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1. Auchitya Siddhant Aur Hindi Ka Riti Kavya Suresh Chandra Trivedi

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Barcode : 5990010044316 Title - Auchitya Siddhant Aur Hindi Ka Riti Kavya Author - Suresh Chandra Trivedi Language - hindi Pages - 253 Publication Year - 1977 Barcode EAN.UCC-13

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औचित्य सिद्धाते हिन्दी का रीति-काव्य और

डॉ. सुरेशचन्द्र त्रिवेदी

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प्रकाशक :शोध-प्रबन्ध-प्रकाशन दिल्ली-७

मुद्रक : सतीस कंपोजिंग एजेन्सी द्वारा नवप्रभात प्रिंटिंग प्रेस, शाहदरा, दिल्ली-३२

मूल्य : ३५.00 प्रथम संस्करण . दीपावली, १६७७

सर्वाधिकार • लेखकाधीन

प्रमुख वितरक: सूय-प्रकाशन, नई सड़क, दिल्ली-६.

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सहधर्मिणी

सौ० पुष्पावती त्रिवेदी को

सप्रेम

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牛 群 式

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भूमिका

प्रस्तुत ग्रंथ सरदार पटेल विश्वविद्यालय द्वारा पीएच० डी० उपाधि के लिये स्वीकृत मेरे शोध-प्रबन्ध का किंचित् सस्पृष्ट व मुद्रित रूप है। पूर्वसूत्र भारतीय काव्यशास्त्र और भापा-विज्ञान छात्र-जीवन से ही मेरी रुचि के विषय रहे हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे सन् १६५७ मे एम० ए० कर जब मै बल्लभ- विद्यानगर के भीखाभार्ड जीवाभाई वाणिज्य महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप मे नियुक्त होकर आया, तब हिन्दी मे अनुसन्धान कार्य करने की यहॉ कोई सुविधा न थी। दो वर्ष पश्चात् विश्वविद्यालय मे समद्ध स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग की स्थापना हुई और विभाग मे प्राध्यापक के रूप मे मेरी नियुक्ति भी। फलत मेरे लिए अनुसन्धान कार्य करने की सम्भावनाएँ व सुविधाएँ उपलब्ध हुई। किसी काव्यशास्त्रीय विषय को लेकर हिन्दी मे अनुसन्धान कार्य करने के सकल्प के साथ जब मैंने शोध-क्षेत्र में दृष्टिपात किया, तो पाया कि रस, ध्वनि, अलं- कार, वकोक्ति आदि प्राय सभी काव्यशास्त्रीय विषयो पर कार्य हो चुका था या हो रहा था। केवल 'औचित्य' ही एक ऐसा काव्यशास्त्रीय विषय था, जिसे हिन्दी के किसी युग-विशेष के साथ संयुक्त कर कार्य करने के लिए क्षेत्र उवर जान पडा। मेरी रुचि और विवेच्य क्षेत्र की शोध-सम्भावना ने ही मुझे औचित्य-सिद्धान्त और हिन्दी का रीति-काव्य' विषय पर शोध-कार्य करने को प्रेरित किया।

शीर्षक री व्याएया 'औचित्य-सिद्धान्त और हिन्दी का रीति-काव्य' शीर्षक से सामान्यत तीन कार्यों का बोध होता है-(१) औचित्य का स्वरप निर्णय-पूर्व और पश्चिम के मनीषियों की औचित्य-विषयक अवधारणाओ के परिप्रेक्ष्य मे 'औचित्य' का तात्विक चितन, उसकी काव्यशास्त्रीय स्थिति पर विचार तथा तत्सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओ पर विमश करते हुए 'औचित्व' का स्वरूप निर्वरण, (२) हिन्दी के रीतिकालीन काव्य की प्रवृत्तियों का युगीन परिस्थितियो व परिवेशादि के परिप्रेक्ष्य मे निदर्शन तथा (३) औचित्य का हिन्दी के रीति-काव्य में व्यावहारिक समायोग। प्रश्न उठ सकता है कि 'औचित्य' के व्यावहारिक समायोग व परीक्षण के लिए --

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भूमिका

प्रस्तुत ग्रंथ सरदार पटेल विश्वविद्यालय द्वारा पीएच० डी०उपाधि के लिये स्वीकृत मेरे शोध-प्रबन्ध का किचित् संस्पृष्ट व मुद्रित रूप है। पूर्वसूत भारतीय काव्यशास्त्र और भाषा-विज्ञान छाव-जीवन से ही मेरी रुचि के विषय रहे है। काशी हिन्दू विञ्वविद्यालय से सन् १६५७ मे एम० ए० कर जद मैं वल्लभ- विदयानगर के भीखाभाई जीवाभाई वाणिज्य महाविद्यालय मे प्राध्यापक के रूप ने नियुक्त होकर आया, तब हिन्दी में अनुसन्धान कार्य करने की यहॉ कोई सुबिधा न थी। दो वर्ष पश्चात् विश्वविद्यालय मे समुद्ध स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग की स्थापना हुई और विभाग मे प्राध्यापक के रूप मे मेरी नियुक्ति भी। फलत मेरे लिए अनुसन्धान कार्य करने की सम्भावनाएँ व सुविधाएँ उपलब्ध हुईं। किसी काव्यशास्त्रीय विषय को लेकर हिन्दी में अनुसन्धान कार्य करने के सकल्प के साथ जब मैंने शोध-क्षेत्र मे दृष्टिपात किया, तो पाया कि रस, ध्वनि, अल- कार, वक्ोक्ति आदि प्राय सभी काव्यशास्त्रीय विषयो पर कार्य हो चुका था या हो रहा था। केवल 'औचित्य' ही एक ऐसा काव्यशास्त्रीय विषय था, जिसे हिन्दी के किसी युग-विशेष के साथ सयुक्त कर कार्य करने के लिए क्षेत्र उर्वर जान पडा। मेरी रुचि और विवेच्य क्षेत्र की शोध-सम्भावना ने ही मुझे 'औचित्य-सिद्धान्त और हिन्दी का रीति-काव्य' विषय पर शोध-कार्य करने को प्रेरित किया।

शोर्षक की व्याख्या 'औचित्य-सिद्धान्त और हिन्दी का रीति-काव्य' शीर्पक से सामान्यत तीन कार्यो का बोध होता है-(१) औचित्य का स्वरूप निर्णय-पूर्व और पश्चिम के मनीषियों की औचित्य-विषयक अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य मे 'औचित्य' का तात्विक चितन, उसकी काव्यशास्त्रीय स्थिति पर विचार तथा तत्सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओं पर बिनन करते हुए 'औचित्य' का स्वरूप निर्धारण, (२) हिन्दी के रीतिकालीन काव्य की प्रवृत्तियो का युगीन परिस्थितियो व परिवेशादि के परिप्रेक्ष्य मे निदर्शन तथा (३) औचित्य का हिन्दी के रीति-काव्य मे व्यावहारिक समायोग। प्रश्न उठ सकता है कि 'औचित्व' के व्यावहारिक समायोग व परीक्षण के लिए

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( v ) हिन्दी का रौति-काव्य ही क्यो चुना गया? वस्तुत हिन्दी के रीतिकालीन काव्य ने अपना प्रस्थान-बिंदु वही से लिया है, जहाँ संस्कृत का काव्मशास्त्र पंडितराज जगननाथ को समीक्षक मेधा से चरम परिणति को प्राप्त हो गया था। अत. रीतिकालीन कविता इस सैद्धान्तिक समायोग के लिए अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त भूमि मानी जा सकती है। साथ ही आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र प्रभृति विद्वानों ने रीतिकालीन काव्य को विशुद्ध साहित्य की सज्ञा दी है। चूंकि औचित्य का सम्बन्ध काव्य के अतर्बाह्म दोनो प्रकार के चारुत्व से है, शुद्ध काव्य-रीतिकाव्य में ही उसके व्यावहारिक समायोग की समी- चीनता स्वत सिद्ध प्रतीत होती है। यों भी रीति-काव्य या शुद्ध-काव्य को सामाजिकता विषयक औचिन्य के निकप पर परखना अपने-आप मे स्वय एक उपलब्धि मानी जा सकती है।

प्राप्त सामग्री और उसका परीक्षण इघर पिछले कुछ वर्षों मे 'औचित्य-सिद्धान्त' तथा 'रीति-काव्य' पर पृथक- पृथक अपेक्षाकृत अधिक सामग्री प्रकाश मे आयी है, परन्तु 'औचित्य-सिद्धान्त' पर कोई स्वतन्त्र गोध-ग्रथ प्रकाशित नही हुआ है। (सम्प्रति ज्ञात हुआ है कि डॉ० चन्द्रह्म पाठक का 'औचित्य-सम्प्रदाय का हिन्दी-काव्यशास्त्र पर प्रभाव : प्रत्यक्ष और परोक्ष' विषय पर आगरा विध्वविद्यालय से म्वीकृत शोध-प्रबन्ध, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी से १६६७ में प्रकाशित हो चुका है।) डॉ० बी० पी० महाजन ने अंग्रेजी मे Kshem- endra' An Author Study' विषय लेकर पूना विश्वविद्यालय में अपना गोध-कार्य सम्पन्न किया था। इसके अतिरिक्त प्राप्त सामसो का इस प्रकार वर्गीकरण किया जा सकता है-(क) पुस्तकाकार प्रकाशित सामग्री, (ख) समीक्षा-ग्रन्थो में उपलब्ध आनुषंगिक सामग्री तथा (ग) पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखादि। पुस्तकाकार सामग्री मे पूर्वोल्लिखित डॉ० पाठक के शोध-प्रबन्ध के अतिरिक्त अन्य उल्लेख्य ग्रंथ है-डॉ० मनोहरलाल गौड़ रचित 'आचार्य क्षमेन्द्र', 'औचित्य-विचार- चर्चा' (हिन्दी अनुवाद); डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी रचित 'औचित्य-िमर्ग', डॉ० रामपाल विद्यालंकार प्रणीत 'क्षेमेन्द्र की औचित्य-दृष्टि' और डॉ० सूर्यकान्त रचित अंग्रेज़ी ग्रथ 'Kshemendra Studies'! डॉ० पाठक का शोध-प्रबन्ध भुख्यतः रीतिकालीन काव्यशास्त्र पर पडे औचित्य के प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव से सम्बद्ध है। डॉ० गोड के दोनों ग्रंथ क्मशः क्षेमेन्द्र की पीवती, औचित्य का इतिहास एवं क्षेमेन्द्र की प्रमुख तीन कृतियों का अनुवाद होने के कारण सामान्यतः क्षेमेन्द्र के दृष्टिकोण को हो प्रस्तुत करते है। 'औचित्य-विमश' मे डॉ० त्रिपाठी ने औचित्य के स्वरूप, औचित्य के इतिहास पर प्रकाश डाला है और अंत के मूल 'औचित्य-विचार-चर्चा' को सानुवाद प्रस्तुत किया है। यद्पि उक्त ग्रंथ मे औचित्य-विपयक समस्त जिज्ञासाओं का समाधानमूलक विशद् विवेचन कम ही उपलब्ध है तथा औचित्य का समग्र रूप उभर नहीं पाया है तथापि ग्रंथकार का पांडित्य व ग्रथ

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की उभादेयता सन्देहातीत है। डॉ० विद्यालंकार ने क्षेमेन्द्र की औचित्य-दृष्टि को आशय की गम्भीरता व शैली की मनोरजकता के साथ स्पष्ट किया है, किन्तु अन्ततः वह है, तो औचित्य की विषयीनिष्ठ व्याख्या ही; क्षेमेन्द्र के अतिरिक्त अन्य विद्वानों के विचारो का पूर्णत. प्रतिनिधित्व न होने के कारण उसमे ओचित्म का स्वरूप निर्धारण एकागी ही रह गया है। डॉ० सूर्यकान्त ने 'Kshemendra Studies' मे क्षेमेन्द्र के जीवन की चर्षा करते हुए उनकी प्रमुख तीन कृतियो का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रस्तुत कर दिया है। औचित्य की अपेक्षा इसमे क्षेमेन्द्र ही प्रमुखता पा गये है, परिणामत्तः सिद्धान्त-निरूपण में सभी चहलुओ पर परिपूर्ण विचार नहीं हो पाया है। समीक्षा ग्रन्थों में उपलब्ध आनुषंगिक सामग्री इस प्रकार की सामन्री हमें निम्नलिखित ग्रंथों में प्राप्त होती है-पं० बलतेव उपाध्याय रचित 'भारतीय साहित्य-शास्त्र' भाग १ और २; डॉ० रामलाल सिंह रचित 'समीक्षा-दर्शन' भाग २; पं० विश्वनाथप्रसाद मिश्र प्रणीत 'वाड्मय-विमर्श'; डॉब तारकनाथ वाली कृत 'रस-सिद्धान्त की दार्शनिक और नैतिक व्याख्या, म० म० कुप्पु स्वामी शास्त्री रचित' High ways and by ways of literary Criticism in Sanskrit' तथा डॉ० वी० राघवन् रचित 'Some concepts of the Alankar shastra'. उक्त सभी सामग्री का-जो मूलतः आनुषंगिक है-मूल्याकन करने से ज्ञात होता है कि कमश पं० बलदेव उपाध्याय का औचित्य-इतिहास; डॉ० रामलालसिंह का औचित्य-सम्प्रदाय-परिचय; पं० विश्वनाथप्रसाद मिश्र का औचित्य विषयक सामा- जिक सन्दर्भ; डॉ० तारकनाथ बाली का औचित्य का नैतिक आख्यान, म0 म० कुप्पु- स्वामी शास्त्री की औचित्य की सर्वोपरिता; डॉ० राघवन का अग्रेजी में प्रस्तुत औचित्य का इतिहास आदि औचित्य को देखने के विगिष्ट दृष्टिकोण मात्र है। पत्न-पत्िकाओ में जो सामग्री प्राप्त होती है, उसमें भी प्रधान रूप से औचित्य के इतिहास पर ही विचार किया गया प्रतीत होता है; औचित्य के विषय में विभिन्न जिज्ञासाओ एवं स्वरूप-विषयक प्रश्नो पर अधिक विचार नही किया गया है। औचित्य सम्बन्धी सामग्री के अतिरिक्त रीतिकाल पर भी प्रभूत सामग्री प्राप्त होती है। डॉ० नगेन्द्र ने 'रीतिकाव्य की भू्मिका' में-जो उनके डी० लिट के शोघ- प्रबन्ध के पुर्वार्द्ध का मुद्रित रूप है-रीतियुगीन सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक पकित स्थितियों के परिवेश में रीतिकालीन काव्य व जीवन का विस्तृत परिचय दिया है। डॉ० नगेन्द्र सम्पादित 'हिन्दी साहित्य का बृह्द् इतिहास' भाग ६ (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) मे भी रीतिकालीन जन-जीवन, साहित्य, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला आदि की प्रभूत व प्रमाणभूत जानकारी प्राप्त होती है। डॉ० राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने 'रीतिकालीन कविता और शृंगार-रस का विवेचन' नामक अपने शोध-प्रबन्ध में युग बौर जीवन को स्पष्ट करते हुए रीतिकाक के प्रतिनिषि कचियों की रचनाओं मे शृंभार

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रस के निर्वाह पर चर्चा की है डा० मोमप्रकाश ने रीतिकालीन अलकार साहित्य का शास्त्रीय विवेचन' मे नवीन सामग्री के प्रकाश में अलकार साहित्य का भास्त्रीय विवे- चन किया है। डॉ० कृष्णत्त विपाठी ने 'रीतिकाल एव आधुनिक काल के सधि मूव' (अप्रकाशिन शोध-प्रबन्ध) मे रीतितत्त्व और रीतिकाल को स्पष्ट करने का सफल प्रमत्न किया है। डॉ० अरविन्द पाण्डेय ने 'रीतिकालीन काव्य मे लक्षणा का प्रयोग एक आलोचनात्मक अध्ययन' में प्रथम लक्षणा के स्वरूप एव भेदो का विवेचन किया है, तदुपमन्त रीतिकाल के प्रमुख प्रतिनिधि कवियो की रचनाओ मे उन भेदो का व्यावहारिक ममायोग किया है। उपर्यक्त सभी प्रकार की उपादेय नामग्री के होते हुए भी हमारे विवेच्य विषय पर शोध की सम्भावनाएँ यथावत् हैं और हमारा विपय अव तक नितान्त अस्पृष्ट रहा है। प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध द्वारा लेखक का प्रस्तावित योगदान प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के योगदान के विषय मे अत्यन्त विनम्न भाव से यह निवे- दन किया जा सकता है कि- (') प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध में लेखक ने औचित्य की अवधारणा को यथासम्भव निष्ठापूर्वक स्पष्ट करते हुए औचित्य की स्वरूप नम्वन्धी जिज्ञासाओ का यधामति समाधान प्रस्तुत करने का प्रामाणिक प्रसत्न किया है। और (२) तत्त्वत विचार करते हुए उसमें लेगक ने रीतिकालीन प्रमुख कदियों की कविता मे औचित्य का व्यावहारिक समायोग किया है। इस प्रकार इन शोध-प्रबन्ध के द्वारा हिन्दी-समीक्षा के क्षेत्र से और अन्यत्न भी किसी काल-विशेष के काव्य की औचित्य- धरक व्याख्या करने का द्वार उद्घाटिन किया गया है। शोध-प्रक्रिया व प्रविधि अनावश्यक विस्तार व पिष्टपेषण से बचने का प्रयत्न करते हुए इस शोध- प्रवन्ध मे औचित्य का स्वरूप निर्धारण करने एवं पूर्व-पश्चिम के अनेक मनीषियो के विचारो का परिचय करने-कराने के लिए ऐतिहासिक क्रम के स्थान पर तत्त्व-क्रम को ग्रहण किया गया है। नत्व-क्रम का यही आधार तृतीय अध्याय मे औचित्य का रीति- काव्य मे समयोग करते समय अपनाया गया है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यह तत्त्व क्म क्षेमेन्द्र द्वारा स्वीकृत तत्व कम ही है इस तत्त्व क्रम मे लोक कला एव सामाजिकता के आधारो को भी सन्निविष्ट कर लिया गया है। क्षेमेन्द्र द्वारा सुवृत्त तिलक' में चचित छन्दौचित्य को भी समायोग के लिए ग्रहण किया गया है। अध्याय संक्षिप्ति प्रस्तुत शोष-प्रबन्ध तीन अध्यायों मे विभक्त है-(१) औचित्य • सैद्ान्तिक विवेचन (२) रीतितत्व और रीतियुग और (३) रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग।

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प्रथम अध्याय मे ओचित्य की व्युत्पति, परिभाषा, औचित्य के मारनीय एव पश्चिमी पर्याय आदि पर विचार करके व्याकन्ण, साहित्यशास्त्र, नीतिशास्त्र, सौन्दर्य- शास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र आदि से औचित्य का सम्बन्ध स्थिर किया गया है। माथ ही औौचित्य तथा अन्य काव्य-सम्प्रदायो का पारस्परिक सम्बन्ध भी स्पष्ट किया गया है। 'औचिति्य' के स्वरूप सम्बन्धी कतिपय जिज्ञासाओ पर भी यहाँ विचार किया गया है। अन्त में निष्कर्ष प्रस्तुत किये गये है। द्वितीय अध्याय मे रीतितत्व और रीतियुग पर िस्तृत विमर्श किया गया है। रीतितत््व पर विमर्श करते समय 'रीति' की व्युत्पनि, परिभाषा, 'रीति' के सामान्य विशिष्ट अर्थ, 'रीति' के अन्य भारतीय पर्याय तथा पञ्चिमी 'हैली' तत्त्व के सन्दर्भ मे 'रीति' के स्वरूप पर विचार किया गया है। रीति के इतिवृत्त पर प्रकाश डालते हुए रीति का रस, ध्वनि, अलंकार, वक्ोक्ति, औचित्य आदि से सम्बन्ध भी स्पष्ट किया गया है। 'रीतियुग' क्ीर्पक के अन्तर्गत रीतियुगीन जीवन की सामाजिक, धार्मिक, आथिक, राजनतिक, सास्कृतिक परिस्थितियो व कला एवं साहित्य, सगीत, चित्रकला इत्यादि की अवस्था पर सामूहिक रूप से विचार कर रीतिकालीन जीवन के चित्र को पूर्णत उभारने की यथाशक्ति चेप्टा की गई है। नृतीय अध्याय में औचित्य व अनौचित्य के अनेक भेदो का-जो सुविधा के कारण क्षेमेन्द्रीय ही है-रीतिकालीन प्रमुख कवियो की रचनाओ से समायोग कर उपमहार मे औचित्य के परिवेश मे समस्त रीतिकाव्य की उपलब्धियों व अभावो पर विचार किया गया है। परिशिष्ट मे आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र जी का पत्र है तथा अकारादिक्रम मे ग्रथानुक्रमणिका प्रस्तुत की गई है। आभार-दर्शन अपने शोध-कार्य मे मुझे अनेक विद्वानो व सस्थाओ मे विविध प्रकार की प्रेरणा व सहायता मिलती रही है, जिनसे उत्हण होना मेरे लिए सम्भव नही है : विषय-विमर्श के प्रथम बिन्दु पर स्व० प्रो० मोहनवल्लभजी पंत, स्व० आचार्य नन्टदुलारेजी वाजपेयी एवं स्व० डॉ० पी० के० गोडेजी से जो सत्परामर्श प्राप्त हुआ, तदर्थ मैं इन तीनो दिवगत आत्माओं के प्रति श्रद्धावनत हूँ। अनेक स्थलो पर मेरी उलझनो को मुलझाने मे पत्नोत्तर देकर अथवा प्रत्यक्ष समय देकर प० विश्वनाथप्रसाद मिश्रजी एव डॉ० नगेन्द्र जी ने मेरी अत्यन्त महायता की है। अत मैं आचार्य मिश्रजी तथा आचार्य डॉ० नगेन्द्रजी का अत्यन्त कृतज हैं। श्रद्धेय डॉ० रामेश्वरलालजी खण्डेलवाल 'तम्ण' (भूतपूर्व प्रोफेमर एवं अध्यक्ष, हिन्दी-विभाग, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर एव सम्प्रति प्रोफेसर एव अध्यक्ष, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र, जिनके कृपापूर्ण मार्ग-दूर्शन मे प्रस्तुत शोध-कार्य आद्यन्त सम्पन्न हुआ है और जिनके स्नेहपूर्ण प्रश्रय के बिना यह

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कार्य सम्भवत, अधूरा ही रह गया होता, के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मेरे पास बन्द नही हैं-केवल श्रद्धावनत हूँ। काशी नागरी प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय के व्यवस्थापक, भाण्डारकर ओोरियण्टल इस्टिट्यूट के अधिकारी-गण, भाई काका पुस्तकालय के पुस्तकालमाध्यक्ष आदि के प्रति मैं कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। उन्होंने मुझे समय-समय पर आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की हैं। विश्वविद्यालय अनुदान-आयोग ने शोध-कार्य के दिनो में पुस्तको के ऋ्रय के लिए मुझे ५००) रु० का अनुदान दिया था, जिसका यहाँ सघन्यवाद उल्लेख करना प्रसंगोचित है। इसी प्रकार इस प्रबन्ध को प्रकाजित करने की अनुमति देने के लिए मै सरदार पटेल विश्वविद्यालय के अधिकारियो के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ। प्रवन्ध को प्रकाशित करने में जो तत्परता व स्नेह सूर्य-प्रकाशन के श्री तनसुख- रामजी गुप्त ने दिखाया है, उसके लिए मैं उनका हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। डॉ० विजयेन्द्रजी स्नातक, डॉ० विजयपालसिंह जी तथा डॉ० राममूर्तिजी त्निपाठी ने शोष-प्रबन्ध पर अपना अभिमत भेजकर मुझे विशेष रूप से अनुगृहीत किया है, मै उनका चिर-कृतज्ञ हूँ। विभिन्न प्रकार के सहयोग निमित्त सर्वश्री प्रो० विष्णप्रसाद जानी, डॉ० मधुसूदम मेहता, श्रीमती अरविन्दा मेहता, प्रो० भूरतिराम झाकरिया, प्रो० रमणभाई पटेल के प्रति मैं अपना आभार व धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। विगत कुछ वर्पों के विघ्नसकुल व रग्णावस्था से ग्रस्त जीवन मे मेरी प्रत्येक छोटी-बडी आर्थिक-सामाजिक समस्या से मुझे निरन्तर चिन्तामुक्त रखने का सेवाभाव- पूर्ण व तपनिरत सहयोग देने का जो उद्योग किया है, तन्निमित मै अपने अनुज प्रो० जगदीशचन्द्र त्रिवेदी को हार्दिक साधुवाद देता हूँ। डॉ० श्रीराम नागर के प्रति आभार व्यक्त करूँ भी तो कैसे? वे मेरे अभिन्न है और मैं आत्म-स्तुति से बचना चाहता हूँ। इस शोध-प्रबन्ध के लिखने के परम्भ से प्रकाशम तक के विभिन्न सोपानो पर जिन ज्ञात-अजात व्यक्तियों व संस्थाओं से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग मिला है, उन सभी का आभारी हूँ। विद्वानो के सुझावों व सत्परामर्शों का स्वागत है। यदि इस ग्रंथ से हिन्दी- साहित्य के ज्ञान-क्षेत्र में किचिन्मात भी वृद्धि हुई या किसी भी व्यक्ति को लाभ हुआ, री मैं अपना श्रम सार्थक समझूंगा। 'क्लेश. फलेन हि पुन. नवतां विघत्ते।'

श्रावणी, वि० सं० २०३३ -सुरेशचन्द्र विवेदी २८-८-१६७७

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शमिमत

(१) भा रतीय साहित्य शास्त्रियो ने काव्य और काव्यास्वाद का विवेचन करने के साथ काव्य की आत्मा का विचार पूरे आग्रह के साथ किया है। इस आग्रह का ही परिणाम है कि प्रत्येक सम्प्रदाय काव्य की आत्मा अपने स्वीकृत सिद्धान्त में ही स्थिर करता है। रस, ध्वनि, रीति, अलकार और वक्ोक्ति के बाद आचार्य क्षेमेन्द्र ने काव्य को जीबिन औचित्य में स्थिर किया तथा पूर्ववर्ती आचार्यो के मन्तव्यों का समाहार औचित्य मे कर लिया। यह एक मनीपी पंडित की प्रतिभा की ही देन समझी जायेगी। रचनाकार के कर्त्तव्य कर्म का नियामक औचित्य को होना चाहिए; यदि उचित-अनु- चित के विवेक से रहित साहित्य लिखा जाता है तो उसे सत्साहित्य नही माना जा सकता। सभवतः क्षेमेन्द्र ने इसी व्यापक दृष्टि से यह सिद्धान्त स्थापित किया था। हिन्दी साहित्य के इतिहास मे रीतिकालीन काव्य का मूलाधार शृगार, प्रेम, प्रणय, रति, नायक-नायिका भेद ही है। इस काल के साहित्य को सामत युगीन मान- सिकता मे संश्लिष्ट माना जाता है, जिसमे न तो स्वस्थ सामाजिक मूल्यो की स्नीकृति है और न जीवन्त चरित्रो तथा वास्तविक अनुभूतियों का चित्रण ही। अत औचित्य की मर्यादा के निकष पर उसे कसने की उदारता नही दिखाई गई। कुछ समीक्षको ने उसे अनैतिक और मासल शृंगारी भी ठहरा दिया, किन्तु समस्त रीतिकालीन काव्य को इस प्रकार निरस्त कर देना इस समुद्ध काव्य के साथ न्याय नही है। इसी दृष्टि से डॉ० मुरेशचन्द्र त्रिवेदी ने रीतिकाव्य के बहिरग एवं अन्तरग का परीक्षण करने का निश्चय किया और औचित्य सिद्धान्त की कसौटी पर इस काव्य की शोध की वैज्ञानिक पद्धति से परीक्षा की। डॉ० त्रिवेदी के शोध-प्रबन्ध मे रीतिकाव्य के साथ मात्र सहानु- भूति नही है वरन् उनकी दृष्टि तटस्थ और निस्सग रहले हुए काव्य मे औचित्य के बिन्दुओ को स्पष्ट करने की ओर रही है! बिहारी, देव, मतिराम, पद्माकर, घनानन्द आदि कवियो ने शरृंगार और प्रेम वर्णन मे भी किसी मर्यादा को सामने रखा है ऊ ह क्या है और किस सीमा तक औचित्य की मयदा का निर्वाह करती है, यही देखना डॉ० व्रिवेदी का लक्ष्य रहा है। मैं डॉ० त्रिवेदी को इस प्रयास के लिए साधुवाद देता हूँ। डॉ० विजयेन्द्र स्नालक आचार्य, हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्य

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(२ ) प्रस्तुत कुनि डॉ० सुरेशचन्द्र त्रिवेदी के पी-एच० डी० के निमित्त लिखे गये शोध- प्रबन्ध का परिष्कृत रूप है। यो शोष-प्रवन्ध अपने मूलरूप मे ही पर्याप्त सुविचारित स्वस्थ और मं त रहा है। कृति मे विवेचन के तीन मुख्य बिन्दु है-औचित्य का तान्विक निरूपण, रीति और बैली की समनीलता और उनके अग-प्रत्यग तथा रीति- युगीन रचनाओ की औचित्यान्वयी और औचित्य व्यतिरेकी विवेचना। प्रथम खण्ड में 'औचित्य' शन्द की व्युत्पत्ति, चिन्तन की विभिन्न धाराओ के मन्दर्भ मे औचित्य, 'औचित्य' का अलकार शास्त्रन्तर्गत स्वरूप गत विकास और अन्तत उसकी सिद्धान्न रूप मे मान्यता निरूपित हुई है। विद्वान लेखक ने 'औचित्य' समानार्थी पाश्चात्य काव्यणास्त्रीय नत्त्व का भी ऐतिहासिक क्रम मे अत्यन्त विघद् और बोधगम्य उपस्यापन द्वारा जो तुलना प्रस्तुत की है-उससे 'औचित्य' के स्वरूप के क्षि तिज को व्यापक विस्तार मिला है। इस विवेच् बिन्दु के अन्तर्गत न केवल पूर्ववर्ती विवेचनाओ का ही समाहार किया गया है, अपितु अपनी ओर से भी उसको व्यवस्थित किया गया है। साथ ही यथामभव कोई कोण नही बचा है, जिसमे 'औचित्य' को न देखा गया हो। लेगक वस्तुमुखी विश्लेषणजन्य अपनी स्थापनाओ, मान्यताओ, निप्पत्तियो और निष्कर्पो के प्रति पर्याप्त आश्वम्त और सचेन है। दूसरा बिद्द है-रीतिनत्त्व और उसका समवेत विवेचन। इसमे पश्चिमी विषयिनिष्ठ शैली और उनके उपकरणों के साथ पौरस्त्य वस्तुमुखी 'रीति' के घटको का स्वरूपत और तुलनात्मक निरूपण है। पता नही, लेखक ने 'गीतिकाल' के घटक 'रीति' का काव्य की रीति सिखी मुकबीन सो' के सन्दर्भ में विचार क्यो नही किया। 'रीनि साहित्य' नियमानुधावी रचनाओं का काल है। लगना है लेखक ने 'रीति' के सम्कृन तथा लक्षण ग्रथीय परम्परा के ही सन्दर्भ में विभेष रूप से देखा है। ब्रथ का तृतीय विवेच्य भाग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कारण, इस अध्याय में रीतिकालीन रचनाओं के साक्ष्य पर औचित्व के अत्वयी और व्यतिरेकी रूपों का क्षोदक्षम प्रयोग और परीक्षण है। कही क्तित् मतभेद संभव है पर कुल मिलाकर विवेचन साफ और सुथरा है। निश्चय ही इस प्रयास से 'औचित्य' तत्व के जिज्ञासुओं का ज्ञान क्षितिज विस्तृत होगा और विद्वानों के बीच कवृतिकार को प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। आलो- चना के क्षेत्र मे 'परम्परा' को आत्मसात् कर उसे और युगोचित विकास देने की दिशा मे इम 'प्रयोग' का मैं स्वागन करता हूँ और आशा करता हूँ- कि विद्वान् लेखक इस दिशा को और भी आलोकित करता रहेगा। -डॉ० रामसूति त्रिपाठी प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, डीन, कला-संकाय विक्रम विश्वविद्यालय उज्जन (म० प्र०)

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विषय-सूची

पृ० म०

भूमिका .. ... V मे XI (१) पूर्वसूत् (२) गोर्षक की व्याख्या (३ ) प्राप्तसामग्री और उसका परीक्षण ...

(४) प्रस्तुन शोध-प्रबन्ध द्वारा लेखक का प्रस्तावित योगदान (५) शोध-प्रक्रिया व प्रविधि (६) अध्याय-सक्षिप्ति (७) आभार-दर्शन ...

प्रथम अध्याय

औच्ित्य : सैद्धान्तिक विवेचन

प्रकरण-प्रवेश ... १ ने ७५ (१) औचित्य व्युत्पन्ि, परिभाषा नथा अन्य पर्या (२) औचित्य की शास्तरीय स्थिति बाद, सिद्धान्त, सभ्प्रदाय अथवा विचारधारा ...

(३) औचित्य तथा अन्य शास्त्र (क) औचित्य और व्याकरण, (र) औचित्य और सौन्दर्य- शास्त्रं, (ग) औचित्य और आचारणास्त्र, (घ्र) औचित्य और लोकव्यवहार, (च) औचित्य और साहित्यशास्त्र, (छ) औचित्य और राजनीविशास्त्र (४) औचित्य एवं अन्य काव्य-सम्प्रदाय ... (अ) औचित्य और रम, (आ) औचित्य और ध्वनि, (इ) औचित्य और वकोक्ति, (ई) औचित्य और रीति, (ड) औचित्य और अलंकार ..

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पृ० स.

'(५) औचित्य-सम्बन्धी कतिपय दृष्टियां *" औचित्य अंग मगति के रूप मे, औचित्य काव्यीय आचार- सहिता के रूप मे, औचित्य रस-सिद्धान्त की नैतिक व्याख्या के रूप मे (६) औचित्य. स्वरूप, जिज्ञासा व समाधान (१) औचित्य का आधार लोक या शास्त्र, (२) औचित्य : अन्तरग या बहिरग, (३) औचित्य कलागत या सामाजिक, (४) औचित्य, सापेक्ष या निरपेक्ष, (५) औचित्य : वस्तुगत या विषयिगत, (६) औचित्य. स्थिर या गतिशील, (७) औचित्य और आधुनिकता, (र) औचित्य का अनुवर्त्तन क्यो नही? (६) औचित्य का निर्णायक कौन ? (3) औचित्य-विमर्श पूर्व और पश्चिम के आचार्यों के परिप्रेक्ष्य मे (र) औचित्व भेद, वर्गीकरण एव व्यापक महत्त्व ( ) निष्कर्ष

द्वितीय श्रध्याय

रोति-तत्त्व और रोति-युग

प्रकरण-प्रवेश ७६ से १०७ (१) रीति-तत्व : व्युत्पत्ति, कोशगत अर्थ, विशिष्ट अर्थ (२) रीति का इतिवृत्त (३) रीति और वृत्ति (४) रीति और प्रवृत्ति ... ...

(५) रीति और गैली (६) रीति तथा अन्य काव्य-सम्प्रदाय : रीति और रस, रीति और ध्वनि, रीति और अलंकार, रीति और वकोक्ति, रीति और औचित्य-निष्कर्ष '(७) रीति-युग राजनीतिक परिस्थितियाँ, सामाजिक परिस्थितियाँ, आर्थिक परिस्थितियाँ, धार्मिक परिस्थितियाँ, सास्कृतिक

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( xv )

पृ०म० परिस्थितियाँ-भाषा, साहित्य, सगीत, चित्रकला, स्थापत्य- कला

(८) उपसंहार

तृतीय अध्याय

रोति-काव्य में औतित्य : व्यावहारिक समायोग

प्रकरण-प्रवेश १०८ से २२४

(१) रीनि-काव्य में औचित्य : पदौचित्य, वाक्यौचित्य, प्रबंधौचित्य, गुणौरित्य, अलंकारौचित्य, रसौचित्य, करियौचित्य, कारकौचित्य, लिंगौचित्य, वचनौचित्य, विशेषौचित्य, उपसगाचित्य, निपातौचित्य, कालौचित्य, देशौचित्य, कुलौचित्य, व्रतौचित्य, तत्त्वौचित्य, सत्त्वौचित्य, अभिप्रायौचित्य, स्वभावौचित्य, सारसंग्नहौचित्य, प्रतिभौचित्य, अवस्थौचित्य, विचारौचित्व, नामौचित्य, आशीर्वादौचित्य, सर्वनाभौचित्य, छन्दौचित्य .-· (२) रीति-काव्य में अनौचित्य पदानौचित्य, वाक्यानौचित्य, प्रबंधानौचित्य, गुणानौचित्य, अलंकारानौचित्य, रसानौचित्य, क्रियानौचित्य, कारकानौचित्य, लिंगानोचित्य, वचनानौचित्य, विशेषणानौचित्य, उपसर्गा- नौचित्य, निपातानौचित्य, कालानौचित्य, देशनौचित्य स्वभावानौचित्य, लोकानौचित्य, मंघटनानीचित्य, कलानौचित्य छंदानोचित्य, (३) उपसहार : औचित्य के परिवेश मे रीति-काव्य का मूल्याकन- अभाव और उपलब्धियॉ

परिशिष्ट

२२५ से २३ TH (१) आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्रजी का पत्र (२) घंथानुक्रमणिका मुलग्रंथ

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(AVI

काव्यशास्त्र, गुजराती-काव्यगास्त्र, पाश्चात्य- काव्यशास्त्र ..

आलोचनाग्रथ : हिन्दी-आलोचनाग्रंथ ... सौन्दर्यगास्त्र : हिंदी, मराठी, अंग्रेजी ... नर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, आचारणास्त्र इतिहास व्थ तथा साहित्येतिहास ग्रथ हिंदी, अंग्रेजी प्रकीर्ण ... कोप एवं व्याकरण ग्रंथ पत्न-पत्रिकाएँ .. .. .

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औचित्य : सैद्धान्तिक विवेचन

प्रकरण प्रवेश

'औचित्य सिद्धान्त और हिन्दी का रीति-काव्य' नामक प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के इस प्रथम अध्याय मे विषय-प्रवेश करते ही सर्वप्रथम औनित्य की स्वरूप-विषयक सहज ही उपस्थिन कतिपय जिजञासाओं का ममाधान आवश्यक प्रतीत होता है। औचित्य- सिद्धान्न के यथार्थ स्वरूप-बोध के लिए औचित्य की व्युत्पत्ति, औचित्य की परिभाषा, औचित्य और उसके अन्य पर्याय, औचित्य का महत्त्व, औचित्य तथा अन्य शास्त्र, औचित्य की काव्य-शास्त्रीय स्थिति, औचित्य तथा अन्य काव्य-सम्प्रदाय, आचार्यो का औचित्य-विषयक दृष्टिकोण, पूर्व-पश्चिम की औचित्य-चिता का परिचय, औचित्य के भेद व उनका वर्गीकरण आदि पर विचार कग्ना अनिवार्य है।

व्युत्पत्ति 'उचित' विशेषण मे भाववाचक 'ष्यव'9 प्रत्यय लगाकर 'औचित्य' शब्द साधित किया जाता है। 'उचित' शब्द की व्युत्पति व्याकरण के अनुसार दो धातुओ से सिद्ध की जाती है: 'बच्' (परिभापण), 'उच्' (समवाये) से। किन्तु 'उचित' का आज जो अर्थ ग्रहण किया जाता है, (योग्य, अनुरूप) बह न तो 'वच्' 'परिभाषणे' (बोलना) से प्राप्त होता है न 'उच्' 'समवाये' (एकत् करना) से। संस्कृत के शब्द-कोपो मे से कुछ ने प्रस्तुत अर्थ मे 'उचित' की व्युत्पत्ति 'वच्' धातु से मानी है,3 तो कुछ ने 'उच्'

  1. वर्ण द्ढदिभ्य व्यअ च सि० कौ०, ५१११२३ गण वचन ब्राह्मणादिम्प: कर्मणि च, सि० को०, ५११२४ २ भट्टोजि दीक्षित सि० को०, पृ ३६५,४०६ जयशकर जोशी. हलायुध कोश, पृ० ८६, १६५; राधाकान्त देव शब्द करुपद्गुम, पृ० २२०; सवाईलाल वोरा शब्द चिन्तामणि, पृ० १७%

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२ आचिय सद्धातिक निवेचन

धातु म, १ एक स्थान पर उसे उच् और 'बच् दोनो धातुओ से व्युत्पन्न माना गया है।२ डॉ० सूर्यकान्त शास्त्री ने 'उचित' की व्यृत्पनि तो 'उच' धातु से ही मानी है, परंनु उन्होने 'उच्' का अर्थ दिया है-'प्रसन्न होना'/3 प० महादेव गास्त्री ने 'उचित' शब्द को 'उच्' (समवाय) मे वयुन्पन्न माना है। वे 'समवाय' का अर्थ 'गुणो का समुदाय' करते है और 'उचित' का अर्थ योग्प गुणो का समुदाय' करते है।४ श्री आप्टे महोदय ने इसे 'उच्' में व्युत्पन्न मान कर इसके बार अर्थ बताये 2 -- (1) To coilect, (2) To take pleasure m, (3) To be accustomed or used to; (4) To be suitable, suit, fit .* इसी प्रकार सर मोनियर बिलियम्स ने भी इसे 'उच' से व्युन्पन्न माना है और जर्थ भी प्राय वे ही दिय है, जो आप्टे महोदय द्वारा दिए गये है। ६ 'हलायुध कोश" में 'उचित' की व्युत्पनि 'तच्' से मानी गई है-उचितम् ((ि०) (वच-कितच्-चि बचि वुचि कुटिन्य वितिन्।) और उनके अर्थ बताये गय हे-विदितं, न्याय्य, प्राप्त, औषधिक, युक्त, ग्राह्य, परिमितम्।" सपादक मधोदस ने औपयिक के सासने अग्रेजी मे Pmoper' 'Fit' लिश्न कर अधिक स्पष्टता ग दी है। 'शब्द कलपद्ुम" और 'शब्द चिंतामणि' भी व्युत्पत्ति एव अर्थ के विषय में हलायुद कोण का हो अनुरारण करते प्रतीत होते है। वाचतम्पत्यम्' कोश में इस गब्द को 'बच््' और 'उच्' दोनो धातुओ से व्युत्पन्न मानकर इसके अर्थ इस प्रकार दिये गये है-"घस्त पर्शित युक्ते"। इन विद्वानो एवं कोझकारा ने 'उच्' धातु का यह अर्थ कहा से ग्रहण किया, यह कहना कठन है। उच्' (समवाय) की अपेक्षा 'बच्' (परिभापण) से 'उचित' का 'योग्य', 'उपयुक्त', 'अनुकूल'-अर्थ निकालना अविक समोचीन प्रतीत होता है।

१ द्वारिकाप्रसाद पटुर्नेदी : संस्कृत शब्दार्भ कौग्तुम वृ २१६-२० V. S. Apte . Sanskrit-English Dictionary, p. 397 Monter Williams : Sanskrit-English Dictienary, p. 172 तारानाथ तर्कं वागीम : वाचस्पत्यम् प० १०५६, १५६६ काव्यशारत का मूल फोर औचित्य (तेख), पालोचना, मईल, १६५७ ४ डाँ राममूनि जञिशठी : शौषित्य विमशे, प० १६००६१ -5 V. S Apte : Sanskrit-English Dictionary, p 397 6 Monier Williams Sanskrit-English Dictionary, o 172 - ७. जयशंकर जोशी : हनायुघ कोश, पृ० ८६, १६४ ८. राष्राकान्त देव -शब्द कल्पबरुम, प० २२० ह. सवाईलाल वोग शब्द चिन्तामणि, पृ० १७१ ९०. तारकनाय सर्क वागीश: वाचस्पत्यम्, पृ० १०५८, ९५६६

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औनित्य सज्जातिक विवेचन ३

सभवन प्रारम्भ मे यह शब्द 'भापण मे उचितानुचित-विवेक के अर्थ मे प्रयुक्त हुआ होगा, जो कालान्तर मे अर्थ-विस्तार की प्रवृत्ति के अनुसार 'योग्यायोग्य-विवेक' के अर्थ मे सर्वव प्रयुक्त होने लगा। 'हलायुध' और 'शब्द कल्पद्रुम' से इसका समर्थन भी हो जाना है। निष्म्ं रूप ने कहा जा सकता है कि 'रूपविचार' की दृष्टि से 'उचित' शब्द 'उच्' धानु के अधिक निकट प्रतीत होता है और 'अर्थ विचार' की दृष्टि से 'उचित' शउद को 'बच' धातु से व्युत्पन्न मानना ही समीचीन होगा। 'औचित्य' 'उचित' विशेषण से वनी हुई भाववाचक संज्ञा है। यह शन्द सस्कृत में विलिंगी है। स्त्रीलिंग मे उसका रूप 'औचिती' होता है, यथा- "औनितीमनुधावन्ति सर्वे ध्वनिरसोन्नया।"१ नपुसक लिंग में उसका रूप 'औचिन्यम्' होता है यथा-"औचित्य रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्"।२

परिभाषा

'उचित' के नाव को औचित्य कहते है। क्षेमेन्द्र ने औचित्य की परिभापा इस प्रका दी है-"उचितस्य च यो भाव तदौचित्यं प्रचक्षते।"3 और 'उचित' की स्प्टता करते हुए वे कहते है कि "उचितं प्राहुराचार्या सदृशं किन् यम्य यत्।"४ अर्थात् जी जिसके सद्श या अनुकूल होता है, वह उसके लिए उचित है। इस प्रकार 'औचित्य' एक सम्वन्ध विशेय है और काव्यशास्त्र में उसका सापेक्ष महत्त्व है। वह एक सापेक्ष पदावली है और तीन उपकरणों की पूर्व-कल्पना करती है-(१) वह पदार्थ जिस अन्य पदार्थ अनुकूल होते है: काव्य के प्रमग में हम उसे अगी अर्थात् रस कह सकते है, (२) वह पदार्थ जो अनुकुल होता है काव्य के सदर्भ में-मम् रसतर पदार्थ-जिन्हे अंग-रूप माना जाता है-इसके अंतर्गत आ नगते है; था (३) अगी (रस) और अग (रसतर पदार्थ) के बीच अनुकूलता का सम्बन्ध। अन्य पर्याध भारतीय काव्य-गास्त में औचित्य के अन्य पर्यायों के रूप मे भरत द्वारा प्रयु्त अनुरपता'2; भामह द्वारा प्रयुक्त 'न्याय्य" और 'युक्तता'; दण्डी का निधि दर्गित

१ बरावेव उपाध्याय: भारतीय साहित्य शास्त्र भाग २ पृ० २५ २. क्षमेन्द्र , धोचित्य विचार चर्चा, पृ० ११५ वही, पृ० ११६ वहो, प० ११६ योडनुमम. प्रथमस्तु वेष', वेपानुस्पण्न मतिप्रचार: । 74 गतिप्रचाशानुगत च पाठ्य, पाठ्यानुस्पोडभिनयश्च कार्यः॥। -भ० ना० सा० १४६ द उलकारवदग्रा म्यमर्थ्य व्वाय्यमनाकुलम्। -काव्यालकार १।३५ युक्त लोकस्वभावेन रमैश्न मकले: पृथक् । -काव्यालकार १।२१

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औषित्य सैद्धातिक विवचन

साग १, पडितराज जगन्नाथ का 'योग्यता' आदि प्रमुख है। माश्चात्य काव्य-शास्त्र मे "अरस्तू' एव होरेस' द्वारा प्रयुक्त 'Propr- iety': मिसेरो द्वारा प्रयुकत 'Decorum' 'औचित्य' के मुख्य पर्याय है। इनके अति- RFT Appropriateness; Adoption; Harmony; Symmetry; Fitness, In Keeping आदि शब्द भी पर्याय रूप में प्रयुक्त होते हैं। डॉ० राघवरन् ने Mutual Conformity of parts के अर्थ मे 'Sympathy' शब्द को भी औचित्य के पर्याद के रूप में प्क्युत किया है। महत्व डॉ० सूर्यकान्त ने 'काव्य-शास्त्र का मूल और औचित्य' नामक अपने लेख मे 'औचित्य' को जीवन और जगत् का आधारतत्व बताया है और साहित्य मे उसकी महना समझाते हुए उसकी अतिप्राचीनता पर प्रकाश डाला है। नाहित्य एवं जीवन मे सुसवादिता स्थापित करने वाले इस 'औचित्य' का मूल उन्होने अथववेद मे प्रयुक्त 'स' 'मह' 'एव 'सम्' शब्दो में देखा है।" उनका कहना है कि काव्याचार्यो ने 'उचित' शब्द के व्यापक अर्थ पर ध्यान न देकर उसके सीमित अर्थ 'समजसता' पर अधिक ध्यान दिया और वह अपने व्यापक अर्थ 'मन्द्रता' से च्यृत होकर आलोचको की टीका-टिप्प- गियो का भाजन वन गया। क्षेमेन्द्र का 'औचित्य-तन्व' अपने भीतर व्यापक और सीमित इन दोनो अर्थों को समाहित करके काव्य-सिद्धान्त के रूप मे खिल उठा है और 'सौन्दर्य' का वह सर्वांगपूर्ण लक्ष्य बन गया है।१ वस्तुतः 'औदित्य' शब्द और 'औचित्य-तत्त्व' इतना विशाल है कि उमकी परिधि-भावात्मक और अभावात्मक-मे सभी कुछ समाबिष्ट हो जाता है। 'उच्ित' और 'अनुचित' के भीतर क्या कुछ समाविष्ट नही होता ? जीवन के विभिन्न क्षेत्रो मे

  1. व्यत्पन्नबुद्धिरमुना विभिदतितेन मार्चेण दोषसुणयोवेश्यवतंनोभि। वा्भि कताभिसरयो मदिरेक्षणाभिः धन्यो युवेव रमसै लभते व कीतिम्॥ परि० कान्या- दर्क ६१६७ २ योग्ता व मुक्तसिर्दामति सौकिक व्यवहार गोचरता। रस गगावर प्राम्मा औचिती योग्यतषा। -रस गगाघर, द्वि० पा० 3 Aristotle : Poetics, Humphry House, p. 83 4 Cleanth Brooks . Literary Criticism a short History, p. 80 5 Ditto, p. 80 6. Dr. V Raghavan : Some Concepts of the Alamkar Shastra p. 208 5 डा. सूयंकान्त : काव्यशास्त्र का मूल औौर शचित्य (लेख), सालोचना, अपल, ५६५ू७ = मही ६ यही १०. वहो

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ओचिय संद्ोंतिक विचेचन ५

उसकी सत्ता अवाधिन है। अनेक दृप्टियां से 'औचित्य' का अपना महत्त्व है। एक प्रमुख व व्यापक-महत्वपूर्ण काव्य-शास्त्रीय सिद्धान्त के रूप में ता इसकी प्रतिष्ठा सवेविदित है ही; अन्य अनेक शास्त्रो में भी वह एक आवध्यक कनौटी और उपयोगी तत्त्व के रूप ने पर्याप्त प्रतिष्ठित है। बहुधा वह सीमा-निर्वारण करने व सामंजस्य स्थापित करने बाले मिद्धान्त के रूप में समाबृत है। औचित्य की शास्त्रीय स्थिति

'औचित्य' की व्युत्पत्ति, परिभाषा तथा अन्य पर्याधो पर दृष्टिपात कर लेने के प्चात् 'औचित्य' की शास्त्ीय स्थिति की स्पष्ट करने के हेतु काव्य गास्त्र की परम्परा मे गृहीत 'बाद', 'सिद्धान्त', 'सम्प्रदाय तथा 'विचारघादा'-पदावली पर विचार करना अपेक्षित ही होगा।

नाद

'बारद' न्याय-शास्त्र का एक पारिभाषिक शब्द है। 'नर्कसंग्रह"' मे 'वाद' की परिभापा इम प्रकार दी गई है-'तत्त्व वुभुत्सो: कथा वादः । अर्थात, तत्वार्थ बोध की इच्छा ने किया गया दो व्यक्तियों का परस्पर संवाद 'वाद' कहलाता है। इस परिभाषा मे निम्न लक्षण फलित होने है- (१) 'ब्राद' तत्वाथ बोध की इच्छा मे होता है न कि विजय-पराजय के विचार से, न ही अपने ज्ान के प्रदर्शन की भावना से। (२) 'वाद' दो व्यक्तियों के बीच होता है। 'वेदान्त शब्दकोष मे विजय- पराजय की भावना से मुक्त होकर गुरु-शिष्य के बीच तस्वार्थ बोध के लिए हुए प्रम्नी- तरमूलक सवाद को 'वाद' कहा गया है। हिन्दी में 'वाद' शब्द अंग्रेजी के 'इज्म' शब्द के पर्याय के रूप मे भी प्रयुक्त होना है-अभिव्यजनावाद, अस्तित्ववाद, माक्सवाद। वहाँ पर 'बाद' शब्द का अर्थ है-क्षेत्र विशेष मे खण्डन-मण्डन का आश्रय लेते हुए स्व-पक्ष का समर्थन तथा अन्यान्य विचारयाराओं का विरोध करते हुए अपने मन्तव्य का ही प्रतिपादन। 'औचित्य' न तो भारतीय न्यायशास्त्र की शब्दावली के अर्थ मे वाद है, न ही अंग्रेजी पदावली 'इज्म' के अर्थ में ही। तन्वार्थ बोध होते हुए भी वह प्रश्नोनरमूलक गुरु-शिष्य-सवाद नही है और काव्यगत चास्ता का परम रहस्य होते हुए उसन स्त्र-पक्ष के समर्थन के लिए अन्यान्य सम्प्रदायों के खण्डन-मण्डन का उपकम नहीं किया है। अत. औनित्य न 'वाद' है और न 'इज्म' ही। सिद्धान्त "सिद्धान्त' भी भारतीय दर्शन-शास्त्र का पारिभापिक शब्द है। 'तर्क-तग्रह्' में

१. अन्नम् भट्ट. त्क-सग्रह, ५ृ० ६४ २. स्वामी आात्मानन्व गिरि : वेदान्त शब्द कोश, पृ० ८४

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मौचित्य सद्धातिक विवेचन ७

'औचित्य' को 'मम्प्रदाय' कहना उचित नही, क्योंकि औचित्य के समर्थको ने उमे काव्यात्मा के रूप मे प्रतिष्ठित करने या कराने का कोई उनकम नही किया (यद्यपि कुछ विद्वान् उसे काव्यात्मा के रूप ने स्वीकृति देते हुए प्रतीत होते है और बुछ के अनुसार क्षेमेन्द्र भी औचित्य को काव्य की अत्ना मानते प्रतीत होते है)।१ क्षेमेन्द्र ने 'औनित्य' को 'रस' का प्राण माना है। 'रस' की अनुपस्थिति न वे औचित्य को कोई महत्त्व नही देते। न नो उन्होंने 'औतित्य' की सम्प्रदाय के रूप मे परिकल्पना ही की है और न 'औचित्य' का उनके बाद कोई अनुवर्तन ही हुआ। निष्कर्पत यह कहा जा सकता है कि 'औचित्य' को सम्प्रदाय मानना भी समी- चीन नही है। सम्भवत उक्त तथ्यों को ध्यान मे रखने हुए ही आचार्य प० विग्बनाय प्रसादजी मिश्र ने अपने ग्न्थ में 'औचित्य मन' शब्द का प्रयोग कर औचित्य को 'मन' ने रूप मे न्वीकार किया है।

विचारधारा

विचारधारा में जहाँ एक ओर ऐतिहासक अनुक्रम, शृखलाबद्वता, व्यवस्था होती है, वहाँ दूसरी ओर उसमे सामयिकना तथा परिवर्तनगीलना भी होती है। दुछ आचार्य औचित्य को एक विचारधारा अथवा साहित्यिक विचारणा भी मानते हु। स्वयं क्षेमेन्द्र ने ही अपने म्रन्थ का नाम 'औचित्य विचार चर्चा' रखा है, परन्तु यह उनकी विनय मात्र है। प्रकृति से सरल होने से उन्हे अपने पक्ष का घटाटोपमूलक किंवा आडम्बरपूर्ण मण्डन करना इष्ट न था। आधुनिक पण्डितो मे स्वर्गीय आचार्य पण्डित नन्ददुलारे वाजपेयी जी औचित्य को 'एक साहित्यिक-विचारणा' भानते है। उनका कथन है कि - "औचित्य मन का परम्परागत विवेचन क्षेमेन्द्र द्वारा एक विगिष्ट केन्द्र पर लाया गया और तब से औचित्यमत को एव स्वतन्त्र साहित्य-विचारणा का स्वरूप प्राप्न हुआ। परन्नु यह विचारणा साहित्य-गास्त्र के किसी सिद्धान्त का निर्माण नही करनी वरन् वह अनेक सिद्धान्तों में अन्तर्भूत रहकर सवका सयमन और एक सीमा तक एकी- करण करती है।"२ एक अन्य स्थान पर आचार्यजी ने औचित्य को व्यावहारिक समीक्षा का एक 'आवश्यक उपकरण' माना है। सामान्यत औचित्य को एक साहित्यिक-विचारधारा या विचार-पद्धति मानने मे कोई आपत्ति नहीं हो सकती, किन्तु वह उसकी अन्तिम या एकमात्र स्थिति नहीं है' ऐतिहासिक अनुक्रम, देशकालानुसार परिवर्तन-क्षमता एव व्यवस्था से युक्त होने नथा

१ डॉ० सूर्यकान्त शास्त्री • डॉ० गमलालसिंह, डॉ० मनोहरलाल गोड। डॉ० राममूर्ति विपाठी शवित्य-विमर्श (भूमिका-नन्ददुलारे बाजपेयी)। A1 रहा

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औचिय मद्धातिक विवचन

वेवल माधयिक तल्व स निरमित न होने व अस नीतिशास्त्रीय भरातल पर स्थिन होने के कारण औनित्य की धारण को एकान्तत. एक विचारवारा मानना उसके मान अत्याय करता है। औचित्य तथा अन्द शास्त्र व्याकरण, साहित्य, कला, सौन्दर्यशास्त्र, आचारशास्त, राजनीति, लोकव्यव- हारादि से 'औचित्य' का अपना नहत्त्व किसी-न-किसी रूप मे है ही। उसकी मता व महना मे से सभी शास्त्र व्याप्त है। औचित् और व्याकरण

व्याकरण का साहित्य से-विशेषतः काव्यशास्त्र से वनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। 'ध्वनि' का 'प्रसिद्ध सिद्धात्त' व्याकरण के 'स्फोट' सिद्धान्त पर खडा है। व्याकरण और कगव्य-गास्त्र के परस्पर-सम्बन्ध के विषय मे डॉ० नगेन्द्र का यह कथन द्रस्टव्य है नास्तव मे व्याकरण-शास्त्र हुमारे काव्य-गास्तर का एक प्रकार से मूलावार है। वाणी के अनंकरण के जो सिद्धान्त काव्य-शास्त्र मे स्थिर किये गये, उन पर व्याकरण के मिद्धात्तो का स्पष्ट प्रभाव है। भामह, वासन तथा आनन्दवर्द्धन जैसे आचार्यो न अपने द्रन्यों मे व्याकरण की स्थान -सस्थान पर महायता की है।" महर्षि पनंजलि ने अपने महाभाष्य के प्रारम्भ मे ही शब्दो की साधुता-असाधुता की चर्चा की है। व्याकरण-मम्मन होते हुए भी कुछ पातुओ का तत्तदर्थ में प्रयोग न करने का उन्होने आवेश भी दिया है-पथा 'गव्' धातु का गत्यर्थक प्रयोग व्याकरण- लब्ध होने पर भी निपिद उनका यह विवेचन व्याकरण मे 'औदित्य' की प्रारम्भिक एव अप्रत्यक्ष चर्चा के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। संभवत. औचित्य-सिद्धान्त के मूल मे इसकी कुछ प्रेग्णा स्थ्रित रही हो। व्याकरण में 'ओनित्य' का प्रत्यक्ष एवं स्पप्ट उल्लेख सर्वप्रथम तो वैयाकरण भनृ हुरि के अ्रंथ 'वाक्यपदीय' मे मिलता है जहाँ नानार्थक शब्दो के अर्थ-निर्णयार्थ 'औचित्य' को भी एक आवक्यक कसौटी के रूप में ग्रहण किया गया है।2 भोज, मम्मट, विदवनाथ आदि सभी प्रमुख परवर्ती आचारवो ने 'अभिधा' के विवेचन के प्रसंग मे भनु हरि की इन्ही प्रसिद्ध कारिकाओं का आघार लिया है। शब्दार्थ-निर्णय केवल 'रूप' के आधार पर ही नहीं किया जा सकता; अपितु वाक्य, प्रकरण, अर्थ, औचिन्य, देव, वालादि के आधार पर होता है। जिन बारह कलौटियों के आधार पर अर्थ-निर्णय हेत है, ने है-संयोग, वियोग, साहचर्य, विरोध, अर्थ, प्रकरण, लिंग, अन्यसन्निधि,

१ डॉ० नगेन्द्र. रीति काव्य की भूमिका, पृ० २६ र. वासुदेव शास्त्री अभ्यकर: व्याकरण महाभाष्य, भाग १ (अन०), पृ० २१

शन्दार्था प्रविभज्जन्ते न रूपादेव केवलास् ॥३१६ वा० प०

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अनिय सकानिक विवेचन

माधय औचित्य देश और काल, औचित्य और सौदर्यशास्त्र सौदर्य विपयनिष्ठ है औौर विपयनिष्ठ भी। वम्तुजगत मे उसकी जितनी सत्ता है, अंतर्जगत् भी उसकी सता से उतना ही व्याप्त है। डॉ. कुमार बिमल के अनुमार औचित्य-विचार भारतीय सौदर्यगास्त्र का वह आधारमूतर है, जो सभी ललित कलाओं पर मसान रूप में लागू हो सकता है। इतना ही नहीं वे उसे सभी ललित कळाओ के लिए एक सर्वमान्य निकष प्रस्तुन करने वाला व्यापकनम सिद्धान्त मानते हैं नथा रग एव ध्वनि-सिद्धान्नो की मूल भावना की अवस्थिति भी औचित्य-भावना मे मानते है।3 जहाँ एक ओर डॉ० कुमार विपल ने 'औचित्य' की सौडर्यशास्त्रीय महत्ता निरूपित करने हुए उसकी व्यापक महत्ता प्रतिपादित की है, वहाँ कुछ अन्य सौदर्य- शास्त्रियों ने उसे बाह्य-सौदर्य के एक आवश्यक उपकरण या नत्त्व के रूप मे प्रतिपादित किया है। डॉ० सुरेन्द्रनाथ दाम गुप्त ने उसे बाह्य-सौदर्य के एक तन्ब के रूप में ग्रहण किया है। और यदि देखा जाय तो 'सगति' और 'प्रमाणबद्धना' भी मूलत औचित्य की रित्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ है। सौदर्य लिित-कलाओ का प्राण है और काव्य मे तो हम उसे आनन्द या रस के पर्याय के रूम में स्वीकार कर चुके है। वस्तुत 'सरभ' और 'मुन्दर' मे कोई मोलिक भेद नही है। काव्य एव अन्य कलाओ मे रस अथवा सौदर्य की स्थिति 'तदगभूत उपकरणों की परस्पर अनुकलता और प्रमाणवद्धता पर ही निर्भर है। औचित्यमयी होने मे ही कृति सुन्दर हाती है। सुन्दरता का एक आवश्यक गुण है -- व्यवस्था। औचित्य के अ्रभाव में व्यवस्था सभव नही और व्यवस्था के अभाव मे 'सुन्दरता' की स्थिति दुप्कर है। काव्य-गत सौदर्य की खोज के सुदीर्ध- कालीन उद्योग का ही यह मुफल है कि 'रस', 'ध्वनि', 'औजित्य' आदि मुख्य काव्य- सिद्धान्त आविर्भूत हुए। सौन्दर्य, सौन्दर्यानुभूति एवं सौन्दर्याभिव्यक्ति सभी मे औचित्य-दृप्टि आवश्यक है। व्यक्ति-वैचित्र्य को अपने स्थान पर यथोचित महत्त्व प्रदान करके भी सौन्दर्य की विषयगत सता स्वीकार करनी पहेगी। सुन्दर वस्तु अनलकृत अवस्था मे भो

१. मयोगो विप्रयोगशव साहचर्य विरोधिता । पथं. प्रकरण लिंग शब्दस्यात्यस्य सुन्निधि॥ मामर्थ्यमौचिती देश कालोव्यविति सवरादय । पव्दार्यंस्थानवच्छेदे विशेय स्मति हेतव 1 ३१७ वा० प० १ प्रोर २- -- (डॉ० राघवन् सम्पादित भोज प्रणीत 'शृगार प्रकास' से उद्धम डॉ० कुमार विमन. सौन्दर्यशास्त के तत्व, पृ० १० ३. वही, पृ० १० डॉ० सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त : सोन्दर्यतत्व, पृ०६.बाह्य-सोन्दर्य के तत्वसम्मात्रा, सुब्यवम्था, विविधता, एकरूपता, शरचित्य, जहिल्ता, सगति, प्रमाणवद्धता, आनुवुष्य, मंयम, व्यजना, स्पष्टता, मस्णता, कोमलता, वर्णप्रदीप्ति-वे वस्तुनिष्ठ सौन्दर्य के सत्व माने गये हैं।

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१० मोचिय सद्धातिक तिवचन

सुन्दर ही लगती है।१ इसी प्रकार यह भी सत्य है कि अननुकूल अलकरण सुन्दर वस्तु को भी असुन्दर बना देनी है। यह सम्भव् है कि पकृत्या सुन्दर वस्तु भी मव को एक-सी समान नुन्वर प्रतीत न हो क्योंकि द्रष्टा की दृष्टि भी सौन्दयानुदनि की प्रत्रिया का एक प्रमुख अग है। माना-भेद से कोई वस्तु न्यनाधिक सुन्टर प्रतीन हो सकती है. किन्तु उसका यह नात्पर्य नहीं कि कला के क्षेत्र में किसी निश्चित, स्विर मानको या सापदण्डो की निर्मिति अनावश्यक या असम्भव है। व्यक्न-वैचित्र्य या विजय- निष्ठता मे व्यनिरिक्त कलाश मे सौन्दर्य के सर्व-सावान्य द सर्वग्राह्य आधागो की स्थिति सहज सम्भाव्य है। कलागन इन्ही आधारों को 'औचित्य' से परिभादित या जा सकता है। इसकी तनिक-मी विच्युति या उपेक्षा सौन्दर्य को सौन्दर्याभास में परे- णत कर देनी है। पानी मे नमक गल जाता है, परन्तु एक सीमा तक ही। उस सीमा मे आगे पानी नमक को गला नही सकता। इसे रसायन शास्त्र (कैमिस्ट्री) मे सतप्न ददा (प्वाइन्ट आफ सैच्युरेशन) कहते है। उसी प्रकार नभी कलाओ मे एक सीभा तव ही मौन्दर्याधान या अलकरण सुखकर किवा सह्य होता है, जिसके आगे किया गया किचि- न्मात अलंकर्ण या वर्द्धन सौन्दर्य की हानि कर डालता है। सगीत, चिवकला, गिल्ादि सभी कलाओ मे यह सीमा सदैव दृष्टिगत रहती है। उसे ही 'औचित्य' सज्ा मे अनि- हित किया जा सकता है। प्रादेशिक भिन्नताओ अथवा कालाकारो के वैयक्तिक र्वँचितन के रहते हुए भी इनमे अवश्य ही कुछ अश मामान्य रहता है। यह सामान्य अश सर्वत्र समान एव ब्राह्य होता है। इसे हम कला का 'बिजानाश' कह सकते हैं। चित्रकला को ही लीजिए-बगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के चिन्नकारे मे अपनी-अपनी प्रदेशगत विशेषनाए अवश्य रहेंगी। नेत्र, नासिका, कपोल, बाहु, वक्ष- स्थलादि के अकन में इनका प्रभाव भी पड़ेगा किन्तु इसका मूल ढॉचा (स्ट्रक्चर) नो मानव शरीर-गठन विषयक विज्ञान (एनाटामी) पर ही आघुन रहेगा। यही बान विदेशी कलाकारो के विषय मे भी कही जा सकती है। किसी सुनिश्चित परिमाण मे अधिक लम्बी या छोटी नासिका सौंदर्यगत सीमा, सम्माता का अभाव ही समझा जाएगा। इसी प्रकार इन अंगों की बेमेल योजना भी औचित्य का अनिर्वाह ही समझी जाएगी। शिल्प-विद्या में लम्बाई-चौडाई एवं गहराई - तीन आयामों से काम लिया जाना है। अत' उसमें प्रत्यंगीण सुन्दरता व आनुपातिक सुसंगति का होना आवध्यक है। किसी एकांग की मुन्दर निर्मिति से कोई कृति सफल शिन्प नही बन पाती। संगीत मे स्वरों की साधना प्रमुख है। एक निञ्चित सीमा मे ही स्वरो का आरोह-अवरोह करना इष्ट होता है। तनिक भी त्युनािक आरोह-अवरोह- वाछित परिणाम निष्पन्न नहीं कराता। अत सगीत मे भी सुर की मात्रा का अर्थात् औचित्य १. किमिय हि मधुराणा मण्डन नाकृतीनाम्। -कालिदाम माकन्नलम। २ अशरोर नन्भंवति। रूपति पापयामया -डॉ० मुबेन्द्रनाथ दाम गप्त •सौन्दर्य तस्व्र, पृ० ३८

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ओचित्य सद्धातिक विवेचन

का निवाह आवश्यक है। संक्षेप मे यही कलागत औचित्य का स्वरूप है। प्रत्येक कला मे सौदर्य की न्थिनि एव सौदर्य की अभिव्यक्ति के लिए 'औचित्य' का समधिक महत्त्वर है। सौदर्य-निणन की अनेक महत्त्वपूर्ण कमौटियो मे से एक 'औचित्य' भी है। वस्तु के वाह्य मौदर्य के परीक्षण का एक आधार 'औचित्य' है। सभी ललितवालाओं के अन्न सौदर्य की आधार- शिला भी औचित्य है। डॉ० कुमार विमल और डॉ० मुरेन्द्रनाध दाम गुप्त ने क्रम सौदर्य-शास्त्र के सन्दर्भ में 'औचित्य' की 'अन्तरग व बहिरंग महना' पर प्रकान डाला है। दोनों के दृप्टिकोण अपने-अपने क्षेत्र व स्थान में समीचीन प्रतीत होते है। औचित्य और आचार-शास्त्र आचार-शास्त्र अथवा नीति-शास्त्र की तो आधारशिला ही 'औचित्य' है। आचार-गास्त मानव-व्यवहार का शास्त्र है। मानव-आचरण के औचित्य-अनोचिन्य, शिवत्व एव अशिवत्व का निर्णय करनेवाला शास्त्र आचार-शां्त्र है। मैकेन्जी ने आचार- शास्त्र की यही परिभाषा की है कि- Ethics may be defined as the study of what is right or good in conduct "* आाचार-शास्त्र के अध्ययन का विषय ही 'मानव-आचरण' है। आचार-गान्त के प्रमुग् उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए आस्टरले कहते है कि- ' we may therefore propose as a definition of Ethics that it is the science which deals with those acts that proceed from the deliberative will of man especially as they are ordered to the ului- mate end of man."* अर्थात् सोद्ेव्य व स्वेच्छा-चालित मानव-आचरण का विश्लेषण एव अध्ययन कन्ना आचार-शास्त्र का मुख्य उद्देश्य है। मनुष्य के आचरण के विषय मे किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व आचार-शाम्त्र का अध्येता उसके सम्पूर्ण परिवेश को ध्यान मे रखेगा। उमकी चतुर्दिक् परिस्थिनियो पर भी उसे दृष्टिपात करना पडेगा। व्यक्ति के आचरण का मामाजिक परिवेश के सन्दर्भ में अध्ययन करना आचार-शास्त्र Tा एक लक्ष्य है। आचार-शास्त्र का प्रमुत् कार्य यह खोजना है कि मानव का चरित्र और उसका आचरण कैसा होना चालि।3 मनुष्य के चरितर का सम्बन्ध उसके भीतरी पहलू ने है और आचरण का सम्दन्ध बाह्य पहलू से। चरित्र के इन अन्तर्बाह्य पहलुओ पर विनार करने समय यह 'औचिन्न

  1. J. S. Mackenzie : A Manual of Euucs p 1 2 Osterle, Ethics, n 4 5 ३ इ० कचनलता सब्यरवाल : आचार शास्त्र, पृ ० ६

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ही आचार शास्त्र का पथ-निर्वेश करता है। आचार-शास्त्र व्यक्नि को अपने लिए थेयस को चुनने मे सहायता करता है। प्रत्येक व्यक्नि अपने सामाजिक परिवेश मे अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न दायित्वो म निर्वाह करता रहता है। व्यक्ति के दायित्व-सज्ञान' का 'ब्रेरक-तत्त्व' 'औचित्य' है। भारतीय धर्मशास्त्र मे आचरण' की शुदधि पर विशेष बल दिया गया है। हमारा चरित्र निर्मल व आचरण अनुकरणारह होना चाहिए। गीता मे भी कहा गया है कि "यद्यदा- चरनि श्रेष्ठ तत्तदेवेतरो जन ।" प्राय वडे व्यक्तियों के चरित्र का छोटे लोग अनुकूरण करते है। अच्छा और अनुकरणीय आचरण वही है, जो व्यष्टि के लिए अच्छा होने के माथ-साथ समष्टि के लिए भी अच्छा हो, जिससे अपना और दूसरो का कल्याण हो। औचित्य और लोक-व्यवहार लोक-व्यवहार भी आचार-गास्त्र का एक अग है अत लोक-व्यवहार मे औचित्य के महन्व पर विचार कर लेना यहॉ प्रासगिक ही होगा। उचित-अनुचित के विवेक के अभाव मे हमारा व्यक्तिगत एव सामाजिक जीवन बहुत ही विशृंखल हो जाएगा। जीवन के प्रवाह को सहज एव सुचारु रूप से प्रवहमान रहने देने के लिए सामाजिक नियन्रण आवध्यक है। मामाजिक नियन्त्रण का आधार भी औचित्य है। साहित्यिक औचित्य भी मूलत सामाजिक औचित्य की भित्ति पर खडा है। इसीलिए तो किसी रचना के प्रकाशन, प्रदर्शन, क्रय-विक्रय, पठन-पाठन इत्यादि का-उनसे निष्पन्न सामा- जिक प्रभाव को ध्यान मे रखते हुए ही-निर्णय किया जता है।3 प्रसिद्ध विद्वान् ब्रेडले का कथन है कि ...... "The problem of social control of Art anses then from the possibilties of such a conflict, and from the fact that, though the aesthetic object is itself but an object neither right nor wrong, neither legal nor illegal, the act of producing, performing, acting, presenting, publishing, exibiting or selling that object is an act that must like all acts be judged by its social ends for it is an act with consequences * * इस प्रकार के निर्णय के मूल मे औचित्य-बुद्धि ही अबस्थित रहती है। केवल साहित्य मे ही नही जीवन मे भी 'रामादिवत् न तु रावणादिवत्' आचरण उपकारक हता है। प्रसंग, परिम्थिति एवं समय के प्रतिकल आचरण करने वाला व्यक्ति या तो घृग्ा-पात्र बनता है या हास्यास्पद। केवल दॉत, केग, नग्व और नर तक ही यह उक्ति सामित नही कि 'स्थान भ्राटा न गोभन्ते दन्ता. केशाः नखाः नराः।' डॉ० कचनसता सब्बरबाल. आचारसास्त्र, पृ० ६ श्रीमद्भगवद्गोता, प० ३, प्लो २१ n 3 Breadsley . Aesthetics, p. 577 4. Ditto, p. 577

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जीवन के प्रयेक काय से पद पद पर अपन व्यवहार में हमे औचित्य-निवाह कम्ना पड़ता है, वाणी का तनिक असयम वक्ता की कपालक्रिया करा देता है। चाणी का माधुर्य बिछड़े हुए दो प्राणियों को मिला देता है। आचरण की जरा-सौ विच्युति स्वर्ग ने पाताल मे पतन करा देती है, राजा नहुष का उदाहरण हमारे समक्ष मौजूद ही है। औतित्य और साहित्य-शास्त्र काव्य मे औचित्य कथ्य और कथन की परत्पर अनुकल स्थिति के रूप में सदैव विद्यमान रहता है। आस्वाद-प्रक्रिया में जहाँ कही कुछ विरोधी, अपकर्षक किवा अवगे- धक पाया जाता है, वहाँ हम अनौचित्य की सहज ही स्थिति पाते है। चारुत्व प्रवाह में सटकनवाली बात 'अनोचित्य' और पोपक वान 'औचित्य' मज्ञा पा जाती है। आचार्य विश्वनाधप्रसाद जी मिश्र का निन्नोबृत मन्तव्य द्रस्टव्य है- "भारतीय साहित्य-शास्त्र ने काव्य आदि का विचार करने के लिए एक विभेध प्रकार की दृष्टि विकसित की, जिसका मुख्य आधार रस हुआ। यह रम आस्वाद ने उपमित किया गया है। किसी पदार्थ के खाने मे उसका स्वाद अनेक कारणो मे बिगडता है। स्वाद को बिगाडनेव्राले इन कारणो, तत्त्वो आदि को जो रोके रहे बही औचित्य है।" औचित्य जहां अवांछनीय त््वो को रोकने का कार्य करता है, वहाँ नवीन नारत्व सन्निवेश के लिए काव्य के विभिन्न उनकरणों की सवादिता भी योजित करता है। इस दृष्टि मे वहु एक सामजस्य-सथापक काव्य-सिद्धान्त (Harmonisiog princIple) सिद्ध होता है। इसके अभाव मे रस, 'रसाभास'; सौन्दर्य 'मौन्टर्याभाम' बन जाता है। रसदृष्टि के अतिरिक्त आधुनिक भाव-बोध के विचार से भी औचित्य का महत्त्व है। अनुचित वस्तु प्रतीतिकर नहीं वन पाती। और प्रतीतिकरता के अभाव मे उनने मवेना जम नही सकती, न उनका प्रत्यक्ष प्रत्यय ही हो पाता है।

औचित्य और राजनीति शास्त्र राजनीति के क्षेत्र ने भी औचित्य की महत्ता कम नही है। एक कुशल राज- नीनिज्ञ अथवा शासक को औचित्य का सदध ध्यान रखना चाहिए। अपने निणयो घोप- णाओं या विधि-विधानों मे वह निरन्तर इस बात का ध्यान रखे कि ये सारे निर्णय वेव- काल व परिस्थितियो के सदर्भ मे ठीक तो हैं। माघ ने अपने 'शिशुपाल व्ब' में एक अत्यन्त सटीक बात इस सन्दर्म में कही हैं- तेज: झमा वा नैकालात् कालज्ञस्य महीपने, । नैकमोज: प्रसादो वा रसभागविद कवे। र५।र जिस प्रकार रसज्ञ एव रसाभिनिवेशी कवि के लिए एकान्त ओज या प्रसाद भुग की साधना इप्ट नहीं है, उसी प्रकार कालज महीपति के लिए भी सर्वथा तेज अथबा

१ दंखिए परिशिष्ट में दिया गया आमार्य जी का पन्न।

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हा जाचानयान्त का पय-निर्देश करता है। आचार-शास्त्र व्यक्ति की अपने लिए श्रेयम को उनने में सहायता करता है।१ प्त्यंक व्यक्ति अपने सामाजिक परिवेश में अनेक प्रकार के भित्न-भिन्न दायित्वो का निवाह करता रहता है। व्यक्ति के 'दायित्व-सज्ञान' का 'प्रेरक-नत्व' 'औचित्य' है। 'भारतीय वर्मशास्त मे आचरण की जुद्धि पर विशेष बल दिया गया है। हमारा चरितर निर्मन्ट व आचरण अनुकरणाह होना चाहिए। गीना मे भी कहा गया है कि "यददा- चर्गन श्रेष्ठ तनवेवतरो जन ।" प्राय बड़े व्यक्तियों के चरित्र का छोटे लोग अनुकरण करते है। अच्छा और अनुकरणीय आचरण वही है, जो व्यप्टि के लिए अच्छा होने के साथ-साथ समष्टि के लिए भी अच्छा हो, जिससे अपना और दूसरो का कल्याण हो।

औदित्य और लोक-व्प्रवहार लोक-व्यवहार भी आचार-शास्त का एक अग है अतः लोकव्यवहार मे औचित्य के महल्ट पर विवार कर लेता यहाँ प्रासंगिन ही होगा। उचित-अनुचित के विवेक के अभाव मे हुमारा वक्तिगत एव सामाजिक जोवन बहुत ही विशृखल हो जाएगा। जीवन के प्रवाह को सहज एव सुचार रूप से प्रबह्मान रहने देने के लिए सामाजिक नियन्रण आवश्यक है। सानाजिक नियन्त्रण का आधार भी औचित्य है। साहित्यिक औचित्य भी मूलत सामाजिक औचित्य की भित्ि पर खडा है। इसीलिए तो किसी रचना के प्रकाशन, प्रदर्शन, कय-विक्रय, पठन-पाठन इत्यादि का-उनने निष्पन्न सामा- जिन प्रभाव को ध्यान मे रखने हुए ही -- निर्णेय किया जाता है।3 प्रसिद्ध विद्वान् ब्रेडल का कथन है कि ... "The probiem of social control of Art anses then from the possibilities of such a conflict, and from the fact that, thongh the aesthette object is itself but an object neither right nor wrong, neither legal nor jllegal, the act of producing, performing, acting, presenting, publishing exibiting or selfing that object is an act that must like all scts be judged by its social ends for it is an act with consequences "* इन प्रकार के निर्णय के मूल में औचित्य-बुद्धि ही अवस्थित रहनी है। केवल साहित्य में ही नही जीवन मे भी 'समादिवत् न तु रावणादिवत् आचरण उपकारक होना है। प्रसंग, परिस्थिति एवं समय के प्रतिकल आचरण करने वाला व्यक्ति या तो वृण्रा-पात बनता है या हरयास्पद। केवल दाँत, केग, नख और नर तक ही यह उक्ति "सोमिते नही कि 'स्थान भष्ठा न शोभन्ने दन्ता: केशा: नखा नरा।'

डॉ० कचनजता सब्बरवाल : आचारशास्त्र, पृ० ६ २ श्रीमद्भगवद्गीता, प० ३, ्लो० २१ 3 Breadsley . Aesthetics, p. 577 4. Ditto, p. 577

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जीवन के प्रत्येक काय मे पद पद पर अपने व्यवहार मे हमे औचित्य-निर्वाह करना पडता है। वाणी का तनिक असयम वक्ता की कपालकिया करा देता है। वाणी का माधुर्य बिछड़े हुए दो प्राणियों को मिला देता है। आचरण की जरा-सी विच्युति म्वर्ग से पाताल में पतन करा देती है, राजा नहष का उदाहरण हुमारे समक्ष मौमद ही है। औचित्य और साहित्य-शास्त्र काव्य मे औचित्य कथ्य और कथन की परम्पर अनुकल स्थिति के रूप में सदैव विद्यमान रहता है। आस्वाद-प्रक्रिया मे जहां कही कुछ विरोधी, अपकर्षक किया अवरो- धक पाया जाता है, वहाँ हम अनौचित्य की सहज ही स्थिति पाते है। चारुत्व प्रवाह मे खटकनेवाली बात 'अनोचित्य और पोपक बात 'औतित्य' सज्ञा पा जाती है। आचार्य विश्वनायप्रसाद जी मिश्र का निम्नोद्धत मन्तव्य द्रष्टव्य है- "भारतीय माहित्य-शास्त्र ने काव्य आदि का विचार करने के लिए एक विजेष प्रकार की दृष्टि विकसित की, जिसका मुख्य आघार रस हुआ। यह रस आस्वाद में उपमिन किया गया है। किसी पदार्थ के खाने में उसका स्वाद अलेक कारणों में बिगडता है। स्वाद को विगाड़नेवाले इन कारणो, तत्वों आदि को जो रोके रहे वही औचित्य है।"4 औचित्य जहां अवाछनीय तत्वो को रोकने का कार्य करता है, वहाँ नवोन चारम्व सन्निवेश के लिए काव्य के विभिन्न उपकरणों की सवादिता भी योजित करता है। इम दृष्टि से वह एक मामंजस्य-स्थानक काव्य-सिद्धान्त (Harmonising prIncIpie) सिद्ध होता है। इसके अभाव मे रस, 'रसाभास', सौन्दर्य 'सौन्टर्यभास' बन जाता है। रसदृष्टि के अतिरिक्त आधुनिक भाव-बोध के विचार से भी औनित्य का महत्त्व है। अनुचित वस्तु प्रतोतिकर नही वन पानी। और प्रतीतिकरता के अभाव मे उनमे नवेदना जग नही मकती, न उनका प्रत्यक्ष प्रत्य ही हो पाता है। औदित्य और राजनोति शास्त्र राजनीति के क्षेत्र में भी औचित्य की महत्ता कम नहीं है। एक कुशल राज- नीतिज्ञ अथवा शासक को औचित्य का सदैव ध्यान रखना चाहिए। अपने निर्णयो, छोप- पाओ या विवि-विधानों मे वह निर्तर इस बात का ध्यान रखे कि ये सारे निर्षय ढेश- काल व परिस्थितियों के संदर्भ में ठीक तो है। माघ ने अपने 'शिभुपाल वब' में एक अत्यन्ल सटीक बात इम सन्दर्भ मे कही है- तेज क्षमा वा नैकान्तात् कालज्स्य महीपते। नैकमोज: प्रसावो वा रसभागविद कवे ॥ ८५२ जिस प्रकार रमज्ञ एवं रसाभिनिवेशी कवि के लिए एकान्त ओज या प्रसाद कुग की साथना इप्ट नही है, उसी प्रकार कालज महीपतति के लिए मी सर्वथा तेज अधवा 1 १ दे दिए परिशिष्ट में दिमा गया आचार्य जी का पत।

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मचिय सदधातिक विवेचन

पकान्त क्षमा भाव का आश्रमण उचित नही है। अर्थात् कवि यथा-प्रसग कभी ओज तो कभी प्रसाद गुण की योजना करता रहे। ठीक वैसे ही राजा भी प्रथावसर कभी तेज तो कभी क्षमा का उपयोग करे। आनन्दवद्धन ने उसे 'काले च ग्रहणत्यागौ' कह कर व्याख्या- मित किया है। परिवर्तनशोल राजनीति, देश, काल एव परिस्थिति-मापेक्ष होती है। उचित- निर्णय का अवसरानुरूप ग्रहण व समयानुरूप किसी निर्णय का त्याग करते रहना राज- नीति में अत्यावश्यक है। आज के इम विज्ञान-विध्वसक युग मे तो राजनीनज्ञो का उन्रवायित्व् अनेकश बढ गया है। औचित्य की ईषत् उपक्षा कैसे-कैसे भयकर प्ररि- पाम उपस्थित कर देती है, यह सर्वविदित है। अनेक अनर्थ केवल इमीलिए उत्पन्न हो जाने है कि उसके कारण-रूप निर्णय जब लिए गये होगे तब अधिकारियो ने औचित्य को दृष्टिनपथ में रखा न होगा। राजनीति मे तो औचित्य का महत्त्व स्वत सिद्ध है।

औचित्य एवं अन्य काव्य-सम्प्रदाय रेवित्व और रस काव्य मे 'औचित्य' और 'रस' के परस्पर-सम्बन्ध, स्थान एव महत्व के विषय मे क्षेमेन्द्र का अनिमत क्या था ?- इस पर विद्वानों मे मतैक्य नही है। नद्विपयक प्रमुख तीन धारणाएँ इस प्रकार है : (१) क्षेमेन्द्र ने 'औचित्य' को एक काव्य-सम्प्रदाय माना है और 'औचित्य' को काव्य की आत्मा। इस धारणा के पोपक है-डॉ० सूर्यकान्त शास्त्री, डॉ० मनोहरलाल गौड और डॉ० रामलालसिंह।१ (२) क्षेमेन्द्र रस को ही काव्यात्मा मानते है, किन्तु 'रससिद्ध' काव्य को भी औचित्य-नियन्त्रित मानते हैं। प० बलदेव उपाध्याय और डॉ० राघवन इसी मत के हैं।२ (३) क्षेमेन्द्र का काव्यात्मा से कोई सम्बन्ध नहीं, वे तो मात्र समीक्षक की दृष्टि से 'औचित्य' को लेकर दिसी भी कृति मे अगागि की परस्पर सुनियोजना पर विचार करते है और रस को भी विवेचन के प्रसग मे अग-रूप मे स्वीकार करते है। डॉ० रामपाल विद्यालंकार इसी धारणा

  1. Dr Suryakant · Kshemendra Studies, p. 38-39 डॉ. मनोहरलाल गौड शचार्य क्षेमेन्द्र, प० १४ डॉ= रामलालसिंह समीक्षा दर्शन, भाग २, पृ० १११-११२ : न० वलदेव उ्पाध्याय. भारतीय साहित्य, भाग २, पृ० ३३ . Dr. V. Raghavan : Some Concepts of the Alamkar Shastra, p. 198, 245

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गच य सङ्कातिक विवेचन

के समथन ह. उक्त तीनो धारणाओं की उत्पत्ति क्षेमेन्द्र के ही निम्नलिखिन सूत के व्याख्या- नद मे हुई प्रतीन होती है -- "औचित्यम् रससिद्धस्य स्थिर काव्यस्य जीवितम्।" प्रस्तुत नूत्र में 'जी विनम्' शब्द का अर्थास्यान ही महत्त्वपूर्ण व व्याम्या-भेद का कारण है। अमेन्द्र के समय 'जीवित' शब्द 'आत्मा' के अर्थ में प्रयुक्त होता था। स्वय अमेद्र ने भी 'रसजीवितभूतस्य विचार क्रियतेऽधुना।"3 लिखकर 'जीवित' शब्द का प्रयोग 'आत्मा' के अर्थ मे किया है। बकोक्निकार भी 'वक्रोबित काव्य-जीवितम्' कह- दः 'जीवितम्' को 'आत्मा' के अर्थ में ब्रहण करता है, किन्तु, क्षेनेन्द्र उक्न सूत्र से काव्य' को 'रससिद्व' कहकर प्रथमत. रस को काव्यात्मा मान लेते है, तत्पश्चात् 'नीवितम्' शब्द को 'स्थिर' विशेपण में सयुक्न करके उसे 'दीर्घजीवन' के पर्याय-रूप न ब्हण करते है। अत स्पष्ट है कि अेमेन्द्र 'औचित्व' को काव्यात्मा के रूप मे स्वीकार न करके उसे मात्र रसयुक्त काव्य के दीर्घ जीवन के रूप में ही ग्रहण करते है। जिम प्रकार आचार्य आनन्दवर्द्धन 'रस ध्वनि' की बात करते हुए भी 'रस' को ही काव्यात्मा मानते है और अन्तत 'प्रसिद्ध औचित्य वन्वस्तु रसस्योपनिपत् परा' कहकर औचित्य करस का परम रहस्य ्वीकार करते हुए भी 'रसवादी' बारा से वियुक्त नही होते, उली प्रकार उनकी शिष्य-परम्परा में (क्षेमेन्द्र आचार्य अभिनव गुप्त के शिष्य थे) क्षेमेन्द्र भी 'रसौचित्य' की चर्चा करते हुए उक्त सत्रानुसार रस को ही काव्यात्मा मानते ह और 'रसवादी' धारा से वियुक्त नही होते। अत क्षेमेन्द द्वारा औचित्य को काव्यात्म- न्यानीय मानने की एव तदनुमार 'औचित्य' को सम्प्रदाय मानने की धारणा का स्वत स्ण्डन हो जाता है। इसी प्रकार 'रसीचित्य' की पृथक् भेद मानकर भी समीक्षक-दृष्टि से रस और औचित्य का परस्पर अगागि भाव भी भेमेन्द्र को अभिप्रेत नहीं था-वह नी सहज स्पष्ट है। साथ ही समीक्षक को दृष्टि ने औचित्य को रस का नियन्त्रक तत्व मानकर इनमे परस्पर 'अगागि भाव' की क्रत प्रकल्पना करता कुछ ऐसा माना जाएगा, जैम शरीर और आत्मा को पुष्ट करने वाले पौप्टिक भोजन व पठनादि को ही सब कुछ मानकर उन्हे आत्मस्थानीय नहत्त्व प्रदान करना। परिणामन प्रथम व तृतीय वारगाओ के स्वन, खण्डित हो जाने पर तथा उप- सुंवत सूत्र की उकत व्याख्या के परिवेश में दूसरी धारगा ही स्वीकार्य जान पडती है। नम्भीरतापुर्वक ठेखने से औनित्य काव्य के आंवश्यक और उपयु्न सभी वप- कर्गो की यथोचित सुनियोजना ही है, जिसका सम्दन्ध मूकत. आलोचक के सार्थ हू। नही आलोचक जब किमी कृति की आलोचना करते बैठता है, तब रस तथा अन्य उप-

१ डॉ० रामपाल विद्यालकार : क्षेमेन्द्र की शचित्य-दृष्टि, पृ० ९० २ क्षेमेन्द्र भचित्य विचार चर्चा (का्यमाला सीरीज), युच्छ ६ पृ० १४ ३ वही।

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करण उसके अध्ययन का अंग बन जाते है। ये अग पूर्णत स्वतन्त्र न होकर एक-दमरे को स्थिति से अनुगासित होते रहते है। इस अनुगासन की सहिता को औचित्य क्हा जा सकता है, किन्तु यह औचित्य भी कोई स्वतन्त्र मत्ता नही है, अपितु उपकरणो के समवाय से वह उत्पन्न होती है और उनके विघटन से नप्ट हो जाती है। ऐमी स्थिति मे वह भी रस की भाँति अन्य मुसापेक्षी है। तव स्वभावत यह प्रश्न उठता है कि रम और औचित्य का परस्पर-सम्बन्ध क्या है? इस प्रश्न का उत्तर प० बलदेव उपाध्याय के शब्दो ने इस प्रकार है- "काव्य की आत्मा (Soul) रस है और जीवित (Life) है औचित्य । आग्मा के बिना जिस प्रकार जीवन असंभव है, उसी प्रकार रम के बिना औचित्य की सना निरर्थक है। इमी प्रकार मैं तो यह भी कहूँगा कि फिर जीवन के न रहने पर निर्गण अनभिव्यकत आत्मा की तरह रस का भी क्या आम्वाद्य त्रस्तित्व होगा ?" आत्मा मे जिनका विश्वास नही, ऐसे शुद्ध पदार्थवादियों के मन्तोष के लिए यही कहा जा सकता है कि औचित्य और रस परस्पराश्रित तत्त्व है और उनके बीन 'अन्वय-व्यतिरेक' सम्बन्ध मानना ही पूर्णत निरानद है। औचित्य और ध्वनि 'रस', 'ध्वनि' और 'औचित्य'- ये तीन - 'काव्य' के तीन पाद है। किसीक के अभाव मे काव्य स्थिर नहीं खड़ा रह पाना है। आचार्य आनन्दवर्द्धन ने इन तीनो का यथार्थ महत्त्व समझा था। अत उन्होंने काव्य की आत्मा 'ध्वनि, 'ध्वनि' का प्राण 'रस' और 'रस' का रहस्य 'औचित्य' स्वीकार किया। जहाँ एक ओर उन्होंने 'रस-धवनि' को हवीकार कर रस-सिद्धान्त का व्वनि-सिद्धान्त द्वारा विस्तार किया, वहा दूसरी ओर रस के परम रहस्य के रूप मे 'औचित्य' को ग्रहण कर औचित्य की महत्ता भी स्थामिन की। इस प्रकार आचार्य आनन्दवर्द्धन ने रस, ध्वनि और औचित्य-इन तीन तत्वो को एक साथ सबलित नर दिया। ध्वनि के समस्त प्रभेदों का नियामक तत्त्व वे औचित्य को मानते है। आचार्य आनन्दवर्द्वन अनौचित्य को ही समस्त रसभगो का एकमात्र कारण मानते है- "अनौचित्यादृते नान्यद्रसभगस्य कारणम्।"२ और औचित्य निबन्धन को रस का परम गूह रहस्य मानते है-"प्रसिद्धौित्यबन्धस्तु रसम्योपनियत्परा।"3 आचार्यपाद के विचार से कोई भी ध्वनि-चाहे वह वस्तु-ध्वनि हो, अलंकार- ध्वनि हो या रस-ध्वनि हो-यदि उचित रीति से निबद्ध नही है, तो ग्राह्म नहीं हो सकती। उचित व्वनि ही सहृदय ग्राह्म बनती है, अनुचित-ध्वनि नही। औचित्य में विरहित व्वनि का अपना कोई महत्त्व नही है। इम विषय मे प० बल्देव रपाध्याय १ डॉ० राममूर्ति त्निपाठी श्रचित्व विमर्श, प० १५७ पर उद्धृद। २ डॉ० रामसागर व्रिपाठी अवन्यालोक (उत्तरार्ज), पृ० ७८० दही।

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मोचित्य सद्धातिक विवेषन

का निम्नलिखित उद्धरण द्रष्टव्य है."रस-वव्रति से समन्वित काव्य भी औचित्य-बजित होने पर आनन्दोल्लाम कथमपि विकसित नही कर सकता। रस की चारता औचित्य के कारण ही होती है।"१ द 'रस-ध्वनि' और 'औचित्य' को परस्पर प्रगाढ रूप से अनुस्यूत मानते है। परतु ध्वनि के अभाव मे कोरे औचित्य की स्थिति स्वीकार करने वालो को बे मूल को छोड़कर पल्लव-सिंचन करने वालो के सदृश मानते है। आनन्दवर्द्न ने भी ललित एव उचित सनिवेश को ही काव्य की चारता का कारण माना है। उनके द्वारा प्रयुक्त 'उचित' शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य अभिनव गुप्त कहते है- "उचित शब्टेन रसविषयमेवौचित्य भवतीति दर्शयन रस-ध्वनेर्जीवितत्व सचयति। तदभावे हि किमपेक्ष्मेदमौचित्य नाम सर्ववोद्घोष्यते।" अर्थात् 'उचित' शब्द से रस-विपयक औचित्य का जो कि 'रस-व्वनि' का जीवातुभूत है-ही ग्रहण किया जाय, क्योकि उसके अभाव मे (स के अभाव मे) किस को लेकर यह औचित्य सर्वत्र अपना उद्घोष कर सकेगा ? अत स्पष्ट है कि रस-ध्वनि के अभाव में कोरे औचित्य की कोई महत्ता नही है। निष्कर्ष यह है कि औचित्य के अभाव मे ध्वनि महृदयाह्हादकारी नहीं बन पाती, फलत अग्राह्म ही होती है, तो ध्वनि के अभाव में औचित्य अपनी कोई सत्ता नही रखता। दोनो परस्परावलम्वित है, अन्योन्याश्रित है। औचित्य और वक्रोकिति

'औचित्य' लोकमीमानुवर्तन पर बल देता है और 'वक्ोक्ति' लोकसीमात्तिवर्निनी विवक्षा के प्राधान्य पर। इस दृष्टि से दोनों में परस्पर विरोध की कल्पता सहज ही की जा सकती है, किन्तु इनमें वास्तविक विरोध नहीं है। 'लोकसीमातिव्तिनी' का अर्थ लोकसीमातिक्रमण नहीं बल्कि लोकोत्तर वैगिष्ट्य है। वस्तुत औचित्य और वकोक्ति तो परस्पर प्रगाढ रूप से सम्बद्ध हैं। आचार्य वलदेव उपाध्यायजी ने औचित्य सिद्धान्त को वकोकति का पूरक कहा है।3 बकोनिन को वे औचित्य का ही दूसरा नाम मानते है।5कुत्तक द्वारा निरूपित वकता के भेदो- पभेदो का आधार 'औचित्य' है और इस प्रकार उन्होंने इन वकता-भेदो मे औचित्य के सटविपयक भेवो की स्थिति मानी है।2 'औचित्य' को वकोक्ति का आधार अथवा रहस्य मानने में तो कोई विरोध नही है, किन्तु उसे वकोक्ति का पर्याय मानने पर तो दोनो आचार्यो की स्वतन्त्र व

१. पं बनदेव उपाध्याय भारतीय साहित्यशस्त्र, भाग २,पृ० ३२ २. डॉ० रामसागर निपाठो : ध्वन्यालोक (लोचन टीका), भाग १, ५ृ० ७३ ३ प० बलदेव उपाध्याय भारतीय साहित्यशास्त्र, भाग २, पृ० ८१ ४ दही, भाग २, प० ६७ ५ वह़ा, भाग २ T० ८७

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१८ औचित्य सद्धातिक विवेचन

मौन्क चिंतन-दृष्टियो का अस्तित्व ही सदिग्ध हो जाएगा। आचार्य डॉ० नगेन्द्र ने इन दोनो सिद्धान्तो में प्राप्त साम्य-वैषम्य को भल्ी-भाति स्पष्ट किया है।

आँचित्य और बकोवित में साम्य "दास्तव मे वकोक्ति और औचित्य दोनों सिद्धान्तो की प्रतिपादन-योजना में ही सूलगत साम्य है। कुन्तक और क्षेमेन्द्र टोनों ने काव्य के सुक्ष्मतम तत्त्व से लेकर महत्तम रूप तक प्राय एक ही कम से अपने सिद्धान्त का विस्तार कर उसे सर्वव्यापक बनाने का प्रयत्न किया है।" अर्थात् दोनों ने वर्ण-योजना से लेकर महाकाव्य की प्रबन्ध-योजना तक मे वकरता एव औचित्य का निर्वाह विवक्षित किया है। होनो की प्रतिपादन शैली मे सहम्य है। "वकोक्ति का आधार है वस्तुनिष्ठ कल्पना और औचित्य का आधार है वयक्तिनिष्ठ विवेक-आधुनिक शब्दावली में वकोक्तिवाद जहाँ रोमानी काव्यरूप की प्रनिष्ठा करता है, वहा औचित्य-सिद्धान्त विचारगत सौष्ठव की, और इन दोनों का मिलन तीर्थ है रम, जहाँ दो भिन्न दिशाओ से आकर ये लीन हो जाते है।"2 डॉ० नगेन्द्र के उपर्युक्त कथन से इतना स्पष्ट हो जाता है कि औचित्य मौष्डववादी सिद्धान्त है और वकोक्ति रोमामवादी सिद्धान्त है। औचित्य काव्य के बाह्याभ्यंतर दोनो अगो मे अपनी व्याप्ति रखता है। बकोक्ति काव्य के बहिरंग अर्थात् कलापक्ष (अभिव्यक्ति-पक्ष) से वनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। कृति के सर्वाग सौदर्य के लिए उसके विभिन्न अंगो मे औचित्य की अवस्थिति अनिवार्य है, किन्तु औचित्य के विविध रूपो में वकोक्ति की अनिवार्यता स्नय कुन्तक को भी स्वीकार्य नही है। अत औचित्य वकोक्ति की अपेक्षा व्यापकतर सिद्ध होता है। वकोक्ति के संदर्भ मे औचित्य की कुन्तक-सम्मत स्थिति को स्पष्ट करने हुए डॉ० नगेन्द्र लिरते हैं कि- "अतएव कुत्तक के मत से औचित्य काव्य-सौदर्य अथवा वकरता का अनिदार्य किन्तु सामान्य गुण मात्र है, न व्यावर्नक धर्म है और न पर्याय ही।"3 सारागतः यही कहा जा नकता है कि औचित्य वकोक्ति से घनिष्ठ रूप से नम्बद्ध होने हुए तथा बकोतित का आधार होते हुए भी, उसमे एकर्प नही, उसका स्थानापन्न नही, उसका पर्याय नहीं है। स्वय कुन्तक ने भी उसे उसी रूप मे ग्रहण नही किया। कुन्तक के वकोक्ति जीवितम्' में आचित्य का ग्रहण तीन स्थानो पर इस रूप मे हुआ है- (१) कुन्तक द्वारा निरूपित काव्य-परिभाषा मे गृहीत 'साहित्य' शब्द का

q. डॉ. नगेन्द्र : हिन्दी वकोक्ति जीवित, पृ० २१२ ₹ वही, पृ० २१३ ह. वहीं।

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ओचिय सद्धातिक विवेचन १६

आधार औचित्य है। शब्द और अर्थ का 'उचित' सहभाव अथवा सम्बन्ध ही कुन्तक को ग्राह्म है।१ (२) कुन्तक द्वारा विवेचित काव्य के दो सामान्य गुणों मे प्रथम गुण औचित्य' है। इस 'औचित्य' गुण का आधार है-उचित अर्थात् यथानुरूप कथन।२ (३) कुन्तक द्वारा विस्तार से प्रतिपादित वकता के अनेक भेदोपभेदों का आवार भी औचित्य है। वक्ता आह्लादकारिणी होती है और औचित्य के अभाव मे किसी भी प्रकार का आह्लाद मंभव ही नही है।2 सक्षेप मे यही कुन्तक के औचित्य-विषयक दृष्टिकोण का सार है। जौचित्य वक्रोकिनि का भी नियामक तत्त्व प्रतीत होता है। औचित्य और रोति आचार्य वामन ने 'रीति' की स्वतत्र प्रतिष्ठा कर 'रीति-तम्प्रदाय' स्थापित किया। रसवादी-धारा से वियुक्त होकर पहली बार भारतीय काव्य-शास्त्र मे अनात्म- वादी तत्त्व की काव्यात्मा के रूप मे प्राण-प्रतिष्ठा उनके द्वारा की गई। अब तक काव्य के बाह्याग के रूप में प्रतिद्ध इस 'रीति' तत्त्व को आचार्य वामन ने बडे त्रबल शब्दो से अतरंग ततत्व के रूप में प्रस्थापित किया। काव्य-मीमांसा के क्षेत्र में उनकी यही मुख्य देन है कि उन्होने काव्य के प्रमुख एव गौण तत्त्वों का पार्थक्य स्पष्ट किया तथा बहिरग को अतर्तस्व के रूप में प्रतिष्ठित कर जीवन के अनात्मवादी दृष्टिकोण को काव्य के क्षेत्र से आरोपित किया।5 इस रूप मे वे भरतादि आचार्यो-जिन्होने रस को प्राण- तत्त्व माना है-से अलग पड जाते है। वासन ने रीति को काव्य की आत्मा कहा है-'रीतिरात्मा काव्यस्य'।4 और आगे रीति की परिभाा इस प्रकार देते है-'विशिप्टा पद-रचना रीति ।" अथात् विरेष प्रकार की पद-रचना रीति है। 'विशेष' की स्पष्टता करते हुए वे कहते है कि 'विशेपोगुणात्मा।' इस प्रकार 'रीति' की पूर्ण परिभाषा यो हुई- "गुण-सम्पन्न पद-रचना काव्य की आत्मा है।" यहाँ पर 'पद-रचना' पर विशष बल दिये जाने से काव्य का अभिव्यक्ति पक्ष (बहिरंग) प्रमुख बन जाना है और अर्थ अर्थात् वस्तु-पक्ष शिथिल पड़ जाता है। अतः एक प्रश्न यह भी उपस्थित होता है कि काव्य में वस्तुपक्ष एवं रीतिपक्ष का पारस्परिक महत्त्व, नग्बन्व एव स्थिति क्या हो?

