1. Amrita Nada Upanishads
Text
1.0
शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः। परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत्तान्यथोत्सृजेत्।।
śāstrāṇyadhītya medhāvī abhyasya ca punaḥ punaḥ। paramaṃ brahma vijñāya ulkāvattānyathotsṛjet।।
The wise, having studied the Shastras and reflected on them again and again and having come to know Brahman, should abandon them all like a fire-brand.
परम ज्ञानवान् मनुष्य का यह कर्त्तव्य है कि वह शास्त्रादि का अध्ययन करके बारम्बार उनका अभ्यास करते हुए ब्रह्म विद्या की प्राप्ति करे। विद्युत की कान्ति के समान क्षण-भङ्गुर इस दीवन को (आलस्य-प्रमाद मे) नष्ट न करे।।
2.0
ओंकाररथमारूह्य विष्णुं कृत्वाथ सारथिम्। ब्रह्मलोकपदान्वेषी रूद्राराधनतत्परः।।
oṃkārarathamārūhya viṣṇuṃ kṛtvātha sārathim। brahmalokapadānveṣī rūdrārādhanatatparaḥ।।
Having ascended the car of Om with Vishnu (the Higher Self) as the charioteer, one wishing to go to the seat of Brahmaloka intent on the worship of Rudra, should go in the chariot so long as he can go.
ॐकार रूपी रथ मे आरूढ़ होकर तथा भगवान् विष्णु को अपना सारथि बनाकर ब्रह्मलोक के परमपद का चिन्तन करता हुआ ज्ञानी पुरूष देवाधिदेव भगवान् रूद्र की उपासना मे तल्लीन रहे।। [प्राण यदि लौकिक सुखपभोहगो पर आरूढ़ हो जाता है, तो क्षीण होता है। जब रेडियो तरंगो पर ध्वनि को आरोपित (सिपर इम्पोज) करते हैं, तो रेडियो तरंगे कैरियर=रथ बनकर उस ध्वनि को विश्व भर मे पहुँचा देता है। उसी प्रकार ॐकार पर आरोपित प्राण परब्रह्म तक पहुँच जाता है।]
3.0
तावद्रथे गन्तव्य यावद्रथपथि स्थतिः। स्थात्वा रथपतिस्थानं रथमुत्सृज्य गच्छति।।
tāvadrathe gantavya yāvadrathapathi sthatiḥ। sthātvā rathapatisthānaṃ rathamutsṛjya gacchati।।
Then abandoning the car, he reaches the place of the Lord of the car.
उस (प्रणवरूपी) रथ के द्वारा तब तक चलना चाहिए, जब तक कि रथ द्वारा चलने योग्य मार्ग पूर्ण न हो जाये। जब वह मार्ग (लक्ष्य) पूर्ण न हो जाये। जब वह मार्ग (लक्ष्य) पूर्ण हो जाता है, तब उस रथ को छोड़ कर मनुष्य स्वतः ही प्रस्थान कर दाता है।। [जब ध्वनि तरंगे रेडियो तरंगो के साथ अपने लक्ष्य-ट्रांजिस्टर तक पँहुच दाती है, तो वे उन्हे छोड़कर अपने वास्तविक रूप मे पुनः प्रकट हो जाती है। इसी प्रकार प्राण को चाहिए कि वह अपने इष्ट लक्ष्य तक पहुँच कर वाहक-रथ (कैरियर) को छोड़कर अपने को इष्ट के साथ संयुक्त कर दे, यह परामर्श ऋषि दे रहे हैं।]
4.0
मात्रालिङ्गपदं त्याक्त्वा शब्दव्यञ्जनवर्जितम्। अस्वरेण मकारेण पदं सूक्ष्मं हि गचछति।।
mātrāliṅgapadaṃ tyāktvā śabdavyañjanavarjitam। asvareṇa makāreṇa padaṃ sūkṣmaṃ hi gacachati।।
Having given up Matra, Linga and Pada, he attains the subtle Pada (seat or word) without vowels or consonants by means of the letter 'M' without the Svara (accent).
प्रणव की अकारादि जो मात्राएँ हैं तथा उन (मात्राओं) में जो लिङ्गभूत पद हैं, उन सभी के आश्रयभूत संसार का चिन्तन करते हुए उसका त्याग कर, स्वरहीन ‘मकार’ वाची ईश्वर का ध्यान करने से साधक की क्रमशः उस सुक्ष्म पद मे प्रविष्टि हो जाती है। वह परम तत्त्व (‘अकार’) आदि स्वरो तथा ‘ककारादि’ व्यंजनों रूपी) सभी प्रपचों से पूर्णतया दूर है।।
5.0
शब्दादि विषयान्पञ्च मनश्चैवातिचञ्चलम्। चिन्तयेदात्मनो रश्मीन्प्रत्याहारः स उच्यते।।
śabdādi viṣayānpañca manaścaivāticañcalam। cintayedātmano raśmīnpratyāhāraḥ sa ucyate।।
That is called Pratyahara when one merely thinks of the five objects of sense, such as sound, etc., as also the very unsteady mind as the reins of Atman.
