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18. Bhagavad Gita — Chapter 18

Chapter 18 (Part 1)

【 Verse 18.1 】

▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | सन्न्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् | त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ||

▸ Transliteration: arjuna uvāca | sannyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum | tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthak keśiniṣūdana ||

▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna says; sannyāsasya: monkhood; mahābāho: O might- yarmed one; tattvaṁ: truth; icchāmi: I wish; veditum: to understand; tyāgasya: of renunciation; ca: also; hṛṣīkeśa : O master of the senses; pṛthak: differently; keśiniṣūdana: O killer of the Kesi demon

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.1 O mighty armed Kṛṣṇa, I wish to understand what is the essence, tattva of renunciation, tyāga and the renounced order of life, sannyāsa, and the difference between the two, O Hriśikeṣa, O Killer of the demon Keśī.’

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.1।।(टिप्पणी प0 868) अर्जुन बोले -- हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.1।। अर्जुन ने कहा -- हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशनिषूदन मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्पृथक् जानना चाहता हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.1 संन्यासस्य of renunciation? महाबाहो O mightyarmed? तत्त्वम् the essence of truth? इच्छामि (I) wish? वेदितुम् to know? त्यागस्य of Tyaga or abandonment? च and? हृषीकेशः O Krishna? पृथक् severally? केशिनिषूदन् slayer of Kesi.Commentary The teaching of the whole of the GitaSastra is summed up beautifully in this discourse. This last discourse is a brief masterly summary of all that is told in the previous chapters. Arjuna wishes to know the distinction between Sannyasa and Tyaga.Kesi was an Asura whom Lord Krishna slew. So? Lord Krishna is addressed as Kesinishudana by Arjuna.The words Sannyasa and Tyaga have been used here and there in the preceding discourses? but their connotations are not lucidly distinguished. Therefore Lord Krishna clearly explains to Arjuna the right significance of the two terms in the following verse.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.1. Arjuna said O Mighty-armed ! I desire to know severally the distinctive nature of renunciation and of relinishment, O Hrsikesa ! O Slayer of Kesin !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.1 "Arjuna asked: O mighty One! I desire to know how relinquishment is distinguished from renunciation.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.1 Arjuna said I desire to know the truth about renunciation (Sannyasa) and abnegation (Tyaga) severally, O Krsna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.1 Arjuna said O mighty-armed Hrsikesa, O slayer of (the demon) Kesi, I want to know serverally the truth about sannyasa as also about tyaga.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.1 Arjuna said I desire to know severally, O mighty-armed, the essence or truth of renunciation, O Hrishikesa, as also of abandonment, O slayer of Kesi.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.1 Samnyasaya etc. It has been delcared earlier that 'He [alone] is a man of relinishment and is also a man of wisdom' (II, 50); and 'He [alone] is a man of renunciation and a man of Yoga; but not he who remains without his fires (VI, 1)', and so on. Thus, becuase a man of relinishment and a man of renunciation are both found mentioned, now arises this estion from a person (Arjuna) who is desirous of understanding their difference. Now [by giving] the answer -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.1 Arjuna said Both Sannyasa and Tyaga as a means for release are enjoined in such Srutis: 'Not by rituals, nor by progeny, nor by rituals, nor by progeny, nor by wealth but by Tyaga alone do some attain immortality ৷৷.' (Ma. Na., 5.14). Ascertaining the truth about the Supreme Reality from a knowledge of Vedanta, and becoming purified in mind by the means of Sannyasa Yoga, these Yatis (ascetics), at the dissolution of their bodies, attain the Lord who is higher than the freed selves and become liberated from bondage' (Man. U., 3.2.6). I want to know separately the truth, viz., whether Tyaga and Sannyasa are synonymous or not.

The import is this. Do these two terms Sannyasa and Tyaga have different meanings or do they signify the same thing? If they signify different things, I want to know their different natures. If they are synonymous, their identical nature should be elucidated.

Then, in order to prove that the nature of both is identical and that it is such and such, the Lord explains, showing the disagreements among some disputants:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.1 O mighty-armed Hrsikesa, kesi-nisudana, O slayer of (the demon) Kesi; icchami, I want; veditum, to know; prthak, severally, through their mutual distinctions; tattvam, the truth, the intrinsic nature, i.e. the real meaning; sannyasasya, of sannyasa, i.e. the meaning of the word sannyasa, ca, as also; tyagasya, of tyaga, i.e. the meaning of the word tyaga. Kesi was a demon who had assumed the form of a horse, and Lord Vasudeva had killed him. Hence He is addressed by that name (Kesi-nisudana) by Arjuna. The word sannyasa and tyaga, used in various places in the preceding chapters, are not explicit in their implications. Therefore, in order to determine them for Arjuna who had put the estion,-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.1।। यद्यपि अर्जुन की जिज्ञासा शैक्षणिक रुचि की है? तथापि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण गम्भीरता के साथ उसका उत्तर देते हैं। जब शिष्य अपना सन्देह या जिज्ञासा प्रकट करता है? तब निश्चय ही वह स्वयं अपनी कठिनाई नहीं जान पाता है। अत गुरु का यह कर्तव्य हो जाता है कि शिष्य की कठिनाई को समझकर उसका समाधान करे। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का यही प्रयत्न है।यह सम्पूर्ण अध्याय त्याग और संन्यास के अर्थ के चारों ओर घूमता रहता है। त्याग के बिना संन्यास अनाकलनीय है? असम्भव है? और यदि कोई ऐसा प्रयत्न करता है? तो उसका संन्यास केवल पाखण्ड ही कहा जायेगा। यह अध्याय हमारी उन वासनाओं? प्रवृत्तियों? उद्देश्यों आदि का वर्णन करता है? जो सर्वथा त्याज्य है। इनके ज्ञान से अवांछनीय गुणों का वास्तविक त्याग संभव हो सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर इस अध्याय का अध्ययन करना चाहिए? अन्यथा? निश्चय ही? यह हमें प्रभावित नहीं कर पायेगा।केशनिषूदन केशि नामक एक असुर अश्व का रूप धारण करके बालकृष्ण की हत्या करने आया था? परन्तु भगवान् ने उसे ही दो भागों में विदीर्ण कर दिया था। अत वे केशिनिषूदन के नाम से प्रसिद्ध हुए।इन शब्दों के तत्त्वनिर्णय हेतु

