1. Avadhuta Upanishad
Avadhuta Upanishad
[ Sutra 1 ]
अथ ह सांकृतिर्भगवन्तमवधूतं दत्तात्रेयं परिसमेत्य पप्रच्छ । भगवन्कोऽवधूतस्तस्य का स्थितिः किं लक्ष्म किं संसरणमिति। तं होवाच भगवो दत्तात्रेयः परमकारुणिकः ॥ अक्षरत्वाद्वरेण्यत्वाद्धूतसंसारबन्धनात् । तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वावधूत इतीर्यते ॥1॥
atha ha sāṃkṛtirbhagavantamavadhūtaṃ dattātreyaṃ parisametya papraccha । bhagavanko'vadhūtastasya kā sthitiḥ kiṃ lakṣma kiṃ saṃsaraṇamiti । taṃ hovāca bhagavo dattātreyaḥ paramakāruṇikaḥ ॥ akṣaratvādvareṇyatvāddhūtasaṃsārabandhanāt। tattvamasyādilakṣyatvāvadhūta itīryate ॥1॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सांकृति ने भगवान् दत्तात्रेयजी के समीप जाकर पूछा- ‘हे भगवन्! अवधूत कौन है? उसकी स्थिति किस तरह की होती है? उसका लक्षण किस प्रकार का होता है? तथा उसका संसार (सांसारिक व्यवहार) किस प्रकार का होता है?’ उनके इन प्रश्नों को सुनकर परम कृपालु भगवान् दत्तात्रेयजी ने कहा- जो अक्षर । अर्थात् अविनाशी (भावयुक्त) हो, वरण करने योग्य हो, संसार रूपी बन्धनों से रहित हो तथा ‘तत्त्वमसि’ आदि वाक्यों के लक्ष्यार्थ बोध से युक्त हो, उसे ही अवधूत (अक्षर का ‘अ’, वरेण्य का ‘व’, धूतसंसारबन्धन का ‘धू’ तथा तत्त्वमस्यादि लक्ष्य का ‘त’ लेने से ‘अवधूत’) कहा जाता है ॥1॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Then, it is said, Samkriti approached the venerable Avadhuta, Dattatreya, and questioned: Venerable Sir, Who is an Avadhuta? What is his condition? What his characteristic? And what his worldly existence? To him replied the venerable Dattatreya, the most compassionate:
- The Avadhuta is so called because he is immortal [akshara]; he is the greatest [varenya]; he has discarded worldly ties [dhuta samsara bandhana]; and he is the indicated meaning of the sentence 'Thou art That', etc., [tattvamasyadi-lakshya] ॥1॥
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[ Sutra 2 ]
अथ ह सांकृतिर्भगवन्तमवधूतं दत्तात्रेयं परिसमेत्य पप्रच्छ । भगवन्कोऽवधूतस्तस्य का स्थितिः किं लक्ष्म किं संसरणमिति । तं होवाच भगवो दत्तात्रेयः परमकारुणिकः ॥ अक्षरत्वाद्वरेण्यत्वाद्धूतसंसारबन्धनात् । तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वावधूत इतीर्यते ॥2॥
atha ha sāṃkṛtirbhagavantamavadhūtaṃ dattātreyaṃ parisametya papraccha । bhagavanko'vadhūtastasya kā sthitiḥ kiṃ lakṣma kiṃ saṃsaraṇamiti । taṃ hovāca bhagavo dattātreyaḥ paramakāruṇikaḥ ॥ akṣaratvādvareṇyatvāddhūtasaṃsārabandhanāt। tattvamasyādilakṣyatvāvadhūta itīryate ॥2॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — सांकृति ने भगवान् दत्तात्रेयजी के समीप जाकर पूछा- ‘हे भगवन्! अवधूत कौन है? उसकी स्थिति किस तरह की होती है? उसका लक्षण किस प्रकार का होता है? तथा उसका संसार (सांसारिक व्यवहार) किस प्रकार का होता है?’ उनके इन प्रश्नों को सुनकर परम कृपालु भगवान् दत्तात्रेयजी ने कहा- जो अक्षर । अर्थात् अविनाशी (भावयुक्त) हो, वरण करने योग्य हो, संसार रूपी बन्धनों से रहित हो तथा ‘तत्त्वमसि’ आदि वाक्यों के लक्ष्यार्थ बोध से युक्त हो, उसे ही अवधूत (अक्षर का ‘अ’, वरेण्य का ‘व’, धूतसंसारबन्धन का ‘धू’ तथा तत्त्वमस्यादि लक्ष्य का ‘त’ लेने से ‘अवधूत’) कहा जाता है ॥2॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Then, it is said, Samkriti approached the venerable Avadhuta, Dattatreya, and questioned: Venerable Sir, Who is an Avadhuta? What is his condition? What his characteristic? And what his worldly existence? To him replied the venerable Dattatreya, the most compassionate:
- The Avadhuta is so called because he is immortal [akshara]; he is the greatest [varenya]; he has discarded worldly ties [dhuta samsara bandhana]; and he is the indicated meaning of the sentence 'Thou art That', etc., [tattvamasyadi-lakshya] ॥2॥
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[ Sutra 3 ]
यो विलङ्घयाश्रमान्वर्णानात्मन्येव स्थितः सदा । अतिवर्णाश्रमी योगी अवधूतः स कथ्यते ॥3॥
yo vilaṅghayāśramānvarṇānātmanyeva sthitaḥ sadā । ativarṇāśramī yogī avadhūtaḥ sa kathyate ॥3॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो योगी पुरुष आश्रम एवं वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर आत्मा में ही सदैव स्थित रहता हो, वह वर्णाश्रम रहित योगी पुरुष ‘ अवधूत’ कहा जाता है ॥3॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — He who rests constantly in himself, after crossing (the barrier of) castes and stages (of social position) and thus rises above varnas and asramas and is in union (with God) is said to be an Avadhuta.॥3॥
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[ Sutra 4 ]
तस्य प्रियं शिरः कृत्वा मोदो दक्षिणपक्षकः । प्रमोद उत्तरः पक्ष आनन्दो गोष्पदायते ॥4॥
tasya priyaṃ śiraḥ kṛtvā modo dakṣiṇapakṣakaḥ । pramoda uttaraḥ pakṣa ānando goṣpadāyate ॥4॥
— Translation from Aurovindo
(Hindi) —
उस (योगी) का प्रिय (ब्रह्म) ही सिर है, ‘मोद’ दायाँ बाजू और ‘प्रमोद’ बायाँ बाजू है तथा ‘आनन्द’ मध्य आत्मा है ।