१ द्वा० नगेदद्व, हिन्दी वकाकत जीवित, पृ० २०६ २ वही, पृ० २१० बही, प० २१११२ ४. डॉ० नगेन्द्र (सपा०) हिन्दी काव्यालकार सूल्न, पू० २८ ३ वही (व्याख्या भाग), ५० ५८ वही पृ० १६

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२० अरभचित्य सद्धासिक विवचन

इस विषय मे भारतीय समीक्षा का सार-सग्रह प्रस्तुत करते हुए डॉ० नगेन्द्रजी ने निम्न वाते कही है-१ बस्तु और रीति के सापेक्ष्षिक महत्त्व के विषय मे साधारणत चार सिद्धान्त है- (१) काव्य का मूल तत्त्व तो वस्तु तत्व (भाव एवं विचार) ही है। गैनि सर्वया उसी के आश्रित है। रीति केवल वाहन या माध्यम है जो वस्तु की अनुवर्तिनी है। (२) काव्य मूलत आत्माभिव्यक्ति है अतः वस्तु और रीति दोनो को ही व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति माना गया है। (३) आधुनिक अभिव्यंजनावादियों के अनुसार केवल रीति अर्थात् अभिव्येजना की ही सत्ता है वस्तु का उससे (रीति-अभिव्यंजना से) स्वनल्र कोई अस्तित्व नही है। (४) वस्तु और रीति दोनों का समन्वय ही वाछित है। काव्य मे अर्थ और शब्द दोनों का ममान अस्तित्व है। यदि 'रीति'-जसा कि बामन ने प्रतिपादित किया है-काव्य का सर्वतन्त्र स्वतन्त्र तत्त्व है, तब तो उसके किसी प्रकार के नियंत्रण का या सयमन का प्रश्न ही उपस्थित नही होता, किन्तु यदि वह काव्य मे किसी अन्य प्रमुख त्त्ब की अनुवर्तिनी है, (जंसाकि वामनेतर बहुत से आचार्य मानते है) तब तो उसके नियन्ण का प्रश्न अबश्य उठता है और वह प्रश्न विचारणीय भी है। तब प्रश्न यह है कि 'रीति' का निवामक तत्त्व कौन-सा है ? आचार्य आनन्दवर्द्न ने उसका उत्तर देते हुए रीति को रसाश्रित कहा है तथा रस को रीति का नियंत्रक तत्द स्वोकार किया है।२ रम के अतिरिक्त वे वक्तृविषयक औचित्य, विषयगत औचित्य और वाच्य-सम्बन्धी औचित्य को भी रीति का नियत्रण करने वाले तत्त्व के रूप में म्वीकार करते हैं।3 आनन्दवर्द्धन ने 'रीति' के लिए 'संघटना' शब्द का प्रयोग किया है। अत वामन की 'विशिष्ट पद-रचना' औ्षौर आन्दवर्द्धन को 'संघटना' मे कोई मौलिक अन्तर नही है। अन्तर है तो इतना ही कि जहा आनन्दवर्दन ने पद-रचना अर्थात् घटना के लिए 'सम्यक' विशेषण का बन्धन लगाकर उस पर औचित्य एवं रस का नियन्त्रण स्वीकार किया है, वहाँ वामन ने उसे स्वतन्त्र मानकर उसके वशिष्ट्य को ही सवीकार किया है। वामन के अनुसार पद-रचना का वैशिप्ट्य अपने शब्द और अर्थगत सौन्दर्य से अभिन्न है, जबकि आनन्दवर्द्धन ने 'रीति' को रस-रूप मौदर्य की अभिव्यक्ति करने वाली साधन माल माना है-'व्यनकति सा रसादीन्।' पश्चिम मे भी 'शैली' को (कोचे को छोड़कर) स्वतन्त्र महत्त्व न देकर, उसे १. डॉ० नगेन्द्र (सपा०). हिन्दी काव्यालकार सूत् (भूमिका), पृ० १० र अ. रामसामर तिपाठी : ध्वन्यालोक (उत्तराड), पृ० ७२० ३ बहो, पृ० ७४१ ४ डॉ० रामसागर तिपाठी धवन्यालोक (उत्तरार्द्ध), पृ० ७२०

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औचित्य सैद्धातिक विवेचन २१

औचित्य से अनुशासित स्वीकार किया गया है।' अरस्तू ने औचित्य को शैली के एक गुण के रप में तथा गरिमा के नियन्त्रक तत्त्व के रूप मे स्वीकार किया है।1 वाल्टर पेटर ने भी गैली और वस्तु का अनिवार्य सहभाव ही 'साहित्य' माना है और वब्द को वही िट्ट माना हे, जहाँ वह अर्थ के साथ तदाकार हो जाता है।२ निष्कर्ष यह कि 'औचित्य', 'रीति' का नियामक तत्त्र है। दोनो भाग्तीय एव गन्चन् दृष्टियों से रीति की स्वतन्त्र सत्ता मानने वाले आचार्य अल्पसस्यक ही है तथा उनका विशेय अनुवर्नन भी नही हुआ। · 'चित्य' शैली का अग भी है और नियात्मक तत्व भी। भारतीय समीमा मे 'औतित्य' रीति का सयमन करनेवाला तत्व है। औचित्य और अलकार

भारतीय आचार्यो के अलंकार-सम्बन्धी विवेचन से इतना स्पष्ट होना है कि 'अलकार' के प्रति उनका द्विविध दृष्टिकोण इस प्रकार रहा है- (१) 'अलकार' काव्य का स्थिर धर्म है। काव्यगत सौदर्य का वह पर्याय है।* तथा काव्य मे उसकी आत्म-म्थानीय मत्ता है।" 'अलंकार' महा व्यापक अर्थ में गृहीत किया गया है। इस व्यापक सन्दर्भ में वह 'काव्य-सौदर्य' का ही-चाहे वह वर्ण्य मे हो या वणन में-वाचक है। (२) 'अलकार' काव्य के अस्थिर धर्म हैं।६ काव्य में उनका स्थान अगमस्थान- वत् है था वे काव्य की वाह्य शोभा बढाने वाले मात्र है।" 'अलकार' का यह् श्र सक्कुचिन किन्तु अधिकाश आचार्यो द्वारा गृहीत अर्थ है। इस 'व्यापक' ओर 'संकोर्ण' अर्थ के बीच 'अलकार' का एक अन्य अर्थ भी कुछ काल तक साहित्य और जीवन के प्रागण मे पल्लवित हुआ जिसके अनुसार 'अलकार' न तो 'काव्यात्मा' ही सिद्ध होता है, न ही कटक-कुण्डलाठिवत् शरीर पर अलग ने विन्यस्त किए जाने वाले आभूषण माव। वहा पर वह शरीर अथवा काव्य शरीर के दगेभा-वृद्धि करने वाले सभी सौंदयकारी साज-सामान का वाचक हो जाता है, जिसके अन्तर्गत काव्य के प्रसग में भाषा के विभिन्न तत्त्व (रीति गुणादि) समाविष्ट हो जाते हे और शरीर के प्रसंग मे आभूषणो के अतिरिक्त अन्य बहुत से प्रसाधन (अलक्तक, वस्त्र-परिधान, केश-विन्यासादि) अन्तर्भुक्त हो जाते है। १ डॉ० नगेन्द्र . हिन्दी काव्यालकार सूल्र, पृ० १०१ ₹ वही, पृ० १३३ ३. सोन्दर्यमलकार, वामन. काव्यालकार सूत्र, ११।२,५०५ ४ जयदेव चन्द्रालोक, पृ०४(चौ०सं० सी० १६३८) ५. अ• हजारीप्रसाद द्विवेदी (सपा०). काव्यशास, पृ० ११७ ६. डॉ० सत्यव्रत सिंह (सपा) साहित्य दरपम, पृ० ६६५ ७. डॉ० सत्यव्रत सिंह (सपा०) काव्यशास्त्र, पृ० २८५ म आचार्य हृजारीप्रसाद द्विवेदी (सपा०).काव्यशास्त्र, पृ० ११६

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२२ ओचिय सद्धातिक विवेचन

इन नीनो अवस्थाओ मे 'अलकार' को 'औचित्य' का नियन्वण स्वीकार करना पड़ता है। यद्यपि काव्य में 'अलंकार' की आत्म-स्थानीय स्थिति आज किचिन्माल भी समादृत नही होती तथापि उने 'मौदर्य' का पयाय माल लिये जाने पर भी उसे 'औचित्व से अनुकासिन नो रहना ही पडेगा। क्योकि 'सौदर्य' की 'वस्तुनिष्ठ' एव 'विषयिनिष्ट'- दोनो स्थितियों मे किसी-न-किसी रूप में, विसी-न-किसी स्तर पर औचित्य' विद्यमान रहता है ही। 'वस्तुनिष्ठ नौदर्य का एक उपकरण' 'औचित्य' स्वोकार कर लिया गया है।4 नौदर्थ ली विषयिनिष्ठ स्थिति भी औचित्य का सर्वथा परित्याग कर नहीं चल सकती। अनुचित वस्तु सुन्दर लग ही नही सकती। अंग-रूप मे 'अलंकार' की स्थिति तो 'औचित्य' की आधार-शिला पर खडी है। अलकार्य के अभाव मे, अलकार्य के अनौचित्य मेदोनो अवस्थाओं में अलकार व्यर्थ सिद्ध हो जाता है। आचार्य अभिनव गुप्त के ये शब्द अत्यन्त महनीय है- "नथाहि-अचेतनं शवशरीर कुण्डलाद्युपेतमपिन भाति, अलंकार्यस्याभावात्। यति शरीर कटकादि युक्त हास्यावहं भर्वात, अलकार्यानौचित्यात्। न हि देहस्य किंचिन् अनौचित्यमिति वस्तुत आत्मवालकार्य, अहमलकृत-इत्यभिमानात्।"२ अर्थान् कुण्डलादि से अलंकृत शव-शरीर शोभित नही होता, क्योकि वहॉ अल- कार्य का अभाव है। इसी प्रकार यति शरीर पर विन्यस्त अलंकार भी अपनी शोभा सो देते है, क्योंकि वहाँ अनुचित अलंकार्य की स्थिति है। उचिन अलंकार्य की स्थिति (प्रसंग मे) मे भी अलकारों की यादृच्छिक विन्यस्ति ग्राह नही होनी। भरत एव क्षेमेन्द्र ने इस पर पर्याप्न प्रकाश डाला है। भरत का कथन है कि- अदेशजो हि वेशस्तु न शोभा जनयिष्यति। मेखलोरसि बन्धे च हास्यायँवोपजायते।3 मग्वला को हृदय पर धारणा करना हास्यास्पद ही हैं। क्षेमेन्द्र ने कहा है- कण्ठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण जा। पाणौ नुपुरबन्धनेन, चरणे केयूरपाशेन वा। औौर्यण प्रणने रिपौ करुणया नायान्ति के हास्यताम्? औचित्ये विना रुचि प्रतनुते नोऽलकृतिर्नोगुणा।। माराश यह कि 'उचित स्थान पर विन्यस्त होने पर ही अलंकार अपनी सार्थकतः 'दिख्ाने हैं।'

१ डॉ० सुरन्द्रनाथ दासगुप्त. सौैन्दर्य तत्व, पृ० ६ २ डॉ. रामसागर विपाठी : इ्वन्यालोक, पृ० ४९६, प्र० ख० (लोचन टीका) ३ भग्त नाट्यशास्त्र, २३६६ ४ क्षेमेन्द्रः भोचित्य विचार चर्चा, पृ ११६

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औचित्य मैद्धातिक विवेचन २३

निष्कर्ष यह कि अलकार चाहे 'अगी' हो या 'अग' 'उन्हें औचित्य का अनुशासन स्वीकार करना पडेगा। (१) अनुचित वस्तु सुन्दर नही हो सकती। (२) अलंकार्य के अभाव में अलकार की कोई सत्ता नहीं। (३) अनुचित अलंकार्य के मन्दर्भ में भी अलकार निरर्थक है। (४) उचित स्थान पर आयोजित अलंकार ही सार्थक है। शचित्य-सम्बन्धी कतिपय दृष्टियाँ औचित्य अंग-संगति के रूप में काव्य अथवा किसी भी कलाकृति मे अवयवी के अनुरूप अव्यवो की योजना क मिद्वान्त को पश्चिम मे अंग-सगति का सिद्धान्त कहा गया है। पूर्व मे नाटक के सन्दर्भ मे यशोबर्मन् ने तथा महाकाव्य के सन्दर्भ मे लोल्लट ने इस पर विचार किया है (यद्पि इमे उन्होने 'अंग-सगनि' ऐसा नाम नही दिया है) ; पश्चिम में 'अरस्तू एव होरेम' ने इसका विगेप विचार किया है। यशोवर्मन् द्वारा प्रयुक्त 'सत्निवेशप्राशस्त्यम्' पश्चिमी अग-सगति का ही बोध कगता है। यशोवर्मन के विचार मे महाकाव्य मे कथा के मुख्य अग के साथ गौणअंगो की संगतिपूर्ण स्थिति, गौण अगों का अनतिविस्तृत एवं यथावश्यक विनिवेश और नाटक मे पात का वय, जाति व प्रकृति के अनुरूप वचनादि का व्यवहार, रस की सथावसर पुष्टि, अर्थ एव शब्द की प्रौढ स्थिति एव कथा की अव्यतिकामी सस्थिति ही 'सन्निवेश प्राशस्त्यम्' है जो अपनी मूल चेतना में अग-संगति का अन्तर्भाव कर लेती है। इसी प्रकार लोल्लट के ये विचार-जहा वे नाटक एव महाकाव्म में रस के उद्भावक एव पोषक विभिन्न तत्त्वों की परस्पर मुसगति एवं तार्किक-मगति तथा प्रक्ृति-वर्णन ब अल- कार-योजना की अवयनी-अनुरूपता का प्रबल शब्दों में प्रतिपादन करते है-भी अग- सगति में सर्वाशतः मेल खाते है। परन्तु वस्तुत अग-संगति के इम विचार का सूल तो अरस्तू का वह विवेचन है, जहाँ वे महाकाव्य एवं तामद के विभिन्न अगो की ममुचित योजना पर बल देते प्रतीत होते है।3 होरेस ने तो अपने ग्रन्थ के प्रारम्भ मे ही प्रत्यक्ष विवेचन के रूप में अग-सगति का प्रश्न उठाया है। चित्रकार द्वारा घोड़े की गरदन

१ श्रचित्य बचमा प्रकृत्यनगत्, सर्वत्रपातीचिता, पुष्ित म्वावसरे रसस्य चकयामार्गे न चातिक्रम। शृद्धि प्रस्तुत संविधानक विधौ ब्रौदिश्च शब्दाथयो विर्द्वान्द्धि परिभाव्यतामवहिते एतावदेवास्तु न.।। -डॉ० राघवन, शंगार प्रकाश, भाग २, पृ० ४९१ २ डॉ० गणामागर राय हिन्दी काव्य मीमासा, पृ० ११६ पर उद्घृत लोल्लट के श्लोक- श्री रसिकलाल परीख. काव्यानुमासन, नृ० ३०७ पर उद्धृत लोल्लट के श्लोक। 3. S. H Butcher . Arstotle's Theory of Poetry and Fine Arts, p 30-39 Every man's Library Aristotle-Poeucs, pp 24 and 61-62

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२४ औचित्य सद्धातिक विवचन

पर मनुष्य का सिर, अथवा किसी स्त्री के मुख के अधोभाग मे कुरूप मछली को अकित किए जाने पर कौन अपनी हेंसी रोक सकता है? इसी प्रकार रचना मे असम्भव प्रतीत् होने वाली बोझिल अलंकार-योजना तथा रुग्णव्यक्ति के स्वप्न की भाति वेसिर-पैर की निरधार बाते भी हास्यास्पद सिद्ध होती है। यहाँ कलाकृति मे अगो की परस्पर अनु- कल अन्विति का महत्त्व प्रतिपादित किया गया है। किन्तु औचित्य और 'अग-संगति' को परस्पर अभिन्न मानना या एक-दूनरे के पर्याय के रूप मे ग्रहण करना समीचीन नही है। औचित्य-सिद्धान्त अग-मगति मे भी अधिक व्यापक काव्य-सिद्धान्त है। इन दोनो का भेद स्पष्ट करने हुए आचार्य नददुलारे बाजपेयी जी कहते है कि 'औचित्य के समकक्ष पश्चिमी विवेचन में मुग्यत अग-मंगनि की वह विचारणा आती है, जिसका प्रथम विन्यास एरिस्टाटिल ने किया था, परन्तु पश्चिमी साहित्य-शास्त्र में अग-सगति केवल कलापक्ष की वस्तु बनी रही। 'भारतीय औचित्य' मत उससे कही अधिक व्यापक है और काव्य के बस्तु एवं कलापक्ष का अलग- अलग और सम्मिलित रूप में नियमन करता है।"२ अग-संगति का सम्बन्ध केवल नाट्य-कृतियों एव प्रबन्ध-काव्यो तक सीमित है। जबकि औचित्य काव्य के सभी अगो तक व्याप्त है। औचित्य की व्यापकता पर आचार्य बाजपेयी जी का निम्न कथन द्रष्टव्य है-"यद्यपि अग-सगति के भीतर पश्चिमी विचा- रको ने प्राय प्रबन्ध-काव्यो और नाट्य-कृतियो के अंग-संगठन को ही अधिकतर विवे- चन का विषय बनाया है, जबकि औचित्य मत की सीमा में भापा-योजना, छद-योजना, अन्नकार-योजना जैसे व्याप्क तत्त्वो को ग्रहण किया गया है। इस प्रकार एक मत के रूप मे औचित्य का क्षेत्र अधिक स्पष्ट है और व्यापक है।"3 साराज यह कि 'अंग-सगति' की अपेक्षा 'औचित्य की प्रसकित' अधिक व्यापक तर है। औचित्य जहाँ काव्य के सर्वाग से सम्बद्ध होकर उसका अन्तर्वह् संयमन करता है, अग-सगति केवल अगी और अग की अन्विति तक सीमिन है। आचार्य विश्वनाध- प्रस्गद सिश्र जी भी औचित्य की प्रमक्ति व्यापक मानकर टरो 'अंग-संगति' से व्वापक स्वोकार करते है।6 औचित्य में अग-संगति का अन्तर्भाव हो सकता है। अग-समति मे औचित्य का अन्तर्भाव नही हो सकता। बल्कि औनित्य अंग-सगति का भी नियत्ररण करनेवाला तत्त्व है। कलाकृति अथवा काव्य में अंगी-अंग की या विभिन्न अवयदो की अन्विति भी औचित्य के सूत से शासित व सग्रथित रहती है। दो तत्त्वों या पदार्थो मे परस्पर अन्विति तभी सभव है, जब ये परस्पर अनुकूल, औचित्यपूर्ण रीति से सम्बद्ध हो। अग-सगति एक स्थिति

  1. Allen Gilbert : Lierary Criticism Plato to Dryden, p. 128 डॉ० राममूति त्िपाठी. भोचित्व विमर्श, भूमिका, पृ० ३(आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी) ३ यही, पृ० ४ (आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी) ४ देखिए-मरिशिष्ट।

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ओचिय संद्धातिक विवेचन २५

विरेष है जिममें औचित्य मूल कारण (रहस्य) के रूप मे प्रतिष्ठित रहता है, जिमके पभाव में पदार्थो या तत्त्वो की सुनृखवलित स्थिति असभव-सी है। औचित्य : काव्यीय आचार-संहिता के रूप में 'औचित्य' एक काव्यीय आचार-मंहिता के रूप मे भी सोचा-विचारा गया है। जिस प्रकार विभिन्न शास्त्रो, विपयो एव जीवन के कर्म-क्षेत्रों मे अपने-अपने विधि- निषेधो की एक सहिता होती है, जो प्राय तद्-तद् विपय व जीवन-क्षेत्रो मे सम्बद्व कण्णीय और अकरणीय कार्य-व्यापारों का मार्ग-निर्देश करती है, उसी प्रकार काव्य की भी एक आचार-महिता का होना आवव्यक है। 'औचित्य' ही वह आचार-सहिता हे। चिकिन्सा, न्याय, शामन, धर्म, कर्म-काण्डादि विपयो मे उनके प्रतिष्ठापक आचार्यो व कवियो द्वारा निषिद् एव वैध विधानो का स्पष्ट आदेश होता है। काव्य के क्षेत्र मे रम को केन्द्र मे रखकर वर्ण-प्रयोग, शब्द-प्रयोग, गण-प्रयोग, अलकार-प्रयोग, रीति- प्रयोग, वृत्ति-प्रयोग, छन्द-प्रयोग आदि के विषय मे किये गए स्पष्ट विधि-निषेधो का ही रूप 'औचित्य' है। किस रस मे कौन-सी वर्ण-योजना उपकारक है तथा कौन-सी वर्ण- वोजना अपकारक है, कौन-सा गुण-सौदर्य-वर्द्धक तथा कौन-सा अपकर्षक है; तथा कानसा छद चमतकार-निप्पादक है और कौन-सा चमत्कार-आघातक, आदि का निर्णा- यक एव निर्देशक तत्त्व औचिन्य है। इस वृष्टि मे विचार कग्ने पर औचित्य कबि की मृजन-प्रक्रिया से प्रत्यक्षत अधिक सम्वद्ध है और भावक अथवा समीक्षक के व्यापार मे रुम। समीक्षक भी जब इस पर इस दृष्टि से विचार करता है, तब मूलद वह कवि की नफलता-बिफलता को ध्यान में रखकर ही अग्रसर होता है। भावक की दृष्टि से विचार करने पर सौदयानुभ्ति तथा उसकी अभिव्यक्ति के प्रसंग मे 'औचित्य' एक महत्त्वपूर्ण निर्णायक व सहायक तत्त्व ही सिद्ध होता है। समीक्षक जब काव्य-ममीक्षा करने को समुदत होता है, तब औचित्य उसका पय- निर्देश करता है। वह केवल इनना निर्णय करना चाहना है कि आलोच्यकृति मे सभी अगो की उचित योजना हो पायी है या नही। गुण, अलकार, रीति आदि रस के अनु- रूप है या नही। रस स्वय भी अन्य उपकरणों के सबर्भ मे मुनियोजित है या नही। कत्रि, भावक एवं समीक्षक तीनों के विचार से 'औचित्य' एक आचार-सहिता के रूप मे ग्राह्य होता है। औचित्य के प्रति यह भी एक दृष्टि हो सकती है। ओचित्य रस-सिद्धान्त की नैतिक व्याख्या के रूप में काव्य तत्त्वत व्यक्ति से और परिणामत समाज से अभिन्न रूप से सम्बद्ध है। व्यक्ति और समाज का नैतिक जीवन भावात्मक सामरस्य एव संतुलन की शक्ति पर आधारित है। अतः इस दृष्टि से काव्य का एक प्रयोजन व्यक्ति के लिए भावात्मक संतुलन व सहज स्वास्थ्य जुटाना भी है। आज के इस यात्रिक युग में-जहाँ व्यक्ति का जीवन

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२६ औचिय सदातिक विवेचन

चतुर्दिक विघ्न-संकुल परिस्थितियो मे फँसा पडा है, व्यक्ति की चतना कुठित, दुर्बल न उलजी हुई बनती जा रही है -- काव्य का यह वायित्व और भी अधिक बढ जाता है। व्यक्ति की यह स्थिति उसके एवं समाज के लिए घातक सिद्ध होती है। इसलिए सामा- जिक स्वास्थ्य व व्यक्ति के भावात्मक संतुलन की रक्षा के लिए काव्य का नैतिक आछाग पर सयमन-नियन्त्रण आवश्यक प्रतीत होता है। प्राचीन व नवीन, पूर्वी एव पब्चिमी काव्याचार्यो एव सदर्यवास्त्रियों ने इसकी आवश्यकना को ठीक्-ठीक सममा था। इमीलिए प्राचीनों ने रसादि के औचित्य-अनौचित्य का (काव्य एवं नाटक मे) विह्नने- पण कर्ते हुए अनौचित्य का निपेध व औचित्य का सन्निवेश आदिष्ट किया तथा विदिध भावाभासो व रसाभासी की स्थिति पर बिचार किया तो नवीन सौदर्यगाम्न्नयो न नैतिकता की आधार-शिला पर औचित्य को कमौटी के रूप मे स्वीकार करने हुए माम- जिक परिणाम के विचार में अनुचित प्रतीन होने वाले रचनाशो (काव्य-नाटक-कना इन्यादि वे) के ऋय-वित्र्य, प्रदर्शन, प्रकाशन आदि का प्रतिबन्ध स्वीकार किया है।२ भारतीय काव्य-शास्त्र मे भरत से लेकर अद्यावधि आचार्यो की रसाभाम- भावाभास-विषयक विवेचना के मूल में यही नैतिक दृष्टि आधार रूप में कियानील है। इस प्रसंग में आचार्यो ने द्विविध कार्य करने का निर्देश किया है-(१) अनौचित्य परिहार, (२) औचित्य सन्निवेग। काव्य मे रस एव रसेतर तत्त्वों के विषय में जितना 'दोय- विचार' हुआ है वह प्रथम अर्थान् अनौचित्य-परिहार की प्रवृति का प्रतिफलन है। औचिन्य- सन्निवेश के प्रयत्न के फलस्वरूप समग्र काव्य-गुणो व उनके विकास की तथा काव्य के प्रत्यंग मे औचित्य-विनिवेश की दृष्टि विकसित हुई। डॉ० तारकनाथ वाली ने विभिन्न रसाभासी एवं भावाभासी का विवेचन करते हुए नैतिकता और मनोविज्ञान को आधार मानकर उनकी काव्यशास्त्रीय स्नीकृति-अस्बीकृति पर विचार किया है। शंगा- रादि रसो मे आश्रय के अनोचित्य से अथवा भाव, विभाव, सचारी भावों के अनुचित निबन्धन के काग्ण रसाभास उत्पन्न हो जाता है। शृगार के प्रभंग मे विवाहिता की पर-पुरुप-विषयक रति, बहुपति-विपयक- रति, नैतिक आधारो पर अनुचित सिद्ध हो जाती है, तो एकागी-रति अथवा निप्प्राण वस्तु के प्रति रति मनोविज्ञान के आधार पर अनुचित प्रतीत होती है।3 इमी प्रकार सभी रमो के रसाभामो की स्थिति माननी चाहिए। भावो के आलम्बन अथवा विपय के अनौचित्य के कारण भावाभासो की स्थिति होती है। उनके औचित्य व अनौचित्य विवेचन का सार-संग्रह इस प्रकार है- विभावादि के अनौचित्य के कारण रसानुभूति खण्डित हो जाती है। अनौचित्य "ही रसभग का एकमात्र कारण है। रस का परम रहस्य औचित्य है। क्षेमेन्द्र के अनु-

१ डॉ सत्यव्रत सिंह - साहित्य-दर्पण, पृ० २७२-२७३ (रसाभास-सबधी-विवेचन) 2. Breadsley : Aestherics, p. 577 ३. डॉ० तासकनाय वाली: रम सिद्धात की दार्शनिक वर मैतिक ड्यारुपा, पृ १८६-६७

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औचिय संद्धातिक विवेचन

सार ओचित्य ही काव्य का स्थिर जीवन' है, प्राय रस को काव्य की भाम, माता जाता है किन्तु रस-सृष्टि मे कवि को औचित्य का ध्यान रखना ही पड़ता है। काव्य ओर जीवन दोनों की सुरम्यता के लिए औचित्य एक आवश्यक सिद्धान्त है। काव्य में रस के महस्व की औचित्य सिद्धान्त डिगा नही सकता, किन्तु इससे औचित्य की महना की हानि नही होती। औचित्य के दो आधारो-लोक एव शाम्त्र मे से पंडितराज जगन्ताथ ने शास्त्र की अवहेलना न करते हुए लोक का आधार ग्रहण करने का समर्थस किया है।१ . नतिकता को औचित्य का एक अनिवार्य धगतल मानने हुए वे विषय की किनी भी प्रकार की अनैतिकता को काव्य मे अनिर्वाह मानते हैं। विषय यदि अनैतिक ह् तो रस-निर्ष्पान हो ही नही सकती। विषय का अनौचित्य रस का घातक है। रस नैनि- कता की दृढ आधार-जिला पर प्रतिष्ठित है, अन उमे औचित्य का बन्धन लगा हुा है। विषय की अनैनिक्ता रस की सम्यक अनुभूति मे बाधक होगी। रस-मिद्वान्न में रस की कल्पना मे आनन्द और औचित्य की कल्पना मे नैनिक्ता की स्वीकृति आ ही जाती है।२ रस और औचित्य, आनन्द और नैतिकता दोनों अन्योन्याश्रित है। दोनो अभिन्न रूप से सम्बद्ध हैं। अनैतिक वस्तु आनन्दप्रद हो ही नहीं सकती, इनी प्रकार अनुचित वस्तु रसप्रद्द नही हो सकती! 'औचित्य' की प्रतिष्ठा करने वाले आचार्य क्षेमेन्द्र ने आत्म-तत्त्व 'रस' को मान्य नैतिक धारणाओं से संयमित व अनुशासिन मान लिया है।3 इस दृष्टि में औचित्य को 'रस-सिद्धान्त' की नैनिक व्याख्या के रूप में म्वीकार करना ही ममीचीन है।

शौचित्य : स्वरूप-जिज्ञासा व समाधान औचित्य का आधार : लोक या शास्त ? औचित्य मूलत लोकाश्रित है या शास्त्राश्रित-इस प्रग्न पर विद्वानों में पर्याप्त चर्चा है। प्राय सभी आचार्य उसे लोक-व्यवहारनिष्ठ मानते हैं। आचार्य भरत ने नाट्य को लोकधर्मी माना है और वे लोकव्यवहार की रक्षा को ही औचित्य तथा लोक-व्यवहार के अतिकमण को ही अनौचित्य मानने है। नाट्य सदैव रसलक्षी होना है। रस का रहस्य है 'औचित्य' और औचित्य लोक-व्यव्रहार मे अनुशासिन रहता ह। पंडितराज जगन्नाथ ने विभावों के अनौचित्य का कारण लोक-व्यवहार-विरुद्रता माना है और उनके द्वारा प्रयुक्त 'योग्यता' शब्द वस्तुन औचिन्य का पर्याय है। 'योग्तन' का अर्थ स्पष्ट हुए करते वे कहते हैं कि-

डॉ० तारकनाथ वाली रम सिद्धान की दार्शनिक व नैनिक वमव प० ०६०-१:२ २ उदी, प० २4२ वही, प०२१३ ITY

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२८ औचित्य सढातिक विवेचन

योग्यता च युक्तमिदमिति लौकिक व्यवहार गोचरता-"अथति लौकिक व्यवहार मे योग्य-अयोग्य का विवेक ही योग्यता (औचित्य) है। लोक जिम युक्त वहे बरी योग्म या उचित है। इसी का कुछ विस्तार करते हुए डॉ० तारकनाथ बाली -हने हैं- 'रम-गसावरकार ने विभाव के अनचित्य के ज्ञान के लिए लोक को ही प्रमाण नना है। इस प्रकार ओचित्य के दो आधार सिद्ध हुए-नथन लोक और दूसरा शम्त। आचार्य स्रनन्दव दवंन औचित्य के इन दो आपागे में गास्त्र को प्रधानना देते प्नोन होने है- 'कवि को चाहिए कि वह भग्तादि वे वास्त्र का अनुसरण, प्रसिद्ध काव्यो का दर्वानोचन तथा अपनी प्रनिभा का अनुगसन कग्ता हुआ, अपने काव्य की रचना मे अनौवित्य का बहिषकार करे।"3 आनन्दवर्द्वन द्वारा प्रयुक्त शब्दावली 'भरतादि के वास्त्र का अनुमरण' वस्तुत नकव्यवहार का अनुमरण ही है। औचित्य को केवल लोक-व्यवहार-निष्ठ मानना ी दृ्टि का एकांगीपन है। इस विपय मे डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी के विचारो का सार- सगह इम प्रकार है- "जहाँ तक औचित्य के म्रोत का सम्बन्ध है -कुछ लोग केवल 'लोक' को ही प्रमाण मानते है। निश्चय ही लोक को औचित्य का निकष मानना चाहिए-इसमे दो मत नही हो सकते, परन्तु लोक-परम्परा समर्थित कतिपय काव्य-सामग्री के अतिरिक्त अाव्य-ससार की कुछ चीजे ऐसी भी है जो गास्त्र-परम्परा अथवा काव्य-परम्परा का आनुकूल्य भी चाहती हैं। काव्य एवं शास्त्र के अनुशीलन से भी एक ऐसा ससार उत्पन्न होना है-जिसके अनुरूप सहृदय लोग काव्यगन सामग्री एव सविधान में औचित्य एव अनौचित्य का विचार करते है। व्यावहारिक जगत् से काव्य-जगत् का कुछ व्यतिरेक अवग्य होता है और इस व्यनिरिवताश मे औचित्य का नियामक काव्य एव काव्य- शास्त्र की परम्परा को भी स्वीकार करना चाहिए।"४ डम प्रकार डॉ० विपाठी लोक-व्यवहार के अतिरिक्त काव्यशास्त्र को भी औचित्य के स्रोत के रूप में ग्रहण करते प्रतीत होते है, परन्तु काव्यशास्त्र में औनित्य का मूल खोजना अथवा उसे औचित्य का सूल आधार मानना भी युक्तिसगन नहीं जान पड़ता। मूलतः औचित्य मानव-व्यवहार की अच्छाई और बुराई का निर्णय करने वाला तम्थ है। मनुष्य के व्यवहार की अच्छाई-बुराई का विचार करना 'नीतिशास्त्र' का कान है। भारतीय सस्कृति में इस विदेक की व्यवस्था वर्मशास्त्र मे प्रतिपादित व

१. प० बदरीनाथ ज्ञा और प० मदनमोहन झा रस गगाधर, तृतीय भाग, पृ० ४७६ २ डॉ तारकनाथ बाली : रस सिद्धांत की दाशनिक व नैतिक व्याख्या, पृ० १६१-१६२ ३. डॉ० रामसागर तिवाठी स्वन्यालोक, द्विनीय खण्ड, पृ० ७६० ४ डॉ० राममूर्ति तिणठी. भौचित्य विमर्श, पृ०७

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औचित्य सद्धातिक विवेचन

समरित है। अतः नीतिशास्त्र अथवा धर्मशास्त्र को औचित्य का मूल स्रोत् मानना निरापद स्थिति है। औचित्य मूलत लोक-व्यवहार पर आधृत है और लोरु-व्यवहार का विशेष विचार धर्मशास्त्र या लोक-धर्मदास्त्र अथवा नीतिशास्त्र के ही अतर्गन किया जाता रहा है। औचित्य को यदि शास्त्रनिष्ठ माना जाय, तब तो उमे धर्मशास्त्र किवा नीतिशास्त्र पर अधिष्ठित मानना चाहिए। 'औचित्य लोकाश्रित है और शास्त्ाश्रित भी।' प्रधानता लोक की ही विशेप हे।

औचित्य : अतरग या बहिरंग औचित्य के दो पक्ष-कलापक्ष एव भावपक्ष माने जाते हैं। भाकपक्ष औचित्य का अंतरग और कलापक्ष औचित्य का बहिरग है। अपने बहिरग मे औचित्य वर्ण-योग मे अलकार-योग तक की समस्त योजना से सम्बद्ध है। भाषा, छद, अलकार, गुण, रीति, वृत्ति आदि अभिव्यक्ति के समस्त अंग-उपाग औचित्य के इस पहल मे समाविष्ट हो जाते है। यही नही, इन अगोपांगों की अगी के अनुरूप अवस्थिति तथा इनकी परस्पर सुसंगत स्थिति भी इसके अतर्गत विचाराधीन हो जाती है। इन सभी काव्यागो का अगी (रस) मे उचित संश्लेष ही काम्य है। औचित्य के अतरग पहलू के अतर्गत भावपक्ष की सम्पूर्ण सामग्री सहज ही समाविष्ट हो जाती है। यहाँ इम बात पर विचार किया जाता है कि वर्ण्य-विषय स्वय उचित है या नही। इसके भीतर विभाव, अनु- भाव, सचारियों का औचित्य एवं भावौचित्य का विमर्श किया जाता है। औचित्य का यह अतरंम पक्ष वस्तुत सामाजिकता के विचार पर आधृत है अथवा यो कहिए कि रसचक की सामाजिक व नैतिक व्यास्या से सम्बद्ध है। कला-पक्ष अथवा बहिरंग मे सम्बद्ध औचित्य तो काव्य या किमी कलाकृति के चिभिन्न अगो की समानुपातिक एव सौदर्याधायक योजना तक ही मीमिन है। औचित्य का महत्त्वपूर्ण अंग तो उसका वह अतरग-पक्ष है, जहाँ दस्तु (काव्यार्थ) के औचित्य-अनौचित्य का विचार किया जाता है। स्त्रय गृहीन वस्तु, भाव, विवार या वर्ण्य निर्दोष तो है, रसोत्पत्ति-ग्मानुभूनि का सहायक तो है? इस पर विचार करना वहाँ उसका प्रमुख प्रतिपाद्य है। काव्यशास्त्र में जहॉ कही विभावादि के अनौचित्य पर विचार हुआ है, वह सारा विवेचन इनका अग है। अनुचित विभावो की योजना नैतिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक आधारी पर रम- विरोधी ही नही बड़ी घातक समझी गई है। साहित्यदर्पणकार ने नृतीय पा च्छेद के अनिम उलोकों मे भावाभास एव रसाभासो का संकेत करते हुए लिखा है कि-उप- नय्यक सस्थित रतिभाव, सुस्पत्नी अथवा मुनिपन्नी-विपयक रतिभाव, बहुनानक- विषयक रतिभाव, एकागी रतिभाव, नायिका की प्रतिनायक में रनि, अवन-प्रकर्धन के जनो मे रति, पशु-पक्षी मे निष्ठ रनि आदि मे शृगार-रम-विषयक अनौचित्य होने मे शृगार रसाभास होता है। इसी प्रकार अन्य रमो में भी अनौचित्य का विमर्ग कर लिया जाता है। आलंबन का अनौचित्य, उद्दीपन का अनौचित्य, आश्रय का अनौचित्य

१ डॉ० सत्यव्रत सिंह : साहित्यदर्पण, पृ २७३

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आदि ही इन रसाभामो के जनक-कारण है। औचित्य-अनौचित्य के इस आतरिक पहलू पर ठंठ भरत से लेकर पंडिन जगन्नाथ तक ने विचार किया है। आचार्य रामचद्र शुक्ल न भी रस-मीमासा मे इसका स्पर्श किया है।"

औचित्य : कलागत या सामाजिक ऊपर के विवेचन को ही कुछ विद्वान् इन दो शी्पकस्नन्भो के अतर्गत विवेचित कन्ते है। पूर्व एव पश्चिम के आधुनिक विद्वान् औचित्य के अतरग एवं बहिरग पक्षो का क्रमश 'सामजिक' और 'कलागत' गीर्षको के अतर्गत अनर्भाव करते प्रतीत होते हैं। वरिपमता से ममता स्थापित कग्ना तथा व्यवस्था का सनिवेश करना कला का एक महन्वपूर्ण लक्षण है। इसलिए औचित्य के कलात्मक अश मे विभिन्न तत्त्वो की व्व्था एवं परस्दर अनुकूलतापूर्ण संस्थिति का ही विरेष महत्त्व हे, उसी पर विभेष बन दिया जाता है। औचित्य का सामाजिक रू भाव की बहणशीलता तथा अग्रहण- नीरता ने सम्बद्ध है। भरतावि द्वारा विवेचित प्रकृति-औचित्य, आनदवर्दधन द्वारा निरपित 'काले च ग्रहणत्यागौं' का मिद्धान्द, अभिनव गुप्त द्वारा विर्भाशत देशकाल- पावदि के अनुरूप समाज की धारणा के अनुरूप आचार का सन्निवेश मूलन इसके अन्गत अवस्थित है। भाव की शुद्धि या काव्यीय ग्राह्य-अग्राह्य का विवेक यदि मामाजिक औचित्य क विषय है तो भाव की आनन्दपूर्ण, प्रतीतिकर, सुसंगत एवं मुन्दर तथा व्यवस्थित अन्विति कलागत औचित्य का विषय है। वेडौल, अव्यवस्थित एवं अनन्वित चित्र मे सौदर्य की अवस्थिति हो ही नहीं सकती। व्यवस्था के अभाव मे कृति मे सौदर्य का अधिवान कल्पित किया ही नही जा मकता। औचित्य : सापेक्ष या निरपेक्ष नायः 'औचित्य' को एक सापेक्ष पदावली के रूप में ग्रहण किया जाता है। ऐमा कहने से यदि उसकी अन्य-निरपेक्ष व स्वतन्त्र सत्ता निपिद्ध हो जाती हो तो वह ममीचीन नही होगा। यह सत्य है कि जीवन मे, अत साहित्य मे भी आँचित्य की वाग्णा नित्य परिवर्तनशील व गतिशील होती रहती है, यह भी सत्य है कि औचित्य दो नत्वों के बीच एक अनुकूल सम्बन्ध विशप भी है; इमल्िए वह अंगांगी की पूर्व- कन्पना कर लेता है और स्वतन्त्र रूप से किसी प्रकार क्रियागील नही हो पाता तथा इन दो तत्त्वों (अगी-अग) के अभाव से अपना समस्त महत्त्व खो देता है, परन्ु साय ही यहु भी उतना ही सत्य है कि औचित्य के अभाव में काव्यार्थ (वस्तु-रमादि) एव काव्याग (गुणालंकारादि) भी अल्पजीवी, महत्वहीन और श्रीहीन हो जजाते है। अचित्व केवल दृष्टिकोण ही नही, अगागी की अनुकूलता-मात्र ही नही है. वरन् वह नो सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि है। उसकी सना केवल सापेक्षिक ही नहीं, निरपेक्ष भी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल. रस मीमासा, पृ० २४६-२५६

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निरपेक्ष दृष्टि से औचित्य मे स्वय देशकालादिस परे कुछ रे छत्त्व विद्य मान रहते हैं, जिनके कारण वह अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखता हैय का स्वरूप या रूपाकनि परिवर्तनशील हो सकती है; उसकी विभावना (Concept) अपरिवर्तनगील या जधिक स्थिर है। यही औचित्य (अपने निरपेक्ष रूप में) कला एव काव्य-जगत् मे बैचित्र्यो व सममामयक देशकालादि को उचित मात्रा मे स्वायत्तता देने हुए भी उनका अनुशामन करना है। यदि सौदर्य की वस्तुगत सत्ता म्वीकार्य है तो उसके कुछ ऐने सौदर्याशों की भी स्थिति स्वीकार करनी पडेगी, जो बाह्य प्रभावों से अपरिवर्तित ही बने रहते हे। से सैदयोग ही सौदर्य की निरपेक्ष सत्ता का उद्घोप करने है। चित्रकार अपने रृचि- वैचित्र्य के आधार पर किसी स्त्री के चित्र मे उसके विभिन्न अगो की योजना ने उनकी दीर्धना-स्फीतता आदि का अकन करने मे एक सीमा तक स्वतत्र है। वह चाहे तो नेतो को 'कानननारी मृग बना ले, किसी को कोई आपनि नहीं हो सकती परन्तु- जैमा कि होरेस ने अपनी रचना 'आस पोएतिका' के प्रारम्भ मे ही लिखा है-यदि वहु स्त्री के सिर के अधोभाग में कुरूप मछली का बड जोड दे तो कौन दर्शक अपनी हुँसी रोक पाएगा ? कण्ठ मे मेखला धारण करने वाला और कमर में हारादि वाँधने बाला म्व देगों मे सब कालों में हास्यास्पद ही होगा। औनित्य की इसी मूल धारणा में उमके निरपेक्ष अस्तित्व का अधिवास है। काव्य-समीक्षा के क्षेत्र मे औचित्य के इन दो रूपो-सापेक्ष व निरपेक्षमे से विदेष-नित्य-प्रति व्यवहृत रूप तो सापेक्ष रूप ही है। औचित्य की निरपेक्ष व कालजयी मत्ता को स्वीकार करते हुए भी साहित्यशास्त्र में तो उसके सापेक्ष रूप का ही अधिक उप- योग है। आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्रजी ने भी साहित्यशास्त्र मे तो औचित्य की सापेक्ष मत्ता स्वीकार करने का समर्थन किया है। आचार्य पं० बलदेव उपाध्याय जी भी औचित्य की सापेक्षता का विमर्श करने पर भी उसकी निरपेक्ष सत्ता प्रतिपादित करते हुए प्रतीत होते है।२ निष्कर्षतः यह कहना ही अधिक निरापद होगा कि औनित्य की विभावना या धानणा निग्पेक्ष हो सकती है, उसकी मूलभूत (Basic) स्थिति निरपेक्ष हो सकती ह। उसका निरपेक्ष अस्तित्व स्वीकार किया जा सकता है, परन्तु काव्य एव कला की समीक्षा के सन्दर्भ में जब वह एक आवार या मानक बनकर उपस्थित होता है तब उमकी लापेक्षता उमसे सहज ही सब्लिप्ट हो जाती है। माहित्य-शास्त्र मे अथवा विभिन्न कलाओं की मीमासा के अवसर पर उसका सापेक्ष रूप ही विशेष उपादेय सिद्ध होना है। ओित्व : वस्तुगत या विषयिगत 'सौदर्य' की भॉति 'औचित्य' के विषय में भी एक सहज प्रश्न उपस्थित होता

१ देखिए-परिशिष्ट में आचायंजी का पत्न। २ डा० राममूर्ति व्रिपाठी : औचित्य चिमर्श, पृ० १५६-५७ पर उद्धुत अ्रभिमता

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३२ औनित्य सदातिक विवचन

है कि औचित्य की वास्तविक अवस्थिति कहाँ है? विषय मे या विर्षाय मे? अर्थान् औचित्य द्रष्टा मे है या व्रष्टव्य मे प्राय औनित्य की स्थिनि विपयिगत ही अधिन मानी गयी है। डॉ० नगेन्द्र ने व्यक्तिनिष्ठ विवेक को औजित्य का आधार माना है।१ इस दृष्टि से वे औचित्य को वस्तुवादी सिद्वान्त न मानकर विपययनिष्ठ सिद्धान्द अधिक माना प्रतीत होते है। यह विचार बहुधा नर्वग्राह्म, प्रसिद्ध एवं मान्य-मा हो गया हु कि औौचित्य की स्थिति समीक्षक की अपनी दृष्टि मे ही है। औचित्य मूलत विरषयि- गत होते हुए भी उसकी विषयगत सना सवथा निरादन नहीं की जा सकती। यदि वर्ष्ये-विषय ही मूल रूप मे अनुचित हो तो वह रसास्वाद-क्षम नहीं बन सकता। मधुर आकृतियों के स्वतन्त्र व अन्य निरपेक्ष सौदर्य का प्रतिपादन कर कालिवास ने सौनर्य की वस्नुगत स्थिति सिद्ध कर दी है और यह भी प्रतिपादित कर दिया है कि सहज-माँदर्य मे अन्वित पदार्थ प्राय सभी को सुन्दर ही लगते है। उसी प्रकार औचित्य की भी व्रस्तु- गत स्थिति सिद्ध की जा सकती है। डॉ० तारकनाथ बाली ने नॅतिक आधारे पर विषय के औचित्य एवं अनोचित्य पर विचार करते हुए यह विमर्श किया है कि सामग्री अर्थात् विभावादि (वस्तु) के अनौचित्य के कारण रसास्वाद खण्डित होता है और परिणामन रसाभासों को स्थिति उत्पन्न हो जाती है।2 इससे यह स्पष्ट है कि विषय-दस्तु के औचित्य-अनोचित्य का मी अपना स्वतन्त्र (अलग) अस्तित्व है। आस्वाद का स्वरूप व परिणाम न तो एकान्तत आस्वार्द्यारत है न आस्वाद्दकनिरत ही। आस्वाद्य का भी अपना विशेष महत्त्व है। वस्तु की उपेक्षा करना सम्भव ही नहीं है। सहदयगत लोरु- वृत्ति अर्थात् सामाजिकता का प्रतिमान स्वीकार करते हुए डॉ० रामभूर्ति तिपाटी ने रस, ध्वनि एव बकोकतिवादियों को औचित्य के विषयगत स्वरूप का व्यवस्थित एव विल्तृत् विमग करनेवालो के रूप मे अभिशंसिन किया है।3 निष्कर्ष रूप मे यह कहना ही प्राप्त होता है कि औचित्य को सवथा 'विषयय किंवा सवका विषयगत मानना नितान्त अदूरदर्शी होना है।' उसका मूलाधार वस्तु या विपन है और उसकी लीला का प्रमार विर्षाय-द्रष्टा की अन्नर्द् ्टि तक व्याप्त है। औथिन्य : स्थिर या गतिशील औचित्य की स्थिरता अथवा गतिशीलता का निर्णय स्थिर एव 'गनिशील' विशेषणो की अवधारणा के बिसमे व तज्जन्य परिणाम पर आघृत है। 'स्थिर' और गतिशोल' शब्द सापेक्ष है। 'स्थिर' यदि 'अटल', 'अपरिवर्तनशील', 'ज' 'निरनवाद' आदि का बोध कराता हो तो औचित्य अपने को उम विशेषण से संयुक्त करना नहीं चाहेगा। इसी प्रकार 'गनिशील' से केवक सामयिक-स्थिति के अनुर्प होने का अथवा म्वरूप के डीलेपन या निश्चित रूपाकृतिहीनता का ही बोध होना हो तो भी औबित्य

१. डॉ० नगेन्द्र. हिन्दी वक्रोक्ति जीवित, पृ० २१३ २. ड० तारकनाथ वाली. रक-सिद्वात की दार्शनिक व नैतिक व्याख्या, पृ० १८५-१८७ 3. डॉ० राममूर्ति तिपाठीऔचित्य-विमर्ग, पृ० ८ु६.८७

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गतिबील कहलाना पसन्द नही करेगा। औवित्य को स्यिर कहकर हम उसे सुनिश्चन सामाजिक नैतिक आधारों पर स्थित एक काव्य-सिद्धान्न मानते है। औचित्य न तो निराधार है न कोई 'Vague Term ही। औचित्य को गनिशील कहकर हुम उने नुगानुरूप परिवर्तन-क्षम एव निरन्तर विकसनशील काव्यादर्श मानने है। सामाजिक- नतिकता थ लोक-व्यवहार के धरातल पर आधृत होने के कारण ही औचित्य की परि- वर्तनशीलता स्वत सिद्ध है, क्योक लोक-व्यवहार एव सामाजिक नैतिक्ता की धारणाएँ समय के माथ बदलती रहती है। मध्ययुग की नैतिकता या लोक -यवहारातुकलता आाज कीण नही हो सकती। उस गुग में जो कुछ स्वीकार्य एवं 'उचित' ममझा गया हो वह नब आज के सुरु में अतिवार्यन स्त्रीकृत या उचित हो ही ऐना सम्भव नहीं। आ्रवार्य नन्दनुलारे वाजपेवी का इस विपय मे यह कथन द्रप्टव्य है-"नैनिकता और मामाजिक वव्हार की कोई स्थिर व अटल रूपरेसा नही है, वे एक गतिनील पदार्थ है जनएव औचित्य की धारणा भी गतिशील है और विभिन्न युगो मे बदलती रहती है। इम दृष्टि में औचिन्य का कोई एक प्रिमान स्वीकार नही किया जा सकता।"9 डॉ. तारकनाथ वाली भी औचित्य को लोक-प्रवृत्ति के साथ परिवर्तनगील अ्रत त्रिकमनशील मानते प्रतीत होते है। औनित्य स्थिर' भी है और 'गतिशील' भी। अपनी रामाजिकना व अनुगुणता के कारण वह अधिक दीघजीवी एव जन-जीवन से प्रगाढ रूप से संश्लिष्ट है। स्थिरता व गतिशीलना के पलडो मे गतिणीलना का पलड़ा विचित् भारी ही पड़ेगा। उसे केवल स्थिर अथवा केवल गतिशील मानना उ.के यथार्थ स्वरूप को ठीक-डीक न समझने के सनान होगा। औचित्य और आधुनिकता वदलता हुआ युग अपनी आवश्यकतानुसार नये समीक्षादर्श निर्मित कर लेता है और पुराने काव्यादर्शो का पुनरास्यान कर उन्हं अपने अनुरूप ढाल लेता है। युग की इसी आवश्यवता ने 'म-सिद्धान्त' के व्यप्त प्रतिष्ठित हो चुकने पर भी 'ध्वनि- मिद्धान्त' को जन्म दिया और रमान्विति का मुक्तको तक प्रसार कर दिया। इसी आवध्यकता ने नवयुग में 'रम-सिज्धान्न' का पुनराख्मान करवाया और 'रस' के पूर्ग परिकषर की अनुपस्भिति मे भी आस्वाद की स्थिति स्वीकार करवाई तथा प्रत्येक मृजना- त्मक (गमीक्षात्मक भी) कृति मे भी 'रस' की परिकल्पना कर ली। इतना ही नहीं अनात्मवादियों के परिनोप के लिए 'रस' को एक नवीन सना-आनन्दमयी चेतना' -- ने विभूपित भी कर दिया। वही क्ाव्म-निद्धात्त समादृत व ग्राह्य वना रह सकता है, जो अपने को युग की आवश्यकता के अनुरूप ढाल सकता है, जीवन को उततकी घरि- पूर्गना व बहनता के साथ ग्रहण कर अग्रसर होता है। वही सजीव एवं स्फूर्तिवान्, नाजा एव गतिशोल बना रहता है जो भामाजिकता से अभिन्नतम रूप से सम्बद्ध हो।

डॉ० रात्रमृति निपाठी शशचित्य विमरश (भूमिका), पृ०३ ६ डॉ. तारकनाथ बाली. रस-सिद्धात की दार्शनिक व नैतिक व्याख्या पृ० १६५

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जोच्य सनातिक विवचन

इस दृष्टि स विचार कग्ने पर विभिन्न काव्य-सिद्धान्तो ने 'औवित्य-सिद्धान्त विशेषत आधुनिक समग्र में अधिक ग्राहम, समादृत एवं वैतन्ययुकन काव्य-सिद्धान्त है। अपनो व्यावहारिकता, लचोलापन व युगानुरूपता के कारण वह 'अन्य सिद्धाल्नो की अपेक्षा' विशेष समाज-निबद्ध है। आरज का सर्जक, समोक्षक एव भावक जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखने, परखने व प्रस्नुत करने का अभिलाषी है। अत वहु काव्य एव काव्य- समीक्षा के क्षेत्र में जीवन को पूर्णता के परिवेश मे ग्रहण करने का आग्रही है। उरूकी इस अभिलापा की पूर्ति में औचिन्य-सिद्वान्त का योगदान सम्भवत सर्वाधिक है। श्री० गंकरदत्त ओझा की कुछ पक्तियाँ दष्टव्य है - "आज के व्यावहारिक युग मे क्षेमेन्त्र के सिद्धान्त का समादर हम देग्व रहे हे। वर्तमान साहित्य की गतिविधि औचित्य-सिद्धान्त पर ही आधारित देखी जा सकती है। अलकार, रीति, गुण एवं ग्स को वर्नमान साहित्य मे सम्भवत इतना आदर एव स्थान नही मिल रहा है, जितना 'औचित्य की भावना' को। सामंजस्म और नमरसता का नाम ही 'औचिन्य' है और 'यही वर्तमान माहित्य का प्रधान लक्ष्य है।"१ 'औचित्य-सिद्धान्त' का अनुवर्तन क्यो नहीं हुआ? यह सत्य है कि एक व्यावहारिक समीक्षा-सिद्धान्त के रूप मे व्यापक महत्ता व सा्वनिक स्वीकृति प्राप्त करने पर भी 'औचित्य-सिद्धान्त' का क्षेमेन्द्र के बाब अनुवर्तन नही हुआ। अन्य सम्प्रदायो एव काव्य-तिद्धान्नों की अपेक्षा अधिक सामाजिकता से सवकित होने व जीवन से धनिष्ठ रूप मे सम्बद्ध होने पर भी इस 'औचित्य-मिद्धान्त' का अनुवर्तन क्यो नही हुआ, यह जिनासा होना सहज है। क्षेनेन्द्रोत्तर उससी पार- न्परीण गति न बढने के निम्नलिखित काग्ण हा सकते है। (१) अपनी व्यापकता के कारण यह सिद्धान्त इतना सहज-साधारण व मर्व- म्राह्म रूमझा गया कि किसी आचार्य को उसके महन्व का पुन-पुन प्रतिष्ठापन करने की आवश्यकता ही प्रनीत नही हुई। न तो इसने किसी विचारधारा या परम्परा प्राप्त काव्य-सिद्धान्त के खण्डन-मण्डल मे अपना योगदान दिया न अपनी महत्ता के प्रतिपाट- नार्थ पाणण्डत्यपुर्ण शव्दावली का ही आश्रय रिया। श्री नकरदत्त ग्र्रोझा ने औचित्य के अनुवर्ननन होने के कारण के रूप में औचित्य के सहज सारल्य एव व्यापकत्व को निर्दिष्ट करते हुए उसे क्षेमेन्द्र की उर्वर कल्पना मानकर अभिकसित किया है।२ किसी प्रकार के तर्काडम्बर व चाकचिक्म का उसमे सन्निवेश न होने कारण विद्वानों का हठात् उस तरफ ध्यान गया ही नही। (२) औचित्य के अनुवर्त्तन न हो पाने का एक अन्य कारण है विद्वाना की काव्य-शास्त्र-विपयक दृष्टि का सीमित व परम्परानिष्ठ होना। डॉ० तारकनाथ वाली ने इसकी चर्चा करते हुए यह प्रनिपादित किया है कि परम्परावादी काव्य-शास्त्रियो ने १. साहित्यशास्त्र मे मौचित्य विचार, ना प्र० सभा पक्िका, वर्ष ६६, अक १ २. वही।

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जोचिय महातिक विवचन ३५

कुछ वध हुए माग से कुछ निश्चिन विषयो का ही विवेचन किया है, परिणामत, स्वच्छन्द मनीक्षा-दृष्टि का विकास उतना नही हुआ, जितना दाछनीय है। औचित्य की चर्चा इनीलिए नही हुई कि उसमे स्वच्छन्द-समीक्षा-दृष्टि वाछनीय थी। (३) हिन्दी की रीति-कालीन समीक्षा तो रीति एव वकोक्ति की भूल-सुलैया मे फम गई। परिणामत औचित्य का विमर्श वहाँ भी नही हुआ। आधुनिक काल मे अवभ्य ही हिन्दी-सस्कृत के विद्वानों एवं कुछ अन्य सज्जनो के बुष्टि-पथ में 'औचित्य' पडा। उसकी महत्ता व व्यापकता को वे समन पाये एवं उस पद मिचार करन में प्रवृत्त हुए। महामहोपाध्याय कुप्यू स्वामी गास्त्री ने औचित्य को सर्वो- परि वर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण काव्य-सिद्धान्त मानकर उसमे रस, ध्वनि, अनुमिति, वत्रोकित, गुग, अलकार एव रीति आदि का अन्तर्भाव कर दिया है। डॉ० राधवन, प० बणदेत उपाध्याय, आचार्य विश्वनाथप्रसाद मित्र, डॉ० रामसूति ब्रिपाठी, श्री रामपाल विद्यालकार, डॉ० मनोहरलाल गौड एव डॉ० रामलालसिंह प्रभृति विद्वानों ने कुप्पूस्वामी शारत्री के द्वारा प्रस्नुत किए उस चित्र की व्यास्या कर एक या दूसरे रूप मे 'औनित्य' के महत्व का स्वीकार किया है एव उसकी प्रतिष्ठा भी की है। फिर भी इतता नो निव्चित है कि औचित्य के चिन्तन व भेदोपभेद-निरुपणादि का क्षेमेन्द्रीय गैली व पद्दनि में कोई प्रयत्न नहीं हुआ। अरित्य का निर्णावक कौन?

अन्त मे एक जिज्ञासा शेप रह जाती है कि औचित्य का निर्णायक कौन है? कषि, भावक एवं समीक्षकइन तीनों में से औचित्य का अतिम निर्णायक कौन है? विचार करने पर यह सहज स्पष्ट हो जाता है कि वरपुन औचित्य का निर्णय तो 'स्भीक्षक' ही करता है न कवि और न भाबक ही। सृजन की बेला मे कवि औचित्य- अनौच्ित्य का विचार करने नहीं रुकता। आस्वादन को प्क्रिया मे भावक अवश्य ही रमस्वाद के चारुल्व-अचारत्व, सौर्कर्य-असीकर्य, अवरोध-अनवरोध आदि की अनुभुति करता है, परन्तु ऐमा क्यों हुआ, जस पर विचार करने वह नही बैठता। इस पर तो केवन समीक्षक ही विचार करता है, जो विश्लेपणोपरान् यह निश्चित करता है कि रसास्वाद बिगडा कैसे? भावक भी जब औजित्य-अनोचित्य पर विचार करने लगता है तब वह समीक्षक की कोटि मे आ जाता है। मदि कवि सजगतापूर्बक औचित्य-अनौ- चित्य विचार में लगता होता तो काव्य की सदोषता का प्रश्त ही नहीं उठता। यह तो उनकी शक्ति का क्षेण्य है। औचित्य सन्निवेश व अनोचित्य परिहार के लिए बह किसी रूप में सजग चेष्टा नहीं करता। महृदय की अन्तर्व ति नही, किन्तु मनीक्षक की मजन बुद्धि औचित्य की अन्लिम निर्णायिका है।

१ ड० तारकनाथ वाली : रक्ष-सिद्धास्त की दार्शनिक व नैतिक व्याख्या, पृ० १६३

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औचिय सदातिक विवचन ६

औतित्य विमश पूव और पश्चिम के आचार्यो के परिपेक्ष्य मे

नाट्य-दृष्टि दूर्व और पश्चिम मे 'औचित्य विमर्श' का सूत्रपात नाट्य-मीमाया के मन्दर्भ मे हुआ प्रतीत होता है। पूर्व मे आचार्य भरत ने और पश्चिम में आचार्य अग्न्तू ने नाटक के प्रसंग मे 'औचित्य' की महत्ता व आवश्यकता पर प्रत्यक्ष बल दिया। आचार्य भरत ने अभिनय के विभिन्न उपकरणो की पारस्परिव अनुरूचना, अहार्य अभिनय में अलंकारो की यथास्थान समुचित योजना; अग-रचना (मतअष) मे पात्नानुरपता का विवेक, पात्रो की प्रकृति एवं शील के अनुरूप व्यवहार आति की रक्षा के लिए असंदिग्व प्दावली में आदेश दिये है। वही नही, औचित्य की विभा- बना (Concept) की व्याख्या भी प्राय उसी पदावली से की है जिसमे औचिन्द के प्रतिष्ठापक आचार्य क्षेमेन्द्र ने उनके लगभग एक सहस्राब्द बाद 'शचित्य' की प- भाषित किया है।4 भरत परवर्ती नाट्य-विमर्श मे राजा यशोब्मन् ने अपने नाटक 'रामाभ्युदय' में 'औचित्य' का प्रत्यक्ष प्रयोग किया है। नाटक मे पात्ो के दय, जानि व प्रकुनि के अनुरूप वाणी-व्यवहार, अवसरेचित रस-पुष्टि, अव्यततकामी कथा, शब्दार्थ की पौटता, वस्तु-सगठन मे शुद्धि का समायोग आदि-जिसे वे 'सन्निवेश प्राणस्त्यम्' कहते है- का निर्वाह वे आवश्यक समझते है।१ पश्चिम मे अरस्तू ने व्ासद के वस्तु-संगठन में घटनाओ की आवजनिक अन्विति; 'औचित्य' गुण से युक्त पात्रो की निर्मिनि, काव्य-रूप के अनुसार अुकल वर्ण एवं छंद-योजनाई, तथा विषय की गरिमा के अनुरुप गरिभापर्ण गैली के प्रगंग को अनिवार्य माना है। अलकार्य के अनुरूप अलंकार प्रयोग तथा विशेष्य के अन्सार विशेषणों के प्रयोग पर भी अरस्तू ने सम्यक विमर्श किया है। १ प० बटुकनाथ शर्मा : नाटय शास्त्र, प० १४, श्लोक ६स २ वही, अ० २३, श्लोक ६६ 5. वही, अ्० २१, श्लोक ८टी ४ वही प्र० २३, म्लोक दद वही, अ० ३३, श्लोक १ 6 Dr. V. Raghavan Some Concepts of The Alamkar Shastra, p. 205 7 Anstotle : poetics, Everyman's Library, p. 61-62 & Atistotle's pocties : Humphry House, p 83 0 Aristotle, poetics : Every man's Library, p 45 10 Arntotle : Rhetorcs Book DI. Chap VII, p. 245 U Jbid, p. 232-33 12 I'nd, p. 246

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औौचन्न सद्वातिक विवचन

अरस्तू के बाद होरेस ने नाटक ने पाव, अभिनय, शैली, छंद-सम्बन्धी ओचित का विवेधन किया है। होरेम ने पत्र-निर्माण ने समति एवं प्रतीतिकरता नाटक-गुणो को रक्षा करने पर अषिक बल दिया। आचार्य भरत की भाँति वे भी नाटक में दूरय सन्य व वर्ज्य अंशो की व्यवस्था स्वीकार करते है तथा वध, मैथुन, दाहक्स आदि भभ, जुगुष्माप्ररक्ष दश्यों का रंगमन पर प्रवर्शन प्रतिषिद्ध मानते हैं। वे वानदी एव बानटी के लिए 'विपय-वस्तु' के वैभिन्य के कारण 'अलग-अलग छंदो की योजना' स्वकार करते हैं। शैली के प्रयोग ने कलात्मक अनुभूति की सुरक्षा वे आनश्यक मनकते है।5

उभयदेशीय इन चारी आचार्यों का ओचित्य-विषयक निनन नाट्य-केन्व्रित है। उन्होने काब्य के संदर्म में औनित्य की आवश्यकता व महना पर विशेष कुछ नही कहा। काव्य के रदर्न में औचित्य का प्रत्यक्ष, गहन, व्यवस्थित एव स्पष्ट तरिवेचन तो भग्त के बहुत बाद में आचार्य खट ने ही किया। हमाग विवेच्य विषय तो भरन पन्वर्नी काव्य-गास्तीय-चितन से काव्य को केन्द्रस्थ कर किए गए औचित्य-विमर्श में ही नन्चद् है, अन यह आवश्यक है कि भारतीय एवं पश्चिमी काव्यचिता मे अपने जिन अनेक रूपो मे औचित्य फुट पडा है, उस पर तत्वत विचार किया जाय। नाट्य- चिन्ता एवं नाट्य-विषयक औचित्य-चिन्ता को स्वल्प स्प्ग करके ही अनसर होना उपावेन है। काव्य-समीक्षा के अंत्र-विरतार के साथ-माथ आचार्यो की दृष्टि का प्रसार बहना गया। काव्य-विषयक औवित्य पर उभयदेशीय मनीषियों ने मुख्यत दो रूपो मे विचार किया है - प्रत्यक्ष और परोक्ष। प्रत्यक्ष विवेचन करने वाले आचार्यो ने ओनित्य की अवधारणा व स्वर्य को स्पष्ट करने हुए, उसके महत्त्व्र का प्रतिपादन कर दिना है तभा यधावसर उसके प्रमुख भेदोपसेवो का (सोदरण अथवा कही-कही मेवल आान्वीय या सैद्धान्तिक) निरूपण व व्यास्यान कर दिया है। संस्कृत के अचार्यो मे स्वर, आनन्दवर्द्धन एवं क्षेमेन्द्र ने औचित्य का प्रत्यक्ष विवेचन किया है। परीक्ष विवेचन दरने वालो ने 'ओचित्य' बब्द का सीधा प्रयोग न कर, उसको गुण, अलकार या अन्य काव्याग के रूप मे ग्रहण तथा विवेचित किया है। भामह, दण्डी, लोल्लड, उद्भट, नम्मट, हेमचन्द्र, विश्वनाय, जगन्नाथादि आचार्यो का विवेचन प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष माना जाता है। परोक्ष विवेचन करा बहुत कुछ रूप गुण-दोष विवेचन (चाहे गद्द-दोप, अलकार-वोप, गस-दोप के रूप में ही क्यों न हो) के रूप में, दोषों की नित्यानित्व व्यनस्था के रूप मे, विशिष्ट गुण के विवेचन के रूप मे, औचित्य की अलकार-रूप में 1. Allen Gilbert . Literary Criticism, Plato to Dryden, p. 132 2 Ibid, p. 134 3 Ibid p 131 4 Ibid, p. 129

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औचिय सदातिक निवचन

(गब्दालकार एवं अर्थालकार के रूप मे) व्याख्या करने के अर्थ मे ही उपलब्ध द्वाा ह। पश्चिम में शैली-विवेचन के प्रसग मे ही औचित्य पर विचार हुआ है। बहा न भी नैनिक धरातल पर औचिन्य का काव्य-मीमासा के सदर्भ ने स्वतन्त्र विचार हआ है और गैली के अगभूत तत्त्व (जिमने वर्ण-योजना से लेकर प्रबन्ध-काव्य की योजना नर का सथा छदादि की योजना का अतभव हो जाता है। के रूप मे विवार हुआ है। प्रत्यक्ष एव परोक्ष रूप मे औचित्य-निरूपण की र्चा उठते ही स्वभावन हमारा धान उन तम्वों की ओर आकृष्ट हो जाना है, जिनको लेकर विवेचन अग्रसर हुआहै। इन नत्वो वो आधार बनाकर भी औचित्स की चर्चा न्याय-सगत कही जा सकती ह। अर्थत औचित्य-विवेचन का एक अन्य मुख्य रूप है-नत्व-क्राम से उस पर निन्वार रना। इन पद्धति को अपनाकर ऐतिहासिक क्रम से किए जाने वाले विवेचन मे सर्बन अनावण्यक विस्तार से बचा जा सकता है और साथ ही प्रत्यक्षपपरोक्ष विवेचन मे जो पुननवुनि होने की सभावना है, उससे भी बचा जा सकता है। पूर्व और पविचिन के आचार्यो द्वारा विवेचिन 'औचित्य' प्रायः इन रूपो मे उफलब्ध होता है- (१) विषय, वकना, भाषा, शैली, गुण-दोप, छद, अलंकार, काव्य-रूप, रम एव प्रबध-सम्बन्धी औचित्य। (२) संगति-सिद्धान्त (आवयविक संगति व तार्किक संगति): अर्थ-निणय की एक कमोटी के रूप मे, मौन्दर्यशास्त्रीय विवेचन (सम्मात्ना, अनुगुणता आदि) के रूप मे, सामजस्य स्थापक सिद्धान्त के रूप में; प्राप्त औचित्य विवेचन। द्वितीय विभाग के अन्तर्गत 'उल्लिखित विषयो' पर 'स्वरूप-जिज्ञासा' - गीर्पक के अनर्गत विचार किया जा चुका है, अत. यहाँ प्रथम वर्ग मे-परिगणित तत्वो के आधार पर आचार्यों की शतित्य-चिन्ता का सिंहावलोकन कर लेना प्रसग-प्राप्त होगा। विषयगत औचित्य 'विषय' काव्य-सजेना व समीक्षा में अत्यन्त अनिवार्य तत्व है। उसके अनाव मे सर्जनात्मक कृति का अस्नित्व ही असम्भव है। वह नहीं होगा तो अभिव्यक्ति किसे प्रकट करेगी ? उसका समग्र कौशल व्यर्थ होगा। उसी प्रकार उसके औचित्य के अभाव मे रसास्बाद पर प्रत्यक्ष गहन व मौलिक आघात पड़ेगा। अनुचित विषय न कभी सुन्दर बन पाता है न आस्वाद्य ही। 'विषय' से काव्य के प्रसंग मे काव्य-वस्तु और नाटक के प्रसग में कथा-वस्तु को ग्रहण करना चाहिए। पूर्व मे आचार्य स्त्रट ने एवं पश्चिम में अरस्तू एवं ड्रायडन ने स्फुट (नक्न) रूप मे विषय के औचित्य पर विचार किया है। आचार्य रुद्रट ने काव्य के सदर्न म काव्यार्थ (विषय-वस्तु) के अनुरूप किया, पद एवं अन्य कुछ सामग्री के प्रयोग पर बल दिया है। केवल वक्ता का औचित्य रक्षित हो, ऐसी बात नहीं। विषय का भी अप्ना महत्त्व है और तदनुरूष सारी सामग्री की विनियोजना होनी चाहिए।9 १ माचार्य स्दट काम्पालकार भ०६ फ्लोक २४-२६

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ओचिय मद्धातिक विवचन

अर्स्तू ने वामद के कथा-वस्तु के औचित्य व मगठन पर बल दिया है मभाव्यता और सुमगठन के विनियोग मे ही औचित्य का निर्वाह हो पाता है। रचयिता को चाहिए कि वह अपनी रचना के अनुरूप वस्तु का चयन करे और उसमे अनम्भव पनीत होने वाले अंत छोड दे। प्राचीन इनिहासादि में से उपलब्ध प्रभूद सानग्री म मे विवेकपूर्ण रीनि सें केवल उनना ही अंश चुने, जो उसकी रचना के लिए अनुकूल हो नथा दर्शको की स्मग्ण-परिधि मे समाविष्ट हो सके। वास्दी के निर्माण मे प्रमग एवं घटनाओ का विनियोग अपेक्षित प्रभाव को लक्ष मे रखकर ही किया जाय ।3 घट- ताओं की अन्विति, चयिन घटना की मत्य-प्रनीति,गौण व मुख्य तत्वो का सामंजम्य, सुगउित प्रमंग-योजना8तब समग्र प्रभावापेक्षी रचनानत् पर उन्होंने बल दिया हे। घटनाओं की काकनालीय योजना वे स्वीकार नही करते।5 होरेस ने अपने ग्रन्थ का प्रारम्भ ह्ी विपय-वस्तु के अनुचित-निवन्धन के हाम्या- सपद परिणाम की दर्चा मे किया है। 'घोडे की गरदन पर' मनुष्य का सिर और उसके अधोभाग मे मछली का शरीर अकित करना, विपय-वस्तु के औचित्व का अभाव ही मना जाएगा, जो हास्यास्पद होगा।5 अन्य नाट्य-तत्त्वो की औचित्यपूर्ण बोजना पर भी वे बल देते है। ड्रायडन ने नाटक की कथावस्तु का विवेचन करते हुए कहा है कि नाटक की कथा-दस्तु न तो अत्यन्त गनिशील हो और न ही अत्यन्त मन्दगामी। इन विषय मे वे मध्यम मार्ग का अनुमरण करने का निर्देश देते है। अभिनयादि अन्य नाट्यागो के औचित्य की चर्चा पर भी उन्होने बल दिया है।१० काव्य एव नाटक मे वस्तु के औचित्य की रक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अनुचिन काव्य-वस्तु या नाट्य-वस्तु मुन्दर नही हो सकती, अन हृदयग्राह्म भी नहीं हो सकती। वक्त-औचित्य

विषय के औचिन्य के नाथ ही वक्ता के औचित्य का विचार भी आचार्यों ने कर लिया है। पश्चिम मे व्यग्यनाटककार एरिस्टोफेनीज ने अरस्तू के भी पूर्व विषय- वस्नु एवं वक्ता के अनुरूप वाणी-व्यवहार का विवेचन कर इसका सूत्रपात किया था। यदि वक्ता एवं विषय गम्भीरता एवं गरिमायुक्न है तो भाषा भी गरिमायुक्त एव

1 Aristotle, Poetics : Everyman's Library, p. 30 2. S H. Butcher . Aristotle's Theory of Poetry and Fine Acts, p. 89 3-5. Aristotle, Poetics . Everyman's Library, pp. 24, 61, 62 6-7 S H. Butcher : Aristotle's-Theory of Poetry and Fine Arts. pp. 31.35,39 8 Ibid, p. 31, 35, 39 9 Allen Gilbert : Literary Criticism; Plato to Dryden, p 128 * 10 Ibid, p. 634

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४० औचित्य सैद्धातिक विवेच

गम्भोर होनी चाहिए। 'फ़रान्स' (Frogs) नामक अपने नाटक मे दो पातो के सम्भापण के माध्यम मे उन्होंने यह सारी चर्चा उठायी है।१ भारत मे आचार्य भग्त ने नाटक मे पावों की प्रकृति एव नील-औचित्य- विवेचन के प्रग में वक्ता-विपयक औचित्य का प्रथम स्पर्श किया है। काव्य-गमीक्षा मे वक्ता के औचित्य पर प्रथम विचार आचार्य रुबन ने किया है। रुद्रद ने उनम, मध्यम एव अधम-तीन प्रकार के वक्ता माने है। इन वक्ताओ के सम्भाषण में पन्म्पर-सबोधन के औचित्य का निर्वाह किया जाना चाहिए। वक्ता-सम्वन्धी औनित् का भग वक्त-विपयक अनौचित्व नाना जाएगा। उत्तम पावो का मध्यम एत अश्म पातो से, अ्धम पात्रो का उत्तम एवं मध्यम पात्रो से तथा मध्यम पातो का अधम एन उन्तम पातो से सम्भाण योजित करते समय औचिन्य का ध्यान बराबर रा जाय।२ मुनि के लिए 'भवन् भगवन्' सबोधन, राजा के लिए 'ईश, परममट्टारक' आदि सबोधन ही प्रयोज्य है।3 आधुनिक काव्य एव नाटकादि मे पात्रों की ये श्रेणियाँ जाति-गन न होकर वर्ग-गन है, जहाँ नौकर सेठ से बात करते समय कैसे व्यवहार करेगा, यह निर्दिष्ट किया जाता है। साहित्य मे जहां कही भी पात्र-योजना तथा उनके सम्भापण की योजना होती है, वहॉ वक्तृ-औचित्य का स्वन विचार उपस्थित हो जाता है। भाषा-औचित्य काव्य के अभिव्यक्ति-पक्ष से सम्वद्ध इस 'भाषा' की लघुत्म इकाई है 'वर्ण' और महत्तम इकाई है 'वाक्य'। इसके बीच 'पद' की स्थिति है। 'भापा' शीर्षक के अन्नर्गत वर्ण, पद, वाक्य-योजना, काल, लिग, वचन, कारक, विशेषण, क्रिया, उप- सर्ग, निपात, सर्वनाम आदि का तथा कुछ अशो में पद-रचना, रूप, रीति और उसकी आत्मा के रूप मे प्रतिष्ठित गुणो का समावेश भी किया जा सकता है। कैली को भी उसी मे अन्तर्भुक्त किया जा सकता है। किन्तु ऐसा करना 'भाषा' शब्द की व्याप्ति को अधिक विस्तृत करना होगा। काव्यशास्त्र में रीति और शुग को भाषा से स्वतन्त्र महन्व प्राप्त है तथा इसीलिए उसे अलग से विवेचिन भी किया गना है। पब्चिम मे भाषा-रौली साथ चलते हुए भी अनम-अलग तत्वो के रूप मे वरिवेचित होते रहे है। 1. Oh Let us at least use the Language of man' 'FROGS'-Tran Gilbert Murray, p 79 'When the subject is great and the Sentiment, f then of necessity great grows the word. 'Frogs' Tran, Gilbert Murray, p. 79 .. यदनुचित यत्र पद तत्तत्रंोषजायते ग्राम्यम् । *तद्यक्तृ वस्तु विषय विभिद्यमानं द्विघाभवति ॥१७॥६ -काव्यालकार ३. तस्न भवन्भगवन्निति नैवार्हत्युत्तमोऽपि राजानाम् ! वक्तु' नापि कथचिन्मुनिमपि परमेश्वरेशेति ॥२०॥६ --- काव्यालकार

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अचय सैद्धातिक विवचन ४१

भाग' से यहाँ यही बोध्य होता है कि बर्ण से वाक्य तक अपनी व्याग्ति गखने वाला न नोंग जिसे कवि या नाटस्कार अपने-अपने काव्यार्थ की अभिव्यजना के लिए व्यव- हार मे लाता है, 'भापा' है। काव्य एव नाटक दोनों के सन्दर्भ मे भापा-प्रयोग के औचित दर उभयदेशीय विद्वानों ने पर्याप्त विचवार किया है। पश्च्म मे एरिस्टोफेनीज (जिसका विवरण आगे दिया जा चुका है), वर्ड- स्वभ, दाते, फिलिप मिडनी और बेन जानमन आदि ने 'भाषा-ओचित्य' पर विचार किया है। पूर्व मे राजणेखर, अवति सदरी और भोज ने प्रत्यक्षत तथा आनन्दवर्दन (पद- सपटना के प्रसग मे। कुन्तक (वर्ण-वक्रता आदि के प्रमग पे) आदि ने परीक्षतः भाषा के जौचित्यपूर्ण प्रयोग पर बन दिया है। लोजाइनस ने 'उन्हष्ड-भाषा' को उदात जैली का एक आवश्यक अंग मानकर ज्मका महत्त्व स्वीकार किया है।9 भाषा-नम्बन्धी उनके विचार मैली-विवेचन के प्रमग मे ही उत्थित विचार है। दाने ने भाषा-प्रयोग के औचित्य पर सीधे ही ध्यान दिया। उन्होंने परम्परागन, रू गास्त्रीय एव क्वनिन भापा के प्रयोग का विगेध कर उसके स्थान पर पादेशिक बोन्दो के माध्यम ने उदश एक सार्वजनीन एव आदर्भ सस्कृति की प्रतीक, निद्व त्समाज एव जन-माधारण द्वारा समानस्येण समादृत शिष्ह जन-भाला (जिसे वे 'इलस्टियस वर्ना- बनुलर' कहते है) को काव्य के लिए उनम मानकर उसका समर्थन किया है, परन्तु इमका यह अर्थ नहीं कि उन्होने भापा के उत्तम गुणो की अवहेन्दना कर पूर्णतया गॅवार भाषा के प्रयोग का समर्थन किया। उदात्त एवं गरिमामय विषय के अभाव मे गरिमा- मर व गम्भीर भाषानप्रयोग में काव्य उसी प्रकार कुरूप हो जाता है, जिम प्रकार कोई कुरय स्त्री अलकारो के विन्यान से जधिक कुरूप लगती है। दाते ने 'काव्य-भाषा' का रवरूप-सुनिश्चित करते हुए-उसमे व्यवहृत शब्दावली का तीन कोटियो मे वर्णीकरण किया है (१) बच्चो की तुनलाहट से पूर्ण शब्दावली, (२) स्त्नियोचित ुकुमारता वाडे शब्दो से समाविष्ट शब्दावली, तथा (३) नागर एवं ग्राम्य शन्द सन्निविष्ट शब्दा- बली। नागर शब्दो मे कुछ ममृण, चिक्कण आदि शब्दो का समावेग होता है। उत्तम कैली के लिए मसृण एन प्रकुत शब्द साधक है। इस प्रकार दाते ने परिप्कृत लोक- भाषा अर्थात् 'Hightened speech' को ही उचित समझा। दाते के दृष्टिकोण से आदर्ग काव्य-भाषा एक ऐसा सबल एव सुद्ढ अस्त्र था, जिसके उचित प्रयोग के बिना उच्च-उदात्त साहित्य निर्मित हो ही नही सकता। दाने द्वारा परिकल्पित काव्य-भापा एक नरफ तो मातृभाषा में दूर नही रहना चाहनी तो दूसरी ओर कवि के प्रकृत भावी

1 A O. Prickard On the subhme, p 13 2. 'It must be the language .. an illustrious Vernacular'. -- Scott James : The Making of Literature, p 104 ३ डॉ० नगेन्द्र : हिन्दी वकोकिति जीवितम्, प० २२३

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४ै औचिय सद्वातिक विवचन

का स्वतन्त्र अभिव्यक्ति में सर्वोधिक सहायक सिद्ध होना नाहती है। दाते ने सास्द्रीव आधार पर जन-भाषा का संस्कर कर उसे 'काव्य-भरपा' के रूप मे स्वीकार्य बनाया। नर्वद उन्होंने इसके प्रयोग के औचित्य पर बल दिया। फिलिप सिडनी भी प्राचीन परम्परावादो एव आवर्शबादी (सौप्ठबनादी) रपी- क्षक थे। दात की भाँति ही से भी गम्भीर भापा का काव्य से प्रयोग करना स्वीकार करने है। उन्होने काव्य के लिए विपयानुरूप, समुच्चित-गारवयुक्त, गम्भीर भागा की उपादेयता का समर्थन किया। विषय-गाम्भीरय एव भाव-गम्भीये के अनुरूप गन्नीर भाण का प्रयोग ही उन्होने उचित ममझा है। वे मानते है कि भापा का प्रयोग करते समय (विशेषत सौखिक) प्रत्येक वर्ण के अर्थ-गारव और उसके 'परिणाम पर विचार' करना जाहिए। उसके प्रयोग मे सगति, सामंजन्य, अर्थगरिना वर्गरह गुणो की म्निनि होनी चाहिए। भाषण -शक्ति का औचित्यपूर्ण प्रयोग ही उन्ने इाट हे।3 दाले के पद चिह्न पर चलकर वर्ड स्वर्थ ने भी कृत्निम, परस्परा निष्ठित व आडम्बरपूर्ण भापा के स्थान पर सहज स्वाभाविक और बोल-चाल की भाषा के प्रयोग का समर्थन किया है परन्तु प्रावेशिक जन-भाषा के सहारे नवीन काव्य-भपा के निर्माण का वे समर्थन क्ने प्रतीत नहीं होते है। वे सथासभव जन-साधारण द्वारा वस्तुन व्यवहत, निराडम्बरडणँ, अभिव्यक्ति मे सरल एवं सशक्त, सामाजिक दम्भ से अपेक्षाकृत अस्पृष्ट साषा का प्रयोग करना ही इष्ट मानते हैं। उनके द्वारा परिकल्मित यह भाषा-रूप पूर्व के कवियो द्वारा प्राय प्रयुक्त जन-मामान्य भाषा-रूप की अपेक्षा अधिक स्थायी और दार्शनिक है, उन. प्रयोज्य भी।* एलेनजेण्डर पोप ने वर्ण-प्रयोग के औचित्य पर विगेय बन् दिया है। रनवं भाव अथवा वर्ण्य-वस्तु के स्वरूप, स्थिति आदि के अनुरूप वर्णन करने में अपना नर्वा- धिक योगदान देन वाले वर्गों की योजना ही उन्हें स्वीकार्य है। काव्य में ध्वननलीन्दर एवं रवानुसारी पद-प्रयोगो द्वारा शाव्य-दृश्य बिम्ब-योजना करने मे समर्थ भापा-नमा- योग के वे पक्षपाती हैं। उनकी दृष्टि मे प्रभजन के चलने का और मद-मंद पवन के बहने का वर्णन रवानुर्प उत्विन पकावली मे ही होना स्पष्ट इप्ट है।2मौदर्य के दसंग में नी वे समग्रता के पक्षपाती है। वेन जानसन वाव्य एवं भाषण मे भाव-प्रधान, गरिमायुक्त, औचित्यपूर्ण, मवेग- शील शब्दो से सम्पन्न भाषा के प्रयोग को समुचित समझते हैं। प्रयुक्त शब्द रचना-भाब के अनुरूम, उपयुक्त, अलंकृत, भव्य, उदात्त, अभिव्यक्ति मे समर्थ हो, ऐसा उनका अनुरोध

  1. Abercrombie · Principles of Literary Criticism, p 143-144 2. Dorothy Macardle (Ed.) : Defence of Poesy, p 10 3. Ibid, p. 30 4. H Littledale : Lyrical Ballads, p. 226-27 5. Edmund Jones English Critical Essays p 717

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औचिय सज्जातिक विनचन

है। अत. दे काव्यामिव्यक्ति में अश्लील, निर्बन, उलझे, अस्पष्ट, अनुचित, स्वैण त्र जुगु्साव र शब्दों को पविष्ट होने नही देता चहते। उनम अभिव्यक्ति गहणीय इन जानी है।१ इस प्रकार पश्चिम में काव्य-वस्नु को केन्द्र सें रखवर उमके अनुरूप वर्ग-प्रयोष मन्द-प्रयोग और भापानप्योग पर पर्याप्त विमर्न हुआ है। अधिकाश विद्धानों ने भब्छ, उदाल एत्र गरिमापुर्ण साणपपरोग का समर्थन किया है। बर्ड स्वर्थ प्रभृति ने जन- भापा के किसी एक रूप को अपनाने की तथा दानें ने एक अन्य रूप को स्वीकार कग्ने की द्ात कही है। मिमी ने अनियंत्रित, याबृछिक प्रयोग का समर्थन नहीं किया। स्वच्छन्दतावादियों का रुझान भी भव्य, अलकृत व उदास भापा के गति रहा है। पूर्व में आनन्दवर्द्धन ने 'रसानुर्य वर्ण-योजना' का नमर्थन किया तथा ओज, प्रसाद, माधुरयादि गुणो की व्यजक वर्ग योजना पर विशेष बिचार किया।2राजगेम्वर और अवंति सुन्दरी ने भाषा के बृहत्तर जंग 'वाक्य' के प्रयोग मे विवेक को आवन्य कता पर बल दिया है। उन्होने उचित वाक्य-प्रयोग की बाक्य-पाक सज्ञा दी है- गुणालंकाररीत्युक्ति शब्दार्थग्रथनकमः । स्वदने सुधिया मेन वाक्म पाक स मा प्रति ।।3 'पद वाक्य विवेक' संजक छठे अध्याय में राजशेखर ने पद एवं वाक्य के औचित्य- पूर्ण प्रयोग पर विस्तार से त्रिवेचन किया है। भोज ने यथाचित भाषा-प्रयोग का 'जाति' से अन्तर्भाव कर लिया है। भोज का 'जाति' अलकार पावानुरूप भाषा की ही अपर सज्ना है। दोनोंपूर्व और पश्चिम के आचार्यो ने वर्ण्य के अनुरप भाषा-प्रयोग के विचार का अपने-अपने ढग से समर्थन किया है। शैलीगत औदित्य इस उपशीर्षक के अत्तर्गत उस समस्त औचित्य-विषयक चिता को समािष्ट किया जा सकता है, जो पश्चिम में 'ैली'-विवेचन के रूप में उपलब्ध है और पुर्त्र मे पद-रचता, वाक्य-रचना (अर्थात् मघटना) रूप 'गीनि', 'वृनिि', 'प्रवृत्ति' आदि विषयक विवचन के रूप मे विद्यमान है। यद्यषि 'तत्वत. गैली, रीति, वृति, प्रवृत्ति परस्पर्-भिन्न इनका यह भेद सथास्थान द्वितीय अध्याय मे निरसित किया जायगा) हैं किन्तु चिळे- चन व वर्गीकरण की सुविधा के कारण व्यतहारत उनकी एक-स्थानीय समीक्षा कर लेना समीचीन ही होगा। पश्चिम मे 'शैली' तत्व मे व्यक्तितत्व्र अनिवार्यन सरिन समझा गया है। इस दृष्टि से पश्चिमी शैली और भारतीय रीर्ति में व्यक्तिनिष्ठा की मावा को लेकर भेद स्पष्ट है। रीति 'वस्तुनिष्ठ' अधिक है और कैली व्यक्निनिष्ट। गैली के औनित्य के प्रसग मे प्रथम उल्लेस्न नान हे लोजाइनन का, अपने

  1. Ibid, p. 94-95 २. डॉ० रामसागर त्रिपाठी ध्वन्यालोक (उत्तरार्द्ध), पृ०६६७ ३. डॉ० गगासागर राथ : हिन्दी काव्य मीमासा, पृ०५२

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४6 ओचित्य सव्जातिक विवचन

प्रत्न 'आन द सब्लाइम' में उन्होने उदात्त शैली का सागोपाग विवेचन प्रस्तुन किया है। अभिव्यक्ति की विशिष्टता ओर उत्कृ्टता को ही वे ओदात्म कहते है।१ यह अ क्रात्य ही कवियो के अनर यग का परम रहस्प है। उदात शैली के इन पाँच तत्वो ने से-(१) महान् धारणाओ की क्षमता, (२) उद्दाम और प्ररणा प्सुत आवेग, (३) सनुचित अलकार-योजना, (४) उत्कृष्ट भापा, (५) गरिभामम एव ऊर्जस्वित्-रचना- विनान-प्रथम दो का नम्बन्ध आत्मा की गरिमा से (अर्थात् भावपक्ष मे) है और शेष तीन का सम्बन्ध कला-पक्ष ते है। वे केवल भव्य आवेग जिसमे आत्मा का उन्नयन ह्" --. को ही ग्राह् मानते है। समुचित अलकार-योजना :- उनका तात्पर्य 'उदात्त' के पंपक अलकागे के दचित प्रयोग मे है। जलंकार की सहज व अयत्नज योजना ही उन्द म्यीकार्य हे।3 उत्कप्ट भापा मे उनका तात्पर्य है, विचार की गरिमा के अनुरूप भन, मृद्डु, सुन्दर, ओजस्वी, गरि्मिायुक्त, शक्ति एव श्रेष्ठ गुण-सम्पन्न भाषा-प्रयोग।" पन्न्नु गरिमासयी नारा का प्रयोग भी सर्वेत्र न होकर अवसरोचित ही होना चाहिए। गईिामय व ऊर्जित रचना विधान' वे वहाँ मानते है, जहॉँ शब्द और अर्थ के बीच स-17, सामजन्य, समभाव, सगतिपूर्ण अवस्थिति (जिस प्रकार शरीर के सभी अग परम्पर मुस्थित है, उसी प्रकार काव्य के अगो मे सगतिपूर्ण स्थिति का होना) आदि पाना जाता है।2 वागाडम्बर, वालेयता, गब्दाडम्वर और भावाडम्बर-मे गैली के विरोधी तत्त्व हें, जिनमे कुछ नित्य-विरोधी (नित्य-दोप है) कुछ अनित्य-विरोधी अर्थात् परिहान (अनित्य-दोप) है। अनित्यविरोधी परिहार्य है और कभी-कभी अपना विरोध छोडकर उक्ति की उदात्तता में वृद्धि कर देते है।६ उदान-शैली म्वय कोई साध्य नही, साधन मात्र है, अत भाव या विचार- सवेग को छोडकर अधवा उनके अनुकूल होकर वह अपना कोई महत्त्व नही रखती। भाव के औचित्य का अकुग उस पर लगा हुआ है।" मैथ्यू आर्नल्ड ने काव्य के तीन तथ्यो पर बल दिया -- विपय निर्वाचन, यथा- तच्य वस्तु-विधान और अभिव्यंजना अथवा कैली की विषयाधीनता-जिनमे विषय- निर्वाचन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बताया गया है तथा शैली को विषय की अनुवर्तिनी कहा गयग है। वे उदात्त शैली के समर्थक थे, परत्तु आवच्यकता से कभी अधिक महत्व देन

