14. Bhagavad Gita — Chapter 14
Chapter 14 (Part 1)
【 Verse 14.1 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् | यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता: ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | paraṁ bhūyaḥ pravakṣyāmi jñānānāṁ jñānamuttamam | yajjñātvā munayaḥ sarve parāṁ siddhimito gatāḥ ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Kṛṣṇa says; paraṁ: supreme; bhūyaḥ: again; pravakṣyāmi: I shall speak; jñānānāṁ: of all knowledge; jñānaṁ: knowledge; uttamam: the supreme; yat: which; jñātvā: knowing; munayaḥ: the sages; sarve: all; parāṁ: supreme; siddhiṁ: perfection; itaḥ: from this world; gatāḥ: attained
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.1 Bhagavān Śrī Kṛṣṇa says: I will declare to you again the Supreme wisdom, The knowledge of which has helped all sages attain Supreme perfection.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.1।।श्रीभगवान् बोले -- सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा? जिसको जानकर सबकेसब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.1।। श्री भगवान् ने कहा -- समस्त ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान को मैं पुन कहूंगा? जिसको जानकर सभी मुनिजन इस (लोक) से जाकर (इस जीवनोपरान्त) परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.1 परम् supreme? भूयः again? प्रवक्ष्यामि (I) will declare? ज्ञानानाम् of all knowledge? ज्ञानम् knowledge? उत्तमम् the best? यत् which? ज्ञात्वा having known? मुनयः the sages? सर्वे all? पराम् supreme? सिद्धिम् to perfection? इतः after this life? गताः gone.Commentary Further analysis of the field is made in this chapter.In chapter XIII? verse 21? it has been stated that attachment to the alities is the cause of Samsara or births in good and evil wombs. In this chapter the Lord gives answers to the estions What are the alities of Nature (Gunas) How do they bind a man What are the characteristics of these alities How do they operate How can one obtain freedom from them What are the characteristics of a liberated soulAll knowledge has no reference to the knowledge described in chapter XIII? verse 7 to 10? but it refers to that kind of knowledge which concerns sacrifices. That kind of knowledge which relates to sacrifices cannot give liberation. But the knowledge which is going to be imparted in this discourse will certainly lead to emancipation. The Lord eulogises this knowledge by the epithets supreme and the best in order to create great interest in Arjuna and other spiritual aspirants.Having learnt this supreme knowledge? all the sages who practised Manana or reflection (Munis) have attained perfection after being freed from bondage to the body.Itah After this life after being freed from this bondage to the body.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.1. The Bhagavat said Further, once again I shall explain the supreme knowledge, the best among the knowledges, by knowing which all the seers have gone from here to the Supreme Success.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.1 "Lord Shri Krishna continued: Now I will reveal unto the Wisdom which is beyond knowledge, by attaining which the sages have reached Perfection.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.1 The Lord said I shall declare again another kind of knowledge: It is the best of all forms of knowledge, by knowing which all the sages have attained the state of perfection beyond this world.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.1 The Blessed Lord said I shall speak again of the supreme Knowledge, the best of all knowledges, by realizing which all the contemplatives reached the highest Perfection from here.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.1 The Blessed Lord said I will again declare (to thee) that supreme knowledge, the best of all knowledge, having known which all the sages have gone to the supreme perfection after this life.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.1 Param etc. Knowledge has been described earlier; the same I shall again explain thoroughly, i.e., in detail in order to examine individually the nature of the Strands. By knowing which etc.: By this [the Bhagavat] proclaims the tested trustworthiness and the popularity of this knowledge.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.1 The Lord said I shall declare again another kind of knowledge which is distinct from what was taught earlier concerning Gunas such as Sattva, falling within the sphere of Prakrti and Purusa. This knowledge going to be revealed is the best of all forms of knowledge concerning the Prakrti and the self. Having gained this knowledge, all sages, namely, those given to meditation, have attained perfection, beyond this world, the sphere of Samsara, having attained the essential and pure form of the self.
He further extols this knowledge, distinguishing it by its fruits:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.1 The word param should be connected with the remote word jnanam. Pravaksyami, I shall speak; bhuyah, again-even though spoken of more than once in all the preceding chapters; of the param, supreme-it is supreme because it is concerned with the supreme Reality;-which is that?-jnanam, Knowledge; uttamam, the best-since it has the best result; jnananam, of all knowledges-. 'Of all knowledges' does not mean 'of humility' etc. (13.7-11). What then? It means 'among knowledges of all knowable things like sacrifice etc.' They do not lead to Liberation, but this (Knowledge) leads to Liberation. Hence the Lord praises it with the words 'supreme' and 'best', so as to arouse interest in the intellect of the listener. Yat jnatva, by realizing which, by attaining which Knowledge; sarve, all; munayah, the contemplatives, the monks [But not those who espoused monasticsim as a formality in in the fourth stage of life.] gatah, reached, attained; itah, from here-when this bondage of the body had ceased; param, the highest; siddhim, Perfection, called Liberation. And the Lord shows the infallibility of this Perfection:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.1।। किसी भयंकर मनोवेग से विक्षुब्ध होने पर एक अत्यन्त बुद्धिमान पुरुष को भी बारम्बार सांत्वना की आवश्यकता होती है। जीवभाव को प्राप्त पुरुष अपने जीवन के दुखों के कारण उपदेश के पश्चात भी अपने सच्चिदानन्द स्वरूप को सरलता से नहीं ग्रहण कर पाता। इसलिए? जब तक शिष्यों की विद्रोही बुद्धि इस तत्त्व को समझ नहीं लेती? तब तक आचार्यों को इन आध्यात्मिक सत्यों का बारंबार पुनरावृत्ति करना आवश्यक हो जाता है। अपने छोटेसे शिशु को भोजन करा रही माता इसका आदर्श उदाहरण है। जब तक वह शिशु पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं कर लेता? तब तक उसकी माँ उसे बहलाती फुसलाती रहती है। इसी प्रकार? शिष्य को निश्चयात्मक ज्ञान हो जाने तक आचार्य को इस ज्ञान को बारंबार दोहराना पड़ता है।इसलिए? इस अध्याय का प्रारम्भ भगवान् के इस कथन से होता है? मैं तुम्हें पुन परम ज्ञान कहूंगा। ऐसा नहीं है कि पहले परम ज्ञान नहीं बताया गया था? किन्तु उसके और अधिक स्पष्टीकरण तथा यथार्थ ग्रहण के लिए उसकी पुनरावृत्ति अपरिहार्य है।इस अध्याय की विषय वस्तु को भगवान् परम उत्तम ज्ञान कहते हैं? जिसका शब्दश अर्थ नहीं लेना चाहिए। इस अध्याय का विषय प्रकृति के गुणों का मनुष्य के अन्तकरण पर पड़ने वाले प्रभाव का तथा उसके व्यवहार का अध्ययन है। इसे दर्शनशास्त्र की सर्वोच्च विषयवस्तु की संज्ञा नहीं दी जा सकती। तथापि इसके सम्यक् ज्ञान के बिना साधक अपने आन्तरिक दोषों को समझ कर उन्हें सुधार नहीं सकता और ऐसी स्थिति में वह परम पुरुषार्थ को भी प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए इन त्रिगुणों के ज्ञान को ही यहाँ परम ज्ञान कहा गया है।जिसको जानकर मुनिजन परम सिद्धि को प्राप्त हुए यहाँ वचन दिया गया है कि त्रिगुणों के यथार्थ ज्ञान से साधक की तीर्थयात्रा सरल हो जायेगी। लक्ष्य के मार्ग का तथा सभी संभाव्य संकटों और कठिनाइयों का सम्पूर्ण ज्ञान पहले से ही प्राप्त होने पर उन संकटों के निवारण की तैयारी करने में यात्री को सहायता मिलती है। इस प्रकार अध्यात्म मार्ग में भी अपने मन की दुष्टप्रवृत्तियों का पूर्ण और पूर्व ज्ञान होने पर एक परिश्रमी साधक आन्तरिक समस्या के उत्पन्न होने पर उसका हल स्वयं ही कुशलतापूर्वक खोजने में समर्थ हो जाता है।मुनि शब्द से हमें किसी जटाजूटधारी वृद्ध पुरुष की कल्पना नहीं करनी चाहिए? जो अरण्यवास करते हुए कन्दमूलों के आहार पर अपना जीवनयापन करता हो। मननशील पुरुष को मुनि कहते हैं। संक्षेप में समस्त मननशील साधकों को इस अध्याय के विषय का ज्ञान अपनी आध्यात्मिक साधना के साध्य को सम्पादित करने में सहायक होगा।अनेक उपनिषदों के अनुसार यहाँ भी परम सिद्धि की प्राप्ति मरणोपरान्त कही गयी है। कुछ तत्त्वचिन्तक पुरुष इसका वाच्यार्थ ही स्वीकार करके यह मत प्रतिपादित करते हैं कि इसी जीवन में रहते हुए मोक्षसिद्धि नहीं हो सकती। देह त्याग के बाद ही मुक्ति संभव है। शास्त्रीय भाषा में इसे विदेहमुक्ति कहते हैं। परन्तु? श्री शंकराचार्य अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रामाणिक तर्कों के द्वारा इस मत का खण्डन करके जीवन्मुक्ति के सिद्धांत का मण्डन करते हैं। उनका मत है कि साधन सम्पन्न जिज्ञासु साधक को यहाँ और अभी इसी जीवन में मोक्ष प्राप्त हो सकता है। इस जीवन के पश्चात् का अर्थ देह के मरण से नहीं? वरन् अविद्याजनित अहंकार केन्द्रित जीवन के नाश से है। अर्थात् यहाँ अहंकार का नाश अभिप्रेत है? देह का नहीं।लौकिक जीवन में भी हम देखते हैं कि गृहस्थ बनने के लिए अविवाहित पुरुष का मरण आवश्यक है और माँ बनने के लिए कुमारी का। इन उदाहरणों में? व्यक्ति का मरण नहीं होता? किन्तु ब्रह्मचर्य और कौमार्य का ही अन्त होता है? जिससे कि उन्हें पतित्व और मातृत्व प्राप्त हो सके। इस प्रकार? व्यक्ति तो वही रहता है परन्तु उसकी सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आ जाता है। युक्तियुक्त मनन और यथार्थ ज्ञान के द्वारा हमारे असत् जीवन मूल्यों का अन्त हो जाता है और इस प्रकार नवार्जित ज्ञान के प्रकाश में हम श्रेष्ठतर? आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। इस नवजीवन का साधन है? स्वस्वरूप का निदिध्यासन। साधनाकाल में? संभव है कि इन त्रिगुणों के विनाशकारी प्रभाववश बुद्धिमान और परिश्रमी साधक का भी मन विचलित होकर ध्यान की शान्ति खो दे। इसलिए? इन्हें भलीभाँति जानकर इनके कुप्रभावों को दूर रखने पर शतप्रतिशत सफलता निश्चित हो जाती है।अब? भगवान् इस ज्ञान के निश्चित फल को बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.1।।यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्तावरजंगमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ इत्युक्तं तत्कथमिति प्रकाशनार्थं ईश्वरतन्त्रयोः क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः जगत्कारणत्वं नतु सांख्यानामिव स्वतन्त्रयोरित्येवमर्थं च। तथाकारणं गुणसङ्गेऽस्य सदसद्योनिजन्मसु इत्युक्तं। कस्मिन् गुणे कथं रागः के वा गुणाः कथं ते बध्नान्ति गुणेभ्यश्च मोक्षणं कथं स्यात् मुक्तस्य च लक्षणं वक्त्वयं इत्येवमर्थं चाध्यायमारभमाण आदौ श्रोतृरुच्युत्पत्तये श्रीभगवानुवाच -- परमिति। ज्ञानानां यज्ञादिज्ञेयवस्तुविषयाणां सर्वेषामुत्तमफलत्वादुत्तमं नत्वमानित्वादीनां तत्त्वज्ञानान्तरङ्गसाधनानां एतादृशं परमात्मसाक्षात्कारसाधनं ज्ञानं पूर्वेष्वध्यायेष्वसकृदुक्तमपि ब्रह्मणः सूक्ष्मत्वेन दुर्बोधत्वात् भूयः पुनरहं प्रकर्षेण वक्ष्यामि। यज्ज्ञानं ज्ञात्वा सर्वे मुनयो मननशीलाः परां सिद्धिं मोक्षाख्यां इतोऽस्माद्देहबन्धनादूर्ध्वं गताः प्राप्ताः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.1।।पूर्वाध्यायेयावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि इत्युक्तं? तत्र निरीश्वरसांख्यनिराकरणेन क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्येश्वराधीनत्वं वक्तव्यम्? एवंकारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु इत्युक्तं तत्र कस्मिन्गुणे कथं सङ्गः के वा गुणाः कथं वा ते बध्नन्तीति वक्तव्यम्? तथाभूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् इत्युक्तं तत्र भूतप्रकृतिशब्दितेभ्यो गुणेभ्यः कथं मोक्षणं स्यान्मुक्तस्य च किं लक्षणमिति वक्तव्यं? तदेतत्सर्वं विस्तरेण वक्तुं चतुर्दशोऽध्याय आरभ्यते। तत्र वक्ष्यमाणमर्थं द्वाभ्यां स्तुवन् श्रोतृ़णां रुच्युत्पत्तये श्रीभगवानुवाच -- ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं परमात्मज्ञानसाधनं परं श्रेष्ठं परवस्तुविषयत्वात्। कीदृशं तत्। ज्ञानानां ज्ञानसाधनानां बहिरङ्गाणां यज्ञादीनां मध्ये उत्तमं उत्तमफलत्वात्। नत्वमानित्वादीनाम्। तेषामन्तरङ्गत्वेनोत्तमफलत्वात्। परमित्यनेनोत्कृष्टविषयत्वमुक्तं? उत्तममित्यनेन तूत्कृष्टफलत्वमिति भेदः। ईदृशं ज्ञानमहं प्रवक्ष्यामि भूयः पुनः। पूर्वेष्वध्यायेष्वसकृदुक्तमपि यज्ज्ञानं ज्ञात्वाऽनुष्ठाय मुनयो मननशीलाः संन्यासिनः सर्वे परां सिद्धिं मोक्षाख्यां इतो देहबन्धनाद्गताः प्राप्ताः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.1।।पूर्वाध्यायान्ते भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुस्ते परं यान्तीत्युक्तं तत्र का वा भूतप्रकृतिः किमाश्रयेण तस्या भूतजकत्वं कथं वा बन्धकत्वं कथं च ततो मोक्षः किंच मुक्तानां लक्षणमित्येतदर्थजातं विवरीतुं चतुर्दशोऽध्याय आरभ्यते। तत्र रुच्युत्पादनार्थं परं ज्ञानं स्तुवन् श्रीभगवानुवाच -- परमिति। परं सर्वोत्कृष्टं ब्रह्मविषयत्वात् ज्ञानं भूयः पुनः असकृदुक्तमपि प्रवक्ष्यामि। किं तत्स्वरूपं आह। ज्ञानानाममानित्वादीनां यज्ञादीनां ज्ञानसाधनानां मध्ये यदुत्तमं मोक्षफलत्वादन्तरङ्गं तदेव तत्। अहं घटं जानामीत्यत्राहमर्थस्य घटाकारवृत्तेर्घटस्य च ज्ञानमस्तीति विषयभेदात् ज्ञानत्रयमस्ति। तत्राद्यद्वयं नान्तरीयकं? यच्च उत्तमं चरमं घटप्रकाशफलरूपं ज्ञानं तदेव परं ब्रह्मेत्यर्थः। यथोक्तं वार्तिककारैःपरागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन संमता। संवित्सैवेह ज्ञेयोऽर्थो वेदान्तोक्तिप्रमाणतः इति। यत् ज्ञानं ज्ञात्वा वेदान्तवाक्यजन्यया धीवृत्त्या अपरोक्षीकृत्य परां सिद्धिं मोक्षमितः संसारात्संसारं विहाय गताः प्राप्ताः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.1।।कृष्णः स्वगुणसम्बन्धात्प्रपञ्चस्य विचित्रताम्। बोधनार्थं पाण्डवाय वर्णयामास विस्तरात्।।1।।अथ स्वक्रीडार्थं विरचितसत्त्वादिगुणसङ्गजप्रपञ्चवैचित्र्यस्वरूपेण फलात्मकं निरूप्य वर्णयति? तत्र श्लोकद्वयेन फलरूपस्वरूपमाह -- परमिति। परं भगवत्सम्बन्धिफलात्मकं ज्ञानं ज्ञेयसाधनं तेन भूयः पूर्वमुक्तं साधारण्येन? पुनः प्रकर्षेण ससाधनं वक्ष्यामि कथयामीत्यर्थः। भूयः प्रकर्षकथने विशेषणेन विशेषयति। कीदृशं तत् ज्ञानानां पूर्वोक्तज्ञेयसाधनानां मध्ये उत्तमं मुख्यमित्यर्थः। एवं कथनं प्रतिज्ञाय फलरूपत्वमाह -- यदिति। यत् ज्ञानं ज्ञात्वा मुनयो मननशीलास्तदभ्यसनपराः सर्वे परां सिद्धिमनुभवात्मिकां इतः लौकिकदेहात् गताः प्राप्ताः।सर्वे इतिपदेन येषां सिद्धिर्जाता तेषामनेनैवेति ज्ञापितम्। ज्ञानानामुत्तममनेन विशेषणेन ज्ञानेष्वेवोत्तमत्वं? न तु भक्तित इति व्यञ्जितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.1।।पुंप्रकृत्योः स्वतन्त्रत्वं वारयन्गुणसङ्गतः। प्राह संसारवैचित्र्यं विस्तरेण चतुर्दशे।।1।।यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ इत्युक्तम्। स च क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः संयोगो निरीश्वरसांख्यानामिव न स्वातन्त्र्येण किं त्वीश्वरेच्छयैवेति कथनपूर्वकंकारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु इत्यनेनोक्तं सत्त्वादिगुणकृतं संसारवैचित्र्यं प्रपञ्चयिष्यन्नेवंभूतं वक्ष्यमाणमर्थं स्तौति। श्रीभगवानुवाच -- परं भूय इति द्वाभ्याम्। परं परमार्थनिष्ठं? ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानमुपदेशं भूयोऽपि तुभ्यं प्रकर्षेण वक्ष्यामि। कथंभूतम्। ज्ञानानां तपःकर्मादिविषयाणां मध्ये उत्तमम्? मोक्षहेतुत्वात्। तदेवाह। यज्ज्ञात्वा प्राप्य मुनयो मननशीलाः सर्वे इतो देहबन्धनात्परां सिद्धिं गताः प्राप्ताः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.1।।अनादित्वान्निर्गुणत्वात्पुरुषो विमलः स्वतः। अनादित्वेऽपि मलिना प्रकृतिस्त्रिगुणा यतः।।1।।तत्सम्बद्धप्रपञ्चेऽस्मिन् गुणातीतस्तु कश्चन। इत्युच्यतेऽस्मिन्नध्याये गुणत्रयविभागशः।।2।।तत्र पूर्वंयावत्सञ्जायते किञ्चित् [13।27] इत्युक्तं स च क्षेत्रात्मनोः संयोगो निरीश्वरसाङ्ख्यानामिव? न स्वातन्त्र्येण किन्तु भगवदिच्छयेति कथनपूर्वकंकारणंक गुणसङ्गोऽस्य [13।22] इत्यनेनोक्तं सत्त्वादिगुणकृतं जगद्वैचित्र्यं प्रपञ्चयिष्यन्क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् [13।35] इति परशब्दं च विवृण्वन् श्रीभगवानुवाच -- परं भूय इति द्वाभ्याम्। पूर्वश्लोकोक्तं यत्परं तद्भूयः प्रवक्ष्यामि विवृण्वन्वक्ष्यामीति प्रशब्दार्थः। किं तत्परं ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानमिति ज्ञायते इति ज्ञानं अचिन्त्यशक्तिमहिमपुरुषोत्तमविषयकं तत्त्वज्ञानं यदधिगम्य मुनयः परां गुणातीतां मुक्तिं गताः? इतस्त्रैगुण्यात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.1।।तथा जो यह कहा कि प्रकृतिमें स्थित होना और गुणविषयक आसक्ति -- यही संसारका कारण है? सो किस गुणमें किस प्रकारसे आसक्ति होती है गुण कौनसे हैं वे कैसे बाँधते हैं गुणोंसे छुटकारा कैसे होता है तथा मुक्तका लक्षण क्या है यह सब बातें बतलानेके लिये भी इस अध्यायका आरम्भ किया जाता है --,श्रीभगवान् बोले -- परम् इस पदका दूरस्थ ज्ञानम् पदके साथ सम्बन्ध है। समस्त ज्ञानोंमें उत्तम परम ज्ञानको अर्थात् जो पर वस्तुविषयक होनेसे परम है और उत्तम फलयुक्त होनेके कारण समस्त ज्ञानोंमें उत्तम है? उस परम उत्तम ज्ञानको? यद्यपि पहलेके सब अध्यायोंमें बारबार कह आया हूँ? तो भी फिर भली प्रकार कहूँगा। यहाँ ज्ञानोंमेंसे इस शब्दसे अमानित्वादि ज्ञानसाधनोंका ग्रहण नहीं है। किंतु यज्ञादि ज्ञेयवस्तुविषयक ज्ञानोंका ग्रहण है। वे यज्ञादिविषयक ज्ञान मोक्षके लिये उपयुक्त नहीं हैं और यह ( जो इस अध्यायमें बतलाया जाता है वह ) मोक्षके लिये उपयुक्त है? इसलिये परम और उत्तम इन दोनों शब्दोंसे श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये इसकी स्तुति करते हैं। जिस ज्ञानको जानकर -- पाकर सब मननशील संन्यासीजन इस देहबन्धनसे मुक्त होनेके बाद मोक्षरूप परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं? ( ऐसा परम ज्ञान कहूँगा )।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.1।। व्याख्या -- परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् -- तेरहवें अध्यायके अठारहवें? तेईसवें और चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रक्षेत्रज्ञका? प्रकृतिपुरुषका जो ज्ञान (विवेक) बताया था? उसी ज्ञानको फिर बतानेके लिये भगवान् भूयः प्रवक्ष्यामि पदोंसे प्रतिज्ञा करते हैं।लौकिक और पारलौकिक जितने भी ज्ञान हैं अर्थात् जितनी भी विद्याओं? कलाओँ? भाषाओं? लिपियों आदिका ज्ञान है? उन सबसे प्रकृतिपुरुषका भेद बतानेवाला? प्रकृतिसे अतीत करनेवाला? परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला यह ज्ञान श्रेष्ठ है? सर्वोत्कृष्ट है। इसके समान दूसरा कोई ज्ञान है ही नहीं? हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। कारण कि दूसरे सभी ज्ञान संसारमें फँसानेवाले हैं? बन्धनमें डालनेवाले हैं।यद्यपि उत्तम और पर -- इन दोनों शब्दोंका एक ही अर्थ होता है? तथापि जहाँ एक अर्थके दो शब्द एक साथ आ जाते हैं? वहाँ उनके दो अर्थ होते हैं। अतः यहाँ उत्तम शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान प्रकृति और उसके कार्य संसारशरीरसे सम्बन्धविच्छेद करानेवाला होनेसे श्रेष्ठ है और पर शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे सर्वोत्कृष्ट है।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः -- जिस ज्ञानको जानकर अर्थात् जिसका अनुभव करके बड़ेबड़े मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त हो गये हैं? उसको मैं कहूँगा। उस ज्ञानको प्राप्त करनेपर कोई मुक्त हो और कोई मुक्त न हो -- ऐसा होता ही नहीं? प्रत्युत इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सबकेसब मुनिलोग मुक्त हो जाते हैं? संसारके बन्धनसे? संसारकी परवशतासे छूट जाते हैं और परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।तत्त्वका मनन करनेवाले जिस मनुष्यका शरीरके साथ अपनापन नहीं रहा? वह मुनि कहलाता है।परां सिद्धिम् कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक कार्योंकी जितनी सिद्धियाँ हैं अथवा योगसाधनसे होनेवाली अणिमा? महिमा? गरिमा आदि जितनी सिद्धियाँ हैं? वे सभी वास्तवमें असिद्धियाँ ही हैं। कारण कि वे सभी जन्ममरण देनेवाली? बन्धनमें डालनेवाली? परमात्मप्राप्तिमें बाधा डालनेवाली हैं। परन्तु परमात्मप्राप्तिरूप जो सिद्धि है? वह सर्वोत्कृष्ट है क्योंकि उसको प्राप्त होनेपर मनुष्य जन्ममरणसे छूट जाता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.1।।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्य सर्वोत्पत्तिनिमित्तत्वमज्ञातं ज्ञापयितुमध्यायान्तरमवतारयन्नध्याययोरुत्थाप्योत्थापकत्वरूपां संगतिमाह -- सर्वमिति। विधान्तरेणाध्यायारम्भं सूचयति -- अथवेति। तदेव वक्तुमुक्तमनुवदति -- ईश्वरेति। प्रकृतिस्थत्वं पुरुषस्य प्रकृत्या सहैक्याध्यासस्तस्यैव गुणेषु शब्दादिविषयेषु सङ्गोऽभिनिवेशः। षड्विधामाकाङ्क्षां निक्षिप्य तदुत्तरत्वेनाध्यायारम्भे पूर्ववदेव पूर्वाध्यायसंबन्धसिद्धिरित्याह -- कस्मिन्निति। पूर्वोक्तेनार्थेनास्याध्यायस्य समुच्चयार्थश्चकारः। परमित्यस्य भाविकालार्थत्वं व्यावर्तयितुं सङ्गतिमाह -- परमिति। भूयःशब्दस्याधिकार्थत्वमिह नास्तीत्याह -- पुनरिति। पुनःशब्दार्थमेव विवृणोति -- पूर्वेष्विति। पुनरुक्तिस्तर्हीत्याशङ्क्य सूक्ष्मत्वेन दुर्बोधत्वात्पुनर्वचनमर्थवदित्याह -- तच्चेति। विशेष्यं प्रश्नद्वारा निर्दिशति -- किं तदिति। निर्धारणार्थां षष्ठीमादाय तस्य प्रकर्षं दर्शयति -- सर्वेषामिति। परमुत्तममिति पुनरुक्तिमाशङ्क्य विषयफलभेदान्मैवमित्याह -- उत्तमेति। ज्ञानं ज्ञेयमित्यादौ ज्ञानशब्देनामानित्वादीनामुक्तत्वात्तन्मध्ये च ज्ञानस्य साध्यत्वेनोत्तमत्वान्न तस्य वक्तव्यतेत्याशङ्क्याह -- ज्ञानानामिति। नामानित्वादीनां ग्रहणमिति शेषः। इतिशब्दादूर्ध्वं पूर्ववदेव शेषो द्रष्टव्यः। यथोक्तज्ञानापेक्षया कुतस्तज्ज्ञानस्य प्रकर्षस्तत्राह -- तानीति। स्तुतिफलमाह -- श्रोतृबुद्धीति। ज्ञानं ज्ञात्वा ज्ञानस्य ज्ञेयत्वोपगमादनवस्थेत्याशङ्क्याह -- प्राप्येति। मुनिशब्दस्य चतुर्थाश्रमविषयत्वे तन्मात्रादेव ज्ञानायोगात्कुतस्तेषां मुक्तिरित्याशङ्क्याह -- मननेति। सिद्धेर्ज्ञानत्वं परामिति विशेषणाद्व्यावर्त्य मुक्तित्वमाह -- मोक्षाख्यामिति। देहाख्यस्य बन्धनस्याध्यक्षत्वमाह -- अस्मादिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.1।।उत्तरेषां पञ्चानामध्यायानां प्रतिपाद्यमाह -- साधनमिति।योगे त्विमां शृणु [2।39] इति प्रतिज्ञायाषष्टपरिसमाप्तेः कामवर्जनादीति कर्तव्यतासहितं कर्मध्यानलक्षणं ज्ञानसाधनमुक्तम्। तत्रेतिकर्तव्यतांशमुत्तरैरध्यायैः प्रपञ्चयतीत्यर्थः।मम योनिर्महद्ब्रह्म [14।3]न तद्भासयते सूर्यः [15।6] इत्यादिनेश्वरमाहात्म्यस्यापि वचनात्कथमेतत् इत्यत उक्तम् -- प्राधान्येनेति। प्राचुर्यापेक्षया संग्राहकमेतदित्यर्थः। अवान्तरप्रतिपाद्यभेदादध्यायभेदः। तत्रयावत्सञ्जायते किञ्चित् [13।27] इत्युक्तविवरणपूर्वकंकारणं गुणसङ्गोऽस्य [13।22] इत्युक्तं गुणसम्बन्धं प्रपञ्च्य तदत्ययसाधनमनेनाध्यायेनोच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.1।। साधनकृज्ज्ञानदात्रे नमः। साधनं प्राधान्येनोत्तरैरध्यायैर्वक्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.1।। --,परं ज्ञानम् इति व्यवहितेन संबन्धः? भूयः पुनः पूर्वेषु सर्वेष्वध्यायेषु असकृत् उक्तमपि प्रवक्ष्यामि। तच्च परं परवस्तुविषयत्वात्। किं तत् ज्ञानं सर्वेषां ज्ञानानाम् उत्तमम्? उत्तमफलत्वात्। ज्ञानानाम् इति न अमानित्वादीनाम् किं तर्हि यज्ञादिज्ञेयवस्तुविषयाणाम् इति। तानि न मोक्षाय? इदं तु मोक्षाय इति परोत्तमशब्दाभ्यां स्तौति श्रोतृबुद्धिरुच्युत्पादनार्थम्। यत् ज्ञात्वा यत् ज्ञानं ज्ञात्वा प्राप्य मुनयः संन्यासिनः मननशीलाः सर्वे परां सिद्धिं मोक्षाख्याम् इतः अस्मात् देहबन्धनात् ऊर्ध्वं गताः प्राप्ताः।।अस्याश्च सिद्धेः ऐकान्तिकत्वं दर्शयति --,
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【 Verse 14.2 】
▸ Sanskrit Sloka: इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता: | सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ||
▸ Transliteration: idaṁ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ | sarge’pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||
▸ Glossary: idaṁ: this; jñānam: knowledge; upāśritya: taking shelter of; mama: My; sādharmyam: nature; āgatāḥ: attained; sarge ‘pi: even in the creation; na: never; upajāyante: comes in; pralaye: in the annihilation; na: nor; vyathanti: disturbed; ca: also
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.2 By becoming fixed in this knowledge, one can attain the transcendental nature, like my own, and establish in his Eternal Consciousness, that one is not born at the time of creation, or disturbed at the time of dissolution.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.2।।इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं? वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.2।। इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.2 इदम् this? ज्ञानम् knowledge? उपाश्रित्य having taken refuge in? मम My? साधर्म्यम् unity? आगताः have attained to? सर्गे at the time of creation? अपि also? न not? उपजायन्ते are born? प्रलये at the time of dissolution? न not? व्यथन्ति are (they) disturbed? च and.Commentary Having resorted to this knowledge they (the sages) are assimilated into My own nature. They have attained to My Being. They have become identical with Me. They live in Me with no thought of thou or I. They go beyond birth and death. There is no birth for them when creation begins and there is no death for them at the time of dissolution. Having reached Me they attain eternity? immortality and perfection. Having become identical with Me through the attainment of the knowledge of the Self by practising the necessary means? they are neither born at the time of creation nor are they disited at the time of dissolution. Knowledge of the Self is eulogised by the Lord in this verse.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.2. Holding on to this knowledge, they have attained the state of having attributes common with Me; [and] they are neither born even at the time of creation [of the world], nor do they come to grief at the time of dissolution [of it].
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.2 Dwelling in Wisdom and realising My Divinity, they are not born again when the universe is re-created at the beginning of every cycle, nor are they affected when it is dissolved.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.2 Resorting to this knowledge, partaking of My Nature, they are not born at the time of creation, nor do they suffer at the time of dissolution.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.2 Those who attain identity with Me by resorting of this Knowledge are not born even during creation, nor do they suffer pain during dissolution.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.2 They who, having taken refuge in this knowledge, have attained to unity with Me, are neither born at the time of creation nor are they disturbed at the time of dissolution.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.2 Idam etc. Vyathanti : The suffix tip (Personal Termination, Third person, Singular) is due to Vedism. The same may be stated in other [similar] instances of the suffixes of Case Terminations and Personal Terminations. Now to begin with, [the Bhagavat] speaks of the seence in the cycle of birth and death. For, if what is to be abandoned is understood along with its cause then it is easy to abandon that -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.2 They, 'resorting to this knowledge' which will be expounded later, come to partake of My nature, and they attain My status. 'They are not born at the time of creation,' they are not subjected to the process of creation, and they 'suffer not at the time of dissolution,' i.e. they are not subjected to the distress involved in dissolution of the universe.
In order to show how the Gunas of Prakrti constitute the cause of bondage, Sri Krsna now declares that, the aggregation of beings, born from the conjunction of Purusa and Prakrti as stated already in the passages, 'Whatever being is born' (13.26), is brought about by the Lord Himself:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.2 Agatah, those who attain; mama sadharmyam, identity with Me the supreme God, unity with My real nature-sadharmyam, however, does not mean similarity of attributes, for, in the scripture Gita, distinction between the Knower of the field and God is not admitted; and this statement of the result is by way of eulogy-; upasritya, by resorting to i.e. by following; idam, this; jnanam, Knowledge as described, i.e., by following the means to Knowledge; na, are not; upajayante, born, produced; api, even; sarge, during creation; nor do they vyathanti, suffer pain, i.e. they do not perish; pralaye, during dissolution, when even Brahma perishes. The Lord says that association of this kind between the field and the Knower of the field is the origin of all beings:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.2।। इस अध्याय में उपदिष्ट ज्ञान की महत्ता सैद्धान्तिक दृष्टि से उतनी अधिक नहीं है? जितनी कि साधना में उसके द्वारा होने वाले लाभ से है। इस अध्याय के गम्भीर अभिप्रायों को सम्यक् रूप से जानने वाला साधक पूर्णत्व की स्थिति को प्राप्त होता है। भगवान् कहते हैं? वे मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं।गीता में? भगवान् श्रीकृष्ण मैं शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक पूर्णत्व की दृष्टि से ही करते हैं। इस अध्याय का विषय उन गुणों की क्रीड़ा का अध्ययन करना है? जो हमें उपाधियों ओर अहंभाव के साथ बांध देते हैं। यदि एक बार हम उनसे मुक्त होकर अपने मन पर होने वाले उनके प्रभाव को समाप्त कर दें? तो तत्क्षण ही जीव भाव से मुक्त होकर हम अपने पारमार्थिक स्वरूप का अनुभव कर सकते हैं।स्वप्नद्रष्टा को स्वप्नावस्था में सत्य प्रतीत होने वाले दुख जाग्रत् अवस्था में असत् हो जाते हैं। नियम यह है कि एक अवस्था के सुखदुखादि अनुभव अन्य अवस्था में प्रभावशील नहीं होते हैं। अत? आत्म अज्ञान की अवस्था का उपाधि तादात्म्य तथा तज्जनित संसार का बन्धन जीव को ही सत्य प्रतीत होता है आत्मज्ञानी पुरुष को नहीं। ज्ञानी पुरुष अपने उस सर्वत्र व्याप्त सत्यस्वरूप को पहचानता है? जिसकी न उत्पत्ति है और न प्रलय।इसे यहाँ एक वाक्य से इंगित किया गया है? वे सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते हैं सृष्टि मन का एक खेल है। जब हम मन से तादात्म्य नहीं करेंगे? तब हम उससे अविच्छिन्न भी नहीं होंगे? और इस प्रकार हमें सृष्टि का कोई अनुभव भी नहीं होगा। उदाहरणार्थ? जब कोई व्यक्ति क्रोधावेश में आ जाता है? तब वह एक क्रोधी व्यक्ति के रूप में व्यवहार करता है परन्तु क्रोध से निवृत्त होने और मन के शान्त हो जाने पर वह वैसा व्यवहार नहीं कर सकता। मन की युक्ति यह है कि वह विचारों के द्वारा एक सृष्टि की कल्पना करता है? और फिर उसी के साथ तादात्म्य कर स्वयं को इस प्रकार बन्धन में अनुभव करता है मानो उससे मुक्ति पाना कदापि संभव ही न हो। जब तक हम मन में ही डूबे रहेंगे तब तक उसके क्षोभ से उद्वेलित भी होते रहेंगे। मन से अतीत अर्थात् मुक्त होने पर शुद्ध आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है? तब हमें जन्म का अनुभव कैसे हो सकता है और उस स्थिति में प्रलय से भय कैसा वह पूर्ण मुक्ति की स्थिति है।परन्तु अपने मन पर विजय पाने के लिये? साधक को मन की उन युक्तियों (योजनाओं) का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है? जिनके द्वारा यह प्राय उसे छलता रहता है। शत्रु पर आक्रमण करने के पूर्व उसकी रणनीति का ज्ञान प्राप्त करना अपरिहार्य होता है। इस दृष्टि से? भगवान् का यह कथन भी समीचीन है कि इन तीन गुणों का सम्पूर्ण ज्ञान साधक को अपने मन पर विजय प्राप्त कराने में सहायक होगा और इस प्रकार वह अपनी समस्त प्रकार की अपूर्णताओं से मुक्ति प्राप्त कर सकेगा।अब? भगवान् कहते हैं कि किस प्रकार जड़ और चेतन के सम्बन्ध में इस दुखपूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.2।।मोक्षाख्यसिद्धेः कर्मफलापेक्षया परमत्वे तत्साधनस्य ज्ञानस्य चोत्तमत्वे हेत्वाकाङ्क्षायां सिद्धेरैकान्तिकत्वं दर्शयति -- इदमिति। इदं यथोक्तं वक्ष्यमाणं च ज्ञानामुपाश्रित्य श्रवणादिज्ञानसाधनमुष्ठाय मम परमात्मनः साधर्म्यं स्वरुपतामागताः प्राप्ता इत्यर्थः। ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः नतु समानधर्मता साधर्म्यमिति भ्रमितव्यम्। गीताशास्त्रे क्षेत्रक्ज्ञेश्वरयोर्भेदानभ्युपगमात्? प्रस्तुतं ज्ञानफलं विहाय अप्रस्ततध्यानफलस्वीकारप्रसङ्गाच्च। सर्गेऽपि ब्रह्माद्युत्पत्तिकालेऽपि नोपजायन्ते? प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति व्यथां नापद्यन्ते न चलन्तीत्यर्थः। अवान्तरसर्गादौ जन्मादिकं न प्राप्तनुवन्तीति किमु वक्तव्यमित्यपिशब्दार्थः। परं सर्वोत्कृष्टं ब्रह्म तत्स्वरुपमाह। ज्ञानानाममानित्वादीनां यज्ञादीनां ज्ञानसाधनानां मध्ये यदुत्तमं ज्ञानं मोक्षफलत्वादन्तरङ्गम्। अहं घटं जानामीत्यत्राहमर्थस्य घटाकारवृत्तेर्घटस्य च ज्ञानमस्तीति विषयभेदाज्ज्ञाननत्रयमस्ति तत्राद्यद्वयं नान्तरीयकम्। यच्चोत्तमं चरमं घटप्रकाशकफलरुपं ज्ञानं तदेव परं ब्रह्मेत्यर्थः। यथोक्तं वार्तिककारैःपरागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन संगता। संविभेत्सैवेह ज्ञेयोऽर्थो वेदान्तोक्तिप्रमाणतः इति। यज्ज्ञानं ज्ञात्वा वेदान्तवाक्यजन्यया धीवृत्त्या अपरोक्षीकृत्य इदं ज्ञानं विषयविषयीरुपविकल्पविनिर्मुक्तमुपाश्रित्येत्यन्ये। अस्मिन्व्याख्याने ज्ञानानामिति निर्धारणष्ष्ठ्याः सामञ्जस्यं चिनत्यम्। साधनापेक्षया साधनोत्तमतायाः प्रतिपादनस्यैव सम्यक्त्वात्। किंच तत्स्वरुपमाह। ज्ञानं मोक्षफलत्वादन्तरङ्गं अहं घटं जानामीत्यादिपरस्परमसंगतमिति दिक्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.2।।तस्याः सिद्धेरैकान्तिकत्वं दर्शयति -- इदं यथोक्तं ज्ञानं ज्ञानसाधनमुपाश्रित्यानुष्ठाय मम परमेश्वरस्य साधर्म्यं मद्रूपतामत्यन्ताभेदेनागताः प्राप्ताः सन्तः सर्गेऽपि हिरण्यगर्भादिषूत्पद्यमानेष्वपि नोपजायन्ते। प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति च न व्यथन्ते। नच लीयन्त इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.2।।इदं ज्ञानं विषयविषयिरूपविकल्पविनिर्मुक्तं उपाश्रित्य मम ईश्वरस्य साधर्म्यं सर्वात्मत्वं सर्वनियन्तृत्वं सर्वभावाधिष्ठातृत्वमित्यादिधर्मसाम्यं साधर्म्यमागताः। तथा च श्रुतयःय एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति।सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिःस न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयान् इति ज्ञानफलं ईश्वरसाधर्म्यप्राप्तिमाहुः। किंच भुशुण्डीप्रभृतयो ज्ञानबलादेव सर्गेऽपि न जायन्ते? प्रलयकाले च तत्तद्भूतभावं गच्छन्तो न प्रलयाग्न्यादिभिर्व्यथन्ते व्यथां प्राप्नुवन्ति। इदं श्लोकद्वयं भाष्ये वक्ष्यमाणज्ञानस्तुत्यर्थत्वेनैव व्याख्यातम्। तज्ज्ञानमुपाश्रित्य ज्ञानसाधनमनुष्ठायेति पदार्थः। शेषं स्पष्टम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.2।।ज्ञानेन कथं सिद्धिं प्राप्ताः इत्यत आह -- इदमिति। इदं वक्ष्यमाणं ज्ञानमुपाश्रित्य साधनानुष्ठानं कृत्वा मम साधर्म्यं समानधर्मत्वं लीलायोग्यत्वमागताः सन्तः सर्गेऽपि आदिसर्गे ब्रह्मादिसृष्टावपि नोपजायन्ते। च पुनः प्रलये सृष्टिसंहारे न व्यथन्ति? न पुनरावर्तन्त इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.2।।किंच -- इदमिति। इदं वक्ष्यमाणं ज्ञानमुपाश्रित्य इदं ज्ञानसाधनमनुष्ठाय मम साधर्म्यं मद्रूपत्वं प्राप्ताः सन्तः सर्गेऽपि ब्रह्मादिषूत्पद्यमानेष्वपि नोत्पद्यन्ते तथा प्रलयेऽपि न व्यथन्ति प्रलये दुःखानि नानुभवन्ति। पुनर्नावर्तन्त इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.2।।इदं वक्ष्यमाणं मम साधर्म्यं षड्गुणवत्तया साम्यं प्राप्ता एके ते सर्गेऽपि नोपजायन्ते? प्रलये च न व्यथन्ति किन्तु नित्यं समीपे तिष्ठन्तीत्यर्थः। अनेन मुक्तानां तत्र बाहुल्यं सूचितंअनुव्रता यत्र हरेः इत्यादिवाक्यात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.2।।इस ( ज्ञानद्वारा प्राप्त हुई ) सिद्धिकी अव्यभिचारिता -- नित्यता दिखलाते हैं --, इस उपर्युक्त ज्ञानका भलीभाँति आश्रय लेकर? अर्थात् ज्ञानके साधनोंका अनुष्ठान करके? मुझ परमेश्वरकी समानताको -- मेरे साथ एकरूपताको प्राप्त हुए पुरुष सृष्टिके उत्पत्तिकालमें भी? फिर उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकालमें -- ब्रह्माके विनाशकालमें भी व्यथाको प्राप्त नहीं होते? अर्थात् गिरते नहीं। यह फलका वर्णन ज्ञानकी स्तुतिके लिये किया गया है। यहाँ साधर्म्य का अर्थ समानधर्मता नहीं है क्योंकि गीताशास्त्रमें क्षेत्रज्ञ और ईश्वरका भेद स्वीकार नहीं किया गया।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.2।। व्याख्या -- इदं ज्ञानमुपाश्रित्य -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने उत्तम और पर -- इन दो विशेषणोंसे जिस ज्ञानकी महिमा कही थी? उस ज्ञानका अनुभव करना ही उसका आश्रय लेना है। उस ज्ञानका अनुभव होनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण संशय मिट जाते हैं और वह ज्ञानस्वरूप हो जाता है।मम साधर्म्यमागताः -- उस ज्ञानका आश्रय लेकर मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जैसे मेरेमें कर्तृत्वभोक्तृत्व नहीं है? ऐसे ही उनमें भी कर्तृत्वभोक्तृत्व नहीं रहता। जैसे मैं सदा ही निर्लिप्तनिर्विकार रहता हूँ? ऐसे ही उनको भी अपनी निर्लिप्ततानिर्विकारताका अनुभव हो जाता है।ज्ञानी महापुरुष भगवान्के समान निर्लिप्तनिर्विकार तो हो जाते हैं? पर वे भगवान्के समान संसारकी उत्पत्ति? पालन और संहारका कार्य नहीं कर सकते। हाँ? योगाभ्यासके बलसे किसी योगीमें कुछ सामर्थ्य आ जाती है? पर वह सामर्थ्य भी भगवान्की सामर्थ्यके समान नहीं होती। कारण कि वह युञ्जान योगी है अर्थात् उसने अभ्यास करके कुछ सामर्थ्य प्राप्त की है। परन्तु भगवान् युक्त योगी हैं अर्थात् भगवान्में सामर्थ्य सदासे स्वतःसिद्ध है। भगवान् सब कुछ करनेमें समर्थ हैं -- कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थः। योगीकी सामर्थ्य तो,सीमित होती है? पर भगवान्की सामर्थ्य असीम होती है।सर्गेऽपि नोपजायन्ते -- यहाँ अपिपदसे यह मालूम होता है कि वे ज्ञानी महापुरुष महासर्गके आरम्भमें भी उत्पन्न नहीं होते। महासर्गके आदिमें चौदह लोकोंकी तथा उन लोकोंके अधिकारियोंकी उत्पत्ति होती है? पर वे महापुरुष उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनको फिर कर्मपरवश होकर शरीर धारण नहीं करना पड़ता।प्रलये न व्यथन्ति च -- महाप्रलयमें संवर्तक अग्निसे चरअचर सभी प्राणी भस्म हो जाते हैं। समुद्रके बढ़ जानेसे पृथ्वी डूब जाती है। चौदह लोकोंमें हलचल? हाहाकार मच जाता है। सभी प्राणी दुःखी होते हैं? नष्ट होते हैं। परन्तु महाप्रलयमें उन ज्ञानी महापुरुषोंको कोई दुःख नहीं होता? उनमें कोई हलचल नहीं होती? विकार नहीं होता। वे महापुरुष जिस तत्त्वको प्राप्त हो गये हैं? उस तत्त्वमें हलचल? विकार है ही नहीं? तो फिर वे महापुरुष व्यथित कैसे हो सकते हैं नहीं हो सकते।महासर्गमें भी उत्पन्न न होने और महाप्रलयमें भी व्यथित न होनेका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषका प्रकृति और प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। इसलिये प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जो जन्ममरण होता है? दुःख होता है? हलचल होती है? प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित महापुरुषमें वह जन्ममरण? दुःख आदि नहीं होते। सम्बन्ध -- जो भगवान्की सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं? वे तो महासर्गमें भी पैदा नहीं होते परन्तु जो प्राणी महासर्गमें पैदा होते हैं? उनके उत्पन्न होनेकी क्या प्रक्रिया है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.2।।ज्ञानफलस्य कर्मफलवैलक्षण्यमाह -- अस्याश्चेति। कथं ज्ञानाश्रयणं तद्धेतुश्रवणादिसामग्रीसंपत्तिद्वारेत्याह -- ज्ञानेति। साधर्म्ये गोगवययोरिव विद्वदीश्वरयोरपि भेदः स्यादित्याशङ्क्याह -- मत्स्वरूपतामिति। साधर्म्यस्य मुख्यत्वे भेदध्रौव्याद्गीताशास्त्रविरोधः स्यादित्याह -- नत्विति। ज्ञानस्तुतये तत्फलस्य विवक्षितत्वाच्च नात्र सारूप्यमिष्टमित्याह -- फलेति। सारूप्ये धीफलं हित्वा ध्यानफलमप्रस्तुतं प्रसज्येतेत्यर्थः। ईश्वरात्मतां गतानामेवावान्तरसर्गादौ जन्माद्यभावेऽपि महासर्गादौ तद्भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- सर्गेऽपीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.2।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.2।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.2।। --,इदं ज्ञानं यथोक्तमुपाश्रित्य? ज्ञानसाधनम् अनुष्ठाय इत्येतत्? मम परमेश्वरस्य साधर्म्यं मत्स्वरूपताम् आगताः प्राप्ताः इत्यर्थः। न तु समानधर्मता साधर्म्यम्? क्षेत्रज्ञेश्वरयोः भेदानभ्युपगमात् गीताशास्त्रे। फलवादश्च अयं स्तुत्यर्थम् उच्यते। सर्गेऽपि सृष्टिकालेऽपि न उपजायन्ते। न उत्पद्यन्ते। प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति च व्यथां न आपद्यन्ते? न च्यवन्ति इत्यर्थः।।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगः ईदृशः भूतकारणम् इत्याह --,
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【 Verse 14.3 】
▸ Sanskrit Sloka: मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् | सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत ||
▸ Transliteration: mama yonir-mahad-brahma tasmingarbhaṁ dadhāmyahaṁ | saṁbhavaḥ sarvabhūtānāṁ tato bhavati bhārata ||
▸ Glossary: mama: My; yoniḥ: source of birth; mahad brahma: material cause of the entire creation called mahat brahma; tasmin: in that; garbhaṁ: pregnancy; dadhāmi: create; ahaṁ: I; saṁbhavaḥ: possibility; sarvabhūtānāṁ: of all living entities; tataḥ: thereafter; bhavati: becomes; bhārata: O son of Bhārata
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.3 The total material substance, called Brahman, is the source of birth, It is that Brahman that I impregnate, making possible the births of all living beings, O son of Bhārata.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.3।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्तिस्थान है और मैं उसमें जीवरूप गर्भका स्थापन करता हूँ। उससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.3।। हे भारत मेरी महद् ब्रह्मरूप प्रकृति? (भूतों की) योनि है? जिसमें मैं गर्भाधान करता हूँ इससे समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.3 मम My? योनिः womb? महत् the great? ब्रह्म Brahma? तस्मिन् in that? गर्भम् germ? दधामि bears? अहम I? संभवः the birth? सर्वभूतानाम् of all beings? ततः thence? भवति is? भारत O descendant of Bharata (Arjuna).Commentary My womb is the great Nature. The cosmos is evolved out of His Nature. Nature is called the great Brahma for She is the resting place of the five subtle elements and also the Mahat (cosmic mind). She is callled the great Brahma? because through Her the whole manifestation takes place.All changes arise out of this great Nature. So She has got the name Mulaprakriti or Primordial Nature or the original principle. From the point of view of the Unmanifest She is called Avyakta. The Vedantins call Her Maya (illusion). The Sankhyas call Her Prakriti.This Prakriti is called great because She is greater than all Her effects. This Nature? made of the three alities? is the material cause of all beings. As She is the source or cause of all Her,modifications and also nourishes all the modifications with Her energy? She is called Brahma.I place in it (the Mahabrahma) the embryo of life then all beings begin to come to life therefrom. In the great Brahma or Nature I place the germ
Chapter 14 (Part 2)
or the seed for the birth of Hiranyagarbha and the seed gives birth to all beings. The birth of Hiranyagarbha or Brahma (the Creator) gives rise to the birth of beings. The Primordial Nature is like the clay. She cannot create the forms Herself. She gives birth to Brahma Who creates all beings just as the potter creates various forms from the clay. I am endowed with the two Saktis? viz.? the superior and the inferior Natures (Cf. VII. 4 and 5)? the field and its knower. I unite these two (the Spirit and the matter). The individual soul comes under the influence of the limiting adjuncts? viz.? ignorance? desire and action. On account of ignorance (Avidya)? the individual soul forgets his original divine nature? gets himself entangled in the meshes of desire (Kama) and action (Karma)? and revolves in the wheel of birth and death. The individual soul turns towards ignorance without knowing his own true divine nature. The Jiva (individual soul) being overpowered by ignorance and the modifications? forgets its pristine purity and moves in various forms.The Primordial Nature or the Unmanifested is a dark matrix with infinite potentialities. It is not a substance. Sound and energy are in an undifferentiated state in It. The whole world gets involved into It during the cosmic dissolution. There is no relationship of substance or ality between It and the three Gunas. The alities are the Mulaprakriti and the latter is the former in a state of poise or eilibrium. This manifested world of the three alities is compared to a twisted rope of three colours? viz.? white? red and black. Each colour represents a Guna. Sattvic is white? Rajas is red and Tamas is black. The three are not in a state of eilibrium in the manifested world.Water and the seed coming in contact with the earth produce sprouts which grow into trees. In the womb of Nature? the seed develops into the eightfold elements -- earth? water? fire? air? ether? mind? intellect and egoism. The first fruit of the contact of Nature with the soul is the MahatTattva or intellect. From intellect mind is born from mind egoism from egoism? the five elements.There are four classes of beings? viz.? Jarayuja? Andaja? Svedaja and Udbhijja. The Jarayuja is born of the placenta (viviparous). Human beings? cows? elephants? horses? etc.? belong to this class. In this variety the five senses of knowledge exist. The Andaja is born of eggs (oviparous). In this variety the elements of wind and ether predominate. Lice come under the category of Svedaja they are born of sweat. In this variety fire and water predominate. Trees that are born of seeds are classified under the head Udbhijja in this variety earth and water predominate. (Cf.VII.6IX.17XV.7)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.3. The mighty Brahman is a womb for Me; and in That I lay seed; therefrom is the birth of all beings, O descendant of Bharata !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.3 The eternal Cosmos is My womb, in which I plant the seed, from which all beings are born, O Prince!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.3 My womb is the great brahman (i.e. Prakrti). In that I lay the germ. From that, O Arjuna, is the birth of all beings.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.3 My womb is the great-sustainer. In that I place the seed. From that, O scion of the Bharata dynasty, occurs the birth of all things.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.3 My womb is the great Brahma; in that I place the germ; thence, O Arjuna, is the birth of all beings.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.3 Mama etc. For Me : [For Me] Who am of the nature of the inexplicable Supreme Bliss, the mighty Brahman : the Brahman that is identical with My own energy, allowing expansion [of all in It]. Taking hold of just My own energy of Self-consciousness, I cause the beginningless tiny [individual] Souls to pass through the cycle of birth and death by way of favouring them. Therefore-
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.3 In that great brahman forming my womb, I lay the germ. The non-conscient Prakrti is alluded to in the text 'Earth, water, fire, air, ether, Manas, Buddhi and Ahankara - thus My Prakrti is eightfold' (7.4-5). This Prakrti is designated here by the name 'the great brahman' by reason of its being the cause of modifications like the Mahat, the Ahankara etc. In the Srutis also, here and there, even the Prakrti is designated as brahman, as in: 'He who is all-knowing, all-wise, whose austerity consists of knowledge - from Him are produced this brahman as also food, i.e., the universe of name and form' (Mun. U., 1.1.9) The higher Prakrti, which is the mass of conscient selves, alluded to in the passage, 'Know My higher Prakrti to be distinct from this; it is the life-principle' (7.5). It is here expressed by the term 'Garbha', the source or womb in which all living beings originate. I lay the germ, constituting the mass of conscious beings, in that great brahman, which is non-conscient and forms the womb. From that conjunction between the two Prakrtis, brought about by My will is brought forth the origin of all entities from Brahma down to tuft to grass.
He continues to say: 'I Myself bring about the conjunction of the conscient and unconscient Prakrtis in the manifested state of effect'.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.3 Mama, My own Maya, i.e. Prakrti consisting of the three alities, which belongs to Me; is the yonih, womb [Here Ast. adds 'karanam, cause' (-off all the creatures).-Tr.] for all the creatures. Since it (Prakrti) is great (mahat) as compared with all its effects, and it is the sustainer (brahma) [Prakrti is brahma since it permeates all of its own products.-A.G.] of all its own transformations, therefore the womb itself is alified as mahat brahma. Tasmin, in that, in the womb which is the great-sustainer; aham, I, God, possessed of the power in the form of the two aspects, viz the field and the Knower of the field; dadhami, place, deposit; garbham, the seed-the seed of the birth of Hiranayagarbha, te seed which is the cause of the birth of all things-; i.e., I bring the field into association with the Knower of the field who conforms to the nature of the limiting adjuncts, viz ignorance, desire and activity. Tatah, from that, from that deposition of the seed; O scion of the Bharata dynasty, bhavati, occurs; sambhavah, the birth, origination; sarva-bhutanam, of all things, following the birth of Hiranyagarbha.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.3।। महद् ब्रह्म योनि यहाँ महद् ब्रह्म को भूतमात्र की योनि अर्थात् कारण कहा गया है। परन्तु? यहाँ महद् ब्रह्म यह शब्द सम्पूर्ण विश्वाधिष्ठान परमात्मा के लिये प्रयुक्त नहीं है। यह शब्द जगत् की अव्यक्त अवस्था अर्थात् जड़ प्रकृति को इंगित करता है। वह अपने स्थूल और सूक्ष्म कार्यरूप विकारों की अपेक्षा बड़ी? व्यापक होने से महत् है तथा स्वविकारों का भरणपोषण करने के कारण ब्रह्म कहलाती है। इस प्रकार व्युत्पत्ति के आधार पर प्रकृति को यहाँ महद्ब्रह्म कहा गया है। इसी महद्ब्रह्म के लिये पूर्व के अध्यायों में अपरा प्रकृति? क्षेत्र? प्रकृति इत्यादि शब्दों का प्रयोग किया गया था।उससे मैं गर्भाधान करता हूँ यह महद्ब्रह्मरूप प्रकृति स्वयं जड़ होने के कारण स्वत स्वतन्त्ररूप से सृष्टि नहीं कर सकती है। इसमें शुद्ध चैतन्यस्वरूप परमात्मा जब प्रतिबिम्बित होता है? तब यह चेतनयुक्त होकर सृष्टिकार्य में प्रवृत्त होती है। परमात्मा का इसमें चैतन्यरूप से व्यक्त हो जाना ही गर्भाधान की क्रिया है। इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम समष्टि मन को धारण करने वाले ईश्वर जिसे इस अवस्था में वेदान्त के अनुसार हिरण्यगर्भ कहते हैं व्यक्त होता है और तत्पश्चात् असंख्य जीव और नामरूपमय सृष्टि उत्पन्न होती है।सृष्टि की इस प्रक्रिया को हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि किसी भी रचनात्मक कार्य का प्रादुर्भाव एवं विकास कर्ता के मन में उदित होने वाली वृत्ति के साथ होता है। जीवनी शक्ति से युक्त होकर वह वृत्ति शक्तिशाली बनकर स्वयं को व्यक्त करने के लिये अधीर हो उठती है। फलत वह विचारों और भावनाओं के रूप में व्यक्त होकर अन्त में कर्मरूप में परिणत हो जाती है। एक चित्रकार अपने विचारों को रंगों के माध्यम से व्यक्त करता है तो एक गायक संगीत के रूप मे शिल्पकार उसे पाषाणों के द्वारा प्रगट करता है और साहित्यकार शब्दों के माध्यम से। परन्तु इनमें से किसी भी कल्पना के मृत हो जाने पर वह अपने विचारों को कर्म रूप में अभिव्यक्त न्ाहीं कर सकता है। जैसे व्यष्टि की सृष्टि है? वैसे ही समष्टि सृष्टि को भी समझना चाहिये।समष्टि वासनाओं? विचारों? भावनाओं एवं कर्मों के संगठित रूप को प्रकृति कहते हैं? जो सत्त्वरजतमोगुणात्मिका होने से इन गुणों से नियन्त्रित होती है। इसी प्रकृति को यहाँ महद्ब्रह्म कहा गया है? जिसे वेदान्त में माया शब्द से भी सूचित किया जाता है। माया के व्यष्टि रूप को ही अविद्या कहते हैं। जीव ओर ईश्वर में भेद यह है कि जीव अविद्या के अधीन रहता है? जबकि ईश्वर माया को अपने वश में रखता है।भगवान् आगे कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.3।।ज्ञानस्तुत्या तदभिमुखाय समाहितचित्ताय क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोग ईदृशो भूतकारणमिति विवक्षितमर्थमाह -- ममेति। मम मदीया मदधिष्ठिता नतु स्वतन्त्रा माया त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः सर्वभूतानां योनिः कारणम्। मम योनिः गर्भाधानस्थानमिति तु सुगमत्वादाचार्यैर्न व्याख्यातम्। योनिमेव विशिनष्टि। सर्वकार्येब्यो महत्त्वात्स्वविकाराणां भरणाच्च महद्ब्रह्म। महत्तत्त्वस्य प्रथमकार्यस्य ब्रह्म बृंहकं कारणमिति तु ब्रह्मशब्दस्य कारणरुपामुख्यार्थपरत्वं लधुभूतकर्मधारयत्यागं ब्रह्म महदिति वक्ष्यमाणाननुरोधे चासमञ्जसमभिप्रेत्याचार्यैर्न व्याख्यातम्। तस्मिन्महति ब्रह्मणि योनौ गर्भं हिरण्यगर्भादिस्रवभूतानां जन्मकारणं बीजमहं दधामि निक्षिपामि। क्षेत्रक्षेत्रज्ञप्रकृतिद्वयशक्तिमानीस्वरोऽहमविद्याकामकर्मोपाधिस्वरुपानुविधायिनं क्षेत्रज्ञं क्षेत्रेण संयोजयामीत्यर्थः। ततस्तस्माद्गर्भाधानात्सर्वभूतानां हिरण्यगर्भादिस्तम्बपर्यन्तानां संभव उत्पत्तिर्भवति। ननु हिरण्यगर्भस्य ततः संभवेऽपि सर्वेषां कथं ततः संभवः स्वस्वमातृपित्रादेस्तत्तद्भूतसंभवदर्शनादितिचेत्तत्राह -- भारतेति। यथा पित्रादेरुत्पन्नानामपि भवदादीनां भरतोद्भवत्वेन भारतत्वं तथेति संबोधनाशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.3।।तदेवं प्रशंसया श्रोतारमभिमुखीकृत्य परमेश्वराधीनयोः प्रकृतिपुरुषयोः सर्वभूतोत्पत्तिंप्रति हेतुत्वं नतु सांख्यसिद्धान्तवत्स्वतन्त्रयोरितीमं विवक्षितमर्थमाह द्वाभ्याम् -- सर्वकार्यापेक्षयाऽधिकत्वात्कारणं महत्? सर्वकार्याणां वृद्धिहेतुत्वरूपाद्ब्रंहणत्वाद्ब्रह्म अव्याकृतं? प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका माया? महद्ब्रह्म तच्च ममेश्वरस्य योनिर्गर्भाधानस्थानम्। तस्मिन्महति ब्रह्मणि योनौ गर्भं सर्वभूतजन्मकारणं अहंबहुस्यां प्रजायेय इतीक्षणरूपं संकल्पं दधामि धारयामि। तत्संकल्पविषयीकरोमीत्यर्थः। यथाहि कश्चित्पिता पुत्रमनुशयिनं व्रीह्याद्याहाररूपेण स्वस्मिन् लीनं शरीरेण योजयितुं योनौ रेतःसेकपूर्वकं गर्भमाधत्ते तस्माच्च गर्भाधानात्स पुत्रः शरीरेण युज्यते तदर्थं च मध्ये कललाद्यवस्था भवन्ति? तथा प्रलये मयि लीनमविद्याकामकर्मानुशयवन्तं क्षेत्रज्ञं सृष्टिसमये भोग्येन क्षेत्रेण कार्यकरणसंघातेन योजयितुं चिदाभासाख्यरेतःसेकपूर्वकं मायावृत्तिरूपं गर्भमहमादधामि। तदर्थं च मध्ये आकाशवायुतेजोजलपृथिव्याद्युत्पत्त्यवस्थाः। ततो गर्भाधानात्संभव उत्पत्तिः सर्वभूतानां हिरण्यगर्भादीनां भवति हे भारत? नत्वीश्वरकृतगर्भाधानं विनेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.3।।अथेदानीं का वा भूतप्रकृतिः किमाश्रयेण तस्या भूतजनकत्वं तदाह -- ममेति। मम शुद्धचिन्मात्रस्य योनिः प्रवेशस्थानम्। महद्ब्रह्म महत्तत्त्वस्य प्रथमकार्यस्य ब्रह्म बृंहकं कारणमव्यक्ताव्याकृतापरपर्यायं त्रिगुणात्मकमायाख्यं तस्मिन् गर्भं स्वप्रतिबिम्बरूपं दधाम्यर्पयामि अहं चिदात्मा। ततो मत्प्रतिबिम्बगर्भिता या माया ततः सर्वेषां भूतानां भवनधर्माणां महदादीनां हिरण्यगर्भादीनां च संभव उत्पत्तिर्भवति हे भारत। एतेन चित्प्रतिबिम्बसापेक्षत्वोपपादनेन प्रकृतेः सांख्याभिमतं स्वातन्त्र्यं निरस्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.3।।एवं फलरूपतामुक्त्वा तदेव प्रपञ्चयति -- ममेति। महत् देशकालाद्यपरिच्छिन्नं ब्रह्म बृहत्त्वाद्बृंहणत्वेन मल्लीलार्थवस्तुवृद्धिहेतुत्वात् ब्रह्म प्रकृतिः मम पुरुषोत्तमस्य योनिः क्रीडार्थविचित्रानेकवस्तुरूपप्रकटनात्मकगर्भाधानस्थानम्। तस्मिन् गर्भं क्रीडेच्छात्मकभावं दधामि स्थापयामि। ततो गर्भाधानानन्तरं सर्वभूतानां सम्भव उत्पत्तिर्भवति। भारत इति सम्बोधनं विश्वासार्थम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.3।।तदेवं प्रशंसया श्रोतारमभिमुखीकृत्य परमेश्वराधीनयोः प्रकृतिपुरुषयोः सर्वभूतोत्पत्तिं प्रति हेतुत्वं नतु स्वतन्त्रयोरितीमं विवक्षितमर्थं कथयति -- ममेति। देशतः कालतश्चानवच्छिन्नत्वान्महत्? बृंहणत्वात्स्वकार्याणां वृद्धिहेतुत्वाद्वा ब्रह्म। प्रकृतिरित्यर्थः। तन्महद्ब्रह्म मम परमेश्वरस्य योनिर्गर्भाधानस्थानं? तस्मिन्नहं गर्भं जगद्विस्तारहेतुं चिदाभासं दधामि निक्षिपामि। प्रलये मयि लीनं सन्तमविद्याकामकर्मानुशयवन्तं क्षेत्रज्ञं सृष्टिसमये भोग्येन क्षेत्रेण संयोजयामीत्यर्थः। ततो गर्भाधानात्सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां संभव उत्पत्तिर्भवतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.3।।तदेवं प्रशंसया श्रोतारमभिमुखीकृत्य स्वस्याचिन्त्यशक्तिवैभवलीलां दर्शयति -- ममेति। तत्रसर्गेऽपि नोपजायन्ते [14।2] इत्यत्राभिप्रेतं सर्गस्य प्राकृतत्वेन सगुणत्वं वदन् तत्सम्भवमाह -- मम योनिरिति। गुणानां हेतुभूता सर्वस्य भूतजातस्य मत्प्रकृतिगुणसंसर्गजत्वं पूर्वोक्तं मयैव कृतमिति स्पष्टयितुं ममेति। मम सदंशभूता योनिः निषेकस्थानं प्रकृतिः त(तस्मा)देतद्ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते [मुं.उ.1।1।9] इति श्रुतेर्ब्रह्मांशभूतत्वान्महद्ब्रह्मेत्युच्यते सूत्रभूतादिकारणभूताऽचेतना? तत्र गर्भं बीजभूतं सूत्रं चेतनपुञ्जीभूतं च दधाम्यहमक्षरात्मा पुरुषः स धारणमीक्षणद्वारा भवति तदेव बीजमित्युच्यते तत्सम्मृष्टपुरुषो विराट्? तत्संसृष्टा उभयस्वरूपाश्चेतना अणवो व्युञ्चरिता जायायामिवात्मा वै जायते इति तदंशभूता मत्स्वरूपचैतन्यतोऽभिन्नाः प्राणधारणप्रयत्नवन्तोऽनेके जीवा इति व्यपदिश्यन्ते। तदाह -- तत इति। गर्भात्सर्वभूतानां सम्भवो भवति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.3।।अब यह बतलाते हैं कि इस प्रकारका क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संयोग भूतोंका कारण है --, मुझ ईश्वरकी माया -- त्रिगुणमयी प्रकृति? समस्त भूतोंकी योनि अर्थात् कारण है। समस्त कार्योंसे यानी उत्पत्तिशील वस्तुओंसे बड़ी होनेके कारण और अपने विकारोंको धारण करनेवाली होनेसे प्रकृति ही महत् ब्रह्म इस विशेषणसे विशेषित की गयी है। उस महत् ब्रह्मरूप योनिमें? मैं -- क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दो प्रकृतिरूप शक्तियोंवाला ईश्वर? हिरण्यगर्भके जन्मके बीजरूप गर्भको? यानी सब भूतोंकी उत्पत्तिके कारणरूप बीजको? स्थापित किया करता हूँ। अर्थात् अविद्या? कामना? कर्म और उपाधिके स्वरूपका अनुवर्तन करनेवाले क्षेत्रको क्षेत्रज्ञसे संयुक्त किया करता हूं। हे भारत उस गर्भाधानसे हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिद्वारा समस्त भूतोंकी उत्पत्ति होती है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.3।। व्याख्या -- मम योनिर्महद्ब्रह्म -- यहाँ मूल प्रकृतिको महद्ब्रह्म नामसे कहा गया है? इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे -- (1) परमात्मा छोटेपन और बड़ेपनसे रहित हैं अतः वे सूक्ष्मसेसूक्ष्म भी हैं और महान्सेमहान् भी हैं -- अणोरणीयान्महतो महीयान् (श्वेताश्वतरोपनिषद् 3। 20)। परन्तु संसारकी दृष्टिसे सबसे बड़ी चीज मूल प्रकृति ही है अर्थात् संसारमें सबसे बड़ा व्यापक तत्त्व मूल प्रकृति ही है। परमात्माके सिवाय संसारमें इससे बढ़कर कोई व्यापक तत्त्व नहीं है। इसलिये इस मूल प्रकृतिको यहाँ महद्ब्रह्म कहा गया है।(2) महत् (महत्तत्त्व अर्थात् समष्टि बुद्धि) और ब्रह्म(परमात्मा) के बीचमें होनेसे मूल प्रकृतिको महद्ब्रह्म कहा गया है।(3) पीछेके (दूसरे) श्लोकमें सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च पदोंमें आये सर्ग और प्रलय शब्दोंका अर्थ क्रमशः ब्रह्माका दिन और ब्रह्माकी रात माना जा सकता है। अतः उनका अर्थ महासर्ग (ब्रह्माका प्रकट होना) और महाप्रलय (ब्रह्माका लीन होना) सिद्ध करनेके लिये यहाँ महद्ब्रह्म शब्द दिया है। तात्पर्य है कि जीवन्मुक्त महापुरुषोंका इस मूल प्रकृतिसे ही सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? इसलिये वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।सबका उत्पत्तिस्थान होनेसे इस मूल प्रकृतिको योनि कहा गया है। इसी मूल प्रकृतिसे अनन्त ब्रह्माण्ड पैदा होते हैं और इसीमें लीन होते हैं। इस मूल प्रकृतिसे ही सांसारिक अनन्त शक्तियाँ पैदा होती हैं।इस मूल प्रकृतिके लिये मम पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि यह प्रकृति मेरी है। अतः इसपर आधिपत्य भी मेरा ही है। मेरी इच्छाके बिना यह प्रकृति अपनी तरफसे कुछ भी नहीं कर सकती। यह जो कुछ भी करती है? वह सब मेरी अध्यक्षतामें ही करती है (गीता 9। 10)।मैं मूल प्रकृति(महद्ब्रह्म) से भी श्रेष्ठ साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हूँ -- इसको बतानेके लिये भगवान्ने,मम महद्ब्रह्म पदोंका प्रयोग किया है।महद् ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माका अंश होते हुए भी जीव परमात्मासे विमुख होकर प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है। इतना ही नहीं? वह प्रकृतिके कार्य तीनों गुणोंसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और उससे भी नीचे गिरकर गुणोंके भी कार्य शरीर आदिसे सम्बन्ध जोड़ लेता है और बँध जाता है। अतः भगवान् मम महद्ब्रह्म पदोंसे कहते हैं कि जीवका सम्बन्ध वास्तवमें मूल प्रकृतिसे भी श्रेष्ठ मुझ परमात्माके साथ है -- मम एव अंशः (गीता 15। 7)? इसलिये प्रकृतिके साथ सम्बन्ध मानकर उसको अपना पतन नहीं करना चाहिये।तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् -- यहाँ गर्भम् पद कर्मसंस्कारोंसहित जीवसमुदायका वाचक है। भगवान् कोई नया गर्भ स्थापन नहीं करते। अनादिकालसे जो जीव जन्ममरणके प्रवाहमें पड़े हुए हैं? वे महाप्रलयके समय अपनेअपने कर्मसंस्कारोंसहित प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं (गीता 9। 7)। प्रकृतिमें लीन हुए जीवोंके कर्म जब परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं? तब महासर्गके आदिमें भगवान् उन जीवोंका प्रकृतिके साथ पुनः विशेष सम्बन्ध (जो कि कारणशरीररूपसे पहलेसे ही था) स्थापित करा देते हैं -- यही भगवान्के द्वारा जीवसमुदायरूप गर्भको प्रकृतिरूप योनिमें स्थापन करना है।सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत -- भगवान्के द्वारा प्रकृतिमें गर्भस्थापन करनेके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है अर्थात् वे प्राणी सूक्ष्म और स्थूल शरीर धारण करके पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं। महासर्गके आदिमें प्राणियोंका यह उत्पन्न होना ही भगवान्का विसर्ग (त्याग) है? आदिकर्म है (गीता 8। 3)।[जीव जबतक मुक्त नहीं होता? तबतक प्रकृतिके अंश कारणशरीरसे उसका सम्बन्ध बना रहता है और वह महाप्रलयमें कारणशरीरसहित ही प्रकृतिमें लीन होता है।] सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें समष्टि संसारकी उत्पत्तिकी बात बतायी? अब आगेके श्लोकमें व्यष्टि शरीरोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.3।।ज्ञानस्तुत्या तदभिमुखायावहितचेतसे विवक्षितमर्थमाह -- क्षेत्रेति। स्वरूपत्वेन स्वभूतत्वं वारयति -- मदीयेति। ईश्वरीं चिच्छक्तिं व्यावर्तयति -- त्रिगुणात्मिकेति। सांख्यीयप्रकृतिरपि मदीयेति व्यावर्तिता। योनिशब्देन सर्वाणि भवनयोग्यानि कार्याणि प्रत्युपादानत्वमभिप्रेतमित्याह -- सर्वभूतानामिति। प्रकृतेर्महत्त्वं साधयति -- सर्वेति। सर्वकार्यव्याप्तिमादाय योनावेव ब्रह्मशब्दः। लिङ्गवैषम्यान्महद्ब्रह्मेत्यर्थान्तरं किंचिदित्याशङ्क्याह -- योनिरिति। तस्मिन्नित्यादि व्याचष्टे -- तस्मिन्निति। ईदृशस्य क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्य भूतकारणत्वमिति वक्तुमुपक्रम्य किमिदमन्यदादर्शितमित्याशङ्क्याह -- क्षेत्रेति। गर्भशब्देनोक्तसंयोगस्य फलं दर्शयति -- संभव इति।आदिकर्ता स भूतानाम् इति स्मृत्या हिरण्यगर्भकार्यत्वावगमाद्भूतानां कथंयथोक्तगर्भाधाननिमित्तत्वमित्याशङ्क्याह -- हिरण्यगर्भेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.3।।अत्र महत् ब्रह्मेति जडाऽविद्योच्यत इति प्रतीतिनिरासार्थमाह -- महदिति। प्रकृतिर्महालक्ष्मीः। ननु सत्त्वं रजस्तम इति जडा प्रकृतिर्वक्ष्यते? तत्सन्निधानादत्रापि सैव युक्तेति चेत्? न तत्रापि चेतनप्रकृत्यभिधानात्? कथमस्याः सत्त्वादिभेदभिन्नत्वं इत्यत आह -- सा चेति। जडप्रकृतेरभिमानिनी तत्कार्यसत्त्वादिगुणाभिमानिन्येतद्रूपत्रयवतीत्यर्थः। ननु भगवती माहेश्वरी ब्राह्मी कौमारी माहेन्द्री श्रीर्भूर्दुर्गेति सप्तधा भिन्नाऽऽगमेषूच्यते? तत्कथं त्रिधा भिन्नोच्यते इत्यत आह -- उमेति। आद्याश्चतस्रो भगवत्या अन्याः। कुतः जीवाः। कथं तद्रूपत्वोक्तिः तदंशयुतास्तत्सन्निधानोपेताः। कुत एतत् इत्यत आह -- तथा चेति।मम योनिः इत्येतत्परे व्याचक्षते मम स्वरूपभूता योनिः कारणं विश्वस्य प्रतीत एवान्वये मम मातेत्यापत्तेरिति तन्निरासार्थमाह -- ममेति भार्येत्यर्थः। ममेत्यनुवादेनान्यथा प्रतीतावन्वयबाधः स्यादिति सूचयति। प्रतीतान्वयाङ्गीकारेमाता इत्यपि प्रतीयेत? तत्र कथं भार्येति निश्चयः इत्यत आह -- न त्विति। इति प्रतीतिः प्रसज्ज्यत इति शेषः। कुतो न इत्यत आह -- वाक्येति।तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् इति वाक्यशेषाद्भार्यार्थतानिश्चयात्। श्रुतिबलाच्चेत्याह -- तथा हीति। प्रकाशयन्ती प्रवर्तते। अनयैव श्रुत्याऽन्यदपि लब्धमिति प्रसङ्गादाह -- अत इति। मृषाऽयथार्थं प्रदर्शनं यस्य तत्तथा। इतश्चैवमेवेत्याह -- तथेति। तत्र ह्येवमुक्तम्दग्ध्वा मायामयीं सीतां भगवानुग्रदीधितिः। रामायादर्शयत्सीतां पावकोऽसौ सुरप्रियः [ ] इत्यादि। ननु महालक्ष्मीः श्रीर्भूर्दुर्गेति भिन्नेत्युक्तम्। भुवश्चगौर्भूत्वाऽश्रुमुखी खिन्ना [भाग.10।1।18] इति दुःखं प्रतीयते? तत्कथं तत् इत्यत आह -- न चेति। इयं भूताभिमानिनी प्रसिद्धा भूः भगवत्या रूपं न भवति? किन्त्वियमन्यैव। कुतः इत्यत आह -- तथा चेति। महालक्ष्मीरूपं भूरन्या? इयं प्रसिद्धा? तस्य तस्याः। छाया प्रतिमा। ननु रावणहरणादिकं भवतु मायासीतायाः वाल्मीकिदास्यं तावन्मत्स्यपुराणे साक्षात्सीताया एवोक्तम्दास्ये च दुःखमवर्जनीयं इत्याशङ्कां प्रमाणपूर्वकमपाकरोति -- अवापेति। श्रुतिरस्ति।यतोऽतः इति शेषः। महद्ब्रह्म प्रकृतिरित्युक्तम्? तत्र प्रमाणं वक्तुं व्यवहितत्वात्पुनः प्रतिजानीते -- महदिति।महत्? ब्रह्म इति भिन्ने पदे ततः परमितिशब्दोऽध्याहार्यः। कुतः इत्यत आह -- महतीति। तत्रैव मत्स्यपुराणे। अर्थक्रमेणमम योनिर्महद्ब्रह्म इत्यत्र व्युत्क्रमेण व्याख्यानम्। मत्स्यपुराणोदाहरणप्रसङ्गादत्रोपपादनमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.3।।महद्ब्रह्म प्रकृतिः? सा च श्रीर्भूर्दुर्गेति भिन्ना। उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः। तथा च काषायणश्रुतिः -- श्रीर्भुर्दुर्गा महती तु माया या लोकसूतिर्जगतो बन्धिका च। उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः इति। मम योनिरिति गर्भाधानार्था योनिः? न तु माता? वाक्यशेषात्। तथा हि सामवदे शार्कराक्षश्रुतौ -- विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना। तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा इति। अतः सीतादुःखादिकं सर्वं मृषा प्रदर्शनमेव। तथा कूर्मपुराणे -- न चेयं भूः [ब्र.सं.पु.] तथा च सौकरायणश्रुतिः -- अन्या भूर्भूरियं तस्य छाया भूताऽवमा सा हि भूतैकयोनिः इति। अवाप स्वेच्छया दास्यं जगतां प्रपितामही इत्यनभिम्लानश्रुतिः। मत्स्यपुराणोक्तमपि स्वेच्छयैव। महद्ब्रह्मशब्दवाच्या़ऽपि प्रकृतिरेवमहती ब्रह्मणी द्वे तु प्रकृतिश्च महेश्वरः इति तत्रैव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.3।। --,मम स्वभूता मदीया माया त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः योनिः सर्वभूतानां कारणम्। सर्वकार्येभ्यो महत्त्वात् भरणाच्च स्वविकाराणां महत् ब्रह्म इति योनिरेव विशिष्यते। तस्मिन् महति ब्रह्मणि योनौ गर्भं हिरण्यगर्भस्य जन्मनः बीजं सर्वभूतजन्मकारणं बीजं दधामि निक्षिपामि क्षेत्रक्षेत्रज्ञप्रकृतिद्वयशक्तिमान् ईश्वरः अहम्? अविद्याकामकर्मोपाधिस्वरूपानुविधायिनं क्षेत्रज्ञं क्षेत्रेण संयोजयामि इत्यर्थः। संभवः उत्पत्तिः सर्वभूतानां हिरण्यगर्भोत्पत्तिद्वारेण ततः तस्मात् गर्भाधानात् भवति हे भारत।।
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【 Verse 14.4 】
▸ Sanskrit Sloka: सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या: | तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता ||
▸ Transliteration: sarvayoniṣu kaunteya mūrtayaḥ saṁbhavanti yāḥ | tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bījapradaḥ pitā ||
▸ Glossary: sarva yoniṣu: in all species of life; kaunteya: O son of Kuntī; mūrtayaḥ: forms; saṁbhavanti: as they appear; yāḥ: which; tāsāṁ: all of them; brahma: supreme; mahad yoniḥ: the source of birth in the material substance; ahaṁ: Myself; bījapradaḥ: seed-giving; pitā: father
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.4 Arjuna, understand that all species of life are made possible by birth in this material nature, and I am the seed-giving father.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.4।।हे कुन्तीनन्दन सम्पूर्ण योनियोंमें प्राणियोंके जितने शरीर पैदा होते हैं? उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीजस्थापन करनेवाला पिता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.4।। हे कौन्तेय समस्त योनियों में जितनी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं? उन सबकी योनि अर्थात् गर्भ है महद्ब्रह्म और मैं बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.4 सर्वयोनिषु in all the wombs? कौन्तेय O son of Kunti (Arjuna)? मूर्तयः forms? सम्भवन्ति are produced? याः which? तासाम् their? ब्रह्म Brahma? महत् great? योनिः womb? अहम् I? बीजप्रदः seedgiving? पिता father.Commentary I am the father The Primordial Nature is the mother. The whole manifested world is the child Nature has produced in its association with me. Therefore I am called the father of this world.Wombs Such as the gods? the manes? men? cattle? beasts? birds? etc.Forms Bodies consisting of parts? limbs? organs? etc.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.4. O son of Kunti ! Whatever manifestations spring up in all the wombs, of them the mighty Brahman is the womb and I am the father laying the seed.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.4 O illustrious son of Kunti! Through whatever wombs men are born, it is the Spirit Itself that conceives, and I am their Father.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.4 Whatever forms are produced in any womb, O Arjuna, the Prakrti is their great womb and I am the sowing father.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.4 O son of Kunti, whatever forms are born from all the wombs, of them the great-sustainer is the womb; I am the father who deposits the seed.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.4 Whatever forms are produced, O Arjuna, in any womb whatsoever, the great Brahma is their womb and I am the seed-giving father.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.4 Sarvayonisu etc. In all the wombs (whatever gives birth to anything), the expansive Energy of the Bhagavat exists as the prime cause; and hence It is the Mother having the innate nature of giving birth to the entire world process. But I am the Father, the Energetic, the Inexplicable.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.4 In all wombs such as those of gods, Gandharvas, Yaksas, Raksasas, men, animals, beasts, birds, serpents etc., whatever forms are generated, the brahman (Prakrti) is the 'great womb' or cause. Beginning from Mahat and ending with the five elements, Prakrti, with the mass of conscient selves imbedded by Me in it, is the cause. I am the sowing father. The meaning is that I am the imbedder of the multiplex of conscient selves according to each one's Karma.