उसकी (आत्मा की) स्थिति गाय के पैर के सदृश (चार-प्रिय, मोद, प्रमोद एवं आनन्द रूप) हो जाती है ॥
[यही प्रकरण तैत्तिरीयोपनिषद् (२.५) में भी आया है ।
] ॥4॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — His joy [priya] is (to be envisaged as) the head; delight [moda] is his right wing; great delight [pramoda] his left wing; and bliss (his very self). Thus he assumes a fourfold condition. ॥4॥
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[ Sutra 5 ]
गोवालसदृशं शीर्षे नापि मध्ये न चाप्यधः । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छाकारेण कारयेत् । एवं चतुष्पदं कृत्वा ते यान्ति परमां गतिम् ॥5॥
govālasadṛśaṃ śīrṣe nāpi madhye na cāpyadhaḥ । brahma pucchaṃ pratiṣṭheti pucchākāreṇa kārayet । evaṃ catuṣpadaṃ kṛtvā te yānti paramāṃ gatim ॥5॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — उस सिर (हर्ष) में, अधः (मोद-प्रमोद) में तथा मध्य (आनन्द) में आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए (आत्मा नहीं मानना चाहिए, तो किसे मानना चाहिए, इस पर कहते हैं कि) गोवाल (गौ की पूँछ) सदृश उस ब्रह्म की पुच्छ प्रतिष्ठा है, उस ब्रह्म को इसी पुच्छाकार में जानना चाहिए । इस प्रकार ब्रह्म को भलीप्रकार जानकर वे (योगीपुरुष) परमगति को प्राप्त करते हैं ॥5॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — One should identify Brahman neither with the head nor with the middle part nor with the bottom but with (what remains in the shape of) the tail, since it is said that Brahman is 'the Tail' and substratum. Thus, those who contemplate this fourfold division attain the supreme Goal. ॥5॥
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[ Sutra 6 ]
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ॥6॥
na karmaṇā na prajayā dhanena tyāgenaike amṛtatvamānaśuḥ ॥6॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — अमरत्व की प्राप्ति न तो विभिन्न कर्मों के द्वारा, न प्रजा के द्वारा और न ही धन के द्वारा होती है । एक मात्र त्याग के द्वारा ही अमरत्व को प्राप्त किया जा सकता है ॥6॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Not by rituals, not by begetting children, not by wealth, but by renunciation [tyaga] alone a few attained immortality. ॥6॥
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[ Sutra 7 ]
स्वैरं स्वैरविहरणं तसंसरणम् । साम्बरा वा दिगम्बरा वा । न तेषां धर्माधर्मौ न मेध्यामेध्यौ । सदा सांग्रहण्येष्ट्याश्वमेधमन्तर्यागं यजते । स महामखो महायोगः ॥7॥
svairaṃ svairaviharaṇaṃ tasaṃsaraṇam । sāmbarā vā digambarā vā । na teṣāṃ dharmādharmau na medhyāmedhyau । sadā sāṃgrahaṇyeṣṭyāśvamedhamantaryāgaṃ yajate । sa mahāmakho mahāyogaḥ ॥7॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना हो उन योगियों का संसार है । उनमें से कितने ही तो वस्त्रों को धारण करते हैं और कितने ही दिगम्बर अर्थात् बिना वस्त्रों के ही रहते हैं । उन योगियों के लिए न कुछ धर्म है और न ही कुछ अधर्म है, पवित्र एवं अपवित्र आदि भी कुछ नहीं है । (इन्द्रियों को वश में करने के रूप में) सदा संग्रह की दृष्टि से वे (योगीजन) अन्त:करण में(आत्मा का ध्यान रूप) अश्वमेध यज्ञ किया करते हैं । यही उनका महायज्ञ और महायोग है ॥ [अन्तः स्थित परमात्म चेतना में बहिर्मुखी व्यक्त शक्ति धाराओं को समर्पित कर देना-विसर्जित कर देना ही । आन्तरिक अश्वमेध कहा गया है। इसे ही महायज्ञ या महायोग भी कहा गया है। ] ॥7॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — His (the Avadhuta's) worldly existence consists in moving about freely, with or without clothes. For them there is nothing righteous or unrighteous; nothing holy or unholy. Through all-consuming, correct knowledge [samgrahaneshti] (the Avadhuta) performs Ashvamedha sacrifice within (himself). That is the greatest sacrifice and the great Yoga. ॥7॥
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[ Sutra 8 ]
कृत्स्नमेतच्चित्रं कर्म । स्वैरं न विगायेत्तन्महाव्रतम् । न स मूढवल्लिप्यते ॥8॥
kṛtsnametaccitraṃ karma । svairaṃ na vigāyettanmahāvratam । na sa mūḍhavallipyate ॥8॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस प्रकार उन योगियों का सम्पूर्ण चरित्र आश्चर्य युक्त होता है । उनके इस प्रकार के चित्र विचित्र कर्मों की निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही उनका महाव्रत है । वे अज्ञानी मनुष्यों की भाँति (पाप-पुण्यादि में) लिप्त नहीं होते । वे सदैव निर्लिप्त भाव से इच्छानुसार विचरण करते रहते हैं ॥8॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Nought of this extraordinary, free action (of his) should be disclosed. This is the great vow [mahavrata]. He is not tainted like the ignorant. ॥8॥
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[ Sutra 9 ]
यथा रविः सर्वरसान्प्रभुङ्क्ते हुताशनश्चापि हि सर्वभक्षः । तथैव योगी विषयान्प्रभुङ्क्ते न लिप्यते पुण्यपापैश्च शुद्धः ॥9॥