शबद, स्पर्श आदि पाँचो विषय तथा इनको ग्रहण करने वाली समस्त इन्द्रियाँ एँव अति चंचल मन-इनको सूर्य के सदृश अपनी आत्मा की रश्मियों के रूप मे देखे अर्थात आत्मा के प्रकाश से ही मन की सत्ता है और उसी प्रकाश स्वरूप आत्मा की बाह्य सत्ता आदि भी सत्तावान् है। इस प्रकार से आत्म-चिन्तन को ही प्रत्याहार कहते हैं।।
6.0
प्रत्याहारस्तथा ध्यानं प्राणायामोऽथ धारणा। तर्कश्चैव समाधिश्च षडङ्गो योग उच्यते ।।
pratyāhārastathā dhyānaṃ prāṇāyāmo'tha dhāraṇā। tarkaścaiva samādhiśca ṣaḍaṅgo yoga ucyate ।।
Pratyahara (subjugation of the senses), Dhyana (contemplation), Pranayama (control of breath), Dharana (concentration), Tarka and Samadhi are said to be the six parts of Yoga.
प्रत्याहार, धयान, प्राणायाम, धारणा, तर्क तथा समाधि इन छः अंगों से युक्त सीधना को योग कहा गया है ।।
7.0
यथा पर्वतधातूनां दह्यन्ते धमनान्मलाः। तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणधारणात्।।
yathā parvatadhātūnāṃ dahyante dhamanānmalāḥ। tathendriyakṛtā doṣā dahyante prāṇadhāraṇāt।।
Just as the impurities of mountain-minerals are burnt by the blower, so the stains committed by the organs are burned by checking Prana.
जिस प्रकार पर्वतो में उत्पन्न स्वर्ण आदि धातुओ का मैल अग्नि मे तपाने से भस्म हो जाता है। उसी प्रकार समस्त इन्द्रियों के द्वारा किये गये दोष प्राणो को रोकने अर्थात् प्राणायाम की प्रक्रिया द्वारा भस्म हो जाते हैं ।। [प्राण शक्ति का भोगों की ओर भटकना ही पापो को जन्म देता है, उसके नियमन से पाप की संभावना समाप्त होने लगती है ।]
8.0
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम् । प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ।।
prāṇāyāmairdaheddoṣāndhāraṇābhiśca kilbiṣam । pratyāhāreṇa saṃsargān dhyānenānīśvarānguṇān ।।
Through Pranayamas should be burnt the stains; through Dharana, the sins; through Pratyahara, the (bad) associations; and through Dhyana, the godless qualities.
प्राणायाम के माध्यम से दोषो (अर्थात् इन्द्रियों में एकत्रित विकारों) को तथा धारणा के माध्यम से पापों को (अर्थात् कुसंस्कारो को ) जलाकर भस्म कर डाले । प्रत्याहार के द्वारा इन्द्रिय के संसर्ग से उत्पन्न दोष तथा ध्यान के द्वारा अनीश्वरीय गुणो का नाशा होता है । इस प्रकार संचित पोपों एवं उन इन्द्रियों के कुसंस्कारो का शमन करते हुए अपने इष्ट के मनोहारी रूप का चिन्तन करना चाहिए ।। [प्राणायाम के साथ इष्ट के मनमोहक रूप के स्मरण से मन सहज ही उस ओर लग जाता है, अतःप्राण-प्रक्रिया तेजस्वी हो जाती है ।]
9.0
किल्बिषं हि क्षयं नीत्वा रूचिरं चैव चिन्तयेत् ।।
kilbiṣaṃ hi kṣayaṃ nītvā rūciraṃ caiva cintayet ।।
Having destroyed the sins, one should think of Ruchira (the shining).