Now, He teaches the cause of continuing births as divinities etc., of those born in this manner at the beginning of a cycle of creation. It is due to the conjunction of these beings with Prakrti, in keeping with their old Karmas:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.4 O son of Kunti, yah, whatever; murtayah, forms-that have their parts and limbs integrated, which is characteristic of the formation of bodies; sambhavanti, are born; sarva-yonisu, from all wombs-from the wombs of gods, manes, humans, cattle, beasts, etc.; tasam, of them, of those forms; mahat brahma, the great-sustainer, which exists as all the (various) forms; is the yonih, womb, source. Aham, I, God; am the pita, father; bija-pradah, who desposits the seed, the agent of impregnation. (Now) is being stated which are the alities and how they bind:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.4।। सृष्टि की ओर एक दृष्टिक्षेप करने से ही यह ज्ञान होता है कि यहाँ प्राणियों की निरन्तर उत्पत्ति हो रही है। मृत प्राणियों का स्थान असंख्य नवजात जीव लेते रहते हैं। मनुष्य? पशु? मृग? वनस्पति इन सभी योनियों में यही प्रक्रिया निरन्तर चल रही है। ये सभी प्राणी जड़ और चेतन के संयोग से ही बने हैं। इनमें विषमता या भेद जड़ उपाधियों के कारण है? जबकि सभी में चेतन तत्त्व एक ही है। यह जड़ प्रकृति ही महद्ब्रह्म शब्द से इंगित की गई है।भगवान् श्रीकृष्ण अपने सच्चिदानन्दस्वरूप के साथ तादात्म्य करके कहते हैं? इस प्रकृति रूप योनि में बीज की स्थापना करने वाला पिता मैं हूँ। उनका यह कथन लाक्षणिक है। जैसा कि पूर्व श्लोक की व्याख्या में हम देख चुके है? प्रकृति में परमात्मा का चैतन्यरूप में व्यक्त होना ही उनके द्वारा बीज स्थापित करना है? जिसके फलस्वरूप वह जड़ प्रकृति चेतन होकर कार्यक्षम होती है जैसे वाष्पशक्ति से युक्त होने पर ही इन्जिन में गति आती है? अन्यथा वह एक आकार विशेष में लोहमात्र होता है यही स्थिति चैतन्य के बिना शरीर? मन और बुद्धि उपाधियों की भी होती है। एक अविवाहित पुरुष में प्रजनन की क्षमता होने मात्र से ही वह किसी का पिता नहीं कहलाया जा सकता। इसके लिये विवाहोपरान्त उसे गर्भ में अपना बीज स्थापित करना होता है। इसी प्रकार? प्रकृति के बिना केवल पुरुष स्वयं को व्यक्त नहीं कर सकता। इसी सिद्धान्त को भगवान् यहाँ सारांश में बताते हैं कि वे सम्पूर्ण विश्व के सनातन पिता हैं? जो विश्व मञ्च पर जीवननाटक के मंचन की व्यवस्था करते हैं।यद्यपि अन्य धर्म के अनुयायियों के द्वारा हमें यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया जाता है कि ईश्वर का जगत्पितृत्व केवल ईसाई धर्म ने ही सर्वप्रथम पहचाना और मान्य किया? तथापि वस्तुस्थिति इस धारणा का खण्डन ही करती है? क्योंकि ईसा मसीह से हजारों वर्ष पूर्व गीता का उपदेश अर्जुन को दिया गया था। अधिकसेअधिक हम इतना ही कह सकते हैं कि इस विचार को ईसा मसीह ने अपने से पूर्व विद्यमान धर्मों से ही लिया होगा। हिन्दुओं ने ईश्वर के जगत्पितृत्व पर अधिक बल नहीं दिया। यद्यपि यह कल्पना काव्यात्मक है? तथापि सैद्धान्तिक दृष्टि से अधिक युक्तिसंगत नहीं कही जा सकती। परन्तु? सामान्य जनता को यह कल्पना सरलता से बोधगम्य होने के कारण पश्चात् के धर्म संस्थापकों ने इसे पूर्वकालीन धर्मों से उदारतापूर्वक स्वीकार कर लिया।इस अध्याय के मुख्य विषय का प्रारम्भ करते हुये भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रकृति के वे गुण कौन से हैं और वे किस प्रकार आत्मा को अनात्मा के साथ बांध देते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.4।।न केवलं सृष्ट्युपक्रमे एव प्रकृतेः योनिरहं च गर्भाधानकर्ता अपितु सर्वदैवेत्याह -- सर्वयोनिष्विति। सर्वाषु योनिषु मनुष्याद्यासु निषु या मूर्तयो देहसंस्थानलक्षणाः संभवन्ति हे कैन्तेय? यथा तव कुन्ती तथा तासां ब्रह्म महत्तत्रतत्र तत्तत्कारणरुपेणावस्थितं योनिः कारणमहमीशो बीजप्रदः गर्भाधानस्य कर्ता पिता। तथाच प्रकृतेरेवावस्थाविशेषेषु कारणान्तरेषु गर्भाधानकर्तुः परमेस्वरस्यैव सर्वत्र सत्त्वात् युक्तमुक्तं संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारतेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.4।।ननु कथं सर्वभूतानां ततः संभवो देवादिदेहविशेषाणां कारणान्तरसंभवादित्याशङ्क्याह -- सर्वयोनिष्विति। देवपितृमनुष्यपशुमृगादिसर्वयोनिषु या मूर्तयो जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जादिभेदेन विलक्षणविविधसंस्थानास्तनवः संभवन्ति हे कौन्तेय? तासां मूर्तीनां तत्तत्कारणभावापन्नं महत् ब्रह्मैव योनिर्मातृस्थानीयां। अहं परमेश्वरो बीजप्रदो गर्भाधानस्य कर्ता पिता। तेन महतो ब्रह्मण एवावस्थाविशेषाःकारणान्तराणीति युक्तमुक्तं संभवः सर्वभूतानां ततो भवतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.4।।किंच सर्वेषु भूतेषु योनिषु उपादानभूतेषु पृथिव्यामोषधय इव या मूर्तयः शरीराणि सुरनरतिर्यक्स्थावरात्मकानि चतुर्विधानि संभवन्ति तासां मूर्तीनां ब्रह्ममहत्पूर्वोक्तं महतो ब्रह्म ब्रह्ममहत्। राजदन्तादित्वादुपसर्जनस्य परनिपातः। मायैव योनिरित्यर्थः। अहं तु तासां बीजप्रदः पिता तास्वपि स्वप्रतिबिम्बस्यार्पयिता। यथा पुरुषो भार्यायामनुशयिसंपृक्तं रेतो निषिञ्चति ततो भार्यातः पिण्डोत्पत्तिः रेतोंशतस्तत्र चैतन्योत्पत्तिरिति चैतन्यविशिष्टस्य पिण्डस्य पिताऽहं माता च मायेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.4।।नन्वनेकविधवस्तूनामनेकयोनिषु नानाविधप्रतीतौ कथमेकयोनित्वं इत्यत आह -- सर्वयोनिष्विति। पूर्वं तु सर्वोत्पत्तिरूपसर्वयोन्युत्पत्तिः? ततः सर्वयोनिषु हे कौन्तेय या मूर्तयः स्वरूपाणि सम्भवन्ति? तासां महद्ब्रह्म प्रकृतियोनिरुत्पत्तिस्थानं मातृस्थानीयं बीजप्रदः इच्छाज्ञानात्मकबीजप्रदः पिता उत्पादकः? अहमेवेत्यर्थः। तदेव ब्रह्म मदिच्छया नानायोनिरूपेण भूत्वा भासते इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.4।। न केवलं सृष्ट्युपक्रम एव मदधिष्ठिताभ्यां प्रकृतिपुरुषाभ्यामयं भूतोत्पत्तिप्रकारः अपितु सर्वदैवेत्याह -- सर्वयोनिष्विति। सर्वासु योनिषु मनुष्याद्यासु या मूर्तयः स्थावरजङ्गमात्मिका उत्पद्यन्ते तासां मूर्तीनां महद्ब्रह्म प्रकृतिः योनिर्मातृस्थानीया। अहं च बीजप्रदः गर्भाधानादिकर्ता पिता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.4।।एवं कार्यावस्थोऽयं चिदचित्प्रकृतिसर्गो मयैव कृत इति सर्वयोनिष्विति। नेदमपूर्वतरमिवोच्यते किन्तु सर्वत्रैवमेव लोके दृश्यत इत्याह एकः पिताऽन्यत्क्षेत्रमिति। तत्र तासां भूतमूर्तीनां महद्ब्रह्म योनिः? अहं बीजप्रदः पितेति वस्तुतोऽवसेयम्। अत एव विष्णुपुराणादौ लक्ष्मीनारायणौ गौरीशङ्करौ सर्वत्र स्त्रीपुम्भावापन्नस्वरूपौ निरूपितौ।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.4।।हे कुन्तीपुत्र देव? पितृ? मनुष्य? पशु और मृग आदि समस्त योनियोंमें जो मूर्तियाँ? अर्थात् शरीराकार अलगअलग अङ्गोंके अवयवोंकी रचनायुक्त व्यक्तियाँ उत्पन्न होती हैं? उन सब मूर्तियोंकी सब प्रकारसे स्थित महत् ब्रह्मरूप मेरी माया तो गर्भ धारण करनेवाली योनि है? और मैं ईश्वर बीज प्रदान करनेवाला अर्थात् गर्भाधान करनेवाला पिता हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.4।। व्याख्या -- सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः -- जरायुज (जेरके साथ पैदा होनेवाले मनुष्य? पशु आदि)? अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले पक्षी? सर्प आदि)? स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जूँ? लीख आदि) और उद्भिज्ज (पृथ्वीको फोड़कर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष? लता आदि) -- सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिके ये चार खानि अर्थात् स्थान हैं। इन चारोंमेंसे एकएक स्थानसे लाखों योनियाँ पैदा होती हैं। उन लाखों योनियोंमेंसे एकएक योनिमें भी जो प्राणी पैदा होते हैं? उन सबकी आकृति अलगअलग होती है। एक योनिमें? एक जातिमें पैदा होनेवाले प्राणियोंकी आकृतिमें भी स्थूल या सूक्ष्म भेद रहता है अर्थात् एक समान आकृति किसीकी भी नहीं मिलती। जैसे? एक मनुष्ययोनिमें अरबों वर्षोंसे अरबों शरीर पैदा होते चले आये हैं? पर आजतक किसी भी मनुष्यकी आकृति परस्पर नहीं मिलती। इस विषयमें किसी कविने कहा है -- पाग भाग वाणी प्रकृति? आकृति वचन विवेक। अक्षर मिलत न एकसे? देखे देश अनेक।।अर्थात् पगड़ी? भाग्य? वाणी (कण्ठ)? स्वभाव? आकृति? शब्द? विचारशक्ति और लिखनेके अक्षर -- ये सभी दो मनुष्योंके भी एक समान नहीं मिलते। इस तरह चौरासी लाख योनियोंमें जितने शरीर अनादिकालसे पैदा होते चले आ रहे हैं? उन सबकी आकृति अलगअलग है। चौरासी लाख योनियोंके सिवाय देवता? पितर?,गन्धर्व? भूत? प्रेत आदिको भी यहाँ सर्वयोनिषु पदके अन्तर्गत ले लेना चाहिये।तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता -- उपर्युक्त चार खानि अर्थात् चौरासी लाख योनियाँ तो शरीरोंके पैदा होनेके स्थान हैं और उन सब योनियोंका उत्पत्तिस्थान (माताके स्थानमें) महद्ब्रह्म अर्थात् मूल प्रकृति है। उस मूल प्रकृतिमें जीवरूप बीजका स्थापन करनेवाला पिता मैं हूँ।भिन्नभिन्न वर्ण और आकृतिवाले नाना प्रकारके शरीरोंमें भगवान् अपने चेतनअंशरूप बीजको स्थापित करते हैं -- इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक प्राणीमें स्थित परमात्माका अंश शरीरोंकी भिन्नतासे ही भिन्नभिन्न प्रतीत होता है। वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक ही परमात्मा विद्यमान हैं (गीता 13। 2)। इस बातको एक दृष्टान्तसे समझाया जाता है। यद्यपि दृष्टान्त सर्वांशमें नहीं घटता? तथापि वह बुद्धिको दार्ष्टान्तके नजदीक ले जानेमें सहायक होता है। कपड़ा और पृथ्वी -- दोनोंमें एक ही तत्त्वकी प्रधानता है। कपड़ेको अगर जलमें डाला जाय तो वह जलके निचले भागमें जाकर बैठ जाता है। कपड़ा ताना (लम्बा धागा) और बाना(आ़ड़ा धागा) से बुना जाता है। प्रत्येक ताने और बानेके बीचमें एक सूक्ष्म छिद्र रहता है। कपड़ेंमें ऐसे अनेक छिद्र होते हैं। जलमें पड़े रहनेसे कपड़के सम्पूर्ण तन्तुओंमें और अलगअलग छिद्रोंमें जल भर जाता है। कपड़ेको जलसे बाहर निकालनेपर भी उसके तन्तुओंमें और असंख्य छिद्रोंमें एक ही जल समानरीतिसे परिपूर्ण रहता है। इस दृष्टान्तमें कपड़ा प्रकृति है? अलगअलग असंख्य छिद्र शरीर हैं और कपड़े तथा उसके छिद्रोंमें परिपूर्ण जल परमात्मतत्त्व है। तात्पर्य है कि स्थूल दृष्टिसे तो प्रत्येक शरीरमें परमात्मतत्त्व अलगअलग दिखायी देता है? पर सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो सम्पूर्ण शरीरोंमें? सम्पूर्ण संसारमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। सम्बन्ध -- परमात्मा और उनकी शक्ति प्रकृतिके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जीव प्रकृतिजन्य गुणोंसे कैसे बँधते हैं -- इस विषयका विवेचन आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.4।।ननु कथमुक्तकारणानुरोधेन हिरण्यगर्भोद्भवमभ्युपेत्य भूतानामुत्पत्तिरुच्यते देवादिजातिविशेषेषु देहविशेषाणां कारणान्तरस्य संभवात्तत्राह -- सर्वयोनिष्विति। तत्र तत्र हेत्वन्तरप्रतिभासे कुतोऽस्य हेतुत्वमित्याशङ्क्य तद्रूपेणास्यैवावस्थानादित्याह -- सर्वावस्थमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.4।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.4।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.4।। --,देवपितृमनुष्यपशुमृगादिसर्वयोनिषु कौन्तेय? मूर्तयः देहसंस्थानलक्षणाः मूर्छिताङ्गावयवाः मूर्तयः संभवन्ति याः? तासां मूर्तीनां ब्रह्म महत् सर्वावस्थं योनिः कारणम् अहम् ईश्वरः बीजप्रदः गर्भाधानस्य कर्ता पिता।।के गुणाः कथं बध्नन्तीति? उच्यते --,
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【 Verse 14.5 】
▸ Sanskrit Sloka: सत्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: | निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ||
▸ Transliteration: sattvaṁ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisaṁbhavāḥ | nibadhnanti mahābāho dehe dehinamavyayam ||
▸ Glossary: sattvaṁ: mode of goodness; rajaḥ: mode of passion; tamaḥ: mode of ignorance; iti: thus; guṇāḥ: qualities; prakṛti: material nature; saṁbhavāḥ: produced of; nibadhananti: does condition; mahābāho: O mighty-armed one; dehe: in this body; dehinaṁ: the living entity; avyayaṁ: eternal
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.5 Material nature consists of the three modes—goodness, passion and ignorance. When the living entity comes in contact with nature, it becomes conditioned by these modes.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.5।।हे महाबाहो प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.5।। हे महाबाहो सत्त्व? रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.5 सत्त्वम् purity? रजः passion? तमः inertia? इति these? गुणाः alities? प्रकृतिसंभवाः born of Prakriti? निबध्नन्ति bind? महाबाहो O mightyarmed? देहे in the body? देहिनम् the embodied? अव्ययम् the,indestructible.Commentary Sattva is the best. Rajas comes next. Tamas is the lowest and the worst. The three alities indicate the triple mentality. They produce attachment in the individual souls? delude them and bind them down? as it were? to Samsara. Just as the three conditions of childhood? youth and old age are found in the same body? so also the three alities inhere in the mind. The soul gets limited by identifying itself with body and the three alities. It is subject to birth and death and experiences happiness and misery? pleasure and pain? joy and sorrow till it realises its identity with the supreme Self.The word Guna is usually translated as ality. It does not signify property? attribute or ality? such as the blue colour of a cloth. Gunas are really the primary constitutents of Nature and are the basis of all substances. Therefore it is not proper to call them alities inhering in substances.If you want to attain freedom or perfection? if you wish to become immortal? you must rise above the modes of Nature. You must transcend the Gunas.If the water in the vessel is agitated? the reflected sun in the water also appears to be agitated through Pratibimba Adhyasa (superimposition of reflection on water). Even so the pure unchanging Self appears to be bound by the alities of Nature through superimposition. In reality the Self is ever free and untainted. It is beyond them.The Gunas which are only forms of ignorance are ever dependent on the knower of the field. They bind? fast? as it were? the knower of the field. They have him as the basis of their existence.A knowledge of the Gunas and their operation is very necessary. Only if you have this knowledge can you free yourself from their clutches.Mahabaho Mightyarmed with strong and sinewy arms reaching down to the kness. This is a very auspicious sign. Yogis and sages have such beautiful arms.These three Gunas are present in all human beings. No one is free from the operation of any one of the three alities of Nature. They are not constant. Sometimes Sattva predominates at other times Rajas or Tamas predominates.Sattva has the characteristic of effulgence. It is also harmony and goodness or purity. Rajas is passion or activity. Tamas is inertia or darkness.Analyse all phenomena in terms of these three. Know their characteristics. Stand as a witness of these alities. Do not identify yourself with them. Separate yourself from them. Become a Gunatita. You will attain Supreme Peace? immortality and eternal
Chapter 14 (Part 3)
bliss. (Cf.XIII.22)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.5. The Strands, viz. the Sattva, the Rajas and the Tamas, born from the Prime Cause (the said Mother), bind the changeless Embodied (Soul) to the body, O mighty-armed One !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.5 Purity, Passion and Ignorance are the Qualities which the Law of nature bringeth forth. They fetter the free Spirit in all beings.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.5 Sattva, Rajas and Tamas are the Gunas that arise from the Prakrti. They bind the immutable self in the body, O Arjuna.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.5 O mighty-armed one, the alities, viz sattva, rajas and tamas, born of Nature, being the immutable embodies being to the body.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.5 Purity, passion and inertia these alities, O Arjuna, born of Nature, bind fast in the body, the embodied, the indestructible.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.5 Sattvam etc. This embodied Soul is bound fast by Her (the Mother) by means of Her attributes of the Sattva, the Rajas and the Tamas for the former's enjoyment that continues till his emancipation. The nature of these is detailed one by one -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.5 The three Gunas of Prakrti - Sattva, Rajas and Tamas - are inherent in the essential nature of Prakrti and are particular expressions of it. They can be known only through their effects such as 'brightness' etc. They are not apparent in the unevolved state of Prakrti but become apparent in its transformations as Mahat etc. They bind the self, which is conjoined with bodies such as those of divinities, men etc., composed of the modifications of Prakrti beginning with Mahat and ending with the elements. The self is immutable, i.e., It is not in Its pristine nature conjoined with the Gunas. But the Gunas bind It when residing in the body. The meaning is that they bind It by virtue of the limiting conditions of Its living in the body.
Sri Krsna proceeds to speak of the nature of Sattva, Rajas and Tamas and their modes of binding (the self):
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.5 O mighty-armed one-who are possessed of hands which are great and mighty, and extend upto the knees, gunah, the alities are named sattva, rajas and tamas. And they, prakrti-sambhavah, born of Nature, born of Maya which belongs to God; nibadhnanti, bind, as it were; the avyayam, immutable-the immutability has been spoken of in the verse, 'Being without beginning৷৷.,' etc. (13.31); dehinam, embodied being; dehe, to the body. The word guna is a technical term, and is not a ality like colour etc. which inhere in some substance. Nor is it meant here that ality and substance are different. Therefore they are ever dependent on the Knower of the field, just as alities are dependent (on some substance). Being of the nature of ignorance, they bind the Knower of the field, as it were. They come into being, making That (Knower) their sustainer. In this sense it is said that they bind. Objection; Was it not said that the embodied one does not become defiled (see 13.31-2)? So, why as it contrarily said here that 'they bind'? Reply: We have rutted this objection by using the word iva (as it were) in 'they bind, as it were'.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.5।। गुण शब्द अध्यात्मशास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली का होने के कारण उसका किसी अन्य भाषा में अनुवाद करना कठिन है। विशेषकर अंग्रेजी में उसका समानार्थी कोई शब्द नहीं है। इसका कारण यह है कि पाश्चात्य मनोविज्ञान अभी भी शैशव अवस्था में ही है। जब उनके द्वारा मनोविज्ञान का सैद्धान्तिक और प्रायोगिक निरीक्षण तथा अध्ययन पूर्ण कर लिया जायेगा? केवल तभी? वे प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण में उदित होने वाले विचारों पर इन गुणों के पड़ने वाले प्रभाव को समझ पायेंगे।आध्यात्मिक साहित्य में सत्त्व? रज और तम? इन तीन गुणों को क्रमश श्वेत? रक्त और कृष्ण वर्ण के द्वारा सूचित किया जाता है।संस्कृत में गुण शब्द का अर्थ रज्जु अर्थात् रस्सी भी होता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्रकृति के ये तीन गुण रज्जु के समान हैं? जो सच्चित्स्वरूप आत्मतत्त्व को असत् और जड़ अनात्मतत्त्व के साथ बांध देते हैं। सारांशत? ये गुण वे तीन विभिन्न प्रकार के भाव हैं जिनके वशीभूत् होकर हमारा मन? निरन्तर परिवर्तनशील परिस्थितियों में विविध प्रकार से अपनी प्रतिक्रियारूपी क्रीड़ा करता रहता है।ये गुण प्रकृति से उत्पन्न हुये हैं। वे आत्मा को देह के साथ मानो बांध देते हैं? जिसके कारण वह जीव भाव को प्राप्त होकर जन्म और मरण के अविरल चक्र और संसार के दुखों में फँस जाता है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है? प्रकृति के ये गुण द्रव्याश्रित धर्म नहीं हैं। हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि ये विभिन्न प्रकार के भाव हैं? जिनके कारण भिन्नभिन्न व्यक्तियों का व्यवहार भिन्नभिन्न प्रकार का होता है।आत्मा और अनात्मा का यह संबंध मिथ्या है? वास्तविक नहीं। देशकालादि के परिच्छेदों से मुक्त आत्मा को इन परिच्छेदों से युक्त? स्वप्न के समान प्रक्षेपित? जड़ उपाधियों के साथ कभी नहीं बांधा जा सकता। वह इनके दोषों से सदा असंस्पृष्ट ही रहता है? जैसे? स्तंभ अपने में अध्यस्त प्रेत से और जाग्रत् पुरुष स्वप्न द्रष्टा के अपराधों से वस्तुत अलिप्त ही रहता है। इसी प्रकार? जब तक त्रिगुण जनित बन्धन बना रहता है? तब तक ऐसा प्रतीत होता है? मानो आत्मा इन अनात्म उपाधियों के संसर्गवशात् जीव भाव को प्राप्त हुआ है? परन्तु यथार्थत वह नित्यमुक्त ही रहता है।उपर्युक्त विवेचन से अब यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार इन गुणों के स्वरूप तथा उनसे उत्पन्न बन्धन की प्रक्रिया का स्पष्ट ज्ञान हमें मुक्ति का अधिकार पत्र प्रदान कर सकता है।अब? भगवान् श्रीकृष्ण सर्वप्रथम सत्त्वगुण का लक्षण बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.5।।एवं द्वाभ्यां प्रकृतिपुरुषयोरीश्वरपारतन्त्र्यप्रतिपादनेन सांक्याभिमतं तयोः स्वातन्त्र्यं निरस्तम्? इदानीं के गुणाः कथं वा सङ्ग इति निरुपयति -- सत्त्वमित्यादि चतुर्दशबिः। सत्त्वं रजस्तम् इत्येवंनामानो गुणाः। इतिशब्दो न रुपादिवत्पारिभाषिकः सत्त्वादीनां द्रव्याश्रितत्वबोधकः। प्रकृत्यात्मकानां तेषां सर्वाश्रयत्वात्। नापि गुणगुणिनोरन्यत्वमत्र विवक्षितम्। अत्यन्तभेद गवाश्ववत्तद्भावासंभवात्। तस्माद्गुणा इव नित्यपरतन्त्राः क्षेत्रज्ञं प्रति तमास्पदीकृत्यैव तेषां प्रतिलम्भात्प्रकृतिसंभवाः त्रयाणां गुणानां साम्यावस्था प्रकृतिर्भगवतो माया संभवोऽभिव्यक्तिकारणं येषां ते देहे देहिनं देहमात्मानं देहवन्तं मन्यमानं जीवं वस्तुतोऽनादित्वादिति श्लोके प्रतिपादितं अव्ययं निर्विकारं निबध्नन्तिकुर्योन्मेरावणुधियम् इति न्यायेन मायामाहात्म्यमिदं? यदव्ययस्य बन्धनं तदपि मायिकत्वान्मिथ्याबूतमेव नतु वास्तवं तेन न करोति न लिप्यते? न स पापेनेत्यादिना देही न लिप्यत इति पूर्वमुक्तं तत्कथमिह निबन्धन्तीत्यन्यथोत्यत इति न शह्कनीयम्। महान्तौ समर्थौ वा जानुप्रलम्भौ बाहू यस्य स महाबाहुस्तस्य संबोधनं हे महाबाहो इति। अहमव्यय इति ज्ञानमेव गणकृतबन्धान्मुक्तिसाधनं नतु महाबाहुरहमिति,बाहुसामर्थ्यस्यात्रानुपयोगात्प्रत्यत देहाभीमानस्य बन्धनसाधनत्वाच्चेति द्योतनार्थम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.5।।तदेवं निरीश्वरसांख्यनिराकरणेन क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्येश्वराधीनत्वमुक्तं? इदानीं कस्मिन्गुणे कथं सङ्गः के वा गुणाः कथं वा ते बध्नन्तीत्युच्यते -- सत्त्वमित्यादिनान्यमित्यतः प्राक्चतुर्दशभिः -- सत्त्वंरजस्तम इत्येवंनामानो गुणा नित्यपरतन्त्राः पुरुषंप्रति सर्वेषामचेतनानां चेतनार्थत्वात् नतु वैशेषिकाणां रूपादिवद्द्रव्याश्रिताः। नच गुणगुणिनोरन्यत्वमत्र विवक्षितम् गुणत्रयात्मकत्वात्प्रकृतेः। तर्हि कथं प्रकृतिसंभवा इत्युच्यन्तेत्रयाणां गुणानां साम्यावस्था प्रकृतिर्माया भगवतस्तस्याः सकाशात्परस्पराङ्गाङ्गिभावेन वैषम्येण परिणताः प्रकृतिसंभवा इत्युच्यन्ते। ते च देहे प्रकृतिकार्ये शरीरेन्द्रियसंघाते देहिनं देहतादात्म्याध्यासापन्नं जीवं परमार्थतः सर्वविकारशून्यत्वेनाव्ययं निबध्नन्ति निर्विकारमेव सन्तं स्वविकारवत्तयोपदर्शयन्तीव भ्रान्त्या जलपात्राणीव दिवि स्थितमादित्यं प्रतिबिम्बाध्यासेन स्वकम्पादिमत्तया। यथाच पारमार्थिको बन्धो नास्ति तथा व्याख्यातं प्राक्शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.5।।एवं ईश्वराश्रयेण प्रकृतिर्भूतानि सृजतीत्युक्तम्? इदानीं सा कथंभूता निबध्नातीति तदुच्यते -- सत्त्वमिति। प्रकृतिः सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था। ततः सकाशात्परस्पराङ्गाङ्गिभावेन वैषम्येण उद्रिच्यमानाः प्रकृतिसंभवा इत्युच्यन्ते न तु प्रकृतितो वैशेषिकाणामिव द्रव्याद्गुणा अन्ये एते हे महाबाहो? देहे अव्ययमविकारिणमपि देहिनं स्थूणायां वत्समिव रशनाभूता गुणा निबध्नन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.5।।ननु लीलात्मकप्रकृत्युत्पादितलीलार्थदेहादिषु स्थितस्य बीजस्य बन्धः कथं इत्यत आह -- सत्त्वमिति। सत्त्व रजस्तम इति संज्ञका गुणाः प्रकृतिसम्भवाः प्रकृतितः सम्भव उत्पत्तिर्येषां तादृशाः ते अव्ययं विनाशादिधर्मरहितं भगवतश्चिदंशात्मकं देहिनं जीवं तद्रूपेण तद्द्वारा गुणभोगार्थमाविर्भूतं निबध्नन्ति वशीकुर्वन्ति? रसपरत्वादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.5।। तदेवं परमेश्वराधीनाभ्यां प्रकृतिपुरुषाभ्यां सर्वभूतोत्पत्तिं निरूप्य इदानीं प्रकृतिसंयोगेन पुरुषस्य संसारं प्रपञ्चयति -- सत्त्वमित्यादि चतुर्दशभिः। सत्त्वं रजस्तम इति त्रयो गुणाः प्रकृतिसंभवाः प्रकृतितः संभव उद्भवो येषां ते तथोक्ताः। गुणसाम्यं प्रकृतिस्तस्याः सकाशात्पृथक्त्वेनाभिव्यक्ताः सन्तः प्रकृतिकार्ये देहे तादात्म्येन स्थितं देहिनं चिदंशं वस्तुतोऽव्ययं निर्विकारमेव सन्तं निबध्नन्ति। स्वकार्यैः सुखदुःखमोहादिभिः संयोजयन्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.5।।अनेन स्वस्येच्छया जीवेषु निजप्रकृतिसम्भवसंसर्जनलीलामुपपाद्येदानीं बन्धलीलामुपपादयितुं चतुर्दशलोकबन्धहेतुभूतगुणानाह चतुर्दशभिः -- सत्त्वमिति। नचैते सकार्या आत्मनो गुणाः? अपितु प्रकृतेरुक्ताः प्रकृतिसम्भवा इति सम्भूतं चेतनं तत्तद्देहे गुणा एव बध्नन्ति। प्रकृतिधर्म एव तत्र हीनतापादको देहे अहंवृत्तिमान् नोपाधिविशिष्टस्य नान्यस्य। ये च भगवदंशभूतायां प्रकृतौ समागता गुणास्ते भगवतः सच्चिदानन्दा एव मूलतः परिणममाना बन्धका दोषा जडगतत्वात्। बन्धनश्लेषात्गुणाः इति संज्ञा तेषाम्। तदेवाह निबध्नन्तीति। तत्र प्रकृतिरुद्भूता गुणाः सत्त्वादयो देहाभिमानिनस्तमणुस्वरूपं चिदंशं जीवमव्ययमपि निबध्नन्ति। त्वं तं बन्धं,निवर्त्तयेति सम्बोधयति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.5।।वे गुण कौनकौनसे हैं और कैसे बाँधते हैं सो कहते हैं --, सत्त्व? रज और तम -- ऐसे नामोंवाले ये तीन गुण हैं। गुण शब्द पारिभाषिक है। यहाँ रूप? रस आदिकी भाँति किसी द्रव्यके आश्रित गुणोंका ग्रहण नहीं है? तथा गुण और गुणवान् ( प्रकृति ) का भेद भी यहाँ विवक्षित नहीं है। जैसे रूपादि गुण द्रव्यके अधीन होते हैं वैसे ही ये सत्त्वादि गुण सदा क्षेत्रज्ञके अधीन हुए ही अविद्यात्मक होनेके कारण मानो क्षेत्रज्ञको बाँध लेते हैं। उस ( क्षेत्रज्ञ ) को आश्रय बनाकर ही ( ये गुण ) अपना स्वरूप प्रकट करनेमें समर्थ होते हैं? अतः बाँधते हैं ऐसा कहा जाता है। जिसकी भुजाएँ अतिशय सामर्थ्ययुक्त और जानु ( घुटनों ) तक लंबी हों? उसका नाम महाबाहु है। हे महाबाहो भगवान्की मायासे उत्पन्न ये तीनों गुण इस शरीरमें शरीरधारी अविनाशी क्षेत्रज्ञको मानो बाँध लेते हैं। क्षेत्रज्ञका अविनाशित्व अनादित्वात् इत्यादि श्लोकमें कहा ही है। पू0 -- पहले यह कहा है कि देही -- आत्मा लिप्त नहीं होता? फिर यहाँ यह विपरीत बात कैसे कही जाती है कि उसको गुण बाँधते हैं। उ0 -- इव शब्दका अध्याहार करके हमने इस शङ्काका परिहार कर दिया है। अर्थात् वास्तवमें नहीं बाँधते? बाँधते हुएसे प्रतीत होते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.5।। व्याख्या -- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः -- तीसरे और चौथे श्लोकमें जिस मूल प्रकृतिको महद् ब्रह्म नामसे कहा है? उसी मूल प्रकृतिसे सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण पैदा होते हैं।यहाँ इति पदका तात्पर्य है कि इन तीनों गुणोंसे अनन्त सृष्टियाँ पैदा होती हैं तथा तीनों गुणोंके तारतम्यसे प्राणियोंके अनेक भेद हो जाते हैं? पर गुण न दो होते हैं? न चार होते हैं? प्रत्युत तीन ही होते हैं।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो ये तीनों गुण अपनी तरफसे किसीको भी नहीं बाँधते? प्रत्युत यह पुरुष ही इन गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर बँध जाता है। तात्पर्य है कि गुणोंके कार्य पदार्थ? धन? परिवार? शरीर? स्वभाव? वृत्तियाँ? परिस्थितियाँ? क्रियाएँ आदिको अपना मान लेनेसे यह जीव स्वयं अविनाशी होता हुआ भी बँध जाता है? विनाशी पदार्थ? धन आदिके वशमें हो जाता है सर्वथा स्वतन्त्र होता हुआ भी पराधीन हो जाता है। जैसे? मनुष्य जिस धनको अपना मानता है? उस धनके घटनेबढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है जिन व्यक्तियोंको अपना मानता है? उनके जन्मनेमरनेसे स्वयंपर असर पड़ता है जिस शरीरको अपना मानता है? उसके घटनेबढ़नेसे स्वयंपर असर पड़ता है। यही गुणोंका अविनाशी देहीको बाँधना है।यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि यह देही स्वयं अविनाशीरूपसे ज्योंकात्यों रहता हुआ भी गुणोंके? गुणोंकी वृत्तियोंके अधीन होकर स्वयं सात्त्विक? राजस और तामस बन जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं -- ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी।। (मानस 7। 117। 1)जीवका यह अविनाशी स्वरूप वास्तवमें कभी भी गुणोंसे नहीं बँधता परन्तु जब वह विनाशी देहको मैं? मेरा और मेरे लिये मान लेता है? तब वह अपनी मान्यताके कारण गुणोंसे बँध जाता है? और उसको परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कठिनता प्रतीत होती है (गीता 12। 5)। देहाभिमानके कारण गुणोंके द्वारा देहमें बँध जानेसे वह तीनों गुणोंसे परे अपने अविनाशी स्वरूपको नहीं जान सकता। गुणोंसे देहमें बँध जानेपर भी जीवका जो वास्तविक अविनाशी स्वरूप है? वह ज्योंकात्यों ही रहता है? जिसका लक्ष्य भगवान्ने यहाँ,अव्ययम् पदसे कराया है।यहाँ देहिनम् पदका तात्पर्य है कि देहमें तादात्म्य? ममता और कामना होनेसे ही तीनों गुण इस पुरुषको देहमें बाँधते हैं। यदि देहमें तादात्म्य? ममता और कामना न हो? तो फिर यह परमात्मस्वरूप ही है।विशेष बातशरीरके साथ जीव दो तरहसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है -- (1) अभेदभावसे -- अपनेको शरीरमें बैठाना? जिससे मैं शरीर हूँ ऐसा दीखने लगता है? और (2) भेदभावसे -- शरीरको अपनेमें बैठाना? जिससे शरीर मेरा है ऐसा दीखने लगता है। अभेदभावसे सम्बन्ध जो़ड़नेसे जीव अपनेको शरीर मान लेता है? जिसको अहंता कहते हैं और भेदभावसे सम्बन्ध जो़ड़नेसे जीव शरीरको अपना मान लेता है? जिसको,ममता कहते हैं। इस प्रकार शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेपर सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुण अपनी वृत्तियोंके द्वारा शरीरमें अहंताममता दृढ़ करके जीवको बाँध देते हैं।जैसे विवाह हो जानेपर पत्नीके पूरे परिवार(ससुराल) के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है? पत्नीके वस्त्राभूषण आदिकी आवश्यकता अपनी आवश्यकता प्रतीत होने लगती है? ऐसे ही शरीरके साथ मैंमेरेका सम्बन्ध हो जानेपर जीवका पूरे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और शरीरनिर्वाहकी वस्तुओँको वह अपनी आवश्यकता मानने लग जाता है। अनित्य शरीरसे सम्बन्ध (एकात्मता) माननेके कारण वह अनित्य शरीरको नित्य रखनेकी इच्छा करने लगता है क्योंकि वह स्वयं नित्य है। शरीरके साथ सम्बन्ध माननेके कारण ही उसको मरनेका भय लगने लगता है क्योंकि शरीर मरनेवाला है। यदि शरीरसे सम्बन्ध न रहे? तो फिर न तो नित्य बने रहनेकी इच्छा होगी और न मरनेका भय ही होगा। अतः जबतक नित्य बने रहनेकी इच्छा और मरनेका भय है? तबतक वह गुणोंसे बँधा हुआ है।जीव स्वयं अविनाशी है और शरीर विनाशी है। शरीरका प्रतिक्षण अपनेआप वियोग हो रहा है। जिसका अपनेआप वियोग हो रहा है? उससे सम्बन्धविच्छेद करनेमें क्या कठिनता और क्या उद्योग उद्योग है तो केवल इतना ही है कि स्वतः वियुक्त होनेवाली वस्तुको पकड़ना नहीं है। उसको न पकड़नेसे अपने अविनाशी? गुणातीत स्वरूपका अपनेआप अनुभव हो जायगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंके द्वारा देहीके बाँधे जानेकी बात कही। उन तीनों गुणोंमेंसे सत्त्वगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.5।।एवं क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगाज्जगदुत्पत्तिं दर्शयता ब्रह्मैवाविद्यया संसरतीत्युक्तमिदानीमध्यायादावुक्तमाकाङ्क्षाद्वयं पूर्वमनूद्यानन्तरश्लोकेनोत्तरमाह -- के गुणा इति। सत्त्वादिषु,कथं गुणशब्दप्रवृत्तिरित्याशङ्क्य परतन्त्रत्वादित्याह -- गुणा इति। रूपादिष्विव गुणशब्दः सत्त्वादिषु द्रव्याश्रितत्वं निमित्तीकृत्य किं न स्यादित्याशङ्क्य प्रकृत्यात्मकानां तेषां सर्वाश्रयत्वान्नैवमित्याह -- न रूपादिवदिति। गुणानां प्रकृतेश्च पृथगुक्तेरन्यत्वे कुतस्तेषां प्रकृत्यात्मत्वमित्याशङ्क्याह -- नच गुणेति। अत्यन्तभेदे गवाश्ववत्तद्भावासंभवादित्यर्थः। भेदाभेदे च तद्भावासंभवाद्विशेषात्कुतस्तेषु गुणपरिभाषेत्याशङ्क्याह -- तस्मादिति। क्षेत्रज्ञं प्रति नित्यपारतन्त्र्ये हेतुमाह -- अविद्येति। के गुणा इत्यस्योत्तरमुक्तं? कथं बध्नन्तीत्यस्योत्तरमाह -- क्षेत्रज्ञमिति। तदेवोपपादयति -- तमास्पदीकृत्येति। प्राकृतानां गुणानां प्रकृत्यात्मकत्वमाह -- ते चेति। संभवत्यस्मादिति संभवः प्रकृतिः संभवो येषां ते तथेति। सांख्यीयां प्रकृतिं प्रधानाख्यां व्यावर्तयति -- भगवदिति। इवकारानुबन्धेन नितरां बध्नन्ति स्वविकारवत्तयोपदर्शयन्तीति क्रियापदं व्याख्याय महाबाहुशब्दं व्याचष्टे -- महान्ताविति। देहवन्तं देहमात्मानं मन्यमानं देहस्वामिनमित्यर्थः। कूटस्थस्य कथं बध्यमानत्वमित्याशङ्क्यकुर्यान्मेरावणुधियम् इतिन्यायेन मायामाहात्म्यमिदमित्याह -- अव्ययमिति। स्वतो धर्मतो वा व्ययराहित्यमित्यपेक्षायामाह -- अव्ययत्वं चेति। लिप्यते न स पापेनेत्यनेन विरुद्धमिदं निबध्नन्तीति वचनमिति शङ्कते -- नन्विति। इवकारानुबन्धेन क्रियापदं व्याचक्षाणैरस्माभिरस्य चोद्यस्य परिहृतत्वान्नैवमित्याह -- परिहृतमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.5।।ननु प्रतिज्ञातं ज्ञानं श्लोकद्वयेनोक्तं? तत्किमुत्तरेण ग्रन्थेनाध्यायासङ्गतमुच्यते इत्यत आह -- बन्धेति। यो हि बद्धोऽस्मीति जानाति स एव तन्निवृत्तिसाधनं विजिज्ञास्य ज्ञात्वाऽनुतिष्ठति? अतो बन्धोच्छेदसाधनानुष्ठानाय तज्ज्ञापनार्थं जिज्ञासामुत्पादयितुं गुणत्रयकृतबन्धप्रकारमादौ तावद्दर्शयतीति नासङ्गतिरित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.5।।बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय -- सत्त्वमित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.5।। -- सत्त्वं रजः तमः इति एवंनामानः। गुणाः इति पारिभाषिकः शब्दः? न रूपादिवत् द्रव्याश्रिताः गुणाः। न च गुणगुणिनोः अन्यत्वमत्र विवक्षितम्। तस्मात् गुणा इव नित्यपरतन्त्राः क्षेत्रज्ञं प्रति अविद्यात्मकत्वात् क्षेत्रज्ञं निबध्नन्तीव। तम् आस्पदीकृत्य आत्मानं प्रतिलभन्ते इति निबध्नन्ति इति उच्यते। ते च प्रकृतिसंभवाः भगवन्मायासंभवाः निबध्नन्ति इव हे महाबाहो? महान्तौ समर्थतरौ आजानुप्रलम्बौ बाहू यस्य सः महाबाहुः? हे महाबाहो देहे शरीरे देहिनं देहवन्तम् अव्ययम्? अव्ययत्वं च उक्तम् अनादित्वात् (गीता 13.31) इत्यादिश्लोकेन। ननु देही न लिप्यते इत्युक्तम्। तत कथम् इह निबध्नन्ति इति अन्यथा उच्यते परिहृतम् अस्माभिः इवशब्देन निबध्नन्ति इव इति।।तत्र सत्त्वादीनां सत्त्वस्यैव तावत् लक्षणम् उच्यते --,
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【 Verse 14.6 】
▸ Sanskrit Sloka: तत्र सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् | सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ||
▸ Transliteration: tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśakamanāmayam | sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha ||
▸ Glossary: tatra: thereafter; sattvaṁ: mode of goodness; nirmalatvāt: being purest in the material world; prakāśakaṁ: illuminating; anāmayam: without any sinful reaction; sukha: happiness; saṅgena: association; badhnāti: conditions; jñāna: knowledge; saṅgena: association; ca: also; anagha: O sinless one
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.6 O Sinless One, the mode of goodness, satva, being purer than the others, is illuminating, and it frees one from all sinful reactions. Those situated in that mode develop knowledge, but they become conditioned by the concept of happiness.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.6।।हे पापरहित अर्जुन उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.6।। हे निष्पाप अर्जुन इन (तीनों) में? सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (निरुपद्रव? निर्विकार या निरोग) है (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.6 तत्र of these? सत्त्वम् purity? निर्मलत्वात् from its stainlessness? प्रकाशकम् luminous? अनामयम् healthy? सुखसङ्गेन by attachment to happiness? बध्नाति binds? ज्ञानसङ्गेन by attachment to knowledge? च and? अनग O sinless one.Commentary Sattva is stainless like the crystal. It lays for one the trap of happiness and knowledge. It is a golden fetter. A Sattvic man compares himself with others and rejoices in his excellence. He is puffed up with his knowledge. His heart is filled with pride when he thinks that he,has more comforts or more pleasant experiences. He thinks? I am happy I am wise? and so he is bound as it were. These ideas really belong to the field but they are transferred through superimposition to the Self on account of the force of SattvaGuna.Rajas and Tamas are pitfalls on the path of knowledge.This attachment to happiness is an illusion. This is ignorance. An attribute of the object cannot belong to the subject. All the alities from desire to firmness (Cf.XIII.6) belong to the field. From ignorance? nondiscrimination is born and so the individual self is not able to discriminate between the permanent and the impermanent? the subject and the object.Knowledge is an attribute of the Antahkarana (inner instrument? viz.? mind? intellect? the unconscious and the ego) but not of the Self. It if were an attribute of the Self? it could not produce attachment and bondage. Sattva binds the soul to knowledge through attachment.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.6. Among them (the Strands) the Sattva-because it is dirtless-is illuminating and healthy; and it binds [the Embodied] by attachment to happiness and also by attachment to knowledge, O sinless one !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.6 O Sinless One! Of these, Purity, being luminous, strong and invulnerable, binds one by its yearning for happiness and illumination.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.6 Of these, Sattva, being without impurity, is luminous and free from morbidity. It binds, O Arjuna, by attachment to pleasure and to knowledge.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.6 Among them, sattva, being pure, [Nirmala, pure-transparent, i.e., capable of resisting any form of ignorance, and hence as illuminator, i.e.a revealer of Consciousness.] is an illuminator and is harmless. O sinless one, it binds through attachment to happiness and attachment to knowledge.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.6 Of these, Sattva, which from its stainlessness is luminous and healthy, binds by attachment to happiness and by attachment to knowledge, O sinless one.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.6 See Comment under 14.8
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.6 Of 'these', i.e., of Sattva, Rajas and Tamas, the characteristic nature of the Sattva is this: it illuminates on account of its being pure. What is called purity is to be bereft of alities which veil light and happiness. Because its nature is solely the generation of light and happiness, it constitutes the cause of light and happiness. 'Light' or illumination is enlightenment about a thing as it is. It is 'not morbid,' i.e., an effect called morbidity (disease) does not exist in its presence. The meaning is, that Sattva is the cause of health.