yathā raviḥ sarvarasānprabhuṅkte hutāśanaścāpi hi sarvabhakṣaḥ। tathaiva yogī viṣayānprabhuṅkte na lipyate puṇyapāpaiśca śuddhaḥ ॥9॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिस प्रकार सूर्य सभी प्रकार के रसों को ग्रहण करता है तथा अग्नि सभी कुछ भक्षण कर लेता है, उसी प्रकार योगी पुरुष विषयादि भोगों का उपभोग करता हुआ भी शुद्ध होने के कारण पाप-पुण्यादि का भागीदार नहीं बनता ॥9॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — As the sun absorbs all waters, and the fire consumes all things (remaining unaffected by them), even so, the pure Yogin enjoys all objects, unstained by virtues or sins. ॥9॥
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[ Sutra 10 ]
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥10॥
āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat। tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmī ॥10॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिस प्रकार चारों ओर से परिपूर्ण होने पर भी अचल प्रतिष्ठा (स्थिति) वाले समुद्र में जल प्रविष्ट होता । है, वैसे ही योगी पुरुष सभी विषय-भोगों के रहने पर भी अचल रहता है और शान्ति को प्राप्त करता है । विषय-भोगों की इच्छा करने वाला कामना युक्त मनुष्य वैसी शान्ति नहीं प्राप्त करता ॥10॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — As the ocean into which all waters flow maintains its own nature despite the water pouring in (from all sides), so, he alone attains peace into whom all desires flow in like manner; not he who seeks the objects of pleasure ॥10॥
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[ Sutra 11 ]
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥11॥
na nirodho na cotpattirna baddho na ca sādhakaḥ । na mumukṣurna vai mukta ityeṣā paramārthatā ॥11॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — अतः सत्य बात तो यह है कि किसी का (निरोध) लय नहीं है, किसी की उत्पत्ति नहीं है, कोई आबद्ध (बँधा) हुआ नहीं है, कोई साधक नहीं है, कोई (मुमुक्षु) अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करने वाला नहीं है तथा कोई मुक्त भी नहीं है, यही वास्तविक स्थिति है ॥11॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — There is neither death nor birth; none is bound, none aspires. There is neither seeker after liberation nor any liberated; this indeed is the ultimate Truth. ॥11॥
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[ Sutra 12 ]
ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्ध्यै मुक्तेश्च सिद्धये । बहुकृत्यं पुरा स्यान्मे तत्सर्वमधुना कृतम् ॥12॥
aihikāmuṣmikavrātasiddhyai mukteśca siddhaye । bahukṛtyaṃ purā syānme tatsarvamadhunā kṛtam ॥12॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है । इस तरह से हर एक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है । (इसके पक्षात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फसूँ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ । जिन लोगों को इस बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ । मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता। जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं । अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है । तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित ही नहीं, है इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥12॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Many were my activities perchance in the past for gaining things here and hereafter, or for obtaining liberation. All that is now of the past ॥12॥
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[ Sutra 13 ]
तदेव कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुर:सरम् । दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया ॥13॥
tadeva kṛtakṛtyatvaṃ pratiyogipura:saram । duḥkhino'jñāḥ saṃsarantu kāmaṃ putrādyapekṣayā ॥13॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है । इस तरह से हर एक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है । (इसके पक्षात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फसूँ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ । जिन लोगों को इस बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ । मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता । जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं । अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है । तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित ही नहीं, है इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥13॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — That itself is the state of contentment. Verily remembering the same (i.e. the past) achievements involving objects, he now remains thus ever content. The miserable ignorant, desirous of children, etc., needs must suffer. ॥13॥
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[ Sutra 14 ]
परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया । अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः ॥14॥