प्राणायाम के माध्यम से दोषो (अर्थात् इन्द्रियों में एकत्रित विकारों) को तथा धारणा के माध्यम से पापों को (अर्थात् कुसंस्कारो को ) जलाकर भस्म कर डाले । प्रत्याहार के द्वारा इन्द्रिय के संसर्ग से उत्पन्न दोष तथा ध्यान के द्वारा अनीश्वरीय गुणो का नाशा होता है । इस प्रकार संचित पोपों एवं उन इन्द्रियों के कुसंस्कारो का शमन करते हुए अपने इष्ट के मनोहारी रूप का चिन्तन करना चाहिए ।। [प्राणायाम के साथ इष्ट के मनमोहक रूप के स्मरण से मन सहज ही उस ओर लग जाता है, अतःप्राण-प्रक्रिया तेजस्वी हो जाती है ।]
10.0
रूचिरं रेचकं चैव वायोराकर्षणं तथा । प्राणायामास्त्रयः प्रोक्ता रेचपूरककुम्भकाः।।
rūciraṃ recakaṃ caiva vāyorākarṣaṇaṃ tathā । prāṇāyāmāstrayaḥ proktā recapūrakakumbhakāḥ।।
Ruchira (cessation), expiration and inspiration - these three are Pranayama of (Rechaka, Puraka and Kumbhaka) expiration, inspiration and cessation of breath.
इस प्रकार अपने इष्ट के सुन्दर रूप का ध्यान करते हुए वायु को अन्तः करण मे स्थिर रखना (अर्थात् कुम्भक करना), रेचक (अर्थात श्वास को निःसृत करना) और पूरक (अर्थात् वायु को अन्दर खींचना) । इस प्रकार रेचक, पूरक एवं अन्तः—बाह्य कुम्भक के रूप मे तीन तरह के प्राणायाम कहे गये हैं ।।
11.0
सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह । त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ।।
savyāhṛtiṃ sapraṇavāṃ gāyatrīṃ śirasā saha । triḥ paṭhedāyataprāṇaḥ prāṇāyāmaḥ sa ucyate ।।
That is called (one) Pranayama when one repeats with a prolonged (or elongated) breath three times the Gayatri with its Vyahritis and Pranava (before it) along with the Siras (the head) joining after it.
प्राण शक्ति की वृद्धि करने वाला साधक व्याहृतियो एवं प्रणव सहित सम्पर्ण गायत्री महामन्त्र का उसके शीर्ष भाग सहित तीन बार मानस-पाठ करते हुए पूरक, कुम्भक तथा रेचक करे। इस प्रकार की प्रक्रिया को एक ‘प्राणायाम’ कहा गया है।।
12.0
उत्क्षिप्य वायुमाकाशे शून्यं कृत्वा निरात्मकम् । शून्यभावे नियुञ्जीयाद्रेचकस्येति लक्षणम् ।।
utkṣipya vāyumākāśe śūnyaṃ kṛtvā nirātmakam । śūnyabhāve niyuñjīyādrecakasyeti lakṣaṇam ।।
Raising up the Vayu from the Akasa (region, viz., the heart) and making the body void (of Vayu) and empty and uniting (the soul) to the state of void, is called Rechaka (expiration).
(नासिका द्वारा) प्राणवायु को आकाश मे निकालकर हृदय को वायु से रहित एवं चिन्तन से रिक्त करते हुए शून्यभाव मे मन को स्थिर करने की प्रक्रिया ही ‘रेचक’ है । यही ‘रेचक प्राणायाम’ का लक्षणल है।।
13.0
वक्त्रेणोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः। एवं वायुर्गहीतव्यः पूरकस्येति लक्षणम्।।
vaktreṇotpalanālena toyamākarṣayennaraḥ। evaṃ vāyurgahītavyaḥ pūrakasyeti lakṣaṇam।।
That is called Puraka (inspiration) when one takes in Vayu, as a man would take water into his mouth through the lotus-stalk.
जिस प्रकार पुरूष मुख के माधयम से कमल-नाल द्वारा शनैः-शनैः जल को ग्रहण करता है, उसी प्रकार मन्द गति से प्राण वायु को अपने अन्तःकरण मे धारण करना चाहिए । यही प्राणायाम के अन्तर्गत ‘पूरक’ का लक्षण है
14.0
नोच्छ्वसेन्न च निश्वसेन्नैव गात्राणि चालयेत् । एवं भावं नियुञ्जीयात्कुम्भकस्येति लक्षणम्।।
nocchvasenna ca niśvasennaiva gātrāṇi cālayet । evaṃ bhāvaṃ niyuñjīyātkumbhakasyeti lakṣaṇam।।
That is called Kumbhaka (cessation of breath) when there is no expiration or inspiration and the body is motionless, remaining still in one state.
श्वास को न तो अन्तः करण मे आकृष्ट करे और न ही बहिर्गमन करे तथा शरीर मे कोई हलचल भी न करे। इस तरह से प्राण वायु को रोकने की प्रक्रिया को ‘कुम्भक’ प्राणायाम का लक्षण कहा गया है।।
15.0
अन्धवत्पश्य रूपाणि शब्दं बधिरवच्छृणु। काष्ठवत्पश्य वै देहं प्रशान्तस्येति लक्षणम्।।
andhavatpaśya rūpāṇi śabdaṃ badhiravacchṛṇu। kāṣṭhavatpaśya vai dehaṃ praśāntasyeti lakṣaṇam।।
Then he sees forms like the blind, hears sounds like the deaf and sees the body like wood. This is the characteristic of one that has attained much quiescence.
