवा के भरौद़ झोंके है और में मी वही हूँ तथापि सरतग्यापार को उन्हों मुक्तपूई लोनाओं के पुनर्विधान के लिए रेवा के तट पर वेनसतर के नीचे चित् उस्कष्ठित दो रहा है।' -यहाँ विभावना और विरेशेकति का सकर है। क्योंकि यदों उत्कण्ठा के कारण के विरुद्ध 'जो कोमार्य को दूर करने वाला है' इत्यादि प्रस्तुन किया गया। इसलिए विमावना हुई। इसी प्रकार 'जो कोमार्य का दरण करने वाला है' इस कारण के कार्य [अनुत्कण्ठा ] के विरुद्ध 'चित् उत्कण्ठित हो रहा ई' इत्यादि डकण्ठा नाम के कार्ये यहाँ प्रस्तुत किया गया है इसलिए विशेषोकि हुई। इतना है कि ये दोनों अस्पष्ट हैं क्योंकि इनका मस्तुतोकरण विरुद्ध वस्तु के द्वारा किया गया है। सकर का सदेहसकरभेद इमलिए है कि यहाँ न तो किसी एक का साधक प्रमाण है और न अन्य का बाधक प्रमाण ही। [ वामन ने] जो 'एक गुग की कमी की ककपना करके समता को दृढ बनाया जाय तो विरेषोकि इस प्रवार विशेषोकि का रक्षग बनाया है वह इस सिद्धान्त के अनुमार रूपक का दौ भेद है। इसलिए उसे र्वनन्द्र भलंकार नहीं महना चाहिए। िमर्शिनी सद्िप्ययेति। कारणसामप्रये कार्यामुर्पादाय्। तामेवाह-कारणेत्यादि। समग्राणीति नावश्यं कारणानि कार्यवन्ति सवन्तीति न्यायादसममार्जा पुनः कार्यजनकरव न स्यादिति भावः। अत पवाव्यमिचारायाह-नियमेनेति। अन्ययेति यदा कारणानि कार्य नो्पा दयन्ति। एवं नैक किंचन अनकं, सामग्री वे जनिहति नीत्या समपार्णा कारणानां कार्य- जनक्वं भवायेवेति तामपर्यार्य.। यदा श्वेतदविपयंय उपनिषन्यते तदा विशेषोकिर्भंव तीत्याह-वयत्वित्यादि। अत्र च वस्तुतो निमित्तमस्नीति विशेधपरिहार:। तद्वेतकमेवास्या भेदनिर्देशमाह-सा चेत्यादि। अचिनयेस्युत्तानाशयः। वस्तुतस्तु सभवर्ेच। अन्यथा हास्या विरोधो दुप्परिद्ाय: स्यात्। अविकल इति। समपे विरुनूधमरव शकपशवत्यो र्विरोघाव्। अस्याक्ष कार्यानुर्पपेर्विर्न्वायन्तरेण चन्धं दर्शयितुमाह-कार्येत्यादि। यथा क्पूर इ्वे- श्यादी। समिति। यथैवात्र कार्यानुश्पत्तिविरुद्मुखेनोपनियध्यत हत्यर्थः। तया च सनोति। इयोरप्यनयोर्विसदमुसेन कार्यकारणभावोपनिबन्धे सतीत्यथ:।उ कण्ठाया.कारण कौमार- हरवराधसंनिघानम् 1 तथ्य विरुदू वरसनिधानम्। तेन कोमारहरवराघसनिधानरूपं करणं विताप्युरकणठाया उत्पाद इति विभावना। तथा कौमारहरवरादिसंनिधानरूपरय कारणस्प कार्यमनुर्कण्ठा, तस्याक्ष,िबदोरकण्ठा। तेन सत्यपि कौमारहर व रादिस निघान रूपे कारणे समझे कार्यरपानुरकण्ठारूपरयाभाव दवि विशेषोकि:।अस्पष्टतमिति। कारयकारणयोः सापाध्िपेध्यतवेनापतीते। नमु चात्रानयो किमिति संदेहन, एकपचाश्रय एव क्रियतामि- र्याशा हयाद-सावदेत्यादि। ननु 'पत दि नाम पुरुषस्यासिद्दासन राज्यम्' इस्यादी वामनेन या विशेषोकिसका सा कि नोच्यत इस्याश=याह-या सिवित्यादि। एवमनयैव दशा 'एक. गुण हान्युपच यादिकदप नायां साम्मदाव्य विशेष' इति एवितो विशेपाळंकारोऽप्यस्मिन्दर्शने रुपकभेद पवेति न पृयग्वाध्य:। दद्विपयंय उससे उळटी भथाद पूरे पूरे कारण रहने पर भी कार्य की उत्पत्ति न होना। उसी का नक्षण रळाने है-'कारण इत्यादि। समव्ाणि=समम्र अर्थात 'कारण कार्य से युक हो ही ऐसा
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नियम नहीं है' इस प्रकार का जो एक सिद्धान्त है उसके अनुसार असमत्र कारण कार्य के जनक नहीं होते। इसीलिए अव्यभिचार [निरपवादता] वतछाने के लिए कहा 'नियमेन' नियमतः। अन्यथा अर्थात् जब कारण कार्य को उत्पन्न नहीं करते। इस प्रकार तात्पर्य यह कि 'कोई एक कार्य का जनक नहीं होता, सामग्री जो है वह जनक होती है' इस उक्ति के अनुसार जन सभी कारण उपस्यित रहते हैं तो कार्य उत्पन्न होता ही है। 'जय कमी इसका उलटा बतलाया जाता है तब विशेषोकि होती है' इस तथ्य को त्पष्ट करते हुए कहते हैं-'सत्तु' इत्यादि। यहाँ [विशेयोकि में ] भी [सभी कारण उपस्थित रहने पर भी कार्य न होने में] कोई वास्तविक कारण रहता ही है इसलिए विरोध हट जाता है। इसी [ वास्तविक कारण] को लेकर इसके भैद वतलाते हैं 'सा घ' इत्यादि। अचिन्त्य अधिक भावुक लोगों ने कहा है बस्तुतः कारण वहाँ भी संभव रहता है। नहीं तो वहाँ विरोध का परिहार ही न हो। अविकल समग्र। विरुद्यमत्व इसलिए कि शक्ति और अशक्ति में परस्पर विरोध रहता है। यह जो कार्यानुत्पत्ति है उसी को अन्य प्रकार से भी प्रस्तुत किया जाता है। वही बतलाने के लिए कहा 'कार्य' इत्यादि। इसका उदाहरण है 'कर्पूर इव' इत्यादि। एवम्- जर्थात जैसे यहाँ कार्य की अनुत्पत्ति विरुद्ध वस्तु के द्वारा प्रस्तुत की जा रही है उसी प्रकार ००।तथा च सति = अर्थात् इन दोनों [विमावना तथा विशेषोि] के ही कार्यकारणभाव का निरुद्ध वस्तु के द्वारा उपनिबन्ध रद्दने से। उत्कण्ठा का कारण है कौमार्य का हरण करने वाले वर आदि का असव्निधान उसके विरुद्ध हुआ उनका सन्नियान। इस प्रकार कौमायहरणकारी वर आदि के असननिधान-स्वरूप कारण के विना भी उत्कण्ठा की उत्पत्ति वतलाई गई। अतः यह विभावना हुई। इसी प्रकार कौमार्य हरण करने वाले वर आदि का सनिधान कारण है अनुत्कण्ठा रूपो कार्य का। उसके विरुद्ध हुई उत्कण्ठा। इस प्रकार कौमार्य हरणकारी वर आदि का सविधानरूपी समग कारण रहने पर भी मनुत्कण्ठारूपी कार्य का अभाव बतलावा गया, इसलिए यहाँ निशेषोकि हुई। अस्पष्टत्वम्=अस्पटटता, क्योंकि यहाँ कार्य और कारण साक्षात निषेध्यरूप से प्रतीत नहीं होते। [शंका ] अच्छा, इसमें संदेह [संकर ] ही क्यों माना जा रहा है, [दोनों में से] किसी एक को ही क्यों स्वीकार नहीं कर लिया जाय' इस पर उत्तर देते हैं साधक इत्यादि [शंका ] अच्छा, 'जुआ जो है वह पुरुष के लिए बिना सिंहासन का राज्य है [ सृच्छकटिक ]' इत्यादि [ उक्तियों] में वामन ने [काव्यालंकारसूत्रवृत्ति में] जो विशेषोकि बतलाई है वही यहाँ क्यों नहीं मान ली जा रदी 'इस पर कहते हैं-'या तु' इत्यादि। इसी प्रकार 'एक गुण की हानि या वृद्धि की कल्पना कर साम्य को दृढ बनाना विशष' [रतनाकर में नहीं] इस प्रकार जो विशेष नामक अलंकार का लक्षण किया गया है वह मी इस पक्ष में रूपक का दी एक प्रकार सिद्ध होता है इसलिए वह मौ स्वतन्त्र अलंकार के रूप में वतलाने योग्य नहीं है। विमर्श :- विशेषोकि का इतिहास :- सरवस्त्रकार ने उदाहरण तो भामह का स्वीकार किया है परन्तु लक्षम उन्हट का। भामह का लक्षण ठीक वामन जैसा ही है। सया- भामह- 'एकदेशस्य दिगमे या गुणान्तरसंस्थितिः । विशेषप्रयनायासौ विशेषोक्तिर्मता यया॥' 'स एकसीणि ज'॥
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४८० अलङ्गारसघंस्वम्
-एक गुण की बमी बतलाकर विशेषता के प्रतिपादन के लिए जो अन्य गुण की स्थापना वह विदेषोकि मानी जाती है'। यथा 'स एकस्रीणि' पदार्थ। यहाँ शरीर की दानि और बल की स्थापना बनलाई गई है। इसका उददश्य कामयक्ति की अपरिदार्यता बतलाना है। घामन = [सू० ] कगुणदानिकमपनार्या साम्यदाढ्य विशेषोक्ति.'। [घ० ]एकस्य गुणस्य हाने. कर्पनार्यां शेषेगुणै: साम्य यल तस्य दाद्य विशेषोदि:। रूपकं चेद प्रायेण। यथा 'दूत हि नाम'॥ चिसी एक गुण की द्ानि की कल्पना कर शेष गुणों से प्राप्त समना का जो दृढ करना वह विशेषोक्ति है। यह प्रायः रूपक ही है। रदाहरण 'जुआा जो है वह"' स्पष्ट दै कि वामन में मामद के समान एकगुणहानि की चर्चा तो हे परन्तु अन्य गुण की स्थापना और विशेषता के प्रनिपादन की चर्मा नहीं है। वामन ने स्वय इस प्रकार की विशेषोक्ति को रूपक ही मान लिया है। उन्दट = 'यद सामग्रयेदपि शुसोना फलानुत्पत्तिबन्धनम्। विनेषस्याभिषित्सानस्तद् विशोषोतिकच्यते ।। "।४।। दशिनेन निमिचेन निमित्तादर्शनेन च तस्या बन्धो दिया उक्ष्ये दृशयते ललितात्मक ॥५न॥ -- उत्पन्न करने वालो पक्तियाँ सबकी सब उपस्थित रहे तथापि किसी विशेषता के मतिपादन की इच्छा से फल की उत्पत्ति न दिखलाई खाए तो वह विशेषोकि कही जाती है। काष्यों में यह दो प्रकार को मिलती है [ १] जहाँ निमित्त दिखषा दिया बाता है और [२] जहाँ नहीं दिसलाया जाता। यथा :- 'मददिनि गृद्े जन्म रूर्प रमरमृदृद् वय। तथापि न सुखप्राप्ति. कास्य चित्रीयते न धी:। -- 'अत्यन्त समृद्धिशाली घर में जन्म, रूप और काम का मिन्न वय। इतने पर भौ सुख की प्रापि नहों। किसकी बुद्धि अचरज में नहीं पढती।' यहाँ विधाता की वामना रूपी कारण अनुक्त है। उककारण का उदाइरण- 'इत्व विसंष्ठल दृष्टा तावकीन विचेषितम् । नोदेति किमपि प्रष्टु सत्वरस्यापि मे वचः॥ -सुम्दारी इस प्रकार की विपरीत चेषाऐ देखकर पूछने के लिए अत्यन्त उातक दोने पर भी मेरा मुँद नहीं खुलता।' यहाँ पार्वतीजी की तपोनिष्ठा वह कारण है जिससे पूछने को उरसक व्यक्ति का पूछना रुका हुआ है। स्पष्ट है विशेषोक्ति का स्पष्ट और मान्य रूप पहले पहल उद्भट ने ही प्रस्तुत किया है। स्ट्रट= रुद्रट ने विशेषोकि नाम से तो किसी अलकार का निरवचन नहीं किया किन्तु उनके व्याधान नामक अल्कार में इस सलकार के समी लक्षण आ जाते है- अन्यरे प्रतिवतमपि कारणमुस्पादन न कार्यस्य। यस्मिन्नमिधीचेत व्याघान-स इति वि्ेय:।॥ ९५२।। -महाँ कारण पूरा का पूरा रहता है तयापि कार्य की सत्पत्ति नहीं बनलाई जाती, उसे व्याघान समझना चाहिए।' यथा- 'यत्र सुरतप्रदोपा निष्कज्जळवत्तयो महामणयः। मात्यस्यावि न अ्रम्या हृतवधूवसनविसृष्टस्य।।'
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विशेषोकतयलङ्कारः
-- 'जहाँ बढ़ी बड़ी मणियाँ सुरतप्रदोप रहती हैं जिनमें न तो कज्क पढ़ता गौर न बत्ती ही रहती। साथ जो हृतवस वघजन द्वारा घुसाने के लिए फेकी मालाओं से भी बुझते नहीं। यहाँ दीपक महामतियों पर नरोप है अतः यह उदाहरण नामन की विशेषोकति के ही व्दाहरण के समान रूपक का ही उदाहरण है। इस प्रकार रद्रट विद्ेपोतति के विष्य में अधिक प्रामाणिक नहीं ई। सम्मट-नन्मट ने वद्धट का ही अनुमोदन किया है और लक्षण में कारणसमग्रता तथा उसके • साथ कार्य के अमाव इन दोनों अंगों को बधावत् स्थान दिया है। उनका लक्षण इस प्रकार है -- [सू०] 'विशेषोफिरखण्डेपु कारणेपु फलावचः।' [वृ० ] मिलिनेवृपि कारणेपु कार्यस्याकथनं विकेषोकि:॥ -- 'कारण पकन्रित रहने पर भी कार्य का अकथन विशेषोकति कहलाता है।' मम्मट ने इसके तीन भेद माने हैं उकनिमित्ता, अनुक्तनिमित्ता तथा अचिन्तयनिमित्ता। इननें से उक्तनिमित्ता तथा अचिन्त्यनिमित्ता के तो उदाहरण वे हो है जो सर्वत्वकार ने दिए हैं। अनुक्तनिमित्ता का उदाहरण यह है- निद्रा निवृत्तासुदिते ुरत्ने सखीजने द्वारपदं पराप्ते। इलथीकृताइलेपरसे भुजके चचाल नालिड्नतोडडना सा।* 'नींद खुल जाने पर, सूर्य उग आने पर, सखियों के दरवाजे पर आजाने पर तथा प्रिय के आलिद्व नानन्द के शिधिल हो जाने पर भी वह सुन्दरी आलिद्वन से नहीं डिगी। यहाँ प्रवासशान कारण है जो भनुक्त है। मम्मट ने अचित्त्यनिमित्ता और अनुक्तनिमित्ता को स्वतन्त्र माना है। सर्वस्वकार ने इसी पर संशोधन देते हुए अचिन्त्यनिमित्ता का अनुक्तनिमित्ता में अन्तर्भाव दिखला दिया है। तष है कि सर्वस्त्रकार ने उद्भट और मम्मट की परम्परा पर विशेषोति का लक्षण बनाया है। परवर्त्ी साचार्यों में- शोभाकर-ने विशेषोक्ति का लक्षम सर्वस्व के पथ पर ही बनाया है- 'हेतुसाकल्ये फलानुरपत्तिविशेषोकि: ।' रत्नाकरकार द्वारा अचिन्त्यनिमित्ता में निमित्तगत अचिन्त्यता पर मनोवैज्ञानिक विश्लेपण प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने उसे प्रमातबुद्धिसापेक्ष माना है। जो तथ्य किसी एक प्रमाता के लिए अचिन्त्य होता है, उसे समझ नहीं पढ़ता, वही अन्य किसी प्रमाता वे लिए चिन्त्य हो सकता है, उसकी समझ में आ सकता है। उदाहरणार्थ 'स पकस्रीणि०' पद्य में ही कुहुमायुध के दल का शरीर नाश होने पर नष्ट न हेने में कारण है काम का चित्तयोनित्व=चिच्त से उत्पन्न होना। फलतः वह चिन्त्व ही है, अनित्त्य नहीं। उनका कहना- 'अनिन्त्यता नाम न वस्तुधर्म संदेध्वत सा हि भवेत प्मातुः। कस्यापि, सर्वस्य तु नैव, तस्माद् विभावनादिख्तिवियो न वाच्य:।।' -'अचिन्त्यता वस्तुनिष्ठ धर्म नही है। वह भी सन्देह के ही समान प्रमातृनिष्ठ धर्म है। यह भी किसी-किसी प्रमाता में रहता है, सब में नहीं। अतः विभावनादि अलंकार को तीन प्रकार का कहना ठोक नहीं। अप्पस्यदीचित-ने कुकल्यानन्द में जयदेव के विशेषोकिरनुत्पत्तिः कार्यर्य सति कारणे।-इम विशेषोकिलक्षण को- 'कार्यजनिर्विशेषोकि: तति पुष्कलकारणे।'
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इस प्रकार बदल दिया है। सरष ही जयदेव के लक्षण में कारणगत समझता का उत्लेख नहीं था। अल्कार के नाम से कारिका का आरम्म यथावव रसने के लिए अप्पयदीक्षित को कारिका इस प्रकार की गढनी थी- 'विदेषोकिरनुत्पत्ति: कार्यस्यासिलकारणे'। यदि अलकार का नाम कारिका के आरग्म में नहा भा देना था तो भी दवितीय चरण का निरमाग उन्हें 'पुष्कले सनि कारणे' इम प्रकार 'कारणे सनि पुक्कले' इम प्रकार 'पुरले कारने सति' इस प्रकार अथवा 'कारणे पुष्कले सति' इम प्रकार करना चाहिए था। उक्त सभी चीजनाओं में 'सब के सब कारण रहने पर भी कार्य की अनुत्वत्ति विक्षेषोकि' अर्थ यही निकल्ता है। उदाहरण- 'नमन्नमषि धीमन्न न लछ्पयनि कशन'-जयदेव। *ददि स्नेदक्षयो नाभूत समरशोवे वदलत्यपि'-दीक्षिन। 'युद्धिमान् लोय नत्रने हैं तो भी उन्हें कोई लाँधना नहीं'-जयदेव। 'हृदय में रमरदीप के जलते रहने पर मी स्नेदक्षय नहीं दुआ'-दोक्षिन। दोनों में विशेषोक्ति का अधिक शुद्ध रूप जयदेव के उदाहरण में ही है। उसमें आहाये- ज्ञान की पृष्ठभूमि नहीं के बरावर हे, जबकि अपय्यदीश्षिन के उदादरण मे उमी का साम्राज्य है। इमी प्रकार जयदेव के उदादरण में दलष नगण्य जैसा है और अन्यय्यदोक्षिन के उदादरण में स्नेहशब्द में इलेष मो है ही तमरदीप पद में रूपक भी है।
'प्रसिद्ध कारणों के समुदाय के विद्मान रहने पर भो बसी के साथ साथ बनलाई जा रही कार्य की अनुत्पत्ति विशेषोकि कडलानी है।' यह पण्डिनराज ने कारणमामयी में असिद्धि का मी निवेश किया है। यह उनकी नवीन देन है। अचिन्त्यनिमित्ता को पण्डितराज ने भी सवीकार नहीं किया है। उन्होंने उस पर सवस्वकार द्वारा चठाई गई आपत्ति का उत्लेव भी किया है। विश्वेश्वरपण्टित ने लक्षण में कारणगन समगता का उल्लेस नहीं किया है और न अचिन्त्य निमित्ता की स्वतनत्रता अस्त्रीकार की है। यह उनके निम्नलिखित विवेचन से सपष्ट है- 'देनो मत्यपि कार्यानुत्पत्ति त्याद विदोषोकि । -हेतु के रह्षने पर मो कार्य की अनुत्पत्ति विशेषोक्ति होती है। 'सा च न्रेषा -अनुतनिमित्ता, उक्तनिमिचा, अचिन्त्यनिमिचा च'-ववह तौन प्रकार की होनो है अनुवनिमित्ता, उक्तनिमित्ता तथा अचिन्त्यनिमिक्ा।' विश्वेश्वर ने अनिन्तयनिमित्ता के विषय में पूर्वाचार्यों का विरोष न नो उपस्थित किया है और न उसका खण्डन हो किया है। सजीविनीकार श्री विद्याचकवचों ने सबस्वकार के सपूर्ण विचेचन का सक्षेप कारिका में इम प्रकार किया है- 'विशेषोक्रिर्मदेद कार्यानुत्पत्ति सति कारणे। मघकगुणहान्या तु साम्यदाडर्यमलक्षाम् ।।' -'कारण के रहने पर कार्य की अनुत्पत्ति विशेषोकि होनी है। एक गुण को दानि में माम्य की पुष्टि इमका लक्षण नहीं है।
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अतिशयोक्त्यलङ्कार: ४८३ [सर्वस्व ] अतिशयोक्तो लक्षितायामपि कश्चित्पभेदः कार्यकारणभावप्रस्तावेने- होच्यते- [सू० ४४] कार्यकारणयो: समकालत्वे पौर्वापर्यविपर्यये चाति- शयोकि: । इह नियतपूर्वकालभावि कारणं नियतपश्चात्कालभावि च कार्यमिति कार्यकारणयोरलेक्षण प्रसिद्धस्। यदा तु विशेषप्रतिपादनाथ तयोरेतद्रपाप गमः क्रियते तदातिशयोक्ति: पतद्रपापगमन्न कालसाम्यनिवन्धनः कालेविप र्यासनिबन्धनव्रेति द्विधाभवन्नतिरायोकिमपि द्वैवे स्थापयति। क्रमेण यथा-
भूपालेपु तवान्र सूक्ष्मनिशिते निख्तिरिंशव्ाराध्वनि। कीर्त्या व द्विषदः प्निया च युगपद् राजन्यचडामणे! हेलानिर्गमनप्रचेशविधिना पश्येन्द्रजाल कृतम्॥' 'पथि पथि शुकचञ्धूचाकराभाङ्कराणां दिशि दिशि पवमानो वीर्वां लासकच्च। नरि नरि किरति दराकू सायकान् पुष्पधन्वा पुरि पुरि च निवृत्ता मानिनीमानवर्चा।।' पूर्वत्र मौढोकिनिर्मिते5र्थे शामुश्रीप्रवेशः कीर्तिनिरगमनस्य हेतुरिति भिन्नकालयोस्तुव्यकालत्वं निबद्धम्। उत्तरन्न च माननिवृत्ति: स्मरशर प्रकिरणकार्येति तयोरुपपन्रं पौर्वापर्य व्यत्ययेन निर्दिष्टमित्यतिशयोकि:। कार्यस्य चाशुभावख्यो विशेष: प्रतिपाद्यते। अतिशयोकि का लक्षण किया जा चुका है तथापि उसका एक भेद[ कार्यकारणभानमूलक होने से] कार्यकारणभाव के प्रसङ्ग में यहाँ वतलाया जा रहा है- [सू० ४४] 'कार्य और कारण के समकालीन हो जागे अथवा उनके पूर्वपश्ाद्भाव के उसट जाने से अतिशयोकि [होती है]। यहां कारण और कार्य के 'नियमतः पहले उत्पन्न होने वाला कारण' तथा 'नियमतः पश्चात् उत्पन्न होने वाला कार्य'-ये लक्षण प्रसिद्द है। किन्तु जन विश्ेपता के प्रतिपादन के लिए उनकी इस स्थिति को हटा दिया जाता है तब अतिशयोकि होती है। इस स्थिति का निराकरण 'सत्पत्ि- काल में एकता या समता लाने से होता है और उत्पततिकाल के विपर्यास से' इस प्रकार दो प्रकार का होता है अतः अतिशयोक्ति को भी दो प्रकार की बना देवा है। इनके क्म से उदाहरण यथा [कारण कार्य की समकालिक उत्पत्ति से होने वाली अतिशयोकि यथा]- क्षत्रियचूहामणे! देखिए तो शत्रुओं की कीति तथा सी ने आपके इस अत्यन्त सूक्ष्म और तीक्ष्म सड्गवारा-पथ पर कीढापूर्वक निकलने तथा प्रवेश करने का इन्द्रजाल किया है। राजालोग इस इन्द्रजाल को उमढ़ते हुए घने आाइचर्य से प्रोत्फुल्ल नेन्नोत्पल होकर देख रहे थे।' [ इन्द्रजाल में दर्शकों के वीच दो ऐन्द्रजालिक तलवार की तीखी धार पर जैसे चाहें वैसे निमोंक होकर चलते हैं।
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[कार्यकारण के उत्पत्तिकाल में विपर्यास से हुई अतिरायोक्ति यथा ]- 'पथ-पथ में तोने की चोंच जैसी अकुरों की शोमा बिखरी हुई है, दिशा दिशा में लनाभों को नचाने वाला पवमान [वायु] वह रहा है, पुष्पधन्वा आदमी-आदमी में बाणों को नेजी से बिसेर रहा है-और नगर-नगर में मानवती वनिताओं के मान की चर्चा समाप्त दो गई है।' [इनमें से] प्थम पद् में जो अर्थ दे वह कवि की मौहोकि मे निरमिन [ कविकलयिन ] है। उसमें रातुओ का प्रवेश शदुकीति के निर्गमन का हेनु है अन वे दो भिन्न भिन्न काल में वतन्न होने वाले हैं तथापि उनकी उत्पत्ति एक साप होती हुई बनला दी गई है। दूसरे पद्य में माननिवचि कामशरवर्या का कार्ये है। इम कारण उनकी सत्पत्ति का पूर्वपश्ाद भार निश्चित है। उसे यहा वल्ट कर बनलाया गया है। रसलिए [उद्त दोनों म्थलों में] अति- शयोक्ति है। इनमें जो विशेषना वत्नार जा रही ह वह है कार्ये का श्रोध होना। विमर्शिनी प्रस्नावेनानुसुण्येन। अत पुवेयन्त, कार्यकारणभावात्रया निच्छित्तिविशोषा: संभ- वम्तीति प्रपञ्जमात्न दर्शयितुं पुनरिहास्या वचनम्।एतत् अन्यकृतैवोकम् 'प्रकारपखकम प्यारकार्यकारणभावेन य: प्रकार स कार्यकारणनाश्रयालकारमस्तावे प्रपक्वार्थ लपयिप्यत' हति। उच्यत इनि न पुननिणीयते, पूर्ववैवास्य निर्शातरवात्। तामेवाह-कार्यकारणयो- रित्यारि। उभयननापि नियतशव्द् एनदृग्यभिचारदर्शनान। एवद्रपापगम हनि। कार्यकार- पायोः सामान्यविपर्यासाम्यामुपनिबन्धनाद्। प्रोदोकिनिमिंत इति। कीर्तिथ्रियोवस्तुतो निर्गमनप्रवेशासंमवात्। प्रतिपाद्यन इनि प्रयोजनरवास्। प्रस्नावेन-प्रमग मे अर्थात् इमके विवेचन के इसी प्रमग के अनुष्प होने से। तात्पर्य यह कि इस अनिशयोक्ति को यहाँ उपस्थिन करने का उद्देश्य यह बनलाना है कि कार्यकारणमावमूलक अलवारों के इनने भेद हो सकते हैं। [अतिशयोकि के प्रकरण में ] यह स्वय अन्यकार ने ही कह दिया है कि "[अतिशयोकि के ] पाँच नेदों में से जो कार्यकारणमावमूलक भेद है उमे कार्यकारणमावमूलक अलकारों के प्रकरण में प्रपज् के लिए दिसलाया जाएगा।' उच्यते कही जा रही है, न कि उसका निर्णय किया जा रहा है। क्योंकि उसका निणय तो पहले ही किया ना चुका है। उसी [ अविशयोक्ति] को बतलाते है-कार्यकारणयो. इत्यादि। दोनों ही जगह नियन-शब्द इस स्थिति का कमी भी निराकरण न होने के कारण दिया गया है। एतद्रपाप- गम इसी स्थिति का निराकरण= इमलिए कि यहाँ कार्थकारग का सामान्य स्थिति के विपरीन उपनिबन्न रदता है। मोढोकिनिर्मिनक्योंकि कीचि और श्री के निर्गमन और प्रवेश वस्तुत. नहीं हो सकने। प्रतिपाद्यते=वैनलाया जा रहा है अर्थात् प्रयोननरूप से। विमर्श-इस अतिरायोकि का इतिहास-पूर्वप्रतिपादित अतिशयोक्ति के इतिदास से ही गनार्थे है।
प्रकार किया है- श्री विदयाचकवती ने मर्वस्वकार द्वारा किए गए इस अतिशयोकि के विवेचन का सक्षेम इस
'कार्यकारणयोयों तु कालसाम्यनिपरयेथी। अन्या स्वतिरायोकि सा विरोधाशोपजीवनात्।' -- 'वह एक अन्य ही अतिशयोकि होनी है जिनके कार्य और कारण के उत्पप्ि समय में मकता या उठटाब रहता है। यह विरोधाश पर निर्भर रदती है।' [सर्वस्व ] [ सू० ४५ ] तयोस्तु भिन्नदेशत्वेऽसंगतिः । तयोरिति कार्यकारणयोः। यद्देशमेव कारणं तद्देशमेव कार्य दृष्टम्।
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नहि महानसस्थो वहिः पर्वतदेशस्थं धूर्म जनयति। यदा त्वन्यदेशस्थं कारणमन्यदेशस्थं च कार्यमुपनिवध्यते, तदोचितसंगतिनिह तेरसंगत्या ख्योऽलंकार ।सच विरुद्धकार्यकारणभावप्रस्तावादिह लक्ष्यते। यथा- 'मायः पथ्यपराङमुखा विषवयेणो सूपा भवन्त्यात्मना निर्दोपान सचिवान् सजत्यतिमहाँल्लोकापवादञ्वर:। वन्घाः श्लाध्यगुणास्त एव विपिने संतोपभाज परं बाह्योडयं वरमेव सेवकजनी घिक सर्वथा मन्निनिण।।' अत्र पथ्यपराङमुखत्वसुपालम्भज्वरविषयत्वस्य भिन्नदेशह्वेतुरित्य संगतिः । एचम्- 'सा वाला वयमप्रगल्मवचसः सा स्नरी वयं कातराः सा पीनोत्तिमत्पयोधरभरं धत्ते सखेदा चयम्। सा क्ान्ता जघनस्थलेन गुरुणा गन्तुं न शक्ता वयं दोपैरन्यसमाश्ितैर पटवो जाता: स्म इत्यद्सुतम्॥' इत्यन्न ज्ञेयम्। अन्न वाल्यनिमित्तमप्रगल्भवचनत्वमत्यद्न्यच्च स्मर निमित्तकमित्यनयोरमेदाध्यवसायः। पवमन्यन्न क्षेयम्। [सू० ४५] किन्तु वे [कार्यकारण] भिन्नदेशगत हो तो [अलंकार का नाम] असंगति [होता है]। तयो := वे अर्थात कार्यकारण। कारण जिस स्थान पर रहता है उसी स्थान पर कार्य का रहना देखा गया है। ऐसा नहीं है कि रसोरईघर की अग्नि पर्वत पर के घुछ को उत्पन्न करे। किन्तु जव कारण अन्य स्थान पर और कार्य अन्य स्थान पर वतलाया जाता है तव उचित संगति न रहने से असंगति नामक अलंकार होता है। वह यहाँ इसलिए वतलाई या रही है कि यहाँ विरुद्ध कार्यकारणभाव का मसंग चला हुआ है। उदाहरण यया- 'पथ्यपराङमुख और विपयी प्रायः राजा लोग ही सयं होते हैं किन्तु लोकापवाद का मद्ान् ज्वर आाता है निर्दोष मन्त्रियों को। ये [ मन्नी] लोग ही यदि जंगल में जाकर -संतोष के साथ रहें तो इनकी वन्दना और इनके गुणों की प्रशंसा होती है। इसलिए ये वाहरी सेवक लोग ही अच्छे। मन्त्री लोगों को सवेथा धिक्कार है। यहाँ पथ्यपरासमुसत्व हेतु है उपालम्मज्वर का किन्तु वह मिनदेशस्थ है इसलिए असंगति है। इसी प्रकार-[वामन के द्वारा-विरोधालंकार के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत ]- 'वाला है वह किन्तु अप्रगल्म वाणी है हमारी, स्त्री है वह किन्तु कातर हैं इम, मोटे औौर उन्नत पयोघरों का मार है उस पर किन्तु सेद है इमें, जवनस्थल की गरिमा से क्लान्त है वह किन्तु चलने में असमर्थ हैं हम। इस प्रकार हम अन्याश्रित दोपों से अभिभूत हो गए हैं यह आश्चर्य की बात है।' -- इस पद्य में भी जानना चाहिए। यहां वत्यजनित सप्रगत्भ वचन मिन्न है और स्मर जनित अप्रगत्म वचन मिन्न। यहां इन दोनों में अमेदाध्यवसाय है। इसी प्रकार सन्य उदाहरणों में भी समझना चाहिए। घिमर्शिनी तयोरित्यादि। एतदेव व्यतिरेक मुखेनापि दर्शयति-नहीत्यादिना। उचितसंगतिनिवृत्तरिति।
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विषयभेदेन भवतीत्येकविपयाद् विरोधादृश्य भेद:। इह लक्ष्यत इति। अस्या अदि कार्य- कारणयोर्मिन्नदेशखवेन विरोधगभंखाद्। अभेदाध्यवसाय हति। अनेनातियोकिरस्या अध्यनुप्राणकरवेन कटासिता। अभ्यथा हि विरोधो दुष्परिहर। स्थात् एवं पध्यञवर- शब्दपोर तिशयोकिबलारपरजा पाएनयु क्तिसंतापचाचकर्व दष्टव्यम्। अन्यत्रेति कातरखवादी। तयोरित्यादि। इसीको व्यतिरेक द्वारा भी बनलाते है 'न हि' इत्यादि द्वारा। उचित- सगतिनिवृत्ते टचिव रगति न रहने से ययोंकि कार्य और कारण सदा ही रहते वो एक ही स्थान पर है तथापि यहा उनका भिन्न भिन्न स्थान में दिसलाए जाने से और इसी कारण कि वे दोनों भिन्न मिन्न स्थान में रहत हैं। पटन इसमें विषयमेद रहता है, यह विरोधानकार से मिन्न है, क्योंकि उसमें विषय एक दो रहता है। छह लचयते इसका लक्षम यहां किया जा रहा है। इसमें भी कार्यकारण मिन्न मिनन रथकों में रहते हैं अत. यह मी विरोध गर्मित है, इसलिए। अमेदाध्यवसाय-इससे यह बतलाया कि इस [असगति] में अतिशयोकि अनुप्राणक है। अन्यथा विरोध का परिहार कटिन हो जाए। इसी प्रकार 'पथ्य' और 'ज्वर' शब्दों में भी अतिशयोकि के वळ पर प्रजापालनयुक्ति और सताप को वाचकता समसनी चाहिए। अन्यत्र=अन्य स्थलों में अर्थात् 'कानरत्व' आदि में। विमर्ग-असंगनि का पूर्वेतिदास- असगति नाम का कोई भी अलकार न तो मामह के काव्यालकार में मिलना न बामन और उद्टट के। वामन में विरोगलकार के लिए जो 'सा बाला0' पद दिया गया है उसमें अरसगति अवश्य है किन्तु वहाँ अलंकार का नाम असगति नहीं है। असगनि नाम पहले पहल रुट्रट के काव्यालकार में मिलता है। रनट-'विम्पष्टे समकालं कारणमन्यन्न कार्यमन्यत्र। यस्यामुपलम्येने विद्वेयासंगति- सेयम्॥'-९॥४८।। उद्ाहरण-'नवयोवनेन मुननोरिन्दुकलाकोमलेन पूर्यन्ते। अङ्ञान्यसङताना यूर्ना हृद्धि वर्षत काम।।' 'नहाँ स्पष्टरूप से कार्य अन्यन प्राप्त हो और क्वारण अन्यन्न तो उमे अरगति समझना चाहिए।' यथा- -'इन्दुकला के समान कोमल नवीन चौवन से भरे तो जा रहे हैं अग उस सुन्दरी के, किन्तु काम की वृद्धि हो रही है दूरस्थ युककों के हृदयों में।' मम्मट-'भिन्नदेशनयाउत्यन्त कार्यकारणभूतयो। युगपद्ध्मयोर्यंत्र ख्याति सा स्यादसंगति:।' 'नहो कार्यकारणभून धर्मों का अत्यन्न भिन्न भिन्न स्थानों में मनिपादन हो उमे अमगति कहते है।' उदाहूरण-'दन्तशन कपोले वध्वा वेदना सपतनीनाम्' -'दात का थाव तो है वधू के कपोल पर किन्तु वेदना है सौतों में 1' मम्मट ने विरोध से असगति का अन्तर विरुद्ध तत्वों की मिन्नदेशता तथा पकदेशता को लेकर किया है। विमर्गिनी- कार ने उसी को अपना लिया है। विरोध में भिन्न भिन्न स्थानों में रहने वालों का एक स्थान में आना विरोध का कारण होता है जब कि अक्गति में सदा एक हो स्थान पर रहने वाटों का मिन्न भिन्न स्थान पर रहना। आगे पण्ढितराज के मत्त से भी यह तथ्य स्पष्ट होगा। चोभाकर-ने असंगति के आठ भेद माने है। उनका सामान्य लक्षण यह है- 'तयो देशका लान्यल्वमसंगति।'
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उन-हेतु और कार्य के देश तथा काल की विपरीतता असंगति कहलाती है।' यह विपरोतता इस प्रकार होती है। [१] एकदेशस्थ कार्ये की भिन्नदेशस्थता [२] भिन्ननेशस्थ कार्य की एकदेशस्यता [३] पश्चात्कालमावी की पूर्वकालभाविता [४] पधात्कालभावी की सहकालभाविता [५]तुरन्त बाद होने वाले की चिरकालमाविता [६)] बिरकाल्भावी की तत्कालभाविता [७] पेहिक कार्य की आमुष्मिकता और [] आनुष्मिक कार्य की ऐहिकता। इनमें से नवीन सात भेदों के वदाहरण देकर रत्नाकरकार ने अन्त में सभी में चारुत्व की सत्ता मानी है। उन्होंने लिखा है - 'भेदससकमन्रान्यद यदस्माभिरुदाहृतन्। चारुतातिशयात तत्मिन्ननलक्कारता कुतः ।' ये अतिरिक्त मेद भावुकतामात्र है। इ्नमें अतिशयोकि आदि से भिन्न कोई स्वतन्न्र मौलिकता नहीं है। अप्पय्यदीक्षित-ने भी असंगति के तीन भेद माने है। उनमें से प्रथम तो कार्यकारण की भिन्नस्धानस्थता मूलक ही है, श्ेप दो में से एक 'अन्यन्न करणीय कार्य के अन्यत्र किए जाने' से तथा द्ितीय 'अन्य किसी कार्य को करते करते उसके बिरुद्ध कार्य के कर डालने' से होती है। इनके लक्षण ये हैं- [१] 'विरुद्धं भिन्नदेशत्वं कार्यहेत्वोरसंगतिः।' [२ ] 'अन्यन करणीयस्य ततोऽन्यत् कृतिश सा।' [ ३ ] 'अन्यत्, कर्तु प्रवृत्तस्य तद्विरुद्धकृतित्तथा ॥* इनके वदाहरण है- [१ ] 'विपं जलधरैः पीतं मूर्च्छिता: पतिकाङ्गनाः।' विप [जल तथा जहर ] पिया मेषों ने और मूर्च्छित हुई पथिकों की ख्त्रियां। [२] अपारिजातां वसुधा चिकीपन् यां तथाडकरोत्। 'श्रीकृष्ण चाहुते बनाना पृथिवी को अपारिजात[अप = अपगत हो गया है छट गया है अरि = शत्जु का जात=समुदाय जिससे तथा 'पारिजातरहित'] किन्तु बना दिया अपारिजात [पारिजात दरण द्वारा पारिजात रहित ] घी को।' [ ३ ] 'गोतोद्वारप्रवृत्तोडपि गोतोन्वेदं पुराषकरेव्।' श्रीकृष्ण रगे तो थे बोबोद्वार [गोत्=पृथिवी के उद्धार में] किन्तु कर दिया उन्होंने उससे उलटा गोतोन्हेद [ गोबा प्रथिवी का भेद नाश तथा गोत=पर्वत अथवा वंश का] कर दिया।' इनमें द्ितीय भेद विशेषालंकार में तथा तृतीय विरोधालंकार या विपमालंकार में अन्तर्भूत हो जाता है। मण्डितराज ने भी इनका खण्डन किया है। पव्दितराज-जगनाथ ने असंगति का वक्षण इस प्रकार किया है- 'विरुद्धत्वेनापाततो मासमान हेतुकार्ययो वैय्यधिकरण्यमसंगतिः।' हेतु और कार्य का मिन्न-मिन्न अधिकरण में रहना, जो आपाततः विरुद्धसा लगता है, वरंगति कहंलाता है।
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अलङ्गारसर्वस्वम्
पण्डितराज ने सर्वरवकार की इस मान्यता का खण्डन किया है कि असंगति में अतिशयोकि सहायक होती है। सण्डन में उन्होंने वेवल शब्द पर आक्षेत किया है। कहा है कि यहाँ अनिशयमात्र महायक है अनिदयोक्ति नहीं। वस्तुन यह सर्बं्वकार के कथन का सष्षीकरण- मात्र है।
विमर्शिनीकार का मी खण्डन करने हुए पण्टितरान ने हिसा है कि उन्होंने दक अधिकरण में दो के मबन्ध से विरोध होता है और असगनि में मिन्न मिन्न अधिकरणों में यह जो भेद बनलाया है यह अमान्य है। कारण कि अम्यनि में मी दो निरद्ध धर्म एक ही स्थान पर रहने है ये धरमे हैं कार्यत्व और कारणवैयधिकरण्य [कारण के अधिकरण मे अश्ग रहना ]। अन्नन विरोध से असगनि का अन्तर पण्डितराज ने दो हेतुओं द्वारा बनदाया है। १-उत्पत्िपरामर्श, यह विरोध में नहीं रहता। असगति में रहना है। २-मित्र मिन्न स्थान पर रहने के लिए प्रसिद्ध पदार्थों का एक स्थान में रद्दना विरोध का निष्पादक तत्त्व है और एक स्थान में रहने वालों का मिन्न स्थान में रहना अनगति का। यह भेद इम भी अभी-अभी दतला आए है। विश्वेश्वर-'हेतुव्यधिकरण स्यान् कार्य चेन् सा त्वसंगति.प्रोक्ता।' -यदि कार्य हेतु के माश्रय से मिन्न आश्रय में बतलाया जाय तो उसे असगति जाननी चाहिए।' विशेशवर ने पण्डितराज द्वारा किए गए विमशिनीकार के उपर्युक्त विरोध का प्रतिवाद किया है। वन्तुद पवहितराज का तात्पयं भेदक कसौटी तय करने में था। वह उन्होंने द्वितीय कर्प द्वारा तय कर दी है। विशेश्वर को भी वह मान्य है। भीविद्याचकवत्ती ने अस्ंगति का सक्षेप इम प्रकार किया है- 'कार्यंकारणयोमिंन्न देशत्वे स्यादसगति 1 अभेदाव्यवसायादिविच्छित्त्या दृश्यते च सा।।'
[सर्वस्व ] [सू० ४६] विरूपकार्याSनर्थयोरुत्पत्तिर्विरूपसंघटना च विपमम्। चिरोधप्रस्तावेनेह लक्षणम्। तभ कारणगुणप्रक्रमेण कार्यमुत्पद्यत इति मसिद्धी यदिरूप कार्यमुत्पद्यमानं ददयते तद्देकं विपमम्। तथा कंविदुर्थ साधयितुमुद्यतस्य न केवलं तस्यार्थस्याप्रतिलम्भो यावद्नर्थपातिरपीति द्वितीयं विथमम्। अत्यन्ताननुरुपसंघटनयोविरुपयोध् संघटनं तृतीयं विपमम्। अननुरूपसंसर्गो दि विषमम्। क्रमेण यथा- 'सय: करस्पर्शमवाव्य चित्रं रणे रणे यस्य कृपाणलेसा। तमालनीला शरदिन्टुपाण्ड यशस्त्रिलोकाभरणं प्रसूते ।।' 'तीर्था-तरेपु मलपङ्कवतीर्विहाय विव्यास्मनूस्तनुभृतः सहसा लभनजं। चाराणसि त्वयि तु मुक्तकलेवराणों लामोऽस्तु मूलमपि यात्यपुनर्भवाय ।।'
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विपमालङ्गार: ४८९
'अरण्यानी क्वेवं धृतकनकसूत्र. क्व स नृगः क्व सुक्ताहारोड़यं क च स पतगः केयमचला। क् तत्कन्यारत्न ललितमहिभर्तुः कर च व्यं स्वमाकृतं घाता निमृतनिमृतं कन्द्लयति
त्पत्ति:, अत्यन्ताननुरूपाणा चारण्यात्यादीना परस्परं संघटनं क्रमेण मन्त- व्यम्। केवल्रमनर्थात्पत्तिरत्र व्याजस्तुतिपर्यवसायिनीति गुद्धोदाहरण- मप्यूह्यम्'। [सू० ४६] विपरीत कार्य तथा अनर्थ की उत्पत्ति साथ ही विपरीत संघटना विषम [नामक अलंकार होता है ]। इसका लक्षण यहां विरोध के प्रसंग से किया जा रहा है। इसमें 'कार्य, कारण के गुणों के अनुरूप [ गुणों से शुक्त होकर ] ही उत्पन्न होता है' इस प्रसिद्धि के रहने हुए भी जो विपरीत गुण वाला कार्य उत्पन्न होता दिखलाया जाता है वह एक प्रकार का विषम होता है। इसके अतिरिक्त 'किसी लाम को सिद्ध करने के लिए उद्यत व्यक्ति को उस लाभ की प्राप्ति तो नहीं ही हो ऊपर से अनिष्ट की प्राप्ति और हो जाए यह दूसरे प्रकार का विम होता है। दो स्रतयन्त अननुरूप अर्याद पदार्थो की संघटनाएँ वृतीय प्रकार का विषम होता है। प्रतिकूल संघटना ही विषम है। इन के क्रम से उदाहरण [विपरीतगुणी कार्य की उत्पत्ति से होने वाला विपम ]- 'यह मश्चर्य की बात है कि तमाल जैसी नीली कृपाणलेखा प्रत्येक युद्ध में जिसके कर का स्पर्श पाकर शरत्काक्षीन चन्द्रमा से शुभ्र और तिलोकी के भामरण यश को उत्पन्न करती है।' [नवसाहसांकचरित १६२] [ अनर्थ की उत्पत्ति से होनेवाला विषम ]- अन्य तीथों में शरीरघारी लोग मलिन शरीर छोड़कर दिव्य शरीर प्राप्त कर लेने हैं। परन्तु हे काी! तुझमें शरीर छोड़ने वालों का लाभ तो दूर रहे, मूल [भूत शरीर] मी फिर से उत्पन्न न होने के लिए चल बसता है [ वस्तुतः इस पद्म में व्याजत्तुति और व्वतिरेक अलंकार है]। [विपरीत पदार्थो की संघटना से होने वाला विषम यथा ]- 'कहाँ यह [ बिन्ध्य ] भटवी और कहाँ वह सुवर्णे की सॉकल पहने हिरना, वहाँ यह मोतियों का इार और कहाँ वह पक्षी [हंस], कहाँ वह अवला [पाटला नामक शशिपमा की सखी], सर्पराज [शंखपाल] की कहाँ वह्द उत्तम सुन्दरी कन्या और कहां हम। विधाता अपनी इच्छा अत्न्त निभृत रूप से पूर्ण करता रहता है [ नवसाहसांकचरित ५।८१ ]।
१. निर्णयसागर प्रति में इतना पाठ अधिक है-'यथा- 'परहिभअं सग्गंतीइ् आतम अत्तणो तए हिवअं। अच्यो ल्लाहप्स कए मूलाओ विछेइ्भा जाआ।' [परहृदयं मार्गनया हारितमात्मनस्तया हृदयम्। हंहो लामस्य कते मूलविच्छेदिका जाता। ] इति तत्रोदाइार्थम्।
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४९० अलङ्कारसवस्वम् इन [तीन पद्यों में ] क्रम से [प्रथम पद्य में] कृष्णवर्ण से शुद्धवर्ण को उत्पत्ति, [द्वितीय में] शरीर के अत्यन्न अपहररूणपी अनर्थ की प्रात्ति तथा [तृतीय में ] जगल आदि अत्यन्त बेमेल पदार्थों का परस्पर मिलान मानना चाहिए। इनना अवद्य है कि यहाँ अनर्थोकपत्ति व्याजस्तुति में पर्यघसिन हो रही है फलन इसका कोई शुद्ध उदाहरण सोच लेना चाहिए। विमर्शिनी विरुपेन्यादि। रदेति। अश्याप्यननुस्पसंसर्गेण विरोधगभरवाद। विरूपमिति। कारणा पेचया विनातीयरवेनातद्गुगरवात। यद्यपि 'गोमयाद्यृत्रिकोरपतिः' इतिवदकार्यकारण योर्वरितवं विरुपत्व संभर्वत, तथापीह कविम्रतिभानिर्वतितमेव तद ग्राद्यम। तेन 'दाक्ाफलानि शिसु रेपु शिलोच्पानां पीयूपसाररसनिभरगर्भवन्ति। चिप्वग्ट पर क ठिन का य निगूढ शृद्धभपट का नि पुनरम्मसि समवन्ति ।' इश्यादी विषम न वाच्यम्। ईदश एवं कार्यकारणभाउस्य वस्तुत, संभवान्। तस्येति साधयिनुमिष्टम्य। अप्रतिटम्म इति। असिद्धिरिति यावतू। अत्यन्नेति। न केचलं तयो हवय विरुपरवं यावत्तरसंघटनाया अप्यननुरूपरवमित्यय्र तातपर्यम। एकमिग्याद्यभिद्धता अन्यकृता विपमार्णं मिसननमुकम्, न मकशप्रकारित्वम्। सामान्यवस्षणश्यासंभवाद्। पुवमेव पुनरेषां कस्मादमिधानमित्याशट्याह-अननुरूपेत्यादि । यर्रिकचिरपुनरामददर्शन-
सग्वाप निरातमिति न तदेव सिद्धान्तीकार्यम्।तस्य पृथटनिरसिप्यमाणरवास्। इछ हि यथादबत्यस्माकमाग्रहम्टृत्तपर कीयदूषणोद्धारमात्रमेव विवितम्। यथोपयोगं पुनस्तवनिराकरणमपि कृत करिष्यते च। अम्र शुक्त कृष्णवणरवं कार्य कार णातमकविपय वयगतत्वेन स्थितमिग्यस्य मिन्नविपयरवा देकविपयाद्विरोघानेदो ज्ेय.। एवमन्यवरापि जेयम्। अरण्यान्यादीनामननुस्पमन्यो न्यघटन वास्तवमित्युदाहर णन्तरेणोदाइियते। यथा- शिरीपादपि मृद्द्ी वेवेयमायतलोचना। क्षय कव च कुफूलामिकर्कशो मदनानल:।।' अग्नाननुरू्पपोस्तन्वीमदनानछयो: सघटनम्। अन्नेति तीर्थान्तरेप्विरयादौ। शुद्धेति। यन्न विपममेव न स्यात्। तततु यथा- 'यो इठं प्रतिनिपेद्धुसुदस्तः सुम्नुवा पियतमस्य कटान.। स पतोद इव तस्य विशेपातमेरका किमपि इन्त सभूब ।' अत्र कटावस्य हठनिवेधायोद्स्तरय म केवल तदसिदिर्यावत्तरमैवात्यन्तंस मेरको जान हृश्यनर्थोतपत्ति। विरपे्यादि। ६ह=इम प्रसग में क्योंकि यह अलकार भी अननुरूपसमर्गात्मक होने से विरोधगर्मित है। विरूप=कारग की अपेक्षा विजातीय होने के कारण अर्यातू उसके गुग से युक्त न होने के कारण। यद्यपि कार्य और कारण में विलुपना वास्नविकु भी होनो है [ यया ] गोमय [गोदर] से विच्छ की उत्पत्ति होनी है, तथापि यहाँ कविप्रतिभाप्रस्तुत विरुपता हो अपनानी चाहिए। इमलिए- अमृतसाररूपी रस से निवरां गर्मिन दाशाफळ पहाड़ों के शिखर पर होते हैं और चारों औोर में कठिन शरीर के गृंग छिपाए सिंघाड़े पैदा होते हैं पानी में।
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विषसालह्वार: ४९१
-इत्यादि र्थलों में विषम नहीं मानना चाहिए। क्योंकि ऐसे ही है वे कार्य-कारणभाव जो वारतचिक होते हैं, [कस्पित नहीं]: तस्य =उस सिद्ध करने के लिए अमोष्ट। अप्नतिलक्भ असिद्धि। अत्यम्त-अर्थ यह कि केवल वे स्वयं ही विरूप नहीं होते, अपितु उनकी संघटना भी वैसी ही विरूप होती है। एक इत्यादि कहकर अन्थकार ने तीनों विषमों की परस्पर मिन्नता वतलाई न कि प्रकार प्रकारिभाव। क्योंकि इनसे कोई सामान्य लक्षण संभव नहीं है। फिर इन्हें वतलया कैसे इस पर कहते है अननुरूप। अन्य आाचार्यों ने थोड़ा अधिक कह दिया है जो हुमारे सिद्धान्त के विरुद्ध है, और हमने भी उसका खण्डन नहीं किया है, क्योंकि हुमारा चित्त अन्यस्थित पदार्थो की व्यवस्थित व्याख्या करने के लिए उन्मुक्त है। किन्तु पनावता उसे सिद्धान्तभूत नहीं मान लेना चाहिए। उसका निराकरण अलग से किया जाने वाला है। यहां तो हमें आग्रह में भड़कर दिए गए दूसरे के दोपों का उह्ारमात्र ययाशक्ति करना अभोष् है और वह जहा जितना आावश्यक था इमने पहले भी किया है और आगे मी करेंगे। यहाँ कृष्णता और शुकलता कार्यकारणात्मक दो भिन्न वस्तुओं में अवस्थित है अतः विषम मिन्न होने से इसका विरोध से अन्तर है, विरोध में आधार एक ही होता है। अन्यन्न भी इसी प्रकार समझना चाहिए। 'अरण्वानी०' आदि पद्य में जो पदार्थों की विपरीत योजना है वह वास्तविक है इसलिए हम एक अन्य उदाहरण द्वारा इसे स्पष्ट करते हैं। यथा- कहां तो शिरीप से भो अधिक कोमल अंगों वाली यह विशालनेत्रा और कहां यह तुपाग्नि के तमान कर्कश कामानल।' -यहां [कविकलपना में ] दो विपरीत गुणी पदार्थ, तन्वरंगी तथा कामानल का मिलन है। अन्र= यहाँ अर्थात् 'तीर्थान्तरेयु' पघ्य में। शुद्धा =अर्थात जहां केवल विषम ही हो। उसका उदाहरण चथा- 'अच्छी मौहो वाली उस कामिनी ने जो कराक्ष [वाण] हठ का प्रतिषेध करने के लिए प्रियतम पर छोड़ा, इन्त, वह तो किसी भी कारण चाबुक की नाई उसके लिए और अधिक प्रेरक हो गया।' -यहां हठ के निषेध के लिए चलाए कटाक्ष से इस कार्य की असिद्धि ही कैवल नहीं हुई प्रत्युत 'वह उसी हठ का अधिक पेरक वन गया' इस प्रकार अनर्योतपत्ति और हो गईं। विमर्स-अनर्थोत्पत्ति वाले विषम के शुद्ध उदाहरण के रूप में स्वयं मूल में ही पक गाथा निर्णयसागरीय प्रति में छपी हुई है। श्रीरामचन्द्र द्विवेदी ने उसे मूल मान लिया है। पृष ४८९ पर उसे हमने अविकल रूप से अपनी ननाईं संस्कृत छाया के साथ पादटिप्पणी में दे दिया है। अन्थकार ने जब उसके उदादरण की कर्पना करना 'अभ्यूद्यम्' कहकर पाठकों पर छोड़ दिया, तब वह स्वयं उदाहरण देगा यह संभव नहीं लगता। विमर्शिनी, समुद्रबन्धी तथा संजीविनी में भी इस अंश का उल्लेख नहीं हैं। विपम का इतिहास :- भामह, नामन तथा उजट में विषम का विवेचन नहीं मिलता। पहले पहल रुद्रट के काब्दालंकार में इसका विवेचन इस प्रकार मिलता है- नद्ट- 'कार्यस्य कारणस्य च यत्र विरोध: परस्परं गुणयो: । तद्वत क्रिययोरथवा संजायतेति तदू विषमम् ॥९४५॥ -नहां कार्य और कारण के गुण या क्रियाओं में परस्पर विरोष हो उसे विषम कहते हैं।
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अलद्धारसर्वस्वम्
उदाहरण= [१] 'नीले सड्षग मे शुभ यश नर्पप्र होना'-इमी भाव का पद्य। [२] आनन्दममन्दमिम कुवलयदल्लोचने ददासि र्वम्। निरइस्तवयेव जनिनस्तापयतितरा शरीर मे ॥९४७॥ 'हे नीलकमन् की पंसुडी जैसी आँसों वाली' तुम सय तो अत्यन्न आनन्द देती हो किन्सु दुम्दारे द्वारा ही उत्पन्न वियोग उनना हो तथना है।' रुद्ट ने विरुपमंघटना वाले विषम को मी वास्नव नामक अ्नंकार वर्ग में गिनाया है- 'विषम इति प्रथितोडमी वकाा विषट्यति किमपि सम्वन्धम्। यत्रारथंयोरसन्त परमतमाशाङ््य नत्सत्वे । ७७। -उमे विषम कहा जाता है जहाँ वन्तुओं के अशोभन सम्न्ध को दूसरे के अनुसार घोमन रूप से प्रतिपादित समझ वत्ा अनुचित प्रतिपादित करता है। यथा-'क्व खला. कव च सज्जन रतुनय.' कहाँ खल और कहां सज्नों की स्तुति ।' मग्मट-मम्मट ने रुट्रट से बडकर विषम में वह भेद और जोड़ा जिसे सर्वस्वकार ने अनर्थ- प्राप्ति कहा है। उनका विषमा लकार विवेचन इस प्रकार है- 'ववचिद् यदतिवेध्म्यान्न इलेषो घटनामियाद। कर्स. क्रियाफलावापिनैवानर्भंदच यद मवेद। गुणक्रियाम्यां कार्यस्य कारणस्य गुभकिये । क्रमेग च विरुद्धे यव स यप विधमो मत:।' -पहैँ [ १] अश्यन्त वैध्म्य होने से वस्तुओं का सम्बन्ध फबता न हो [र]कर्षा को क्रियाफल की प्राप्ति तो हो ही नहीं अनर्थप्रामि और दो जाय, [३ ] कार्य के गुग नया क्रिया क्रमशः कारण के गुण तथा क्रिया मे विरुद्ध हो तो यह [चार प्रकार का ] विषम होना है।' उदाइरण के रूप में उनहोंने प्रथम दो के लिए निम्नलिखित पद्य दिये है- [१]'शिरोषादवि मृदवह्गी' [विमसिनी में उदृत] ['] सिदिकासुनमननरत शशः शीनांशुमागन । जग्रसे साश्रय तत्र तमन्य सिहिकामुनः। -सिहिका [सिंहो] के सन [सेर] से डरा हुआ खरहा चन्द्रमा में पहुँचा। वहाँ उसे उसके आश्रय के साथ ही एक दूमरे सिंहिका [राहु की माता ] के सुन [राहु] ने ग्रस लिया। [ यहाँ सिंदिकायद में दलेप है]। रेष दो भेरो के लिए मम्मट ने नवमाइसांकचरित का 'सथ. करस्पशमवाप्य' यह पद तथा सद्ूट का ही 'आनन्दममन्दमिमम्०' पद उद्धन कर दिया है। इस विवेचन से स्पष्ट है कि सवस्वकार ने कार्यकारण के वैषम्य को गुण तथा किया के दो भागों में नहीं वाँटा। विमशिनीकार ने भो इम दिश्ा में ध्यान नहीं दिया। परवत्ती आचार्यों में- शोभाकर-ने [१) अर्थानर्थेपदे सदन्यस्योतपत्तिविषमम्।
-इन दो सूत्रों में विषम के निम्नलिस्नित पाँच नेद माने हैं- १-अर्ष के स्थान पर अनर्थ की प्रात्ति १-अनर्थ के स्थान पर अर्थ की प्राप्ति
४ -- विरुपसंघटन तथा ५-असमन्नवा
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चिषमालङ्कार: ४९३
इनमें से प्रथम, तृतीय तथा चतुर्थ के उदाहरण तो वे ही माने जा सकते है जो स्वसककार ने दिए हैं। शेप द्वितीय तथा पंचम के वदाहरण रत्नाकर में ये हैं- 'वेन राहुरपि निमहेच्छुना दुर्मरीदरमिंदा सस्तीकृतः।' 'जिन विष्णु मगवान् ने चाहा तो या रादु का निगह किन्तु दुर्भर उदर भलग कर बना लिया उस्े मिन्र०। पृथ्वीय खुद्व पीठिका सुघदित सिक तदेनन्भः सानी चागरनिन्नगा जलमिद सबजीकृत बत्तते। अस्त्येपा पुरतः स्थिता नवनवा नक्षत्रपुष्पावली स्यान्चेव करचन पूजकोडन तदियं पूजोपकलप्ता भनेत्॥ -यह वितत भूपस पीठिका है और यह आकाश है शिवलिद। सुमेरुनंग पर गंगाजी का यह जल भी तैयार है। सामने हो नक्षमों की यह नई नई पुष्पावली मी उपस्थित है। कोई [पूजा ] करने वाला यहाँ होता तो यह सूजा पूरी हो जाती।' इस पच्यरत्न में सेवल पूजा करने वाले की कमी है इस कारण पूजा में कमी पड़ रही है। यह एक खलने वाली बात है अतः यहां विषम हुआ। रत्नाकरकार ने विषम विवेचन में एक क्रान्ति भी प्रस्तुत की है। बन्होने अधिकालंकार को मी विषम में ही अन्तर्भूत करना चाहा है। उनका कह़ना है- 'आधाराधेद्रयोर्यंत्र संसर्ग: स्याद विरुपयो: । स स्फुटी विषमो वाध्यमधिक नाधिकं ततः ॥।' -जहां आधार तथा आधेय की संघटना भी विरुप हो नहा विषम ही मानना चाहिए, मतः एक स्ववन्त्र अलंकार अधिकालंकार नहीं हो सकता।' उन्होंने इस तर्क की पुष्टि में अन्य तर्क प्रस्तुत करते हुए लिसा है 'यदि अधिक नामक एक स्वतन्त्र अरंकार माना जाता है तो 'विशुण'-नामक मी एक स्वतन्त्र अलंकार माना जाना चाहिए जहां कारण कार्य के गुण परस्पर विरुद्ध हो। रत्नाकर- कार की सार्किक सर्वरता स्तुत्य है, किन्तु वस्तुतः अधिक अलंकार अतिरायोकि पर निर्भर है और विषम विरोध पर। अल्यकाल में पूरा संसार जिनमें समा जाता है वन्हीं श्रीकृष्ण में नारद- मिलन का आनन्द नहीं अटा-इस उक्ति में विरोध नहीं अतिशय ही अधिक मानन्दकारी है। अप्पस्यदीक्षित ने वियम के वे ही भेद माने हैं जो मम्मट मे माने हैं। उनके बदाहरण प्रायः वे ही अमिव्यक्तियां हैं जो मम्मट ने प्रस्तुत की हैं। यथा- [१] 'विषम वर्ण्येते यन घदनाननुरूपयोः। कवेयं शिरीपमृद्वङ्ी कत तानन्मदनज्वर:॥ विषस उसे कहते हैं जिसमें अननुरूप पदार्थो की जोड़ी बतलाई जाती है। कहां तो यद शिरोपतुल्य कोमल अंगों वाली सृन्दरी और कदां वह कामज्र। [२] विरूपकार्यस्योत्पत्तिरपरं विपमे मतम्। कोत्ति प्रसुते धवलां श्यामा तब कृपाणिका ॥ चिपरीत कार्य की उत्पत्ि दूसरा विषम है। यथा आपकी श्याम असि श्वेत कीर्ति उत्पन्न करती है।
मध्याक्षया हि्मज्जूषां दड्डाइखुस्तेन भक्षितः। इष्टार्थ के लिए प्रयत्न करतेकरते अनिष्ट की प्राप्ति भी विषम होती है। यधा-'मक्ष्य वस्तु की आशा ते साँप की पिटारी कुतर कर चूहा साँप के द्वारा सा लिया गया।'
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अप्पय्यदोक्षित ने केवल अनिष्टप्रापि में भी विषम माना है और उसके अनेक उदाहरण दिए है। उनमें से एक यह है- 'नपुंसकमिति शत्वा मियाये मेषित मन. । तक्ष तमव रगते इता. पाणिनिना वयम्॥ -'इमने मन को नपुमक ममझ कर मिया के पास भेगा किन्तु वह वही रम कर रह गया। पाणिनि ने [नन को नपुमकलिह् बनलाकर] इने मार डाला ।' किन्तु यर्दा भी इष्टावासि विवक्षिन है। वेदल शब्दन कथिन नहीं है। दूनर्सप्रेपण प्रियामाति के उद्देश्य से ही होता है। पण्टिनराज ने मी इमी त्त से अध्पव्पदीक्षित के इस मन का सण्डन किया है। पण्टितराज ने सर्वस्वकार का 'अननुरुपमसर्गो विपमम्' यही वाभ्य विषम का लक्षगमूय मान दिया है। स्मर्ग को उन्होंने अनेक प्रकार का बनलाया है जिननें मम्मटामिमन समी विषममेद आ जाने है। 'अरण्यानी' पध में विर्माशनीकार के हो समान यविकश्पितता के अनान में विषम संसर्ग को अलकार नहीं मानना ही उचित बनलाया है। विश्वेश्वर ने सवस्व के समर्थन में तर्क देने हुए दिखा है कि 'अरण्यानी' आदि पदार्थों में कविकस्पितता मले ही ने हो किन्तु उनकी परस्पर योजना तो कविकस्पित ही है। इरिण और इस में बनकमूत्र तथा मुत्ताहार की और उन दोनों की विन्ध्याटवी में उपस्थिति कविकक्पित दी है। मम्मट की ही परम्पर पर विषम का लक्षग विश्वेश्वर ने इस प्रकार बनाया है-
जन्यजनकोमयशुण किया विरोधे च विषम: स्यान्।।' विश्वेशर ने उदाहरण कालिदाम साहित्य मे चुने हैं- (१) 'क रुज्रा दृद्यप्रमायिनी०'[ मालविकग्निमित्र :।] (२) न खतु न सतु वाण [शाु्तल-१] जो अधिक स्वामाधिक और प्रभावपूर्ण है। स प्रेषणौयता इनमें भरपूर है। श्रीविद्याचकवतीं ने सवस्व के विपमालद्वार के विवेचन का कारिकात्मक मक्षप इम प्रकार किया है- 'विरूपानर्थयोर है त्वोरुतपस्तिनरिषम मनम्। तथा विरूपघटना नेनेद त्रिश्नभेदकम्।।' [सर्वस्व ] [सूत्र ४७ ] द्विपर्ययः समस् । विषमवैधर्व्यादिद प्रस्तावः। यद्यपि विषमस्य भेदवयमुक्तं तथापि तच्छव्देन संभवादन्त्यो मेद: परामृश्यते। पूर्वभेदद्यचिपर्षयस्थानलका रत्वात्। अन्त्यभेद्विपर्ययम्तु चारुत्वात् समास्योडलंकार। स चाभिरुपा नभिरूपविषयत्येन दविविध:। आधो यथा- 'रवमेयंसौनदर्या स च रचिरतायाः परिचितः कलानां सीमान्तं परमिह्द युवामेव भजयः। अयि द्वन्व्वं दिष्ठ्या तदिद सुभगे संवदति वा मतः श्ेर्षं यरस्याज्नितमिद्द तदानी गुणितया।।'
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अन्नाभिरूपस्यैव नायकसुगलस्योचितं संघटनमाशंसितम्। द्वितीयो यथा- 'चित्रं चिन्नं वत बत महन्ितमेवद्विचिन्नं जातो दैवादुचितर चनासंविधाता विधाता। यननिरबारना परिणतफलस्फीतिरास्वादुनीया यच्चैतस्या: कवलतकलाकोविद: काकलोक: ॥' अन्नानभिरुपार्ण निम्बाना कासानां व समागम आशंसित:। आनुरुप्यात समत्वव्यपदेशः। [सूत्र 8७]उस [विषम] का उरदा सम [अलंकार कहलाता है ]। विषम के साथ [इस अलंकार काा] वष्न्य है अतः [इस] यहाँ प्रस्तुत किया का रहा है। यद्यपि विषम के तीन भेद वतलए हैं तथाे यहां 'तत=उस' शब्दर से अन्तिम भेव का ही परामर्श किया जा रहा है, क्योंकि उसी का परामर्श यहाँ सभव है। यह इतलिए कि [विषन के] प्रथम दो मेदों का विपरयय अलंकारसप नहीं होता। जब कि अन्तिम भेद का विपचेष वारत्व से युकत होने के कारण 'सभ'-नामक अलंकार होता है। वह दो प्रकार का होता है सृन्दरविपयक [सृन्दर सुन्दर का योग] तथा अनुन्दरविषयक [असुन्दर असुन्दर का योग ]। इनमे से प्रथम, चथा- 'सखि ! तेरा सौन्दर्य ऐसा है और वह सौन्दर्य का देत्ता है। कलाओं की अन्तिम सीमा को तुम दोनों ही धारण करने हो। तुम दोनों का जोड़ा भी, नास्य से, फवता है। वतः अ जो होना शेष है यदि वह हो जाए तो चुणवत्ता की जीत हो जाए। यहाँ नायक नाविकारुपी अच्छो-अच्छों के ही उचित योग की इच्छा की गई है। द्वितीय चथा- 'आश्चर्थ,माश्चर्य, वाह वाह, बहुन ही बड़ा आश्चर्य, विचिन ही है यह विधासा, भाग्य से, उचितरचना करने वाला सिद्ध हुआ। क्योंकि नीम की पकी निमोरो की स्फीनता जैसी आत्वादनीय है उसकी कवलनकछा का ैसा हो कोविद काक समुदाय उसे मिल गया है।' यहाँ नीम और काक इन असुन्दर वस्तुओं का सनागम वतलाया गया है। [दोनों में] अनुरूपता है अतः इसे सम कडा गया। चिमर्शिनी वद्विपर्यचेत्यादि। संभवादिति, मलंकारत्वस्य।अनरंकारत्वादिति। कारणाद कार्योपततेः, वस्तुसाधनोद्यतत्य तसिद्वेश्व वास्तवत्वात्। बधेवं तव सरुपसंघटनापि वस्तुत एव युन्केति तत्या अदि कथमलंकार त्वमित्याशङयाह-अन्त्येत्यादि। चासम्मादिति, सलंकारत्व पर्यवसाचिनः । असिरुपेति। जोभनाशोभनविपयखेने र्थः। श्राद्य इति, भमिरुप निपयः। द्वितीय इति, अनभिरूपविषयः। आपुरूप्यादिति, औचित्यकप्षणात्। तद्विपर्ययेत्यादि। संभवाव= संभव होने से अर्थात अलंकारत्व के संभव होने से। सनलंका रत्वास=अलंकार न होने से अर्थात कारण से कार्य की उत्तत्ति के अलंकार न होने से। क्योंकि किसी व्यक्ति का किसी वस्तु की सिद्धि के लिए उद्यत तथा उसको उसकी सिद्धि मिलना लौकिक सत्य है, यदि ऐसा है तो सरूप सरूप की संघटना भी लौकिक सत्य है, उसे मौ अलंकार कैसे
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४१६ . अलङ्गारसवस्वम्
माना जाए । इस पर उत्तर बने हैं-अन्तप रत्यादि। चारु्यात् चारुल होने से अर्थात् अलंकारत्व में पर्यसिन दोने वाले चारत के होने से। अभिरूप=सर्वात शोमन-विषयक और अशोमन- विषयर होने से। आथ= प्रथम = अिम्यविषय [सदरविषय]। द्वितीय= अनमिरपविषय= असुन्दरविषय। आमुरूप्यात् = अनुरूपना जो औचित्वम्वरूप होनी है। विमर्श-समाउंकार का इतिहाम- मामद, वामन, उड्ट तथा रुट्रट में समाक्कार नहीं मिलता। अत. यह मानना अप्रामाणिक नहीं होगा कि इसका निरूपण पहले पहले मम्मट ने ही इस प्रकार किया है- 'सम योग्यतया योगो यदि समावित हचि्।' -यदि कमी के माथ किसी के इवव्य सबन्ध की समावना की जाए तो समारकार होता है। मग्नट ने इमे दो प्रकार का मी बनलाया है सद्योगात्मक नथा अमद्योगात्मक। इन्दी दो शब्दों के हिर मर्नस्वकार ने अमिरूपविष्य और अनमिरूविषय शब्द दिए है। मम्मट ने इनमें से प्रथम का जो उदादरण दिया है वह सर्वस्व के 'त्वमेवसौन्दर्या' पद्य का समानार्थी पद है- 'धानु शिव्वानिशय। मम्मट ने 'सवमेतसौन्दर्या' पद्य को भी सप्तम उशलास के दोष प्रकरण में अमवन्मतयोग दोप के लिए उद्धृत किया है। इमके चतुर्थधरण में चेन् के लिए अपेकिन 'तव' पद का अमाव है। अन. उसमे अपेक्षिन चेत का सबन्ध हो नहीं पाना। द्विनीय के उदाहरण के लिए मम्मट ने 'चिन्रं चित्र' पद्य ही उपरिथन किया था। परवत्ती आचार्यों में- शोभाकर ने सम का उक्षण तो वही बनाया जो सर्वस्कार ने बनाया है-'तदिपर्यय, समन्' किन्तु उन्होंने तत्पद से विपम के तीन नेहों का भी परामर्श किया है।-'तच्छम्देन श्रयाणं विषममेदाना परामर्श ।' ये तीन भेद हैं अनुरूपसयोग, कारण से अनुरूप कार्ये की उत्पत्ति तथा साममौसाकव्य। कारण से अनुरूप कार्य की उत्पत्ति में भी ने चारुत्व पाते हैं और सामग्री की समग्रता में भी। इनके उराहरण उन्होंने इस प्रकार दिए हैं- *सन्ध्यासगोत्र कुसुमम्वन्धसुवाइ यद गाढमसोकशासी। विलासिनीयवकपकविग्पादप्दारस्य तदेव कृन्यम्।।' -'अश्योक वृक्ष ने जो सन्ध्या जैमे वुमुमसमूदद को पर्याप्रमा्त्रा में धारण किया वह टीक हो है करोंकि विलासिनी के यातकरजिन पाद प्रहार का परिणाम होगा ही वही।' यहां लाल अरते से रजित पर के प्रहार के अनुरूप लाल पुष्वों की उत्पत्ि की कल्पना में चमर्कार अवदय है। इमें लमना है यह चमत्कार व्यग्य उत्प्रेक्षा पर निर्मेर है। ममग्रना के लिए उदाहरण- श्रीहर्षों निपुणः कवि: परिषद्प्येषा गुणमाहिगी लोकानन्दि च बोधिसत्ववरित नाटथे च दक्षा वयम्। वस्त्वे के कमपीइ वाक्ठित फलप्राप्ते पद कि पुन- मेज्ाग्योपचयाटय समुदिनः सर्वो मुगाना गण ॥' -[नागानन्द नाटक में सूत्रधार का परोचना वाक्य] श्रदप निपुण कवि है, यह दर्शक समाज मी शुगवाही है, वोपिसच का चरिन लोकाननददायी ह और इम भी नाव्यनयोग में दक्ष है। एक एक वस्तु मी अमौष्ट फळ देने में कारग बनना है, तब मेरे माग्याविशय से तो यह ममी के सभी गुगों का समुदाय एकशित हो गया है। रत्नाकरबार ने सर्वस्वकार पर कदाक्ष करने हुए मी लिख- 'एव धानुरूनकार्यात्पत्ी विच्छिसिविरेषवमेन सौन्दर्यतिशयदर्शनाव कारणानुरुपर्वे कार्यस्य न किचित वास्त्वमिति न वाच्यम्।'
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विमशिनीकार ने इतने स्पष्ट माक्षेप का भो कोई सत्तर नहीं दिया। कदाचित उन्हें मी यह मत मान्य हो। अप्पय्यदीक्षितअप्पय्यदीक्षित ने रत्नाकर के इस मत को रवीकार कर लिया है। उन्होंने समालंकार के तीन भेद माने हैं- [१] समं त्याद् वर्णनं यम द्वयोरण्यनुरूपयोः। अच्छे या बुरे दोनों अनुरूपों का वर्णन समालंकार। इसे दोक्षितजी ने प्रथम विषम का प्रति- इन्दी माना है। इसके दोनों प्रकार के उदाहरण उन्होंने दे दिए हैं। उनमें अशोमन योग के लिए तो 'चिन्रन चिन्र' पद्य ही उन्होंने दिया है। [२] सारूम्यमपि कार्यस्य कारणेन समं विदु:। -कारण से कार्य की सरूपता भी सम कही गई है। इसे दीक्षित जी ने द्वितीय विपम का प्रतिदन्दी नाना है। उदाहरण के लिए उन्होंने वह पद्य उडृत किया है- दवद हनादुत्पन्नो धूमो घनतामवाव्य वर्षस्तम्। वच्छमयति तद् युक्त सोडपि हि दवमेव निर्दहति॥' -'दवाग्नि से उत्पन्न धुओ नेघ वनकर वर्षा के द्वारा दवाग्नि को जो बुताता है वह ठीक ही है, वह [दवाग्नि] भी तो [जिससे उत्पन्न होता है उसी] दब [जंगल] को ही जला डालता है।' [ ३ ]'विनानिष्टं व तत्सिद्धिर्यमर्य क्तुमुदयत्ष:।' -'जिस कार्य को करने के लिए कोई वद्यत हो उसकी सिद्धि यदि बिना अनिष्ट के हो जाए तो वह भी सन होता है।' इस भेद को दीक्षितजी ने अनर्थप्राप्ति नामक विषमभेद का प्रतिइन्दी माना है। उदाहरण-हाथी के याचक को राजदरवार से अर्धचन्द्र मिलने पर कमित- 'युक्ो वारणलामोडयं जातस्ते वारणायिन: ।' -तुम तो वारण [हाथी] चाह ही रहे थे अतः तुम्हें यद वारण [निवारण ] का लाम ठीक ही हुआा।' पण्टितराम-सेवल अनुरूप वस्तुयोजना के विपर्यय को दी समालंकार मानने तथा अन्यविषम- मेदों के विपर्यय को मलंकार न मानने के सर्वस्वकार द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्त और विमशिनीकार द्वारा किए गए उसके समर्थन का जो खण्डन रत्नाकरकार ने किया था वह दीक्षितजी के ही समान पण्डितराज को भो उचित लगा। पण्ढितराज ने समालंकार का 'अनुरूपसंसर्ग: समभ्' इस प्रकार सम को अनुरूपरसंसर्गात्मक मान अननुरूपसंसर्गात्मक विषम से सर्बया उलटा वतलाया और सम को भी विषम के ही समान तीन प्रकार का मान सर्वस्व और विमर्शिनी का स्वयं भी खण्डन किया। इसी प्रकार विषम के सभी भेदों के विपरीत आनुरूप्य के चारुत्व से निष्पन्न इस अवंकार के एक-एक कर के उदाहरण भी दिये। पण्डितराज ने सर्वस्व और विमर्शिनी को जिस रूप में उपस्थित किया है उसे सर्वस्व और विमार्शनी की टीका ही कहा जा सकता है। विश्वेशवर ने भी 'अन्योन्यसंगमाहों संवध्येते यदा सम तत् स्याद।' इस प्रकार श्ञोमन या अशोभन पदार्थों की परस्पर सम्बन्ध की अनुरूपता को समालंकार का कारण मानकर कार्थकारण के आनुरूप्य में समारंकार सवीकार कर लिया है। उसका उदाहरण उन्होंने यह दिया है- 'तुणौ पयोधेनिजकारणत्य न हानिवृद्धी कथमेतु चन्द्र:'। ३२ अ० स०
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-'अपने कारण समुद के गुग दानिवृद्धि को चन्द्रमा कैसे न प्राप्त करें'। विश्वेदवर ने पण्ठितराज द्वारा सर्वेस्त्र के खण्डन का कोई उत्र नहीं दिया है। अन. स्वस्व का मन उन्हें भी अस्वीकार ही है। श्रीविदाचकवतीं ने समालकार का सारसक्षेप सजीविनी में इम प्रकार किया है- 'सरूपयो सहटना समालक्कार रप्यते। रलाव्यास्लाध्यत्वयोगेन को भेदावस्य सम्मनी ।' [सर्वस्व ] विरोधमूल विचिधं लक्षयति- [ सूत्र ४८ ] स्वविपरीतफलनिष्पत्तये प्रयत्नो विचित्रम्। यस्य द्वेतोर्यम्फलं तस्य यदा तद्विपरीत भवति तदा तद्विपरीतफल निष्पत्यर्थे कस्यचित् भयत्न उत्सादो विचिनालंकार:, आश्चर्यप्रतीति- द्वेतुत्वात्। न चायं प्थमो विषमालंकारप्रकारः। स्वनिषेधमुखेन वैपरीत्य प्तीने:। विपरीतप्रतीत्या तु स्वनिषेधस्तस्य विपयः। यथा-'तमाल नोला शरदिन्दुपाण्ड यशसत्रिलोकामरणं प्रसूते। इह्व त्वन्यथा पतीतिः। यथा- ेततुं मुचइ अहरो अण्मतो वलइ पेक्सउं दिट्ठी। घडिदुं विद्इंति भुआ रभाज सुरअम्मि बीसामो।।' मत्र मोचनवलनविघटनविश्रमाणां यथाकर्म ग्रहणप्रेक्षणघटनरमणानि विपरीत फलानि प्रयत्नविषयत्वेन निवद्धानि । यथा वा- 'उन्नत्ये नमति प्रभुं प्रभुगद्दान् दरष्टुं वद्िस्तिष्ठति स्वदव्यव्ययमातनोति जडधीरागामिवित्तारया। प्राणान् प्राणितुमेव मुख्जति रणे क्लिश्नाति भोगेच्छया सर्घ तद्विपरीतमेव कुरते तृष्णान्घटकू सेवकः।।' अन्न चिपरीतफलनिष्पादनप्रयत्नः सुक्षानः। विरोधमूलक [एक ] विचित्र [नामक सवंथा स्वोपच, पूर्वाचार्यो द्वारा अम्रविपारित अलकार] का लक्षण वनाते हैं- [सू० ४८] अपने विषद्ध फळ की निष्पत्ति के लिए प्रयान विचित्र [कहलाता है]। जिस हेतु का जी फल होना है उमका जब उमके विपरीत फल होता है तत्र उसके विपरीत फळ की निष्पत्ति के लिए किसी का प्रयत्न अर्थात् उत्साद विचिन्ालंकार कदलाता है, इसलिन कि यह आश्वर्य को प्रतीति का कारण बनता है। यह विषमालकार का ही प्रथम प्रकार है ऐमा नहीं क्योंकि यहाँ वैपरीत्य की प्रतीति अपने निषेध के माध्यम से होती है, जब कि विषम में वैपरीत्य की प्रनीति के माध्यम से अपना निषेध प्रतोत होना है। यथा 'तमारनीळ कृपाग शादिन्दुपाण्डु यश जो त्रिठोक का आमरण है, पैदा करता है' इत्यादि में। यहाँ प्रनीति उकटी होती है। यथा- ्रद्दोतु सुच्यतेधरोज्यतो वलति प्रेक्षितु दूषि। घटितुं विधटेते मुजो रवाय सरतेपु विनम.॥।
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अभर छोड़ा जाता है ग्रहण करने के लिए, दृष्टि अन्यत्र घूमती है देखने के लिए, सुजाएँ छुस्ती हैं सुड़ने के लिये, सुरत में विधाम होता है रमण के लिए।' यहाँ छोड़ा जाना, घूमना, छूटना और विशाम के प्रति ग्रहण, देखना, जुड़ना तथा रमण चिपरीत फल है जो प्रयत्न के विषय के रूप में यहाँ निवद् हैं। दूसरा उदाहरण यथा- -- 'उन्नति के लिए प्रभु के समक्ष झुकता है, प्रमु के घर देखने के लिए वाहर बैठता दै, जड़धी आगामो धन की आशा से अपने धन का ज्यय कर डालता है, जोवित रहने के ही लिये रण में प्राण छोढ़ देता है, भोग की इच्छा से कलेश उठाता है। इस प्रकार तृष्णा से अन्धी आँख का सेवक [जो कुछ चाहता है] सब कुछ उसके विपरीत ही करता रहता है।' यहाँ विपरीत फल की निष्पत्ति का प्रयत्न सुखपूर्वक जाना जा सकता है। विमर्शिनी स्वविपरीतेत्यादि। एतदेव व्याचष्टे-यत्येत्यादिना। यदिति प्रसिद्धम्। फलमिति का 'सू्। तक्ष्येति हेतोः । तदिति कार्यम्। प्रयत्नस्य कार्यादिभेदेऽपि न चैचित्यमिति तदिद नोकम्। एवं वस्य यत्कार्य तस्य तावत्तद्विपरीतं न भवति। यदि च त्त्वं स्यासननिष्पत्यर्थ च यदि कस्यचित्मयतन: स्यातदायमलंकार इत्यत तात्पर्यम्। नतु चैतहिरुपकार्योदयत्ते कि न चिपममेव सवतीत्याशद्धाह-न वायमित्यादि। तस्येति विपसस्य। नीलयापि पाण्ड यशा प्रसूतमिति विपरीत्षपतीतिवलानेतनोपपद्यत इति ह्वान प्रतीतिः। अन्ययेति निषेध वलाद् वैपरीस्यप्रयान इति। यद्यपि घिषमे विरुपस्य कार्यस्य स्वयमेवोस्पत्तिरिह च तन्निप्पतये प्रयत्न इति स्थितोऽ्यनयो: एफुटो भेदस्तथापि अ्रन्थकृता चिशेपपरिपोषायैव सूचमेघिकागम्यो भेदोऽयमुक । साचनस्याग्रहण स्वं फरम्। ग्रहणं पुनः कर्थ भवतीत्या- मुस एवोदिकवेनास्र निषेधप्रतीतिः। अनन्तरं व तक्षिमित्ता वेपरीत्यप्रतीतिः। अत पतर विपमादस्य भेदः। सुजान इति। पूर्वोक्तयुकतयेवावगतावातू पुनरुदाहरणमस्य लपे प्राचुर्य दर्श नार्थम्। एतद्ति ग्रन्थकृतैवाभिनवववेनोक्तम्। स्वविपरीतेत्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-यस्य हत्यादि के द्वारा। यत् =जो=मसिद्ध। फउमू = कार्य। सस्य=हेतुका। तत्=वह काये। [ जैसा कि अलंकाररत्नाकरकार ने वतलाया है-प्रयत्न कार्य आादि के मेदों से कई प्रकार का [ अर्थात कायिक, वाचिक, मानस] होता है किन्तु उसकी गणना में कोई विशेषता [ चमत्कृति ] नहों रहती अक्ः [यहाँ] उसे नहीं कहा गया। इस प्रकार तात्पर्य यह हुआ कि जो जिसका [उद्देश्यभूत] कार्य होता है वह सामान्यतः तो उसके निपरीत नहीं होता, तयापि यदि विपरीत को और यदि उसके लिये कोई व्यक्ति प्रयत्न करता है सब यह अलंकार होता है। अच्छा, इसे विरूपकार्यसिद्धित्वरूप विषय हो कयों न मान लिया जाय ? ऐसी शंका उठाकर लिसते हैं न नायम् इत्यादि। तस्य उसका =विषम का। 'नीलो तलवार ने भी सफेद यश को जन्म दिया' ऐसी वैपरीत्य की पतीति से यद प्रतीति होती है यहाँ कि 'यह ठीक नहीं है'। अन्यथा=निषेध के आधार पर वैपरोत्य के लिए प्रयत्न होता है। यद्यपि विपम में विरूप कार्य की उस्पत्ति विना प्रयत्न के स्वयमेन्र होती है और यहाँ होता है उसके लिए प्रयत्न, इस प्रकार इन दोनों का अन्तर स्पष्ट ही है तथापि ग्रन्थकार ने इसी अन्तर की पुष्टि के किए यह अन्तर बतलाया है। यह सूक्ष्म दृष्टि से समझा जा सकता है। छोड़ने का अपना फळ है अहण न करना। ग्रहण करना उसका फल कसे हो सकता है इस प्रकार यहाँ आरम्म में निपेध की प्रतीति साफ-साफ हो जाती है। उससे होने वाले वैपरीत्य की प्रतीति उसके
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दाद होनी है। इसलिए यह विषम से मिन्न है। सुज्ञान := सुखपूर्वक समझा जा सकता है, अर्थ यह कि इम विचित्रालक्षार का अस्तित्व प्रथम उदाहरण मे दी सष्ट ो जाना है। तब यह जो दूसरा उदाहरण दिया गया है यह केवळ लक्ष्य [काव्यक्षेत्र] में इसकी मचुरता दिसलाने के लिए। इस अलंकार को अन्थकार ने ही पहले पहल नवीन अलकार के रूप में प्रस्तुत किया है। घिमर्द-मामह, दण्डी वामन, सड्ट, रुदरड और मम्मट में यह अटकार नहीं मिर्ता। विमशिनोकार का कहना यथार्थ है कि इम अलकार की उदा सवस्ककार ने ही की है। परवर्ची आलकारिकों में- शोभारुर-ने अलकार रत्नाकर में इस अलकार को मान तो दिया है किन्तु इसका लक्षण अथिक व्यानक बना दिया है। उनका लक्षण इस प्रकार हे- 'विफल, प्रयत्नो विचित्रम्। -विफल प्रयतन विचित्र।' प्रयत्न के उन्होंने तीन भेद किश है [१]कायिक, [२] वाचिक तथा [३] मानसिक। इन तोनों प्रयत्नों को उन्होंने पुन पवृत्तिरप और निवृत्तिरूप, इस प्रकार दो प्रकार का माना हे। इस प्रकार रत्नाकरकार के अनुसार प्रयत्न ६ प्रकार का हुआ। बिमसिनीकार ने इसी को ओर कदाक्ष किया है और इनकी अल्कारमईस्व में अप्राप्त गगना का समर्थन किया ह। रतनाकरकार ने विफल्ना को भी अनेक मेद तथा उपभेदों में बाँदा है [१] प्रथम विफ- लना वह है जिसमें प्रसिद्ध फल के विपरीत फल के लिए प्रयत्न हो। [२]दितीय बिफलता दह है जिसमें प्रयत्न तो बहुत वडा हो परन्तु फल तुच्छ हो अथवा इमके विपरीत स्थिति हो [३] तीस्षरो विफलता वह है जिसमें प्राप्त फब असाध्य, असमव या अनुपयोगो हो। इम प्रकार ६ पकार के प्रयतनों में से प्रत्येक प्रयत्न में इन छर्झो विकलताओं का गुणन करने से विचित्र के शुद्ध ६६ भेद हो जाते हैं। रत्नाकरकार ने निम्नलिसिन कारिका द्वारा इमका स्पषटीकरण करते हुए लिसा है- 'अर्थो विरुद्वविषमादिरनेकभेद: कार्यातितो मवति यद्यपि किन्लमुष्मिन्। औचित्यवत्फल वियोगनपुस्तयापि सामान्यलक्षगमण्ठितभैदभागि ।' -कार्य की दृष्टि से अर्थ विरुद्ध और विषम आदि अनेक प्रकार का होता है नथापि इस अरंकार में 'उचित फल का अभाव' यह सामान्य वक्षण प्रत्येक में असण्डित हो रदता है।' उकक मेदों में से कतिपय भेदो के उदाहरण भी रत्नाकरकार ने दिए है बिन्तु उनरमें से अधिकाश अन्य अलकारों में अन्तभूंत सिद्ध होने हैं। अप्पय्यदीक्षित ने भो विचित्रालकार की स्वनन्त्र सता स्वीकार को है। उनका लक्षण हम प्रकार है- 'विचित्र नत्म्रयत्नशचेद् विपरीतफलेच्छया।' -'फल के लाम के लिए विपरीत प्रयत्न विचिन्न ।' उदाहरण-'नमन्ति सन्तस्तरैलोक्यादपि लब्धु समुन्नतिम्।' -- 'सत्पुरुप शैतरोक्य से ऊँचा होने के लिए नवते है।' पष्टितराज जगन्नाथ ने भी विचिन्न को स्वनन्न्न अरंकार माना है और इसका लक्षण इस प्रकार किया है-
इष्टसिद्धि के दिए हष्टवस्तु को हो वाद रहे व्यक्ति के द्वारा किया जा रहा रषास्तु के विपरीत सर्थाव प्रतिकूल आचरण विचित्र कहलाता ईै।' बिषम से इसका भेद पण्डितराज ने एक ही बिन्दु
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पर किया है। वह है पुरुपप्रयतन। विपय में वैषम्य आकृतिक होता है पुरुपप्रयत्नकृत नहीं। विषम में कार्य और कारण के गुणों में विपरीत्षता ही चमत्कारजनक होती है। रस्नाकरकार द्वारा प्रस्तुत अपंच को पण्डितराज ने छोड़ दिया है। विश्वेश्वर ने विचित्र को स्वतन्त्र अलंकार नहीं माना यद्यपि विषम के विवेचन में उन्होंने इसका अन्तर्माव भी नहीं दिखलाया। श्रीविद्याचकवतों की कारिका इसपर इस प्रकार है- 'प्रयत्नस्तु विचिनं स्याद् विपरीतफलापये। निपेपतो बैपरीत्याद् विषमालङ्कृत्तेमिंदा :' [ सर्वस्व] [सू० ४९] आश्रयाश्रयिणोरनानुरूप्यमधिकस्।
विरोधप्रस्तावादिह्न निर्देशः। अनानुरुप्यस्य विरोधोत्थापकत्वात्। तच्चानानुरुप्यमाश्रयस्य चैपुल्येप्याधितस्य परिमितत्वाद्ा भवति आश्रि तस्य वैपुल्येऽ्याश्रयस्य परिमितत्वाद्वा। क्रमेण यथा- औौरत्र कचिदाश्रिता प्रवितरत पातालमत्र क्वचित् क्वाव्यश्रैव घरा धराधरजलावारावधिवतते। स्फीतस्फीतमहो नभः कियददं यस्येत्थमेवंविधै दूरे पूरणमस्तु शून्यमिति यननामापि नास्तं गतम्।।'
पंकारध्वनिरार्यवालचरितपरस्तावनाडिण्डिमः । द्राकपर्यस्तकपालसंपुटमिलद् ब्रम्माण्ड माण्डोदुर भ्राम्यत्पिण्डितचण्डिमा कथमहो नादयापि विश्राम्यति॥' पूर्वत्र नमस आश्रयस्य वैपुल्येऽप्याश्चितानां द्यम्रभृतीनां पारिमित्यं चारुत्वहेतु:। उत्तरन्न तु टंकारध्वनेराथितस्य महत्वेऽपि ब्रह्माण्डस्या श्रयस्य स्तोकत्वम्। [सू० ४९] आश्रय और आश्रयी की अननुरूपता अधिक[नामक शलंकार कहलाता है ।। विरोध के कारण इसे यहाँ बनलावा जा रहा है, क्योंकि अननुरूपता [अनुरूपता का अभाब ] विरोष खड़ा करती है। यह अननुरूपता माश्रय के विश्वाल होने पर भी आश्रित के परिमित होने से भी होती है और आश्रित के विशाल होने पर भी आश्रय के परिमित होने पर भी । क्म से उदाहरण-[ माश्रयविपुलता तथा आभिततुच्छता पर आश्नित अषिक ]- 'इसी में कहीं स्वर्ग आशित है, कहीं इसी में पर्याप्त विस्तृत पाताल भी है, और इसी में कहीं पर्वत-समुदों तक व्यापक भूमि भी टिकी हुई है। इस प्रकार देखो तो कितना स्फीत और र्फीततर है यह आकाश, जिसके इस प्रकार के इन [स्वर्ग, परताल और पृथ्वी जैसे पदार्थो ] के द्वारा •भी मर जाने की वात तो दूर रहे, जिसका 'शूत्य' यह नाम भी समास् नहीं हो सका।'
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[आश्यतुच्छता तथा आभितविपुछता पर आध्रित अधिक ]- 'मुजदण्ड द्वारा खींचे शिवधनुष के टूटने से उटी टंकार, जो बडे आईे [ राम] के वाएचरित [ रूपी नाटक] की प्रस्तावना [आरम्भ ] की सूचक नान्दी [नगाडा] है सथा जिसकी पुजीभूत प्रचण्डता, तत्काल कपालसन्धि के शिथिल हो जाने से गमगाते मकाण्डरूपी भाण्ट [घट] में धूम रहो है, अहो१ अभी तक शान्त नहीं दो रही।' प्रथम [दघ] में आकाशरूपी आश्रय के विव्वाठ होने पर भी स्वर्ग आदि आधित की परिमितता चारता का हेतु है और दूसरे में टकारध्वनिरूपी सथ्रित के चिपुल होने पर भी बझ्ाण्डरूपी माश्रप की परिमिचता। विमर्शिनी आाययेत्यादिना। इहेति विचिन्नानन्तरम। नन्वनपुरूपयोः सघटने विषममुक्कमित्या- थ्रयाथमिणोस्तरवे कथमलंकारान्तरमुच्यत इत्याशङ्टयागीकारेणेतदवाघष्टे-तच्चेत्यादिना। आध्रयस्येति, आधारस्य।आध्ितस्थैति, आघेयस्य। अनेनैव चास्य भेवदूयमप्ययुक्कम्। एवं घ परिमितरवापरिमितरवयोः सापेक्षवात्तयाविधवस्तद्वयसंघटनयेव तदवगमन- सिद्धिरित्य त्राघाराधेययो: सघटनेनैवानुरूपत्वमव गभ्यते। विपमे वानन्यापे सरवेन स्वत एवाननुरूपयो: संघटनमित्यनयोमहान् भेद दत्यत्र पिण्हार्थः। इत्थमू- 'आघाराधेय्ययोर्यंश संसर्ग. स्याद विरुपयोः। स सफुटो विपमो वाच्यमधिक नाधिकं तत:।।' इति न वाच्यम्। वस्ाधयाश्रयिणो: कविपतिभाकरिपतमेव ग्राह्यम् न पुनर्वास्तवम्। तेन चादत्ाप्रतीतेः। तेन नमसो चुप्रमृतीनां चान्योन्यापेक्षया चैपुवमं पारिसित्यं च वारत- वमेवेश्यनुदाहरणमेतव। तदुदाह रणाम्तरमन्वेष्यम्। तत्तु यथा- 'रगरणअगुणिअमुजच्चर्ण्म तणुई समुद्दगहिरग्मि। मेरुअडवरछस सुबध हिमए कहं णु ठाई।।' अत्र हृदयस्य महत्वं तन्प्याश्र तनुत्वमित्याघाराधेय योरनालुरूप्यम्। आथ्रयेत्यादि। हूछ यशा अर्थात विचिन्राटंशर के पश्चात्। 'अननुरूप के मिलन में विपम अटंकार माना ही है अवः जब आश्रय और आश्रयी अननुरूप है तो इसे अलग अलंकार क्यों बतलाया जा रहा है :- इस आशका को हृदय में रसकर इम सूत्र की व्याख्या करते हैं- तब्च इत्यादि द्वारा। आश्रय= आवार। आश्रित = आाधेय। इसी के द्वारा इस अलंकार के दो भेद मी बतला दिए। इस प्रकार परिमिनत्व और अपरिमितत्व परस्पर सापेक्ष होते हैं। अतः इनसे युक्त दो वस्तुओं के समागम से ही इनकी परिमितता और अपरिमितता तथा तदाभित अननुरूपता का रोध समव होता है। इस प्रकार यहाँ अननुरूपता का बोध आधार और आधेय के योग पर निर्भर रदता है। विषम में अननुरूपता दूसरे पर निर्मर नहीं रद्ती, वशों अननुरूप पदार्थों का योग रवतः हो होता है। इस प्रकार इन दोनों में महान् भेद है। इस प्रकार-[अरकार रत्नाकरकार को] 'जहों विरुप आधार और आधेय का संबन्ध हो बढ़ भी एक स्पष्ट विषम है। अतः भधिक को अषिकालंकार या अतिरिक अटकार नहीं मानना चाहिए।' ऐमा नहीं कहना चाहिए। आधाराधेय को वही वह [अननुरूपना ] यहाँ [अलकारत्व के लिए] ग्राध है जो कवि- कपित हो, वास्तविक्र नहीं। वास्तविक से चारत्व की प्रतीति नहीं होती। इसलिए, आकाज
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और स्वर्गं आदि की परस्पर के प्रति वियुलता और परिमितता वास्तविक है अतः इसे इदाहरण नहीं माना जाना चाहिए। मतः उसका अन्य कोई वदाहरण खोजा जाना चाहिए। वह यह है- 'रगरणकगुणितमुग्धतवे तनवी समुद्रगम्मीरे। मेरुकटवक्षसस्तव हृदये कर्भ नु स्थास्यति ।।' अर्थाव 'तुम्हारे उस हृदय में यह तन्वी कैसे बैठेगी जिसमें भरा हुआ मुग्धत् उत्कण्ठा से कई गुना हो गया है को समुद्र के समान गंमौर है और जिसका वक्षत्थल सुक्णगिरि-सुमेरु के तट के समान है ( ?) । यहाँ हृदय में विपुलता और तन्वी में परिमितता चतलाई ता रही है अतः आाषार और आषेय में अननुरूपता है। अधिकालंकार का इतिहास- मामह, वामन तथा उन्भट में अधिक नहीं मिलता। इसकी कल्पना पहले-पहल रुद्रट ने की है। सट्रट ने इसके दो भेद बतलाए हैं- [१] दो विरुद्ध वस्तुओं का एक ही वस्तु से जन्म। यथा 'मेघ पानी और जलती भाग दोनों एक साथ बरता रहा है।' [२] छोगा होने पर भी आधेय बड़े आधार से बढ़ जाना। यथा उसके जगदिशाल हृदय में वह तन्वी इतनी फेल कर रह रही है कि दूसरी किसी सुन्दरी को वहाँ अवकाश ही नहीं है। उपर्बुकत दोनों के लक्षण इस प्रकार हैं-
वस्तुद्यनेकसमाज्जायत इति तद् भवेदभिकम्॥ ९२६॥ [] पन्नाधारे समहत्याधेयमवस्यित तनीयोडपि। अतिरिच्येत कर्थंचित तदविकमपर परिशेयम् । २२८। सम्मट-मम्मट ने रट्ट के प्रथम अधिक को छोड़ वैवल द्वितीय को हो अलंकार माना है। उनकी क्तारिका यह है-
श्रयाश्रविणौ स्यातां तनुत्वेऽप्यधिकं तु ठत।।2 -'प्रस्तुत वस्तु के प्रकर्ष की विवक्षा से, छोटे होने पर भी जहाँ माश्रय और आश्रित [अर्थाव आधार और आधेय ] अपने से बड़े अपने आश्षित और भशय से बड़े बतलाए जाएँ वह मधिक।' दोनों में से प्रथम का उदाहरण- 'सहो विश्यालं भूपाल भुवनत्रितयोदरन्। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशियंदत्र ते॥।'
जो बन जाता है। -'अहो, तीनों भुवन का उदर बहुत वड़ा है राजन्! इसमें आपका अमेय यशोराशि मी
इसमें अधेय यश को बड़ा बतलाकर उससे छोटे नैवोक्यरूपी आधार को वड़ा बतलाया जा रहा है। इसमें विबक्षित है यशोराति का प्रकर्ष। द्वितीय का उदाहरण- 'युगान्तकालपतिसंहृतात्मनो जगन्ति वत्वां सविकासमासत। तनी ममुस्तन न बैटमददिपस्तपोधनाभ्यागमसंभवा सुदः ।।' -'युगान्त काल में जो अपना प्रपंच बटोर लेते हैं तो जिनके शरीर में सारे भुवन पर्याप् फलाव के साथ वन जाते हैं भगवान कृष्ण के उसी शरीर में तपोधन नारद के माने का पकर्ष नहीं वन सका।' यहाँ वास्तविक रूप से छोटे प्रहर्ष को प्रकृष्ट वतलाने के लिए उते उसके उससे बड़े भगवच्छरीर रूपी आपार से बड़ा बतलावा जा रहा है।
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५०U मलद्ारसपस्वमू
इस प्रकार अधिक के स्थापक रुदट से आगे बढकर मम्मट तक आते-आते ही अधिक के लक्षग में अन्तर आा गया। आगे सवस्व्कार तक पहुँचते-पहुँचते तो उसके लक्षा में पर्याक्ष परिवतन दिखाई दे रहा है। रूद्रट और मम्मट के रक्षगों में तीनननीन कोटियाँ थीं छोटा, बढा और छोटा बडे से वडा। सर्वस्वकार ने इन कोटियों से बव कर लक्षण योजना का सरलनम रूप निकाला। इसमें दो ही कोटियों आाती है। एक नो आधार और आधेय की वास्तविकना की कोटि और दूसरी उसके विपरीत उनके कार्पनिक आकार की कोटि। इसमें वास्तविकना के ये दो अश् एक ही सूत्र में आ समाते हैं-एक आधारगन परिमितता या अपरिमिनता का और दूसरा आधेयगत अपरिमितता या परिमितता का। इस प्रकार परिष्कार लक्षणमान में उदरता है। अधयोजना ज्यों की त्यों रहती है। किन्तु रुदट द्वारा प्रतिपादित प्रथम नेद अमान्य सवस्वकार को ी है। परवर्ती आचार्यों में- शोमारुर-अविक को विषम का हो भेद बनलाने हैं और उने एक अतिरिक्त अलकार नहीं मानते। विमर्शिनीकार उनका सण्डन करते है। अप्पयपदीचित-ने मम्मट द्वारा प्रस्तुत अधिकालकार दो स्थितियों को दी दो पृथक् अनुष्टमों में इस प्रकार विभक कर दिया है- [१]'अधिक पृथुलाधारादाधेयाधिक्यवर्णनम्। स्झ्ाण्डानि जले यत्र तत्र मान्ति न ते गुणा. ।।' [२]पपृथ्वापेयाद् यदाधाराधिक्य तदपि तन्मतम्। कियद् वाग्मह यत्रेते विश्ाम्यन्ति गुणास्तन।।4 अप्पय्यदीक्षिन ने पथम के लिए मम्मट द्वारा उदाहन माघ का हो 'युगान्तकाल' पद् भी दे दिया है और द्वितीय के लिए 'अहो विशवाल०' पद्य भी। रक्षण निर्माग में अप्पयदीक्षित ने भी कम सर्वस्वकार का ही अपनाया है। पष्डितराज-नगन्राथ भी सर्वस्व और कुबलयानन्द की हो पद्धति पर अधिरु का लक्षण बनाते है किन्तु उसमें वह प्रयोजनाश भी समाविष्ट कर देते हैं जो मम्मट ने वृत्ति में स्पष्ट किया था-'प्रस्नुतार्थ के प्रकर्ष की विवक्षा'। उनका लक्षण यह है-
'आधार और आधेय में से किसी एक को अतिविस्तृनता बतलाने के लिए अन्य में अति- न्यूनता की कल्पना अधिक।' कल्पनाशब्द देकर पण्टिनराज ने वास्तविरु अन्तर को अकाव्य और अधिक के लिए अनुदहार्य कहा है। इस प्रकार वे 'चौरत्र" पघ को कविकल्पना के अभाव में अधिक के लिए ठोक उसी प्रकार अनुदाहार्य मानते हैं जिस प्रकार विमशिनीकार। विश्वेश्वर मण्डिन इसका ठीक उसी पद्धति पर प्रतिवाद करते हैं जिस पर उन्होंने 'अरण्यानी क्वेयम्' पद्य में स्बस्व के सण्डन का प्रतोकार किया है। वे यहाँ मी पद्ार्थ के रूप में नम के मध्य स्वर्गादि की कर्पना कविप्रतिमा का ही विषय मानने है। इम प्रकार वे यहाँ भो चमत्कार रवीकार करते और अषिकालंकार के लिए इमे उपयुक्त मानते हैं। सच यह है कि स्वत समवी अर्थ को काव्य मानना यदि मनन्दवर्धन से लेकर पण्डितराज तक के आचार्यों को यदि अनुचित नहीं लगता तो उन्हें, ऐमे पर्धों में अलकारख और तदाश्रित काव्यत्व मानने में कोई अनौचित्य नहीं देखना चाहिए।
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अन्योन्यालङ्गार: ५०५
निश्वेश्वर का अधिक लक्षण इस प्रकार का है- 'आधार स्याधेयदाधेय स्यापि वाघारात्। यदि वण्यते महत्वं तत कश्यन्यधिकमधिकज्ञाः ।।' श्ीविद्याचकवत्तों को कारिका इस पर निम्नलिखित है- अनानुरूप्य मधिकमाश्नयाश्रयिणोर्मतम्।
[सर्वेस्व] [सू. ५०] परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम्। इह्वापि विरोधप्रस्ताव पव निर्देशकारणम, परस्परजननस्य विरुद्ध सवात्। क्रियाद्वारक यत्र परस्परोत्पादकत्व, न स्वरूपनिवन्धनं, स्वरुपस्य तथार वोकिविरोधात् तन्रान्योन्याखयोडलंकार:। यथा- 'कण्ठस्य तस्याः स्तनबन्धुरम्य सुक्ताकलापस्य च निस्तलस्य। अन्योन्यशोभाजननाद् वभूव साधारणो भूषणभूष्यभाव:।।' अन्न शोभाक्रियामुखकं परस्परजननम्। [सू० ५०] परस्पर में क्रिया की उत्पत्ति हो तो अन्योन्य। यहाँ भी विरोध का प्रसन्न ही निर्देश का कारण है क्योंकि परस्पर की उत्पत्ति विरोधपूर्ण होती है। परस्पर की उत्पादकता जहाँ करिया के द्वारा होती है, न कि स्वरूप के द्वारा, क्योंकि स्वरूप की पैसी उत्ति [अपरिहार्य रूप से ] विरुद्ध दोती है, वहाँ अन्योन्यानक्कार होता है। चभा- 'उस [ पार्वती ] का स्तनों से चन्धुर [उतार-चढ़ाव युक्त ] कण्ठ तथा निस्तक [गोल ] मुक्ता- हार ये दोनों, दोनों के भूपण ि और दोनों दोनों के भूष्य, क्चोंकि शोभा दोनों को हो बढ़ रही थी दोनों से" [ कुमारसं० १४२ ययहाँ शोभारूपी क्रिया के द्वारा परस्परजनकता है। विसर्श :- इस अलंकार के सून और वृत्ति की भावयोजना कुछ ऐती है जिससे प्रतीत होता है कि दोनों दो भिन्न रचयिताओं द्वारा रचे गए हैं।
विमर्शिनी परस्परमित्यादि। नतु यदि परस्परजननस्य विरुद्धत्वं तत्कथमायालंकारत्वमित्याश सवाह-क्रियेत्यादि। कियाशन्देनात् धर्मा लचयते। अन्यथा- 'प्रकाश: कोऽपि कैलासशेलपूर्णेन्दुबिम्बयोः।
हृत्यादो गुणात्मकपहुत्यमुखेन परस्परजननेऽप्यव्यासि: स्थाय। परस्परोतपादकत्वमिति। परस्परनिप्पाद्कृत्वमित्यर्थः। एवं शनेन जननस्य कियासामान्यामककारणार्थत्वं दर्शितम्। तेन- 'विय तम हृरदयं विवेश तन्वी परयुवतिप्रसरापसारणाय। अतिसुभगतया हरन्तु मान्या इति च निजे हृदये न्यवेशयव् तम् ।।'
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५०६ इध्यत्र परम्परं ददयानुम्रवेशस्ताम्य!ं कृत इति प्रतीतेः प्ययसानारपरस्परजननस्या- व्यापकत्व न वाच्यम्।
पपात यलष्पतिर्वरादस्त विह्वलान वसुधा यनार।।'
स्तीति कस्पान्यापकरवं वा स्थात्। एतमन्पनापि नेयम्। तथातवोक्तिविरोपादिति। इत रेतराश्रयदोपलसगाद। यदि पुनरध विरोधसमाधिर्भवेत्तदालकारतवमपि स्यादिति भाव:1 यथा- 'धनेन जायते प्रज्ा प्रज्ञया जायते घनम्। पन्ञायी जोवलोकेस्मिन्परस्पर नियन्धनम्॥ अत्र प्रज्ञाधनयो: स्वरूपस्प परतपर जननम्। शोमाक्रियेति। सैव ह्यम्र परस्पर- निमित्तम्। [शका] यदि परस्पर की उत्पादकना समव नहीं है [ वह तो व्याघात है] तो इसे अलकार क्यों माना जा रहा है, ऐेसी मर्शका कर वत्तर देते हैं क्रिया इत्यादि। करिया शब्द का न्थे यहाँ धर्म मानना चाहिए। नहीं तो- 'उस समय वेलासपवंत तथा चन्द्रबिम्ब का कोई अलोकिक पकान प्रकट दुआ क्योंकि ये दोनों एक दूमरे में अधिक चमक का रद्दे ये!' इत्यादि में चमक [पटस्व ] गुणात्मक है उसके दारा परस्पर की उत्पधि में अन्योन्य का लक्षण न जारगा। परस्परो्पाद्ककरवम् अर्यात परस्पर की निष्दकता। इस प्रकार यहीँ जनन [शम्द) का अर्थ करियामामान्यरूप कारण दिखलाया गया। इस कारण- 'तन्वी प्रियनम के हृदय में प्रविष्ट हो गर्य, इमलिए कि उसमें अन्य युवतियों को जगह न मिले। इसी प्रकार अत्यन्न सुन्दर होने से अन्य कोई [सुन्दरी ] उसे हर न लें इससिए उसे भी [ उस तन्वी ने] अपने हृदय में निविष्ट कर लिया।1 यहां प्रतीति 'उन दोनों ने परसपर के हृदय में प्रवेश किया' इम रूप में परिणन होती दै, अतः यहाँ परस्परजनन की अव्याति है ऐसा [अलंकार- रतनाकरकार को ] नहीं कदना चाहिए। 'आाइवमक्लदेव के बाण ने [वराह को वराहावतार में प्राप्त समुद्र से पृथिवी को भारण कर निकलने की ] पूर्व कथा के आश्चर्य को उसट दिया, क्योंकि जब बराह घवराकर गिरा तो विहुन्ध अग के उसी [ बराइ] को पुथिती ने धारण किया।'[ विक्रमांकदेवचरित १६।३७] यहाँ केवल आदिवराह के वृत्तान्त से [मृगयाकाल में शरबिद्ध और भूपतित वराह के वृत्तान्त की] मिनननामाय को विकसा है, यन यहाँ [ रस्नाकरकार द्वारा स्वोकार अन्योन्यालंकार ही नहीं है, तब अध्यापक कौन होगा? इसी प्रकार मन्य उदाहरणों में जानना चाहिए। तथारवोकिविरोघ= क्योंकि यह विरोध अन्योन्याययदोष होगा [अन्योन्यालकाररूप नहीं] भाव यह कि यदि यरहां विरोध का समाधान हो जाता तो कदाचित्र यहां अलंकारता मंमव होती। यथा- "धन से प्रशा उत्पनन होनी है और पत्ना से धन। प्रत्ा और धन इस ओवलोक में परस्पराशरिन हैं। यहां प्रश्ञा और धन इन दोनों के स्वरूप एक दूसरे को उत्पन्न करते हैं। [किन्तु यर्श] विरोष का समाधान देश और काल के भेद से हो जाता है [अन यहां अनंकारत्व मान्य है] शोभाकिया= यहां जो ी वही पररपर में निमित्त है।
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अन्योन्यालद्कार:
विमर्श :- इतिहदास- अन्योन्य की कल्पना प्रथमतः रद्रट ने ही की है। उनके पूर्ववर्ती मामद, वामन तथा बद्भट में यह अलंकार नहीं मिल्ता। सुद्रट ने इसका विवेचन इस प्रकार किया है- 'यत्र परस्परमेक: कारकमानोडभिधेययो: क्ियया। संजायेत -- जहों दो पदार्थों में परत्पर के प्रतिकिया द्वारा एक ही कारकभाव हो और उससे तत्व- विशेष व्यक होता हो तो उले अन्योन्य कहते है।' उदाहरण- 'रूपं यौवनलह्ष््या यौवनमपि रूपसंपदस्तस्याः। अन्योन्यमलकरणं विभाति शरदिन्दुसुन्दर्या:।।७९२।। -'उस झरदिन्दुसुन्दरी का रूप [ आकृति ] यीवनभी का और उसकी यौवनश्री रूप का अलंकार प्रतीत होठा है।' मम्मट-मम्मट में रुद्रट का ही असफल सनुकरण है- 'करियया सु परस्परन्, वस्तुनोजेननेडन्योन्यम्।' 'दो वस्तुओं का क्रिया के द्वारा परस्पर की उत्पत्ति अन्योन्य।' उदाहूरण- 'हंसानां, सरोमि: श्रीः सार्यतेश्य हंसैःसरसाम्।' [प्राकृतच्छाया ]। -'हंसों की शोमा तालाब बढ़ाते हैं और तालायों की हंस।' सर्वत्व के सूत तथा उसकी वृत्ति की योजना से लगता है कि ये दोनों दो भिन्न रचयिता के हैँ। वृत्ति में रुदट तथा मम्मट का सिद्धान्त प्रतिपादित मिलता है जब कि सूत्र की पदार्थ योजना उससे मिन्न अर्थ का संकेत देती है। सूत्र में 'क्रियाजनन'-पद का समास पष्ठीतत्पुरुष माना जा सकता है। तदनुसार सीधा मर्थ निकलता है 'परस्पर में किया की उत्पति', और सभी आचार्यो को यही अर्थ विवक्षित है। वे कहते भले ही 'क्रिया के द्वारा परस्पर की उत्पत्ति' यह हो। रूप औौर चौवन, इंस और तालाव तथा पार्वतीकण्ठ एवं निस्तल मुक्तादार परस्पर में एक दूसरे की शोभा हो सत्पन्न करते हैं, एक दूसरे के स्वरूप को नहीं। वृत्ति में जो 'परस्परोत्पादकत्व' शब्द है उसमें पाठान्तर 'परस्परोपपादकत्व' मी मिलता है। इससे लगता है कि प्रानीन पाठकों को मो यह वैषम्य सटका था। विमर्शिनीकार ने सूत्र और वृत्ति के इस निगूढ वैषन्य पर ध्यान नहीं दिया। वे भी मन्मट मत के समर्थक जो हैं। परवर्त्ती रत्नाकरकार- शोभाकर-ने इस वैधम्य में सूत्रकार का ही साथ दिया है। यह तथ्य उनके निम्नलिखित सूत्र से स्पष्ट है- [ सू०]'रूपधर्योः परस्परनिवन्धनत्वमन्योन्यन्।' -'रूप और धर्म की परस्पर के द्वारा निष्पत्ति अन्योन्य।' र्पष्ट ही इसमें रूपवान् या धर्मो के प्ति कारणता न मान रूप और धर्म के प्रति ही वह मानी गई है। रत्नाकरकार ने सर्वस्व की वृत्ति के विरुद्ध स्वरूप की अन्योग्यनिष्पत्ति में भी अन्योन्यालंकार माना है और विमर्शिनीकार ने उसे र्वीकार मी किया है। स्वरूपनिष्पत्ति के लिए रत्नाकरकार ने 'धनेन नायते प्रश्ा० इसी पद्य का उदाहरण दिया है। विमशिनीकार ने सूतरस्थ करिया को ध्मे का उपलक्षण भी माना है। उसके लिए रत्नाकरकार ने अनेक स्पष्ट उदाहरण दे 'कण्ठस्य तस्याः' पद्य में भो शोमा को क्रियारूप न मान धर्मरूप माना था। सिद्धावस्थापन्न करिया भी धर्म ही होती है। धर्मे और उपाधि पर्याय हैं अतः करिया भी धर्म ही है क्योंकि उपाभिचतुष्टयवाद में
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५०८ अलङ्कारसवस्वम्
क्रिया को भी उपाविस्वरूप मानकर शब्द का पवृत्तिनिमिच माना है। रस्नाकरकार ने शोभा के लिए पर्याय रूप में बहुत ही सहसयता पूर्ण 'परभाग'-शन्द दिया है। अप्ययदीचषित-ध्म या धर्मी का नाम बिना लिए केवल अन्योन्य उरकार को अन्योन्या संकार मानते है- 'अन्योन्य नाम यत्र स्यादुपकार परस्परम्।' उदाहरण तियामा पाशिना माति शची भाति नियामया।।' -जहोँ परस्पर के प्रति परस्पर का उरकार हो तो उमे अन्योन्यालंकार करते हैं। यथा- राि चनद्रमा से सुशोमिन होतीं है और चन्द्रमा रात्रि से।।' पविस्तराज जगनाप ने भी अप्पयदीक्षित के ही अनुसार निम्नतिखित लक्षण किया है-
-'दो में से एक दूमरे के द्वारा एक दूसरे में विशेषना का आधान अन्योन्य।' विशेषता को 'पण्टितराज ने 'क्रियादिरूप' कद्दा है-'विशेष, कियादिरूप।' विश्वेश्वर पण्डित ने भी-अप्पयदीक्षिन और पण्टितराज का हो पथ अपनाया मर अन्योन्य का लक्षण उन्हों के अनुकरण पर इस प्रकार किया है- 'अन्योन्यं वस्तूरनां परस्परोत्कर्पहेतुत्वम्।' -वस्तुओं का परसवर में उत्कपं देतुत्व अन्योन्य।' यहाँ उत्कर्षपात्र वस्तु में पूर्वाचार्य प्रतिपादित दित्व को विश्वेश्वर ने नहुत्त्व में बदल दिया है। वस्तुनः उपकार्ये और उपकारी के। दो स्पष वर्ग तो वत्कपेपानगत बहुत्व की स्थिति में भी रहेंगे ही। श्री विद्याचकवर्तों को निष्कृष्टार्थ कारिका यहाँ यह है- 'क्रियाजननमन्योन्यमन्योन्यालत् कतिर्मता ।' [सर्वस्व ] [सू० ५१] अनाधारमाधेय मेकमने कगोचरमशक्यव स्त्वन्तर करणं विशेप:। इहाधारमन्तरेपाधेयं न वर्सत इति स्थितावपि यस्तत्परिद्वारेणाधेयस्यो- पनिबन्धः स पको विशेष:। यच्चैकं वस्तु परिमितं थुगपदनेकधा चर्त- मानं कियते स द्वितीयो विशेष:। यञ् किचिदारभमाणस्यासंाव्यवसत्च- न्तरकरणं स तृतीयो विशेष:। आनुरुप्यपरिद्दाररूपविर्योधप्रस्तावादिदोक्ति:। कमेण यया- 'दिव मप्यु पयातानामाकल्पमनल्पगुणगमा येपामू। रमयन्ति जगन्ति गिर. कर्थमिव कचयो न ते चन्घा:।।' मासादे सा पथि पथि च सा पृष्ठन. सा पुरः सा पयक्के सा दिशि दिशि च सा तद्वियोगातुरस्य। हंदो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति ते कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमह्वैतयादः।'
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विशेपालङ्कार: ५०९
'निमेपमपि यद्येक क्षीणदोपे करिष्यसि। पदं चित्ते तदा शंभो किं न संपादयिध्यसि।' अन्र कवीनामाधाराणामभावेडप्यावेयानां गिरामवस्थिति: अनम्यत्रभावो विषयार्थ इति विषयत्चेन तेपामावारत्वात्। एकस्या एव योषितः मासा- दादी अवस्थानम्, चित्तविपये पद्करणे प्रस्तुतेऽपि भाविलोकोत्तरवस्तुसंपा दनं क्रमेण ज्ञेयम्। [सृ० ५१]आधाररहित आधेय, पक का अनेक रूप से दिखाई देना, अशक्य अन्थ कार्य की निप्पत्ति विशेष [कहलाते हैं]।।' [१] यहाँ अधिय आधार के बिना नहीं रदता। इतने पर भी जो उस [आधार ] के बिना आधेच का बतलाया जाना वह एक प्रकार का विशेष होता है। । २] इसी प्रकार एक वस्तु सीमित होते हुए भी जो एक साथ अनेक रूपों में विद्यमान दिखलाई जाती है वह दूसरे प्रकार का विशेष कहलाता है। इसी भोति [ ३ ] अन्य कुछ कर रहे व्यक्ति का जो अन्य मसंभान्य कार्य कर देना दिखलाया जाता है वह तीसरे प्रकार का विशेष होता है। मनुरूपता छोड़ने रूपी विरोध को लेकर इसे यहाँ दतलाया गया। कम से उदाहरण- [आधारहीन आधेय-] 'सवर्ग चले जाने पर भी जिनकी अन्प शुगों से युक्त उक्तियाँ संपूर्ण जगत को आानन्द देती रहता है वे कविजन कैसे वन्दनीय न होंगे।' [एक की अनेकगतता - ] 'उसके वियोग में आतुर मेरे लिए प्रासाद पर वह और गली-गली में वह, पीछे वह, आागे वड़, पलंग पर वह और दिद्या-दिक्ा में वह। अरे [ मेरे] चित्त! तुझे कुछ और नहीं सूझता ? सारे संसार में वह वह, वह यह, वह यह। यह कौन-सा अहैतवाद है।' [ अन्य असंभाव्य कार्य की निष्पत्ति-] 'ह भगवान् शिव ! आप [मेरे ] दोषमुकत चिस्त में यदि क्षणमर के लिए भी आ वसेंगे तो आप क्या-कया संपन्न नहीं कर देगे। यहाँ [प्रथम पद्य में ] आधारभृत कवियों के न रहने पर भी आधेयभूत उत्तियों की अवस्थिति, कयोंकि ने विषयरूपी आवार है, विषय का अर्थ है अन्शन न जाना [ 'जैसे उढ़ते पक्षी का आधार आकाश, क्योंकि पक्षी आकाश से मलग नहीं जा पाता ]। [द्वितीय] में एक ही त्त्र की प्रासाद आदि में एक साथ स्थिति, तथा [ तृतीय] में चित्त में स्थान करने रुपी प्रस्तुत कार्य के साथ-साथ मावी लोकोस्षर कार्य की निष्पप्ति क्रम से जाननी चाहिए। चिमर्शिनी मनापारमित्यादि। एतदैव व्यासष्ट-इहेत्यादिना। तत्परिहारणवि। आधार्यतिरेकेणे त्यर्थ:। परमिसमिति अध्यापकसन्। व्यापकस्य हि युगपदनेकन्र स्थितिर्वरतुसंभविनीति तन्न नालकारत्वम्। किचिदिति यत्र यादग्विवच्षितम। न केवळमारव्घस्य वस्तुनो निप्पत्तिर्यावद्संमाव्यस्यापि वस्त्वन्तरस्येत्यन्न तात्पर्या्थ:। तन्त वर्त्वनतरं चिकीपितं भवस्यचिकीपितं वा। एुवं च 'फलाम्तरस्य निष्पत्तिश्चिकीर्पाविर हेऽपि या। स विशेषश्चिकीर्पायां मसङ्गस्तु ततः पृथक्॥'
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अलङ्कारसर्वस्थम्
हरयायुक्तयुक्या प्रसक्रादन्या्थः। मसन इति। प्रसद्वाकयमलंकारान्तर न वाच्यमू। न हि चिकीर्पितत्वं वा किद्विक्रत्तिविरोपो येनालंकारान्तरं स्पातू। यात्रता हान्रा संभाव्यस्य वणश्वन्तरस्य विच्छुतिविवसिता सा चात्र स्थितेति कि चिकीर्पितस्वाचि कीपिंतरव कर्पनेन । नरमाव- 'अप्रेपु मान्दहरिचन्दनपट्टचर्चा मार्णालहारव लयादि च पात्मवप्वा। योडभूद्िया पतिवियोगविषाद दम्भो ज्योहस्त्रामिसारपरिकर्म स नक्कमासीत् ।' इरयन्र हरिचन्दरनचर्चादिना न केवल पतिियोगविषाददम्म: कृतो यावदमिसारि कापरिकर्मापि छृल मित्यशक्य वर्वन्तर करणार मैवा्यं विशेष। विशेषाशात् त्रयो न पुनरेकखविविध 1 लक्षणस्य मिनखात। उचितस्य तु विशि सश्वस्य भावासत्रयागामपि विशेषत्वम्। गिरामत्र कविस्वभावाद्न्यत्र साव, शम्भोक्ष लोकोत्तरवस्उुसपादनं वास्तयमेवेति विशेषमम्रान्ये न मन्यते। पतावतैव पुनरस्याभावो न वाच्या उदाहरणान्तरेप्वसय सभवाव्। तानि सु यथा- 'अङ्गानि चन्दनरसाद्पि पीतलानि चन्द्रानप वर्मन बाहुरथं यशोमिः। चालुषय गोत्रतिलक कव घसतयसी से दुर्वृ तभूपपरितापगुकः प्रतापः॥' मग्राह्काशीनामनर्हरवेनाधारा मावेप्याधेयस्य पतापस्य स्थितिरिति विशेषालंकारत्म्। तथा प- 'चोरिअरमणा ठलिए पुत्ति पिज हरि हि सित्ति कि वुज्ज। वच्घती सुहजोण्हामोहि तिमिरं पि पण्गिहिसि ॥' 'अन्न न केवळं प्रिय हरिष्यसि यावजिकीर्याविर हे गासंमाव्यं तिमिरमपी'ति वरवन्त रकरणास्मा विशेष 1 यमा वा- 'माघा शिश्ुपाषवयं विद्धस् कविमद्वर्धं विद्े। रटनाकर स्वविजम हरविजयं वर्णयन् व्यतृणोद।।' अत्र न केवलं साघ शिशुपाळवध चकार यावदसंभाव्य विक्ीपितं कविमद्रवयम- पीत्यशक्यवखन्तरकरणारमार्य विशेष:। अववयमेव कविमद्वर्घ कर्तु माघस्याध कर्तृश्वम्। एव मुत्तरत्ापि नेयम्। अनः 'एकस्मिन्कियमाणे तञ्जातीयस्य प्रसङ्गत' सिद्धि -रनुषक्' हर्यनुषझ्गालकारोऽपि विशेष एवान्तगंव तीति न पूथम्वाच्य:। अनाधारेत्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-हह इत्यादि के द्वारा। तत्परिदारेण=उसके बिना आधार के बिना। परिमित = अव्यापक। जो व्यापक होता है वद भकेगा मी एक साथ अनेक स्थलों में वस्तुत रह सकना है अन वहाँ अलकारत नहीं शोता। किचिद्=जहाँ जैसा अर्थ विवकित हो। अर्थ यह कि 'न देवल शुरू किर कार्य की हो निष्पति हो अपितु ऐसे किमी अन्य की भी निष्पत्ति हो बार जिसकी संभावना मो न की जा सकती हो। वह असंभान्य अन्य वस्तु चिकीपित या अचिकीपिंत [इस प्रकार दोनों हो पकार की] हो सकती है, अनः [अलंकार- रह्नाकरकार को ] विना चिकीर्षों के भी अन्द फल की जो निग्पत्ति उसमें विशेषनामक अलंकार होता है। मसंग नामक अलहार वहाँ होना है जहाँ चिकीषा रहती है।' -- इत्यादि के द्वारा प्रस्तुत युक्ति द्वारा 'पसन् से अन्य पदार्थ की निष्पत्ति प्रसङ्ग' [भटकार- रत्नाकर सूत्र ८७] इम प्रकार प्रसक नामक पक स्वनन्त्र अलकार नहीं बतलाना चाहिए। देसा -भोडे ही है कि चिकी पिंतत्व और अचिकीपितत्वमें कोई विविट चमतकार या चमतकारमेद हो जिससे
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विशेषालक्कार: ५११
अलंकार में भेद आए। जहां तक अन्य असंभाव्य वस्तु की निष्पत्ति की विवक्षा का सम्बन्ध है यह यहाँ [ इन दोनों ही स्थितियों में ] है ही। फिर चिकीपितत्व और अचिकीपिंत्त्व की कत्पना से क्या? इसलिए [ सरंकाररत्नाकरकार द्वारा प्रसद्भालंकार के उदाहरण के रूप में उद्धत-] -- अम्-भक्ष में घिसे रिचन्दन का लैप, मृणाल के हार और वलय आदि जो भी कुछ पथिकवधू के लिर दिन में पतिवियोगजनित विपाद का दम्म [दिखावा] था वही रात में चाँदनी में (शुक्ल] आामिसारिक मण्डन वनता रहता था।' इस पद् में, 'हरिचन्दन के लेप आदि से केवल पति वियोग के विपाद का दम्भ ही नहीं हुआ, अभिसारिक मण्डन भी निम्पन्र हो गया'-इस प्रकार यह अन्य असंभावित वस्तु के निष्पादन से होने वाला विशेषालंकार ही है। यहाँ विशेष तीन है, एक नहीं, क्योंकि तीनों के लक्षण भिन्न हैं। उचित विशिष्टत्व तीनों में है अतः नाम तीनों का विशेष ही है। [दिवमप्यु० पथ में] यहाँ उक्तियों का कवियों से अलग रहना [ इस पध के निर्माता ] कवि की कल्पना से प्रसूत है, किन्तु [निमेमपि० पद्म में] शिव का लोकोत्तर वस्तु का सम्पन्न करना नास्तविक ही है अतः अन्य आचार्य इसमें विशेषालंकार नहीं मानते। किन्तु केवल तने भर से [ विशेषालंकार के] इस [ तृतीय भेद] का अभाव नहीं मान बैठना चाहिए क्योंकि अन्य उदाहरणों में मी यह दिखाई देता है। वे ये हैं- 'हे चालुक्यवं श्ञतिळक! [आपके] अङ्ग चन्दनरस के समान शोतल हैं और [ आपका ] यह वाडु यशों के द्वारा चाँदनी उगल रहा है। तब भापका दुछ राजाओं को सन्ताप देने में महान् प्रताप कहाँ रहता है।' [ विक्मांकदेवचरित ५१८६]। यहाँ यङ आदि अयोग्य होने से आधार बन नहीं पाते तब भी आधेय प्रताप को स्थिति नतलाई जा रही है अतः यहाँ विशेपालंकार है। इसी प्रकार- 'चौर्यरताकुलिते ! पुत्रि I प्रियं हरिष्यसीति कि नस्तम्। न्रजन्ती मुखज्योत्सनामरैस्तिमिरमपि नोत्स्यसि ।' बोरी चोरी रमण करने हेतु आकुल पुत्रि! तू परिय को गँवा देगी इसी का डर नहीं है, जाते समय सुखचन्द्र की ज़ुन्हाई से तू अँधेरे को दूर कर देगी।' यहाँ 'इतना ही नहीं कि तू केवल ग्रिय को गँवा देगी अपि तु अँधकार को भी, जो तू करना चाहती नहीं अतः असभाव्य है' इस प्रकार अन्य वस्तु के निष्पादन से उत्पन्न विशेष अलंकार है। और जैसे- 'मावकवि ने शिशुपालववकाव्य बनाकर कविमद का वध कर डाला। [और] रत्नाकरकवि ने [ हरविजयकाव्य में] शंकर की विजय का वर्णन कर अपनी विजय व्यक्त की। यहाँ-'माघ ने केवल शिशुपालवध ही नहीं किया कविमदका वप मी कर दिया, जो असभाव्य किन्तु चिकीरपिंत था इस प्रकार यह अन्य अशक्य वस्तु के करने से हुआ विशेषालंकार है। यहां कविमद का वध जो सनया अशक्य है, करने में माघ को कर्ता बतलाया गया है। इसी प्रकार मागे [अन्य भलंकारों में] भी जानना चाहिए। अतः- 'एक कार्य किया जा रहा हो तो उसीके प्रसंग में उसीके सजातीय किसी अन्य कार्ये की सिद्धि अनुषंगं' यह अनुपड्ञालद्कार भी विशेष में ही अन्तर्भूत हो जाता है अतः उसे भी स्वतन्त्र अलंकार नहीं कहना चाहिए।
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५१२ मलङ्गारसर्वस्वम्
विमश :- इतिहास- विरेल्कार के उक्त तीनों भेद इदपयमनया रुटट की ही करपना है। उनके पूर्ववनी भामइ, वामन, उटट में इस पर बोई विचार नहीं मिल्ना। मद्ट का विनेषविवेचन इस प्रकार है- [१ ] 'किविदवश्याधेय यरिमत्रमिषीयते निराधारम्। वाइगुपरन्यमानं विद्वेयोऽसी विशेष इति ॥ ९१५ ।' 'जहो कोई वस्तु किमी का आधय होने दुए भी निराधार रूप से माप् होती हुई बनलाई जए तो वह विशेष नामक भटकार होना है।'
[२] य मेकमने करिमन्नाधारे वस्तु विद्यमनतया। युगपद्भिषीय नेडमावत्रान्य स्याद विशेष इति ।।९७।।' -'जहाँ एक वस्तु एकमाथ अनेक आधार में रहती हुई बतलाई जाए तो यह दूसरा विशेष होना है।' उदाहरण-'हृदये चक्षुषि वाचि व तव सेवामिनवयौवना वसति। वयमन निरवकासा विरम कृन पादपतनेन ।।' -'वही अभिनवयौवना तुम्दारे दृदय, नेत्र और वाणी में बस रद्दी है। इमें इनमें कहीं स्थान नहीं है। रहने भी दो। पैरों पर गिरने से क्या ?। [१]'यन्नान्यन कुर्वागो युगपत्कार्यान्तरं च कुर्वीत। कतुंमशक्य कर्रा विशेयोऽसौ विशेषोडन्य ।। ७९।' -'जहों और कुछ कर रहा व्यक्ति उमी के साथ अन्य कोई वशस्य कार्य भी कर डाले तो यह एक अन्य विशोष होता है।' उदाहरण= 'लिसिन वाणमृगाक्या मम मनमि तथा शरीरमाहमीयम्। स्पुटमात्मनो लिखुन्त्या डिलक बिमले कपोलतले।।' -'उम वाळमृगाक्षी ने सपने केपोलतल पर तिलक लिसकर सपना रूप इमारे चित्त में लिस दिया।' स्पष्ट है कि रद्रट की विशेषाल्कारविषयक धारणा स्पष्ट और लक्षण व्वाहरण की योजना मौ पूर्णे समर्ये है। मम्मट ने रुटट के इस संपूर्ण विवेचन को ज्यों का त्यों अपना लिया है। उनका विशेष विवेधन यह है- मम्मट-'बिना प्रसिद्धमाधारमाधेयस्य व्यवस्थिति"। एकात्मा युगनद् शृत्िरेकस्यानेकगोचरा॥ अन्यज् प्रकुवत' कार्यमत्यवयस्यान्यवरतुनः। तथेव करणं न्ैति विश्ेरषस्त्रिविध स्मृत* ।।' -- 'पमिद्द आाधर के बिना आधेय वौ स्थिनि, एक पदार्ये की एकमाथ अनेक स्थानों में एक रूप से अवस्थिति तथा अन्य कार्य कर रहे व्यक्ति द्वारा अन्य अशक्य वसतु का उसी पकार नि्शन कर देना इस प्रकार से विशेषालंकार तीन प्रकार का माना गया है। ददहरण-प्रथम का रदूट का 'दिवमम्युपयानानान्०' पम ही। द्वितीय का रुद्रढ के पद 'ढृदये चशुषि' की समानाथीं ही गाथा 'सा वमह तुच्झ०' तथा तृनीय का- *गृदिणी सचित ससी मिथ: भियशि या ललिते कलाविधी। करुणाविमुखेन मृत्युना हरता स्वां वद किन मे हत्तमू ।।' [रघुवंश, ८ ]
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विशेपालङ्कार: ५१३