paramānandapūrṇo'haṃ saṃsarāmi kimicchayā । anutiṣṭhantu karmāṇi paralokayiyāsavaḥ ॥14॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है । इस तरह से हर एक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है । (इसके पक्षात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फसूँ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ । जिन लोगों को इस बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ । मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता । जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं। अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है । तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित ही नहीं, है इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥14॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Wherefore shall I suffer, who am filled with supreme bliss? Let those who yearn to go to the other worlds perform rituals. ॥14॥
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[ Sutra 15 ]
सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम्। व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा ॥15॥
sarvalokātmakaḥ kasmādanutiṣṭhāmi kiṃ katham। vyācakṣatāṃ te śāstrāṇi vedānadhyāpayantu vā ॥15॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है । इस तरह से हर एक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है । (इसके पक्षात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फसूँ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ । जिन लोगों को इस बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ । मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता । जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं । अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है । तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित ही नहीं, है इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥15॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — What shall I, who am of the nature of all the worlds, perform? For what and how? Let those who are worlds, perform? For what and how? Let those who are qualified interpret the Shastras or teach the Vedas. ॥15॥
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[ Sutra 16 ]
येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च ॥16॥
ye'trādhikāriṇo me tu nādhikāro'kriyatvataḥ nidrābhikṣe snānaśauce necchāmi na karomi ca ॥16॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है । इस तरह से हर एक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है । (इसके पक्षात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फसूँ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ । जिन लोगों को इस बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ । मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता । जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं। अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है । तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित ही नहीं, है इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥16॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — I have no such qualification, since I am free of action. I have no desire for sleeping or begging, bathing or cleaning. Nor do I do them. ॥16॥
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[ Sutra 17 ]
द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्तु किं मे स्यादन्यकल्पनात् । गुञ्जापुञ्जादि दह्येत नान्यारोपितवह्निना ॥ नान्यारोपितसंसार धर्मानेवमहं भजे ॥17॥
draṣṭāraścetkalpayantu kiṃ me syādanyakalpanāt । guñjāpuñjādi dahyeta nānyāropitavahninā ॥ nānyāropitasaṃsāra dharmānevamahaṃ bhaje ॥17॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है । इस तरह से हर एक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है । (इसके पक्षात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार में पुनः फसूँ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ । जिन लोगों को इस बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ । मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक भी इच्छा नहीं करता । जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की कल्पना करने से कोई लाभ नहीं। अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है । तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित ही नहीं, है इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥17॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — If onlookers thus superimpose, let them do so. What matters to me the superimposition of others? A heap of the red-black berries (of the Abrus precatorius) would not burn, even if others superimposed fire on it. Likewise, I partake not of worldly duties superimposed (on me) by others. ॥17॥
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[ Sutra 18 ]
शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते जानन्कस्माच्छृणोम्यहम् । मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥18॥