जिस भाँति अन्धे को कुछ भी दृष्टिगोचर नही होता, उसी भाँति साधक नाम रूपात्मक अन्य कुछ भी न् देखे।शब्द को बधिर की भाँति श्रवण करे और शरीर को काष्ठ की तरह जाने।यही प्रशान्त का लक्षण है।। [आँख-कान आदि प्राण के संयोग से ही देखते-सुनते हैं। जब प्राण-प्रणव की ओर लग जाते हैं, तो इन्द्रियों से प्रकाश पूर्ण ध्वनि तरंगें टकराती भर हैं। उनका बोध करने वाला (प्राण) वहाँ न होने से अंधे-बहरे जैसी ही स्थिति हो जाती है।]
16.0
मन:संकल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि बुद्धिमान्। धारयित्वा तथात्मानं धारणा परिकीर्तिता ॥
mana:saṃkalpakaṃ dhyātvā saṃkṣipyātmani buddhimān। dhārayitvā tathātmānaṃ dhāraṇā parikīrtitā ॥
That is called Dharana when the wise man regards the mind as Sankalpa and merging Sankalpa into Atman, contemplates upon his Atman (alone).
बुद्धिमान् मनुष्य मन को संकल्प के रूप में जानकर, उसे आत्मा (बुद्धि) में लय कर दे। तत्पश्चात् उस आत्मारूपी सद्बुद्धि को भी परमात्म सत्ता के ध्यान में स्थिर कर दे। इस तरह की क्रिया को ही ‘धारणा की स्थिति’ के रूप में जाना जाता है॥
17.0
आगमस्याविरोधेन ऊहनं तर्क उच्यते। समं मन्येत यल्लब्ध्वा स समाधिः प्रकीर्तितः ॥
āgamasyāvirodhena ūhanaṃ tarka ucyate। samaṃ manyeta yallabdhvā sa samādhiḥ prakīrtitaḥ ॥
That is called Tarka when one makes inference which does not conflict with the Vedas. That is called Samadhi in which one, on attaining it, thinks (all) equal.
शास्त्रानुकूल ‘ऊहा’ अर्थात् विचार करना ‘तर्क’ कहा जाता है। ऐसे ‘तर्क’ को प्राप्त करके दूसरे अन्य सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को तुच्छ (निकृष्ट) मान लिया जाता है। इस प्रकार की स्थिति को ही ‘समाधि’ की अवस्था कहा जाता है ॥ [भौतिक पदार्थ वरेण्य नहीं-इष्ट ही वरेण्य है, यह तर्क अन्त: करण में बैठते ही प्राणों को इष्ट में समाहित कर देता है।]
18.0
भूमौ दर्भासने रम्ये सर्वदोषविवर्जिते। कृत्वा मनोमयीं रक्षां जप्त्वा वै रथमण्डले॥
bhūmau darbhāsane ramye sarvadoṣavivarjite। kṛtvā manomayīṃ rakṣāṃ japtvā vai rathamaṇḍale॥
Seating himself on the ground on a seat of Kusa grass which is pleasant and devoid of all evils, having protected himself mentally (from all evil influences), uttering Ratha-Mandala, assuming either Padma, Svastika, or Bhadra posture or any other which can be practiced easily, facing the north and closing the nostril with the thumb, one should inspire through the other nostril and retain breath inside and preserve the Agni (fire). Then he should think of the sound (Om) alone.