1 A. O. Prickard . On the Sublime, p 2 2 Tbid, p 11-12 *3 Ibid, p 41 4 lbid, p. 56 5 -Ibid, P. 72 6 Ibid, p. 6-8 ड. नबन्द काव्प में उवाघ् सर्च (भूमिका) पृ० २३

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ओचित्य सन्वातिव विवचन ४ ५

के पक्ष मे नही थे। शैली सवथा विषयाधीन है। जिस प्रकार भाग्नीय रसवादिग ने रीति को स्वतन्त्र महत्व न देकर उसे रसानुर्वातनी माना है, उसी प्रकार वे भी रीति अर्थात् शैली को विपयानुसारिणी मानते हैं। वे विषय के गौरव को किचिन्मान भी विजन होने देने के पक्ष मे नही है। वोल्टर पेटर ने न तो एकान्तत 'विपय-वस्तु' को ही महत्त्वपूर्ण माना है और न शैली को। शैली और विषय-वस्तु के अनिवार्य सहभाव को ही 'साहित्य' मानते हुए वे कला की महानता को न केवल रूपाधित मानते है, न केवल तन्व-निष्ठ ही। उभय-निष्ठ होने के कारण दोनों में औचित्यपूर्ण स्थिति व मामज्म्य अनिवार्य है।"अर्थ क नाथ श्वद का तादात्म्य ही गैली का औचित्य है। घेटर द्वारा निरूपित गेली के दो पक्ष वुद्ि (मस्तिष्क) और आत्मा-भारतीय गीति एव धवनि-विचार सें बहुत-कुछ मेल खाते है। स्कॉट जम्म ने वोन्टर पेटर के बैली सस्भी विचारो की समीक्षा करने हुछ ठैली-सम्बन्धी औचित्य के निर्वाह पर सर्वाधिक बल दिया है,। उनके विचार से झौली केवल बाह्य नत्त्व ही नही है, कि तु एक महत्त्वपूर्ण अन्तरग तत्त्व भी है और ग्चयिता के व्यक्तित्व से उसका अभिन्न सम्बन्ध है। उत्तम कैली वही है, जिसमे भावानुकूल भापा, विचार के सवथा अनुश्य वाणी, अनुभूति की सथार्थ अभिव्यक्नि के लिए सक्षम ओर उचित शव्दावली का प्रयोग करने में प्रयोक्ता सफल हो मका हो। वे ही शब्द चने जाए, जो विचारो की अभिव्यक्नि करने में सबधा समर्थ हो, सक्षम हो, सुमगन हा एव औचित्यपुर्ण हो।5 वे विचागे की अस्पष्टता की स्थिति मे भापा की स्पप्टता सभव नही मानते; विचार या भाव की स्पप्टता के अभाव में वाणी या अलकरण का चा्क- चिक्य व्यर्थ मानने है।5 कृति की सर्वाग मुन्दरता के लिए वे अग-उपागो की आनमदिक अन्विति (Organtc Unity) को अत्यन्न अनिवार्य मानते है। सामजस्य सुक्लिप्टता के अभाव मे कुनि सुन्दर और पूर्ण नहीं हो सकती।* इम प्रकार पश्चिमी आचार्यो ने शैली-सम्बन्धी आचित्य नथा आवयवक-मर्गन (Oreanre Unity) पर विशेप बल दिया प्रतीत होता है। भारतीय काव्य-शास्तर मे 'ॉली' के समानार्थी गव्द के रूप में - रीनि, वृति ऊर प्रवृत्ति (यद्यपि ये तीनो परस्पर भिन्नार्थी भी है) प्रयुक्त किये जाते है। राजघेखवन ते तीनो का पन्स्पर भेद इस प्रकार स्पष्ट किया है- तत्र वेग विन्यामकमः प्रवृत्ति, विलास विन्यासकमो वृति वचन विन्यामनसा रीति ।क

१. डॉ० नगन्द्र •हिन्दी काव्यालकार सूक्ष (भूमिका), पृ० १३२ २ वही, पृ० १३३ 3. Scott James : Making of Literature, p 303 4. Ibid. p. 304 5. Ibid, p. 305 ६. डॉ० गगासागर राय हिन्दी काव्य-मीमासा, पृ० २५

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४६ ओचिय सन्धातिक विवचन

प्रवृत्ति का सम्बन्ध वेश-विन्यास से, वृति का सम्बन्ध विलास-विन्यास से तथा रीनि का सम्बन्ध वचन-विन्यास से है। प्रवृत्तियों एवं बृत्तियाँ मूलत नाटक से आर रीतियाँ काव्य ने सम्बद्ध है। प्रवृत्ति-वृत्ति आदि के औचित्य का विवेचन भरत ने नाटक के प्रसग मे कर दिया है। आगे चकर आचार्य सु्व्रट ने रीति एव बृनियो के औनित्य ना विवेचन किया है। रीति से उन्होने पद-सघटना का अर्थ लिया प्रीन होता है। अन. सघटना के औचित्य की आवध्यकता पर बल ढेते हुए व मानते है कि सघटना अर्थ का सहजोदुघाटन करने वाली होनी चाहिए न कि अधिक उलझाने बाली- किमिति न पव्यसि कोप पादगन बहुगुण गृहाणैनम्। ननु मुच हृदयनाथ कंठे मनम्नमोरूपम्।।' यह पद-सघटना अर्थ को उनजाने वाली है। उसका यथार्थ-कम इम प्रकार होना चाहिए- 'पादगत हृदयनाथ उहुगुण प्रिय न पव्यमि कि ननु भनम्तमोरुपम् कोप मुच ए च शियकण्ठे गृहाण ।' वृत्तियो के विवेचन के प्रसग में सवया मौलिक अभिनिवेश कर बे पॉच प्रकार की वृनियॉ-मधुरा, मौडा, सम्पा ललिता एवं भद्रा-स्वीकार करते है। इन पाँचा दृत्तियों को प्रयत्नपूर्वक अविगत करके उनका सम्यक व उचित गीति से नानिबहल नान्यल्य प्रयोग किया जाना चाहिए। इनके प्रयोग मे कवियो को सदैव ग्रहण-त्याग' का विधेक रखना आवव्यक है।2 इमी को आनददवर्द्न ने अपने ध्वन्यालोक के द्वितीय उद्योत म अलकार-प्रसग में 'काले च पहणत्यागौ' कहा है।3 रुद्रट के बाद आचार्न आनन्दवर्द्धन ने पदन्लघटना-रूप रीति के औचित्य का विस्नृत विवेचन किया है। वामन ने पद-रचना के लिए 'रीनि' पद का प्रयोग किया है। और आनन्डवर्द्धन ने उसके लिए 'पद सघटना' पद का प्रयोग किया है। आनन्दवर्दधन ने असमासा, मध्यसमामा एव दीर्घसमामा-तीन प्रकार की पद-सघटनाएँ स्वीकार की है उन्होंने उन्हें गुणाशिद मानकर रस को प्रकट करने दाली कहा है।2 अलग- अलग रसों में रमानुकूल व उचित पद-सघटना का प्रयोग वे इप्ट मानते है। रेफयुक्त. ग, प और ढकार का प्रयोग बीभत्म एवं रौद्र रस मे साधक एवं शृगार रस में वाबक होता है। दुव्य काव्य में दीर्घसमासा रचना बाधक है, अत अप्रयोज्य है। करुण एव विप्रलम्भ शृगार में दीर्घममासा सघटना बाधक है, किन्तु वीर एवं गैद्रादि रसी

१. बटुकनाथ शर्भा नाट्यशास्त्, प्० ३३, श्लो० मद २ एना: प्रयत्नादधिगम्य सम्यगीचित्यमालोच्छ तथार्थसस्थम्। मिश्रा कबीन्द्ररघनाल्प दीर्घा कार्याः मुसुश्चवगुहीत मुक्ता॥ ra ३. डॉ० रामसागर तिपाठी : 5वन्यालोक (पूर्वादधै), ५०४र६ -काव्यालकार: रट, ग्र० २१२

४ बहो, प० ७१७ ५.० यही, पृ० ७१० ६ वही, पृ० ६६७

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औचिय सद्ानिक विवचन ४७

म बही बडी सावक सिद्ध होती है। करुण एव विप्रलम्भ शृगार मे असमासा संघटना ही त्रयोज्य है।1 इस प्रकार भारतीय आचार्यों मे रुद्रट एवं आनन्दवर्दन ने रीति एव सघटना वे ओचित्य का विवेचन किया है। उनका यह विवेचन रीति या सघटना की वस्तु- निष्ठना को लेकर ही हुआ है। पण्चिम के ैली-विवेचन की भाँति उसे अन्तरग तत्व मनकर उस पर विचार नहीं किया गया। इन आचार्यो ने रस को केन्द्र मानकर इन रीति-सघटनादि का तन्नुवर्तन ही प्रतिपादित किया है। गुण-दोष-विवेचन के रूप में औचित्य-विचार गुणो को लेकर औचित्य का विवेचन भारतीय काव्य-शास्त्र मे स्वतन्त्र रूप से इम प्रकार हुआ है : १. 'औचित्य' गुण का एक पर्याय माना गया है तथा उसे सामान्य गुण माना गया है। २. 'औचित्य' को एक विशिष्ट गुण के रूप में ग्रहण किया गया है। ३. अनौचित्य को एक सामान्य-दोष अथवा दोप का पर्याय माना गमा हे तथा काव्य मे सब प्रकार के अवरोध का मूल माना गया है। ४ अनौचित्य-औचित्य का निर्णय गुण-दोपों की नित्य-अनित्य-व्यवस्था पर आधृत मानकर किया गया है। ऊपर के 'विचार-बिन्दुओ के प्रकाग' मे भारतीय आचार्यों के दो वर्ग मान जा सनत है। प्रथम वर्ग मे वे आचार्य आते है, जो औचित्य को गुण का पर्याय तथा अनौ- चित्य को दोष का पर्याय मानकर चलते है (यद्यपि उन्होंने इस प्रकार का स्पप्ट कथन कही नही किया है, परन्तु इनके त्रिवेचन से स्वत ये निर्कर्ष प्रतिफलित होते है) और गुज-दोपो की नित्य-अनित्य व्यवस्था स्वीकार करते हुए सन्निवेश-कौशल या कवि- कोणल तथा आश्रय-सौदर्य के कारण दोपों का भी क्वचित् गुणत्व-ग्रहण करना स्वीकार रते है। आचार्य भामह, दण्डी, उद्भट, वामन इस वर्ग में स्थान पाते हैं। दूसरा वर्ग उन आचार्यो का है जो औचित्य को साहित्य या काव्य का विशिष्ट गुण मानने हु। आचार्य कुतक इस वर्ग में प्रमुख है। व्यक्ति विवेककार महिमभट्ट का ओचित्य-चिन्तन अधिकाशत. अनौचित्य-चिन्तन के रूप में उपलब्ध होता है। भामह ने दोष के दो मुख्य भेद किये है-नित्य-दोप एव अनित्य-दोष 1 नित्य- दोप अपरिहार्य है। अनित्य-दोष समय, स्थान, परिस्थिति एव प्रसंगवश दोपत्व छोड- कर गुणत्व ग्रहण कर लेने है। भामह के विचार से प्रयोगवैशिष्ट्य,2 उचित आश्यण,3

डॉ० रामसागर त्िषाठी हवन्यालोक-कारिका ६, पृ० ७२०-४९ भामह : काव्यालकार, प्र० १, श्लो० ५४ वही, प० १, शलो० ५५

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जोचिय सजातिक न्वदन

अवस्थाविशेप के कारण दाप भा गुणत्व प्राप्त कर लेता है। पदों का अनाधुत्व भी साधुत्व ग्रहण कर लेता है। किसी व्रिक्षुब्ध या भयभीत व्यक्ति की नकल करने मे कृन- लाना, हिविचाना, लड़सडाना आदि अपना दोषत्व छोड सुणत्व पा लेते है। उसी प्रकार भय, शोक, अमूया, विस्मय, हर्ष आदि के प्रदर्शन के अवसर पर पुनरक ा प्रयोग दोप नही माना जाता:र तात्पर्य यह है कि प्रयोग, परिस्थिति एव वातावग्ण वे आधार पर ही आचरण या प्रयोग-विशेष के औचित्य-जनचित्य का निर्णय किया जा गकता है। कोई भी गुण, नाव, शैली या रीति स्वत अपने-आपमे न तो मवथा नस की वाषक है न साधक ही। उन्होने दोपो की सख्या दग माती है। रीति के रस्ष-प्रतिकृल प्योग को नामह न 'अरीतिमन्' दोण माना है। उनी को रीति का अनौचित्य कहा जा सकता है। शृंगार रन के लिए गौडी गीनि अनुक है, परन्तु बीर, शौद्र, अद्भुत रतों के लिए वही जनुकल हूं। इसी प्रकार वर्गों के रस-विरोधी प्रयोग से वर्ण-विषयक अनौचित्य उपन्चिन हादा है। शरृगार रम के लिए नघोष, ऊष्म, कठोर वर्ण तनिक भी अनुकूल नहीं है। परन्तु वीर एव रौद्र रस के लिए वही वर्ण-योजना ओचित्यपूर्ण हे। एक स्थान पर भामह ने यह सकेत दिया है कि वर्याकरणसम्मत व कोय लब्ध हाने पर भी यदि कोई प्रयोग रूद न हुआ हो, तो उसे काव्य में प्रयुकत नही करना चाहिए यश्रा- 'कुज हृन्ति कृणोदरी मे हन् धातु का गत्यर्थक प्रयोग व्याकरण-नब्घ होने पर भी उचिल नही है। दण्डी का विवचन प्राय, भामह की परम्परा मे ही हुआ है। वे भी दोयों की नित्यानिन्य व्यवस्था स्वीकार करते हुए विशेष परिम्थिनियो में दीप का गुणत्व ग्रहण प्रतिपादित करते है। भामह के विचारों का बहुत कुछ समर्थन करते हुए उन्होंने अतिरिक्त विशेष बात समाधि-गुण की कही है। लोक-सीमा का गालन करने की तत्मरता तथा उसका निर्वाह करते हुए प्रस्तुत पर अप्रस्तुत का आरोप करना के 'समाधि' गुण का लक्षण मानते है।4 लोक-मीमानुवर्तन करने वाला यह 'समाध' गुण 'औचित्य का ही अर्थ ध्वनिन कारता है। अपन विवेचन के अन्त में वे कहते है कि कववि कौशल के पभाव से माने दोप (अनित्व) अपना व्रिरोध छोडकर गुणो की बीधियो में प्रविष्ट हो जाते है।* वामन का 'दोप-विवेचन' भी पर्वाचार्यो की परम्परा पर आधुन है। वामन ने पद, पवार्थ, वाक्य एव वाक्यार्थ-सम्बन्धी दोपों का विस्तृत एवं सोदाहरण विवेचन किया है।

भामह : काव्यालकार, अ० १, श्लो० ३५-३७, ४२-४४, ५७ २ वही, य० ४, श्लो० १३-१४ दही, प. ४, श्लो० १-२ ४. दण्डी काव्यादर्श, तृलीय परिच्छंद, पलो- १२६-३० २ वहो, प्रथम परिच्छेद, श्लो० ६३-१०० वही, तृतीय परिच्छेद, शलो० १०६

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औचिय सैद्वानिक विवचन

कुछ बलकार-दोषों की चर्चा करते हुए उन्होने वे सभी उदाहरण दिए है, जिनका विने- वन काव्य-शास्त्र में हो चूका है। भामह के साथ सहमत होते हुए उन्होंने कुछ प्रयोगो को निषिद्ध व कुछ को प्रयोज्य चनलाया है।१ (१) 'हन्' धातु का मत्यर्थक प्रयोग निपिद्ध है। (-) श्लोक के चरणान्त मे ही हल हो पहले नहीं। (३) पदान्त में लघु-गुरु की व्यवस्था हो। (४) पदारम्भ में 'सबु' का प्रयोग व्यर्थ है। • (५) बहुव्नीहि की भ्रांति करावे वैसा कर्मधारय एव कर्मधारय की भ्रानि करावे दैमा बहुब्रीहि अप्रयोगनीय है। (६) विशेष्य की प्रतीति कराने के लिए ही विशेतण का प्रयोग किया जाय। (19) अत्यन्त रुद्ध देश्य शब्द्रों को संस्कृत मे प्रयुक्त किया जा सकता है। (न) अति प्रचलित पदो को अनुक्न रवा जा सकता है। (६) अति प्रयुक्त लक्षणा का बारस्बार प्रयोग न किया जाय। (१०) स्तन, चक्षु आदि का नित्य द्विवचन मे प्रयोग करना चाहिए। (११) शिव-पार्वती के युग्म के लिए 'शिवौ', 'रुद्रो' का प्रयोग नही हो मकता। (१२) 'मार्ग' धामु का 'खोजने' के अर्थ में आत्मनेपड प्रयोग अनुचित है। (१३) अवर-बिम्ब ही उचित प्रयोग है बिम्बाधर नही। महिम भट्ट ने पॉच 'शब्द-दोषों' द्वारा अनौचित्य का विवेचन किया है। विधेया- विमर्श, प्रकम भेद, कम भेद, पुनरुक्ति एवं अधिक पदत्व-इन पाँच शब्द-ोपों की चर्चा उन्होने की है। अनौचित्य को वे काव्य का सर्वातिशायी दोष मानते हैं। अनो- चित्य के दो रूप उन्होने वर्चित किये है-अन्तरंग और बहिरंग। अन्तरंग का सम्बन्ध काव्य के आन्न्नत्व 'रस' मे है। वहिरग का सम्वन्ध 'रसंतर' बाह्य उपकरणों मे है। मुख्य भाव और रस के वीच सम्बन्ध के अभाव को ही वे अनौचितय' कहते है। औचित्म के बिना वे रस की स्यिति मानत हो नहीं। औपित्य : तुण सामात्य कुन्तक ने 'औचित्य' को एक सामान्य गुण के रूप मे ग्रहण किया है। कुन्तक के मत से काल्म का पाण तो निश्चय हो वकता है, परन्तु वक्रता का मूलावार है- औचित्य। कुन्तक ने काव्य के 'औचित्य और 'सौभाग्य' नामक दो गुण माने हैं। 'औनित्य' गण के अभाव में वे सहृदय के आह्वान की क्षति मानते है।3 यद्यपि कुत्नक ने 'औचित्य' को 'वकता' के पर्याय के रूप में प्रयुक्त नही किया

१ डॉ नगेन्द्र (सम्पा०). काध्यालंकार सूववृत्ति, द्वितीय अषिकरण, पु० ६७-११२, तृत्तीय अध्ि- करण, पृ० २१०-२६5, अतुर्थ भधिकरण, पृ० ३१ २ डॉ० नगेन्द्र (सम्पा०) हिदी बकोकत जीवितम् (मूल भग), पृ० १६३ ३ दही, पृ० १६३

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ओचित्य सद्धात्तिक विवेचन

है तथापि उनके द्वारा चर्चित प्राय सभी वकता-भेद तद्-तद् विषयक औचित्य का अर्थबोध कराते है। उनकी वर्णवक्तता ही वर्णोचित्य है। 'वाक्य वकता' को ही वाक्यौ चित्य कहा जा सकता है। कुन्तक की प्रकरण-वक्रता ही प्रकरण या सघटना-विपयक औचित्य है। 'प्रबन्ध वकरता' मे प्रबन्ध, रस, नाम-विषयक औचित्य ममाविष्ट हो जाते है। व्यवहारवकता को व्यवहारौचित्य एवं स्वभाव-वक्ता को स्वभावौपित्य कहा जा सकता है। कुन्तक-प्रतिपादित लिग-वकता एव काल-वक्ता ही कमश, लिगौचित्य और वालौचित्य है।१ पश्चिम मे गुण-दोप-विवेचन के प्रसग में जानसन, एडिसन स्काट, जेन्स आदि ने तथा दोषों की नित्यानित्य व्यवस्था के रूप मे, रोबर्ट व्रिजेस ने औचित्य-अनौ- चित्य का अप्रत्यक्ष विवेचन किया है। रोवर्ट ब्रिजेस का विवेचन दोप-विचार के प्रसग मे किया जा रहा है। अलकार-सम्बन्धी औचित्य

अलकार-औचित्य से तात्पर्य है-अलकारो का औनित्यपूर्ण प्रयोग ओर 'औचित्य' का एक अलकार के रूप मे ग्रहुण। जहों तक अलकारो के उचित प्रयोग का प्रश्न है पूर्व और पश्चिम के सभी प्रमुख समीक्षको ने इसका स्पर्श किया है तथा उसका महत्व भी स्वीकार किया है। 'औचित्य' को एक अलकार के रूप में ग्रहण कर उसकी विवेचना करने वालो मे भोज, अग्तिपुराणकार और प्रकाशवर्ष प्रमुख है। औचित्य को अलकार-रूप में ग्रहण करने वाले पृथक्-पृथक आचार्यो ने इसे शब्दालकार, अर्थालकार अथवा उभया- लकार के रूप में स्वीकृत किया है। अलकारो के उचित प्रयोग पर दूर्व मे भरत, रुद्रट, आनन्दवर्जन एवं अभिनव गुप्त ने तथा पश्चिम में लोजाइनस ने इस पर बल दिया है। भरत ने नाटक में पात्रों की वेभूषा व अंगरचना (Make up) के प्रसग में वस्त्नालंकारो के उचित संविधान को सवल शब्दो मे समर्थित किया है।2 रुद्र ट ने काव्य के सदर्भ मे यमकादि अलकारो का निवेकसम्मत प्रयोग प्रतिपादित किया है।5 उनके विचार से रससिद्ध कवि को भी यमक श्लेपादि के प्रयोग मे अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिए, क्योंकि जरा-सी असावधानी से प्रयुक्त अलकार सरस काव्य को भी दूपित कर देता है। शृयार एवं करुण रस के प्रसंग मे यमक इलपादि का प्रयोग अवरोधक होता है। आचार्य लोल्लट ने भी अलकार के पाण्डित्य-प्रदर्शन हेतु किये गए अलंकार- प्रयोग की निंदा करते हुए कहा है- 'यमक और चकबन्ध का कौशल दिखाने के हेतु

१ डॉ० नगेन्द्र (सम्पा०) हिंदी बकोवित जीवितम् (भूमिका भाग), पृ० २११-१२ २ बटुकनाथ शर्मा : नाट्य शास्त्र, प्र० २३, श्लो० ४२-६६ सुदरट : काव्यालकार, भ० ३, श्लो० ५६ ४ वही।

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ही यदि कोई अलग सर्ग का निर्माण करता है तो यह या तो गडुरिका प्रवाह का (अवानुसरण) अनुसरण मा करता है या अपने अभिमान का प्रदर्शन-मात। क्योकि महाकाव्य के भाव-प्रवेग मे ये यमक-चक्रवन्धादि बाघक ही सिद्ध होते है।"4 आचार्य आनन्दवर्द्धन ने कवि की सहज प्रतिभा से समुद्भुत व सहज निष्पन्न जल्कारो को ही स्वागताह समझा है। अलंकार-योजना के लिए कवि अलग से कोई प्रयत्न न करे। भावो की रमणीयता की रक्षा एवं वृद्धि करने मे अलकार साधन- मात्र है साध्य नहीं। यमक, व्लेप आदि का प्रयोग केवल चमत्कार के हेतु नहीं परन्तु काव्य प्रवाह मे सव्लिष्टता लाने के लिए होना चाहिए। सामर्थ्यवान् कवि भी रस के अनुरूप उचित विवेक के साथ ही अलकारों का प्रयोग करें। प्रसग के बीच अलकार महज रूप मे बैठ जाय और हमारा ध्यान पृथकश. आकृष्ट न करे। आचार्य अभिनव गुप्न ने 'अलंकार के अभाव मे अलंकार की व्यर्थता मानी है।' व मानते है कि अनुचित अलंकार्य के प्रसंग मे भी अलंकार अपनी सारी महत्ता रो देता है। अनुचित स्थान पर विन्यस्त अलंकार अपनी हंसी कराते है। इस प्रकार वे अलकार के लिए अलकार्य का अस्तित्व, अलंकार्य का औचित्य और अलकार का उचिन स्थान -विन्यास-तोन आवश्यकताओं को अनिवार्य समझते है।3 'औचित्य' को एक अलकार के रूप में ग्रहण करने वालो मे भोज प्रमुख है। भोज के 'गति' और 'जाति' अलंकार क्मश छन्द, काव्यरूप के तथा भापा के औचित्य का बोध कराते है। वे 'गति' मे छन्दादि तथा काव्य-रूप के शचित्य को अंतर्भुक्त कग्त प्रतीत होते हैं और 'जाति' में भाषा-सम्बन्धी औचित्य का अंतर्भाव करते दिखाई पडन है।5 पात्रानुरूप भाषा-प्रयोग ही 'जाति' संज्ञा से अभिहित किया जाता है। अर्थ- निर्णय की एक कसौटी के रूप मे औचित्य का ग्रहण करते हुए भी वे मूलत औचित्य को गस से सम्बद्ध मानने है। शब्दों के अनुचित प्रयोग को भोज 'अपद' दोष मानते है, रस या भाव-विरुद्ध वान को वे 'विरस' दोप की सज्ञा दते है। लोक-काल-देश बिमुद्ध वर्णन को भोज ने तदिवषयक अनौचित्य कहा है। वैशपिक गुणो को स्वीकार कर भोज ने अनित्य दोषों की सुणत्व-सिद्धि भी समर्ाथित कर दी है। अग्निपुराणकार ने भी औचित्य को मुख्यत एक अलकार के रूप ने ग्रहण किया है। 'औचित्य' को शब्दाथलिंकारो में परिगणित कर दिया गया है। 'प्रशस्ति कातिरौचित्य सक्षेपो यावदर्थता। अभिव्यक्तिरिति व्यक्त पड् भेदाम्नस्य जाग्रति ।।'4 इम 'औचित्य' सज्ञक गब्दारयलिकार का तात्पर्य है-विपयानुकूल रीति, वृति एव रम

१ हेमचन्द्र कृत काव्यानशासन' मे पृ० ३०७ पर उद्धुत लोल्लट के श्लोक देखिए। २ डॉ० राणसागर विपाठी : धयन्यालोक (प्रथम खड), पृ० ४६० ३ वही, पृ० ४१६ Y. Dr. V Raghavan : Some Concepts of Alunkar Sastra, p. 233 234 ५ रामलाल वर्मा अग्निपुराण का काव्य-शास्त्रीय भाग, पृ० ३६

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की योजना करना।9 अलकार के रूप मे औचित्य को ग्रहण करने के अतिरिक्त अग्नि- पुराण मे 'काव्य की परिभाषा',२ कथा-वस्तु की योजना मे देश-काल की रक्षा,3 नाटक के प्रारम्भ में करणीय विधि-निषेधो का आर्देश, दोषों की भावात्मक व अभावात्नक स्थिति एवं उनकी क्वचित् अदोषता सिद्ध कर 'औचित्य' का व्यापक महत्त्व प्रनि- मादित कर दिया है। इस परम्परा मे एक अन्य नाम उल्लेख्य है प्रकानवर्ष का। वे औचित्य को एक शब्दालंकार के रूप में ग्रहण करते प्रतीत होते हैं। यथा 'श्लेषश्चित्रं तथौचिन्य प्रश्नोत्तर प्रहेलिका'।5 प्रकाशवर्ष ने शब्द और अर्थ, विचार और वाणी, अनुभूति और अभिव्यक्ति की पारस्परिक सह-योजना को 'औचित्य' कहा है। औचित्य के उन्होने शब्द- गत एव अर्थगत-दो भेद स्वीकार किए हैं। उनका ग्रन्थ 'रसाणेवालकार' यदि उपनब्ध होता तो उनके विस्तृत विचार भी ज्ञात हो सकते थे। पश्चिमी आचार्यो में लोजाइनम ने शैली-विवेचन के प्रसग में अलंकारों के उचित प्रयोग पर बल दिया है। समुचित- अलकार-योजना के अंतर्गत लोजाइनस ने दो तथ्यो पर विमर्श किया है-(१) अलंकार- योजना का औचित्य और (२) उदात-शैली के पोषक अलंकारो का निर्देश। अलकार का उचित एव सार्थक प्रयोग वे वही मानते हैं, जहाँ वह उक्ति का सहज अंग बनरर उपस्थित होता हो और 'जहाँ इस बात पर भी किसी का ध्यान न जाए कि यह अलकार है।' छंद-विषयक ओचित्य छंदौचित्य को लेकर आचार्य क्षेमेन्द्र ने एक स्वतंत्र पुस्तक 'सुवृत्त तिलकम्' लिखी है। क्षेमेन्द्र के पूर्व रुद्रट ने छंदौचित्य की मूल-अवधारणा का सकेत कर दिया था। पर्चिम मे अरस्तू के काव्य-रूप व काव्य-विषय की गरिमा के अनुरूप छद-विधान करने का प्रतिपादन किया है। रुद्रट ने रस तथा प्रकृत प्रसंग के अनुरूप छंद-योजना करने का समर्थन बिया है। इस विषय मे प्रयोक्ता की अन्तर्दप्टि व विवेक को निर्णयात्मक माना है। इमे वे 'व्युत्पत्ति' कहते है- छंदो व्याकरण कला लोक स्थिति पदपदार्थ विज्ञानम्। युक्तायुक्त विवेको व्युत्पतिरिय समासेन ॥।5

रामलाल वर्मा : अग्निपुराण का काव्य-शास्त्रीय भाग, पू० २७८ . यही, पृ० ३२६ ३ दही पृ० ३६ ४ वही, पृ० ६० ४ वरो, पृ० ६१ €. Dr. V. Raghavan : Some Concepts of Alankar Sastra, p 252 ७. डॉ० नगेन्द्र : काव्य मे उदात्त तत्व, पृ० ७७ 5. यद्रट : काव्यालकार, भ० १, श्लो० ६८

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आचा्ये क्षेमेन्द्र ने इस विचार का विस्तार करते हुए यह कहा है कि किस प्रसग मे कौन-सा छद प्रयोजनीय है। वे मानते है कि निर्दोष एवं गुणयुक्त छदो के उचित प्रयोग से प्रबन्ध की गोभा बढ़ जाती है। ये छद मोतियो के समान है। उनके समग्र विवेचन का सार-तग्रह इस प्रकार है- (१) शास्त्र-रचना मे 'अनुष्टुप' छन्द का प्रयोग करना चाहिए। (२) पुराण जैने तथा उपदेश-प्रधान काव्यो में भी 'अनुष्टप' छंद की योजना करनी चाहिए। * (३) शांत-रस के प्रसग मे भी 'अनुष्टुप' छद की योजना करनी चाहिए। (४) शृंगार-रस के प्रसग मे विशेष्त नायिका के अंग-वर्णन तथा ऋतु-वर्णन के अवसर पर 'उपजाति' छद की योजना इप्ट है। (५) चन्द्रोदयादि-वर्णन मे 'रथोदता' एव नीति-वर्णन मे 'वशस्थ' छद प्रयोज्य है। (६) दो तथ्यों का परस्पर भेद दिखाने के लिए 'गिखरिणी' का प्रयोग किया जाये। (७) आक्षेप, क्रोध एवं तिरस्कार के वर्णन में 'पृथ्वी', विपत्ति-वर्णन मे 'मंदाकान्ता' छंदों की योजना उचित है। (र) शौर्य-वर्णन मे शार्दूलविकीडित, मुक्तक रचना में तथा सूक्तियो की रचना में 'दोधक', 'तोटक' एव 'नुर्कुट' छद प्रयोज्य है।१ डॉ० नगेन्द्र ने अरस्तू के महाकाव्य-विवेचन के प्रसग मे अरस्तू द्वारा प्रतिपादित छद के महत्त्व और औचित्य का सार निम्नलिखित शब्दो में प्रस्तुत किया है- (9) महाकाव्य मे केवल एक ही छंद का प्रयोग आरम्भ से अंत तक होना चाहिए, क्योकि इससे समाख्यान के अविच्छिन्न प्रवाह की रक्षा होती है। अनेक छदो का मिश्रण इस प्रवाह को खण्डित कर देता है, जिससे महाकाव्य की गरिमा की हानि होती है। (२) वृत्तों मे षट्पद वीरवृत्त सबसे अधिक भव्य एवं गरिमामय होता है, अत काव्य के सबसे अधिक भव्य और गरिमामय रूप-महाकाव्य के लिए वही मवाधिक उपयुक्त है। उसकी लय इतनी भव्य और उदात होती है कि असाधारण गब्द उसमे सहज ही रम जाते है। द्विमातिक आदि अन्य छद अभिनय आदि के लिए तो अत्यन्त उपयुक्त है, परन्तु वीर-काव्योचित गरिमा उनमे नही है। (३) वृत्त का चयन किसी शात्ीय नियम के अनुसार प्रयत्नपूर्वक नही किया जाना, काव्य-वस्तु की प्रक्रृति ही स्वानुरूप छद का चयन करा देती है। काव्यरूप-सम्बन्धी औचित्य काव्यरूप-विषयक शचित्य से तात्मर्य है विषय के अनुरूप काव्यरूप का चयन। १. क्षमेन्द्र - सुवृत्त तिलब म्, तृतीय विन्यास। २. डॉ० नगेन्द्र : अररस्तू का काव्य-शास्त्र, पृ० १३६

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इसका विस्तार से विचार पश्चिमी काव्य-मीमामा में हुआ है। कुछ विषय ऐसे है, जिन्हे नाटक मे निरूपित करना अधिक अनुकाल होता है, कुछ ऐसे है. जिन पर महा- काव्य लिखना ही उचित होता है; कुछ ऐसे होने है, जिन पर कहानी या उपन्यास रचा जाना ही अधिक सुकर हो सकता है, कुछ केवल कामेडी के लिए ही योग्य ममसे जाते है। तात्म्य यह कि विषय स्वत अपने अनुरूप काव्य-रूप (Poetic form) का तकाजा करता है। विघय के अनुरूप रूप 'वित्रा' की बोजना करता ही काव्य-र- सम्बन्धी औचित्य कहलाता है। वासदी का विषय कामेडी मे निरूपिन नही किया जा मकता। इसी पकार गीति-काव्य का विपय महाकाव्य मे निबद्ध नही किया जा सबता है। अरस्तू ने इसका किचित् स्पर्श किया है। इस विचार का प्रारभिक सूत् एरिहटोफेनीज के नाटक 'फागस' में मिलता है। वहाँ वह विषय के अनुरूप गरिमायुक्त भाषा-प्रयोग पर बल देता है- 'When the subiect is gieat and tho sentiment then of necessity, great grows the word "* पश्चिम मे विषयानुरूप काव्य-रूप के प्योग के इस विचार का विशेप नमर्थन बर्सफोल्ड ने किया है। अपने यथ Judgement in Literature' मे अनुभूति की यथार्थ एवं सुन्दरतम अभिर्व्यक्ति के लिए तदनुरूप माध्यम की आवश्यकता पर वे व देते है। अभिर्याकक्ति की इस अनुरूपता को वे काव्यरूपौचित्य कहते है। किसी विनष भावानुभूति के लिए काव्य की भिन्न-भिन्न विधाओं में से कौन-सी विधा अनुकूल है, इसका ध्यान रचमिता को रखना ही चाहिये। विषय-वस्तु के अनुरूप काव्य-रूप का चयन कर कवि को उसे उत्तम रीति से अभिव्यक्त करना चाहिए।" रस-सम्बन्धी औचित्य 'रसौपित्य' पर विस्तृत विवेचन करने का कार्य आचार्य आनन्दवर्द्धन ने किया है। उनके बाद अभिनवगुप्त ने रसौचित्य का विमश किया है। अभिनवगुप्न के पत्वर्ती प्राय सभी आचार्यो ने रसाभास' के प्रसग मे रस के औचित्य एवं अनौचित्व पर विचार किया है परन्तु क्षेमेन्द्र का तद्विष्यक विवेचन कुछ माने में विशिष्ट है। रस की पोषक द संवर्द्धक सामग्री का-विभावादि का-रसानुरूपविनियोग ही 'रसौचित्य' की प्रचलित धारणा के अंतनिविष्ट है। शृमारादि रसो के निर्पण के प्रसग मे वर्ण से लेकर गुणालकार त्क के सारे धर्मो का तथा विभावानुभाव, सचारि-भावादि रस के उद्भावक व संपोषक तत्त्वों का उचित निबन्ध ही रसोचित्य है और अनुचित निबन्धन ही रसाभास अर्थात् रस-अनौचित्य है। क्षेमेन्द्रेनर ममी आचार्यो ने 'रसौचित्य' से यही अर्थ ग्रहण किया है। उनके ऐसा अर्थ-ग्रहण करने पर

  1. Aristophems, Tr. Gilbert Murray : Frogs, p. 79 2. W. Basil Worsfold : Judgement in Literature, p 80

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काव्य में रस की स्वतन्त्र व निर्बाधित स्थिति स्वत सिद्ध हो जाती है परन्तु आचार्य क्षेमेन्द्र ने काव्य मे 'रस' को आत्मा मानते हुए तथा उसकी सर्वोपरि महत्त्वपूर्ण सता स्वीकार करते हुए भी उसको सवथा सर्वनंत स्वतन्त्र न मानकर जीचित्य से शासिन- अंकुशित माना है। समीक्ष-पक्ष मे क्षेमेनद्र 'रस'ोी औचित्यानणासित मानने हैं। 'रसौमित्य' से क्षमन्द्र का यही तात्पर्य है। कमश आनन्दवर्दन, अभिनवगुप्न व क्षमेन्द के 'रसौतित्य'-विषयक विचारों का परिचय प्राप्त करने पर बात स्वतः म्ष्ट हो जाएगी। आचार्य आनदवर्द्धन ने काव्य एव नाटक-दोनों के 'संदर्भ मे रसौचित्य का विचार किया है। काव्य मे अंगी (अर्थात् रम) की सिद्धि के लिए सभी अगों (अर्थात रसेतर सभी उपकरण) की वोजना औचित्यबती होनी चाहिए। वर्ण, रीति, गुण, छन्द, अलकार आदि अभिव्यक्नि किवा कलापक्ष मे सम्बद्ध सभी तत्त्व या उप- करण काव्यार्थ को प्रकट करने के साधन-रूप है अन: साध्य का प्रकर्ष करने मे ही उनका उचित विनियोग होना चाहिए। इस दृष्टि से भाषा-जो कि अभिव्यक्ति का नाध्यम है- के छोटे-मे-छोट अग वर्ग-याजना से लेकर पद-क्म या संघटन तक के सभी तत्वों-प्रन्यय, वचन, कारक, लिंग, समास, सघटना-के रस-पोपी उपयोग पर आचार्य ने बल दिया है। भाव या विचार के क्षेत्र में रसाभिनिवेश के प्रमग मे पर- "स्पर-विरोधी और अवरोधक-रसाकर्षक विभावादि का तिबन्धन न करने का आदेश आचार्य ने दिया है। नाटक के प्रमग में वे इस बात पर अधिक ल देते प्रतीत होते है कि नाटक के वस्तु-मगठन से सम्बद्ध कार्यावस्थाएं, अर्थ-प्रकृतियाँ व संधियॉ औचि- त्यपूर्ण रीति से परस्पर-योजित व सुसम्बद्ध रहे। प्रवधकाव्य तथा नाटक मे रस का प्रयोग उचित अवसर पर होना ही चाहिए। अभिनव सुप्त ने काव्य के नीन आधार माने है-(१) रस, (२) व्वनि और (३) औचित्य। औचित्य सें उनका तात्पर्य रसव्वनि के औचित्य से ही है। मथा- 'उचित अन्देन रसविषयौचित्य भवतीति दर्णयन् रसध्वने जीवितम्वं सूचयति।'२ अर्थान् 'उचिन' शब्द से रमध्वनि-विषयक औचित्य ही अभीष्ठ है। उसके अभाव मे (रस-ध्वनि के अभाव मे) औचित्य का उद्घोष निरर्थक है। आचार्य क्षेमेन्त्र ने 'रसौचित्य'-विषयक अपना तात्पये इन शब्दो मे प्रकट किया है-'औचित्येन भ्राजिष्ण शृंगारादिलक्षणो रस सकलजन हृदय-व्यापी (वमन्त इब अशोक तरुम) मनोंकुरितं करोति।'5 अर्थात् औचित्य मे सुशोभित शृमारादि रस सकल जनो के हृदय मे व्याप्त होकर, उन्हे उसी प्रकार आनदविभोर कर देता है. डिस प्रकार वसत अशोक वृक्ष को। उनके इस कथन का तात्पर्य यही है कि रस भी सहदय

१. भाचार्म विश्वेमवर (सपा०) डबन्यालोक, ४ृ २५६-२६७ २. डॉ. रामसरगर विपाठी : हवन्यालीक (प्रथम खड), पृ० ७३ पर उद्धत, लोचन टीकार। ३ क्षेमेन्द्र -ओोचित्य विचार चर्चा (काव्य माला), पृ० १२४, सृ० १

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को तभी आह्लादित कर सकता है, जब वह औनित्य से सयुक्त हो (औचित्य से भास्वर हो उठा हो) । औचित्य-रस का सयमन करता है। 'रसौचित्य' की कल्पना रस का अगत्व सिद्ध नही कगती परन्तु उसको अकुशित नियत्नित) करती है। प्रबध-औचित्य 'प्रबन्ध' का रूळ अर्थ है 'महाकाव्य के कथा-प्रवाह का अविच्छिन्न निर्वाह। महाकाव्य में कथा-प्रवाह का आद्यत अनवरुद्ध प्रवाहित होते रहना ही प्रबन्ध-निर्बाह है। प्रवधौचित्य से काव्य के सदर्भ में प्रबंध-काव्यों की कथा-शृखला का निर्वाह ही बोध्य होता है। वस्तु-सगठन चाहे महाकाव्य मे हो या नाटक में, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस विचार से नाटक का वस्तु-सगठन भी इस 'प्रवधौचित्य' शोर्षक के अंतर्गत समाविष्ट हो जाता है, परन्तु क्षेमेन्द्र की 'प्रबन्धौचित्य'-विषयक कल्पना केवल वस्तु-मगठन तक सीमित नही रहती। उससे आगे बढकर वे नवीन व रमणीय अर्थोद्भावना को भी 'प्रबन्धौचित्य' मे समाविष्ट कर लेते है। संस्कृत-काव्यशास्त्र मे आनन्दवर्द्धन और क्षेमेन्द्र ने क्रमश वस्तु-सगठन (महा- काव्य मे) और नवीन अर्थोदभावना के रूप मे प्रबन्धौचित्व पर विचार किया है। पश्चिम मे अरस्तू ने वासदी के कथानक-सगठन के प्रसग में उस पर विचार किया है। आनन्दवर्दधन ने वर्ण्य-वस्तु (काव्यार्थ या घटना) की रसानुकूल स्थिति स्वीकार्य मानी है। रस-निष्पत्ति के लिए वे कल्पित घटनाओं के सन्निदेश को एक सीमा तक निर्वाह्य समझते है। इतिवृत्त निर्वाह-मात्र को वे कवि-कर्म की सार्थकता नही मानते। ख्यात, उत्पाद्य और मिश्र कथाओ मे मुख्य और गौण कथा-ततुओं का उचित सवलन वे वाछनीय ही नही अनिवार्य समझते हैं। घटनाओ का ग्रहण-त्याग, सकोच, विस्तार, परिवर्तन आदि सब रसानुलक्षी होना चाहिए और चरिद्रो का निर्माण उनके द्वारा आधातित न होना चाहिए। इनके वर्णन के निमित्त पात्रो की प्रकृति मे परिवर्तन न किया जाना चाहिए। साराग यह कि समस्त उपकरण समवेत रूप में एक सुन्दर प्रभाव को निरूपित करे। आचार्य क्षेमेन्द्र का कथन इस प्रकार है- 'अम्लानप्रतिभा प्रकर्षोत्प्रेक्षितेन सकलप्रबन्धार्थाप्यायिपीयुय वर्षेण समुचितार्थ विशेषेण महाकाव्य स्फुरदिव चमत्कारकारितामापद्यते।' अर्थात् अम्लान प्रतिभा के प्रकर्ष से समस्त प्रबन्धार्थ को परितृप्त कर देने वाले अर्मृत की वर्षा-जैसा समुचित विशेषार्थ जब छलक पडता है, तब प्रबन्ध-काव्य (महा- काव्य) चमत्कार-सम्पन्न हो जाता है। 'प्रतिभाप्रकर्षोत्प्रेक्षितेन' से नवीन, चमत्कारी अर्थोद्भावना ही बोधित होती है।

१. भाचाय विश्वेश्वर : धवन्यालोक, पृ० २५६ २. लेमेन्द्र, औनित्य विचार चर्चा (काव्यमाला, गु० १), पृ० ११६

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रतामास, नम्ा एवं दोष-विचार और औचित्य भारतीय काव्यशास्त्र में औचित्य-विचार की एक परोक्ष-पद्धति वह भी है, जहां उसके अभाव तथा अनौचित्यजन्य रनानासो एव भावाभासो की स्थिति पर विचार किया गया है। दोप-विचार की भी स्थिति इसके अतर्गन समाविष्ट हो जानी है। रसाभास और भावाभास का मूल कारण ही अनौचित्य है। विभावादि के अनुचित निबन्धन के कारण ही उनकी स्थिति होती है। भारतीय समीक्षको द्वारा विनगित समस्त रस-बोषों का अतरभवव इसमे हो जाता है। आचार्य सम्मट, विरवनाथ, जगन्नाथादि का औचित्य-चितन, इसी पद्धति पर हुआ प्रतीत होता है। मम्मट को 'काव्य-परिभाषा' मे अदोषता पर बल दिया गया हे। सातवे उल्लास मे वे पद-दोष, वाक्य-दोप, पदैक-दोप, वाक्यक-दोप, अर्थ-सम्दन्धी दोष, समामगत-दोष, रस-सम्बन्धी दोपों पर विचार करते है, तो दसवें उल्लास में अलकार- गन दोषो पर विस्तार से निचार करते है। ग्रन्थ मे सर्वत्र मम्मट की औचित्य-दृष्टि सजग दिखाई पडती है। आचार्य विश्वनाथ ने अनौचित्य-प्रवृत्त रस एव भाव को कमश रसाभास एव भावाभास की सज्ञा की है। उनके विचार से मुनि-पत्नी, गुरु-पत्नी, उपनायक, बहु- नायक, प्रतिनायक, अधम पात् एवं पशु-पक्षियो के प्रति रतिभाव अनौचित्य ही है।२ उनके द्वारा की गई दृश्यकाव्य मे सूच्याणों एवं वजिताशी की व्यवस्था मे भी औित्य- दृष्टि क्रियाशील है। पडितराज जगन्नाथ ने अनुचित रीति से प्रयोजित रस तथा भाव को क्रमश 'रमाभास और भावाभास' कहते हुए भी उन्हें रस-स्वरूप माना है। उनका तर्क यह है कि जिस प्रकार लंगडा घोडा भी घोडा तो रहता ही है, उसी प्रकार रसाभास एव भावाभास भी रस-स्वरूप है। रसो की विरोधी-अविरोधी योजना पर विचार करते हुए, वे विरोधी रसो की योजना न करने का परामर्ग देते है। 'मुन्दोपसुन्द' न्याय से विरोधी रस उभय-नाग का कारण बनते हैं। 'अनौचित्य' नामक रस-दोष की स्थिति उन्होंने स्वीकार की है-जिसके भीतर जाति, देश, काल, वर्ण, आश्रम, वय, अवस्था, प्रकृति, व्यव्हारादि के अनुचित वर्णनों का समावेश होता है। उनका रसाभास के कारणो का विवेचन प्राय परम्परानिष्ठित ही है, कोई विशेष बात वे नही करते। आचार्य हेमचन्द्र का तत्सम्बन्धी अधिकाश विवेचन मम्मट के मार्ग पर ही हुआ है। उनकी कुछ स्थापनाओ का सार-सग्रह इस औचित्य के कारण ही स्थायी भाव रमत्व को प्राप्त होता है। ास्य-रस में अनौचित्य ही कारण है। अत. हास्य-रस के

मम्मट, काव्य-प्रकाश, ७र्वा और १० वाँ उल्लास। कृष्णमोहन शास्त्री (सपा०) साहित्य दर्पण, पृ० २३० 4. वदरीनाथ झा (सपा०) : रस संगाधर, पृ० १७५ ४. बही, पृ० १६५-६६ भू रसिकलाल परीख (सपा०).काव्यानुशासन, पृ० १०२

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वोचिय सद्धातिक विवेचन

प्रसंग मे अनौचित्य की मार्थकता है।9 विभावाटि का महत्व औचित्य सापेक्ष है। औचित्याभाव में उनकी कोई सार्थकता नही है।१ अनौचित्य ही रसाभास एव भावा- भास का एकमाव कारण है और अत. स्वगब्द-कथन-दोष वहाँ होता है, जहाँ स्थायी, व्यभिचारी एवं रसादि का स्व-शब्द-कथन किया जाय।3 दोप-विचार के रूप मे औचित्य-अनौचित्य का विचार करने मे बाग्भट, विद्यानाथ, बाग्भट द्वितीयादि नथा पश्चिमी समीक्षक रोबर्ट त्रिजेस प्रमुस है। 'वाग्भटा- लकार' मे वाग्भट ने काव्य की निर्दोषता पर बल देते हुए कहा है कि 'केवल दोप-हीन काव्य ही लोक मे यश देने वाला और स्वर्ग-पद प्राप्त कराने वाला होता है। दुन्ट- काव्य से तो केवल अपकीर्ति ही बढती है।" उन्होने इमीलिए सर्वप्रथम दोष-विवे्न किया है। वे काव्य में पद-दोष, वाक्य-दोप, वाक्यार्थ-गोष-नीन प्रकार के दोपो की स्थिति मानते है। इन विविध प्रकारो के दोषो का परीक्षण करने पर यह म्पष्ट हो जाता है कि वे तत्तद् प्रकार के अनौचित्य के ही रूप है। वाग्भट द्विनीय ने अपने अ्रन्थ 'काव्यानुशासन' में प्राय्तः हेम्चद्र का ही अनुसरण किया है। उन्होंने विशेपत प्रक्कति- औँचित्य और प्रकृति-अनौचित्य का स्पर्श किया है। अनुकरण के प्रसग मे, विदूपक नी उक्ति मे अनौचित्य को वे दोष नही मानते। निन्दा तथा प्रोत्साहन के प्रनंग मे अनुचितार्थत्व-दोष नही माना जाता है। मन्न, उन्मत्त, मूर्ख एव अज्ञ जनो की उस्ति मे निरर्थकत्व-दोष नही माना जाता। रसों के परस्पर विरोध-अविरोध के विषय मे उनका मत है कि पृथक-पृथक आश्रय में स्थित दूसरे रसों के अनर्गन एक रस का अंगन्न न तो दोष ही है और न विरोध ही उपस्थित करता है।* उनका औचित्य-अनौचित्य विचार दोष-विचार के रूप मे ही मिलता है।६ विद्यानाथ ने अपने ग्रन्थ 'प्रताप रुद्रीय' मे काव्य की परिभाषा इस प्रकार दी है- "गुणालंकार सहितौ शब्दाथौ दोषवजितौ। गद्यपद्योपभयमयं काव्यं काव्यविदो विद्दुः। वे काव्य को गुणालकार युक्त एव दोपवर्जित ही ब्राह्य मानते है। उनका दोष- विचार अत्यन्त विस्तृत है-१७ पद दोष, २४ वाक्य दोष, १८ अर्थ दोप-इम प्रकार ५६ दोषों का विवेचन उन्होने किया है। गुणों के प्रसंग में २४ गुणो का विवेचन उन्होने किया है। सुकुभारता, काति, उदात्तता, सुशब्दता, आदि इनमे प्रमुख है और अर्थ के विचार से वे औचित्य के अधिक समीप है। 'उर्जस्वी-विवेचन के प्रसंग में रमा-

१ रनिकलाल परीख (सम्पा०): काव्यानुशासन, पृ० ११३ २ वही, पृ० १२६ ३ वही, पृ० १४६-५६ · डॉ. सत्यव्रतसिंह - वाग्भटालकार, पृ० २० . परस्पर जाष्य-नाधक भावे पृथकपयकाअये अ््न्न रसरन्तरितरेंगत्वे च न दोष :- कान्यानुशासन। ६. वाग्घट द्वितीय : काव्यानुशासन, पृ ६०-६८

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औचित्य सद्धातिक विवेचन

भासों का भी औनित्यान्तर्गत समावेग उन्होने कर दिया है।" रोबर्ट ब्रिजेस ने अपने लेख 'Essay ou Poetics' मे दोपों की नित्यानित्य व्यवस्था स्वीकार की प्रतीत होती है। वे 'औचित्य' के लिए 'In keeping' शब्द का प्रयोग करते है। आप के विचार में सौन्दर्य-शास्त्र मे कोई भी वस्तु स्वत दोष-युकन नहीं होती यदि वह संदर्म-विशेप में औचित्यपृर्ण-संगति के साथ अवस्थित है। औचित्य के कारण दोप भी दोपत्व छोडकर व्वचित गुणस्व ग्रहण कर लेता है। औचित्य को वे एक सामजस्य स्थापक सिद्धात्त मानते है । ऊर्जस्वी अलकार के रूप में अनौनित्य का औचित्य-ग्रहण ऊर्जस्त्री अलंकार के अन्तर्गत क्रोधादि (सामान्यत गुरुजनो के प्रति क्रोध "अनुचित है अत ढोष भी) का औचित्य भी स्वीकार किया गया है। उद्भट, अप्पय दीक्षित' और स्व्यकर ने भी इसका विवेचन किया है। पूर्व और पश्चिम के आचार्यो मे कुछ ऐसे आचार्य भी है जो विगत पृष्ठो में चचित उपविभागो या श्रेणियों मे बन्ध तही पान फिर भी जिनके औनिन्य- विपयक विचार महत््वपूर्ण है अत अनुपेक्षणीय भी। पूर्त्र मे लोल्लट और जयदेव ह नथा पन्चिम मे कॉलरिज, एम. एच. अब्राम्स नथा आई० ए० रिचर्ड स है, जिन्हें हम भूल नही भकने। लोल्लट ने महाकाव्य मे प्राप्त असगत व दीघ प्रकृति-वर्णनो की निरर्थकता पर बल दिया है। महाकाव्य के सन्दर्भ में एक विशेष ध्यातव्य बात उन्होने यह भी कही है कि महाकाव्य मे विभिन्न अगों व उपागो के बीच तार्किक सगति होनी चहिए। हादी के अगो की भाँति असमानानुपातिक वृद्धि किसी भी अग की न हो। संसार असीम विपयों से (काव्यार्थो से) भरा पडा है किन्तु कवि उसी का ग्रहण करे जो सार्थक उप- सोगी व सरस हो।9 जलकीडा, संध्या, चद्रोदयादि का वर्णन न तो अत्यन्त लम्बा हो न रस के विरोध मे ही हो।5 केवल गतानुगतिकता किवा वर्णन की शक्ति के प्रदर्शन

शकर राम गारत्री प्रताप रुद्रीय, पृ० २०८ 2 Dr V Raghavan . Some Concepts of the Alamkar Shastra, p. 255 अनौचित्य प्रवृत्ताना काम क्रोधदि कारणात्। भावाना च रसानां च बन्ध ऊर्जस्वि कथ्यते।। -इटभट का्यालकार मग्रह, पृ० २६ डॉ० भोलाशकर व्यास. कुबलयानन्द, पृ० २४१-७२ %. Ku Janki (Ed.) : Alamkar Sarvasva, p 217 ६ मज्जन पुष्पावचयन सध्याचद्रोद्रयादि वाक्यमिह्। सरसमपि नाति बहुल प्रकृत रसनिन्वित रचमेत्॥ -डॉ. गमासामर राय (सपा) काव्य मोमोस्ा, पृ० ११६ पर उदघुत लोल्लट का श्लाक। अस्तु नाम निसीमार्य सार्थ.। किन्तु रसवत एव निवधो युक्ती न नीरमस्य। हॉ चापराजिनि.। -डॉ. मंगासागर राय (सपा) काव्य-मीमासा, पृ० ११. २र लोल्लट की उदधुत पक्तियाँ। र. ऊपर "4" सखयक उद्धरण तथा यस्तु सरिदद्रि सागर पुर तुरग रथादिं बणने यत्न। कविशकिति: मयाकि फनो वितलधिया नो मत- स इहू।। -डॉ० गगासागर राय (सपा०) : काव्यमोमासा, पृ० ११६ पर उद्धत फ्लोन।

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६० औचिय सैद्धाा्तक विवेचन

मात्र का सातिर यमकादि का प्रयोग न किना जाय। लोल्लट ने काव्य-कृति के अगों की तार्किक सगति की बात कही है जो पश्चिमी समीक्षक कॉलरिज के अग-सगति निद्धात एवं एम० एच० अन्राम्म के 'Rule order and Harmony' के साथ आकस्मिक व उद्भूत समता रखती है। आचार्य जयदेव ने 'अनुचिन' नामक एक विशेष दोष को स्वीकार किया है और इस प्रकार औचित्य के नति अभावात्मक दृष्टि से विचार किया है। 'अनुचित' दोष वे वहा मानते हैं जहॉ, वस्तु के अनुम्य उसका निबन्धन न हो पाया हो- अनौचित्य कीतिलता तरगयति य सदा। अनौचित्यम् अयोग्य सम्वन्ध । कीतिलतायास्तरग सम्बन्धा योग्यत्वात्। वर्ड स्वर्थ ने काव्य में जन-भापा का प्रयोग तथा सामान्य जीवन की घटनाओ का समावेक्ष उचित समझा, किन्तु कॉलरिज उनसे सहमत नही हुए। उन्होने तो काव्य मे सौन्दयं की स्थिति तभी सम्भव मानी, जब उसके अग-उपागो मे परस्पर सुसंगति हो, औचित्य बुद्धि से नियोजिन हुए हो। भव्य भाषा और असाधारण घटनाओ को काव्योकिति मानते प्रतीत होते है। वे 'औचित्य' के लिए 'In keeplng' मब्द का प्रयोग करते है। उनके औचित्य-विमर्श का सार इस प्रकार है- (१) काव्य मे नामजस्यपूर्ण इकाई की अन्विति करनी हो तो उसके विभिन्न ऊगों की परस्पर औचित्यपूर्ण सगति आवश्यक नही अनिवार्य है।2 (२) उचित अर्थ काव्य का शरीर है, अलंकार उसकी भावभंगिमा; गति उसका जीवन है और कल्पना-जो कि सर्वत्र रहती है तथा भव्य एव तर्कपूर्ण इकाई का निर्माण करती है-उसका प्राण है। राजशेखर की 'काव्य-पुरुष' की कल्पना के साथ कॉलरिज की यह कल्पना तुलनीय है। एम० एच० अब्राम्स ने अपने ग्रंथ The Mirror and the lamp' में ओचित्यार्थ का बोध कराने वाले 'Rule, Order & Harmony' शब्दो का प्रयोग किया है।* वे मानते है कि काव्य का प्रयोजन सत्य एवं गुणो की रक्षा करते हुए मनुष्य को प्रसन्न करना है अर्थात् औचित्य-निर्वाह करते हुए प्रीति-सम्पाबन करना है।६

रसिकलाल परीख (सपा०): काव्यानशासन, पृ० ३०७ पर उद्धृत श्लोक! २ जयदेव चन्द्रालोक, पृ० २५ (द्वितीय मय्ख)। 3 S. T. Coleridge . Biographia Literaria, p 11 ४ Finally good sense is the body of Poetic genius. fancy its dra- pery, motion its life, and imagination the soul that is everywhere and in each whole. -S. T. Coleridge : Biographia Literaria, p. 13 14 ५ू M. H. Abrams . The Mirror and the Lamp, p 17 $ Ibid, p. 19

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ओचिय सज्धातिक विवेचन ६१

काव्य कवि के आतरिक लक्ष्य के अनुकल हो और उसमे सम्भावना का तत्त्व भी निहित होना चाहिए।9 आइ० ए० रिचर्ड स ने नैतिक धरातल पर काव्य-मीमासा करते हुए यह कहा है कि 'कवि ही नीति के बीजों को रोपित करता है, धर्मोपदेशक नहीं।' अच्छे व्यक्तियो ने पायी जाने वाली रुचिहीनता घातक है। जीवन तब तक सुन्दर नहीं हो सकता, जब तक 'अव्यवस्था व उलझन-भरे तत्वो की जड़ें जमी हुई है।" उनके विचार से लत्त्वत कोई भी शब्द न अच्छा है न बुरा, न प्रसन्न कर सकता है न अप्रसन्न; परिस्थिनि, प्रश्ग व परिवेश में ही वह ग्राह्य-अग्राह्य या अच्छा-बुरा सिद्ध होना है।3 'अभिव्यक्ति की सुन्दरता निरर्थक है यदि अनुभूति ही खोखली होगी।" न यह भी आवश्यक ह कि अनुभूति को नितान सादगी के साथ सक्षिप्त-रीति मे प्रस्तुत किया जाय।१ औचित्य और हिन्दी के आचार्य रीतिकालीन काव्यशास्त्रीय ग्रन्थो मे प्रधानतया शब्द-शक्ति-विवेचन, अलंकार- निरूपण, नायक-नायिका-भेद एव शृंगार-रस-विवेचन ही अधिक हुआ है। औचित्यादि सम्प्रदाय प्राय. उपेक्षित ही रहे है। रीतिकालीन शास्त्रीय ग्रन्थो मे यत्किचित् उपलब्ध औचित्य-सम्बन्धी सामग्री का सार इस प्रकार दिया जा सकता है. (१) अर्थ-निर्णय की एक कसौटी के रूप में औचित्य का ग्रहण, (२) काव्य-गुण के रूप मे औचित्य का स्वीकार, (३) दोषाभाव के रूप मे औचित्य की स्वीकृति, और (४) अग-अगी के बीच अनुकूल सम्वन्ध के रूप मे औचित्य की ब्राह्यता। रीतिकालीन आचार्यों में से सम्भवत किसी ने भी औचित्य को काव्य के अनिवार्य व व्यापक महत्तम तत्व के रूप में न तो ग्रहण ही किया है न व्यार्यात ही। चारुत्व के सहज रहस्य के रूप मे या सामाजिकता के निर्वाह के रूप में औचित्य का जो विमर्न रीति-परवर्ती आधुनिक आचार्यो में विशेषन आचार्य पं० बलदेव उपाध्याय तथा आचार्य पं० विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने किया है-वैसा रीतिकालीन आचार्यो मे से किसी ने भी नही किया। रीतिकालीन आचार्यो मे प्रथम आचार्य केशववास ने का य की अदोपता पर अधिक बल दिया है। उन्होंन दोप-युक्त कविता को नदिरा-युक्त गगाजल की भाँनि अर्पावत्र अर्थात् अनुपादेय माना है। पथ से भिन्न कविता को वे अंधीः सुगब्द मे हीन

₹ M. H. Abrams : The Mirror and the Lamp, p. 19 ₹. I. A. Richards : Principles of Literary Criticism, p. 62 ३. Tbid, p. 136 ४. Ibid, p. 199-200 x. I. A. Richards Principles of Literary Criticism, p. 199-200 ६. प० विश्ववायप्रसाद मिश्र (सपा०) : केशव ब्रंथावली, भाग १,पृ० १०१

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६२ चित्य सद्धात्िक विवेचन

कविता को बधिर, छदोभगयुक्ल कविता को लंगडी, अलकार मे हीन कतिता को नन्न और अर्थ से हीन कविता को मृतक मानते है।9 आचार्य चिंतामणि ने 'कवि कल्पतरु' मे औतित्य का स्वल्प म्पर्श किया है। रवयाकरण भत्तु हरि द्वारा प्रवर्तित एवं प्राय सभी भारतीय काव्य-शात्तीय आचार्यो द्वारा अनुवनित अभिधार्थ निर्णय की एक कसौटी के रूप मे 'औचित्य' को ितामणि ने भी ग्रहण किया है। चद्रालोककार जयदेव (जो 'अनौचित्म' नामक विकिष्ट काव्य- दोप की स्थिति स्वीकार करते है) के पर्थ का अनुसरण करते हुए, आचार्य चितामणि भी काव्य की अदोषता समर्ित करते हुए 'जनुचित' संज्ञक शब्द-दोप और 'प्रलिकलाक्षर सनक वाक्य-दोप के माध्यम से ऋमनः वर्णन-अनौवित्य और रस-अनौचित्व पर प्रकाश डालते है। इनी प्रभंग में उन्होंने आगे चलकर भात्राभासी और रसाभासो का विवेचन भी किया है। सम्कुन के पूर्वाचार्यों पर आवृत होकर भी उनका विनेचन स्पप्ट, संक्षिप्त और नुलझा हुआ है। रीतिकालीन काव्य-शास्वीय ग्रथो में आचार्य भिवारीदाय के 'काव्य-निर्णय' का अपना विशिष्ट स्थान है। ग्रथ के प्रपम्भिक भाग में दासजी ने अर्थ-निर्णय की कनौटी के रूप मे 'औचित्य को विवेचित किया है: कहूँ उचित ते पाइये एके अर्थं सुरीति। सरुपर दुज बैठो कहै होति विहंग प्रतीति॥3 यहा 'तर' के प्रमंग में 'द्विज' का अर्थ पक्षी करना ही उचित है। अपने ग्रथ के अध्याय २३-२४ और २५ में दामजी ने दोप, दोषों के प्रकार, दोपो की निर्दोषता व क्वचित रयत्व-प्राप्ति का निर्वचन किया है। दासजी द्वारा चर्चित शब्द-दोपों को केमेन्द्र-निरूपित पद-अनौचित्य के भीतर रखा जा सकता है। उनके द्वारा निरूपित 'प्रतिकलाक्षराद्रि' वाक्य-दोष क्षेमन्द्रीय वाक्य-अनौचित्य में अन्त- भुक्त हो जाते है। दानजी के 'अपुप्टाथादि' अर्थ-टोपों का भी क्षेमेन्द्रीय दृष्टि मे प्रवन्धार्थ एवं विचार-सम्वन्धी अनौचित्य में अन्नभाव हो जाता है। उन्होंने जिन रस दोपों का विवेचन किया है वै क्षेमेन्द्र-निरपल रस-सम्बन्धी अनौचित्य का ही अपर रूप है। ये सारे दोष नित्य-दोप नही है। कभो -नभी ये भी अपना दोषत्व छीड़कर गुपास्व ग्रहण कर चारुत्व की वृद्धि करते है। दोपों के गुणन्व ग्रहण कर विस्तृत विवेचन आचार्य भिसारीदासजी ने किया है।* ऊरजस्वी अलकार के विवेचन ने प्रमंग मे भी आपने अनुचित भाव या रस का औित्यपूर्ण निबन्धन ग्राह्म माना है --

  1. प० विश्वनाथप्रसाद मिश्र (सपा०) केशन ग्रथावली भाव १. पृ० ५०२ २ डॉ० भगोरथ मिश्र: हिन्दी कान्यशास्त्र का इतिहास, पु० ७२ ३. प० विषधनायप्रसाद मिश्र (सपा०)- मिखारीदाम प्रथावली (द्वितीय खड), उृ० ७ ४. वही, पृ० २१५-२५

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औचित्य मदाातक विवचन ६३

औधो तहाइ चलो क हम जहं कुबरि कान्ह बसे इक ठोरी। देखिए दाम अधाइ अधाड तिहारे प्रसाद मनोहर जोरी। कबरी सो कछु पाइये मंत्र लगाइये कान्ह सो प्रेम की डोरी। कृबर भक्ति बढाइये बृंद चढ़ाइये चंदन बदन रोरी।।" इस उदाहरण को स्पाट कर उसकी टीका ने दामजी लिसने हैं- 'मौति' को सुघ देखिबे की उत्कण्ठा, मन्त्र लीबे की चिता और कूबर की भक्तिये तीन्यौ भावाभाम है, सो बीभत्स रम को अंग है।'2 उपयोगितावादी दृष्टि से सम्पत्न आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदीजी ने नायक नायिका भेव जैमे कुछ विषयो का पारनरीण अनुमरण न करने की बात कहते हुए भी औषित्य के प्रति उदार व सजग दृष्टि से काम लिया है। 'रसज्नरजन' मे विषय के अनुकल छंद-योजना, अनुप्ासादि अलकारो की सहज व सार्थक योजना रस-विरोधी रक्षाक्षरो का परिहार एवं मृदु-ललिन रसानुकूल वर्णों की योजना2, भावानुरूप शब्द- प्रयोग, अर्थदीन व निरुपयोगी शव्दो का त्याग, अश्लीलता एवं साम्यता से काव्य की रक्षा तथा देन, काल एवं लोक-विरुद्वू कथन न करने की बात पर बल दिया है। समग्र विवेचन का समाहार करते हुए वे कहते है कि कवि का धर्म केवल 'पावस पचासा' लिखना नही है।" कविना को प्रभविष्णु बनाने के लिए उन्होंने उचित एव बिम्वग्नाही वर्णनोचिन पदावली का प्रयोग करने पर सानुरोध बल दिया है।११ शब्द-शक्ति-विवेचन के प्रसंग में शुकलजी ने पूर्व-परम्परा मे प्राप्त 'औचित्य' को अभिधार्थ निर्णय की कमौटी के रूप में ग्रहण किया है।9R शब्द-प्रयोग के औचित्य को म्पष्ट करते हुए वे कहते है कि विपन्नावस्था मे कृष्ण का स्मरण करते समय उन्हे 'हे कम निकंदन '' 'हे मुरारे' कहकर पुकारना ही उचिन है।"8 नवीनता के मोह मे रडकर किसी पाचीन परम्परा-प्राप्त ऐतिहामिक अथवा पौराणिक चर्तिरि के साथ खिल-

१. प० विषवनाय प्रसाद सिध्र : भिखारीदास ग्रन्थावली (हि० खण्ड), पृ० ४० म. वही, q० ४० ३. महावीर प्रमाद ह्विवेदी : रमज्ञ रजन, पृ० १४ ४. बहो, पृ० १६-१७ ५. वढ्ो, प० १ =- २० बहो, पृ० र१ बही, प० २२ 5. वहो, पु० २२ ٤٠ वहो पृ० ३२ ९०. वही, पृ० २७ ११. वही, पृ० ५६-५७ १२ भाचार्य रामचन्द्र शुक्ल. रस मीमासा, पृ० ३६३ बहो, पु० ३६

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६४ औचिय सदातिक विवचन

बाड़ करन के व विरोधी थ। अत वे पात्र या चरित्र मे मनमाता परिवर्तन करने के पक्षपाती नही थे। एक स्थान पर वे कहते हैं कि "केवल अपने नमय की परिस्थिनि विशेष को लेकर जो भावनाएँ उठती है, उनके आश्रय के लिए जबकि नए आख्यानो और नए पात्ों की उदभावना स्वच्छन्दतापूर्वक की जा सकती है, तब पुराने आदर्शो को विकृत या खण्डित करने की क्या आवश्यकता है? "आचार्य आनन्दवर्द्धन की भॉति आप भी अनौचित्य को ही' एकमाल रसभंग का कारण मानते है। वे कहने है कि 'पूरण रस मे कमर आलम्बन के अनौचित्य और अनुपयुक्तता के कारण होगी सगचा- रणत्व के कारण नही।"3 आश्रयगन एवं आलम्वनगत विरोध को रसभग का कारण मानते हुए परस्पन- विरोधी भावों की एक स्थानीय स्थिति वे अप्रनोजनीय व धातक मानते हैं। उकका कहना है कि "बहुत से भाव ऐमे होते है-जो एक हो आलर्बन के पति एक साथ नहीं हो सकते जैमे जिस व्यक्ति के प्रनि कोई रति भाव प्रकट कर रहा है, उसी के प्रनि उसी अवसर पर वीर-भाव या जुगुप्ला का भाव नही प्रकट कर सकता।"* शुवलजी के समस्त विवेचन में परम्परा-पालन के साथ-साथ निजी मौनिक दृष्टि भी सलगन है। शुक्लजी ने औचित्य की शब्दार्थ निणय की एक कलौटी, अवसद एवं भावोचित पद प्रयोग, ऐतिहासिक व पौराणिक चरित्रो की रक्षा एवं अविकृनि, प्राचीन आदर्शों की रक्षा का प्रयल्न, रस या चारुस्व का रहस्य नया अनौचित्य को रसभंग का एकमात कारण, परस्पर-विरोधी भावों एवं रमों की योजना का परिहार आदि दृष्टियो (आदि रूपो में) से ग्रहण किया है। प्रधानना रम-दृष्टि की ही रही है। आचार्य पं० बलदेव उपाध्याय ने औचित्व पर दो दृष्टियों से विवार किया है. (१) लोक-व्यवहार की दृष्टि से और (२) शास्त्रीय दृष्टि से। शास्त्रीय दृष्टि में आपने काव्य-शास्त्रीय व नौंदर्य-शास्त्रीय-दोनो दृष्टियो रे विचार किया है। लोक-व्यवहार की दुष्टि में विचार करने पर उनकी दृष्टि से 'औचित्य' मनु्य के आचरण के सन एवं असत् का निर्णायक कहरता है। मनुन्य के सद्व्यवहार और असद् व्यवहार का निश्चय औचित्य की कलौटो पर ही होता है! औचित्म ने विचहिन व्यवहार को ही वे 'असद् व्यवहार' की संज्ञा देते है। औचित्य लोक-व्यवद्ार की सीमा का निर्धारण करने वाला तत्व है। औचित्य के अभाव मे सामाजिक जीवन छिन्न-भिन्न होकर अव्नवस्था के गते मे जा गिरेगा।५ कला एवं सौन्दर्य-जगत मे 'चित्य' के स्थान व महत्त्व को आचार्यजी ने

१ झचार्य रामचन्द्र शुक्ल : रस मीमसा, पृ० ३६

३. उहो, पृ०७२ वही, पृ० २०५ पाचार्य प० बलदेव उपाध्याय : भारतीय माहित्य शास्त्र, भाम २,पृ० २६

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औचित्य सद्ातिक विवेचन ६५

सुष्ठु रीत्या प्रतिपादिन किया है। आप कहते है कि "ससार से सौन्दर्य की भावना इसी औचित्य तत्व के ऊपर आश्रित है। प्रत्येक वस्तु का अपना विशिष्ट तथा निरदिष्ट स्थान है. जहां से भ्रष्ट होकर उनका मूल्य तथा महत्त्व नष्ट हो जाता है। शरीर को सुसज्जित करने के लिए आभूषणों की सृष्टि की गई है। परन्तु इन आभूपणों का आभूषणत्व तभी तक है, जब नक वे उचित स्थान में धारण किये जाते है। अनुचित स्थान पर धारण किया गया अलकार केवल अमुन्दर ही नही प्रतीत होता प्रन्युत् धारण करने वाले की मूर्खता का कारण बनकर उसे उपहामास्पद सी बना देता है।"१ अनौचित्य को आश्रय देने वाली कला को वे वाला नहीं मानने। राव्य-कला एवं नाटक मे रस की चारुता का रहस्य वे औचित्व को ही मानते है।3 औचित्य' को काव्य के अतरंग, गढ राव सक्ष्म तत्व के रूप मे प्रतिष्ठिन कर उसे वे विश्व-साहित्य के इतिडाम ने भारतीय साहित्य की महती व महिमाणालिनी ढेन मनते है। आचार्य पं० बलटेव उपाध्याय की ही नाति, आचार्य पं० विश्वनाधप्रसाद मिश्र भी औचित्य पर सामाजिकता के दृष्टिकोण से तथा साथ ही चारुत्व के रहस्य के रूप से विवार करते हुए प्रवीत होने है। कलागत औचित्य को भी वे सामाजिकना के द्वारा अनुशासित मसलते है। आचार्यजी का कहना है कि- औचित्य-अनौवित्य का सारा विचार अभिनवगुन्तपादाचार्य ने सामाजिकता की ही दृष्टि से किया है। रीति-बव्न कविता करने वाले कितने ही कर्ताओं ने औचित्य का विचार किये बिना ही अलवारों की योजना कर दी है। यदि कोई करुण प्रमंग मे यमक को कारीगरी दिखाने बैठे तो क्या कहा जायेगा? यही न कि कविजी सामा- जिकता से कोनो दूर है। 'यम' के प्रसंग मे यमक न लना ही बुद्धिमानी है। य्रथार्थ से. सामाजिक व्यवहार से इसका मेल नही।"1 औचित्य को मूलत मामाजिकता से सम्बद्ध मानते हुए भी आचार्यजी उसे अनुभूति-प्रवाह से घनिष्ठनम रूप मे सम्बन्ध मानते है। इनी कारण वे एक स्थान पर लिखते भी है कि "पारुत्व प्रवाह मे जो स्थान वकोक्ति का है, नही स्थान अनुभूति- प्रवाह मे औनिल्य का है।"8 महिमभट्ट के विचारों का उल्लेख करते हुए वे औचित्य को काव्म-म्वरप-निर्माण का मुलाधार मानते है तथा रसात्मा काव्य को अनौचित्य के स्वन्प म्पर्श-मात्र मे भी दूषित समझते हैं। रसादि की प्रतीति में त्रिन्न-रूप होने मे अनोचिन्य को नो वे सब स्थिनियो मे परिहार्म (परिहर्तव्य) ही सममने है। अनौचित्य

१. आनार्थ पे० बनदेव उपाध्याय भारतीय साहित्व-शास्त्र, भाव २, ५ृ० २६-३० यहो, पृ०३१ 2. यही, पू० ३२ 4 दहो, पृ० १३० शज्य विशवनाथप्रमाद मिश्र, बाङममविमर्श, पृ १४८ ६ बही, पृ० १८७

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६६ ओचित्य : संद्धातिक विवेचन

को वे दोष का सामान्य लक्षण ही कहते है।१ आचार्यजी के 'औचित्य' विषयक विस्तृत विचार परिशिष्ट में दिये गये पत्र मे द्रष्टव्य है। विराद मानव-मूल्यों न मानवता पर ही आचार्य हजारीप्रसाद व्विवेदीजी का समस्त साहित्य-चिन्लन प्रतिष्ठित है। 'औचित्व'-विचार करते समय वे कवि एवं भावक (समीक्षक) दोनों की दृप्टियों से औचित्य के स्वरूप व महत्व पर विचार करते है। उनके मामन कुछ प्रश्न हैं-शब्द की सार्थकता कया है? किसी कार्य या व्यापार से औचित्य का निर्णय कैसे किया जाय ? आदि। इन प्रश्नों के अनुचिन्नन मे वे उत्तर भी देते है- (१) एक वयक्ति के चित्त में उदित उचित अर्थ को दूसरे व्यक्लि के चित्त में प्रवेश करा देना ही शब्द की कार्थकता है। (२) बुहत्तर मानवीय नैनिकता के तुला- दण्ड पर रखकर ही हस प्रन्येक कार्य के औचित्य का निर्णस घर मकेंगे। उनके विचार में वह सव कुछ उचित हे, जो सनुष्य को चेतनवर्स (मनुष्यता) के साक्षान्कार की ओर के जाय। गहा पर द्विवेदोजी ने औचित्य पर बडे व्यापक दृप्टिकोण मे विचार किया है। काव्य में कलागत औचित्य की यथार्थ महिमा स्वीकार करते हुए भी वे विषय-रुस्तु- नम्बन्धी औचित्य पर अधिक बल देते है, जो यथार्थ म अधिक ग्राह्य प्रतीत होता है. क्योंकि यदि मूलत, काव्य-वस्तु या विषय ही उचिन न होगा, तो वह आस्वाद्य बन ही कैम पारगा? प्रत्येक सर्जक अत्यन्त सजगता के साथ वस्तुगत औचित्य के सन्निवेश पर सनर्क रहे। वस्तुगत औदित्य की रक्षा वे कवि त भावक दोनों की दृष्टियों से अनिवार्य ममशते है।२ स्त्र० आचार्य प० नन्ददुलारे वाजपेयी ने औदित्य के विषय में निम्न जिज्ञानाए उपस्थित की है-(१) औचित्य कोई स्वतंत्र काव्य-सिद्धांत है या एक विचारवारा नात (२) औचित्य केवल अंग-नियोजन मे है या अर्प्य-विषय मे भी ? (३) पश्निमी अंग- संगति और भारतीय औचित्व-विचार में परस्पर क्या साम्य-वैषम्य है? (४) औचित्य के प्रकृति स्थिर है या गतिशीक? (X) औचित्य का एकमत स्रोत लोक ही है या गास्त्र भी? (६) क्षेनेन्द्र ने रसौचित्य को औचित्य का सेद मानकर रम को एक काव्याग हो माना है या कव्शता ? यदि रस काव्यांग है, नो अंगी कौन ? (७) खेनेन्द्र ने औचित्य के भद-प्रभेदो में रसाभासो एव भावाभासी को चर्चा वर्यी नही की? इन प्रश्नों के उत्तर उन्होन किये है-(१) औचित्म रस एव व्वनि-सिद्धान्त 'की भाति स्वतन्त्र काव्य-सिद्धान्त नही है। उनके विचार में औचिय्य दे स्वनन्त्र काव्य-सिद्धाल्न का स्थान ग्रहण करने जितनी मौलिकता न यी। वे औिन्य को काव्य

आवार्य विशयनाथप्रसाद मिन् वाड्सय विमर्श, पृ० ९:७ डॉ० राममूति विपाटी औचित्य विमश. पृ० १६६-६० वही (भूमिका) . ५० १६१६६

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औचित्य सैद्धातिक विवेचन ६७

के विभिन्न तस्वो को संतुलिन योजना करने वाला एक विचार मानते है। (२) औचित्य केवल अग-नियोजन ही नही है, वह उसमे व्यापकतर वस्तु है। (३) पश्चिमी अंग-समनि और भारतीय औचित्य-विचार में साम्य यह है कि दोनों का लक्ष्य काव्य को मयत, सुचारु बनाकर, उसके विरोधी या घातक तत्वो को रोककर काव्य के स्वरूप मे एक व््यवस्था लाना है। वैषम्य यह है कि औचित्य अग-सगतति से व्यापकनर है। अग-संगति की प्रमक्ति केवल कला-पक्ष तक सीमित है, जर्बक औचित्य- विचार, कला-पक्ष एव नीतिशास्त्रीय सोमाओ को भी स्प्श करना है। (४) औचित्य के प्रौिमन गतिशील है, क्योंकि वे नदैव लोकान्वित है और लोक का स्वरप कभी स्थिर नही होता, सदैव गतिशील ही रहता है। (५) लोक से अविरुद्ध होकर भी औचित्य काव्य और गास्त्र की परम्परा मे गृहीन नैतिक आद्शों से भी सम्बद्ध है। (६) रसौचित्य की कल्पना करते समय क्षेमेन्द्र औचित्य पर कवि या सर्जक के दृष्टि- कोण से नही, कि्नु भावक या समीक्षक के दुष्टिकोण से विचार करते हैं। केमेन्द्र केवल इतनी जाँच-भर कर लेना चाहते है कि 'रस' भी उचित दग से निबद्ध हुआ है या नही। इससे 'रस' का अगत्व सिद्ध नही हो जाता है। रस की सत्ता पर कोई आघात नही पहुँचता। (७) पूर्वाचायों ने रमाभासी और भावाभासों की चर्चा की है, अतः क्षेमेन्द्र पिष्टपेषण करना नही चाहते थे। निष्कर्पत वे मानते है कि क्षेमेन्द्र का औचित्य-मन अपेक्षाकृत अधिक बुद्धि-सम्मन एवं वास्तविक, परिवर्तनशील मामाजिक- नैनिक आदर्शों के साथ नित्य-सुसंगत मत है। वे उरे आत्मवादी सिद्धान्त न मानकर व्यावहारिक समीक्षा की एक विशिष्ट पद्धनि (विधि) मानते हैं। कलागत नामजस्य और नैतिक आदर्शों का संयोजन कर काव्य के द्वारा सामाजिक आह्वाद के लक्ष्य को पूर्नि कशने में आचित्य-मत अधिक सफलता प्राप्त करता है। उनके मत से 'शचित्य- मत' भारतीय काव्यशास्त्र की विचारण का एक उत्लेखनीय मन है। अचार्य डॉ० नगेन्द्रजी के औचित्य-विषयक विचारो का सार इस प्रकार प्रस्तुन किया जा सकता है- (१) सामान्य भाषा काव्य-सापा से निन्न होती है। काव्य-भाषा मे रस दया तक पहुँचाने की क्षमता होनी चाहिए। काव्य-भाषा मे रस-दशा तक पहुँचाने की इस क्षमता का विरोधी तत्त्व है अनौचित्य। औचित्य का व्यतिकम ही समस्त दोषों का सूलद है। रस का उत्क्यक तत्त्व है गुण और अपकर्जक तत्व है दोष। साहित्य में पढ- विपयक व्याकरण-विषयक, वुद्धि एवं भावना-विषयक औनित्व आवश्यक रना गया है। इनमे पद-विषयक एवं व्याकरण-विपयक औचित्य का सम्बन्ध भापा मे है। पद विषयक औचित्य शब्द और अर्थ के सामंजस्य पर एवं व्याकर्ण-विषयक औचित्य पदों की आर्थी व्यवस्था पर आधित रहता है। बौद्धिक औचिल् भी अन्ततोगत्वा गब्द-नयन में आवश्यक विवेक से सम्बद्ध होने के कारण भाषा-प्रयोग की संगति अर्थात औित्य से सुस्बद्ध है। अतः काव्य-भापा में तीन प्रकार के औचित्यों का धर्यान रखना आवश्यक है। अन्तिम औचित्य, भावना-विशयक औचित्य स्पष्टतः रस में सम्बद्ध है। इन औचित्यों

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६५. औचित्य सैद्धातिक विवचन

के अभाव में उत्पन्न होने वाले दोषो की चर्चा करते हुए डॉ० नगेन्द्र लिखने है कि पद- विपयक औचित्य के अभाव मे श्ुनिकटुत्वादि पद-दोष उत्पन्न होते है। व्याकरण-विषयक औचित्य के अभाव मे न्यूनपदत्वादि वाक्य-टोषो का जन्म होना है। बौद्धिन औचित्य के भग से प्रसिद्धि-त्याग आदि ढोषों का उदम्व होता है। भावता विषयक औचित्य न रहने से अश्लीलता आदि रम दोषो की सभति होती है। इन दोषों से मानसिक मवेदन मे असामंजस्य, अर्थ गहण मे अवरोध, बौद्धिक मवेदनो पर आघात और रसानुभूति म विरोध उत्पन्न होता है।1 (२) श्रुतिकहुत्वादि के कारण विरोधी ऐन्व्रिय चित्र का आरोप होने से ग - बड हो जानी है। न्यूनपदादि के कारण मनसिक चित्र बहुत धुधला और अस्पष्ट बन जाता है। रन दोषों के कारण दो परस्पर-विरोवी मानसिक चित्रो का एक-दुमरे पर आरोप होने से भावचित्र पूरा नही हो पाता।१ शास्त्रीय पीठिका पर तथा मनोवैज्ञानिक दुष्टि से डॉ० नगेन्द्र ने औचित्य पर बिमर्श किया है। औदित्य : भेद, वर्गीकरण एव व्यापक महत्व भारतीय-समीक्षा मे 'औचित्य' के भेदोपभद-निरूपण का इतिटाम बहुत सक्षिप्त व सरल ही है। सर्वप्रथम भरत ने नाटक के सन्दर्भ मे 'औचित्य' के प्रमुख हो भेद निरूपित किए : (१) 'अभिनयौचित्य' और (२) 'प्रकृत्यौचित्य'। 'अभिनयाँचित्य' के अन्तर्गन वे पात्र के वम, जाति, अवस्था आदि के अनुरूप वेश, वेश के अनुरूप गति, गति के अनुरूप पाठ्य, पाठ्य के अनुरूप अभिनय का समावेश करते है। 'प्रकृत्यौचित्य' से उनका तात्पर्य पात्र की प्रकृति-दिव्य, अदिव्य, दिव्यादिव्य-की रक्षा एवं तदनुरूप व्यवहार का सन्निवेश करना है। परवर्ती प्रमुख आचार्यो के औचित्य-विमर्श व औचित्य भेद-निरूपण के जीज भरत के इन भेदों में ही है। यशोवर्मन ने महाकाव्य के प्रसग में औनित्य के प्रमुख दो भेदो का निरूपण किया-(१) 'वचनौचित्य' (अर्थात् भापौचित्य) । (२) 'रसौचित्य' महाकाव्य और नाटक में अवसरोचित रस-पुष्टि को वे रसौचित्य कहते है तथा पालानुरुम भाना-प्रयोग को वचनौचित्य। सु्द्रट ने काव्य-मीमांसा के प्रसंग मे ही औखित्य के छह सेद निर्वजिन किये- (१) छन्दौचित्य', (२) 'वृत्त्यौचित्य', (२) 'अलकारोचित्य', (४) 'बक औित्य' (५) 'विषयौचित्य', (६) 'पद-सघटनौचित्य'। निश्चय ही मुद्रट का यह भेद-निरुपण मौलिक है। चिन्नन-दूव भल ही पूर्वाचार्यो से निजा हो, परत्तु काव्य के सुग् उपकरणो मे सम्बद्ध इन छह औचित्य-भेदों की कल्पना आचार्य की प्रथम कल्पना है तथा मीलिक प्रतिभा का परिचय ढेनी है। आनन्दवर्द्धन ने भी छह प्रकार के औनित्य-भेद विवक्षित किये है: (१ १. ड० नगेन्द्र, भारतीय काव्यभास्त्र को भूमिका, ५० ७६-० २. यही, पृ० ७६-८०

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ओचित्य संद्धातिक विवेचन ६१

'सघटनौचित्य', (२) 'रीति-औचित्य', (३) 'गुणौचित्य', (४) 'अलकारौचित्य', (५) 'प्रबन्धौचित्य' और (६) 'रसौचित्य'। आचार्य रुद्रट से एक कदम आगे बढकर आनन्द- वर्द्धन ने अलकार, प्रबन्ध व रस का भी स्पर्श कर लिया है। रु्व्रट ने रसौचित्य पर विचार नही किया था, आनन्दवर्द्धन ने कर लिया। रुद्रट मे आधार पाकर भी आनन्द- वर्द्धन ने अपनी पर्याप्त मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। अभिनवगुप्त भेदोपभेद- निरूपण मे नही पड़े। उन्होंने तो केवल व्याख्या की है। इन व्याख्याओं मे उनका पाण्डित्य झलकता है। उनके शिष्य क्षेमेन्द्र ने विस्तृत भेदोपभेद-निरूपित किए है : " (१) पदौचित्य, (२) वाक्यौचित्य, (३) प्रबन्धौचित्य, (४) गुौचित्य, (५) अलकारौचित्य, (६) रसौचित्य, (७) क्रियौचित्य, (८) कारकौचित्य, (६) लिंगौचित्य, (१०) वचनौचित्य, (११) विश्वेषणौचित्य, (१२ ) उपस्गौं चित्य, ( १३ ) निपातौचित्य, (१४) कालौचित्य, (१५) देशौचित्य, (१६) कुलौचित्य, (१७) व्रत्रौ- चित्य, (१८) तत्त्वौचित्य, (१६) सत्त्वौचित्य, (२०) अभिप्रायौचित्य, (२१) स्वभावौ- चित्य, (२२) सार-मग्रहौचित्य, (२३) प्रतिभौचित्य, (२४) अवस्थौचित्य, (२५) विचारौचित्य, (२६) नामौचित्य, (२७) आशीर्वादौचित्य। अन्त मे क्षेमेन्द्र ने 'काव्यस्यागेषु च प्राहुरौचित्य व्यापिजीवितम्' कहा है अर्थात् इसी प्रकार काव्य के अन्य अंगो के औचित्य की बात आचार्यो ने की है। क्षेमेन्द्र की इस पक्ति के आधार पर कुछ विद्वान् 'अन्य काव्याग सम्बन्धी औचित्य' नामक २८ वॉ भेद भी प्रकल्पित करते प्रतीत होते है। क्षेमेन्द्र परवर्ती आचार्यो मे भेद-निरूपण की यह प्रवृत्ति मन्द पड गयी। आधु- निक विद्वानो में पुनः इन सूक्ष्मातिसूक्ष्म भेदों का प्रमुख बड़-बडे वर्गो में अन्तभव करने की प्रवृत्ति हुई। अर्थात विश्लेषण से सश्लेषण की ओर प्रवृत्ति होने लगी। डॉ० मनोहर लाल गौड तथा डॉ० रामपाल विद्यालकार ने इसी आधार पर अपने वर्गीकरण प्रस्तुत किये है, जो क्रमश यहाँ दिए जा रहे हैं। डॉ० मनोहर लाल गौड औचित्य

शब्द-गत काव्य-शास्त्र-गत चरित्र-गत परिस्थिति-गत १ पद-औचित्य १. प्रबंध-औचित्य १. व्रत-औचित्य १. काल-औचित्य २ वाक्य-औचित्य २. गुण-औचित्य २. सत्व-औचित्य २. देश-औचित्य क्रिया-औचित्य ३. अलंकार-औचित्य ३. अभिप्राय- ३ कुल-औचित्य * ४ कारक-औचित्य ४. रस-औचित्य औचित्य ४ अवस्था-औचित्य ५ लिंग-औचित्य ५. सार-संग्रह-औचित्य ४ स्वभाव-औचित्य ६. वचन-औचित्य ६ तत्त्वऔचित्य ५. प्रतिभा-औचित्य ७. विशेषण-औचित्य आशीर्वाद-औचित्य ६. विचार-औचित्य र. उपसर्ग-औचित्य र. काव्य के अन्यांग- ७ नाम-औचित्य ६ निपात-औचित्य औचित्य

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4 डॉ० रामपाल विद्यालंकार औचित्य

मीमांसा व्याकरण काव्य-शास्त्र लोकव्यवहार

१. पद-औचित्य १. किया-औचित्य कवि की अन्तर्दृ ष्टि

१. गुण-औचित्य

२. वाक्य-औचित्य १. देस-औचित्य १. तत्त्व-औचित्य

२. कारक-औचित्य २. अलंकारऔचित्य

२. प्रबन्ध-औचित्य ३. लिंग-औचित्य २. कुल-औचित्य २. सत्त्व-औचित्य

३. रस औचित्य ३. व्रत-औचित्य

४, वचन-औचित्य ३. अभिप्राय-चित्य

५. विशेषण औचित्य ४. स्वभाव-औचित्य ओजित्य : संद्धातिक विवेचन

६. उपसर्ग-औचित्य ५ सार-संग्रह-औचित्य

७. निपात-जतित्य ६. प्रतिभा-औचित्य

  1. काल-औचित्य ७. अवस्था-ओचित्य ८. विचार-औचित्य ६. नाम-औचित्य १०. आशीर्वाद-औचित्य ने

1 41

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औदित्य सद्वातिक विवेचन ७१

इन वर्गीकरणो पर पुन. विचार अपेक्षित है। डा० गौड का वर्गीकरण यादृच्छिक है तो डा० विद्यालकार ने भी वर्गीकरण के आधारों का स्पष्ट रेखाकन या विभाजन नही किया।

कवि, काव्य और सहृदय (भावकभूत सनीक्षक) के चैत को केन्द्र ने रख कर इन २ भेदो को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है :

औचित्य

कवि-गत काव्य-गन सहदय-गल

विचार-तल्व व्यक्तित्व भापा अलकार भाव छन्द देश कुल व्रत

तत्व सत्व पद प्रबन्ध

विचार अभिप्राय नादय रस

नाम स्वभाव गुण

आगीर्वाद प्रतिभा किया

अवस्था कारक

सारतंग्रह लिंग

वचन

विशेषण

उपसर्ग

निपात

काल

औचित्य का एक अन्य वर्गीकरण यह भी हो सकता है कि उसे प्रमुख वो बगों में ही विभक्त कर दिया जाय : वस्तु-सम्बन्धी औचित्य और (२) गिल्प-सम्बन्धी औचित्य । वस्तु-सम्बन्धी औचित्य भी भाव, विचार, वस्तु-विन्यासादि उपवर्गो मे विभाजित किया जा सकता है। शिल्प-सम्बन्धी औचित्य को भाषा, छन्द, अलकार, कल्पना आदि वगों बाँटा जा सकता है जी निम्न 'चार्ट' से पूर्णतः स्पप्ट हो जायगा :

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७२

औित्य

वस्तु-गत शिल्प-गत

--

वस्तु-विन्यास विचार भाव या रस भाषा छन्द अलकार कल्पना

रस छन्द अलंकार प्रबन्ध प्रतिभा अवस्था

--

पद वाक्य गुण किया कारक लिंग वचन विशेपण 1 उपसगे निपात काल औचित्य सैद्ध

तत्व सत्व अभिप्राय स्वभाव सार-सग्रह विचार

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आचिय मवातिक विवेचन ७३

महत्व औचिय के व्यापक महत्व पर म० म० कुप्पु स्वामो शास्त्री के एक रेखाकन का डा० राघवन् ने प्रतुत किया हैं जिसे यहाँ प्रस्तुत करना सप्रसग ही होगा। औचित्व की व्यापक महत्ता इसमे स्वतः स्पष्ट हो जाती है।

रस

रीति

वक्रोक्ति *- औचित्य

गुण अलकार

ध्वनि अनुमिति

औचितीमनुधावन्ति सर्वे ध्वनिरसोन्नया: ।

निष्कर्ष गुणालंकृतिरीतिना नयाश्चानृजुवाड्मया.।।

'औचित्य' का सद्धान्तिक विवेचन-विश्लेषण स्वत हमे कतिपय परिगामों तक पहुंचाता है। औनित्य-तत्व सम्बन्वी उपलब्ध परिणाम इस रूप में प्रस्तुत किये जा 1 सकते हैं (१) 'औचित्य' शब्द 'उच्' और 'वच्' दोनो धानुओो मे मिद्ध किया जा ककता है। रूप-विचार की दृष्टि मे उसे 'उच्' धातु से और अर्थ-विचार की दृष्टि मे उने 'बच' धातु मे व्युत्पन्न मानना समीचीन प्रतीत होता है। 'औचित्य' के वर्तमान अर्थ तक पहुँचने के लिए अर्थ-विन्तार की प्रवुत्ति का आश्रय लेना पडेगा। (२) 'उचित' के भाव को ही 'औचित्य' कहते है। जो जिसके सदग या अनु- कूल है, वही उचित है। इस दृष्टि से 'औचित्य' एक अनुकूल सम्बन्ध विशेष है, जो, 'अनुकूलनीय', 'अनुकूलनान' और 'अनुकलन व्यापार'-तीनो की अपेक्षा रखता है। (३) भारतीय काव्य-मीमासा मे 'अनुरूपता', 'युक्तता', 'न्याय्य', 'योग्यता', I. M. M. Kuppuswami Shastrr . Highways and Byways of Literary Criticism In Sanskrit, p. 27