-- 'तुम मेरी गृहिणी थीं, सचिव थीं, सखा थीं, एकान्त में ककाओं के ललित विधान में परिय शिष्या थीं। करणाविमुस मृन्यु ने तुम्हें हरण करते हुए मेरा क्या नहीं हर लिया।' सर्वस्वकार ने मन्मट के लक्षण की दो सूष्ष्मताओं को छोड़ दिया, एक तो आधारगत प्रसिद्धि को और दूसरी एक की एकसाथ अनेकगोचरता में एकरूपता की। प्रसिद्धि की आवश्यकता विरोधपरिदार के लिए है और एकरूनता की आवश्यकता पर्यायालंकार के निराकरण के लिए। शोमाकस-परवर्ती रत्नाकरकार शोभाकर ने सर्मस्वकार के लक्षण में संशोधन प्रस्तुत् किया। उन्होंने लक्षण में आए मशक्य तारूपी विशेषण को असंमाव्यता के रूप में स्थिर किया। सर्वस्व के वृत्तिकार ने असंमाव्यता का प्रयोग तो किया था किन्तु मे अशक्यता की भी दुहराते जाते थे। इस नृतीय विशेष में शोमाकर ने बुछ विस्तार और किया और उसमें विरुद्ध की निष्पत्ति को भी स्थान दिया। उनका लक्षण इस प्रकार है- अनाधार माधेय मेकमनेकमोचरं संभावितादधिकस्य विरुद्दस्य वा सम्पत्तिश्व विशेष: ॥ ६३॥ सभाचित से अधिक निष्पत्ति का अर्थ अशक्य की निप्पत्ति नहीं है। प्रथम का उदाहरण रत्नाकरकार ने भी ल्दट का 'दिवमप्युप्यातानान्'-पद्य ही दिया है। इसी के लिए रत्ना- करकार ने 'अंगानि चन्दरन०' पय्य भी पस्तुत किया था। द्वितीय के लिए विमर्शिनीकार द्वारा उद्दत 'बोरिअ०' गाथा रत्नाकर से ही लो गई है। इसकी संगति रत्नाकर में इस प्रकार की दी हुई ह- 'अन्र चौर्यरतेन प्रिंयरतेन (?) प्रियरअनार्थ गमनरूपस्य अ्यत्नत्व मवृत्तस्यानुनिष्पन्नतया तमोहरणरूपॅ कार्यान्तरमपि संभाविताद् भवतीत्युक्तन्।' इसके अनुसार छिपे-छिपे प्रिय से मिल्कर कोई लढ़की प्रिय को आकष्ट करना चाहती है। विरुद्धकार्यनिग्पत्ति के लिए रत्नाकरकार ने प्रामृत की यह एक इलेषपूर्ण गाया उद्धृत की है- 'आलिह्माणीभो विचित्तवत्तिआा कि पि कि पि तद्यह्म्। गहु णवरं तणुआयन्ति ताक वड्ढंति लोअर्स।।' 'आलिख्यमाना अपि चिन्नवर्तिका [चित्तवृतिका: ] किमपि किमपि तदिवसम्। न केवलं तनुकायन्से ता वर्षन्ते लोकस्व ।। यहाँ 'चित्तवतिआ' शब्द की संस्कृत छाया 'चित्रवर्त्तिका' और 'चित्रवृत्तिकाः' दोनों हो विरवाक्षित हैं। दोनों शब्द की प्राकृत एक ही है अतः दोनों में इ्लेष है। फरतः चित्र- पक्ष में चितरवत्तिका अर्थ ले लिया जाता है और लोकपक्ष में चितवृत्ति अर्थ! इस प्रकार 'उस नाविका का चित्र लिखने से केवल चिन्नवर्ततिका ही क्षीण नहीं होती लोगों की चिततृति ी दढ़ने लगती है' इस अर्थ में क्षय के विरुद्ध वृद्धिरूपी असंमाव्य अन्य अर्थ की निष्पत्ति वतलाई जा रही है अतः यहाँ तृतीय विशेष का दवितीय भेद है। परवर्ती अप्पयदीक्षित और पण्टितराज जगन्नाथ ने इस उपनेद को नहीं माना है। उन्होंने केवल तीन प्रसिद्ध भेद दी किए हैं। अध्ययदीक्षित-[.] विशेषः व्यातमावारं विनाप्याधेयवर्णनन्।
(२ ] विशेष: सोपि यद्ेकं वत्त्वनेकत्र वण्येते॥ उदा- 'अन्तर्वहिः पुरः पश्चाव सर्वदिस्यपि सेव मे।' अर्थात 'प्ासावे सा०' पद्य का संक्षेप
'्वां पर्यता मया लव्ष कल्पवस्निरीक्षणन'॥
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मलक्कारसर्वस्वम्
आापको देखने से मैने केश वृक्ष का दर्शन पा लिया। अधपदीक्षित ने समंमान्य मुद्द के स्थान पर अरक्य शब्द हो रसा है। पव्डितराज दोनों को अपनाने और विशेष का लक्षण इम प्रकार बनाने हं- पण्दितराज-[१] पसिद्धमाश्रय विनाऽधेय वर्ण्यमानमेंवो विशेषप्रकारः ।
सुगपदने का वारगतनया वर्भ्यने सोम्परो विशेषप्रकार। [ २) वच्च किश्चिन् कार्यमारममागग्यासमाविता - राज्यवस्त्म्ननिवर्तन तृमीयो विशेषप्रकार। ये तीनों नेइ प्रस्तुन कर पण्टिनराज ने दो पक्ष मी दिसलाए है, एक प्राचीनों का पक्ष जो इन तीनों को एक हो विशेषालकार के भेद मानता है और दूसरा नवीनों का वह पक्ष जो तीनों को स्वतन्त्र स्वीकार करता है। ननीन के अनुमार उक्त तीनों में फोइ एक सामान्य धर्मे नहीं है अन ये एक नहीं कहे जा सकते। विमशिनीकार ने भी यह पक्ष प्रम्तुन किया है और तोनो विशेषों को स्वतन्त्र माना है। विश्नश्वर-ने पण्डितराज तथा उनके भी पहले के विमधिनीकार द्वारा प्रस्तुन आपति को न्याय को किपत मान्यताओं द्वारा सामान्य नत्त्त की सिद्धि को दूर करना चाहा है। उनके अनुसार तीनों भेदों में 'स्वनिरपिनव्यभिचारप्रतियोगिकन्व' एक सामान्य धर्म है। इसका भाव इनना ही है कि सामान्य स्थिति का अमार इन तीनों ही प्रकार में समान दै। म्वामाविकता है आधार के बिना आधेय के न रहने में= प्रषम भेद में उसका अमाव है। इमा प्रकार एक का एक रूप से एक साथ कडीं एक की जगह रहना स्वामाविक है। दितीय भेद म उसका समान है। तृतीय भेद में मो निम्पन्न हो रहे अनिरिक्त कार्य के बारण का अभाव रहता है। इम प्रकार तोनों नेदों में किमी न किमी का अमान [व्यमिचार] प्रनिपादित है। विश्वेश्वर ने तीना को बही ही स्पष्टना और वड़े ही मक्षेप में इस प्रकार गूँथा है- 'स्थितिराधागमावे वृत्िरनेकेपु युग दकर्य। एकफरणेन दुष्करकार्या तरमिद्धिरिति विसेष-।।' रमका सपष्टीकरण करसे दुए उन्होंने नीन मूष मो प्रस्तुत किए है- १-प्रमिट्माधारम-तरेणान्याधेयस्य मिद्धिदत्रोक्ता स पको विशेष। ·- यन चैकमपि वस्तु युगपदनेकव वर्चने स दवितीय। ३-यत्र चैरुकार्यारग्मयतनेन दुषकरकार्यान्तरमषि समारम्यने म तृनीय:। इस प्रकार विश्वेशवह प्रथम में प्रसिद्धि और द्वितीय में यौगरय का निवेश कारिका नें नो नहीं कर पाए थे किन्तु मूनो में वे उनकी उपेक्षा नहीं कर सके। श्रीविद्याचकवनी की निम ष्टार्थकारिका इस पर इस प्रकार है- 'मनावारादिमेदेन विशेषोपि निया मख: । [सर्वस्व] [सू० ५२] यथा माधितस्य तथ रात्येनान्यथाकरणं व्याघातः। यं कंचि दुपायविशेषसवलम्व्य केनिद् यननिप्वादितं वम्तु तत्ततोडन्येन केनचितत्मविद्वन्दिना तेनैयोपायविशेषण यदन्यथा कियते स निष्पादित- यस्तुन्याद्दतिद्वेतुत्वाद् व्याघातः। यथा-
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व्याघातालह्वार: ५१५
'दशा दग्धं मनसिजं जीवयन्ति दशैव याः। विरूपाक्षस्य जयिनीस्ता: स्तुमो वामलोचना: ' अत्र दष्टिलक्षणेनोपायेत स्मरस्य हरेण दाहविपयत्वं निष्पादित्तम्। सृगनयनाभि: पुनस्तेनैयोपायेन तत्य जीवनीयत्वं कियते। तच्च दाह. विपयत्वस्य प्रतिपक्षभृतम्। तेन व्याघाताख्योऽयमलंकार:। सोऽपि व्यति रेकनिमित्तत्वेनाशोक्त। विरूपाक्षस्येति वानलोबना इति व व्यतिरेकगर्भा वेव वाचकी। जयिनीरिति व्यतिरेकोकि:। पूर्ववदिह पकरणे लक्षणम्। [सू० २२] वस्तु जिस प्रकार सिद्ध की गई हो उसका उसी प्रकार अन्य व्यक्ति द्वारा तह्िपरीत साधन व्याघात ॥' किसी व्यक्ति ने जिस किसी उपाय से जो कोई वस्तु निष्पन्न की हो उसका उससे भिन्न उसके विरोधी व्यक्ति के द्वारा उसी उपाय से जो विपरोत रूप में परिणत किया जाना है वह निम्पा- दित वस्तु की व्याहति = हनन का हेतु होने से व्याघात कहलाता है। यया- 'आँख से जले काम को जो आँख से ही जिला देती है, अतः जो विरुपाक्ष [अर्थात् निरूप असुन्दर तीन नेत्र वाले शिव] को भी जीत लेने वाठी हैं उन सन्दर नेत्र वाली युवतियों की स्तुति करता हूँ।' वहाँ नेवरूपी उपाय से शिव ने काम को जलाने का कार्य संपन्न किया था। नृगाक्षियों द्वारा उसके विरुद्ध उसी नेत्ररूपी उपाय से उस काम को जिलाने का काम किया जा रहा है। वह जलानेरमी कार्य का उलदा है। इसलिए यह व्यावात नामक अलंकार हुआ। वह भी यहाँ व्यतिरेक की पीठिका पर यहाँ निबद्ध हुआ है। विरूपाक्ष [विरूप नेत्र वाले] तथा बाम [सुन्दर]-लोचना वे शब्द यहाँ व्यतिरेकगर्मित ही है। 'जीतने वाली' इस प्रकार स्यतिरेक को शब्दतः मी कह दिया गया है। इस प्रकरण में इसका लक्ष पूर्ववत् ही है। विमर्शिनी यथा साधिनत्वेत्यादि। निष्वदितमिति न व निष्पादयितुं संमाव्यमानम्। तद्ि द्वितीय व्यापातविषयः। ततः इति निप्पादनकुतुः । तत्पतिद्वन्द्विनेति। निप्पादितवस्तुव्याहति कारिस्वान्। तेनवेति, अन्र भरा, अन्यया द्वि वैचित्यातिशयो न स्यात। अन्यथाक्रियत इति। तदुपमर्दकवरत्वन्तरजननेनेयर्थः। अत एव नामाप्यरय योगिकमित्याह-निष्पा दितेत्यादि। अतश्र यम्न निष्पन्नक््य वस्तुनो व्याहतिरुपनिवध्यते तत्र नायमलंकारा निम्पत्तेरे बापरोहादू व्वाघातायोगास्। निप्पसवस्तुव्या हतिर्हि व्याघातः। फलं छात्र व्या. 4h सूत्र गीय म्। एवं हि व्याघातत्वमेव न स्थाठ्। कुलममलिनं भद्रा सूतिमतिः श्रुतिशालिनी सुजवलमलं स्फीता लपमी: पमुखमसरविडितम्। प्रकृतिसुभगा होते भावा अमोभिरयं जनो व्रजति सुतरां दर्प राजस्त एव तवाहुनाः॥ इश्यन च कुलादयो यथान्येषां दर्पहेतवो न तथा तब, अ्रत्युत विनयकारिण इत्येवं विघगुणविशिष्टेभ्य: पुरुपान्तरेम्योडस्य वैलदण्यमातं विवच्ितम्। न तु कुलादििरा दितोऽपि दुर्पत्तव व्याहत इति येन व्याघातालंकारो मवति। अथान्न दर्पकारिणोऽपि
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५१६ अलद्कारसवस्वम् कुषादेरतद्विनाश हश्य यमसं कार इति घेतू, नैतत्, कुषादीनां प्रृतिभेददेन दर्पादपकारि रस्य वाहतनर्वेनालंकाररवाद्। तम्रापि कृलादिभिस्तव दुर्पस्य विनाश इत्यम्युपगमेना- यमलंकार। निष्पादितवस्तुव्याहतेरभावासविबन्ध नव्वेन चासयोक्कत वाल्। 'विण्णाणेण मअदिरसं बिगियटृड भिष्णकारणुप्पण्णं। विष्याशकारणं संत पुण मण को गिवटटेह।' दश्यन्राविमदुश्य विज्ञाननदन्यहेतुरुरने वम्पुसमव्यन्यदवतुमंदी विज्ञानेन निवश्यते सदे-
घातः विज्ञानहेसुकाया मदनिष्पतरेय मरोह्षाद्। 'गाट कान्त दृशनवतम्यथास कटादरिवधुजनरय य.। ओष्ठविदुमक्लान्यमोचमन्निदंशनयुधि रृपा निजा २रम्।।' हत्यग्र चाघरव्ययानिर्मो चनारम कत्रिपरीत फलनिष्पा्यर्थ तलिदशनामा प्रयरन उप निषद्ध हति विचित्रमिति न व्याघातालकारो वाच्य । नेनैवेति। दष्टिलक्षणेनैन न पुनर- नयेनेशयर्थ: । तेनेति निष्पचवस्य वस्तुनातेनेवोपा्यन व्याहनत्वात। तदेव विभजति- विरूपाक्षस्येत्यादिना। अनेनाश्य व्यतिरेक विनोत्यानमेव न स्यादिति सूचितम। तथा हि येन केनचिद्यरिक चिरसाघितं तदप्यन्येनान्ययाकियते तदा तत्य तनोऽनयथाकरणनुपपत्या वैवण्यमवश्याम्युपगन्तध्यम्। अतश्चास्य सर्वात्मना व्यतिरेको निमित्तरव यायाद्। पूर्व- वद्दिति आनुरूप्यपरिहाराव। स र चकस्योपायस्थान्ययाकरणरवेन विववणाव। ययासाधित्तरयेशयादि। निष्पादित-न कि निष्पादित करने के लिए सभाव्यमान 1 व दिनीय व्यायान का विषय है। तत = उससे निष्पादनकर्ना से। ता्प्रतिद्धन्द्विना उसके विरोधी द्वारा=प्रतिहन्द्री या विरोधी इमलिए कि वह निष्पादित वस्तु .. व्याधान करता है। तेनैव= उसी उपाय के द्वारा इम पर बल देता है, नहीं नो वेचित्र्यातिशय न होगा। अन्यथा कियते= उसके विपरीत रूप में बदला जाता है= अर्थाद् उस [ पूर्रवर्त्ती रूप ] को दवाकर अन्य वस्तु उत्पन्न करने के द्वारा। 'हसीलिए इमका नाम मी यौगिक ही है' इस बान को कदते है- निप्पादिन। इसीलिए जहाँ निग्पन वस्तु की विपरीनना नहों वतलाई जानी वहाँ यह अल्कार नहीं होना क्योंकि निष्पात्त हो नहीं हो पानी तो विपरीत रूप में पर्णति हा सभव नहीं होती। इस प्रकार निष्पन्न वस्तु की व्याइति विपरीतरूपता हो व्याघात है और फल है यहा व्याहतिकारी व्यक्ति में अविशय की प्रतीति। इमीलिए [अलंकाररत्नाकरकार को व्याघान के लिए] 'उत्पत्ति और विनाश का उपाय एक छो तो व्यापात'-ऐसा मृत्र नहीं वनाना चाहिए। इम प्रकार तो व्याघानत् हो निष्पन्न नहीं हो पाष्गा इसी प्रकार [रत्नाकरकार द्वारा व्यानन के उदाहरण के रूप में उपस्थिन ]। "अमलिन कुछ, मुन्दर शरीर, वेदविद्या में निमात मति, पर्याप्त वाहुवल, स्फीत मेश्वयें, असष्टित प्रमुत्व' ये मत्र पदार्थ, जो हैं सो, स्वमावव सन्दर होने है [ अर्थात इन सबमें से प्रत्येक स्वन. सुन्दर होना है] इन [ में मे प्रत्येक ] मै ये मासारिक प्राणी बटो ही सरलता से अत्य- चिक दर्प में या जाते है। किन्तु हे राजन्। आपके लिए ये ही अकुश हैं।" इस स्थल में 'कुल आदि जिस प्रकार अन्य लोगों के लिए दर्प के हतु बनते हैं उस प्रकार आपके लिए नहीं, [आपके दिए तो] प्रत्युन विनय के हेतु है'-इस प्रकार, इस प्रकार के गुणों से विशिष्ट अन्य पुरुषों से इम [प्रस्तुव राजा] का अन्नरमात्र प्रतिपादित करना अमोष्ट है, न कि 'कुल आदि से उत्पन्न आपका "द्प व्याहत हो गया' यह मतिपादित करना, जिससे यश न्याघातालकार हो। यदि कहें-'यहोँ दर्पकारी कुल आदि के दर्पकारित्व का विनाय कयिन
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व्याघातालद्वार: ५१७
है' इसलिए यह अलंकार यहाँ संभव है, तो यह भी अमान्य है, कयोंकि कुल आदि दर्ष या मद्प के कारण व्यक्ति के स्वमाव के आधार पर बनते हैं, अतः यह एक लौकिक तथ्य का अनुवादमान्र हुआ फठतः यहाँ अलंकारता नहीं रहेगी। यहाँ यह अलंकार तमी संभव है जब 'कुल आदि से तुन्हारे दर्प का विनाश हो गया' ऐसी अथयोजना मानी जाय। किन्तु यहां निष्पादित हो चुकी वस्तु की व्याहति नहीं वतलाई जा रही और यद [ व्यापात] अलंकार तन्मूलक ही है ऐेसा हम चतला चुके हैं। 'विज्ञानेन मदविषं विनिवततते भिन्नकारणोत्पन्नन् ! विज्ञानकारणं यत् तव पुनर्भण को विनिवर्तयेत।' -- 'अन्य कारणों से उत्पन्न मदविष ज्ञान से दूर हो जाता है, किन्तु जी विशान से ही उत्पन्न हो उसे वतलाओ, कौन दूर करे।' [अलंकाररत्नाकरकार द्वारा व्याघातोटाहरण के रूप में प्रदत्त] इस [गाया के अर्थ] में मी जब मद, विद्ञान और विज्ञानेतर कारणों से उत्मन्न होता हुआ बतलाया जा रहा है तद, 'अन्य किसी हेतु से उत्पन्न होने वाला वास्तविक मद तो खान से हट जाता है किन्तु जो मद उस [ज्ञान] से उत्तन्न होता है वह किस से हटाया जाए इस वोध के आधार पर यहाँ भलंकार माष्यकार द्वारा प्रतिपादित वितर्कालंकार माना जा सकता है क्योंकि यह वोध उस [ उक्त वस्तु] की निवृत्ति के हेतु का जो प्ररोह [प्रस्तुतीकर"] तदूप है [ 'वह किससे हृटया जा सकता है' इस उक्ति में मद निवृत्ति हेतु का प्रोह हो रहा है।] अतः यहां व्याघासालंकार नहीं है। यहां तो ज्ञान जनित मदनिष्पत्ति हो वाक्यार्थ बनी हुई है। [इसी प्रकार रत्नाकरकार द्वारा व्याघातालंकार के लिए वदाहृत ]- 'जिसने युद्ध में अपना अधर दाँतों से डस डस कर शबुनारियों के भषठविद्रुमदलों को पिय के दन्तक्षतों की गाढ़ व्यथा के संकट से छुढ़ा दिया।' इस पद्यार्थ में भी व्वाघात नहीं, विचिन्नालंकार है, क्योंकि यहाँ अधरव्यथा से छुटकारेरुपी विपरीत फल की निष्पत्ति के लिए अवरदंशरूपी प्रयत्न उपनिवद्ध किया गया है। तेनव= उसी के द्वारा अर्थात दृष्टिरी साधन के द्वारा ही, न कि किसी अन्य साधना के द्वारा तेन= उसके द्वारा=निष्पन्र वत्तु उसी उपाय से व्याहत बतलाई गई है। उसी को विमक करते हैं- 'विरुपाक्षस्य' इत्यादि के द्वारा। इससे यह सूचित किया कि व्यतिरंक के विना इसकी निष्पत्ति ही नहीं हो सकती। क्योंकि किसी के द्वारा कोई कार्य सिद्ध किया गया हो और यदि उसको अन्य व्यक्ति अन्यथा कर डाले तो उससे उसकी विलक्षणता सवश्य ही स्वीकार करनी होगी, नहीं तो अन्यथाकरण ही चरितार्थ न होया इसीलिर इसमें व्यतिरेक सब प्रकार से निमित्त बनेगा [ही]। पूर्वस्-पहले के समान अर्थात् आनुरूप्य के अभाव से। वह [आतुरूप्याभाव ] यहाँ इस लिए होता कि यहाँ एक ही उपाय दो विरुद्ध परिणाम वाला वतलाया जाता है।। [सर्वस्व] प्रकारन्तरेणाप्यर्यं भवतीत्याह- [सू० ५३] सोकर्येष कार्यविरुदधक्रिया च। वव्याघात' इत्येव। किंचित्कार्य निष्पादयितुं संभाव्यमान: कारणविशेष स्तर्कार्यविरुद्धनिष्पादकत्वेन यतसमर्थ्यते सोऽपि संसाव्यमानकार्यव्याहति निवन्धनत्वाद व्याघातः। कार्यविरुद्धकार्यनिष्पत्तिश् कार्यापेक्षया सुकरा।
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५१८ अलङ्भारसवंस्वम् तस्य कारणस्यात्यन्तं तदानुगुण्यात्। नत्वन् कार्याभिमतस्य कार्यत्वाभावः । तद्विरुद्धस्याध सौकर्येण कार्यत्वात्। अत एव द्वितीयाद्विपमान्नेदः। तन्न ह्व कार्यस्यानुत्पत्तिरनर्थस्य चोद्रमनम्। इद्व तु कार्यमकार्यमेव न भवनि। तद्विरुद्धस्यानथस्थ व्यतिरेकिणोऽप्यत्र सुष्ठुकार्यत्वात्। यथा दर्षचरिते राज्यवर्धनं प्रति थ्रीहर्पोकिपु- 'यदि वाल इति सुतरामपरित्याज्योऽस्मि, रक्षणीय रति भवद्टज. पञ्जरमेव रक्षास्थानम्' इत्यादि । अत्र राज्यवर्धनेन श्रीहर्षाप्रस्थाने कार्ये चाल्यरक्षणीयत्वादि कारणत्वेन यत्संभावितं तत्पत्युत प्रम्यानकारणत्वेन सुकरतया श्रीहर्पेण राज्यवर्धनस्य समर्थितमिति व्याघाता्योडलंकार:। यश अलक्ार दूसरे प्रकार से भी होता है। यही बनलाते हैं- [सू० '३] सौकयं के कारग कार्यविरुदक्रिय। [भी] 'व्याघान' इसकी अनुवृति पूर्तसूत्र से प्राप्त है हो। किसी कार्य को निष्पन्न करने के लिए समाविन किमी कारण का उसी कार्य के विरुद्ध काय के निष्वादक के रूप म समर्थन किया जाए तो वह भी रमाव्यमान कार्य को व्यादति का हेतु होने से व्याघान होना है। यहाँ [ प्रस्तुम] कार्य के विरुद्ध कार्य की निभ्प्ति [प्रस्तुत ] कार्य की अपेक्षा यह दनलाकर सरल बासाई जानी है कि उस [प्रस्तुख कार्यं] का बारण उस [विरुद्ध कार्ये] के अत्यन्त अनुकल है। ऐसा नहीं कि यहाँ कार्यरूप से अभिमन वस्तु में वार्येत्व का अभाव बतलाया जाता है। कयोंकि यहाँ दस [प्रस्तुन कार्य] के विरुद्ध कार्य तो सुग्वपूर्वक किए जाने योग्य कार्य के रूप में ही प्रतिपादित किया जाता है। इसीहिए द्वितीय विषम से इसका भेद है। वर्हाँ जो है सो, कार्य की तो उत्पचि नहों रहती ऊपर से अनर्थ [रूपी अकार्य] की उत्पत्ति मर करती है। जर्बक यहों काये तो अकार्यें तक नहीं हो पाता, उस के विरुद्ध व्यतिरेकी [अधिक्व सदल १] अनर्थ भी यहों सुखसूवक करने योग्य कार्य के रूप में शी प्रस्तुत रददना है। जैसे हपचरित में राज्यवर्धन के प्रति श्रहर्ष की [ इन]उक्तियों में- 'यदि [आप मुझे युद्ध में यह समझकर नहीं ले जा रहे हैं कि मैं] बालक हूँ तब तो और भी अपरित्याज्य हूँ, रक्षमीय हूँ तो रक्षास्थान आपका ही भुजपज्ञर है' इत्यादि [ दपचरित उच्छवास- ६ पृ० १८४ नि० सस्क० ]। यहाँ राज्यवर्धन द्वारा श्रीहरप के अपरस्थान [साथ न ले जाने ] रूपी कार्य में बात्य और रक्षणीयत आदि जो कारण सोचे गए हैं उन्हीं को श्रदप द्वारा राज्यवर्धन के प्रति सुकर और उळटे प्रस्थान में ही कारण प्रतिपादित किया जा रहा है। इम कारण यह व्याधान नामक [ही] सलकार है !! चिमर्शिनी प्रकासन्तरणेति प्रतीतिभेदात्। अयमति व्याघात। समेवाह-सौवदेणेत्यादि , एतचेव उ्याचष्टे-विचिदित्यादिना। सभाध्यमान इति वेनचिदन्येन। तत्कार्येनि। तब तत्कार्यम, निष्पादयितुं पमानवमू। अत एवास्य प्रयमाद्याघाताहेदा। तन दवि येनकेन चिदुपायेन निम्पादितं सदस्तु तथेवान्येनान्पयानियत इ्ायुकम्। दद त किविचिष्पादयितं संभाग्य
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व्याघातालहार: ५१९
मानस्य कारणस्य सदिरुतुनिप्पादुकरवेन समर्थनम्। तद्विरुदनिष्पत्तेश्व सौकर्य किमुक्त
तु दुक्करत्वेन कार्यमित्यर्थः। अनेनाप्यस्य प्रथमादययाघाताद्ेद: सूचितः। इछ द्वि किंचि निप्पानयितुं संभाव्यमान: कारणविरेप: सौकर्पेण तदविर्तू निप्पादकरवेन समर्थ्यते। तन्न पुनरुपायविशेषविवत्तापरिहारेण कतुरेव पक्षपतिपषभातमाशित्य तथारोपनिबन्ध:। अत पवेति। द्योरपि कार्यत्वसंभवास्। अनर्धेत्यनेनापि विपमादस्य भेद एवोपोटलितः। संभावितमिति। तथा समरथितमिति। अनेन प्रथमध्याघातोदाहरणत्वमस्य निरस्तम्। तन्र हि हयोरपि कार्ययोनिप्पत्तिविवसिता। वात्यस्य तु कार्यद्वय जननेपि सामर्थ्य किंतु प्रस्थानननने सौकर्यम्। अत पवात् पंभाव्यमानस्य कार्यस्य व्याहतत्वम्। यथा वा- सत्सशब्दमिति कामविमर्दे नूपुरं परिहरन्ति तरुण्यः। तहभार कतरापि विदग्धा गोपनाथ निजकण्ठरुतानासू।' मत्र संभाव्यमानं कार्य परिहारः। तस्य व्याइतिर्धािगम्। उपावस्य सुकरदुप्करत्वेन विश्िष्टरवादत् न प्रथमव्याघातोदाहर णस्म्। यथा नायसर्थो चक्रोक्ते र्मेदस्तथा वक्रो कावेय वच्याम: पकाशम्तरेण = दूसरा प्रकार इसलिए कि प्रतीति में भेद है। अयसयह न्याघान। उसी का स्वरूप बतलते हैं-सौकयेंग इत्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-किचित् इत्यादि के द्वारा। संभाव्यमान नर्यात किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा। तरकार्य=इसमें कर्मपारय समास है, तत= वह अर्थात निष्पन्न करने के लिए शुरू कार्य। इसीलिए इसका प्रथमव्याघात से अन्तर है। उसमें, यह कहा जा चुका है कि 'जिस उपाय से किसी व्यक्ति के द्वारा वस्तु नि-पादित होती है उसी उपाय से दूसरे के द्वारा वही वस्तु अन्यथा वना दी जाती है जब कि पहाँ वस्तु निष्पन्न नहीं वतलाई जाती, उसकी निष्पत्ति की संभावना भर बतलाई जाती है, साथ हो उसका निम्मादक जो कारण रहता है उसमें [ भी] विरुद्वकार्य के निष्पादन की क्षमता भर जतलाई जाती है। उससे कार्य की निष्पत्ति नहीं दिखलाई जाती अतः रत्नाकरकार का द्वितीय न्याघात को प्रथम से भिन्न न मानना ठीक नहीं।[ यहाँ ] प्रसतुत कार्य के विरुद्ध कार्य की निष्पत्ति में सुकरता क्यों बतलाई गई है' ऐसी शंका कर, कहते हैं-कार्ये इत्यादि। तदानुगुण्याव=उसके परति अनुरूपता अर्थात् कार्य विरुद्ध कार्य के प्रति अनुरूपता। न तु-न कि =अभितु दुष्कर होने से उसे कार्थ माना जाता है। इससे भी इसका प्रथम व्यावास से अन्तर बतलाया। यहाँ, जो है, कोई कारण कुछ कार्य करने में समर्थ [भर] समझा जाता है और उसी में सुकरता के साथ बेरुद्ध कार्य करने की क्षमता प्रतिपादित कर दी जाती है। इसके विपरीत उस [ व्याघात] में उपायगत विशेषता की विवक्षा नहीं रहती, नेवल कर्ताओं में पक्ष और प्रतिपक्ष का भाव परस्पर विरोध ] देखकर वही पक्ष प्रतिपक्षभाव पतिपादित किया जाता है। अतएव =दोनों में कार्यत्व संभव होने से। अनर्थ-इसके द्वारा भी इसका विपम से भेद ही दृढ़ किया गया। संभावितम् से लेकर समर्थितम् तक के अन्थ द्वारा [हूर्षचरित के] उत्त उदाहरण के प्रथम व्यावात के दाहरण होने की संभावना दूर की। उसमें दोनों ही कार्यों की निष्यत्ति विवक्षित रहती है। वाल्य, जो है वह, तो दोनों ही कार्यो में समर्थ है किन्तु प्रस्थापन की निष्पत्ति उससे अधिक तुकर है। इसीलिए यहां जो व्याहति है वह संभाव्यमान कार्य की है [ निष्पन्न कार्य की नहीं ]। इसका दूसरा उदाहरण यह है- 'तरुणियाँ जिस नूपुर को सुरत संघर्ष में बजने के कारण हटा दिया करती है उसी को किसी वदन्ध तरुणी ने [ विपरीत रति में] सपने कण्ठ का रव छिपाने के लिए जान वूझकर पहना।'
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५२० अलङ्कारसर्वस्वम्
यहां ममाव्यमान कार्य दै परिदार, और उसकी म्यादनि है धारण। यदा उपाय में सुकरता और दुष्करता है [न पदनना अर्थात पहने हु० नूपुर को उतारना जिनना कठिन है उममे पहने रहना उतना दो सरल है] अतः वह। उपाय विशेषता लिए हुए है, फलना यह प्रथम व्यानात का उदाहरण नहीं हो मकता।[ उपाय में विशेषना रहने के कारण यदि यह प्रथम का उदाहरप नहीं हो मकता तो कार्यों की निष्पत्ति हो जाने के कारण यह दवितीय व्याघान मी केमै हो सकता है यदि एक अश प्रथम व्याधान का इसमें नहीं तो द्वितीय व्याघात भी इसमें समम नहीं है उसके में एक पक्ष का यहाँ अमार है] इसी प्रकार 'यह स्थल बकोकि का भी उदाहरण नहीं है' यह एम मारे चकोकि के ही प्रकरण में वनलायेंगे। विमर्श :- इतिहास [१] प्रथम व्याघान :- व्याधान नाम तो पहले पहल रुद्ट में ही मिथ्नता है किन्तु उसको यदा के प्रथम व्यानान का सवरूप देने का श्रेय मम्मट को है। सट्रट ने व्याघात नाम से जिस अलकार का विवेचन किया है यह विशेषोकि से सवथा अभमिन्न है। विशेषोकिप्रकरग में इसका विवेचन तद्वरपपूर्वक किया जा चुहा है। मम्मट में इसका विवेचन इम प्रकार है 'यद् यथा साधित केनाप्यपरेण तदभ्यया। तयव तद् विधीयेन स व्यापात इति स्मृत: ।।1 येनोपायेन यव एकेनोपकक््यित वस्यान्येन जिगीपुतया तदुपायकमेव यदन्यथाकरणंस मर्ा चम्तुव्याइतिदेतुत्वाद् व्याघात।' -'जो कार्य एक किमी व्यक्ति के द्वारा जिस प्रकार सर्थोन् जिस सपाय से किया गया हूँ उसका अन्य व्यक्ति के द्वारा उसा उपाय से उलटा कार्य कर देने से सिद्ध वन्तु की व्याइि का हेतु कथित रहने से भलकार व्यानन कहलाता ह। वदाहरण = 'दसा दुग्व' पद्। (२) द्विवीय न्याधान इद प्रथमनया सर्वस्त में ही मिलता है। मामद से लेकर मम्मट तक वे आचार्यों में से किपी में यह नहीं मिलता। परवर्त्ता आचार्यों में- शोभाकर द्वारा किए गए प्रथम व्यायात के लक्षण तथा उदाइडण विमर्सिनी में उदपृत है दितीय व्याधान को उन्होंने प्रथम व्याघात में ही अन्तभूंत माना है। उन्होंने स्पष्ट लिसा है- " -- 'बाल इति सुनरामपरित्याज्योडस्मि, रक्षभीय इन भवद्मुजपस्रमेव रकाम्थानन् इत्याद स्ररोहपंस्य विजेतुं मस्थित ज्यायक्ष राज्यवर्धन प्रति उक्तो राज्यवर्धनेन वालत्वाच्यपस्थाननिमि समाविनम् नेन प्रत्युव सोकयेन परयाननिमित्तनया समयितम् रति 'सोकयेंग कार्यविरद्ध च' र्श भेदन्तरं व्याघावस्येति न वाच्यम्। वथाहि यदि प्रस्थानरूप विनुद्धमेत कार्य वार्पादिना किय सदयमेव व्यापानो, न मेदान्तरम्, प्रस्थानामावनिमित्ताव प्रस्थानोसत्ी विनाशकारणदुम्पस अथ चैव प्रस्थानापस्थानयोहियरषि विरुद्धयोरयोत्यािकम्य कारस्थ मद्मावादपस्थाने वाच्यादेरने कान्तिकतर विवस्यने तर्दिं एकस्य कारणस्य परस्परविरुद्धकार्दयजननादचिन्त्यालक्कर=म्यान्र्मा इति व्यानानस्य मैद: 1' अर्थाव योहपें की विजय के लिए पस्थित किन्तु स्वय को साथ न ले जा रहे दडे माई राज्यवर्षन प्रति 'बाल हूँ इमटिए ती और मी अपरित्याज्य हूँ, रक्षगीय हूँ तो रक्षाम्थान आपका ही मुजपञ् है' इत्यादि तकियों में राज्यवर्धन ने वालरवादि को साथ न ले चलने का कारण सोचा, उस्र
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विरुद्ध, उस [हर्प] ने सुकरता प्रतिपादित कर उन्हें साथ ले चलने में ही कारण प्रतिपादित किया। इस प्रकार यहाँ 'कार्यविरुद्ध कार्य में सुकरता भी' [ इस लक्षण के अनुसार ] यह व्याघात का एक अन्य भेद है यह [जो सर्वस्वकार ने कहा है वह] नहीं कहना चाहिए। क्योंकि यदि वात्यादि कारण के द्वारा प्रस्थानरूपी विरुद्धकार्य ही किया जा रहा है तो यही [प्रथम ] व्याधात यहां है, अन्य भेद नहीं क्योंकि यहां जो वस्तु [दात्यादि] प्रस्थानामाव का निमित्त है उससे प्रस्थान की उत्पत्ति हो रही है अतः विनाश के कारण उत्पत्ति प्रतिपादित की ज रही है। यदि वाल्यादि कारण में यह बतलाकर कि 'वे प्रस्थान और अप्रस्थान इन दोनों परस्पर विरुद्ध कार्यों में कारण है' अप्रस्थानरूपी कार्य के कति निश्चितता प्रकाशित करना विवक्षित है तो 'एक कारण के द्वारा परस्पर चिरुद्ध दो कार्य उत्पन करने से' इस व्याघात का अविनया लंकार में सन्तर्माँव हो नाएगा । इसलिए इसे व्याघात का भेद मानना ठीक नहीं।' यहाँ रत्नाकरकार कार्य की निष्पतति मान रहे हैं जब कि मूल में केवल निष्पत्ति की संभावना मात्र प्रतिपादित है। इसी कारण विमिनीकार ने इनका खण्डन किया है। वे उनके अपने शब्द हैं। उन्हें वाण के शब्दों के रूप में बिना स्पष्टीकरण के छाप दिया गया है। अप्पयदीततित-ने दोनों न्याघातों का निरूपण इस प्रकार किया है- [१] 'स्याद व्याघातोऽन्यथाकारि तयाकारि क्रियेत चेतु।' [क] नो जैसा कार्य निग्पन्न करता हो उसे उससे मिन कार्य करने वाला बना दिया जाय तो [ प्रथम ] न्याघात नामक मलंकार होता है। यथा- 'यजगद पोयते हन्ति तेरेव कुसुमायुष: । संसार जिन [पुष्पों] से मसनन होता है कुसमावुध [काम] उन्हीं से प्रछार करता है।' [स ] इसी में कहीं प्रतिदन्द्विता का नाव विवक्षित होता है। यथा 'दृशा दन्' वद्य में। [२] सोकर्चेण निवद्धापि किया कार्यनिरोबिनी।' सुकरता के आधार पर उपनिवद्ध कार्य- विरोधिनी किया भी व्याघात कहलाती है। उदाहरण हर्मचरित के उक्त उद्धरण का ही संक्षेप- 'दया चेदू वाल इति मय्यपरित्याज्य एव ते॥।' इसका स्पष्टीकरण दीक्षित ने इस प्रकार किया है- 'जैत्रयात्रोन्मुखेन राज्षा [राज्यवर्धनेन ] युदराजस्य राज्य पव स्थापने यव कारणतवेन संभावितं बाल्यं तत् प्रत्युत तद्विरुद्वस्य सहनयनर्यैव कारणतया युवराजेन परित्यागस्यायुक्तं दर्शयता समथ्यते।' पण्डितराज जगनाथ ने दोनों ही न्यापात स्वीकार कर लिए हैं, किन्तु उन्होंने दोनों का यह एक ही लक्षण बनाया है- 'यत्र होकेन कर्त्रा येन करणेन कार्य किश्चिनिष्पादितं निष्पिमादयिपितं वा तदन्वेन कर्तरा न तेनैव करणेन तदिरुद्वकार्यस्य निष्पादनेन निष्पिपादयिपया वा व्याइन्येत स न्यावातः।' -'नहाँ कहीं, किसी एक कर्ता के द्वारा जिस कारण से किसी कार्य की निप्पत्ति की गई हो या निष्पात्त करना सभीष हो, उसी का उससे मिन्न कर्ता के द्वारा उती कारण से उसके विनुद्ध कार्य की निष्पत्ति कर या निष्पत्ति की इच्छा कर व्याघात किया जाता है वहाँ अलंकार भी व्याघात नामक दी होता है।' एण्डितराज ने 'दशा दग्वं' पद्य में सर्वस्वकार द्वारा प्रस्तुत व्यततिरेक की संभावना पर विचार किया है और सवस्व का समर्थन किया है।
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५२२ अलट्ठारसवस्वम्
विश्वेश्वर ने भी 'दशा दग्ध०' बथ पर सवस्वकार का ही समर्थन किया है। किन्तु वे व्याघात के दूसरे भेद पर चुप हैं। उनका व्याघातलक्षण इस प्रकार है- 'कार्यान्त रहेतुनयानयेनाभिमताद् विरुद्धकार्य चेतु। कियने परेण तरमाद् व्याघावोडय समाख्यात ।।' 'अन्य व्यक्ति द्वारा अन्य कार्य का हेतु माने गए पदार्थ मे किमी अन्य के द्वारा यदि उसके विरुद्ध कार्ये किया जाता है तो वह व्याधान कहलाना है।' इमी का न्याय की मापा में उन्होंने ऐमा परिष्कार किया है-'अमिमतकार्यनिरुपिम- कारणवत्वेनन्यविवक्षितारथंस्य तदिक्द्वार्थनिष्ठकार्यतानिरुपित करणनाप्रयत्वं केनचिन प्रतिपाधते स व्यानान, व्याइन्यने अन्याभिमनकार्यकारणमावोडनेनेनि वयुरते.।' श्रीविदाचक्रवचीं की निष्कृष्टार्यकारिका इम पर यह है- 'यथा साधनमेकेन नथेवाव्येन वाधनम्। न्याधानोडय विरुदस्य सौकर्यण किया यथा॥ पाठाम्तर-(') निर्गयसागरीय प्रति में दविताय व्याघात का सूत्र 'सौक्येग कार्यविरुद्ध- करिया च व्याधान' इम प्रकार हपा है। इसमें वृत्ति में 'व्याघात (त्येव' नहीं मिलना। काशी सस्करण में 'व्यानान इत्येत' सूत्र के ही साथ जार दिया गया है। रत्न कर, विमर्सिनी तथा सजीविनी में उदधृ पाठ के अनुसार सूत्र 'च' पर समाप्त हो जाता है। नाहिए मी वही। अनु- शृत्ि विधि मे सूत्ररचना का जो क्रम इस के पूर्व के सूत्रों में मिलना है उसके अनुमार 'च'-दस समुचचायकु अन्वय द्वारा अरकार के नाम की अनुवृति हो जाने पर उमका कथन निरर्थक ह नहीं पुनरक्तिदोष मे दूपिन भी है। (२) 'श्रीदर्षाप्रस्थाने' के स्थान पर निर्णयसागरीय प्रति में श्रीपंप्रस्थापने अर्थान नम् से रहित पाठ है। छपी हुर्ई अन्य प्रतियों में नञ् का अभाव समान है, केवल कु० जानकी के सस्करण में शेप सस्करणों के प्रम्थापन के स्थान पर प्रस्थान पाठ ही अपनाया गया है। 'प्रत्युव प्रस्थान०' के स्थान पर निर्णयसागर की प्रति में भी 'प्रत्युता प्रस्थापन' पाठ हरा है और यही डॉ. रामचन्द्र दविवेदी के संस्करण में । यर्द्याप अनुवाद में थ्रीद्विवेदी 'प्रस्थान' पाठ यहाँ मी मानते हैं और अनुपदोक्त स्थल में मी। अनन्तरायन में मो नव्घटिन पाठ ही है। रत्नाकर के पूर्वोद्धृन उद्दरण में यहाँ प्रस्थापन शब्द के स्थान पर प्रस्थान शब्द ही है और थीविदाचकवतों की सजीविनी के दोनों छापों में भा। इन दोनों में 'नभ' की स्थिति भी वैसी ही है जैसी हमने मानी है। विमधिनी में मी नम् की स्थिति तो ठीक है कि तु प्रस्थान के स्थान पर प्रस्थापन पाठ भी मिलता है। अप्पयदीक्षिन के पूर्वोक्त उदरण से पाठन्तरविचार को एक न दिशा मिलती है। उन्होंने न तो प्रस्थापन शब्द दिया है और न प्रस्थान। उनका शब्द है 'स्थापन'। लगता है कि मूलपाठ दो प्रकार का माना जाता रहा है- १-'श्रीध्पस्य सथापने', 'प्रत्युनास्थापने' तथा ·--- 'श्रीहर्पस्याऽप्रस्थाने', 'प्रत्युन प्रस्थाने'। परवतों लिषिकों ने कदाचिन् इन्हें ही मिश्रित कर दिया, किन्तु नन की स्थिति में अन्तर नहीं किया। इस प्रकार 'श्रीह्षंस्य प्रस्थापने' तथा 'प्रश्युता प्रस्यापने' पाठ चल पदा।
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कारण मालालह्कार: ५२३
मूळ हर्पचरित में राज्यवर्धन के आदेश-वाक्य में केवल 'त्था'-धातु का प्रयोग है 'तिष्ठन्तु सर्वे त्वयैव सार्धन्। इससे 'स्थापना'-पक्ष की बल मिलता है। प्रस्थान शब्द का अर्थ साथ चलना नहीं होता और श्रहर्प ने प्रा्थना की थी युद्ध के लिए साथ-साथ चलने की हो। इसी प्रकार प्रस्थापन शब्द का अर्थ भी 'स्थापन' नहीं होता यद्यपि प्रसिद्ध शब्द का सिद्ध अर्थ होता है। ये दोनों पाठ रत्नाकरकार के समय तक ही चल पड़े होंगे। दोनों में 'प्रस्थान'-पदघटित पाठ ही अधिक प्रचलिंत प्रतीत होता है और ग्रन्थसंगति में वह वाधक मी नहीं है, भतः इमने इसीको मूल मान लिया है। डॉ० द्विवेदी की पाद टिप्पणी से विदित ेता है कि पूना की तीन पाण्डु- प्रतियों में भी यही पाठ है। इन पाण्डु-प्रत्ियों में से दो तो काश्मीर देश की शारदालिपि की ही प्रतियाँ है। (३) 'वाल इति' के पूर्व आक्षेप प्रकरण में 'केवदम्' तथा यहाँ जो 'यदि' शब्द जुड़े हुए है ये सर्वस्वकार के शब्द हैं वाग के नहीं। मूल हर्षचरित में मे नहीं मिलते। विमर्शिनी
इस [विरोधमूलक अलंकारों] के प्रकरण का उपसंहार करते और दूसरे प्रकरण की अवतरणिका प्रस्तुत करते है- [सर्वस्व ] एवं विरोध मूलानलंकारान्निणीय शृह्गलावन्घोपचिता अलंकारा लक्ष्यनते। तन्न- [सू० ५४] पूर्वस्य पूर्वस्योत्तरोच्तरहेतुत्वे कारणमाला । यदा पूर्व पूर्व कमेणोत्तरमुत्तरं प्रति हेतुत्वं भजते तदा कारणमालाख्यो- डयमलंकार: ।सथा- 'जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणध्रकर्षो विनयादवाप्यते। गुणप्रकर्षेण जनोऽलुरज्यते जनाऽनुरागप्रभवा हि संपद्: ।' कार्यकारणक्रम पवातर चारुत्वहेतु:। इस प्रकार विरोधमूलक अलंकारों का निण किया। भव शङ्धलावन्ध के मनुरुप अलंकारों के लक्षण प्रत्तुत करते हैं। उनमें - [सृ०५४]पूर्व-पूर्व के उत्तर उत्तर के प्रति हेतु होने पर कारणसाला॥ जब पूर्व पूर्व के पदार्थ उत्तर-उत्तर के पदार्थों के प्रति हेतु बनते हैं तब कारणमाळा नामक मलंकार होता है। यथा- 'जितेन्द्रियता विनय का कारण है। विनय से प्राप्त होता है गुफप्रकप। गुणम्रकर्प से समाज अनुरक्त होता है और संपत्ति, नो है वह, जनानुराग से ही उत्पन्न होती हैं।' यहाँ पारुत्वहेतु कार्यकारणक्म ही है। विभर्श-सनंस्वकार ने महलावगं में चार अलंकारों की गणना की है कारणमाला, एकावली, मालादीपक और सार। उन्होंने इनके लक्षण इसी क्रम से दिए हैं। रत्नाकरकार ने स्वस्वकार
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५२४ मलद्वारसर्वस्वम्
कौ इस मान्यता का खण्डन किया है और मूल अलकार श्ह्ला को ही मानकर इन्में से प्रथम तीन अलकारों को मृह्धला लकार के भेद माना है स्वतन्न्न अलकार नहीं। विभर्सिनीकार ने रत्नाकर के सण्डन का निराकरण कर स्वस्व का समर्थन किया है। हम पडले रत्नाकर का शृह्धलाविवेचन प्रस्तुन करते हैं- [सूत्र] 'उत्तरोत्तरस्य पूवपूर्वानुबन्धित्व विषययो वा मृद्ला ।।' [शृत्ति] उत्तरोत्तरस्याश्रयत्वादिना पूर्व पूर्व प्रति पूर्वस्य पूर्वस्वोत्तरमुत्तर प्रति वा सापेक्षत्वं
मत्र (१) दूवंस्य पूर्वस्योत्तरोत्तरहेतुकत्वे कारणमाला, तथा (२) यथापूर्व परस्य विशेषण- तया स्थापनापोहेन एकावली (२. पूर्वस्योत्तरो त्तर गुगाव हृत्वे माल द्ीपकमिति त्रय मद्टला वनधेना- न्यरलद्वारा लक्षिना, तेपु च शसलात्वपरिहरिण प्रत्येक न विष्किस्िविशोषोडस्ति येनाल क्वारभेद: रयात्। यदि च कार्यंकारणविरोषणविशेष्यमानादिविशेषाश्रयगन मैदेनाभिधानम्, तहिं उत्तरोक्षर माधाराधेयना-स्वस्वामित्वादिसम्वन्वावलम्नेन मृद्ठलाया वहवोडलंकारा उपसख्येया, प्रसज्येरन्। अत इह रक्ष्यव्याप्त्यये शृद्धतेव लक्षिना। अस्या महाविषयार्या तेषामन्तर्भावोपपचेः। अपि च मान्रूपकर देकरिमन् यत्र बहूनी योगपधेन स्थितिस्तन मालात्व वक्तुमुचिनम्, र तु तदभाजात कारणमालाचमिधानमसमनसमेव। यदपि शद्धलादय उपमाधवान्तरभेदा इति, तदयुक्तम्। उपमादिन्यतिरैयोग कार्यकारणमावाय वलम्वनेनापि शङ्डलाया समवात्। अनदयोषमादिणयद्वलामिमते विषय उपमादीना शृलया सह संकीण स्म्, न तु उपमादिभेदत्वम्। यया- शैल इव जलवराणा शैलानामिव जलनिधि पृवित्रीनाथ। जलधीनामित्र पाताल सत्पुरुषागां स्व निल्य. ।। -'परवर्त्ती पदार्थों की पूर्ववर्ती पदार्थों के प्रति अथवा पूर्ववनों पदार्थों की परवर्नी पदार्थो के प्रति माश्रयना यादि के लिए सापेक्षना मद्ला नामक अलकार कइलाती है।' 'इस में मृसकावन्ध से [१] पूव पूर्व का उत्तर-उत्तर की कारण बनाने में कारणमाला, पूर्व-पूर्व के प्रति उत्तर-उत्तर के विद्येपण होने में एकावली, तथा [ ₹] पूर्व पूर्व के उत्तर-उत्तर के प्रति गुभावद् होने में मालादीपक, ये तीन अलंकार अन्य याचार्य [सवस्वकार] ने बनलाए है। इनमें से प्रश्चेक में मृङलात को छोडकर चारुत्व का कोई अन्य कारण नहीं है जिससे इन्हें मिनन-मिन्न सरकार माना जाए। यदि 'कार्यकारणभाव, विशे्यविशेषणभाव' आदि सबन्वगत विशेषताओं को लेकर अहंकारों को अलग अल्ग बनलाया जा रहा हो तो आधाराधेयमाव, स्वस्त्रामिमावादि सब-वों को लेकर मृदला में और भी भेद गिनने पढ जाएँगे। इसलिए सभावित सभी भेदों को अपना लेने के लिए वेवल एक मृहल्ना का ही लक्षण अलकार रूप से बना दिया गया। यह अत्यन्न व्यापक है, भत्त' इममें सभी लकयों का अतर्माव दो सकता है। इसी प्रकार मालात्व भी वहां मानना उचित है जशा अनेक पदार्थो की स्थिति एक में हो हो और वह मी एक साथ हो। यहाँ स्थिति वैसी नहीं है, मत कारणमाल आदि नाम निराधार है। उपमा आदि के जो शृद्धला आदि अवान्तर भेद बतलाए गए हैं, वे भी ठीक नहीं है क्योंकि मृदला तो उपमादि से रहित वेवल कार्यकारणमाद आदि के आधार पर भी हो सकती है। मतः उपमाशृह्ला आादि नाम से माने गर स्थलों में भी उपमा आदि के साथ मृह्ला का संकर मानना चाहिए, न कि उपभा आदि का भेद। यथा-
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कारणमालालङ्गार: ५२५
'जैसे मेपी के आधार पर्वत होते है, पर्वतों के आधार समुद्र और समुद्र के आधार पाताल वैसे हो सरपुरुषों के आधार हे राजन्! आप हैं।' यहां अथम तीन चरणों में माश्रयाश्यिभाव- मूलक, शहला दे और उसके आधार पर निष्पन्न दृत्तीय चरण में उपभा! विमर्शिनी अ्रद्वारा इति न पुनः शृङ्गलैवैकोडलंकारः। एवं हि साधर्म्यमप्येक एवालंकार: स्यास्। न सपसादिपु साधर््यपरिह्वारेण प्रत्येक कव्षिद्टिविच्छित्तिविरोपसंभवः येनालंकार भेद: स्यास्। एवं विरोधोऽप्येक पव वाच्यः। न हि विभावनादीनां विरद्धुत्वादन्यः
मादीनामपि साध्मयदाववान्तरोऽस्त विशेष इति चेत सहि कारणसालादीनामपि मृहूला- चन्छोपचित्नितत्वेऽपि व च्य माणनीत्या का र्यका रणिशेषण विशोष्यभावाद्यातमार्येवावानतरो इपि विच्छित्तिविशेप: रे नोपसादिनत परथगेवेपामवंकारतवं चुकम। एवं हि श्रङ्गलायामवान्तर विच्छिित्तिविशेपसंभवेऽप्यन्यलंकारोपसंस्यान प्रसज्यत इति चेत्, न, यद्यस्ति विच्ध्- त्यन्वरं तद्सत्वलंकारान्तरपसंख्यानं, को दोप :: प्रत्युतामासमानस्य विशेषस्थापह्नवो न वाच्य:। तद्यथास्यित एवालंकारभेद आश्रयणीयः। तरमाद 'उत्तरोत्तस्य पूर्वपूर्वा नुवन्धिस्वे विषर्यये वा शृङ्गुरेति न वाच्यम्। तत्र तावरकार मालामाह-पूर्वेत्यादि। कारणमालाइयोऽयमिति मालान्यायेन बहनां कारणनां यौगपदयेनावस्थानात। अत एवाह-कार्यकारणकम शवेति न पुनः केवलमेव शरङ्ध- लाखमित्यर्थः। अत पुव कारणमालेत्यर्या अन्वर्थमभिधानम्। एवमन्येग्य: शृङ्धलाबन्धो पचिनितेभ्योडलयूरभ्योडया विपयविभागः। न हि तेपु कार्यकारणक्रम एव चाहुत्वहेतु:। विशेषणविशेष्यभावादेवावान्तरस्य विच्छित्तिविशेपस्य संभवात्।कचिद्विप्ययेममापि भवति। यथा- 'माणो गुणेहि जाअह गुणा वि जाअंते सुणलेवाइ। चिमलेण सुभनप्पसरणे सुअणसेवह उद्टाणं ।। अत्र हि पूर्वस्योसरोत्तरं कारणतयोपनिवद्धम्। एवमुत्तरत्नापि विपर्ययोड्यूह्यः। अलंकारा: - अलंकार शब्द में बहुवचन के अयोग का अर्थ यह कि प्रत्येक अलंकार स्वतन्न्न अलंकार है, न कि सब मिलकर एक महला नामक अलंकार हैं। ऐेसा मानने पर तो [उपमा आदि को अलंकार न मानर्कर] एक साधन्ये को ही अलंकार मानना होगा, उपमा आदि सलंकारों में से प्रत्येक में साधम्ये के बिना कोई चमस्कार थोड़े ही संभव है, जिससे इन्हें पृथक् पृथक अलंकार माना जाए। इसी प्रकार विरोध मी एक हो वतलाया जना चाहिए। विभावना आदि में विरुद्धस्व की छोड़कर कोई अन्य विशेषता नहीं रहती। अधिक क्या, इस प्रकार विचार करने पर तो केवल सात ही अलंकारों के लक्ष वनाने की आपत्ति सामने माती है। यदि कहें कि उपमा आदि में भी साध्म्य के अतिरिक्त अन्य भौ विशेषता रहती है, तो कारणमाला आदि में भी, महलावन्ध की कला रह्ने पर भी आगे प्रततिपादित किए जाने वाले हेतुओं से कार्यकारणभाव, विशेपमविशेष्यमाव आदि रूप मवान्तर विच्छित्ति स्वीकार करनी होगा, जिससे इनको उपमा आदि के समान पृथक अलंकार मानना होगा। यदि कहें कि ऐसा मानने पर मङला में भी मन्य अनेक विशेपताएं संभव हैं अतः उनके आवार पर अन्द अनेक अलंकारों का भी संग्ह करना पढ़ जाएगा, [और यह एक अनवत्था जैसा दोप होगा ], तो ऐसा भी नहीं। क्योंकि यदि अन्य कोई उत्तिप्रकार चारता से युक्त संमव है तो उसका भी संग्रह स्वतन्त्र अलंकार के रूप में अवद्य हो। इसमें दोध ही क्या? प्रतीत हो रहे
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वेशिष्य का छिपाया जाना ही बल्कि ठौक नहीं। इस प्रकार मलंकारों का जैसा भेद [ स्वस्र- कार ने ] किया है दैसा ही भेद अपनाना उचित है। और इसीलिए [सयं रत्नाकरकार को ही] उतरोत्तर पदार्थ का पूर्व पूर्व पदार्थ के प्रति सापेक्ष होना या इससे उलटे क्रम से सापेक्षा होना मृदला कहलाती है-ऐसा लक्षग नहीं करना चाहिए। [रत्नाकर वार आशिक खण्डन कर अत मूलग्रन्थ का स्पष्टीकरण करना आरम्म करते हैं]- इन [मकलामूटक अटकारों] में पदलें कारणमाला का लक्षण बनाते हैं-पूर्व इत्यादि। कारण मालास्योडयन्= इसका नाम कारणमाल है, इमलिए कि इसमें बेहुत से कारणों की एक साथ अवस्थिति है जैमी कि माना में होती है। इसीलिए कहा-'कार्यकारणकम एव। यहों कार्यंकारणकम है न कि वेवल अइलात्व हो है इसीलिए 'कारणमाठा' यह इसका सार्थक नाम है। इसीलिए मदलाब ध के शिव् वाले मन्य सलकारों से इस [कारणमाण] का क्षेत्र भी भिन्न है। उन अल्कारों में चारुत्व का आधार केवल का र्यकारणमाव हो नहीं होता। क्योंकि वहो कार्यकारणभाव के आधार पर भी विशिष्ट चाहृत्व की निम्पत्ति समन होती है। कहीं इलटी स्थिति भी रदती है। यथा- [ रत्नाकर में ही उदाहत ] *मानो गुणेजोयने गुथा अपि जायन्ते सुजनसेराया"। विमटेन सुकृतप्रसरेण सुजनसेवाया उत्थानम्।1 'मान गुण से उत्पन्न होता है, गुण भी सुजनों की सेवा से उत्पन्न होते हैं। और सुजनसेवा का उत्थान होता है पुण्यों के विमल परिषाक से। यहाँ पूर्व पूर्व पदार्थ को उत्तर उत्तर पदार्थ के प्रति कारण मनलाया गया है। इसी प्रकार अगले स्थलों में मी स्वय सोच लेना चाहिए।।
मामह, वामन तथा उद्ट में इम पर कोई सर्चा नहीं मिलनी। मयमतः सुटूट ने इमका निरव- चन किया है। वास्तववग के अलंकारों में वे इसे इस प्रकार उपस्थित करते हैं- 'कारणमान्ग सेय यम्र यषापूर्वमेति कारणनाम्। अर्थाना पूर्वार्षाद् मवतीदं सर्वमेवेति॥७८४ ॥ -'प्रथम प्रथम पदार्थ से उत्तर-उत्तर पदार्थ उत्पनन होने है अन परवर्ती पदार्थो के प्रति पू्वं पूर्ववच्ती पदार्थ कारण होने के कारण यह अलकर कारणमाला कहलाता है। रदा०-'जितेन्द्रियत्व विनयस्य कारणम्' पद्य का हो रपानवर- 'विनयेन मन्नति गुणवान् गुणवति नोकोडनुरज्यते मकल,। अभिगम्यते-नुरक्त ससहायो सुज्यने लक्ष्म्या ।।' -विनय से व्यक्ति गुणजान् वनता है, गुणवान् पर लोग अनुरक होते ईै। अनुरक्त लोग साथ देते हैं। माधियों वाला व्यक्ति दक्ष्मी से युक होता है। मम्मट-मम्मट ने स्द्रट का अनुसरण इस प्रकार किया है- भू० 'यथोचरं चेतू पूर्वस्य पूर्वस्यारथस्य हेतुना। तदा कारगमाला स्वात।' वृ० उत्तरमुत्तर परति ययोत्तरम्। उदा०-'जिनेन्द्रियत्वं' पद्य हो। परवर्ती आचार्यों में से शोभाकर का मत दिया ही जा चुका है। इसमें 'मानो झुणै0' गाया, को विमर्शिनी में उदभृत् है, द्वारा वत्तर उत्तर पदार्थ को मी पूर्व पूर्व पदार्थ के प्रति कारण् बतलाया गया है। रुद्रट, मम्मडे सवस्वकार का इस ओर ध्यान नहीं है।
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कारणमालालद्टार: ५२७
अष्पयदीक्षित ने रतनाकर की सूक्ष का अनुमोदन किया है और दोनों ही प्रकार की कारणमालाओं के उदाहरण प्रस्तुत किए है, यपपि इन्होंने रत्नाकरकार के समान कारणमाला को शृद्धला में अन्तर्भूत नहीं माना है। उनका कारणमाला विवेचन यह है- 'गुम्फः कारणमाला स्याद यथा प्राकप्रान्तकारणैः ।' - 'पूर्व-पूर्व या उत्तर उत्तर के पदार्थों का उत्तर-उत्तर या पूर्व-पूर्व के पदार्थो के प्रति कारग वनना कार णमाला लंकार कहलाता है। प्रथम का उदाहरण- 'नयेन श्रीः प्रिया त्यागस्त्यागेन विपुलं यरः ।' -'नय से श्री, श्री से त्याग, त्याग से विपुल यघ।' द्वितीय का उदाहरण- 'भवन्ति नरकाः पापाव पापं दारिद्यसंभवम्। दारिद्रथमप्रदानेन तरमाद् दानपरो भव।।' -'नरक होते हैं पाप से, माप होता हैं दारिकय से, दारिद्रय होता है दान न देने से। इसलिए दानपरायण बनो।' पण्टितराज ने पहले मृहला का लक्षण बनाया है और उसके परचात् तन्मूलक एक एक अलं- कार का। उनका शङला का लक्षण यह है- 'पड्धिरूपेण निवद्धानामर्थाना पूर्वपूर्वस्योत्तरोक्षरस्मिन्, उत्तरोत्तरस्य वा पूर्वपवरिमिन् संसृष्ठत्वं शृह्गला ।।' -पंकिरूप से जपनिवद्ध पडार्थी में से पूर्व-पूर्व का उत्तरोत्तरपदार्थ के साथ अथवा उत्तरोत्तर का पूर्व-पूर्व पदार्थ के साथ संवद्ध होना शङ्गल कहलाता है। इसके स्वतन्त्र अलंकारत्व पर रत्ना- कर और निमर्शिनी के पक्षविपक्ष भी पण्डितराज ने यहाँ संक्षेप में नामोल्लेख के बिना उपस्थित किए हैं। किन्तु सारालंकार के प्रकरण के अन्न में उन्होंने विमर्शिनी के हो तर्कों का समर्थन किया है। कारणमाला का लक्षण उन्होंने इस प्रकार बनाया है- 'सेव श्रङ्का आनुगुण्यस्य कार्यकारणभावरूपत्वे कारणमाला।' -'वही शहला संबन्ध के कार्यकारणभावरूप होने पर कारणमाला।' पण्डितराज ने रत्नाकर द्वारा प्रस्तुत इसके दोनों भेद भी स्वीकार किए हैं और लिखा है- (१) 'तन्न पूर्व पूर्व कारणं परं परं का र्यमित्वेका। (२) पूर्व पूर्व कार्य पर परं कारणमित्यपरा।' विश्वेश्वर-ने कारणमाला के दोनों भेद स्वीकार किए है किन्तु कारणमाला का लक्षण केवल इतना वनाया है- 'कारणमाला पूर्वे पूर्वे कार्ये ययोत्तरं हेतौ।' -उत्तर-उप्तर के प्रति पूर्व-पूर्व के हेतु होने पर कारण माला। इन्होंने इसका वदाहरण भी. अच्छा खोज निकाला है- 'दारिद्र याद्भियमेति०' इत्यादि मृच्छकटिक का प्सिद्ध पद्य। इस पर श्रीविद्याचकरवर्त्ती की निष्कृष्टार्थकारिका यह है- 'कार्यका रणमालायो प्राचः प्राचः परं परम्।
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[सर्वस्व ] [सू० ५५] यथापूर्व परस्य विशेषणतया स्थापनापोहने एकावली। यत्र पूर्व पूर्व प्रति क्रमेण परं परं विशेषणत्वमनुभवति स भकावल्य- लंकार: । विशेषणत्वं च स्थापनेन निवर्तनेन वा। स्थापनेन यथा 'पुराणि यस्यां सवरामनानि वराङ्ना रूपपुरस्कृताङगयः। रूपं समुन्मीलित सतिलासमस्मं विलासा: कुसुमायुधस्य।।' अध चराहनाः पुराणां विशेषणं स्थापनीयत्वेन स्थितम् । पयं बराङ्ग नानां रुपमित्यादि घ्ेयम्। निवर्तनेन यथा- 'न तजलं यमन सुचारुपङजं न पङुजं तद् यदलीनपट्पदम्। न पट्पदोडसी न जुगुस यः कलं न गुकितं तन जददार यम्मन.।।' अन्र जलस्य सुचारुपङ्कजत्वं विशेषणं निषेध्यत्वेन स्थितम्। एवं पङ्कजा नामलीनपट्पदत्वादि केयम्। [सू० ५५]'पव-पूर्व के प्रति परवर्ती के विशेषण रूप से स्थापन या निवर्सन हो तो [अलंकार की सज्ञा] एकावली [होती है]। जहों उत्तरवर्स्ती पदार्थ पूर्व-पूर्व के प्ति विशेषण बनते जाये वह अलकार एकावली कहलाता है। विशेषणना स्थापन से हेती है या निवर्तन से, स्थापन से यथा- जहाँ नगर उद्तम अगनाओों से युक्त है, उत्तम अंगनाएँ रूप से पुरस्कृत अंगवाली है, रूप उन्मोछित हो रहे अभिनान विलासों से युक्त है और विलास काम के अस है।' यहोँ उत्तम अगनाऐँ नगर के प्रति ऐने विशेषण है। जो स्थापित किए जा रहे है। इसी प्रकार रूप उत्तम अंगनाथो के प्रतति वैसा हो विरेषण है और आगे भी पेसा दी है। निवरचन से यथा- 'ऐमा कोई अल न था जिसमें सुन्दर कमल न हो, कमल भी ऐसा न था जिसमें मौरे नहीं टूट रहे हो, मौरे भी ऐेमे न थे जी मधुर गुआार न कर रह हों और कोई मधुर गुजार भी ऐमा न था जी मन न दरता रहा हो।' -यहाँ जल के प्रति 'सुचारुपङ्कनव्व-सुन्दर कमल से युक्त होना', ऐसा विशेषण है जो निमेन्यरूप से स्थित है। इमी प्रकार कमला आदि के मनि 'अलीनपटपदत'= जिसमें मौरे न इब रहे हो आदि को समझना चाहिए। चिमर्शिनी यथापूर्वमित्यादि। पर परमिति। अत एव पूर्वस्य पूर्वस्य यथायथ विशिष्टतयाद राम.1 स्वरूपमानेजनगतस्य चस्तुनो यामंबन्धवलेन वैशिषयमवगम्यते तद्टिशेषम्। यहच्यति, उत्तरोषरस्य पूर्व पूर्व प्रतपुरूषहविसुवे एकावलीति। एकावत्यरकार रति। पूर्वी- तर यो: परस्परासुपक्चेनेकपडि्फर परवाद्।
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विशेपोकत्यलङ्गार: ५२९
यथापूर्वस् इत्यादि। परं परम्= उत्तरवर्सती, अत एवं पूर्व-पूर्व का उसी क्रम से एक एक करके विशिष्ट-[विशेषण-युक्त ]-ता के साथ ज्ञान होता है। विशेषण वढ़ तत्व है जिसके संबन्ध के वल पर स्वरूपमात से विदित कोई पदार्थ विशिष्टता का अनुभव करता है। जैसा कि कहेंगे- 'उचरोत्तर के पदार्थ पू्व-पूर्व के पदार्थों के उस्कर्प के हेतु हो तो एकावली। एकावस्यलङ्कार := अलंकार का नाम मकावली, इसलिए कि इसमें पूर्व और पर के पदार्थ परस्पर में सम्बद्ध रह्ते है मौर एक पंकि जैसे प्रतीत होते हैं। विमर्श :- इठिहास एकावलो मी प्रथमतः रुद्रट की देन है। इन्होंने इसके उपर्युक्त दोनों पक्ष भी परस्तुत किए हैं। उनका एकावली विवेचन- 'एकावलीति सेयं यत्रार्थपरम्परा यथालाभन्। साधीयसे ययोत्तरविशेषणा स्यित्यपोहाभ्याम्॥।' -'एकावली नामक अर्लकार वह है जिसमें पदार्थ जिस क्रम से प्राप्त होते हैं उसी क्रम से उत्तरवर्त्ती पदार्थ पूर्व के प्रति स्थापित या निषिद्ध होकर विशेषण होते जाते हैं।' उदाहरण-(१) 'सलिलं विकासिकमळं कमलानि सुगन्धिमधुसमृद्धानि। मधु लीनालिकुलाकुलमलिकुलमपि मुररणितमिष्ट ॥' -'पानी यहाँ विकसित कमलो से सुशोभित है, कमल सुगन्धित मधु से समृद्ध हैं, मधु हूब रददे भोरों से आकुलित है औौर मौरे भी मधुर गूँज से मरे हैं।' यह पद्य निश्चित ही भटिकाव्य के 'न तज्जलं' पद्य का विभिरुप है। निम्नलिखित पद् भी इसी पद्य की छाया पर निर्मित है- (:) 'नाकुसमस्तरुरस्मिन्तुदाने नामधनि कुसुमा नि । नालीनालिकुलं मधु नामधुरकाणमलिवलयम्।।' -'इस उद्यान में कोई भी वृक्ष पुष्पदीन नहीं है, कोई पुष्प मधुदीन नहीं, कोई मधु भमरहौन नहीं और कोई मो भ्रमर मनोहर गुआर से रदित नहीं है।' निश्चित ही रुदूद ने मट्टिकाव्य की रीतिवद्ध कविता से पर्याप्त सहायता लो है, प्रकाश पाया है। मम्मट-स्थाप्यतेऽपोसते वापि यथापूर्व परं परभ्। विशेषणतया यत्र वस्तु सैकावली दविया॥ -- 'जहाँ, पूर्व-पूर्व के प्रति परवर्ची पदार्थ विशेषणरूप से स्थापित किए जाएं या हटाए जाएं वद दो प्रकार की एकावली होती है।' उदादरण दोनों ने ही जो अलंकारसर्वस्वकार ने दिए हैं। 'इस प्रकार एकावसी के विषय में सुट्रट का मम्मट ने और मम्मट का सर्वस्वकार ने अतुसरण किया है। परवर्त्ती आचार्यों में-जोभाकर की प्रतिक्रिया कारणमाला में व्यक्त हो चुकी है। नप्पयदीक्षित ने कुवलयानन्द में इस अलंकार का लक्षण भिन्न प्रकार से किया है- 'गृद्दीतमुक्तरी त्यार्थश्रे णिरेकाव लिर्मता।' 'मृद्दीतमुक्तरीति से मर्थ की श्रेणी एकावली'। यहाँ गृहीतमुक्त शब्द से पूर्व का उत्तर के प्रति भी विशेषणभाव माना गया है। जब कि सर्वस्वकार ने इस स्थिति में मालादीपक माना है। इसका स्पष्टीकरण आगे पण्डितराज ने कर दिया है। दीक्षित जी ने अपोह को लक्षण में स्थान नहीं दिया न तो उसके उदाहरण ही दिए हैं। ३४ अ० स०
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५३० पव्टितराज-ने एकावली का लक्षग स्वतन्त्र चिन्तन दवारा इस प्रकार बनाया है- 'सैव शदला संसर्गस्य विशेष्यविशेषणमावरूपत्व मकावली' वही मला एकावली कहलानी है जन संबन्ध विशेष्यविशेषणभाव रूप होता है। पण्टितराज ने इसमें स्थापन और अपोहन का मी अस्तित्व सकारा है और उनके लक्षम मी रम प्रकार बनाए हैं -- [१]सवसम्वन्धेन विशेभ्यतावच्छेदकनियामकत्व्र स्थापकत्वम्। [ २] सवम्यतिरेकैण विशेष्यतावच्छेद्क्यति रेकबुद्धिजनकत्वमपोद्दकत्वम्। अथातू अपने संबन्ध के द्वारा विशेष्य में उसकी विशेषता का निश्चय कराना स्थापन।यथा 'पण्डित वह जो अपना हित देसे'। यहाँ स्वदितदर्शिता द्वारा पाण्डित्य का निश्चय कराया जा रहा है, इसका स्पष्टीकरण 'जो सवहितदर्शी नहीं होना वहध पण्डित नहीं होता'-इस परवर्ती व्यतिरेकी नोष से होता है। अपोहन वह होता है जो अपने अभाव से विशेष्यगत विशेषण का अभाव तय करा। यथा यही-'जो सपहित न देखे वह पण्टित नहीं।' इसमें स्वदितिदशिता का अभाव पाण्डित्य के अभाव का निश्चायक है। अध्पयदीक्षित के ही समान पण्डितराज ने पूर्व पूर्व को भी जयरोतर के प्रति विशेषणीभूत मानकर एकावली स्वीकार को है। मादादीपक से इस भेद का अन्तर कहोंने धर्मगत कता को लेकर किया है। यदि पूर्व पूर्वर के द्वारा रतरोघर में उत्पन्न किया गया वैशिभ्व्य एकरूप सो हो तो मालादोपक होता है। एकावकी में यह प्रतिग्यत्ति मिन्न-भिन्न होता है। विधेश्वर-ने दकावली का निरूपण इस प्रकार किया है- 'पथम विशेषण यद् विशेष्यमग्रे भवत्यसकृद। विरद्प्रतियोगी वा तहानेकावली सोका।।' 'जी पहले विशेषण हो वही भागे विशेष्य बने या उस्से युक्त अमाद का पनियोगी बने और ऐसा अनेक बार से तो उसे एकावळी कहते है।' विश्वेश्वर ने यहाँ पूर्व का उत्तर के पनि विशेषणमाव भी माना है। विश्वेधर की दृष्टि एकावलौ के विषय में पण्डितराज से अधिक व्यापक है। पण्डितराज ने स्थापन और मपोहन के जी लक्षण फिर है उनकी दृष्टि में वे एकांगी ऐैं व्यापक नहीं। 'न तज्जलं' में उनका अपोइनलक्षम लागू नहीं होता। यहा सरत्काल का वर्णन है। इसमें कमल के समान में सलत्व का अमाव विदक्षित नहीं है, अपितु जद् के साथ करमल का अयोगव्यवच्छेद विवक्षित है: इसी प्रकार 'पुराणि यरया' में वरांगनायुक्तल पुरत्व का निश्चायक नहीं है वह केवल पुर के वत्कर्ष का व्यजक है। पकवसों को निष्टष्टार्थकारिका इस प्रकार है- 'एकावर्क्या यथापूर्व भेदकं तूचरोतरम्। स्थाप्यनेऽरपोछ्ते चैव तेनेयं दिबिना मना।।' [सर्स्व ] [ सूत्र ५६] पूर्वस्य पूर्वस्योत्तरोत्तरगुणावहत्वे मालादीपक्म् । उत्तरोत्तरस्य पूर्व पूर्व प्रत्युत्कर्पद्वेतुत्वे पकावली। पूर्वस्य पूर्वस्यो तरोत्तरोन्कर्पनियन्धनत्वे तु मालादीपकम्। मालात्वेन धारत्वविशेषमा श्रित्य दीपकपस्तायोल्द्वनेनेह लक्षण कृतम्। गुणावद्ृत्वमुत्कर्षद्ेतुत्त्वम्। यथा-
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समालह्गार: ५३१
'संग्रामाङ्गणमागतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्णय येन येन सहसा यद् यत्समासादितम्। कोदण्डेन शराः शरेररिशिरम्तेनापि भूमण्डलं तेन त्वं भवता च कीर्तिरतुला कीर्त्यां च लोकचयम्।' अत्र कोदण्डादिमि: क्रमेण शराद्ीनामुत्कर्षा बिहितः । समासादन लक्षणक्रियानिवन्वमें च दोपके दोपनविषयाणामुत्तरोत्तरभिमतत्वेन इतम्। [सूत् ५६] पूर्व पूर्व उत्तर उत्तर का उत्कर्षाघायक हो तो [ अलंकार] माजदीपक [कहलाता है ]। उत्तर-उत्तर पूर्र-पूर्व के प्रति उत्कर्ष का हेतु हो तो एकावलो मानो गई है, इस के विपरीत पूर्व- पूर्व व तर उत्तर का उतकर्षाधाचक हो तो मालादीपक होता है। मालामात के कारण इसमें एक विशेष प्रकार की चारता चली आाती है। उसे दृष्टि में रखते हुए इसका लक्षण दीपक के प्रसंग से इटाकर यहाँ किया गया है। नुणावहत्व का अर्थ है उत्कपहेतुत्व। उदाहरण- 'देव ! संग्रामांगण में आाकर आपने धनुप चढ़ाया तो सुनिर जिस-जिसने जो जो प्राप्त किया। धनुप ने बाग, बाणों ने शत्रु सिर, सन्दोंने भूमण्डल, उसने आपको, अपने कीर्ति और कोचि ने तोनों लोकों को।' वहां धनुष आदि के द्वारा कम से कर आदि का उत्कर्म किया गया। [अतः यहां मालास है और सब में] समासादनरूप [एक] क्रिया होने से यहां दीपक है। दीपन कार्य विषयों में उत्तरोक्षर अभिमतता वतकाने से निष्पन्न हुआ है।1 विमर्शिनी पूर्वेत्यादि। श्तश्रैकावक्ष्यलंकाराद वे उक्षण्यं दर्शयन् व्याचष्टे-उत्तरेत्यादि। उतकर्षनि- वन्षनत्व इत्यनेन कारणमालातोऽप्यस्य वैरपण्यसुकम्। तत्यां हि पूर्वस्य पूर्वस्योत्तर मुत्तरं प्रति कारणध्वम्। नतु घास्य प्राच्येदपकानमतर लष्षण कुतम् हह तु कि न तथेया- शङयाह-मालाखवेनेत्यादिना। मालाशव्दरेनाव भृङ्गळा लचयते, तस्या एवोपक्ान्तस्वातू। न पात्र मालोपमावन्सालाशब्दो ज्ेय:। एकसयोपमेयवय बहुपमानोपादानाभावातू। अत्र दीपस्यमेव नारित। कोदण्डशराद्ीनां तस्याविवक्तणाद। अत एवास्य दीपक्रमेदत्ं न वाच्यम्। औपम्यजीवितं हि तख। आच्येः पुनरेतदीपनमात्रानुशुण्यात्तदनन्तर कषि- तम्। नङ्गरव्वेन त विशिष्टमस्य अवमितीह उप्षणं युकम्। एतव दीपक एव ग्रन्थकृतोकम् 'छायान्तरेण तु सालादीपक पस्तावानतरे लक्षयिप्यते' इति। अतेत्यादि। उरकर्पश्र शरादीनां कोदण्डादिसमालाद नलतगः। दीपनविषयागमिति। कोदण्डरराह्ट्रीनामू। अत पवास्य दोपकमित्यन्वर्यमभिधानम्।। पू्वेरयादि। इसीलिए एकावली अलंकार से रकका भेद बतलाते हुए व्याख्या करते हैं उत्तर इत्यादि। उरकर्षनिबन्धना्व=उत्कर्पहेतु होना = इसके द्वारा कारणमाला से मी इसका भेद बतलाया। उसमें पूर्व-पूर्व उत्तर-उत्तर के प्रति कारग होता है। 'इसका लक्षम प्राचीन आचार्यो [ सम्मट] ने दीपक के वाद किया है, यहाँ वैसा क्यों नहीं किया जा रहा है'-ऐसी शंका करके उत्तर देते हैं-मालाल्वेन इत्यादि। यहाँ माळाशब्द का अर्थ सक्षणा द्वारा महला है, क्योंकि प्करण उसी का चला हुआ है। यहाँ मालाशब्द मालो- पमा जैसा नहीं समझना चाहिए-क्योंकि यहाँ एक सपमेय के लिए अनेक उपमानों का उपा-
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५३२ अलङ्कारसर्वस्वम् दान नहीं है। यहाँ तो औषम्य ही नहीं है, क्योंकि धनुप-चाण आदि में उसकी कोई विवश्ा नहीं। इसीलिए [मालादोपक] दीपक का भेद नहीं कह़ा जा सकता। वद [दीपक] औपम्य पर निमर रहता है। प्राचीनों ने जो इसका लक्षण दीपक के बाद रसा है वह केवल दीपन मात्र की समानता के आधार पर। वस्तुन इसमें चारता आती है शवलातव से, भतः इसका लक्षण यही ठीक है और यह तो मन्यकार दीपक [के अन्त ] में ही कह चुके हैं कि-'माला- दीपक एक मिन चमर्कार को लेकर होता है, उसका लक्षम अन्य असग में किया जायगा।' अग्र= शरादि का उत्कर्ष है धनुष आादि के द्वारा प्राप्त किया जाना। दोपन विपयाणाम्= दीपन कार्य के विषय =धनुप आदि। इसीलिए इसका 'दीपक' नाम सार्थक है।' विमर्श- इतिहास-माछादीपक भामह, वामन, उद्दट और रुद्रट में नहीं मिलता। दण्डी-यह इदप्रयमतया दण्डी में मिलता है। उनका निरूपण- 'शुकल श्वेतारचिषो वृद्धये पक्ष पद्चशरस्य स। स च रागस्य रागोि यूर्ना रत्युत्सवभिय.॥। इत्यादिदीपकत्व5यि पूर्जपूर्व ्यपेक्षिगी। वाक्यमालाप्रयुक्कति तन्मालादीपर्के स्मृनम्।। -- शुशलपक्ष चन्द्रमा की वृद्धि करता है, चन्द्रमा काम की, काम राग की, राग युवकों की रतोत्सवश्री की।' यह आदिदीपक है तथापि इसमें पूर्व पूर्व के प्रति परवर्ती को सापेक्ष व।" वाक्यों की माला वनाई गई है, अत- इसे माछादौपक कदा गया है।'-[ काव्यादर्श-श१०) मम्मट- मालादीपकमार्च चेद् ययोचरगुणावहम्। -- 'यदि आदि-आदि के पदार्थ यथोचर उत्कपंकारी हो तो मालादीपक होता है।' उाइरण-'संग्नार्भांगण0' पद्य ही। रत्नाकर का जो उद्धरण कारणमाला के मरुग में उद्भृत किया गया है उससे स्पष्ट है कि योमाकरमित्र मालादीपक को स्वतन्त्र अलकार नहीं मानते। अप्पयदीच्षित-ने मालादीपक की निष्पच्ति दीपक और पकावली के योग से मानी है-
उद्या०-'स्मरेण हृदये तस्यास्तेन त्वयि कृता स्थिति: ।।' -क्राम ने उस सुन्दरी के हृदय में और उस [हृदय] ने आपमें टिकाव कर रखा है।' दूसरा उदाहरण 'सग्रामाझण' हो इन्होंने दिया है। भण्टितराज-जगननाय मालादीपक की एकावली का दो एक मेद मानने है, दीपक नहीं [द्० रसगंगाधर दीपकमकरण]। विमर्शिनीकार के ही समान उनका कहना है कि इस अलंकार के उदाहरणों में आए पदार्थो में न तो सादृश्य की रहवा और न प्रकृताप्रकृतत्व दी। अत* यहाँ दीपकत्व कथमि समन नहीं। 'मंगामाङग' उदाहरण से यह तथ्य स्पष्ट है। [द० एकाकलीपकरण रभगगाधर ] मालादीपक शब्द का आशय बतलाने हुए उन्होंने दिसा १ 'मालापदेनात्र मखलोच्यते दीपकशष्देन दौप पवेति व्युत्पत्या पकदेशस्य सर्वोपकारकमुच्यते।' हेन- 'एकदेशस्थसर्वोपकारकक्रियाश्ाविनी मद्धलति पददयार्थः।'
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सारालट्गार: ५३३
-- 'माला शब्द यहाँ मछला का बाचक है और दोपक शब्द 'दीप के समान' इस व्युत्पत्ति के आधार पर पकदेशस्य सभी द्रव्यों का उपकार के पदार्थ। इस प्रकार दोनों पदों का मिलित अर्थ हुआ-'एकदेशस्थित सभो पदार्थो का उपकार करने वाली क्रिया से युक्त शृह्लला।' [दर० रसगं एकावलीप० ]। विश्वेश्वर-ने मालादीपक को दण्डी और मम्मट के हो समान दीपक प्रकरण में ही स्थान दिया है। उनका लक्षण- [सूत्र] 'माला तु पूर्दपूर्वे विध्यन्तरेणोत्तरान्वयिनि॥' [ वृत्ति] तत्यां क्रियायां रूपान्तरेणान्वितत्य पुनस्तस्यामेव्र रूपान्तरेणान्वये मालदीपक मिति। -'एक हो करिया में एक रूप से अन्वित का पुनः दूसरे रूप से अन्वय मालादीपक कहलाता है।' 'संग्रामाङ्ण०' पद्य में पद समासादनकिया में जिस वाण का कारणतवेन अन्वय है उसी का कतृत्वेन भी अन्वय है। विश्वेश्वर पण्डितराज द्वारा प्रस्तुत प्रस्तुत आपत्तयों का कोई उल्लेस नहीं करते। न तो उनका खण्डन ही करते। स्विदयाचकवचतीं की माछादीपक पर निष्कृष्टार्थकारिका यह है- 'मालादी पकमाद्यस्योत्तरोत्तरदौपनम्।' साय नाद्य का उत्तर उत्तर के प्रति उत्कर्पक होना मालादीपक कहलाता है। [सर्वस्व] [सू० ५० ] उत्तरोत्तर मुत्कर्पः सारः । पूर्वपूर्वा पेक्षयोत्तरोत्तरस्योत्कर्पनिबन्धन: सार । यथा- 'जये धरित्र्याः पुरमेव सारं पुरे गृहं सझनि चैकदेशः। :नापि शय्या शयने वरा स्री रतोज्जला राजसुसस्य सारम्॥'
त्यादि योजनीयम्। अन्र धरित्र्यपेक्षया पुरस्य सारत्वमेवं पुपापेक्षया तदेकदेशस्य गृह्स्ये-
यथा- 'राज्ये सारं वसुधा वसुन्धरायां पुरं पुरे सौधम्। सौधे तल्पं तल्पे वराङनानतस्वस्वम्।।' अत्र राज्यापेक्षया वसुन्घरायाः सारत्वमेवं वसुधापेक्षया तदेकदेशस्य पुरस्येत्यादि योजनीयम्। एवं शृङ्धलानिच्छित्यालंकाराः प्रतिपादिताः। [सूत्र ] उत्तरोत्तर उत्कर्ष सार [नामक जलंकार कहलाता है ] । पूर्व पूर्व की अपेक्षा उत्तर वत्तर का उत्कर्ष बतलाना सार कहलाता है। यथा- 'पृथिवी के विजय में सार नगर ही है, नगर में सार गृह है, और गृह में उसका एक भाग। उसमें भी सार है शय्या, शय्या पर राज्य सुख का सार है रत्नोज्जवल उत्कृर सती। -यहाँ पृथिवी की अपेक्षा नगर का सारत्व वतलाया जा रहा है इसी प्रकार नगर की अपेक्षा उसके एक अंश गृद्द का, इत्यादि योजना कर लेनी चाहिए। दूसरा उदादरण यथा-
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अलङ्कारसवंस्वम्
'राज्य में सार है पृथिवी, पृथिवी में सार है नगर, नगर में सौध, सौष में तक्ष्प, तत्त्प में मनंग का सर्देस्व उध्टम स्त्री। -यहाँ राज्य की अपेक्षा परथिवो का सारत्व प्रतिपादित है, इसी प्रकार पृथिवी की अपेक्षा उसके एक अंश नगर का, इत्यादि योजना कर लेनी चाहिए। इस प्रकार शखलामूलक चमत्कार वाले भलंकारों का प्रतिपादन पूरा तुआ। विमर्शिनी उत्तरेत्यादि। पुतदेव व्याचष्टे-पूर्वेत्यादि। एतच्छैकरमैव वस्तुनो बहुनां वा स्यादित्यस्य दैधम तेन पूर्वत्र पूर्वपूर्वेति, उत्तरोक्षरश्येति चावस्थाविशेपामिप्रायेश ग्यादवेयम्। अन्यथा छोकरयैव, पवत्व मुतरवं च कर्थ स्यात्। एवमप्युत्तरोत्तरमुपचयः स्वरूपेग धर्मेण या भवतीत्यस्य चातुविध्यम्। एव प्रकृते यथायथसमारोहकमेग घाराधिरूढतयो:कर्प- प्रतिपादनं स्वादितयलं कारयीजम्। यदुषम-'उत्तरोत्तरमुर्कर्षो भयेरसार परावधिरि'ति। पूर्वपतयोत्तरशयोह्ट्ृ ष्वत्वमिर्यनेन मालादीपकादश्य मेदोडप्युक्क। तम दि पूर्वस्थोत्तरं प्रर्युरक पनिबन्धनत्व दुकम्। अत एव पारयोपरोप्तयो र्पपनिवद्धाद्वपखम्। तै कस्य स्वरूपेणोत्कर्यो यथा- "कि छाय्र कि यु हान तिलकमय तथा कुण्डल कौस्तुमो या चक्र वा वारिज वेोयमरयुव तिभियंदलिदे पिेहे। ऊम्बे मौही छलाटे अवसि ददि करे नामिदेशे च दट पायातट्ोडकविम्वं स च दनुजरिपुर्वर्धमान क्मेण।' अग्रैकस्यैय हरेश्तत्तद्वस्थाविशिष्टतया स्वरूपेणोतरोप्तरमु्कर्। घर्मेणापि यथा- अतसीकुसुमप्रभ मुखे तदसु श्वाकचमेचकद्यति। क्षथ बालतमायमांसलं प्रछत सर्मतति सर्वतसतमः ।' अैकरपैय तमसो निविदर्वासयधर्ममुसेनोत्तरोत्तरमुश्पं। क्षम्र व यद्यप्येकरिमि- न्नेव तमस्यनेकस्यातसीसुसुमप्रमादिकस्यावस्थानातपर्यायश्वम्, तथापि तमसो नैविसयं पथायथमुख पतया वावयार्थीभूतमिति यथोप्मेव दुम्। बहूनां स्वरुपेणोर्कर्षो थथा- अ्युचास्तरवस्ततोऽपि गिरय: स्वर्नासिशेला्तत- सस्माद्िणुपदं ततः किसपर स्थादन्यदायुघतम्। तस्मार्सवंत एव साधुहृद यान्युप्तन्रमह्गीनि ते कसया उततये तवाथिपद्र्षी चिन्तामणे तन्वते॥' अग्रानेवेपां पूर्वापेष्या स्वरूपेणोत्तरोत्तर मुरकपः। धर्मेण यया- 'कुपे. कोटर एव कैटमरिपुर्धते ब्रिलोकीमिमा- मप्युद् पुहमरो विभर्ति तमपि प्रीतो भुजनेश्वर। श्रीरण्ठर्य स कण्टस्य्रममवद्वेव रया सं हदा विभ्राणेन परोपु पौरुषकथा श्रीकर्ण निर्नाशिता।' अन्न कैटमारिप्रमृतीनां पौरुपाययधर्ममुेनोत्तरोसरमु्कर्। एवं 'जये धरिध्या इरयादी सारयमुसेन चोदग्यम। यदाहावरित्यादि। यया वा- 'त्रिलोक्यां र्नसूः स्लाध्या तरयां धनपतेरहरिय्। तभ्न गौरीगुरु: शैलो यत्तस्मिचवप मण्डलम्।'
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सारालह्कार: ५३५
अन्न बहूनां श्लाध्यरवेनोसरोत्तरमुत्कर्पं:। यश्वन्यैरेतरस्थाने रूपधर्माभ्यामाधिक्य- मिति वर्धमानमुळम् तत्तेपां नाममान्ननवीकरणरसिकरवम्। अस्थैव पूर्वपूर्वापेषयोत्तरो- सरोत कप पनिवन्ध नारमक्वात् सममविपयावगाहनसहिप्णुर्वाष्। तस्मादु 'अस्मिंश्र वर्धमाने सारोऽतभविमेति न पुनरिदम् अन्तर्भूत सारे परिमितविषये महाविपयम्' दश्या धयुक्मेवोक्स् । उसरेत्यादि। इसी की व्याख्या करते है-पूर्व इत्यादि। [रत्नाकरकार सारालंकार को वर्धमान नामक अलंकार में अन्तर्भूत मानते हैं। विमशिनीकार इसके विपरीत वर्धमान को नया नाम मर मानते और उसको सार में ही अन्तर्भूत दिखलाते हैं। अगला प्रकरण केवल रत्नाकर के वर्षमानालंकार का सारालंकार के रूप में अक्षरशः वल्लेख है। रत्नाकरकार ने वर्धमान में एक वस्तु या अनेक वस्तुओं के उपचय का चमत्कार बतलाया है, अतः विमर्शिनीकार सार में भी ये विशेषताएँ बतलाने जा रहे हैं। एक एक कर सभी उदाहरण भी वे रत्नाकर से ही लेते ना रहे है-]
यह उत्कर्ष एक हो वस्तु का वतलाया जा सकता है और अनेक वस्तुओं का भी। इस प्रकार [वर्मान के ही समान ] इसके भी दो प्रकार हो जाते हैं। इस कारण 'पूर्व पूर्व' इस औौर उत्तरोत्तर एस अंश की व्याख्या अवस्थागत विशेषताओं के आधार पर की जानी चाहिए। नहीं तो केवल एक का पर्वत्व और उत्तर कैसे होगा। इसी प्रकार उत्तरीचर उपचय दो प्रकार से होता है स्वरूपतः या धर्मनः 1 इस प्रकार इसके चार भेद हो जाते हैं। इस प्रकार यहाँ अलंकार का बीज उत्कर्प का पक-एक के मरोह कम द्वारा आगे आगे बढ़ते जाना है। जैसा कि [मम्मट ने] कहा है 'उचरोत्तर बढ़ा और परा कोटि तक गया उत्कर्प ही सार है' पूर्व की अपेक्षा उत्तरवर्ती का उत्कर्म वतलाकर मालादीपक से इसका अन्तर भी स्पष्ट किया। उसमें जो है सो, पूर्व-पूर्व का उत्तर-उत्तर के प्रति [उत्कर्ष नहीं ] उलकर्ष हेतुत्व वतलाया गया है। इसीलिए इसकी संका सार्थक है क्योंकि इसमें उत्तरोत्तर का उत्कर्ष वतलाया जाता है। इनमें- [१ ]एक वस्तु का स्वरूपतः उत्कर्प यया- 'वह सूर्य विम्व और वह बढ़ता जा रहा दैत्यारि [वामनावतारी विष्णुविग्रइ ] मी आपकी रक्षा करे जिस सूर्यबिम्ब को बलिदिी [बामन] के [बढ़ते जा रहे] शरीर में ऊपर की ओर देखा तो अप्सराओं ने सोचा कि यह छत्र है क्या सिर पर देसा तो सोचा रत्न है क्या, ललाट पर देखा तो सोचा तिलक है क्या, कान के पास देखा तो सोचा कुण्डल है क्या, वक्ष पर देखा तो सोचा कौस्तुम है क्या, हाथ में देखा तो सोचा चक है क्या, तथा नामिदेश में देखा तो सोचा कमळ है क्या ?' यहाँ एक ही वामन का स्वरूपगत उत्तरोत्तर उत्कर्ष उन-उन अवस्थाओं को लेकर वतलाया गया है। [२ ] [एकवस्तु का ही] धर्मतः उत्कर्ष यथा- 'संघकार पहले तो अतसीवुसुमाम था, तत्पश्चात तुम्हारे केशों के समान मेचकच्छवि [व्यासवर्ण ] हुआ, तदनन्तर नाळतमाल के समान मांसल होकर यह सबत्र फैल गया है। यहाँ एक ही अन्वकार का उत्तरोत्तर उत्कर्प निविडतारूपी एक ही धर्म को लेकर वतलाया गया है। इस पद्म में यद्यपि पर्यायासंकार भी है क्योंकि एक ही अन्धकार में अतसीकुसुमप्रभत्वादि धनेक धर्मों का क्रम से अस्तित्व दिखलाया गया है तथापि सार को ही अलंकार मानना टीक है क्योंकि यहाँ प्रभान है अंधकार की क्रमिक वत्कष्टता।
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५३६ अलद्भारसर्वस्वम्
[ ३ ] अनेक वस्तुओं का स्वरूपत* सत्कर्पे यया- "[प्रयमत'] बहुत ऊँचे होने हैं वृक्ष, उनसे ऊँचे हैं पर्वत, उनमें ऊँचा सुमेरु, उमसे ऊँचा आकाश। उससे ऊँचा और कौन हो सकता है। हाँ, उन मब से उत्तह चेषा वाले होने हैं साधुओं के हृदय। तब हे चिन्तामगे! वे [ साधुजन ] किस उन्नति के लिए तेरे सामने याचक बनें।' यहों अनेक वस्तुओों का पूर्व-पूर्व वस्तुओं की अपेक्षा उत्कर्ष दिसलाया गया है। [४ ][ इन्दीं अनेक वस्तुओं का ] धर्मेत उत्कर्ष, यया- 'विष्णु भगवान् इस त्रिलोकी को कूँख की कोटर में ही धारण कर लेने है, उन्हें भी प्रेमपूर्वंक धारण कर लेता है शेषनाग, यदयपि उस पर पहले से ही काफी वोझ रहता है। वह शेषनाग भो श्रीकण्ठ [मगवान् सिव ] का कठला [कण्ठसूत्र] बन जाता है। हे यीकर्ग राजन् उन [ मगवान् शिव] को हृदय में धारण कर के आपने सो पौरुष की फया ही समाप्त कर दौ।' यहाँ विष्णु प्रमृति का उत्तरोत्तर उत्कर्ष पौरुष नामक धर्म के आधार पर बनलाया गया है। इसी प्रकार 'जये घरित्र्या' आदि पधों में सारत्वरूपी धर्म के द्वारा उत्तराचर उत्त्कर्र जानना चाहिए। जैसा कि [वृत्तिकार ने ] कहा। अग्र हत्यादि। और जैसे- 'त्रिलोकी मर में श्ला्य है रत्नस् [उसम भूमि ], उसमें कुबेर की दिश्ा [बत्तर], उसमें गौरो का पिता पर्वेत [हिमाचळ] और उसमें मी मण्डल [१]। यहां स्लाघ्यक् गुण के आधार पर अनेक वस्तुओं का वयरोत्तर उस्कर्ष बतलाया गया है। एक अन्य विद्ान् [रत्नाकरकार शोमाकर ] ने जो इस [ सार] के स्थान पर बर्धमान नामक अलकार स्वीकार किया है और इसका लक्ष 'रूप या धर्म से आभिक्य' यह बनाया है, बह उनका नाममात् नवीन रखने का चसका है। क्योंकि इसमें भी पूर्व-पूर्व की अपेक्षा उतरोचर का उत्कर्ष बजलाया जाता है अत. [वर्धमान के अन्तर्गन आने वाली ] संपूर्ण विषय समेट लेने में समर्थ है। इसलिए- 'इस वर्धमान में सारका अन्नर्माँव हो जाना है। इसका उसमें नहीं क्योंकि सार का क्षेत्र छोटा है औौर वर्धमान का विद्याल। [ परिकरश्लोक के द्वारा ] इत्यादि जो उन्होंने सिद्धान्त किया है वह अयुक्त ही है॥। विमर्श-विमर्शिनी के ठक्त विवेचन में रत्नाकर द्वारा बनाया गया वर्षमान अलंकार का लक्षण एवं उनके द्वारा प्रस्तुत उसके सभी उदाइरण था गय हैं। शेष केवल सवस्वकार का खण्डन है। वह इस प्रकार हे- 'राज्ये सार वसुधा [पूर्ण पद्य] •* अय वसुषादीनामुचरोचर मारत्वाख्यस्य धर्मस्याधिक्यमिति धर्मोंपचयक्षमवादन्ये- 'उततरोचरमुत्कषः सार,' इति लक्षितर्य सारालशरस्यास्मिन्नेवान्र्मावान्न पृथगुपादानं कृनम्। 'अर्मिश्र वर्षमाने-महाविषयम्।" इति परिकर॥। -'राज्ये सार वसुधा०' इन्यानि में वसुधादि के उचरोतर सारत्व नामक धर्म का आधिक्य है इसलिए घर्मोपचय की समावना होने से 'उत्तर-उत्तर का उत्कर्र सार' इम प्रकार जिस सारा- संकार का अन्य आचार्य (सवस्वकार) ने लक्षण किया है उसका अन्तर्माव इसी में हो जाता है। मत उसका पृथक उपादान नहीं किया।' 'सार इस 0०0000 विषय विश्ाल।' इस प्रकरण में 'अत्युच्चा' पद के तुनीय चरण में रस्नाकर की प्रति के ही समान निर्णय- सागर की पति में मी 'े' के स्थान पर 'तत्' छपा है। समासान्नगत पद के अर्थ का परामर्श
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सारालक्कार: ५३७
सर्वनाम द्वारा होता है अतः इमने उसे 'ते' बना दिया है। उससे अर्थसंगति अधिक सवल हो जाती है। इतिहास-सार का विवेचन पदलेपहल रुद्रट में मिलता है। वह इस प्रकार है- 'यत्र यथा समुदायाद यर्थकदेश क्मेण गुणवदिति। निर्धार्यते परावधि निरतिशयं तद मवेव सारम्॥७९६॥ ज्हां समुदाय में से एक-एक अश गुणवत्तर और अन्यन् उत्कृष्ट वतलाकर अरग किया जाता है वह सार कहलाता है।' तदा० 'राख्ये सारं वसुधार'। मम्मट-'उत्तरोत्तरमुत्कर्षो भवेत सार: परावधि :- ' [ विमर्शिनी में पृष्ठ ५३४ पर उद्वृत ]। उदा०- 'राज्ये सार वसुधान'। सर्वस्वकार ने सम्मट का लक्षण अक्षरकः अपना दिया है केवल परावपि शब्द को छोड़कर। परवर्त्ती आचार्यो में रत्नाकर का मत विमर्र्िनी में स्पष्ट हो ही चुका है। सप्पयदीक्षित-का लक्षण भी मम्मट का अनुवाद है। वह इस पकार है- 'टत्तरोत्तरसुत्कर्ष: सार इत्यमिधीयते। उदाहरण में समालंकार के समान गुणगत इलाव्यता और अइलाध्यता पर भी दीक्षितनी ने ध्यान दिया है।
पण्डितराज-जगन्नाथ ने दीक्षितजो की यह सूझ स्वीकार कर की है। उन्होंने लक्षण में उत्कर् के ही समान अपकर्ष में भी सार स्वीकार किया है। उनका लक्षण इस प्रकार है- 'सैव [शङ्गला ] संसर्गस्योत्कष्टापक्कष्टमावरूपत्वे सार:। वदी शृह्गता संसर्ग के वत्कर्म अपकर्य रूप होने से सार कहलाती है। दोनों में से उदाहरण चमल उत्कर्ष का ही पष्डितराज ने दिया है। वस्तुतः उत्कर् का सर्थ तरत्षममाव है। वद्द अपकर्ष में मी संभव है अतः पण्डित्राज की यह सू उन्हें स्वयं अधिक नहीं जंची। विमशिनीकार के समान पण्डितराज ने सार में भुण और स्वरूप को भेदक माना है तथा एकविषयता और अनेक- विषयता भी स्वीकार की है, और उनके उदादरण दिए हैं। रत्नाकर के वर्धमान की चर्षा भी पण्डितराज ने की है और उन्होंने उसका स्पष्ट खपडन तो नहीं हो किया, दवे स्वर में मण्डन भी किया है। सार में यदि वस्तु एक हो और वह आरम्म से अन्त सक एक-सी ही रहे तो चमत्कार नहीं रद्दता। नर्धमान में उसी वस्तु में अवस्थादि भेद भी रहते हैं जो अधिक चनत्कारी होते हैं। सार को पण्डितराज ने शृंखला से रहित मी माना है। दोनों का समन्धय करने हेतु उन्होंने एक व्यापक लक्षण मी सुझाया है-'गुणस्वरूपास्यां पूर्वपूर्ववेशिष्टचे सारः।' गुण और स्वरूप के द्वारा पूर्व पूर्व का वैशिष्य हो तो सार अलंकार होता है। यह लक्षण श्रंखकारहित भेद में भी समान रूप से अन्वित हो सकता है। विश्वेश्वर-मम्मट का दी अनुसरण करते हैं- 'सारस्तु पूर्वपूर्वादुत कषिण्युत्तरे प्रोके'। 'पूर्व-पूर्व की अपेक्षा उत्तरवर्त्ती पदार्थ यदि वत्कर्पशरली बतलाया जाए तो सार होता है।' अवस्थाभेद से एक ही वस्तु के उत्कर्षपूर्ण वर्णन में रत्नाकर और पण्डितराज ने जो चमत्कार
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देखा है विश्वेश्वर उसे मी वटस्य रवर में उपस्यत कर देने है। धर्मे और सवरूप के भेदों पर के चुप है'। इस पर चक्रवर्ष्ती की निश्नृष्टार्थकारिका यह है- 'उतरोतरमुत्कपांवहरवे सार इष्यते।' पाटान्तर-निर्णयसतागरीय प्रति में अलंकार का नाम सार के स्थान पर उदार छरा है। 'उप्तरोत्तर मुत्कर्पणमुदार.' रत्नाकर में प्राप्त सर्वस्व के व्दरण में सूत्न का जो रूप मिलता है इसमें उदार का उस्लेस नहीं दै। म्ट्रट, मम्मट और अप्पयदीक्षित के लक्षण भी सार वाले पाठ से ही मिलते हैं। संजोविनी में भी यही पाठ है। विमसिनी मी इसी पक्ष में है। वृत्ति में 'निबन्धन सारः' के स्थान या निर्णयसागरीय प्रति में 'निबन्धनत्वमुदाराख्योडरकार' छपा है किन्तु पाठान्तर में 'निबन्धनसार" दो पाठ दिया हुआ है। उदाइरणों में से रत्नाकर में कैवळ 'राज्ये सार' पद हो च्द्धृत है और सजीविनी मी बैवल इसी पद्य से अवगत है। विमर्शिनी में 'जये परिध्या' इत्यादी सारत्वमुटन' इस प्रकार आदिपद से सारता को धर्म प्रतिपादित करनेवाले पकाषिक पद्य का निर्देश मिलता है। कदाचित उनका मकेन 'राज्ये सार' पद्य की हो और है। लगता है रत्नाकरकार और विमर्सिनीकार को दो मिन्न प्रतियों मिठी थो। अधिक सटीक प्रति रत्नाकरकारवाली ही प्रतीत होती है। निर्शेयसावरीय प्रति के संपादक ने 'उदार' को मूल मानकर पाद टिप्पणी में अपनी और से हिखा है-'अयमेव काव्यप्रकाशकारादिमि सारनाप्ना व्यवहस: ।' अर्गद इसी उदार को काव्यप्रकाशकार आदि ने 'सार'नाम से पुकारा है।' विमर्शिनी में उद्धृत रत्नाकर का एवा प्रकरण भी अशुद हपा है। यहाँ तक कि 'अस्मिशब' यह संग्रहकारिका भी अम्गत गयपक्ति के रूप में छपी है। इमने उसे मूछ रत्नाकर के आधार पर भारम्म से अन्त तक ठीक कर दिया है। विमर्शिनी
इस [श्रृंसळा ] प्रकरण का उपसंदार किया। अब दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं- [सर्वस्व ] अधुना तर्कन्यायाथ्येणालंकारद्वयमुच्यते। तत्र- [सू० ५८] हतोर्याक्यपदार्थता काव्यलिङ्गम्। यत हेतु: कारणरूपो वाक्यार्थगत्या विशेषणद्वारेण या पदार्थगत्या लिद्गत्वेन निवद््यते तत् काव्यलिङ्गम्। तर्कवैलक्षण्यार्थ काव्यग्रहणम्। न हान्र व्याप्तिपक्षधमतोपसंहाराद्य: क्रियन्ते। वाक्यार्थगत्या च नियध्यमानो द्ेतुत्वेनैवोपनियद्धव्यः, नोपनियद्धस्य द्वेतुत्वम्। अन्यथार्थान्तरन्यासान्नास्य भेद: स्थाल्। क्रमेण यया- 'यस्वन्नेन्नसमानकान्ति सलिले मग्नं तदिन्दीवर मेघ रन्तरितः घिये तब मुसच्छायानुकारी शशी। येऽपि त्वद्गमनानुसारिगतयस्ने राजहंसा गता- स्त्वत्सादृश्ययिनोदमात्रमपि मे दैवेन न क्षम्यंते।।' 'मृग्यध्च दर्भाद्गरनिर्व्यपेक्षास्तवागतिवं समवोधयन्माम्। व्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिणस्यामुत्पक्षमराजीनि विलोचनानि।'
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पूर्वत्र पादत्रयार्थोडनेकवाक्यार्थरूपश्चतुर्थपादार्थे द्वेतुत्वेनोपन्यस्तः। उत्तरन्न तु संघोधने 'व्यापारयन्त्यः इति सृगीविशेषणत्वेनानेक: पदार्थो देतुत्वेनोका। एव मेकवाक्यार्थपदार्थगतरवेन काव्यलिङ्गसुदाहियते। यथा- 'मनीपिता: सन्ति गृद्देपु देवतास्तपः क वत्से क्व च तावकं वपुः। पद सहेत भ्रमरस्थ पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्रिणः।।'
तत्सनिधौ तदधुना हृदयं मदीय- मक्ारचुम्चितमिव व्यथमानमास्ते।।' पूर्वत्र वरप्राप्तिहेतुभूततपोनिषेधत य 'मनीपिताः इति वाकयार्थरूपो हेतु- निर्दिष्टः। उत्तरत्र पुनः 'अस्तमितान्यभावम्' इत्यत् विस्मयस्तिमितमिति विशेषणद्वारेण पदार्थ:। वव तर्क [स्वरूप] न्याय पर आश्नित दो अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं। उनमें- [सु० ५८] हेतु के पदार्थरुप होने या वाक्यार्थरूप होने पर [अलंकार का नाम] काव्यलिंग [होता है ] । 'नहों कारपरूप [न कि झाफ्करूप ] हेतु जो वाक्यार्थरूप हो या विशेषणरप होने से पदार्थरूप, लिंगरूप से उपनिवद्ध होता है उसे काव्यलिङ्ग कहते हैं। [नाम के साथ] काव्य शब्द का प्रयोग तर्क से भेद करने के लिए किया गया है। यहाँ, व्याति, पक्षवमता, उपरसद्दार आदि नहीं किए जाते। वाक्यार्थरूप से उपनिवद्ध किया जाने वाला हेतु हेतुरूप से ही उपनिवद्ध होता है, उपनिवद्ध होने के वाद हेतु नहीं दनता। नहीं तो इसका जर्थान्तरन्यास से भेद नहीं हो सकेगा। कम से उदाइरण [वाक्यार्थरूप अनेक हेतुमूलक कान्यलिद् ]- -'हे मिये! जो तुम्हारे नेन के समान कान्ति वाला था वह नीळकमल पानी में डूब गया, तुम्हारे सुख की छाया का अनुकरण करने वाला चन्द्र मेषों ने छिपा लिया, और जो तुम्हारी गति के समान गति वाले राजहंस थे वे चले गए [इस प्रकार], तुम्हारे सादृश्य से होने वाला जो मेरा थोड़ा बहुत विनोद है, वह भी विधाता को सहा नदीं है।7 [पदार्थरूप अनेक हेतुमूलक कान्यलिङ्ग ]- 'और, हिरनियाँ बुशाक्कर की अपेक्षा [परवाह] छोड़ तुम्हारा पथ न जान पा रहे मुझे उनके, ऊँची उठी वरौनी वाले नेवों को दक्षिण दिशा में सुमा-बुमाकर सूचना दे रही थीं।' [रघुवंश-१३] [इन पधों में से] प्रथम में तीन चरणों का अर्थ, जो सनेक वाक्यार्थरूप है, चतुर्थ पाद के अर्थ में हेसुरूप से प्रस्तुत किया गया है, और द्वितीय में सूचना देने रूपी अर्थ में 'घुमा-धुमाकर' इत्यादि मृगीविशेषण के रूप में अनेक पदार्थ हेतुरूप से कहे गए। इसी प्रकार, काव्यलिद्ग एकवानयार्थगत और एकपदार्थगत भी होता है। उसके उदाहरण- 'घर ही में मन चाहे देवता हूँ बत्से। तप कहाँ, कहाँ तेरा शरीर। शिरीप का कोमल पुम्प औौरे के पैर की चोट सह सकता है, पखेरू की नहीं।
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५४० अलङ्कारसवंस्वम्
'उसके पास मेरा जो हृद्य विस्मय से निशस, था, अन्य समस्त का्य जिसने बन्द कर दिए थे और जो मानों अमृत में तैरने से आनन्दमन्यर था, वद्ो [ इम समय उसके वियोग में] मानों अगारे से दग कर व्यथित हो रहा है।' [ इन पदों में से ] प्रथम में वरपापति में हेतु तप के निषेध के प्रति 'मनोपिना:'='मनचाहे०' यह वाक्यारभरूपी द्वेतु बतलाया गया है और द्वितीय में 'अस्तमितान्यमाव' = 'अन्य समस्न कार्य जिसने बन्द कर दिए थे' [हृदय के]। इसके प्रति 'विस्मयस्तिमित' इस विशेषण के द्वारा पदार्थ।।' विमर्शिनी तन्नेति द्वयोनिर्धारणे। देनोरित्यादि। यत्रेति। हेतोक्ष वाक्यार्थपदार्थगत्योपनिबन्धा- दस्यानेन सह भेदहयमत्युक्तम्। वाक्यार्थंगत्येति। न तु पदार्थगत्या। तम् छुपनिबद्धर्पैव हेतरवा। हेतुरवेनैवेति। हेतुत्वश्यामुख एवोट्रिक्तत्वेन प्रतीतेः। अन्ययेति। हेतुरवेनोपनि- बन्धो यदि न स्थात्। ननु द्ेतोर्वक्यपदार्योभयोपनिबन्धे न कश्चिद्विच्छित्िविशेप पनीयत इति कथमसया लंकारवमुक्कम्। न हि साध्यसाधनायोपासस्य हेनोरेवं प्रकार द्वयातिरेकेणोपनिबन्धः स्यात्। न च यथासभनिनोपनिबन्धमान्रेणालंकारवं वर्कू युक्तम्। कविम्तिभाषमकस्य विचछ्तिविशेषार्मकस्यालंका रव्वेनो क्क्वात्। न धैवसुपनिबन्धाकश्षिदतिशय इति कथ. मस्यालंकारखम् 1 पवंद्ि 'ढक स्वाभासैव नान्येन वेदयेयादावपि स्वाभासत्वस्य हेतोवि शेषणद्वारेण पदार्थंगत्या, तथा 'प्रत्य मादिर लकरा ह्ुलिप्तीतिर्र्यापिर्वाद कुशलमिन्द्रियं न तस्याम्' इश्यादौ तमसि विरलान्गुलिप्तीती व्यापित्वादिन्द्यकौशछमेव सानमिति हेतोर्वश्यार्थगतयोपनिबन्धादलंकारत्व स्यात्। सत्यम। यथ्यरेवमुयनिवन्धस्य वस्तु- वृत्तेरसंभवान्न कश्चिदतिशयः प्रतीयते, तथापि ग्रन्थकता प्रात्येलचितावादेवदिद छष्तिम्। अय यत् ग्यङ्चालििष्टो वाच्यार्थो वाच्यमेवार्थ प्रति हेतुता मन्रते तत्रायमठकारो युग्यल प्वेति चेद्, तर्हि उ्यद्रवाश्लेपवशेन तदुस्थानाद्वाक्य रथतयोपनिवद्ध पमानश्य हेतो: स्वात्मनि न कश्िदतिशय इति व्यद्गयकृत पवातिशयोडम्युपगम्यते, न ताकृत:। तस्देवमुपनिवद्धस्य वास्तव्यर्वा्। यदि व व्यज्ञवसाहचर्येणैव हेतुरलंकारतामियाव चच्छान्दश्यापि हेतोरलंकारवं प्रसज्यते, यदि तम्रापि ्य्रयाश्लेप स्याद। अथ तश्य शाब्दत्वाहैव ैचित््याभावाद्यमनलंक्ाररे निमित्ततवं कर्थ न यायासू। अथ तम् व्यह्ञया रलेषो न सवतीति घेत्, कि नामापरावम् बेनात्र व्यङ्ग्याएलेपसतन्न च नेति। तथारेन लच्यादर्शनादिति चेत, नैतदू। अवाग्दर्शिन एवं निश्चयातुपपतेः। प्रत्युत यत्र भवता श्यङ्गचर्लेप उक्कर्तत्र स नासतीति वक सकयते। तथाहि 'वसरथली रसतु सा जगन्ति जगतम्रसूतेर्गरुढध्वजस्य। प्रियोऽङ्वरागेग विभाव्यते या सौमाग्यहेम्ा कपपट्टिकेव॥' हृश्यत्र वसःस्यक््या अगउसकर्वे जग प्रसूतितं पदार्थो हेतुः। प्रसव्वितुर्ददि निजम्रसूते: सर्वचैव रक्षणसुचितम्। अत एव गरुदध्वपचत्तस्थ्या जगदपक्े कतृतवं युक्कम। हर्या वामिधेय एवार्थ:। अत एव पात् न द्देतो कबिद्वयङ्गचारलेयः। इरथम्। 'संजीविणीसइम्मित्र सुभर्स अगण्णवावारा। सास गवनमद्सणकठागअजीविअं सो्हं।।' इश्यत्र कण्ठागअजीवितत्वस्य। अत्र न जगतमूतिरस्य हेतोः पदार्यतमोपनिब न्वेन कश्निवृतिशयो विशेष । एवम्।
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'अथि प्रमत्ते सिचयं गृहाणेश्युकेपि सरया न विवेद काचित्। सग्ना हि सा तब्र रसान्तराळे यन्नान्तरङ्गे मगवाननय।' इत्यन्रापि सेयम्। यद्यपि चात्र रसशव्दस्य जलवाचितवं न विचच्नितम्। तथाप्यभेदा- व्यवसायादतिरायोकि:, न पुनः शब्दशक्तिमू्लं व्यङ्गधमू। तथारवे हि हेतुहेतुमन्नावस्य न कश्षिदतिशयः।पुरवं हि 'एकान्तजाड्याद्हम्यां करभोर्वा पराजिताः। कदत्यो यन्न तचित्रं जय: कन कछवताम्।'
हेतोरलंकारतं स्यान । एव सुदाह रणान्तरेप्ववसेयस्। एवं व यन्नापि व्यङ्चाश्लेप: स्यातनापि द्वेतोवकयार्थतयोपनिवन्धे न कश्िदतिशायः। अथ साध्यमतीतये हेतोरुपनिबन्धादस्त्येव वैचित्यातिशय! इति चेस्। तहांनुमान मेवेदं स्यासालंकारांतरम्। साध्यसाघनस्य तक्षवतणरवेन वच्यमाणरवाव। एवं हेतोर्ववक्यप- दार्थतयोपनिवद्धस्य वासतवत्वादस्य पृथगलंकारत्वं न युककम। तकव पयमाणनीत्यानुमान एवान्तर्भावोपपत्े:। तम्र= उनमें, यह दो में से एक का निर्धारण करने के लिए कहा गया है। हेतो: इत्यादि। यन्न इति। हेतु, जी है वह वाक्यार्थ या पदार्थ के रूप में उपनिषद्ध होता है, कथन के साथ इसके दो भेद भी बतला दिए। वाक्यार्यंगत्या=वाक्यार्थरूप सेन कि पदार्थरूप से, क्योंकि वहाँ [पदार्थरूप होने पर] तो उपनिवद्ध हो चुकने पर [पदार्थ में ] हेतुता आती है। हेसुत्वेनेव= हेतुरूप से ही= क्योंकि वहाँ हेतुतव आरम्म में ही स्पषरूप से प्रतीत हो जाता है। अन्यया यदि हेतुरूप से उपनिवद्ध न किया नाय। [शंका ] हेतु का वाक्य और पदार्थ के रूप में उपनिवद्ध किए जाने में कोई चमत्कार प्रतीत नहीं होता तो इसको अनंकार कैसे वतलाया गया। [तर्कशास्त्र में ] साध्य की सिद्धि के लिए अपनाए गए हेतु को = उपनिबन्ध में मी इन दो प्रकारों के अतिरिक कोई प्रकार संभव नहीं है और लोकसिद्ध वस्तु के उपनिबन्ध मात्र से किसी को अलंकार कहना ठीक नहीं है, अलंकार तो वह कहा गया है जो कविप्रतिभात्मक और वैचित्र्यरूप हो। और इस प्रकार का जो [ तर्क शास्त्र जैसा] लिखना है इसमें कोई विशेषता नहीं है। तव इसे अलंकार कैसे कहा। ऐसे तो- 'दूक्स्वामासेव, नान्येन वेद्या' [ 'ईश्वरप्रत्यमिद्ञा-कारिका-१।३२।] इश्यादि में भी स्वामासत्वरूप हेतु विशेषण द्वारा पदार्थरूप से उपनिवद्ध है और- 'प्रत्यक्षाद् विरककराङ्गलिपती तिर्व्यापित्वादकुशकभिन्द्रियं न तस्याम्।' इत्यादि में 'अन्धकार में विरळ अंगुली की जो प्रतीति होती है, उसमें 'व्यापक होने से इन्द्रियकौशल ही कारण है' (१) यह हेतु वाक्यार्थरूप से उपनिवद्ध है। मतः यहोँ भी अलंकारत् मानना होगा। [उत्तर ] ठीक है। यदपि इस प्रकार के उपनिवन्ध वास्तविक ही होते हैं मतः इनमें कोई अतिशय की प्रतीति नहीं होती, और वैसी प्रतीति संभव मी. नहीं है, तयापि इसका लक्षण प्राचीन आचार्यों ने किया था इसलिए ग्रन्थकार ने भी यहाँ कर दिया है। [ पूर्वपक्ष ] यदि कहें [ जैसा कि रत्नाकरकार ने कहा है] कि यह अलंकर वहाँ मानना ठीक होगा जहाँ वाच्य अर्थ हो तो वाच्य अर्थ के ही पति हेतु किन्तु व्यंग्य मर्थे से झुक छोकर, [उत्तर ] तो इसका अर्थ यह हुआ कि वाक्यार्थ या पदार्थरूप से उपनिबद्ध हेतु यदि व्यंग्य के
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अलङ्कारसवस्वम्
कारग अलंकार बनता है तो इमसे सिद् होता है कि स्वयं हेतु में कोई अतिशय नहीं रहना। इम प्रकार अविशय में कारण व्यंग्याये ही माना जा रहा है, वह [ रेतुभून वाच्य अर्थ ] नहों। इस प्रकार चपनिबद्ध वह हेतु तो अपने आप में लोकिक हेतु जैमा है। इसके अतिरिक्र एक आपति यह भी आाती है कि यदि हेनु व्यग्य के ही कारण अलंकार बनना है तो उस देतु को मो अडकार बन जाना चाहिए जिसका हेतुत्व चम्दत- कवित्र हो किन्तु जिसके भाष व्यग्यार्थ का योग हो। [यदि कहें] हिनुत्त के शब्दत. कमिन होने से ही वह [हेतु] चमतकार- शून्य और इसीलिए अलकारत्वचून्य क्यों न हो जाएगा।' तो इम पूछने हैं 'यदि व्यंग्यार्थ का योग न हो तो ९' 'एक नगह व्यग्यार्थ का योग है और दूसरो नगद नहीं-इससे विमटने वाला कया है?" यदि कहें-'टश्प में ऐसा नहीं दिखाई देना', तो यह मी ऐेसा नहीं है। [अवाग्दसी] मूठ पर विचार करने वाले ऐसे निश्चय पर पहुँच ही नहीं सकते। उलदे, नहाँ आप [रत्नाकरकार] ने व्यंग्यार्थ का योग बतलाया है वहीं 'वह [व्यग्यार्थ या अलकार] नहीं है'-ऐसा कशा जा सकता है। प्रमागार्थं [आप= रत्नाकरकार के द्वारा ही देखवंकार नामक काव्यहिज्लालकार के लिए उद्धुन ]- 'जगन के अनक भगवान् गरुढम्वज [किशु] की वह व सवछी जगत की रक्षा करे, जो लक्ष्मी के अगराग मे सौमाग्यसवर्ग की कमौटी-सी प्रतीत होती है। -इस पययार्थ में वक्ष स्थली के जगररक्षकत्व में जगतासूतित्व रूपी पदार्थ हेतु है। जो जनक होता है उसके लिए अपनी सनति की रक्षा करना सबथा उचिन ही है। हसीदिर विन्ु की वस्स्थली का जगदरक्षा में कतृंत्व उचित ही सिद्ध होना है। इतना सत् यहाँ अिषेय अर्थ हो है। इसीलिर यहाँ देतु के साथ [रत्नाकरकार द्वारा कविन ] व्यंग्य का कोर योग नहा है। [क्योंकि यहाँ जगद्रश्षगौचित्य व्यंग्य नहीं है]। हमी प्रकार [रत्नाकर द्वारा ही उद्धृत ]- 'संजी वनौषचमिव सुनस्य रक्षत्यनन्यव्यापारा। इव धूर्नवाभ्रदर्शन कण्ठागतजी विर्ता स्नुपाम्।।' -'सास नवीन मेघ के दर्शन मे कण्ठागन प्राण हुर्ई बड्ू को पुत्र की संजीवनीषधि के,समान, सब्र कुछ छोडकर बचा रही है।' -इस पद्यार्थ में कण्ठागन जीवितत्व रूपी हेतु में [ व्यग्यार्थे योग नहीं है] यहों भी 'अगत्ममूनित्व' के ही समान हेतु में कोई अविशय, कोई विशेषत नहीं है। इसी प्रकार [ रत्नाकरकार द्वारा ही उद्मृत ]- 'अरे देसवर, साडी तो उठा ले' सखी के इस प्रकार कहने पर मी कोई सुन्दरो नहीं चेनी, यह उस रस में सूबी थी जिसमें भगवान् अनग काफी अन्तरंग रहते हैं।' इस स्थल में मी जानना चाहिए। यदयषि इस पद्य में रसगब्द अळवाची भी हो सकता है किन्तु वह अर्थ विवक्षित नहीं है, तयापि यहाँ अभेदाध्यतमाय के कारण अविरयोकिही होगी, शध्दशविमूटक व्यग्य नहीं। वेसा होने पर [शब्दशक्तिमूलक् व्यंग्य होने पर] हेतुरेतुमद्माव का कोई अनिशय न रहेगा। इमी प्रकार- 'उम करमोरू से कदली एकदम शोनल होने के कारण यदि हार गई तो यह कोई आश्ये की बात नहीं। मला कलावान् लोगों की जीन कही नहीं होनी। यहों जान्चर जडता, शीतलता ] शब्द में अतिशायोकि है और उसस चमर्कार भी दै अनु. यहों पदार्थरूपी हेतु का हेतुत्व शब्दत- कथित्व होने पर भी चमत्कार संभव है, इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी जाना जा सकता है[ वयापि वह चमत्कार अतिशयोकिमूलक होगा चदग्यार्थमूटक नहीं ]।
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इस प्रकार जहाँ व्यंग्य का योग रहता भी है वहाँ भी हेतु चाहे वाक्यार्थ रूप से कमित हो या पदार्थरूप से उसके कथन में कोई चमत्कार नहीं रहता। यदि कहें कि साध्य की प्रतीति के लिए हेतु का जो प्रयोग रहता है उससे तो इसमें अविशय रहता ही है? तो फिर यह अनुमाना- टंकार हो होगा, अन्य स्वतन्त्र मलंकार नहीं, क्योंकि अनुमान का लक्षण साध्यसाधनमाव ही है जैसा कि पहले मी बतलाया जा चुका है और आगे भो वतलाया जाएगा। इस प्रकार वाक्यार्थ रूप से प्रस्तुत किया गया या पदार्थरूप से प्रस्तुत किया गया हेतु वास्त- तिक हेतु ही होगा [कविकरिरत नहीं ] अतः उसे पृथक अलंकार कदना ठीक नहीं है' कयोंकि उसका अन्तर्माँच पूर्वकथित और मागे कही जाने वाली रीति से अनुमान में ही हो जाता है।।' विमाशनीकार ने काव्यलिंग की बनुमान में अन्तर्भूत मान लिया है। यह प्रेरणा उन्हें राना- कर से मिली है। रत्नाकरकार ने भी लिखा था- [ सू०] 'परपरत्यायक लिद्गं हेतुः' [वृ०] पर त्रह्णमनुमानवैलसण्यार्थम्। तेन स्वयं लिंगात प्रतिपत्तिरतुमानम्, लिङ्गेन पर- प्रत्यायनं परार्योसुमानरूपं कान्यलिङ्गपर्यायो हेखवलंकारः। यद्यप्यनुमानस्यैव स्वार्धपरार्थरपत्वेन द्वेविध्यं तयापि प्रतिमादितरूपेण प्राच्ये: पृथक लक्षित:, तरथवेहापि लक्षगन्।' [सूत्र ] दूसरे को ज्ञान कराने वाला लिंग हेतु। [वृत्ति ] 'पर' = 'दूसरे' शब्द का ग्रहण अनुमान से इसका भेद करने के लिए किया। इस प्रकार स्वयं लिंग से हुई प्रतीति अनुमान होता है और विंह से दूसरे को ज्ञान कराने में हेतु। स्वार्थ और परार्थ दोनों रूप एक अनुमान के ही होते हैं तथापि प्राचीन आचार्यों ने अलग- मलग लक्षग किये हैं अतः यहां मी मल लक्षग किया गया। पण्डितराज जगनाथ ने भी अनुमान से कान्यर्लिग का भेद करते हुए सुख्यतः दो सूत्र मस्तुत किए हैं- १-अनुमान में अनुमानप्रक्रिया वक्तृगत और काव्य में उपनिबद्ध रदती है, जब कि काव्यलिंग में वह कविगत रदती है और अनिवद्। २-अनुमान में हेतु और उसका हेतुत्व दोनों वाच्य रहते हैं जब कि कान्यर्लिंग में हेतुख नियमतः व्यंग्य ही रहता है। इतना कहने के वाद भो काव्यलिंग विवेचन के अन्त में पण्डितराज ने इसको स्वतन्त्र अलंकार न मानने का पक्ष भी पूरे बल के साथ प्रस्तुत कर दिया है। विमर्शिनीकार का उल्लेस बिना किए उनके उपर्युक्त विवेचन को उन्होंने इस प्रकार संक्षिप्त किया है- १-काव्यलिंग में कोई चमत्कार नहों रदता क्योंकि उसमें ातिभत्व नहीं रहता। २-इलेष आदि [ उपर्युत्त पर्द्यो के 'जाड्य, रस' आदि पदों] के रहने से हुआ चमत्कार न्हों इलेष आदि का चमत्कार होगा, काव्यलिंग का नहीं। ३-इस प्रकार तो प्राचीनों द्वारा प्रतिपादित अनेक अलंकार अढंकार सिद्ध नहीं हैं तो हो जाएं। इसमें हमारा कुछ नहीं बिगड़ता। आागे बढ़कर उन्होंने यह भी कहा दिया है कि काव्यलिंग निर्हेतुलदोष का अभाव है, अलंकार नहीं। विमर्शिनीकार के कुछ हेतु अमान्य हैं। वे कान्यलिंग में हेतुत्तव को न्यंग्य नहीं मानते। यहाँ तक कि रत्नाकरकार द्वारा उद्वृत 'वक्षःस्थली०' आदि पद्यों को उद्धृत कर ने उसमें उनके द्वारा प्रतिपादित व्यक्यार्थ को वाच्यार्थ ही मानते हैं। वक्षास्थली में प्रतीत हो रहा 'जगत्पसुतित्व' कयमपि वाच्य नहीं हो सकता, क्योंकि उसका पतिपादक कोई भी विशेषण वक्स्थली के साय
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अलङ्कारसवस्थम्
नहीं है। जिसके साथ है वह एक भिन्न पदार्थ है विष्पुरूपी। विमर्धिनीकार केवल इतना कढ सकते घे कि यहाँ हेतुत्व वाच्य जैसा ही सपुट व्यग्य है। इस तम्य को स्वयं रत्नाकरकार ने मी स्वीकार किया है। काव्यलिंग को अलग न मानने का जो मौन समर्गन पण्डितराज तक चलता रहा उसका समर्थ टप्तर विश्वेश्वर ने दिया है। उनका कड़ना है कि काव्यलंगि में उपनिबद्ध होने वाला हेतु मले ही वास्तविक दो, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि वह कविमतिमापसून नहीं है। हेतुरूप से दिया गया पदार्थ मले ही लोकसिद् हो, किन्तु उसको वस्तुविशेष या परिणाम- विशेष के प्रति हेतु सिद्ध करने का कार्य एकमान प्रतिमाजन्य ही होता है। विश्वेश्वर का कपन मान्य है। नीलकण्ठदीक्षित ने भी कदा है- 'यानेव शब्दान् वयमालपामो यानेव चार्धान् वयमुल्लिसाम.। तैरेव विन्यासविशेषमव्येः सवेदयन्ते कवयो यशासि।' 'कवि के शब्द और अर्थ नए नहीं होते, हमारे अनुभूत हो होने है, किन्तु उनकी योजना, उनका विन्यास उमका अपना होता है।' [शिवलीलार्णंव ]। सच यह है कि अनुमान का अनुमान, अनुमानरूप में दिसाई देता है जब कि काव्यलिंग का नहीं। इसीलिए यहाँ चमत्कार हेतुसिद्धि में हैं और अनुमान में अनुमानपक्रिया के प्रस्तुनी करण में। हेतु अनुमान का एक संग होता है न कि अनुमान का समग्र शरीर। काव्यलिंग में वाक्यार्थ या पदार्थ को हेतु बतशना चमत्कार का कारण होता है जब कि अनुमान में किसी साध्य को सिद्धि। इसीलिए दोनों अलकारों की संज्ञाऐे मिन्न हैं। इस प्रकार काव्यलिङ अनुमान से ठीक उसी प्रकार मिन्न है जिस प्रकार भावध्वनि रसध्वनि से। यह तथ्य मनुमान के प्रकरण में और मी स्पष्ट हो बाएगा। काष्यलिद्ग का इतिहवास- काव्यलिद्ग के शविशास में आचार्यों के तीन वर्ग मिलते है [ १] सुइ्ट के पूर्मवर्चती आचार्य [२ ] रुंद्रट तथा [ ३] रुद्रट के परवर्ती आचार्य। [ १] प्रथम वर्ग में दण्डी मामह और उद्दट आाते हैं। दण्डी और आमह में परत्पर विरोध है, उद्ट समन्वयवादी है। दण्डी ने 'हेतु'-नामक अलकार का विस्तुन विवेचन कर उसमें आने वाले कारणों के दो वर्ग बनाए ये कारक और छापक। 'हेतुक् सूक्ष्मलेशौ व वाचामुचमभूषणो। कारकच्चापको हेतू तो चानेकविधौ ००।।'२।२३५ । कारक का सदाहरण- 'अयभान्दोलित-प्रोढ-चन्दन-दुम-परल्वः । उत्पादयति सर्वस्य प्रीति मळ्यमारुत. ।।' 'चन्दनवृक्ष के प्रौड़ पहवों को हिला रहा यह मलयमारत सब को अच्छा लग रहा है।' यहों प्रीति की तत्पत्ति के प्रति मलयमारत को दिया गया 'आन्दोविन' इत्यादि विशेषण कारण है।
देहोष्मभि सुबोध ते ससि कामातुर मन.।।' -'हे सखि! चन्द्रमरीचियों से शान्त न होने वाढी और चन्दनरस से मौ असाध्य देहोग्मा से तुम्दारा मन सुख से कामातुर प्रवीत हो जाता है।'
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यहाँ देदोष्मा साधन है और कामाचुरता साध्य। हेतुदेदमद्भाव मौ देदोष्मा की तुतीया- विमक्ति द्वारा शम्दतः कमित है। इस प्रकार र्पष्ट है कि प्रथम का हेतु काव्यकिंग कहा जा सकता है और द्वितोय अनुमान। यद्यपि काव्यलिंग के साथ-साथ प्रथम हेतु को परिकर मी कदना सरल है। भामह= ने दण्डी के इस पक्ष का स्पष्ट खण्डन किया और कहा-'हेतु के उदाहरणों में कोई वैचिन्न्य नहीं रहता। यह तो उक्तिमात्र है, उसे अलंकार नहीं कहा जा सकता'- हेतुरच सूक्ष्मो लेशोऽथ नालंकारतया मताः। समुदायाभिषानस्य वकोत्तनमिधानतः ।१ २।८५।। दण्डी ने- 'गतोऽस्तमर्को भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः। इतीदमषि साध्येव कालावस्थानिवेदने'॥ २॥२४४॥ कइकर 'मूर्य हृब गया, चन्द्रमा चमक रहा है, पक्षी धोंसलों की ओर जा रहे हैं'-ऐसे वाक्यों में भी सन्ध्याकाल की सूचना होने से हेत्वलंकार माना था। मामह ने स्पष्ट कहा- 'गतोऽस्तमर्कों भातीन्दुयान्ति वासाय पक्षिणः। इत्येवमादि कि काव्यं वार्तामेता प्रचक्षते ॥ २८६॥ 'सूर्य डब गया, चन्द्रमा चमक रहा है, पक्षी धोसलों की ओर जा रहे हैं ?- इत्यादि वाक्य कैसे काव्य? इन्हें सो बात मर कहते हैं।' इस प्रकार मामह ने शापकमात्र का खण्डन किया, कारक का नहीं। किन्तु अमान्य घोषित कर दिया पूरे हेतु को। इसी के साथ उन्होंने अनुमान नामक कोई मलंकार नहीं माना। सभ्मेट-ने इसके विरुद्ध शापक हेतु को ही अलंकार मानने का साइस किया। ने कार कांश पर तो सुप रहे किन्तु हेतु के ज्ञापकांश को उन्होंने अलंकार माना और काव्यलिद् नाम दिया- 'शुतमेकं चदन्यत्र स्मृतेरनुमवस्य वा। हेतुतां प्रतिपद्येत कान्यलिङ्ग तदुच्यते। ६॥७ ॥ इस पर लखुवृत्तिकार ने लिसा- 'यन्न एक वस्तु शुतं सद् वस्त्वन्तरं स्मारयति अनुभावयति वा तत्र काव्यलिद्गनामालंकारः। पक्षपसंत्वान्वयव्यतिरेकानुसरणगर्भतय। यथा तार्किकप्रसिद्धा द्ेतवो लोकप्रसिद्धवस्तुविषयतवेन वै रस्यमावइनिति न तथा काव्यवेतु: अतिशयेन सर्वेपां जनाना योडसी हृदयसवादी सरसः पदार्थ स्तन्निष्ठतवा उपनिवध्यमानत्वात्। अतः काव्यलिक्वमिति काव्यग्रहणमुपात्तमू। न सद तच्छार लिङ्गं कि तहिं काव्यलिङ्गमिति काव्यगहणेन प्रतिपाधते। [का०] जहाँ सुनी गई एक वस्तु अन्य वत्तु की स्वृति या उसका अनुभव कराने में देतु वनती है उसे काव्यलिङ्ग कहते हैं। [वृत्ति] [ आशय ] जहाँ सुनी गई एक वरतु अन्य किती वस्तु का स्मरण या अनुमव कराती है उसे फाव्यलिंग नामक अलंकार कहते हैं। यहाँ पक्षधमेता, अन्वय, व्यतिरेक आादि अनुमान सामग्री तो रहती है किन्तु उसमें वैसी नीरसता नहीं रहती जसी तर्कशास्त्र में रहती है। इसका कारण है काव्यगत पदार्थो की सरसता। इसीलिए काव्यशब्द का प्रयोग किया गया है। इस प्रतिपादन से स्पष्ट है कि उन्ट ने काव्यलििंग नाम से झापकहेतुमूलक अनुमान को दी भलंकार माना है। अनुमान नाम से उद्धट में कोई अलंकार नहीं मिलता।- .