भूमि को स्वच्छ, समतल करके रमणीय तथा (अशुद्ध, विषय एवं कीट आदि) सभी दोषों से रहित क्षेत्र में मानसिक रक्षा (दिग्बन्धादि) करता हुआ रथ मण्डल (ॐकार) का जप करे॥
19.0
पद्मकं स्वस्तिकं वापि भद्रासनमथापि वा। बद्धवा योगासनं सम्यगुत्तराभिमुखः स्थितः ॥
padmakaṃ svastikaṃ vāpi bhadrāsanamathāpi vā। baddhavā yogāsanaṃ samyaguttarābhimukhaḥ sthitaḥ ॥
पद्मासन, स्वस्तिकासन और भद्रासन में से किसी एक योगासन में आसीन होकर उत्तराभिमुख हो करके बैठना चाहिए ॥
20.0
नासिकापुटमङ्गुल्या पिधायैकेन मारुतम्। आकृष्य धारयेदग्निं शब्दमेव विचिन्तयेत् ॥
nāsikāpuṭamaṅgulyā pidhāyaikena mārutam। ākṛṣya dhārayedagniṃ śabdameva vicintayet ॥
तत्पश्चात् नासिका के एक छिद्र (दायें) को एक अँगुली से बन्द करके, दूसरे खुले छिद्र (बायें) से वायु को खींचे। फिर दोनों नासापुटों को बन्द करके उस प्राण वायु को धारण करे। उस समय तेज:स्वरूप शब्द (ओंकार) का ही चिन्तन करे ॥
21.0
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ओमित्येतन्न रेचयेत्। दिव्यमन्त्रेण बहुधा कुर्यादामलमुक्तये॥
omityekākṣaraṃ brahma omityetanna recayet। divyamantreṇa bahudhā kuryādāmalamuktaye॥
Om, the one letter is Brahman; Om should not be breathed out. Through this divine mantra (Om), it should be done many times to rid himself of impurity.
वह शब्द रूप एकाक्षर प्रणव (ॐ) ही ब्रह्म है। तदनन्तर इसी एकाक्षर ब्रह्म ॐकार का ही ध्यान करता हुआ रेचक क्रिया सम्पन्न करे अर्थात् वायु का शनैः-शनैः निष्कासन करे। इस तरह से कई बार इस ‘ओंकार’ रूपी दिव्य मन्त्र से (प्राणायाम की क्रिया द्वारा) अपने चित्त के प्रमादादि मल (विकारों) को दर करना चाहिए।।
22.0
पश्चाद्धयायीत पूर्वोक्तक्रमशो मन्त्रविद्बुधः। स्थूलादिस्थूलसूक्ष्मं च नाभेरूर्ध्वमुपक्रमः॥
paścāddhayāyīta pūrvoktakramaśo mantravidbudhaḥ। sthūlādisthūlasūkṣmaṃ ca nābherūrdhvamupakramaḥ॥
Then as said before, the Mantra-knowing wise should regularly meditate, beginning with the navel upwards in the gross, the primary (or less) gross and subtle (states).
इस प्रकार प्राणायाम के द्वारा सभी दोषों का शमन करते हुए पूर्व निर्दिष्ट क्रम (अकार, उकार, मकार) के अनुसार ‘ओंकार’ का ध्यान करते हुए प्राणायाम करे। इस तरह का ‘प्रणव गर्भ’ प्राणायाम नाभि के ऊर्ध्व भाग अर्थात् हृदय में (विराट् आदि का) ध्यान करते हुए स्थूलातिस्थूल मात्रा में सम्पन्न करे॥ [प्राणायाम की अस्सी आवृत्ति-स्थूल मात्रा तथा एक श्वास में अस्सी प्रणव मन्त्र का जप-अति स्थूल मात्रा कहलाती है।]
23.0
तिर्यगूर्ध्वमधोदृष्टिं विहाय च महामतिः। स्थिरस्थायी विनिष्कम्पः सदा योगं समभ्यसेत् ॥
tiryagūrdhvamadhodṛṣṭiṃ vihāya ca mahāmatiḥ। sthirasthāyī viniṣkampaḥ sadā yogaṃ samabhyaset ॥
The greatly wise should give up all (sight) seeing across, up or down and should practice Yoga always being motionless and without tremor.
अपनी दृष्टि को ऊपर अथवा नीचे की ओर तिरछा घुमाकर केन्द्रित करते हुए बुद्धिमान् साधक स्थिरता पूर्वक निष्कम्प भाव से स्थित होकर योग का अभ्यास करे।।
24.0
तालमात्राविनिष्कम्पो धारणायोजनं तथा। द्वादशमात्रो योगस्तु कालतो नियमः स्मृतः ॥
tālamātrāviniṣkampo dhāraṇāyojanaṃ tathā। dvādaśamātro yogastu kālato niyamaḥ smṛtaḥ ॥
The union as stated (done) by remaining without tremor in the hallow stalk (viz., Susumna) alone is Dharana. The Yoga with the ordained duration of twelve Matras is called (Dharana).
योगाभ्यास की यह क्रिया तालवृक्ष की भाँति कुछ ही काल में फल प्रदान करने वाली है। इसका अभ्यास पहले से सुनिश्चित योजनानुसार ही करने योग्य है अर्थात् बीच में उसे घटाना, बढ़ाना या रोकना नहीं चाहिए। द्वादश मात्राओं की आवृत्ति भी समान समय में ही पूर्ण करनी चाहिए ॥
25.0
अघोषमव्यञ्जनमस्वरं च अतालुकण्ठोष्ठमनासिकं च यत्। अरेफजातमुभयोष्मवर्जितं यदक्षरं न क्षरते कथंचित्॥
aghoṣamavyañjanamasvaraṃ ca atālukaṇṭhoṣṭhamanāsikaṃ ca yat। arephajātamubhayoṣmavarjitaṃ yadakṣaraṃ na kṣarate kathaṃcit॥
That which never decays is Akshara (Om) which is without Ghosha (third, fourth and fifth letters from 'K'), consonant, vowel, palatal, guttural, nasal, letter 'R' and sibilants.