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।18.1।।नमः समाय सोमाय मखार्च्याय मखारये। कृष्णायाकृष्णरुपाय विष्णवे शंभवे नमः।।1।।पूर्वाध्यायैर्विस्तरेणेतस्ततो विक्षिप्ततयोक्तमर्थमुपनिषत्सु चेतस्ततो विस्तृतमर्थं सुखप्रतिपत्तये उपसंहृत्य वक्तुमयमध्याय आरभ्यते। अतोताध्यायेपूक्तस्य सर्ववेदार्थस्यास्मिन्नध्यायेऽवगम्यमानत्वात्। अर्जुनस्तु संन्यासत्यागशब्दार्थयोरेव विशेणं बुभुत्सुरुवाच। संन्यासस्य संन्यासभ्दार्थस्य त्यागस्य च त्यागशब्दार्थस्य च पृथगन्योन्यविभागतस्तत्त्वं याथात्म्यं वेदितुं ज्ञातुमिच्छामि। हे महाबारो इति संबोधयन् तब बाहुतो जातैः क्षत्रियैः महाबाहुभिरितरैर्बाह्वादिसाध्ये कर्मण्यधिकृतैरज्ञैश्च कृतस्य संन्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वं पृथग्वेदितुमिच्छामीति ध्वनयति। सर्वेन्द्रियनियन्तुरन्तर्यामिणः सर्वज्ञस्य मदभिप्रायनुसारेणैतत्कथनं सुकरमितिद्योतयन्नाह -- हृषीकेशेति। स्वजनसुखार्थं केश्यादिदुष्टनिषूदनस्य तव स्वभक्तस्य ममाप्यज्ञाननिषूदनं युक्तमेवेति सूचयन्संबोधयति केशिनिषूदनेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.1।।पूर्वाध्याये श्रद्धात्रैविध्येनाहारयज्ञतपोदानत्रैविध्येन च कर्मिणां त्रैविध्यमुक्तं सात्त्विकानामादानाय राजसतामसानां च हानाय। इदानीं तु संन्यासत्रैविध्यकथनेन संन्यासिनामपि त्रैविध्यं वक्तव्यम्। तत्र तत्त्वबोधनानन्तरं यः फलभूतः सर्वकर्मसंन्यासः स चतुर्दशेऽध्याये गुणातीतत्वेन व्याख्यातत्वान्न सात्त्विकराजसतामसभेदमर्हति। योऽपि तत्त्वबोधात्प्राक् तदर्थं सर्वकर्मसंन्यासस्तत्त्वबुभुत्सया वेदान्तवाक्यविचाराय भवति सोऽपित्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इत्यादिना निर्गुणत्वेन व्याख्यातः? यस्त्वनुत्पन्नतत्त्वबोधानामनुत्पन्नतत्त्वबुभुत्सूनां च कर्मसंन्यासःस संन्यासी च योगी च इत्यादिना गौणो व्याख्यातस्तस्य त्रैविध्यसंभवात्तद्विशेषं बुभुत्सुरर्जुन उवाच -- संन्यासस्येति। अविदुषामनुपजातविविदिषाणां च कर्माधिकृतानामेव किंचित्कर्मग्रहेण किंचित्कर्मपरित्यागो यः स त्यागांशगुणयोगात्संन्यासशब्देनोच्यते एतादृशस्यान्तःकरणशुद्ध्यर्थमविद्वत्कर्माधिकारिकर्तृकस्य संन्यासस्य केनचिद्रूपेण कर्मत्यागस्य तत्त्वं स्वरूपं पृथक् सात्त्विकराजसतामसभेदेन वेदितुमिच्छामि त्यागस्य च तत्त्वं वेदितुमिच्छामि। किं संन्यासत्यागशब्दौ घटपटशब्दाविव भिन्नजातीयार्थौ किंवा ब्राह्मणपरिव्राजकशब्दाविवैकजातीयार्थौ। यद्याद्यस्तर्हि त्यागस्य तत्त्वं संन्यासात्पृथक् वेदितुमिच्छामि? यदि द्वितीयस्तर्ह्यवान्तरोपाधिभेदमात्रं वक्तव्यमेकव्याख्यानेनैवोभयं व्याख्यातं भविष्यति। महाबाहो केशिनिषूदनेति संबोधनाभ्यां बाह्योपद्रवनिवारणस्वरूपयोग्यताफलोपधाने प्रदर्शिते। हृषीकेशेत्यन्तरुपद्रवनिवारणसामर्थ्यमिति भेदः। अत्यनुरागात्संबोधनत्रयम्। अत्रार्जुनस्य प्रश्नौ कर्माधिकारिकर्तृत्वेन पूर्वोक्तयज्ञादिसाधर्म्येण संन्यासशब्दप्रतिपाद्यत्वेन च गुणातीतसंन्यासद्वयसाधर्म्येण त्रैगुण्यसंभवासंभवाभ्यां संशयः प्रथमस्य प्रश्नस्य बीजं। द्वितीयस्य तु संन्यासत्यागशब्दयोः पर्यायत्वात्कर्मफलत्यागरूपेण च वैलक्षण्योक्तेः संशयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.1।।अस्यामष्टादशाध्याय्यां प्रथमे उपोद्धातितानां द्वितीये सूत्रितानां शेषैर्व्युत्पादितानामर्थानां कात्स्न्र्येनोपसंहारार्थोऽयमन्तिमोऽध्याय आरभ्यते। तत्र पूर्वाध्यायान्तेऽश्रद्धया कृतं सर्वं व्यर्थमित्युक्तम्। तत्र फलावश्यंभावनिश्चयः श्रद्धा सा च फलवतां कर्मणामेवाङ्गं न तु कर्मविरहरूपस्य संन्यासस्य भावरूपफलवर्जितस्य। अभावाद्भावोत्पत्तेरयोगात्। तस्माच्छ्रद्धासापेक्षकर्मापेक्षया श्रद्धानपेक्षः संन्यासः श्रेयान्। नचास्यैवंरूपस्य श्रद्धात्रैविध्यप्रयुक्तं सात्त्विकादिभेदेन त्रैविध्यं संभवति। येन फले तारतम्यं स्यात्। तत्फलस्य दृष्टविक्षेपनिवृत्तिरूपस्य सर्वत्र तुल्यत्वात्। स च संन्यासो यदि कर्मत्याग एव तर्हि सिद्धं नः समीहितम्। यदि तु तौ भिन्नौ तर्हि तयोर्वैलक्षण्यं विचार्यमित्याशयेनार्जुन उवाच -- संन्यासस्येति। हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदनेति बहुकृत्वः संबोधयन् जिज्ञासितेऽर्थेत्यादरं दर्शयति। संन्यासस्य तत्त्वं याथात्म्यं त्यागात्पृथग्भूतं वेदितुमिच्छामि। त्यागस्य याथात्म्यं संन्यासात्पृथग्भूतं वेदितुमिच्छामीति चकारेणानुवर्त्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.1।।अष्टादशानां विद्यानां फलमेतद्यतो मतम्। सर्वत्यागेन कर्त्तव्यो ह्याश्रयः सर्वभावतः।।1।।अतः पार्थाय सुप्रीतः प्राहाष्टादशसंज्ञके। अध्याये स्वाश्रयं श्रीमत्कृष्णो देवकिनन्दनः।।2।।अत्र सप्तदशाध्यायैर्भगवद्वाक्यतरणिकिरणविपाटितहृदयमोहान्धकारोऽर्जुनः सन्न्यासकर्मफलत्यागयोरेव भगवत्प्राप्तिहेतुत्वनिश्चयप्रकाशितहृत्सरोरुहः स्वबुद्धिनिश्चयेन सन्न्यासोत्तमज्ञानोऽपि भगवदुक्तस्वमुख्यज्ञानेन तत्सिसाधयिषुस्तयोस्तत्त्वं पृच्छति -- सन्न्यासस्येति। हे हृषीकेश एतत्तत्त्वज्ञानार्थं मदिन्द्रियप्रेरक सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्याऽऽस्ते सुखं वशी। सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि [5।13] इत्यादिना सन्न्यासस्य स्वप्राप्तिरुक्ता? तत्र तस्य तत्त्वं यादृशेन त्वत्प्राप्तिर्भवति तादृक् तत्त्वं? हे महाबाहो अहं वेदितुं ज्ञातुमिच्छामि? तज्ज्ञापयेत्यर्थः। महत् क्रियाशक्तिमत्? स्वोद्धारणसमर्थ त्वत्सम्बन्धेनैतत्तत्त्वोपदेशेन मामुद्धरेत्युक्तं भवति। च पुनः हे केशिनिषूदन दैत्यनिवारक दैत्यावेशेन कायक्लेशादिककृतत्यागात् पृथक् त्यागस्य त्वत्सेवार्थकृतत्यागस्य तत्त्वं मुख्यरूपं वेदितुं ज्ञातुमिच्छामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.1।।न्यासत्यागविभागेन सर्वगीतार्थसंग्रहम्। स्पष्टमष्टादशे प्राह परमार्थविनिर्णये।।1।।अत्र चसर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। संन्यासयोगयुक्तात्मा इत्यादिषु कर्मसंन्यास उपदिष्टः। तथात्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् इत्यादिषु च फलमात्रत्यागेन कर्मानुष्ठानमुपदिष्टम्। न च परस्परं विरुद्धं सर्वज्ञः परमकारुणिको भगवानुपदिशेत्। अतः कर्मसंन्यासस्य तदनुष्ठानस्य चाविरोधप्रकारं बुभुत्सुरर्जुन उवाच -- संन्यासस्येति। भो हृषीकेश सर्वेन्द्रियनियामक? हे केशिनिषूदन केशिनाम्नो हि महतो हयाकृतेर्दैत्यस्य युद्धे मुखं व्यादाय भक्षयितुमागच्छतोऽत्यन्तं व्यात्ते मुखे वामबाहुं प्रवेश्य तत्क्षणमेव विवृद्धेन तेनैव बाहुना कर्कटिकाफलवत्तं विदार्य निषूदितवान्। अतएव हे महाबाहो इतिसंबोधनम्। संन्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वं पृथग्विवेकेन वेदितुमिच्छामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.1।।अष्टादशे स्वगीतार्थस्त्यागन्यासविनिर्णयात्। सर्वधर्मान्परित्यज्य शरणे मोक्ष उच्यते।।1।।इह खलुसर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी [5।13]सन्न्यासयोगयुक्तात्मा [9।28] इत्यादिषु सन्न्यासशब्दोऽभिहितःत्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं [4।20] इत्यादिषु त्यागशब्दश्च तत्र सन्न्यासत्यागशब्दयोरेकविषय एवार्थो विशेषो वा कश्चनेत्यवशेषिततत्त्वबुभुत्सयाऽर्जुन उवाच -- सन्न्यासस्येति। सन्न्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वं पृथक् विवेकतो ज्ञातुमिच्छामि? संशयासुरनिरासार्थंमहाबाहो केशिनिषूदन इति सम्बोधयति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.1।।इस अध्यायमें पहलेके सभी अध्यायोंमें कहा हुआ अभिप्राय मिलता है। तथापि अर्जुन केवल संन्यास और त्याग -- इन दो शब्दोंके अर्थोंका भेद जाननेकी इच्छासे ही प्रश्न करता है --,अर्जुन बोला -- हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यासका अर्थात् संन्यासशब्दके अर्थका और त्यागका अर्थात् त्यागशब्दके अर्थका तत्त्व -- यथार्थ स्वरूप अलगअलग विभागपूर्वक जानना चाहता हूँ। भगवान् वासुदेवने छलसे घोड़ेका रूप धारण करनेवाले केशि नामक असुरको मारा था? इसलिये वे उस,( केशिनिषूदन ) नामसे अर्जुनद्वारा सम्बोधित किये गये हैं।,

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.1।। व्याख्या --   संन्यासस्य महाबाहो ৷৷. पृथक्केशिनिषूदन -- यहाँ महाबाहो सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें? जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ।हृषीकेश सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः इस विषयमें जोजो आवश्यक बातें हों? उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें।केशिनिषूदन सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं? उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शङ्काओँ और संशयोंको दूर कर दें।जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है --,(1) अपने आचरणमें लानेके लिये और (2) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं? वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं? पर अपना कल्याण नहीं कर सकते (टिप्पणी प0 869)। अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं? जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं।यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है? प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है।एषा तेऽभिहिता सांख्ये (गीता 2। 39) में आये सांख्य पदको ही यहाँ संन्यास पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है जैसे -- पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें संन्यासः? चौथे श्लोकमें सांख्ययोगौ? पाँचवें श्लोकमें यत्सांख्यैः और छठे श्लोकमें संन्यासस्तु पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है।इसी प्रकार बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु (गीता 2। 39) में आये योग पदको ही यहाँ त्याग पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है जैसे -- दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा इक्यावनवें श्लोकमें फलं त्यक्त्वा? तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कर्मयोगेन योगिनाम्? चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्? पाँचवें श्लोकमें तद्योगैरपि गम्यते? ग्यारहवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा बारहवें श्लोकमें त्यागात् पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है।अच्छी तरहसे रखनेका नाम संन्यास है -- सम्यक् न्यासः संन्यासः। तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्धविच्छेद कर लेनेका नाम संन्यास है।कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम त्याग है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता? वह योगारूढ़ हो जाता है। सम्बन्ध --   अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.1।।पूर्वैरध्यायैर्विस्तरेण यतस्ततो विक्षिप्ततयोक्तमर्थं सुखप्रतिपत्त्यर्थं संक्षेपेणोपसंहृत्याभिधातुमध्यायान्तरमवतारयति -- सर्वस्यैवेति। उपसंहृत्य वक्तव्य इति संबन्धः। किं चोपनिषत्सु इतस्ततो विस्तृतस्यार्थस्य बुद्धिसौकर्यार्थमस्मिन्नध्याये संक्षिप्ताभिधानं कर्तव्यमुपनिषदां गीतानां चैकार्थत्वादित्याह -- सर्वश्चेति। कथं सर्वोऽपि शास्त्रार्थोऽस्मिन्नध्याये संक्षिप्योपसंह्रियते तत्राह -- सर्वेषु हीति। ननु वेदार्थश्चेदशेषतोऽत्रोपसंजिहीर्षितस्तर्हि किमिति त्यागेनैके संन्यासयोगादिति च वेदार्थैकदेशविषयं प्रश्नप्रतिवचनं तत्राह -- अर्जुनस्त्विति। पृथगनयोस्तत्त्वं वेदितुमिच्छामीति विशेषणादपृथगर्थस्तयोरस्तीति गम्यते। बुभुत्सितस्य प्रष्टव्यत्वादेकदेशे तदभावादुक्तप्रश्नोपपत्तिरिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.1।।अध्यायप्रतिपाद्यमाह -- पूर्वोक्तमिति। साधनं ज्ञानसाधनम्। उक्तस्योक्तिर्व्यर्थेत्याशङ्कानिरासाय सङ्क्षिप्योपसंहरतीत्युक्तम्। अनुक्तं त्रैगुण्यं च वक्तीत्यपि ग्राह्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.1।।अनन्तगुणपूर्णाय नमः। पूर्वोक्तं साधनं सर्वं सङ्क्षिप्योपसंहरत्यनेनाध्यायेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.1।। --,संन्यासस्य संन्यासशब्दार्थस्य इत्येतत्? हे महाबाहो? तत्त्वं तस्य भावः तत्त्वम्? याथात्म्यमित्येतत्? इच्छामि वेदितुं ज्ञातुम्? त्यागस्य च त्यागशब्दार्थस्येत्येतत्? हृषीकेश? पृथक् इतरेतरविभागतः केशिनिषूदन केशिनामा हयच्छद्मा कश्चित् असुरः तं निषूदितवान् भगवान् वासुदेवः? तेन तन्नाम्ना संबोध्यते अर्जुनेन।।संन्यासत्यागशब्दौ तत्र तत्र निर्दिष्टौ? न निर्लुठितार्थौ पूर्वेषु अध्यायेषु। अतः अर्जुनाय पृष्टवते तन्निर्णयाय भगवान् उवाच --,श्रीभगवानुवाच --,

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【 Verse 18.2 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदु: | सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा: ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | kāmyānāṁ karmaṇāṁ nyāsaṁ sannyāsaṁ kavayo viduḥ | sarvakarmaphalatyāgaṁ prāhus tyāgaṁ vicakṣaṇāḥ ||

▸ Glossary: śrībhagavānuvāca: Śrī Bhagavān says; kāmyānāṁ: with desire; karmaṇāṁ: activities; nyāsaṁ: renunciation; sannyāsaṁ: renounced order of life; kavayaḥ: the learned; viduḥ: know; sarva: of all; karma: activities; phala: of results; tyāgaṁ: renunciation; prāhuḥ: call; tyāgaṁ: renunciation; vicakṣaṇāḥ: the experienced

