Books / Atma Bodha Manorama Hindi Bhasha & Tika Ed. Suradina Shukla

1. Atma Bodha Manorama Hindi Bhasha & Tika Ed. Suradina Shukla

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वन्दना।

दोहा।

मम मति नित प्रेरत रुचिर भासत प्रज्नारुप।

भजत भक्ि हित उस पराविद्या ब्रह्मस्वरूप ।। १।।

आत्मवोध भाषा करत निज टर हेत प्रमोद।।

भज़त वोधमय व्रह्म जो विलसत करत विनोद॥२॥

सो मन सुधि वार्णी अगम निगम न पावत पार॥

सोइ मम उर चिलसत सदा करत कलोल अ्रपार।३।।

अहो भारती मम हृदय वसट् सदा अस होय।।

तव स्वरूप रत् नित मगन अपर न जानहुँ कोय।।४।।

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( २ ) कंरुणा करि करुणा करिय ब्रह्मरूपिणी बुद्धि॥ संतचित सुख अ्रनुराग में यहि तनु पावहुँ शुद्धि॥।५।।

पढ़त सुनत यहि ग्रन्थ के ब्रह्मभाव अ्स त्ाव ।

क्रमक्रमसे परमात्मसुखअ्रधिकत्रधिकश्नधिकाव ।।६।। बहु जन्मन के कर्म की होयँ चासना दूर॥। मिटहिं तापत्रय होय अस अतिपुरुषारथ पूर।।७॥

सूर्यदीन शुक्क

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श्रीआात्मवोध

ॐ तेपोभि: क्षीखपापीनां शान्तौनां वीतरगरम सुमुकेरामपेक्ष्यीडयँमात्मैवोधो विधीर्यते ।१॥

पाकस्य वैहिवज्ज्ञानं विनो मोक्षी नें सिध्यति॥२। यह आर्त्मवोध विधि कहत चडते हैं जालू।। तर्प से हतशरंघ शमरंत विरोगि जिज्ञासृ॥ १॥ दूसर साधन से शानहि इक सारधेन अस।। चिने ज्ञान मोक्ष नैहिं सिद्ध पांक पार्वेक जस ॥२॥ पट् सम्पत्ति आादि तप से पापविहीन, शान्तचित्त, वैराग्यदान, सुमुखु पुरुपों को आव्श्यक यँह शर्त्मबोध विधिपूर्वके वर्णन करता हूँ॥१ ॥ दूसरे साधनों से झैानैही एक सैवयं मोक्ष का साधन है बिना जान मोपे नहीं सिद्धे होता है जैसे विना श्रैरिन रसोई ॥ २ ॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।

अविसोधितंया कर्म नोविदयाँ विनिवर्तयेद्।। विद्याडविद्या निहन्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत् ।। ३।। परिरच्छिन ईवाझोनात्तनोशे सँति केवँलः ॥ f :स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेधीपायेंडशुमार्निवे ॥ ४ ॥

नहिं हरेत फर्म अज्ञन चिरोधे न तैसे। अज्ञीन जार्नही हरते तेजें तैम जैसे॥३॥ आात्मा पवोध से छिन एक उस नोशंत।। अैस दुरत मेधी के भौतुं आर्पदी काशते ।।४।।

विरोधे न रखने से क्म अज्ञान को नहीं दूर करसक़ा ज्ञानही शर्ज्ञान को नाशे करता है जैसे तेजं बहुत अधेरे को । ३ । आ्रत्मा अ्र्प्र्ञन से ढका हुओं सा है उसके दूर हेतिही इकल्सा अपने आँप. प्रकाशिते होता है जैसेबादल इटने से सूर्य ।:।।

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श्रीआत्मवोध सटीक।

अ्ज्ञानकेल्ुष जीवं ज्ञानाभ्यासारद्ि निर्मलंम्।। कृत्वाँ ज्ञान स्वरयं नश्येज्जलं कतकरेरुनत् ५र संसार: स्वप्नंतुल्यो हि रागद्वेपादिसंकुलः ॥ स्त्रेकाले सत्यवद्धाँति मवोधे5सत्यववेत् ॥ ६॥ अज्ञानमंलीना जाचे ज्ञाने से भांसेंत।। जस नीरै' निर्मली" आपे ज्ञान करि नाशेत ।।X।। हैराग द्वेषे से भरा जगत जसे सोये।। स्वैसमय सत लखैत भूरड इव वोर्धहि होये॥६॥। जीचात्मा श्रज्ञान से मलीन है ज्ञान के श्र- - भ्यास से ही निर्मल होता है और ज्ञान को करके फिर ज्ञानाभ्यास अपने आप नार्श हो जाता है जैसे जस को निर्मली"॥ ॥ राग द्वषे से भरा हुआ संसार स्वम की बरावैरही है अपने समये में (पज्ञान दशा मे संसार लोते समय स्वम्) सच्चासा मालूँम होता है और ज्ञान होने तथा जानने पर भूठा हो जाता है॥ ६।।

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श्रीत्मात्मवोध सटीक।

तौवत्सत्य जगद्भीति शुक्किकी रजैत यथा।। योवने ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्यमृँ।७।। सच्चिरदोत्मन्यतुस्यूँते निते्ये विष्णी प्रकल्पता: ।। व्यक्कयी विविंधा: सर्वो हार्टके कटकौंदिवन्।= ॥

अैस रजैत सीपे जर्ग सत्ये लखत है तवतकँ।। इके वहें सकल आधार ने जानिय जवतैक।।७।। सेव विविधे जाँति वन्धन कस्पित भगर्वाना ।। निते सच्चिदात्म में कनेक कटकईच नाना ॥ ८॥