The Guna, called Sattva, however, binds the self by attachment to happiness and knowledge. The meaning is that it causes attachment to happiness and knowledge. When attachment to knowledge and happiness is born, one engages oneself in secular and Vedic means for securing them. Conseently, one is born in such bodies which constitute the means for realising such fruits. Hence the Sattva binds the self through attachment to happiness and knowledge. What is said is this: Sattva generates knowledge and happiness; again it generates attachment to them.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.6 Tatra, among them, among sattva etc.;-the characteristics of sattva itself is being stated first-sattva, nirmalatvat, being pure like a crystal stone;is prakasakam, an illuminator; and anamayam, harmless. Anagha, O sinless one; badhnati, it binds. How? Sukhasangena, through attachment to happiness. Bringing about the association of happiness, which is the object, with the Self, which is the subject, in the form of the idea, 'I am happy', is certainly an unreal contact with happiness. This as such is nescience, for the ality of an object cannot belong to a subject. And it has been said by the Lord that all the alities, from 'desire' to 'fortitude' (see 13.6), are, indeed, of the field, which is the object. Therefore, it is certainly through nescience, which is an attribute [In reality, though nescience has no connection with the Self, yet, since there is none other with which it can become associated and since it has no independence, therefore the Commentator imagines it as an attribute of the Self.] of the Self and has the characteristics of non-discrimination between object and subject, that sattva apparently brings about the association with happiness, which is not the Self. It makes (the Self) attached, as it were; [Here Ast. adds 'asangam saktam iva, (makes) the Unattached attached, as it were'.-Tr.] makes one not possessed of happiness as though possessed of it! Similarly, it binds also jnana-sangena, through attachment to knowledge. [Jnana, derived in the sense of 'that through which one knows,' means an instrument of knowledge, and not Consciousness. (S.: Knowledge arising from the study of the import of various scriptures; or, jnanam, means the scriptures, through which the supreme God is known and which leads to devotional practices, but not to steadfastness in (the absolute) Brahman.] Because of its concomitance with happiness, knowledge here is an attribute of the internal organ, the field, but not of the Self. Were it an attribute [If knowledge were a natural attribute of the Self, then there can be no estion of the latter again becoming bound through association with the former.] of the Self, there could be no contact (between it and the Self), and 'bondage' would become illogical. Association with knowledge etc. should be understood in the same sense as with happiness.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.6।। विज्ञान की सभी शाखाओं में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि किसी वस्तु के लक्षणों का वर्णन किये बिना उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता है। किसी रोग या किसी भावना के विषय में भी यही बात सत्य है। इसी प्रकार इन गुणों की भी अपने आप में कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती। आगे के श्लोकों में यह वर्णन किया गया है कि इन गुणों के लक्षण क्या हैं तथा जब कभी कोई गुण अधिक प्रबल हो जाता है? तब उससे प्रभावित व्यक्ति का व्यवहार किस प्रकार होता है। निसन्देह? यह लक्षणात्मक वर्णन हम साधकों के लिए अधिक सहायक होगा? क्योंकि हम अपने मन में उठने वाले विचारों एवं भावनाओं का निरीक्षण और विश्लेषण कर यह निश्चित कर सकेंगे कि किसी क्षण विशेष में हम कौन से गुण के वश में हैं। इस प्रकार? उस प्रभाव के बन्धन से मुक्त होने का प्रयत्न भी हम कर सकेंगे।निर्मल होने से सत्त्वगुण प्रकाशमय है जिस प्रकार जल स्वत शुद्ध होता है? परन्तु अन्य मिश्रणों से अशुद्ध बन जाता है। उसी प्रकार सत्त्वगुण भी स्वत निर्मल होने से प्रकाशक अर्थात् आत्मचैतन्य को स्पष्ट प्रतिबिम्बित करने वाला है। उसमें न रजोगुण का विक्षेप है न तमोगुण का घोर अज्ञान।अनामय इस शब्द का अर्थ है उपद्रवरहित अर्थात् दोषरहित। आत्मस्वरूप का अज्ञान तथा उससे उत्पन्न अहंकार और स्वार्थ ही मूल दोष हैं? जिनसे अन्य अनर्थों की उत्पत्ति होती है। ये दोष रजोगुण और तमोगुण से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिये यहाँ कहा गया है कि सत्त्वगुण स्वत इन दोषों से रहित है। यद्यपि सत्त्वगुण निर्मल है तथापि वह भी बन्धनकारक होता है। उससे उत्पन्न होने वाले बंधनों का निर्देश यहाँ किया गया है।सत्त्वगुण सुख और ज्ञान की आसक्ति से जीव को बांधता है अपने आनन्दस्वरूप को न जानकर जीव सदैव विषयों में ही सुख की खोज करता रहता है। यह अज्ञान तमोगुण का लक्षण है तथा विषयों में सुख की कल्पना और विक्षेप रजोगुण का लक्षण है। प्रयत्नों के फलस्वरूप जब कभी इष्ट विषय की प्राप्ति होती है? तब क्षणभर के लिये विक्षेपों की शान्ति हो जाती है। उस शान्त स्थिति में आत्मा का आनन्द अभिव्यक्त होता है। परन्तु जीव यही समझता है कि वह सुख उसे विषय से प्राप्त हुआ है और मन की उस सुख वृत्ति के साथ तादात्म्य करके कहता है? मैं सुखी हूँ। इस प्रकार? विषयोपभोग से उत्पन्न यह सुखवृत्ति क्षेत्र का धर्म होने पर भी उसे अपना धर्म समझ कर उसमें आसक्त होना ही सत्त्वगुण से उत्पन्न हुआ बंधन है।सत्त्वगुण प्रधान बुद्धि स्वभावत स्थिर होती है। इसलिये उसमें चैतन्य का प्रकाश स्पष्टरूप से प्रतिबिम्बित होता है। इस प्रतिबिम्बित प्रकाश को ही हम बुद्धि का प्रकाश कहते हैं? जिसके द्वारा हमें विषयों का ज्ञान होता है। यही कारण है कि इस गुण के न्यूनाधिक्य के कारण ही सभी व्यक्तियों की बौद्धिक क्षमता एक समान नहीं होती।इस प्रकार? बुद्धि के इस प्रकाश से प्रकाशित होकर विषय के ज्ञान की वृत्ति अन्तकरण में उदित होती है मनुष्य इसी वृत्ति के साथ तादात्म्य करके अभिमानपूर्वक कहता है? मैं इस वस्तु का ज्ञाता हूँ। यहाँ भी क्षेत्र के धर्म के साथ तादात्म्य है और यही ज्ञान से आसक्ति का बन्धन है।इन दोनों का सरल अर्थ यह भी है कि जब मनुष्य को सूक्ष्मतर सुख या ज्ञान का अनुभव हो जाता है? तब उसका मन उसी में इतना अधिक आसक्त होकर रमता है कि उसका ध्यान सूक्ष्मतम वस्तु की ओर सहसा आकर्षित ही नहीं होता। यह सत्त्वगुण का बन्धन है। यह स्वर्ण की शृंखला है? परन्तु है तो शृंखला हीभगवान् कहते हैं कि सत्त्वगुण सुख संग और ज्ञान के साथ आसक्ति से बांध देता है। एक बार जब कोई व्यक्ति रचनात्मक चिन्तन तथा सदाचार और ज्ञान के अनुप्राणित जीवन के सात्त्विक आनन्द का अनुभव कर लेता है? तब उसमें वह इतना आसक्त हो जाता है कि फिर उसके लिये वह अपने सर्वस्व का भी त्याग करने के लिये तत्पर रहता है। विज्ञान को अपना जीवन समर्पित किये हुये प्रयोगशाला में कार्यरत एक सच्चा वैज्ञानिक क्षुधा और व्याधि से दुर्बल अपनी चित्रशाला में चित्रांकन कर रहा चित्रकार समाज द्वारा बहिष्कृत सार्वजनिक उद्यानों में रहकर अपनी कल्पनाओं? भावों और शब्दों के ही आनन्द में निमग्न एक कवि क्रूर उत्पीड़न को सहने वाले देशभक्त दीर्घकाल तक देश निष्कासन का जीवन जीने वाले राजनीतिज्ञ मृत्यु का आलिंगन करने वाले पर्वतारोही ये सब उदाहरण ऐसे पुरुषों के हैं? जिन्हें सात्त्विक आनन्द का अनुभव होता है और जो उसी में आसक्त हो जाते हैं? जैसे स्थूल बुद्धि के लोग धन तथा अन्य भौतिक वस्तुओं के परिग्रह में आसक्त रहते हैं।रजोगुण का बन्धन निम्न प्रकार से होता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.6।।किंलक्षणो गुणः केन सङ्गेन बध्नातीत्यपेक्षायामाह -- तत्रेति। तेषु सत्त्वादिगुणेषु सत्त्वं निर्मलत्वास्फटिकवत्सच्छत्वात् प्रकाशकं चैतन्याभिव्यञ्जकमनामयं निरुपद्रवम्। एतादृशं सत्त्वं सुख्यहमिति विषयभूतस्य सुखस्य विषयिणि प्रत्यगात्मनि मृषैव संश्लेषापादनेन सुखसङ्गेन बध्नाति अविद्ययैव ह्यन्यधर्मोऽन्यस्मिन्नारोप्यते इच्छादिकं धृत्यन्तं क्षेत्रस्य धर्म इत्युक्तं भगवतातोऽविद्ययैव स्वकीयधर्मभूतया विषयविषय्यविवेकलक्षणयाऽस्वात्मभूते सुखे संजयतीवासङ्गं सक्तमिव करोति। असुखिनं सुखिनमिव। तथाच यथोक्ताविद्यामाहात्म्यमिदं यदस्वरुपेऽतद्धर्मे च सक्तिसंपादनम्। प्रकारन्तरेण सत्त्वस्य निबन्धनहेतुत्वमाह -- ज्ञानसङ्गेनचेति। ज्ञायतेऽनेनेति सत्त्वपरिणामो ज्ञानं तेन ज्ञान्यहमिति विपरीताभिमानेन सत्त्वमात्मानं निबध्नाति ज्ञानमिति। सुखासाहचर्यात्। क्षेत्रस्यैवान्तःकरणस्य धर्मो नात्मनः आत्मधर्मत्वे सङ्गानुपपत्तर्बन्धानुपपतेश्च सुखइव ज्ञानादौ सङ्गो मन्तव्यो हेऽनघाघशन्याव्यसन? अनघेति संबोधयन् सुखादिव्यसनाभावसंपत्त्या सत्त्वप्रयुक्तं बन्धनं नार्हसीति सूचयति। पापादिदोषहीनस्यैवात्र शास्त्रेऽधिकार इति द्योतयतीत्येके।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.6।।तत्र को गुणः केन सङ्गेन बध्नातीत्युच्यते -- तत्रेति। तत्र तेषु गुणेषु मध्ये सत्त्वं प्रकाशकं,चैतन्यस्य तमोगुणकृतावरणतिरोधायकं निर्मलत्वात्स्वच्छत्वात्। चिद्बिम्बग्रहणयोग्यत्वादिति यावत्। न केवलं चैतन्याभिव्यञ्जकं किंत्वनामयम्। आमयो दुःखं तद्विरोधिसुखस्यापि व्यञ्जकमित्यर्थः। तत् बध्नाति सुखसङ्गेन ज्ञानसङ्गेन च देहिनम् हे अनघाव्यसन। सर्वत्र संबोधनानामभिप्रायः प्रागुक्तः स्मर्तव्यः। अत्र सुखज्ञानशब्दाभ्यामन्तःकरणपरिणामौ तद्व्यञ्जकावुच्येते।इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः इति सुखचेतनयोरपीच्छादिवत्क्षेत्रधर्मत्वेन पाठात्। तत्रान्तःकरणधर्मस्य सुखस्य ज्ञानस्य चात्मन्यध्यासः सङ्गः अहं सुखी अहं जान इति च। नहि विषयधर्मो विषयिणो भवति। तस्मादविद्यामात्रमेतदिति शतश उक्तं प्राक्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.6।।तत्र कः केन सङ्गेन बध्नातीत्युच्यते -- तत्रेति। तत्र तेषु गुणेषु सत्त्वं निर्मलत्वाद्दुःखमोहाख्यमलराहित्यात् प्रकाशकं आलोकवत्सर्वार्थावद्योतकम्। यतोऽनामयं रजस्तमोभ्यामनभिभूतम्। तत्सुखसङ्गेन ज्ञानसङ्गेन च नरं अविद्यया तिरोहितस्वरूपज्ञानानन्दं अहं सुखी अहं ज्ञानीत्यभिमानेन अन्तःकरणवृत्तिधर्मयोः सुखज्ञानयोरात्मनि आरोपेण बध्नाति। हे अनघ अव्यसनिन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.6।।अथ त्रयाणां बन्धनरीतिं सलक्षणामाह -- तत्रेति। तत्र गुणत्रये सत्त्वं निर्मलत्वाद्भगवदिच्छात्मकपदार्थस्थितिहेतुत्वेन शुद्धत्वात् प्रकाशकं भगवद्रमणात्मकसर्वस्वरूपप्रकटीकरणसमर्थम् अनामयं भगवत्सेवाप्रतिबन्धात्मकरागादिदोषरहितम्? अतः सुखसङ्गेन भगवतः साधनात्मकसेवनसुखजनकदेहाद्युत्तमत्वसङ्गेन बध्नाति। च पुनः ज्ञानसङ्गेन ज्ञानोत्पत्तिसाधकत्वेन बध्नाति। अनघ इतिसम्बोधनेन मत्कृपाविशिष्टत्वात्तव बन्धाभाव इति ज्ञापितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.6।। तत्र सत्त्वस्य लक्षणं बन्धकत्वप्रकारं चाह -- तत्रेति। तत्र तेषां गुणानां मध्ये सत्त्वं निर्मलत्वात्स्वच्छत्वात् स्फटिकवत् प्रकाशकं भास्वरम्? अनामयं च निरुपद्रवम्। शान्तमित्यर्थः। अतः शान्तत्वात्स्वकार्येण सुखेन यः सङ्गस्तेन बध्नाति। प्रकाशकत्वाच्च स्वकार्येण ज्ञानेन यः सङगस्तेन च बध्नाति। हे अनघ निष्पाप? अहं सुखी ज्ञानी चेति मनोधर्मास्तदभिमानिनि क्षेत्रज्ञे संयोजयतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.6।।तत्र क्रमतो लक्षणं गुणानां बन्धनप्रकारं च वदन् पूर्वं सत्त्वस्य तदाह -- तत्रेति। सत्त्वं प्राकृतत्वात् सुखसङ्गेन ज्ञानसङ्गेन च लौकिकेन बध्नाति? पुरुषस्य सुखे ज्ञाने च सङ्गं जनयतीत्यर्थः। ज्ञानसुखयोः सङ्गे जाते तत्साधनेषु लौकिकवैदिकेषु पुरुषप्रवृत्तिः? ततश्च तत्फलानुभवसाधनभूतासु योनिषु जायते इति सत्त्वं मर्यादया तद्द्वारेण पुरुषं बध्नाति। एवमेवान्यत्र। लक्षणं तु निर्मलत्वादिति मूले उक्तमेव? एवमन्ययोरपि लक्षणं स्पष्टमेव मूले। तथा च सत्त्वं प्राकृतं सोऽहं सुखी शब्दादिज्ञानी चेति ज्ञानसुखसङ्गजनेन () बन्धकमित्युक्तं भवति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.6।।उन सत्त्व आदि तीन गुणोंमेंसे पहले? सत्त्वगुणका लक्षण बतलाया जाता है -- सत्त्वगुण स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल होनेके कारण? प्रकाशशील और उपद्रवरहित है ( तो भी ) वह बाँधता है। कैसे बाँधता है सुखकी आसक्तिसे। (वास्तवमें ) विषयरूप सुखका विषयी आत्माके साथ मैं सुखी हूँ इस प्रकार सम्बन्ध जो़ड़ देना यह आत्माको मिथ्या ही सुखमें नियुक्त कर देना है। यही अविद्या है। क्योंकि विषयके धर्म विषयीके ( कभी ) नहीं होते और इच्छासे लेकर धृतिपर्यन्त सब धर्म विषयरूप क्षेत्रके ही हैं -- ऐसा भगवान्ने कहा है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि जो आरोपितभावसे आत्माकी स्वकीय धर्मरूपा हो रही है और विषयविषयीका अज्ञान ही जिसका स्वरूप है? ऐसी अविद्याद्वारा ही सत्त्वगुण अनात्मस्वरूप सुखमें ( आत्माको ) मानो,नियुक्त -- आसक्त कर देता है? यानी जो ( वास्तवमें ) सुखके सम्बन्धसे रहित है? उसे सुखीसा कर देता है। इसी प्रकार ( यह सत्त्वगुण उसे ) ज्ञानके सङ्गसे भी ( बाँधता है )। ज्ञान भी सुखका साथी होनेके कारण? क्षेत्र अर्थात् अन्तःकरणका ही धर्म है? आत्माका नहीं -- क्योंकि आत्माका धर्म मान लेनेपर उसमें आसक्त होना और उसका बाँधना नहीं बन सकता। इसलिये हे निष्पाप अर्थात् व्यसनदोष -- रहित अर्जुन सुखकी भाँति ही ज्ञान आदिके सङ्ग को भी ( बन्धन करनेवाला ) समझना चाहिये।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.6।। व्याख्या -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् -- पूर्वश्लोकमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंकी बात कही। इन तीनों गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (मलरहित) है। तात्पर्य है कि रजोगुण और तमोगुणकी तरह सत्त्वगुणमें मलिनता नहीं है? प्रत्युत यह रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा निर्मल? स्वच्छ है। निर्मल होनेके कारण यह परमात्मतत्त्वका ज्ञान करानेमें सहायक है।प्रकाशकम् -- सत्त्वगुण? निर्मल? स्वच्छ होनेके कारण प्रकाश करनेवाला है। जैसे प्रकाशके अन्तर्गत वस्तुएँ साफसाफ दीखती हैं? ऐसे ही सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे रजोगुण और तमोगुणकी वृत्तियाँ साफसाफ दीखती हैं। रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले काम? क्रोध? लोभ? मद? मात्सर्य आदि दोष भी साफसाफ दीखते हैं अर्थात् इन सब विकारोंका साफसाफ ज्ञान होता है।सत्त्वगुणकी वृद्धि होनेपर इन्द्रियोंमें प्रकाश? चेतना और हलकापन विशेषतासे प्रतीत होता है? जिससे प्रत्येक पारमार्थिक अथवा लौकिक विषयको अच्छी तरह समझनेमें बुद्धि पूरी तरह कार्य करती है और कार्य करनेमें बड़ा उत्साह रहता है।सत्त्वगुणके दो रूप हैं -- (1) शुद्ध सत्त्व? जिसमें उद्देश्य परमात्माका होता है? और (2) मलिन सत्त्व? जिसमें उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रहका होता है (टिप्पणी प0 716)। शुद्ध सत्त्वगुणमें परमात्माका उद्देश्य होनेसे परमात्माकी तरफ चलनेमें स्वाभाविक रुचि होती है। मलिन सत्त्वगुणमें पदार्थोंके संग्रह और सुखभोगका उद्देश्य होनेसे सांसारिक प्रवृत्तियोंमें रुचि होती है? जिससे मनुष्य बँध जाता है।मलिन सत्त्वगुणमें भी बुद्धि सांसारिक विषयको अच्छी तरह समझनेमें समर्थ होती है। जैसे? सत्त्वगुणकी वृद्धिमें ही वैज्ञानिक नयेनये आविष्कार करता है किन्तु उसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्ति न होनेसे वह अंहकार? मानबड़ाई? धन आदिसे संसारमें बँधा रहता है।अनामयम् -- सत्त्वगुण रज और तमकी अपेक्षा विकाररहित है। वास्तवमें प्रकृतिका कार्य होनेसे यह सर्वथा निर्विकार नहीं है। सर्वथा निर्विकार तो अपना स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्व ही है? जो कि गुणातीत है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे भगवान्ने सत्त्वगुणको भी विकाररहित कह दिया है।सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ -- जब अन्तःकरणमें सात्त्विक वृत्ति होती है? कोई विकार नहीं होता है? तब एक सुख मिलता है? शान्ति मिलती है। उस समय साधकके मनमें यह विचार आता है कि ऐसा सुख हरदम बना रहे? ऐसी शान्ति हरदम बनी रहे? ऐसी निर्विकारता हरदम बनी रहे। परन्तु जब ऐसा सुख? शान्ति? निर्विकारता नहीं रहती? तब साधकको अच्छा नहीं लगता। यह अच्छा लगना और अच्छा न लगना ही सत्त्वगुणके सुखमें आसक्ति है? जो बाँधनेवाली है।जब सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंका? इनकी वृत्तियोंका? विकारोंका साफसाफ ज्ञान होता है और साधकको ऐसी बहुतसी आश्चर्यजनक बातोंकी जानकारी होती है? जो पहले कभी जानी हुई नहीं होती? तब साधकके मनमें आता है कि यह ज्ञान हरदम बना रहे। यह ज्ञानमें आसक्ति है? जो बाँधनेवाली है। मैं दूसरोंकी अपेक्षा अधिक (विशेष) जानता हूँ -- यह अभिमान भी बाँधनेवाला होता है।इस तरह सत्त्वगुण सुख और ज्ञानके सङ्ग(आसक्ति) से साधकको बाँध देता है अर्थात् उसको गुणातीत नहीं होने देता। यह सङ्ग ही रजोगुण है जो बाँधनेवाला है (गीता 13। 21)। यदि साधक सुख और ज्ञानका सङ्ग न करे तो सत्त्वगुण उसको बाँधता नहीं? प्रत्युत उसको गुणातीत कर देता है। तात्पर्य है कि यदि सङ्ग न हो तो साधक सत्त्वगुणसे भी ऊँचा उठ जाता है और अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेता है।सत्त्वगुणसे सुख और ज्ञान होनेपर साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि यह सुख और ज्ञान मेरा लक्ष्य नहीं है। ये मेरे भाग्य नहीं हैं। ये तो लक्ष्यकी प्राप्तिमें कारण हैं। मेरेको तो उस लक्ष्यको प्राप्त करना है? जो,इस सुख और ज्ञानको भी प्रकाशित करनेवाला है।सुख? ज्ञान आदि सभी सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ हैं। ये कभी घटती हैं? कभी बढ़ती हैं कभी आती हैं? कभी जाती हैं। परन्तु अपना स्वरूप निरन्तर एकरस रहता है। उसमें कभी घटबढ़ नहीं होती। अतः साधकको सत्त्वगुणकी वृत्तियोंसे सदा तटस्थ? उदासीन रहना चाहिये। उनका उपभोग नहीं करना चाहिये। इससे वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिमें फँसेगा नहीं।अगर साधक सत्त्वगुणसे होनेवाले सुख और ज्ञानका सङ्ग न करे? तो उसको शीघ्र ही परमात्मप्राप्ति हो जाती है। परन्तु अगर वह इनके सङ्गका त्याग न करे तो (परमात्मप्राप्तिका लक्ष्य होनेसे) समय पाकर उसकी इस सुख और ज्ञानसे स्वतः अरुचि हो जाती है और वह परमात्मप्राप्ति कर लेता है। सम्बन्ध -- रजोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.6।।किंलक्षणो गुणः केन बध्नातीत्यपेक्षायामाह -- तत्रेति। निर्धारणार्थतया सप्तमीं व्याचष्टे -- तत्र सत्त्वादीनामिति। पुनस्तत्रेत्यनुवादमात्रं? निर्मलत्वं स्वच्छत्वमावरणवारणक्षमत्वं? तस्मात्प्रकाशकं? चैतन्याभिव्यञ्जकं? निरुपद्रवमिति निर्मलं सत्सुखस्याभिव्यञ्जकमित्यर्थः। केन द्वारेण तदात्मानं निबध्नातीति पृच्छति -- कथमिति। सुखसङ्गेन बध्नातीत्युत्तरं तदेव विवृणोति -- सुख्यहमित्यादिना। मुख्यसुखस्याभिव्यञ्जकसत्त्वपरिणामोऽत्र विषयसंभूतं सुखमुच्यते -- संश्लेषापादनमेव विशदयति -- मृषैवेति। किमिति मृषैवेति विशेषणं सङ्गस्य वस्तुत्वसंभवादित्याशङ्क्याह -- सैषेति। नन्विच्छा सङ्गोऽभिनिवेशश्चेत्येकोऽर्थस्तत्रेच्छादेरात्मधर्मत्वात्किमविद्ययेत्याशङ्क्य मनोधर्मत्वादिच्छादेर्नात्मधर्मतेत्याह -- नहीति। इच्छादेरनात्मधर्मत्वे किं प्रमाणमित्याशङ्क्याह -- इच्छादि चेति। तस्यात्मधर्मत्वासंभवे फलितमाह -- अत इति। संजयतीव सत्त्वमिति शेषः। इवकारप्रयोगे हेतुमाह -- अविद्ययेति। तस्या वस्तुतो नात्मसंबन्धस्तथापि संबन्ध्यन्तराभावादस्वातन्त्र्याच्चात्मधर्मत्वमापाद्य दृष्टत्वमाचष्टे -- स्वकीयेति। वृत्तिमदन्तःकरणस्य विषयत्वादात्मनः साधकत्वेन तद्विषयत्वेऽपि तदविवेकरूपाविद्येति तत्स्वरूपमाह -- विषयेति। यथोक्ताविद्यामाहात्म्यमिदं यदस्वरूपेऽतद्धर्मे च सक्तिसंपादनमित्याह -- अस्वेति। तदेव स्फुटयति -- सक्तमिवेति। प्रकारान्तरेण सत्त्वस्य निबन्धनत्वमाह -- तथेति। ज्ञायतेऽनेनेति सत्त्वपरिणामो ज्ञानं तेन ज्ञान्यहमिति विपरीताभिमानेन
Chapter 14 (Part 4)
सत्त्वमात्मानं निबध्नातीत्याह -- ज्ञानमित्यादिना। विपक्षे दोषमाह -- आत्मेति। स्वाभाविकत्वेन प्राप्तत्वात्तत्र स्वतः संयोगात्तद्द्वारा बन्धे च तन्निवृत्त्यनुपपत्तेर्नात्मधर्मत्वमित्यर्थः। ज्ञानैश्वर्यादावपि क्षेत्रधर्मे सङ्गस्य पूर्ववदाविद्यकत्वं सूचयति -- सुख इवेति। पापादिदोषहीनस्यैवात्र शास्त्रेऽधिकार इति द्योतयति -- अनघेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.6।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.6।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.6।। --,निर्मलत्वात् स्फटिकमणिरिव प्रकाशकम् अनामयं निरुपद्रवं सत्त्वं तन्निबध्नाति। कथम् सुखसङ्गेन सुखी अहम् इति विषयभूतस्य सुखस्य विषयिणि आत्मनि संश्लेषापादनं मृषैव सुखे सञ्जनम् इति। सैषा अविद्या। न हि विषयधर्मः विषयिणः भवति। इच्छादि च धृत्यन्तं क्षेत्रस्यैव विषयस्य धर्मः इति उक्तं भगवता। अतः अविद्ययैव स्वकीयधर्मभूतया विषयविषय्यविवेकलक्षणया अस्वात्मभूते सुखे सञ्जयति इव? आसक्तमिव करोति? असङ्गं सक्तमिव करोति? असुखिनं सुखिनमिव। तथा ज्ञानसङ्गेन च? ज्ञानमिति सुखसाहचर्यात् क्षेत्रस्यैव विषयस्य अन्तःकरणस्य धर्मः? न आत्मनः आत्मधर्मत्वे सङ्गानुपपत्तेः? बन्धानुपपत्तेश्च। सुखे इव ज्ञानादौ सङ्गः मन्तव्यः। हे अनघ अव्यसन।।
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【 Verse 14.7 】
▸ Sanskrit Sloka: रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् | तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ||
▸ Transliteration: rajo rāgātmakaṁ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam | tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam ||
▸ Glossary: rajaḥ: the mode of passion; rāgātmakaṁ: born of desire or lust; viddhi: know; tṛṣṇā: with craving; saṅga: association; samudbhavam: produced of; tan: that; nibadhnāti: binds; kaunteya: O son of Kuntī; karmasaṅgena: by association with fruitive activity; dehinam: the embodied
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.7 Kaunteya, know that the mode of passion, rajas, is char- acterized by intense craving and is the source of desire and attachment. Rajas binds the living entity by attachment to work.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.7।।हे कुन्तीनन्दन तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो। वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.7।। हे कौन्तेय रजोगुण को रागस्वरूप जानो? जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.7 रजः Rajas? रागात्मकम् of the nature of passion? विद्धि know? तृष्णासङ्गसमुद्भवम् the source of thirst and attachment? तत् that? निबध्नाति binds? कौन्तेय O son of Kunti (Arjuna)? कर्मसङ्गेन by attachment to action? देहिनम् the embodied one.Commentary The ality of Rajas denotes activity and ambition. The Rajasic man is full of cravings and desires. The cravings force him to act for their fulfilment. He gets attached to those who help him in the fulfilment of his desire and hates those who stand in his way. He is attached to action. He enters on great undertakings. He performs various sorts of sacrifices and rituals and charitable activities. He runs after sensual pleasures and his desires become insatiable like a flame fed by oil. The Self is not the doer. It is the silent witness but Rajas creates in the man the idea? I am the doer.Rajas pleases the mind and keeps alive the passions.A Rajasic man is never contented. He is ever greedy and restless. The more he acires? the more passionate and greedy he becomes. Desires multiply. Nothing gives him satisfaction. If he is a millionaire? he tries to become a multimillionaire. It is like petrol poured into the fire? which inflames it further. A Rajasic man loses his understanding and power of discrimination. His understanding is clouded. He is under intoxication of the pride of wealth. His intellect is turbid. He has a perverted intellect. On account of perversion of intellect misery appears to him to be happiness pain appears to him to be pleasure sorrow appears to be joy. His goal is money and women. He worships mammon as his god.He runs after name? fame and comforts and involves himself in endless activities. Quickness has been associated with the fish? with the flash of lightning and with the glance of a woman. But Rajas is icker than these. A Rajasic man is more active than these. He thinks What will happen to me after my possessions are gone and thus worries himself unnecessarily and engages himself in endless activities. He has no peace of mind.He thirsts for what has not been attained and is attached to what has already been obtained. He wishes and tries to protect his possessions. This is Sanga. I will do such and such an action. I will get such and such a result. I will do this sacrifice. I will enjoy in heaven. This sort of clinging to action and its fruits is Karma Sanga.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.7. You should know that the Rajas is of the nature of desire and is a source of craving-attachment; and it binds the embodied by the attachment to action, O son of Kunti !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.7 Passion, engendered by thirst for pleasure and attachment, binds the soul through its fondness for activity.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.7 Know, O Arjuna, that Rajas is of the nature of passion springing from thirst and atttachment. It binds the embodied self with attachment to work.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.7 Know rajas to be of the nature of passion, born of hankering and attachment. O son of Kunti, that binds the embodied one through attachment to action.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.7 Know thou Rajas to be of the nature of passion, the source of thirst (for sensual enjoyment) and attachment; it binds fast, O Arjuna, the embodied one by attachment to action.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.7 See Comment under 14.8
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.7 Rajas is of the nature of passion, namely, it causes sexual desire. 'Passion' (Raga) is mutual yearning between a man and a woman. 'Springing from thirst and attachment' means it is the source of sensuality and attachment. 'Trsna', (thirst, sensuality) is the longing for all sense-objects, such as sound etc. 'Sanga' (attachment) is the inordinate longing for union with one's sons, friends and such other relations. By creating longing for actions, it binds the embodied self. Whatever actions have been begun by the self from longiing for sensual enjoyments, they become the cause of births in bodies that constitute the means for experiencing such enjoyments. Therefore Rajas binds the embodied self through attachment to actions. What is said is this: Rajas is the cause of sexuality, sensuality and attachment, and of constant engagement in actions.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.7 Viddhi, know; rajas to be ragatmakam, of the nature of passion (-raga is derived in the sense of that which colours-), having the property of colouring, like the ochre pigment etc.; trsna-asanga-samud-bhavam, born of hankering and attachment-hankering is the longing for things not acired; attachment is the clining-of the nature of fondness-of the mind to things in possession. O son of Kunti, tat, that, that rajas; nibadhnati, binds; dehinam, the embodied one; karma-sangena, through attachment to actions. Deep involvement in actions related to seen or unseen objects is karmasangah. Rajas binds through that.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.7।। अपने मन पर विजय प्राप्त करने के इच्छुक साधक को मन की उन समस्त सूक्ष्म प्रवृत्तियों एवं रुचियों का ज्ञान होना चाहिये? जिनके द्वारा वह बारम्बार उन्मत्त के समान विषयों की ओर भागता है। इस प्रकार? यह मन साधक के आन्तरिक व्यक्तित्व को नष्ट करने के षड्यन्त्र में ही लगा रहता है।रजोगुण को रागस्वरूप जानो जब अन्तकरण में रजोगुण के प्रभावों का घातक आक्रमण होता है तब वह मनुष्य के मन को असंख्य पीड़ादायक उद्वेगों से चूरचूर कर देता है। मन के स्तर पर उठने वाले ये उद्वेग ही रजोगुण के मुख्य लक्षण हैं। ये मनोवेग असंख्य प्रकार से व्यक्त होते हैं? जैसे हठ? कामना? भावना इत्यादि। तथापि इन सबका समावेश केवल दो वृत्तियों में किया जा सकता है तृष्णा और संग अर्थात् आसक्ति। यहाँ इन दोनों का ही समस्त उद्वेगों के मुख्य स्रोत के रूप में निर्देश किया गया है।तृष्णा और संग विषयोपभोग की इच्छा के लिये संस्कृत में शब्द है तृष्णा अर्थात् प्यास। एक प्यासे व्यक्ति के लिये उस समय जल से अधिक महत्व की और कोई शान्तिप्रद वस्तु प्रतीत ही नहीं होती है। वह तृष्णा के कारण छटपटाता है? और केवल किसी प्रकार किसी भी स्थान से जल प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करता है। इसी प्रकार एक बार किसी विषय की कामना मन में उत्पन्न हो जाती है? तब उसकी सन्तुष्टि किये बिना मनुष्य को शान्ति अनुभव नहीं होती। यदि इष्ट वस्तु की प्राप्ति हो जाती है? तो उसके प्रति संग हो जाता है। संग एक ऐसा दुष्ट मनोवेग है? जो मन के सुख और शान्ति को भंग कर देता है। संक्षेपत? अप्राप्त वस्तु को पाने की काम्ाना तृष्णा कहलाती है? और प्राप्त वस्तु से आसक्ति को संग कहते हैं।विषयों के प्रति मन में उत्पन्न होने वाली तृष्णा और संग ही वे ज्वालामुखी पर्वत हैं? जो निरन्तर अपना पिघला लावा उगल कर जीवन के हंसते उपवन को झुलसाकर ध्वस्त कर देते हैं। इन आग्नेय पर्वतों से उगला गया तप्त लावा विविध प्रकार के मनोद्वेग हैं? जो मनुष्य के कामुक जीवन में असंख्य वस्तुओं को अर्जित करने? उन पर अधिकार जमाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिये संघर्ष और कलह को जन्म देते हैं।यह रजोगुण मनुष्य को कर्मासक्ति से बांधता है रजोगुण के वशीभूत पुरुष के मन में विभिन्न इच्छाएं उत्पन्न होती हैं? जिन्हें पूर्ण करने के लिये स्वाभाविक है कि वह दिनरात कर्म में ही व्यस्त और आसक्त हो जाता है। उसका सम्पूर्ण जीवन धन के आय और व्यय? वस्तुओं के अर्जन और रक्षण करने में ही व्यतीत होता है। इस प्रक्रिया में उसका शरीर तो वृद्ध होता जाता है परन्तु उसकी तृष्णा नवयौवन को प्राप्त होती जाती है अधिकाधिक भोग को प्राप्त करने की व्याकुलता और प्राप्त वस्तु के नष्ट होने के भय के कारण वह एक कर्म से दूसरे कर्म में प्रवृत्त रहता है। इस प्रकार अपने ही कर्मों से उत्पन्न हुए सुख दुख रूप फलों को भोगने के लिए य्ाह जीव देह से बंधा रहता है।यदि सत्त्वगुण के बन्धन में मनुष्य को यह अभिमान होता है कि मैं सुखी हूँ और मैं जानने वाला हूँ? तो रजोगुण में मैं कर्ता हूँ इस प्रकार कर्तृत्व का अभिमान होता है। इस तथ्य का हमें स्मरण रहे कि इन गुणों से उत्पन्न ये बन्धन प्रतीतिक ही हैं? वास्तविक नहीं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.7।।रजः किंलक्षणं कथं वा देहिनं बध्नातीत्यपेक्षायां तस्य लक्षणं बन्धकत्वं चाह -- रज इति। रजः रागात्मकं रज्यते संसज्यतेऽनेन पुरुषो दृश्यैरीति रागो दृष्टादृष्टसुखं तत्साधनविषयकः कामः गंधः स एवात्मा यस्य तद्रागात्मकं विद्धि जानीहि। अप्राप्तोभिलाषस्तृष्णा मनसः प्रीतिलक्षणः संश्लेष आसङ्गः समुद्भवत्यस्मादिति समुद्भवः। तृष्णासङ्गयोः समुद्भूवं निदानं एतादृशं तद्रजः। कर्मसङ्गेन दृष्टादृष्टार्थेषु सञ्जनं तत्परता कर्मसङ्गेस्तेन देहिनं निबध्नाति। अकर्तारमेव करोमीत्यभिमानेन प्रवर्तयतीत्यर्थः। बध्वा च जननीजढरवासादिरुपां संसृतिं विस्तारयतीति ध्वनयन्नाह -- हे कौन्तेयेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.7।।रज्यते विषयेषु पुरुषोऽनेनेति रागः? कामो गर्धः स एवात्मा स्वरूपं यस्य धर्मधर्मिणोस्तादात्म्यात् तद्रागात्मकं रजो विद्धि। अतएव अप्राप्ताभिलाषस्तृष्णा? प्राप्तस्योपस्थितेऽपि विनाशे संरक्षणाभिलाष आसङ्गतयोस्तृष्णासङ्गयोः संभवो यस्मात्तद्रजो निबध्नाति हे कौन्तेय? कर्मसङ्गेन कर्मसु दृष्टादृष्टार्थेषु अहमिदं करोम्येतत्फलं भोक्ष्य इत्यभिनिवेशविशेषेण देहिनं वस्तुतोऽकर्तारमेव कर्तृत्वाभिमानिनम्। रजसः प्रवृत्तिहेतुत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.7।।रजोगुणो रागो रञ्जना तदात्मकं विद्धि। तृष्णा प्राप्यमाणेष्वप्यर्थेष्वतृप्तिः। सङ्गः प्राप्ते विषये मनसः प्रीतिलक्षणः संश्लेषस्तयोः समुद्भवं निदानभूतं तद्रजो हे कौन्तेय? कर्मसङ्गेन दृष्टादृष्टार्थेषु कर्मसु सङ्गस्तत्परता तेन निबध्नाति देहिनं देहाभिमानिनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.7।।सत्त्वलक्षणमुक्त्वा रजोलक्षणमाह -- रजो रागात्मकमिति। रजः रजोगुणं रागात्मकं अनुरञ्जनात्मकं नानापदार्थोत्पादनेन भगवद्रञ्जनात्मकं विद्धि। तत् तृष्णासङ्गसमुद्भवं तृष्णा,भगवदर्थोत्पन्नवस्तुमात्राज्ञानेन स्वाभिलाषः? तत्सङ्गेन समुद्भव उत्पत्तिर्यस्य तादृशं देहिनं? न तु भगवदर्थकज्ञानात्मकम्। कर्मसङ्गेन तत्स्वाभिलषितप्राप्त्यर्थं क्रियासङ्गेन बध्नाति लौकिकासक्तिं जनयतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.7।।रजसो लक्षणं बन्धकत्वं चाह -- रजोरागेति। रजःसंज्ञकं गुणं रागात्मकमनुरञ्जनरूपं विद्धि। अतएव तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। तृष्णा अप्राप्तेऽर्थेऽभिलाषः? सङ्गः प्राप्तेऽर्थे प्रीतिर्विशषेणासक्तिस्तयोस्तृष्णासङ्गयोः समुद्भवो यस्मात्तद्रजो देहिनं दृष्टादृष्टार्थेषु कर्मसु सङ्गेनासात्तया नितरां बध्नाति। तृष्णासङ्गाभ्यां हि कर्मस्वासक्तिर्भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.7।।रजसोऽप्याह -- रज इति। अनुरागात्मकंरञ्ज रागे इति धातोः स्पष्टमेव। कर्मसु,रञ्जनाद्बन्धकम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.7।।अप्राप्त वस्तुकी अभिलाषाका नाम तृष्णा है और प्राप्त विषयोंमें मनकी प्रीतिरूप स्नेहका नाम आसक्ति है? इन तृष्णा और आसक्तिकी उत्पत्तिके कारणरूप रजोगुणको रागात्मक जान। अर्थात् गेरू आदि रंगोंकी भाँति ( पुरुषको विषयोंके साथ ) उनमें आसक्त करके तद्रूप करनेवाला होनेसे? इसको तू रागरूप समझ। हे कुन्तीपुत्र वह रजोगुण? इस शरीरधारी क्षेत्रज्ञको कर्मासक्तिसे बाँधता है। दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले जो कर्म हैं उनमें आसक्ति -- तत्परताका नाम कर्मासक्ति है? उसके द्वारा बाँधता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.7।। व्याख्या -- रजो रागात्म्कं विद्धि -- यह रजोगुण रागस्वरूप है अर्थात् किसी वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति? घटना? क्रिया आदिमें जो प्रियता पैदा होती है? वह प्रियता रजोगुणका स्वरूप है।रागात्मकम् कहनेका तात्पर्य है कि जैसे स्वर्णके आभूषण स्वर्णमय होते हैं? ऐसे ही रजोगुण रागमय है।पातञ्जलयोगदर्शनमें क्रिया को रजोगुणका स्वरूप कहा गया है (टिप्पणी प0 717.1)। परन्तु श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् (क्रियामात्रको गौणरूपसे रजोगुण मानते हुए भी) मुख्यतः रागको ही रजोगुणका स्वरूप मानते हैं (टिप्पणी प0 717.2)। इसीलिये योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्ग त्यक्त्वा ( 2। 48) पदोंमें आसक्तिका त्याग करके कर्तव्यकर्मोंको करनेकी आज्ञा दी गयी है। निष्कामभावसे किये गये कर्म मुक्त करनेवाले होते हैं (3। 19)। इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि प्रवृत्ति अर्थात् क्रिया करनेका भाव उत्पन्न होनेपर भी गुणातीत पुरुषका उसमें राग नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि गुणातीत पुरुषमें भी रजोगुणके प्रभावसे प्रवृत्ति तो होती है? पर वह रागपूर्वक नहीं होती। गुणातीत होनेमें सहायक होनेपर भी सत्त्वगुणको सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे बाँधनेवाला कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि आसक्ति ही बन्धनकारक है? सत्त्वगुण स्वयं नहीं। अतः भगवान् यहाँ रागको ही रजोगुणका मुख्य स्वरूप जाननेके लिये कह रहे हैं।महासर्गके आदिमें परमात्माका बहु स्यां प्रजायेय -- यह संकल्प होता है। यह संकल्प रजोगुणी है। इसको गीताने कर्म नामसे कहा है (8। 3)। जिस प्रकार दहीको बिलोनेसे मक्खन और छाछ अलगअलग हो जाते हैं? ऐसे ही सृष्टिरचनाके इस रजोगुणी संकल्पसे प्रकृतिमें क्षोभ पैदा होता है? जिससे सत्त्वगुणरूपी मक्खन और तमोगुणरूपी छाछ अलगअलग हो जाती है। सत्त्वगुणसे अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियाँ? रजोगुणसे प्राण और कर्मेन्द्रियाँ तथा तमोगुणसे स्थूल पदार्थ? शरीर आदिका निर्माण होता है। तीनों गुणोंसे संसारके अन्य पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार महासर्गके आदिमें भगवान्का सृष्टिरचनारूप कर्म भी सर्वथा रागरहित होता है (गीता 4। 13)।तृष्णासङ्गसमुद्भवम् -- प्राप्त वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? परिस्थिति? घटना आदि बने रहें तथा वे और भी मिलते रहें -- ऐसी जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई की तरह तृष्णा पैदा हो जाती है। इस तृष्णासे फिर वस्तु आदिमें आसक्ति पैदा हो जाती है।व्याकरणके अनुसार इस तृष्णासङ्गसमुद्भवम् पदके दो अर्थ होते हैं -- (1) जिससे तृष्णा और आसक्ति पैदा होती है (टिप्पणी प0 718.1) अर्थात् तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाला और (2) जो तृष्णा और आसक्तिसे पैदा होता है (टिप्पणी प0 718.2) अर्थात् तृष्णा और आसक्तिसे पैदा होनेवाला। जैसे बीच और वृक्ष अन्योन्य कारण हैं? अर्थात् बीजसे वृक्ष पैदा होता है और वृक्षसे फिर बहुतसे बीज पैदा होते हैं? ऐसे ही रागस्वरूप रजोगुणसे तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है तथा तृष्णा और आसक्तिसे रजोगुण बहुत बढ़ जाता है। तात्पर्य है कि ये दोनों ही एकदूसरेको पुष्ट करनेवाले हैं। अतः उपर्युक्त दोनों ही अर्थ ठीक हैं।तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् -- रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है अर्थात् रजोगुणके बढ़नेपर ज्योंज्यों तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है? त्योंहीत्यों मनुष्यकी कर्म करनेकी प्रवृत्ति बढ़ती है। कर्म करनेकी प्रवृत्ति बढ़नेसे मनुष्य नयेनये कर्म करना शुरू कर देता है। फिर वह रातदिन इस प्रवृत्तिमें फँसा रहता है अर्थात् मनुष्यकी मनोवृत्तियाँ रातदिन नयेनये कर्म आरम्भ करनेके चिन्तनमें लगी रहती हैं। ऐसी अवस्थामें उसको अपना कल्याण? उद्धार करनेका अवसर ही प्राप्त नहीं होता। इस तरह रजोगुण कर्मोंकी सुखासक्तिसे शरीरधारीको बाँध देता है अर्थात् जन्ममरणमें ले जाता है। अतः साधकको प्राप्त परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे कर्तव्य कर्म तो कर देना चाहिये? पर संग्रह और सुखभोगके लिये नयेनये कर्मोंका आरम्भ नहीं करना चाहिये।देहिनम् पदका तात्पर्य है कि देहसे अपना सम्बन्ध माननेवाले देहीको ही यह रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे बाँधता है।सकामभावसे कर्मोंको करनेमें भी एक सुख होता है और कर्मोंका अमुक फल भोगेंगे इस फलासक्तिमें भी एक सुख होता है। इस कर्म और फलकी सुखासक्तिसे मनुष्य बँध जाता है।कर्मोंकी सुखासक्तिसे छूटनेके लिये साधक यह विचार करे कि ये पदार्थ? व्यक्ति? परिस्थिति? घटना आदि कितने दिन हमारे साथ रहेंगे। कारण कि सब दृश्य प्रतिक्षण अदृश्यतामें जा रहा है जीवन प्रतिक्षण मृत्युमें जा रहा है सर्ग प्रतिक्षण प्रलयमें जा रहा है महासर्ग प्रतिक्षण महाप्रलयमें जा रहा है। आज दिनतक जो बाल्य? युवा आदि अवस्थाएँ चली गयीं? वे फिर नहीं मिल सकतीं। जो समय चला गया? वह फिर नहीं मिल सकता। बड़ेबड़े राजामहाराजाओं और धनियोंकी अन्तिम दशाको याद करनेसे तथा बड़ेबड़े राजमहलों और मकानोंके खण्डहरोंको देखनेसे साधकको यह विचार आना चाहिये कि उनको जो दशा हुई है? वही दशा इस शरीर? धनसम्पत्ति? मकान आदिकी भी होगी। परन्तु मैंने इनके प्रलोभनमें पड़कर अपनी शक्ति? बुद्धि? समयको बरबाद कर दिया है। यह तो बड़ी भारी हानि हो गयी ऐसे विचारोंसे साधकके अन्तःकरणमें सात्त्विक वृत्तियाँ आयेंगी और वह कर्मसङ्गसे ऊँचा उठ जायगा।अगर मैं रातदिन नयेनये कर्मोंके करनेमें ही लगा रहूँगा? तो मेरा मनुष्यजन्म निरर्थक चला जायगा और उन कर्मोंकी आसक्तिसे मेरेको न जाने किनकिन योनियोंमें जाना पड़ेगा और कितनी बार जन्मनामरना पड़ेगा इसलिये मुझे संग्रह और सुखभोगके लिये नयेनये कर्मोंका आरम्भ नहीं करना है? प्रत्युत प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अनासक्तभावसे कर्तव्यकर्म करना है ऐसे विचारोंसे भी साधक कर्मोंकी आसक्तिसे ऊँचा उठ जाता है। सम्बन्ध -- तमोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.7।।रजस्तर्हि किंलक्षणं कथं वा पुरुषं निबध्नातीत्याशङ्क्याह -- रज इति। रज्यते संसृज्यतेऽनेन पुरुषो दृश्यैरिति रागोऽसावात्मास्येति रागात्मकं रजो जानीहीत्याह -- रञ्जनादिति। समुद्भवत्यस्मादिति समुद्भवस्तृष्णा चासङ्गश्च तृष्णासङ्गौ तयोः समुद्भवस्तमिति विग्रहं गृहीत्वा कार्यद्वारा रजो विवक्षुस्तृष्णासङ्गयोरर्थभेदमाह -- तृष्णेत्यादिना। रजसो लक्षणमुक्त्वा निबन्धृत्वप्रकारमाह -- तद्रज इति। कर्मसङ्गं विभजते -- दृष्टेति। अकर्तारमेव पुरुषं करोमीत्यभिमानेन प्रवर्तयतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.7।।अत्ररजस्तृष्णासङ्गसमुद्भवं इत्यस्यतृष्णासङ्गाभ्यां समुद्भवो यस्य इत्यपव्याख्यानमिति भावेन विग्रहप्रदर्शनपूर्वकमर्थमाह -- तृष्णेति। समुद्भवत्यस्मादिति समुद्भवं कारणम्। अन्यथाप्रकृतिसम्भवाः (14।5) इत्युक्तविरोधात् समुद्भवशब्देनाविर्भावो विवक्षित इति चेत् तथापि गुणकार्यकथनप्रकरणविरोधात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.7।।रज इति। तृष्णासङ्गयोः समुद्भवं तयोः कारणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.7।। --,रजः रागात्मकं रञ्जनात् रागः गैरिकादिवद्रागात्मकं विद्धि जानीहि। तृष्णासङ्गसमुद्भवं तृष्णा अप्राप्ताभिलाषः? आसङ्गः प्राप्ते विषये मनसः प्रीतिलक्षणः संश्लेषः? तृष्णासङ्गयोः समुद्भवं तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। तन्निबध्नाति तत् रजः निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन? दृष्टादृष्टार्थेषु कर्मसु सञ्जनं तत्परता कर्मसङ्गः? तेन निबध्नाति रजः देहिनम्।।
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【 Verse 14.8 】
▸ Sanskrit Sloka: तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् | प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ||
▸ Transliteration: tamas tv ajñānajaṁ viddhi mohanaṁ sarvadehinām | pramādālasya-nidrābhis tannibadhnāti bhārata ||
▸ Glossary: tamaḥ: mode of ignorance; tu: but; ajñānajaṁ: products of ignorance; viddhi: know; mohanaṁ: delusion; sarvadehinām: of all embodied beings; pramāda: madness; ālasya: indolence; nidrābhiḥ: sleep; tat: that; nibadhnāti: binds; bhārata : O son of Bhārata
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.8 Know, O Arjuna, that the mode of ignorance, tamas, the deluder of the living entity is born of inertia. Tamas binds the living entity by carelessness, laziness, and excessive sleep.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.8।।हे भरतवंशी अर्जुन सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको तुम अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला समझो। वह प्रमाद? आलस्य और निद्राके द्वारा देहधारियोंको बाँधता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.8।। और हे भारत तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद? आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.8 तमः inertia? तु but? अज्ञानजम् born of ignorance? विद्धि know? मोहनम् deluding? सर्वदेहिनाम् to all,embodied beings? प्रमादालस्यनिद्राभिः by heedlessness? indolence and sleep? तत् that? निबध्नाति binds fast? भारत O descendant of Bharata (Arjuna).Commentary Tamas is that binding force with a tendency to lethargy? sloth and foolish actions. It causes delusion or nondiscrimination. It binds him who associates the Self with the body. A Tamasic man acts under the compulsion of the wants of the body. He has no power of judgment. Troubled by the wants of the body he acts under pressure to keep himself alive. His actions are not guided by reason. They are on the plane of instinct. His senses are dull. He becomes infatuated and stupefied. He has no inclination to work. He yawns much. He sleeps too much. He always wants to sleep. He nevr knows when and how to act? what? to whom and how to talk. He takes delight in following the wrong path. He does not know how to behave or how to address others. He is thoughtless and ignorant. He forgets everything. He is negligent and indolent. He is just in a stage higher than lifeless matter.He who is under the grip of heedlessness (Pramada) is not able to discriminate between the eternal and the noneternal. This is an enemy of illumination? the effect of Sattva. He who is overpowered by laziness (Alasya) is not able to exert. This is an enemy of Pravritti? the effect of Rajas. Sleep (Nidra) is LayaVritti? (a state of absorption into ignorance) which is dependent on Tamas. This is the enemy of the works done by Sattva and Rajas.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.8. But, you should [also] know that the Tamas is born of ignorance and is a deluder of all the Embodied; it binds [them] by negligence, laziness and sleep, O descendant of Bharata !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.8 But Ignorance, the product of darkness, stupefies the senses in all embodied beings, binding them by chains of folly, indolence and lethargy.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.8 Know that Tamas is born of false knowledge and deludes all embodied selves. It binds, O Arjuna, with negligence, indolence and sleep.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.8 On the other hand, know tamas, which deludes all embodied beings, to be born of ignorance. O scion of the Bharata dynasty, that binds through inadvertence, laziness and sleep.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.8 But know thou Tamas to be born of ignorance, deluding all embodied beings; it binds fast, O Arjuna, by heedlessness, indolence and sleep.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.6-8 Tatra etc. upto Bharata. The Sattva is dirtless. [Source of craving-attachment] : that from which the attachment of craving springs up. Negligence : wasting the human birth which is difficult to get, but got by means of hundreds of merits accumulated for a very long period, and which is the sole means for attaining emancipation. That has been also said- 'Not even a single moment of life is gained by (spending] all the gems. [Hence], he, who wastes it, is a man of negligence and is the lowest of men'.
Laziness : i.e., in doing good deeds. Sleep : being poor totally i.e. a contemptible course.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.8 By 'false knowledge' is here to be understood as what is other than knowledge. What is called knowledge is right perception of things. What is other than this is false knowledge. And Tamas springs from knowledge contrary to the true nature of thinngs. It deludes all embodied selves. Delusion is erroneous knowledge. The meaning is that Tamas is the cause of erroneous knowledge. Being the cause of negligence, indolence and sleep, it binds the embodied self through them. 'Negligence' is inattentiveness, which causes one to perform works other than what ought to be done. 'Indolence' is the tendency to avoid work; it may even develop into absolute inaction. 'Sleep.' is the state in which the external organs stop working due to exhaustion and seek to recover from the same. In sleep when only the outgoing actionof the senses stop, it is called dream state. When even the mind (Manas) ceases to function, it is called dreamless sleep.
He states the cardinal feature forming the ways of bondage through Sattva etc.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.8 Viddhi, know; tamas, the third alitty; mahanam, which deludes, which is a cause of indiscrimination; sarva-dehinam, of all embodied beings; to be ajnanajam, born of ignorance. O scion of the Bharata dynasty, tat, that tamas; nibadhnati, binds; pramada-alasya-nidrabhih, through inadvertence, laziness and sleep. The activities of the alities are again being briefly stated:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.8।। तमोगुण अज्ञानजनित है तमोगुण के प्रभाव से सत्य और असत्य का विवेक करने की मनुष्य की बौद्धित क्षमता आच्छादित हो जाती है और फिर वह किसी संभ्रमित या मूर्ख व्यक्ति के समान व्यवहार करने लगता है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह तमोगुण जीवन के सत्य और दिव्य लक्ष्य के प्रति अनेक मिथ्या धारणाओं एवं मिथ्या आग्रहों को जन्म देकर मनुष्य को निम्न स्तर का जीवन जीने को बाध्य करता है। इसके वशीभूत होकर मनुष्य प्रमाद (असावधानी) और आलस्य (कार्य को टालते रहने की प्रवृत्ति) का शिकार बन जाता है। जीवनादर्शों और दिव्य महात्वाकांक्षाओं के प्रति मानो वह सुप्त रहता है। तमोगुणी पुरुष में न लक्ष्य की स्थिरता होती है और न बुद्धि की प्रतिभा उसमें न भावनाओं की कोमलता होती है और न कर्मों की कुशलता।अब तक भगवान् श्रीकृष्ण ने क्रमवार सत्त्व? रज और तमोगुण के उन लक्षणों का वर्णन किया है? जो हमारे मानसिक जीवन में देखे जाते हैं। ये हमारे मन की शान्ति को भंग कर देने वाले होते हैं। इन तीनों गुणों के कारण विभिन्न व्यक्तियों में दिव्यता की अभिव्यक्ति में भी तारतम्य होता है और ये गुण नित्य? अनन्तस्वरूप आत्मा को मानो अनित्य और परिच्छिन्न बना देते हैं।संक्षेपत?
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.8।। तमस्तर्हि किंलक्षणं कथं वा पुरुषं निबध्नातीत्यपेक्षायां तस्य लक्षणं बन्धकत्वं चाह -- तमस्त्विति। तुशब्दो विसेषद्योतनार्थः। अज्ञानाज्जातमज्ञानजम्। यद्यपि त्रयाणामज्ञानजत्वं समानं तथापि तमसोऽज्ञानजत्वं विशेषणं तद्विपरीतस्वभावाऽनापत्तेः विद्धि विजानीहि। सर्वदेहिनां सर्वेषां देहवतां मोहनं हिताहितादिविवेकप्रतिबन्धकं कार्यान्तरासक्ततया चिकीर्षितस्य कर्तव्यस्याकरणं प्रमादः। यत्तु प्रमादो वस्तुविवेकासामर्थ्यमिति तदुपेक्ष्यम्। उक्तार्थस्य मोहनमित्यस्मिन्नन्तर्भावसंभवात्। निरीहतयोत्साहप्रतिबन्धकं त्वालस्यं। त्वापो निद्रा। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तत्तमो निबध्नाति निर्विकारमेवात्मानं विकारयतीत्यर्थः। त्वं तु भरतवंशोद्भवत्वात्तमःकर्तृकबन्धनायोग्योसीति सूचयन्संबोधयति -- भारतेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.8।।तुशब्दः सत्त्वरजोपेक्षया विशेषद्योतनार्थः। अज्ञानादावरणशक्तिरूपात्तदुद्भूतमज्ञानजं तमो विद्धि। अतः सर्वेषां देहिनां मोहनं अविवेकरूपत्वेन भ्रान्तिजनकं। प्रमादेनालस्येन निद्रया च तत्तमो निबध्नाति देहिनमित्यनुषज्यते। हे भारत? प्रमादो वस्तुविवेकासामर्थ्यं सत्त्वकार्यप्रकाशविरोधी? आलस्यं प्रवृत्त्यसामर्थ्यं रजःकार्यप्रवृत्तिविरोधि? उभयविरोधिनी तमोगुणालम्बना वृत्तिर्निद्रेति विवेकः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.8।।तमोगुणस्तु पूर्वाभ्यां विलक्षणः। अज्ञानं मायाया आवरणशक्तिस्तत उद्भूतं अज्ञानजं विद्धि। अतः सर्वेषां देहिनां मोहनं भ्रान्तिहेतुः। प्रमादोऽनवहितत्वं स च सत्त्वकार्यप्रकाशविरोधी। आलस्यं जडता तच्च रजःकार्यप्रवृत्तिविरोधि। उभयकार्यनिरोधिनी तमोगुणालम्बना वृत्तिर्निद्रा ताभिस्तत्तमो नितरां बध्नाति। हे भारत? देहिनमित्यनुवर्तते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.8।।तमसो लक्षणं सबन्धकमाह -- तमस्त्विति। तमः पूर्वोक्तभगवल्लीलाद्यज्ञानाज्जातं प्रलयात्मकत्वात् भगवद्विस्मारणात्मकं सर्वदेहिनां मोहनं भ्रमजनकं विद्धि। प्रमादालस्यनिद्राभिर्भगवत्सेवाप्रतिबन्धात्मकत्रयरूपाभिरन्यथाज्ञानेन तं बध्नाति। प्रमादो भगवदनवधानता। आलस्यं भगवत्सेवानुद्यमः। निद्रा चित्तस्थ ज्ञाननाशः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.8।। तमसो लक्षणं बन्धकत्वं चाह -- तम इति। तमस्तु अज्ञानाज्जातं आवरणशक्तिप्रधानात्प्रकृत्यंशादुद्भूतं विद्धीत्यर्थः। अतः सर्वेषां देहिनां मोहनं भ्रान्तिजनकं। अतएव प्रमादेनालस्येन निद्रया च तत्तमो देहिनं निबध्नाति। तत्र प्रमादोऽनवधानं? आलस्यमनुद्यमः? निद्रा चित्तस्यावसादो लयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.8।।तमसश्चाह -- तम इति। विरुद्धज्ञानजन्यं? अविद्याजन्यमिति वा।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.8।।और समस्त देहधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको? यानी जीवोंके अन्तःकरणमें मोह -- अविवेक उत्पन्न करनेवाले तम नामक तीसरे गुणको? तू अज्ञानसे उत्पन्न हुआ जान। हे भारत वह तमोगुण? ( जीवोंको ) प्रमाद? आलस्य और निद्राके द्वारा बाँधा करता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.8।। व्याख्या -- तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् -- सत्त्वगुण और रजोगुण -- इन दोनोंसे तमोगुणको अत्यन्त निकृष्ट बतानेके लिये यहाँ तु पदका प्रयोग हुआ है।यह तमोगुण अज्ञानसे अर्थात् बेसमझीसे? मूर्खतासे पैदा होता है और सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित कर देता है अर्थात् सत्असत्? कर्तव्यअकर्तव्यका ज्ञान (विवेक) नहीं होने देता। इतना ही नहीं? यह सांसारिक सुखभोग,और संग्रहमें भी नहीं लगने देता अर्थात् राजस सुखमें भी नहीं जाने देता? फिर सात्त्विक सुखकी तो बात ही क्या हैवास्तवमें तमोगुणके द्वारा मोहित होनेकी बात केवल मनुष्योंके लिये ही है क्योंकि दूसरे प्राणी तो स्वाभाविक ही तमोगुणसे मोहित हैं। फिर भी यहाँ सर्वदेहिनाम् पद देनेका तात्पर्य है कि जिन मनुष्योंमें सत्असत्? कर्तव्यअकर्तव्यका ज्ञान (विवेक) नहीं है? वे मनुष्य होते हुए भी चौरासी लाख योनियोंवाले प्राणियोंके समान ही हैं अर्थात् जैसे पशुपक्षी आदि प्राणी खापी लेते हैं और सो जाते हैं? ऐसे ही वे मनुष्य भी हैं।प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत -- यह तमोगुण प्रमाद? आलस्य और निद्राके द्वारा सम्पूर्ण देहधारियोंको बाँध देता है।प्रमाद दो तरहका होता है -- (1) करनेलायक कामको न करना अर्थात् जिस कामसे अपना और दुनियाका? अभी और परिणाममें हित होता है? ऐसे कर्तव्यकर्मोंको प्रमादके कारण न करना और (2) न करनेलायक कामको करना अर्थात् जिस कामसे अपना और दुनियाका अभी और परिणाममें अहित होता है? ऐसे कर्मोंको करना।न करनेलायक काम भी दो तरहके होते हैं -- 1 -- व्यर्थ खर्च करना अर्थात् बीड़ीसिगरेट? भाँगगाँजा आदि पीनेमें और नाटकसिनेमा? खेल आदि देखनेमें धन खर्च करना और 2 -- व्यर्थ क्रिया करना अर्थात् ताशचौपड़ खेलना? खेलकूद करना? बिना किसी कारणके पशुपक्षी आदिको कष्ट देना? तंग करना? बिना किसी स्वार्थके छोटेछोटे पेड़पौधोंको नष्ट कर देना आदि व्यर्थ क्रियाएँ करना।आलस्य भी दो प्रकारका होता है -- (1) सोते रहना? निकम्मे बैठे रहना? आवश्यक काम न करना और ऐसा विचार रखना कि फिर कर लेंगे? अभी तो बैठे हैं -- इस तरहका आलस्य मनुष्यको बाँधता है और (2) निद्राके पहले शरीर भारी हो जाना? वृत्तियोंका भारी हो जाना? समझनेकी शक्ति न रहना -- इस तरहका आलस्य दोषी नहीं है क्योंकि यह आलस्य आता है? मनुष्य करता नहीं।निद्रा भी दो तरहकी होती है -- (1) आवश्यक निद्रा -- जो निद्रा शरीरके स्वास्थ्यके लिये नियमितरूपसे ली जाती है और जिससे शरीरमें हलकापन आता है? वृत्तियाँ स्वच्छ होती हैं? बुद्धिको विश्राम मिलता है? ऐसी आवश्यक निद्रा त्याज्य और दोषी नहीं है। भगवान्ने भी ऐसी नियमित निद्रोको दोषी नहीं माना है? प्रत्युत योगसाधनमें सहायक माना है -- युक्तस्वप्नावबोधस्य (6। 17) और (2) अनावश्यक निद्रा -- जो निद्रा निद्राके लिये ली जाती है? जिससे बेहोशी ज्यादा आती है? नींदसे उठनेपर भी शरीर भारी रहती है? वृत्तियाँ भारी रहती हैं? पुरानी स्मृति नहीं होती? ऐसी अनावश्यक निद्रा त्याज्य और दोषी है। इस अनावश्यक निद्राको भगवान्ने भी त्याज्य बताया है -- न चाति स्वप्नशीलस्य (6। 16)।इस तरह तमोगुण प्रमाद? आलस्य और निद्राके द्वारा मनुष्यको बाँध देता है अर्थात् उसकी सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति नहीं होने देता।विशेष बातसत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण मनुष्यको बाँधते हैं? पर इन तीनोंके बाँधनेके प्रकारमें फरक है। सत्त्वगुण और रजोगुण सङ्गसे बाँधते हैं अर्थात् सत्त्वगुण सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे तथा रजोगुण कर्मोंकी आसक्तिसे बाँधता है। अतः सत्त्वगुणमें सुखसङ्ग और ज्ञानसङ्ग बताया तथा रजोगुणमें,कर्मसङ्ग बताया। परन्तु तमोगुणमें सङ्ग नहीं बताया क्योंकि तमोगुण मोहनात्मक है। इसमें,किसीका सङ्ग करनेकी जरूरत नहीं पड़ती। यह तो स्वरूपसे ही बाँधनेवाला है। तात्पर्य यह हुआ कि सत्त्वगुण और रजोगुण तो सङ्ग(सुखासक्ति) से बाँधते हैं? पर तमोगुण स्वरूपसे ही बाँधनेवाला है।अगर सुखकी आसक्ति न हो और ज्ञानका अभिमान न हो तो सुख और ज्ञान बाँधनेवाले नहीं होते? प्रत्युत गुणातीत करनेवाले होते हैं। ऐसे ही कर्म और कर्मफलमें आसक्ति न हो? तो वह कर्म परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करानेवाला होता है (गीता 3। 19)।उपर्युक्त तीनों गुण प्रकृतिके कार्य हैं और जीव स्वयं प्रकृति और उसके कार्य गुणोंसे सर्वथा रहित है। गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वह स्वयं निर्लिप्त? गुणातीत होता हुआ भी गुणोंके द्वारा बँध जाता है। अतः अपने वास्तविक स्वरूपका लक्ष्य रखनेसे ही साधक गुणोंके बन्धनसे छूट सकता है। सम्बन्ध -- बाँधनेसे पहले तीनों गुण क्या करते हैं -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.8।।तमस्तर्हि किंलक्षणं कथं वा पुरुषं निबध्नाति तत्राह -- तमस्त्विति। गुणानां प्रकृतिसंभवत्वाविशेषेऽपि तमसोऽज्ञानजत्वविशेषणं तद्विपरीतस्वभावानापत्तेरिति मत्वाह -- अज्ञानादिति। मुह्यत्यनेनेति मोहनं विवेकप्रतिबन्धकमिति कार्यद्वारा तमो निर्दिशति -- मोहनमित्यादिना। लक्षणमुक्त्वा तमसो बन्धनकरत्वं दर्शयति -- प्रमादेति। कार्यान्तरासक्ततया चिकीर्षितस्य कर्तव्यस्याकरणं प्रमादः? निरीहतयोत्साहप्रतिबन्धस्त्वालस्यं? स्वापो निद्रा ताभिरात्मानमविकारमेव तमोऽपि विकारयतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.8।।तमस्त्वज्ञानजं इत्यस्यअज्ञानाज्जातं (शं.) इत्यपव्याख्यां प्रत्याख्यातुमाह -- अज्ञानमिति। एतच्चअन्येष्वपि दृश्यते [अष्टा.3।2।101] इति दृशिग्रहणसामर्थ्याल्लभ्यते। कुतः प्रतीत एवार्थो न इत्यत आह -- प्रमादेति। वाक्यशेषेऽज्ञानस्य तमःकार्यत्ववचनादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.8।।अज्ञानं जायते यतस्तदज्ञानजम्।प्रमादमोहौ तमसः [14।17] इति वाक्यशेषात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.8।। --,तमः तृतीयः गुणः अज्ञानजम् अज्ञानात् जातम् अज्ञानजं विद्धि मोहनं मोहकरम् अविवेककरं सर्वदेहिनां सर्वेषां देहवताम्। प्रमादालस्यनिद्राभिः प्रमादश्च आलस्यं च निद्रा च प्रमादालस्यनिद्राः ताभिः प्रमादालस्यनिद्राभिः तत् तमः निबध्नाति भारत।।पुनः गुणानां व्यापारः संक्षेपतः उच्यते --,
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【 Verse 14.9 】
▸ Sanskrit Sloka: सत्वं सुखे सञ्जयति रज: कर्मणि भारत | ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे सञ्जयत्युत ||
▸ Transliteration: sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata | jñānamāvṛtya tu tamaḥ pramāde sañjayatyuta ||
▸ Glossary: sattvaṁ: mode of goodness; sukhe: in happiness; sañjayati: develops; rajaḥ: mode of passion; karmaṇi: fruits of activities; bhārata: O son of Bhārata; jñānam: knowledge; āvṛtya: covering; tu: but; tamaḥ: the mode of ignorance; pramāde: in madness; sañjayati: develops; uta: it is said
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.9 The mode of goodness conditions one to happiness, passion conditions him to fruits of action, and veiling the knowledge, tamas binds one to carelessness.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.9।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें भी लगाकर मनुष्यपर विजय करता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.9।। हे भारत सत्त्वगुण सुख में आसक्त कर देता है और रजोगुण कर्म में? किन्तु तमोगुण ज्ञान को आवृत्त करके जीव को प्रमाद से युक्त कर देता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.9 सत्त्वम् purity? सुखे to happiness? सञ्जयति attaches? रजः active force? कर्मणि to action? भारत O Bharata? ज्ञानम् knowledge? आवृत्य shrouding? तु verily? तमः inertia? प्रमादे to heedlessness? सञ्जयति attaches? उत but.Commentary Just as a dark cloud enshrouds the sun? so also Tamas envelops knowledge or the light of the Self. Tamas creates an attachment for heedlessness? that is? ignorance or forgetfulness of duty or the nonperformance of necessary (obligatory) duties.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.9. O descendant of Bharata ! The Sattva fully dominates [the Embodied] in the field of happiness; the Rajas in action; but the Tamas also totally dominates in the field of negligence, by veiling knowledge.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.9 Purity brings happiness, Passion commotion, and Ignorance, which obscures wisdom, leads to a life of failure.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.9 Sattva generates attachment to pleasure, Rajas to action, O Arjuna. But Tamas, veiling knowledge, generates attachment to negligence.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.9 O scion of the Bharata dynasty, sattva attaches one to happiness, rajas to action, while tamas, covering up knowledge, leads to inadvertence also.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.9 Sattva attaches to happiness, Rajas to action, O Arjuna, while Tamas verily shrouding knowledge attaches to heedlessness.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.9 See Comment under 14.10
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.9 Sattva mainly attaches one to pleasure. Rajas mainly attaches one to actions. But Tamas, veiling knowledge of true things and being the cause of false knowledge, mainly attaches one to actions which are contrary to those which ought to be done.
The Sattva and other alities evolve from the nature of Prakrti, developed into the form of the body. Owing to this fact that they have evolved out of the nature of Prakrti, they always co-exist in bodies at all time. How, then, can they cause effects which are mutually contrary? He replies:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.9 O scion of the Bharata dynasty, sattva, sanjayati, attaches one; sukhe, to happiness; rajas (-attaches is understood-) karmani, to action; tu, while; tamas, avrtya, covering up, veiling; jnanam, knowledge, the discrimination produced by sattva; sanjayati, leads pramade, to inadvertence; uta, also. Pramada means non-performance of a duty on hand. When do the alities produce the effects stated above? That is being answered:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.9।। प्रस्तुत श्लोक पूर्व के तीन श्लोकों का सारांश है। गीता गुरु शिष्य संवाद के रूप में होने से जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण सामान्य बुद्धि के अपने शिष्य अर्जुन के कल्याण के इच्छुक होने के कारण विवेचित विषय का ही संक्षेप में निर्दश करते हैं? जिन्हें पहले हम विस्तारपूर्वक देख चुके हैं।ये गुण उपर्युक्त कार्य कब करते हैं इस पर कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.9।।पुनः संक्षेपेण गुणानां व्यापारमाह -- सत्त्वमिति। सत्त्वं सुखे संजयति संश्लेषयति। रजः कर्मणि संजयतीत्यनुवर्तते। रजसा कर्मासक्तस्य भरतस्य वंशे समुद्भूतस्त्वं स्वकर्मण्यासक्तो न भवसीत्यतिचित्रमिति ध्वनन्नाह -- हे भारतेति। तमस्तु स्वेनावरणात्मना ज्ञानं सत्त्वकृतं विवेकमाच्छाद्य प्रमादे प्राप्तकर्तव्यताऽकरणे संजयति।
Chapter 14 (Part 5)
अप्यर्थादुतशब्दादालस्यादिकं गृह्यते। प्राप्तज्ञायमानताकस्याप्यज्ञानं प्रमाद इति तु ज्ञानमावृत्येत्यस्मिन्नन्ततर्भावमभिप्रतेयाचार्यैर्न व्याख्यातम्। तथाच सुखे साध्ये सत्त्वस्य कर्मणि साध्ये रजसः प्रमादादौ तमस उत्कर्ष इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.9।।उक्तानां मध्ये कस्मिन्कार्ये कस्य गुणस्योत्कर्ष इति तत्राह -- सत्त्वमुत्कृष्टं सत् सुखे संजयति दुःखकारणमभिभूय सुखे संश्लेषयति। सर्वदेहिनमित्यनुषज्यते। एवं रज उत्कृष्टं सत्सुखकारणमभिभूय कर्मणि? संजयतीत्यनुषज्यते। तमस्तु प्रमादबलेनोत्पद्यमानमपि सत्त्वकार्यं ज्ञानमावृत्य आच्छाद्य प्रमादे प्राप्तज्ञायमानताकस्याप्यज्ञाने संजयति। उत अपि प्राप्तकर्तव्यताकस्याप्यकरणे आलस्ये तामस्यां च निद्रायां संजयतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.9।।सत्त्वमुत्कृष्टं सत् सुखे दुःखकारणमभिभूय संजयति संश्लेषं जनयति। एवमुत्तरत्रापि। ज्ञानं प्रकाश आवृत्त्य प्रमादे अवश्यकर्तव्यस्याकरणे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.9।।एवं सत्त्वादीनां स्वरूपमुक्त्वा तेषां स्वकार्यकरणातिशयत्वमाह -- सत्त्वमिति। सत्त्वं सत्त्वगुणः सुखे भगवज्ज्ञानात्मके सञ्जयति संयोजयति। एवमेव रजः कर्मणि पूर्वोक्ते संयोजयति। तथा तमो भगवदीयसङ्गादिना जायमानं ज्ञानं निद्रालस्याद्यैरावृत्य प्रमादे अनवधानतायां संयोजयति। यद्वा सुख उत्पादिते सत्त्वं सञ्जयति सर्वोत्कर्षेण तिष्ठति? तथैव कर्मणि रजः? प्रमादे तमः।अत्रायं भावः -- भगवता त्रयोऽपि गुणा एतद्वैचित्र्यार्थमेवोत्पादितास्तेषां तत्कृतकार्यदर्शनेन सन्तुष्यति प्रभुस्तेनैव तदुत्कर्षः सिद्ध्यतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.9।।सत्त्वादीनामेवं स्वकार्यकरणे सामर्थ्यातिशयमाह -- सत्त्वमिति। सत्त्वं सुखे संजयति संश्लेषयति। दुःखशोकादिकारणे सत्यपि सुखाभिमुखमेव देहिनं करोतीत्यर्थः। एवं सुखादिकारणे सत्यपि रजः कर्मण्येव संजयति। तमस्तु महत्सङ्गेनोत्पद्यमानमपि ज्ञानमावृत्याच्छाद्य प्रमादे संजयति महद्भिरुपदिश्यमानस्यार्थस्यानवधाने योजयति। उत अपि आलस्यादावपि संयोजयतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.9।।सत्त्वादाना स्वभावमाह -- सत्त्वमिति। सुखादिसञ्जनस्वभावमित्यर्थः। एवमन्यदपि ज्ञेयं तत्र हेतुमाह -- ज्ञानमिति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.9।।फिर भी उन गुणोंका व्यापार संक्षेपसे बतलाया जाता है --, हे भारत सत्त्वगुण सुखमें नियुक्त करता है और रजोगुण कर्मोंमें नियुक्त किया करता है तथा तमोगुण? सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए विवेकज्ञानको? अपने आवरणात्मक स्वभावसे आच्छादित करके फिर प्रमादमें नियुक्त किया करता है। प्राप्त कर्तव्यको न करनेका नाम प्रमाद है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.9।। व्याख्या -- सत्त्वं सुखे सञ्जयति -- सत्त्वगुण साधकको सुखमें लगाकर अपनी विजय करता है? साधकको अपने वशमें करता है। तात्पर्य है कि जब सात्त्विक सुख आता है? तब साधककी उस सुखमें आसक्ति हो जाती है। सुखमें आसक्ति होनेसे वह सुख साधकको बाँध देता है अर्थात् उसके साधनको आगे नहीं बढ़ने देता? जिससे साधक सत्त्वगुणसे ऊँचा नहीं उठ सकता? गुणातीत नहीं हो सकता।यद्यपि भगवान्ने पहले छठे श्लोकमें सत्त्वगुणके द्वारा सुख और ज्ञानके सङ्गसे बाँधनेकी बात बतायी है? तथापि यहाँ सत्त्वगुणकी विजय केवल सुखमें ही बतायी है? ज्ञानमें नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि वास्तवमें साधक सुखकी आसक्तिसे ही बँधता है। ज्ञान होनेपर साधकमें एक अभिमान आ जाता है कि मैं कितना जानकार हूँ इस अभिमानमें भी एक सुख मिलता है? जिससे साधक बँध जाता है। इसलिये यहाँ सत्त्वगुणकी केवल सुखमें ही विजय बतायी है।रजः कर्मणि भारत -- रजोगुण मनुष्यको कर्ममें लगाकर अपनी विजय करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यको क्रिया करना अच्छा लगता है? प्रिय लगता है। जैसे छोटा बालक पड़ेपड़े हाथपैर हिलाता है तो उसको अच्छा लगता है और उसका हाथपैर हिलाना बंद कर दिया जाय तो वह रोने लगता है। ऐसे ही मनुष्य कोई क्रिया करता है तो उसको अच्छा लगता है और उसकी उस क्रियाको बीचमें कोई छुड़ा दे तो उसको बुरा लगता है। यही क्रियाके प्रति आसक्ति है? प्रियता है? जिससे रजोगुण मनुष्यपर विजय करता है।कर्मोंके फलमें तेरा अधिकार नहीं है (गीता 2। 47) आदि वचनोंसे फलमें आसक्ति न रखनेकी तरफ तो साधकका खयाल जाता है? पर कर्मोंमें आसक्ति न रखनेकी तरफ साधकका खयाल नहीं जाता। वह तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है कर्म न करनेमें तेरी आसक्ति न हो (गीता 2। 47)? जो योगारूढ़ होना चाहता है? उसके लिये निष्कामभावसे कर्म करना कारण है (गीता 6। 3) आदि वचनोंसे यही समझ लेता है कि कर्म तो करने ही चाहिये। अतः वह कर्म करता है? तो कर्मोंको करतेकरते उसकी उन कर्मोंमें आसक्ति? प्रियता हो जाती है? उनका आग्रह हो जाता है। इसकी तरफ खयाल करानेके लिये? सजग करानेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि रजोगुण कर्ममें लगाकर विजय करता है अर्थात् कर्मोंमें आसक्ति पैदा करके बाँध देता है। अतः साधककी कर्तव्यकर्म करनेमें तत्परता तो होनी चाहिये? पर कर्मोंमें आसक्ति? प्रियता? आग्रह कभी नहीं होना चाहिये -- न कर्मस्वनुषज्जते (गीता 6। 4)।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत -- जब तमोगुण आता है? तब वह सत्असत्? कर्तव्यअकर्तव्य? हितअहितके ज्ञान(विवेक) को ढक देता है? आच्छादित कर देता है अर्थात् उस ज्ञानको जाग्रत् नहीं होने देता। ज्ञानको ढककर वह मनुष्यको प्रमादमें लगा देता है अर्थात् कर्तव्यकर्मोंको करने नहीं देता और न,करनेयोग्य कर्मोंमें लगा देता है। यही उसका विजयी होना है।सत्त्वगुणसे ज्ञान (विवेक) और प्रकाश (स्वच्छता) -- ये दो वृत्तियाँ पैदा होती हैं। तमोगुण इन दोनों ही वृत्तियोंका विरोधी है? इसलिये वह ज्ञान(विवेक) को ढककर मनुष्यको प्रमादमें लगाता है और प्रकाश(इन्द्रियों और अन्तःकरणकी निर्मलता) को ढककर मनुष्यको आलस्य एवं निद्रामें लगाता है? जिससे ज्ञानकी बातें कहनेसुनने? पढ़नेपर भी समझमें नहीं आतीं। सम्बन्ध -- एकएक गुण मनुष्यपर कैसे विजय करता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.9।।उक्तानां मध्ये कस्मिन्कार्ये कस्य गुणस्योत्कर्षस्तत्राह -- पुनरिति। सुखे साध्ये विषये समुत्कृष्यते सत्त्वमित्याह -- सत्त्वमिति। संजयतीत्यस्यार्थमाह -- संश्लेषयतीति। कर्मणि साध्ये रजः समुत्कृष्यत इत्याह -- रज इति। प्रमादे प्राधान्यं तमसो दर्शयति -- ज्ञानमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.9।।सत्त्वमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.9।।सत्त्वमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.9।। --,सत्त्वं सुखे सञ्जयति संश्लेषयति? रजः कर्मणि हे भारत सञ्जयति इति अनुवर्तते। ज्ञानं सत्त्वकृतं विवेकम् आवृत्य आच्छाद्य तु तमः स्वेन आवरणात्मना प्रमादे सञ्जयति उत प्रमादः नाम प्राप्तकर्तव्याकरणम्।।उक्तं कार्यं कदा कुर्वन्ति गुणा इति उच्यते --,
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【 Verse 14.10 】
▸ Sanskrit Sloka: रजस्तमश्चाभिभूय सत्वं भवति भारत | रज: सत्वं तमश्चैव तम: सत्वं रजस्तथा ||
▸ Transliteration: rajas tamaś cābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata | rajaḥ sattvaṁ tamaścaiva tamaḥ sattvaṁ rajastathā ||
▸ Glossary: rajaḥ: mode of passion; tamaḥ: mode of ignorance; ca: also; abhibhūya: also surpassing; sattvaṁ: mode of goodness; bhavati: becomes prominent; bhārata: O son of Bhārata; rajaḥ: mode of passion; sattvaṁ: mode of goodness; tamaḥ: mode of ignorance; ca: also; eva: like that; tamaḥ: mode of ignorance; sattvaṁ: mode of goodness; rajaḥ: mode of passion; tathā: as in this
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.10 Sometimes the mode of passion becomes prominent, de- feating the mode of goodness, O son of Bhārata. And sometimes the mode of goodness defeats passion, and at other times the mode of ignorance defeats goodness and passion. In this way there is always competition for supremacy.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.10।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण? सत्त्वगुण और तमोगुणको दबाकर रजोगुण? वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.10।। हे भारत कभी रज और तम को अभिभूत (दबा) करके सत्त्वगुण की वृद्धि होती है? कभी रज और सत्त्व को दबाकर तमोगुण की वृद्धि होती है? तो कभी तम और सत्त्व को अभिभूत कर रजोगुण की वृद्धि होती है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.10 रजः Rajas? तमः inertia? च and? अभिभूय having overpowered? सत्त्वम् Sattva? भवति arises? भारत O Arjuna? रजः Rajas? सत्त्वम् Sattva? तमः inertia? च and? एव even? तमः inertia? सत्त्वम् purity? रजः active force? तथा also.Commentary Just as winter has its sway when summer and autumn have gone? just as sleep has its sway when a man is neither dreaming nor waking? so also Sattva has its sway when Rajas and Tamas are suppressed and makes people say that they are happy. The Sadhana for increasing Sattva is given in the 17th and 18th chapters.Each ality acts in its own turn at different times. All the three alities cannot operate at one and the same time. When one ality asserts itself or prdominates by overpowering or suppressing the other two? it produces its own effect. Sattva produces knowledge and happiness Rajas action Tamas veiling of knowledge? inertia? error? indolence? sloth and sleep. When Sattva is in the ascendant in a man? he is endowed with discrimination. Sublime thoughts roll in his mind. He has pure understanding. His mind turns away from sensual pleasures and moves inward towards the Self.What is the characteristic mark by which you can know that a particular ality is predominant or is in the ascendant The answer is given in the following three verses.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.10. O descendant of Bharata ! The Sattva increases by overpowering the Rajas and the Tamas; the Rajas [increases by overpowering] the Sattva and the Tamas; and the Tamas does likewise [by overpowering] the Sattva and the Rajas.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.10 O Prince! Purity prevails when Passion and Ignorance are overcome; Passion, when Purity and Ignorance are overcome; and Ignorance when it overcomes Purity and Passion.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.10 Prevailing over Rajas and Tamas, Sattva preponderates, O Arjuna. Prevailing over Tamas and Sattva, Rajas preponderates. Prevailing over Rajas and Sattva, Tamas preponderates.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.10 O scion of the Bharata dynasty, sattva increases by subduing rajas and tamas, rajas by overpowering sattva and tamas, and tamas by dominating over sattva and rajas.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.10 Now Sattva arises (prevails), O Arjuna, having overpowered Rajas and Tamas; nor Rajas, having overpowered Sattva and Tamas; and now Tamas, having overpowered Sattva and Rajas.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.9-10 Sattvam etc. Rajah etc. Dominates fully i.e. sets [to work]. The Sattva flourishes by overpowering the Rajas and the Tamas. But, the Rajas [flourishes by overpowering] both the Sattva and the Tamas; and the Tamas [does so by overpowering] both the Sattva and the Rajas. That has been stated :
'The Strands augment by overpowering each other'.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.10 Even though all the three Gunas of Sattva etc., are associated with the nature of the self conjoined with Prakrti in the form of body, yet owing to the dominance of previous Karmas and the differences in the food nourishing the body, Sattva etc., preponderate or are subdued by turn. Sometimes Sattva preponderates prevailing over Rajas and Tamas; sometimes Rajas preponderates prevailing over Tamas and Sattva, and sometimes Tamas preponderates prevailing over Rajas and Sattva.