३५ अ० सु०
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इम प्रकार दण्डी ने देतु के दोनों अंशों को अल्कार माना, मामह ने दोनों को अनलकार मौर उट्भट ने ज्ञापकांश को अलकार तथा कारकाशा को अनलंकार। रम प्रकार उद्भट के मन में हेतुपूलक अनकार अरकार तो है किन्तु केवल चापरकांश में ही और उमका मो नाम हेतु न छोकर काम्यलिंग है, साथ हो नाम काव्यलिंग होने पर भी वह अनुमानस्वरूप है सनन्त्र नहीं। फळ्त दण्डी के मन में जहँ काव्यलिंग और अनुमान दोनों का माना जाना संभव है वहाँ उद्रट के मन में केवल अनुमान का हा। बद्धट द्वारा उदादरण से यह तथ्य और भी सपष् ह- 'छायेय तब शोपाङकानने किक्षिदनुज्जला। विभूषाघटनादेशान् दर्शयन्ती दुनोति माम् ।' 'तुम्हारे अन्य अर्गो की कान्ति से कुछ मलिन यह कान्नि आदूषग पहनने योग्य स्थान दिखला रही और मुझे दु खी कर रही है।' उदाहरण की अभिव्यक्ति अपने आप में अस्पष्ट है, किन्तु इससे यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि अन्य अंगों की कान् से कण्ठ आदि की कान्नि मलिन है। इमसे लगता है कि इन अगों में भूपणस्योग बहुत दिनों से छूम है। इस प्रकार है वह अनुमान दो। इस प्रकार उद्रद ने अनुमान के लिए काव्यलिंग शब्द का प्रयोग किया है। उपर्युक्त सामम्रो से यह मो स्ष्ट है कि प्रथम वर्ग के आचार्यो में अलंकार का नाम 'हेतु' था "लिंग' ही अधिक मान्य था अनुमान नहीं। बदट= [ २] द्वितीय वर्ग में केवल रुदट आते है। इन्होंने दण्डी के दो समान हेतु के दोनों असा को अलंकार मान लिया है किन्तु उमे नाम अनुमान दिया है। उनका विवेवन इस प्रकार है- 'वस्तु परोक्षे यरिमन् साध्यमुपन्यस्य साधर्कं तस्य। पुनरन्यदुपन्यस्येद विपरोत चैनदुपमानम्॥७11ई॥ -- 'परोक्ष वस्तु साध्यरूप में उपस्यिन कर उसके लिए साधक मी उपस्थित करे अपवा इस के विपरीत सापक उपस्थिन कर साध्य को उपस्थिन करे तो अलंकार का नाम अनुमान होता है।' उदाहरण- वचनमुपचारगर्भ दूरादुद्गमनमासने सकलम्। इदमद मयि तथा से ययासि नून पिये कुपिना। -- प्रिये 'औपवारिक बानचोन, दूर से हो उठ सडे होना, दूर ही बेठना' यह सद मेरे प्रति कुछ ऐसा है कक जिससे लगना है तुम मुझ पर गुर्ता छो।' यह ठीक अनुमान का उदाहरण है। इसके अतिरिक्त रुद्रट ने जो दूसरा हेतु दिया हे बढ काव्यलिंग का विषय माना जा सकता है। वह यह है- 'यत्र बलीय कारणमालक्याभूनमेव भूनमिति। मावीति वा तथान्यत् कथ्येत तदन्यदनुमानम्।' -जहोँ बलवतर कारण देखकर न भी हुए कार्य को हो चुका या होने वाला वनलाना दूसरा अनुमान होता है। उदाहरण-
अयमायातः कालो दन्न मृत्ा पथिकगेहिन्य:।।'
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काव्यलिसालक्वार: ५४७
--- पने घहराते वादल; कुचैया, कोइा और कदम्य से सुगन्भित वनबात लिए यह समय [प्राबृद] आ गया। हन्त ! पधिक स्त्रियाँ मरों।' -यहाँ कार्यकारणभाव स्पछट है। उद्दीपन सामनी वियुक्मृत्यु का कारक कारण है, ज्ञापका नहीं। अतः इसे परवर्ती आचार्यों की मान्यता के अनुसार काव्यलिङ् कहा जा सकता है। स्वयं स्द्रट ने काव्यविंग नाम से कोई भी अलंकार नहीं बतलाया है। इस प्रकार अलंकार के नामकरण की दृष्टि से उक्त आचार्यो के दो बर्ग वन जाते हैं- एक हेतुवादी और दूसरा अनुमानवादी। प्रथम में दण्डी और उद्भट आते हैं और दूसरे में केवल रुद्ट। मम्मट= मम्मट कारण के दोनों अंशों को अलग अलग कर देसे हैं। वे कारकांश को कान्य- लिंग नाम से एक स्वतन्त्र अलंकार मान लेते हैं और व्ञापकांश को अनुमान नाम से रवतन्न्न। उनके लक्षण इस प्रकार हैं- 'काव्यलिक्षम् काव्यलिन्ग नाम अलंकार को तब मिलता है जब हेतु वाक्यार्थरूप होता है या पदार्थरूप। उदाहरण- 'वयुःप्रादुर्मावादनुमितमिदं जन्मनि पुरा पुरारे न प्रायः कचिदपि भवन्तं प्रणतवान्। नमन् मुक्त संपत्यहमतनुरमेडप्यनतिमान् महेश! क्षन्तव्यं तदिदमपराधद्यमपि॥' --- 'हे प्रभो शिव! शरीर मिला इससे यह अनुमान हुआ कि पूर्वजन्म में मैंने आपको प्रायः कभो भी प्रणाम नहीं किया, और अभी जो प्रणाम कर हा हूँ उससे मुझे आगे शरीर मिलेगा नहीं, अतः तब भी प्रणाम न कर पाऊँगा। मगवन् आप मेरे ये दोनों अपराध क्षमा करें।' इस पचयरत्न में अपराध के अति प्रणामामाव को कारण चतलाया गया है। प्रणामामाच प्रथम तीन चरणों द्वारा बतलाया गया है अतः वह वाक्यारथरूप है। वाक्यार्थगत अनेकता का उदाहरण मम्मट ने नहीं दिया। सरमस्वकार ने वह भी दिया है। मम्मट ने पदार्थगन एकत्व और अनेकत्व के लिए अवश्य ही दो पृथक उदाहरण दिए हैं। ने सर्वस्व के वदाहरणों से गतार्थ हैं। अनुमान का विवेचन मम्मट ने इस प्रकार किया है- 'अनुमानं तदुक्तं यद् साध्यसाधनयोवैघ:।' जिसमें साध्य और साधन का शब्दतः कथन हो वह अनुमान। उनका उदाहरण सर्वस्वकार ने अनुमान प्रकरण में उद्धृत कर दिया है-'यन्रता लहरी0'। वह रुद्रट के 'वचनमुपचारगर्मै' पद् से गतार्थे है। सर्वस्वकार ने मम्मट का ही अनुसरण किया है। रत्नाकरकार ने भी अनुगमन तो भम्मट का ही किया किन्तु नामकरण में उन्होंने कान्यलिद् के लिए हेतुपक्ष का अनुगमन किया और दण्डी के ही समान उसे हेतु कहा। उ नका लक्षण इसी प्रकार के आरम्भ में दिया जा चुका है। विमर्शिनीकार ने पुनः रुद्रटपक्ष को ही प्रवल प्रतिपादित किया। वे रत्नाकर, सर्वस्व मौर मन्मट के प्रति वेमुलाहिजे हो गए। कुवलयानन्द, रसगंगाधर और अलंकारकौस्तुम में दीक्षितजी, पण्डितराज और विश्वेशवर- पण्डित ने अनुसरण मम्मट के ही मध्यमार्ग का किया, किन्तु वे पूर्ववर्ती आचार्यों की अरुचियां मी सुला नहीं सके। इनका विवेचन इस प्रकार है-
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५४८ अलङ्कारसर्वस्वम्
अध्पय्यदीचित-'समर्यनीयस्यार्थश्य काव्यलिद्ग समर्थनम्। जितोप्रस मन्द कन्दर्प मच्चित्तेडरित तिलोचन:।' 'समर्थनीय अर्थ का समर्थन काव्यलिद्ग कहलाता है। यथा-'अरे नीच काम 1 मैने तुझे जीत लिया मेरे चित में त्रिरोचन [शिव] का वास है।' शिव ने काम को तीसरे नेत से भरम किया था। शिव का बाम बतलाकर कामविजय का समर्थन किया, विन्तु दौक्षित जी का रक्षण अर्थान्तरन्यास से अटम नहीं किया जा सकता । पण्डितराज ने उन्हें यही कहकर अकसीरा भी है। एक टम्बे प्रकरण के द्वारा दीक्षित जी ने अनेक परसिद्ध उदाहरण मी प्रस्तुत किए और यह भी रपह दिखा कि प्राचीन माचाय काव्यलिंग के साथ ही 'हेतु' भी कहते हैं-'व काव्यलिद्मिति, हेतवरकार इति व्याजहु.'। परिकारएकार से इसका अन्ववर मी दीक्षित जी ने बड़े सरम्भ के साथ बनलाया है। रपण्टितराज-'अनुमितिकर णत्वेन सामान्यविशेषभावार्भ्या चानालिद्वितः प्रकनायोपपादकरवेन चालिहितोऽथ: कान्यविङ्रम्।' -- 'अनुमितिकरणत्व तथा दो प्रकार के सामान्यविशेषमाव से रहिति जो प्रकृतार्थ के समर्थक के रूप विरक्षित अर्थ वह काव्यलिह् कहलाता है।' इसमें पण्डितराज के हो कथन के अनुसार प्रथम विशेषण अनुमिति के निवारण के लिए तथा द्वितीय विशेषण वर्थान्तरन्यास के निवारण के रि दिया गया है। अनुमान का लक्षण पण्डितराज ने केवल-
'अनुमितिकरणता अनुमान' इनना हो किया है। पण्डितराज ने 'यव त्वन्नेन0' तथा 'सृम्यश्० पद में काव्यविदि का निराकरण कर अनुमान को ही अरकार सीकार किया है। सवरवकार के ही समान अप्पम्पदीक्षित ने भी उक्त दोनों पद्यों में 'काव्यलिंग' स्वीकार किया था। पण्डिसराज ने इन दोनों का खण्डन किया है। सरवेसव के-यत् तनेप०० हेतुत्वेनोक [रसगगाधर में 'हेतुरुत्त'] इतना उद्वरण देकर उन्होंने कदा ई-इत्यनकारसवरववृतोक्तम, अनुमोदिरत व कुवलयानन्दकता नदुमयमप्यसन्। ०00 'अप चानुमानर्यैव विषय:।' "इन दोनों का कथन गल्त है। ०० यह भी मनुमान का ही विषय है।' एक एक कर दोनों पद्यों में अनुमान प्रकार मी इन्होंने इस प्रकार दिए ह- १= दैव नायिकाहसादश्यदशनजन्यमदिष्टससासदिष्णु तत्तनायिकाऊ साहश्याधार विघट कारवास
-- 'विधाता नायिका के अगों के सादृश्य से उत्पन्न मेरे सुख का असहिष्णु है, क्योंकि वद नाविका के उन उन अंगों के सादृश्य का नाशक है जैसे मेरा वधु यचरच।' २-मृम्यो दक्षिणानिल सम्पर्कवत्यो दक्षिणामिमुसविवक्षणनेत्रल्यापारवत्वाठ'। 'नृगियां दक्षिणानिल के रुपक से युक्त थी क्योंकि वे दक्षिण की ओर नेत्रों का विलक्षण व्यापार कर रहा भी'। पण्डितराज का यह भ्रम केवल तथ्य को लेकर है। वह यह कि यहाँ हेतुद्ेतुमद्माब कविनिष्ट न होकर कविनिवद् वक्तूनिष् है। यदपि ऐेसा लगता है कि द्वितीय पध का सदर्भ उन्हें विदित नहीं हैं। वे नहीं जानते कि यह पद रखुवश का है। वह़ों दक्षिगानिल का कोई प्रसंग ही नहीं है। सच यह है कि इन पद्ों में अनुमिति कविनित न होने पर भी अनुमिति रूप
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अनुमानालङ्गार: ५४९
से प्रस्तुत नहीं है क्योंकि दोनों ही स्थलों में अनुमान परार्थानुमान नहीं है। यह तो स्मरणमात्र है। इसके अतिरिक्त प्रथम में अनुमिति सवया गम्य ही है औौर द्विवीय में 'सम्नोधन्'-द्वारा वाच्यप्राय होने पर भी देतुदेतुमद्भाव वाच्य नहीं है, क्योंकि सम्वोधन का हेतु दक्षिण की ओर आँखे बुमाना ही है। उसका हेतुत्व तब साक्षाद वाच्य होता जब कहा जाता 'मृगियों के दक्षिणामि- मुख घूम रहे नेत्र जतला रहे थे कि तुम्हें राक्षस इसी दिशा में ले गया है।' इसी कारण नागेश ने पण्डितराज का खण्डन किया है। उन्होंने लिखा है 'अनुमितिगम्य भ ही और तव भी यदि अनुमान ही भलंकार माना जाने लगे तो कान्यसिद् कहीं होगा ही नहीं । स्थिति यह है कि वाच्य मनुमान अतुमानालंकार कदलाता है और गम्य काव्यलिद' । [द्र० रसगंगाधर मर्मप्रकाश काव्यर्लिंग का अन्त ]। पण्डितराज ने हेतु के वाक्यगत और पदगत होने तथा एक या अनेक होने को भी चमत्कार की दृष्टि से निरर्थक माना है। विश्वेश्वर का काव्यलिग्गनिरूपण यह है- 'वाज्यपदार्थत्वाभ्यां हेतूकि: काव्यलिङ्गं स्याद।' 'हेतु की वाक्य और पदार्थ के रूप में उक्ति काव्यिंग कहलाती है।' काव्यलिस्ग का परिकर से भेद- विशेषणगत चमस्कार परिकर में भो रहता है और कान्यलिंग में मी। पदार्थ काव्यलिंग में हेतु विशेषणरूप से आता है यद्यपि उसका हेतुत्व गन्य रहता है। इस प्रकार पदार्थकाव्यलिह और परिकर की स्थिति में अन्तर करना मी एक प्रश्न है। इसे प्रथमतः रत्नाकरकार ने उठाया है। उन्होंने अन्तर स्पष्ट करते हुए लिखा है- 'वाच्योपस्कार कता व्यग्यस्य सदैव परिकरे हेया। व्यवग्याश्लिष्टो वाच्यो वाच्यं प्रत्येव हेतुरिति'॥ परिकर में व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ का उपस्कारक रहता है जब कि हेतु में व्यंग्यार्थ से युक्त होकर नाच्य वाच्य के प्रति हेतु बनता है'। इसीका स्पष्टीकरण पण्डितराज ने इस प्रकार किया है- 'हेत्वलंकार में व्यंग्यार्थ का कोई महस्व नहीं रहता, वह निरर्थक रहता है, जव कि परिकर में वह प्रकृत अर्थ में शोमा मी बढ़ाता है और कभी कभी उसकी सिद्धि का भौ कारण बनता है। [दरृ० रसगंगाधर परिकरप्रकरण] पण्डितराज ने परिकर और कान्यलिंग के जो उदाहरण दिए हैं उनसे यह तथ्य स्पष्ट है कि परिकर के विशेषणों में हेतुत्व नहीं रहता जब कि पदार्थकाव्यलिक् में वही रहता है। यहाँ श्रीविद्याचकवतों की संग्रहकारिका यह है- 'काव्यलिहं तु हेतुत्वेनोत्तिर्वाक्यपदाथयोः। नायमर्थान्तरन्यासो हेतोः शब्दत्वसंश्रयात्॥' काव्यलिए वाक्यार्थ या पदार्थ की हेतुरूप से रक्ति को कहते हैं। यह अर्थान्तरन्यास नहीं है, क्योंकि इसमें हवेतु शब्दतः कथित रहता है। [सर्वस्व ] [सू० ५९]साध्यसाधननिर्देशोऽनुमानस्। यत्र शव्दवृत्तेन पक्षधर्मान्वयव्यतिरेकवत् साधनं साध्यपतीतये निर्दि श्यते, सोऽनुमानालंकार:। विच्छित्तिविशेषश्चात्रार्थादाश्रयणीया, अन्यथा तर्कानुमानात् कि वैलक्षण्यम्।
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उदाद्दरणम्- 'यथा रनधं व्योग्नश्चलजलद्धूम: स्थगयति स्फुलिद्ानां रूपं दघति च यथा कीटमणय:।
स्तथा मन्ये लग्नः पथिकतरूपण्डे स्मरद्यः।।'
पादितं वदि गमयन्तीत्यनुमानम्। रूपकमूलत्वेनालंकारान्तरगर्भीकारेण विच्छित्याधयणासर्कानुमानवैलक्षण्यम्। क्कचित्तु शुद्धमपि भवति। यथा- 'यत्रैता लद्दरीचलाचलहशो व्यापारयन्ति भ्रुवं यत्तपैघ पतन्ति संततममी मर्मस्पृशो मार्गणा:।
घावत्यग्रत पव शासनधर: सत्यं सदार्सा स्मर:॥I' मत योपितां भध्यापारेण मार्गणपतन म्मरपुरोगामित्वे साध्येऽनलंकृत- मेव साघनमिति शुद्धमनुमानम्। म्रौढोक्तिमाश्रनिष्पन्नार्थनिष्ठत्वेन ध विच्छि
अयमत्र पिण्डार्थ :- इद्ास्ति प्रत्याय्यप्रत्यायकभावः।सस्ति च समर्थ्य समर्थकमावः।तम्नापतीत प्रत्यायने प्रत्याय्यम्त्याय्यकभावः। प्रतीतप्रत्यायने तु समर्थ्यसमर्थकभावः।तन् प्रत्याय्य प्रत्यायकमाचेऽनुमानम्। समर्थ्यसमर्थ- कभावे तु यत्र पदार्थो द्वेतुस्तत्र द्वेतुत्वेनोपादाने 'नागेन्द्रदस्तास्त्वचति कर्क- शत्वात्' इत्यत न कधििदलंकार। यत् तूपात्तस्य द्वेतुत्वं यथोदाहते विपये 'मृग्यक्च दुर्भाङ्कुरनि्व्यपेक्षा' इत्यादौ तन्नैकं काव्यलिस्म्। यत तु वाक्यार्थी द्वेतुस्तन देतुत्वप्रतिपाद्कमन्तरेण दवेतुत्वायोपन्यासे काव्यलिस्कमेव। तट स्थत्वेनोपा्यस्तस्य तु ह्वेतुत्वेऽर्यान्तरन्यास। एवं चास्यां प्रक्रियायां कार्यका- रणवाक्यार्थयोह्वॅतुत्वे कान्यलिद्गमेव पर्यवस्यति, समर्थ्यवाक्यार्थस्य सापे- क्षत्वात्. ताटस्थ्याभावात्। ततथ सामान्यविशेषभावोऽर्थान्तरन्यासस्य विपयः। या्पुनरर्थान्तरन्यासस्य कार्यकारणगतत्वेन समर्थकत्वमुक्तम्, तदुकलक्षणं काव्यलििक्षमनाथित्य तद्विपयत्वेन लक्षणान्तरस्यौन्नटैराथि- तत्वात्। उक्तलक्षणाश्रयणे तु यत्वन्नेन्रेत्यादिर्विविक्तो विषय: काव्यल्िहस्यार्था न्तरन्यासादू दशित इति कार्यकारणयो: समर्थ्यसमर्थकत्वमर्थान्तरण्यासे पूर्व दर्शितमितीयं गमनिकाश्रयितव्या। एवं तर्कन्यायमूलमलंकारव्वयमिद्द प्रतिपादितम्।
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अनुमानासङ्कारः ५५१
[सृ० ५९] साध्य की सिद्धि के लिए साधन का निर्देश [हो तो अलंकार ] अनुमान [कहलाता है ] । [वृ०] जिसमें साधन शब्दवृत्ति [अभिधा] द्वारा पक्ष [साध्यसिद्धिस्थल] मं रहता हुआ, [साध्य के साथ] अन्वय तथा व्यतिरेक से युक्त तथा साध्य की प्रतीति कराता हुम कथित हो, वह अनुमानालंकार होता है। [अलंकारत्व के लिए अपेक्षित] चमत्कार इसमें ऊपर से लाना पड़ता है, नहीं तो तर्कशासत्रीय अनुमान से [ इस अनुमान का ] भन्तर ही क्या रहे। उदाहरण- 'क्यों कि धूमते मेघों के धूम ने आकाशरूपी रन्भ [गुफा] को भर दिया है, क्योंकि जुगनू चिनगारियों का रूप धारण कर रहे हैं और क्योंकि विजलीरूपी लपटों के धथक उठने से दिशाएँ पीली पड़ गई हैं, इसलिए में समझता हूँ 'पथिकरूपी वृक्षसमुदाय में काम की दँवार लग गई है'। यहाँ धूम, चिनगारी और दिजाओं का पीलापन आदि अति के लिंङ् हैं क्योंकि ये त्रिरूप [पक्ष- वृत्ति, अन्वयी अर्थाव सपक्षवृच्ति और व्यतिरेकी अर्थात विपक्षावृत्ति]है। ये दवशब्द से कथित अग्ति को [ रूपी साध्य] का अनुमान कराते हैं, इस कारण यहाँ अनुमान है। यह क्योंकि रूपक मूलक है, अतः अन्य अलंकार को लंकर होने से इसमें चमरकार चला आाता है, अतः इसमें तर्कानु- मान से भेद है। कही यह शुद्ध [अलंकारान्तर रहित] भी होता है। यथा- 'तरंगों के समान चंचल चितवन वाली ये जिधर अपमी मौं बुमाती हैं उधर ही जो ये मर्म- स्पर्शी वाण लगातार झड़ने लगते हैं, इससे स्पष्ट है कि इनकी आज्ञा धारण कर काम क्रोध में आकर धनुध खींचते और उस पर चढ़े वाण पर हाथ साधे हुए इनके भागे-आगे सदा ही दौड़ता रहता है।' -- यही सियों के भुकुटिचालन से वतलाई जा रही वाणवर्षा काम के आगे आगे चलने रूपी साध्य की सिद्धि में बिना किसी अन्य अलंकार के योग के ही साधन है। अतः यह अनुमान शुद्ध [अलंकारान्तररहित] है। यह [अनुमान कवि की ] मौदौसिमान से निष्पन्न अर्थ पर निर्भर होने के कारण विशिष्ट चमरकार से युक्त है, अन इसमें सुन्दरता है। यहां निष्कर्ष यह है कि यहां [ काव्य में एक तो ] आ्ाप्यम्ापकमाव रहता है और [ दूसरा] समर्थ्यसमर्थकभाव। इनमें से शाप्यज्ञापकमाव वहाँ होता है जहाँ अझ्षात अर्थ का ज्ञान कराया जाता हैं। इसके विरुद्ध समर्थ्यसमर्थकमाव वहाँ होता है जहाँ ज्ञात अर्थ का ज्ञान कराया जाता है। इनमें से ज्ञाप्यत्ञापकभाव होने पर अनुमान होता है। समर्थ्यसमर्थंकमान में जहाँ हेतुपदार्थ होता है वहाँ यदि वह हेतुरूप से कथित रदता है[ जहाँ उसका हेतुत्व कथित रहता है] तो 'नागेन्द्रहस्तास्त्वचि कर्कशत्ात्-'[कुमार १]-'हाथी की सूँढ त्वचा-भाग में कर्कश होने से [पार्वती के ऊरु का उपमान न वन तकी ] आदि में कोई अलंकार नहीं होता; किन्तु 'मुग्यश्ष दर्भाकुरनिर्व्धपेक्षाः' आदि पूर्व उदाहृत स्थलों में जहाँ वह शय्दतः कथित होकर [व्यक्षनया] देतु बनता है [ अर्थाव् उसका हेतुत्व व्यंग्य रहता है] वहाँ एक प्रकार का काव्यलिम्वालक्वार कह- हाता है। जहॉं हतुवाचयार्थ रुप होता है वहाँ हेतुत्व के प्रतिपादक शब्द के दिना हेतुत्व के लिए उसका प्रयोग होने पर काव्यलिग ही होगा और उस [हेतुत्व] के बिना साधारणरूप से प्रयोग होने पर अर्थान्तरन्यास। इस प्रकार [विचार की ] यह प्रक्रिया अपनाने पर कार्य और कारण के वाक्यार्थों में हेतुत्व रहने पर काव्यलिंग ही [अलंकार] ठहरता है। क्योंकि समर्थ्य वाक्यार्थसापेक्ष रहता है अतः वहाँ [दोनों वाक्यार्थों में ] सटस्थता नहीं रहती। इस प्रकार मर्थान्तरन्यास का विषय [केवल] सामान्यविशोषभाव तक सीमित ठहरता है। [सूत्रकार के अनुसार इमने] अर्थान्तरन्यास में कार्यकारणभाव के आधार पर भी जो समर्थकता यतबई है वद इस कारण कि
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उद्भटमतानयायियों ने उक्त [कार्येकारणभावमूलक ] काव्यलंग को छोड़कर [काव्यलिंग नाम के साथ एक] दूसरा हो लक्षण बनाया था [जो जाप्य-शापक-मावमूलक था] और उसे उन्होंने उसी [काव्यलिंग] का लक्षण बतलाया था [ जर कि या वह लक्षण अनुमान का; इस प्रकार उनके भत में कार्यकारणभावमूषक काव्यलिंग का संमह नहीं हो पाया था, फलतः उसके मंमइ के लिए इम लोगों ने अर्थान्तरन्यास में कार्यकारणमाव का भी निवेश किया और दोनों को अभिन्न बनलाया किन्तु काव्यरिंग का ] उक [ कार्यकारणभावमूलक ] लक्षण अपना लिया जाता है तो अर्थान्तर- न्यास से, काव्यलिंग, 'यद त्वन्नेन्र' आदि रथफों में एक स्वतन्त्र दी अलकार सिद्ध हो जाता है जिसका निरूषण किया जा चुका है। यह पथ इससिए अपनाना चाहिप कि अर्थान्तरन्याम के प्रक- रण में कार्यकारण का समर्थ्यसमर्थंकमाव पहले बतला दिया था।' इस प्रकार तर्कन्यायमूलक दोनों अलकार बनला दिए गए। विमर्शिनी साध्येत्यादि। एतदेव व्याघष्े-यत्रेत्यादिना। एव चात्र साध्यमनीतये तरिरुपर्य साधनस्य निर्देशात्तरकोनुमानसमानकचयमेवास्य लच्णमिति माकः । पद्येवं तत्ततोऽस्य को विशेष इत्यारइपाह-विच्छत्तीतयादि। तच्तानुमान हिया। स्वार्थ परार्थच। तन्न स्वायं यम् मयायभवगतोञर्यं इति स्वपरामशंश्य निश्नयः रयाद। परार्थतु पत परेणा नवसतस्य वश्तुन- प्रतिपादनातपरप्रथायकरवं र्थात्। एवं व स्वार्थपराथमेदेन दिविघमसु- मानमेवैकोलंकारो वाय्यो न पुनरनुमानहेतुतया पृथगलंकारत्वम्। उभयन्नापि सामा. न्यलप्गनुगमात्मकारप्रकारिभावस्पैवोपपते। तग् स्वायानुमानं यथा ग्रन्थकृतैवो- दाहतमू। तत्र हि समरदवो वग्न इति स्वपरामर्शरयैव निश्वयः। परार्भानुमानं यथा- 'तदस्ति तेपां तमसि प्रसर्पिणो निशाचरवं यदि पारमार्थिकम्। ततः प्रिये संनिदितेऽ्त्र वासरे कर्थ नु तासंचरणं भविष्यति॥' अब दियासंधरणश्य कार्यस्य विरुदूं निशाघरतवं परप्रत्यायको हेतुः। रूपकम्स्त्वेनेति।
व्यनिमित्तम्, उतान्यदपि किचिदिरयाशङ्कयाह-कविदित्यादि। अनठंकूनमिति। शासन धर्मादे: मढोकया वास्तवरवेनव विसितावादतिरायोव त्यादयलंकाशन्वरगर्भीकारामा पाव। अवशास्य कविकमव वैलप्ण्यनिमित्तमिति भावः। तदाद-प्रोढोक्तीत्पादि। एवं र कविकर्माभावादत्र विच्छित्तिविशोषाश्रपर्ण न स्यातत नायगलंकार:। यया- 'यो यर्कथापसक्रे विव्वच्छिन्नायतोप्णनि.शासः। स भवति तं प्रति रक्तर्वं व तथा हश्यसे सुतनु ॥' अत्र रकवं प्रति विशिष्टस्य निशश्वसितस्वारथेऽपि हेतुखवे वास्तवरवारकविप्रनिमानिव
*प्रजानां विनयाधानाद् रघणाद्वरणाददि। स पिता पितरस्तासा केवल जम्महेतव ॥'
नहंकारसवमिति वाच्यम्। कविकर्मण पवालकारनिबन्ध नस्नेनोत्तवास आर्थस्वस्य तद- प्रयोजकरवाव्। न द्वि हेतोरार्थतवेऽपि कविकर्मष्यतिरेकेणालंकारावं स्वाद। तच्छ्राव्देपि हेती कचिरकवि मतिभानिवरतितर्वेनालंकारवाम्युपगमे न कशिद्दोपः। अ्रन्थकृता पुनोत.
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अनुमानालक्कार: ५५३
चिरन्तनमतानुरोघेनोछम्। तन्मतमेवाधिकृत्य हि 'अ्षय'-मन्नेशयादिना विचार: प्रस्तुतः। सम्नेति द्यनिर्धारणे। प्रतीतेति। वोद्व्येन समर््यतया प्रमुख एवाधिगतस्पेत्यर्थः। न फश्विदलंकार इति। हेतुमातरूपत्वाद्। हेतुत्ववाचकं विनापि तदधिगमे झस्य च चाहरवा विशय इति भाक:। यद्च्यति-हेतुत्वप्रतिपादकमन्तरेणेति। उपात्तत्वेति। पारिशेप्यात् पदार्थस्य हेतुत्वेनोपादानाभिघानाव। एकमिति पदार्थगतस्। हेतुत्वप्रतिपादक इति शब्दादि। सटस्यत्वेनेति। न त हेतुत्वेनेत्यर्थः। अत एव चानयोर्भेदः। ततक्वति पारि- शेप्याव। ननु यद्ेवं तह्पूर्वमर्धान्तरन्यासस्य केनामिग्रावेण कार्यकारणगतरवेन समर्थकदव- सुकमित्याशङ्याह-वसुनरित्यादि। लक्षणान्तरत्वेति। पदार्थगतरवेनेवेप्टे। यदाहु :- 'अुतमेकं यदन्यत्र स्मृतेरनुभवश्य वा। हेतुतां प्रतिपद्येत काष्यलिद्गं तटुप्यते ॥' इति। यघेतदुमटमताभिप्रायेणोरक तत्कथं स्वमतं संगच्छते इस्याशङ्कयाह-उत्तेत्यादि। विविक्तविषय इति। ताटस्थ्यव्यतिरेकेण वाक्यार्थस्य हेतुखवायोपन्यासादर्थान्तरन्यासस्या न्रध्यापृतेः। आथयितव्येति। न पुनर्वस्तुतः संभवतीतयर्थः। साध्य इत्यादि। इसी की व्याख्या करते है-यन्र इत्यादि। इस प्रकार वहाँ साध्य को पतीति के लिए तीन प्रकार के साधन का निर्देश होने से इसका लक्षण मी तर्कशात के अनुमान के ही समान सिद्ध होता है। 'यदि ऐसा है उससे इसका अन्तर क्या- ऐेसी शंका कर लिखते हैं-'विच्छित्ति' इत्यादि। यह अनुमान दो प्रकार का होता है स्वारथं और परार्थ। इनमे स्वार्थ अनुमान वह है जिसमें इस परामर्श का निश्धय रहता है कि 'मैंने यह अर्य जान लिया है'। परार्थं वह नहाँ दूसरे के द्वारा अश्ञात वस्तु का प्रतिपादन रहता है फलतः जिसमें परप्रत्यायकरव रहता है। इस प्रकार स्वारयं और परार्थ भेद से दोनों प्रकार का अनुमान एक हो अलंकार कहा जाना चाहिए, न कि अनुमान और हेतु इन दो रूर्पो में पृथकु पृथक अलंकार, क्योंकि सामान्य लक्षण दोनों में लागू होता है जिससे प्रकार प्रकारिभाव ही सिद्ध होता है। इनमें से जो स्वार्थानु- मान है उसका उदाहरण [ यथा रन्न्र" ] ग्रन्थकार ने ही वतला दिया है। उस उदादरण में 'कामदेवार' लगी हुई है' यह वक्ता का अपना ही निश्वय है। परार्थानुमान का उदाहरण वर्था- 'हे प्रियो यदि अंधेरे में वूमने वाले वन राक्षसो का निशाचरत्व वास्तचिक है तो बद यह दिन निकला आ रहा है, इसमें उनका संचार कैसे होगा।' यहाँ दिन में संचारलपी जो कार्य है उसके विरुद्ध निशाचरत्व रूपी परप्रत्यायक हेतु उपात्त है। रूपकमू उत्वेन=रूपकमूलक होने से, क्योंकि इस पद्म में उसका सत्थान रूपक के बिना संमव नहीं है। [ शंका ] क्या अन्य अलंकार से बुक होने के ही कारण इस अनुमान में तर्क के अनुमान से भेद जाता है अथना इसका हेतु कोई और भी है-ऐसी शंका कर लिखते हैं- कचित्। अनलदकृत - 'शासनधारण करना' आदि कविभोढोकि के द्वारा वास्तविक जैसे विवक्षित हैं इसलिए इनमें [रत्नाकरकार आदि को ] अतिशयोक्ति आादि मन्य अलंकारों का निश्रण नहीं मानना चाहिए। इस लिए इसका भेदक तत्व कविकर्म ही है। यही कहते हैं- 'औढोक्०' इत्यादि के द्वारा। इस प्रकार जहाँ कविकर्म का नमाव रहेगा सौर इसीलिए कोई चमत्कार नहीं रहेगा नहाँ यह अलंकार नहीं होगा। बया-[ रत्नाकरकार द्वारा हेल- लंकार के उदाइरण के रूप में उद्मृत ] 'जो जिसकी चर्चा के प्रसंग में एक तक कर लम्बी और वष्ण उसाँस लेता है वह उसके प्रति अनुरक रहता है और रौ सलोनी! वह वैसा ही दिसाई दे रहा है।' इस पदार्थ में
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५५४ सलश्रसर्वस्वम्
भनुराग के प्रति विशिष्ट उसोस अर्थतः हेतु है तयापि वह वास्नविक है, कविप्रतिमाप्रसूत नहीं, अत. यह [सनुमान ] अरंकार नहीं है। मौर जैसे- 'शिक्षा का आधान, रक्षा और पालन पोषण करने से प्रजाओं का [सच्चे अर्थ में ] पिता वह [ दिलीप ] था, उनके अपने पिता तो केवल जन्म के हेतु थे। [ रघुवेय-१] यहाँ शिक्षा का आाधान आदि जो हेतु है वे वास्तविक है अतः भलकार नहीं है। इसलिए नहों कि यहोँ देतु आर्थ नहीं है इसलिए अलकार नहीं है। अलकार का मूल कविकर्म को माना गया है मत आयत् उसमें कारण नहीं। ऐैसा नहीं कि कविकर्म के सभाव में केवल आर्य होने से देतु में अरकारत्व चला आए। इसलिए देतु के शाब्द रहने पर भी उसके कविप्रतिभामसून होने पर उसमें अल्कारत्व मानने में कोई दोष नहीं। स्रन्थकार ने इमे प्रावीन आचार्यो के मत के अनुरोध से बतलाया। उन्हीं के मत को लेकर अन्थकार ने 'अयमत्र' इत्यादि द्वारा विचार का मसग चलाया है। 'तत्र= उनमें' यह दोनों के निर्धारण के लए हैं। प्रतीत= बोद्धव्य व्यक्ति [जिसे समझाया जा रहा हो] के द्वारा समर्थ्यरूप से आरम्म में ही जान लिए गए। न कब्िदलकार := कोई अर्लकार नहीं=हेतुमाशरूप होने से। भाव यह कि उममें चारुतानिशय नम आता है जब वह देतुत्व के वाचक शब्द के बिना ही विदित हो। जैसा कि कहेंगे-'हेतुत्व के प्रतिपाइक शब्द के बिना'। उपास अर्थात् शेष बचे पदार्थ का हैतुरूप से उपादान रूप अमिधान दोने वे कारण 'पुकम्= एक प्रकार का-' अर्थात पदार्थगत। हेतुरवप्रतिपादक अर्थात शब्द आदि। तटस्थत्वेनन कि हेतुत्वेन। इसीलिए इन दोनों [अर्थन्तरन्यास और काव्यलिंग] में अन्तर है। ततश्=इस कारण जो शेष रहा वह सामान्यविशेषमाव। [रका] यदि ऐसा है तो पहले भर्थान्तरन्यासप्रकरण में किम अमिन्ाय से कार्यकारणों में समर्थकत्व बतलाया है। ऐसी शंका कर लिखने हैं-यद पुन.। लव्षणान्तर दूसरा लक्षण अर्थात केवल पदार्थगत ही मानतर किया दूसरा लक्ष, जो इस प्रकार है-'धुनमेक०' [अर्थं काव्यलिंग के इतिहास में देखिर]।[शका] यदि यह उन्भट के मत के अनुसार कहा तो फिर आपका मत कैसे ठीक सिद्ध दागा'-ऐसी शका पर दिसते हैं- उक्त इत्यादि। विविष्विषय= सवतन्त्रक्षेत्र = यरहाँ वाक्यार्थ देतुत्व के लिए उपात्त तो रहता द किन्तु इसमें तटस्थता रहती है [ सापेक्षता नहीं ] इसलिए [सापेक्षता से युक्त] अर्थान्तरन्यास की पहुँच यहँ नहीं होती। आश्यता्या= अपनानी चाहिए' अर्थ यह कि वस्तुत ऐसा होना है नहीं ।।' अनुमानालकार के सूत्र तथा वृत्ति से स्पष्ट प्रनीत होता है कि इनके रचयिता दो पृथक विदान् हैं। ृत्तिकार सूत्रकार को स्वनन्त्र चिन्तक सिद्ध नहीं कर पाने। पहले उद्धट के अनुसार सूत्र बनाना, पुन उसी तथ्य के लिए एक पृथक सूत्र बना देना स्वीकार करने पर सूतकार का पक्ष शिथिल सिद्ध हो जाता है। वस्तुन अर्यान्नरन्यास में आनेवाले कार्यकारणभाव में हेतुत्व या जनकत्व नहीं, सम्थकत्व प्रमुस रहता है। काव्यलिंग में न तो समर्धकत्व ही प्रमुख रहता और न ज्ञापकत्व ही, यहाँ प्रमुख रहता है जनकत्व। यहाँ कार्य से कारण का अनुमान होता है, अतः हेतूत्प्रेक्षा के समान कारण का कारणत्व सिद्ध करने में ही चमत्कार रहता है। 'यत त्वन्० पद्य में प्रथम तीन चरणों द्वारा प्रतिपादित अर्थ कार्य है। उससे चतुर्थ चरण में प्रतिपादित अर्थ को कारण बनलाया जा रहा है। इसी प्रकार 'वपु पादुर्भाव' पध में 'अपरावद्वय' कार्य है, उससे दूर्वजन्म और भावीजन्म में प्रणामामाव में कारणत्व सिद्ध किया जा रहा है। 'मृग्यश्च०' पघ्य नें मी मृगियों के दक्षिणाभिमुख नेत्रसचार में दिम्नोधरूपी कार्य के प्रति कारणर्व बनलाया जा रहा है। इस प्रकार चमरकार के प्रति, अर्थान्तरन्यास में कारण होता है सम्थंकरव जय कि
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अनुमानालङ्वार: ५५५ कान्यसिंग में कारण होता है कारणत्वसिद्धि। कार्यकारणभाव दोनों अलंकारों में समान होने पर मी चमत्कारकारण भिन्न है अतः दोनों को पक नहीं माना जा सकता। इस प्रकार सून्रकार का उचित समर्थन किया जा सकता था किन्तु वृत्तिकार वह नहीं कर सके। वस्तुतः सृत्तिकार ठोक बैसे ही स्वतन्त्र आचार्य हैं जैसे विमर्शिनीकार मूलकार के साथ इनकी जितनी निभ जाय उतनी ही बहुत है। विमर्शिनीकार ने अनुमान और काव्यलिंग की अमिन्नता का स्वर उठाया है। इस अकार वृच्चिकार के ही समान विमर्शिनीकार भी यहाँ सूत्रकार से टकराते दिखाई देते हैं। इतिहास= काव्यलिंग के इतिहास से अनुमान का इतिहास मायः गतार्थ है। उससे स्पष्ट है कि अनुमान नाम से अनुमान को अलंकार मानने का प्रथम श्ेय रुद्रट को है। यद्यपि यह भी स्पष्ट है कि अनुमान का अभिप्राय दण्डी और उन्तट द्वारा भी नामान्तर से स्पष्ट कर दिया गया है। रुद्रट में इसका जो स्वरप है यह काव्यलिग के प्रकरण में सद्धृत किया जा चुका है। मम्भट तथा पण्डित- राज के मत भी दिए जा चुके हैं। शेप माचार्यो के मत इस प्रकार हैं- शोभाकर :- रत्नाकरकार ने अनुमान का लक्षम काव्यलिंग के साथ इस प्रकार दिया है- (१) साधनाव साध्यपतीतिरतुमानन्। (२) परमत्यायक लिंन देतुः ॥ साधन के द्वारा [अझ्षात] साध्य का ज्ञान अनुमान [और दूसरे को ज्वान कराने वाला लिंग हेतु ]। हेतु नामक कान्यलिंग से अनुमान का अन्तर करते हुए उन्होंने लिखा है- परेणाप्रतिपन्नत्य वस्तुनः प्रतिपादनम्! परानुमानरूपो हि हेतवलंकार हृत्यते।। मयायं प्रतिपन्नोडर्थे इति यत्र निवेदते। तन्नातुमतनं तेन स्याव प्रतिपत्तिनिवेदनम्।।2 'दूसषरे के द्वारा अज्ञात वस्तु का प्रतिपादन हेत्वलंकार कहलाता है इसमें परार्थातुमान रहता है। 'मैंने यह पदार्थ जान लिया' यह जिसमें बतलाया जाता है वहाँ अनुमानालँकार होता है। यह ज्ञान निवेवन स्वरूप है।' रत्नाकरकार ने 'यो यत्कथा' पद्म में अनुमान माना था। विमर्शिनीकार ने उसका खण्डन किया है। रत्नाकरकार ने काव्यप्रकाश तथा सर्वस्व द्वारा अनुमानालंकार के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत 'यतैता०' पद्य में असंबन्ध में सम्बन्ध नामक अतिशयोकि माती है। उनका कहना है कि इस पद्य में काम के साथ जिस 'शासनचरत्व' का संबन्ध नहीं है उसका संबन्ध वतलाया जा रहा है यहाँ उसी में चमत्कार है। उनका कथन अमान्य नहीं हो सकता किन्तु उन्हें वस्तुतः अनुमान में अतिशयोकि का क्षीण स्पर्श मानना चाहिए था, अनुमान का आत्यन्तिक सभाव और अतिशयोंकि का सार्वभौम चमत्कार नहीं। अप्पयदीक्षित ने ऐसा माना मी है। अप्पयदीसित ने अनुमान का कोई स्वरूप प्रस्तुत नहीं किया-केवल उदाहरण ही है दिए हैं। उन्होंने 'यथा रन्भं' में रूपक तथा 'यत्रता' में अतिशयोकि का स्पर्श माना है। विव्वेश्वरने अनुमान का रक्षण इस प्रकार बनाया है- 'अनुमानं व्याप्यवलाद् व्यापकपीपमिनिष्ठा स्यात्।'
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५५६ मलङ्गारसवस्वम् -- 'व्याप्य के द्वारा पक्ष में व्यापक का ज्ान अनुमान'। इसमें स्पष्ट ही विश्वेधर ने न्याय- शास्त को अधिक स्थान दे दिया है। व्याप्य साधन या हेतु का हो दूसरा नाम है और व्यापक साध्य का। इसी प्रकार धर्मी का अर्थ पक्ष होता है। विश्वेश्वर ने अनुमान के लिए अपेक्षित व्यापति को दो प्रकार का माना है पारमार्थिक और कविकस्पित। 'यत्रेता०' पद्य में उनके अनुसार कविकसरित है। श्रीविद्या चक्रदर्त्ती ने इस अलकार का निष्कर्ष इस प्रकार स्पष्ट किया है- 'अनुमानं तु साध्याय माघनस्योपवर्णना।
अप्रतीनप्रतीतो स्वादनुमानव्यवस्थिति 1 पदार्थाद् वाय वाक्यार्थोन्निर्देशे सति हेतुन। समर्थन पतोतस्य काव्यलिमदयं मतम्। हेतुमावत।। कार्यकारणमावे तु तस्योक्त रक्षमान्तरम्।।' अनुमान साध्य के किए साधन का [सर्वोगसपूर्ण] वर्णन होता है। यह संकीण और शुद्ूध दो प्रकार का होता है। अन्य भलकारों से यह चमस्कार में मिन्न होना है। अनुमान होता है मजान का ज्ञान कराने में। काव्यलिंग इसके विरुद्ध शब्दत कभित पदार्ये या वाकयार्धरूपी हेतु के द्वारा पहले से छात पदार्थ के समर्थन में होता है। इस प्रकार यह दो प्रकार दोता है। मर्थान्तरन्यास वहोँ होता है जहाँ हेनुत्व से तटस्थता रहती है [अर्थात हेतुत्व विवक्षित नहीं रहता, केवल सामान्यविशञेषमाव रहता है। जहाँ यद विवक्षित रहवा है वहाँ] कार्यकारणमाव को लेकर इस [ अर्थान्तरन्यास] का एक स्वनन्त्र लक्षम बना दिया गया है। विमर्शिनी एतदुपसहरप्नन पद्वतारयति-एवमित्यादिना। ['एवं-प्रतिपादितम्' का अनुवाद अनुमानालकार के अन्त में देखिए।] इस प्रकरण को समाप्त करने और दूसरा प्रकरण आरम्भ करते है- [सर्वस्व ] अधुना वाक्यन्यायमूला अलंकारा उच्यन्ते- [ सू० ६०] उदिष्टनामर्थानां क्रमेणानुनिद्र्देश्ो यथासंखयम्। ऊध्च निदिष्टा उदियाः। पश्चाननिर्देशोऽनुनिद्देशः। स चार्थादुर्थान्तर- गतः। संबन्धधात्र सामर्थ्यात् प्रतीयते। ऊध्व निर्दिष्टानामर्थानां पश्चाणि र्दिष्टेरर्थ: क्रमेण संबन्धो यथासंख्यमिति वाक्यार्थ.। अन्ये त्विममलंकारं क्रमसंक्षयामिदधिरे। तञ्च यथासंख्यं शान्दमार्थ च द्विधा। शव्दं यत्रासम स्तानां पदानामसमस्तैः पदैरर्थद्वारक. संबन्धः। तन्र क्रमसंवन्धस्यातिरोदि तस्य प्रत्येयत्वात्। आार्थे तु यध समासः क्रियते तत्र समुवायस्य समुदायेन सद्द संवन्धस्य शाब्दत्वादर्थावगमपर्यालोचनया त्ववयवगतः क्रमसंयन्धः प्रतीयते। ततोऽत यथासंख्य आर्थत्वम्।
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यथासंख्यालङ्कार: ५५७
मादयस्वोदाहणम्- 'लावण्यौकसि सप्रतापगरिमण्यग्रेसरे त्यागिना देव त्वय्यवनीभरक्षमभुजे निष्पादिते वेधसा। इन्दुः कि घरितः किमेप विहितः पूषा किसुत्पादितं िन्तारत्महो घृथैव किसमी सषा: कुलक्ष्माभृतः।।' अन्न प्रतीते: शब्द यथासंख्यम्। यथा- 'कजलहिमकनकरुच: सुपर्णवृपहंसवाहनाः शंवः। जलनिधिगिरिकमलस्था हरिहरकमलासना ददतु।।' अन कजलादीनां सुपर्णादिमि: संवद्धानां जलनिध्यादिमि: सह संबन्धो हरिप्रभृतिमि: संबन्ध: श्रुत्या समुदायनिष्ठः प्रतीयते। अर्थातुगमानुसारेण त्ववयवानां क्रम संचन्धावगतिरित्यार्थ यथासंख्यम्। मन [मीमांसाशास्त्रगत ] वाक्य= न्यायमूटक महंकारों का निर्वेचन किया जा रहा है- [सू० ६०] पहले कहे गए अथों के करम से पुनः [अन्य नर्थों का] कथन यथा संरयालंकार [कहलाता है]। [उद] ऊपर निर्दिध=कयित =उदिए, [अनु= ] पश्बाव निर्देश=कथन = अनुनिर्देश, नर्थाव कन्य अ्धों का। इनमें सम्बन्ध [वाक्यार्थ] सामर्थ्य से पतीत होता है। इस प्रकार तातपरये चह हुआ कि 'पहले कहे अर्थों का बाद में कहे गए अर्थों के साथ कमदःसंवन्ध यथातंख्य कहलावा है। [चामन आदि ] अन्य आचार्यों ने इस अलंकार को 'क्म' नाम से पुकारा है। यह यथा- संस्थ दो प्रकार का होता है शाब्द्र और आर्थ। शाब्द वह जहाँ असमर्त शब्दों का मसमस्त शब्दों से अर्थ के द्वारा संवन्ध रदता है। [यह शाब्द इसलिए कहा जाता है] क्योंकि इसमें क्रम- सन्वन्ध अतिरोहित रहता और [स्पष्ट रूप से] वोघविषय बनता है। आर्थ वह होता है जिसमें समास रहता है। यहाँ समुदाय से समुदाय का संबन्ध शब्दतः कथित रहता है, फलतः अवयन से अवयव का कमिक संबन्ध अर्थ का दान होने के पश्चाव विचार करने पर प्रतीत होता है। इस कारण यहाँ यवार्संस्य में आर्थता रहती है। प्रथम का उदाहरण- 'महाराज! आप लावण्य के घर है, अतापगरिमा से मण्डित है, त्यागियों में स्रेठ हैं और आपकी भुझा परथिवी का मार सन्हाठने में समर्थ है। विधाता ने जब इस प्रकार के आपनो बना दिया था तब फिर चन्द्रभा को क्यों गढ़ा, सूर्य क्यों बनाया, चिन्तामणि की उत्पत्ति क्यों की और बिना काम इन कुलाचलो की सृष्टि क्यों की। इस वदादरण में [पूर्वार्दगत] 'हाबण्य के घर' आदि पदार्थो का [उत्तरार्य के] चन्द्रमा आदि के साथ कमिक सन्दन्य सोधे सीधे प्रतीत हो नाता है इसलिए वयासंख्य शान्द है। [द्वितीय का उदाहरण ] वथा- 'कज्जल, हिम और सुवर्ण सी कान्ति वाले, गर्ड, वूष और इंस को वादन बनार हुए समुद्र, पर्वत और कमल पर विराजमान विष्यु, शिव और मदाा तुन्हारा हमारा कल्याण करें।'
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५५८ अलङ्कारसचस्वम्
यहाँ गढट आदि से सम्बद्ध कज्जल आदि का विष्णु आदि से सम्बन्ध शम्दतः समुदायगत रूप से प्रतीत होता है। अवयवों का क्रमिक सम्वन्ध अर्थ पर विचार करने से मनीत होता है। इस कारण [यहाँ] यथासंख्य आार्य है।।'
विमर्शिनी उदिष्टानामित्यादिअर्थादिनि। उद्टिषानामेव हानुनिर्देशे पौनस्वरयं स्यात्। साम्म्या दिवि। वायपर्यालोचनपलात्। अन्य रवि। वामनादय:। यदाहु :- 'उपमेयोपमानाना कमसंबन्धतः क्रमः इति। अनेनाशय प्रार्योकरवं दर्दितम्। अव्यवहितित्वेनेति। समासाघ मावात्। अवयवानामिदि। हरिकमलाडी नाम् । न पारपालंकारवं युव्छम्।दोपा माव माबरूपरवाद। वद्िशना क्रमेणानुनिदेसे झक्ि यमाणेऽपकमासयो दोप पसज्यते । यदुकम्-'क्महीनार्थमपकमम्' इति। तथ यथा- 'कीर्तिप्रतापी सवत' सूर्याचन्द्रमसाविच' इनि। दोपाभावमाग्रं घ नालंकारावम्। तम्य कवि प्रतिभाष्मकविद्द्रितिविशेपावेनोक्त वाय। सब्ने चास्य 'यथासंयमनुदेश समानाम' हत्पादिसय्रोदाहरणाना 'तूदीश्षलातुर वर्मतीयचवारादढवछण्टव्यक" इश्यादीनामप्य लंकारखप्रसङ्गः। एनच च क्ो छिजी वितकना सपपधमुक्ममग्यस्मामिरिद नापरतम्। ग्रन्थ. कृता पुनरतहुजरमतानुयापितया छचिनम् । एवम् आसनिवित्रकरपवर्ता तद्वेव उपदेश क्रम' इति लवितः कमोऽव्यमलंकार एव। योपाभावमागरूपरवाय। आदिपश्वाष्ि्दैश्या नामवयानिदेशे छपकमाण्य एव दोप स्याद्। यथा-'तुरक्मय मातद्ं मे प्रयष्छ
स्वस्थाननिर्देशे दोषा मातमात्रचम्। न पुनरलंकारखम्।तरमादु- 'अवश्य तदहो भावी विदोगो यत्र नो भुवम्।
हरयत्र परिच्छदादीनामन्ययानिर्देसे दोष एुव स्थान्। न चात्र ताटक त्रिद्विशेष उपलम्यते सेनालकारख स्यास्। एव म्- 'आस्तामस्तमयोऽद मिन्य मिमतेर्दहादिमानरपृज्षो माभूदा विशनिर्ममेनि व सतेर्दाराश्म जादिप्वपि।
देशच्मेशदिगादिiं प्वषि कथ सा हन्त नारत गता।।' दश्यग्रापि जेयम्। उदिषनाम ह्यादि। अर्थात् = पूर्वकयिन वर्थों का हो पुन निर्देश=कथन हो तो उममें पुनरुकि दोष चला आवे। सामर्थ्यात=वाक्यार्थ के सामर्थ्य से- अर्थात वाक्य पर विचार करने से। अन्ये=अन्य आाचार्य=वामन आदि। जैसा कि [ वामन ने] कहा है-'उमेयों और उपमानो का क्रमिक संबन्ध होने से कम' [ का सू. ४३।१७] होता है। इससे यह अलकार प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रतिपादित अत: प्रतिद्वित है यह बतलाया गया [इससे केवळ नामान्वर- मातर बसलाया गया है क्योंकि वामन के पूरवी आचार्य दण्डी और आमइ ने इसे यथा संख्य नाम से ही निरूपित किया है।। अब्मवहितत्व=समास आदि न होने से। अवयवानाम्= अदयदों का = हरि कज्जल मानि का।
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इसे भलंकार मानना ठीक नहीं है, क्योंकि यह दोपाभावमान है। यदि कथित पदार्थों का अनुकथन क्रम से न किया जाए सो 'अपक्रमत्व' नामक दोष होता है। जैसा कि कहा है- 'कमहीन पद अपक्रमत्व दोष से युक्त होता है' [वामन काव्या० सू० २।२।२२]। इसका उदाहरण यह प्रयोग है-'आपके की्ति और प्रताप सूर्य और चन्द्र के समान है' [नामन का० सू० वृ० २।२।२२]! [यहाँ कीति का उपमान चन्द्र है और प्रताप का सूर्य अतः इनका प्रयोग 'चन्द्र और सूर्य' इस क्म से होना चाहिए था]। केवल दोपाभाव को अकंकाररूप नहीं माना जा सकता। क्योंकि अलंकार तो वह उकि होती है जो कविपरतिभात्मक होती है, यह हम महले भी कह चुके हैं। केवल दोषाभावरूप ही अलंकार दो तो 'यथासंख्यमनुदेशः समानाम्' [१३१० अ०] समान अर्थो का अनुनिर्देश यथासंख्य होता है हत्यादि [पाणिनिकृत व्याकरण- सुत्र ] के उदाहरण-तूदी, शलतुर वमती, कूचवार शब्दों से ढकू, छण, ढन, यकु प्रत्यय होते हैं' [अ ४।३।९४] इत्यादि में अलंकार मानना पड़ेगा। इस विषय का विवेचन वक्रोक्ति जीवितकार ने विस्तार पूर्वक [वक्त्रोकिजीनित-१] किया है इसलिए यहाँ [हम इस विपय -पर अधिक ] श्रम नहीं किया चाहते। गन्धकार ने इस [ यथारसंख्य] का लक्षण इसलिए किया है कि वे उद्गटाचार्य के मत के अनुयायी है। इसी प्रकार 'आसति [सम्बन्ध] और विप्रकर्ष [दूरी] से युक्त पदार्थों का उन्दीं [ सम्बन्ध तथा दूरी] को लेकर हुआ कथनक्म [कमालंकार कहलाता है]'-इस प्रकार लक्षित क्रम भी अलंकार नहीं है, क्योंकि वह मौ दोषाभावमानरूप है। पूर्वपश्चाद्भाव के क्रम के साथ कदे जाने योग्य पदार्थों का कथन यदि बैसा नहीं हो तो अपकमत्वनामक दोप ही होता है। अलंकारत्व नहीं । इस कारण- 'अहो! जहाँ परिचारक, मिन्र, वन्दुबान्धव, [रूपादि] विषय, इन्द्रियाँ तथा प्राणों से हमारा वियोग अवश्य हो होने वाला है।' इसमें परिचारक आदि का कथन यदि इस क्रम से न हो तो दोष ही दोगा। इसके अतिरिक इस प्रकार के कथन में ऐसा कोई वैशिष्ट्य मी नहीं मिलता जिससे इसे अलंकार माना जा सके। इसी प्रकार- 'देह आदि में अहंत्व [आत्मत्व ] का अभिमान मिटना [तो] दूर रहे, स्त्री पुत्रादि में मी ममत्व की बुद्धि भले ही दूर न हो; आश्चर्य और खेद इसका है कि धन, घर, बागनवगीचे, नदौतट, उसके पास की क्यारियाँ, देश, राजा, दिशाओं आदि के पति भी बह- [ममत्व बुद्धि] समाप्त नहीं हो रही है।' यहाँ भी जानना चाहिए। [ इस पद में तथा 'अवश्य०' पद्य में जो दन्द् समास है उसमें पदों का क्रम पदार्थो के महत्व के आधार पर निर्धारित किया गया है]। विमर्शिनीकार यथासंख्य को भी काव्यलिद् के ही समान अलंकार नहीं मानते। पण्डितराज ने भी अपना मत इसी पक्ष में दिया है। यथासंख्य निरूपण के अन्त में उन्होंने लिखा है- 'यथासंख्यमलंकारपदवीमेव तावत् कथमारोद' पभवतीति तु विचारणीयम्। न ह्यरिम- ल्लोकसिद्धे कवित्रतिमा निवर्तितत्वस्या लंकारताजी वालोर्लेंशनोड्युपलब्धिरस्ति येनालंकारव्यपदेशो मनागपि स्थाने स्याद। अतोऽपक्रमत्वरूपदोपामाव एव यथासंख्यम्। एवं चोद्धटमतानुयाबिना- सुक्तय: कूटकार्षोपणवदरमणीया एव। पतेन यथासंख्यमेव क्रमालंकारसंजञया व्याहरतो वामनत्यापि गिरो व्याख्याता इति तु नव्या:।' 'विचार यह करना चाहिए कि ययासंख्य अलंकारपद को ही कैसे प्राप्त करता है। यह तो एक लोकसिद्ध तथ्य है। इसमें अलंकारत्व का प्राण कविप्रतिमापसृतत्व लेशमात्र को भी प्राप्त नहीं होता, जिससे अलंकार कहना जरा भी उचित हो। इसलिए यथासख्य अपकमत्वनामक
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५६० मलङ्गारसचस्व्रम्
दोष का अमाव ही है। इस प्रकार उन्ट का मत मानने वासें का कपन नकली कार्षोपण के समान स्बथा अरमणीय ही है। और इसीकिए यमासंर्य को ही क्रमानंकार नाम से पुकारने बाले वामन के कथन की भी जाँच हो जानी है। इस प्रकार ननीन आचार्य ययासतय और करम को दिोषामाव ही मानते है।
स्पष्ट है कि पण्डितराज ने विमर्शिनी का दी अक्षरश अनुगमन किया है। विमर्शिनी और रसगगाधर के इन प्रतिवादी स्वरों का मूळ शोभाकर का रत्नाकर है। रस्नाकर में शोमाकर ने भी यथासख्य को अलकार नहीं माना है। उन्होने क्रमालकार नामक पर्यायालकार के एक भेद के प्रकरण में लिसा है- 'येनोद्देश क्रमेगादावपरेण पुनर्यद्वि। क्रियते प्रतिनिर्देशो द्रोषः प्रकममङत॥ अथ दोषनिरासार्य कमस्तरस प्रवचते। यथ.सख्यमल्द्वारो न स्याद दोषनिवृत्तिन॥। वस्याश्यालकृतित्वे स्याद्ेककस्य पदस्य सा। पौनरूवत्यादिविरदात तेन नेदमळकृति:।। एककस्य विशेषस्य सनिधो यद् विशेषणम्। यथायोगामिषो वाच्य सोडलक्टारस्तन पृथक। वैचित्यविरदान्नेवमिष्यते चेन् सम हयो। क्रमेण शुगपद् वापि न डि दुद्धिविशिष्यते।। 'आरम्म में जिस क्रम से पदार्थो का कथन हो, प्रतिनिर्देश यदि [उसी क्रम से न होकर] भिन्न क्रम से होना है तो वह 'परक्ममङ' नामक दोष है। यदि इस दोष की निवृत्ति के लिए वही क्रम रखा जाबे तो इमे ययासख्य कहा जाएगा किन्तु यह अलंकार नहीं होगा क्योंकि यह तो दोषामावमात्र होगा। इस दोपनिवृत्तिरूप दोषामाव को यदि अलकार माना गया तो यह एक ही पद में जितने पदों में दोषनिवृत्ति रह्ेगी उतने सब पदों में एक एक करके अनेक सख्या में माना जाएगा। और इसना ही नहीं पुनरुकि आदि सभी दोषों की निवृत्ति में अलंकारत मानना होगा। इसलिए यह [यथासंख्य ] अलकार नहीं है। यदि इसे अलकार माने तो जहों एक एक विशेषना के लिए एक एक विशेषण का प्रयोग किया जाता है वहाँ [ लावण्योकसि० आदि मद्यों में] एक 'यथायोग' नामक भो अलकार मानना होगा। यदि उसमें विचिन्य का अभाव वनलाकर उमे अलकारत्वशून्य बनलाया जाए तो यही तर्क यथासख्य में भी लागू होगा। सच यह हे कि पदार्थो का ज्ान क्रम से हो या अन्यथा, ज्ान में कोई अन्तर नहीं आता।' रत्नाकरकार को इतने से संतोष नहीं हुआ। उन्होंने दवे स्वर में यवासंख्य को दोष भी बतलाना चाहा- *प्रत्युव विशेष्यपदनिकट एव विशेषणपदोपादानेन नैराकाड्कष्येश प्रतिपठेरस्तयेव विशेष:। यथामख्ये तु विशेष्यारणां विशेषणाना व पृथम पृथगुपादान व्यवहिनसमन्वयेन साकाड्शत्ात।' -'यदि यथायोग' को अलंकार माना जाय तो वह कुछ दूर तक मान्य भी है क्योंकि विशेषनों का अपने विशोष्यों के साथ प्रयोग होने वाक्यार्थप्रतीति बिना आर्काक्षाव्यवचान के हो जाती है। यह भो एक विशेषता मानी जा सकनी है। यथासंख्य में तो उलटे मार्काक्षा का व्यवधान रहता है क्योंकि उसमें विशेष्य और विशेषणों का उपादान पृथक भृथक होता है।'
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रत्नाकर ने निम्नलिखित चोट और की- "कि चयं बासंख्यालंकार: किम् अर्थत्य, शब्दस्य वा ? न तवदर्यस्य ०००0 अर्थस्य क्रमा- संमनाद। न द्वितीयः अनुपासादिवच्छव्दस्य चारुताऽपतीतेः। तन्नाभिधेयक्रमः, सेनालंकार: अमितु कमेणाभिधानन्। न चाभिधानालंकार: कश्िदर्ति। -'यथासंस्य अलंकार किसका है? अर्थ का या शब्द का ? अर्थ का दो नहीं सकता क्योंकि [इसके किए वदाहत पद्यों में] अर्थ में कभ नहीं रहता। दूसरा भी नहीं क्योंकि शब्द में अनु- प्रास्तादि के समान चालता की प्रतीति नहीं होती। इस प्रकार अभिषेय का क्रम तो यहाँ है नहीं जिससे यह अलंकार हो सकता, यहाँ तो होता दै क्म से अभिधान और अमिषान नाम का तो कोई अलंकार होता है नहीं। वहाँ रत्नाकर ने यह बतलाना चाहा है कि सिलसिला नहीं, तरतमता ही समिषेयों का क्म कहला सकती है। वथासंखय में सिलसिला रहता है और तरतमता पर्याय और पर्याय के ही सगे भाई क्रम नामक अलंकार में। सिलसिला सर्थ या अमिषेय की विशेषता नहीं अभिधान की विशोषता है। अमिधान यदि अलंकार होता तो इसे अलंकार माना जा सकता था। बक्रोकिजीवितकार कुनतक ने वक्ोक्तिमान को काव्य का अलंकार माना है और बकोकि को माना है 'विचित्र अभिषा'-स्वरूप। असिषा और अमिधान समानार्थी शब्द है। इस प्रकार समिधान को अलंकार मानने का पक्ष उठाया जा सकता है। और महिममट्ट ने उठाया भी है तयापि यह फत्प टिक नहीं पाता, क्योंकि वकोततिनीवितकार के अमिषाशब्द का अर्थ अभिषानामक शब्दव्यापार नहीं, अपितु उत्तिप्रकार है जो कविकर्म के अन्तर्गत आता है। विमर्शिनीकार ने जो वकोकिजीवितकार का इस प्रसंग में उल्लेख किया है वह केवल वैचिन्यमात्र को अलं- कारत्वाधाचक मानने के लिए। वकरोकिजीवित शब्द दी प्रमाणित करता है कि वक उति ही अलं- कार है कयोंकि वकोकजीवितकार ने स्पष्ट कहा है-'काव्य अलंकृत नहीं किया जाता अपितु अलंकृत वस्तु काव्य बनती है-'सालद्वारस्य काव्यता।' इस प्रकार उनके मत में अलंकार जी चक्रोकित्वरूप है, कान्य का जीवातु अर्थाव प्राण है। यथासंख्य में विमर्शिनीकार किसी प्रकार की वकता का अनुभव नहीं करते अतः उनकी दृष्टि में यह अलंकार नहों कहा जा सकता। इनके विरुद्ध दण्डी, मामह, उन्ट, रुद्रट और मम्मट ने यथासंख्य को अलंकार माना है। इनके विवेचन इस प्रकार हैं- दण्डी = 'उदिष्टानो पदार्थानामनूद्देशो यथाकमम्। वथासंस्यमिति प्रोक्तम् ॥' [ शा२७ काव्यादश]। -कथित पदार्थों का उसी कम से अनूद्दैश यथासंख्य कहलाता है।'
कमशो थोडनुनिर्देको यथासंख्य तद्च्यते॥२८९ ॥ -पहले कहे गए अनेक ऐसे पदार्थों का क्रमशा पुनः निर्देश यथासंख्य कहा जाता है जो समान धर्म से युरू न हो। वटा6-पद्मेन्दुमृनमातह पुंस्कोकिटकलापिन:। वक्त्रकान्तीक्षषगतिदाणी चालैसत्वया जिताः ॥ २९० । -- तुमने चनत्र, कान्ति, नेतर, गति, चाणी तथा वेशों से पद्म, चन्द्र, भुक, मातझ, कोकिल तथा कलापधारी मथूरों को जीत लिया है। मामह के लक्षण में पदार्थों का 'मसाधम्य' एक विशेष तथ्य है। उनके उदाहरण में वद्यपि ३६ अ० स०
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उदिष्ट और अनुनिदिष्ट [ पहले और बाद में कहे] पदार्थों में साम्य है तथापि उन पदार्थों में से केवल रदिष्ट और केवन अनुनिर्दिष् पदार्थो में कोई साम्य नहीं है। चामन :- .* उद्भट :- उद्धद ने यथासख्य के लिए मामद की कार उद्धृत कारिका ज्यों की स्यों अपना ली है। सदाहरण के रूप में भी उन्होंने मामड से मिठना जुटना एके अतुदप अपने डुमारसंमव से उद्धृन कर दिया है- 'मृणालइदस पद्मानि वाहुनइनमगाननै । निजयन्त्यानया व्यक्त निन्य सकला जिताः।' यहाँ 'असपर्मंता' का निर्वाह पूर्वप्रदर्शिन क्रम से करना होगा। वस्तुत असधर्मस्व के लिम रद्रड का उदाहरण ठोक है। सन्ट के टीकाकार प्रतोहारेन्दुराज ने मी एतदर्ष उन्हें हो उद्धृत किया दै और असपर्मत्व की सारथकना के लिए कहा है-'जझों उपमा या व्यतिरेक न भी हो, केवळ दो से अधिक पदार्थों में यथासत्य अन्वय रखा गया हो तो वहों भो चमरकार का अनुमव होता है'। रुइट-'निर्दिश्यते सस्मिन्नर्था विविधा ययव परिाठया। पुनरपि नम्मनिवद्धास्तयैव तत स्याद् यथार्सरयम्॥ ७२४॥ तद द्विशुण त्रिशुण वा वहुपूदिष्टेपु जायते रम्वम्। यव नेपु तयैन तनो दयोस्तु वद्योऽपि बघ्नीयाव।७।३५॥ 'जिसमें विविध [अर्थात् असवर्मा ] पदार्थ पहले जिस परिपाटी=क्रम से कदे गये हो वाद में भी उमी क्रम से कहे गए हो तो वह वास्तव वर्ग का यथासख्य नामक अलंकार होता है। वह अनेक पदार्थो के दो या तीन वार कथन में [ अधिक ]सन्दर होता है। यदि केवल दो पदार्थों में हो यथार्माख्यमाव लाना दो और यह अलकार निध्पन्न करना हो तो दो दो पदार्यों का यह कम पकाधिक बार उपनिवद्ध किया जाना चाहिए। उदाहरण- (१) कज्जन-डिम-कनकरूच" सुपर्ण-वृप इस-चाइना, शा वः। जलनिधि-गिरि-पमस्था रि-दरचतुरानना ददतु। ७३६॥ (२) दुग्वोदभिरौटस्थी सुपर्ण1पत्राह्दनौ धनेन्दुरुची। मधुम्करध्व नमथनी पार्वा व: शाहशूलघरी ॥ ७३७॥ 'कमजल, हिम तथा सुवर्ग सी कान्ति वाले, गरुड़ तृप तथा इस पर शार्ट होने वाले, समुह, पर्वन तथा केमल में निवास करने वाले विष्णु, शिव, वक्षा आपको शान्ति दे। 'दुग्धोदधि तथा पर्वा पर रहने वाले, गरुद तथा वृपभ पर आस्द होने वारे, मेव तथा वृषभ पर आर्द होने वाले; मेन तथा चन्द्र के समान काम्तिवाले, मधु तथा काम के हन्ता: रर् तथा शुल धारण करने वाये [ विष्यु तथा चित्र] आपकी रक्षा करें। ध्यान देने को बान है कि यहाँ उपर्युक्त दोनों ही योबनामों के पदार्थों में साम्य नहीं है। मामह तथा उद्भट के 'अमरसत' विशेषण को 'विविध' शब्द मे अपना कर उसमें ठीरू निर्वाह स्द्रट ने ही किया। दण्टी ने पेसषा कोर्ई विशेषण दिया हो नहीं था। मम्मट ने मी यद विशेषण नहीं दिया किन्तु 'साधर्म्यामान' को स्वीकार अवस्य किया। उनके उदाहरण से यह तथ्त प्रमाणिन है। मामट-'यथामख्यं कमेणेव कमिकारणां समन्दय'।' -- 'क्रम मे कथित पदार्थों का क्रम से दी अन्वय यथासंख्यालकार कइलाता है।'
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उदाहरण= 'रकसति्रिया वससि चेतसि चिन्रमन देव दिपा च विदुषा च सृगोदर्शी च। दापं च संमदरसं च रति च पुष्णन् शौर्योष्मण च विनयेन च लीलया च।।' -'आश्चर्य की पाउ है कि देव ! आप श्ु विदान् और सन्दरियों के चिर्तों में शौर्योष्मा, विनय और चेष्टाओं से ताप, हर्ष तथा रति पुष्ट करते दुए तीन रूपों में बसते हूँ।' इन सभी आचार्यी ने अलंकार की चारुत्व या सौन्दर्य का आधायक तत्त्व माना है। निश्चय ही इन्हें यथासंख्य में भी कोई न कोई सौन्दर्य सुझता होगा। इसी पकार रत्नाकरकार को छोड़ -परवर्ती आचार्यों ने भी यथासंख्य को इस प्रकार अलंकार माना है- दीच्ित='वयासंख्यं क्रमेणैव क्रमिकाण समन्वयः। शतुं मिन्नं विपत्ति च जय रंजय भंजय ।I2 झुतु मित्र और विपत्ति को जीतिए, प्रसन कीजिए और नष्ट कीजिए।' पण्दितराज - 'उपदेशकमेणार्थानां सम्वन्धो यथासंख्यन्॥ -कथनकम से अर्थों का संबन्ध यथारसंखय कहलाता है।' विश्वेश्वर='निर्देशकमतो यदि समन्वयस्तद् यथासंख्यम्।' -'यदि निर्देशकम से समन्ध हो तो उसे यथासंख्य कहते हैं।' इस प्रकार सर्वस्वकार के परवर्ती आावार्यों ने भी यथासंखय में सौन्दर्य पाया है। प्रद्न ठठता है कि इन पुराणवादी आचार्यो को मान्यता कहाँ तक तथ्यात्मक है। इसका उत्तर सदट ने दिया है। उन्होंने कहा है- ययासंख्य अपने आप में सुन्दर नहीं होता। यह सुन्दर तब बनता है जब उसमें अनेक सर्थ द्विगुण या त्रिगुणरूप [दो दो तीन तीन के वर्ग] में कम लिए हुए कथित हों- 'तद् द्वियुगं तरिगुगं वा बहुषूदिधेषु जायते रम्यम्' [७३५] नमिसाधु ने 'द्विगुण त्रिगुण' इन संख्यावाचक शब्दों का तात्पर्य इससे अधिक संख्या के. प्रतिपेष में वतलाया है। वस्तुतः उदादरण तीन से अधिक अर्थो के समुदाय के मी मिलते है। आामह द्वारा निर्मित उदाहरण 'पझ्मे०' ऐसा ही उदाहरण है। 'कजल०' पद्य त्रिगुण विशेषणों से अधिक का उदाहरण है। यद्यपि यह सत्य है कि ऐसा विशेषण यदि बहुत अधिक हो जाय तो उक्ति पहेली जैसी हो सकती हैं। स्टूट के उक्त कथन से यह स्पष्ट है कि सम्द्ध अर्थो में वर्गनिर्माण और कमविधान से कोई नवीनता मवश्व ही आती है। यह प्रवृत्ति कवि प्रज्ञापूर्वक अपनाता है, प्रमादपूर्वक नहीं। फलतः यह उसकी अशत्ति नहीं, अपितु शिव्योजना है। दोप तो अशककि से आता है। कवि चाहे तो उसी वाक्य को रचना वर्विहीन क्म ते भी कर सकता है, अतः वर्गयोजना उचति का आवस्यक धर्म नहीं है। इस प्रकार उक्त आचार्यो का इसे अलंकार मानना चुकतिसंगत है। अनुभव भी इसका अनु- मोदन करता है। 'तूदी चलातुर-वर्मती कूचवाराड् ढक्छणूढन्यकः' सूत्र और 'पझेन्दु०' या 'कजल- हिम० वाक्य परस्पर में उक्ति की समानता रखने पर भी अनुभूति या प्रभाव में भिन्न हैं। मम्मट के उदाहरण पद्य में तो चमत्कार का कोई अन्य हेतु भी नहीं मिलता। उसमें न तो भामह और उद्भट के उदादरणों के समान व्यतिरेक का पुट है औौर न दण्डी के उदाहरण के समान उत्पेक्षा का। क्रमालंकार =यथासंख्य को क्रम नाम से पुकारने का जो उल्लेख सर्वस्व में मिलता है वही
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रतनाकर [कमालकार], कुवलयानन्द्र [यथासख्यांकार] तथा रसगंगापर में मिलता है। इसका मूल विमरिनीकार ने वामन के विमदनी में ही उद्घृन और उदाहत कमालंकार को माना है। वामन का क्रम उपमानोपमेय नर सीमिन है अत उसमें कम रहने पर भी सौन्दर्य- निम्पत्ति में बसका स्वनन्त्र महत्व नहीं है। वस्तुन इसका मूछ दण्डी म दी है। दण्डी ने इसे न केवल क्रम नाम मे ही, अपितु 'सख्यान' नाम मे मी पुकारा जाता बनलाया है- 'उद्दिष्टानां ०० प्रोत-'भरयान क्रम हत्यदि ॥' इस प्रकार दण्टी के पूर्वाद्धून यथासंख्य- लक्षम की कारिका का चनुर्ष चरण 'सख्यान नाम हत्पवि' है। नामह के काव्यालकार से विदिन होता है कि मेघाी नामक किमी अलकारशाग्री को कोई पसी भी परम्परा मिली थी जिसमें ययासरय और उत्पक्षा का 'मख्यान' कहा जाना था। [२ा८८] रत्नाकरकार ने- [क्रमेग] आरोहावरोदादि. क्रम ॥ ९२ सू० ॥ 'किसी वस्तु का अधिक पद ऊंचा सथान प्राप्त करना या उसके विपरीत कम या निम्न स्थान प्रास्त करना क्रम कदलाता है।'-इस प्रकार एक क्रम नामक अलंकार तो माना है किन्तु उसका यपासरय की अभिव्यक्ति से सवंथा पाथक्य है। रत्नाकरकार ने इसमें आरो का उदाहरण 'नन्वायस्थिति'-यह पद्य दिया है जिसने मम्मट ने और सर्वस्वकार ने पर्याय नामक अवकार माना है। पाठभेद=निर्णेयसागरीय प्रति में सूत्र तथा वृत्ति दोनों में 'अनुनिर्देश' के स्थान पर 'अनूदेश' छपा है। विमशिनी तथा सजीविनी दोनों में अनुनिर्देश ही पाठ है। अन्य प्रतियों में भी यही पाठछरा है। प्राचीन आचार्यों के पूर्वोद्धृत उद्धरणों में दोनों हो शब्दों का प्रयोग है। दण्डी में 'अनूद्वेश' शम्द है और मामइ में 'अनुनिर्देश'। अन्य अलंकारों में सवस्वकार की परम्परा मामह से मिती है किन्तु इस अल्कार में ऐसा लगता है कि सवसवकार दण्ही से अधिक प्रभावित है। इस कारण कदाचित् 'अनूददेश' शब्द ही मूल शब्द है। उद्भटानुयायिता = विमदनी तथा रसगगाधर में यथासख्य को अन्कार मानने की परम्परा का आरम्भ उद्रट से माना गया है। सर्वस्वकार को दोनों ने उद्धटानुयायी कहा है। वस्तुत इन्हें मामहानुयायी अथवा दण्डचनुयायी कहना चाहिए। ठट्र्ट का यवासख्य लक्षण अक्षरण मामद का ही लक्षण है। औीविद्याचकवनों ने ययामस्य पर निषकृष्टार्थकारिका इम प्रकार बनाई है- 'प्रामुक्तानामनुक्तेस्तु सबन्ध, क्रैमिको यदा। यथासस्य नदा शाम्दमर्थक्रेति हिया मनन्॥2 पूर्व कथित अर्थों का अरुिन अर्थों के साथ क्रमिक सम्बन्ध यथामस्य कहलाता है। वह शाब्द औौर आर्थ इस प्रकार दो प्रकार का होता है। उक्त इविशास से विदित होता है कि यवासख्य का आर्य भेद प्रथमत, सवस्वकार ने दो बलाया है। इसी प्रकार मम्मट के पूर्ववरसी अन्य आचार्यों के लक्षण में कथन और अनुकथन जिन सर्थों का हो वे भिन्न हो ऐसा स्पषीकरण नहीं है। सवस्व्र के लक्षम में 'उदिशनाम्' इस पद की पष्ठो का सबन्ध 'क्रमेण' के 'क्म' पदार्थ के साथ करने पर यद अयगन भेद स्पष्ट हो जाना है।
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[सर्वस्व] [सू० ६१] एकमनेकस्मिवने किसेकस्मिन् क्रमेण पर्यायः। क्रमपस्तावादिदसुच्यते। एकमाधेयमनेकस्मिन्नाधारे यत् तिष्ठति स एक: पर्याय:। नतु 'एकमनेकगोचरमिति प्राकनेन लक्षणेन विशेषालंकारोड प्रोक्त तत्किमर्थमिदपुच्यते' इत्याशटयोक्तम्-कमेणेति। इह च क्रमो- पादानादर्थालन्न यौगपद्यपतीतिः। तेनास्य ततो विविक्विषयत्वम्। तथा- पकम्मिन्नाधारेडनेकमावेयं यत् स द्वितीय: पर्याय:। नन्वन समुच्चयालंकारो वक्ष्यते इत्येनदर्थमपि क्रमेणेति योज्यम्। अत पव 'गुणकियायोगपदयं समुच्चयः इति समुच्चयलक्षणे यौगपद्यग्रहणम्। अत एव कमाश्रयणात् पर्याय इत्यन्वर्थसभिधानम्। विनिमयासावात्परिवृत्ति- वैलक्षण्यम् । तस्या द्वविनिमयो लक्षणत्वेन वक्ष्यते। नत्रानेकोऽसंहतरूप: संहतरूपश्चेति ह्विवियः। तच द्वैविध्यमाधारावेय गतमिति चत्वारोडस्य मेदा:।क्रमेणोदाहरणानि- 'नन्वाश्रपस्थितिरियं किल कालकट केनोसरोत्तरविशिष्टपदोपदिष्ा। प्रागर्णवस्य हृदये वृपलत्त्मणोऽथ कण्ठेडधुना वलसि वाचि पुनः सलानाम्॥। 'विसएरागादवरान्निवर्तितः स्तनाह रागाकणिताच्च कन्टुकात्। कुशाहुरादानपरिक्षताङ्कुति: कतोऽझसूत्प्रणयी तया करः॥' 'निशासु भास्वत्कल्रनू पुराणां यः संथरोडभूद भिसारिकाणाम्। नवन्मुसोल्काविचितामिपामि: स वाहाते राजपथ: शिवाभि:' 'यतरैव सुग्घेति कशोदरीति प्रियेति कान्तेति सहोत्सचोडभूत्। तत्रैव दैवादू बदने मदीये पत्नीति भार्येति गिरश्रन्ति।।' अत्र कालकूटमेकमनेकस्मिन्रसंछते आश्रये क्रमेण स्थितिमन्निबद्धम्।
संहृतत्वेन स्थितत्वात्। अमिसारिका: शिवाश्ानेकस्वभावा अ्संहतरूपा ए.कस्मिन्नाश्रये राजपथे क्रमवर्तिन्यः। वदने चैकस्मिनाश्रये सुग्धत्वादि वर्ग: पत्नीत्वादिवर्गश्च वर्गत्वादेव संहतरूपोडनेका क्रमवातृपविवद्धः। [सून्र प०] एक का अनेक में तथा अनेक का एक में क्रम से रहना पर्याय [नामक अलंकार कहलाता है]। क्रम का प्रकरण है, इसलिए [पर्याय का ] यह [लक्षण] यहाँ कहा जा रहा है। एक अधिय का अनेक आधार में जो रहना वह एक प्रकार का पर्याय होता है। शंका होती है कि 'एक का अनेक में दिखाई देना' इस लक्षण के अनुसार ऐसे स्थलों में विशेषालंकार वतला ही दिया गया है तब यह करयों वतलाया जा रहा है।
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यही सवा करके बइा क्रमेण=क्रम से। यहाँ क्रम का उपादान करने से सिद्ध हुआ कि वहाँ [विशेषालंकार के उक्त भेदमें] योगपध रहता है। उसे लेकर इसका विषय भिन्न मिन्न दो जाता है। इमी प्रकार एक आाधार में जो अनेक भषय का रहना वह दूसरा पर्याय होता है। शका होती है 'ऐसी स्थिति में आगे समुच्चयातकार वतलाया जायगा'।[उत्तर ] जी हा, इसीलिए यहाँ भी 'क्रम से' इस पद की योजना सूत् में कर देनी चाहिए। इसीलिए समुच्चय के 'गुण और क्रिया का यौगपय समुच्चय' इम लक्षग में यौगपथ का ग्रहण किया जायगा। और इमी- लिए इसका पर्याय नाम भी सार्थक है, क्योंकि इसमें क्रम अपनाया जाना है। इसमें 'िनिमय नहीं रहता इसलिए इसका परिवृत्ि से भी भेद है। उस [ परिवृति] में विनिमय को लक्षम वनलया जाएगा। इसमें अनेकत्व्र से युक पदार्थ दो प्रकार के होते हैं सहत।इकट्ठे] तथा असंहत [अल्ग अन्ग] इसके अतिरिक आधार और आधेय को लेकर जो दैविध्य है वह है ही। फल्त इसके चार भेद हो जाते हैं। इनके कमश उदाहरण- [ समइन मनेक आधारों में एक आधेय ] हे! कालकूट [विपराज ] आक्षय की यह उतरोत्तर उस्कृष्ट पद वाली स्थिति तुझे किसने घिसराई है। पहले तू ममुद्र के हृदय में था, फिर शिव के कण्ठ में पहुँचा और अव सलों की वागी में रद् रहा है।' [संहृत अनेक आधारो में एक आधेय-] 'राग [रजक द्रव्य] भुक अधर और र्ननों के भगराग से अरुण कन्दुक से इटाया हुआ [भपना] हाथ, जिसकी उगलियाँ कुशाकुर उपाटने से जडां तहाँ डच गई थी उम [ पारवती] ने रद्राक्षमाला का प्रेमी बना दिया।' [ कुमार सं० ५] [ असहत अनेक आधेयों का एक सधार ]- [मेरा] वही राजपथ जो रात्रिकाल में मकने और कलरव से युक् नूपुर पहिनी अभिसा- रिकाओं का संचारपथ बना रदता था, इस समय वोलते समय मुदसे निकली लुकाटियों की सिलमिलाइट में मांस खोज रही सिरकट्टियों द्वारा रोदा जाना रहता है। [ रघुवञ-१६]।। [ रदत अनेक आधेयों का एक आाधार] 'जिसमें सुग्धा, कशोदरी, पिया, कान्ना इस प्रकार के शब्दों के बोटने का महान् उत्सव चला करता था, मेरे उसी मुख में इस समय देवगति से पत्नी और मार्या आदि शब्द घूमते रहते है।' इनमें [ से प्रथम में ] एक ही काल्कूट मनेक भदग भरग सापारों में क्रम से अवसि्थिन बतलाया गया। [द्वितीय में] एक ही हाथ अनेक पकजिन [ एक ही स्थान पर इकट्ठे] पदार्थों में क्रम से [निवृत्तिशाली] बनलाया गया। क्योंकि अधर और कन्दुक यहाँ निवृत्ि विषय के रूप में [एकत्रित ] महन रूप में विद्यमान हैं। [तृतीय से] अभिमारिकाएं और सिरकट्टियाँ अनेक स्वमान की हैं बर [अलग भवग समय में रहने वाली सत.] अर्सदन है, साथ ो एक राजपथ रूपी आधार क्रम से संचारयुकत बतलाई गई है। [चतुर्थ में ] मुखल्पी एक हो नाश्रय में मुग्धात्व आदि के वाचक शब्दों के वर्गे और पत्नीत्व आदि के वाबक शम्दों के वर्ग जो वर्गत्व के कारण परसर सहत तथा अनेकरूप हैं क्रम में विषमान बनलाए गए है।
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विमर्शिनी एकनित्यादि। इृदमिति पर्यायलचणभ्। तहेव व्याषष्टे-एकमित्यादिना। एक इति दितीयापेपया। अवश् हो पर्यायी। न पुनरेक एूच। सामान्यलप्षयोगाव। अत एव काव्यप्रकाशकृता परथगेती लचिती। यदाह-'एकं क्रमेगानेकस्मिम्पर्यायः' हूति, 'अन्य स्ततोऽन्यथा' इृति च ग््धवता रनयोरचान्यस्यान्यथा अहणेन कमान्यथा भावोपि प्रसक इति दूषगोसतावनयैवं लक्षण कृतम एवं कमेणैकमनेकन्नान्यथा वा पर्याय' इश्यपि न समुख्चितं त्स्वैव प्रवोननं दुर्शयति-नन्वित्यादिना। किमर्थमिति। विशेपालंकारेणव तत्पतीसिसिद्धेः। अर्धादिति। पारिशेप्यात्मकासामर्थर्यादिव्पर्थ1 सेनेति। क्रमयोगपचयस् वरूपरवेनेयर्थः। तव इति। विशेपात। तयेत्यादि। अन्नापि कमग्रहृणरय प्रयोजनं दशवति-नन्वित्यादिना। अत एवेति। विशेषसमुचचय चोर्यागपद्यसभवाद। अन्वर्थ निति। 'परावनुपात्यय हण' हृत्यनेनातुपात्यये ग्यमाने घजो चिहितत्वादू। अतश्रार्येव कमार्थामिघायित्वाकसोऽपि प्रृथगलंकारतया न लक्षणीयः। अथावारोहावरोहयोरधि- कयो: मतीतिरस्तीति वुरमेवास्य पुथरलसणसिति चेठ्। एवं तर्वयाधारधियार्ना परस्परं विलस गर्वास्यासप्य लंकारान्तरप्रणयन स्याय। सयोतप्यधिकयो। पर्याये समवा्। न चान तावकश्िदृतिशय उपलभ्बते, बेन पृथगलंकारश्वमपि स्यात्। एवमारोहादिना यदत वैलकण्यमवणग्यते तद्ेतलेदत्वे निमित्तम्, न पूनः पृथगलंकारतायाम। एकस्यानेकब्र न्यया वा क्रमेणावम्धानाव्वतय सामान्यकप्तपरयामाप्यतुगभावू। एवं- 'यदेकस्माशिवृत्तोड्यं आधारान्तरमाध्रयेव। स पर्षायो निवृत्तौ तु क्रमोडयं बहुषा स्थिता॥' इत्यपि पर्यायादस्य पृथषमत्वे निमितं न वाच्यम्। निवृषय निवृस्ोविच्छत्तिविशेष- स्वामवात्। तत्मादृत्व पर्याय एवान्तर्भावापृथरलक्षणप्रणयनं नवनवालंकारप्रदुर्शन हेवाकमात्रमेवेत्यलं बहुना। ननु चकाने करूपस्य वस्तुनोऽन्यत्र प्राप्ते: परिवृततिरचार्यं कि नत्याशस्याह-विनि- मयेत्यादि। संहतरूप ति। संघातल्प इा्यरथा। अरेति शब्दसामान्यमचल्योकम्। असंदते इति। आध्रयाणामनेकरात्। क्रमेगेति : हृदयाधनुकमान। एवमप्येकत्यैंव कालकूट- स्योत्रोत्तराधिकस्थानासाद नादारोहणवतीतिः। अवरोही यया-'शिरा शार्व स्वर्गात्' इत्यादि। मत्र गङ्गनया उत्तरोस्तरस्थानासाशनम्। संहते इति। अधरकनदुकादेरनेकस्याश्रय त्वात्। कमवर्तिन्य इति। अमिसारिकाशिवानामतीतवर्तमानकाला वच्छ्रिसत्वाद। सुग्घत्वा दीनां बहुस्ताद वर्गखम्। एकम् इत्यादि। इदम् यह=पर्यापलक्षण। उसी की व्याख्या करते हैं-एकम। एक= द्वितीय की अपेक्षा। इसलिए पर्याय दो हुए, पक नहीं, क्योंकि इसने सामान्यलक्षण नहीं इनता। इसीलिए काव्यमकानकार ने इनके रक्षण अलग अलग किए हैं। एक कम से अनेक में [ एक] पर्याय होता है' दस प्रकार एक का लक्षण बिया है और 'दूसरा पर्याव उस्ष [ प्रथम ] से उलटा' इस प्रकार दूसरा लक्षण। ग्रन्थकार ने इसके विपरीत यहाँ इन दोनों का जो इस प्रकार मिलित लक्षम बनाया है वह इस दोप की शंका से कि दूसरे को अलग दतलाकर यदि पयम से उलटा मतलाया नया तो [ एकता और बनेकता के उलटाव के साथ ही] कम में मी उलकब को संभावना होने लगती [ जबकि नम दोनों में समानरूप से अवस्थित रह्ता है]। इस प्रकार [रत्नाकरकार द्वारा दनाया गया। 'कम से एक अनेक में या उलटा पर्याय [ कहलता है]' यह रक्षण मी
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ठोक नहीं है। उम। कम] का प्रयोजन बनलाने है-ननु० हसादि पक्ति के द्वारा। करिमर्थम्= विरेपालकार से ही उसकी प्रनीति हो सकनी थी तब इसे क्यों अलकार माना गया। अर्थास्= पारिशेष्यरूपी मामर्थ्य से। तेन= उससे म न्रम और यौगपष मे। ततः= उससे = विशेष से। तथा= यहोँ भी कमशब्द अपनाने की आवश्यकता बतलाने है-'ननु'। अत पुव=इसी दिए=विशेष और समुच्चय में योगपध रहने में। अन्वर्यम्= साथक= क्योंकि 'परि ठपमर्गूरबक इण् धातु से अनुपात्यय [= परिपाटी=क्रम] अर्थ निकन रहा हो तो 'इणप्रत्यय होना है। [पा० सृ० ३।३३८ 'कमप्राप्तस्वानतिपानोऽनुपात्यय 'काशिका] इस मूत्र से अनुवात्यय अर्थ की व्यंजना में इण प्रत्यय के विधान से पर्यायशष्द वना है। इस प्रकार पर्यायशब्द क्रम का वाचक है- फळन [ रत्नाकरकार के] कमारकार को मी मलग से अल्कार नहीं दनलाना चाहिए। यदि कहें-'यहाँ [क्रम में] आरोह और अवरोह ये दो तन्व प्रनीति में अधिक मामिन होंने हैं अतः इसका पूथकू अल्कार के रूप ने लक्षा ठोक ही है' [उत्तर, तो] ऐसे नो आधार और आवेय में मौ परस्वर में विलसनाए रहती है, तब उनमें से भो एक एक के आधार पर स्वतन्न्न अदंकारों के लक्षग बनाने चाहिए, उन आधाराधेयों] में मो [आपके द्वारा स्वीकार] पर्याय के अन्तर्गन प्रत्येक के प्रति प्रत्येक दूमरे को अधिक माना जा सकता है। फिर इस [क्म नाम मे अमिहित अभकार के आरोह अव रोह] में कोई चमरकार भेद मी नहीं दिखाई देता, जिसमे इसे ृथक अनंसर माना जाए। यदि आरोह आदि को लेकर कोई विशेता दिसाई देती हो तो उसमे क्रम पर्याय का भेद ही सिद्ध हो सकता है, पृथक अलकार नहीं। पर्याय का 'क्रम से एक का अनेक में रहना था इसमे तलंटे अनेक का एक में रहना' इस आशय का जो सामान्य लक्षग [आपने बनाया] है वह दोनों में हो लागू हो जाता है। इस कारण [ रत्नाकरकार द्वारा]- 'किमो के एक मे हट कर दूसरे आधार में पहुँचने से पर्याय, लौर अनेक बार हटने मात्र से क्रम होता है।' इस प्रकार मी क्रम को पर्याय से अलंग बतलाने में जो निमित्त बतलाया गया है वह अकिनित्कर है। निवृत्ति और अनिवृत्ति मे चमरकार में कोई अन्तर नहीं आता। इमकिए बव इमका पर्याय में अन्तर्मान हो सकता है ता र्वनन्त्र अरकार के रूप में अलग लक्षण बनाना और कुछ नहों केवन नए नए मठकारों के अदर्शन की हवस मर है। इस विषय में इतना ही कइना पर्याप है। चंका होनी है-'अनेकरूप वस्तु की अन्यन् प्राप्ति होने से [पर्याय का] यह [भेद] परिवृत्ति स्वरूप दी है'-इम पर उत्तर देने हैं-विनिमय। संहवरूप = मघानात्मक। अस्य= इम [पर्याय] के [चार भेद है यह पर्याय] श्रब्द की समानता को लेकर कहा [ क्योंकि दोनों पर्याय तर्वन भिन्न है]। असंहसे=अलग अछम=आाश्रयों के अनेक होने से। क्रमेग=हृदय आदि के अनुक्म से। इनने पर मो सत्य है कि यहाँ [ रनाकरकार द्वारा प्रतिपादिन ] आरोइण की पतीति होतो है क्योंकि यहाँ एक ही कालकूड को उत्तरोतर अधिक ऊंचे स्थान की प्राप्ति हेती है। अवरोह का उदादरण [मर्तृदरि का ] यह [प्रसिद्ध] पध है- 'शिर- जार्वं स्वर्गात्०।' यहा गह्ा जो का उत्तरोचर [अवर ] स्थान प्राप्त करना वर्गित है। सहते= पकनिन- अधर कन्दुक आदि अनेक आश्रय रूप से सहत हैं। क्रमवर्ततिन्य =क्रमसे युक्त=क्षोंकि अमिसारिका और सिरकट्टियां अतीत तथा वर्त्तमान काल की वस्तुए बनलाई गई है। सुग्धत्व आदि में वर्ग इमकिए है कि पकाधिक है।'
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पर्यायालङ्कार: ५६९
विमर्श-पर्यायालकार का इतिहास- पर्याय को अलंकार प्रथमतः स्द्रट ने ही माना है। बन्होंने इसके दो भेद किए हैं, जिनमें से प्रथम पर्यायोकतालंकार के अन्तगंत माता है। द्वितीय का रूप वर्तमान पर्याय से अक्षरयः मिलता है। वह यह है- 'यन्रैकमनेकस्मिन्ननेकमेकन वा क्रमेण स्याद। वस्तु सुखादिप्रकृति कियेत नान्य: स पर्यायः ॥ ७४४॥ 'जहाँ सुखादिस्वरूप एक वस्तु अनेक में अथवा अनेक वस्तु एक में कम रहे या रखी जाए तो वह पर्याय कहलाता है।' इस प्रकार चार भेद हैं [ १] कर्षृरूप एक वस्तु का अनेक में रहना [२ ] कर्तुल्प अनेक वस्तु का एक में रहना, [३] कर्मरूप एक वस्तु का अनेक में रहना तथा [४] कर्मरूप अनेक वस्तु का एक में रहना।' सद्रट ने इसके उदाहरण दो हो दिए है, किन्तु उनमें चारों भेद गतार्थ हो जाते हैं। उदाहरण ये हूँ- 'कमलेपु विकासोडभूदुदयति मानावुपेत्य कुमुदेभ्यः। नभसोडपससार तमो बभूव तरि्मित्रयालोक: ।।'
'सूर्य उगते ही कुमुदों से हटकर विकास कमलों में दिखाई देने लगा इसी प्रकार ाकाश में बन्धकार हटा और प्रकाश आया ॥।' इसमें प्रथमार्ध में कर्तृरूप एक विकास की स्थिति कुमुद और कमल रूप अनेक आधारों में दिखलाई गई है जब कि अपरार्ध में कर्तृरूप अनेक अन्धकार और मालोक की स्थिति एक ही साकाश में । इस प्रकार यह एक पद्य कर्तुमूलय दोनों भेदों का उदाहरण हुआ। 'मच्छिद रिपोर्लक्ष्मी: कृता त्वया देव मृत्यभदनेपु। दस भयं द्विपदभ्यः पुनरमयं याचमानेभ्यः॥ हे राजम् ! आपने लक्ष्मी को शत्रुओं से छीना कर भृत्यों के भवनों में वसा दिया है। इसी प्रकार शत्रुओं को द्वेप करने पर मय तथा याचना करने पर अभय प्रदान किया है।' यहाँ प्रथमार्ध में ही लक्ष्मीरूपी कर्म को शत्रु और भृत्यभवन रूपी अनेक आधारों में वतलाया गया है। इस्ी प्रकार उत्तरार्ध में शत्ु रूपी एक ही आधार में मय और अमय रुपी अनेक कर्मों का अस्तित्व बतलाया गया है। फलतः यह पद्य कर्ममूलक दोनों पर्यायों का उदाहरण है। मम्मट और रत्नाकरकार के पर्यायलक्षण विमशिनीकार ने यहीं उद्धृत कर दिए हैं। रत्नाकर का पर्यालक्षण यथासंख्य के प्रकरण में भी दिया जा सुका है। मम्मट ने उदाहरण के रूप में सर्वस्वकार द्वारा उडत 'नन्वाक्रयस्थिति' पद्य ही पस्तुत किया था। शोमाकर के बाद के आचार्यों के पर्यायनिरूपण इस प्रकार हैं- अप्पयदीसित-'पर्यायो यदि पर्यायेणकस्यानेकसंश्रयः ।' 'एकस्मिन् यधनेकं वा पर्यायः सोडपि संमतः ॥' पण्डितराज-१ कमेणानेकाविकर णकमेकमावेयमेक पर्यायः । २ कमेगाने काधेय कमेकमधिकरणमपर: विश्वेश्वर-'एकमनेकमनेवकरिमिन् क्रमतोऽस्ति स पर्यायः ।' इन सभी लक्षणों का अर्थ वही है जो सवस्वकार के लक्षण का है। केवल विश्वे श्वर ने दोनों
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पर्यायों को एक ही सूत्र में रखकर कदाचिन् यद सिद्ध करना चाहा है कि ये दोनों दो पृथक् पृथक नहीं, अपितु एक ही है। मजीविनीकार की निष्कृशर्थकारिका इम पर यह है- 'पर्याय पकोनेकस्मिलेकनानेके इत्यपि। द्विया कमवशादेती न विशेषममुच्चयौ।। नेय विनिमयामावात परिदृत्िमिदा सिवद। चनसोडनेकरूपस्य पृथक समानवर्तनाव।। पृथक मघानसृतित्वादनेकोर्डमों द्विया स न। आावाराधेयमावसयर्चनस्रोऽम्य मिदास्तन ।।' 'पर्याय अल्कार वह होता जिसमें क्रम से अनेक एक में अथवा कमसे ही एक अनेक में स्थित दिसलया नाना है। क्रम के कारण यह न विशोपाटकारस्वरूप है और म समुच्चयस्वरूर। इममें विनिमय का अमाव रहना है इसलिए यह परिवृत्तिस्वरूप मी नहीं ठदरता । इसमें चार भेद होते हैं कदोंकि इसमें अनेकरूप अर्थस्धात में नहीं रहता है। तब एक भेद स्वनन्त्र नेह माना जाता है, और जब रहता है तब एक स्वनन्त्र भेद। इभी के साथ यह अनेक अर्थ सन. आवार रूप होता है और आधेयरूप। इम कारग इमके केवल चार ही भेद होने हैं। स्पष्ट है कि सुदट के चार मेदों की अपेक्षा सवखकार के चार भेद अधिक मजानिक हैं। सट्ट के भेदों में कर्नुकर्मभव को आधार माना गया है जबकि सवस्वकार के भेदों में आधार और आधेय को सननात्मकन। और अरुघतात्मकता को। कर्तुकर्ममाव अर्थप्रकृतिगत धर्म है जबकि सघातासवात- मात्र पररिम्थिति जनिन विरेषताएँ। अनकार परिस्थिति पर अधिक निर्भेर रहते हैं। इसके अतिरिक आधारधियमाव के साथ कर्तकर्ममाव को जड देने से व्याकरणनत्त्र को प्रमुखना मिळती है, काव्यनत्वर को नहीं। मम्मट आदिने ये भेद स्वीकार नहीं किए। वस्तुन इन अवान्तर सूक्ष्मताओं को मौन्दर्य का प्रतिमान मानना हृदयस्षमन नहीं कहा जा सकता। पाठभेद-पर्यायालकार के जो दो अलग अलग रूप है उनमें से प्रत्येक के लिए वृत्तिकार ने इम प्रकार मलग अलग वाक्य बनाए है- [१]यरुमाधेघमनेकस्मिन्नाधारे यत तिप्ठनि स एक पर्याय। [२ ] ए क स्मिननाधारेडनेकमावेय यव स द्वितीय पर्याय। इनमें से निर्गेयसागरीय संस्करण में प्रयम वाक्य तो उृत्ि रूप में हो छपा है, किन्तु द्वितीय के सुदाकर स्थूट है अत वह सून-ा में छपा प्रतोत होना है। संजीविनीकार, विमर्शिनीकार, सनन्तरायनसस्करगकार, काशोमस्करणकार तथा कुमारी जानकी ने इस वाक्य को धृत्ति रूप में ही स्वाकार किया है। डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी के +स्करण में टिप्पर्णी में तो इमे वृत्ति हो माना गया है परन्तु मूल में सूरूप से अल्ग वन्ग सूत्र मख्या और स्मूलाक्षरों में छाप दिया गया है। वस्तुतः यह वेमा हो अम है जेसा सूत Y के विषय में हुआ था। उसे तो इन सभी प्रकाशकों और मस्कर्नाओं ने वृत्ति रूप में ही प्रराशित कर रसा है। विमर्शिनी में-'कनेणैकमनेरवा्यथा वा पर्याय हत्यपि न समुचितम्' के अन्तिम तीन पद निर्णय नागरमंस्करण में 'हत्यपि सूचितम्' इसी रूप में छने है। अर्थसंगनि तो इम मुद्रण में मी संभव भी किन्नु उममें कश्पना को अविक स्थान देना पढता, उसके साथ [न समुचिनमिति] पूरक वाक्य नोड़ना पढता अन- इमने समत्या पाठ बदल दिया है।
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[सर्वस्व ] [सूत्र ६२]समन्यूनाधिकाना समाधिकन्यृनेविनिमय: परिवुचि:। चिनिमयोऽन किंचित् त्यक्त्वा कस्यनिदादानमू। समेन तुत्यगुणेन त्यज्यमानेन ताटशस् वावानम्, तथाधिकेनोत्कृष्गुणेन दीयमानेन न्यूनस्य गुणह्ीनस्य परिग्रहः एवं न्यूनेन हीनगुणेम त्वज्यमानेनाधिकशुणस्यो र्कष्टस्य त्वीकार, तदेपा निप्कार परिवृत्ति। क्रमन्नतिभाससंभवात पर्या पानन्तरमस्या लक्षणम्। ससपरिवृित्तिर्यश- 'उरो दतवामरारीणां येन युद्धेष्घगह्यत। हिरण्याक्षववाद् येपु यश साकं जयश्रिया।।'
'किमित्वपास्थाभरणानि यौवने घृत त्वया वार्धकशोभि चल्कलम्। वह मदोपे स्फुटचन्द्रतारका विभावरी यद्यरुणाय कल्पने॥।' अन्नोत्कष्टणुणैरामरणैर्न्यूनगुणस्य वत्कलस्थ परिवृत्ति:। न्यूनपरि वृत्तियथा- 'तस्य च प्रतयसो जटायुप: स्वर्गिणः किमितर शोच्यते बुधै।। येन जर्जरकलेवरव्ययात् क्रीतमिन्दुकिरणोज्जवलं यश:॥' मत्र हीनगुणेन कलेवरेणोत्कृष्टशुणस्य यशलो विनिमयः। 'दत्वा दर्शनमेते मत्माणा वरतनु त्वया क्रीता। किं त्वपहरसि मनो यहदासि रणरणकसेतदसत्।।' अन्नाद्यार्घे समपरिवृत्ति:। द्वितीयार्ध न्यूनपरिवृत्ति:। [चूत्र ६२ ]सम, न्यून और अधिक का सम अधिक और न्यून से विनिमय परिवृत्ति [नामक अलंकार कहलाता है]। [वृत्ति] विनिमय का अर्थ है यहाँ कुछ छोढ़कर बुछ लेना। [१] सम अर्थाव समान अहता के पदार्थ के त्याग के द्वारा ैसे हो पदार्थ का आदान, [२] इसी प्रकार अधिक अर्थाव उत्कृष्ट शुण या अधिक अहता के पदार्थ के दान के द्वारा न्यून अर्थात हीनगुण या न्यून महता के पदार्थ का आदान तथा [३] न्यून अर्थोव हीनगुण या कम म्हता के पदार्थ के त्याग के द्वारा अधिक गुण भर्थात् वत्कृष्ट पदार्थ का आदान, इस प्रकार परिवृत्ति तीन प्रकार की होती है। इसमें भी क्रम का प्रतिमास होना संभव है हसलिए इसका लक्षण पर्याय के पश्चात् किया गया। इनमें से समपरिवृत्ति, यथा- 'हिरण्याक्ष के वध ते, जिन सुद्धों में जिसने उर देकर राक्षसों का यश जयमी के साथ ले लिया था।'[ काव्यालंकारसार के टीकाकार प्रतीहारेन्दुराज ने 'डरोवचवा' की लोकोकि माना है। बौर अपनी छाती शब्ु के सामने खोल देता है यही उसका जरोदान है। काचित् यहाँ 'दा का अर्थ विदारण करना है। इस सर्थ में दान=देने विदारण करने में दलेश मानना दोगा ]। यहाँ डर और यश गुणों में समान हैं।
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अधिक परिवृत्ति, यथा- 'इस योवन में तुमने विविध आभूषग छोड, वार्थवय में शोमा देने वाले वल्कल क्यों पदन रसे है। तुम्हीं कहो। यदि सिले चन्द्र तारों की [मध्य] राधि मरुणोदय के लिए प्रयत्न करे।' [ कुमार० ५] यहां वस्ृष्ट गुण वाले आभूषों से न्यून गुग वाले वल्कलों की परिवृत्ति [अदलाबदली] है। न्यूनपरिवृत्ि, यथा- 'उम बहुत अषिक उमर वाले जटायु के स्वगें सिधारने से विद्वानों को दु.ख ही कयों ोगा जिसने जनंर शरीर के व्यय से चन्द्रकिरणों जैसा सुन्दर यश अजित कर टिया।' यहॉँ हीनगुण वाले शरीर से उत्कृष्ट गुग वाले यश का विनिमय बनलाया गया है। 'हे सुन्दरि' तूने दशन देकर मेरे ये प्राग सरीद लिए [सो ठीक किया] किन्तु मन को हरण कर जो तुम उत्कण्ठा दे रही हो यह ठीक नहीं है।' यहाँ पूर्वार्थ में समनरिवृत्ति है और उत्तरार्े में न्यून परिवृत्ति ॥ विमर्शिनी समन्यूनेत्यादि। पतदेव व्याचष्टे-विनिमय इत्यादिना। तादृशस्येति। सुक्यगुणस्पेश्यर्थः। अतथान् द्वयोरपि तुक्य गुणर्वान् स्वऽयमान।दीयमानयोगग्यमानमौपम्यम्। एवं च तवि मित्तस्य माधारणवर्मर्यापि मैविध्यम्। अधिकर्वं न्यूनरं चोरष्टव्वानुरृष्ट्वयोगातू। अतथ्रात्र शव्दोपात्तमेतद् भवति कचिग्सामर्थ्यम्। तदिति विनिमयस्य त्रिरुपरवाद्। क्रमप्रतिमामेति। त्यागादानयो: पीर्वापर्यण क्रमिकरवान्। तुत्यगुणत्वमिति। बैपुल्यादिना साधारणघर्मस्यानुगामितया पुनरत् तुत्यगुगरवम् यथा- 'सधावदातं पाण्डुरं विनिधाय कपोलयोः। मीर्यर्कथोरया दघणां निशेषमकरोद् यशः॥' सुधावदात्तमित्यस्यानुगा मिखम्। निम्ब प्रतिविन्वभावो यथा- छतानामेतासासुद्दित कुसुमाना मरुइसौ मतं लाशयं दच्वा श्रयति मशमामोद्मसमम्। लतारत्ध्वन्यानामहद रस्मादाय रमसादृद श्याधिष्याधिभ्रम रुद्वितमोहग्यतिकरम् अत मतत्वासमत्वयोर्विग्वमतिवित्व माकः। शुठ् सामान्यरुप्व यथा- मनोहर ववं प्रतिवेतनाय दत प्रकसप्योन्मदचित्तहारि। मध्बाददानो मधुपामिलोक पझ्माकरणामनृगी यभूद ।' मत्र मनोहरखचित्तहारिखयो: शुद्धसामाम्यरूपध्वम्। आाभरगाना पायोेटृषवं चस्तुसामर्ध्याप्म्यते। वत्कलस्य पुनर्वार्धकशोभीश्यनेन रवयमेव न्यूनस्वमुकतम्। पुवं कलेचर यशसोरपि जर्जरोउज्व द्रश्वेन न्यूनाविकत्वमुक्म्। पतचास्य मच्येरप्युक्तमिति बद्टोदाहरणेडपि समपरितृत्यादि योजयति-द्र्वेत्यादिना। समन्यू नादेश्यादि। इसी की व्याख्या करते है-'विनिमय' इत्यादि के द्वारा। ताटशस्य= वेमे-तुक्ययुग वाले। इसी वारण यहाँ छोडे जाते औौर लिए जाने पदार्थो में सादृश्य गम्य रह्वा है क्योंकि इन दोनों में गुणगत तुल्यता रहती है। इसी कारण शुण निमिचक साधारणप्मे मी तोनों प्रकार का होता है। अधिकत्व और न्यूनत् यहाँ शुगगत उत्कृष्टत्व और अनुरकष्टतव के
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योग से होता है। इसीलिए यह प्रायः सब्दतः कयित हो रहता है, यदपि कहीं वाक्यार्थसामर्थ्य से मन्य भी होता है। तत = एस कारण अर्थात विनिमय के तीन प्रकार के होने के कारण। कमप्रतिभास-कयोंकि त्याय और न्रहण में पौर्यापर्य रहता है अतः ये क्रमिक होते हैं। तुल्य- गुणत्च = मेंपुष्य विश्ञालत्व आदि को लेकर [यश और वक्ष दोनं विशाल होते हैं]। साधारण धर्म की अनुगानिता के कारण जव यहाँ शुगगत समानता रहती है उसका उवाहरण- 'छुई मिट्टो जैसी उज्जवल सफेदी कपोलों में आहितिकर [जिसके] यश ने जिसकी चर्चा से -- उत्पन्न मय को समाप कर दिया। यहोँ [ भय और सफेदो के साध्म्यं में ] सुधावदातत्व= छुई मिट्टी सी उज्जलता अनुगामी धर्म है। चिम्वपतिविन्मावमूलक साधारणधर्म यथा- 'यह पवन इन कुसुमित लताओं को अभिमत लास्य देकर पर्यात् मात्रा में अद्वितीय सौरम ले रहा है। मिन्तु बड़े दुःख की बात है कि लताऐँ पान्यों की आँखें लेकर सहसा आधि, व्याधि, चक्र, रोदन, नुर्च्छा आदि एक साथ देती हैं।' वहाँ[ लास्य और सौरम के साधर्न्य में मतत्व ] अभिमतत्व और [असमत्व] अद्वितीयत्व धर्मों में विन्तमतिविन्वमाद है। गुद्धसामान्यक साधारण धर्म यथा- भभूत्य के रूप में अपना मनोहर गुंजन देकर उन्मत चिसों को आकट करने वाले मधु ले रहे मधुकरों ने पच्माकरों से उरिणता प्राप्त कर ली "' यहाँ मनोहरत और चित्तारित्व शुद्ध सामान्य धर्न हैं [ नधु और गुंजन के सान्य में ]। [किमित्य पास्या-पद्य में] आमरर्गों की उत्कृष्टता पदार्थसामर्थ्य से विदित होती है, किन्तु वरकलों की न्यूनता 'वार्धकशोमि'= 'वार्धकय में शोभा दैने वले' इस विशेषण से [कवि ने ] स्वयं ही कद दो है। इसी प्रकार [तस्य प्रववसो० पद्य के ] कलेवर [शरीर ] और य के न्यूनगुणत्व और उत्कृष्टत्व जरजर तथा रज्जल शब्दों के द्वारा कह दिए गए हैं। ये [ न्यूनत्वादि वामन तथा उन्जट इन सद्रटपूर्ववर्त्तो] पचीन आचार्यों ने भी वतलाए थे [ किन्तु रुद्ट ने नहीं अतः] रुदट के [परिवृत्ति-] उदाहरण में भी समपरिवृत्तित्व आदि धर्म दिखलाने के लिए लिखते है 'दत्वा' इत्यादि ॥ दिमर्शं-परिवृत्ति का इतिदास दण्डी-के काव्यादर्श में परिवृत्ति का उच्लेख मात्र है लक्षण नहीं। उसमें उदाहूरण के रूप में निन्नलिखित पद्य दिया है- 'शस्त्रप्रहारं ददता भुजेन तद भूसुजान्। चिराजित हतं तेर्षा यज्: कुमुदपाणडुरम् ॥५६॥ 'आपके राजाओं को शस्त्र प्रहार दे रहे वाड ने उनका चिरार्जित कुमुदतुत्य उज्वल यश हरण कर लिया!' मामहः='विशिषवत्य यदादानमन्यापोहेन वस्तुनः । अर्थान्तरन्यासवती परिवृततिरसौ यथा ॥ ३४१॥ प्रदाय वित्तमविभ्य: स यश्ोषनमादित 1 सतां विश्वजनीनानामिदमरसलितिं न्रतम् ।३४२। 'अन्य वस्तु के त्याग के द्वारा जन्य विशिष्ट वस्तु का जो सादान उसे परिवृत्ति कहा जाता है: यह अर्थान्तरन्वास से मी युकत रहती है। यथा- 'याचकों को धन देकर उसने यशोराशि अर्जित की। यह सभी सतपुरुषों का अचूक व्रत है।
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मामह के इम विश्लेषा में न्यूनाविरुमाव की व्यजना है। वामन इसे पकड लेते हैं। वामन-[सूत्र] 'ममविसट्साम्या परिवर्तन परिवृति ॥४।३१६॥ [शृत्त] समैन विसटशेन वार्येन अर्थस्य परिवर्तन परिवृत्ति। यथा- मदाय कणकिस्यमियमरमे चरणमरुणमर्पयनि। उमयो. सदृशविनिमयादन्योन्यमवञित मन्ये ॥ [ मालविकाग्निमित्र] विमुच्य सा हारमहार्यनिश्चया विलोष्ट्यष्टिप्रविनुसच-दनमू । वबन्न वालारुणवभु वरकलं पयोधरोत्मेघविद्तीणसंदति ॥[कुमारसमब-] समान या मसमान अर्यो द्वारा अर्थो का परिवर्तन परिवृत्ि कहलाता है। यथा [अग्नि- मित्र की उकि ]- [अशोकदोहद सम्पन्न कर रही] यह [मालविका] इसमे ानमें लगाने यो् कपल लेकर अपना यावकरजित अरग चरण दे रही है। दोनों का सौदा अनुरूप रहा, अतः दोनों को मैं घाटे में रहा नहीं मानवा।'यहा माकूविका का चरण और अशोक का किसरय समान महता के दै, अतः सद्ृस िनिमय हुआ। अहार्यनिश्चया उस [पार्वती ] ने हार को अरग कर दिलती रालकाओं द्वारा चन्दन मिटा देने वाला, बालसूर्य सा पिशग वर्ण का वच्छल बाँधा, पयोधरों के उठाव से जिसकी शुलाकाओं का जमाव विरल हो जाना था।' यहाँ हवार और वक्कल असमान हैं। उन्नट = ने 'सम न्यून अधिक' इन तीन गुगमान मेदों तथा 'इट और अनिष्ट' इन दो अथगन विशेषताओं में परिवृत्ति का स्वरूप अविन किया है- 'सम न्यूनविशिषटस्तु कम्यचित् परिवर्तनम्। अर्थानयस्वमाव यव परिवृत्तिरमाणि सा ॥'५१६। समपरिवृष्ि का उदाइरण-'उरोदत्वा०' पद्य ही। न्यूनपरिवृत्ि-
रत्नैरापूर्य दुग्धान्ति य. समादृत्त कौस्तुमम्॥ 'नेती बने सर्पराज के द्वारा वलपू्वरक घुमाष जा रहे मन्दराचल के शिखरों से गिरे रत्नों द्वारा दुग्धाब्धि को मरकर जिसने कौसतुममणि ग्रहण की ।' यश निकृष्ट रत्नों के दान द्वारा कौम्तुम- नामक उत्कृष्ट रत्न लिया गया अत न्यूनपरिवृत्ति हुई। अधिकपरिषृत्ति-'यो बलौ व्यासमूमीम्नि मखेन या जिगीपति। अमय स्वर्गसअम्यो दत्वा बग्राइ सर्वत्राम् ।' जिसने, बलि जम भूसीमा को व्याप कर स्वर्ग यशदवारा जीनना चाह रहा था, तब देवताओं को अमय देकर वामनत्व ग्रहण किया।' यहाँ अमय एक विश्िष्ट वस्तु जिसकी तुलना में छोटापन [वामनत्व] तुच्छ वस्तु है। इम प्रकार यहां वत्कृश्टता देकर निम्नता का अ्हण होने से अधिकपरिकृत्ि हुई। सुद्रट-ने समासमत्व आदि पर वन् नहीं दिया और परिवृत्ति का लक्षम सामान्यत इस प्रकार किया- 'युगपद् दानाबाने अन्योन्यं वस्तुनो: कियेते यद। ववचिद्पचयेंे वा मसिद्धित: सेति परिवृतिः ॥७७७।
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परिवृत्त्यलद्गार: ५७५
वस्तुओं का एक साथ जो दान मौर आदान वस्तुतः किया जाता बतलाया जा रहा हो अथना प्रतिद्धि के आधार पर लाक्षणिक रूप से तो वही परिवृत्ति कलाता है। उदाहूरण 'दत्त्ा दर्शन०' पद्य। यहां प्राणों की खरीद और मन का हरण पसिद्धि पर निर्भर और औपचारिक तथ्य हैं। मम्मट-'परियतिर्विनिमयो योडर्थाना स्याव समासमैं: "' पदार्थो का विनिमय परिवृत्ति कहलाता है। यह सम के द्वारा सम का और असम के द्वारा असम का [इस प्रकार ते] हो सकता है। उदाहरण=सम से सम और असम में अधिक से न्यून की परिवृत्ति के लिए 'लताना- मैतासा' पद्य। और न्यून से अधिक की परिवृत्ति के लिए निम्नलिखित पद्य- 'नानाविधे: मरहरणैनृप संप्रहारे त्वीक्ृत्य दारुणनिनादवतः प्रहाशन्।
हे राजन् । वुद्ध में नाना प्रकार के अस््रों से दारण निनाद वाले प्रहार अपना कर दृक्ष शत्रु वीरों ने आपको यह विप्रलम्मदीन आइलेप वाली वसुन्धरा म्दान की है। यहॉ प्रहाररूपी निम्न वस्तु लेकर वसुन्धरा जैसी उत्कृष्ट वस्तु के दान का वर्णन होने से परिवृत्ति अधिकपरिवृत्ति कहलाएगी। सर्वस्वकार के परवर्ती आचार्यों ने परिषृत्ति का निरूपण इस प्रकार किया है- शोभाकर='विनिमयः परिवृत्तिः ॥ सू० ९० ॥ विनिमय परिवृत्ति कहलाता है। लौकिक विनिमय का इस विनिमय से अन्तर बतलाते हुए रत्नाकरकार ने लिखा है-'लोक में देकर लेने का विनिमय माना जाता है जब कि यहाँ त्यागपूर्वक अपनाने को भी विनिमय कहा जाता है और उपकार पर किए गए प्रत्युपकार को मी।' परिवृत्ति की भेदगगना भी रत्नाकरकार ने अपने ढक से की है। सर्वस्वकार द्वारा प्रति पादित सम, न्यून तथा अधिक ये तीन भेद रत्नाकरकार से प्रथम '्यागपूर्वक आदान'-नामक वर्ग में गिनाए हैं। कृतप्रतिकृतनामक द्वितीय वर्ग में उन्होंने 'भनमीष्ट वस्तु मिरुने पर अनमीष्ट कार्य करना' तथा 'अमीष वस्तु मिलने पर अमौष कार्य करना-'ये दो भेद वतलाए हैं। इसमें मी, उन्होंने समत्य, न्यूनल तथा अधिकत्व नामक तीन कोटियाँ मानी है अन्ततः परिवृत्ति के मुख्य तीन दो शीर्प स्वीकार किये हैं सम, न्यून तथा अधिक। रत्नाकरकार ने लाभ और हानि के विनिमय में विषमालंकार माना है- 'दोपे च दोपस्य गुणे च सस्य कने कृतिः स्यात् परिव्ृत्तिरेव। गुणे तु दोपस्य विपयचे वा यद्गोचरोइसौ विषम: स भिन्:॥' लाभ और हानि के विनिमय में विषमालंकार मानकर कदाचिव मम्मद के 'उताना मेतासानू' षद् के उत्तरार्ध नें मानी गई परिवृत्ति को रत्नाकरकार विषम नावना चाहत है। उन्होंने मम्मद का यह पद्य उदाहरण के रूप में अपनाया भी नहीं है। सभी भेदों के िए सईया नवीन उदाहरण दिए हैं। अप्पयदीक्षित-का चिन्तन इस दिद्या में कान्तिपूर्ण है। वे समपरिवृत्ति स्वीकार नहीं करते। उनका लक्षण- 'परिवृत्िर्विनिमयो न्यूनाम्यधिकयोमिंय:।' उदा०-'तस्य च प्रवयसो जटायुप:'।
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अलक्रसर्यस्वम् पण्टिनरात-नगगाप के परिवृत्ति चिन्नन में नवीनना मी दे और परिष्कार मी। वे परि १द्ि को सगेद या मोदा मानने है। उनका लक्षग- दरकोयपतन्यिक्वन्सवारानविघिष्ट परसमे स्वकीय यतरत्चदयस्नुस मर्दन परिवृषि:।' कन इनि याववू। अन्य व्यक्ति को कोई वस्तु लकर टमे अपनी अपनी औोहं वस्तु देना परिवृतति बद्लाता है।' मवा अर्थ दुआ कब। इन्दोंने परिवृत्ति का मूसन दो मार्गों में विमक, किया-समपरिवृत्ति तथा विषनपरिवृत्ति। समपरिवृष्ि पव्टिनराज ने दो प्रदार की मानी है, उत्तम पदार्थों से उत्तम पदार्थो की नया निम्न पशार्थो मे निम्न पदार्षो की। विषम परिवृत्ि भी वे दो प्रकार की मानते है रसम से निम्न को तथा निम्न से उरम की। दण्दितराज ने रुक्ग में परकीय-शुब्ध का निवेश कर सबस्कार की इस मान्यता को समान्य ठदराया ह-मय के द्वारा किसी वस्तु का त्याग किया जए और अन्य वस्तु का परिगरह नो उमनें मो परिवृति दोमी है। उन्होंने स्पष्ट गभ्दो में सवस्कार की इस मान्यवा का सण्डन कर उनके द्वारा इम भेद के लिर प्रदस उद्ाहरण 'निमित्यपम्या को मी परिवृतिगत्य बसशया है। वस्तुन, इम पथ में परिपृत्ति का चमस्कार, करम, विपमना का चमरकार अविक दै। इमके अतिरिक इममें दृश्न्नाषकार की मी सष्ट छनि है। पविश्तराज ने यह मो स्पहीकरण दुदशया है कि परिवृत्ि का सौदा वविकस्पित दोना चाहिम। यदि वद लोकिक हुआ सो उमनें अलकारमाव नहीं आा सरेगा। विश्नंधर मे प्रनिगामी मस्तिष्क से प्रसुन परिवृत्ति का सक्षण यह ह- 'मदशासहशेरपैंरयाना विनिमयस्तु परिवृत्ति:।' -'सम विषम अर्थो द्वारा अर्थों का विनिमय परिवृत्ति सलकार होता है। इम प्रकार विद्वेश्वर मम्मट के अनुयायी है। रसगगाधरकार द्वारा दिए गए 'परकीयत्व' विशेषण और उससे दुप सर्वस्व के खण्डन पर विश्वेशवर का ध्यान तो गया है किन्तु वे उस पर कोई टिप्पणी नहों करे। चऋ्रवर्तती की निष्टृ ष्टार्थकारिका यहाँ इस प्रकार को ह- 'परि्वित्तिविनिमयखििया सेयें समादिमिः।' पाठन्तर=विमर्सिनी की 'अवशाम सब्द्रोगसमेनद् मवति' पक्ति निग्यसागरीय सस्करण में 'मतश्ाम सम्दरोपासदपति (१)' इस प्रकार सपादक के प्रश्नचिद् के साथ अशुद्ध मुद्रिन है। इसी पकार 'टजानामेना' पद के वाह 'म्वरसमत्वयो' के स्थान पर इस सकरण में 'लना समरयो.' मुद्रम है। उदाहरग की दृष्टि मे परिवृत्ति के सर्वोत्तम उदादर वामन द्वारा उद्वृन काटिदास के पच है। भेदों के नाम मिन भिन्न मानइण्डों पर किए गए हैं। अधिकपरिवृत्ति या न्यूनपरिवृष्ि का अमिप्राय कमी दो जाने वाली वसतु की उच्तमता से है और कमी ली बाने वाली वस्तु की। वस्तुतः दो जाने वाली वस्नु के हो आधार पर नामकरण उचित है। विनिमय की पहली कडी देना हो होता है।
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परिसंख्यालद्कार: [सर्वस्व ] [ सूत्र ६३] एकस्यानेरुपातावेकव नियमनं परिसंरुया । एकानेकप्रस्तावादिह वचनम्। एकं वस्तु यदानेकम युगपत् संभाव्यते तदा वस्यैकत्रासंभाव्ये व्वितीयपरिह्वारेण नियमनं परिसंख्या। परि अपवर्जने। कस्यचित् परिवर्जनेन कुत्रचित् संख्यान वर्णनीयत्वेन गणनं परिसंख्या। सा चैपा प्रश्नपूर्विका तदत्यथा वेति प्रथर्म दविधा। प्रत्येकं च वर्जनीय- त्वस्य शान्दत्वार्थत्वाभ्यां हवैविध्यमिति चतुमपमेदाः । क्रमेण यथा- 'कि भूपणं सुदळ्मव यशो न रत्नं किं कार्यमार्यचरितं सुकृतं न दोप:। कि चक्षुरप्रतिहतं घिपणा न नेन्र जानाति कस्तवदपर: सदसविवेकम्।' 'किमासेव्यं पुंसां सविधमनवय ुसरितः किमेकान्ते धषेयं चरणयुगलं कौस्तुभसृतः । किमाराध्यं पुष्यं किममिलपणीय च करुणा यदासकत्या चेतो निरवधि विमुकत्यै प्रभवति।' 'भक्तिर्भवे न विभवे व्यसन शालत्रे न युवतिकामारतरे। चिन्ता यशसि न वपुषि प्रायः परिदृश्यते महताम्॥।' 'कौटिल्यं कचनिचये करचरणाधरदलैपु रागस्ते। काठिन्यं कुचयुगले तरलत्वं नयनयोर्वसति॥' अत्र चालोकिकं वस्तु ग्रह्यमाणं वस्त्वन्तरव्यवच्छेदे पर्यवस्यतीति व्यवच्छेद्ं वस्त्वन्तर शाब्दमार्थ वेति नियमाभावः। अलौकिकत्वाभि्रायेणैव क्वचित्प्रश्नपूर्वकं त्र्प्रहृणम् । 'निलङ्गयन्ति श्रुतिवर्त्म यस्यां लीलावतीनां नयनोत्पलानि। विभर्ति यस्यामपि वकिमाणमेको महाकालजटार्धचन्द्र:।।' तथा -'चिमकर्मसु वर्णसंकरो, यतियु दण्डग्रहणानि' इत्यादौ ग्लेप- संपृक्तत्वमस्या अयन्तचारुतवनिवन्धनम्। अमच नियमपरिलंख्ययोर्वाक्य वित्प्सिद्धं लक्षणं नादरणीयमिति ख्यापनाय नियसनं परिसंख्येति सामाना- धिकरण्येनोकिः। अत एव पाक्षिकयपि प्रापतिसत् स्वीक्रियत इ्ृति युगपत्सं- भावनं प्रायिकम्। [सूत्र ६३]एक की अनेक स्थानों में माप्ति होने पर एक सें नियमन परिसंख्या [सलंकार कहलाता है]
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५७८ [बूचि] एक और अनेक वस्तु को लेकर इसे यहाँ बतलाया जा रहा है। एक वस्तु जब अनेक स्थानों पर एक साथ संभावित हो तब उसका किसी एक असभाव्य स्थान पर अन्य का परिहार करते हुए जो नियमन किया जाता है उसे परिसस्या कहते हैं। परि अर्थात् अपवर्जन [या निषेध]। किसी का निषेध कर कहीं जो सख्यान अर्थाद वर्णनीयरूप से गगना करना वह हुई परिसंख्या। यह प्रथमतः दो प्रकार की होती है [ १] प्रदनपूर्वेक तथा [२] उस के विपरीन [ प्रश्नरहित ]। अनन्तर इसमें वर्णनीय की परिहार्यसा शाब्द और आर्य दो प्रकार की होती है, अत भेदों की संरया चार हो जानी है। इन के कमश. उदाइरण- [प्श्नपूर्वक शान्द् परिहायं से युक्त परिसंखया ]- 'संसार में सदृढ़ भूषण क्या है। यश, रत्न नहीं। करणीय क्या है? आयपुरुषों द्वारा किया सुकन, दोप नहीं। अप्रतिहत चक्षु कया है? बुद्धि, चर्मचश् नहीं। [ इस प्रकार ] सद असद का अन्तर आपको छोडकर जानता हो कौन है।' [प्रश्नपूर्वक तथा आर्थ परिदारय से युक्त परिसव्या-] 'पुरुषों के लिए सब प्रकार से सेव्य क्या है? गगा जी का निर्दोष परिसर [सट], एकान्त में ध्यान करने योग्य वस्तु क्या है? कौस्तुमधारी भगवान् विष्णु के चरणयुगल: आराधनीय क्या है? पुण्य। इसी प्रकार चाहने योग्य वस्तु क्या है ? करुगा, जिसकी आसकि से चिच सदा के दिए मुक्ति पाने में समर्थे हो पाता है।' [प्रश्नरहित शं्द परिहाय युक परिसंख्या-] 1 -'महापुरुषों में प्राय. भक्ति भगवान् रंकर के प्रति देखी जाती दै, विमन के प्रति नहीं, व्यसन वाख में देखा जाता है, सुवतिरूपी कामान्र में नहीं; चिन्ता यश की देग्ी जाती है, मरय शरीर की नहीं।' [प्रश्नरहित आर्थ परिहाययुक्त परिसख्या-] 'कुटिलता तेरे केशपाश में है, राग कर, चरण और अवर में, कठिनता कुचयुग्म में है और चंचलता नेत्र में । यहाँ [परिसंख्या के इन उदाहरणों में ] असमाविन वस्तु का विधान किया जाता है, अत. इसके द्वारा उससे मिनन । लोकप्रसिद्ध ] वस्तुओों का निराकरण ठहरता [ ही] है। इस कारण निराकरणीय मिन्न वस्तु शम्दत ही कथिन हो अथवा अर्थत हो प्रतीत हो ऐसा कोई नियम नहीं रहता। अर्समाव्यता के अभिपाय से ही कहीं विधान प्रश्नपूर्वक होना है[ जय कि मौमासाशाक में प्रसिद्ध परिमख्या में प्रश्न कभी होता ही नहीं ै ]। -'जिस [उज्जयिनी नगरी] में शुतिवत्मे [वैदिक धर्म तथा कनपदी] का उद्लंधन लीलावती पनिताओं के नेन्नोत्पल ही किया करते है तथा जिममें वक्रता को केवल महाकाल की जटा का अर्थचन्द्र हो भारण करता है [ यह ] ।।' तथा-जहोँ वर्णसंकर [जाहगादि वर्णो का मियग तथा रर्गों का मिश्नण ] चित्रकर्म में होता रै, दण्डग्रहण [राजदण्द पाना तथा मदण्ड अपनाना] यतियों में देखा जाता है'-इत्यादि प्रयोगों में इम [ परिसंख्या ] का श्लेष से मिश्रग बहुत ही अधिक चारुत ला देता है। 'इसमें जो 'नियम' और 'परिसंख्या' शब्द है इनके मीमासकों में प्रसिद्ध लक्षण नहीं अपनाने ै'यही बनलाने के लिए सून में 'नियमन परिसरया है' इम प्रकार दोनों को अभिन्नरूप में कहा गया है[ जन्न कि मीमांसाश्यासतर में ये घरस्पर मिन्न होने है]। इसी कारण इममें भाति को भी पाक्षिक मान लिया जाता है[ जब कि मीर्मामाशासत्र में पाक्षिकता केवल नियम में दी
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मानी जाती है] इस प्रकार [मीमांसा में प्रसिद्ध दो विपरीत पक्षों में] 'एक साथ प्राप्ति' [ लागू होना यह जो परिसंख्या का लक्षण है यह ] यहाँ मान्य होता भी है और नहीं भी।' विमर्शिनी मकानेकेति। पर्याये एकस्थानेकन्र पर्यवसानादेरुक्तत्वात्। असंमाव्य इति। कविप्रतिमा निवर्तितत्वाछोकोत्तर इत्यथ:। न पुनः पराप्तिविपयत्वेनारसंभाध्यत्वं व्याएयेयम्। सवथा- प्राप्तस्यार्थान्तरस्थ निपेधमावपरो हि विधिः परिसंखया। अत एवार्थानतरनिपेधे तात्पर्यमेव दर्दयितुं द्वितीयपरिहारेणेक्युक्कम। अपवर्जन इति। 'अपपरी वर्जने' [पा० १।४८८] इति वचनाद। सेति। यथोकरूपा। पपेति। परिसंख्या। कि भूपणमिति पश्नपूर्वकत्वम्। न रश्नमिति शब्दोपादानाव् परिवर्जनीयस्य श्दतवस्। न पुनरीश्वरादि सेव्यमिति परि- वर्जनीयस्य शब्दानुपादानादार्थस्वम्। मत्रेति 1 पपूदाहरणेपु। अलौकिकमिति । कविप्रतिसा निवर्तितम्। गृद्यमाणमिति। विधीयमानतया। वस्त्वन्तरव्यवच्छेद इति। अर्थान्तरनिषेध मात्रतार्पर्याव्। नियमामाव इति। नह्न व्यवच्छेद्यस्य शाव्द्ृस्वार्थतवाभ्यां कश्विव्वक्कणभेद इति मावः। भकौकिकत्वाभिप्रायेणेति 1 नहि 'पञ पञ्चनसा भच्याः' इत्यादी प्रश्नपूर्वरक ग्रहण- मि्याशयः। कचिदित्ति। कुन्नाप्यप्रश्नपूर्वकत्वमपि भवेदिति भावः। इकेपसंपृक्तत्वमिति।
संपृषततवे न तथा चारवं भवतीति पयोजनम्। अत्यन्तैति। पूर्वोदाहर पेभ्यः। नत्षु नियम परिसंख्ये भिननछदणे प्रसिदे इति कर्प तयो: सामानाधिकरण्यं सून्ितमित्याशक्याह- अननेस्यादि। वाक्य विशो मीमांसकाः। यदाहु :- 'विधिरत्यन्तमप्रापती नियमः पाषिके सति। सम्न चान्यत व प्राप्ती परिसंगया निगयते ।।'हृति। अश्रायमर्थः । इह कस्यचिदर्थस्य नियमेनाज्ञातस्य विधिः क्रियमाणी यदार्थान्तर निपेधार्थमपि परयंवस्यति तदा नियमविधिः । न पुनरज्ञातज्ञापनमान्नपयंवसित एव सवति। तेन नियमे 'मीहीनवहन्ति' इत्यादाव वघातमात्रपर्यव सायित्व मेव न, दलनादेरपि निपेध्यस्वेन पर्यवसानाद्। नापि निपेधमाय एव तात्पर्यम्। अववाताभावे विध्यनिप्पतेः।
पर्यवस्यति सा परिसंख्या। तेन 'पख प्नसा भघयाः' इत्यादावन्यपनखभप्णनिषेध मावतारपर्यमेव। न पुनरेतस्पञ्ञनखभव्वणकर्तव्यतापि । तथारवे हि पज्ानां पज्नसानाम- भष्षणे ग्रत्यवायप्रसङ्को नियमादस्या भेदो वा न स्यादू। नादरणीयमिति। अनेनेव लक्षणेनो भयोः संग्रहात। तथाहि नियमे 'समे देशे यजेत' इत्यादौ यागस्य समविषमाष्मन्यनेकत् देशे ग्रापाचेकत्र सम एव नियमन कतमू। परि संख्यायामपि सर्वत्र मषणस्य प्रास्ती पञ्ञपञ्चनस्रविषय एवंकन्न नियमनम्। नन्वम्र पञ् पखनसानतर निषेधमाततापर्यात् पञ्ञपज्चनखविपये भक्षणनियमने न वाक्यार्थत्वमिति कथमुभयानुगाम्येतल्लत्तणमिति चेछू। सत्यम्। अस्ति तावदामुखे पञ्ञपक्चनखचिपये भक्षणे विधि:1 यदास्वार्थान्तर निषेधपर्यवसायित्वं तदेव जीवि तभूततवेनेदालकारत्वप्रसिठ्ठापकम्। तख् नियमपरिसंख्ययो: समानम्। अथ नियमे विधिनिषेधयोदवयार्थतवं पतिसंख्याया घ निपेथस्यैवेत्थनयोमहान् भेद इति पेव।ना अस्ति तावद्विधेरर्थान्तरे निषेधपर्यंवसाथित्वं समानं य निवन्ध नमनयोरलंकारत्वम्। यसु नियमे विधावपि ताप्पर्य न तु परिसंख्यायाम,
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तदनौपयिकरवादिहानादरणीयम्। न हीह पज्ञानां पञ्चनखानामभचण एवं प्रत्यवाय: प्रसज्यते थेन विधिनिपेधतास्र्यान्यामनयोरलंकारभेद्: रयानू। तथारवे व सर्वालक्कार मेदानां भेदहेखतिायादिस भवानिप्लप्तण प्रसद्रेप्लंवरननय स्याद्। अतश्रैतर्न्वेवृश्वमेव नियमश्य वाध्यम। तदाह-अत एवेत्यादि। स्वीक्रियत रति। भेदृश्वेनेश्यर्थः। सा च सथा-किमासेगयं पुसाम्' इत्यादौ घुसरित्तटेच्वरयो: सेवाया न युगपर्मंभाव नमिति निपेध पर्यवसायी घुसरिचद एवं कत्न सेवाया नियम कृना। अत पुव च तरमायिकमिरयुत्तम्। एकानेकेति = क्योंकि पर्यायालकार में एक का अनेक में पर्यवसान बतलाया गया है। असंभाष्य= कविप्रतिमादवारा सिद्ध होने से अममाव्य अर्थात् लोकोत्तर। असभाव्य का अर्थ 'प्रात्ति विषय के रूप में जिसकी कन्पना नहीं की जा सकती, यह अर्थ नहीं करना चाहिए क्योंकि परिसख्या उस विधि का नाम है जिसका वात्पये सरवथा पाप्त सर्थान्तर के निषेध में रहता है। इसीलिए, अर्थान्तर निषेध में सात्पर्य दिखकाने के लिए हो 'द्वितीय का परिदार करने गुए'-यह कहा। अपवर्जन-जैसा कि [पाणिनि का ] सूत्र है 'अपपरी बर्जने' [२८८] 'अप' और 'परि' उपसर्ग बजन अर्थ में कर्मप्रवचनीय होते हैं [ प्रकुनेन स्वन्धिना करयचिदनभिसबन्धी वर्जनम्=काशिका ] सा =वद= जिसका स्वरूप वनना जा चुका है। पपा =यद परिसख्या। कि भूषणम्=यह हुई प्रश्न पूर्वक। 'न रत्नम्'= 'रन नहीं'-इस प्रकार शब्दत, कथन होने से यहाँ परिवर्जनीय अर्थ शब्द है। 'राजा आदि सेवा योग्य नदीं' इस परिवर्जनीय अर्थ के शब्दतः कथित न होने से वह पार्थ हुआ। अम्रयहाँ- इन रदाइरणों में। अलौफिक कविम्रतिमा से निष्पन्न । गृह्यमाण= जिसका विधान किया जाता है। वरत्वन्वरण्यवच्छेश=अन्य वस्तुओं का परिदार, इसलिए कि इसमें वात्पर्ये ही भन्य अर्थ के निषेध में रहता है। नियमाभाव= यहाँ परिशाय अर्थ के शाब्द या बार्ये दोने से रक्षम में भेद नहीं रहता। अली किकरवाभिन्नाषेण असमान्यता के अमिप्राय से= [मीमांसा के] 'पाँच पञनस माणी खाए का सकते हैं-इत्यादि [परिसंख्या प्रयोगों] में विधान प्रद्नपूर्वक नहीं रदता। ववचित्= कही' सर्धाद कही कहीं विधान प्रश्नपूर्वक नहीं भी रहता। श्लेपसंपृत्तरवम्=इलेप का मियन= यहाँ इलेप शब्द का अर्थ है दलपयुक्त शब्द से निष्पन्न अतिरायोकि और इसका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार की उक्तियों में यदि श्लेष न छो, बेघल अतिशपोकि ही हो तो चमत्कार की उननी माता नहीं आा पाती। अत्यन्त = सर्थाद प्राचीन उदाइरणों की अपेक्षा। संका होती है कि नियमविधि और परिसख्या के लक्षण भिन्न भिन्न छोते है, तब यहाँ उन्दें अभिन्न क्यो बतलाया गया है।' इस पर कहते हैं-'अत्र'=यदा। वाक्यविद्= मोर्मामक, जैमा कि [मीमसिकों ने दो] कहा है- 'अत्यन्त अप्राप्ति में विधि, विकत्प में नियम और मिन्न दो तच्यों की प्रात्ति में परिसंख्या कहलाती है।' ['खर्ग के हिए कया करना चाहिए' इम जिश्ाक्षा का कोई उत्तर नहीं मिलता, कोई उपाय विदित नहीं होता। तब वेदवाक्य कहना है 'स्वर्म के लिए ज्योतिष्टेम यप् करना चाहिए। इस वाक्य को विधिवाक्य कक्षा जायगा। इस वाक्य के अविरिक्त स्वर्गप्राप्ति का उपाय किसी भी प्रमाण से जो उपलब्ध नहीं होता। नियम तथा परिमसत्या का स्पष्टीकरण विमर्रिनीकार करते है-j इसका अर्थ इम प्रसग में यह है-अब किमी अम्ञान अर्थ का विधान किसी नियम वाक्य के द्वारा किया जाना है और वह अन्य किमी अर्थ के निषेष में पर्यवसित होता है तो उसे नियमविधि कहते हैं। यह [विधि के समान ] केवल अज्ञान अर्थ के ज्ञापन में ही समाप्त नहीं हो रदता। इस प्रकार 'धान को कृदता है'-हत्यावि नियमविधि में केनल कूटने मान में ही विधिवाक्य की
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समाप्ति नहीं हो जाती, 'दरना' आादि के निषेध तक भी उसकी पहुंच होती है। इसी प्रकार केवल निषेष में मी [वाक्यार्थ की] समाप्ति नहीं दोती क्योंकि सब ['कूढता है' इस विभि का सर्थ 'दरता नहीं है' होगा, इस प्रकार ] कूटने का ज्ञान न होगा, फछसः विधानात्मक सर्य प्रतीत न होगा। जन सभी अर्थ का ज्ञान रहता है, फरतः किसी अज्ात अर्थ के ज्ञापन का प्रश्न नहीं रछता तव जो विधान होता है उसका तारपये केवळ अर्थान्तर के निषेध में ही रहता है। उसे परिसंख्या कहते हैं [ परि= वर्जन या निषेध, संख्या- ज्ञान, निषेज्ञान]। *पंच पंचनखा भक्ष्या धर्मतः परिकीतिंताः। गोधा कू्म: शशः सड़गी शत्यकश्चेति ते स्मृतःः ॥'- ['पाँच पाँच पाँच नखवाले म्राणी धर्मशास्त्र द्वारा मक्ष्य रुपसे मान्य हैं। ये है गोषा, कूर्म, रय, खडगी तथा शत्यक द्र० परिसंख्यापादटि वामनीसहित काव्यप्रकाश]। इस प्रकार 'पाच पंचनखी प्ाणी मक्ष्य है- इत्याद बचनों का तात्मर्य केवल अन्य पननखी प्राणियों के मक्षण के निषेध में रहता है। किन्तु इसमें पॉच पंचनखी प्राणियों के भक्षण का विधान नहीं रहता, वैसा होने पर तो पाँच पंचनसी माणियों के नक्षण न करने से [आतवाकय का उत्लंवन होगा और ततः ] पाप अर्पनन होने लोगा, साथ की इसका [उपर्युक्त ] 'नियम' विधि से फोई भन्तर नदी रह्षेगा । नादरणीयमू= 'मीमासकों के मसिद् अर्थ नहीं अपनाने है'-इसलिए [ नियम और परिसख्या] दीनों का संगह [परिसंख्यालंकार के] इसी एक लक्षण में हो नाता है। तथाहि-'यध सम भूमि में करे' इत्यादि जो नियमविधि के वाक्य हैं इनमें प्रयमतः प्राप्त सम और विषम सभी भूमिओं में से समभूमि में विधि का नियमन= हकोच कर दिया जाता है। इक्षी प्रकार परिसंख्या में मी सभी पंचनखी प्राणियों के भक्षण की जो प्राप्ति रहती है उसमें भी केवल पाँच पंचनसी प्राणियों के भक्षण तक विधि का संकोचे रहता है। शंका होती है कि पाँच पंचनसी प्राणियों के निषेयमात्र में यहाँ तात्पर्य है अतः पाँच पंचनखी प्राणियों के भक्षण में विधि के नियमन में वाक्य का सात्पर्य नहीं माना जा सकता तब यह कैसे कहा कि 'यह लक्षग उमयानुगामी है'। [उत्तर ] ठीक है, [मीमांसा में भले ही न छो, हमारे यहाँ तो] आरम्भ में पाँच मंचनखी प्राणियों के भक्षण की विधि रहती है किन्तु जय इसका पर्यवसान अन्य पंचनस्ी प्राणियों के भक्षण के निषेष में सिद्ध होता है तब वही इसमें अलंकारत्व ला देता है क्योंकि वही [ निषेध में पर्यवसान] इसका प्राण है, और यह [निषेध में पर्यवसान] दोनों [नियम और परिसख्या] में समान रूप से रदता है। यदि कहें कि नियम में विधि और निषेध दोनों में ही तातपर्य रहता है, जब कि परिसंख्या में कैवल निषेध में, इस प्रकार इन दोनों में बहुत बड़ा अन्तर है, तो इस कथन का कोई प्रभाव नहीं, क्योंकि इन दोनों में विधि का निषेध में पर्यवसित होना [भी तो ] समान है, जिसके आधार पर यहाँ अरंकारख आ जाता है। जहाँ तक 'नियम में विषि में भी तात्पर्य रहता है, परिसंख्या में नहीं' इस [ अन्तर] का ससंबन्ध है वह यहाँ (अलंकारत्वमीमांसा में) कोई महत्व नहीं रखता इसलिए अनादरणीय है। यहाँ [अलंकार क्षेत्र में ] पाँच पंचनखी प्राणियों के अमक्षण में कोई पाप नहीं होने वाला है जिससे एक का तात्पर्य विधि औौर निषेध दोनों में और दूसरे का सात्पर्य केवल निषेध में मान कर [ रसनाकरकार के समान नियम और परिसंख्या इन] दोनों को दो स्वतन्त्र अलंकार माना जाए। ऐसा होने पर तो सभी अलंकारों में भेद का कारण थोढ़ा-योड़ा अन्तर मिळना संभव है अतः प्रत्येक में भिन्न-भिन्न अनेक लक्षण करने की आपत्ति आरगी। और तब