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७४ ओचित्य सद्धातिक विवेचन

'समीचीनता', 'उपयुक्तता', 'अनुकलता', 'मद्रता', 'समजसता', 'अनुगुणता' आदि तथा पश्चिमी काव्य-मीमांसा मे, 'Propriety', 'Decourum','Adaptation', 'Appro- priateness', 'fitness', 'Inkeeping', 'Symmetry', 'Harmony', 'Mutual Conformity of parts', 'Sympathy' आदि 'औचित्य' के समानार्थी कहे जा सकते है। (४) 'वाद', 'सम्प्रदाय', 'मत', 'सिद्धान्त' एव 'विचारधारा' आदि संज्ञाओ मे से 'औचित्य' को 'सिद्धान्त' की मंज्ञा देना विशेष समीचीन होगा। (५) 'औचित्य' काव्य तथा जीवन के सब क्षेत्रो में और विभिन्न शास्त्रो- व्याकरण, साहित्यशास्त्र, आचार-शास्त्र, सौन्दर्य-शास्त्र, लोक-व्यवहार, राजनीति आदिमे अपना महत्त्व रखता है। संभवतः 'औचित्य' की मूल अवधारणा 'पतजलि' के महाभाष्य' में उपलब्ध शब्दो के साधुत्व-असाधुत्व-विवेचन से प्रेरिन व पुष्ट हुई हो! (६) विभिन्न काव्य-सिद्धान्तो व सम्प्रदायों के प्रत्यक्ष सन्दर्भ मे 'औचित्य' पर विचार करने पर इस बात की प्रतीति हो जाती है कि इन पर प्रत्यक्षत या परोक्षन 'औचित्य' का नियत्रण है। (७) 'औचित्य' की प्रसक्ति बडी व्यापक है, अत पश्चिमी 'अग-भगनि', 'काव्यीय-आचार-सहिता' अथवा 'रस सिद्धान्त की नैतिक व्याख्या', 'औचित्य' के रूप को सर्वथा अन्तिम या पूर्ण रूप से निर्वचित नही कर पाती। औचित्य इनमे अवस्थित है और इनके बाहर भी। (र) औचित्य-स्वरूप-बोध विषयक विमर्ग का निप्कर्ष इस प्रकार है : (क) 'औचित्य' लोकाश्रित है और शास्त्राश्रित भी। तान्तनिक दृष्टि ले उसे लोकाश्रित अधिक मानना पडेगा। यदि औचित्य का कोई शास्त्रीय आधार है तो वह धर्मशास्त्र ही है। यह एक स्मार्त काव्य-सिद्धान्त है। (ख) काव्य के सन्दर्भ मे औचित्य उसके अन्तरग एव वहिरंग-दा्नो पक्षो से सम्बद्ध है। काव्य के अन्तरंग में स्थित रहकर वह काव्य के विपय-वस्तु की ग्राह्य- ता-अग्राह्मता एवं औचित्य-अनौचित्य का नियंत्रण करता है। यदि वस्तु स्वय उचित नही है तो काव्य-सृजन असंभव है। काव्य के बहिरग से सम्बद्ध होकर वह वस्तु की अभिव्यक्ति का स स्कार-परिप्कार करता है। यहाँ वह अभिव्यकत के समस्त उपकरणो को अपने निकष पर चढ़ाकर ही उन्हें प्रयोज्य-अप्रयोज्य सिद्ध करता है। (ग) 'औचित्य' कलागत है और सामाजिक भी। उसका कलागत रूप शैली का सयमन कर नित्य नूतन आकर्षक भगिमाओ के आविष्कार मे निरत रहता है। उसका सामाजिक-पक्ष वस्तु की आस्बाद्यता के विरोधी तत्त्वो की रोककर वस्तु के प्रति उठी हुई सामाजिक किया-प्रतिक्रियाओं की मीमासा करता है और तदनन्तर उसे ग्राह्य-अग्राह्य घोषित करता है। (घ) 'औचित्य' वस्तुगत है और विषयिगत भी। विशिष्ट परिस्थितियो में ही उमकी विषयि-निष्ठता ग्राह्य होती है। सामान्यत. वह वस्तुनिष्ठ ही अधिक माना गया है। (च) 'औचित्य' जितने अशो में सनातन मान्यताओव धारणाओ का आश्र-

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नीचिय सैद्धातिक विवेचन

रण करता है उतने अशों मे वह 'स्थिर' है और जीबन-प्रवाह के साथ-साथ गतिशील परिदर्तित होते रहने के कारण वह गतिशील भी है। सामाजिक नैतिकता और लोक- यवहार का रूप समय-समय पर बदलता रहता है। इन परिवर्तनो से औचित्य प्राय अपना स्वर मिलाता चलता है। (छ) 'औचित्य' के निरपेक्ष-रूप की स्थिति असभव नहीं है परन्तु काव्य-समीक्षा मे तो उसे 'सापेक्ष' ही स्वीकार करना पडेगा। कोरा औचित्य बुछ नहीं। वह अपना प्रभाव तभी दिखा सकता है, जब विशेष्यभूत अन्य तत्त्व (रसादि) उपस्थित हो। " (ज) 'औचित्य' की आधुनिकता अमदिग्ध है। दह नित्य आधुनिक ही बना रहता है, अत किसी भी युग में समीक्षक उसे छोडकर चल नही सकता। (झ) आचार्यो की परम्परा-निष्ठा तथा औचित्य के प्रति किचित् उपेक्षा-दृप्टि औचित्य के अनुवर्तन होने के कारण है। उसकी अति सरलता एव व्यापकता भी कारणभूत हो सकती है। (द) 'औचित्य' का निर्णायक समीक्षक है, क्योंकि कवि सर्जनात्मक प्रक्रिया के अवसर पर औचित्य-रक्षा के लिए कोर्ड सजग सायास चेष्टा तो नही करता। सर्जनोपरान् वह स्वय जब समीक्षक दृष्टि से विचार करता है तब औचित्य-अनोचित्य पर दृष्टि डालना है। भावक भी तब समीक्षक की कोटि मे सकान्त हो जाता है। (६) पूर्वीय और पश्चिमीय साहित्य-नीमासा मे औचित्य के प्रति प्रमुख दृष्टियो का रूप इस प्रकार रखा जा सकता है- (अ) 'औचित्य' रस के भी पत्म-रहस्य के रूप मे मान्य एक व्यापक काव्य- सिद्धान्त समझा गया है। (आ) 'औचित्य' संगति एव सामजस्य स्थापक काव्य-सिद्धान्त है (इसके अन्न- गंत अग-सगति, तार्किक अन्विति और अवयवी के अनुरूप अवयव-योजना आदि समा- विष्ट हो जाते है)। (इ) काव्य मे विषय, वक्ता, भाषा, शैली, छन्द, अलंकार, गुण, दोष, प्रबन्ध एव रस की उचित योजना के नियामक तत्व के रूप में 'औचित्य' को स्वीकार्य समझा गया है। (ई) औचित्य को गुण का पर्याय भी माना गया है तथा एक विशिष्ट गुण भी। इसी प्रकार अनौचित्य को दोष का पर्वाय भी साना गया है तथा एक विशिष्ट दोष भी। (उ) औचित्य एक अलकार विशेष के रूप में विमृष्ट किया गया है। (ऊ) आधुनिको ने 'औचित्य' को सामाजिकता-निर्वाह एवं चारत्व-सवृद्धिधे विधायक तत्त्व के रूप मे भी ग्रहण किया है।

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२ रीति-तत्त्व और रौति-युग

प्रकरण-प्रवेश

औचित्य का सैद्वांतिक विवेचन कर लेने के उपरात रीतिकालीन काव्य मे उसका व्यावहारिक समायोग करने के पूर्व 'रीति-तत्त्व' और 'रीति-युग' पर सम्यक् विचार कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है, क्योकि किमी भी युग का साहित्य अपने युगीन प्रभावों से असंपृक्त नही रह पाता। 'रीति' के यथार्थ स्वरूप का सूक्ष्म परिचय प्राप्त किये बिना रीति-युग व रीतियुगीन प्रवृत्तियो के अध्ययन के साथ न्याय नही हो सकता। रीति-तत्व व रीतियुगीन जीवन के विविध पक्षो का ज्ञान प्राप्त किये बिना रीति-काव्य का परिगीलन सर्वथा अपूर्ण समझा जाएगा और उस पर 'औचित्य-सिद्धात' का परीक्षण तो नितात असगत ही सिद्ध होगा। 'औचित्य' तो काव्य को उसके समग्र परिवेश मे ही ग्राह्य व आलोच्य समझता है। अतः प्रथम रीति-तत्त्व पर और फिर रीति-युग पर विचार करना समीचीन होगा।

रीति-तत्व रीति-तत्त्व से अवगत होने के लिए 'रीति' शब्द की व्युत्पत्ति, 'रीति' शब्द का कोश-गत अर्थ, 'रीति' का सामान्य व विशिष्ट अर्थ, 'रीति' के पर्याय, 'रीति' का अर्थ- विस्तार एवं 'रीति' के इतिहास आदि पर विचार करना आवश्यक प्रतीत हाता है। व्युत्प्ति 'रीति'गन्द पाणिनि के अनुसार गत्यर्थक 'री' (चुरादिगण)१ और श्रवणार्थक 'रीड़' (दिवादि गण)२ धातुओं मे 'क्तिन्' अथवा 'क्तिच्' प्रत्यय लगाकर निष्पन्न किया जा सकता है। 'री' का अर्थ है-गति करना और 'रीड' का अर्थ है सुनाई देना।

१ भट्टोजि दीक्षित. सिद्धान्त-कौमुदी, पृ० ४१६ २. वही, पृ० ४०२

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रीति-तत्त्व और रीति-युम ७७

अत इन धातुओ से साधित इस 'रीति' शब्द के क्रमण दो अर्थ हुए 'वह जो गनि- शील हो।' और 'वह जो सुनाई दे।' व्याकरण की दृष्टि से 'रीनि' के सुख्य दो लक्षण हुए गतिगीलता और श्राव्यता। प्रारम्भ मे 'रीति' शब्द अपने सामान्य अर्थ-गति' और 'श्राव्यता'-मे प्रयुक्त होता रहा होगा, किन्नु कालान्तर मे अर्थ-विस्तार की प्रवुनि के अनुस्पर 'गति' मा 'मार्ग-सामान्य मे 'काव्य गति' या 'काव्य-मार्ग का वह वाचक वन गया प्रतीत होता है। इसी प्रकार 'रीनि' के प्रारम्भक दो प्रमुख गुण-गगति- गोलता और श्राव्यना-भी 'काव्य मार्ग' के साथ सकात हो गय तथा 'समान्य गति' से कुाव्यगत-लय या प्रवाह एव 'सुश्राव्यता' मे रसानुरूप सधुर सुधाव्य वर्ण-योजना मे परिणत हो गए प्रतीत होते हैं।

'रीति' शब्द के कोश-गत अर्थ रीति शब्द की व्युत्पनि पर विचार कर चुकने पर उसके कोशगत विविध अर्थ भी ज्ञातव्य हैं। मोनियर विलियम्स ने अपने कोश मे' रीति' शब्द के निम्नलिखित अर्थ प्रस्तुत किये हैं : Riti (F) Going, Motion, Course, A Stream, Current, line . . Row, limit, Boundary, General Course or Way, Usage, Custom. Practice, Method Manner, Natural Poetry, Style of speaking or writing, Yellow or Pale Brass, Bell-M-tal, Rust of fron, Scon of oxide formed on metals by exposure to heat and air. श्री आप्टे महोदय ने भी 'रीति' शब्द के प्राय वे ही अर्थ दिये है जो मोनियर विलियम्स ने दिये है। संस्कृत के हलायुध कोश मे 'नीति' शब्द के अर्थ दिये गये हैं- आरकूट, कांस्य, सौराष्ट्रकम्, पित्तलम्, प्रचार, स्यन्द, लोहकिट्टम्, दग्धवर्णादिमलम्, सीमा, सुवर्ण, गति, स्वभाव, रूप, लक्षण, भाव, आत्मा, प्रकृतिः, सहज, रूप तत्व, धर्मः, सर्ग, निसर्ग, गील, सतत्वं, ससिद्धि। संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ मे 'रीति' शब्द के अर्थ इस प्रकार है-गनि, बहाव, नदी, सोता, रेखा, सीमा, ढंग, प्रकार, चलन, रिवाज, रस्न, तर्ज, शैली, पीतल, कासा, लोहे का मोर्चा, जंग, बरतनो पर की कलाई, काव्य की आत्मा। बृहत् हिन्दी कोश2 मे 'रीति' शब्द के अर्थ दिय गये है-क्षरण, झरना, टपकना,

₹. Mcnier Williams A Sanskrit-English Dictionary, p. 881 ?, V 'S Apte . The Stedents' Sanskrit-English Dictionary, p. 470 ३. जयशकर जोमी हलायुध् कोर, प० ५६७ ४. द्वारिकाप्रमाद सर्मा. मस्कृत शब्दारथं कौस्तुम, पृ० ६४% ५. कालिकाप्रसाद बृहृत हिन्दी कोश, पृ० ११३४

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रौति-तत््व और रीति-युग

कुग तरीका ढब प्रकार, रिवाज, चलन, परिपाठी, नियम, कायदा, विशिष्ट पद- रखना। हिन्दी शब्द सागर में उपलब्ध 'रीति' शब्द के अर्थ हैं-ढंग, प्रकार, तरह डब, रस्स, न्वाज, परिपाटी, कायदा, नियम, साहित्य में किसी विषय का वर्णन करने से वर्णों की वह योजना जिससे ओज, प्रसाद वा माधुर्य आता है। नालंदा विशाल शब्द सागर के अनुम्ार 'रीति' शब्द के कनिनम अर्थ इस प्रकार है-कोई काम करने का ढंग, डब, तग्ह, रम्म, रिवाज, नियम, कायदा, लोहे की मैल, गीतन, जले हुए सोने की मैल, सीसा, गति, स्वभाव, प्रगंमा, स्तुति, माहित्य में किसी विपिय का वर्णन कग्ने मे वर्णो की वह योजना जिससे ओोज, प्रसाद या साधुर्य आता है। ज्ञान शब्य कोग मे 'रीति' शब्द के अर्थ है-क्षग्ण, झग्ना, ढग, ढब, प्रकार, रिवाज, चलन, परिपाठी, नियम, कावदा, विशिष्ट पद रचना। हिदी साहित्य कोग मे भी इस शव्द के कुछ अर्थ इम प्रकार है-प्रणानी, पद्धति, मार्म, पथ, नैली आदि। बिरिष्ट अर्थ

ऊपर दिए गए अनेक अर्थो मे हमारे विवेच्प 'रीति' मब्द के अनुकल अर्थ है- दिशिष्ट पद-रचना, घोली, काव्य-परियाटी तथा साहिन्य में किसी विषय का बर्णन- करने मे वर्णो की वह योजना, जिसमे ओज, प्रसाद या माधु्य गुण आता है। 'रीति का इतिदृत

आचार्य वामन द्वारा 'काव्यात्मा' के रूप मे प्रयुक्त किये जाने के बहुत पूर्वे ही 'विशिष्टा मढ-रचता' रूप यह 'रीति' शब्द विभिन्न अर्थो में प्रयुक्त हो चुका था। संसेप मे 'रीति' की इस विकास-याता का बिहंगावलोकन कर लेना यहाँ पर प्रसंग- प्राप्त ही होगा। 'रीति' शब्द का नर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेव में तीन स्यानो पर भिन्न- भिन्न अर्थो मे हुआ पाया जाता है।4 चड्रॉ पर प्रयुक्त 'रीति' शब्द के अर्थ कमश. स्तुति, शीघ्रगति, नमविता (प्रर्क) है। तटनन्नर पाणिनि ने उसकी व्युत्पतति पर विचार करते हुए उसके वात्वर्य पर विचार किया और तदनुसार रीति के दो गुण- गनिशीलता और आ्राव्वता-स्थिर किने पतजनि ने अपने महाभाष्य मे 'रीति' के

रामचन्द् दर्माहिल्दी शब्द सागर, मृ० ६४६ नवलजी नालन्दा विमल शब्द सामर, पृ० १५८५ मकुन्दीलाल धीआत्तन जञान शब्द कोह, पृव ६५७ ४ डॉ० घीरेन्द्र वर्मा . हिन्दी म्ाहित्य कोम ५० ६५६ उ० हजारोप्रसाद द्विवेदी (सपा०) कव्यशास्त्र मे परुलित डॉ० पारसनाथ दविवेवी का रीति और आचार्य परम्परा' सेख, पृ० १२२ मट्टोजि दीक्षित - सिद्धान्न कोमदी, ५ृ० ४१६, ४०२

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रीनि ततत्व और गीति-युग ७६

अथ मे रौली शब्द का प्रयोग किया-'एषा हि आचार्यस्य रैली लक्ष्यते।"१ 'शील' सब्द में अण प्रत्यय लगाकर (स्त्रीलिग में डीप् प्रत्यय जोड़कर) शैली शब्द सिद्ध किया जाता है।" ऊपर बेव और व्याकरण मे 'रीति' शब्द के प्रयोग का उल्लेख हो चुका है। माहित्यशास्त्र में उसके प्राचीनतम प्रयोग का उल्लेख 'सबणनाभ' के लाय जोडा जाता हैं। राजशेखर ने अपनी 'काव्य-नीमाना' मे 'रीति' के आदि व्यवस्थापक के रूप मे 'सुवर्णनाभ' का नामोल्लेख किया है। वे कहते है-रीनिनिर्णय सुवर्णनानः, आनुप्रासिक प्रचेना, यसके यम चिवं चितानद: "3 भारतीय काव्यशास्त्र के आदि-प्रणेता आचार्य भरत नुनि ने अपने 'नाद्मणास्त्र' में 'प्रवृत्ति' संज्ञा से 'रीति' का विवेचन किया है। 'ाट्यशास्त्र' का प्रमुख प्रतिपाद्य था 'नाट्यरस' अतः अभिनय के अंगभुत वेजभूपा, भाषा एवं आचार के औचित्य पर भन्न ने विरोध बल दिया है। नाना देवो के वेश, भाषा व आचार के समुच्चय को वे 'प्रदृत्ि' कहते है। 'नाट्य-रस' मे प्रवृत्ति का ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रवृत्ति को स्पष्ट करते हुए भान मुनि कहते है-"प्रवृततिरिति कस्सात् उच्चत-पृथिव्यां नाना देशवेश सापाचार वार्ता: स्यापयतीति प्रदृत्तिः। बल्शिवि निवेदने।" अथति भरत मु्नि ने विभिन्न देवों के वेश, भाषा एव आचार की वार्ता का ख्यापन कराने वाले तत्व को प्रवुतति' कहा है। अत' 'प्रवुनि' मूलत भौगोलिक एवं जनमदीय आवारों पर निर्भर करती है। इस जनपदीय आधार पर भरत ने प्रृत्ति के चार भेद माने है-(१) आवन्ती अर्थात् पश्चिमी, (२) औड़ मागधी अर्थात् उडीसा, यगध व पूर्वी भारत की, (३) दाक्षिणात्या अर्थाल् दक्षिण भारत की और (४) पाचाली अर्थात् मध्यदेशीय। साराश यह कि भरत ने रीति के लिए 'प्रवृत्ति' शब्द का प्रयाग किया है। भरत की 'दुति' सूलत, नाटक के अभिनय के अगरूप वेश, भापा व जचार से सम्बद्ध है। भरत के 'प्रवृति' -सम्बन्धी इस विवेचन का ही वाणभट्ट ने अपने हर्षचरित में न्पर्श किया है- कलेप प्रायमुदीच्देष प्रतीच्छेष्वर्धमाहकम्। उत्पेक्षा दाक्षिणात्वेष गौडेय्वक्षरडम्बर.।।2 अर्थरल उत्तरी भू-भाग मे श्लेष, पश्चिमी भू-भाग ने अर्थ-गौरव, दक्षिणी भू- भाग मे उत्प्रेक्षा और गौड़ (एर्वी) प्रदेश मे अक्र-आइम्वर की प्रवानना है। पन्तु १ डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी (सप०): काय्यमान्त मे सकलित टा पारसनाय दिवेदी मा रीति और आचार्य परम्परा लेख वृ ११३ वही डॉ० गगग्मागर राय हिन्दी काव्य मसासा, पृ० २ जलदेव उपाध्याय : भारतीय साहित्य गाम्न, पृ० १३६ x. P. V. Kane . The Harsha Charit, p. 1

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50 रीति-तत्त्व और रीति-युग

वाणभट्ट ने इन शैलियों की एकान्तिक साधना को प्रशय नही दिया। वे कहते है- नवोडर्यों जातिरप्राम्या इलेगो क्लिप्ट स्फुटो रस। विकटाक्षरबन्धदन्त, कृत्स्तमेवत्र दुर्लभम्॥।" नवीन अर्थ, अग्रास्य स्वभावोक्ति, अक्लिप्ट इलेप, मफूट रस, विकट अक्षरबध आदि का एकत्र होना दुर्लभ अवश्य है, किन्तु प्रतिभा के स्वामा कवि के लिए यह अस्म्भव नहीं है। भारतीय काव्यशास्त्र का वास्तविक प्रारम्भ विद्वञ्जन भामह मे ही मानते हु। भामह ने रीति शब्द का प्रयोग नही किया है। उन्होने 'रीति' के स्थान पर 'काव्य या 'काव्य भेद' शब्दो का प्रयोग किया है। 'प्रवुतति' विवेचन मे भरत द्वारा गृहीत चतुविध भोगोलिक आधारों को सर्वथा आँख मूँदकर भामह ने स्वीकार नही किया बल्कि उनके आधार के रूप मे 'ौड और वैदर्भ' दो मार्ग स्वीकार किए। भामह का गौड़ मार्ग बाण- सट्ट की गौडीय बैली है। भामह-निरूपित वैदर्भ मार्ग बाण की दाक्षिणात्य सँली का ही अपर नाम प्रतीत होता है। भामह भी इन दो-गौड एव वैदर्स-मार्गो मे से किसी एक की एकानिक साधना न करने का विमर्श देते है। 'ये मागँ साधन है, साध्य नही।' जिन मार्ग से काव्य के बान्नविक गुण उपलब्ध हो उन्ही का आश्रयण करना वे इष्ट समटते हैं। दोनों मार्गो की विवेक-सम्मत साधना उन्हे इष्ट है।२ दण्डी ने भामह की अपेक्षा अधिक स्पप्ट एव पूरक विवेचन किया किन्तु मौनिक दृष्टि तो भामह की ही थी। भामह ने जिन व्यापक अर्थ मे 'रीति' शन्ट को ग्रहण किया उसकी सगतिपूर्ण व्याख्या दण्डी ने कर दी है। वे वाणी के अनेक मार्ग मानते है। इन सब में ने वे 'बैदर्भ' व 'गौड' मार्ग को ही प्रशस्त मानते है। इन दोनो मे भी दण्डी ने 'वदर्भ' मार्ग को ही अधिक प्रशस्त मान कर रीति को 'वैदर्भ' मार्ग का प्राण माना है तथा दश गुणों को भी वैदर्भ मार्ग मे निबद्ध कर दिया है।3 भामह ने गीति को व्यापक संदर्भ मे (अलंकार, गुण-दोषादि के संबर्भ में) ग्रहण किया था जब्कि दण्डी ने उसे केवल वैदर्न मार्ग तक सीमित कर दिया तथा दग गुणो मे निबद्ध कर रीति को उसका (वैदर्भ मार्ग का) प्राण बताया। आचार्य वामन ने 'रीति' को काव्य की आन्ग के रूप मे ग्रहण किया। श्द्यपि उनकी इस स्थापना का प्रबन् विरोध हुआ तथा उनके बाद किसी ने इसका अनुवर्तन नही किया तथापि इतना तो स्पष्ट है कि काव्य-गतस्त् के इतिहाम में वे ही अकेले आचार्य हुए जिन्दोने रीनि को आन्य-स्थानीन माना है। आज उनकी स्थापना वा पुन- राख्यान हो रहा है और, 'वस्तु' गण 'अभिव्यक्ति' प्रमुख मानने वाले चिंतक उनका

  1. P V Kane : The Harsha Chant, p I २६० दनदेश उसाध्याय : भान्तीय एणहृत्य शास्त्र, भाग २, ० १"५ ३ डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी (नपा०). काव्यमास्त्र में सकलिस डॉ० पारसनाथ द्विसेदी का गोति ओर आजार्य परम्परा' लेख, प० १२७

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रीति तत्व और रीति-युग ५१

समयन कर स्वय संबल पाते है। वामन ने कहा-'रीति. आत्मा काव्यस्य।" और रीति की परिभाषा देते हुए कहा-'विगिष्टा पढ रचना रीति।' आगे स्पप्टता क्ते हुए लिखा 'विशेपो गुणात्मा' आदि। वामन ने रीति के तीन भेद माने है- 'बैदर्भी', 'गौड़ी' और 'पाचाली।' इन तीनों में वे'वैदर्भी' को ही ओज, प्रसादादि समग्र गुणो में उपेन नानत है।२ 'गौडी' रीनि, ओड एवं काति-गुण सम्पन्न है तो 'पाचाली' माधुर्य और मौकुमार्य गुणो ने सम्पन्न है। इन सब से वैदर्भी श्रेप्ठ है अन्य सभी अपेक्षाकृत कम ग्राह्म हे :३ • दामन द्वारा निरूपित इन तीन रीतियों को कुछ अन्य आचार्यो, उपनागरिका', 'पस्पा और 'चोमला' नार भी दिये है। बामन के मनानुसार 'रीति' गुणाशचिन हे। गुण काव्य के नित्य धर्म है। गुणो का अभाव दोष हे। गुणो की उपस्थिति व दोपो का अभाव काव्य मे मौन्दर्य ला देता है। वाम्न द्वारा विवक्षित विशिष्ट पद-गचना वे अन्तर्गत गुण-दोप, रस, अलगर सभी दुछ समाविष्ट हो जाता है। स्ट्रट ने 'लाटीया' नामक एक और गीति जोडकर रीतियो की सज्ञा चार नक पहुँचा दी।5 वैदर्भी और पांचाली रीतियों को वे शृगार, करुण, भयानक और अद्भून रस मे तथा 'लाटीया' एव गौडीया' को रौद्र रस में प्रयोज्य समझते है। उनकी एक अन्य मौनिक देन यह भी है उन्होने 'ललिता' और 'भद्ना' नानक दो वृत्तियों की कल्पना कर वृत्तियों की संख्या भी पॉच तक पहुँचा दी। आनन्दवर्द्वन ने रीति के लिए 'सघटना' शब्द प्रयोजित किया है। वामन की पद्-रचना (रीनि) ही उनकी 'सघटना है। वानन ने गणात्मा रीति को काव्य की आत्मा अर्थात काव्य का साध्य माना है जबकि आनन्दवर्द्धन ने पद-संघटना को गुणा- श्रित मान कर भी उसे 'रसादि को व्यक्त करनेवाली' - साधन-रूपा माना है। अनन्दवर्द्धन द्वारा निरूपित असमासा, मध्यमसमासा एन दोर्घसमासा संघटनाए हो कमश वामन की वैदर्भी, णचाली और गौडी रीतियाँ है। आनन्दवर्द्धन ने रीति-रूप सघटना को अग-संस्थानवत् ही माना है, आत्मस्थानीय नही। गजगेखर ने 'काव्य-मीमासा' मे रीति, प्रवृत्ति एव वृत्ति तीनो शब्दो का अर्थ स्प्ट किया है 'वेप विन्याम कम प्रवृति, विलास विन्यास क्मो वृत्ति वचन विन्यासकमो रीति अर्यत् वेग-विन्यास को प्रवृति, विलास-विन्यास को वृत्ति और वचन-वित्यास को रीति कहते है। भोज ने ढण्डी की भॉनि ही 'रीति' के अर्थ ने मार्ग' शब्द का व्यवहार किया

डॉ० नगेन्द्र और आचार्य विश्वेश्वर. हिंदी काव्यालकार सूत्रवृत्ति, पृ० १८ २ वही, प० २६२७ ३. वही पृ० २६।२७ ४ सुद्रट काव्यालवार, अध्याय १५, क्लोक २० :डॉ राममागर तिगठी ध्वन्यालोक (उत्तरार्ट), पृ० ७७७२० डॉ० गगा सागर राय हिन्दी काव्य मीमासा, पृ० २५

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रीति तत्त्व और रीति-युग

हे किन्तु रीति शब्द और उसकी व्युत्पत्ति भी निदिष्ट कर दी है। वे कहते हैं- वैदर्भादिकृत पथा काव्ये मार्ग इति स्मृत. । गीड गताविति धानो सा व्युत्पत्त्या रीति रुच्यते।9 भोज ने 'रीति' को गत्मर्थक 'रीड़' धातु से व्युत्पन्न माना है। रीति के वे छह प्रकार बतलाते है-पाचाली, गौडीया, वैदर्भी, लाटीया, आवन्तिका और मागधी। इनने से प्रथम चार तो परम्परा-प्राप्त है। आवन्तिका और मागधी के भेदो की कल्पना अवव्य नवीन मानी जा सकती है। बदर्भी और पाचाली के बीच की रीति क नाम है 'आवन्तिका।' मागधी को वे खण्ड 'रीति' कहते हैं अर्थात रीति के लक्षणों का अनिवाह होने पर वह खण्ड रीति (मागधी) कहलानी है।3 कुन्नक ने 'रीति' के लिए 'कवि-प्रस्थान-हेतु' शब्द का प्रयोग किया है। रीति को देश-भेद के आवार पर निर्मित, वर्गीकृत या अभिधेय करने के सिद्धात का समादर करने वाले कुन्तक नही है। वे तो रीति को भूलत, कवि के स्वभाव से निबद्ध मानते है। गुणो को छोडकर अन्य किसी तत्न को रीतियों की पारस्परिक उच्चावचना का निर्थायक आवार वे नहीं नानत। अत उन्होंने रीतियों के भौगोलिक नामो का भी तिर- रकार किया और 'मुकुमार मार्ग', 'विचिन्न मार्ग', 'मध्यम मार्ग' नाम स्वीकार किए" मम्मट ने 'रीति' शब्द का प्रयोग न कर 'वृत्ति' शब्द का प्रयोग किया है और वृत्ति की परिभाषा देते हुए वे कहते है कि-वृत्तिनियत वर्णगनो रम विषयो व्यापार:।12 अर्थात् रसानुकूल बर्ण-योजना को ही मम्मट वृत्ति कहते है। अलकार- निरूपण के प्रसंग में अनुप्रास के विवेचन के सन्दभ में मम्मट ने उपनागरिका, परुपा एव कोमला-तीन भेद निरूपित किये है।4 ये तीनो वृतियॉ क्रमशः वामन-निर्दिष्ट वंदर्भी, गौडी एव पाचाली रीनियां के अपर नाम ही है-"एतास्तिस्रो वृत्तय. वामना- दीनां मते वैदर्भी, गौडी, पांचाल्याख्या रीतमोमता।" विरवनाथ रीति को पद-संघटना मानते है नथा उने अंग-संस्थानवत् महत्त्व देते हैं। उनके विचार से रीति 'रसादि' की अभिव्यक्ति मे साधन रूप है- पद-संघटना रीतिरगसंस्थान विशेपवत्। उपकर्त्री रसादीनां सा पुन. स्याच्चतुविधा।5

१. भोज : सरस्वती कण्ठामरण, पृ० १५४ २ वही -३. वही, पृर १५७ ४ डॉ० नगेन्द्र और आचार्य विश्वेश्वर हिंदी धकोक्ति जीवितम (मुल भाग), पृ०६ू ५ डॉ. सत्यव्रत मिंह - हिंदी काव्य प्रकाश, पृ० ३०६ ६ वही, पृ० ३० ६-१० ७. यही, पृ० ३०६-१० म वही, हिन्दी साहित्य दयग, वृ० ६५६

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रीति तत्त्व और रीनि-युग ८३

अथात् पद-सघटना रूप रीनि रसादि का उपकार करने वाली है तथा अंग- संस्थानवत् है। उसके चार भेद हैं-वैदर्भी, गौडी, पाचाली और लाटिका। ये चारो विभित्न रसो का उपकार करती हैं।

अ्तिपुराणकार ने 'वक्तृत्व कला' को रीति मानकर 'रीति' के लिए वाग्विद्या सम्परतिज्ञान रीति।' का प्रयोग किया है। तात्पर्य यह कि वे 'रीति' को वाकली के रूप में ग्रहण करते प्रतीत होते है।9 अग्तिपुराण में भी इस रीति के चार भेद - पाचाली, गौड देगीया, बदर्मी और लाटजा स्वीकृत किये गये हे।

सस्कन के आचार्यो के इस रीति विवेचन मे पता चलता है कि (१) अधि- कार आचार्यो ने रीनि को 'काव्यांग' माना है तथा उसे रस का उपकारक तत्त्व भी कहा है। (२) आचार्य वामन रीति का 'काव्याग' न समझकर 'ाव्यात्मा' मानते है। (३)कही-कही 'रीति' को पद्-रचना का वैशिष्टय न मानकर व्ष्वदब्ध्य का एक रूप भी माना गया है। (6) प्रारम्भ मे गीति' शब्द काव्य-सोन्दर्य के पर्वाय के रूप में गृह्हीत हुआ फिर सकीर्ण होकर पद-रचना के वैविष्टय तक सीमित रह गया और अन फिर पुन, व्यापक अर्थ का-समस्त काव्यांगों का या काव्यशास्त्र का ~ व ासिक बनना जा रहा है। हविन्दी के रीतिकालीन आचार्यो एवं कवियो ने तो उसे पद-र है था एक सोमित न रखकर काव्यशास्त्र का पर्याय मान लिया प्रतीत होना है। अर्थ-विस्तार

सस्कृन से हिन्दी तक आते-आते 'रीति' शब्द का अर्थ फैल गया है। सम्कृत का 'रीति' शब्द पद-रचना की विशिष्टता का वाचक है; हिन्दी के रीति-काल में 'रीति' बब्द अपने भीतर शब्द-क्ति-विवेचन, नायक-नायिका-भेद-निरूपण एवं मभी काव्यागो के विवेचन को समाविष्ट कर अवस्थित है। हिन्दी मे 'रीति' गब्द काव्य- शास्त्र का पर्याय-साबन गया है।

रीति और हिन्दी-आचार्य

रीतिकाल के आचार्यो मे चिनासणि, कुलपति, देव और भिखारीवास ने रीति का विवेचन किया है। राजशेखर की भाँति ही चिंतामणि ने भी 'काव्य-पुरुप' की कलपना की है तथा काव्य के विभिन्न उपकरणों को 'काव्य-परुप' के विविध अग के रूप में निर्दिष्ट किया है। वे 'रीति' को 'काव्य-पुरुष' का स्वभाव मानते है-

सबद अर्थ तनु जानिए, जीवित रस जिय जानि। `अलंकार हारादि ते, उपमादिक मन आनि।

१ रामलाल वर्मा- अग्निपुराण का काम्यशास्त्रीय, भाग, पृ० ४६

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रीति तत्व और रीनि :

इनेषादिन गुन सूरताड़िक से मानौ चित्त। बरनौ रीति सुभाव ज्यो वत्ति वृत्ति मौ मित्।1 अर्थात बब्द और अर्थ काव्य-पुर्ष का शरीर है। रस उसका प्राण है। उप- मादि अलकार जाभूपण है। गुण गूरत्वाति के मसान है। रीति उसका स्वभाव है। वृत्तियाँ उसकी मिन्न है। कुरूपति मिश्र ने उपनागरिका, पस्पा, कोमला-तीन वृतिनो तथा हैदर्भी गौडी, पाचाली-नीन गैतिटाँ निरूपित की है- उपनागरिका मसुर गुन व्यंजक बश्नन होय। ओज प्रकाशक बरन तै परुप कहिय मोग॥। वरन प्रकाश प्रसाद को पर कोमला सोय। तीन वति गुन भेद ते कहै बडे कवि लोय।। वैदमी गौडी कहत पुनि पाचाली जानि। इनही नो कोऊ कवि बरनत रीति बखानि ।।'२ चिंतामणि और कुलपति मिश्र का विवेचन मम्मटाचार्य पर आघुृत है। देव ने 'रीति' को काव्य-शरीर को गति प्रदान करने वाला तत्व माना है। वे कहते हैं- शब्द जीव तहि अर्थ मनु काव्य सु सर्स सरीर। 'चलत रीति सो छन्द गति, अलंकार गम्भीर॥3 आच्ार्य भिखारीदास ने मम्मट की भाँति रीति और वृत्ति मे अभेद माना है। उनके द्वारा विवेचित रीति वस्नुत वत्ति का ही विवेचन करनी है।* रीति, वृत्ति, प्रवृत्ति और शैली 'रीति, वृत्ति, प्रवृत्ि एव बौली' ये चारो शब्द व्यवहार में परस्पर समानार्थी व एक-दूसरे के स्थानापन्न माने जाते है तथा काव्यशास्त्र में भी कही-कही पर्याय के रूप में प्रयुक्त हुए दिखाई पडते हैं किन्तु तत्वत. इनमे परस्पर पर्याप्त सूक्ष्म भेढ है। यह पार्थक्य अवगत कर लेना आवश्यक है। रीति और बुसि नामन न 'रीति' को 'विशिष्टापद-रचना' कहा है। मम्मट वृति का स्वरूप निरूपित करते हुए कहते है-'वृत्ति नियत वर्ण गतो रस विषयो व्यापार।'इम दृष्टि से विचार करने पर रीति और वृत्ति मे अभेद दिखाई पड़ता है तथा दोनों मूलन भापा डाँ० कृष्णदत्त त्रिपाठी रीतिकाल और म्राधुनिक काल के सधि-सूत्र (भप्नकट मोध-प्रबंध),

२ वही! * वही। ४ वही।

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राति तत्व और रीति-युग =५

से सम्बद्ध प्रतीत होती हैं तथापि 'रीति' 'वृत्ि' मे अपेक्षाकृत व्यापक सिद्ध होती है। वृति वर्ण-योजना में और रीति पद-योजना से सम्बद्ध है। रीति में पत्ति का अन्त- भवि हो सकता है वृनि से रीति का नहीं। वृत्तियाँ दो प्रकार की मानी गई है-काव्य- बतयॉ एवं नाट्य-वुतियाँ। भारती, मारवती, कैशिकी एव आरभटी-ये चार नाट्य- वलियाँ है। उपनागरिका परुपा एव कोमला -मे तीन काव्य-वृत्तियाँ है। तीनो काव्य- वृत्तियाँ रीतियों के निकट होने पर भी रीति की वाह्याग मात् है। रीति औौर प्रवृत्ति 'रीति' पद-रचना से और 'पबुत्ति' वेश, भाषा एवं आचार मे सम्बद्ध है। भरत की 'प्रवृत्ति' व्यापक है। राजशेखर की प्रवृत्ति' भी वेग-विन्यास से सम्वद्ध होने के कार्ण 'रीति' से तो व्यापकतर प्रतीत होती है। अत 'प्रवुनि' व्यापक है और उसमें 'रीति' का अन्तर्भाच हो जाता है। रीति और शैली 'गली' शन्द आज तो अग्रेजी के (Style) शब्द के अनुवाद के अर्थ मे अधिक रूत व व्यवहृत होता जा रहा है। पश्चिम मे 'शैली' लेखक के व्यक्तित्व का एक अभिन्न अग मानी जा चुकी है। आचार्य प० वलदेव उपाध्याय ने शैली के अग्रेजी पर्याय (Style) का व्युत्पत्पर्थ स्पष्ट करते हुए उसके स्वरूप पर विचार किया है तथा पश्चिमी Style' के दर्यायभुत 'शैली' तत्त्व को अतिराय आत्म-परक, व्यक्ति-परक सिद्ध किया है।१ मैली व्यक्ति-निष्ठ अधिक होती है, रीति कम। भैली लेखक के व्यकतत्व का अभिन्न अंग है। वह बहुत कुछ निजी होती है और उसका कोई एक स्थिर व निश्चित रुप नहीं होता। जितने लेखक उतनी बैलियाँ पायी जा सकती है। दण्डी ने सम्भवत. इसोलिए कहा होगा-"असत्यनेको गिरा मार्ग " रीति का स्वरूप बहुत-कुछ स्थिर है। शैली का सम्बन्ध रचनाकार से और रीति का सम्बद्ध रचना से है। शैली रचनाकार के अन्तरंग से और रीति रचना की प्रकुति से घनिष्ठ रूप में सम्बद्ध है। शैली और रीति का भेदक तत्त्व है 'व्यक्तित्व'।

रीति तथा अन्य काव्य-सम्प्रदाय 'रीति' गब्द की व्युत्पत्यादि पर विचार कर लेन पर रीति' का अन्य काव्य- सम्प्रदायो के साथ सम्बन्ध भी जान लेना आवश्यक प्रतीत होता है। रस, व्वनि, वकोक्ति, अलंकार एवं औचित्य आदि प्रमुख काव्य-सम्प्रदायों के परिवेश मे रीति का स्वम समझ लेना प्रसंग-प्राप्त ही समझा जाएगा। रीति और रस रीति और रस का परस्पर-सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित दो प्रश्नों

१ आचार्य पं० बलवेव उपाध्याय भारतीय साहित्य शास्त्र, भा० २, पृ० २१३-१४

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रैति तत्त्व और गोत-युम

पर विचार करना आवश्यक है- (१) रसवादी आचार्यो का रीति के प्रति क्या दृष्टिकोण है? (२) रोतिवादी आचार्यो का रस के प्रति क्या दृष्टिकोण है? रन्वादी आचार्यो में विश्वनाथ प्रमुख है। रीतिवादी आचार्यो में वामन नमुख है। विश्वनाथ के रीति-विषयक एव वामन के रस-विषयक विचारों का परिनय पाने ही यह सम्बन्ध स्पष्ट हो जाएगा। 'साहित्य दर्पण' मे विद्वनाथ ने 'रीति' का स्वरूप इस प्रकान स्पष्ट किया हे- 'पदसंघटना उपपर्तती रसादीनां सा पुनः स्याच्चतुविधा।" अर्थति-(१) रीति पद संघटना-रूप है। (२) काव्य मे वह अंग-मस्थान बत् है। (३) रसादि की वह उपकर्ती है। (४) रीतियों चार प्रकार की है। इसमे स्पष्ट है कि विध्वनाथ 'रीति' को रस का अंग मानते है और उसे अग-सस्थान मे अधिक महत्त्व प्रदान नहीं करते। उनके अनुतार 'रस' अंगी और रीति' अंग है। दोनों मे अंगी-अंग सस्बन्ध है। वामन ने 'काव्यालंकारसूत्' मे 'रीति' को काव्यात्मा कहकर 'रस' को कार्व्य के एक अर्थ-गुण 'काति' का आधार-मात माना है। वे कहते हैं-दीप्तरसत्व काति.।" अर्थात् रचना के उस गुण को 'कांति' कहते हैं जिसमे शृंगारादि रम दीप्त हुए हो। वाभन के अनुसार 'रस' अंग और 'रीति' अगी है। और दोनों में (कमश') अंग- श्ंगी सम्बन्ध है। इस प्रकार ये दोनो परस्पर प्रतियोगी से दिखाई पडते है। किन्तु स्थिनि वस्तुतः जैसी नही है। अन्य आचार्यो ने 'रम' का प्रामुख्य एवं रीति का गौणत्व प्रतिपाद्विन कर दिया है। आनन्दवर्द्धन ने रीति (जिसे वे संघटना कहते हैं) के नियाभक नन्ब के रूप में-रस, वक्ता, विषय एव वाच्य-सम्बन्धी औित्य को स्वीकार किया है।3 दार' रीति की अंग-रूप मे स्थिति प्रमुख सभी आचार्य स्वीकार कर चुके हैं। डॉ० नगेन्द्र ने मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी रीति का अंगत्व सिद्ध कर दिखाया है। उनके विचार मे माधुर्य, ओज और प्रसाद गुणो में कमश चिन की द्रुति, दीप्ति और परिव्याप्ति-रूप रस-दशा के पूर्व की स्थितियाँ अवस्थित रहती है। अत. अवयंकार की भाँति ये रीतियाँ भी रस-रूप काव्यात्मा का उत्कर्षवर्द्धन करती हैं। वे रीति के

१. डॉ० सत्यव्रत सिह. साहित्य व्पग, पृ० ६५८ र डॉ. नगेन्द्र • काव्यालकार सूत्र, मूल, पृ० १५७ इ डॉ० रामसागर तिपासी ध्वन्यालोक (उत्तरावं), पृ०७४१ 7. हॉ० नगेन्द्र : काव्यालकार सूत्र, भूमिका, पृ० १८५ ५. बही।

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रीति-तत्त्व और गीति-युग ८७

स्वरूप को अधिक वस्तु-गन औद रस के स्वरूप को अधिक व्यक्ति-परक सानते हैं।9 निष्कर्ष यह कि 'रस' अगी और 'रीति' उसका अग है।

रेति और ध्वनि

लांिण्यवती के प्रत्यंग में अवस्थित फिर भौ तद्रिकक्षण, केशल वोध-गम्य किंतु अनिर्वचनीय लावण्य की भॉति समस्त कव्यागो मे परिव्याप्त फिर भी तद्भिन्न केवल प्रतीयमान एव अनिर्वेचनीय 'धर्वनि' की प्रसक्ति काव्य के अन्तरंग व वहिरंग-उभयर मे अवाधित है जबकि अंग-सम्धान रूप विशिष्टा-पद-रचना-मूलक 'रीति' काव्य के बहिरंग मात्र से सम्बद्ध है काव्य के अत्तरग मे उसको प्रसक्ति अवरुद्ध है।

रीति-सम्प्रदाय देहबानी काव्य-सम्प्रदाय है जिसमे काव्य के बहिरंग तत्त्व-रूप 'रीति' की आत्मस्थानीय प्रतिष्ठा कन्ने का प्रयत्न किया गया है जबकि ध्वनि-सम्प्रदाय आत्मवादी सम्प्रदाय है जिसमें सहृद्य कलाव्य एवं प्रतीयमान अर्थ-रूप ध्वनि की आत्म- स्थानीय प्रतिष्ठा की गईट है। आनन्दवद्ध न ने 'संघटना' (अर्थात् रीति) का गौणन्व प्रतिपादित किया है। वे मघटना को अस्थिर व गुणो को स्थिर काव्य-धर्म मानते है। उनके विचार से मघटना गुणाश्रित है और रसादि की व्यंजक होने से साधन-भूता है।२ दपमन जिसे साध्य-रपा मानने है वह आनन्दवद्ध न के यहां साधन-रूपा है। मूल विचार- णीय प्रश्न है कि ध्वनि और रीति का पारम्परिक सम्बन्ध कमा है? विचार करने पर प्रतीत होता है कि दोनों पन्स्पर प्रतियोगी अधिक, सहयोगी कम है। एक केवल पद- रचना को ही काव्य की आत्मा मानकर बलता है तो दूसग लावण्यरुप पतीयमान ध्वनि को! ध्वनि की व्यापक परिधि की तुलना मे रीति का प्रसार अत्यन्त सीमित जान पड्ता है। वामन के भी बहुत पूर्व '्वनि' की अवधारणा का विकास होता आ रहा था किंतु सिद्धात-रूप में 'ध्वन' की व्यवस्था व प्रतिष्ठा तो वामन-परवर्ती आचार्य आनन्दवर्द्धन ने ही की है। अत' यह स्वन स्पष्ट है कि रीति-सिद्धांत ध्वनि-सिद्धात का पूर्ववर्ती है फलत ध्वनि से अप्रभावित भी। अवश्य रीति-विवेचन में ध्वनि के कुछ आभास खोजने पर उपलब्ध होंगे। डॉ० नगेन्द्र ने इस और सकेत करते हुए कहा है कि वामन कृत 'वकोक्ति' के लक्षण मे व्यजना का, शब्द-गुणों मे वर्ण-ध्वनि का, अर्थ गुण ओज मे अर्थ-परौढि के कई रूपो मे ध्वनि की प्रच्छत्न स्वीकृति का, साभिप्राय विशेषण मे पर्याय-व्वनि का, अर्थ-गुण क्रांति में असलक्ष्य क्रम-व्वनि का सकेत मिल जाता है।5 निष्कर्ष इस प्रकार है-(१) रीति की अपेक्षा ध्वनि अधिक व्यापक सिठात है। (२) रीति शरीखादी एवं ध्वनि आत्मवादो सिद्धात है। (३) ध्वनि रीति का नियामक व साध्य है, गेति का ध्वनि मे समाहार हो जाता है (४) रीति घ्वनि का

१ डॉ० नगन्द्र : काव्यालकार सूत्र, भूमिका, पृ० १८५ २ डॉ० रामसागर व्रिपाठी 6वन्यालोक (उतराद), ५ृ० ७२० डॉ० नगेन्द्र. हिन्द काव्यालकार सूब (भूमिका) पृ० १८४

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रीति तत्व और रीति युग

धबनर्सी सिद्धात हे अत. उससे अप्रभादित भी, ५। गति सिदात ध्वनि सिद्वत व प्रनियोगी अधिक है सहयोगी कम। रो त और अलंकार अलंकार और नीति परम्पर सहयोगी काव्य-मिद्धात है। अलकार-सम्भदाय के आदि पुरम्कर्ता दण्डी और रीति-सम्प्रदाय के प्रवर्नक बामन है। दोनों ने क्मश काव्य मे वहिरग तत्त्वो-अलकार और रीतिकी आत्म-प्रनिष्ठा का प्रवल उद्योग किया। टण्डी ने अलकारों को काव्य की शोभा करने वाले धर्म के रूप में प्रतिष्ठित कर अल- कार की व्यापक सला स्थापित की-'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलकारान् प्रचक्षते।" तो वामन ने 'गीतिरात्मा काव्यस्य', 'दिशिष्टा पद रचना रीति' तथा 'विशेषो गुमात्मा' आदि सूतो द्वारा 'रोति' की आत्मस्थानीय सत्ता प्रतिपादित की।२ इस प्रकार रीति एव अलकार दोनो सम्प्रदायों ने स्वकीय तत्त्वो को ही अधिक महत्व दिया है। वस्तुत रीति अलकार एवं वक्रोक्ति का सम्बन्ध मूलत काव्य के अभिव्यक्ति- पक्ष से है, अत तीनो मम्प्रदाय काव्य के गरीर से सम्बद्ध है। रीति और अलकार सन्प्रदायो की तो यात्रा भी बहुत दूर तक साथ-साथ होती रही। आगे चलकर उनका मेठ-प्रस्थान-बिंदु आ गया। दोनो सम्प्रदायों के साम्य-वैषन्य को सारभून रीति से डॉ० नगेन्द्र ने इस प्रकार विवृत किया है3-(१) दोनों ने शब्दार्थ मे काव्य-मौदर्य कदी स्थिति स्वीकार की है। (२) दोनों ने काव्य-सौदर्य के पर्याय के रूप मे 'अलंकार' को ग्रहण किया है। वामन भी कहते है-'सौन्दर्यमलकारः।" (यद्यपि वामन का आनय दण्डी से भिन्न है)। रीति और अलंकार के बीच अन्नर यह है कि अलकार की व्यापक परिवि मे 'अलकार सम्परदाय' के अनुयायी सौन्दर्य (वस्तुगत और गैलीगत भी) के समग्र नत्त्वो- मुम, रीति, वृत्ति, मधि, संध्यग इत्यादि का अन्नर्भाव कर लेते है तथा अलगारेतर तत्त्वो को गौणत्व प्रदान करने है जबकि रीति के प्रस्थापक आचार्य वामन 'अलकार' की परिधि सकीर्ण कर काव्य के नित्यधर्म गुणो का उसमे अन्तर्भाव नहीं करते । वामन के मतानुसार 'अलंकार' काव्य का अनिवार्य तत्व नही है। अत अलकार के अभाव मे गुणो की सत्ता या नहता आहत नही होती। गुण अवश्य अनिवार्य तत्त्व है; 'उनके अभाव मे अलकारो की निस्सारता स्वत सिद्ध है। गुण रीति की आत्मा और काव्य- सौन्दर्य के प्रत्यक्ष उद्भावक हैं। अत. अलकार की अपेक्षा रीति अधिक व्यापक है और काव्य-तत्व (आत्मा) के अधिक निकट भी। अलकार और रीति का भेदक-बिंदु यही है कि 'अलंकार' अपने से भिन्न तत्त्वो

१ ने रामचन्द्र मिश्र : हिन्दी काव्यादर्श, पृ० ५४ डॉ० नगेन्द्र हिन्दी काव्पालंकार सूत्र (मूल), पृ०१६२० ३ बही (भूमिका), पृ० १७६-६० ४. वही (मूल), पृ० ५

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रीत तत्व और रीति यग

वो गागल प्रदान करता है तो 'रीति' मम्प्रदाय गुणात्मा रीति के अन्नर्नद अलंकारो का त्हुण कर उनका अगत्व सिद्ध कर देता है। इन दोनों की यात्राएँ वही मे भिन्न दिवाओं में प्रस्थान करती है। इन दोनों में परस्पर क्या मम्बन्ब हो सकता है? इम प्रश्न का उत्तर आचार्य वासन ने दे दिया है। आचार्य वामन अलकार को रीति का अप स्वोकार करते है। पश्चिम मे भी प्रमुख समाक्षको ने अलकारो को गैली का अग माना है।१ सारत यही कहा जा सकता है कि रीति में अलकार की अपेक्षा अधिक व्यापक- कता है। अलकार की अपेक्षा रीति काव्य-सौन्दर्य के अधिक निकट है। रीति में अर्ल- कार की अपेक्षा व्यक्ति-तत्व की भी अधिकता है। रीति और वक्रोक्ति 'रीति' वचन विन्यास-क्रम रूपा हे।2 बक्रोक्नि वैदवध्यभंगी नणिति' है।3 रीति का साम्राज्य वर्ण से लेवर वाक्य-विन्यास तक परिव्याप्त है, किन्तु वकोक्ति की साया तो दो पग आगे चलकर प्रकरण एव प्रमन्ध-योजना तक फौल जाती है। वक्रोक्ति कवि-प्रतिभाजन्य उक्ति-चारत्व की पर्याय है। रीति केवत विशिष्ट पद-रचना की पयाय है। दोनो मूलत अभिव्यक्ति से वनिष्ठ रूपेण सम्बद्ध है। परन्तु रीति जहाँ भाषा-विमरश से आगे नही बढ पाती, वनोक्ति कवि-प्रतिभा एव कवि-स्वभाव को भी अपने विमर्श-वितान के नीचे नमेट लेती है। वक्रोबिन समस्त लाव्य-सौराल की पर्याय है। इन दोनों का पारस्परिक साम्य-वैषन्य-निरूपित करते ह डॉ० नगेन्द्र लिखते है - (१) रोति वकरोदित का एक जग-मात् है। गीनि कवि मार्ग है, वकरोक्ति ववि कमं। (२) दोनों में काव्य का बन्तु-परक विवेचन है। (३) रीति की आक्षा वकोकित का प्रसार अधिक है। (४) रीनि की अपेक्षा वकोकति रस-मिद्धांत के अधिक निर्कट है। (५) वकोबिन में रीति का अन्तरभव हो सकता है परन्तु रोति में वक्रोक्ति का अन्तर्भव नही हो सक्ना। म० गu कम्पूस्वासी शास्त्री ने बकोकन के एक वृत्त से रीनि, गुण एवं अलकार दा समाहार क दिवाना है।*

१ डॉ० नगेन्द्र- हिन्दी दाव्यालकार सूत्र (भूमि ।), ५ृ० १८१ २ डॉ० नुगेद्: हिन्दी बकाबित जीवितम (मन भाग), पूः ५१ ३ डॉ० मगासागर राय : हिन्दी काव्य मीमासा, प०२५ ४ डॉ० नगेन्द्र हिन्दी काव्यालकार सूत्र (भूमिका), ५ु० ९८३ x M M Kuppa Swami Shastri . Highways and Byways of Literary Crticism In Sanskrıt, p. 27

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६0 रीनि तत्त्व और दीति-युग

रीति और औचित्य रस, ध्वनि और औचित्य-सिद्धात आत्मवादी निज्वात है नो रीति, अलकार एम वक्रोकित देहवादी निद्धान। औजित्य और गीति का परस्पर-सम्बन्ध स्पष्ट कषर्ते के लिए औचित्य के प्रति वामन का और रीति के प्रनि क्षेमेन्द्र व आनन्दवर्जन का दस्टिकोण परीक्षणीय है। वामन ने 'औचित' का या 'अनौचित्य' का नन्यक्ष कोई म्पर्श नही किया है। न तो उन्होने औचित्य की स्वतन्त्र सत्ता या महता की पमक्ष-परोक्ष ची ही उठायी है। उनके 'गुण-दोप-विवेचन' को ही उनका औनित्य-विमर्श माना जा सक्ता है। सभस्त रुण-दोष-विचार औचित्य-अनौचित्य का आधार लेकर ही अग्रसर हुआ प्रलीत होता है। रस को तो वामन ने अर्थगुण 'काति का अंग माना तथा उसे अंगत्ब प्रधान किया, किंतु औचित्य का उन्होने न तो किसी प्रकार से अगत्व ही प्रतिपादित किया है, न ही अंगीत्व भी। वामन ने न तो औचित्य की उपेक्षा ही की है, न उने अंगी-रूप मे स्वीकार ही किया है। आनन्दयद्धत ने अवश्य ही 'औचित्य'-रस, वक्त, विषय एव वाच्य विषयक- को रीति का नियामक तत्त्व घोषित किया है।9 उनके परवर्ती आचार्य अभिनव गुप्त के शिष्य क्षेमेन्द्र ने औचित्य के अनक भेदोपभेदों मे-पद, वाक्य, गुण विषयक औनित्य का समावेश कर उन्हे काव्याग की कोटि मे विन्यस्त कर विवक्षित किया है।इम प्रकार औचित्य के समर्थक आवायों ने रीति का स्पष्टत अगत्व प्रतिपादित कर उमे औचित्य से अनुवासित स्वीकार किया है। परन्तु रीतिवादी वामन ने न तो औचित् के व्यापक महत्त्व का उद्घोष ही किया है न ही उसकी सता या महत्ा का निरादर ही। पश्चिम मे भी शैली को एक काव्यांग के रूप में ही विवेचित किया जा रहा है। वस्तुत रीनि की आत्मा गुण, गुण की आत्मा रस, और रस का प्राण औित्य है। इस तर्क-सृखला को स्वीकार करने का फल है-गेति को औचित्यानुशासिन मान लेना! औचित्य सर्वोपरि सिद्ध होता है। सब तत्त्वों का नियन्नण करने वाला 'औतित्य' स्वयं भी अन्य काव्यागों से शामित होता रहता है। काव्य के उपकरणो के अभाव मे या अपनी निरपेक्ष स्थिति मे केवल 'औचित्य' व्यर्थ है। कोरा औचित्य अपनी मना नही रखना। उसे भी काव्यांगा या चतुर्दिक के परिवध की अपेक्षा है। म० म० ङुप्पू स्वामी शास्त्री ने औचित्य को सर्वोपरि और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना है -- औचितीमनुवावन्ति सर्वे ध्वनिरसोन्नया.। गुणालंकृतिरीतीना नयाश्चान्जुवाड्मया:।।3 अर्थात् रस ध्वनि, अलकार, गुण, रीति, आदि सभी औचित्य का अनुधावत

१ डॉ० रामसागर त्निपाठी. रवन्यालोक (उत्तरार्ड), पृ० ७४१ २ केमेन्द्र - घोवित्य विजार विमर्श, पृ० ११६ ?. Kuppu Swami Shastri . Highways and Byways of Literary Cri- ticism In Sanskrit. p 27

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रेति तल्व और रीति पूर

करत है। औचित्य सब का अन्तरभाव अपने में कर लेता है। निष्कर्ष रीति-विषयक इस समस्त विवेचन का निष्कर्ष इस प्रकार रखा जा सकता है ·(१) 'रीति' शब्द 'री' और 'रोड्' धातृओ से सिद्ध होता है। (२) 'गति' शब्द के तात्वर्थ है -- गति एव श्रव्णद्ीलता। (३) रीति के कोशगन अर्थ अवेम है हिन्तु विव्ेच्य 'रीति' के ग्राह्य अर्थ तो है-पदरचना, शैली, काव्य-परिषाटी जौर नाहित्य मे वर्णों की वह योजना जिसमे ओज, पमाद या माधुयें गुणो की स्थिति होती है। (४)'रीति' शब्द का अर्थ-बिर्गर हुआ और मद-रचना से वह 'काव्यशान्न्' तक व्यान हो गया। हिन्दी में 'रीति' नब्द व्यापक अर्थ मे प्रयुक्त होने लगा और वह वर्ण-योजना मान्र न रहकर 'काव्यणास्त्र' का वाचक हो गया। (५) सस्कृत के आचार्यो ने प्राय सभी प्रमुख आचार्यो ने रीति को एक काव्याग के रूप मे ग्हण किया है। केवल आचार्य वामन ने उसे काव्यात्मा के रूप में प्रतिपादित किया है। अग्निपुराणकार ने उसे वागोली का पर्याय कहा है। कही-कही 'रीति' को 'वृत्ति' का पर्याय भी माना गया है यथा मम्मटाचार्य के विवेचन मे। रीति- कालीन आचार्यो में चितामणि ने 'रीति' को काव्य-पुरुष का स्वभाद, देव ने उसकी गति कहा है। कुलपति मिश्र ने रीति और वृत्ति का अलग-अलग निरूपण किया है. जबकि भिखारीदास ने रीति और वृनि में अभेद माना है। (६) रीति, वृनि, प्रवुनि और शैली भब्द यद्यदि व्यवहार मे नमानार्थी प्रतीन होते है और तद्वत् प्रयुक्त भी किय जाते है तयापि तत््वत के परस्पर पर्याप्न भिन्न है। रीति पद-योग, वृत्ति वर्ण-योग, प्रवृत्ति वेश-भापा एव आचार योन तथा हैली कवि के व्यक्तित्व का योग है। (७) विभिन्न भारतीय काव्य-सम्प्रदायों से रक्, ध्वनि और औषित्य सम्प्रदाय रीति से अधिक व्यापक है। वे आत्मवादी सम्प्रदाय है। रीति उनकी प्रतियोगी अधिक सहयोगी कम है। रीति का उनके समक्ष गौणत्व या अगत्व सहज मिद्ध हो जाता है। अलंकार मम्प्रदाय रीति का सहयोगी सम्पदाय है। अलंकार की तुलना मे रीति मम्पदाय की व्यापकता स्वत स्पष्ट है। वक्राक्ति भी सूलत अभिव्यक्ति-पक्ष से सम्बद्ध हीकर 'रीति' का सहयोगी सिद्धान्त ही जान पड़ना है, परन्तु वह रीति से व्यापकतर है। रीति का प्रसार केवल पद-योजना तक है, जबवि वकोक्नि का प्रसार कविकर्म एव उसके अतर्मन तक भी है। वकोक्ति रस के अधिक निक्ट भी है।

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रीति तत्त्व और रीति युग

रोति-पुग "रीनि' के विवेचन के उपरात्न गीति-युग पर विचार करना आवश्यक है। बिन्न युग से पणिचित हए उम दुग के माहित्द का परिचय अधुर ही समझा जायेगा। उम युग की मामाजिक, धार्मिक, सास्कृतिक, राजनीतिक परिस्थितियो पर वित्वार कर नेना चाहिए। रीनि-युग सें तात्पर्य हिन्दी के रीतिकाल से ही है। आचार्य गमचद् शु्ल ने संबन् १७०० से १६०० तक के काल को रीतिकाल की सज्ञा प्रदान दी है। ई० म० १६५० से १८२० तक का यह समय भारतीय इतिहास में अनेक दृप्टियो से महन्दपूर्ण है। गाहजहों के उतन्बालीन आासन से इसका प्रारम्भ होता है और गवर्नर जनरल डल्हौजी के भारत आगमन के पाच-छ वर्ष बाद और ई० म० १८५७ के म्वातंत्र्य-संग्राम के कुछ वर्ष पूर्व समाप्त होता है। इस बीच पूरे देश का जीवन अनेक प्रवहों मे डूबता-उतराना रहा। राजनीतिक परिस्थितियॉ शाहजहॉँ के गासन-काल के उन्तरार्द से रीनिकाल का प्रारम्भ होता है। उसके पूर्व बाबर, हुमायूं, अकबर और जहाँगीर जैसे कुशल व विराट् व्यक्तित्व-सम्पन्न मुगल सम्राह् शासन कर चुके थे। उदारता, दूरदर्शिता, धार्मिक सहिष्णुता व प्रबन्ध-कौगल से अकबर ने भारत मे अपना विशाल साम्राज्य प्रतिष्ठित कर दिया था। हिन्द-मुस्लिम एकता द्वारा उसने राष्ट्रीय शासन की सुदृढ नीब डाली थी। जहाँगीर का व्यक्तित्व अपने पिता के ममान विराद् नही था। प्रकृति से वह तिलासप्रिय था। शामन का ममस्न दायित्व नुरजहां पर था। शाहजहाँ अवध्य कुशल शासक था। उसके शासन- दाल को 'स्वर्णकाल' कहा जाता है, परन्तु उसके व्यक्तित्व मे धार्मिक असहिप्णुता और कला व सस्कृति-प्रेम का विचित्न नयोग था। उसने राज्यारूढ होने के बाद दक्षिण का बहुत-सा भू-भाग जीनकर अपने राज्य मे मिला दिया। अकबर द्वारा स्थापित परम्पराओं को इतना शीघ्र उलट ढेना न जहाँगोर के लिए सभव था न शाहजहों के लिए ही। अपनी उदार नीति से अकनर ने जिस गरिमामय, महिमामण्डित व ऐग्वर्य- सम्पन्न मुगल-शासन को स्थापित किया था, उसकी सुरक्षा एव व्यवस्था मे ही इन दो परवर्नी शासको के शक्ति और समय का व्यय हुआ। अकबर द्वारा सुगठ्त मुगल- सम्राज्य का राष्ट्रीय-रूप जहाँगीर और शाहजहॉ के हाथो में बहुत-कुछ तो सुरक्षिन रहा, किन्तु अपने हाथ में गासन लेने ही औरगजेब ने उमे बहुत उलट-पलट कर दिया। भारतीय सस्कृति व दर्णन के अनुगगी युवराज दारा की पराजय एव हत्या से केवल मुर्गन-ताम्राज्य की ही हानि नहीं हई, भारतीय जीवन व इतिहास की भी बडी भारी हानि हुई। अपने पिता को जीते-जी कारावास में डाल और भाइयो की हत्या कर औरगजेब साम्राज्य का अधिपति बना । अकबर की उदार व सहिष्णु नीति का सर्वंथा त्कग कर उसने भारत मे इस्लामी राज्य स्थापित करने का सकल्प व प्रयत्न किया। वह कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह धर्मान्ध था। उसके बीतरागी व शुष्क व्यक्तित्व ने कला समीत व काव्यादि की बढी हानि की। शियाओं के प्रति भी वह अनुदार

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रीति तत्व और रीत पुर

था चारत का सानी के साथ उसके व्यक्तित्व में धार्निक कट्टरता घुल-सिन् गई था। शासन-मृत्र हाथ में आते ही उमने हिन्दुओ पर 'जजिया' लगाया, प्रतिद् नीरभो के मंदिर तुडवाये, हिन्दुओ मे दुगुनी मालगुजारी बमल कग्ने का नियम के दिया। मुसलमान बनने वालो को जानीरे देना शुरू किया। हिन्दुओ को उच्च पदों में हदा दिया। हिन्दुओ से नार्वजनिक त्वौहार मनाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। दिन्ली टरबार से हिन्दू-ीति-रिवाज उटा दिए।' पलत नारे ओर से उसके विरुद्ध विद्रोह का प्रबल दवंडर उठ खडा आ और मथुर दे ननीप जाटों मे, नारनोल के ममीर सतनामी सम्प्रदाय वालो ने, पजाब मे सिक्खो के गुरु तेग्बहाुर ने, राजपूनाने में बीर दुर्गादीस राठौर ने, दक्षिण मे गिवाजी ने उसका प्बत विरोध किया। औरगजेब की मृत्यु के बाद प्थिति और भी करुणाजनक हो गई। तोर अव्यवस्था, न्वतपान और नैतिक पतन की कहानी बनकर हो रहु गई बाद की स्थिति। उपकी सत्यु के बाद सभी छोटे-बडे राजा एव मामत स्वतन्त्र गालकन बैडे। उसके उनराविकारी सभी निर्वीर्य, अयोग्य, पुरचरित्र हुए। औरंगजेव के किसी भी उत्तराविकारी मे वह महान् व विराट व्यक्तित्व नही था, जो बाबर या अकबर मे था। परवर्ती शामको की विलासिता, दुर्बलता, चरिवहीनता ने सुगल-वासन की सुदढ़ इमास्त की जब हिला दी ओर वह इमान्त उहने लगी। प्रजा मे साबलिक अरक्षा व भय तथा अनुजामनहीनना का भाव भर गया। केन्द्रीय गासन दुबल पडता गया। प्रातीय घासक स्वतन्त्र व स्वेचछावारी हो गए। व्यपार और कर की केन्द्रीय आय घटती गई। इधर शक्ति क्षीण होती गई, उधर मराले की शक्ति बढ़ती गई। दक्षिण के मुसलमानी राज्यो को शिवाजी ने जीत लिया। चौय और सन्देशमुखी कमूल की जाने लगी। शिवाजी के बाद पेशवाओ का नेनत्व कायम हुआ। वालाजी विश्वनाथ, बाजीराव, बालाजी बाजीरव आदि ने मरानो की वक्ति को क्रमश चरमोत्वर्ष पर पहुचा दिया। दिल्ली उर्वार मे भी इन पेशवाओ की धाक थ्ी। दिल्ली के बादशाह इन पेगवाओ के हाथ की कठपुतली बने हुए ये। सन् १३६१ में पानीयन के नैदान में अहमदमाह अब्दाली और नगठो के बीच घोर संताप ुआा, जितने ननके की पराजय हई। मदाठों के ननान का अन हो गया। अट्ठारहवी दानो के उनराई्ध न भारत में पञ्चिमी वेर्वों से आए-डच्तर, वलन्दा, पुर्तगाली, फ्रच, अंग्रेज आि-का प्रसृत्व शनै,-शन, बने रगा। वे ब्यागारी बनकर आए और धीरे-धौरे शासन बन बैठे। सन १७५३न १८२७ तक पूरी एक गती तक भारतीय इतिहास व राजनीति पर अग्रेजों का प्रभुत्व रहा। इस काले मे बहुत से गुनर्नर-जनरल भारत आद। उन्होंने शासन किया। भारत में आुनिक-युग का सूवपात उन्हाने किया। इस युग मे भाग्त का सर्वाधिक नाम एक शासन के अनग १. सत्यकेतु विद्यालकार भारतीय समकति औौर उसका इतिहास, पृ०५२७ ₹ वही, प० ५२६

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रीति बत्व और रीति युग

आ गया छोटे छोट राज्यो की स्वतन्त सना समाप्त-सो हो गई। केन्द्रीय शासन का आरम्भ हुआ। विदेशी आकमण थम गए। समग्र भारत मे मुव्यवस्थित व सुगठित सरकार की स्थापना हुई। अग्रेजी भाषा के द्वारा शिक्षा दी जाने लगी, ज्ञान-विज्ञान का प्रसार हुआ। भारतीय सैन्य-शक्ति से अग्रेजों ने अन्यन्न भी अपना प्रसार किया। ज्यों-ज्यो राष्ट्रीय-चेतना का विकास होता गया, अग्रेजो के एकाविकार न स्वेच्छाचार को चुनौनी दो जाने लगी। शासन-कार्य दुष्कर बनना जाते लगा। ई० स० ६५० म १५० तक का-दो अताब्दियों का यह काल जिसे साहित्ये- निहाम में 'गेतिकाल' कहते हे-निरन्तर भघर्पो से हो भशा पडा है। परत्तु इन मघर्षो के बीच भी छोटे-छोटे गजा तो अपनी विलास-साधना में निरत ही रहे।धर्म, नासन और सस्कृति की विविन भूमियो पर यह सघर्ष चलता रहा। सक्षेप में यही कहा जा सकता है कि राजनीतिक दृष्टि मे ये दो सौ वर्ष वि लब और युद्ध के ही वर्ष रहे। युद्धों के पीछे न तो राष्ट्रीय जागरण था न ही शोपितो का वगेपको के प्रति आक्ोन। इनमे था व्यक्तिगत पारस्पिक वैसनस्य और धार्मिक सकीणता एव अधिकार की लोलुपता। इससे राजनीतिक ऊहापोह तथा सामाजिक अव्यवस्था ही पैदा हुई। जनना का जीवन-स्तर भी नीचा हो गया।५ सामाजिक परिस्थितियाँ रीतियुगीन नामाजिक जीवन सामतीय अविक था, साधारण व सहज कम। जीवन सामंतीय होने से उसमे बादशाह का स्थान सर्वोपरि था। नर्वतन्त्र स्वतन्त्र ये' मुगल वादशाह् व अन्य शासक अपने-आप को 'देव' समझते थे और उनके कुछ विशिष्ट अधिकार भी थे। डॉ० सत्यकेतु विद्यालकार ने उनके इन विशिष्डाधिकानो का निर्देश किया है-(१) धर्म और शासन-दोनो क्षेत्रो मे सर्वोच्च सना केवल बादशाह की ही थी। (२) लोग बादशाह के दर्शन के लिए प्रातःकाल महल् के पास एकत्र होते थे। कुछ लोग दर्शन किए बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करते थे। नूरजहाँ भी 'दर्शन' देती थी तथा अपने को 'जगत् गुसाइनी' कहलवाती थी। (३) बादशाह के सिवा अन्य किसी के भी सामने जमीन से हथेली छुआ कर तसलीम नहीं की जाती थी। (४) बादशाह के यात्रा पर प्रस्थान करते समय नगाड़ा और लौटने पर दमामा बजाया जाता था। (५) केवल बादशाह ही किसी को उपाधि या खिताब दे नकता था। (६) बादशाह के सवारी पर चलते समम दूसरा कोई सवारी पर नही चल सकता था। (७) किसी व्यक्ति को विकलाग करने का अधिकार केवल बादशाह को ही था। (न) केवल बादशाह के लिए ही हाथियों की लड़ाई का मनोरजन आयोजित किया जाता था।२ इन विगिष्टाधिकारो से यह सहज र्पष्ट हो जाता है कि ये बादशाह सही माने मे एक- राटु, स्वतन्त्र, एकतन्त्र एव स्वेच्छाचारी थे। उनकी देखादेखी बहुत से छोटे-मोटे शासक और सामंत भी निरंकुण व्यवहार करने लगे थे। इन सामतों व अमीर-उमराओ का जीवन सर्वसाधारण जनता से सवेया अलग व अछता रहा। प्रजा चाहे अरक्षा, नय, १ . नगेन्द्र : हिन्दी साहित्य का बृहृत् इतिहास, (भाग ६), पृ० ११ डॉ= सत्यकेतु विद्यालकार. भारतीय सस्कृति औौर उसका इतिहास, पृ० ५४२

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नेरत-तत्व और रीति-युग ६५

प्रगाति, विशृखतता, अव्यवस्था एवं अनुशासनहीनता से ग्रस्त हो, ये निरन्तर सोग व विलास में डबे रहते थे। अनर्गल भोग-विलास में लीन सामतो को प्रजा की कोई चिना नही भी। इनके अन्त पुर मे बेगमो, सेविकाओं, अविवाहिताओ की बडी भारी सख्या रझली थी, जिनकी व्यवस्था के लिए बहुत से कर्मचारी होते थे, अपार द्वव्य वर्च होता था। इनका बहुत-सा समय दावतो, सुरापान, सुम्वादु भोजन, नृत्य-गान, क्रीडादि मे बीतता था। केवल बादगाह के पद् को छोडकर अन्य कोई पद वशानुगत नहीं था। इनके वैभव-ऐश्वर्य तडक-भड़क आदि का विस्तृत वर्णन ब्नियर एव मनूनी ने अपने पथा मे किया है। जिस शाहजहॉ के शामन-काल को 'स्वर्णकाल' कहकर उसके प्रबन्ध की प्रशमा की जाती है, उसकी विलासिता, ऐश्वयें-वैभव प्रदर्शन, पाधबिक ऐन्द्रिय भोग, लीलपवृति का विशद् विवरण पर्चिमी इतिहास-लेखको में मिलता है। भारतीय इनिहासकार उने आदर्ग शामक मानते है और पश्चिम के इनिहास लेखकों से उनका मतभेद ह।' परवर्ती मुगल शासकों को विलासिता एवं चरितहीनता की कहानी तो और भो दु खद है। ये इतने गये-गुजरे थे कि अपराधियो को उचित दण्ड भी नही वे सकते थे। उनकी चहेती वश्या या रखैल के इशारो पर राज्य का कारोबार होता था। अनाज का भाव बढा दिया जाता था। यात्रियों से भरी नौकाऍ उलट दी जाती थी। योग्यता का चनई विचार किए बिना सारगी व तवला-वादकों को ऊँचे मदो पर नियुक्त किया जाता था। संतानोत्पनि के लिए बादशाह दरगाह में नग्न स्नान करता था। चहेती के यारों के थप्पड-बूँसे और लातें सहता था। साधारण जनता का जीवन इतना पतित व घृणित नही था। यद्यपि वे इन प्रभावो से सवथा अप्रभावित नही थे तथापि उनकी स्थिति उतनी वितृष्णा व जुगुम्सा प्रेरक न थी। सभ्नात हिन्दू-परिवारी में मार्हस्थ्य की पदिवता व नैतिकता बराबर पाई जाती थी। साधारण जनता मे जाति-भेट, वर्ग-भेद, छुआछूत-विचार पाया जाता और इसका भग करने का कोई उद्योग नहीं होता था। बाल-विवाह अत्यन्त अधिक माता मे होते थे। विधवा-विवाह का विशेप समर्थन नही होता था। महाराष्ट्र में ब्राह्मणतर कुछ जातियों मे और उत्तर में जाटो में विधया-विवाह का निषेध नहीं था। शासको का प्रयल्न इसमें विफल होता था। पति की मृत्यु के बाद सती हो जाने का प्रचलन था परन्तु स्त्री की इच्छा के विपरीत बलात उसे सनी नही कर दिया जाता था। जाति, दश एवं कुल का गौरव विशेष रहता था; लोग अपने से निम्नतर जातियो को हीन नानते थे। हिन्दू और मुसलमान दोनो ज्योतिप मे विश्वास करते थे। शकुन-अपनकुन का विचार भी अधिक करने थे। जनता अधविश्वासो में घिरी हुई थी। इसी कारण फकी रो व भिक्षुकों की संख्या काफी बढी हुई थी। टेव्नियर ने लिखा है कि इस देश में आठ लाख फकीर और बारह लाख साधु है जो जनता से भीख प्राप्त कर अपना निर्वाह करते हैं।* गुलामो का क्रय-विकय होता था। लोग नरबलि भी देते थे। 9. अ नगेन्द्र हिन्दी साहित्य का बूहत् इतिहास, भाग ६, पृ० १३ २. डॉ० सत्यकेतु विद्यालकार भारतीय सस्कृति और उसका इतिहास, पृ० ५५=५५३

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६६ रति तत्व और रीति नुग

आर्थिक दृष्टि न रीतियुगीन सनाज तीन स्तरो ने विभक्न था- () सामन या शासक वर्ग, (२) मध्य वर्ग (३) श्रमजीवी व कृपक वर्ग। सामत वर्ग या गग्सक वर्ग किमी प्रकार के अभावों से पीड़ित नही था। लाथ ही विवास-दैनन की प्रखुग्ता के कारण उनमे प्रदशन, अलंकरण व अनैतिकना आ घुने थे। मध्य वर्ग मे धनाभाव विद्येप नही था किंतु वानको के अन्याचार के भब से वे खुलकर धन का नर्व न करते थे न यही वताते थे कि उन्हे अभाव नही है। अ्रमजीवी वर्ग, मजदूर वर्म, कपक बर्ग धनाभाड़ ने पीडित रहता था। उसे खाने भर को तो निट जता परत्तु विलासिता के दिए पवर्शन व वैभव के लिए, उत्सवों के लिए उनके पाग धन नहीं रहना था। केवल खाने ीने के मामले में वे दुखी नहीं बहे जा सकते। कपडे-लल्त भी वे ठीक मे पन्नुन मही पाते थे।

आथिक परिस्थितियाँ आर्थिक दुष्टि से इस युग का समाज तीन बर्गों में वरिभाजिन था-(") सानन वर्ग (२) मध्यम वर्ग और (३) निम्न दर्ग ामक, मासकीय कर्मचारी-वर्ग इन प्रथम वर्ग मे स्थान पाते है, जिन्हें कोई अभाव नही था। उनका कोम प्रजा के द्रव्य से सदैव भग रहता था। नाना प्रकार की विलास-सामग्री व आमोद-प्रमोद के आयोजनो मे यह दव्य ख्ष होना रहता था। विदेशी यात्रियों ने पूर्णत निरंकुश इन सुगल वादशाहीं की स्वेच्छाचारिता, विलास-वँभव, ऐश्वर्य आदि का जत्यन्त रोचक व विसद् वर्णन किया है। विशेषत शाहजहॉं के दरबार के ऐश्वर्य, वैभव व तडक-भड़क का वर्णन अत्यन्त रसप्रद है। सर्वत्र प्रदर्शन, चमत्कार व अलं करण की प्रवृनि प्रधान थी । सुन्दर में सुन्दर मोशाक, उत्कृष्टतम सुरा, पड्रस भोजन, भोग-विलास, नूत्य-पान, वृत-क्रीड़ा कबुतर बाजी आदि मे वे पानी की तरह रुण्या बहाते थे। उनके अन्तपुर मे बेगमो, दवास- दासियो अन्य रित्नियों की बड़ी भारी सम्या होती थी। उनकी देस-रेख के लिए अरूग व्रिभाग होता था। उस विभाग के अधिपति को 'ख़ानसामा' कहते थे। वह इनके द्त, आभूषण, इत्र तथा अन्य विनोद-सामग्री को जुटाने का काम करता था। राजकरेत मे इस विभाग के लिए भी अपार खर्च मिल जाता था। बादमाह की देखादेखी छोटे-छोटे कर्मचारी भी बड़े ठाठन्वाट से वैभवयुक्त व विलासमय जीवन जीने थे। इन सामतो का वैभव इतना अधिक था कि फारस का सम्नाह भी उनकी बराबरी नहीं कर सकना था। तीसरे दर्जे के सुशी की आय भी बलख के सम्राट की आय मे अधिक होती थी। मोरलैंड के दिये आकडा के अनुसार पाँच हजारी मनसबदार की आय (अपना मैन्य- खर्च निकाल कर) १८००० रुपये मासिक थी। एक हजारी की आय ५००० सपये नामिक थी।* वस्तुओ का भाव इतना कम था कि इस सारी आय को खर्च करने के लिए डन्हे नवीन-नवीन आयोजन करने पहटते थे।

9 उ नगेन्द्र हिन्दी साहित्य का बहन् इतिहास, भाष ६ प० ९४ डॉ० सत्यकेतु विद्यालकार : भारतीय मस्कृति और उसका इतिहान, प ५५०

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रीति तत्व और रीति-युग ६७

मध्यम वसे से निम्नवर्ग के कर्मचारी, व्यापारी, समुद् शिल्पियो, कलावतो, आदि का समाबेश होता है। व्यापारियो एवं शिल्पियों की माली हालत अच्छी होती थी किन्तु उन्हें नित्य-प्रति राजस्व का भय मताना था। वे अपने पहनावे व अन्य बाह्य- विभव के लिए पैसा सर्च इमालए नही कन्ते थे कि कही राज-कर्मचारी उनकी सपन्नता का पता राकर उनसे राजकीय कर के रूप मे धन-म्पत्ि छोत न ले। वे राज-कर्म- चारियो को समय-समय पर भेंट-पूजा-उपहार बढाते रहते थे। कलाबतों व शिल्पियो की आथिक हालत भी काफी अच्छी थी। उन्हें पुरस्कार के रूप में बहुत धन मिलता रहता था। तीमरे वर्ग मे साधारण जनता किसान कमकार, पेशेवर लोग, छोटे शिल्पियों का समावेश होगाहै, जिनकी आर्थिक दक्षा तुलनात्मक दृष्टि में बहत पिछडी थी। प्रथम दो बर्गों को तुलना मे इस वर्गे की हालन बहुत खराब थी। कहने को ये स्वतन्त्र थे परन्तु सबसे अधिक पीड़ित और परतन्त्र वे ही थे। उनसे राज-कर्मचारी बेगार कर- वाते थे, उन्हे वेतन का आश्वालन न था। छोटे दुकानदार भी राज-कर्मचीरयों से पोडित थे। वे इनसे माल लेकर पूरो कीमत नही देते थे।1 यद्यपि साधारण जनता की अवस्था अच्छी नही थी तथापि यह भी स्पष्ट है कि वस्तुओं का मूल्य बहुत कम होने से वे अपना सुजारा कर लिया करते थे। उस युम के वस्तुओ के भावों से यह स्पष्ट हो जाता है। अकबर के समय में (कुछ बाद भी) वस्तुओं के मूल्य इस प्रकार थे गेहूँ एक रुपये के मई सेर, बाजरा एक रुपये का १२५ सेर, उदड़ या मूँग की दाल एक रुफये की ५६ सेर, जी एक रुपये का ह सेर, दूध एक रुपये का ४० सेर, बकरे का माँस एक रुपये का १५ सेर, चीनी एक रुपये की 5 सेर मिलती थी।3 मजदूरी की दरे इस प्रकार थीमामूली मजदूर - प्रतिदिन दो दाम, मिस्ती, राज, बढई आदि-प्रतिदिन सात दाम पाते थे। पूरे देश मे सर्वत खाद्य परदार्थों का बाहुल्य था। बिना किसी कठिनाई के सब लोग रोटी खा सकते थे। इतना होते हुए भी निम्न वर्ग केवल पेट पाल सकता था। कपडे, गहने, मकान, शादी-उपाह, उत्मव व अन्य दायित्वों के निर्वाह के लिए उन्हें कर्ज लेना पडता था। समय- समय पर आने वाले दुर्भिक्षों के कारण भी इनकी दशा बिगड़ती रहती थी। युद्ध के लिए प्रस्थित सेनाएँ खड़ी फसले उजाड देती थी। डेड लाख मुगल मैनिक जिधर चल पडते वहां की मारी फसले नष्ट हो जाती। मराठे भी विजय प्राप्त करने की बुन मे इन बातो की पन्वाह नहीं करते थे। श्रमिकवर्ग केवल क्षृबा व आनतायियो के,

१ डॉ. सत्यकेतु विद्यालकार भारतीय सस्कृति और उसका इतिहास, पू० ५४६ २ यह सेर र जरात के सेर से दुगुना होता था। ८० तोले का होता था। . डॉं० सत्यकेतु विद्यालंकार: भारतीय सस्कृति और उनका इतिहास, प०५५४ ४. एक दाम = उस समय के रुपये का ४०वाँ हिस्सर : आज का स पैसा। डॉ० सत्यकेतु विदयालकार : भारतीय सस्कृति भोर उसका इविहास, पृ० ५४४

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राति तत्त्व और रीति युग

आक्मणो से ही मीडित न था, अनेक महामारियो से भी नस्त था। जन-घन की बहुत हानि होती थी। धार्मिक परिस्थितियाँ अकबर की धार्मिक सहिष्णुता के फलम्वरूप भारत मे उस सय हिन्दू, सिक्ख, वौद्ध, जैन, इस्लाम, जरथोष्टी एवं ईसाई धर्म के मतावलंबी शातिपूर्वक अपने-अपने मत एव सम्प्रदायो का अनुवर्नन करने थे। अकबर भी इन विभिन्न धर्मों के धर्मगुरुओ के उपदेश मुनता था तथा जिस धर्म मे जो कुछ ग्राह्य हो सकता था, उसे ग्रहण करता था। अकबर के समय में लोगों को धार्मिक स्वतन्त्रता का अनुभव यथार्थ रीति से हुआ। हिन्दू-धर्मे के अन्तर्गत उस समय प्रमुख्त, मुग्य रूप से निर्गुण व सगुण मतो का समावेश होता था। सगुण सप्रदाय भी जैव, वैष्णव आदि भेदों मे विभाजित थे। राँधो के प्रमुख भेद थे- (१) शकराचार्य के अद्वैतवाद का अनुसरण करने वाले, (२) पाशुपत शैद, (२) कापालिक शँच, (४) बीर शैव, (५) लिंगायत शैब, (६) शिव सिद्धाता- नुयायी। शाँवों के ये छ भेद पायं जाते है।१ वैष्णवो मे कृष्णोपासक, समीपासक और आलवार-तीन भेद है। आलवार संत दक्षिण मे हुए और उन्होने भक्ति का प्रदाह द्रविड़ देश से उत्तर में प्रवाहित कर दिया। कृष्णमतावल्बी सम्प्रवायो मे (१) विशिष्टाद्वैत, (रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिपाचित), (२) मध्वगौडीय, (मध्वाचार्य द्वारा प्रतिपादित) (३) द्वैताद्वँस (निम्बाकाचार्य द्वारा प्रतिपादित) (४) शुद्धार्व्वत (वल्लभा- चारयं द्वारा प्रतिपादित) प्रमुख है। रामोपासको के दो वर्ग है-मर्यादावादी अथात् तुलसीदास की परस्परा में आने वाले तथा माधुर्यभाव के उपासक। सखी-सम्प्रदाय की भी सही स्थिति है। रामानन्द की परम्परा में तुल सी ने मयदायुमुषोत्तम भगवान् राम की उपासना की, जबकि नाधुर्य भाव से राभ की उपासना करने वालो ने-'रास रसिक सम्प्रदाय' मे लीला विहारी राम की कल्पना की। इस सम्प्रदाय के उपासक राम को लीला विहारी, सीता को राधा और स्वयं अपने आप को गोपी समझकर राम की उपासना करते है। सखी सम्प्रद्राय गोपी भाव की उपासना पद्धति का अनुवर्तन करता है। निर्गुण धाग के दो भेद-(हिन्दी में) चल पड़े-ज्ञानाश्रयी व प्रेमसार्गी। ज्ञानाश्रयी कबीर ने बाह्याचार का खडन कर आत्मशुद्धि व अडिग ईश्वर-निष्ठा का प्रवल समर्थन किया। प्रेसमार्गी जायसी ने लौकिक प्रमा्यान के माध्यम से अलौकिक रहस्यमय 'पारत' रूप का सर्वत्र उद्घोप किया है। ज्ञानमार्नियो मे दादू, नानक रैदास, वर्ग रह निरक्षर सन्तो ने अपने-अपने पत्थ चलाए। बौद्धो मे उस समय महायानी न्र बज्यानी दो नेट थे। महायान-वाँद्ो का 1

प्रसार पश्चिमी भारत और नव्य प्रदंश में विशेष रूप से था। बजयानो बौद्ध उड़ीसा मे अधिक प्रबल थे। वज्चयानियों से प्रभावित 'वाम मार्ग' तथा 'गाकन सम्नकाय' अपनी-

  1. Dr. A. B Pandey : Socicty and Government in Medieval India, p.208

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रीति-तस्व और रीति-युग

अपनी आचार-निष्ठा छोड़ प्रतीको का रहस्य भूलकर स्थूल ऐन्द्रिय भोगादि में लिप्त हो गए थे। नानक के बाद सिक्खों मे गुरु-परम्परा गुरू हुई। शुद्ध-धर्म-सम्प्रदाय के रूप से शुरू हुए इस सम्प्रदाय को मुगल अत्याचारों का सामना करने के लिए थोड़ा राजनीतिक स्वरूप ग्रहण करना पडा। मुगल शासको के द्वारा की गई गुरु अर्जुनदेव, गुरु तेग- बहादुर की हत्याएँ तथा गुरु गोविन्दसिंह के दो पुन्नो-रहसिंह और जुम्मारसिंह- को जीवित दीवार मे चुनवा देने का परिणाम ही यह हुआ कि समस्न सिवस्न आति उनकी विरोधिनी हो गई। जैनों की परम्परा पर्याप्त प्राचीन थी। उन्हे किसी राजनीतिक संघर्ष का प्रवल प्रतिकार करना नही पडा। गुजरात और राजस्थान में ही उनका अधिक प्रसार था। स्थयं अकबर ने भी अपने दरबार में जैनाचार्य हीर विजयसूरि, विजयसेन मूरि, भानुचंद्र उपाध्याय और जिनचन्द्र आदि को सम्मानपूर्वक स्थान दिया और उनसे जैन धर्म का उपदेश भी सुना था। उनसे प्रभावित होकर उसने पशु-हिंसा बन्द करने का प्रयत्न भी दिया था।1 जरथ ष्ट के उपदेश सुनने के लिए अकबर ने दस्तूर मेहरजीराना नामक धर्म- गरु को तथा ईसाई धर्म के उपदेश सुनने के लिए गोवा से पुरतगाली पादरियो को दुलवाकर अपने यहाँ स्थान दिया था। मुगल शासन के कुछ पूर्व ही भारत में सूफी सन्तो का प्रभाव बढने लगा था इम्लाम का प्रचार भी बढ़ रहा था। अकबर ने सब धर्मो का भार-संग्रह कर 'दीने इलाही' की रचना की जिसमे-एक हो ईश्वर को मानने, अन्धवश्वास का त्यागकर विवेक से काम लेने, नॉस-भक्षण न करने, पझुहिंसा न करने, सूर्य और अग्नि की पूजा करने-का उपदेश दिया गया है। कुछ दरवारी और जनता के लोगो ने इस का अंगी कार किया परन्तु वह व्यापक वर्म नही वन पाया। धर्म जासक द्वारा चलाया नही जा तकता वरन् महज ही जन-हृदय-ग्राह्य बनता है, यह इससे स्वन सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त कुछ सम्प्रदाय-प्राणनाथ, सतनामी, नारायणी, चिब्निया (सूफी), निजामिया, कादरिया आदि-भी चले, जिनमे हिन्दू-मुस्लिम दोनो का विश्वास घाI उतर-मध्य-काल अथाल् रीतिकाल मे जहाँगीर और गाहजहॉ ने इन धार्मिक प्स्पराओं को तोडने का प्रयत्न नही किया. नम्भवत. इसकिए मि दोनों की नानाएँ हिन्दू (गजपुत) थी, किन्दु औरंगजेब ने अपनी कट्टरता मे इनमे से बहुत से वर्म-सत्- दायो को पनपभे नही दिया। जूरा रीति-युग धार्सिक दृष्टि से त्रिभिन्न सम्प्रदाया का असाडा था। नैतिक व

१ डॉ० सत्यकेतु उिद्यालकार: भारतीय सस्कृति और उसका इनिहाम, पृ० ५६१

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१०० रोति-तस्व और रीति-युग

बौद्धिक ह्रास का युग था।9 धर्म भी अपने उदात्त रूप को छोडकर अन्धवि्वास, रूडियों की दासता, बाह्याडम्बर, में फँसा था। धर्मगुरुओं, मौलवियो, वैष्णव-आचार्यों का स्थान 'ईश्वर' के बराबर था। उनकी बात वेद-वाक्य समझी जाती थी। बादशाह भी उनमे भील रहता था। उनके धन-वैसन, विलास की तुलना मे शासक फीका पड जाता था। जनता का नंतिक स्तर उठाने के स्थान पर वे उसे अधि: निम्नतर करते थे। भक्तिकालीन माधुर्य भावना का सूक्ष्म तत्व लुप्न-सा हो गया और उसके स्थान पर स्थल ऐन्द्रिक भोग व भ्रष्टाचार बढने लगा। डॉ० ए० बी० पाण्डेय ने इम पर प्रकाग डालते हुए विस्तार से उसकी आलोचना की है।२ उनके मतव्य का सार यह है कि जीव और ब्रह्म के अद्वैत के उच्च आदर्श के प्रतीक-रूप यह 'राधाभाव' परवर्तीकाल मे स्थूल स्त्री-पुरुप सम्बन्ध मे परिणत होकर रह गया। सामाजिकता का विचार किए बिना इसने भ्रष्टाचार का अधिक प्रचार किया। राजाओ की भोग-लिप्सा को उसने अनुकल भूमि प्रदान की व एक अलग सम्प्रदाय के रूप मे प्रतिष्ठा भी पायी। इसकी लपेट से 'रामभकति' भी वच नही पायी। 'रसिक सम्प्रदाय' ने राम की माधुर्य भाव से उपासना की। राम का लीला-विहारी रूप ग्रहण कर उनकी सयोग लीला के कुत्सित चित्न भी प्रस्तुत किए। इस पर अत्यन्त खोझकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल नें कठोर शब्दों में इसकी प्रतारणा की।5 उसके प्रत्युत्तर में डॉ० भगवती सिंह ने 'राम भवित मे रसिक सम्प्रदाम' नामक शीघ ग्रंथ में इस सम्प्रदाय के स्वरूप व दर्जन को स्पष्ट किया और बहुत सी शकाओं का निरसन भी किया। फिर भी इतना तो सत्य है कि यह एक ऐसा सम्प्रदाय था, जिसमें युगीन विलास वृत्ति का प्रत्यक्ष प्रभाव पडा कक्षित होता है। नैतिक भ्रष्टाचार, कामुक लीलुपता, भक्तजनो की स्त्रैण चेष्टाएँ, शारीरिक- स्थूल आकांक्षाएँ धार्मिक विकृतियों के रूप में उभर कर सामने आयी। इन विकृतियों को 'उन्नयन' कहना ईश्वर प्रेम का अपमान करना है। सर्वव स्थूल पार्शिवता व्याप्त थी। भक्ति मे वित्त सेवा का महत्त्व बढता ही गया।5 साम्प्रदायिक गुरुओ की पूजा व भक्तों मे गोपी भाव के कारण अनाचार फैलने की पर्याप्त सुविवा हो गई। धर्म के गम्भीर तत्व-चिंतन के स्थान पर वितण्डावाद, चमत्कार, भेडियाघसान, बाह्याडम्बर, गुरुओ का आतक व तातिको का प्रभाव ही अधिक बढ गया था। सर्वत्र वार्मिक अरा- जकता दिख्वाई देती थी। रीतियुग में किसी भी सम्प्रदाय मे एक भी ऐसा सन्त या महात्मा नहीं हुआ,

१. डॉ० नगेन्द्र हिन्दी साहित्य का बुहृत् हतिहास, भा० ६, पृ० १७ R. Dr. A. B Pandey . Society and Government in Medieval Indta, p.152-54 इप रामचन्द्र शुक्त . हिन्दी साहित्य का इतिहाम, पृ० १४२-५४ ₹• नगेन्द्र. हिन्दी साहित्य का बहत् इतिहाम, भाग ६, पृ० १८

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रीति-तत्त्व और रीति-युग

जिसने अपनी वाणी व आचरण द्वारा समुचे समाज का नेतृत्व किया हो या समाज की गति बदल डाली हो। युगोन विलासपरक दृष्टि से धर्म भी प्रभावित हुए बिना नही रहा। सर्वत्र ऐव्वर्य, तृष्णा व स्थूल शृंगारोपासना का ही राज्य था। सास्कृतिक परिस्थितियाँ रीति-युग दो सस्कृतियों का संगम-स्थल है-इस्लामी संस्कृति और भारतीय सस्कृति का। भकति-युग मे इन दो सस्कृतियो का संघर्ष रहा किंतु क्रमश यह उप- नर्मित होता गया। जैसाकि सदैव होता है-विजेता की सस्कृति का विजित पर प्रभाव पटता है और विजित भी इस प्रभाव को गनैः-वनै आत्मसात् कर लेता है। विजेता सुगलो का प्रभाव विविध क्षेत्रों में पडा। उन पर अलग-अलग विचार कर लेना समीचीन ही होगा। भाषा सस्कृति के अंगो मे भाषा प्रमुख है। विजेता की भाषा का प्रभाव बहुत शीध्र- भामी व तीव्रतर होता है। मुगल शासन का बल पाकर फारसी पूरे देश मे छाने लगी थी। राज्य-भाषा भी वही थी। शिक्षा, न्यायालय, श्ञासन सर्वत्र फारसी का व्यवहार होने लगा। हिन्दू भी फारसी पढने लगे थे। राज-दरबारो मे हिन्दी का स्थान फारसी ने ले लिया था। शाहजहॉं ने अवश्य हिन्दी को थोड़ा-बहुत प्रश्रय दिया परन्तु औरंगजेब ने तो अपने दरबार से हिंदी को बहिष्कृत कर दिया। हिन्दी के कवि छोटे-बडे हिन्दू- राजाओ के आश्रय मे पलने लगे। यद्यपि राजभाषा फारसी थी और उसमे भी साहित्य रचा जाता था, परन्तु साहित्य सूजन की प्रमुख भाषाएँ ब्रज एव अवधी ही थी। विभिन्न राजाओं का आश्रय पाकर रीतियुगीन कवि अपनी काव्य-रचना किया करते थे। केशव को इन्द्रजीत का, भूषण को शिवाजी, छत्साल आदि का, बिहारी को राजा जयसिंह का, मतिराम को राव भावसिंह का, घनानन्द को मुहम्मदशाह रगीले का आश्रय मिला था। इन कवियो की भाषा पर फारसी का प्रभाव पडना सहज स्वा भाविक है। वनानन्द की भाषा पर फारसी प्रभाव बहुत स्पष्टतया लक्षित होता है।

साहित्य रीतियुगीन साहित्य मुख्यत फारसी, ब्रज एवं अवधी भापाओ मे ही रचा गया है। फारसी के कई प्रसिद्ध कवि इस युग में हुए हैं। उनमे प्रमुख है-अबुल फजल, गिसास बेग, नकीब खॉ, मुतमिद खॉ, निआमतुल्ला और अब्दुल हक देहलवी। औरंगजेल काव्य का प्रेमी नही था। उसके बाद के शासक भी विशेष कला व साहित्य-प्रेमी न थे। फारसी काच्य का विकास भी औरंगजेब के समय में अवरुद्ध हुआ। हिन्दी मे उस समय ब्रज और अवधी मे रचना होती थी। रीतियुग मे असंख्य कवियों ने काव्य- रचना की थी किन्तु उच्च स्थान-लाभ तो गिने-चुने कवियो को ही हुआ। केशव देव, बिहारी, मतिराम, सेनापति, घनानन्द, भूषण, रहीम, गिरधर, पद्माकर, बोधा आलम ठाकुर का नाम सगव लिया जा सकता है। काव्य-शास्त्रकारों में चिन्तामि