He teaches that this changing preponderance of the Gunas can be inferred from the knowledge of the effects produced by them.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.10 O scion of the Bharata dynasty, sattva bhavati, increases, comes into being; abhibhuya, by subduing both rajas and tamas. When sattva increases, then, coming to its own, it produces its own effects-knowledge, happiness, etc. Similarly, when the ality of rajas increases by overpowering both sattva and tamas, then it produces its own effects-activity and hankering. When the ality called tamas increases by similarly dominating over sattva and rajas, it then produces its own effects-obscuring of knowledge, etc. When any ality preponderates, then what is its indication? This is being answered:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.10।। पूर्वोक्त विवेचन के सन्दर्भ में एक बुद्धिमान् साधक की यह जिज्ञासा होगी कि क्या ये तीन गुण अपना कार्य भिन्नभिन्न समय पर किसी क्रम विशेष में अथवा एक ही समय में सब कार्य करते हैं। यदि एक ही साथ तीनों कार्य करते हैं? तो क्या इनमें सामंजस्य होता है या विरोध इस प्रकार के प्रश्न का पूर्वानुमान करके भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिव्यगान के इस श्लोक में इसका उत्तर देते हैं। वे वर्णन करते हैं कि किस प्रकार ये गुण भिन्नभिन्न समय पर कार्य करते हैं। प्रत्येक गुण उस क्षणविशेष तक प्रमुख और शक्तिशाली बन जाता है।विचारपूर्वक अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि समयसमय पर किसी एक गुण की अधिकता से प्रभावित होकर मनुष्य कार्य कर रहा होता है। उस दशा में अन्य दो गुणों का सर्वथा अभाव नहीं होता? किन्तु उनका महत्व गौण हो जाता है। जब हम कहते हैं कि कोई पुरुष सत्त्वगुण के प्रभाव में है? तब उसका अर्थ यह होता है कि उस समय उसमें रजोगुण और तमोगुण इतने अधिक प्रबल नहीं होते कि वे अपने प्रभाव को व्यक्त कर सकें। यही बात अन्य गुणों के विषय में भी समझनी चाहिये।वर्धमान गुण के लक्षण को हम किस प्रकार पहचान सकते हैं भगवान् बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.10।।इतराविरोधेन सत्त्वादयो गुणा युगपदुत्कृष्यन्ते विरोधेन वा क्रमेण वेत्यपेक्षायां सत्त्वोत्कर्षार्थिनामितराबिभवार्थं क्रमपक्षमाश्रित्याह -- रज इति। रजस्तमश्चोभावप्यभिमूय तिरोधाय सत्त्वं भवत्युत्भवति वर्धते यदा तदा रजस्तमसोस्तिरोधानदशायां लब्धात्मकं सत्त्वं स्वं कार्यं ज्ञानसुखाद्यारभत इति शेषः। भारतेति संबोधयन् भायां ब्रह्मविद्यायां रतेन रजस्तमसोस्तिरोधायिका सत्त्ववृद्धिः संपाद्येति द्योतयति। तथा रजोगुणो यदा सत्त्वं तमश्चैवोभावभिभूय वर्धते तदा कर्म तृष्णादि स्वं कार्यमारभते। एवं तमआख्योऽपि गुणो यदा सत्त्वं रजश्चैवोभावभिभूय वर्धते तदा ज्ञानावरणप्रमादादि स्वं कार्यभारभत इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.10।।उक्तं कार्यं कदा कुर्वन्ति गुणा इत्युच्यते -- रजस्तमश्च युगपदुभावपि गुणावभिभूय सत्त्वं भवत्युद्भवति वर्धते यदा तदा स्वकार्यं प्रागुक्तमसाधारण्येन करोतीति शेषः। एवं रजोऽपि सत्त्वं तमश्चेति गुणद्वयमभिभूयोद्भवति यदा तदा स्वकार्यं प्रागुक्तं करोति। तथा तद्वदेव तमोऽपि सत्त्वं रजश्चेत्युभावपि गुणावभिभूय उद्भवति यदा तदा स्वकार्यं प्रागुक्तं करोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.10।।सत्त्वादयः कदा स्वस्वकार्ये प्रभवन्तीत्याशङ्क्येतरेतरयोरभिभवे सतीत्याह -- रज इति। रजस्तमसी अभिभूय सत्त्वं भवति वर्धते। एवं रजोपि सत्वतमसी अभिभूय भवति। तथा तमोऽपि सत्त्वरजसी अभिभूय भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.10।।ननु सुखदुःखाद्यदृष्टसाधनत्वे सति स्वकार्यकरणमन्यथाभावकत्वं कथं इत्याशङ्क्य तेषां तथा सामर्थ्यं मया दत्तमस्तीति ज्ञापनाय सिद्धवत्कारेणानुवदति -- रजस्तम इति। रजस्तमः दुःखाज्ञानात्मकगुणद्वयमभिभूय तिरस्कृत्य सत्त्वं भवतीत्यर्थः। भारत इतिसम्बोधनेन यथा मदिच्छया सर्वपराभवेन त्वं जयसि तथेत्यर्थो द्योतितः। एवं रजोऽपि सत्त्वं तमश्चेति गुणद्वयाभिभवेन भवति। एवकारेण तमसो मोहकसामर्थ्याधिक्येऽपि तथाकर्तृत्वं व्यज्यते। तथा तमः सत्त्वं रजश्चाभिभूय भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.10।।तत्र हेतुमाह -- रज इति। रजस्तमश्चेति गुणद्वयमभिभूय तिरस्कृत्य सत्त्वं भवत्यदृष्टवशादुद्भवति। ततः,स्वकार्ये सुखज्ञानादौ संयोजयतीत्यर्थः। एवं रजोऽपि सत्त्वं तमश्चेति गुणद्वयमभिभूयोद्भवति। ततः स्वकार्ये तृष्णाकर्मादौ संयोजयति। एवं तमोऽपि सत्त्वं रजश्चाभिभूयोद्भवति। ततश्च स्वकार्ये प्रमादालस्यादौ संयोजयतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.10।।रजस्तमश्चेति। गुणद्वयमभिभूय सत्त्वं भवत्यदृष्चवशात्। एवमन्यदपि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.10।।ये तीनों गुण उपर्युक्त कार्य कब करते हैं सो कहते हैं --, हे भारत रजोगुण और तमोगुण -- इन दोनोंको दबाकर जब सत्त्वगुण उन्नत होता है -- बढ़ता है? तब वह अपने स्वरूपको प्राप्त हुआ सत्त्वगुण अपने कार्यज्ञान और सुखादिका आरम्भ किया करता है। तथा सत्त्वगुण और तमोगुण -- इन दोनोंको ही दबाकर जब रजोगुण बढ़ता है तब वह कर्मोंमें तृष्णा आदि अपने कार्यका आरम्भ किया करता है। वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण इन दोनोंको दबाकर जब तम नामक गुण बढ़ता है तब वह ज्ञानको आच्छादित करना आदि अपना कार्य आरम्भ किया करता है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.10।। व्याख्या -- रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत -- रजोगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है अर्थात् रजोगुणकी लोभ? प्रवृत्ति? नयेनये कर्मोंका आरम्भ? अशान्ति? स्पृहा? सांसारिक भोग और संग्रहमें प्रियता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद? आलस्य? अनावश्यक निद्रा? मूढ़ता आदि वृत्तियाँ -- इन सबको सत्त्वगुण दबा देता है और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता? वैराग्य? निःस्पृहता? उदारता? निवृत्ति आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।रजः सत्त्वं तमश्चैव -- सत्त्वगुणकी और तमोगुणकी वृत्तियोंको दबाकर रजोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी ज्ञान? प्रकाश? वैराग्य? उदारता आदि वृत्तियाँ और तमोगुणकी प्रमाद? आलस्य? अनावश्यक? निद्रा? मूढ़ता आदि वृत्तियाँ -- इन सबको रजोगुण दबा देता है और अन्तःकरणमें लोभ? प्रवृत्ति? आरम्भ? अशान्ति? स्पृहा आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।तमः सत्त्वं रजस्तथा -- वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है अर्थात् सत्त्वगुणकी स्वच्छता? निर्मलता? प्रकाश? उदारता आदि वृत्तियाँ और रजोगुणकी चञ्चलता? अशान्ति? लोभ आदि वृत्तियाँ -- इन सबको तमोगुण दबा देता है और अन्तःकरणमें प्रमाद? आलस्य? अतिनिद्रा? मूढ़ता आदि वृत्तियोंको उत्पन्न कर देता है।दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है? बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है और विजय करके मनुष्यको बाँध देता है। परन्तु भगवान्ने यहाँ (छठेसे दसवें श्लोकतक) उलटा क्रम दिया है अर्थात् पहले बाँधनेकी बात कही? फिर विजय करना कहा और फिर दो गुणोंको दबाकर एकका बढ़ना कहा। ऐसे क्रम देनेका तात्पर्य है -- पहले भगवान्ने दूसरे श्लोकमें बताया कि जिन महापुरुषोंका प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद हो चुका है? वे महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते। कारण कि महासर्ग और महाप्रलय दोनों प्रकृतिके सम्बन्धसे ही होते हैं। परन्तु जो मनुष्य प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जो़ड़ लेते हैं? उनको प्रकृतिजन्य गुण बाँध देते हैं (14। 5)। इसपर स्वाभाविक ही यह प्रश्न होता है कि उन गुणोंका स्वरूप क्या है और वे मनुष्यको किस प्रकार बाँध देते हैं इसके उत्तरमें भगवान्ने छठेसे आठवें श्लोकतक क्रमशः सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंका स्वरूप और उनके द्वारा जीवको बाँधे जानेका प्रकार बताया। इसपर प्रश्न होता है कि बाँधनेसे पहले तीनों गुण क्या करते हैं इसके उत्तरमें भगवान्ने बताया कि बाँधनेसे पहले बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है? तब उसको बाँधता है (14। 9)। अब प्रश्न होता है कि गुण मनुष्यपर विजय कैसे करता है इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि दो गुणोंको दबाकर एक गुण मनुष्यपर विजय करता है (14। 10)। इस प्रकार विचार करनेसे मालूम होता है कि भगवान्ने छठेसे दसवें श्लोकतक जो क्रम रखा है? वह ठीक ही है। सम्बन्ध -- जब दोगुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है? तब उस बढ़े हुए गुणके क्या लक्षण होते हैं -- इसको बतानेके लिये पहले बढ़े हुए सत्त्वगुणके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.10।।इतरेतराविरोधेन वा सत्त्वादयो गुणा युगपदुत्कृष्यते विरोधेन वा क्रमेण वेति संदेहात्पृच्छति -- उक्तमिति। सत्त्वोत्कर्षार्थिनामितराभिभवार्थं क्रमपक्षमाश्रित्योत्तरमाह -- उच्यत इति। सत्त्वाभिवृद्धिमेव विवृणोति -- तदेति। रजस्तमसोस्तिरोधानदशायामिति यावत्। रजसो वृद्धिप्रकारं तत्कार्यं च कथयति -- तथेति। तमसोऽपि विवृद्धिं तत्कार्यं च निर्दिशति -- तम इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.10।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.10।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.10।। --,रजः तमश्च उभावपि अभिभूय सत्त्वं भवति उद्भवति वर्धते यदा? तदा लब्धात्मकं सत्त्वं स्वकार्यं ज्ञानसुखादि आरभते हे भारत। तथा रजोगुणः सत्त्वं तमश्च एव उभावपि अभिभूय वर्धते यदा? तदा कर्म तृष्णादि स्वकार्यम् आरभते। तम आख्यो गुणः सत्त्वं रजश्च उभावपि अभिभूय तथैव वर्धते यदा? तदा ज्ञानावरणादि स्वकार्यम् आरभते।।यदा यो गुणः उद्भूतः भवति? तदा तस्य किं लिङ्गमिति उच्यते --,
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【 Verse 14.11 】
▸ Sanskrit Sloka: सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते | ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्वमित्युत ||
▸ Transliteration: sarvadvāreṣu dehesmin prakāśa upajāyate | jñanaṁ yadā tadā vidyād vivṛddhaṁ sattvamityuta ||
▸ Glossary: sarvadvāreṣu: all the gates; dehe ‘smin: in this body; prakāśaḥ: quality of illumines; upajāyate: develops; jñanaṁ: knowledge; yadā: when; tadā: at that time; vidyāt: must know; vivṛddhaṁ: increased; sattvam: the mode of good- ness; iti: thus; uta: said
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.11 When the light of Self-knowledge illumines all the senses (or gates) in the body, then it should be known that goodness is predominant.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.11।।जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारों(इन्द्रियों और अन्तःकरण) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है? तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.11।। जब इस देह के द्वारों अर्थात् समस्त इन्द्रियों में ज्ञानरूप प्रकाश उत्पन्न होता है? तब सत्त्वगुण को प्रवृद्ध हुआ जानो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.11 सर्वद्वारेषु through every gate (sense)? देहे in the body? अस्मिन् in this? प्रकाशः wisdomlight? उपजायते shines? ज्ञानम् knowledge? यदा when? तदा then? विद्यात् (it) may be known? विवृद्धम् (is) predominant? सत्त्वम्,Sattva? इति thus? उत indeed.Commentary When a particular ality becomes predominant? it reveals its distinctive characteristics in man. Just as jasmine scatters its fragrance far and wide? so also knowledge disseminates itself in all directions. Convert Tamas into Rajas and Rajas into Sattva. Now stand firm in Sattva. You will get increase of light? purity? peace and harmony. Sattva will lead you upwards. You will have an upward pull towards the Supreme Light. Sattvic diet? Japa? meditation? study of holy scriptures? living in seclusion? company of holy men? singing His Names and glories? and regulation of breath (Pranayama) will increase Sattva.Introspect. Look within. Watch the Gunas carefully. Be vigilant. Stand as a doorkeeper. Allow only Sattvic thoughts to pass through the door of the mental factory. Check Rajas. Curb Tamas. When Sattva predominates there is unruffled peace of mind? inner harmony? perfect serenity and tranillity. There is clarity or clear vision also. The understanding is not clouded. There is penetrative insight. The door or threshold of intuition is wide open. The senses will not run towards external objects.The senses are the avenues of senseknowledge. They are the gateways of perception for the Self. When light shines in all the gates of the body? such as the eyes? the ears? etc. (in other words when there is the manifestation of the BuddhiVritti of the Antahkarana)? then knowledge arises. You can understand by the mark of knowledge that Sattva is predominant. You can also know that Sattva is increasing by the mark of happiness. Just as the aspirant knows that Sattva is predominant in him by the marks of knowledge and happiness? so also he knows by the mark of knowledge that Rajas and Tamas are gradually decreasing.The ears shun whatever is improper to be heard. The eyes abandon what they should not look at. The tongue avoids to speak anything that is not right to speak of. The mind is not attracted by the sensual objects. Purity thus increases gradually by Japa? meditation? and selfrestraint. If there is increase of Sattva or harmony? there is also increase of knowledge. Sattva is the only sure means for the attainment of the knowledge of the Self. It lays the foundation of knowledge.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.11. When the knowledge-light arises in all the gates in this body, then one should also know that the Sattva has increased predominantly.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.11 When the light of knowledge gleams forth from all the gates of the body, then be sure that Purity prevails.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.11 When knowledge as light illumines from all gateways (i.e., the senses), then, one should know that Sattva prevails.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.11 When the illumination that is knowledge radiates in this body through all the doors (of the senses), then one should know that sattva has increased greatly.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.11 When through every gate (sense) in this body, the wisdom-light shines, then it may be known that Sattva is predominant.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.11 See Comment under 14.13
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.11 When the light of knowledge shines revealing the truth of things emerging through all the gateways of knowledge such as the eyes etc., in the body, one should know that Sattva is prevailing.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.11 Yada, when; prakasah, the illumination-prakasa, illumination, is a function of the internal organ, intelligence; that itself is jnanam, knowledge; when this illumination called knowledge upajayate, radiates; asmin, in this; dehe, body; sarva-dvaresu, through all the doors-all the sense organs, (viz) ear etc., are the Self's doors of perception; through all those doors; tada, then; through this indication, viz the illumination that is knowledge, vidyat, one should know; iti, that; sattva has vivrddham, increased; uta, greatly [See A.G.-Tr.]. This is the characteristics of rajas when it has become prominent:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.11।। सर्वप्रथम? सत्त्वगुण की प्रवृद्धि होने पर उत्पन्न होने वाले लक्षणों का बोध यहाँ कराया गया है। इसके अगले दो श्लोकों में क्रमश रज और तम की विवृद्ध स्थिति का वर्णन किया गया है।जब इस देह के समस्त द्वारों मे प्रकाश उत्पन्न होता है हमें बाह्य जगत् का ज्ञान पंच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा होता है। स्थूल शरीर में इन इन्द्रियों के निवास स्थानों को गोलक कहते हैं। इन इन्द्रियों के माध्यम से चैतन्य का प्रकाश? मानों? बाहर जाकर जगत् की विविध वस्तुओं को प्रकाशित करता है। इस प्रकार हम अपनी श्रोत्र नेत्रादि इन्द्रियों के द्वारा शब्दरूपादि विषयों को प्रकाशित करते हैं? अर्थात् उनका बोध प्राप्त करते हैं।इस प्रकार? शीर्ष भाग में स्थित सात गोलकों में से ज्ञानाग्नि (आत्मा) की सात ज्वालायें फूटकर बाहर निकलती हैं प्रत्येक ज्वाला एक ही वस्तु विशेष को प्रकाशित करती है। जब इस स्थिति में हमें वस्तुओं का यथार्थ बोध होता है तो सत्त्वगुण को प्रवृद्ध हुआ समझना चाहिये। यदि उस समय रज और तम बढ़ते हैं? तो हमारा यथार्थ विषय ग्रहण अवरुद्ध हो जाता है।यदि रजोगुण से मन क्षुब्ध हो और तमोगुण से बुद्धि आच्छादित हो गई हो? तो हमें सामान्य लौकिक ज्ञान भी प्राप्त करना कठिन हो जाता है। अत इन दो गुणों की मात्रा जितनी कम होगी? हमारी निरीक्षण? विश्लेषण और समझने की बौद्धिक क्षमता उतनी ही अधिक होगी।यह पूर्व में भी बताया जा चुका है कि चैतन्यस्वरूप आत्मा बुद्धि के माध्यम पर प्रतिबिम्बित होकर बुद्धि के प्रकाश द्वारा जगत् की वस्तुओं तथा आन्तरिक मनोवृत्तियों को प्रकाशित करता है। वह सीधे ही उन्हें प्रकाशित नहीं करता। सूर्य का प्रकाश भी दीवारों पर परावर्तित होकर ही कमरे को प्रकाशित करता है।यह सुविदित तथ्य है कि परावर्तन के माध्यम के स्वच्छ और स्थित होने पर प्रतिबिम्ब स्पष्ट होता है? अन्यथा नहीं। रजोगुणजन्य विक्षेपों से बुद्धि मे अस्थिरता आती है तो तमोगुणजन्य आवरण से अशुद्धि। अत इन दोनों का आधिक्य होने पर बुद्धि का प्रकाश मन्द पड़ना स्वाभाविक ही है। इसलिए? भगवान् का यह कथन शुद्ध वैज्ञानिक है कि वस्तुओं के यथार्थ ज्ञान होने के समय अन्तकरण में सत्त्वगुण प्रवृद्ध होता है।प्रवृद्ध रजोगुण का लक्षण निम्न प्रकार से है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.11।।यदा यो गुण उद्भूतो भवति तदा तस्य किं लिङ्गिमित्यागाङ्क्षायामाह -- सर्वद्वारेष्वति। सर्वाण्यात्मन उपलब्धिद्वाराणि श्रोत्रादीनि करणानि सर्वद्वाराणि तेषु निमित्तभूतेषु अस्मिन्देहेऽन्तःकरणस्य बुद्धेर्वृत्तिः प्रकाशस्तदेव ज्ञानं यदैवं प्रकाशः शब्दादिविषयज्ञानाख्य उपजायते तदा ज्ञानप्रखाशलिङ्गेन सत्त्वं विवृद्धं उद्भूतं विद्याद्विजानीयात्। अप्यर्थक उतशब्दः सुखादिलिङ्गसमुच्चायार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.11।।इदानीमुद्भूतानां तेषां लिङ्गान्याह त्रिभिः -- अस्मिन्नात्मनो भोगायतने देहे सर्वेष्वपि द्वारेषूपलब्धिसाधनेषु श्रोत्रादिकरणेषु यदा प्रकाशः बुद्धिपरिणामविशेषो विषयाकारः स्वविषयावरणविरोधी दीपवत्? तदेव ज्ञानं शब्दादिविषय उपजायते तदाऽनेन शब्दादिविषयज्ञानाख्यप्रकाशेन लिङ्गेन प्रकाशात्मकं सत्त्वं विवृद्धमुद्भूतमिति विद्याज्जानीयात् उत अपि सुखादिलिङ्गेनापि जानीयादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.11।।तत्तद्गुणोद्भवलिङ्गान्याह त्रिभिः -- सर्वेति। अस्मिन्देहे यदा सर्वेषु द्वारेषु बाह्याभ्यन्तरविषयोपलब्धिसाधनेषु बाह्याभ्यन्तरकरणेषु। प्रकाशः स्वस्वविषयावरणविरोधी परिणामविशेषो जायते तेनच ज्ञानं शब्दादिविषयस्य याथात्म्येन प्रकाशो यदा जायते तदा सत्त्वं विवृद्धमिति विद्याज्जानीयात्। उत अपि सुखादिलिङ्गेनापि जानीयादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.11।।ननु तदभिभवेन तत्तदुत्पत्तिः कथं न ज्ञातव्या इत्यत आह -- सर्वद्वारेष्विति। अस्मिन् देहे साधनात्मके सर्वद्वारेषु श्रोत्रादिषु यदा भगवत्सम्बन्धित्वेन प्रकाशो दर्शनमुपजायते? अथवा ज्ञानं? तदा सत्त्वं विवृद्धं विशेषेण भगवत्सम्बन्धित्वेन विवृद्धं विद्यात्।अयमर्थः -- श्रोत्रद्वारेण भगवत्कथाश्रवणात्मकः? वचनद्वारेण च कीर्तनात्मकः? प्रसादग्रहणात्मकः? नासाद्वारेण च गन्धादिग्रहणम्। एवं सर्वत्रेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.11।।इदानीं सत्त्वादीनां वृद्धानां लिङ्गान्याह त्रिभिः -- सर्वद्वारेष्विति। अस्मिन्नात्मनो भोगायतने देहे सर्वेष्वपि द्वारेषु श्रोत्रादिषु यदा शब्दादिज्ञानात्मकः प्रकाश उपजायते उत्पद्यते तदा अनेन प्रकाशलिङ्गेन सत्त्वं विवृद्धं विद्याज्जानीयत्। उतशब्दात्सुखादिलिङ्गेनापि जानीयादित्युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.11।।एतच्च कार्योपलब्ध्यै वाऽवगच्छेदित्याह -- सर्वद्वारेष्विति। श्रोत्रादिषु अस्मिन् भोगायतने शब्दादिज्ञानात्मकः प्रकाश उपपद्यते? ज्ञानं च सुखं तदा सत्त्वं विवृद्धमिति जानीयात्। उतशब्दश्चार्थे लिङ्गेनेह विजानीयादित्युक्तम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.11।।जिस समय जो गुण बढ़ा हुआ रहता है? उस समय उसके क्या चिह्न होते हैं? सो बतलाते हैं --, जब इस शरीरके समस्त द्वारोंमें यानी आत्माकी उपलब्धिके द्वारभूत जो श्रोत्रादि सब इन्द्रियाँ हैं उनमें? प्रकाश उत्पन्न हो -- अन्तःकरण यानी बुद्धिकी वृत्तिका नाम प्रकाश है और यही ज्ञान है। यह ज्ञान नामक प्रकाश जब शरीरके समस्त द्वारोंमें उत्पन्न हो -- तब इस ज्ञानके प्रकाशरूप चिह्नसे ही समझना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.11।। व्याख्या -- सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् ৷৷. ज्ञानं यदा -- जिस समय रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंको दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है? उस समय सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता प्रकट हो जाती है। जैसे सूर्यके प्रकाशमें सब वस्तुएँ साफसाफ दीखती हैं? ऐसे ही स्वच्छ बहिःकरण और अन्तःकरणसे शब्दादि पाँचों विषयोंका यथार्थरूपसे ज्ञान होता है। मनसे किसी भी विषयका ठीकठीक मननचिन्तन होता है।इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता होनेसे सत् क्या है और असत् क्या है कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है लाभ किसमें है और हानि किसमें है हित किसमें है और अहित किसमें है आदि बातोंका स्पष्टतया ज्ञान (विवेक) हो जाता है।यहाँ देहेऽस्मिन् कहनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणके बढ़नेका अर्थात् बहिःकरण और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता और विवेकशक्ति प्रकट होनेका अवसर इस मनुष्यशरीरमें ही है? अन्य शरीरोंमें नहीं। भगवान्ने तमोगुणसे बँधनेवालोंके लिये सर्वदेहिनाम् (14। 8) पदका प्रयोग किया है? जिसका तात्पर्य है कि रजोगुणतमोगुण तो अन्य शरीरोंमें भी बढ़ते हैं? पर सत्त्वगुण मनुष्यशरीरमें ही बढ़ सकता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह रजोगुण और तमोगुणपर विजय प्राप्त करके सत्त्वगुणसे भी ऊँचा उठे। इसीमें मनुष्यजीवनकी सफलता है। भगवान्ने कृपापूर्वक मनुष्यशरीर देकर इन तीनों गुणोंपर विजय प्राप्त करनेका पूरा अवसर? अधिकार? योग्यता? सामर्थ्य? स्वतन्त्रता दी है।तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत -- इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता और विवेकशक्ति आनेपर साधकको यह जानना चाहिये कि अभी सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ बढ़ी हुई हैं और रजोगुणतमोगुणकी वृत्तियाँ दबी हुई हैं। अतः साधक कभी भी अपनेमें यह अभिमान न करे कि मैं जानकार हो गया हूँ? ज्ञानी हो गया हूँ अर्थात् वह सत्त्वगुणके कार्य प्रकाश और ज्ञानको अपना गुण न माने? प्रत्युत सत्त्वगुणका ही कार्य? लक्षण माने।यहाँ इति विद्यात् पदोंका तात्पर्य है कि तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका पैदा होना? बढ़ना और एक गुणकी प्रधानता होनेपर दूसरे दो गुणोंका दबना आदिआदि परिवर्तन गुणोंमें ही होते हैं? स्वरूपमें नहीं -- इस बातको मनुष्यशरीरमें ही ठीक तरहसे समझा जा सकता है। परन्तु मनुष्य भगवान्के दिये विवेकको महत्त्व न देकर गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है और अपनेको सात्त्विक? राजस या तामस मानने लगता है। मनुष्यको चाहिये कि अपनेको ऐसा न मानकर सर्वथा निर्विकार? अपरिवर्तनशील जाने।तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ अलगअलग बनतीबिगड़ती हैं -- इसका सबको अनुभव है। स्वयं परिवर्तनरहित और इन सब वृत्तियोंको देखनेवाला है। यदि स्वयं भी बदलनेवाला होता तो इन वृत्तियोंके बननेबिगड़नेको कौन देखता परिवर्तनको परिवर्तनरहित ही जान सकता है।जब सात्त्विक वृत्तियोंके बढ़नेसे इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता आ जाती है और विवेक जाग्रत् हो जाता है? तब संसारसे राग हट जाता है और वैराग्य हो जाता है। अशान्ति मिट जाती है और शान्ति आ जाती है। लोभ मिट जाता है और उदारता आ जाती है। प्रवृत्ति निष्कामभावपूर्वक होने लगती है (गीता 18। 9)। भोग और संग्रहके लिये नयेनये कर्मोंका आरम्भ नहीं होता। मनमें पदार्थों? भोगोंकी आवश्यकता पैदा नहीं होती? प्रत्युत निर्वाहमात्रकी दृष्टि रहती है। हरेक विषयको समझनेके लिये बुद्धिका विकास होता है। हरेक कार्य सावधानीपूर्वक और सुचारुरूपसे होता है। कार्योंमें भूल कम होती है। कभी भूल हो भी जाती है तो उसका सुधार होता है? लापरवाही नहीं होती। सत्असत्? कर्तव्यअकर्तव्यका विवेक स्पष्टतया जाग्रत् रहता है। अतः जिस समय सात्त्विक वृत्तियाँ बढ़ी हों? उस समय साधकको विशेषरूपसे भजनध्यान आदिमें लग जाना चाहिये। ऐसे समयमें किये गये थोड़ेसे साधनसे भी शीघ्र ही बहुत लाभ हो सकता है।, सम्बन्ध -- बढ़े हुए रजोगुणके क्या लक्षण होते हैं -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.11।।उत्तरश्लोकत्रयस्याकाङ्क्षां दर्शयति -- यदेति। सत्त्वोद्भवलिङ्गदर्शनार्थमनन्तरं श्लोकमुत्थापयति -- उच्यत इति। सर्वद्वारेष्वित्यादिसप्तमी निमित्ते नेतव्या। उतशब्दोऽपिशब्दपर्यायोऽप्यतिशयार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.11।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.11।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.11।। --,सर्वद्वारेषु? आत्मनः उपलब्धिद्वाराणि श्रोत्रादीनि सर्वाणि करणानि? तेषु सर्वद्वारेषु अन्तःकरणस्य बुद्धेः वृत्तिः प्रकाशः देहे अस्मिन् उपजायते। तदेव ज्ञानम्। यदा एवं प्रकाशो ज्ञानाख्यः उपजायते? तदा ज्ञानप्रकाशेन लिङ्गेन विद्यात् विवृद्धम् उद्भूतं सत्त्वम् इति उत अपि।।रजसः उद्भूतस्य इदं चिह्नम् --,
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【 Verse 14.12 】
▸ Sanskrit Sloka: लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा | रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ||
▸ Transliteration: lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā | rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha ||
▸ Glossary: lobhaḥ: greed; pravṛttiḥ: hankering; ārambhaḥ: endeavor; karmaṇām: of ac- tivities; aśamaḥ: uncontrollable; spṛhā: desire; rajasi: in the mode of passion; etāni: all this; jāyante: develop; vivṛddhe: when there is excess; bharatarṣabha: O chief of the descendants of Bhārata
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.12 O Bharatarṣabha, chief of the Bhārata, when there is an increase in the mode of passion, the symptoms of great attachment, uncontrollable desire, hankering, and intense en- deavor develop.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.12।।हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन रजोगुणके बढ़नेपर लोभ? प्रवृत्ति? कर्मोंका आरम्भ? अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.12।। हे भरतश्रेष्ठ रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ? प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ? शम का अभाव तथा स्पृहा? ये सब उत्पन्न होते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.12 लोभः greed? प्रवृत्तिः activity? आरम्भः the undertaking? कर्मणाम् of actions? अशमः restlessness? स्पृहा longing? रजसि in Rajas? एतानि these? जायन्ते arise? विवृद्धे having become predominant? भरतर्षभ O best of the Bharatas (or O Lord of the Bharatas).Commentary Greed Covetousness Desire to appropriate the property of others a desire to possess more wealth though one has sufficient already.Pravritti Action in general.Asamah Restlessness being agitated by joy? attachment? etc. I will do this and then I wil take up that action. After finishing the second? I will take up the third? and so on. There is no end to the continuity of desire? will and action. This is called Asama or restlessness.Spriha Thirsting or longing for all sensual objects in general.These are the characteristic marks that indicate that Rajas is predominant.Do not mistake Rajasic restlessness or Rajasic movements for Karma Yoga or divine activity. People may say that they are doing selfless service to the world? but if you analyse their motives,there will be the taint of personal desire in some form or other. Many persons cannot sit iet even for a moment. They think that moving about here and there or doing some action or other is to full of life. The Yogi or sage who sits still by calming the mind? who does nothing at all physically? is the most active man in the whole world whereas the man who runs here and there and who is always very busy does nothing at all. This may be paradoxical to you. Very few can comprehend the truth of this statement. Sattva is intense activity. A wheel that revolves very rapidly appears to be at rest. So is Sattva. So is a Sattvic man.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.12. Greed, exertion, undertaking of actions, unrest, and craving-these are born when the Rajas increases predominantly, O chief of the Bharatas !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.12 O best of Indians! Avarice, the impulse to act and the beginning of action itself are all due to the dominance of Passion.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.12 Greed, activity, undertaking of work, unrest and longing - these arise, O Arjuna, when Rajas prevails.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.12 O best of the Bharata dynasty, when rajas becomes predominant, these come into being: avarice, movement, undertaking of actions, unrest and hankering.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.12 Greed, activity, the undertaking of actions, restlessness, longing these arise when Rajas is predominant, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.12 See Comment under 14.13
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.12 'Greed' is the tendency not to spend one's own property. 'Activity' is the disposition to be active devoid of any purpose. 'Undertaking of works' is engagement in works which yield fruits. 'Unrest' is absence of rest of sense-activities. 'Longing' is the desire for sense objects. These predominate when Rajas has increased. The meaning is that whenever greed etc., prevail, then one should know that Rajas has very much increased.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.12 O best of the Bharata dynasty, when the ality of rajas vivrddhe, becomes predominant; etani, these indications; jayante, come into being; lobhah, avarice, the desire to appropriate other's possessions; pravrtih, movement in general; arambhah, undertaking;-of what?-karmanam, of actions; asamah, unrest, lack of tranillity-(i.e.) manifestation of joy, attachment, etc.; and sprha, hankering, desire in general for all things.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.12।। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ रजोगुण के मुख्य लक्षणों की गणना करते हैं। जिस क्रम में उनका उल्लेख किया गया है? उसमें हम यह देखते हैं कि उत्तरोत्तर लक्षण पूर्व के लक्षण से उत्पन्न होता है। परद्रव्य की इच्छा का नाम है लोभ जो कभी सन्तुष्ट नहीं होता। लोभी पुरुष में आ जाती है प्रवृत्ति अर्थात् फिर वह क्रियाशील हो जाता है? शान्त नहीं बैठ सकता। लोभाधिक्य होने पर उसके किये गये कर्म स्वार्थपूर्वक ही होते हैं? जिनका निर्देश यहाँ कर्मों का आरम्भ इस शब्द से किया गया है। स्वार्थ और
Chapter 14 (Part 6)
लोभ के वशीभूत पुरुष को शम अर्थात् शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। श्री शंकराचार्य अशम शब्द का अर्थ बताते हैं? हर्ष रागादि प्रवृत्ति। इसका अर्थ यह हुआ? कि ऐसा पुरुष सदैव इष्टानिष्ट की प्राप्ति होने पर हर्ष विषाद को प्राप्त होता रहता है? ऐसी स्थिति में उसे शान्ति कैसे मिल सकती है वह अपने ही कर्मों के फलस्वरूप स्वयं को ऐसी स्थिति में पाता है? जो उसे अधिकाधिक कटुतर क्रूरता? नीच अनैतिकता और हत्या जैसे अपराध करने में प्रवृत्त करती है उसकी आन्तरिक शान्ति को छिन्नभिन्न कर देती है। रजोगुण से अभिभूत यह पुरुष स्पृहा अर्थात् विषयोपभोग की लालसा के वश में भी आ जाता है। अप्राप्त वस्तुओं तथा लाभ को पाने की कभी न समाप्त होने वाली यह कामना ही स्पृहा कहलाती है।संक्षेप में? रजोगुण के स्पर्शजन्य रोग के प्रभाव से हमारा मानसिक व्यक्तित्व अपनी ही चंचल प्रवृत्तियों से उत्पीड़ित होता रहता है? जो अन्तहीन योजनाओं? थका देने वाले कर्मों? व्यथित करने वाली इच्छाओं पीड़ादायक लालसाओं? उन्मत्त करने वाले लोभ और व्यथापूर्ण व्याकुलताओं के रूप में व्यक्त होती हैं। जब ऐसा व्यक्ति समाज मे कार्य करता है तब उसके दुख उस तक ही सीमित नहीं रहते? वरन् स्पर्शजन्य रोग के समान? उसके आसपास के सहस्रों लोगों को भी व्यथित करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.12।।सत्त्वस्योद्भूतस्य चिह्नमुक्त्वा तथाभृतस्य रजसस्तदाह। लोभः स्वकीयधनादिबाहुल्येऽपि परद्रव्यादिषु लुब्धता,प्रवृत्तिः प्रवर्तनं सामान्यचेष्टा। आरम्भः काम्यनिषिद्धलौकिकिविषयाणां व्यापाराणामुद्यमः। अशमः हर्षरागादिप्रवृत्तेरनुपरमः। सर्वसामान्यवस्तुविषया तृष्णा स्पृहा। रजसि गुणे विवृद्धे एतते लिङ्गानि जायन्ते। लोभाद्युपलम्भाद्रजोविवृद्धिं विद्यादिति भावः। भरतेभ्यः ऋषभः श्रेष्ठस्त्वं रजसश्चिह्नान्याश्रजितुमयोग्योऽसीति सूचयन्नाह हे भरतर्षभेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.12।।महति धनागमे जायमानेऽप्यनुक्षणं वर्धमानस्तदभिलाषो लोभः। स्वविषयप्राप्त्यनिवर्त्य इच्छाविशेष इति यावत्। प्रवृत्तिर्निरन्तरं प्रयतमानता। आरम्भः कर्मणां बहुवित्तव्ययायासकराणां काम्यनिषिद्धलौकिकमहागृहादिविषयाणां व्यापाराणामुद्यमः। अशम इदं कृत्वेदं करिष्यामीति संकल्पप्रवाहानुपरमः। स्पृहा उच्चावचेषु परधनेषु दृष्टमात्रेषु येनकेनाप्युपायेनोपादित्सा। रजसि रागात्मके विवृद्धे एतानि रागात्मकानि लिङ्गानि जायन्ते। हे भरतर्षभ? एतैर्लिङ्गैर्विवृद्धं रजो जानीयादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.12।।लोभः प्राप्ताधिके गर्धः। प्रवृत्तिः अग्निहोत्रादौ। आरम्भो गृहादेः। कर्मणां अशमः सतामसतां वा कार्याणामनुपरमः। स्पृहा दृष्टे परधनादावुपादित्सा। रजसि विवृद्धे सति एतानि लिङ्गानि जायन्ते हे भरतर्षभ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.12।।एवं सत्त्वज्ञानमुक्त्वा रजोज्ञानरूपमाह -- लोभ इति। लोभो भगवत्सेवार्थं स्वेच्छया दत्ताप्तव्यवहारयोगद्रव्ये सत्यपि लौकिकासक्त्या पुनर्द्रव्येच्छयेतस्ततो मनोधावनेन तद्यत्नादिकरणे प्रवृत्तिः क्रियाकरणम्। आरम्भः कर्मणां लौकिकस्वोपभोग्यवस्तुकरणम्? अशमः अशान्तिःप्रातरिदं कर्त्तव्यमद्येदं कृतं इत्यादिविचारेण चित्तोद्वेगः? स्पृहा स्वायोग्यवस्तुन्यपीच्छा? रजसि विवृद्धे एतानि जायन्ते। एतदुत्पत्तौ रजोविवृद्धिं विद्यादित्यर्थः। भरतर्षभ इति सम्बोधनं राज्याद्यर्थस्पृहाभावेनैतद्दोषराहित्याय।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.12।। किंच -- लोभ इति। लोभो धनाद्यागमे बहुधा जायमानेऽपि पुनः पुनर्वर्धमानोऽभिलाषः? प्रवृत्तिर्नित्यं कुर्वद्रूपता? कर्मणामारम्भो गृहादिनिर्माणोद्यमः? अशमः इदं कृत्वा इदं करिष्यामीत्यादिसंकल्पविकल्पानुपरमः? स्पृहा उच्चावचेषु दृष्टमात्रेषु वस्तुष्वितस्ततो जिघृक्षा? रजसि प्रवृद्धे सति एतानि लिङ्गानि जायन्ते। एतैर्लिङ्गै रजोगुणस्य वृद्धिं विद्यादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.12।।लोभ इति। लोभस्तु कार्पण्यम्। प्रयोजनमनुद्दिश्यापि चलस्वभावता प्रवृत्तिः। आरम्भ उद्योगः कर्मणाम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.12।।उत्पन्न हुए रजोगुणके चिह्न ये होते हैं --, हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ लोभ -- परद्रव्यको प्राप्त करनेकी इच्छा? प्रवृत्ति -- सामान्यभावसे सांसारिक चेष्टा और कर्मोंका आरम्भ तथा अशान्ति -- उपरामताका अभाव? हर्ष और रागादिका प्रवृत्त होना तथा लालसा अर्थात् सामान्यभावसे समस्त वस्तुओंमें तृष्णा -- ये सब चिह्न रजोगुणके बढ़नेपर उत्पन्न होते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.12।। व्याख्या -- लोभः -- निर्वाहकी चीजें पासमें होनेपर भी उनको अधिक बढ़ानेकी इच्छाका नाम लोभ है। परन्तु उन चीजोंके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है। जैसे? कोई खेती करता है और अनाज ज्यादा पैदा हो गया? व्यापार करता है और मुनाफा ज्यादा हो गया? तो इस तरह पदार्थ? धन आदिके स्वाभाविक बढ़नेका नाम लोभ नहीं है और यह बढ़ना दोषी भी नहीं है।प्रवृत्तिः -- कार्यमात्रमें लग जानेका नाम प्रवृत्ति है। परन्तु रागद्वेषरहित होकर कार्यमें लग जाना दोषी नहीं है क्योंकि ऐसी प्रवृत्ति तो गुणातीत महापुरुषमें भी होती है (गीता 14। 22)। रागपूर्वक अर्थात् सुख? आराम? धन आदिकी इच्छाको लेकर क्रियामें प्रवृत्त हो जाना ही दोषी है।आरम्भः कर्मणाम् -- संसारमें धनी और बड़ा कहलानेके लिये मान? आदर? प्रशंसा आदि पानेके लिये नयेनये कर्म करना? नयेनये व्यापार शुरू करना? नयीनयी फैक्टरियाँ खोलना? नयीनयी दूकानें खोलना आदि कर्मोंका आरम्भ है।प्रवृत्ति और आरम्भ -- इन दोनोंमें अन्तर है। परिस्थितिके आनेपर किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नयेनये कर्मोंको शुरू करना आरम्भ है।मनुष्यजन्म प्राप्त होनेपर केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रहे? भोग और संग्रहका उद्देश्य बिलकुल न रहे -- इसी दृष्टिसे भक्तियोग और ज्ञानयोगमें सर्वारम्भपरित्यागी (12। 16 14। 25) पदसे सम्पूर्ण आरम्भोंका त्याग करनेके लिये कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मोंके आरम्भ तो होते हैं? पर वे सभी आरम्भ कामना और संकल्पसे रहित होते हैं (गीता 4। 19)। कर्मयोगमें ऐसे आरम्भ दोषी भी नहीं हैं क्योंकि कर्मयोगमें कर्म करनेका विधान है और बिना कर्म किये कर्मयोगी योग(समता) पर आरूढ़ नहीं हो सकता (6। 3)। अतः आसक्तिरहित होकर प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्मोंके आरम्भ किये जायँ? तो वे आरम्भ आरम्भ नहीं हैं? प्रत्युत प्रवृत्तिमात्र ही हैं क्योंकि उनसे कर्म करनेका राग मिटता है। वे आरम्भ निवृत्ति देनेवाले होनेसे दोषी नहीं हैं।अशमः -- अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल रहनेका नाम अशम है। जैसी इच्छा करते हैं? वैसी चीजें (धन? सम्पत्ति? यश? प्रतिष्ठा आदि) जब नहीं मिलतीं? तब अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल होती है। कामनाका त्याग करनेपर यह अशान्ति नहीं रहती।स्पृहा -- स्पृहा नाम परवाहका है जैसे -- भूख लगनेपर अन्नकी? प्यास करनेपर जलकी? जाड़ा लगनेपर कपड़ेकी परवाह? आवश्यकता होती है। वास्तवमें भूख? प्यास और जाड़ा -- इनका ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत अन्न? जल आदि मिल जाय -- ऐसी इच्छा करना ही दोषी है। साधकको इस इच्छाका त्याग करना चाहिये क्योंकि कोई भी वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है।रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ -- जब भीतरमें रजोगुण बढ़ता है? तब उपर्युक्त लोभ? प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं। ऐसे समयमें साधकको यह विचार करना चाहिये कि अपना जीवननिर्वाह तो हो ही रहा है? फिर अपने लिये और क्या चाहिये ऐसा विचार करके रजोगुणकी वृत्तियोंको मिटा दे? उनसे उदासीन हो जाय। सम्बन्ध -- बढ़े हुए तमोगुणके क्या लक्षण होते हैं -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.12।।अतिशयेनोद्भूतस्य रजसो लिङ्गमाह -- रजस इति। उपक्रमपर्यायस्यारम्भस्य विषयं पृच्छति -- कस्येति। काम्यानि निषिद्धानि च लौकिकानि कर्माणि विषयत्वेन निर्दिशति -- कर्मणामिति। अनुपशमो बाह्यान्तःकरणानामिति शेषः। लोभाद्युपलम्भाद्रजोवृद्धिर्बोद्धव्येति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.12।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.12।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.12।। --,लोभः परद्रव्यादित्सा? प्रवृत्तिः प्रवर्तनं सामान्यचेष्टा? आरम्भः कस्य कर्मणाम्। अशमः अनुपशमः? हर्षरागादिप्रवृत्तिः स्पृहा सर्वसामान्यवस्तुविषया तृष्णा -- रजसि गुणे विवृद्धे एतानि लिङ्गानि जायन्ते हे भरतर्षभ।।
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【 Verse 14.13 】
▸ Sanskrit Sloka: अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च | तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ||
▸ Transliteration: aprakāśo’pravṛttiś ca pramādo moha eva ca | tamasyetāni jāyante vivṛddhe kurunandana ||
▸ Glossary: aprakāśaḥ: darkness; apravṛttiḥ: inactivity; ca: and; pramādaḥ: madness; mohaḥ: illusion; eva: certainly; ca: and; tamasi: in the mode of ignorance; etāni: these; jāyante: are manifested; vivrddhe: is developed; kurunandana: O son of Kuru
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.13 O son of Kuru, when there is an increase in the mode of ignorance, madness, illusion, inertia and darkness are manifested.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.13।।हे कुरुनन्दन तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश? अप्रवृत्ति? प्रमाद और मोह -- ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.13।। हे कुरुनन्दन तमोगुण के प्रवृद्ध होने पर अप्रकाश? अप्रवृत्ति? प्रमाद और मोह ये सब उत्पन्न होते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.13 अप्रकाशः darkness? अप्रवृत्तिः inertness? च and? प्रमादः heedlessness? मोहः delusion? एव even? च and? तमसि in inertia? एतानि these? जायन्ते arise? विवृद्धे have become prdominant? कुरुनन्दन O descendant of Kuru (Arjuna).Commentary When Tamas increases? darkness? a desire to do nothing? forgetfulness of ones duties and confusion ome into existence.Darkness Absence of discrimination.Apravritti Inertness extreme inactivity.Pramada (heedlessness) and Moha (delusion) are the effects of darkness. These are the characteristics or marks which indicate that Tamas is predominant. Tamas is a great stumbling block to spiritual progress and success in any walk of life. It must be destroyed at all costs. People mistake Tamas for Sattva or Santi (peace). They take the Tamasic man for a silent Yogi All is Prarabdha Everything is Maya There is no world Why should I work Work will bind me. I am Brahman. This is not spirituality but pure and thick Tamas.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.13. Absence of [mental] illumination, non-excertion, negligence and mere delusion-these are born when the Tamas is on the increase predominantly, O darling of the Kurus !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.13 Darkness, stagnation, folly and infatuation are the result of the dominance of Ignorance, O joy of the Kuru-clan!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.13 Non-illumination, inactivity, negligence and even delusion - these arise, O Arjuna, when Tamas prevails.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.13 O descendant of the Kuru dynasty, when tamas predominates these surely [i.e. without exception.-M.S.] come into being: non-discrimination and inactivity, inadvertence and delusion.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.13 Darkness, inertness, heedlessness and delusion these arise when Tamas is predominant, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.11-13 Sarva-etc. upto kurunandana. In all the gates : in all the sense-organs. Greed etc., are born in succession when the Rajas dominates. Similarly, absence of mental illumination and so on arise in succession only at the time of the increase of the Tamas.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.13 'Non-illumination' is the absence of knowledge. 'Inactivity' is immovableness. 'Negligence' is inadvertence resulting in works that should not be done. 'Delusion' is wrong knowledge. These arise when Tamas waxes strong. By these, one should know that the Tamas has increased very much.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.13 Kuru-nandana, O descendant of the Kuru dynasty; when the ality of tamas vivrddhe, predominates; etani, these indications; eva, surely; jayante, come into being; extreme aprakasah, non-discrimination; and apravrttih, inactivity; its [i.e. of non-discrimination.] effects, pramadah, in-advertence; and mohah, delusion, i.e. stupidity, which is a from of non-discrimination. Whatever result is achieved even after death, that is also owing to attachment and desire; every-thing is certainly caused by the alities. By way of showing this the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.13।। यदि कोई साधक अपने में इस श्लोक में कथित लक्षणों को पाये? तो उसे समझना चाहिये कि वह तमोगुण से पीड़ित है। अप्रकाश का अर्थ बुद्धि की उस स्थिति से है? जिसमें वह किसी भी निर्णय को लेने में स्वयं को असमर्थ पाती है। इस स्थिति को लैकिक भाषा में ऊँघना कहते हैं? जिसके प्रभाव से मनुष्य की बुद्धि को सत्य और असत्य का विवेक करना सर्वथा असंभव हो जाता है? हम सबको प्रतिदिन इस स्थिति का अनुभव होता है? जब रात्रि के समय हम निद्रा से अभिभूत हो जाते हैं।अप्रवृत्ति सब प्रकार के उत्तरदायित्वों से बचने या भागने की प्रवृत्ति? किसी भी कार्य को करने में स्वयं को अक्षम अनुभव करना तथा जगत् में किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न और उत्साह का न होना ये सब अप्रवृत्ति शब्द से सूचित किये गये हैं। तमोगुण के प्रबल होने पर सब महत्वाकांक्षाएं क्षीण हो जाती हैं। मनुष्य की शक्ति सुप्त हो जाने पर मात्र भोजन और शयन? ये दो ही उसके जीवन के प्रमुख कार्य रह जाते हैं।इन सबके परिणामस्वरूप वह अत्यन्त प्रमादशील हो जाता है। उसे अपने अन्तरतम का आह्वान भी सुनाई नहीं देता। और वस्तुत? वह रावण के समान अत्याचारी भी नहीं बन सकता है। क्योंकि दुष्ट बनने के लिए भी अत्यधिक उत्साह और अथक क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है।शुभ और अशुभ इन दोनों प्रकार के कार्यों को करने में असमर्थ होकर वह शनै शनै मोह के गर्त में गिरता जाता है। वह जगत् का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करता है और जीवन में अपनी संभावनाओं का विपरीत अर्थ लगाता है? तथा अपने व्यावहारिक सम्बन्धों को निश्चित करनें में भी सदैव त्रुटि करता है। इस प्रकार जो पुरुष न अपने को? न जगत् को और न अपने सम्बन्धों को ही समझ पाया है? उसका जीवन एक भ्रम है और उसका अस्तित्व ही एक भारी भूल है।इस प्रकार? मन पर पड़ने वाले इन तीनों गुणों के प्रभावों का वर्णन करने के पश्चात्? गीताचार्य हमें बोध कराना चाहते हैं कि इन गुणों का प्रभाव केवल किसी एक देह विशेष में जीवित रहते हुये ही नहीं होता है। मन की ये प्रवृत्तियाँ जिन्हें हम इस जीवन में उत्पन्न कर विकसित करते हैं और उनका अनुसरण कर उन्हें शक्तिशाली बनाते हैं? जीव के मरण के पश्चात् उसकी गति और स्थिति को भी निर्धारित करती हैं।वेदान्त दर्शन के अतिरिक्त तत्त्वज्ञान की किसी भी अन्य शाखा में मरणोपरान्त जीवन के विषय में सम्पूर्ण रूप से विचार नहीं किया गया है। इस विषय में अन्य सभी धर्ममतों द्वारा दिये गये विभिन्न स्पष्टीकरण हैं? तथापि मरण के पश्चात् जीवन के अस्तित्व में किसी को भी अविश्वास नहीं है। अन्य मतों में जीव की गति के विषय में धार्मिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त केवल हठवादी घोषणायें हैं? किन्तु दर्शनशास्त्र का रूप देने योग्य युक्तियुक्त विवेचन नहीं है।इसके पूर्व भी गीता में पुनर्जन्म के विषय में विस्तृत विवेचन किया गया था। सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से सर्वथा वियोग ही मृत्यु कहलाता है। इसलिये? मृत्यु स्थूल शरीर का प्रारब्ध है। वह सूक्ष्म शरीर के अभिमानी नित्य विद्यमान जीव का दुखान्त नहीं है। एक देह विशेष में अपने प्रयोजन के सिद्ध हो जाने पर जीव उस देह को त्यागकर चला जाता है। वृत्तिरूप मन और बुद्धि ही सूक्ष्म शरीर कहलाती है। एक देह विशेष को धारण किये हुए जीवन में भी अन्तकरण के विचार ही व्यक्ति के कर्मों के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। इसलिए? हिन्दू तत्त्वचिन्तकों का यह निष्कर्ष युक्तिसंगत है कि मरण के पश्चात् भी? जीव वर्तमान जीवन के विचारों के संयुक्त परिणाम की दिशा में ही गमन करता है।जब किसी व्यक्ति का स्थानान्तरण होता है? तब वह बैंक में जाकर अपनी उस धनराशि को प्राप्त कर सकता है? जो उस समय उसके नाम पर शेष जमा होती है? न कि भूतकाल में उसके द्वारा जमा की गई कुल राशि। इसी प्रकार? जीवन में किये गये शुभाशुभ विचारों और कर्मों के संयुक्त परिणाम के द्वारा ही मरण के समय हमारे विचारों के गुण और दिशा निर्धारित किये जाते हैं।हम यह पहले ही देख चुके हैं कि हमारे विचारों के स्वरूप पर सत्त्व? रज और तमोगुण का प्रभाव पड़ता है। इसलिये मनुष्य के अपने जीवन काल में जिस गुण का प्राधान्य रहता है उसी के द्वारा देह त्याग के पश्चात् की उस मनुष्य की गति होनी चाहिये यह सर्वथा युक्तिसंगत है। इस अध्याय के निम्न प्रकरण में इन्हीं संभावनाओं का वर्णन किया गया है।भगवान् कहते है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.13।।उद्भूतस्य तमसश्चिह्नमाह। अप्रकाशः कर्तव्याकर्त्यविवेकाभावः। अप्रवृत्तिः पूर्वोक्तप्रवृत्त्यभावः। प्रमादो व्याख्यातोऽविवेककार्यं। मोहो ज्ञातव्याविवेको मूढतेत्यर्थः। च आलस्यादिसमुच्चायार्थः। एवकारो व्यभिचारवारणार्थः। तमस्येव विवृद्धे एतानि लिङ्गानि जायन्ते। एतान्येवेति वा। अप्रकाशातिशयादिना विवृद्धं तमो विजानीयादिति भावः। त्वं तूत्तमवंशोद्भवस्तमसश्चिह्नान्याश्रयितुं नार्हसीति द्योतयितुमाह हेकुरुनन्दनेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.13।।अप्रकाशः सत्यप्युपदेशादौ बोधकारणे सर्वथा बोधायोग्यत्वम्। अप्रवृत्तिश्च सत्यप्यग्निहोत्रं जुहुयादित्यादौ प्रवृत्तिकारणे जनितबोधेऽपि शास्त्रे सर्वथा तत्प्रवृत्त्ययोग्यत्वम्। प्रमादस्तत्कालकर्तव्यत्वेन प्राप्तस्यार्थस्यानुसंधानाभावः। मोह एवच मोहो निद्राविपर्ययो वा। चौ समुच्चये। एवकारो व्यभिचारवारणार्थः।,तमस्येव विवृद्धे एतानि लिङ्गानि जायन्ते। हे कुरुनन्दन? अत एतैर्लिङ्गैरव्यभिचारिभिर्विवृद्धं तमो जानीयादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.13।।सत्यपि बोधके गुर्वादौ अप्रकाशः सत्त्वकार्यप्रकाशानुदयः। अप्रवृत्तिः सत्यपि प्रवृत्तिनिमित्ते रजःकार्यप्रवृत्त्यनुदयः। प्रमादः कार्याकार्यविवेकराहित्यम्। मोहो निद्रालस्यादिरूपः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.13।।तमसो ज्ञानायाऽऽह -- अप्रकाश इति। अप्रकाशश्चित्ताप्रसादः। अप्रवृत्तिः भगवत्सेवनभगवदीयसङ्गाद्यनुद्यमः। प्रमादो भगवद्भजनाननुसन्धानम्। मोहः संसारासक्तिः। हे कुरुनन्दन तमसि विवृद्धे सत्येतानि जायन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.13।।किंच -- अप्रकाश इति। अप्रकाशो विवेकभ्रंशः? अप्रवृत्तिरनुद्यमः? प्रमादः कर्तव्यार्थानुसंधानराहित्यं? मोहो मिथ्याभिनिवेशः? तमसि प्रवृद्धे एतानि लिङ्गानि चिन्हानि जायन्ते। एतैस्तमसो वृद्धिं जानीयादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.13।।अप्रकाश इति। अन्धतामिस्रं तामिस्रं महामोहो मोहश्चेति चतुर्धा। तमः पञ्चमं प्रथममेवोक्तम्। स्वरूपाज्ञाने हि (प्रवृद्धे विलोमतः) प्राणान्तःकरणेन्द्रियदेहाध्यासाः। इयं च पञ्चपर्वाऽविद्यैव नामान्तरेणोक्ता। श्रीविष्णुस्वामिप्रोक्ता तुता(स्वा)दृगुत्थविपर्यासभवभेदजभीषु च इति रूपाविभिन्नपर्याया? साऽप्यस्यामेव पर्यवस्यति। अत्राविद्या तमोगुणान्तर्भूता न पृथगुक्ता।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.13।।हे कुरुनन्दन अप्रकाश अर्थात् अत्यन्त अविवेक? प्रवृत्तिका अभाव? उसका कार्य प्रमाद और मोह अर्थात् अविवेकरूप मूढ़ता -- ये सब चिह्न तमोगुणकी वृद्धि होनेपर उत्पन्न होते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.13।। व्याख्या -- अप्रकाशः -- सत्त्वगुणकी प्रकाश (स्वच्छता) वृत्तिको दबाकर जब तमोगुण बढ़ जाता है? तब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें स्वच्छता नहीं रहती। इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें जो समझनेकी शक्ति है? वह तमोगुणके बढ़नेपर लुप्त हो जाती है अर्थात् पहली बात तो याद रहती नहीं और नया विवेक पैदा होता नहीं। इस वृत्तिको यहाँ अप्रकाश कहकर इसका सत्त्वगुणकी वृत्ति प्रकाश के साथ विरोध बताया गया है।अप्रवृत्तिः -- रजोगुणकी वृत्ति प्रवृत्ति को दबाकर जब तमोगुण बढ़ जाता है? तब कार्य करनेका मन नहीं करता। निरर्थक बैठे रहने अथवा पड़े रहनेका मन करता है। आवश्यक कार्यको करनेकी भी रुचि नहीं होती। यह सब अप्रवृत्ति वृत्तिका काम है।प्रमादः -- न करनेलायक काममें लग जाना और करनेलायक कामको न करना? तथा जिन कामोंको करनेसे न पारमार्थिक उन्नति होती है? न सांसारिक उन्नति होती है? न समाजका कोई काम होता है और जो शरीरके लिये भी आवश्यक नहीं है -- ऐसे बीड़ीसिगरेट? ताशचौपड़? खेलतमाशे आदि कार्योंमें लग जाना प्रमाद वृत्तिका काम है।मोहः -- तमोगुणके बढ़नेपर जब मोह वृत्ति आ जाती है? तब भीतरमें विवेकविरोधी भाव पैदा होने लगते हैं। क्रियाके करने और न करनेमें विवेक काम नहीं करता? प्रत्युत मूढ़ता छायी रहती है? जिससे पारमार्थिक और व्यावहारिक काम करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती।एव च -- इन पदोंसे अधिक निद्रा लेना? अपने जीवनका समय निरर्थक नष्ट करना? धन निरर्थक नष्ट करना आदि जितने भी निरर्थक कार्य हैं? उन सबको ले लेना चाहिये।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन -- ये सब बढ़े हुए तमोगुणके लक्षण हैं अर्थात् जब ये अप्रकाश? अप्रवृत्ति आदि दिखायी दें? तब समझना चाहिये कि सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ा है।सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों ही गुण सूक्ष्म होनेसे अतीन्द्रिय हैं अर्थात् इन्द्रियाँ और अन्तःकरणके विषय नहीं हैं। इसलिये ये तीनों गुण साक्षात् दीखनेमें नहीं आते? इनके स्वरूपका साक्षात् ज्ञान नहीं होता। इन गुणोंका ज्ञान? इनकी पहचान तो वृत्तियोंसे ही होती है क्योंकि वृत्तियाँ स्थूल होनेसे वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरणका विषय हो जाती हैं। इसलिये भगवान्ने ग्यारहवें? बारहवें और तेरहवें श्लोकमें क्रमशः तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका ही वर्णन किया है? जिससे अतीन्द्रिय गुणोंकी पहचान हो जाय और साधक सावधानीपूर्वक रजोगुणतमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुणकी वृद्धि कर सके।मार्मिक बातसत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ स्वाभाविक ही उत्पन्न? नष्ट तथा कमअधिक होती रहती हैं। ये सभी परिवर्तनशील हैं। साधक अपने जीवनमें इन वृत्तियोंके परिवर्तनका अनुभव भी करता है। इससे सिद्ध होता है कि तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ बदलनेवाली हैं और इनके परिवर्तनको जाननेवाले पुरुषमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ दृश्य हैं और पुरुष इनको देखनेवाला होनेसे द्रष्टा है। द्रष्टा दृश्यसे सर्वथा भिन्न होता है -- यह नियम है। दृश्यकी तरफ दृष्टि होनेसे ही द्रष्टा संज्ञा होती है। दृश्यपर दृष्टि न रहनेपर द्रष्टा संज्ञारहित रहता है। भूल यह होती है कि दृश्यको अपनेमें आरोपित करके वह मैं कामी हूँ? मैं क्रोधी हूँ आदि मान लेता है।कामक्रोधादि विकारोंसे सम्बन्ध जोड़कर उन्हें अपनेमें मान लेना उन विकारोंको निमन्त्रण देना है और उन्हें,स्थायी बनाना है। मनुष्य भूलसे क्रोध आनेके समय क्रोधको उचित समझता है और कहता है कि यह तो सभीको आता है और अन्य समय मेरा क्रोधी स्वभाव है -- ऐसा भाव रखता है। इस प्रकार मैं क्रोधी हूँ ऐसा मान लेनेसे वह क्रोध अहंतामें बैठ जाता है। फिर क्रोधरूप विकारसे छूटना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि साधक प्रयत्न करनेपर भी क्रोधादि विकारोंको दूर नहीं कर पाता और उनसे अपनी हार मान लेता है।कामक्रोधादि विकारोंको दूर करनेका मुख्य और सुगम उपाय यह है कि साधक इनको अपनेमें कभी माने ही नहीं। वास्तवमें विकार निरन्तर नहीं रहते? प्रत्युत विकाररहित अवस्था निरन्तर रहती है। कारण कि विकार तो आते और चले जाते हैं? पर स्वयं निरन्तर निर्विकार रहता है। क्रोधादि विकार भी अपनेमें नहीं? प्रत्युत मनबुद्धिमें आते हैं। परन्तु साधक मनबुद्धिसे मिलकर उन विकारोंको भूलसे अपनेमें मान लेता है। अगर वह विकारोंको अपनेमें न माने? तो उनसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है। फिर विकारोंको दूर करना नहीं पड़ता? प्रत्युत वे अपनेआप दूर हो जाते हैं। जैसे? क्रोधके आनेपर साधक ऐसा विचार करे कि मैं तो वही हूँ मैं आनेजानेवाले क्रोधसे कभी मिल सकता ही नहीं। ऐसा विचार दृढ़ होनेपर क्रोधका वेग कम हो जायगा और वह पहलेकी अपेक्षा कम बार आयेगा। फिर अन्तमें वह सर्वथा दूर हो जायगा।भगवान् पूर्वोक्त तीन श्लोकोंमें क्रमशः सत्त्वगुण? रजोगुण और तमोगुणकी वृद्धिके लक्षणोंका वर्णन करके साधकको सावधान करते हैं कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ उसको अपनेमें प्रतीत होती हैं? वास्तवमें साधकका इनके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। गुण एवं गुणोंकी वृत्तियाँ प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील हैं और स्वयं पुरुष परमात्माका अंश होनेसे अपरिवर्तनशील है। प्रकृति और पुरुष -- दोनों विजातीय हैं। बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका एकात्मभाव हो ही कैसे सकता है इस वास्तविकताकी तरफ दृष्टि रखनेसे तमोगुण और रजोगुण दब जाते हैं तथा साधकमें सत्त्वगुणकी वृद्धि स्वतः हो जाती है। सत्त्वगुणमें भोगबुद्धि होनेसे अर्थात् उससे होनेवाले सुखमें राग होनेसे यह सत्त्वगुण भी गुणातीत होनेमें बाधा उत्पन्न कर देता है। अतः साधकको सत्त्वगुणसे उत्पन्न सुखका भी उपभोग नहीं करना चाहिये। सात्त्विक सुखका उपभोग करना रजोगुणअंश है। रजोगुणमें राग बढ़नेपर रागमें बाधा देनेवालेके प्रति क्रोध पैदा होकर सम्मोह हो जाता है? और रागके अनुसार पदार्थ मिलनेपर लोभ पैदा होकर सम्मोह हो जाता है। इस प्रकार सम्मोह पैदा होनेसे वह रजोगुणसे तमोगुणमें चला जाता है और उसका पतन हो जाता है (गीता 2। 62 63)। सम्बन्ध -- तात्कालिक बढ़े हुए गुणोंकी वृत्तियोंका फल क्या होता है -- इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.13।।उद्भूतस्य तमसो लिङ्गमाह -- अप्रकाश इति। सर्वथैव ज्ञानकर्मणोरभावो विशेषणाभ्यामुक्तः। तत्कार्यमिति तच्छब्दो दर्शिताविवेकार्थः। प्रमादो व्याख्यातः। मोहो वेदितव्यस्यान्यथावेदनम्। तस्यैव मौढ्यान्तरमाह -- अविवेक इति। अविवेकातिशयादिना प्रवृद्धं तमो ज्ञेयमिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.13।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.13।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.13।। --,अप्रकाशः अविवेकः? अत्यन्तम् अप्रवृत्तिश्च प्रवृत्त्यभावः तत्कार्यं प्रमादो मोह एव च अविवेकः मूढता इत्यर्थः। तमसि गुणे विवृद्धे एतानि लिङ्गानि जायन्ते हे कुरुनन्दन।।मरणद्वारेणापि यत् फलं प्राप्यते? तदपि सङ्गरागहेतुकं सर्वं गौणमेव इति दर्शयन् आह --,
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【 Verse 14.14 】
▸ Sanskrit Sloka: यदा सत्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् | तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ||
▸ Transliteration: yadā sattve pravṛddhe tu pralayaṁ yāti dehabhṛt | tadottamavidāṁ lokānam alānpratipadyate ||
▸ Glossary: yadā: when; sattve: mode of goodness; pravṛddhe: in development; tu: but; pralayaṁ: dissolution; yāti: goes; dehabhṛt: embodied; tadā: at that time; ut- tamavidāṁ: of the great sages; lokān: the planets; amalān: pure; pratipadyate: attains.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.14 When one dies in the mode of goodness [satva], He goes to the highest of worlds.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.14।।जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो? उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है? तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.14।। जब यह जीव (देहभृत्) सत्त्वगुण की प्रवृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है? तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल अर्थात् स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.14 यदा when? सत्त्वे in Sattva? प्रवृद्धे having become predominant? तु verily? प्रलयम् death? याति meets? देहभृत् the embodied one? तदा then? उत्तमविदाम् of the knowers of the Highest? लोकान् to the worlds? अमलान् of the spotless? प्रतिपद्यते (he) attains.Commentary Lokan Amalan Sptless worlds Brahmaloka and the like where Rajas and Tamas never predominate.The Highest Deities such as Hiranyagarbha.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.14. But, if the body-bearer dies at the time when Sattva is on the increase, then he attains to the spotless worlds of those, who know the Highest.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.14 When Purity prevails, the soul on quitting the body passes on to the pure regions where live those who know the Highest.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.14 If the embodied self meets with dissoution when Sattva prevails, then It proceeds to the pure worlds of those who know the highest.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.14 When an embodied one undergoes death while sattva is exclusively prodominant, then he attains the taintless worlds of those who know the highest (entities).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.14 If the embodied one meets with death when Sattva is predominant, then he attains to the spotless worlds of the knowers of the Highest.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.14 See Comment under 14.15
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.14 When the 'Sattva prevails' i.e., while the Sattva continues to be prevalent, if the embodies self meets with death, It reaches the pure worlds, i.e., regions conducive to the knowledge of the self. The purport is this: If Satva preponderates in a person at the time of death, he will be rorn in the families of those who have the knowledge of the self, and thus be alified to perform auspicious acts which are the means of attaining the true knowledge of the self.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.14 Yada, when; deha-bhrt, an embodied one, the soul; yati, undergoes; pralayam, death; sattve pravrddhe, while sattva is predominant; tu, exclusively; [Tu is used to exclude rajas and tamas.-S.] tada, then; pratipadyate, he attains, i.e. gains; the amalan, tainless, stainless; lokan, worlds; [The worlds of Brahma, etc., which are free from the impurity of predominance either of rajas or tamas.] uttamavidam, of those who know the highest, i.e. of those who have known the principles-mahat and the rest.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.14।। मरणोपरान्त जीव के अस्तित्व तथा उसकी गति का विषय इन्द्रिय अगोचर है। अत प्रस्तुत प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांत के सत्यत्त्व की पुष्टि इसी देह में रहते हुए इन्द्रियों के द्वारा नहीं हो सकती है किन्तु मनुष्य के वर्तमान जीवन के मानसिक व्यवहार का सूक्ष्म अध्ययन करने पर प्रस्तुत सिद्धांत की युक्तियुक्तता के विषय में कोई सन्देह नहीं रह जाता है। कोई चिकित्सक अकस्मात् किसी दिन स्थापत्यशास्त्र (गृह निर्माण के विज्ञान) की किसी सूक्ष्म समस्या के विषय में चिन्तन नहीं प्रारम्भ करता और न ही कोई अभियन्ता रातों रात कर्करोग (कैंसर) के उपचार की प्रेरणा पाता है। किसी भी समय दोनों ही व्यक्ति अपनी शिक्षा दीक्षा के अनुरूप विषय का ही चिन्तन करते हैं।इस प्रकार? वर्तमान देह में ही हम वैचारिक जीवन का सातत्य अनुभव करते हैं। यह सातत्य? वर्षों? महीनों? सप्ताहों? दिनों और प्रत्येक क्षण के विचारों में भी देखने को मिलता है। प्रत्येक क्षण का विचार पूर्व क्षण के विचार का विस्तार मात्र है। इस प्रकार? यदि हमें वैचारिकजीवन में एक निरन्तरता और नियमबद्धता का स्पष्ट अनुभव होता है? जिसकी अखण्डता भूत? वर्तमान और भविष्य में बनी रहती है? तब मृत्यु के समय अकस्मात् इस शृंखला के टूटने का कोई कारण सिद्ध नहीं होता है। मृत्यु एक अनुभव विशेष मात्र है? जो उत्तरकाल के अनुभवों को प्रभावित कर सकता है। परन्तु यह कोई नवीन विशेष बात नहीं है? क्योंकि प्रत्येक अनुभव ही अपने पश्चात् के अनुभव को अपने गुणदोष से प्रभावित करता रहता है। अत जीवन पर्यन्त के विचारों के संयुक्त परिणाम से ही देहत्याग के पश्चात् जीव की गति निर्धारित होती है। यद्यपि इस भौतिक जगत् से उसका सम्बन्ध समाप्त हो जाता है? तथापि उसका वैचारिक जीवन बना रहता है।भगवान् कहते हैं कि सत्वगुण प्रवृद्ध हो और उस समय जीव देहत्याग करे? तो वह उत्तमवित् लोगों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है। ये स्वर्ग से लेकर ब्रह्मलोक तक के लोक हैं। ब्रह्मलोक में रज और तम का प्रभाव नगण्य होने के कारण वह लोक परम सुखी है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.14।।मरणद्वारेणापि यत्पारलौकिकं फलं प्राप्यते तदपि सहेतुकं सर्वं सत्तवादिगुणप्रयुक्तमेवेति दर्शयन्नाह -- यदेति द्वाभ्याम्। तत्र सत्त्ववृद्धिकृतं फलविशेषमाह। यदा सत्त्वे विवृद्धे उद्भूते देहभृज्जीवः प्रलयः मरणं याति प्राप्नोति तदा उत्तमविदां महत्तत्त्वहिरण्यगर्भादितत्त्वविदां तदुपासकानां लोकानागमसिद्धान् ब्रह्मलोकादीनमलान् रजस्तमसोरन्यतरदुद्भूतं मलं तेन रहितान्प्रतिपद्यते प्राप्नोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.14।।इदानीं मरणसमये विवृद्धानां सत्त्वादीनां फलविशेषमाह द्वाभ्याम् -- सत्त्वे प्रवृद्धे सति यदा प्रलयं मृत्युं याति प्राप्नोति देहभृत् देहाभिमानी जीवस्तदोत्तमा ये हिरण्यगर्भादयस्तद्विदां तदुपासकानां लोकान्देवसुखोपभोगस्थानविशेषानमलान् रजस्तमोमलरहितान्प्रतिपद्यते प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.14।।प्रलयं मरणम्। उत्तमविदां हिरण्यगर्भाद्युपासकानां देवानां वा लोकान्। अमलान्निर्दुःखान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.14।।एवं विवृद्धौ सत्यां मरणान्तं तेन यान्त्यतस्तत्सम्बन्धिदेहाप्तिर्भवतीत्याह -- यदेतिपद्येन। सत्त्वे प्रवृद्धे -- तुशब्दोऽन्यव्यवच्छेदकः -- यदा देहभृज्जीवः प्रलयं याति मृत्युमवाप्नोति तदोत्तमविदान् उत्तमैर्ज्ञानिभिर्ये ज्ञातुं योग्यास्तान् लोकान् अमलान् वैष्णवब्राह्मणादीन् प्रतिपद्यते प्राप्नोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.14।। मरणसमय एव वृद्धानां सत्त्वाद्रीनां फलविशेषमाह -- यदेति द्वाभ्याम्। सत्त्वे प्रवृद्धे सति यदा जीवो मृत्युं प्राप्नोति तदा उत्तमान् हिरण्यगर्भादीन्विदन्ति उपासत इत्युत्तमविदस्तेषां ये अमलाः प्रकाशमया लोकाः सुखोपभोगस्थानविशेषास्तान्प्रतिपद्यते प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.14।।मरणसमये प्रवृद्धानां सत्त्वादीनां फलं गतिभेदमाह -- यदेति द्वाभ्याम्। सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं गतो देही योगिनामुत्तमोपायविदां देहान्प्रपद्यते? अर्थात्तत्कुले भवति। तत्र जन्मवान् भूत्वाऽऽत्मयाथात्म्यज्ञानसाधनेषु पुण्यकर्मस्वधिकारी भवतीत्युक्तं उत्तमलोकान्वा प्राप्नोति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.14।।मरणसमयकी अवस्थाके द्वारा जो फल मिलता है? वह सब भी आसक्ति और रागसे ही होनेवाला तथा गुणजन्य ही होता है? यह दिखानेके लिये कहते हैं --, जब यह शरीरधारी जीव? सत्त्वगुणकी वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होता है? तब उत्तम तत्त्वको जाननेवालोंके अर्थात् महत्तत्त्वादिको जाननेवालोंके निर्मल -- मलरहित लोकोंको प्राप्त होता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.14।। व्याख्या -- यदा सत्त्वे प्रवृद्धे ৷৷. प्रतिपद्यते -- जिस कालमें जिसकिसी भी देहधारी मनुष्यमें? चाहे वह सत्त्वगुणी? रजोगुणी अथवा तमोगुणी ही क्यों न हो? जिसकिसी कारणसे सत्त्वगुण तात्कालिक बढ़ जाता है अर्थात् सत्त्वगुणके कार्य स्वच्छता? निर्मलता आदि वृत्तियाँ तात्कालिक बढ़ जाती हैं? उस समय अगर उस मनुष्यके प्राण छूट जाते हैं? तो वह उत्तम (शुभ) कर्म करनेवालोंके निर्मल लोकोंमें चला जाता है।उत्तमविदाम् कहनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य उत्तम (शुभ) कर्म ही करते हैं? अशुभकर्म कभी करते ही नहीं अर्थात् उत्तम ही उनके भाव हैं? उत्तम ही उनके कर्म हैं और उत्तम ही उनका ज्ञान है? ऐसे पुण्यकर्मा लोगोंका जिन लोकोंपर अधिकार हो जाता है? उन्हीं निर्मल लोकोंमें वह मनुष्य चला जाता है? जिसका शरीर सत्त्वगुणके बढ़नेपर छूटा है। तात्पर्य है कि उम्रभर शुभकर्म करनेवालोंको जिन ऊँचेऊँचे लोकोंकी प्राप्ति होती है? उन्हीं लोकोंमें तात्कालिक बढ़े हुए सत्त्वगुणकी वृत्तिमें प्राण छूटनेवाला जाता है।सत्त्वगुणकी वृद्धिमें शरीर छोड़नेवाले मनुष्य पुण्यात्माओंके प्राप्तव्य ऊँचे लोकोंमें जाते हैं -- इससे सिद्ध होता है कि गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ कर्मोंकी अपेक्षा कमजोर नहीं हैं। अतः सात्त्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मोंके,समान ही श्रेष्ठ है। इस दृष्टिसे शास्त्रविहित पुण्यकर्मोंमें भी भावका ही महत्त्व है? पुण्यकर्मविशेषका नहीं। इसलिये सात्त्विक भावका स्थान बहुत ऊँचा है। पदार्थ? क्रिया? भाव और उद्देश्य -- ये चारों क्रमशः एकदूसरेसे ऊँचे होते हैं।रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा सत्त्वगुणकी वृत्ति सूक्ष्म और व्यापक होती है। लोकमें भी स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्मका आहार कम होता है जैसे -- देवतालोग सूक्ष्म होनेसे केवल सुगन्धिसे ही तृप्त हो जाते हैं। हाँ? स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्ममें शक्ति अवश्य अधिक होती है। यही कारण है कि सूक्ष्मभावकी प्रधानतासे अन्तसमयमें सत्त्वगुणकी वृद्धि? मनुष्यको ऊँचे लोकोंमें ले जाती है।अमलान् कहनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल है अतः सत्त्वगुणके बढ़नेपर जो मरता है? उसको निर्मल लोकोंकी ही प्राप्ति होती है।यहाँ यह शङ्का होती है कि उम्रभर शुभकर्म करनेवालोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है? उन लोकोंमें सत्त्वगुणकी वृत्ति बढ़नेपर मरनेवाला कैसे चला जायगा भगवान्की यह एक विशेष छूट है कि अन्तकालमें मनुष्यकी जैसी मति होती है? वैसी ही उसकी गति होती है (गीता 8। 6)। अतः सत्त्वगुणकी वृत्तिके बढ़नेपर शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उत्तम लोकोंमें चला जाय -- इसमें शङ्काकी कोई बात ही नहीं है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.14।।सात्त्विकादीनां भावानां पारलौकिकं फलविभागमुदाहरति -- मरणेति। सङ्गः सक्ती रागस्तृष्णा तद्बलादनुष्ठानद्वारा लभ्यमानमित्यर्थः। गौणं सत्त्वादिगुणप्रयुक्तमिति यावत्। तत्र सत्त्वगुणवृद्धिकृतफलविशेषमाह -- यदेति। मलरहिताव्रजस्तमसोरन्यतरस्योद्भवो मलं तेन रहितानागमसिद्धान्ब्रह्मलोकादीनित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.14।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.14।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.14।। --,यदा सत्त्वे प्रवृद्धे उद्भूते तु प्रलयं मरणं याति प्रतिपद्यते देहभृत् आत्मा? तदा उत्तमविदां महदादितत्त्वविदाम् इत्येतत्? लोकान् अमलान् मलरहितान् प्रतिपद्यते प्राप्नोति इत्येतत्।।
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【 Verse 14.15 】
▸ Sanskrit Sloka: रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते | तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ||
▸ Transliteration: rajasi pralayaṁ gatvā karmasaṅgiṣu jāyate | tathā pralīnas tamasi mūḍhayoniṣu jāyate ||
▸ Glossary: rajasi: in passion; pralayaṁ: dissolution; gatvā: attaining; karmasaṅgiṣu: in the pursuit of activities; jāyate: takes birth; tathā: thereafter; pralīnaḥ: being dissolved; tamasi: in ignorance; mūḍha: ignorant; yoniṣu: species; jāyate: take birth
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.15 When one dies in the mode of passion [rajas], he takes birth among those engaged in activities. When he dies in the mode of ignorance [tamas], he takes birth in the space of the ignorant.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.15।।रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.15।। रजोगुण के प्रवृद्ध काल में मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मासक्ति वाले (मनुष्य) लोक में वह जन्म लेता है तथा तमोगुण के प्रवृद्धकाल में (मरण होने पर) मूढ़योनि में जन्म लेता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.15 रजसि in Rajas? प्रलयम् death? गत्वा meeting? कर्मसङ्गिषु among those attached to action? जायते (he) is born? तथा so? प्रलीनः dying? तमसि in inertia? मूढयोनिषु in the wombs of the senseless? जायते (he) is born.Commentary Meeting with death in Rajas If he dies when Rajas is predominant in him? he is born among men who are attached to action. If he dies when Tamas is fully predominant in him? he takes birth in ignorant species such as cattle? birds? beasts or insects.He may take his birth amongst the dull and the stupid or the lowest grades of human beings. He need not take the body of an animal. This is the view of some persons.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.15. By meeting death when the Rajas [is on the increase], he is born among those who are attached to action; likewise meeting death when the Tamas [is on the increase], he is born in the wombs of the duluded.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.15 When Passion prevails, the soul is reborn among those who love activity; when Ignorance rules, it enters the wombs of the ignorant.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.15 (a) Meeting with dissolution when Rajas is prevalent, one is born among those attached to work৷৷.
(b) Similarly, one who has met with dissolution when Tamas prevails, is born in the womb of beings lacking in intelligence.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.15 When one dies while rajas predominates, he is born among people attached to activity. Similarly, when one dies while tamas predominates, he takes birth among the stupid species.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.15 Meeting death in Rajas, he is born among those who are attached to action; and dying in Tamas, he is born in the womb of the senseless.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.14-15 Yada etc. Rajasi etc. When the Sattva is predominantly on the increase on account of increase on account on account of incessantly practising actions of the Sattva throughout the entire life-at that [time] having met dissolution [of body], one attains the auspicious worlds. Likewise whosoever has practised throughout his life the activities of the Rajas, he, by his [last] journey attains manhood for mixed enjoyment. Likewise : i.e. in the same order, if one practises action of the Tamas alone by one's entire life, then [on his death] he is rorn in the bodies of the hell, of the animals, of the trees and so on.
Those, who explain [the passage under study to the effect] : 'These results [are for him in whom] the Sattva etc., have predominantly increased only at the time of death' - these commentators have not correctly entered into (grasped) the behaviour of the embodied. For, nothing but delusion arises, by all means at the last moment, without exception in the case of one and all. However, with regard to our explanation [given above] these passages and other verses (Ch. VIII, 5ff) speak in one voice.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.15 (a) Meeting with death when Rajas is preponderant, one is rorn in the families of those who act for the sake of fruits for themselves. Being rorn in such families, he becomes alified to perform auspicious acts which constitute the way for attaining heaven and the like.