इस प्रणव नाम से प्रसिद्ध घोष का उच्चारण बाह्य प्रयत्नों से नहीं होता है। यह व्यञ्जन एवं स्वर भी नहीं है। इसका उच्चारण कण्ठ, तालु, ओष्ठ एवं नासिका आदि (सानुनासिक) से भी नहीं होता। इसका दोनों ओष्ठों के अन्त: में स्थित दन्त नामक क्षेत्र से भी उच्चारण नहीं होता। ‘प्रणव’ वह श्रेष्ठ अक्षर है, जो कभी भी च्युत नहीं होता। ओंकार का प्राणायाम के रूप में अभ्यास करना चाहिए तथा मन गुञ्जायमान घोष में सदैव लगाए रहना चाहिए॥ [ॐकार को ‘उद्गीथ’ कहा गया है। इसे उद्=प्राणों के माध्यम से ही झंकृत किया जाता है।]
26.0
|येनासौ गच्छते मार्गं प्राणस्तेनाभिगच्छति। अतस्तमभ्यसेन्नित्यं यन्मार्गगमनाय वै॥
yenāsau gacchate mārgaṃ prāṇastenābhigacchati। atastamabhyasennityaṃ yanmārgagamanāya vai॥
Prana travels through (or goes by) that path through which this Akshara (Om) goes. Therefore it should be practiced daily, in order to pass along that (course).
योगी पुरुष जिस मार्ग का अवलोकन करता है अर्थात् मन के माध्यम से जिस स्थान को प्रवेश करने योग्य मानता है, उसी मार्ग (द्वार) से प्राण और मन के साथ गमन कर जाता है। प्राण श्रेष्ठ मार्ग (द्वार) से गमन करे, इस हेतु साधक को नित्य- नियमित अभ्यास करते रहना चाहिए ॥
27.0
हृद्द्वारं वायुद्वारं च मूर्धद्वारमथापरम्। मोक्षद्वारं बिलं चैव सुषिरं मण्डलं विदुः ॥
hṛddvāraṃ vāyudvāraṃ ca mūrdhadvāramathāparam। mokṣadvāraṃ bilaṃ caiva suṣiraṃ maṇḍalaṃ viduḥ ॥
It is through the opening (or hole) of the heart, through the opening of Vayu (probably navel), through the opening of the head and through the opening of Moksha. They call it Bila (cave), Sushira (hole), or Mandala (wheel).
वायु के प्रवेश का मार्ग हृदय ही है। इससे ही प्राण सुषुम्णा के मार्ग में प्रवेश करता है। इससे ऊपर ऊर्ध्वगमन करने पर सबसे ऊपर मोक्ष का द्वार ब्रह्मरन्ध्र है। योगी लोग इसे सूर्यमण्डल के रूप में जानते हैं। इसी सूर्यमण्डल अथवा ब्रह्मरन्ध्र का बेधन करके प्राण का परित्याग करने से मुक्ति प्राप्त होती है॥
28.0
भयं क्रोधमथालस्यमतिस्वप्नातिजागरम्। अत्याहारमनाहारं नित्यं योगी विवर्जयेत् ॥
bhayaṃ krodhamathālasyamatisvapnātijāgaram। atyāhāramanāhāraṃ nityaṃ yogī vivarjayet ॥
(Then about the obstacles of Yoga): A Yogin should always avoid fear, anger, laziness, too much sleep or waking and too much food or fasting.
भय, क्रोध, आलस्य, अधिक शयन, अत्यधिक जागरण करना, अधिक भोजन करना या फिर बिल्कुल निराहार रहना आदि समस्त दुर्गुणों को योगी सदैव के लिए परित्याग कर दे॥ [गीता (६.१७) में यही भाव ‘युक्ताहार विहारस्य................ ‘आदि शब्दों द्वारा व्यक्त किया गया है।]
29.0
अनेन विधिना सम्यङ् नित्यमभ्यस्यते क्रमात्। स्वयमुत्पद्यते ज्ञानं त्रिभिर्मासैर्न संशयः ॥
anena vidhinā samyaṅ nityamabhyasyate kramāt। svayamutpadyate jñānaṃ tribhirmāsairna saṃśayaḥ ॥
If the above rule be well and strictly practiced each day, spiritual wisdom will arise of itself in three months without doubt.