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१०२ रीति-तत्व और रीति-युग

केशव, कुलपति, भिवारीदास, श्रीपति आदि मुख्य है। रौतियुगीन काव्य-धाराओ को तीन भागो में वर्गीकृत किया जाता है-रीतिनद्ध, रीति-सिद्ध, रोति-मुक्त। रीनिनद धारा के प्रतिनिषि केशव, रोतिसिद्ध धारा के प्रनिनिधि बिहारी और रीनिमुक् धा के प्रतिनिधि घनानन्द है। विषय की दृष्टि ने इस युग की कविता अधिकार शृगार परक ही थी। नामिका-भेद, षड्ऋतु-वर्णन, वारहमासा, नवरशिखवर्णन, संयोग-वियोग के ऊहात्मक वर्णनो से, कुछ वीर रम की रचनाओ मे, कुछ भक्ति की रचनाओ मे व कुछ नीतिपरक उक्नियों से इस रुग का साहित्य-भण्डार आपूरित है। प्रेम और श्रृंगार ही इस युग के प्रयुख विषय थे और उनका निरूपण करना ही प्रमुख प्रवृत्ति थी। साहित्य मे सर्वत्र चमरकार, अलकार-योजना एवं प्रदर्शन-भावना प्रमुख थी। संगीत रीतिकाल में सगीत की विशेय उन्नति नहीं हुई, बल्कि यों बहना चाहिए ि उसकी अवस्था गोचनीय हो गई। रीतिकाल के पूर्व राजा मानसिह के प्रशय मे भारतीय संगीत ने अपना चरसोत्कर्य प्राप्त किया। राजा मानसिंह ने 'श्रुपद' शैली का आविरकार किया। मुगल युग में भारतीय संगीत कला एव सगीत शास्त्र को विदेशी प्रभावो का सामना करना पडा जिसमे संगीत कला तो इन प्रभावो को झेलकर अपना अस्तित्य भुरक्षित रख सकी, कितु संगीत शास्त्र मे कोई नवीन मौलिकता नही आई। मुगल- बरबार मे प्रश्य पाने वाले ३६ संगीतज्ञो में केवल चार ही हिन्दू थे। अकबर के समय में तानसेन, पुढरिक विट्ठल का स्थान महत्वपूर्ण था। तानसेन संगीत कला के क्षेत्र मे और पुढरिक विट्सल सगीत शास्त्र के क्षेत्र मे अन्यतम थे। जहॉगीर के समय में पडित दामोदर ने संगीत शास्त्र का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'संगीत दर्पण' रचा। शाहजहां के समय मे सगीत के क्षेत्र में प्रदर्शन वृत्ति व अलंकरण वृत्ति का प्रवेश हुआ। इसी युग मे ग्रहो- बल का प्रसिद्ध ग्रन्थ 'संनीत पारिजात' रा गया, जिसमे २९ विक्रृत स्वरों के नामों का उल्लेख युगीन अलंकरणवृत्ति का प्रमाण प्रस्तुत करता है। प्रायः सभी दरबारी गायक तानसेन की रोली में ईषत् परिवर्तन कर अपने युग की रति का प्रदर्शन करते थे। औरंगजेब संगीत का शत्रु था। उसके समय मे सगीत कला का बहुत ह्रास हुआ। उसने दिल्ली दरबार के संगातकारों को दरबार से बहिष्कृत कर दिया, संगीत गोष्ठियों पर राजकीय प्रतिबन्ध भी लगवा दिये। फलत संगीतकारो के लिए आजीविका चलाना भी बडा दुष्कर हो गया। ये सभी छोटे-मोटे राजाओं के आश्रय मे चले गये। बीकानेर नरेश के आश्रय में आचार्य भावभट्ट ने 'अनुप-संगीत-रत्नाकर', 'अनूप विलास' तथा 'अनपांकुश' ग्रन्थ रचे।२ इसी समय दक्षिण में एक स्वतन्त्र बौली विकसित हो रही थी, जिसके प्रमुख सवार्य थे आंधनिवासी सोमनाथ और पं० व्यकट भरवी। उत्तर भारत की संगीत-

१ डॉ नगेन्द्र : हिंदी साहित्य का बुहत् इतिहास, भाग ६, प्० २३ २. यही, पृ० २७-२७

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पद्धति पर इनका प्रभाव बहुत स्पष्ट है, विगेपत. गीत-रचना पर। औरंगजेव की मृत्यु के बाद मंगीतकला का पुनरुदधार हुआ। मुहम्मदशाह रगीले के दरबार मे उच्च-कोडि के सगीतज्ञ रहते थे। रीतिकाल की स्वच्छन्द धारा के प्रतिनिधि, प्रमुख कविवर 'घनानद' जो बड़े नबुर गायक थे, प्रारम्भ मे इन्ही के मीरमुशी थे। उत्तर रीति-युग मे सगीत मे चमत्कार, अर्लकरण, अनुरजन, शृंगारोद्ीपन की प्रधानता रढती गई। सगीत मे गम्भीर तत्वों का अभाव तथा स्व्रैण-तन्व्रो को अविकता बढ़ती गई। उमरी जैने स्वैण प्रकार का स्वागत बडा। रीति-दुग के प्रमुख संगीतकार है-लोचन, पढरिक, भाव भट्ट, हुक्यनारायण देव, सुहम्सद रजा, महाराजा प्रतापसिह एव कृष्णानद व्यास। प्रमुख सगीत-ग्रंथो के नाम है गगन रंगिणी, सद्राग चद्रोक्य, गग सजरी, राग माला, नर्तन निर्णय, राग- रत्नाकर आि। निष्कर्ष रूप मे यही कहा जा सकता है कि रीति-युग में आकर सगीत तमस्या न रहकर मन-बहलाब की बीज बन गयी थी। संगीत-कला और सगीतगास्व दोनों क्षेत्रों में लोकप्रियता की ओर दौड अधिक थी, गास्तीयता पिछड़ती जाती थी। प्रुपद का स्थान स्वाल, ठुमरी, टप्पा और दादरा ने ले लिया था। सगीत विनासयुक्त रगीनी से प्रभावित होता जा रहा था। गोरी के टप्पो के आलकारिक स्वर बहुत लोकप्रिय हुए। तराना, रेखता, कव्वाली आदि प्रणानियों का प्रचार बढा।१

चित्रकला रीतियुगीन चित्रकला की तीन प्रमुख कैलियाँ प्रसिद्ध थी (१) राजधूत- गैली, (२) मुगल-शैलो, और (३) पहाड़ी अथवा कांगडा-शौली। ये तीनों सँलियाँ सचथा पृथक् व अप्भावित न होकर परस्पर सम्बद्ध व प्रभावित थी। विद्वानों की गय है कि राजपूत-गैली जन-भावना मे, मुगन-बैली दरबार से और कांगडा-ैली स्थानीय जन-पद-भावना से धनिष्ठ रूपेण मम्बद्ध थी। इन मैलियों की अपनी कुछ विशेपताओ के कारण इनका अलग परिगणन और अध्ययन किया जाता है, किन्तु इसका यह नात्पर्य नहीं कि वे सवथा असंपृक्त है। इस युग की चित्रकला में कलाकारों की 'स्वान्त: सुखाय'- भावना कम, बल्कि आश्रयदाता की परितुष्टि की भावना विशेष दुष्टियत होती है। परिणामतः इन छोटे-मोटे सामन्तों की सुरुचि-कुरुचि का प्रत्यक्ष व नीव्रतम प्रभाव इन कृतियो पर पडता स्वाभाविक था। अन्य कलाओ व साहित्य की भाँति रीतियुगीन-चिव्रकला मे भी प्रदर्शन, अलकरण अधिक, कलाकार का आत्मन्ंवेदन नही- बत् दिलाई देता था। रीतियुगीन चित्रकला की प्रमुख लाक्षणिकताएँ इस प्रकार है- (१) विलास्परकता एवं प्रदर्शन-प्रधानता, (२) शृगार-निरूयण की प्रमुखता, (३) आत्मसवेदन की गौणता, (४) विशदता और गाम्भीर्य का अभाव, (५) अलंकार की

१ डॉ० नगेन्द्र. हिन्दी साहित्य का बहत् इतिहास, भाग ६,यृ० २७-२५ वहो

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प्रवृत्ति, तथा (६) परम्परा-पालन, चमत्कार-प्रधानता, श्रमसिद्ध बारीकियो का सन्नि- वेश आदि। रीतियुगीन चित्रकला के प्रमुख विषय थे-(१) नायिका-भेद पर आधारित विभिन्न प्रकार की नायिकाओ का चित्नांकन, (२) पौराणिक उपाख्यानों पर आधृत प्रसग व व्यक्ति-चित्र, यक्ष, नल-दमयंती, हरिश्चन्द्र-तारामती, गंगावतरण आदि, (३) राग-रागिनियो के प्रतीक चित्र और (४) व्यक्ति-चित्र (आश्रयदाता राजा या बादशाह सामतादि के चित्र)।१ मुगल-शैली के चित्रो मे विलासपरक प्रदर्शन की प्रधानता है, तो राजपूत व कागड़ा-ैली के चित्रो मे नारी-सौन्दर्य (आवृत और अनावृत भी) के अकन मे कला- कार की नव्यतर कल्पना व तज्जन्य कोमल ऐद्रिय भाव की अभिव्यक्ति की प्रधानता है, इसमे विशदता एव गम्भीरता का अभाव पाया जाता है। मुगलों मे बाबर, हुमायूं, अकबर व जहॉगीर चित्नकला के बडे प्रेमी थे, किन्तु शाहजहॉं को स्थापत्य-कला से विशेष अनुराग था। हुमायू के साथ पणिया से भारत आए हुए सैयदअली तजरीजी और र्वाजा अब्बुस्समद नामक दो चित्रकारो ने भारत मे मुगल-शैली की चित्न-शैली की नींव डाली 1 अकबर के आश्रय मे सत्तरह चित्रकार थे, जिनमे तेरह हिन्दू थे। अकबर के आदेश पर इन्होने चगेजनामा, रामायण, नल-दमयंती, कालिय दमन आदि विविध प्रसिद्ध पुस्तको को चित्नो द्वारा विभूषित किया। जहाँगीर के सरक्षण मे आध दर्जन से भी अधिक चित्रकारो ने ख्याति प्राप्त की थी। जहाँगीर बहुत ऊँचे मूल्य दे- देकर उनके चित्र कय करता तथा इनका गौरव बढ़ाता था। उसमे चिवों की परीक्षा करने तथा उनकी अभिशसा (एप्रिसिएशन) करने की अद्भुत क्षमता थी। वह चित्रो के गुण-दोषां की बडी सूक्ष्म मोमासा करता था। इतिहासकार व चिवकला मर्मज्ञ मानते है कि जहाँगीर की मृत्यु के साथ ही मुगल-चिव्रकला की आत्मा मर गई।* शाहजहॉ को चिव्रकला से अधिक वास्तु-कला से प्रीति थी। फलत. राज्याश्रित चित्रकारो को अन्यन आश्रय खोजना पड़ा। अपने चित्रो को बेचने के लिए घूमना पडा। शाहजहाँ के बाद तो चित्रों का व्यवसाय ही होने लगा। चित्नकार अब अमीर-उमराओ की रुचि का ही ध्यान न रखकर सर्व-साधारण जनता की पमन्द का विचार कर चित्र- निर्माण करने लगे। इस युग के चित्नो की आत्मा शृगार ही थी। अभिसारिका खडिता, वासक-सज्जा आदि नायिकाओं के परम्परा-निबद्ध चित्र ही अकित किए जाने लगे। कागड़ा-शैली के चित्रो में कृष्ण-राधा, राजपुत-शैली के चित्रो मे शिव-पार्वती के शृगारपरक चित्नों की प्रधानता रही। रानी रूयमती एव राजबहादुर के चित्र भी बनने लगे। अधिकाश नायिकाओ के चित्र भानुदत्त की 'रतमजरी' पर आधुत थे। बारहमासा, षड्ऋतु, वसंत-वर्षा के उद्दीपक चित्र भी इसी युग की उपज हैं। जयदेव उ डॉ० नगेन्द्र : हिंदी साहित्य का बुहृत् इतिहाम, भाग ६,पृ० १६ २. डॉ० सत्यकेतु विद्यालकार : भारतीय सस्कृति और उसका इतिहास, पृ० ५७६ ३ बहो. प० ५७७

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और विद्यापति के गीतो पर (और आगे चलकर बिहारी के दोहो पर) चित्र बनाने की प्रवृत्ति भी प्रबल पडती गई। व्यक्ति-चित्रो के नाम पर दरवार के तथा विकार के प्रसगो पर भव्य चित्र बने। विभिन्न राजाओ के पुरे जीवन को चित्रो मे अकित करने की प्रवृत्ति भी गुरू हुई। औरगजेन व उसके परवर्ती शासकों ने चित्रकला के प्रस्ति कोई आकर्षण नही दिखाया। स्थापत्य-कला

रीतियुगीन स्थापत्य-कला के दो रूप उपलब्ध होते है-राजपूत-शैली का स्थापत्य और मुगल-शैली का स्थापत्य। मुगल-शैली का एक रूप वह है. जिसमे भार- तीय एवं फारमी परम्परा का समन्वय किया गया है। दूसरा रूप वह है, जो पूर्णत फारमी परम्परा का अनुसरण करता है। अकबर ने समन्वयवादी रूप अपनाया था, तो बाहजहाँ ने 'शुद्ध फारसी परम्परा' का अनुसरण किया था। जहॉगीर चित्रकला का विशेष अनुरागी था। उसकी ख्याति तो कम्मीर मे निर्मित उद्यानो, झीलो और उप- बनो के कारण ही विशेष थी। जहॉगीर द्वारा निर्मित सभी स्थापत्यो मे विलास, ऐश्वर्य, लालित्य व अलंकरण अधिक मात्रा मे विद्यमान थे, गाम्भीयँ कम। विशद, व्यापक एव गम्भीर प्रभाव के स्थान पर ये रचनाएँ पाषाण के माध्यम से कोमल व ललित अभिव्यक्ति ही अधिक कर देती थी। यही कारण है कि अकबर की स्सृति मे निर्मित अकबर का मकबरा सम्राट अकबर के गम्भीर व प्रभावाली व्यक्तित्व के अनुरूप नही बन पाया। गाम्भीर्य व व्यापक प्रभाव का तो उत्तरोत्तर ह्रास ही होता जा रहा था। जहॉगीर का मकबरा, अब्दुरहीम खानखाना का मकबरा, एतमाद उद्दौला का मकवरा देखने से यह स्वत स्पष्ट हो जाता है कि मुगल स्थापत्य-कला किस प्रकार दिन-प्रतिदिन अना गाम्भीर्ग एव व्यापक-प्रभाव ख्रोगर कमग अलकृग्ण, पच्चीकारी का आश्रयण करती हुई स्वैण प्रभावो से ग्रसित होती जा रही थी। इन रचनाओ मे रचयिताओं या निर्माता शानक-सस्ाटो या साम्राजियों की किसी प्रकार की मौलिक़ प्रतिभा के दर्शन नही होते थे। उसका स्पष्ट उदाहरण है, नूरजहों द्वारा परिकल्पित व उसके निर्वेधन मे निर्मित उसके पिता एतमाद उद्दौला का मकबरा। शाहृजहाँ के समय मे स्थापत्य-कला का चरम विकास हुआ। शैली और अलंकरण दोनों क्षेत्रो में नव्यनर प्रदोग किये गए। उसकी अमर कृति 'ताजमहल' समस्त ससार के लिए आकर्षण का केन्द्र है। ताजमहल की समस्त गरिमा व समूचा वैभव उसकी सज्जा एव अलकरण पर निरभर है। वास्तव मे कला-सौप्ठव की उत्तमोत्तम मिसाल है यह ताजमहल। इम विषय मे एक मंतव्य द्रष्टव्य है-"दरास्तव मे शाहजहॉँ के शिल्पी ने अपनी कुला के द्वारा पुप्प-वदना मुमताज की प्रस्तर समाधि मे भी फूल की-लौ कोमलता ला दी है। सफेद सगमर्मर की आत्मा में शाहजहॉ का ऐश्वर्य तथा उसके कोमल प्रभाव मे उसका प्रेम सदा के लिए अमर हो गया है।"

१ डॉ. नर्गेन्द्र : हिंदी साहित्य का बहत इतिहास, भाग ६, प० २५-२६

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औरगजेब ने साहित्य, सगीत, कला-किसी को भी बढावा नही दिया। उमके शासनकाल मे वने सभी मकवरे स्थापत्य-कला की दुर्बलता के उदाहरण है। उसके बाद के शासको ने भी स्थापत्यकला के विकास मे कोई योगदान नही दिया। परवर्ती कृनिग मे न तो मार्दव है, न गाम्भीर्य और न ऐश्वर्य ही। रीतियुगीन स्थापत्य-कला मे रीनि- युगीन साहित्य की भाँति परम्परानुसरण, चमत्काराश्रय, अलकरणाधिक्य, शृगनी एव रोमानी वातावरण की सृष्टि ही पायी जाती है। इसका प्रभाव रीतियुगीत रन- पूती स्थापत्य पर भी पडा है. किन्तु उसने भागतीयता की रक्षा की है। महागजा मानसिह, महाराणा कुभा, महाराजा बीरसिह देव आदि के नाम बडे गौरव के सान लिए जा सकते है। महाराणा कुभा द्वारा निर्मित विष्णु-मदिर, गुजरात विजय के उपलक्ष्य मे निर्मित एक सौ बारह फीट ऊँचा विजय स्नम्भ उनकी कीर्ति का प्रमग्ण है। महाराज मानसिंह द्वारा बनवाया गया मानमदिर व बृन्दावन का विनाल गोविंद देव का मदिर बड़े प्रसिद्ध है। महाराज वीरसिह देव ने ओरछा मे विभान चतुर्भुज मदिर बनवाया था। जोधपुर, ओरछा, दतिया आदि स्थानो पर विकसित राजपूत स्थापत्य-कला मे मृगल-शैली का प्रभाव अवव्य पाया जाता है किन्तु अलकरण उसका अपना है। सर्वत्र अलकरण व प्रदर्शन की प्रवुनि प्रबल रूप से पायी जाती है।

उपसंहार रीति-युग की विभिन्न परिस्थितियों पर सामूहिक रूप से विचार करने पर कुछ तथ्य स्त्रत स्पष्ट रूप से उभर आते है (अ) रीतियुगीन समाज व्यवहार मे प्रमुखत. दो भागो मे विभक्त था -- (१) ऐग्वर्य-सम्पन्न शासक वर्ग एवं उसके वर्म- चारी, कलावत, शिल्पी, सगीतकार, कवि आदि जिन्हे किसी प्रकार का अभाव नही था। जिन्हे अपनी प्रभूत सम्पत्ति के व्यय करने के लिए विलास एव भोग के नित्य नबीन मार्ग खोजने पडते थे। (२) श्रमजीबी, मजदूर, कृपक वर्ग एवं राज्य के अति निम्न वर्ग के कर्मचारी जो केवल अपनी उदरपूर्ति कर सकते थे, जिन्हे अपने जीवन के अन्य उत्तरदायित्वो के निर्वाह के लिए सदैव चिंताग्रस्त रहना पडता था। यद्यपि उस युग मे वस्तुओं के मूल्य इतने कम थे कि व्यक्ति को सामान्य-स्तर के जीवन-यापन के लिए घोर परिश्रम करना नही पडता होगा, किन्तु उदरपूर्ति के अतिरिक्त मनोविनोद, विलास- वैभव के नाम पर वे कुछ भी सक्रिय नही होगे। लोक-व्याप्त सामूहिक उत्सव, मेले, व्रतर्द्द से अवश्य इस की क्षति-पूर्ति हो जाती होगी। (आ) रीतियुगीन काव्य, सगीत, शिल्प, चित्रकारी, स्थापत्य आदि का भी इस सामन्त वर्ग से घनिष्ठतम सम्बन्ध रहा और इनकी रुचि-कुरुचि से वे अत्यन्त तीव्र एवं प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित रहे। लोम- जीवन से वे अल्पान मे ही सम्बद्ध थे। रीतियुगीन काव्य अपने तीनों रूपो मे (विशेषत. तिनद्ध और रीतिसिद्ध) साभन्तो-शासको की परितुष्टि को केन्द्र मे रखकर परि- चालित रहा। निष्कर्ष यह कि रीतियुमीन कविता सर्व-साधारण लोक हृदय की यथार्थ-

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तम अभिव्यक्ति कम, सामन्तीय जीवन की प्रदर्शनमूलक एव चमत्कारपूर्ण अभिव्यक्ति ही विशेष थी। सम्भवतः यही कारण है कि उसमे अभिव्यक्ति-गत गास्त्रीयता और अनुभूति-गत रोभास का मणि-कांचन योग हुआ है। रीनि काव्य अपने कलेवर में परम्पसुश्रित और आत्मा (spirt) से स्वच्छन्द्र रोमासवादी व विलासपरक है। (१) वार्मिक क्षेत्र मे भी अनेक समवायो का डिन-डिन पीा जा रहा था। अराजकता, निरकुगता, भ्रष्टाचार, विलामप्रियता आवि दषणों में कूछ वापिक सम्प्रदाय ग्रस्त थे। 'राधा भाव' का कुत्मिततम रूप रीनियुगीन वैषणव धर्म-साधको ने दिग्ा दिया। (ई) राजनीतिक दृष्टि से विचार करने पर विशाल राष्ट्रीय नाम्राज्य भावना के स्थान पर सकोर्णता, व्यक्तिगत अहकार तथा छोटे-छोटे राज्यो का ई्प्यामूलक मंघर्पपूर्ण अम्नित्व दृगगोचर होता है। धर्म के क्षेत्र में तुलसी द्वारा स्थानित ममन्वय व गजनीनि के क्षेत्र में अकबर द्वारा स्थापित एकता व समन्द्रय की भावना परवर्ती गासको द्वारा गन- मन तोडी जाने लगी, विशेषतः औरगजेव द्वारा सर्वोधिन। रीतियुगीन जीवन का चित्र विखरा हुआ अधिक, सुगठित कम मालून पडता है। ऐसा प्रतीन होना है कि समाज स्पष्टत दो वर्गो मे अलग-अलग-परस्पर अल्पतम प्रभावित होकर-जी रहा होगा। जीवन का सारा प्रेथ सामन्तीय वृत्तियो के परिपोप के लिए ही प्रयुक्न होना गहा; अधिकाशत रीतिकालीन कविता इनकी अकशायिनी ही बनी रही।

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रीतिकाव्य में श्रचित्य ः m व्यावहारिक समायोग

प्रकरण-प्रवेश औचित्य का सैद्धान्तिक विवेचन कर चुकने के बाद अब उसका हिन्दी की रीति- कालीन कविता मे व्यावहारिक समायोग करना आवश्यक है। यह जिज्ञासा सहज ही हो सकती है कि औचित्य-सिद्धान्त का हिन्दी की रीति- कालीन कविता से क्या सम्बन्ध हो सकता है ? अथवा यह कि हिन्दी की रीति-कविता मे इस सिद्धान्त का व्यावहारिक समायोग किस रूप मे संगत है? उत्तर मे यही कहा जा सकता है कि सर्जन-प्रक्रिया मे सर्जक निरन्तर इसी बात के लिए सचेष्ट रहता है कि उसकी कृति मे उनरोनर चारुत्व वृद्धि होती रहे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह उन सभी काव्य-विरोधी अतः अवाछनीय तत्वो को दूर रखता है। रस विरोधी तत्त्वो का परिहार एव रस-पोषक तत्वो का सन्निवेश उसकी दृष्टि मे बराबर रहता है। युगीन प्रभाव व व्यक्ति-वचित्र्य के बीच भी उसकी यह प्रवृत्ति अविच्छिन्न रूप से रहती है। औचित्य इसी परिहार एवं सन्निवेर प्रक्रिया का नाम है। यद्यपि यह विज्ञान के सिद्धान्तो की भॉति देश-काल-निरपेक्ष, अपरिवर्तनशील नही, सिद्धान्त भी नही तथापि एक सर्वाधिक अविगेधी एव सामंजस्य-स्थापक व्यवस्था होने के नाते सच कालो की कृतियो से उसका मेल खाता ही है। निरन्तर परिवर्तनशील व विकसनशील काव्य में भी कुछ सामान्य- तत्व निहित रहते हैं। नित्य नुतन वाग्भगिमाओ का आविष्कार होते रहने पर भी मनुष्य की अनुभुति मूलत सागर के जल की भाति सर्वत्र एक-मी ही होती है। एक अन्य सनति यह भी है कि हिन्दी की रीति कविता का प्रारम्भ वही से होता है, जहा संस्कृत का काव्य-शास्त्र अपने विकास की नरम सीमा तक पहुँच चुका था। काव्यगास्त्र में विभिन्न काव्य-सिद्धान्त सम्यक परीक्षाओं के अनन्तर पर्य्प्त स्थिर व प्रतिष्ठित हो चुके थे। परिणामस्वरूप काव्य मे शास्त्रीयता के निर्वाह, अभिव्यकति एकंकलापक्ष में खूब परिष्कार करते रहने की एवं अपनी बात को ज्यादा से ज्यादा जकर कहने की प्रदुत्ति इस युग में बढी प्रतीत होती है। भाव के क्षेत्र में भी इस काल की कविता ने अधिक निर्द्न्द्व व उन्मुक्त होकर शृमार का खेल सेला है'भाषा

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रोतिकाव्य मे औचित्य व्यवहारिक समायोग १०६

एव भाव-दोनो क्षेत्रो मे शुद्ध साहित्यिक दृष्टि से रचना करने की अधिकाविक प्रवृत्ति इसी युग के साहित्य मे पायी जाती है। इस विषय मे ाचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र का निम्नोद्धुत मन्तव्य द्रष्टव्य है- "सच पूछा जाए तो शुद्ध साहित्य की दृष्टि से निर्माण करने वाले कर्ता इस युग मे जितने अधिक हुए, हिन्दी साहित्य के सहस्र वर्षो के दीर्घकालीन जीवन में उनने अधिक कर्ता शुद्ध साहित्य की दृष्टि से निर्माण करनेवाले कभी नहीं हुए। आधुनिक काल मे भी नही।"9 सात्पर्य यह कि हिन्दी साहित्य के चारो कालो की कविता मे केवल रीतिकालीन कविती ही अधिकाधिक शुद्ध-साहित्य की दृष्टि में प्रणीन हु प्रनीत होनी है। भले ही भक्तिकाल को स्वर्णकाल कहा गया हो, शुद्ध माहित्यिक दृष्टि मे माहित्येतिहास मे तो रीतिकाल ही स्वर्णकाल माना जाएगा। एक स्थान पर आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र लिखते है- "एक ही युग मे एक से एक उत्तम कर्ता सख्या मे सबसे अधिक इसी उत्तर भध्यकाल या शृंगारकाल या रीतिकाल में हुए। हिन्दी का सच्चा साहित्य युग यदि कोई था नो वस्तुत. यही था।"१ इस मुग के प्राम् सभी रचनाकारो ने शुद्ध साहित्यिक उद्देश्यो से प्रेरित होकर रचनाएँ की हैं। बीरगाभाकाल के कृतिकारो में आश्रयदाताओं की प्रशसा, प्राकृत जन गुन गाया, राजस्तुतियाँ, अत्युक्तिपूर्ण प्रपास्तियों करने की प्रवृत्ति ही विशेष दिखाई देती है। उस युग की रचनाओं की भाषा भी शैशवावस्था मे थी। भक्तियुग के सभी कृतिकारों का प्रमुख उद्देश्य काव्य-रचमा न होकर अपमें-अपने इष्ट की परम-अनुरक्ति का ही प्रकाशन करना रहा। भाषा में निश्चय ही थोडा विकास हुआ, परन्तु भाव-क्षेत्र मे साहित्येतर तत्त्व का प्रभाव बढ गया था। आधुनिक युग की कचिता पर तोन जाने कितने अमाहित्यिक या साहित्येतर तत्त्रो का प्रभाव है। कही राजनीति ने कविता को दबोच रखा है, कही किसी विशिष्ट विचारधारा ने। मार्क्सवाद, गाधीवाद आदि अनऊ वादो के प्रभाव में कविता आ गई है। इस (रीति) युग के प्राय नभी रचनाकार भक्त या सन्त न होपर काउ्- शास्त से परिचित-कुछ तो काव्यगास्त्र के पडित व आचार्य कवि ये। अन ऐसी स्थिति मे भाव व उसकी निरूपण विधियों के विभिन्न स्तर भेदों के कारण ीनिकन के कवियों को हम प्रमुख चार धाराओ मे विभाजित कर सकते हे (१) रीतिनद् कवि-जिन्होने शास्त्र-स्थिति-सम्पादन करते हुए काव्य-रचना की; (२) रीतिसिंद्ध कवि-जिन्होने लक्षणो का ध्यान तो रखा, पर उनके बन्धन में सर्वथा बँधना स्व्रीकार नही किया। तथा रोतिमुक्त कवि-जिन्होंने रीति की किसी भी परम्परा का पालन न करते हुए भाव-भापा, अनुभूति-अभिव्यक्ति आदि के क्षेत्र में सवेथा विलक्षणता दिखाई। १. घनानन्द और स्वच्छद कान्यधारा (भमिका),पृ०२ २. बहा,५० ३े

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११० रीतिकाव्य मे ओचित्य व्यावहारिक समायोग

इन्हें स्वच्छन्दतावादी भी कहा जाता है। इन तीन धाराओ से हटकर एक चौथी धारा भी थी, जिसके कवियों ने नीति व उपदेश की बाते तथा जीवन के अनुसून सत्यो व तथ्यो को सरलतम शब्दो में प्रकट कर दिया। क्रमशः इन चार धाराओ के प्रमुख प्रतिनिधि कवि है-केशव, बिहारी, घनानन्द, रहीम। रीतिसिद्ध कवि लक्षण-ग्रन्थों के निर्माण के चक्कर मे नही पडे, परन्तु उनके काव्य मे इनका निरूपण पाया जाता है, रीतिमुक्त कवियों ने प्रेम का ुक्त गान किया। परम्परा से मुक्त रहकर वे मन की अनुभूति को ही अभिव्यक्त करते रहे। प्राय. रीति-युग की कविता मे नख-शिख वर्णन, नायक-नायिका भेद, परकीया प्रेम, सयोग- वियोग के चित्र आदि का ही निरूपण अधिक हुआ है। अधिकांश कवि राज्याश्रिमं थे; इन्हे आजीविका की कठोर समस्या का सामना करना नहीं पडा। जिस वातावरण मे वे रहते थे, वह मध्ययुगीन सामत्ती विलास एवं वैभव से परिपूर्ण था। फलतः शृगार की अधिकता, विभिन्न भाव-नित्नों को उभारने तथा अभिव्यक्ति मे नित्य नवीन चमत्कार लाने की तीव्र चेष्टा इस युग की कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ बन गइँ। इसका एक सुपरिणाम यह हुआ कि काव्य का अभिव्यक्ति-पक्ष नित नवीनता से परिपूर्ण होकर पूर्ववर्ती दो कालो की तुलना मे अधिक निखर उठा। एक ही भाव, चित्र या अनुभूति को भिन्न कवियों के द्वारा विभिन्न भगिमाओ में प्रस्तुत करने की होड़-सी लग गई। लक्षण-ग्रन्थो के निर्माता आचार्यों पर प्राय सस्कृत के प्रमुख आचार्यो-मम्मट, विश्व- नाथ, जयदेव, अप्पय दीक्षित आदि-का प्रभाव ही अधिक था। ध्वनि, औचित्य आदि सम्प्रदायों का प्रभाव या परम्परा-निर्वाह नहीवत् था। प्रायः शृमार-रस-विवेचन, नायिका-भेद, काव्य-प्रयोजन, काव्य-भेद आदि ही वर्ष्य विषय रहे। नाट्य-विपयक गास्तीय विवेचन तथा शब्द-शक्ति का गम्भीर विवेचन तो प्राय उपेक्षित ही रहा किन्तु व्वनि और औचित्य नो नितान्त अस्पष्ट ही रह गए। गम्भीर शास्त्र-चर्चा के अनुरूप उस युग का वातावग्ण न होने के कारण छोटे किन्तु चमत्कारपूर्ण, ऊहात्मक, रम- सिक्त दोहो के निर्माण मे ही कवतिकारों की दृष्टि उलझी रही। जनरुचि ने साहित्य- दारो को प्रबल रूप में प्रभावित किया। परिणामस्वरूप, कही-कही कुत्सित चित्र भी पाये जाते है, यथा विपरीन रति, पडीसी में अवैध प्रेम सम्बन्ध, परकीया-प्रेम, देवर- भामी के अनुचित सम्वन्ध आदि के चित्र। प्रत्येक युग की भॉनि इस युग के काव्य पर नी तद्युगीन परिस्थिनियो-सामा- जिक, राजनीतिक आदि-की छाया पडना एक अनिवार्यता ही मानी जायगी। अपने युग से स्पच्ट साहित्य की औचित्यानीचित्य की दृष्टि से परीक्षा करते समय उस युग के परिवेश, म्चि-अरुचि आदि से सबंधित नथ्यो को छोडकर नही चला जा सकता। अतः आलोच्य युगीन काव्य के गरीक्षण के लिए ही आधार स्वत जभर कर आते है (१) शुद्ध काव्यशास्त्रीय आधार, जिस पर काव्य के गुण-दोपो को परखा जा सकता है, तथा (२) नयाजणास्त्रीय आधार, जिस पर विषय-वस्तु के उचितानुचित होने का अख्यात सरभ्व है। द्वितीय आधार को कम दुढ़ नही माना जा सकता, क्योंकि नित्द तदलते सुग ने

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तिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग १११

औचित्य की अवधारणा भी सापेक्षिक मूल्य रखकर युग के परिप्रेक्ष्य में ही महत्त्वपूर्ण नानी जाती है। उक्त चर्चा के पश्चात् रीतिकाव्य मे औचित्य के व्यावहारिक समायोग का नश्न उपस्थित होता है। गम्भीरता से विचार करने पर तत्सम्बन्धी कुछ प्रबिधियॉ इस प्रकार सामने आती है (अ) कविक्रमानुसार औचित्य-अनौचित्य का परीक्षण। (आ) कालक्रमानुसार औचित्यानीचित्य का विचार कर लेना। (इ) धारा या प्रवृत्ति-कमानुसार अर्थात् रीतिनद्ध, रीतिसिद्ध एवं रीति-मुक्त काव्यधाराओ का औचित्य-अनौचित्य-परक अध्यमन प्रस्तुत करना। (ई) तत्त्वक्रम से औचित्य-अनौचित्य की समीक्षा करना अर्थात् सामूहिक रूप से सब कवियो की रचनाओ को व्यान मे रखते हुए, औचित्य के प्रमुख भेदो के निर्वाह -अनिर्वाह का परीक्षण करना और वही प्रसगतः अनौ- चित्य का भी निर्देश करना। कविकमानुसार एव कालकमानुसार परीक्षण करने मे पुनरावृत्ति व नीरसता (नॉनॉटोनी) का भय बहुत है। प्रत्येक कवि के प्रसंग मे सभी औचित्य-अनौचित्य के प्रकारो का परीक्षण करते जाना एक प्रकार से अत्यन्न स्थूल, रूढिगत व घिसा-पिटा होगा। यही बात अगतः कालक्रमानुसार परीक्षण में भी सम्भव है। तत्वक्रम ने औचित्य का विचार करने पर इस पुनरावृत्ति के दोष से तो बचा ही जा सकता है। साथ ही, पूरे युग के प्रमुख कृतिकारो की रचनाओ के परिवेश मे किसी एक प्रकार के औचित्य-अनौचित्व का एक ही स्थान पर सभग्रत विवेवन भी सभव हो सकेगा। सामान्यत शास्त्रो मे औचित्य के अनक प्रभेदों की चर्चा प्राप्त होती है, जिन्हें विवेचन के सुविधार्थ चार-पॉच प्रमुख विभागों में रखा जा सकता है. (अ) भापागत औचित्य-जिसमे पद, वा्क्य, किया, कारक, लिंग, वचन, विशेषण, काल, निपात, उपसर्ग-सम्बन्धी औचित्य-प्रकारी को समाविष्ट किया ना सकता है। (आ) काव्य-शास्त्रगत औचित्य के अन्तर्गत गुण, अलकार, प्रनिभा, प्रबध व रस-विषयक औचित्य का समाहार कर दिया जा सकता है। (ड) लोक-व्यवहार या समाजगत औचित्य के अन्तर्गत देश, कुल, छरमादि सम्बन्धी औचित्य का समावेश हो जाता है। (ई) भाव, विचार या कविगत औचित्य के अन्नर्गत तत्व, सत्व अभिप्राय स्वभाव, सूर-संग्रह, अवस्था, विचार, नाम और आगीवदगत औचित्य का समावि किया जा सकता है। एक अन्य प्रकार से भी इन २७ भेदी का वर्गीकरण हो सकत है-कविगत औचित्य, काव्यगत औचित्य और सामाजिक अर्थात् सहृदय अथवा स०रे 2 क (यहॉँ सहृदय भी समीक्षक हो जाता है) गत औचित्य। कविगत औचित्य के भीत

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उन सभी प्रकार के औचित्यो का समावेश है, जिनका अनुभूतिपक्ष मे मौलिक व मूलभून सम्बन्ध है। काव्यगत औदित्य में विचार-पक्ष के अतिरिक्न उन सभी प्रकार के औचित्यो का समावेश हो जाता है, जिनका अभिव्यक्ति से सम्बन्ध है तथा जो काव्य-शास्तरीय वृत्त मे स्थान पाते है (रमदि सम्बन्धी)। समीक्षक या सहृदय सम्बन्धी औचित्य के भीतर सामाजिकता के घेरे मे आने वाले मभी तत्त्ों से सम्बन्ध रखने वाले औचित्यो का समावे हो जाता है (यथा-देन, काल, कुल, व्रतादि सम्बन्धी) रीतिकाव्य में औचित्य के निर्वाह-अनिर्वाह का परीक्षण करने के लिए वित्रेचित उपर्युक्त चार पद्ध- तियो मे से मै अन्तिम (चतुर्थ) पद्धति को अपनाने के पक्ष मे हूँ, क्योंकि मेरे विचार से वह अधिक निरापद, गास्तीय वैज्ञानिक है, उसमे पुनयावृत्ति तथा रूठिगनता भी नही है। पदोचित्य पद का उचित प्रयोग पदौचित्य है, क्योंकि पाल्र, प्रसंग, भाव एवं परिस्थिति के अनुरूप पद-प्रयोग काव्यार्थ को चमका देता है। प्राय सभी कवि पद-प्रयोग के औचित्य की रक्षा के लिए सहज ही जागरूक रहते हैं। जब किसी भाव की विशेष व्यजना करने मे कोई पद अपना विशिष्ट योगदान देता है तब काव्य-सौन्दर्य की वृद्धि का वह प्रमुख कारण बनता है। कोश मे उपलब्ध अनेक पदों, पर्यायो व समानार्थी शब्दो मे से कौन- सा पद या पर्याय विवक्षित भाव या वर्ण्य की चारु-अभिव्यक्ति करने में सर्वाधिक सफल हो सकेगा, इसका निर्णय प्रयोक्ता को कर लेना चाहिए। सिव, रुद्र, भव, पश्ुपति, कपाली, पिनाकी, महेश आदि सभी पद भगवान शंकर के वाचक है परन्तु किस प्रसग मे इनमें से कौन-सा पद प्रयोज्य तथा कौन-सा पद अप्रयोज्य है, इसका पूरा-पूरा विचार सर्जक को सदैव करते रहना चाहिए, शंकर की दरिद्रता के वर्णन के प्रसग मे उन्हे कपाली और उनके शौर्य-वर्णन के प्रसग में उन्हें पिनाकी ही कहना उचित है। इसी प्रकार स्त्री के पर्यायवाचक तन्वी, ललना, कामिनी, रामा आदि अनेक शब्द हैं। परन्तु सयोगावस्था में उसके लिए ललना तथा यौवनागभजनित मदन-विकार की अवस्था का बोध कराने के लिए उसे कामिनी कहना ही उचित है। रीतिकालीन हिन्दी कविता की भाषा मे अपूर्व निखार आ गया था। इस काल के प्राय सभी कवि सस्कृत में परिचित तथा काव्यशास्त्र के विद्वान् थे। व्रज और अववी भाषा के पण्डित इन कवियो ने अपनी भाषा को निरन्तर मॉजते रहने का उद्योग किया। फलत. पद-प्रयोग के कौसल की ओर उन्होंने विशेष सजगता दिखाई है। सस्कृत मे विरहृजन्य कृशता का बोध कराने के लिए नायिका को 'कशागी' और उनकी सहज तनुता की व्यजना करने के लिए उसे 'तन्वंगी' कहा गया है। गीतिकाल के कवि भी इस पार्थक्य से परिचित रहे है। उन्होने भी विरहजन्य कृशता की व्यजना के लिए दूबरम पद का तथा सहज मुकुमारता के बोध के लिए 'पातरी' पद का प्रयाग किया है, य'1-

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रीतिकाव्य मे औचिय व्यावहारिक समायोग ११३

देखि परो नहिं दूबरी, सुनिये स्थाम सुजान। जानि परे परजंक मे, अग आँच अनुमान।9 मतिराम ने यहॉ नायिका की विरहजनिन कृशना प्रकट करने के लिए 'दूबरी' विशेषण-पद प्रयुक्त किया है। पर्यक मे उसका अस्तित्व केवल उसकी गरम सॉमो के सहारे ही अनुमानित किया जा सकता है। उक्ति ऊहात्मक होने हुए भी 'दूबरी' पद मे नायिका की अतिकृशता सम्यक रीति से बोवित हो पाई है। इसी प्रकार नायिका की सहज सुकुमारता व तनुना को बोघित कराने के लिए बिहारी ने 'पातरी' पद का प्रयोग किया है, यथा- अंग-अम छवि की लपट उपटनि जाति अछेह। खरी पातरीऊ तऊ लगै भरी सी देह॥२ यहाँ कवि ने 'पानरीऊ' पद का अत्यन्त सटीक व प्रभाव्वाली प्रयोग किया है। नायिका की ननुता की व्यजना इस पदप्रयोग से सहज ही हो जाती है। पदान्त में स्थिन ऊ' निपान के सयोग से यह व्यजना तीन्तर हो गई है। लावण्यवतियो की कृशता उनका सौन्दर्य है, पीनता उनका दोष। नायिका पातरी होने हुए भी उसकी देह भरी-भरी-सी लगती है, यही उसके रौवन व सौन्दर्य की विगिष्टना है। देव ने नायिका के सौन्दर्य का प्रभाव निरूनित करते हुए उसके भोलेपन ब यावन की व्यजना की है- जे जे गनी गुन आगरि नागरि हू है ते बाके चितौत ही चेरी॥3 सामान्यतः नगर के स्त्री-पुरुष चनुर एवं रूप-गुण सम्पन्न समझे जाते है। ब्रामीण जनो की अपेक्षा उनमे वाणी, वेशभूपा, शरृगार-सज्जादि की प्रवीणता भी विशेष मानी जाती है, परन्तु यहों तो इम ग्रामवधु के अनाबिल रूप-सौन्दर्य व लावण्य को देखकर सभी गुण-आगरी स्त्रियाँ भी चकित होकर उसकी चेरी बन गई है। ग्रामवधू तथा नागरी स्त्रियो के सौन्दर्य का विरोध (कंट्रास्ट) दिखाने के लिए 'आगरि नागरि' पद बड़े मार्थक सिद्ध होन है। कोमल भावो की व्यजना के लिए उचित पदप्रयोग की जितनी आवश्यकता है, उत्तनी ही आवश्यकता कठोर भावों की व्यजना के अवसर पर भी है। घृणा, अब- मानना, तिरस्कार, गर्न-गजन के अवसर पर भी प्रसग व पवीचित शब्दावली का प्रयोग वाछनीय है। केशव्र के निम्नलिखित उदाहरण मे यह द्रष्टव्य है अति अमल ज्योनि नारायनी कह केशव बुझि जाय जाइ बर। भृशुनन्द सँभारु कुठार मैं कियो सरासन युक्त सर ।।* १. हरदयाल सिंह मतिराम-मकरन्द, प०२०३ २. विश्वनाथ नमाद मिश्र : बिहारी, पृ० १६६ राजकृष्ण दूचअ औोर ब्रजमोहन जाबनिया . देवकाव्य रत्नावली, पृ० ११-१२ or 2 ४ लाला भगवानदीन : रामचद्रिका (पूर्बाध), पृ० १२४

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११४ रोतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

परशुराम द्वारा वार-बार युद्ध के लिए ललकारे जाने पर तथा गुरु विश्वामित् की निदा की जाने पर रामचन्द्रजी भी कुद्ध हो गये। कोधावेश मे उन्होंने परशुराम के लिए सम्मानदर्शक, भार्गवेश, भृगुकुलावतस, भृगुकुलशिरोमणि आदि पदो या सम्बो- धनो का प्रयोग न कर उन्हे कैवल 'भृगुनन्द' हो कहा है। 'भृगुनन्द' पद से रामचन्द्रजी के कोध की समुचित व्यंजना तो हो ही जाती है साथ ही, परशुराम के प्रति दिखाये गये अनादर का भी इससे बोध हो जाता है। स्व० लाला भगवानदीनजी ने एक अन्य च्यजना यह भी निकाली है कि 'अब तुम केवल ब्राह्मण हो, नारायणावतार नही रहे।2 अर्थात् अव तुम्हारा प्रभाव समाप्त हो गया है। 4 सेनापति ने भी ऐसे अवसर पर राम द्वारा परशुराम के लिए केवल 'जामदग्नि अर्थात् 'जमदग्नि का पुन्न' पदप्रयोग करवाया है। परशुराम के लिए 'जानदग्नि' पद का प्रयोग कर कवि ने उसी अनादर व तिरस्कार की व्यंजना की है, जो केशव के राम प्रकट करते है। जनेऊधारी ब्राह्मण होने के कारण वे अवध्य है। गम इसका संकेत भी करते है-

आज जामदग्नि। जानतेऊ एक घरी मॉझ। होती जौ न ज्यारी यह जिरह जनेऊ की।।२ यदि जनेऊ की आड (कबच) न होनी तो परशुरामजी को ठीक-ठीक पता चल जाता। सीता के स्वयंवर के प्रसग मे केगव ने शिवजी के धनुष का भारीपन प्रकट करने के लिए भी सुन्दर पदप्रयोग किया है- रघुनाथ शरासन चाहत देख्यो। अति दुष्कर राज समाजनि लेख्यो॥ ऋषि हैं वह मन्दिर मॉझ मँगाऊँ। गहि ल्यावहिं हौ जनयूथ बुलाऊँ।!3 'जनयूथ' पदप्रयोग से धनुष्य की गुरुता व भारी-भरकमता का सहज ही बोध हो जाता है। इसी पदप्रयोग से रामचन्द्रजी के बल व पराक्रम की व्यंजना भी कवि ने कर दी है। इतने बड़े भारी धनुष्य को रामचन्द्रजी ने उठाया ही नही, खेल ही खेल मे तोड़ भी दिया। एक साथ ही धनुष्य की भीषणता व राम के पराक्रम की भूमिका व्यंजित करने मे यह पदप्रयोग अत्यन्त सफल हुआ है। भूषण ने शिवाजी और औरंगजेब के सैनिको के लिए कमशः सिहराज और गजन पदो का प्रयोग कर दोनो दलो के सैनिकों की विशेषताएँ व्यजित की है-

म. लाला भगवानदीन : रामचन्द्रिका (पूर्वार्ध), पृ १२५ २. उमाशकर शुकल कवित्त-रत्नाकर, पृ० ८० 5. लाला भगवानदीन : रामचन्द्रिका (पुर्वाध), प० ७२

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रीतिकाव्य मे ओचित्य व्यावहारिक समायो ११५

उत पातसाहजू के 'गजन' के ठट्ट छुटे उमडि घुमड मतवारे घन भारे है। इते सिवराजजू के छूट 'सिंहराज' और बिदारै कुम्भ करिन के चिक्करत कारे है।।" शिवाजी के सैनिक 'सिंह राज' है और औरगज़ेब के सैनिक 'गजराज' है। सिह् और गज के बीच स्वाभाविक सत्ुता है तथा सिंह हाथियो के कुम्भस्थलों को चीर डालता हे-यह भी प्रकट है। परस्पर की इस शत्रुता की व्यजना के अतिरिक्त यह भी व्यग्य है कि औरगजेब के सैनिक स्थूल, तुन्दिल व शिथिल है तथा शिवाजी के सैनिक लम्बे, पतले, छरहरे, चपल व स्फूर्तिवान् हैं। दोनो पदप्रयोग बडे सटीक है।

वाक्योचित्य

भावानुरूप वाक्यप्रयोग को वाक्यौचित्य कहते हैं। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व अकित करते समय अथवा किसी भाव विशेष की तीव्रतर अभिव्यक्ति करते समय कवि- गण प्रायः तदनुरूप वाक्यावली की योजना करने मे तत्पर दिखाई देते है। परशुराम, द्रोण, अश्वत्थामा, भीम, कर्ण आदि पात्रों के पौरुष की व्यंजना करने के लिए, उनके क्रोध की अभिव्यक्ति के लिए अथवा उनके भीषण पराक्रमों का वर्णन करने के लिए सस्कृत के कवियो ने तदनुकल वाक्यावलियों का सटीक प्रयोग किया है। भट्ट नारायण रचित सस्कृत नाटक 'देणीसहार' मे ऐसे अनेक स्थल है, जहाँ अश्वत्थाभा, कर्णादि का कोध ओजपूर्ण, प्रवाहमय वाक्यों मे वर्णित किया गया है। अश्वत्थामा की इस प्रतिज्ञाबद्ध स्वभावोक्ति मे यह द्रष्टव्य है- यो य. शस्त्रं बिभत स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीना चमूनाम्। यो य. पाचालनोते शिशुरधिकवयः गर्भशय्या गतो वा। यो मस्तत्कर्मसाक्षी चरति मयि रणे यश्च यश्च प्रतीप: । कोघान्धस्तस्य तस्य स्वयमपि जगतामन्तकस्यान्तकोऽहम् ॥ शास्त्र-निदिष्ट अति परुष वर्गों की समधिक योजना नही होने पर भी वक्तव्य बडा प्रभावशाली हो पाया है। रीतिकाल के कवियो मे केशव और पझ्माकर इस दृष्टि से विशेष सफल हुए हैं- देशव परुष वर्णयुक्त वाक्यावली के प्रयोग में और पझ्माकर कोमल बर्णयुक्त वाक्या वली के प्रयोग मे। अन्य कवियो के भी कुछ अच्छे उदाहरण मिल जाते हैं। केशव द्वषरा अकित एक व्यक्तिचित्र इस दृष्टि से दर्शनीय है- प्रचण्ड हैहयाधिराज दण्डमान जानिए। अखण्ड कीर्ति लेय भूमि देयमान मानिए ।।

१. इयामबिहारी मिश्र और शुकदेवबिहारी मिश्र : भूषण ग्रन्थावली, प० १४२-४३

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११६ रोतिकाव्य मे औचित्य : व्यावहारिक समाभोग

अदेव टेव जेय भीत रक्षनान लेखिए। अमेय तेज भर्ग भव्न सार्गवेश देखिए।।१ यहाँ केशव ने बड़ी समक्त वाक्यावाली में भागवेश थी परशुराम का चिव अकित किया है। अतुलित वन, तेज व पराक्रम के भण्डार, हैहयाविराज को दण्डित करने वाले, अखण्ड कीर्ति को पाने वाले, भूमि को जीनकर दान दे देने वाले, भीत व गरणार्थी का रक्षण करने वाले भार्गवेश परशुरान के वीरत्व एद पराक्रम की बीरोचित वाक्या मे व्यजना हुई है। अन्तिम पंकिति में प्रयुक्त भर्ग भवत, भार्गवेश आदि शब्द चित्र को समुचिन रीति ने उभार सके है। वाक्य की गति और लय भी इम औचित्यनिर्बाह में अपना विमेप दोगदान दे रही है। निम्तोद्धन पक्नियों में देव द्वागा अवित भावचित्र में वाक्यौचित्य का सुन्दर उदाहरण देखा जा सकता है. बोलिए बोल सबा हँसि कोमल, जे मनभाग्त के मन नाये। यो सुनि ओछे उरोजनि पै, अनुराग के अकुर से उठि आये ॥२ लग्जायुक्त 'अंकुरित अनुराग व आन्तरिक इल्लास' का ऐसा मधुर चित्र बुर्लभ है। गौने का अवसर है; सखियाँ नायिका को सीख देती है, पति को रिझानेवाली मधुर वाणी बोलने का उपदेश देती है। सखियों की वाणी सुनकर वह हल्का-सा रोमाच अनुभव करती है। नायिका के शरीर मे उत्पन्न रोमाच और अनुराग की झलक उसके ओछे उरोजों में प्रकट हुई। नायिका में उदिन इस अनुराग व रोमांच की सटीक व्यजना करने मे 'यो सुनि ओछे उरोजनि पे, अनुराग के अंकुर से उठि आये।' पक्ति अत्यन्त सफल हुई है। वाक्यावली की सहज विकासात्मक प्रमोदमयी लय, कोमलवर्ण तथा कोमल ध्वनि का इस सरल वाक्य में प्रयोग ही नायिका के सारल्य व मौग््य की व्यजना कर देता है। मतिराम ने नामिका के मन की स्थिति का चित्राकन अत्यन्त सयत किन्तु भाव- ग्राही वाक्यावली में प्रस्तुत किया है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम शरीर से तो एक स्थान पर है, परन्तु हमारा मन कही अन्यल ही मंडराता रहता है। प्रेमी-जन इस प्रकार की मन स्थिति से विशेष परिचित होते है- तन तो तिया को बर भॉवरे भरत मन, साँवरे बदन पर 'भॉवरै' भरत है।8 यहां सब्रीडा गोपिका के मन की अवस्था का मार्मिक चित्र अंकित किया गया है। सस्नियों के साथ मन्द-मन्द चलती वह गोपी घूँघट के पट में से बीच-बीच मे कृष्ण को देख लेती है। नन्दलाल का दर्शन जी-भरकर करना तो चाहती है, पर सकोचवन उन्हे जी- भरकर देख नही सकती। शरीर से तो वह सखियो के साथ जा रही है, परन्त्रु मन उसक १. वाला भगचानदीन : रामचट्रिका (पूर्वारध), पृ० ११०-११ २ हरदयाल सिंद देव-दर्शन, पृ० ७० ३. हरदयालु सिह् . सतिराम मकरद, पृ० १४८

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रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोम ११५ राबरे के आस-पास भाँवरें लेता है। 'सावरे बदन पर भाँदर भरत है।' पंक्ति मान- सक दशा व्यकन करने मे बडी सफल हुई है। 'भॉवरे भरत है।' करिया-प्रयोग द्वारा मन की कृष्ण मे एकनिष्ठ अनुरविति का बोध कराया गया है। लगता है, यह वाक्य हो स्वय नत्यावर्तित होकर खड़ा रह गया है। अब एक चित्र घनानन्द का देखिए- ज्यौ बुधि सी सुधराई रचे कोऊ, सारदा को कबिताई सिखावै। मूरतिबन्त महालछमी-उर पोत-हरा रचि ले पहिरावै। रागवबू-चित-चोरन के हित सोधि सुधारि के तानाहिँ गावै। * त्यौ ही सुजान तिय घनआनन्द मो जिय-चौरई रीति रिजावै ।4 धनानन्द के इम छन्द में प्रेसिका की रिजाने के लिए प्रेमी की आतुरता व विह्हलता का चित्र अंकित है। प्रेम की समस्त भंगिमाओ मे सर्वथा सुपरिचित सुजान को रिझाने का प्रयल्न पूर्णत निरर्थक है, यह मंशान प्रेमी को भी है। वह जानता है कि जब नक सुजान स्वयं रीझना न चाहे, उसे रिझाना सम्भव नहीं। नायक की सबमे बडी विवशता इसी मे प्रकट हो जाती है कि वह जानता है कि नार्यिका उसकी सभी युक्तियों से परिचित है। पद्माकर ने अपनी चित्रात्मक भाषा के बल पर नायिका के कपोल-स्थित तिल का सौन्दर्य उद्घाटित किया है- कैधौ रूप-रासि मे सिगार रस अकुरित संकुरित कैधौ तम तडित जुन्हाई मे। कहै पदमाकर त्यों किधौ काम कारीगर नुकता दिया है हेम-फरद सुहाई मे। कैधौं अरविंद मे मलिंद-सुत सोयो आनि ऐसो तिल सोहत कपोल की लुनाई मे। कैधौ परयो इंदु में कलिदि-जल-बिन्दू आ मरक सुविंद किवौ गोरी की गुराई मे॥२ सन्देहालंकार का आश्रय लेकर कवि ने नायिका के गौरवर्ण और लावष्य तथा तिल का सौन्दर्य निरूपित किया है, जिसमे की गई मे विभिन्न कल्पनाएँ अत्यन्त भावप्रवण व सटीक है। वाक्यौचित्य की दृष्टि से अतिम पक्ति दर्णनीय है।

प्रबध्धौचित्य प्रबन्धौचित्य का पारम्परिक अर्थ है कथा-प्रवाह की अविच्छित्नता की सुरक्षा आचार्यो के अनुसार महाकाव्य एव खण्डकाव्य में कवि द्वारा गृहीत कथा की शृखल अविरत व अविच्छिन्न बनी रहनी चाहिए तथा रस-प्रवाह को कही भी शिथिल नहं

१. विश्वनाथप्रसाद मिश्र घनानन्द कवरित्त, पृ० २ २. विछवनाथप्रसाद निश्न पभाकर प्रयावली, पृ० ३१३

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११६ रीतिकाव्य मे औचित्व व्यावहारिक समायोग

होने देना चाहिए। परिणामन प्रत्येक रसाभिनिवेशी कवि इसका निर्वाह करने के लिए निरन्तर उद्योगशील रहना है। परन्तु 'प्रबन्ोचित्व' से क्षेमेन्द्र का तात्मर्य उकत सात्पर्य ने कुछ अधिक व्यापक है। कथा-प्रवाह के मुचारु निर्वाह के अतिरिक्त क्षेमेन्द्र वहाँ पर r प्रबन्धौचित्य की स्थिति मानते है, जहाँ कवि अपनी प्रतिभा के बल पर, वर्ण्य विषय-वस्तु के अनुरूप, नवीन (जन-ग्राह्य व सदाश्रित), रसोपकारक अर्थोदभावना कर लेता है। जहाँ तक कथा-प्रवाह की अविशंखलता का प्रश्न है, रीतियुगीन-काव्य मे प्रबन्ध-काव्य ही अत्यन्त अल्प मात्रा मे है। केशव की 'रामचन्द्रिका' ही उस युग का प्रमुख काव्य है, जिसके प्रबन्ध-कौशल पर विद्वानों मे मतक्य नहीं है। अधिकाण विद्वानो ने उसकी प्रबन्ध-योजना को अत्यत्त शिथिल माना है। यदि हम जम रचना की मूल प्रेरणा व उसके उद्देश्यों पर गहराई से विचार करें, तो उसके प्रबन्धत्व पर किये गये बहुत से आक्षेपो का निग्सन स्वत हो जाएगा। वह न तो चरित-प्रधान महाकाव्य है, न घटना-प्रधान। उसमें तो कवि केवल अपने कथा-नायक श्रीराम के वैभव की बन्द्रिका का पूरा प्रकाश विकीरित करना चाहता है। जहाँ तक प्रनिभा के बल पर नवीन कल्पनाओ व उदभावनाओं का सम्बन्ध है, रीति-काव्य से ऐसे बहुत से उद्ाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमे कवि-प्रतिभा का चमल्कार सहृदया हादकारी है। उदाहरणार्थ- सुन्दरि-वदनि राधे सोभा को सदन नेरी, बदन बनायो चारिबदन बनाय के। ताकी रुचि लैन को उदित भमो रैनपति, मूढ मति राख्यो निजकर बगराय के।। 'मतिराम' कहै निसिचर चोर जानि याहि, दीनी है सजाइ कमलासन रिसाय के।। रातौ दिन हेरे अमरालय के श्सपास, मुख मैं कलंक मिस कारिख लगाय के ।२ चन्द्रमा कनक युक्त है, यह तो सर्वविदित है; किन्तु इसके कारण की कल्पना सर्वथा अपूर्ब एवं मौलिक है। राषा की रूप-माधुरी को चोरी करने के उपक्रम में पकडे जाने पर ब्रह्मा ने उसके मुख पर कालिख लगवाकर अमरालय के चारों ओर पहरा लगाने का दण्ड दिया है। व्यंग्य है राघा का अप्रतिम रूप-सौन्दर्य, जिसकी व्यंजना करने में कवि की यह कल्पना नितान्त सार्थक हुई है। कामदेव का एक पर्याय 'मनसिज' भी है। काम मन की ही संतम्न है। मन मे है.हसेमेन्द्र का उस्त मत उनके द्वारा दिए गए उद्रणों से ही फलित किया गया है; उनकी किसी स्पष्टोक्ति का परिणाम नहीं है। २. हरदयाल सिंह : मतिराम-मकरंद, पृ० १६७

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पािकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग ११६

री उत्पन्न होकर यह 'काम' मन को ही निग्न्तर वेधता रहता है। अपने ही जनक को पतानेवाला यह कामदेव 'पितृहंता' है, अत. 'कपृत' ही कहलाने योग्य है। घनानन्द के निम्नलिखित छद्द में 'कपूत' कामदेव को कथा द्ष्टव्य है -- मुरझाने सबै अंग, रह्यौ न तनक रग, दैरी सु अनंग पीर पारँ जरि गयौ ना। इते पै बसंत सो सहायक समीप साके, महा मतवारो कहँ काहू ते जु नयौ ता। नीखे नए नीके जी के गाहक सरनि ले लै, ब्रेधे मन को कपूत पिता-मोह-मयौ ना। पवन-गवन-सग माननि पठायहौ तौ, जान घनआनन्द को आवन जौ भयो ना ।।"

कामदेद को 'कपूत' कहने में पदौचित्य तो है ही, किन्तु साथ-साथ इसमे कल्पना का चमत्कार व नवीनता भी कम नही है। उक्त दोनो पदो में कवि-प्रतिभाजनित नवीन उद्भावनाओ को देखने से रीति- कालीन कवियो में प्रबन्धीचित्य की उपस्थिति की सन्यक् प्रतीति हो जाती है। गु्णोचित्य रसानुरूप गुणों का प्रयोग गुर्णोचित्व कहलाता है। गुण रस के स्थिर धर्म माने गये है। सुणो का संविधान वर्ण-सघटना पर आधारित है। किस रस मे कौन सा गुण प्रकर्षाधायक है तथा कौनसा गुण अपकर्षकारक है, इसका विवेकसम्मत ज्ञान प्रयोक्ता को होना चाहिए। ओज, माधुर्य और प्रसाद-इन तीन गुणो मे से रस की प्रकृति के अनुकल गुण को व्यावहारिक स्वीकृति ही महत्त्वपूर्ण है, यथा-शरृगार रस के प्रसग मे माधुर्य गुण का तथा वीर, रौद्र, भयानक रसो के अवसर पर ओज गुण का प्रयोग ही उचित होगा। प्रसाद सुग के विषय मे ऐसा कोई विशेष बन्धन नहीं है। रीति-काव्य मे एकमात्र भूपण की कविता को छोड़कर जिसमे बीर रस प्रति- पाद्य है-शृंगार-रस की योजना ही प्रमुख रही है। अतः माधुर्य गुण का इस युग के काव्य मे सर्वाधिक सन्निवेश हुआ है। सामान्यत ओज एव प्रसाद गुण के औचित्या के उदाहरण भी समुचित मात्रा मे उपलब्ध हो जाते हैं, परन्तु इस युग की प्रकृति के अनु- कूल तो माधुर्य गुण ही था। माधुर्य गुण मे कोमल वर्गो की अधिकता रहती है। मृदु, सुचिक्कण, मसृण व सरल वर्णों से इसका गठन होता है। ओज गुण में परप व कठोर वणों की प्रधानता रहती है। प्रसाद गुण का लक्षण है अर्थ की सुवाह्यता। सूखी लकड़ी मे जैसे आग सद आद्यत फैल जाती है, बैसे ही प्रसाद गुण में काव्यार्थ सघ आदन व्याप्त हो जाता है।

१ विश्वनामप्रसाद मिश्र, वन वानद कवित, पू० ४१-४२

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१२० रीतिकाव्य में औचित्य : व्यावहारिक समायोग

पसाद गुण नासा मोरि नवाय दुग करौ कका की सौह। काटे सी कसकति हिये वहै कटीली भौंह।' वालापन को भेदि के छवि को अकुर हाइ। जग मोहै दिन दिन बढे जोबन कहिए सोइ।२ बिहारीरचित इस प्रसिद्ध उद्धरण में नायिका की समग्र चेष्टाओ तथा हावो का उद्दीपन विभाव के रूप में वर्णन हुआ है। ये सभी उद्दीपन शगार रस की योजना मे बजे सहायक सिद्ध हुए है। भाव की सहज बोध-गम्य स्थिति के कारण यहाँ प्रसाद गुण का अनाविल रूप प्राप्त है। दूसरे उदाहृग्ण में देव ने 'योवन' को परिभाषा निबद्ध करने की सफल भ सार्थक चेष्टा की है। शिशुता को भेट कर उभर आने वाने यौवन का कवि ने आडम्बर हीन व सहज सरल पदावली मे चित्रांकन किया है। नव-प्रस्फुटित योबनाकुरो ने समस्त जगत् को मोहित कर रखा है। यही यौवन का लक्षण है, यही उनका प्रभाव। केशब ने निम्नलखित छन्द मे दर्शन की उल्झी हुई व गुरुगम्भीर बात को भी कितने सरल शब्दो में अकित कर दिया है। केशव को कठिन काव्य का प्रेत कहने वाले यदि उनकी ऐसी रचनाओ पर ध्यान देते तो शायद अपना अभिमत परिष्कृत करते- जैसे चढ़े बाल सब काठ के तुरग पर, तिनके सकल गुन आपुही मे आने हैं। जैसे अति बालिका वै खेलति पुतरियन, पुत्र पुव्रिकानि मिलि विषय बिताने है। आपनौ जौ भूलि जात लाज साज कुल कर्म, जाति कर्मकादिकन ही सो मनमान है। ऐसे जड जीव सब जानत है 'केमौदास' आपनी मचाई जग सांचोई के जाने है।।* संसार मिध्या, है फिर भी हम मायावशवर्ती होकर उसमे सत्य का आक्षेप करते हैं और भ्रमवश उसी को सच्चा मानने लगते हैं-उसी प्रकार जैसे बच्चे काठ के धोडे पर वैठवर उसे सच्चा घोडा कल्पित कर लेते है और काल्पनिक सुरू पाने रहते है। यर्मद इन छन्द में 'केसौदास' की छाप न होती तो कदाचित् रसे केशद की रचना मानने से भी लोग इन्कार कर देते। यहाँ पाण्डित्य भी सरल व प्रासादिक शब्दावली में प्रकट हुआ है।

: विष्वनाथप्रसाद मिश्र: बिहारी, पृ० १६५ २ राजकृष्ण दूगड और ब्रज्मोहन जावलिया : देवनाव्य रत्नावली, पृ० ११ ३ विश्वनाभप्रसाद मिश्र : केशय प्रंधावली (भाग ३), पृ० ६६०

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रालिकन्न मे औचिय व्यावहारिक समायोग १२१

माधुय गुण अरुन बरन तरना चरत अगुरी अति सुकुमार। चुवत सुरंग रंग सो मनौ चरि बिलयुवन के भार॥१ मोरह सिंगार के नवेली की सहेलिन हूँ, कीन्ही केलि मन्दिर मे कनपति केरै है। कहै पदमाकर सु पास ही गुलाब पास खासे खस खास खुसबोइन की ढेर हैं। त्यों गुलाबनीरन सो हीरन के हौज भरे दपन मिलाप हित आरती उजेरे हैं। चोखी चादनीन पर चौसरे चमेलिन के चंटन को चौकी बारु चाँद की चगेरे हैं।२

मजुल-बजुल-पुज-निकुज अछ्ेह छबीलो महारस-मेहते। धौस मैं रँन सो चैन को ऐन, मै जोति पग्यौ जगि दपति-देहतें। द्ास-विकास विलास-प्रकास सुजान समान अदहू के तेहतें। भीजि रहे घन आनन्द स्वेद, समीर हुलै विजना भरि नेह नें॥3 च वर्ग के वर्णो का प्रयोग माधुर्य गुण का पोषक होता है। इसी प्रकार अधोप व अत्पप्राण व्यजन कोमल भाव की व्यंजना में सहायक सिद्ध होते है। बिहारी और पद्माकर ने रीतिकाल के कवियों में अपनी चित्रात्मक भापा व मधुर-पद योजना के कारण विशेष प्रसिद्धि पाई है। बिहाटी के इस दोहे में नायिका के चरणो की कोमलता व्यग्य है। इस कोमलता की व्यंजना करने में प्रयुक्त मधुर पदावली शृंगार रस के सर्वथा अनुकल है इतना ही नही उसमे 'र' वर्ण की आवृति भी अत्यन्त मनोहारी है- अरुन बग्न तरुनी चरन-मे वर्णावृत्ति व लय द्रप्टव्य है। दूसरी पक्ति में अगु- लियो की मुकुमारना ही व्यजित नही होती, अपितु लालिमा भी प्रकट होती है। द्वि तीय कवित ने पद्साकर ने मुग्ावासकसज्जा नायिका का चिन्न अंकित करिया है। सभी प्रकार के शृमारादि से सुसज्ज होकर वह केलि-मन्दिर मे प्रतीक्षा-रस है। हीरे के हौजों में गुलावजल भरा हुआ है। खस की खशबू फैली हुई है। चाँदनी में चन्दन की चौकियाँ बिछी हुई है। कोम्ल वर्ण-योजना के भीतर 'ख' वर्ष से बुक्त एक पूरी पक्ति किचित् सटकने लगती है परन्तु यह दोप अन्य सभी पकतियों में पयुक्त सुन्दर बर्णो में इस प्रकार हँन गया है, जिन प्रकार फूलों की सुन्दर माला के बीन एक नीला पलाश का पत्ता। तृतीय सवये में बलानन्द ने माधुय गुण की वर्षा-सी कर दी है। यो भी सबैजा

१ विश्वनाथप्रसाद मिश्र: बिहारी, प० १६६ २ वशवनाथप्रसाद मिश्न. पद्याकर ग्रथावली, पृ० १२५ विश्वनाथप्रसाद मिश्र घन आनद कवित, पृ० १६७

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१२२ रीतिकाव्य मे औचिय व्यावहारिक समायोग

छन्द श्रृगार की अभिव्यक्ति के लिए श्रेष्ठ साधन है; ऊपर से मधुर-वर्णों की योजना तथा प्रासादिकता का संयोजन मणिकाचन-योग ही माना जायगा।

ओजगुण बोरौं सबे रघुबश कुठार की धार मे वारन बाजि सरत्थहि। बान की वायु उडाय के लच्छन लच्छ करो अरिहा समत्यहिं। रामहिं बाम समेत पठे बन कोप के भार में भूँजौ भरत्थाि। जौ धनु हाथ धरे रघुनाथ तौ आजु अनाथ करौं दसर्त्थाि।9 प्रेतिनी पिसाचडरु निसाचर निसाचरिहु, मिलि मिलि आपुस मैं गावत बधाई है। भेरौ भूत प्रेत भूरि भूधर भयकर से, जुत्थ जुत्थ जोगिनी जमाति जुरि आई है। किलकि किलकि के कुतूहल करति काली, डिम डिम डमरू दिगम्बर बजाई है। सिवा पूँछे सिव सो समाज आजु कहा चली, काहू पै सिवा नरेस भकुटी चढाई है?२ अपने गुरु शिवजी के धनुष्य का भग हुआ सुनकर परशुराम का ऋुद्ध हो जाना स्वाभाविक ही है। करोधाविष्ट परशुराम को जब यह पता चला कि धनुष्य रामचन्द्र ने तोड़ा है, तब वे अधिक क्रोधाभिभूत होकर प्रतिज्ञा करने लगे कि आज मैं समस्त रघु- वश को अपने कुठार की तीक्ष्ण धार में डुबो दूँगा। उनकी इस प्रतिज्ञावद्ध म्वभा- वोक्ति मे ओज गुण का पूर्ण प्रकर्ष दिखाई पडता है। प्रत्येक पंक्ति के अन्त मे स्थिन कमश सरत्थहिं, समरत्थ ह, भरत्थाहं, दसरत्थहिं शब्दो में मंयुक्ताक्षर के कारण बचन की परुषता में वृद्धि होती है। इसी प्रकार कुठार, धार की कठोर वर्ण-योजना भी रस- पोपक है। 'कोप के भार मे भूँजौ भरत्थहि'-मे कोध की चाक्षुष बिम्बात्मक अभिव्यक्ति हो पाती है, भाड मे मूँजने की किया का दृग्गोचर रूप उपस्थित हो जाता है। द्वितीय उद्धरण मे भूषण ने युद्ध के लिए प्रस्थित सेना को देख प्रहर्षित प्रेत- प्रतनियों, भूतो, निशाचरो, जोगिनियो का वर्णन उपस्थित कर भयानक रस का अगभूत ओजगुण निष्मादित किया है। 'पिसाच', 'निसाचर', 'मैरौ', 'मूत', 'जोगिनी' के उल्लेख-मात् से ही पर्याप्त भयंकरता छायी हुई है। 'भैरौं भूत प्रेत भूरि भूधर भयकर' से तथा 'डिम डिम डमरू दिगम्बर बजाई है।' पंक्तियों से भय की साक्षात् प्रतिमा-सी स्थापित हो जाती है। शिवाजी के क्रोध की प्रतिमा-सम ये पंवितिया आकुचित भृकुटी का दृश्य-बिंब उपस्थित कर देती है। १ लाला भगवानदीन . रामचद्रिका (पूवाद्ध), पृ० १०६ '२ पयामबिहारी मिश्न और शुकदेव बिहारी मिश्र ः भषण प्रवावली, पृ० १३४

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रीतिकाव्य में औचित्य- व्यावहारिक समायोग

अलकारौचित्य अलकार का उचित प्रयोग अलंकारौचित्य कहलाता है। अलकार गृण के और गुण रस के धर्म हैं। अन. अलकारो का धर्मी के रूप से प्रयोग आचार्यो के द्वारा समा- दृत नही है। आचार्य आनन्दवर्द्धन ने अलंकारो का अयत्नज प्रयोग ही उपकारक माना है अपृथन्यत्ननिर्वत्य, सोडलकारो ध्वनौ मत ।।१ लांजिनस ने भी उसी अलकार-प्रयोग को सुन्दर व सार्थक माना है जो काव्य मे उक्ति कुा सहज अंग बनकर आवे तथा पाठक को यह आभास न होने दे कि यहॉँ अमुक अलंकार है। अलंकार ऊपर से यत्नपूर्वक आक्षिप्त न होने चाहिए। इस विपय मे लाजि- नस की उक्ति द्रष्टव्य है. 'A Figure looks best when it escapes one's notice that it is a figure."? अलंकारों के प्रयोग के विषय मे दूसरी महत्त्वपूर्ण शर्त यह है कि वे अलकार्य के अनुरूप हो। इस विषय मे आचार्य अभिनव गुप्त का यह कथन सर्वथा ध्यान देने योग्य है कि- तथाहि-अचेतन शबशरीर कुण्डलाद्युपेतमपि न भाति, अलंकार्यस्याभावात्। यतिशरीर कटकादियुक्त हास्यावह भवति, अलकार्यस्यानौचित्यात्।3 गव-शरीर अथवा यति का शरीर कटक, कुडलादि के लिए उचित अलकार्य नही है। अलकार्य के अभाव मे अलंकार व्यर्थ व निरर्थ है। अनुचित अलकार्य के प्रसग मे भी वे अपनी सारी शक्ति खो बैठते हैं। उचित अलकार्य के प्रसंग मे भी उनका यथा- स्थान सन्निवेश ही शोभाधायक सिद्ध होगा। आचार्य क्षेमेन्द्र भरत के भाव को दोह- राते हुए यही कहते है कण्ठे मेखलया, नितम्बफलके तारेण हारेण वा, पाणौ नूपुरबधनेन, चरणे केयूरपाशेन दा। शौर्येण प्रणते, रिपौ करुणया ना्याति के हास्यताम् ? औचित्येन विना रुर्चि प्रतुनते नाडलकृतिर्नोगुणाः ।।* उक्त सभी विद्वानों की धारणाओ से पुष्टि हो जाती है कि- (१) काव्य में अलंकारो का प्रयोग अयत्नज, सहज और स्वाभाविक हो, ऊपर से लादा गया न हो। (२) अलकार्य के अभाव में अलंकार की कोई सार्थकता नही है।

१ सपा० डॉ० रामभागर त्निपाठी : इवन्यालोक (दुर्वार्द्ध), पृ० ४८० २ बलदेव उपरयाय भारतीय साहित्यशास्त्र (भाग २) पृ० ११६ से उद्घुन ३. सपा डॉ० रामसागर त्रिपाठी : धबन्यालोक (लोचन टोका), पूर्वादं, पृ० ४१६ ४. डॉ० राममूर्ति ननिपाठी : श्रचित्य विमर्श, पृ० ९८६

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१२४ रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग

(३ ) अनुचित अलकार्य के प्रसंग में भी अलंकार अपनी सत्ता-महत्ता खो देते है। (४ उचित न्थान पर विन्यस्त होकर ही अलंकार अपनी सार्थकता सिद्ध कन्ते है। परिणामतः अलंकार्य और अलकार के बीच सहज एकान्विति को ही अल- कारौचित्य कहा जा सकता है। रीति-काव्य अधिकांशन जलंकार-प्रधान काव्य है। अलकारो के प्रतति जितनी सजगता इस युग मे पायी जाती है, उतनी, सम्भवत., अन्य कालों के कवियों में नही है। इस युग के प्राय सभी कवि अलार-पण्डित थे। रीति-नद्ध, रीतिसिद्व व रीति- मुबन सभी धाराओ के कवि अलकार-प्रयोग मे अपना कौशल दिखाने मे ममुदत रहे। हॉ, इनका अलंकारो के प्रति अभिगम (एप्रोच) अलग-अलग रहा। चमत्कार का मन्नि- वेश कर अपनी उक्ति को सर्वाधिक आकर्पक बनाने के उपकम में कवियो ने ऊहाओ नथा वकनापूर्ण वाग्वैदग्व्य का समाश्रय लिया, कार्ण कि सीवी व सरल उक्तियो मे वँसा आकर्षण व प्रभाव नही रहता जैसा वकोक्ति में । परिणामत विरोध-मूलक अल- कारो-विभावना, विरोष, विषम, असगति, परिसंस्या-की ओर कवियो का स्वाभा- विक रुझान पाया जाता है। रीति-काव्य मे अलंकारौचित्य का परीक्षण अपने मे एक स्वतत्र विषय हो सकता है, अत. यहाँ अनावश्यक विस्तार न करते हुए कुछ उद्दाहरणों में अपनी बात को स्पष्ट कर देना हो उपगुक्त होगा। अलकारों के प्रमुख दो भेद-गन्ालकार और अर्थालकार-शास्त्र-गृहीत है। शब्दानंकारो में यमक, इलेप, व अनुपास ही मुख्य हैं। इन शब्दालंकारो का प्रयोग नाद-सौन्दर्य को भम्प्रेपित करने तथा शब्द-गत प्रयोगो के माध्यम से काव्य की चमत्कृति वघिन करने के लिए होता है। अनुप्रास हीन भएँ जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समानै। नीर सनेही को लाय कलंक निरास हवै कायर त्यागत प्रानै। प्रीति की रीति मु क्यौं समुझ जड मीत के पानि परे को प्रमानै। या सन की जु दसा घन आनन्द जीव की जीवनि जान ही जानै ।।9 प्रिय की परवगता, आकुल-व्याकुल अवस्था की जड मीन से कोई समता नही है। उस मर्मालक पीडा को वही समझ सकता है, जिसे विरह ने बीध डाला हो। 'हीन', 'मीन', 'प्रीति', 'रीनि', 'जीव की जी्वत जान ही जाने में वोजित अनुप्रास की सह- जता नथा पक्तियों के अन्त मे स्थिन 'समानै', 'प्रान', 'प्रमान', 'जाने मे आए अंत्या- नुप्रास ने विरही की व्याकुलता तथा वेदना को सशक्त शाब्दिक अभिव्यक्ति प्रदान को है।

१ विश्वनाथप्रसाद मिश्र: घनानद कवित, पृ० ७

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रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

इलेष (१) राउरी दुहाई तौ बुआई ना बुझेगी फेरि। नहभरी नागरी की दह दिया बाती सी।१ (२) ऐमो यति पायो वडभागनि सो प्यारी सदा, सुविरन ही को पघिलावत सुहाग मो॥२ (ग)खेलन मिव्वए अलि भले चतुर अहेगी भार। काननचारी नन मुग नागर-नरनि सिकार।3 प्रथम उद्धरण में पदूमाकर ने इलव का चसत्वारी प्रयो कर 'नेहभरी' नायिका की देत्र को डिया बाली की बताया है। दीपक की लौ में जलत है और वह तेल मे भरी भी रहती है। नायिका का वेह में ज्वलनगीलता (विर्ह्जन्य नाप) और स्नेहशीलना का समन्वित निवास है। इ्लेव की महायता में दोनो का उद्घाटन कर दिया गया है। स्नेह और जलन मे विरोध नही किन्तु कार्य-कारण भाव अर्वसस्थित है। यह दिया- बाती-मी उसकी देह विरहजनित अपार कप्टो मे भी चिर-ज्वनिन रहनी है। बुनाने पर भी नहीं बुझ पानी है। स्नेह का नवल तो है। सतिराम ने नायिका को सुहागा ओर नायक को सुदर्ण कहकर कलेप का अच्छा प्रयोग किया है। 'सुविग्न' और 'सुहाग' करमण सुपुरुष और सोभाग्य के यर्य का बोध भी कराते है। सोने को पिघलान के लिए उनमे सुहागा मिलाया जाता है। सुपुरूप अथवा सुन्दर नायक को भी सौभाग्यवती के अतिरिक्त कौन उवीभुत कर सकता ह ? नायिका की सम्मोहृत-्क्ति की व्यजना कर उसके अद्सृत रूप-मौन्धर्य के कि ने अपूर्व व्यंजना की है। विहारी ने नेव्रो को काननचारी मृग कहकर उनके वाचत्व दीर्घत्व औन ईरु- वत् बेधन-क्षमता को ब्यजना कर दी है। नायिका के नेत्र-सन्दर्य की बडी सटीक वय- जना कवि ने यहाँ की है। अमल कमल, जहाँ सीतल सलिल, लागी, आस आस पारिन सवनि ताल जाति है। तहा नव नारी, पचवान बैस बारी, महा, मत्त प्रेम-रस आस वनि ताल जाति है।। गावनि मधुर, तीनि ग्रान, सात सुर मिलि, रही ताननि मैं वसि, बनि ताल जाति है।

  1. विश्वनाथप्रसाव मिश्र पशाकर प्रथावली, पृ० १६० २ कृष्जविहारी मिश्र मतिराम अथाबती, पृ० ६२ ३. विश्वनायप्रसाय मिश्र. बिहारी, पृ० ९७म

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१२६ रीतिकाव्य मे ओचित्य व्यावहारिक समायोग

सेनापति मानौ रति, नीकी निरखत अति, देखिके जिने सुरेस बनिता लजाति है।।१ कविवर सेनापति ने उक्त उद्धरण के प्रत्येक चरण के अन्त मे 'बनिता लजाती है।' की आवृत्ि की है। प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न-भिन्न है, अतः यमक अल- कर की यहाँ स्थिति होती है। शृंगार के प्रसग मे यमक-योजना बड़ी पोपक होती है। ग्राम-वधुओ का सहज मौन्दर्य, उनके कठ का मधुर संगीत, उनका जल हर, उनकी नई उमर, उनकी तालबद्ता, उनकी निकाई आदि को देख सुरेग-वनिता अर्थान शची भी लज्जित हो जाती है। कथ्य की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति मे 'यमक- योजना' अधिक सक्षम हो गई है। अर्थालकार उपमा राम पद-पद्म सुख सद्म कहँ बन्धु युग, दौरि तब षट्पद समान सुख पाइयो॥२ यद्यपि केशव विरोधमूलक अलकारो का प्रयोग कर चमत्कार की सृष्टि करने मे प्रवीण माने जाते है और उनकी इसी कारण विशेप अनुकूल-प्रतिकूल आलोचनाएँ भी होती रहती हैं तथापि सादृश्याधुत अलकारों-उपमा-उत्प्रेक्षादि-के प्रयोग मे उनका कौनल अवज्ञा-योग्य नहीं है। प्रस्तुत उदाहरण मे उन्होने राम के चरणों को कमल तथा भरत एव शत्रुघ्न को भ्रमर कहकर भक्ति-भाव की तीव्रता, इष्ट के चरणो में आनुरतापूर्ण प्रणति व अधीर होकर अपने-आपको समर्पित करने की व्यंजना की है। राम के प्रति इन दो अनुजो की अनन्य भक्ति, राम से मिलने की छटपटाहट, आतुरता, विकलतादि की तीव्रतर व्यंजना इस उपमा द्वारा हो पाई है। एक स्थान पर केशव ने भरत की उपमा बछडे से तथा माताओ की उपमा गायो से देकर वात्सल्य की अपूर्व व्यंजना कर दिखाई है।3 अग्नि की गोद मे स्थित सीता को 'पिता अंक ज्यो कन्यका शुभ्र गीता।' कह- कर सीता के पावित्र्य की व्यजना की है।5 ये सारी उपमाएँ निश्चय ही सुन्दर व क्ध्यानुकूल है। सेनापति सहज की तन की निकाड़ ताकी, देखि के दृगन जिय उपमा विचारी है। ताल गीत बिन, एक रूप कै हुरति मन, परबीन गाइन की ज्यौ अलापचारी है॥।4

१. जमाशंकर शुक्ल. कचित रत्नाकर (भूमिका), पृ०४३ २. लाला भगवानदीन, केशव कौमुदी (भाष २), पु० १३ ३. लाला भगवानदीन, रामचदिका (पूर्वातं), पृ० १६३ वही, यृ० ३५२ नसाशकर शक्न. कवित्त रत्नाकर (भूमिका), पृ०८

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रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग १२७

सेनापति ने सद् स्नाता के अग की सहज 'निकाई' की व्यजना करने के लिए उसकी तुलना ताल-गीत रहित अलाप' से की है। अंग की निकाई की अपेक्षा अलाप अधिक सूक्ष्म है। इस उपमा में आभूषणादि से विरहित नायिका के अनाविल व सहज सौन्दर्य की मूर्त अभिव्यक्ति हो पायी है। श्राव्य-बिम्ब की इस योजना मे किचित् नवीनता, ताजगी व मोलिकता भी आ गई है। भूषण ने इस छद मे उपमाओ की वर्षा-सी कर दी है- सक जिमि सैल पर अर्क तम फैल पर, विघन की रैल पर लबोदर लेखिये। राम दसकंध पर भीम जरासंध पर, भूषन ज्यो सिधु पर कुभज बिसेखिये। हर ज्यो अनग पर गरुड़ भुजंग पर, कौरव के अग पर पारथ ज्यो पेखिये। बाज ज्यो बिहग पर सिंह ज्यो मतंग पर, म्लेच्छ चतुरंग पर सिवराज देखिये।' शिवाजी के बल, पराक्रम एव प्रभाव का वर्णन करने मे यह मालोपमा बहुत मफल हुई है। उत्तरोत्तर शात्ब भाव की तीव्रता व प्रकर्ष दिखाने मे ये उपमाएँ सटीक है। प्रयुक्त सभी उपमाओ मे उल्लिखित प्राणियों, व्यक्तियों व पदार्थों का परस्पर-विरोध या आत्रव सुप्रसिद्ध है। आँखिन ते गिरे ऑंसु के बूंद, सु हास गयौ उड़ि हस की नाई॥२ वार्त्तालाप के प्रसंग मे नायक द्वारा निरभिप्राय ही परकीया का नाम-कथन हो जाने पर नायिका की समग्र प्रसन्नता विलुप्त हो गई। नेत्रो से अश्रु बहने लगे। विलुप्त होते हास्य की उडते हुए हंस से तुलना किया एव रूप-सादृश्य पर आघृन है। हास्य का रंग भी श्वेत माना जाता है और हंस तो श्वेत होता है ही। दोनो के आकस्मिक उड जाने का बोध इस बिम्ब द्वारा हो जाता है। वर्षा का संध्या से जश्रु- पात की सगति, भी अपर्व है। नायिका की उदातीनता भी 'वर्षों की सॉज' से व्यजित हो जाती है। घनानंद ने भी इसी प्रकार के भाव की मधुर व्यजना की है- गए उडि तुरत पखेरू लौ सकल सुख, परयौ आय औचक वियोग बैरी डेल सो॥।3 अमूर्त (सुख) के लिए मूर्त (पख़ेरू) की उपमान रूप में कल्पना अत्यत मोहक, १. मिश्र-बधु : भूषण प्रथावली, पृ० १४६ २ हरदयाल सिंह : मतिराम-मकरद, पृ० १४६ ३. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : धन आनद कवित्त, पृ० २३

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१२८ रीतिकाव्य मे औचित्य- व्यावहारिक सनयोग

नवीन व ताजी है। विरहजनिन मुख-लोप का सुन्दर निरूपण उष्टव्य है। अलकार के क्षेत्र मे भी स्वच्छन्दधारा के कवयों की विलक्षणता अपनी चमक दिखा जादी है। एक अन्य उदाहरण भी द्ृष्टव्य है- मेरो मन भँवै भटू, पात हव बधूरे को।१ नायिका के मन की भटक नमय विवशता और पारस्थितियों की प्रवलना की व्यजना के लिए कवि ने क्रमय पत्ते और वात्याचक का आश्रय लिया है, जो नायिका की मानसिक अवस्था का सटीक उपमा द्वारा बिम्वग्राही चित्र उपस्थित करता है। उत्प्रेक्षा सोहत ओढे पीत पट स्याम सलोने गान। मनौ नीलमनि-सैल पर, आतम परयी प्रभात ।।2 पीताम्वर ओढे हुए श्रीकृष्ण का सुन्दर व्याम शरीर ऐसी गोभा देता है, गने नीलमणि पर्वत पर प्रात काल की धूप पड रही हो। यहा पर उक्तविपयावस्तुतपेक्षा है। नायिका के सामने सखी द्वारा कहे गए इन वचनो में नायक श्रीकृष्ण के रूप को उभारने की नेष्टा की गई है। इस दोहे मे श्रीकृष्ण और उनका पीत-ट उपमेय है और नीलमणि पर्वत और प्रात कालीन सूर्य की पीत किरणे क्रमन उपमान है। रग- साद्व्य के आधार पर कवि ने रूप के ओप को बडे ही सुन्दर ढंग से व्यजित किया है। लसत सेन सारी ढक्यौ तग्ल नरौना कान। पर्यौ सनौ सुरमरि सलिल रवि-प्रतितिंब बिहान!।3 यहां पर भी उक्तविपयावस्तूतप्रेक्षा हे। रवेत साडी में ढँका हुआ झिलमिलाना कान का कर्ण-फूल इस तरह गोभित है, मानो गगा के जल ने प्रभातकालीन सूर्य का बिभ्व पड रहा हो। प्रस्तुत उत्प्रेक्षा के द्वारा दो समानान्तर दृश्य-बिम्ब खड हो जाते है। एक तो ऐसी नायिका का चित्र खडा होना है, जो स्वेत वस्त्रो से आवृत्त है और जिसका कर्णफूल झीने रवेन पट से अपनी प्रतिच्छवि को वाहर फेकता रहता हु। साथ ही प्रकृति-विपयक दूसरा बिम्ब है, जिसमे गगा के लहराते पानी में सूर्य का प्रति- विम्ब झिलमिलाता है। इस प्रकार उपमेय और उपमान के ये दोनो बिम्ब रग-रूप और तारल्य के सादृव्य को प्रकट करते है। नायिका का सौन्दर्य तो इस उत्प्रेक्षा के माध्यम से द्विगुणित व मूर्तिमंत हो जाता है। रुपक बरुनी बघंबर औ गूदरी पलक दोऊ, कोये राते बसन भगोहै भेख रखियाँ।

१ विशवनाथप्रसाव मिश्र धन म्रानंक कवित्त, पृ० २२ २ वही, बिहारी, पृ० २१७ विशवनाथप्रसाद मिश्र : बिहारी, पृ० २१२

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तिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

बूडी जल ही मैं दिन जामिनी रहति भ्िं, धम सिर छायो बिरहानल विलखियाँ। आँसू ज्यों फटिक माल, लाल डोरे सेल्ही सजि, भयी है अकेली तजि चेली संग सखियाँ। दीजिय 'दरस' देव लीजिय सजोगिनि के, जोगिनि है बैठी वा विजोगिनि की अखियाँ।।9

देव का यह अत्यन्त प्रसिद्ध रूपक है। इसमे आद्यन्त सादृश्य व साधर्म्य की सुरक्षा व उनका निर्वाह हुआ है। उफनते हुए क्रोध को नदी के रूपक मे बाँधना सरल है। ज्ञान-दीपक की रूपक-योजना भी विशेष दुष्कर नही है। क्योकि वहॉ लम्बी-चौडी भूमि (कैनवस) प्राप्त होती है, परतु ऑख जैसे छोटे पदार्थ मे जोगिनी का रूपक बाँधना तथा उसका निर्वाह कर लेना निध्चय ही बहुत वडे कौगल की अपेक्षा करता है। रूपक की सफलता इसी मे है कि उसके अंग-प्रत्यग का सटीक निरूपण हो। प्रस्तुत पद मे कवि उसका पूरा-पूरा निर्वाह कर पाया है। बरुनी व्याघ्रचर्म है; दोनो पलकें सूदड है; नेत्रों की लालिना लाल वस्त्र है; ऑसू स्फटिक माला है; विरहानल जोगिनी की बूनी है, भौहों का धुआँ इनने छाया रहता है। उभय-पक्ष की सगततिपूर्ण विनि- योजना करने में देव ने अद्सुन कौशल दिखाया है। देव ने अन्य सफल रूपक लिखे है यथा-वसंत-रूपक, दूध-जीवन रूपक; ढोल का रूपक आदि।

व्याजस्तुति

धीवर कौ सखा है, सनेही बन चारन कौ, गोध हू कौ बन्धु सवरी कौ मिहमान है। पंडब को दूत, सारथी है अरजुन हू कौ, छाती बिप्र-लात कौं धरैया तजिमान है॥। व्याध अपराध-हारी स्वानसमाधान-कारी, करें छरीदारी, बलिहू कौ दरबान है। ऐसो अवगुनी! ताके सेइबे कौ तरसत, जानियै न कौन सेनापति के समान है।२

प्रस्तुत व्याजस्तुति में सेनापति ने अनेक अवगुणो (1) से युक्त श्री रामचन्द्रजी को सेवा की जाने पर आश्चर्य प्रकट किया है। इस व्याजस्तुति मे निंदा के बहाते राम के समत्व, वधुत्व, सहनशीलता, क्षमाशीलता, दया, भक्त-वत्सलता आदि गुणो का निर्वचन किया गया है।

१ दूगड़ और जावलिया 'देवकाव्य रत्नावली, पृ० ५७ २. उमाशकर शक्ल : कवित्त रत्नाकर, पृ १००-१०१

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१३० रीतिकाव्य मे ओचित्य - व्यानहारिक समायोम

परिसंख्या

विरोधमूलक या विरोधाश्रित अलकारो का प्रयोग चमत्कारवर्द्धक होता है। नृप-वैभव, गासन-सुप्रबन्ध, प्रताप-वर्णन आदि के प्रसग मे ऐसे विरोधमूलक अन्ठकार अधिक उपकारक सिद्ध होते है। परितम्या का प्रयोग भी प्रायः ऐसे अवसरो पर होता है। केशव का यह अति प्रिय अलकार ज्ान पडता है। भूषण ने भी इसका प्रयोग किया हूं। नीचे कमश, केशव और भूपम के उदाहरण देखिए-

मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय। होम-हुताशन-धूम नगर एके मलिनाइय। दुर्गति दुर्गन ही जु कुटिलगति सरितन ही मे। श्रीफल को अभिलाप प्रगद कवि कुल के जी मे।।१

चोरी रही मन में ठगौरी रूप ही में रही, नाही तो रही हूँ एक मानिनी के मान मे। केस मे कुटिलताई नैन मे चपलताई, भौह में बंकाई हीनताई कटियान मे। भूषण भनत पातसाही पातसाहन मे, तेरे सिवराज अदल जहान मे। कुच मे कठोरताई रति मे निलजताई, छाँड़ि मब ठौर रही आई अबलान मे ।२

प्रथम-पद में राजा दरथ के प्रताप व व्ञवासन-प्रबन्ध की विशेपता दर्शाई गई है। अयोष्या मे वृक्ष की जडों को छोड़कर किसी की अवोगति होती ही नहीं। केवल यज के धुएँ से ही भवन मलिन होते है। दुर्गों में ही दु्गति पायी जाती है। कुटिलता केवल सरिताओ के प्रदाह मे ही है। श्रीफल (लक्ष्मी की वाछा अथवा कुचो की अभि- लापा) की अभिलापा केवल कवियो को ही है, क्योकि कुचो की उपमा देने के लिए वे उसका आश्रय लेते है। साराग यह है कि अयोष्या में कुटिल, पधोगामी, दुर्गनिपूर्ण, मलिननग्ति द्रव्य-लोभी एवं कामी जनो का वास ही नहीं है। द्वितीय उदाहरण मे भूषण ने शिवाजी के श्ञामन-प्रबन्ध का वर्णन किया है। शिवाजी के राज्य मे नोरी, ठगविद्या, अवज्ञा, कुटिलता, वकता, हीनता, कठीरता, निर्कज्जता आदि का वास केवल अबलाओ के रूप व शृगाराराघन मे ही था, अन्यव नहीं। प्रजाजन इनमे सर्वथा विमुक्त थे। चोरी केवल नायिकाओ के मनमे थी, ठगौरी मात्र रूप मे थी. 'ना' केवल मानिनियों के मान मे थी, कुटिलता केवल उनदे केगों ने बी, ⑈⑈ लाला भगवानदीन रामचद्रिका (पूर्वार्द्ध), पृ० २२ २ विश्वनाथप्रसाद मिश्र भूषण ग्रन्थावली, पृ० १०%

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१३२ रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

भिन्न-भिन्न स्थानो पर होते है। प्रेम की विचित्नता का निरूपण करने में यह असंगति अलकार अपू्व योग देता है। केशव के निम्न उदाहरण में दशरथ का प्रताप व बल-पराक्रम प्रकट किसा गया है। असंगति का चमत्ार देखिए: जब तें बैठे राज, राजा दशरथ भूमि मे। सुख सोयो सुरराज ता दिन ते सुरलोक में ॥१ इधर राजा दशरथ अयोध्या के राज-सिहासन पर विराजमान हुए और उबर सुरराज इन्द्र ने सुख की नीद पायी। कारण पृथ्वी पर और परिणाम स्वरगभुमि में दिख्वा कर राजा दशरथ के स्वर्ग तक व्याप्त प्रभाव की, उनके बल-पराक्रम व पौरुष की व्यजना कवि ने कर दी है। रघुवंशी राजा दशरथ के बल-बूते पर ही इन्द्र स्वर्ग का राज सुख- पूर्वक चला लेता है, यह व्यजित है। विषम कन दैबो मौप्यो ससुर बह थुरहथी जानि। रूप-रहचटे लगि लग्यौ मॉगन सब जग आनि।।2 ससुरजी ने पुत्रववू को छोटे हाथो वाली जानकर अन्न-भिक्षा देने का कार्य सौंपा, किन्नु उसके रूप का यह प्रभाव हुआ कि सारा गाँव भिक्षुक बन बैठा। 'चोौबेजी होने गये छब्बे और रह गये दूबे वाली स्थिति हो गई। इम प्रकार उक्त दोहे में छोटी बह के अप्रतिम रूप-सौन्दर्य की व्यंजना करने मे यह अलकार-योजना बड़ी सार्थक है। विरोध प्यो राख्यौ परदेस ते अति अद्भुत दरसाय। कनक कलस पानिप भरे मगुन उरोज दिखाय। सामान्यतः प्राचीन काल में विदेश-गमन, युद्ध-गमन, यात्रा-प्रस्थान आदि अवसरों पर रीती गागर आदि का आगमन अशुभ माना जाता था और याला आदि स्थगित कर देनी पड़ती थी। किन्तु मतिराम की नायिका तो आपूर्ण कतक पयोवरों (कनक कलश सदश उरोजो) को दिखाकर यानी शुभ शकुन दिखाकर नायक की नाला स्थगित करा देती है। इस प्रकार विरोधालंकार द्वारा कवि ने नायक-नायिका के मनोभावों व नायिका के रूपाकर्षण की सुन्दर व्यंजना कर दी है। विवादन याके उर और कछू, लगी बिरह की लाइ। पजरे नीर गुलाब के, पिय की बात बुझाइ।*