जबतैक सचको आधार ग्रद्वितीये ब्रेह्म नेहीं जाना जाता है तबैतक संसार सरय मालूमें होता है जैसे" सीप में चांदी। ७॥ सर्वे ग्रनेक प्रकार के जीव नित्यस्वरूप सचिदारनेन्द भगवान् में बँधेहुँए कल्पित हैं - जैसे सुवर् में कड़े आदि ॥। र॥

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श्रीआत्मवोध सटीक। ७

यंधाकौशो हर्पाकशी नानोपाघिगतो विमु:॥ तच्चेगन्दिर्वैक्दांति तन्नाशे सति कवलः ॥।६।। नानोपोधिवशादेवैं जातिनामथमादय:।।

प्रंभु पूंरन भेदें उपार्धि विविधगत वह्ुईव।। भांरसत पकहि उसैनाशत जैंस सोहत चिर्व।। ६। वर्णाथ्रमं नाम उपाधि मेद से नाना।। आत्मों में कैल्पित जस जले रसे रँग भाना ।१०।।

इन्द्रियों को स्वामी सर्वव्यापी परमात्मा श्रनेक प्रकोर की उपाधियों में मिलके उनके मेर्दे से जुदासों मालूमें होता है और उन उपाधियों के नाश होतेही" इकला देख पढ़ता है जैसेआकाशै ।। ६ै।। जाति आक्षम नोम आदिक अ्नेक प्रकार की उपाधि के वश से ही शात्मों में कल्पित हैं जैसे जल में सीठा खारी आँदि रस व संफ्रेद नीला आदि रा ॥१0।l

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श्रीआत्मवोध सटाक। 15

पश्चीकृतमहोभूतसम्भवं कर्मसश्चितम्। शैरीरं सुखदुःखाँनां भोरगोगतनमुर्च्यते ॥११॥ पश्चमायामनीवुद्धिदशन्द्रिय समन्वितम् ॥ अपश्चीकृतभूतोत्यं सू्ह्षेमाङ्ं भोगसाधनय् ॥ १२॥

पश्चीकिंत भूतज कर्म सुसक्चित देदो।। यहि कहत थूल सुख दुरख भोगन कर गेहा ११ तर्नुलिङ्ग दशेन्द्रिय मन ुधि प्राए सयोगा।। भवभूत अेपञ्चीकृत है सार्धन भोगा १२ पञ्चीकरण महाभृंत से उत्पन्न, कर्मों का ढेर, सुख दुःख के भोगेंने का घर, शरीरें कहाता है। ११ ॥ पॉचों नायां मन वुद्धि दशो इन्द्रियाँ इन १७ तत्वो से युक्न अपज्ोकरसं महाभूत से उत्पन्न सुख दुःख आदि भोगों का साधन करनेवाला सृदर्म शरीर है।। १२ ॥।

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श्रीआत्मवोध सर्वीक।

अनाद्यविद्याऽनिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते॥ उपाधि त्रितयादन्यमार्त्मानमवधारँयेत्- ॥ १३ ।। पश्चकोशोदियोगेन तत्तन्मय इवें स्थितः ॥ शुद्धोत्मानीलवर्स्रादियोगेन स्फँटिको यर्था १४ ।।

सायामय अकेथ अनादि कैहिय तनु हेतूँ।। न्यारा उपाधिन्रेय ऑतम घैरिय चित चेतू १३ शुद्धात्म कोशगत उस उसमय श्रेस राजेत ।I जस शुभ्र फँटिक नीलादि वत्त्र सँग, भ्राजत १४

कहने में न आनेवाला अनादि काल की माया से भरा हुआ कारया शरीर कहाता है आत्मों को इन तीनों उर्पोधियों से अ्रलैग सैममिये॥ १३॥ आ्र्रात्मी निर्मल है अनमयादि पाँच को शों के संयोग से उस उस धर्मवाला सो स्थितें जान पढ़ता है जैसे नीले आादि वसों के साथ स्फटिकमैँसि॥ १४ ॥

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१० श्रीआत्मवोध सटीक।

वपुस्तुपादिभिः कोशैयकं युक्कंचावघावतः ॥। आर्त्मानमन्तेर शुद्ध विविच्यात्तणडुलं यथाँ ॥१५॥ तदा सर्वैगतोऽटँयातॅमा न सैर्वत्रावभाँसते।। बुद्धावेवावभौसेत स्वच्छेषु प्रतिविन्धवत् ॥१६॥ जसे तुपयुंत तराहुल कृटि युक्किकरि धारिय॥ युत कोश विमल परमातेम सुचित्त विचारिय १५ सर्वेगत भी आर्तेम तर्दृपि ने सर्वडर भासँत प्रतिविस्व मुक्कुर इव स्वच्छ वुद्धि में कासंत १६ कोशों से युक्त निर्मल अन्तरात्मों को युक्धि से विचारपूँ्वक ग्रदय करना चाहिए जैस कूँटने स भूसी श्रदि से मिने हुए चार्वल को ॥ १४॥ तोमी सबमें रहेता हुआ भी आरमा सबेमें नहीं मालूमँ होता बुद्धि में ही मालूम होता है जैसे निर्मल शीशौ आदि में प्रतिबिस्व । १६ ॥।

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श्रीआत्मवाध सटीक। ११

दे हेन्द्रियम नोबुद्धिमककृतिभ्यो विलनैखम् ॥ तद्दृटत्तिसाचियं विद्यादात्मोनं रार्जवत्सदी १७