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.2 Bhagavān Kṛṣṇa says, the renouncing of all selfish work based on desire, is what the learned ones call as sannyāsa, the renounced order of life. And renunciatig the attachment to fruit or result of one’s actions is what the wise ones call as tyāga, renunciation.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.2।।श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- (कुछ) कवि (पण्डित) जन काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं और विचारशील जन समस्त कर्मों के फलों के त्याग को त्याग कहते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.2 काम्यानाम् (of) desireful? कर्मणाम् of actions? न्यासम् the renunciation? संन्यासम् Sannyasa? कवयः the sages? विदुः understand? सर्वकर्मफलत्यागम् the abandonment of the fruits of all works? प्राहुः declare? त्यागम् abandonment? विचक्षणाः the wise.Commentary Kamya Karmani Activities such as the Asvamedha (a special sacrifice)? etc.? which are performed for the attainment of specific selfish ends. The wise men declare that Tyaga means abandonment of the fruits of all the Nitya and Naimittika works (ordinary and extraordinary or occasional duties).The rootmeaning of the words Sannyasa and Tyaga is to give up. In popular usage Sannyasa and Tyaga are more or less synonymous. Both mean renunciation. The two words do not mean two altogether distinct ideas as stone and fruit? or pot and cloth. They convey the same general idea with a slight distinction.An objector asks It is said that the Nitya and Naimittika actions cannot produce any fruits. Why then is the relinishment of their fruits mentioned here It is like asking for the relinishment of the barren womans sonWe say The objection is not correct. In the opinion of the Lord? ordinary and occasional duties cause their own fruits (vide XVIII.12). Sannyasins alone who have renounced the desire for the fruits of actions will not get the fruits? but other persons will have to reap the fruits of the ordinary and occasional actions.If one renounces all actions after the attainment of Selfrealisation and enters into the fourth order of life (Sannyasa) it is called VidvatSannyasa. If one renounces all actions and enters into the order of Sannyasa for the sake of doing VedantaVichara (or reflection on the truths of the Vedantaphilosophy and on the true significance of the great sentences of the Upanishads which reveal the identity of the individual soul with the Supreme Being) and for thus attaining Selfrealisation? it is called VividishaSannyasa.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.2. The Bhagavat said The seers understand the act of renouncing the desire-motivated actions as renunciation; the experts declare the relinishment of the fruits of all actions to be relinishment.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.2 Lord Shri Krishna replied: The sages say that renunciation means forgoing an action which springs from desire; and relinquishing means the surrender of its fruit.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.2 The Lord said The sages hold that Sannyasa is the giving up of all works which are motivated by desire. The wise declare Tyaga to be the abandonment of fruits of all works.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.2 The Blessed Lord said The learned ones know sannyasa to be the giving up of actions done with a desire for reward. The adepts call the abandonment of the results of all works as tyaga.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.2 The Blessed Lord said The sages understand Sannyasa to be the renunciation of action with desire; the wise declare the abandonment of the fruits of all actions as Tyaga.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.2 Kamyanam etc. The desire-motivated actions : the Agnistoma (sacrifce) etc. All actions etc. : The relinishment is the relinishment of fruits, even while performing all actions tha are to be performed daily or occasionally. Whatever remains to be spoken in this chapter had been examined in detail even by the previous commentators like the revered Bhatta Bhaskara and others. Hence why should we take the trouble of repeating. For, our main concern is to fulfil the promise to show only the hidden purport of this [work]. Therefore now [the Bhagavat] relates different views in order to determine the best in this regard -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.2 The Lord said Some scholars understand that Sannyasa is complete relinishment of desire-prompted acts. Some other wise men say that the meaning of the term Tyaga, according to the Sastras dealing with release, is relinishment of the fruits not only of all desiderative (Kamya), but also of obligatory and occasional, duties . Here, the problem is, whether the Tyaga taught in the Sastras concern desiderative acts themselves, or fruits of all acts. Sri Krsna has used the terms Sannyasa in one place and Tyaga elsewhere. From this it is understood that Sri Krsna uses the terms Tyaga and Sannyasa as synonyms.

Likewise, the decisive teaching is about Tyaga alone in the statement: 'Hear My decision, O Arjuna, about Tyaga' (18.4). That the terms are synonymously used to denote the same sense, is conclusively established from such passages as: 'But the renunciation (Sannyasa) of obligatory work is not proper. Abandonment (Tyaga) of it through delusion is declared to be Tamasika' (18.7); and 'To those who have not renounced the fruits of actions, threefold are the conseences after death - undesirable, desriable and mixed. But to those who have renounced, none whatsoever' (18.12).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.2 Some kavayah, learned ones; viduh, know; sannyasam, sannyasa, the meaning of the word sannyasa, the non-performance of what comes as a duty; to be the nyasam, giving up; karmanam, of actions; kamyanam, done with a desire for reward, e.g. Horse-sacrifice etc. Sarva-karma-phala-tyagah, abandonment of the results of all actions, means the giving up of the results accruing to oneself from all actions- the daily obligatory and the occasional (nitya and naimittika) that are performed. Vicaksanah, the adepts, the learned ones; prahuh, call, speak of that; as tyagam, tyaga, as the meaning of the word tyaga. Even if 'the giving up of actions for desired results' or 'the abandonment of results' be the intended meaning, in either case the one meaning of the words sannyasa and tyaga amounts only to tyaga (giving up); they do not imply distinct categories as do the words 'pot' and 'cloth'. Objection: Well, is it not that they say the daily obligatory (nitya) and the occasional (naimittika) rites and duties have no results at all? How is the giving up of their results spoken of-like the abandoning of a son of a barren woman?! Reply: This defect does not desire. It is the intention of the Lord that the nitya-karmas (daily obligatory duties) also have results; for the Lord will say, 'The threefold results of actions-the undesirable, the desirable and the mixed-accrue after death to those who do not resort to tyaga', and also, 'but never to those who resort to sannyasa (monks)' (12). Indeed, by showing that, it is only in the case of sannyasins (monks) alone that there is no connection with the results of actions, the Lord asserts in, '৷৷.accrue after death to those who do not resort to tyaga (renunciation)' (abid.), that the result of daily obligatory (nitya) duties accrue to those who are not sannyasins (monks).