śṛṇvantvajñātatattvāste jānankasmācchṛṇomyaham । manyantāṃ saṃśayāpannā na manye'hamasaṃśayaḥ ॥18॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो लोग तत्त्व को न जानते हों, वे भले ही कुछ भी श्रवण करें: किन्तु मैं (अवधूत) तो स्वयं ही तत्त्व को जानने में समर्थ हूँ । फिर किस लिए श्रवण करूँ? जो लोग संशय में पड़े हों, वे मनन करें । मुझे तो किसी भी तरह का संशय ही नहीं है, इस कारण से मैं (अवधूत) मनन नहीं करता ॥18॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Let them, who are ignorant of the reality, study the scriptures; knowing (the reality) why should I study? Let them who have doubts reflect (upon what was studied). Having no doubts, I do not reflect. ॥18॥
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[ Sutra 19 ]
विपर्यस्तो निदिध्यासे किं ध्यानमविपर्यये । देहात्मत्वविपर्यास न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥19॥
viparyasto nididhyāse kiṃ dhyānamaviparyaye । dehātmatvaviparyāsa na kadācidbhajāmyaham ॥19॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — जिसको विपर्यास अर्थात् विपरीत ज्ञान हुआ हो, वह भले ही निदिध्यासन करे; परन्तु जहाँ पर विपर्यास ही नहीं, वहाँ पर ध्यान की आवश्यकता नहीं होती । शरीर को आत्मा मान लेने का विपर्यास मुझ (अवधूत) को नहीं होता। इस कारण निदिध्यासन को आवश्यकता ही नहीं पड़ती ॥19॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Were I under illusion, I may meditate; having no illusion, what meditation can there be (for me)? Confusion of body for the self, I never experience. ॥19॥
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[ Sutra 20 ]
अहं मनुष्य इत्यादिव्यवहारो विनाप्यमुम् । विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥20॥
ahaṃ manuṣya ityādivyavahāro vināpyamum । viparyāsaṃ cirābhyastavāsanāto'vakalpate ॥20॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं मनुष्य हूँ, इस तरह का व्यवहार भी बिना विपर्यास (विपरीत ज्ञान) के नहीं होता । यह विपर्यास भी दीर्घकाल से अभ्यास में पड़ी वासना के कारण ही होता है ॥20॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — The habitual usage 'I am a man' is possible even without this confusion, for it is due to impressions accumulated during a long time. ॥20॥
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[ Sutra 21 ]
आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्मक्षये त्वसौ नैव शाम्येयानसहस्त्रतः ॥21॥
ārabdhakarmaṇi kṣīṇe vyavahāro nivartate । karmakṣaye tvasau naiva śāmyeyānasahastrataḥ ॥21॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — प्रारब्ध कर्मों के विनष्ट होने पर ही यह व्यवहार निवर्तित (बन्द) होता है; किन्तु प्रारब्ध कर्मों का नाश न हुआ हो, तब तक सहस्त्रों बार चिन्तन करने के बाद भी यह व्यवहार शान्त नहीं होता ॥21॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — When the results of actions set in motion [prarabdha-karman] are exhausted, the habitual usage also ends. This (worldly usage) will not cease even with repeated meditation unless such actions are exhausted. ॥21॥
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[ Sutra 22 ]
विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टं चेद्ध्यानमस्तु ते । बाधिकर्मव्यवहृतिं पश्यन्ध्यायाम्यहं कुतः ॥22॥
viralatvaṃ vyavahṛteriṣṭaṃ ceddhyānamastu te । bādhikarmavyavahṛtiṃ paśyandhyāyāmyahaṃ kutaḥ ॥22॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — यदि व्यवहार कर्म करने की इच्छा हो, तो तुम अपनी इच्छानुसार ध्यान करो; परन्तु मेरी दृष्टि में तो कर्मों का कोई व्यवहार ही नहीं, तो मैं किसलिए ध्यान करूँ ॥22॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — If infrequency of worldly dealings is sought, let there be contemplation for you. Wherefore should I, to whom worldly dealings offer no hindrance, contemplate? ॥22॥
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[ Sutra 23 ]
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम । विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥23॥
vikṣepo nāsti yasmānme na samādhistato mama । vikṣepo vā samādhirvā manasaḥ syādvikāriṇaḥ ॥23॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मुझे विक्षेप अर्थात् चित्त की अस्थिरता होती ही नहीं, इस कारण से मुझे समाधि-अवस्था की जरूरत ही नहीं पड़ती । जब यह मन विकारग्रस्त होता है, तब चित्त अस्थिर होता है और तभी समाधि की आवश्यकता होती है । मैं तो नित्य ही अनुभव रूप हूँ । समाधि में मुझे और क्या कुछ भिन्न अनुभव हो सकता है ? ॥23॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Because I do not have distractions, I do not need concentration, distraction or concentration being of the mind that modifies. ॥23॥
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[ Sutra 24 ]
नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव नित्यशः ॥24॥