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अलकार मी सख्यातीत हो जायेंमे। इसलिए नियम को इसी परिसंख्या का भेद मानना हो ठीक होगा [ न कि रत्नाकरकार के समान अलग अरकार मानना ]। यही कह्दा 'भव पद' हत्यादि। स्वीळ्टियते= रवीकार की जाती है-' अर्थोत भेदरूप से। इसका उदाहरण है 'किमासेव्य पुसाम्०'। इन उदाहरणों में गगाजी के तट तथा राजा को सेवाऐँ एक साथ पाप्त नहों होतीं [ कवळ राजसवा ही प्राप्त होती द], अत. कवल गगातट में ही अक्ेले में सेवाविधि का नियमन कर दिया यह नियमन निषेधपर्यवरसायी हुआ। इसीलिए कहा कि वह भायिक है = कभा मान्य नहीं मी हाता ।।' विमर्श-परिसस्या यम्द का अर्थ निषेधबोध है। परि का अर्थ विमशिनी में उद्भृत 'अपपरी चर्जने' सूत्र के अनुसार निषेध ह ही 'परेवैजने' [८१] सूत के अनुसार भी यही अर्थ ह। सख्या का अर्थ ज्ञान होता है। इस प्रकार परिसख्या शब्द का यौगिक अर्थ निषेषशान निदलता है। पूर्वमीमाक्षा में जैमिनि का सूत्र है 'परिसख्या [२२४२] इसमें परिसंख्या का अथ निषधज्ञान हा ह। अश्वमेध के प्रकरण में क्षुतिवचन है-'(मामगृम्णन् रथनामृतस्य' [बाज० स० २२२ ] इसक पश्तु की लगाम पकड़ने का अर्थ निकलता है। तन प्रश्न होता है- "कस पछ्ु की', मध का या अन्य किसी पशु का। उत्तर में रवपथनाकण का वचन है 'अभ्वा- मिधानामादत्ी' [२३१८१] 'इस मंत्र के द्वारा अ् की लगाम पकढ़ता है'। इस वचन का तास्पय अवतर पशुभो की लगाम पकड़ने के निषेष में माना जाता है। 'परिसख्या'-सूत्र द्वारा यही अर्थ प्रतिपादित किया जाता है [दर0 सायणकुत ऋग्वेदभूमिका] देवलस्मृवि के नाम से प्रासेदू [काम्यप्रकाश वामनी की परिसख्या पर पादटिप्पणी] किन्तु उसके कलकत्ा के वर्मारमा व्यापारी आमनसुखरायजी मार द्वारा प्रकाशित संस्करण में अप्रास्त 'पच पचनखा मकष्या'प्रयोग, जिसका स्पाकरण ऊपर किया जा चुका है, मो परिसख्या का उत्तम और इसीलिए प्रायः इस शरसग में सवेत्र उक्किसित प्रयोग है। रत्नाकरकार ने विधि, नियम और परिसख्या तीनों को तीन स्वतन्त्र अरंकार माना है। इनके लक्षण उन्होंने इस प्रकार बनाए हैं- १= अममान्यहेतुफलप्रेषण विधि: ॥८२॥ २ = अन्यनिषेधार्थोऽवि विधिनियम॥ ८३ । ३ = प्राप्तस्य [अन्यनिषेधार्थो विधि:] परिसँखया ।। ८४ ॥। वोनों के परस्पर में अन्तर भी उन्होंने बतलाए है और उदाहरण भी दिए हैं। इनमें 'किमासेव्यं०' को नियमालकार का उदाहरण माना गया है और 'विलह्यन्ति०' पघ को परि- सख्या का जिसे विमर्शिनीकार ने भी उद्धृत किया है। विमशिनीकार सवस्वकार का समर्थन करते और नियम तपा परिसख्या में अलकारत्व का नीज एक ही मानकर इन्हें मिन्न मानना अनुचिन बतलाने है। यह नोज है निषेध्य अर्म की प्रतीति या अर्यान्तर के निषेध की पतीति। विधि के विषय में उन्होंने यहाँ कोई चर्चा नहीं की है। परिसंख्या का इतिहास- दण्डो, मामह, वामन और उद्रट की दृष्टि परिसख्या पर नहीं गई। इसे प्रथमतः कद्रट ने खोजा है। टनका विवेचन- इटट = 'ृट्टमपृष या सद्युगादि यव कथ्यते भवचित सत्यम्। अन्यन दु तदभाव: पतोयने सेदि परिसंखया।। ७७९।
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परिसंख्यालद्कारः ५८३
पूछने या न पूछने पर जदाँ मनेकत्र साधारण गुण आदि का कहीं इस प्रकार अस्तित्व दतलाया जाए कि उससे कहीं अन्यन अमाव प्रतीत हो तो उसे परिसंख्या कहते हैं। उदाहरण- प्रश्नपूर्वक परिसंख्या 'कि ससतमपारतन्त्रयम्' =सुख क्या है? स्वतन्न्नता। प्रश्नरहित परिसंख्या='कोटिव्यं कचनिचये०' पद्य हो। मम्मट=सुद्रट की हौ पदावली में लिखते हैं :- "किचित पृष्टमपुषटं वा कथितं यद प्रकरपते। तादृगन्यव्यपोहाय परिसंख्या तु सा स्मृत्ा ।' 'प्रमाणान्तरावगतमषि वस्तु शव्देन प्रतिपादितं प्रयोजनान्तराभावात् सदशवस्त्वन्तरव्यवच्छे दाय यत पर्यवस्यति क्षा भवेत परिसंरया। अन्न च कथनं प्रश्नपूर्वक तदन्यथा न परिद्वष्टम्, तथा उमयन व्यपोद्यमानत्य प्रतीयमानता नाध्यत्वं चेति चखवारी भेदा: ।' पृष्ट या सपृष्ट कोह वस्तु शब्द से कथित होकर वैसी हो किसी अन्य वस्तु का निराकरण कराए तो वह परिसंख्या मानी गहं है।' कोई वस्तु किसी अन्य प्रमाण से चिदित होती है (अतः जिसके लिए शब्द प्रयोग की अपेक्षा न हो) तथापि उसे शब्दसे कहा जाता है तो वद अन्य प्रयोजन के अभाव में वैसी ही अन्य वस्तु के निराकरण का कारण बनती है। उसी को परिसंख्या माना जाता है। इसमें कथन मश्नपूर्वक या तद्रहित रहता है साथ ही निराकरणीय वस्तु कहों प्रतीयमान होती है और कष। वाच्य, फलतः इसके चार भेद दो जाते है। उदाहरण = एकएक कर वे होजा सर्वस्वकार ने दिये हैं। स्पष्ट ही मम्मट ने र्टूट के आगे दो अतिरिक भेदों की करपना भर की शेष द्वारा विवेचन उनका समान है। मम्मट ने परिसंख्या को मीमांसा की पृष्ठभूमि से यथाशकति अछता रखना चाहा था। सर्वस्वकार ने उसमें मीमांसा को खुलकर स्थान दिया । रत्नाकर और विमशिनी ने उसे और मचा दिया। परव्ता आचार्यी में रत्नाकर का मत्ष इसी विमशमें पहले आा चुका है। जयदेव मौर अप्पयदीक्षित का लक्षण यह है- जयदेव, दास्तत-'पारसंख्या निषिध्यैकमन्यत्मिन् वस्तुयन्त्रणभ्। स्नेहक्षय: प्रदीपेघु न स्वान्तेपु नतभ्रुवाम्।' 'एक का निषेधकर अन्य में वस्तुनियन्त्रण परिसंख्यालंकार कहलाता है। उदा०-स्नेह [प्रीति तथा तेल ] क्षय दीप में है, स्त्रियों में नहीं।' दीक्षित जी ने इसमें निषेव को शाब्द वतलाया है और आर्थ निमेश के लिए रत्नाकर सर्या विमर्शिनी में उद्धृत 'विलद्यन्ति' पद् उद्धृत किया है। पण्डितराज=ने परिसंख्या के विषय में अनेक नवोन सूचनाएँ द हैं जो स्द्रट, मम्मट, सवस्वकार, रस्नाकर, विमर्शिनी और कुवलयानन्द में नहीं मिलतीं। उनके रसगंगाधर से विदित होता है कि, कुछ आचार्य परिसंखया को अलंकार केवल वहीं मानते हैं जहाँ निषेष आार्थ या पतीयमान होता है, शाब्द नहीं। शाब्द में वे केवल परिसंख्यात्व मानते हैं अलंकारत्व नदीं। पण्डितराज ने इन आचार्यो का नामोब्लेख नहीं किया है। दूसरी यह सूचना भी मिलती है कि विमर्शिनीकार ने जिस 'पंध पंचनख प्राणी मक्य हैं'-इस वाक्य में परिसंख्या को अलंकार माना है, कुछ आचार्य इसमें मी केवल परिसंख्यारव मानते हैं। उनका तर्क है कि यद केवल लोक वाक्य है, इसमें कविपतिभा नहीं है। इसी प्रकार 'किमासैव्यं युंसा' में सेव्यत्वेन क्पित गंगातट वास्तविक वस्तु है प्रातिम नहीं, अतः यहाँ भी 'पंच पंचनखाः' के समान परिसंख्यामान्र है, परिसंख्यालंकार नहीं। इन्होंने यह भी कहा है कि इन आचार्यो के अनुसार 'किं भूषणँ सुदृदमन यः इत्यादि स्थलों में मी परिसंख्या नहीं, रूपक है।
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५८४ ये सब मन पण्डितराज र्वय को अमान्य प्रतीत होते हैं क्योंकि उन्दोंने इनका सल्लेख मात्र किया है वह मा परिशिष्ट के रूप में। उनका समत इस प्रकार है- 'सामान्यव. माप्तस्यार्थरय कस्मान्विद् विशेषाद् व्यावृत्ति: परिसरया'। 'सामान्यव प्राप्त अर्य का किसा विशेष से अलमाब परिसख्या कहलाना है'। नियम को परिसख्या का हा एक प्रकार रवीकार करने हुए पण्डितराज ने समर्थन में वही तके दिया इ जो सनरकार और विर्माशनाकार ने दिया या-एक द रक्ष मे दोनों का समए पण्टितराज ने साहित्यसिद्धान्न मे मान्य नियम और परिसख्या के अभेद को व्याकरणसिद्धान्त से मी पुष्ट किया है। उन्होन लसा है कि व्याकरण म मी परिसस्या की नियमशब्द से कद्ा जाता ह। उदाहरण के रूप म सष्टाध्यायों के प्रथम अध्याय के दितीय चरण का 'कृछदविवसमासाश्व' यह छयालीसवाँ सूत प्रस्तुत किया है। इस सूघ में 'समास' का ग्रहण वास्यस्वरूप समासेवर सार्थ नम्दसमुाय स प्राततिर्बदिक सज्ञा का व्यावृत्ति के लिए किया गया है। क्योंकि इसके पूत्र के पैतालासये सूत 'अद्वदधातुरप्त्यय प्रातिपादिकम् के द्वारा अर्थवता के साय प्राति परदिकत्व की स्थापना की गह ह। इसे अनुसार जा जा शम्द सारथक है वे यदि धातु और मस्यय नहा है ता प्रातिपदिक है। वाक्य और समास दानों हो ऐसे शब्धो में आाते हैं। 'राना फ्रा पुरुष', 'मेरी पोयी' आदि वाक्य न तो प्रत्ययरुप ह और न मातुरूप, अर्थ इनसे विविस रोवा ही है, अव इन्हें इस पैताछासमें सूत्र से हो प्रतिपनिक माना ना सकता या। 'कर्तातसमासाश्च' सूत्र के द्वारा कदा गया कि वून, वदित और समास मौ मातिपदिक होते ह'। इसम समास की प्रातिपदिक सज्ञा का विधान पूर्वसूत 'अर्थवव०' से गतायें डोकर व्यर्थ सिद होता है। उसका सार्कता सिद्ध होती तन जन यह स्े निकाला जाता है कि समासतर वाक्यसमुदाय में आविपदिक सतान हो। इसी प्रकार यह प्रयोग परिसरयात्मक हुआ। किन्तु व्याकरण शास्त्र म इसे परिसख्या न कहकर नियम कहा घाता है-यथा 'समासम्रहण नियमाद्षम्, ००० समासप्रदणस्य नियमार्थंताद वाक्यस्य अर्थवत्ः संचा न भवति= काशिका 1 पूर्वेवा दाओों में इनके भिन्न होने की मान्यता को भो पण्टितराज ने उपस्थित किया है। तदये उन्होंने बिर्माशनी में उद्ृत 'विधिरत्यन्तमप्रासौ०' कारिका ही प्रमाणरूप से उपर्थन का है और उसकी व्यारया भी की है। 1 पण्डितराज ने भी परिसरया के चार उपर्युक्तक भेद माने है। विश्वेश्वर ने भी पण्टितराज को दो सरणि पर चल कर आरम्म में परिसंखया के चार भेद स्वीकार किये हैं और अन्त्र में निराकरणीय अर्थ की व्यग्यता में हो परिसंस्या के अहंकार होने कौ रट दोहरा दो है। उनका लक्षण यद है-
पृष्टमशृष्ठ चोकत यद व्यर्ग्न वाषि वा्च्य या। फलनीतरव्यपोह् परिसखया सातु संस्याना ।।' पूछा गया अथवा न पूछा गया कोई अर्थ यदि कहा जाय और यह अन्य मर्ये के वाच्य या धयग्य निराकरण में परिणत दो तो वह परिसख्या होती है। यहाँ यह नसिकषप होती है। विश्वेश्वर ने नियम और परिसख्या को एक मानने का समर्थन पण्डितरान के ही समान ब्या करणशास्त के प्रमाण द्वारा किया है। उनके अनुमार व्याकरण महाभाष्य में 'पंच पंचनखा.' प्रयोग में परिसख्या को नियम ही कहा गया है। भेद इन्होंने भी चार हो माने है।
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चकवर्ती की निष्कष्ठर्थकारिका परिसंख्या पर इस प्रकार है- *परिसंख्या त्वनेकत्र पाप्तत्यकत्र यन्त्रणन् । चतुर्धा पक्षवर्ज्योकत्योर्भावामावादियं मता॥ न परं युगपछ प्राप्ति: पक्षेऽपि प्राप्तिरिण्यते। परिसंख्यानियमयोरतोऽञालौकिकी स्थितिः । -'भनेक स्थानों पर प्राप्त का एक स्थान पर नियमन परिसंख्या कहलाती है। यह प्रश्न तथा वर्ज्य [ परिदार्य ] अर्थ के कथन और अकथन से चार प्रकार की होती है। यहाँ केवल चुगपत् अनेकत्र प्राप्ति ही नहीं, पाक्षिक प्राप्ति भी गिनी जाती है, अतः परिसख्या और नियम में असामान्यरषूप से अभेद की स्थिति रहती है।' मूलपाठ-मूल सर्वस्व में 'कस्यचिव परिवर्जनेन' के पहले 'परि अपवर्जने' विमर्शिनी के आाधार पर इमने जोढ़ा है। अन्य प्रतियों में यह अश नहीं मिलता। निणयसागरीय प्रति में 'कौदिश्यं कर्चनिचये' के वाद की द्वितीय पंत्ति में 'वस्तनतरं शाध्दमार्य च' पाठ पाठान्तर में रखकर 'वस्तन्तरशन्तमान्ं' पाठ मूल में माना गया है। विमर्शिनी में 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ० वद्धरण के बाद की तृतीय पंकिकि में 'तदा नियमविधि:। न पुनर०' अंश का 'न' निर्णेयसगरीय प्रति में नहीं है और चतुर्थ पंकि में, 'पर्यवसायित्वमेव न, दखनादेः इस प्रकार भया 'न' भी नहीं है। [सर्वस्व] [सूत्र ६४ ] दणडापूपिकयार्थान्तरापतनमर्थापत्ति:। दण्डापूपयोर्भांवो दण्डापूपिका। 'द्न्द्मनोशादिम्यश्च' इति वुभ्। पृषो- दरादित्वाय वृस्भावः। यथा-अहमहमिकेत्यादाविति केचिद्। अन्ये तु दण्डापूपी विद्येते वस्यां नीतो सा वण्डापूपिका नीतिः। एवमहं शकोऽहं शक्तोऽस्यामिति अहमहमिकेतिचन्मत्वर्थीयष्ठनित्याहुः।अपरे दण्डापूपाबिध दण्डापूपिकेति 'दवे प्रतिरृतावि'ति कनं वर्णयन्ति। अन्र हि 'मूषककर्तृकेण दण्डभक्षणेन तत्सहमान्यपूपमक्षणस् अर्थोद् सिद्धम्' एष न्यायो दण्डापूपिफाशव्देनोच्यते। ततथ्च यथा दण्डभक्षणादपूपभक्षणमर्धा. यातं तद्त् कस्यचिदर्थस्य निष्पत्ती सामर्थ्यात्समानन्यायत्वलक्षणाद यद. र्थान्तरमापतति सार्थापत्ति: । न चेद्मनुमानम्। समन्यायस्य संचन्ध रूपत्वाभावात्। असंबन्धे चातुमानातुत्थानात्। अर्थोपचिश्व वाक्य विदां न्याय इति तज्जातीयत्वेनेहाभिधानम्। इयं व द्विधा। प्राकरणिकादप्रकारणिकस्यार्थापतनमेक: प्रकार । अम्राकरणिकात् प्राकरणिकस्यार्थापलनं द्वितीय: प्रकार: । आद्यो यथा- 'पशुपतिरपि तान्यहानि कच्छरादगमयदद्रिसुतासमागमोत्का। कमपरमवश न विभकुयुर्विभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावा:॥।'
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५८६ मलद्वारसचस्वम्
द्ितीयो यथा- अप्र विभुवृत्त: प्राकरणिको लोकवृत्तान्तमप्नाकरणिकमर्थादाक्षिपति।'
'घृतधनुषि वाहुशालिनि शैला न नमन्ति यत्तदाश्चर्यम्। रिपुसंघकेपु गणना कैध राकेपु काकेपु।' अत्र शैलवृतान्तोऽप्राकरणिको रिपुवृत्तान्तं प्राकरणिकमर्थादाक्षिपति। कविन्न्यायसाम्ये निमित्तं श्लेपेण गम्यते- 'अलंकार: शाङ्काकरनरकपालं परिकरा विशीर्णाझ्गे भृद्गी वसु च वृप एको गतचया:। अवस्थेयं स्थाणारपि भर्वति सर्वामरगुरो विधौ वक्रे सूध्न प्रभवति च्य क पुनरमी॥' अन विधाँ बक्रे इति श्लिष्म्, अप्राकरणिकस्थाणुप्टत्तान्ताव् पाकर- िकार्थापतनम्। [सू० ई४] दण्डापूषिका के द्वारा अन्य अर्य की सिद्धि अर्थापचि [नामक अलंद्वार कहलाती है]। [वृ०]दण्ड ओर अपूप [पूआा] क। माव तुआ दण्डापूषिका। [ इस शब्द को व्युतपति पर] कुछ का मस्ष है कि [इस शष्ध के एकाश दण्टापूर में हन्दू हाने के कारण] 'दन्दमनोशादिम्यश्व' [५१।१६१ पा०वुन प्रतयथ=दवन्दयुक्त शब्द और मनोशादिशम्दों से भी [होता है] सूत्रसे वुजू प्रत्यय हुआ [इसमें से शेप रहता है 'कु' और सूत्र शर से उसे हो बाता है अक, सीलिंग होने से 'अ' का हो बाता है '३', इस प्रकार शब्द वन जाता है दण्डा पूपिका, 'सू' का लोप होने से पूर्वपद ] वद्धि [प्राप्त है किन्तु वह] 'पृषोदरादि' [सू० ६३।१०१ में उपलब्ध अपवाद ] के कारण नहीं हुई जैसे 'अद्महमिका-आदि शब्दों में [नहीं होती] दूसरों का कहना है कि 'दण्डापूपिका' का अर्थ है वह नीति जिसमें दण्ड और अपूप हों। इस प्रकार इस शब्द में ['दण्डायूप'-इस दन्द के आगे ] मख्वर्थीय [युकता अर्थ का] 'ठन्' मश्यय [अत इनिठनी ५।२।११५-सूत्र से ] हुआ है [जिसके शेष बचे 'ठ' को 'उस्येक -७३।५० से 'इक' हो जाता है] जैसे 'इस प्रकार में समर्थ है, मैं समर्थे हूँ इस किया में' इस अर्य की विवस्ा में 'अड्महमिका' शब्द में होता है। अन्य कुछ के अनुसार यहाँ 'दण्डापूप के स्रमान दण्डा पूपिका' इस प्रकार 'इवे प्रतिकृतौ' [५३९६] 'साहृश्य [युक्त] भर्थ में प्रयुक्तश्ब्द से चपमेय अर्थ में [कन् प्त्यय दोता है] सूत्र के द्वारा 'कन्' प्रत्यय बनलाते है [ जैसे 'दीपक' शब्द में ]। प्रकृत में [ जो) दण्दारूपिका शन्द [सूत में जाया ह उस] का मये है ूचों के द्वारा जब दग्द हो सा डाला गया तब उसमें लटके पूर्पों का सा अाठना अपने आाप सिद्ध है'-यह दृशनत। इस प्रकार 'जैसे दण्डमशण से अपूयभक्षण अपने आप चला आाता है नैसे हो किसी अर्थ की सिद्धि दो जाने पर स्थितिसाम्य के आवार पर जहाँ अन्य किमी अर्थ की सिद्धि मपने आप बनलाई बाती है तो उसे अर्यापचि [नामक अलंकार] कदते है। यह अनुमानस्वरूप नहीं है, क्योंकि स्थिविमाम्य [व्याति ] सम्वन्वरूप नहीं होता, और संदन्ध के बिना अनुमान का उत्यान नहीं होता । अर्थोपति को मीमांसकों ने न्याय [ हेतु] माना है। यह अर्थापत्ति मी वैसी ही है, इस कारण इसे यहाँ [वाक्यन्यायमूक्षक अरकारों के प्रसग में ] बवलाया गया है।
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यह दो प्रकार की होती है। एक प्रकार वह जिसमें पाकरणिक अर्थ से अपाकरणिक अर्थ की, सिद्धि होती है और दूसरा प्रकार वह जिसमें अपाकरणिक अर्थ से प्राकरणिक अर्थ की सिद्धि। इनमें प्रथम, यथा- 'पश्चुपति [शिव] ने भी वे दिन वढ़ी कठिनाई से विताय, क्योंकि वे पार्वती से मिळने के लिए उत्कण्ठित थे। जव वन विभु [जितेन्द्रिय] को भी ये भाव स्परश कर सकते हैं तन अन्य किस अवस [इन्दियों के वशीभूत ] प्राणी को ये विकारमग्न न करेंगे' [कुमार० ६] यहाँ शिववदान्त प्राकरणिक है, वद अमाकरणिक लोक [सामान्य न्यक्ति ] वृत्तान्त को स्वत्षः सिद्ध करता है।
'माश्चर्य है कि शैल प्रशस्त भुजाओं से समृद्ध वीर पुरुष [किसी वर्णनीय व्यक्ति] द्वारा धनुप दितीय, यया-
ठठ लेने पर भी झुका नहीं करते, शत्रुनामक बेचारे कीओ की तो गिनती ही क्या। यदोँ शैलवृत्तान्त ममाकरणिक है। यह प्राकरणिक शन्बृत्तान्त को स्वतः खौंच लाता है। कहीं स्थितिसाम्य में कारण का ज्ञान शलेप के द्वारा होता है [ यया ]- विषु और विधि दोनों का सप्तमी के एकवचन में 'विधौ' यही एक रूप बनता है, फलतः एकशब्दवाच्यता के क्तारण दोनों का अमेदाव्यवसाय हो जाता है। इसी आाधार पर निम्नकिखित सूक्ि में कहा जा रहा ह-J 'वक विधौ [ विधि=विधाता और विधु चन्द्रमा ] के चलते सभी देवताओं के स्वामी स्थाणु [ अपरिणामी या मूलभूत शिव] की भी यह दशा होती है कि डरावना नरकपाल उनका आभूपण है, परिजन [सेवक] हैं अंगमंग वाले भझ्गो, धन है केवल एक दैळ और वद भी चीती उमर का बूढ़ा; तब ये जो हम लोग हैं, हम क्या है। यहाँ 'विषो' और 'वक्र' शब्दों में इलेप है और अप्राकरणिक शिववृत्तान्त से पाकरण [अस्मदादि वृत्तान्तरूपी ] मर्थ खिंच जाता है।' विमर्शिनी
युज्। शैष्योपाध्यायिकेतिचछ। ननु चास्य नधो न्गितीति जित्वाद् वृद्धि किं न भव सीत्याशइयाह-पृपोदरेत्यादि। मथोपदिष्टमित्यनेन हि श्षिष्टप्रयोगभाजां शब्दानां व्याकरणशास्र्रेण को पाममवपंविकारादि यद विदितं तन्नवति। उचयमूलखाइयाकरणस्य । तेनात्राविदितोपि वृडधयभावोडनेन सिद्ध:। इतिशच्दो हैतौ। 'मत इनिठनो' इति ठनू। एतच् पक्षत्रयं सामान्येनैवाभिदघता ग्रन्थकृता स्वयमेवोपपतः पम माश्रमणीय इति सूचितम्। तेनावाद्य पुव पछ मश्रयणीया, पचान्तरयोरतुपपत्तेः। तथा चात्र 'एकापरायकृतो जातेः ससन्यां च न तौ स्मृती' इस्यायवत्या तश्य ससग्यर्थे निषिद्धत्वाद उनेव न भवति। अथापि विषयनियमार्थस्येतिकरणस्याध्रापि संबन्धादिदापि भवतीति चेतु। न।-एतद्रि नियतोदाहरणविपयम । अन्यया हि निषेधकत्याकरणप्रसङ् एव स्याद। अदमइदमिकाशब्वस्थ पुनरेतदश्यतमेवायुक्तम्। अदन्ताव्ष प्रातिपदिकाद्वनो विहि तस्वाद्। कनोडप्यम्र न प्राहिः। तस्य प्रतिकृती ग्यमानायामिचार्थे वर्तमानात प्रातिपदि- काडुकवास्। भदन्तातू प्रातिपदिकादु कता्वाद प्रतिकृत्यभावाच कन्न भवति। अन्यथा हि गौरिव गवय इत्यनापि कनः प्रसङ्ग। तदित्थमाद्य एव पदो ज्यायान्।
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नन्वन्न किमर्थसिवया तरसहभाविनोऽर्थर्य करयापतनं स्थितं येनेह रष्टान्तरवेम दरशंनमित्याशइपाइ- अतेयादि। एवदेव प्रकृते योजयति-तवश्रेत्यादिना। समानन्यायरव-
प्रतीते: किमयमननमानमेव न भवतीयाशइयाद-न चेदमित्यादि। सबन्वरूपरवामावादिदि। दृण्डमश््णे हयपूपभष्षण समानन्यायव्वाहुघितमवि न निथ्चितमेव। दृण्टभप्तणेि पूथव प्रदेशावस्थानाविना केनापि निमिचेनापपानाममच्तणरयापि भावाद। अनुमानं पुन-
प्रस्तावे। द्विविधेतयनेनापततोउर्थान्तरस्य साम्यादिना बहुप्रकारं न तथा वेपिध्यावह. मिति सूघितम्। आपाततः पुनरर्थन्तर स्योपादानान्ुपादानाम्या संभवध्यस्या वेचित्र्यम्। तत्रोपादाने अन्यकृतैवोदाहतम्। अनुपादाने यथा- 'श्रीशार दापादर ज-पवित्र रपशः समन्ताद्विमवन्मरि:।
'दण्डापूविकमा'- हयादि। पहले शम्दव्युत्पचि पतलांते है-वण्ड हत्यादि। यद मम्दसंतक है इसलिए इस शब्द स 'युञ्' ठीक वैस हो जेसे "ंभ्योपाध्यायिका' में। [ शका] सो इसमें 'अचा व्शिति' [मू भर णूका लोप हो तो उपान्त्य अ, ६, उ,६ मे में वृद्धि होती है] इस [पा० ७२११५] सूत्र से वृद्धि क्यों नहां दुद क्योंकि यहाँ 'मू' का लोप है, [उत्तर में] कहते हैं-पृपोदर= इत्यादि। [पृषोदरादानि यथोपदिष्टम् ७३१०१ सूत्र में] 'जैसा नोला गया है।' यद कहकर यह वतगरा कि व्याकरण शास से जिन सब्दो में लोप, आगम, वर्णविकार आदि नहीं झोवे और वे श्िष पुम्भों दारा बोले जाते हैं तो बहें विदित हो मान लेना चाहिए। क्योंकि व्याकरण तो लक्ष्य के अनुसार चढता है। इस प्रकार यहाँ ['दण्डापूपिका' में] वृद्धि का समाव व्याकरणविदित न होने पर मो सिद्ध हो मानना चाहिए। ['इवे प्रतिकृनौ इति' इसमें आथा] इति शम्द हैत्वर्थक है अर्थात इम सून के द्वारा उन् दोगा 'अत इनिठनी' सूत्र से। ये जो तीन पक्ष है इन्हें समान रूपसे प्रस्तुन करते हुए अन्यकार ने यह सूचित किया कि इनर्में से जो पक्ष शास्त्रसम्मत हो उसे स्वयं हो अपना दिया बाए। यहोँ प्रथम पक्ठ ही अपनाया जा सकता है, क्योंकि अन्य दो पक्ष शाखसम्मत सिद्ध नहीं होते। इसमें प्रमाण है-'एकाश्षरान' [५११५-काशिका ] इत्यादि वचन। इसका अर्भ है- [स, ख आदि] एक अक्षर वाले सुम्ो, [कारक आदि] कृव अत्यय वाले शब्दो, [व्याब् आदि] जाति शम्दों तथा सपमीविमक्ति के अर्थ से युक [जैमे जिममें दण्ड है ऐसी शाला- दण्डवती-आदि] वरव्दों से ये दोनों [इननि और उन् ]प्रत्यय नहीं होते'। इन बचनों।, से ठन् प्रत्यय सहमी विमक्ति मे युक्कत अर्थ [नीती] में निषिद है। सतः उन् होगा ही नहीं। यदि कहें कि [माध्यकार द्वारा की ] निषेध वेकवपिक माना गया है, अव. यहाँ यह प्रत्यय सम्मन है तो यह भी नहीं कहा जा मकता, क्योंकि यह विकर्प कुछ ही गिने चुने प्रयोगों के दिए है, प्रत्येक प्रयोग के लिए नहां । यदि ऐेसा न हो तो निषेध करना निर्थक सिद्ध दोगा। अइमद्दमिका शन्द में सो यद एकदम हो अयुक है। कयोंकि 'ठन् का वियान ['अत दनिठनी' सूत्र के दारत] हस्व मकार से युक्त प्रातिपदिक शब्द से किया गया है[ भव कि सद्दम् शब्द मकारान्त शम्द है।। मानुनिदाक्षित ने इसमें 'म्रीझादिम्यथ्ष' ५।२११६, सूत्र से ठन माना है। शीघादि में 'मत दनि'
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अथापच्यलहार: ५८९
उनौ' से 'अतः' की अनुवृत्ति नहीं होती यद्यपि तीवादिगण में अह्महम् शब्द नहीं मिलता] यहाँ कन् प्रत्यय की भी प्राप्ति नहीं होती ययोंकि वह साद्डयार्थक प्रातिपदिक से तम होता है जब प्रतिकृति रूपी अर्थ गन्य हो। यह मी अदन्त प्रातिपादिक से विहित होता बतलाया गया है। प्रतिकृति रूपी मर्थ का अमान होने से मी कन नहीं हो सकता। नहीं तो 'गौरिव गवयः'= 'गवय नामक वन्य पश्ठु बैल जैसा होता है' यशो भी कन् प्रत्यय होने लगेगा [ यहाँ उपमेयरूप प्रतिकृति = गवय शण्दतः कमित है, नन्य नहीं] तो इस प्रकार प्रथम व्युत्पत्ति हो मान्य है। [शंका ] सिदधि यहाँ किस अर्थ की होती हैं और आक्षेप उसके साथी किस अर्थ का जिसमे लिए इसे दृष्टान्त रूपसे यतलाया गया है। इस पर उत्तर देने हैं-अन्न। अकृत में इसी अर्थ की योजना करते हुए सिखते हैं-ततश्। समानन्यायरवलप्षणात्=स्थितिसाम्य के कारण= सर्थात जिस हेतु से एक अर्थ की सिद्धि होती है उसी से इस अन्य अर्थ को मी सिद्धि हो जाती है। [शंका ] 'एक अर्थ से सन्य अर्ध का ज्ञान होने के कारण इसे अनुमान रूप ही कर्यो नहीं मान लिया जाता' ऐसी शंका कर कहते हैं-नचेदसू०। सम्वन्धरूपावामावाद=सम्बन्वरूप न होने से= अर्थाद दण्ड का मक्षण होने पर अपूप का भक्षण स्थितिसाम्य के कारण उचित तो है किन्तु निश्चित नहीं है। क्योंकि यदि गपूप किसी अन्य स्थान पर रख दिए गए हों या ऐेखा हो कोई अन्य कारण हो तो दण्ड का भक्षण हो जाने पर भी अपूप का अमक्षण भी संभव होता हैं। जहाँ तक अनुमान का सम्यन्ध है उसमें एक अर्थ से दूसरे अर्थ का ज्ञान नियमतः होता ही है। इस कारण यह [ अर्थापत्ति] उससे पृथक है। इछ=यहाँ=वायन्यायमूलक अलंकारों के प्रकरण में। द्विविध= दो प्रकार की = इत्यादि कदकर यह सूचित किया कि अन्य अर्थ [रत्नाकर में प्रतिपादित ] साम्य आदि के आघर पर अनेक प्रकार का हो सकता है [ मौर रत्नाकरकार ने इसे २४ प्रकार का बतलाया मी है] तथापि उसमें उतना चमत्कार नहीं रहता। किन्तु आपाततः इसमें अन्य अर्थ के उपादान और अनुपादान के आधार पर चमतकारगत वैशिष्टच माना जा सकता है। इनमें से उपादान का उदाहरण तो स्वयं अन्थकार ने हो दे दिया है [ यया 'पशुपति०' पद्य में अवश शब्द द्वारा तथा 'वृतधनुषि' पद्य में 'रियु0' शब्द के द्वारा] अनुपादान का उदाहरण यह है- 'जहाँ दिमवान् की श्रीशारदा की चरणरज से पवित्र हवाओं से सृष्ट बच्चे भी शाख्त्रों के भीतरी रहस्यों पर पर्याप्त सन्दर्भ [ग्रन्थ ] रचा करते हैं।' यहाँ अर्थ निकलता है कि बच्चों के अतिरिक्त व्यक्तियों [वयस्कों] की वात ही कया। यह यहाँ शन्दतः कथित नहीं है। श्लेपेण= इलेय के द्वारा=अर्थात सलेषमूलक अतिशयोकति के द्वारा। अर्थापत्ति अलंकार का इतिहास- अर्थापत्ति अलंकारसर्वस्वकार की हो देन है। मामह से लेवर मम्मट तक के अन्थों में यह नहीं मिलता । परवसी आाचार्यो में- रत्नाकरकार ने इस दिशा में सवत्वकार की बहुत दूर तक अनुसरण किया है। उनका i अर्थापत्ति लक्षण इस प्रकार है-
दण्डापूपिका का स्पष्टीकरण एक पंक्ति में इन्दोंने इस प्रकार किया है- 'सूफमै दैण्डाना मक्षणेडपूपभक्षणमर्थात सिद्धमिति न्यायो दण्डापूपिका। अनेन न्यायेन कस्यचि-
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'चूहों द्वारा दण्डों का मकण हो जाने पर मपूर्पों का भक्षण अपने आप सिद्ध है'-यह उपमा वाक्य है दण्टापृषिका। 'इसके द्वारा किमी अर्थ की निष्पत्ति होने पर किसी अन्य अर्थ की भपने आप आपति को अर्थोपत्ति कहा जाता है।' भेदगणना में रस्नाकरकार ने अति कर दी है। उन्होंने इसके २४ भेद भाने है। प्रकृत से प्रकृत, अप्रकृत से अप्रकृत, प्रकन से अप्रकृत तथा क्प्रकुत से प्रकृत अर्थ का आपादन होने से भेदों की संख्या प्रथमन: चार हुई। तदनन्तर दोनों अर्थों का सादव्य कही बराबर होगा कहीं न्यूनना होगी, कहीं अधिकता। फलत उक्त चार भेद १२ हो जाएंगे। पुनः ये ही भेद समव अर्थ से संभव अर्थ की निपत्ति में होंगे और असंभव भर्थे से असंमव भर्थ की निष्पत्ति में फलतः २४ हो जायेंगे। इसके पश्चाद अन्य अर्थे या साम्य कहीं शाब्द होगा और कहीं आर्ध, अतः ये ही २४ भेद ४८ हो जायेंगे। अनुमान से अर्थापत्ति को अलग करते हुए रत्नाकरकार ने भी वही तर्क दिया है जो सवस्व में मिळवा है- 'दण्टापूपनयेन वर्खवनुमितिः सामर्थ्यनो जायते नान्तर्मावमसी प्यात्यनुमिती यरसम्भवार्मा ततः । अर्थापसिरबदकृति, पृथगियं नो लक्षणीयेत्यसय वर्काऽड् यदयं सुधेरनुमिने: सम्भावनात्मोदित:। दण्टापूपरीति से वस्तु की अनुमिति मपने आप दो जती है अत क्योंकि समावनात्मक होती है [निश्चास्मक नहीं, अतः अनुमान में अन्तभूंत नहीं होती। इस प्रकार अर्थापति अलंकार को स्वतन्त्र रूप से नहीं बतलाना चाहिए! यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह नो संमावनात्मक तर्क है इसे विद्ानों ने अनुमिति का अग माना है [अनुमिति नहीं ]। यद कारिका अमिव्यक्ति को दृष्टि से लटिल हो गई है किन्तु इतना अर्थे तो इससे निकळ हो आता है कि अर्थोपति में दोनों गयों का संबंध संमावनात्मक रहता हे नव कि अनुमिति में निश्धयारमक। अप्पयदीपित=और पण्डितराज ने भी इस अलंकार को अलंकार मान लिया है। अप्पय- दीक्षित ने इसका लक्षण इस प्रकार बनाया है- कैमुस्येनार्थंसंसिद्धि: काव्यार्थापच्तिरिष्यते। उदा० स जितरत्वन्मुमेनेन्दु' का वार्ता सरसीददाम्॥ 'वैमुख्य [इसकी तो बान भी क्या] के द्वारा अर्थ की ससिद्धि काम्यार्थपत्ति मानी जाती है।' यथा नेरे मुग ने तो वह चन्द्रमा भी जीव लिया, कमलों की तो नात ही क्या है [ जिन्हें चन्द्रमा भी निष्पम बना देवा दै]। अप्पयदीक्षित ने अर्थापतति में काव्यशब्द का प्रयोग ठीक उसी अमिप्राय से किया है जिममे काव्यलिंग में काव्यशब्द का प्रयोग किया गया है। पण्टितराज=जगन्नाथ ने दण्डापूपिका को लक्षण से इटा दिया है। उसके स्थान पर तृत्य- न्यायत्व शम्द का प्रयोग करते हुप उन्होंने सूत्र यह वनाया-
-'कारणसाम्य के आधार पर किमी अर्थ से किमी अन्य अर्थ की स्वतः प्राप्ति अर्यापसि- कही जाती है।' न्याय कारणम् न्याय का अर्थ है कारण। भैदसंख्या रत्नाकरकार के ही समान पण्डितराज ने भी चौदीस हो मानी है। अन्तर इतना है कि बारह भेदों को रत्नाकरकार ने संभव और अमंमत वथों के वर्गो द्वारा दिगुण माना दे जनकि पण्डितराज ने भाव और अभाव के दारा। अन्य मलंकारों से इसका अन्तर बतलाने दुए पण्डितराज ने लिखा- अनुमान में निश्चयात्मक बोव होता है जन कि अर्थापत्ति में संभावनातमक, अर्थात अनुमान में
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विकस्पालगार: ५११ बोप होता है कि-'ऐसा दोता ही है' जबकि अर्थापत्ति में 'ऐेसा हो सकता है' ऐसा। यदर्थाति- शयोकि में वास्यार्थ का पर्यवसान विपरीत अर्थ में होता है जनकि अर्थापत्ति में समान अर्थ में 1 पण्डितराज ने अर्थापत्ति अलंकार को अप्पयदोस्षित के समान काव्यार्थापत्ति तो नहीं कहा किन्तु मीमांसकों की अर्थापत्ति से उसका अन्तर उन्होंने अवश्य दिखलाया- मीमांसकों की अर्थापतति में पूर्व अर्थ की तिद्धि अपर सर्थ के बिना नहीं होती, पूर्व अर्थ अर्थान्तर के प्रति सापेक्ष रहता है। इस अर्थापत्ति में ऐेसी विवशता नहीं रद्षती। इसमें द्वितीय अर्थ के समर्थन में प्रथमार्थ दृष्टास्त का कार्य करता है। पण्डितराज ने अपरा्थ का कविकस्पित होना आवश्यक बतलाया है और इसीलिए सवस्वकार द्वारा सद्धृत 'पशुपति० तथा 'अवस्थेयं' पद्य में अपशार्थ मक्पित मान इन्हे अच्छा उदाहरण नहीं माना। द्वितीय पथ्य में चमस्कार का कारण 'विधो'-इस रिर्द पद्य में है अथवा शिव की विषम स्थिति के प्रति वक्र चन्द्राभिन्न नाम विधि को हेतुरूप से पस्तुत करने में। प्रयम पद्य में यदि कैमुतिक न्याय की स्थिति लौकिक है और चमरकारशून्य है तो उपमा में मी दो लौकिक अर्थों के उपादान में अलंकारत्व नहीं मानना होगा। 'मुख कमल के समान है' इस वाक्य में मुख, कमल और दोनों का साम्य ये तीनो तत्त्व लोकसिद्ध हैं। यदि साम्यदर्शन प्रातिम है तो केमुतिकन्याययोजना में भी प्रातिमत्व माना जा सकता है। विश्वेश्वर ने अर्थापत्ति नामक कोई अलंकार नहीं माना । वे मन्मट के जो मनुयायी ठदरे। चक्रवत्तीं की निष्कष्टार्ष कारिका- अर्थापत्तिस्तु प्रकृतापकृतापातादियं च दविविधा गता।।' कमुतिकन्याय के द्वारा अन्य अर्थ की सिद्धि अर्थषपत्ति नामक अलंकार मानी जाती है। यह प्रकृत और अपकृत की सिद्धि के कारण दो प्रकार की होती है। दण्डापूप-पूर, कड़ाह में से, सौंक में छेद छेद कर निकाले जाते हैं और धी नितारने के लिए उन्हीं सौकों को दीवाल आदि में खोंस दिया जाता है। वहाँ चूदा हो और वह सींक को ही कुतर खाय और यदि पूर गिने हुए न हो तो सोचा जाएगा कि उसने पूए भी खाए ही होंगे। उससे कठिनतम कार्य कर लेने पर सरतम कार्य करने की शक्यता घ्ोतित होती है। यही बात 'किमुत'= भल क्या इन दो अव्ययों द्वारा कही जाती है। इस प्रकार इन दृषन्तों को दण्डापृपिका और कमुतिक न्याय कहते हैं। [सर्वस्व] [ सूत्र ६५ ] तुल्यवलविरोधो विकल्पः ।
त्वादेव यौगपद्यासभवे विकल्प:। औपम्यगर्सत्वाचचान चायत्वम्। यथा- 'नमन्तु शिरासि धनूंपि चा, कर्णपूरीक्रियन्तामाक्षा मौरव्यो वा' इत्यादि। अत्र प्रतिराजकार्ये नमने शिरसा धनुर्पा च तुल्यपमाणारिलि- पत्वम्। संधिवित्ही चात्र क्रमेण तुल्यप्रमाणे, मतिराजविषयत्वेन स्पर्या द्वयोरपि संभाव्यमानत्वात्। द्वो चेमौ विरद्धाविति नास्ति तयोरयुग-
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अलङ्गारसवस्वम्
पत्मवुत्ति:। प्राप्नुपतश्चात्र युगपत्मफारान्तरस्यानाशक्््यत्वात्। तवश्र न्यायप्रासो विकल्प:। नमनऊतं च तथोः सादश्यमित्यलंकारता। पवं कर्णपूरीक्रियन्तामित्यादी योजनीयम्। औपम्यगमत्वाच्चात्र चायत्वम्। कचिच्छ लेपावष्टम्भेनाप्ययं हश्ष्यते। यथा-
ध्यानालम्बनतां समाधिनिरतैनत द्वितभातये। लावण्यस्य महामिधी रसिकता लक्ष्मीद्दशोस्तन्वती शुष्माकं कुरता भवार्तिशमनं नेत्रे सतुर्वा हरेः।।' अन्न नेत्रे तनुर्वेति पिकल्पः। उत्तमत्वाच्च तुल्यप्माणं श्लि्त्वम्। न चात्र समुच्चये वाशव्दाः। संभवन्त्यामपि गतौ महाकविव्यवहारे तथा प्रयोगामावात्। ननु विरोधनिमित्तो विकल्प:। करथ चान् विरोध:। नैतत्। तनुमध्ये नेत्रयोः प्रविए्त्वास्यो: पृथगभिधानमेव म कार्यम्। फृतं घ तर्स्पर्धिभावं गमयति। स्पर्धिभावाच्च विरुद्धत्वम्। नेत्रे अथवा समस्तमेच शरीरमित्यर्थायनमे विरोधस्य सुमत्येयत्वात्। स चात्र श्लेपच्छिलए:। लिद्गश्लेपस्य वचनश्लेपस्य चाम दऐ: । तस्मात्समुच्चयप्रतिपक्षभूतो विकल्पाखयोडलंकार: पर्वैरकृतषिवेकोऽय द्शित इत्ययगन्तव्यम्। [सू० ६५] समान चहवाले पदार्थों का विरोध विकश्प [नामक भलंडार कहलाता है]। [शृ०] दो विरोधी पदार्थ समान प्रमाण से युक्त दोने के कारण दल में समान दो और एक ही स्थान में पक साथ प्राप्त हो, किन्तु विरुद्ध होने के कारण उनका साथ वनता न हो तो [अलंकार का नाम ] विकव्प होता है। इसमें सात्थ्य छिपा रहता है अनः चारता चली आाती है। * उदावरण यथा- 'नमें सिर या धनुप, करनफूळ बनाई जाएँ आज्ञाएँ या अत्यंचारँ [हपचरित-६, पृ० १९४] रत्यादि। यहाँ शघुराजा द्वारा करणीय रूप में कचित जो नमनकार्य है उसमें सिरे और धनुष समान प्रमाणों से युक्त हैं। ये प्रमाण है यहाँ क्रम से सन्धि और विग्ह क्योंकि रचुराजा के साथ 1 स्पर्धा होने से दोनों हो सम्माविन हैं। ये दोनों [ सन्धि विपद] परस्पर में विरुद्ध है इसलिए इनकी एक साथ प्रवृत्ि नहों हो सकनी, किन्तु हो रहे हैं प्रमूच यहाँ दोनों ही एक साथ; क्योंकि अन्य कोई प्रकार यहाँ सोचा नहीं जा सकना। इम प्कार, यहाँ विकल्प देतुत सिद्ध है। उन [धनुप औौर सषिर] दोनों में नमन को लेकर साहृयय है, सलिए[यइ विकत्प] यहाँ अलकार है। इमी प्रकार 'करनफूल बनाए जायें इत्यादि वाक्य में योजना की जानी चाहिये। इनमें चारुख सादृश्यगमता के कारण हो है। कहों यह [ विकल्प] दचेष से भी होता है। यया- 'भगवान् विष्णु के नेत्र या उनकी काया आपकी मतव्याधि नष्ट करें जो भक्ति प्रद्व विकोकन प्रणदिनी [नेत्र =मक्ति से नम्न जनों को देखने कंा प्रणय = प्रम लिये एये, तंनु = काया=मक्ति से
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विकलपालङ्कार: ५९३ नम्र जनो का जिसके दर्शन में प्रणय= प्रीति तथा याचना है।, नीलकमल से स्पर्धा रखने वाले, समाधि में लगे व्यक्तियों द्वारा ईहित या हित को प्राप्ति के लिए ध्यानास्पद बनार हुये, लवण्य की महान् निथि तथा लक्ष्मी जी के नेवो के लिए रसिकता देने वाले हैं।' यहाँ 'नेत्र' या 'तनु' इस प्रकार विकल्य किया गया है। दोनों हो पदार्थ उत्तम है इसलिए दोनों की रिलिष्टता में प्रमाण सामग्री समान है। यहाँ जो 'वा'= 'या' शब्द आया है इसे समुच्चयवाचक नहीं मानना चाहिए [जिससे अर्थ निकलेगा 'नेत्र तथा शरोर दोनो० और अलंकार होगा समुच्चय] क्योंकि 'वा' का अर्थ समुच्चय संभव होने पर मी महकवियों के व्यवहार में वैसा प्रयोग नहीं देखा जाता। शंका होती है कि [सूत्र के अनुसार ] विकव्प तो विरोधमूलक होता है, यहाँ विरोध कैसे सिद्ध होगा? ऐसा नहीं, नेत्र [नो है वे ] तो शरीर के बीच प्रविष्ठ हैं अतः उनका अलग से कथन ही नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि वह किया गया है अतः उन [नेत्रों] में स्पर्चिता व्यक करते हैं, और स्प्मिता से इनमें विरोध है। यहाँ 'नेत्र मथवा पूर्ण शरीर [ मवार्चि शान्त करें]' इस प्रकार [के अर्थ से ] विरोध सूखपूर्वक जाना जा सकता है। वद [विकल्प इलेप से हुआ है मतः रिलिष्ड है। क्योंकि यहाँ [तनु में स्रीलिंग तथा नेत्र में नपुंसकर्लिग होने के कारण ] लिगशलेप तथा [नेन्र में द्विवचन तथा तनु में एकवचन होने से] वचनदलेष दिखाई देता है। इस कारण विकल्म नामक यह अलंकार समुच्चय नामक अरंकार का चल्टा अलंकार है। इस प्रकार ध्यान देने की बात है कि पूर्ववर्सी आचार्य इसका अन्तर नहीं कर पाए थे। यहाँ इसका अन्तर कर दिया गया है।' विमर्शिनी तुल्येत्यादि। पतदेव व्यापष्टे-दिरद्धयोरित्यादिना। तुक्यवळत्वादेवेकस्यापि बाधा- भावान्नैकतरग्रहणम्। तच्च द्योरपि युगपप्पास्तिः। न व विरुदयोरेतद्यज्यते इस्ययै कस्यापि साधकवाघकप्रमाणाभावादनिव्वमादनियतैकतरा वलम्वनेन पाष्िकी प्रास्ति। अत एव नियतोभयपनावलम्बी विकत्क। ननु च 'यवैर्मीहिभिर्वा यजेत' इति वास्त. वरवाद्विकतपादस्य को विशेष इत्याशक्याह-औपम्येत्यादि। औपन्यं साधारणध्मे- निबन्धनमिति तस्याप्यत्र वैधम्। एवं घ यत्रैवौपम्पगर्मतवं तत्रैवायमलंकारो न स्वन्य- थेति भावः। यथा- 'निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्षमी: परापततु गच्दतु वा यथेष्टम्। अघेव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्यथः मविचलन्ति पदं न धीरा:।'
क्रमेणेति। शिवेनमने संधिर्धनुनमने विग्रहश्चेति। रपर्ंयेत्यनेन विरुतत्वमेवोदलितम्। दो चेमाविति। संघिविग्रही। अनयोविदद्धूरवादेत्तत्कार्ययोरपि शिरोधतुर्नमनयोविरुद्ध स्वम्। तबोरिति। शिरोधनुर्नमनयोः। प्रकारान्तरस्येवि। यत्र शिरसां धनु्पां ट युगपद्-
व्वमुकम्। अत एव वेतदभाव वादिनामन्यायवादिश्व मपि सूचितम। अश्रप्यकृतमेवा लंकारत्वनित्याह-नमनेत्यादि। तेनाघ नमनाव्यव्य समानधमंस्यानुगामितयैक्यरूपेण निर्देश: । वस्तुभतिवस्तुभावस्तु सथा- 'सत्र्ट विधातुरुचितं मुखमेव चन्नदभ्नकं नतभ्नु तव कान्तिविलोकितेपु। पणाछ विन्वमथ वा विवल्कलष्टमेकं, न यदिहित एव जगत्पकारः॥॥'
त्वादिति। द्योरपि भगसंचन्धिरवेन भवार्तिशमनकरणसाम्प्यॅन समरवाद। ३८ म० स०
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ननु च नेत्रे च तनुश्रेतयत्र समुघय पूव किं न भवतीश्याशक्डयाद्-न चात्रेत्यादि। गताविति। वाशव्दृस्य समुचयाधयत्तणायाम्। तर्मेति। समुचया्थपरतवेत्यर्थः। न दम्र समुचपार्थो विवसितः। एवमत् विशोधाभावास्कर्य विकश्वोि भवतीत्याद- नन्वित्यादि। न कार्यमिति। तन्वभिधानेनैव नेव्रयो स्वीकृतरवाकू। कूनमिति। अन्यया हि पृयगभिधानं निम्पयोजनं स्यात्। रपषिमावादिवि। तुर्य्वात्। सप्त्येयत्वादिति। सुष्टर्वेन विरुदूस्य कष्टकक्षपनानिरासा कृसः। सहति। विकवप। पतदेवोपसंहरवि-तरमा- दित्यादिना। समुचये पयोरपि युगपद्वस्यानम्, इछ खवन्यपेश्यस्य तत्मतिपचभूसा्वम्। अनेनास्य अन्यकपपत्ञत्वमेव दर्शितम्। मुख्य हत्यादि। इसी को व्याख्या करते है-विरुद्ुओो: इत्यादि के द्वारा। क्योंकि दोनों अर्थ समान बर के होते हैं इसलिए किमी एक का बाध नहीं होता और न किमो एक का ग्रहण। उस [विरुद्धरव या समबस्] का स्वरूप है दोनों पक्षों की एक दौ स्थान पर प्रापति। किन्तु विरुद्ध पक्षों में यह सम्मव नहीं होता। फलतः यहों न किमी एक पक्ष का माधक हो मिलता और न वाधक हो। निदान यहाँ अनिश्चय रहता है। परिणामत यहाँ किसी मी एक का अवलम्बन संमव नहीं होता। इस प्रकार यहाँ पाक्षिक[ वैकसपक] स्थिति रहती है। इसी कारण इसे विकल्प कहा जाता है, जिसमें नियमत दोनों पक्षों का अवलम्बन किया जाता है। शूका होती है कि 'जो या चावळ [किसी] से यश करो-इस वास्तविक विषवप मे इस विकश्प का क्या अन्तर है, इस पर उत्तर देते हैं-'औपम्य' हस्यादि। औपम्य साधारण धर्म पर निर्मर रहता है अतः वह [औपग्य ] भी यहाँ तीन प्रकार का होगा क्योंकि साधारण धर्म तीन प्रकार का होता है ] निष्कर्म यह कि यह विकल्प वहीं अलंकार दोगा जहाँ यह धषम्यगर्मिन दोगा, नहीं नो नहीं। [औपम्यरहित होने में जहाँ यह अलकार नहीं बनता उपका उद्ाहरण] यथा- 'नीति निपुण लोग निन्दा करें या प्रमसा, लक्ष्मी बरमनी चली आए अथवा जहाँ चाहे चली जए, आज ही मर जाना पड़े या युगान्वर में [ किन्नु ] धीर पुरुष नीनि पथ से अलग दग नहीं रखते।' यहाँ औपम्यगभंखव न होने ने विकक्प में केवल विकश्पत्व है[ रन्नाकरकार द्वारा स्वीकृत अलकारत्व नहीं। नमन्तु आदि में ] विरश्प की स्थिति बनन्गते हुए लिखते हैं अत्र। क्रमेग क्रम से अर्थात सिर झुकाने में सन्धि प्रमाण है और षनु झुकाने में विग्रह = बुद्ध। रपर्घया = स्पर्षा बनलाकर यहाँ विरोध का को समर्यन किया। द्ो सेमी - ये दोनों अर्यान् मन्यि और विग्रह। ये दोनों विरुद्ध है इमलिए इन के कार्य सिरोनमन तथा धनुनेमन भी विरुद्ध हैं। तथो = उनका अयोत शिरोनमन और धनुनर्मन का। प्रकारान्तर = अन्य प्रकार=देमा कोई प्रकार जिसमें सिर और धनुष का नमन साय न हो सके। ननश=इस कारण=विरुद्धों की प्रृत्ति एक स्थान पर एक साथ न होने के कारण। न्यायप्राप कहकर यह बनलाया कि यह अरंकार काटा नहीं था सकता। और रसी से यह मी बवला दिया कि इमे न मानने वालों का कथन न्यायशून्य है। यहाँ सादृश्य से हो चमत्कार होना है इसी को दुहराने है-'नमन०'। इस वदहरण के द्वारा यदो नमनरूपी सावारण धर्मे अनुगामी रूप से एक वतलाया गया। वस्तु प्रतिवस्तुभाव वा उदादरण यह है- कान्ति देखनी थी तो विधाता को केवल तुम्हारा चचत् मौहों वाला मुम हो बनाना चाहिए था, या तो रदुरित कन्न्क से युकत चन्दरिम्व ही अवेला । क्या इन [दोनों ] ने ही जगव में प्रकाश { भी] नहीं कर रसा है? यहाँ 'चचटता और रकुरण' शुद्ध सामान्यरप से माधारण धर्म रूप है और मौंह तथा कलंक
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विकल्पालङ्कार: ५९५
विन्वप्रतिविम्वमाव से युक होकर। उसमत्व=क्योंकि दोनों हो भगवत्संबन्धी होने के कारण भवारततिशमन के सामर्थ्य में समान हूँ। शंका होती है-'यहॉ नेत्र और तनु' इस प्रकार समुच्चय ही क्यों न मान किया जाए इस पर उत्तर देते हैं-न चान्न। गती='वा'-शब्द का जो समुच्चयरूपी अर्थ है तदरूपी गति। तथा = समुच्चयार्थपरक। वहाँ समुच्चयरूपी अर्थ विवक्षित मी नहीं है। [शंका ] यदाँ विरोष का अभाव है अतः विकल्प मी मैसे होगा' यही कहते हैं-ननु। न कार्यम्=केवळ तनु का कथन करने से ही नेत्रों का भी संगह संभव होने से 1 कृतम्=पृथक् अभिान। स्पर्धि भाव= नहीं तो पृथक अभिधान निष्प्रयोजन हो जाता। स्पर्धिभावात्=स्पर्थिता=तुत्यता के कारण । सुप्रत्येय = सुख पूर्वक जानने योग =इस प्रकार 'सुखपूर्वकता बतलाकर विरोध को ्िष् कल्पना द्वारा सिद्ध होने का निराकरण किया। स = वह= विकल्य। इसका उपसंदार करते हुए कहते हैं-तस्मास०। समुच्चय में दोनों पक्ष एक साथ प्राप्त रहते हैं, जब कि यहाँ [विकव्प में] उसके विपरीत अलग अलग, इस कारण यह उस [ समुच्चय ] से चलटा है। ऐसा कहकर यह चत- लाया कि यह अलंकार प्रयमतः अन्यकार को ही कल्पना है।।' विमर्श-परवर्त्ती आचार्यो में रत्नाकरकार, दीक्षित जी और पण्डितराज ने विकल्प को भलंकार मान लिया है। इनके लक्षण इस प्रकार हैं- रत्नाकरकार =सू० 'विरुद्धयोस्तुव्यत्वे पाक्षिकत्वं विकत्पः ॥ ८८ ।। कृ० 'यध दयोर्थयोविरुद्धत्वात समुच्चयाभावेन तुल्यवलत्वाच्च एकस्य वाधाभावाद् अनियतेकतावलम्वनेन पाक्षिकत्वं स विकल्प:।' 'दो विरुद्धों की समानता होने पर जो पाक्षिकता आती है वही विकल्प कहलाती है।' जहाँ दो अर्थ विरुद्ध हों अतः जिनका समुच्चय न हो सक रहा हो साथ ही वल में समान होने से जिनमें से किसी एक का बाघ भी न हो रहा हो अतः किसी एक के पक्ष का अपनाया जाना संमव न छोकर पाक्षिक हो तो वहाँ विकल्प को अलंकार माना जाता है। विमशिनीकार की 'साधकवावकपमाणमावादनिश्वचयादनियतैकतर त्वालम्बनेन पाक्षिकी प्रापतिः'-रत्नाकर की उक्त पंकति का ही परिष्कार है। रत्नाकरकार ने 'निन्दन्तु नीति०' पद्य में विकल्प माना है। रूपक आदि के समान उन्होंने मौपम्य को यहाँ भी आवश्यक नहीं माना है। 'निन्दन्तु०' पद्य में चमतकार है और विकत्पमूलक ही चमतकार है अतः विमर्शिनीकार का यहाँ केवल लौकिक विकल्प' मानना हदयसंवाद के विपरीत है। अप्पयदीक्षित - 'विरोधे तुश्यवलयोर्विकल्पालड्कृतिर्मता' -- 'तुल्यवलों के [ परस्पर] विरोष में विकस्पाकंकार माना गया है'-इस प्रकार पाक्षिकत्व को लक्षण में स्थान नहीं देते। उनका उदाहरण हर्पचरित के 'नमन्तु शिर्रासि०' का ही पद्यरूप यह है-'सघः शिर्रासि चापान् वा नमवन्तु महीभुनः। यद्यपि दीक्षित जो ने यहाँ साद्श्य की कोई चर्चा नहीं की है। तथापि ढन्होंने उदाहरण सादृश्ययोजना के ही दिए हैं। पण्टितराख् ने 'विरुव्यो: पासिकी प्राष्तिविकलप :- इस प्रकार 'विरुद्ध अर्थो की वैकत्विक मरप्ति में विकव्प माना है। उन्होंने औपम्य को मी आवश्यक बतलाया है। उनका कहना है कि औपम्यरहित विकल्प में केवल विकत्पत्व होगा अलंकारत्व नहीं। इस प्रकार पण्ठितराज ने सर्वस्व और विमशिनी का इस दिशा में अ्नुगमन किया है।
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'मरतिमन्ठ-'पद पर विचार करते हुए पण्डितरान ने कहा है यहाँ 'या' का अर्थ= तनु के समान नेत्र' इस प्रकार सादृश्य है। संस्कृनकोषों में वा का सर्थ उपमा मान्य मी है- 'वा स्याद् विकल्पोपमयो ।' सवरकार के द्वारा प्रतिपादित विरोध पर टिप्पणी करते हुए उन्होने कदा है कि विकावन में वास्तविक विरोध ही कारण बनता है, कर्पित नहीं। 'भकिपड्ड' पघ में सर्वस्वकार द्वारा प्रतिपादित विरोध क्पित विरोध है। वस्तुतः 'वा' शष्द का परयोग उपमा अर्थ में भी 'पममिनी वान्यरूपाम्' [मेषदूत ] हत्यादि स्थों में कचित ही पाया जाता है। प्रसिद्धि उस्षकी 'विकश्य' अर्थ में दी है। अत. 'मक्िम्रह' पद्य में विकव्प मानने पर पूर्वकथित विशेषगों की उमयान्वयिता पर ध्यान जाता है। विरद्ध वस्तुओं के विकव्प में चमतकारमाना अवश्य की अधिक रहती है तथापि अविरुद्ध वस्तुओं में भी विकश्प का चमत्कार नहीं रइता ऐसा नही है। सच्च यह है कि विकल्प भूमिका पर आरद दोते दो मचिरद्ों में भी विरोध चला माता है। एककक्षा के सहाध्यायो मित्रो का एक ही पद के लिए नियुत्ति में विकस्प होते ही विरोध देखा ी गया है। सर्वर्वकार के स्र्यातर्वर की ओर ध्यान ळे बाने का अभिमाय यही दिखाई देवा है। चकरची ने इस विषय का सक्षेप इस प्रकार किया है- 'विरोधे तुश्यकलयोनिकल्प. सन्निपातिनीः । अश्लेप रलेषमित्ित्वाद् दिधायमुपव्ण्येते ।।' समानबळ वाले तथा एक ही स्थान पर पराप्त दो सर्यों का विरोध होने पर विकल्पालंकार होता है। यह श्लेपमूलक होता है और शलेपरहित [शुद्ध ], अतः दो प्रकार का होता है। [सर्वस्व] [सू० ६६ ] गुणक्रियायौगपदयं समुच्चयः। गुणानां वैमल्यादीनां यौगपद्येनावस्थानम्, तथैव कियार्णा च समुच्च- योडलंफार: । विकल्पपतिपक्षेणास्प स्थिति:। क्रमेण यथा- 'विद्लित सकलारिकुलं तव वलमिद्मभवदाशु विमलंच। प्रखलमुखानि नराधिप मलिनानि च तानि जातानि।।' अयमेकपदे तथा वियोग: प्रियया चोपनतोऽतिदुःसद्दो मे। नयवारिधरोदयाद्द्वोभिर्भवितव्यं च निरातपत्वरम्यैः ॥' पतवविभिन्नविषयत्वेनोदाहरणद्वयम्। एकाधिकरणत्वेनाप्ययमलंकारो टश्यते। यथा- 'विभ्राणा हृदये त्वया चिनिद्धितं प्रेमाभिधान नवं शल्यं यद्विद्धाति सा विधुरिता साधो तदाकर्ण्यताम्। शेते शुष्यति ताम्यति अल्लपति प्रम्लायति भ्राम्यति प्रह्वत्युस्लिप्नति प्रणश्यति दलत्युन्मूच्छति त्रुस्यति।।' परवं गुणसमुच्चयेऽप्युदाद्दार्यम्।
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समुच्चयालट्कार: ५९७ केचित्पुनन केवलं गुणक्रियायां व्यस्तत्वेन समुच्चयो यावत्समस्तत्वे- नापि भवतीति वर्णयन्ति। उदाहरन्ति च- 'न्यश्चतकुश्चितमुन्मुखं हसितवत्सा कृतमाकेकरं व्यातुत्तं प्रसरत्यसादि मुकुलं सप्रेमकम्पं स्थिरम्। उदूभ्रभ्रान्तमपाङवृत्ति विकचं मज्जत्तरद्वोत्तरं चक्षु: सासत्रु च वर्तते रसवशादेकैकमन्यक्रियम्॥' अत्राकेकराद्यो गुणशब्दा न्यश्चदित्यादय: क्रियाशव्दा इति सामस्त्येन गुणक्रियायौमपद्यम्। प्रसादिसप्रेमेत्यादीनां समासकृत्तद्वितेषु संबन्धाभि- धानमिति संचन्धस्य वाच्यत्वात्, तस्य च सिद्धरूपत्वेन गुणत्वाद् गुण- शब्दत्वेन गुणयोगपद्यमिति द्ष्टव्यम्। पवमयं तरिधा समुच्चय:। [सू० ६६ ] गुण और क्रियाओों की एकन स्थिति समुच्चय [नामक अलंकार कहलाता है ] । [वृ०] दिमलता आादि गुणों का एकत्रित होना और इसी प्रकार क्रियाओं का एकत्रित होना समुच्चय नामक अरंकार कदलाता है। यहाँ जो इसे रखा गया है यह इसलिए कि यह विकरप का विरोधी है। क्रम से उदाहरण- [ गुणसमुच्चय ]- 'आपकी यह सेना सम्पूर्ण शत्रुकुल को दलित कर उज्जलता को प्राप्त हुई और दुषों के वे चेहरे मठिन हो गए। [क्रियासमुच्चय ]- 'मकाएक उस प्रिया से मेरा यह अति दुःसह वियोग अभी-ममी सुझ पर मा पड़ा तो क्या इसी समय इन दिनों को नवीन मेवों के उदय से निरातप औौर रम्य होना चाहिए था। ये ऐसे उदाहरण हैं निसमें अधिकरणगत भेद है। यह अधिकरणगत एकता में भी दिखाई देता है। यया- तुम्हारे द्वारा निहित प्रेमनामक नवीन शत्य हृदय में धारण की हुई वह विचारी जो-जो करती हैं, साधो! उसे सुनो, सोती है, सूखती है, व्ययित होती मै, प्रछाप करती है [ कुछ भी बकती है], कुम्हलाती जाती है, चक्कर साती है, दोलती है, रंगीटे वनाती [ कुरेदती ] है, छिपती जाती है [ जोझल होती जाती है ], गहरी मूर्च्छा में पढ़ जाती है [ और ] ददनी जाती है। इसी प्रकार गुणो के समुच्चय का भी उदाहरण दिया जा सकता है[ आगे विमर्शिनीकार ने दिया भी है]। कुछ [आाचार्य ] केवल व्यस्तरूप से [अलग-अरग करके] हो गुण और क्रियाओं का समुच्चय नहीं मानते समस्तरूप में [ दोनों के मिलित रूप में ] भी मानते हैं। उदाहरण भी देते हैं- 'इस समय किसी [ भीतरी ] रस के कारण प्रत्येक नेत्र अलग-अलग व्यापार में रगा है, कोई तिरछा है तो कोई सिकुड़ा, कोई तन्मुख है तो कोई इँसीलिए, कोई भाव-मरा है तो कोई आकेकर [मदमरा ], कोई न्यापृ्त [लोटा हुआ] है तो कोई फैलता हुआ, कोई प्रसादपुर्ण है तो कोई मुकुलित, कोई प्रेमपूर्ण कम्पन लिए है तो कोई स्थिर; कोई मौह चढ़ार है तो कोई कनखी
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५९८ अलह्ारसवस्थ्रम् पर टिका, कोई खिक्षा हुआ है तो कोई दूबा हुआ, इसी प्रकार कोई सग्गायित है तो कोईं साधु।1 यहाँ आकेकर आदि शब्द गुणवाचक शब्द हैं और 'न्यन्चत' आदि क्रियानष्द। इस प्रकार यहाँ मिश्रितरूप में गुण और क्रिया का एकशीकरण है। 'प्रसादि' और 'सप्रेम' शब्द, 'समास, क्दन्त ता तद्धित में सवन्ध का अमिधान होता है' इस वचन के मनुसार, मम्बन्ध के वाचक है, वह सदन्ध भी यहाँ सिद्ध है अतः गुण है, इस प्रकार इन शब्दों में गुणशम्दर्व है। इस प्रकार यहोँ गुणों का एकत्रीकरण माना जा सकता है। इस प्रकार यह समुच्चय तीन प्रकार का हुसा। चिमर्शिनी शुणक्रियेत्यादि। तथवेति। यौगपचावस्थानेनेतयर्थः अनेनैव चारय गुणक्रियाणां युगपद वस्थिते में दद्दयमप्युक्म्। नैमत्यमालिम्य योगुणयोवपनमनभव नयोक्ष किययोर्य गपद्येना वस्थानम् । विभिन्नविषयरवेनेति। गुणादीनां वलमुसादिविषयगतत्वाद। अवक्ष मिन्नाघि करणोडयं समुच्चयः। एकेत्यादि। पद्यतयत् शयनादीनां शोषणादीनां च क्रियाणामपन- मनभवनादियर कालान्तर माविरवाच योगपद्ेनावरयानम्, तथापि तन्नैरन्तर्येण नेयम्। स्वमिति। य त्रै वात्रैक विषमखवेन सायनाघा किया हरपये। तत्त यथा- 'सितं ज्योरस्नाआलैररुणरुच्वि सध्याकरमरै- स्तमस्तोमे: श्यामच्छुवि भपटळैः पीतमपि घ। नभो नीलीनीलं रतिरमणलीलाविहरणे स्थली घात्रा चित्रं चतुरमचुना चित्रितमदः।1 अम्र सिवादीनां गुणानामेकाधिकरणरवेन युगपद्यस्थानम्। ननु च केकरादयो न्यन्चदित्यादयथ्ष यदि गुणक्किया शब्दाश्तम्प्रसादीत्याहु: पुनः किशन्दा इत्यारासथाह- प्रसादीत्यादि। तस्येति। संबन्घस्प । पत्तदुपसंहरति-पवमिस्पादिना। त्रिधेति। गुणाना क्रियाणा गुणक्रियाणां च यौगपद्येनावरयानाप। मिद्याभिसाधिकरणरवेन यो विशेष: स एताप्रपव्च पुवेति न पृथगिह्ोपात्त। गुणकरिया। इत्यादि। तथव = इसी प्रकार= एकत्रित होकर एक नगर रहना। ऐेसा कहकर गुग और करिया में से एक-एक के एकत्रीकरण को लेकर संभावित दो भेद सूचिन किए। [ चिदलित० पथ में ] निर्मलता या उज्ज्वलता और मटिनता रूपी दो गुणों का एक साथ रहना बनछाया गया है और [अयमेकपदे पद्य में ] उपनमन=मा पडना और होना किया का एक साथ रहना बसलाया गया है। विभिन्नविपयरव=मिन्न मिन्न अधिकरणों में = क्योंकि गुण आदि सेना और मुख आदि अलग भल्ग पदार्यों में विद्मान वतलाए गए है। इसीलिए यह समुच्चय मिन्नाधिक- रण समुच्चय हुआ। एक =इत्यादि। यद्यपि ['विभ्राण' पद् में] सोना =सूखना आदि क्रियाएँ मिन्न भिन्न समय में होती हैं। अत. इनका दैसा एक साथ रहना नही है जैसा कपर कषित 'आा पटना' और 'होना' क्रियाओं का, उथापि बीच में अन्तर न पहने के कारण ऐसा माना जा सकता है। पवम्=जिस प्रकार यहाँ ['शेने शुष्यति'-पद्य में ] शयन आादि करियाऐ एक विषय में है उसी पकार वह [ गुणो का एक विषय में रहना] भी इस उदाहरण में देखा जा सकता है- 'चन्द्ररदिमियों से सफेद, साँस की किरणों से लाल, अन्धकारपटल से साँवसा, नक्षतरों से पीछा और स्वय नोटी के समान नौथ वर्ण या यह आकाश विधाता ने बहा हो कौशलपूर्ण चित्र बनाय। है जो इस समय काम, के सीलाविद्ार को स्थली है।'
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समुच्चयालङ्कार: ५९९
यहाँ सफेदी आदि गुणों का [आकाशरूपी] एक ही अधिकरण में एक साथ रदना मतलाया गया है। शंका होती है कि यदि 'केकर' आदि और 'न्यजत्' आदि शब्द शुणवाचक और क्रिया- वाचक शब्द हैं तो 'प्रसादि' आदि शब्द कैसे शब्द है' इस पर लिखते हैं-'प्रसादि' इत्यादि। तस्य उसका सनन्ध। इस प्रकरण का उपसंहार करते हैं 'एवम्' हत्यादि के द्वारा। त्रिघा तीन प्रकार का = इसलिए, गुण करिया, तथा गुणकिया दोनों का एक साथ समुच्चय रदता है। मिन्न या अमिन अधिकरण को लेकर जो विशेषता आती है वह इन्हीं भेदों का विस्तार है इ सलििए उन्हें यहाँ पृथक रूप से नहीं अपनाया॥ विमर्श-'न्यन्चत०' इत्यादि पद्य का प्रत्येक विशेषण मरतविया में प्रसिद्ध नेत्रचेषमों की विशेष मुद्राओं के लिए प्रयुक्त है। संजीविनीकार ने उनमें से प्रत्येक का स्पष्टीकरण स्वनिमिंत लक्षणों द्वारा इस प्रकार किया है-
न्यश्चित = स्यान्न्यन्चितं न्यव्दपाज्मागम् कुक्रित = अपालसक्कोचि तु कुन्घितं स्याद। उन्मुख = उदन्घितं तूव्मपांगसकि दसित = निमेपशून्योलसितं चिहासि ॥ १ ॥ साकूत - साकृतमा काछिक्षतमावगर्भम् भाकेकर=आकेकरं तिर्यगरालतारम्। व्यापुत=तिर्यह निवृसं बलितं विलोक्य प्रसरत=प्रेम्णा सुदूरं परिवतगदुक्तम्॥ २ ॥ प्रसादि=सभ्नविलासं स्मयते प्रसन्नम् मुकुल =सम्मीव्यमानं मुकुलं वदन्ति। सप्रेंम = स्याद श्रेमगर्भे मनसो द्रवाय कम्प्र= उदकम्पसुत्कम्पित पक्ष्मता रम् । ३ ॥ स्थिर= स्थिरं विदूरान्तरितार्थनिए्ठम् उद्म्ु = उद्वचितं तूर्ध्व विकम्पितसु। म्रान्त = विभ्रानतरक्तं मदमन्थरं स्वादू अर्पागवृत्ति = विक्षेपि पाशवें यद पाङ्गवृत्ति ॥ ४ ॥ विकच = विकासि दृश्ये सविशेषलक्ष मज्जत् = नासामनिष्ठ तु निहन्चितं स्यात्। तरदोत्तर= तरडितं यद् धुतिरूर्मिकल्पा सास्र = उक्कण्ठितं रागनिवद्धवाष्पम् ॥५॥। [सर्वस्व ] एकं समुच्चयं बिप्कारभिन्नं लक्षयित्वा द्वितीयं लक्षयति- [सृ० ६७] एकस्य सिद्धिहेतुत्वेऽन्यस्य तत्करत्वं च। समुच्चय इत्येव। यभ्कः कस्यचित्कार्यस्य सिद्धि हेतुत्वेन प्रक्रान्तस्तना- न्योऽपि यदि तत्क्पर्वया तत्सिद्धिं करोति तदायमपरा ससुच्चयः। नचार्यं तमाध्यलंकारेडन्तर्सवरति। यत होकस्य कार्य प्रति.पूर्ण साघकत्वम्, अन्य.
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स्तु सौकर्याय काकतालीयेनापतति, तम्न समाधिवक्ष्यते। यम तु खलेक पोतिकया यद्ूनामवतारस्तपायं समुच्चयः। अतः सुमद्दान्मेदोऽनयोः। स पप समुच्चयः सद्योगेऽसद्योगे सद्सद्योगे च भवतीति भिधा मिद्यते। सतः शोभनस्य सता शोमनेन समुच्चीयमानेन योगे यथा- 'फुलममलिनं भद्दा मूर्तिर्मतिः श्रुतिशालिनी भुजवलमलं स्फीता लक्ष्मी प्रभुत्वमसण्डितम्। प्रकृतिसुभगा पते भावा समीभिरयं जनो वजति नितरां दर्प राजस्त एव तवाङ्शाः" अग्रामालिन्येन शोभनस्य कुलस्य मूर्त्यादिमि: शोभनैः समुच्चयः। एफेकं व दर्पह्वेतुतायोग्यं तत्स्पर्वया निबद्धम्। असतोऽशोभनस्यासता समुच्चीयमानेन योगे यथा- 'दुर्वारा: स्मरमार्गणा: प्रियतमो दूरे मनोऽस्युत्सुर्क गाढं प्रेम नवं घयोऽतिकठिना माणा: कुलं निमलम्। स्त्रीत्वं धैर्यविरोधि मन्मथसहृत् फाल कृतान्तोऽस्षमो नो सख्यक्षतुराः कर्थ नु विरद्वः सोढग्य इत्यं कठः।।' अत्र दुर्घार त्चेनाश्ञोभनानां स्मरमार्गणानां तादशीरेव प्रियतमद्ठूरत्वादिभि: समुच्चयः। नववयःप्रभृतीना च यद्यपि स्वतः शोभनत्वम्, तथापि विरद्द. विषयत्वेनात्राशोभनत्वं लेयम्। सदसतः शोमनाशोमनस्य तादशेन सदसता समुच्चीयमानेन योगो यथा- 'शाशी दिवसधूसरो गलितयौचना कामिनी सरो विगतवारिजं मुजमनक्षरं स्वाऊतेः। प्रभुर्घनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो नृपाङ्गणगतः सलो मनसि सत शल्यानि मे ।।' अत्र शशिन: स्वतः शोभनस्यापि दिवसधूसरत्वादशोभनत्वेन सद्सत- स्तादशरेव कामिनीप्रमृतिभि: समुच्चय। नत्वत्र कश्वित्समुच्चीयमान: शोमनः। अन्यस्त्वशोमन इति सदसद्योगो व्याख्येयः। नतु नृपाङ्गपागतः सल इत्यशोमनोडन्ये तु शोमना इति कथं न समुच्चीयमानस्य सतस्ताहशे नासता योगः। नैतनू। 'नृपाङणगतः खल'इति प्रत्युत प्ररुममङ्गाद् दुष- मेव। न तु सौन्दर्यनिमित्तमित्युपेक्ष्यमेवैतत्। मत पवान्यैरेवमादौ सहच रमिन्नोऽर्थ इति दुष्ट पचेत्युक्तम्। प्ररुते तु नृपाहणगतत्वेन शोमनत्वं पल. स्वेनाशोमनत्वमिति समर्थनीयम्। एवमपि विशेष्यस्य शोभनत्वं प्रक्रा न्तम्, विशेपणस्य त्वशोमनत्वम्, इद् त्वन्यथेवि न सर्घथा निरवद्यम्।
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समुच्चयालङ्गार: ६०१
ननु 'दुर्वाराः स्मरमार्गणा' इत्यन्रोक्तोदाहरणवत् कर्थ न सदसद्योगः । नैतत्। इछ शोभनस्य सतोऽशोभनत्वमिति विवक्षा। तन्न त्वशोभनमेवैत- दिति विवक्षितमित्यस्त्यनयोभेद्ः। अत पवैकनरोपसंहृसं 'मनसि सतश- ल्यानि' इति सुन्दरत्वेनान्तःप्रविष्ठानामपि व्यधादेतुत्वात् ; अपरत्र तु 'कथं सोढव्यः इति सर्वथा दुष्टत्वाभिप्रायेण। तस्मादरिति प्रकारत्नयस्थ विविक्तविषयत्वम्। तीन प्रकारों में विभक एक समुचय का लक्षण कर दूसरे समुचय का लक्षण करते हैं- [सू० ६७] एक को [किसी कार्य की ] सिद्धि का देतु वतलाया जा रहा हो उसी समय उसी [ कार्य की ] सिद्धि के अन्य हेतु का प्रतिपादन भी [समुच्चय नामक अलंकार कहलाता है]। [सृ०] समुच्चय यह पूर्ववत्ती सूत् से यहाँ प्राप्त ही है। जहाँ किसी कार्य की सिद्धि का कोई एक हेतु वतलाया जा रहा हो वहीं अन्य कोई भी पूर्ववत्तों कारण के साथ स्पर्धा कर उसी कार्य की सिद्धि करता हुआ वतलाया जाय वहाँ यह एक दूसरे प्रकार का समुच्चय माना जाता है। यह समाभिनामक मलंकार में अन्तर्भूत नहीं होता। जहाँ कार्य के प्रति एक मी कारण पूर्ण रूप से सिद्धिकारक रहता है, दूसरा कारण केवल सौकर्य के लिए काकतालीय न्याय से आ पहुँचता है। वहाँ समाधि नामक अलंकार वतलाया जाएगा। इसके विरुद्ध खलेकपोत न्याय से जहाँ अनेक कारण एक साथ मा पहुँचते हैं वहाँ यह समुच्चय होता है। अतः इन दोनों में बहुत वड़ा अन्तर है। यह ससुच्चय तीन पकार से होता है [ १] सव सत के योग में [ २ ] असत्, असतू के योग में तथा [३] सत और असव के योग में। सत सर्थात शोमन का सत् अर्थात् शोमन के साथ योग, यथा- 'कुलममलिनम्' [प्रथम व्याधात की विमर्शिनी में अनूदित ] यहाँ कुल जो अमालित्य के कारण शोमन है, का मूर्चि मदि शोमन पदार्थों के ही साथ समुच्चय है। इनमें से प्रत्येक दर्ष में हेतु वनने योग्य है और उस [कुल ] के साथ स्पर्धा लिए हु उपनिवद्ध है। भसद् = मशोमन का असत् = अशोमन के साथ योग, यथा- 'काम के दुर्वार चाण चल रहे हैं, प्रियतम दूर है, मन अति उत्कण्ठित है, प्रेम गाद है, चय नवीन है, प्राण बड़े कठिन हैं, कुल निर्मल है, स्तरीत्व धीरज का विरोधी ठहरा, समय काम को मिन्न [वसन्त ] का है, माग्य भी उलदा है, चतुर सखियां भी नहीं है। अब यह शठ विरद् कैसे सडा जाय ।' इनमें दुर्वारत्व के कारण काम वाण अश्ोभन बतलाए गए है उनका उन्हीं जैसे 'प्रियतम की दूरस्थिति आदि अर्थों के साथ समुच्चय है। यद्यपि नवीन वय आदि स्वतः तो शोनन हैं तथापि यहाँ दे विरह के विषय होने से भशोभन हैं, ऐसा समझना चाहिए। सद और मसत् अर्थात शोभनत्व और अशोभनत्व दोनों से चुक किसी एक का उसी प्रकार के किसी सत् और अस्त के साथ योग, यथा- 'चन्द्र, जो दिन से घूसर हो गया हो; कामिनी जिसका यौवन निकल चुका हो; तालाव जो कमलरहित हो गया हो; अच्छी आकृति के व्यक्ति का मुख जो निरक्षर हो; मभु, जो धन- संग्रही हो; सत्पुरुष, जो सदा की दुर्गति में पड़ा रहता हो तथा खल, जो राजा के अंगने में 11 पहुँच रखता हो, ये सात व्यक्ति मेरे चित् के शष्य हैं।'
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यहाँ चन्द्रमा सवयं शोमन है, तयापि दिवाकालिक उसमें घूसरता के कारण मशोमनता था जाती है। इस प्रकार वह सत मी है और असन मी। उसका वैसे ही कामिनी आदि सब मौर मसत् पदार्यों के साथ समुच्चय हे। सदसद्योग शब्द की व्याख्या यहों ऐसी नहीं की जानी चाहिए कि जिन जिन पदार्थों का समुच्चय किया जा रहा है उननें से एक कोई शोमन माना जाए और उससे मिन्न कोई अन्य मशोमन, और उनका योग सदसद्योग। धका शेवी है कि 'राजा के अँगने तक पहुँच रखने वाध खळ' तो केवल अशोमन हो है, बत कि शेष सब शोमन हैं। इस प्रकार इनके योग को लेकर ही यहाँ सन् के साथ असन का योग क्यों न मान टिया बाय? ऐसा नहीं। 'राजा के अगने तक पहुँच रखने वाला 'खए' इम अंश के कथन से तो यहाँ सलटे प्रक्रम भंग होता है। अतः यह तो सदोप है, न कि सौन्दर्य का हेतु। इससिए यद अंश उपेक्षीय ही है। इसौसिए [मम्मट आदि ] अन्य माचार्यों ने इसे सहचरमिन्न अर्थ मानकर सदोय ही बतलाया है। यहाँ खल को 'नूपागगगवस'-राजा के अगने तक पहुँचने के कारण शोमन तथा स्वट खद् रूप से अय्योमन मान कर समर्थन करना चाहिए। परन्तु ऐसा मानने पर मी दोष का स्वथा निरास नहीं होता क्योंकि मारम्म किया गया है विशेष्य की शोमनता और विशेषण की अशोमनता से और यहों की स्थिति मिन् है [यहो विशेषगगत शोमनत पदले और विशेष्य- गन अशोमनत्व वाद में कमित है]। शका होती है 'दुर्वारा रमरमागंगा' इस पद में मी सभौ कह [ रशी दिवसघूमरः] उदाहरण के हो समान सदसद्योग कयों न माना जाए [केवळ असद्योग दी क्यों माना जाए क्योंकि वर्हो भी स्मरणमागग स्वनः सोमन है उनमें दुर्वारत्व के कारण मशोमनता है]। ऐसा नहीं। यहाँ [रभी दिवस० पद में ] विवक्षा यह है कि शोमन होते दुए भी पदार्थविशेष में अशोमनता है, जब कि वहाँ [ दुर्वारा.० यध में] 'यह सवथा अगोमन ही है'यह विवक्षा है। इस प्रकार इन दोनों में अन्तर है। इसीलिए एक में उपददार किया गना हे 'मेरे मन में साव शव्य है' इस उकि से, क्योंकि वे पदार्थ सुन्दर होने से चिच में प्रवेश पा लेने हैं तत व्यपाजनक सिद्ध होकर थनोमन सिद् होते हैं। दूसरे पद् में इसके विरुद्ध 'कैसे महा जाए' इस प्रकार उपसंदार किया गया है यह इसी अनिपराय मे किये पदार्थ सर्वमा दुष्ट है। इम कारण [समुच्चय] तीनों प्रकारों के क्षेत्र मिन्न हैं।' विम्शिनी लक्षयतीति। एकस्ये यादिना। एक कस्यनिदिति। यत्र याडशो विवषितस्य। स्पर्ष- यैनि। प्रश्न्तस्य हेतो. 1 त्सिद्धिमिति। कार्यनिष्पतिम् 1 सपर रवि। पूर्वस्मुच्चयाठ्। मिन्नलदमावात्। नतु यधेवं तत्कर्य वच्यमाणलम्षण समाधिरेवार्य न भवतीध्या- रासयाद-न चेति। पूर्णमिति। अग्यनिरपेक्षमिन्यर्थ। आकस्मिकमापततो दि कारणान्त- रस्य सौकयेग मुखेन स्वर्पोपचयाघायित्वेन सुष्टुकार्यनिष्पत्तिः प्रयोजनम्। समुच्चय पुनः स्पर्धमे व सहनामेककार्यकारित्वम्। अत पवात्र खलेकपोतिकयेति निद्शनीयम्। पव च- 'सोबाणारृदण परिर्समेण कीस्सवि जे विनिस्सरिया। वे रिवअहरिदं सनवद्अरेणे रसासा न वाषटिण्णाः।।' इश्यादी सनुच्चय पत्र। सोपानारोहणपरिश्रमस्पघंयैय दरिवर्शनरूपस्यापि कारणान्त रत्य तम्यनच्दनिषेघमुसेन श्वासकारित्योपनिषन्धात्। अत पनाग्र न समाधि:।तसष्य दि काक तादी ये नापतना कार पान्तरेण कार्यसौकयं लस्णम् 1 न चायैतत्संभवति। न छ्त्र काकनालीयेन इरिदशनरूपरय कारणान्तरस्यापतनम्। तदर्थमेत सोपानारोहणरयोप
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समुच्चयालङ्कार: ६०३
क्रान्तत्वात्। नापि तद्योगाकार्यंस्योपोदल नातमकं सौकर्य, इरिदर्शनस्यापि सोपानारोहुण परिश्रमसपर्धितया तर्कारिस्वमात्रस्येव विवषितरवाद्। अत एव 'ण वोवारिछण्णा' इत्यु- कमू। शोमनैरिति। भद्ररवादिति योगाद। ननु दूरनिर्वासितस्वादिना पियादीनां यद् शोभनत्वं तटकर्थ न नववयः प्रमृतीनामपीत्याशष्याह-नवेत्यादि । ताद्टशरेनेति। सद- सिः। कामिन्यादीनां स्वतः शोभनानामपि गलितयौवनरवादेरशोमनस्वादू। अन्यथा पुनरत्र सदसद्योगो व्याय्येय इत्याशक्कयाह-नन्वित्यादि। ताद्ृशेनेति। समुच्चीयमाने- नेत्यर्थः। प्रक्रममेदादिति। शोभनानासुपक्रमेऽ्प्यशोननस्य निर्देशान्। अत शवेति। सौन्दर्य निमित्तस्वाभावात। अन्वैरिति। काव्य प्रकाशकारादिभिः। तसु यथा- 'श्रुतेन बुद्धिम्यंसनेन मूर्खता मदेन नारी सलिलेन निग्नगा। निशा शाशाठ्ठेन पृतिः समाधिना नयेन चालंकियते नरेन्द्रता।।' अत्र श्रुतिर्टतिवुद्ध्धादिभ्य उत्कृष्टेभ्यः सहचरेभ्यो व्यसनमूसंतयोनिकृष्टयो्मिनम्। पवमपाति। सश्यामप्यस्यां समर्थनायासू। न सवथेति। अनेनापि मार्णेग क्रमभेदोपपतेः। सदसदयोगाहदसद्योगी मेदयति-नन्वित्यादिना। इहेति। प्रकृते सदसय्योगोदाहरणे। तन्नेति। असदयोगोदाहरणे। अत एवेति। शोभनस्य सतोडशोमनर्वेन विवचणात। सोहग्य इति, उपसंहृतमिश्यत्रापि संबन्धनीयम्। एतदेचोपसंहरति-तत्मादित्यादिना। प्रकारमयस्येति। प्रकारद्पत्य तावन्ेद उफकस्तहूचनादेव पारिशेष्वात्तृतीयरयापि प्रकारभैद: प्रतिपादितो
लक्षपति = लक्षण करते हैं-एकस्य इत्यादि के द्वारा । एक: कस्यचित्=एक कोई अर्थात जहाँ जैसा विवक्षित हो उसका। स्पर्धया=सपर्धा लिए हुए=सर्यात जिसका वर्णन शुरू हुआ हो उस हेतु के साथ रपर्धा। तत्सिद्धि=कार्यनिष्पत्ति। अपर=दूसरा अन्य, अर्थात पूर्न कथित समुच्चय से, कारण कि इन दोनों के लक्षण मिन्न है। यदि ऐसा है तो इसे समाघि सलंकार हो क्यों नहीं मान लेते, जिसका लक्षण आप वतलाने वाले है-ऐसी माशका पर लिखते हैं-न च। पूर्णम् = सन्यनिरपेक्ष। यदि कोई अन्य कारण पकामक आ पड़ता है तो उसका प्रयोनन सुकरता के द्वारा और स्वरूप में अतिशय लाने के कारण कार्य की और अच्छी तरए से निम्पत्ति होती हैं। जद कि समुच्चय में बहुत से कारण स्पर्धा के साथ एक कार्य करते हैं। इसीलिए यहाँ 'सलेकपोतिका' यह दृष्ानत दिया गया है[ जैसे खलिहान में कबूतर अनेक संख्या में एक साथ सतरते हैं वैसे ]। इस प्रकार-[ रत्नाकरकारद्वारा समाधि के उदाहरण के रूप में उद्धृत] 'सोपानारोहपरिश्रमेण कस्या अपि ये विनिःसताः। त एव हरिदर्शनव्यतिकरेण श्वासा न विच्छिताः॥' 'सीढ़ी चढ़ने के परिशम से किसी सुन्दरी की जो साँसें चली र्थी वे इरिदर्शन के कारण विच्छिन नहीं हुई।'-इस स्थल में समुच्चय ही मानना चाहिए। क्योंकि यहाँ जो इरिदर्शन- रूपी दूसरा कारण है उसमें ध्ासों के व्यवच्छेद के निपेध के प्रति कारणतव न बतलाकर दवास के प्रति कारणत्व चतलाया गया है और यह श्वास के सोपानारोहणपरियमरूपी प्रथम कारण के साथ स्पर्षा लिए हुए है। इसीलिए यहाँ समाधि नहीं है। उसका लक्षण तो 'काकतालीचन्याय से एकाएक या पहुँचे अन्य कारण द्वारा कार्य की निप्पत्ति में सुकरता' है। वह यहाँ सनव नहीं है। यहाँ हरिदर्शनरूपी अन्य कारण का आना काकतालीय न्वाय से नहीं हुआ है। वह तो सोपानारोहण का लद्देश्य ही था। ऐसा भी नहीं कि उस [इरिदर्शनरपी कारणान्तर ] के भा
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६०४ जाने से कार्य को सिद्धि में सहायता पहुँचा कर सुकरता ला दो हो, क्योंकि यहाँ इरिदर्शन को मी सोपानारोहण परियम के साथ स्पर्षा किए दुए कारण के रूप में दवासजनकरूप से दी बत- लाना अमीष है। इसीलिए 'विच्छिनन नहों हुए' यह कहा मो। कीभनैः=शोमन मत्व आदि के योग मे। शंका होनी है कि यदि 'दूरस्थित होने आदि के कारण प्रिय आदि में अशोमनता चलो आमी है तो 'नवीन वय' आदि में क्यों नहीं आती । इस पर उत्तर देने हुए लिखते है-'नवः'। ताटश - वसे छो=सदसस्व से युक्। कामिनी आदि स्वतः शोमन है सथापि उनमें गलिन योवनत्व आदि शोमन है। 'यहों दूसरे प्रकार से मी सदसद्योग की व्याख्या की जा सकती ह क्या' इस चका पर कहते हैं-'ननु०'। ताहशेनसमुच्चीयमान। प्रकमभेदास-पकमभेद क्योंकि शोभन से आरम्म है और ा बिठाया अयोमन को। अन पुव = इसीलिए=सौन्दर्य का निमिष् न बनने के कारण। अन्य=काव्यप्रकाशकार आदि। [काव्यप्रकाश में] उस [ सश्चरमिन्नत्व ] का उदाहरण यह है- 'बुद्धि विद्या से अलकृत होती है, मूखंना व्यसन से, नारी मद से, नदी पानी मे, रात चन्द्रमा से, ध्ये समाधान से और राजत्व नीति मे।' यहाँ विद्वा धैयें औौर दुद्धि आदि जो उत्कूष्ट सइचर है उनसे व्यसन और मूर्सना भिन्न हैं। चयोंकि वे निकृष्ट है। एवमपि= ऐमा होने पर मो-इम प्रकार का समर्थन किए जाने पर मौ। न सवथाक्योंकि यह मार्व अपनाने पर भी क्रममेद बना हो रहना है। असद्योग और सदसद्योग का अन्तर करते हैं-'ननु' इस्यादि दारा। हुछयहाँ पकृन जो सदसद्योग का उदाहरण है इसमें। तग्र=वहाँ असद्योग के उद्ाहरण में। अत एव = शोमन अर्योव सनत् की अशोमनरूप से विवक्षा होने के कारण। सोढव्य=इसके साथ भी पूर्वोक्त 'उपमह्त्न्'= उपमद्दार किया यह क्रियापद लगाना चाहिए। अव इसी का उपसदार करते है-तहमाद्=रस्यादि के दारा। प्रकास्त्यस्य =तीनों प्रकार का इनमें दो प्रकारों का भेद पहले की बतला दिया है। उससे बचे हुए तृतीय प्रकार का भौ भेद प्रतिपादित हो जाता है।।' विमशं इतिदास-समुच्चयालंकार रु्द्रट की देन है। दण्डी से लैकर सद्द्रट तक यह नदीं मिछता। इस विषय में स्द्रट का बहुसुखी विवेचन इस प्रकार है- [१]यत्रेकमानेकं वस्तुपर स्यात सुखावद्दाघव। केय: समुच्चयोडसौ न्रेषान्य सदसतोर्योग ॥७१९॥ [२] व्यधिकरणे वा यस्मिम् शुगक्रिये चेककालमेकरिमन्। उपमायेते देशे समुच्चय स्यात् तदन्योडपि।७।२७।। जहाँ पक ही जगह अन्य अनेक वसतुएँ आ जाती हैं या वे सुखावह हो जाती है[ या दु खा- वह ही] वहा समुच्चय होता है। यहों समुच्चय एक प्रकार का और होता है जिसमें सत् और असत का सम्बन्ध रहता है। इसी प्रकार जहाँ [अनेक] गुग और करियाएँ एक ही काल और एक हो समय में अलग-अलग बनटाई जाए तो वह मी एक अन्य प्रकार का समुच्चय होना है। इस प्रकार वस्तुसः रुदट ने तीन प्रकार के समुच्च्यों की कपना को है। इन सभी के उदाहरण भी बम्होंने दिए है। इन कारिकाओं में से प्रथम का अर्थ नमिसाधु ने ऐसा कुछ किया है जिससे विदित दोता है कि प्रथम कारिका प्रथम समुच्चय के लिए है और दिवीय दूसरे के लिए तथा रद्रट को समुच्चय केव दो ही प्रकार मान्य है। वस्तुत इन कारिकाओं से जो स्वामाबिक अर्थ निकलता उसके
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समुच्यालङ्कार: ६०५
मनुसार प्रथम कारिका तीन प्रकार का समुच्चय प्रसतुत करती है औौर दूसरो कारिका केवल एक प्रकार का। फलतः रुद्रट के मत में समुच्चय चार प्रकार का मान्य है। कारिकाओं का भर्थ यह है-
[१]'[१] जां एक ही स्थान पर अन्य अनेक वस्तुएं दिखलाई जाएं [२] या जहाँ से ये परतुएं सृसावह आदि प्रतिपादित हो वह समुच्चय कहलाता है। यह तीन प्रकार का होता है [ एक ] बन्ब [तीसरा ] भैद है दो सदसत् वस्तुओं का योग ।। ७१९ ॥ [२ ] इसके मतिरिक जहाँ भिन्न भिन्न स्थानों पर रहने वाले गुण और करिया एक ही समय में पक दी स्थान पर होते हुए चतलाए जाते हैं वह भी एक समुच्चय होता है जो उपर्युक्त प्रकारों से भिन्न होता है।। ७।२७।। नमि साघु ने प्रथम कारिका में आए 'पर-' शब्द का अर्थ वत्कृष्ट किया है और उत्कृष्ट का सर्थ शोमन। रुट्रट द्वारा प्रदत्त प्रथम अंश के उदाहरण में शोमनत्त्र का कोई संकेत नहीं है। उपर सदसद्योग से शोभनत्व गतार्थ है अत: यहाँ परशब्द का अर्थ शोभन करना अनावश्यक है। नमिताधु को शोभनत्वर और उसके साथ अशोभनत्व के उदाहरण अपनी ओर से देने पढ़े हैं। 'नेधा'-विशेषण को भी नमिसाधु ने 'सदसतोर्योगः' में मन्वित माना है। फलतः 'सदसतोः' इस दविवचन का समाधान उनसे बन नहीं पड़ा। उन्होंने 'सव और असत' योग से होने वाले तृतीय भेद में 'सदसतोः' इस दिवचन की उपपत्ति के लिए 'केवल एक सत् और एक हो असब' का योग स्वीकार किया है अर्थाव इस तृतीय भेद में एकाधिक सत् का पकाधिक मसत से योग नहीं हो सकता। रुदट ने उपर्युक्त प्रथम तीन भेदों के उदाहरण अलग अलग दिए हैं उन्हें उनके काव्यालंकार से ही देख लेना चाहिए। परवर्ची आचार्यो में रुद्रट के तुरन्त बाद आाने वाले मम्मट ने ही रुद्ट की इस मान्यता को केवट 'सदसद्योग' तक सीमित कर दिया। द्वितीय भेद में 'विदलितसकला' तथा 'दैवादहमद' पद् रुद्रट के ही पद् है जिन्हें उन्होंने यहाँ उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया था। मग्मट=ने समुच्चय को वादमें सर्वस्त्रकार द्वारा स्वीकार किए गए दो ी मेदों तक सीमित रखा था। उनका विवेचन है- [१ ]तत्सिद्धिद्वेतावेकर्मिन् यत्रान्यव तत्कर भवेव समुच्चयोऽसौ [२ ] स त्वन्यो युगपद या गुणक्रियाः ॥' [१]'किसी कार्य की सिद्धि के लिए सक्षम किसी एक हेतु के उपस्थित रहने पर यदि जसी कार्य को करने में सक्षम कोई दूसरा हेतु चला आए तो एक प्रकार का समुच्चय होता है और [२] गुण, क्रिया तथा गुणक्रियाओं का संयह दूसरे प्रकार का समुच्चय होता है। इन मेशों के जो उदाहरण मम्मट ने दिए ये सवस्वकार ने उन सव को उन्हीं भेदों के लिए यहाँ अपना लिया है। स्द्रट ने गुण और क्रिया में समुच्चय के पूर्व अधिकरणगत भेद रहना आवश्यक माना था। मन्मद ने उसको अ्षमान्य ठहराते हुए उदाहरण दिया-'धुनोति चासि तनुते च कौतिम् भाप तलवार चलाते हैं और कीति फैलाते हैं'। यहाँ 'चलाना और फैलाना दोनों क्रियामं भिन्न-भिन्न
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६०६ अलङ्गारसर्वस्वम्
अधिकरण में प्रसिद्ध नहीं है और उनका एर ही वर्ण्य व्यक्ति में समुच्चय किया जा रहा है। इसो प्रकार सट्रट के विशेषण 'एक दो स्थान में'-पर भी मम्मट ने यह विरोधी उदाहरण दिया कृपाणपाणिश्व मतान् रणक्षितौ ससाधुवादाश्य सुरा सुराळये'युद्धसथल में आप कृपागपाणि होते हैं और देवता लोग स्वर्ग में ससाधुवाद। यहाँ समु्चय विपयीभूत राजा और देवताओं के स्थान मिन्न हैं। सवस्वकार ने मम्मट के इस सुझाव का उचित उदादरणों द्वारा अनुमोदन किया है। सवसकार को जो कल्पना सदसद्योग के तृनीय भेद के विषय में है उसे काव्यप्रकाश की "राशी दिवस०' पद्य की वृत्ति से अपुष्ट समर्थन मिलता है। वृति इस प्रकार है-'मन् रशिनि धूसरे मस्ये वत्यान्तरागोति 'शोमनाशोमनयोग'। इसका सर्थ उद्ोत और प्रमा में वही किया गया है जो सर्वस्व में करना अभोष बतलाया गया है। रसषगगावरकार ने भी इसे खवीकार किया है। इन सबमें दोष भो वहो सहचरमिन्नस्व हो दिया गया है। वस्तुनः इस प्रकार की व्याख्या में चमरकार का कारण समुच्चय सिद्ध न होकर वैषम्य मिद होता है। 'कहाँ चन्द्र जैसा कान्विमान्, दूध, सुन्दर पदार्थ और कहाँ भूसरता' इस प्रकार का अर्थ निकनने पर हो तो यहँ चमरकार होता है। इस अर्य में विषमन के अतिरिक्त यदि समुच्चय भी है तो विषम के ममी वदाहरणों में समुच्चय ही माना जा सकता है, अन्तर यद रद्देगा कि यहाँ वैषम्य शुग- क्रियागत होगा जन कि निषम के उद्ादरणों में वह द्रव्यादिगत रहता है। इमके अनिरिक्त 'पशी दिवसभूसर' इम अस तक ही समुचचय को सीमित माना जाए तो इस पूर्ण पद में माला-ममुच्चय मानना होगा। तब यह सोचना होगा कि क्या केवल 'शाशी जो दिन में मलिन हो मेरे मन में शल्य है' इनना हो कहने पर समुच्चयकत चमत्कार होता है। फिर इम प्रकार के समुच्चय को सदा ही मवाच्य मानना होगा क्योंकि इनमें उसके वाचस व आादि पदों का प्रयोग कमो न होगा। साथ ही यह मान्यना इटानी पड़ेगी कि एक में अनेक शोमनाशोभन का योग हो, क्योंकि 'रशी' में घूमरत्व रूपी लशोमनत्व तो कवित है, शोमनत्व कवित नहीं है। तो क्या अनुक्त का मो समुच्चय होना है। उधर रश्ी स्वय कोई गुम नहीं है। और यदि वह शोमन भी है तो अधिकरण है, न कि आधेद : अधिकरण और आधेय का वो समुच्चरय, लक्षग में उक है नहीं। शशी शु्द को रशिन्व जाति का वाचक माना जर तो योग होगा गुग और जाति का, गुग शुग का नहीं। यदि गुण का सर्थ धर्म करें तो किया का पृथक कहना मनानसयर्क सिद्ध होगा क्योंकि क्रिया मी एक वम्तुषमे है। रत्नाकरकार ने वेसा किया है उन्होंने लक्षय में शुग या करिया शब्द न देकर धर्म शब्द दी दिया है। जहाँ तक सदचरमिन्रत्व को बान है वह 'बुनेन बुद्धि पद्य में अव्य है क्योंकि वहाँ पकमिन किए अर्थों में साम्य विवक्षित नहां हे जेमा पाणिनि के सूत्र 'एवयुवमधोन(मवद्धिते' में फबत" वदों को प्रत्येक इकाई स्वतन्त्र है, जब कि 'रस्ी विनम' पद्य में 'सात्यत्वेन' सव समुच्चीयमानों में साम्य है, अन. यहाँ 'रव्यवावच्छिन्' होने मे सभी सचर है। ऐसा कुछ लगता है कि 'रुशी दिवसधूसर०' पद्य की पूर्ण अमिध्यक्ति दो रकाइयों में विभक्त है, एक ममुच्चय और दूसरी दोपक। राजमासाद में डटे रहने वाले किमी चुगलखोर को लक्ष्य कर के यद बात कही गई है। चूि ऐमा न्यक्ति अप्रिय होता है अत. कवि ने यहाँ अप्राकरणिक अन्य अप्रिय वस्तुओं का जमान करना चाहा है, और इसोलिए चन्दमा को धूसर रूप में और बामिनी आदि को गळतयीवन रूप में रखा है। इन रूपों में ये सब अप्रिय हो होने हैं। इसा प्रकार यहाँ केवल अशोमन सशोभन का योग सिद्ध होगा। चिच शल्य तो शोमन होता नहां है और जब सभी शाव्य हैं तो समी अशोमन हैं। समुचप भी अपने आप में प्ररुद्ध न छोकर दोपक का अग दनता है और सब चमस्कार लाता है।
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यदि चहाँ समुच्चय भी मान लिया जाए तो मम्मट की उपयुक्त पंकि का झुकाव सर्वस्व- द्वारा प्रस्तुत पक्ष के विरुद्ध जाता है। इसके अनुसार उक पंकति में 'शव्यान्तराणि' अंश व्यर्य होगा। इस प्रकार का अर्थ मानने पर 'दुर्वारा:0' पद् से भी अन्तर करने की विपत्ति टल बाती है। सर्वस्वकार के परवर्ती आचार्यों में- शोभाकार - ने दोनों समुच्चर्यों को मिला दिया है और उनका एक अभिन्न लक्षग इस प्रकार वताया है- 'धमयोगपद्यमन्यस्यापि तत्करत्वं च समुच्चयः ।' 'धर्मगत यौगपद और अन्य का भी उसी कार्य का करना समुच्चय।' धर्म में गुण और करिया का ही नहीं उनके अभावों का संग्रह भी रत्नाकरकार को मान्य है। सदसद्योग को समान्य ठहराते हुए उन्होंने लिखा है- 'न चास्य सदयोगासद्योगसदसद्योगे ्मेदो गणनीथा, व्ाधयो: समसंकीणत्वात; उत्तरस्य विषमगर्भत्वाद्, अन्ययान्यार्लंका रसंकीर्णतया भेदगणनापरसद्गाव!' इसमें सद्योग, असद्योग तथा सदसद्योग के आधार पर भेदगणना नहीं माननी चाहिए, क्योंकि इनमें से प्रयम भेद में समालंकार का संकर मात्र है, और शेष दो में विषमाकंकार का। यदि अन्य अलंकार के संकर से भेद गणना करेंगे तो अन्य अलंकारों के संकर से होने वाले भेद भी गिनने होंगे।' पण्डितराज जगनाथ ने रत्नाकर की इस स्थापना का उनके नान का उदलेख करते हुए खण्डन किया है। पण्डितराज-ने दोनों समुच्चर्यो का समन्सय एक ही लक्षण में इस प्रकार दिखलाया है- 'युगपत्पदार्थानामन्त्रयः समुच्चयः।' 'अनेक पदार्थों का एक साथ अन्वय समुच्चय कहलाता है।' उनकी भेदगणना इस प्रकार है-
समुच्चय
अनेकधमिगत एकधर्मिगत
कारणतातिरिक संबन्वमूलक कारणता संबन्धमूलक
गुणयोगमद्यरूप क्रियायौगपद्यरूप गुणक्रियोभययोगपद्यरूप सद्योगरूप असद्योगरुप सदसद्योगरूप
४ जैसा कि कहा जा चुका है सदसदुमययोग की अर्थयोजना पण्डितराज ने वही मानी है जो सर्वस्वकार ने मानी थी । उनके- 'जीनितं मृत्युनालीढं संपद: श्वासविन्नमाः। रामा: क्षणप्रभारामाः शत्यान्येतानि देहिनाम् ॥'
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-- 'जीवन, जो मृत्यु से प्रसित हो, मंपतियाँ जो श्वास के समान अस्यिर हो, स्त्रियाँ भ बिञली के समान मस्थिर हो, प्राणियों के लिए शन्य है।' इस स्पल में उन्होंने एक ही जीवन में स्वः जेमनत्व और मृत्युमस्तत्व के कारण अशोमनख माना है। यदि इन आचायों के समस- शुद्धमाविळमवस्थत चलं वक्रमार्जवगुणान्वितं च यद। सर्वमेव तमसाइस्त साम्भत वीतभेदमयि मघ्रकाशिनि।' ऐसा कोई पथ दोा तो इन्हें शोभनाशोमनयोग की उपर्युक्त कत्पना न सताती। इस पघ में उज्जल तथा मलिन चचल तथा स्पिर वक तथा ऋजु पदार्थों का विरोष शोमनत्व और मगोमनस्व पर ही आमित है तथा यहाँ एक 'वीतभेदत्' में उनका समुच्वय भी है। कार्यकारणमाद के लिए उत्तरार्धं में-'सर्वमेव तमसा समीकृत दोपयत्यसमसायकं सभम्'।-इस प्रकार की योजना की जा सकती है। इसमें 'सर्व' शब्द से पूर्वामरोक पदार्थों की शोमनाचोमनता व्यक्त है। विश्वेधर-ने मम्भट के ही समान दोनों समुच्च्यों को पृथक माना है और उनके लइ्षन इस प्रकार दताम है- (१) 'मकष्भिन् सति ह्ेती हेतन्तरगी समुरच्य: कपिन:। सरसत्सदसद्योगे।
सदसद्योग शब्द पर इन्होंने कोई सोदक्षेम नहीं उठाया। सजीविनीकर थीविद्याचकवसी की निष्कृष्टार्थकारिका समुच्चय पर इस प्रकार है- मककरियायामन्यस्य किया रवन्य: समुच्चय:। सदसद्द्रधयोगेन स त्रिया संँव्यवस्थिनः॥। पाठान्तर-प्रथम समुच्चय के अन्त अन्त में आया 'गुणसब्दत्वेन' शब्द सभी प्रतियों में 'गुणशम्दैन' इसी प्रकार छपा है। 'समासकृत्तद्धिनेयु गुणशम्दत्वेन'-ऐसा अन्वय मान स्वकरपना से इमने 'गुणशम्दत्वेन' पाठ बनाना ही उचित समझा है। दवितीय समुच्चय में सौकर्याय के स्थान पर निर्णय सागरीय प्रति तथा डा० राघवन् की प्रति में कार्याय तथा डो० दिवेदी वाली प्रति में "तत्कायेसौकर्याय' पाठ है। इसके पहले आए यन के स्थान पर मी इन सब प्रतियों में 'तम' छपा है। [सर्वस्व] [सू० ६८] कारणान्तरयोगात्कार्यस्य सुकरत्वं समाधि:। केनचिदारव्धस्य कार्यस्य कारणान्तरयोगात् सौकर्य यव, स सम्य- गावानात्समाधिः । समुच्चयसादृटश्याचद् नन्तरमुपक्षेपः । तद्वैलक्षण्यं तु माक्पतिपादितमेव । उदाहरणम्- 'मानमस्या निराकतुं पाद्योमें पतिष्यतः। उपकाराय दिष्टयेद्मुदीणे घनगर्जितम्।।' माननिराकरणे कार्ये पादपतनं हेतुः। तत्सौकर्याथे धनगर्जितस्य कार णान्तरस्य प्रक्षेप:। सौकर्य चोपकारायेति पदेन प्रकाशितम्।
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समाध्यलद्ार: ६०९
[सूत्र ६८]अन्य कारण के योग से कार्य का सुकरतापूर्वंक निप्पत्न होना समाधि [अलंकार कहलाता है]। [सृ०] किसी एक कारण के द्वारा गुरु किए गर कार्य का अन्य किसी कारण के सहयोग से जो सरलनारर्वक निष्पन्न होना वह सम्यकभली माँति, आधान=निम्पत्ि इस न्युत्पत्ति के आधार पर समाथि [नानक अलंकार कइलाएगा ]। समुच्चय के साथ सादृश्य होने से इसे उसके बाद प्रस्तुत किया जा रहा है। उससे इसका अन्तर पहले ही बतला दिया गया है। न्दाहरण- इस [रठी प्रिचा] का मान दूर करने के लिए इसके पैरों पढ़ना चाहता था कि मेरे उपकार के लिए माग्य से यह बादल गरज रठा ' यहाँ मान का निराकरण कार्य है। इसमें हेतु है पैरों पर पड़ना। इसकी और सरलता- पूर्वक निःपत्ति के दिए नादल की गडगड़ाइट रूपी अन्य कारण प्स्तुत किया गया। सृखपूर्वक निष्पत्ति मो यहाँ 'उपकार'- पद से स्पष्ट की गई है।।'
विमर्शिनी कारणेत्यादिना। एतनेव व्याचष्े-केनचिदित्यादिना। सौकर्थमिति। कार्यस्य सुखेना नावासमेव प्रकृतकारणवश्ेन निप्पन्तवववपि स्वरूपोपचयाधाय कतवे नाक्क््ार्य स्योप लक्षण परव्चेन विवचितत्वातसुष्ठ दा करणमित्यर्थ:। अत एव कारणान्तरयोगाव कार्यस्य सुखेन सुष्ट वा करणस्य भेददयमपि ज्ञेवस्। प्रागिति समुच्चये । हेतुरिति। प्रकृतः। तत्सौकर्यामे- मिति। सुखेन कार्यनिप्पत्यर्थित्यर्थः। यद्याकस्मिकधनगजितयोगो न स्यातदा निरा यासमाननिराकारण न सिद्धचेद्। एतस प्रथमपकारत्योदाहरणम्। द्वितीयस्थ यया- सेण लीलाभरणममितसोटयित्वा थमामभ :-
केलिनोभ: कुवलयदर्शा मान्मथे कार्यभावे सुंबद्तावं वटितममितः पारिपूर्ण्य निनाय।' अन्र स्वेदादिना वटितस्यापि पुंवद्भावस्य केलिक्षोभासयेन कारणान्तरेण सैणामरण-
रकं, तत्तेप।मेतल कण स्वरूपानवधारणमेवेत्यल बहुना। कारण इत्यादि। इसी की व्याख्या करते है-'वनचित्' इत्यादि के द्वारा। सौकर्यम्= कार्य, प्रकृत कारण के ही द्वारा सुखपूर्षक निम्पन्न हो सकता है तथापि कार्य शरीर में और अविक विशेपता लाने, सरतता, अथवा सुन्दु पकार से कार्य निम्पत्ति करने के अमिशराय से सौकर्य शब्द का प्रयोग किया नया। इसीसिए अन्य कारण के योग से कार्य का, 'इसपूर्वक अषपवा मलीमोति, इस प्रकार जो दो प्रकार से किया जाता है इन दोनों को इसके दो प्रकार समसना चाहिए। माक=पहले=समुच्चय प्रदरण में। मेतुः= हेतु अर्थातू प्रकृत हेतु। नत्लीकर्यार्थन= उसके सौकर्य के लिए-मर्यात् सुखपूर्वक कार्य निष्पत्ति के लिए। यदि वकस्मिक घनगर्जना न होती तो मान का अनायास निवारण न होता। यह [ उकत प्रकारों में से] प्रथम प्रकार का सदाहरण हुआ। द्विवीय [भलीमाँति निम्पत्ति] का उदाइरण [रत्नाकरकर द्वारा ही उद्धृत] वह पद्य है- ३९ अ० स०
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६१० अलट्कारसर्वस्वम् काम देव का कार्ये बब होने लगा सब नीलकमल से नेत्रों वाली सुन्दरियों ने [विपरीन रति में]श पुरुषकार्य अपनाया उसे कैलिक्षोम ने पूरी तरह पूर्ण्ता को प्राप्त करा दिया क्योंकि उमने अग प्रत्यंग के स्तिरियोचिन लोक्षामरण तोड़ डाले और पमीने में बहे पत्नावले के सृगमद से दाढी मूछ बना दी।' यहाँ पसीना निकलने से स्पष्ट होता है कि म्वियों का पुरुषायित पूरा हो चुका था किन्तु केलिभोम रूपी अन्य कारण ने खियोचित सोलामरग तोडने आदि के द्वारा उसी पुरुषायित के स्वरूप को और बढ़ा दिया, इसलिए यहाँ समाधि का दूमरा भेद हुआ। इम प्रकार अन्य आचार्य [रलषाकरकार ] ने [समाधिप्रकरण के उदाहरण ३९८ की वृत्ति में] जो यह कहा है कि इस प्रकार के स्थलो में यह [सवस्वकार का] लक्षण लागु नहं हो पाता बह इम लक्षण के विषय में उनका अज्ञान ही है। इस विषय में अविक कुछ न कहकर इतना ही कदना पर्याप्त है।' विमर्श-रत्नाऊरकार ने समुच्चय प्रकरण की विमर्सिनी में उदघृन 'मोगनारोइण' पद में समाधि मानते हुए लिसा था कि यहाँ सोपानारोइणपरियरम से श्वासरूपी कार्य की उत्पत्ति हो चुकी है, हरिदशन उसमें विच्छिन्नता मर नहीं आने देता, इम प्रकार इन्दिशन श्वासरूपी कार्य की निष्पत्ति में नहीं, स्थिति में कारण है, फलत वह कार्य का उपोदवल्क है। सवस्वकार ने समाधि के एक्षण में जो सौकय शब्द दिया था र्नाकरकार ने उसका दक ही अर्थ एगाया 'उतपस्ति' में सहायता करना, जिसमे कार्य सरलता और सुख से निष्पन्न हो जावे। इस अर्थ के अनुसार 'श्ाम'-रूपी कार्य का लेकर बतलाए गए उपर्युक्त समाधिस्थल में यह लक्षण लागू नहीं होटा । विमर्शिनीकार ने 'सोपनारोदग' पद में वो समुच्चय सिद्ध कर दिया, और सैकर्य शब्द का उपोदुदळन अर्थ कर रत्नाकरकार के आक्षेर का भी निराकरण कर दिया। हतिहास- दवडी-समाधि की कल्पना प्रथमत दण्टी ने की है। उन्होंने इसे समाहिन नाम दिया है। उनका निरूपण-'किविदारममागस्य वार्य दैववश्ञात पुभ.। सरसाधनसमापचियाँ तदाङ्ु: समाहितम्'।२२८॥ कोई कार्य आरम्म कर रहे व्यक्ति के पास भाग्यवशात अन्य साधन की पहॅुन समाहित कहलाती है। उदाइरण के रूप में 'मानमस्या"' पद् ही दण्डी ने दिया है। भमह ने भी इसी आश्यय में समाहिता सकार माना है किन्तु उसका कोई लक्षण उनमें नहीं मिलता। वामन ने खोजी जा रकषे वस्तु के समान वस्तु को समाहित कहा है-यरसादृश्य तर्स्पति: समाहितम्। और उदाहरण के रूप में विक्रमोदशोय का 'तन्वी मेघ०' पद्य दिया है। यह बही सता है जिसे पुरुरवा उवशी समझता है और वह उवशी रूप में परिणत भी हो नानी है। उद्गर में समाहित नामक अल्कार तो है परन्तु वह रसवदादि के वर्ग का है। समाधि नाम मे इसमें कोई अरकार नहीं मिलता। रुट्रट में समाहित या समभि दोनौ हो नाम नहीं मिलने। इमसे विदित होता है कि इस अलकार को समाधि सज्ञा प्रथमन मम्मट ने दी है। उनका लक्षण F यह है- मम्मट-'समावि सुकर कार्ये कारणान्तरयोगन "'-अन्य कारण के सदयोग से कार्य की सुरुरना-समाधि'1 उदाहरण के रूप में उन्होंने 'मानमस्या.' पद् ही दिया है। रानाकरकार -शोमाकर ने केवल 'उपोद्बलनें समाधि'= बद्ावा समाधि कहलाता है- इना हो रक्षण किया है। उनहोंने कारणों में दो कोटियों की मौ खोज की है-स्थिन और
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समाध्यलङ्कार: ६११
आगन्तुक। इनमें से दोनों में दोनों का सहयोग उन्हें विवक्षित है। 'मानमस्या' पद्य को उन्होंने मो उदाहरणरूप से उद्धृत किया है। अप्पयदीक्षित-ने रत्नाकरकार का संशोधन अस्वीकार कर सवसवकार का ही अनुसरण किया है और समाधि का यह लक्षण दिया है- 'समाधि: कार्यसीकम कारणान्तरयोगतः ।' उद्ा०-'उत्कण्ठिता च तरगी जगामास्तं च भानुमान्॥' अन्य कारण के योग से कार्यसौकर्य समाधि कहलाता है। उदा० इपर तो तरणी उत्कण्ठित हुई और उधर सूर्य भत्त हो गया।' समाधि से समुच्चय का अन्तर अप्पयदीक्षित ने कारण की आकस्मिकवा और अनेकता दारा किया है। समाधि में कारणान्तर आकस्मिक होता है जब कि समुच्चय नें कारणान्तरों की सरमार रहती है। इसी मरमार का नाम समुच्चय है। पण्डितराज-जगन्नाथ ने सर्वस्कार का हो लक्षण अपनाया है। उनका परिष्कृत लक्षण चह्द है- 'वककारणजन्यत्य कार्यस्यास्मिक कारणान्तरसमववानाडित सौकर्य समायिः।।' 'एक किसी कारण से उत्पन्न हो सकने योग्य कार्य में किसी अन्य आकत्मिक कारण के आा जाने से जो सौकर्थ आता है वही समाधि है।' पण्डितराज ने विमर्शिनीकार के द्वारा सुझार गए सौकर्यशब्द के दोनों अर्थ मी मान लिए हैं उन्होंने लिखा है- 'तच्च सौकर्च कार्यत्यानायासैन सिद्धया साङसिद्धया च'। वह सौकर्य दो प्रकार से होता है कार्य की बिना आयास के हुई सिद्धि से तथा साङ्गोपाऊ सिद्धि से। विर्वेश्वर-ने मी सौकर्य को स्थान देते हुए समाधिलक्षण इस प्रकार चनाया है- 'सवति समाधिः सुकरे हेत्वन्तरसमवधानतः कार्ये। 'चिकीर्पितत्य कार्यत्य सिद्धचर्थम- मिमतो यो हेतुस्तदतिरिचहेतुना कार्यस्य सौकर्ष समाधि:, समाघोयने कार्यमनेनेति व्युत्पच्ते:।' अनीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए माना हुआ जो हेतु उससे मिन्न हेतु के द्वारा जो कार्य का सौकर्य वही समाधि, समाहित किया जाता है कार्य इससे इस व्युत्पत्ति के माधार पर'। चक्रवतो की निष्कृष्टार्थकारिका समाधि पर इस प्रकार है- 'समाधिः सन्यगाधानं कारणान्तरयोगतः ।' अन्य कारण के सदयोग से ठौक से कार्य की निम्पच्ि समाधि तौकर्ये को समाधि कहना लाक्षणिक प्रयोग है। वस्तुतः 'सन्क आाधान' हो समाधि का स्वरूप है। पाठान्तर-समाधि की अन्तिम पंकि में 'पदेन' के स्थान पर निर्णयसानरीय प्रति में पदै छपा है। डॉ० राघवन् के संस्करण में वेवल 'उपकारायेति प्रकाशितन्' दी पाठ है।
विमर्शिनी
इस प्रकरण का उपसंद्ार कर अन्य प्रकरण की अवतरणिका प्रस्तुत करते हैं-
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[सर्वस्त्र ]
लंकारा उच्यनते। नघ्र- [सू० ६९ ] प्रतिपक्षतिरस्काराशक्तौ तदीयस्य तिरस्कार: प्रत्यनीकम्। यत्र बलवतः प्रतिपक्षस्य दुर्बलेन प्रतिपक्षेण प्रतीकार: कर्तु न शक्यत इति तत्संचन्धिनो दुर्बलस्य तं वाधितुं तिरस्कार: क्रियते तत्मत्यनीकम्। अनीकस्य सैन्यस्य प्रतिनिधि: प्रत्यनीकसुच्यते। तत्तु्यत्वादिदमपि प्रत्य- नोकमुच्यते। यथानीकेऽभियोक्तव्ये तन्नासामर्थ्यात्तत्मतिनिधिभूतमन्यद्मि युज्यते, तद्धदिद्द प्रतिपक्षे विजेये तदीयम्य दुर्बलस्य तिरम्करणमित्यर्थ:। प्रतिपक्षगतत्वेन वलवत्वस्यापनं प्रयोजनम्। यथा- 'यस्य किंचिद्पकर्तुमक्षम कायनिग्रद्दगृद्दीतविग्रद्यः। कान्तवकप्र सदशाति कृती राहुरिन्टुमधुनापि बाधते।।' अन राहोः सकाशादरगवान्वलवान्विपक्षः। तदीयः पुनर्वक्तसादश्य मुखेन दुर्वलश्चनद्रमा । तत्तिरस्कारान्न्र गवतः मकर्पावगतिः । इस प्रकार वाक्य-[ मीर्मासाश्रित]-न्याय पर निरमर अडकारों का प्रतिपादन किया, भब लोक-[गत]-न्याय पर आशित अलंकारों का निरूपण करते हैं। [सू० ६९]विरोधी का तिरसकार करने की समता के अभाव में उससे मंबन्धित का तिररकार प्रत्यनीक [कहलाता है]। [पृ०] जहाँ बलवान् विरोधी का दुर्वल विरोधी द्वारा प्रतीकार करना समव नहीं होना अत. उससे सम्बद किसी दुर्बल का पनीकार उसे पीढा पहुँचाने के लिए किया जाता है वह सेना का प्रत्यनीक कद्शाता है। अनीक अर्थोद मेना उमका प्रतिनिधि प्रत्यनीक कहलाता है। उसके समान होने से यह भी प्रत्यनाक कहा जाता है। अर्थ यह कि जिस प्रकार युद्ध करना होना है सेना से, किन्तु बैसा करने की यकि न रहने पर उसके प्रतिनिधिभून अन्य किमी से युद्ध किया जाता है दमी प्रकार यहाँ जीतना तो अमीष रहता है रात्रु को, किन्तु निरस्कार किया जाता है उसके किसी दुर्वल सम्बनधी का। इसका प्रयोजन होता है विरोधी की बठबचरता व्यक्त करना। उदाहरण यथा- 'शरीर के निग्ह [काट कर दो खण्ट कर देने] से लडाई ठान बैठा राड जिस [मगवान् विष्णु] का कुछ भी अपकार करने में अस्मर्थ होकर उसी के कान्तिमान् मुसबिम्ब के समान सारकृनि के चन्द्र को अभी तक वाषा पहुँचाना है।' यहाँ राहु की अपेक्षा ममवान् वठवतर बात्ु है, चन्द्रमा मुखबिम्त्र के साहश्य के कारण उनसे सम्बन्धित है किन्तु दुर्बल है। उसके तिरस्कार से मगवान् के प्रकर्ष का ज्ञान होता है।।'
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प्रत्यनीकालङ्वार ६१३
चिमर्शिनी तन्नेति निर्धारणे। प्रतिपक्षेत्यादि। एतदेव व्यापष्टे-यन्रेत्यादिना। बलवत इति दुर्वलेनेति व प्रतीकाराकरणे विशेषणद्वारेण हेतुद्दयोपन्यासः। तत्सन्वन्धिन इति। वल- चस्मतिपसाश्मकस्य। तर्सम्बन्धित्वं व सादश्यादिसम्बन्धमूलम्। दुर्दलस्येति। तस्यापि हि वलबरवे दुर्चलेन प्रतित्ेण प्रतिकारः कतु न शक्येत इति भावः। तमिति। सबलं प्रतिपषम्। वाधितुमिति। अन्यथा हि निप्पयोजनस्तदीयतिरस्कार: स्याद्। क्रियत इति। दुर्घलेन प्रतिपत्नेण नैत:संज्ञमान्रमित्याशङचाह-अनीकत्येग्यादि। तुल्यत्वमेव दर्शयति- चयेत्यादि। कि चात्र प्रयोजनमित्याशङ्याह-पतिपक्षेत्यादि। वलवत्त्ाख्यापनमिति। अप्रती कार्यरवात्। अन्नेत्यादि। व स्वसादृश्यसुखेन तदीय इति सम्बन्धः। तत्तरस्कारादिति। न पुनस्तरवीकारात्। बाधत इस्युक्तेरितिररकारस्यैव साव्ाद्वान्यार्थरातू। अत एुव परै रपि 'तत्सम्बन्धितिरस्कार द्वारा तस्वैव बाघनादि'-युक्तम्। प्रुपोंडप्रनीकार्यच्म्। एतेन चास्य प्रयोजनं दशितम्। अत्न हयतिरसकार्यतिरसकरणकर्तुनिन्दाद्वारेण बलवतः प्रति
तन्न- यह निर्धारणार्थक। प्रतिपनेत्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-यश्र इत्यादि के द्वारा। बलवान् और दुर्बल इन दोनों विशेषणों द्वारा प्रतीकार न कर सकने में दो हेतु उपस्थित किए। तत्सम्बन्धिन := उसके सम्न्धी अर्थात् शब्ु के सम्पन्धी के। उससे सम्वन्ध होगा स.दृश्य आादि सन्वन्ध के आधार पर। दुर्वलस्य =दुर्वल=यदि वह सम्बन्धी भी चलवान् हो तो दुर्बल विरोधी द्वारा उसका भी प्रतीकार नहीं हो सकेगा। तम् = उस =सबल शुत्ु को। वाधितुम =वाध=पोढ़ा पहुँचाने के लिए। नहीं तो उससे सम्बन्धित का तिरस्कार निष्प्रयोजन ठहरेगा। क्रियते=किया जाता है =अर्थात दुर्वळ विरोधी के द्वारा। [प्रत्यनीक] केवल संजामात्र नहीं हैं ऐसी शंका कर लिसते हैं-अनीकस्य। तुस्यता ही दिखलाते हैं-यथा इत्यादि के द्ारा। 'तब यहाँ प्रयोजन क्या है' ऐसी शंका सोचकर लिखते हैं - प्रतिपद् इत्वादि। बलवत्वास्यापन = प्रतीकार्य न होने के कारण। अन् इत्यादि =मुख के सादृश्य के द्वारा उससे सम्वन्धित' इससे भी सम्वन्धित है। तत्तिरत्कारात=उसका तिरस्कारन कि उसका अंगीकार [जैसा कि रत्नाकरकार ने माना है]। वाधते=वाभा-पीड़ा पहुँचाना=' इस कथन से तात्पर्य यह निकला कि यहाँ तिरस्कार ही प्रमुख अर्थ रहता है। इसीलिए अन्य [ रत्नाकरकार] ने भी कहा है-'उसके सम्वन्धी के तिरस्कार के द्वारा उसी को पीड़ा पहुँचाने से०'। प्रकर्ष= अप्रतीकार्यता। इसके द्वारा इसका प्रयोजन वतकाया। यहाँ अतिरस्कार्य का तिरस्कार करने से तिरस्कार करने वाले की निन्दा व्यक्त होती है। उसके द्वारा वलवान् शत्रु की नपतीकार्यता चतलाई जाती है। इससे जो उसकी प्रशंसा होती है तातपर्ये उसी के प्रतिपादन में रहदता है।' विमर्श-इतिहास- अत्यनोक रुद्रढ की ही देन है। उन्होंने इसका लक्षण इस प्रकार किया है- 'दव्तुमुपमेयमुच्तममुपमानं तज्जिगीपया चम्र। तस्य विरोधीत्युवत्ा कत्प्येत प्रत्यनीकं तव् ।।'८।९२।। -'नहां उपमेय को उत्तम वतलाने के लिए उपमान को उसे जीतने के लिए उत्तिपूर्वक विरोधी वतलाया जाए तो वह प्रत्यनीक होता है।' उदाहरण- 'यदि तब तया जिगीषोस्तद्वदनमहारि कान्तिसर्वस्वम्। मम तन्न किमापतिसं तपति सितांशो यदेवं मानू।।'
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६१४ सलङ्गारसर्वस्यम्
हे चन्द्र तुम उस सन्दरी को जीतना चाहते ये और यदि उसी ने तुम्दारा कान्तिमान् मुख छीन टिया तो इसमें तुम्दारा मैने क्या किया जो तुम मुझे इस प्रकार तमा रहे हो।' मग्सट='प्रतिपक्षमशकतेन प्रतिकस तिरस्क्रिया। या सदीयस्य तत्स्तुत्ये प्रत्यनीक तदुच्यते।' वृ०-न्यक्कृनिपरमपि विपक्ष साक्षाननिरसितुमशवतेन वेनापि यद तमेव प्रतिपक्षमुत्कर्षषितु वदाभिवस्य तिरस्करणम् सद अनोकप्रतिनिधितुन्यत्वात् प्रत्यनीकममिधीयते। यथा अनौके अभि योज्ये वत्प्रतिनिधीभूतमपर मूढतथा केनचिदमियुज्यते तथेह प्रतियोगिनि विजेये तदोयोज्यो विजोयते हत्यरथ। 'विरोधी का प्रतिकार करने में अस्षमर्थ व्यक्ति द्वारा जो उससे सम्बन्धित व्यक्ति का उसी विरोषी की सतुति कराने वाला जो तिरस्कार वह प्रत्यनीक कहलाता है। -विरोषी अपमान करता चला जा रहा हो और इसका निराकरण साक्षाद न किया ना सकता दो अत कोई उसी विरोधी का उत्कर्ष प्रतिपादित करने वाला उसके भात्रित का तिरस्कार करे, तो वह सेना के प्रतिनिषिभूत व्यक्ति के समान होने से प्रत्यनीक कहा जाता है। जैसे सेना से उडना हो किन्तु मूदतावछ़ उसके प्रतिनिधिभूद व्यक्ति से बोई उड़ता है उसी प्रकार यहाँ मी जीवना होता है विरोधी को किन्तु जीता जाता है उसका सबन्ी कोई अन्य न्यक्ति।' उदाहरण, यही-'यस्य किचिदपकर्तुम्' पद। रस्नाकरकार ने अन्य अठंकारों के हो समान इस अल्कार में मी सपनी भावयित्री प्रतिभा को उवरता दिखलाई है। उन्होंने विरोधिसबन्धी का तिरस्कार तो प्रश्यनीक में गिना हो है विरोधि के विरोधी का अगौकार मी माँति माँति के उदाहरणों द्वारा पत्यनीक के भेद के रूप गिनाया है। साथ ही न केवल विरोधी अपि तु सदश पदार्थ के सदन्धी के मी अमितपणीय और परिहरणीय रूप से अंगीकार में मत्यनीक माना है। उनका विवेचन इस प्रकार है-
[fृ०] दळवत पतिपशस्य तिररकाराशकती नत्मम्यन्धिनी दुर्वलस्य अाध्यतया रोकारमुसेन तिरस्कर्नुनिन्दाद्वारा बलवत स्तुतिप्तिपादनरूपमेक प्रत्यनीकम्।०। तथा प्रतिपक्षसम्बन्धि- नश् प्रतिपश्चस्य तद्बाधकतया स्वीकारस्तयेव द्वितीयम्। आदिदम्देन प्रतिपक्षादन्यस्य सदशादि- रूपस्य सम्वन्धिनोऽभिळयणीयत्वेन परिहरणीयत्वेन वा स्वोकारस्तृतीयम्। विरोधी के विरोषी के अपनाए जाने का उदाहरण- 'इदं मद चन्द्रमसरसमन्तादरमस्मपत्नस्य इरिष्यतीति। यरिमन् पुरग्भीवदनस्य लक्ष्मी निजा व्यघुः प्रामृतमम्दुनानि।' -'हमारे शत्तु चन्द्रमा का मद यह [सुन्दरीमुख ] पूरी तरह हरण कर लेगा यह सोचकर बिस नगर की सुन्दरियों के सुसों की कान्ति को कमशों ने अपना उपहार वना दिया।' सदससम्बन्धी गुण का स्पृददणीय रूप में अगीकार इस पचरत्न में दिखळाया है- 'पुष्राशामेव निन्दामचकमत गुणान् पल्लवानामगृकाव स्तुत्यों सकता पिकनाममवदगमयद् राजहसेपु दोषान्। मरकि व्यानस सान्द्रे भृगमइतिलके चान्दने नादरागे ध्वान्त तुष्टाव तुषटा न तु मिहिरमह: कृष्णलोमा हि राका ।।'
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'राध कृष्ण के अनुराग में युप्पों की दो निन्दा करती है और पत्तों के ही गुणों को चाहती है, कोयछों की ही स्तुति में आसक रहती थी, राजइंसों में दोप देखती थी, कस्तूरी के गदन तिलक में ही रुचि व्यक करती थी, चन्दन के अंगराग में नहीं और संघेरे की ही सुति करती थी सूर्यप्रकाश की नहीं: मल्लव आदि कृष्ग सदशा वर्ण के हैं, अतः कष्णातुरत राधा उनके सामान्यतः अस्पृदणीय गुणों की मो स्वृदा करती दिखलाई गई है। सद्छ सन्वन्धी गुण का परिदरणीयत्वेन अंगोकार के लिए उदाहरण- 'नीरामा सृगलाक्छने मुखमपि स्वं दर्पण नेक्षते।' चन्द्रना पर विरक झोकर वह प्रेमनिर्भर नायिका दर्पण में भी सपना सुख नहीं देखती। विमर्सिनोकार ने रत्नाकरकार के इस 'स्वीकारपक्ष' पर कटाक्ष तो किया है किन्तु वे अधिक कुछ रहने का भी साहस न कर सके। यहाँ 'मुखमहो नो दर्पणेडपीक्षते' ऐसी योवना चाहिए। अप्पयदीच्चित-'प्रत्यनीक चलदतः र्त्रो: पक्षे पराक्रमः । 'वलवान् शत्तु के पक्ष वाले व्यक्ति पर पराक्रम प्रत्यनीक ।' निश्चित ही दीक्षित जी ने लक्षण- निर्माण के साथ ही प्रत्यनीक शब्द की निरुत्ि मी वढ़ी ही सफाई के साथ इस वाक्य में ला दी है। रननाकर की नवीनकत्पनाओं के प्रति दीक्षित जी मौन है। पण्डितराज=रत्नाकर के नवीन पक्षों को छोड़ कर पण्टितराज ने प्रत्यनीक का निरूपण तो किया सिन्तु वे तर्कधुरा पर इतने आरूद हो गए कि इस पूरे हो अलंकार को प्रतीयमान हेतूतप्रेक्षा से गव्ार्थ बता बैठे। उनका निरूपण इस प्रकार है- 'पतिपक्षसम्बन्धिनस्तिरस्कृतिः प्रत्यनीकम्।' -'मधुसम्बन्वी का तिरस्कार प्रत्यनीक।' अपने वाइरणों में गम्य हेतूप्रेक्षा की सिद्धि कर पण्डितराज ने मम्मट और सर्वस्वकार द्वारा उद्धृत 'वस्ब किचित' पद्य में मी उसे इस प्रकार वतलाया- 'यस्य किचित० [पूर्ण पद्य] इत्यलंका रसवंत्व कृतोदाहते प्राचीनप घेप भगवद्वैरानुदन्धादिव भगवद्वक्मसदशमन्दुं राहुर्वाधत इति प्रतीतेरुत्प्रेक्षेत गम्यमाना।' अलंकारसवस्वकार द्वारा सद्धृत 'यत्य किचितू' इस प्राचीन [मन्मटोदाहृत ] पद्य में भौ गन्य हेतूतप्रेक्षा है क्योंकि यहाँ भी यह प्तीति होती है क्रि 'राहु चन्द्रमा को मानो इसलिए दुःख देता कि वह भगवान् के मुख के समान है।1 प्रत्यनीक में प्रतिपक्ष में दुर्वलता तथा वर्ण्य- वस्तु में प्रवलता भी शब्दतः प्रतिपादित रहती है जो हेतूत्प्रेक्षा में नहीं रहती, अतः इतने अंश में इन दोषों का अन्तर हो सकता था किन्तु पण्डितराज ने इससे प्रत्यनीक को उत्प्रेक्षा का एक् नवीन नेद नानना अधिक उचित माना, स्वतन्त्र अलंकार नहीं। विर्वेश्वर-ने पण्डितराज के इस क्रान्तिपूर्ण विचार को प्रतिगामी तर्कों द्वारा काटते हुए अत्यनीक मौर हेनुरप्रेक्षा में एक भेदक और सुझाया। उन्होंने कहा कि प्रत्यनीक में दो कारण प्रतिपादित रहते है जब कि हेतू पेक्षा में पैवल एक। दोनों कारणों में प्रथम कारण द्वितीय कारण के प्रति कारण रहना है और उन दोनों का कार्यकारणमान निर्गात रहता है। 'वत्य किचित0- भद्य में चन्द्रवाधा के प्रति कारण है विष्णु के साथ बैर और उसमें कारण है कायनिग्रद्द। विश्वेश्वर की पंकति है- 'अन्न [प्रत्यनोके] किचित्निष्टकार्यतापरतियोगिक [चन्द्रवाधारूपकार्यनिष्ठकार्यतानिलपकं ] यत् [चन्द्रसदसविष्णुवैरर] कारणमुत्क्ष्यते तत्निष्ठकार्यतानिरुपितकारणस्य [काय-
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६१६ अलङ्गारसवंस्वम् निमदरूपस्य] अप्यमिधानेन[ कायनिग्रद्तिपदामिवानेन] पूर्वकारणनिणेया, उत्प्रेक्षार्या च तद मावान्न तन्निर्णय पति वैपम्य सुटमेन।' वरतुत, विश्वेश्वर के इम तर्क में कोई विनिगमकना नहीं है। इवना होने पर भी प्रत्यनीक को उत्प्रेक्षा का एक विशिष्ट भेद मानना भयुक नहीं ठदरता । चकवतों की निष्कृष्टार्थकारिका प्रत्यनीक पर यह हे- 'नदीयस्य तिरसकार प्रत्यनीकमरुकतत ।' पाठान्नर-प्रत्यनीकमृत्र में प्रथम तिरस्कार शब्द के स्थान पर डा० दिवेदी ने मूल तथा उनके सजीविनीसस्करण में 'प्रतीकार'- शब्द् दिया है। कु० जानकी के मंजीविनी सर्करण में तिरस्कारपाठ ही है। स्वय रिवेदीमस्करण में मनीविनीकार ने इम रूप की व्याख्या में तिरस्कार शब्द को हो दो बार पढा है और वही स्वामाबिक है। पाठान्तर का मूल मम्मट का 'प्रनिकत तिरस्किया' पाठ है। परवर्ती आचार्यों के सूतरों में तिरस्कार शब्द ही मिलना है। [सर्वस्व ] [ सू ७०] उपमानस्याक्षेप उपमेयताकल्पनं वा प्रतीपम्।
आलोवनं करियते, तदेकं प्रतोपम्। उपमानप्रतिकूलत्वादुपमेयस्य प्रतीपमिति व्यपदेशः। यद्युपमानतया प्रसिद्धस्योपमानान्तरप्रतितिप्वापयिपयानादरणा- र्थमुपमेयत्यं कल्प्यते, तत् पूर्वाक्तगत्या द्वितीयं प्रतीपम् । क्रमेण यथा- 'यत च प्रमदानां चक्षुरेव सहजं मुण्डमालामण्डनं मारम्तु फुवलयदल- माल्यानि' इत्यादि। यथा वा- 'लावण्योकसि सम्रतापगरिमण्यग्रेसरे त्यागिना देव त्वय्यवनीभरक्षमभुजे निष्पादिते वेधसा। इन्दुः कि घठितः किमेप विदितः पूषा किमुत्पादितं विन्तारतमद्दो मुधैव किनमी सृष्टा: कुलक्ष्मामृतः।।' अत्र यथासंख्यमप्यस्तीति प्रारू प्रतिपाद्ितम्। 'ए पद्ि दाव सुंदरि कण्णं दाऊण सुणतु वअणिज्ञं। तुज्झ मुद्देण किसोमरि चंदो उममिजद जणेण।I' 7
अधोपमानत्वेन प्रसिद्धस्य चन्द्रमसो निकुर्थार्थमुपमेयत्वं कल्पितम्। चद्नस्य चोपमानत्वविचक्षात्र प्रयोजिका।