दृश्यँतेऽ्रेपुं धावैत्सु धविन्निने यथाँ शेरी १८ ।।

शतम देदेन्द्रिय मने वुधि प्रकृति विलक्षेर॥ जानियँ उन साँखी निरतें नृ्पसरिस .. विचक्षर १७ इन्द्रियरत कुमतिन आरम सरिर्सँ व्यॉपारी।। लैखिये धावत वौरिद जैस शैशि ईव चौरी १८

देह इन्द्रिय मने बुद्धि प्रकृति इन सबसे चिलतस इनके कामों को साखी आत्मांको सदैवें राजा के समान जानिए॥ १७ ॥ अ्र्रन्ञानियों का प्रत्मा इन्दिरयों के मेलें होने में व्यापोरी सौ दिखैलाई देता है जैसे दौड़ते हुए बांदलों में दौद़ती सौ चन्द्रेमा ।। १८ ॥।

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१२ श्रीआत्मवोध सटीक।

आत्मचैतन्यमाश्रितय देहेन्द्रियेमनोधियः ॥ स्वकीयर्थिपु वैर्तन्ते सूर्यालोंकं यर्था जनाँः १६ ॥ देहेन्द्रिय गुणन्कर्मा एथ मैले सच्चिर्दोत्मनि॥। अरार्ध्यस्यन्त्यविवेकेन गगँने नीलिमादिवत् २० ।।

मन तुधि देहेन्ट्रिय लहि चिदरम आधारा। लागत निर्जेविषय उदिर्तरवि जसे संसौरा १६ देहेन्द्रिय गुस अरु कैर्म अविद्याध्यांसा॥ निर्मेल चिदारम में जस नीलिमा तकाँसा २०

देह इन्द्रिय मन वुद्धि ये सब चैतन्यारमा का शासरा लेकर अपने अपने कामों में लगेते हैं जैसे प्राँसी सूर्योदय को ॥ १६॥ देह इन्द्रि्य गुए करमं ये सब निर्मल सच्निदानेन्द परमात्मा में अज्ञाने से कलपर्त है जैसे आ्काशँं में श्यामता ॥ २० ॥

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श्रीआत्मवोध सटीक। १३

शरज्ञोनान्मानसोपाधे: कतृत्वौदीनि चान्मोंनि।। कल्प्यन्तेऽम्बुगते चन्द्रे चलनाँदिर्यर्था म्भसँ:॥।२१।। रागेच्छासुखेदुःखादि बुद्धौ सतयां प्रवैर्तते।। सुपुप्ती नास्ति तन्नाशे तस्माद्बुद्धेस्तु नात्मन: २२

जस जलगत शैशि जल चर्लन अविद्या जल्पित।। मन की उैपाधि कतृत्व आरर्रंम में कल्पित ॥। २१। दुधि रहतहि हों सुखदुसें सव अरु उसनौशत।। नैहिं रह सुपुप्ति इससे नें आतमदुिभैसित २२

मन की उैपाधि का कर्ता-भोकापना आदि आर्त्म में प्रज्ञान से कल्पनों किया जाता है जैसे जले का हिलना आदि जलेंके भीतर चन्दरैमा के प्रतिबिन्ब में ॥२१॥ सुख दुःख इच्छ्रा आदि राग जो कि बुद्धि में उसके होते ही रहते हैं सुषुप्ि अवस्यों में उस बुद्धि के नार्श हो जाने पर नहीं रहते हैं इसलिय ये बुद्धि केही धर्म हैं श्राम्मा के नहीं ।। २२॥

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१४ श्रीात्मवोध सटीक।

मकोशोडर्कस्ये तोयस्य शैत्ययग्नैर्यथोष्णाँता ।।

आर्त्मेनः सचिरदशश्च वुर्द्धैर्द्टततिरितिदृयम्ँ। संयोज्य चाविवेकेन जानागीति भवत प्रवेरतते ॥२४।।

जस अनंल उप्णँ जल शोते भांतु रुचिमाविक।। सतचित सुखं नित निर्मलपरमात्म स्वमाविक २३ आतंम कर सन चिंत अंश वृत्ति बुँधि नाना।। यहँ दुँहुँ मिलि वशे अज्ञान होते यह जानी २४ जैस सूर्य का पकाशपना, जलकी शीतलैता, श्रग्नि की उप्ँता स्वभावसे है ऐसेही आत्मा का सत्य होना ज्ञान व आनन्दरूप होना सदैव रहना निर्मल होना ये स्वाभाचिक है।। २३।। श्रात्मो का सत्य चैतन्घे श्रंश और बुद्धि के सुख दुःख इच्छा आदि कॉम ये दोनों मिर्स के प्ज्ञोन से मैं जानेता हूँ सुखी हूँ दुःखी हूँ ऐसे" व्यवहार चैलते हैं।।२४॥

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श्रीआत्मवोध सटीक-। १५

आत्मनो विक्रिया नास्ति बुद्धवोधो नें जात्विति। जीवः सर्वमंल शीत्व्रा कैर्ता द्रैष्ठेति"मुह्यति २५ ॥ रज्जुसैरपवदात्मान जीव जञात्वा भेय वहेदूँ।। नी ई- जीव:परासमेति" शीत 'चेन्निभैयी भवत्" २६ आत्मा के है ने विकार मे बुधि के जाना।। मेल जीनि जीव श्रैस करंत लखषत वौरोना २५।। रजुंश्हि इब शत्महि जीव जानि डरे श्ानत ।। यँदि हों ने जीवें परमीत्म में डर श्रैस जानेत २६ शट्मा के विकार नहीं है और र्वुद्धि के ज्ञान नहीं होता है जीवात्मा सैव मलिनता को जानके मैं करतं हूँ मैं देखता हूँ ऐसी मोहित होता है॥ २५ ॥ रस्सी को सर्प की तरह आत्मों को जीचे जानकर भ्ये मर्स होता है यदि में जीवे नहीं हूँ परमारिमा हूँ ऐसी जने तो निभैये होती है। २६ ॥