nityānubhavarūpasya ko me'trānubhavaḥ pṛthak kṛtaṃ kṛtyaṃ prāpaṇīyaṃ prāptamityeva nityaśaḥ ॥24॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मुझे जो-जो करना है, वह-वह मैंने किया तथा जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सदा ही प्राप्त करता रहा । इस कारण लौकिक, शास्त्रीय या फिर अन्य किसी भी तरह का व्यवहार मुझे क्यों करना चाहिए? अतः मैं नहीं करता हूँ । मुझे किसी भी बात की लिप्तता नहीं है । सहज प्राकृतिक ढंग से जो होता है, उसी में रत रहता हूँ ॥24॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — What separate experience can there be for me, whom am of the nature of eternal experience? What has to be done is done, what has to be gained is gained for ever. ॥24॥
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[ Sutra 25 ]
व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वाऽन्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारखधं प्रवर्तताम् ॥25॥
vyavahāro laukiko vā śāstrīyo vā'nyathāpi vā । mamākarturalepasya yathārakhadhaṃ pravartatām ॥25॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मुझे जो-जो करना है, वह-वह मैंने किया तथा जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सदा ही प्राप्त करता रहा । इस कारण लौकिक, शास्त्रीय या फिर अन्य किसी भी तरह का व्यवहार मुझे क्यों करना चाहिए? अतः मैं नहीं करता हूँ । मुझे किसी भी बात की लिप्तता नहीं है । सहज प्राकृतिक ढंग से जो होता है, उसी में रत रहता हूँ ॥25॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — . Let my dealings, worldly, scriptural or of other kinds proceed as they have started, I being neither an agent (of action) nor one affected (by it). ॥25॥
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[ Sutra 26 ]
अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया। शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेऽहं मम का क्षतिः ॥26॥
athavā kṛtakṛtyo'pi lokānugrahakāmyayā । śāstrīyeṇaiva mārgeṇa varte'haṃ mama kā kṣatiḥ ॥26॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — अथवा मैं कृत-कृत्य (पूर्णकाम) हूँ, तब भी साधारण लोगों पर अनुग्रह करने की इच्छा से यदि शास्त्रज्ञानुसार मैं चलती हूँ, तो इसमें मेरी क्या हानि है ? ॥26॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Or, even though I have achieved what has to be achieved, let me remain on the scriptural path for the sake of the well-being of the world. What harm for me thereby? ॥26॥
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[ Sutra 27 ]
देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक्तद्वत्पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥27॥
devārcanasnānaśaucabhikṣādau vartatāṃ vapuḥ । tāraṃ japatu vāktadvatpaṭhatvāmnāyamastakam ॥27॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — देवताओं की स्तुति-अर्चना, स्नान, शौच, शिक्षा आदि में शरीर भले ही लगा रहे । वाणी ॐकार रूपी प्रणव को भले ही जपती रहे, उपनिषदों का पाठ भले ही होता रहे, बुद्धि सदैव भगवान् विष्णु का चिन्तन भले ही करती रहे या फिर भले ही (वह) ब्रह्मलीन रहे; किन्तु मैं तो केवल साक्षी रूप हूँ । मैं (अवधूत) इनमें से किसी भी काम को कभी भी नहीं करता हूँ और न करवाता ही हूँ ॥27॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Let the body be engaged in the worship of gods, bathing, cleaning, begging and so forth. Let speech repeatedly utter the tara-mantra or recite the Upanishadic passages. ॥27॥
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[ Sutra 28 ]
विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥28॥
viṣṇuṃ dhyāyatu dhīryadvā brahmānande vilīyatām । sākṣyahaṃ kiṃcidapyatra na kurve nāpi kāraye ॥28॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — देवताओं की स्तुति-अर्चना, स्नान, शौच, शिक्षा आदि में शरीर भले ही लगा रहे । वाणी ॐकार रूपी प्रणव को भले ही जपती रहे, उपनिषदों का पाठ भले ही होता रहे, बुद्धि सदैव भगवान् विष्णु का चिन्तन भले ही करती रहे या फिर भले ही (वह) ब्रह्मलीन रहे; किन्तु मैं तो केवल साक्षी रूप हूँ । मैं (अवधूत) इनमें से किसी भी काम को कभी भी नहीं करता हूँ और न करवाता ही हूँ ॥28॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Let thought contemplate Vishnu or let it be dissolved in the bliss of Brahman. I am the witness. I neither do nor cause any doing. ॥28॥
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[ Sutra 29 ]
कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥29॥
kṛtakṛtyatayā tṛptaḥ prāptaprāpyatayā punaḥ । tṛpyannevaṃ svamanasā manyate'sau nirantaram ॥29॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं (अवधूत) कृतकृत्य होने से पूर्ण तृप्त हूँ तथा जो कुछ भी मुझे प्राप्त करना था, वह सभी कुछ प्राप्त कर लिया है । इस प्रकार से इस तृप्ति को ही मैं निरन्तर अपने मन में मानता रहता हूँ ॥29॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Being contented with duties fulfilled and achievements accomplished, he ceaselessly reflects as follows with a contented mind: ॥29॥
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[ Sutra 30 ]
धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि ॥ धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥30॥
dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ nityaṃ svātmānamañjasā vedmi ॥ dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ brahmānando vibhāti me spaṣṭam ॥30॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं धन्य हूँ-धन्य हूँ; क्योंकि मैं नित्य, अविनाशी अपने आत्म-तत्त्व को सहज रूप से ही जानता हूँ । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे ब्रह्म का आनन्द स्पष्टतया प्रकाश प्रदान करता है ॥30॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Blessed am I, blessed am I. Directly and always, I experience my own self. Blessed am I, blessed am I, the bliss of Brahman shines brightly in me. ॥30॥
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[ Sutra 31 ]
धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य । धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥31॥
dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ duḥkhaṃ sāṃsārikaṃ na vīkṣe'dya। dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ svasyājñānaṃ palāyitaṃ kvāpi ॥31॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ, क्योंकि मैं अब इस नाशवान् संसार का दुःख बिलकुल भी नहीं देखता । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरा अज्ञान कभी का (अर्थात् बहुत पहले ही) विनष्ट हो गया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे अब कुछ भी करना शेष नहीं है । मैं धन्य हूँ-मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सभी कुछ मैंने यहीं पर पहले ही प्राप्त कर लिया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरी तृपति की क्या इस लोक में कोई उपमा है ( अर्थात् कोई नहीं है) । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; मैं बारम्बार धन्य हूँ- धन्य हूँ । अहो पुण्य ! अहो पुण्य ॥ स पुण्य की सफलता दृढतापूर्वक फलीभूत हुई है । धन्य हैं हम सब । अहो ज्ञान!! अहो सुख! अहो सुख!! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र!! अहो गुरु! अहो गिरू!! (वास्तव में सफल होने के कारण सब धन्यवाद के पात्र हैं) ॥31॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Blessed am I, blessed am I. I do not see the misery of existence. Blessed am I, blessed am I; my ignorance has fled away ॥31॥.
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[ Sutra 32 ]
धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किंचित् । xधन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमत्र संपन्नम् ॥32॥
dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ kartavyaṃ me na vidyate kiṃcit । dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ prāptavyaṃ sarvamatra saṃpannam ॥32॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ, क्योंकि मैं अब इस नाशवान् संसार का दुःख बिलकुल भी नहीं देखता । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरा अज्ञान कभी का (अर्थात् बहुत पहले ही) विनष्ट हो गया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे अब कुछ भी करना शेष नहीं है । मैं धन्य हूँ-मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सभी कुछ मैंने यहीं पर पहले ही प्राप्त कर लिया है । ♥मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरी तृपति की क्या इस लोक में कोई उपमा है ( अर्थात् कोई नहीं है) । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; मैं बारम्बार धन्य हूँ- धन्य हूँ । अहो पुण्य ! अहो पुण्य ॥ स पुण्य की सफलता दृढतापूर्वक फलीभूत हुई है। धन्य हैं हम सब । अहो ज्ञान!! अहो सुख! अहो सुख!! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र!! अहो गुरु! अहो गिरू!! (वास्तव में सफल होने के कारण सब धन्यवाद के पात्र हैं) ॥32॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Blessed am I, blessed am I; no duty exists for me. Blessed am I, blessed am I; everything to be obtained is now obtained. ॥32॥
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[ Sutra 33 ]
धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तेर्मे कोपमा भवेल्लोके । धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥33॥
dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ tṛpterme kopamā bhavelloke। dhanyo'haṃ dhanyo'haṃ dhanyo dhanyaḥ punaḥ punardhanyaḥ ॥33॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ, क्योंकि मैं अब इस नाशवान् संसार का दुःख बिलकुल भी नहीं देखता। मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरा अज्ञान कभी का (अर्थात् बहुत पहले ही) विनष्ट हो गया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे अब कुछ भी करना शेष नहीं है । मैं धन्य हूँ-मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सभी कुछ मैंने यहीं पर पहले ही प्राप्त कर लिया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरी तृपति की क्या इस लोक में कोई उपमा है ( अर्थात् कोई नहीं है) । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; मैं बारम्बार धन्य हूँ- धन्य हूँ । अहो पुण्य ! अहो पुण्य ॥ स पुण्य की सफलता दृढतापूर्वक फलीभूत हुई है । धन्य हैं हम सब । अहो ज्ञान!! अहो सुख! अहो सुख!! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र!! अहो गुरु! अहो गिरू!! (वास्तव में सफल होने के कारण सब धन्यवाद के पात्र हैं) ॥33॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Blessed am I, blessed am I. What comparison is there in the world for my contentment! Blessed am I, blessed am I; blessed, blessed, again and again blessed. ॥33॥