१. लाला भगवानदीन रामचंद्रिका (पूर्वारद्ध), पृ० ७५ ६ विश्वनायप्रभाद मिश्र: बिहारी, पृ० १७१ ३. हरकयालुसिह भतिराम-मकरद, पृ० २४४ ४ विश्वनाथप्रसाद मित्र : बिहारी, प० २०६

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रीतिकाव्य मे औचित्व व्यावहारिक समायोन १३३

साधारण अग्नि से विरहार्ति की भित्नता यह है कि साधारण अग्नि पर जल डालने से वह बुझ जाती है और तायु (बात) के चलने पर भड़क उठती है, जब कि तरिरहाग्ति तो गुलाब जल से भडक उठती है और प्रिय की वानचीन (बायु) से शमित होे जाती है। नायिका की अवस्था, विरह की विलक्षणतादि का बोध कराने में यह विषा- दन अलकान बडा सफल हुआ है। परिकराकुर मीत सुजान अनीति करौ जिन, हाहा न हुजिय मोहि अमोही। दीठिको और कहूँ नहिं ठौर, फिरी दृग रावरे रूप की दोही। एक बिसास की टेक गहे, लगि आम रहे बसि प्रान-बटोही। हौ घनआनन्द जीवनमूल दई! कित प्यासनि भारत मोही।9 यहाँ 'जीवनमूल' विशेषण का प्रयोग साभिप्राय हुआ है। जोवन पानी का पर्याय भी है। यह शब्द प्राण और पानी दोनो अर्थो की ब्यजना करता है। व्यंजना यह है कि तुम प्राणो की रक्षा करने वाले या प्राण देने वाले होकर भी हमे तडपाते हो, प्यासा मारते हो? 'जीवनमूल' विशेषण सटीक व औचित्यपूर्ण है। केशव की भाँति केवल चमत्कार-प्रदर्शन के लिए प्रयुक्त नहीं हुआ है। लोघलेविति यह कीरति और नरेशन सोहै। भुनि देव अदेवन को मन मोहै। है को बपुरा सुनिये ऋषिराई। सब गाँऊँ छ सातक की ठकुराई।* जनक के विनम्र, विनयसम्पन्न व निरभिमनी स्वभाव आदि की सुष्ठ अभि- व्यक्ति करने मे 'सब गाँऊँ छ सातक की ठकुराइ' पंक्ति बडी सफल हुई है। लोकोक्ति का प्रयोग सार्थक है, क्योंकि अपने वैभव की स्वीकारोक्ति केवल गर्विष्ठ जन ही करते हैं। अभ्योक्त खरी मातरी कान की, कौन बहाऊ बानि। आक-कली न रली करै, अली अली जिय जानि।।3 नायिका कान की पातरी अर्थात् भोली है। सुनी-सुनाई बातों पर झट से विश्वास कर लेती है। प्रिय के अत्यन् रमण करने के समाचार मात्र से मान करने लगी है; रक गई है। सखी उसे समझाती है कि तू इन मिथ्या बातों पर विव्वास मत कर। यह विश्वास रख कि भौरा कभी मदार को कली में अनुरक्त नही होदा। यहाँ परकीया की निकृष्टता, नायक की निष्ठा व नायिका का रूप-सौन्दर्य अन्योक्ति द्वारा व्यंजित हो जाता है। १ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : चनम्रानन्द कवित्त, पृ०र २ लाला भनवानदीन रामचद्रिका (पूर्वार्द्ध), पृ० ६८ ३. विश्वनाथप्रसाद मिश्र. बिहारी, पृ० १७७

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१३४ रीतिकाव्य मे औचित्य व्यातहारिक समायोग

ूढोतर सुढ उत्तर-प्रत्युन्तर का प्रयोग संवाद-कौशल दिखाने में वडा सहायक होता है। उसमे काव्यीय सौन्दर्य की अभिवृद्धि होती है। केशव ने अपनी संवाद-योजना मे इसका पर्याप्त प्रयोग किया है। रावण-अंगद संवाद मे गूढोत्तर का सौन्दर्य द्रष्टव्य है. कौन के सुत? बालि के, वह कौन बालि न जानिये ? कॉख चॉपि तुम्हे जो सागर सात न्हात वखानिये ॥ है कहाँ वह ? वीर अंगद देवलोक बताइयो। क्यों गयो? रघुनाथ-बान विमान बैठि सिधाइयो॥ यहाँ राम का प्रताप वकर गैली मे वर्णित किया गया है। अनुज वधू को अपनी बनाकर रखने वाले बालि व उसके पराक्रम का स्मरण कराकर एक ओर तो रावण को अपनी दीन-हीन अवस्था का बोध कराना अंगद का इष्टार्थ है, जो इस रूप मे व्यजित होता है कि. जो बालि तुम्हे अपनी कॉख में दवाकर सातों समुद्रो में नहाता रहता था, उसे भगवान ने वाण के विमान पर बिठा कर स्वर्गधाम पहुँचा दिया, तो तुम किस गिननी में हो और दूसरी ओर यह भी व्यजित करना इस्ट है कि सुग्रीव की पत्नी को बालि ने अपने घर में रख लिया था; केवल इतने अपराध मात्र में भगवान् राम ने उसको मार डाला।यद्यपि बालि ने राम का प्रत्यक्ष कोई अपराध नही किया था) तो तुमने तो उनकी पत्नी को ही अपने घर मे बिठा रखा है तुम्हारा क्या हाल होगा? अनुरणन (आनामोटोपोइया) ध्वनि के माध्यम से बिम्ब-स्थापन करना इस अलंकार की विशेषता है। इसके प्रयोगोचित्य पर पोप ने बहुन बल दिया है। पवन की सरसराहट का बिम्ब तभी खडा किया जा सकता है जब तदनुरूप व्वननशील वर्ण-योजना हो। इसी प्रकार गगन का निर्घोष दिन्ाने के लिए भी वैसे ही ध्वननशील वर्ण ही प्रयुक्त किए जाय। रीतिकाल मे विहारी और पद्माकर ने इसके सुन्दर एवं सफल प्रयोग किए है। रनित-भृग-घंटावली भरित-दान-मधुनीर। मन्द मन्द आवत चल्यौ कुंजर-कुज-समीर॥२ बिहारी के उक्त पद में समीर के लिए हाथी का उपमान जुटाया गया है। गैरों की युजार को घम्टो की ध्वनि से झरते हुए पराग को गण्डस्थल द्रवित मद से उपमित कर कवि ने दृश्य-श्राव्य बिम्ब की सफल योजना की है। उसकी अनुरणन- क्षमता को आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र भी अभिशंसात्मक दृष्टि से देवते है।3

१. लाला भगवानदीन : रामचद्रिका (पूर्वाद्ध), पृ० २८४ २. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : बिहारी, पृ० ३०८ है. वही, पृ० १२०

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रोतिकाव्य में औनित्य : व्यावहारिक समायोग १३५

पझ्माकर के निम्न उदाहरण में युद्ध की पूर्व-पीठिका का आत मनोरम व्वन्यात्मक चित्र पावा जाता है - समर ग्रबल दल दिन्ध उमडिय दंदुभि-धुनि दिगमंडल मंडिय। घर्घरात घनते अति धुक्नि भर्मरात अि भजल सुनुक्कनि॥9 सैन्य के चलने, दुदुभियों के बजने, नगाझी पर चोट पडते और सेना के भागने का जो चित्र यहाँ कवि ने उपस्थित किया है उसका बहुत कुछ आधार भाव व लयानु- कारी या प्रसगानुरुप वर्ण योजना पर ही है। ध्वनननील वर्णों की योजना से भाव का चित्र उभर आना है। रसाखित्य आचार्य क्षेमेन्द्र द्वागा 'रतांतित्य' की कल्नना किये जाने में समीक्षक व सहृदय की दृष्टि ही प्रधान रही है। रसौचित्य पर विचार करने समय प्रश्न उठता है कि यदि काव्य के विभिन्न तन् दस के मुखापेक्षी है तो रस किन का मुखापेक्षी है? आचार्य क्षेमेन्द्र का उत्तर स्पष्ट है-रस अन्य काव्यागो का मुखापेक्षी है। वें रस को सर्वतन्त्र स्वतन्त्र नही मानते। कभी कभी ऐसा होता है कि रसाभिनिवेशी कवि रस का प्रकर्षपूर्ण निबन्धन तो कर लेता है परन्तु प्रवाह-प्तिन होकर इसका विचार नही कर पाता कि उसका प्रम्तुत रस-निबन्धन प्रकृत विपय-वस्तु के अनुरूप है या नही। काव्य को आत्मा रस है, रस अगी है; सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्र है, सर्वोपरि होते हुए भी औचित्य के अनुशामन से मुक्त नहीं। रसौचित्य से क्षेमेन्द्र का नात्पर्य केवल इतना ही है कि रम का पूर्ण परिचक वस्तु, विषय, प्रसगादि के अनुरूप हो। क्षेमेन्द्र के ऐसा मानने सें रस अगी से अग नही बन जाता, अंकुगित अवश्य हो जाता है। रीतिकालीन कविता मे रसौचित्य की स्थिति करे स्पष्ट देखने के लिए कुछ रसो में उसके समायोग की चर्चा अपेक्षित ही होगी। शृंगार रस (संयोगपक्ष) वतरस-लालच लाल की मुरली धरी लुकाय। सोह करे भौहनि हुँमै, दैन कहे नटि जाय।।" सयोग की अवस्था का चित्न है यह। प्रिय से बात करने का अवसर ठूँढने के लिए नागिका नाना प्रकार के हावो का आश्रय लेती है। नायिका का सौह करणा, भौहों मे हँसना, मुरली लौटाने का वचन देना और फिर नट जाना (मुकर जाना) आदि सारी चेष्टाऍ जीपन विभाव के अन्तर्गत समाविष्ट हो जाती है। समग्र रस-योजना प्रसंगानुरप है। १ विश्व नाथप्रमाद मिश्र : पपाकर प्रन्थावली, पृ० ई २. विश्वनाथप्रसाद मिश्र: विह्वागे, ९ृ० २९१

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१३६ रीतिकाव्य में औचित्य. व्यावहारिक समायोग

ीतम दृग मीचत तिया पानी।परस-सुख पाइ। जानि पिछानि अजान लौ नेकु न होति लखाइ।।4 प्रियतम का नायिका के नेत् बन्द करना, उन्हे जान लेने पर भी प्रिय-स्पर्श का अधिक सुख लेने के विचार से न जानना आदि शृगार चेष्टाएँ शृगार रस का उद्दी- पन करने मे सर्वथा समर्थ है। पद्माकर ने तो प्रसग की योजना ही ऐसी कर दी है कि कुछ कहते नही चनता- मंडप ही में फिर मण्डरात न जात कहूँ तजि नेह को औनो। त्यो पदमाकर तोहि सराहत बात कहै जु कहूँ कछु कौनो। ए वडिभागिनी तो सी तुँही बलि जो लखि रावरो रूप सलौनो। T व्याह ही मे भए नाह लटू तब ह है कहा जब होइगो गौनो ।।" पद्माकर ने यहॉँ अनुकूल नायक की योजना की है तथा नायिका के प्रति उसकी परम अनुरक्ति दिखाकर नायिका की रूप-माधुरी का प्रभाव एवं नायिका का सौभाग्या- तिशय निरूपित किया है। सारी शृगार-योजना नायक-नायिका के अनुराग के सवथा अनुरूप है। किकिंनि नेवर के झनकारन, चारु पसारि महा रस जालहि। काम कलोलनि मै मतिराम, कलानि निहाल कियौ नन्दलालहि। स्वेद के बिन्दु लसे तन मैं, रति अन्त रही भरी अक गोपालहि। फूली मनो मुकताफल कॅजनि, हमलता लपटानी तमालहि॥3 नायिका को हेपलता तथा नायक को तमाल वृक्ष कहकर तथा हेमलता को तमाल-वेष्टित दिखलाकर कवि ने मिलन की व्यजना कर दी है। चित्र न पूर्वराग का है न मिलन का, परन्तु सुरतात के प्रगाढ़ आवेष्टन का। संयत शब्दावली मे शृगार के सभोग-पक्ष का ऐसा चित्र सामान्यत दुर्लभ ही है। सेनापति द्वारा निरूप्ति एक अन्य चित्र द्रष्टव्य है- फूलन सौं बाल की बनाइ गुही बेनी लाल, भाल दीनी बैदी मगमद की असित है।

१ विश्वनाथप्रसाद मिश्र, बिहारी, प० १६६ 1 २ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : पद्माकर ग्रन्थावली, पृ० १४२ 4 हरक्याभुसिंह मविराम-मफरंद पृ० १४०

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रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक सभायोग १३७

अग अग मूषन बनाइ ब्रज-भूषन जू, ब्रीरी निज करके खवाई अति हित है। ह्नू के रस बस जब दीबे कौ महाउर के, सेनापति स्याम गह्यौै चरन ललित है। चूमि हाथ नाथ के लगाइ रही ऑख़िन सौ, कही प्रान पति यह अति अनुचित है।१ नवानुरागवती नवोढा स्वकीया नायिका और अनुकूल नायक का यह चित्र है। नायक ने फूलो की माला स्वय बनाई तथा नायिका की चोटी उससे सजाई और गूँथी भी। नायिका के भाल में कस्तूरी की बिदिया भी लगा दी। नायिका के सब अंगो को आभूषणो से स्वय अलकृत किया। पान की 'बीरी' अपने ही हाथो से खिलाई और अन्त से पैरो मे महावर लगाने के लिए ज्योही नाथक ने नायिका के चरण ग्रहण किए त्योंही व्रीडा से नायिका ने उसे वर्जित किया, उसके हाथ पकड लिये। उसके हाथो को चूमकर कहा-'प्राणपति यह अनुचित है। यह आप को शोभा नही देता।' भारतीय नारी के स्वभाव का चित्र तो है ही। अनुकल नायक तथा सौभाग्या- तिशायिनी नायिका का भी चित्र मधुर है। कवि ने जिस प्रकार प्रसग उठाया व चित्रित किया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण योजना रसानुकूल ही है। विय्योगपक्ष

(१) हिमाशु सूर सो लग सो बात वज्र सो बहै। विशा लगे कृसानु ज्यों विलेप अग को दहै। बिसेस काल राति सो कराल राति मानिये। वियोग सीय को न, काल लोकहार जानिये।।२ प्राय कवियो ने वियोग-पक्ष को अकित करते समय नायिकाओ की विरह- व्यथा पर ही विशेष ध्यान दिया है। नायक की विरह-व्याकुलता की ओर दहुत कम कवियों ने ध्यान दिया है। वियोग-वर्णन में नायक-पक्ष सर्वथा उपेक्षणीय नहीं है। केशव ने उपयुक्त छद मे सीता के वियोग मे व्याकुल दिहल रामचन्द्रजी की अवस्था का चित्र अकित किया है। रामचद्रजी को चद्र जलाता है, पवन वज्न- सा लगता है। दिवाएँ कृशानु की भाँति ताप्कारी होती है, चदनादि का लेप अग को अधिक जलाता है। कालरावि के समान कराल यह वियोग ससार-सहारक काल ही हे। उक्त स्थिफट में विप्रलम्भ शरृगार सुकरता से व्यंजित हो गया है।

उमाशकर शुक्ल : कवित्त रत्नाकर (भूमिका), पृ० ११ २ नाला शमवानदीन रामचंटिका (पूवांव) पृ० १६६

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रोतिकाव्य में औशित्य व्यावहारिक समायोग

(२) कहा कहौं वाकी दसा हरि प्रानन के ईस। विरह-ज्वाल जरिबौ लखै मरिबो भयो असीस॥9 कागद पर लिखत न बनत 'कहल सँदेस लजात। कहि है सब तेरो हियो मेरे हिय की बान ॥" ऊपर दिए गये दो दोहो में बिहारी ने ऊहा का आश्रय न लेकर सरल किनु प्रभावपूर्ण पदावली मे नायिका की विरहावस्था का चित्र प्रस्तुत किया है। नायिका की दशा का वर्णन किन शब्दो मे किया जाय? विरह की ज्वाला मे जलती-तडपती उसके लिए तो मृत्यु आशीर्बाद-समान होगी। द्वसरे दोहे मे भी नमे-तुले शब्दो में विरह- व्यथा प्रकट की गई है। उसकी व्यथा पत्न मे लिखी नही जाती। मौखिक सदेग भिज- बाने में भी बड़ा सकोच होता है। परस्पर के अत करण ही एक-दूसरे की बात कह देते है। इस प्रकार बिहारी के इत दोहो मे विप्रलभ शृगार के अनुकूल परिस्थितियो की योजना होने के कारण विप्रलम्भ शृगार व्यवस्थित रूप से व्यजित हो सका है।

(३) लाज छुटी गेहौ छुट्यो, सुग् सो छुट्यो सनेह। सखि कहियो वा निठुर सो रही, छूटिबे देह।।3

जे अगनि पिय सग में बरखत हुते पियूख। ते वीछू के डक से, भये मयक मयूख ॥४ मतिराम ने किसी प्रकार का सदेश न कहलवाकर केवल इतना ही कहलबा दिया कि प्रिय के विरह मे अब नायिका की मृत्यु होना ही शेष है। दूसरे दोहे मे मनि- राम ने पुर्वानुभूत सुख का स्मरण कराकर सयोग एवं वियोग अवस्था का साम्य-वैषम्य निरूपित कर और विरहजन्य दु.ख वर्णित कर शृंगार के वियोग-पक्ष का सुन्दर नियो- जन किया है। सोऐं न सोयवो, जागे न जाग, अनोखिय लाग सु ऑखिन लागी। देखत फूल पै भूल भरी यह, सूल रहै निन ही चित जागी। चेटक जान-सजीवनि-मूरति रूप-अनूप महारस पागी। कौन बियोग-दसा धनआनन्द, मो मति-सग रहै अनि खागी।।२ घनानंद की नायिका विरहजनित विकलता के कारण न सो पाती है न उससे जागते ही बनता है। यह अनोखी ऑख लगी है। वह उन्मनी-सी बनी घूमती रहती है। सम्पूर्ण प्रसग-नियोजन रसानुकूल ही है।

विश्वनाभप्रसाद मिश्रः बिहारी, पृ० १७४ वही, प० १७१ भूरदयालुसिह : मतिराम-मकरद, पृ० २१३ ४. वही, पृ० २०५ विश्वनाथप्रसाद मिश्र घननानन्द कवित्त, पृ० ३७

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रीतिकाव्य मे औचित्व व्यावहारिक समायोग

सॉमन ही सो ममीर गयो अरु माँसुन ही सब नीर गयो ढरि। तेज गयो गुन लै अपनो अरु भूमि गई तनकी तनुता करि। 'देव' जिये मिलिबेई की आस कि आमहपान प्रकास रह्ो भरि। जा दिन ते मुख फेरि हरे हुँसि है हियो जू लियो हूरि ज् हरि।9 इस छन्द के काव्य-सौन्नर्य के समीक्षा करने हुए डॉ. नगेन्द्र लिखते है कि " ... इसमे संबेह नहीं कि उनके पूर्वराग और विनेषकर सव्विता के वर्णन अपूर्व है, परन्तु विवह की गम्भीर अवस्थाओ तथा मनोवशाओ का जंकन करने मे भी वे उतने ही सकल हो पाए है-यह कव पीड़ा की गहरी अनुनूर्तियों से परिचित था, इसलिए इसे अतिशमोकति और ऊहा पर ही निर्मर रहना पडा।"२ यहाँ उद्धुत छन्द मे भाव की सरसता एव अतिशयोकित की श्ञक्ति दोनों के सहयोग से एक ऐसी नीव्रता आ गई है जो विरहजन्य कृशता की व्यंजना करने में बड़ी मफल हुई है। देव के विरह की गम्भीरता ताप पर ही समाप नहीं होती। विरह की विविध अवस्याओ का यहा तक कि मरण तक की अवस्था का भी उन्होने कौगलपूर्वक बडे प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया है। "सॉसन ही सो समीर गयो ... "-इस उद्मरण में मरणावस्था का चित्र अंित किया गया है। इस छद में भाद-मौदर्य आदि की व्यान्या करने लुए प्रसिद्ध विद्वान् एवं वेव-काव्य-ममेन प० कृष्ण विहारी मिश्र ऋहत है कि "मनुष्य शरीर पंच-तत्व (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) मे निर्मित है। देवजी कहते हैं कि मुख घुमाकर ईपत् हाम्यपूर्वक जिस दिन में हरिज ने हृदय हर लिया है, उस दिन मे सुम्मिलन मात्र की आशा से जीवन बना है (नही तो शरीर का द्वारा तो ख़ब ही हुआ है)। उसॉसे लेतेलेते वायु का विनाश हो चुका है। अव्रिरल अश्र-प्रवाह से जल भो नही रहा है। तेज भी अपने गुण समेत तिदा हो चुका है। शरीर की कृगता और हल्कापन देखकर जान पड़ता है कि पृथ्वी का अंश भी निकल गया और शून्य आकाश चारों और भर रहा है, अर्थात् नायिका विनहुनग नितास कगागी हो गई है। अश्रु- प्रवाह और दीर्घोच्छवास अपनी चरम-सीमा पर पहँच सये है। अब उनका भी अभाव है। न नायिका साँसे लेती है और न नेतो से आँसू ही बहते हैं। उसको अपने चारो ओर शून्य आकाश दिखाई पडता है। यह सब होने पर भी प्राण-पखेरू केवल इसी आशा से अभी नही उडे हैं कि सभव है, प्रियतम से मिलन हो जात, नही तो निस्तेज हो चुकने पर भी जीवन सेष कैसे रहता ?"३ वोररस सतिकाल के बहुत से कवियों को राज्माश्रय प्राप्त था। परिणामस्वरूप, कुछ ऐसी रचनाएं भी रवी गई जिनमें अश्रयदाता के परात्म, बल, तेज, दान इन्यादि का

१ हूरदशलुसिह. देवइशन, न *६ ₹ डॉ० नगेन्द्र : देव और उनकी क्रकिता, पृ० १०८-१०६ ३. वही, पृ० ११७

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१४० रीतिकाव्य में औचित्य. व्यावहारिक समायोग

अतिरंजनापूर्ण वर्णन पाया जाता है। ये स्तुतियाँ राज-स्तुतियाँ मात्र है, इनमे सच्चे वीरत्व के दर्शन बहुन कम होते है। केवल भूषण ही एक ऐसा कवि था जिसने वीर रस को अपना प्रमुख प्रतिपाद्य माना और वीर रसात्मक रचनाएँ प्रस्तुत की। युगीन परम्परा-प्रभाव में आकर भूपण ने भी अनकार-ग्रथ लिखा है परन्तु वह उनका प्रकृत क्षेत्र नही है। भूपण का प्रमुख क्षेत्र तो वीर रस है। उनकी 'गिवा बावनी' और 'छत्र साल दशक' रचनाएँ इस युग की प्रमुख वीर रसात्मक कृतियाँ है। इनके अतिरिक्त मतिराम ने राव 'भावसिंह की वीरता' में और पभ्माकर ने 'हिम्मतबहादुर बिरुदावली' नामक कृति में वीर रस का नियोजन किया है। केशव की रामचंद्रिका मे कुछ स्थानो पर वीर रसपूर्ण छन्दो के उदाहरण अबश्य मिलते हे। रामाश्वमेध के प्रसंग पर लव- कुश तथा भरतादि के बोच युद्ध हो जाता है। लव युद्धभूमि मे घायल हो गया है। सीताजी बडी व्याकुल हैं। उस अवसर पर कुश की यह उक्ति रसानुकूल है- रिपुहि म्ा सघारि दल जमते लेहुँ छॅडाइ़। लवहि गिले हौ देख्विहौं माता तेरे पाइ।9 यहा कुग की प्रतिजाबद्ध स्वभावोक्ति है। सीता माता को चिंतामुक्त करने और अपने क्षात्न-तेज का परिचय देने के लिए वह प्रतिज्ञा करता हे कि मै शनुओ का सहार कर, लब को यमराज के पंजे से भी छुडा कर साथ मे ले आऊँगा तभी आप के, चरण छूऊँगा। क्षत्रियोचित इस वीर उक्ति में बालक कुश का ब्रीरत्व एवं दर्प समुचित रीति से त्रकट हुआ है। सिर कटहिँ सिर कटि धर कटहि धर कटि सुहम कटि जाते है। इमि एक-एकहि बार मे कटि भट भए बिन गात है। इत सुभट भूप अनूप गिरि के उकढि आए ताउ सो। उत सुभट अर्जुन के बिकट फिरि परे अति चाउ सो।2 कुश ने लड़ने की प्रतिजा की थी। पझ्माकर ने दो दलों के सैनिको के भिड जाने व लडने का वर्णन किया है। कवि ने अनुप गिरि और अर्जुनसिह के सैनिको के परस्पर युद्ध का नब्दचित्र अंकित किया है। टवर्ग की बारबार आवृत्ति तथा धड, मिग, हयादि के दटने का वर्णन जीर रस का पोपक है। भूपण ने सैनिको के भिड जाने के बाद की स्थिति का चित्र अकित किया है। परसार अस्त्र-वस्त्रों का प्रहार तथा तीर तलनार, बन्दूक-गोले आदि के चलने का तादृश चित्र कबि ने अपनी ओजस्ती बाणी में अकित किया है। छत्रसाल बुंदला की वीग्ता इस छन्द में अकित की गई है। जिस प्रकार सूर्य की किरणे अन्ध्कार के जाल को नट कर देती है वैसे ही उनकी तल्वार हाथियों के समूह को नष्ट कर देती है।

न विश्वनायग्रसाद मिश्र. केशव म्रन्थावली (भाग २), पृ० ४४ १ विश्वनाथप्रसाद मिश्र - पशाकर स्रन्थावनी प० २१

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रीतिकोव्य में ओचिय व्यावहारिक समायोग १४१

ये तलवारें वैरियो के कठ मे नागिनो की भाँति लिपट जाती है, मुड काटकाट कर मुण्ड- मालाएँ अपित कर शिवजी को रिझाती है, शत्रु-सैन्य-रूपी कटीले केनकी वन को काट- काटकर वह कालिका-सी किलक-किलक कर काल को भोजन कराती है। यथा- निकसत म्यान ते मयूखें प्रलै भानु कैसी, फारै तम तोम से गयदन के जाल को। लागति लपटि कठ वैरिन के नागिनि सी, रुद्रहि रिझावै दे दे सुण्डन के माल को। लाल छितिपाल छत्नसाल महाबाहु वली, कहाँ लौं बखान कगौ तेरी करवाल को। प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि कालिका सो किलकि कलेऊ देनि काल को।१ यहाँ पर परुष वर्णों की योजना रसानुवर्ती है। पूर्णोपमा का भी चमत्कार द्रष्टव्य है।

हास्य रस रीति-काव्य मे हास्य की विशेष रचना नही हुई है। बहुत खोजने पर यत्-तत् कुछ उदाहरण मिल जाएँगे। केगवर की रामचद्रिका से उदाहरण देखिए : भगी देखिक मकि लकेस-बाला। दुरी दौरि मन्दोढरी चित्नसाला॥ तहॉँ दौरिगो बालि को पूत फूल्यौ। सबै चिन्न की पुत्रिका देखि भूल्यौ।। भली के निहा सव चित्न सारी। लहै सुन्दरी क्यों दरी को बिहारी।। तज देखि के चित्र की सृषिठि धन्या। हँसी एक तादे तही देव कन्ना॥4 रावण की चित्रशाला मे अगद प्रविष्ट हुआ। चित्रनाला मे स्थित सुन्दर पुत्तलिकाओ को साक्षात् सुन्दरियाँ समझकर वह कमशः एक-एक की पकड़ता है और उन्हें निर्जीव पुतलियाँ पाकर छोड़ देता है। वहाँ उसके इस कार्य को देखकर छिपी हुई एक देवकत्या हँस पडी। उसने उसे पकड़ लिया। देवकन्या ने मन्दोदरी का पता बता दिया। अंगद की वानर-प्रकृति का निरूपण कर हास्य उत्पन्न करने मे यह छंद सफल है। बन्दर स्वभाव से ही चंचल होता है और जो वस्तु हाथ मे आ जावे उने तोड़- फोडकर फेंकने में अभ्यस्त भी।

करुण रण लक्ष्मण राम जही अवलोक्यो, वैनन ते न रहो जल रोक्यो।

१. मिश्रबधु -भूपण ग्रन्थावली, पृ० १५७ लाला भगवानदीन : रामचद्विका (उवद्धि वोंड), पृ० ३३८-३६

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१४२ रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

बारक लक्ष्मण मोहि बिलोकौ, मोकहूँ प्रान चले तजि रोकौ। हौ सुमरौ गुन केनिक तेरे, सोदर पुत्र सहायक मेरे। बोलि उठौ प्रभु कौ पन पारौ, नातरु होत है मो मुख कारो।।9 राम को कभी विचलित होते नहीं देखा गया। किन्तु जब लक्ष्मण शक्ति के आपान से मू्च्छित हो जाते है, तब राम का हृदय फूट-फूटकर रोने लग जाता है हे लक्ष्मण । एक बार तो मुँह खोलो' मैं तुम्हारे किन गुणो को याद करूँ? तुभ मेरे भाई, पुत्र, महायक सभी कुछ हा। तुम वोलो, नहीं नो मेरा मुंह काला हो जाएगा। केशव ने इस छद ने करुण रस का अत्यन्त सुन्दर, निर्दोष उदाहरण प्रस्तुत किया है! कहे जु वचन वियोगिनी बिरह-विकल बिललाई। किये न को अँसुवा-सहित सुआ ति बोल सुनाई॥२ कुछ विद्वानों ने बिहारी के इस दोहे में करुण रस के स्थान पर वियोग-शृंगार् के ढगम दशा मानी है, परन्तु वस्तुत यह करुण रस का ही उदाहरण है। यह नामिका की सखी की उक्ति है। नायिका तो विरह मे प्रिय के वियोग में तडप-तडप कर मर चुकी है। घर के पालित शुक ने नायिका के नरण-पूर्व कहे गये हृदयद्राबी गब्द सुने थे। नायक के आने पर मुगे ने उन सभी वाक्यो को दुहरा दिया, जो नायिका मरते समय बोली थी। मुग्ने के वचन मुनकर कोई भी तो वहॉ ऐसा नही था, जो अपने आँसू रोक सका हो। यहाँ शब्दो का किचित्मात् भी अपव्यय नहीं हुआ है, करुण रस बड़े ही नार्मिक ढग से ध्वनित हो गया है। रौद्र रस करि आदित्य अद्ृष्ट नष्ट जम करौ अप्ट वसु। रुद्रन बोरि समुद्र करौं गधरवं सर्व पसु। चलित अवर कुबेर बलिहि गाहि देउँ इन्द्र अब। विद्याघरन अविद्य करों बिन सिद्धि सिद्ध सब। निजु होहि दानि दिति की अदिति, अनिल अनल मिटि जाय जल सुनि सूरज ! सूरज उवतही, करौ" असुर संसार वल॥3 लक्ष्मण को शक्ति लगने पर राम प्रथम तो विचलित हो जाते है, किन्तु बाद में कुछ ही क्षणोपरान्त वे दृढ़ निश्चय कर अपनी प्रतिज्ञा घोषित कर देते है मैं

१5 लीला भगदानदीन रामचन्द्रिका (पूर्वादध), पृ० ३१० २ विश्यनाथप्रसाद मिश्र बिहारी, पृ० १७५ ३. लाला भगवानदीन रामचद्रिका (पूर्वाद्ध), पृ० ३१ २

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रीतिकाव्य मे औचित्य- व्यादहारिक समायोग १४३

आदित्य को नष्ट करूँगा; जमराज को भी नष्ट कर दूँगा, आठो वसुओो का सर्वनाश कर दूँगा, इन्द्र, कुबेर, विद्याधर, गन्धर्व, किन्नरादि को मिटा दूँगा, रुद्र को समुद्र में डुबो दूँगा। पृथ्वी, पवन, अग्नि, जल सभी तत्त्वो का नाश करूँगा। प्रलय मचा दूँगा। सूर्योदय होते ही सारे ससार में से असुरों का बल सहार करूँगा। राम की यह प्रतिज्ञा रौद्र रस का परिपाक प्रस्तुत करती है। कठोर वर्ष, द्विन्व का प्रयोग वर्ण-छप्पय जेसे छद का प्रयोग रौद्र रस का बहुत ही उपकारक है। नति, लय का उतार-चढाव भी अनुकूल है। इसी प्रकार सेनापति ने निम्नलिखित छंद मे परशुराम के रौद्र रूप का चित्र समुरस्थित किया है- भीज्यौ है रुधिर भार, भीम, घनघोर धार जाकौ सतकोटि हू तै कठिन कुठार है। छत्नियन मारि के निच्छत्रियन करी है छिति, बार इकईस तेज पूज कौ अधार है। सेनापति कहत कहाँ है रघुवीर कहौ ? छोह भरयो लोह करिब कौ निरधार है। परत पगन दसरभ कौ न गनि आयौ, अगनि-सरूप जमदगनि-कुमार है॥।8 धनुभंग के समाचार सुनकर कुपित परशुराम का यह चित्र है। रौद्र रस के सभी अवयव यहाँ उपस्थित है। अग्नि के समान मह जमदग्नि कुमार करोध मे इस बान का भी विचार नहीं करते कि दशरथ उनके पैरों मे गिरकर क्षमा मॉग रहे है।

भयानक रस मस्त दंति अमन्न ह गय देखि देखि न गज्जही! ठौर ठौर सुदेस 'केसव' दुदुभी नहिं वज्जही। डारि डारि हध्यार केसव जीव ले ले भज्जही। काटि के तन व्ान एके नारि भेपन सज्जही। प्रस्तुत पंक्तियों मे परशुराम के रुद्र-रूप का प्रभग्व निरूपित किया गया है। दूर मे ही उन्हे आते देखकर मदमत हाथी मदहीन हो गए; उनका मद उतर गया। नगाडो और ददुभी-वाद्यों का वजना बन्द हो गया। सब मैनिक हथियार छोड-छाड़ कर अपने-अपने प्राण बचाने के लिए भागने लगे, कुछ सैनिक नो अपने कदचादि उतार कर नारी-वेश धारण करने मे प्रवृत हो गये। इस प्रकर इन पकितयों मे भय की सफल व्यजना हुईडै।

१. उमाशकर शुभल कविन रत्नाकर (भूमिका) ६ृ० १७ २ लाला भगवानदीन रामचद्रिका (वूव्ू), पृ० १०५

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रीतिकाव्य में औचिय व्यावहारिक समायोग

सेनापनि ने निम्नलिखित छंद मे धनुष्य दूटने में उत्पन्न भयाकान्तना का निरूपण किया है- हहरि गयौ हरि हिए, धघकि धीरततन मुक्किय। घ्रव तरद थरहरयौ, मेरु वरनी धसि घुक्किय। अख्मि पिश्खि नहि सकड सेस नस्खिन लग्मिन नल। सेनापति जय सद्द, मिद्ध उच्चरत बुद्धि नल। उद्दण्ड चण्ड भुजदण्ड सरि, धनुष राम करषन प्रबल। दुट्टिय पिनाक निर्धात सुनि, लुट्टिय दिगंत दिग्गज बिकल॥१ धनुप्य के ऐंचने की टंकार को सुनकर और उसके भयावह परिणामों की कल्पना कर विष्णु अपने स्थान पर कॉप उठे; श्रव विचलित हो उठाः धीरजनो की धीरता मचल कर रह गई; पृथ्वी शोपनाग के सिर से लुढक गई; दिन्ज लड़खडाने लगे, मेरु धरनी में धँस गया। धनुर्मग का प्रसग ही मयानक रस के प्रणयन की अपूर्व सामग्री मे पूणन गभित है। बीभत्स रस सूनल के सब भूपन को मद भोजन तौ बहु भाँति कियोई। मोद सो तारकनन्द को मेद पछ्यावरि पान सिरायो हिनोई। खीर वडानन को मद 'केसव' सो पल में करि पान लियोई। राम तिहारेइ कंठ को सोनित पान को चाहै कुठार पियोई।2 राजाओ के मद का भोजन, तारकामुर के मेद का पछयावर, वडानन कार्तिकेय के मद का खीर-पान आदि वीभत्त का परिकर प्रस्तुत करते है। राम के शोणित को पान करने की इच्छा भी बड़ी जुगुप्माकर है। सब मिलाकर उक्त प्रसग योजना बीभत्स रस को व्यंजित करने वाली है। अद्भुत रस केसोदास' मृगज-नछेरु चोषै बाघनीन, नाटत सुरभि बाघबालकबदन है। सिंहन की सटा ऐंचे कलभ करनि करि, सिंहन के आसन गयंद्र का रदन है। फणी के फणन पर नाचत मुदित मोर, करोध न विरोध जहाँ मद न मदन है। बानर फिरत डोरे डोरे अंब तापसनि, सिव को समाज कैधौ रिषि को सदन है।।2 १. उमरशकर झुक्ल कविल रलाकर (भूमिका), पृ० १७ २. लाला भगवानदीन : रामचट्रिका (पूर्वाद्ध), पृ० ११७ ३. वही, पृ० ३६५

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रातिकाव्य में औवित्य व्यावहारिक समायोग १४५

यहा भारद्वाज मुनि के आश्रम की अदभत् गाति तथा विस्मय प्ररक वातावरण का केशव ने अवन किया है आश्रम के वातावरण की अद्भुतता यह है कि सहां सभी प्राणी परस्पर निर्वेर होकर रह रहे है, बाघिन मृगशिशु को चाटती है; गाय बाघ के बच्चे का मुँह बूमती है; हाथी के बच्चे सिंह की सटाएँ खीचते है, सिंह हाथी के दाँतों पर आसन जमाए बैठा है, सर्प के फणों पर मयूर नाचता है और बंदर अंधे तपस्वियों को पकड़ कर रास्ता पार कराते हैं। सभी प्राणी अपनी प्राकृतिक शत्रुता- दुष्टता छोडकर शांतिपूर्वक रह रहे है। उपर्युक्त तथ्यों को पढकर पाठक अद्मुत तत्व की अनुभूति का सुख लेता है। शांत रस हाथी न साथी न घोरे न चेरे न गार्ऊ ठाऊँ कुठाउँ बिलेहे। तात न मात न पुत्र न मित्र न वित्त न तीय कहूँ सॅग रैहें। केशव काम के राम बिसारत और निकाम रे काम न ऐहे। नेति रे चेति अजौ चिन अन्तर अतक लोक अकेलोइ जैहे।।' संसार की असारता, क्षणिकता का चित्र उपस्यित कर केशव ने यहाँ निर्वेद का सचार किया है। इस दुनिया को छोड़कर जब जीत्र जायेगा तब उसके साथ कोई चीज नहीं जा सकेगी। हाथी, साथी, घोड़े, नौकर, चाकर, स्थान, महल, गाँव, चोपारे, पुसे, मित्र, पत्नी, परिवार, माता, पिता, घन, आदि सारी चीजे व सारे सम्बन्धी यहीं रह जायेंगे। कोई कहीं किसी के साथ नही जा सकता। हे चित्त इमीलिए चेत और निकम्मी बाते छोड़कर भगवान का नाम ले। इस दृष्टि से केशवदास ने 'मांत रस' की निष्पत्ति करने वाले सभी आवश्यक प्रमंग बोजित किए हैं। जम-करि-मुँह-तरहरि परयौ इहिं धर हरि चित लाउ। विषय-तृषा परिहरि अजौ नरहरि के गुन गाउ।२ इसी प्रकार यम की प्रबल दाढों से छुटने का कोई साधन न देखकर बिहारी नर- हरि के गुण गाने का उपदेश 'जीव' को देते है। रस-सांकर्य का औचित्य आचार्यों ने रसों का परस्पर शत्रु-मिन्न भाव बताया है। दो मित्न-रस मिल- कर चल सकते है किन्तु दो शत्रु-रस या विरोधी रसों की एक साथ योजना नहीं की जा सकती। दो रसों के एक साथ आ जाने से उनमें एक प्रमुख व दूमरा गौण हो जाता है। इसे रस-सांकर्य कहते है। किन्तु रस-साकर्य प्रयोक्ता की यदृच्छा के वशवर्ती नहीं होता। उसे भी औचित्य का अनुशासन स्वीकार कर चलना पड़ता है। वोर और शांत के सांकर्य का औचित्य बालक वृद्ध कहौ तुम काकों। देहनि को किधौ जीव प्रभा को। है जड़ दह कहै सब कोई। जीव सो बालक वृद्ध न होई।। १ लाला भगवानदीन : रामचद्धिका (पूवार).प०२६ २ विश्वनाथप्रसाद मिश्र बविहारी, बु्यi

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१४६ रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिव समायोग

जीव जट न मर नहिं छीज। ताकहँ सौक कहा अब कोजे। जीवहि बिप्र न क्षत्रिय जानौ । केवल ब्रह्म हिये महँ आनौ।। जौ तुम देव हमै कछु सिक्षा। तो हम देहिं तुम्हैं हय भिक्षा। चित्त बिचार पर सोड़ कीजै। दोष कछ न हमै अद दीजै।" केशब ने यहाँ गात की पृष्ठभूमि पर वीर रस का प्रकर्ष दिखाया है। वोर रम मुख्य और शात रस गौण है। अथवा कात रस का आधार लेकर वीर रस को प्रस्तुन किया गया है। सामान्यत वीर और गांत रस परस्पर विरोधी समझे जाते है परन्तु प्रयोग कौशल से इनका यह विरेध उपगमित ही नहीं होना वे परस्पर सपोषक भी बन जाते है। प्रमग इस प्रकार है कि रामाश्वमेध के प्रसग पर भरत ने लब-कुश को छोटे वालक समझकर युद्ध करना उचित नही समझा और घोडा दे देने के लिए सम- झाया। किन्तु कुश ने प्रत्युन्त में दर्शन का आश्रय लेकर यह कहा कि न तो जीव बालक होता है न वृद् न युवा। न जीव स्त्री है न पुर्ष। देह तो जड़ है। जीव चैतन्य है उसे न कोई मारता है न काटता है, न क्षीण करता है। ब्रह्म न ब्राह्मण है, न क्षतिय न वैश्य न यूद्र। अत यह चर्चा हीडकर युद्ध होने दो। कुश का यह सारा ब्रह्मज्ञान तो माध्यम या उपलक्षण मात है। व्यंग्य यह है कि तुम बालक वृद्ध का विचार किये बिना सीधे-सीध युद्ध होने दो। पद्माकर ने कांत को वीर रस की पृष्ठभूर्मि मे विकसित किया है। यहा शात मुख्य और वीर गौण है। यथा- जैसे' ल" न मो को कहूँ नेकहूँ उरात हुलो ऐसे अब हौहूँ तोहि नेकहूँ न रिहौ। कहै पदमाकर प्रचंड जौ परँगो तौ, उमंड करि तोसो भुजदण्ड ठोकि लरिहौ। दल्यो चल चल्यो चल बिचल न बीच ही ते कीच बीच नीच तो कुटुंब को कचरिहौ। ए रे दगादार मेरे पातक अपार नोहि गंगा के कछार में पछारि छार करिहौ।।" पध्ाकर ने भी युद्ध ठाब लिया है किन्तु अपने ही पातको से। पालकी और उद्दण्ड मन तथा इन्द्रियाँ बार-बार अकुशहीन हो जाती है और अनेक कुचाले चलती रहती हैं। मन ने जीवन भर असख्य उपद्रब किये है, अनेक नाच नचाये है। अब उसे वश मे करने के लिए कवि अनेकविध धमकियाँ देता है। गंगा की कछारों में बार बार उसे पछाड़ कर कुराह से सच्ची राह पर लाया जाता अनिवार्य है। यहाँ बीर आधार है और शांत आधेय। वीर की पृष्ठभूमि मे सात का पल्ल- बनु हुआ है।

विश्वन।थप्रसाद मिश्र. केशव ग्रन्थावली (भाग २), प० ४१० २ दिश्वनाथप्रसाद मिश्र : पसाकर प्रन्थावली, पृ०

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रविकाव्य में शषित्य व्यावहारिक समायोग १४७

अद्भुत और शृगार के साकर्य का औचित्य : पुनि गर्भ सयोगी रनि रस भोगी जग जन लीन कहाव। गुणि जगजन लीना नगर प्रबीना अति पति को मन भावै। अति पतिहि रमावे चित्त भ्रमावै सौतिन प्रेम बढावै। अवयौ दिन रातिन अद्भुत भातिन कविकुल कीरति गावै।"9 फुलवारी के इस वर्णन मे केशव का पाण्डित्य द्रष्टव्य है। प्रत्येक शब्द प्राय- श्लेषार्थ से सम्पन्न है। प्रयुक्त सभी विशेषण एक ओर फुलदारी पर तो दूसरी ओर दशरथ की रानियो पर लागू होता । शरृगार की सहायता से अद्भुत का प्रकर्ष होना दिखाया गया है। वाटिका का अद्भुत तौन्दर्य और उसका मादक प्रभाव लक्षित कराने के लिए कवि ने विरोध व श्लेष अलकारो का आश्रय लिया है। अर्थ की गम्भीरता, रोचकता द्रष्टव्य है। प्रास भी ध्यान आकृष्ट करता है। वीर और शृगार के साकरय का औचित्य. पहुँचति हटि रन-सुभट लौ रोकि सके सब नाहिं। लाखन हू की भीर मे, ऑखि उहीं चलि जाहि।2 यहाँ शृगार को उद्दीप्त करने के लिए वीरत्व आ पहुँचा है। नायिका की दृष्टि को सुभट कहकर नेत्रो की अप्रतिरुद्ध गति, तीखा प्रवेग, पैनापन व तीव्र प्रभाव लक्षित कराया गया है। शृगार प्रमुख व वीर गौण है। कियोचित्य क्रिया का उचित प्रयोग कियौचित्य कहलाता है। काव्य-वस्तु या भाव की तौव्रतम अभिव्यक्ति में कभी-कभी क्रिया के विशिष्ट प्रयोग से अपूर्व सहायता मिलती है। सस्कृत मे कियाएँ आत्मनेपद व परस्मैपद-दो रूपों मे प्रयुक्त की जाती है। वाच्य की भिन्नता भी किया के प्रयोग का सौन्दर्य बढाती है। कर्त वाच्य का प्रयोग करने की अपेक्षा कर्मवाच्य मे किया-प्रयोग करने पर व्यजना मे सचनता आ जाती है। आज्ञा, अनादर, विधि निषेध इन्यादि की व्यजता मे करिया का भिन्न-भिन्न कालो मे प्रयोग किया जाता है, और उनसे काव्यीय अर्थ चमत्कृत हो उठता है। सस्कृत मे रघुवश, मिशुपाल बघादि में करियौचित्य का सुन्दर प्रयोग प्राप्त होता है। रीतिकाल के कवियो मे स्वच्छन्द काव्यधारा क कवियों में मुख्यत घनानन्द मे इसके अच्छे उदाहरण मिलते है। अन्य कवियो मे बिहारी, देव, मतिराम उल्लेख- नीय है। अत. रीतिकालीन कविता के कुछ उद्धरणों के आकार पर क्रियौचित्य की चर्चा उचित ही नानी जाएगी।

लाला भगवानदीन रामचंद्रिका (पूर्वाद्ध), पू० १५ २ विश्वनाथप्रसाद मित्र बिहारी, पृ०

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रीतिकाव्य में औचित्य : व्यावहारिक समायोग

मौ घनजानन्द रैनि दिना न वितीतत, जानिय कैमे बिताऊँ ? रीभ बिलोएई डारति है हिय, ोहति टोहति प्यारी अकोर ।५ घनानन्द के प्रथम उदाहरण में कर्त बाच्य का प्रयोग प्रगट करता है कि दिन सहज गति से बीन नही रहे हैं मरन्नु कष्ट से बिताए जा रहे हैं। दिन बिताह नहीं बीतते। बड़ी विवशता है। यह विवशता 'न बितीतत' किया-प्रयोग से व्यजित हो पाती है। दूसरे उदाहरण मे प्रयुक्त क्रिया न केवल किया बिम्ब ही उपस्थित करती है, अपितु मन की सम्पूर्ण विकलता को रूपायित कर देती है। हृदय के मथित हो जाने का ऐन्द्रिक बोध कराने मे यह क्रिया-योजना सफल है। इसी प्रकार क्रियौचित्य का उदाहरण बिहारी के काव्य मे भी दर्शनीय है: रॅंगी सुरल-रँग, पिय-हिये, लगी जगी सब राति। पैंड पेड पर ठठुकि के ऐंड भरी ऐंडाति।3 प्रेम व रूप-गर्विता नायिका की सुरतांत-प्रसन्नता, सौभाग्यातिशय एवं उसकी ऐंठ आदि की व्यंजना 'ऐंडाति' किया द्वारा इतनी सहज रूप में हो जाती है कि दरा चित्र ही उभर आता है। मतिराम के इस छन्द मे भी क्रिया-प्रयोग का चमत्कार द्वष्टव्य है- दूसरे की बात सुनि परत न ऐसी जहाँ, कोकिल कपोननि की सुनि सरसाति है। छाइ रहै द्रुम बहुवेलिन सो 'मनिराम', अलि कुल कलित अँध्वारी अधिकाति है। नखत से फूल है सुफलनि के पूज बन- कुंजन में होल मनो दिन ही मे राति है। ता बन की बाट कोऊ संग न महेली कहि, कैसे तू अकेली दधि बेचन को जाति है॥* इस छन्द के काव्य-सौन्दर्य पर प० कृष्ण बिहारी मिश्र मुग्ध है।2 'सरसाति' क्रिया का प्रयोग अत्वत्त आकर्षक है। वचन चतुर नायक की इस उक्ति में भकेत स्थाल का पूरनपूरा विवरण है। नायिका को उस स्थान की एकातता, निजनता, रम्वता

१. विश्वनाथप्रसाद मिश्र. वन मानन्द कवित, प० ८७ वही, दृ० १४५ ३. वही, बिहारी, पृ० २०८ ४. हृरदयालुसिंद : मतिराम-मकन्द, पृड १३२ पं० कृष्णबिहारी मिश्र : साराम प्रम्थावली (भूमिष्ा), पृ० १४

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रीतिकाव्य में ओचित्य : व्यावहारिक समायोय १४६

मिलन-स्थान के लिए सर्वाधिक उपयुक्तता का बोध कराने के लिए कवि ने विवक्षित वाच्य-अवति का प्रयोग किया है। देव ने निम्न पकतियों में अनुरूप एव सटीक क्रियाओ का प्रयोग किया है- वैरागिन की मौ अनुरागिन सोहागिन तू, 'देव' बडभागिन रजाति औ लरति क्यो? सोवति जगति अर्सानि हरखाति, अनखाति, बिलखाति, दुख मानति उरति क्यो? चौकति चकति उचकति ओ बकति बिथकति ओ थकति ध्यान धीरज वरति क्यो? मोहति, मुरति, सतराति, इतराति साह, चरज सराहि आह चरम मरति क्यो? विरह जनित विभ्रम और तदभीभूत अन्य चेष्टाओं व कियाओं का बोध विभिन्न करियाओ के प्रयोग द्वारा कवि ने कराया है। विग्हानस्था के उन्माद का चित्न उपस्थित करने मे क्रियाओं की यह बोछार अपूर्ब सहयोग प्रदान करती है। कारकोचित्य -कारक का उचित प्रयोग कारकोचित्य कहलाता है। कारक प्रयोग से उक्ति का सौन्दर्य बढाना, उसमे विशेष चमक पैदा कर देना, अर्थ की व्यंजना मे तीव्रता ला देना अथवा भाव को अधिक तीक्ष्म व प्रभावशाली रूप मे प्रकट कर देना कारकौ- चित्य माना जाता है। सस्कृत में इस प्रकार के अनेक उदाहरण उपलब्ध होते हैं जहाँ भाव के तीव्र बोध मे एकमात्र कारक ही कारणभूत पाया जाता है। नीचे दिए गए श्लोक मे चतुर्थी एक वचन का प्रयोग द्रष्टव्य है- दिङ मान गघटाविभक्त चतुराघाटा मही साध्यते, सिद्धा सापि वदन्त एव हि वय रोमाचिता: पश्यत। विप्राय प्रतिपादते किसपरम् 7 रामाय तस्मे नम यस्मावाविरभूनकथाइद्भुतमिदं यवंव चास्तगतम् ।२ यहाँ बावि ने 'विप्राय' का प्रयोग किया है। 'विप्राय प्रतिपादयते।' (एक ब्राह्मण को ढे दी)-कहकर उक्ति में अर्थ चमत्कार का सन्निवेश कर दिया गया है। चारो ओर दिगन्तव्यापी पृथ्वी को जीत कर अत्यन्त निस्पुह भाव से एक ब्राह्मण को दान कर देने मे परशुर्ाम के निरतिवय औदार्य एव त्याग का परिचय प्राप्त होता है। रीतिकाव्य मे केनव की रामचन्द्रिका के कुछ छन्दो पर यह प्रभाव दृण्डिगन होता है। रावण-राम के बीच सन्धि की चर्चा हुई। रावण ने यह शर्त रखी कि सदि

१. हरदयालुसिंह : देव दर्शन, पृ० १२४-२५ २ आचार्य क्षमेन्द्र : औचित्य विचार चर्चा, ९० १३८

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१५० रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

रामचन्द्रजी परशुराम द्वारा प्रदत्त परशु रावण को दे देवे तो युद्ध शांति हो जाएगी। उत्तर में रामचन्द्र जी ने दृत से कहला भेजा कि- भूमि दई भुव देवन को भृगुनन्दन भुपन सो बर लैके। वामन स्वर्ग दियो नववे नो बली बलि बाँधि पताल पठँकें। सवि की बानन को प्रति उत्तर आपुन ही कहिए हित के कै। दीन्ही है लँक विभीषण को अब देहि कहा तुम को वह दे कै।।१ परगुराम ने राजाओं से बलपूर्वक भूरमि छीनकर ब्राह्मणों को दे दी। नामन ने स्वर्गलोक इन्द्र को, पाताल लोक वलिराज को दे दिया। रह गया लका का रज्य, वह तो मैं विभीषण को देने के लिए प्रनिश्रुत हू। अब नुम ही कहो कि तुम्हे क्या दिया जाय। यह क्षुद्र परशु बड़ी तुच्छ वस्तु है। उसे देने में बड़ा सकोच होता है। अन, अब तो बुद्ध ही होने दो। यहाँ 'तुमको' का प्रयोग राम की निर्भयता, दृढता दिखाता है। रावण के प्रति तिरम्कार व अतादर की व्यजना भी इनसे हो जानी है। घनानन्द ने कर्ना कारक का औचित्य दिखाया है 'उजरनि' बसी है हमारी अॅखियानी देखौ, सुबस सुदेस जहाँ भादते बसत हौ ।।२ 'उजरनि' को कर्ता कारक मे रखकर घनानन्द ने तीव्र व्यंजना की है। 'नेव उजड गये' कहने से उतना प्रभाव नही पैदा होता, जितना 'उजरनि बसी हैं' कहने से।" इसी प्रकार 'प्राण व्याकुल है' न कहकर 'अकुलानि के प्रानि परयौ दिन राति'- कहने से आकुलता की तीव्रता अधिक व्यंजित होती है। इन व्यंजनाओं का आवार कारकोचित्य ही माना जायगा। लिंगोचित्य कोश मे एक ही शब्द के बहुत से विभिन्नलिंगी पर्याय उपलब्ध होते है। इनका यथावसर विवेकसम्मत एवं रसपोषी प्रयोग ही सौदयकारी सिद्ध होता है। काव्यार्थ की सहज उद्दीप्ति के लिए रमानुरूप पर्यायों का (एवं उनके लिंग निर्णय का) प्रयोग ही इष्ट है, यथा-वीर रस के प्रसंग में 'भुजदण्ड' का प्रयोग ही उचित है, 'भुजलता' का नही। लिगौचित्य से एक अन्य तात्पर्य भी है -- विशेष्य और विशेषण के बीच भी समान-लिंग व्यवहार करना। संस्कृत मे तो यह एक गृहीत सिद्धान्त-सा है। वहाँ विशेषण-विशेष्य मे भिन्न लिंग का व्यवहार प्राय नहीं होता। विशेष्य के लिंग व वचन के ही अनुरूप विशेषण होता है। हिन्दी में भी अधिकाश कवि इस ओर ध्यान देने लगे हैं। आधुनिक कवियो में सुमित्ानन्दन पंत के काव्य में भाव के अनुरूप कोमल व स्वीलिगी शब्दो का व्यवहार पाया जाता है।

ै. लाला भगवानदीन : रामचन्द्रिका (पूर्वारड्), पृ० ३३५ २. विश्वनाधप्रसाद मिश्र .घन आानन्द कविस, पु० ३

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रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग १५१

रीति-काल मे भी कवियों ने इस ओर ध्यान दिया प्रतीत होता है। केशव का निम्नोद्धृत छद उष्टव्य है- अंग अली धरियें अगियाऊ न आजु ते नीदौ न आवन दीजे। जानति हौ पिय सखीन के लाजउ तौ अव साथ न लीजै। थोरेहि चौस ते खेलन तेऊ लगौ जिय सो जिनवी जिय जीजै। नाह के नेह के मामिल आपनी छाँह हू की परतीति न कीजै।। सण्डिता नायिका की इस उकित में सखी की वंचना पर नार्मिक व्यन्य है। अन्योकिति के चमत्कार के साथ-साथ यहां लिगवकता का मनोहारी प्रयोग भी बड़ा लुभावना है। उक्ति का परम सौदय तो 'लिग-औचित्य' के इस अद्भत एवं दकोक्नि- मूलक प्रयोग से अवहित है। वंचना की प्रनिकिया इतनी प्रवल है कि अन नायिका प्रिय के प्रसग मे किसी का प्रत्यय क्ता नही चाहती। वह शरीर पर 'अंगिया' बारण नही करेगी; 'नीद को पाम फम्ने तक न देगी; 'लज्जा को तनिक भी गहण नही करेमी; अपनी 'छाँह' तक का भी विश्वास नही करेगी। 'छॉह तक' का प्रयोग कर वह अन्योकिन द्वारा यह प्रगट करना चाहती है कि अब तो अगनी अभिन्ननम सखी का भी विश्वास नहीं करँगी। 'अगिया', नीद', 'ज्जा और 'छॉह' आदि पदो की स्तीलिंगी-योजना वस्तुत बडी मार्मिक व प्रभावशाली है। खण्डिता की मर्मातक पीडा का समुचित स्फोट यहाँ हो पाया है। क्षेमेन्द्र ने गजा वत्पे्वर की विरहावस्था का प्रकाशन करने के लिए एक ऐसा ही सुन्दर दलोक प्रस्तृत किया है - जिंद्रां न स्पृशनि त्यजत्यपि घृतिघत्ते स्थिति न क्वचिद्। दीर्घो वेत्ति कथा व्यथा न भजते सर्वा्मना मिर्व तिम्। तनारावयता गुणस्तव जप व्यानेन रत्नावलीम्। नि संनेन परांगना परिगत नामापि नो सच्यते ।। रेखांकित सभी पद स्त्रीलिंगी है। रेखाकित शब्द समानललिगी होने के कारण भावाभिव्यजन मे समुचित योग देते है। वचनोच्ित्य संस्कृत में स्नन, नेत्र आदि शब्द सवव द्विवचन मे प्रयुक्त किये जाते है। यथा स्तनौ, नेवे आदि। 'प्राण' शब्द भी संस्कृत मे एक्वचन मे प्रयुक्त न होकर बहवर्चन में प्रयुक्न किया जाता है, यथा -प्राणा। सम्मान प्रदर्शन, गौरव प्रदर्शन, राजा के वैभव प्रदर्शन, पूज्य गुरुजनों के आदर-प्रदर्शन के लिए भी प्राय बहुवचन का पयोग

१ पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र केशव ग्रन्थावलो ख० १,५०९७७ २ डाँ० राममति तिपाठी औ्रचिटर विमर्श, पृ० २०६

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१५२ रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग

हञोता है। हिन्दी मे भी इन नब बानो का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है, किन्तु हिन्दी की वचन-व्यवस्था ने द्विवचन को स्थान नहीं है, अत द्वित्व के वाचक कुछ शब्दो का प्रयोग आवश्यक है। बिहारी के नीचे दिये गए उदाहरण मे वचन-औचित्य द्रष्टव्य है- चमचमात चचल नयन बिच घंघट-पट झीन। मानहु सुर-सरिता-विमल-जल उछ्रत जुगमीन।।१ यहाँ 'जुगमीन' पद प्रयोग ध्यान देने योग्य है। महोन अथव पारदर्णी वम्त के घंघट के भीतर ने चमकते हुए नायिका के नेत्र ऐसे मालूम होते है मानो किसी नदी के स्वच्छ जल-पारदर्शी जल मे दो मछलिया उछल रही हों। पारदर्शी वस्त्र की तुरना पारदर्शी जल से करके स्वच्छता व निर्नलता व शैत्य-प्रभाव लक्षित कराया गया है। नेखों को दो मछलियाँ कहकर उनके चाचल्य को भी व्यजिन किया गया है। केशव के निम्न उदाहरण मे भी बचनौचित्व अपनी विशिष्टता रखता है. सो अपराघ परो हमसौ" अब क्यों सुधर तुम ही घौ कहौ ।!२ राम की परशुराम के प्रति यह उक्ति है। सामान्यत रामचंद्रजी परसुराम को आदरणीय जानकर उनके लिए 'आप' का ही प्रयोग करते हैं। परन्तु जब वे राम को बार-बार युद्ध के लिए ललकारते है, भय दिखाते है, गुरु विश्वामित् की निंदा तुक करते हैं, वारों भाइयों का नाश कर दशरध को अनाथ कर डालने की धमकी देते है, तब राम भी ऋद्ध हो जाते हैं। ऐसे अवसर पर अनादर प्रदर्शन के लिए रामचन्द्र परशुराम के लिए भी 'तुम ही धौ" कहौ' का प्रयोग करते है। राम के कोध की व्यंजना व परशुराम के प्रति अनादर प्रगट करने के लिए यह एक वचन-प्रयोग बहुत ही सटीक है। विशेषणौचित्य विशेषण और विशेष्य के बीच औचित्व पूर्ण सगति-निर्वाह को विशेषणौचित्य कहते है। केवल लिंग वचनादि की ही अनुरूपता इस में वाछित नहीं कुछ और भी आवश्यक है। विगेध्य की पूर्ण आकृति, अवस्था का बोध करा देने मे समर्थ विशेषणो का प्योग ही औचित्मपुर्ण माना जाएगा। पद्ाकर एवं बिहारी ने कुछ ऐमे दोह लिखे है, जिनमे विशेपणोचित्य का सुन्दर निर्वाह पाया जाता है। वाही की चित चटमटी धरत अटपटे पाइ। लपट मुझावत विर्ह की कमट भरेह आइ।।3 नायक ने रावि में परकीया के यहाँ रमण किया है। प्रात वह अपने घर लौटा है। उसके पैर ठक से नही पड रहे है। पैरों की गनि का ठीक-ठीक बोध कराने

*१.विश्वनामप्रसाद मिश्र. बिहारी, पृ० १६० २. लाला भगवानदीन : रामचन्द्रिवा (पूर्वाद्ध), पृ० ११२ ३. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : बिहारी, पू० २१२

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रीतिकोश्य में ओचित्य व्यावहारिक समायोग १५३

के लिए कवि ने पैरो के लिए 'अटपटे' विशेषण का प्रयोग किया है। बोल के लिए 'अट- पटे' विशेषण तो प्राय प्रयुक्त किया जाता है। वाणी की अव्यवस्था, असगति, विश्- खलता का बोध उससे होता है। परत्तु कवि ने उस विशेषण को पैरो के लिए प्रयुक्त कर नायिका के खंडिता होने की, नायक के परकीया रमण की, नायक के गति भंग की शिथिलता की व्यजना कर दी है। 'अटपटे' में ध्वनन वीलता, बिम्बात्मकता और चित्रोपमता है। सु बिहाति न जानि परी भ्रम सी कब हव विसवासिनि बीति गई। धनानन्द में यहाँ 'विश्वासघातिनी' के अर्थ मे ही 'बिसवासिनि' विशेषण का प्रयोग राति के लिए किया गया है। यह अर्थ बिपरीत लक्षणा से ग्राह्य होता है। सर्वत्र उन्होने इस विशेषण का उलटे अर्थ में ही प्रयोग किया है। आतरिक व्यथा की सटीक अभिव्यक्ति यह विशेषण करता है। दसरथ सुत द्वेषी रुद्र ब्रह्मा न मासे। निसिचर बपुरा तू क्यो न स्यों मूल नास।।2 रात्ण के लिए सीता ने 'बपुरा' विशेषण प्रयुक्त किया है। रावण की हीनता, शीनना, तुच्छता एवं राम का पराक्रम व्यंजित करने में यह विशेषण-प्रयोग विशेष व्यजक सिद्ध होता है। उपसगी चित्व

अर्थ की अधिकता दिखाने के लिए उपसर्गो का प्रयोग किया जाता है, यथा- कोध की अधिक मात्ा की व्यजना करने के लिए हम 'कुप' धातु को 'प्र' उपसर्ग लगाकर प्रकुप्यति, प्रकोष आदि शब्द बना लेते है। उसी प्रकार अन्य उपसर्गो की सहायता में हम बहुत से शब्द बता लेने है। कभी-कभी दो-दा उपसर्ग भी लगा देते है, यया-'सम्प्रवदन्ति' में (सम् +प्र+वदन्ति)। 'वदन्ति' के साथ 'सम' तथा 'प्र' का 1 प्रयोग किया गया है। परन्तु काव्य-भाषा में उपनर्गों का प्रयोग करते समय उनके औचित्य का पूरा-पूरा विचार कर लेना चाहिए। व्याकरण मे प्राप्त सभी उपसर्गो के मुक्त प्रयोग से सनमाने शब्द नहीं गढे जा सकने; जैसे विलाय और प्रलाप दोनो में नमग वि और म उपम्ग है और बोनो गन्द उपसर्ग के कारण अर्थ की कुछ भघिकता दिख्वाते है, किन्तु यदि हम दोनों को एक स्थान पर एक साय प्रयुक्त कर 'विप्रलाप' जैसा अब्द-प्रयोग करे तो वह निश्चय ही अनुचित साना जाएगा। उपसर्ग का प्रयोग केवल व्याकरणिक गृद्धि या संगति तक ही मोमित न होकर, जब वह भाव की व्यंजना का एक मुख्य आधार वन जाता है, तब वहाँ उपमर्गो चित्य की स्थिति होती है।

१ विश्वनाभप्रसाद मिश्न, घन प्रानून्द कवित, पृ० ४६ २. साला अगवावदीन : रामचन्द्रिका (पुर्वाद), पृ०२३३

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१२४ रीतिकाव्य में औचित्य : व्यावहारिक रमादग

साजे मोहन-मोह कौ मोही करत कुचैन। कहा करौं उलंट परे ढोने लोने नैन।।9 तजी सक सकुचति न चित बोलति चाक कुबाक! दिन-छनदा छाकी रहति छुटत न छिन छबि-छाक।।2 यह विनसत नग रासि के जगत बडो जस लेह। जरी विषम जुर ज्याइये आय शुद्ररसन देहु।।3 बिहारी के प्रथम दो दोहो मे करमम 'कुचन' और 'दबाक' मे 'कु' उपमर्ग नथा तीसरे दोहे में 'बिनसन' मे कि' उपसर्ग का प्रयोग अर्थाभित्यक्ति में अपूर्बु योग- दान देता है। नायिका ने अपने नेवनों को ऑजा नाकि नायक को सम्मोहित कर सके। परंतु व्याम को देखते ही सम्मोहन मव उलट गया और नायिका स्वय ही वेखुदी में खो गई। उसका ही हाल बेहाल हो गया, वह अपना चैन खो बैठी। इग अवस्था की व्यजना 'कुचैन' से भली-भाँति हो गई है। इसी प्रकार दूसरे उदाहरण मे नायिका की न्मन अवस्था व प्लाप की व्यजना भी 'कुबाक' से हो जाती है। प्रिय की छबि-मद से छकी नायिका इतनी मस्ती मे झूमती है कि उसकी वाणी का क्रम इस प्रकार दटता है, जैसे कोई मदिरा-मग्न व्यक्ति ढग से बोल नहीं पाना हो। नृतीय उदाहूरण मे 'बिनसत' मे 'वि' उपसर्ग से विरहविणी नायिका के सवस्वान् का बोध हुआ है। उसे सर्वेनाश से बचाना हो तो आइा और सुदर्गन दीजिये, सुदर्गन मे भी 'सु' उपसर्ग का प्रयोग अर्थ की मरिमा बढाता है; 'शलेष' उत्पन्न करता है। घनानन्द ने तो उपसर्ग के प्रयोग द्वारा अभिव्यक्ति को चरभोत्कर्ष पर पहुँचा दिया है देखियै दसा असाध अँखियॉ निपेटनि की भसमी बिशा पे नित लंघन करति है।४ आखे 'ेटनि' नहीं 'निपेटनि' हैं। 'नि' उपसर्गे से यहाँ काव्य की मार्मिकता बढ गई है। आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने 'निपेटनी' का रहम्य बड़े ही सुन्दर शब्दों में उद्धाटित किया है : "प्रिय की बुभुक्षा का तो मह हाल, प्रमी की बुभुक्षा का इससे भी विक्ट हाल। पूरा भस्मक रोग ही हो गया है-'देखिये दसा असाध अँखियाँ निपेटनि की, असमी बिथा पै नित लंघन करति हैं।' भस्मक रोग वह है, जिसमें रोगी सामान्य भोजन का कई गुना भोजन करने लगता है, पर उसकी भूख शांत नही होती। वह नित्य दुबला होता जाता है। उसके शरीर में रक्त नहीं बनता। ऐसे रोगी से लंघन नही कराया १. विश्वसध प्रमाव मिश्र : बिहारी, पृ० २१६ २. कहो, पृ० १८८ वही, पृ० २०८ ४ वही, धन आानन्द कवित्त, पृ० १८

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रीविकाव्य मे शौचित्य व्यावहा, रक समायोग १५५

जाता। भोजन देते हैं, औषध करते है। करमशः उसका रोग शात होता है। लघन करने से तो रोग असाध्य हो जाता है। यदि ऐसे को यह रोग हो, जो बड़ा चटोर हो. पेटू हो तो रोग दु साध्य रहता है। पेटू भी कई प्रकार के होते है-माधारग और असाधारण। असाधारण पेट के लिए तो नारी कठिनाई होती है। यहाँ आँखें केवल पेटनी (पेट) नही है, निपेटली है, 'नितगम पेट़' है। फिर भी कभी-कभी नही 'नित्य लंघन और रोग 'सस्मना'। अमाव्य स्थिति स्पष्ट है"

निपातौचित्य निपान अव्यय को कहते है। 'न', 'हरै', 'अपि', 'तु, 'तथाषि', 'हि' आदि संस्कृत निपातो का कव्रि-गण प्राय छद-रक्षा अथवा पादनरणार्थ प्रयोग करते रहते है। काव्य में निपातों का यह सही द उचित प्रयोग नही है। निपातों का उचित पयोग वहाँ माना जाता है, जहाँ वे भरती के लिए प्रयुक्त न होकर काव्यीय अर्थ की ददधि, चमत्कृति या सौदर्य-नृष्टि के निरमित्त प्रयुक्त किये जाएँ। कभी-कभी किसी पद- विगेषण, किया या सज्ञाके पीदे ऐसे निपातो ना प्रयोग कर कवि विसी भाव की नीवतम अभिव्यक्ति कर देते है। रीतिकाल में ब्रिहारी एवं घनानन्द ने निपातो का सुन्दर प्रयोग किया है और गति और वचन, भयी बदन-रंग औौर। धौसक ते प्रिय चवित चढी कहै चढ़ाँहै त्यौर।।* और कछु चितवनि चलनि और मृद्डु मुमिक्यानि। और कलु सुख देत है, सके न बैन बखानि॥3 रूप-सुधारस-प्यार-भरी नितही अँसुवा ढरिबोई करेगी।४ प्रथम दोहे में बिहारी ने नायिका की गति, वाणी की मधुरता और बदन की चमक दोतित करने के लिए 'और' निपास का प्रयोग किया है। 'और' मे सलग्न 'ऐ' का यहॉ प्रयोग विशेष व्यजता करता है। उत्तरोत्तर अधिकता का बोध इस निपान- प्रयोग से होता है। दूसरी पक्ति में 'दौसक' में 'क' का प्रयोग भी अत्यत व्यंजक है। एक-दो दिन से ही नायिका प्रिय की 'भावती' हुई है, परन्तु उसकी गति, उसकी मधुर- वाणी और उसका लावण्य ऐसा बढा है कि वर्णन करते नहीं बनता। सतिराम ने भी नायिका को चितवन, मुस्कान व सुघ की विलक्षगता द्ोतिन करने के लिए 'औौर' बब्द का प्रयोग किया है। तीसरे उदाहरण में घनानन्द ने क्रिया के सातत्य व अविरत प्रवाह की व्यंनना ९. डा० मनोहर लाल गौडघनानन्द और स्वच्छद कान्पधारा, भूमिका विष्वनायत्र- मिश्रन प०१३ २ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : बिहारी, पृ० ९७२ ३ हरयाह सिंह सतिराम-्मकरड, ५० २४५ ४. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : घन आानन्द कवित, पृ० १२१

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१५६ रीतिकाव्य में ओचित्य व्यावहारिक समायोग

करने 'ई' का प्रयोग किया है। प्रिय की रूप-सुधा की प्यासी आँखें अविरल अशु-प्रवाह वहानी ही रहेंगी। इस अर्थ की सटीक व्यंजना करने के लिए घनानन्द ने 'ढरिबोई करेंगी।' करिया का प्रयोग किया है। इसी छद मे मरिबोई, भरिबोई, बरिबोई का प्रयोग भी हुआ है, जो बडा मधुर प्रभाव डालने वाला है।

कालीचित्य

भूतकाल, भविष्यकाल, वर्तमानकाल के भेदोपभेदो का विचार करते हुए विशेष व्यजना के हेतु किसी विशेषकाल में करिया का प्रयोग कालौचित्य है। सस्कृत में परोक्ष भूत, आसन्न भूत, अद्यतन भूत के प्रयोगो मे विशेष अर्थ निहिन रहता है। विस्मरण, अवज्ञा, तिरस्क्रिया वर्गरह की व्यजना करने मे इन विभिन्न कालों का प्रयोग बड़ा उपकारक सिद्ध होता है। काल गति की विचित्नता दिखाने वाला काल-प्रयोग भी कालोचित्य कहलाता है। संस्कृत में क्षेमेन्द्र कृत 'मुनिमत मीमासा' मे एक श्लोक है, जो इसका सुन्दर उदाहरण है - योऽभूग्दोपशिशु पयोदधिशिरश्चौर करीषकष तस्यवाऽय्य जगत्पते खगपते शौरे मुरारे हरे। श्रीवत्साक जडरिति स्तुतिपद कर्णौ नृणा पूरितौ। ही कालस्य विपर्यय प्रणमिनी पाकक्रियाऽचर्यभू: ॥ दूध-दही चुराने वाले, कण्डे बीनने वाले, इस गोप शिश्ु को जब भूर्ख जनता आज जगत्पति, शौरि, मुरारि, हरि एव श्रीदत्साक कहती है और स्तुतियो से कान भर देती है, तब काल का विपर्यय और तज्जन्य आश्चर्य ही दिखाई देता है। ऊपर के श्लोक मे 'अभूत' भूतकालिक किया का प्रयोग शिगुपाल के हृदय की असूया प्रकट करने मे अत्यत सफल हुआ है। साथ ही अंतिम पक्ति में परिवर्तनगील काल की महिमा भी सुन्दर रीति से व्यजिन हुई है। रीतिकाल मे केशव की रामचद्रिका मे ऐसे उदाहरण मिलते है जहाँ कालौनित्य (दोनो अर्थो मे) विद्यमान है हरह होतो दण्ड दर्व, धनुष चढावत कष्ट। देखो महिमा काल की, कियो सो नरसिसु नष्ट।२ हैहय कौन ? वहै विसरयो जिन खेलत ही ताहि बाँधि लियो॥ बाण सु कौन बली, वलि को सुत वै बलि बावन बाँधि लियो। बई सुनौ जिनकी निर चेरिन नाच नचाइ के छाँडि दियो॥

१ अ'चार्य क्षेनेन्द्र, औचित्य विचार चर्चा, पृ० १४६ र लाला भगवानदीन. रामचन्द्रिका (पूर्वाद्ध), पृ० १०८ (का व्यमाला गुच्छ-१)

वही, पृ० २८७ "४. वही, पृ० २८६

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रीतिकोग्य मे ओचित्य- व्यावहारिक समायोग

प्रथम उदाहरण मे केशव ने नरशिशु' पद की व्यंजना दिखाई है। काल की गनि बड़ी विचिन्न है। इस विचित्रता का बोध कराने के लिए कवि ने 'नरशिशु' पद प्रयोग किया है। जिस धनुप्य को चढाने के लिए स्वय भगवान शकर को दो दण्ड के समय तक कष्ट होता था, उसे एक नरशिशु ने नष्ट कर दिया। देखो तो काल की महिमा कैसी है। काल की भति की विलक्ष्णता की व्यजना के अतिरिक्त राम का पराक्रम- प्रभाव भी व्यंजित किया गया है। दूसरे उदाहरण मे 'बिसरया भूतकालिक क्रिया-प्रयोग भी सटीक है। अगद- रावण संवाद के अवसर पर अगद द्वारा बाण, हैह्यराज, बाली, परशुराम आदि का स्मरण दिलाए जाने पर रावग प्राय अपना अवज्ञा-भाव प्रकट करता था। हैहयराज का नाम आने पर रावण ने पूछा कि यह हैत्यराज कौन है? तब प्रत्यभिज्ञान कराने के हेतु अंबद ने कहा-'वहै बिसरयो जिन खेलत ही तोहि बॉध लियो' अर्थात 'हैहय- राज को भूल गया। जिसने तुम्हे खेल ही खेल मे बॉध लिया था!' रावण की वाक्ति- हीनता दीनता की व्यजता करने के लिए यह 'विसरयो' पद प्रयोग मार्मिक प्रयोग है। कालौचित्य का यहाँ सुन्दर निर्बाह हो पाया है। तीसरे उदाहरण मे भी 'छाडि दियो' क्रिया का भूतकालिक प्रयोग अत्यन्त मार्मिक है। जब बलिराजा का नाम लिए जाने पर रावण ने उसी प्रकार उपेक्षा और अवज्ञा जताई, तब अंगद ने कहा 'वे ही बलिराज, जिनकी दासियो ने तुझे नाच नचा कर छोड दिया था'। तीनो प्रयोग बडे मार्मिक, सटीक व भावानुरा है, जिनमे क्रमश काल की विचित्रता, रावण की शक्तिहीनता और दुर्बलता व्यजित हुई है।

देशोौचित्य जहाँ कवि प्रकृति वर्णन, नगर वर्णन, उपवन वर्णन, वाटिका वर्णन, नदी सगे- दर-्तालाब आदि जलशयों का वर्णन, प्रदेशगत अलवायु, भौगोलिक स्थिति व वातावरण के अनुरूप कर लेता है, वहाँ देशोचित्य की रक्षा हुई मानी जाती है। इसके विपरीन जहाँ ये वर्णन प्रकृत देश जलवायु-वातावरण के अनुरूप नही होते, वहाँ देगौचित्य का नग माना जाएगा। हिन्दी मे रीतिकालीन कवियो मे स्थानादि का वर्णन केशव ने ही अधिक किया है। अत उसके निर्वाह एवं अनिर्वाह दोनो के उदाहरण उनकी रचानओ मे प्राप्त हो जाते है। प्राय आश्रम का वर्णन करते समय उसकी शाति, तपोपूत वातावरणादि का वर्णन उसमे अंतनिहित है। आश्रम वर्णन मे हमे मिंद्र और बकरी एक साथ पानी पीत दिखाई देगे। जलाशयीं का जहाँ वर्णन होगा, वहाँ हसो का वर्णन अवभ्य होगा। ये सन् वर्णन 'कवि परपरा' के रूप मे ग्राह्य है। अत कोई अनोचित्य या आक्षेप नहीं लगाता है। परन्तु यदि किसी स्थान पर ऐने वृक्षादि का वर्णन किया गया हो जो वहाँ की

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१५८ रीतिकाव्य मे औचित्य. व्यावहारिक समायोग

भूमि के सवथा विपरीत हो तो निश्चय ही देशौचित्य का भग माना जायगा । मरुभूमि मे सरित् प्रवाह या हरे-भरे कुँजो का वर्णन औचित्य के विरुद्ध है। केशव मे औचित्य व अनौचित्य दोनो के उदाहरण मिलते है- भरद्वाज की वाटिका राम देखी। महादेव की मी बनी चित्त लेखी। सबै वृक्ष मदारहूँ ते भले है। छहूंकाल के फूले फूले फले है"॥। कहूँ हृंसिनी हस स्यो चित्त चोरै"। चुनै ओस के बुन्द मुक्तान भौंरै"। शुकाली कहूँ शारिकाली विराजै। पढैं वेद मंत्रावली भेद सार्ज। कहूँ वृक्ष मूल स्थली तोय पीतै। महामत्त मातग सीमा न छीवै । कहूँ विप्र पूजा कहूँ देव-अर्चा। कहूँ योग-शिक्षा कहूँ वेद चर्चा ।' मंदार वृक्षो से भी अधिक सुन्दर वृक्षो की गोभा से युक्त यह आश्रम है। जहाँ सारे वर्ष तक फुल खिलते रहते है। हम-हसियों के युग्म मन को मुग्ध कर देते है। ओस रूपी मुक्ताओं को ये चुन रहे है। तुकमारिकाएँ अनेक-प्रकार के वेद-मन्न पढते है। ही मदमनर मातग झूम रहे है। कही वृक्ष की जडे सिंचित हो रही है। कही बिप्र लोग दब-पूजा-अर्चा कर रहे है। कही वेदाभ्यास तो कही योगाभ्यास कराया जा रहा है। आश्रम का समस्त वर्णन प्रभावशाली है। सर्वत्र देशौचित्य ही प्राप्त है। कुलौचिल्य कुल गौरव के अनुरूप कार्यों का वर्णन, आभिजात्य का निर्वाह तथा वशा- नुगत चरित्न का निरूपण कुलौचित्य के अन्तर्गत समाविष्ट हो जाता है। कभी-कभी अग्नि, वायु, मेघादि को उच्च कुलोत्पन्न कह कर उनसे अभ्यर्थना की जाती है। कालिदास के 'मेघदूत' मे यक्ष 'मेघ' को उसके कुल गौरव व कौलीन्य तेज का स्मरण दिला कर उसमे प्रार्थना करता है कि वह उसका संदेश यक्ष-प्रिया के पास पहुँचा दे। वह कहता है- 'जात वशे भुवन विदिते पुष्करावर्त्तकानाम्।' रीतिकाल के कवियो मे भूषण, मतिरामादि ने आश्रयदाता के कौलीन्य तेज व उच्च कुलावतसत्व का गुणगान गाया है। मतिराम ने राव भावसिंह तथा भूषण ने शिवाजी एव छतसाल के कुल गौरव का गान किया है। धनानंद ने मेघदूत की पद्धति पर पवन के उच्च कुलत्व का निरूपण किया है। बड़े-वस अवतंस राव भावसिंह तेरे, बडे तेज नये नये देसपती दवि हैं।२ X X X

१ लाला भगवावदीन : रामचन्द्रिका (पूवासं), पृ० ३६३ २ हरववाल् सिंहु : भतिराम-मकरद, पू० १७४

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काव्य में औपित्य : व्यावहारिक समायोग १५६

प्रगट भए द्विजराज-कुल, सुबस बसे ब्रज आइ। मेरे हुरौ कलेस सब, केसव केसन राइ।।9 एरे बीर पौन, तेरो सबै और गौन, बीरी तो सो और कौन, मनै ढरकौहीबनि दै। जगत के प्रान, ओछे बडे सों समान घन आनन्द-निधान, सुख दान दुखियानि दै। जान उजियारे गुन-भारे अन्त मोही प्यारे 7h अब ह अमोही बैठे पीठि महचानि दे। बिरह बिथाहि मूरि ऑखिन मै राखौ पूरि धूरि तिन पायन की हा हा! नेकु आनि दै॥२ परकाजहि देह को धारि फिरौ परजन्य जभारथ ह्वू दरसौ। निधि-नीर सुधा के समान करौ मब्र ही विधि सज्जनता सरसौ। घन-आनन्द जीवन दायक हौ कछू मेरियाँ पीर हिये परसौ। कबहूँ वा बिसाली सुजान के ऑगिन मो अँसुवानहिं ले बरसौ।3 जा हित मात को नाम जसोदा सुनंस को चद कला-कुलधारी। सोभा-समूह भई घन-आनन्द मूरति रग-अनंग-जिबारी। जान महा, सहजै रिजवार, उदार विलास में रास बिहारी। मेरो ननोरथ हू बहिय, अरु है मो मनोरथ पुरनकारी॥४ प्रथम उदाहरण मे मतिराम ने अपने आश्रयदाता राव भावसिंह के कौलीन्य कुल-गौरव और प्रताप का वर्णन किया है। भावसिंह की दानशील्ता, उसका परा- उच्च-कुलता का प्रकाशन कवि ने किया है। भावसिंह के तेज से अनेक राजा दबे है। उसकी कीति अपार है, चारीं दिशाओ मे फैली हुई है। उसकी भुजाएँ कल्प- के समान हैं जो अपने आश्रितो को मुहमागा दान दिया करती है। व्वितीय उदाहरण मे बिहारी ने चन्द्रवशोदभव कृष्ण की कुलीनता निर्वान की कृष्ण चंद्रवशी है। चद्रवगी कहकर उन्हे ललित मधुर मीठे स्वभाव वाले कहा है। तीसरे छन्द में धनानन्द ने मेघदूत' की शैली पर पवरन को दवत बनाकर सुजान स भेजने की तथा सुजान के पैरों की धूलि ले आने की प्रार्थना की है। पवन को बनाने में सगति भी है क्योंकि पवन का विस्तार व विचरण अप्रतिबद्ध होता है। 'भाई' कहकर पुकारने में करुणा उपजाना ही मुख्य है।

दश्वनाथप्रसाद भिल्र बिहारी, पृ० १९६ वही, घन आानन्द कबित, प० ४४

हो, प० ८६

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१६० रीतिकाव्य मे आचित्य: व्यावहारिक समायोग

चौथे छन्द में शनानन्द ने 'परजन्य' शब्द का प्रयोग कर बादल की उदारता का मंकेत किया है। परजन्य का अर्थ है दूसरो का हित करने के लिए पैदा हुआ। बादल सदैव दूसरो के लिए ही बरसता है। घनानन्द उनसे अपने अश्रुओ को सुजान के आंगन में बरसवाना चाहते हैं। परोपकारी ही तो यह समझ सकेगा और बरसेगा। अन्तिम छन्द ने कृष्ण को यशोदा का पुत्र कहकर यशोदा का गुणांकन किया गया है। कवि को विश्वास है कि जिसके कारण माता का नाम ही यशोदा (-यग देने वाली) हुआ, वह उसके मनोरथ भी पूरे करेगा। उपर्युक्त सभी उद्धरणों मे किसी न किसी प्रकार के कुलौचित्य का निर्वाह पाया जाता है।

व्रतोचित्य विशेष परिस्थिति मे पडकर किसी पान द्वारा धारण किए गए व्रत संकल्प, प्रतिज्ञा आदि का तदनुरूप पदावली में निरूपण व उसका निर्वहण करना वतौचित्य है। क्षेमेन्द्र द्वारा दिया गया व्रतोचित्य का उदाहरण इसी सन्दर्भ मे पृष्ठभूमिका के रूप में द्रष्टव्य है, जिससे कि व्रतौचित्य की अवधारण अधिक स्पष्ट हो। अत् वल्कलजुप पलाशिनः पुष्परेणु भस्म-भूषिता। लोल भृ गवलयाऽक्षमालिकास् तापसा इव विभास्ति पादपा ।।4 अर्थात् वल्कल धारण किए हुए पृष्पों की रेणु रूपी भस्म से भूषित चंचल भौरो के वलय की अक्षमाला से युक्त ये पलाश वुक्ष तपस्वी जैसे लगते है। यहाँ वृक्षो को तपस्वी कहने पर उनके वर्णन मे तपस्वीजनोचित संगति के लिए वल्कल, भस्म, मालादि का समाहार करना पडा है। देव का प्रसिद्ध रूपक-जिसमे वियोगिनी की अँखियों को जोगिनी कहा गया है-इसका उदाहरण है। रीतिकाव्य मे प्रतिज्ञाबद्ध स्वभावोक्ति के रूप मे भी व्रतौचित्य मिलता है और तदनुरूप वर्णनःपदावली में भी व्रतौचित्य मिल पाता है। केशव के इस छन्द मे अपने कठोर व्रत के पालन में समुद्यत परशुराम की उक्ति देखिए -- तब एक विसति बेर मैं बिन छन्न की पृथिवी रची। बहु कुण्ड सोनित सो भरे पितु तर्पणादि क्रिया सची। उबरे जु छात्रिय छुद्र मूतल सोधि-मोधि सँहारिहौ। अब बाल वुद्ध न ज्वान छाँडहुँ धर्म निर्दय पारिहौ ॥न 'सोधि-सोधि सँहारिहौ' और 'धर्म निर्दय पारिहौ' उक्तियों मे परशुराम के सकल्प की दृढता समुचित गम्भीरता के साथ प्रकट हो जाती है।

१. आचार्य क्षेमेन्द्र औचित्य विचार चचा, पृ० ३ लाला भगवानदीन : रामचन्द्रिका (पूवंड), पृ० १२१

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रीतकाप मे ओचित्य. व्यावहारिक सभायोग १६१

तत्त्सेचित्य उचित रीति से किया गया तत्त्व-कथन ही तत्त्वौचित्य कहलाता है। सब जानते है कि जीवन क्षणभगुर है, मिट्टी के घड़े के समान है। जीवन की क्षणिकता को कवि जब प्रकट करना चाहता है तो वह उसे सीधे प्रकट न कर उदाहरणो के द्वारा या अल- कार-विधान द्वारा प्रकट करता है। 'पानी केरा बुद-बुदा' कहकर ही जीवन की क्षण- स्थायिता प्रकाशित की जाती है। कोरा उपदेश या कोरा तथ्य-कथन काव्य के क्षेत्र मे विशेष समादरणीय नही बन पाता है। तत्त्वौचित्य की दृष्टि से वुन्द के कुछ दोहं प्रस्तुत है- (१) रस अमरस समझ न कछु पढे प्रेम की गाथ। बीख मत्र न जानई सॉप-पिटारे हाथ।। (२) कमें निबहै निवल जन कर सबलन सो गैर। जैसे वसि सागर विषै करत ममर सों बैर।।

(३) दीबौ अवसर कौ भलौ जासौं मुधर कामह खेती सूखे वरसिबो धन को कौने काम।

(४) अपनी पहुँच बिचारि के करनब करिय दौर। तेते पॉव पसारिए जेती लॉबी सौर । (x) पिसुन छल्यो नर सुजन सो करत बिसासुन चूकि। जैसे दाघ्यौ दूध कौ पीवत छाछहिं फूँकिH (६) अति अनीति लहिय न धन जो प्यारौ मन होय। पाए सीने की छुरी पेट न मारै कोय॥ प्रथम उदाहरण मे अज्ञान के प्रदर्शन की भर्त्सना है। 'बीछू' का मंत्न तो जानता नहीं और साँप के पिटारे में हाथ डालता है। लोकोक्ति का काव्योचित प्रयोग किया गया है। दूसरे दोहे मे बलवान् व्यक्ति के साथ रह कर उससे शत्रुता न करने की सलाह दी गई है। पानी में रहकर मगर से वैर करना अच्छा नही। तीसरे उदाहरण मे समय बीत जाने पर होने वाली वर्षा के माध्यम से अवसर बीतने पर किये गए काम की निरर्थकता प्रकट की गई है। चतुर्थ दोहे मे अपनी सामर्थ्य-भर काम करने की सलाह दी गई है। पाँव उतने ही फैलाने चाहिये जितनी चादर लम्बी हो । पचम उदाहरण में 'दूध का जला छाछ भी फूँकता है।' इस लोकोक्ति का आश्रय लेकर यह लक्ष्यार्थ प्रकट किया गया है कि एक बार बोा खा लेने पर व्यक्ति साववान रहता है। अन्तिम दोहे मे यह व्यजित किया गया है कि धन पाकर अन्याय नही करना चाहिए।

१ डॉ० अरिद्र पाण्डेय : रीति काव्य मे लक्षण का प्रयोग से सद्धुन, पृ० २७०-७२

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१६२ रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिव समायोग

बरन दीन दयाल लोग सब अपने गरजी : जामा जीरन भयो कहा अन सीवै दरजी॥१ कह गिरधर कविराय अरे यह सब घट तौलत। पाहुन निशिदिन चारि रहत सब ही के दौलत।।2 राजा अरु जुवराज जग, प्रोहित मत्नी मित्र। कामी कुटिल न सेइयै, कृपण कृतव्न अमित् ।।8 कोटि जतन कोऊ करौ पर न प्रकृतिहिं बीच। नल बल जलु ऊँच चढ अन्त नीच को नीच॥४ कोटि-कोटि 'मतिराम' कह, जतन करो सब कोइ। फाटे मन अरु दूध मै, नेह न कबहूँ होइ।।2 कहा लियो गुरु मान कौ, अति ताती है नेम। पारद सो उडि जायगौ अलि चचल यह प्रेम ।६ प्रथम उद्धरण मे जीवन की जीर्ण-शीर्ण स्थिति का चित्नर है। शरीर-रूपी कपड़ा अब इतना जीर्ण-शीर्ण हो गया है कि कोई भी दरजी उसे सी नही सकता। दीनदयाल गिरि ने ससार की स्वार्थपरकता और शरीर की नागवतता का बोध कराया है। गिरिधर कवि ने धन-सम्पत्ति की क्षणिकता पर प्रकाश डाला है। सम्पत्ति को चार दिनो का मेहमान कहकर उसकी क्षणिकता की सटीक व्याख्या की है। केशव ने यह बतलाया है कि कामी राजा, कुटिल युवराज, कृपण पुरोहित, कृतघ्न मंत्री एवं विरोधी मित्र का कभी सेवन (साथ) नही करना चाहिए। कुभकर्ण की यह रावण के प्रति उक्ति है। बिहारी ने मनुष्य-प्रकृति की अपरिवर्तनशीलता की बात कही है। सनुप्य की प्रकृति जो एक बार एक रूप ले लेती है सो कभी परिवर्तित नही होती। बाह्य परि- स्थितियों के प्रभाव मे क्षणिक परिवर्तन हो भी जाय तो भी पुनः प्रभाव हटते ही वह अपना मूल रूप धारण कर लेती है। नल-नीर चाहे कितना ही ऊँचा उठे अन्त मे नीचे ही आ जाता है। मतिराम ने फटे दूध से वी नही बनता कहकर स्नेह की सहज स्थिति का बोव कराया है। अन्तिम उदाहरण मे मतिराम ने यौवन को पारद की तरह चंचल

डॉ० अरविंद पाण्डे रीतिकालीन काव्य में लक्षणा का प्रयोग, पू० २७५ २ वही, पृ० २७८ ३ लाला भववानदीन. रामचन्द्रिका (पूवाद्ध), पृ० ३१६ विश्वनाथप्रसाद मिश्र बिहारी पृ० १७७ हरदयालु सिंह : मतिराम-मकरद, पृ २३५ वहो, पृ० २६१

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रीतिकाव्य में औचित्य. व्यावहारिक समायोग १६३

कहकर क्षणिक (क्षणस्थायी) कहा है, अत उसका गर्व नही करना चाहिए। ऊपर के सभी उदाहरणों मे कवियो ने तत्त्व की बात को काव्यीय-माधुर्य की लपेट मे स प्रकार प्रकट किया है कि वह कोरा उपदेश नही जान पडता और साथ ही उनमे जीवन की सारभूत अनुभृति का निचोड प्रस्तुन हो गया है। ये सभी उदाहरण तस्वौं- चित्य के उदाहरण है। उस्वोच्ित्य वर्ष्य व्यक्ति के आत्मिक प्रकाश, अन्त.सत्त्व, बल, पराक्रम, धैर्य, ऐश्वर्य आदि चारित्िक गुणों का समुचित पदावली मे चारुत्व-सम्पन्न रीति से निर्वचन करना सत्वौचित्य है। कवि-गण प्राय. ऐसे अवसर पर अतिरंजना से कार्य लेते है, फलतः वर्णन प्रभाव- शाली न होकर हास्यास्पद हो जाता है। रीतिकाल के प्रायः सभी कवि किसी न किसी राजा के आश्रित रहे। अपने आश्रयदाता की प्रशसा में उन्होने अतिरजना से काम लिया है। इन्द्र और कुबेर से भी इन्हें बढकर बताया गया है। ऐसे स्थानो पर सत्व- प्रकाशन कम स्तुति-गान ही अधिक है। फिर भी कुछ पाठों का वर्णन ऐसा हुआ है जहा आत्म-प्रकाश को समुचित अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है। भूषण का निम्नलिखित सवैया देखिए F केतिक देस दल्यो दल के बल दच्छिन चगुल चापि के चाख्यौ। रूप गुमान हर्यो गुज़रात को सूरति को रस चूसि के नाख्यो। पजन पेलि मलिच्छ मले सब सोई बच्यो जेहि दीन ह्ं भाख्यो। सोरंग है सिवराज बली जेहिं नौरँग मैं रंग एक न राख्यो।9 शिवाजी के सार्वत्रिक प्रसार के परिवेश में कवि गिवाजी का वर्णन करता हुआ कहता है. शिबाजी ने कितने ही किले जीते, दक्षिण दिशा को अपने अधिकार मे कर लिया; गुजरात का ुमान दूर कर दिया, सूरत को लूट लिया; म्लेच्छो को कुचल दिया, वही बचा जिसने दीन हो कुछ प्राण भिक्षा मॉगी; औरंगजेव के मुख का रस फीका कर दिया है यहाँ शिवाजी के सत्व (पराक्रम) का सुन्दर प्रकाशन हुआ है। इसी दृष्टि से मतिराम का एक कविन देखिये- महाबीर सतुसाल-नन्द राव भार्वासह तेरी धाक अरि-पुर जात भय भोय से। कहै 'मतिराम' तेरे तेजपुज लिये गुन. मारुत औ भारतण्ड मण्डल बिलोय मे ।। उडत नवल टूटि फूटि मिटि फटि जात, बिकल सुखात बैरी दुखनि समोय से। १ पं० प्यामबिहारी मिश्र और शुकदेव बिहारी मिश्र : भूषण प्रथावली, पृ० १४३-४४

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१६४ रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग

तूल से तिनूका से तरोवर से तोयद से, तारा से तिमिर से तमीपति से तोय से।9 राब भावसिंह छत्रसाल हाडा के पुव थे। इनके पिता दारा की ओर से ओरंगजेब के साथ लडाई लडे थे और चम्पतराय के द्वारा मारे गए थे। भावसिंह की इसी कारण औरगजब से गलुता थी। भावसिह परम पराकमी थे। मतिगाम के दे आश्रयदाता थे। महाराज भावसिंह की प्रशसा मे मतिराम ने अनेक छद लिसे है। प्रस्तुत छंद में उनका पराक्रम व प्रभाव वर्णित है। उनकी धाक शतुओं के नगर मे भय पैदा कर देती है। उनकी धाक के मारे शत्रु तूरु की भाँति उर्ड जाता है, तिनके की भाँति नमित हो जाता है, वृक्ष की भॉति टूट जाता है, बादल की भाँति बिखर जाता है, तारे की भाँति मिट जाता है, अधकार के समान फट जाता है, तमी- पति की भाति व्याकुल रहता है, जल की भाँति सूख जाता है। कवि ने भावसिंह के सत्व का सुन्दर परिचय दिया है। अभिप्रार्यीचित्य अक्लिष्ट एवं चित्तावर्जेक पदावली में अपने गूढार्थ, प्रतीयमानार्थ एव विशेष अभिप्राय की अभिव्यक्ति करना ही अभिप्रायोचित्य है। क्षेमेन्द्र निरूपित यह अभि- प्रायोचित्व आनत्दवर्धन के वस्तुध्वनि के भेदापभेदो में अंतर्भुक्त हो जाता है। उन्होने इसकी सोदाहरण विस्तृत व्याख्या की है। यद्यपि आनन्दवर्धन ने अभिप्रारयोचित्य सज्ञा का प्रयोग नही किया है तथापि उनके उदाहरणों एवं उदाहरणो के विवेचन का मर्म बही है, जो क्षेमेन्द्र को अभीष्ट है। उदाहरण भी बहुत कुछ ऐसे ही है, जो क्षेमेन्द्र ने दिये है। आनन्दवर्धन का उदाहरण इस प्रकार है- अत्ता एत्थ णिमज्जइ एत्व अहं दिअसअ पलोएहि। मा पहि रत्ति अन्धअ सेज्जाएमह णिमुज्जहिसि।२ है पथिक ! भली-भाँति दिन में ही देख लो; यहॉ मैं सोती हूँ और यहाँ मेरी सास नींद में डूब जाती है। तुम रतौंधे हो, कही हम लोगों की चारपाई पर न आ गिरना।' क्षेमेन्द्र की स्वैरिणी भी संध्या समय द्वार पर आये हुए किसी युवा क्षत्रिय- कुमार को देखकर द्रवित-चित्त हुई है। मुग्धा इस स्वैरिणी ने अपना अभिप्राय अपनी माता से निवेदित किया। माता ने भी उसका अभिप्राय समझ कर कहा- पुत्र्येव यदि कोष्डमेतु सुकृतै. प्राप्तो विशेषातिथि।3 'हे पुत्नि, यदि ऐसी बात है तो उसे घर मे आने दो, मेहमान बडे पुण्य से प्राप्त होता है।'

१ हरदयालुसिंह : मतिराम-मकरद्, पृ० १८७ २. डॉ० रामसागर तिपाठी ह्वन्यालोक (पू्याई), पृ० 7३ ३ डॉ० रामभूति व्रिपाठी शोचित्य विमर्श, पू० २१५

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रीतिकाव्य में ओचित्य व्यावहारिक समायोग १६५

रीति-काव्य में ऐसी व्यजनाएँ वहलता से प्राप्त हाती हैं। बिहारी, मतिराम आदि पर तो अपभ्रंश के उपर्युद्धृत उदाहरणो का पर्याप्त प्रभाव दिखाई पड़ता है। कही-कही इन प्रभावो से मुक्त व स्वतन्त्र कल्पना का भी परिचय मिलता है। दोनो ही प्रकार के उदाहुरण मिल जाएँगे। मनिराम का एक उदाहरण यहाँ द्र्टव्य है जु पै द्वार मे बसत तौ, पथिक जाइ जिन सोइ। मेरो घर सूनौ इहा, चोरनि को डर होइ।। सतिराम के इस दोहे पर अपभ्रश की उपर्युद्धृत उक्ति का प्रभाव स्पष्ट लक्षित होता है। यहाँ भी स्वैरिणी ने अपना अभिप्राय प्रकट कर दिया है कि मैं अकेली हूँ। मेरा घर भूना है. यथेच्छ रमण के लिए किसी प्रकार की कोई अड़चन नही है। 'रात्रि मे सो मत जाना' कहकर ही उसने निस्संकोच चले आने का निमंत्रण दे दिया है। 'मेरो घर सूनौ' कहकर निरापद स्थिति की व्यंजना कर दी है। 'चोरनि को डर होइ' कहकर सामाजिको के समक्ष अपने भय का प्रकट प्रकाशन तथा गूढार्थ-अभिप्राय का किचित् अपह्ब भी कर दिया है। उत्तम ध्वनि का यह उदाहरण है। कुज-भवन तजि भवन को चलिय नन्द किसोर। फूलति कली गुलाब की चटकाहट चहुँ ओर।२ यहों पर बिहारी ने खडिता के इस कथन द्वारा नायक के रात्रि मे परकीया- रमण की व्यंजना कर दी है। नायिका कुलस्त्री है, अत उसे अपने पति की प्रतिष्ठा भी प्यारी है। एक तरफ कुल-प्रतिष्ठा है तो दूसरी तरफ यह भी है कि वह अपना यह अभिप्राय प्रकट करना भी चाहती है कि आप कल परकीया से रात्रि-रमण कर चुके है वह मुझे ज्ञात है। अपने पति को प्रकट रूप से न डॉटकर भी उसने उसे लज्जित तो कर ही दिया है। 'फूलनी कली गुलाब की के द्वारा प्रभान होने की व्यजना की गई है। अभिप्राय यह है कि 'अब तो चलिए घर मे श्रीमन् सुबह हो रही है। रात्नि- भर तो आप रमण करते रहे, अब कुछ कुल-प्रतिष्ठा भी है कि नही।' पलनु पीक अजनु अधर धरे महावरु भाल। आजु मिलै, मु भली करी, भन्ै बने हौ लाल॥3 नायक ने रात्रि मे अन्यत् रमण किया है। प्रात जब लौटा तो अपने शरीर पर रनिचिह्ह लेकर लौटा। नायक के अधरो पर नायिका का अजन लगा हुआ है, नायिका का महावर उसके भाल पर लगा हुआ है और पलको पर पीक लगी हुई है। स्वकीया-जो कि नायक के अन्यत रमण के कारण खंडिता हुई है-ने अपने पति को इन चिह्नो से युवत देखकर कुछ नही कहा। केवल इतना ही कहा कि आज मिले, अच्छा किया, बड़ अच्छे लग रहे हो। यहाँ 'आजु मिलै में दीर्घ विरह की व्यंजना है।

१. हरदयालुसिंह मतिराममकरद, पृ० २१६ २. विश्शनाथप्रसाद मिश्र ब्रिह्मारी, पृ- १७६ ३. वही, प. १६८

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१६६ रीतिकाव्य मे मौचित्य व्याक्हारिक समायोग

'भली करी' मे नि.श्वास या दुख की व्यंजना है। 'भले वने हौ लाल' मे व्यग्य-काकु वकोक्ति है। स्वभावोचित्य स्वभाव का यथार्थं रीति से यथोचित मदावली मे वर्णन करना स्वभग्वौचित्य है। मुनियो के विराग, नृपो के अनुराग, रमणियो के वैदग्ध्य, दुप्टों के औद्धत्य, कपणो के कार्यण्यादि का निरूपण उन्ही के स्वभावानुरूप पदावली मे किया जाना चाहिए। कार्पण्य, औदार्य और औद्धत्य की समुचित व्यजना करने वाले रीति-काव्य के कुछ उदाहरण देखिए- जेती सप्पति कपन के तेती सूमति जोर। बढत जात ज्यो ज्यौ उरज त्यौ त्यौ होत कठोर।।१ कृपण और उरोज दोनों स्वभाव से कठोर है। कृपण के पाम ज्यो-ज्यो धन- वृद्धि होती रहती है, त्यो-त्यों कठोरता भी बढती जाती है अर्थात् कृपणता और भी अधिक बढती जाती है। यौवनोदय मे ज्यों-ज्यो उरोज बढते जाते हैं, त्योनत्यो कठोर होते जाते है। उरोजो के काठिन्य की व्यंजना के लिए कृपण के स्वभाव का तथा कृपण की कृपणता को व्यजना के लिए उरोजो की कठिनता का उदाहण बहुन ही सटीक है। सोहृति उत्तग उत्तमग ससि मंग गंग, गौरि अरधंग जो अनंग प्रतिकल है। देवन कौं मूल सेनापति अनुकल कटि चाम सारदूल कौ, सदा कर तिसूल है। कहा भटकत, अटकत क्यौ न तासौं मन, जाते आठ सिद्धि नव निद्धिरिद्धि तू लहै। लेत ही चढाइबे कौ जाके एक बेलपात, चढत अगाऊ हाथ चारिफलफूल है।।2 एक बेलपत्न के बदले मे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों फल तथा आठो सिद्धि तथा नवों निद्धि-रिद्धि दे देने वाले भोलेनाथ के भोलेपन की इन पंक्तियो मे समुचित व्यजना हो गई है। भगवान् शकर आशुतोष हैं, उन्हे प्रसन्न होते देर नही लगती और प्रसन्न होने पर वे शत्ु-मित्र का भेद रखे बिना सब कुछ दे डालते है। उनके औदार्य की यह अच्छी व्यंजना है। रे कपि कौन तुं ? अक्ष को घातक दृत बली रघुनन्दन जू को। को रघुनन्दन रे? त्रिशिरा-खर-दूषण-दूषण भूपण भू को।

९. विश्वनाधप्रसाद मिश्र : बिहारी, पृ० १८५ २. उमाशंकर शुक्न : कवित्त रत्नाकर, पृ० १०८

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रीतिकाव्य मे औनित्य व्यावहारिक नमायोग १६७

सागर कैसे तर्यो ? जस गोपद, काज वाहा? मिय चोर हि देखो, कैसे बँधायो? जू सुन्दरि तेरी छुई दृग सोवत पातक लेखो।१ रावण-अगद सवाद के इस प्रसग में 'रावण का औद्धत्य समुचित रीति से प्रकट होता है। राजसभा में बैठकर भी बह ढूत के साथ ऐसा व्यवहार करना है जो एक अहकारी एव घमण्डी पुरुप के ही अनुरूप है, वीर, शात गासक के नही। अपनी पद- मर्यादा के विपरीत उसका यह आचरण व सभाषण स्वभाव की वृष्टता, अहम्मन्यता, उद्धतता की व्यंजना करता है। गुरुजन दूजे व्याह का, प्रतिदिन कहत रिसाइ। पति की पति राखे बहू, आयुन बॉझ कहाड।। यहाँ भारतीय नारी के महोचशील, लज्जाशील व सहिप्णु म्वभाव का सति- राम ने वहुत ही अल्प-वब्दो में चित्र खीचा है। घर में सभी गुरुजन उसके पति के दसन विवाह की प्रतिदिन चर्दा करते रहने है। वह जो वुपचाप सुनती रहती है। स्वय पर 'बध्या' (बाझ) होने का आक्षेप भी सहन करती है किन्तु अपने पति की पुसत्वहीनना प्रकट नही करती। ज्यौ लगि जीवन है जग मे नहिं तौ लगि जीद मुभाव टरैगो। देव यही जिय जानिय जू, जन जो करि आया है सोई करैगो। कोटि करौ कोई प्रान हुर बिन, हारिल की लकरी न हरँगो! भूलेह भौर चलावे न चित, जो चपक चौगुनो फूलि फरैगौ।3 जीव की प्रकृति की अटलता, अपरिवर्तनशीलता का देव ने दो उदाहरणों द्वारा निर्वचन किया है। मनुष्य का स्वभाव उसके व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग हो जाता है और जन्म लेकर मृत्यु तक उसके साथ बना रहता है। उसके स्वरूप में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नही हो सकता । वाह्य-परिस्थितियों के प्रभाव से यदि उसमे अल्प- कालििक परिवर्नन हो भी जाय नो वह प्रभाव हटने पर (कुत्त की दुम की भॉति) अपने मून्न रूप को ग्रहण कर लेती है। हारिल पक्षी जिस लकडी को पकड लेता है, उसे मरण तक नही छोडता। भौरा चपक की ओर अभिरुचि नहीं करता, चाहे नपक चार- गुना ही क्यो न फूले-फले। उक्ल उदाहरणों को देखने से ज्ञात होता है कि कृपण की कवपणता, शकर के भोलेपन, रावण का अहंकार, भारतीय नारी का संकोच व उसकी उज्जाशील-सहननील प्रकृति की जिस ढंग से व्यजना की गई है, स्वभावौचित्य के रूप को स्पष्ट करती है सार-संग्रहोपित्य सारभूत एवं सग्रहृणीय बातो का-काव्यार्थ की पृष्टिकारक रीति से-कथन

लान भगवानदीम रामचद्रिका (पूवाड), पृ० २४५ २ हरदयालुसिंह : मतिराम-मकेरद, पू० २०२ द्रूयह मौर जावसिया देवाव्य रत्नावली प० १३५ AY

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रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

करना हो सार-मंग्रहौचित्य है। ऐसे कथन अतिदीर्घ व अस्पप्ट न होने चाहिए तथा उनमें किसी निश्चित निष्कर्प या उपदेश का मर्म निहित होना चाहिए। छोटे व्यक्तियो से भी यदि सग्ह्णीय एवं सारभूत बातें ज्ञात होती हो तो उनकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। रहीम की सारी अक्तियाँ इस शीर्पक के अंतर्गत समाविष्ट हो सकती है। मधपान रस तियजित होई सन्नियात युत बातुल जोई। देखि देखि जिनको सब भाग तानु बॅन हुनि पाप न लागै।।१ राम के वन में जाने का निर्णय सुनकर भरत जो अत्यंत विचलित हुए है। वे पिता के इस आदेश का विरोध करते हुए कहते है कि-मदप, स्तीवर, सन्निपात के रोगी की बातो का उल्लंघन करने में कोई पाप नही।' भरत के इस नीति-वचन पर शका हो सकती है कि अपने ही जनक की निंदा या भत्सना करने वाले व्यक्ति का यह उपदेश उचित माना जाना चाहिए या अनुचिन ? रामचरित मानस मे भी भरत ने अपनी माता ककेयी की कठोर गब्दो मे प्रतारण की हैं। इस शका का निराकरण करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते है, 'धर्म के स्वनप की उच्चता उसके लक्ष्य की व्यापकता के अनुसार समझी जाती है। हॉ धर्म की पूर्ण शुद्ध और व्यापक भावना का तिरस्कार दिखाई पडेगा वहाँ उत्कृष्ट पात्र के हुदय मे भी रेष का आविर्भाव स्वाभाविक है। राम पूर्ण धर्म-स्वरूप है, कयोकि अखिल विश्व की स्थिति उन्ही से है। धर्म का विरोध और राम का विरोध एक ही बात है। 'भरत कोई ससार त्यागी विरक्त नही थे कि धर्म का ऐमा तिरस्कार, और उस तिरस्कार का ऐसा कटु परिणाम देखकर भी कोध न करते या साधुता के प्रदर्शन के लिए उमे पी जाते। अस काव्य-दृष्टि से भी यदि देखिए तो इम अमर्प के द्वारा उनके प्रेम की जो व्यंजना हुई है, वह अपता एक विशेष लूक्ष्य रखती है। अतः अपने पिता के विषय में भरत के ये नचन व्यापकतर-वृहतर धर्म-भावना के संदर्भ मे उचित ही टहरते हैं। मदोदरी, विभीषण, कुभवर्ण की शदण के प्रति उपदेश-उक्तियों भी सार्थक व उचित ठहरती है। कहै यहै सृति मुम्नत्यौ यहै सयाने लोग। तीन दवावत निसकही पातक राजा रोग।।3 राजा, पातक और रोग अशक्त एव दुर्बलो को निरतर दबाते रहते है, यह सभी समाने लोग जानते हैं और कहते है। अत. रोग, पाप और राजा का प्रभाव अपने पर

लाला भगवानदीन रामचद्रिका (पूर्वासे), पृ० १६५ २. चिन्नार्मि, पृ-२०१ र- विश्वनाघप्रसाद मिश्र. बिहारी, पृ० १७४

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रतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग १६६

वनते रहने देना न चाहिए इसमे स्पष्ट है कि रीतिक्षा्य म उपदेश काव्यात्मक रूप ही ग्रहण कर आया है कोर उपवग के रूप मे नहीं। प्रतिभौचित्य •'नवनवोत्मेषणालिनी प्रज्ञा प्रतिना मता' भट्ट तौत की इस परिभाषा के शतु- सार प्रतिभा वह बुद्धि है जो नित्य-नूतन चमत्कार दिखाती रहती है। प्रतिभा के इस चमत्कार का काव्यीय सौदर्य की अभिवृद्धयर्थनिबधन प्रतिभौचित्य है। आपत्ि के अब- सर पर जो सूझ-बूझ काम दे, उसे भी प्रतिभा कहा गया है। प्रतिभा के विहार का क्षेत्र सीमित व निश्चित नहीं। न जाने कब कहाँ वह अपना चमत्कार दिखा दे। संस्कृत मे ऐसी उक्तियाँ उपलब्ध है, जहाँ नायिका अथवा सखियों या दास- दासियाँ अपहृब-संगोपन के प्रसंग में ऐसी प्रतिभापूर्ण चमत्कारोक्तियों का आश्रय हेती हैं। विशेषत जार-समागमोदुभूत वंतक्षत, नखक्षतादि का अपह्लव करने मे ऐसी उक्नियों का प्रयोग होता है। यथा - अदम, दशसि कि त्व बिम्ब बुद्धयाऽवर मे? भव चपल निराश: पकव जम्बूफलानाम् इनि दयितमवेस्य द्वारदेशाइप्तमन्या निगदति शुकमुच्चँ: 'अरे चपल, क्या तुम बिम्बफल समझकर मेरे अधरो को काट रहे हो, अब पके हुए जामुन फलो की आशा मत करो।' उपपति द्वारा किए गए दतक्षतो की छिपाने के लिए नार्थिका ने इस उक्ति का आश्रय लिया। रीति-गाव्य मे ऐसे अमस्प उदाहृग्ण मिलेंगे, जहां ऐसा कवि-प्रतिभा का चमतकार दृष्टिगत होता है। रोमावली कृपान सौ, मार्यो निव ही मनोज। ताके भये स्वरूप है, नोहन बाल इर्ेज।2 सेन वमन में मोलगे- उघरत मोरे गात। उडै दागि ऊनर लगी, ज्यो विनुति अवदात ।3 स्ी मिख्ावति मान-विवि मौहनि बरजनि दाल। हम्बेरड मो हिय कमन महा विहारीलाल।।४ हूंमि उताि हिए ते दई मुरु जू तिहि बिना लाल। रासति प्रान कपूर ज्यो, बहै चुहटनी-माल।:

राममूनि बरिपाही. शित्य विमर्श, प० २१७-१८ हूरदगर्लरसह. मृतिराममकरद, पृ० २६२ बही, पृ० २२४ विप्वनाथप्रसाद मिश: दिहान, ५ृ०२२७ वही, ५० ११६

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१७० रीतिकाव्य मे औचित्य-व्यावहारिक समायाग

उक्त उदाहरणों में प्रथम दो मतिराम के और शेष दो विहारी के काव्य मे उद्धृत दोहे है। उरोजो को शिव कहने की कल्पना नबीन नही है। विद्यापति बहुत पहले ही 'जुग-कुच सभु' कहकर उन्हें शिव की उपमा दे चुके है। जायमी ने उरोजो को 'हिया थार कुच कंचन लाड' कहवर उनकी कचन के मोदको से उपमा दी है। मतिराम की कतपना का चमत्कार एक पग आगे चढा हुआ है। कामदेव दा शंकर मे सहज ही बैर है। जब से गकर के तृतीय नेन्नोस्थित बह्नि ने उमे अनग कर दिया है, तब से वड अपने वैर-शोधन के लिए प्रतीक्षारत है। उसने नायिका की रोमावली की कृपाण-वना- कर शिवजी के दो टुकडे कर दिये। और शिवजी एक से दो हो गये। ये दो उरोज दो मिच है, जो नायिका के वक्ष स्थल में स्थित है। कल्पना निश्चय ही नवीन है। दूसरे दोहे मे मतिराम ने कल्पना के शुभ्नत्व एव पावित्रय का परित्रय दिया है। श्वेत वस्त्र मे ईषत् अनावत्त यह गौरागना यो लगती है मानो उदान विभूति उपर उठ रही है। शुभ्रना का विभूति से रग-सादृश्य तो है ही, साथ-ही-साथ वह पाब्रिन्न की भी व्यजना करती है। ब्रिहारी के इस दोहे में प्रिय के प्रति अनत्य निष्ठा का सुन्दर निरूरण हुआ है। नायिका अपने प्रिय के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित व एकनिष्ठ है। यहॉ तक कि वह मान करना भी नही चाहती। समी उसे मान करने की सीख देती है, तब वह कहनी है-'हे सखि, धीरे कह, मेरे हृदय मे स्थित प्राणेश्वर तुम्हारी बातें सुन रहे है।' इसी भाव की एक संस्कृत पंक्ति इस प्रकार है 'नीचे शस हृदि स्थितो हि ननु मे प्राणेश्वर. श्रीष्यति।' दूसरे दोहे मे बिहारी ने विरहणी की अवस्था का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। यह सभी जानते हैं कि कपूर को उड़ने से बचाने के लिए उसे गुजाओ के सग ने रखा जाता है। नायिका ने अपने प्राण-कपूर को नायक द्वारा जाते समय हँसकर दी गई गुजा की माला के बल पर टिकाये रखा है। वह उस माला को हृदय से हटाती ही नही हैं। बैठो आनन कमल के, अरुन अधर दल आइ। काटन चाहृत भाँवते, दीजौ भौर उड़ाइ।१ यह खण्डिता की उक्ति है। उसकी वचन-विदग्घता द्रष्टव्य है। नायक ने रात्रि नें परकीया-रमण किया है। प्रात जब लौटा तो परकीया के काजल का दाग भी उसके साथ चला आया। नायक के इस अपराध को बड़े मार्मिक डर से प्रकट करती हुई नायिका कहती है कि 'हे प्रिय, आपके आनन कमल के अरुण अधर पर एक भौरा आ बैदा है। इसे जल्दी से उगा दीजिए नही तो काट लेगा।' पर भौरा वहाँ कहा ? इशारा तो काजल के दाग की ओर था। नायिका अपनी अबोचता का बहाना कर मानो ·१. हर्दयालुसिंह : मतिराम-मकरद, वृ० २२३

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रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग १७१

यह दिसाना चाहता है कि उसे काजल के दाग में भौरे का भ्रम हुआ है। प्रकट रूप में नायक को लज्जित न कर नायक को अपनी करतूत दिखा देना ही अभिप्रेत है। -- 4- सेनापति के इस उदाहरण में प्रतिभा का चमस्कार देखिए- बरसे तुसार, वह सीतल समीर नीर, कपमान उर दोहु धीर न धरत है। राति न सिराति सरमाति विय्या विनववां मदन अराति जोर जोबन करत है। तेनापति स्याम हम बन है तिह्ारी, हमै मिलौ, बिन मिले, सीत पार न पर्त है। और की कहा है, सबिता हू सीन रितु जानि, सीत को मतायौ इन रासि मे परत है। जाडे के बिनों में सूर्य धन राशि मे सकान्त होना है। उसे धनार्क कहते है। मकर राशि मे सकान्त हने पर मकर-मतान्ति होनी है। मगर सूर्य छनराणि मे क्यो संकान्त होता है ? इसका कारण सेनापति की जानते है। 'धन' पत्नी को भी कहने है। धन राशि को भी घन कहते है। इनी आधार पर विरहिणी सभी के लिए अकाटय f तर्क प्रस्तुत करती हुई कहती है जाडे के दिनो मे नीत से सताया हुआ मूर्य भी अपनी पत्नी (घन राशि) के पास जा पहुँचता है तो है प्रिय, हम नुम्हारी धन (पत्नी) है, हमें क्यों वियोग का कष्ठ देते हो? केगद ने लक्ष्मी के कुछ दुगुणों के कारण खोज रखे हैं- सागर मे बहु काल जु रही। मीत वकता ससि ते लही। सुर तरग चरननि ते नात। सीखी चचलता की बात।२ बहुत काल नक समृद्र में रही, अत लक्ष्मी में स्वभाव की उदासीनता (सद मिजाजी) आ गयी है। चन्द्रमा के साथ रहने से वकता आ गई है। उच्चशवा के सग रहने के कारण चाचल्य आ गया है। आदि- आज ते न जैहौ" दधि बेचन दुहाई खाउँ मया की कन्हैया उत ठाढोई रहत है। कहँ पदमाकर त्यो मोकरी गली है अति, इत उत भाजिबे को दाउँ न लहत हूँ। दोरि दधि द्वान काज ऐतो अमनेक तहाँ आली बनमाली जाइ बाहसाँ गहत है।

१. उमाशकर मृक्ल कविल रत्नाकर, पृ० ६७ २ लला मगवानदीन केशव कोमुदी (भाग १), पृ० र६

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१७२ रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग

मादो सुदि चौथ को लख्यो में मूग अंक याते झूठह कलंक मोहिँ लागिचो चहत है।१ पझ्माकर की गोगिका ने अपनी प्रतिरक्षा के लिए पहले से ही भूमिका तैयार कर रख्षी है। कृप्ण के प्रसंग में फैलने वाले लोकापबाद की पूर्व कल्पना कर वह पहले से ही उसका कारण खोज लेती है। भादी सुदी चौथ को चद्र-दर्शन करने वाला व्यक्ति कलकित होता है। स्वयं भगवान् श्रीकृप्ण पर भी म्णि चुराने का आरोप लगा था। गोपी ने कह दिया कि मैने भूल से भादो सुदी चौथ के चंद्र का दर्शन कर लिया है, अत मै आज से दधि वेचने न जाऊँगी, क्योंकि रास्ते मे कृष्ण खड़ा रहता है। कृष्ण हमे छेडता रहता है। आदि- निरापद मिलन व सगोपन के लिए गोपी ने जिस प्रकार की कल्पना का आश्रय लिया है, वह नितान्त रम्य व चमत्कारी है तथा कवि-प्रतिभा का परिचय देती है। अवस्थाचित्य अवस्था कहते है स्थिति-विशेष को। अवस्था के औचित्य का निर्वाह् अवस्थौचित्य है। साहित्य मे प्राय बाल्यावस्था व यौवनागम के सधि-स्थल को वय .- सधि के नाम से वणित किया जाता है। क्य मधि के चित्र 'अवस्थौचित्य' के अंतर्गत स्वतः समाबिष्ट हो जाते हैं। किन्तु 'अवस्था' से केवल कय संधि का ही बोध नही होता है। संयोग-वियोग की अवस्था अथवा जराजीर्णता आदि का भी बोध होता या हो सकता है। रीति-काव्य मे पझ्माकर, मतिराम, घनानन्द आदि ने अवस्था के कुछ उत्तम चित्र अंकित किए है। कमश. उदाहरण देखिए- चौक में चौकी जराउ जरी तिहि पे खरी बार बगारति सौधे। छोरी वरी हगी कंचुकी न्हान कौ अंगन ते उठे जोति के कौ धै। छाई उरोजनि की छबि यो पदभाकर देखत ही चक चौ घै। भाजि गई लरिकाई मनौ करि कंचन के दुहुँ दुदुभि औ बै॥२ यह नवाजतयौवना का चित्र है। विद्यापति ने शैगव-यौवन के बीच हुए संग्राम की चर्चा की है। दोनों मे द्वन्द छिड गया है परत्तु परिणाम क्या हुआ, इसका उत्तर तो पझ्माकर ने ही दिया है। हार कर भागता हुआ शतु अपने अस्त्-शम्त्र तथा वाद्य- दुदुभि आदि छोड जाता है। लरिकाई ने जाते-जाते अपने दो कचन-दुदुभि औधे कर दिये है। तरणाड की विजय और लरिकाई की पराजय हुई है। कनक दुदुभि-द्वय (कुननय) ने औधे पड़े-पड़े ही शत्रुपक्ष की विजय-घोषणा कर दी है- जा छिन ते मतिराम कहै, मुसकात कहूँ निरख्यौ नँदलालहिं।

१ विश्वनाथप्रसाद मिश्र: पभाकर ग्रयावली (जगद्विनोद), पृ०६६ २. वही, पृ० ८५

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रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग १७२

ना छिन ने छिन ही छिन छीन, विथा बहु बादी वियोग की बालहं। पोछति हैं कर सौ किसलै गहि,

भोरी भई बुझति स्याम सुरूप गोपालहि। मयंकमुखी, भुज भेटत हूँ भरि अंक तमारला ।!१ सलिराम ने यहा पतिप्राणा, उत्मना, आ्रात बावरी गोपिका का विद्न अकित किया है। विरहाधिक्य के कारण शिरही-जनों को चेतन-अचेतन का कोई भेद लक्षित नही होता है। विरही राम ने इसीलिए हर पेड-पौधे, नदी-नाले की सीता के समाचार पूछे, पुरुरबा अगल के हर वृक्ष से लिपटता रहा, यक्ष ने जड मंध को दवुत बनाया। चिन- विक्षेप के कारण नायिका तमालवृक्ष को ही कृप्ण समझकर निपट गई। छद मे प्रयुकत 'भोरी' पद भी उसकी अवस्था की व्यंजना करने मे योगदान करता है। उन्माद और विकलता की अवस्था का यह सटीक चित्र है। भतिराम ही का एक अन्य चित्न देखिए- भरी भॉवर सॉवरे, रास रसिक रस जान। तिनही मे मनु भँवन हूँ, हँ बौडर को पान ॥R श्याम मे लीन नायिका के चिन की अवस्था, विकलता का बोध 'हव बौडर को पान' पदावनी से बहुत ही सहज किन्तु तीव्रता मे हो जाता है। शनानन्द की एक ऐसी पक्ति 'ेरो मम सर्व भट्ट पात हँ बधूरे को' को हम पहले विर्वचित कर ही चके है। सेनापनि द्वारा व्णित विरहिणी की अवस्था का एक चित्न देखिए- बाल, हरि लाल के वियोग से बिहाल, रैनि बासर बरावे बैँठि वर की निसानी सौ। बोल ? कौन बल ? कर-चरन चलावे कौन? रहत है प्रान प्रानपति की कहानी सौ।। लागि रही सेज सौं, अचेत ज्यौ न जानी जानि, सेनापति वरनत वनत न बानी मौं रही इकचक, मानौ चनर चितेरे तिय रंचक लिखी है कोई कंचन के पानी सौ ।3 हुरि के वियोग मे बाला की यह दशा है कि वह स्वय न तो उठ सकती है, न बैठ सकती है। वह बोले भी तो किस बल से ? उसके प्राण केवल पति की कहानी

१ हरदयालुसिंह मातिराम-मकरद, पृ० १५३ २. वही, पृ० २६१ ३ उमाशंकर शुनल 'कवित रत्नाकर, पु० ४५

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१७४ रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग

सुनने के लिए ही अटके हुए है। शैया पर वह अचेत-सी पड़ी है। वह पर्यक पर जानी ही नही जाती। उसकी देह दुर्बल व पीली पड गई है। ऐसा लगता है नानो किसी चतुर चित्रकार ने (कचन के रंग) कचन के पानी से उसको रेखाकित कर रखा है। अंतिम दो पक्तियों मे उसकी अवस्था का यथार्थ अंकन हो गया है। देद को उन्मादिनी का एक चित्र तेखिए- जब ते कुबर कान्ह रावरी कला निधान

बैठी बान बकति विलोकति बिकानी सी।।१ देव ने उन्मादिनी की स्थिति का बोध कराने के लिए अनेक विशेषणो तथा कुछ क्रियाओं का प्रयोग किया है। 'हँसत-सी, रीझत-सी, रुानी-भी, रिसानी-सी, छोही-सी, छली-सी, जकी-सी, छकी-नी, थिरकानी-सी, वाधी-सी, बँधी-सी, विमोहित- सी, बिकानी-सी आदि विशेषण तथा बकति, बिलोकति आदि कियाएँ बाला के उत्माद, प्रलान, अस्थिरता, विकलता को द्योतित कर जाती है। वय मधि तथा विरह की विभिन्न अवस्थाओ के ये चित्र अवस्थौचित्य के सुन्दर उदाहरग है। विवारोचित्य भाव एवं विचार-सम्बन्धी औचित्व का समावेग विचारोचित्य के अंतर्गत होता है। व्यापक रूप मे विचार करने पर काव्य के दो पक्षों-वस्तु-पक्ष और शैली-पक्ष- मे मे वस्तु-पक्ष-विषयक सारा औचित्य इसके भीतर अ जाता है। काव्य-वस्तु या काव्य-अर्थ भी ओचित्य से अनुशासित है। विचार या वस्तु अपने-आप मे न उत्तम है न अनुत्तम; न उचित है न अनुचित। वह तो प्रयोग सामेक्ष है। प्रयोक्ता, जिसके पति वह प्रयुक्त हआ हो, परिस्थिति इत्यादि के सदर्भ में ही उसका औचित्य-अनौचित्य निर्णीत किया जाना चाहिए। कोई भाव या विचार सुन्दर होते हुए भी इसलिए प्रभावशाली नही बन पाता कि वह प्रसग परिस्थिति व पात्र या रम के अनुरूप नही होना। क्षेमेन्द्र ने नाव का अलग से कोई उल्लेख-विवेचन नही किया है। अनः विचागैचित्य में भाव को लेकर ही चलना उचित होगा। (अ) भाव का औचित्य राम जलन नुप के युग लोचन। वारि भरित भये बारिद रोचन।। पायन परि ऋषि के सजि मौनाि। केशव उठि गए भौतर औनहिं।2 प. दुगड़ और जावलिया : देवकाव्य एत्नरवली, पृ० १३५ २. लाला भयवानदीन रामचन्द्रिका (पूर्वाड), पृ० ३३

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रीतिकाव्य मे ओचित्य : व्यावहारिक समायोग १७५

केशव के कवि-हृद्य की पहचान ऐसे स्थानों पर हो जाती है। यज्ञ की रक्षा के लिए विश्वामित्र राम-लक्ष्मण की अपने साथ ले जाने का दशरथ के समक्ष प्रस्ताव करते हैं। कोमल बालकों की मृदुता एवं राक्षसो की कठोरता के विचार मात से दगरथ का हिया कॉप उठता है और अपने पुत्रों के स्थान पर वे स्वयं जाने के लिए उद्यन हाते है, परन्तु विश्वानित्र के कोध की आशका से तथा वतिष्ठ द्वारा समझाये जाने पर क विश्वामित्र के तप और राम के बल का भरोसा रखिए-राजा दशरथ अपनी मौन स्वीकृति दे देते हैं। जब राम-लक्ष्मण मुनि विश्वामित के साथ चलने लगते है तब, साक्षु गद्गद दशरथ कुछ भी नही बोल पाते। वे चुपचाप सभा-भवन से उठकर ऋषि के चरण छुकर महल मे चले जाते हैं। दशरथ के हृदय-गत भादों की सटोक व्यजना केशव ने चार पक्तिमों मे ही कर दी है। यहाँ मीन ही अधिक मुखर हो उठा है। केशव ने प्रसंग की नार्मिकता व गम्भीरता को भली-भाँति पहचाना है। इसी प्रकार का एक अन्य उदाहरण देखिए- तब पूछ्यो रघुराइ। सुखी है पिता तन माइ। तब पुत्र कौ सुग जोइ। कम तें उठी सब रोड।9 वन मे रामचद्रजी से मिलने के लिए भरत अपनी माताओं तथा साकेत की मनस्त प्रजा सहित पहुँचे। रामचद्जी ने अपने पिना के समाचार पूछे, परन्तु कौन उतर ढे? क्या उत्तर दे ? पुत्र-मुख देख-देखकर तीनों मानाएँ रो जठी। उनके रुदन ने ही सद-कुछ कह दिया। यहाँ पर भी केशव ने 'मोन' व 'हदन' द्वारा बड़ी सशक्त भाज-ब्यजना की है। आजु आदित्य जल पवन पावक प्रबल। चन्द आनन्द भय लालजग को हरौ।। गान किन्नर करौ, नृत्य गन्धव, कुल। दक्षविधि लक्ष उर, यक्ष कदम धरौ। ब्रह्म रुद्रादि दै, देव तिहुँ लोक के। राज को जाय अभिपेक इन्द्रहि करौ। आजु सिय राम दै, लंक कुल दूपणहिं। यज्ञ को जाय सर्वज्ञ विप्रह् बरौ ।२ उक्त पंक्तियों में पुत्र-शोक से पीडित गवण की उबति है। दृ.सी व्यकिति वीनरागी, उ्दामीन, निसंग तथा अधिकार व सत्ता के प्रति अवज्ञापूर्ण होता है। रावण का सर्वस्व नष्ट हो गया है। उसे अब देवताओ को अकुशित रखने या तैलोक्य मे अपना भय फैलाने की कोई वाछा नही है। उसने सब को मुकन कर दिया। मनुप्य का सन अत्यन्त प्रसन्नता अथवा धोर विपत्ति या दु.ख के अवसर पर असाधारणत्व

4 लाला भगवानदीन : रामचन्धिका (पूर्वाडध), पृ० १६४ २ बही, पृ० ३३०

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१७६ रीतिकाव्य में नोचित्य व्यावहारिक समायोग

ग्रहण कर लेता है। तब वह संसार के बने-बनाये मार्गो से नहीं चलता। इसी असा- धारणत्व की स्थिति मे रावण कहता है-'आज सूर्य, जल, पवन, प्रबल अग्नि, चन्द्रादि देवगण भयमुक्त होकर आनंदित हो, क्योकि जिसमे तुम्हे डर था वह तो खुद मारा गया है! किन्नरगण आनन्द से गावे, गन्धर्वंगण नृत्य करें ब्रह्मा रुद्राद्रि तोनो लोक के देवता जाकर इन्द्र का राज्याभिषेक करे। आज सीता और राम मिलकर कुछनाशाव विभीषण को लंका का राज्य दे दे। ब्राह्मण गण निडर होकर यज्ञानुष्ठान करें। मेरे सय से अब तक जो कार्य नही हो रहे थे, वे सभी अब स्वच्छन्दतापूर्वक हो। मैं तो पुत्र-शोक में अपने प्राण दे रहा हूँ।' ऊपर दिये गए तीनो प्रसंग बडे मार्मिक है और केशव ने तीनो अवसरों पर अत्यन्त संयम व कौशल से काम लेकर भावो की समुचित व्यजना कर दी है। (आ) विचारौचित्य जौन जुगति पिय मिलन की, धूरि मुकति मुँह दीन। जौ लहिए संग सजन तौ, घरक नरक हू कीन।।9 पाइ तर्रन कुच उच्चपद चिरम ढग्यौ सब गाउँ। छुटे टौर रहिहै वहै जुही मोल छबि नाडें।।२ दिन दस आदर पाइके, करि ले आप बखान। जौ लगि काग ! सराध पखु तौ लगि तो सनमान ।।3 लटुआ लो प्रभु-कर गहै, निगुनी गुन लपटाइ। वहै गुनी कर ते छुटे, निगुनीयै हँ जा।।* प्रिय के अभाव में स्वर्ग भी नरक है और प्रिय के साथ नरक भी स्वर्ग हो जाता है। प्रिय नहीं है तो मुक्ति भी धूल के समान है। यदि स्वजन सग है तो दु ख मे सुख है। दूसरे दोहे मे बिहारी ने इस तथ्य की व्यजना की है कि किसी के बलवृते पर उच्च पद पर आसीन व्यक्ति तभी तक अपना प्रभाव रखता है, जब तक वह व्यक्ति प्रभावशाली है। जिस क्षण वह व्यक्ति प्रभावक्षीण हो जाता है अथवा स्थान व उच्च पद से हटा दिया जाता है, उसी क्षण उसके बलबूते पर ऊँचा उठा हुआ व्यक्ति भी क्षीण हो जाता है, यथा कुचो का सहारा पाकर गुजा की माला भी स्पृहणीय व गौरवयुक्त बन जाती है, परन्तु वक्ष.स्थल से हटाये जाने के बाद वह एक कौडी की भी कीमत नही रखती।

१. लक्ष्मीनिधि चहुवेदी : बिहारी सतसई, पृ० ३७ २ वही, पु० ६७ ३ दही, पृ० १०४ ४ बडी, पृ० ११६

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रीतिकाव्य मे ओचित्य : व्यावहारिक समायोग १७७

श्रद्धपक्ष आने पर जिस प्रकार कौओं को आदरपूर्वक खोर खिलाई जाती है तथा श्राद्वपक्ष बीत जाने पर उन्हे कोई भी नहीं पूछना। इसी प्रकार समय बीतने पर कोई सम्मान नही देता। जब तक कोई व्यक्ति पदारूढ है, नव तक ही उसका गौरव व सम्मान होता है। तात्पय यह है कि पदारूढता की स्थिति मे मदोन्मन नहीं होना चाहिए। अ्तिम दोहे में बिहारी ने इस तथ्व पर प्रकान डाला है कि ईश्वर जिसका हाथ पकड ले, वह निर्गुण से गुणी बन जाता है और जब वह हाय छोड़ देना है तो गुणी से निर्नुण होता है और भ्रमित ही रहता है, यथा-लट्टू डोगी से युक्त (गुण युक्त) होकर स्थिर रहता है, डोरी से हीन अर्थान् गुणहीन होने पर वह निर्गुण हो घूमने लगता है। नामैचित्य नामौचित्य से क्षेमेन्द्र का तात्पर्य पर्यायौचित्य से है। कर्मानुरूप नाम के द्वारा गुण या दोष की अभिव्यक्ति करना ही नामौचित्य है। एक ही व्यक्ति के अनेक नामो मे मे प्रसगानुरूप नाम-चयन करना और उसका प्रयोग करना ही काव्य मे सौन्दर्य- वृद्धि कर देता है। परशुराम की प्रशमा के अधमर पर उनके लिए 'पित्भक्त' शब्द का प्रयोग इष्ट है। परन्तु उन्ही की निन्दा के अवसर पर उन्हे 'मातृहन्ता' ही कहना चाहिए। इस विषय मे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत उद्धरणीय है- "जैसे यदि कोई मनुप्म किसी दुर्धर्ष अत्याचारी के हाथो से छुटकारा पाना चाहता हो तो उसके लिए 'हे गोपिकारमण ! हे वृन्दावन विहारी'' आदि कहकर कृष्ण को पुका- रने की अपेक्षा 'हे मुरारि । हे कसनिकंदन !' आदि सबोधनो से पुकारना अधिक उप- युक्त है, क्योंकि श्रीकृष्ण के द्वारा कंस आदि दुष्टो का मारा जाना देखकर उसे उनसे अपनी रक्षा की आशा होती है न कि उनका वृन्दावन में गोपियों के साथ विहार करना देखकर। इसी तरह किसी आपत्ति से उद्धार पाने के लिए कृष्ण को 'मुरलीघर' कहकर पुकारने की अपेक्षा 'गिरिधर' कहना अधिक अर्थसंगत है।" बामा भामा कामिनी कहि बोलौ प्रानेस। प्यारी कहत लजात नहि पावस चलत विदेस।R नायक ने वर्षा मे विदेश जाते समय अपनी प्रिया को 'प्यारी' कडकर पुकारा, जिस पर नायिका ने आपत्ति उठाते हुए कहा कि 'हे प्राणेश, आप मुझे बामा, भामा, कामिनी आदि अन्य किसी संवोधन से पुकारिए परन्तु कृपा करके पावस में परदंग जाते सम सुझे 'प्यारी' मत कहिए, क्योंकि कोई व्यक्ति पावस में अपनी 'प्यारी' को छोड़कर परदेश नही जाता। 'प्यान' कहकर पुकारना और परदंेग जाना दो बाते परस्पर विसगत है।"

१ रामचद्र शुक्ज रम मोमना, ५ृ०३६ २. विश्वनाथप्रसाद मिश्र. बिहारी, पृ० २०२

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१७८ रीतिकाव्य मे ओचित्य : व्यावहारिक सभायोग

कोग में वामा, भामा, कामिनी, ललना, भार्या, जाया, रमणी, अर्धागिनी, तन्वी आदि अनेव पर्साय उपलब्ब है परन्तु प्रत्येक की अर्थक्छटा (Shades of meaning) भिन्न-भिन्न है। 'फलना' शब्द सयोगावस्था में ही प्रयुक्त होता है। 'कामिनी' शब्द यौवनागमजन्य मदन-विकार की अबस्था का बोध कराने के लिए है। तन्वी शब्द विरह- कशण का या कही-कही सुकुमारता का बोब बराता है। 'भारया' दह है जिसका भार वहन किया जाता है या जिनका भरण-ोपण किया जाता है। 'जाया' वह है, जो हमाने लिए पुन-नुवियोँ पैदा करती है। इस प्रकार उक्त पद मे 'प्यारी' सम्बोवन में जिस विसग- तता का बोध होता हे, वह उपर्युक्त किसी अन्य गब्द से नहीं होता। अत. नाविका की उक्त मे अन्य नामोल्लेख कराने की याचना अधिक उचित है। मोहुनि मतनि मननोहन कियों ते बस, वारन ज्यौ बाधि राख तामरस ताग मो। हाथी को वॉघ कर रखने के बिए तामरस का तागा चाहिए। मन भी मदमतत हाथी की भाति ह। नामिका या गोपिका ने जपनी मोहिनी में (मोहकमू्ति के वधीकरण से) कृष्ण को मोहित कर रवा है। यहाँ कृप्ण के लिए 'मनमोहन' और गोपिका के लिए 'माहृनि' पर्दाणे का प्रयोग अनूटा है। व्यजना यह है, कृप्ण जो कि दूसरो के मन को मोहने वाला हे, उसे तुमने अपने मोहर रूप के मन्त्र में वशीभून कर रखा है, यही तुम्हारे रूय का प्रभाव है। उक्त पंक्तियों मे नामौचित्य दर्गनीय है। आशीर्वादौचित्य सपूर्ण अर्थ का समर्थक एवं विद्वानों का परितोष करने वाला आशीर्वाद ही आभीर्वाद का औचित्य कहलाता है। सस्कृत नाटको मे 'भरत वाक्य' के रूप में ऐी आशीर्वादोक्तियाँ आती है। ये उक्तियाँ प्राय कवि के धार्मिक विद्वास, नाटक के मुख्य रस, धोता या द्रप्टा की मनोवृत्ति, परिहासोकिति आदि पर आधारित होती है। यदि रचना- कार शैव है तो आशीर्वाद गिव-सम्बन्धी होगा, यदि वह विष्णुभक्त या कृष्णनक्त है तो आशीर्बाद विष्णुपरक या कृष्णपरकहोगा। यदि रचना शृगार रस की है तो आशीर्वाद शंगार-ग्नोचित अर्थात् राधा-कृष्ण सम्बन्बी होगा। यदि रौद्र रस मुख्य है तो आशीर्वाद नुसिह भगवान् मे सम्बद् होगा। हास्य रस में शंकर के दिगम्बरत्व, पार्वती की लज्जा अथवा गणेश की अबुधता-विषयक आशीवादोकितियाँ होगी। यही स्थिनि 'नान्दी' की भी है। सस्कन मे प्रायः सभी प्रकार के उदाहरण उपलब्ध होते है। रीतिकाव्य का प्रमुख प्रतिपाद्य रस श्रृंगार ही रहा, अत. रावा-कृष्ण को ही केन्द्रित कर आगीर्वचन कहे गये हैं। यों परिहास के लिए शकरजी को भी छुआ है किंतु कवियों द्वारा मुख्यत शृगार के आराध्य देव-कृष्ण-राधा को ही अपनाया गया है। बिहारी ने अपनी मनसई के मंगलाचरण में ही 'राधा नागरी' की स्तुनि की

१. हरदयालुसिह. नतिराम-मकरद, पृ० १६७

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रीतिकाव्य मे ओचित्य : व्यावहारिक समायोग १७६

है। मतिगाम ने भी अपनी सतसई के प्रारम्भ में राधा के मुख्चन्द्र की स्तुति की है। बिहारी का वह दोहा प्रसिद्ध है, जिसमे कृप्ण-राधा के दीर्घायु की वाछा की गई है- चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यो न सनेह गॅभीर। को चटि ये वृपभानुजा, वे हलघर के बीर ॥।१ मतिराम ने राधा के मुखचन्द्र की वन्दना की है, जिसे देखते ही मन के मोहा- धकार का नाश होता है और हृदयसितु उछलने लगता है। मनिराममतसई के मगला- चरण का यह दोहा शृगार रसानुकुल और भावानुम्प है : मो मन तम-तामहिं हगै, राधा को मुब-चृद वहै जाहि लवि सिधु लौ, रन्द नटन-आनद।। केगब न भी एक स्थान पर आगीर्वाद का सुन्दर निवन्धन किया हैं- सब काल हूँ हौ अमर अरू तुम समर जय पद पावहौ। सुत आजु ते रघुनाथ के तुम परम भक्त कहाइहौ॥3 ऊशोकवाटिका में हनुनानजी सीता से मिले, रामचन्त्जी की सुद्रिका दी और सभी कुशल- समाचार भी दिये। सीताजी का सवेश लेकर जब हनुमान लोटने लगे, तव सीनाजी ने उन्हे आशीर्वाद दिया जो हनुमान के कर्म एव गुणानुर ही है। सब काल में तुम सकर- विजयी हो, संसार मे तुम अमर हो और राम के परम भ्वत कहलाओ। अन्त से एक परिहासपूर्ण आनीर्वाद भी देख लीजिए। गौने को चौस सिंगारन कौ 'प्रतिराम' सहेलिन को गन आयो। कंचन के बिछवा पहिगवत प्यारी सखी परिहास जनागे ॥ पीतम श्रौन समीप सदा बजौ, यौ कहिके पहिले पहरायो। कामिनी कौल चलावन कौ, कर ऊॅँचो कियो पे चल्यो न चलायो।* पनिह्वास के द्वारा यहाँ सखियों ने नायिका के निरतिमय सौभाग्य की ब्यजना की है। निरन्नर अपने पति के मान्निध्य-लाभ करती रहना, ऐसा आशीर्वाव सखियो ने अप्रत्यक्षन. दे दिया है। 'पीतभ श्रौन समीप सदा बजौ" से विपरीत र्गत के अतिरिक्त पति द्वार उसकी चरण-सेवा की व्यजना तो होती ही है, साथ ही नायिका के परन सौभास की

१. न६मीनिश्चि चदुरवदी विहारी सतसई, पृ० २० २ हरदयालसिंह : मतिराम-मकरद, पृ० २०१ ३. लाला भगवानदीत रमचद्रिका (पर्वाड), पृ० २४३ ४. हर्यालुसिंह मतिद्ताम-मकरद, पु० १३८

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रीतिकाव्य में औसित्य. व्यावहारिक समायोग

भी। यहाँ यह कथन भी अभिपेत है कि तुभ अपने पति की इतनी प्यारी बनना कि वह तुम्हारे बिछुए की मधुर ध्वनि निरन्तर सुनता रहे। सर्वनामौचित्य क्षमेन्द्र ने सर्वनाम-सम्बन्धी औचित्य की कोई स्वतन्त्र चर्चा नही की है, न अपने ब्रंथ 'औचित्य-विचार-चर्चा' मे ही उसकी कोई व्याख्या ही की है। मंभवत संस्कृत में पद की परिभाषा 'सुबन्त तिडन्न च पद संज्ञा स्यात्।' के अनुसार सर्वनाम का 'सुबन्त' प्रत्यय लगने के कारण 'पद' मे अन्तर्भाव हो जाना उन्हें भी इष्ट हो। सस्कृत में भी सर्वनाम के औचित्य-सम्बन्धी कुछ उत्तम उदाहरण मिल जाएँगे, यथा- य प्रख्यातजव सदा स्थितिविधौ सप्ताब्धिसंध्याचने। दोर्दपेंण निनाय दुदुभिवपुर्यः काल ककालताम्॥ य. पातालमस् डग्भय प्रविदधे निष्पिष्य मायाविन सुग्रीवाग्रूयविभूतिलुण्ठन पटुरवाली स कि स्मर्यते। "जो अपने इस प्रकार के बेग के लिए प्रसिद्ध था कि सात समुद्र लॉघकर सू्य को संध्या- विधि मे अंजलि प्रदान करके खडा होता था, जिसने अपनी भुजाओं के मद मे आकर दुदुभि के शरीर को कंकाल कर दिया, जिसने मायावी को पीसकर सारे पाताल को रक्त रंजित कर दिया, सुग्रीव की श्रेष्ठ विभूतियो को लुढकाने वाले उस बाली को क्या तुम भूल गए।" यहाँ संस्कृत श्लोक मे प्रथम तीन चरणो मे बार-बार 'य.' की आवृत्ति तथा अन्तिम चरण मे 'स.' का प्रयोग सर्वनाम के औचित्य का सुन्दर उदाहरण है। उसी प्रकार भट्टनारायण के 'वेणी संहार' मे अश्वत्थामा की इस उक्ति मे-'योय" शस्त्र ...... अहम्।' भी 'यः' को आवृत्ति रसपोषी एवं प्रभावशाली है। इसी प्रकार रीति काव्य मे घनानन्द ने सर्वनाम के प्रयोग द्वारा काव्य मौंदर्य की वृद्धि की है- वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि वहै, लडकीली वानि आनि उर मैं अरति है। वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन, वहै हॅँसि देन, हियरा ते न टरति है। वहै चतुराई सो चिताई चाहिबे की छवि, वहै छैलताई न छिनक विसरति है। आनन्द निधान प्रान प्रीतम सुजान जू की सुधि सब भॉतिन सो बेसुधि क्रत है।२

१. डॉ० राममूति त्रिपाठी : औौचित्य विमझ, पृ० २०२ * २. विश्वनाथप्रसाद मिश्र, घनानद कवित्त, पृ० ५

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रीतिकाव्य में ओचित्य व्यावहारिक समायोग १८१

जोई रात प्यारे-सग वातन न जात जानी, सोई अब कहा ते बढनि लिये आई है। जोई दिन कन्त साथ जीवन को फल लाग्यौ सोई बिन अन्त देत अन्तक दुहाई है।* प्रथम उदाहरण से घनानन्द ने 'वहै' की बार-बार आवृत्ति कर मुस्कान, मृदु- बाते, गति, चतुरता, छैलता आदि नायिका की चेष्टाओ की विलक्षणता-विशिष्टता व्यजिन की है। ये चेष्टाएँ साधारण चेप्ठाएँ नहीं है। इनका प्रभाव भी साधारण नही है। ये हृदय मे अड गई है। 'हियरा से टरती' नही है। क्षणार्ध के लिए भी ये भुलाई नहीं जा सकनी। उनका चिन्तन सब प्रकार से वेसुध कर देता है। नायिका के हावो का यह वैशिष्ट्य-'वहै' की आवृत्ति के कान्ण ही है। दूसरे उदाहरण मे धनानन्द ने 'जोई' 'सोई', सम्वन्ध सर्वनामो का प्रयोग कर सयोगकालीन सुख तथा वियोगकालीन दुख की तारनमिक स्थिति को उपस्थित किया है। सुग्व के दिनो में जो राते प्रिय के माथ बाने करने मे कैमे वीत गईं- जान भी नही पडता था, वे ही (सोई) रातें वियोग मे जब काटे नहीं कटती। जो दिन सयोग के अवसर मे सफल सार्थक मालूम पडते थे, वे ही अब वियोग में दारुण दुःख देने वाले सिद्ध हते है। सयोगावस्था का वियोगावस्था से विरोध (कट्रास्ट) उपस्थित करने मे 'जोई'-'सोई का प्रयोग अत्यन्त प्रभावगाली व सार्थक है।

छन्दौचित्य आचार्य क्षेमेन्द्र ने छन्दौचित्य पर ही एक स्वतन्त्र ग्रन्थ-'सुवृत्त तिलकम्'- लिखा हे, जिसमे छन्दो के लक्षण व उदाहरण का क्रम और निरूपण प्र्य. उसी गैली मे किया गया है जो उनकी 'औचित्य विचार चर्चा' में है। ग्रंथ तीन वित्यासों में रचित है। प्रथम विन्यास मे गणो का लक्षण तथा संस्कृत के निम्नलिखित छन्दो के लक्षण-स्वरूपादि निरूपित है-तनुमध्या, कुमार ललित विद्युन्माला, प्रमाणी, अनु्टप, भुजग, शिशुभृता, रुकमवती, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उप- जाति, दोधक, शालिनी, रथोद्धता, स्वागता, तोटक, वंशस्थ, द्वुतविलम्वित, प्हरषिणी, वसत तिलका, मार्लिनी, नर्कट, पृथ्वी, हरिणी, शिखरिणी, मन्दाक्रान्ता, शार्बुलवि- क्रीडितम्। द्वितीय विन्यास में इन छन्दो के गुण-दोणे का विवेचन किया गया है। विबे- चन का सार-मंग्रह इस प्रकार है -- (१) छन्दों में उघु-गुरु की स्थिति शास्त्र-निर्दिष्ट न होने पर भी यदि छन्द पढते समय उसकी लय अनवरुद हो तो उमे निर्दोष मानना चाहिए। छन्द में लय अथवा प्रवाह ही अधिक महत्त्वपूर्ण है। १ विश्वनाथप्रसाद मिन घनानद कवित्त, पृ० ५६

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रीतिकाव्य मे ओचित्य व्यावहारिक समायोग

(२) प्रयोग-कौगल के कारण अननुकूल छन्द भी अनुकूल, सफल एवं उपकारक मिद्ध होता है। (३) काव्य मे सर्वत्र रमानुर्प छन्द-योजना ही इष्ट है। नृतीय विन्यास में छन्दो के साबक-वाधक कारणो का निर्देश करने के उपरान्त ऊपरिनिदिष्ट छन्दों में से प्रत्येक के प्रयोग की उत्कर्ष-अपकर्पपूर्ण स्थिर्ति पर एव उनकी भावानुरूप अवस्भा पर प्रकाश डाला गया है। एक व्यावहारिक समीक्षक की भाँति सोदाहरण व्याख्या भी की गई है। सारभूत वाते इस प्रकार है १. पुराण-सदुग उपवेश-प्रधान सग्ल काव्यो मे, प्रबन्ध काव्यों के कथारमभ व कथा-सक्षेप के अवसरो पर, शात रम प्रधान कृतियो में 'अनुप्टुय्' छन्द ही सर्वाधिक अनुकूल होना है। २. शृगार रस में, नायिका-वर्णन व वसत-वर्णन में 'उपजाति' छन्द ही गोभा- धायक होता है। ३. चंद्रोदय-वर्णन मे तथा उद्टीपन विभाव के निरूपण मे 'रथोद्वता' छन्द ही श्रेष्ठ होता है। ४. नीति-प्रधान कृतियो मे 'वंगस्थ' छन्द उपकारक सिद्ध होता है। ५. वीर तथा रौद्र रस के सकर मे वसंततिलका' ही अधिक अनुकृल है। ६. तथ्यो के परम्पर भेद-निरूपण में 'शिखरिणी' ही अधिक उपयुक्त है। * ७ उदारता के निरूपण मे 'हारिणी' का प्रयोग ही उचित है। 5. आक्षेप, क्रोध, तिरस्कार, धिक्कार की व्यजना के अदसर पर 'पृथ्वी' छन्द ही विशेष मुखकर होता है। ६. वर्षा, प्रवाम, विपत्ति आदि के वर्णन पर 'मन्दाकान्ता' छन्द का प्रयोग ही इष्ट है। १ राज-स्तुतियॉ, प्रशस्तियां व जौर्यादि-वर्णन मे 'शार्द्ल विक्रीडितम्, छन्द ह अनुकूल है। ११. वेगपूर्ण चलते पवन, प्रभजन का वर्णन करने में 'स्नग्धरा' छन्द अधिक अनु- रूप है। १२. मुक्तक-रचनाओ में 'दोधक', 'तोटक' और 'नर्कुट' न्दो का प्रयोग अत्य- धिक उपकारक होता है।9 हिन्दी में रीतिकाव्य में वर्णिक छन्दो की अपेक्षा मात्रिक छन्दो का प्रयोग व्रिशेप हुआ है। हिन्दी की प्रकृति को मात्रिक छन्द ही विशेष अनुकूल है। इस विपय में डॉ० नगेन्द्र का निम्न कथन द्रष्टव्य है- "हिन्दी की प्रकृति एकात विश्लेपण-प्रधान है- अतएव उसकी रुचि स्वभाव से ही मात्रिक छन्दों पर रही। वीरगाथा काल मे वणिक छन्दो कन भी प्रयोग हुआ परन्तु

१. पानार्य क्षेमेन्द्र: सुवृत्त तिनकम्, पृ० ४८ से ५४

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रीति गव्य मे ओचित्य. व्यावहारिक समायोग

उनकी अपेक्षा दोहा, छप्पय, पद्धटिका आदि गात्रिक छन्द ही कही अधिक प्रचलििन थे। भक्तिकाल के नेय-पदो को तो मात्रिक छन्दो का कोमलतम रूप कहा जा सकता है, उनका सौदर्य सर्वथा स्वरों पर ही आश्रित है। परन्तु भक्तिकाल के उपगन्न रीति काव्य को अचानक ही दो वणिक छत्दों ने-मेरा अभिग्राय सवैया और वनाक्षरी मे है-आच्छादित कर लिया?"१ रीनिकाल का सर्वाधिक प्रिय एव अन्निकाधिक व्यवहुन छन्द है 'सदैया'। "रीति- काल के मुक्तक शृगार-चित्रों में वह ऐसा जमकर बैठुकर गया था मानो उसका जन्म उन्ही के लिए हुआ हो।"२ इस रग के अन्य प्रमुम्द प्रयुक्त छन्हो मे है-दोहा, वग्वै, वनाक्षरी, कुडलिया, कवित छप्पय आदि। देव और पझ्माकर ने पनाक्षरियो का, बिहारी ने 'दोहा' छन्द का. रहीम ने 'बरवै' उन्द का, गिन्धिर कवि ते 'क डलिनों का, घनानन्द ने 'सवैया' का भूगण ने 'छप्यय' एवं 'कवित' जैने वीर रसात्मक छन्दो का मेनापनि ने कवित' और मतिराम ने दोहा, कविन एव सवैयों का, सन्दर सफल प्रयोग किया है। केशन ने प्राय सभी प्रचलित (एत्र अनचकिन) छन्दो का प्रयोग किया है। डॉ विजयपाल सिह ने केशव् द्वारा प्रयुक्त भाव एव रसानुकल छल्दों ना विस्तन विवेचन किया है। छन्द-प्रयोग के वैविध्य व कौमल पर अपना नतव्य प्रस्ट करने हुए, वे किबने ह कि 'हिन्दी मे केगव को छोड़कर अन्य किसी कवि ने उनने छन्दो का प्रयोग नक्ी किया, जिनना केशव ने।" केनव द्वारा प्रयुक्न माविक छन्द है दोहा, छप्पय, सजैया, पझ्मावनी, गेला, सोरठा, चौनाई, धला, प्रज्झटिका, अगलल, पादाकुलक, तिभगी, सुखदा, डिल्ला, कृड- लिया, गीनिका, मधुभार, मोहन, विज्या, शोभना, हीर, हरिप्रिया, हरिगीतिका, चौबोला, रूपमाला, चचरी। केशव द्वारा प्रयुक्त वर्गिक छत्दो के नाम इस प्रकार है-श्री सार, दडक, तरणिज्ञा, मदिग, नमानिका, सोमनजी, कुमारललिता, नगस्वरूपिणी, हुस, नागच, विशेष, चचला, गगिवदना, शार्दूल विधीडितम्, मल्ली, विजोहा, तरग्म, कमला, सप्ता, मोदक, तारक, कलहस, स्वागता, मोटनक, अनुकूला, भुजंग प्रयात, तानरय, मनगयद, मालिनी, चामर, चन्द्रकला, किरीट, मोतियदाम, मारवती, त्वग्ति गति, द्रुतविवित, चित्रपदा, मत्त मानग, लीलाकरण, दुर्मिल सवैया, अनग शेखर, इन्द्रवज्ना, उपेन्द्रवञ्धा, रथोद्ता, चन्द्रवत्म, वगस्थविलम्, प्रतिभाक्षरा, पृथ्वी, कवित चासूर, मुन्दरी, तोटक, गगोदक, मनोरमा, कमल, हीरक, दोधक, हरिलीला एवं नलिनी।४"

  1. डॉ० नगेन्द्र •देव् और उनकी कविता, पृ० २४४ २ वही, पृ० २४६ ३. डॉ० विजयपालमिंह : केशव और उनका साहित्य, पृ० ३१७ ४. वही, पृ० ३१८

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१८४ रीनिकाव्य मे मचिय व्यावहारिक समायोग

केशव ने बीर, रौद्र एव मयानक रसो की उत्तम अभिव्यजना के लिए छप्पय, नाराच, वंशस्थ आदि छन्दो का प्रयोग किया है- तहँ अमान पठ्ठान ठान हिय बान सु उठ्ठिव । जहॅँ 'केमद' कासी-नरेस दल-रोप भरिठिठब। जहँ तहॅँ पर जुरि जोर ओर चहुँ दु दुभि बज्जिय। नहॉ त्रिकट भट सुभट छटक घोटक तन नज्जिय। जहूँ ग्तनमेन रन कहूँ लिब हल्लिव महि कंप्यो गगन। तहँ सैँ दयाल गोपाल नव विप्रभेष बुल्लिय बयन।१ जगस्थ का प्रयोग भी बीग रस में बहत सफल हआ है - तपी जपी विप्नन क्षिप्रही हरौ। अदेव द्वेपी सब देव सहरौ। सिया न दैहौ' यह नेम जी धरौ। अमानुषो भूमि अबानरी करौं।2 इसी प्रकार विभगी का प्रयोग भी बहुन सफल हुआ है- सुग्रीव-सँवाती, मुरदति राती, 'केसव' साथ हि सूर नए। आकासबिलासी, सूर प्रकासी, तबही बानर आइ गाइ। दिसि दिसि अवगाहन, सीनहि चाहन, जूथप जूथ सबै पठए। नल नीलरिक्षर्पत, अंगढ के सँग, दक्षिन दिसि को विदा भग॥3 केशव ने घोड़े के वर्णन मे 'चंचला' छन्द को प्रयुक्त किया है, जिसकी गति अश्ब की गति से मिलती है- भोर होत ही गयो सु गजलोक मध्य बाग। बाजि आनियो सु एक इगितज्ञ सानुरान। सुभ्र सुद्ध चारिहन अंस रेनु के उदार। सीख्वि सीखि लेत है ते चित्त नचला प्रकार।।४ छन्द पढ़ते समय ऐसा लगता है, मानो घोड़ा दौड़ रहा हो।

अनोचित्य

औचित्य की ही भाँति अनौचित्य की भी द्विविध-भावात्मक एव अभा- वात्मक स्थितियाँ स्वीकृत है। औचित्य का अभाव, अनौचित्य की उपस्थिति ये दोनो अनौचित्य' सज्ञा में अंतर्भुक्त है। जिस प्रकार गुणो का अभाव ही 'दोप' नही, दोप

१ विश्वनाथप्रसाच मिश्र वेशव ग्रंथावली, खड ३, पृ० ४६६ २ बही, खड़ २, पृ० ३९७ ३. वही, पृ० २६७ ४. वही, पृ० ३८२

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रानिकाव्य म औचिय व्यवहारिक समायोग १ ५

करी स्वत त मता भी काव्यशास्त्र मे महीत हे उसी प्रकार औचिय का अभाद ही अनौचिय नही अनौ चय की अलग सत्ता भा है। य दोनो स्थितियॉ परस्पर इम प्रकार कुक्फित है कि एक का विचार कारते ही दूसरी सहज ही उपस्थित हो जाती है। आवार्य विध्वनाथप्रसाद मिश्रजी ने इस बात को इस रूप मे प्रस्तुन किया है- 'भारतीय साहित्य-शास्त्र ने काव्य आदि का विचार बरने के लिए एक विशेष प्रकार की दृष्टि विवित की, जिसका मुख्य आावार गम हुआ। यह रस आस्वाद मे उपमित किया गया है। किमी पदार्य के खाने में उसका स्वाद अनेक कारणों मे बिगनता है। स्वाद को बिगाइने वाले इन कारणो, तत्वो आदि को ओो रोके रहे, वही औचित्य है।"१ आचार्यजी के विवार से रसास्वाद को विगाठने वाला तत्त्व अनोवित्य तथा जसके परिहार करने में प्रथत्नसील तत्व औनित्य है। अन ओचित्व के अभाव मे अनौचित्य अधिक उभर आएगा और रसाव्बाद का अपकई करेगा। जहाँ-जहा औचित्य का अभाव होगा, वहा-वहाँ अनोचित्य की व्याप्ति होगी। अनौचित्य का प्रसार रेकने के लिए औौचित्य को उसके प्रयोवता को द्विविध कार्य करता पड़ेगा-अनौवित्न का परिहार करना एवं औचिन्य की स्थापना करना। आचार्य अभेन्द्र ने जहा शचित्य के प्रभेदो की मादाहर्ण व्याय्या की है, वही अनौचित्य का भी उदाहरग महित व्याग्यान कर दिया है। व्यावहारिक समीक्षा का मार्ग उद्षाटित कर आचार्य ने सस्कृत-समीक्षा को एक नितान्न नवीन भूमि पर प्रति- ष्ठिस कर दिया है। उन्होने ऐसा करते समय स्वय अपनी रचनाओं के भी दोष प्रस्तुत किये है और अल्पज्ञात कदियों की सुन्दरता व प्रसिद्ध कवियो की त्रूटियो पर एक-मी सतुलित दृष्टि डाली है। अनौचित्य के प्राय उतने ही भेद है, जिनने औचित्य के। इस औचित्य- अनौचित्य का क्षेत्र बहा विजाल है। उनका कही पार नही। अत सनाईस भेवों का (श्रमुख् भेदों का) निर्पण कर वक्ने के बाद लेखक कहता है-"अन्येषु वा काव्यागेषु अनयव दिना स्वयक् ओनित्यम् उत्प्रक्षणेनम्। तदुडाहरणानि, आनन्त्यात्, न प्रदशितानि॥" अर्थात् हमी पवार अन्य काव्यांगों मे औवित्व-अलौचित्य की कल्पना कर लेनी चाहिए। प्रस्न विवेचन मे हूमने कुछ प्रमुख अनौचित्यों पर ही विचार किया है। पदानीचित्य अनुचित पद-प्रयोग को पद-अनौचित्य कहा जाता है। वक्ता, प्रसग. परिस्थिति एवं भाव के मबर्भ मे ही नद-प्रयोग के अनौचत्य का निर्णय किया जाता है। पदस्वय शुद्ध एव व्याकरण-सम्मत हो सकता है. परन्तु जिस संवर्म मे वह प्रयुक्त किया गया हो, वह उसके प्रयोग के लिए अनुरूप नही भी होता। व्याकरण में 'हन्' धानु गत्यर्थक नी है, किन्तु वह 'हन्' (to kill) मारणार्थ प्रयोग मे इतना रूढ़ हो बुका है कि भब १ देखिए परिशिष्ट में दिमा गया आचार्यजी का पत्।

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रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

सेनापति ने निरधार मव्ट का 'निर्मल' अथवा 'निर्वश' के अर्थ मे प्रयोग किया है जी इष्टार्थ की कथमर्पि अभिव्यक्ति नही कर पाता। मायः 'तिरधार' मे निश्वय ही' का बोध होता है। कभी-कभी 'निराधार' के अर्थ में भो 'तिरधार का प्रयोग किया जाता है परत्तु 'निर्वश कर वालने' के अर्थ मे निग्धार' का प्रयोग नही पाया जाता इष्टार्थ की अभिव्यक्ति नही कर पाने वाले पद का प्रयोम यह 'अमनर्थत्व' दोष है। अतः यह पदन्प्रयोग भी उचित नही है। दूसरे उदाहरण में सेनापति ने छदानुरीध से 'ोयना के 'कवला' कर दिया है। शन्द का रूप विकृत करने से ऊर्थ की प्राप्ति से अवगंध उपस्थित होता है। मेना- पति ने कही-कही ऐस शब्द गढे है जो व्याकग्ण-सम्भत न होने के कारण उचिन नही प्रतीन होते वृद्धापा, एकाके, पवता आदि। धलाण-पुष्प की उपमा अब-जने कोयले मे देक्र तथा विरही को जलाने के लिए उनकी कारण-कल्पना कर कवि ने कुछ नवीनना अवव्य झजाई हे किन्ु नब्द का रूप विकरृत कर देने मे अर्थ की प्रतीति कष्टकर हो गई है। लपदी पुहपन्पराग-ट सनी स्वेद नकरद। आवति नारि नवोढ लौ मुखद बाय गति मद ॥१ सन सुकयौ बीत्यो वतौ उमउ लई उखारि। हरी-हरी अरहरि अजौ भरि बरहररि हियनारि।" बिहारी के इन दोह में 'पुडुप' पद का प्रयोग अनाव्श्यक है। 'पराग' शब्द मे ही 'पुपन' का अन्तर्भाव हो जाता है। 'पराग' पुप्प का ही होता है। जिम प्रकार 'विब्याचल' कहने के बाद 'पर्वन' कहने की आवशयकता नही क्योकि 'अचल' पर्वत का बोध कर देता है, उसी प्रकार 'पराग' बहने ने ही 'पुप्प' का ग्रहण हो जाता है, अलग में 'पुह्रुप' कहना व्यर्थ है। अन्य उदाहग्ण में विहारी द्वारा बरहरि' पद का प्रयोग 'घैस' के अर्थ में किया गया है जो उस अर्थ को प्रगट नही कर पाता: यहाँ असमर्थत्व दोप आ रया है। बैरि नारि दृग जलन सो दूडिजात अरि गॉव। भूषण ने एक ही पक्ति मे दो बार खैरि' और 'अरि' पदो का प्रयोग किया है। दोनो पद रत्र के वाक है। 'अत्ु-नारियो के नेव जल में शत्रओ के जाँव डद गए।' इसमे पुनरुक्त दोप के कारण अर्थ-प्रभाव क्षीण हो गया है। लाल अनोलक लालची, करत वोटि मनुहारि। मन्विर आवन इन्दिरा, दे न किवारि गँजारि॥४

१ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : ब्रिहारी, पृ० २११ दही, पृ० २१५ * ३. बही, भूषण प्रयावली, प० १०५ हृग्दयालुसिंह मतिराम-मकरब, पृ० २१२ #

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रीतिकव्य मे औचिय व्यावहारिक समायोग

मतिराम न लक्ष्मी के स्थान पर 'इन्दिरा' पद रखकर इस मुहावरे या कहावत को बे- जान कर दिया है। मुहाबरे की व्यजना का सारा वल 'लक्ष्मी' पद पर ही है। उसके स्थान पर अन्य पर्याम रने सें उसका सारा सौंदर्म ही खत्म हो गपा है। कोई भी अन्य शब्द उसका स्थानापन्न नही बन मकता। ताः बिन विचारनि ही जोति-जाल नमी है।1 हूँ है सोऊ घरी भाग-उधरी अनन्द घन, मुन्स बरसि लाल देखिहा हरी हमैं।।" इन उदाहरणों में धनानन्द ने 'विचारि और हूरी हमै' प्रयोग किये है जो सुरचिंनित तही है। 'विारनि' विशेपण के रूप में प्रयुक्त हुआ है और अर्थ है कद्दारे'। किन्तु इमसे विचार के बहुवचन का बोध हो जाता है और इप्टार्थ नेत्र-पथ से विन्दुप्त हो जाना है। इसी प्रकार 'देखिविहौ हरी हमै' प्रयोग मे भी अर्थ-वैपरीत्य वोधित हो जाला है। वजभाण मे 'हरी होना' या 'हरी देखना' गाय, भैसादि के गर्भ धारण करने की स्थिति मे प्रयुक्न होते है। जवकि कवि ने यहाँ 'हमे प्रसन्न देखोगे।' के अर्थ मे प्रयुकत किया है। संस्कृत में अश्लीलता की तनिक भी नभावता पैदा कर देने वाले नब्बो या गन्द-योगो को सदैव वर्जित करने का गास्त्रादेण है-'रुचि' और 'कर' शब्दो का एक नाथ प्रयोग इसी कारण निषिद्ध है। इस प्रकार यहा पर 'लाल देखिहौ हरी हमे'- पूग प्रयोग अश्लील की सभान्रता से ग्रस्त एवं अनुरचित है। कीजन फिराद सुनि लीजिय हुमारी गंगा साखन के साथी दुख दिग्गज डिगार त्।।3 पद्माकर ने 'फरियाद' को 'फिरद' बार दिया है। फारमी के गब्दो को ब्रजमाषा की दीना देने की इस प्रवृतति से अर्थ का अपकर्प होता है। ऊपर केशव, विहारी, सतिराम, घनानन्द, भृपण, नेनापति और पझ्माकर के कुछ उद्धरणों द्वारा पद-गन अनौचित्य पर विचार किया गया है। इस श्रेणी में देव का उल्लेख न होने से यह न मान लिया जाय कि देव की पद्योजना सर्वधा निर्दोप है। रीतिकालीन कनियो मे शब्टो का तोड-मरोड सर्वाधिक क्षेत्र ने किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ष तो देव की इम प्रवृत्ति से किचित् खिन्न भी थे। इस विषय मे डॉ० नगेन्द्र जी का निम्नलिखित मतव्य देखा जा सकता है- "देव पर शब्दो को विकृत करने का दोप लगाया जाता है। प० रामचन्द्र शुक्ल इस अपगध मे सूपण के नाथ ही देव की भी गणना करते हैं। वास्तव मे इस प्रसंग मे भूषण के साथ देव को तुलना तो उनके साथ बडा अन्याय है। परन्तु वैे यह आरोप उचिन ही है। लाला भगवानदीन ने देव के द्वारा प्रयुक्त अनक शब्दो का विश्लेषण करने हुए उनके अनोचित्य का अत्यन्न प्रामाणिक विवेचन किया है। देव ने यमक, अनु- 9 दिशवनाथप्रसाद मिश्र मनानद कवित, पृ० २० २ वहीं, पृ० ६२ ३ वही, पद्माकर अ्पावली, पृ० २६७

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रीमिकाव्य मे ओचित्य व्यावहारिक समायोग

प्रास अथवा तुक के लिए शब्दो की बहुत बड़ी तोड-मरोड की है। ऐसा करने मे उन्होंने भाषा-विज्ञान के नियमो का सल्लंघन हो नहीं किया, कही-रही तो उनका रूप ऐसा बदल दिया है कि वे सर्वथा नवीन शब्द ही प्रतीत होते है, जिनका अर्थ लगाना असभव हो जाता है। इस शब्द-तरिकृति के मूल में प्राय दो कारण है'एक तुक का आग्रह् दूसरा यमक अथवा अनुनास का आग्रह। नुक के आग्रह से कंदुक का कद बन जाता है, इच्छा का ईछा, अभिलाषिणी का अभिख्या, हिरण्य का हिरन, तुला का तुलही, उन्लसित हृदयावली का हिये उलती, विदित का वधोत, द्वन्द का दंदरा।" वाक्य-अनोचित्य वाक्य-विषयक अनौचित्य को वाक्य-अनौचित्य कहते हैं। वाक्यनगन समस्त दोषों का इसमें अन्तर्भवव हो जाता है-विशेपतः दुरान्तय दोप का। वाक्य में कन्ो, कर्म, करिया, विशेषण, विगेष्य इत्यादि की एक सुनिश्चित व्याकरणिक स्थिति होनी है। इस कम या स्थिति का व्यतिक्रम व्याकरण में सामान्य असह्य है। मौखिक व्यव- हार में भी एक सीमा तक ही वह सह्य होता है। यद्म पि काव्य में व्याकरणानसार पद-कम नहीं होता तर्दापप उसका ऐसा होना लो आवश्यक माना ही गया है, जिमसे अर्थ-ततीति विश्ृखल व विघटित न हो। काव्यशास्त्र में इस प्रकार के व्तिकम को 'दरान्वय' संज्ञक दोष माना गया है। रीतिकाल का कवि इन दोषों मे बच नही पाया है। निम्न उद्धरणो से यह बात स्पष्ट हो जायगी कदति न देवर की कुवन कुर्लनय कलह डराति। पजर-गत मजार-दिग मुरु लौं सूकने जानि। बिहारी के इस दोहे मे 'हूरान्वय' दोप के कारण अर्थ की कलिष्ड़ता उपस्थिन हुई है। 'पंजरगत' विशेषण 'सुक' के लिए प्रयुक्त हुआ है। किस्तु विशेष्य और विशेषण के बीच 'मंजार' पद आ पड़ा है। 'सुक' तो कही दूर पड़ गया है। फलत 'पंजर गत' विशेषण का मंजाद' पट से सम्बत्व स्थापित कर विपरीत अर्थ की सम्भावना हो जाती है। या गिहरे पर सुग्रीव नुम, ता सॅग सन्त्री चारि। बानर लई छड़ाइ तिय, दीन्हो बालि निकारि॥3 केशव ने इन रक्तियों में पदान्वय की उन्दझी हुई योजता कर वाछित ज्न करो उलझा ही नही दिया बल्कि उल्टे अर्थ की प्रतीति करा दी है। इस पद का इन्दाथ इस प्रकार है- "इस पर्वस पर राजा सुीव रहते है। उनके साथ उनके चार मन्नी हैं।

१. डॉ० नगेन्द्र: देव और उनकी कविता, प०२१७ २ विश्वनाथप्रसाद मिश-बिहारी, प० १७४ ३. लाला भगवानदीन केशव कोमुदी, प्रथम भाग, पृ० २०४

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9६० रातिकाय म औचिय व्यावहरिक समायोग

बाईल नामक वानर ने उनकी स्वी छीन ली है और उन्हें निकाल दिया है।" परन्तु पद्रान्वय की उलझन ने अर्थ को भी इस प्रकार गडबड कर दिया है "इस पर्वत पर राजा सुग्रीव रहते है। उनके चार मन्वी है। वानरो ने बालि को निकाल दिया और उसकी स्त्ी छीन ली।" छरी सपल्लव लाल कर, लख्ि तमाल की बाल। मुरानी हिय नाल घरि, फुल-माल नी हाळ।।3 मनिराम के इस दोहे में भी दगन्वय दोष के कारण अर्थ प्राप्ति में वि-न उप- स्थिन होता है। यहाँ पर 'लखि' 'उससाल', और 'हाल' वदो का स्थान एक-दूसर मे दूर पन जाने के कारण अर्थ दुर्बोध बन गया है। इस प डॉ० महेन्द्र कुसार का वशन इम पकार है - "इसका शन्वय ऐसे होगा-तमाल की सपल्लव छरी लाल कर (मे) लखि (ओम) उर (मे) माल धरि, फुलमाल- ज्यों-बाल हाल कुम्हिलानी। इसमे स्पष्ट है कि 'लच्वि' और 'उस्साल' दवूर पड गये है, जबकि 'हाल' को उचित स्थान ही नही मिल सरा।"2 काके कहै लूस्त मने हो द्वि-दान में।2 धरत न धीर, उर अधिक अधीर मैं।4 ओठन ते उठि पीठि पे बैठि, कधान पे ऐठि मुर्यो मुख मोरनि। देव कटाउछन ते कढि कोपि, लिलार चढ्मो बढि भौह मरोरनि। अँक मे आय मयक-मुन्नी रई, लाल को बक चिते दुग-कोरनि। ऑमुन बूडयो उसास उड्यो किधौ मान गयो हिलकी हिलोरनि॥4 ऊपर उद्भृत तीनो उदाहरण देव की बविता से बुने गये है। प्रथम उद्धरण में-काके कहैं लूदत मुने हो दधि-दान मैं मेंपवकर कुछ ऐना है कि अर्थ स्पष्ट नही हो पाता है। वस्तुन 'मै सुनेहो' एक माथ और 'काके क है लूटत एक साथ होने नाहिए। इसी प्रकार 'वरन न धोर, रर अधिक अधीर मैं'-मे अधिक अधीर आदि 'उर' के विशेषण है। इन विशेषणों का स्थान विशेष्य 'उर' के पूर्वं होता चाहिए। 'अस्थान पद' दोप के कारण अथ उलज गया है। अतिम उद्धरण में कर्ता 'मान अ्तिम पक्ति में आने से बहुत दूर पड़ गया है, अत" 'दूरान्वय दोप' वन गया है। इम विषय मे डाo नगेन्द्रजी की ये पंकितियाँ 4 हरदयालुभिह मतिराम-मकरद, पृ० २६ र. डॉ० महेन्द्रकुमार : नतिराम कवि और य्याचार्य, पृ० २२४ . डॉ० नगेन्द्र देव और उनकी कविता, पृ० २२ ४ बही, पृ० २२७ ५. वही, पृ० २९८

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गनिकाव्य में औचिय यात्रहारिक समायास १६१

द्रष्टव्य है - "इस छद में कर्तता 'मान' बिलकुल अंत मे आया है। रोति काल की परिपाली के अनुमार इनको स्वीकार भी कर लिया जाये, परत्तु नीसरे चरण मे एक गर्मित ताका और आ गपा है, जिससे यह अन्तर और भी बढ गया है और फिर इस गभित वाक्य को अन्वय नहीं बैठना। इसके अतिरिक्त ऐसे पद-ममूह, जिनका कोई भी अन्वथ नही वैठता, देव में एह नहीं, अनेकु हे, कहो-कहा पाठ की अगुद्धि मानी जा सकती है?"९ अबंध अमोित्य नवीन अर्थोद्भावना, वस्तुसगठन एव अविच्छिन्न कधा-नवाह प्रवरषाचित्य के अंतर्गत सन, विष्ट होने है, नो नव्विनगैन विशष्डरकस््पना, बस्पु-रोविएववरुद कय प्रवाह प्रवधगत अनो।चत्य के अनर्गत स्थान पाते हैं। रीनिकाल मे केवल एक ही महाकाव्य रचा गया हे और वह है 'रामचत्रिका'। उसमे 'क्लिष्ट कल्पता', 'वस्तु-सैथिल्य' और अवरुद्ध कथा-प्रवाह' सभी प्राप्त है। 'रामचद्रिका' के प्रबंधत्व को लेकर समीक्षकों के परस्पर-विरोवी विचार प्रवर्तमान है। कुछ उने नितास् असफल प्रबंध-काव्य माते है. तो कुछ उसे गिथिल • प्रवध-महाकाव्य कहते है। 'रामचद्रिका' को अमफल अ्रथश सिथिल प्रबध काव्य कहने वालो के प्रमुख तर्काधार है- (१) वर्णन व्यामोह के कारण कथा उपेक्षित हो गई है। (२) चिर-परिचित रान-कथा में कुछ प्रसग छोड़ देने से उसकी मार्मिकता आहृत हुई है। (३) कवि द्वारा की गई कुछ मौलिक उद्भावनाओ का काव्य को कथा, प्रबधत्व व चरित्र-चिल्नण पर विपरीत परिणाम हुआ है। (४) भक्ति के स्थान पर राम के ऐश्वर्म-प्रभाव का वर्णन होने से रचना रसमयी व प्रभावपूर्ण नहीं वन पाई है। (५) अलकार व चमत्कारप्रियता के कारण भी काव्य-साँदर्य को आघात पहुँचा है। (६) छंद-बाहुत्य व पाडित्य-प्रदगन भी उसकी विफ्लता का तक प्रमुख कारण है। (७) मामिक प्रसथ अव्याख्येय रह गए है या चलते ढम से वणित कर दिय गए है। विपक्ष के तर्क हैं- (१) रामचद्रिका, जीवन-चरित या इतिहास नही है।

ड'0 नगन्द्र. दब और उनकी कदिता, पृ० २२

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१६२ रीतिकाव्य मे आित्य व्यावहािक समायार

(२) रामकथा विश्रुत है, अत कुछ प्रसग छोड देने से एकसूता मे आघात नही पहुँचता। (३) वत्कालीन राजनीति व कूटनीति का संस्पर्श देकर कवि न उसे अविक मौलिक व आकर्षक बना दिया है। (४) कवि का उद्देश्य राम का चरित लिखना या भक्ति-प्रदर्शन नही है। बह तो राम के ऐश्वयं व बभव की 'चन्द्रिका' को प्रकाशित करना चाहता है।१ दोनो पक्षो के विचार पर चिन्तन करने के उपरान्त भी यह तो कहा जा सकता हे कि कथा स्थान-स्थान पर अवव्य अवरुद्ध होती प्रतीत होती है। गुण-अनौचित्य रस-विरोधी गुणो की योजना 'गुण-अनौचित्य' कही जाती है। ओज गुण के प्रकर्षक ट ठ ड ढ ण, रंक युक्त ष आदि का शृगार-रस के प्रसग में प्रयोग अनुचिन है। गुणो को रस के स्थिर धर्म कहा गया है। अत विभिन्न रसो के उत्कर्ष-अपकर्षा- धायक गुणो की व्यवस्था भी सुस्थिर की गई है। रीतिकालीन कविता मे कही-कही इसका व्यतिक्रम भी पाया जाता है- लटकि लटकि लटकत चलत डटत मुकुट की छाँह। चटक भरयो नट मिलि गयौ अटक-भटक-बट मॉह॥२ प्रस्तुत दोहे मे बिहारी ने 'ट' की बारम्वार आवृत्ति कर अर्थ को अटका दिया है। 'ड' की योजना भी वर्ष्यानुरूप नही है। यहा प्रतिकल-वर्णत्व नामक दोष आ गया है। शृगार-रस के इस प्रमग मे वर्णयोजना ने नायिका के ही अभीष्टार्थ को भी भटका दिया है। ओजगुण-प्रधान यह योजना शृंगार-रस के प्रतिकूल है। एक ध्म गृह खम्भ जभरिपु रूप अवनि पर। एक बुद्धि गभीर धीर वीराधिवीर वर। एक ओज अवतार सकल सरनागत रच्छक। एक जासु करबाल निखिल खलकुल कहै तच्छक। 'सतिराम' एक दाता निमनि जग जस अमल प्रगट्टियउ। चहुवान बस अवनंस इमि एक राव सुरज न भयउ॥3 मनिराम के इस छद मे ओज गुण की स्थिति ठीक-ठीक नही बन पायी है। 'सुन्न राव' की वीरता का वर्णन करने में कवि यहाँ सफल नही हो पाया है। इस असफलता का प्रनुख कारण है-रस-विरोधी गुण-योजना। ब्रजभाषा स्वभावतः कोमल है। वीर-रस की योजना करने के लिए व्रजभापा के स्वरूप को तोडना-मरोडना अनि-

डॉ० विजयपालसिंह : केशव और उनका साहित्य, पृ० २६५ विश्वनायप्रसान मिश्र. बिहारी, पृ० २११ ३ डॉ० महेन्द्रकुमार : सतिराम, कवि औौर आचार्य,पृ२३२

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रीतिकाव्य में औचित्य : व्यायहारिक समायोग १६३

वार्य होता है। नतिराम ने वजमाषा को अनने प्रकृत रूप मे ही अपनाया है। फलत वे गीर रस का समुचिन प्रकर्ष नहीं दिखा पाये हैं। डॉ० महेन्द्रकुमार का निम्नलिखित उद्धरण इस तथ्य का समर्थन करता है- "बीररस की रचनाओं के लिए व्रजभाषा 'ओोज' गुण की दृष्टि मे अनुकूल नही पडली औरे सतिराम इस गुण को जबर्दस्ती ठोकने के लिए शब्दो की तोड-मरोड उपयुक्त नही समझते। ऐसी दगा मे वे उनने सफल नहीं हो पाये जितने शृगारिक रचनाओ से हुए है।"4 हाथ धरे हथियार सबै तुम सोभत हौ। माग्नहारहि देगवि कहा मन छोभत हौ। छतिय के कुल हूँ किमि बैन न दीन रचौ! कोटि करो उपचार न कैसहु मीचु बचौ।२ केशव के इस छन्द मे भी गुण की योजना रौद्र रसानुरूप नही है। प्रसग जितना रौद्र रस से पूर्ण है, उसका निरूपण उतने ओजगुण युक्त शब्दो मे नही हुआ है। इस बिफ- लना का एक कारण छन्द-योजना भी है। 'विशेषक' छन्द बीर या रौद्र रस के अनु- कुल नही जान पडता है। यहाँ गुणौ चित्य का निर्वाह नहीं हुआ है। अलंकार-अनौचित्य रीतियुगीन जीवन मे सभी क्षेत्री मे अलंकार, प्रदर्शन व चमत्कृति का प्राधान्य रहा है। काव्य मे भी यह प्रवृत्ति दृष्टिगत होती है। अलकारो की भरमार सर्वत्र दिखाई देती है किन्ु अलकार यदि यत्नज, पृथक-विन्यस्त हो तो वे शोभा बढ़ाने के स्थान पर शोमा घटाते हैं। अलंकार-योजना के लिए अवमर खोजते रहना, जरा-सा अव- सर पाते ही अलंकारों की वर्षा-सी करना, यह प्रयोक्ता के अलंकार-पाण्डित्य का प्रदर्शन-मात्र हो सकता है, विजेष कुछ नहीं। 'तारा' नाम के सादृश्य मात्र से चन्द्रमा को अंगद का पिता कह देना; घ्रव, भीम, अर्जुन शब्दों का अवसर पाकर वृक्षों को भीम, अर्जुनादि के समान कह देना, या 'जाहू नवी' में सभग पद इलेष द्वारा 'जाह', 'नबी' अर्थ कर गगा का अद्भुत प्रभाव निरूपित करना आदि कवि के अलकार-व्यामोह एव स्थूल चमत्कार (शाब्दिक) के प्रति मोह को ही प्रकट करता है; विशेष कुछ नही। कही-कही तो यह प्रवृति चित्र को बहुत ही भौंड़ा बना देती है। रीतिकालीन काव्य मे ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ अलकार-योजना सुचितित व सहज-प्रभा- वोत्पादक नही हो पाई है। अनुप्रास का अनौचित्य नभलाली चाली निसा, चटकाली धुनि कीन। रतिपाली, आली अनत, आए बनमाली न।3 १. डॉ. महे-द्रकुमार. मविराम, कवि और आचाय, पृ० २३२ लाला भग्वानदीन केशद कौमदी भाग १, पृ० ११६ विश्व नायप्रसाद मिश्र. बिडारी, पृ० १६४ AY

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१९४ रीतिकाव्य में औचित्य : व्यावहारिक समायोग

विरह एवं प्रिय-प्रतीक्षा के इस प्रसग में यह अनुप्रास-योजना कथमपि भाव- मोदर्य की पोपक नही है, अपितु भाव की अवरोधक है। शुद्ध शब्द-चमत्कार पर आधुत होने से यह अनुप्रास किसी प्रकार से उपकारक सिद्ध नहीं होना। भाव की तीव्रता का बाध तो हो ही नहीं पाता बल्कि उन्टा भाव अवरुद्ध हो जाता है। इलेष का अनोचित्य न्हाई के विसुन-पदी जाह नू विसुन पद जाह्नवी न्हाइ जाह नवी पान वादरे।।9 'विष्णु-पद्ी' में नहाकर तू विष्णु के चरणों में स्थान प्राप्न कर एव 'जाह नवी मे स्नान कर तू नबी (खुदा) के पास जा। सभग-पद का यह चमत्कार जरा भी मोहक या आाक- यंक नही है। अजौ तरौना ही रहाँ सत ति सेवत इक अग। नाक-बास वेसरि लह्यौ, बसि मुकुतन के सग ।।* बिहूारी के इस प्रसिद्ध दोह म 'इलैय' का प्रयोग केवल शाब्दिक चमत्कार पर आधारित है। इलप-योजना स्वत सुन्दर हो सकतो है परन्तु उसका रार्थक उपयोग तो वर्ण्य-विपय के सदर्भ मे ही निर्णीत होता है। 'तरौना' के वर्णन के प्रसग मे यह सारा श्लेप निरर्थक व निष्पभ है। इस लेष-योजना की निरर्थकता पं० विष्बनाथ प्रसाद मिश्र जी के शब्दो से भी पुष्ट हो जाती है।3 सिसु सौ लसे संग धाय। बनमाल ज्यो सुर राय। अहिराज सो यहि काल। बहु सीस सोभनि माल॥ यहाँ पर केशव ने किसी प्रकार के सादश्य या साधम्य का विचार किये बिना 'घाय' शब्द में इलेप का चमरकार दिखा दिया है। परिणामत अप्रस्तुत (घाय रक्षक मा) के गुण प्रस्तुत घव वृक्ष में ठँसने का व्यर्थं प्रयत्न हो गया है। पर्वत की धाई और धृद- वृक्ष की शिशु-रूप में कल्पना अधिक उचित जान पडनी। तव तो जन्य-जनक या पाल्य- पालक सम्बन्ध का भी निर्वाह हो जाता। परन्तु इसके विपरीत मदा कल्पना यह की गई है कि धव-वक्ष को धारण किए हुए यह पर्वत ऐसा लगता है मानो धाय के सग शिशु। यह कल्पना स्वतः बड़ी विसगति पूर्ण है। अन्यत्न भी केशव ने इस प्रकार को नेमेल ठँस-ठॉस की है। यभक का अनौचित्य तो पर वारौ उरवसी सुनि राधिके सुजान। तूँ मोहन के उर बमी, ह्व उरबसी समान ॥।2 १. उमाशंकर शुकल कवित्त रतनाकर, पृ० ११५ २. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : बिहारी, पृ० १६५ ३. वही, पृ० १२० ४ लाला भगवावदीन : केशन कौभुदी, भाग १, पृ० २१० १. विश्वतापप्रसाद मिश्र : बिह्ारी, पृ० १६०

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रीतिकाव्य में मोचित्य व्यावहारिक समायोग

समक-योजना का एक सामान्य नियम है कि छन्द के चारों चरणों से यनक हो तथा प्रत्येक बार उसका नवीन अर्थ प्रकट होता रहता हो। यहाँ पर तीन चरणो मे यमक-योजना है चारो मे नही। प्रथम और तृतीय चरणो मे प्रयुक्त 'उरबसी' का अर्थ एक ही है। लाला भगवानदीन यमक सम्बन्धी ऐमे दोष को 'अप्रयुक्त' दोष मानते है। चपमा का अनोचित्य उपमा सादृश्याधृत अथवा साधम्याधृत होती है। उपमेय और उपमान का संबब मुखद, सुरुचिपूण, कल्पनाग्राह्य होना चाहिए। मूर्त के लिए अमूर्न, अमूर्न के लिए सूर्न; मूत्त के लिए मूर्त; अमूर्त के लिए अमूस की योजना की जाती है। योजना चाहे कैसी ही क्यों न हो, वह सहज एवं मुग्राह्म होनी चाहिए। जहाँ वह सहज व सुग्राह्य नही होती, वहाँ वह उचित प्रतीत नही होती। रीतिकाल मे उपमा के क्षेत्र में क्लिप्ट कल्पना करने बालों में केशव मुख्य है। कटि को तत्व न जानिए मुनि प्रभु त्रिभ्वन राव। जैस सुनियत जगत के सत अरु अरुत मुभाव ॥9 कटि की अति-मूक्ष्मता का बोध कराने के लिए केशव ने सत्-असत्-विलक्षण ब्रह्म को ही अप्रस्तुत के रूप में निरूपित कर दिया है। कटि को सूक्ष्मता भावक को किम प्रकार म्राह्य हो सकती है। गुढ व दार्शनिक उपमान के स्थान पर यदि किसी पार्थिव उप- मान का ग्रहण कवि करता, तो कल्पना अधिक ग्राह्म हो जाती। व्ासर की सम्पत्ति उलूक ज्यो न चितवत । यहाँ पर राम की तुलना उलूक से कर कवि ने अनोचित्य उपस्थित कर दिया है। विरह- याकुल राम को दिन मे सूर्य का प्रकाश अच्छा नही लगता। वे प्राय. शुफा में ह रहते है, यहाँ मूल कथमितव्य तो एक ओर पड़ गया और अर्थ का अनर्थ हो गया। 'बिनायक प्रकुर्वाणी रचयामास वानर' वालो बात हो गई। कहूँ रेन चारी गहे ज्योति गाढे मानो ईश रोयाग्नि मे काम काढ़े।।3 कवि ने लका मे जलते हुए राक्षसों की तुलना भव-तेत्न-जन्मा वह्धि में जलते 'कामवेव' से कर उपमेय को अकारण गौरवान्वित कर दिया तथा 'अधिकोपमा' दीप ओढ़ लिया। तुलना-आधार केवल इलना ही है कि दोनो अग्नि मे जलते है। चनुर चोर से शोभित भए। यहाँ पुनः केशव ने राम की उपमा चोर से दी है। परम्परा विरुद्ध यह उपमा बडी अनु- चित प्रतीत होती है।

१ लाला भगवानदीन . केशय कौमदो, भाग २,प० २३५ लाला भगवानदीन बेशव कौमुदी, भाग १, पृ० २४१ ३ वही, भाग १, पृ० २६६. ४ वही, भाम २, प० १७३

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१९६ रीतिकाव्प मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

जानि न परत अति सूक्ष्म ज्यो देवगति, भूत की चलाकी धौ कला है कोटि नटते॥9 देवजी ने भी केशव की भॉ्ति कदि की अनि सूक्ष्मता का बोध कराने के लिए दुर्बोध उपमान बना है। नट की कला ने उसे उपसित करने मे तो कोई औनित्य-भंग नही हो जाता, परन्तु उसे 'भूत की चालाकी' कहकर तो कवि से कल्पना को और भी विनष्ट कर दिया है। ऊपर के उदाहरणों से यह स्पष्ट प्रतीत हो जाता है कि कवियो ने जहाँ केवल प्रयोग दृष्टि को ही प्राधान्य दिया, वहाँ वे सहज अलकार-योजना नही कर पाये हैं। निम्नलिखित बिहारी के देहे मे उपमान और उपमेय के बोच (सम्माता)-अनुगुणता (प्रपोर्शन) का निर्वाह नही हो पाया है- कुच गिरि अति थकित है, चली डीठि मुँह चाड। फिरि न टरी परियै रही परी चिबुक की गाड ।R दृष्टि को किरण कहने के कारण ही कुचों को पहाड़ कहना पड़ा है. कुचों की उन्नतता या उठान की व्यंजना के लिए उन्हे 'गिरि' कहना तो निम्चय ही प्रपोगन का भंग है। उरोज चाहे कितने ही ऊॅचे उठे हुए हो, वे पर्वत थोड़े ही कहे जाएँगे। मम्मटादि आचार्यो ने यहा उपमा दोष माना है-नाभि को पाताल; उरोजो को क्षितिधर; वेणी को यमुना प्रवाह कहना उपमानगत सम्मात्ा का अविवेक ही है। उत्पेक्षा करा अनोचित्य भाल लाल बेंदी ललन आखत रहे बिराजि। इन्दुकला कुज मे बसी मनौ राह भय भाजि ।3 बेंदी और अक्षत का कमश इन्दुकला तथा कुज से केवल रग का ही (और वह भी सर्वोशत: नहीं) सादृश्य है। भय की स्थिति उपमेय एवं उपमान दोनों पक्षों मे नही प्रवरित होने से यहॉ साध्म्प कथमपि नहीं है। यह उत्प्रेक्षा अधिक दृढ़-आधार पर स्थित न होने से केवल खिलवाड-सा प्रतीत होती है। अरुन गात अति प्रात पदमिनी प्राणनाथ भय। मानह केगवदास कोकनद कोक प्रेम मय ॥ परिपूरण सिंदूर पूर कधौ मंगल-घट । किधौ शत्र को छत मढ्यौ माणिक मयुख-पट।। कै श्रोणित कलित कपाल यह किल कापालिक काल को। यह ललित लाल कैधौ लसत दिग्भामिनी के भाल को ॥४

१. डॉ० नगेन्द्र देव और उनकी कविता, पृ० १६१ . विश्वलाथप्रसाद मिश्र बिहारी, पृ० ९७६ ३. मही, पृ० ३०४ Y. साता भगवानदीन : केशन कोमुदी भाग १, प० ६०

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रीतिकाव्य मे औचित्य व्यावहािक समायोग १६७

केशव की यह प्रसिद्ध उतप्ेक्षा अनेक समीक्षको के समीक्षानिकष पर चढ चुकी है। उसके विपक्ष एवं पक्ष को लेकर केशव के आलोचको ने बहुत कुछ कहा है। चाहे केशत्र ने एक आचार्य की भाँति,-दोष की जरा-सी स्थिति काव्य-सौदर्य की कैसी हानि करती है,- यह समझान के लिए म्वयं पूर सज्ञान के साथ ये पंकतियाँ रची हो या अलंकार-प्रयोग के प्रवाह मे सिख डाली हो,-इनमे अनौचित्य आ ही गया है। प्रथम चार पंक्तियों मे उत्तरोनर सुन्दर उत्प्रेक्षाएँ योजित करने के बाद एक असुन्दर, अभद्र उत्प्रेक्षा रखकर मारा सौदर्य चौपट कर दिया है। सद्योदित मूर्य के लिए अनु- राग, मंगल-घट, इन्द्र का छत्, विग्भामिनी के भाल का टीका आदि उत्प्रेक्षाओ की योजना कर जिस सौदर्य की सृष्टि कवि ने की थी, वह 'के श्रोणित ककित कपाल यह किल कापालिक काल को पंक्ति द्वारा विनष्ट हो गयी है। निश्चय ही महाँ उत्प्रेक्षा- गत अनौहित्य है। रूपक का अनौचित्य प्रेम-भय, भूप रूपसचिव संकोच सोच, बिरह-विनोद पील पेलियत पचि कै। तरल नुरंग अवलोकनि अनत गति, रश मनोरथ रहै प्यादे गुन गचि कै। दुहुँ ओर परी जोर घोट घन 'केसोदास' होइ जीति कौन की को हारै जिय लचिक। देखत सुम्है गुपाल सिहि काल उहि बाल, उर सतरज की सी बाजी राखी रवि कै।।9 यहाँ नायिका के शरीर-सौदर्य को निरूपित करते हुए केशव ने शतरंज के सेल की सारी सामग्री का विन्यास व उसकी संगति दिखा दी है, परन्तु इस प्रयत्न में औचित्य- बुद्धि से तनिक भी कान लिया गया प्रतीत नहीं होता। नायिका का शरीर न हुआ बाजीगर का अख़ाडा हुआ। यह रूपक निश्चय ही अनौचित्यपूर्ण है। मंगल बिन्दु सुरंग, मुख ससि केसर आडुरु। इक नारि लहि संग, रस मय किय लोचन जगत ।।२ बिहारी ने यहाँ ज्योतिष का चनत्कार दिखाने के प्रयत्न मे नायिका के सहज अनाविल सौदर्य को उलझा दिया है। एक नाड़ी स्थित चन्द्र, मंगल और गुरु जगन को मोहित कर लेते हों तो हो, परन्तु नायिका के मुखचन्द्र पर मगल-बिन्दु एवं केसर-गुरु-प्रहो का झमेला आकर्षक नही लगता है। रग-सादृश्य के सिवा अन्य कोई विशेषता यहाँ नही है। एतत्सम्बन्धी आचार्य विश्वनायप्रसाद मिश्र जी की कनिषय पंकितियां देखिए :-

१ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : केशव प्रथोवल्ती, प्रथम खड़, प०४६ २. वही, बिहारी, पृ० २०४

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१६८ रीतिकाव्य में औचित्व : व्यावहारिक समायोग

"कवि ने उपमान के लिए आकाश के तारे उतारे है। केवल रंग का सान्य और वह भी ज्यीतिष की पुस्तको में ब्णित। नायिका के मुख पर बिंदु, केलर, आड आदि के कारण जो शोभा होती है, उने सामने लाने मे यह नक्षत्र सस्था किसी प्रकार समर्थ नही।" विबली दिवेणी लट रोमावली धूम-लट, योवन पटल ज्योति वेंदी छबि तुण्ड मैं। बेद-ध्वनि बोले गुणदत भुनि किंकणीक, रसना रतन मणि मुकुनान झुण्ड मैं!