'गर्व मसंवाह्यमिमं लोचनयुगलेन किं वहसि भद्रे। सन्तीदशानि दिशि दिशि सर सु नतु नीलतलिनानि।' अत्रोत्कर्पमाज उपमानस्य प्रादुर्भाव एव न्यक्कारकारणम्। थनेन
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प्रतोपालङ्कार: ६१७
न्यायेनोत्कष्टशुपत्वाद् यदुपमानभावमपि न सहते तस्योपसानं रव- कल्पितं प्रतीपमेव। यथा- अहमेव गुरु: सुदारुणानामिति हालाहल तात मा न्म प्यः। नतु सन्ति भवादृशानि भूयो सुवनेस्मिन्वचनानि दुर्जनानाम्।'
निवद्दम्।
[सू० ७०] उपमान का अपमान अथवा उपमेयता प्रतीप [कहलाती है]। [वृ०] उपभेय के ही उपमान का संपूर्ण भार ढोने में समर्थ दोने से उपमान का 'इससे क्या लाभ' इस प्रकार जो आक्षेप अर्थात आलेचन [अपमान ] किया जाता है वह एक प्रकार का प्रनोप होता है। उपमान के प्रतिकूल होने से उपमेय को 'प्रतीप' शब्द से पुकारा गया है। इसके अतिरिक यदि अन्य किसी रपमान को उपस्थित करने की इच्छा से उपमान रूप से प्रसिद्ध वस्तु को उसका बनादर करने के लिए उपमेयरूप से प्रस्तुत किया जाय तो वह भी पूर्कोक रीति से [विरोध के कारण ] एक दूसरे प्रकार का प्रतीप होता है। कम से उदाहरण- 'जिस [श्रीकण्ठजनपद] में प्रमदानों के नेन्न ही मुण्डमाला [सिर पर से कर्णमूल तक लटके ] आभूषण ये, नील कमलों की मालाएं तो केवल मार थी। [ हर्षचरित पृo ९८, ८० ३] और जैसे-लावण्यौकसि [यथासंख्यालंकार में आचुका] पद्य। यहाँ यथासंख्य भी है ऐसा पहले[ यथासं्य प्रकरण में] वतलाया जा चुका है। 'ए रहि तावद सुन्दरि ! कर्ण दत्वा शणुष्व वचनीयम्। सत सुखेन कृशोदरि! चन्द्र उपमीयते जनेन।।' 'अरी सुन्दरि? इघर आा पहले, औौर कान देकर ददनामी सुन। अरो कशोदरि! लोग तेरे मुख से चन्द्रमा को उपमा दे रहे हैं। यहाँ उपमानरूप से प्रसिद्ध चन्द्रमा को उसके अपकर्ष के लिए उपमेय रूप में कस्पित किया गया है। इसमें कारण है मुख की उपमेय रूप से विरक्षा। कहीं कहीं तो उपमा निम्पन्न हो जाती है और तब यह अनादर का कारण वनती है, चथा- 'मदे। आँखों की जोढ़ी नें इतना होते नहीं यन रहा गर्व क्यों भरे हुए है। इस प्रकार के नीलकमल स्थान स्थान पर बहुत मिलते हैं।1 यहा उत्कपयुक्त वस्तु के उपमान की कल्पना ही [ उसके प्रति] अपमान का कारण है। इसी प्रकार गुणोत्कर्ष के कारण जो वस्तु उपमान बनना मी नहीं सहती उसकी उपमान रूप में प्रतिपादित करना भी प्रतीप ही है। यथा- 'हे हालाहल! अत्यन्त दारण पदार्थो में मैं ही सब से बड़ा हूँ यह सोचकर तुम दर्प धारण न करना, तुम्हारे जैसे दुर्जनों के वचन इस संसार में चहुत मिलते हैं। यहाँ हालाइल में दोप का इतना उत्कपे है कि उसमें उपमानता संभव नहीं है, इतने पर भी उसे उपमान रूप से बतला दिया गया।।
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६१८ मलङ्गारसवस्वम्
विमशिनी उपमानम्येत्यादि। कैमर्थकयेनेत्यादि। तद्वयापारस्योपमेयेनैव कृतत्वाइनुपयोगेनेत्यय:। उपमानान्नरेति। उपमानानां सच्ये। अनादरणाधेमिति। उपमानववेन नैवययोग्यमिति यावत्। पूर्वोक्तगत्वेति। उपमेयस्थोपमानप्रतिकूल व्रतिर्वाद्। अनेनोभयत्रापि नैतासं. ज्ञामान्नमित्युक्तम। एकं द्वितीयमित्यभिद्धता अन्थकृता प्रतीश्षरयमलंक्ारदयम्, नं पुन सामान्यलघणाभा वादेकमेव द्विप्रकारमित्युकम्। उपमापकारवं धानयोनं वाज्यम, उपमानस्याक्षेपादुपमेयकरूपनाच्च। न दि तन्न तदस्तीति ततोऽनयोः सुपत्यय एव भेदः। अनयो पुन. साधम्यंजीवितत्वात्माधारणवर्माणामरिति त्रैविध्यम। एवमौपम्य मन्तरेण नेतदलद्वारदय मवतीश्यवगन्तव्यम्। तेन- मिद्दश्विम वदिनिम कि किरऊ देवआदि अपणादिं। जिइ पसाएण पिओो लघह दूरेदि शिवसंतो।' हर्वप्रापि प्रतिपालकारत्वंन वाच्यम्। अम्न हि देवतान्तरार्णा तथा सामर्थ्यादर्शना- रदापेपेण स्वप्नकाले प्रियोपलब्धिदायिन्या निदाया विरहिणीकतूकें वास्तवमेव वन्य स्म्। वस्तु च नालकार इति निविवादम। कुचलयद्लदाम्नामाषपश्सुपामध्यन्तमेव त:साधर्भ्यप्रतिपादनाथे:। अन्यया हि वदान्षेपो निरर्थक: स्याद्। पवं- "कि कर्णपूरै यदि सायुवादा सुकाफलै। कि यदि वाण्चिलासा:। कि घुर्णयोगैर्यी रूपशोमा कावण्यभास्ते यदि चन्दनै: किम्।' इत्यत्रापि शेयम्। अग्न हि यथा कर्णपूरादिमि: श्रोत्रशोभा क्रियते तथैव साघुवादा- दिमिशिि साधुवादादिमिरेव तक्कार्यकरणास्कर्णपूराज्ीनामाचेप.। तस्य व साधुवा दादीनामत्यन्नमेव नव्साधर्व्यप्रतिपादन फलम्। एवं- 'से छन्तीनां सुरपतिपुरीवारवाराङनाना यन्मझीरध्वनितसुभगो रौति कोलाइळोडयम्। तेनैवास्ते मदननृपतेमाद्गलिकये प्रयोधे मोघायन्ते पथि पथि गिर: कच्छपारावतानाम्।' इत्यव्रापि शेग्रम्। यहपुनरतान्येरपमानोपमेयरवसयाविव वितरवमुक्कम्, तस्षेपां तरव रूपानमिनस्वम्। लावण्यादिधर्मंथ्ात्र नृपचन्द्रयोरनुगामितया निर्दिष्टः। सथा वा- 'तस्याश्ेन्मुखमरिति सौम्प सुभग कि पार्वणेनेन्दुना सौन्दयंश्य पद हशी यदि प ते कि नाम नीलोरलै.। किं वा कोमलकान्तिमि, किसलयै सत्येव तत्राघरे ही धातु: पुनरुकव स्तुरच नारम्भेप्वपूर्वो अष्ः ।।' हतयत्र सौम्यसुभगावादि सकृव्विरदिष्टम्। असकृतिर्देशस्तु यथा- 1 'यद्यस्ति तस्या: स्मरशार्कमद्विविलासवेसनद्द्नु सुसं नवाखया.। तिन्दुना कि विहित विघाना सष्टेन वएगन्मृगलाबकेन्।' अब्र चेव्ळदूरगत्त्रयो: शुद्धसामान्यरूपर भ्रुमृगयोस्तु विम्नमतिन्िम्बभाव:।
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पतीपालङ्कार: ६१९ निकपथनिति। अन्यया चन्द्रस्योपमेयतवकक्पनं निर्थकं स्यादू। प्रयोजिकेति। उत्कर्प- पतिपादनाव। मत्रापि साधारणघर्मस्यानुगामितया यथा- 'मुखेन ससित्रि पोयूपपेळवेन निशासु से। उपमानतया चन्द्र: प्रियेणशिप्यते घुवम्॥' अम्र पीयूषपेलवरवमनुगामितयोपासम्। मसक्कविर्देशस्तु यया- 'पौलसत्य वित्तृतविवेद पूर्वचभ्रुकूरचच्छटाप्रकटितं छजताद्य व त्वामू। नीतोऽअनादिरप मेयधुरां चिधाता पोतुहणद्गविवलत्पृथुदाववह्ि॥' अन वेश्षद्विवलत्वयोः शुूसामान्यरूपत्वम, कूर्घदावयोस्तु विश्वप्रतिविग्वभावः। अस्थ हि विच्छित्यन्तरं दर्शयति कचिदित्यादिना। निष्पन्नमिति। सिद्ध्वेनो के। उत्कर्पभाज इति । जर्थान्नेव्रयुगवस्य।प्रादुर्भाव इति। उपमानस्याभूतत्योत्पत्तिः। अतएुव स्पर्वाबन्घभाजः परस्योत्पादान््यवदार:। अनेन न्यायेनेति। अन्न यथोपमानत्वमादुर्भावो न्यषकार कारणं तथैवेव्यर्थ। अतश्व पूर्वस्या एव विच्छित्तेरिदं विसजनं न पुनर्विच्छ्ित्य न्तरमिति भावः।परतीपमिति। उपमानमार्वं यो न सहते मा्ष्यं न्यूनगुणेन चोपमेयेन, तथापीदश मरकृष्गुणतवं विचातं यद्पेषया न्यूनगुणमप्युपमेयं न संभवतीत्यत्र पिण्डार्थ:। वैकृण्ठाय श्रियममिनवां शीतभानुं भवाय प्रादादुच्चेःश्रवसमपि वा चब्िणे तत्क गण्यम्। तृष्णार्ताय स्वमपि सुनये यहदाति रम देहं कोऽन्यरतरमान्नवति भुवने वारिधेर्वोघिसच्तः ।' इत्यत्र पनरन्यमतेपि न प्रतीपम्। लचम्यादेरधिकगुणस्य न्यूनगुणेनावरत्ापाद नाभाशद। अत्र हि लचयादिदानाद देहदानस्याधिकगुणत्वं विवचितम्। अत एवा- मुधेः स्व्रेदहदानसुस्प्रेकष्य को नाम लचपादिदानोक्कर्ष इत्यन्र वाश्यार्थः। एतच् वत्तिविति नालंकार हत्यलमतिविस्तरेण। उपसानश्य इा्यादि। कैमर्थकयेन-किस लाभ के लिए=उसका कार्य उपमेय के द्वारा कर दिए जाने से निरपयोग होने के कारण। उपमानान्तर-अनेक उपमानों के वीच अनादर- णार्थम्=मनादर के लिए = अर्थाव यह उपमान के रूप में फवता नहीं है इस रूप से। पूर्वोक गत्या= पूर्नोक रीति = वपमेव के तपमान से प्रतिकूल होने के कारण इससे यह बतलाया कि दोनों भेदों में यह केवल नाम मात्र नहीं हैं, [यह सार्थक भी है]। 'एक' और 'दूकषरा' ऐसा कहकर न्थकार ने दत्तलाया कि प्रतीप इस एक ही नाम के ये दो अलंकार हैं। दोनों का कोई सामान्य वक्षण नहीं है अतः ये दोनों एक ही समुच्चय के दो प्रकार नहीं हैं। इन्हें [दण्डी के अनुसार] उपमा का प्रकार नहीं मानना चाहिए क्योंकि यहाँ उपमान का अपमान रहता है और उसे उपमेय भी वना दिया जाता है। उपमा में ऐसा नहीं होता, अतः इनका अन्तर सुखपूर्वक जाना जा सकता है। ये दोनों प्रतीप सादृश्य पर निर्भर रहते हैं अनः इनमें साधारणधर्म के तीनों भेद मिलते हैं। इसी प्रकार यह भी अन लेना चाहिए कि यह अलंकार बिना सादश्य के नहीं हो सकता। इस कारण[रत्नाकरकार द्वारा प्रतीप के उदाहरण के रूप में प्रदस ]- 'निद्रैव वन्धते कि कियते देवतामिरन्याभिः। चस्या: प्रसादैन प्रियो लभ्यते दूरंपि निवसन् ।'
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"[इम तो] निद्रा को दो वनदना करते है, अन्य देवनाओं से करना हो घया है, जिस [निद्ा] के प्रमाद से दूर गया भी प्रिय प्राप्त सो जाता है।' इस स्थल में भी प्रतीपा लंकरता नहीं माननी चाहिए।' अन्य देवताओं से वैसा साम्थ्यं नहा है अ कि निद्वा में स्वप्न में मिय समागम कराने की क्षमता ह। अन. निद्रा में विरहणी द्वारा की नाने वाली वन्दना की पात्रता वास्तविक पानता है और इममे कोई विवाद नहीं कि वास्तविक वम्तु अलंकार नहीं होती। [यम प्रमदनाम्0 स्थल में] नोलकमलों का जो साक्षेप है उमका लदय नेयों के साथ उनका अत्यन्त साम्य प्रतिपादित करना है। नदीं तो उन [नीहरुमकों] का आक्षेप निर्थक ठददरेगा। इसी प्रकार [ रूकाकरकार द्वारा प्रतीप के उदाहरण के रूप में उद्पृत ]- करनफनें से क्या, यदि सायुवाद है, मुकाफलों से क्या, यदि वाग्विलास हैं, चूर् योगों [Powders ] से क्या यदि रूपशोभा है और चन्दन से क्या यदि लारण्य है।' इस पद्यार्थ में मो जानना चाहिए। यहाँ भी कर्ण आदि की कोमा जिस पकार करनफूम आदि के द्वारा होतो है उसी प्रकार साघुवाद आदि के द्वारा मो। इसीलिए सामुवाद आदि के द्वारा नेत्रशोमा का कार्य हो जाने पर करनफूल आदि का आक्षेप किया गया है। इस [आक्षेप] का प्रयोजन साधुवाद आदि का अत्यन्न साध्म्य प्रतिपादित करना ही है। इसी प्रकार [रत्नाकर द्वारा प्रतीप के उदादरण के रूप में उपस्पिन ]- सेछ रहीं अप्सराओं का, नूपुर की ध्वनि से सन्दर जी यह कोलाइल मचा हुआ है, उसीसे मदन नृपति का मांबलिक प्रबोध= [जागरण] हो जाना है अत मार्ग मार्ग में जो कच्छ के पारावन [कपोनो] को बाणी है वह नित्थंक पड जाती है।' इम पघ में मी [आक्षेप को साम्यभूलक ही] जानना चाहिए। इस कारण [रत्नाकरकार ने पूर्वोक्त 'कि कर्णपूरै:' भद का स्पष्टीकरण करते हुए] जो यह कहा है[ कि जहाँ उपमान पसिद्ध रहते हैं वहो प्रतीप द्वारा उनका तिरस्कार होता ई किन्तु 'कि कर्ण०' आदि पर्धों से जहाँ साधुवाद आदि उपमान प्रसिद्ध नहीं है वहों तिरस्कार के बाद उनका साध्म्यमूलक उपमानत्व सिद्ध होता है अत आक्षेप या प्रवीप के लिए] 'यहो उपमानोप- मेयमाव की कोई विवश्ा नहीं है' वह तन [ उपमानोपमेयों] का स्वरूप न जानने के ही कारण। यहाँ राजा और चन्द्र के बीच लावण्य आादि धर्म अनुगामी धर्म के रूप में शब्दनः कमित है। दूमरा उदाहरण यथा- 'उसका सौम्य सुभग मुस है तो पूर्गचन्द्र से क्या, यदि सौन्दर्य की घर वे आँखें हैं तो नील कमलों से क्या; रस सधर के रहते हुए कोमल कान्ति वाले किसलयों की आवश्यकना ही कया है। सेद है कि विधाता को दोहरी औौर व्यर्थ वस्तुएँ वनाने का विचित्न आवह है।' हत्यादि में सौम्यसुमगत्व आदि धर्म एक बार निदिष्ट [कहदे गए] है। अनेक बार निर्देशका उदादरण- 'यदि उम सुन्दरो का काम के धनुष की बनावट से विलास से फरकनी मौहों वाला चेदरा दे तो विधाता द्वारा बनाए स्फुरित मृगशावक से युक्त चन्द्रमा के क्या ? यहां वेस्लद=फरकता और तुआ वलाद=सपुरित होता हुआ इन शब्दों से प्रतिपादिन धर्म शुद्ध सामान्यरूप धमे हैं और मौह तथा मृग विम्वमतिविम्बमावापत्र धर्म है।
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परतीपालद्वार: ६२१ निष्कर्पार्थ-अपकर्ष के लिए, नहीं तो चन्द्र का उपमेय रूप में चित्रण निरर्थक दो जादगा। मचोजिका= कारण= उत्कर्ष का प्रतिपादन करने से। वहाँ भी साधारण की अनुगामिता का सदाछरण यह है- 'सखि ! तेरा मरिय रात्रि के समय निश्चित ही तेरे अनृतसुन्दर मुख के साथ उपमानमाव लिए रहने वी कारण चन्द्रमा को चाहा करता है।' यहाँ अमृतसुन्दर ता अनुगामी धर्म है। अनेक वार निर्देश के लिए- हे मौलस्त्य [रावण]! तुन्हें काफो विस्तृत और हिलती पिसंग वर्ण की अपूर्व डाढ़ी से चुक वना कर वियाता ने उस अंजनादि को उपमेय वना दिया जिसके पर्याप्त उच्च श्रृंग पर दौढ़ती भयंकर दवार लगी हो।' वहाँ वेक्लत तथा विवलत पद से प्रतिपादित हिलना और दौढ़ना शुद्ध सामान्य धर्मे है; तथा डाढ़ी और दँवार में विम्मनतिविम्बभाव है। इसी [ पतीप का एक विशिष्ट प्रकार बतलाने हेतु लिसते हैं-कचित्। निप्पन्न=सिद्ध रूप में कथन होने से। सत्कर्पभाज :- उत्कर्युक्त=अर्यात, नेत्र झुगल। प्रादुर्भाव=पइले से अविदमान उपमान की उ्पत्ति। इसीलिए अन्य किसी स्पर्धायुक्त वस्तु का अस्तित्व वतलाने से यहाँ अपमान व्यक्त हुआ। अनेन न्यायेन=इसी प्रकार=जिस प्रकार यहाँ उपमानत्व की स्थापना से अपमान हुआ उसी प्रकार। इसीलिए यह पूर्वोक प्रकार का ही विमाग है न कि अन्य कोई त्वतन्त्र प्रकार। प्रतीप= जो कभी भी किसी के प्रति उपमान वनना बरदास्त नहीं करता उसका उपमानत्व सिद्ध करने से इसमें [ प्रतीपता=अर्थाव] प्रतिकूदता जो चढी आवी है। आशय यह है कि यद्यपि उचित यह है कि जो अधिक गुणवाला हो वह उपमान बनाया जाए और जो न्यून गुण वाला हो वह उपमेय, तब भी यहाँ गुर्णो में इस प्रकार का पकर्ष ही दिखलाया जाता है जिससे न्यून गुण वाली वस्तु मी उपमेय वन सके ।[ रत्नाकरकार ने जो प्रतीप की न्यूमतापतिपादक विधा के लिए निम्नलिखित - ] 'विष्णु को अभिनव लक्षमी, शिव को चन्द्रमा औौर इन्द्र को जो उच्चैवा [कान ऊँचे रखने वाला अत एव तनाम का अम दिया इसकी तो गणना ही कहों? पिपासा से आतुर [अगस्त] ऋषि को जिसने अपना शरीर ही [ समुद्र ने ] दे डाल उस समुद्र से भिन्न दोधिसत्व संसार में कौन हो सकता।' पथ [उद्धृत किया है इस] में अन्य [रत्नाकरकार ] के मत के अनुसार भी प्रतीप नहीं सिद्ध होता, क्योंकि वहों जो अधिक गुण वाले लक्ष्मी आदि पदार्थ हैं इनमें कम गुण वाले किसी पदार्थ से न्यूनता का प्रतिपादन नहीं किया गया है। यहाँ तो लक्ष्मी आदि के दान की अपेक्षा देद के दान में अधिक गुणत्व=उत्कप्टत्व मात्र प्रतिपाध हैं। इसीलिए समुद्र के स्वदेहदान की उलमेक्षा करके यहाँ यद वाक्यार्थ प्रतिपादित करना चाहा है कि लक्ष्मी आदि के दान से ससुद्र का उत्कर्ष ही क्या ? यह तो केवक वस्तुस्थिति मात है, अलंकार नहीं। मस्तु जाने भी दिया जाए। अधिक विस्तार से क्या? ॥ विमर्श-इतिहास- अतीपालंकार का पूर्वरूप प्रयमतः दण्डी की विपयासोपमा में मिलता है। काव्यादर्श में उन्होंने इसका निरूपण इस प्रकार किया है-
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६२२ अलङ्कारसवस्वम्
सवदाननमिवोन्निदमरविन्दममूदिनि। सा प्रसिद्धिविपर्यामाद् विषरयासोपमा मता ।'२११७।। 'खिला अरनिन्द तुम्हारे मुग के समान १- यह जो उपमा ह इसमें प्रसिद्धि का विपर्यास है वत यड विषर्यासोपमा हुई। प्रसिद्धि तो उपमान रूप में चन्द्र को है, मुख की नहीं। यहाँ इने उत्र दिया गया है। यही उलटाव विपयास है। मामह, वामन और उद्भट में इसे इम नहीं पाने। सद्रट ने इमे अपनाया है और स्ववन्त्र अलंकार के रूप में इमे प्रस्तुत किया है- रुत्ट-'यत्रानुकम्प्यते सममुपमाने निन्धने दाषि। उपमेयमति स्वोतु दुश्वस्थमिति प्रतीप स्यात् ।' जिस [अटकार] में उद्देश्य होता है उपमेय की अधिक प्रशसा, और नदर्थ या तो उस पर जनलाई बाती है कृपा, या को जानी है उसकी निन्दा, और इन दोनों का उपाय रहता है यह बतलाना कि उपमेय तुलना में किसी के समान है, वह अलकार प्रनीप कहलाएगा, इमसिपि कि इम प्रकार की उक्ति में दुरवस्थता अर्थान् वास्तविक स्थिति के विपरीत स्थिति रहती है। [१]प्रथम का उदाहरण- 'वदनमिद समभिन्दो: सुन्दरमपि ते कथ चिर न भबेन। मलिनयनि यत् करोलो लोचनससिल दिं कजलवर ।। प्रिये। नेरा मुख केवल सन्दर [कान्निमान् ] हे तो क्या? यह मद्दा के छिए चन्द्रमा के समान क्यों नहीं होगा [कर्लक का प्रातिनिव्य करने के लिए] इमके कपोलों को कज्जल मिन्रित आँसू मन्न्नि मो जो बना रहे हैं जो। यहाँ मुस की अधिक प्रशमा उद्देद्य है। उमी के लिए चन्द्र को उपमान रूप में प्रस्तुत किया गया है। वास्तविवता के विपरीत होने मे उमे पनोप नाम दिया गैया। [२] उपमान योजना द्वारा निन्दा के माध्यम से उपमेय की स्तुति का उदाहरण रुद्रट में 'परवमसवाच' पद्य ही ह। इसमें उपमानयोजना द्वारा निन्दा करने का सर्थ उपमेय की वास्त- बिक स्मिति को उपमान की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट, अनुपम, अपतिम, अनुपमेय या अद्वितीय बनडाना है। मम्मट और सदस्वकार ने रुद्रट की इस स्थापना को इसी रूप में स्वीकार कर दिया है। प्रथम प्रतोप रुद्रट तक हो सीमित रहा। न नो मम्मट और सवस्वकार ने ही उमे स्वीकार किया और न रत्नाकरकार आदि ने। परवर्ती अन्य आवार्यों ने मो हमे सवोकार नहीं किया है। मम्मट-'भाशेप उपमानत्य प्रतोपसुपमेयता। सस्पेद यदि या कत्या तिरस्का रनिहन्यनन्।i उपमान पर निरदकता का आक्षेप अथवा तकषी उपमान को अपमानित करने के लिए उपमेव ववलाना प्रवोप कइलाना है। उदाहरण के रूप में मम्मट ने लावण्योकसि, ए पदि दाय, गर्वमसंवास तथा 'अहमेव्र गुरु'' पद्य प्रस्नुन किए जिन्दें सवसकार ने भी उद्धृन कर दिया है। इतना हो नहीं उन्होंने इन उद्राइरगें में जी विशेषताषे मानी थी' वे मी सुर्वस्कार ने ज्यों को त्यों मान लो हैं। वस्तुनः सर्वस्व के प्रनीप का प्राय अक्षर अक्षर काव्यप्रकाश के प्रतीप से मिळता है। इम प्रकार प्रतीप को प्रस्तुत रूप में लाने का पूरा ग्रय मम्मट को है, ययपि उसके पूथक अलकारत्व पर बनके पह्छे
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प्रवीपालङ्कार: ६२३
सटरट की दृद्टि जा चुकी थो और 'गर्वमसंवास०' में सुद्रट की मान्यता को मम्मट ने भी अंगीकार कर लिया था। सर्वस्वकार प्रतीप के लिए मम्मट के ऋणी हैं। रत्नाकर-होसंगावाद की नर्मेदा जी के समान विमर्शिनी का जो पाट यहाँ चौड़ा हो गया है उसका कारण उसमें तवा के समान रत्नाकर का मिलना है। रत्काकरकार, जैसा कि कदा जाचुका है अप्रसिद्ध उपमान वाले स्थल में उपमानोपमेयभाव की निष्पत्ति प्रतीप को निष्पत्ति के दाद मानते है अतः उन्होंने प्रतीप लक्षण में उपमान को स्थान नहीं दिया है। उसके स्थान पर वन्दोंने अधिकगुण शब्द रखा है। इसी प्रकार उपमान के आाक्षेप और उपमेयता को मी उन्होंने पक 'मनादर'-शब्द में संगृहीत कर दिया है। उनका लक्षण यह है-
'अधिक गुण वाले पदार्थ का अनादर प्रतीप कहलाता है।' विमर्शिनीकार ने रत्नाकरकार के प्रथम संशोधन [ उपमान के स्थान पर अविकगुणशब्द के प्रयोग] पर तो आपत्ति की है किन्तु द्वितीय संशोधन पर वे मौन है। इतना अवश्य है कि उन्होंने अ्न्थकार की ओर से यह सफाई दो है कि वे दोनों प्रतीकों को दो स्वतन्न्न अलंकार मानते हैं, इसीलिए उन्होंने दोनों का समन्वय नहीं किया। सर्वस्त्रकार ने जहाँ एक दी नाम से अनेक अलंकारों का निरपण किया है बह़ोँ उन्होंने उन्हें पृथक पृथक सूतों में रखा है। व्याघात, समुच्चय आदि इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। पर्याय को एक सूत्र में रखा है। उससे लगता है कि वे उसके दोनों भेदों को स्वतन्न्न दो अलंकार नहीं मानना चाहने। यहाँ सर्वस्वकार ने दोनों प्रतीपों को भो एक ही सूत्र में रखा है। वे निश्ित ही दोनों को एक ही मानते हैं। मन्मट ने मी ऐसा ही माना है। विमर्शिनीकार का जो यह कहना है कि दोनों प्रतीपों में कोई सामान्य लक्षण नहीं है उसका वत्तर रत्नाकर के सूत्र से मिल जाता है। एक ही सूत्र में एक डी अलंकार के दो प्रकारों का पृथक पृथक इस्लेख यदि इस कब्पना का पोषक है कि सूत्रकार दोनों प्रकारों को दो स्वतन्त्र अलंकार मानना चाहता है तो कार्यकारणभावमूल अतिशयोत्ि [पृ०४४] और उसके पूर्व व्याजसतुति [पृ० ३८] के सूत्र में निदिष प्रकारों को मी त्वतन्त्र अलंकार मानना होगा सर्वथा यहाँ रत्नाकर का पक्ष प्रवल है। रत्नाकरकार ने प्रतीप में अन्य विष्छित्तियों का भी अनुसन्धान किया है। विमशिनीकार उस पर भी मोन है। अधिकगुण के अनादर के ही समान न्यूनगुण का आदर भी एक ऐेसी हो विच्छित्ति है। उसका उदाहरण 'यणमुअ' गाथा से दिया है-जिसकी संस्तृत छाया यह है- 'रत नमु जमू लनितम्वान् मरियाया नीर्णाम्वरायाः पेक्षमाणः । मुसले व्यापृताया बहु मन्यते रोरम्।' 'गरीब गृहिणी मूसल चलारही है। उसकी साड़ी जगह जगह से फट चुकी है। हाथ उठाने में उसके स्तन, मुजमूल तथा नितम्ब उससे वाहर साफ दिखाई देते हैं। उसे इस स्थिति में देख उतका मिय दारिद्रय को हो बबुत आदर दे रहा है।' यहां आए रोर शब्द का अर्थ दारिद्रय है। सर्वस्वकार मंख के शी श्रीकण्ठचरित में इस शब्द का इसी अर्थ में इस प्रकार प्रयोग मिलता है- 'वित्रृण्वता सौरम-रोर-दोषं चन्दित्नतं वर्णतुणैः स्पृश्ञन्त्याः। विकस्वरे कस्य न कर्णिकारे म्राणेन दृष्टववृधे विरोष: ।।'
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ग्रोष्म नें कगिकार [अमलनास ] फूछ तो दर्शक की दृष्टि से नासिका को झडप हो गई। दृष्टि मके सुवों वर्ण को प्रशसा करती थी और नसिका उमे सुगन्ध में रोर दरिद्र बनलानी थी। [६१३ श्रीकण्ठचरित ]। अप्पयद्ीसषित-ने दोनों प्रतीनों के लिए दो पृथक लक्षण बनाए हैं-
[२ ]अन्योपमेयलाभेन वर्ण्यस्यानादरश्ष तत्।। पमान को उपमेय बतलाना प्रतीप तथा अन्य उपमेय का मिलना दिखलाकर वर्गनीय का अनादर मी। उन्होंने उदाहरण के रूप में प्रथम के लिए 'यत्वन्नेत' पद्य दिया है जो काव्यलिंग के उदाइरण के रूप में सर्वस्व में भी आया है तथा द्वितीय के लिए रुद्ट का छी सवं सम्मानिन 'गर्तममव्राह्यम्०' पद्य सद्धृन दिया है। पण्डितराज-प्रनीन के विवेचन में दोलायित चिछ् के दिखाई देने हैं। उन्होंने उपमा पकरण नें उपमेयोपमा के ही समान प्रतीप को मी उपमा का ही रूपान्तर मान दिया है। प्रतीप मकरण में भी वे विशद विवेचन करने के पश्चात् इसी स्वर को औौर सवलता के साथ दुहराने दिखाई देने हैं। उन्होंने प्रनीप के पाँच भेद माने हैं जो इस प्रकार है- [१ ] प्रसिद्धोपमानवेपरित्येन वर्ण्यमानमौपम्यमेक प्रनीपम्- प्रमिद्ध उपमान के विपरीत वणित किया जा रहा सादृश्य एक प्रकार का प्रतीप होता है। [२-३] अनमानोपमेकयोरन्यनरस्य किचिद्गुगप्रयुक्तमद्वितीयनोत्कर्ष परिदत्तु द्विवीयप्रदर्शनो- सलास्यमान साट्वयमपर दिविषम्। उरमान और उपमेय में से किसी एक का किसी गुण को लेकर भदितीयत्व प्रकाशिन करने से निकल रहा सादृश्य दूसरे तथा तौसरे प्रकार का प्रतीप होता है। [x] वपमानस्य केमर्थ्य चतुर्थम्। उपमान की निरर्थकना चौथा प्रनोप होता है तथा- [५] सादृशय विघटन पश्चम्- साहृदय का विघटन पाँचनों। इनके स्वदरण- [')'के जश्यसि मुग्धनया दन्न ममाङ्ग सचणेवरमिति। नद् यदि पतनि हुनारे नदा इनासे तवादवर्ण स्यास।' अति हनारे! मोलेयन में यह कहती है कि मेरा भाँग सोने से रँग का है। वही धाँग के के रग का हे सरेगा यदि याग में तपे। यह उपमान की उपमेयता से होने वाला मेद ही है। 'यदि तदा' से यद अनिशयोतिगमिंन हो गया है। [२] वपमान की अदवितीयता के परिदार का वदाहरण-पण्टिनराज के मन में भी 'अहमेव गुरु पद् माना जा मकना है। [ ३]उनके मत में उपनेद की अहवितायया के परिहार का उदाहरण मी 'गर्वमसवाझ्यम्०' पद्य माना जा सकता है। इसी प्रकार [४] उपमान की निरथकना के ठिए 'लावण्योकसि०' तथा [५ ] सादृश्य विघटन के लिए 'ए एडि किमपि०'।
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मौलिवालद्दार: ६२५ पण्डितराज ने इनमें से प्रथम तीन में उपमा ही माना उचित माना है, चतुर्थ को आक्षेपालंकार और पंचम को सनुक्वर्मक व्यतिरेक। समर्थन में उनके तर्क हैं कि प्रथम तीन में सादृश्य की निष्पत्ति ठीक उसी प्रकार हो जाती है जिस प्रकार रपमा से। जहाँ तक प्रसिद्धिविपरीतता का प्रदन है-उससे उपमा में ही एक विच्छित्ति का समर्थन करना अधिक चित है न कि स्वतन्त्र अरंकारता का।[दण्डी ने ऐेता किया सी है। उन्होंने इसे विपर्यातोपमा नाम दिया है।। उनका यह दृषान्त दस विषय में उल्लेखनीय है-'न हि द्राक्षा माधुर्यातिशयेन पार्थिवान्तराद् विलक्षणेति अपार्थिवी मनति'-दराक्षा अतिशय माधुर्ये के कारण अन्य पार्यिव पदा्थो से विलक्षण होती है इसका अर्थ नहीं होता कि वह अपार्थिव हो जाती है' विपरीत उपमा, उपमान, या उपमेय की अद्वितीयता का परिदार उपमा को अनुप्मा या उपमेतर नहीं चना सकता, उसमें अतिशय भर ला सकता है। पण्टितराज करपना के धनी हैं। उन्होंने खप- मानोपमेय के तिरस्कार के ही समान पुरस्कार में मी एक छठे प्रकार का प्रतीप मानने की आ्रपति प्रस्तुत की है और चसके लिए एक स्वनिरमित उदाहरण भी दे दिया है।-वस्तुतः पण्डितराज भूल गए कि अलंकारों का भेदक तत्व् वस्तुभेद या योजनामेद नहीं, चमतकारभेद्र है। प्रतीप में चमत्कार सादृडप से नहीं वैपरीत्य से होता है। यह तथ्य स्वयं पमिडतराज हो मनेक बार दुए- राते, पतलाते और जतलाने आए हैं। अन्य भेदों में भी यह तर्क कागू हो सकता है। उपमालंकार के प्रकरण में नागेश ने गुरुमर्मप्रकाश में पण्दितराज को भड़े हाथों किया भी है। विश्वेश्वर ने प्रतीप के दो ही भेद माने हैं-उपमान की निरथैंकता तथा उपसेयता- 'उपमानानर्थक्यं प्रतीपमस्थोपमेयत्वम्।' इनका अनुगत सामान्य उन्होंने इस प्रकार वतलाया है-'सामान्यलक्षणं तु यन्िष्ठसादृश्य प्रतियोगितानाअयत्वामिमतोपमानकत्वं [तत्वं प्रतीपत्वम्]। अर्थाव उपमान में जिसका साइश्य अस्वीकार किया जाय वह उपमेय प्रतोप। अस्तीकृति स्वयं उपमान में भी बतलाई जा सकती है और अन्य किसी में मी। पण्डितराज द्वारा वतलाए समस्त भेद उन्होंने सकितिक रूप से उक्त दो भेदों में ही अन्तर्भूत मान लिए हैँ, यद्यपि उनके प्रतीपविरोधी स्वर पर विश्वेश्वर का पुराणवादी समीक्षक चुप है। चक्रवर्त्ती की निष्कष्टार्थकारिका प्रतीप पर यह है- 'उपमानस्य वैमर्य्यादुममेयत्वकत्पनम्। द्विषा प्रतीपं क्वाप्येतदुपमानत्वतोडपि च।। [सर्वस्व ] [सू० ७१] वस्तुना वस्त्वन्तरनिगूहनं मीलितस्। सहजेनागन्तुकेन वा लक्षमणा यद्धस्त्वन्तरेण वस्त्वन्तरं निगूह्यते तदन्वर्थाभिधानं मीलितम्। न चायं सामान्यालंकार, तस्य हि साधारण गुणयोगान्नेदानुपलक्षण रूपम्। अस्य तूत्कष्टतुणेन निम्वध्टणुणस्य तिरोधान- मिवि महाननयोविशेप:। सहजेन यथा- 'अपाह्ृतरले दशी मधुरवक्रवर्णा गिरो विलासमरमन्धरा गतिरत्षीव कारन्तं मुखस्। इति स्फुरितमझके सृगदशां स्वतो लीलया यदज न मदोद्या कृतपदोऽपि संलक्ष्यते ।I' २० म० स०
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६२६ अलट्कारसवस्वम् अत्र एक्तारल्यादिना स्वामाविकेन लक्ष्मणा मदोदयरुतं एक्तारत्यादि तिरोधीयने। आगन्तुकेन यथा- 'ये फन्दरासु नियसन्ति सदा हिमाद्रे सवन्पततशङ्गितधियो विचशा द्विपस्ते।
तेपामह्दो वत मिया न सुधोडप्यमिव.।.' अत्र हिमादिकन्दरनिवाससामर्थ्यप्रतिपल्नेन शैत्येन समुद्धावितावाग नतुकौ कम्परोमाय्षी मय्कतयोस्नयोस्तिरोवायकी। तिरोधायकत्वादेव च मीलित वयप देशः। [सू० ७१]एक वस्तु के द्वारा दूसरी वस्तु का [तिरोधान मीलित नामरु अलंकार] कहलाता है। [प.] सदजान अथवा ऊपर से आए किमी धर्म के द्वारा किमी मिन्न वस्तु के द्वारा जो किमी मिन वस्तु का [निमून अर्यान ] तिरोधान वद 'मीलित' इस अर्यामुरूप नाम से पुकारा जाता है। यह सामान्यालकार नहीं है, उसका स्वरूप साधारण गुणों के कारण भेद का समझ में न आना है। इस के विरुद्ध इस [ मीलिन ] का स्वरूप है ठरकष् गुगों वाली वस्तु के द्वारा निरृष्ट गुणों वाली वस्तु का निरोधान। इस प्रकार इन दोनों में मदान् भेद है। सहजान धर्मे के द्वारा, यपा- 'अपाग तक घूमनी दृष्टि, मधुर किन्तु वक बर्गों वाली बोली, विलाम के मार ने धीमी चाछ, अनीव कान्न मुस, यह सब तो बस मृगनयनी केर भंग में अपने आप स्फुरित है, अन [मधुरन मनिन ] नशा आजाने पर भी दिखाव नहीं पड रहा है। -यहाँ दृष्टिचाश्वव्य आदि धर्म स्व्ामाविक धर्म है। इनके द्वारा नशे से उत्पन्न दृष्टिचाद्त्य आादि छिया दिए गए हैं। कपर से आप धर्म के द्वारा, यया- तुम्हरे जो शदु तुम्हारे टूट पढने की साका से हिमाद्ि को गुफाओं में विवशनापूर्वैक सदा हो समार रहते हैं, उनके शरर रोमाचिन और कम्पित होने रहते है सब मी उनके मय का ज्ञान चनुरजनों को भी नहीं होना। -यहाँ हिमानि [बहोले परवन= हिमाचल] की शुफाओं में निवास के कारग प्राप्त ठड के कारण उत्पन्न अनएव ऊपरी धर्मरूप जो कम्प और रोमाच हैं वे भय से उत्पन्न उन्दीं [ कम्प और रोमांच रूपी धर्मा] के तिरोगयक है। और तिरोधायकता के कारय ही मीलिन यह नाम भी पडा है। - चिमर्श- रस्नाकरकार मीलिन से सामान्य को पृथकु नहीं मानने। वे सबस्वकार की स्थापनाओं का उत्तर देते हुए लिसने हैं- 'ृथक सामान्यमीलिनयोलेक्षमें न कार्यम्, भेदामावान्। तथा हि यत्र सामान्य मर्वननविरिष्यने तत वस्य भैदानवसमस्नस्य कि स्वरूपमत्रगम्यते न वा। गादये घटपटयो: पटयोरेव वा यथा निज्नि नरुनपतीत्पाडसयेव भेदप्रतीति, तयेहावि स्यादिति न मीठितम्, नावि सामान्यम्। दितीये
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मीलितालद्कार: ६२७
निजस्वरूपत्यानवगमेधिकगुणेनाच्छादनमेव निमित्वम्, न समानशुगलम्। तथारवे लताज्यो- रतनादेरपि समानगुणत्वसम्मवात् कर्थ तु निजतयानवगमः । न च स्वरूपाच्छादनेपि सहजागन्तु- वत्वाद् विशेषादलकारमेदो युक्त, प्रतीतिसाम्येनकस्यैयालकारस्य भेदपभेदामिधानोपप्त्ते: परिवृ- त्यादिवद्। ००० नापि गुणसाम्यविदक्षया भेदस्यावगभे्यनवगमाभिधानं सामान्यस्य मौलिवाद
सवरूपानगमस्य संमवादेक एवाला्षरो वाच्य:, स व मीचितनामेव, वत्त्न्तरेणावच्छाद नात- भेदेनानुपलम्भस्य वलवद्गुगसमतिः। सामान्ये मीलिते तुक्यो हेतुस्तेन न मिनता'। सामान्य और मीलित के लक्षम पृथक पृथक नहीं किए जाने चाहिए, क्योंकि इनमें कोई भेद नहीं है। यह इस प्रकार कि आप [सबंस्वकार] जहाँ सामान्य मानते हैं वहाँ जिसके भेद का प्ञान नहीं होता उसके स्वरूप का ज्ञान होता है या नहीं। होता है तो जैसे घट और पट या पट और पट का अपने पने रूप के ज्ञान से मेद प्रतीत होता है, वैसे हो यहाँ भी भेद प्रतीत होगा, तव न तो मीलित ही होगा और न सामान्य ही। स्वरूपस्ञान नहीं होने का पक्ष माना जाय तो निजस्वरूप के ज्ञान न होने में कारण अधिक सुग वाली वस्तु के द्वारा आच्छादन हो भाना जायगा, गुणसाम्घ नहीं, क्योंकि तब [विमर्सिनी में भागे आाने वाले पद्य अभेदमूढ0' में] लका [ तथा सामान्यालंकार के उदाहरण के रूप में सर्वस्व में आने वाले पध 'मळयजरस०' मे] ज्योत्त्ना आादि में भी निजस्वरूप का ज्ञानाभाव क्यों नहीं रहता [अर्थात उनके स्वरूप का ज्ान क्यों होता है] क्योंकि गुणसान्य तो उनमें भी है। जहाँ तक [ इमारे द्वारा स्वीकार किए गम] स्वरूपाच्छादन रूपी कारण का संदन्ध है उसमें यद्यपि 'सहजातता और मागन्तुकत्षा' ये दो विशेषताएँ रहती हैं किन्तु उनके आधार पर अलंकार भेद नहीं माना जा सकता, परिवृत्ति आदि के समान एक ही अलंकार में दो प्रकारों की कल्नना भर की जा सकती है क्योंकि प्रतीति दोनों में एक् सी ही रहती है। ००००। यह भी नहीं कहा जा सकता कि गुणगत साम्य की विवक्षा से, भेद का ज्ञान हो जाने पर भी ज्ञान न होने का कथन मीलित से सामान्य का भेदक है, क्योंकि [मीलित में उदाहरग अपांग० में आए ]नशे से उत्पन्न नेनचांचव्य का भी भेद प्रतीत होना संमव है। इस कारण [मीकित और सामान्य दोनों के] उदाहरगों में जन स्वरूपश्ञान संभव है जिसके आधार पर दोनों का एक ही लक्षण [ समानामिहार०] बनाया जा सकता है तव अलंकार एक ही वतलाया जाना चाहिए और उसका नाम मोलित ही होना चाहिए क्योंकि इसमें अन्य वस्तु का मोलन - माच्छाइन रहता है। निष्कर्म यह कि- [सामान्य औौर मोछित से वस्तु का ] ज्ञान भेदपूर्वक जो नहीं होता उसका सामान्य और मीलित [दोनों ] में एक ही हेतु है 'अधिक गुण वाली वस्तु की सन्निधि'। मतः इन दोनों में भिन्नता नहीं है। इस पूरे प्रघट्टक का निष्क्म यह हुआ कि मीलित के ही समान सामान्य में भी वस्तुस्वरूप का विरोधान रहता है तथा सामान्य के समान मौलित में भी वस्तुस्वरूप में भेदरोष। बोधगत तरतममान या मानाभेद को लेकर एक ही उत्तिप्रकार को दो अलंकारों में दिमक करने की अपेक्षा, दो पवरो में विमक्त करना अविक उचित है और उन दोनों प्रकारों को एक ही अलंकार मानना। 'इस अलंकार को नाम कौनसा दिया जाए मीलित या सामान्य' इस पर रत्नाकरकार का कहना है कि दोनों में चमरकार का कारण एक हो है-'वस्तुस्वरूप का तिरोधान', अतः मोित नाम देना ही उचित है। विमर्शिनोकार रत्नाकरकार की इस मूल
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स्थापना का निराकरण नहीं कर पाप हैं। वे रत्नाकरकार के अवान्तर विकव्पो पर सवस्वकार का पक्ष स्पष्ट करने तरु मीमित है। यह तथ्य उनकी इस विमािनी से स्पष्ट है- विमर्शिनी वस्तुनेति। रष्मगेति। चिद्धसूपेण धर्मेणेोपथ:। तस्य दि सहभागन्तुकरवेन द्िचि घरवाद्ध्यापि दविमकारवमरती्य नेनोकम्। नद्ु वसवन्तरतष्य वस्त्वन्तरेण निमूद्ितर्वे मैकारम्योपनियन्धारिकिसयं सामान्यालंकार एूव न भवसीत्याशप्ययाह-न चायमिश्यादि। साधारणगुणयोगादिति। यदाटु :- 'प्रस्तुतरय यदम्पेन गुणसाम्यविवयया। ऐकाम्पं यमपते योगातत्सामान्यमिति स्मृतम् ॥'
षद्भेदेन प्रातिस्विकेन रूपेगानुपलषण यथावगमनमध्यवसाय इश्यर्यः। मया-राज. गआदो शुक्िकार जत पोः सनिकर्पणसामान्याकारतपा पृषणचगमेडप्येकडर विशेपस्सरणा. दुभयत्र विशेषामद्णाकस्यचिर्द्कतरव्घेनैय निक्षयो जायते तयैवेदापि शेयम। मीलिते
गुणाषछ्ावक तया तह शावश्म्मेनाधि कगुणशयैव प्रतिभासनाम्। अत प्वाद् मदोदयकतस्य रकतारक्यादेर्मावगममार्वं, तस्य मदोदयापूर्वमवि तर्थेवावस्थानात् पलवता स्वाभाबिकेन हक्तारपयादि नाच्छादिनरवाय्। सामान्ये पुन .- 'अभेद मूढस्तव काभिरागता छतामिरीपळलुलिताछिपसकिमिः। इयं पुरोमाहननतितालका न लपयते व्यक्मवामनसतनी।'
घक्षमू। अवश एवरूपेणवगवरयापि मैवानध्यवसायः सामान्यं, चलवता तिरोदितत्वालू स्वरूपानव्रगमो मोछितमिति स्थितम। अत पवाह-महाननयोविंशेष इवि। एवं तहिं समा नगुणावरयाविशेपाद्ृयय मागोद्ाहरणादा व मिसारि का डिययोर नदेरिपि भेानुपलपर्ण करि न स्याय्। ननूक पवाप् परिदारो यत् समानसुगर्वेप्येकतरविशेपस्मरणादुभयविशेषा म्रहणाच्चेति। एवमपि कथमिति चेनू, कसयायं पयतुयोगन कि जातुरत जेपस्य वा। पृतचामस्तुन वान्नेहारमा मिर्कम्। इछ व प्रस्तुसरपैवा प्रस्तुतान्नेदेनानुपछक्षण विवधि तम्। तद्टतरवेने वाभेददरेग नरमाद्श्यस्य प्रतिपिमादयिपितावान।न चरमप्यन्यस्यान्य- सपा मतीतेरस्य म्रान्तिमत्यन्वर्मारी वाच्य: । तस्य दि मकनवर्त्वाच्छायकरवेनैव प्रतीति कचणम्। हुछ सु सथर्रवेमि वर्वन्तरस्य पथवप्रतिपत्तिरितयल बहुना। न च्ाश्य सक्षा मात्रमेवदिश्याह-विरोधायकत्वादिति। सतश्र पूर्व 'तदन्वर्थामिधान मीजितमित्युक निर्वाहितस् ॥ वस्तुना। रचमणाू विह्दरूप धर्मे से। नह दो प्रकार का होता है सददन तथा आगनतुक अनः यह अलंकार मी दो प्रकार का होता है यह बतलाया। 'अन्य वस्तु के द्वारा अन्य वस्तु का जो छिपायो जाना है वह सामान्यालंकार में भी होता है, अन दोनों में पकरूपता रहने से यह सामान्य टकारसवरूप ही क्यों नहीं माना जाता-ऐसी शका उठाकर कढते है-'न चायम्०। साधारणगुणयोगाव= गुण साम्य=जैसा कि [मम्मट ने ] कदा है-
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'गुणसाम्य बतळाने के लिए, प्रस्तुत का, अन्य के साथ, सादृश्य संबन्ध के भाधार पर, अभेद चतलाया जाता है वह [ सामान्य नामक अलंकार कहलाता है, काव्यप्रकाश]। भेदानुपलक्षणाव = भेद समझ में न आना=यद्यमि प्रस्तुत और अप्स्तुत दो समान वस्तुओं का आकार सामान्य= [एक समान या अभिन्न] नहीं होने से पृथक्पृथक ज्ञान तो होता है तथापि इस म्ान में या तो किसी एक के विशेष का दोध नहीं हो पाता या फिर दोनों के विशेषों का: फलतः इस ज्ान से जो निश्चय होता है उसमें दोनों वस्तुएँ किसी एक रूप में हो विदित होती हैं, इस प्रकार इसमें दोनों वस्तुओं का भेद घट और पट के समान स्वरूपगतरूप से विद्ित नहीं होता फलतः जैसा प्रारम्मिक बोध होता ह वैसा ही अन्तिम निश्चय मी। उदाहरणार्थ जैसे राजगंज [कदाचित रायल मार्ेट Royal marbet ] आदि में जहाँ चाँदी और सीप के ढेर लगे रहते हों और दूर से दो दिखाई देने पर भी दनमें चाँदी का ढेर कौनसा है और सीप का ढेर कौनसा यह अन्तर पतीत नहीं होता। सीप और चाँदी पास पास रहती है। उनके वाकार अलग-अलग रहते हैं अतः उनका वोध अलग-मरूग होता है तथापि किसी एक की विशेषता का स्मरण न होने या दोनों की विशेपताओं का मान न होने से किसी व्यक्ति को दोनों का निश्चय एक ही रूप में होता है उसी प्रकार यहाँ [समुच्चय में ] समक्षना चाहिए। [राजगंज कदाचित रायळमार्केट है या राजा क्री मंढी, जहाँ चाँदी और छिपनियों के अलग-अलम ढेर लगे रहते होंगे। दूर से दो दिसाई देने पर भी उनमें, चाँदी का देर कौन है और सीप का कौन यह अन्तर प्रतीत नहीं होगा] इसके विपरीत मीलित में दोनों का ज्ञान सामान्यरूप से भी होता हो ऐसा नहीं है क्योंकि इसमें अधिक गुणवाला पदार्थ कम गुण वासे पदार्थ को छिपा देता है और [क्योंकि कम गुण वाले पदार्थ को अधिक गुण वाला पदार्थ दवा देता है। इसलिए कम गुण वाले पदार्थ के स्थान पर मी एकमान अधिक गुणवाले पदार्थ का हो मान होता है। इसीलिम इस [मीलित के उदाहरण 'अपाङतरले०'- पद्य] में नशे से उत्पन्न नेवचांचव्य आदि का प्ान एकदम नहीं होता क्योंकि वे [ नेतचान्जल्य आादि] नशे के पहले से उसी रूप में विद्यमान रहते हैं और उनसे धिक बलवान् स्वामानिक नेत्रवाज्जत्य आादि से वे दवा दिए गए हैं। इसके विरुद्ध सामान्य के-
सामने की हवा से नचाए गए अलकों तथा अवामन [बढ़े-वड़े] स्तनों वाली यह सुन्दरी- किचित हिल्ती अमराली से युक्त तथा स्तवकों से लदी लताओं से इस प्रकार अमेद को प्राप्त हो गई है कि र्पष्ट दिखाई नहीं पड़ रही है।' इत्यादि [उन] स्थलों में [जिनमें रत्नाकरकार ने मोलितालंकार माना है] निर्कुन के बोच स्थित स्त्रो का भिननरूप में निश्चय नहीं हो पा रहा है, इसमें कारण है साधारणतुणों का योग, यद्यपि पहले वही स्त्री अन्य स्थाम पर अपने असामान्य रूप में विदित होती है। इसीलिए 'त्पषट दिखाई नहीं पड़ती' यह कहा गया है। इस कारण सिद्धान्त यह तय हुआ कि 'आारम्म में स्वरूपतः पात पदार्थ का भी अन्त में मिन्न रूप में निश्चय न होना समान्य कहलाता है तथा मलनान् के द्वारा छिपा दिए जाने से आरम्म में मी स्वरूप का ज्ञान न होना मोलित'। इसीलिए कहा-'महाननयोविशेष := इनमें महान् अन्तर है। [रत्नाकरकार द्वारा शका उठाई गई हैं कि]उक क्रम से जब दोनों में समानगुणों का महत्व समानरूप से स्वीकार किया जा रहा है तब आगे [ सामान्यप्रकरण] कहे नाने वाले [मल्यजरस आदि] उदाहरणों में अमिसारिका आदि के समान ज्योत्सना [चादनी ] आदि का भी भेद कयों नहीं छिप जाता? इसका तो उत्तर दिया हो जा चुका है कि-'या तो यहाँ किसी एक की ही विशेषता का ज्ञान होता है
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या फिर दोनों की दी विशेषताओं का प्ान नहीं होता'। यदि पूछे-'ऐसा मी क्यों होता है।' [तो बतलाइय कि] यह[जो समानगुणत्वबोध है यह] विंनिष्ठ हे मातूनिष्ठ या सेयनिष्ठ। ह निश्िन ही शाटनिष्ठ है और इमलिए इयस्थिति जो मी हो, मदस्व व्वानस्थिति को ही दिया जाएगा, और पान यहाँ सा हो होता है जैसा हम बता आए है। यह विचार अमासंगिक हे, इसलिए इमने इस पर यहो कुछ नहीं कहा। वस्तुत. यहाँ [ सामान्य में ] केवल प्रस्तुन का हो अप्रस्तुन से भेद प्रतीत न होना विवसविन रहता है [अमस्तुत का प्रस्तुत से नहीं ] कयोंकि [केवल ] उस [ प्रस्तुव] के विषय में ही हुए अभेद बो के द्वारा यहाँ उस [अप्रस्तुत] का सादश्य प्रतिपादित करना अमीत होता है। [अतः अग्नाकरणिक ज्योतस्ना आदि का भेद छिपना, सामान्य में, आवश्यक नहीं] ऐसा मानने पर, अन्य का अन्यरूप से ज्ञान [आन्तिमान् में मी रहता है अनः उस] के आपार पर इसका आन्तिमान में भी अन्तर्मान नहीं माना जा सकता, क्योंकि उस [भ्रन्तिमान्] में प्रतीतिस्वरूप वस्तु के बच्छादन तक सौमित रहता है जब कि यहाँ [मीलिन में] वैसा सो दोता ही है, अन्य वस्तु का वृथक रूप से भी बोध होता है। अस्तु, रहने भी दिया बार अधिक विस्तार से कोई लाम नहीं। तिरोघाययरवाद=इत्यादि द्वारा यह बनलाते हैं कि इस [मीलित] की यह संशा केवल सथा हो नहीं है। [यह सार्थेक भी है ]। रस प्रकार पहले जी 'तदन्वर्यामिघानें मीळिनम्'= कहा या इसका अन्त तक निर्वाह कर दिया।' विमर्श-इविछास- मीकित की कर्पना पहले पहल रुद्रट ने की है। उन्होंने इसके सदजथमसूळक और आगन्तुकधमंमूएक दोनों भेद भी बनलाए है- तन्मीलितमिति यरिमिन् समानचिद्टेन हपकोपादि। अपरेण सिरस्क्रियते निश्येनागन्तुकेनापि ॥। ७।१०६।। वह अलकार मौल्त कहलाना है जिसमें किसी सहज या आगन्तुक समान चिह्ध के माध्यम से किमी अन्य पदार्थ के द्वारा एषं कौप आदि हिपा दिए जाते है। सदज धर्म- वियक्परेक्षणतरले सुस्निग्धे च स्वमाववस्तस्या: । अनुरागो नयनयुगे समपि केनोपल्दयेत ।। ७१०७।। उसके दोनों नेश्र विरछा देखते और चचन रदते हैं। उनमें स्नेह भी है। अतः उनमें अनुराग रहने पर भी उसे कौन जान सकता है। भागन्तुक क
कोपो मनस्व्रिनीना न लक्ष्यते कामिमि: प्रभवन्॥ 'मदिरा के मद से काल कपोल तथा नेत्र वाले मनस्विनियों के चेहरों पर कोप आता है पर कामियों को समझ में नहीं आाना।' यहाँ मदिरामद की लाली मागन्तुक लाती है। उसमे कोप की पाकी का छिपना पतिपादित है। म्मट म ने सुट्रट का ही बनुसरण इस प्रकार किया है- 'समेन उक्मणा वसतु वस्तुना यविगुद्धने। निजेनागन्तुना वापि तन्मीितमिति स्मृतम्। -
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भीलितालङ्कार: ६३१
ददहरण भी मम्मट ने स्ट्रट से मिलते जुलते दिए है। उन्हीं को सर्वरवकार ने भी उद्धृत कर लिया है। रस्नाकर- रत्नाकर भोलित और सामान्य को एक ही अलंकार के दो प्रकार मानते हैं, जैसा कि अमी अभी बतलया गया है। तदनुसार उर्होंने दोनों में अनुगत एक लक्षण मीलित नाम से ही इस प्रकार बनाया है- 'धर्मतान्याद् भेवाप्रतीतिमीलितम्।' -- 'धर्मगस समानता के कारण भेद की प्रतीति न होना मीलित कहलाता है। दिमशिन कार मे जित 'अभेदन्०' पद्य में सामान्यालंकार माना है, रत्नाकरकार ने मोलित के उदाहरण के रूप में यहों पद्य पहले उद्धून किया है। काव्यप्रकाशकार तथा सर्वत्वकार द्वारा उद्धृत 'मलयनरस' पद्य में सामान्यालंकार तथा 'अपासतरले' पद एवं 'ये कन्दरासु०' पद्म में मीलितालंकार को पृथक कल्पना पूर्वपक्ष के रूप में रत्नाकरकार ने भी प्रस्तुत की है किन्तु उन्होंने उपर्बुक तकों द्वारा इस पार्थक्य का निराकरण मी कर दिया है। अप्वचदीछ्षित-'मौलितं यदि सादश्याद् भेद एव न लक्यते। उदाय-'रसो नालक्षि लाक्षायाश्चरणे सहजारुगे॥' सादृस्य के कारण यदि भेद ही न दिखाई दे तो मोलित नामक अरंकार होगा। इदा यथा-सहज अरुण चरण में लाक्षा का रस दिसाई नहीं दिया।' पण्डितराज='स्फुटमुपलम्यमानत्य कत्यचिद् वस्तुनो िहगरतिसाम्याद मिन्नत्वेनागृह्यमाणं वसवन्तर लिद्गारना र्वकारणाननुमापकर्त्वं भीलितम्। भेदाग्रहेण लिद्वानां लिहे: म्रत्वक्षवस्तुनः। मपकाशो सनध्यक्षस्तुनस्तननिमीलितम् ॥' 'स्प् रूप से समझ पड़ रही किसी वस्तु के चिह्ों के साथ अत्यन्त सादृश्य के कारण, अन्य वस्तु के चिहहों का भिन्न रूप से गृहीत न होकर अपनी आधार भूत अन्य वस्तु का अनुमान न करा पाना मीलिति कदलाता है।' प्रत्यक्ष वस्तु के चिह्नों के साथ अपने चिह्नों का भैद मृहीत न होने के कारण अप्रत्यक्ष वस्तु का जो अज्ञान वही मीलित है। इन लक्षणों के विशेषणों का प्रयोजन बतलाते हुए स्वयं पण्डितराज ने कहा है 'अनध्यक्षी वस्तुनः = अप्रत्यक्षवस्तु' अर्थाद वत्तुन: = अप्रत्थक्षता। इसका उद्देश्य सामान्य का निवारण है। सामान्य में दोनों ही वस्तुओं का प्रत्यक्ष होता रहता है। चिह्गत सहजस्व और आगन्तुकत्व को पण्डितराज ने लक्षण में तो स्थान नहीं दिया किन्तु इनहें उन्होंने उदाहरणों में अवश्य ही अपना लिया है। 'अपाङ्गतरहै' तथा 'ये कन्दरासु0' की अमिव्यत्तियों द्वारा पण्टितराज के उदाहरणों की अभिव्यक्ति गतार्थ है। विश्वेश्वर-'सहनिमित्तजवर्मात सवश्ादन्वेन वस्तुना वस्तु। सषपिधीयन यदेतन्मीलित माहु निशेपजाः॥ संजीदिनीकार-नकवर्त्ती की मीलितकारिका- 'निजेनागन्तुना वापि लक्षणेनान्यगोपनम्। निमीलिताख्यालद्वारी दिप्रकार: प्रकाश्वितः॥ पाठान्तर विम्शिनी की कुछ पंकियाँ निर्ण्यसागर संस्करण में इमारी दृष्टि से अशुद्ध छपी हूँ। प्रमुख स्थल यथा-
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[१ ] 'घटपटवद्मेदेन०' [पृ० ६२८५० १२] वे स्यानपर घटपटवद मेदो न । रर्नाकर के पूना संस्करण में कपर उद्धत सम्रदकारिका का प्रथम पद भी 'मेदेन' के स्थान पर 'मेदोन'-इमी प्रकार रपा है।
[२] 'सननिकर्षेणासामान्य०' [प० ६२८ प० १४] के स्थान पर 'सन्निकर्षेण सामान्य' तथा [३] 'उमयावगमो न" [इ० ६२८ प० १६] के स्थान पर 'उमयावगमो' मात्र छपा है। [x]'पृमण्देशावष्म्भेनासामा०' [पृ० ६२८ प०]के स्थान पर 'यृपग्ेद्यायष्टम्भेन सामा०। [५] 'यव समानगुग'[पू० ६२८ प० २७] के स्थान पर 'यत सुमनोगुण। मूल में मो 'अपगनरले०' पद् का पाठ काष्यप्रकाश तपा रत्नाकर में आए इसी पछ के पाठ मे मिन्न है। उनमें नहाँ 'अगके' ह वहं निर्गय० प्रतति में 'महकै.' ह और उननें जहीं सदत् है वहो निणय प्रति में यदत्र। अ्थस्षगति की दृष्टि से काव्यप्रकाश और रत्नाकर का दी पाठ अधिक उपयुक्त है। कु० जानकी की म्रति में अहके तो अहके ही छापा गया है किन्तु यदत तद्षय नहां। इमी प्रकार श० दिवेदो को प्रति में यदत के स्थान पर तदत तो छापा गया है किन्तु 'अबकै.' के स्थान पर 'अहयो' नहीं। मीदित औौर सामान्य के भेद पर कुछ विचार सो मीक्सि के ही इस प्रकरण में दो गया है कुछ मागे आारहे सामान्य के प्रकरण में होगा। भोज ने आगामी सामान्य को पिहित कहा है और उमे तथा तद्गुण एव अवद्गुण को मीलिव के ही प्रकार के रूप में स्वीकार किया है [ द्र० स० कण्ठा० ३।४१ ] [सर्वस्व्र ] [सू० ७२] प्रस्तुतस्यान्येन गुणसाम्यादकात्म्यं सामान्यम्। यत्र प्रस्तुतस्य वस्तुनोऽप्रस्तुतेन साधारणगुणयोगादेकात्म्यं भेदानध्य- वसायादेकरूपत्वं नियध्यते तत्समानगृणयोगात्सामान्यम्।न चेयमपहुतिः। किंचिननिपिध्य कस्यचिद पतिप्वापनाद्। यथा- 'मलयजरसविलिप्ततनवो नवह्ारलताविभूपिताः सिततरदम्तपत्त्ककृतवनत्ररूची रुचिरामलांशुकाः। रशभृति विततघाम्नि धवलयति धरामविभाव्यतां गना मियवसवि प्रयान्ति सुसमेव निरस्तमियोऽभिसारिका ॥' अन्र मलयजरसचिलेपनादीनां चन्द्रग्रमया सद्द 'अविभाष्यतां गता।' इत्यभेदप्रतीतिर्दर्शिता। [सू० ७२] गुणगत साम्य के आधार पर प्रस्तुन की तदिस् [अप्रस्तुत] के साथ एकरूपता सामान्य [नामक अलकार कहलाता है]॥ [सृ०]बिस [अल्कार] में प्रस्तुत वस्तु की अभस्तुन वस्तु के साथ सापारणगुणों के आधार पर ऐेकात्मना अर्थाद भेद की प्रनीति न होने से एकरूपता बतलाई जाती है वह समान गुणों के संबन्ध के कारण सामान्य कहलाना है। यह थपहुति नहीं है, क्योंकि [यक] किसी का निषेध कर किसी का प्रतिष्ठापन नहीं रहवा। उदावरण, यथा-
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सामान्यलक्कारा ६३३
सफेर चन्दन के रस [घिसे हुए सफेद चन्दन] से विलिस् शरीर वाली, नवीन मौकिकमाला पहने हुई, खूय सफेद हाथी दाँत की पशवली से मुख की उज्जल कान्ति बढ़ाए हुई और सुन्दर धवल अंशुक पहने हुर्ई [शुक्ल ] अभिसारिकाएँ, इस समय सूझ नहीं पड़ती जिस समय चन्द्रमा अपनी किरणें विसेर कर धरापृष्ठ की सफेदी से रंगता है, और वे प्रिय गृह तक निर्मीक होकर सुख पूर्वक पहुँच जाया करती हैं।' यहाँ चन्दनरस के विलेपन आदि के चन्द्रप्रभा के साथ अमेद का ज्ञान 'सूझ नहीं पढ़ती' इस प्रकार वतलाया गया है।।।
विमर्शिनी प्रस्तुतस्वेत्यादि। प्रस्तुतश्येति उपमेयस्य। अप्रव्तुतेनेति उपमानेन। साधारणगुणाना च
'मध्ये जानपदखतेण मुखानाममलदिवपाम। राधोरलचय तामेति यम्र पूर्णेन्दुमण्डरम्।।'
अत्र रतव कस्तनयो्विग्वप्रतिविम्वभावः। लुलितत्वनर्तितत्वयोः शुद्ध सामान्यरूपावम्। नतु चान प्रहतुतस्याप्रस्तुतेनापहव: क्रियत इति किमयमपरनतिरेव न भवतीत्याश कपाह-न चेयमित्यादि। 'अविभाव्यतां गताः' इति, अर्थादुक्े:॥ प्रस्तुवस्य इत्यादि । प्रस्तुतस्य = प्रस्तुत = उपमेय। अपस्तुतेन = अप्रस्तुत=उपमान । साधारगगुणों की तरिरुपता यहाँ स्वतः सिद्ध है। साधारण गुणों की अनुगामिता का उदाहरण यह हे- 'गाँवों की महिलाओं के निर्मल कान्ति वाले सुखों के बीच चन्द्र का पूर्ण मण्डल जहाँ राहु को दिखाई नहीं पढ़ता।' यहाँ 'निर्मळकान्तित्व' धर्म उभयानुगत रूप से एक बार कहा गया। मलग-अरग कथन का उदाहरण वथा-[पूर्वोक्त] 'अभेदमूढ०' पद्य। इसमें स्तवक और स्तनों में विन्वप्रतिविम्वमाव है तथा सुल्तित्व और नतितत्व में शुद्धसामान्यधर्मत्। [झंका] यदि यहाँ प्रस्तुत को अपस्तुत के द्वारा छिपाया जाता है तो इसे अपहुति अलंकार ही क्यों न मान लिया जाता 'ऐसी शंका बठाकर कहते है-न च इत्यादि। 'अविभाष्यता गताः'-सूझ नहीं पढ़ती=अर्थात इस प्रकार अभेद का ज्ञान शब्द से ही करा दिया गया है। विमर्श-इतिहास- इस अलंकार को सामान्य नाम तो मम्मट की देन है किन्तु यह अलंकार अपने आप में कक्पना है रुद्रट की । रुद्रट ने इसे तद्गुण का एक भेद माना है। उनका एत्त्संबन्धी विवेचन इस प्रकार है- 'यस्मित्नेकगुणानामर्यानां योगलक्ष्यरूपाणाम्। संसर्गे नानातवं न लक्ष्यते तद्गुण: से इति ॥९।२२॥ नहाँ दक ही गुण वाले पदार्थों का संबन्ध होने पर स्वरूप तो दिखाई दे, पर उनका पार्थक्य प्रतीत न हो तो वह तदशुण कहलाता है। उदाहरण- 'नवभौतधवलवसनाश्चन्द्रिकया सान्त्रया तिरोगमितम:। रमणभवनान्यशक् सर्पन्त्य मिसारिका: सपदि॥ १२३॥
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६३४ 'नवीन धुने धवम वस्त्र पहिने और सान्द्र चाँदनी में छिपी अमिसारिकाऐं निदंक होकर अपने प्रिय के घर झटिनि पहुँच जाती है।' निश्ित हो स्द्रट को वामन दवारा अतिशयोक्ति के लिए उद्धून पद 'मल्यजरम०' से यह नद्गुग सूक्षा होगा। मम्मट ने रद्रट के उदाहरण से उमका मूलभून पद् 'मवयव0' ता सोज निकान किन्तु उससे सूझे अलंकार को तद्गुग से अभिन्न मानना उचिन नहीं समझा। उन्होंने रुद्ूद के ही मोहितालकार की ककपना से मिलनी जुलनी सामान्य का कच्पना की और उसका स्वनन्त्र लक्षा बनाया। विमर्शिनीकार ने मोख्षित प्करण के आरम्भ में समे उद्भूत कर दिया है। किन्तु रुद्रट जेसी सूझमेकिका उनके लक्षग से प्रकट नहीं होती। रुद्ट का यह कहना एक सूक्ष्म मनोवैद्ञानिक सत्य है कि यदां वस्तु स्वरूप तो प्रनीन होता है, वस्तुगत नानाल नहीं। कदावित् विमर्शिनीकार को इसौसे प्रेरणा मिठे है और उन्होंने रश्नाकरकार के सण्डन में कुछ ऐसी ही तंपणालो अरनाई है। मवस्वकार का विवेचन मम्मट की सामान्यकारिका पर प्राप्त वृत्ति से काफो प्रमावित है। मम्मट ने पृति में रिसा हे- 'अताहृसमपि तादशनया विवश्वितु यत अप्रस्तुतार्येन सपक्तमपरित्यकनिजगुणमेव तदेकातम- तया निवध्य तव सामान्यपुरनिबन्बनात् सामान्यम्। -जो प्रस्तुत वस्तु जिसके समान नहीं है उमे उसके समान बनलाने के लिए अप्नस्तुत वस्तु के साथ उसका अपना स्वरूप बिना छुडाम एकरूप बनलाया जाता है वह सामान्य गुगों का उलनेख होने के कारण मामान्य कदलाता है। यहाँ अपरित्यक निजस्वरूप - अपना स्वरूप विना ' छोंट' पद मौलिन से सामान्य का अन्नर करने के लिए हो दिया गया है। मीकित में वा्तु का स्वरूप मो निरोहित हो जाता है। उदाहरण के रूप में 'मलयजरसविलिस०' पद हो मम्मट ने दिया था। रत्नाकरकार का दृष्टिकोण इस विषय में स्पष्ट ही है। वे इमे मोलिन की ही एक विश मानते है। मोलिमप्रकरण में उनका मत दिया जा चुका है। अप्पयदीष्षित = 'सामान्य यदि सादश्यान् विशेषो नोपवदष्यने। पझ्माकरपविष्ठारना मुख नाउधि सम्रुवाम्।। साृश्य के कारण गदि भेद दृष्टिगोबर न हो तो सामान्य। उदा कमनसमूद से मरे तालाद में प्रविष्ट मन्दरियों के सुख दिखाई नहीं पड़े।'
सामान्यम्।' प्रत्यक्ष दिखाई देती वस्तु का वध्वत्तर सज्ञातीय के भान के कारण उससे मिन्न रूप से ज्ञान न होना सामान्य कहलाता है।' विश्वेश्वर= सगुणमजातीय गुणाभरयकरूप्य तु सामान्यम्। अपने गुणो के समान गुण वाले के साथ मकरूपता सामान्य कहलाती है। मोलिन और सामान्य का अन्तर सुख्यन प्रस्तुन के स्वरूप के बोध पर निर्मर है। मीलित में वह अप्नस्तुन के स्वरूत के रूप में ही मासिन होना है जब कि सामान्य में स्वस्वरूप में ही। मीन्त में प्रस्दुन के स्वरूप का वोध न होने का मिप्राथ विमर्सिनीकार के अनुसार प्रस्तुन के विशिष्ट रूप का बोध न होना है। सामान्य रूप में तो उसके स्वरूप का बोध होता ही है। सुद्रट के विवेचन से यह तथ्य बदुत ही स्पष्ट है। रानाकरकार, अन्पयदीक्षित, पण्डितराज और वश्वेश्वर पण्टित के लम्बे लम्बे विमशों का तात्पये वेवळ इखना ही है।
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तद्गुणालङ्कार: ६३५
यहाँ चक्रवर्तती की सामान्यकारिका इस प्रकार है- 'प्रस्तुतस्यान्यतादात्म्यं सामान्यं गुणसान्यतः। गुणसाम्य के आधार पर प्रस्तुत का अप्रस्तुततादातम्य सामान्य कहलाता है। [सर्वस्व]
यत्र परिमितगुणस्य वस्तुनः समीपवतिमरुष्ठवस्तुमुणस्य स्वीकरणं स तद्गुण:। तस्योस्कृष्टगुणस्य गुणा अस्मिन्निति कृत्वा। न चेदं मीलितम्। तन्न द्ि प्रकतं वस्तु वस्त्वम्तरेणच्छादितत्वेन प्रतीयते। इद् त्वनपह्तस्वरूप मेव प्रकतं वस्तु वस्त्वन्तरगुणोपरक्ततया प्रतीयत इत्यस्त्यनयोर्भेद्:। यथा- 'विभिन्नवर्णा गरुडाग्रजेन सूर्यस्य रथ्या: परितः स्फुरन्त्या। रत्नैः पुनर्यत्र रुचा रुचं स्वामानिन्यिरे वंशकरीरनीलै:।' अन्र रविरधाश्वानामस्णवर्णस्वीकार, तस्यापि गावत्मतमणिप्रभा- स्वीकार इति तद्गुगत्वम्। [सूत् ७३] अपने गुण के स्याग से अत्युकृष्ट वस्तु के गुण का स्वीकार तद्गुण [ नामक अलंकार कहलाता है]। [दृ०] 'जिस [अलंकार] में न्यून गुण वाली वस्तु समीपस्थ उत्कृष्ट गुण वाली वस्तु के गुण अपनार वद्द तद्युग कहलाता है, 'तद् यानी उस उत्कृष्ट के गुण हैं इसमें'-इस व्युतपसि के आधार पर। यह मीलित नहीं है। वहाँ प्रकृत वस्तु अन्य =अप्रकृत वस्तु के द्वारा ढंकी हुर प्रतीत होती है, यहाँ उसके विपरीत प्रकृत का स्वरूप प्रकट ही रहता है। केवल वह अन्य वस्तु के गुणों से रँगी भर प्रतीत होती है। इस प्रकार इन दोनों में महान् भेद है। उदाहरण, यथा- 'जिस [गिरनार पर्वंत] पर अरुग की ल्लोई से अन्य वर्ण के हुए सर्याश्ब वाँस की पौर के समान दरे कच्च रत्नों द्वारा चारों ओर विखरती प्रमा से पुनः अपने [हरे] वर्ण को प्राप्त करा दिए गए थे [ माधकाव्य ]। यहाँ सूर्य के अश्व पहले अरुण का वर्ण त्वीकार करते हैं और वह [अरुण ] भी गारुत्मत [मरकव ] मणि की प्रमा स्व्रीकार करता है। इसलिए यहाँ तद्गुण हुआ।' चिमर्शिनी स्वगुणेत्यादि। परिमितेति। र्वीकिय माणस्य गुणत्याभावात्। तत्संभवादेव चात्यरय प्रकृष्टगुणत्वम्। समीपवर्तीत्यनेन सुणग्रहणे योग्यत्वमुक्तम्। अस्मिन्निति। परिमितगुणे प्रकृते। अवश्र नैतासंक्षामान्नमू। ननु च प्रकषमुणेन परिमितपुणस्य तिरोधानान्मीलित मेवायं कि न भवतीव्याशङ्कयाह-न चेत्यादि। वच्छादितत्वेनेति। अपह्तिस्वरूपव्वे नेत्यथः । उपरक्तवयेति। विशिष्ट्वेनेत्यर्थः। तस्वेति। अरणवर्णस्य। अपि: समुच्चये। यथा वा-
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वपुथ शग्गारमय स मन्ये संतापकर्वं दरयद्दियोगात्।।' अत्त दरवद्िमुणस्य संतापकरवरय रतरीकारः । रयुग हत्यादि। परिमित-बिस गुम को अरनाया जा रहा है उमका अपनाने वाली वरतु में अमार होने से। और उसी के रद्भाव से अन्य वस्तु मी प्रकृटट गुणवाली हुई। समीप बर्सी करकर गुग अपनाने की योग्यता बनलाई। अरिमन्= १समें = परिमित - न्यून गुग वासी वस्तु में। इम कारण यह केवल सदामान नहीं है। प्रवृष्ट गुनवाकी वस्तु से न्यून गुण वाली वस्तु का तिरोधान होने से यह मीलित हो कयों नहीं माना जाना-[ जैसा कि सरखवती षण्ठामरण में महाराज मोज ने माना है] ऐसी चका उठाकर कहते है-न घ हतयादि। आच्छादितरवेन आक्छादितरूप से जो कि अपदुति का स्वरूप है। उपरतया= रगे हुए रूप में= उससे विश्िष्ट रूप में। तस्य उसका = अरुग का। अपिमो यहाँ समुच्चय अर्थ में है। दूसरा उदाहरण यह है- दे काम। चन्द्रोदय, चन्दन, चन्द्रमुसी, रेश्र शयादि तुमारी सहायक सामभी है और तुम्हारा स्वयं का शरौर शंगारमय हे। ऐसे तुम जो स्ताप पहुँचाते हो वह कदाचित शिव की नेत्राग्नि के संपर्क से "[ रस्नारर्कार द्वारा तद्युण के लिए उद्पृम ]।। दहो शिवनेत्राग्नि का संताप कत्वरूपी गुण अपनाया गया।। विमर्श-इतिहास- पहले कदा जा चुका है कि तद्गुग के मथममेर के रूप में स्ह्ट ने जिस अमिभ्यक्ति का ममइ किया था उसे मम्मट ने सामान्य नाम दिया है। सुटूट ने तद्गुण का जो दूसरा भेद खोजा या उसे मम्मट भादि ने तदगुग नाम से दी अपनाया। दूमरा भैद यद है- 'असमानगुण पस्मिन्ननिबहलसुणेन वस्तुना वस्तु। संसष्ट तद्गुणतां धर्तेन्यसतद्गुण स हति॥'९२४॥ -जिस [अलंकार] में असमान गुण वाली वस्तु अधिकगुण वाली वस्तु से मिळकर उसी का गाण अपना ले वह दूसरा तद्गुण कहलाता है। उदाहरण- 'कुग्जकमा लापि कृता कार्तस्वरभास्वरे त्या फण्ठे। एतसपमानुलिता चम्पकदामभ्रम कुरुते।। ९।२५। -प्रिये। तूने सोने से चमकौले गले में नो माला पहनी है वह कुब्जक माका होने पर भी टस [गले] की प्रमा से छिप छोकर चम्पक माला का भरम करा रहो है। नदाहरण से स्पष्ट है कि रुद्रट का तद्गुणसम्वन्धी सरकार बहुत ही रपष्ट औौर पूर्ण है। मश्मट='समुत्सज्य गुण योगादरयुज्जलगुणस्य पद। वस्तु सद्गुणतामेति मण्यते स तु तद्गुण। अधिक उज्जवल गुग वाले पदार्थ के संपर्क से जहाँ कोई वम्तु अपना गुण छोडकर उसी के गुण से सुक्त हो जानी है उमे तदगुण कहते हैं। उदाहरण-'विभिन्नवर्णा:' पद्य ही। इस उदाहरण में गुर्गे के स्याग और परिग्रह की घटना दो बार आई है जब कि रुटट के उदाइरण में केवल एक वार। किन्तु रुद्रट के पद्य में शुद्ध तद्गुण है। भग्मट द्वारा उद्धृन पध में गिरिनार की ऊँचाई अतिशयोकि हिए है। सवस्वकार का इस पद की सगति में रत्नों को गावत्मतमणि के समान मतलाना असगत है। गारुस्मत मणि का वर्ण लाल माना जाता है, हरा नहीं। बाँस की पौर भौर सूर्य के अश्व दरे रग के किए ही प्रसिद्ध है। सूर्य को इरिदश्व, हर्थेश् कडा जाता है। भले ही
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अतद्गुणालद्गार: ६३७
यहाँ हरे का अर्थ नीता हो जैसा कि संस्कृत कवियों में देखा जाता है, परन्तु लाल नहीं हो सकता। संजीविनीकार ने भी गारुत्मत के स्थान पर मरकत पाठ माना है। रस्नाकरकार ने न केवरू रंग के दो, अन्य गुणों के सर्वस्वकार में मी तद्गुण माना है। यह उनकी व्यापक दृष्टि का प्रमाण है। उनका लक्षण है- 'अन्यधर्मस्व्रीकारस्तद्मुणः ॥९७॥ अन्य के धर्म का स्वीकार करना तद्गुण ।' उनने स्पष्ट किया है कि यह तमी संमव है जब अपने गुण का त्याग किया जाए, अन्यथा दोनों के विरोधी गुणों में विरोध उत्पन्न होगा। इस प्रकार स्वगुणत्याग को लक्षण में स्थान न देने से मी रत्नाकरकार का वदस्व्य व्यक्त है। उदाहरण के रूप में उन्होंने 'विभिन्नवर्गः' से हो मिलता माव का ही ४२६ पद्य भी उद्भृत किया है यदपि उसमें पदार्थनिदर्शना मवल है, और निमशिनी में गृद्दोत 'इन्दूदय' पद्य भी। अध्पयवीचित 'तद्गुणः स्वमुणत्यागादन्यदीयगुणग्यः । पझरागायते नासामौकिक तेडधरत्विपा ॥' अपने गुण का त्याग कर अन्य के गुण का ग्रहण तद्गुण कहलाता है। यया-दुम्हारे मघर की कान्ति से नाक का मोती पद्मराग का कार्य कर रह्दा है। पण्डितराज= 'स्वगुणत्यागपूर्वकं स्वसन्निष्ि्ितवत्न्तरसम्वन्धिगुणग्रह्णं तद्मुण:।।' अपना गुण त्याग कर अपने पास के किसी अन्य पदार्थ के गुभो का ग्रहण तद्गुण कह- है' लाता है। विश्वेश्वर= 'परकीयगुणतिरोहितिगुगस्य मानं हु तद्गुणः प्रोक।। अन्य के गुणों से छिपे गुणों वाले पदार्थ का व्वान तद्गुण कहा गया है। उदाहरण के रूप में एक रंग से दूसरे रंग के रंजित होने की घटना से युकत पद्य तो विश्वेश्वर ने दिया हो है, इसके अतिरिक रत्नाकरकार द्वारा अन्यगुणों के ग्रहण करने का उदाहरण भी उन्होंने दिया है। चक्रवरतीं की निष्कष्टार्थकारिका यह है- -'तद्गुणः स्वगुण त्यागादुत्कृष्टस्य गुणग्रह्ः ।' [ सर्वस्व ] [सू० ७४ ] सति हेतौ तद्गुणाननुहारोऽतद्गुणः। तद् गुणप्रस्तावात्तद्विपर्यंयरूपोऽतद्गुण उच्यते। इद न्यूनगुणस्य विशि- प्रशुणपदार्थधमँस्वीकार: प्रत्यासत्या न्याय्यः। यदा पुनरुत्कृष्टणुणपदार्थ- सन्निधानाज्ये हेतों सत्यपि तद्रपस्योतकष्टगुणस्याननुद्दरणं न्यूनगुणेनानतुवर्तनं भवति सोऽतद्गुणः। तस्योत्कृष्टणुणस्यास्मिम्गुणा न सन्तीति । यद्वा तस्यापकृतस्य रूपाननुहार: सत्यतुहरणहेतौ सोडतद्गुणः। तस्यापकृतस्य गुणा नास्मिन सन्तीति कृत्वा । क्रमेण यथा - 'धवलो सि जह वि सुन्दर तह वि तुप मज्झ रंजिअं हि अक्षं। राअभरिए वि हियए सुद्दभ णिहित्ती ण रतो सि।।' 'गाङ्मम्तु सितमम्यु यामुनं कज्जलाभमुभयन मल्जतः । राजहंस तव सैप शुभ्ता चीयते न च न चापरीयते।.'
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६३८ अलङ्टारसवस्वम् पूर्वत्रातिरक्तष्टदयसंपर्काल्तायकम्य घवलशब्दवाच्यस्य प्राप्तमपि रक्तत्वं न निष्यन्नमित्यतद्शुणः। उत्तरघाप्नकतस्य गान्यामुनजलस्य संपर्केपि न तथारूपन्वमित्ययमप्यतद्गुण पव। [ 'घवलोऽसी'ति यत् तत् तद्गुण पव-] कार्यकारणभावम्य चाश्राविवक्षणान् विशेषोक्त्यलंकारावकाशः। [सू० ७४] कारण विदयमान रहने पर भी उसके गुग का अनुकरण न होना [अतद् गुण [भलंकार कहळाता है]। [कृ०] तदकुण का प्रमंग चल रहा था अतः नसका उछटा अतद्गुण समी के बाद बवलाया जा रहा है। सामान्यत कम गुभ वाले पदार्थ के द्वारा वििष्ट गुण वाले पदार्थे का संपर्क होने पर उसके धर्म अपनार ही जाते हैं, किन्तु जब उत्कृष्ट गुण वाने पदार्थ के सन्निधानरूपी देतु के रहने पर भी उम[ हेतुरूप उत्कृष्ट गुग वाले पदार्थ] के उस्कृष्ट गुणो का न्यून गुण वाले पदार्थ के द्वारा अनुकरण नहीं किया जाना तब उससे युक उक्ति को अतद्गुण कहा जाता है। यह नाम इसलिए कि इसमें यह व्युत्पत्ति अन्वित होती है-'तत उम= व्रत्वृष्ट गुग वाले पदार्थ के गुण इस [ न्यूनगुण पदार्थ ] में नहीं है।' इसकी दूमरी व्याख्या यह हो सकती है-'उस अप्रकन वस्तु के रूा का अनुकरणहेतु विदमान रहने पर मी अननुकरण जिसनें दो वह [परवृत पदायं] अतद्गुण।' इम पक्ष में गुश्पचि होगी 'तव=उस अप्रकन वस्तु के गुण इममें नहीं हैं [ ऐसी प्रकृत वम्तु]। दोनों के कमश उदादरण= धवलोपि यदपि सुन्दर तथापि त्वया मम रजित दृदयम्। रागमरितेऽपि इदये झुमग निदितो न रवोडसि। हे सुन्दर ! तुम धवल वर्ग के हो तथापि तुमने मेरा हृदय रकत [काल और अनुरागयुक्त] कर दिया है। तुम स्वय मेरे रागपूर्ण हृदय में निदित हो तब भी रक्त नहीं हो।' हेन्निवेगी के राजहस। गझ्ा का बल सफेद हैं यमुना कब्जलाम श्याम! तुम दोनों में गोता लगाते हो, परन्तु तुम्दारी सुभना नदी की वही है, न वद बढनी न घटती।" [ इन वदाहरणों में ] प्रथम में अत्यन्त रकत हृदय के संपको से घवल्यब्द से कमिन नायक में रकता आनी चाहिए परन्तु वह न आ सकी अन अनद्गुण हुआ और दूमरे में गगा यमुना में जल रूपी अमाकरणिक पदार्थ के सँपर्क रहने पर भी उनका सा रूप [ इस में] नहीं दवलाया गया अन. यह मौ अतद्गुण ही दुआ। 'धबचोडसि'-यह जो कथन है वह तद्गुण- रूप ही है। यहाँ कार्यकारणभाव वी विवशा नहीं रहनी अव- विशेषोकि [और विपमाषकार-] की प्राप्ति यहाँ समन नहीं है।।' चिमर्शिनी सतीत्यादि। तदविपिरययेति। तत्र दि प्रश्यामत्यान्यगुणप्रइ्णमुककम्। इह तु योग्यताया- पि न यद्गरहणम्। प्रत्यामत्त्यैति। विम्रकृष्टस्य हन्यगुणरवीकारातुपपत्ति। यशा वेतस भजति तदायमलंकार हत्याह-यदेत्यादि। उरकृश्गुणस्येोयनेन व्याक्यान्तरे द्वयोरवि गुणतवं सूचितम। एवं प्राप्तेऽप्यन्यगुपस्वीकारे तद्मावोऽयमलंकर।। यदुत्तम्- 'तन्नृपाननुदारव्वेदरय तत्सयादृतद्गुण'इति। अरिमिन्निति। =यूनगुणे। यद्वैति पम्मान्तरे। अप्रकृनस्येति। अननुहरणीयगुणस्यान्याय। तहेतं व्याच्यानद्वयेनास्य प्रकारशयं दर्द्षितम्, अननुहृरणाव्यश्य सामान्यस्यानुगमाद। अतिरिकनेनायुरकृष्टणुमध्वं हृदयस्य दर्शितम्।
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अथमपीति। समानगुणत्वेनापीर्यर्थः। 'धवलोसीत तत्तद्शुण' एवेति ग्रन्थकदेशातु कचि- ल्लेखके कलिपित हृतयुपेष्य एव पुस्तकान्तरेप्वत्याहऐ।। न व गाथाव्याख्यानं प्रस्तुतं येनान्नासंकारान्तरसयापि व्यासयानं स्वाद। नाप्यत्र तद्यूगः। तत्य हि स्वगुणत्यागे
घवतत्वध्यमित्रारा। कि तवत काहमाभावेि कार्मोोपाद नादिनावना, न तुविरूप कार्योरनत्या विषमालकारः। सत्र दि कार्यकारणयोविंरुपत्वेयवाध्यमानतया मतीति:। इह स्वेकस्य वाध्यमाननयेति महाननयोर्भेदः। नन्वत्र सत्यषि कारणसामग्रचेशल्यतुग नुदाहर गरुपश्य कार्यस्यानुत्पत्ते: किमयं विशेषोकिरेव न मवती व्याशहयाह-कार्यरयादि। अविवक्षगादिति। वस्तुतत्त संभवत्वेष कार्यकारणभावः। अ्षत एवालंकारसारकृता विशे पोकयन्तर्माव एवोका। अ्रन्धहता तु माच्यासुरोधाल्लव्षितः। 'विषमालंकार-' इति पाठस्तु पुस्तकान्तरेषु स्थितोऽ्यत्रायुकक। न हि कार्यकारणभावचित्रपामान्नेगान् तरवं स्याद्येन सव्विवेघेन तस्यानवकाशः। तस्य हि विरूपस्य कार्यस्थानर्थश्योस्पततिक्व लक्षणमु।
सतीत्यादि। तहटपर्यंयेति-उस तद्गुण का सलटा=उसमें सन्निष्य के कारण अन्य के गुण का ग्रहण बनलाया गया है, जब कि यहाँ योग्यता रह्षने पर भी उसके [ अन्य के] गुण का ग्हण नहीं मतलाया जाता। प्रत्यास्या=सनिधि=जो दूरवर्ती होगा उसके गुण का ग्रहण संभव नहीं होगा। 'जब यह [ अन्य के गुण का ग्रहण ] नहीं होना तव यह अलंकार होता है यह वतलाते ई-यदा०। उत्टृष्गुणस्य इसकी दूसरी व्याख्या में दोनों का गुणत्व [अप्रधानत्व और केवल गुणों का प्रधानत्व] वतलाया। इस प्रकार अन्य के गुण का स्वीकार करना प्राम होने पर मी वैसा न होना यह अलंकार है। जैसा कि [ मम्मट ने ] कहा है-'रस [प्रस्तुत] के द्वारा उस [अप्रस्तुत] के गुण का अनुकरण न हो तो अतद्गुण'। नस्मिन्=इसमें अर्थात् न्यूनगुणवाले पदार्थ में। यह्ा = यह अन्य पक्ष उपस्थित करने के किये कहा। कप्रकतस्य= जिसके गुणों का अनुकरण नहीं करना होता उस अन्य वस्तु का। इस प्रकार दो व्याख्यानों द्वारा इस अलंकार के दो भेद दिसलाएं। इन दोनों में अननुहरणोयतारूपी गुण समानरूप से रहता है। अतिरिक वतलाकर हृदय में उत्कूप्टर गत्व वतलाया। अयमपि=यह भी मुणगत समानता के आघर पर मी। 'धत्रलोडसि यह मी तद्गुण ही है' यह जो अंश है इसे लिभिकारों ने कहीं-कड़ीं जीड़ दिया है, यह सर्वथा त्वाज्य है, कर्योंकि अन्य प्रतियों में यह नहीं मिरता। यहाँ इस गाया की व्याख्या तो की जा नहीं रही कि उसमें अन्य अलंकार भी व्याख्या की जाए। फिर यहाँ तद्गुण है ी नहीं। उसका तो लक्षण 'अपना गुण स्याग कर अन्य के गुण को अपनाना है। और यहाँ न तो अपने गुण का त्याग है और न अन्य के गुण का अपनाना। ऐसा होता तो नायक में धवलस न रहता। यहाँ तो कारण का अभाव रहने पर भी कार्य की उत्पत्ति दिखलाने से विभावना है, न कि विपरीत रूप वाले कार्य की उत्पत्ति [धनल से रात्व की उत्पन्ति ] के कारण विषमालंकार। उसनें तो कार्य और कारण में रूपगत विपरीतता रहने पर भी उन दोनों की प्रतीति सवाधित रूप से ही होती रहती है। जनकि यहाँ एक वाधित रूप से प्रतीत होता है। इस प्रकार इन दोनों [विषम और विमावना ] में महान् गन्तर है। 'यदि यहाँ सारे कारण उपस्थित रहने पर भी अन्य के गुण का अनुकरणरूपी कार्य उत्पन्न नहीं होता तो इसे विशेषोक्ति क्यों नहीं मान लिया जाता' ऐसी शंका उठाकर कहते हैं-'कार्य'-इत्यादि। अविव वरणात् = निवक्षा मर नहीं रहती, वस्तृतः तो कार्यकारणभाव रहता ही है। इसीलिए अलंकारसारकार ने इसका विशेपोकति में अन्वर्भाँव दो दिखलाया है। ग्रन्थकार ने प्राचीन
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६४० अलङ्कारसवेस्वम्
आटकारिकों [मम्मट] के अनुरोध पर इमे अलग दिखलाया है। [विशेषोकत्यल्रकार' के स्थान पर]'रिपमालक्गर' यह पाठ तो, अन्य पुस्तकों में मिळने पर भी यहाँ गलत है। कार्यकारणमाव की विवशाभाव से यहाँ विषमालक्वारत्व नहीं हो सकता जिससे कि उस [ कायकारणभाव] के निषेध से उस [विषम] को स्थान न मिले। उसका लक्षण तो 'विपरीत रूप वाले कारये की और अनर्थ को सर्पत्ति लक्षण है' विमर्श-ग्रन्थ समाति के समीप है अत. कदावित टीकाकार भी रप गए है और सपादक भी। टोकाकार अतद्गुण की दो व्याख्याओं में भेद बिना दिखलाए आगे बढ़ जाते हैं, और विषमारकार पाठ को प्रोदिवाद द्वारा असगत रतला विशेषोकि पाठ का समर्थन करने है। संवादन में मी यहाँ अश्ुद्धियों की सरमार है। दोनों प्रकारों का अन्तर पण्ठितराज जनन्नाथ ने इस प्रकार बनलाया है- 'अत्र शुगाग्राइ कापेशया सवििनस्य गुणवन, उस्कष्ृत्व-समस्वाम्यां दैविध्यम्ति सर्वस्वकारः । वस्यायमाशय अपकृष्ट-सम्न्धिन-गुणप्रहणस्य साइजिकरवेन वेचित्यानाघायकत्वादनलद्गारतै वेत्यपकष्टत्वेन तृतीयविषा तु न समवति। गुग ग्रहण न करने वाले पदार्थ की अपेक्षा सनिहित पदार्थे में सत्कूषता और समता को लेकर अतद्गुण में दो भेद होने हैं। अपकृष्ट के गुण का म्हण न करना तो लौकिक तथ्य है अत उसमें विचित्नता न रहने से वह अलंवारम्वनून्य ही है अत सपकूष्ट के गुण के अग्रहण में तोसरा प्रकार नहीं माना जा सकता। 'धबनोऽसि'-गाया में हृदय राग को लेकर उत्कृष्ट है, जन कि 'गाहम'तु' पद में राजहम महाजल को लेकर समान। विशोषोकि में अतद्गुण के अन्तर्माव का जो ककप विमर्सिनीकार ने उपस्थित किया है। उन के पूर्व रग्नाकरकार ने उसी को सिद्धान्त माना था। उन्होंने लिखा था- 'हेनी सत्यपि नान्यस्य गुणानुदरणं यदि। विशेषोक्तिरसाविष्टा न वाच्योडपि सातद्गुणः ।।[तद्युगान्त] हेतु के रदने पर भी यदि अन्य के गुण का अनुहरण नहीं रहता तो यह विशेषोक्ति होगी। अनः [सामान्य के समान] अनद्गण को भी भटंकार नहीं मानना चाहिए। रत्नाकरकार ने अतद्- गुण का कोई सक्षण नहीं भी किया। पण्डितराज ने भी इमे विशेपोक्ति में अन्तभूत मानने की शक्यना का दूरगामी समर्थेन कर दिया है। यह विकव्य विश्वेश्वर की पुराणप्रशा से भी टकराया है। विमर्शिनीकार ने यहां विभावना की पुरजोर पहल की है। यूं नो विरोषोक्ति की पहल भी को जा सकनी है, क्योंकि ये दोनों अलकार एक दूसरे के द्वारा न्यग्य होने है। जहाँ दिमावना वाच्य होती है यहाँ विशेषोकि व्यहय होती है और जह़ाँ वह वाच्य होती है वहाँ विमावना। विरमाशिनीकार ने यहाँ विषमालकार की मी चर्चा की है और अन्ततः यह कहा है कि इमके स्थान पर विशेषोकि पाठ होना चाहिए। सजीविनीकार ने मी विशेषोकि हो पाठ माना है। वस्तुन विशेपोक्ति पाठ ही उचित है, क्योंकि यह समय्र अनद्गुण के दिए उठाई गई आपि हे अन अधिक व्यापक और आवश्यक है। विषमाकार का प्रश्न केवल 'धबलोडसि०' पध के पूर्वाधंगत सीमित है। उममें कारण धवल है और कार्य रक अन 'सब'करस्पर्शन' के समान विषम हा है। यदपि इसके मण्डन के लिए विमर्शिनीकार ने जो तरकें दिया है वह अपुष्ट है। दिपम के समर्थन में यह कहा जा सकता है कि केवल कार्यगत गुणविपरीतता से ही विषमश्व निष्पक्ष नहीं हो जाना उसके कार्यकारणमान की भी विवक्षा अपेक्षित है जो इस पूर्वोदध में नहीं है। वस्तुव.
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उत्तरालह्टार: ६४१
विषम का यह विचार यहाँ अनावश्यक है क्योंकि इसका संबन्ध पूर्वार्ध से है, उत्तरार्ष से नहीं, जय कि यहाँ अतद्गुण के लिए 'धवलोऽसि' गाया का उत्तरार्ष को उदाहरण माना गया है। मम्मद ने भी इसके उत्तरार्थ को ही उदाइरण माना है। हतिहास-अतद्गुण की कत्पना मम्मट ने दी की है। उनका लक्षण विमर्शिनीकार ने दे दिया है और उदाहरण सवस्वकार ने ही उद्धृत कर दिए हैं। रस्नाकरकार का मत दिया ही जा चुका है।
चिरं रागिणि मच्चित्ते निदितोऽपि न रज्सि॥' अन्य सम्वद्ध के गुण का अंगीकार न करने को अतद्गुण कहा है। उदाहरण, मेरे रामपूर्ण चित्ु में चिरकाल तक निहित रद्दकर भी तुम रक्त नहीं हुए। अप्पयदीक्षित ने भी दबे स्वर में अतद्गुण को चिशेषोकति रूप मान लिया है।
इतद्गुण: ।= 'तद्गुण का उलटा अतद्गुण।' इस प्रकार अतद्गुण का लक्षण कर इसे विशेषोकि में अन्तर्भूत मानने की संभावना पर विचार करते हैं और कोई समर्थक समाधान नहीं दे पाते। उनका कहना है कि अतद्गुण में मी कार्यकारणभाव की विवक्षा रहती है इसका प्रमाण है इसके लक्षण में 'अपि = मी' शब्द, जो विरोध का झापक है। बिना कार्यकारणभाव के विरोध संभव नहीं। विश्वेश्वर= 'अन्यगुणासम्बन्धे प्रकृतस्यातद्गुणः प्रोक्तः। अन्य के गुण का प्रकृत के साथ सम्बन्ध न वतलाने में अतद्गुण होता है। इसी को वे वृति
विश्वेश्वर पण्डितराज के उक्त तर्क का समाधान इस प्रकार देते हैं-कारणसत्वे कार्यानु- रमत्तिसाम्येमि यमामावप्रतियोगितावच्छेदकस्य तद्धर्मावच्छिन्न-कारणतावच्छेदक-प्रतियोगि- कार्यतावच्छेदकत्वं विवक्षितं तत्र विशेषोकि, यत्र त्वमावम्रतियोगिनस्तन्निष्कारणतानिरूपित कार्यताशादित्वं तव्रातद्गुण इति विभागाछ।' चक्नत्तों की निष्कृष्टर्थकारिका अतद्गुण पर इस प्रकार है- 'तद्दूपाननुदारस्तु देतो सत्यप्यतद्गुणः ।' पाठान्तर-'धवळोऽसीति ततद्गुण एव' इस पंक्ति को विमर्शिनीकार प्रक्षिप मानते हैं। संजीविनीकार इसे 'धवलोऽसीत्यतद्गुणः' इस रूप में पढ़ते हैं। वस्तुतः यह चनावश्यक ही है। इस पर संजीविनीकार के तर्क मान्य हैं। [सर्वस्व] [सू० ७५] उत्तरात् प्रश्नोभ्नयनमसकृदसंभाव्यसुत्तरं चोत्तरम्। यन्नानुपनिवध्यमानोSि प्रद्न उपनिवध्यामानाटुत्तरादुन्नीयते, तदे- कमुत्तरस्। न चेद्मनुमानम्। पक्षघर्मतादेरनुददेशाद्। यत्र च प्रश्न- पूर्वकमसंभावनीयसुत्तरं, तथ न सकृतू तावन्मात्रेण चावत्वामतीतेः। अत- ४१ अ० स०
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६४२ अलङ्गारसवस्वम् श्वासकृत्निबग्धे द्वितीयमुत्तरम्। न चेयं परिसंख्या व्यवच्छेद्य्यवच्छेद्क- परत्वाभावात्। क्रमेण यथा- 'एकाकिनी यदयला तरुणी तथाद मस्मद्गृद्दे गृद्दपतिश्च गतो विदेशम्। कं याचसे तदिह वासमियं बराकी ऋ्वथ्र्ममान्धवविरा ननु मूढ पान्य।।' 'का विसमा देवगई कि लद्ध जं जणो गुणम्गाह्दी। कि सोकखं सुकलत्तं कि दुफ्खं जं खलो लोमो।' पूर्वत्र मम वासो दीयतामिति प्रश्न उत्तरादुन्नीयते। उत्तरत्र दैव- गत्यादि निगूढत्वाद्संमाव्यमसरुत्प्रश्नपूर्वकमुत्तरं नियद्धम्। [सूत् ७५] उत्तर से प्रश्न की कवपना तथा असभाव्य क्षनेक उत्तर उत्तर [नामक अलङ्कार कहलाते है]n [वृचि] जिस [पकार] में प्रश्न कहा तो नहं जाना परन्तु कहे गए सधर मे उसकी कक्ष्पना कर ली जाती है वह एक प्रकार का उत्तरालकार हुआ। यह अनुमान नहीं होता गयोंकि इममें [अनुमान के लिए अपेक्षिन ] पक्षवर्मता आदि [अनुमानमामग्री] नहीं रहती। इसी प्रकार प्रश्न करते हुए उसका अममाव्य उत्तर दिया जाता है, किन्तु केवल एक बार नहीं, क्योंकि उनने से चारता निष्पन्न नहों होनो, अत अनेक बार वैसा किया जाता है तो वह वत्तरा- लंकार का दूसरा प्रकार होता है। यह परिसख्या नहीं हो सकती, क्योंकि यहाँ व्यवसेचव्यच्छेदक भाव में तारपर्य नहीं रहता। क्रम से उदाहरण, यथा - [प्रदन से वत्तर की कलपना] "मैं घर में अहेली हूँ, अवला हूँ और नई उमर की हूँ। घरवाला विदेश चला गया है। यह बिवारी सास अन्वी और बदरी है। मतः निवास की याचना किससे कर रहे हो। पषिक तुम दडे नासमझ हो।' 'का विषमा दैवगतिः कि लम्य यञ्जनो गुणग्नाही। कि सोख्यं सुकलशं कि दुखें यद सलो लोक।। -'विषम क्या है, देवगति, प्राप्त करने योग्य वस्तु क्या है, गुणमह्ी जन; सौख्य क्या है, शोभन परनी, 5 ख क्या है, खक लोग।' इनमें से प्रथम में 'मुझे रहने का स्थान दो' यह प्रश्न उत्तरवाक्य से निकलता है। दूसरे में दैवगति आदि उत्तर, जो निगूढ होने के कारण अमभाव्य है, प्रश्नपूर्वक अनेक बार उपनिवद्ध किया गया है।।' विमर्शिनी उचरादिरयादि। उतोयत इति। प्रश्नरूपरवेन संभाव्यत इश्यर्थः । ननु चाप्रतीतरय पश्यायनारिकमिदमनुमान न भवतीत्याशक्याह-न चेदमिर्यादि। असंभावनीयमिति। क विप्रति मानिवर्तितमित्यथः। वदिति 1 प्रश्नपूर्वकमुत्तरम। एवं प्रश्नस्थाध्यमक्ृदेवोप- निवन्धो न्याय्य:। अनशचेदि। सकृदुनरत्य चाएवाप्रतीतेः। एवं समानन्यायरवापूवत्रा- व्यनुपनिवध्यमानप्रशनागूरकमुत्तं न मकृत्, तावन्मान्रेग चारताप्रतीतेरियाश्रय- जोयम्। ननु च प्रश्नोततररूपस्वाडियं परिसंवयैव कि न भवतीत्याशद्याद-न चेय- मित्यादि।
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उततरालकवार: ६४३
एतचोत्तराययमलंकारपयस्। न पुनरेक सामान्यवप्षणयोगाद। एतच्छोदाहरण- इयं ग्रन्थकृता प्राच्थमतानुरोघेन दत्तम्। वस्तुतरत्वत्र नासयेतदलंकारह्यम्। अत परवरेता- वसालंकारसार कारादि मिरेतद्लंकार हयमपास्तम्। न च तद्यसम, लक्षणदोषाभावादू। उदाहरणान्तरेप्वस्य प्रतिष्ठानात्। तत्तु यषा- 'मिष्षो कन्या रलया कि ननु शफरवधे जालिकेपाविसि मरस्यान् मध्येमद्यावदशं पिसि मधु समं वेश्यया यासि वेश्याम। हत्बारीन्कि करिप्ये कति तब रिपव: संधिभेतास्मि येपां चोर सवं यतहेतो: कथमसि कितवो येन भिननुनमस्ते।।2 अ्न्न हि शफरनन्धजालिकेपेश्ष्युत्तरान्मत्स्यादनरूपस्य प्रश्नस्योजय नम्। एवमन्यद्पि जेयम्। 'येन दासीसुतोऽस्मि' इति पुनः पाठो ग्राहयः। दासीसुतत्वे कितवस्य निमित्तरवा मावाद्। प्रश्नोत्तरोजयनस्यासम प्रे: साकाढक्षरवाद्दा क्यार्थस्या विश्नान्ते:। द्वितीयो यया- 'पुंसः संबोधनं कि विद्धति करिणां के सचोऽमेमिपर्विंक का शून्या ते रिपूर्णां नरवर नरकं कोऽवधीस्कीटनं किम्। के वा वर्षासु न स्युस्तृणमित हरिणा कि नखाय्रैनिभिन्नं विन्ध्यादौ पर्यटन्को विघटयति तनुनर्मदाबारिपूरः॥' 'नमंदावारिपूरः' इति समहासमङ्गखवेन त्रिरतरम्। अ्म्र च थथोकम तुमानपरिसंख्या मैउक्षण्यं सुर्पष्टमेवेति ग्रन्थविस्तरभयान्जोक्कमिति। उत्तराव इत्यादि। उच्जीयते =कत्पना=प्रकनरूप से संभावित किया जाता है। 'अज्ञात का ज्ञान कराने से यह अनुमान क्यों नहीं मान लिया जाता-ऐसी शंका ठठाकर कहते हैं- 'नचेद्म०' इत्यादि। असंभवनीयम्=असंमाव्य=कवित्रतिमाप्रसूत। तत् =वद=प्रश्नपूर्वक उत्तर। इस प्रकार प्रश्न भी अनेक वार उपस्थित करने होंगे। अतश्र=एक वार उत्तर में चारुता की प्रतीति न होने से। इसी प्रकार प्रथम प्रकार में भी जिसमें अनुपनिवद्ध प्रश्न की कच्पना रहती है, यह मान लेना चाहिए कि उतर एक ही बार नहीं होना चाहिए, क्योंकि वहों मौ इतने भर से चारुता की प्रतीति नहीं होती। [यह विमशिनीकार का अपना प्रोहिवाद है, मम्मट आदि ऐेसा नहीं मानते, न तो स्वयं सर्वस्वकार की ही दैसी कोई मान्यता हैं]। यहोँ 'प्रश्न और उत्तर रहते हैं अतः इसे परिसंख्या क्यों नहीं मान लिया जाता' ऐसी शंका उठाकर सहते हैं-न चेयमू०। उत्तरनामक ये दो अलंकार है, एक नहीं, क्योंकि इनमें कोई सामान्य लक्षण नही वनता। ये जो दो उदाहरण ग्रन्थकार ने दिए हैं ये भी प्राचीन आचार्यों के अनुरोध से दिए हैं। वस्तुतः इनमें ये दोनों उत्तर अलंकार नहीं हैं। इसीलिए अलंकारसारकार यादि ने इन दोनों मलंकारों को इटा दिया है। किन्तु उनका ऐसा करना ठीक नहीं है क्योंकि एक तो इनके लक्षणों में कोई दोष नहों है दूसरे मन्य उदादरणों में ये स्पष्ट प्रतिष्ठित मिकते हैं। अन्य उदाहरण, यथा- मिक्षो! तुम्हारी कथड़ी चिन्धकचिन्धा क्यों हो गई? यह तो मछली मारने का जाल है। ऐ, मछली खाते हो! हाँ हाँ मद्य के वीच खारे नमकीन के रूप में। मधु भी पीते हो? हाँ हाँ वेश्याओं के साथ। नरे वेश्या के पास मी जाते हो? शतुओ को मारकर और करूँगा ही क्या? कितने है तुम्हारे शत्रु? वे सब जिनके घर में मैंने सेंघ लमाई हैं। तुम चोर मी हो? जूएँ के लिए। क्यों नी तुम झुआाड़ी मी हो। इसी से तो मिसु हूँ। तुम्हें नमस्कार है।'
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यहाँ 'यह मछली मारने का जाल है' इस प्रकार के उत्तर से 'मछली खाते हो'-इस प्रकार का प्रद्न निकलता है। इसी प्रकार आगे भी [ अन्य उत्तरों से असमावित प्रश्न निकलते है]। यहाँ [चतुर्थ चरण के अन्त में] 'बेन दासीसुतोऽ्रस्मि'= क्योंकि वेश्यापुत्र हूँ [दासी = वेश्या या चेटी]' यह पाठ अपनाना चाहिए, क्योंकि वेद्यापुतत्व के पति जुमडीपने में कारणता नहीं है। साथ ही इस पाठ से प्रद्न और उत्तरकर्पना समाप्तिपर्यन्त बने रहते हैं अतः वाक्यार्थ बैठ नहीं पाता [अर्थात 'क्या तेरा बाप भी वेश्यागामी या' यह प्रश्न इस पाठ से खागना है और वहाँ वाक्य समाप्त हो बाता है फछत उसका उत्तर नहीं मिलता]। दूसरे का उदादरण, यषा- मश्न उत्तर पुरुष का सबोधन क्या है [नः= नृशम्द का संबोधन] हाथियों की शोभा कौन उत्पन्न करते हैं [मदा := मदनल ] अभि का वध कौन [वारि = जल ] हे नरभेष् आपके मत्चुओं की कया चीज खाळी है [पू = नगरी] नरकासुर को किसने मारा था [अ = विष्णु ] कोटन क्या है [नर्म=६सी मज़ाक ] वर्षा में क्या नहीं होते [दावाः= दावानल] [नृसिदावतारी ] विष्णु नै नसायों मे तृणवद किमे फाड डाला [रिपूर := पद=
विन्ध्याद्धि में घूमता हुआ कौन दिरण्यकश्िपु का वक्ष]
अपना शरीर छिन्न मिन्न करता है [नमंदावारिपूर := नर्मेदानी का प्रवाद ] इममें 'नर्मदावारिपूर' चब्द ही समझ और अमद रूप में [उपर्युंक्त क्रम से ] तीन वार ठघर बनता है। [इस पद् में कुछ विद्वान् 'भिपक' के स्थान पर 'विप' पाठ मानना चाहते हैं, पृद्धस्य वरुणी विषम्' के समान ] अन्यकार ने अनुमान और परिसख्या से उत्तरालंकार का जो भेद बत- छाया है वह उक्त स्थलें में भी स्पष्ट ही है। इम उसे मन्थविस्तारमय से पुन नहीं कह रहे हैं।' इतिहास-उततरालंकार की दोनों विधाओं की सोज प्रयमतः रुद्रट ने की है। उनका विवेचन इस प्रकार है- रद््ट-'उत्तरवचनश्रवणादुलयन यत् पूर्ववचनानाम्। क्रियते तदुत्तर स्यात् प्रश्नादम्युत्तरं यत्र ॥ ७/९३॥ जिसमें उत्तर सुन कर प्रश्न की कत्पना की जाय, वह अलंकार उत्तर नाम से पुकारा मता है इसी प्रकार जिसमें प्रश्न से उच्तर निकलता है वह भी।। 'रकाकिनी यदवला०' पद में रुद्ट ने मावालकार माना है। उचर के लिए उन्होंने निम्नलिखित उदाहरण दिए है- प्रथम का उदाहरण = 'भण मानमन्यथा में भुकुटि मौनं विधातुमइमसद्दा। शक्नोमि तस्य पुरत. सखि न खलु पराङ्मुखोमवितुम्॥ सखि! मुसे मान का सपदेश दे। वैमे तो मैं मौं को मौन रखने में असमर्थ हूँ। सखि! मैं उसके सामने पराठमुख हो नहीं पानी हूँ।। द्वितीय का उदाइरण 'कि सवर्गादधिकसुस बन्धुसुहत्पण्डित समे कक्षमी.। सौराज्यमदुर्मिश्व सत्काव्यरसामृतास्त्राद.॥
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स्वर्गं से अधिक सुख की वस्तु क्या है? वन्धुवान्भव, मिन्न तथा पण्डितों के साथ साथ धन, दुर्मिक्षरहित सौराज्य क्या है १ उत्तम काव्य के रसरूपी अनृत का आस्वाद ।।' रटट ने द्वितीय उदाहरण में उत्तरगत असंमाव्यता को स्थान नहीं दिया था, साथ हो मदनगत अनेकता को भी। मम्मट ने असंभाव्यता को स्थान दिया ह- [१]उस्तरश्ुतिमात्रतः, प्रश्नस्योन्नयनं यत क्रियते, [२] तत्र वा सति, मसकृद् यदसम्माव्यमुच्तर स्याद तदुत्तरम्। [१] केवल उत्तर सुनकर जहाँ प्रश्न की कत्पना की जाए, [२] अथवा प्रश्न रहे परन्तु उसके अनेक असंमाव्य उत्तर प्रस्तुत किए जाएं तो वह अलंकार उत्तर कहलाता है। प्रथम का जो उदाहरण मम्मट ने दिया है 'वाणिजक हस्तिदन्ता:०' उसकी अमिष्यक्ति स्द्रट के प्रथम वदाहरण से गतार्थं है। द्वितीय के उत्तर में अन्तर है। इसके लिए सुट्रट के उदाहरण में प्रश्न केवल एक ही वार आया था। मम्मट ने इसका ऐसा उदाहरण दिया जिसमें प्रश्न भी अनेक वार मता है यद्यषि उन्होंने प्रशनगत अनेकता को कारिका में ठीक दैसे ही स्थान नहीं दिया है जैसे उनके अनुयायी सवस्वकार ने। इस द्वितीय उत्तर के लिए मम्मट का वदाहरण 'का विषमा० ही है। विमर्शिनीकार ने इस उदाहरण की स्टट के बदाहरण से तुलना करके ही कदाचित यह पक्ष प्रस्तुत किया है कि द्वितीय उत्तर में प्रघ्न भी अनेक होने चाहिए। यद्यि विमर्शिनीकार की यह कक्पना अधिक उत्तम नहीं है कि उत्तर के प्रथम प्रकार / में भी प्रश्न की करपना कराने वाला उत्तर एक ही नहीं होना चाहिए। यह मान्यता उनके अपने रदाहरण [मिक्षो कन्था: ] के लिए ही उपयुक्त है, जो अवश्यमेव आदरणीय है। रत्नाकरकार-'विमर्शिनी के अनुसार अलंकारसारकार ने उत्तरालंकर को अलंकार नदीं माना है। अळंकाररत्नाकरकार भी इसे महंकार नहीं मानते । नियमनामक एक स्वतन्त्र अलंकार परिसंख्या के प्रकरण में मानकर उन्होंने उत्तरालंकार को उसी में अन्तर्भूत बतलाया है। परि- संख्याप्रकरण में नियम के विषय में बतलाया जा चुका है कि इसमें किसी भी वस्तु का निर्धारणात्मक ज्ञापन रहता है। 'बीहीनवन्ति'- धान कटता है, में अन्य प्रकार से चारळ निकालने का निराकरण कर केवळ 'कूटने' के द्वारा ही चावल निकालने का निर्धारण करना है। रनाकरकार 'का विषमा देवगतिः-पद्य में दवगतिगतत्वेन वषमत्व का निर्धारण मानते है और उत्तरालंकार के स्थान पर नियमालंकार को ही मान लेना पर्याप्त बतलाते हैं। मम्मट द्वारा प्रदत 'वाणिजक हस्ति०' पद्य में वे अ्लकारत्व ही नहीं मानते। अलंकाररत्नाकर में उनका कहना है- सवश्यवाच्ये नियमे मर्नपूर्वकमुत्तरभ्। अन्तभू तमतो अन्यद् वत्तव्यं न तदुरम्॥ घातज्ञापनरूपा या परिसंख्येति तत्र न। प्रश्नपूर्वकता युक्ता तेनात्र नियम: स्फुट:॥ जव नियमालंकार को मानना आवश्यक है तब उत्तर को पृथक अलंकार नहीं कडना चाहिए। प्रश्नपूर्वक उत्तर का कषन्तर्माव इसी में हो जाता है। नियम को परिसंख्या से अलग मानना इस किए ववश्यक है कि परिसंख्या का जो श्ञातनापन रूप है उसमें प्रश्न का कथन अनिवाये नहीं रहता। जो आचार्य प्रश्नपूर्वक परिसंख्या को परिसंख्या ही मानते हैं नियम नहीं उनके मत में इसका अन्तर्माव परिसंख्या में बनलाया जा सकता है। सर्वस्वकार का उत्तर है कि परिसंख्या में तातपर्य अन्यव्यपोद् में रहता है और प्रश्नपूर्वक उत्तर में अन्यव्यमोह नहीं रहता। नियम में tr
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६४६ भी अन्यव्यपोह नहीं रहता। नियम में मी अन्यव्यपोद आवश्यक होता है यर्थाप इसमें वात्पर्ये केवळ अन्यव्यपोह में ही नहीं रद्दता, अत. सवस्वकार के अनुसार नियम में भी उत्तर का अन्तर्भाव नहीं माना जा सकता। विमसिनीकार ने नए उदाहरण देकर इम प्रकार की शंकाओं का कोई स्थान नहीं रहने दिया। अव्ययदोसित-विमर्शिनीकार की नवीन स्थापना का प्रमाव परवसी आषार्यों पर पढा। अप्पयदीक्षित ने उन दोनों भेदों को मपना किया किन्तु सट्रट और मग्मट द्वारा प्रतिपादित उत्तर से प्रश्न की कर्पना के प्रथम भेद को वे छोड नहीं सके जबकि विमर्शिनीकार ने रत्नाकरकार और अलंकारसारकार के ही समान उसके मोह का सवरण कर टिया था। अप्पयदीक्षित का उरासकारनिरूपण इस प्रकार है-
[१] किचिदाकूतसहित स्वादगूटोत्तरमुत्तरम्। यनासौ वेनसी पान्य तवासी सनरा सरिव।1 किसी अभिप्राय को छिपाकर आप किसी गूढ उत्तर को उत्तरालंकार कहते हैं। उदा० पान्य । नदी सुखपूर्वक वहों पार की जा सकती है जहँ वेतसीकुंज है। स्वच्छन्दतापूर्वक रमणस्थल को मन में रखकर यह उतर दिया गया है। इससे पान्य का प्रश्न भी निकल आता है। विमश्निनीकार ने 'मिक्षो कन्या०' पद्य द्वारा उत्तर से प्रश्न की उत्पत्ति और उसी कौ शखला का पक्ष प्रस्तुत किया पा Eसी सन्दर्भ में अप्पयदीक्षिन ने एक मनोरम पत् भी यहाँ उद्दत किया- "कुश्ल तस्या! सीवति, कुशलं पृष्छामि, बौदतीत्युक्तम्। पुनरपि तदेव कथयसि, मृर्ता नु कथयामि या धसिति।' ईर्ष्यां मान से सवस्त नायिका की अपने पास आई दूती और नायक के बीच प्रश्नोस्षर-'दह सकुशष तो है? जीवित है। मैं कुशल पूछ रहा हूं? कहा तो कि नीवित है। फिर वहो कह रही है? तो क्या मरी बनला दूँ समी जिसकी साँस चछ रहो है। सखी कहना चाहती है कि विना मरे उस विचारी की कुशलता केसी'। इमे अप्पयदीक्षित ने निवद्ध प्रश्नोत्तर नाम दिया है। विमर्शिनी- कार के द्ितीय उदाहरण में लो समझ शलेप की चर्चा है कौर जो क शब्द समुदाय के अंश अश पर प्रश्न योजना मिलती है अप्पयदीक्षिन ने उसे चित्रोत्तर नामक भेद माना है। चित्र इसलिए कि इसमें शब्द श्लेष रहता है। इसके लक्षण और वदाहरण कुबळयानन्द में इस प्रकार है- प्रश्नोप्त रान्तरामिश्रसुत्तर चित्रमुच्यते। केदार पोपणरता, के सैया: कि चल वय।' जहाँ उतर या तो प्रश्न से ही अभिन हो या अन्य किसी उत्तर सेउसे विपोतर कहते हैं। पथा-के दारपोपणरता में पद्न= के = कौन है क्या। दारपोषण रत स्त्री व्चों के पोषण में लगे -उत्तर है केदार-पोषगरता := क्यारियों पोसने में लगे अर्थात किसान। यहाँ प्रश्न और वघ्तर के शृष्द अभिन्न हैं। एक वत्तर के दूसरे उत्तर से अमिन होने का उदाइरण है-'के स्ेटा = कौन है आकाश में घूमने वाले, कि चलम्= क्या है चल ? इन दो पश्नों का उत्तर एक ही है वयः= पक्षी और उमर। पक्षी आकाश में अटन करते हैं और उमर चल होती है। यहाँ 'वयः' इस उत्तर के भीतर एक उतर और हिपा है। अप्पयदीस्विन का कहना है ऐसे उदाहरण विदग्यमुख- मण्डन में अनेक हैं। 'कसमघान कृष्ण, का शीनवाहिनी गझ्गा' आदि ऐमे दी वाक्य हैं। पण्दितरान-जगन्नाथ ने भी उपर्युक्त सभी विधाओं को स्थान दिया दे और उतरालकार का विवेचन अप्पयदीक्षित तथा विमर्शिनीकार के ही अनुमार किया है। इनका सूत है।
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सूक्ष्मालङ्कार: ६४७
'जिसके ज्ञान से जिश्यासा शान्त हो वह अर्थ उत्तर कहलाता है।' जिछ्ासा और भश्न एक ही वरतु है। जिश्यासा ज्ञानविषयक इच्छा को कहते हैं। इच्छा वस्तुशन के विना नहीं होती। यह प्वान सामान्यात्मक होता है। इच्छा जिस मान के अर्जन के लिए होती है वह विशेपरूप होता ह: इस प्रकार सामान्यतः प्रात वस्तु की विशेषतः जानने के लिए हुई इच्छा, जिसे प्रश्न कहते है, वस्तुनिष् विशेष के ज्ञान से शान्त होती है। उत्तर द्वारा इसी विशेष का ज्ञापन कराया जाता है। उदाहर णार्थ यदि जिद्वासा यह हो कि 'संसार में प्रधान देवता कौन है और उत्तर दो शिव' तो इसका जर्थ यह हुआ कि जिशासा के समय शिव का शान देवता रूप में ही था शिन रूप में नहीं, अधवा प्रधानता का म्ान देवत्व के साथ था शिव्व के साथ नहीं। वत्तर से वह शिवरूय से विदित हो जाता है या प्रधानत्व शिवत्व के साथ विदित हो जाता है। पण्डितराज ने प्रथम उत्तर को उन्नीत प्रदन और द्वितीय को निवदप्रइन नाम दिए हैं। उनके अनुसार दोनों में प्रद्न और दोनों या दोनों में से एक, साभिप्राय या निरमिप्राय होते हैं, इस प्रकार इनमें से प्रत्येक के चार चार भेद हो जाते हैं। विमशिनीकार का मत पृथकू रूप से उपस्यित करते हुए उन्होंने 'मिक्षो कन्याः' पद्य के अनुकरण पर जदाँगोर की स्तुति में 'श्यारमें यशोपवीतं किमिति०' पद्य वना दिया है। उन्होंने प्रश्नोत्तर की अनेकता वहीं आवश्यक बतलाई है नहों वे सामिग्राय न हों। चित्रोत्तर के लिए मी पण्डितराज ने अनेक प्रकारों की कत्पना की और उत्तरगर्मित प्रश्न का वामन के समान यह त्निपाद उदाघरण बनाकर रस- गंगाघर के ही समान अपना जीवन मी कदाचित् समाप्त कर दिया- "कि कुवेते दरिद्राः कासारवती धरा मनोकतरा। को पावनस्त्रिलोक्याम् 'दरिद्र क्या करते हैं कि कुवते = किकरता=सेवा करते हैं। कौन भूमि सारवती मौर मनो शतर होती हैं = कासार = तालाब नाली' तिलोकी में कौन अपावन है जो कोप की रक्षा करता है-। इस पद्य का तृतीय चरण ययदि पण्डितराज के जीवन का अन्तिम शिव्ष्प है तो बह बढ़ी दुःख की जात है, क्योंकि यह चरण अर्थ की दृष्टि से दरिद्र है। एतदर्थ देखिए सागरिका ६ा४ में प्रकाशित हमारा 'पण्डितराज-पद्यपूर्तिसंशोधनम्' नामक लेख विश्वेश्वर= 'उत्तर मात्राध् प्रश्नोनयने स्यादुत्तरं नाम। प्रश्ने लोकाविदितोत्तरस्य तच्चासकृत प्रोक्तौ।।' उत्तर से प्रश्न की कल्पना तथा प्रश्न कर ने पर अप्रसिद्ध अनेक उत्तर उत्तरालंकार। इस परकार उत्तर के किए निश्वेश्वर मम्मट के ही अनुयायी है। यहो चक्रवर्ती की निप्कृष्टार्भकारिका यह है- 'पश्नोद उत्तरं तस्माद् गूढं चासकृदुत्तरम्।' विमर्शिनी अघुनालंकारानतराणां लक्षणं कर्तुमुपक्रमते-इत इत्यादि। मद अन्य अलंकारों का लक्षण करना आरम्म करते हैं- [सर्चम्व] इतः प्रसृति गूढार्थप्रतीतिपरालंकारलक्षणम्- [ सू० ७६] संलक्षितवृक्ष्मार्यप्रकाशनं सूक्ष्मम्। इद्द सूक्ष्म: स्थूलमतिमिरसंलक्ष्यो योडर्थ, स यदा कुशाग्रमतिमिरिङि
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ताकाराम्यां संलक्ष्यते तदा तस्य संलक्षितस्य विद्ग्वं प्रति प्रकाशनं सूक्षम- मलंकार:। तघेद्विताद् यथा- 'संकेतकालमनसं विटं छात्या विदग्धया। हसन्नेत्रार्पिताकूतं लीलापद्मं निमीलितम्॥' अत्र संकेतकालाभिप्रायो विटसंबन्धिना भ्रक्षेपादिना इद्गितेन लक्षितः रजनिकालभाविना लीलापद्मनिमीलनेन प्रकाशितः । आकाराद् यथा- 'वक्त्रस्यन्दिस्वेद् बिन्दुप्रबन्वेर्हए या भिन्नं कुद्गमं कापि फण्ठे। पुंस्त्वं तन्व्या व्यअ्ञयन्ती वयस्या म्मित्या पाणी सड्गलेसा लिलेख।।' अत्र म्वेद्विन्दुरुतकुह्कुमभेद्रपेणकारेण संलक्षिन पुरुषायितं पाणी पुरुपोचितल्ङ्गधारालेसनेन मकाशितम्। यहोँ से गुहार्थ द्ञान परक अलकारों के सश्ग करते हैं- [सू० ७६] ताद लिए गए सूपम अर्थ का प्रकाशन सूक्ष्म [अलकार कहलाता है]। [सृ०] यहाँ नो पदार्थ सूहम अर्थात् स्थूलमति वाने व्यक्तियों द्वारा न जाना जाने योग्प रहता है, उमे जब कुशायबुद्धि वाले व्यक्ति चेषा और आकार के आधार पर नाट लेने हैं, तब उस वाड लिए गए अर्थ का किसी चतुर व्यक्ति के प्रति जो प्रकाशन होना है उसीको सूक्षम नामक्र अलंकार कहा जाता है। इनमें से चेटा से ताटने का उदाहरण- 'चतुर ननिता ने विट को संकेत जानने के लिए उत्सक देसा तो सुमकुरावी आँसों में चाइ मर कर अपना लोनकमल मूद दिया है।' यहाँ ससेनकाल का अभिप्राय विट की अविक्षेप आादि चेष्टाओं से ताह लिया गया है और रात्रिकाल में होने वाले खीलापघ्निमीलन से उसे प्रकाशिन कर दिया गया है। आाकार से ताडने का उदाहरण- किसी सखी ने चेहरे पर मे लगानार वह रहे पसीने से कण्ठ का कुंकुम फेला हुआ देखा तो तन्वी के पुरुषायित [विपरीत रमग] को व्यक्क करते हुए मुसकुरा कर दाथ पर खद्दग का चित्र वना दिया। यहोँ स्वेदविन्द द्वारा उत्पन्न कुंकुम के फेलाव रूपी आगार से विटित दुए पुरुपायित दाय पर खद्ग बनाने के द्वारा प्रकाशित किया गया है, क्योंकि खट्ग पुरुषोचित वस्तु है। विमर्शिनी एव दैव व्याचट्टे-रहेत्यादि। इद्विताकाराम्यां सूचमारथसंउव्णादस्य भेददयमप्युक्कम्। एव संछवितस्यार्थर्य प्रकाशनमयमलंकार हश्यय तात्पयम्।[यदाहुः] 'कुतोऽपि छचितः सूपमोऽपयर्थोऽनयसमै प्रकारयते। धर्मेण केनचिद् यत्र तव सूपमं परिचपते।' कि घ-'यग्र कर्णोरपलन्यस्तहस्ता दीपावलोकिनी। दृष्ट्वा वधू प्रियोपान्ते मसीमिः प्रतिमुच्यते।' इश्येतदुमन्थमकिििययालंका रोदाहरणभ्ञातं कुर्वनाप्पलकार माध्यकृता सूचमालंकारे यत्त वनुगुणमदाहत तत्रायमाशय-यरमूच्मार्थस्य संछनननमात्रं प्रकाशनमाथ्र वा्ययमेवा- संकार इति । अत पवात् सस्त्रीमि' सुरतोरसुकरव संळमितम् कर्णोतपळहस्तन्पासादिना
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सुक्ष्मालद्कारा ६४९ पकाशितमिश्युभचार्थसहितावम्। तदेव मादौ सूषमालंकार एव वाय्यः। सूचमस्यैवार्थर्य
इसी सूत्र की व्याख्या करते हैँ-इह इत्यादि। पेषटा और आकार इन दो हेतुओं द्वारा सूक्ष्म अर्य के जानने से इस अलंकार के दो भेद भी वतलाए। इस प्रकार तात्पर्य यह निकाल कि 'जाने दुए अर्थ का प्रकाशन ही इस अलकार का स्वरूप है [ जैसा कि मम्मट ने कहा है-] जिसमें, सूक्ष्म होने पर मी किसी भी कारण से जान किया गया कोई अर्थ किसी धर्म के द्वारा किसी अन्य को वतलाया जाता है उसे सूक्ष्म कहते हैं।' और [अन्यन्न] इक्ी [ सर्वस्व] अन्थ के अनुसार अलंकारों के वदाहरण देते हुए भी सूकष्मालंकार के प्रकरण में अलंकार- माष्यकार [तथा रत्नाकरकार] ने जो- 'जहाँ ससियॉ कपोल पर दाथ रखकर दीप निदारती देस, वधू को प्रिय के पास छोढ़ आती है।' यह उनकी अपनी मान्यता के अनुरूप उदाहरण दिया है उससे उनका तात्पर्य यह है कि 'सूक्ष्म अर्थ का केवल जान लेना, या केवल प्रकाशित करना भी यही अलंकार है'। इसीलिए यहाँ जो सखियों द्वारा सुरतोतसरता जान लो गई है और जो कर्णोत्पल पर हाथ रखने आदि से उसे [ बधू द्वारा सखियों के पति] पकाकित किया गया है इससे यहाँ दोनों प्रकार के अर्थ का होना वतलाया गया। इस प्रकार ऐसे उदाहरणों में सूक्ष्मालंकार ही माना जाना चाहिए। क्योंकि इन सब में जान लिए गए रूप में सूक्ष्म अर्थ ही विद्यमान है। [ अलंसारमाष्य के उपकब्ध न होने से मम्मटकारिका के बाद का यह टीकांश इमने जोड़ तोड़कर ही अनूदित किया है] ।' विमर्श-गलेका रमाण्य में कदाचित नेवल जान लेने को सी सूत् का अर्थ माना गया था। मम्मट, सर्वस्त और विमर्शिनी उससे विपरीत साने गए अर्थ के प्रकाशन तक सूक्ष्म की व्याि मानते है। इतिहास=सूक्ष्मालंकार को जो रूप मम्मद की विमर्शिनी में उद्धृत कारिका तथा सर्वस्व में मिलता है उसकी खोज का श्रेय दण्डी को है। वन्होंने सूक्ष्म का जो लक्षण किया था मम्मट आदि ने उसी की पदावली पर अपता विवेचन खढ़ा किया है। दण्डी का सूक्षम-विवेचन इस प्रकार है- दण्डी='इदिताकारलक्ष्योऽर्: सौक्ष्म्यात सूक्ष्म इति स्मृसतः । कदा नौ सङ्गमो मावीत्याकीर्णे वक्तुमक्षमम्। सवेत्य कान्तमवला लीलापरदय न्यमीलयत।। पझसमीटनादन्न सूचितो निशि संगम: । आश्वासयितुमिच्छनत्या मदर्पितद्टश्स्तस्वा उद्दामरागतरठा छाया काषि मुखाम्बुजे॥ इत्यनुद्धिन्नरूपत्वाद रत्युत्सवमनोरय:। अनुद्लड्ध्येव सूक्ष्मत्वमभूद्श् न्यवस्थित: ॥। -[ काव्यादर्श श२६०६४।] इंगित या साकार से लक्षणीय स्थ सूक्ष्मता के कारण सूक्ष्म माना गया है। उदा० 'जनसंकुल स्थान में प्रिय को 'इम दोनों का मिलन कब दोगा' यह जोर से पूछने में असमर्थ जानकर मबला ने 'लोलामम् मूँद दिया"' यहाँ कामपीढ़ित पिय को आश्वासन देने के लिए रात्रिकाल में मिलन की सूचना पझनिमीलनदवारा दी गई है। [पुनः वदाहरण-] 'संगीतगोछ्ठी में उस सुन्दरो
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को दृष्टि मुझ ही पर टिकी रही और मुखकमल पर वक्षम रचिमा से तरल एक विचिन्न कान्ति दिखाई दी "' यहाँ पर मी रत्युत्सव की लालसा छिपी हुई होने के कारण सूक्ष्मता को बिना खोए न्यक्त हुई दे।।' हेस्र कार के प्रकरण में दण्डीदारा प्रतिपादित लेश, सूक्षम आदि अहंकारों का मामर द्वारा खण्डन उद्धृन किया जा चुका है। उससे स्पष्ट है कि भामह सूक्ष्म को अलंकार नहीं मानते। भामह् का अनुकरण करते हुए वामन और उद्रट ने मो इस नाम का कोई अलकार नहीं दलाया है। रुटट-रुटट के काव्यालद्वार में सूक्ष्मनामक अलकार तो है, किन्तु उसका स्वरूप और उदाहरण दण्डी और मम्मट के उपर्युक्त सक्षम से मिन्न एक दूसरे हो प्रकार का है। वद यह ह- 'यपायुक्तिमदर्यो गमयति शब्दो निजार्थसबद्धम्। सर्धान्वरसुपपाचमदिति तव् संजायवे सुक्ष्मम्।।'७।९८। जिसमें अयुक्त मर्थ का शम्द अपने मर्ये से सम्वन्धित किसी युक्ति-युक्त सर्थ का ज्ान करार वह सूक्ष्म नामक अन्यकार होता है। यथा-'आदो पश्यनि बुद्धिव्यंवसायोडकालद्दीनमारमते। घैयं व्यूढमशमरमुत्साइ साधयतपर्थम ।। 'अरम्म में देसा करती है बुद्धि, व्यवसाय समय गवाए बिना कार्ये आरम्भ कर देता है, पैर्य महान् मार को दोए रहता है, उरसाह कायें सिद्ध करता है।' यहों ये सब कार्य तद्वान् प्राणी करता है। वह यहाँ निगृद हे अत. उसका बोष होने से यहाँ अकंकार भी सूक्ष्म नामक ही है। वस्तुड. ये लक्षणिक प्रयोग मात्र है। मम्मट-'कुमोपपि लक्षिन सूष्षमोऽप्यर्थोऽन्यरमे प्रकाश्यते। धर्मेग देनचिद् यम तत सूक्ष्मं परिचक्षतरे।' अर्थ अभी अमी विमशिनी ने किया जा चुका है। इसकी पदावली से स्पष्ट है कि इस अलंकार के रूपनिर्माण में मम्मट नक्षर अक्षर के टिए दण्डी के ऋणो है। ठोक इसी प्रकार सघम्नकार भी अपने विवेचन और उदाहरणों के लिए मम्मट के ऋणी है। दोनों की पदावली पायः एक है, उदाहरण तो एक है हो। मम्मट की पदावली यह है-वक्त्स्यन्दि0' अनाकृति- मवलोक्य कनापि विनर्किन पुरुषायितम असिवतालेखनेन वैदगयादमिव्यक्तिमुपनीतम्, पुसामेव कृपाणपाणितायोग्यव्वात। यथा वा 'सकेनकालमनसम् अत्र जिप्ासित: संकेनकाळ: कयाचिद् इद्विनमावेग विदितो निशासमयशसिना रुमलनिमीसनेन लीलया प्रतिपादित:।। शोभाकर-रत्नाकरकर चोभाकर ने न तो अर्टकारमान्य के समान 'जान' और 'प्रकाशन' की दोनों इफाइयों को सूक्षम के लिए स्वतन्त्र और पर्याक्ष ही माना है और न मम्मट तथा सवस्वकार के समान दोनों की एकन अनिवार्यता हो मानी है। उन्होंने केवळ प्रकाशन को सूक्ष्म के लिए पर्याप्त माना है, ज्ान को उसका वैकदिपिक सहयोगीमात्र माना है। उनका लक्षण यह है- 'सृक्ष्मार्थंस्य सूचनं सूक्ष्मम्॥ १०३॥ 'सृकषम अर्थ की सूचना सृक्षम' नामक अलकार होगी। रत्नाकरकार ने सूचना का माध्यम आकार और चेष्टा शी नहीं वाच्य को भी माना है। उसका उदाहरण तन्होने यह दिया है- 'रथ्याभ्रमणशोल बार तरणी दृषटवा मक्ययतत सखीम्। इदानीं चर सन मूर्यः सरितं सम्ध्या्या सद् याम.1'
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सूक्ष्मालहर: ६५१
यार को गली में धूम रहा देख तरुणी सखी से कहती है-'सूर्य डूय रहा है, सखि! चल नदी चलें।' यहाँ नदी को संकेत स्थान बतलाया जा रहा है। 'यत्र कर्णोत्पलन्यस्त पद्य में वसू का मौत्तुक्य किसी अन्य के द्वारा नहीं जाना जाता, न कोई अन्य हो किसी अन्य के प्रति उसे व्यक्त करता। रत्नाकरकार ने इसमें भी सुक्ष्म को अलंकार माना है। 'वक्त्रस्यन्द्रि' पद्य मी उ्न्होने सूक्ष्म के लिए उद्धृत कर दिया है। इस प्रकार सूक्ष्म को मनेक नवीन परिस्थितियों में देखकर रत्नाकरकार ने अपनी भावक प्रतिभा की उर्वरता का परिचय दिया है। 'ज्ञान और प्रकाशन' दोनों को अनिवाय इकाई मानने के पक्ष पर वे स्पष्ट रूप से इस प्रकार प्रतिवाद प्रस्तुत करते हैं- 'वक्रस्यन्दि०' मन चाकारेणेकितेन वा संलक्षितस्वार्थत्य पर प्रतति प्रकाशनम् इति द्विभेदत्वं न वाच्यम्, संलक्षितत्य प्रकाशनाभावेपि निक्षामिप्रायादिपकाशनेि संभवतीति 'संलक्षितस्य पूक्ष्मार्थ प्रकाशनं सुक्ष्मम्' इति लक्षणमव्यापकम्, यथानैव 'यत्र कर्णोरपलन्यस्त०' इत्यादौ।' 'प्रकाशन के प्रति केवल साकार और इद्गित को ही ज्ञान का साधन मानकर सूक्ष्म को दो भेदों तक सीमित नहीं रखना चाहिए क्योंकि कहों कहीं अन्य के द्वारा ज्ञान और अन्य के द्वारा ही प्रकाशन के अभाव में स्वयं प्रकाशन होने पर मी यह अलंकार देखा जाता है। इसलिए :सर्वस्वकार ] 'संलक्षित सूक्ष्म अर्थ का प्रकाशन सुक्ष्म है' इस प्रकार का जो लक्षण बना्या है वह सभी स्थलों में लाग नहीं होता यथा इसी 'यत कर्गोत्पल०' पम्म में। अप्पयदीक्षित ने 'वक्तस्यन्दि०' पद्य में विदितनामक अलंकार मान सक्ष्म को 'संकेतकालमनसै' तक सौमित रखा है। अप्पयदीक्षित = 'सूक्ष्म परामवाभिज्ञोत्तरं साकृतचेषितम्। मयि पश्यति सा केशैः सीमन्तमणिमावूणोद। -दूसरे का आशय जान रहे व्यक्ति दूसरे के प्रति अमिप्राय चेष्टा सूक्ष्म कहलाती है। उदा 'मैं देख रहा था तो उसने वालों से अपनी माँग की मणि ढंक ली" यहाँ मणि सूर्य का नतीक है। उससे सन्ध्याकाल के संकेतकाल होने की सूचना दी गई। अन्य में अप्पयदीक्षित ने 'संकेक्षकालमनसं०' पद्य मी उद्धृतकर दिया है। पिहित का लक्षण उन्होंने इस प्रकार किया है- 'पिहितं परवृत्ान्तवातु: साकृतचेष्टितम्। मिये गृहागते प्रातः कान्ता तत्पमकत्पयत ।।' दूसरे को स्थिति जानने वाले की सामिपाय या व्यंग्यपूर्ण चेष्ा पिडित कइलाती है। उदा० 'प्रिय प्रातःकाल सपत्नी के पास से लौटा तो नायिका ने उसके लिए विछौना विछवा दिया।' दूसरा ददाहरण 'वन्त्रत्यन्दि०' पद्य ही दिया है। चन्द्रिकाकार ने सृक्ष्म और पिहित का अन्तर बतलाते हुए किखा है-'सूक्ष्म में दूसरे का अभिप्राय जानकर अपनी मोर से उत्तर मी दिया जाता है, और इस उत्तर में वक्ता अपना गृढ् अभिप्राय व्यक्त करता है, जब कि पिहित में दूसरे की गूढ स्थिति को ज्ञान लेने की सूचना दी जाती है। अर्थ यह कि सूक्ष्म वक्ा के स्वगत सूक्ष्म या निमूढ माव के स्वयं निवेदन में होगा और पिडित किसी के द्वारा अपने गूढ भाव के छिपाने में, य्द्यपि इसमें छिपाय माव का प्रकाशन भी रहेगा, क्योंकि उसके विभा उस छिपे भाव का अस्तित्व ही प्रकट न होगा और पाठक की चेतना पर उसका प्रभाव न पढ़ेगा। उद्योतकार आनि ने इस पार्थक्य का प्रत्यास्यान कर दोनों विषाओं को प्राचीन आचार्यो के समान अवान्तरभेद के रूप में एक 'सूक्ष्म' शीषेक में ही गिचना उचित बतलाया है।
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पण्टितरा जगन्नाथ के रसगंगाधर में सूक्षम अलकार नहीं मा पाया है। विश्वेश्वर ने अपना सूक्ष्मालंकार मम्मट के हो लक्षण पर निर्मर रख इस प्रकार बनाया है- प्रतिमानिशयाद् जातो यधाकारदिनादर्थ: । विशवदीक्रियतेऽन्यसमै तथैव तव सूक्ममित्युक्तम्॥ रत्नाकरकार और अध्ययदीक्षित की नवीन उद्भावनाओं पर चुप है। इस अलंकार पर चक्वत्तों की निष्कृष्टार्थकारिका यह है- सूक्ष्मं तु सूक्ष्म मक्ष्य विदग्धेपु प्रकाशनम्। रद्विताकारत सूह्मसंलक्षममिति दिषा। रद्वित और आकार का सन्तर सीचकवतों ने इन प्रमाणों दवारा स्पष्ट किया है- उद्वित = आकृतव्यजजिताद्ेश रदित बुद्धिकारिता.। आकार= आकार. पुनराम्नातस्ता रवादुद्िकारिता।। तथा- दद्वित - 'तारापुटभद्ृष्टयादैविकारानिद्ञित विदु-। आकार = आकारा सर्वजा भावा आदा बुद्धया परेन्यथा।। -जो चेष्टाऐँ मावामिव्यक्ति के लिये जानवूझकर की जाती है उन्हें इदित कहा जाता है, वे हो चेशएं यदि जानबूझकर न की जाए अपितु स्वभावनः निष्पन्न दो जाए तो आकार मानी जाती है। -पलक, भ्रुकुटि और दृष्टि के विकार इद्ित होते हैं जब कि आकार चित्तस्थिति की धोतक मुद्राएँ। इनमें से प्रथम बानवूझ कर किए जाते हैं और द्वितीय स्वमावन निष्पन्न होते है। [सर्वस्व ] [सू० ७७] उद्भिमवस्तुनिगूहनं व्याजोकि: । यत्र निगूढं चस्तु कुतश्चिननिमित्तादुमिनं प्रकटता पातं सदू वस्त्वन्तर प्रक्षेपेण निगूह्यते अपलप्यते, सा वस्त्वन्तरप्रक्षेपरूपस्य व्याजस्य वचनादू व्याजोकि:।थथा- शैलेन्द्र प्रतिपाद्य मानगिरिजाहस्तोपगढोलस-