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१६ श्रीतत्मवोध सटीक।

दीपों घटादिवत्सर्वात्मा जडैस्तैनिभास्यते २७ स्वेवाधे नान्यवोधेच्छा वोधरूपतर्योत्मनः ।। मैं दीपस्पान्यदीपेच्छा यर्था स्वात्मा मकाँशते २८ इक आतेम इन्द्रिय वुद्धि सभी को भासत ।। दीपक घेटे इच वे जड़ नहिं आंत्म प्रकसित २७ यह आतरमे ज्ञानसेवरूप इसी से कोई।। निजे ज्ञान दूसरेज्ञीन चाह नहिं होई।। . . जस दरपक अन्य भैदीपक चाहत नौहीं॥ तंस स्वयं प्रकाशत यह आर्तिम अपनाहीं ॥ २८॥ एकही आतमा युद्धि और इन्द्रियों को प्र्का- शित करता है उन जड़ों से शह्मा नैहीं प्रकाशित होता है जैसे दीर्पक घड़े को ॥ २७ ॥ श्ात्मा ज्ञानरूप होने से अपने जानने पर दूसरे के जानने की इच्छा नहीं होती जैसे दुीर्पक को दूसरे दीपक की इच्छा नैहीं होती ऐसेही आत्माँ स्वयं प्रकाश करता है॥ २८॥

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श्रीआत्मवोध सटीक। १७

निषिध्य निखिलोपाधीन्नेति' नेतीति वाक्यतः।।

आविद्यकं शरीरादि दैश्यं वुद्दुदवत्क्षरम्।। एवंद्रिलक्षँगं विन्धोदेहं ब्रह्मति निर्मलम्॥ ३० ॥ श्रुति स उपाधि सब नेति नेति करि छकै॥ जीनै जीवात्म परात्म तत्त्वमसि एँके ॥ २६॥ बुदयुदे इव क्षर देदादि दृश्य जे ततक्षेण॥ जॉनै निर्मल व्रह्महि हों इनहिं विलक्षर २० नेति' नेति इसे वेदवाक्यें से सब डैपाधियों का निषेष कर तत्वमसि महावाक्य से जीवात्माँ परमात्मा की पुर्कता जीने, ॥। २६ ॥ विद्यमाने शरीर आदिक जो दिखलाई पढ़ता है ुलले की तरह नाशवानू जोने और मे इनसे विलक्षण निर्मत महे हूँ ऐसा जाने ॥ ३० ॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।

दे हैन्येत्वाननें मे जन्मजराकाश्यलयादयः ॥ शब्दादि विपयः संङ्गो निरिा द्रियतया में च ॥३१॥। त्रमनस्त्वान्त में दु:खरागद्वपँभयादयः ॥। शमाणणो हमेनाः शुभ्र इत्यादिश्रुतिशासनात् ३२।। तनु जन्म जरा कंश मरण ने मेम हों न्यारां।। शव्दादिविषय सँगे नैहीं इन्द्रियनै पारा ३१॥ डुख द्वेपँ भयादिक राग नें ममे मन नाहीं।। नहिं पारा न मैन हो विमल वेद ऊस गाहीं ३२

जन्म बुढ़ापा मश्य डुबला होना आदि देह में है. मुझेमें नहीं है क्योंकि उससे श्न्य हूँ औई बिना इन्द्रियँवाला हूँ इससे शब्द स्वर्श आदि विषयों का संगे भी मेरा नहीं है।। ३१ ॥ चिना, मनवाला होन से राग द्वेप दुःख भय आदि मुझमें नहीं हैं वेद की 'श्राज्ञा से भी मैं विना प्राथ् वे विना मन्वाक्षा निर्मल- रपे हूँ।। ३२ ।।

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श्रीआत्मवोध सटीके। . १६

एनस्माज्जयिते पाशी मनैः सर्वेन्द्रिभासि चें ॥ खंचांयुर्ज्योतिरीपश्च पृरथवी विशस्य धीरिखी ३३ निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो निर्विकेलो निरञ्जन: निर्विकारो निरांकारो निर्त्मुक्तोडस्मि निर्मलं:३४ इससे होते" मन प्राण व इन्द्रियें सारा॥ नर्म अनिलँ अरनल ज़ले धरंण धरत संसौरा ३३ सैन अगुं निग्सन अंक्रियं विकलपहि न्यारा॥ हॉं निसकार नितर्मुक्क विमल अविकारा ३४- इस आतमा से प्राश, मन वें सब इन्दियाँ आर्कांश, वाँयु, अर्ग्नि, जले चार संसौर के धारस करनेवाली पृथ्वी उत्पनें होती है॥ ३३ ॥ सत्, रज, तम गुर्ए से राहित, जाना आना आदि क्रिया से रहित, सदैव रहनेवाला, संकलप विकर्रप से रहित, माया के दोषों से रेहित, जन्स आदि पट् विकारों से रहित, निरनाँह सट्टा, मुहसस्कनिर्मजे Shes