(b) Similarly, one who dies when Tamas is preponderant is born in the wombs of beings lacking in intelligence, namely, in the
Chapter 14 (Part 7)
wombs of dogs, pigs etc. The meaning is that he is rorn as one incapable of realising any human end.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.15 Pralayam gatva, when one does; rajasi, while the ality of rajas predominates; jayate, he is born; karma-sangisu, among people attached to activity, among human beings having attachment to work. Tatha, similarly, in that very way; pralinah, when one dies; tamasi, while tamas predominates; jayate, he takes birth; mudha-yonisu, among the stupid species, such as animals etc. A summary of the idea of the preceding (three) verses is being stated:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.15।। पूर्वोक्त सिद्धांत के अनुसार ही मरणकाल में रजोगुण के आधिक्य के प्रभाव से जीव कर्मासक्त मनुष्य लोक में जन्म लेता है। उसके लिए कर्म करने और फल भोगने के लिए यही अत्यन्त उपयुक्त क्षेत्र है।इसके विपरीत यदि तमोगुण के प्रवृद्ध हुए काल में जीव देह का त्याग करता है? तो उसके फलस्वरूप वह मूढ़योनि अर्थात् पशुपक्षी या वनस्पति जीवन को प्राप्त होता है।कुछ दार्शनिकों का यह मत है कि एक बार विकास के सोपान पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर लेने के पश्चात् हमारा निम्न स्तर की योनियों में पतन नहीं होता। निसन्देह? यह सान्त्वना प्रदान करने वाला मत है परन्तु अनुभूत उपलब्ध तथ्यों के विरुद्ध होने से ग्राह्य नहीं हो सकता। वास्तविकता यह है कि प्रगति के लिए सर्वोत्तम परिस्थिति और वातावरण को उपलब्ध कराने के पश्चात् भी सभी मनुष्य समान रूप से उनका उपयोग करके गौरवमयी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं होते। एक धनी मनुष्य का सामान्य बुद्धि का पुत्र? जीवन के प्रारम्भ से ही अनुकूल स्थिति को प्राप्त करता है तथापि प्राय यह देखा जाता है कि वह अपनी स्थिति का उचित उपयोग करने के स्थान पर प्रमाद और विलास का जीवन जीकर अपना सर्वनाश ही कर लेता है।बुद्धि से सम्पन्न होने पर भी हम में से कितने लोग विवेकपूर्ण आचरण करते हैं समाज के कुछ लोग तो पशुओं की ओर ईर्ष्या की दृष्टि से देखते हुए घोषणा भी करते हैं कि उनका जीवन श्रेष्ठतर और सुखी है कहने का तात्पर्य यह हुआ कि कुछ अल्पसंख्यक द्विपादों की दृष्टि से चतुष्पादों का जीवन उच्चतर विकास का है यदि किसी व्यक्ति का यही विचार हो? तो उसके लिए पशुजीवन निन्दनीय न होकर वरणीय होता है? जिसकी वह कामना करता है। मद्यपान न करने वाला एक संयमी पुरुष मधुशाला को दुखालय समझता है किन्तु एक मद्यपायी को वही स्थान सुख और शान्ति का विश्रामालय प्रतीत होता है।तामसिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए पशुयोनि में जन्म लेना माने आनन्द प्राप्ति का अद्भुत अवसर है? जहाँ वे अपनी रुचि और प्रवृत्ति को पूर्णतया व्यक्त कर सकते हैं। इस प्रकार दर्शनशास्त्र की दृष्टि से देखने पर हमें बिना किसी सन्देह या संकोच के यह स्वीकार करना पड़ेगा कि तमोगुणी लोगों को पशु देह में ही पूर्ण सन्तोष का अनुभव होगा। अत यहाँ कहा गया है? तमोगुण के प्रवृद्ध हुए काल में मरण होने पर जीव मूढ़योनि में जन्म लेता है।प्रस्तुत प्रकरण का सारांश यही है कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.15।।रजःप्रवृद्धिकृतं फलविशेषमाह। रजसि प्रवृद्धे प्रलयं मरणं गत्वा प्राप्य देहभृत् कर्मसङ्गिषु कर्मासक्तियुक्तेषु मनुष्येषु जायते। यथा सत्त्वे रजसि च प्रवृद्धे मृतो देहभृत् ब्रह्मलोकादिषु मनुष्यलोके च देवादिषु मनुष्येषु च जायते। तथा तमसि प्रवृद्धे देही मूढानां पश्चादीनां योनिषु जायते उत्पद्यत इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.15।।रजसि प्रवृद्धे सति प्रलयं मृत्युं गत्वा प्राप्य कर्मसङ्गिषु श्रुतिस्मृतिविहितप्रतिषिद्धकर्मफलाधिकारिषु मनुष्येषु जायते। तथा तद्वदेव तमसि प्रवृद्धे प्रलीनो मृतो मूढयोनिषु पश्वादिषु जायते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.15।।कर्मसङ्गिषु श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठातृषु मनुष्येषु। मूढयोनिषु तिर्यक्स्थावरचाण्डालादिषु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.15।।किञ्चैवमेव रजसि प्रवृद्धे प्रलयं गत्वा मृत्युमवाप्य कर्मसङ्गिषु कर्मासक्तेषु तेषु नरेषु पुनस्तदाचरणेन तत्फलभोगार्थं जायते। तथा तमसि प्रवृद्धे प्रलीनो मृतो मूढयोनिष्वासुरेषु जायते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.15।।किंच -- रजसीति। रजसि प्रवृद्धे सति मृत्युं प्राप्य कर्मासक्तेषु मनुष्येषु जायते। तथा तमसि प्रवृद्धे सति प्रलीनो मृतो मूढयोनिषु पश्वादिषु जायते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.15।।रजसीति कर्मसङ्गिषु मध्यमलोकेषु जायते। तमसीति अधोयोनिषु नीचलोकेषु जायते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.15।।रजोगुणकी वृद्धिके समय मरनेपर कर्मसंगियोंमें अर्थात् कर्मोंमें आसक्त हुए मनुष्योंमें उत्पन्न होता है और वैसे ही तमोगुणके बढ़नेपर मरा हुआ मनुष्य मूढ़योनिमें अर्थात् पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.15।। व्याख्या -- रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते -- अन्तसमयमें जिसकिसी भी मनुष्यमें जिसकिसी कारणसे रजोगुणकी लोभ? प्रवृत्ति? अशान्ति? स्पृहा आदि वृत्तियाँ बढ़ जाती हैं और उसी वृत्तिके चिन्तनमें उसका शरीर छूट जाता है? तो वह मृतात्मा प्राणी कर्मोंमें आसक्ति रखनेवाले मनुष्योंमें जन्म लेता है।जिसने उम्रभर अच्छे काम? आचरण किये हैं? जिसके अच्छे भाव रहे हैं? वह यदि अन्तकालमें रजोगुणके बढ़नेपर मर जाता है? तो मरनेके बाद मनुष्ययोनिमें जन्म लेनेपर भी उसके आचरण? भाव अच्छे ही रहेंगे? वह शुभकर्म करनेवाला ही होगा। जिसका साधारण जीवन रहा है? वह यदि अन्तसमयमें रजोगुणकी लोभ आदि वृत्तियोंके बढ़नेपर मर जाता है? तो वह मनुष्ययोनिमें आकर पदार्थ? व्यक्ति? क्रिया आदिमें आसक्तिवाला ही होगा। जिसके जीवनमें काम? क्रोध आदिकी ही मुख्यता रही है? वह यदि रजोगुणके बढ़नेपर मर जाता है? तो वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेनेपर भी विशेषरूपसे आसुरी सम्पत्तिवाला ही होगा। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यलोकमें जन्म लेनेपर भी गुणोंके तारतम्यसे मनुष्योंके तीन प्रकार हो जाते हैं अर्थात् तीन प्रकारके स्वभाववाले मनुष्य हो जाते हैं। परन्तु इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि रजोगुणकी वृद्धिपर मरकर मनुष्य बननेवाले प्राणी कैसे ही आचरणोंवाले क्यों न हों? उन सबमें भगवत्प्रदत्त विवेक रहता ही है। अतः प्रत्येक मनुष्य इस विवेकको महत्त्व देकर सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदिसे इस विवेकको स्वच्छ करके ऊँचे उठ सकते हैं? परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। इस भगवत्प्रदत्त विवेकके कारण सबकेसब मनुष्य भगवत्प्राप्तिके अधिकारी हो जाते हैं।तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते -- अन्तकालमें? जिसकिसी भी मनुष्यमें? जिसकिसी कारणसे तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है अर्थात् तमोगुणकी प्रमाद? मोह? अप्रकाश आदि वृत्तियाँ बढ़ जाती हैं और उन वृत्तियोंका चिन्तन करते हुए ही वह मरता है? तो वह मनुष्य पशु? पक्षी? कीट? पतंग? वृक्ष? लता आदि मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है। इन मूढ़योनियोंमें मूढ़ता तो सबमें रहती है? पर वह न्यूनाधिकरूपसे रहती है जैसे -- वृक्ष? लता आदि योनियोंमें जितनी अधिक मूढ़ता होती है? उतनी मूढ़ता पशु? पक्षी आदि योनियोंमें नहीं होती।अच्छे काम करनेवाला मनुष्य यदि अन्तसमयमें तमोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरकर मूढ़योनियोंमें,भी चला जाय? तो वहाँ भी उसके गुण? आचरण अच्छे ही होंगे? उसका स्वभाव अच्छे काम करनेका ही होगा। जैसे? भरत मुनिका अन्तसमयमें तमोगुणकी वृत्तिमें अर्थात् हरिणके चिन्तनमें शरीर छूटा? तो वे मूढ़योनिवाले हरिण बन गये। परन्तु उनका मनुष्यजन्ममें किया हुआ त्याग? तप हरिणके जन्ममें भी वैसा ही बना रहा। वे हरिणयोनिमें भी अपनी माताके साथ नहीं रहे? हरे पत्ते न खाकर सूखे पत्ते ही खाते रहे? आदि। ऐसी सावधानी मनुष्योंमें भी बहुत कम होती है? जो कि भरत मुनिकी हरिणजन्ममें थी। सम्बन्ध -- अन्तकालमें गुणोंके तात्कालिक बढ़नेपर मरनेवाले मनुष्योंकी ऐसी गतियाँ क्यों होती हैं -- इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.15।।रजःसमुद्रेके मृतस्य फलविशेषं दर्शयति -- रजसीति। जायते शरीरं गृह्णातीत्यर्थः। यथा सत्त्वे रजसि च प्रवृद्धे मृतो ब्रह्मलोकादिषु मनुष्यलोके च देवादिषु मनुष्येषु च जायते तथैवेत्याह -- तद्वदिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.15।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.15।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.15।। --,रजसि गुणे विवृद्धे प्रलयं मरणं गत्वा प्राप्य कर्मसङ्गिषु कर्मासक्तियुक्तेषु मनुष्येषु जायते। तथा तद्वदेव प्रलीनः मृतः तमसि विवृद्धे मूढयोनिषु पश्वादियोनिषु जायते।।अतीतश्लोकार्थस्यैव संक्षेपः उच्यते --,
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【 Verse 14.16 】
▸ Sanskrit Sloka: कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्विकं निर्मलं फलम् | रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमस: फलम् ||
▸ Transliteration: karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṁ nirmalaṁ phalam | rajasastu phalaṁ duḥkham ajñānaṁ tamasaḥ phalam ||
▸ Glossary: karmaṇaḥ: of work; sukṛtasya: in the mode of goodness; āhuḥ: said; sāttvikaṁ: mode of goodness; nirmalaṁ: purified; phalam: result; rajasaḥ: of the mode of passion; tu: but; phalaṁ: result; duḥkham: misery; ajñānaṁ: nonsense; tamasaḥ: of the mode of ignorance; phalam: result
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.16 By acting in the mode of goodness, one becomes purified. Work done in the mode of passion results in distress, and actions performed in the mode of ignorance result in foolishness.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.16।।(विवेकी पुरुषोंने) शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है? राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.16।। शुभ कर्म का फल सात्विक और निर्मल कहा गया है रजोगुण का फल दुख और तमोगुण का फल अज्ञान है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.16 कर्मणः of action? सुकृतस्य (of) good? आहुः (they) say? सात्त्विकम् Sattvic? निर्मलम् pure? फलम् the fruit? रजसः of Rajas? तु verily? फलम् the fruit? दुःखम् pain? अज्ञानम् ignorance? तमसः of inertia? फलम् the fruit.Commentary Good action Sattvic action. The fruit of good action is both happiness and,knowledge.They The wise.Rajas means Rajasic action as this verse deals with action. The fruit of Rajasic action is bitter. Rajasic action brings pain? disappointment and dissatisfaction. Rajasic activity leads to greed. When the Rajasic man tries to gratify his original desires? new desires crop up. This opens the door to greed.Tamas Tamasic action? unrighteous deeds or sin (Adharma). There is no knowledge within and no foresight.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.16. The fruit of good action, they say, is spotless and is of the Sattva; but the fruit of the Rajas is pain, and the fruit of the Tamas is ignorance.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.16 They say the fruit of a meritorious action is spotless and full of purity; the outcome of Passion is misery, and of Ignorance darkness.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.16 The fruits of a good deed, they say, is pure and is of the nature of Sattva. But the fruit of Rajas is pain; and the fruit of Tamas is ignorance.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.16 They say that the result of good work is pure and is born of sattva. But the result of rajas is sorrow; the result of tamas is ignorance.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.16 The fruit of good action, they say, is Sattvic and pure, verily the fruit of Rajas is pain, and ignorance is the fruit of Tamas.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.16 See Comment under 14.20
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.16 Thus, the 'fruit of a good deed,' namely, disinterested work in the form of My worship, performed by one who dies when Sattva prevails - is birth in the family of those who know the self. There he acires more Sattva than before and the self becomes more pure, namely, devoid of the slightest vestige of suffering. So say those who know about the development of Sattva. But the 'fruit of Rajas,' dominating at the time of death, is 'suffering in Samsara.' In consists in successive births in families attached to actions for the sake of fruits. Rirth of this type increases Rajas further, resulting in actions for gaining their fruits. So say those who know about the developments of this Guna. 'Ignorance' is the result of Tamas. The fruit of Tamas dominating at the time of death, is successive conditions of ignorance.
What are the results derived from Sattva etc.? To this, He answers:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.16 Ahuh, they, the wise persons, say; that phalam, the result; sukrtasya, of good; karmanah, work, i.e. acts having the sattva ality; is verily nirmalam, pure; and is sattvikam, born of sattva. Tu, but; phalam, the result; rajasah, of rajas, i.e. of acts that have the alitty of rajas-for the topic relates to actions; is duhkham, sorrow. In accordance with its cause, the result too is indeed sorrow, a product of rajas. So also ajnanam, ignorance; is, as before, (the result) tamasah, of tamas, of unrighteous acts that have the ality of tamas. What else results from the alities?
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.16।। इस श्लोक में संभाषण कुशल भगवान् श्रीकृष्ण पूर्व के श्लोकों में कथित विषय को ही साररूप से वर्णन करते हैं। प्रत्येक गुण के प्रवृद्ध होने पर जो फल प्राप्त होते हैं उनका निर्देश यहाँ एक ही स्थान पर किया गया है।शुभ कर्मों का फल सात्विक और निर्मल कहा गया है। सावधानीपूर्वक अध्ययन करने पर हमें ज्ञात होगा कि अन्तकरण का विचार ही समस्त कर्मों का जनक है विचार बोये गये बीज हैं? तो कर्म हैं अर्जित की गयी उपज। घासपात के बीजों से मात्र घास ही उत्पन्न होगी वैसे ही अशुभ संकल्पों से अशुभ कर्म ही होंगे। बाह्य जगत् में व्यक्त हुए ये अशुभ कर्म दुष्प्रवृत्तियों का संवर्धन करते हैं और इस प्रकार मन के विक्षेप शतगुणित हो जाते हैं।यदि कोई पुरुष सेवा और भक्ति? स्नेह और दया? क्षमा और करुणा का शान्त? सन्तुष्ट? प्रसन्न और पवित्र जीवन जीता है? तो निश्चय ही ऐसा जीवन उसके सात्विक स्वभाव का ही परिचायक है। यह तथ्य जैसे सिद्धान्तत सत्य है वैसे ही लौकिक अनुभव के द्वारा भी सिद्ध होता है। ऐसे आदर्श जीवन जीने वाले पुरुष को अवश्य ही अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त होती है।यहाँ यह प्रश्न सम्भव हो सकता है कि यदि वर्तमान जीवन में कोई व्यक्ति अत्यन्त अधपतित है? तो किस प्रकार वह अपना उद्धार प्रारम्भ कर सकता है। यदि कर्म विचारों की अभिव्यक्ति हैं? और अन्तकरण में स्थित विचारों का स्वरूप अशुभ है? तो ऐसे व्यक्ति के विचारों के आमूल परिवर्तन की अपेक्षा हम कैसे कर सकते हैं विश्व के सभी धर्मों में अपनी विधि और निषेध की भाषा में इस प्रश्न का उत्तर एक मत से यही दिया गया है कि सत्य के साधकों? भगवान् के भक्तों और संस्कृति के समुपासकों को सदाचार और नैतिकता का आदर्श जीवन जीने का प्रयत्न करना चाहिए। वैचारिक परिवर्तन का यह प्रथम चरण है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन को अनुशासित करना और विचारों के स्वरूप को परिवर्तित करना सरल कार्य नहीं है किन्तु कर्मों के प्रकार को परिवर्तित करना और अपने बाह्य आचरण और व्यवहार को संयमित करना अपेक्षाकृत सरल कार्य है। इसलिए? सदाचार और अनुशासित व्यवहार आत्मोत्थान की महान् योजना के प्रारम्भिक चरण माने गये हैं। सदाचार के पालन से शनैशनै सद्विचारों का निर्माण भी प्रारम्भ हो जाता है।यही कारण है कि सभी राष्ट्रों की संस्कृतियों में बालकों से कुछ नियमों के पालन का आग्रह किया जाता है? जैसे श्रेष्ठजनों का आदर? आज्ञाओं का पालन? असत्य का त्याग? शास्त्रों का स्वाध्याय? शिक्षा? स्वच्छता आदि। जब बालक से इन नियमों का पालन करने को कहा जाता है? तब सम्भवत उन्हें ये सब नियम क्रूर नियम प्रतीत होते हैं? जिनका पालन करते हुए उन्हें जीने के लिए बाध्य किया जाता है। तथापि? दीर्घकाल की अवधि में अनजाने ही ये नियम बालकों के विचारों को अनुशासित करते हैं।सदाचार से मन सात्विक और निर्मल बन जाता है। इससे प्राप्त होने वाले फल? मनप्रसाद? न्यूनतम विक्षेप? चित्त की एकाग्रता? श्रद्धा? भक्ति? जिज्ञासा इत्यादि है। विकार और विक्षेप ये मन की अशुद्धियां हैं? जो अशुभ कर्मों से और अधिक प्रवृद्ध होती हैं। सत्कर्म अपने स्वभाव से ही मनोद्वेगों को नष्ट करके मन को शान्त और प्रसन्न करते हैं।रजोगुण का फल दुख और तमोगुण का फल अज्ञान है।पूर्वोक्त विवेचन के प्रकाश में भगवान् के इस कथन को समझना कठिन नहीं है। सत्त्व? रज और तम इन तीन गुणों का लक्षण क्रमश विवेक? विक्षेप और आवरण है। अत साधक का अधिक से अधिक प्रयत्न सत्वगुण में स्थिति की प्राप्ति के लिए होना चाहिए क्योंकि सक्रिय शान्ति की स्थिति ही सत्त्व है? जो मनुष्य के आन्तरिक जीवन का रचनात्मक क्षण होता है।इन गुणों से क्या उत्पन्न होता है सुनो
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.16।।अतीतश्लोकयोः सत्त्वादीनां स्वानुरुपकर्मद्वारेण विचित्रफलहेतुत्वस्य प्रतिपादकयोरर्थं संक्षिप्याह। कर्मणः सुकृतस्य पुण्यस्य सात्त्विकस्य सत्त्वकार्यस्याशुद्धिरहितस्येत्यर्थः। सात्त्विकं सत्त्वेन निर्वृत्तमेव निर्मलं रजस्तमःसंक्षिप्याह। कर्मणः सुकृतस्य पुण्यस्य सात्त्विकस्य सत्त्वकार्यस्याशुद्धिरहितस्येत्यर्थः। सात्त्विकं सत्त्वेन निर्वृत्तमेव निर्मलं रजस्तमःसमुद्भवान्मलाद्रहितं स्वर्गलोकादिषु भोग्यं सुखं फलमाहुः शिष्टाः। रजसस्तु राजसस्य कर्मण इत्यर्थः। कर्मण इति प्रकान्तत्वात् मर्त्यलोके भुज्यमानं कारणानुरुपं राजसं दुःखमेव आहुः। तथा तमसस्तामसस्य कर्मणोऽधर्मस्य पश्वादियोनिषु परिदृश्यमानमज्ञानं फलमाहुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.16।।इदानीं स्वानुरूपकर्मद्वारा सत्त्वादीनां विचित्रफलतां संक्षिप्याह -- सुकृतस्य सात्त्विकस्य कर्मणो धर्मस्य सात्त्विकं सत्त्वेन निर्वृत्तं निर्मलं रजस्तमोमलामिश्रितं सुखं फलमाहुः परमर्षयः। रजसो राजसस्य तु कर्मणः पापमिश्रस्य पुण्यस्य फलं राजसं दुःखं दुःखबहुलमल्पसुखं। कारणानुरूप्यात्कार्यस्य। अज्ञानमविवेकप्रायं दुःखं तामसं तमसस्तामसस्य कर्मणोऽधर्मस्य फलमाहुरित्यनुषज्यते। सात्त्विकादिकर्मलक्षणं चनियतं सङ्गरहितम् इत्यादिनाष्टादशे वक्ष्यति। अत्र रजस्तमःशब्दौ तत्कार्ये कर्मणि प्रयुक्तौ कार्यकरणयोरभेदोपचारातगोभिः श्रीणीत मत्सरम् इत्यत्र यथा गोशब्दस्तत्प्रभवे पयसि? यथावाधान्यमसि धिनुहि देवान् इत्यत्र धान्यशब्दस्तत्प्रभवे तण्डुले? तत्र पयस्तण्डुलयोरिवात्रापि कर्मणः प्रकृतत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.16।।सुकृतस्य सात्त्विकस्य कर्मणः फलं निर्मलं दुःखाज्ञानमलशून्यं सात्त्विकं ज्ञानवैराग्यादिकम्। रजसो राजसस्य कर्मणः फलं दुःखम्। तमसस्तामसस्य कर्मणः फलं अज्ञानम्। सात्विकादिकर्मलक्षणं चनियतं सङ्गरहितम् इत्यादिनाऽष्टादशे वक्ष्यति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.16।।तथाजातानां किं फलं इत्यत आह -- कर्मण इति। सुकृतस्य सुष्ठु भगवदाज्ञया भगवत्तोषहेतुत्वेन कृतस्य सात्त्विकस्य कर्मणः सात्त्विकं विष्णुप्रसादात्मकं निर्मलं दोषरहितं फलमाहुः व्यासकपिलादय इत्यर्थः। तु पुनः रजसो राजसकर्मणो दुःखं संसारात्मकं फलमाहुः। तथा तमसः कर्मणोऽज्ञानं भगवद्वैमुख्यात्मकं फलमाहुः। कर्मस्वरूपं चाऽग्रेऽष्टादशे [श्लो.2325] वक्ष्यति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.16।।इदानीं सत्त्वादीनां स्वानुरूपकर्मद्वारेण विचित्रफलहेतुत्वमाह -- कर्मण इति। सुकृतस्य सात्त्विककर्मणः सात्त्विकं सत्त्वप्रधानं निर्मलं प्रकाशबहुलं सुखं फलमाहुः कपिलादयः। रजस इति राजसस्य कर्मण इत्यर्थः। कर्मफलकथनस्य प्राकृतत्वात्तस्य दुःखं फलमाहुः। तमस इति तामसस्य कर्मण इत्यर्थः। तस्याज्ञानं मूढत्वं फलमाहुः। सात्त्विकादिकर्मलक्षणं चनियतं सङ्गरहितं इत्यादिनाऽष्टादशे वक्ष्यति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.16।।अमरणसमये इह तु फलं सुकृतस्य सत्त्वेन कृतस्य कर्मणः पुण्यरूपस्य निर्मलं भवति दुःखगन्धरहितं अज्ञानादिगन्धरहितं च। रजसस्तु दुःखमज्ञानं तमसः कर्मणः फलं येन च पुनः पुनर्जन्ममरणपर्यावर्त्तेऽपि विवेकाभाव एव भवति। यद्यपिरजः कर्मणि [14।9] इति वाक्यात्कर्ममात्रसम्बन्धो राजस एव तथापि मतान्तररीत्याऽऽह -- कर्मणः सुकृतस्येति। सर्वमेव हि गौणम्। सत्त्वेन कृतस्य कर्मणः सात्त्विकस्य सुकृतपदवाच्यस्य फलमपि सात्त्विकं निर्मलं प्रकाशबहुलं भवति? सुखं चेत्याहुः कापिलाः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.16।।पहले कहे हुए श्लोकोंके अर्थका ही सार कहा जाता है --, श्रेष्ठ पुरुषोंने शुभ कर्मका? अर्थात् सात्त्विक कर्मका फल सात्त्विक और निर्मल ही बतलाया है? तथा राजस कर्मका फल दुःख बतलाया है? अर्थात् कर्माधिकारसे राजस कर्मका फल भी अपने कारणके अनुसार दुःखरूप राजस ही होता है ( ऐसा कहा है ) और वैसे ही? तामसरूप अधर्मका -- पापकर्मका फल अज्ञान बतलाया है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.16।। व्याख्या -- [वास्तवमें कर्म न सात्त्विक होते हैं? न राजस होते हैं और न तामस ही होते हैं। सभी कर्म क्रियामात्र ही होते हैं। वास्तवमें उन कर्मोंको करनेवाला कर्ता ही सात्त्विक? राजस और तामस होता है। सात्त्विक कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म सात्त्विक? राजस कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म राजस और तामस कर्ताके द्वारा किया हुआ कर्म तामस कहा जाता है।]कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् -- सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल? स्वच्छ? निर्विकार है। अतः सत्त्वगुणवाला कर्ता जो कर्म करेगा? वह कर्म सात्त्विक ही होगा क्योंकि कर्म कर्ताका ही रूप होता है। इस सात्त्विक कर्मके फलरूपमें जो परिस्थिति बनेगी? वह भी वैसे ही शुद्ध? निर्मल? सुखदायी होगी।फलेच्छारहित होकर कर्म करनेपर भी जबतक सत्त्वगुणके साथ कर्ताका सम्बन्ध रहता है? तबतक उसकी,सात्त्विक कर्ता संज्ञा होती है और तभीतक उसके कर्मोंका फल बनता है। परन्तु जब गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? तब उसकी सात्त्विक कर्ता संज्ञा नहीं होती और उसके द्वारा किये हुए कर्मोंका फल भी नहीं बनता? प्रत्युत उसके द्वारा किये हुए कर्म अकर्म हो जाते हैं।रजसस्तु फलं दुःखम् -- रजोगुणका स्वरूप रागात्मक है। अतः रागवाले कर्ताके द्वारा जो कर्म होगा? वह कर्म भी राजस ही होगा और उस राजस कर्मका फल भोग होगा। तात्पर्य है कि उस राजस कर्मसे पदार्थोंका भोग होगा? शरीरमें सुखआराम आदिका भोग होगा? संसारमें आदरसत्कार आदिका भोग होगा? और मरनेके बाद स्वर्गादि लोकोंके भोगोंकी प्राप्ति होगी। परन्तु ये जितने भी सम्बन्धजन्य भोग हैं? वे सबकेसब दुःखोंके ही कारण हैं -- ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते (गीता 5। 22) अर्थात् जन्ममरण देनेवाले हैं। इसी दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ राजस कर्मका फल दुःख कहा है।रजोगुणसे दो चीजें पैदा होती हैं -- पाप और दुःख। रजोगुणी मनुष्य वर्तमानमें पाप करता है और परिणाममें उन पापोंका फल दुःख भोगता है। तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनके द्वारा मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है ऐसा पूछनेपर उत्तरमें भगवान्ने रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाली कामनाको ही पाप करानेमें हेतु बताया हैअज्ञानं तमसः फलम् -- तमोगुणका स्वरूप मोहनात्मक है। अतः मोहवाला तामस कर्ता परिणाम? हिंसा? हानि? और सामर्थ्यको न देखकर मूढ़तापूर्वक जो कुछ कर्म करेगा? वह कर्म तामस ही होगा और उस तामस कर्मका फल अज्ञान अर्थात् अज्ञानबहुल योनियोंकी प्राप्ति ही होगा। उस कर्मके अनुसार उसका पशु? पक्षी? कीट? पतङ्ग? वृक्ष? लता? पहाड़ आदि मूढ़योनियोंमें जन्म होगा? जिनमें अज्ञान(मूढ़ता) की मुख्यता रहती है।इस श्लोकका निष्कर्ष यह निकला कि सात्त्विक पुरुषके सामने कैसी परिस्थिति आ जाय? पर उसमें उसको दुःख नहीं हो सकता। राजस पुरुषके सामने कैसी ही परिस्थिति आ जाय? पर उसमें उसको सुख नहीं हो,सकता। तामस पुरुषके सामने कैसी ही परिस्थिति आ जाय ? पर उसमें उसका विवेक जाग्रत् नहीं हो सकता? प्रत्युत उसमें उसकी मूढ़ता ही रहेगी।गुण (भाव) और परिस्थिति तो कर्मोंके अऩुसार ही बनती है। जबतक गुण (भाव) और कर्मोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक मनुष्य किसी भी परिस्थितिमें सुखी नहीं हो सकता। जब गुण और कर्मोंके साथ सम्बन्ध नहीं रहता? तब मनुष्य किसी भी परिस्थितिमें कभी दुःखी नहीं हो सकता और बन्धनमें भी नहीं पड़ सकता।जन्मके होनेमें अन्तकालीन चिन्तन ही मुख्य होता है और अन्तकालीन चिन्तनके मूलमें गुणोंका बढ़ना होता है तथा गुणोंका बढ़ना कर्मोंके अनुसार होता है। तात्पर्य है कि मनुष्यका जैसा भाव (गुण) होगा? वैसा यह कर्म करेगा और जैसा कर्म करेगा? वैसा भाव दृढ़ होगा तथा उस भावके अनुसार अन्तिम चिन्तन होगा। अतः आगे जन्म होनेमें अन्तकालीन चिन्तन ही मुख्य रहा। चिन्तनके मूलमें भाव और भावके मूलमें कर्म करता है। इस दृष्टिसे गतिके होनेमें अन्तिम चिन्तन? भाव (गुण) और कर्म -- ये तीनों कारण हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेपर जो गतियाँ होती हैं? उनके मूलमें सात्त्विक? राजस और तामस कर्म बताये। अब सात्त्विक? राजस और तामस कर्मोंके मूलमें गुणोंको बतानेके लिये भगवान् आगेका श्लोक बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.16।।भावानां फलमुक्त्वा सात्त्विकादीनां कर्मणां फलमाह -- अतीतेति। सुकृतस्य शोभनस्य कृतस्य पुण्यस्येत्यर्थः। सात्त्विकस्याशुद्धिरहितस्येति यावत्। सात्त्विकं सत्त्वेन निर्वृत्तं निर्मलं रजस्तमःसमुद्भवान्मलान्निष्क्रान्तम्। रजश्शब्दस्य राजसे कर्मणि कुतो वृत्तिस्तत्राह -- कर्मेति। दुःखमेव दुःखबहुलं सुखमेवेत्यर्थः। कथमित्थं व्याख्यायते तत्राह -- कारणेति। पापमिश्रस्य पुण्यस्य रजोनिमित्तस्य कारणत्वात्तदनुरोधात्फलमपि रजोनिमित्तं यथोक्तं युक्तमित्यर्थः। अज्ञानमविवेकप्रायं दुःखं तामसाधर्मफलमित्याह -- तथेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.16।।दुःखशब्दः केवलदुःखवाचीत्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह रजस इति। दुःखशब्देनोच्यत इति शेषः। तत्कथं इत्यत उक्तम् अल्पेति। अल्पत्वात्सुखस्याविवक्षेति भावः। कुतः इत्यत आह -- तथा हीति। रजस इति पञ्चमी। मात्रयेति सुखविशेषणम्। स्तोकात्मकं सुखं दुःखं चेत्यर्थः। तान् राजसकर्मिणः। केवलदुःखार्थाङ्गीकारे बाधकं चाह -- अन्यथेति। अतिकष्टत्वात् ज्ञानादपि कष्टत्वात्। तत्फलकस्य रजसः। तथा चमध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ৷৷. अधो गच्छिन्ति तामसाः। [14।18] इत्याद्ययुक्तं स्यादिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.16।।रजसस्तु फलं दुःखमित्यल्पसुखं दुःखम्। तथा हि शार्कराक्षशाखायाम् -- रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखं तस्मात्तान्सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते इति। अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात्तमोधिकत्वं रजसो न स्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.16।। --,कर्मणः सुकृतस्य सात्त्विकस्य इत्यर्थः? आहुः शिष्टाः सात्त्विकम् एव निर्मलं फलम् इति। रजसस्तु फलं दुःखं राजसस्य कर्मणः इत्यर्थः? कर्माधिकारात् फलम् अपि दुःखम् एव? कारणानुरूप्यात् राजसमेव। तथा अज्ञानं तमसः तामसस्य कर्मणः अधर्मस्य पूर्ववत्।।किं च गुणेभ्यो भवति --,
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【 Verse 14.17 】
▸ Sanskrit Sloka: सत्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च | प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ||
▸ Transliteration: sattvātsañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva ca | pramādamohau tamaso bhavato’jñānameva ca ||
▸ Glossary: sattvāt: from the mode of goodness; sañjāyate: develops; jñānaṁ: knowledge; rajasaḥ: from the mode of passion; lobhaḥ: greed; eva: certainly; ca: also; pramāda: madness; mohau: illusion; tamasaḥ: from the mode of ignorance; bhavataḥ: develops; ajñānam: ignorance; eva: certainly; ca: also
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.17 From the mode of goodness, real knowledge develops; from the mode of passion, greed develops; from the mode of ignorance develops foolishness, madness and illusion.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.17।।सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद? मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.17।। सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद? मोह और अज्ञान उत्पन्न होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.17 सत्त्वात् from purity? सञ्जायते arises? ज्ञानम् knowledge? रजसः from activity? लोभः greed? एव even? च and? प्रमादमोहौ heedlessness and delusion? तमसः from inertia? अज्ञानम् ignorance? एव even? च and.Commentary From Sattva When Sattva becomes predominant. Sattva awakesn knowledge just as the sun causes daylight. Sattva enlightens the intellect.Greed is insatiable like fire. Greed brings misery and pain. Greed is born of Rajas. Rajas creates insatiable desire. Rajas makes one blind to the interests and the feelings of others. A Rajasic man treats others as tools to be utilised for his own selfadvancement or selfaggrandisement.Tamas produces shortsightedness? torpor and ignorance. A Tamasic man does not think a bit of the future conseences. He completely identifies himself with the body and begins to fight with people if they injure his body or speak ill of him. He is ready to do any sinful act in retaliation. He has no sense of proportion and no sense of balance or poise.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.17. From the Sattva arises wisdom; from the Rajas only greed; and from the Tamas arise negligence, delusion and also ignorance.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.17 Purity engenders Wisdom, Passion avarice, and Ignorance folly, infatuation and darkness.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.17 From the Sattva arises knowledge, and from Rajas greed, from Tamas arise negligence and delusion, and, indeed ignorance.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.17 From sattva is born knowledge [Knowledge acired through the sense-organs.], and from rajas, verily, avarice. From tamas are born inadvertence and delusion as also ignorance, to be sure.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.17 From Sattva arises knowledge, and greed from Rajas; heedlessness and delusion arise from Tamas, and also ignorance.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.17 See Comment under 14.20
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.17 From the increase of Sattva, knowledge i.e., 'true and direct knowledge' of the self arises. From Rajas develops likewise 'intense desire' for heaven etc. From Tamas similarly develops 'negligence' leading to evil deeds; and from this, delusion, i.e., erroneous knowledge; and from that still more Tamas; and thence ignorance, namely absence of knowledge.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.17 Sattvat, from sattva, when it predominates; sanjayate, is born; jnanam, knowledge; and rajasah, from rajas; is verily born lobhah, avarice. Tamasah, from tamas; bhavatah, are born; both pramada-mohau, in-advertence and delusion; as also ajnanam, ignorance [Absence of discrimination.]; eva ca, to be sure. Further,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.17।। मन और बुद्धि के रंगमञ्च पर प्रवेश करने पर ये तीन गुण जिस भूमिका का निर्वाह करते हैं? उसका निर्देश इस श्लोक में किया गया है। इनका विस्तृत वर्णन पहले किया जा चुका है।सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है स्वयं चैतन्यस्वरूप आत्मा में विषयों का अभाव होने से उसका किसी विषय को जानने का प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु चैतन्य से युक्त अन्तकरण की बुद्धिवृत्तियों विषयों को प्रकाशित करती है। यदि अन्तकरण शुद्ध और शान्त अर्थात् सात्त्विक हो तो उसकी ज्ञानक्षमता अधिक होती है। ऐसे शुद्ध मन के द्वारा ही नित्यशुद्धबुद्धमुक्त आत्मा का अपरोक्षानुभव हो सकता है।रजोगुण से लोभ तथा तज्जनित अनेक प्रकार की स्वार्थमूलक प्रवृत्तियां और विक्षेप उत्पन्न होते हैं।तमोगुण से प्रमाद? मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। विषय को किसी प्रकार से भी नहीं जानना अज्ञान है? जब कि दो वस्तुओं या कर्मों में विवेक का अभाव होना मोह कहलाता है। धर्मअधर्म? सत्यअसत्य? आत्माअनात्मा इत्यादि का विवेक न होना मोह है। किसी भी कर्म में सावधानी न रखना या वस्तु को अन्य प्रकार से समझना प्रमाद कहलाता है। इसके कारण बाह्य जगत् में सुख की कल्पना करके मनुष्य उसी में भटकता रहता है। सम्पूर्ण समुद्र में क्या एक पात्र भर मधुर जल मिल सकता है वस्तुत नहीं? परन्तु तमोगुण के वशीभूत पुरुष उसी के लिए प्रयत्न करता रहता है और जब उसे दुख भोगने पड़ते हैं? तो इसका दोष वह जगत् को देता है यह सब्ा तमोगुण का कार्य़ है।आगे कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.17।।किंच गुणेभ्यो भवति एतादृशफलवैचित्र्यमित्यपेक्षायामाह -- सत्त्वादिति। रजस्तमसी अभिभूय लब्धात्मकात्मत्त्वाज्ज्ञानं संजायते। रजसा सत्त्वं तमश्चाभिभूय लब्धस्वरुपाल्लोभः संजायते। चः प्रवृत्त्यादिसमुच्चायार्थः। एवकारो व्यभिचारवारणार्थः। एवं रजःसत्त्वं चाभिभूयोद्भूतात्तमसः प्रमादमोहौ भवतोऽज्ञानं च भवति। अव्ययार्थः प्राग्वत्। तथाच प्रकाशजनकसत्त्वकार्यस्य कर्मणः प्रकाशबहुलं सुखमेव फलमनुरुपं लोभादिजन्करजःकार्यस्य कर्मणः दुःखबहुलमेव फलमनुरुपं प्रमादादिजनकं तमःकार्यस्य कर्मणोऽज्ञानबहुलमेव फलं उचितमिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.17।।एतादृशे फलवैचित्र्ये पूर्वोक्तमेव हेतुमाह -- सर्वकरणद्वारकं प्रकाशरूपं ज्ञानं सत्त्वात्संजायते? अतस्तदनुरूपं सात्त्विकस्य कर्मणः प्रकाशबहुलं सुखं फलं भवति। रजसो लोभो विषयकोटिप्राप्त्यापि निवर्तयितुमशक्योऽभिलाषविशेषो जायते। तस्य च निरन्तरमुपचीयमानस्य पूरयितुमशक्यस्य सर्वदा। दुःखहेतुत्वात्तत्पूर्वकस्य राजसस्य कर्मणो दुःखं फलं भवति। एवं प्रमादमोहौ तमसः सकाशाद्भवतो जायेते। अज्ञानमेव च भवति। एवकारः प्रकाशप्रवृत्तिव्यावृत्त्यर्थः। अतस्तामसस्य कर्मणस्तामसज्ञानादिप्रायमेव फलं भवतीति युक्तमेवेत्यर्थः। अत्र चाज्ञानमप्रकाशः प्रमादो मोहश्चाप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्चेत्यत्र व्याख्यातौ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.17।।एतादृशफलवैचित्र्ये पूर्वोक्तमेव हेतुमाह -- सत्त्वादिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.17।।ननु स्वरूपज्ञानाभावे कथं तादृक्कर्मकरणं सम्भवति इत्यत आह -- सत्त्वादिति। सत्त्वात् ज्ञानं सञ्जायते? तादृक्स्वभावविशिष्टस्यैव प्रकटनात्। तथा रजसो रजोगुणाल्लोभः पापमूलको भवतीति। तस्य च दुःखात्मकत्वात्तदेव भवति। तमसस्तामसगुणात् प्रमादमोहौ भवतः। ततस्ताभ्यां चाज्ञानमेव भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.17।। तत्रैव हेतुमाह -- सत्त्वादिति। सत्त्वाज्ज्ञानं संजायते। अतः सात्त्विकस्य कर्मणः प्रकाशबहुलं सुखं फलं भवति। रजसो लोभो जायते। तस्य च दुःखहेतुत्वात्? तत्पूर्वकस्य कर्मणो दुःखं फलं भवति। तमसस्तु प्रमादमोहाज्ञानानि भवन्ति। ततस्तामसस्य कर्मणोऽज्ञानप्रापकं फलं भवतीति युक्तमेवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.17।।तर्हि सत्त्वादिजनितं निर्मलादिफलं किं इत्यत्राह -- सत्त्वादिति। ज्ञानं वस्तुयाथात्म्यापरोक्षरूपं जायते। रजसस्तु स्वर्गादौ फले लोभः? तमसः पुनरनवधानमोहतत्त्वज्ञानाभावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.17।।गुणोंसे क्या उत्पन्न होता है ( सो कहते हैं -- ) उत्कर्षको प्राप्त हुए सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुणसे लोभ होता है तथा तमोगुणसे प्रमाद और मोह -- ये दोनों होते हैं और अज्ञान भी होता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.17।। व्याख्या -- सत्त्वात्संजायते ज्ञानम् -- सत्त्वगुणसे ज्ञान होता है अर्थात् सुकृतदुष्कृत कर्मोंका विवेक जाग्रत् होता है। उस विवेकसे मनुष्य सुकृत? सत्कर्म ही करता है। उन सुकृत कर्मोंका फल सात्त्विक? निर्मल होता है।रजसो लोभ एव च -- रजोगुणसे लोभ आदि पैदा होते हैं। लोभको लेकर मनुष्य जो कर्म करता है? उन कर्मोंका फल दुःख होता है।जितना मिला है? उसकी वृद्धि चाहनेका नाम लोभ है। लोभके दो रूप हैं -- उचित खर्च न करना और अनुचित रीतिसे संग्रह करना। उचित कामोंमें धन खर्च न करनेसे? उससे जी चुरानेसे मनुष्यके मनमें अशान्ति? हलचल रहती है और अनुचित रीतिसे अर्थात् झूठ? कपट आदिसे धनका संग्रह करनेसे पाप बनते हैं? जिससे नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगना पड़ता है। इस दृष्टिसे राजस कर्मोंका फल दुःख होता है।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च -- तमोगुणसे प्रमाद? मोह और अज्ञान पैदा होता है। इन तीनोंके बुद्धिमें आनेसे विवेकविरुद्ध काम होते हैं (गीता 18। 32)? जिससे अज्ञान ही बढ़ता है? दृढ़ होता है।यहाँ तो तमोगुणसे अज्ञानका पैदा होना बताया है और इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें अज्ञानसे तमोगुणका पैदा होना बताया है। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे वृक्षसे बीज पैदा होते हैं और उन बीजोंसे आगे बहुतसे वृक्ष पैदा होते हैं? ऐसे ही तमोगुणसे अज्ञान पैदा होता है और अज्ञानसे तमोगुण बढ़ता है? पुष्ट होता है।पहले आठवें श्लोकमें भगवान्ने प्रमाद? आलस्य और निद्रा -- ये तीन बताये। परन्तु तेरहवें श्लोकमें और यहाँ प्रमाद तो बताया? पर निद्रा नहीं बतायी। इससे यह सिद्ध होता है कि आवश्यक निद्रा तमोगुणी नहीं है और निषिद्ध भी नहीं है तथा बाँधनेवाली भी नहीं है। कारण कि शरीरके लिये आवश्यक निद्रा तो सात्त्विक पुरुषको भी आती है और गुणातीत पुरुषको भी वास्तवमें अधिक निद्रा ही बाँधनेवाली? निषिद्ध और तमोगुणी है क्योंकि अधिक निद्रासे शरीरमें आलस्य बढ़ता है? पड़े रहनेका ही मन करता है? बहुत समय बरबाद हो जाता है।विशेष बातयह जीव साक्षात् परमात्माका अंश होते हुए भी जब प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब इसका प्रकृतिजन्य गुणोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। फिर गुणोंके अनुसार उसके अन्तःकरणमें वृत्तियाँ पैदा होती हैं। उन वृत्तियोंके अनुसार कर्म होते हैं और इन्हीं कर्मोंका फल ऊँचनीच गतियाँ होती हैं। तात्पर्य है कि जीवितअवस्थामें अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं और मरनेके बाद ऊँचनीच गतियाँ होती हैं। वास्तवमें उन कर्मोंके मूलमें भी गुणोंकी वृत्तियाँ ही होती हैं? जो कि पुनर्जन्मके होनेमें खास कारण हैं (गीता 13। 21)। तात्पर्य है कि गुणोंका सङ्ग कर्मोंसे कमजोर नहीं है। जैसे कर्म शुभअशुभ फल देते हैं? ऐसे ही गुणोंका सङ्ग भी शुभअशुभ फल देता है (गीता 8। 6)। इसीलिये पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें पहले चौदहवेंपन्द्रहवें श्लोकोंमें गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेका फल बताया और जीवितअवस्थामें जो परिस्थितियाँ आती हैं? उनको सोलहवें श्लोकमें बताया तथा आगे अठारहवें श्लोकमें गुणोंकी स्थायी वृत्तियोंका फल बतायेंगे। अतः वृत्तियों और कर्मोंके होनेमें गुण ही मुख्य हैं। इस पूरे प्रकरणमें गुणोंकी मुख्य बात इसी (सत्रहवें) श्लोकमें कही गयी है।जिसका उद्देश्य संसार नहीं है? प्रत्युत परमात्मा है? वह साधारण मनुष्योंकी तरह प्रकृतिमें स्थित नहीं है। अतः उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंकी परवशता नहीं रहती और साधन करतेकरते आगे चलकर जब अहंता परिवर्तित होकर लक्ष्यकी दृढ़ता हो जाती है? तब उसको अपने स्वतःसिद्ध गुणातीत स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसीका नाम बोध है। इस बोधके विषयमें भगवान्ने इस अध्यायका पहलादूसरा श्लोक कहा और गुणातीतके विषयमें बाईसवेंसे छब्बीसवेंतकके पाँच श्लोक कहे। इस तरह यह पूरा अध्याय गुणोंसे अतीत स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव करनेके लिये ही कहा गया है। सम्बन्ध -- तात्कालिक गुणोंके बढ़नेपर मरनेवालोंकी गतिका वर्णन तो चौदहवेंपन्द्रहवें श्लोकोंमें कर दिया परन्तु जिनके जीवनमें सत्त्वगुण? रजोगुण अथवा तमोगुणकी प्रधानता रहती है? उनकी (मरनेपर) क्या गति होती है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.17।।विहितप्रतिषिद्धज्ञानकर्माणि सत्त्वादीनां लक्षणानि संक्षिप्य दर्शयति -- किञ्चेति। ज्ञानं सर्वकरणद्वारकम्। अज्ञानं विवेकाभावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.17।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.17।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.17।। --,सत्त्वात् लब्धात्मकात् संजायते समुत्पद्यते ज्ञानम्? रजसो लोभ एव च? प्रमादमोहौ च उभौ तमसो भवतः? अज्ञानमेव च भवति।।किं च --,
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【 Verse 14.18 】
▸ Sanskrit Sloka: ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: | जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा: ||
▸ Transliteration: ūrdhvaṁ gacchanti sattvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ | jaghanyaguṇavṛttisthā adho gacchanti tāmasāḥ ||
▸ Glossary: ūrdhvaṁ: upwards; gacchanti: go; sattvasthāḥ: one who is situated in the mode of goodness; madhye: in the middle; tiṣṭhanti: dwell; rājasāḥ: those who are situated in the mode of passion; jaghanya: abominable; guṇa: quality; vṛttisthāḥ: occupation; adhaḥ: down; gacchanti: go; tāmasāḥ: people in the mode of ignorance
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.18 Those situated in the mode of goodness gradually go upward to the higher world; those in the mode of passion live on the earthly planets; and those in the mode of ignorance go down to the worlds below.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.18।।सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.18।। सत्त्वगुण में स्थित पुरुष उच्च (लोकों को) जाते हैं राजस पुरुष मध्य (मनुष्य लोक) में रहते हैं और तमोगुण की अत्यन्त हीन प्रवृत्तियों में स्थित तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.18 ऊर्ध्वम् upwards? गच्छन्ति go? सत्त्वस्थाः in Sattva seated? मध्ये in the middle? तिष्ठन्ति dwell? राजसाः the Rajasic? जघन्यगुणवृत्तिस्थाः abiding in the function of the lowest Guna? अधः downwards? गच्छन्ति go? तामसाः the Tamasic.Commentary Those who abide in Sattva become the lords of heaven after giving up the physical body. The Rajasic are rorn on this earth as human beings. The Tamasic go downwards? i.e.? they will be born in the wormbs of cattle and beasts. They may take their birth amongst the lowest grades of human beings. The lowest grades of human beings are only brutes though they have assumed human form. Their actions are brutal. Therefore it is not necessary for them to enter into animal incarnation.Man identifies himself with Nature on account of the force of ignorance or illusory knowledge and gets attached to the alities of Nature. This is the cause of his birth in the wombs of high or low creatures. He feels? I am happy? miserable or deluded? on account of the attachment to the Gunas.The nature of the Gunas? their functions? how they bind a man to the Samsara? the effects of each Guna when it is predominant? and the plane reached by the man when he is under the influence of a particular Guna are described in the previous verses. Now the Lord describes in the following verse that liberation comes when one knows Him Who is above the three Gunas.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.18. Those who are established in the Sattva, go upward; the persons given to the Rajas, remain in the middle [state]; those who are given to the Tamas, being established in the tendencies of bad alities, go downwards.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.18 When Purity is in the ascendant, the man evolves; when Passion, he neither evolves nor degenerates; when Ignorance, he is lost.
▸ English Translation By Swami
Chapter 14 (Part 8)
Adidevananda: 14.18 Those who rest in Sattva rise upwards; those who abide in Rajas remain in the middle; and those, abiding in the tendencies of Tamas go downwards.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.18 People who conform to sattva go higher up; those who conform to rajas stay in the middle; those who conform to tamas, who conform to the actions of the lowest ality, go down.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.18 Those who are seated in Sattva go upwards; the Rajasic dwell in the middle; and the Tamasic, abiding in the function of the lowest Guna, go downwards.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.18 See Comment under 14.20
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.18 Thus, in the manner explained, those who 'rest in Sattva rise upwards,' namely, they attain liberation from the bonds of Samsara gradually. Those who, 'abiding in Rajas' which produces greed for heaven etc., engage themselves in actions which constitute the means for obtaining such results. Experiencing those results, they are born again and engage in, and perform, the very same acts. So they remain in the 'middle'. This is mostly suffering, as it is characterised by rirths. Those of Tamasic nature 'stoop down' into lower levels, as Tamas grows ever worse in them. They go 'downwards' i.e., to the lowest state among human beings, then to the condition of animals; then to that of worms; insects etc., then of immovable things, and even to the condition of shrubs and creepers, and ultimately to the condition of stones, wood, clod of earth, straw etc.
Sri Krsna now teaches about the manner of those in whom the Sattva has gradually increased by adopting special holy food and performance of special disinterested deeds, and who thus rise upward by transcending the Gunas.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.18 Sattvasthah, people who conform to sattva, to the actions of sattva ality; gacchanti, go, are born; undhavam, higher up, in the worlds of gods and others. Rajasah, those who conform to rajas; [Those who are endowed with sense-knowledge and actions conseent on the preponderance of rajas.] tisthanti, stay, are born; madhye, in the middle, among human beings. Tamasah, those who conform to tamas, jaghanya-gunavrttasthah [A variant reading is vrttisthah.-Tr.], who conform to actions of the lowest ality of tamas, those who are attached to its actions-sleep, laziness, etc.-, the foolish; gacchanti, go; adhah, down, (i.e.) they are born among cattle etc. The association, owing to the false ignorance in the form of 'being seated in Nature', that an individual soul has with the gunas-in the form of happiness, sorrow and delusion, and which are matters of experience in such ways as, 'I am happy,' 'I am sorrowful,' 'I am ignorant,'-that (association) is the cause of the individual soul's mundane existence characterized by coming to have births in good and bad species. This was stated briefly in the earlier chapter. Elaborating that here in the text beginning with, 'the alities, viz sattva, rajas and tamas, born of Nature' (5), the Lord has said that the nature of the alities, the conduct conforming to the alities, and the power to bind that the alities have through actions conforming to them, and also the course of a person under the bondage, of behaviour conforming to the alities,-all this is false knowledge; it has ignorance as its root and is the cause of bondage. Now, it is necessary to state that Liberation follows from right knowledge. Hence the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.18।। विकास के सोपान के तीन पाद हैं। न्यूनतम विकास की अवस्था में वनस्पति और पशु जगत् हैं। बुद्धि और प्रतिभा से सम्पन्न मनुष्य मध्य में स्थित है और वेदों से ज्ञात होता है कि स्वर्ग के देवतागण मनुष्य से उच्चतर अवस्था में रहते हैं। यहाँ विकास का अर्थ है अनुभवों का विशाल क्षेत्र और ज्ञान? विक्षेपों की न्यूनता और बुद्धि की प्रखरता का होना। विकास को नापने का मापदण्ड प्राणियों के द्वारा अनुभव की गई सुख? शान्ति और आनन्द की मात्रा है।इस दृष्टि से पाषाण का विकास शून्य माना जायेगा। तत्पश्चात् विकास की श्रेष्ठतर अवस्थाओं का क्रम है वनस्पति? पशु? मनुष्य और देवता। निसन्देह प्रखर बुद्धि युक्त मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ प्राणी है किन्तु उसकी,भी देशकाल की सीमाएं होती हैं। इन सीमाओं के टूट जाने पर मनुष्य देवताओं की श्रेष्ठतर योनि प्राप्त करता है। उदाहरणार्थ? दो मंजिलों की एक इमारत है। दूसरी मंजिल पर स्थित कमरे में पहँचने के लिये जो सोपान बना है? वह दो भागों में विभाजित है। प्रथम भाग में कुछ पायदानों को चढ़ने के पश्चात् मध्य में एक स्थान है? जहाँ से घूमकर सोपान के दूसरे भाग पर चढ़ना पड़ता है। जो लोग सबसे नीचे खड़े हैं? उन्हें विकास के निम्नस्तर पर मानें और जो मध्यस्थान में खड़े है वे उच्चतर स्थिति में हैं? जबकि सोपान के दूसरे भाग को चढ़कर जो लोग वहाँ हैं? वे उच्चतम अवस्था में हैं। सबसे नीचे हैं वनस्पति और पशु मध्य में है मनुष्य और उससे उच्चतर स्थिति में हैं देवतागण।ध्यान रहे कि इन तीनों में से कोई भी उस आराम और सुखसुविधाओं से पूर्ण कमरे में नहीं पहुँचा है। मध्य में स्थित मनुष्य को उच्चतर या निम्नतर स्थिति में जाने की स्वतंत्रता है। इस चित्र को यदि हम भलीभांति समझ लेते हैं तो हिन्दू दर्शनशास्त्र में वर्णित विकास के सिद्धान्त को हमने किसी सीमा तक समझ लिया है यह माना जा सकता है। यहाँ विकास का माप दण्ड प्रत्येक विकसित प्राणी के द्वारा अभिव्यक्ति की गयी चैतन्य की मात्रा है।सत्त्वस्थ पुरुष उच्च लोकों को प्राप्त होते हैं जो लोग विवेक? विचार? यथार्थ निर्णय और आत्मसंयम का शुद्ध जीवन जीते हैं? उनमें सत्त्वगुण की उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। ऐसे शान्त? रचनात्मक और शक्तिशाली पुरुष की प्रगति उच्चतर लोक की ओर होती है।कामना और विक्षेप? महत्त्वाकांक्षा और उपलब्धि से पूर्ण रजोगुणी स्वभाव के लोग बारम्बार मनुष्य लोक को तब तक प्राप्त होते रहते हैं? जब तक वे आवश्यक चित्तशुद्धि नहीं प्रप्त कर लेते हैं।प्रमाद? मोह और अज्ञान जैसी हीन प्रवृत्तियों में रमने वाले जीव अपना अधपात करा लेते हैं।मरणोपरान्त भी जीव के अस्तित्व की अखण्डता का वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्ण ने जीव की गति पर पड़ने वाले त्रिगुणों के प्रभाव को भी दर्शाया था। उपर्युक्त श्लोक उसी का सारांश है। परन्तु फिर संसार से मुक्ति कहाँ है रज्जुस्वरूप ये तीनों गुण हमें देह और उसके दुखों? मन और उसके विक्षेपों? बुद्धि और उसके स्पन्दनों और उसके परिच्छेदों से बांध देते हैं। इस संसार बन्धन से मुक्त होकर अपने सच्चिदानन्द स्वरूप का अनुभव हमें कब होगाअब तक त्रिगुणों के स्वरूप? लक्षण तथा मरणोपरान्त जीव की गति पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन किया गया है। परन्तु यह सब हमारे बन्धनों के कारणों का ही वर्णन है।प्रकृति में स्थित पुरुष ही जीव कहलाता है। अनित्य जगत् का अनुभव? निराशाओं के दुख यही सब जीव का संसार है। त्रिगुणों से अतीत होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।अत्यधिक ज्वर से पीड़ित रोगी के मस्तक और पीठ में असहनीय पीड़ा होती है। यह पीड़ा रोग का लक्षण है। ज्वर के उतरने पर भी रोगी को कष्ट होता रहता है। उस रोग के लक्षणों से सर्वथा मुक्त होकर जब उस पुरुष को पूर्व की भाँति स्वास्थ्य और शक्ति प्राप्त हो जाती है? केवल तभी उसे हम पूर्ण स्वस्थ कह सकते हैं। उसी प्रकार? वास्तविक मोक्ष तीनों गुणों से अतीत होकर अपने आनन्दस्वरूप में स्थित हो जाना है।अब? सम्यक् दर्शन से मोक्ष किस प्रकार प्राप्त होता है उसका वर्णन करते है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.18।।तस्मात्सत्त्व एव स्थेयं नतु रजसि समसि वेति बोधनाय सत्त्वादिगुणवत्तत्शितानां फलभेदं वदन्नुपसंहरति -- ऊर्ध्वमिति। अत्र तमसि वृत्तशब्दप्रयोगात् सत्त्वरजसोरपि वृत्तमेव विवक्षितं सत्त्वस्थाः। सत्त्ववृते शास्त्रीयोपासनायां कर्मणइ च निरताः ऊर्ध्वं उपासनादितारतम्येन ब्रह्मलोकपर्यन्तं गच्छन्ति देवेषु उत्पद्यन्ते। तथा राजसाः रजोगुणवृत्ते लोबादिपूर्वके काम्यनिषिद्धादिराजसे कर्मणि स्थिताः मध्ये दुःखबहुलेऽल्पसुखे मनुष्यलोके तिष्ठन्ति मनुष्येषूत्पद्यन्ते। जघन्यः गुणद्वयापेक्षया निकृष्टः स चासौ गुणश्च तस्य जघन्यगुणस्य तमसः वृत्ते निद्रालस्यादौ स्थिता जघन्यगुणवृत्तस्था मूढाः सदैव तामसाः अधो गच्छन्ति पश्वादिषूत्पद्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.18।।इदानीं सत्त्वादिवृत्तस्थानां प्रागुक्तमेव फलमूर्ध्वमध्याधोभावेनाह -- अत्र तृतीये गुणे वृत्तशब्दप्रयोगादाद्ययोरपि वृत्तमेव विवक्षितं? तेन सत्त्वस्थाः सत्त्ववृत्ते शास्त्रीये ज्ञाने कर्मणि च निरता ऊर्ध्वं सत्यलोकपर्यन्तं देवलोकं गच्छन्ति ते देवेषूत्पद्यन्ते ज्ञानकर्मतारतम्येन। तथा मध्ये मनुष्यलोके पुण्यपापमिश्रे तिष्ठन्ति नतूर्ध्वं गच्छन्त्यधो वा मनुष्येषूत्पद्यन्ते। राजसा रजोगुणवृत्ते लोभादिपूर्वके राजसे कर्मणि निरताः। जघन्यगुणवृत्तस्था जघन्यस्य गुणद्वयापेक्षया पश्चाद्भाविनो निकृष्टस्य तमसो गुणस्य वृत्ते निद्रालस्यादौ स्थिता अधो गच्छन्ति पश्वादिषूत्पद्यन्ते। कदाचिज्जघन्यगुणवृत्तस्थाः सात्त्विका राजसाश्च भवन्त्यत आह -- तामसाः सर्वदा तमःप्रधाना इतरेषां कदाचित्तद्वृत्तस्थत्वेऽपि न तत्प्रधानतेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.18।।यतः सत्त्वादिभ्यो ज्ञानादीनि जायन्तेऽतः सत्त्वादिवृद्धिकाले प्रलयं गच्छन्तः। क्रमेणोत्तममध्यमाधमासु योनिषु जायन्त इत्याह -- ऊर्ध्वमिति। ऊर्ध्वं देवभावे। मध्ये मानुषभावे। अधः नरकतिर्यक्स्थावरभावे। जघन्यं निन्द्यं यद्गुणवृत्तं निद्रालस्यप्रमादादि तत्स्थास्तामसाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.18।।अथ तेषां फलं तद्रूपं चाह -- ऊर्ध्वमिति। सत्त्वस्थाः सात्त्विककर्मनिरता ऊर्ध्वं सत्यादिलोकं गच्छन्ति। राजसा राजसकर्मनिरता मध्ये मनुष्यलोके दुःखावृते राज्यादिसुखफले तिष्ठन्ति। जघन्यगुणतामसतद्वृत्तिस्थास्तत्कर्मसु वर्तमानास्तामसा अधो नरकादिनीचयोनिषु गच्छन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.18।। इदानीं सत्त्वादिवृत्तिशीलानां फलभेदमाह -- ऊर्ध्वमिति। सत्त्वस्थाः सत्त्ववृत्तिप्रधाना ऊर्ध्वं गच्छन्ति। सत्त्वोत्कर्षतारतम्यादुत्तरोत्तरशतगुणानन्दान्मनुष्यगन्धर्वपितृदेवादिलोकान्सत्यलोकपर्यन्तान्प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। राजसास्तु तृष्णाद्याकुला मध्ये तिष्ठन्ति मनुष्यलोक एवोत्पद्यन्ते। जघन्योऽतिनिकृष्टस्तमोगुणस्तस्य वृत्तिः प्रमादमोहादिस्तत्र स्थिता अधो गच्छन्ति। तमोवृत्तितारतम्यात्तामिस्रादिषु निरयेषूत्पद्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.18।।तैर्गतिभेदमाह -- ऊर्ध्वं गच्छन्तीति। ब्रह्मलोकपर्यन्तमपि मोक्षं च। राजसास्तु मध्ये ततोऽधरस्थाने लोभस्य च तत्र निरूपितत्वात्। जघन्योऽधमो गुणस्तमोरूपः? तस्य वृत्तिः प्रमादमोहादिः? तत्र तेन वा स्थिता अधो गच्छन्ति। ततोऽधोभागरूपं जघन्यत्वेन निरूपितं स्थानमतलादि -- यथाऽसुराणां वैरोचनादीनाम् -- तत्र स्थितिः। नीचयोन्यादिषु वा नरकादौ यान्तीति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.18।।तथा --, सत्त्वगुणमें यानी सात्त्विक भावोंमें स्थित पुरुष उच्च स्थानको जाते हैं अर्थात् देवलोक आदि उच्च लोकोंमें उत्पन्न होते हैं। और राजस पुरुष बीचमें रहते हैं अर्थात् मनुष्ययोनियोंमें उत्पन्न होते हैं। तथा जघन्य गुणके आचरणोंमें स्थित हुए अर्थात् जो जघन्य -- निन्दनीय गुण है? उस तमोगुणके कार्य -- निद्रा और आलस्य आदिमें स्थित हुए मूढ़ -- तामसी पुरुष नीचे गिरते हैं -- वे पशु? पक्षी आदि योनियोंमें उत्पन्न होते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.18।। व्याख्या -- ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः -- जिनके जीवनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रही है और उसके कारण जिन्होंने भोगोंसे संयम किया है तीर्थ? व्रत? दान आदि शुभकर्म किये हैं दूसरोंके सुखआरामके लिये प्याऊ? अन्नक्षेत्र आदि चलाये हैं सड़कें बनवायी हैं पशुपक्षियोंकी सुखसुविधाके लिये पेड़पौधे लगाये हैं गौशालाएँ बनवायी हैं? उन मनुष्योंको यहाँ सत्त्वस्थाः कहा गया है। जब सत्त्वगुणकी प्रधानतामें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है? तब वे सत्त्वगुणका सङ्ग होनेसे? सत्त्वगुणमें आसक्ति होनेसे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें चले जाते हैं। उन लोकोंका वर्णन इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें उत्तमविदां अमलान् लोकान् पदोंसे किया गया है। ऊर्ध्वलोकोंमें जानेवाले मनुष्योंको तेजस्तत्त्वप्रधान शरीरकी प्राप्ति होती है।मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः -- जिन मनुष्योंके जीवनमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और उसके कारण जो शास्त्रकी मर्यादामें रहते हुए भी संग्रह करना और भोग भोगना ऐशआराम करना पदार्थोंमें ममता? आसक्ति रखना आदिमें लगे रहते हैं? उनको यहाँ राजसाः कहा गया है। जब रजोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् रजोगुणके कार्योंके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है? तब वे पुनः इस मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं। यहाँ उनको पृथ्वीतत्त्वप्रधान मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है।यहाँ तिष्ठन्ति पद देनेका तात्पर्य है कि वे राजस मनुष्य अभी जैसे इस मृत्युलोकमें हैं? मरनेके बाद वे पुनः मृत्युलोकमें आकर ऐसे ही बन जाते हैं अर्थात् जैसे पहले थे? वैसे ही बन जाते हैं। वे अशुद्ध आचरण नहीं करते? शास्त्रकी मर्यादा भङ्ग नहीं करते? प्रत्युत शास्त्रकी मर्यादामें ही रहते हैं और शुद्ध आचरण करते हैं,परन्तु पदार्थों? व्यक्तियों आदिमें राग? आसक्ति? ममता रहनेके कारण वे पुनः मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः -- जिन मनुष्योंके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रहती है और उसके कारण जिन्होंने प्रमाद आदिके वशमें होकर निरर्थक पैसा और समय बरबाद किया है जो आलस्य तथा नींदमें ही पड़े रहे हैं आवश्यक कार्योंको भी जिन्होंने समयपर नहीं किया है जो दूसरोंका अहित ही सोचते आये हैं जिन्होंने दूसरोंका अहित किया है? दूसरोंको दुःख दिया है जिन्होंने झूठ? कपट? चोरी? डकैती आदि निन्दनीय कर्म किये हैं? ऐसे मनुष्योंको यहाँ जघन्यगुणवृत्तिस्थाः कहा गया है। जब तमोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् तमोगुणके कार्योंके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्य मर जाते हैं? तब वे अधोगतिमें चले जाते हैं।अधोगतिके दो भेद हैं -- योनिविशेष और स्थानविशेष। पशु? पक्षी? कीट? पतङ्ग? साँप? बिच्छू? भूतप्रेत आदि योनिविशेष अधिगति हैं और वैतरिणी? असिपत्र? लालाभक्ष? कुम्भीपाक? रौरव? महारौरव आदि नरकके कुण्ड स्थानविशेष अधोगति है। जिनके जीवनमें सत्त्वगुण अथवा रजोगुण रहते हुए भी अन्तसमयमें तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है? वे मनुष्य मरनेके बाद योनिविशेष अधोगतिमें अर्थात् मूढ़योनियोंमें चले जाते हैं (गीता 14। 15)। जिनके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रही है और उसी तमोगुणकी प्रधानतामें जिनका शरीर छूट जाता है? वे मनुष्य मरनेके बाद स्थानविशेष अधोगतिमें अर्थात् नरकोंमें चले जाते हैं (गीता 16। 16)। तात्पर्य यह हुआ कि सात्त्विक? राजस अथवा तामस मनुष्यका अन्तिम चिन्तन और हो जानेसे उनकी गति तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार ही होगी? पर सुखदुःखका भोग उनके कर्मोंके अनुसार ही होगा। जैसे -- कर्म तो अच्छे हैं? पर अन्तिम चिन्तन कुत्तेका हो गया? तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह कुत्ता बन जायगा परन्तु उस योनिमें भी उसको कर्मोंके अनुसार बहुत सुखआराम मिलेगा। कर्म तो बुरे हैं? पर अन्तिम चिन्तन मनुष्य आदिका हो गया? तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह मनुष्य बन जायगा परन्तु उसको कर्मोंके फलरूपमें भयंकर परिस्थिति मिलेगी। उसके शरीरमें रोगहीरोग रहेंगे। खानेके लिये अन्न? पीनेके लिये जल और पहननेके लिये कपड़ा भी कठिनाईसे मिलेगा।सात्त्विक गुणको बढ़ानेके लिये साधक सत्शास्त्रोंके पढ़नेमें लगा रहे। खानापीना भी सात्त्विक करे? राजसतामस खानपान न करे। सात्त्विक श्रेष्ठ मनुष्योंका ही सङ्ग करे? उन्हींके सान्निध्यमें रहे? उनके कहे अनुसार साधन करे। शुद्ध? पवित्र तीर्थ आदि स्थानोंका सेवन करे जहाँ कोलाहल होता हो? ऐसे राजस स्थानोंका और जहाँ अण्डा? माँस? मदिरा बिकती हो? ऐसे तामस स्थानोंका सेवन न करे। प्रातःकाल और सायंकालका समय सात्त्विक माना जाता है अतः इस सात्त्विक समयका विशेषतासे सदुपयोग करे अर्थात् इसे भजन? ध्यान आदिमें लगाये। शास्त्रविहित शुभकर्म ही करे? निषिद्ध कर्म कभी न करे राजसतामस कर्म कभी न करे। जो जिस वर्ण? आश्रममें स्थित है? उसीमें अपनेअपने कर्तव्यका ठीक तरहसे पालन करे। ध्यान भगवान्का ही करे। मन्त्र भी सात्त्विक ही जपे। इस प्रकार सब कुछ सात्त्विक करनेसे पुराने संस्कार मिट जाते हैं और सात्त्विक संसार (सत्त्वगुण) बढ़ जाते हैं। श्रीमद्भागवतमें गुणोंको बढ़ानेवाले दस हेतु बताये गये हैं -- आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः।।(11। 13। 4)शास्त्र? जल (खानपान)? प्रजा (सङ्ग)? स्थान? समय? कर्म? जन्म? ध्यान? मन्त्र और संस्कार -- ये दस वस्तुएँ यदि सात्त्विक हों तो सत्त्वगुणकी? राजसी हों तो रजोगुणकी और तामसी हों तो तमोगुणकी वृद्धि करती हैं।विशेष बातअन्तसमयमें रजोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला मनुष्य मनुष्यलोकमें जन्म लेता है (14। 15) और रजोगुणकी प्रधानतावाला मनुष्य मरकर फिर इस मनुष्यलोकमें ही आता है (14। 18) -- इन दोनों बातोंसे यही सिद्ध होता है कि इस मनुष्यलोकके सभी मनुष्य रजोगुणवाले ही होते हैं सत्त्वगुण और तमोगुण इनमें नहीं होता। अगर वास्तवमें ऐसी बात है? तो फिर सत्त्वगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (14। 14) और सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य ऊँचे लोकोंमें जाता है (14। 18) तथा तमोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (14। 15) और तमोगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य अधोगतिमें जाता है (14। 18) सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं (14। 5) यह सारा संसार तीनों गुणोंसे मोहित है (7। 13) सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीन प्रकारके कर्ता कहे जाते हैं (18। 26 -- 28) यह सम्पूर्ण त्रिलोकी त्रिगुणात्मक है (18। 40)? आदि बातें भगवान्ने कैसी कही हैंइस शङ्का समाधान यह है कि ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधनाता तो है? पर साथमें रजोगुणतमोगुण भी रहते हैं। इसलिये देवताओंके भी सात्त्विक? राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अतः सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेपर भी उसमें अवान्तर भेद रहते हैं। ऐसे ही मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता होनेपर भी साथमें सत्त्वगुणतमोगुण रहते हैं। इसलिये मनुष्योंके भी सात्त्विक? राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता है? पर साथमें सत्त्वगुणरजोगुण भी रहते हैं। इसलिये पशु? पक्षी आदिमें तथा भूत? प्रेत? गुह्यक आदिमें और नरकोंके प्राणियोंमें भी भिन्नभिन्न स्वभाव होता है। कई सौम्य स्वभावके होते हैं? कई मध्यम स्वभावके होते हैं और कई क्रूर स्वभावके होते हैं। तात्पर्य है कि जहाँ किसी भी गुणके साथ सम्बन्ध है? वहाँ तीनों गुण रहेंगे ही। इसलिये भगवान्ने (18। 40 में) कहा है कि त्रिलोकीमें ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है? जो तीनों गुणोंसे रहित हो।ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधानता? रजोगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता? सत्त्वगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता? रजोगुणकी गौणता और सत्त्वगुणकी अत्यन्त गौणती रहती है। तात्पर्य है कि सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंकी प्रधानतावालोंमें भी अधिक? मध्यम और कनिष्ठमात्रामें प्रत्येक गुण रहता है। इस तरह गुणोंके सैकड़ोहजारों सूक्ष्म भेद हो जाते हैं। अतः गुणोंके तारतम्यसे प्रत्येक प्राणीका अलगअलग स्वभाव होता है।जैसे भगवान्के द्वारा सात्त्विक? राजस और तामस कार्य होते हुए भी वे गुणातीत ही रहते हैं (7। 13)? ऐसे ही गुणातीत महापुरुषके अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें सात्त्विक? राजस और तामस वृत्तियोंके आनेपर भी वह गुणातीत ही रहता है (14। 22)। अतः भगवान्की उपासना करना और गुणातीत महापुरुषका सङ्ग करना -- ये दोनों ही निर्गुण होनेसे साधकको गुणातीत करनेवाले हैं। सम्बन्ध -- पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक प्रकृतिके कार्य गुणोंका परिचय देकर अब आगेके दो श्लोकोंमें स्वयंको तीनों गुणोंसे अतीत अनुभव करनेका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.18।।सात्त्विकादिज्ञानकर्मफलान्युक्त्वानुक्तसंग्रहार्थं सामान्येनोपसंहरति -- किञ्चेति। वक्ष्यमाणफलद्वारापि सत्त्वादिज्ञानमित्यर्थः। सत्त्वगुणस्य वृत्तं शोभनं ज्ञानं कर्म वा तत्र तिष्ठन्तीति तथा। राजसा रजोगुणनिमित्ते ज्ञाने कर्मणि वा निरताः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.18।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.18।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.18।। --,ऊर्ध्वं गच्छन्ति देवलोकादिषु उत्पद्यन्ते सत्त्वस्थाः सत्त्वगुणवृत्तस्थाः। मध्ये तिष्ठन्ति मनुष्येषु उत्पद्यन्ते राजसाः। जघन्यगुणवृत्तस्थाः जघन्यश्च असौ गुणश्च जघन्यगुणः तमः? तस्य वृत्तं निद्रालस्यादि? तस्मिन् स्थिताः जघन्यगुणवृत्तस्थाः मूढाः अधः गच्छन्ति पश्वादिषु उत्पद्यन्ते तामसाः।।पुरुषस्य प्रकृतिस्थत्वरूपेण मिथ्याज्ञानेन युक्तस्य भोग्येषु गुणेषु सुखदुःखमोहात्मकेषु सुखी दुःखी मूढः अहम् अस्मि इत्येवंरूपः यः सङ्गः तत्कारणं पुरुषस्य सदसद्योनिजन्मप्राप्तिलक्षणस्य संसारस्य इति समासेन पूर्वाध्याये यत् उक्तम्? तत् इह सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः (गीता 14।5) इति आरभ्य गुणस्वरूपम्? गुणवृत्तम्? स्ववृत्तेन च गुणानां बन्धकत्वम्? गुणवृत्तनिबद्धस्य च पुरुषस्य या गतिः? इत्येतत् सर्वं मिथ्याज्ञानमूलं बन्धकारणं विस्तरेण उक्त्वा? अधुना सम्यग्दर्शनान्मोक्षो वक्तव्यः इत्यत आह भगवान् --,
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【 Verse 14.19 】
▸ Sanskrit Sloka: नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति | गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ||
▸ Transliteration: nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣṭānupaśyati | guṇebhyaśca paraṁ vetti madbhāvaṁ so’dhigacchati ||
▸ Glossary: na: never; anyaṁ: other than; guṇebhyaḥ: from the qualities; kartāraṁ: the performer; yadā: when; draṣṭā’nupaśyati: he who sees properly; guṇebhyaśca: from the modes of nature; paraṁ: transcendental; vetti: know; madbhāvaṁ: My spiritual nature; saḥ: he; adhigacchati: is promoted
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.19 When we see that there is nothing beyond these modes of nature in all activities and that the supreme Lord is transcendental to all these modes, the seeker can know My spiritual nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.19।।जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है? तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.19।। जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता? अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है? तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.19 न not? अन्यम् other? गुणेभ्यः than the Gunas? कर्तारम् agent? यदा when? द्रष्टा the seer? अनुपश्यति beholds? गुणेभ्यः than the alities? च and? परम् higher? वेत्ति knows? मद्भावम् My Being? सः he? अधिगच्छति,attains to.Commentary The Supreme Self is in no way contaminated by the alities. The liberated sage exclaims I am the witness of the alities. I am neither the enjoyer nor the doer. The alities form the motive power of all actions. I am beyond the Gunas. The Gunas alone are responsible for all actions. I am entirely distinct from the alities. I am pure consciousness. I cannot be touched by the alities. I am like the ether.When a man gets illumination or attains knowledge of the Self? when he realises that there is no agent except the Gunas which are themselves modified as the bodies? the senses and their objects? when he knows that it is the Gunas only that become the agent in all transformations? in all states and in all actions? and when he realises the Supreme Self Who is distinct from the Gunas? Who is the silent witness of the Gunas and their functions? he attains to My state (liberation)? i.e.? becomes identical with Me. He becomes a Gunatita? i.e.? one who has transcended the three Gunas.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.19. When the Perceiver (the Self) finds no agent other than the Strands, and realises That which is beyond the Strands, then he attains My state.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.19 As soon as man understands that it is only the Qualities which act and nothing else, and perceives That which is beyond, he attains My divine nature.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.19 When the seer beholds no agent of action other than the Gunas, and knows what transcends the Gunas, he attains to My state.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.19 When the witness sees none other than the alities as the agent, and knows that which is superior [i.e. different from.] to the alities, he attains My nature.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.19 When the seer beholds no agent other than the Gunas and knows That which is higher than they, he attains to My Being.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.19 See Comment under 14.20
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.19 The seer has in the first place to totally subdue his Rajas and Tamas and stay in pure Sattva. This is accomplished through nourishment by Sattvika food and the performance of disinterested actions for the propitiation of the Lord. He then perceives 'no agent of action other than the Gunas' i.e., sees that the Gunas are themselves the agents according to their nature. Further he perceives what is 'other than the Gunas,' i.e., perceives the Gunas which are agents and the self who is not an agent of action. Such a seer attains to 'My state,' i.e., gains likeness with Me in transcending the three Gunas etc. The purport is this: The self, pure in nature by Itself, gains agency through varius actions by contact with the Gunas springing from past Karmas. When one perceives the self in this way, namely, that the self by Itself is no agent of actions and is of the nature of infinite knowledge, then It attains to My likeness.