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.2।। काम्य कर्मों का त्याग संन्यास कलाता है और समस्त कर्मों का फलत्याग त्याग कहा जाता हा। शास्त्रीय सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों को इन दोनों में कोई अन्तर नहीं ज्ञात होता? क्योंकि कामना सदैव फलप्राप्ति की ही होती है। अत? कामना प्रेरित कर्मों का त्याग और कर्मफल की आसक्ति का त्याग ये दोनों ही समान प्रतीत होते हैं। इसका कारण शास्त्रों से अनभिज्ञता अथवा उनका सतही अध्ययन ही हो सकता है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि दोनों का अर्थ कामना का त्याग ही है? परन्तु त्याग और संन्यास में कुछ अन्तर है। फिर भी त्याग? संन्यास का अविभाज्य अंग है। मनुष्य वर्तमान में कर्म करता है और आशा करता है कि उसे इष्टफल भविष्य में प्राप्त होगा। वर्तमान के कर्म का परिणाम ही भावी फल है। इसलिए? निष्काम कर्म वर्तमान में ही हो सकते हैं? जब कि फलभोग की चिन्ता से उत्पन्न होने वाली मन की व्याकुलता का संबंध भविष्य काल से होता है। वर्तमान के कर्म की परिसमाप्ति भावी फल में होती है। कामना और विक्षेप मन में अशान्ति उत्पन्न करते हैं। कामना जितनी अधिक तीव्र होगी? उतनी ही अधिक मात्रा में हमारी आन्तरिक शक्तियों का ह्रास होगा और ऐसा शक्तिहीन पुरुष किसी भी कर्म को कुशलता एवं उत्साह के साथ सम्पादित नहीं कर सकता। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अहंकार या जीव ही इच्छा करता है। अत? अहंकार की निवृत्ति का अर्थ है? व्यष्टि जीव की विरति और उस साधक की अपने सर्वोच्च स्वरूप में दृढ़ स्थिति।कर्म वर्तमान में होते हैं और उनके फल भविष्य में प्राप्त होने की सम्भावना रहती है। जो व्यक्ति फल की चिन्ता करता है वह वर्तमान में कार्य करने की अपनी क्षमता खो देता है। स्वाभाविक ही है कि उस व्यक्ति को इष्ट फल मिलने की सम्भावना कम हो जाती है? क्योंकि कर्म का फल कर्ता के प्रयत्न तथा प्रकृति के नियमादि अन्य कई कारणों पर निर्भर करता है। अत हमें फलासक्ति का त्याग करने का उपदेश दिया जाता है।संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि त्याग साधन है और संन्यास साध्य है। त्याग और संन्यास की साधना का संबंध हमारे कर्मों से है। भगवान् श्रीकृष्ण कर्म के महत्त्व पर बल देते हुए कभी नहीं थकते। इन दोनों शब्दों में से कोई भी यह नहीं दर्शाता है कि हमको कर्म की उपेक्षा करनी चाहिए। इसके विपरीत? दोनों का आग्रह कर्म के पालन पर ही है। हमको कर्म करने ही चाहिए। तथापि? ये कर्म अहंकार और स्वार्थ या फलासक्ति से रहित होने चाहिए। फलासक्ति ही हमारी कार्यकुशलता में बाधक बनती है। फलासक्ति के अभाव में हमारे कर्म हमें अपना पूर्ण पुरस्कार प्रदान कर सकते हैं। हम कह सकते हैं कि वेदों में प्रयुक्त इन दो शब्दों के अर्थों की अपेक्षा गीता में दी गई इनकी परिभाषाएं अधिक उदार एवं सहिष्णु हैं।अज्ञानी पुरुष को कर्म करने चाहिए या नहीं इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.2।।एवं पृष्टो ज्ञातार्जुनाभिप्रायः सर्वेष्वध्यायेषु तत्रतत्र निर्दिष्टौ संन्यासत्यागशब्दौ न विविक्तार्थावित्यतः प्रश्नौचित्यं मत्वा तन्निर्णयाय श्रीभगवानुवाच। काम्यानां स्वर्गादिकामनाप्रयुक्तानामश्वमेधादीनां कर्मणां न्यासं परित्यागं संन्यासं संन्यासशब्दार्थमनुष्ठेयत्वेन प्राप्तानामनुष्ठायं कवयः पण्डिताः केचिद्विदुर्विजानन्ति। नित्यनैमित्तिकानामनुष्ठीयमानानां सर्वकर्मणामात्मसंबन्धितया प्राप्तस्य फलस्य परित्यागः सर्वकर्मफलत्यागः तं त्यागं त्यागशब्दार्थं विचक्षणाः निपुणाः पण्डिताः कथयन्ति। ननु नित्यनैमित्तिकानां कर्मणां फलाभावद्वन्ध्यापुत्रस्य त्यागइव तेषां फलत्यागासंभवादुक्तस्त्यागशब्दार्थो न युक्त इतिचेदुच्यते। यद्यपि स्वर्गकामः पशुकाम इत्यादिवत्संध्यामुपासीतयावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति इत्यादिषु फलविशेषो न श्रुयते तथाप्यपुरुषार्थे व्यापारे प्रेक्षावन्तं प्रवर्तयितुमशक्नुवन्विधिर्विश्वजिन्न्यायेन किमपि फलमाक्षिपत्येव। श्रुयते च नित्यादिषु फलंसर्व एते पुण्यलोका भवन्ति कर्मणा पितृलोकः? धर्मेण पापमपनुदति इत्येवमादिषु। वक्ष्यति च भगवान्अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य नतु संन्यासिनां क्वचित्त इति। तस्माद्युक्तमुक्तं सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षण इति। नचैवमपि निष्फलेषु कर्मस्वप्रवृत्तिरेव प्राप्तेति वाच्यम्। सर्वेषामपि कर्मणां संयोगपृथक्त्वेन तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्या विविदिषार्थतत्वा विनियोगात्। तदुक्तं सरेश्वराचार्यैःवेदानुवचनादीनामैख्यात्म्यज्ञानजन्मने। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः।।यद्वा विविदिषार्थत्वं सर्वेषामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः।।यद्वा विविदिषार्थत्वं सर्वेषामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः।। इति। तथाच चतुर्थाध्यायस्थं सूत्रंएकस्य तूभयत्वं संयोगपृथक्त्वम् इतिखादिरो यूपो भवतिखादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्वीत इत्यत्रैकस्य खादिरत्वस्योभयत्वे क्रत्वर्थत्वपुरुषार्थत्वरुपोभयात्मकत्वे वचनद्वयेन क्रतुशेषत्वफलशेषत्वसंयोगभेदावगमान्न नित्यानित्यसंयोगविरोधः तथा सर्वेषआं कर्मणां स्वोत्पत्तिविधिसिद्धानां प्रत्येकं वाक्येन तत्तत्फलसंयोगः तमेतमितिवाक्येन विविदिषासंयोगश्च सिद्य्धत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.2।।तत्रान्तिमस्य सूचीकटाहन्यायेन निराकरणायोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानामिति। काम्यानां फलकामनया चोदितानामन्तःकरणशुद्धावनुपयुक्तानां कर्मणामिष्टिपशुसोमादीनां न्यासं त्यागं संन्यासं विदुर्जानन्ति कवयः सूक्ष्मदर्शिनः। केचित्तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति वाक्येन वेदानुवचनशब्दोपलक्षितस्य ब्रह्मचारिधर्मस्य यज्ञदानशब्दाभ्यामुपलक्षितस्य गृहस्थधर्मस्य तपोऽनाशकशब्दाभ्यामुपलक्षितस्य वानप्रस्थधर्मस्य नित्यस्य नित्येन नित्यविहितेन पापक्षयेण द्वारेणात्मज्ञानार्थत्वं बोध्यते। नच विनियोगवैयर्थ्यंज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः इत्यनेनैव लब्धत्वादिति वाच्यम्। विनियोगाभावे हि सत्यपि नित्यकर्मानुष्ठाने ज्ञानं स्याद्वा न वा स्यात्। सति तु विनियोगे ज्ञानमवश्यं भवेदेवेति नियमार्थत्वात् तस्मान्नित्यकर्मणामेव वेदने विविदिषायां वा विनियोगात् सत्त्वशुद्धिविविदिषोत्पत्तिपूर्वकवेदनार्थिना नित्यान्येव कर्माणि भगवदर्पणबुद्ध्याऽनुष्ठेयानि काम्यानि तु सर्वाणि सफलानि परित्याज्यानीत्येकं मतम्। अपरं मतं सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाःसर्वेषां काम्यानां नित्यानां च प्रतिपदोक्तफलत्यागं सत्त्वशुद्ध्यर्थितया विविदिषासंयोगेनानुष्ठानं विचक्षणा विचारकुशलास्त्यागं प्राहुः।खादिरो यूपो भवति? खादिरं वीर्यकामस्य यूपं करोति इत्यत्र यथैकस्य खादिरत्वस्य क्रतुप्रकरणपाठात्फलसंयोगाच्च क्रत्वर्थत्वं पुरुषार्थत्वं च प्रमाणभेदात्? यथाऽग्निहोत्रेष्टिपशुसोमानां सर्वेषामपि शतपथपठितानां चोत्पत्तिविधिसिद्धानां तत्तत्फलसंयोगः प्रत्येकवाक्येन विविदिषासंयोगश्च यज्ञादिवाक्येन क्रियत इत्युपपन्नं?एकस्य तूभयत्वे संयोगपृथक्त्वं इति न्यायात्। तदुक्तं संक्षेपशारीरकेयज्ञेनेत्यादिवाक्यं शतपथविहितं कर्मवृन्दं गृहीत्वा स्वोत्पत्त्याम्नातसिद्धं पुरुषविविदिषामात्रसाध्ये युनक्ति इति। तस्मात्काम्यान्यपि फलाभिसंधिमकृत्वाऽन्तःकरणशुद्धये कर्तव्यानि। नह्यग्निहोत्रादिकर्मणां स्वतः काम्यत्वनित्यत्वरूपो विशेषोऽस्ति पुरुषाभिप्रायभेदकृतस्तु विशेषः फलाभिसंधित्यागे कुतस्त्यो नित्यकर्मणां च प्रातिस्विकफलसद्भावअनिष्टमिष्टमिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलं इत्यत्र वक्ष्यति। नित्यानामेव विविदिषासंयोगेन काम्यानां कर्मणां फलेन सह स्वरूपतोऽपि परित्यागः पूर्वार्धस्यार्थः। काम्यानां नित्यानां च संयोगपृथक्त्वेन विविदिषासंयोगात्तदर्थं स्वरूपतोऽनुष्ठानेऽपि प्रातिस्विकफलाभिसन्धिमात्रपरित्याग इत्युत्तरार्धस्यार्थः। तदेतदाहुर्वार्तिककृतःवेदानुवचनादीनामैकात्म्यज्ञानजन्मने। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः।।यद्वा विविदिषार्थत्वं सर्वेषामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः।। इति। तदेवं सफलकाम्यकर्मत्यागः संन्यासशब्दार्थः सर्वेषामपि कर्मणां फलाभिसन्धित्यागशब्दार्थं इति न घटपटशब्दयोरिव संन्यासत्यागशब्दयोर्भिन्नजातीयार्थत्वं किंत्वन्तःकरणशुद्ध्यर्थकर्मानुष्ठाने फलाभिसन्धित्याग इत्येक एवार्थ उभयोरिति निर्णीत एकः प्रश्नोऽर्जुनस्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.2।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानामिति। काम्यानां रागतः प्राप्तानां पुत्रकामेष्ट्यादीनां न तु फलस्य कामनाविषयत्वात् सर्वस्य कर्मणः फलवत्त्वनियमात् सर्वं कर्म काम्यमेवेति नित्यादीनामपि मुमुक्षोस्त्यागः स्यादिति सिद्धं नः समीहितमित्याशङ्क्याह -- सर्वेति। सर्वेषां नित्यनैमित्तिककाम्यानां कर्मणां फलत्यागमेव त्यागं विचक्षणाः प्राहुर्न स्वरूपतस्त्यागं प्राहुः। अतो न त्वदिष्टः संन्यासः सिद्ध्यतीत्यर्थः। अयमाशयः -- यद्यपि संन्यासत्यागशब्दौ निवृत्तिमेव ब्रूतः तथापि सा वैराग्याद्वा कायक्लेशभयाद्वा मौढ्याद्वा भवतीति तत्कारणानां सात्त्विकादिभेदेन भिन्नत्वात्तस्या अपि सात्त्विकराजसतामसभेदेन त्रैविध्यं त्रिविधश्रद्धाप्रधानत्वं च दुर्वारम्। न चाविरक्तोऽश्रद्दधानश्च त्यक्तकर्मापि दृष्टविक्षेपहीनो दृश्यते। यथोक्तं वार्तिकाचार्यैःप्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः। संन्यासिनोऽपि दृश्यन्ते दैवसंदूषिताशयाः। इति। तस्मादविरक्तकृतसंन्यासापेक्षया निष्कामकर्माचरणमेव श्रेय इत्याशयेन भगवता काम्यकर्मत्यागः संन्यासत्वेन नित्यादिकर्मणां फलानभिसंधानं च त्यागत्वेन स्तूयत इति। तस्मादश्रद्धया कृतः संन्यासोऽप्यसन्नेवेति संन्यासाद्ब्रह्मणः स्थानमिति स्मृतं स्वफलं दातुं न समर्थ इति युक्तमुक्तं भगवता अश्रद्धया कृतं सर्वं व्यर्थमिति। यत्तु नित्यानामेव विविदिषायोगात्काम्यानां स्वरूपतोऽपि त्यागः पूर्वार्धस्यार्थः। सर्वेषां कर्मणां फलतस्त्याग इत्युत्तरार्धार्थ इति व्याख्यानं पक्षद्वयप्रदर्शनपरं तदग्रिमेण श्लोकेन पौनरुक्त्यमावहतीत्युपेक्षितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.2।।अस्योत्तरमाह श्रीभगवान् -- काम्यानामिति। काम्यानां ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत। सर्वपाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां तरति योऽश्वमेधेन यजते [आप.श्रौ.10।1।2।1] इत्यादिकर्मणां न्यासं परित्यागं कवयो निर्दुष्टशब्दरसिकाः सन्न्यासं विदुः जानन्तीत्यर्थः।अत्रायं भावः -- सन्न्यासशब्देन सम्यक्प्रकारेण न्यासं स्थापनं तच्च काम्यानां कामितफलपरित्यागेन भवदर्थफलार्थस्थापनरूपं शब्दार्थज्ञानेन ते जानन्ति। एतेन तेषामपि शब्दार्थज्ञानवत्त्वमेवोक्तं? न तु तत्त्वज्ञानवत्त्वमिति भावः। किञ्च? ये विचक्षणा विशेषेण व्याख्यानसमर्थाः चातुर्यादियुक्ताः सर्वकर्मणां नित्यनैमित्तिकानामपि फलत्यागं त्यागं प्राहुः। यद्यपि नित्यकर्मसु फलं न श्रूयते अहरहः सन्ध्यामुपासीत। यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात् [ ] इत्यादिषु? तथापि प्रत्यवायपरिहार एव फलमिति कल्पयन्ति। एतदेव विचक्षणत्वेनोक्तम्। तेऽपि तत्त्वं न जानन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.2।।तत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानामिति।पुत्रकामो यजेतस्वर्गकामो यजेत इत्येवमादिकामोपबन्धेन विहितानां काम्यानां कर्मणां न्यासं परित्यागं संन्यासं कवयो विदुः सम्यक्फलैः सह सर्वकर्मणामपि न्यासं संन्यासं पण्डिता विदुः जानन्तीत्यर्थः। सर्वेषां काम्यानां नित्यनैमित्तिकानां च कर्मणां फलमात्रत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा निपुणाः नतु स्वरूपतः कर्मत्यागम्। ननु नित्यनैमित्तिकानां फलाश्रवणादविद्यमानस्य फलस्य कथं त्यागः स्यात्? नहि वन्ध्यायाः पुत्रत्यागः संभवति। उच्यते। यद्यपि स्वर्गकामः पशुकाम इत्यादिवत्अहरहःसंध्यामुपासीतयावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति इत्यादिषु फलविशेषो न श्रूयते तथाप्यपुरुषार्थे व्यापारे प्रेक्षावन्तं प्रवर्तयितुमशक्नुवन्विधिःविश्वजिता यजेत इत्यादिष्विव सामान्यतः किमषि फलमाक्षिपत्येव। नचातीव गुरुमतः श्रद्धया स्वसिद्धिरेव विधेः प्रयोजनमिति मन्तव्यम्? पुरुषप्रवृत्त्यनुपपत्तेर्दुष्परिहरत्वात्। श्रूयते च नित्यादिष्वपि फलम्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति इति?कर्मणा पितृलोकः इति?धर्मेण पापमपनुदति इत्येवमादिषु। तस्माद्युक्तमुक्तंसर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः इति। ननु फलत्यागेन पुनरपि निष्फलेषु कर्मस्वप्रवृत्तिरेव स्यात्तन्न? सर्वेषामपि कर्मणां संयोगपृथक्त्वेन विविदिषार्थतया विनियोगात्। तथाच श्रुतिःतमेतमात्मानं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन इति। अतः प्रतिपदोक्तं सर्वं फलं बन्धकत्वेन त्यक्त्वा विविदिषार्थं सर्वकर्मानुष्ठानं घटत एव। विविदिषा च नित्यानित्यवस्तुविवेकेन निवृत्तदेहाभिमानतया बुद्धेः प्रत्यक्प्रवणता। तावत्पर्यन्तं च सत्त्वशुद्ध्यर्थं ज्ञानाविरुद्धं यथोचितमावश्यकं कर्म कुर्वतस्तत्फलत्याग एव कर्वत्यागो नाम न स्वरूपेण। तथाच श्रुतिःकुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा इति। ततः परं तु सर्वकर्मनिवृत्तिः स्वत एव भवति। तदुक्तं नैष्कर्म्यसिद्धौप्रत्यक्प्रवणता बुद्धेः कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः। कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते घना इव इति। उक्तंच भगवतायस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते इति। वसिष्ठेन चोक्तमन कर्माणि त्यजेद्योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ। कर्मणो मूलभूतस्य संकल्पस्यैव नाशतः इति। ज्ञाननिष्ठाविक्षेपकत्वमालक्ष्य त्यजेद्वा। तदुक्तं श्रीभगवता भागवतेतावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते।।ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः। सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः इत्यादि।।अलमतिप्रसङ्गेन। प्रकृतमनुसरामः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.2।।तत्र त्यागसन्न्यासयोरैकार्थेऽपि विषयभेदेन विनिर्णयं मतान्तरोपन्यासेन दर्शयन्नुत्तरभाष्यं स्वयं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानां कर्मणामिति। ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत स पाप्मानं तरति स ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते पुत्रकामो यजेत इत्यादिकामोपनिबन्धेन वेदेन विहितानां सर्वेषां न्यासं स्वरूपतस्त्यागं सन्न्यासं कवयो योगिनो विदुः। ततोऽपि विचक्षणाः स्वरूपतः त्यागमसहमाना निपुणा भक्ताः सर्वकर्मफलत्यागं सर्वेषां नित्यनैमित्तिककाम्यानां तथाश्रुतानामपि कर्मणां श्रुतफलस्य त्याग एव मोक्षशास्त्रे त्यागशब्दार्थ इति प्राहुः। तत्रैतेषां मते सन्न्यासार्थः सम्यक् फलत एव? न स्वरूपत इत्यायाति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.2।।पहले अध्यायोंमें जिनका जगहजगह निर्देश किया गया है? वे संन्यास और त्याग -- दोनों शब्द स्पष्टार्थयुक्त नहीं हैं? इसलिये ( उनका स्पष्ट अर्थ जाननेकी इच्छासे ) पूछनेवाले अर्जुनको उनका निर्णय सुनानेके लिये श्रीभगवान् बोले --, कितने ही बुद्धिमान -- पण्डित लोग? अश्वमेधादि सकाम कर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं अर्थात् कर्तव्यरूपसे प्राप्त ( शास्त्रविहित ) सकाम कर्मोंके न करनेको संन्यास शब्दका अर्थ समझते हैं। कुछ विचक्षण पण्डितजन अनुष्ठान किये जानेवाले नित्यनैमित्तिक सम्पूर्ण कर्मोंके? अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले फलका परित्याग करनारूप जो सर्वकर्मफलत्याग है? उसे ही त्याग कहते हैं? अर्थात् त्याग शब्दका वे ऐसा अभिप्राय बतलाते हैं। कहनेका अभिप्राय? चाहे काम्य कर्मोंका ( स्वरूपसे ) त्याग करना हो और चाहे समस्त कर्मोंका फल छोड़ना ही हो? सभी प्रकारसे संन्यास और त्याग इन दोनों शब्दोंका अर्थ तो? एकमात्र त्याग ही है। ये दोनों शब्द घड़ा और वस्त्र आदि शब्दोंकी भाँति भिन्न जातीय अर्थके बोधक नहीं हैं। पू0 -- जब ऐसा कहा जाता है? कि नित्य और