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.२० श्रीआत्मवोध सटीक।

सदो सेर्वसरमः शुद्धो निर्संङे निर्मलोऽचलें:३५॥। नित्यशुद्ध विदुकतैकम ख एडा नन्दमद्यम्। सत्यं ज्ञानेमनन्तं यत्पेर ब्रह्माहमेव ततूं॥ ३६॥ मैं' अच्युत नभे इव वाहर भीतर सबहीं। निते शुद्धँ विर्मल निर्सङ्ग अचल सम सवहीं ३५ नित शुद्ध मुक् इक सुखेअखराड अ्रद्धय सतें। जो परंवह्मे विज्ञान अनन्तैहि हा ततं॥३६॥ मैं आकाश की नाई सबमें बाहर भीतरं - रहनेवाला, नाशरहित, सर्दो सबमें बरार्बर निर्कोप, सबसे अलंग, निर्मत, अचल हूँ ।।३५। सदा स्वच्छ मुक एक अद्वितीय अखएड आ्नन्द जो सत्ये अनन्तं ज्ञानर्रूप पर व्रह्मे है, वै० ही' मैं हूँ२। ३६ ॥

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श्रीशात्मवोध सटीक। २१.

एवं. निरन्तराभ्यरता ब्रह्मैवास्मिर्ति वासना ।। है रत्य विद्याविक्ेपानोमोनिव रसायैंनम्॥३७ ॥ विविक्देश आ्रसीनो विराँगो विजितेन्द्रियः ॥ भोवयेदेकेमात्मानं तैमनन्तमनन्यधी: ॥३॥ ह प्रसाँहि नित अभ्यास वासना ऐंसी॥ नशेत अवोर्ध विक्षेप भिपंज रुने जैसी ३७ विनराग जितेन्द्रिय विजेन सुआसने लावै।। यर्केचित उस इके आतम अनन्त को भौवै.३= ऐसी प्रतिदिन की अम्यासवाली यह वासना कि मैं वहाही हूँ्ञन के विक्षेपों को दूर केरती है जैसे रसारथेन रोगोंको ॥३७॥ एकान्त स्थान मे. श्ासन पैर बैठ वैराग्यवान् व जितेन्द्रिय हो एकार्ग्रेचित कर उस अन्त श्द्धि तीय परमातमा का ध्यान करे ॥ ३८॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।-

शत्मन्येवाखिल दृश्यं पविलाँप्य घियां सुंघीः। भावयेदेरकंमात्मौंन निर्मलार्कांशवत्सदा॥।३६॥ नामवर्ग्ादिक सैव विर्हाय परमार्थवित्।।

सब दंश्य सुमति मति से ओत्मैदि लयलापे। निर्त विमल सरिस आकाश आंतैम इक भैंवै २ह तैजि नाम वर्ण आदिक सेँव ब्रहमंज्ञानी। परिपूर्ण सच्चिदानन्द रूप रह प्रानी ।।४0।।

सुन्दर बुद्धिवाला पुरुप वुद्धिसे सर्ब दिखते हुए. संसार को आरंमा में ही जीन करके सर्दा निर्मल आध:श की तरह एक परभीतमा का ध्यनि करे॥ ३६ ॥ श्रात्मज्ञानी पुरुष सरवे नामवैर्स आदि छोर्ड़के पूरे चैतन्यानेन्द रूप से रहता है॥ ४०॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।

ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परात्मोनि ने विदयेते।। चिदानन्दैकरूपत्वादीप्यैते स्वयमेवँं हि ॥ ४१ ॥ एर्वेमात्मारंणौ ध्यानमथने सततं कृते।। उदितावर्गतिर्ज्वाला सर्वाज्ञानेन्घनं दह्देत्ं॥४२.॥ 1 आत्मों में ज्ञाता जेये ज्ञान है नाहीं।। चित सुख स्वरूप इक लसत आरपँही माही ४१ अस्ते आर्त्मअ्रराण में निते करि मंथनैध्याना।। गति अनंल उदित सव दर्हत समधश्रैज्ञाना ४२.

जाननवाला व जानने की वस्तु और जिसके द्वारा जाना जावे ये भेद परमातमा में नहीं है' सच्विदानन्दरूप होने से अपने आपँही प्रकाशित होता है।। ४१ ॥ इस प्रकार सेदा अरसिरुपी भात्मा में मथनरूपी ध्यान करने से उत्पन्न हुई अग्निरूपी अ्भ्यास की गति सारे ईंधनरूपी श्रज्ञान को भस्म करती है॥ ४२ ॥

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  • श्रीआत्मवोध सटीक। 20

अर रुगोने वें बोधेनं, पूर्वसंतेमसे हृते।। तते शविर्भवेदात्माँ स्वयंमेवींशुर्मानियं॥।४३॥ आत्मा तुँ सतैत पोसीडएँयप्राप्यवदविद्यैया। तनाश प्राप्तकनाति स्वकएठीभरसं यर्था।।४४।। जसे परुंस प्रथर्म तम नाशेत अस विज्ञानीं।। फिरे श्रीपहि प्रकटैत श्रार्त्म श्दित्य समाँना ४२ निते मत्ति आत्म विनमाप्त अविद्यादुपर॥ उसनसत प्रार्प्त अस लस जस निजरगल भूपण ४४

पहले घोर अन्धकार के दूरे करते अरुसं (ललाई) की तरह ज्ञान से 'अ्ज्ञान दूर होता है' फिरें सूर्य की तरँह आत्मा अपने शपही उदये होता है।। ४३॥ निरेन्तर, रहतां हुआ भी आ्त्मा अ्ज्ञॉन से न रहने की बराबर है, और उस अज्ञानें के दूर होते पहले ही से रहताँ हुआ सा मालूम होता है जैसे" अपने गले'२ का आभूपए।।४४।।