इस प्रकार नियम पूर्वक जो भी साधक क्रमश: उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ नियमित अभ्यास करता है, उसे तीन मास में ही स्वयमेव ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।
30.0
चतुर्भिः पश्यते देवान्पञ्चभिर्विततःक्रमः। इच्छयाप्नोति कैवल्यं षष्ठे मासि न संशयः॥
caturbhiḥ paśyate devānpañcabhirvitataḥkramaḥ। icchayāpnoti kaivalyaṃ ṣaṣṭhe māsi na saṃśayaḥ॥
In four months, he sees the Devas; in five months, he knows (or becomes) Brahma-Nishtha; and truly in six months he attains Kaivalya at will. There is no doubt.
वह योगी-साधक नित्य-नियमित अभ्यास करता हुआ चार मास में ही देव दर्शन की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। पाँच माह में देव-गणों के समान शक्ति-सामर्थ्य से युक्त हो जाता है तथा छः मास में अपनी इच्छानुसार निःसन्देह कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है॥
31.0
पार्थिवः पञ्चमात्रस्तु चतुर्मात्रस्तु वारुणः। आग्नेयस्तु त्रिमात्रोऽसौ वायव्यस्तु द्विमात्रकः॥
pārthivaḥ pañcamātrastu caturmātrastu vāruṇaḥ। āgneyastu trimātro'sau vāyavyastu dvimātrakaḥ॥
That which is of the earth is of five Matras (or it takes five Matras to pronounce Parthiva-Pranava). That which is of water is of four Matras; of Agni, three Matras; of Vayu, two;
पृथिवी तत्त्व की धारणा के समय में ओंकार रूप प्रणव की पाँच मात्राओं का, वरुण अर्थात् (जल तत्त्व) की धारणा के समय में (प्रणव की) चार मात्राओं का, अग्नि तत्त्व की धारणा के समय में (प्रणव की) तीन मात्राओं का तथा वायु तत्त्व की धारणा के समय में (प्रणव की) दो मात्राओं के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए ॥
32.0
एकमात्रस्तथाकोशो ह्यर्धमात्रं तु चिन्तयेत्। संधिं कृत्वा तु मनसा चिन्तयेदात्मनात्मनि॥
ekamātrastathākośo hyardhamātraṃ tu cintayet। saṃdhiṃ kṛtvā tu manasā cintayedātmanātmani॥
And of Akasa, one. But he should think of that which is with no Matras. Having united Atman with Manas, one should contemplate upon Atman by means of Atman.
(इसके पश्चात्) आकाश तत्त्व की धारणा करते समय प्रणव की एक मात्रा का तथा स्वयं ओंकार रूप प्रणव की धारणा करते समय उसकी अर्द्धमात्रा का चिन्तन करे। अपने शरीर में ही मानसिक धारणा के माध्यम से पंचभूतों (पृथिवी आदि तत्त्व) की सिद्धि प्राप्त करे और उनका ध्यान करे। इस तरह के कृत्य से प्रणव की धारणा द्वारा पञ्चभूतों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है ॥
33.0
त्रिंशत्सार्धाङ्गुलः प्राणो यत्र प्राणैः प्रतिष्ठितः। एष प्राण इति ख्यातो बाह्यप्राणस्य गोचरः ॥
triṃśatsārdhāṅgulaḥ prāṇo yatra prāṇaiḥ pratiṣṭhitaḥ। eṣa prāṇa iti khyāto bāhyaprāṇasya gocaraḥ ॥
Prana is thirty digits long. Such is the position (of range) of Pranas. That is called Prana which is the seat of the external Pranas.
साढ़े तीस अङ्गुल लम्बा प्राण श्वास के रूप में जिसमें प्रतिष्ठित है, वही इस प्राण वायु का वास्तविक आश्रय है। यही कारण है कि इसे प्राण के रूप में जाना जाता है। जो बाह्य प्राण है, उसे इन्द्रियों के द्वारा देखा जाता है॥
34.0
अशीतिश्च शतं चैव सहस्त्राणि त्रयोदश। लक्षश्चैको विनिश्वास अहोरात्रप्रमाणतः॥
aśītiśca śataṃ caiva sahastrāṇi trayodaśa। lakṣaścaiko viniśvāsa ahorātrapramāṇataḥ॥
The breaths by day and night are numbered as 1,13,180 [or 21,600 -?].