... मनोजमख मा यो नाभिकुण्ड मै॥२ देव ने 'मनोजयज' का रूपक पूरा करने के लिए नाभि को कुण्ड, तिवली को त्रिवेणी, रोमावली को धूम-शिखा, किकणी को मुनि कहा है। रूपक-योजना बडी खोचातानी से की गई है। न सादृश्य-निर्वा है, न नाधर्म्य और न किसी प्रकार की सम्मावा (Proportion) का ही निर्वाह हो पाया है। केवल बेमेल की ठूँस-ठॉस है। डॉ० नगेन्द्र के तद्विषयक विचार द्रष्टव्य हैं- "मनोज यज को पूरा करने के लिए तिवली को त्रिवेणी और रोमावली को धूम-शिखा वनना चाहे स्वोकार्य भी हो जाए लेकिन किकिणी स्वयं मुनि बनकर अपनी झनकार को वेद-ध्वनि मे परिणत करने को कभी तैयार नही हो सकती।"3 अतिशयोक्ति का अनौचित्य उरझत उरग चपत चरननि फन, देखत बिबिध निसिचर दिसि चारि के। गनति न लागत मुसल-धार सुनत न, झिल्लीगन-घोष निरघोष जलधारि के। जानति न भूषन गिरत, पट फाटत न, कंटक अटकि उर उरज उजारि के। प्रेतनि की पूछे नारि कौन पै ते सीख्यो यह जोग कैसो सारु अभिसारु अभिसारि के।४ अतिशयोक्ति की झोंक में केशव ने अभिसारिका का चित्न बडा विरुप कर दिया। अभिसारिका न हुई, कोई प्रेतिनी या पिशाचिनी हुई। 'काम' की प्रबलता की व्यंजना करने के लिए गृहीत अत्युक्ति ने विपरीत प्रभाव उत्पन्न किया। अभिसारिका

१. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : विहवारी (भूमिका), पृ० १२२ २. डॉ० नगेन्द्र: देव और उनकी कविता, पृ० १६१ ३. वहो, पृ० १६१ ४. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : क्ेशव ग्रन्थावली, भाग १, पृ०४४

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रानिकव्य मे औवत्य व्यावहारिक समायोग १६६

रास्ते के सर्पो चतुर्दिक व्याप्त अवकार मूपलधार वर्षा सिल्लीगण का छोप, वस्त्रा का फनन भूषणो का गिर जाना, कटको स गरीर का क्षत-विक्षत होना आदि जमरुष क्रष्टों की जरा भी परवाह न कर अपने संकेत-स्थान पर पहुँचने के लिए तीव्र गति मे जा रही है। नायिका के प्रबल अनुराग व दुर्दम्य काम की व्यजना करना कवि का लक्ष्म था, परन्तु बह लक्ष्य भ्रष्ट हो गया। अभितारिका का चित्र बनतेबनते किसी प्रेलनी का या जोगनी का चित्र अकित हो गया है।

तदगुण का अनौचित्य

अधर धरत हरि के परत ओठ हीठि पद जोति। हरित बाँस की बॉँसुरी इन्द्रवनुघ-रग होति।।१ यह अवहार-विवान इस दृष्टि मे नित्य है कि हरे बाँस में प्रतिबिब ग्रहण करते की शक्ति है क्या? फिर अधर, दृष्टि और हरित बॉमुरी के रंगों में ही इन्द- धनुष के सभी रंग समाविष्ट कैसे हो मकते है? आतरिक प्रभाव की बात तो दूर रही, बाह्य रग-संयोजन भी ठीकठीक नहीं हो पाया है। निषर्ष यह है कि रीतिकालीन कवि जहाँ कही भी अलंकार-विधान मे प्रमत्न- पूर्वक निषवाड, वससकार या पाण्ठित्व-प्रदर्शन अथवा प्रयोगवादिता में प्रेरित हुआ है, वहाँ उसकी अलकार-योजना दूपित हो गई है और जहाँ भी उसने अलंकार को धर्म मे धर्मी के रूप में निरूपित किया है, वहाँ सारा मौन्वर्न विघटित हो गया है।

रस-अनौ चित्य अनौचित्व-प्रवर्तित भाव एवं रस को काव्यशास्त्र मे भावाभास एवं रक्षाभास कहा गया है। अनः जहां कही रसाभास की उपस्थिति हो, वहा रस-गत अनौचित्य मानना चाहिए। अनुचित विभाव, अनुचित अनुनावादि के निबन्धन से रस-विपयक अनोचित्य उत्पन्न होता है। रस की निष्पत्ति उचित रीति से हो पायी हो फिर भी यदि वह पात्र, प्रसंग, परिस्थिति आदि में आनुकल्य-सम्बन्ध रखता न हो तो वह अनुचित सिद्ध हो जाता है। क्षेमेन्द्र के विचार से 'रस' काव्यात्मा होते हुए भी सर्वतन्त्र स्वतन्त्र नहीं है। उस पर नियंत्रण है। रस का विचार भी उसके पूर्ण परिवेश मे ही होता है। इसी प्रकार अनौचित्य (रस-विषयक) का भी विचार पूर्ण परिवेग मे ही किया जाता है। रीतिकालीन काव्य में रसगन अनौचित्य के कुछ उदाहरण अवश्य मिल जाते हैं। शृंगार को ही लीजिए-अवस्था का अनादर कर योजित किया गया शृंगार कितना ही मुदर क्यों न हा, वह न तो प्रभावकारी होता है, न ही आल्लादकारी।-

१ विश्वनायप्रसाद मिश्र : बिहारी, प०१६५

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रीतिकाव्य मे औचित्त्य व्यावहारिक समायोम

शृगार-रस का अनोचिस्य जानि आगि लागी वृषभान के निकट भौन, दौरि ब्रजवासी चढे चहूँ दिि धाइ कै। जहा तहाँ सोर भारी भीर नर नारिनि की, सब ही की छूटि गई लाज हाइ भाइ कै। ऐसे में कॅवर कान्ह सारी सुक बाहिर के, राधिका जगाई और जुबती जगाइ के। लोचन बिसाल चारु चित्रुक कपोल चूमि, चपे की सी माल लाल लीनी उर ला कै। नायक कृष्ण के हृदय में नायिका राधा के लिए अनुराग उदित हुआ है। अपने अनुराग के प्रकाशन के लिए कृष्ण ने जिस अवसर को ग्रहण किया बहु अपने सम्पूर्ण परिवेश मे 'शृंगार-रस' के लिए अनुकल नही है। एक ओर पडौसी के घर मे आग लगी है, लोग-लाज छोड़ कर-उसे वुझाने के लिए व्यस्त एवं ब्यग्र है। दौडा-दौडी मची हुई है; भारी शोग्गुल है। ऐसे चिंता-व्याकुल वातावरण मे, भय-व्याप्त परिस्थिति मे कृप्ण ने अपनी चपाकली (राधिका) को हृदय से लगा लिया। केशव ने उद्दीपन- गत अनौचित्य की अवस्थिति कर शृगार रन के स्थान पर शृंगाराभास को योजित कर दिया है। कृष्ण का यह आचरण जुगुप्मा-प्रेरक ही लगता है। पूर्ण परिवेश रस- विरोधी है। एक अन्य उदाहरण भी लीजिए- बल की बरस-गाठ ताकी रात जागिवे को, आई ब्रज सुदरी सवारि तन सोनो सो। 'केसौदास' भीर भई नदजू के मदरनि, अधौ मध्य ऊरध बचौ न काहू कोनो सी। गार्वत बजावति औ नाच नाना रूप करि, जहॉ तहाँ उमगत आनद कौ औनो सो। साँवरे की सूनी सेज सोबति ही राधिका जू, सोए जानि सॉवरेऊ मनि मन गौनो सो।२ बलदेव की वर्षगाठ पर सब स्त्रियाँ उत्सब मे सम्मिलित होने के लिए नन्दजी के भवन मे आई है। गा-बजाकर वे थक गई है। राधा की उनमें है। वह भी श्रमित- सी तनिक विश्राम के लिए कृष्ण की सेज पर लेट गई। तभी अचानक कृष्ण वहा ज धमके तथा गौनेका-सा मुख मनाने लगे। यहाँ पर भी पूरा परिवेश शृंगारबरस के अनुकल नही है। कृष़्ण के असयत व कामुक स्वभाव का ही परिचय यहाँ मिलता है। बिना कनुकी स्वच्छ नक्षोज राजै"। किधौं साँचहू श्रीफलसोभ साजै ॥ १ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : केशव ग्रन्थावली, खड १, पृ० २६ . २ पं० कृष्णशंकर शुक्ल. केशव की काव्य-कला. प० ३४- ३४

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रीतिकाव्य में औचित्य. व्यावहारिक समायोग २०१

किवौ स्वर्ण के कुभ लावण्य-पूरे। वशनीकर्ण के चूर्ण मम्पूर्ण पूरे॥।" अगद द्वारा घर्पिता, निपीडिता रावणेश्वरी मंदोदरी के अनावृत्त उरोजो का यह पूरा घर्णन अनुचित है। कचुकी रहित उगेजो का केणद ने बहुत दूर तक विभिन्न उन्प्रेक्षाओं के सहारे वर्णन किया है, जो रीतियुगीन रुचि (कुरुचि) शीलता का एक प्रतीक है। इस वर्णन से न भयानक रस ही उद्दीप्त हो पाया है न शृंगार ही। सृगार-वर्णन की यह प्रवृत्ति केवल केशव तक ही लीमित नहीं रही। अन्य कुछ कवियो पर भी तत्मदश प्रभाव पड़े है। मेनापति का एक छंद देखिए- बिन ही जिरह, हथियार बिन ताके अब, भूलि मनि जाहु सेनापति समझाए हौ। करि डारी छाती वोर घाइन सौ रती राती, मोहिं धौ बतावौ कौन भाँति छूटि आए हौ। पौढौ बलि सेज, करौ औषद की रेज वेगि, मै तुम जियत पुरबिले पुन्य पाए हौ। कीने कौन हाल! वह बाविन है दाल ! ताहि कोसति हौ लाल, जिन फारि-फारि खाए हौ।। नायक परकीया के मन्दिर से क्या लौटा है, मानी रणभूमि से लौटा न हो। खण्डिता की वाणी मे चाहे कितनी ही वचन-वकता अथवा नायक के प्रति स्नेहार्द्रता क्यों न हो, वियोग-विह्वला नारी के अतर्मन का, उसकी सवेदना का कनई प्रकाशन नही हो पाया है। परकीया को वाधिन कहना, नायक के क्षत-विक्षन शरीर पर मरहम पट्टी करने की व्यवस्था करना, 'फारि-फारि खाए हौ' जैसी पदावली का प्रयोग करना, वियोग शृंगार के निरूपण मे बाधा ही उपस्थित करता है। चित्र हमारी सहा रभूति के स्थान पर घृणा का ही भाजन बन जाता है। चाहे सयोग का क्षेत्र हो चाहे वियोग का रक्तपात, घात-आघात व मरहम पट्टी का उसमे कोई स्थान नही है। अॅगुरिन उचि, भरु भीति दे उलमि चित चख लोल। रुनि सो दुहँ दुहूँन के चूमे चार कपोल ।।3 परकीया और नायिक के बीच एक दीवार ही का व्यववान है। परन्नु उन्हे इसकी चिता नही। वे अपनी अँगुलियो के बल पर उचकर ऊर उठ जाते है और परस्पूर कपोलो का चुबन कर ही लेते है। उद्दीपनगत अनोचित्य के कारण चित्र कामुकता के पक्ष को अधिक उभारता है।

१ लाला भगवानदीन केशव कौमुदी, भाग १, प० ३४ २. उमाशकर शुक्ल. कवित्त रत्नाकरे, पृ० ४१-४२ विश्वनाथप्रसाद मिश्र बिह्ारी-प० १६८

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२०२ रीातकाव्य मे आचित्य व्यावहारक समायोग

लरिका लेवे के मिसनि लगर मो ढिंग आय। गयो मचानक आगुरी छाती छल छवाय ' किया-चतुर नायक ने परकीया के उरोजो का स्पर्श करने के लिए बच्चे को खिलाने का कष्ट उठाया है। शिशु-स्नेह यहाँ प्रमुख नही है, उरोजो का रपश ही मुख्य है। 'काम' ने शिशु-स्नेह का गला घोट दिया है। भावाभास के कारण यहाँ शृंगार रस का अनौचित्य है।" .. इसी प्रकार नायिका ने प्रिय द्वारा चूमे हुए पुत्र-मुख को चूमकर वात्सल्य का गला घोट दिया। बिहँसि वुलाय विलोकि उत प्रौढ तिया रस घूमि। पुलकि पसीजनि पूत को पिय-चूम्यौ मुँह चूमि ॥* दुग थिरकौहै अधखुले देह-यकौहै टार। सुरन-सुखित-सी देखियत दुखित गरभ के भार ॥3 गर्भ-भार-अलया नायिका के सुरत-सुख द तज्जन्य खेद एव श्रम का चित्र प्रस्तुत कर बिहारी ने आयस्त मातृत्व के भाव को विकृत कर दिया है, सुरति-सुख ने आयस्त मातृत्व के गौरव से सम्पन्न गर्भ-रिमा से दीप्त नारी की महिमा को लाछित कर दिया है। इसी संदर्भ में मतिराम का एक सदाहरण देखिा- कंत चौक सीमंत की, बैठी गॉठ जुराइ। पेखि परोसी कौ पिया, घुँघट मै मुमिक्याइ।४ सीमंत-संस्कार में पूजार्थ पनि के साथ बैठी हुई नायिका पडौमी को देख-देख कर घंघट में ही मुस्करा रही है। यहॉँ विवाहिता की पर-पुरुष-विषयक रति की व्यंजना शृंगार रस का अनौचित्य है। इसी प्रकार नीचे के उदाहरण में भी रसाभास की स्थिति स्पष्ट है - पासे गर्भवती तिया, निथिल हाथ ढरकाड़। हसत लाल लोचन लखे, लोचन रही नवाइ।।५ यहाँ मतिराम ने भी बिहारी की भाँति आयस्त मातृत्व की गरिमा को पकिल बना दिया है। देव ने नायिका एवं नायक के रंग-रास का एक चित्र उपस्थित किया है- "नैन लागे बैन लागे देव-चत चैन लागै F दुहुन के क ख ख खेल ही सो खिलि गये।

१ विश्वनाथप्रसाद मिक्ष बिहारी. पृ० २११ २ वूही, पृ० २०३ ३. वही, पू० १६२ * हरदयासुसिंह : भतिराम-मकरद, पृ०२०१ ५. वही, पृ० २०६

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रीतिकाव्य में ओचित्य : व्यावहार्कि समायोग २०३

अरि कै सरस रस ढर के सस्याने युग, जाने न परत जल वृदनि ज्यो मिलि गये।

फ़ेरि-फेरि जही कहि नीके नेंक रैहो कहि चैठि-बैकि उठिर्जाठ रग रचो रुचिनी।।" इस वर्णत के अनौचित्य का वर्णन करते हुए डॉ नगेन्द्र इस प्रकार लिखते है- "वास्तव में इस प्रकार के चित्र उपस्थित करने में कोई औचित्य नही है-वह रस नहीं रसाभास है और कुरुचच उत्पन्न कर आनन्द में व्याघात उत्पन्न करना है। यही सन्तोष है कि ऐसे वर्णन केवल दो ही एक है।"*

हास्य-रस का अनौचित्य

यद्यपि हास्य का मूल कारण 'अनौचित्य' है। 'अनौचित्यात् हाम्पम्' तथापि अनुच्ित रीति मे निबद्ध हाम्प रसत्व को प्राप्त नही होता। आकार, वेप, वचनाटि की विक्कृति के कारण हात्य उत्पत्न होता है, परन्नु यह उत्पन्न हा्य भी किसी न किसी रूप मे संगतिपूर्ण होना चाहिए। माता-पिता, गुरुजन एव आदर्णीय जनो के प्रति किये गये हास्य-निबन्धन का स्वत. अनौचित्य सिद्ध है। दवताओ के प्रनि भी हास्य का निबन्धन उचित नही। उसी प्रकार हास्य रम का स्व-शब्द वाच्यत्व-कभन भी उचिित 1

नहीं है। सारंश यह है कि अनुचित आलम्वन (मुनि, देव, माता-पिता) के कारण हास्य मे रस का अनौचित्य होता है। द्रष्टव्य है- हँसि-हँसि भागे देखि दुलहै दिगस्वर को पाहुनी जे आवै हिमाचल के उछाह मे। कहै पदमाकर सु काह सो कहै को कहा जोई जहाँ देखे सो हँसई तहाँ शह में। मगन भएई हसै नगन महेस ठठे, f औरौ हँसे येह हसाहस के उमाह मे। मीस पर गंगा हँमे भुजनि भुजमा हँमें हास ही को दंगा भो स नंगा के विवाह मौ॥ यहाँ अन्तिम दो पंकितियों में स्व-गब्दवाच्यत्व दोप आ गया है। 'वहाँ बहुत हुँसा हस हुई ऐसा कहने मान से हास्य आविर्भूत नहीं होता। इस छन्द के विपय में आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्रजी की टिप्पणी द्रष्टव्य है- "यहॉ आलंबन महादेव हैं. जिन्हे शब्दभेद से तीन बार नग्न कहा गया है, उनका

१ डॉ० नगेन्द्र, देव घोर उनकी कविता, पृ० १०४ २. वही, द०१०४ - ३ वरिन्वनाथप्रसाद मिश्र: पद्माकर ग्रथावली, पु० २२१

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२०४ राातकाव्य मे आचित्य व्यावहारिक सवायोग

स्वरूप चित्रण नही है। उद्दीपन का भी कोई विधान नहीं है। चौथे चरण मे गंगा सरप आदि स्वयं आश्रय हो गये है, उनमे अनुभाव मात् दिखाया गया है। हॅँसने वाले तो सभी है, पाहुनी, गह चलते। हास का दगा ही खडा हो गया है। 'हास' शब्द आ जाने से स्वशन्द्रवाच्यत्व दोष भी है। किसी रस का रूप खड़ा करने के लिए थोथे अनुभानों का जमघट कर देना ही पर्याप्त नही होता।" रस तांकर्य का अनोचित्

टूे ठाट घुन घुने धूम घूरि सो जु सने झीगुर छगोड़ी सॉप वीछिन की वात जू। कंटक-कलित निन-दलित बिगन्व जल निलके तलप-तल ताकों ललचात जू। कुलटा कुचील गात अन्ध तम अवरात कहि न सकत बात अति अकुलात जू। छेंडी मे घुसौ कि घर ईधन के वनस्याम पर-घरनीनि पहं जात न घिनात जू यहॉ वीभत्स एवं शृंगार-रस का तो साकर्य है, किन्तु बीभत्स-रस ने श्ृंगार को इस प्रकार दवा लिया है कि शृभार-रस ऊपर उठ ही नही सका है। किया का अनौचित्य क्रिया का प्रयोग कर्त्ता-कर्मादि के अनुसार होना चाहिए। व्याकरणसम्मत होते हुए भी अमुक कियाओ का अमुक अर्थ में प्रयोग सस्कृत मे निपिद्ध है। बजभाषा एवं अवधी मे भी इस प्रकार की व्यवस्था है। कोमलता की व्यजना के लिए किया का रूप ईपत् परिवर्तित कर दिया जाता है। रीतिकाव्य मे क्रिया के रूपो मे मनमाना परिवर्तन करने के लिए देव बहुत ही ख्यात हैं। 'देवजू' मोहिंन लागे फिरै, गहिके गहिरे रंग मैं गहिराऊ- पीत पटा पहिरो है भटू उन्हे नील पटा अपनो पहिराऊ- बांसुरी की बनी तानन सों ब्रज की बनितान सबे वहिराऊ.3 यहाँ देव ने गहरा, बहरा आदि विशेषणो से गहराना, बहिगना आदि करियाएँ बनायी हैं। फिर उन कियाओ का आज्ञाथक प्रयोग किया है। क्रियाएँ अंत में दीर्घान्त कर दी गई है। डॉ० नगेन्द्र इसकी आलोचना करते हुए लिखते है- "यहाँ एक तो 'गहरो' मे आज्ञा में 'गहराउ' बना लेना ही व्याकरणसम्मत नही है, फिर दीर्घान्त कर

'१ विश्यनाथप्रसाद मिश्र- पद्माकर ग्रन्थावली (भुमिका), पृ० ७८ २. वहो, केशव ग्रन्थावली, खड १ पृ० ५७ * ३. डॉ० नगेन्द. देव और उनकी कविता प० २२४

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रीसिकाव्य मे औपित्य व्यावहारिक तमायोग २०५

देना तो स्वथा अनियमित हैं। यही बात 'हिराऊ', 'वहिराऊ' के लिए भी कही जा सकती है।" प्रान ले साथ परी-पर-हाथ बिकानि की बानि पै कानि 'बखेरी'। घनानद के इस उदाहरण मे 'बखेरना' करिया का 'विकानी' के साथ सम्बन्ध असंगतिपूर्ण है। यहां प्रयुक्त क्रिया अभीष्टार्थ की अिव्यक्ति करने मे असमर्थ है। यहाँ पर अनुपपत्ति नामक दोप आ गया है। एक स्थान पर घनानद ने 'परेखना' किया" का 'प्रायश्चित करना' के अर्थ मे प्रयोग किया है, जो उचित नहीं है। कवि सतिराम आइ आरस जम्हाइ मुख, ऐसो मनभावती की छवि सरमत है।।3 अत्य अनुप्रास के मोह मे मतिराम ने यहाँ 'सरसति है', किया-प्रयोग के स्थान पर 'सरसत है' कर दिया है। करिया का कर्त्ा 'छवि' शब्द स्त्नीलिग है, अत उसके अनुरूप क्रिया भी स्वीलिग मे होनी चाहिए। उसी छद् में प्रयुक्त अन्य करियाएँ- बिलसत, बिगसन, सरसत ठीक है।

कारक का अनौचित्य कार्क का प्रयोग जब लुप्त, अनुक्त या अनुपयुक्त (रीनि से) होता है तब उसे कारक-अनौचित्य कहा जाता है। झूठे जानि न संग्रहे, मन मुँह-निकसे बैन। याही ते मानहू किये बातन कौ विधि नैन ॥5 बिहारी ने यहाँ 'मग्रहे' त्रिया का भूतकालिक प्रयोग कर उसके कर्ता मे कर्ता कारक चिह्न का लोप कर दिया है। परिणानत अर्थ उलझ गया है। प्रानपिया मनभावन संग अनंग-तरगनि रग पसारे।4 यहाँ मतिराम ने मनभावन और सग के बीच सम्बन्ध-द्योनक चिह् का लोप कर अर्थभ्राति की सभावना बढा दी है। इसी प्रकार- छवि-जुत छीरधि तरमनि बढावत है, जगत पसारत चमेली की सुदाम कौ।4 में 'तरंगनि बढावति' में करण कारक; 'छीरधि तरंगनि' मे सम्बन्ध कारक; 'जगत पसारत' में अधिकरण कारक का लोप भी अर्थ को उलझा देता है।

१. डॉ० मगेन्द्र देव और उनकी कविता, पृ० २२४ २ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : घन आनद्र कवितत, मृ० २०३ ३ हरदयानुसिंह मतिराम-मकरद पृ० १४३ ४. विश्वनाथप्रसाद मिश्र बिशरी, प० १६७ *. हरद्यालुसिंह . मतिराम-मकरड, प० ६X ६. रही, प० १७६

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२०६ रीसिकाव्य में ओचिष्य व्यावद्वारिक समायोग

देव अहों बलि हौ वलिहारी, तिहारी सी प्रीति निहारी न मेरे।१ कल हस कलोलत है कल 'सो'-६ खुले भुजमूल प्रतिकूल विधि वक ममैं'। देव ने इन स्थानों पर कारक लोप, एक कारक के स्थान पर दूसरे कारक का प्रयोग अथवा विकल्प से कारक प्रयोग कर अर्थ को उलझा दिया है। उदाहरग सख्या १ मे 'मेरे' का प्रयोग 'मैने' के स्थान पर किया गया है। उदाहरण २ मे 'सो' कारक निह्न व्यर्थ-निश्थक प्रयुक्त किया गया है। उदाहूरण ३ में 'मैं' का प्रयोन 'सो' के स्थान पर हुआ है। करण कारक के स्थान पर यहाँ अधिकरण कारक का प्रयोग हुआ है। देव के कारक-चिह्नो के प्रटोग पर डॉ० नगेन्द्र ने समुचित चिंता व्यक्त की है।४ लिंग का अनोचित्य

शब्दों का प्रयोग करते समय उनके लिंग-सम्बन्धी औचित्व का निर्वाह करना चाहिए। विचेषण-विशेष्य मे भी इस प्रकार के औचित्य के निर्वाह का बराबर ध्यान रखा जाए। इसका भग ही लिग-अनौचित्य कहलाता है। केशव ने इसके पालन पर विशेष ध्यान नहीं दिया प्रतीत होता हे। कही-कही सस्कृत शब्दो को हिन्दी के विशेष अर्थ मे एवं विशेष लिंग मे प्रयुक्त करने से उनके काव्य मे यह दोष विशेष प्रबल हुआ है- सीताजी के रूप पर देवता कुरूप को है।* पीछे मघवा मोहि गाप दई।६ अंगद रक्षा रघुपति कीन्हों।9 यहाँ केशब ने 'देवता' शब्द को 'देव नारियाँ' अर्थ में प्रयुक्त किया है। 'देवता' शन्द मस्कृत में स्वीलिग है, किन्तु ब्रजभाषा में वह पुल्लिंग है तथा 'देवियो' का अवाचक है। दूसरे उदाहृरण मे 'शाप' के संदर्भ में 'ई क्रिया का स्त्रीलिंग-प्रयोग उचित नही है। इसी प्रकार 'अंगद रक्षा रघुप्नि कौन्हों' मे 'कीन्हों' क्रिया-प्रयोग भी उचित नहीं है। 'कीन्ही' ही उचित प्रयोग है। कितौ मिठास दयौ दई इत सलोने रूप।प

१ डॉ० नगेन्द्र : देव और उनकी कचिता, पृ० २२२ २. वही। ३वही। ४. वही। ५ लाला भगवानदीन केशय कौमुदी, भाग २, T०३३ ६. वही, भाग १, पृ० १६६ ७. वहो, प० २२२ 5. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : बिहारी, ५० २०६

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र्रीतिकाव्य में औचित्य व्यावहारिक समायोग २०७

बिहारी ने मिठास शब्द का पुल्लिंग मे प्रयोग किया है, जो उचिन नही है। बारिचर बिरची इलाज जय काज की। १ सतिराम ने 'इलाज' को स्त्रीलिंग में प्रयुक्त किया है। 'इलाज' पुल्लिंग है और उसका पुल्लिग े ही प्रयोग होना चाहिए था। मतिराम तब रसराज बखानी।" # मतिराम ने 'बखानी' क्रिया का स्त्रीलिंग में प्रयोग किया है। यहाँ 'रसराज' के सदर्म में वह पुल्लिग में प्रयुक्त होनी चाहिए थी। उचकै कुच कंद कदब-कली-सी ।3 भूपति भगीरथ के जसकी जलुस कैधी प्रगटी तपस्या पूरी कैधौ जन्हु जन की।6 अखियाँ सिराती ताप छाती की बुझाती रोम रोम सरसाती तन सरस परसते॥2 उदाहरण संख्या ३ मे देव ने कुचकद गब्द का स्त्नीलिंग मे प्रयोग किया है, जो सर्वथा अनुचित है। उदाहरण ४ मे पन्माकर ने जस की जुलूम में जुलूस को स्तीलिंग मे प्रयुक्त किया है, जबकि उसका पुल्लिग प्रयोग होना चाहिए। उदाहरग ५ मे सेना- प्रत्ति ने 'रोम रोम' का प्रयोग स्त्रीलिग मे किया है, वह उचित नही है। रीतिकालीन कवियो ने लिंग-प्रयोग के विपय मे कोई विशेष सजगता से कोम नही लिया प्रतीत होता है! कहीं छन्दानुरोध से, कही संस्कृत के प्रभाव से, कही लय की रक्षा में, कही मनस्विता के कारण ऐसा हो गया है। वचन का अनौचित्य वर्ण्य-वस्तु को उसके अनुरूप एक वचन या द्विवचन एवं बहुवचन में वित्यस्त न करना वचन-औचित्य का भंग करना है। संस्कृत में नेत्र, स्तनादि का नित्य द्विवचन एव प्राण का नित्य बहुवचन प्रयोग गास्त-निर्दिष्ट है। हिन्दी में इस प्रकार का कोई बन्धन तो नही, फिर भी सर्वनाम (पुरुष वाचक) के उत्तम, मध्यम और अन्य पुरुप- भेदों के एक वचन एवं बहुवचन सम्बन्धी प्रयोंगों के साथ किया की संगति का बराबर विचार करना चाहिए। इसी प्रकार विनेष्य एव विशेषण के बीच भी यह संगति ठीक- ठीक बैठनी चाहिए। भूपण में विशेषणों एवं क्रियाओ को बहुवचनात्त एव स्व्रीलिंग कर देने की प्रवृत्ति विशेष पाई जाती है। अविकारी विशेषण भी भूबण के हाथ मे पडकर विकारी बन जाते हैं-

१ हूरदयालुसिंह : मतिराम-मकरंद, पृ०१७१ २. वही, पु० ६१ ३ डॉ० नगेन्द्र. देव और उनकौ कविता, पृ० २२० ३. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : षद्माकर ग्रन्थावली, पृ० २६२ ५ उमाशकर शुक्ल कबित्त रत्नार्कर (भूमिका), पृ० ३८'

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रोतिकाव्थ में मौचित्म व्यावहारिक समायोम

लालियां मलिन मुगलानिया मुखून की।"१ 'मुगल स्त्रियो की मुख-लाली मलिन हो गई' यह कहने के लिए उन्होंने लाली को भी वहु- वचनात कर दिया है। इसी प्रकार-तनियाँ, सुथनियाँ, पगनियाँ, सेजिया, छहिया, रहिया, बालियाँ, आलियों आदि प्रयोग भी किये गये है जिनमे कुछ उचित है, कुछ अनुचित ! संज्ञाओं का बहुवचन करना उचित क्रियाओ एव विरेषणो का बहुवचन करना कुछ जँचता नही है। एक अन्य उदाहरण देखिए-3 आगरे अगारन हँ फॉदती कगारन हूँ बाधनी न वारन मुखन 'कुम्हिलानियां'। 'मुख' के संदर्भ में 'कुम्हिलानियाँ' प्रयोग संगतिपूर्ण नही जान पडता। वोलत कसे सृगुपति सुनिये सो कहिए तन मन बनि आबै। आदि बड़े हौ बड़प्पन रच्ए, ताहित तूं सब जग जस पावै।।5 उठो ही होहु न काज कीजं। कहाँ कछ राम सो मानि लीजे। अदोष तेरी सुत मानु सोहै। सो कौन माया इनकी न मोहै ॥9 केशव ने यहां भगुपति के लिए प्रथम पंक्ति में आदरसूचक 'सुनिये', कहिये' का प्रयोग किया है; दूसरी पक्ति के पूर्वाद्ध में तुम और उत्तरारज मे 'तूँ' प्रयोग किया है। एक ही व्यक्ति के लिए आप, तुम और तू का प्रयोग उपेक्षा या अवज्ञा की व्यजना करते हुए भी उचित नहीं जँचता। 'तूँ' प्रयोग तो निश्चय ही खटकता है। केशन-प्रेमी लाला भगवानदीनजी भी केराव के इस प्रयोग को चित्य मानते हैं। इसी प्रकार गंगाजी द्वारा भरत के लिए प्रारम्भ मे 'उठो', 'होहु', 'कीजै' का प्रयोग करवाया गया है और दूसरी पंक्ति में 'तेरी' का प्रयोग हुआ है। यह भी सुसंगत नहीं जान पडता। जाके एक-एक रोम कृपनि मैं कोटिन, अनन्त ब्रह्मांडनि को बुन्द विलसत है। मतिराम ने 'रोम' को एकवचन और 'कृपनि' को बहुवचन मे प्रयुक्त किया है, जो अमं- गत है। पायनि के चित चायन को बल लोलत लोग अथायनि बैठयौ।प

१ पं श्यामबिहारी मिश्र तथा प. मुकदेव विहारी मिश्न : भयम प्रत्यावली, पृ० ११० २. बही। ३ै. महो, पृ० ११० ४ लाला भगवानदीन : केशव कोमुदी, भाग १, पृ० १९

वृही, पृ० ११४ ७. हरदयालसिंह : सतिराम-मकरंद, पृ० १८४ 5. डॉ० नगेन्द्र : देव औोर उनको कविता, पृ० २२०

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रीतिकान्य में ओचिय व्यावहारिक समायोग २०६

त्यौ पुलक्यौ जल सो झलक्यौ उर, औचक ही उचकी कुच-कद सौ।' देव 'जू' बाढत ओप घरी मल, त्यो ही नितम्ब भयो कछु भारो ॥२ देव ने 'लोग' को एकवचन मे 'कुच' एव 'नितम्ब' को भी एकवचन में प्रयुक्त किया है, जो उचित नही है। विशेषण का अनौचित्य

विशेषण का अनुचित प्रयोग विशेषण-अनौचित्य है। प्रयुक्त विशेषण यदि विशेष्य की विशेपता का समुचित प्रकाशन न कर पाता हो और अर्थ वैपरीत्य प्रति- पादित कर देता हो, तो उसे उस रूप मे प्रयुक्त करना उचित नहीं। प्रफुलित होन भान के उदोत कज-पुज, ता बिन बिचारनि ही जोति-जाल तनी है।3 यहॉँ घनानन्द ने 'विचारनि' विशेषण का 'बेचारे' के अर्थ मे प्रयोग किया है। चातको के लिए प्रयुक्त यह विशेषण उनकी विवशता का प्रकाशन करने मे उतना समर्थ नही होता, जितना 'विचार' शब्द के बहुवचन की भ्रांति फैलाने मे समर्थ होना है। इस विशेषण का रूप छन्दानुरोध से बिगाड़ दिए जाने के कारण 'अर्थान्तर प्रतीति' नामक दोष आ गया है। 'बिचारनि' विचार शब्द के बहुवचन का अर्थ भी देता है।४ घनानन्द की स्वच्छन्द प्रवृत्ति के कारण इस प्रकार के कुछ प्रयोग उनके काव्य मे पाये जाते है।

उपसर्ग का अनौचित्य

उपसर्ग भाषा की बड़ी शक्ति है। उनकी सहायता से शब्द-निर्माण में बहुत सरलता होती है, किन्तु उनका प्रयोग भी सुचिंतित होना चाहिए। महज प्रयोग के खातिर उपसर्ग का प्रयोग काव्यार्थ की हानि करता है और इससे स्वय भी व्यर्थ सिद्ध होता है। रीति-कवियों मे केशव ने उपसर्गो के प्रयोग मे स्वेच्छाचार से काम लिया है। निम्नलिखित उद्धरणों से यह बात भली-भाँति पुष्ट हो जाएगी।- ले गये नृपनाथ को सब लोग श्री सरजूतटी। राजपत्नि समेत पूत्ननि विप्रलाप गटी रटी। सस्कृत में वि और प्र उपसर्गों की सहायता से कमश विलाप और प्रलाप शब्द बनते है, जो रुदन की अधिकता की व्यंजना कर देते हैं। परन्तु केशव ने यहाँ पर वि

१ डॉ० नगेन्द्र देव और उनकी कविता, पृ० २२० २ वही पृ० २२० ३. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : घनग्रानन्द कवित्त, प० २० ४ डॉ० मनोहरलाल गौड. धवानद सपैर स्वच्छन्दर काव्यधारा, पृ०२०६ ५ लाला भगवानदीन : केशव कौमुदी, भाग १, पृ० १५८

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२१० रीतिकान्य मे औचित्य व्यावहारिक समायोग

और प्र दोनों उपसर्गों की सहायता से एक सर्वथा नवीन शब्द 'विप्रलाप' निर्मित कर दिया है, जो रुदन की तीव्रता का बोध कथमपि नहीं करा पाता, बल्कि विप्र+लाप विप्र का रुदन या विप्र का जल्पन ऐसे भ्रात अर्थ का बांध करा देता है। यह उप- सर्ग-प्रयोग निश्चय ही अनुचित है और उससे इष्ट प्रभाव की व्यजना नही हो पाती है। इत जामवन्त अनत राक्षस लगब लक्षन ही हने। मृगराज ज्यो वनराज में गजराज मारत नीगने ।।१ केशव ने यहाँ पर नीगने को 'असस्य के अर्थ मे प्रयुक्त किया है। नि+गने 'नीमने' प्रयोग मे सस्कृत-प्रत्यय और व्रजभापा-प्रकृति का वेमेल मयोग ही आपनिकर है, दूसरे यह कि उसका दीर्घीकरण भी उचित नही। इन्ही आपनयो का विचार करते हुए आचार्य विर्वनाथप्रसाद मिथजी ने उसका पाठ नागने कर दिया हे, जो बहुत कुछ उचित प्रतीत होता है।२ निपात का अनौचित्य च, वै.तु, अपि आदि निपातो का केवरू पादपूरणार्थ प्रयोग काव्य मे आहत नही होता। इन निपातो का पयोग अर्थ की गरिमा-वृद्धि करने में होना ही इप्ट है। इनमे काव्यार्थ का वैशिष्ट्य बढ़ना चाहिए। निपातो के निरर्यक व आत प्रयोगों से अर्थ का अपकर्ष होता है। सिर तें पावन पादुका लै करि भरथ विचित्न। चरनकमल-तरहरि बरी हँसि पहिरी जगमित्र।३ केशव ने इस छन्द मे 'तरहरि' पद का 'नीचे' के अर्थ में प्रयोग किया है। यह गरहरि' निमात इष्टार्थ की सद्य. व समुचित प्रतीनि नहीं करा पाता। राजसभा महँ स्थान बोलायो। रामहिं देखत ही सिर नायो। राम कह्यो जु कछ दुख तेरे। स्वान निसक कहौ पुर मेरे॥ राजसभा मे राम के समक्ष खवान का आगमन व उसका निवेदन आदि प्रसंग स्वतः कितना अनुचित व अप्रासंगिक है यह सुविदित है। केशब ने यहॉ अनिम चरण मे 'पुर' निपात को संस्कृत के अर्थ में-'पुरस' (पुरः)- प्रयुक्त किया है। पुरः का अर्थ होता है-समक्ष या सामने। संस्कृत मे पुर. सदैव विसरगयुक्त ही अयुक्त किया जाता है। सन्धि के नियमो के अनुसार जहाँ विसर्ग का लोप होगा, वहा वह विसर्ग- हीन भी रहेगा (यद्यषि ऐसी स्थिति मे वहाँ '5' चिह्न आ जावेगा)। विसर्नहीन प्रयोग के कारण यहाँ पर यह निमात प्रकृतार्थ से भिन्न 'पुर' नगर का बोव करा देता है।

१ लाला भगवानदीन केशव कौमुदी, भाग २ पृ० १६ २. विश्वनाथप्रसाद मिश्र : केशव प्रथावली, खड २, ५ृ० ३४५ ३- वही, पृ० ३४७ ४. वही,, पृ० ३६७

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रीतिकाव्य मे औचिय व्यावहारिक समायोग

मूल अथ है-तुम्हे जो कुछ दुःख हो मेरे समक्ष कह दो। भ्रांत अर्थ होगा-मेर नगर मे तुम्हें जो दुख हो सो कह दो। दोनों उदाहरणों में निपातानौचित्य है। काल का अनौचित्य काल-अनौचित्य से तात्पर्य है किमी क्रिया का अनुचित काल मे प्रयोग और दूसरा-मेतिहामिकना का भंग। इतिहास की दृष्टि से जो वस्तु-वर्णन-रीति-रस्म आदि किनी विशेष युग मे प्राप्त नही होते हो, उनका उम काल में व्णन कर डालना भी काल-अनोचित्य माना जाता है। मतिराम, सेनापति, केशव आदि को रचनाओ मे कुछ ऐसी काल-गत विच्पुतियाँ उपलब्ध होनी है। लाल तिहारे चलन की, सुनी बाल यह बात। सरद नदी के सोत लौं, प्रतिदिन सुखति गान।।' प्रिय के चलन की बात सुनते ही बाल (नायिका) गरद ऋतु के सरित्रवाह की भाति भूखने लगनी है। मतिराम की इस कल्पता मे स्पप्ट विसगति यही है कि वरद् ऋतु मे तो प्रायः नदियों के प्रवाह में गति रहती है। वर्वा काल के पानी से भरी ये नदियाँ अपने दोनो किनारो को छूकर बहती है। यदि जेठ मास के नरित्परवान मे तुलना करते तो समीचीन होता। चीर के हरत बलवीर जू बढामौ चीर, दौरि मारि डाइयों न दुसासन प्रगटि कै। सेनार्पात जानि याकौ जान्यौ है निदान, सुनि जुगति बिचारौ जौब रावरे मन टिकैं। जोई मुख मॉग्यौ, सोई दीनौ बरदान, ओप दीती द्रौपदी कौं, रही पर सौ लपटि के। रोवत मैं श्ीवर कहत कही छीबर, सु मेरे जान याते चले छीवर उपटि कै।। सनापति के इस वर्णन का तात्पर्य है कि दौपदी को छीवर (छींट) का बस्त् पहनाकर वीच सभा मे उसकी लाज रख ली। यह निश्चिन, पूर्णतया निस्सदिग्ध भाव से कहा नही जा सकता कि पाण्डवो के समय मे छींट का कपडा था ही। ब्कि यो कहा जा सकता है कि वह नहीं ही रहा होगा। इसी प्रकार सनापति ने राम के दल का वर्णन भी किया है। संस्कृत नाटको से राम के धूत-कीडा का और धृत के समय बाजी मे सीता के वस्तालकारो को लगा देने का वर्णन पाया जाता है, अत, वह ऐसा आपलिकर नही, कित्तु पाण्डवो के काल में छीट का कप्डा रहा होगा या नहीं वह प्रश्न निश्चय ही विकट है।

१ हरवयालुसिंह : मतिराम-मकरद, पृ० २३ २. उमाशकर शुक्ल, कवित रत्नाकर, पृ० १०७

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२१२ रीतिकाव्य में ओचित्य व्यावहाररिक समायोग

केशव ने तो राम के समय मे जैना, मठधारियों, यवनों की निन्दा की है। सनादय ब्राह्मणो की स्तुति की है। तथा भीम, अर्जुन आदि पेड़ो के नाम-सादृश्य-मात्र से पाण्डवो की चर्चा की है- पाण्डव की प्रतिमा सम लेखो। अर्जुन भीम महामति देखो।।' यहाँ इलेप के चमत्कार के लिए काल-भग कर पाण्ड सुतों का स्मरण किया गया है। पद्माकर ने युद्ध-वर्णन के प्रसंग में ऐसे अनेक आयुधो-बन्दको का वर्णन कर डाला है, जो उनके समय मे उस युद्ध में प्रयुक्त हो नही हुए थे।२ देश का मनौचित्य देश और काल की अनुरूपता का विचार कर किया गया वर्णन तद्विषयक औचित्य कहलाता है। उसके अभाव को देश-अनीचित्व की नज्ञा प्राप्त होती है। वर्णन के प्रवाह मे या व्यामोह के कारण सभ्यक देशादि के अनुरूप वर्णन न करके कवि उसे अनौचित्य का भाजन बना देता है। केशव कृत प्रकृति-निरूपण या प्रकृति-वर्णन बहुधा इस प्रकार के अनौचित्य से ग्रस्त है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि केशव का प्रकृति से प्रत्यक्ष व जीवंत सम्बन्ध नही था। उनका प्रकृति-व्णन अधिकाशतः शास्तीय परिपाटी पर निर्दिष्ट कुछ संकेतों पर ही आधृत है-जहाँ प्रति सरोवर को हंस युक्त, कमलयुक्त अंकित करने, चंद्रिका को शुक्लवर्ण, तमिस्ा रजनी के अँधकार को प्रगाढ अंकित करने आदि का (दे० आचार्य हेमचन्द्र कृत काव्यनुशासन, पृ० २३) बना-बनाया विधि-विधान है। केशव के प्रकृति-वर्णन के विषय मे डॉ० पीनाम्बरदन इडथ्वाल ने उचित ही कहा है-"मनुष्य-जीवन के भीतर तो केशव की अंत्द्प्टि कुछ दिखाई भी देती है, पर प्रकृति के जितने भी वर्णन उन्होने दिए है, वे प्रकृति-निरीक्षण से प्रभावित होने का जरा भी परिचय नहीं देते।"3 केशव के उपवन-वर्णन, आश्रम-वर्णन, बाटिका-वर्णन में देश-औचित्य के निर्वाह का कोई ध्यान नहीं रखा गया है। विशेषतः जनक के उपवन-वर्णन की निम्नलिखित पक्तियाँ द्रष्टव्य है- एला ललििन लनंग सग पुगीफल सोहै। सारी शुक कुल कित चित्त कोकिल अलि मोहै। शुक राजहस कलहंस कुल नाचत मत्त मयूर गन। अति प्रफुलित फलित सदा रहै केशवदास विचिन्न बन।6

". नाला भगवानदीन वेशव कोमुदी, भाग १, १० १७६ २ विश्वनाथप्रसाद मिश्र : पदभाकर प्रथावली (भूमिका), पृ० ४६ ३ डॉच पीताम्बरदत्त बडभ्वाल : सक्षिप्त रामचद्रिका (भूमिका), पृ२६ ४. साला भगवानदीन केशय कामूदी, भाग १, पृ० ३५.

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रीतिकाव्य में औषित्य : व्यावहारिक मूसायोग २१३

केशव ने यहाँ जनक के उपवन मे एला, लबग, नारिकेल, पुंगीफल आदि के वर्णन में देशगत औचित्य का भंग किया है। वर्णन की झोक मे आकर कवि ने यह नहीं सोचा कि बिहार की भूमि में ये सब वनस्पतियाँ एक साथ नही हो सकती। स्वभाव-अनौचित्य स्वेभाव कहते है प्रकृति को । काव्य मे उत्तम, मध्यम व अधम प्रकृति के एवं दिव्य, अदिव्य एव दिव्यादिव्य प्रकृति के पात्रो का निरूपण होता है। इन पात्ो का आचरण उनकी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप होता है। उस अनुरू्यता का निर्वाह न करना प्रकृति अथवा स्वभावगत अनौचित्य है। धर्म करत अति अर्थ बढावत। संतनि हित रति कोविद गावत। सतनि उपजत हो, निति वासर। साधत तन मन मुक्ति महीवर।3 कुभकर्ण की यह उक्ति रावण के प्रति उपदेश के रूग मे कही गई है। उपदेश अच्छा है, परंतु राक्षस-प्रकृति के उपदेष्टा के मुख से निर्गत है। एक अन्य स्थान पर केशब ने रावण की पत्नी मंदोदरी द्वारा रावण की भ्त्सना तथा गत्रु राम की वक्ति की प्रशमा करवाई है। ये सारे स्थल प्रकृति अथवा स्वभावगत औचित्य से विहीन है। लोक-अनौचित्य गीतिकाल मे कुछ रचनाएँ ऐसी भी हुई है, जो लोक-सीमा का अतिकमण कर जाने के कारण अनुचित समझी जा सकती है। उनके रचयिताओं ने युगीन प्रभाव में आकर या वर्णन के व्यामाह में पडकर इस बात का कतई विचार नही किया कि इस प्रकार के सृजन को समाज द्वारा अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। इन रचनाओं के औचित्य का निर्णय न तो काव्यशास्त्र करेगा, न कवि की अतरवति। इनके औचित्य-अनौचित्य की कसौटी है लोक-हृदय। रति-योग, दिवा-रति, विपरीत रति, आलिंगन, देवर-भाभी के बीच अनुचित सम्घन्ध, पर-पुरुष के प्रति विवाहिता की अनुरक्ति, केलि-भवन की कीडाओ का अरसंयत वर्णन, एक साथ ही दो रमणियो से अनुरक्ति व उसका प्रकट प्रकाशन, होली का अनियंत्रित वर्णन आदि ऐसे कुछ चित्र हैं, जो सामाजिकता के आधार पर निश्चय ही अनुचित माने जाएँग। देवर-भाभी का अनुचित सम्बन्ध औरि सबे हरषी हँसति गावति भरी उछाह! सुही बहू बिलखी फिरै क्यो देवर के ब्याह ॥3 १. लाला भगवानदीन : क्रेशव कोमुदी, भाग १.पृ० ३१ २ बही, पृ० ३२०-३२३ . ३. विश्वनायप्रसाद मिश्न :विहारी, पृ० १७२

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२१४ सातकाव्य मे आिय व्यावहाारक समायोग

देवर से अनुरक्त इस नायिका की-देवर के विवाह के अवसर पर -उदामी नता की कवि ने व्यजना की है। घर और पडौस की सारी स्त्रियाँ उत्साहित है, अकेली वह ही बिलखी फिरती है। देवर के प्रति अनुराग ही इस उदासीनता का सुग्य कारण है। देवर फूल हने जु हठि उठे हरपि अँग फूलि। हँसि करत औपधि सखिन देह ददोरनि भूलि॥१ नायिका का अपने देवर के साथ गुप्त प्रेम है। देवर ने नायिका पर फूल फेके। जिन अगों पर फूल लगे, वे सब ह्पोत्फुल्ल हो गए है। मखियाँ इन फलनो को ददोरा (मच्छर आदि काटने से होने वाला फूलन) समझकर औषधि करने को उदव होती है। सखियो के इस भ्रम पर नायिका हँस पड़ती है। देवर-भाभी के गुप्त प्रेम का यह वर्णन भी अनुचित है। कहति न देवर की कुबत कुलतिय कलह डराति। पजर-गत मंजार-ढिग सुक लौ सूकति जाति॥२ यहाँ भाभी तो सुशीला कुलवधू है, मगर देवर छैला है। वह निरन्तर इस प्रतीक्षा मे है कि कब अवसर प्राप्त हो। भौजाई बेचारी न तो देवर की बात कह सकती है न सह सकती है। एक तरफ गृह-कलह का डर है तो द्ूसरी तरफ पातिव्रत भग का। बिल्ली के पास पिजड़े मे बन्द शुक की भाँति वह नित्य प्रति सखती जाती है। ऊपर के उद्धरणों में प्रथम दो तो निश्चय ही अनुचित हैं, क्योंकि इनमें देवर- भाभी के प्रेम का, अनुचित सम्बन्ध का वर्णन किया गया है। तीसरा भी एक रीति से अनुचित ही समझा जावेगा, जहाँ देवर की वासनामूलक कुबृति का सकेत किया गया है। विपरीत-रति-वर्णन पर्यौं जोर बिपरीत रति रूपी सुरत-रन धीर। कर्रात कुलाहल किंकिनी गह्यौं मौन मजीर॥3 ऊध्वंवर्ती मजीर विपरीत रति के कारण अधोवर्ती होने से मौन हो गए हैं तथा अधोवर्ती किंकिणी ऊर्ध्ववर्ती होकर मुखर हो उठी है। सुरन-रण-वीरा नायिका दृढता- पूर्वक ऊपर डटी है और नायक नीने पड गया है। विपरीत-रति का यह वर्णन किसी प्रकार से उचित नही समझा जा सकता। बिनती रति विपरीति की करी परसि पिय पाय। हँसि अनबोले हीं दियौ ऊतर दियौ बुलाय॥४

विश्वनाथप्रसाद मिश्र : बिहारी, पृ० १६३ वही, पृ० १३४ ३ यही, पृ० १६८ ४. वही, पृ० २०२

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रीतिकाव्य मे ओचिय व्यावहारिक समायोग २५

प्रिय ने प्रिया के चरण लूकर विपरीत रति की कामना संकेतित की। प्रिया ने हँसने हुए दीपक को बढ़ाकर बिना बोले ही अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। यह वर्णन ऊपर के वर्णन की तुलना में ईषत् संयत है फिर भी विपरीत-रति की कामना का प्रकाशन होने से वह महृदय-श्लाघ्य नही बन सकता। मेरें वूझ्न बान तू केत बहगवति बाल। जग जानी विपरीत-रति लख्ि बिंदुली पिय-भाल ।।१ नायिका ने नायक का तथा नायक ने नामिका का वेश धारण कर विपरीत रति की ककिया सम्पन्न की है। सखी द्वारा प्रश्न किए जाने पर नायिका बान बहगती है। इस पर सख्वी कहती है कि तू बात क्यो बहराती है-प्रिय के भाल मे तेरी बिंदिया देखकर साग समार जान गया है कि तुम दोनो विपरीत-रति में प्रदृत्त रहे हो। यहाँ विपरीत-रनि क्रिया की मम्पन्न होने की अवस्था का वर्णन बहुत अरुचिकर प्रतीत होता है। राश्रा हरि हनि राधिका बनि आए सकेत। टपति रति-विपरीत-सुख महज सुरत हूँ लेत।।२ कृप्ण ने राधा का, राधा ने कृष्ण का वेश धारण किया है। और साधारण रति मे भी विपरीत-रति का-सा सुख प्राप्त करते है। यहाँ रति तो स्वाभाविक ही वर्णित है, परन्तु वेश-धारण मे विपरीत का सुख अनुभव किया जा रहा है। विपरीत-रति का वर्णन अकेले बिहारी ने ही किया हो मो बात नहीं। मतिराम ने भी अपनो 'मतिराम सतसई' में स्थान-स्थान पर विपरीत रति का वर्णन किया है।3 ये सारे वर्णन सामाजिकता के विचार मे अनुचित है तथा उनसे किसी प्रकार का आस्वाद संभव नही है। दिवा-रति बिपरीत-रति की ही भाँति दिवा-रनि की इच्छा अथवा उसका क्रिया-व्यापार- वर्णन भी अनुचित समझा जाना है। मतिराम ने एक स्थान पर ऐा वर्णन किया है- केलि की रात अघाने नही, दिन में ही लला पुनि घात लगाई। प्याम लगी कोउ पानी दे जाय, यो भीतर बैठि के बान सुनाई। जेठी पठाई गई दुलही, हुँसि हेरि हर 'मतिराम' बुलाई।

विश्वनाथप्रसाद मिश्न बिहारी, पृ० २०६ २. वही, प्० २१० उरशालुरमह : मतिराम-मकरद, पृ० २२=

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२१६ रोतिकाव्य मे आिय न्यावहारिक समायाग

कान्ह के बोल मे कान्हू न दीन्हो, सु गेह की देहरी पै धरि आई॥1 यहाँ मूल प्रश्न है 'दिवा-रति' के औचित्य-अनौचित्य का। साहित्यशास्त्र को दिवा-रति के प्रति कोई आपत्ति सभवत न हो, परतु आचार-शास्त्रीय विधान उसे उचित नही ही समनेगा- दिवाभागे महाभाग यो गच्छेत् रमणी नर। स्वल्पायु स भवेदानुः सत्य सत्य न सगय ।। दिवाभागे व्रजेत कोऽपि रमणी यदि कामत! तज्जाततनयो व्रह्मन् नहावापी भविष्यति ॥2 पर पुरुष के प्रति विवाहिता की अनुरवित इसका अनौचित्य तो काव्यशास्त्र मे भी 'रसाभाम' शीर्षक के अनर्गत स्वीकार किया है। ऐसे स्थानों पर शृगार नही, शृंगाराभास ही समझा जाएगा। मतिराम के कुछ स्थल इम दृष्टि से चित्य है- कत चौक सीमन्त की, वैठी गॉठ जुराइ। पेखित्र परोसी कौ पिया, घूँघट मे मुसिन्याइ।3 पति के साथ सीमन्त सस्कारार्थ पूजा मे बैठी नायिका पडौसी की ओर देख कर घूँघट मे ही मुस्करा रही है। व्यंजना यह है कि पुरुषार्थ किसी का है, फल-प्राप्ति कोई कर रहा है। बिहारी ने भी एक-दो स्थान पर ऐसे वर्णन किए है- चाले की बाते चली तुनत ससिनु के टोल। गोएंहूँ लोइन, हॅसत, बिहुँसत जत कपोल।।४ अपनी ससुराल के ही सभीपवर्ती किसी ग्राम मे रहने वाले अपने उप-पति से मिलन की सम्भावना से नायिका गौने की चर्चा चलते ही अपार हर्षित हुई कि वह हुष नेत्र, कपोलादि, के द्वारा फूट पडा। देह-लग्यौ ढिग गेहपति, तऊ नेह निरबाहि। नीची अखियन ही इनै गई कनसिि मनु चाहि।4 स्वपति मे मिली नायिका ने नीची अॅखिियो से कनखियो मे ही उपपति के प्रति अनुराग प्रकट कर उसे प्रसन्न कर दिया।

१ हरद्यालुसिंह. मतिराम-मकरंद, पृ० ६४ २. प० कृष्णबिहारी मिश्र : मतिराम ग्रन्थावली (परिचय भाग), पृ० १३= १ ३. हरदयालुसिंह : मतिराम-मकरद, पृ० २०१ ४ रत्नाकर •बिहारी रत्नाकर, पृ० ६० ५ वही, पृ० १६३

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रीतिकाव्य म औचित्य व्यावहारिक समायोग २१७

दो नायिकाओं के प्रति एक साथ ही प्रेम-प्रदर्शन रसशास्त्रीय दृष्टि से यह स्थिति अनुचित एव असूयोत्पनिजनक है, और समाजगास्त्रीय विचार से आपत्तिकर नी। मतिराम ने सस्कृत कवि अभरुक की रमिकना को सात करते हुए दो कदम आगे बढकर ही वर्णन किया है- बैठी एक मेज पे सलोनी मृगनैनी दोक, आनि तहाँ प्रीतम सुधा ममूह बरसे। कृवि 'नतिराम' ढिंग बैठयो मनभावन के दुहॅ के हिये में अरबिन्द मोह सरमे। आरसी द एक सों कह्यो यों निज मुख लखो, अर्गबद बारिद विलास बर दरसे। दर्प भरी सो जौ लौ दग्पन देखे तौ लौ, प्यारे प्रान प्यारी के उरोज हरि परमे ।।१ अमरुक का कष्ण एक गोपी के नेत् वन्द कर दूसरी के कपोल चूम लेता है। अमनुक के ऐसा करने मे एक उद्देश्य है-अमूया भाव की उत्पनि होती ही नही। दोनो अपने-अपने सौभाग्यानिगय को सराहती है। मनिगम ने वह स्थिति भी न रहने दी। एक को हाथ में दर्पण दे दिया तथा दूसरी के उरोजों का स्पर्श करवा दिया। असूया की स्यिति बरावर बनी रहेगी। यो भी वर्णन अरुचिकर है। केलि-प्रसंग और वस्त्हरण बसन हरयो पिय सुरत में, तिय नन जोति समीप। केलि भौन मे राति हूँ, भये च्यौस के दीप।२ नायिका की अग-दीप्ति का वर्णन करने मे कवि ने केलि-भवन मे उसके प्रिय हागा उसका वस्त्-हृग् करा तो दिया, परन्तु इसका ध्यान नहीं रखा कि इसमे लोक- मर्यादा भी अनावृत हो गई और केलि-भवन में रात को ही मूर्योदय तो हो गया, कितु लोक-भवन का सूर्य अस्त हो गया। सखित्रयों की अवज्ञा और राधा का निकुंज प्रवेश नंदलाल नयो तित ही चलिके जित सेलत बाल अलीगन में। तहाँ आपु ही गंटे सलोनी के लोचन चोर मिहीचनि खेलनि से। दुरिवे को गई सिगरी सखियाँ 'मतिराम' कहै इतने छिन मे। मुसकाय के राधिका कठ लगाय छिप्यौ कहॅँ जाय निकुजन में 1:3 मतिराम के कृष्ण सखियो के बीच ने राधा को कुज मे ले जाते है. तो क्या आपनि है? केशव के कृष्ण भी तो पड़ौसी के घर मे आग लगने पर राधा का आलिंगन करते है। निञ्चय ही ऐसे वर्णनी का औचित्य चित्य है। पझमाकर ने भी होली के वर्णन मे ऐसा उन्मादक चित्र प्रस्तुन किया है। यथा- १ हरदयालुमिंह मतिदाम-मकरद, पृ० ६द २. वहो, पृ० २२१ ३. डॉ. महेन्द्रकुमार : मतिराम कवि और आचार्य, पृ० २५१

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२१८ रीतिकाव्य म आचिय व्यायहारिक समायोग

ऊधम एसो मचो ब्रज मे सब तरग उमगनि सोच त्यों पभाकर छन्जनि छातनि छव छिछि छाजती कसरि कीच दे सिचकी भजी भजी तहाँ परै पीछू गुपाल गुलाल उलीचै। एक ही सग इहॉ रपटै सखि य भष ऊपर हौ भयी नीने। होली का यह वर्णन बहुत ही अनुचित है। रतियोग एवं आलिंगन सब गोपी अरु कबरी मेनापति सब भोग। ने आलिंगति गिरधरै परी एक रति योग ॥२ आलिगन और रति योग का यह वर्णन उचित प्रतीत नही होता। केशव का यह चित्र भी उचित नही है- श्री रामचन्द्र हँसी अंक लगाय लीन्हो। संसार-साक्षि शुभ पावक आनि कीन्हो।।3 इन्द्र, अग्नि, वरुण, ब्रह्मा एवं दगरथ (दिवात्मा) की उपस्थिति मे रामचद्रजी का सीता को गले लगा लेना उचित नहीं जँचता। इसी प्रकार रावण-मंदिर मे अगद का मदोदरी के केश पकड़ कर घसीटना, उसके अनावृत उरोजो का बहुत दूर नक वर्णन आदि भी अनुचित ही है। ये सभी उदाहरण सामाजिकता व लोक-सीमा का अतिक्रमण करने वाले होने से अनुचित ही कहे जाएँगे। सघटना का अनौचित्य पदक्रम को संघटना कहते हैं। काव्य मे पदो का क्रम, अर्थ की स्पष्ट एव निर्मल अभिव्यक्ति एवं सद्य प्रतीति के लिए उपकारक होना चाहिग, माथ ही यह भी वाछनीय है कि वर्ण्य-विषय का उपमान-उपमेयादि के क्रम का निर्वाह भी बराबर बना रहे। इसका अभाव या भंग ही संघटना-गत अनौचित्य है। इहि बसंत न खरी अरी गरम न सीतल वात। कहि क्यो अलक देखियत पुलक पसीजे गात॥।४ यहाँ प्रथम पक्ति मे जिस कम से गरम और सीतल पद है उसी क्रम से दमरी पंक्ति में पुलक और पसीजे पद नही है। पहले पसीज पद होना चाहिए और बाद मे पुलक। भाषागत अनोचित्य न्हाइ के बिसुन-पदी जाह तू विसुन-पद। जाह्नवी न्हाड जाह नबी पास बाउरे॥१ 'जाह्हवी' सस्कृत पद का सभंग-पद क्लेष कर जाह +नबी कर देने से कोई सौन्दर्य-वृद्धि नहीं होती। इस प्रकार के भाषा-प्रयोग विशेष रुचिकर प्रतीत नही होते। १ विश्वनाथप्रसग्द मिश्र : पद्माकर ग्रन्थावली, पृ० ६८ २ उमाशकर शुक्ल *कवित्त रत्नाकर पृ० १२१ लाला भगवानदीन केशव कौमुदी, भाग १, पृ० ३५५ ४. विश्वनाथप्रसाद मिश्र -बिहारी, प० १७१ उमाशकर शुक्ल कवित रत्नाकर, पृ० ११%

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रोतिकाव्य में ओचित्य व्यावहारिक समायोग २१६

कलागत अनोचित्य 'कवि समय' या 'कवि परम्परा' की अवज्ञा कर देने से एव तद्विपरीत वर्णन कर देने से काव्य की अवश्य हानि होती है। इसे ही कलागत अनौचित्य माना जा सकता है। जटित नीलमणि अगमगति, मीक सुहाई नाक। मनौ अली चपक-कली बमि रस लेत निमाँक ।,१ भ्रमर का चंपे की कली ने रन होना म्यानिनिरुद्ध है। कवि-परम्पग है कि भौरा चपे की कली में अनुरक्त नहीं होला। एक अन्य स्थान पर बिहारी ने वर्षा ऋतु की संध्या में चकवाक मिथुनो का वर्णन किया है। छद का अनोचित्य छंद-सम्बन्धी समस्त दोष यथा हृतवृत्तत्व, यति भगादि छंदगत अनौचित्य के अतर्गत समाविष्ट हो जाते हैं। या द्वादशे प्रकाश खर, दूपण त्रिशिरा नाम। सीता हग्ण विलाप सु, गीव मिलन हरि ह्ाम ।। यहाँ प्रथम पंक्ति मे खर के बाद और दूसरी पक्ति में म के बाद यति पडती है, परिणामल खर दूषण और सुग्रीव शब्द टूट जाते है। यनि के कारण शब्द भग होने से छंद दूषिन हो जाता है। *

मेनापति की भी छद-रचना कही-कही दूषित हो जाती है। F (१) सारंग धुनि सुनावै घन रस बग्मावै मोर मन हरपाव अति अभिराम है।3 इस छंद मे लय बिगडती है। यदि 'सारग सुनाव वुनि' पाठ होता तो लय ठीक हो जाती, परन्तु सर्वत पाठ यही है। पक्ति के पूर्वार्द्ध मे क अक्षरी की व्यवस्था इस प्रकार होती है- (१ ४४=८ (२) 2+२-२7२=८ (३) ३+३+२ (४) ५३ परतु यहाँ तो 'सारंग धुनि सुनावै' व्यवस्था है। यदि 'मारंग सुनावै धुनि' का ३ ₹ ३ ३ पाठ होता तो यह दोष नहीं रहता। (२) जागरन कारी जाके होत है बिहारी मैं नि- हारी अमरावती सी भावती लसति है।* यहाँ पर भी 'नि' एक स्थान पर 'हारी' दूसरे स्थान पर आने से 'निहारी' अद के टुकड़े हो गए है। यति ने शब्द को द्विधा विभक्त कर अर्थ मे असुन्द्रता प्रकट कर दी है। १ विश्वनाथप्रसाद मिश्र, बिहारी, पृ० १८४ २ लाला भगवानदीन •केशव कौमुदी, भाग १ पृ० १८५ ३. उमाशंकर शुक्ल. कवित्त रत्नाकर, पृ०४ ४. उमाशकर शक्ल. कवित्त रत्नाकर प० ७

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उपसंहार

रीतियुगीन कबिता में तत्त्वक्रम से औवित्य-अनोचित्य के बिमशोपरान्ती सामू- हिरु रूप से उस पर विचार कर निष्कर्ष रूप मे किन्ही तथ्यो तक पहुँचने के लिए निम्नलिखित दो आधारो पर अग्रसर होना अत्यन्त उपादेय होगा (१) सामाजिकता अर्थात् लोकदष्टि, तथा (२) शास्त्रदृष्टि। सामाजिकता का निकप ग्रहीत काव्य-वस्तु की नैतिकतापरक व सामाजिक दृष्टि से ग्राह्मता-अग्नाहमता मबधी व्यवस्था देता है। वस्तु के सामाजिकता विरोधी होने का अर्थ है कि वह आस्वाद्य या रसात्मक नही हो सकती। काव्यशास्त्र के अनुसार ऐसी वस्तुएँ रसाभास के अन्तर्गत ही आती है। काव्यशालीय निकण इस बात पर भी विचार करता है कि काव्य में प्रयोजित सब कुछ सगतिपूर्ण है या नही१ इसमे समस्त विमर्श का केन्द्र रस रहता है। सामाजिकता या सामाजिक व्यवहार निरपेक्ष अवधारणा नही है, चूँकि समाज न व्यक्ति है और न माव कुछ व्यक्तियो का समूह ही, इसमे अनेक वर्गो व समुदायो का सन्निवेश रहता है। जिस प्रकार जन-जीवन बदलता रहता है, सामाजिक मान्य- ताएँ बदलती रहती है, उसी प्रकार सामाजिकता के रूप में भी यत्किचित् परिवर्तन होता रहता है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए भी जैसे यह स्पष्ट हुए बिना नही रहता कि रीतियुगीन साहित्य अपने प्राप्त रूप मे समस्त समाज का, उसकी यथार्थ अन्त- वृत्तियों का वास्तविक प्रतिबिम्ब न होकर मात्र सामन्त-वर्गीय प्रवृत्तियो का प्रकाशन है। इतस्ततः कुछ अपवादो को छाड़कर वह गातकों तथा उनके चतुर्दिक व्याप्त एक विशिष्ट वर्ग की रुचि-कुरुचि से ही मम्बद्ध है। सम्भवतः इसी का परिणाम है कि उसमे चमत्कार-प्रदर्णन व अलकरण की प्रवुनि सर्वत्र दिखाई देती है। साथ ही, वासनाओ को खुलकर खेलते हुए देखवने की प्रवृत्ति सामन्तवादी तो हो सकती है किन्तु उसे तत्का- लीन सामान्य जन-जीवन के नैतिक मानदण्डो पर खरा उतरता हुआ नही बताया जा सकता। ऐसे सभी वर्णन असदिग्ध रूप से अनौचित्य के ही प्रमाण गिने जायेगे। रीतिकाल की सबसे बड़ी दुर्बलता वही पर दिखाई देती है, जहाँ कवि की अल- करण-प्रवृत्ति या भाषागत पाण्डित्य की झोक अतिशयता को प्राप्त हो गई है। आलोच्य न्काव्य में अनौचित्य के मूल मे यही प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है। आलोच्य कविता को काव्यशास्त्रीय निकष पर कसते समय यह ध्यातव्य होगा

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उपसहार

कि उसमे रस नियोजन छन्द विधान अलकार निरूपण आदि यथास्थान वतमान है? नही? रीतिकालीन काव्य मे शृगार रस का सर्वाधिक निरूपण हुआ है। कतिप स्थानो को छोडकर, जहाँ औचित्य का निर्वाह या तो हो नहीं पाया है या उसे कर का प्रयत्न नहीं किया गया है, शेष काव्य औचित्य के मान पर खरा ही उतरता है रीतिकालीन काव्य में सामान्यतया भाषा, छन्द तथा अलकारो के प्रयोग परस्पर: अनुकूल हैं ही, साथ ही, रम, वस्तु आदि के उपकारक तत्त्वो के रूप में प्रतिष्ठित होक प्राय सर्वत्र औचित्य का निर्वाह करते है। कलावादी या मौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि से उस वास्तविक मूल्याकन होना आवश्यक ही नही, अनिवार्य है। अन्त मे, उक्त अभावो व उपलन्धियों की ओर सकेत कर लेने के पश्चान् इतना तो निस्सकोच भाव से कहा जा सकता है कि रीतिकालीन काव्य, अपने सम अभावों के उपरान्त भी, निश्चय ही एक औचित्यपूर्ण साहित्यिक प्रयास है। इ- औचित्य की अव्हेलना कम और उसका निर्वाह अधिक हुआ है।

रु

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परिशिष्ट

आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र जी का पत्र

बाणी वितान भवन ब्रह्मनाल, वाराणसी-१ १५-११-६६ प्रिय महोदय, आशी। आपका पत्न बहुत दिनो से उत्तर की प्रतीक्षा मे पड़ा है। स्वस्थ न रहने से मै उत्तर न दे सका। आपकी जिज्ञासाओ का कमशः सक्षिप्त उत्तर दे रहा हूँ। (१) भारतीय साहिन्य (शास्त्र ने काव्य आदि का विचार करने के लिए एक विशेष प्रकार की दृष्टि विकसित की, जिसका मुख्य आधार रस हुआ। यह रस आस्वाद से उपमित किया गया है। किसी पदार्थ के खाने मे उसका स्वाद अनेक कारणो से बिगडता है। स्वाद को बिगाड़ने वाले इन कारणो, तत्त्वो आदि को जो रोके रहे, वही औचित्य है। मैंने तो बाद आदि शब्दो को ठीक न मान कर 'मत' शब्द का व्यवहार किया है। अलंकार-मत, वकरोक्ति-मत, औचित्य-सत आदि। यह मान्यता या धारणा है। औचित्य नैतिक व्याख्या भी है, अगसगति भी है और सके अति- रिक्त भी है, क्योकि इसकी प्रसक्ति रस के बाहर भी है। चारुत्व मे भी कोई कमी होगी तो औचित्य के अभाव के ही कारण। (२) औचित्य रन आदि की भॉनि तो नही नाना जा सकता। केवल औचित्य काव्य नही हो सकताह। औचित्य स्थिर भी नही माना जा सकता। समय, समाज आदि से सम्बद्ध ही उसे मानना पड़ेगा। यह तो काव्योक्ति का 1

विशेषण प्रतीत होता है। जसे वकोक्ति को काव्य मानते है। वकर विशे- 1

षण है। वैसे ही उचित भी विशेषण है। विशेषण किसी विशेष्य का होगा। वह भेदक हो सकता है, भेद्य नहीं। (३) लोक या शास्त्र की मान्यता पर अवलम्बित होने 'से स्थिर पृगतना नही कह सकते। सनातन मान्यताएँ स्थिर कही जा सकती है। 1

A

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पररिशष्ट २२३

(४) विपयनिष्ठ ही कहना ठीक है। स्थिति विशेष मे वह विपयिनिष्ठ भी हो सकता है। उसका अस्तित्व निरपेक्ष हो, पर साहित्य मे वह सापेक्ष ही गृहीत दिखाई देता है। (५) पाश्चात्य मॉरैलिटी का विचार औचित्य के अन्तर्गत ही आ सकता है। पर धर्मशास्त्र से ही मुख्य रूप से उसे सम्बद्ध मानना पडेगा। (६) काव्य के शब्द का औचित्य की दृष्टि से व्याकरण से सम्बन्ध हो सकता है। (७) विकृति के निरोधक रूप मे उस आत्मा कह सकते है। चारुत्व की दृष्टि से प्राण। (र) आचार-सहिता से अधिक इसकी प्रसक्ति है। शब्द और अर्थ दोनो से सम्बद्ध होकर। (६) कोई एक इसके समग्र रूप को व्यक्त नहीं कर पाता। यह वह काव्य- रहस्स है, जिसके कारण अन्य काव्यमत भी अपने चरम उत्कर्ष को प्राप्त होते है। काव्योत्कर्पाधायक रहस्य है यह। आपने जितने प्रश्न उठाये है उन सबका सम्यक विचार पत्र के द्वारा सम्भव नही। न मुझे सब पर परिपूर्ण विचार करने का अवसर है और न किसी उत्तर के - अनन्तर आपके अनुप्रश्नो की कल्पना ही कर पा रहा हूँ। फिर भी जो ध्यान मे आया, आपको लिख दिया, इसीसे सतोष करे। आशा है आप सानन्द है। भवदीय, विश्वनाथप्रसाद मिश्र अध्यक्ष, हिन्दी-विभाग, मगध विश्वविद्यालय, गया।

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ग्रंथानुक्रमणिका

मूल ग्रंथ

औचित्य विचार चर्चा-क्षेमेन्द्र, निर्णय सागर प्रेस, ई० १९२६ कवित्त-रत्नाकर (सेनापति कृत)-उमाशंकर शुक्ठ, हिन्दी परिषद्, इलाहाबाद ई० १६५६ केशव-ग्रंथावली भाग १-विश्वनाथप्रसाद मिश्र, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद ई० १६५४ केशव-प्रंथावली भाग २-विश्वनाथप्रसाद मिश्र, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, ई० १६५५ केशव-ग्रंथावली भाग ३-विश्वनाथप्रसाद मिश्र, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद," ई० १६५६ केशव-कौमुदी भाग १-लाला भगवानदीन, रामनारायण लाल बेनीमाधव, इलाहाबाद, स० २०१८ केशव-कौमुदी भाग २-लाला भगवानदीन, रामनारायणलाल बेनीमाधब, डलाहाबाद, स० १६८० वनआानन्द कवित्त-विश्वनाथप्रसाद मिश्र, सरस्वती मंदिर, बनारस, सं० २०१२ देव-दर्शन-हरदयालुसिंह, इंडियन प्रेस, प्रयाग, ई० १६५३ देवकाव्य रत्नावली-दूगड और जावलिया, रामप्रसाद एड सस, आगरा-३, ई० १६६२ पझ्माकर-ग्रथावली-विश्वनाथप्रसाद मिश्र, नागरी प्रचारिणी सभा, काणी, सं० २०१६ बिहारी-विश्वताथप्रसाद मिश्र, वाणी-वितान प्रकाशन, वाराणसी, सं० २०१६ बिहारी-सतसई-लक्ष्मीनिधि चतुर्वेदी, भारतवासी प्रेस, इलाहाबाद, ई० १६५० बिहारी-सनसई-मार-अम्विकाचरण शर्मा, विश्वम्सर 'अरुण', प्रसाद बुक ट्रस्ट, आगरा, 4 ई० १६६५ भूपण-प्रंथावली-पं० व्यामबिहारी मिश्र, प० शुकदेवबिहारी मिश्र, नागरी प्रचारणी सभा, काशी, स० १६८३-२०१५ भूषण विश्वनाथप्रसाद मिश्र, वाणी-विनान कार्यालय, वाराणसी, स० २०१ मतिराम मकरंद-हरदयालुसिंह, इंडियन प्रेस, प्रयाग, सं० १६६६

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ग्र थानुकमणिका २२५

मतिराम ग्रन्थावली (परिचय भाग)-प० कृष्णबिहारी मिश्र, गगा ग्रथागार, लखनऊ, ई० १६५१ मतिराम ग्रंथावली (परिचय भाग)-पं० कृष्णविहारी मिश्र,गगा पुस्तकमाला, लखनऊ, स० २०१८ रामचद्रिका (पुर्वाद्ध)-लाला भगवानदीन, रामनारायणलाल वेनीमाधव, प्रयाग स० २०२२ सक्षिप्त रामचद्रिका-पीताम्बरदत्त बडथ्वाल, ना० प्र० सभा, काशी, स० २०१६ सुवृत्त तिलक क्षेमेन्द्र, चौखम्बा संस्कृत सीरिज, वाराणसी, ई० १६३३ संस्कृन काव्यशास्त्र अग्निपुराण का काव्यशास्त्रीय भाग-रामलाल वर्मा, नेगनल पब्लिशिग हाअस, दिल्ली ई० १६५६ अलकार सग्रह-अमृतानन्द योगी, सम्पादक नी० कृष्णमाचारी, अडयार लायब्रेरी,

अलकार सर्वस्व-सथ्यक, निर्णय सागर प्रेस, बम्बई, ई० १६३६ मद्राम, ई० ४६८६

काव्यादर्श-दण्डी, प्रो० रगाचार्य, भा०ओ० रिसर्च इस्टिट्यूट, पूना, ई० १६३८ काव्यादर्श-दण्डी, रामचन्द्र मिश्र, चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी, ई० १६५८ काव्यानुशासन वाग्भट द्वितीय, निर्णय सागर प्रेस, बम्बई, प्रथम आवृत्ति काव्यालंकार-रुद्रट, निर्णय सागर प्रेस, बम्बई, ई० १६२ काव्यालकार-भामह, बलदेव उपाध्याय, चौखबा संस्कृत सीरिज, वाराणसी, ई० १६२६ काव्यालकार-भामह, देवेन्द्रनाथ शर्मा, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, ई० ६६२ काव्यालंकार सूत्र-वामन, डॉ० नगेन्द्र, हिंदी अनुसन्धान परिषद्, स० २०११ काव्यालकार संग्रह उद्भट, निर्णय सागर प्रेस, बम्बई, ई- १६२८ काव्य प्रकाश-मम्मट, डॉ० सत्यव्रतसिंह, चोखंबा विद्याभवन, वाराणसी, ई० १६६० काव्य मीमासा-राजशेखर, केदारनाथ सारस्वत, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, सं० २०११ काव्य मीमासा-राजवेखर, डॉ० गगासागरराय, चोखंबा विद्याभवन, वाराणसी, ई० १६६४ कुवलयानन्द-अप्पय दीक्षित, डॉ० भोलाशकर व्यास, चौसंबा विद्याभवन, वाराणसी, ई० १६५६ चन्द्रालोक-जयदेव, चौखंबा सस्कृत सीरिज, वाराणसी, ई० १६३म ध्वन्यालोक (प्रथम खड)-आनन्दवर्धन, डॉ० रामसागर त्रिपाठी, मोतीलाल बनारसीदास, पटना, ई० १६६३ ध्वन्यालोक (द्वितीय खंड)-आनन्दवर्द्धन, डॉ० रामसागर त्रिपाठी, मोतीलाल बगा- रसीवास, ई० १६६३ ववन्यालोक आनन्दवर्द्धन, आ० विश्वेश्वर, गौतम बुक डिपो, दिल्ली, ई० १६५२

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२२६

नाट्य-दर्पण-रामचन्द्र-गुणचन्द्र, डॉ० नगेन्द्र, आ० विश्वेश्वर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, ई० १६६१ नाट्य-शास्त्र-भरत, बटुकनाथ शर्मा, नि० सा० प्रे० वम्बई, ई० १६२६ 1 प्रताप रुद्रीय-विद्यानाथ, नि० सा० प्रे० बम्बई, ई० १६५० भारतीय काव्य-शास्त्र की परम्परा-डॉ० नगेन्द्र, नेवनल पब्लिशिग हाउस, दिल्ली, ई० १६६४ रस रागाधर-जगन्नाथ, वटरीनाथ झा, मदनमोहन झा, चौखबा विद्याभवन, वाराणसी, ई० १६५५ रस-विसर्श-डॉ० राममूर्ति विपाठी, विद्यामन्विर वाराणसी, ई० १६६५ रस-सिद्धान्त-डॉ० नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिग हाउस, दिल्ली, ई० १६६४ रम-सिद्धान्त, स्वरूप विश्लेषण-डॉ० आनन्द प्रकाश दीक्षित, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, ई० १६६० वक्रोकिति जीवितम्-कुतक, डॉ० नगेन्द्र, आ0 विश्वेरवर, आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली, ई० १६५५ वारमटालकार-वाम्भट प्रथम, डॉ० सत्यव्रतसिंह, चौसवा विद्याभवन, वाराणसी, स० २०१6 सरस्वती कठाभरण-भोज, नि० सा० प्रेस वम्बई, ई० १६२४ Alamkar Sarvasva-Ruyyak, Kum. S S. Jank: Meharcnand Lachhamandas, Delhi, 1955 History of Sanskrit Poetics-P V. Kane, Motilal Banarsidas, Delhi, 1961 Highways and Byways of Literary Criticism m Sanskrit -- Kuppu- swami Shastri, Kuppu Swami Shastri Research Institute, Madras, 1945 Some Concepts of the Alamkar Shastra-Dr. V Raghavan, Adyar Library, Madras, 1942 1 Shrinagar Prakas-Bhoi Dr V. Raghavan, Punarvasu, Krishna- puram, Madras, 1940 Kavyanushasan-Hemchandra, R C Parikh, Mahaveer Jain So- ciety, Bombay. 1938 Kshemendra Studies -Dr. Suryakant, Oriental Book Agency, Poona, 1954 हिन्दी-काव्य-शास्त्र अलकार मंजूषा लाला भगवानदोन, रामनारायणलाल बेनीप्रसाद, इलाहाबाद, स० २००८ काव्य कल्पद्रुम-सेठ कन्हैयालाल पोद्दार, पं० जगन्नाथप्रसाद शावा, मथुरा, स० २००३ काव्य-शास्त्र-डॉ० भगीरथ मिश्र, विश्वविद्यालय प्रकाशन, गोरखपुर, ई१६६६

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२२७

काव्य शास्त मपा: आ० हजारीप्रसाद द्विवेदी भारती साहित्य मदिर, दिल्ली,

काव्य -शास्त्र का आलोचनात्मक अध्ययन-ा० संभनाथ पाण्डेय, सरस्वती संवाद आसरा, सं० २०१७ जसवत भूपण- मुरारिनान, ना० प्र० सभा, पुस्तकालय से उपलब्ध ध्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धान्त-डां० भोलाशकर व्यास, ना प्र० सभा कागी,

भारतीय साहित्य गास्व भा० १-प० वलदेव उपाध्याय, नन्दर्किशोर एण्ड सस काशी, ई. १६६३ भारतीय साहित्य वास्तर भा० २-प बलदेव उमाध्याय, प्रसाद परिवद् काशी, सं० २०१२ भिनारीशम प्रत्यावली भाग २- संपा विश्वनायरसाद मिश्र नाम प्र सभा कागी, सं. २०१४ रन कलस-अनोष्यासिह उपाध्याय हिन्दी साहित्य कुटीर बनारस, ई० १६५२ रम-मीमासा रामचन्द शुक्ल, ना० प्र० सभा काणी, स० २०१७ रस-सिद्धान्त की दार्शनिक व नैतिक व्याख्या-डॉ० तारकनाथ बाली, त्रिनोद पुस्तक मदिर आगरा, ई० ५६६४ रसज्ञ-रजन-महावीरप्रसाद द्विवेदी, साहित्य रत्न भण्डार आगरा, ई० १६२० रीविकाल और आधुनिक काल के सन्धि मूत्र डॉ० कृप्णवत तिपाठी (अप्रकाशित गोध-प्रबन्ध) वाङ्मय विमर्श- पं. विश्वसाथप्रसाद मिश्र, हिंदी साहित्य कुटोर वाराणसी, स० २१ व्यंग्यार्थ कौमुदी-लाला भगवानवीन, नाo प्र० सभा, पुस्तकालय मे उपलब्ध समीकषा दर्शन-नाग २-डॉ० रामलाल सिंह, इण्डियन प्रेस लिमिटेड इलाहाबाद ई० १६५४ हिन्दी आव्य-शास्त्र का इतिहास-डॉ० भगीरध मिथ, लखनऊ विश्वाविद्यालय, लखनऊ सं. २०१५

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म्र य हनुक्रमणिका २२६

हिन्दी पालोचना-ग्रन्थ आचार्य केशवदास-डॉ० हीरालाल दीक्षित, लखनऊ विश्विद्यालय, लखनऊ, सं० २०११ आचार्य क्षेमेन्द्र-डॉ० मनोहरलाल गौड, भारत प्रकाशन मन्दिर अलीगढ, प्र० आवृत्ि औचित्य-विमर्श-डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी, भारती भण्डार इलाहाबाद, सं० २०२४ केगव और उनका साहित्य-डॉ० विजयपालमिंह, राजपाल एण्ड संस दिल्ली, ई० १६६१ केगददास- चन्द्रबली पाण्डेय, शक्ति कार्यालय इलाहाबाद, ई० १६५१ वेशव की काव्य कला प० कृष्णशकर शुक्ल, पुस्तक-सदन, वाराणसी, स० २०१: घनानन्द- विञ्वनाथप्रसाद मिश्र, प्रसाद परिपद् काशी, स० २००६ घिनानन्द और स्वच्छन्द काव्य-धारा-डॉ० मनोहरलाल गौड, ना० प्र० स० काशी, स ० १ ५ चन्तामणि भाग-१-रामचन्द्र शुक्ल, इण्डियन प्रेस (प्रा०) लि० प्रयाग, ई० ६६६ देव और उनकी कविता-डॉ० नगेन्द्र, नेशनल पव्लिशिंग हाउस, दिल्ली, ई० १६५७ पद्माकर कदि शुकदेव दुबे, साहित्यभवन लिमिटेड इलाहाबाद, ई० २०१३ बिहारी बोधिनी-लाला भगवानदीन, साहित्य सेवा सदन, वाराणसी, सं. २०१४ विहारी रत्नाकर-जगन्नाथदास रत्नाकर, ग्रन्थकार प्रकाशन शिवाला बनारस, ई० १६५१ बिहारी की वाग्विभूति विश्वनाथप्रसाद मिश्र, वाणी वितान कार्यालय वाराणसी, सं० -०१३ बिहारी और उनका साहित्य- डॉ० हरवशलाल शर्मा डॉ० परमानन्द शास्त्री, भारत प्रकाशन मन्चिर अलीगढ, द्वि० सं० महाकवि भूषण-भगीरथप्रसाद दीक्षित, साहित्य भवन प्रा० लिमिटेड, इलाहाबाद, ई० १६५३ मनिराम कवि और आचार्य-डॉ० महेन्द्रकुमार, भागतीय साहित्य मन्दिर दिल्ली, ई० ६६० महाकवि मतिराम-डॉ० विभु वनसिंह, हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय बनारस, ई० २०१७ रीतिकालीन काव्य मे लक्षणा का प्रयोग-डॉ० अरविन्द गण्डेय, जवाहर पुस्तकालय मथुरा, ई० १६६६ रीतिकाव्य की भूमिका-डॉ० नगेन्द्र, गौतम बुक डिपो दिल्ली, ई० १६५३ रीतिकालीन कविता एव श्रृंगार-रस का विवेचन डॉ० राजेश्वरप्रसाद नतुर्वेरी, सरस्वती पुस्तक सदन, आगरा, सं० -०१० रीतिकालीन अलंकार-साहित्य का शास्त्रीय विवेचन-डॉ० ओमप्रकाश शर्मा, हिन्दी साहित्य भण्डार, दिल्ली, १०६४. क्षेमेन्द्र को औचित्य-दृष्टि-डॉ9 रामपाल विद्यालकार, मोतीलाल बनारसीदास पटना, सं २०१६

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ग्र थात कमणका २३१

Mughal Rule m India -- S. M. Edwards ard others, S Chand & Co., Delht, 1956 Some Aspects of Society and Culture during the Mughal age-P.N Chopra, Shivlal Agrawal & Sons, Agra, 1963 Suciety and Government in Medieval India- Dr A. B. Pandey, Central Book Depot, Allahabad, 1965

कोए

अवदान कल्पलता (खड़ १)-भमेन्द्र, सम्पादक परशुराम शर्मा, द मिथिला इंस्टिट्नूट आफ पोस्टनप्रेजुएट प्टडीस इन सस्कृत लनिंग, दरभगा, १६५६ अवदान कल्पलता (खंड २)- केमेन्द्र, सम्मादक परगुराम शर्मा, द मिथिला इंस्टिट्युट आफ पोल्ट-ग्रेजुएट स्टडोस इन सस्कृत लनिग, दरभंगा, १६५६ कवि कंडाभरण-अमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्याला ४, ई० १६३७ कला विलास-क्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्यमाला ४, ई० १६२६ गीना-तिन्क, तिलका बन्धु प्रकाशन गृह, पूना २, ई० १६५६ चनुर्वरग सग्रह- क्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्यमाला ५, ई० १६३७ चार चर्चा-क्षेमेन्द्र, नि० सा०प्रेस, काव्यमाला २, ई० २६३२ दर्पननन-क्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेम, काव्यमाला ६, ई० १६३० दश्यावतार चरितक्षेमेन्द्र, नि० सा० परेस, काव्यमाला २६, ई० १६३० देमोपदेश-सेमेन्द्र, निसिर्च डिपार्टमेट जम्मू एण्ड कश्मीर स्टेड, श्रीनगर, ई० १६२३ नर्म माला-क्षमेन्द्र, रिसर्च डिपार्टमेट जम्मू एण्ड कब्मीर स्टेट, थीनगर, ई० १६२३ नीनि कल्पनरु-क्षमेन्द्र, डॉ० महाजन, भाण्डारकर ऑरिएन्टल रिसर्च इस्टिट्यूट, पूना, ई० १६५६ भारत मजरी-क्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्यमाला ६८, ई० १५हम महाभारत (वन पर्व)-गीना प्रेस गोरखपुर, ई० ६५६ बृहत्कथा सजरी-क्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्यमाला ६६. ई० २ ६३१ रामायण सजरी-क्षेमन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्यमाला ६३, ई० १६०३ व्यासाष्टक- क्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्यमाला ६३, ई० १६०२ समय मामका-क्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, काव्यमाला, ई० १६२५ साहित्य सागर-बिहारीलाल भट्ट, ना०प्र० सभा काशी के पुस्तकालय मे उपलब्ब सेव्य सेवकोपटेश क्षेमेन्द्र, नि० सा० श्रेस, काव्यमाला २, ई० १६३२ जाकुतलम्-कालिदाम, ए०बी० गजेन्द्रगडकर, पोप्युलर बुक स्टोर, सूरत, पष्ड सस्करण शिशुपाल बध-माघ, चोखबा संस्कृत सीरीज, वाराणसी, ई२ १६२६

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२३२ ग्रन्थानकमणिका

कोष एव व्याकरण ग्रथ लोक प्रकाश कोष-क्षेमेन्द्र, रिसर्च डिपार्टमेट आफ कश्नीर स्टेट, श्रीनगर, ई० १६४७ वाचस्पत्यम् - तारानाथ-तर्कवागीश, चौखबा सस्कृत सीरिज, गाराणमी, ई० १६६२ सस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ द्वारिकाप्रसाद चतुर्वेदी तारिणीश जा, रामनाययणलाल बेनीमाधन, इलाहबाद, ई० १६५७ सिद्धान्त कौमुदी-भट्टोजि दीक्षित, नि० सा० प्रेस, बम्बई, ई० १६४२ शब्दकल्पद्रुम-राजा राधाकान्तदेव, शब्द कल्पद्रुम कार्यालय ७१, पथुरिया घाट स्ट्रीट, कलकत्ता, ई०१८८७ शब्द-चिंतामणि - सवाईलाल बोरा, दौलतराम शाह, बड़ौदा, स० १६५६ व्याकरण महाभाष्य (भाग १)-पतंजलि भाष्य-दासुदेव शास्त्री अभ्यकर, डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी, पूना, शकाब्द १८६० हलायुध कोश-जयशंकर जोशी, प्रकाशन ब्यूरो, सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश लग्बनऊ, स० २०१४ हिन्दी साहित्य कोश-डॉ० धीरेन्द्र वर्मा, ज्ञान मडल, वाराणसी, स० २०२० The Concise Oxford Dictionary-Fowler & Fowler, Oxford Univer- sity Press, London, 1958 Sanskrit-English Dictionary-V.S. Apte, Motilal Banarasidas Delhi, 1957 The Students' Sanskrit-English Dictionary - V. S. Apte, Motilal Banarasidas, Delhi, 1563 Sanskrit-English Dictionary -- Moneir Williams, Oxford University Press, London, 1956

पत्र-पत्रिकाएँ आलोचना-अप्रैल १६५७ नागरी प्रचारिणी पत्रिका-वर्ष ६६, अंक १ कविना-(निराला व रांगेय राघव स्मृति अंक) १६६३

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