हा शैत्यं तुदिना वलस्य करयोरित्यूचिवान् सस्मितं
अत्र रोमाश्चादिनोद्विननो रतिभाव. शैत्यप्रक्षेपणेनापलपितः। यद्यप्यप हुतोऽपि सस्मितत्वख्यापनेन पुनरप्युन्भिन्नत्वेन प्रकाशित: तथाव्यपलाप-
नन्वपह्नुतिग्रन्थे 'यथा सादश्याय याऽपहतिः तथापह्मवायापि यत्सा दृश्यं साप्यपहुति.' इति स्थापितम्, व्याजोकी चोत्तरप्रकारो विद्यते तत्कथ- मियमलंकारान्वरे[रमपे]ण कथ्यते। सत्यम्। उद्भरसिद्धान्ताथ्रयेण तत्
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तत्रो तन्मते व्याजोपत्याख्यमलंकरणमस्ति। इह तु तस्य संभवात् तद्वध तिरिक्तापहुतिरिति पृथगयमलंकारो निदिष्ठः। [सूत्र ७७] मकट वस्तु का छिपाया जाना व्याजोकि [नामक अलंकार कहलाता है ] । जिसमें कोई निगूद वस्तु किसी भी कारण बदितव अर्थात् प्रकटता को प्राप्त हो जाती है। अतः उसे अन्य कोई वस्तु बीच में सकर निगूहिति किया जाता अर्थात छिपाया जाता है, वह अन्य वस्तु के वीच में ढालने रूप व्याज का कथन होने से न्याजोकि मानी जाती है। यथा- 'पर्वतराज हिमाचल द्वारा सौमे जा रहे पार्वती जी के हाथ के स्पर्श से हुए रोमांच आादि के कारण अस्तव्यस्त हुए समस्त कार्य कलाप में रुकावट मा जाने से घवराए, मतपव 'भाह कितने ठंढे है हिमाचल के हाय' इस प्रकार चोल बैठे और पवतराज के अन्तःपुर, ब्राह्मी आदि माताओं तथा प्रथमगणों द्वारा मुसुकुरा मुसुकुराकर देखे जा रहे शिव आपकी हमारी रक्षा करें।' यहाँ रोमांच आादि द्वारा प्रकट हुई रतिरुपी चित्तवृत्ति शीतलता को दीच में लाकर छिपाई गई। यदपि छिपार जाने पर भी मुसुकुराइट के उब्लेख के द्वारा उसे पुनः प्रकट बतलाया गया, तथापि छिपानेमात्र पर ध्यान जाने से इस अलंकार का अनुमव होता है [ चमक्कार प्रतीत होता है। तथा इसे नाम दिया जाता है। शंका होती है कि अपरूति [श्लेष] प्रकरण के ग्रन्थ में यह बतलाया है कि 'जिस प्रकार जो छिपाव सादृश्य ज्ञापन के लिए होता है वह सपहति होता है, उसी प्रकार जो सादृश्य छिपाद बतलाने के लिए होता है वह भी सपहुति होता है।' इनमें से जो द्वितीय प्रकार है वह व्यानोकि में विद्यमान है, तव इस मिन्न अलंकार क्यों वतलागा जा रहा है। [ उत्तर ] ठीक है। [अपहुति का ]वह [रूप] उद्भट के सिद्धान्त के अनुसार वहाँ बतलाया गया है। उनके मत में न्याजोकि कोई अलग अलंकार नहीं है। इस [ अन्यकार के मत] में वह संभव है, अतः [इस मत में ] उस [द्वितीय प्रकार] से बचा हुआ भेद ही अपहुति का विषय होगा। इस कारण यहाँ यह अलंकार पृथक वतलाया गया है। चिमर्शिनी उद्िन्नेत्यादि। निगूहमिति। वस्तुतः। वस्त्वन्तरप्रक्षेपेणेति। निमिच्तान्तरकथनेनेत्यर्थः। रतिमाव इति। स्थायी। अपहुतीडपीति। व्याजोसे: पररोहास। अपलापमात्रचिन्तयेति। ताच न्मान्नस्यैय तव्वक्षणत्वाद। अस्याश्चापह्वतेभेंदं दर्शयितुसुपक्रमते-नन्वित्यादिना। स्थापित मिति। श्लेपग्रन्थे यदुकम्।,'साहश्यव्यकये यत्रापह्नवोऽसावपहृतिः' हति। एवमपह्य- अरन्थ दति पूर्वचाकय एवं संबन्धनीयम् । उस्र: प्रकार हसि। अपहवाय साहश्यस सदिति। उत्तरेणैव प्रकारेण व्यापरवात्। कथमिति। निष्पयोजकत्वाव। एतदेवाम्युपगम्य अत्ति- विधन्ते-सत्यमित्यादिना। तदिति अपह्नवाय सादश्यम्। तत्रेति। शलेपे। तन्मत इति। उद्टमते। तस्येति। व्याजोवत्याख्यस्यालकारस्य। तह्यतिरिकेति। अपहती हि प्रकृतमे. वोतकर्पयितुमप्रकृतस्योपाधानम्। इह तूद्धिन्नं सत प्रकुत वस्तु वस्त्वन्तरणाप्रकृतेन निगूहयते हत्यनयोर्महाम्भेदः। एवं 'माहृप्यादौ' इस्यादौ च चोलकात्मचरस्म्तरप्रत्तेपेणो- द्ववप्रिमनिगूहनस्येव वाक्यार्थत्वाद्वयाजोिरेव न पुनरपहतिः। अत पूव च नान वक्रोकि:। तस्य यथायोजनमाननं लक्षणम्। उद्विछ इत्यादि। निमूद अर्थात वस्तुतः निमूद। वरवन्तरप्रप्वेपेण दूसरी वस्तु को नीच में काने से =अन्य कोई कारण वतलाने से। रतिभाव := स्थायिभावरूप रति। अपह्वतोपि=
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छिपार जाने पर भो= भर्यात् ग्यापेक्ि के जम जाने के कारण। अपलापमाशचिन्नया=छिपाव मात्र के ध्यान से = क्योंकि व्याजोक्ि का उक्षण ही केवल वह (छिपाव) है। इम [ब्याजोकि] का अपहुति से भेद बननाना आरम्म करते हैं-ननु०। स्थापित। नेसा कि इलेष प्रकरण [के अन्त] में कहा है-'सादृश्य की व्यक्ति के लिर जहाँ छिपार होता है उसे भपहुति कह्दा जाना है'= इत्यादि। इस प्रकार 'अपहत मन्य' इसका अर्य 'पूर्व वाक्य लगाना चाहिए। उत्तरः प्रकार := दूसरा प्रकार= 'मादृश्य छिराव बतलाने के लिए'। सत् = इस कारण- दूसरे मकार में ही चले आाने मे। कथम- क्यों= कोई प्रयोजन न होने से। स्वीकारकर सी का खण्डन करते है-मध्यनू इत्यादि के द्वारा। तत्= सादृश्य छिराब के लिए। तत्र= वहा दलेषप्रकरण में। तन्मत= उनके मन में= उद्भर के मन में । तकय व उमका ब्याजोकि नामक गलकार का। तद्द ग्यतिरिक=उममे बचे अपहृति में तो अप्रकृत का उपादान प्रकृत के उरकूर्प के लिए ही होता है, जब कि इम ध्याओकि में अप्रकृत वस्तु प्रकट हुई प्रकत वस्तु को छिपाया करती है। इस प्रकार इन दोनों में बहुन बड़ा भेद है। इस प्रकार [शलेष प्रकरण में उद्घृन] 'भाकृष्यादावमन्द०' इत्यादि [पद] में 'चोली' रूप अन्य वस्तु को वोच में लाकर पकट हुए प्रियरपी अर्थ का छिपाना ही वाक्यार्थ स्वरूप है, अत. वहाँ ध्याजोकति ही है, अपहुति नहों। क्षत एद यहाँ[ अगले मूत्र द्वारा प्रतिपादित] वक्रोकि भी नहीं है क्योंकि उमका स्वरूप 'दूसरे प्कार से योजना करना' है।। घिमर्श-वचिकार ने शलेवपकरण के बन्न में अपहुति के दो भैद इस कारिका द्वारा बनलाए ये- 'सादृश्यव्यकये अपङ्वाय सादृइयं यत्राप्येघाप्यपद्ुनिः।' इसके पूर्व वृत्ति में वहीं लिस। या-'उमयथाप्यपछ्चुनिसमवाब् सादृश्यपर्यवसायिना वापद्वेन, अपहुप्यवसायिना या सादश्येन, भृतार्यावह्वस्योमयत्र विदमानखवात् [पृ० २७३] यहाँ 'अप- द्ुतिप्रन्थे' लिखने का अर्थ विमर्शिनीकार ने अपहुनिविषयक पूर्व चर्चा किया है। संजीविनीकार इस पर चुप हैं। वस्तुन अपसुतिप्रकरण में मी इसने मिलती जुलनी निम्नलिखित बात भाई है-'अपङवपूर्वरक आरोप तथा आरोपपूवंक अ्पद्व ।' आरोप साहश्यमूलक दोता है। प्रथम भेद में अपछन उसका निष्पादक होगा। फळत वह़ाँ अपदब सादृश्य के हिए दोगा। द्विवीय में सके विपरीत 'सादृश्य अपहव के लिए' होगा। इसमे प्रकृत ग्रन्थ का संबन्ध जोडा जा सकता दे। इविहास-व्याबोकि वामन को देन है। उनका सूत्र है-'व्याजस्थ सत्यसारूप्यं व्याजोकि:।' व्याजपूर्ण वस्तु का सत्य वस्तु के साथ सादृश्य व्याजोकि कहलाती है। इसे वामन ने मायोकि मो कहा गया बतलाया है। उदाइरण-'काशपुष्पलवेनेदं साशषुपात मुसं मम' मेरा मुख आमूँ युक्त इसलिए है कि इसमें कामपुष्प का दुकडा मर गया है। यहाँ सात्विकमाव से जनित अध्ट को काशपुष्प के वहाने छिपाया गया है उद्ट और स्ट्रट के काय्यालंकारों में यह अठकार नड़ीं मिलता। मम्मट-ने 'रेलेन्द्रप्रति०' पद्य का ही उदाइरण देते एए व्याजोकि का विवेचन इस प्रकार किया था-
[वृ०] निगढमपि वस्तुनो रूप कथमपि प्रमिन्न केनावि उयपदेशेन यदपछ्यते सा ब्याजोकि1 न चैशपहतिः प्रकृतापकृतोमयनिषठस्य साम्यस्येहासमवात्। उदा०सेलेनद्र। अन पुलकवरेपयू- सास्विकरूपतया प्रसतो रौत्यकारणतया प्रकाश्वितत्वादपठपितस्वरूपौ व्याजोकि प्रयोजयत।'
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प्रकट हुप वस्तुरूप को एल द्वारा छिपाना ज्यानोकि। चस्तु का रूप छिपा दोने पर किसी प्रकार मकट हो गया हो तो किसी भी बदाने से उसे जो छिपाया जाता है वह ब्यानोकि कइलाता है। यह अपदृति नहीं ह क्योंकि यहाँ प्रकृत और अप्रकृत के बीच साम्य की विरक्षा नहीं है। 'उदा० सैलेन्द्रपति०' में रोमांच और कम्प सात्वकरूप में प्रकट द और शैत्यजनित चतलाकर उनकी वास्तविकता छिाई गय। स्ष्ट ऐ कि सबस्वकार का विवेचन मन्मट के विवेचन पर आाखित है। रहनाकरकार-ने ज्याजोकि को व्याज के लिए वाक्यप्रयोग तक सीमित नहीं रखा, उसे चेष्टा आदि द्वारा मी संमव वतलाया है। इसी प्रकार उद्धेद=प्रकाशन को भी दो प्रकार का माना है आशक्यमान तथा उत्पन्। इस प्रकार उन्होंने इसे चार प्रकार का माना है। चेष्टा आदि को उतित्वरूप मानने के लिये उन्हें रक्षगा का सदारा लेना पढ़ा है। उनका लक्षण केवस- 'उद्मेदप्रच्छादनं व्याजकि: ।। १०४।।' उद्टेद=प्रकाशन को छिपाना=ढैकना म्याजोकि'-इतना दी है। इनका आशंक्यमान उद्धेद का उदाहरण अप्पयदीक्षित के उदाहरण से गतार्थ है। इत्पन्न उद्धेद के लिए उन्होंने 'शैकेन्द्रप्रतिपादमानय' पद्य का ही उदाहरण दिया है। मोलित औौर व्याजोकि का अम्तर करने दुए उन्होंने लिसा है- 'उद्धेदस्य निरूपणं स्वरसती हेत्वन्तरान्वेद भवेत प्रत्यूद: समध्मकोरकटगुणप्रच्छादनान्मीलितन्। ्याजोसेर मिसन्धिपूर्वकतया चेशादिनोकत्याडथवा व्याजेन प्रतिभेदगद्दनमतो युक्तं विवितं वपुः ॥' मीलित और ब्याजोकि दोनों में उद्भेद ती स्वतः होता ह किन्तु अच्छादन के हेतु में अन्तर रहता है। मोलित में प्रच्छादन ममान धर्म वाले पदार्थ के उत्कृष्ट गुणे से होता है, जब कि न्याजोकि में चेषा मादि के द्वारा अथवा वाक्य द्वारा पच्छादन जानबूझ्ष कर किया जाता है। अप्पयदीक्षित = 'न्याजोकिरन्यहेतूकत्या यदाकारस्य गोपनम्। सरि I पश्य सृहारामपरागेरस्मि धूसरा ॥' 'कोई अन्य हेतु देकर आकार का छिपाना व्याजोकि कहलाता है। यह-'ह सखि! देख मैं घर के बगीचे के पराग से धूसरित हो गई हूँ।3 यहाँ भूल में पड़ कर की गई चौर्यरति किसी के द्वारा जानने के पहले ही छिपाई गई है। न केवल वाक्य ही अपितु चेष्टादि अन्य हेतुओं को मो अप्पयदीक्षित ने रत्नाकरकार के ही समान पच्छादनदेतु माना है। जैसे कोई नायिका अपने अनुरागजनित रोमांच को प्रणाम के वहाने छिपाती है।' पण्डितराज के रसषगंगाघर में यह अलंकार नहीं मिलता। चिश्वेश्वर-ने मी वाक्य और चेषा दोनों के द्वारा प्रकट भाव के छिपाद में व्यानोकि मानी है-
अप्रकाश्यस्यार्थस्य कथच्निद् विभावनप्रसके सति कैनचित कैतवेन तदपह्वो व्याजोकिरित्यर्थ:। अप्रकाशनीय सर्थ का किसी भी प्रकार से मकाशन का प्रसंग या जाने पर किसी भी बहाने उसे छिपाने को व्याजोकि कहा जाता है।'
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वाक्यानिरिक्त उपाय का उदाइरण उन्होंने 'दम्पत्योनिशि०' पथ दिया है जिसकी भावयोजना यह है-'रान की यानचीत जय शुक सबेरे सखियों के सामने वोळने लगा तो चतुरा ने अनार का दाना देकर उसकी चोंच बन्द कर दी। चक्रवर्ती को निम्कृष्टार्थंकारिका इस अलकार पर यह है- निगहनम्। अपदवाय सादृश्ये दृष्टा नापसुतियंत.।।' प्रकट सर्थ का व्याजवचन के दारा हिपाना व्यानोक्ति कहलाता है। यह अपहति नहीं है क्योंकि वह सादृश्यमूलक अपदव [छिपान] में होती है।' [ सर्वस्व ] [सू० ७८]अन्यथोक्तस्य वाक्यस्य काकुश्लेपाम्यामन्यथा योजनं वक्रोक्ति:। उक्तिव्य पदेशसाम्याद् व्याजोदत्यनन्तरमस्या लक्षणम्। यद्वाक्यं केन- चिद्न्यथामिमायेणोकं सद्परेण वक्त्रा काकुप्रयोगेण श्लैपप्रयोगेज वान्यथा न्यार्थघटनया योज्यते तदुक्ति: वक्रोक्तिः। काकुप्रयोगेण यथा- 'गुरुपरतन्त्रतया वत दूरतरं देशमुद्यतो गन्तुम्। अलिफुल कोकिललत्िते नैष्यति सप्ि सुरमिसमयेडसौ ॥' अत्रैतद्वाक्यं नायिकया आगमननिषेधपरत्वेनोक्तम्। तत्सख्या काकु. प्रयोगेण विधिपरतां प्रापितम्। काकुवशाद्विघिनिषेधयोविपरीतार्थ- संक्रान्तिः।
यथा- 'अहो केनेदशी बुद्धिर्दार्ुणा तब निर्मिता। घिगुणा भ्रूयते बुद्धिर्न तु दारूमयी कचित्।' +-
अत्र दारुणेति प्रथमान्तं प्रकान्तं श्लेपभङ्गया तृतीयान्ततया संपादि तम्। सभदश्लेपमुसेन यथा- "त्वं दालाहलभृत्करोपि मनसी मूच्छो समालिद्वितो हालां नैव विममं नैव च दलं भुग्वे कथं दालिक:। सत्यं हालिकतैव ते समुचिता सकस्य गोवाहने वकोक्त्येति जितो दिमाद्रिसुतया स्मेरोऽवताद् वः शिवः।।' उभयमुखेन यथा- विजये कुशलस्त्र्यक्षो न कीडितुमद्दमनेन सद्द शक्ता । चिजये कुशलोऽस्मि न तु व्यक्षोऽकद्रयमिद पाणी।।
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किं मे दुरोदरेण प्रयातु यदि गणपतिने तेऽभिमतः। कः प्रद्वेष्टि विनायकमिलोकं कि न जानासि॥ चन्द्रग्रहणेन विना नास्मि रमे कि प्रतारयस्येवम्। देव्ये यदि रुचितमिदं नन्दिन्नाह्यतां राहुः॥ हा राही शितदंष्ट भयकृति निकटस्थिते रतिः कस्य। यदि नेच्छसि संत्यक्त: संप्रत्येषैव हाराहि:॥ वसुरहितेन क्रीडा भवता सदद कीदशी न जिहेषि। किं वसुमिर्नमतोSमून्सुरासुरान्नैव पश्यसति पुरः॥ आरोपयसि मुधा कि नाहममिक्ञा किल त्वदङ्गस्य। दिव्यं चर्षसहसरं स्थित्वेति न युक्तमभिधातुम्॥ इति कृतपशुपतिपेलवपाशकलीलाप्रयुक्तवकोक्ति। हर्षवशतरलतारकमाननमव्याद् भवान्या वः॥'
[सूत्र ७८] अन्यथा कथित वाक्य की काकु और श्लेप के द्वारा अन्यथा योजना [ हो तो अलंकार को ] वक्रोकि [कहषा जाता है] [वृत्ति] इसका लक्षण उक्ति में छल की समानता को लेकर व्यानोकि के बाद किया जा रहा है। जो वाक्य किसी [अन्य] के द्वारा अन्था अर्थात अन्य अभिग्राय से कहा गया हो और अन्य के द्वारा काकुपयोग किंवा श्लेषप्रयोग के आधार पर, अन्यया अर्थात अन्य अर्थ में उगाया जाता है उस [वाक्य ] की उक्ति वक्रोक्त कहलाती है। काकु प्रयोग से, यथा- 'बड़ों के अधीन होने से दूरतर देश जाने को उद्यत यह हन्त, अलिकुल और कोकिल से ललित सुरमिसमय में नहीं आएगा'। इस वाक्य को नायिका ने भगमन के निषेध [नहीं हो आएगा-इस] के अभिप्राय से कहा, [अतः इसमें बत या हन्त का अर्थ सेद हुआ किन्तु] उसकी सखी ने [ नहीं आमगा क्या? इस प्रकार] काकुप्रयोग से [अवश्य भाषगा इस सर्थ में] विधिभरक बना दिया।[ अतः इस अर्थ में वत या हन्त का अर्थ हर्ष हुआ] निपेधरूपी अर्थ की विधिरूप अर्थ में जो संक्रान्ति हुई उसका कारण काकु प्रयोग है। श्लेप अमङरूप समङ्रूप, तथा उमयरूप से तीन प्रकार का होता है। इनमें से- अभन्गश्लेप से [ वकरोक्ति ] यया- 'महो ! किस दारुण ने तुम्हारी इस प्रकार की बुद्धि बनाई है। बुद्धि तो तीन गुणो [ सत्त्व, रजस् तथा तमस् ] से बनी सुनी जाती है, दारु से बनी तो कहीं नहीं। [दारुणा= दारुण शब्द का स्त्रीलिंग प्रथमैकवचन तथा 'दारु' शब्द का तृतीयैकवचन। दोनों पक्षो में बब्द एक ही बना, अर्थमेद के साथ उसमें भङ्ग नहीं हुआा अतः यद अभझद्लेष का उदाहरण हुआ ।। समह्लेष से [वकोकि ] यया- [पार्वती] 'तुम हालाहलधारी [इालाहल = विष तथा हाला=वारुणी और हल को धारण करने वाले हो, अतः आलिजन करते ही मन को मूच्छित कर देते हो। [शिव] प२ अ० सु०
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न मैं इाछा ही भारण करता और इल दी, धरी मोली, मैं क्या दालिक [किसान] हूँ। [पावती ] तुम्हें (सचमुच) इालिक कहा जा सकता है क्योंकि तुम गोवाइन [गो=नन्दी वृष, तनूषी वाहन तथा गो = बैल को हाँकने] में वो लगे रहते हो। इस प्रकार बक्रोकि में पावती जी द्ारा जीत लिए गए अत एव मुसकुराते हुए भगवान् आपकी हमारी रक्षा करें। उमयश्लेष से [ वक्रोकि], यया-[ उमामहेश्वरसवाद-[पावेती] [ससि] विनये, [ विन्रया का सम्बोधन तथा विजय शष्द का सप्तम्येकवचन] ये त्यक्ष [तीन अक्ष = अक्षि - नेत्र तथा अक्ष=पासे वाले] बडे कुशछ है। मैं इनके साथ घनक्रीटा नहीं कर सकनी। [शिव] विजय में तो कुशल हूँ परन्तु व्यक्ष [तीन पासे वाखा ] नहीं हूँ, मेरे हाथ में पासे केवल दो हो हैं।। [पार्वती ] मेदुरोदर [मे =मुझे दुरोदर=घुन तथा मेदुर +वदर वाछा मैदुरोदर = गणेश] नहीं भाता। [शिव] यदि तुम्हें नहीं माता तो गणेश चला जाए। [ पावती ] विनायक [बिना यक= गणपति तथा वि पक्षी उनका नायकगरुड] से किसको देष दे, [श्िव] तुम्हें कया अदिलोक [सपो] का ज्ञान नहीं है[ लो गरु से देप करते हैं] । [ पा्वरिती] मैं चन्द्रमहण [चन्द्र की वाजी तथा चन्द्रग्रहण राहूपराग] के बिना नहीं सळती यूँ सो क्यों मुझे छल रहे हो। [शिव] नन्दिन् ! देवी को यदि यही प्रिय है तो बुलाओ राहु को॥। [पावती] इा राहो [डा,रादी=रात्ु पर, झर+अद्दो=द्वार के सर्व पर] जो तीसो डाढ वाल और बरावना है, पास बाम तो किमे प्रेम दोगा। [शिव ] यह इारादि [दारभूत सर्प ] तुम्हें पसन्द नहीं तो को इसे ममो दाल छोडे देता हूँ।। [पासती] तुम ठहरे वसु[ धन तथा आठ वस]-रहित। तुम्वारे साथ कैसा जुआ, लाज नहीं याती। [ शिद] सामने [आठो ] वस्तुओं के साथ प्रगाम कर रहे इन देव और दानवों को देख नहीं रही हो क्या । [ इम सर्यो का 'सह वसु-पश्यसि किम्? ऐसा पाठ अधिक अच्छा होता I ॥ [पावंती ] वेकाम क्यों आरोपसि [आरोप लगा रहे, उठा रहे हो] मैं तुम्हारे अङ्क [दोष रेषण तथा गोद] से अनमित हूँ। [शिव ] हजारो दिव्य वर्षो तक [गोद में ] देठकर मी इस प्रकार कहना ठोक नहों।।' -हम प्रकार शिव के साप घुत की ललित कीड़ा में प्रयुक की गई वकोकि की प्रसन्नना से चंचल तारा वाला पवती का मुखमण्डल साप इमारी रक्षा करे॥ [ यहो-विभये, व्यक्ष, विनायक, ग्रहण, वक्ष, आरोप तथा अक्ठ शष्द में खोड नहीं छोती अन: ये अमह श्लेप के उदाहरण है, मेदुरोदर तथा हाराहौ शब्द में वह होती है अत. समझ- शळेष है। पूरा सन्दर्भ एक वाकोवाक्य है अतः यहाँ आरम्म से अन्त तक एक बकोकि मानी घायगो ]। दकोकि शब्द अर्रकारमात्र का वाचक है तपापि यहाँ एक विशिष्ट अलंकार के लिए प्रयोग में लाया गया है। विम्शिनी अन्यथेत्यादि। पतदेव व्याधष-यदक्यमिति। अन्यामिप्रायेमेति। विवचितार्थंपरतये स्व्थ:। काकु: ध्वनिविशेष 1 यदुक्रम- 'वाक्येऽभिघीयमानोऽयों येनान्य: प्रतिपद्यतै। मिलकण्टध्वनिधीर: स काकुरिति कथ्यते।' अन्यार्थघटनयेति। प्रकान्तादन्यस्य व्यतिरिकस्यार्थस्य घटनयोषलेखनेनेशयथः। येनकेन- चिहवत्रामिमेतार्थरय प्रतिपिपाद्यिषयोफाय वाक्यस्यान्येन विघाताय महेलिकामानार्य
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चकरोक्त्यलह्ार: ६५९
'नवकम्बलको्ऽयं माणवकः इत्यादिना वाषछलेनान्यथायोजनमात्रमयमलंकार इति पिण्ठार्थः। अत एव द्वितीयो व्याघातो नास्या भेदतया चाच्यः। न हि तन्न वचनविघ्याता यवान्यथा योजनस्। तन्र हि 'बाल इति सुसरामपरित्याऽयोडस्मि, रक्षणीय हति मवद्सुष- पञ्षरं रक्षास्थानम्' इत्पादो वालत्वादिकं प्रस्थाननिषेघ कतमा राज्यवर्धनेन संभावितं श्रीह्र्षेण पुनरन्पथा प्रस्थाननिमिततया योजितम। अवश्नाब्ान्यया योजनश्य प्रस्तुतवस्तुव्याह- तिनियन्धनरवेऽपि प्रस्थानविषौ तात्पर्यम। ननु तद्विघातमात्रेणास्य चक्रीक्तावन्तर्भाव इति चेतू तहिं साध्न्यविशेपादुपमेयोपमादी नामप्युफ्मयामन्तर्भाव: कि न स्याद। अथात्र फलभेदोऽरतीति कथमेतदिति पेतू, एवमिहापि फलमेदस्य विद्यमानरवात्कयम- स्थान्तर्भावः स्याद। तथाह्यन्यथा योजनस्य कचिह्चनविदातमानं फलं कचिव्व संभाव्य-
तेन पूर्वन्न वक्रोफिस्परन्न व्याघात इति यथोक एवालंकारभेदो न्याय्य:। एवं फलान्तरे- पवपि जञेयम्। तस्मात् 'एप श्रीकण्ठफण्ठच्छविरनमिमतो राजहंसव्रजानां सययस्तापं द प्रजानां प्रशमसुपनयनच्छुधाराच्छवेन। कुर्बन्दियपकवालाक्रमणमुदयते देव को चारिवाहो मा मैवं माळवेन्द्रो परिमल कतरस्तर्दि राजनसिस्ते ।' इत्यन्न श्रोम्रा संभावितस्यान्यथा सद्गव्वेन योजनं, तक्ष्य तत्सादृश्यप्रतीत्यर्थ- मिर्यमन्भू तोत्तर मार्थमौपस्यं वक्तुर्विचष्चितम्। 'वाक्छुलमुपचारच्छ्रलस्, तदविशेषा दि'ति वाक्छलेनैवास्य संग्रहादुपचारच्छलातमकम् । 'कचिर्वीपचारिके प्रयोगे मुख्यार्थापादनमिति भेवान्तरमप्यस्था न वाच्यम्। यस्तु तदर्थान्तराभावादिति न्यायादागुपचारण्ट्ळयोर्विशेष उच् स नैयायिकानामुपयुक्को नालंकारिकाणाम्।
गतफल्ह्धयन्यायेन शव्श्रिष्टवादश्य रलेषवक्रोक्तावन्तर्भावः स्यान। उभयमुखेनेति समग्ासभङ्गश्लेपपवारेण । विजय इति श्ेस्यासभाम्। मेदुरोदरेणेति सभक् रम्। 'स्मेरोऽवताट्ट: शिव'' तथा 'प्रयुकतनछोकि' हत्यादिना वचनविधातमान् प्रयोजनस्यान्यथा योजनस्य मरहेलिकाप्राय्यत्वमेव प्रफाशितम्। ननु 'सैपा सर्वेव चक्रोि: कोलंकारोऽनया चिना' इति नीत्या समग्न एवालंकारवर्गो वक्रोकिरूप इति कथ मयमेव तथारवेन नि्दिष्ट इत्याशक्याह-त्रकोकोत्यादि। इहेति। वाक्छुलात्म करचेनोकेः कोटिल्याव। अन्पथेस्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-यद वाक्यम्। अन्याभिमायेण=अन्य अर्थ के अभिपाय से = अर्थात विवक्षित अर्थ के अभिप्राय से। काकु = स्वरविशेष। जैसा कि कहा है- 'दक प्रकार की मसाधारण या विशेष प्रकार की उस कण्ठव्वनि को काकु कहा जाता है जिससे [ सामान्य ] वाक्य में कहा जा रहा अर्थ अन्यरूप में समझा जाता है। अन्यार्थघटनया=प्राकरणिक सर्थ से मिन्न किसी अन्य अर्थ की घटना= सक्लेख=समझ से। निष्कर्ष यह कि किसी वक्ता के द्वारा अपने अमिप्रेत सर्थ के प्रतिपादन के लिए कहे गए वाक्य की योजना का, उस मर्थ को काट कर पहेली के समान 'नवकम्बलको्डयं माणवक' (न्यायदर्शन सूत्रमाष्य १३३।१२) इत्यादि । वाक्छल के मध्यम से दूसरे रूप में किया जाना ही इस अलंकार का स्वरूप है। इसीलिए [रत्नाकरकार को] द्वितीय व्याघात को इसका भेद नहीं बतलाना चाहिए। उसमें अर्थ की जो मिन्न
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रूप में योजना होती है वह केवल किसी के वचन को काटने के लिए नहीं। उसमें तो 'बाछ हूँ तो और भी अपरित्याज्य हूँ, रक्षगीय हू वो रक्षास्थान आप का ही सुजपअर है' इ्यादि स्पसों में राज्यवर्धन वालत्वादि को प्रस्थाननिवारक समझता है, स्रीहर्ष उन्हें प्रस्थाननिमिच के रूप में बनलाते है। [अर्थोद यहाँ विघातक को साधक बनाया जाता है जब कि बकोकि में साधक को विघानक रूप में लिया जाता है]। इसीलिए -यहाँ 'अन्यया योजना'= दूसरे प्रकार से लगाने' में, प्रस्तुन अर्थ का विधान तो दोता है परन्तु, तारपये प्रस्थानविभि में ही रहता है। बेवल उस [प्रस्तुत अर्थ] के विवान मात् को लेकर इस [ व्याघाव के दिनीय भेद] का वक्रौकि में अन्तर्माद करेंगे मो सब में साघम्यें की स्थिति समान देसकर उपमेयोपमा आदि का मीउपमा में हो अन्तर्माव करना होगा। यदि कहें कि यहाँ [ उपमा और उपमेयोषमा आदि में ] फल मिन्न होता है। [उपमा में केवल सादृश्य उपमेयोपमा में द्वितीयसदृश व्यवच्छेद् ] अतः यह मैसे समव है[ कि उपमेयोपमा आदि का उपमा में अन्तर्माव किया जाए] तो इस [भ्याघात] का अन्तर्माव भी मैसे किया जा सकता है; फल में मिन्नना यहाँ भी विधमान है। यह इस प्रकार कि कहीं तो 'मन्यया योजना' का फक केवल वचनविधात दी होता है और कहीं होता है अन्य किसी मर्थ का प्रति- पादन, यदपि इस दूमरे प्रकार में अन्य अर्थ का विधान मी रहता है। यह तो सर्वमान्य सथ्य है कि अलंकार का भेदक तत्व फलमेद ही है। इमलिए प्रथम स्थल में बकोकि और द्वितीय में व्याघात मानना उचित है। मतः इन अरंकारों में [सबस्वकार ने ] जो भेद बतलाया है उसे [रत्नाकरकार को भी] उसी रूप में स्वीकार करना उचित है। इसी प्रकार अन्य मलकारों में मी जानना चाहिए वहाँ अन्य फल निकन्ते हैं। इस कारण-[अंकारररनाकरकार द्वारा वकोफि के उदाहरण के रूप में उद्धृन ]। "[कवि ] है देव, यह उदित हो रहा है, जिसकी छवि नीलकण्ठ (भगवान् शिव) केकण्ड के ममान है, राजइसों को अप्रिय है, स्वच्छ धारा के जल से प्रजा वर्गे का सनाप तत्काल श्ान्त करता है, जो दिखाओं पर आक्मण करता है, [राजा ] कौन, मेघ? [कवि ] नहीं मालवचन्द्र ! ऐसा नहीं, [ राजा ] तप कोन है ऐमा, [ परिममकवि] राजन् नापका खन्ग । इस पद्य में सुनने वाले [राजा माइसांक] के द्वारा समावित मेघरूपी सर्थ की योजना सदगरूप में की गई है, ऐसा उस [सडग] से उस [मेघ ] के सादृश्य का ज्ञान कराने के लिए किया गया है। इम कारण यहाँ वकरा का विर्दाक्षत अर्भ सादृस्य ही है, जिसमें यहा उत्तरालंकार को भंग बनाया गया है। 'उपचारच्छल को वाक्छल हो कयों न मान लिया जाए, क्योंकि उसमे इसका कोई अन्तर नहों है, [न्यायदर्शेन १।२।१५ दारा प्रतिपादित] इम वाक्ल के द्वारा हो इस [रत्नाकरकार द्वारा कश्पित उपचारवकरीकि नामक बकोकि के नवीन भेद] का सम्ह दो जाना है, अत. [रत्नाकरकार ने बो] उपचारच्छसात्मक भेद यह कहते हुए माना था कि 'प्रयोग कहीं औपचारिक होना और वहो मुख्यारयें को रूपर से लाना पडता है', वह भेद मी इस [वकोकि] में नहीं बतलाया जाना चाहिए। [न जाने किसने और कहां] जो 'उन में अर्थान्तर का अभाव रहता है' यह तर्क देकर वागुपचार और वाक्छन का अन्तर किया है वह न्यायवास्यों के लिए उपरयुंक्क है, आरंकारिकों के लिए नहीं। अथवा मुख्य और औपचारिक दोनों सरथों का प्रकान्तगत दो फलों के समान शब्द के साथ चिपके रहने से इसका अन्तर्माव दवेषवत्रोकिमें हो सकता है। उभयमुसेन= समझ तथा असमन दोनों दलषों के द्वारा 'विजये'-इममें दलेष असमझ है तथा 'मेदुरोदरेण' में समद। 'मुसकुशाने शिव आपको और हमारी रक्षा करें तथा 'बकोकि के प्रयोग से' हत्यादि के दारा यही सूचित किया कि 'कन्य प्रकार से योजना करने का' उद्देश्य केवल वचनविधान ही रहता के, व्यस यह पहेली जैसी ही रहती है।
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वक्रोक्त्यलङ्कार: ६६१
'यह सद वकोक्ति ही है इसके बिना कौन सा अलंकार निष्पन्न हो सकता है' इस प्रकार [मामह आदि आचार्यों ने] सभो अलंकारों को बकोकिरूप ही बतलाया है। तब यहाँ इसी मलंकार को वकोकिरूम कर्यों कहा 'ऐसी शंका उठाकर उत्तर देते हैं-वकरोकि०। इह-यहाँ अर्थाद क्योंकि इस अंकार में वाक्छसरूप से वोला जाता है अतः इसमें कुटिलता रदती है मसः इसे 'वक'-उकि कहा।'
विमर्श-द्वितीय व्याघात का 'वाल इतिव' इत्यादि जो वदाहरण हूर्षचरित से दिया गया है उसमें रत्नाकरकार ने अर्थवक्रोंक्ति मानी थी। उनके अनुसार वकोकि केवल शब्द का ही अलंकार नहीं है। विमशिनीकार ने टनका खण्डन और सर्वस्वकार का समर्थन करते हुए न्याघात के द्वितीय भेद और वक्रोकि में अन्तर स्पष् किया है। उनके कथनानुसार इनका अन्तर फलगत भेद पर निर्भर है। नकोकि का उद्देश्य या फल केवल वचनविघात अर्थात दूसरे के कहे शब्दों की तोढ़ मरोड़, सथवा वक्ता द्वारा अमिप्रेत अर्थ को बदलना होता है। इस प्रकार वकोकि का चमत्कार अभाव या निराकरण पर ही निर्भर रहता है। व्याघात के द्वितीय भेद में न तो वक्ा के शब्दों की तोड़ मरोड़ ही रहदती, और न उनका पूर्वाभिमत मर्थ हो वदला जाता, केवल उसकी अग्राह्यता सिद्ध की जाती है; किन्तु इसका उद्देश्य केवल यही नहीं रहता। इसमें द्वितीय अर्थ की स्थापना मी की जातो है और यही मुख्यतात्पर्यविषयीभूत मर्थ होता है। न्याय की भाषा में यहाँ-'पूर्वप्रतिपादितका रणतानिरूपितप्रतियोगिता को पूर्वप्तिपादित कार्य से इटाने मात्र में तात्पर्य नहीं है अपितु उसे तद्विरुद्ध कार्य में नियोजित करने में तात्पर्य रहता है।' इस प्रकार इस अलंकार का चमरकार समाव पर नहीं विधि पर, और निराकरण पर नहीं स्थापना पर निर्सर रह्ता है। इतिदास :- वक्रोकि एक विशिष्ट अलंकार- चकोक्ति नाम तो वामन में भी मिलता है किन्तु वहाँ इसका स्वरूप मिन् है। उनका सूत्र है- घामन-'सादृश्यलक्षणा वक्रोकिः । अर्थाद गौणी लक्षणा वकोकि है। उद्ाहरण के लिए 'उम्मिल कमलं सरसीनाम'। 'तलैयों के कमल खुल गए।' यहाँ उन्मोटन पर खुलना धर्म नेत्र का है, उसे विकासरपी साधन्यं के आधार पर कमल में अन्वित कर दिया गया है। इस प्रकार वामन की नक्रोकि औपचारिक वाक्यप्रयोग है। रुद्ट-इसका यह जो रूप सर्वस्वकार ने दिया है प्रथमतः रुद्रट में मिलता है। उनहोंने इसे शब्दालंकारों के प्रकरण में गिना है और इसका विवेचन इस प्रकार किया है- 'वक्त्रा यदन्यथोकं व्याचषे चान्यथा तदुत्तरद:। वचमं तत्पदभदैर्जैया सा रलेशवकोकि: ।२।१४।। वक्ता द्वारा मन्य अभिप्राय से कथित वाक्य की व्याख्या उत्तरदाता के द्वारा परदों को तोड़ मरोड़ कर अन्य प्रकार से की जाय तो वह अलंकार शलेपवकोकि कहकाता है। उदादरण- कि गौरि मां प्रतिरुपा ननु गौरहं किम्।' शिवजी ने कहा 'गौरि मां प्रति= हे गौरी! मेरे प्रति रोप क्यों। पार्वतीजी ने अर्थ लिया 'गौः इमां अ्रति' सर्थात 'हगौ, इसके पति रोष क्यों, और उत्तर दिया कि 'क्या मैं गौ हूँ।' इसी प्रकार रुद्रट ने काकुनकोति का भी एक स्वतन्त्र लक्षण और स्वतन्त्र उदाहरण दिया है।
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सम्मट-ने रुद्रट का पूर्णनः अनुसरण किया। उनहोंने वक्रोकि को शम्दालकार प्रकरण में ही नवम वल्लास में प्रथम अरकार के रूप में गिनाया। उनका विवेचन- 'यदुक्तमन्यथा वाक्यमन्यथान्येन योज्यते। श्लेषेग काका वा घेया सा वकरोकिस्नय दिया ।' जहाँ दूसरे के द्वारा अन्य प्रकार से कथित वाक्य अन्य के द्वारा दलेप या काकु के द्वारा अन्य प्रकार से योजित किया जाता है वद दो प्रकार की बकोकि जाननी चाहिए। स्पछटत. रुद्रट से आगे बढकर मम्मट ने वक्रोकि में अर्थभेद के कारणों का भी निवेश किया। उन्होंने इलेष के दोनों प्रकार भी इसमें अपनाए अमह और समझ। इनमें से अमजरलेप के लिए जो उदाहरण सरवं रवकार ने दिया है वह मम्मट से दी लिया गया है। समसदलेय के लिए उनका उदादरण है 'नारोगा प्रतिकूलमाचरसि चेज्ानासि कश्चेवनो वामाना प्रियमादभाति'। यदि तुम नारोगाम [नारी ख्री, न अरि=शत्रुओों के प्रतिकूछ] आचरण करठे हो तो विदान् हो । कौन चेनन ऐेसा दोगा जो वामाना [बाम प्रतिकूल = नधु, वामा- मन्दरी का] प्रिय कार्य करता हो। काकु के लिए मी सवस्वकार ने मम्मट का ही उदाहरण उद्धृत कर दिया है। सर्वस्वकार का वक्रोक्ति का आधार स्पष्टत. मम्मट का वकोक्तिविवेचन है। शोभाकर-परवर्ती आचार्यों में रश्नाकरकार शोभाकर ने वकोक्ति को, जैसा कि कहा जा चुका रे शब्द औौर अर्ष इन दोनों में माना है। उनका सकषण इस प्रकार ह- [सू०] 'अन्यथा संभावितयो, शम्दारथंयोरन्यया योजनं वकोसि:। [वृ०] वक्धा सोवा वा शष्दस्यारयर्य वान्यया मंभावितस्य प्रकारान्तरेण योजन वक्रोकि:। [ सू०]'मन्यया समावित्र शम्द औौर अर्थ की अन्यया योजना वकोकि कहलाती है। [दृ०] वका या सोता द्वारा अन्यरूप में समाविन शब्द या मर्य की अन्य प्रकार से योखना चक्रोकि कइछाती है। इस अन्ययायोजना के उपायों में रत्नाकरकार ने काकु और इलेप के अतिरिकत धर्ममामान्य को मी गिना दै । 'एघ सीडण्ठकण्ठ० पद् में धर्मसाम्यमूलक वकोकि मानते हुए रत्नाकरकार ने लिखा है- .. कालरवादिघर्मार्णां वारिवाइगतख्वेन थोता समावितारना वक्त्रा खड्गगतत्वेन योजना कृतेति धर्मसाम्याद वक्रोकि। यहाँ श्यामस्वादि जिन धर्मों की संभावना सोता द्वारा मेघ में की गई थी वका ने उन्हें खड़ग में अन्वित किया, इस प्रकार यहाँ साधारण धर्म के आधार पर बकोक्ति हुई। सवस्वकार द्वारा श्लेष के प्रकरण में मिस 'आकृष्य0' आदि पध में अपसुति मानो है, र्नाकरकार ने उसमें भो वक्रोकि की ही तक विधा स्वीकार को हे- 'अत्र कान्तस्य सम्पन्चिमिः अठकादिकर्षणादिधर्मस्य चोसकैधी योगाव पूर्ववद् वक्रोकि:। यहोँ प्रिय से सम्बन्धित अलकादिकर्षणप्रभृति के द्वारा चोषक में भी साधारणघर्म की योबना दो जाती रे सत यहाँ भी पूर्ववस[एप शीकण्ठ पद् के हो समान ] वक्रोकि है। अर्थगत वक्रोकि के सन्दम में 'बाल इति०' रयल पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- 'अब्र वाहत्वादिकं प्ररयाननिषेधकतया राज्यवर्धने रुमावितम्, औ्रीदर्षेंण प्रस्थाननिमित्तक-
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वक्रोक्त्पलह्कार: ६६३
यहाँ वालत्वादि को राज्यवर्धन ने प्रस्थाननिषेषक समझा। उन्हों को श्रीहर्य ने पस्थान- निमित्त सिद्ध कर दिया। अतः यहाँ वर्थ बक्तोकि ही है। अप्पयदीपषित से अर्थवकोकि को समर्थन मिलता है। उन्होंने शब्दस्लेप को भी वकोकि का उपाय बतलाते हुए यह उदाहरण दिया है- लक्ष्मीनी पार्वतीजी से कहती हैं- 'मिक्षार्थी स क यातः सृतनु'! यह मिखारो कहाँ गया सुन्दरी! पार्वती जी उत्तर देती है- 'इलिमखे'-बलि के यश् में। वामनावतार में विष्णु भगवान् ने मी वलि से याजना की थी। यहाँ 'मिकषार्थीं' शब्द के स्थान पर 'याचक' शब्द दिया जा सकता है, किन्तु 'याचना'-अर्थ नहीं वदला जा सकता, मतः इलेप अर्थ गत ही है। विमर्शिनीकार के अनुसार यहाँ पूर्वप्रतिपादित गर्य के काटने में चमत्कार है अतः अलंकार बकोकि नाम से ही पुकारा जारगा। व्याघात का चमत्कार पूर्वप्रतिपादित अर्य को विरुद्धफलक सिद्ध करने में होता है, उसकी काट में नहीं। अतः सर्थनकरोकि मानने पर भी उसका स्वतन्न्न अस्तिरव नहीं मिटता । अप्पयदीक्षित ने काकु तथा शब्दश्लेप के दोनों प्रकारों को भी बकोकि का उपाय माना है और उनके पृथकृ-पृथक उदाहरण दिए हैं। अमझश्लेषमूलक वकोकि का उदाहरण तो 'अह्दो केनेदशी०' पद् ही दिया है। दोनों प्रकार की बकोकियों को दीक्षितनी ने एक ही अलंकार माना ऐे और उनका कक्षण इस प्रकार बनाया है- 'वकोकि: इलेपकाकुभ्यामपरार्थप्रकाशनम्।' सलेप और काकु के द्वारा अन्य अर्थ का प्रकाशन वकोकि माना जाता है। जयदेव ने इसी लक्षण में 'अपरार्थ०' शब्द के स्थान पर 'वाच्यार्थं०' शब्द रखा या। पण्डितराज जगन्नाय के रसगंगापर की अपूर्णता यहाँ भी खळती है। उसके उपलब्प अंश में यह अलंकार नहीं है। विश्वेश्वर के अलंकारकौस्तुभ में केवल गर्थालंकारों का दो निरूपण है। उनमें वकोकि नहीं मिलती। वे कदाचित इसे मम्मट के हो समान केवल शब्दालंकार मानते हैं। श्रीविद्याचकवतों की निष्कृष्टार्थकारिका इस पर इस प्रकार है- 'अन्ययायोजनं वाकये बक्रोकिरमिषीयते। द्विप्रकारा च विशेया काकुवलेषसमाश्रयात ।' २. वक्रोकि अलक्कारसामान्य- अलंकार माम को वकरोकि मानने की जो चर्चा सर्वस्व में आई है उसका मूल भामह की की निम्नलिखित घोपणा है- 'सेपा सर्वैव वकोकिरनयाथो विभाव्यते। यत्नोडर्स्या कविना कार्य: कोडलद्ारो नया बिना।' [फाव्यालं० २।८५] 'अतिशयपूर्ण सक्ति हो वकोकि होती है। इसीसे काव्यारथ में विशेषता आती है। कवि को इसके लिये यत्नशील रहना चाहिए। इसके विना कौन अलंकार अलंकार बन सकता है। मतिशयोक्ति को काव्य का सामान्य अरंकार दण्डी ने वतलाया था उन्होंने अतिशयोकि प्रकरण के अन्त में लिखा था- अलंका रान्तराणामप्येकमाङु: परायणम् । बागीशमद्दितामुक्तिमिमामतिशयाहयाम् ॥2 २१२२० ॥।
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६६४ मलङ्गारसर्वस्वम्
मामइ ने यद्यपि अविशयवत्व को ही महत्त्व दिया या किन्तु उक्त उक्ति की तुका वक्ता को ओर अधिक झुक गई। मामइ ने इसके पूर्व भी अवक्रोकति [१।३४] काम्य को अच्छा काव्य नहीं कहा था। भटंकारसामान्य का लक्षण करते हुए मी उन्होंने लिखा था-'वक्रामिधेयशब्दोकिरिष वाचाम लठ्दृवि: [१३६ ] इमें अर्थ और शब्द की वकतापूर्ग उतति हो काव्य का अलकार मान्य है। दण्डी के अतिरपत्त्व में निश्चिन हो मामह ने बकतानत्त्व खोज निकाला था। और उमे अपेक्षा- कृत अधिक महत्व दिया था। इसो कारण उनकी उपर्युक्त-'सेपा सवैंव०' कारिका आनन्दवर्षन 7 और मम्मट ने मी प्रमाणभूत कारिका या सिद्धान्नवचन के रूप में रवीकार कर ही है। आनन्दवर्षन और मम्मट के बीच हुए कुन्तकाचार्य ने तो वकोकि को हो काव्य का प्रमुख तत्व स्वीकार कर िया था। सर्वस्वकार ने आरग्मिक भूमिका में उनका उक्लेस भी किया है। उनका मठ है- 'ठभावेतावसकार्यों तवो. पुनरलछृकृति। वकोकिरेव शब्द और अर्थ अलकार्ये है और उनका अलद्कार है वकोकि। जिसका स्वरूप है वदग्ध्य पूर्वक विचिनता के साथ कही उक्ति॥ मंख ने थकण्ठचरित में वक्रोक्ति को चन्द्रकछा के चाँकपने के समान सर्वाविक आवर्जक द्रश्व माना है- 'कटंकशून्यापि रसप्रवादमपि स्रवन्ती वियुषेकमोग्यम्। वाणी किमेणांककलेव घछ्ते टङ्कूं विना वकिमविभ्रमेण ॥' [२।११] [सर्वस्व ] [सू० ७९]सूक्ष्मवस्तुस्वमावयथावद्वूर्णनं स्वभावोक्ति:। इद वस्तुम्यभाववर्णनमार्त्र नालंकार:। तत्वे सति सर्व काव्यमलंक्कारि स्यात्। न दि तत्काव्यमस्ति यत्र न वस्तुस्वमाववर्णनम्। नदर्थ सूक्षम- प्रद्णम्। सूक्ष्म: कवित्वमात्रस्य गम्य. । अत पव तननिर्मित एव यो वस्तु- भावस्तस्य यथावदन्यूनानतिरिक्तत्वेन वर्णनं स्वभावोक्तिरलंकार:। उक्ति- घाचोयुक्तिपस्तावादिह लक्षणम्। भाविकरसवदलंकाराम्यामस्य भेदो भाविकमसङ्गे निणेष्यते। यथा- 'हुद्गारो नस्त्रकोटि चञ्चुपुटकब्याघट्टनोदृङ्गित- स्तन्या: कुन्तलकी तुकव्यतिकरे सीत्कारसीमन्तित.।
सेकाकेकरलोचनस्य कृतिनः कर्णावतंसीभवेत् ।।' [सूत ७९] वश्तु के सूदम स्वभाव का यथावत् वर्णन स्वमानोकि [नामक अलंकार कहुष्ता] है। [वृच्ति] यहाँ [काव्य में] वस्तु के वेवल खवमाव [स्वरूप] का वर्णन अलंकार नहीं होता, वेसा होने पर सभी काव्य अठकार युक्त हो जाएँगे। क्योंकि ऐसा कोई काव्य नहीं जिसमें वस्तु के रवमाव [स्वरूप] का वर्णन न दो। इस हेतु [रक्षण में ] सुक्ष्म शध्द का
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अ्रष्ण किया। सूक्ष्म का अर्थ है एकमात्र कवित्व [कविमतिमा] का विषय। इस प्रकार वस्तु का जो स्वमाव [स्वरूप ] उस [कविप्रतिमारूप कवित्व] के द्वारा निष्पन्न होता है उसको [यथावत्] जैसा का तैसा अर्थात उसका कोई अंश छोडे या उसमें कोई अंश जौड़े बिना हुआ वर्णन स्वमावोकि नामक अलंकार होता है। [ब्याजोकि, वक्रोकि इस प्रकार] उक्ति शष्दान्त अलंकारों का प्रकरण होने से इसका लक्षण यहाँ किया गमा। ाविक और रसवद् अलंकारों से इसका अन्तर माविक के प्रकरण में तय किया जाएगा। उदाहरण, यथा- [नायिका ने अपनी पीवर छाती नायक की पीठ में सटा दी, नायक की ओसें काम के नशे में चूर दो गई। उसने नायिका को नखों से कुरेदा और काछागत कामाचेश में जब केश पकड़ कर रतिक्रिया करना आरम्म किया तो नायिका ने पछले सीरकार करना शुरू किया अन्त में कृतकृत्य हो जाने से अपुण काम नायक के निवारण लिए 'हुँ हु' करना आरम्भ किया। पूर्वभूमिका से लेकर दर्पशमन तक हुई इस रमण क्रिया को कवि यथावस प्रस्तुत करते हुए कपता है- ] [नायिकादारा]'पोछे से आकर चिपकर जा रहे, अवामन और विशञाल स्तनों के समार की गोद में भरी सुधा के सेक से मावेकर [शृंगारभावपूर्ण] नेम्र वाला कोई ही ऐसा बढ़भागी होता है जिसे नखों की चिमटी की कुरेद से उमड़ा औौर केशकौतुक मारम्म करने पर सीरकार से चढ़ा बढ़ा हुंकार कर्णावसंस बनाने का अवसर मिलता है।।1 चिमर्शिनी
सूक्षमेत्यादि। ननु कथ वस्तुवर्णनमात्रमलंकार इत्याह-इदेत्यादि। 'तदतिशयहेतव सवलंकारा।' हृति नीव्या वसवतिशयदायिना धर्माणासलंकारत्वात्कर्य वस्तुमात्रत्यैवा लंकारवं स्यादिति भावः। ननु कथमेतत्सयममात्रग्रहणेनेव समाहि तमित्याशक्याह- सूक्ष्म इत्यादि। कवित्वमान्रस्येति। कुशाग्रीयधिपणत्वात्। एवं स्थूलमतीनामकवीनां कुक वीनां तस्यावगमेऽपि तथा विकल्पारोहो न भवेदिति भावा। अरत पवेति। कविरवमात्र- गम्यर्वास्। तन्निर्मित पवेति। अन्शेपां तथाध्वेन वक्तुमशक्मर्वास्। तह्वस्तुगतश्यासाधा रणस्य फलक्रियादेः संभवतः स्वभावश्य शव्देद प्रतिपादनमाम्रस्वास्ततनिमित एवेटयुक्तम्। अन्यूनानतिरिक्तत्वेनेति। चथा वरतुनि संभवतीत्यर्थः। अत एव सचेतसां वस्तुगतत्य सूघमसुभगस्य वस्तुनो वर्णनेन हृदयसंबादाक्ष किमयं रसवद्लंकारो वा न भवतीव्या-
'वस्तुनश्वित्तवृत्तेश संवाद: फुटता प्रथा। स्वभावो के रसचतो माविकस्य च लक्षणम् । इतयर्थ संघेप:। सूचम इत्यादि। मला 'वस्तुवणनमात् अलंकार कैसे हो सकता है' ऐसी संका उठा लिखते हैं -- 'इह०। अर्थ यह कि [वामन की] 'अलंकार वे होते हैं नो उस [शब्दार्थ रूप] काव्य में अविशय लाते हैं' इस उचति के अनुसार वस्तु में अतिशय दाने वाले ध्मों को अलंकार कहा जाता है, अतः केवल वस्तुमात्र को अलंकार कैसे माना जा सकता है। मला 'सूक्ष्मशब्दमात्र के ग्रहण से इसका समाधान कैसे हो जाता है, ऐसी शंका उठाकर कहते हैं-सूचम इत्यादि। कविश्व- मात्रभ्य=कविप्रतिमामात क्योंकि कवि कुश के अग्रभाग के समान पैनी बुद्धि वाला होता है। इसका अर्थ यह कि स्थूलवुद्धि वाले अकवि या कुकवि उसे [ वस्तु को लौकिक भूमिका पर]
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६६६ अलङ्कारसवस्थम
नान भी लें तो उनमें [उनको बुद्धि में वैसा विकल्प नहीं ठठता। अत एव=इस कारण क्योंकि वह केवल कवित्व [प्रतिमा] मात्र का विषय होता है इस कारण। तर्विमित पूव क्योंकि मन्य वस्तुओों को तद्रप नहीं बतलाया जा सकता। इस प्रकार वस्तु में जो फल कियादि रूप असाधारण स्वमाव (स्वरूप) रहता है उसका शब्द से प्रतिपादन करने मात्र के कारण 'तश्निमित एव=उसमे निष्पादित ही' कहा। अन्यृनानतिरिफतवे -कुछ छोटे या कुछ जोड़े बिना अर्थात वस्तु में जैसा जैमा स्वरूप समव होता है। वस्तुस्वरूप में स्थित सूक्ष्म और सन्दर वस्तु का वर्णन होने से यहाँ सहृदयों का हदयसवाद रहता है। इस कारण इमे रसवदलंकार क्यों न माना जाए' ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं-'माविक०' इत्यादि। इसका जो भेद वहाँ स्थिर किया जाने वाण है उसका सक्षेप यह है-'वरतुनक्षितवृत्तेश्-सर्थात् वस्तु और विचवृत्ति के सवाद में स्वमायोकि, सपुटता में रमवद् तथा प्रथा में भाविक अलकार होते हैं।।' विमर्शं- इतिहास-खमादोकि को दण्डी ने सभी अल्कारों में प्रथम स्थान दिया था। अरकारों के नाम गिनाते हुए उन्होंने लिखा था- दृण्दी-सवमावास्यानमुपमा रूपक दीपकावृती I२I४। स्वमादाख्यान को भगे वे स्वमावोकि और जाति नाम से पुकारने और उपमा के पहले उसका लक्षण इस प्रकार करते हैं- 'नानावस्थ पदार्याना रूप साक्षाद विवृण्वती। स्वभावोकिश्व जातिश्चेत्यामा साम्ठ्कृतियथा।' जो सलकार पदार्थों के नाना प्रकार के रूप का मानो साक्षास्कार कराता है वह सवमावोकि या जाति कदलाता है। यह प्रथम अलंकार है। पदार्थ के जाति, गुण, क्रिया और द्रव्य के रूप में विमक्त होने से दण्डी ने स्वमावोकि के भी चार उदाहरण दिए है। उनमें जाति का सदाहरण निग्न- लिखित है-
न्निवर्णराजिमि कण्ठैरेते मन्जुगिर= शुका ॥२॥५॥ लाछ और टेढी चोंच, हरे और कोमल पस तथा तिरंगी धारियों के कण्ठ से युक्त ये शुक बढी ही मीटी पोठी बोलते है। अन्त में उन्होंने लिखा है- 'स्त्रमावास्यानमीटश्म्। शासते सवत्यैव साम्राज्य काव्ये स्वस्येतदौदिसितम्।।' यह जो जात्यादि मेद से उपर्युक्त चतुर्विध आख्यान है, शासत्रों में तो इसी का साम्राज्य है ही, काव्यों में भी यह कविषों को अमौष है।' निश्चित ही स्वमावोकि को स्थापना का येय दण्शी को है। मामह का स्वर स्वमावोकि के विषय में मन्द है। द्वितीय परिच्छेद के जन्त में वे सिखने हैं- 'स्वमावोकिरबद्धार इति केचिव प्रचमते। अर्थस्य सदवस्पस्व स्वभावोञ्रिदितो यथा।। २। ९३। आक्रोशन्नाह्टपसन्यानापावन् मण्डले रुदन्। ना वारयति दण्डेन डिम्म सस्यावतारणी.। समाप्तेनोदितमिद धौसेदायैव विस्तर ॥'२॥ ९४। 'कुछ आचार्य स्वमायोक्ति को भी अलंकार बतलाते हैं। सर्थ की सदवस्थना [लोकवन् काव्य- स्थिति ] स्वमाव कहलाता है। उदाहरण -'स्वय चिर्थाता, दूसरों को पुकारता गोड गोछ धूमता और रोता हुआ किसान वालक दण्डे से सस्य [कच्ची फसल, दद्टव्य डो० अग्रवाल का पाणिनि काडीन भारतवर्ष] में उतरी गाय मगा रदा है।
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स्वभावोक्यलट्कार: ६६७
दमने इसे संक्षेप में बतलाया, क्योंकि इसका विस्तार वुद्धिन्यायाम मात्र है। २१९३, ९४॥ स्पष्ट ही भामह का कटाक्ष दण्डी की स्वमावोकििसंबन्धी महत्व्वुद्धि पर है। वामन तो मामह के दी अनुयायी उदरे। उन्होंने सचमुच स्वमावोक्ति को अनकह्वार मान छोड़ दिया। उम्नट-ने इसे महत्त्व दिया। उन्होंने इसका लक्षण इस प्रकार वनाया- क्रियायां सप्रवृत्तस्य हेवाकारनां निबन्धनम्। कस्यचिन्मृगडिम्भादैः स्वभावोकिरुदाहता ॥ ३।५।। 'कुछ कर रहे मृग या वच्चो आदि की चेषाओं का शब्द द्वारा चित्रण स्वनावोक्ति कही गई है।' यथा- 'क्षणं नंद्ार्धवलितः शुङ्ेणाते क्षणं नुदन्। लोलीकरोति प्रणयादिमामेप नृगार्भक: ॥' 'मगवती पार्वती को यह' सृगशावक जरा एक छिपकर, आघा वूमकर, सामने सींग से धकाकर स्नेद्वश चंचल बना देता है।' अवश्य ही उद्दट का स्वमावोकिनिरूपण वाल्छित समृद्धि से रहित और कदाचित् स्वमावोक्ति में मलंकारत्व की पुनः प्रतिष्ठा तक सीमित है। रुदट-र्द्रट ने इसे जाति नाम से अलंकारों के वास्तवनामक प्रथम वर्ग में गिना है। उनका निरूपण- 'संस्थाना वस्थानक्रियादि यद्यस्य सादृशं भवति। लोके चिरप्सिद्वं तत्कथनमनन्यथा जातिः ।। ७।३० ॥ 'लोक में जिसकी आकृति, स्थिति, किया आदि चिरकाल से जैसी पसिद्ध दो उनका जन- न्यथा=जैसा का तैसा कथन जाति कहलाता है।' अधिक स्पष्ट करते हु उन्होंने लिखा-
सा कालावस्थोचितचेश्स विशेषतो रम्या ॥' ३।३१॥ शिश्ु, मोली युवति, कातर तिर्यक, मीत अधम पात्रों की समय और नवस्था के अनुरूप चेष्ाओं में वह अधिक खुलती है। कातर और संभ्रान्त को तिर्यक और पात्रों का विशेषण न मान स्वतन्त्र भी माना ना सकता है। नमि साधु वे माना भी है। उदादरणार्थ शिशुवर्णन, यथा- धूछीधूसरतनवो राज्यस्थितिरचनकत्पिकेकनृपाः। कृतमुखवादनिकारा: क्रीदन्ति सुनिर्मर डिम्भाः॥' वच्चे सूब खेल रहे हैं। उनके शरीर धूलीधूसर है, सेल-सेल में राज्य बनाकर उन्होंने किसी को राजा वना रखा है, वे भुख से बाजे वजा रहे हैं। एक अन्य उदाहरण द्वारा उन्होंने सुग्धयुवति का चित्र भी प्रस्तुत किया है। स्पष्ट है कि सुद्ट ने स्वमावोकि को उचित महत्त्व दिया। मम्मट- 'स्वभावोक्तिस्तु डिम्मादे: स्वत्रियारूपवर्णनम्।' चकचों आदि की अपनी करिया, उनके रूप अर्थाव रंग और शरीर का वर्णन स्वमावोकि कहाता है। उदाधरण के रूप में उन्होंने हर्षचरित का यह अ्वर्णन प्रस्तुत किया है- 'पश्चादव्त्री प्रसार्य तरिकनतिविततं द्राघयित्वाङ्गमुच्चै रासज्याभुग्नकण्ठो मुसमुरसि सर्वां धूलिधून्रां विधूय। घासगरासामिळापादनवरतचलत्प्रोयतुण्ड स्तुरक्षे मन्दं शब्दायमानो विलिखति शायनादुस्थितः क्षमां खुरेण ।।'
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६६८ अलङ्गारसवस्वम्
'सोकर उठे घोड़े ने पिछली टाप पीछे फैलाई और पीठ को झुकाते हुए शरौर को लमा किया, उसने धूठिघूसर सटा को हिलाकर गरदन टेढी की और मुह वेट में चिपकाया। घाँस के कौर की इच्छा से उसके धुथने निरन्नर फडफढा रदे हैं और वह धीमेधीमे कुछ शम्द कर रहा है।' मम्मट के लक्षग तक 'टिम्भ या शित्षु' का जो अस्तित्व चळा आया उससे इस अलंकार की मामह से आागे बढ़ी सुदीर्घ परगपरा का आमास मिलता है। स्टूट और मम्मट के बीच स्वमावोक्ति को लेकर एक बदुन ही गम्भोर विवाद भी उठा था। कुन्तक ने स्वमावोक्ति की भलकारता का बडी हो दृढता और त्वकर्कशता के साथ खण्टन किया और उसका उतनी को विदग्धता के साथ व्यक्तिविवेककार राजानक मदिममट्ट ने समर्थन-वक्रोकि- जीवित में कुन्तक का स्वभावोकि सम्बन्धी विवेचन इम प्रकार है- 'अरकार कृतां येषा स्वमावोफिरटढवृवि.। अछकषायतया तेषां किमन्यदवशि्यने॥ स्वमावष्यतिरेकेण वक्तमेव न युज्यते। वस्तु तद्रहिन यश्मान्निरुपास्यं पसज्यते ॥ १। १२ । शरीरं चेदवंकार: किमलह्ुरूने परम्। भारमैव नात्मन स्ं्य कचिदप्यधिरोहति ॥११३॥ भूषणत्वे स्वमावस्य विदिते भूषणान्तरे। भेदाववोष प्रकटस्नयोरमकटोऽपवा ।।२।१४।। सपष्टे स्वत्र ससष्टिरस्ष्टे सक्करस्तन । अलक्करान्तराणा च विषयो नावतिष्ठते ॥ १।१५।। अलकार ग्रन्थ बनाने वाले जिन आचार्यों को स्वमावोक्ति अलकाररूप में मान्य है उनके यहाँ अलकारयरूप में क्या शेष रहना है जो उस [ स्वमाव ] से मिन्न हो। कारण कि स्वमाव को छोड कर सो कुछ भी बोलना समव नहीं होता। उससे रहित वस्तु अगोचर अवर्गनीय हो जाती है। यदि शरोर ही अलंकार है तो फिर उससे भिन्न ऐसी कौन सौ वस्तु है जिसे वह भलंकृत करता है, स्वय अपने ही कन्धे पर स्वय कदापि नहों चढ सकना। यदि स्वमाव अलंकार है तो सन्य अलकार आने पर दोनों में मिन्नता प्रतोत होगी या नहीं। यदि दोगी तो प्रश्येक काव्य में ससूष्टि दो असंकार होगी, यदि नहीं तो केवल सकर 1 इम प्रकार अन्य अलकारों के लिए कोईं स्थान दो शेप नहीं रहेगा।' स्वभाव शब्द की व्याख्या भी, कुन्तक ने, इम प्रकार को थौ-'स्वमावस्य पदार्थधर्मेलक्षणस्य परिस्पन्द्रस्य उकिरमिया'= स्वभाव अर्थान पदार्थ का धर्म जो इन्द्रियगोचर होता है उसकी उक्कि भमिया'। महिममट्ट ने व्यक्तिविवेक में इसका वह्त हो दारशेनिक उत्तर दिया है। उन्दोंने अवाच्यवचन नामक दोष के निरूषण में स्वरूपानुवादमात्र परक विशेषण को निररथक और योया कहकर स्याज्य बनलाया है और किसा है- यद स्वरूपानुवादैवपलं फष्णु विशेषणभ्।
तदवाच्यमिति ज्वेयं वचन तस्य दूषणम्। तद् पृथ्ठपूरणायेव न कवित्वाथ करपते॥[ पृ० ५१ चोखंभा संस्करण २]
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स्वभावोक्यलङ्कार: ६६९
-जो विशेषण केवल स्वरूप मात्र का अनुवादक होता है, फलतः निःसार और संप्रेपणीयता- शून्य होता है, इसीिए जो प्रतिमाशव्यता का परिचायक होता है, वह विशेषण अवाच्य कहलाता है। उसका वचन-कथन अवाच्यवचन दोप होता है। ऐेसा विशेषण केवल छन्दःपुर्तिकारक होता है, इससे कवित्व सिद्ध नहीं होता।' इसी प्रकार के विशेषणों को अपुष्ठार्य विशेषण माना जाता है। उदाहरणार्थ 'कुश शत्रुओों का अंकुशवस्तु था [रघु० १६ ]' यहाँ भंकुश के साय वस्तु शब्द निरर्थंक ही है। इस पर स्वमावोक्ति की चर्चा चलाते हुए महिमाचार्य ने लिखा- कर्थं तदि स्वमावोत्तेरसद्कार त्वमिष्यते । न दि स्वमवमात्रोक्ती विशेष: कच्चनानयोः । [६ृ० ४५२-वही] तब स्वमानोकति को अलंकार कैसे माना जाता है। स्वमानमात्र की उतति और इस अवाच्य वचन में भन्तर ही क्या है। इस पर उत्तर देते हुए लिखा। 'उच्यते, वस्तुनस्तावद् दवैरूप्यमिह विद्यते। तम्रैकमत्र सामान्यं यदिकल्पैकगोचरः॥ स एव सर्वशब्दानां विषय: परिकीर्तित:। अ्त रवाभिधेयं ते सामान्यं वोषयन्त्यलम्। विशिष्टमस्य यद रूपं तव पत्यक्षस्य गोचर:। स एव सत्कविगिरा गोबरः प्रतिभामुवाम्॥ अर्थस्वमावस्योकिर्या सालकारतया मता। यतः साक्षादिवामान्ति तवार्थाः प्रतिमार्पिताः ॥' [ व्यक्तिविवेक चौ० सं० पृ० ४५२-५३] उत्तर यह है कि वस्तु के दो रूप होने हैं। एक सामान्यरूप, जो विकल्प [अविस्पष्ट ज्ान] का विषय रहता है। सब के सब शब्द उसी का ज्ञान कराते हैं। इसीलिए वे सामान्यात्मक अमिधेय [अर्थ] का ज्ञान कराते है। इसके अतिरिक इनका जो विशिष्ट रूप होता है वह पत्यक्षप्रमाण का विषय होता है। किन्तु सरकवि की प्रतिमाप्रसूत वाणी इसी विशिष्ट अर्य को प्रस्तुत किया करती है। इस प्रकार अर्थ के इस विशिष्ट स्वमाब की जो उक्ति होती है इसे अलंकार स्वीकार किया गया है। द्योंकि इस उक्ति में प्रतिभा द्वारा अर्पित सी पदार्थ ऐसे दिखाई देते हैं जैसे उनका ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण से हो रहा हो।' सन्य अलंकारों के विषय में उन्होंने लिखा कि- 'सामान्यस्तु स्वमावी यः सोडन्यालफ्टारगोचरः ॥' [ पृ० ४५५ वह्दी ] [स्वमावोकि में मए विशिष्ट वस्तुस्वमाव के अतिरिक्त जो ] वस्तु का सामान्य स्वभाव है वह अन्य अलंकारों का विषय वनता है। इस प्रकार स्वमावोकि तन अलंकार मानी जाती है जब वस्तु का विम्न प्रत्यक्षवत प्रस्तुत कर देती है। ऊपर आए अश्वादि के वर्णन ऐसे ही है। सवस्वकार ने सूत्र में सूक्ष्म शब्द और वृत्ति में कवित्यर्तित्व को स्थान देकर मदिमभट्ठ की स्थापना यथावत् अंगीकार करली है। अन्यकार ने यहाँ इस प्रकार के विशेष स्वभाव को प्रतिमानिमित क दिया है। द्वोपान्तरादि के अप्रत्यक्ष पदार्थ यदि प्रत्यक्षवत् प्रस्तुत हों तो उन्हें प्रतिमकप्रसूत भाना ही जाएगा। कनिबुद्धु- पारूदि और शब्दारपितता इन दो तत्त्वों का महत्व इस मरसंग में जानना आावश्यक है। कवि के मानस में चित्नित वस्तुविम्ब प्रतिमा पर आरुद होने के बाद जब कला के कविकर्म पर जमाया
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६७० मलङ्कारसर्वस्चम्
जाता है तभी वह वर्णनशब्द का विषय बनता है। इस प्रकार वर्णनतत्त्व कछा या शिव्प की परिधि का चोतक शब्द है। स्वमाव रवन में अलकार नहीं होता जबतक वह शिक्ष्प की इस भूमिका पर प्रतिअ्वापित न हो। अत. उसकी उक्ति ही अरकार बनती है। वस्तुनिष्ठ दृष्टि से कला की मोमासा करने पर स्वमावोकिति को उक्त वोधप्रकरिया मनोवे ज्ञानिक और अनुमवसिद्ध मक्रिया सिद्ध छोती है। परवनों आचार्यों में रत्नाकरकार शोमाकरमिन्न ने शोभाकर-स्वमावोकति का निरूपण अलकारसर्वस्वकार को ही लोक पर किया है- [ सृ०] सम्यक स्वमाववर्गनं सवमावोकि ॥०६॥ 'रवभाव का सम्यकू वर्णन स्वमावोकति।' इसकी व्याख्या करते हुए रत्नाकरकार ने सर्वस्वकार की सभी मान्यताओं को औरम विशाद कर दिया है- 'द्विविधो वस्तुन स्वमाव स्थूल सूहमश्व तत्र कवितृमाधगाचर स्थूल, तस्य वर्णने न कश्षिद- लकार, सर्वस्य काव्यत्य स्वमायोकतिपसज्ञाव। सम्यग् वर्ण्यमानस्तु स्वभाक: सूक्षम- ।स तु मदा- कविगोचर 1 तस्य सम्यग वर्ण्यमानरयान्यूनानतिरिक्तत्वेन स्वमावोकि । न तु साधारणत्य रूपक्रियादेसतत्तद्वालादिगनस्य शव्देन प्रतिपादनम्, अपितु यर्येव वस्तु सथेद प्रतिपादनमिति वस्तुवादिनो यत्र शब्दात् प्रतिपस्तिभंतति त्मेवालद्वार:। -'वस्तु का स्वमाव दो प्रकार का होता है-स्थूल तथा सूक्ष्म। इनमें स्थूछ समी कविया का विषय होता है, उनके वर्णन में कोई अलकार नहीं होता, अन्यया सभी काव्यों में स्वामानोकि माननी पद जाएगी। जो स्वमाव सम्यक वणिन दोता है उसे सूक्ष्म कहते हैं। वह केवल महारुषि का विषय होता है। उस सम्यक वर्गित स्वमाब्र का अन्यून अनतिरिक्त रूप से कवन स्वमादोकि [अल्कार] कहलाता है। न कि बालक आदि के साधारण से रूप और चेष्ाओं का शम्द से प्रतिपादन। इस प्रकार नहां शध्द से हुआ बोष वस्तुस्वरूप से मिछता होता है, वहीं इसे अलकार माना जाता है। यहाँ रवमावगत सूद्षमत्व को रत्नाकर ने और भी सूक्ष्म कर कवि मे महाकवि तक सीमिव दिया है। अन्य अलंकारों में वस्तु के जिस स्वमान की चर्चा महिममट्ट में मिछती है उसी मोर लइया कर रत्नाकरकार ने मो स्वमानोकि का अन्य भलकारों से भन्तर इस प्रकार बनलाया है- 'अन्यालकारससरगे स्वमानोकयादि यधपप। वाक्यार्थीभावविरदादज्ञमेय तथापि तु। यत्रोतकटतया माति तमाजित्वेन युज्यते।
अन्य अलकार में भी जहाँ स्वमानोकि मिलती है वहाँ वह अप्रधान रहती है, किन्तु जहाँ वह प्रधान रूप से प्रनीत होती है, वहाँ स्वमानोकि सलकार कहलावी है। अन्य अलकार प्रधान होते दैं तो अलंकार का नाम उनके नाम से किया जाता है, और जहाँ मिश्रण की स्थिति रहती है वहोँ सकर [संसुषि मी]। स्पषटत- मदिममट्ट से आगे बढकर रत्नाकरकार ने अन्य अरकारों में भी वस्तु के सूक्षम रवमाव का अस्तित्व स्वीकार कर लिया है। अप्पयदीपित-ने रवमावोकि पर आचार्यों को सिद्ध मान्यतामान इस पकार प्रस्ुत कर दो है-'स्वमावोकिः रवभावस्य जात्यादिस्वस्य वर्गनम्।' 'बच्चों आदि के जाति आदि रूप
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भाविकालक्कार: ६७१
स्वमाव का वर्णन स्वभावोक्ति कहलाता है।' स्पष ही अप्पयदीक्षित स्वमवोक्ति की छकड़ी सींचते दीख पढ़ते हैं। विश्वेश्वर-'यो वस्तुनः स्वभावस्तस्य निरुत्ति: स्वमावोकि:।' सज्जातीय-नियत-वर्मवर्णनं सवमावोकि:। वस्तु का जो त्वभाव होता है उसका निर्वचन स्वमावोति होगा। अर्थात् व्यक्तिविशेय के अपने अस्ाधारण धर्म का वर्णन स्वमादोकति कइलाएगा। विश्वेशवर ने स्वमाव को दो प्रकार का चतलाया-'साधारण तथा प्रातिस्विक। इनमें से प्रातिस्वक स्वभाव को वे भी प्रतिमामान का विषय बतलाते प्रतीत होते हैं। इस पर विधाचकवतों की निष्कृदार्धकारिका यह है-
वस्तु के कवियों द्वारा कल्पना द्वारा विहित स्वमाव का वर्णन स्वभावोकि कहलाता है। पाठान्तर-सूत्र में 'स्वमावत्य' इस प्रकार व्यस्त पद भी मिलता है किन्तु धृत्ति में बारवार 'वस्तुस्वभाववर्णन' शब्द आने से हमने समस्त पाठशी ठोक माना है। वृत्ति में कवित्वमात्रस्य गोचर: की जगह 'कवितृमात गोचर' तथा 'कचिमात्रगोचर' पाठ मी है। [सर्वस्व्र ] [सूत्र ८०] अतीतानागतयोः ग्रत्यक्षायमाणत्वं भाविकम्।
सम्बन्धरद्वितशब्दसन्दर्भसमर्पितत्वाच्च प्रत्यक्षायमाणत्वं भाविकम्। कविगतो भाव आशयः श्रतरि प्रतिबिम्वत्वेनास्तीति, भावो भावना वा पुनः पुनश्चे- तसि निवेशनम्, सोऽवास्तीति। न वेयं भ्रान्तिः। भूतभाविनो भूतभावितयैव प्रकाशनात्। नापि रामो- डभूदितिवद् वस्तुमान्नम्। भूतभाविगतत्य प्रत्यक्षत्वाख्यस्य ध्मस्य स्फुट- स्याधिकस्य प्रतिलम्भात्। नापीयमेतिशयोकतिः। अव्यस्यान्यतयाध्यव- सायाभावात्। नहि भूतमाव्यभूतभावित्वेनाध्यवसीयते, अभूतभावि वा भूतभावित्वेनापि, प्रत्यक्षमप्रत्यक्षत्वेन, अप्नत्यक्षमपि प्रत्यक्षत्वेन। न हि प्रत्यक्षत्वं केवलं वस्तुधर्मः। प्रतिपत्यपेक्षयैव वस्तुनि तथा भावात्। यदाहु :- 'तन्न यो ज्ञानप्रतिभासमात्मनोऽन्वयव्यतिरेकावनुकार- यति स प्रत्यक्ष: इति। केवलं वस्तुप्रत्यक्षत्वे प्रतिपत्तु: सामम उपयुज्यते। सा च लोकयात्रायां चक्षुरादीन्दियस्वभावायोगिनामतीन्द्रियार्थदर्शने भाव- नारूपा, काव्यार्थविर्दा च भावनास्वमावैव। सा च भावना वस्तुगत्यात्य- द्भुतत्वपयुक्ता। अत्यद्भुतानां व चस्तूनामादरप्रत्ययेन हृदधि संधार्य माणत्वात। [सू० ८०] अतीत और अनागत का प्रत्यय जैसा योध भाविक [नामक अलंकार कहछाता ] है।
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[दू०] अतीन औौर मनागत वर्यात् भूत और मावो पदार्थ का परश्यक्ष जैसा बोष भाविक कहलाना है। यह बोध उन पदार्पों की लोकोचरता, अद्मुनता और ऐसे शष्दसंदर्भ द्वारा उपस्थिति से होता है जिस [के अयों ] का सबन्ध दिखरा नहीं रदता [अर्थात् जिनमें कोई वलझन नहीं रदती। यह [माविक नाम इमे] इस कारण [दिया जाता है] कि इसमें कवि का माशाय थोता में प्रतिविम्नित होता है, अथवा [इस कारण कि इसमें ] भाव अर्थात मावना अर्थात चित्त में पुनः पुनः निवेशन रहता है। यह [प्रत्यक् जैसा रोध] भ्रान्ति नहीं है, क्योंकि इसमें भूत और मावी का ज्ञान भूत और भावी के रूप में ही होता है। यह 'राम था' इम प्रकार का वस्तुमात्र मी नहीं है [ जिसमे अलंकार न हो ], क्योंकि इसमें भूत और भावी पदार्थो के भीतर एक अतिरिकत और स्पष्ट प्रत्पकषस्व नामक धर्मे भी मिलता है। यह अतिरायोक्ि भी नहीं है, कयोंकि इसमें अन्य का अन्य रूप में अध्यवसान [निगरणात्मक वोष ] नहीं होना। ऐेसा नहीं है कि यहं भूत और मावी [तदिरुद्ध ] अभूत और समावी रूप से अध्यवसित होने दो अथवा अभूत और अभावी [तद्विपरीत] भूत और भावी रूप में, अथवा प्रत्यक्ष कप्रत्यक्ष रूप में या अप्रायक्ष प्रत्यक्ष रूप में। प्त्यसृत्व केवल [झेयभूत] वस्तु में रहने वाका धर्म नहीं शेव, वस्तु में रहता है वह क्ञान को लेकर। जैमा कि कहा है-'कोई मी पदार्थ तब प्रत्यक्ष कह- छाता है जब कि वह अपने अन्वयव्यतिरेक का ज्ानप्रतिमास [के अन्वयव्यतिरेक] से अनु- करण कराता है। इतना अवस्य है कि वस्तु के प्रश्यक्ष के दिए घाता को [सदायक] सामभ्री की भावरकता होती है। और वह ससार में चस्ुरादि इन्द्रियरुप होती है, योगियों को [धर्मअ्रयमे आदि] अतीन्द्रिय पदार्थों के प्रश्यक् देतु वढ मावनारूप होती है, और काव्य में भौ वह मावनारूप ही होती है। वह भावना वास्तविकरूप मे [काव्यवस्तुनिष्ठ] अत्यदभुनता से निष्पन्न होती है। क्योंकि जो पदार्थ अत्यन्त अद्भुन होने हैं उन्हें मदरभाव के साथ अपनाया जाता है। घिमर्शिनी
वघानाहख्मुकतम्।व्यर्नेति। वदपि वापामाकुक्टरवं सर्वग्रव वर्जनीय तथापि तचन्र वै पम्येनार्था विशेषाप्रतीते विहमावफलम्। इद ठ सदाकुव्धरवेनातीता नागतयो.प्रशयनायमा मश्वमेव न स्याविति प्राधान्येनैतदुछम। एवमनेन हेतुदयेनाहपालंकारखमुक्कम्। हछ वाच्यवाचकयो रामणीयकमिर्युक्म्। अत एवंकरयापि रामणीयकहानी नासयालंकार- खम। इछ दि केचिदर्या कविवचसि सुस्ष्टमधिरूदा अपि निजसौभाग्यामावात् तृणक्ष- रकरावस् सद्ववयानामवज्ञास्पश्तया नावधानाहा । केचिव्च सुभगा अपि दुर्भगशब्द्रोपारो दितया सहृदयानाम नावर्जका पवेश्युभयमपीद्दावश्यमाथयणोयम्। यदाट :- 'प्रत्यका इव यम्रार्था हश्यनते भूतमाविनः । अर्यद्भुना: स्यात् सद् वाधामनाकुल्येन भाविकस्।। हति। वाशव्द पचान्नरद्योतक:। नतु प्रत्यचाणां मूनभाविनां मत्यलेणोपनियन्धाद्व स््रान्तिमानेवार्यं कि न भवतीशपाशङ्याह-न चेयमित्यादिना। ननु यदि भूनभावितयैव प्रतीयने तदतद् वसवेव किं नेयाशकयाइ-नापीनि। अधिकस्येति। वर्तुवृतते तस्यामंभवाद। अ्रत एवास्य ततो व्यतिरेकः नन्वन्यस्थान्यतयावसायारिंक नायमतिशा योतिरित्याशइबाद्- नापीयमित्यादि। मूतभाविनो भूतमावितर्यवारफुटतयावगमात्। नन्वध्ाप्रत्यक्षमेव प्रश्य-
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भाविकालद्वार: ६७३
द्वितम्। मतु यद्येवं तरप्रमातु: सदैव समस्तवाह्यवरत्ववगमः किंन स्वादित्याशकयाद- केवलमित्यादि। भावनारपेति। तत्रेन्दियादीनामच्यापारणात्। एवं योगिनां भावनावलाद भूतमावितयैव मत्यत्तावभास इति भावः। यदाहु :- 'अतीतानागतज्ञानं प्त्यकास विशिप्यते' इति। चः समुच्चये। तेन योगिनामतीन्द्रियार्थदर्शने यथा भावना निमित्त सथैव काव्यार्थविदामपीत्यर्थः। तस्याद्र निमित्तमाह-सा चेत्यादि। वस्तुनोऽयद्भुतः रमादरे निमित्तम्। आदुशच्च वस्तुनो हृदि संधारणम्। तच्च तदेकतानतया परुदं सद् भाव नाव मुप्यातीति काष्यार्थविदां योगिनामिच भाव नाचलात् स्वकालावच्छेदेनैव भूत- मानिवस्तु प्रत्यक्षतया मासत इति प्रत्यक्षतयाध्यव सायः। अतीतानागतययो: इत्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-भतीत इत्यादि। 'अळौकिकस्व= लोकोत्तरता' यह कइकर यह बतलाया कि वह सहद्यों के ध्यान देने योग्य वस्तु है। ब्यस्त [भामद और उद्हट ने यहाँ शब्दसन्दर्भ के लिए 'अनाकुल' विशेषग दिया था, उसका भर्थे प्रतीहारेन्द्रराज आदि ने व्यस्तसम्बन्धरितत्व ही किया था। गरन्थकार ने यहाँ उसी को अपनाया, टोकाकार उसका मूलशब्द अनाकुलत्व चित्त में रखकर व्याख्या करते हैं] यद्यपि शब्दों की आाकुलता [उलसे अर्थ से युक होना] समी अलंकारों में त्याज्य है तथापि उनमें आकुलता से प्रतीति में विध्नमात्र उत्पन्न होता है, क्योंकि आकुल्ता से विषमता उत्पन्न होती है और अर्थ के ज्ञान में स्पष्टता नहों आा पाती [किन्तु ऐसा नहीं कि अलंकार की प्रतीति दो न होती हो] यहों [ भाविक में ] तो उस [शब्दसम्वन्ध] की आकुलता होने पर अत्षीत और अनागत का प्रत्यक्ष- चमाणत्व [प्रत्यक्ष जैसा बोध ] ह्यी नहीं बनता [मतः यहाँ उसे प्रधानरूप से अपनाया गया] इस प्रकार इन दो द्ेतुओं के द्वारा इसका अलंकारत्व वतलाया। यहाँ [भाविक में ] अर्थ और शब्द दोनों की सुन्दरता अपेक्षित है ऐसा [समो आचार्यों ने] कड़ा है। इस कारण किसी एक की मी सुन्दरता समाप्त होने पर यह अलंकार नहीं बन पाता। स्थिति यह है कि इस अलंकार में कुछ सर्थ कवि की पदावकी में स्पष्ट रूप से अधिरुद् छोकर भी अपने आप में सुन्दर न होने के कारण तृणशर्करा के समान सहदयों के लिए उपेक्षणीय होते हैं, ध्यान देने योग्य नहीं वन पाते। इसके विरुद्ध कुछ अर्थ अपने आप में सुन्दर होकर मी दुर्मग पदावली से माहित रदते हैं, अतः वे भी सहृदयों को आकुष्ट नहीं कर पाते। इसलिए कवि को यहाँ दोनों ही पर आवश्यक रूप से ध्यान देना चाहिए। जैसा कि [सटटाचाये ने] कहा है- 'भूत और मावी पदार्थ जिसमें शब्दों की अनाकुळता के कारण अत्यद्मुत और पत्यक्ष जैसे दिखाई देते हैं उसे भाविक कहते हैं।' [ का० सा० सं० ६६]।। 'वा' = अथवा शब्द पक्षान्तर का धोतक है। 'भूत और भावी अर्थात अप्रत्यक्ष पदार्थो का प्रत्यक्षरूप से कथन होने के कारण इस [नाविक] को भ्रान्तिमान् को वर्यों नहीं मान लिया जाता' ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं-'न वेयम्'। 'यदि यहाँ पदार्थ भूत और भावी रूप में ही पतीत होते हैं तो यह वस्तुमात्र ही कयों नहीं मान ली जाती'-ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं-'नापि' इस्यादि। अधिकर्थ=अतिरिक्त= वास्तविक लौकिक स्थिति से उसके न होने से। इसी कारण इस [माविक की प्रत्यक्षायमाणता] का उस [वस्तुस्थिति] से अन्तर है। 'इसमें अन्य [भूतभावी ] वस्तु अन्य [प्रस्यक्ष ] रूप से विदित होतो है, तो यह व्तिशयोकति हो क्यों नहीं मान लो जाती'-ऐसी शंका का उत्तर देसे ४३ अ० स०
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६७४ १-'नापीयमृ' रस्यादि। अतिशयोकि इसलिए नहीं कि इसमें भून और भावी पदार्थों का भूत और मावी रूप में ही द्ान होता रहता है। 'यहाँ ममत्यक्ष अत्यसरूप से अध्यवतित कयों नहीं मान लिया जाता' ऐसी कंका कर सत्तर देते है-'न हि' हयादि। यह विषय एक तो अप्रासजञिक है और दूसरे अवि गम्भीर इर्सालर यहीँ इसका विस्तार नहीं करते। 'यदि ऐमा है [अर्यात् वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञानप्रनिभास सापेक्ष है] तो माद् वस्तुओं का द्वान सदा ही क्यों नहीं होता रहता-ऐमी शंका कर उस्तर देते है केवलम्। भावनारूपा=कयोंकि उन [अवीन्द्रिय पदार्थो] मैं हन्द्रियों को पहुँच नहीं होनी। भाव यह कि योगियों को मावना के बछ़ पर हो भूनमावीरूप में अत्यक्षमनीति होतो है। जैसा कि कहा है-'असीत और अनागत का धान प्रायक्ष से मिन्न नहीं होना।' व= समुखयार्थक है। इसका अर्थ यह दुआ कि जिस प्रकार कवीन्द्रिय पदार्थों के दर्शन में योगियों के लिए मावना हो कारण बनती है उसी पकार भूढ और मावी पदार्थो के पत्यक्षदशन में कान्यार्षवेताओं [ कवियों] के लिए भी [मावना दी कारण बननी है।। उस मावना का कारण बतलाने है-सा च । वस्तु की अतयद्भुमना [वस्त के] आदर में निमिच बनती हे और उस आादर से वस्तु हृदय में धारण की जाती है। और वह जो ृदय में धारण करना है, वस्तु स्वरूप के प्रति एकनानता के रूप में परुद की मावनात्व को प्रात्त होता है। इस प्रकार मावना के बक से काव्यार्थवेद्या [ कवियों और सहदयों] को मी योगियों के दी समान भूत और भादी वस्तु अपने अपने समय में ही प्रश्यशरूप से भासित होती है। इस प्रकार यहाँ अपश्यक्ष पदार्थो का प्रत्यश्षरूप से अध्यवसान नहीं होता। [सर्वस्व ] नापि भूतभाविनामपत्यक्षाणां प्रत्यक्षतथैव पतीतेरिवार्थगर्भीकारेणेयं प्रतीयमानोत्प्ेक्षा, तस्या अमिमानरूपाध्यवसायम्चमावत्वात्। न समत्यक्षं प्रत्यक्षत्वेनाध्यवसीयते, किं तर्हि काव्यार्थविद्धिः प्रत्यक्षत्वेन दश्यते इति। नापि वस्तुगता इवार्या उत्प्रेक्षाप्रयोजका:। तस्या अभिमानरूपाया: प्रति पत्तुधर्मत्वात् । यदाहु :- 'समिमाने च सा योज्या छानघमे सुक्ादिवत्' इति। काव्यविपये च प्रथोक्तापि प्रतिपत्तैव। नाप्यद्भुतदर्शनादतीताना गतयोः प्रत्यक्षत्यप्रतीतेः कान्यलिदमिदम्, लिद्गलिक्षिमाचेन प्रतीत्य- भावात् , योगिवत् मत्यक्षतया मतीते:। 'इसमें अप्रत्यक्ष भूव भावी पदार्थों का ज्ञान प्रत्यक्षरूप से होता है, अत इसे श्वार्थगर्मित ['मानो' आदि शब्दों का अर्थ छिपाय रखने वाळी अवश्व] प्रतीयमान [कहलाने वाली उरमेक्षा दो मान किया लाम यह संभव् नहीं, क्योंकि वह मान्यता [अभिमान ] रूप [जो ] अध्य वनाय-[तत्] स्वरूप होती है। [यहाँ] अप्रत्यक्ष वक्तु प्रत्यशरूप से [भतिशयोकि के समान] अध्यवसित नहीं होवी, अपि तु काव्यार्थवेधाओं द्वारा प्रत्यश्वरूप से देखी जाती है। ऐसा मी नहीं हैं कि उत्पेक्षा में 'इव= मानो आदि शब्दों के अर्थ उत्मेक्ष्यमाण वस्तु में रहकर उस्प्रेयषा को निम्पन्न करते हो, क्योंकि वद को + f+- मान्यतात्वरूप है अव. व्ावनिष्ठ पर्म है। जेसा कि कहा है-'औौर उसे सुखादि के समान ज्ानवर्मेरूप अमिमान [मान्यवा] में भवस्यिन समझना चाहिए।' जहाँ तक काव्य का सम्बन्ध है इसमें कवि [प्रयोचा ] भी बाता हो होता है।
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भाविकालक्कार: ६७५
अतीत और अनागत पदार्थो के प्रत्यक्षमान अत्यद्भुतत्व रूपी कारण से होते हैं, अतः यदि इसे काव्यरिदि कहा जाए तो वह संभव नहीं है; कर्योकि इसमें नो प्रतीति होती है उसमें छिह्- लिकि भाव का अभाव रहता है। यहाँ तो प्रश्यक्षता की प्रतीति वैसी रहती है जैसी योगियों को दुआ करती है।
चिमर्शिनी ननु यद्यपि योगिवद् भृतभाविनो भावाः स्वकालावच्छेदेनैव सचेतसः प्रत्यचतयेव [पतीता: तथावि] तदभाव[सं]भावनं युक्कमित्येतत्प्रतीयमानोतेक्षैव कि नेव्याशखयाह- नापीत्यादि। कि तहीति। प्रतिपत्तैवेति। महाजानता कवितुः प्रयोवतृत्वं भवतीति भावः। नन्वरयद्सुततपदार्थप्रश्य छम्रतीत्यो गंग्यगमकभावाररिक नेदमनुमानमिश्याश्ङ्कवाह-नापी त्यादि। एवं रसचद्लंकारादस्य भेदं दर्शयति-नाम्ययमित्यादिना। 'यद्यपि अतीत और अनागत पदार्थ उसी काळ के पदार्थो के रूप में सहदर्यों की भी योगियों के ही समान प्रत्यक्षरूप से ही भासित होते हैं तथापि यहाँ उन [ अतीत और अनागत पदार्थो] के अमाव की संभावना मानना ठीक है अतः यहाँ प्रतीयमान उत्प्रेक्षा ही क्यों नहीं मानी जाती' ऐसी शंका सठाकर उत्तर में कहते हैं 'नापि०'। किं तहि=अपि तु अर्थात यहाँ अध्यवसाय है नहीं। प्रतिपतैव - ज्ञाता ही अर्थात् कवि पदार्थ को बिना नाने प्रयोग में नहीं लाता। 'पदार्थ की अत्यन्त अद्भुतता और प्रत्यक्ष प्रतीति के बीच गम्यगमकनाव होने से क्या यह [उन्हर के अनुसार ] अनुमान [रूप से स्वीकृत ] काव्यलिन् नहीं हो सकता' ऐसी शंका कर कहते हैं-नापि इत्यादि। भव इस [भाविक ] का रसवदलक्कार से भेद बतलाते हुए लिखते हैं- [सर्वस्व ] नाप्ययं पुरःस्फुरद्रृपतया सबमत्कारं प्रतीते रसवदलंकार:। रत्यादि· वित्तवृत्तीनां तदचुषक्ततया विभावादीनामपि साधारण्येन हृदयसवादितया परमाव्वैतिज्ञानवत् प्रतीती तस्य भावात्। इद् तु ताटस्थ्येन भूतभाविनां स्फुटत्वेन भिन्नसवज्ञवत् पतीते। स्फुटप्रतीत्युत्तरकालं तु साधारण्य- पतीतो स्फुटप्रतीतिनिमित्तक औौत्तरकालिको रसवदलंकार: स्यात्। इस [ अलंकार] में जो प्रतीति होती है उसमें पदार्थ सामने उपस्थित से और चमर्कार पूर्ण पतीत होते हैं इस [सामान्य धर्म के] आधार पर इसे रसवदलंकार से अभिन्न कहा जाम, यह भी ठीक नहीं, क्योंकि उसमें जो प्रतीति दोती है उसमें रत्यादि चित्तवृत्तियाँ उनसे सम्बद्ध विभावादि इस प्रकार साधारण और हृदयसंवादमय मासित होते हैं जैसे परम मद्वैती के जान में मासित हो रहे हो। इसके विपरीत यहाँ [भाविकालंकार में ] भूत और माची पदार्थ उस प्रकार [साटस्थ्य= ] वास वस्तु के रूप से मरग अलग [स्वकाकावच्छेदेन] और स्पष्ट भासित होते हैं, जैसे दवतबुद्धि वाले सर्वज [सांख्य सिद्ध या शैव विघेश्वर ] की प्रतीति में. भासित हो रहे हो। [ उक्त] रफुटप्रतीति के पश्चाद ये पदार्थ यदि साधारण रूप में प्रतीत हो नाएं तो वहाँ भी रसबदलंकार हो सकता है।' यद्यपि यह स्फुट प्रतीति के पश्चात होगा क्योंकि यह वसी प्रतीति से निष्पन्र होगा।
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६७६ मलङ्कारसर्वम्चम् विमशिनी पुर.फुर दुपतयेह्यादिना न पोरमेदनिमिसमुकम्। पर कीयाया कसृत्तेराामीयचित्तवृ रयमेदेन परामर्को हृदपसंवादः। तत्य व रवपर विभागामावाद् देशकालामावाद्य ग्यापक- ख्वेन प्रतीते: सामारण्यम्। अस एव परमार्द्वत[ति]ज्ञानतुषपण्वम्। तस्प छयपमिरयेव परामशः। तद्यतिरियस्यान्यस्पासभवात्। तारस्थ्येनेति। इदमएं जानामीति असामाना षिकरण्येन परतीत्येत्ययः। अत एव विधेधरादितसयम्। ननु माविकप्रतीत्यनन्तरं यग्र रसव षषं कार: प्रतीयते तम्न कि प्रतिपततम्यमित्या सश्याह-सुटेम्यादि। एष्मध्रानयोरङ्रा- दितया समावेश इति तापपर्यारप: । तत्त यया- 'व नान्तरादुपावृत्तैः रकन्घासकक पमिष्हुशै"। अझ्िषश्युद्रमा/पूतैः पूयंमाणं तपश्विमि:।' अ्ग्न तपस्विना स्फुटरप्रतीति शान्ताप्यरसोदयाङ्गमिति न तवोरकाम्पम्। एवं घ सुन्दरस्य पा्तुनो यथावपूर्णनावशास्पत्य चायमाणर्वस्य स्वरूपमिति सात्पर्यम्। नतु पद्येव तरिक मिरद रवभावोकिरेवेत्याशकवाह-नापीयमित्यादि। पुर.रफुरद् इस्यादि के द्वारा इन दोनों [ रसवदलकार और माविक] के अमेदका निमिद पतथाया। हृदयसवाद का अर्थ हे परकीय चित्तवृ्ति का अपनी चित्तवृत्ति से अमेद पूर्वक बोष। उस [हृदयसवादारमक बाष] में स्वपर का भेद नहीं रहता न तो देश काल का छो मान रहता, अत उसकी प्रतीति में व्यापकता रहनी है फलन साधारण्य भी रहता है। इसी कारण उसकी तुलना परम अद्वेतो के कान से की ग्ई है। उसे थहम् रना हो रोष होता है। क्योंकि उससे मिन्न अन्य कोई संमव नहीं है। ताटरपपरेन-'मैं हसे जानता हूँ' इस प्रकार असामानाधिकरण्य [भिन्नता] की प्रतीति के कारण। इसीलिए इसकी तुछना 'विदेशर'आदि से की गई है। 'जहाँ माविक की प्रनीति के बाद रसवदलंकार की प्तीति होती है वहाँ क्या मानना होगा-ऐसी शंका कर कहते है- रफुट इत्यादि। इस प्रकार तातपर्ये यह कि इन दोनों का समावेश अँग और अगी के रूप में होगा। इसका उदाहरण यह है- वनमध्य से लौटे, काधे पर समिधा और कुश लिए, अग्नि का प्रत्युद्गमन करने से पवित्र सपस्वियों द्वारा मरा हुआ आश्रम ।।' [ रखुवंश-१1,९ से तुलनीय ]। यहाँ तपस्वियों की पनीवि स्कुट रूप से होती है। वह ज्ञान्त रस का मन है, अना दोनों में अभेद है। इस प्रकार तारपयें यह निकला कि ययावद वर्णन के आषार पर सुन्दर वस्तु का प्रत्यक् तुल्य ज्ञान रस [भाविक] का स्वरूप है। 'यदि ऐेसा है तो फिर इसे सवमायोकि ही क्यों नहीं माना जाता' ऐसी शका पर दिखते हैं- [सर्वस्व ] नापीयं सूक्ष्मवम्तुस्वभाववर्णनात् स्वमावोक्ि:। यश्यां लौकिक- धस्तुगतसूक्षमधर्मवर्पने साधारण्येन हृदयसंवादसंभवात्। इछ घ लोकोच्तराणां वस्तूनां स्फुटतया ताटम्थ्येन पनीते: 1 कचिसु लौकिका- नामपि वस्तूनां सकुटत्वेन भतीतौ भाविकस्वमाघोपत्योः समावेशः
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भावकालङ्कार: ६७७
स्यात्। न व हृदयसंवाद्मातन्रेण स्वभावोक्तिरसवदलंकारयोरमेद्ः । वस्तुसंचाद्रूपत्वात् स्वभावोक्ते। चित्ततृत्तिसमाविरूपत्वाञ्च रसवदलं कारस्य। उभयर्संवाददर्शनेऽपि समावेशोऽषि घटते। यत्र वस्तुगत- सूक्ष्मधर्मवर्णन स्थात् तत्र स्वभावोकति, अन्यत् तु रसबदलंकार पव। नाप्ययं शब्दानाकुलत्वहेतुकाउझगित्यर्थसमर्पणात् प्रसादाख्यो गुणः। तस्य दि स्फुटास्फुटोमयवाच्यगततवेन झटिति समर्पणं रूपम्। मस्य तु झटिति समर्पितस्य सतः स्फुढत्वेन प्रतीतौ स्वरूपप्रतिलम्भः। तस्मा दयं सर्वोत्तीर्ण पवालंकार:। 'इसमें वस्तु के सूक्षम स्वमाव [स्वरूप] का वर्णन रदता है इसलिए इसे स्वमानोकि से अभिन्न मानने का प्रश्न उठाया जा सकता है किन्तु वह्द समव नहीं है, क्योंकि सौकिक वस्तु के सूक्ष्म धर्म का वर्णन रहता है और उसकी प्रतीति साधारण रूप से दोती है तथा हृाय संवाद रहता है। जब कि इस [माविक] में लोकोत्तर वस्तुओं की प्रतीति वाक वस्तु के रूप में स्फुट [ परस्पर भिन्न] रूप में होती है। कहीं लौकिक वस्तुएं मी स्फुट रूप में प्रतीत हो सकती हैं। वहाँ भाविक तथा स्वमावोक्ति का पकत समावेश माना जा सकता है [ न कि किसी का किसी में अन्तर्भाव ]। 'हृदयसंवाद की समानता को लेकर स्वमानोकि और रसवदलंकार में भी अमेद नहीं माना जा सकता। क्योंकि स्वमानोकि का स्वरूप है वस्तुसंवाद जनकि रसवदलंकार का स्वरूप है चित्तवृत्तिसंवाद । कहीं यदि दोनों प्रकार के मबाद मिल जाएं तो इन दोनों का एकब समावेश मी संमव है। वहाँ जितने अंश में वस्तु के सूक्ष्म धर्म का वर्णन होगा उतने में स्वमावोक्ति मानी जाएगी, किन्तु शेष में रसवदलंकार ।।' 'शब्दों की अनाकुलता [स्पषर्यंता] रूपो देतु से अर्थ का ज्ञान अतिशीत कराने के कारण इस [भाविक] को प्रसाद गुण से अमिन मानने की बात सठाई जा सकती है, किन्तु वह मी संभव नहीं है। उस [ प्रसाद गुण] का स्वरूप है स्फुट या अस्फुट दोनों प्रकार के वाच्यार्थे की शीम प्रतीति कराना जबकि इस [भाविक] को स्वरूप लाम होता है तव जब पहले से शीम्रतया विदित वस्तु का स्फुट [परस्पर में मिन्न मीर स्रष्ट] रूप से बोध होता है। इस प्रकार वह सव अलंकारों से पृथक मलंकार है। विमर्शिनी
ईदमिदं वसत्वत्यत्र हृदयसंवाद: ।सच पया- 'यत्र रतनन्घयान् हस्ते रतदीपाक्िघृष्तः। दष्टवा हा हेति संम्नान्ता घात्री चेटेविहस्यते।' सन्न घातीणामीदगयं स्वभाव इति वस्तुनिष्ठो हृदयसंवाद:। यथा वा- 'यदस्वाद्य सीका वितरति तदग्रे स्वगृहिणे सुमिन्नापुनाय प्रणिहितविशेषं तदनु घ। यदामं यस् चामं यदनतिरसं यञ्त विरसं फलं वा मूलं वा रचयति तु तेन स्वमशनम् ॥'
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६७८ मलङ्गारसर्वस्वम्
अन्रेहगेव गृहिणीना र्वमाव हति संवाद: । सुटतपेति। पुरःहफुरद्रूपतया। सा घ प्रतीतियंया- 'निमीळितस्थ पूर्णेन्दो: सुधार्यां परलिाहुलो। यत्न मृःयुजित: पादी भयेसे मावितै: पुसः॥' पया च- 'दुर्भाङ्ुरेण चरणा पत हस्पकाण्डे तन्वी स्यिता कतिचिदेव पदानि गरवा। आसीद्विवृततवदना च विमोघयन्ती शासामु वश्कछमसकमपि दुमाणाम्।' क्षत्र पाद्मो: शकुन्तवायाक् शुद्धव प्रायपर्वेन प्रतीतिः।नतु च यत्र रवभायोंका धदि प्रत्य चत्या परतीतिस्नन किमिरयासबथाठ-कचिदित्यादि। समावेश इति। सस्षटिरूप संकररूपो था। ससु यथा- 'हेर्वेशन्न हरीघरे नखमुखैः कण्टूयमाने गलं कुवन् पुच्छ विवर्तनानि विरतो शोमन्यकीकायिताव्। संमीलपयनं विसंरयुललसा सास्न नतोस्षामित. ग्रीव निश्वळकणमीश्वरयळीवर्द्: सुसं मन्पते।' क्षत्र घृथभर्य पृच्छुविवर्तनारिसूचमधर्मवर्नेन वभा्ोकि, प्र्थसायमाणरवेन भाविकमित्यनयो: समावेक रवभावोकवि रसवर्द्लंक्ाराप्रसट्रेन भेद दशयति- न चेतादिना। हृदयसंवादी हि वरतुचित्तवृत्तिगतरवेन दिविधण। तन्र स्वभावोषी वरतु- संवाद: प्रवुर्शितः। चित्तवृत्तिसंधादस्तु यथा- 'चन्द्रांशुर्मेरघ्मिस्मप्िकार्ना प्रिय प्रति। सौधेपु गीतं रामाणों चत्रालिमिस्नूयते ।' अत्र परियामिलापिणी नायिकाचित्तवृत्ति सचैतर्सा स्रित्तवृत्त्यभेददेन संवदतीति सरसंवादः। यत्र द्विविघोऽपि संवादस्तत्र कि प्रतिपत्तम्य मित्वारकयाद-उभयेत्यादि। स व समावेशो यथा-
पूजन्ती विततैकपर्शतपुटेनालिक्गय लोलाउस धन्यं कान्तमुपान्तर्वतिनमिय पारावतं सेवते ॥' अ्त्र पारावतयो: सूषमघर्मवर्णनेन स्वमावोकि, वित्तवृत्तिविशेपास रसवद्ठकार दव्य नयो: समावेदः। अन्यन्रेति। यत् वव तुगतसूषमधमंवर्णना न स्वाद्। अनेन व भाविक रसवदल काराभ्यामर्या मेदो भाविकमससे निषेष्यते इति यर्मापुव्त तन्निर्वादितम्। हदानी घ प्रकृतमेवाह-नाम्यय मिस्यादि। समित्यर्थंसमर्पण प्रसाद सगिति समर्ित- पतर्च नारमामिरेस्थान एवामिनिविट्मिरयाह-ववकय इरयादि। यहा जो हृदयस्षवाद होता है उसका स्वरूप है कि 'हॉ यह वस्तु ऐसी ही है।' इसका बदाहरण यद है-
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६७१ जयां ररनदीमों को छाम में लेने जा रहे हैं दुधमुदो को देखकर घवराई और 'हा डा' करवी भाई पर चेटलोग हँसा करते हैं।' यहां 'घार्ई की यह चेह ऐसी ही होती है' इस प्रकार का ददयसंवादअनुभूतिगत मेल रहता है। यह संवाद वस्तुविषयक रदता है। दूसरा उदाहरण पया- 'जो कोई फल या कन्द स्वादु होता उसे सीता जो 'पहले अपने गृषपति [भगवान् राम] को परोसतीं, उसके पश्चात बचे फल या कन्द में से जिसे अच्छा समझती उसे समिनापुत्र [रक्ष्मण जी] को परोसतीं। इसके पश्चाव फल या कन्दों में जो कोई कच्चा जो सूखा, जो कम रवादु या जो नोरस बच जाता उससे अपना भोजन पूरा करतीं। यहां सामाजिक को भी यही प्रतीत होता है कि गृहिणियों का स्वमाव ऐसा हो रहता है। रफुटतया स्फुटरूप से= पुराफुरद= सामने झिलमिलते रूप है। इस प्रतीति का बदाहरण यह है-
जहाँ भावत चित्त्वाले मक्तों द्वारा भगवान् मृत्युअय के, निमीलित पूर्णेन्दु की सुधा से सिक अंगुली वाले चरण सामने उपस्थित से देखे बाते रहते हैं।' दूसरा उदाहरण पथा - 'वह शकुन्तला कुछ हो डग चली औौर अस्थान पर ही जहा कुश नहीं थे वहीं 'कुशांकुर से पाँव रायल हो गया' ऐसा कह ठहर गई। पास के पेडों की शखाओं में नहीं उसझा वल्कल भी वद [ मेरी मोर ] मुंद बुमा खोलने लगती थी'। [शाकुन्तल] इन [दोनों पदों] में चरण तथा शकुन्तला की शुद्ध रूप में ही प्रत्यक्ष रूप से पतीति हो रही है। 'जहाँ स्वभानोक्ि में मी [पदार्यों की ] प्रतीति प्रत्यक्ष जैसी ही शेती है यहोँ कौन सा अ्लंकार दोता है। ऐसा प्रश्न कर उत्तर देते हैं-'कचिव' इस्यादि। समावेश=संसृष्टिरूप में समावेश य संकररूप में। इसका बदाहरण यह है- 'हरि सिंह या चूछे ] पर सवारी करने वाले होने पर भी गणेश जी अय गला खुनलाने लगते हैं तो शिवनी का नन्दीवृष पूंछ इमाने लगता और रौथना बंद कर देता है। वह सुख का इतना अनुमव करता है कि उसमें उसकीं आें मुँद जाती हैं, [दिसंस्थुल ] वेडौल सारना हिलने लगती है, गरदन नीची कँची करने लगती है औौर कान निश्चष् हो जाते हैं। इस पद्य में चैल का पूँछ घुमाना आदि जो धर्म है उसका सूक्ष्म वर्णन होने से स्वमावोति है और उसका प्रत्यक्ष जैसा अनुभव होने से माविक। इस प्रकार यहाँ इन दोनों का समावेश है। इसी प्रसंग में रसवदकंकार से स्वभावोक्ति का सन्तर मी दिखलाते हैं-'न च' इत्यादि के द्वारा। हृदयसंवाद जो है वह दो प्रकार का होता है वस्तुगत और चित्तवृत्तिगत। दोनों में से स्वभावोकि में वस्तुसंवाद होता है जो उपर्युक्त पघों द्वारा वतलाया ना चुका है। चित्तवृत्ति संवाद का उदाहरण यह है- 'नईी, चन्द्ररश्मियों से मुसकुराती भम्मिलक मसिलिका [लूड़े में लमे मोगरे के पुप्प ] वाली रामाओं के प्रियजन के लिए गाए गए गानों का स्रमरों द्वारा अनुवाद किया जाता है।' यहा नायिका की प्रियामिलापरूपी चित्तवृत्षि सहदयों को अपनी चित्तृत्ति के साथ यमिम- रूप में प्रतीत होती है, अतः यहां चित्तवृत्तिरसंवाद हुआ।
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६८० अलद्गारसवस्वम्
'ज ईी दोनों ही प्रकार का संवाद दो वह। क्या समझना चाहिए इस प्रश्न पर कहते हैं- 'उमय' हतयादि। इस समावेश का उदाहरण यह है- 'यर कपोती [ कबूतही। सोकर जाग नठी है। इसकी आँखें विश्िर-कुचिन-चचु-चुम्बन- सुख से सफारित हो गई है। नौंद के पशात् उदित चार चाटटकारी दवारा अपना चित् अ्पित करतो हुई यह बार बार गुटर गुटुर कर रही है और उसने अपना एक पख फेलाकर कपोत का आ्लिंगन कर रखा है। इस प्रकार यह समीपबत्ी, लोखालस और ्रिय कपोत का सेवन कर रही है।' यहाँ कपोत कपोतो के सुक्षम धर्म का सूक्ष्प वर्शन है, अत. स्वभावोकति है, और चित्तवृत्ि- विशेष [रनि] के कारण रसनदलकार है। इस प्रकार इन दोनों का पकन समावेश है। अन्यथ= जशा वस्तु का सूदमवर्णन नहीं। इस विवेचन के द्वारा अन्वकार ने पछले [ स्वमाबीकि प्रकरण] में जो यह कदा था कि 'माविक तथा रसवदलंकार से इसका अन्नर माविकारकार के प्रकरण में तय किया जायगा' उमे पूरा कर दिया। अब प्रकृत विषय आ्रम्भ करते हैं-नाप्ययम् हत्यादि। अर्थ का सोत जान कराना है प्रसाद, और माविक है व्ञान पदार्थे का सफुट रूप से यान। इस प्रकार इन दोनों में महन् अन्तर है। इसीका उपमदार करते हुर लिखते है- सस्मासुन। यह बतलाने दुप कि हमने यह विवेचन निराधार नहों किया है आगे लिखने हैं- [सर्वस्व ] लक्ष्ये चायं प्रचुरमयोगो दृश्यते। यथा- मुनिर्जयति योगीन्द्रो मद्धात्मा कुम्भसम्मया। येनैंकचुलुके दष्टी दिन्यी तौ मतस्यकच्छपौ ।।' यथा चा-दर्पधरितप्रारम्भे ब्रह्मसदसि वेदम्यरूपवर्णने। तन्र हवि प्रत्यक्षमेव क्फुटर्वेन नदीयं रूपं हइयते। एवं तन्रेव मुनिकोधवर्णने, पुलिन्दचर्णनादी शेयम्। अर्यं त्वत विवारलेश संभवति-इद क्वचिद्वर्णनीयस्य वर्णनावशादेव प्रत्यक्षायमाणत्वम्। कचित्पत्यक्षायमाणस्यैव वर्णनम्। आद्यो ययोदाहतं पराकू। द्वितीयो यथा- अनातपश्रोऽव्ययमत्र लक्ष्यते सितातपत्रैरिव सर्वतो घृनः। यचामरोडप्येप सदैव चीज्यते घिलामवालव्यजनेन कोऽप्ययम्॥' इति। अघ प्रथमप्रफारविपयोऽयमलंकारो न प्रकारान्तरगोचर., कविसम- पितानां धर्माणां ह्यलंकारत्वात्। न हिमांशुत्ावण्यादीनामिच वम्तुसननि वेशिनाम्। अपि च 'शध्दानाकुलता चेति तस्य हेतून्प्रचक्षते' इति भाम दीये, 'वाचामनाकुलत्वेनापि माधिकम्' इति चौन्नटलक्षणे व्यस्तसंबन्ध- रा्िनशब्दसंदर्भसमर्पितत्वं प्रत्यक्षायमाणत्यप्रतिपादरुं कथं प्रयोजकीभवेद, यदि वस्तुसनिनिवेशधर्मिगतत्वेनापि माचिकुं स्थान् । तस्माद् वास्तव
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भाविकालङ्कार: ६८१
मेव महत्वमुत्तरप्रकारविपये वर्णितमिति नायमलंकार: । यदि तु वास्त मेवात सौन्दर्य कविनियद्ध कविनिबद्वक्तृनिवद्धं वा सकलवततृगोचरी- भूतं स्वभावोक्तिवद्लंकारतया वर्ण्यतेः तदायमपि प्रकारो नातीव दु: शिलिछ्ः। मतु एव 'प्रत्यक्षा इच यत्रार्थाः, क्रियन्ते भूतभाविन', तन्भाविकम्' इत्येताव देवान्यैर्भाविकलक्षणमकारि। स्वमावोक्त्या किंचित्सादृश्यात्तद्. नन्तरमस्य लक्षणं कृतम्। लक्ष्य [काव्य] में इसका प्रयोग प्रचुरमात्रा में मिलता है। जैसे- 'महाहमा और योगिराज मुनि वगस्त्य सर्वोत्कष्ट है बिन्होंने [ समुद्रपान के समय ] एक ही चुल्ल में वे दोनों दिव्य [ विष्णु के सवतारभूत] मत्त्य और कच्छप देखे।' और जैसे- दर्पचरित के आरम्म में नह्ाजी की सभा के बीच वेद के स्वरूप के वर्णन में। वहाँ प्रत्यक्षरूप से उस [वेद] का स्वरूप स्पष्टतया दिखाई देने लगता है। इसी प्रकार उसी प्रसंग में भुनि के कोप के वर्णन, औौर [अष्टम उच्छवास के मरम्भ में] पुलिन्द के वर्णन मादि में जाना जा सकता है। यहाँ थोड़ा सा यह विचार किया जा सकता है-यहाँ [काव्यों] में कहीं तो वर्णनीय पदार्थे की प्रत्यक्षनत पतीति वर्णना के कारण ही होती है और कहीं प्रत्यक्षवत् प्रतीति की चर्णना होती है। इनमें प्रथम का उदाहरण पहले ही [सुनिजयति० ] दिया जा चुका द्वितीय का उदाहरण यह है- 'यह कोई ऐसा व्यक्ति है जो मतपत्ररहित होने पर भी चहुँओर से धवल आतपत्रों से घिरा प्रतीत होता है और चामर रहित होने पर भी विलासरूपी वालव्यजन से इस पर सदा हो हवा होती रहती है।' [हमारी दृष्टि में] इन दोनों में से यह [माविक] अलंकार केवल प्रथम प्रकार तक सीभित दै, दूसरे प्रकार में यह नहीं होता। क्योंकि जो धर्म कविदारा समर्पित होते हैं वे ही अलंकार माने जाते है, न कि वे धर्म जो वस्तुनिष्ठ होते हैं, जैसे चन्द्रमा आदि में रहने वाले आव आदि। और इसीलिए एक कठिनाई यह भो आती है कि वस्तुनिष धर्मो में भी माविक मान लिया जाए तो प्रत्यक्षवत प्रतीति के परति व्यस्त सम्नन्धरहित शग्द सन्दर्म द्वारा [हुई] उपस्थिति को जो मामह के लक्षण में 'औौर शब्दों की अनाकुलता उसके हेतु वतलाए जाते हैं'- इस प्रकार तथा उडूढ के लक्षण में 'शब्दों की अनुकूलता में भाविक होता है' इस प्रकार निष्पादक के रूप में स्व्रीकार किया गया है यह निष्पादक कैसे सिद्ध दोगी। इक कारण द्वितीय प्रकार में वास्तविक महत्व हो वर्गित किया गया है फलतः वहाँ यह अलंकार नहीं है। हाँ, यदि वास्तविक् सौन्दर्य मी कवि के द्वारा उरनिवद् दो अयना कविदारा प्रस्तुत पात द्वारा, साथ ही सभी पाठकों के प्रत्यक्ष का विषय हो और स्वमावोति के समान अलंकार रूप से प्रस्तुत किया जाए, तो यह [ द्वितीय] प्रकार नी अधिक अहृद्यंगम न होगा। इसीलिए अन्य [मम्मट] आचार्य ने भी माविक का वक्षण 'जहां भूत और भावी पदार्थो का प्रत्यक्ष सा किया जाता है उसे 'भाविक कहा जाता है' इतना ही किया है। इसका स्वभानोक्ति के साथ कुछ सादृश्य है इस कारण इसका कक्षण सवमावोकि के बाद रखा गया है।' विम्शिनी तश्रैवेति। हर्पचरिते। तन्र क्रोधसुनिवर्णन प्रारम्भ एव स्थितम्। पुलिन्दवर्णनं पुव रष्टमोच्छवासारम्भे स्थितमिति तत एव स्वयमवधार्यम्। इृछ तु अन्थविस्तरमयान
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६८२ मलङ्गारसर्वस्वम्
सिखितम्। अतीतानागतयो: सूत्रितेऽपि प्रायवायमाणत्वे देशादिविप्रकृश्ठना प्रश्यचाय माणरवमुदाइरसा ग्रम्थकृवातीतानागतत्वस्य विप्रकर्पमात्रसारश्वं सूचितम्। तथ देश- कालश्वभाव विप्रड्ष्टामाम विशिष्टमित्येतदुदावतम्। तम्रागसय मुनेरदेशविप्रकृषवम्। मनागतस्य सु यर्या- 'पिसो रिपपा सिष्सुर पुटाहन्यमानादिरौव-
पार्वशस्पर्शाहदनतुरग प्रेरयन् व्वेष्छजाति जैप्यर्वेष त्रिमुवनविसुः कर्किरूपेण विष्णु: ।' एवं चिरंतनोफनीश्या विवायं पुनरपि स्वोपन कविद्विचारमाह-अयमिश्यादिना। संभवतीति। न पुन कैनापि रष्ट इति भाव: । यथोदाहनमिति । मुनिजंयती यादिया। प्रथमेति। पत्र वर्णनावशापरयनायमाणावम्। अत एव कविसमर्पितघर्माणी न वस्तु- स्रिवेशिनां धर्माणामलंकारखवादिति सम्वं्धः। न द्ि वस्तुमात्रवर्णने कविकौशलं किचिदिति भाव.। अषि चेति। निपातसमुदायः समुच्चयार्यः अग्रेव वाक्यगत्या हेरवन्तर. रय समुच्चीयमानरवासू। कपमिति। वस्तुमात्रपमने सव्वानामाचुखताया अनकुलनायाक्षा विशेपात्। उत्तरप्रकारेति। अनातपशेऽपीश्यादी। अय्ापि मकारान्तरेणार्लंकारं योज- यति-यदि खित्यादिना। सकलववतृगोघरीभूतमिति। कविमान्नगम्परवास्। अत एव प्र- स्यताय माणवर्य तव्विर्मितायमानतवं सयात्। सकबवतृगोघरीभूतावे पुन्यंधोकं वारतव. रवमेवेति भावः। नामोवेति। न पुनः प्रकाशवद सुश्षिष्ट इति यावद्। अन रवेति। वाश्तवरमापि सौन्द्यस्थाध्ालंकारतया वर्णनातू। पतावदेवेति। न पुनः शव्यानाकुछ रवादि वस्तुनि तश्याविशेपात्। अन्येरिनि। काग्यप्रकाशकारादिमि:। तश्नेव=वरहीं हषचरित में ही। वदा कोषमुनि-दुर्वात्ता का वर्ष्न आरम्भ [प्रयम उच्छवास] में ही है, और पुसिन्दवर्णन अट्टम उच्छवास में है। उमे वहाने समझ हेना चाहिए। यह अ्रन्थ के विस्वार के भय से उसे उदधृत नहीं किया। यदपि सूत् में अन्यकार ने केवक अतीत और अना- गत् की प्रश्यक्षायमायता का उब्लेख किया है किन्तु वृत्ति में उदाइरण दिए है दूर देश और मिन्न काल में स्थिन [ अत एव अतीन और अनागत के हो समान अपस्यक्ष ] वस्तुओं के, इससे यह सूचिन किया गया कि अनीद और अनागन में भी सारभूत तत्व [ भाविक में अलकारख का कारण] विमकर्पमात्र [दूरी] है। इनमें से अगसत्यमुनि की दूरदेश स्थिति का उदाहरण दे दिया गया है [ मुनिर्जयति० इत्यादि ] अनागत का उदादरण यद है- 'तीनों बोर्कों के स्वामी मगवान् विष्शु क्किरूप में अपने वाहन उस मध को दैद लगाते हुए म्लेच्छजातियों को जीतेंगे जो [अश्] सुरपुटों से आहत और दिस रिक्षप्त समी पर्वतों को रौद् ध्वनि से करे देवताओं द्वारा उच्चारित नमस्कार शब्दों पर कान दिय हुए होगा।' इस प्रकार प्राचीन आचार्यों की दृष्टि से विचार कर अब अपनी मर से मो कुछ विचार प्रस्तुन करते हुए लिसते हैं-'अयम्' हत्यादि। संभवतीति=किया ना सकना है अर्थाँत यह विचार भमी तक किसी ने देसा नहीं है। ययोदाहतम्='मुनिनयति' इरयादि द्वारा उदाहनम्। प्रथम जहाँ वर्गना के कारण प्रत्यक्षायमागता थाती है। इसीलिए इसका सम्न्ध ऐसा होगा-'कविसमर्पित धर्मों में हो,न कि वस्तुनिष्ठ धर्मों में, अलकारत्व होने से' भाव यह कि वेवल वस्तुमान्न के वर्गन में कोई कविकौशन नहीं रहता। अदि घमयह निपानममुराय समुच्चयार्थेक है गयोंकि यही [ अगले ] वाक्य के द्वारा एक मन्य हेत का भी समुच्चय किया था
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भाविकालङ्कार: ६८३ रहा है। कथस्= मैसे= क्योंकि वस्तुमात के वर्णन में शब्दों की आकुलता दो या अनाकुलता दोनों में कोई अन्तर नहीं रहता। वत्तरप्रकार= परवर्ती दूसरे में सर्थाद 'अनातपत्रोऽि' इत्यादि द्वारा प्रदर्शित प्रकार में। भब यहां भी अन्य प्रकार से अलंकारत्व की सिद्धि करते हैं-यदि तु। सकलवयत्ृगोचरी भूतम् = सभी पाठकों के अनुमव में आने वाला=क्योंकि वह भी कविमान्र का विषय रहता है। इसीलिए प्रम्यक्षायमाणता भी तन्निमिंतायमानता= [कविदारा निर्मित होना] ही दोगी। नवीन=अधिक रिलस-न कि इसके प्रकार के समान सुशिष्ट। अतप्व=वास्तविक सौन्दर्य को भी अलंकार रूप में चतलाए जाने से। एतावदेव = इतना ही न कि [मामद और बन्टट के समान] शम्दानाकुलश्व मो उसमें जोढ़ा है वयोंकि वह तो वास्तविक वस्तु के कथन में भी समान रूप से रहता है। अन्येः= अन्य =काव्यप्रकाश्कार आदि ने॥, विमर्श-विधेशर- 'आणव-कार्म मलदन्ददीना मायामलान्विताः। सर्वशा: सर्वकर्सरो मता विदेश्वराश् ते ॥ -पूर्णताप्रत्यमिक्ञा उच० ५०४ अर्थाव शिव, मन्त्रमदेश्वर तथा मन्वेश्वर नामक पमाता नव अभिलाष या अपूर्णत्वानिमानरूपी भगव मल तथा धर्माधमे वासना-रूपी कार्म मल से रहिति और वैद्य वस्तु के प्रति स्वमिन्नताबोध रूपी मार्यिक मल से युक्ता रहते हैं तो विधेश्वर कदलाते हैं। ये सर्वंत्र और सर्वकर्ता होते हैं। " मायामल का लक्षण पूर्णताप्रत्यमिज्ञा में दी इस प्रकार दिया गया है- 'माययान्धीकृतो वैद्यं भिन्नं पश्यॅस्तु परशितः । [र० ४९७ का०] विमर्शिनी में 'विद्येध्धर आदि' इस प्रकार जो आदि शब्द दिया गया है उसका संकेत विज्ञानाकल जादि की और है। इन्हें शैवदर्शन से समझ लेना चाहिए। हतिहास-माविकालंकार सरवेमान्य अलंकार है। इसका सूत्रपात दण्डी-के काव्यादर्दों में इस प्रकार मिलता है- 'तद्माविकमिति प्राद्ुः प्रमन्धविषयं गुणम्। मावः कचेरमिपायः काव्येष्वासिद्धिसंस्थितः ॥ २३६४ परस्परोपकारित्वं सर्वेषां वस्तुवर्णनम्। विशेषणारना व्यर्थानामकिया स्थानवर्णना॥ ३६्५ न्यक्तिर त्िकमवलाद् गभीरस्यापि वस्तुनः । मावायस्समिदं सर्वमिति तद्माविकं विदुः ॥ ३६६। माविक प्रदन्ध विषयक धर्भ है। क्योंकि काव्य में कवि का अमिपरायरूपी माव मासमाति स्थित रददता है। इसमें कथावस्तु के समी पर्व परस्पर में उपकारी होते हैं। व्यर्थ विशेषणों का इसमें अमाव रहता है। इसमें स्थानों की वर्णना तथा उत्तक्रम के बल पर गम्भोर वस्तु की भी अभिष्यक्ति रहती है। यह सर्वमानायत्त रहता है अतः भाविक कहलाता है [ काव्यादर्श श ६४-६]दण्डी के इस विवेचन से प्रतीत होता है कि इपंचरित के मझ्सभा आदि के वर्णन में माविक मानने की प्रेरणा सवस्वकार को दण्डी से ही मिली है। स्फुट पद्चार्थ में भी भाविक का अस्तित्व दण्डी को मान्य है ऐसा उनके कपर दिए विवेचन से प्रतीत नहीं होता। भामह-का साविकलक्षण आंशिक रूप से वृत्तिकार ने उद्धृत कर दिया है। दण्ही की अनुकृति पर इन्होंने भाविक का पूरा विवेचन इस प्रकार किया है- भाविकत्वमिति प्राङ्कः प्रबन्धविषयं गुणभ्। प्रत्यक्षा इव दृशयन्ते यत्रार्था भूतमाविनः ॥३।५३॥ चित्रोदा साद भुतार्थेतं कथाया: स्वमिनीतता। शदानाकुलता नेति तत्य हेतुं प्रचक्षते ।३।५४।।
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माविकश्व एक ऐसा गुण है जो प्रबन्ध में रहता है। इमनें भूनमात्री पदार्थ प्रश्यक्व जैमे दिखाई देते हैं। इसके हेतु बतलाए जाते हैं (१) कपानक के वैविध्य, उदात्तल सथा अद्सुतसव्र, (२) अमिनयकला का ठौक अनुगम तथा (२) सब्दों को भनाकुलता। इस प्रकार स्पष्ट है कि भूतमावी पदार्थो को प्रत्यक्षायमाणता को मामह ने हो माविक में स्थान दिया है। इसी प्रकार बहुचचित शम्दानाकुलता भी भाविकरक्षण में मामद से ही भाती है। अन्य विषयों में इन दोनों आचारयों की मान्यताएँ आयः समान है। इन्होंने माविक को मबन्धगत अढकार माना है अत उदाहरण के रूप में कोईे पद नहीं दिया है। वामन भाविक के विषय में चुप है। किन्तु उद्धट ने हमे सुन्क गुण मी मान लिया है। उन्होंने मामह द्वारा प्रस्ुन देतुओं में से केवळ शग्दसन्दर्भ की अनाकुलता को अपनाया है। मामह को देप समी स्थापनाऐं रवीकार करते हुए वे लिखते है -- 'प्रत्यक्षा एव यत्रार्थ दृश्यन्ते भूनभाविनः। अश्यद्भुता: स्यात् नदवाचामानाकुश्येन माविरुम्' ॥३।६।। जिनमें अत्यन्त मदभुन भूत और भावी पदार्थ उक्ति की अनाकुलता के कारण प्रश्यक्ष जैने दिसाई देवे हैं वद माविक कहलाता है।' उद्भट ने मुक्तक गुम के रूप इमका यह उदाहरण दिया े- 'नाना प्रकार के आमरणों की शोमा देखने योग्य इम आकृति से अज्ञन शुव्य नेष्रों वाली तुम [पा्वती ] पीडा और प्रीति दोनीं दे रहो हो।' यहां पावतीजी के भों पर तप के पूर्व जो अळंकारओी शोभा दे रही होगी और तप के पशात् जो भूषगश्नी होगी उसको प्रत्यक्ष देखा जा रहा दे। इसीलिए उसके अमात में दुख व्यक्त किया जारह है। इस प्रकार माविक्र का प्रबन्ध से मुकतक तक सीमिन करने का अनकम कद्र से आरम्म होता है। चद्रट में माविक का विवेचन नहीं मिलता। मम्मट ने उद्रट के लक्षण को और मी संक्षित किया और उसमें से पदार्थगन अद्सुनता तथा उक्रिगत भनाकुलता दोनों को इडाकर उसका रूप मैवळ रना ही रहने दिया- 'प्रश्यक्षा इव यवार्या क्रियनते भूतमाविन, तद्माविरम्। सर्वस्वकार ने इसे उद्धृत भी किया है। मग्मट की दृष्टि वरतुपरक न होकर आत्मपरक है। इसोलिए उन्होंने दृश्यन्ते कियापद के स्थान पर करियम्ने कियापड अपनाया। 'दिसाई देना' जेयगन वैशिष््य है जनकि देखना जातृगत। निश्चिन हो मम्मट के अनुवार काव्यशषिला और वस्तुगन अद्मुनना से भी बढी वस्तु है जातुनिष्ठ माचुकता। माककशब्द की व्युत्पत्ति उन्होंने दण्डी की मानी है-'मात्र" कवेर मिप्रायोडतारनीवि।' सर्वस्वकार ने एक नवीन विरुत्प के साथ इसो को अपना लिया। मम्मट ने भाविर को मुत्तकगत बनलाया है प्रबन्यगन मानने के विषय में वे मौन हैं। ठनका उदाहरण है- *आसीदज्जनमत्रेति पश्यामि तव लोचने। माविभूषगसंमारा साक्षात कुर्ये तवाकृतिम्।। हे सुन्दरि। तुमहारे इन नेत्रों में अश्ञन या ऐस्ा देख रहा हू औीर तुम्हारी आगे भूषयसंमार से उत्पन्न श्री वालो आकृति का भी साक्षत्कार कर रहा हूँ।' यहाँ पूर्वारव में भूनविषयक तथा उत्रार्ध में भाविविषयक प्रश्यक्ष का वर्षन है।
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इस पूर्वकथा से स्पछ है कि माविक का जो रूप मम्मट तक निसरा था सर्वस्कार ने उसौ को अपना किया है। रसनाकरकार=विमर्शनीकार ने जो वस्तुगत विभकर्ष को महत्व्र दिया था, उसके पोछे रत्नाकर का निग्निलिश्वत भाविकसूत्र छिपा था- [ सू.] 'विप्रकृष्टस्य प्रत्यक्षायमाणतं भाविरम्। [वृ.] 'देशकाखन्यां स्वभावेन वाविप्रवृदत्यार्थेत्य साक्षादमदणयोग्यस्यापि सामय्रोवलेन प्रग्यक्षायमाणत्वं स्फुटतया पुर. र्फुर दरूपत्वे नैव पतीस्षिर्माविकम्। देश, काल या स्वमावसः विप्रकृष्ट अर्याव प्रत्यक्ष द्वारा जानने के अयोग्य वस्तु का मो सामघ्री के आधार पर प्रत्वक्षायमाणत्व अर्थाव सामने सड़े से रूप में ज्ञान भाविक कहलाता है।' आागे रत्नाकरकार ने यह भी दिसा है कि मारबिक में यदयपि सभी पदार्थ शब्द से ही प्तीत होते हैँ तथापि होता है उनका ज्ञान, प्रत्यक्षत ही। सामग्री की व्याख्या में वन्होंने दण्डी और मामह द्वारा गिनाए सभी हेतुओं को अपना लिया है। 'वस्तु की अद्भुतता, शब्दों की झटिति अर्थसमर्पकता, वाक्य का सरल अन्त्रय, कवि का कुशल कविकर्ग-इत्यादि समी के योग से चिरानुभून वस्तु मी चित्तमित्ति पर प्रतिफलित हो नाती है। प्रतिफठित शोकर वह निविड़ता धारण करती है। फलस्वरूप झातचेतना उसी पर एकाम हो जाती है। इस स्पिति में ज्ञाता वस्तु का प्रत्यक्षञ्ान चिरकाल तक करता रहता है। यही मानना है। मावना के वल से सहृदय दूरस्थित वस्तु का प्रत्यक्ष मी उसी प्रकार करता रहता है जिस प्रकार योगी किया करता है।' इन शब्दों में रत्नाकरकार ने सवस्व के विस्तृत दार्शनक विवेचन का हो संक्षेप कर दिया है। वदाहरण द्वारा अपनी मान्यता स्पष्ट कर उन्होंने अन्त में सवमावोकति और मानिक के अन्तर पर यह पद्य भी बना दिया है- 'सूक्षमत्वमावकयनेन विनापि साक्षादर्यप्तीतिरिइ केवळमाविकाङम्। शुद्धरसमग्रजनतानु पवप्रसिद्धसभ्यवस्वभावभणिती तु नवेव स्वमापः।। साविक में वेवल साक्षात अर्थ प्रतीति रहती है, इसमें [ स्वमावोकि के समान ] सूक्ष्म- स्वमाव का कथन नहीं रहता। शुद्ध समानोकि वदों होती है जहां समी कोगों के अनुमन् में आने वालै अतरन प्रसिद्ध स्वमाव की सम्यक उक्ति रहती है।' अम्पयदीक्षित ने भाविकालंकार मावकता की जिक्ष अतिभूमि से रदित हुआ या उसे अत्यन्त क्षीण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया है- 'माविक भूतमाव्यर्थसास्षात्कारस्य र्णनम्।' भूत और भावी अर्थ के साक्षात्कार का वर्णन भाविक। सदा० 'अहुं विलोकयेडययापि युध्यन्तेडत सुरासुरा:।' मैं देख रहा हूँ कि सुर और असुर माज मी लढ़ रहे है। न तो इसमें वस्तुगत अदसुतता है, न कविकम की सुक्ष्मगति। लगता है मम्मट से भाविक की ओर जो दुलकष्य होना आरम्म हुआ या अप्पयदीक्षित में उसकी परा काछा हो गई है। पण्डितराज जगनाथ के रसगद्गाधर में माविक का संगह नहीं हो पाया था, किन्तु विश्वेश्वर पण्डित ने उसकी आशिक पूर्ति कर दी है। रन्होंनें- 'भाविकमध्यक्षं स्यात् प्रथ्वसप्रागभावानाम्।' प्रध्वस तथा प्रागभाव वाले पदार्थो का प्रत्यक्ष भाविक कहलाता है। प्रध्वंस से अतीत तथा प्रागमाव का संग्रह कर विश्वेश्वर ने माविक पर मम्मट का लक्षण दुएरा दिया है। मम्मट ने
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'प्रत्यश जैसे' लिखा था विश्वेश्वर ने 'प्रत्यक्ष' दो लिख दिया। वस्तुत' मानस साक्षारकार यहा होता ही है। माविक की व्युश्पत्ति पर स्वस्वकार का सण्डन करते हुए विश्वेश्वर ने कहा है कि 'माव' कवेरमिप्रायोडस्त्यरिमिन् यह व्युम्पत्ति माध्यविरुद्ध है। क्योंकि [अर्थोपत्ति प्रकरण की विभर्शिनी में उद्धुन] 'सप्तम्या च न तौ स्मृती' इस माध्यवरचन द्वारा निषेध हो जाने से ठन् मत्यय सक्मी अर्थ में नहीं होगा। यहाँ रन् प्रत्यय मश्वर्थाय होगा अन. 'युतपतति दोगी'- भाव कवेरमिपायोऽसयस्य= जिसका विषय भावकवि का अभि्ाय होता है वह माविक। विश्वेइ्वर के अनुसार मी भूत और मावी पदार्थों के पत्यश्न में अपेक्षिन सन्निकम वस्तुगत अद्भूतता से निष्पस्न हो जाना है। श्रीविद्याचकवसी की निष्कष्टार्यंकारिका माविक पर इस पकार है-
माविक दूरदुलेक्ष व्यक्त व्याक्रियतेतमाम्।। योडयं प्रश्यक्षवद् भावरत्वनीतानागनाथयो:। तद्भावविभ्नाच्चित विनिवेशच्च माविकम्॥ नाविपर्यपतो आन्ति: साक्षात्वान्नेतिवृत्तकम्।
न परं वर्समानारथेथम प्रत्यक्षतेष्यते। प्रतिपश्चनपेक्षाया पत्यम्षत्वे व सामभी भावनाद्भुतवसतुजा। प्रत्यक्षत्व न समाव्यभिद नोस्प्रेक्षण ततः॥ भविद्रचिद्धिमावाच्च काव्यछिद् न चैष्यते। ताटस्प्याव सुरसविसेने वदा रसवद्भ्रमः ॥ पश्चाव साधारणोमावे रसर्वास्तन्निमित्तक। सफुत्वान् खवमावोकिकोकोत्तीर्णस्य वर्तुनः॥। स्वमावोके रसवनी भेद सवादमेदत। न प्रसादगुणश्चेनद् यस्मादौघरकालिकम्॥ वास्तवेदपि च सौन्दये योग्यत्वादस्य समनः। चिरन्तनानुरोवास तथा व्यक्त न कीपितम्।। भाविके दुद्धिसंवादो मया स्याद् यदि कश्यचित्। व्यास्याशिव्पस्यनिका समे घीमान् भविष्यति ।।' [स्वमावोकि के पश्चाव ] अब भाविक भो अश्यन्त कठिनाई से जाना जा सकता है प्रतीति गत वेवित्र्य तथा सारतम्य का अनेकधा निरूपय कर अत्यन्त स्पष्टना के साथ बतळाया जा रहा है। अतीत और अनागत पदार्थों का सो चित् पर यह प्रत्यक्ष तुश्य भावप्रतिनिम्न पडता है यद, भाव के विम्वन तथा चिछ् में विनिवेशन के कारण माविक कहलाता है। इसमें विपयय नहीं छोता इसलिए यह आन्तिस्वरूप नहीं है। वस्तु साक्षारकार के कारण यह इतिवृत्तमात्र नहीं है। अन्य अध्यवसान न होने से यह अविशयोक्ति मी नहीं है। केवळ वर्त्तमान पदार्थ का धर्म ही प्रत्यक्षना नहीं मानी जानी। क्योंकि यदि शाता न रहे तो प्रत्यक्षता भी नहीं रहती। प्रत्यक्षना में कारण होती है अद्सुनवस्त की भावना। यहाँ प्रत्यक्षता समावनात्मक नही रहती भत- इमे उत्पेक्षा नहीं माना जा सकता। और हिद्लिद्रमान के न होने से इसे कान्यछिद् भी नहीं कड़ा जा सकता। इसमें तटस्यता औौर सफुटता का जान रहता है अत, इसमें रसवदलकार का भ्रम नहीं हो सकता। बाद में जब साधारण माव होता है तब माविक से रसवदलंकार को निष्पत्ति होती है। यहाँ कोकोसर वस्तु का प्रश्यम होता है अ- यह स्वमावोकि रूप नहीं दोता। समादो-
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उदात्तालङ्वार: ६८७
कि और रसवदसंकार में मी संवादगत भेद के कारण भेद रहता है। यह प्साद गुण मी नहीं है क्योंकि यद प्रसादजनित स्पष्ट प्रतीति के पश्चाव की वस्तु है। यह वास्तविक वस्तुओं के सौन्दर्य में भी दोने की योग्यता रखता है किन्तु प्राचीन आाचार्यों के अनुरोध से अन्यकार ने उसे स्पष्ट रूप से माविक नहीं कहा। माषिक के विषय में मैरे साथ यदि किसी का बुद्धि संवाद हो तो वही बुद्धिमान् व्यक्ति मेरे इस व्याख्याशिल् की ककौटी होगा। चकपतीं की संजीविनी माविक के कुछ कठिन अंशों पर उक्लेखनीय प्रकाश डालती है। ऐसे कुछ अंश इस प्रकार है- (१) प्रतिपत्मपेषयैव वस्तुनस्तयाभावात्=प्रतिपस्त्रपेक्षयैव प्रत्यक्षत्स्य वस्तुषर्मेता। न हि प्रतिपश्षारमनपेक्ष्य वस्तुनि प्रत्यक्षता नाम काचिव। (२: तन्न यो ज्ञानवतिसास०= यो सर्थः स्वम्राइ्क प्रतिपत्तुर्यानप्रकाश स्वान्य्रयव्यतिरेका- चनुकारयति, स्वयमस्ति चेद् ज्वानप्रतिमासोरि्ति नासत चेन्रास्तीति व्यवस्यापयति स प्रत्यक्ष इत्यर्थ: । ( ३) परमातितज्ञानिवत=00 न माविकर सवतोर मेदा। कुतः१ रति-हासादिचित्तवृत्षीना तदनुरश्वितत्वेन विमावानुमावव्यमिचारिणों व यदा परमाद्वैतवानिवद् ममैव शत्रोरेवेत्यादिविशेष- परिधारात् साधारण्येन हृदयसंवादिनी प्रतीतिस्तदैव रसवतो भाव: 1 ००1 इद तु भूतमाविना प्रतीतिन साधारण्येन, अपितु प्रतिपत्तुस्ताटस्थ्येन, स्फुटतया ताटस्थ्यं हि भेदः। यया सांख्यादि- सिद्धानां भेदेन सर्व जानतां प्रतीि:। पाठान्तर= निर्णयसागरीय प्रति के मूल तथा टीका दोनों के पाठ अशुद्धिवहुस है। अतः यहोँ इमने अन्य संत्करणों की सहायता तथा रत्नाकर और अपनी कल्पना के आधार पर पाठसंशोधन किया है। अयापि 'पर माहवैतिघ्वानवत' के स्थान पर संजीदिनी में परमाद्वैत- शनिवत पाठ है। विमर्सिनी से परमाद्वैत ज्ान पाठ का हो सन्दिन्ध समर्थन होता है। इनमें से कोई भी पाठ मानने पर अपेक्षित अर्थ निकल दी आता है।
[सर्वस्व्र ] [सू० ८१ ] समृद्धिमद्वस्तुवर्णनमुदात्तम् । स्वभावोक्तो भाविके व यथावद्वस्तुवर्णनम्। तद्विपक्षत्वेनारोवितवस्तु- वर्णनात्मन उदात्तत्यावसरः। तबासंभाव्यमानविभूवियुक्तस्य वस्तुनो वर्णनं
'मुक्ताः केलिविसूत्रहारगलिता: संमार्जनीमिहताः
दूरादू दाडिमचीजशङ्गितधिय: कर्पन्ति केलीशुका यद् विद्द्भषनेपु भोजनृपतेस्तत् त्यागलीलायितम्।' [सू० ८१] समृदिशाली पदार्थ का वर्णन उदाच [नामक अलंकार कहछाता है]। [घृ०] समानोक्ति और माविक वस्तु का यथावद् [जैसा का सैसा] वर्णन होता है। उदात् कहलाता है आरोपित वस्तु का वर्णन। अतः यह उनके विरुद्ध है। इसीिए इसे यहाँ
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६८८ मलङ्कारसवस्वम् प्रथमनः इसका लक्षण समझ लेवा चाहिए। उकतसूत्र के संदर्भ में वह यह है-'असंभाभ्य विभृति से युक्त वस्तु का वर्णन कविप्रतिमा से कब्पित अतः वश्वयस्वरप दोने से उदाप कडलाना है। उदहरण यया- 'विद्ानों के घर में [रात को] वेलिकाल में टूटे हारों मे गिरे, पात र्ऑंगन के एक कोने मैं झाडू से दटीर दिए गए और मन्दगति से घूमती बालाओं के चरणाळकक से लास हो गर मोतियों को दूर से सनार के दाने समझ केली शुक जो खीचते हैं वह भाजराज के स्याग की होळा है।' विमर्शिनी समृद्धिमदरिश्यादि। तद्िपक्षत्वे मैति। वशत्व वस्तुवर्णन यो विरिद्वर वात्। तनेति। पवमवसर सतीत्पर्था। असमाव्यमानेति। संमाव्यमानविभूतियुफस्य तुवणंने नैतवअमिति माक:। यथा-