इस बाह्य प्राण में एक लाख तेरह सहस्त्र छ: सौ अस्सी नि:श्वासों (श्वास-प्रश्वास) का आवागमन एक दिन एवं रात्रि में होता है॥ [प्रायः दिन-रात्रि में श्वासों की संख्या इक्कीस हजार छः सौ मानी जाती है। जो प्रति मिनट पन्द्रह नि:श्वास के हिसाब से ठीक बैठती है, यहाँ इतनी संख्या का उल्लेख शोध का विषय है।]
35.0
प्राण आद्यो हृदि स्थाने अपानस्तु पुनर्गुदे। समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमाश्रितः॥
prāṇa ādyo hṛdi sthāne apānastu punargude। samāno nābhideśe tu udānaḥ kaṇṭhamāśritaḥ॥
(Of the Pranas) the first viz., Prana is pervading the heart; Apana, the anus; Samana, the navel; Udana, the throat;
आदि प्राण का निवास हृदय क्षेत्र में, अपान का निवास गुदा स्थान में, समान का नाभि प्रदेश में एवं उदान का निवास कण्ठ प्रदेश में है॥
36.0
व्यानः सर्वेषु चाङ्गेषु व्याप्य तिष्ठति सर्वदा। अथ वर्णास्तु पञ्चानां प्राणादीनामनुक्रमात्॥
vyānaḥ sarveṣu cāṅgeṣu vyāpya tiṣṭhati sarvadā। atha varṇāstu pañcānāṃ prāṇādīnāmanukramāt॥
And Vyana, all parts of the body. Then come the colours of the five Pranas in order.
व्यान समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गों में व्यापक होकर सदैव प्रतिष्ठित रहता है। अब इसके पश्चात् समस्त प्राण आदि पाँचों वायुओं के रंग का क्रमानुसार वर्णन किया जाता है॥
37.0
रक्तवर्णो मणिप्रख्यः प्राणवायुः प्रकीर्तितः। अपानस्तस्य मध्ये तु इन्द्रगोपसमप्रभः॥
raktavarṇo maṇiprakhyaḥ prāṇavāyuḥ prakīrtitaḥ। apānastasya madhye tu indragopasamaprabhaḥ॥
Prana is said to be of the colour of a blood-red gem (or coral); Apana which is in the middle is of the colour of Indragopa (an insect of white or red colour);
इस प्राण वायु को लाल रंग की मणि के सदृश लोहित वर्ण की संज्ञा प्रदान की गई है। अपान वायु को गुदा के बीचो-बीच इन्द्रगोप-बीर बहूटी नामक गहरे लाल (रंग वाले एक बरसाती कीड़े के) रंग का माना गया है॥
38.0
समानस्तु द्वयोर्मध्ये गोक्षीरधवलप्रभः। आपाण्डुर उदानश्च व्यानो ह्यर्चिःसमप्रभः॥
samānastu dvayormadhye gokṣīradhavalaprabhaḥ। āpāṇḍura udānaśca vyāno hyarciḥsamaprabhaḥ॥
Samana is between the colour of pure milk and crystal (or oily and shining), between both (Prana and Apana); Udana is Apandara (pale white); and Vyana resembles the colour of archis (or ray of light).
नाभि के मध्य क्षेत्र में समान वायु स्थिर है। यह गो-दुग्ध या स्फटिक मणि की भाँति शुभ्र कान्तियुक्त है। उदान वायु का रंग धूसर अर्थात् मटमैला है और व्यान वायु का रंग अग्निशिखा की भाँति तेजस्वी है ॥
39.0
यस्येदं मण्डलं भित्त्वा मारुतो याति मूर्धनि। यत्र कुत्र म्रियेद्वापि न स भूयोऽभिजायते न स भूयोऽभिजायत इत्युपनिषत् ॥
yasyedaṃ maṇḍalaṃ bhittvā māruto yāti mūrdhani। yatra kutra mriyedvāpi na sa bhūyo'bhijāyate na sa bhūyo'bhijāyata ityupaniṣat ॥
That man is never reborn wherever he may die, whose breath goes out of the head after piercing through this Mandala (of the pineal gland). That man is never reborn.
जिस श्रेष्ठ योगी अथवा साधक का प्राण इस मण्डल (पञ्चतत्त्वात्मक शरीर-क्षेत्र, वायु स्थान एवं हृदय प्रदेश) का बेधन कर मस्तिष्क के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाता है, वह अपने शरीर का जहाँ कहीं भी परित्याग करे, पुनः जन्म नहीं लेता अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है, यही उपनिषद् (रहस्य) है ॥
Shanti Patha
Om! May He protect us both together; may He nourish us both together; May we work conjointly with great energy, May our study be vigorous and effective; May we not mutually dispute (or may we not hate any). Om! Let there be Peace in me! Let there be Peace in my environment! Let there be Peace in the forces that act on me!