Chapter 18 (Part 2)

नैमित्तिक कर्मोंका तो फल ही नहीं होता? फिर यहां वन्ध्याके पुत्रत्यागकी भाँति? उनके फलका त्याग करनेके लिये कैसे कहा जाता है उ0 -- नित्यकर्मोंका भी फल होता है -- यह बात भगवान्को इष्ट है? इसलिये यह दोष नहीं है। क्योंकि भगवान् स्वयं कहेंगे कि मरनेके बाद कर्मोंका अच्छाबुरा और मिला हुआ फल असंन्यासियोंको होता है?,संन्यासियोंको नहीं इस प्रकार वहाँ केवल संन्यासियोंके लिये कर्मफलकी अभाव दिखाकर? असंन्यासियोंके लिये कर्मफलकी प्राप्ति अवश्यम्भावी दिखलायेंगे।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.2।। व्याख्या --   दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है।2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है।3 -- त्याज्यं दोष (टिप्पणी प0 870.1) वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं (टिप्पणी प0 870.2)। अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)।3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है (टिप्पणी प0 871.1)। ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)। सम्बन्ध --   पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.2।।ननु पूर्वेष्वध्यायेषु तत्र तत्र संन्यासत्यागयोरुक्तत्वात्किमिति पुनस्तौ पृच्छ्येते ज्ञाते तदयोगात्तत्राह -- तत्र तत्रेति। न निर्लुण्ठितार्थौ न निकृष्टार्थौ न विविक्तार्थावित्यर्थः। बुभुत्सया प्रश्नस्य प्रवृत्तत्वात्प्रष्टुरभिप्रायं प्रश्नेन प्रतिपद्य भगवानुत्तरमुक्तवानित्याह -- अत इति। पक्षद्वयोपन्यासेन संन्यासत्यागशब्दयोरर्थभेदं कथयति -- काम्यानामिति। तत्किमिदानीं संन्यासत्यागशब्दयोरात्यन्तिकं भिन्नार्थत्वं तथा प्रसिद्धिविरोधः स्यादित्याशङ्क्यावान्तरभेदेऽपि नात्यन्तिकभेदोऽस्तीत्याह -- यदीति। पुत्राभावाद्वन्ध्यायास्तत्त्यागायोगवन्नित्यनैमित्तिककर्मणामफलानां फलत्यागानुपपत्तेरुक्तस्त्यागशब्दार्थो न सिद्ध्यतीति शङ्कते -- नन्विति। नित्यनैमित्तिककर्मफलस्य वन्ध्यापुत्रसादृश्याभावात्तत्त्यागसंभवादुक्तस्त्यागशब्दार्थः संभवतीति समाधत्ते -- नैष दोष इति। भगवता तेषां फलवत्त्वमिष्टमित्यत्र वाक्यशेषमनुकूलयति -- वक्ष्यतीति। तर्हि संन्यासिनामसंन्यासिनां च नित्याद्यनुष्ठायिनामविशेषेण तत्फलं स्यादिति चेन्नैवेत्याह -- नत्विति। वक्ष्यतीत्यनुकर्षणं चकारार्थः। प्रसक्तस्य वचसोऽर्थं प्रकृतोपयोगित्वेन संगृह्य स्मारयति -- संन्यासिनामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.2।।काम्यानां कर्मणां इत्येतं श्लोकं केचिद्व्याचक्षते -- काम्यानां कर्मणामश्वमेधादीनां स्वरूपेण त्यागः सन्न्यासः? नित्यनैमित्तिकादिसर्वकर्मफलत्यागस्त्यागः इति? तदसदिति भावेनाऽऽह -- फलेति। वैकल्पिककाम्यानां स्वर्गादिफलानिच्छया विशेषणत्यागेन त्यागो नियतकाम्यानां स्वरूपाकरणेन त्यागः सन्न्यासः? काम्यकर्मणामेव फलत्यागस्तु त्यागः करणाकरणे तु न विवक्षित इत्यर्थः। कुत एतत् इत्यत आह -- तथा हीति। अकर्मणा अकरणेन जनकाश्वपत्यादिभिर्मुमुक्षुभिरश्वमेधादीनामनुद्दिष्टफलानामनुष्ठानान्न काम्यानां स्वरूपपरित्याग एव नित्यनैमित्तिकफलस्यान्तःकरणशुद्धेः सर्वापेक्षितत्वेन तत्त्यागो न युक्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.2।।फलानिच्छयाऽकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः। त्यागस्तु फलत्याग एव। तथा हि प्राचीनशालश्रुतिः -- अनिच्छयाऽकर्मणा वाऽपि काम्यकर्मन्यासो न्यासः? फलत्यागस्तु त्यागः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.2।। --,काम्यानाम् अश्वमेधादीनां कर्मणां न्यासं संन्यासशब्दार्थम्? अनुष्ठेयत्वेन प्राप्तस्य अनुष्ठानम्? कवयः पण्डिताः केचित् विदुः विजानन्ति। नित्यनैमित्तिकानाम् अनुष्ठीयमानानां सर्वकर्मणाम् आत्मसंबन्धितया प्राप्तस्य फलस्य परित्यागः सर्वकर्मफलत्यागः तं प्राहुः कथयन्ति त्यागं त्यागशब्दार्थं विचक्षणाः पण्डिताः। यदि काम्यकर्मपरित्यागः फलपरित्यागो वा अर्थः वक्तव्यः? सर्वथा परित्यागमात्रं संन्यासत्यागशब्दयोः एकः अर्थः स्यात्? न घटपटशब्दाविव जात्यन्तरभूतार्थौ।।ननु नित्यनैमित्तिकानां कर्मणां फलमेव नास्ति इति आहुः। कथम् उच्यते तेषां फलत्यागः? यथा वन्ध्यायाः पुत्रत्यागः नैष दोषः? नित्यानामपि कर्मणां भगवता फलवत्त्वस्य इष्टत्वात्। वक्ष्यति हि भगवान् अनिष्टमिष्टं मिश्रं च (गीता 18।12) इति न तु संन्यासिनाम् (गीता 18।12) इति च। संन्यासिनामेव हि केवलं कर्मफलासंबन्धं दर्शयन् असंन्यासिनां नित्यकर्मफलप्राप्तिम् भवत्यत्यागिनां प्रेत्य (गीता 18।12) इति दर्शयति।।

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【 Verse 18.3 】

▸ Sanskrit Sloka: त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण: | यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे ||

▸ Transliteration: tyājyaṁ doṣavadity eke karma prāhurmanīṣiṇaḥ | yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyamiticāpare ||

▸ Glossary: tyājyaṁ: must be given up; doṣavad: like sins; iti: thus; eke: one group; karma: work; prāhuḥ: said; manīṣiṇaḥ: of great thinkers; yajña: sacrifice or service; dāna: charity; tapaḥ: penance or austerity; karma: work; na: never; tyājyaṁ: is to be given up; iti: thus; ca: certainly; apare: others