अ्युद्गताइमकशह तिपा्यमानन चमराशिशपला हूष पत् रप्वा:। अम्र द्वि भगवसगर्या वस्तुत पव समवति रत्नवियेयः। अव पवार्प कविनति- मोरयापिवश्वमुक्म। एवं चार्य नामापि सारपेकपू। अछंकारसारकृता पुनरवाविज्ञयोदि प्रकार कशव मुख्तम्। समृद्धिमदितयादि। तद्विपबरवेनउनके विरड, इसलिए कि वस्त्ु और अवस्तु के वर्णन परस्पर विरुद्ध होते है। तत् इस प्रकार अवसर होने पर। असंभाष्यमान=मात्र यह कि समाव्यमान विभृति से युक्त वस्तु के वर्शन में यह अलकार नहीं होना। यथा- [हरविजयमहाकाष्य के पथमसग में भगवसपुरी का वर्णन] 'जिसवु [म्योरनखनी] नगरी में मासादों के भीवरी फषो के अग्रभाग से फेंके रतन तैथा पुष्पों के पुर्र से छाईे सड़कें प्रात:काळ के समय ददित पाठसूर्य की किरणों के आाषान से गिरी नक्षतरामियों से अषषित सी कगती है।' [१।६२] इस पद्म में वर्णित रस्नों का फंका जाना वास्तविक और संभव है कयोंकि यह नगरी भगवान् को नगरी है। इसोटिए रस प्रकार इसका नाम भी साथक है। अळंकारसारकार ने इसके विरुद इसे अविशायोकि का भेद पतकाया मा।
[सर्घस्व ] [सू. ८२] अङ्गभृतमहापुरुपचरित च ।
भूतव स्त्यन्तराह माचेनोपनिवध्यमानं चरितं चोदात्तम्। मह्ापुरुपचरितस्यो दात्तत्वात्। यथा- 'तदिद्मरण्यं यहिमिन् दशरथचचनानुपालनव्यसनो। निवसन् घाहुसहायश्रकार रक्षाक्षयं राम: ।।'
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उदा सालद्वार: ६८९
[सू० ८२] [ किसी के प्रति] अंगभूत महापुरुप चरित भी [ उदात्त कहलाता है]। [पू०] उदात्त शब्द के साम्य के कारण इसे यहाँ वतलाया जा रहा है। उदाचरित वाले महापुरुषों का चरित, अंगीभृत किसी अन्य वस्तु के अंग के रूप में उपनिवद्ध हो तो वह मी व्वात [नामक एक मन्य अलंकार ] होता है। [रदान्त] इसलिए कि महापुरुप का चरित् ददात्त होता है। यथा- 'यह वह बन है जिसमें दशरथ के वचन का पाठत करने में निरत राम ने जिन के सहायक केवल उन्ही के सुनदण्ठ थे राक्षसो का क्षय किया था।' यहाँ व्णन करना है वन है। उसमें राम का चरित अगरूप में वर्णित किया गया। चिमशिनी अह्भूतेत्याद। एतदेव व्यावष्टे-महापुरुपाणामित्यादिना। अङ्गिभूतस्य वस्तुनो महा पुरुष चरित मुत्कर्पप्रति पिपादयिपयाङ्तयोपनियध्यमानमेतद ्लंकाराक्म। न तूपलक्णमान्र परतयोपात्तमिति तार्पर्यार्थः। तच्च यथोदाहतम्। 'कश्िर्कान्साविरहगुरुणा स्वाधिकार प्रमत्तः शापेनास्तंगमितमहिमा वर्षभोग्येण भहुः। यचश्रके जनकतनयास्ना न पुण्योद केपु स्निग्धच्छायातरुपु वसति रामगिर्याश्रमेपु॥ अघादिनो गिरिविशेषस्य वसतियोग्यत्वादिवर्शनार्थमुत्कर्षप्रतिपिपादयिषया राम- सीताविव्वरितमुपलक्षणपरम्, तदत्र नाथमलंकाद:। यथा- 'गोदावर्याः करिकुलमदषोददशेदकायाः पारे पारे वत बत परावृश्यतामृप्यमूक:। कंकाला ही पिहितगगने दुन्दुभेर्यत्र रामः पादाङ्ुष्ं निजमपि भवददैवतं निर्ममेऽसतम्।' कत पवनं प्रति वियोगित्या उक्ती रामचरितमु पळप्षणमाम्रपरमू , न वभूतेनाद्ग्िनः कविदिशेपो विवचितः । 'अव्नासीतफणिपाशवन्धनविधि: शकत्या भवद्देव रे गाढं वक्सि ताहिते हनुमता द्रोणाद्विशवाहतः। दिश्येरिन्द्जिदन् लपमणशरर्लोकान्तर प्रापित स्तस्याप्यध् मृगाचि राच्सपते: कृत्ता घ कण्ठाटवी॥' इस्यन्र तु रामध्य सीतां प्रश्युक्ावुपलक्षणीभूतदेशविशेषे पाशबन्धनाधयेव साप्ादू विच च्वितमिति न महापुरुषचरितस्य वरखन्तरं प्रत्यङ्गभाव इति नायमलंकार:। अंगभूतेस्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-'महापुरुषाणाम्' इत्यादि के द्वारा। तात्पर्य यह कि अंगी वस्तु के उत्कर्ष के प्रतिपादन हेतु अंगरूप में, न कि उपलक्षण मात्र के रूप में उपनिवध्यमान महापुरुष चरित इस अलंकार का निष्पादक होता है। इसका उदाहरण [ तविद- मरण्यं] दिया जा चुका है। [ रत्नाकरकार द्वारा उदात्त के लिए उदाहृत] 'अपने सषधिकार में अरसावधान अतरव स्वामी के वर्ष भर के कान्ताविरह् संवन्धी अर्यन्त गुरु शाप से महिमाशून्य किसी एक यक्ष ने रामगिरि के, सीताजी के स्नान से पवित्र जल वाले तथा घनी छाया वाले नमेर वृक्षों से सुन्दर आयर्मों में डेरा डाला ।।' ४४ अ० स०
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६१० अलद्गारसवस्वम्
इस पद में अड्गी है गिरिविशेष। उसमें निवास करने की योग्यता दिखलाने के छिए उसका टरकर्ष बतलाना आवश्यक है। तदर्य रामसीता आदि का चरित अपनाया गया है। यह यहा नपलक्षणमानपरक है, अत. यशा यह [उदाघ-२] अलकार नहीं है। 'हाथियों के मदचूर्ण से तिक्त जळ्वाली गोदावरो के किनारे, आा हाडा, इस ऋष्यमूकप्वेत को देखो, जहाँ रामने दुन्दुमनामक देस्य के वकालरपी आकाशरोभी पवत पर अपने पेर के अँगूठे और तुम्हारे दैवन को मो भरत [क्षिप्त ] कर दिया था (?)। पवन के प्रति वियोगिनी को इस ठकि में राम का चरित उपकक्षगमान हे, क्योंकि वह अंगभूत तो है परन्तु उसमे अगी का कोई वेशिषय कवि को विवक्षित नहीं है। [रत्नाकरकार द्वारा उदाच के लिए उदाइन।- 'यहां नागपाश का बन्यन हुआ था, तुम्हारे देवर [दक्ष्मग] को वस्,स्थल में मक्ति छपने पर इनुमान ने द्रोणार्गार यहों हा पहुँचाया था। यहां लक्ष्मण के दिग्यशरों ने इन्द्रित् { मेघनाद] को दूसरे लोक भेन दिया था, अरे उस राक्षसपति [रावण] की मो कण्ठाटवी यहां कटी थी। सीता के प्रति राम की इस बकति में उन उन उपलक्षणीभूत स्थानों में पाशबनधन आदि हो साक्षात विवसिन है, इसलि महापुरुषर्चारत अनय वस्तु के अति भ नही है इसिहां ी यह अलकार नही है। विमर्श- इतिहास-दोनों हो उदात्त प्रयमत. दण्डो में हो मिल जाते है। दण्टी-उन्होंने दोनों रदासों को एक ही अलंकार के दो भेद माना है। उनका रक्षण इसमें प्रमाण है-'आशयस्य विभूतेवां यन्महत्त्तमनुत्तमम्। सदासं नाम त माहुरलंकार मनोपिण ।२।३०० ।। सशय [चित्त] या वैमव का जो सर्वोत्षम महत्व उसे विदशन वदात्त नामक अलेंकार कहते हैं। दण्डी के दोनों उदाहरण सवस्वकार के दोनों उदाहरणों से गतार्थ है। दोनों की अमिव्यक्तियाँ दिलकुल एक सो है। मामह-का उदास्विवेचन दण्डी की ही अनुकृति है। इन्होंने माने तो दोनों ही उदाय हैं किन्तु लक्षण केवल प्रथम का हो दिया है- 'नानारत्नादियुक्क यद वद किषोदाघ्मुच्यते। जो नाना रा्न आदि से सुक्त होता है उसे उदात कहते हैं।' दोनों के बदाहरण दण्डी के उदाहरणों के हो मवानुकरण है। सवया उदाक्ष के विषय में मामइ दण्डी से उपकृत है। इस विषय में वामन चुप हैं। वमट= ने भी दण्टी के ही समान दोनों उदाघों को एक हो लक्षण में गूँय ढाला है। ठनका रक्षण है- उदाष्मृद्धिमद वस्तु चरित च महारमनाम्। उपलख्षणतो प्राप्त नेतिवचृत्व मागनम् । ४ । ८ । संपचिशासी वस्तु रदाप कहलाती है और महात्माओं का उपलक्षणता को प्राप्त चरित, रिन्दु इविवृत्तात्मकता को पाप्त चरित नहीं।' यह यह जान लेना आवश्यक हे कि बन्दर का पक्षणशम्द वर्वस्वकार के अंग सब्द का ही समानाथी सब्द है। विमर्मिनीकार जिस वपस-
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उदात्तालद्वार: ६९१
क्षणस्व का खण्डन कर रहे हैं वह वस्तुतः उस मर्य के लिए प्रयुक्त शब्द है जिसके िए उन्भट ने 'इतिवृत्त'-शब्द दिया है। यह उनके उदादरणों से स्पष्ट है। रुद्ट-वामन के दी समान स्ट्रट के काव्यालंकार में मौ उदात्तांकार नहीं मिसता । बकोकि जोवितकार वदात्त को अलंकार नहीं मानते। इनके अनुसार वह वरतुस्वमाव से मिन्न कोई वस्तु नहीं है।
सग्मट-ने दोनों बदातों के दो चलग लक्षण किए हूँ। वे ये ह- (१) उदात्तं वस्तुन: संपद्, व्दा० मुकाः केलि० () 'महता चोपलक्षणम्। उदा० तदिदमरण्यम्'। मग्मट के उपलक्षण शब्द का अर्थ मी रंगता ही है। क्योकि उन्दोंने उदाहरण अगता का ही दिया है।
रत्नाकरकार=ने उदात का दितीयरूय दी व्दात नाम से सवीकार किया है। प्रथम को मे 'असंबन्ध में संबन्धरूपी अतिशयोकि से गतार्थ मानते हैं। 'मुक्ताः केलि०' पद्य उदधृत कर वे उसमें उदात्तालंकार का निराकरण और क्र अतिशयोकि भेद की स्थापना करते हैं। उनका उदाचसूत्र यद है-
रदार व्यक्ति के चरित का अंग बनना उदात्त कदलाता है। इसके किए इन्होंने कश्चित कान्ताविरह०' पदय वदाहरण रूप से रद्घृत किया था और लिखा था कि 'यहां देश विशेष- [पर्वत ]-रूपी मर्थ प्रधान है, उसमें उदारचरित व्यक्ति जानकी सादि का चरित अंग रूप से ्पनिबद्ध है।' विमर्शिनीकार इसे अगत्व नहीं उपदक्षणत्व मानते हैं। उपलक्षण का अर्थ के 'मुख्यतः वर्णनविपयीभूत न दोना करते हैं। यहाँ अवश्य ही सीताचरित मुख्यतः वणन विषयीभूत नहीं है। किन्तु जानकी सम्बन्ध से उस माय्रम की उदास्ता का मान भी नहीं मेवा जा सकता। इसी प्रकार रत्नाकरकार ने 'अन्नासीत फणि' पद्य में भी उदात्तलंकार माना है। अपर ववीछित= दोनों ही प्रकार का दाप्तालंकर रवीकार करते हैं और लक्षण में मंग- शब्द के स्थान पर उपलक्षण शब्द ही रसते हैं- 'उदात्तमृद्वेश्वरितं रलाव्यं चान्योपरक्षणम्।' ऋद्धि का चरित और रलाव्यतापूर्ण उपलक्षणभूत चरित बदात्त अलंकार माने जाते हैं। विश्वेश्वर= "वस्तुप्रचय उदासं महतामङखववचन वा।' संपदादिवस्त्वतिशयवर्णनमुदात्तम्, ड्कूष्टाना वर्णनीयनिष्वाद्वित्वप्रतियोगिखं च यत्रोध्यते तदपीति। जहां संपत्ति आदि वस्तुओं का अतिशय वर्णित हो उसे उदाक्त कदते हैं तथा सत्कुष्ट वस्तु का संगी वर्णनीथ में अंग वनाना सी।' इस प्रकार विश्वेश्र दोनों ही उदा्त को मम्मट के हो स्वर में स्वीकार करते हैं किन्तु वे उपकक्षणशब्द के स्थान पर अंग शब्द ही अपनाते हैं।' श्रीविद्याचकवतीं की निष्कृष्टार्थकारिका इस पर इस प्रकार की है- [१]वदासं तु समृद्धस्य वस्तुनः कविदर्णनम्। [२ ] नक्यन्तरेडङ्रता पत्रं महचरितळक्षणम्। दिती योदात्तविषयो व्याह व्यास्ती रसवदादिमि: ॥।
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-['] समृद्ध वस्तु का कविवारा वर्णन उदाक्ाएंकार कहलता है। [२ ] अन्य किमीअगी में महपुरुष के चरित का अंगता को प्राप्त होना मी टदासरवार कइछाना है। इस द्वितीय उदास के क्षेत्र में प्राय रमवदादि अर्मंकार व्याप रह्ते हैं। [सर्वम्य ] [सू० ८३] रसभावतदाभासतत्परशमानां निबन्धनेन रसनत्प्रेय- ऊर्जस्विसमाहितानि। उदात्े महापुरुपचरितम्य चित्तवृत्तिरूपत्वान्चित्तवृत्तिविशेषम्वभाव- त्वाच्च रसादीनामिह तद्वदलंकाराणा प्रस्ताव:। अत एव चत्वारोSलंकारा युगपहवकषिता। तत्र घिमावानुभावव्यभिचारिमि प्रकाशितो रत्यादिश्वित- वृत्तिविशेषो रस । भावो विभावानुभायाम्गा सूचितो निर्वेदादिस्त्रयस्त्रि- शद्भेद। देवादिविषयध्च रत्यादिर्भाव । तदाभासी रसामासो मावाभासव् आमासत्वमविषय प्रतृत्यानौ- चित्यम् तत्मशम उक्तप्रकाशणां निवर्तमानत्वेन प्शाम्यदचस्था। तमापि रसस्य परविध्रान्तरूपत्वान सान संभवनि इति पणिशिष्टभेदविपयो : षुव्य:। एपामुपनिबन्धे क्रमेण रसवदादयोऽलंकारा। रसो विद्यते यत्र निबन्धने व्यापारत्मनि तद् रसवत्। प्रियतरं पेयो निबन्धनमेव द्रष्टव्यम्। एवमूर्जो वलं विद्यते यत्र, तद्पि निबन्धनमेव। अनौवित्यप्रवृत्तत्वादन यल्योग। समादितं परिहास:। स च प्रकृतत्वादुक्तभेदविपय प्रशमापरपर्यायः। तत्र यस्मिन्दर्शने वाक्यार्थीभृता रसादयो रसवदायलंकारा, तत्राङ्गभूतरसादि- विपये द्वितीय उदात्तालंकारः। यन्मते त्वङ्गभूते रसादिविपये रसवदादय लंकारा: अन्यस्य रसादिध्वनिना व्याप्तत्वात् तन्नोदात्तारलंकारम्य विपयो नावशिष्यते, तद्विपयम्य रसवदादिना व्याप्त्वात्। [सू० ८३] रस, भाव इन [दोनों] के आभाम तथा इन [भावो] के प्रशम का उपनिबन्ध हो तो [अलंकारी के नाम] रमवय प्रेयस् ऊर्जश्वित् तथा समाहित [ होते हैं ] । [वृच्ि] उदाच में महापुरृष का चरित चित्तवृत्तिरूप दोता है, और रसादि भी चितवृत्ि विशेषरूप होने हैं इसलिए उनसे युक्त [रस्षवदादि ] अलंकारों का निरूपण इस स्थान पर किया जा रहा है। इसीलिए चार मलंकारों के लक्षण एक साथ किए। दोनों में [ जो] रस [ दै वह] है विमाव, अनुभाव तथा व्यमिचारियों के द्वारा अपने साथ प्रकाशित रत्यादिनामक विशिष्ट चित्- वृत्ति। भाव नाम है विमाव और अनुमाव से सूचित निर्वेद आदि तैतीस्ष चिच्वृत्तियों का । देव आदि विश्यक रत्यादि मी भाव हो होने हैं। तदामास का सर्थ है रसामास तया मातामास। आमासत्व है अविषय मे[ जहाँ प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए वहां। प्रवृत्ति से उत्पन्न अनौवित्य। उनका प्रशम कहने से अर्थ निकळता है पूर्वांक [- तद] भेद्ों की निवृत्तिमूटक शान्ति। किन्तु उक्त त्त्वों में से जो रस है वह पर विभान्तिरूप होता है, अन उसमें वह [शाम्ति ] सेमव नहीं दोती, फळसः उस (शान्ति) का विषय बचे दुए
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रसवदाघलङ्वार: ६९३
भेद ही जानने चादिए। इनका जय काव्य में सुंफन होता है तब रसवदादि अलंकार होते हैं। 'रस ऐै सुंफव रूपी व्यापार में जहाँ वह रसवत्। प्रेय कर्थात प्रियता, इसे भी गुंफन ही मानना चाहिम। रसी प्रकार ऊजस का अर्थ है बल बद, जिसमें रहता है वह [ कर्जसवत], यह भी झुंफन रूप हो होगा क्योंकि इसमें प्षृत्ि अनीचित्वमूलक होगी इसलिए इसके साथ वल शब्द जोड़ा गया। ननाहिन का अर्थ है परिदार वह इस पसंग में उक्त भेद विषयक ही होगाजिसका दूसरा पर्याय प्रदन होगा। यहाँ [आानन्दवर्धन के पूर्व के दण्डी मामद आदि] जिन आचार्यो के मत में वाक्यारथीभून रस आदि ही रसनदलंकार है, वश अंगभून रसादि के अंश में उदासालंकार माना जाएगा। किन्तु 'जिन [सानन्दवर्धन, अभिनव गुप्त और मम्मद] के मत में अंगभूत रस आदि को हो रसवदादि अलंकार माना जाता है वहाँ अन्य [ वास्मार्थी भृत्त रसादि] रस आादि की ध्यनि में चला आाता है, अतः उदात्तालंकार के लिए कोई स्थान नहीं रहता। वह जहाँ हो सकता या वहाँ रस- वदादि जो हो जाते हैं।
विमशिनी
रसमविति। अत वेनि। छतुर्गामवि चित्तवृत्िविशेषस्वभावातष। व्न्नेति । युगपत्जपणे स्यिते सतीत्यर्थः । विभावा लक्षनोय्यानादयः आलम्बनोहीयनकारणानि अनुभावाकटाप़ भुगन्तेपादय: कार्याः। व्यमिवारिगो निर्वेदादया सहकारियः। प्रमाशित इति। व्यकिता। . यदुक्तम- 'निभावानुभावष्यमिव्नारिसंयोगादु रसनिष्पत्तिः इति। रत्यादीव्यादिशब्देन हासादीना स्थायिनां ब्रहणमू। निर्वेदादिरिति । यदुकम्- 'निर्वेदग्छानिश क्ाख्यास्तयासुयामदघमा:। आछस्यं चैव दैन्यं घ चिन्ता मोह: स्मृतिर्ष्ठति: ।' बरीढ़ा चपलता हर्ष आवेगो जैडता तथा। गचों विपाद औरसुक्यं निद्धाउपस्मार एव । सुसं विवोछोऽमर्पश्राप्यवहित्थ मथोम्रता। मतिर्वर्याषिस्तथोन्मादस्तथा सरपामेव च॥ त्रासश्ैव वितर्कश्र विश्ेया वयनिचारिण:। न्रयसिनिशदमी भावा: समाख्यातास्तु नामतः ।' हूति। देवसादिविपयाणसानन्वादनेकुप्रकारवेडप्येक्प्रक्ाा एव रत्यातमा भावा। अत एव रध्यादिरितयादिशब्द: प्रकारे। पा समुचमे। यदुकम्-'रतिह्ेवादिविषचा व्यभिचारी तथाझिन: माव: प्रोक इति, तथा 'तदाभासा मनीचित्य प्रवर्तिताः' हति। प्रशाम्यद- वस्थेति। न तु ध्यंसरपा प्रजान्तावस्थेतयथः । तथावे हि सर्वन्नेव कस्यचिम्पकृतखवे सर्वे पामन्येर्पा प्रशान्तव्व्राहेवंमाव: स्यात।ननूकतपकारतवेन परामृश्स्य रसस्यापि कर्थ प्रशान्यदवस्था संगच्छत हत्यासकचाह-तत्रापीत्यादि । परिक्षिष्टेति। भवतदामास सप्प्रश्मविषय एवेत्यर्था। पयामिति। रसभावतदाभासतरप्रशमानाम्। वलयोग इति। अनुचितेन वकात्कारेणैव प्रतुसि:। प्रकृतत्वादिति। तेनात्र वसवन्तरं प्रकृतमिति भानः। नतु व परविश्रान्तिरुपस्य काष्यामनोडलंकार्यस्य रसषर्य कथमलंकारत्ं संगच्छृत इत्याशपयाह-तन्नेत्यादि। यस्मिन्दर्शन इति। धवन्यभाववादिनां मत इस्यथः। द्वितीय इति। ऐश्वर्यलक्षगाद। अन्यस्येति। यम वाक्यार्थीभूतो रसः 1 एवं ध्वन्यभाववादिमतं विषयद्दयत्य हष्टान्तीकृष्य रसरसबद्लंकारयोरनेन विषयविभाग: कुक्ः।
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६९४ सलद्वारसर्वस्वम् अजभूतस्य रसादेश्ालंकारय्वं युक्कम्। तपा व यावनोपमाहोना सर्वालकारार्णा परहुनवस्तूपर अकश्वमठंकारचे नियन्धनम् अक्षमतेनापि रमेव सरि्किरिपत एव, पकनस्य रसादेमदुपस्ककृनर्वेन भावात्, अनश्योपमाह्षीनामळमराये पाहश्येव वार्ता तारशपेव सादीनान्। वद्यपि चोपमादयोउर्यालकारा, नयापि नस्य वाध्यार्थस्य विभावादिरूपना पर्यवसायित्वमेवेति काध्या्मनो उवक्रयस्य रमाहेरव तदलकायम्। कि पुनातस्य शव्द मुखे नो परकारका: पाब्डाळ क्वारा, अर्थमुैन स्वर्थालक्ारा। तवदवयवगतैरपि दि कट
तनं शबशरीराडिकं कटकायपेतमपि न भाति, अळकार्यस्यामायासू। अतथ्य देदहारेण सवं प्रार्मैवालंकायः। ए तमस्यापि शन्दाथंशरीस वात्तमुखेने वाल फार्यर्म्। तेन- 'रसषभावादितार र्यंमाित्य विनिवेशनम्। अलंकृतीनां सर्वासामलंक्ारतसाधनम्॥' इति रशा रसाद्याश्रपेणैवालंकारगा विनिवेशनं जोवितम्। अतश्चेद्दापि प्रकृतरप वाक्यार्थीभूना्वेन प्रधानम्प रसाहेरपस्कार्यरयाङ्माचेन रसादेरलंकारं युम। पद्ाहु .- प्रधानरता पत्र रसादयो गता रसो रसादिष्वनिगोघरो भवेष्। मवन्ति ते पत्र रसादिपोपका रसाघछकारयथा दि सा पृथक ।'हति। ननु निधदादीरनो भावाना गर्भदासवरकदाविद्पि स्वप्ाधान्यामावारसवदा रसा घङ्गत्त पव अनिभेष्वमिति पधानेतरकचाइमाभावादेतेर्षां भावरियायुद् यस्षचित्तपछता- प्रशमार्मतया कथमलंकारत् वाच्यम्। तपारवे अभिषीय माने वनिभेदख्वमेषा न स्याद्। असदेतव। हुछ दि निवेदानीनां त्रयी गतिः। तत '्यक स तैर्विमावा्छ रथायी भाषो रस: समृत.'इति नी:या विभावानुमावस्पधयेपा रसव्यक्षकरवमेका गतिः। तम्र च रसस्यैव प्राघान्याधिर तिशय प्रीतिकारि्येन फलवत्वात् फछवरस निधावफल तदद्रम' इति नीश्या रसव्य- जकश्व माय्रेणैव कृतार्थतयालासयेवां रसव्य किष्य तिरेकि किचिर्मयोजनान्तरम्। 'नायं कखुलिकाविमो पसमय: सपृष्टो न काकीगुणः पकान्ता न मया विपपंयरतारग्माय वा प्रार्थना। न श्वरकतृँकमर्थयामि निविद बोष्कन्द्लीपन्घनं तसिष्कारणमेव वाहलवलीवतकीय किं वेपसे।।' अभ्ना्वननिभाव उपा, वेपनादिरनुभाव: वितकश् व्यमिचारिमायः। पु्पा चात्र समस्पर्धितया रसप्यअ्षकुख्वमात्रमेव प्रयोजनम्। व्यसन्न रसः सचेतर्सा दततफत् इति नैपां किंचिरफअन्तरम्। अत पव रसाधन्रभूनस्य व्यमिचारिण: स्यित्याध्यारमत्रनिप्रका रखं मततीति न वाच्यम्। तयारे चाभिषीय माने निर्वेदादे: माघान्यामावाल ध्वनिष्य पदेश एव न युकः। अप्रधानस्य प्रधानवामिधाने विरोधा। एवं व गुणीभूनव्यङ्गयस्या पि एनिष्यपदेश, केन प्रतयुक:। ववचिदपि 'मुखये रसेऽपि तेऽद्वितवं प्राप्नुवन्ति कदाचन' इति नीरया राजानुगतविवाह पतृततमृत्यव द्विभावव्यज्ञितारना रसगुणीभावेनपामेव आघा न्यम्। यथा- 'इतश्रमेमन्नगय सुडमारा वरवधू रित: स्वेच्ड्रालम्पानुपमफ-मूला वनमही। इसो मोर्बी नादोनसुखनिखिएसैनयो रणविधि: वव नामायं ताटकरलहदयो रज्यतु जनः।।'
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रसवदादयलक्कार: ६९५ अन्न विमावानुभाशर्म्या व्यलितः महराद्दीनां रसानाममरूदर्वेन विश्रान्तेश्चिन्ता पयो न्यनिचारिभावः प्रधानम्। अन एबत्र भावस्थितेर्ध्वनिमेदख्वस्। एवं चात्र चिन्तायाः भुङ्गाराद्ट्रीन पति तदसरवाभावास गुणीभाना। अत एव नात्र तत्परिषोषकत्व स्यागात, तदीयकार्याकत्णाद, रसं प्रति गुणीभावाभावास स्वेनैव मिरतिशयम्रीति- कारिव्वेन सचेतसां वत्तफपरवात् निजम्रयोजनासंपादका्वविरहाद् राजानुगतविवाद प्रशुस्तमृशयवनमुख्यानपि रसाननाद्य चिन्ताया युव वाक्यतात्पर्यविपयर्वेव माघान्यातू अहित्वस्। वत एव व हट्न्तदार्श्न्तिकचोरन कश्षिह्िपम उपन्यासा। वक्तृख्ञात्र सरक. हदयरवेनेकुम्र तापर्येद्छभावन्नकतरपसाधयगमिति न कर्थख्विदपि रसस्य प्राधान्यम्। नाप्पेपां पररुपरविरोधार्सधिरिति व्यमिव्यारिभावस्वैय प्राधान्यस्। एवं व निर्वेदा दीमां गर्भदासवाकदाचिद पि प्राधान्यं [न] मवती्यपर्यालोचितामिधाम्। गर्मदासस्या- पि कदाचिनन्ततो गर्भदार्सी प्रत्यस्ति प्राधान्यम्। प्रधानाप्रधानभावस्यापेतिकर्वादू। 'बव चिदप्यपरस्याङ्गम्' इति नीत्यैं पासद्ृरवे प्राधान्या भावादलंकारस्। चया- 'कधकु षचियुकाय्रे पाणिपु व्यापृतेपु प्रथमनरधिपुश्रीसंगमेऽनङ्गघान्नि।
क्षत्र मृङ्गाररसर्याप्रहढरवाद् गुणीभावेन वाक्यतापर्यवि यत्वेनो निवस्मप्यीसुकयं पशार्द्धिविषयां रति प्रति अङ्गमिति प्रेयोऽलंकार:। ननु व यदयपि परस्याङ्गरवे सत्येपामलंकाररवं तद् रसषाक्रमू नत्वादेर्प सवन्रैव तव स्यादिति चेतु, नैसत। यस्मान्निमित्तान्तरेभ्यो लब्घसवाकस्यादियूतस्य वस्तुन उपरकार
लंकरणभावस्योक्तावास्। रसादेः पुनः स्वूपनिवृतये निर्वेदादवोताुपया त ति नै रसोपसर्जनीभूतरवात् तह्चअनमान्नमेव फलमू। अत एव तप्रेव पूर्वोकनीत्या न ध्वनि- शम्, नाप्यलंकारत्वम् । रस्षष्य किष्प तिरे किप्रयोजना्तर निप्पाद ना्यो गय। एवं निरवेदादीनों रस्षम्पकी सहकारिखम्, अित्वे ध्वनिश्वम, अक्षरवे चालकारत्वमिति विप वियभागा। सहमात्- 'निर्वेदादीनां सर्वदैषाङ्रमावात् प्रेयोडलंकारस्तद्वयपेष्षो न वाच्य:। तस्मादेतेषां व्यब्यतार्या ध्निर्वं न प्राधान्यं ववापि यस्मान्वजन्ते॥ पतेन मावप्रशमादयोऽि व्यप्षयाः सद्य अवनिता प्रथान्ति। ध्वनिस्वमिएं यदि तहि तेषु न लप्णीयस्तु समाहितादि:।' इत्यादि यदन्पेदकं तदुपेषयम्॥ रसषभाव हत्यादि। अतएव =क्योंकि चारों ही चित्तवृत्तिविशेपलप हैं। तब्र=अर्थांत् नव इन सबका लक्षण साथ-साथ करना है। विभाव ललना आदि आउमन कारण तथा वधान मादि उद्ीपन कारण। अनुभाव कटाक्ष, भुजक्षेप आदि कार्य। व्यभिचारी=निर्वेद मादि सहकारी। प्रकाशित: व्यज्जित। जैसा कि [भरतमुनि ने] कहा है = 'विभावानुमाव-व्यभि- चारी-संयोग से रसषनिष्पत्ति [होती है]'1 इत्यादि =यर्श आदि पद से दास आदि स्थायि- मावो का ग्रहण होता है। निमेदादि, जैसा कि [ भरतमुनि तथा उन्हीं की कारिकाएँ उद्पृत कर मम्मट ने] कहा है-'निर्वेद, व्लानि, शंका, मसूया, मद, श्रम, भालत्य, देन्य, चिन्ता, मोद, स्मृति, धृति, वीडा, चपलता, धर्ष, आवेग, जसता, गर्व, विषाद, औतसुक्य, निद्रा, अपस्मार, मिद्रा, पवोध, अमर्ष, अवहित्य, उग्ता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, श्रास तथा वितर्क-ये तैंतीस व्यमिचारी माव हूँ जिन्हे नामोदलेखपूर्वक गिना दिया गया।' देवता आदि विषय अनन्त
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रेमत सदिषयक रतिमाव अनेक प्रकार के हैं, फळतः उसका रतिरूप भाव के रूप में एक हो भेद गिना गया है। इसीलिए 'रत्यादि' = शब्द के साथ आया आदिशब्द प्रकार वाचक है। 'घ'-समुच्चयार्थेक है। जैसा कि [मम्मटभटट ने इसे इसी रूप में गिनाते हुए] कदा है- देवादि-विषयक रति तथा व्यक्वित व्यमिचारी माव कहणना है' तथा 'उनके स्पमास छोहे हैं रब, जब वे अनचित्य में निष्पन्न होने हैं।' मशाभ्यद्वस्या श्रान्त हो रही स्थिति, न कि स्वसरूप प्रशान्व हो चुकी स्थिति। वैसा मानने पर वह़ां, नहों कोई एक माद पणिन हो जिन, शेष सव भादों का अमाव रहेगा टनकी भावशान्ति माननी पढ जायमी। रम जिसका स्वरूप ऊपर दतकाया या चुका है उस में मी क्या श्ान्तिस्यिति लागू दोती ह'-ऐमी शका कर उत्तर हेते हैं 'सजापि'। परिशिष्टेति= शेप भेदों के विषय में माव, रक्षमावामास तथा भावप्रशम के विरय में। एथाम्= रस, माव, दोनों के आमास तथा आावप्ररम के वटयोगअनुचिन मधारकार द्वारा प्रवृत्ति। मकृतश्वास इममे माव यह निकृश कि यहाँ अन्य कोईं वस्तु प्रकृत रहती है। 'रस जो परविधान्तिस्वरप है [जिसकी मनीति के आगे कोई प्रतंति नहीं रहती] उसका अलकारस समव मैसे' ऐमी शका कर वदर देते है-'तन' ६यादि। यस्मिन् दर्शने=जिस मक्ष या सिद्धान्त में = ध्वनि न मानने वाले [ दण्डी और ब्यूट] के सिद्वान्त में। द्वितीय=ऐश्यस्वरूप। अन्यरय=अन्य मर्यत् उस पक्ष में अन्य जिसमें रस वाक्यार्थींभूत रहता है। इस प्रकार ध्वनि न मानने वालों के मत को दोनों विषयों का दृष्षन्त बनाकर इसके द्वारत रस और रमवदलकार का क्षेत्र विमक्त किया। जो रस आदि अगभूत होते हैं उनमें अलकारता मानना उचित हो है, कयोंकि उपमा आदि समी अलकारों में प्रकृष्व वस्तु को शोभा बढाने से ही महंकारता आाती है, और क्योंकि अगभूत रस के द्वारा भी यह कार्य किया हो जाना है इसलिए कि उसके साथ प्रकृत रस [उपस्काय] अहंकार्य रूप से विद्यमान रहता है, अतः उपमादि में अश्कारखव आने पर जैसी स्थिति होती है वैसी शो स्यिवि रसादि में है [अतः वे मी भलंकार कहे जा सकते है]। यद्यपि उपमा आदि सर्थ के अलंकार होते हैं [ अत. अर्थ को ही उनका अलंकार्य मानना चाडिए] तथापि कयोंकि वह वाच्य अर्थ विभाव आदि के रूप में उपस्थित होता है अतः काध्य की आत्मा और व्यंग्य रूप से उपस्थत रसादि हो उस [उपमा आदि] का अलकायें टदरता है। यहाँ तक कि शम्दारंकार मी शम्द के माध्यम से उसी [रसादि व्यग्य काव्यारमा] के अहंकार होते है, इसी प्रकार भर्थ के माध्यम से अर्थोलकार मी। ठीक मी है। लोक में भी कटक आदि रहते तो उन दन अवयदों में ही हैं, किन्तु वे उन उन निशिष्ट चिसछतियों की सूचना देते और उसके द्वारा चेतन आात्मा को ही अल्कून करते हैं। दब शरीर आदि अचेतन वस्तु कदक आदि से झुकत होकर मी अच्छे नहीं एगते, इसलिए कि उनमें अत्वार्य का सभाव रहता है। इस प्रकार सबंग्र ही देह के द्वारा आरमा का ही अलकार किया जाता है। यहाँ [काव्यस्थक में ] यह मो रसादि रूप आत्मा है, शब्द और अर्थ उसके शरीर होने हैं मस उसका इनके द्वारा दी अरूं सूकृत किया जाना उचिन ठदरता है। इस प्रकार- 'सभी सलंकारों के अलकारत्व का साधक है उनका प्रषानभूत रक्षभाव आदि की दृष्टि से रुनिवेश ॥ [धन्यालोक २1५ संग्रशकारिका ] 4 इस दृष्टि से रस आदि को लेकर ही किया गया निवेश भरंकारों का माम है। इसीलिए यहों मो रस आदि में अलकारत्व तभी ठीक हाँगा जब प्रकृत और वाकयार्थीभूत होने से प्रधान रस आदि अलंकार्य के प्रति अग हो। जैसा कि [ रत्नाकरकार ने मी] कडा है-
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'जहों रस आादि प्रयान रहते है यहाँ रस रसादिध्वनि का विपय चनता है। करिन्तु वे ही जहे रसादि के पोषक बनते हैं नहाँ रसादि [ रसवदादि] अलंकार बन जाते है। उनकी यद एक मिन हो दशा है। [ सू० १०९ कारिका ]। [ रनाकरकार का कहना है कि-] 'निर्वेद आदि [संचारी] माव सदा रस आादि के अंग और ध्वति के भेद के रूप में ही रहते हैं, क्योंकि उनकी अपनी प्रयानता उसी प्रकार कमी मी नहीं रहती जिस पकार गर्मदास [दासी ने गर्भ से सत्पन्न होने आदि के कारण जन्मतः दास] की इस पकार उनमें प्रधानता और अप्रयानता की दी कक्षाए ही नहीं बनतीं । एकमाद् अप्रधानता की रहनी है] तब [सर्वस्वकार द्वारा मगले सूष में] इन्हें मानस्यिति, माठोदय, मावसन्धि, नावतवलत तथा मावप्रकम के रूप में अलंकार पसे कहषा जा रहा है। ये तो रक्ष ध्वनि के अवयन हैं अता स्वनि रूप हो है। वैसा मानने पर ये ध्वनिभेद सिद्ध नहीं हो सरेंगे। दसव्य रत्नाकर, रसवदकंकार वृति प १-५ पूना संर्करण]। यह कथन ठफ नहीं है। स्थिति यह है कि निर्वेद आदि की तीन दद़ाऐं होती हैं[ अर्थात ये तोन प्रकार के होते हैं] इनमें [मम्मटाचार्य के] खन विमाव आदि के द्वारा व्यक्त वह स्थायी माव रस माना गया है [काव्यप्रकाश- मल्लास] रस वचन के अनुसार विभाव और अनुमाव के समान रस की व्यक्ष करना इसकी एक दक्षा दै। यहां प्रधान रहता है रस ही, क्योंकि वह़ी निरतिशय प्रीति उत्पक्ष करता रै अतः वही फलवान् [परीतिरपी फल से युक ] होता है। इस प्रकार 'फलवान का साथ होने से फलहीन उस फलवान् का अंग बन जाता है इस नीति के अनुसार इन मातो का कोई पेसा प्रयोजन नहीं रहता जो रस के प्रयोजन से मिन्न हो, इनकी इतिकतव्यता तो रसव्यअतना तक दी सीमित है, अर्थात् ये रस की व्यजना कराकर कृतकार्य हो जाते हैं। सदाइरणार्थ- 'अर्भा चोली इटाने का अवसर आया नहीं, करमनी छुई नहीं, मैंने विपरीत रति के लिए ही आगह किया नहीं, न तो यही याहा कि तुम अपनी भुजलता द्वारा सुझे पौधो, तो भी अकारण ही तुम वाललवलीवल्ली के समान कॉप रही हो क्यों।' इस पद्यार्थ में आहम्वन विभाव है उषा, कम्पन आदि अनुमान हैं और बितर्के है व्यमिचारी माव। इन तीनों का प्रयोजन एकमात् समान रूप से रस की व्यंजना कराना है। रस व्यजित हो नाता है तो वही सहृदयों को [प्रोतिरूप ] फल दे देता है, अतः इन विभावादि का अन्य कोई फल नहीं रहता। इसलिए [ रत्नाकरकार को ] यह नहीं करमा चाहिए कि ये संचारी माव रसादि का अंग होते हूँ और वे अपनी स्थिति आदि रूप ध्वनि का प्रकार बनते है। [द० रत्नाकर सू० १८९ पं० १३] यदि उन्हें अंग पसब्या जाता है तो उनमें प्रधानता नहींर हेगी और तव उन्हें ध्वनि कहना उचित न होया। क्योंकि अप्रधान को प्रधान पतलाना विरुद्ध होग। और यदि ऐसा है[ अ्थोद अंगभूत संचारी को व्वनि कहा जा सकता है) तो गुणोभूत व्यंभ्य को ध्वनि कहने का निषेम क्यों किया? [गुणीभूत व्यंग्य में व्यंग्यार्थ शुीभूत या अप्रधान रहता है इसीलिए उसे ध्वनि नहीं कहा जाता, क्योंकि प्वनि में व्यंग्य अनिवार्यतः प्रधान रहता है। यदि अप्रधान को मी ध्वनि मानना आरम्भ कर दिया जाए तो गुणीभूत व्यंग्य को नो ध्वनि मानना होगाह। [निर्वेदादि की दूसरो ददा वद होती है हाँ] कहीं मे [ मम्मटाचार्य] की 'मुख्य तो रस हो झोता है तथापि कमी कभी ये भी मुख्य बन जाते हैं :- [ काव्यमकाश ४३७ सू० ५१] इस वक्ति के अनुसार विमावानुमावों से व्यंजित होते और ठाक पैसे ही रसकी अप्रथान बनाकर स्पर्य प्रधान वन जाते है जिस प्रकार विवाह में दूरदा वना राजा का नौकर, राजा स्वयं जिसके पोछे चलता है। इसका बदाहरण है-
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'पर प्रगययाचना कर रही सुन्दर और सुनुमार बधू हे, और इधर वनभूमि है जिसमें अनुपम फछ और मूल स्वेष्ठाकम्य हैं और इस मर प्रत्यन्चा की गडगडाइट के लिए उच्चत सेना का युद्धकार्य है। अब उनमें अधिक चचन चित्त का यह जन किसे चाहे।' यशं शृगार आदि रस प्रहृद हो पाने नहीं, अत वे अप्रधान है और प्रधान है विभाव तथा अनुमाशें से व्यजिन चिन्नानामकु व्यमिचारी माव्र, क्योंकि उसी में वाक्यार्थ की परिसमामि होनी है और वही वाक्य का तात्र्यविश्य है। इसीलिर यर्श जो भावस्थिति है द ध्वनि है। इम प्रकार यहाँ चिन्ता गुणीभून नहीं है। क्योंकि वह नगारादि रस के प्रति अग नहीं है और इसीलिए [रत्नाकरकार ने मातो के लिर जो कह् था कि वे ] रस आदि की परिषोषकता कभी नहीं छोडने, सदा उन्हीं [रसादि] का कार्य करते हैं, रस के प्रति गुणीभून रहते हैं, अपने आप कोई निरतिशयान-द नहीं देते, अस सह्दयों के लिए वे स्वय फलदायक नहीं होते, वे उनका कोई अपना प्रयोजन निष्पन्न नहीं करते, [द्र० रत्नाकर सू १०९ पं० १५-२२] एन सबका [उपयुक्त पध में आई] चिन्ता में अभाव है [अर्थाद रस की पोषकता का एसमें अमाव है, रस का कार्य वह नहीं कर रही, रसके मति दह गुणीभून भी नहीं है, उसके स्वय के द्वारा वह निरतिशय प्रीति दे रही दे, अत. सहदयों के लिए वह स्वयं फचपद है और इसीसिए उसका अपना स्वय का प्योजन मी है। और इसीलिय वह [अन्यत्र] मुख्य माने जाने वाले रसों को मी मनाहत कर वाक्य का सार्पर्य विषय वन कर ठीक वैसे दो प्रधान और ततः अगी है जैसे विवाह में दूच्हा बना ऐसा सेवक जिसका स्वामी राजा होवे हुए मी उसके पीछे चछ रहा हो। और इसीकिए [विव्ादप्रवृत्तमृग्य के ] पुधान्त तथा दार्टान्तिक में [रत्नाकरकार द्वारा प्रतिपादित, (आागे दिय जा रहा)] कोर्ई मो वैषम्य नहीं है। इस [पद इवश्वारु] में वक्ता सरछ हृदय का व्यक्ति है अत उसका तात्परये किसी एक अर्थ में नहीं है, फकन, कोई एक पक्ष यहाँ नहीं अपनाया जा सकना, इसकिए [इसमें शगारादि] रस की किसी भी प्रकार की प्रधानना नहीं है। न तो इनमें [सीनों रसों की ] सन्धि ही है क्योंकि ये परस्पर विरुद्ध है। इस प्रकार यहाँ [चिन्तारूपी ] व्यमिचारी माव की ही प्रधानना है। ["स्वनिकार आदि के इस कथन में कि भाव जव व्यजक वाक्य के प्रति प्रधान और रस के प्रति अमधान रोता हैतर वह भावध्वनि ही कहलाता है जैसे विवाहप्रवृत्त मृत्य" इम कथन में दृष्ान्न और दार्धन्तिक में यह वैषम्य है कि दार्शन्निक में तो माव रक्ष के अति गुणीभून रहता है पर दृष्टानत- में मृत्य विवाह के समय किसी के भी पति अप्रधान नहीं रहता। अनः] गर्मदास के समान निर्वेदादि माद कमी भी प्रधान होते ही नहीं" [इस प्रकार रत्नाकरकार ने जो दृषानत- वैपम्य की मिद्धि के हेतु गर्मदास की ऐकान्तिक अ्प्रधानता का तर्क अर्तुत किया है] यह मौ विचारनन्य उकि है। गर्मदास मी कमी, अन्तन, गर्भदामी के प्रति दो प्रधान होता ही है। प्रधानत्व अप्रधाना तो सापेक्ष तर्व है। [निर्वेदादि की तीसरो दशा वद है] जब ये कमी 'कहीं ये दूसरे के अंग बन जाते है' इम रीति से जद ये अग बन जाते हैं तो ये प्रधान नहीं रहने। फलत अलकार हो जाने हैं। इसका उदाहरण यह है- 'समुद्र की पुनो [दक्ष्मी ] के प्रथम ममागम, जो काम का धाम था, में केश, दोनों कुच तथा चितुक (ठुड्डी) के अग्रमाग में बारों हाथ लग जाने पर, अत्यन्त निविड नीवी खोलने के शच्दुरु विष्णु भगवान् की चार से अधिक हारथों की इच्छा माप दम सबको पवित्र करे। इस पद् में प्रेयोककार है क्योंकि इसमें शृंगाररस परन दो नहीं पाता, फळतः वह भप्रधान
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रसवदाघलक्वार: ६९९
रहता , साथ हो वाक्य के सातपर्यविषय के रूप में प्रस्तुत [अतः प्रधान] दोने पर भी सत्सुक्य विष्युविषयक रति के प्रति अंम [अतः अपपान] है। ययपि यह कहा जा सकता है कि यदि ये भाव दूसरे के अंग होने से चटंकारत को आप् होते है तो ये सबंध ही वहो [ अलंकार ] होंगे क्योंकि रक्ष के अंग तो ये सदा हो ऐोते हैँ। [सर्थाद विभाव और अनुभाव के समान संचारी माव मो रसब्यक्ति के किए आावश्यक होते हैं अतः वे रस के कारण होकर सदा ही रस के अंग बने रहते हैं]। रिन्तु यद कथन ठीक नहीं है, क्योंकि ये तब अलंगर कहलाते हैं जब ये ऐसे किसी प्रथान तत्त का उपस्कार करते हैं, जो पहले से हो किन्हीं अन्य निमित्तों से निष्पन्न हो चुका हो। ऐसा इसलिए कि अलंकार्यालंकरणभाव उपस्कारयोपस्कारकमाव [उपस्कार्य शोमनीय, उपस्कारक= शोयाजनक] पर निर्मर है जैसा कि वतछाया जा सुका है। नहाँ निर्वेद आदि रसादि के स्वरूप की निष्पत्ति में कारग बनते है वहाँ इनका फल केवल इन [रसादि] की व्यशना दी होता है, क्योंकि ये रस के प्रति समर्पित अतः उपसर्जनीभृत मर्थाद अप्नधान या गौण रहते है। और इसी कारण ये न तो वहाँ ध्वनि होते और अलंकार दी [ दाय पैर आदि शरीर के निष्पादक अंग है अतः न वे आात्मा के समान प्रधान है सौर कटक कुण्डल आादि के समान अलंकार ही। इसलिए कि इस स्थिति में वे रस की लमिव्यक्ि के अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रयोजन के निष्पादक वन नहीं पाते। इस प्रकार निर्वेद आदि रस की नमिव्यक्ति में होते हैं सहकारी, प्रधान होने पर होते हैं व्नि और अंग होने पर होते हैं अलंकार। यह दे मावकी इन तीनों स्थितियों का अन्तर। इस कारण अन्य आाचार्य ने [ रत्नाकरकार ने रसवदादि के ही पकरण में] जो- 'निर्वेद आादि सदा ही अंग रहते हैं, अतः उन्हें लेकर प्रेय को बलंकार नहीं मानना चाहिए। इसलिये लब ये व्यंग्य होते है तो ध्वनि हो होते हैं नयोंकि इनमें कभी कहीं भी आषान्य नहीं रहता । 'इस कारण भावप्रशम आदि भी व्यंग्य होते हैं तो सदा ध्वनि ही हुआ करते हैं। और यदि इनमें ध्वनित्व मान्य है तो समादित आदि को अर्छकार नदीं कहना चाहिए।' यह सब कह़ा है वह उपेक्ष्य ही है। चिमर्श-रतनाकरकार ने प्रेयोडलंकार के लिए नाव की अंगता तो स्वीकार की है किन्तु उनके माव का अर्थ है रत्यादि स्यायीमात्र, संचारीमाव नहीं, जन कि ध्वनिवादी अवार्य चिन्ता आदि को अंगभूत ग्यस्थिति में प्रेयोडलंकार मानते हैं। संचारीमाषों को प्रेयोडलंकार न मानने के लिए उन्होने प्रधानरूप से यह तर्क प्रस्तुत किया है कि संचारीभाव रस को छोड़कर कमी नहीं रहते, अतः वे सदा ही इसके संग रहते हैं। साथ हो वे रसके व्यंजक होते हैं और रसानुभूति में मी छृसते नहीं। पानकरसन्याय से उनका भी अस्तित्व वहाँ रहता है मतः ये ध्निरप रस से अभिन्न होने के कारण स्वयं भी ध्वति हैं। इस स्थापना के आवारपर वे मम्मट और उनके अनुयायी स्वस्वकार का खण्डन करते और कहते हैं कि उन्हें माबोदय, भावशान्ति भवसन्धि, मानशवलता तथा माव को अलंकार नहीं नानना चाहिए। ये सब ध्वनियाँ ही है। उनका ग्रन्थ है- 'भावस्य देवविषयस्य रत्यादेः स्थायिनः भाधान्ये भावध्वनिम रसाघहले तु प्रेयोडलझास। ० व्यमिचारिभूतस्य निर्वेदादेभववरय गर्मदासवस कदानिदपि स्वम्राधान्याभावाव सर्बदा
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७०० अलक्वारसवंस्थम्
तेवा भावस्यत्युदयादीना व्वनित्वमेव। तस्माद् व्यनिचारिमावापेक्षिया मेयऊर्ज्वसमाहित- माधोदय सन्धिरानतत्वानि न पृथगलकाराणि'। द्धन्वरार्धन्तिक की विशमता पर रत्नाकर की पतियों ऊपर उद्ृत पंतियों के की पच्छिन्न सानत्य में ये हैं- 'यदप्युत्त यत्र वाक्यार्थीभूनाना रसादोनामुपरकार का निर्वदाद्रयस्तन प्रेय प्रमृतपोडद्षारा', यत्र तु रसाधुपसजंनीभूता नामपि मावरथियादीना वाक्यतात्पर्येंण राजानुगनववाददप्रवृतमृत्यवन माषा्ये तम्र मावादिध्वनिरिति, तदसत, विषमोपन्यामात्। तथा दि विवाइसमये निजप्रयोजनरसंपादनाथे प्रपकश्षस्य भृत्यस्थ न राजान प्रति गुगत्वम्, तदोयाना तदीयकार्यकरणात। प्रत्युन राजैव विवाह शोमोद्व कनया से प्रति मुणभून। इह तु वाक्यतातपर्यविषयत्वेन प्राधान्येि मावस्पित्यादे रसादिपरिपोषकत्वात्यगात् निजप्रयोजनान्तर सपादक्वविरदाच न रसावीक्षया म्ाषान्यम्। रस्नाकरकार ने एक पूर्वपक्ष और प्रस्तुत किया है तथा वसमे निदेदादि को भी लेकर प्रेयोडकार की निष्पास पर बल दिया है। वह यह है- 'अथ प्रधानभूतरसाघहृत्वे भावस्यत्यादिव्वनि, अन्याह्भूतरसादिपरिपोपकर्वे भेय प्रमुखा अटंकारा इति चेव, न, रसादेरेव हि प्रधानेतरमावे विशेष., न तदुपकरणीभूवस्य मावादे। न अन्योपम्ज्ञन स्वनन्त्र वा स्वामिन प्रति पारतम्त्मे गर्मदामस्य विशेष, कश्चिन्'। 'यदि भाव प्रधान रसा्दि के अग होने पर ध्वनि होते हैं तो क्षप्रधान भूत रसादि के अग होने पर प्रेय. आदि अरकार कर्यों न मान लिए जाएै। 'उत्तर - प्रथानेतरमाव रसादि में हो विशेषना लाना है, न कि उसके साधनभूत मावादि में नहीं। किसी अन्य के प्रति सम्पित हो या न हो, उससे अपने माषिक के प्रति मदा परतन्त्र गर्भदास में कोई अन्तर नहीं माता।' इस विषय का सारसक्षेर करते हुए रत्नाकरकार ने पाँच परिकर्लोक बनाए है। इनमें से सीन तो विर्मानीकारने ही उद्धृत कर दिप हैं। उपर्युक्त विवेचन से सम्बद्ध एक पद यह है- 'रसादिगुणभूनयोरिव च वरतलक्कारयो- यथा ध्वनिरुपेयते न दु कदाप्यलकारय। तर्म्व परिगृद्मतामिह मावशान्त्यादिपु रुटा तदवधार्यनामिति रसादिभेदस्थिति. ।' जिस प्रकार रस आदि के प्रति गुभीमूत वस्तु और अलंकार को ध्वनि हो माना जाता है, कमी भी अरकार नहीं, इसी प्रकार यहाँ मावान्त्यादि में जानना चाहिए। अत सन्हें रसादि से भिन्न मानने को स्थिति छोड़ दो जानी चाहिए। निमर्शिनीकार वनिवादी आचार्या का समर्थन करते और कह ने है कि पानवरसन्याय से जहाँ भाव भी रसलीन रहत हैं वहाँ वे अवश्य हो ध्वनिरूप रहते हैं तथापि अह्दा कहीं उनमें चदिकता चली आती है, जसे पानकरस में दी कालीमियें या चौनी आदि को वहाँ वे रसरूपता की उचिन्न कर आरवाद कुल्या को भदनी दिशा में वहा ले जाने और स्वय ही म्रधान दो आते है। उनके उदाहरण मी इसके समर्थ प्रमाग है। [सर्वम्य ] तत्र रसवन उदाहरणम्- 'कि हास्येन न मे प्रयात्यसि पुन प्राप्तशिरादर्शन केयं निष्कषण म्रयासरचिता केनासि दूरीहतः।
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रसवदाद्यतङ्कार: ७०१ स्वप्नान्तेष्विति वो वदन् वियतमव्यासक्तकण्डग्रद्दो चुदृध्वा रोदिति रित्तवाहुयलयस्तारं रिपुस्त्ीजन:।।' पतन्मतहयेऽप्युदाहरणम्। वाक्यार्थीमूतोऽघ करुणो रसा। अज्भूत- स्तु विमलम्भशृह्गारः। एवं रसान्तरेप्वप्युदाहार्यम्। प्रेयोऽलंकारादी वि. शेपमनपेक्ष्योदाहिय ने। प्रेयोडलंकारो यथा- 'गाडालिसनवामनीकृत कु व प्रोद्िननरो मोदमा
मा मा मानद माति मासलमिति क्षामाक्षरोललापिनी सुपा कि तु मृता तु किं मनसि से लीना बिलीना नु किम्।' अघ मायिकायां दर्षाख्यो व्यभिवारिभावा। यथा वा- 'त्वदक्नासृतपानदुर्ललितया दषया क्व विश्वम्यर्ता स्वदवाक्यश्रवणाभियोगपरयोः आव्यं कुतः कर्णयोः। पमिस्तत्परिरम्मनिर्भरभरैरट्रेः कर्थ स्थीयर्ता कष्टं तद्विव्हेण संमति वर्य कच्छ्रामवस्यां गता: ।।' अन्न चिन्तास्यो व्यमिवारिभावः। एष रव च भावालंकार। भावस्य चात्र स्थितिरूपतया वर्णनम् शान्त्युद्दयावस्थे तु वक्ष्येते। ऊर्जस्वी यथा- 'दूराकर्पणमोह्यमन्त्न इव मे तलाम्नि याते श्षुति चेतः कालकलामपि प्रकुरुते नावस्थिर्ति तां विना। पतैरा कुलितस्य विक्षततररह्ैरनङ्गातुरैः संपद्येत कदा तदाप्तिसुसमित्येतन बेभि स्फुटम्।2 अत्र रावणस्याभिलापको विप्रलम्भशद्वार औरसुक्य च व्यभिचारि भावोऽनौचित्येन प्रबृत्तौ। समाहितं यथा- 'अक्णो: स्फुटास्रकलुपोऽरुणिमा निलीन: शान्तं च सार्वमधरस्फुरणं मुकुख्या। भावान्तरस्य तव चण्डि गतोऽपि रोपो नोदाढवासनतया प्रसर ददाति ॥' अत्र कोपस्य प्रशमः । एवमन्यन्राध्युदाहार्यम्। इनमें से रसवदलंकार का सदाहरण, यथा- 'हंसी से क्या! वदुत दिनों के बाद दिखाई दिए तुम पुनः नहीं दिखाई दोगे। है निष्करण, यह कैसी पवासरचि, तुम्हें दूर किसने कर दिया-'सपनेमें प्रियतम के गले एाय डालकर इस प्रकार बात करतों आपके शत्रुओं की खियाँ जागने पर अपना वाहुपाश रिक्त देखर्ती नर पुक्का फाडकर रोवी हैं।'
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अलङ्गारसवस्वम्
यह दोनों ही मतों में उदाहरण माना जा सकना है। यहाँ प्रधान है करुग रस और भङ मून है विप्रर्म्म शदार। इसी प्रकार अन्य रमों में भी जानना चाहिए। प्रेयोडलकार आदि में [दोनों मनों की ] विशेषता की ओर ध्यान न देकर ही उदाहरण दिए जा रहे है। प्रेयोडटंकार का उद्ादरण, यथा- 'गाट मार्िंगन से जब सनन सिक्ुड गए और रोम खिन उठे तो निविदतम स्नेह और आनन्द के अतिरेक से जिसके सुन्दर नितम्नों का वम्त सिसल गया या ऐसी यह, 'नहीं नहीं, अरे मानभजरू मेरे साम अति न कर' इम प्रकार लढमडाने भसर बोल रही यह सो गई है क्या, कहीं चल तो नहीं बमी, मेरे मन में तो करी होन विकीन नहीं हो गई है।। यहों नायिका में दर्षनामक व्यमिचार माव [सभोग शदार का बङ्ग ] है। और जैसे- उसके वस्तरामृत के पान को दुलारी यह दृष्टि कहाँ टिकाई जाय, उसके वाक्य सुनने के लिए अमिनिवेशपरायण ये मेरे कान सुनने योग्य वस्तु कहो से पाय, उसके भ्लिंगन से प्रकाम आध्यायित ये मैरे अग कहों ढदरें। ओइ। उसके विरद से इम बडी दी कठिन स्थिति में पहुँच गए है। यरशो चिन्ता नामक व्यमिचारिमात्र [विपकम्म शृद्ार का अद्ग] और यही है भावालकार। इन बदाहरणों में माव का व्णन अस्तित्वयुक्त रूप में है। शान्ति तवा उदय की मवस्था आगे पतठाई जागेगी। क्जसवी का उदाहरण यथा- 'दूर से सोच लाने वाले मोहमन्त्र जैसा टसका नाम कान में आते हो चिस उसके बिना एक पल्ष मी टिकता नहीं। मुझे यह सूझ नहीं पढ़ रहा कि इन कामातुर और पायल अंगों से आाकुळ मुझे उसकी प्राप्ति का सुख कब मिलेगा। यहा [सीना के लिए] रावग की निम्न अभिचाषा से निष्पन्न विप्रक्म्म शृंगार तथा औरसक्य नामक संचारीभाव अनोवित्य पूर्वक आगे पढ़े हैं। समाहित का चदाहरण यथा- मँखों में फूट पढे आमुभों से मिश्रित अरुणिमा विौन हो गई। मुकुटी के साथ अघर को फड़क भी शान्त हो गई है। इस प्रकार हे कोपने। तेरा रोष हट गया है तव भी अन्य माव को उद्गाढ वासनापूर्वक बढने का अवसर नहीं दे रहा। यहाँ कोप का प्रशम [शृगार का अंग ] है। इसी प्रकार अन्य [मा्को] के उादरण भी दिय ला सकते है। विमर्शिनी एतन्मतद्य इति। ध्वव्य माव वादिनां व्वनि माववादिरना च । तन्र व्रन्यभाववादिमते करणापेदया रसवदलंकार ऋव्वारापेद्यया तूदापम्। मतान्तरेण तु कषणामिनायेण रसप्वनि: शह्ारापेकया सवयमलंकारः। अय्र वदपि राजविषयाया रतेरदविरवारकरुगोऽपि तददमेघ, तथापि तस्य मध्ारापेघयाद्वित्वमाधित्येतदुकतम।करुगश् गगारोपाकृतः भसी- पव इति तस्यालकारखम् । प्वमिति। यथा मतनूयमपि संगच्छत हयर्थः। तक्षु यया- 'का रवं रकपदावगुष्ठितमुखी मुग्धघे तवाहं सखी किं शून्योकसि केवला निवससि स्वामागतान्वेवितम्। प्ठनमत्रमुदसयेति कथयन्तयालोषय दूच ततः पायु: रमेरमुस्नाम्नुजश्य तरुणी जाता विषलरिमता '
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रन वाक्यार्थीभूतः महारः, अम्भूतस्तु द्दासः । एवमिति सामान्येनाप्युदाहरण्या स्िपर व्यास्येयम्। यथा- 'पार्वथ्या रचिता कपालिवृपभारूढं विलासाक्षन अ्रन्थिक्लान्तमहाहिलो चनछसळवाल पिना का हि तम्। कन्दुर्पार्पितशासनं कविवछधाकं काळमर्धेन्दुमद् सत्माह्व च पुनातु वो नवरसान् पुप्णत पुरारेवपुः॥ अत्न भगवद्धिपपाया रतेनेव रसा अग्ञनत् । विशेपमिति। अग्गाहगिरवेन। तेन ध्वन्यभा ववादिमतेना क्ाहिस मे वैषमाशित्योदाहियत इति तार्पर्यम्। मावालंकारा इति। निर्वेदा दीनों शावानां स्पत्यात्मकतयो पनियध्यमानरवास्। यनुदयावस्येति आवस्ये्यनापि संपन्घनीयमू। अनेन चात्य समाहितादिम्यो वैलपण्यं द्योतितम्। तेन यन्न भावत्य स्थितिस्तन्ायमलंफारः, अन्यथा त्वन्यंडलक्ार हति। सवमिति। यर्थेतदुदाहतमित्यर्थः। अन्यनेति। ध्वनिवादिमते एपामहत्व हुस्चमः। तब् प्रेयोडलंकार: 'कपकच-' इस्यादिना व्यमिवारि मावापेक्षयोदाहतः। देवताविपय रस्यात्मभावोपनिबन्धे पुनर्यथा- 'कणठेडपयस्युरगपाशमसूयया मे यामिन्यपीशशिस यत्समये कृतानतः। नूनं तदा मुहुरुपेंमि फणीन्द्रहार खवनतुकयतामिति भजे मरणेडपि हर्षम्॥1 अम्र मवद्विपयाया रतैर्मरणचिपया रतिरङमिति प्रेयोडलंकार। ऊर्जस्वी पथा- 'वन्दीकृश्य तृप हिपां मृगहशदता पश्यता प्रेयर्सां हििष्यन्ति प्रगमन्ति कान्ति परितरचुन्बन्ति से सैनिकाः। अत्माकं सुसतैहटज्ञा निषतितोऽस्योपरितयवारांनिधे विध्वसता विपदोऽसिलास्तदिति तेः प्रत्यर्थिमि: स्तूयसे॥' अन्र राजविपयस्य भावस्य प्रथमद्वितीयार्घोरयौ रसाभासभावाभासावङ्रम। व्यभि चारिमावपेक्षया पुतष्यं यथा- 'दिपां सवाद्ण्यनिवासमीयुपा नितग्विनीनां निकुरवर्कं तृप। मुहुर हुष्यश्रवलहिलोचनं न केन परलीपतिना निरीचितम्॥' अम्र शवराण परदार विपयमौरसुकयमनीपित्येन पृत्तमिति मावाभासी राजविपर्या रति प्रश्यक्षम।समाहितं यथा-
दसके तव बैरिणा मद: स गतः कवापि तवेकणे पणादू ।' क्षत्र राजविषयाया रतैरह्भूतस्य शञ्ुविषयस्य मदस्य प्रशामः। देवतादिविषयरत्या हमभावापेक्षया पुनस्यं सर्था- 'आयुन्ता: परितः स्फुरम्ति गिरय: स्फारास्तयाम्मोघय सतानेतानपि विभ्रती किसपि न कलान्तासि तुर्भ्य नमः। आश्चर्येण मुहुर्मुहु: स्तुतिमिति प्रस्तौमि यावद्सुब स्तार्वावादिमां स्मृतस्तव सुजो वाघस्वतो मुदिता:।' अत्र राजविपयाया रतेरक्वभूतस्थ भूविषयस्य रव्यास्यभावस्य प्रशाम्या्वसू। भत एव प् समाहितं यदन्यैमे लक्षितं तवत्यन्तमेवायुक्कम्। तन्मतेपि प्रेयोलंकाशवद्र्याभावा
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पेशयास्य क्षषितुं युपखाद्। वयमिचारिमावापेठया दि भवदि: प्रेष:प्रमृतीनामलंकार-
पषलर्वानि न नृयगडकाराणि वाध्यानि' इति। तस्मान्नवन्मतेऽपि समाहिताह्ीनां छक्ष- पीयरव सुक्कम्। पनम्मननूय=इन दोनों मतों में = अर्थात् ध्वनि न मानने वालों तथा ध्वनि मानने वालों के मन में। इनमें ध्वनि न मानने वालों के मन में रसवदलकार करुण को लेकर है और शृंगार को लेकर उदास। अन्य मन में (ध्निमन में) इसके विरुद्ध करुण को लेकर है रसध्वनि और मृगार को लेवर है अलकार। यद्यपि इस पद् में अगी है राजविषयक रति, अन- वरुण भी उसके प्रति अ्षग ही है तथााप इमे शगार की अपेक्षा अगी मानकर ऐस्षा कहा गया है। करुग जो है वह शृगार के द्वारा उपरकूत होकर मनोत हो रहा है अनः वह [शरृंगार] यहाँ अरकार छो है। एवम् इमी प्रकार - अर्थान इम प्रकार दोनों हो मन उसमें लागू दो सके। इसका उदादरण यह १- 'लाष् घूघट में भुंद छिराए तुम कौन हो१ अथि सुग्धे मैं तेरी ससी हूँ। इस साकी मकान में अकेली क्यों बठी ई" तुझे सोनने आई हूँ। यह मुँह तो ( ऊँचा फर या) खोल !'-ऐमा करकर मुमकुराने पति का दाढीमूछ से युक्त पेइरा देख कोई तरुणी सज्जित और मस्मित हो गई।' यश प्रधान शृगार है और दाम अग (अप्रधान) है। 'श्वम् इस प्रकार इमकी व्यस्या सामान्यरूप से भी को जानी चाहिए जिसमे अन्य उदाहूरणों में भा इमकी व्याप्ति दो मके। अन्य उदाहरण यया- 'मगत्र नू सित का वह शरीर आप दम मबकी रक्षा करे, जो नवों रसष को पुष्ट करता है कषों कि [शृद्धार के लिर] जो गोद में पार्वती जी को लिए है, [हास्द के लिए] वृषम पर आस्द है, [करुण के लिए] जो विलासाऊद के रूप में गाँठ माँधकर कम देने से वन्त भुजगराज से युक है, [रोद्र के लिए] जिसके कपासनेत्र से ज्वाला निकुल रहो है, [वोर के लिए] जो पिनाक धनुष लिए हुए है, [मयानक के लिए] जिसकी आशा मानकर काम भाग रहा रै [बोमत्म के सिव] जो [क= ] सिर पर ककाल [नरकपाल [धारण किए है [अद्सुत के लिर] जो चन्द्रमा को कमण हिए हुम है [ तथा प्रान्त के लिए ] जो भरम रमार दुए है।' यहाँ नो के नौ रस इस भगवान् सिवर [के विषय] की रति के प्रति अगभूत है। विशेषम= अज्रादिमान। अभिपाय यह कि इन्हीं उदाहरणों को ध्वनिविरोधियों के मन में अगोगिमाव के आधार पर घटाया जाता है। मावालक्वर=क्योंकि इन प्दों में निर्वेद आदि माद स्थितियुक्त मार्वो के रूप में प्रस्तुन फिए गम है। 'शान्ति अवरया और उदयादस्या' -इनका मबन्व अनन्तरोक्त मात्र के साथ करना चाहिर अर्थान माव की शान्नि और मात्र का हो उदय। ऐसा कहकर समाहित आदि से मावालंकार का अन्नर सष्ट कर दिया। फलन जहाँ मात की स्थिति रहेगी वहों यह अलकार [मायारकार] दोगा और अ्न्यत [मावपशमजनन समाहित आदि ] अन्य मलकार। पुवम = इसी प्रकार सर्थान जिस प्रकार उपयुंक उदादरण दिए गर है। अन्यन्न-अन्य मावो के अर्थान् धनिवादियों के मत में नहों ये अगभूत रह्ते हैं वहाँ। इस मत में प्रेयोडनकार का उदाहरण 'कपकुचचियुकाग्रे०' पघ के द्वारा जो उदाहरण दिया था वह व्यमिचारी माच को लेकर दिया था। देवविषयक रनिरूपी माव को लेकर [जैसा करि सनाकरकार को सरन्य है] इसका उदाइरण यह होगा-
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रसचदादयलट्गारा: ७०५ 'मगवन् शिव ! आप क्षोभ (मस्या) में आकर [मुझे मार ढालने के लिए ] मेरे गले में अपना सॉप वाँध रहे हैं जब कि मृत्यु आपका माशाकारी है, तव निश्चित ही हे फगीन्द्रहार ! मैं आपकी समता की प्राप्त होने जा रहा हूँ। और इसलिए मुझे मरने से मी हर्ष है। इस पद्यार्थ में मरणविषयकरति [या मरणेच्छा ] मगवद्विषयक रति के प्रति अँग है। अत्षः मेयोडलंकार है। ऊर्जसी यथा- 'आपके सैनिक' शबुसं्दरियों को बन्दी बनाते और उनके प्रियतमों के देखते-देखते उनका आलिंगन करते हैं, उन्हें [रतिलालसा से ] प्रणाम करते हैं, पकढ़ते है सौर हर कहीं चुमते भी है। इस बीच में आप जब पहुंच जाते हैं तो शश्रु लोग आपको स्तुति करते हैं-'हे औचित्य के समुद्र, आप हमारे भाग्य से इमारी आँखों के सामने आए, अद हमारी सारी विपत्तियोँ [आाँखों के सामने अपनी स्तिरियों की दुर्दशा ] नष् दो गई। इस पद्य में प्रथमार्ध से व्यक्त रसामास तथा द्वितीयार्ध से व्यक्त भाषामास [कविनिष्ठ] राजविपयक रति के अंग हैं। व्यमिचारिभाव को लेकर इस [कर्नस्वी] का उदाहरण यह है- 'बनो में पड़े हुए मापके शतुओं की झुण्ड को झुण्ट स्त्रियों को वार-वार कनखी के पास घुमा-चुमाकर किस पक्लीपति [मोलों के गाँव के स्वामी ] ने नहीं देखा।' यहाँ शबरों में परस्त्री विषयक औरसुक्य मनुचित है। अतः यह मावाभासरूप है। वद्द राजविपयक [कबिनिष्ठ ] रति का मंग है। समाहित का उदाहरण, यथा- 'वार धार तलवार सुमाने, मोँहे टेढी करने और गरजने से आप के शबुबों में जो मद दिखाई दिया था वह आपके दिसाई देते ही क्षणमर में कहीं तो भी चला गया।' यहाँ राजविषयक [कविनिष्ठ] रति के परति अंगभूत शत्रुनिष्ठ मद का प्रशमन वतखया गया है। देवताविषयक रतिलपी भाव को लेकर इस [समाहित] का वदाहरण यह है- 'देवि ! पृथ्वि! जो ये अत्यन्त ऊँचे पर्वत चारों ओर दिखाई दे रहे ैं, इसी प्रकार जो पे विज्ञाल समुद्र है, इस प्रकार के इन्हें भी तुम धारण किए हुप हो और तनिक भी यकती नहीं, इस आशवर्य के साथ जन तक मैं पृथ्वी की स्तुति करता हूं तभी तक इसको भी धारण किए हुए आपके सुबदण्ड का स्मरण हो आाता है और तब वाणी अवरुद्ध हो जाती है।' इस पद्य में पृथ्नीविषयक रतिमाव राजविषयक रतिभाव का अंग है, और उसकी प्रशमा- वस्था द्योतित की है। इससिए समाहित का जो लक्षण अन्य आचार्य [रत्नाकरकार] ने किया हे वह सवया अयुक्त है।[रत्नाकरकार ने समाहित को ध्वनिरुप ही माना है। जैसा कि कपर दिए उन्दीं के वदरण से रपष है] क्योंकि उन्हीं के मत में जो प्रेयोडलंकार है जिसमें वे रतिमाव को अंग मानते हैं उसी के अनुसार यहाँ भी समाहित को अलंकार वतलाया जा सकता है। आपने तो प्रेय आदि में अलंकारत्व का निराकरण केवल न्यभिचारी भावों को लेकर किया है जैसा कि अापने ही कह़ा है-'इस कारण व्यमिचारी माव को लेकर मेय, अर्नस्वी, समाहित, माोदय, भावसंधि तथा आावशवलता को पृथक अलंकार नहीं बतलाया जाना चाहिए [रत्नाकर सूत्र १०९ वृत्ति ]। इस प्रकार उस पद्य [अत्युच:] के अनुसार आपके मत में मौ समाहित आदि में अलंकारत्व बतलाना उचित सिद्ध हो जाता है [ अतः सर्वस्वकार का मत मान्य सिद्ध होता है और उस पर आपका खण्डन ही अमान्य ह। ४५ अ० स०
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७०६ अलद्कारसर्वस्वम् विमर्द-सर्वस्वकार, रस्नाकरकार और विमर्सिनीकार का परस्पर संघर्ष रसवदादि के विषय में काफी स्पष्ता ला चुका है। सदसवकार और रत्नाकरकार का भवभैद केवल इतने हो अश में है कि सवस्वकार केवल रस्षवद को छोट म्ेथोलंकार से हेकर मावनगस्ता तक के इन सभी अलंकारों में भावशष्द से स्थायीमाव के ही समान संचारीभाव को मी अपनाते है, जर कि रस्नाकरकार इन्हें केवल रत्यादि स्थायी मावो तक सीमित रसते है। संचारी मादों को ने सदा ही अप्रधान और रसाग मानते और इसलिएि उनमें अलकारत्व स्वीकार नहीं करते। ननका मतदिषयक विवेचन पहले दिया दो ना चुका है। विमर्धिनीकार सर्वस्वकार का समर्थन करते और सचारी मावों में मौ आपेक्षिक प्रधानता स्वीकार करते है। संचारीमायों का उपमान गर्मदास रत्नाकर के मन में कमी भी प्रधान नहीं होना, विमर्रिनीकार उमे गर्मदासी अर्थात उसको स्त्री के प्रति प्रधान मनला देते हैं। रत्नाकरकार ने भी विवाइपवृत्ठ भृत्य के दृष्ान्त में विषमना का दोष देते हुए कहा था कि मृत्य जन दूछहा बना रहता है और उसका स्वामी उसके पीछे चेलता है तब वह नेवल प्रधान दो रहता है। भृत्य का अर्थे है अन्य किसी की आाशा मानने और उसका कार्य करने वाला। दूनहा बना मृत्षय किमी की आका का पालन नहीं करता अतः उसमें प्रधानतामात्र रदती है अप्रधानना नहीं। विर्ममिनीकार की गर्मेदासी और रत्नाकर- कार का दूचछा दष्ान्तपक्ष में आपेक्षिक प्रधानता सिद्ध कर दार्दामनक मचारो में मी आपेक्षिक प्रधानता [बिमशिनी और रतनाकर दोनों के आचार्यो के मत में] समान रूप से सिद्ध कर देते हैं। इस प्रकार प्रेयोडनकार आदि में सचारी मा्वो का सम्ह मौ समर्थन पा बाता है। इनिद्वाम-रसवदादि अल्कारों का इविहास एक स्वनन्त्र ग्रन्थ का विषय है। संक्षेप में' इसका इतिहाम कला और अनुभूति के दो भक्षों में विभक्त मिलता है। प्रथम पक्ष की पारा दण्डी से आरम्भ होती और मामह के मध्यनिन्दु से आगे नढ उभ्ट तकु भहुँचती है। इनके अनुमार रसवत का स्वरूप इस प्रकार है- [ १) कक्षा या वस्तुवादी आचार्य- दण्डो-प्रेय प्रियनराख्यान रसवद् रसपेशम्। कमेरिव रुदाहंकार युकोत्कर्ष व वत् न्यम् ॥२१२७५।। मियडर कथन [स्पष्टन" चादु या मकि ] प्रय, रस से सन्दर कमन रसवन, रूद अजकार से युक्त कथन कर्जेस्वी कहलाता हैे। एन तोनों में [वाध्यतोमारूपी] उतकर्ष रहता है[अनः ये तीनों अलकार कददे जा सकते है]। उदाइरण- प्रेय-'अघ या मम गोविन्द जाता स्वयि गृरागते। कालेनेवा भवेद मीतिस्तवेव्रागमनाव पुन: ।। इत्याइ युक्त विद्रो नान्यवस्तादृत्ती धृतिः। पीतिप्रकाशनें तब्व प्रेष इत्यवगभ्यवास् । २।२७६-९॥। मगशान् कृष्य के घर आने पर विदुर ने उनसे कहा 'हे गोविन्द आपके पवारने से जो आानन्द मुझे भाज आाया हे यह मनन्द मुझे दूसरी बर तभी प्राप्त होगा नव लप ही पुनः कमी पषारेंगे।' यह कथन अपने प्रतिपाध के प्रतिपादन में सवया उपयुक्त है कयोंकि भन्य किमो प्रकार से ऐैसी [भृति] वित्रवृति व्यक्त नही हो सकनी। क्योंकि इस कपन में प्रोति का प्रकाशन है अत: इसे 'प्रेथ' नाम से पुकार बा सकता है। दण्डी ने प्रेय का हो एक उदाहरण और दिया है, जिसमें भगवात् अष्टमूर्ति की राजा रति- वर्मा ने रुति की है। कुमारसंमव के द्वितीय सर्गं में महादेव थथा वछ सर्ग में स्वय भगवान्
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रसवदाद्यलङ्वारा: ७०७
शंकर की देवकृत स्तुतियाँ इसका वैसा ही अन्य उदाहरण है, अथवा रघुब्श के दक्षम सर्गे में विष्णु नगवान् की स्तुति। स्पष्ट रूप से इस प्रकार के संदर्भ रतिभाव के व्यंजक है। मो रति कान्ताविषयक नहीं होती उसे प्रीति कहा भी जाता है। ध्वनिवादी आचार्यो ने इन संदर्भो को वद्पृत किया है, और इसमें मावध्वनि का अप्रांजल रूप सवोकार किया है। रसवत=के ठिए दण्डी ने अनेक उदाहरग दिए हैं। उन्होंने, रस को हो रसवद माना है। शृंगार, रौद्र, वीर, करुण, बोमत्स, अद्सुत, हास्य तथा मयानक के उदाहरण प्रस्तुत कर वे उनमें से पत्येक के व्यंजक वाक्यसन्दर्म को रक्षवद कहते गर है। उदाहरणार्थ शृंगार की रसवता- 'मृत्तेति प्रन्य संगन्तुं यया मे मरणं मतमू। सैवावन्ती मया लब्घा कथमन्रेव अन्मनि। सेयं रतिः शृंगारतां गता। रूपवाुश्ययोगेन तदिंदं रसवद् वचः ॥ २।२८०-१! उदयन वासवदत्ता के पुनः मिल जाने पर कहता है-'मृत जान जिससे मिलने के लिए मैने मरना ही एकमात्र उपाय माना था वही आवन्ती [वासवदता] इसी जन्म में मिक्ठ गई यह आश्च्य है। इस कथन में वासवदत्ताविषयक उदयननिष्ठ रति पुष्ट होकर श्रृंगार वन गई है। अतः यह कथन रसबत कथन है। इसके अनेक रूप दोते हैं यथा-रौद, वीर, आदि। दण्डी के इस प्रकरण में केवल माठ ही रसों के नाम मिलते हैं। शान्त का नहीं। स्पछ है कि दण्डी सामाजिकनिष्व रसानुभूति को ही रस मानते हैं। उनकी स्थापना में नवीनता बैवल इतनी है कि वे इसको मी काव्य का अलंकार मानते हैं। इसमें सन्देह नदीं कि रसानिव्यत्ति की सामग्ी पस्तुन करने पर भी काव्य में असामान्य विशेषता वैसे ही चली आती है जैसे उपमा आदि को सामय्री प्रस्तुत करने पर। इस विषय पर इमने अपना दृष्टिकोण मपने व्यत्तिविवेक के हिन्दी मान्य की भूमिका तथा साहित्यतत्तविमरश नामक एक संस्कृत शोधपत्र में स्पष्ट कर दिया है। ऊर्जस्वी= 'अपकर्तताह मस्मीति हृदि ते मारम भूद भयम्। विमुखेषु न मे खट्गः प्रहतु जातु वाञ्छति ।। इति मुक्त परो युद्धे निरुद्धी दर्पशालिना। पुंखे केनापि तज्जेयमूअस्वीत्थेवमादिकम्॥' "में तेरा वदित करँगा ऐसा मय तेरे मन में न आए मेरा खद्ग युद्धपराछमुख पर नहीं चलना चाहता-ऐसा कह कर किसी दर्पशाली ने शब्ु को छोड़ दिया अतः यह ऊ्जरवी कथन है। भामद= ने दण्डी के हो अनुकरण पर अभिन्यअ्चक सामग्री से युकत शब्दार्थ को रसवदादि माना है। दण्डी की पदावली में ही रसवदादि का निरूपण करते हुए उन्होंने लिखा- प्रेय :- 'प्रयो गृदगतं कृष्णमवादीद् विदुरी यथा। मघ या मम-पुनः " ३५ ॥' रसचद्= 'रमवद् दशिंतस्पष्टंगारादिरस यथा। देवी समागमद् धर्ममस्करिण्यतिरोहिता ॥'३६॥ वह कथन जिसमें मृंगारादि रस स्पष्टरूप से दिखलाए गए हों। यथा देवी पावती व्यकरूप से ब्रक्मचारी वेषधारी शिव से मिल गई।
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ऊर्जस्वी='ऊर्जस्वि कर्मेन यथा पाषोय पुनरागतः। दि. स दपाति कि कर्ण सब्ये'-तयहिरपाकृत-।।' खाण्टवदाह द्वारा सर्पनाश करने वाले मर्जुन से रदका हेने के दिए फर्ज के बाण में प्रविष्ट औौर वा के साथ अर्जुन पर हूदे किन्तु भीकृष्ण द्वारा भर्जुन की रक्षा कर लेने पर चिफल छोकर वापस कौटे सर्प के करण से पुन नाण चलाने का सध्यानुमोदिव मामह करने पर कर्णका यह क्रथन-'मैं एक बाण दूसरी बार नहीं चलाना'-कर्जरवी है। सपष्ट ही गयोकि हो इन माचार्यो के ऊर्जस्वरी कथन है।
मामद ने प्रेय औौर ऊर्जरवी के वक्षण नहीं दिए क्योंकि वनका सकेन दण्डी ने कर दिया था, किन्तु रसवत् पर दण्डी ने जो आाटकारिक सकेन दिया था 'रसपेशल', मामह ने उसे अवश्य हो स्पष्ट कर दिया है। उदाहरण भी उन्होंने दण्डी से अच्छे दिप है। दण्डी के चदाहरणों में अमिन्यक्ति अधिक विकीर्ण थी। मामह के वदादरणों में वद् कसी हुर, सक्षित तथा सारपूर्ण है। वामन की कान्यासकार सूत्रनृत्ति में ये अलकार नहीं मिळते। उद्धद= ने प्रेय, रसवत् और ऊजस्वी इन होनों के लक्षण अधिक स्पष्टता के साथ दिए। इन लक्षणों को विशेषता यह है कि ये परवर्ती व्वनिवाद से भो नहीं कटते। उनके विवेधन इस प्रकार हैं- प्रेथः='रत्यादिकाना मावानामनुमावादसूचनैः। यद काव्य बध्यते सम्रिस्तत प्रेयख्वदुद्ाहृतम्।।' रति आदि मार्शो के अनुमाव आदि की सूचना द्वारा जो काव्य ग्रथित होता है उमे विदब्जन प्रेयस्वन् कहते है।'बदाहरण-
उक्सापयितुमारय्वा कृत्वेमें क्रोड आरमन: ।' 'पाविती जी मृगमोत को अपनी गोद में लेकर पुचकारने एगो, उनका प्रेम उसके प्रति पुत्र- प्रेम से कम नहीं था। उघुवृत्ि के अनुमार यहाँ 'गोद में लेने रुपी आगिक अमिनय तथा पुचकारने रूपी वाचिक अभिनय'-इन दो अनुमावो, भृगपोत रूपी आलम्बर्नाभाद तथा ओतसू वयरुपी सचारी माव से वारसत्यरूपी रविभाव की प्रधानरूप से अभिव्यक्ि होती है। इस रति का वाचक 'सपरा'-शम्द मो इस पद में छया हुआ है। अतः यह उक्ति प्रेयह्तत्व से सुक है। यश प्रेय का अर्थ अषिक मरियता ही है जिसे दण्डो ने प्रीति कह़ा है।
'वृदार आदि रसों के स्पष्ट प्रतिपादन से यह बलकार रमवत् कहलाता है। इसमें रसका स्वचाचक शष्द स्थायी मान, संचारी माव, विभाव तथा अमिनयात्मक मनुभाव रहते है।' चद्ट की यह उक्ि केवळ पक तथ्य को लेकर धवनिवादी आचार्यों की रसथक्षणकारिका से मिन्न है। वइ है रसवाचक शन्द का कथन। व्वनिवादियों ने इसे अनावश्यक ही नहीं रक्षा पकर्षक् दोष भी माना है। उ्हट ने इसका को उदाहरण दिया है इससे 'स्वशब्द' का अर्भ रवि
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रसचद्द्यिनट्कारा: ७०९
या मदार आदि शब्द नहीं, अपि तु काम, फन्दर्प, मन्मथ, कामप्रिया आादि शब्द मौ हैं। ये शब्द शृहारपसम में कहाँ नहीं आते। उद्ध का दाहरण यह है- 'इति मावयतस्तस्य समस्तान् पार्वतीगुणान्। संभृतानस्पसंकष्पः कन्दर्प: म्रबलोमवन्॥ स्विद्यतापि च गात्रेण बभार पुलकोत्करम्। कदम्बकलिकाकोशकेसर प्रकरो स्करभ् क्षणमौत्सुक्यगरमिण्या चिन्तानिश्चलया क्षणम्। क्षणं प्रमोदालसया दशास्यास्यमभूष्यत ।।' पावसी के सभी गुणों पर ध्यान देते हो मगनान् शिव का अनव्य संकम्पों से समृद्ध कन्दर्ष प्रबल हो उठा। उनके शरोर में स्वेद और रोमंच बैसे ही होने लगे जैसे कदम् की कली के कोश में केसर प्रकर। उनका चेहरा क्षण भर के लिए औतसुक्यमयी, क्षणमर के लिए चिन्ता निश्चल तथा क्षण मर के लिए प्रमोद से अलसाई दृष्टि से भूमित हो उठा।' उङ्गट के कुमार- संभव का यह स्थल रस की प्रवन्धव्यंग्यताके लिए ठीक उतना ही महत्वपूर्ण स्थल है जितना महत्व- पूर्ग काविदास के कुमारसंमव के तृतीय सर्गे का 'अट्टश्यत स्थावरराजकन्या'-से लेकर 'हरस्तु किचित'-तक का स्थल, जिसे ्वनिकार आनन्दवर्षन तथा अभिनवशुप्त ने हो नहीं, अनुमितिवादी महिममट्ट ने भी समान रूप से रसपिच्छल तथा रस की सम्पूर्ण सामगी से युक्त एक आदर्श स्पर माना है। रसनिष्पत्तिपरक्रिया के इविहास में उन्धद का यह निरूपण अत्यन्त महत्व रखता है। इससे स्पष्ट हे कि रस की निष्पत्ति के लिए अपेक्षित सामय्री और उसके अनुरूप काव्यशिल्प का सो रूप आनन्दवर्धन आदि परवर्त्ती व्वनिवादी माचार्यों ने प्रस्तुत किया था वह उनके द्वारा समा हत और उनके पूर्ववर्त्तीं आचार्य उद्ट में छी उसी रूप में उतनी दी सुष्कलता और उतनी ही समगता के साथ स्थापित और स्पष् हो चुका था। तल्ट ने इस रसवद्बिवेचन के पश्चास् नवो रसों को भी गिनाया है- 'रसवद् 000 सपदम् [७८ पृ०]1 मुङ्गार दास्य करुणरौद्रवीर भयानका: 1 बीमत्साद् भुतश्ान्ताश्च नव नाटये रसा: स्मृताः ॥' इसमें एक विशेषता यह भी है कि यहाँ दण्डी द्वारा परित्यक्त शान्त का संगह भी समान रूप से एक साथ हो गया है। ऐसा कार्य मम्मट मी नहीं कर पाए हैं। उनहोंने शान्त को अलग रखकर पहले आठ रस गिनाए हैं। पश्चात् शान्त का समर्थन दबे स्वर में किया है। तथापि नाव्य में तो उसकी पुष्टि ने स्वीकार नहीं ही कर पाप। ऊर्जस्वी के विषय में मी उद्धट की स्थापना ही वह वेदिका है जिसे मम्मट आदि ने अपना आधार बनाया है। उन्होंने ऊर्जस्विता के लिए अनौचित्य को आवश्यक माना था । उन्भट ने इसे उनके पूर्व ही इस प्रकार स्पष्ट रूप से उपस्थित कर दिया था- अनौचित्यप्रवृत्तानां कामक्रोधादिकारणाव 1 मावानां च रसाना च बन्ध ऊर्जस्वि कथ्यते ।।' 'काम या क्रोध आदि के कारण उमड़े और आागे बढ़े भाव तथा रसों का काव्योपादान ही ऊजस्वी कहलाता है। ऊजस्वो पर दण्डी और नामद की दृष्टि अधिक व्यापक थी। फर्ण आदि की गर्वोकियाँ भी ऊर्जस्वी कथन दी हैं यद्यपि उनमें अनौचित्य नहीं है। गहंकार अवश्य है। अनौनित्य अहंकार
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का कादाचिरक फन तो हो सकता है सार्वेदिक और ऐकान्तिक फल नहीं। सोता जो को प्रणय मिक्षु रावग के प्रति यह उक्ति- 'वरणेनापि सव्येन न स्पृर्षेयं निज्ञाचरम्। रावण कि पुनरह् कामयेय निज्ञाचरम्॥' तुझ निज्ाचर रावण को मैं चाहुँगी तो कया? मैं तुझ निशाचर को बाएँ पेर से मी छू तक नहीं सकनी,' कर्जस्वी उक्ति नहीं है, मैसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इम उकति में कोई अनौचित्य नहीं है। इमारो दृष्टि में तो वस्तुन ऐसे कथन ही क्जस्वी के उदावरण हो सकते हैं, मग्मट आदि द्वारा उदघृत राव आदि का सीता आदि के प्रति प्रेमयाचना का कथन सो एक प्रकार से कर्जस्वताशून्य और विपरीन कथन है। ऊकू का अर्थ सर्वस्वकार ने बल किया है। अदंकार अपनी लवत्ा का समिमान ही है। अपना अमिमान नतलना अच्छा मले शो न माना था सके, परन्नु अनुचित मौ नहीं माना जा सकता। अतः अनुचित भाव तक हो कर्जस्वी को सौमिद रखना एकपक्षीय और युक्तिशून्य मी है। समाहित=के विष्य में दण्डी, मामह और वामन के मत समाधि भलकार के प्रकरण में दिए जा चुके हैं। इनके समाहित का भावमश्चम से कोई सबन्ध नहीं है। उसका स्वरूप उनमें वही है जो मम्मट और सवस्वकार के मत में समाधिनामक अल्कार का। ममाहित का नो स्वरूप मम्मट के काव्यप्रकाश और यहाँ सर्वस्व में मिलता है उसका पूर्वरूप वद्भट ने दी स्थापित कर दिया था। उनके काव्यालंकारसारसमह् में इसका विवेचन हम प्रकार है- पशमबन्धनम्। अन्यानुमावनि शन्यरूपं य् वव समादिविम्।।' -'रस, माव तथा इन दोनों के आमास का प्रशम दत्णना समाहितालंकार कहलता है कयोंकि इसमें अन्य रस आदि के अनुभाव का सवंपा अभाव रहता है। एखुषरिकारने इसका वास्पर्येवाक्य इस प्रकार बनाया है- 'यत् पूर्वेषा रसादीनां वासनाया वाटयेंन तेपूष श्ान्नेषवपि रसाधन्तराणी न स्वरूपमाविभवति आाविर्भव दषि वा कार्यवशेन वेनचिच्िरोधीये तत समाहिवालक्वारो भवति।' -'जहों पू्ववर्तो रस आदि की वासना दृढ होने से उनके शान्न हो जाने पर मी अन्य रसों का स्वरूप आविभूत नहों हो पाया, अथवा ्विभूत होता दुआ भी कार्यवशात किसी के द्वारा तिरोहित कर दिया जाता है नसे समाहित नामक अलकार माना जाता है। उदाइरण-'अथ कानतो दृश दषवा विभ्रमाच्च अ्रमं भुवो.। समरज्वरप्रदोप्षानि सर्वाह्षाणि समाद्धत।' भगवती पावंत्री की कान्तिमती दृष्टि तथा विभ्रमवताव घूमती मौहे देखकर शिवज रमरज्वरप्रदीस सभी अभों को प्ान्त करते हुए पावतीजी के समीप पहुँचे। यहों लघुवृसिकार के अनुसार निवजी द्वारा मपनी विववृत्ति का छिपाया बाना प्रतिपादित है। वस्तुन: उद्भट के इस विवेचन से मावशान्ति का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता, किन्तु इससे समाहित सामान्य अलकारोंसे निदलकर रसवदादिके वर्ग में भवश्य ही चछा आता है। परवर्ची आचार्यो ने सचारी मावो की दी शान्ति मानी है, रसादि की नहीं। सड्ट के पश्चात इस विषय में जिस आचार्य को स्थान दिया जाना चाडिये ने हैं आचार्ये आनन्दवर्षन। इनसे वस्तुवादो या ककावादी दृष्टिकोग को
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अनुभूतिवादो इष्टिकोण का रूमान्तर प्राप्त होता है। ये रसवत शध्द के स्थान पर रसालंकार शवब्द हो देते हैं। [२ ] अनुभूतिवादी आचार्य- आनन्दवर्धन-'प्रधानेऽन्यत वाक्यार्थे यत्राजं तु रसादयः। काव्ये तस्मिन्नलंकारो रसादिरिति मे मतिः ।' धन्या० =५॥ 'जहाँ प्रधान कोई और तत्व हो और रसादि हो अङ्त, इमारे मत में रसादि उसी काव्य में अलंकार होते हैं।' आनन्दवर्धन की इस स्यापना से रसवदलंकार के क्षेत्र में प्रधानता औौर अ्प्रधानता का अध्याय जुड़ा। रस जब अनुभूतिरूप है और विश्रान्तिरूप मी, तव रस के भागे कुछ भी शेप नहीं रहता, फलतः रस किसी के अलंकार नहीं बनते। अतः अज्भूत रस की उपर्युक्त चर्चा में रस शब्दर का वर्थ अद्गभूत स्थायिभाव लगाया जाता है। स्थायी भी आस्वाद के कारण रस के समान ही होता है अतः उन्हें भी रस कह दिया जाता है- रसनादू रसत्वमेरपां माधुर्यादीनाभिवोत्तमाचारय: । निर्वेदादिष्वपि तव अकाममस्तीति तेऽि रसाः ॥ इससे स्पष्ट है कि ध्वनिसिद्धान्त में रस कभी भो अलकार नहीं बनता। दण्डी से लेकर उन्टूर के सिद्धान्त में काव्य की उपादेयता में उपमा आदि के ही समान रस की कारण है, अतः बह मी काव्य को अलं=पर्याप्त समृद्ध करने वाला होने से अलंकार है। रस और सौन्दर्य को व्यकिविवेककार ने अमिन्न माना है, अतः वामन के प्रसिद्ध सिद्धान्त 'काव्यं ग्राहमलमवराव, सौन्दरयमलंकार: के अनुसार काव्य की म्राधता का कारण बनने से सौन्दर्यरूप रस भी अलंकार चन सकता है। इस प्रकार ध्वनिवादी अनुभूति की भूमिका से निर्णय लेता है और ध्वनिपूर्ववती माचार्यं व्यवहार को भूमिका से। इम नहीं समझते कि ये दोनों मत किसी भो प्रकार परसुपर विरोधी हो सकते हैं। भरे हुए शरीर में खादी मी शोभा पाती है और सूखे इाढ़ पर उत्तम क्षौम भी फोका लगता है। सच यह है कि अलंकार्य भी अलंकार का अलंकारक होकर उसके प्रति अलंकार रहता है। काहिदास का रवेशी के विषय में यह कथन कि वह 'आमरणस्यामरणम्' है तथा वल्कलधारिणी शकुन्तला के लिए यह कथन कि 'किमिच हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम' इसी ओर संकेत देता है। नपधकार का 'तरुणीस्तन रव शोभते मणिदारावलिरामणीयकम्' वाक्य तो इस तथ्यको अभिधा में ला उतारता है। अतः इन सापेक्ष तथ्यों पर स्याद्वादी हष्टिकोण से अनेकान्ती समझौता ही ठीक होगा, ऐकान्तिक इदमित्थंभाव नहीं। कुन्तक अभिनवसुप्त और मम्मट नेधवनिकार के ही सिद्धान्त का समर्थन किया है। कुन्तक ने वक्रोकिजीवित के तृतीय उन्मेप में रसवत् पर अति विस्तीर्ण शास्त्रार्थ खड़ा किया है और अन्त में ध्वनिकार का मत स्वीकार कर दिया है। उनका सारा पौरुष 'रसवत्' शब्द की व्युत्पत्ति में लगा प्रतीत होता है। कमी ने दण्डी के 'रसपेशल' शब्द के अभिप्राय को खोजते हैं और कमी 'रसवद् रससंत्रयाद' वचन के। अन्त में वे 'रसवत्' में मतुप न मानकर तुल्यार्थक वतिप्रत्यय मानते हैं और वे इसे इस प्रकार स्वीकार करते हैं- 'रसेन वसते तुक्यं रसवत्वविधानतः। योडलङ्गार: स रसवत् तदिदाइ्लादनिर्मिते:' ॥३१५॥ -'जो अलंकार काव्य में रसयुक्तता लाने से रसतुत्य प्रतीत होता है वह रसवत कइलात्ा है। अलंकार इसलिए कि वह उसके वेत्ता को आानन्द देता है।'
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इस उक्ति में 'रसवश्वविधान = काव्य में रसयुक्तता छाना' ककर कुन्तक ने प्राचीन मावायों पर उठार तर्क के विराट माटम्वर को स्वयमेव धराशायी कर दिया। इसी प्रकार पदले पइस तो कुन्तक ने कर्मेस्वी, प्रयान् और समाहिति में भी अलकारत्व नहीं माना है, किन्तु बाद में उन्होंने 'रसकत' के विषय में जो मीड लिया है उससे उनके मतर्मे ये भो अलकार सिद्ध हो जाते हैं। समाहितका जो उदाहरण सवस्वकार ने प्रस्तुत किया है यह उनहोंने बकोकिनचितकार से दी किया है। ले दे कर पक्रोफिजीविन का रसवदादिखण्डन उनकी विभिन्न व्याख्याओरों का खण्डन है, मुळ मान्यताओं का नही। मग्मट-असलक्ष्य कमर्व्यग्यध्वनि गिनाते दुए किसने हैं- 'रसमवतदा भासभावधयानयादिरकमः । मिन्नो रसाधलकाराइल कार्यतया स्थित । ४। व्संफइप कमभ्यग्य ववनि में रस, माव, इब दोनों के आभास तथा मावशान्ति आदि माते है, किन्तु तर जब वे रसादि अलकार से भिन्न हो और मदकार्यरूप से स्थित हों। इसी कारिका की उयास्या में वे लिखने हें- मधानतया यन्त्र स्थितो रमादिस्तत्राळहार्य, ''मन्यन धु प्रधाने वाक्यार्ये यत्राज्ञभूनो रसादिसतन गुगीभूनवपढाये रसवतपेय ऊर्जस्विस्माहितादयोइड्ारा.।' इसके उदादरण बन्होंने पंचम सर्ास के गुणीभूतव्यकूग्य के प्रकरण में दिए है। क्योंकि घनिवादी आचारयें रसवदाचलकारों को गुणीभूतव्यल्ग्य मानते हैं। रनाकरकार ने समाहित से लेकर सबकता तक शोष सभी अकफारों की ध्वन्यंग मान केवल रस, भाव और दोनों के आमासों को अटकार माना है। उनका सृत्र है- 'रसमावतवामासाना रसाबनरवे रसवत्प्रेयऊजस्वीनि॥ १०९।। इसो की लम्बी व्यास्या, जिसके सुख्य अंश शद्धून किए ना चुके हैं, के परचाव रत्नाकरकार ने को पाँच समदरकीक बनाए ये बनमें से चार चदषृत किए या चुके हैं शेष पाचनों यह है- 'रसादेरक्ित्वे ध्वनिरथ रमादीन् प्रति यदि शुणश्व वहि स्वाद् रसवदनुगोडलइ्कतिगण। गुणस्व्रं वाकयेड्यें वजति यदि चौदारचरितं तदोदासं मावस्थितिननलतादो ध्वनिरिति॥' रस आदि यदि, अगो हो तो खवनि और यदि रस आदि के प्रति अेंग हो तो रसवदादि भदकार होते हैं। यदि बदार पुरुषों के चरित वाच्य अर्य में अग बनें तो उदातानकार होना है। भावस्थितिशबलता आादि सदा की वनिरूप रहते हैं। छप्पयदीपित-ने रसवत् आदि के समान मावशबलता आदि सभी को अलकार माना है, बिन्तु उन के लक्षण नहों बनाए है। केवल वदाहरणों दवारा हो बन्हें स्पष्ट कर दिया है। प्दितराज-ने रसवदादि अलंकारों का स्वतं्त्ररप से विवेचन नहीं किया किन्तु उनके द्वारा रसविषयक उदादूरणों के प्रसंग में स्पषीकरण के सिप दिए गए प्रस्युदाहरण पर्दो से यद तथ्य स्पष्ट है कि वे राजा आदि की स्तुति में रस आदि को अ मानने हैं। विश्वेश्वर-ने अलकारकौस्तुम में केवल अर्थाटकारों का ही विवेचन किया है तथाषि उन्होंने रस्षवदादि अलंकार भी इन्हीं बलंकारों में गिन िर है। उनका विवेचन इस पकार है- 'रस मावतदामासे रसवत्प्रेयक जेरी। घमे तु समाहितमुद्ये्न्योड्यस्य शवळत्वे।।'
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इसकी वृत्ति से स्पष्ट है कि वे अंगभूत रसको रसवत, अंगभूत माच को प्रेय, अंगभूत सामासों को ऊर्जस्वी तथा मावप्रशम को समादित मानते हैं। साथ दी शवलता आदि को उन्ही नामों से अलंकार रूप हो रवीकार करते हैं। संजीविनोकार विद्याचकवर्त्ी को निष्कष्टार्थकारिका इस पर ये हैं - 'रसभावगुणी मावादनीचित्य प्रडसितः । रसवत्प्रेय कजरिवस माहि्ितिच नुष्टयम् 11 रसवर्वप्रियत्वाभ्यामूर्ज: प्रशमयोगन: । निबन्धनं रसवदाद्याख्यां संप्रतिपदते।' [सर्वस्व] [स्. ८४] मावोदयो भावसंधिर्भावशवलता च पृथगलंकारा। भावस्योक्तरूपस्योदय उद्गमावस्था, संधिः द्योर्विरुद्धयो: स्पर्धित्वे- नोपनिवन्ध शवलता च वहनां पूर्वपूर्वोपमर्देनोपनिबन्धः । पते च पृथग रसवदादिभ्यो मिन्ना अलंकाराः। पतत्प्रतिपादनं चोद्धटादिभिरेषां पृथ- गलंकारत्वेनानिरदिपत्वात्। अथ व संकरसंसृष्टिवैलक्षण्येनैते सर्वालंकारा: पृथककेच लत्वेनालंकारा इति सर्वालंकारशेषत्वेनोक्त्म्। संसृष्टिसंकरयो्हि
[सू० ८४] भावोदय, भावसन्वि तथा शवलता पृथक अलंकार हैं। [वृ०] माव, जिसका स्वरूप वतलाया जा चुका है उसका उकय हे सद्रमावस्था [उसकी] सन्धि है दो विरोधियों का परस्पर स्वर्षी के रूप में उपनिबन्ध, तथा [उसकी] शवळता है मनेकों का पूर्व पू्ववत्तीं को दवाते हुए रूप में उपनिबन्ध। ये पृथक् अर्यात रसवद् आदि से मिन्न अलंकार हैं। यह इसलिए कहा जा रहा है कि उन्दट आदि माचायों ने इन्हें पृथक अलंकार के रूप में नहीं बतलाया था [भावोदय आदि तीनों दण्ढी से लेकर रुद्रढ तक के ग्रन्थों में नहीं मिलते]। इसी प्रकार एन सभी [मावोदय, मावसन्धि, भावशयलता] अलंकारों में संकर और संसृषि नहीं होते, किन्तु ये अन्य मलंकारों के समान अपने साप में मी स्वतन्त्र रूप से पृयक अलंकार होते हैं। इसलिए इन्हें [ संकर औौर संसृष्टि के पहले और] अन्य सव अरंकारों के अन्त में रखा गया है। संसृष्टि और संकर में तो भलंकार मिछित स्थिति में रहते हैं। उनसे इनकी विलक्षणता [भिन्नता] वतलाने के लिए यह कहा गया। विमर्शिनी मावेत्यादि। पतदेव व्याचष्टे-मावस्येत्यादि। उक्तरूपस्येति। व्यभिचारिदेवादिरतिर्वेन द्विप्रकारस्वेश्यर्थः। उद्गमावस्येति। उद्गमावस्था न पुनरुडितेत्यर्थः। उदितार्या कि भावस्व स्थियात्मकत्वाम्प्रेयोडलंकर एव सयात्। पते इति। भावोदयमावसंधिभावशवलतासत्रयो लंकारा। ननु प लक्षजश्य मिनवादेवेपां पृथवत्वावगम इति कि तद्म्णनेव्याशक्याह- एतदित्यादि। अथ चेति पत्तान्तरे। सर्वालंकारा इति। पुनरकवदाभासादिमावशबलानता। केवलत्वेनेति। तस्येवैककस्य वाक्यार्थवेन परोहाद। तस्मात [केवल,] अङ्गभूतैरलंकारा मतरेरुपस्क्रियमाणे वाय एव यत्र वाक्यात ताप्पर्यविषयरवेन प्रतीयते स एव तन् सात्तादलंकार इति भाव:। अल एबात न संवश्ट्संकरव्यपदेशः। यतस्तयोरलंका राणां मिश्नखवेनावस्थानं लक्षणम्। तदेवाह-संसूष्टीत्यादि। यत्त पूर्वत्र कुश्रचिदुदाहरेषु
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संकराधलंकारत्वमस्ति, तचत्र संभवमावेण निदशनीकृतम्। न तु सामादलंकारखम। तत्तम्न तयाविघस्योदाहरणस्य स्वयमेव लपयादग्यूक्ष: कार्य:। माव इत्यादि। इसी की व्याख्या करते हैं-'मावस्य' सयादि। वफहरुपस्य=जिसका स्वरूप बनलाया जा चुछ है अर्थात व्यमिचारिरूप तथा देववारनिरूप से दो भेदों में। उद्गमा- वस्या= उदमावस्था, न कि उदित हो चुकना। उदिन हो चुकने की स्थिति में तो ये स्थित्या स्मक होकर प्रेयोडलकार होंगे। पतेये सावोदय, मावसन्धि, तथा मावनुवलता नामक अलकार। 'रक्षग अलग करने से ही इनकी पृथका सिद्ध यी तब पृथक शब्द देने की आवश्यकता क्या थो'-ऐसी शका करकहते हैं-'पनद्-इत्यादि। अथ च= यह अन्य पक्ष प्रस्तुत करने हेत्ु कहने हैं। सर्वालद्वारा - सर अरकार =पुनरुक्तवदामास से लेकर मावशवक्षना पर्दन्त [दमारी व्यास्या इससे मित्र है]। केवलख्वेन= अपने आप में-क्योंकि इनमें से भरेला एक हो अतकार वाक्यार्थरूप में प्ररद हो जाता है। इसका भमिनाय यह कि जहा कहों कोई अवंकार अगभून अन्य अटकारों से उपरकृत झोकर मी वाक्य से उसके तारपये विष्य के रूप में प्रतीत होता है यहों वडी सलकार साश्षद सलवार माना नाता है। इमीसिए यहा मसष्टि और सकर नाम नहीं चलते हैं, क्योंकि उनका लक्षण है अल्कारों की मिश्रित स्थति। इमी तथ्य को स्पष्ट करसे हुष कहते हैं- 'संसृष्टि' सदादि। पहले दिए[ ययामखप आदि अन्य अरकारों के] उदाहरणों में जो कहीं सकर आदि अलकार वतलाए गए है, वह उन [यथासख्य आदि) की समावनामात्र वनलने के सिए। बई वे [ यथार्मस्य आदि ] साकाय अनकार नहीं है। इसदिए वहा उस प्रकार के [ साक्षात सल्कारत्व के] उदाहरण सक्ष्य को देसकर स्वय हौ खोज लेने चाहिए। विमर्श-प्थगरद्वारत्वेनानिर्दिष्टवाद=के स्थान पर सभी प्रतियों में 'पृथगरकारत्वेन निर्दिष्त्वात' पाठ मित्ता है। उद्गट आदि में मावोदय आदि तीनों अलंकारों के लक्षग और उदाहरण नहीं मिल्ते। केवल रभवत् प्रेय और कर्जस्वी के दी मिलते हैं। यदि उन्होंने लक्षग दिए होने तो विमनिनीकार भी उन्हें उद्धृत करते। मम्मट ने अवश्य इन्हें माना है और रस- बदादि से मिन्न हो माना है। मम्मट ने भी इन अलंकारों को अलंकार प्रकरण में न रख, गुणी- भूनव्यग्य प्रकरण में रखा था। 'पृथक्'- शब्द इनकी स्वनन्त्र मलकारता और उनको अलकार्गे में गमना की ओर मँकेत करता है। इन तोन अल्कार को प्रथम बार सवस्व में दो अनकार प्रकर7 में पाया गया है। 'अथ च-वैळकण्यप्रतिपादनमैनव'-का अभिप्राय भी विमर्शिनी में कुछ और है। संज्ञीविनी में भी वैसी ही व्याख्या मिल्ती है। इमारी दृष्टि में इन व्याख्यायों के अनुमार इस अन्थार को मावोश्य आदि के वदाहरण के बाद रखा नाना उचित है। वरतुत, यह अन्याश यह वतलने के दिए कडा गया है कि इन अरकारों को एमी अहंकारों के पश्चाद और सकर मस्टि के पूर्व क्यों रखा गया। अल्कारों के क्रम का निर्धारण अन्कार जिस हेत्ु से करते आए है उसका तक्लेख वे प्राय. प्रश्येक अटकार में करते रहे हैं। यहां, यदि उक अंश् का अर्थ विर्माशनी जैसा लगा लिया जाय तो, वेसा कोई द्ेतु नहों रहना। [सर्वस्व ] तत्र माचोदयो यथा- 'एकम्मिष्छयने विपक्षरमणीनामग्रहे मुग्धया सग: कोपपरिपद्दग्लपितया चाटूनि कुर्चअ्नपि।
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भावोदयाघयलक्कारा ७१५
आवेगादवधीरितः प्रियतमस्तूष्णो स्थितस्तरक्षणा नमा भूत् सुप् इवेत्यमन्दचलितग्रीचं पुनर्वीक्षित:।।' अघौत्सुक्यस्योदयः । भावरसंधिर्यथा- 'वामेन नारीनयनास्रुधारां कृपाणधारामथ दक्षिणेन। उत्पुंसयन्नेकतर: करेण कर्तव्यमूढ: सुभदो बभूव।।' अत्र स्मैहाख्यरतिभावरणौससुक्ययो: संधिः। भावशवलता यथा- 'क्वाकार्य शशलक्ष्मण क च कुलं भूयोपि दश्येत सा दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेडपि कार्न्तं सुखम्। किं वक्ष्यन्त्यपकल्मपा:कृतधियः स्वप्नेपि सा दुर्लभा चेत स्वास्थ्यमुपेदि क: खलु युवा धन्योडघरं पास्यति॥' अ्षन्र वित्कोत्तुक्यमतिस्मरणशङ्कादैन्यधृतिचिमताना भावानां शबलता। तदेते वित्तवृत्तिगतत्वेनालंकारा दशिताः। इनमें से मानोदय यथा- क ही पंग पर सोते समय सौन का नाम ले लेने से तुरन्त कोपम्लान सुग्धा ने प्रसन्न करने में लगे हुए प्रियतम को आवेग में आाकर दुतकार दिया तो जब वह चुपचाप लेटा रहा तो उसे नायिका ने 'कहीं सो तो नहीं गय!'- इस विकवपसे बार बार मीवा मोड़, मोड़ कर देखा।' यहाँ औत्सुक्य का उदय अनुभव में आाता है। मावसन्धि [ का उदाहरण ], यथा- 'एक कोई सुमट वाएँ हाथ से प्रिया की आँखों की अश्नुधारा और दाहिने हाथ से कृपाण की धारा पोछते हुए कर्तव्य विमूढ़ था।' यहाँ स्नेहनामक रतिमाव और युद्धोत्सुकता की सन्धि है।
मावशचलता, यथा - कहों अनुचित कार्य और कहाँ चन्द्वंश [बितरक] वह पुनः एकबार दृष्टिगोचर होतो [औौरसुक्य] दोषों को दबाने के लिए मैंने विद्याभ्यास किया है [ मति ], भोडो उसका मुखमण्डल कोप में भी कान्तिमान रहता था [ स्मरण ]। निष्कलंक धीर पुरुष (मुझसे) क्या कहेंगे [ शङ्ा ]। वद ती अव स्वम्न में मी दुर्लम हो गरई [ दैन्य]। चित्त स्वस्थ हो जा [धृति ], कौन होगा वह धन्य युवक जो उसका अधरपान करेगा [चिन्ता ] ।।' यहाँ बिसक औत्सुक्य, मति. स्मरण, शङ्का, दैन्य, धृति तथा चिन्ता [नामक संचारी मावो) की शबलता है। इस प्रकार ये चित्तवृत्तिगत अलंकार बतलाए गए॥ चिमशिनी एतदुदाहरणनयं ध्वन्यभाववादिमतेन अन्थकृतोपास्तम्। ध्वनिवादिमतेन पुनरद- हियते। तत्र भावोदयो यथा- 'साकं कुरङकदशा मधुपानलीला कतुँ सुहृद्धिरपि वैरिणि व प्रसुसे। अन्याभिधायि तव नाम विभो गृहीतं केनापि तत्र विपमामकरोदवस्थाम्।।'
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सलङ्वारसवेस्वम्
संघटनाकृतं चावत्वान्तर जायते, तद्वत् प्रकृतालंकाराणामपि संयोजने चाय- त्वान्तरमुपलम्यते। तेनालंकारन्तरप्रादुर्भावो न पृथक्पर्यवसानमिति निर्णयः। अलंकारान्तरत्वेऽपि च संयोगन्यायेन भफुटावगमो मेद:, समवा- यन्यायेन वाक्फुटत्वायगम इनि द्वैधम्। पूर्वत्र संसृष्ठि, उत्तरत्न संकर:। सत एव तिलतण्डुलन्याय, क्षीरनीरन्यायश्च तयोयथार्थतामवगमयतः। अब इन मर अलकारो के संदलेष से निष्पन्न होने वाले दो अलदार बनलाए ना रहे है। इनमें मंश्लेष दो प्रकार का होता है सयोग जैमा और ममदाय जैसा। सयोग जैसा वह जिसमें भेद स्पष्ट रूप से विधमान रहता है। यही भेद जहां स्वरूप से विदमान नहीं रहता वह समवाय जैमा होता है। इनमें से उस भेदों के स्पटरूप से विद्यमान रहने पर [संद्देप की] स्थिति तिलनण्डल जैमी रहती है और दूसरे में सीरनीर नैमी। क्रम से इनके लक्षण बनझाप
[सू०८५]इन [अलंकारों] का निलतण्टुळ जैसा मिश्रण समूष्टि [नामक अलकार कहलाता है]। [सू०] उकत अलकारों [में से किन्हीं] का यदि कहीं किमी प्रकार एक साथ मयोजन हो जाए तो यइ विचार उपर्यिन होता है कि क्या वहोँ वे अलकार अन अलग समनत्र रूप मे अटकार रूप में अनुमद में आने हैं अववा वहो कोई मिन्न हो अलकार होता है। इस पर निर्गय यह दोता है कि विस प्रकार सुबरणे या मणि के बने हुए बाघ [छोकिक] अल्कार रवनन्नरूप से पृथक अलंकार होने हैं तथापि उनकी संघट्ना से एक अलम हो छोभा होती है उसी प्रकार इन असकारों के सयोजन में भी एक भलग ही चारना उपलब्ध होनी है। इस कारण यहाँ मिन्न शी सर्कार का मादुरभाव होता है, एकनपक अलंकार का स्वनन्त्र अनुमव नहों। मिन्र सलकार मानने पर भी या तो सयोग के समान [मिषित अकारों में से प्रत्येक का] प्ञान स्पटरूप से होता है, या समवाय के समान अस्पष्ट रूप से। इस कारण उमके भी दो भेद हो जाठे है। इनमें से प्रथम में संसृष्टि और द्विनीय में सकर होता है। इसीलिए इन्हें [ कमशः] तिर्षतण्डुछ [चावल के मिश्रग] की उपमा और नोर क्षीर [कै मिश्रण] की उपमा दो बाती है, इससे इनके नाम यथार्थ प्रतीत होने है। मिमर्शिनी अधुनेति प्राप्तावसरम् । पषामिति पूर्वोदिष्टानाम्। तनेति। अलंकारडये। सर्यैनेति। मेदस्प।रफुटावमरफुटषं च सुरपर्टमेव। अत एव तिलतण्टुक्टन्याया, चीरनीरन्याप व्ेयु
दवीचंहूनो वालंकाराजी युगपद्विनिवेशर्न संघटना, तथा कृतम्। तदुश्थापितमिध्यर्थ:। चावत्वान्तरमिवि। पकेकाळंकारननियन्धनाव मकताव्वाहवाद्न्यात् सातिशयमिति यावय। उपलम्यने-श्रसंवित्सिद्वतया साकास्कयत इस्परये.। तैनेति। घासवानतरीपलम्भेन। नदि विषयभूनालकाराविशय मन्तरेणोपठा भातिशयो मवितुमहतीति भागः। ननु-शब्दार्थालक्ाराणो संघटनामात्रेगेव कथमटंक्ारान्तरखमुक्तम्। मिसकपयर्वे. में पा मे कबु द धुपारो हासं मवा चासरवाग्तरामावात। सेपा दि संघटिनवेि- अलंकारेपु वादावं तद्द्विदि विमिद्यते।
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संसृषटयलद्कारः ७१९
इति नीत्या भेदखेनेव चारुत्वावगमातिनतवमेव न्याययम्। नापि लौकिकालंकार वदेतेपां संघटनाकृतं वारत्वान्तरसुपलभ्यते। नदि मौक्तिक पझरागेन्द्र नीलाविविस् सचेतसः कस्यचिदनुमासोपमादीना परस्परं परमाो मासते। शब्दार्थदोर्भिन्नेन्दियम्राह्यावेन
असदेतत्। तथाहि सलु यथा पृथगवस्थितेपु न्थालीजलज्लनरत(स १)तण्दुलादिपु न समतापत्यया, समुदितेषु तु भवति, समम्रसंनिधानाउयस्य धर्मस्य प्रत्यक्ष सुपा- लम्भात, तर्थेव मिननकचयाणामलंक्वाराणीं संघटनावनेन पूर्वापरे कीकारेलेंकसुदधधं- विरोहादुपलभ्यत एव कक्चन संसर्गो नाम यस्य संसृष्टिसंकरव्यपदेशाहखवम्। अपि व रुपमेदेऽप्यविच्छेदादेकरवम्, 'चिन्नपत्त्रक' हत्यादिनीस्या चिन्रास्तरणदी यथा र्व. रुपस्य रूपान्तराम्याटृप्तरवऽपि विच्छेदानवभासोदकघटश्लिष्टाकार प्र्यय चित्ररुपम च्येकमेव वस्तुरूपं भासते तथव मिश्नकध्याणामप्यलंकाराणं संघटमानवेन प्रतीतावे- कतावसाय इति युक्कमेव संसृष्ट्याध्यलंकाशन्तरत्वम्। इचवादीनां प माधुर्यस्य भेदेपि संमीलनायां पानकादिर सनिष्पत्तावुपलम्यत एव कश्िद्वंनित्रयातिशया, तहदेपासपीति युकमलंक्ारानतरत्म्। न चास्य चारुतातिशयस्य शपथपत्येयत्व वाच्यम्। एकत्रवे कस्य दय वंहुनां वालंकाराणामनगमे यधायधमतिशयोकर्पस्य स्वसंवित्सान्तिकरवेन वेद मानरवाद।
संघटमानखवेन व प्रतिपत्तिरलंकाराणमेकस्मिन्त्राबये तत्तच्छदसि वा भवति, न तु कुलकादो, विदूरतया तस्यान्तावत्या: परोहासंमवात्। यदाहु :- 'वाक्यार्यभेदेऽप्येक. श्लोकान्तर्गतावेनालंकारस्यालंकारान्तरसाहित्यं पतिभारवेव। अविदूरतवाद् विभिन्न रलो कगातत्वेन वाष्यमेे व्यवछितित्वान्र भवति ससतृष्टिः ॥'इति। कुळकादाव प्य लंकारारणां वाय यै कचाच्य तया यद्यविच्छेदेन प्रतिपत्तिपरोहः स्यात् तदा आ्रापि संसृष््धाद्यम्युपगमने न कश्रिद् दोप:। ननु, समग्रताप्त्यये चित्रज्ञाने वा स्था्यादीनां चेन्द्रियग्राल्रेन समानजातीया नामेकबुद्धधिरुवादुपपद्यत एव सामग्रयादेरेकस्य वस्तुनोऽबगमः। इह तु भिन्नेन्द्रिय आ्ह्यव्वेन भिवजातीययो: शब्दार्थयोरेकबुसचधिरूढाभावात्तलंकाराणं युगरमतीतिरेव नास्तीति कथमेकस्य संसर्गादेवस्तुनोऽचभासो यस्यापि संसृष््याद्यलंकारान्तरव्यपदेशा-
तीयत्वे तावदविवादः। मत एव च तमोरेकसुद्दूधधिरोहाद् युगपत प्रतीतेः संसर्गावगमः। सति प संचये चारुतातिदायोपसर्जन इश्यन्र संसष्टाद्यलंकार्वम्। पुवमर्थावगमस्यापि शब्द करणस्वारसमानजातीययो: संसृप्टखवेन प्रतीयमानयोरलंकाशयोरपि जेयस्। शब्दा थयो: पुनरूपायभेदेऽपि तदलंकाराणं सुगन्धिवत्धूकघ्ोधन्यायेन [मानसवोधन्यायेन] मानसज्ञानविषयस्वाद्यगपदचमासः सिद्धद्यतीति लौकिकालंकारवदेव शब्दार्थोभया कंकाहणां संसर्गे उ्घपर भागतयावभासत पूव नारूरान्तरमिति न्यायप्राप्तमेव संसप्टया- धलंकारखम्:l यापुनरन्य: शव्दार्थयोर्मिव्नजातीय्वे भिन्नेन्द्वियग्राह्मावं निमित्तमुक्तं तद्ुपेष्यमेव। शव्दार्थशरीरे काव्ये शब्दप्रतिपाद्यस्येवार्थस्याङ्स्वानतचचुरिन्दियग्रा
यधेवं पूर्चळचितानामनुपरासोपमादीनामभावः स्याद्, असंकीर्णानामलंकाराणाम-
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७२० सलङ्कारसर्वस्वम् संभवारसवंध्र संसृष्टिसंकरपोरेव भावादेपां विषयापदारात्। नैतत्। शसंकीर्णोना मलंकाराण सहसश्ो दर्शनाव। तथाहि- 'यशोवर्माणमुक्टंध्य दिमादिमिव जाहवी। सुखेन आविश्ञतस्य वाहिनी पूर्वसागरम् ॥ ४१४६ ॥ उत्तरा: कुर योऽविसुस्तद्याधन्द्रपादपान्। उरगान्त कम म्रा स्ता दिलानी व महोरगा ॥४१७५॥ लयार्भितधनः सोडय प्रविवेश स्वमण्दलम्। मिन्नेममौसिकापूर्णपाणि सिंह इवाचलम ॥४6॥ राजतान्क्वापि सौवर्णान्कापि देवान्विनिर्भेमे। पार्श्वेपु मुदयदेवान। पार्थिवो धनदोपम ० ३र०५ ह सु सारध्रकूणश्चके रव्नामाङविद्ारकृद्। मूपाचत्तोपमं स्तूपं जिनान् हेममर्यास्तया।। भरा१।। ईशानदेष्या तर्परन्या खाताम्युप्रतिपादितम। सुधारममिव स्वच्छुमारोग्यादायि रोगिणाम्॥ ४२२६
विकधान्सुमनव्हनोमानपादपेम्य ददवानिला: । ४२२५। अमेमसारे मयि सु व्यकमेवंविघोऽपि ते। प्रयाम: कुण्ठर्ता यातो छोह वज्रमणाविव ॥४२९८॥ निदेशेनैव सपश्य पय. सूतेऽ्ध मेदिनी। रसषितेनास्युवाह्स्य रतन सैहूयंभूरिव ॥४३०॥ इध्युकवा सोऽम्वु निप्छटं कुन्तेनोर्वीमदारयद। टब्िद्ीपुवितस्तारमः शूलेनेव म्रिछोचनः। ४३०१।। श्रुते प्रणष्टे नगरे निः्शोकोभून्महीपतिः। खवप्नान्तर्द्ारिते पुत्रे प्रवुद्दोऽम्र दघेषते॥४३१९॥ अत्ररये: सर्वंदा रपया रवमेद: प्रमविष्णुमिः। धार्वोकाणामिवैया दि भयं न परलोकत:। ४३४५।। इस्यादि राजतरह्ठिण्या लठितावित्यवर्णने अपमाया: शुद्रमुदाहरणजातम्। एवमप्रे वान्यराजवर्णने प्रबन्धान्नरेंधु वा शुद्धाया उपमाया कियान्विपय इति को नाम दर्शवितुमरम्। अपमैव धानेकालकारयीजमूतेति तदिद शनमेव कृतम् । पूवमत्या एकाराणामपि सहसशधातोदाहरणवं समपदपि अन्थविस्तरमयाध दर्शितम्। तस्माने पामविपयाचं प्रविरलविपयत्व घ न वाच्यम्। पबिरछवियमरवेप्युपमादीना संसटटिसक्
एवं च 'न संसुषट। पूर्वहानाच् चाहत्वामावाच्चे स्पायकमयुक्कम। अ्रत एव च 'तरमार्समरतविषय प्रतिबन्धकारे ससष्सकरयुगे दलिते विदूरम। प्राधाम्यतः स्वविषयं सुविशालरमाप्य सर्वोडप्यछ्षंकृतिगणो रमर्वा घिराय ।' दतयाशीवंद्न सूक्मपि निप्पयोजनम् । नन्वेवं पलकारान्तरववं युक तदेक पव संछृष्टिः संकरो वास्त, कि दाम्यामित्याश शपाइ-[ अलकारान्तरत्वेऽ्ि चेति।] श्रोभोजदेवेन पुनर्भेदस्म सफुटारफुट्वमाशरित्य नाना. उंकारसंकर: सर्वा्टिरिति संकीणमाश्नाभिप्रायेश संसष्यासय एक पवाळकार उक:।
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संसृष्टचलङ्कार: ७२१
अधुना= अव= अवसर आने पर। एपाम्=इनके = पूर्वकथितों के। तन्न - उनमें = दोनों मलंकारों में । तस्यैव=उसके=भेद के। स्फुटत् और अस्फुटत्व स्पष्ट ही हैं। इसीलिए तिलतण्डु- सन्याय और क्षीरनीरन्याय प्रस्तुत किए गए। पपाम्=इत्यादि [सूत्र]। इसी का उपपादन करने का उपक्राम करते हैं-'उक'-इत्यादि द्वारा। इन-दोनों पक्षों में से 'मिन्न अलंकार' का पक्ष ही दृष्टान्त द्वारा सिद्धान्तपक्ष सिद्ध करने हेतु कहते हैं-तप इत्यादि। संघटनाफृतम् संघटना से निष्पन्न-संघटना का अर्थ है दो या दो से अधिक अलंकारों का एक ही त्थान पर विनिवेश। उससे निष्पन्न अर्थोत् उससे उत्यापित। चावर्वान्तर=एक एक अलंकार के निवेश से हेने वाले चारुत्व से मिन्न सातिशय चारख। उपलभ्यते=उपलब्ध होती है = स्वसंविति अपनी स्वरयं की बुद्धि से प्रमाणित वस्तु के रूप में साक्षात्कार का विषय बनती है। तेन=इस कारण=भिन्न चारत् के उपलब्ध होने के कारण। अभिप्राय यह कि यदि विषयभूत सलंकार में सतिशय न हो तो उसकी सपलब्धि में मतिशय नहीं मा सकता। शंका होती है कि-'शब्द और अर्थ के अलंकारों की संघटनामात्र को लेकर मलंकार में भिन्नता कैसे बतलाई गई, क्योंकि इनका ज्ञान भिन्न-भिन्न समय में होता है [ साथ नहीं, परिणामतः] ये एक ज्ञान का विषय नहीं वन पाते, [परिणामदः] इनमें कोई मिन्न चारत्व नहीं रदता। यदि इनमें संघटना मान मी ली जाए तो- 'अलंकार में चारुत्व, संवित्िभूमिका पर उसी प्रकार सर्वा भिन्न सिद्ध होता दे जिस प्रकार इक्ष, दूध, गुड़ आदि में माघुयं।' इस वचन के अनुसार चारुत्ववोध भिन्नतापूर्वक हो होता है, फलतः [मलंकारो में] भिन्नता मानना ही उचित है। इसके अतिरिक इन [अलंकारों] में उक्ष प्रकार संघटनाननित भिन्न चारुत्व भो नहीं मिछता जिस प्रकार लौकिक अलंकारों में मिठता है।[जैसा कि रत्नाकरकारने कहा है-]ऐसा नहीं है कि [सफेद ] मोती, [लाल ] पझमराग और [नीले ] इन्द्रनील मदि [की संघटना] के समान अनुपास [आदि शब्दालंकार तथा] उपमा आदि [अर्थालंकारों] [ की संघटना] में परस्पर में कोई परभाग [गुणोत्क्, भिन्न रंगों के मिक्रण से उत्पन्न विशिष्ट छवि] मासित नहीं होता। यह इसलिए कि शब्द जिस इन्द्रिय से गृहीत होता है अर्थ उस इन्द्रिय से गृद्दीत नहीं होना, फळतः दोनों विजातीय हैं।' [ समाधान] यह [शंका] असत्= ठीक नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार स्थाली [चटलोई], जल, अग्नि, रत (स) तथा चादल आदि जव अलग अलग रहते हैं तब उनमें समत्ववोध नहीं होता क्योंकि उनमें समगसन्निधान [अपेक्षित सभी पदार्थो का जुद जाना] नामक धर्मे का स्वतन्त्र रूप से वोध होता है, किन्तु जन ये एकत्रित हो जाते हैं तब होने लगता है, उसी प्रकार अलंकार भी भले ही मिन्न भिन्न समय मे प्रतीत होते हों, संघटनाशक्ति उनमें विधयमान पूर्वापर भाव [आगे पीछे करके भिन्न भिन्न समय में प्रतीत होने रूपी धर्मों को ] अभिन्न बना देती है। तब वे एक ही ज्ञान के विषय नते हैं। इस प्रकार सनमें परस्पर संबन्ध भासित होता ही है जिसे संसृष्टि और संकर नाम से पुकारा जा सकता है। इसके अतिरिक्त रूप में भेद होने पर भी संबन्ध न टूटने से एकरूपता आा जाती है। जैसे 'चिन्न पन्नक' [ विविध रंगों के बेलषबूटों से सुसज्जित फलक या कालीन] में। जिस पकार चिन्नास्तरण [उपर्युक्त प्रकार के फलक या कालीन या रंगवल्ली जसे मंडन ] आदि में [ बने ] अन्य पदार्थो के आकारों से [उसका ] अपना आकार भिन्न रहता है तयापि भिन्नता का भान नहीं होता, फलतः तदकघट [पूर्णकुम्भ ] आादि से चिननित रूप में हुए [ चित्रास्तरण] का बोध होता है, [अर्थाद] वस्तु का रूप मनेक प्रकार का [चित्ररूप] होते हुए मी एक ही प्रकार का भासित ४६ म० स०
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७२२ लङ्कारसर्वस्वम् होता है, उसी प्रकार भिन्न मिन्न समय में प्रतीत होने वाले भल्कारों में भी संघटितरूप से प्रतील होने पर एकरूपना का बोध होना दै। इस प्रकार उनमें मंसृष्टि आदि को भिन्न अलंकार मानना हीक हा है। जहाँ तक इछ आदि का सवन्ध है उनमें मे प्रत्येक की मिठास अवश्य ही भिन्न रदनी है तथापि सबके मिन्न देने पर पानकरम आदि नामक अन्य हो पदार्थ बन जाते है और आग्वाद भी नवीन ही होना है, उसी प्रकार इन अटकारों में मी। इस प्रकार [रसृषटि सकर को] मिन्न ल्कार मानना उचित ही है। इनमें जो एक अतिशायी सौन्दर्य प्रतीत होता है उसको शपथप्रस्येय अर्थात-'तुम्हें कमम है यदि तुम यह न करो कि मुझे इम वस्तु का नान हो रहा है-'इस प्रकार कमम देकर सिद्ध की वाला वस्तु न माने, क्योंकि जहों कहीं एक, दो या अनेक अलकारों का द्ञान होता है वहाँ सौन्दर्य बढना हुआ अनुमव में आता है, इस प्रकार उनमें दोने वाला सौन्दयोतिमय स्वानुभवसिद्ध है। अल्कारों में जो सचटना प्रतीत होती है वह एक ही वाक्य तक सीमिन रहदो हे कथना किसी भी एक छन्द तक, कुलक [अनेक पघव्यापी एक वाक्य] आदि तक व्यास नहीं, क्योंकि वहाँ प्रथम और अन्तिम ज्ञान में अयन् दूरी हो जाने से वह संघटना जम नहीं पाती। जैसा कि कदा है-'ाक्पार्थ में मेद हो जाने पर मी यदि दमोक एक रहता है तो उसमें एकर अलेकार का अन्य अलकार के साथ सहमाव भासित होता ही है, क्योंकि वे दोनों दूर नहीं पढने, [किन्तु ] इलोक मो यदि विभिन्न हो जाते है तो भिन्न वाश्य में रहने वाले सलकारों का सदमाद नहीं रह पाना क्योंकि वे व्यवहित हो जाते हैं। फलत. वहाँ संसृष्टि नहीं होनी। [इससे निष्कर्प यह निक्ाळा जा सकना है कि] यदि कुलक आदि में भी वाक्य पक ही रहे [ पदले नहीं] और उसके बोष में भखण्डता रहै तो यहाँ मी मसृषटि भदि स्वीकार करने में कोई दोष नहीं। [पुनः] शंका होती है कि [उपर्युक्त] समग्रताशान या चित्रज्वान में बटलोई आदि सभी पदार्थ एक ही इन्दिय के द्वारा गृहीत होने है, अन वे समानजानीय हो जाते है, फलतः वे एक ज्ञान का विषय बन जाते है, और इमकिए उनमें समपता आदि एक भिन्न वस्तु का ज्ञन होना संभव है। [ जहाँ तक भलकारों का सबन्ध है] यहाँ तो सब्द और वर्य भिन्न मिन्न इन्द्रियों से गृदोन होते है अत विजानीय होने है, अन ये एक ज्ञान का विषय नहीं वन पाते, मत एव इनके अलंकारों का भी एक साथ दान होना संभर नहीं होता। इम प्रकार इनमें [संसृषि=] समग आदि एक किसी [भिन्न ] वस्तु का ज्ञान ही कैसे माना जा सकता है जिमे संसृष्ि आदि भिन्न अटकार के नामसे पुकारने योग्य कशा जा सके।' इस (सका]पर[इमारा] एतर यह है-'नहाँ तक केवल शुब्द के अलकारों का सम्बन्ध है उनके आधारभून ममो शब्द पक ही सोत इन्द्रिय से नाने जाते हैं। इस कारण इनके अरंकारों का द्ान मो एक दो इन्द्रिय से हो सकता है फलत इनकी सजावीयना में तो कोई विवाद मतभेद नहीं हो सकना। और इसीलिब कि इन अलकारों का ज्ञान एक्र रूप होता है और इनकी पतीति मक साथ होता है इनमें संसर्ग नामक अतिरिक्त वस्तु का बोध भो माना जा सकता है। इसी प्रकार इन अलकार का 'सचय' परकजानविषयत्व मान लेने पर इनमें सौन्दर्याविशय [एक अतिरिक सौन्द्ये] भी उत्पन्न होता माना जा सकता दे, और इसकिए यहाँ ससृष्टि आादि अलकार माने ना सकते हैं। इमी प्रकार अर्थ का म्ान भी शब्द के द्वारा दोता है अन दमके बलकार भो सजानीय ोकर ससूष्ट रूप से प्रवीत होने हैं फचन उनमें भी सवदि आदि अरकार माने जा मकते हैं। जहाँ तक शब्द और अर्थ इन दोनों के सदनोध का सम्बन्ध है इनमें से प्रत्येक का ज्ञान यद्यपि भिन्न भिन्न सपायों [ श्रोत्ेन्द्रिय तथा मन ] से होता है [ अतः ये अवश्य दो विज्ञानीय हैं। सथापि उनके मलंकारों का ज्ञान ठीक ससी प्रकार एक साथ होना समव है जिस प्रकार सुगन्धी बन्घुरू पुष्प के जान में [सगन्ध का ज्ञान मागेन्द्रिय से
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संसृष््यलङ्कारः ७२३
तथा पुष्प का प्ञान चक्षुरिन्द्रिय से दोने पर मी क्योंकि इन्द्रियाँ मन से नविष्ठित छोकर विषय का शान करती है अतः ] जो मानस ज्ञान होता है उसमें मन का विषय दोनों दो समान रूप से बनाते हैं फलतः दोनों पदार्थों का बोध एक साथ हो नाता है। इस प्रक्ार शब्द और अर्थ दोनों के अलंकारों के संसर्गे में लीकिक अलंकारों के ही समान विशेषता का लाम ोता ही है मतः उनमें एक भिन चारुत्व का बोध भी होता ही है, और इसीसिए बनका संसूष्टि आदि नामक अलंकारत्व भी युत्तियुक्त हे और[ रत्नाकरकार आादि अन्य आचार्यो ने शब्द और अर्थ को विजातीय वतलाते हुर यह हेतु दिया था कि दोनों का ज्ान मिन गिन्न इन्द्रियों से होता है वद सी उपेक्षणीय मे, कयोंकि काव्य का शरीर शब्द और नर्थ के युग्म से जो बना हुआ माना जाता है। उसमें सर्थ शब्द से प्रतिपादित दोकर दी अद्ग बनता है। इसलिए अर्थ के उस रूप का काव्य में कोई उपयोग नहीं रहता जो वाह [अर्थात अौद्ध ] और [इसीलिए] क्षुरिन्द्रियमाल रोवा है। [रसनाकरकार ने जो यह कहा है कि] यदि ऐसा है[ अर्थात उपर्युक्क क्रम से संसृषटि औौर संकर को मिन्न सकंकार मान लिया नाता है] तो पूर्वलक्षिन अनुप्रास और उपमा आदि का अमाव हो जाएगा, क्योंकि ऐसा एक भी अलंकार न होगा जो असकीरण हो, फळतः सर्वन्र संसूष्टि और संकर हो अलंकार मान लिए जाएँगे और उन [अनुपास उपमा आदि] का कोई स्थान हो न रहेगा- यह ठीफ नहीं, क्योंकि असंकीर्ण अलंकारों के सरस्रो उदाहरण देखे जाते हैं और दिए ना चुके हैं]। उदाहरणार्थ- 'उस [ललितादित्य] की सेना यशोधर्मा को लाँधकर पूर्वसागर में वैसे ही सुखपूर्वक जा धंसी जिस प्रकार हिमाचल को लधकर गंगा 1 राज० ४।१ ४६ ॥। उत्तर कुछ जनपद के निवासी उसके मय से जन्म [जन्तु] पादपो [जन्तुपादप= केवड़ों में] उसी प्रकार जा सुमे जिस प्रकार गरुड के त्रास से बड़े बड़े सप बिल में॥। ४1१७५ ॥ इसके पश्चाव जय से धन अर्जित कर चुका वह अपने राज्य में पहुँचा, जसे विदारित गजो के मौकिकों से भरे हुए पंजे वाला सिंह प्वत में पहुँचता है॥ ४।१७६॥ तत्पश्चात कुवेरतुव्य उस राजा ने कहीं चाँदी और कहों सोने की देवपतिमाएँ मुख्य देव प्रतिमाओों के पाशवे भागों में स्थापित कराई ॥४।२०१॥ तुःसार देश के निवासी चहुण ने, जिसने अपने नाम से अंकित [चक्कणनाम का ] विहार बनवाया था, राजा [ललितादित्य] के चित्त जैसे [सविशाल ] स्तूप औौर वैसी हो सुवर्ण की जिन-प्रतिमाऐ बनवाई ॥ ४२११॥ उस [लठितादित्य] की पटरानी ईशान देवी ने सुधारस के समान स्वच्छ तथा रोगियों को आरोग्य प्रदान करने वाला खाताम्तु [खोदे हुए तालाब यादि के जल] को व्यवस्था की ॥ ४२१॥ उसने उन उन देशों से उनकी मीतरी विशेषता नानने वाले व्यत्तियों का संगह किया जैसे वृक्षों से खिले मुष्पपुज का संग्रह वायु करता है।। ४२४५॥ [ हे शय्ुमन्त्रिन् निर्ज मरुपय में प्रवेश कराकर इमें सेनासहित नष्ट करने का] तुम्हारा यह इस प्रकार का [स्वरयं के नाक कान कटवाकर मेरे प्रिय बनने और अपने राना के लिए मुझको ही मरुपथ में भटकाने का धोखे का] प्रयास भी मुझ अमेधसार पर उसी प्रकार कुण्ठित हो गया है जिस प्रकार वज्रमणि [होरे] पर लौइ ॥४२९८॥
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देख, केवछ भाशामात्र से [यही] पृथ्दी वैसे ही पानी पैदा कर देगी जैसे मेघगर्जन से बैदूर्य भूमि रत्न देदा कर देती है॥ ४३००॥ [ दुमनीय-'विदूरभूमिनेवमैधरम्दादुद्विजया रटनशुलाकयेव' कुमारसंभव -* ]।। पेसा कइकर पानी निकाशने के किए माले से उसने पृथ्वी को उसी प्रकार विदारित किया जिस प्रकार जळट निकालने के लिए शिवजो ने विनस्ता की सूल से विदारित किया था ॥४३०१॥ [मदिरामद में लठिताद्ाय ने पवरपुर की सुन्दरता पर ईष्यो कर ऐसे जला डाठने की आज्ञा मन्त्रियों को दी मन्न्रियों ने 8स नगर के पास फूम में आग कगाकर प्रासाद के छपर पैठकर देख रहे लहिवादित्य को झूठा नगरदाह दिखला दिया। नश्चा उतरने पर दुखोहो रहे उससे मन्त्रियों ने परवरपुर के सुरक्षित रहने को बान कही तो-] उस नगर को रक्षित मुनकर राजा का शोक हट गया, जैसे र्प्न में पुत्र के मदहरण का शोक जागने पर उसे सामने खढ़ा देख हट जाता है॥ ४।३१९॥ [वत्तरापय के विजय के लिए बदुत दिनों से निकले राजा लवितादित्य का उसके पास भेजे दूस के द्वारा मन्त्रियों को उसकी अनुपस्थिति में राष्ट्रक्षा के दिए सुझाया गया मन्त्र-] आप लोग यहाँ के राजाओं से अपना मेर रक्षित रखें। चावोंकों के समान इन्दें परकोक [वशुपक्ष में पर मशघ, छोक - लोग] से मय नहीं है॥ ४३४५! इत्यादि राजतरमिणों में लितादिश्य के वर्गन में उपमा के शुद्ध [अल्कारान्वर से अर्सकीगें] उदाहरण है [सन्तिम पघ में परछोकपद रिष्ष है सथाषि वह उपमा का अग है,y स्वयं अलंकार नहीं]। इसी प्रकार इसी [राजतरक्िणी] में अन्य राजाओं के वणेन के म्रसंग में भपदा अन्य मन्यों में शुद्ध उपमा का क्षेत्र किवना व्यापक है इमे कौन दिखला सकता है। उपमा हो अन्य अलंकारों का बीम हे इसलिए उसीके उदाहरण दिखलाए। इसी मकार अन्य अलैकारों के मी सइसों बदाहरण यहाँ बतलाए जा सकते हैं तथापि ग्रन्थगौरव के भय से उन्हें नहीं दिखलाया गया। इसलिए [अटकारर तनाकरकार आदि को ] इन सलकारों का अभाव या इनकी कमी की बात नहों उठानी चाहिए। इसी प्रकार यदि उपमा मादि के स्पछ बदुत कम मी हो दब मी केवल रुसृसि और संकर के ही रक्षग करने की आपा्ि नहीं उदती, क्योंकि यदि इन [उपमा आादि] का क्षेत्र उतना कम मो मान लिया जाय तब इनका पृथक लक्षण तो बनाना हो होगा। इस प्रकार [अ० रत्नाकरकार ने ]-'समूष्टि नहीं मानी जा सकती, क्योंकि उमे मानने पर पुर्वप्रतिपादित अलंकारों का अमाव मानना होगा और उसमें कोई पुथक सौन्दयें का भी अनुमव नहों होता-' [सूत्र= १११] इत्यादि जो दुछ कहा था यह युक्तिहीन और अमान्य है। और इसीलिए [न० रस्नाकरकार का संसूषटि और सकर का खण्डन करने के पशचाद बनाया गया जो]- -"इस कारण सभी अलकारों का अमाव कर देने वाले 'संसकि और संकर'-इन दोनों का जम मफीमाति निराकरण कर दिया गया तब नय अपना-अपना विशवाल क्षेत्र प्राप्त कर औोर उसमें प्रधानरूप से विद्यमान रहकर सभी सलंकार सदा के लिए मानन्द करें।- यह आशीर्वादात्मक पद्य है यह मी निप्प्रयोजन सिद्ध होता है। प्रश्न छठाया वा सकता है कि यदि उपयुक क्रम से [अलंकारों के योग में] मिन्न को अनंकार मानना है तो 'संसषटि या संकर'-इन दोनों में से कोई एक ही अलकार मान दिया बाय, दोनों कर्यों माने नाते हैं। इस पर उघर देवे पम कहते हैं-अछंकारान्तररवेपि '। यद्यपि महारान भोज ने [सरस्वतीकण्ठामरण ४।८८-९० में ] नाना सलकारों का स्फुटल मर
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संसृष्टघलङ्कारः ७२५