It is stated that one attains to the likeness of the Lord after perceiving the self as a non-agent and as other than the Gunas. What is meant by the state of likeness to the Lord? Sri Krsna now describes it:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.19 Yada, when; drasta, the witness, after becoming illumined; anupasyati, sees; na anyam, none other; gunhyah, than the alities that have transformed into the shape of body, orgnas and objects; kartaram,as the agent-(i.e.) he sees thus that the alities themselves, in all their modes, are the agents of all activities; ca, and; vetti, knows; that which, standing as the witness of the activities of the alities, is param, superior; gunhyah, to the alities; sah, he, the witness; adhigacchati, attains; madbhavam, My nature. How does he attain? That is being stated:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.19।। अब तक किये गये वर्णन से तो आत्मा का ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण चित्र सामने उभरकर आता है कि मानों वह कभी इन गुणों के बन्धन से मुक्त ही नहीं हो सकता। गीता के अध्येता को इस स्थल पर निराशा का अनुभव हो सकता है। जब तक हम रेलगाड़ी में आसीन रहेंगे? तब तक रेल की गति हमारी गति होगी। परन्तु जैसे ही हम गन्तव्य स्थान पर उतर जाते हैं? तब हम स्थिर हो जाते हैं हैं? केवल रेल गतिमान रहती है। इसी प्रकार? देहादि उपाधियों को ही अपना स्वरूप समझकर उनसे तादात्म्य करने पर उनके विकारों को हम अपने ही विकार मानकर दुख? कष्ट और बन्धन का अनुभव करते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि आत्मा के अनुभव में आने वाला बन्धन अविद्याजनित (मिथ्या) है? वास्तविक नहीं। अत उपाधियों में स्थित अहंभाव को त्यागकर उसके साक्षीस्वरूप आत्मा में स्थिति प्राप्त करना ही तीनगुणों से मुक्ति है।निदिध्यासन की साधना में इस तादात्म्य की निवृत्ति और स्वस्वरूप में स्थिति प्राप्त करने का अभ्यास किया जाता है। जिस साधक में ध्यान की योग्यता है? वह आत्मा को देखेगा अर्थात् साक्षात् आत्मरूप से अनुभव करेगा। यह आत्मा समस्त दोषों से सर्वथा मुक्त है परन्तु यह देखना घटपटादि दृश्य वस्तु को देखने के समान नहीं है आत्मा इन्द्रिय? मन और बुद्धि का भी द्रष्टा है? उनका दृश्य नहीं। दर्शन से तात्पर्य ऐसे निश्चयात्मक ज्ञान से है? जिसको प्राप्त कर लेने के पश्चात् तत्त्व के विषय में संकल्पविकल्प करने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता।गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता आत्मानुभवी पुरुष न केवल अपने अनन्तस्वरूप को पहचानता है? वरन् यह भी जानता है कि अब तक जिस अहंकार को कर्तृत्व का अभिमान था वह इन गुणों के अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है? अर्थात् अहंकार उन गुणों का ही कार्य है। ये गुण ही हमारे विचारों पर शासन करके उनकी दिशा को निर्धारित करते हैं। अत कर्तृत्वभोक्तृत्वादि अभिमान जिसमें स्थित है? वह सूक्ष्म शरीर यहाँ गुण शब्द से सूचित किया गया है।और गुणों से परे तत्त्व को जो जानता है मन स्वयं जड़ होने के कारण न कुछ कार्य कर सकता है और न स्वयं अपनी वृत्तियों को देख सकता है। अत जो चेतन तत्त्व उसे चेतनता प्रदान कर कार्यक्षम बनाता है? वह उस मन से भिन्न ही होगा। यदि किसी पात्र में रखा जल पिघले हुये रजत के समान चमक रहा हो? तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसने वह प्रभा सूर्य से प्राप्त की होगी। जल में अपनी स्वयं की कोई चमक नहीं होती। अब यदि उस जल में स्थित सूर्य का प्रतिबिम्ब छिन्नभिन्न होता है? तो उसका कारण पात्र में स्थित जल का स्वभाव होगा? न कि स्वयं सूर्य ही आकाश में नृत्य कर रहा होगा मन की उपाधि में व्यक्त हुआ चैतन्य ही व्यष्टि जीव कहलाता है? जिसे उपाधि के परिच्छेदों का कष्ट अनुभव होता है।जो पुरुष जीवभाव को त्यागकर उसके बिम्बभूत सच्चिदानन्द आत्मा को अपने स्वरूप से पहचान लेता है? वही पुरुष सभी परिच्छेदों के बन्धनों? दुख के अश्रुओं और निराशाओं के निश्वासों से सदा के लिये मुक्त हो जाता है।वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है उपनिषद् की घोषणा के अनुसार आत्मवित् पुरुष स्वयं ही आत्मा बन जाता है। मेरे स्वरूप से तात्पर्य आत्मस्वरूप से ही है। भगवान् श्रीकृष्ण को देवकीपुत्र या वृन्दावन के मुरली मनोहर कृष्ण ही नहीं समझना चाहिये। यहाँ श्रीकृष्ण भूतमात्र की आत्मा के रूप में उपदेश दे रहे हैं और गीता के प्रत्येक अध्येता को यह समझना चाहिये कि उसकी आत्मा ही जीव को उपदेश दे रही है।जाग्रतपुरुष स्वप्न में ऐसी स्थिति को उत्पन्न करता है कि वहाँ स्वप्नद्रष्टा के रूप में वह वस्तुओं को प्राप्त कर या खोकर सुखी और दुखी होता है। ये समस्त सुखदुख स्वयं में ही निहित स्वप्नद्रष्टा को होते हैं। जब वह स्वप्न से जागता है? तो स्वप्न जगत् और उसके बन्धन समाप्त हो जाते हैं और स्वयं स्वप्नद्रष्टा ही जाग्रतपुरुष बन जाता है। कल्पना कीजिये कि स्वप्नवस्था में उस दुखी स्वप्न द्रष्टा को उसकी जाग्रत अवस्था की चेतना आकर उपदेश देती है? तो वह यही श्लोक कहेगी कि जब स्वप्नद्रष्टा तुम स्वप्न देखने वाले मन के अतिरिक्त किसी कर्ता को नहीं देखोगे? और अपने में ही उस तत्त्व को जानोगे? जो इस मन से परे हैं तब तुम मेरे इस स्वरूप को अर्थात् जाग्रत की चेतना को प्राप्त होगे।इसी प्रकार? यहाँ चैतन्य की दृष्टि से उपदेश देते हैं कि जो मनुष्य अपने जाग्रतस्वप्नसुषुप्ति के व्यक्तित्व को त्यागकर उससे परे स्थित आत्मस्वरूप को पहचानता है? वही वास्तव में परम सत्य का जाग्रत पुरुष कहा जा सकता है। वह स्वयं आत्मस्वरूप (मद्भाव) बन जाता है।इस ज्ञान के फल को और अधिक स्पष्ट करते हुये भगवान् कहते है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.19।।प्रकृतिस्थस्वरुपेण मिथ्याज्ञानेन युक्तस्य पुरुषस्य भोग्येषु गुणेषु सुखदुःखमोहात्मकेषु सुखी दुःखी मूढोऽहमस्मीत्येवंरुपः सङ्गः पुरुषस्य सदसद्यो निजन्मप्राप्तिलक्षणस्य संसारस्य कारणमितिपुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गेऽस्य सदसद्योनिजन्मसु इति पूर्वोध्याये संक्षेपेण यदुक्तं तदस्मिन्नध्यायेसत्त्वं रजस्तम् इति गुणाः
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.19।।अस्मिन्नध्याये वक्तव्यत्वेन प्रस्तुतमर्थत्रयं। तत्र क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्येश्वराधीनत्वं के वा गुणाः कथं वा ते बध्नन्तीत्यर्थद्वयमुक्तम्। अधुना तु गुणेभ्यः कथं मोक्षणं? मुक्तस्य च किं लक्षणमिति वक्तव्यमवशिष्यते। तत्र मिथ्याज्ञानात्मकत्वाद्गुणानां सम्यग्ज्ञानात्तेभ्यो मोक्षणमित्याह -- गुणेभ्यः कार्यकरणविषयाकारपरिणतेभ्योऽन्यं कर्तारं यदा द्रष्टा विचारकुशलः सन्नानुपश्यति विचारमनु न पश्यति गुणा एवान्तःकरणबहिष्करणशरीरविषयभावापन्नाः सर्वकर्मणां कर्तार इति पश्यति। गुणेभ्यश्च तत्तदवस्थाविशेषेण परिणतेभ्यः परं गुणतत्कार्यासंस्पृष्टं तद्भासकमादित्यमिव जलतत्कम्पाद्यसंस्पृष्टं निर्विकारं सर्वसाक्षिणं सर्वत्र समं क्षेत्रज्ञमेकं वेत्ति मद्भावं मद्रूपतां स द्रष्टाधिगच्छति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.19।।कथं प्रकृतिः पुरुषं बध्नातीत्यस्योत्तरमुक्तम्। कथं वा ततोऽस्य मुक्तिरित्यस्योत्तरमाह -- नान्यमिति। गुणेभ्यः कार्यकारणविषयाकारपरिणतेभ्योऽन्यं दृशिमात्रं आत्मानं द्रष्टा जीवः कर्तारं नानुपश्यति विवेकमनु न पश्यति। किंतु गुणा एव कर्तार इत्येव पश्यति न त्वहं कर्तेति। तथा गुणेभ्यः परं गुणव्यापारसाक्षिभूतं मां यदि वेत्ति तदा स वेदिता मद्भावं ब्रह्मभावं गच्छति। अन्यथा तु गुणभावं गतो भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.19।।एवं स्वेच्छया स्वक्रीडार्थोत्पादितगुणादिरूपमुक्त्वा कृतोच्चमध्यनीचादिधर्मेषूच्चत्वादिबुद्धिरहितो मत्क्रीडाज्ञानवांस्तत्सङ्गरहितो यः स मद्भक्तिमाप्नोतीत्येतदर्थमेतन्निरूपितमित्याह -- नान्यमिति। यदा मत्कृपाविशिष्टकाले द्रष्टा विवेकवान् गुणेभ्यः स्वक्रीडार्थप्रकटरूपेभ्यः कृत्वा कर्तारं सर्वमूलभूतमनुपश्यति? नान्यम् च पुनः गुणेभ्यो विचित्ररूपेभ्यः परं पुरुषोत्तमं वेत्ति स मद्भावं मद्भक्तिमधिगच्छति? प्राप्नोतीत्यर्थः।अत्रायं भावः -- गुणकृतनानावैचित्र्यदर्शनेन पुरुषोत्तममाहात्म्यज्ञानेन सर्वत्र तद्वैचित्र्यं पश्यन्तं तत्कर्तारं तद्रूपेणाऽऽविर्भूतम् अनु तद्वदेव यथा भगवान् स्वात्मकमेव पश्यति तथा पश्यति? नान्यं कञ्चन पश्यति स मद्भावं प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.19।।तदेवं प्रकृतिगुणसङ्गकृतं संसारं प्रपञ्चमुक्त्वा इदानीं तद्विवेकतो मोक्षं दर्शयति -- नान्यमिति। यदा तु द्रष्टा विवेकी भूत्वां बुद्ध्याद्याकारपरिणतेभ्यो गुणेभ्योऽन्यं कर्तारं नानुपश्यति? अपितु गुणा एव कर्माणि कुर्वन्तीति पश्यति? गुणेभ्यश्च परं व्यतिरिक्तं तत्साक्षिणमात्मानं वेत्ति स तु मद्भावं ब्रह्मत्वमधिगच्छति प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.19 -- 14.20।।एवं गुणसर्गभेदोक्तौ पुरुषस्य सर्वस्य बन्धलीलामुपपाद्येदानीं तद्विवेकतो गुणात्ययद्वारा मोक्षलीलामाहू द्वाभ्याम् -- नान्यमिति। यदा गुणेभ्योऽन्यं कर्त्तारं नानुपश्यति गुणा एव स्वानुगुणप्रवृत्तिषु कर्त्तार,इति पश्यति गुणेभ्यश्च परमात्मानं वेत्ति तदा द्रष्टा मद्भावं ब्रह्माक्षरभावं प्राप्नोति ब्रह्मवित् (ब्रह्म वेद) ब्रह्मैव भवति [मुं.उ.3।2।9] इति श्रुतेः। निर्गुणं हि ब्रह्म स्वयमव्ययं तदा गुणांस्त्रीनेतानतीत्यामृतमश्नुते प्राप्नुते ब्रह्मसुखं वा भुङ्क्ते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.19।।प्रकृतिमें स्थित होनारूप मिथ्याज्ञानसे युक्त पुरुषका सुखदुःखमोहात्मक भोगरूप गुणोंमें मैं सुखी? दुखी अथवा मूढ हूँ इस प्रकारका जो सङ्ग है? वह सङ्ग ही इस पुरुषकी अच्छीबुरी योनियोंमें जन्मप्राप्तिरूप संसारका कारण है। यह बात जो पहले तेरहवें अध्यायमें संक्षेपसे कही थी? उसीको यहाँ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः इस श्लोकसे लेकर ( उपर्युक्त श्लोकतक ) गुणोंका स्वरूप? गुणोंका कार्य? अपने कार्यद्वारा गुणोंका बन्धकत्व तथा गुणोंके कार्यद्वारा बँधे हुए पुरुषकी जो गति होती है? इन सब मिथ्याज्ञानरूप अज्ञानमूलक बन्धनके कारणोंको? विस्तारपूर्वक बतलाकर? अब यथार्थ ज्ञानसे मोक्ष ( कैसे होता है सो ) बतलाना चाहिये? इसलिये भगवान् बोले --, जिस समय द्रष्टा पुरुष ज्ञानी होकर? कार्य? करण और विषयोंके आकारमें परिणत हुए गुणोंसे अतिरिक्त अन्य किसीको ( भी ) कर्ता नहीं देखता है? अर्थात् यही देखता है कि समस्त अवस्थाओंमें स्थित हुए गुण ही,समस्त कर्मोंके कर्ता हैं तथा गुणोंके व्यापारके साक्षीरूप आत्माको गुणोंसे पर जानता है? तब वह द्रष्टा मेरे भावको प्राप्त होता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.19।। व्याख्या -- नान्यं गुणेभ्यः ৷৷. मद्भावं सोऽधिगच्छति -- गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंसे ही हो रही हैं? सम्पूर्ण परिवर्तन गुणोंमें ही हो रहा है। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण क्रियाओं और परिवर्तनोंमें गुण ही कारण हैं? और कोई कारण नहीं है। वे गुण जिससे प्रकाशित होते हैं? वह तत्त्व गुणोंसे पर है। गुणोंसे पर होनेसे वह कभी गुणोंसे लिप्त नहीं होता अर्थात् गुणों और क्रियाओँका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसे उस तत्त्वको जो विचारकुशल साधक जान लेता है अर्थात् विवेकके द्वारा अपनेआपको गुणोंसे पर? असम्बद्ध? निर्लिप्त अनुभव कर लेता है कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध न कभी,हुआ है? न है? न होगा और न हो ही सकता है। कारण कि गुण परिवर्तनशील हैं और स्वयंमें कभी परिवर्तन होता ही नहीं। वह फिर मेरे भावको? मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि वह जो भूलसे गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानता था? वह मान्यता मिट जाती है और मेरे साथ उसका जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है? वह ज्योंकात्यों रह जाता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.19।।कस्मिन्गुणे कथमित्यादिप्रश्नान्प्रत्याख्याय गुणेभ्यो मोक्षणं कथमिति प्रत्याख्यानार्थं वृत्तानुवादपूर्वकं मिथ्याज्ञाननिवर्तकं सम्यग्ज्ञानं प्रस्तौति -- पुरुषस्येत्यादिना। पुरुषस्य या गतिः सा चेति शेषः। मोक्षो गुणेभ्यो विश्लेषपूर्वको ब्रह्मभावः। सम्यग्ज्ञानोक्तिपरं श्लोकं व्याख्यातुं प्रतीकमादत्ते -- नान्यमिति। सत्त्वादिकार्यविषयस्य गुणशब्दस्य विवक्षितमर्थमाह -- कार्येति। विद्यानन्तर्यमनुशब्दार्थः। अक्षरार्थमुक्त्वा पूर्वार्धस्यार्थिकमर्थमाह -- गुणा एवेति। सर्वावस्थास्तत्तत्कार्यकरणाकारपरिणता इति यावत्। सर्वकर्मणां कायिकवाचिकमानसानां विहितप्रतिषिद्धानामित्यर्थः। परं व्यतिरिक्तम्। व्यतिरेकमेव स्फोरयति -- गुणेति। निर्गुणब्रह्मात्मानमित्यर्थः। मद्भावं ब्रह्मात्मतामसौ प्राप्नोति। ब्रह्मभावोऽस्याभिव्यज्यत इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.19 -- 14.20।।नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं इति स्वतन्त्रकर्तृत्वं गुणानामेव? नान्यस्येत्युच्यत इत्यपव्याख्याननिरासार्थमाह -- परिणामीति। कुत एतत् इत्यत आह -- अन्यथेति गुणेभ्योऽन्यस्य कर्तृत्वाभावे। मोक्षधर्मे परमेश्वरस्य कर्तृत्वमुक्तं तद्विरोधश्चेति वाक्यशेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.19 -- 14.20।।परिणामिकर्त्तारं गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति। अन्यथा यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् [मुण्ड.3।1।3] इति श्रुतिविरोधः।नाहं कर्त्ता न कर्त्ता त्वं कर्त्ता यस्तु सदा प्रभुः इति मोक्षधर्मे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.19।। --,न अन्यं कार्यकरणविषयाकारपरिणतेभ्यः गुणेभ्यः कर्तारम् अन्यं यदा द्रष्टा विद्वान् सन् न अनुपश्यति? गुणा एव सर्वावस्थाः सर्वकर्मणां कर्तारः इत्येवं पश्यति? गुणेभ्यश्च परं गुणव्यापारसाक्षिभूतं वेत्ति? मद्भावं मम भावं सः द्रष्टा अधिगच्छति।।कथम् अधिगच्छति इति? उच्यते --,
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【 Verse 14.20 】
▸ Sanskrit Sloka: गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् | जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्रुते ||
▸ Transliteration: guṇānetānatītya trīn dehī dehasamudbhavān | janma-mṛtyu-jarā-duḥkhair vimukto’mṛtamaśnute ||
▸ Glossary: guṇān: qualities; etān: all these; atītya: transcending; trīn: three; dehī: embod- ied; deha: body; samudbhavān: produced of; janma: birth; mṛtyu: death; jarā: old age; duḥkhaiḥ: distresses; vimuktaḥ: being freed from; amṛtam: nectar; aśnute: enjoys
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.20 When the embodied being is able to transcend these three modes, he can become free from birth, death, old age and their distresses and can enjoy nectar even in this life.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.20।।देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.20।। यह देही पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म? मृत्यु? जरा और दुखों से विमुक्त हुआ अमृतत्व को प्राप्त होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.20 गुणान् Gunas? एतान् these? अतीत्य having crossed? त्रीन् three? देही the embodied? देहसमुद्भवान् out of which the body is evolved? जन्ममृत्युजरादुःखैः from birth? death? decay and pain? विमुक्तः freed? अमृतम् immortality? अश्नुते attains to.Commentary Just as a river is absorbed in the ocean? so also he who has? while still alive? gone beyond the alities which form the seed from which all bodies have sprung and of which they are composed? is absorbed in Me. He ever enjoys the bliss of the Eternal. He attains release or Moksha. He attains to My Being.When the Lord said that the wise man crosses beyond the three alities and attains immortality? Arjuna became inspired with the desire of learning more about it. Just as he has asked a estion about the sage of steady wisdom in chapter II? verse 54? he now asks Lord Krishna about the characteristics of a sage who has crossed over the three alities. How does he act What is his conduct or behaviour How has he gone beyond the alities
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.20. Transcending these three Strands, of which the body [etc.] is born, the Embodied (the Soul), being freed from birth, death, old age and sorrow, attains immortality.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.20 When the soul transcends the Qualities, which are the real cause of physical existence, then, freed from birth and death, from old age and misery, he quaffs the nectar of immortality.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.20 The embodied self, crossing beyond these three Gunas which arise in the body, and freed from birth, death, age and pain, attains immortality.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.20 Having transcended these three alities which are the origin of the body, the embodied one, becoming free from birth, death, old age and sorrows, experiences Immortality.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.20 The embodied one having crossed beyond these three Gunas out of which the body is evolved, is freed from birth, death, decay and pain, and attains to immortality.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.16-20 Karmanah etc. upto asnute. Here, there are certain unconnected verses that have been concocted. They are of the nature of repetition, and hence they have to be necessarily rejected. A mode of life transcending these Strands turn to be nothing but emancipation.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.20 The embodied self - 'crossing beyond these three Gunas,' the
Chapter 14 (Part 9)
Sattva and the rest, which 'arise in the body,' i.e., spring from Prakrti transformed into the form of the body - perceives the self as different from the Gunas and as of the form of knowledge only. Released thus from birth, death, old age and sorrow, It experiences the immortal self. This is what is meant by My likeness.
Arjuna now wants to know about the characteristics of one who has transcended the Gunas and the means of such transcendence:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.20 Atitya, having transcended, having gone beyond-even while living; etan, these; trin, three; gunan, alities as have been described, which constitute the limiting adjunct Maya; and dehasamudbhavan, which are the origin of the body, which are the seed of the birth of the body; dehi, the embodied one, the enlightened one; vimuktah, becoming free-even in this life; janma-mrtyu-jara-duhkhaih, from birth death, old age and sorrow; asnute, experiences; [Some translate this as 'attains'.-Tr.] amrtam, Immortality. In this way he attains My nature. This is the idea. Getting a clue to a estion from the statement that one experiences Immortality, even in this life, by going beyond the alities-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.20।। पाठशाला में कार्यकर रहे व्यक्ति को अग्नि की उष्णता और धुंए का कष्टसहना पड़ता है? तो ग्रीष्म काल की धूप में खड़े व्यक्ति को सूर्य के ताप और चमक को सहन करना पड़ता है। यदि ये दोनों व्यक्ति अपने उन स्थानों से हटकर अन्य शीतल स्थान पर चले जायें? तो उनके कष्टों की निवृत्ति हो जायेगी। इसी प्रकार? हम अपनी उपाधियों में क्रीड़ा कर रहे तीन गुणों के साथ तादात्म्य करके सांसारिक जीवन के बन्धनों और दुखों को भोग रहे हैं। इनसे अतीत हो जाने पर इनकी क्रूरता का अन्त हो जाता है? क्योंकि परिपूर्ण सच्चिदानन्द आत्मा में इन सबका कोई अस्तित्व नहीं है।यहाँ सत्त्वादि गुणों को शरीर की उत्पत्ति का कारण बताया गया है। वेदान्त की भाषा में आत्मस्वरूप के अज्ञान को कारण शरीर कहते हैं जिसका अनुभव हमें अपनी निद्रावस्था में होता है। इन तीनों गुण से भिन्न यह अज्ञान कोई वस्तु नहीं है। इस कारण अवस्था से ये त्रिगुण? सूक्ष्म शरीर अर्थात् अन्तकरण की विभिन्न वृत्तियों और भावनाओं के रूप में व्यक्त होते हैं। विचाररूप में परिणत ये गुण शुभ या अशुभ कर्मों के रूप में व्यक्त होने के लिये स्थूल शरीर का रूप ग्रहण करते हैं।प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचारों और भावनाओं को प्रगट करने के लिए एक उपयुक्त माध्यम की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ? चित्रकार को एक पट? तूलिका और रंगों की? तो संगीतज्ञ को वाद्यों की आवश्यकता होती है। चित्रकार को वाद्य और संगीतज्ञ के हाथ में तूलिका देने से दोनों को कोई लाभ नहीं होगा। इसी प्रकार? पशु की वृत्तियों वाले जीव को पशु का देह धारण करना मनुष्य शरीर की अपेक्षा अधिक उपयुक्त होगा। यह सब कार्य इन तीन गुणों का ही है।इससे स्पष्ट हो जाता है कि त्रिगुणों से परे पहुँचा हुआ व्यक्ति सूक्ष्म और कारण शरीरों के दुखों से भी मुक्त हो जाता है।विकार और परिवर्तन जड़ पदार्थ के धर्म हैं। अत भौतिक तत्त्वों से बने हुये सभी स्थूल शरीर विकारों को प्राप्त होते हैं? जिनका क्रम है जन्म? वृद्धि? व्याधि? जरा (क्षय) और मृत्यु। इनमें से प्रत्येक विकार दुखदायक होता है। जन्म में पीड़ा है वृद्धि व्यथित करने वाली है? वृद्धावस्था विचलित करने वाली है? व्याधि अत्यन्त क्रूर है तो मृत्यु अत्यन्त भयंकर परन्तु ये समस्त दुख देहाभिमानी अज्ञानी जीव को ही होते हैं? आत्म स्वरूप में स्थित आत्मज्ञानी को नहीं? क्योंकि वह अपने उपाधियों से परे स्वरूप को पहचान लेता है। बाढ़? अकाल? युद्ध? महामारी? अन्त्येष्टि? विवाह एवं अन्य सहस्र घटनाओं को सूर्य प्रकाशित करता है? किन्तु सूर्य में इनमें से एक भी घटना का अस्तित्व नहीं है। इसी प्रकार आत्मचैतन्य हमारी उपाधियों को तथा तत्संबंधित अनुभवों को प्रकाशित करता है? परन्तु उसका इन सबके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। अत आत्मवित् पुरुष इन सभी संघर्षों से मुक्त हो जाता है।और वह अमृतत्त्व को प्राप्त होता है आत्मज्ञान का फल केवल दुख निवृत्ति ही नहीं वरन् परमानन्द प्राप्त भी है। भगवान् के कथन में इसी तथ्य का निर्देश है। निद्रावस्था में रोगी व्यक्ति अपनी पीड़ा को भूल जाता है निराश व्यक्ति अपनी निराशाओं से मुक्त हो जाता है क्षुधा से व्याकुल पुरुष को क्षुधा का अनुभव नहीं होता और दुखी को दुख का विस्मरण हो जाता है। परन्तु? इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि रोगोपशम हो गया? निराशा निवृत्त हो गयी? क्षुधा शांत हो गयी और दुख का शमन हो गया। निद्रा तो वर्तमान दुख के साथ होने वाली अस्थायी सन्धिमात्र है। जाग्रत अवस्था में आने पर पुन ये सब दुख भी लौटकर आ जाते हैं। परन्तु आत्मानुभूति में दुखों की आत्यन्तिक निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है। इसलिये यहाँ कहा गया है कि अमृतत्त्व अर्थात् मोक्ष की इस स्थिति को इसी जगत् में? इसी जीवन में और इसी देह में रहते हुये प्राप्त किया जा सकता है। इस पृथ्वी पर ईश्वरीय पुरुष बनने का अनुभव वास्तव में विरला है। ऐसे मुक्त पुरुष के लक्षण क्या हैं? जिन्हें जानकर हम उसे समझ सकें और अपने में भी उस स्थिति को पाने का प्रयत्न कर सकें वह जगत् में किस प्रकार व्यवहार करेगा तथा जगत् के साथ उस ज्ञानी का संबंध किस प्रकार का होगा प्रश्न पूछने के लिये एक अवसर पाकर अर्जुम पूछता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.20।।कथमधिगच्छतीत्यपेक्षायमाह। गुणानेतान्यथोक्तान्मायात्मकांस्त्रीन्सत्त्वरजस्तमःसंज्ञकान् समुद्भवन्त्येभ्य इति समुद्भवाः देहस्य समुद्भवाः तान् देहसमुद्भवान् तान् देहसमुद्धवान् देहोत्पत्तिबीजभूतान् देही अतीत्य विद्वान्,जीवन्नेवातिक्रम्य जन्ममृत्युजरादुःखै जन्म च मृत्युश्च जरा च दुःखानि च तैः जीवन्नेव मुक्तः सर्वानर्थविनिर्मुक्तः अमृतं ब्रह्मानन्दं मद्भावं मोक्षमश्रुते प्राप्तोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.20।।कथमधिगच्छतीत्युच्यते -- गुणानेतान्मायात्मकांस्त्रीन्सत्त्वरजस्तमोनाम्नः देहसमुद्भवान्देहोत्पत्तिबीजभूतान् अतीत्य जीवन्नेव तत्त्वज्ञानेन (नाधिगत्य) बाधित्वा जन्ममृत्युजरादुःखैर्जन्मना,मृत्युना जरया दुःखैश्चाध्यात्मिकादिभिर्मायामयैर्विमुक्तो जीवन्नेव तत्संबन्धशून्यः सन् विद्वानमृतं मोक्षं मद्भावमन्ते प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.20।।कथं त्वद्भावं गच्छतीति तत्राह -- गुणानिति। एतान्गुणान् महदादित्रयोविंशतिविकारात्मना,परिणतान् देहसमुद्भवान् स्थूलदेहस्य समुद्भवो येभ्यस्तानतीत्य जीवन्नेवातिक्रम्य निर्विकल्पकसमाध्यभ्यासेन बाधित्वाऽमृतं मोक्षमश्नुते प्राप्नोति। एतेनानन्दावाप्तिर्गुणात्ययप्रयोजनमुक्तम्। यतो मुक्तो जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तः सन्निति त्वनर्थनिवृत्तिरुक्ता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.20।।ततो मद्भावयुक्तो गुणदोषाभिभूतो न भवतीत्याह -- गुणानेतानिति। देही जीवो देहसमुद्भवान् देहानां समुद्भव उत्पत्तिर्येभ्यस्तादृशानेतान् लौकिकान् न त्वलौकिकान् त्रीन् गुणानतीत्य अतिक्रम्य? जन्म तत्कर्मभोगार्थकं? मृत्युस्तद्भोगसमाप्तिरूपो भगवद्विस्मरणरूपो वा? जरा सेवाप्रतिबन्धरूपा? दुःखं संसारात्मकम्? एतैर्विमुक्तः अमृतं मरणादिदोषरहितम् लौकिकं देहमश्नुते भुङ्क्ते प्राप्नोतीत्यर्थः। अथवा अमृतमलौकिकं देहं प्राप्य मया सह सर्वकामानश्नुते सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह [तै.उ.2।1] इति श्रुत्युक्तरीत्या देहीतिपदादिदं व्यज्यते अन्यथा देहवत्पदं व्यर्थं स्यादिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.20।।ततश्च गुणकृतसर्वानर्थनिवृत्त्या कृतार्थो भवतीत्याह -- गुणानिति। देहाद्याकारः समुद्भवः परिणामो येषां ते देहसमुद्भवाः तानेतांस्त्रीनपि गुणानतीत्यातिक्रम्य तत्कृतैर्जन्मादिभिर्विमुक्तः सन्नमृतमश्नुते ब्रह्मानन्दं प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.19 -- 14.20।।एवं गुणसर्गभेदोक्तौ पुरुषस्य सर्वस्य बन्धलीलामुपपाद्येदानीं तद्विवेकतो गुणात्ययद्वारा मोक्षलीलामाहू द्वाभ्याम् -- नान्यमिति। यदा गुणेभ्योऽन्यं कर्त्तारं नानुपश्यति गुणा एव स्वानुगुणप्रवृत्तिषु कर्त्तार इति पश्यति गुणेभ्यश्च परमात्मानं वेत्ति तदा द्रष्टा मद्भावं ब्रह्माक्षरभावं प्राप्नोति ब्रह्मवित् (ब्रह्म वेद) ब्रह्मैव भवति [मुं.उ.3।2।9] इति श्रुतेः। निर्गुणं हि ब्रह्म स्वयमव्ययं तदा गुणांस्त्रीनेतानतीत्यामृतमश्नुते प्राप्नुते ब्रह्मसुखं वा भुङ्क्ते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.20।।कैसे प्राप्त होता है सो बतलाते हैं --, देहोत्पत्तिके बीजभूत? इन मायोपाधिक पूर्वोक्त तीनों गुणोंका उल्लंघन कर? अर्थात् जीवितावस्थामें ही इनका अतिक्रम करके? यह देहधारी विद्वान् जीता हुआ ही जन्म मृत्यु? बुढ़ापे और दुःखोंसे मुक्त होकर अमृतका अनुभव करता है। अभिप्राय यह कि इस प्रकार वह मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.20।। व्याख्या -- गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् -- यद्यपि विचारकुशल मनुष्यका देहके साथ सम्बन्ध नहीं होता? तथापि लोगोंकी दृष्टिमें देहवाला होनेसे उसको यहाँ देही कहा गया है।देहको उत्पन्न करनेवाले गुण ही हैं। जिस गुणके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है? उसके अनुसार उसको ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेना ही पड़ता है (गीता 13। 21)।अभी इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकसे अठारहवें श्लोकतक जिनका वर्णन हुआ है? उन्हीं तीनों गुणोंके लिये यहाँ एतान् त्रीन् गुणान् पद आये हैं। विचारकुशल मनुष्य इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इनके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता? इनके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग कर देता है। कारण कि उसको यह स्पष्ट विवेक हो जाता है कि सभी गुण परिवर्तनशील हैं? उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं और अपना स्वरूप गुणोंसे कभी लिप्त हुआ नहीं? हो सकता भी नहीं। ध्यान देनेकी बात है कि जिस प्रकृतिसे ये गुण उत्पन्न होते हैं? उस प्रकृतिके साथ भी स्वयंका किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है? फिर गुणोंके साथ तो उसका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता हैजन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते -- जब इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है? तो फिर उसको जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थाका दुःख नहीं होता। वह जन्ममृत्यु आदिके दुःखोंसे छूट जाता है क्योंकि जन्म आदिके होनेमें गुणोंका सङ्ग ही कारण है। ये गुण आतेजाते रहते हैं इनमें परिवर्तन होता रहता है। गुणोंकी वृत्तियाँ कभी सात्त्विकी? कभी राजसी और कभी तामसी हो जाती हैं परन्तु स्वयंमें कभी सात्त्विकपना? राजसपना और तामसपना आता ही नहीं। स्वयं (स्वरूप) तो स्वतः असङ्ग रहता है। इस असङ्ग स्वरूपका कभी जन्म नहीं होता। जब जन्म नहीं होता? तो मृत्यु भी नहीं होती। कारण कि जिसका जन्म होता है? उसीकी मृत्यु होती है तथा उसीकी वृद्धावस्था भी होती है। गुणोंका सङ्ग रहनेसे ही जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंका अनुभव होता है। जो गुणोंसे सर्वथा निर्लिप्तताका अनुभव कर लेता है? उसको स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।देहसे तादात्म्य (एकता) माननेसे ही मनुष्य अपनेको मरनेवाला समझता है। देहके सम्बन्धसे होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख मृत्यु ही माना गया है। मनुष्य स्वरूपसे है तो अमर ही किन्तु भोग और संग्रहमें आसक्त होनेसे और प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले शरीरको अमर रखनेकी इच्छासे ही इसको अमरताका अनुभव नहीं होता। विवेकी मनुष्य देहसे तादात्म्य नष्ट होनेपर अमरताका अनुभव करता है।पूर्वश्लोकमें मद्भावं सोऽधिगच्छति पदोंसे भगवद्भावकी प्राप्ति कही गयी एवं यहाँ अमृतमश्नुते पदोंसे अमरताका अनुभव करनेको कहा गया -- वस्तुतः दोनों एक ही बात है।गीतामें जरामरणमोक्षाय (7। 29)? जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् (13। 8) और यहाँ जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तः (14। 20) -- इन तीनों जगह बाल्य और युवाअवस्थाका नाम न लेकर जरा (वृद्धावस्था) का ही नाम लिया गया है? जबकि शरीरमें बाल्य? युवा और वृद्ध -- ये तीनों ही अवस्थाएँ होती हैं। इसका कारण यह है कि बाल्य और युवाअवस्थामें मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव नहीं करता क्योंकि इन दोनों ही अवस्थाओंमें शरीरमें बल रहता है। परन्तु वृद्धावस्थामें शरीरमें बल न रहनेसे मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव करता है। ऐसे ही जब मनुष्यके प्राण छूटते हैं? तब वह भयंकर दुःखका अनुभव करता है।,परन्तु जो तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है? वह सदाके लिये जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।इस मनुष्यशरीरमें रहते हुए जिसको बोध हो जाता है? उसका फिर जन्म होनेका तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता। हाँ? उसके अपने कहलानेवाले शरीरके रहते हुए वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही? पर उसको वृद्धावस्था और मृत्युका दुःख नहीं होगा।वर्तमानमें शरीरके साथ स्वयंकी एकता माननेसे ही पुनर्जन्म होता है और शरीरमें होनेवाले जरा? व्याधि आदिके दुःखोंको जीव अपनेमें मान लेता है। शरीर गुणोंके सङ्गसे उत्पन्न होता है। देहके उत्पादक गुणोंसे रहित होनेके कारण गुणातीत महापुरुष देहके सम्बन्धसे होनेवाले सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।अतः प्रत्येक मनुष्यको मृत्युसे पहलेपहले अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेना चाहिये। गुणातीत होनेसे जरा? व्याधि? मृत्यु आदि सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्ति हो जाती है और मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। फिर उसका पुनर्जन्म होता ही नहीं। सम्बन्ध -- गुणातीत पुरुषं दुःखोंसे मुक्त होकर अमरताको प्राप्त कर लेता है -- ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें गुणातीत मनुष्यके लक्षण जाननेकी जिज्ञासा हुई। अतः वे आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.20।।अनर्थव्रातरूपमपोह्य विद्वान्ब्रह्मत्वं प्राप्नोतीत्येतत्प्रश्नद्वारा विवृणोति -- कथमित्यादिना। यथोक्तानित्येतदेव व्याचष्टे -- मायेति। मायैवोपाधिस्तद्भूतांस्तदात्मनः सत्त्वादीननर्थरूपानित्यर्थः। एभ्यः समुद्भवन्तीति समुद्भवा देहस्य समुद्भवा देहसमुद्भवास्तानिति व्युत्पत्तिं गृहीत्वा व्याचष्टे -- देहोत्पत्तीति। यो विद्वानविद्यामयान्गुणाञ्जीवन्नेवातिक्रम्य स्थितस्तमेव विशिनष्टि -- जन्मेति। पुरस्ताद्विस्तरेणोक्तस्य प्रसङ्गादत्र संक्षिप्तस्य सम्यग्ज्ञानस्य फलमुपसंहरति -- एवमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.19 -- 14.20।।नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं इति स्वतन्त्रकर्तृत्वं गुणानामेव? नान्यस्येत्युच्यत इत्यपव्याख्याननिरासार्थमाह -- परिणामीति। कुत एतत् इत्यत आह -- अन्यथेति गुणेभ्योऽन्यस्य कर्तृत्वाभावे। मोक्षधर्मे परमेश्वरस्य कर्तृत्वमुक्तं तद्विरोधश्चेति वाक्यशेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.19 -- 14.20।।परिणामिकर्त्तारं गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति। अन्यथा यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् [मुण्ड.3।1।3] इति श्रुतिविरोधः।नाहं कर्त्ता न कर्त्ता त्वं कर्त्ता यस्तु सदा प्रभुः इति मोक्षधर्मे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.20।। --,गुणान् एतान् यथोक्तान् अतीत्य जीवन्नेव अतिक्रम्य मायोपाधिभूतान् त्रीन् देही देहसमुद्भवान् देहोत्पत्तिबीजभूतान् जन्ममृत्युजरादुःखैः जन्म च मृत्युश्च जरा च दुःखानि च जन्ममृत्युजरादुःखानि तैः जीवन्नेव विमुक्तः सन् विद्वान् अमृतम् अश्नुते? एवं मद्भावम् अधिगच्छति इत्यर्थः।।जीवन्नेव गुणान् अतीत्य अमृतम् अश्नुते इति प्रश्नबीजं प्रतिलभ्य? अर्जुन उवाच --,अर्जुन उवाच --,
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【 Verse 14.21 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचार: कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca | kair liṅgais trīnguṇān etān atīto bhavati prabho | kim ācāraḥ kathaṁ caitāṁs trīnguṇānativartate ||
▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna says; kaiḥ: by which; liṅgaiḥ: symptoms; trīn: three; guṇān: qualities; etān: all these; atītaḥ: having transcended; bhavati: become; prabho: my Lord; kim: what; ācāraḥ: behavior; kathaṁ: what; ca: also; etāṁ: these; trīn: three; guṇān: qualities; ativartate: transcend
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.21 Arjuna inquires: O my Lord, by what symptoms is one known who is transcendental to those modes? What is his behavior? And how does he transcend the modes of nature?
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.21।।अर्जुन बोले -- हे प्रभो इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है उसके आचरण कैसे होते हैं और इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.21।। अर्जुन ने कहा -- हे प्रभो इन तीनो गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है वह किस प्रकार के आचरण वाला होता है और? वह किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.21 कैः by what? लिंगैः by marks? त्रीन् three? गुणान् Gunas? एतान् these? अतीतः crossed? भवति becomes? प्रभो O Lord? किमाचारः what (is his) conduct? कथम् how? च and? एतान् these? त्रीन् three? गुणान् Gunas? अतिवर्तते goes beyond.Commentary Arjuna said O Lord? by what characteristics may a man be recognised as having gone beyond the three alities What is the behaviour of that Trigunatita sage (one who has gone beyond the three alities) and how does he go beyond the world and is above the Gunas Tell me that.These are the characteristics of the sage who has gone beyond the Gunas others should cultivate them.Just as a king is able to remove the grievances and sorrows of his servants? so also the Lord is able to remove the sorrows of His devotees. That is the reason why Arjuna addresses Sri Krishna as Lord and uses the term Prabhu. By using this word? Arjuna hinted to the Lord that He alone was capable of relieving his sorrows and pains. (Cf.II.54)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.21. Arjuna said O Master ! with what characteristic marks does he, who has transcended these three Strands, exist ? Of what behaviour is he ? And, how does he pass beyond these three Strands ?
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.21 Arjuna asked: My Lord! By what signs can he who has transcended the Qualities be recognized? How does he act? How does he live beyond them?
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.21 Arjuna said What are the marks of a man who has crossed beyond the three Gunas? What is his behaviour? And how does he cross beyond the three Gunas?
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.21 Arjuna said O Lord, by what signs is one (known) who has gone beyond these three alities? What is his behaviour, and how does he transcend these three alities?
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.21 Arjuna said What are the marks of him who has transcended the three alities, O Lord? What is his conduct and how does he go beyond these three alities?
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.21 Kaih etc. But, if he has a body then how could he have transcended the Strands ? He lives certainly in one way or other with some mental modification, which is necessarily one a among the three Strands, With this intention Arjuna raises the estion. Now [by way of giving] answer -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.21 Arjuna said By what signs, namely, distinguishing features, is a man who has crossed beyond these three Gunas, Sattva and the rest, characterised? What is his behaviour? With what kind of behaviour is he associated and how does it serve as a sign for knowing his state? Such is the meaning. How does he, i.e., by what means does he cross beyond the three Gunas, the Sattva and the rest?
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.21 Prabho, O Lord; kaih, by what; lingaih, signs; bhavati, is one (known); atitah, who has gone beyond; etan, these; trin, three; gunan, alities that have been explained? Kim, what; is his acarah, behaviour; ca, and; katham, how, in what way; ativartate, does he transcend; [Ast. adds here, 'atitya vartate, (in what way) does he exist after transcending (the three alities)?'-Tr.] etan, these; trin, three; gunan, alities? In this verse the signs of one who has gone beyond the alities, and the means of transcending them have been asked by Arjuna. By way of replying to the two estions, the Lord said: 'As for the estion, 'With what sings does one who has gone beyond the alities become endowed with?", listen to them:'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.21।। दर्शनशास्त्र के प्रारम्भिक अध्ययन के समय की अपरिहार्य कठिनाई और थकान दूर करने तथा अध्ययन को और अधिक मनोरंजन बनाने के लिये गीता की रचना संवाद शैली में की गई है। यह स्पष्ट है कि पूर्ण ज्ञानी भगवान् श्रीकृष्ण और मोहित पुरुष अर्जुन के इस संवाद में? कवि व्यास जी को तात्त्विक विवेचन के समय भी मानव स्वभाव का विस्मरण नहीं हुआ है। ज्ञानियों की किसी भी सभा में अर्जुन के प्रश्न बालसुलभ कौतूहल अथवा केवल बुद्धिचातुर्य के समान प्रतीत होंगे। तथापि जिस धैर्य के साथ भगवान् श्रीकृष्ण मध्यम बुद्धि के शिष्य के प्रश्नों का उत्तर देते हैं उससे ज्ञात होता है कि एक ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानी पुरुष का यह कर्तव्य है कि उसको संयमी अथवा नास्तिक लोगों के द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी विस्तारपूर्वक देने चाहिये।यदि ज्ञानदान की ऐसी स्वस्थ परंपरा को प्राप्त करने का सौभाग्य हमें मिला है? तथापि किसी कारण से? इसे रहस्य बनाये रखने की एक दुष्टभावना हमारी गौरवमयी संस्कृति की एक स्वस्थ परम्परा को लूटे लिये जा रही है। तत्त्वज्ञान के सिद्धान्तों को विचार मन्थन के द्वारा जब प्रकाश में नहीं लाया जाता? तब वे नष्टप्राय होने लगते हैं। प्रत्येक जिज्ञासु शिष्य को यह स्वतंत्रता है कि सर्वप्रथम तत्त्वज्ञान के सिद्धान्तों को भलीभाँति समझने के लिये प्रश्न पूछ सके। उन्हें समझने पर ही उनके महत्त्व को पहचाना जा सकता है। जब तक इस प्रकार की समझ और पहचान नहीं होती तब तक हम उन सिद्धान्तों को अपने दैनिक जीवन में नहीं जी सकते। हिन्दू दर्शन एक जीवनपद्धति है? न कि जीवन की ओर देखने का केवल एक दृष्टिकोण। इसलिए आवश्यक है कि इस ज्ञान को हम अपने जीवन में जियें।यहाँ अर्जुन ने तीन प्रश्न पूछे हैं (1) तीनों गुणों से अतीत हुये पुरुष के लक्षण क्या हैं जिनसे उसकी पहचान हो सकती है (2) उसका आचरण किस प्रकार का होगा और (3) किस प्रकार वह ज्ञानी पुरुष त्रिगुणों से अतीत होकर अपने आत्मवैभव को प्राप्त होता है इनके उत्तर में भगवान् श्रीकृष्ण सर्वप्रथम त्रिगुणातीत पुरुष के लक्षण बताते है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.21।।गुणातिक्रमेण सर्वानार्थनिवृत्तिपूर्वकामृतप्राप्तिलक्षणं सम्यग्ज्ञानफलं भगवतोक्तं श्रुत्वा प्रश्नबीजं प्रतिलभ्य गुणातीतस्य लक्षणमाचारं गुणातिक्रमेणोपायं च सम्यक् बुभूत्सुरर्जुन उवाच -- कैरिति। एतानुक्तान् त्रीन् गुणान् कैर्लिङ्गैश्चिह्नैरतीतोऽतिक्रान्तो भवति कैश्चिह्नैर्गुणातिक्रमणे प्रभुः समर्थो भवतीति सूचयन्संबोधयति प्रभो इति। अस्मादादिप्रश्नसमाधानेऽतिसमर्थोऽसीति वा संबोधनाशयः। कोऽस्याचार इति किमाचारः खतं च केन प्रकारेणैतान् त्रीन् गुणान् अतिवर्तते लिङ्गैराचारेण च गुणातीतस्य लक्षणं गुणातिक्रमोपायं च वदेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.21।।गुणानेतानतीत्य जीवन्नैवामृतमश्नुत इत्येतच्छ्रुत्वा गुणातीतस्य लक्षणं चाचारं गुणातीतत्वोपायं च सम्यग्बुभुत्समानः अर्जुन उवाच -- एतान्गुणानतीतो यः स कैर्लिङ्गैर्विशिष्टो भवति यैर्लिङ्गैः स ज्ञातुं शक्यस्तानि मे ब्रूहीत्येकः प्रश्नः। प्रभुत्वाद्भृत्यदुःखं भगवतैव निवारणीयमिति सूचयन्संबोधयति प्रभो इति। क आचारोऽस्येति किमाचारः किं यथेष्टचेष्टः किंवा नियन्त्रित इति द्वितीयः प्रश्नः। कथंच केन च प्रकारेण एतांस्त्रीन्गुणानतिवर्ततेऽतिक्रमतीति गुणातीतत्वोपायः क इति तृतीयः प्रश्नः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.21।।प्रकृतितो मुक्तिप्रकारे उक्तेऽथ मुक्तलक्षणानि पृच्छन्नर्जुन उवाच -- कैरिति। कैर्लिङ्गैश्चिह्नैस्त्रीन्गुणानेतान्व्याख्यातानतीतो भवति पुमान् हे प्रभो? स च किमाचारः कोऽस्याचारः कथं केन च प्रकारेणैतांस्त्रीन्गुणानतिक्रम्य वर्तते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.21।।एवमेतांस्त्रीन् गुणानिति भगवतोक्तं? तेनान्येऽपि गुणाः सन्ति? यैरेतदतिक्रमो भवतीति विचार्याऽर्जुनस्तथैव विज्ञापयति -- कैर्लिङ्गैरिति। हे प्रभो सर्वकरणसमर्थ कैर्लिङ्गैश्चिह्नैरेतान् बन्धनात्मकांस्त्रीन् गुणान् अतीतो भवति? अतिक्रमं कृत्वा अलौकिकदेहवान् भवतीत्यर्थः। ततो देहाप्त्यनन्तरं किमाचारः कीदृगाचारवान् च पुनः एतांस्त्रीन् गुणानतीत्य कथं केनोपायेन वर्त्तते तं कथयेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.21।।गुणानेतानतीत्यामृतमश्नुत इत्येतच्छ्रुत्वा? गुणातीतस्य लक्षणमाचारं गुणात्ययोपायं च सम्यग्बुभुत्सुरर्जुन उवाच -- कैर्लिङगैरिति। हे प्रभो? कैर्लिङ्गैः कीदृशैरात्मन्युत्पन्नैश्चिह्नैर्गुणातीतो देही भवतीति लक्षणप्रश्नः। क आचारो यस्येति,किमाचारः। कथं वर्तत इत्यर्थः। कथं च केनोपायेनैतांस्त्रीनपि गुणानतीत्य वर्तते तत्कथयेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.21।।अथ गुणातीतस्य लक्षणमाचारं गुणात्ययहेतुं च जिज्ञासुरर्जुन उवाच -- कैर्लिङ्गैरिति। कैर्लक्षणैस्त्रीन् गुणानतीत उपलक्षितो भवति स किमाचारः कथं केनोपायेन हेतुरूपेण वा त्रीन् गुणानतिवर्त्तते इति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.21।।( शरीरधारी जीव ) जीता हुआ ही गुणोंको अतिक्रम करके अमृतका अनुभव करता है इस प्रश्नबीजको पाकर अर्जुन बोला --, हे प्रभो इन पूर्ववर्णित तीनों गुणोंसे अतीत -- पार हुआ पुरुष किनकिन लक्षणोंसे युक्त होता है और वह कैसे आचरणवाला होता है अर्थात् उसके आचरण कैसे होते हैं तथा किस प्रकारसे ( किस उपायसे ) मनुष्य इन तीनों गुणोंसे अतीत हो सकता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.21।। व्याख्या -- कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो -- हे प्रभो मैं यह जानना चाहता हूँ कि जो गुणोंका अतिक्रमण कर चुका है? ऐसे मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं तात्पर्य है कि संसारी मनुष्यकी अपेक्षा गुणातीत मनुष्यमें ऐसी कौनसी विलक्षणता आ जाती है? जिससे साधारण व्यक्ति समझ ले कि यह गुणातीत पुरुष हैकिमाचारः -- उस गुणातीत मनुष्यके आचरण कैसे होते हैं अर्थात् साधारण आदमीकी जैसी दिनचर्या और रात्रिचर्या होती है? गुणातीत मनुष्यकी वैसी ही दिनचर्यारात्रिचर्या होती है या उससे विलक्षण होती है साधारण आदमीके जैसे आचरण होते हैं जैसा खानपान? रहनसहन? सोनाजागना होता है? गुणातीत मनुष्यके आचरण? खानपान आदि भी वैसे ही होते हैं या कुछ विलक्षण होते हैंकथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते -- इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करनेका क्या उपाय है अर्थात् कौनसा साधन करनेसे मनुष्य गुणातीत हो सकता है सम्बन्ध -- अर्जुनके प्रश्नोंसे पहले प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें गुणातीत मनुष्यके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.21।।सम्यग्धीफलं गुणातिक्रमपूर्वकममृतत्वमुक्तं श्रुत्वा मुक्तस्य लक्षणं वक्तव्यमिति प्रकृतं विवक्षित्वा प्रश्नमुत्थापयति -- जीवन्नेवेति। ये व्याख्याताः सत्त्वादयो गुणास्तत्परिणामभूतानध्यासानतिक्रान्तः सन्कैर्लिङ्गैर्ज्ञातो भवतीति तानि वक्तव्यानि सिद्ध्यर्थं पूर्वमनुष्ठेयानि पश्चादयत्नलभ्यानि लिङ्गानि? कानि तानीति पृच्छति -- कैरिति। यथेष्टचेष्टाव्यावृत्त्यर्थं प्रश्नान्तरं -- किमाचार इति। ज्ञानस्य गुणात्ययोपायस्योक्तत्वादुपायप्रकारजिज्ञासया प्रश्नान्तरं -- कथमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.21।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.21।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.21।। --,कैः लिङ्गैः चिह्नैः त्रीन् एतान् व्याख्यातान् गुणान् अतीतः अतिक्रान्तः भवति प्रभो? किमाचारः कः अस्य आचारः इति किमाचारः कथं केन च प्रकारेण एतान् त्रीन् गुणान् अतिवर्तते अतीत्य वर्तते।।गुणातीतस्य लक्षणं गुणातीतत्वोपायं च अर्जुनेन पृष्टः अस्मिन् श्लोके प्रश्नद्वयार्थं प्रतिवचनं श्रीभगवान् उवाच। यत् तावत् कैः लिङ्गैः युक्तो गुणातीतो भवति इति? तत् शृणु --,श्रीभगवानुवाच --,
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【 Verse 14.22 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव | न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ् क्षति ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | prakāśaṁ ca pravṛttiṁ ca mohameva ca pāṇḍava | na dveṣṭi saṁpravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati ||
▸ Glossary: śrībhagavānuvāca: the supreme personality of Divine says; prakāśaṁ ca: and illumination; pravṛttiṁ ca: and attachment; mohaṁ: illusion; eva ca: also; pāṇḍava: O son of Pāṇḍu; na dveṣṭi: does not hate; saṁpravṛttāni: although developed; na nivṛttāni: nor stop development; kāṅkṣati: desires
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.22,23,24,25 Śrī Bhagavān says: He who does not hate illu- mination, attachment and delusion when they are present, nor longs for them when they disappear; who is seated like one unconcerned, being situated beyond these material reactions of the modes of nature, who remains firm, knowing that the modes alone are active; He who regards alike pleasure and pain, and looks on a lump of earth, a stone and a piece of gold with an equal eye; who is wise and holds praise and blame to be the same; who is unchanged in honor and dishonor, who treats friend and foe alike, who has abandoned all result based undertakings—such a man is said to have transcended the modes of nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.22।।श्रीभगवान् बोले -- हे पाण्डव प्रकाश? प्रवृत्ति तथा मोह -- ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता? और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनकी इच्छा नहीं करता।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.22।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पाण्डव (ज्ञानी पुरुष) प्रकाश? प्रवृत्ति और मोह के प्रवृत्त होने पर भी उनका द्वेष नहीं करता तथा निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.22 प्रकाशम् light? च and? प्रवृत्तिम् activity? च and? मोहम् delusion? एव even? च and? पाण्डव O Arjuna? न not? द्वेष्टि hates? सम्प्रवृत्तानि (when) gone forth? न not? निवृत्तानि when absent? काङ्क्षति longs.Commentary This is the answer to Arjunas first estion. Light is the effect of Sattva? activity of Rajas and delusion of Tamas. The liberated sage does not hate them when they are present. When Sattva shines he is not carried away by pride. He does not think? I am a vey learned man. When the impulse for action is awakened in the body or when there is a divine call for him to do work for the solidarity of the world (Lokasangraha) he does not hate any action and he does not regret it after the action is accomplished. He feels no remorse while performing actions. The work is like the play of a child. While inertia increases in him? he is not deluded by infatuation.Only an ignorant man thinks Tamas has entered into me. I am deluded. I am under the influence of heedlessness? torpor? sloth? laziness and indolence. Now I am under the influence of Rajas. I am forced to do activities. This is painful. I have fallen from my true nature. This gives me a lot of pain. Now Sattva predominates in me. I am attached to happiness and knowledge. I am proud of my learning and better status.The liberated sage who has transcended the Gunas does not thus hate them when they are present.A man of Sattva or Rajas or Tamas longs for light? action or inertia which first manifested themselves and disappeared. But a liberated sage or one who has gone beyond the three alities does not at all long for these states which have vanished. This mark or characteristic is an internal mental state. It cannot be perceived or detected by others. It can be felt by ones own self alone. If one is endowed with clairvoyant vision or the inner eye of intuition? he can directly behold the longins that arise in the mind of another man.In the following three verses the Lord gives His answer to Arjunas second estion What is the conduct of the sage who has crossed over the Gunas
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.22. The Bhagavat said O son of Pandu ! He does niether abhor nor crave for illumination, and exertion, and delusion too, as and when they arise or cease to be.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.22 Lord Shri Krishna replied: O Prince! He who shuns not the Quality which is present, and longs not for that which is absent;
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.22 The Lord said He hates not illumination, nor activity nor even delusion, O Arjuna, while these prevail, nor longs for them when they cease.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.22 The Blessed Lord said O son of Pandu, he neither dislikes illumination (knowledge), activity and delusion when they appear, nor does he long for them when they disappear.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.22 The Blessed Lord said When light, activity and delusion are present, he hates them not, nor does he long for them when they are absent.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.22 Prakasam etc. Of course the illumination etc., do exist in all as their respective attributive marks. Yet, the men of Yoga do not rejoices in these illumination etc. Nor do they have any hatred [for them]. On the other hand, contemplating 'These exist as attributes merely of the body; and they are not capable of disturbing me.', these persons transcend the Strands. Hence [the Bhagavat] says -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.22 The Lord said He does not hate the effects of Sattva, Rajas and Tamas known as illumination, activity and delusion respectively, when they are prevailing in regard to undesired things other than the self; nor longs for them when they cease, i.e., when desired things other than the self become unavailable. Hating things not conducive to the realisations of the self and longing for things conducive thereof, do not come under this law stated in the Verse.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.22 Na dvesti, he neither dislikes these; prakasam, illumination (knowledge), an effect of sattva; pravrttim, activity, an effect of rajas; and moham, delusion, an effect of tamas; sampravrttani, when they appear, when they fully emerge in the form of objects (of experience)-. 'In me has arisen a perception which is a result of tamas; thery I have become deluded'; so also, 'In me has risen (the inclination to) action which is painful and is born of rajas. By that rajas I have been actuated, carried away from my own nature. This is a matter of sorrow to me that there has been a deviation from my own nature'; similarly, 'The ality of sattva, in the form of illumination that is knowledge, binds me by attributing discrimination to me and making me attached to happiness'-(by thinking) in these ways one dislikes them because of his being not fully enlightened. The person who has transcended the alities does not dislike them in this manner. Unlike a person having sattva etc., who longs for the effects of sattva etc. which withdraw themselves after becoming manifest to him, the person who has gone beyond the alities na kanksati, does not long for them in that way; nivrttani, when they disappear. This is the idea. This is not an indication that can be perceived by others. What then? Since this characteristic is perceivable to oneself, it is merely subjective. For dislike or longing, which is a subjective experience of a person, is not seen by another. Now, then, the Lord gives the reply to the estion, 'What is the behaviour of one who has gone beyond the alities?':
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.22।। जो उपाधियां या वस्तुएं तीन गुणों का कार्य हैं केवल उन पर ही त्रिगुणों का प्रभाव पड़ सकता है? उनसे परे आत्मतत्त्व पर नहीं। अत आत्मज्ञान होने के पश्चात् भी ये उपाधियां पूर्ववत् व्यवहार करती रहती हैं और उनपर गुणों का प्रभाव भी पड़ सकता है। परन्तु ज्ञानी पुरुष उनसे किसी प्रकार से तादात्म्य नहीं करता। समस्त परिस्थितियों में सदैव समत्व भाव में स्थित रहना अनुभवी पुरुष का प्रमुख लक्षण है और यही पूर्णत्व का सार है।प्रकाश? प्रवृत्ति और मोह ये क्रमश सत्त्व? रज और तमोगुण के कार्य हैं। यहाँ त्रिगुणों का निर्देश उनके कार्यों के द्वारा किया गया है। सामान्यत अज्ञानी मनुष्य के मन में जब रजोगुण के कार्य विक्षेप अथवा तमोगुण के कार्य निद्रा? प्रमाद आदि प्रभावशाली होते हैं? तब वह उनका द्वेष करता है और सत्त्वगुण के कार्य ज्ञान? सुख और शान्ति के होने पर वह उनसे प्रीति रखता है। सत्त्वगुण निवृत्त हो जाय तो वह उसकी इच्छा करके उसके लिये लालायित रहता है। इन सबका कारण त्रिगुणों के साथ अविद्यामूलक तादात्म्य है।ज्ञानी की स्थिति अज्ञानी से सर्वथा भिन्न होती है। वह जानता है कि त्रिगुणों का साक्षी आत्मा उन गुणों तथा उनके कार्यों से सदैव असंगअसंस्पृष्ट रहता है। अत वह रज और तम के प्रवृत्त होने पर न उनसे द्वेष रखता है और न सत्त्वगुण के प्रवृत्त होने की कामना। उसकी सुखशान्ति इन गुणों की प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति पर निर्भर नहीं करती। किसी लखपति धनी व्यक्ति को संयोगवशात् पचीस पैसे मिलने या न मिलने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऐसा हो सकता है कि कभी वह नीचे झुककर उस पैसे के सिक्के को उठा ले? किन्तु उसे वह? हर्षातिरेक नहीं होगा? जो एक दरिद्र व्यक्ति को समान परिस्थिति में होता होगा।इस प्रकार? समस्त उपाधियों के तादात्म्य को त्यागकर आत्मानुभूति में रमा पुरुष ही त्रिगुणातीत या मुक्त कहलाता है। संसार के दुख उसे कदापि विचलित नहीं कर सकते।अब? उस ज्ञानी पुरुष के आचरण का वर्णन करते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.22।।एवं पृष्टः श्रीभगवानुवाच। तत्र कैर्लिङ्गैर्गुणातीतो भवतीति प्रश्नस्योत्तरमाह। प्रकाशं च सत्त्वकार्यं? प्रवृत्तिं च रजःकार्य? मोहमेव च तमः कार्यं। चकाराः सत्त्वदिसर्वकार्याणां समुच्चायार्थाः। इत्येतानि संप्रवृत्तानि सभ्यग्विषयभावेनोद्भूतानि न द्वेष्टि यथाऽविद्वान्। मम तामसः प्रत्ययो जातः तेनाहं मूढः तथा राजसी प्रवृत्तिर्ममोत्पन्ना दुःखात्मिका तेनाहं रजसा प्रवर्तितः प्रचलितः स्वरुपात् कष्टं मम वर्तते योऽयं स्वरुपावस्थानात् भ्रंशः। तथा सात्त्विको गुणः प्रकाशात्मा मां विवेकित्वमापादयन् सुखेन च संजयन् बध्नातीति संप्रवृत्तं सत्त्वादिकार्यं द्वेष्टि न तथा सम्यग्दर्शित्वेन गुणातीतो निवृत्तानि काङ्क्षतीत्यर्थः। सर्वतः यथाचाविद्वान् सात्त्विकादिः पुरुषः सत्त्वादिकार्याण्यात्मानं प्रति प्रकाशादीनि निवृत्तानि काङ्क्षति न तथा गुणातीतो निवृत्तानि काङ्क्षतीत्यर्थः। एवंविधो यः स गुणातीत उच्यत इति चतुर्थस्थेनान्वयः। एतादृशस्यैव जनकसंबन्धो नास्ति नत्वन्यस्येति ध्वनयन्संबोधयति हे पाण्डवति। एतच्चिह्नवत्त्वं गुणातीतस्य लक्षणं स्वार्थमेव स्वात्मप्रत्यक्षत्वात्। न परप्रत्यक्षं स्वात्मविषयस्य द्वेषस्याकाङ्क्षायाश्च पररैदृश्यत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.22।।स्थितप्रज्ञस्य का भाषा इत्यादिना पृष्टमपिप्रजहाति यदा कामान् इत्यादिना दत्तोत्तरमपि पुनः प्रकारान्तरेण बुभुत्समानः पृच्छतीत्यवधाय प्रकारान्तरेण तस्य लक्षणादिकं पञ्चभिः श्लोकैः श्रीभगवानुवाच -- यस्तावत्कैर्लिङ्गैर्युक्तो गुणातीतो भवतीति प्रश्नस्तस्योत्तरं श्रृणु -- प्रकाशं च सत्त्वकार्यं? प्रवृत्तिं च रजःकार्यं? मोहं च तमःकार्यम्। उपलक्षणमेतत्। सर्वाण्यपि गुणकार्याणि यथायथं संप्रवृत्तानि स्वसामग्रीवशादुद्भूतानि सन्ति दुःखरूपाण्यपि दुःखबुद्ध्या यो न द्वेष्टि? तथा विनाशसामग्रीवशान्निवृत्तानि तानि सुखरूपाण्यपि सन्ति सुखबुद्ध्या न काङ्क्षति न कामयते स्वप्नवन्मिथ्यात्वनिश्चयात्? एतादृशद्वेषरागशून्यो यः स गुणातीत उच्यत इति चतुर्थश्लोकगतेनान्वयः। इदं च स्वात्मप्रत्यक्षं लक्षणं स्वार्थमेव न परमार्थम्। नहि स्वाश्रितौ द्वेषतदभावौ रागतदभावौ च परः प्रत्येतुमर्हति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.22।।तत्राद्यस्योत्तरमाह -- प्रकाशमिति। प्रकाशप्रवृत्तिमोहाः सत्त्वरजस्तमसां कार्याणि। व्युत्थानावस्थायां तानि सम्यक् प्रवृत्तानि। सामान्ये नपुंसकम्। तान्संप्रवृत्तान्न द्वेष्टि। नापि समाध्यवस्थायां तानि निवृत्तानि सन्ति काङ्क्षति। सोऽयं नित्यसमाधिस्थो ब्रह्मविद्वरिष्ठः यं प्रकृत्य श्रीभागवते स्मर्यतेदेहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति इति। अत्र वासिष्ठे सप्तयोगभूमय उक्ताःज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा समुदाहृता। विचारणा द्वितीया तु तृतीया तनुमानसा। सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका। पदार्थाभावनी षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता इति। तत्र यथोक्ता साधनसंपत् मुमुक्षान्ता प्रथमा। श्रवणमननाख्यविचारात्मिका द्वितीया। निदिध्यासनरूपा तृतीया। एताः साधनभूमयः। सत्त्वापत्तिर्ब्रह्मसाक्षात्काररूपा चतुर्थी फलभूता। यस्यां योगी कृतार्थोऽपि जीवन्मुक्तिसुखं पुष्कलं नानुभवति। परास्तिस्रो जीवन्मुक्तेरवान्तरभेदाः। तत्रापि पञ्चम्यां भूमौ स्वयं स्थितः स्वयमेव व्युत्तिष्ठति। षष्ठयां परप्रयत्नेन सप्तम्यां तु न स्वतः परतो वा व्युत्तिष्ठति। सोऽयं नित्यसमाधिस्थः प्रकाशमित्यनेन श्लोकेनोक्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.22।।अत्रोत्तरं मद्गुणैरेव सर्वं भवतीति ज्ञापनाय गुणसङ्ख्याकैः श्लोकैराह भगवान् -- प्रकाशं चेति। प्रकाशं सर्वद्वारेष्वलौकिकानुभवसिद्ध्यर्थं मदीयालौकिकमत्स्वरूपात्मकसत्त्वोपस्थापितालौकिकानुकरणात्मकलौकिकरूपम्। इदमेव चकारेण व्यञ्जितम्। च पुनः तथैव प्रवृत्तिं? चस्त्वर्थे। तथाच महदनुभवरससिद्ध्यर्थं विप्रयोगलयात्मकरूपं मोहमेव केवलं मोहं वा? एतादृक्श्रवणेऽपि भयाभावाय हे पाण्डव न द्वेष्टि मदिच्छागतानलौकिकान् लौकिकसरूपान्। किञ्चैवं सात्त्विकादित्रयाण्येव कार्याणि प्रवृत्तानि मदिच्छया प्राप्नोति। अतएव स्वतः प्रवृत्तिरुक्ता। स्वेच्छात्वज्ञापनाय लौकिकत्वेन प्रतिबन्धकतया न द्वेष्टि तत्त्यागाय यत्नं न करोति। तथैव मदिच्छाभावे निवृत्तानि न काङ्क्षति स गुणातीत उच्यते इति चतुर्थश्लोकेनाऽन्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.22।। स्थितप्रज्ञस्य का भाषा इत्यादिना द्वितीयाध्याये पृष्टमपि दत्तोत्तरमपि पुनर्विशेषबुभुत्सया पृच्छतीति ज्ञात्वा प्रकारान्तरेण तस्य लक्षणादिकं श्रीभगवानुवाच -- प्रकाशं चेत्यादिषड्भिः। तत्रैकेन लक्षणमाह।।प्रकाशं चेति। प्रकाशं चसर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् इति पूर्वोक्तं सत्त्वकार्यं? प्रवृत्तिं च रजःकार्यम्? मोहं च तमसः कार्यम्। उपलक्षणमेतत्सत्त्वादीनाम्। सर्वाण्यपि कार्याणि यथायथं संप्रवृत्तानि स्वतःप्राप्तानि सन्ति दुःखबुद्ध्या यो न द्वेष्टि? निवृत्तानि च सन्ति सुखबुद्ध्या न काङ्क्षति? गुणातीतः स उच्यत इति चतुर्थेनान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.22।।तदा श्रीभगवांस्तत्स्वरूपमाचारं गुणातीततां च लक्षयन्नाह चतुर्भिः -- प्रकाशं चेत्यादिभिः। प्रकाशः सात्त्विकः? प्रवृत्ती राजसी? मोहस्तामस इत्येतानि त्रिगुणकार्याणि अनात्मसु प्रवृत्तानि न द्वेष्टि? यदि निवृत्तानि च तथापि न काङ्क्षति? अथवा प्रकाशं कर्माणि च निवृत्तानि न काङ्क्षति? कर्मप्रवृत्तिं मोहं च न द्वेष्टि? प्रवृत्तानि च कर्माण्यपीति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas