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.3 Some learned men say that all kinds of result-based ac- tivities are faulty and should be given up, but there are yet

other sages who maintain that acts of enriching sacrifice [yajña], charity [dāna] and austerity [tapaḥ] should never be given up.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.3।।श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.3।। कुछ मनीषी जन कहते हैं कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं और अन्य जन कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.3 त्याज्यम् should be abandoned? दोषवत् (full of) as an evil? इति thus? एके some? कर्म action? प्राहुः declare? मनीषिणः philosophers? यज्ञदानतपःकर्म acts of sacrifice? gift and austerity? न not? त्याज्यम् should be relinished? इति thus? च and? अपरे others.Commentary Some philosophers who follow the doctrine of the Sankhyas declare that all actions,should be abandoned as evil? even by those who are fit for Karma Yoga.Doshavat As an evil All Karmas should be abandoned as involving evil because they cause bondage or that they should be relinished like passion and other such evil tendencies.Others declare that the acts of sacrifice? gifts and austerities should not be given up by those who are fit for Karma Yoga. These are the opinions of some? who are of great understanding.Now listen to Me. I will settle this matter and will tell thee how renunciation should be practised.The subject of the discourse here is about the Karma Yogins only and not about those persons who have gone beyond the path of Karma. It is with reference to the Karma Yogins that these conflicting opinions are held and not with reference to the Jnana Yogins or the Sannyasins who have risen above all worldly concerns.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.3. Certain wise men delcare that the harmful action is to be relinished while others say that the actions of performing sacrifices, giving gifts and observing austerities should not be relinished.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.3 Some philosophers say that all action is evil and should be abandoned. Others that acts of sacrifice, benevolence and austerity should not be given up.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.3 Some sages say that all actions should be given up as evil; others declare that works such as sacrifices, gifts and austerities should not be given up.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.3 Some learned persons say that action, beset with evil (as it is), should be given up, and others (say) that the practice of sacrifice, charity and austertiy should not be given up.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.3 Some philosophers declare that actions should be abandoned as an evil; while others (declare) that acts of sacrifice, gift and austerity should not be relinished.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.3 Tyajyam etc. The harmful : that which is connected with sin, becuase it consists of act of injury etc. Such an action must be relinished and not all aciton that has auspicious result. In this way certain persons-as if they are attached (as domesticated animals do ) to the house of the Sankhyas - think of a distinction is relinishing. But there are other learned persons who put on the coat of the Mimamsakas and who, basing exclusively the scriptures, classify what action to be performed and what action not to be performed . They opine : The act of killing that constitutes the technical aspect of execution of a sacrifice is [in fact] not an act of injury at all in view of the principles, like

'The action intended for sacrifice is indeed known from the scripture only' - (SB, IV, i, 2) and
'Therefore the act of injury known from the Vedas' etc. - (SV, I, i, 2.23)

For, the general rule 'Don't injure' is annulled in this case. But, at the same time the Syena-sacrifice etc., is an act of killing. Becuase,

'The injunctive suffix does not prescribe what falls within the purveiw of fruit of an action of the injunction.' [SV, I, i, 2.222).