मस्फुटत् इस प्रकार दो भेदों से युक्त संकर हो संसृहि है'- [संसृषटिरिति विज्ेया नानालंकारसंकर: । सा तु व्यक्ता तयाडन्यका व्यकान्यक्ेति च मिषा॥ सिळतण्डलबद् व्यक्ता छायादर्शनदेव। अव्यक्ता क्षीरजलबद पांसुपानीयवच्च सा।। व्यकाव्यका चिन्नवर्णवदन्यस्मिन् नानालंकारसंकरे॥ स० क० ४८८-९०॥ अर्थोव-'नाना अलंकारों का संकर संसृष्टि नामक अलंकार जानना चाहिए। यह संसृष्टि न्यक्त अव्यक और व्यकान्यक इस प्रकार से तीन प्रकार की होती है। इनमें तिलतण्डुळ सा संकर व्यक्त संसृष्टि कहलाता है अथवा दर्पण और प्रतिबिम्व का। नीरक्षीर और मिट्टी पानी का सा संकर अव्यकत संसृषटि कदलाता है तया नरसिंद या चित्रवर्ण के समान संकर व्यक्ताव्यक- इस प्रकार संकीणंतामात्र को लेकर संरूष्टि नामक केवल एक ही अलंकार बतलाया है। [सर्वस्व ] तन्न तिलतण्डुलन्यायेन भवन्ती संसृषटित्तिया। शन्दालंकारगतत्वेन, अर्थालंकारणतत्वेन, उभयालंकारगतत्वेन च। तत्र शब्दालंकारसंस्प्टिर्यथा-
चलितया विदधे कलमेपलाकलकलोSलकलोलदशान्यया। अन्नातुप्रालयमक्योर्चिजातीययो: संसृष्टिः। अव्रैध 'अलकलोलकलोल' इति, तथा 'कलोलकलोल' इति सज्ञातीययोर्यमकयोः संसृष्िः। अर्थालंकार- संसृष्टियथा- 'देवि क्षपा गलति चक्षुरमन्दतार- सुन्मीलयाशु नलिनीव सभृद्गमव्जम्। एप त्वदाननरचेव विलृण्ठ्यमान: पशयाम्बरं त्यजति निष्पतिभा शशाङ्ः।।' अत्र विजातीय योरपमोत्मेक्षयो: संसृष्ठि:। 'लिम्पतीव तमोडङ्गानि वर्षतीवाखनं नभः। असत्पुरुपसेवेव दप्टिर्निष्फलतां गता।।' संसृष्टिः। उभयसंसृष्टियथा-
मौलो दठेन निहितं महिषासुरस्य। पादाम्तुजं भवतु मे विजयाथ मक्ु-
अघोपमानुम्रासयो: संखृष्टिः। पादाम्वुजमित्यन्न हपमाया मज्जी
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७२६ अलङ्गारसवंस्वम् शिस्षितयोगो व्यवस्थापकं अ्रमाणम्। स द्वि रूपके मतिकूल: पारिशे- प्यादुपमां प्रसाधयति। तदेवं संसपटिस्त्रिया निर्णीता। दोनों में तिल्तण्डुल के मिश्रण के समान होने वाली ससूष्टि तीन प्रकार की दोती है- शब्दावकारगत, अर्था कारगत तथा उमयालकरगन। इनमें शस्दाटकारगत संसृषटि यथा वदन- सौरमटोम इत्यादि पघ [ इसका अर्थ है] -'मुख को सुगन्धि के लोम से घूमते भ्रमर के मय से अधिक सशोमिन हो रही अलकों के साथ चचल चितवन वाली अन्य किसी चचल सुन्दरी ने सुन्दर मेखला का कलकल रव किया।' इस पघ् में [ वदनसौरभलोम आदि पूर्वार्ध में ] अनुप्रास और [ 'लकथ्ेऽडकल्ो'-में उत्तरार्धगत ] यमक की समृषि है जो दोनों मिन्न दो अलकार है। इसो पद्य में 'अनसटोलकलोल' में ['सरणो सकको'-यह] तथा 'कलोखकलोल' में दो यमको की ससषि है जो दोनों सजातीय हैं [ अर्भातू दोनों के लक्षण एक हैं।। अर्थालकारससूषटि जैसे- 'देवि ! रात ढल रहो है, चचल तारा बाली माँख खोलो जैसे नटिनी मौरे वाला कमल सोल रहो है। देसो यह शराङ् मानो तुम्हारे मुख की क्रान्ति से लुट कर निष्प्रम होकर आकाश छोड रडा है।' -- पहाँ उपमा और उत्मेक्षा की संसषटि है जो दोनों मिन मिन्न अलंकार है। 'अन्धकार भगों को फीम सा रहा है, आकाश कालछ बरसा सा रहा है। इृष्टि मसरुरष को सेवा को आाँति विफल हो गई है।'- [पूर्वार्ष में 'लिम्पतीव' तथा 'बर्षतीव' इन] दो उत्पेक्षाभं की रसषि है जो दोनों सजातीय हैं [अर्थाव जिनके लक्षण अभिन्न हैं] साथ ही उपमा और चरमेक्षा की भी ससृषि है जो दोनों विज्ातीय [परस्पर में ] मिन्न अलंकार है दोनों [शुष्दालकार तथा अर्थालंकार] की संसृष्टि, यपा- 'अम्बिका का, आनन्द से मन्यर पुरन्दर द्वारा पुष्पों से पूनित, मदिपासुर के सिर पर बलात निहित तथा मजज मनीर के शिमित से मनोहर पादाग्युज दमारे लिए विजयप्रद हो।' यहाँ उमा और अनुपास की रसूषि है। पादाम्वुज में [उपमितसमास के द्वारा 'वाद सम्बुज के तुल्य' इस प्रकार] उपमा है, इसका निर्णायक प्रमाण है मनजीरशिक्चित का संदन्ध [जो पाद में हो सम्मव है चम्युन में नहीं, और पाद उपमिव्वसमास में दो प्रधान दो सकता है, विशेषणसमास मानकर रूपक मानने पर प्रधान होगा अम्युजपदार्य जिसमें मधीररव संमव नहीं होगा। इस प्रकार ] वह रूपक के प्रतिकूल है फलत. शेष बची उपमा की सिद्धि कराता है। इस प्रकार ससूष्टि तीन प्रकार की होती है यह निध्ित रहा। चिमशिनी विब्यातीययोरिति। यमकानु प्रासयोमिंघलद्तणरवाद। सम्र व प्रधानस्यानुमासस्य परि पोपकरवेनाङ यमकमिति संकरोदाहरणं न वाच्यम्। मघ हि यमकसगरयोपक्रान्तस्वायू सग्रेव कवितु. संरम्भाविदायाध्यमकश्य प्राधान्यमित्यनुप्रासस्य यमक प्रति परमद्वत्व युछ, न पुनर्विपर्ययः। सकळवाक्य ्यापिनोऽप्यनुमासस्य प्राधान्येनाविषसणाव्। नाप्यभ्र पर
रिघाज्ञाहिमाव:। तताद्यो दविया। सार्वत्िका, परदेशिकक्षेति। तत्र सार्व्रिक़ो यथा विभावनाविघयोपतयोः। 'आश्टिष्टातिनर्यो(कसतु सर्वत्रैध विभावना' इति रक्वाविभ।
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संसृष्टयलह्गार: ७२७
बनाया सर्वन्नवातिशयोकव्यपेक्षरवाय। आ्रादेशिको थथा, श्लेपातिशयोकयो: । 'रजनीमु खम्' इश्यादी कव चिदेव एलेपवरेनातिशयोफेरस्यानाव, 'कमलमनम्ससि' हरयादी र्लेप मन्तरेणापि नम्या संभवात्। एतद्भेदह्दयं व न संकरस्य विपया। तस्य रवहेतुवलालन्ध सचाकानासलंकाराण संसर्गे वययमाणबाव। द्वितीयो पथा-'मङुलीमिरिय' इत्यादौ। लब्न दि स्वस्त्रहेतुयलेन उव्घसत्ताकानासुपसादीनां परस्परसुप कार्योपकार कर्वमानरं सेनाइ्गा झिमाक:1 न हातोपमयो: परम्पर सवरूपनित्पतताद पेव्षा काचिय। एकतराभावेप्येकस्या स्वरूपोर्यानात्। एवमुपमाहवयपरिह्वारेण केवलाप्युखपेना स्यान्। स्यितानां पुनरेषामियं चिन्ता यचरयने केश प्रदणादेरूचितत वादुपमाधुपकार कसुरप्रेक्षा चोपछार्या बेनाइगाद्विभावः। एवं घ-'तेन प्रधानतायासुपमादीनां निर्जनिजं नाम। अङ्गरवे पुनरेपां संकरधीनाह्वि मावेऽपी'-व्यादयन्यैरयुक्तमेवोक्तम्। इह पुनर्यमकातुप्रासयोनं निर्मित्तनिमित्तिमावः। सर्वंतेवानयो सवरूपनिष्पतावन्यो न्यानपेघरवाव। तर्वेऽपि समनन्तरोकतयुवत्या संकरायोगात्। न च सवहेतुम्यो लव्घसत्ता- कदोर्यनयो: परस्परमङ्गाद्विमाच रबडालंकारयो शब्दवदुपकारकरवाभावाष्। अय वर्णसावर्ण्यन वैचित्र्यातिशयाघायकर्वेनानयोरुपकार्योपकारकभाव इति चेव, न । इयमेव हि संसृष्टियद् हयोवहना वालकाराणां परस्परनिरपेक्षाणमपि संसर्गे सति पवारु सातिशयप्रतिपाि: । एव मर्यालंकार संसृष्टावपि संकरोदाहूरणतवं न वाच्यम्। न द्वि तम्रोपमोळेक्योः पर-
एवं स्यादिति वेतु, न। चनुरु्मीलनात्मके एरुस्मिन्नेव प्रधानेर्थे हयोरपि संबदरवाद। न च पाकलक्षणमेकमेवार्थमुररीकृम्य व्यवस्थिवानां स्था्यादीनामप्यन्यः कश्ितसंबन्धः। सथोपमालिद्वितम्य पतुरुम्मीउनस्पोतप्रेस्षारिि्: पशाल्व्या: पारम्पर्येण हेतुेनो पमिवन इति स्वाश्रयभूतार्थचदनयोरव्यड्वाद्विभादोडस्तीति चेव, नैततू, उपमाधाछि इननाभावेऽपि चहतममीलनादेर्हे सुहेतुमन्नावानतिपाताव सवस्थितावे वा तचोरुक्तुक्या परसपर सन्बन्दामावात्। नाप्यत्रोपमाया वाक्यायवम्। सस्या अप्युोक्षादिवचसुरु- न्मीलनाद्खवेनावस्थानाव। अब हिसनुन्मीलनस्यैव वाक्यारथस्। शज्ाग्कम्बरत्यागोप- पादितस्व सपागळनत्य ते प्रायेव हेतुख्वेनोपनिबन्धात्। एवं परं प्रत्युपपर्जनीभूतयोरचा- =तरसंबन्धाभावेऽप्युपमोखपेकयो संसर्गे सति चारतवातिशय इति ययोक्मेव संसृध्धय- दाहरणतवं युकन्। एवम्- 'अन्योभ्यसंबन्धचिवर्जितानामलंकृतीनां विनिवेशनं चेव्। अनन्वितरवाछशदाषिमादिवाकयादिवद् दूषगमेव तर्हि॥ अयान्वचोऽसवेव परस्परं तद्सुणप्धानत्वमवश्यसे्यम्। तदा न संसष्टिकया गुणस्य पराङतायां खुल संकरः स्यान्॥। एकत वेदुद्विनि संगतं स्याद दयं तदन्योन्यसमीलनेन। न संकरोऽन्यापि नवा गुणत्वे कार्याम्तरोतपादनशकिभिक्काू।
चाच्मसू, 'धर्मयोगपद्यमन्यत्यावि तत्करतवं न समुच्चय' इत्युपत्या भवन्मतेs प्यलंकारयोगपद्यम्य तलनणरवाभावाय् 1. सथात्वाम्युपगमे चार्य नाम्नि विवाद:। एवं दि संसृध्या किमपराद्म। अत्र 'घोछ करिष्यामि' हत्याशयेन 'सीय चोरुपमयो: संसृष्टिरित्यशुद्धं पठित्वा सद्न्यंसुवतं तदुपेच्यमेव। भत्र हि
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विजातीयपोरुपमोश्येछपोः सदृष्टिरिति सर्वत्रैव सुस्पष्ट पाठा। उत्प्रेक्षयोरिति। प्रयमाघंगतयोः । यद्यपि धानयोदितीयारधगतयाध्युपमया संसर्गे संघष्टिरेव, तयापि विज्ञातीय योहपमो मेप्षयोसदाइतरवाव सव्ातीयामिप्रायेणैवमुकम्। नाप्य त्रोमेशाठय सुपमाहेतुभूतमिति वाध्यम्, त्रयाणामप्यलंकाराण वाक्यार्थीभूतं तमोचाहूष्यं प्ररयङ्गसवाद्। उमपससष्टिरिति। अनुपासोपमयोः शब्दार्थालकारत्वात्। व्यवस्यापकमिति। मऔीरशजितयोगस्य पादगतव्वेनीचिश्याद्। प्रतिकूम हवि। अम्बुनस्य मक्षीरशिज्जिता
मित्यादि। व्विधेति। यदपि सजातीय विजञासीयखवेनान्यदप्यर्या: संभवति भेवटूयम्, तया पि सदुदिद एस्यंचान्तर्भवतीति यथोक एवायमुपमद्ार:।। विजातीय=कयोंकि यमक और अनुपाप्त के लकषग भिन्न मिन्न हैं। [रत्नाकरकार ने इस 'वदनसौरम' पद में संकरालकार मानवे दुए कहा है कि] 'यहाँ अनुप्रास्त प्रधान है और यमक उमका परिपोषक है अत. उसका अग है अव. यहाँ सकर है' -- ऐसा [उन्हें ] नहीं कहना चाहिए। यहाँ तो यमक हो का उपकम है, क्यांकि कवि का अतिरय सरम्म उसी पर है। अत यमक दो प्रधान हे। इस कारण [अंगाह्विमाव ही बतलाना है सो] अनुप्रास को दो यमक का अग वतलाना उचित होता, रदिपरीत [यमक को अनुभाप का अंग बनछाना ] नहीं। क्योंकि अनुप्रास यदषि पूरे वाक्य में व्याप्त हे तथापि उसमें प्रधानता की विवक्वा नहीं है। यहाँ परस्पर में मी अगाद्िभाव मानना ठीक नहों होगा। क्योंकि यहाँ अगादिमाव दो प्रकार का होता है एक तो निमित्ननिमित्तिभावजनित और दूसरा उपकारयोंपकारकमावजनित। दोनों में प्रथम दो प्रकार का होता है सावंत्रिक तथा प्रादेशिक। उनमें सावंत्रिक जैसे विभावना और अविशयोकि में। क्योंकि 'विभावना सदा की अतिशयोकि से मश्लिष रहनी है'-इस उकति के अनुमार विभावना सदा हो अतिशयोकि की अपेक्षा रखती है। प्रादेशिक, जैसे इ्लेष और अविशयोकि का। क्योंकि रजनीमुख [रअनीरूपी नायिका का मुख और रात्रि का आरम्म ] इस्यादि स्थलों में कहों कहीं ही अतिशयोकि स्लेष के बल पर खढी होती है, क्योंकि 'कमलम- नम्मसि'-हरयादि स्वलों में वह श्लेपनिरपेक्ष होकर मी निम्पन्न होती दिखाई देती है। ये दोनों ही भेद संका के विषय नहीं हैं। क्योंकि वह, जैसा कि आागे कहा जाने वाला है, अपने अपने कारणों से निष्पन्न हो चुके अलकारों के हो संसर्गे में माना जाता है। दूसरा [उपकार्योपकार- कमावजनित अंगादिमाव का उदाहरण है-'अगुलीमिरिव० इत्यादि [आगे आरहा पघ]। इममें टपमा आदि सलंकार अपने अपने हेतुओं के आबार पर निष्पन हो जाने हैं। तदनन्वर उनमें केवल उपकार्योपकारकमावमात आता है जिससे उनमें अंगातिमाव बनता है। यहाँ जो उपमा है वे अपने स्वरूप की निष्पति के किए एक दूसरे की कोई अपेक्षा नहीं रखनीं। क्योंकि उनमें से किसी भी एक के बिना किसी भी अन्य उपमा की निष्पत्ति समय है। इसी प्रकार यह। दोनों उपमाओं के बिना केवल उत्पेक्षा मी निष्पन्न हो सकती है। एक साथ आ जाने पर इनके विषय में यह विमर्स होता है कि चुम्बन में केश प्रहण आदि [अपेक्षित ] होते ही है, अतः यद यहाँ उपमा आदि उपकारक है और उत्मेक्षा उपकार्य है और इससे इनमें अगादिमान चडा आता है। और इस प्रकार अन्य आचार्यें [ रत्नाकरकार ] ने- "इम कारण उपमा आदि की प्रभानता रहने पर उन्हें अपने अपने नामों से पुकारा नाता है। इनमें सकर तब माना खाता है बब [ अप्रधानता या] अगना रहती है, ऐसा नहीं कि अंगी [प्रवान] होने पर भी वह [ संकर] माना जाय।' [ ररनाकर-११२ सू० यृ० पकि ८] इस्यादि गवत दी कहा था।
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संसषधलक्कार ७१९
इस [वदनसीरमण पद्य] में यमका और अनुप्रास में निमित्तनिमिचिभाव संबन्ध नहीं है क्योंकि अपने स्वरूप की निष्पत्ति में ये एक दूसरे की अपेक्षा सर्वत्र ही नहीं रखते। रक्खें भी तो अभी- अभी बतलाई [पुर्वसिद्धि के योग में संकर होने की ] युक्ति से उनमें संकर मानना संभव न होगा। न तो अपने-अपने हेतुओं से निष्पप्न हो चुके इन अलंकारों में अह्ादिमाव दो संभव है क्योंकि शब्दगत अलंकारों में शब्द के साथ जैसे उपकार्योपकारकमान रहता है वैसे आपस में नहीं रहता। यदि कहें कि वर्णों में साम्य निष्पन्न करने और चमत्कार में अधिकता लाने से इनमें उपकार्योपकारक भाव माना जा सकता है, तो वह मी अमान्य है [ क्योंकि इस हेतु से तो यद संकर संसूष्टि ही सिद्ध होता है] क्योंकि इसी का नाम न संसृष्टि है कि दो या दो से अधिक अटंकारों का परस्पर निरपेक्ष रहते हुए भी संबन्ध हो जाने पर व्तिशयित चमत्कार का निष्पुन्न होना। [ रतनाकरकार को ]इसी प्रकार सर्थारलंकार संसृष्टि के वदाहरणों को भी संकर के सदाहरण नहीं कहना चाहिये [ रत्ना० पृ० १९७ ] क्योंकि उन उदाहरणों में जो उपमा मौर उत्प्रेक्षा है उनमें मापस में उपकार्योपकारकमाचात्मक अंगादिमाव नहों है। [ शंका, रत्ना. पृ० १९७] यदि ऐसा ऐे तो ये दोनों [अलंकार ] 'दशदाडिम' मादि वाक्य के समान असंवद्ध हो जाएँगे। [वर ] नहीं। क्योंकि ['देवि क्षपा' इस्यादि पथमें ] एक जो चक्षुरुन्मीलन रूप प्रधान सर्थ है उसमें [उपमा तथा उत्प्रेक्षा ] दोनों ही संबद्ध है। पाक रूपी एक ही अर्थ के किए एकत्रित बटलोईं आदि का मो कोई अन्य संवन्ध नहीं होता। यदि कहें कि चन्द्रकृत उत्प्रेक्षायुक्त माकाशत्याग- रूपी अर्थ उपमायुक्त चक्षरुम्मीछन रूपी अर्थ के प्रतति परम्परया हेतु है, [इस प्रकार इन दोनों भर्थों में परस्पर में अंगादि भाव है] फउतः मपने आधयभृत अर्थो के समान ही इन [ सलंकारों] में भी [हेतुहेतुमद्माव रूपी संबन्ध अर्थाद ] अंगासिमाव माना जा सकता है, तो यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि चक्षुन्मीछन आदि [ उपर्युक्क अर्थों] में जो हेतु- हेतुमद्भाम दे वह उपमा आदि के न रहने पर भी विगढ़ता नहीं है, रहने पर भी उनमें उक्त युकि [दो अप्रधानों का संबन्ध संभव न होने] से संवन्ध नहीं बन पाता। न तो यहां उपमा में वाक्यार्थता [परधानता ] हो है। क्योंकि वह मी उसी प्रफार चक्षुरूम्मीलन आदि के प्रति अंग बनकर उपस्थित है जिस प्रकार उत्प्रेक्षा आदि। यहाँ जो है सो चक्षुरुन्मीलन में ही वाक्यथता [प्रधानता] है, क्योंकि चन्द्रमा द्वारा आकाश के त्याग के द्वारा संपन्न निव्वावसान उसी [ चक्षरुन्मीलन ] के प्रति हेतुरूप से उपस्थापित है। इस प्रकार माना कि अप्रधानों का परस्पर में संवन्ध नहीं होता तथापि उपमा और उत्प्रेक्षा के बीच, उनके अन्य के प्रति अंग और अप्रधान होने पर भी संवन्ध है, और उसके कारण [वाक्यार्थ में] अतिशय चारुत्व मी चला आता है, फलतः [सवस्वकार ने] जो [ उपर्युक्त देवि क्षपाव आदि पर्द्योको ] संसृष्टि का उदाहरण बतळाया वे उसी के रदाहरण के रूप में मान्य हैं। इस प्रकार- [अलंकाररत्नाकरकार द्वारा संसप्टिविवेचन का उपसंदार करते हुए] यदि अलंकारों का निवेश परस्पर में असम्बद्ध रूप से माना जाय तो यह संवन्धामाव के कारण [अरंकार न दोकर] 'दशदाढिम' आदि वाक्यों के समान दोष दी होगा। औौर यदि परस्पर में [अन्वय ] संबन्ध हो हो तो बनमें प्रधानता अप्धानता भी सवश्य ही माननी दोगी। और तब संसृषि की बात समाप हो जाएगी क्योंकि जो अप्रधान होगा वह दूसरे [प्रधान] के प्रति अंग होगा, अतः वहाँ [अंगाद्िमान मूलक ] संकर माना जारगा। यदि दोनों [ अलंकारों] को किसी एक अंगी में अन्वित माना जाए तो वहा दोनों का [अंगी में ] समीलन [ एक साथ तिरोभाव] हो जाने से न तो संकर होगा, न अन्य
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मलक्ूारसवस्यम्
[समटि] दो, कयोंकि अमधानता था जाने पर अन्य किसी कार्य को क्षमता नष हो बातो है।'- इत्यादि जो कहा गया है वह उपेक्ष्य ही है। [अलकाररत्नाकरकार ने समृष्टिविवेचन के अत में जो यह कहा है कि]'ऐमे स्थलों में दोनों हो [या समी]अलकार [अलकार होते] है अन यर्हा आ्य समुच्चयालकार मान लिया जाय यह मी नहीं कदा जा सकता, क्योंकि [रत्नाकरकार ने हो ]-धर्म का योगपुत् [एकशरीकरण ] तथा अन्य किसी में भी किसी कार्य की क्षमना समुच्चय [सू० ८९]इस प्रकार समुच्चय वा लक्षम माना है। इसके अनुमार आाप [रत्नाकरकार] के मत में अलकारों में योगपद उस [समुच्चय] का लक्षण नहीं माना जाना। और यदि वैसा भी मान लेते हैं सो फिर विवाद केवल 'नाम [करण ]' तक सीमित रहता है और त ससूषटि बण्द ने दौ आप का क्या बिगाडा है। इसी प्रकार अन्य किहीं सज्जनों ने केवळ इस माशय से कि मैं आपत्ति निकानॅदो सजातीय उपमाओं की ससूटि' ऐसा अनुद्ध पाठ अपनाकर यहाँ जो कुछ कहा है वह सवमा उपेक्षशीय है क्योंकि इस स्थल के भूल में सभी प्रतियों में 'विजञातीय उपमा और उत्पेक्ष की सँसुष्टि'-यही पाठ स्पष्रूप स मिछता हे। [संजीविनीकार ने 'सजातीययारपमयो.' पाठ ही माना है ]। नत्मेपयो := दो उतप्रेक्षाओं की = अर्थात पूर्वाप [के लिम्पतीव वर्षतीव' पदों] में। यद्पि इद दोनों का उत्तरार्ध की उपमा से ससगें होने पर भी यडा समृष्टि दी दोगी तथापि यह उदाहरण सजातोय अल्वारों की ससूि बतलाने के लिए दिया गया आनना चाहिए, क्योंकि विजातीय अरकारों की ससूष्टि का उदाहरण [देवि क्षपा०] दिया ज चुक है [यर्थाप संजीविनीकार ने वहां भो 'रुचेव' में उत्प्रेक्षा न मानकर उपमा हो मानी है और दो सजानीय उपमाओं की ससष्टि वनलाई है, जो 'अमान्य है' ]। यहां यह नहीं कहा जा सकता कि [पूर्वोधगन] उत्पेक्षाएँ [चचरारघेगन] उपमा के पति हेतु मै [जैसा कि रत्नाकरकार ने कदा है = आगे उद्धून रत्नाकर पृ० १९७ पं० नीचे मे-५] क्योंकि तोनों दी भरंकार प्रधानभूत तमोबाहुत्य के प्रति अंग हैं [ इस अश के पाठान्वर पर आगे य रहा इमारा दिभशे देस लेना आवश्यक है] उभयसंसृष्टि = उमयस्मृष्टि=क्योंकि अनुपास और वपमा कमक शम्द तथा अर्थ के अटकार है। वयउस्थापक=निर्णायक=क्योंकि 'मजीरविजञिन' म तुपूरर का पेर में ी ोनासम है। प्रतिकूल= द्दोंकि कमल में मऔजीरशिक्चित का सम्बन्ध संमत्न नहीं। पारिशे्याव= अवशिष्ट होने से = अर्थात यहाँ 'उपमा' और 'रूपक' इन दो से अतिरिक किसी अन्य भलकार का होना ममव नहीं है। 'इसी का उपसदार करते हुए कहते हैं-'मदेवम्'-इत्यादि। त्रिघा= तीन प्रकार को, यदयपि इसके दो अन्य भेद मी हो सकते हैं, एक सजातीय और दूसरा दिजातीय, तथाषि वे पूर्वोंक्त भेदों में हो सन्तर्भूंत हो जाते है अत, [सवस्वकार द्वारा किया गया] यही चपसव्ार ठीक है। चिमर्श-अलकारररनाकरकार ने समृष्टि को अलंकार न मानना उचित बतळाया दै और सवेरवकार के संसटसूत्र को उद्धृत कर टनके मत के निराकरण में निम्नविखित सर्क दिय ह- [स्.] न समृत्टि, पूर्वहानात चारुत्वामावाच्च। १११ स.।। सर्वे पामल का राणामन्योन्योपसर्जनवामपास्तानामेव ससर्गे- ससटि, यदुकम्-'एर्वा तिश्तण्ड् दन्यायेन मिथसवं ससि -- धत। सा संसूषटिनाएकारान्तरम्, पूर्वेषा सर्वेषामलकाराणामभाव-
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प्रसंगाव। शब्दरार्थोलंकाराणा दि परायशी व्यस्तसमस्तत्वेन स्यितति:, तम संसष्टेर लंकार त्ान्युपगमे नुभासोपमादीना विषयापहारो मचेत् । 0०000 अलंकार चून्यताया असंकोर्णलकारत्वस्य चासमवाव संसृष्टिसंकरावेव हावलंकारी लक्षणीयतया प्राप्ती। यदि व कथनित अलंकारान्तर विविकमुदाएरणं कियते प्रदद्यते वा तमापि ००००० प्रविरसविषयत्वमुपमादीनां स्याद् ।00000 कि व न संसृष्टित्वेन कश्षिच्चारुतातिशयः प्रतिमासते मैनालंकारानतरं कथ्यते। ननु मोफिकपमरागेन्द्रनीलादीरना संसर्गे लव्घपरभागतया मासत एवं चारुतवानतरम्, तद्वद् हदायि स्यादिति चेन्न, अनुपासादिना, उपमादिना तर्य वा तेन सचेतस कस्यचिन हि परमागोडय मासते, मिन्ननातीयत्वाव। समानजातीयाना हि अनुकूलतयाऽन्यथा वाडनुगतयुद्धिवशेन परमागो जायते, न तु शब्दार्थयो:, मिन्नेन्द्रिय ग्राइयत्वात। शव्दार्थालंकारसंसर्गे चारुतातिशय स्वारमामि: संवेदनान्नेदमिति चेन्न, शपयप्रत्येयत्ाव।' विमर्शिनीकार ने रत्नाकर की इस उपस्यापना का प्रतिपद खण्ठन और स्वस्वकार की स्थापनाओों का समर्थन कियाहै। 'देवि क्षपा0' तथा 'लिम्पतीव' पद्यों में सर्वस्वकार ने संसृषटि मानी है। रत्नाकरकार ने उनमें भी संकर सिद्ध करते हुए लिखा है- किस्पतीत्यादावुपमोत्प्रेक्षादीना ०००० मौकिकादिवव परस्पर शोभातिशयहेतुत्वे चाह्ञा द्विमावसंकर एव स्था, न संसृष्टिः1 न तावदयशलाकाकलपा अलंकारा एकत्मिन् वाकये
पगन्तव्य:, इ्योः प्रधानयोरप्रधानयो: संवन्वासंमवात् गुणप्रधानभावेन चालंका राणा सम्न्ेक्विमा- वापस्या संकर एव स्यास। तथा च 'दिेवि क्षपा०' इत्यत्रोपमातिद्ितत्य चक्षुरुन्मीलितस्य वाक्याथों- भूवस्य देतुत्वेनोपाचमपागलनोपपादकरवेनोपनिनद्ध इलेक्षािलए: शशाङ्ाम्वरत्या इत्यु लक्षयो= पारम्पर्येणोपमायोपकत्वेन तवसृता, उपमा तु अर्यन्तराङवत्वागमनादपरिम्काना वाक्यार्थतामुपयातीति संकर पव, नतु संसृष्िः। मरवं 'लिम्पतीन'-इत्यादी उत्प्रेक्षाइयमसत्पुरुप- सेवेव टृष्टिर्विफलता गतेत्युषमाया वाक्यार्थीभूताया हेतुत्वेन गतम् इत्यद्त्वेन संकर एवं। पवमु- दाहरणान्तरेपु विवेच्यम्। परं प्रत्युपसर्जनीभूतयोस्त्वलंकारयी: अवान्तरसम्बन्धाभावे न संकरो न संसष्टिन चा [ न्यो] लंकार: कश्चित। 'अन्योन्यसम्बन्ध-000-शक्तिमङ्गाव'। इति सँगद: । यदि चायमलंकारः प्रधानमलंकारान्तर प्रत्यक्षभूतः तदाऽरत्येव सम्वन्धः, तदापि चाद: समुच्चयमतियादकस्यानुपादानाद अलंकारसमुच्चव आर्थो भवेव, न तु संसृषिः।' पाठान्तर की जो मात चिमर्शिनीकार ने उठाई है उसका मूल रत्नाकरकार का निम्न- लिखित मन्यांश है- '५प त्वदाननरुचे'-इत्यादी सुस्पष्टे्युत्प्रेक्षानिषये यैरुपमामिहिता तेपां मवतामेबमादा- नत्यन्तातीन्द्रियार्थदर्शनाय केन चोगीश्वरेण चक्षुरपितमिति न जानीमः। लिन्पतीत्यादावुषमो सप्रेक्षादीनां सनातीयत्वेन झुकक [एव ऊपर उद्धृन ] ०० ।' पह्ले मी ऐसे मनेक स्थल माचुके हैं जिनसे यह र्पष्ट है कि सर्वस्व की जो प्रत्तियाँ रत्ना करकार तथा स्वस्वकार को मिली थीं वे पाठदूष्टि से बहुत मिनन थीं। संजीविनीकार ने भी 'देवि क्षपा०' तथा 'लिम्पती' मदो की वृत्ति में 'विजञातीययो:' के स्थान पर 'सजातीययोः' शब्द को ही सपनाया है। कवाचित उन्हें प्राप्त प्रति में भी वही पाठ रहा होगा जो रत्वाकरकार को प्राप्त प्रति में रहा है। संजञीविनीकार ने 'रवदाननरुचे' में उपमा वतलाई है। निक्चित दी इसमें मूल प्रति ही कारण है। रत्नाकरकार ने भी यहाँ 'उपमा' बतकाने वाली परति दी पाई थी। रन्ना-
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७३२ अलङ्गारसवस्म्
करकार ने को 'दिव्य चक्षु'-की बात कहकर स्वस्वकार पर चोट की थी उसीसे विचलित हो विमशि- नीकार ने भी उन पर 'बोध करिष्यामी'-त्याशयेन'-इत्यादि प्रविक्षेप किया । वस्तुत हन्हें प्रति ही वेसी मिळी थी। 'त्वाननबचेन' में उपमा बतलाने पर कोई भी विछ्व ्यक्ति रतनाकरकार के समान हो झल्लाए बिना न रहेगा ? अत यहां विमर्सिनीकार को असविष्णु सिद्ध होते हैं। विम्शिनीकार ने ममुच्चयालकार का जो प्रश्न उपस्थित किया है उसकी माषा वत्यन्त सक्षिप्त है। निश्चिन ही बह रस्ाकर के निम्नकिखिन अश का सार है- 'यदि चायमलंकार प्रवानमलकारान्तर प्रति अभूनस्नदास्त्येव समपन्ध, सदापि घादे: समुच्चय पतिपादक स्यानुपादानादठकार समुच्चय आर्यो भचेद न तु संसूषटिः।'
संघृष्टि का इतिद्दास :- [पृ० १९८, ससूषटि प्रकरण का अन्त ]।
सकरप्रकरण के भम्त में देखिए, क्योंकि संरकृतकाव्यशास्त्र में ये दोनों अर्लकार पहले अभिन्न और बाद में भिन्न माने गर हैं।' चिमर्शिनी ददानी संकरमवतारयति-अुनेरयादि। अब सकर की अवतरणिका रचते हैं। [सर्वस्व ] मधुना क्षीरनीरन्यापेन संकर उच्यते- [ सू० ८६] क्षीरनीरन्यायेन तु सकर:। मिशत्व इत्येच। अनुत्कटमेदमिश्रत्वे संकरः। तच्च मिश्रत्वम द्वाद्गि- भावेन, संशयेन, एकवाबकानुप्रवेशेन च त्रिया भवत् संकरं तनिभेदमुत्था- पयति। कमेण यथा- 'अङ्गुलीमिरिव केशसंचयं संनियम्य तिमिरं मरीचिमिः। कुड्मलोकृतसरोजलोचनं चुम्बतीध रजनीमुखं शशी ॥।' अभाङ्ुलीभिरिवेत्युपमा। सैघ सरोजलोचनमिश्यस्या उपमाया: प्रसा घिका। रजनीमुसमिति श्लेपमूलातिशयोकि:, भारम्भवदनाख्ययोर्मुख्य- योरमेदातिशयात्। अत एव तयोरद्गादिमायः। एवं च वाक्योकसमासो के उपमे श्लेपानुगृद्दीता चातिशयोक्तिरत्पेक्षायाः 'चुम्बतीय' इति मकाशि- ताया अनुमादिकाः । तदूबलेन तस्या: समुत्थानाव्। सा च समुत्थापिता समुत्यापकानां चमरकारितानिबन्धनमित्यसत्यङ्गाद्विमाकः। यथा वा- 'प्रयौमयोऽपि प्रथितो जगत्सु यद वारणो मत्यगमद विवस्चान्। मन्येऽस्तशैलात्पतितोऽत एव विवेश शुद्ध्ये वडवाग्निमध्यम्।।' अन्र प्रथमार्षे विरोधप्रतिभोत्पत्तिद्वेतु! श्लैपः। दर्शनान्तरे तु विरोध- श्लेपो द्वावलंकारी तदनुगदीता द्वितीयेऽधॅ मन्येपदप्रकाशितोतपेक्षा। अत- रचाफ्ाहिमाया।
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संकरालद्घार: ७३३
सरथाहन्न यत् कारणमुत्मेक्ष्यते तत्र विरोधश्लेषानुप्वेशः। यच्चान कार्यमुत्प्रेक्षानिमितं तन्र पतितत्वाग्निप्रवेशी वस्तुस्थित्या अन्यथास्थिता वपि अन्ययाभूताभ्यां तास्याममेदेनाध्यवसिती ज्ेया, तेनावापाद्विमाव संकर:। न व विरोधप्रतिभोत्पप्िद्वेती शलेपे छलेपस्य विरोधेन सदाङ्गाद्ि भाव: संकर:, उत्प्रेक्षाया वा निमित्तगतातिशयोकत्या सद्दायं संकर, ताभ्यां चिना तयोरतुत्यानात् । अतश्व निरवकाशत्वाद् वाघकत्वम्। न व मन्तव्यं विरोधमन्तरेणापि मलेपो श्यत इति श्लेषस्य साचकाशत्वमिति। यतो न ध्रमो विरोधमन्तरेणापि श्लेपो न भवतीति, कि वर्ह्यलंकारान्तरविविक्तो विषय: श्लेपस्य नास्तीति निरवकाशत्वास् तेषां बाघः । तन्मध्ये च विरोधोडनुप्रविष् इति सोऽपि तेन वाध्यत इति न कश्चिद् दोष। पक्मर्था- लंकारसंकर उक्त: । [चृ० ] अव क्षीरनीर के समान [अलंकारों के मिश्रण से] होने वाला संकर [नामक अलंकार ] वसळाया ना रहा है- [सू० ८६]तथा पीर नीर जैसा संकर। [सृ०]'मिथव्व' यह [ पूर्वसूत्र से प्राप्त ] दै ही [सूत का सर्थ यह हुआ कि ] मिश्रण में यदि भेद स्पष न दो तो [ अलंकार ] संकर [कहलाता है]। और वह मिश्रण (१) अंगागिभाव (:) संशय तथा (३) एकवाचकानुपवेश इन तीन स्थितिओों में तीन प्रकार का होकर तौन ही प्रकार के संकर को जन्म देता है। इनके उदाहरण, क्रमशः- [ अंगांगिभावसंकर-] अंगलियों के समान किरणों से केशपाश के समान मंधेरा वटोर कर मुद्धितकमननेन वाले रजनीमुख को शशी चूम सा रहा है।' यहाँ 'अँगुलियों के समान' -- यह उपमा है। वदी 'कमलनेत्र'-पद में [ कमर नेम के समान इस प्रकार ] आई उपमा में साधक है। रननीमुख में [ एक ही सुख शब्द का अर्थ आारम्म और चेदरा दोनों होने से] दलेपमूलक अतिशयोकिति है, क्योंकि इसमें 'प्रारम्भ' और 'चेदरा' इन दोनों मुख्य अर्थों में [एक ही मुख शब्द से कथित होने के कारण] अभेद सिद्ध होता है। इस प्रकार ['अंगुियों के समान किरणों से'-इस ] वाक्यसे कथित तथा [ 'सरोनलोचन-'इस ] समास से कथित दो उपमाएं और [ 'मुख' शब्द के ] शलेष से अनुगृहीत [आरम्म तथा चेहरा- इन दो सर्यों की] मतिशयोक्ति 'चूम सा रहा है'-इस पद से प्रकाशित उत्प्रेक्षा की अनुग्राहिका हैं, क्योंकि उसकी निष्पत्ति उन्हीं के बल पर होती है। निष्पन्न होकर वह अपने निष्पादकों में चमतकारकता का कारण बनती है। इस प्रकार इनमें अरगागिभाव है। दूसरा वदाहरण यथा- 'सभी लोकों में [ वेद-] त्यीमय होने के लिए प्रसिद्ध होते हुए भी सूर्य जो वारुणी [ पश्चिम दिशा तथा सुरा ] की मोर बढ़ा, मानो इसीलिए यह अस्ताचल से गिरा और शुद्धि के लिए वद- वाग्नि में प्रविष्ट हो गया।' इस पद् के पूर्वाधमें [उद्ट के मत में] विरोध की वाघकर ्लेप अलंकार बनता है। मन्य मत में विरोध औौर इलेष दोनों ही अलंकार हैं। उत्तरार्ध में उत्प्रेक्षा है वो 'मानो'शब्द से कमित है और उचा अलंकारों से अनुगृशत है। अतः इनमें अंगाहिमाव है।
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७३४ स्पषोकरण के लिए महों [वेदस्वरूप होते हुए मी बारगीगमनरूपी जिस कारण की उत्मेक्षा की जा रही है उसमें विशोष [बाधक] दलेष [अथवा विरोध और द्लेश दोनों] का अनुप्रवेश है। और [उसका] जो कार्य [ वद्वाग्निप्रवेश की] उतपेक्षा का निमित्त है उममें पत्तित्व और अग्निप्रवेश का वास्तविक रूप भिन्न है। किन्तु वे समिन्न रूप से अध्यनसषित होकर विदिन होते हैं। इसलिए सहाँ अर्गागिमाव सकर है [ इलेप अग है और हेतु तथा फन की उत्पस्षाएँ अगी है]। यइ नहीं कहा का मना कि यहें सनेप विरोष का निष्पादक है अत रनेप का विरोध के साथ अगात्तिमाव सकर है अथवा उत्पेक्षा का [उमके] निमिच [पान आदि] में स्यित अतिशयोक्ति के साथ यह सकर है, क्योंकि उनके बिना वै निगपन्न नहीं होने। और इसीलिए वे निरवकाशु छोकर बाषक बनते है। यह नहीं मानना चाहिए कि शलेष विरोध के बिना भी दिखाई देता है, इसलिए रजेप [निरवकाश नहीं ] सावधम ही है, क्योंकि हम यह नहीं कहते कि स्लेप विरोष को छोढकर नहीं होता। इमारा कहना है कि इलेष कहीं भी अन्य किसी सल्कार के बिना नहों मिलता, अत वह निरवकाश हे और उन [अन्य सलकारों) का वाधक है औोर उनमें विरोध चला हो आता है, इसलिए वह विरोधी भी उस [इलेष] के द्वारा वाधिन किया जाता है। इस प्रकार यहोँ कोई दोष नहीं माता इस प्रकार अथोठकारों का सकर उदाहरणों द्वारा समझाया गया। चिमर्शिनी तदेवाह-श्ीरेत्यादि। तदिति। यथोक्तरूपम्। त्रिभेदमिति। अङ्गाद्विमावादिना। मसा- विकेति। आनुगुष्य कारिश्वेनाद्गमिश्यर्थ, ।शेपम्लेनि। सलेपहेतुकेययं। अ्घ् प न
इश्युपमंहार। इलेवनुगृदोतेति। इलेपमन्तरेणारया अनुरयानाद् । तद्बलेनैवि । तेपा सुपमादीनां दलेनोपकारकश्ेनेश्यर्थ. । समुस्यानादिति। उपकार्यावेन । उदाहरणान्तरो पादानं ताधद् ध्याहिमदर्शनपरम्। श्लेष इति। शज्टानामिति शेपः। दावलंकाराविति। हेतुदेतुमद्पावित्यर्थ। सटेपमन्तरेण विशोषस्यानुश्यानात्। तदजुशृदीतेति। श्लेपमूलवि. रोघोपङनेश्यर्थ। अन्नाद्विभावमेव तिमजति-तवा होत्यादिना। कार्यमिति। पतितस्वाग्नि
ननु विशेधोक्ेप्तयोयंददक्गाद्विभानेन संकास्तद्वदतिशयोक्यापि सद्द तस्या विरोधश्ठेप- थोश्च कि संकर उत नेश्यारास्याइ-न चैत्याि। पुननोमटमनानुमार श्लेपस्य प्राधान्या मिप्रायेणोनम्। स्वपसाभिप्रायेण तु विरोधसयाध्येतदेव दष्टव्यम्। अ्षत्र च यथा न सकरी उंकारसतथा पूर्वमेव्रोपपादितम्। अ्म्र हामययाध्यक दवालकार । न वैकश्य संकरो युफ। तश्य द्विपमृतीमामलकारगं मिश्रख्े समनाव। अनक्वेति । विशेधगुभीभावेन श्लेपायेव समुश्यानाम्। यत् अ्रन्थकृता स्वमताध्रवेणतदृपि नोक्म, तघायमाशय :- 'यायता हि यबालकारन्तर्वरूपनिष्पादने देतुरवं भजते तम्र नायमषंकार इति प्रतिपाधम्, त्त्पेवमपि सिद्धयतो-ति सम्मतेनाध्येतर्साघरन चिरन्तनाम्युपगनरवाम्य तुमाना:्मप्रयोजनम्।तन्मध्य इति। शलेपाइ पतिरिफानामन्येपामलंकाराणीं मध्य इश्यर्थः। दोप इति। सावकाशरवा रचतिरुय। वही बतलान हैं-'तीर०' हन्यादि। तद्=जिसका स्वरूप वतलाया जा चुका है। त्रिभेदमू= तीन मेरों से युक्त मंकर अर्थान अगोगिमात्र आदि से। स्टेपमूळ = शनेष हेतुक। यहाँ अंगागिभाव मूचक संकर जिस प्कार नहीं है वह [ संसृषटि प्रकरण में 'वदनसौरम०' पद को ध्याख्या के समय बतळाया ही जा चुका है। भतः यहाँ दोनों उपमाओं के ही परस्वर अंगोगिमाव को
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संकरालङ्कार:
लेकर 'तयोरंगागिभावः' यह उपसंहार किया गया माना जाना चाहिए। श्लेपानुगृहीत= इलेय के विना इसकी निष्पत्ति न होने से। तद्बलेन-उनके वल से= उन उपमा आदि के वल से अर्थास उपकारकत्व से। समुत्यान = सर्थात उपकार्य रूप से। दूसरा जो उदाहरण दिया गया है वह व्यापकता बतलाने के लिए। श्लेप अर्थाव उद्धटपन्थियों के मत में। हालंकारौ= दो सलंकार अर्थात् हेतुदेतुमदरूप, क्योंकि विरोध छलेष के दिना वनता ही नहीं। तदतुगृहीता- उससे अनुगृदौत अर्थात् कलेपमूलक विरोध से उपक्रव। अर्गागिभाय का ही विभाग करते हुए लिखते हैं-'तथा हि' इत्याि। कार्यम् =कार्य=पतितत्व रूप और अग्निप्रवेश्ञ रूप। यह तो प्रसंगवशात् यहाँ कह दिया गया, क्योंकि यह उत्पेक्षा के अनुकूल है। तेन = उत्पक्षाविरोष से उपकृत होने से शंका होती है कि-'जिस प्रकार निरोध और उतमेक्षा में अंगागिमावमूलक संकर है उसी प्रकार उस [उत्प्रेक्षा] का अतिशयोकि के साथ तथा विरोध और इलेप का भी संकर होगा अथवा नहीं-इस पर उत्तर देते है-न च इत्यादि। यह सब उज्गट के मत के अनुसार इलेप को प्रधान मानकर कहा। अपने पक्ष के अनुसार तो विरोध में भो यही [प्रधानत् ] मानना चाहिए। और यहाँ संकरालंकार जिस प्कार यहीं होता है वह पहले [ संसृष्टि प्रकरण में 'वदनसौरम' पद्य की विमर्शिनी में] दी सिद्ध कर दिया है। यहाँ दोनों ही प्रकार से अलंकार एक ही रदता है। एक में संकर होता नहीं, क्योंकि वद तो दो तोन आादि मलंकारों के मिश्रण में स्षेमद छोता है। अतश्च सर्थात विरोध को अप्रधान बनाकर इलेप का ही प्रधान रूप से उत्थान होने से। अन्थकार ने इस विषय पर भी अपना मत नहीं अपनाया इसका आशय यह है उनका तो प्रति पा्य यहो है कि जशों कहीं कोई अलंकार किसी अन्य अलंकार की निष्पत्ति में हेतु बनता है वहाँ वह [संकर] अलंकार नहीं होता। और यह इस प्रकार मी सिद्ध हो नाता है। इसका प्रयोजन है उनके मत से भी [अपनी ]इस [मान्यता] की सिद्धि करना। यह प्रयोजन सिद्ध करता है कि ग्रन्थकार यह बतकाना चाहता है कि प्रानीन आलंकारिकों को भी संकर का अलंकारत्व मान्य था। तम्मधा= एव = उन्हीं के वीच = अर्थात इलेप से भिन्न अन्य मलंकारों के बीच। दोप= सावकाशत्व की जो सापत्ति सब्नूषी दोष। [सर्वस्व ] शब्दालंकारसंकरस्तु कैशिदुदाहतो यथा 'राजति तटीयमभिहतद्ानवरासातिपाति सारावनदा। गजता च यूथमविरतदानवरा सातिपाति सारा बनदा॥।' अन्न यमकानुलोमप्रतिलोमयो: शब्दालंफारयों: परस्परापेक्षतवेना शादि भावसंकर इति। पवसु न सम्यगावर्जकम्। शव्दालकात्योः श्दबद्दुपकार्यो- यथोदाहतं पूर्वम्। यद्ा अघ शव्दालंकारद्यमेकवाचकानुमविद्टमिति तृतीयः संकरो शेयः। एवमेका प्रकारो दर्शितः। शब्दालंकारों के संकर का वदाहरण किन्दी आचार्य [मम्मट] ने यह दिया है-'रानति तटीय' इत्यादि। [इसका अर्थ यह है-] दे दानवों का रास्ष समाप्त कर देने वाले भगवान् शिव! मन्दराचल की यह उपत्यका सुदावनी रग रही है। इस पर वेगपूर्वक गिर रह्े नदों का धर्वर नाद छाया ुआ है। और अविरत मद-
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७३६ अलङ्गारसर्वस्वम्
खल से सुन्दर बलवती तथा वनों का विनाश करने वाली गजपंकि भी अपने यूथ का रक्षण मलीमाँति कर रही है [ हरविजय ५।१२७ ] ।' [उन आाचार्य का करना है कि] 'इस पद् में ['दानवरा-नदा'-पद की पूर्वाधे तथा उत्तराय दोनों में समान आनुपू्तरी में आवृत्ति होने तथा उनके अर्थ में अन्तर होने से पादान्] यमक है तथा ['दानवरा-नदा'= पद को उलटा पढने पर मी वर्णकम के वैसे दी बने रहने के कारण नैसा वह सीधा पढने पर रहता है] यहाँ अनुलोमप्रतिलोम नामक चित्रालकार मी है। ये दोनों शब्द के सलकार है और परसुपर में एक दूसरे के अति सापेक्ष है। इसिए यहाँ अगागिमावमूलक संकरालकार है"। किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि शम्दालंकारों में शब्द के समान परस्पर में उपकार्योपकार कमाव नहीं होता। फळतः उनमें अर्मागिभाव भी नहीं बनता। यहाँ मानना धिक उपयुक्त हे शब्दा लकारों की ससूष्टि। जिसका उदाहरण पहले दिया जा चुका है। अयवा यहाँ दो शब्दाल्कार एक ही वाचकशब्द [दानवरा०' इत्यादि] में या गए हैं भव तीसरा [एक वाचक्नुप्रवेश ] स्कर जानना चाहिए। इस प्रकार सकर का एक प्रकार वतला दिया गया। विमशिनी कैशिदिति। काव्यप्रकाशका दादिमिः। उदाहनमिनि। कुसुमसौर मेयादिना। यहूति। पशान्तरे। एकवाचकेति । य एव शब्दा यमकस्य वाघकास्त पव विम्रश्येति। कैश्चित्-कुछ आाचायों द्वारा=काव्यप्रकाश्कार आदि द्वारा [काव्यप्रकाश में मम्मट ने इस पद्य को उद्भृत कर दिसा है-'अन थमकम् अनुलोमप्रतिलोमक्ष चित्रमेद: पददयगवे परस्परा- पेक्षे ] उदाहतमू=उदाइरण दिया जा चुका है-'कुसुमसौरम' इस्यादि पद दारा। यदा=अन्य पक्ष प्रस्तुन करने द्वेतु कमिन अव्यय। पुकवाधकजो शब्द यमक के वाचक हैं वे ही चिन् के मी।
द्वितीयः प्रकारस्तु संदेहसंकराख्य:। यध्रान्यतरपरिप्रह्े साधक प्रमाणं [सर्वस्व ]
नास्ति वाधकं वा प्रमाण न विद्यते तन्न न्यायप्राप्तः संशय इति संदेहसंकर- स्तन्न विशेय:। यथा- 'यः कौमारहरः स पव द्ि वरस्ता एव चैत्रक्षपा स्ते चोन्मीलितमालती सुरमयः म्रौढाः कदम्यानिलाः। सा चैवास्मि तथापि चीर्यसुरतव्यापारलीलाविधी रेवारोघसि वेतसीतरतले चेतः समुत्कण्ठते।' अन्न विमावनाविशेषोक्त्योः संदेदसंकरः। तथाह्यत्कण्ठाकारणाभावे उरकण्ठाया उत्पत्ती विभावना। स च कारणामावो 'यः कौमारद्वरः' इत्यादिना कारणविरुद्धमुखेन प्रतिपादितः।तथा च 'य कौमारहरः' इत्याघ नुत्कण्ठाकारणसन्द्रावेऽपि अनुत्कण्ठाया अनुत्पत्ती विशेषोकि:। सा चानुत्पत्तिः 'समुत्कण्ठने' इति विरोधोत्पत्तिमुसेनोक्ता। अत एव दयोर- व्यस्फुटत्वमन्यन्ोक्तम्। न चानयो: प्रत्येकं साधकमाधकपमाणयोग इति संदेदसंकरोडयम्। यथा वा- 'यदूक्तचन्द्रे नवयोयनेन शमधुच्छलादुद्विसतितश्चकास्ति। 4 - उद्दामरामाहढमानमुद्राषिद्रावणो मन्त्र इव स्मरस्य।।'
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संकरालक्कार:
सन्न वक्तं चन्द्र इचेति किमुपमा, उत वक्तमेव चन्द्र इति रूपकमिति संशयः। उभयथापि समासस्य भावात। 'उपमितं व्याघ्रादिभिः' इत्युप मासमास:, व्याम्रादीनामाकृतिगणत्वात्। मयूरव्यंसकादित्वाद् रुपकस मास:, मयूरव्यंसकादीनामाकृतिगणत्वात्। न चात्र कचित्साधकवाघक प्रमाणसन्भाव इति संदेहसंकर:। [ संकर का] दूसरा प्रकार हे संदेहसंकर नामक, जिसमें न तो किसी एक को अपनाने में साधक प्रमाण मिलता और न वाधक ही रहता, वह संशय स्वतः सिद्ध दै, इसलिए उसे संदेह- संकर मानना चाहिय। उदाहरण यथा [ पूर्वानूदित ] 'यः कौमारहरः पद्य [का अ्थं]। यहा विभावना और विशेपोक्ति का संदेधसंकर है। यह इस प्रकार कि उत्कण्ठा के कारण [अननुभूतत्व] के न रहने पर मी यहां उत्कण्ठा की उत्पत्ति मतलाई जा रही है, अतः विभावना हुई। यह जो कारणामाव है वह 'यः कौमारहरः इत्यादि द्वारा कारण के विरुद्ध जो पदार्थ उसके कथन के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। इसो प्रकार 'यः कौमारहरः इत्यादि पदार्थ कारण हैं अनुत्कण्ठा के, किन्तु उन सबके रहने पर भी अनुत्कण्ठा की उत्पत्ति नहीं हो रही, मतः यहां विशेषोकि है। यह जो अनुत्पत्ति है यह मी 'समुत्कण्ठते'= 'अकण्ठित हो रहा है' इस प्रकार विरोधी [उत्कण्ठा] की उत्पत्ति द्वारा कही गई है। इसलिए यहा दोनों ही असफुट हैं ऐसा अन्यन् [काव्यप्रकाश में] कडा गया है। इनमें से किसी के मी प्रति न कोई साधक प्रमाण है और न कोई वाधक। अतः यद संदे संकर हुआ। दूसरा उदाहरण यथा- 'जिसके मुखचन्द्र में दाढ़ी मूछ के वहाने नवीन यौवन ने उद्दाम रामाओं के दृढ़ मान की मुद्रा का विदावण [विनाश ] करने वाला काम का मन्न्र सा लिखित दिखाई देता है।' यहां 'मुस चन्द्र के समान इस प्रकार उपमा मानी जाय या 'मुख ही चन्द्र' इस प्रकार रूपक माना नाय यह संदेद है। क्योंकि यहाँ समास दोनों ही प्रकार का हो सकता है। 'उपमितं व्याघादिभि: [ पा० सू०] से उपमासमास हो सकता है क्योंकि व्याप्रादि आकृतिगण है। रूपक- समास दो सकता है मथूरव्यंसकादि से क्योंकि मथूरव्यंसकादि मी आकृतिगण हैं। यहँ किसी का साधक या वाधक प्रमाण मी नहीं है। इसलिए संदेहसंकर ही है।
विमर्शिनी
द्वितीय हत्यद्गाब्विमावात्। साधकमिति। अनुकूकम्। न्यायप्राप्त इति। साधकवाधक प्रमाणाभावादेकस्यानिश्चयात्। संदेहमेवोमपादयति-तथाहीत्यादिना। उत्कण्ठाकारणभाव इति। कौमारहरवराघ संनिधान रुपस्य कारणस्याभाव इत्यर्थ: 1 विरुद्धमुखेनेति। त्संवविा नव्ारेणेश्यर्थः। अत पवेति। द्वयोरषि विरुद्धसुखेनोपनिवन्धात्। अन्यत्रेति। काव्य प्रकाशादी। उमययेति। उपमारूपकरवेनेवयर्थः। चन्द्रशव्दस्याकृतिगणत्वाद्गणभ्वयेनापि हि स्वीकृतत्वमिति भाकः। कचिदिति। उपमार्या रूपके या। न चेतदलंकारसारकारादीना मतम्, अलंकाराणं संदेहयोगात्। तथाहि स्थाणुव पुरुषो चेति संदेहः कत्यचिदेव कदाचिल्रवति, न तु सर्वदेच सर्वेपान, संनिकृष्टानां तदैव, अनन्तरं त्वन्येपामवि निश्चयोत्पादनाव। सर्वदा सर्वन्न सर्वान्म्रति चालंकारलक्षणं प्रणयनस्। तथाखे व संदेहोऽयुकक, तस्य नियतदेशकाळप्रमातृगत्तरवात्। संदेहेऽपि पर्यवसानेऽवश्यमेकतरपक्षात्रयणम्, उत्तरकालं वाघकपत्ययोक्षासाव। इह व संदेहेऽ ४७ अ० स०
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प्युस्तरकालं पद्येकतरालंकाराथ्रयणं तास पतालंकार: स्पाद, तस्येष वाक्यार्थरेन मरोहाद्। वाक्यार्थीमात पव र्वर्सकाराणीं स्वरूपप्रविद्ठापकं पमागम्। न चोमयोरपि वाबपार्थामावो, विप्तिपेघाद्। संदिग्धद् वाक्यार्थो दोप हष्यविवाद:। न च छचयेपि वथामावः तथा दयायोदाहरणे विभावनाया एव निक्कः। विरुद्मुखेनोकण्ठाकारण मावेऽपि प्तिपन्ने 'तयापि पेतः समुकण्ठतते' इयुकण्ठोदयसयैव कारयर्य वार्याथंरवेन परेहात्। अत पवासुस्कष्ठो।पतिरविवव्वितेति विशेपोक्ेबघ इति विभावनाया एय वाष्यार्थीमावः। उत्तरोशहवरणे रूपकस्यैव निश्चय:। मतोऽवान्यप्रयोजनपोर्गापो समास् योरेकन् युगपरप्रासेस्वुत्यवलावाद्विमतिपेध । ततक्ष 'विमरतिपेधे परं कार्यम' इति परत्वादूपकसतमासप्रतृत्ति । एुतदेव रूपकस्य साघने प्रमाणम्। अत पवाद्र यदन्यैः 'अवाघेन गतो समवन्या वाधगतिरपामागिकी' इति न्यायालक्षगारमकरूपकममास वाघकवयाश्रयातमन उपमासमासस्य पवृतिरित्युपमायाः साधकप्रमाणसद्भावोऽरवी रयुककम, तद्युकम्। मवन्मते प समासारनी प्रायशो लक्षणपरस्ातुपमासमासस्यापि उद्गारमकावमित्य वाधेन गठेरसेमवादुयमाया अपि नारति याघकप्रमाणसन्दाव्षः। थोपमार्यां लक्षणा, रूपके सु उचितळप्तणेति न दयो: पशयोक्तक्पत्वमिति चेव, नैतत्। पवमप्य वाघेन गतेरसमवस्य तादवरप्यात्। अम द्वि वाघगतेरेव प्रतीयते, तत्न तासमास् पव कारय हरपाह-पत्र सिवसयादि। द्वितीय= अर्गागिमाव के बाद आने पाला उसषमे भिन्न। साधक = अनुकुल। न्यायप्राह्त= क्योंकि साधक या वापक दोनों में से किमी मी पमाग के न रहने से किसी एक का निशय नहीं रह्वा। सदेह का हो और प्रतिपादन करते है-तथाहि= इत्यादि द्वारा। उरकण्ठाकारण भाव = अर्थाव कौमारदारो पर आदि के असन्निधानरूपी कारण का अभाव । विरुद्वमुखेत- विरुद्ध पदार्थ के कथन के द्वारा=उन [कौमारदारि वरादि] के सव्निधान के कथन के द्वारा। अतएचक्योंकि दोनों की हो योजना विशद्ध पदार्थ के कवन के द्वारा की गई है इसलिए। अन्यत्र - काव्यप्रकाश मादि में [काव्यप्रकाश के टीकाकार वामन झलकोकरने इसका टिप्पणी दारा खण्डन किया है जो अस्षगत है]। तभयया=दोनों ही प्रकार से उपमारूप से और रूपक रूप से मी। अर्थ यह कि चन्द्रसम्द आकृतिगण में चला आया है अवः [ व्यावादि तथा मयूरव्यंसकादि दोनों गणों दारा उसका समह किया जा सकता है। -कसिद् = कहीं = उपमा में या रूपक में। [सकर का ] यह [भेद]अलंकारसार आदि को मान्य नहीं है। उनका कड़ना दे[ जैसा कि रस्नाकरकार ने लिखा है-द सकर प्रकरण ] कि अलंकारों में संदेह बन नहीं सकता। सदेह जो है वह 'यह स्थाणु [ हूंठ ] है या मादमी' इस प्रकार का होता है और किसी को दी कभी ही होता दै, सभी को सदा नहीं, क्योंकि पास के व्यक्तियों को उसो समय और अन्य व्यक्ियों को बाद में [यह कया दै ऐमा ] निधयाम्मक जान हो जाता है। इमके निरुद्ध सहंगार का को कश्म है यह प्रत्यैक समप, प्ररयेक स्थान तभा पत्येक व्यक्ति के लिए बनाया जाता है। ऐेती स्थिति में [उन भलकारों में ] संदेद हो नहीं सकता, क्योंकि वद [सदेह] किसी निश्चित ही देश, निश्चित्र ही समय तथा निश्चित ही व्यक्ति में रहता है। इसके अतिरिक सदेह में भी अन्त में किसी एक पक्ष का वायय लेना ही होता है क्योंकि त्तर काल में बाबक धान हो जाता है। इस प्रकार यहाँ [अककारों में ] यदि सदेह हो भी तो यहां टत्तर काल में जिस अलंकार का निश्वय होगा वही प्रधान अलंदार बन धाएगा, क्योंकि वही वाक्यार्थरूप से विदित होगा। और वाकयार्थंस्व हो वह वस्त है जो भहंकारों के स्वरूप का निर्धारक प्रमाण है। यह कड़ा नही जा
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संफरालङ्कारा ७३१
सकता कि [संदेह में ] वाक्यार्थत्व दोनों में ही रदता है कयोंकि यह परस्पर में विरुद्व बात है। और वाक्यार्थ का संदिग्य होना दोष माना जाता है। इस प्रकार संदेह का विवाद उठता ही नहीं है। उदाहरणों में भी ऐसी स्थिति नहीं है, क्योंकि [ 'यः कौमारहर"-इस ] प्रथम उदाहरण में विभावना का ही निश्वय होता है क्योंकि उत्कण्डा के कारण का अभान उसके विरुद्ध पदार्थ के [कथन के] द्वारा विदित होने पर मी 'तन भी चिस उत्कण्ठित ही हो रहा है' यह जो सस्कण्ठा- रूपीकार्य का उदय है, अन्त में यही वाक्यार्थरूप से प्ररूद होता है। और इसौलिए 'अनुत्कण्ठा की वश्पत्ति' यहां प्रतिपाध ही नहीं है अतः विशेषोकि चाधित हो जाती है, फलतः केवल विमावना ही प्रधान रूप से प्रतीत होती है। दूसरे वदाहरण ['त्द्वप्तचन्द्रे०] मैं रूपक ही निश्चित होता है। क्योंकि यहां दोनों ही समास अन्यप्रयोजनक है और दोनों ही एक ही स्थान पर एक साथ उपस्थित हैं। फळतः दोनों समान दलनाले हैं। मतः [ यही व्याकरणशासत्र की भाषा में] उनका विप्रतिपेध हुआ। और विप्रतिपेध में [तुल्यवलबाले नियमों की एक साथ एकत्र जयी प्रापति हो वदां ] परवर्ती नियम को मानना चाहिए' इस नियम के अनुसार रूपक समास ही यदा हो पाता है, क्योंकि वडी परवर्ती है [ अर्थात उसीका प्रतिषादक मयरव्यंसकादि० सूत्र परवर्ती है] चही यहां रूपक के प्रति साधक प्रमाण है। इसलिए यदां किसी ने जो 'बिना वाध के कार्य समव हो तो वाधयुक्त क्रम अपनाना अमान्य होता है-इस नियम के अनुसार लक्षण-स्वरूप रूपक समास्त का बाघ करके यहो आाश्रयस्वरूप उपमित समास हो प्रवृत्त होता है, अतः यहां सपमा का ऐो साधक प्रमाण है' यह कहा था वह गवत या क्योंकि आापके मत में समास मायः लक्षणपरक छोते है, अतः वपमित समास भी रक्षणपरक ही सिद्ध होता है अतः उसका वाध नहीं होता फरतः उपमा के प्रति भी यहाँ कोई वाषक प्रमाण उपस्थित नहीं है। यदि कहें कि उपमा में केवल लक्षणा दोती है और रूपक में लक्षितलक्षणा, इसलिए दोनों पक्ष समान नहीं हैं। [अतः विप्रतिपेध का प्रद्न नहीं उठता ] तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसा मानने पर भी पूर्ववस् बिना राध के काम चलना संमन नहीं होगा। क्योंकि यद [उपमित समास] तो वाधपूर्ण क्रम से ही प्रतीत होता है अतः वहां [त्वद्वतपचन्द्र में ] वही [रूपक समास ही] मानना चाहिए। [सर्वस्वकार ] यही कहते हुए लिखते हैं-
[ सर्वस्वर ] यत्र तु कस्यचित्परित्रहे साधकं वाधकं वा प्रमाणं विद्यते, तभ्र नियतपरिग्रद्ः। तत्रानुकृव्यं साधकम्, प्रातिकृव्यं वाधकम्। तन्न सावरक यथा- 'प्रसरद्विन्दुनादाय शुद्धमृतमयात्मने। नमोSनन्तपकाशाय शंकरक्षीरसिन्धवे।।
मन्र शंकर पव क्षीरसिन्धुरिति रपकस्यासृतमय्त्वं साधकम्। तस्य शंकरापेक्षया क्षीरसिन्धावनुकूलत्वात्। उपमायास्तु न वाधकम्। शक- रऽपि तस्योपचरितस्य संभवात्। यथा वा- 'पतान्यवन्तीश्वरपारिजातजातानि तारापतिपाण्डुराणि। संम्त्यहँ पश्यत दिग्वयूनां यशःप्रसूनान्यवतंसयामि ।।'
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यलक्कारसर्चस्वम् अनावतंसनं प्रसूनेध्वनुगुणमिति रूपकपरिप्रहेण साधकं ममाणमू। वाधकं यथा- 'शरदीव प्रसर्पन्त्यां तस्य कोदण्डटंकतौ।
अन् विन्ध्य उदधिरिवेत्युपमापरिय्हे विनिद्वजुम्मितह्वरिरिति साधा रणं विशेषणं वाधक प्रमाणम् । 'उपमितं व्याघ्रादिमि सामान्याप्रयोगे' (पा० सू०) इति वचनादुपमासमासे प्रतिकूलत्वात्। यतश्च पारिशेष्याद रूपकपरिमद्दः। न तु शञरदीवेत्युवमाघोपमासाघकतवेन विह्ोया। न छीप- म्येन कदाचिदर्थसिद्धि:।[नदि चापेण पंचाशत्सिद्धि ।] नहोकेनालंकारे- णोपकान्तेन निर्वाद्धः कर्तव्य इति राजाशेपा। नापि धर्मसूश्रकारवचनम्। नाप्येप न्यायः। उत्तरोत्तरसाम्यप्रकर्यविघक्षणे प्रफातोपमापरित्यागेन रुपक निर्वाहस्योचितत्वात् । विपर्ययस्तु दुष्ट एव । यथा -'येनेन्दुदधवनो विषं मलयजं धार: कुठारायते' इवि। तस्मात् प्रकृते सामान्यप्रयोग उपमापरिम्रद्वे वाधक इति मयूर्यंसफानेराकतिगणत्वाद रूपकसमालाथयेण रूपकमेव चोद्धव्यम्। पवं 'भाष्यव्धि: क्वातिगम्भीरः इत्यादी दषव्यम्। साधक- याधकामावे तु संदेहसंकरः। यथोदाहृतम्। किन्तु नहां किसी एक [अलंकार] को अपनाने में साधक या बाक प्रमाण रहता है वहाँ एक किसी को अपना लिया जाता है। यहाँ साधक का अर्थ है आनुकूस्य और बाघक का प्रातिकूल्य। इनमें से साधक पथा- 'जिसमें बिन्दु और नाद का प्रसार हो रहा है जिसका स्वरूप शुद्ध अमृतमय है और जो अनन्त प्रकाशमय है ऐसे शिवश्रीरसागर को प्रणाम दे। यहाँ 'रिव ही क्षीरसागर'-इस प्रकार के रूपक के प्रति 'अमृतमयता' साधक है। क्योंकि उसकी स्थिति पिव को अपेक्षा स्षीरसागर में दो [प्रतिद्धिवर्ञाय ] अनुकूछ है, किन्तु वद उपमा का वाधक नहीं है, क्योंकि लक्षणा दारा उसका अस्तित्व शिव में भो माना जा सकता है। दूसरा ववाहरण, यया- 'मैं, अवन्निराज पारिजात से वत्पन्न, चन्द्रगौर, यश प्रसूनों को, देखो, दिग्वनिताओं का नवर्तंस बनाए देता हू।' नबसाइसकिचरित श१६]। यहो अवसस बनाना प्रसूनों में दी उचित पडता है इसलिए रूपक मानने में यह प्रमाण साधक प्रमाण हुआ। वाबक प्रभाग का उदाहरण, या - उमके धनुष की टकार नब शरद देममान फैळने लगो तो बिन्ध्योदषि इरि [विष्णु और सिंह] की नींद टूढ गई। वे नैभाइयां लेने लगे।'[नवसादसांकचरित शार६]। यहों 'बिन्ध्य उदधि के समान' इस प्रकार उपमा मानने में 'विनिद्ज़ मिन इरि' यह उमय साधारण विशेषण वाघक है क्योंकि वह 'साधारण धर्म का प्रयोग न दो तो उपमित वाचक पद से समास्त होता है'-इस नियम के अनुसार प्रतिकुस है। इम कारण बचे दुए रूपक को ही अपना ढेना पढ़ता है। यदां बो 'झरंद के समान' यह उपमा है यह उपमा के मति साबक नहीं
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मानना चािए। ऐसा थोड़े ही है कि कैवल साम्यमान से किसी वस्तु की सिद्धि हो जाए [चाप चाश की उच्चारणसमता मात्र से] नाप से मंचाशत की सिद्धि नहीं होती। 'जो कोई अलंकार आरम्म में दिया हो उपसंदार मी उसी से किया जाए ऐसी कोई न तो राजाज्ा है और न धर्मसूत्रकारों का वचन। न तो यह उचित ही है। यहं साम्य में उतरोत्तर सत्कर्म की विवक्षा है अतः यहां आरम्म में आई उपमा को छोढ़ रूपक को अपनाना हो उचित है। विपरीत क्रम सदोप ही होगा। उदाहरणार्थ-'जिससे चन्द्रमा अव्ति है चन्दन विप है और इार कुठार सा लगता है' यह स्थल[ लैं। यहां रूपक से आरन्म कर अन्त उपमा से किया गया है, लो साम्योत्कर्पविवक्षा के विपरीत है] । इसलिए प्रकृत ['शरदीव'e पथ्य] में सामान्य- धर्मवाचक शब्द का प्रयोग उपमा में वाधक है अतः मयूरव्यंसकादिगण के आकृतिगण होने से रूपक समास मानते हुए रूपक [ को] हो [अलंकार] जानना चाहिए। इसी प्रकार 'कहा अतिगम्मीर माष्याब्धि इत्यादि में समझना चाहिए।[यहॉँ भी गंमीरता रूपी सामान्यधर्म का वाचक 'अतिगम्भीर' शब्द है, अतः रूपकसमास ही माह है]। [जहाँ] साधक और वाधक [दोनों ही] प्रमाण न हो [ वरह संकर ] संदेसंकर होता है, जैसा कि [चः कोमारहर:]उदाइरण द्वारा सपष्ट किया जा चुका है। विमर्शिनी एतदेव दर्वयति-क्षत्रेत्यादिना। न वाध रुमिति। न पुनः साधकमपीरवर्थ: । वाघकरवा. भावमात्रेण साघकष्वानुपपत्तेः। तथावे ह्यम्नापि संदेह्संकरः स्यादिति भावः। यथा वेति। पूवंत्र शंकरेऽप्युपचरितस्यामृत्मयत्वस्य संभवात्संदेहभ्रमः कस्यचिस्यावित्यस्थो दाहरणस्य पुनरुपादानम्। साधारणमिति। सामान्यपयोगे दि विन्ध्य उदघिरिवेत्यसमास एव स्यास, यथा-'पुरुषोऽयं व्यात हव शूर' इति। सतश्चेति। उपमाया चाघकप्रमाण. संभवाद्परतृसेः। पारिशेष्यादिति। न पुनः साधकममाणसंभवादित्यर्थः। उचितत्वादिति। रूपनिर्वाहिण साम्यस्याविवयेन परवृत्तिः। विपयय इति। रूपकोपक्रमेणोपमानिर्वाह: दुष्ट इति साम्यस्य लाघवेन प्रतीतेः। 'स्वेच्छराचारिणि यतपुरा प्रियसखीवाचस्त्वया नाहता यर्कल्याणपराङमुसित पियतम: पादानतो नेपितः । सस्येदं इरिणाषि दुनयतरोरदापि वालं फलस्' इति चास्य पादतयी। एवं चाधिकपकर्पालंकाशेपकसेण सत्मकपालंकारै निवाहो न कार्य इस्यप्यनेन सर्वालंकारशेपतवेनोक्मू। प्रकृत इति। शरदीवेव्यादौ। द्रष्टव्यमिति। उपमाया बाधकर्वम्, अ्रतिगम्भीरत्वस्य सामान्यस्य हि प्रयोगे उपमासमासे चाघक इति रूपकर्परिग्रह एव युक्: । उदाहृतमिति। 'यः कौमारहर' इश्यादिना। इसोको दिखलाते हुए लिखते हैं-तत्र इत्यादि। न वाधकम् =वाधक नहीं, अर्थात साधक भी नहीं । क्योंकि केवल वाथकत्व के अभाव से साधकत्व सिद्ध नहीं होता । ऐसा होने पर यहा मी संदेदसंकर होता। यथावा-प्रथम उदाहरण में शंकर में औपचारिक अमृतमयत्व का रहेना संसव है अतः वह किसी को संदेहसंकर का भ्रम हो सकता दै, इसलिए इसका उदाएरण पुनः दिया। साधारणम्=साधारणधमे का प्रयोग करने पर [यदि उपमा की विवक्षा रहती तो] 'विन्ध्य उदधि के समान इस प्रकार समासरहित वाल्य ही बोछा जाता, जैसे-'यह पुरुष व्याघ के समान शूर है' यह वाक्य। अतश्=और इसलिए-अर्थाव वाघक प्रमाण के रहने से उपमा की प्रवृति न होने से। पारिशेष्यास्=शेप बचने से -न कि साधकपमाण के सद्भाव से। उचितत्वास्= सचित दोने से- रूपक से वाक्यसमाप्ति करने पर साम्य की प्रवृत्ति अधिक मात्रा में होती है इस
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कारण। विपयंय=विपरात क्रम में - रूपक से आरम्भ कर उपमा से वाकय समाप्त करना। gुe=सदोष क्योंकि उसमें साम्य की प्रतीति कम मात्रा में होती है। ['येनेन्दुवहन: ] इस पप के तीन चरण ये है-'स्वेष्छाचारिणि' [ मूछ टीका में प्रदत्त, अर्थाव] अयि स्वेच्छाचारिणी, मियसखियों की बात वो तूने पइले ही नहीं मानी और अयि कल्याण- विमुखे, पेर पढ रहे प्रियतम पर तूने को दृष्टि तक न डाली, उसी गलतीरूपी वृक्ष का, देमृगाध्ि, यह फळ है, जो अमी तो बाल [रूगा ] ही है। इस प्रकार समी अलकारों के विषय में अन्यकार ने यह नियम बतछाया कि यदि मारम्म किसी प्रकुष्ट अरकार से किया गया हो तो अवसान उससे प्रफुष्ट अ्वंकारों से नहीं करना चाहिए। प्रकृत= 'शरदीव' इयादि पद में। द्रष्टण्यम्=जानना चाहिए- अर्थात उपमा के प्रति वाघकता । 'अतिगम्मीरत्व'-रूपी सामान्य पर्मे का प्रयोग उपमासमास का बाधक दे इसलिय यहां रूपक अपनाना ही रचित है। उदाहतम = उदाहरण दिया जा चुक है अर्यात् 'य कौमारहर '० इस पथ के द्वारा। [सर्वस्व ] तृतीयस्तु प्रकार पकवाचकानुप्रवेशलक्षण, यैफस्मिन्वाचकेडनेकालं कारानुमवेश, न च संदेद्ष: । यथा- 'मुररिनिर्गता नूनं नरकप्रतिपन्थिनी। तवापि मूर््नि शक्गेव चकधारा पतिष्यति।।' अभ मुरारिनिरगतेति साधारणविशेषणद्वेतुफा उपमा, नरकप्रतिपन्थिनी ति शिलिएविशेषणसमुत्थश्षोपमाप्रतिभोत्पत्ति द्वेतु: श्लेप१चैकस्मिन्नेव शब्दे अनुप्रविष्टो, तस्योभयोपकारित्वास्। अप्र यथार्यश्लेपेण मदोपमायाः संकरस्तथा शब्दश्लेपेणापि सद्द टश्यते। यथा-
उद्यानवापीपयसीय यस्यामेणीटश्तो नाट्यगृद्दे रमन्ते।।' अत्र 'पयसीय नाट्यमृह्े रमन्ते' उत्येतायतैय समुचितोपमा निष्पजा सत्पुष्करद्योतितरद्ग इति शब्दश्लेपेण सहैकस्मिन्नेव शब्दे सङ्गीर्णा। शध्दालंकारयो: पुनरेकवाचकानुमवेशेन संकर: पूर्वमुदाहृटतो 'राजति तटीयम्' इत्यादिना। एकवाचकानुप्रवेशेनैव चात्र संकीर्णत्वम्। अत पव व्यवस्थितत्वमन्यानुमापितमप्रयोजनफम्, तुल्यजातीययोरप्यलंकारयोरे- कवाच कानुप्रवेशसंमवात्। शब्दार्थवत्यलंकारसंकरस्तु मटोन्रटप्रकाशित: संसृश्वन्तर्भाचित इति तनिप्रकार पव संकर इद्द प्रदशित। [संकर का] तृतीय जो भेद है उसकी संघा है 'एकवाचकानुप्रवेश [संकर ]' जिसमें एक दी वाचक में अनेक सलंकारों का समावेश रहता है, किन्तु सदेह नहीं रहता। यथा- 'विध्युनिगंत तथा नरक [नरकासुर तथा रौरव आदि नरक ]-नाशक [अतरव] गंगाजी दैसी पकवारा सुम्हारे सिर पर भी पढ़ेगी।'
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यहाँ 'विष्णुनिगत' इस साधारणविशेषण से [गंगोपमानक तथा वक्रधारोपमेयक] उपभा सिद्ध होती है। साथ दी 'नरकनाशक' इस श्लिष विशेषण से उत्यापित श्लेप मी ['नरक'- पद में] है जो उपमा का वाघक है। इस प्रकार ये दोनों [ उपमा तथा श्लेप] पक हो [नरक] शब्द में समाविष्ट हैं, क्योंकि वह [नरक शब्द्र उपमा तथा शलेप ] दोनों का ही उपकार करता है[ इस पद पर प्रतोहारेन्दुराज की निवृति द्रष्ट्व्य है-काव्यालंकारसारसंगइ्द ५।११] यहों [ सपर्युक्क पथ में ] जैसे अर्थश्लेष के साथ बपमा का संकर है वैसे शब्दश्लेप के साथ मी होता है। यथा- जहाँ मृगाक्षीजन समपुष्करधोति तरङ से शोभित तथा जोरों से पीटे जाते मृदंग बाद से युक्त वापोजल के ही समान नाटयगृद्द में रमा करती हैं। [वापीपक्ष=सत पुष्कर = कमल से घोती उज्जवल तरंग से शोमित, मृदगवाद्य=पानी को हार्यों से पीट पीट कर बनाया जा रहा जला स्फालनरूपी सृदंगवादय: नाट्यगृहपक्ष =सत पुष्कर= एक प्कार का नगाडा अर्थात् नान्दी, उससे धोतित=प्राणवान् है रंग ना्थारम्म जिसमें, भृदह=एक भिन्न प्रकार का नगाड़ा तद्नूपी चाघ वजाया जाता रदता है जिसमें, नवसाइसांकचरित श५४] इस पद् में 'जल के समान नाट्यगृ् में रमा करते है'-इतने से हो समुचित [ पूर्ण ] उपमा निम्पन्न हो जाती है। वद 'सत्पुष्करद्योतितरङ' इस एक शब्द में शब्दरलेप के साथ संकीर्ण कर दी गई है। केवल शन्दालंकारों के एकवाचकानुप्रवेश संकर का उदाहरण 'रानति सटीयम० इस पद् के द्वारा पहले हो दिया जा चुका है। इस पथ्य में एकवाचकानुप्रवेश के कारण ही संकर है [ न कि मम्मट के कथनातुसार अरगागिभाव के कारण। इसी लिए अन्य आचार्य [मम्मट] द्वारा जो यहाँ [विमर्शिनी में उद्धृत कारिका में ] 'यवस्थितता' की बात कही गई है वह निरथंक है।' क्योंकि एकजातीय अलंकारों का मी समासेश एक वाचक में संभव दी है। 'उझ्भटने [शब्दार्थवत्यलंकार नाम से ] जो शब्द और अर्थ के अलंकारों का परस्पर में संकर बतलाया है उसे संसृष्टि में अन्तर त कर दिया गया है। इस प्रकार संकरकेवल तीन ही प्रकार का मतलाया गया। विमर्शिनी न च संदेह इति। संदेहसंकरे यद्यप्येकवाचकत्वमस्ति, तथापि तब संदिदयमानाचेन
निवन्धनम्। एकवाचकानुप्रविष्टवेन चालकारयों: संसष्टवेन पासतातिशयोपजन इति नैचैंक देसु कर्वेन संकरोपमयोरिवेत्युकस्या नास्यामादो वाच्यः। न हि यमकयो: संसृष्टवेनै वावभासोऽशतीति यथोक्कमेव युक्कम्। अर्थेइलेवेणेति। नरकशब्दस्य दानवनिर यार्थकश्वाद। चोतित रङ्वेति शन्दश्य सभइत्वाच्छब्दसलेय:। न चास्योदाहरणटयमेतदक्म्। उपमापतिभोत् ्पत्तिहेतुकस्य श्लेपस्यैवान्नालंकार- स्वास्। उपमा दि क्लेपस्य हेतुत्वेनेवागता। तां विना तस्यामुस्यानाय। अवश्र श्लेप पवात्र प्राधान्येनालंकार:। एवं न संकर एक्रमेवामालंकारस्य रिथते।। तस्य द्विप्रभृतीना संसष्टतायामुक्तावात्। उदाहरणान्तरं यथा- 'अङ्टे न्यस्योत्तमाङं प्लवगवलपतेः पादमप्तस्य न्सु: क्ृम्वोर सङ्गे सलीलं स्वचि कनकमृगत्याङमाषाय शेपसू। वाण रक्षाकुलध्नं प्रगुणितमनुजेनादराव तीच्षणमचग: कोणेनैवेकषमाणसत्वद्सुजवचने दत्तकर्फोडयमास्ते।'
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अन्रेहगीघरागा स्वभाव इति स्वमावोकि दायरथेत प्रायमायमाणवमिति भाविक- मिस्येकस्मिग्नेव वा चकेऽलंकारदवय मनुपविशमित्यपं संकरः। अग्र घ माधिकस्वमाघोषरयो रूपकार्योपकार कमावेना म्ाद्ि र्वेऽप्ये कवाथ कानु मचेशकृतो घै चिन्यातिशयः प्रघानसया प्रती यत इश्येतदुदाहरणरवम्। अङ्गाद्गिमावश्य मिघनवासकाछंकारगतरवेम सब्घाव काशोस्ति । सतो 'राजवि तटीयम' इश्यादावेकवाधकानुप्रवेदोपि निरवकाश इति ततोडस्य पृथ- रभाव:। अत एवेति। शब्दालकार पोरेकवाच कानुपवेश्ञाद्। अन्येति। अन्येः काण्य प्राश कारादमि. । यदुक्म्-'फुटमेकत्र विषय शम्दार्थालंकृतिद्वयम्। व्यवस्यितं प' इति। अप्रयोजनकमिति। तथानुभावरणं पुनर्न कविद् दोप इति मावः। मुरारिनिर्गतेत्यादी धर्षा- हंकार्वाव सजातीय योरुपमाश्लेपयो. पूर्वोकनीश्या मिन्नविपपरपरेनावैक्कवाचकानुमचेेशो
दिना संकर उकः। शम्दार्थवर्तिनामलंकारर्गा पुन. ससर्गेणाय मलंकार इत्याह-मम्दार्ये- त्यादि। न केवलं काध्य प्रका शकारेण शष्दार्यवर्तिनोरठंकारयो: सकर उको यावदनेना पीति भाव:। तुकम्-'शव्दार्थवर्यलंकारा वायय पकत भासिना, सकस। इति। संसप्ापिति। अनयोर्ाथयमेदात तिळतण्हुलन्यायेन स्पष्ट एव भेदावगम इथ्यग्रैवान्त- र्भावो युध। ब्रिपकार रति। अङ्गाद्िमाव संद मे कवाधकानुमवेशेन। यदुषम्- 'तेनासौ ननिरूप. परिकीर्तितः इति। पुवं संदेहसंकरस्यानुपपत्तावपि विरंतनोकवादेवारय ग्रन्थकृता प्रिप्रकारख्व मेवोछम्।' न घ संदेह=सदेह न हो,=यचपि सदेह सकर में भी मकवाधकरव रहवा है, सब भी वहो चमरकार सदेह के कारण होता है, अतः उससे इसमें अन्तर रह़ता है। इस [ संकर] मैं जो दो अलकार एक वाचक में प्रविष् रहते हैं उन दोनों का निक्चयात्मक ज्ञान होता रहता है। 'पक् वाचक में परविष्ट अलकारों में चारुवातिशय ससूषटिरूप सबन्य से होता है :- ऐक्षा मानकर 'नेवेकहेतुकरवेन सकरोपमयोरिव' इस वकिदारा '[संकर का] यह [एकवाचकानुप] भेद नहीं होता ऐमा नहीं कहना चाहिए। यमक बी है, वे संसृष्रूप से भासित नहीं होते, अतः जैसा सर्वस्वकार ने कहा है जैसा हो मान लेना ठोक है। अर्थश्लेपेण=सर्थइलेप से क्योंकि नरक चम्द दानव और निरय इन दो अर्थों का वाचक है। धोतितरम शब्द ['धोति तरक' तथा 'घोतिव रङ्' इस प्रकार ] समझ शब्द है, इसलिए यहाँ शम्दइनेप ह। इस [ग्रन्थकार =सवस्वकार] के यो जो दो उदाइरण हैं-['मुरारिनिर्गता' तथा 'सरपु० *करघो] ये ठीक नहीं है। क्योंकि इनमें [अद्धट के अनुसार] उपमा को बाधकर दरेष ही [ प्रवानरूप से] अलकार बनता है। उपमा को है बह तो यहाँ दलेत का हेतु बन कर आईे है क्योंकि उक्ष [ उपमा] के बिना उस [सलेप] की निम्पत्ति हो नहीं होती। इसलिए यह। दळेप ही अधानरूप से अलंकार है। इस प्रकार यहां सकर नहीं है वयोंकि यहां केवल एक ही अलकार की स्पिति है। वद [मकर] तो दो तीन आादि के ससष् होने पर बतछाया गया है। इसका अन्य सदाहरण यह होया- "[ कदाचिव रावण का गुपचर राम के विषय में उससे कह रहा है कि] यह [ राम ] इस समय वानर सेनापति [सुमौव या अगर] को गोद में सिर, भक्षकुमार के दन्ता [इनूमान्] की गोद में पैर और नोषशरीर कनकमृग की छाल पर रम्ववर, एक्षमण द्वारा तेज किए गए अतएव सनेक राक्षसों के धावक नाप को आँख के कोने से सादर देख रहा और छोटे भाई के कथन पर कान सगाए डुप है।
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इस पध में एक तो स्वमावोकि है, क्योंकि मालिक लोगों का स्वमाव ऐेसा ही होता है और दूसरे यहोँ माविकालंकार भी है क्योंकि यहाँ श्रीराम प्रत्यक्ष से दिखाई पढ़ने लगते हैं। इस प्रकार एक ही वाचक [ पदावली] में दो अलंकार अनुप्रविष्ट हैं। इसलिए यहाँ यह [ एकवाचका- नुप्रवेश्यनामक ] संकर है। यहाँ यधपि भाविक और स्वमावोत्ति में परस्पर में उपकार्योपकारकभाव संबन्ध भी है [ अतः यहां अंगागिभावमूलक संकर भी संभव है] तथापि [यहं एकवाचकानुपवेश से उत्पन्न चमत्कार पधानरूप से प्रतीत होता है, इसलिए यह उदाहरण इसी [पकवरच संकर] के लिए दिया। अंगोगिभावसंकर उन अलंकारों मैंमी हो सकता है जहां वाचक भिन्न होते हैं। इसकिए 'रानति तटीयन्०' पद् में [सर्वस्वकार द्वारा प्रस्तावित] एकवाचकानुप्रवेश मी नहीं होता[ कयोंकि वहां वाचक शब्द समझश्लेध द्वारा बदल जाते हैं] इस प्रकार [संकर का] यह [एकवाचका नामक ] प्रकार उस [अंगागिभाव नामक प्रकार ] से पृथक है। अतएव =शब्द औौर अर्थ दोनों के अलंकारों के एक वाचक में अनुप्रवेश के कारण। अन्यकान्यप्रकाशकार आदि, जैसा कि उन्होंने [काव्यप्रकाश में एकवा चकानुप्रवेशसंकर के लक्षण में] कहा है-'औोर एक ही स्थान पर शब्द और अर्थ के अलंकार व्यवस्थित रहते हैं।' अप्रयोजनकम् =निरर्थक=अर्थ यह है कि वेस्षा बोलना कोई दोष नहीं। 'मुरारिनिर्गता0' इत्यादि गदों में, जो है सो, उपमा और श्लेप दोनों ही अर्थालंकार है अतः दोनों सजातीय हैं और अपने अपने क्षेत्र में स्वतन्न्न हैं, किन्तु यहाँ वे एक हो वाचक में अनुप्रविष्ट होकर माए है। इस प्रकार केवल शब्दाक्षित होने अथवा केवल अर्थाश्रित होने से जो समानजातीय होते है ऐसा अलंकारों का अंगागिभाव आदि से होने वाला संकर बतलाया जा चुका है। अब 'शम्द और अर्थ में रहने वाले अलंकारों के संसर्ग से मो यह अलंकार निष्पन्न होता है-यह बतलाने के लिए लिखते हैं- 'शब्दार्थं', इत्यादि अर्थ यह कि शब्द और अर्थ के मलंकारो का संकर केवल कान्यप्रकाशकार ने ही नहीं वतलाया, उस [उन्हट] ने भी इसे वतछाया है: जैसा कि [उद्भ ने ] कदा है- 'दक हो वाक्य में मासित होने चाले शब्द तथा अर्थ के अलंकार संकर [कहलाते हैं]।' [बद्धट ने शब्द और अर्थ दोनों के अलंकारों के एक साथ एक वाक्य में आने पर शब्दार्थ वस्यलंकारसंकर माना है और वाक्यांश में आाने पर मो। मम्मट ने केवळ वारक्याश में आने पर दी यह भेद स्वीकार किया है। सर्वस्वकार केवछ वाक्यगत भेद का खण्डन कर रदे हैं अतः इसे केवल उद्भट का खण्डन मानना चाहिए, मम्मट का नहीं ] संसृष्टी=संसृषटि में, इन दोनों [अलंकारों] में तिळ मौर तण्डुळ [चावल] के समान भेद स्पष्ठ रूप से प्रतीत होता है, क्योंकि इनमें आक्षय (शब्द और सर्य) में भेद रहता है। इसलिए उनका अन्तर्भाव इसी [ संसषि] में मानना ठीक है। त्रिप्रकार := तीन प्रकार का = (१) अंगा- गिमाव (२) संशय तथा (३) पकवाचकानुप्रवेश इन तीन भेदों के आधार पर। जैसा कि [मम्मट ने मी] कहा है-'इस कारण यह तीन प्रकार का वतलाया गया है'। इस प्रकार संवेदसंकर के सिद्ध न होने पर मी अन्यकार ने इसके जो तीन भेद बतलाए हैं वह केवल भावीनतर [चद्धट, मम्मट] आलंकारिक आचार्यों के द्वारा वैसा वतलाए जाने के कारण ही॥ विमर्श-संसुष्टि का पूर्वेतिहास :- संस्कृत काव्यशास्त्र में संकर तथा संसृष्टि का इतिदास अतीव विकासपूर्ण है। दण्डी, भामद 4- त्तथा वामन ने इन दोनों को एक ही शीर्षक में रखा था। और उसे संसृष्टि नाम दिया था। उन्दूट ने दोनों को पदली बार पृथक् पतिपादित किया और संकर को पंचम वर्ग में रखकर संसृषि
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को षछ्ठ वर्ग में गिनाया। वह मौ अन्त और आरम्भ के सातत्य में नहीं, अपित अनेक अलकार बीच में देकर। परवर्ती रुद्रट ने इन दोनों को पुन अमिन्न माना और जहाँ पूर्वाचायों ने अ्मिन्न मानने सुप सर्सा्टि नाम दिया या वहोँ स्ट्रट ने इन्हें सकर नाम दिया। मम्मट ने वद्दट का अनुसरण किया। इस प्रकार पूर्वाचार्यो के दो वर्म बन जाते है अभेदयादी तथा भैदवादी। क्रमराः सोदरण विवेचन- [क]अभेदवादी आचार्यो में ससर्टिवादी आचार्य- [' द०सी= 'नानालकार ससृष्टि ससूष्टिस्तु निगयते ॥ २३५९।। अर्यागिमावावस्थान सर्वेषा समकक्षता। इत्यल कारमसट्टेलेशणीया दयी गतिः ॥ २३६ ॥। उदाहरण='भाक्षिपनयर विन्दानि मुग्धे तव मुखभियम्। कोशृदण्डसममाणां किमेषामस्ति दुष्करम् ॥ २२६१। हिम्पतोव तमोहानि [इत्यादि पूर्वोद्धृत पद ]। अर्थाद= अनेक अलकारों की जो ससृष्टि [ससग ] वही सवष्टि कहलाती है। अंगगिमावपूर्वक स्थिति तथा सबकी समकक्षता इस प्रकार अलंकार संसृषि दो प्रकार की होती है । [उदाहरणार्थ-अंगागिमाव संसृष्टि के किए-]हे मुग्धे कमल तेरे सुख की शोभा हर रहे हैं। कोश [कमळकोश तथा खबाना] तथा दण्ड [कमलनाल तथा सेना ] से समृद्ध है व्यक्तियों के किए मक दुप्कर ही क्या? [इस पद्य में पूर्वार्ध में उपमा अथवा प्रतीप है और उतरार्ध में दलेष तथा अर्थान्नरन्यास। दोनों अरयों के प्रत्येक अलकारयुग्म में अंगीगिमाव है और उनमें जो दो प्रधान अलकार निम्पन्न होते है उनमें मौ अगागिमाव दै। पूर्वार्ष में प्रतोप प्रधान हे और उचरार्ष में अर्यान्तरन्यास। इनमें अर्थान्तरन्यास प्रतीप का समर्थक है, अत अंग है]: 'दिम्पतीव तमोझ्ञानि'-स्वय अन्थकार ने ही अपना लिया है। इस प्रकार दण्डी के संसृषि विवेचन में सकर का स्वरूप स्पष्ट है। किन्तु इसमें सकर का केवक एक्र हो भेद था पाया है- अगोगिभाव । वस्तुतः प्रथम पम के पूर्वार्थ में संदेह स्कर औौर उत्यरार्थं के 'कोशदण्ड' पद में मकवाचकानुपवेश संकर के बोज मी निहित है। [२ ] भामद 'वरा्र विभूषा मसष्टिबहस्कारयोगतः। रचिता रत्नमालेव सा चैवमुदिता यथा ॥६।४९ ॥। उदा० र गाम्मोर्येल्यावण्यवतोर्युवयो. म्राज्यरत्नयो.। सुख से थ्यो जनारना खं दुषमाहोइम्मर्सा पति. ॥ ३५० ॥ अनदकृतकान्तं ते वदन वनजदयुति। निशाकृत: प्रकृत्यैव चारो: का वास्त्यलंकृति. ॥। ३५१ 1 अन्येषामपि कसव्या संसष्टिरनया दिश्ा।। संसृष्टि पक ससम भलंकार है जो अनेक रत्नों के योग से उस्ी माँति बनता है जिस भाँति अनेक रानों के योग से रस्नमाला नामक उततम अलकार। वह इस प्रकार बतलाई गई है, जैसे- गाम्मीर्थ, [गम्मीरता, गहराई ] लावण्य [सौन्दर्य खारापन] तथा प्रभूत रस्नों से आप दोनों दो युक्त है, किन्तु तुम दो व्यक्तियों के लिए सुख सेग्य बनकि समुद्र है दुषग्राह [दुट आ्रद= घडियाल से युक्त अरथवा दुष दोषयुक्त हे आइ जिसका तथा दुष व्यक्तियों द्वारा घिरा]। [यह पूर्वार्ध में श्लेय है और उतरार्ये में म्यतिरेक ]
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संकरालद्वार:
कमल सी कान्ति वाला तुम्हारा मुखमण्डल दिना ही अलंकार के सुन्दर है। स्वभाव सुन्दर चन्द्रमा के लिए भलंकार की आवश्यकता ही या? [यहाँ पूर्वार्ध में कमल की उपमा है। उससे युक्त पूर्व वाक्यार्ध उत्तरार्थ में आए दृषान्तालंकार से परिपुष्ट ो रहा है]। इसी प्रकार अन्य मलंकारों की भी संसृष्टि वनाई जानी चाहिए।' उपर्युत्त विवेचन में मामह दण्डी के समान यह तो स्पष् नहीं कहते कि संसृष्टि में माए सलंकारों में अर्गागिभाव तथा समकक्षता रहती है, किन्तु उन्होंने जो ये उदायरण दिए इनमें यह अभिप्राय निहित है। प्रथम पद में इलेप से अ्यतिरेक निष्पन्न होता है। अतः यहाँ अंगोगिभाव संमव है। द्वितीय पद्य में उपमा और व्यतिरेक परस्पर निरपेक्ष हैं। किन्तु मामह के विवेचन में संदेष और एकवाचकानुप्रवेश संकर की मोर दण्ढी जेसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। मामह ने उपमारूपक और वत्प्रेक्षावयव नामक दो स्वतन्त्र अलंकारों की कल्पना की थी और दण्डी ने उन्हें रूपक तथा उत्मेक्षा में ही अन्तसूंत माना था। वामन ने इन्हें संसृष्टि का अंग माना और संसृष्टि का विवेचन नवीन रूप में इस प्रकार किया- सू०= 'अलंकारस्यालद्वारयोनित्वं संसृषिः ॥ ४३३०॥ संवृष्टिः संसरग: सू० = तद्भेदाचुपमारूप कोत्प्रेक्षावयचौ॥। ४३। ॥ सू०= वपमाजन्यं रूपकमुपमारूपक्रम् ॥ ४३३े२ ॥यथा- ०o"कर्ममूच्िरनयति चतुर्दशलोकवदिलकन्दः। उत्पेक्षाहेतुरुत्प्रेक्षावयवः ॥ ४३।३३ ॥ यथा- 'अंगुफीमिरिव०' पद्य। अर्थात-अलंकार का अलंकारयोनित्व संसृष्टि कहलाता है। [अलंकारयोनित्व=अलंकार है योनि= कारण जिसका, अलंकार का योनि=कारण ] संसृष्टि का अर्थ है ससर्गे। उसके भेद हैं उपमारूपक तथा उतप्रेक्षावयव। उपमारूपक है उपमानन्य रूपक। यया- कूर्म रूपी भगवान् ज चतुर्दश लोकवच्छी के कन्द हैं, सर्वोस्कृष्ट है। [यहाँ यदि कोक को वक्ली के समान वतलाकर तन्निमित्त कूर्मावतारी भगवान् पर कन्द का आरोप किया जाय जो संभव नहीं है तो उपमारूपक हो सकता है। उत्प्रेक्षा का उत्थापक हेतु वत्प्रेक्षाहेतु होगा। यथा-सर्वर्वकार द्वारा उद्धृत अंगुलीभि: पद्य। वामन के अनुसार इन पद्यों में दो दो अलंकार हैं और दोनों में अंगांगिभाव है। इस पकार वामन की संसृष्टि परवर्ती आचार्यो की भाषा में संकर ही कही जा सकती है। उसमें आए अलं कारों में अन्योन्यनिरपेक्षता नहीं है। वस्तुतः वामन ने जिसे उपमारूपक कहा है वह नवीन आचार्यों की माषा में परम्परितरूपक है। [ ख] अमेदबादी आचार्यों में संकरवादी आाचार्य। सुमट-रुद्रट ने संकर और संसृष्टि दोनों को एक ही मिम्र अलंकार के दो भेद के रूप में स्वोकार किया और वन्हें पक संकर नाम दिया। दण्डी ने जो अंगोगिभाव तथा समकक्षता के दो भेदक विन्दु प्रस्तुत किर उनके लिए सुदट ने हो पइले पहल तिछतण्डुक तथा नौरक्षोर के दो दृषान्त दिए जिन्हें परवर्ती आचार्यो ने इन्ही नामों से अपना लिया । रुद्रढ ने अलंकारों को चार (१) वास्तव (२) औपम्य (इ) अतिशय
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और (४) इनेष इन चार वर्गों में बाँट और उनका प्रतिवादन कर अन्त में उनकी मिशरित अवरया का निरूपण करते दुए लिखा या- *एर्पां तु चतुण्गमषि संकीर्णाना स्युरगणिता नेदा. । तन्नामानस्नेया सक्षगमशेषु मयोज्यम्॥१०॥२४॥ वास्नव आदि उपचारों भेदों के सकीर्गो होने पर मनकारों के उन्हीं नामों से मचटिन अगनित भेद दो सकने हैं। उनके लक्षण उन उन अशों में मिलाकर देखना चाहिए। आगे भेद करते हुए रुद्रट ने लिखा-
व्यक्ाव्यक्तांशस्वाद सकर सरपपने देधा॥ १०।२५। इन के तिकनण्युल और दुग्वप्रक् के समान सयोग से दो प्रकार का संकर निष्पन्न दोना है [प्रथम में ] व्यक्त तथा [द्विवीय में] अव्यक।' यहाँ यह स्पष्टीकरण अपेक्षित हे कि रट्ट ने जो तिकतण्डुल की उपमा दी रै उसका तदर्थ दिय उदादरणों में ठीक साम्य नहीं बैटता। सदर्य दिए उदादरण की अमिष्यक्ति ठीकू वही है जो सवस्वकार द्वारा मकवाचकानुप्रवेशसंकर के छिए दिए 'मुरारिनिर्गना०' तथा 'सतपुष्करधो०' एन पघों की है, जिन्हें विमर्धिनीकार ने सवस्वकार के विबद असगन उदाहरण बनखाया है। ससर्में जैमे श्लेष और उपमा स्रष्ट है पैसे हो रुद्ट द्वारा दिप उदाहरणों में और जैसे इनमें श्लेप टरमा का निष्पादक है वैसे हो रुटट के उदादरण में भी। सर्वथा ये उदाइरण अककारों में निरपेश्षता नहीं रखने। इस प्रकार मत्य तो यह है कि कद्ट के उदाहरणों से परवर्ती माचायें द्वारा स्वापित संसषटि का स्वरूप नहीं निकलता फळतः तिलसण्डुलन्याय केवल व्यकतामात्र के साम्य पर निर्मर है। रस्नाकरकार ने जो ससूष्टि का खुण्डन किया है उसका मूछ कदाचित् रद्ट का यही विवेचन दे। मिन्नतावादी आचार्य- [१]उद्बर=सकर और संसूष्टि का जो स्वरूप परवर्ती आवार्य सम्मट और सवसवकार में मिलता है उसको इस रूप में लाने का धेय प्रयमत: बद्भट को है। उन्होंने पहले संकर का विचेचन किया है, ससृष्टि का बाद में। उनके विवेचन क्रमशः रस प्रकार है- संकर - संदेहसकर= 'अनेकालवि कयो क्लेग सम सद्वृत्त्य संमवे। परस्य च प्रहे न्यायशोषमावे प संकुर:। ५।११॥ जहाँ अनेक अलकार समझ पढ रहे हो, परन्तु उनसे चमस्कार निष्पत्ति पक साथ न होवी हो और उनमें से किसी एक के अपनाने अथवा छोटने का कोई हेतु न दो तो उसे [ संदेह ] संकर कहते हैं। उदाहरण- 'यधप्यत्पन्तमुचितो वरेन्दुस्ते न सम्यते।' यधपि तु्हारे अत्यन्त अनुरूप वरेन्दु नहीं मिल रहा है। यहाँ 'वर ही इन्दु' इस प्रकार रूपकर भी माना जा सकता है और 'वर इन्दु के समान' इस पकार उपमा म। अत. उद्ूट और उनके टीकाकार प्रतिहारेन्दुराज के अनुसार यहाँ सदेह संकर है। वस्तुत यहाँ कपमा ही मान्य है क्योंकि कन्या के दिए चन्द्रमा की खोब नहीं होठो, तत्सवश
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सकरालह्टारः
बर की खोज होती है। रुूपक मानने पर चन्द्रमा दो प्रधान हो जाएगा । छाम किया में वसी का प्रधान रूप से अन्वय होगा जो अनुपयुक्त होगा। शव्दार्थालंकार संकर = शब्दार्थवत्यलंकारा वाक्य पकन मासिन: । संकरी वै- एकवाचकानुप्रवेशसंकर=कवात्यांशप्रवेशवाद वाभिषीयते॥ ५१२॥ शब्द और अर्थ दोनों के अलंकार नहाँ एक साथ व पक वाक्य में चले आएँ वह भी संकर होता है जहाँ एक ही वाक्याश में [ मनेक अलंकारों का ] प्रवेश हो जाता है। इनमें से प्रथम शब्दाथत्यलंकार संकर का उदाहरण चद्धट ने जो दिया है, सवस्वकार द्वारा उद्धृत मयालंकारसंसृष्टि का उदाहरण उसके लिए अधिक उपयुक्त है। अतपव सवसवकार ने इस भेद को संसृष्टि से गतार्थ मान लिया है। द्वितीय का उदाहरण [७५२ पृष्ठ पर] विमशिनी में उद्धृत है- 'मैवमेवारस्व' इत्यादि पद। 'मुरारिनिर्गता' पद के समान यहाँ भी प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार एक हो 'इव-शब्दरूपी वाक्यांश में चपमा सौर इलेप में दो अलंकार भा समाप हैं। वस्तुतः यह उसी प्रकार समान्य हे जिस प्रकार सवसवकार द्वारा प्रस्तुत 'एकवाचकानुप्रवेश' के उदाहरण। मनुगाषामाइकसंकर=पररपरोपकरेण यनासंकृतयः स्थिताः। स्वातन्त्रयेणात्मलाभं नो लमन्ते सोऽपि संकर: ।।' नहां अनेक अलंकार एक दूसरे का उपकार करते हुए उपस्थित हों और स्वतन्त्ररूप से निष्पन्न न हो पाते हों यह भी संकर होता है। रदाहरण, 'त्रयीमयोऽपि०' पध मी बद्धद को एतदर्ध अमान्य न होगा। इस प्रकार उन्दट ने संकर के चार भेद माने हैं। तीन तो वे ही जो सर्वस्वकार ने चतलाए हैं और एक वह जिसे शब्दार्थवत्यलंकार कदा गया है जिसे सवस्वकार ने उमयसंसृष्टि माना है। संसृदि- मलंकृतीना वहचीना द्वयोर्वोपि समानयः। एकत निरपेक्षाणां मिय: संसूष्टिरच्यते ।।' जईा परस्पर निरपेक्ष अनेक अथवा दो अलंकार एक ही स्थल में आ जाएं वहाँ संसृषि होती है। वदा०= त्वत्कृते सोडपि वैकुण्ठो शशीचोमसि चन्द्रिकाम्। अप्यघारा सुषावृष्टि मन्ये त्यनति तो शियम्॥।1 हे पार्वति १ उपः के लिए चन्द्रिका को चन्द्र के समान तेरे लिए तो वह विष्णु इस श्री को भी जो पारारदित अमृतदृष्टि है तुरन्त छोड़ देगा। यहों एक तो चन्द्रिका तथा थी, उषा तथा पार्वती एवं चन्द्र तथा विष्णु में उपमा० है, दूसरे श्री पर सुषावृष्टि का आरोप होने से रूपक है। और दोनों ही परस्पर निरपेक्ष हैं। इस प्रकार रुपष है कि उद्धट तक संसृष्टि न4ा संकर का सर्वागीण निर्धारण व्यकतम रूप में सामने आा चुका था। परवर्ती रुद्रट ने इसकी उपेक्षा की जैसा कि ऊपर अभेदवादी आचार्यो में दिए उनके मत से स्यह है। मम्सट=मम्मट ने उद्जट का अनुसरण किया और इन दोनों अलंकारों का स्वरूप विवेचन इस प्रकार किया- संसृष्टि 'ेष्टा संसृष्टिरेत्तेर्षा भेदेन यदिह स्थिति:।
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मलङ्गारसवस्वम् -"इन अलंकारों की भेदपूर्वक जो पकश्र स्थिति वह संसूषटि मानी जाती है।' भैद का अर्थ मम्मट ने हो अन्योन्यनिरपेक्षना किया है। उनके अनुसार यह केवल शम्द और केवल अर्थ में मी हो सकती है। इनमें केवल शब्दाटकारों तथा केवल अर्थालंकार की संसूष्टि के किए जो उदाहरण मम्मट ने दिय ये सवसवकार ने उन्हीं को अपना लिया है। उमपालंकार संसृष्टि के लिए मम्मट ने अनुप्रास और रूपक से युक्त एक गाया 'सो भत्थि' दी है। एतदर्थ सवस्वका 'आनन्दमन्थर'-पद ही अधिक सच्तम है। सकर = अर्गांगिमावसकर = 'अविभान्तिजुषामार्मन्यर्गागित्वं तु सकरः। सदेइसंकर ='एकस्य च मई न्यायदोषामावादनिश्चय'। एकवाचकानु रफुटमेरुप्रविषये [ विमणिनी में टद्धृत पृ० ७४४ पर ]। इनमें द्ितीय तथा तृतीय का अर्थ उद्भट के पूर्व उद्धृन प्रन्थ में तथा विमर्रिनी में स्पष्ट है। प्रयम का सर्य है=सपने याप में भविधान्त अलकारों का अगागिभाव दो तो संगागिमाव नामक संकर होता है। उदाइरण मम्मट के अधिक अच्छे है। साथकवाधक प्रमाणों का विवेचन स्वस्कार ने मम्मट से ही लिया है। किन्तु सर्वस्वकार के विवेचन से स्प्ट है कि वे रद्रट के व्यकताव्यक्तता हेतु दिए तिलनण्डुलन्याय तथा क्षीरनीरन्याय को बहातक बनाकर वद्रानुयायी मम्मट की मान्यताओं पर चळे है किन्तु अपनी मति से। परवर्ती आाचार्यो में- शोभाकर=ने संसुष्टि को कुद्रट के की समान अलकार नहीं माना। उनके तर्के मूछ रूप में ससृष्टि प्रकरण के अम्न में और उसी प्रकरण की विभानी में छद्धृत हैं। संकर के विषय में उन की मान्यता है कि एकवाचकानुपवेश तथा सदेह नामक संकर के भेद मो अमान्य है। इस विषय के वर्क विमर्शिनी में आ सुके है। वे केवल अगांगिमाव सकर को ही सकर मानते है। उनका मूछ विवेचन इस प्रकार है- सृ० अगत्वे संकरः । ११२। अन्यासंकारोपस्कार कत्वेनाङ्वा दुर्यकस्व च संकरालंकार:। वृ० 'हरयं साधकमानसंमवत्रकाव सदेहर्समावना नाछकरगता कदाचिदपि यत्राङ्गानिमावाद कचित्।
ससृष्ट थुक्तनयान्न तरपरिमितो युक्तख्विधा संकरः।' सर्याद= अलंकार यदि किसी अन्य अलंकार का उपस्कारक अर्यात शोमावर्धक होकर उसका अंग बने और उससे दुर्वल हो तो वहाँ संकर अलंकार माना नाता है। प्रत्येक प्रधान अलंकार का साधक प्रमाण वाक्यार्थ में रहता ही है, अत अटंकारों में संदेड को कमी मी ममावना होती ही नहीं। और क्योंकि सदेह को यह समावना अर्गागिभाव से भी कभी संमव नहीं है; इसी प्रकार सभी अलकारों के उच्ठित होने के मय से संसृषटि के समान एकामिधानानुपवेशसंकर मी समर नहीं है, अन. इनके आ्पार पर संकर तीन प्रकार का नहीं डो सकता। अप्पपदीसित-सर्वस्वकार के ही समान तिळतण्डुल के समान ससष्टि और नीरक्षीर के समान संकर मानते है। उनके कुदळयानन्द में ससृषि के वे हो भेद दिए गय है जो सवस्कार ने दिए है। संकर के भेदों में उन्होंने दो नम भेद मिनाप है पक समपाधान्य संकर और दूसरा
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उपसद्दार: ७५१
संकर-संकर। इनमें से प्रथम के लिए उन्होंने उदाहरण के रूप में 'अंगुलीमिरिय०' पद् दिया है। चन्होंने यहाँ उपमा और नत्प्रेक्षा में प्राधान्य की समानता बतळाई है। संकर-संकर के लिए इन्होंने मम्मट द्वारा प्रथम व्दाचालंकार के लिए उदाहत 'मुक्ताः कैलि वि०' पद्य दिया है और इसमें उदा्, तद्गुण, पदार्थह्ेतु काव्यलिंगालंकार का एक वाचकानुप्रवेश माना है। आगे उसके आधार पर भ्रान्तिमान् और उसके आधार पर उदात्त की पुष्टि मान अंगांगिभाव माना गया है। इन दो संकरों का यहाँ संकर माना गया है। इससे अ्तिरिक् इस पद्य में दीक्षित जी ने और भी अनेक अलंकारों की कल्पना की है। शेष मेदों पर अप्पयदीक्षित की भान्यताऐं परम्परागत मान्यताओं से भिन्न नहीं हैं। विश्वेश्वर= विश्वेश्वर ने अलंकारकौस्तुम में मग्मट की परम्परा का अनुसरण कर संसषि औौर संकर को पृथक् पृथक माना है। उनका निरूमण इस प्रकार है- संसृष्टि-मंसृष्टिस्तु परस्परमनपेक्ष्यस्थितिरनेकस्य। अनेक अलंकारों की परस्पर निरपेक्ष स्थिति संसषटि। संकर-अगांगिमाव०='पक्मपेक्ष्यान्यास्य प्रादुर्भावे तु संकरः प्रोका। एक के चल पर दूसरे की निष्पपि हो तो संकर। संदेइसंकर = 'साघ कवाधकमानामावचचैकस्य निर्णयाभावे।' सापक वाधक प्रमाण के अभाव में एक का निर्णय न होने पर [संदेद] संकरः।
शब्द और अर्थ के अलंकारों का एक ही पद से ज्ञान होने पर एक अन्य संकर होता है। चिमर्शिनी
अव इन अलंकारों का उपसंदार करने का उपक्म करते हैं- [सर्वस्व ] इदानीमुपसंहारसूत्रम्- [सू० ८७] एवमेते शब्दार्थोमयालंकारा: संक्षेपतः सूत्रिता। पवमिति पुर्वोक्तप्रकारपरामशः। पने इति प्रकान्तस्वरूपनिर्देशः । सूचिता अलंकारसूतैः सूचिता: संक्षेपतः प्रकाशिताः। तन्न शब्दालंकारा यमकादयः। अर्थालंकारा उपमादय:। उभयालं कारा लाटानुमासाद्यः। संसृष्टिसंकर प्रकारयोरपि कयोशित्नद्रपत्वात्। लोकवदाश्रयाश्रयिभावक्ष तत्तदलंकारनिबन्धनम्। अन्वयव्यतिरेकौ तु तत्कार्यत्वे प्रयोजकौ, न तदलंकारत्वे। तदलंकारप्रयोजकत्वे तु श्रौतोपमा· देरपि शब्दालंकारत्वम्रसङ्गाद्। तस्मादाश्रयाश्रयिभावेनैव चिरंतनमतानु सृतिरिति संपूर्णमिदलंकारसर्वस्वम्।।
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अन उपसदारसूत्र पनाते है- [सू०८७] इस प्रकार शब्द, अर्थ तथा दोनों के ये अलंकार संसेप में सूध द्वारा प्रस्तुत कर दिए गए।। [रृ०]'एवम्= इस प्रकार' = यह पूर्वोक्त का परामशंक है। 'ने =ये' = यह कह प्रक्रान्वत का निर्देश किया। सूतरिता-अलकारसूयों द्वारा सूचित किप गए और मक्षेप में प्रस्तुत किए गए। इनमें शब्द के अलकार हैं यमक आ्ाद्रि। अर्थ के अलंकार हैं उपमा आदि और दोनों के अलकार उमयालकार] है छाटानुपरास आदि। सवृष्टि और सकर के भी कुछ प्रकार वैसे [ चमया हकार] दो होते हैं। उनमें घो तत्तदलंकारत्व आता है उसका कारण लोक के समान आभरयाशयि भाव सम्दन्ध है। अन्वय व्यतिरेक तो तत्कायखव [की सिद्धि] में करण होते है। तदलंकारस्व [ की सिद्धि] में नहीं। इन्हें यदि तदलकारत्व का नियामक माना बर तो धोती उपमा आदि में भी शब्दालकारत्व प्राम होगा। इस कारण आभयाअ्रयिभाव से ही प्राचीन [आचार्यों के] मन का अनुसरण हो पाता है। इस प्रकार यह अल्कारसर्वस्व पूर्णे हुआ। इस प्रकार भटकारसवेस्तर का मध्यप्रदेशस्य सोहोरमण्डलान्तगंत नादनेर-निवासी स्व० प० सी. नर्मदापसाद दिवेदी के पुत्र साहित्यश्तास्त्राचार्य, मम. ए., पीएच. डौ०, मा० प० रेवाप्रसाददिवेदी कृन सविमर्श हिन्दी अनुवाद पूर्ण हुआ। चिमर्शिनी इदानीमिति। प्राप्तावसरमिति [भाव: ]। यथातर्वं सवपामलंकाराणां निर्णातरवाद्। तदेबार-पवमित्यादि। पतदेव उ्याचष्टे-एवमित्यादिना । संसेपेणेति। ग्रन्थस्थ, न पुनर्यंस्य। तस्य दि तथावकयने तेर्षो स्वरूपमेव कथितं न स्यात्। एवं प्रन्थसंवैपेगापि सर्वेपामसंकाराणों विस्तरत एव यथासरमव स्वरूपमुकमिति प्राच्यालकारप्रथेम्योडसय वैछपण्यमपि वनितम्। तम्र अन्यविस्तरेणप्येतावरूपस्यानमिघानाद्। अत वृव अन्य कारेण प्रयोजनमपि घ्योतितम्। के ते शब्दार्भोमयालंकारा हत्याशस््थाद-वत्रेत्यादि। आदिम्रहणादनुप्रासानन्वयरलेपादिना ग्रहणम्। मनु च लाटानुप्रासश्ळेपयोरेवोम यालंका- रं पूर्वमुकवा उमयालकाश इति यहुवचननिर्देश कर्थ संगरधते इस्यामाप्रयाद- संसष्ोत्यादि। तम्न संसृष्टकमयालंकारवं यथा-'आानन्दमन्यर-' इर्यादि। संकरस्य यथा- 'मे वमेवारस्व सच्छायकर्णिका चारवर्मिका। अम्मोप्निनीव चित्रस्था नेत्रमातसुसम्रदा ॥'
एवावसेयम्। अ्रन्थकृता दाथ्य समनन्तरमेव संसष्टावन्तर्भाव उकः । अतश्य अन्थकृन्मते
ननु तुक्यरचेपि काष्यशो भातिवाय हेतुस्वे कश्रिदलंकार: शष्दस्य, कश्षिदर्थश्य कश्चि दुभयस्पेति कुतः पुनरयं प्रतिनियम इत्पारट्य-छोकवदिरयादि। लोकेहि योडलंकारो
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यदाश्रितः स तदलंकारतयोच्पते, यथा कुण्डलादि: कर्णाद्याथितस्तदलंकारः । एवमिददापि शब्दादाश्रितस्तदलंकार इति सिद्ध पुवर विषयविभागरूपः प्रतिनियमः। यत्वन्यैरन्वय- व्यतिरेकी तदलंकार निबन्धनर्वेनोक्ती तद्युक्तमेवेत्याह-अन्वयेरयादि। एवं दिऔ्ौतो- पमायामिवाविशव्यान्तयव्य तिरेकातुवर्तनात्तरकार्यवमेव न पुनस्तद्लंकारत्वम्। तस्वा विशेपाद। अर्थत्य पुनरलंकृततवात तयलंकारत्वमेव युक्कमिति तात्पर्यार्थः। एतत्ोअमविवेके राजानकतिठकेन सपपञ् मुक्कमिति जन्थविस्तरभयान्नेहास्माभिः प्रपध्वितम्। पुतदेवोप संहरति-तत्मादित्यादि। आकयाअयिमावेनेति। उपस्कार्योपसकारकमावेनेत्यर्थः। तेन चोड लंकारो यदुपरकारका लः तदलंकार इति पिण्हार्था। चिरंतनेति। अनेनाश्माभि: सर्वन्नैव तन्मतानुछतिरेव कृते:्यात्मविपयमनौदव्यमपि ग्रन्थकृता मकाशितमिति शिवस्॥ राजराज इति सूभुज्ञामभूद्ग्रणीर्युणियणाञ्रयः परमू। तां सतीसरसि राजहंसतामातनोत किल घनागमेऽपि य:॥ शकाषिक श्चियस्तस्य श्रीशङ्गार हति ध्ुतः। गुणातिक्रान्तविषगो मन्त्रिणामग्रणीरभूत्।।
वयधादिदमसामान्यं श्रवणाभरण सताम्॥। यचाम किचििद सम्यगधान्यथा वा सामतादलंकृति नयोचितमेतदुक्तम्। विद्वेपरोपमपसार्य दुधेः नणस्य तन्नावधेयमियतैव वर्य कृतार्याः॥ दति श्ीजयरथविरचितालंकार विमर्शिनी संपूर्णा ।।
[इदानीन्=अव=] सवसर आने पर। व्योंकि सभी अलंकारों का निर्णय प्रत्येक तत्व के ष्टीकरण के साथ करा दिया गया है। यही कहते हैं-एवम् इत्यादि सूत्र के द्वारा। रसी की व्याख्या करते हैं 'एवम्' इत्यादि द्वारा। संक्षेपेण= संक्षेप में; अर्थात ग्रन्थगत संक्षेप में, न कि वस्तुगत संक्षेप में। वस्तु में सक्षिप्तता कहना अमीष्ट होता तो अलंकारों का स्वरूप ही न कहा जा सकता! इस प्रकार 'ग्रन्थ का संक्षेप रखते हुए भी सबके सब अलंकारो का विस्तारपूर्वक, जैसा सभव था, बैसा स्वरूप बतलाया' ऐसा कहकर प्राचीन अलंकार ग्रन्थों से इस अन्य की विलक्षणता [विशिष्ता] को भी अनित कर दिया। उन ग्रन्थों में तो अन्थविस्तार रहने पर मी इन [अलंकारों ] के स्वरूप ठीक से प्रतिपादित नहीं हो पार हैं। इसीसे ग्रन्थकार ने इस ग्रन्थ का प्रयोजन भी वतलाया। शब्द, अर्थ मौर दोनों के वे अलंकार कौन हैं इस प्रकार की शंका उठाकर कहते हैं-'तत' इत्यादि। 'आदि-' शब्द देकर अनुपास अनन्वय और श्लेष आदि का मी संग्रह किया। झंका होती है कि पहले [अ्न्थारम्म में] तो लाटानुपास तथा इलेप इन दो अरुंकारों की ही वमयालंकार वतलाया है, जब यहाँ 'उमयालंकारा"' इस प्रकार जो बहुवचन का प्रयोग किया इसमें संगति कैसे चैठेगी।' इस पर उत्तर देते हुए कहते है 'सस््ष्टि'-इत्यादि। इनमें संसृष्टि का उमयालंकारत् 'मानन्दमन्थरo' [ इत्यादि पूर्वोधृत ] पद्य में है ही, संकर का उमयालंकारत्व [उन्द्रट के]'मैवमेवा०' इस पद् में मिलता है इसका अर्थ है- 'इसी प्रकार मत नैठो। सच्छायकर्गिका तथा चारुवर्णिका वह [पार्वती] चित्रस्थ अम्सोजिनी के समान केवल नेत्रमान्नसुखप्रदा है। [पार्वती पक्ष='सच्छाय०= सुन्दर कान्ति वाले हैं कान
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७५४ अलङ्कारसर्वस्वम् जिसके, 'चाद' = सुन्दर है वर्ण=गौरत्व जिसका, नेत्र= आसों को० फमलिमीपस= सच्छाय= सुन्दर है कर्गिका पुष्पमध्यमाग जिसका, 'चारु०'= सुन्दर हैं वर्ण= राजहंसादि पक्षी जिसमें, नेत्रमात् नेत्र कमल की नाल या हृगाल [जड, द दपचरित में नवजात राज्यश्री के लिए प्रयुक्त 'दीर्घरक्तनेश्रम्' विशेषण द्वारा उसकी अम्मोजिनी के साथ उपमा] इम पथ में [अनुप्रासरुपी] शब्दालकार तथा [उपमा रूपी] अर्थालकार का सस्गे है, अतः यह [सकर] समयालकार है। सकर का यह जो उमयाएं कारत्व यहीँ बतलाया गया है यद केवल उद्धट के ही मन के अनुसार बनलाया गया समझना चादिए। र्वय ग्रन्थकार तो इसका अमी भ्रमी सपष्टि में अन्तर्मद वतन्म आए है। इसलिए इस पद्य में गरन्थकार के अनुमार एटानुमास सर्ाष्त है। इसी प्रकार समी कलेप समयालंकार होने हैं। प्रश्न उठता है कि अलकार वह धर्म कहलाना है जो 'काव्य शोमाकारी' होता है और यद गुण सभी अलकारों में समान रूप से रहता है, नब यह नियम क्यों कि कोई अलकार केवल शब्द का कोई बेवल अर्थ का और कोई दोनों का। इस पर उत्तर देने हैं-लोकवत्=इत्यादि। कोक में जो अलकार जिम अग में पहना जाता है वह उसी का अलकार माना जाता है जैमे कुण्डल आादि कान आदि में पहना जाना है अन उन्हों का बलकार कहा जाता है। इसी प्रकार यहों मो शब्द आदि में आशित उपमादि अरंकार उन्हों के अल्कार माने जाने है। इस प्रकार विषय मेदरूपी प्रतिनियम वास्नविक सिद्ध होता है। 'अन्य आचार्य [मम्मट] ने अन्वयव्यनिरेक को जो तदलकारता का नियामक माना है वद अयुक्त हो है'-यदी बतगते हुए कहा-नन्वय इत्यादि। तातपर्ये यह कि इस नियम के अनुसार तो भौती उपमा में [उपमा अपने वाचक] 'इ'- शब्द के अन्वयव्यतिरेक का अनुवत्तंन करती है [ इनके रहने पर रहती है और न रहने पर नही] अत उपमा उन वाचक शब्दों का कार्य है न कि उनका अलकार, क्योंकि [उपमा आदि से] उम [वाचक इव आदि शब्द] में कोई विशेषता नहीं आनी। जहाँ तक अर्थ का सबन्ध है वह उससे [उपमा आदि] अनकृत [शोभायुक्त] हो जाता है, अत [उपमा आदि ] का उसी का अलंकार होना उचिन है। यह सब व्रविवेक में राजानक तिलक ने विस्तारपूर्वक चतला दिया है इसलिए ग्रन्थविस्तार के मय से यहाँ इमने उमे नहीं फेलाया। इसी का उपसदार करते हुपलिखते हैं-तस्मात् इत्यादि। आध्रयाश्रयिभावेन= आश्याथ्विभाव से= उपस्का्यों- पकारकमाव से। अन पिण्डार्य यह कि जो अलंकार जिसका उपस्कारक होता है वह उसी का अलकार कहलाता है। चिरंतन= इसमे यह बनलाया गया कि इमने सर्वेत्र उन [प्राचीन भचार्यो] के मत का दो अनुमरण किया है जिससे ग्रन्थकार को अपनी अनुद्तता = शालोनता मौ प्रकुट होती है । इति शिवम्॥
'राजराज नामक राजा शुणी जनों के द्कृष्ट आश्नय और राजाओं के अग्नगी हुए हैं, जो सतीसर में छनागम [वर्शकाल तथा धन=महन आगम-सास] में भी उस [प्रसिद्व] राजइंसना [राजहंस=लाल चोच नथा लाल चरणों वाला घवल इस, तथा राजा रूपी इस = विद्ान् ] को प्रकाशिन करते थे। इन्द्र से भी अधिक श्रीवाले उमी राता के, गुणों में वृहस्पनि से मी बडे श्रीशृंगार नाम से विदित जो प्रधान मन्त्री है-
जनके जयरयनामक विदग्ध मुत्र ने अच्छे विद्वानों के सवगों का यह असामान्य आामरण बनाया।
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उपसंहार: ७५५
सरंकार शाल के अनुरूप ठीक या गलत यह जो भो कुछ कहा गया है इम पर विद्वेष औौर रोप दूर कर विद्वान् क्षगभर के लिए ध्यान दें। इतने से हो हम स्वर्यं को कृतार्थ समझेंगे। इस प्रकार श्री जयरयविरचित अलंकार विमर्शिनी पूर्ण हुई। इस प्रकार अलंकारविमर्रिनी का मध्यमवेशस्थ सीहोरमण्डलान्तर्गत्ष नादनेरग्रामनिवासी स्व० पं० श्रीनर्मदाप्रसादजी दविवेदी के आत्मव साहित्यशाक्राचार्य ए.म्. ए, पीएच ही., पर० पं० रेवापसाद द्विवेदी द्वारा कृत विमर्श सहित हिन्दी अनुवाद पूर्ण हुआ।
रेवाया उत्तरे तीरे नादनेरेति विश्ुतः। यामो मध्यप्रदेशाङ्केशयो वस्तन्निवासिनः ॥। श्रीनमंदापसादस्य काश्यपस्य द्विवेदिन:। आत्मजेन मया रेवाप्रसादेन द्विवेदिना। काव्येडलह्वारवत काव्यालङ्वारे जीविनोपमन्। अदोडलकारसवस्वं विमशिन्या विभासितम् ॥ सचिमर्शेन हिन्दीवागनुवादेन साम्म्तम् । चथायरयं विशोध्याडप्रयोः संदिन्मातुनिधीयते॥ नास्ति काचन विदां निमानना तन्मतं यदि विदूष्यते परैः। अज्जनेन खल तैन लोचनं संविदो नियुणमुतकाशते। नास्ति काचन विर्दा समाजना तन्मर्तं यदि समथ्यते परैः। तारकेरनुसृतं न मण्डलं कि विषोर्भजति लक्ष्मलक्ष्मताम्। ताटस्थ्मान्रमुपजीव्य ततो विपश्चिद् वौक्षेन शास्त्रकृति वत्मे नयेन शुद्धन्। स्वान्वौक्षिकी दि निखिलागमगह्वरेपु दीपायितं अयतति तत्त्वविश्योधनायान्॥
।। ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम् ।
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परिशिष्टम् (१)
श्रीराजानकरुव्य क्प्रणीता सहदयलोला
अथ गुणोलेखः ॥ १ ॥ श्रीमतामुत्क पंपरिज्ञानाद वेदग्ववेन सहृदयत्वानागर कतासिद्धिः। युवत्यादीवासुररुर्षो देहे सुणालंकारजीवित परिकरेभ्यः। तन्न शोभाविधायिनो धर्मा सुणाः। रूपं वर्षः प्रभा राग आभिजात्यं चिलासिता। लावण्यं लक्षणं छाया सौभाग्यं चेत्यमी गुणा:।। अवयवानां रेखास्पाश्यं रूपम्। गौरतादिधर्मविशेषो वर्णः । काचकच्यरूपा रवि- वत्कान्तिः प्रभा। नैसर्गिकत्मेरवमुखप्रसादादि: सर्वेंषामेव चनुर्बन्त्रको धर्मो रागः। कुसुमधर्मा मार्दवादिर्ललनादिरूपः स्पर्शविशेष: पेशलताख्य आभिजाव्यम्। अङ्गो- पाङानां यौवनोहेदी मन्मथवासनाप्रयुक्त कटाकादिवद् विभ्रमाख्यक्षेष्टविशेषो विलासिता।
ह्ादको धर्मः संस्थानमुग्धिमव्यङ्गचो लावण्यम्। अङ्गोपाङगानामसाधारणशोभाप्राशसत्य हेतुरो चित्यात्मा समयो धर्मो लक्षणम्। तस्य युक्तपमाणता-दोप(! पा) रपर्शसििम्धवक्रनिय
पडू मेदा:। अग्रास्पतया वक्िमावसयापिनी ताम्बूलपरिधाननृत्तभणितिगमनादिस्थानकेपु सूचमा भक्रिरदाया। स्फुरहपम्युपभोगपरिमलादिगम्योऽन्तासारो रख्षकतया वशीकर्ता सहृदयसंवेद्यधर्मभेदश्व सौभाव्यम। तन्राद्ये स्मरमदपुलकादयो भेदाः। अन्त्े तु
इति राजानकश्रीरय्यकविरचितारयां सहृदयलीलायां गुणोल्लेखः प्रथमः॥।
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अलङ्कारसवस्वम्
अथ अलदागेलेसः ॥२ ॥ रत्नं द्देमांशुके मा्र्यं मण्डनद्व्ययोजने। प्रकीण चेत्यलंकारा: सपैवते मया मताः ॥
प्रवालरूपाणि तरयोदय रतानि। हेम न वधा। जाम्बूनद-शातकौम्म दाटर-वैगयभृद्रीशुक्तिम-
दिर्निबन्धनीय । उर्मिकाक्टकमक्जीरसदय प्रनेष्य'। प्रालम्ब माहिका दार-नक्षत्रमाला- प्रमृतिराशेप्य । चतुधांशुकमय। स्वक्फलक्रिमिरोमनवानकरमेण क्षीमकर्णमकौशेयराङ्ट वादिभेदात्। पुनख्निधा। निबन्धनीय प्रत्षेप्यारोप्यवैचिन्यास्। तब्र नियन्धनीय: शिर'- शाटक जघनवमनादि'। प्रसेप्य वजलिकादि। आरोप्य उत्तरीयपटादि'। सर्वस्याम्यानेर विधन्व वर्रविच्छित्तिनानातवात्। अ्रयिताप्रवितवशाद द्विविध' सन्नष्या मात्यसयः। घेष्टित विननसंघात्य ग्रन्थिमद्वलब्ब मुफ्तकमक्रीम्तवक्ळत्ृणमालय मेदेन। तत्रोद्दतितं वेष्टितम्। पाश्वंतो विस्तारित विततम्1 बहुमि' पुप्पैः ममूहेन रचितं संघायम्। अन्त शम्तरा विपम अ्रन्थिमत्। स्पष्टोम्भितनवठानमू। केवलं मुकरु। अनेन्पुप्पमयी लता मकरी। कुसुमगुलव्हं स्तबर। तस्यावेध्यादुयोऽपि चरवारो भेदा। कस्तूरीकद्ुमचन्दन व ्पूंरागुश्नु लकदन्त समपट वाससहकारतैटनाम्बूलालककाअन गो रोच नादि निर्वृत्तो मण्डन द्रव्यमयः। म्रघटनालकरचनाधम्मिव्नबन्धादिर्योजनामय। द्विया प्रकीर्णमयः। जन्य
दन्तपत्रियामृणालवल्यकरक्रीडनकादिनिवेश्यः। एतत्समवायो देप । स च देशमलम्रक्ट-
द्ृति राजानकुधीरव्यकविर चितारय सहृद्यलीलायामलकारोल्षेसो द्वितीय.॥
१. कर्केनन- सिग्धा विशुद्धा समरागिगश्व आपीनवर्णा शुरवो विचिना। आम-न्रग-व्याधि विवर्जिताथ कर्हेननास्ते परम पवित्रा. ॥ वर्णेन नद रुधिरसोममभुप्रकाशमानाव्रपीतददनोञज्वसित विभानि। नोल पुन सनसित पमुप विभिन्न व्यान्यादिदोपररणठन ने तद विभानि।।
पहाय्जमृदावविचित्रमक्का एने प्रशस्ता पुल्का प्रसूना.11 रविराशषन-तन्रेन्द्रगोपकलत शुरुवस्त्रवर् सस्थानन प्रकट्पीकुसमानमानम्। नानाप्रकार विहिन कमिरास्यरत्नम् ॥1-शन्दकत्पनुमे गा्डपुरा ववचनानि। भीगम्- शुक्लवर्ग प्रस्तरविश्येष-शव्दार्थचिन्तामणि
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राजानकरुव्यकप्रणीता सहृदयलीलाव्याख्या अथ जीवितोलेखा ॥ ३ ॥ शोभाया अनुप्राणकं यौधनाख्यं जीवितम्। चाव्यानन्वरं गात्राणां वंपुल्यसौएव- विभक्तताविधायी स्फुटितदाहिमोपमः स्मरवसतिरवस्थाभेदो यौवनम्। तस्य वयःसंधिरा रम्भः। मध्यं तु मौदिकालः। मरथमे धम्मिशर चनालकुमगगनीवीनहनदन्तपरिकमपरिष्क
शिक्षाद्य आवर्तमानारचेष्ः। अनत्ये तु शह्ारानुभावतारतम्यं भ्रेयय:। इति राजानकश्रीरय्यकविरचितारयां सहृदयलीलायां जवितोल्लेखस्तृतीयः॥
अथ परिकरोलेखः ॥ ४ ॥
शोभाया आरादुयकारकत्वाद्णव्यक्षकः परिकर:। तस्य चेतनाचेतनयो: स्थाणुचलयोः प्रत्येक छिएसंनिहितमात् रूपव्वेनाष्टविधत्वम्। उत्सङ्गोपासी नकान्तहयपरिवार वातायन- वितान-नौ-छघादीनि दर्शनानि। तानि द्विया व्यस्तसमसतभेदात। एवं झोभासमुत्पादक समुद्दीपकानु प्राणकव्यक्ञका: क्रमाद गुणालंकार जीवितपरिकरा। एवं परस्परोपकारकत्वा दितरेतरानुग्नाहकत्वं सिनूस्॥ इति राजानकक्षीरय्यकविरचितायां सहृदयलीलायां परिकरोल्लेखन्नतुर्थः॥
समातेय सहद्य लीला
- (क) पिशेलसंपादितायाः सहृदयलीलायाः पुष्पिका सर्वस्वस्य भूमिकाया ७ पृछ्े दृश्या। अस्माकमाधारो निर्णयसागरीयः कश्मीरवेशीयपुस्तकश्याश्रितः पाठः। तत्रापि पाठन्तरे साडस्त्येव [ काव्यमाला-4]। (ख) चतुर्णामप्येतेपां गुणालक्कारजीवितपरिकराणां लक्षणान्तराणि रसार्णवसुधाकर- भावप्रकाशनादिपु नियन्धेयु, निदर्शनानि व कुमारसंभवकादम्वरीनेपयादिषु शरद्गार- प्रबन्धेपु सुलभानि।
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परिशिष्टम
पृ०
अचगो: स्फुदास ७०९ आकृष्टिवेग ३३९ अङ्गलेखाम्ं १६५ ३७३ अङ्कुलीभिरिव आटोपेन अण्ण लडद २२५ अतिगयित आनन्दमन्थर ७२५ आभाति ते १२३ अव्रानुगोदं अथ प्त्रिमता ५३६ आरोपयसि
अथोपगढे ३३९ आहृतोऽपि २७६
अनन्तरत्र ४०० इति कृतपशुपति ६५७७
अनन्यसामान्य २०१ अनतपत्रो इन्दः किं ६८० इन्दुलिस ३८४ अन्तश्छिदाणि ३९१ इन्दोर्लक्षम ४२१ अपाइसरले ६२५ अन्घिलंदित २६३ उत्कोपे स्वयि २७७
उस्किस्तं सह ३०९
अयं मातण्ढः कि १४२ उद्भरान्तोज्तित १६९
नयं वारामेको ४५३ उन्नत्य नमति
अयमेकपद़े ५९३ उपोढरागेण ३१५
अर्यरुदितम् २७७ उरो दच्वा अरपयानी ४८९ ए पहि दान ६१६
अलङ्वार: शङ्टा ५८६ एकस्मिन्त्रुयने अचिरल २२८ एकाकिनी ६४२ अन्यात्स वो २६९
असमाह ३६९ पससस्य
असंभृतं ४६५ एतान्यवन्ती
अस्या: सर्गविधौ ऐन्दं धनु: ३३५
अहमेव गुरुः ६१७ ष्टे बिम्नफला ५९ अहीनभुजगा 29
अहो कनेदशी ६५६ कजलहिम
अहो कोपेडपि कण्ठस्य तस्या: ५०५
अहो हि मे ४०२ कपोलफलका १९७
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अलद्वारमवंस्वम् सस्कल पृ० पo कमलमनम्भसि २२४ चिन्नं चिनं ४९५ कर्पूर हय ४७६ चूटामणिपदे २६९ क्म्नूरीसिलक २०१ पोलस्य यद्दीति करतव भो. ३९१ जये धरिभ्या: का विसमा ५३३ ६४२ जञितेन्दियरवं काशा: काशा ५२३ ७२ किं तारण्यतरो ज्योरस्नातम ४३० २४२ कि नाम ददुंर ज्योरस्ना भरम १६९ ६० कि पघस्य १२३ णारात्रणो सि १५९ किं भूषण नण्णस्थिमिपि ३८३ कि मे दूरोदरे ६५१ तदिदमरण्यं ६८८ किं वृत्तान्त. ४२१ तन्वी मनोरमा ३१५ किं हास्येन न ७०० नस्य च अवयसो किमामेव्य नाल जाअन्ति ७१ किमित्यपास्या तीर्वा भूतेश १३५ किवगाण २४५ तीर्थान्तरेपु कुवरजुष्टां नयीमयोऽपि ३६६ सु मुदवने सवं हालाहल ६५६, ७३२ कुलममलिन ६०० स्वत्पादनस २०३ वृतं च गर्वा २६३ स्वदम्माद्वं २३६ कीटित्य कच स्वद्क्त्रासृतपान काकाय ७१५ रवमे वंसीन्दर्या ४९४ मीण: क्षीणोऽपि २८६ दर्वा दशन समिव जलं १०३ दन्तपभापुप्प दामोददूरकरा ३१७ गच्द गच्तसि ४४० गणिकासु विषेयो ४३८ दारण: काछतो 20 गण्डान्ते मद ३२७ दासे कृनागमि १२३ गतासु तीर २०३ दाहोऽम्भ: २२६ गर्वमसवाह्य ६१६ दिदसव पन २८६
६३७ दिव मप्युप ५०८ गाढालिद्ग न ७०५ दुर्वारा स्मर ६०० गुरपरतन्त्र ६५२ दूराकर्पण गृद्षन्तु सव ४३६ दशा दग्घं देया शिलापटट ५१५
घेतुं सुचह. चकोर्य एव दुवि पपा ३३६ ७२५ २५५ दोदण्डाबित चक्राभिघात ५०९ २८६ घामा लिलिन चन्दग्रहणेन ६५७ युजनो मृपयुना ३२७ ३०१
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अलङ्गरसर्वस्वोदाह तन्ो कानुक्रमणिक्का ७६३
पृo पृ० वौस्त्र कचिदाधिता ५०१ प्रासादे सा
धन्या: खलु ३९१ वाणेन हरवा ४३६ धब लोऽसि ६३७ वाउअणाहं ४३०
घावरदश्व २३६ विभ्राणा हृदये ५९६
पतधनुपि ५८६ मम: कियलय न तजतल ५२८ नन्वाश्रयस्थिति भक्तिप्रहविलो ५९२ ५६८ निमेषसपि भक्तिर्भवे ५८७ ५०९ निस्थकं जन्म भवदमराध: २९८ ३८ निरीचय विद्यन्नयने: ३१७ भासते प्रतिभा
निर्हनान्यरुकानि ४७ ३२६ भुजसकुण्डली
निझासु भात्वत ५६५ भ्रमिमरति
नीतानामाककुली ३५२ मर्गअलदूग्म २२५
३३५ मदनगणना
नो किश्चित् कथय ४४० मनीपिता सन्ति ५३९
न्यज्त्कुजित ५९७ मन्दुममि ३२७
पथि पथि मळयजरस ६३२ १९८ परहिशअं महिलासहस्स e८९ परिच्छेदातीत: ६०८ ४५३ मानमस्या ६८७ परयंक्टो राज मुका केलि
पशुपतिरपि मुण्डसिरे २७६ मुनिजयति ६८० पश्यत्सूदत मुरारिनिगता ७४२ पशयन्ती नपमेव ३३४ मृगळोचनया ३०९ परयाम: किमियं ३८४ मृग्यश्च ५३८ पाण्ड्योऽयमंसा ८१ पाताळमेत यः कौमारहर: ४७६, ७३६ पीयृपप्रसति: $२३ चत्वनेत्रसमान प३८ पुराणि यस्थां गन्नेता लहरी ५५० पुप्पं प्रवालोप २२ यत्रेव सुग्घेति ५६५ पूर्णेन्दोः परिषोष चथा रन्धं ५ु५ु० पत्नि स्थिरा भव ४०० यदेतचन्द्रा ६६८ प्रभामहत्या यद्वमब्रचन्द्रे ७३६ प्रसरद्विन्दु ७३९ यद्वा मृषा ४२६ प्रसर्पत्तात्पयं ३२७ य द्विस्मयस्ति ५३९
मसीदेति ४३० चस्य किचिदप ६१२
प्राप्याभिपेक २०६ यान्त्या मुहु माय: पव्य ४८५ यामि मनो वा ९२४
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अलक्कारसर्वस्वम्
पृ० सुद्धेऽजुंनो ९८ विसृषरागा ५६५ ये कन्दुरसु ६२६ चिस्तारशालिनि १२३ चेन ग्वस्तम ३-२ वेन नस्बालक: ३८६ शरदीव ७४० चैरेहुरूप 3२ पेरटषटोकमि दाशी दिवस ६०० २३३ योगपट्टो शुद्धान्तदुर्लभ २३६ शैलेन्द्र पसिपाध ६५२ यी य. पश्यति ६७ सकेनकाल ६४८
रच्दृदत्यं ३५२ संग्रामाङ्गण रजिता नु १४२ सचारपूनानि २४५ रथस्थितानां २०१ स परुस्रीणि ४७६ रानति तटीय ७३५ मच्छायाम्भोज १०३ राजन् गतसुता ३८७ २३६ रज्ञो मान ३४४ सन्युष्करोद्योति राज्ये सारं ५३३ सच: करस्पश १८८ रेहड्द मिहिरेण २४५/ मद्य कीशिक ३७०
लावण्यद्विण म व. पायादिन्दु:
लावण्यौकसि २२५ १९४ स वसमसिलान्
टिग्पनीव ५५०, ६१६ सहमा विद्धीत ४००
लोकोत्तरं सझ्ा पननग ६२ ४०० साधूनामुपकतुं २४५ चत्त्नस्यन्दि ६४८ सा खाला वय ८५ वदनसौरम ७२५ साहित्य पाथो ४३६ वसुरदितेन बामेन नारी ६५9 सीमान न ३२७ मुददभ ४३० बिजये दुशल तिदुळितसकला ६५६ सेणा स्थली १९५ ५९३ सौजन्यास्तु १३० विद्धन्मानम विनयन बिना १२३ स्पृष्टास्ता नन्दने
चिमिसरर्णा ३०६ रचपसलीला ३२ ३५२ दियोगे गौढ ६३५ स्वच्छोपजात
चित टुयन्ति २०५ हा राही ६५७
विलसदमर हुद्वारो नस ६६४ १६८ विलिसति हृद्यमधि २२७ ३२६ ) हे हेलाजिन ४२०
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पृo भके न्यस्योत्तमाङ इन्दूदय ६३६ अक्गनि चन्दन ५६० इहिणं पदुणो अङ्गेपु सान्द्र ५९० ईर्प्याविकाराव अतन्दचन्द्राभ सतसीकुसुममर्भ उत्तनः प्रोल्लस 2२
अन्नासीत फणि ६८९ उहसरसरद २७८
अस्युच्ा: परितः ७०३ पअतंभवन २२८
अनेन साध सरयू ३८५ एकान्तजाड्य 485
अभेतमूटत्तव ६२८ एकाकिनीयद ५२
अमृतकवला 996 पतकथ के
अयं सुरेन्द्रोप १७८ एप नीरोदजन्सा ४३३
अग्महिमत एप श्रीकण्ठकण्ठ ६५९
अथि प्रमत्ते कटु कणन्तो म टर
अलससिरोम 29 कन्दर्पदिपक अलकिकमहा ६२७ कमलदलैर सवरयं तरहो कमलरशः क ६३
अदाप्त:प्रागत्म्यं १५, कमलेव सति ५०५
अविरलक्कर ७०३ कलाभिस्तृपत्यर्थ १७९
मसोढा तर्काल ७१६ कलिमियाक्षश्
अह सन्नणाण ४२० कश्वित् कान्ता ६८९ का स्व रकपटा साजाघर:पञ् २७४ कानसाननस्य के आलितितुदशि २४६ कामशोकभयो आवर्जिता किचि १३ कि कर्णपूरेयदि ६१८
सवाससतम ३५० ६७८
आारता वालस्य सें कि छत्रं किन्नु ५३४
आस्तामस्तमयो कि पङ्मजं किमु माह्लादिचन्द्व ३२० किं मणिमो भण्ण किभानु किसु इच्छन्ती चित्ुक्ा ३५४ किमिदमसिता ९४३
इतश्रारमेम ६९५ इचकुचचचिबुका ६९५
इत्तिअमेतुम्मि १0० कुने: कोटर एव ५३४
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७६६
पृ०
दमदिन्य धमो २०८ तरुगतमाद वु तममलिनं ५१५ तस्मात् समस्त कृष्टरेणोरुयुगं तम्या दे यविना निरन्न्य चिन्त्यानि 5३८ तस्यासयेन प ६८२
दोग्नालितच सेटमीनां सुरपति ६१८ तं णम हणादि तं ताग मिरिस गाटकान्तदशन रव दुयलावण्य गन्पेन मिन्तुर स्वामा लिग्यप्रण गअणं च मत्त २३ तिपेरकोपन गोदाचर्या: करि ६८९ तुरीयो हेपने दममानमिवौ ९००। तुरीयोह्ोप मे ग्रामतरूर्ण न नुहिन चितिम् गिजते मगल १९९ ते गत्ुन्त महा गुणानामेव ४५२ त्याजयो नैप सिश: गीर सुपीबरा ८३ घिलोक्यं रलभू' गृहद्नि परया २११ त्रिशशे: परिपूर्णानां गृहीननिग्रह. ९४ दन्तचनानि क
धनोद्यानच्छाया ८६ दानुं बाब्छति द द्विगुणितादुप २४८ चन्दाशुरमेर दिनअरभर ६७८ चोरिभरमणा दर्भाद्वरेण चरण' ५१० दिव्योतरीयमृ ६ दीदादीनां ददी
जर्माद्अअवि टटनरनिय
जनयिणथा: कुन्ा हलीलासु सकौ .८८ जयति सिशिर दुर्जनदुपित १९३ जाग्रत क्मला दरपवासे २७४ जानेकोपपरा देवि तज़रणा ४0 दाक्षाफलानि ण असव ण क् ४६६ द्विपां तचारपय
तं बीष्य वेपथु हेन्योऽपि संमत
तत सोममिते धनेन जायते तदुम्वि तेपां धम्मज्णेशका तन्वी मनोरमा २२० धर्मायेविद तदुनपुनायुग १०५ न ज्योस्स्ामरणं