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[ Sutra 34 ]
अहो पुण्यमहो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् । अस्य पुण्यस्य संपत्तेरहो वयमहो वयम् ॥34॥
aho puṇyamaho puṇyaṃ phalitaṃ phalitaṃ dṛḍham। asya puṇyasya saṃpatteraho vayamaho vayam ॥34॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ, क्योंकि मैं अब इस नाशवान् संसार का दुःख बिलकुल भी नहीं देखता । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरा अज्ञान कभी का (अर्थात् बहुत पहले ही) विनष्ट हो गया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे अब कुछ भी करना शेष नहीं है । मैं धन्य हूँ-मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सभी कुछ मैंने यहीं पर पहले ही प्राप्त कर लिया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरी तृपति की क्या इस लोक में कोई उपमा है ( अर्थात् कोई नहीं है) । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; मैं बारम्बार धन्य हूँ- धन्य हूँ । अहो पुण्य ! अहो पुण्य ॥ स पुण्य की सफलता दृढतापूर्वक फलीभूत हुई है । धन्य हैं हम सब । अहो ज्ञान!! अहो सुख! अहो सुख!! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र!! अहो गुरु! अहो गिरू!! (वास्तव में सफल होने के कारण सब धन्यवाद के पात्र हैं) 4v
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — Logical! The virtues accrued have yielded fruit! Indeed they have! By the richness of virtue we are as we are. ॥34॥
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[ Sutra 35 ]
अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम् । अहो शास्त्रमहो शास्त्रमहो गुरुहो गुरुः ॥35॥
aho jñānamaho jñānamaho sukhamaho sukham । aho śāstramaho śāstramaho guruho guruḥ ॥35॥
— Translation from Aurovindo (Hindi) — मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ, क्योंकि मैं अब इस नाशवान् संसार का दुःख बिलकुल भी नहीं देखता । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरा अज्ञान कभी का (अर्थात् बहुत पहले ही) विनष्ट हो गया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे अब कुछ भी करना शेष नहीं है । मैं धन्य हूँ-मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सभी कुछ मैंने यहीं पर पहले ही प्राप्त कर लिया है । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरी तृपति की क्या इस लोक में कोई उपमा है ( अर्थात् कोई नहीं है) । मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; मैं बारम्बार धन्य हूँ- धन्य हूँ । अहो पुण्य ! अहो पुण्य ॥ स पुण्य की सफलता दृढतापूर्वक फलीभूत हुई है । धन्य हैं हम सब । अहो ज्ञान!! अहो सुख! अहो सुख!! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र!! अहो गुरु! अहो गिरू!! (वास्तव में सफल होने के कारण सब धन्यवाद के पात्र हैं) ॥35॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — . Wondrous knowledge, wondrous knowledge! Wondrous happiness, wondrous happiness! Wondrous scriptures, wondrous scriptures! Wondrous teachers, wondrous teachers ॥35॥
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[ Sutra 36 ]
इति य इदमधीते सोऽपि कृतकृत्यो भवति । सुरापानात्पूतो भवति । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । ब्रह्महत्यात्पूतो भवति । कृत्याकृत्यात्पूतो भवति । एवं विदित्वा स्वेच्छाचारपरो भूयादोंसत्यमित्युपनिषत् ॥36॥
iti ya idamadhīte so'pi kṛtakṛtyo bhavati । surāpānātpūto bhavati । svarṇasteyātpūto bhavati । brahmahatyātpūto bhavati । kṛtyākṛtyātpūto bhavati । evaṃ viditvā svecchācāraparo bhūyādoṃsatyamityupaniṣat ॥36॥
— Translation from Aurovindo
(Hindi) —
इस प्रकार जो भी मनुष्य इस उपनिषद् का पाठ करता है, वह कृत-कृत्य हो जाता
मदिरापान करने वाला, सुवर्ण की चोरी करने वाला, ब्रह्महत्या करने वाला, कृत्याकृत्य (अर्थात् कार्य-अकार्य) करने वाला भी इसका (भावनापूर्वक) पाठ करने से पवित्र (श्रेष्ठ प्रकृतियों वाला) हो जाता है ।
मनुष्य इसका पाठ करने मात्र से पवित्र हो जाता है ।
मनुष्य इस तरह का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त अपनी इच्छानुसार (आत्म प्रेरणा से ही श्रेष्ठता-पवित्रता की दिशा में) प्रवृत्त हो जाता है ।
ॐ (ब्रह्म) ही सत्य है, यही उपनिषद् है ॥36॥
— Translation from Prof. A. A. Ramanathan — . He who studies this also achieves everything to be achieved. He becomes free of the sins of drinking liquor. He becomes free of the sins of stealing gold. He becomes free of the sins of killing a Brahmin. He becomes free of actions, ordained or prohibited. Knowing this, let him wander according to his free will. Om, Truth. Thus (ends) the Upanishad. ॥36॥ Here ends the Avadhuta Upanishad belonging to the Krishna-Yajur-Veda.