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श्रीआत्मवोध सटीक।

स्थाणी पुरुषव द् भ्रान्त्या कृतां ब्रह्मेशि जीवेता।। : जीवस्य तास्त्कीरुप तस्मिन्टष्टनिवत्तत ४५॥ ज्ञानमञ्जसौं श्रेंं ममोति चाज्ञनिं वौधते दिग्भ्रमींदिवत् ४६॥

भ्रंम से किर्य व्रहमाहि जीवें थता में नर सम । देखते उस तर्त्वस्वरूप जीव नशित भ्रम ४५ निज तत्त्वरूप अ्र्पनुभव से ही जो जञोना।। दिगभ्रैंम इव शीघ्र हरत 'में, मम' अर्राना ४द

भ्रभ से ठूँठ में मनुण्ष की तरह ब्रह्म में जीवेख किर्या गया है जीवे का तत्व स्वरूप उसे ब्रह्म के । देखने1 से त्रज्ञान से हुआ जीवभाव दूर होजाता है"४५ अ्रपना त्त्वरूप जान लेने से रक्षत् हुआ ज्ञानं शीम्रह्ी 'मैं, मेश' यह भ्ज्ञानं दूर करता है जैसे ज्ञान होने पर दिशी का भ्रम ।। ४६।।

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२६ श्रीआंत्मवोध सर्टीक1

सम्यग्विज्ञानवान्यो गी स्वात्मैन्येवाखिलं स्थितम् एँकं चं संर्वमात्मौनमीक्षते ज्ञानचक्षुषा ४७॥। शत्मै वेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्यन विदैते ।। भैंदो यद्वंद्दटीदीनि स्वातमानं सैर्वमीक्षिते ॥४८।

पूरन ज्ञांनी योगी निजथित सव देखैत।। अरुँ ज्ञानदृष्टि से सवं इक आत्महि पेखत ॥४७॥ यंह सवे जँग आतमाही है और ने क्ोई । निजआ्र्ात्म लखेत सैंब जस घट मिट्टिहि"सोई ४म

अच्छे पकारे का ब्रह्मज्ञानी योगोभ्यास में लगा हुआ ज्ञानदृष्टि से अपनाही में सब को स्थित औई संबं एक आत्मी है ऐसा देखती है॥। ४७ ॥ येह सबे-संसौर शत्माही है आत्मा से अन्ये कुछ नहीं है' जैसे मिट्टी" और घढ़े आदि मिटटी ही है ऐसे ही सेबको अपनी 'शरमा ही देखैता है॥ ४म ॥

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श्रीआत्मबोध सटीक। २७

जीवन्मुँक्तिस्तु तद्विद्व नपूर्वोपाधिगुणांस्त्यनेवें।। W

तीतवां मोहोगावं ह्त्वों रागद्वेवादिराक्षसान ।। योगी शान्तिसमांयुक्को ह्यात्मारामो विर्राजते ५० शञानी उपाधधि गुण तर्जत मुझँ हो ऐसे॥ सतंचित सुखरूपाह से क्रिमिमंधुकर जैसे॥४६॥ योगी तरि मोह जैलधि-हैति राक्षेस इन्दा।। युत र्शान्तिहि आर्त्माराम लसत निष्फन्दा ॥५०।।

और उस ब्रह्म को जाननेवाला पहले के नाम वर्स आादि उपाधि और गुणों को छोर्डे देवे सच्िदानन्दरूपं होने से जीताँही हुआ मुक्िरूप होजाताँ है जैसे कीदा अ्रमर॥।४६॥ योगाभ्यांस करनेवाला मोहरूपी समुद्र को उेतर राग द्वेप आदि रौक्षसों को मार शान्ति से भरा हुधा सपँनी आँधमाही में आाराम करता हुआ विरानमान होता है॥। ₹० ॥

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श्रीआंत्मवोध सटीक।

वाह्यानित्यसुखासिँ घटस्थेदीपवत्स्वच्छँ: स्व्रॉन्तरेवं पर्कांशते ५१ ।। उपाधिस्थोऽि तद्धॅमने लिसी व्योमन्मुनि:। सर्वविन्मूंढवतिष्ठेदलै को वार्युवचरेतै ।। ५२।। तैजिंवाह असंत सुखरति निजसुखहि विलासत अन्तरहि दीपे घैटथितंइव विरमेल प्रकासत ॥४१॥ नभईव उपाधि थिते मुनि उसे धर्म ने राताँ।। सर्वविद जड़ इव रेह विरत चैले जसवीता ॥५२॥