Therefore other [Vedic] sacrifices one should not relinish eventhough they are connected with an act of injury.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.3 Some sages, viz., the adherents of Kapila and those Vaidikas who agree with his creed, contend that all acts such as sacrifices etc., should be renounced by aspirants for release, as they bind even as desires and other similar defects tend to bind. Other learned men say that acts like sacrifices etc., should not be renounced.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.3 Eke, some; manisinah, learned ones, subscribing to the views of the Sankhyas and others; prahuh, say; that dosavat, beset with evil (as it is);-What is it?- karma, action, all actions, becuase they are the cause of bondage; tyajyam, should be given up even by those who are eligible for actions (rites and duties). Or, it (action) is to be given up dosavat, just as defects such as attachment etc. are renounced. Ca and, in that very context; apare, others; (say) that yajana-dana-tapah-karma, the practice of sacrifice, charity and auterity; na tyajyam, should not be given up. These alternatives are with regard to only those who are alified for action, but not with regard to the monks who are steadfast in Knowledge and have gone beyond the stages of life. This discussion is not concerned with those who are held to be outside the scope of eligibility for action in the assertion (by the Lord), 'The steadfastness in the Yoga of Knowledge by men of realization was spoken of by Me in the days of yore' (see 3.3). Objection: Well, just as those who are alified for rites and duties and who have their distinct steadfastness are being considered here in the chapter summarizing the entire scripture, though they have been dealt with earlier in '৷৷.through the Yoga of Action for the yogis' (3.3), similarly, let even the men of realization who are steadfast in Knowledge be considered here. Reply: No, because it is not logical that their renunciation should result from delusion and sorrow (cf. 7 and 8). The men of realization do not perceive in the Self the sorrows arising from physical torment; for it has been shown that desire etc. are attributes only of the field (body) (see 13.6). Therefore, they do not renounce action but of fear for physical trouble and pain. Nor do they perceive actions in the Self, on account of which they should give up obligatory duties out of delusion. In fact, they renounce with the conviction that 'action belongs to the organs' (see 3.28); 'I certainly do not do anything' (see 5.8); for, the mode of renunciation of an enlightened person was shown in, '৷৷.having given up all actions mentally' (5.13). Therefore, those others who are alified for rites and duties, who are unelightened about the Self, and for whom renunciation is possible out of delusion and from fear of physical trouble, are alone condemned as persons who, being possessed of tamas and rajas, resort to renunciation. And this is done with a veiw to eulogizing the renunciation of the results of rites and duties by the unenlightened men of action. Besides, the men of renunciation in the real sense have been particularly pointed out in, 'who has renounced ever undertaking,' 'who is silent, content with anything, homeless, steadyminded' (12.16, 19), and also (while determining) the characteristics of one who has transcended the gunas (Chapter 14). The Lord will further say, '৷৷.which is the supreme consummation of Knowledge' (50). Therefore the monks steadfast in Knowledge are not intended to be spoken of here. It is only the abandoning of the results of action which, by virtue of its being imbued with the ality of sattva, is spoken of as sannyasa in contrast to the renunciation of actions which is possessed of tamas etc.; it is not sannyasa in the primary-sense-the renunciation of all actions. Objection: According to the reason shown in the text, 'Since it is not possible for one who holds on to a body to give up actions entirely' (11), may it not be argued that the actions entirely' (11), may it not be argued that the word sannyasa is certainly used in the primary sense because it is impossible to abandon all works? Reply: No, for the next adducing the reason is meant for eulogy. Just as, 'From renunciation immediately (follows) Peace' (12.12), is a mere eulogy of renunciation of the fruits of action, it having been enjoined on Arjuna who was unenlightened and incapable of undertaking the various alternatives (paths) as stated earlier, so also is this sentence, 'Since it is not possible for one who holds on to a body to give up actions entirely' (11), meant for eulogizing the renunciation of the resorts of all actions. No one can point an exception to the proposition that 'having given up all actions mentally, (the embodied man of self-control) continues happily৷৷.without doing or causing (others) to do anything at all' (see 5.13). Therefore these alternative veiws regarding sannyasa and tyaga are concerned only with those who are alified for rites and duties. But the enlightened ones who have realized the supreme Truth are competent only for steadfastness in Knowledge, which is characterized by renunciation of all actions; not for anything else. Hence, they do not come within the purview of the alternative veiws. Thus has this been pointed out by us in connection with the text, '৷৷.he who knows this One as indestructible৷৷.' (2.21) as also in the beginning of the third chapter.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.3।। पूर्व श्लोक में निश्चयात्मक रूप से कहा गया था कि त्याग साधन है और संन्यास साध्य है। सांख्य सिद्धांत के समर्थकों का इस त्याग के विषय में यह मत है कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं। उनके मतानुसार? सभी कर्म वासनाएं उत्पन्न करते हैं? जो आत्मा को आच्छादित कर देती है। अत कर्मों का सर्वथा त्याग करना चाहिए। परन्तु सांख्य दर्शन के कुछ व्याख्याकार कहते हैं कि केवल उन कर्मों का ही त्याग करना चाहिए? जो कामना और स्वार्थ से प्रेरित होते हैं न कि सभी कर्म त्याज्य हैं।तत्त्वचिन्तक मनीषी जनों का यह उपदेश है कि साधकों को काम्य और निषिद्ध कर्मों का त्याग और कर्तव्य कर्मों का पालन करना चाहिए। सत्कर्मों के आचरण से ही मनुष्य का चरित्र निर्माण होता है। इन व्याख्याकारों के अनुसार यज्ञ? दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं।गीता के अध्येताओं को यह ज्ञात होना चाहिए कि भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल दोषयुक्त कर्मों को ही त्यागने का उपदेश देते हैं। उनका मनुष्य को आह्वान है कि उसको कर्म के द्वारा ही ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए। यह आध्यात्मिक साधना है। भगवान का निर्णय है कि अज्ञानी जनो को कर्म करने चाहिये। उपर्युक्त विकल्पों के विषय में वे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.3।।काम्यानि वर्जयित्वा नित्यनैमित्तिकानि फलाभिसंधि विना कर्तव्यानीत्युक्तं पक्षं प्रतिक्षनिरासेन द्रढयितुं विप्रतिपत्तिमाह -- स्याज्यमिति। दोषाऽस्यास्तीति दोषवत् बन्धहेतुतत्वात्। सर्वमेव कर्म त्याज्यं त्यक्तव्यं दोषो रागादिर्यथा त्यज्यते तद्वत्त्याज्यमिति वा। एके मनीषिणो बुद्धमन्तः पण्डिताः सांख्यदृष्टिमाश्रिता अधिकृतैः कर्मिभिरपि सर्वं कर्मं त्याज्यमिति प्राहुः कथयन्ति। ननु अधिकृतानां कर्मिणां कर्मत्यागं प्रत्यवायजनकं कथं प्राहुरितिचेत् हिंसादियुक्तकर्मत्यागे तेषामपि प्रत्यवायाभावं तदनुष्ठानं परं प्रत्यवायं चाभिप्रेत्येति गृहाण। परे मीमांसकदृष्टिमाश्रिता यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्अग्नीषोमीयं पशुमालमेत इत्यादिविधिबोधितहिंसातिरिक्तहिंसानिषेषेन हिंस्यात्सर्वाभूतानि इति वाक्यस्य सार्थक्याद्विधिबोधितं कर्म न प्रत्यवायावहं प्रत्युत विहितत्यागएव प्रत्यवायावह इत्यतः सर्वं कर्म न त्यक्तव्यमिति प्राहुः। अधिकृतान्कर्मिण एवापेक्ष्यैते विकल्पाः नतु ज्ञाननिष्ठान् त्यक्तसर्वपरिग्रहान्। ज्ञानयोगेन सांख्यानां निष्ठा मया प्रोक्तेति कर्मधिकारविनिर्मुक्तान् संन्याससिनोपेक्ष्य। ननु कर्मयोगेन योगनामित्यधिकृताः कर्म कुर्वन्तः पूर्वं विभक्तनिष्ठा अपि इह शास्त्रोसंहारप्रकरणं यथा विचार्यन्ते तथा सांख्या अपि ज्ञाननिष्ठा विचार्यन्ताम्। एवंच संन्यासिनोपेक्ष्य नत्वेते विकल्पा इत्युक्तमनुपपन्नमितिचेन्न गुणानां कर्म।नैव किंचित्करोमीतिकर्माण्यत्मन्यपश्यन्त इत्यादिनि च क्षेत्रधर्मत्वेनैव पश्यन्तो नियतं कर्म मोहात्परित्यजन्ति कायक्लेशदुःखभयाद्वा कर्म परित्यजन्तीति वक्तुमशक्यत्वेन तेषां मोहदुःखनिमित्तत्यागानुपपत्तेः।सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् इत्यादिभिस्तत्त्विदां संन्यासप्रकारस्योक्तत्वाच्च। ननूदाहृतवचने मनसेत्युक्तत्वात् न कायिकादीनां संन्यासः? सर्वकर्माणीति विशेषितत्वात्सर्वेषामिति चेन्न। मानसानामेव सर्वेषामिति तदर्थात्। कायादिव्यापाराणां कारणानि वर्जयित्वाऽन्यानि सर्वाणि कर्माणि मनसा संन्यस्येति भगवतोक्तो न जीवत इतिचेन्न। नवद्वारे पुरे देही आस्त इति विशेषाणानुपपत्तेस्तस्मादुदाहृतवचनादिभिस्तत्त्वविदः संन्यासप्रकारस्योक्तत्वात्। तेषां मोहादिनिमित्तित्यागानुपपत्तेश्च कर्मिणामनात्मज्ञानां कर्मफलत्यागस्तुत्यर्थं ये कर्मण्यधिकृता,अनात्मविदो येषां च मोहात्कायक्लेशभयाच्च त्यागः संभवति तमसास्त्यागिनो राजसाश्चेति निन्द्यन्ते।मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते।।तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येनकेनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः इत्यादिना चतुर्दशद्वादशादौ परमार्तसंन्यासिनो विशेषित्वात्। ज्ञानस्य या परा निष्ठेति वक्ष्यमाणत्वाच्च। ज्ञाननिष्ठाः संन्यासिनो नेह विवक्षिताः किंत्वतत्त्वविदः संन्यासिनस्तामसत्वाद्यपेक्षया सात्त्विकत्वेन गुणेन स्तूयन्ते। नचनहि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः िति हेतुवजनेन मुख्या एवायं संन्यास इति भ्रमितव्यम्। त्यागाच्छान्तिरनन्तरमितिवद्धेतुवजनस्तुत्यर्थत्वादिति संक्षेपः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.3।।अधुना द्वितीयप्रश्नप्रतिवचनाय संन्यासत्यागशब्दार्थस्य त्रैविध्यं निरूपयितुं तत्र विप्रतिपत्तिमाह -- त्याज्यमिति। सर्वं कर्म बन्धहेतुत्वात् दोषवद्दुष्टमतः कर्माधिकृतैरपि कर्म त्याज्यमेवेत्येके मनीषिणः प्राहुः। यद्वा दोषवद्दोष इव यथा दोषो रागादिस्त्यज्यते तद्वत्कर्म त्याज्यमनुत्पन्नबोधैरनुत्पन्नविविदिषैः कर्माधिकारिभिरपीत्यकेः पक्षः। अत्र द्वितीयः पक्षः कर्माधिकारिभिरन्तःकरणशुद्धिद्वारा विविदिषोत्पत्त्यर्थं यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे मनीषिणः प्राहुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.3।।इदमेव पक्षद्वयमाह -- त्याज्यमिति। एके मुख्याः मनीषिणो मनोनिग्रहसमर्थाः परमात्मनि उत्पन्नविविदिषाणां पुरुषाणां दोषवत् रागादयो यथा त्याज्यास्तद्वत् कर्म त्याज्यमिति प्राहुः। अपरे तु विविदिषार्थिना यज्ञादिकं न त्याज्यमिति वा प्राहुरित्यनुवर्तते। तथा च द्विविधाः श्रुतय उपलभ्यन्तेन कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुःकुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः इत्याद्याः। अविद्वद्विषयमेवैतत्पक्षद्वयम्। विदुषां तु कर्मसु प्रवृत्तिकारणस्याज्ञानस्य नष्टत्वात्स्वतःसिद्ध एव त्याग इति न तान्प्रति कर्मविधिर्वा तत्त्यागविधिर्वा प्रवर्तते। यथोक्तंन कर्माणि त्यजेद्योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.3।।किञ्च -- त्याज्यमिति। एके मनस ईषिणो मनीषिणो विवेकिनः दोषवत् कर्म ज्ञानादिसाधनरहितं त्याज्यमिति प्राहुः प्रकर्षेण प्रामाण्यादिना आहुः। अपरे कर्मवादिनो मीमांसकाः यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमित्याहुः? विहितत्वात्। तस्माद्यज्ञं परमं वदन्ति [महाना.17।10] तस्माद्दानं परमं वदन्ति [महाना.17।5] इति च तस्मात्तपः परमं वदन्ति [महाना.17।5] इति च। एतेन ते कर्मण एव ईश्वरत्वं वदन्त्यतस्तेऽपि न जानन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.3।।अविदुषः फलत्यागमात्रमेव त्यागशब्दार्थो न कर्मत्याग इत्येतदेव मतान्तरनिरासेन दृढीकर्तुं मतभेदं दर्शयति -- त्याज्यमिति। दोषवद्धिंसादिदोषवत्त्वेन बन्धकमिति हेतोः सर्वमपि कर्म त्याज्यमित्येके सांख्याः प्राहुर्मनीषिण इत्यस्यायं भावःन हिंस्यात्सर्वभूतानि इति निषेधः पुरुषस्यानर्थहेतुर्हिंसेत्याह।