Chapter 14 (Part 10)
Goenka: ।।14.22।।इस ( उपर्युक्त ) श्लोकमें अर्जुनने गुणातीतके लक्षण और गुणातीत होनेका उपाय पूछा है? उन दोनों प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये श्रीभगवान् बोले कि पहले गुणातीत पुरुष किनकिन लक्षणोंसे युक्त होता है उसे सुन --, सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश? रजोगुणका कार्य प्रवृत्ति और तमोगुणका कार्य मोह? ये जब प्राप्त होते हैं अर्थात् भली प्रकार विषयभावसे उपलब्ध होते है? तब वह इनसे द्वेष नहीं किया करता। अभिप्राय यह कि मुझमें तामसभाव उत्पन्न हो गया? उससे मैं मोहित हो गया और दुःखरूप राजसी प्रवृत्ति मुझमें उत्पन्न हुई? उस राजसभावने मुझे प्रवृत्त कर दिया? इसने मुझे स्वरूपसे विचलित कर दिया? यह जो अपनी स्वरूपस्थितिसे विचलित होना है? वह मेरे लिये बड़ा भारी दुःख है तथा प्रकाशमय सात्त्विक गुण? मुझे विवेकित्व प्रदान करके और सुखमें नियुक्त करके बाँधता है? इस प्रकार साधारण मनुष्य अयथार्थदर्शी होनेके कारण उन गुणोंसे द्वेष किया करते हैं? परंतु गुणातीत पुरुष उनकी प्राप्ति होनेपर उनसे द्वेष नहीं करता। तथा जैसे सात्त्विक? राजस और तामस पुरुष? जब सात्त्विक आदि भाव अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराकर निवृत्त हो जाते हैं? तब ( पुनः ) उनको चाहते हैं। वैसे गुणातीत उन निवृत्त हुए गुणोंके कार्योंको नहीं चाहता यह अभिप्राय है। ( परंतु ये 2()৷৷) 2सब लक्षण दूसरोंको प्रत्यक्ष होनेवाले नहीं हैं। तो कैसे हैं अपने आपको ही प्रत्यक्ष होनेके कारण ये स्वसंवेद्य ही हैं क्योंकि अपने आपमें होनेवाले द्वेष या आकाङ्क्षाको दूसरा नहीं देख सकता।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.22।। व्याख्या -- प्रकाशं च -- इन्द्रियों और अन्तःकरणकी स्वच्छता? निर्मलताका नाम प्रकाश है। तात्पर्य है कि जिससे इन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि पाँचों विषयोंका स्पष्टतया ज्ञान होता है? मनसे मनन होता है और बुद्धिसे निर्णय होता है? उसका नाम प्रकाश है।भगवान्ने पहले (14। 11 में ) सत्त्वगुणकी दो वृत्तियाँ बतायी थीं -- प्रकाश और ज्ञान। उनमेंसे यहाँ केवल प्रकाशवृत्ति लेनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणमें प्रकाशवृत्ति ही मुख्य है क्योंकि जबतक इन्द्रियाँ और अन्तःकरणमें प्रकाश नहीं आता? स्वच्छतानिर्मलता नहीं आती? तबतक ज्ञान (विवेक) जाग्रत् नहीं होता। प्रकाशके आनेपर ही ज्ञान जाग्रत् होता है। अतः यहाँ ज्ञानवृत्तिको प्रकाशके ही अन्तर्गत ले लेना चाहिये।प्रवृत्तिं च -- जबतक गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक रजोगुणकी लोभ? प्रवृत्ति? रागपूर्वक कर्मोंका आरम्भ? अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती रहती हैं। परन्तु जब मनुष्य गुणातीत हो जाता है? तब रजोगुणके साथ तादात्म्य रखनेवाली वृत्तियाँ तो पैदा हो ही नहीं सकतीं? पर आसक्ति? कामनासे रहित प्रवृत्ति (क्रियाशीलता) रहती है। यह प्रवृत्ति दोषी नहीं है। गुणातीत मनुष्यके द्वारा भी क्रियाएँ होती हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ केवल प्रवृत्ति को ही लिया है।रजोगुणके दो रूप हैं -- राग और क्रिया। इनमेंसे राग तो दुःखोंका कारण है। यह राग गुणातीतमें नहीं रहता। परन्तु जबतक गुणातीत मनुष्यका दीखनेवाला शरीर रहता है? तबतक उसके द्वारा निष्कामभावपूर्वक स्वतः क्रियाएँ होती रहती हैं। इसी क्रियाशीलताको भगवान्ने यहाँ प्रवृत्ति नामसे कहा है।मोहमेव च पाण्डव -- मोह दो प्रकारका है -- (1) नित्यअनित्य? सत्असत्? कर्तव्यअकर्तव्यका विवेक न होना और (2) व्यवहारमें भूल होना। गुणातीत महापुरुषमें पहले प्रकारका मोह (सत्असत् आदिका विवेक न होना) तो होता ही नहीं (गीता 4। 35)। परन्तु व्यवहारमें भूल होना अर्थात् किसीके कहनेसे किसी निर्दोष व्यक्तिको दोषी मान लेना और दोषी व्यक्तिको निर्दोष मान लेना आदि तथा रस्सीमें साँप दीख जाना? मृगतृष्णामें जल दीख जाना? सीपी और अभ्रकमें चाँदीका भ्रम हो जाना आदि मोह तो गुणातीत मनुष्यमें भी होता है।न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति -- सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश? रजोगुणका कार्य प्रवृत्ति और तमोगुणका कार्य मोह -- इन तीनोंके अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी गुणातीत महापुरुष इनसे द्वेष नहीं करता और इनके निवृत्त होनेपर भी इनकी इच्छा नहीं करता। तात्पर्य है कि ऐसी वृत्तियाँ क्यों उत्पन्न हो रही हैं? इनमेंसे कोईसी भी वृत्ति न रहे -- ऐसा द्वेष नहीं करता और ये वृत्तियाँ पुनः आ जायँ ये वृत्तियाँ बनी रहें -- ऐसा राग नहीं करता। गुणातीत होनेके कारण गुणोंकी वृत्तियोंके आनेजानेसे उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। वह इन वृत्तियोंसे स्वाभाविक ही निर्लिप्त रहता है।विशेष बातएक तो वृत्तियोंका होना होता है और एक वृत्तियोंको करना (उनमें सम्बन्ध जोड़ना अर्थात् रागद्वेष करना) होता है। होने और करनेमें बड़ा अन्तर है। होना समष्टिगत होता है और करना व्यक्तिगत होता है। संसारमें जो होता है? उसकी जिम्मेवारी हमारेपर नहीं होती। जो हम करते हैं? उसीकी जिम्मेवारी हमारेपर होती है।जिस समष्टि शक्तिसे संसारमात्रका संचालन होता है? उसी शक्तिसे हमारे शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि(जो कि संसारके ही अंश हैं) का भी संचालन होता है। जब संसारमें होनेवाली क्रियाओंके गुणदोष हमें नहीं लगते? तब शरीरादिमें होनेवाली क्रियाओंके गुणदोष हमें लग ही कैसे सकते हैं परन्तु जब स्वतः होनेवाली क्रियाओंमेंसे कुछ क्रियाओँके साथ मनुष्य रागद्वेषपूर्वक अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् उनका कर्ता बन जाता है? तब उनका फल उसको ही भोगना पड़ता है। इसलिये अन्तःकरणमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंसे होनेवाली अच्छीबुरी वृत्तियोंसे साधकको रागद्वेष नहीं करना चाहिये अर्थात् उनसे अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये।वृत्तियाँ एक समान किसीकी भी नहीं रहतीं। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ तो गुणातीत महापुरुषके अन्तःकरणमें भी होती हैं? पर उसका उन वृत्तियोंसे रागद्वेष नहीं होता। वृत्तियाँ आपसेआप आती और चली जाती हैं। गुणातीत महापुरुषकी दृष्टि उधर जाती ही नहीं क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय और कुछ रहता ही नहीं।देखना और दीखना -- दोनोंमें बड़ा फरक है। देखना करने के अन्तर्गत होता है और दीखना होने के अन्तर्गत होता है। दोष देखनेमें होता है? दीखनेमें नहीं। अतः साधकको यदि अन्तःकरणमें खराबसेखराब वृत्ति भी दीख जाय? तो भी उसको घबराना नहीं चाहिये। अपनेआप दीखनेवाली (होनेवाली) वृत्तियोंसे रागद्वेष करना अर्थात् उनके अनुसार अपनी स्थिति मानना ही उनको देखना है। साधकसे भूल यही होती है कि वह दीखनेवाली वस्तुको देखने लग जाता है और फँस जाता है। भगवान् राम कहते हैं -- सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक।। (मानस 7। 41)साधकको गहराईसे विचार करना चाहिये कि वृत्तियाँ तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं? पर स्वयं (अपना स्वरूप) सदा ज्योंकात्यों रहता है। वृत्तियोंमें होनेवाले परिवर्तनको देखनेवाला स्वरूप परिवर्तनरहित है। कारण कि परिवर्तनशीलको परिवर्तनशील नहीं देख सकता? प्रत्युत परिवर्तनरहित ही परिवर्तनशीलको देख सकता है। इससे सिद्ध होता है कि स्वरूप वृत्तियोंसे अलग है। परिवर्तनशील गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ अपनेमें प्रतीत होती हैं। अतः साधकको आनेजाने वाली वृत्तियोंके साथ मिलकर अपने वास्तविक स्वरूपसे विचलित नहीं होना चाहिये। चाहे जैसे वृत्तियाँ आयें? उनसे राजीनाराज नहीं होना चाहिये उनके साथ अपनी एकता नहीं माननी चाहिये। सदा एकरस रहनेवाले गुणोंसे सर्वथा निर्लिप्त? निर्विकार एवं अविनाशी अपने स्वरूपको न देखकर परिवर्तनशील? विकारी एवं विनाशी वृत्तियोंको देखना साधकके लिये महान् बाधक है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.22।।प्रश्नस्वरूपमनूद्य तदुत्तरं दर्शयति -- गुणातीतस्येति। पृष्टो भगवानिति संबन्धः। किंवृत्तस्य त्रिधा प्रयोगदर्शनात्प्रश्नद्वयार्थमित्युपलक्षणं प्रश्नत्रयार्थमिति द्रष्टव्यम्। उत्तरमवतार्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- यत्तावदिति। तानि सम्यग्दर्शी न द्वेष्टीत्युक्तमेव स्पष्टयितुं निषेध्यमसम्यग्दर्शिनो द्वेषं तेषु प्रकटयति -- ममेत्यादिना। सम्यग्दर्शिनः संप्रवृत्तेषु प्रकाशादिषु द्वेषाभावमुपसंहरति -- तदेवमिति। न निवृत्तानीत्यादि व्याचष्टे -- यथाचेति। तेषामनात्मीयत्वं सम्यक्पश्यन्नात्मानुकूलप्रतिकूलतारोपणेन नोद्विजते तेभ्यश्च न स्पृहयतीत्यर्थः। स्वानुभवसिद्धं गुणातीतस्य लक्षणमुक्तमित्याह -- एतन्नेति। परप्रत्यक्षत्वाभावं प्रपञ्चयति -- नहीति। आश्रयो विषयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.22।।प्रकाशं च प्रवृत्तिं च इत्यनेन गुणातीतस्य सर्वथा सत्त्वादिगुणकार्येषु प्रकाशादिषु द्वेषाकाङ्क्षे न स्त इत्युच्यत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थमाह -- प्राय इति। इदमुक्तं भवति -- सत्त्वादयो गुणा द्विविधाः स्थूलाः सूक्ष्माश्च? तत्र स्थूलेभ्यो लौकिकाः प्रकाशप्रवृत्तिमोहाः जायन्ते सूक्ष्मेभ्यस्तु परमेश्वरादिविषयाः। तत्राद्येषु गुणातीतस्य द्वेषाकाङ्क्षे प्रायो न स्तः। न तु सर्वथा प्रारब्धवशात्कदाचित्सम्भवात्। द्वितीयेषु तु आकाङ्क्षादिकं विद्यत एवेति कुत एतत् इत्यत आह -- तथा हीति। यद्यपिन द्वेष्टि इत्यादिकमुक्तम्? तथापि यदि सुतमः सूक्ष्मतमो दैववशात्तं प्रविष्टं स्यात्? तदाऽसौ तज्जह्यात् द्विष्यात्। गुणातीतानां च सूक्ष्मसत्त्वसद्भावे भारतवाक्यं च पठति -- नहीति। यदि देवा ऋषयश्च सूक्ष्मेण सत्त्वेन हीनाः स्युः? तदा सत्त्वस्था इति नोच्येरन्? किन्तु ततस्तदा वैकारिका मताः प्रसज्येरन्? ततः किं कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषोत्तमम् तेषां मोक्षो न स्यादिति यावत्। अस्ति च तेषां मोक्षोऽतः सूक्ष्मसत्त्ववन्त एव त इत्यर्थः। सात्त्विकः सूक्ष्मसत्त्ववान्।ससूक्ष्मसत्त्वसंयुक्तः संयुक्तस्त्रिभिरक्षरैः। पुरुषः पुरुषं गच्छेन्निष्क्रियः पञ्चविंशकः।। इति सूक्ष्मसत्त्वप्रकरणात्। मोक्षार्थनिश्चितः,मोक्षलक्षणे पुरुषार्थे निश्चितः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.22।।प्रायो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। तथा हि सामवेदे भाल्लवेयशाखायाम् -- रजस्तमस्सत्त्वगुणान्प्रवृत्तान्प्रायो न च द्वेष्टि न चापि काङ्क्षति। तथापि सूक्ष्मं सत्त्वगुणं च काङ्क्षेद्यदि प्रविष्टं सुतमश्च जह्यात् इति।न हि देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम। हीनाः सत्वेन सूक्ष्मेण ततो वैकारिका मताः। कथं वैकारिको गच्छेत्पुरुषः पुरुषोत्तमम् इति मोक्षधर्मे।सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षार्थनिश्चितः इति च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.22।। --,प्रकाशं च सत्त्वकार्यं प्रवृत्तिं च रजःकार्यं मोहमेव च तमःकार्यम् इत्येतानि न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि सम्यग्विषयभावेन उद्भूतानि -- मम तामसः प्रत्ययो जातः? तेन अहं मूढः तथा राजसी प्रवृत्तिः मम उत्पन्ना दुःखात्मिका? तेन अहं रजसा प्रवर्तितः प्रचलितः स्वरूपात् कष्टं मम वर्तते यः अयं मत्स्वरूपावस्थानात् भ्रंशः तथा सात्त्विको गुणः प्रकाशात्मा मां विवेकित्वम् आपादयन् सुखे च सञ्जयन् बध्नाति इति तानि द्वेष्टि असम्यग्दर्शित्वेन। तत् एवं गुणातीतो न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि। यथा च सात्त्विकादिपुरुषः सत्त्वादिकार्याणि आत्मानं प्रति प्रकाश्य निवृत्तानि काङ्क्षति? न तथा गुणातीतो निवृत्तानि काङ्क्षति इत्यर्थः। एतत् न परप्रत्यक्षं लिङ्गम्। किं तर्हि स्वात्मप्रत्यक्षत्वात् आत्मार्थमेव एतत् लक्षणम्। न हि स्वात्मविषयं द्वेषमाकाङ्क्षां वा परः पश्यति।।अथ इदानीम् गुणातीतः किमाचारः इति प्रश्नस्य प्रतिवचनम् आह --,
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【 Verse 14.23 】
▸ Sanskrit Sloka: उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते | गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ||
▸ Transliteration: udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate | guṇā vartanta ityeva yo’vatiṣṭhati neṅgate ||
▸ Glossary: udāsīnavat: as if neutral; āsīnaḥ: situated; guṇaiḥ: by the qualities; yaḥ: one who; na: never; vicālyate: is agitated; guṇāḥ: the qualities; vartante: is situated; ityeva: knowing thus; yaḥ: one who; avatiṣṭhati: remains; na: never; eṅgati: flickering
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.22,23,24,25 Śrī Bhagavān says: He who does not hate illu- mination, attachment and delusion when they are present, nor longs for them when they disappear; who is seated like one unconcerned, being situated beyond these material reactions of the modes of nature, who remains firm, knowing that the modes alone are active; He who regards alike pleasure and pain, and looks on a lump of earth, a stone and a piece of gold with an equal eye; who is wise and holds praise and blame to be the same; who is unchanged in honor and dishonor, who treats friend and foe alike, who has abandoned all result based undertakings—such a man is said to have transcended the modes of nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.23।।जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही (गुणोंमें) बरत रहे हैं -- इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.23।। जो उदासीन के समान आसीन होकर गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही व्यवहार करते हैं ऐसा जानकर स्थित रहता है और उस स्थिति से विचलित नहीं होता।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.23 उदासीनवत् like one unconcerned? आसीनः seated? गुणैः by the Gunas? यः who? न not? विचाल्यते is moved? गुणाः the Gunas? वर्तन्ते operate? इति thus? एव even? यः who? अवतिष्ठति is selfcentred? न not? इङ्गते moves.Commentary He is seated as a neutral (one who inclines to neither party). He is free from likes and dislikes. He is entirely unconcerned whether the alities with their effects and the body come or go. He is like the spectator at a football or a cricket match or a drama. Just as the sky remains unconcerned when the wind blows? so also he remains ite unconcerned when the alities operate.He does not swerve from the path of Selfrealisation. He treads the path firmly. He thinks and feels The alities are modified into the body? senses and senseobjects. They act and react upon one another? remains unshaken by them. He abides in his own Self and stands firm like the mountain Meru. (Cf.III.28V.8to11)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.23. He who, sitting like an unconcerned person, is not perturbed by the Strands; who is ignorant that the Strands exist; (or who remain simply aware that the Strands [alone] exist) who is not shaken;
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.23 He who maintains an attitude of indifference, who is not disturbed by the Qualities, who realises that it is only they who act, and remains calm;
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.23 He who sits like one unconcerned, undisturbed by the Gunas; who knows, 'It is the Gunas that move,' and so rests unshaken;
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.23 He who, sitting like one indifferent, is not distracted by the three alities; he who, thinking that the alities alone act, remains firm and surely does not move;
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.23 He who, seated like one unconcerned, is not moved by the alities, and who, knowing that the alities are active, is self-centred and moves not.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.23 See Comment under 14.25
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.23 He who sits like one 'unconcerned,' namely, whose satisfaction consists in the vision of the self as different from the Gunas and sits like one unconcerned about other things and is not therefore disturbed by the Gunas through hatred and longing and who remains iet, reflecting: 'The Gunas function in their effects like illumination etc., and so 'rests unshaken,' i.e, does not act in accordance with the effects of the Gunas.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.23 He, the Self-realized monk, yah, who; asinah, sitting; udasinavat, like one indifferent-as an indifferent man sides with nobody, similarly, this one, set on the path leading to the transcendence of the alities; na, is not; vicalyate, distracted from the state of Knowledge arising out of discrimination; gunaih, by the alities. This point is being clarified as such: Yah, he who; thinking iti, that; gunah, the alities, which have trasnformed into body, organs and objects; vartante, act on one another; avatisthati, remains firm-avatisthati (instead of avatisthate) is used in the Parasmaipada to avoid a break in the metre, or there is different reading, 'yah anutisthati, who acts'-;[His apparent activity consists in the mere continuance of actions which have been subjectively sublated through enlightenment.] and an, does not; ingate, move; i.e., becomes eva, surely settled in his own nature-.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.23।। भगवान् श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में जगत् की वस्तुओं और व्यक्तियों के साथ ज्ञानी पुरुष जो सम्बन्ध रखता है? उसका विस्तृत वर्णन करते हैं। मनुष्य की संस्कृति एक मिथ्या मुखौटा हो सकती है। जब तक पर्याप्त रूप से प्रलोभित करने वाली परिस्थितियां हमारे समक्ष उपस्थित नहीं होती? तब तक हममें से बहुत से लोग ईश्वर के समान व्यवहार कर सकते हैं। मनुष्य के हाथ में जब तक सत्ता नहीं आती? तब तक हो सकता है कि वह क्रूर न हो वह जब तक दरिद्री है? तब तक शान्त जीवन व्यतीत करता हो और प्रलोभनों के अभाव में वह भ्रष्टाचार से ऊपर हो। इस प्रकार? अनेक ऐसे सद्गुण जिनसे अनेक व्यक्तियों को हम सम्पन्न समझते हैं? वे सब केवल कृत्रिम सौन्दर्य के ही होते हैं। उनका वास्तविक हीन स्वरूप उस मुखौटे से छिपा रहता है।सम्भावित दुष्ट पुरुष ऋण लिये सद्गुणों के कृत्रिम परिधानों को धारण करके जगत् में विचरण करते रहते हैं। इसलिए? ज्ञानी पुरुष की वास्तविक परीक्षा या पहचान जंगलों या गिरिकन्दराओं में नहीं? वरन् बीच बाजार में हो सकती है? जहाँ वह जगत् की दुष्टताओं से पीड़ित किया जाता है। ईसा मसीह इतने महान् कभी नहीं थे जितने वे सूली पर चढ़ाये जाने के समय हुए जगत् के द्वारा कुचले जाने पर ही हमारा वास्तविक स्वभाव प्रगट होता है। घर्षण से ही चन्दन की सुगन्ध प्रगट होती है। जिन उँगलियों से हम तुलसी दल को पीसते हैं वह उन्हीं पर अपना सुगन्ध छोड़ जाता है।ज्ञानी पुरुष उदासीन के समान आसीन हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता है। जगत् के सभी शुभ? अशुभ और उपेक्ष्य अनुभवों में वह उदासीन के समान रहता है? क्योंकि वह जानता है कि यह सब मन का खेल मात्र है। चित्रपट ग्रह में दर्शाये जा रहे चलचित्र के सुखान्त अथवा दुखान्त से हम विचलित नहीं होते? क्योंकि हम जानते हैं कि यह छायाचित्र का खेल हमारे मनोरंजन के लिये प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि ज्ञानी पुरुष जगत् की घटनाओं से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ही नहीं रखता है। व्यासजी अत्यन्त सावधानीपूर्वक शब्दों को चुनते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष ऐसा प्रतीत होता है? मानो वह उदासीन्ा हो उदासीनवत् आसीन। इसका अभिप्राय यह हुआ कि वह अपने जीवन में तथा बाह्य जगत् में होने वाली घटनाओं से विक्षुब्ध या उत्तेजित नहीं हो जाता।वह भलीभाँति जानता है कि उसके अन्तकरण में होने वाले ये निरन्तर परिवर्तन केवल गुणों के ही हैं और फिर बाह्य जगत् का अनुभव भी मनस्थिति के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। सम्यक्दर्शी पुरुष अपने आन्तरिक तथा बाह्य जगत् में होने वाले परिवर्तनों की प्रक्रिया को जानकर उनसे अविचलित रहता है।इन गुणों की क्रीड़ा देखने के लिये स्वयं साक्षी बनकर रहना होता है। अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहकर वह गुणों की अन्तर्बाह्य क्रीड़ा को देखते हुये उसका आनन्द उठाता है। गली में हो रहे लड़ाईझगड़े को ऊपर छज्जे पर से देखने वाला व्यक्ति उस लड़ाई से प्रभावित नहीं होता है। उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी अपनी समत्व की स्थिति से गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता है।पूर्व श्लोक को और अधिक स्पष्ट करते हुये कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.23।।कैर्लिङक्षैरित्यादिप्रश्नं समाधायाथेदानीं किमाचार इति प्रश्नस्योत्तरमाह त्रिभिः। उदासीनवत् यथोदासीनो न कस्यचित्पक्षं भजते तथा कौटस्थ्यज्ञानेन निवृत्तकर्तृत्वाभिमान आत्मवित् गुणातिक्रमणोपायमार्गे तत्त्वज्ञानेऽवस्थि आसीनः आत्मविवेकदर्शनावस्थातो गुणैर्न विचाल्यते न प्रच्याव्यते तदेतत्स्पष्टयति। गुणाः कार्यकरणविषयाकारपरिणता अन्योन्यस्मिन्वर्तन्ते नाहिमित्येवं निश्चित्य यः कूटस्थज्ञानेऽवतिष्ठति तेन नेङ्गते न चलति स्वरुपावस्थ एव भवतीत्यर्थ। अपपूर्वस्य तिष्ठरेतात्मनेपदे प्रयोक्तव्ये छन्दोभङ्गभयात्मपरस्मैपदप्रयोगः कृतः। अनुष्टुप्छन्दसि पञ्चमस्य लधुत्वनियमात्।अनुतिष्ठति इति वा पाठान्तरम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.23।।एवं लक्षणमुक्त्वा गुणातीतः किमाचार इति द्वितीयप्रश्नस्य प्रतिवचनमाह त्रिभिः -- यथोदासीनो द्वयोर्विवदमानयोः कस्यचित्पक्षमभजमानो न रज्यति न वा द्वेष्टि तथायमात्मविद्रागद्वेषशून्यतया स्वस्वरूप एवासीनो गुणैः सुखदुःखाद्याकारपरिणतैर्यो न विचाल्यते न प्रच्याव्यते स्वरूपावस्थानात् किंतु गुणा एवैते देहेन्द्रियविषायाकारपरिणताः परस्परस्मिन्वर्तन्ते ममत्वादित्यस्येवैतत्सर्वभासकस्य न केनापि भास्यधर्मेण संबन्धः? स्वप्नवन्मायामात्रश्चायं भास्यप्रपञ्चो जडः? स्वयंज्योतिः स्वभावस्त्वहं परमार्थसत्यो निर्विकारो द्वैतशून्यश्चेत्येवं निश्चित्य यः स्वरूपेऽवतिष्ठत्यवतिष्ठते।यो नु तिष्ठति इति वा पाठस्तत्र नुः पृथक्कार्यः। नेङ्गते नानुव्याप्रियते कुत्रचित् गुणातीतः स उच्यत इति तृतीयगतेनान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.23।।अथ षष्ठ्यां पदार्थाभावन्यां गतो ब्रह्मविद्वरीयानुच्यते -- उदासीनवदिति। योऽयं समाधावुदासीन इवास्ते व्युत्थाने किमपि प्रयोजनमपश्यन्। इदं मम कर्तव्यमस्तीति वासनाशून्यत्वात्। य आस्ते एव न तु परप्रयत्नमन्तरेण कदाचिदपि गुणैर्विचाल्यते। परेण व्युत्थापितोऽपि गुणान्पश्यन् गुणा वर्तन्त इत्येव ज्ञात्वा योऽवतिष्ठति स्तब्ध एव वर्तते न तु गुणकृतैरिष्टानिष्टस्पर्शैरिङ्गते चलति। अयमर्थः -- यथा कश्चिद्भुञ्जानो रसनामौढ्यात्स्वयं शाकादिरसं न विन्दति। परेण ज्ञापितोऽपि कञ्चिद्रसविशेषमुपलभ्यापि तत्रोदासीन एवास्ते। झटित्येव विशेषदर्शनस्य तिरोधानान्न तत्कृतं सुखं दुःखं वा पश्यति तद्वदयं ज्ञेयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.23।।एवं लिङ्गोत्तरमुक्त्वा आचारोत्तरमाह -- उदासीन इति। उदासीनवत्,सुखदुःखप्राप्त्यभावराहित्येन मत्कृतिं साक्षिरूपेण पश्यन्नासीनो गुणैर्लौकिकैर्मत्कृतिं पश्यन्नात्मस्वरूपान्न विचाल्यते। किञ्च गुणाः भगवदात्मकाः गुणेषु स्वकार्येषु वर्तन्ते स्वत एव भगवदिच्छयेत्येवं प्रकारेणैवावतिष्ठति? नेङ्गते न चलति पूर्वरूपात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.23।।तदेवं स्वसंवेद्यं तस्य लक्षणमुक्त्वा परसंवेद्यं तस्य लक्षणं वक्तुं किमाचार इति द्वितीयप्रश्नस्योत्तरमाह -- उदासीनवदिति त्रिभिः। उदासीनवत्साक्षितया आसीनः स्थितः सन् गुणैर्गुणकार्यैः सुखदुःखादिभिर्यो न विचाल्यते स्वरूपान्न प्रच्याव्यते अपितु गुणा एव स्वकार्येषु वर्तन्ते? एतैर्मम संबन्ध एव नास्तीति विवेकज्ञानेन यस्तूष्णीमवतिष्ठति। परस्मैपदमार्षम्। नेङ्गते न चलति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.23।।उदासीनवदिति। गुणातिरिक्तात्मावलोकनतृप्तत्वात् अन्यत्रानात्मवस्तुनि उदासीनवदासीनः द्वेषाकाङ्क्षाद्वारेण गुणैश्च यो न विचाल्यते? किन्तु स्वकार्येषु प्रकाशादिषु गुणा वर्त्तन्त इति तिष्ठति न गुणानुगुणं स्वात्मना चेष्टते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.23।।अब? गुणातीत पुरुष किस प्रकारके आचरणवाला होता है? इस प्रश्नका उत्तर देते हैं --, उदासीनकी भाँति स्थित हुआ? अर्थात् जैसे उदासीन पुरुष किसीका पक्ष नहीं लेता? उसी भावसे गुणातीत होनेके उपायरूप मार्गमें स्थित हुआ जो आत्मज्ञानी -- संन्यासी? गुणोंद्वारा विवेकज्ञानकी स्थितिसे विचलित नहीं किया जा सकता। इसीको स्पष्ट करते हैं कि कार्यकरण और विषयोंके आकारमें परिणत हुए गुण ही एकमें एक बर्त रहे हैं -- जो ऐसा समझकर स्थित रहता है? चलायमान नहीं होता अर्थात् अविचलभावसे स्वरूपमें ही स्थित रहता है। यहाँ छन्दोभङ्ग होनेके भयसे आत्मनेपद ( अवतिष्ठते ) के स्थानमें परस्मैपद ( अवतिष्ठति ) का प्रयोग किया गया है अथवा योऽवतिष्ठति के स्थानमें योऽनुतिष्ठति ऐसा पाठान्तर समझना चाहिये।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.23।। व्याख्या -- उदासीनवदासीनः -- दो व्यक्ति परस्पर विवाद करते हों? तो उन दोनोंमेंसे किसी एकका पक्ष लेनेवाला पक्षपाती कहलाता है और दोनोंका न्याय करनेवाला मध्यस्थ कहलाता है। परन्तु जो उन दोनोंको देखता तो है? पर न तो किसीका पक्ष लेता है और न किसीसे कुछ कहता ही है? वह उदासीन कहलाता है। ऐसे ही संसार और परमात्मा -- दोनोंको देखनेसे गुणातीत मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।वास्तवमें देखा जाय तो संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्स्वरूप परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीख रहा है। अतः जब गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है ही नहीं? केवल एक परमात्माकी सत्ता ही है? तो फिर वह उदासीन किससे हो परन्तु जिनकी दृष्टिमें संसार और परमात्माकी सत्ता है? ऐसे लोगोंकी दृष्टिमें वह गुणातीत मनुष्य उदासीनकी तरह दीखता है।गुणैर्यो न विचाल्यते -- उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें सत्त्व? रज? और तम -- इन गुणोंकी वृत्तियाँ तो आती हैं? पर वह इनसे विचलित नहीं होता। तात्पर्य है कि जैसे अपने सिवाय दूसरोंके अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर अपनेमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता? ऐसे ही उसके कहलानेवाले अन्तःकरणमें गुणोंकी वृत्तियाँ आनेपर उसमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता अर्थात् वह उन वृत्तियोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता। कारण कि उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण संसारका अत्यन्त अभाव एवं परमात्मतत्त्वका भाव निरन्तर स्वतःस्वाभाविक जाग्रत् रहता है।गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति -- गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (गीता 3। 28) अर्थात् गुणोंमें ही सम्पूर्ण क्रियाएँ हो रही हैं -- ऐसा समझकर वह अपने स्वरूपमें निर्विकाररूपसे स्थित रहता है।न इङ्गते -- पहले गुणा वर्तन्त इत्येव पदोंसे उसका गुणोंके साथ सम्बन्धका निषेध किया? अब न ईङ्गते पदोंसे उसमें क्रियाओँका अभाव बताते हैं। तात्पर्य है कि गुणातीत पुरुष खुद कुछ भी चेष्टा नहीं करता। कारण कि अविनाशी शुद्ध स्वरूपमें कभी कोई क्रिया होती ही नहीं।[बाईसवें और तेईसवें -- इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी तटस्थता? निर्लिप्तताका वर्णन किया है।] सम्बन्ध -- इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने दूसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत मनुष्यके आचरण पूछे थे। उसका उत्तर अब आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.23।।कैर्लिङ्गैरित्यादि परिहृत्य द्वितीयं प्रश्नं परिहरति -- अथेति। दृष्टान्तं व्याचष्टे -- यथेति। उपेक्षकस्य पक्षपाते तत्त्वायोगादित्यर्थः। आत्मविदात्मकौटस्थ्यज्ञानेनासीनो निवृत्तकर्तृत्वाभिमानोऽप्रयतमानो भवतीति दार्ष्टान्तिकमाह -- तथेति। गुणातीतत्वोपायमार्गो ज्ञानमेव। शब्दादिभिर्विषयैरस्य कूटस्थत्वज्ञानात्प्रच्यवनमाशङ्क्याह -- गुणैरिति। उपनतानां विषयाणां रागद्वेषद्वारा प्रवर्तकत्वमित्येतत्प्रपञ्चयति -- तदेतदिति। योऽवतिष्ठति स गुणातीत इत्युत्तरत्र संबन्धः। अवपूर्वस्य तिष्ठतेरात्मनेपदे प्रयोक्तव्ये कथं परस्मैपदमित्याशङ्क्याह -- छन्दोभङ्गेति। पाठान्तरे तु बाधितानुवृत्तिमात्रमनुष्ठानम्। करणाकारपरिणतानां गुणानां विषयाकारपरिणतेषु तेषु प्रवृत्तिर्न ममेति पश्यन्नचलतया कूटस्थदृष्टिमात्मनो न जहातीत्याह -- नेङ्गत इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.23।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.23।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.23।। --,उदासीनवत् यथा उदासीनः न कस्यचित् पक्षं भजते? तथा अयं गुणातीतत्वोपायमार्गेऽवस्थितः आसीनः आत्मवित् गुणैः यः संन्यासी न विचाल्यते विवेकदर्शनावस्थातः। तदेतत् स्फुटीकरोति -- गुणाः कार्यकरणविषयाकारपरिणताः अन्योन्यस्मिन् वर्तन्ते इति यः अवतिष्ठति। छन्दोभङ्गभयात् परस्मैपदप्रयोगः। योऽनुतिष्ठतीति वा पाठान्तरम्। न इङ्गते न चलति? स्वरूपावस्थ एव भवति इत्यर्थः।।किं च --,
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【 Verse 14.24 】
▸ Sanskrit Sloka: समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन: | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति: ||
▸ Transliteration: sama-duḥkha-sukhaḥ svasthaḥ sama-loṣṭāśma-kāñcanaḥ | tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-saṁstutiḥ ||
▸ Glossary: sama: equal; duḥkha: in distress; sukhaḥ: in happiness; svasthaḥ: being situated himself; sama: equally; loṣṭa: a lump of earth; aśma: stone; kāñcanaḥ: gold; tulya: equally disposed; priya: dear; apriyo: undesirable; dhīraḥ: steady; tulya: equally; nindā: in defamation; ātmasaṁstutiḥ: in praise of himself
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.22,23,24,25 Śrī Bhagavān says: He who does not hate illu- mination, attachment and delusion when they are present, nor longs for them when they disappear; who is seated like one unconcerned, being situated beyond these material reactions of the modes of nature, who remains firm, knowing that the modes alone are active; He who regards alike pleasure and pain, and looks on a lump of earth, a stone and a piece of gold with an equal eye; who is wise and holds praise and blame to be the same; who is unchanged in honor and dishonor, who treats friend and foe alike, who has abandoned all result based undertakings—such a man is said to have transcended the modes of nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.24।।जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले? पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी निन्दास्तुतिमें सम रहता है जो मानअपमानमें तथा मित्रशत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है? वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.24।। जो स्वस्थ (स्वरूप में स्थित)? सुखदुख में समान रहता है तथा मिट्टी? पत्थर और स्वर्ण में समदृष्टि रखता है ऐसा वीर पुरुष प्रिय और अप्रिय को तथा निन्दा और आत्मस्तुति को तुल्य समझता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.24 समदुःखसुखः alike in pleasure and pain? स्वस्थः standing in his own Self? समलोष्टाश्मकाञ्चनः regarding a clod of earth? a stone and gold alike? तुल्यप्रियाप्रियः the same to the dear and the undear? धीरः firm? तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः the same in censure and praise. Commentary Night and day have no meaning to a post fixed in the ground. Even so pleasure and pain have no meaning to a sage who dwells in his own Self. He is above the pairs of opposites. In his eyes cowdung or gold? a jewel or a stone? are of eal value. He is free from the idea of,giving and taking. His mind is not perturbed by anything pleasant or unpleasant. He is the same towards agreeable and disagreeable things. Praise and censure cannot affect him. He stands adamant. He abides in his own essential state as ExistenceKnowledgeBliss Absolute. He is ever calm and serene. (Cf.V.18)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.24. To whom pain, pleasure and sleep are alike; to whom a cold, a stone and a lump of gold are alike; to whom both the pleasant and the unpleasant things are eal; who is firm [in mind]; to whom blame and personal commendation are eal;
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.24 Who accepts pain and pleasure as it comes, is centred in his Self, to whom a piece of clay or stone or gold are the same, who neither likes nor dislikes, who is steadfast, indifferent alike to praise or censure;
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.24 He who is alike in pleasure and pain, who dwells in his self, who looks upon a clod, a stone and piece of gold as of eal value, who remains the same towards things dear and hateful and who is intelligent, who regards both blame and praise of himself as eal;
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.24 He to whom sorrow and happiness are alike, who is established in his own Self, to whom a lump of earth, iron and gold are the same, to whom the agreeable and the disagreeable are the same, who is wise, to whom censure and his own praise are the same;
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.24 Who is the same in pleasure and pain, who dwells in the Self, to whom a clod of earth, stone and gold are alike, who is the same to the dear and the unfriendly, who is firm, and to whom censure and praise are as one.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.24 See Comment under 14.25
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.24 - 14.25 He who is 'alike in pleasure and pain,' namely, whose mind is eal in pleasure and pain; 'who dwells in his self,' namely, who dwells in his self because his love for the self keeps his mind in eanimity in pleasure and pain arising from the birth, death etc., of his sons and other relatives and friends, and who, because of this, 'looks upon a clod, a stone and a piece of gold as of eal value,' who conseently remains the same towards things dear or hateful, i.e., who treats alike the worldly objects desired and undesired; who is 'intelligent,' namely, proficient in discrimination between the Prakrti and the self; who, therefore, regards blame and praise as alike, namely, who treats with eality praise and blame looking upon good and evil alities as born of identification with bodies such as those of men etc., and as such unconnected with his real self; who is the 'same in honour and dishonour' because these are feelings based on the misconception that the body is the self, and as a conseence of such discrimination between the body and the self, 'looks alike on friend and foe,' because he understands that ther is no connection between them and himself; and who has thus abandoned all entrprises in which embodied beings are involved - he who is like this, is said to have risen above the Gunas.
Now Sri Krsna states the main method (technie) for transcending such Gunas:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.24 Moreover, sama-duhkha-sukhah, he to whom sorrow and happiness are alike;svasthah, who is established in his own Self, tranil; sama-losta-asma-kancanah, to whom a lump of earth, iron and gold are the same; tulya-priya-apriyah, to whom the agreeable and the disagreeable are the same; dhirah, who is wise; tulya-ninda-atma-samstutih, to whom, to which monk, censure and his own praise are the same-.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.24।। जीवन की निरन्तर परिवर्तनशील परिस्थितियों में ज्ञानी पुरुष के मन के समत्व और सन्तुलन का वर्णन इस श्लोक में किया गया है। त्रिगुणों की क्रूरताओं से परे आत्मा में ज्ञानी पुरुष स्थित रहता है? जहाँ सत्त्वगुण का रोमांचक सुख नहीं है? न रजोगुण का कोलाहल है और न ही तमोगुण की थकान है। वह सच्चिदानन्द स्वरूप है।सामान्य मनुष्य को समता की यह स्थिति पूर्ण मृत्यु ही प्रतीत होगी। और? निसन्देह? यह वास्तविकता भी है यह परिच्छिन्न अहंकार की मृत्यु है? जो सांसारिक अनुभवों का भोक्ता है। उपाधियुक्त आत्मा ही जीवरूप में प्रतीत होता है? जो सदैव विक्षुब्ध मन की प्रचण्ड चंचल वृत्तियों पर समुद्री सतह पर बहते हुये काष्ठ खण्ड के समान व्यवहार करता है। प्रेम और घृणा? राग और द्वेष के तूफानों से सदैव विचलित हुआ यह दुखी जीव असंख्य विक्षेपों और दुखों को भोगता रहता है।इसलिये? तृष्णा और आसक्ति के इस दुर्व्यवस्थित क्षेत्र से स्वयं को विलग कर स्वस्वरूप में ही स्थित होना ही मुक्ति है। ज्ञानी पुरुष का जगत् के साथ क्या सम्बन्ध होता है यह प्रश्न ऐसा ही है? जैसे जाग्रत पुरष का अपने स्वप्नजगत् से क्या सम्बन्ध होता है त्रिगुणों के बन्धनों से मुक्त पुरुष जगत् की अनात्म वस्तुओं के साथ के अविद्याजनित अहं और मम भाव को सर्वथा त्याग देता है। उस वास्तविक दैवी जाग्रति की अवस्था में निम्न स्तर के अनुभव? इस जगत् के सुख और दुख? प्रिय और अप्रिय तथा निन्दा और स्तुति का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। समस्त अनुभवों में वह सम? असंग साक्षी बनकर रहता है।स्वस्थ अपने सर्व उपाधिविवर्जित सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित पुरुष स्वस्थ कहलाता है। अत उपाधियों के द्वारा अनुभूत जगत् से वह अछूता रहता है।समदुखसुख इन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत् के सम्पर्क में आकर पूर्वकाल में अर्जित किये हुये समान अनुभवों की तुलना में उसका मूल्यांकन करना और तत्पश्चात् उसे सुख या दुख के रूप में अनुभव करना? यह हमारे व्यष्टि मन की युक्ति है। यदि बाह्य जगत् की वस्तुओं में ही सुख या दुख होता? तो सभी व्यक्तियों का अनुभव एक समान होता जैसे सूर्य के प्रकाश का सबका अनुभव एक समान है? क्योंकि प्रकाश सूर्य का धर्म है। परन्तु विषयों के सम्बन्ध में यह बात नहीं देखी जाती। कोई विषय किसी एक व्यक्ति को सुखदायक प्रतीत होता है तो अन्य व्यक्ति को दुखदायक। इससे सिद्ध होता है कि हमारे सुखदुख अपने मन की कल्पना मात्र हैं? वस्तुस्थिति न्ाहीं। ज्ञानी पुरुष मन और बुद्धि के उपनेत्रों से जगत् को नहीं देखता और? इसलिये? संसारी पुरुषो द्वारा कहे जाने वाले सुख और दुख में वह समान रहता है।समलोष्टाश्मकाञ्चन वह लोष्ट (मिट्टी)? अश्म (पाषाण) और काञ्चन (स्वर्ण) इन सबको समदृष्टि से देखता है। वस्तुओं का परिग्रह करने में संसारी लोगों की अत्यधिक रुचि होती है। लोग स्वर्ण? हीरे? मोती आदि बहुमूल्य वस्तुओं को एकत्र करना चाहते हैं? किन्तु सामान्य मिट्टी? पाषाण आदि की उपेक्षा करते हैं। परन्तु जिसे परमार्थ वस्तु की उपलब्धि हो गई है? वह ज्ञानी पुरुष मिट्टी? पाषाण? स्वर्ण इन सबको एक समान ही देखता है ? क्योंकि पारमार्थिक सत्य की दृष्टि से ये सब मिथ्या वस्तुएं ही हैं। वस्तुत? उनमें कोई भी मूल्यवान नहीं है।बाल्यावस्था में? छोटे बालक मयूरपंख? शुक्तिका? संगमर्मर के टुकड़े? टूटी चूड़ियां? पुरानी टिकटें आदि वस्तुओं का संग्रह करते हैं और उनके लिये वह एक बहुमूल्य कोष के समान होता है। परन्तु युवावस्था के प्राप्त होने पर उस कोष का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। वे उसे अपने छोटे भाई को दे देते हैं तो वह उस धरोहर को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है। इसी प्रकार? जीवभाव में स्थित अज्ञानी पुरुष असंख्य वस्तुओं का संग्रह करना चाहता है? जो ज्ञानी की दृष्टि में बच्चों का एक खेल मात्र है।तुल्यप्रियाप्रिय यदि हम अनेक व्यक्तियों के साथ के अपने सम्बन्धों पर विचार करें? तो यह ज्ञात होगा कि हमें अपने समस्वभाव का व्यक्ति प्रिय प्रतीत होगा और प्रतिकूल स्वभाव का व्यक्ति अप्रिय। यही बात वस्तुओं और परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी सत्य है। यह प्रिय और अप्रिय का अनुभव मन के स्तर पर रहने वाले लोगों के लिये ही है? मन से परे आत्मस्वरूप में स्थित हुये ज्ञानी पुरुष के लिये नहीं। जगत् में सामान्य दृष्टि से किन्हीं वस्तुओं और घटनाओं को प्रिय या अप्रिय समझा जाता है। ज्ञानी पुरुष के लिये वे सब तुल्य हैं? क्योंकि वह समान्य जनों के मापदण्ड से जगत् की ओर नहीं देखता है।तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति स्वप्नावस्था में स्वप्नद्रष्टा पुरुष की कोई निन्दा करते हैं और कोई प्रशंसा। जब वह स्वप्न से जाग जाता है तो क्या वह उस निन्दा और स्तुति को तुल्य नहीं समझेगा संसारी लोग अपनीअपनी बुद्धि और ज्ञान के अनुसार कभी किसी की निन्दा करते हैं? तो कभी स्तुति। सर्वोच्च आत्मज्ञान में निष्ठा प्राप्त पुरुष के लिये दोनों का ही कोई महत्त्व नहीं होता।उपर्युक्त अनुभवों के चार सुन्दर उदाहरणों के द्वारा व्यासजी ने जीवन के कुछ प्रमुख अनुभव दर्शाये हैं? जिनमें सामान्य मनुष्य सुख और दुख का अनुभव करता है।आगे कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.24।।किंच समे रागद्वेषानुत्पादकतया स्वीयत्वाभिमानानास्पदे दुःखसुखे यस्य स समदुःखसुखः स्वस्मिन्नविक्रिये आत्मनि स्थितः स्वरुपान्न कदापि प्रत्युतः। समानि अहेयोपादेयानि लोष्टदानि यस्य स यत्स्तुल्य समे प्रियाप्रिये यस्य स धीरो धीमान्। अतएव तुल्य निन्दात्मसंस्तुती यस्य स गुणातीति उच्यत इति परेणान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.24।।समे दुःखसुखे द्वेषरागशून्यतयानात्मधर्मतयाऽनृततया च यस्य च समदुःखसुखः। कस्मादेवं यस्मात्स्वस्थः स्वस्मिन्नात्मन्येव स्थितो द्वैतदर्शनशून्यत्वात्। अतएव समानि हेयोपादेयभावरहितानि लोष्टाश्मकाञ्चनानि यस्य स तथा। लोष्टः पांसुपिण्डः। अतएव तुल्ये प्रियाप्रिये सुखदुःखसाधने यस्य हितसाधनत्वाहितसाधनत्वबुद्धिविषयत्वाभावेनोपेक्षणीयत्वात्। धीरो धीमान् धृतिमान्वा। अतएव तुल्ये निन्दात्मसंस्तुती दोषकीर्तनगुणकीर्तने यस्य स गुणातीत उच्यत इति द्वितीयगतेनान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.24।।अथ पञ्चम्यां भूमावसंसक्तिनामिकायां स्थितो ब्रह्मविद्वर उच्यते -- समेति। समाधौ समे दुःखसुखे यस्य स समदुःखसुखः। स्वस्थः स्वेनैव स्वेच्छयैव तिष्ठतीति स्वस्थः। यदा तु न समाधाविच्छा तदा स्वयमेव व्युत्तिष्ठतीति भावः। सोऽपि व्युत्थानावस्थायां समलोष्टाश्मकाञ्चनो विरक्त इत्यर्थः। तुल्यप्रियाप्रियः तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिश्च। प्रियाप्रिययोर्निन्दास्तुत्योश्च प्राप्तौ तुल्यो हर्षविषादशून्यः। अत्र हेतुर्धीर इति। यथा कश्चिच्छूरस्तीव्रप्रहारवेदनार्तोऽपि न व्यामुह्यति धैर्याद्वेदनां चानुभवति तद्वदयं हर्षविषादानुभवन्नपि धैर्यान्न चलति। पूर्वस्य तु जातायामपि वेदनायां हर्षाद्युदय एव नास्ति। तत्पूर्वस्य तु वेदनैव नास्तीति भेदः। एतेन श्लोकत्रयेण सर्वेषां जीवन्मुक्तानां समाधौ लिङ्गानि तत्संवेद्यान्याचाराश्च परसंवेद्यानि लिङ्गान्युक्तानि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.24।।किञ्च समदुःखसुखः समे दुःखसुखे विप्रयोगसंयोगात्मके लौकिकालौकिकदेहरूपे वा यस्य सः। स्वस्थः मत्स्वरूपे स्थितः। अतएव समलोष्टाश्मकाञ्चनः समानि लोष्टाश्मकाञ्चनानि यस्य? सर्वस्य भगवदात्मकत्वात्तादृशः। तुल्यप्रियाप्रियः तुल्ये प्रियाप्रिये संयोगवियोगात्मके यस्य सः। भगवदिच्छाया एव मुख्यत्वादुभयोस्तुल्यत्वम्। धीरः विप्रयोगादितीक्ष्णदुःखसहनशीलः। तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः तुल्या निन्दा आत्मसंस्तुतिश्च यस्य।अयं भावः -- दुष्टकृता निन्दाऽपि भक्तत्वेन स्तुतिप्रायैव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.24।।अपिच -- समेति। समे सुखदुःखे यस्य। यतः स्वस्थः स्वरूप एव स्थितः। अतएव समानि लोष्टाश्मकाञ्चनानि यस्य। तुल्ये प्रियाप्रिये सुखदुःखहेतुभूते यस्य। धीरो धीमान्। तुल्या निन्दा च आत्मस्तुतिश्च यस्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.24।।समेति। गुणकार्येषु हर्षद्वेषशून्यतया स लक्ष्य इत्युक्ते समत्वं योगो हेतुरिति साङ्ख्ययोगसारभूतमर्थं स्मारयति। समे दुःखसुखे रजस्सत्त्वकार्ये यस्य। तत्र हेतुः -- स्वस्थ आत्मस्थ इति। समानि लोष्टाश्मकाञ्चनानि हेयतया यस्य? सर्वत्र समभूतस्य।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.24।।तथा --, जो सुखदुःखमें समान है अर्थात् सुख और दुःख जिसको समान प्रतीत होते हैं? जो स्वस्थ अर्थात् अपने आत्मस्वरूपमें स्थित -- प्रसन्न है? जो समलोष्टाश्मकाञ्चन है अर्थात् मिट्टी? पत्थर और सुवर्ण जिसके ( विचारमें ) समान हो गये हैं? जो तुल्यप्रियाप्रिय है अर्थात् प्रिय और अप्रिय दोनोंहीको जो समान समझता है और जो धीर अर्थात् बुद्धिमान् है तथा जो तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति है अर्थात् जिसके विचारमें अपनी निन्दा और स्तुति समान हो गयी है? ऐसा अपनी निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला यति है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.24।। व्याख्या -- धीरः? समदुःखसुखः -- नित्यअनित्य? सारअसार आदिके तत्त्वको जानकर स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित होनेसे गुणातीत मनुष्य धैर्यवान् कहलाता है।पूर्वकर्मोंके अनुसार आनेवाली अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिका नाम सुखदुःख है अर्थात् प्रारब्धके अनुसार शरीर? इन्द्रियों आदिके अनुकूल परिस्थितिको सुख कहते हैं और शरीर? इन्द्रियों आदिके प्रतिकूल परिस्थितिको दुःख कहते हैं। गुणातीत मनुष्य इन दोनोंमें सम रहता है। तात्पर्य है कि सुखदुःखरूप बाह्य परिस्थितियाँ उसके कहे
Chapter 14 (Part 11)
जानेवाले अन्तःकरणमें विकार पैदा नहीं कर सकतीं? उसको सुखीदुःखी नहीं कर सकतीं।स्वस्थः -- स्वरूपमें सुखदुःख है ही नहीं। स्वरूपसे तो सुखदुःख प्रकाशित होते हैं। अतः गुणातीत मनुष्य आनेजानेवाले सुखदुःखका भोक्ता नहीं बनता? प्रत्युत अपने नित्यनिरन्तर रहनेवाले स्वरूपमें स्थिर रहता है।समलोष्टाश्मकाञ्चनः -- उसका मिट्टीके ढेले? पत्थर और स्वर्णमें न तो आकर्षण (राग) होता है और न विकर्षण (द्वेष) होता है। परन्तु व्यवहारमें वह ढेलेको ढेलेकी जगह रखता है? पत्थरको पत्थरकी जगह रखता है और स्वर्णको स्वर्णकी जगह (तिजोरी आदिमें) रखता है। तात्पर्य है कि यद्यपि उनकी प्राप्तिअप्राप्तिमें उसको हर्षशोक नहीं होते? वह सम रहता है? तथापि उनसे व्यवहार तो यथायोग्य ही करता है।ढेले? पत्थर और स्वर्णका ज्ञान न होना समता नहीं कहलाती। समता वही है कि इन तीनोंका ज्ञान होते हुए भी इनमें रागद्वेष न हों। ज्ञान कभी दोषी नहीं होता? विकार ही दोषी होते हैं।तुल्यप्रियाप्रियः -- क्रियमाण कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धिमें अर्थात् उनके तात्कालिक फलकी प्राप्तिअप्राप्तिमें भी वह सम रहता है।तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः -- निन्दा और स्तुतिमें नामकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका नामके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता अतः कोई निन्दा करे तो उसके चित्तमें खिन्नता नहीं होती और कोई स्तुति करे तो उसके चित्तमें प्रसन्नता नहीं होती। इसी प्रकार निन्दा करनेवालोंके प्रति उसका द्वेष नहीं होता और स्तुति करनेवालोंके प्रति उसका राग नहीं होता।साधारण मनुष्योंकी यह एक आदत बन जाती है कि उनको अपनी निन्दा बुरी लगती है और स्तुति अच्छी लगती है। परन्तु जो गुणोंसे ऊँचे उठ जाते हैं? उनको निन्दास्तुतिका ज्ञान तो होता है और वे बर्ताव भी सबके साथ यथोचित ही करते हैं? पर उनमें निन्दास्तुतिको लेकर खिन्नताप्रसन्नता नहीं होती। कारण कि वे जिस तत्त्वमें स्थित हैं? वहाँ गुणोंवाली परकृत निन्दास्तुति पहुँचती ही नहीं।निन्दा और स्तुति -- ये दोनों ही परकृत क्रियाएँ हैं। उन क्रियाओंसे राजीनाराज होना गलती है। कारण कि जिसका जैसा स्वभाव है? जैसी धारणा है? वह उसके अनुसार ही बोलता है। वह हमारे अनुकूल ही बोले? हमारी निन्दा न करे -- यह न्याय नहीं है अर्थात् उसको बोलनेमें बाध्य करनेका भाव न्याय नहीं है? अन्याय है। दूसरोंपर हमारा क्या अधिकार है कि तुम हमारी निन्दा मत करो हमारी स्तुति ही करो दूसरी बात? कोई निन्दा करता है तो उसमें साधकको प्रसन्न होना चाहिये कि इससे मेरे पाप कट रहे हैं? मैं शुद्ध हो रहा हूँ। अगर कोई हमारी प्रशंसा करता है? तो उससे हमारे पुण्य नष्ट होते हैं। अतः प्रशंसामें राजी नहीं होना चाहिये क्योंकि राजी होनेमें खतरा हैमानापमानयोस्तुल्यः -- मान और अपमान होनेमें शरीरकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका शरीरके साथ तादात्म्य नहीं रहता। अतः कोई उसका आदर करे या निरादर करे? मान करे या अपमान करे? इन परकृत क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता।निन्दास्तुति और मानअपमान -- इन दोनों ही परकृत क्रियाओंमें गुणातीत मनुष्य सम रहता है। इन दोनों परकृत क्रियाओंका ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत निन्दा और अपमानमें दुःखी होना तथा स्तुति और मानमें हर्षित होना दोषी है क्योंकि ये दोनों ही प्रकृतिके विकार हैं। गुणातीत पुरुषको निन्दास्तुति और मानअपमानका ज्ञान तो होता है? पर गुणोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेसे? नाम और शरीरके साथ तादात्म्य न रहनेसे वह सुखीदुःखी नहीं होता। कारण कि वह जिस तत्त्वमें स्थित है? वहाँ ये विकार नहीं हैं। वह तत्त्व गुणरहित है? निर्विकार है।तुल्यो मित्रारिपक्षयोः -- वह मित्र और शत्रुके पक्षमें सम रहता है। यद्यपि गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें कोई मित्र और शत्रु नहीं होता? तथापि दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार उसे अपना मित्र अथवा शत्रु भी मान सकते हैं। साधारण मनुष्यको भी दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार मित्र या शत्रु मान सकते हैं किन्तु इस बातका पता लगनेपर उस मनुष्यपर इसका असर पड़ता है? जिससे उसमें रागद्वेष उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु गुणातीत मनुष्यपर इस बातका पता लगनेपर भी कोई असर नहीं पड़ता। वस्तुतः मित्र और शत्रुकी भावनाके कारण ही व्यवहारमें पक्षपात होता है। गुणातीत मनुष्यके कहलानेवाले अन्तःकरणमें मित्रशत्रुकी भावना ही नहीं होती अतः उसके व्यवहारमें पक्षपात नहीं होता।एक व्यक्ति उस महापुरुषके साथ मित्रता रखता है और दूसरा व्यक्ति अपने स्वभाववश उस महापुरुषके साथ शत्रुता रखता है। जब उन दोनों व्यक्तियोंकी किसी बातको लेकर न्याय करनेका अवसर आ जाय? तब (व्यवहारमें) वह मित्रता रखनेवालेकी अपेक्षा शत्रुता रखनेवालेका कुछ अधिक पक्ष लेता है। जैसे -- पदार्थादिका बँटवारा करते समय वह मित्रता रखनेवालेको कम (उतना ही? जितना वह प्रसन्नतापूर्वक सहन कर सकता हो) और शत्रुता रखनेवालोंको कुछ ज्यादा पदार्थ देता है। यह भी समता ही कहलाती है क्योंकि अपने पक्षवालोंके साथ न्याय और विपक्षवालोंके साथ उदारता होनी चाहिये।सर्वारम्भपरित्यागी -- वह महापुरुष सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी होता है। तात्पर्य है कि धनसम्पत्तिके संग्रह और भोगोंके लिये वह किसी तरहका कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता। स्वतः प्राप्त परिस्थितिके अनुसार ही उसकी प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है अर्थात क्रियाओंमें उसकी प्रवृत्ति कामना? वासना? ममतासे रहित होती है और निवृत्ति भी मानबड़ाई आदिकी इच्छासे रहित होती है।गुणातीतः स उच्यते -- यहाँ उच्यते पदसे यही ध्वनि निकलती है कि उस महापुरुषकी गुणातीत संज्ञा नहीं है किन्तु उसके कहे जानेवाले शरीर? अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर ही उसको गुणातीत कहा जाता है।वास्तवमें देखा जाय तो जो गुणातीत है? उसके लक्षण नहीं हो सकते। लक्षण तो गुणोंसे ही होते हैं अतः जिसके लक्षण होते हैं? वह गुणातीत कैसे हो सकता है परन्तु अर्जुनने भी गुणातीतके ही लक्षण पूछे हैं और भगवान्ने भी गुणातीतके ही लक्षण कहे हैं। इसका तात्पर्य यह है कि लोग पहले उस गुणातीतकी जिस शरीर और अन्तःकरणमें स्थिति मानते थे? उसी शरीर और अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर वे उसमें आरोप करते हैं कि यह गुणातीत मनुष्य है। अतः ये लक्षण गुणातीत मनुष्यको पहचाननेके संकेतमात्र हैं।प्रकृतिके कार्य गुण हैं और गुणोंके कार्य शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धि हैं। अतः मनबुद्धि आदिके द्वारा अपने कारण गुणोंका भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता? फिर गुणोंके भी कारण प्रकृतिका वर्णन हो ही कैसे सकता है जो प्रकृतिसे भी सर्वथा अतीत (गुणातीत) है? उसका वर्णन करना तो उन मनबुद्धि आदिके द्वारा सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें गुणातीतके ये लक्षण स्वरूपमें तो होते ही नहीं किन्तु अन्तःकरणमें मानी हुई अहंताममताके नष्ट हो जानेपर उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणके माध्यमसे ही ये लक्षण -- गुणातीतके लक्षण कहे जाते हैं।यहाँ भगवान्ने सुखदुःख? प्रियअप्रिय? निन्दास्तुति और मानअपमान -- ये आठ परस्पर विरुद्ध नाम लिये हैं? जिनमें साधारण आदमियोंकी तो विषमता हो ही जाती है? साधकोंकी भी कभीकभी विषमता हो जाती है। ऐसे इन आठ कठिन स्थलोंमें जिसकी समता हो जाती है? उसके लिये अन्य सभी अवस्थाओंमें समता रखना सुगम हो जाता है। अतः यहाँ उन्हीं आठ कठिन स्थलोंका नाम लेकर भगवान् यह बताते हैं कि गुणातीत महापुरुषकी इन आठों स्थलोंमें स्वतःस्वाभाविक समता होती है।गुणातीत मनुष्यकी जो स्वतःसिद्ध निर्विकारता है? उसकी जो स्वाभाविक स्थिति है? उसमें अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंके आनेजानेका कुछ भी फरक नहीं पड़ता। उसकी निर्विकारता? समता ज्योंकीत्यों अटल रहती है। उसकी शान्ति कभी भङ्ग नहीं होती।[चौबीसवें और पचीसवें -- इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी समताका वर्णन किया है।] सम्बन्ध -- अर्जुनने तीसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। उसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.24।।गुणातीतस्य लिङ्गान्तरमाह -- किञ्चेति। तयोः समत्वं रागद्वेषानुत्पादकतया स्वकीयत्वाभिमानानास्पदत्वं प्रसन्नत्वं स्वास्थ्यादप्रच्युतिरविक्रियत्वम्। विद्वद्दृष्ट्या प्रियाप्रिययोरसंभवेऽपि लोकदृष्टिमाश्रित्याह -- प्रियं चेति। प्रियाप्रियग्रहणेन गृहीतानां काञ्चनादीनां ब्राह्मणपरिव्राजकवत्पृथग्ग्रहणम्। निन्दा दोषोक्तिरात्मसंस्तुतिरात्मनो गुणकीर्तनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.24 -- 14.25।।समदुःखसुखः [14।24] इत्यादिना सर्वथा सुखादौ तुल्यत्वबुद्धिरुच्यत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थमाह -- तुल्यत्वेति। तुल्यत्ववाचिनः शब्दस्यार्थ इत्यर्थः। प्रायः सर्वानित्याद्युक्तरीत्येति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.24 -- 14.25।।तुल्यत्वार्थ उक्तः पुरस्तात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.24।। --,समदुःखसुखः समे दुःखसुखे यस्य सः समदुःखसुखः? स्वस्थः स्वे आत्मनि स्थितः प्रसन्नः? समलोष्टाश्मकाञ्चनः लोष्टं च अश्मा च काञ्चनं च लोष्टाश्मकाञ्चनानि समानि यस्य सः समलोष्टाश्मकाञ्चनः? तुल्यप्रियाप्रियः प्रियं च अप्रियं च प्रियाप्रिये तुल्ये समे यस्य सोऽयं तुल्यप्रियाप्रियः? धीरः धीमान्? तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः निन्दा च आत्मसंस्तुतिश्च निन्दात्मसंस्तुती? तुल्ये निन्दात्मसंस्तुती यस्य यतेः सः तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।किं च --,
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【 Verse 14.25 】
▸ Sanskrit Sloka: मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: | सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते ||
▸ Transliteration: mānāpamānyos tulyastulyo mitrāri-pakṣayoḥ | sarvārambha-parityāgī guṇātitaḥ sa ucyate ||
▸ Glossary: māna: in honor; apamānyoḥ: dishonor; tulyaḥ: equally; tulyaḥ: equally; mi- tra: friend; ari: enemy; pakṣayoḥ: in parties; sarva: all; ārambha: endeavor; parityāgī: renouncer; guṇātītaḥ: transcendental to the material modes of nature; saḥ: he; ucyate: is said to be
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.22,23,24,25 Śrī Bhagavān says: He who does not hate illu- mination, attachment and delusion when they are present, nor longs for them when they disappear; who is seated like one unconcerned, being situated beyond these material reactions of the modes of nature, who remains firm, knowing that the modes alone are active; He who regards alike pleasure and pain, and looks on a lump of earth, a stone and a piece of gold with an equal eye; who is wise and holds praise and blame to be the same; who is unchanged in honor and dishonor, who treats friend and foe alike, who has abandoned all result based undertakings—such a man is said to have transcended the modes of nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.25।।जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले? पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी निन्दास्तुतिमें सम रहता है जो मानअपमानमें तथा मित्रशत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है? वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.25।। जो मान और अपमान में सम है शत्रु और मित्र के पक्ष में भी सम है? ऐसा सर्वारम्भ परित्यागी पुरुष गुणातीत कहा जाता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.25 मानापमानयोः in honour and dishonour? तुल्यः the same? तुल्यः the same? मित्रारिपक्षयोः to friend and foe? सर्वारम्भपरित्यागी abandoning all undertakings? गुणातीतः crossed the Gunas? सः he? उच्यते is said.Commentary He keeps a balanced mind in honour and dishonour. He is the same to friend and foe. He is not affected by the dual throng. He has risen above the Gunas. He rests in his own essential nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute. He abids in his own Self. He is a Gunatita (one who has transcended the alities of Nature) who is not affected by the play of the alities. He keeps an even outlook amidst changes. He maintains a clam eilibrium.He abandons all actions that can bring visible or invisible fruits or results but he does actions that are necessary for the bare maintenance of his body. The alities described in verses 23? 24 and 25? such as indifference? etc.? are the means for attaining liberation. They represent the ideal that you should have before you. The aspirant should cultivate them. But one attains knowledge of the Self when he abides in his own true nature. These attributes form part and parcel of his nature and serve as marks to indicate that he has crossed beyond the three alities.The Lord gives in the following verse the answer to the third estion of Arjuna How does one go beyond the three alities
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.25. Who remains eal to honour and to dishonour, and eal to the sides of [both] the friend and the foe; and who has given up all fruits of his initiatives-he is said to have transcended the Strands.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.25 Who looks equally upon honour and dishonour, loves friends and foes alike, abandons all initiative, such is he who transcends the Qualities.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.25 He who is the same in honour and dishonour, and the same to friend and foe, and how has abandoned all enterprises - he is said to have risen above the Gunas.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.25 He who is the same under honour and dishonour, who is eally disposed both towards the side of the friend and of the foe, who has renounced all enterprise,-he is said to have gone beyond the alities.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.25 Who is the same in honour and dishonour, the same to friend and foe, abandoning all undertakings he is said to have transcended the alities.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.23-25 Udasinavad etc. upto ucyate. He, who is ignorant i.e., he who does not distinguish [even the existence and nonexistence of the Strands] - he alone is wise, because of his correct knowledge. That is why he is not shaken i.e., he does not fall from his own nature. The means in this regard is the firm conviction : 'The exertion that [in found in my body etc.] is nothing but the innate nature of the body, the sense-organs etc.; and I am unconcerned with any fruit [of any action]'.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.24 - 14.25 He who is 'alike in pleasure and pain,' namely, whose mind is eal in pleasure and pain; 'who dwells in his self,' namely, who dwells in his self because his love for the self keeps his mind in eanimity in pleasure and pain arising from the birth, death etc., of his sons and other relatives and friends, and who, because of this, 'looks upon a clod, a stone and a piece of gold as of eal value,' who conseently remains the same towards things dear or hateful, i.e., who treats alike the worldly objects desired and undesired; who is 'intelligent,' namely, proficient in discrimination between the Prakrti and the self; who, therefore, regards blame and praise as alike, namely, who treats with eality praise and blame looking upon good and evil alities as born of identification with bodies such as those of men etc., and as such unconnected with his real self; who is the 'same in honour and dishonour' because these are feelings based on the misconception that the body is the self, and as a conseence of such discrimination between the body and the self, 'looks alike on friend and foe,' because he understands that ther is no connection between them and himself; and who has thus abandoned all entrprises in which embodied beings are involved - he who is like this, is said to have risen above the Gunas.