बाहर के भूंडे सुखों का बैगाव छोड़ श्रत्मसुख से युक्र अपने अंत्स में ही घढ़े में रैक्खे दीपिक की तरह साफ़ प्रकार्शता है।। ४१॥ नाम वर्स आदि उपाधियों में रहता हुआ भी मुनि उनके धर्मों से आकोश की तरह नहीं जिपटता है सब कुर्छ जानता हुआ भी अ्ज्ञांनी की तरह रहे? और विना लगींव वायु की तरहु आचरए करे।। १२॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।- उपाधिविलयाद्टिष्णौ निर्विशेषं 'विशेन्मुमिः ॥ जले जल विषद्धयो ्नि तेजस्तजीस वी यर्था ५३ यंल्लोभाननोपरो लाभो यत्सुखान्नापैरं सुखैम्॥ यज्ज्ञानी नोपर जञौनं तैद्श्रैह्मत्यवधारयत् ५४॥ नाशत उैपाधि मुनि ब्रह्मदि मिलेत अशेषहि जलमें जैल तेजैहि तेजै नसहि नेमें जैसहि॥५३॥ जैहि"सुख सुँख अपर नें लौभ लाभ जेहि' कोई॥ जेहिं ज्ञान नें डूँंलर जौन जैहाँ भैज सोई॥५४॥ मनन करनेवाला उपाधियों के दूर छोने से भगवान् में पूरी नीति से जीन होता है जैसे जैल में जल प्ाकाशे में श्रीकाश और' श्रग्नि में श्रैगनि ॥ २३ ॥। जिस श्र्ोत्म- लाभ से अधिक दूसेरा लाभे नैहीं जिस सुखें से अधिक दूसरा सुख नहीं जिल ज्ञान से अधिक दू्सरा मान नहीं वही" नहां है ऐसा विचार करे। ४४॥

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२० श्रीआत्मबोध सटीक।

यद्दृष्टो ने पैर दृश्य षैद्धत्वाँ ने पुर्नर्भवः॥' यंजज्ञाती ने पर ज्ञानं तदवसेत्यवर्धी रेत् ५५३ तिर्थगूध्वमंधः m

अर्नेन्तं नित्यमें के ये सदू ब्रह्मेत्यैवधरियत्।। ५६ ।।

जहि 'रेखि ने लर्खेन कछुँ फिर ने होब जेि होई जहि'. जानि में जीनन कर्छुक बल्म भेज सोई५५ श्रेध उपरि तिर्रीछ्धे पूर्या नित्य इके जोई। सतचित सुख अरद्रेय ननत जैसां भर्जे सोई"॥५६॥

जिस आटमा को देखेकर और देखेना नहीं रहता व जिस आरत्मरूप होजाने पर फिर होनां नहीं होता व जिसका ज्ञाने होने से औरे जाननी नहीं" रहता वैही बहीं है ऐसी विचार करे ॥ ५॥ जो' एके निर्त्य अ्रनंन्त अद्वितीय संच्विदानन्द तिरंचे ऊपर नाच पूर्य है वैही नहें है ऐसी विचार केरे॥ ४६;॥

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श्रीआत्मवोध सटीक। ३१

पतट्रयाद्ट त्तिरुपेण अखएर्डानन्दमेकें यैतँदू बहे तेयवधौरयेत्॥ ५७॥ अ्रखएडा नन्दरूपस्य तस्यानन्दलवाश्रिता: ॥ ब्रह्माद्यास्तार्तम्येन भवन्त्यानन्दिनोऽखिलोः

इके सुख अखराड अव्यय 'श्रुति लैक्षित जोई। 'वह नहिं ईस आवृतिरूंप' ब्रेहं भजे सोई।५७ ॥। आश्रित लैव सुख सुखरूप अखरिडत श्रहीं। ब्रह्मादिकें कक्षावार सुँखी सेव होहीं॥ ५८॥

जी श्रॅविनाशी एकें अखएट आरनन्दरूप बार बार नेति नेति रूप से वेदान्तद्वाराँ समकायाँ जाता है वैही ब्रेह्म है ऐसेी विचार करे॥ ४७॥ उसे अ्रखएडेश्नानन्दरूप परमात्मा के लवमात्र आ्रानन्द का आ्रासरा लेकर सैव व्रहमां आदिक क्रम से श्रवविकाधिक आानन्दिव होते हैं। १८॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।

तदुक्मखिल वस्तु व्यवर्होरस्तदेन्विनः ॥ तस्मातसवगत ब्रह्म नीरे सैपिरिवीखिले ५ह। अनए वेस्थूल महेरवमेदी घर्मर्जेमव्य्येम्॥ झरगंगुयवर्णारयं तँद्व्रह्मैत्यवर्धारयेत्॥ ६०॥

उसंगुत है वस्तु संकले उसयुत व्यवद्वारा ।I इससे सँवमें प्रभु जसे घृतयुत पयसारा।५६॥ अर्ज्रें अ्रव्येय हस्वे न दीर्घ थूल श्रंु नाहीं।। विन रूपनाम गुए वर्स ब्रहमं भेंज वाँहीं॥ ६० ॥

सारी वस्तु उस परमाधमा से मिली हुई है और स्बें व्यवहार में भी उसकों मेल है इरसलिये म्रह्म सर्वन्र है'२ जैसे सभी दूध में घी" ॥ ५६ ॥ जो बहुत बाराक शंयु नहीं है, स्थून नहीं है, छोटो नहीं है, ा नहीं है,न जैन्म, लेता है, न मरतों है और रूप गुण वया नाम सादि- नहीं है वैही जहा है एसां विचीर करे॥ ६०॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।

यज्ासा भासतेऽकोदि्मास्यैर्यलु ने भास्यते । येनं सेवमिद भौति तैदब्रैह्मत्यवधारयेत्॥ ६१।। स्वरयमन्त्वहिर्व्याप्य भालयन्नखिल जग।। ब्रह्मं प्रकाशते वह्षिमतपतार्यसपिएडवत् ॥ ६२॥। जिसे भा भौसित भान्वादि ने भासित जोई॥ जिसेमे राजते यहं सकसे वैह्मं भर्ज सोई ६१ प्रभु ओप व्योपि संवें जग वहिरन्तैर भालैत।I जस लोहपिरोड परितप हुताश प्रकासेत॥ ६२॥ जिस परमात्मा के प्रकाश से सैर्य आदि प्रैकाशित होते हैं औरं जिसे सूर्य आदि के प्रकाश से वह नहीं प्रकाशित होता है जिससे येह सब संसौर सुशोभिते है भही वसे है ऐसी विर्वार करे ॥ ६१ ॥ परत्रेह अपने आपेंभीवैर वाहर ्व्यॉप कर सेरे संसाई को प्रकाशितं करता हुआ जलते हुए अन्नि से लोह के मोले की तरद प्रकाशिते होता है॥ ६२ ॥

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३४ जगद्विलक्षणं ब्रंह्म ब्रह्मणोड न किश्वनें।। ब्रह्मान्यंद्द्राति चेन्मिथ्यां यर्थी गरुमैरीचिका ६३ दश्यते भ्रूयेते यच्यंदूव्रह्मणोऽन्येन्न तद्रवेत्।। तत्वशञानाचें तदुव्रहमं सचिरदानन्दमद्दयम्ं॥६४॥ है प चिलक्षण जग केछु अपेर ने होई। जस मरु मैराचि है भूँट लसेत २ कीई ॥६३॥ जो सुनिर्य देखिय ब्रह यं वैदि हीई॥ हैक ब्रह्म ज्ञीन से वरुं सत चित सुख सेई"६४॥ म्रह्म संसार से विजपणे है वरहां से अन्थे कछ मेी + नहीं हैं यैदि ब्रहम से शन्यें मालूमं हो तो भूठे है जस'२ निर्जल स्थाने में जन की तरह सूर्य की किरस॥ ६३ ।। जो 'जो* दिखलोई सुनोई पढ़ता है वैह व्रहँ से फन्य नहीं होता है थ। वहे तत्वज्ञान से शद्धितायें सचिदानैन्द वहां ही है॥ ६४ ॥

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श्रीआत्मवोध सटीक। ३५

सैनंगं स्िदात्मानं ज्ञानरचंक्षुर्निरीक्षेते।। अज्ञानेचर्क्षुनेक्षत भासवन्तं भारनुमन्व्रपत्॥ ६५ । श्रवणादिभिरुद्दीसो ज्ञानाग्निपरितापितः । जी वे; सर्वमैलान्मुक्र: स्वर्सात्रद्द्योतंते स्वयम्॥।६६।। सयगत चिदातम सतरूप पानेदण देसन। जस अ्रन्थ प्रकाशित ेवि मे कुमेति दापेखँत ६५ अ्रचसादि प्रज्वलित जव जपलित ज्ञानानल॥ सबमल विमुक जस सोने स्वैयं भासँत भल ॥ ६६॥ जञाने दष्टिवाला सचिदानन्दें परमात्मा को सबमें रहता हुरओं देखता है अन्ञाने हष्टिवाला नहीं देखता ह" जैसे श्रन्धीं प्रकाश करते हुए सूर्य को ॥ ६४ ॥ वेदान्त श्रवशी मनन आादि से जगाये हुए ज्ञानरूपी अग्नि से जैले हुए सब मलीनेताओं से छूटा हुआ जीवें सोने की तरह अपने सांप चमचमौता है॥ ६६॥

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३६ श्रीआत्मवोध सटीक।

सर्वव्यापी सर्वंधारी भोंति सैर्व मकाशते.॥ ६७।

पर्भु ज्ञानभातु उरनमें उगि, तम इति भासतं॥। सव न्यापक सर्वाधार, सवहिं परर्कासत ॥६७ ।।

आात्मो ज्ञानरूपी सूर्य है आकाशरूपी हृदय में- उदय हो अन्धफाररूँपी अ्ज्ञान को दूर कर सबमें व्यास होकर सबको धारएँ करते व सर्बको प्रकाशितें करते सुशोभितं होता है। ६७ ॥।

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श्रीञात्मवोच सटीक।

दिग्देशकालोघनपेक्ष्य सर्वग शीतांदिहन्नित्यमुखं निरञ्ञंनम् ॥।

हरिगीतिका ॥

जो जान से बिनक्ियाँ अस,

नित चित विचारहिं लाबहीं।

दिशि देशे कालादिक न देसर्त,

स्वांत्म-तीरथ ध्यावदी॥।

जो विचार त्यागी पुलु्ष स्थान समेय आदि को विना देसे शीत उप्सें आादि के दूर करनेवाने सबमें रईनवाले माया-रहितँ नित्य श्रारनन्दरूप अपने

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३८ श्रीआत्मवोध सटीक।

यं: स्व्रात्मतीर्थ भजते विनिष्क्रिये: से सैर्वेनित्सर्वगता डमृतो भवदै॥ ६८ ॥ इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छंकराचार्य-

मखीत आात्मवोघ: समाप्त: ।

सर्वगत निरञ्जन नित्यसुँख,

शीतादि जहँ नहिं त्रावद्दीं।

वह सकलचिद सवगत विमुकहि, होर्य पर पद पावही॥ ६८ ॥

भ्रत्मतीर्थ को सेवन करता है वहै सब कुछे जाननेवाला सबमे रैहैता हुआ सुक्र होती है॥ ६म ॥

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श्रीआत्मवोध सटीक।

एकोननिशति शत द्विसतति सर सुधाकर वार। पर कुटु असित आपाड़पूरित प्र्ात्मबोघ उदार॥ यहि अ्व्याद्ित तिलक पद्य सुगद्य भापाकार। किय सूर्यदीन प्वीन जन पि लदददिं अ्रप्रतिसुस्वसार।।

इति श्रीआत्मवोधे मनोरमा भापाटीका समाक्ा।