Now Sri Krsna states the main method (technie) for transcending such Gunas:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.25 Further, tulyah, he who is the same, unperturbed; mana-apamanayoh, under honour and dishonour; tulyah, who is eally disposed; mitra-ari-paksayoh, both towards the side of the friend and of the foe-although from their own standpoint some may be unattached, still, in others' view they may appear to be siding either with friends or foes; hence it is said, 'eally disposed both towards the side of the friend and of the foe'; sarva-arambha-parityagi, who has renounced all enterprise (-those which are undertaken are arambhah, actions intended for seen or unseen results-), i.e. who is apt to give up all undertakings, who has given up all actions other than those needed merely for the maintenance of the body; sah, he; ucyate, is said to have; gunatitah, gone beyond the alities. The disciplines leading to the state of transcendence of the alities, which have been stated (in the verses) beginning from 'he who, sitting like one indifferent,' and ending with 'he is said to have gone beyond the alities,' have to be practised by a monk, a seeker of Liberation, so long as they are to be achieved through effort. But when they become firmly ingrained, they become the indications, perceivable to himself, of a monk who has transcended the alities. Now the Lord gives the reply to the estion, 'And how does he transcend the alties?'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.25।। पूर्वोक्त श्लोकों में चित्रित किये गये त्रिगुणातीत पुरुष के सामान्य चित्र को यहाँ और अधिक स्पष्ट किया गया है? जिससे हम उसका समीप से सूक्ष्म अवलोकन कर सकें।मान और अपमान में सम रहना ज्ञानी पुरुष का लक्षण है। अपने दिव्य स्वरूप में दृढ़ निष्ठा प्राप्त किया हुआ पुरुष जीवन से भयभीत नहीं होता? क्योंकि जगत् की ओर देखने का उसका दृष्टिकोण अज्ञानियों से सर्वथा भिन्न होता है। जीवन का अहंकार केन्द्रित मूल्यांकन हमें मान और अपमान को क्रमश उपादेय (स्वीकार्य) और हेय (त्याज्य) मानने को बाध्य करता है।लौकिक जीवन में भी हम देखते हैं कि देश के लिये प्राणोत्सर्ग करने वाले पुरुष ऐसी स्थिति की कामना करते हैं जिसे अन्य लोग अपमान जनक समझते हैं। परन्तु समाज के मान और अपमान की ओर ध्यान दिये बिना ऐसे लोग पूर्ण उत्साह के साथ अपनी पीढ़ी से प्रेम और उसकी सेवा करते हैं। आपेक्षिक सिद्धान्त की खोज के दिन आर्कमिडीज को विवस्त्र स्थिति में सड़क पर यूरेका? यूरेका चिल्लाते हुये दौड़ने में अपमान का अनुभव नहीं हुआ? परन्तु किसी और दिन यह बात नहीं होती मान और अपमान बुद्धि के निर्णय हैं? जो स्थानस्थान पर और समयसमय पर बदलते रहते हैं। जो पुरुष अहंकार के स्तर से ऊंचा उठ गया है? उसे दोनों ही समान हैं? कांटो के मुकुट का उतना ही स्वागत है? जितना गुलाब के फूलों के मुकुट काशत्रु और मित्र के पक्षों में सम जैसे हम अपने शरीर के किसी अंग को शत्रु और किसी अंग को मित्र नहीं मानते? वैसे ही आत्मैकत्व ज्ञान प्राप्त पुरुष भी किसी से मित्रता या शत्रुता नहीं रखता। तथापि अन्य लोग उससे अवश्य ही मित्र या शत्रु भाव रख सकते हैं? किन्तु वह दोनों के प्रति समान भाव से रहता है। आत्मानुभव की दृष्टि से ज्ञानी पुरुष जानता है वे सब मैं ही हूँ।सर्वारम्भ परित्यागी आरंभ का अर्थ है कर्म। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि त्रिगुणातीत पुरुष क्रियाशून्य हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि उसे अपने कर्मों में न कर्तृत्व का अभिमान होता है और न स्वार्थ का। आरम्भ शब्द में वे सब कर्म समाविष्ट हैं? जो अनेक वस्तुओं के अर्जन और संग्रह करने तथा उनपर अपना स्वामित्य स्थापित करने के लिये अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होते हैं। अज्ञानी जीव के लिये ये कर्म स्वाभाविर्क हैं। अहंकार रहित आत्मज्ञानी पुरुष ईश्वर से अनुप्राणित होकर ईश्वरीय पुरुष के रूप में इस जगत् में कल्याणार्थ कार्य करता है।उपर्युक्त लक्षणों से पुरुष गुणातीत कहा जाता है। इन श्लोकों में अर्जुन के द्वितीय प्रश्न का उत्तर दिया गया है।श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में लिखते हैं कि मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक साधक को इन गुणों को साधन के रूप में अपनाना चाहिये। एक बार ज्ञान में निष्ठा प्राप्त कर लेने पर ये गुण उसके स्वाभाविक लक्षण बन जायेंगे? जो स्वसंवेद्य होते हैं। गुणातीत पुरुष के ये मुख्य लक्षण हैं।अर्जुन का तीसरा प्रश्न यह था? किस प्रकार वह तीनों गुणों से अतीत होता है इसका उत्तर देते हुये भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.25।।मानः सत्कारोऽपमानस्तिरस्कास्तयोर्मानापामानयोस्तुल्यः समो निर्विकारः परदृष्ट्या यौ मित्रशत्रू तयोः पक्षयोस्तुल्यो न कस्यचित्पक्षं भजतीत्यर्थः। दृष्टादृष्टार्थानि कर्माण्यारभ्यन्त इत्यारम्भास्तान्सर्वारम्भांस्त्यक्तुं शीलं यस्येति देहधारणमात्रनिमित्तव्यतिरेकेण सर्वारम्भपरित्यागीत्यर्थः। एतोदृशो यः स गुणातीति उच्यते सर्वारम्भपरित्यागीत्येतदन्तं यावद्यन्त्रसाध्यं तावद्गुणातीतत्वासाधनं विरक्तेन मुमुक्षुणानुष्ठेयं स्थिरीभूतं तु जीवन्मुक्तस्य गुणातीतस्य स्वभावभूतत्वादयन्त्रसिद्धं लक्षणं भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.25।।मानः सत्कार आदरापरपर्यायः? अपमानस्तिरस्कारोऽनादरापरपर्यायस्तयोस्तुल्यो हर्षविषादशून्यो निन्दास्तुती शब्दरूपे मानापमानौ तु शब्दमन्तरेणापि कायमनोव्यापारविशेषाविति भेदः। अत्र पकारवकारयोः पाठविकल्पेऽप्यर्थः स एव। तुल्यो मित्रारिपक्षयोर्मित्रपक्षस्येवारिपक्षस्यापि द्वेषाविषयः स्वयं तयोरनुग्रहनिग्रहशून्य इति वा। सर्वारम्भपरित्यागी आरभ्यन्त इत्यारम्भाः कर्माणि तान्सर्वान्परित्यक्तुं शीलं यस्य स तथा।,देहयात्रामात्रव्यतिरेकेण सर्वकर्मपरित्यागीत्यर्थः। उदासीनवदासीन इत्याद्युक्तप्रकाराचारो गुणातीतः स उच्यते। यदुक्तमुपेक्षकत्वादि तद्विद्योदयात्पूर्वं यत्नसाध्यं विद्याधिकारिणा साधनत्वेनानुष्ठेयमुत्पन्नायां तु विद्यायां जीवन्मुक्तस्य गुणातीतस्योक्तं धर्मजातमयत्नसिद्धं लक्षणत्वेन तिष्ठतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.25।।अथ चतुर्थ्यां भूमौ सत्त्वापत्तिसंज्ञायां स्थितस्य योगिनः समाधिसुखाभावेन स्वसंवेद्यलिङ्गाभावात्तत्त्वनिश्चयेन द्वैतस्य बाधाल्लिङ्गमाचारश्च परसंवेद्य एव तदाह -- मानेति। यथाहि परीक्षकः कूटकार्षापणस्य लाभे विनाशे वा हर्षविषादशून्यो न च तल्लाभार्थं यत्नमारभते? मूढस्तु ताभ्यां बाध्यते तल्लाभार्थं यत्नं चारभते? एवं विद्वान् द्वैतं मरुमरीचिकाह्रदसमानं पश्यन् तत्र मानापमानयोर्वा मित्रारिपक्षयोर्वा तुल्य एव नत्वन्यतरलाभाय परिहाराय वा यत्नमारभते अतो गुणातीत इत्युच्यते। सर्वत्र पदार्थः स्पष्टः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.25।।किञ्च मानापमानयोस्तुल्यः भगवत्कृतमानापमानयोः स्वीयत्वेन कृतत्वात्तुल्यः। तुल्यो मित्रारिपक्षयोः? भगवदीयेन तदीयत्वेन? मित्रपक्षे कृते तुल्यः भगवदीयभावेन अरिपक्षे आसुरैर्भगवदीयत्वेन विचारिते भगवदीयत्वेन तथा विचारयन्तीति तेषामुचितमेवेति तद्दोषाविचारकत्वात्तुल्यः। सर्वारम्भपरित्यागी सर्वेषां पदार्थानामारम्भानां दृष्टप्रत्ययानां परित्यजनशीलवान्। एवमाचारवान् यः सगुणातीत उच्येते? कथ्यत इत्यर्थः। ,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.25।।अपिच -- मानापमानयोरिति। मानेऽपमाने च तुल्यः? मित्रपक्षेऽरिपक्षे च तुल्यः? सर्वान्दृष्टादृष्टार्थानारम्भानुद्यमान्परित्यक्तुं शीलं यस्य। स एवंभूताचारयुक्तो गुणातीत उच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.25।।मानापमानयोरिति। देहित्वप्रयुक्तसर्वारम्भपरित्यागी च यः? एवम्भूतः स गुणातीत उच्यते ज्ञानमार्गीयः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.25।।तथा --, जो मान और अपमानमें समान अर्थात् निर्विकार रहता है तथा मित्र और शत्रुपक्षके लिये तुल्य है। यद्यपि कोईकोई पुरुष अपने विचारसे तो उदासीन होते हैं? परंतु दूसरोंकी समझसे वे मित्र या शत्रुपक्षवालेसे ही होते हैं इसलिये कहते हैं कि जो मित्र और शत्रुपक्षके लिये तुल्य है। तथा जो सारे आरम्भोंका त्याग करनेवाला है। दृष्ट और अदृष्ट फलके लिये जानेवाले कर्मोंका नाम आरम्भ है? ऐसे समस्त आरम्भोंका त्याग करनेका जिसका स्वभाव है वह सर्वारम्भपरित्यागी है अर्थात् जो केवल शरीरधारणके लिये आवश्यक कर्मोंके सिवा सारे कर्मोंका त्याग कर देनेवाला है? वह पुरुष गुणातीत कहलाता है। उदासीनवत् यहाँसे लेकर गुणातीतः स उच्यते यहाँतक जो भाव बतलाये गये हैं? वे सब जबतक प्रयत्नसे सम्पादन करनेयोग्य रहते हैं? तबतक तो मुमुक्षु -- संन्यासीके लिये अनुष्ठान करनेयोग्य गुणातीतत्वप्राप्तिके साधन हैं और जब वे स्थिर हो जाते हैं? तो गुणातीत संन्यासीके स्वसंवेद्य लक्षण बन जाते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.25।। व्याख्या -- धीरः? समदुःखसुखः -- नित्यअनित्य? सारअसार आदिके तत्त्वको जानकर स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित होनेसे गुणातीत मनुष्य धैर्यवान् कहलाता है।पूर्वकर्मोंके अनुसार आनेवाली अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिका नाम सुखदुःख है अर्थात् प्रारब्धके अनुसार शरीर? इन्द्रियों आदिके अनुकूल परिस्थितिको सुख कहते हैं और शरीर? इन्द्रियों आदिके प्रतिकूल परिस्थितिको दुःख कहते हैं। गुणातीत मनुष्य इन दोनोंमें सम रहता है। तात्पर्य है कि सुखदुःखरूप बाह्य परिस्थितियाँ उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणमें विकार पैदा नहीं कर सकतीं? उसको सुखीदुःखी नहीं कर सकतीं।स्वस्थः -- स्वरूपमें सुखदुःख है ही नहीं। स्वरूपसे तो सुखदुःख प्रकाशित होते हैं। अतः गुणातीत मनुष्य आनेजानेवाले सुखदुःखका भोक्ता नहीं बनता? प्रत्युत अपने नित्यनिरन्तर रहनेवाले स्वरूपमें स्थिर रहता है।समलोष्टाश्मकाञ्चनः -- उसका मिट्टीके ढेले? पत्थर और स्वर्णमें न तो आकर्षण (राग) होता है और न विकर्षण (द्वेष) होता है। परन्तु व्यवहारमें वह ढेलेको ढेलेकी जगह रखता है? पत्थरको पत्थरकी जगह रखता है और स्वर्णको स्वर्णकी जगह (तिजोरी आदिमें) रखता है। तात्पर्य है कि यद्यपि उनकी प्राप्तिअप्राप्तिमें उसको हर्षशोक नहीं होते? वह सम रहता है? तथापि उनसे व्यवहार तो यथायोग्य ही करता है।ढेले? पत्थर और स्वर्णका ज्ञान न होना समता नहीं कहलाती। समता वही है कि इन तीनोंका ज्ञान होते हुए भी इनमें रागद्वेष न हों। ज्ञान कभी दोषी नहीं होता? विकार ही दोषी होते हैं।तुल्यप्रियाप्रियः -- क्रियमाण कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धिमें अर्थात् उनके तात्कालिक फलकी प्राप्तिअप्राप्तिमें भी वह सम रहता है।तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः -- निन्दा और स्तुतिमें नामकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका नामके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता अतः कोई निन्दा करे तो उसके चित्तमें खिन्नता नहीं होती और कोई स्तुति करे तो उसके चित्तमें प्रसन्नता नहीं होती। इसी प्रकार निन्दा करनेवालोंके प्रति उसका द्वेष नहीं होता और स्तुति करनेवालोंके प्रति उसका राग नहीं होता।साधारण मनुष्योंकी यह एक आदत बन जाती है कि उनको अपनी निन्दा बुरी लगती है और स्तुति अच्छी लगती है। परन्तु जो गुणोंसे ऊँचे उठ जाते हैं? उनको निन्दास्तुतिका ज्ञान तो होता है और वे बर्ताव भी सबके साथ यथोचित ही करते हैं? पर उनमें निन्दास्तुतिको लेकर खिन्नताप्रसन्नता नहीं होती। कारण कि वे जिस तत्त्वमें स्थित हैं? वहाँ गुणोंवाली परकृत निन्दास्तुति पहुँचती ही नहीं।निन्दा और स्तुति -- ये दोनों ही परकृत क्रियाएँ हैं। उन क्रियाओंसे राजीनाराज होना गलती है। कारण कि जिसका जैसा स्वभाव है? जैसी धारणा है? वह उसके अनुसार ही बोलता है। वह हमारे अनुकूल ही बोले? हमारी निन्दा न करे -- यह न्याय नहीं है अर्थात् उसको बोलनेमें बाध्य करनेका भाव न्याय नहीं है? अन्याय है। दूसरोंपर हमारा क्या अधिकार है कि तुम हमारी निन्दा मत करो हमारी स्तुति ही करो दूसरी बात? कोई निन्दा करता है तो उसमें साधकको प्रसन्न होना चाहिये कि इससे मेरे पाप कट रहे हैं? मैं शुद्ध हो रहा हूँ। अगर कोई हमारी प्रशंसा करता है? तो उससे हमारे पुण्य नष्ट होते हैं। अतः प्रशंसामें राजी नहीं होना चाहिये क्योंकि राजी होनेमें खतरा हैमानापमानयोस्तुल्यः -- मान और अपमान होनेमें शरीरकी मुख्यता होती है। गुणातीत मनुष्यका शरीरके साथ तादात्म्य नहीं रहता। अतः कोई उसका आदर करे या निरादर करे? मान करे या अपमान करे? इन परकृत क्रियाओंका उसपर कोई असर नहीं पड़ता।निन्दास्तुति और मानअपमान -- इन दोनों ही परकृत क्रियाओंमें गुणातीत मनुष्य सम रहता है। इन दोनों परकृत क्रियाओंका ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत निन्दा और अपमानमें दुःखी होना तथा स्तुति और मानमें हर्षित होना दोषी है क्योंकि ये दोनों ही प्रकृतिके विकार हैं। गुणातीत पुरुषको निन्दास्तुति और मानअपमानका ज्ञान तो होता है? पर गुणोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेसे? नाम और शरीरके साथ तादात्म्य न रहनेसे वह सुखीदुःखी नहीं होता। कारण कि वह जिस तत्त्वमें स्थित है? वहाँ ये विकार नहीं हैं। वह तत्त्व गुणरहित है? निर्विकार है।तुल्यो मित्रारिपक्षयोः -- वह मित्र और शत्रुके पक्षमें सम रहता है। यद्यपि गुणातीत मनुष्यकी दृष्टिमें कोई मित्र और शत्रु नहीं होता? तथापि दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार उसे अपना मित्र अथवा शत्रु भी मान सकते हैं। साधारण मनुष्यको भी दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार मित्र या शत्रु मान सकते हैं किन्तु इस बातका पता लगनेपर उस मनुष्यपर इसका असर पड़ता है? जिससे उसमें रागद्वेष उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु गुणातीत मनुष्यपर इस बातका पता लगनेपर भी कोई असर नहीं पड़ता। वस्तुतः मित्र और शत्रुकी भावनाके कारण ही व्यवहारमें पक्षपात होता है। गुणातीत मनुष्यके कहलानेवाले अन्तःकरणमें मित्रशत्रुकी भावना ही नहीं होती अतः उसके व्यवहारमें पक्षपात नहीं होता।एक व्यक्ति उस महापुरुषके साथ मित्रता रखता है और दूसरा व्यक्ति अपने स्वभाववश उस महापुरुषके साथ शत्रुता रखता है। जब उन दोनों व्यक्तियोंकी किसी बातको लेकर न्याय करनेका अवसर आ जाय? तब (व्यवहारमें) वह मित्रता रखनेवालेकी अपेक्षा शत्रुता रखनेवालेका कुछ अधिक पक्ष लेता है। जैसे -- पदार्थादिका बँटवारा करते समय वह मित्रता रखनेवालेको कम (उतना ही? जितना वह प्रसन्नतापूर्वक सहन कर सकता हो) और शत्रुता रखनेवालोंको कुछ ज्यादा पदार्थ देता है। यह भी समता ही कहलाती है क्योंकि अपने पक्षवालोंके साथ न्याय और विपक्षवालोंके साथ उदारता होनी चाहिये।सर्वारम्भपरित्यागी -- वह महापुरुष सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी होता है। तात्पर्य है कि धनसम्पत्तिके संग्रह और भोगोंके लिये वह किसी तरहका कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता। स्वतः प्राप्त परिस्थितिके अनुसार ही उसकी प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है अर्थात क्रियाओंमें उसकी प्रवृत्ति कामना? वासना? ममतासे रहित होती है और निवृत्ति भी मानबड़ाई आदिकी इच्छासे रहित होती है।गुणातीतः स उच्यते -- यहाँ उच्यते पदसे यही ध्वनि निकलती है कि उस महापुरुषकी गुणातीत संज्ञा नहीं है किन्तु उसके कहे जानेवाले शरीर? अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर ही उसको गुणातीत कहा जाता है।वास्तवमें देखा जाय तो जो गुणातीत है? उसके लक्षण नहीं हो सकते। लक्षण तो गुणोंसे ही होते हैं अतः जिसके लक्षण होते हैं? वह गुणातीत कैसे हो सकता है परन्तु अर्जुनने भी गुणातीतके ही लक्षण पूछे हैं और भगवान्ने भी गुणातीतके ही लक्षण कहे हैं। इसका तात्पर्य यह है कि लोग पहले उस गुणातीतकी जिस शरीर और अन्तःकरणमें स्थिति मानते थे? उसी शरीर और अन्तःकरणके लक्षणोंको लेकर वे उसमें आरोप करते हैं कि यह गुणातीत मनुष्य है। अतः ये लक्षण गुणातीत मनुष्यको पहचाननेके संकेतमात्र हैं।प्रकृतिके कार्य गुण हैं और गुणोंके कार्य शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धि हैं। अतः मनबुद्धि आदिके द्वारा अपने कारण गुणोंका भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता? फिर गुणोंके भी कारण प्रकृतिका वर्णन हो ही कैसे सकता है जो प्रकृतिसे भी सर्वथा अतीत (गुणातीत) है? उसका वर्णन करना तो उन मनबुद्धि आदिके द्वारा सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें गुणातीतके ये लक्षण स्वरूपमें तो होते ही नहीं किन्तु अन्तःकरणमें मानी हुई अहंताममताके नष्ट हो जानेपर उसके कहे जानेवाले अन्तःकरणके माध्यमसे ही ये लक्षण -- गुणातीतके लक्षण कहे जाते हैं।यहाँ भगवान्ने सुखदुःख? प्रियअप्रिय? निन्दास्तुति और मानअपमान -- ये आठ परस्पर विरुद्ध नाम लिये हैं? जिनमें साधारण आदमियोंकी तो विषमता हो ही जाती है? साधकोंकी भी कभीकभी विषमता हो जाती है। ऐसे इन आठ कठिन स्थलोंमें जिसकी समता हो जाती है? उसके लिये अन्य सभी अवस्थाओंमें समता रखना सुगम हो जाता है। अतः यहाँ उन्हीं आठ कठिन स्थलोंका नाम लेकर भगवान् यह बताते हैं कि गुणातीत महापुरुषकी इन आठों स्थलोंमें स्वतःस्वाभाविक समता होती है।गुणातीत मनुष्यकी जो स्वतःसिद्ध निर्विकारता है? उसकी जो स्वाभाविक स्थिति है? उसमें अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंके आनेजानेका कुछ भी फरक नहीं पड़ता। उसकी निर्विकारता? समता ज्योंकीत्यों अटल रहती है। उसकी शान्ति कभी भङ्ग नहीं होती।[चौबीसवें और पचीसवें -- इन दो श्लोकोंमें भगवान्ने गुणातीत महापुरुषकी समताका वर्णन किया है।] सम्बन्ध -- अर्जुनने तीसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। उसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.25।।इतश्च गुणातीतः शक्यो ज्ञातुमित्याह -- किञ्चेति। मानः सत्कारस्तिरस्कारोऽपमानः। परदृष्ट्या यौ सखिशत्रू तयोः पक्षयोर्निर्विशेषो न कस्यचित्पक्षे तिष्ठतीत्याह -- तुल्य इति। विदुषो मित्रादिबुद्ध्यभावात्तुल्यो मित्रारिपक्षयोरित्ययुक्तमित्याशङ्क्याह -- यद्यपीति। सर्वकर्मत्यागे देहधारणमपि निमित्ताभावान्न स्यादित्याशङ्क्याह -- देहेति। उक्तविशेषणो गुणातीतो ज्ञातव्य इत्याह -- गुणेति। यदुक्तमुपेक्षकत्वादि तद्विद्योदयात्पूर्वं यत्नसाध्यं विद्याधिकारिणा ज्ञानसाधनत्वेनानुष्ठेयमुत्पन्नायां तु विद्यायां जीवन्मुक्तस्योक्तधर्मजातं स्थिरीभूतं स्वानुभवसिद्धलक्षणत्वेन तिष्ठतीत्युक्ते धर्मजाते विभागं दर्शयति -- उदासीनवदित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.24 -- 14.25।।समदुःखसुखः [14।24] इत्यादिना सर्वथा सुखादौ तुल्यत्वबुद्धिरुच्यत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थमाह -- तुल्यत्वेति। तुल्यत्ववाचिनः शब्दस्यार्थ इत्यर्थः। प्रायः सर्वानित्याद्युक्तरीत्येति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.24 -- 14.25।।तुल्यत्वार्थ उक्तः पुरस्तात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.25।। --,मानापमानयोः तुल्यः समः निर्विकारः तुल्यः मित्रारिपक्षयोः? यद्यपि उदासीना भवन्ति केचित् स्वाभिप्रायेण? तथापि पराभिप्रायेण मित्रारिपक्षयोरिव भवन्ति इति तुल्यो मित्रारिपक्षयोः इत्याह। सर्वारम्भपरित्यागी? दृष्टादृष्टार्थानि कर्माणि आरभ्यन्ते इति आरम्भाः? सर्वान् आरम्भान् परित्यक्तुं शीलम् अस्य इति सर्वारम्भपरित्यागी? देहधारणमात्रनिमित्तव्यतिरेकेण सर्वकर्मपरित्यागी इत्यर्थः। गुणातीतः सः उच्यते।।उदासीनवत् (गीता 14।23) इत्यादि गुणातीतः स उच्यते (गीता 14।25) इत्येतदन्तम् उक्तं यावत् यत्नसाध्यं तावत् संन्यासिनः अनुष्ठेयं गुणातीतत्वसाधनं मुमुक्षोः स्थिरीभूतं तु स्वसंवेद्यं सत् गुणातीतस्य यतेः लक्षणं भवति इति। अधुना कथं च त्रीन्गुणानतिवर्तते इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनम् आह --,
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【 Verse 14.26 】
▸ Sanskrit Sloka: मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते | स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ||
▸ Transliteration: maṁ ca yo’vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate | sa guṇān-samatītyaitān brahmabhūyāya kalpate ||
▸ Glossary: maṁ: unto Me; ca: also; yaḥ: person; avyabhicāreṇa: without fail; bhaktiyogena: by devotional service; sevate: renders service; saḥ: he; guṇān: all the modes of material nature; samatītya: transcending; etān: all this; brahmabhūyāya: to be elevated to the Brahman; kalpate: is considered.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.26 One who engages in full devotional service, who does not fall down in any circumstance, at once transcends the modes of material nature and thus comes to the level of Brahman.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.26।।जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है? वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.26।। जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है? वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.26 माम् Me? च and? यः who? अव्यभिचारेण unswerving? भक्तियोगेन with devotion? सेवते serves? सः he? गुणान् Gunas? समतीत्य crossing beyond? एतान् these? ब्रह्मभूयाय for becoming Brahman? कल्पते is fit.Commentary A Sannyasi or even a Karma Yogi who serves Him (the Isvara? Narayana Who abides in the hearts of all beings) with unswerving devotion? is endowed with the knowledge of the Self. He then goes beyond the three alities and becomes fit to become Brahman? for attaining liberation or release from birth and death.He attains to the knowledge of the Self through the grace and mercy of the Lord. To these everharmonious devotees worshipping Me in love? I give the Yoga of discrimination by which they come unto Me. Out of pure compassion for them? dwelling within their Self? I destroy the ignorancorn darkness by the shining lamp of wisdom. (Chapter X. 10 and 11)Avyabhicharini Bhakti The devotee constantly meditates on the Lord. He has exclusive devotion to the Lord alone. He has no other thought save that of his Lord. His mind is filled with the thoughts of the Lord. His thoughts flow towards the Lord like the continuous flow of oil from one vessel to another. There is Sajatiya Vritti Pravaha? i.e.? unbroken flow of the one thought of God. There is total abandonment of thoughts of sensual objects. Constant thinking of God is the sure means for crossing beyond the three alities of Nature.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.26. Whosoever serves Me alone with an unfailing devotion-Yoga, he, transcending these Strands, turns to be the Brahman.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.26 And he who serves Me and only Me, with unfaltering devotion, shall overcome the Qualities, and become One with the Eternal.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.26 And he who, with unswerving Bhakti Yoga, serves Me, he, crossing beyond the Gunas, becomes fit for the state of Brahman.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.26 And he who serves Me through the unswerving Yoga of Devotion, he, having gone beyond these alities, alifies for becoming Brahman.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.26 And he who serves Me with unswerving devotion, he, crossing beyond the alities, is fit for becoming Brahman.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.26 Mam ca etc. By this [verse the Lord] teaches the basic means. Here the word ca has been used in the sense of affirmation in exclusion of all other things. [So the meaning is] : 'He, who serves Me exclusively'. Hence, craving for fruits etc. [of action], whosoever takes hold of that fruit as his principal aim, but Me (the Supreme) as a subsidiary one-he is excluded by this interpretation. Because the devotion of this person is not unfailing. For, he has consideration for fruit [alone]. On the other hand, he who does not entertain any desire for any fruit; who, even when estioned [by somody as] 'Why do you under-take this desagreeable (foolish) act ?' would give reply by silence alone, shedding tears that roll on his both the eyes wide open, and having shake in body and bodily hair thrilled-[all] due to his internal organ, agitated on account of being struck by the incessant devotion towards the Bhagavat-it should be born in mind that this person alone, not anybody else, in purified by the unfailing devotion which is (nothing but) the foremost Energy (Grace) of the Bhagavat, the Supreme Lord.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.26 The state of transcendence of Gunas is not attained merely by reflecting on the difference between the Prakrti and the self as declared in the text such as, 'When the seer beholds no agent of action other than the Gunas, then he transcends the Gunas, for it is liable then to be sublated by contrary subtle impressions (Vasanas) which have continued from beginningless time. He who, with unswerving Bhakti Yoga, namely, one-pointed Bhakti Yoga, serves Me of true-resolve, supremely compassionate and the ocean of parental affection for supplicants - such a man crosses over the Gunas of Sattva etc., which are otherwise invincible. He becomes worthy for brahmabhuya, the state of brahman i.e., he becomes alified for the state of brahman. The meaning is that he attains the self as It really is, immortal and immutable.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.26 And he-be he a monk or a man of action (rites and duties)-, yah, who; sevate, serves; mam, Me, God, Narayana residing in the hearts of all beings; avyabhicarena, through the unswerving-that which never wavers-; bhakti-yogena, Yoga of Devotion-devotion [Bhakti (devotion), supreme Love, through which one becomes united (with God) is yoga.] itself being the Yoga-; sah, he; samatitya, having transcended; etan, these; gunan, alities as described; kalpate, alifies, i.e. becomes fit; brahma-bhuyaya,-bhuyah is the same as bhavanam-, for becoming Brahman, for Liberation. How this is so is being stated:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.26।। धर्म का व्यावहारिक शास्त्रीय ग्रंथ होने के कारण गीता में केवल सिद्धान्तों का प्रतिपादन नहीं किया गया है। इसमें प्रत्येक सिद्धान्त के विवेचन के पश्चात् उस साधन का वर्णन किया गया है? जिसके अभ्यास से एक साधक सिद्धावस्था को प्राप्त हो सकता है।जो अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी सेवा करता है ईश्वर से परम प्रीति भक्ति कहलाती है। प्रिय वस्तु में हमारा मन सहजता से रमता है। हमारा सम्पूर्ण स्वभाव हमारे विचारों से पोषित होता है। यथा विचार तथा मन? यह नियम है। इसलिये एकाग्र चित्त से आत्मा के अनन्तस्वरूप का चिन्तन करने से परिच्छिन्न नश्वर अहंकार की समाप्ति और स्वस्वरूप में स्थिति हो जाती है।यह सत्य है कि परमात्मा का अखण्ड चिन्तन एक समान निष्ठा एवं प्रखरता के साथ संभव नहीं होता है। जिस स्थिति में आज हम अपने को पाते हैं? उसमें यह सार्मथ्य नहीं है कि मन को दीर्घकाल तक ध्यानाभ्यास में स्थिर कर सकें। साधकों की इस अक्षमता को जानते हुये भगवान् एक उपाय बताते हैं? जिसके द्वारा हम दीर्घकाल तक ईश्वर का स्मरण बनाये रख सकते हैं। और वह उपाय है सेवा। तृतीय अध्याय में यह वर्णन किया जा चुका है कि ईश्वरार्पण की भावना से किए गए सेवा कर्म ईश्वर की पूजा (यज्ञ) बन जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवल मूर्तिपूजा? या भजन ही पर्याप्त नहीं है। गीताचार्य की अपने भक्तों से यह अपेक्षा है कि वे अपने धर्म को केव्ाल पूजा के कमरे या मन्दिरों में ही सीमित न रखें। उन्हें चाहिये कि वे अपने दैनिक जीवन? कार्य क्षेत्र और लोगों के साथ व्यवहार में भी धर्म का अनुसरण करें।अखण्ड ईश्वर स्मरण तथा सेवासाधना मन के विक्षेपों को दूर करके उसे ध्यान की सूक्ष्मतर साधना के योग्य बना देती है। तमस और रजस की मात्रा घटती जाती है और उसी अनुपात में सत्त्वगुण प्रवृद्ध होता जाता है। ऐसा सत्त्वगुण प्रधान साधक ध्यान की साधना के योग्य बन जाता है। ऐसे साधक से आत्मानुभूति दूर नहीं रहती।उत्तम अधिकारी ब्रह्मस्वरूप का अनुभव कर स्वयं ब्रह्म बन जाता है। जैसे स्वप्नद्रष्टा जागने पर स्वयं ही जाग्रत पुरुष बनता है।यह साधक स्वयं ब्रह्म कैसे बनता बनता है सुनो
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.26।।प्रस्नद्वयं समाधायेदानीं कथमेतान् त्रीन् गुणानतिवर्तते इति तृतीयप्रश्नस्य प्रतिवचनमाह -- मामिति। चः पूर्वोक्तगुणातीतलक्षणस्य मुमुक्षुणा प्रयत्नसाध्यस्य समुच्चयार्थः। मामीश्वरं नारायणं सर्वभूतहृदयाश्रितं यो यतिः कर्मी वाऽव्यभिचारेण व्यभिचारशून्येन निष्कामेण परमप्रेमलक्षणेन भजनं भक्तिः सैव यज्यतेऽनेनेति योगः तेन भक्तियोगेन तत्त्वज्ञानोत्पादकेन सेवते विषयचिन्तां विहाय सदानुसंदधाति स भगवदनुग्रहकृतसभ्यज्ञानसंपन्नो जीवन्नेवैतान्गुणान्यथोक्तान्समतीत्य
Chapter 14 (Part 12)
सभ्यगतिक्रम्य ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.26।।अधुना कथमेतान्गुणानतिवर्तत इति तृतीयप्रश्नस्य प्रतिवचनमाह -- चस्त्वर्थः। मामेवेश्वरं नारायणं सर्वभूतान्तर्यामिणं मायया क्षेत्रज्ञतामागतं परमानन्दघनं भगवन्तं वासुदेवमव्यभिचारेण परमप्रेमलक्षणेन भक्तियोगेन द्वादशाध्यायोक्तेन यः सेवते सदा चिन्तयति स मद्भक्त एतान् प्रागुक्तान् गुणान् समतीत्य,सम्यगतिक्रम्य द्वैतदर्शनेन बाधित्वा ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति। सर्वदा भगवच्चिन्तनमेव गुणातीतत्वोपाय इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.26।।अथ कथं त्रीन्गुणानतिवर्तत इत्यस्योत्तरं विवक्षन् साधनभूतासु तिसृषु भूमिषु तृतीयां तनुमानसामाह -- मां चेति। यश्च साधको मां प्रत्यगात्मानम्। चकारस्त्वर्थे पूर्वभूमिस्थापेक्षयास्य वैलक्षण्यं द्योतयति। अव्यभिचारेण वृत्त्यन्तरानन्तरितेन भक्तियोगेन मयि भगवति तैलधारावदविच्छिन्नवृत्तिप्रवाहिमनःप्रणिधानरूपेण,योगेन सेवते ध्यायति स एवं सूक्ष्मीकृतचित्त एतान् गुणान् समतीत्य ध्यानपरिपाकान्ते सत्त्वमपि बाधित्वा ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभावाय कल्पते योग्यो भवति।भुवो भावे इति भवतेर्भावे क्यप्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.26।।कथं गुणानतिवर्त्तते इत्यत्रोत्तरमाह -- मां चेति। चस्त्वर्थे। मां मदर्थे अव्यभिचारेण अनन्यात्मकेन भक्ितयोगेन यः सेवते? स एतान् गुणान् समतीत्य सम्यगतिक्रम्य ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभावाय कल्पते समर्थो भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.26।।कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तत इत्यस्य प्रश्नस्योत्तरमाह -- मांचेति। चशब्दोऽवधारणार्थः। मामेव परमेश्वरं श्रीनारायणमव्यभिचारेणैकान्तभक्तियोगेन यः सेवते स एतान्गुणान्समतीत्य सम्यगतिक्रम्य ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभावाय मोक्षाय कल्पते योग्यो भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.26।।किञ्च भक्तिमार्गीयस्य गुणातीतत्वं केवलगुणातीतभगवद्भक्त्येति तथाह -- मां चेति। मां पुरुषोत्तमं अव्यभिचारेण सर्वात्मना ऐकान्तिकेन भक्तियोगेन स्नेहयोगेन सेवते? स गुणानेतानतीत्य ब्रह्मभूयायाक्षरब्रह्मभावाय कल्पते। एतेन अव्यभिचारिभक्तिमर्यादया सेवतामपि ब्रह्मात्मप्राप्तिरुक्तानुषङ्गिकी अव्यभिचारिभक्तियोगोक्तिः। यथा च श्रुतौ -- यो वै स्वां देवतामतियजते प्रस्थायै देवतायै च्यवते न परीप्राप्नोति स पापीयान्भवति तमेवैकं जानथात्मानं अन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः [मुं.उ.2।2।5] इति। अत्रात्मत्वेन ज्ञानं स्नेहभक्तिविषयत्वेन एवकारेण व्यभिचारिणीभक्तिव्यावृत्तिरनूद्यते अयमेवामृतस्य त्रिगुणात्मकरूपमोक्षस्य सेतुरित्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.26।।मनुष्य इन तीनों गुणोंसे किस प्रकार अतीत होता है इस प्रश्नका उत्तर अब देते हैं --, जो संन्यासी या कर्मयोगी सब भूतोंके हृदयमें स्थित मुझ परमेश्वर नारायणको? कभी व्यभिचरित ( विचलित ) न होनेवाले अव्यभिचारी भक्तियोगद्वारा सेवन करता है -- भजनका नाम भक्ति है? वही योग है? उस भक्तियोगके द्वारा जो मेरी सेवा करता है -- वह इन ऊपर कहे हुए गुणोंको अतिक्रमण करके ब्रह्मलोकको पानेके लिये? अर्थात् मोक्ष प्राप्त करनेके लिये योग्य समझा जाता है? अर्थात् ( मोक्ष प्राप्त करनेमें ) समर्थ होता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.26।। व्याख्या -- [यद्यपि भगवान्ने इसी अध्यायके उन्नीसवेंबीसवें श्लोकोंमें गुणोंका अतिक्रमण करनेका उपाय बता दिया था? तथापि अर्जुनने इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीत होनेका उपाय पूछ लिया। इससे यह मालूम होता है कि अर्जुन उस उपायके सिवाय गुणातीत होनेके लिये दूसरा कोई उपाय जानना चाहते हैं। अतः अर्जुनको भक्तिका अधिकारी समझकर भगवान् उनको गुणातीत होनेका उपाय भक्ति बताते हैं।]मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते -- इन पदोंमें उपासक? उपास्य और उपासना -- ये तीनों आ गये हैं अर्थात् यः पदसे उपासक? माम् पदसे उपास्य और अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते पदोंसे उपासना आ गयी है।अव्यभिचारेण पदका तात्पर्य है कि दूसरे किसीका भी सहारा न हो। सांसारिक सहारा तो दूर रहा? ज्ञानयोग? कर्मयोग आदि योगों(साधनों) का भी सहारा न हो और भक्तियोगेन पदका तात्पर्य है कि केवल भगवान्का ही सहारा हो? आश्रय हो? आशा हो? बल हो? विश्वास हो। इस तरह अव्यभिचारेण पदसे दूसरोंका आश्रय लेनेका निषेध करके भक्तियोगेन पदसे केवल भगवान्का ही आश्रय लेनेकी बात कही गयी है।सेवते पदका तात्पर्य है कि अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा भगवान्का भजन करे? उनकी उपासना करे? उनके शरण हो जाय? उनके अनुकूल चले।स गुणान्समतीत्यैतान् -- जो अनन्यभावसे केवल भगवान्के ही शरण हो जाता है? उसको गुणोंका अतिक्रमण करना नहीं पड़ता? प्रत्युत भगवान्की कृपासे उसके द्वारा स्वतः गुणोंका अतिक्रमण हो जाता है (गीता 12। 67)।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- वह गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र (अधिकारी) हो जाता है। भगवान्ने जब यहाँ भक्तिकी बात बतायी है? तो फिर भगवान्को यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात न कहकर अपनी प्राप्तिकी बात बतानी चाहिये थी। परन्तु यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात बतानेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनने गुणातीत होने(निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति) का उपाय पूछा था। इसलिये भगवान्ने अपनी भक्तिको? ब्रह्मप्राप्तिका उपाय बताया।दूसरी बात? शास्त्रोंमें कहा गया है कि भगवान्की उपासना करनेवालेको ज्ञानकी भूमिकाओंकी सिद्धिके लिये दूसरा कोई साधन? प्रयत्न नहीं करना पड़ता? प्रत्युत उसके लिये ज्ञानकी भूमिकाएँ अपनेआप सिद्ध हो जाती हैं। उसी बातको लक्ष्य करके भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि अव्यभिचारी भक्तियोगसे मेरा सेवन करनेवालेको ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बननेके लिये दूसरा कोई साधन नहीं करना पड़ता? प्रत्युत वह अपनेआप ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। परन्तु वह भक्त ब्रह्मप्राप्तिमें सन्तोष नहीं करता। उसका तो यही भाव रहता है कि भगवान् कैसे प्रसन्न हों भगवान्की प्रसन्नतामें ही उसकी प्रसन्नता होती है। तात्पर्य यह निकला कि जो केवल भगवान्के ही परायण है? भगवान्में ही आकृष्ट है? उसके लिये ब्रह्मप्राप्ति स्वतःसिद्ध है। हाँ? वह ब्रह्मप्राप्तिको महत्त्व दे अथवा न दे -- यह बात दूसरी है? पर वह ब्रह्मप्राप्तिका अधिकारी स्वतः हो जाता है।तीसरी बात? जिस तत्त्वकी प्राप्ति ज्ञानयोग? कर्मयोग आदि साधनोंसे होती है? उसी तत्त्वकी प्राप्ति भक्तिसे भी होती है। साधनोंमें भेद होनेपर भी उस तत्त्वकी प्राप्तिमें कोई भेद नहीं होता। सम्बन्ध -- उपासना तो करे भगवान्की और पात्र बन जाय ब्रह्मप्राप्तिका -- यह कैसे इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.26।।प्रश्नद्वयमेवं परिहृत्य तृतीयं प्रश्नं परिहरति -- अधुनेति। मच्छब्दस्य संसारिविषयत्वं व्यावर्तयति -- ईश्वरमिति। तत्रैव नारायणशब्दान्मूर्तिभेदो व्यावर्त्यते। तस्य ताटस्थ्यं व्यवच्छिनत्ति -- सर्वेति। मुख्यामुख्याधिकारिभेदेन विकल्पः। भक्तियोगस्य यादृच्छिकत्वं व्यवच्छेत्तुमव्यभिचारेणेत्युक्तम्। तद्व्याचष्टे -- नेति। भजनं परमप्रेमा स एव युज्यतेऽनेनेति योगः। सेवते पराक्चित्ततां विना सदानुसंदधातीत्यर्थः। स भगवदनुकृतसम्यग्धीसंपन्नो विद्वाञ्जीवन्नेवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.26।।ब्रह्मभूयाय इत्यस्य परब्रह्मत्वायेति व्याख्यानं प्रमाणविरुद्धमिति भावेनान्यथा व्याचष्टे -- ब्रह्मवदिति। नात्र ब्रह्मशब्दं परं ब्रह्म? किन्तुमम योनिर्महद्ब्रह्म [14।3] इति प्रकृता प्रकृतिरेवब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहं [13।27] इत्युत्तरवाक्यात्। तद्भूयं च न तादात्म्यं? किन्तु तद्वद्भगवत्प्रियत्वमेव अन्यस्यान्यभावायोगादिति भावः। तत्किं यावत्प्रकृतेर्भगवत्प्रियत्वं तावद्गुणातीतस्येत्यतः सप्रमाणमाह -- न त्विति। तत्किं भूयशब्दः प्रियत्ववाची येनैवं व्याख्यायते इत्यत आह -- भूयायेति। भुवो भाव इति वचनाद्भावो भवनं भूयशब्दार्थः। ब्रह्मवद्भावो ब्रह्मभूयम्।वदः सुपि [अष्टा.3।1।106] इति सुबन्तमात्रस्योपपदस्यानुवृत्तेः। वत्यर्थस्य च वृत्तावन्तर्भावात्। मयूरव्यंसकादिवत्। वत्यर्थश्च प्रियत्वमिति तदुक्तमिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.26।।ब्रह्मवत्प्रकृतिवद्भगवत्प्रियत्वं ब्रह्मभूयम्। न तु तावत्प्रियत्वं? किन्तु प्रियत्वमात्रम्।बद्धा वापि तु मुक्ता वा न रमावत्प्रिया हरेः इति पाद्मे। भूयाय भवाय।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.26।। --,मां च ईश्वरं नारायणं सर्वभूतहृदयाश्रितं यो यतिः कर्मी वा अव्यभिचारेण न कदाचित् यो व्यभिचरति भक्तियोगेन भजनं भक्तिः सैव योगः तेन भक्तियोगेन सेवते? सः गुणान् समतीत्य एतान् यथोक्तान् ब्रह्मभूयाय? भवनं भूयः? ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति इत्यर्थः।।कुत एतदिति उच्यते --,
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【 Verse 14.27 】
▸ Sanskrit Sloka: ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च | शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ||
▸ Transliteration: brahmaṇo hi pratiṣṭhāham amṛtasyāvyayasya ca | śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca ||
▸ Glossary: brahmaṇaḥ: of the impersonal brahma; hi: certainly; pratiṣṭhā: the rest; aham: I am; amṛtasya: of the immortal; avyayasya: of the imperishable; ca: also; śāśvatasya: of the eternal; ca: and; dharmasya: of the rightful state; sukhasya: happiness; aikāntikasya: ultimate; ca: also.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 14.27 And I am the basis of Brahman, which is the rightful state of ultimate happiness, and which is immortal, imperishable and eternal.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।14.27।।क्योंकि ब्रह्म? अविनाशी अमृत? शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।14.27।। क्योंकि मैं अमृत? अव्यय? ब्रह्म? शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 14.27 ब्रह्मणः of Brahman? हि indeed? प्रतिष्ठा the abode? अहम् I? अमृतस्य the immortal? अव्ययस्य the immutable? च and? शाश्वतस्य everlasting? च and? धर्मस्य of Dharma? सुखस्य of bliss? एकान्तिकस्य absolute? च and.Commentary The Self Which is immortal and immutable? Which is attainable by the eternal Dharma or the knowledge of the Self? Which is unending bliss? abides in Me? the Supreme Being.,I? the innermost Self? am the abode of the Supreme Self. The aspirant beholds? with the eye of intuition? that the innermost Self is the very Supreme Self? through Selfrealisation.The Lord bestows grace and mercy on His devotees through His Sakti? energy or power? or Maya. Sakti and the Lord are one. Just as heat is inseparable from fire? so also Maya or Sakti is inseparable from the Lord. Sakti cannot be distinct from the Lord in Whom She inheres.There is another interpretation. By Brahman here is meant the Brahman with attributes or alities? the conditioned Brahman. I? the Absolute Brahman? transcending the attributes or alities? the unconditioned Absolute? am the abode of the Saguna (conditioned) Brahman Who is immortal and imperishable. I am also the abode of the eternal Dharma of Jnananishtha (establishment in the highest wisdom) and the abode of the unending bliss born of that unswerving devotion.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the fourteenth discourse entitledThe Yoga of the Division of the Three Gunas.,
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 14.27. 'I' is the place of support for the immortal and changeless Brahman and for [Its] eternal attribute, the unalloyed Happiness.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 14.27 For I am the Home of the Spirit, the continual Source of immortality, of eternal Righteousness and of infinite Joy."
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 14.27 For I am the ground of Brahman, the immortal and immutable, of eternal Dharma and of perfect bliss.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 14.27 For I am the Abode of Brahman-the indestructible and immutable, the eternal, the Dharma and absolute Bliss.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 14.27 For I am the abode of Brahman, the immortal and the immutable, of everlasting Dharma and of absolute bliss.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 14.27 Brahmanah etc. It is 'I' who is the support of the Brhaman. [For], one becomes the [very] Brahman, if 'I' is served [by him]. Otherwise if the Brahman is contemplated on - because Its nature is like that of the insentient (i.e., simply a being)-then it leads him (the seeker) to an emancipation which would simply be undistinguished from the deep sleep stage.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 14.27 The term 'hi' (for) denotes cause. I, who am to be served by unswerving Bhakti Yoga, am 'the ground of the individual self, immortal and immutable, and also of eternal Dharma,' namely, surpassing eternal prosperity and also perfect felicity, i.e., of the felicity attained by the Jnanin stated in texts such as 'Realising that Vasudeva is all' (7.19). I, being of such nature, devotion to Me helps the Jiva to transcend the Gunas. Although the expression 'eternal Dharma' is indicative of the conduct to be observed, in the given context, it means the goal to be attained; for, what follows and what precedes it, denote the goal and not conduct. The purport is this: It has been stated that seeking refuge with the Lord is the only means for transcending the Gunas and the attainment of self-realisation, prosperity and the Supreme Being in the earlier text beginning with, 'For this divine Maya of Mine consisting of the three Gunas is hard to break through, except for those who take refuge in Me alone ৷৷.' (7.14). Thus, seeking surrender to the Lord with one-pointed mind is the only means for transcending the Gunas and for the attainment of the state of brahman through that. [Here Prapatti, surrender to the Lord, is mentioned as a limb of unswerving Bhakti Yoga according to some interpreters. This is however a disputable point, as some maintain that Prapatti is in itself an independent path].
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 14.27 Hi, for; aham, I, the inmost Self; am the pratistha brahmanah, Abode-that in which something abides is pratistha-of Brahman which is the supreme Self. Of Brahman of what kind? Amrtasya, of that which is indestructible; avyayasya, of that which is immutable; and sasvatasya, of that which is eternal; dharmasya, of that which is the Dharma, realizable through the Yoga of Jnana which is called dharma (virtue); and aikantikasya sukhasya, of that which is the absolute, unfailing Bliss by nature. Since the inmost Self is the abode of the supreme Self-which by nature is immortal etc.-, therefore, through perfect Knowledge it (the former) is realized with certainty to be the supreme Self. This has been stated in, 'he alifies for becoming Brahman'. The purport is this: Indeed, that power of God through which Brahman sets out, comes forth, for the purpose of favouring the devotees, etc., that power which is Brahman Itself, am I. For, a power and the possesser of that power are non-different. Or, brahman means the conditioned Brahman, since It (too,) is referred to by that word. 'Of that Brahman, I Myself, the unconditioned Brahman-and none else-am the Abode.' (The abode of Brahman) of what alities? Of that which is immortal; of that which has the ality of deathlessness; of that which is immutable; so also, of that which is the eternal; which is the dharma having the characteristics of steadfastness in Knowledge; of that which is the absolute, unestionably certain Bliss born of that (steadfastness);-'I am the Abode' is understood.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।14.27।। भक्तियोग तथा उसके परम लक्ष्य का वर्णन करते हुये भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा था? तत्पश्चात्? तुम मुझमें ही निवास करोगे। ईश्वर के प्रति अपने प्रेम से प्रेरणा पाकर भक्त अपने भिन्न व्यक्तित्व को विस्मृत करके अपने ध्येय परमात्मा के साथ लीन हो जाता है। पूर्व के श्लोक में भगवान् ने कहा था कि अव्यभिचारी भक्तियोग से उनकी सेवा करने वाला साधक अनात्म उपाधियों के साथ के अपने तादात्म्य से शनै शनै मुक्त हो जाता है। जिस मात्रा में अहंकार समाप्त होता है? उसी मात्रा में आत्मा की दिव्यता की अभिव्यक्ति होती है। जैसेजैसे निद्रा का आवेश बढ़ता जाता है वैसेवैसे मनुष्य जाग्रत अवस्था से दूर होता हुआ निद्रा की शान्त स्थिति में लीन हाेता जाता है। अनुभव के एक स्तर को त्यागने का अर्थ ही दूसरे अनुभव में प्रवेश करना है।मैं ब्रह्म की प्रतिष्ठा हूँ जो चैतन्य साधक के हृदय में आत्माभाव से स्थित है? वही सर्वत्र समान रूप से व्याप्त अमृत? अव्यय? नित्य? आनन्दस्वरूप तत्त्व ब्रह्म है। आत्मा की पहिचान ही विश्वाधिष्ठान अनन्त ब्रह्म की अनुभूति है। घट उपाधि की दृष्टि से उससे अवच्छिन्न आकाश (घटाकाश) बाह्य सर्वव्यापी आकाश से भिन्न प्रतीत होता है? परन्तु उपाधि के अभाव में वह घटाकाश ही महाकाश बन जाता है। इसी प्रकार एक देह की उपाधि से चैतन्य तत्त्व को आत्मा कहते हैं? किन्तु वस्तुत वही अनन्त ब्रह्म है। यह ब्रह्म अमृत और अव्यय? नित्य और आनन्दस्वरूप है।श्री शंकाराचार्य अपने अत्यन्त युक्तियुक्त एवं विश्लेषणात्मक भाष्य में इस श्लोक की व्याख्या में चार पर्यायों की ओर संकेत करते हैं। ये अर्थ परस्पर भिन्न नहीं? वरन् प्रत्येक अर्थ इस श्लोक के दार्शनिक पक्ष को अधिकाधिक उजागर करता है। वे कहते हैं प्रतिष्ठा का अर्थ है जिसमें वस्तु की स्थिति होती है? क्योंकि अमृत और अव्यय ब्रह्म की प्रतिष्ठा मैं हूँ? अत मैं प्रत्यगात्मा हूँ। यह प्रत्यागात्मा ही परमात्मा अर्थात् भूत मात्र की आत्मा है? ऐसा सम्यक् ज्ञान से निश्चित किया गया है।जिस शक्ति से ब्रह्म अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये प्रवृत्त होता है? वह शक्ति ब्रह्म ही है? जो मैं हूँ। यहाँ शक्ति शब्द से शक्तिमान ईश्वर लक्षित है। इसका अभिप्राय यह है कि निर्गुण ब्रह्म ही माया शक्ति के द्वारा ईश्वर के रूप में भक्तों पर अनुग्रह करता है।अथवा? ब्रह्म शब्द से सगुण? सोपाधिक ब्रह्म कहा गया है? जिसकी प्रतिष्ठा निरुपाधिक ब्रह्म मैं ही हूँ। जैसा कि पहले कहा गया है? इन अर्थों में परस्पर भेद नहीं है। हमारी बुद्धि की सीमित क्षमता के द्वारा सोपाधिक ब्रह्म को ही समझा जा सकता है तथा वाणी के द्वारा प्रकृति से भिन्न रूप में उसका वर्णन किया जा सकता है।प्रकृति और सोपाधिक ब्रह्म की प्रतिष्ठा निरुपाधिक चैतन्य ब्रह्म है? जो इन दोनों को ही प्रकाशित करता है। अत वस्तुत निर्विकल्प? अमृत? अव्यय? अनिर्वचनीय आनन्दस्वरूप ब्रह्म मैं हूँ। अब यह स्पष्ट हो जाता है कि साधन सपन्न उत्तम अधिकारी भगवान् श्रीकृष्ण के कथनानुसार मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है? और मैं ब्रह्म हूँ? इसलिये वह साधक ब्रह्म ही बन जाता है।अगले अध्याय में ब्रह्म के विषय में और अधिक विस्तृत निरूपण किया गया है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे।श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।14.27।।योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन मां सेवते स गुणान्समतीत्य ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यत्र हेतुमाह -- ब्रह्मणो हीति। हि यस्माद्ब्रह्मणः परमात्मनोऽहं प्रत्यगात्मा प्रतिष्ठा प्रतितिष्ठत्यस्मिन्नति प्रतिष्ठा यत् ब्रह्म प्रत्यगात्मनि प्रतितिष्ठति। तद्विशिनष्टि। अमृतस्याविनाशिनः अव्ययस्याविकारिणः। शाश्वतस्य नित्यस्यापक्षयरहितस्य। तेन न पौनरुक्त्यम्। धर्मस्य,धर्मज्ञानस्येत्यर्थः। सुखस्य ज्ञानयोगधर्मप्राप्यस्यानन्दरुपस्येन्द्रियसंबन्धोत्थं सुखं व्यावर्थयितुमाह। एकान्तिस्याव्यभिचारिणः। अमृतादिस्वभावस्य परमात्मनः प्रत्यगात्मा प्रतिष्ठा यस्मात्तस्मात्सभ्यग्ज्ञानेन स परमात्मेति निश्चीयते तदेतब्रह्म भूयाय कल्पते इत्युक्तं। यया चेश्वरशक्त्या भक्तानुग्रहादिप्रयोजनाय ब्रह्म प्रवर्तते सा शक्तिः ब्रह्मैवाहं शक्तिशक्तिमतोरभेदादित्यभिप्रायः। यद्वा ब्रह्मशब्दवाच्यत्वात्सविकल्पकं ब्रह्म ब्रह्मशब्देनाभिधीयते तस्य ब्रह्मणे निर्विकल्पोऽहमवाच्यः प्रतिष्ठाश्रयः। सविकल्पकं ब्रह्म विशिनष्टि। अमृतस्य मरणधर्मरहितस्याव्ययस्य व्ययरहितस्य किंच शाश्वतस्यच नित्यस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य सुखस्य च जनितस्यैकान्तिस्यैकान्तनियतस्य च प्रतिष्ठाहं इति वर्तते। अतो मत्सेवया युक्तैव ब्रह्मभावप्राप्तिरित्यर्थः। हि यस्माद्ब्रह्मणोऽहं प्रतिष्ठा प्रतिमास्थानिभूतं यथा घनीभूतप्रकाश एव सूर्यमण्डलं तद्वदित्यर्थः। तथाव्यस्यामृतस्य नित्यस्य मोक्षस्य नित्यमुक्त्वात्। तथा तत्साधनस्य शाश्वतस्य च धर्मस्य शुद्धसत्त्वात्मकत्वात्। तथैकान्तिकस्य सुखस्य च प्रतिष्ठाहं परमानन्दरुपत्वात् इत्यपरे। तथा तत्साधनस्य शाश्वतस्य च धर्मस्य शुद्धसत्त्वात्मकत्वात्। तथैकान्तिकस्य सुखस्य च प्रतिष्ठाहं परमानन्दरुपत्वात् इत्यपरे। त्वद्भक्तस्त्वद्भावमाप्नोतुनाम कथंतु ब्रह्मभावाय कल्पते ब्रह्मणः सकाशात्तवान्यत्वादिति तत्राह। ब्राह्मणः परमात्मनः प्रतिष्ठा पर्याप्तिरहमेव नतु मद्भिन्नं ब्रह्मेत्यर्थः। तथामृतस्याव्ययस्य प्रतिष्ठाहमेव मय्येव मोक्षः पर्यवसितः। मत्प्राप्तिरेव मोक्ष इत्यर्थः। तथा शाश्वतस्य नित्यस्य मोक्षफलस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य च पर्याप्तिरहमेव। ज्ञाननिष्ठालक्षणो धर्मो मय्येव पर्यवसितस्ततो न तेन मद्भिन्नं किंचित्प्राप्यमित्यर्थः। तथामृतस्याव्ययस्य प्रतिष्ठाहमेव मय्येव मोक्षः पर्यवसितः। मत्प्राप्तिरेव मोक्ष इत्यर्थः। तथा शाश्वतस्य नित्यस्य मोक्षफलस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य च पर्याप्तिरहमेव। ज्ञाननिष्ठालक्षणो धर्मो मय्येव पर्यवसितस्ततो न तेन मद्भिन्नं नित्यस्य मोक्षफलस्य ध्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य च पर्याप्तिरहमेव। ज्ञाननिष्ठालक्षणो धर्मो मय्येव पर्यवसितस्ततो न तेन मद्भिन्नं किंचित्प्राप्यमित्यर्थः। तथा ऐसान्तिकस्य सुखस्य च पर्याप्तिरहमेव परमानन्दत्वात्। न मद्भिन्नं किंचित्सुखं प्राप्यमस्तीत्यर्थः। इति केचित्। अन्ये तु वासिष्ठोक्तं ज्ञानभूमिसप्तकं प्रखाशमित्यादिश्लोकैर्दर्शयन्ति। तथाहिज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा समुदाहृता। विचारणा द्वितीया तु तृतीया तनुमानसा। सत्त्वपात्तिश्चतुर्थी स्यात्ततो संसक्तिनामिका। पदार्थाभाविनी षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता इति। तत्र यथोक्तसाधनसंपन्मुमुक्षुता प्रथमा? श्रवणगननविचारात्मिका द्वितीया? निदिध्यासनरुपा तृतीया? एताः साधनभूमयः। ब्रह्मसाक्षात्काररुपा चतुर्थी फलभूता। अस्यां योगी कृतार्थोऽपि जीवन्मुक्तिसुखं पुष्कलं नानुभवति। परास्तिन्नो जीवन्मुक्तेरवान्तरभेदाः। तत्रापि पञ्चम्यामसंसक्तिनामिकायां स्थितो योगी ब्रह्मविद्वरः स्वयमेवोत्तिष्ठते। षष्ठ्यां पदार्थाभाविन्यां स्थितो ब्रह्मविद्वरीयान् परप्रयत्नेन व्युत्तिष्ठते। सप्तम्यां तुर्यगायां ब्रह्मविद्वरिष्ठः न स्वतः परतो वा व्युत्तिष्ठति। तत्र नित्यसमाधिर्स्थोत्यभूमिगः प्रकाशमिति श्लोकेनोक्तः। उदासीन इत्यनेनोपान्त्यभूमिगः समदुःखसुखः इति पञ्चम्यां स्थितो मानापमानयोरिति चतुर्थ्यां मां चेति तृतीयायां स्थितो योगी उक्तः। विषयप्रदर्शनद्वाराऽमृतसाधनस्याव्ययस्यानादित्वादनन्तत्वाच्चपौरुषेत्वेनाप्रामाण्यशङ्काकलङ्कशून्यस्य स्वतःप्रमाणभूतस्येत्यर्थः। एतेनोपक्रमोपसंहारदितात्पर्यालोचनया वेदाविरुद्धतर्कोपकरणया कृत्स्त्रस्य वेदस्य तात्पर्यप्रदर्शनकामेन निर्णेतव्यमिति विचारणाख्या द्वितीया भूमिरुक्ता। हेतुफलोपदर्शनमुखेन शुभेच्छाख्यां प्रथमां भूमिमाह -- शाश्वतस्येति। काम्यधर्मवत्फलदानेन नाशाभावात्। भगवत्यर्पितो नित्यो धर्मः शाश्वतः। विवितषादिपारंपर्येण मोक्षाख्यशास्वतफलत्वात्। तस्य च प्रतिष्ठा परमं प्राप्यमहमेव। तथा सुखस्यैकान्तिकस्य मोक्षसुखस्य च प्रतिष्ठा अहमेव। सेयं प्रथमा भूमिरुक्ता। अत्र परां परां भूमिमारोढुमशक्तस्य पूर्वो पूर्वा भूमिरुपदिश्यते इति तदेतद्यत्किंचित्कल्पनं सर्वज्ञानां मार्गप्रदर्शकानामाचार्याणां न शोभतेऽत एतदनुक्त्या तेषां न्यूनता नापादनीया। तदनेन चतुर्दशाध्यायेन सर्वमुत्पद्यमानं क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगाद्यथोत्पद्यते यस्मिन्गुणे च यथा सङ्ग ये वा गुणाः यथा वा बध्नन्ति गणेभ्यश्च मोक्षणं यथा स्यात् मुक्तस्य च यल्लक्षणं तत्सर्वं प्रतिपादयता तत्त्ववित्प्राप्तयं प्रत्यगभिन्नं ब्रह्म प्रदर्शितम्।इति श्रीमत्परमहंस0 श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां चतुर्दशोऽध्यायः।।14।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।14.27।।अत्र हेतुमाह -- ब्रह्मणस्तत्पदवाच्यस्य सोपाधिकस्य जगदुत्पत्तिस्थितिलयहेतोः प्रतिष्ठा पारमार्थिकं निर्विकल्पकं सच्चिदानन्दात्मकं निरुपाधिकं तत्पदलक्ष्यमहं निर्विकल्पको वासुदेवः प्रतितिष्ठत्यत्रेति प्रतिष्ठा कल्पितरूपरहितमकल्पितं रूपमतो यो मामनुपाधिकं ब्रह्म सेवते स ब्रह्मभूयाय कल्पत इति युक्तमेव। कीदृशस्य ब्रह्मणः प्रतिष्ठाहमित्याकाङ्क्षायां विशेषणानि। अमृतस्य विनाशरहितस्य अव्ययस्य विपरिणामरहितस्य च शाश्वतस्यापक्षयरहितस्य च धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणधर्मप्राप्यस्य सुखस्य परमानन्दरूपस्य। सुखस्य विषयेन्द्रियसंयोगजत्वं वारयति -- ऐकान्तिकस्याव्यभिचारिणः सर्वस्मिन्देशे काले च विद्यमानस्य। ऐकान्तिकसुखरूपस्येत्यर्थः। एतादृशस्य ब्रह्मणो यस्मादहं वास्तवं स्वरूपं तस्मान्मद्भक्तः संसारान्मुच्यत इति भावः। तथाचोक्तं ब्रह्मणा भगवन्तं श्रीकृष्णंप्रतिएकस्त्वमात्मा पुरुषः पुराणः सत्यः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः। नित्योऽक्षरोजस्रसुखो निरञ्जनः पूर्णोऽद्वयो मुक्त उपाधितोऽमृतः इति. सर्वोपाधिशून्य आत्मा ब्रह्म त्वमित्यर्थः। शुकेनापि स्तुतिमन्तरेणैवोक्तंसर्वेषामेव वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान्कृष्णाः किमतद्वस्तु रूप्यताम् इति। सर्वेषामेव कार्यवस्तूनां भावार्थः सत्तारूपः परमार्थो भवति कार्याकारेण जायमाने सोपाधिके ब्रह्मणि स्थितः कारणसत्तातिरिक्तायाः कार्यसत्ताया अनभ्युपगमात्। तस्यापि भवतः कारणस्य सोपाधिकस्य ब्रह्मणो भावार्थः सत्तारूपोऽर्थो भगवान्कृष्णः सोपाधिकस्य निरुपाधिके कल्पितत्वात्? कल्पितस्य चाधिष्ठानानतिरेकाद्भगवतः कृष्णस्य च सर्वकल्पनाधिष्ठानत्वेन परमार्थसत्यनिरुपाधिब्रह्मरूपत्वात्। अतः किमतद्वस्तु तस्माच्छ्रीकृष्णादन्यद्वस्तु पारमार्थिकं किं निरूप्यताम्। तदेवैकं पारमार्थिकं नान्यत्किमपीत्यर्थः। तदेतदिहाप्युक्तं ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहमिति। अथवा त्वद्भक्तस्त्वद्भावमाप्नोतु नाम कथं नु ब्रह्मभावाय कल्पते। ब्रह्मणः सकाशात्तवान्यत्वादित्याशङ्क्याह -- ब्रह्मणः परमात्मनः प्रतिष्ठा पर्याप्तिरहमेव नतु मद्भिन्नं ब्रह्मेत्यर्थः। तथामृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य चाव्ययस्य सर्वथानुच्छेद्यस्य च प्रतिष्ठाहमेव। मय्येव मोक्षः पर्यवसितो मत्प्राप्तिरेव मोक्ष इत्यर्थः। तथा शाश्वतस्य नित्यमोक्षफलस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य च पर्याप्तिरहमेव। ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य पर्याप्तिरेव मोक्ष इत्यर्थः। ज्ञाननिष्ठालक्षणो धर्मो मय्येव पर्यवसितो न तेन मद्भिन्नं किंचित्प्राप्यमित्यर्थः। तथैकान्तिकस्य सुखस्य च पर्याप्तिरहमेव परमानन्दरूपत्वान्न मद्भिन्नं किंचित्सुखं प्राप्यमस्तीत्यर्थः। तस्माद्युक्तमेवोक्तं मद्भक्तो ब्रह्मभूयाय कल्पत इति।पराकृतनमद्बन्धं परं ब्रह्म नराकृति। सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं महः।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।14.27।।विषयप्रदर्शनद्वारा विचारणाख्यां द्वितीयां भूमिमाह -- ब्रह्मणो हीति। ब्रह्मणो वेदस्य प्रतिष्ठा तात्पर्येण पर्यवसानस्थानमहमेव। अमृतस्य कर्मब्रह्मोभयदर्शनद्वाराऽमृतसाधनस्य। अव्ययस्य अनादित्वादनन्तत्वाच्चापौरुषेयत्वेनाप्रामाण्यशङ्काकलङ्कशून्यस्य। स्वतःप्रमाणभूतस्येत्यर्थः। एतेनोपक्रमोपसंहारादिपर्यालोचनया वेदाविरुद्धतर्कोपकरणया कृत्स्नस्य वेदस्य तात्पर्यं मद्दर्शनकामेन निर्णेतव्यमिति विचारणाख्या द्वितीया भूमिरुक्ता। हेतुफलोपदर्शनमुखेन शुभेच्छाख्यां प्रथमां भूमिमाह -- शाश्वतस्येति। काम्यधर्मवत्फलदानेन नाशाभावात् भगवत्यर्पितो नित्यो धर्मः शाश्वतः। विविदिषादिपारम्पर्येण मोक्षाख्यशाश्वतफलहेतुत्वात्। शाश्वतस्य च धर्मस्य प्रतिष्ठा परमं प्राप्यं फलमहमेव। तथा ऐकान्तिकं विषयसङ्गजन्यसुखव्यभिचारि स्वरूपभूतं मोक्षसुखं तस्यापि प्रतिष्ठा पराकाष्ठा अहमेव। एवं निष्कामधर्मेण विशुद्धचित्तस्यैकान्तिकसुखेच्छा भवति सेयं शुभेच्छाख्या प्रथमा भूमिः। अत्र परां परां भूमिमारोढुमशक्तस्य पूर्वा पूर्वा भूमिरुपदिश्यते। यथा ध्यानेनात्मनि पश्यन्तीत्यत्र निदिध्यासनाशक्तस्य सांख्यनामा विचारस्तत्राप्यशक्तस्य कर्मयोग उपदिश्यते तद्वत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।14.27।।ब्रह्मशब्दस्याऽक्षरवाचकत्वे तद्भावे धर्मात्मकभाव एव भविष्यति? न मुख्यभाव इत्यत आह -- ब्रह्मण इति। हीति निश्चयेन यस्माद्धेतोः ब्रह्मणः अक्षरात्मकस्यापि प्रतिष्ठा स्थितिरूपोऽहमेव? अमृतस्य मोक्षस्य? अव्ययस्य नित्यात्मकवैकुण्ठस्यापि? शाश्वतस्य नित्यरूपस्य? शास्त्रीयभक्त्यादिरूपस्य धर्मस्य च। च पुनः। तथा एकान्तिकस्य रक्षात्मकस्य भावादिरूपस्य सुखस्याऽहं प्रतिष्ठा? मूलमित्यर्थः। अतएवमेतैरुत्पन्नो भावो मदात्मक एवेति भावः।एवं चतुर्दशेऽध्याये गुणानां स्वस्वरूपताम्।द्विरूपतां च क्रीडार्थं प्रोक्तवानर्जुनं हरिः।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।14.27।।तत्र हेतुमाह -- ब्रह्मणो हीति। हि यस्माद्ब्रह्मणोऽहं प्रतिष्ठा प्रतिमा? घनीभूतं ब्रह्मैवाहम्। यथा घनीभूतः प्रकाश एव सूर्यमण्डर्ल तद्वदेवेत्यर्थः। तथाव्ययस्य नित्यस्यामृतस्य मोक्षस्य च नित्यमुक्तत्वात्। तथा तत्साधनस्य शाश्वतस्य च धर्मस्य? शुद्धसत्त्वात्मकत्वात्। तथा ऐकान्तिकस्याखण्डितस्य सुखस्य च प्रतिष्ठाऽहं? परमानन्दैकरूपत्वात्। अतो मत्सेविनो मद्भावस्यावश्यंभावित्वाद्युक्तमेवोक्तं ब्रह्मभूयाय कल्पत इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।14.27।।ब्रह्मभूयाय [14।26] इत्यादौ तत्र तत्र च निर्दिष्टानां ब्रह्मामृतधर्मसुखानां सर्वेषामभिन्न आश्रयोऽहमेवेत्याशयेन स्वस्य परत्वमाह -- ब्रह्मणो हीति। अक्षरस्य द्युभ्वाद्यायतनस्य ब्रह्मणोऽहं प्रतिष्ठा मूलस्थानं? तद्येन प्रतिष्ठितं वा सोऽहं ऐश्वर्यधामत्वात्तस्येत्यर्थः। अमृतस्य मोक्षस्य ब्रह्मानन्दस्याव्ययस्य च प्रतिष्ठाऽहं? तथा शाश्वतस्य सनातनस्य भगवद्धर्मस्य मोक्षार्थस्य तथैकान्तिकस्य भजनानन्दस्यागणितस्वरूपस्य क्षराक्षरातीतमत्स्वरूपात्मकस्याहमभिन्न आश्रयः? प्रतिष्ठा? तत्तत्पदैरहमेव तत्तदधिकारिणां तत्तद्भावनाविषयो वाच्यप्राप्य इत्यर्थः। एवं साङ्ख्यविवृतं स्वतात्पर्यवृत्त्येति ज्ञेयम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।14.27।।ऐसा क्यों होता है सो बतलाते हैं --, क्योंकि ब्रह्म -- परमात्माकी प्रतिष्ठा मैं हूँ। जिसमें प्रतिष्ठित हो वह प्रतिष्ठा है? इस व्युत्पत्तिके अनुसार मैं अन्तरात्मा ( ब्रह्मकी ) प्रतिष्ठा हूँ। कैसे ब्रह्मकी ( सो कहते हैं -- ) जो अमृत -- अविनाशी? अव्यय -- निर्विकार? शाश्वत -- नित्य? धर्मस्वरूप -- ज्ञानयोगरूप धर्मद्वारा प्राप्तव्य और ऐकान्तिक सुखस्वरूप अर्थात् व्यभिचाररहित आनन्दमय है उस ब्रह्मकी मैं प्रतिष्ठा हूँ। अमृत आदि स्वभाववाले परमात्माकी प्रतिष्ठा अन्तरात्मा ही है क्योंकि यथार्थ ज्ञानसे वही परमात्मारूपसे निश्चित होता है। यही बात ब्रह्मभूयाय कल्पते इस पदसे कही गयी है। अभिप्राय यह है कि जिस ईश्वरीय शक्तिसे भक्तोंपर अनुग्रह आदि करनेके लिये ब्रह्म प्रवर्तित होता है? वह शक्ति? मैं ब्रह्म ही हूँ क्योंकि शक्ति और शक्तिमान्में भेद नहीं होता। अथवा ( ऐसा समझना चाहिये कि ) ब्रह्मशब्दका वाच्य होनेके कारण यहाँ सगुण ब्रह्मका ग्रहण है? उस सगुण ब्रह्मका मैं निर्विकल्प -- निर्गुण ब्रह्म ही प्रतिष्ठा -- आश्रय हूँ? दूसरा कोई नहीं। किन विशेषणोंसे युक्त सगुण ब्रह्मका जो अमृत अर्थात् मरणधर्मसे रहित है और अविनाशी अर्थात् क्षय होनेसे रहित है? उसका। तथा ज्ञाननिष्ठारूप शाश्वतनित्य धर्मका और उससे होनेवाले ऐकान्तिक एकमात्र निश्चित परम आनन्दका भी? मैं ही आश्रय हूँ। अहं प्रतिष्ठा यह पद यहाँ अनुवृत्तिसे लिया गया है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।14.27।। व्याख्या -- ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम् -- मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा? आश्रय हूँ -- ऐसा कहनेका तात्पर्य ब्रह्मसे अपनी अभिन्नता बतानेमें है। जैसे जलती हुई अग्नि साकार है और काष्ठ आदिमें रहनेवाली अग्नि निराकार है -- ये अग्निके दो रूप हैं? पर तत्त्वतः अग्नि एक ही है। ऐसे ही भगवान् साकाररूपसे हैं और ब्रह्म निराकररूपसे है -- ये दो रूप साधकोंकी उपासनाकी दृष्टिसे हैं? पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं? दो नहीं। जैसे भोजनमें एक सुगन्ध होती है और एक स्वाद होता है नासिकाकी दृष्टिसे सुगन्ध होती है और रसनाकी दृष्टिसे स्वाद होता है? पर भोजन तो एक ही है। ऐसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे ब्रह्म है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् हैं? पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं।भगवान् कृष्ण अलग हैं और ब्रह्म अलग है -- यह भेद नहीं है किन्तु भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही भगवान् कृष्ण है। गीतामें भगवान्ने अपने लिये ब्रह्म शब्दका भी प्रयोग किया है -- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि (5। 10) और अपनेको अव्यक्तमूर्ति भी कहा है -- मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना (9। 4)। तात्पर्य है कि साकार और निराकार एक ही हैं? दो नहीं।अमृतस्याव्ययस्य च -- अविनाशी अमृतका अधिष्ठान मैं ही हूँ और मेरा ही अधिष्ठान अविनाशी अमृत है। तात्पर्य है कि अविनाशी अमृत और मैं -- ये दो तत्त्व नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं। इसी अविनाशी अमृतकी प्राप्तिको भगवान्ने अमृतमश्नुते (13। 12 14। 20) पदसे कहा है।शाश्वतस्य च धर्मस्य -- सनातन धर्मका आधार मैं हूँ और मेरा आधार सनातन धर्म है। तात्पर्य है कि सनातन धर्म और मैं -- ये दो नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं। सनातन धर्म मेरा ही स्वरूप है (टिप्पणी प0 738)। गीतामें अर्जुनने भगवान्को शाश्वतधर्मका गोप्ता (रक्षक) बताया है (11। 18)। भगवान् भी अवतार लेकर सनातन धर्मकी रक्षा किया करते हैं (4। 8)।सुखस्यैकान्तिकस्य च -- ऐकान्तिक सुखका आधार मैं हूँ और मेरा आधार ऐकान्तिक सुख है अर्थात् मेरा ही स्वरूप ऐकान्तिक सुख है। भगवान्ने इसी ऐकान्तिक सुखको अक्षय सुख (5। 21)? आत्यन्तिक सुख (6। 21) और अत्यन्त सुख (6। 28) नामसे कहा है।इस श्लोकमें ब्रह्मणः? अमृतस्य आदि पदोंमें राहोः शिरः की तरह अभिन्नतामें षष्ठी विभक्तिका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि राहुका सिर -- ऐसा जो प्रयोग होता है? उसमें राहु अलग है और सिर अलग है -- ऐसी बात नहीं है? प्रत्युत राहुका नाम ही सिर है और सिरका नाम ही राहु है। ऐसे ही यहाँ ब्रह्म? अविनाशी अमृत आदि ही भगवान् कृष्ण हैं और भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म? अविनाशी अमृत आदि हैं।ब्रह्म कहो? चाहे कृष्ण कहो? और कृष्ण कहो? चाहे ब्रह्म कहो अविनाशी अमृत कहो? चाहे कृष्ण कहो? और कृष्ण कहो चाहे अविनाशी अमृत कहो शाश्वत धर्म कहो? चाहे कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे शाश्वत धर्म कहो ऐकान्तिक सुख कहो चाहे कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे ऐकान्तिक सुख कहो एक ही बात है। इसमें कोई आधारआधेय भाव नहीं है? एक ही तत्त्व है। इसलिये भगवान्की उपासना करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है -- यह बात ठीक ही है।इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।14।।,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।14.27।।विद्वान् ब्रह्मैवेत्यत्र हेतुं पृच्छति -- कुत इति। तत्रोत्तरमाह -- उच्यत इति। ब्रह्मशब्दस्यासति बाधके मुख्यार्थग्रहणमभिप्रेत्याह -- परमात्मन इति। तं प्रति प्रत्यगात्मनो यत्प्रतिष्ठात्वं तदुपपादयति -- प्रतितिष्ठतीति। यद्ब्रह्म प्रत्यगात्मनि प्रतितिष्ठति तत्किंविशेषणमित्यपेक्षायामुक्तम् -- अमृतस्येत्यादि। तत्रामृतशब्देनाव्ययशब्दस्य पुनरुक्तिं परिहरति -- अविकारिण इति। नित्यत्वमपक्षयराहित्यं तेन पूर्वाभ्यामपौनरुक्त्यम्। प्रसिद्धार्थस्य धर्मशब्दस्य ब्रह्मण्यनुपपत्तिमाशङ्क्याह -- ज्ञानेति। अर्थेन्द्रियसंबन्धोत्थं सुखं व्यावर्तयितुमैकान्तिकस्येत्युक्तम्। अक्षरार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह -- अमृतादीति। प्रतिष्ठा यस्मादिति पूर्वेण संबन्धः। तस्मात्प्रत्यगात्मा परमात्मतया निश्चीयते सम्यग्ज्ञानेनेति योजना। अस्य श्लोकस्य पूर्वश्लोकेनैकवाक्यतामाह -- तदेतदिति। विवक्षितं वाक्यार्थं प्रपञ्चयति -- ययेति। सा शक्तिर्ब्रह्मैवेति कथं सामानाधिकरण्यं तत्राह -- शक्तीति। व्याख्यानान्तरमाह -- अथवेति। विशेषणानि पूर्ववदपौनरुक्त्यानि नेतव्यानि। तदनेनाध्यायेन क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्य संसारकारणत्वं पञ्चप्रश्ननिरूपणद्वारेण च सम्यग्ज्ञानस्य सकलसंसारनिवर्तकत्वमित्येतदुपपादयता मुमुक्षोर्यत्नसाध्यं गुणैरचाल्यत्वादि मुक्तस्यायत्नसिद्धं लक्षणमिति निर्धारितम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दगिरिकृतौचतुर्दशोऽध्यायः।।14।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।14.27।।ब्रह्मणो हि इत्येतत्परब्रह्मणो हि इति व्याचक्षते (शां.) तदसत्? प्रतिष्ठाऽहमिति वचनात्। उपचारोऽसाविति चेत्? न मुख्ये सम्भवति तदुपादानायोगादिति भावेनाह -- ब्रह्मण इति। मायेति प्रकृता महालक्ष्मीः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।14.27।।ब्रह्मण इति। ब्रह्मणो मायायाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।14.27।। --,ब्रह्मणः परमात्मनः हि यस्मात् प्रतिष्ठा अहं प्रतितिष्ठति अस्मिन् इति प्रतिष्ठा अहं प्रत्यगात्मा। कीदृशस्य ब्रह्मणः अमृतस्य,अविनाशिनः अव्ययस्य अविकारिणः शाश्वतस्य च नित्यस्य धर्मस्य धर्मज्ञानस्य ज्ञानयोगधर्मप्राप्यस्य सुखस्य आनन्दरूपस्य ऐकान्तिकस्य अव्यभिचारिणः अमृतादिस्वभावस्य परमानन्दरूपस्य परमात्मनः प्रत्यगात्मा प्रतिष्ठा? सम्यग्ज्ञानेन परमात्मतया निश्चीयते। तदेतत् ब्रह्मभूयाय कल्पते (गीता 14।26) इति उक्तम्। यया च ईश्वरशक्त्या भक्तानुग्रहादिप्रयोजनाय ब्रह्म प्रतिष्ठते प्रवर्तते? सा शक्तिः ब्रह्मैव अहम्? शक्तिशक्तिमतोः अनन्यत्वात् इत्यभिप्रायः। अथवा? ब्रह्मशब्दवाच्यत्वात् सविकल्पकं ब्रह्म। तस्य ब्रह्मणो निर्विकल्पकः अहमेव नान्यः प्रतिष्ठा आश्रयः। किंविशिष्टस्य अमृतस्य अमरणधर्मकस्य अव्ययस्य व्ययरहितस्य। किं च? शाश्वतस्य च नित्यस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य सुखस्य तज्जनितस्य ऐकान्तिकस्य एकान्तनियतस्य च? प्रतिष्ठा अहम् इति वर्तते।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य,श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येचतुर्दशोऽध्यायः।।