अग्नीषोमीयं पशुमालभेत इत्यादिप्राकरणिको विधिस्तु हिंसायाः क्रतूपकारकत्वमाह। अतो भिन्नविषयत्वेन सामान्यविशेषन्यायागोचरत्वाद्बाध्यबाधकता नास्ति। द्द्रव्यसाध्येषु च सर्वेष्वपि कर्मसु हिंसादेः संभवात्सर्वमपि कर्म त्याज्यमेवेति। तदुक्तम् -- दृष्टवदानुश्रविकः स ह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्तः इति। अस्यार्थः -- उपायो ज्योतिष्टोमादिः सोऽपि दृष्टोपायवद्गुरुपाठादनुश्रूयत इत्यनुश्रवो वेदस्तद्बोघितः। तत्राविशुद्धिर्हिंसा तया क्षयो विनाशः। अग्निहोत्रज्योतिष्टोमादिजन्यस्वर्गेषु तारतम्यं च वर्तते। परोत्कर्षस्तु सर्वान्दुःखीकरोति। अपरे तु मीमांसका यज्ञादिकं कर्म न त्याज्यमिति प्राहुः। अयं भावःक्रत्वर्थापि सतीयं हिंसा पुरुषेणैव कर्तव्या सा चान्योद्देशेनापि कृता पुरुषस्य प्रत्यवायहेतुरेव। तथाहि विधिर्विधेयस्य तदुद्देशेनानुष्ठानं विधत्ते तादर्थ्यलक्षणत्वाच्छेषत्वस्य। नत्वेवं निषेधो निषेधस्य तादर्थ्यमपेक्षते? प्राप्तिमात्रापेक्षितत्वात्। अन्यथाज्ञानप्रमादादिकृते दोषाभावप्रसङ्गात्। तदेवं समानविषयत्वेन सामान्यशास्त्रस्य विशेषेण बाधान्नास्ति दोषवत्त्वमतो नित्यं यज्ञादिकर्म न त्याज्यमिति अनेन विधिनिषेधयोः समानबलता वार्यते सामान्यविशेषन्यायं संप्रादयितुम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.3।।एके त्वाहुस्त्याज्यं दोषवदिति। कर्ममात्रं हिंसादिदोषवत्त्वात्त्याज्यमित्येके साङ्ख्याः मनीषिण इति युक्तिदर्शनात् स्तौति। अपरे मीमांसका यज्ञदानतपःकर्म सफलमपि श्रुतत्वान्न त्याज्यमित्याहुः। भ्रान्ता अप्येते एकांशतः समीचीनाः? यतः कस्मिंश्चिदप्यंशे वेदं न परित्यजन्ति। यद्यपि पूर्वेऽपि न परित्यजन्ति तथापि आपाततः प्रतीतिमादैयवमुपन्यस्तम् वस्तुतस्तुकाम्यानां इत्युक्तेऽकाम्यानां विधानमित्यर्थादुक्तं भवतीति भावेन कवित्वं तेषूक्तम्। अग्रे चविचक्षणाः इतिदोषवत् इत्युक्तेऽदोषवत्कार्यमिति मनीषिता तत्रोक्तेति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.3।।कितने ही सांख्यादि मतावलम्बी पण्डितजन कहते हैं कि जिसमें दोष हो वह दोषवत् है। वह क्या है कि बन्धनके हेतु होनेके कारण सभी कर्म दोषयुक्त हैं? इसलिये कर्म करनेवाले कर्माधिकारी मनुष्योंके लिये भी वे त्याज्य हैं? अथवा जैसे रागद्वेष आदि दोष त्यागे जाते हैं? वैसे ही समस्त कर्म भी त्याज्य हैं। इसी विषयमें दूसरे विद्वान कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्म त्याग करनेयोग्य नहीं हैं। ये सब विकल्प? कर्म करनेवाले कर्माधिकारियोंको लक्ष्य करके ही किये गये हैं। समस्त भोगोंसे विरक्त ज्ञाननिष्ट? संन्यासियोंको लक्ष्य करके नहीं। ( अभिप्राय यह कि ) सांख्ययोगियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगके द्वारा मैं पहले कह चुका हूँ इस प्रकार जो,( संन्यासी ) कर्माधिकारसे अलग कर दिये गये हैं उनके विषयमें यहाँ कोई विचार नहीं करना है। पू0 -- कर्मयोगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे कही गयी है इस कथनसे जिनकी निष्ठाका विभाग पहले किया जा चुका है? उन कर्माधिकारियोंके सम्बन्धमें जिस प्रकार यहाँ गीताशास्त्रके उपसंहारप्रकरणमें फिर विचार किया जाता है? वैसे ही? सांख्यनिष्ठावाले संन्यासियोंके विषयमें भी तो किया जाना उचित ही है। उ0 -- नहीं? क्योंकि उनका त्याग मोह या दुःखके निमित्तसे होनेवाला नहीं हो सकता। ( भगवान्ने क्षेत्राध्यायमें ) इच्छा और द्वेष आदिको शरीरके ही धर्म बतलाया है इसलिये सांख्यनिष्ठ संन्यासी शारीरिक पीड़ाके निमित्तसे होनेवाले दुःखोंको आत्मामें नहीं देखते। अतः वे शारीरिक क्लेशजन्य दुःखके भयसे कर्म नहीं छोड़ते। तथा वे आत्मामें कर्मोंका अस्तित्त्व भी नहीं देखते? जिससे कि उनके द्वारा मोहसे नियत कर्मोंका परित्याग किया जा सकता हो। सारे कर्म गुणोंके हैं? मैं कुछ भी नहीं करता ऐसा समझकर ही वे कर्मसंन्यास करते हैं? क्योंकि सब कर्मोंको मनसे त्यागकर इत्यादि वाक्योंद्वारा तत्त्वज्ञानियोंके संन्यासका प्रकार ( ऐसा ही ) बतलाया गया है। अतः जो अन्य आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी मनुष्य हैं जिनके द्वारा मोहपूर्वक या शारीरिक क्लेशके भयसे कर्मोंका त्याग किया जाना सम्भव है? वे ही तामस और राजस त्यागी हैं। ऐसा कहकर? आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारियोंके कर्मफलत्यागकी स्तुति करनेके लिये? उन राजसतामस त्यागियोंकी निन्दा की जाती है। क्योंकि सर्वारम्भपरित्यागी मौनी संतुष्टो येन केनचित् अनिकेतः स्थिरमतिः इत्यादि विशेषणोंसे ( बारहवें अध्यायमें ) और गुणातीतके लक्षणोंमें भी यथार्थ संन्यासीको पृथक् करके कहा गया है? तथा,ज्ञानकी जो परानिष्ठा है इस प्रकरणमें भी यही बात कहेंगे? इसलिये यहाँ यह विवेचन ज्ञाननिष्ठ संन्यासियोंके विषयमें नहीं है। कर्मफलत्याग ( रूपसंन्यास ) ही सात्त्विकतारूप गुणसे युक्त होनेके कारण यहाँ तामसराजस त्यागकी अपेक्षा गौणरूपसे संन्यास कहा जाता है। यह ( सात्त्विक त्याग ) सर्वकर्मसंन्यासरूप मुख्य संन्यास नहीं,है। पू0 -- न हि देहभृता इत्यादि हेतुयुक्त कथनसे यह पाया जाता है कि स्वरूपसे सर्वकर्मोंका संन्यास असम्भव है? अतः कर्मफलत्याग ही मुख्य संन्यास है। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं? क्योंकि यह हेतुयुक्त कथन कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये है। जिस प्रकार पूर्वोक्त अनेक साधनोंका अनुष्ठान करनेमें असमर्थ और आत्मज्ञानरहित अर्जुनके लिये विहित होनेके कारण,त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् यह कहना कर्मफलत्यागकी स्तुतिमात्र है। वैसे ही न हि देहभृता शक्यम् यह कहना भी कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये ही है। क्योंकि सब कर्मोंको मनसे छो़ड़कर न करता हुआ और न कराता हुआ रहता है इस पक्षका अपवाद? किसीके द्वारा भी दिखलाया जाना सम्भव नहीं है। सुतरां यह संन्यास और त्यागसम्बन्धी विकल्प? कर्माधिकारियोंके विषयमें ही है। जो यथार्थ ज्ञानी सांख्ययोगी हैं? उनका केवल सर्वकर्मसंन्यासरूप ज्ञाननिष्ठामें ही अधिकार है? अन्यत्र नहीं? अतः वे विकल्पके पात्र नहीं हैं। यही सिद्धान्त हमने वेदाविनाशिनम् इस श्लोककी व्याख्यामें और तीसरे अध्यायके आरम्भमें सिद्ध किया है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.3।। व्याख्या --   दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है।2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है।3 -- त्याज्यं दोष (टिप्पणी प0 870.1) वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं (टिप्पणी प0 870.2)। अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है।2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)।3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है (टिप्पणी प0 871.1)। ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)।4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)। सम्बन्ध --   पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.3।।काम्यानि वर्जयित्वा नित्यनैमित्तिकानि फलाभिलाषादृते कर्तव्यानीत्युक्तं पक्षं प्रतिपक्षनिराशेन द्रढयितुं विप्रतिपत्तिमाह -- त्याज्यमिति। कर्मणः सर्वस्य दोषवत्त्वे हेतुमाह -- बन्धेति। दोषवदित्येतद्दृष्टान्तत्वेन व्याचष्टे -- अथवेति। कर्मण्यनधिकृतानामकर्मिणामेव कर्म त्याज्यं कर्मिणां तत्त्यागे प्रत्यवायादित्याशङ्क्याह -- अधिकृतानामिति। नहि तेषामपि कर्म त्यजतां प्रत्यवायो हिंसादियुक्तस्य कर्मणोऽनुष्ठाने परं प्रत्यवायादिति भावः। सांख्यादिपक्षसमाप्तावितिशब्दः। मीमांसकपक्षमाह -- तत्रैवेति। कर्माधिकृतेष्वेवेति यावत्। कर्म नित्यं नैमित्तिकं च। काम्यानां कर्मणामित्यारभ्य श्लोकाभ्यां कर्मिणोऽकर्मिणोऽधिकृताननधिकृतांश्चापेक्ष्य दर्शितविकल्पानां प्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह -- कर्मिण इति। एवकारव्यवच्छेद्यमाह -- नत्विति। तदेव स्फुटयति -- ज्ञानेति। कर्माधिकृतानां ज्ञाननिष्ठातो विभक्तनिष्ठावत्त्वेन पूर्वोक्तानामपि शास्त्रार्थोपसंहारे पुनर्विचार्यत्ववज्ज्ञाननिष्ठानामपि विचार्यत्वमत्राविरुद्धमिति शङ्कते -- नन्विति। सांख्यानां परमार्थज्ञाननिष्ठानां नात्र विचार्यतेत्युत्तरमाह -- न तेषामिति। ननु तेषामपि स्वात्मनि क्लेशदुःखादि पश्यतां तदनुरोधेन राजसकर्मत्यागसिद्धेर्विचार्यत्वं नेत्याह -- न कायेति। तत्र क्षेत्राध्यायोक्तं हेतूकरोति -- इच्छादीनामिति। स्वात्मनि सांख्यादीनां क्लेशाद्यप्रतीतौ फलितमाह -- अत इति। ननु तेषां क्लेशाद्यदर्शनेऽपि स्वात्मनि कर्माणि पश्यतां तत्त्यागो युक्तस्तेषां कायक्लेशादिकरत्वान्नेत्याह -- नापीति। अज्ञानां मोहमाहात्म्यान्नियतमपि कर्म त्यक्तुं न तत्त्वविदां स्वात्मनि कर्मादर्शनेन तत्त्यागे हेत्वभावादिति मत्वाह -- मोहादिति। कथं तर्हि तेषामात्मनि कर्माण्यपश्यतां प्राप्त्यभावे तत्त्यागः संन्यासस्तत्राह -- गुणानामिति। अविवेकप्राप्तानां कर्मणां त्यागस्तत्त्वविदामित्युक्तं स्मारयन्नप्राप्तप्रतिषेधं प्रत्यादिशति -- सर्वेति। तत्त्वविदामत्राविचार्यत्वे फलितमाह -- तस्मादिति। येऽनात्मविदस्त एवेत्युत्तरत्र संबन्धः। कर्मण्यधिकृतानामनात्मविदां कर्मत्यागसंभावनां दर्शयति -- येषां चेति। तन्निन्दा कुत्रोपयुक्तेत्याशङ्क्याह -- कर्मिणामिति। किञ्च परमार्थसंन्यासिनां प्रशस्यत्वोपलम्भान्न निन्दाविषयत्वमित्याह -- सर्वेति। किंचात्रापि सिद्धिं प्राप्तो यथेत्यादिना ज्ञाननिष्ठाया वक्ष्यमाणत्वात्तद्वतां नेह,विचार्यतेत्याह -- वक्ष्यतीति। कर्माधिकृतानामेवात्र विवक्षितत्वं न ज्ञाननिष्ठानामित्युपसंहरति -- तस्मादिति। ननु संन्यासशब्देन सर्वकर्मसंन्यासस्य ग्राह्यत्वात्तथाविधसंन्यासिनामिह विवक्षितत्वं प्रतिभाति तत्राह -- कर्मेति। संन्यासशब्देन मुख्यस्यैव संन्यासस्य ग्रहणं गौणमुख्ययोर्मुख्ये कार्यसंप्रत्ययादन्यथा तदसंभवे हेतूक्तिवैयर्थ्यादप्राप्तप्रतिषेधादिति शङ्कते -- सर्वेति। नेदं हेतुवचनं सर्वकर्मसंन्याससंभवसाधकं कर्मफलत्यागस्तुतिपरत्वादिति परिहरति -- नेत्यादिना। एतदेव दृष्टान्तेन स्पष्टयति -- यथेति। दृष्टान्तेऽपि यथाश्रुतार्थत्वं किं न स्यादित्याशङ्क्याह -- यथोक्तेति। नहि फलत्यागादेव ज्ञानं विना मुक्तिर्युक्ता मुक्तेर्ज्ञानैकाधीनत्वसाधकश्रुतिस्मृतिविरोधादद्वेष्टेत्यादिना चानन्तरमेव ज्ञानसाधनविधानानर्थक्यादतस्त्यागस्तुतिरेवात्र ग्राह्येत्यर्थः। दृष्टान्तगतमर्थं दार्ष्टान्तिके योजयति -- तथेति। प्रागुक्तपक्षापवादविवक्षया हेतूक्तेर्मुख्यार्थत्वमेव किं न स्यादित्याशङ्क्य तदपवादे हेत्वभावान्मैवमित्याह -- न सर्वेति। न चेयमेव हेतूक्तिस्तदपवादिकान्यथासिद्धेरुक्तत्वादिति भावः। मुख्यसंन्यासापवादासंभवे संन्यासत्यागविकल्पस्य कथं सावकाशतेत्याशङ्क्याह -- तस्मादिति। ज्ञाननिष्ठान्प्रत्युक्तविकल्पानुपपत्तौ कुत्र तेषामधिकारस्तत्राह -- ये त्विति। संन्यासिनां विकल्पानर्हत्वेन ज्ञाननिष्ठायामेवाधिकारस्य भूयःसु प्रदेशेषु साधितत्वान्न साधनीयत्वापेक्षेत्याह -- तथेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.3।।त्याज्यं दोषवत् इत्यनेन हेयः कापिलानां पक्ष उपन्यस्त इति केचित्? तदसदिति भावेनाऽऽह -- मनीषिण इति। पूर्वपक्षः पूर्वोपन्यस्तः पक्षः। ननुयज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् [18।5] इति भगवन्मतविरुद्धोऽसौ कथं ग्राह्यः इत्यत आह -- फलत्यागेनेति। फलत्यागाभिप्रायेण यज्ञादेस्त्यागो विवक्षितः? तत्पक्षे न स्वरूपतः। कुतःमनीषिणः इति विशेषणादेव। अतो न भगवन्मतविरुद्धोऽसौ। कर्मत्यागशब्दः कथं फलत्यागेनार्थेनार्थवानित्यत आह -- यस्त्विति। नन्वेवं सति पूर्वोत्तरार्धोपन्यस्तयोः पक्षयोरविरोध आपद्यत इति चेत् सत्यं? इत्याह -- अत इति। अतो मनीषिपक्षत्वादेकोऽविरुद्धः। अयं पूर्वोत्तरार्धोपन्यस्तः किन्त्वापापप्रतीतिमपेक्ष्य सन्देहबीजत्वेन विप्रतिपत्तिरियमुद्भावितेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.3।।मनीषिण इत्युक्तत्वात्पूर्वपक्षोऽपि ग्राह्य एव। फलत्यागेन त्यागो विवक्षितः। यज्ञादेस्तत्पक्षे।यस्तु कर्मफलत्यागी [18।11] इति च वक्ष्यति। अत एक एवायं पक्षः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.3।। --,त्याज्यं त्यक्तव्यं दोषवत् दोषः अस्य अस्तीति दोषवत्। किं तत् कर्म बन्धहेतुत्वात् सर्वमेव। अथवा? दोषः यथा रागादिः त्यज्यते? तथा त्याज्यम् इति एके कर्म प्राहुः मनीषिणः पण्डिताः सांख्यादिदृष्टिम् आश्रिताः? अधिकृतानां कर्मिणामपि इति। तत्रैव यज्ञदानतपःकर्म ऩ त्याज्यम् इति च अपरे।।कर्मिणः एव अधिकृताः? तान् अपेक्ष्य एते विकल्पाः? न तु ज्ञाननिष्ठान् व्युत्थायिनः संन्यासिनः अपेक्ष्य। ज्ञानयोगेन सांख्यानां निष्ठा मया पुरा प्रोक्ता इति कर्माधिकारात् अपोद्धृताः ये? न तान् प्रति चिन्ता।।ननु कर्मयोगेन योगिनाम् (गीता 3।3) इति अधिकृताः पूर्वं विभक्तनिष्ठाः अपि इह सर्वशास्त्रार्थोपसंहारप्रकरणे यथा विचार्यन्ते? तथा सांख्या अपि ज्ञाननिष्ठाः विचार्यन्ताम् इति। न? तेषां मोहदुःखनिमित्तत्यागानुपपत्तेः। न कायक्लेशनिमित्तं दुःखं सांख्याः आत्मनि पश्यन्ति? इच्छादीनां क्षेत्रधर्मत्वेनैव दर्शितत्वात्। अतः ते न कायक्लेशदुःखभयात् कर्म परित्यजन्ति। नापि ते कर्माणि आत्मनि पश्यन्ति? येन नियतं कर्म मोहात् परित्यजेयुः। गुणानां कर्म नैव किञ्चित्करोमि इति हि ते संन्यस्यन्ति। सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य (गीता 5।13) इत्यादिभिः तत्त्वविदः संन्यासप्रकारः उक्तः। तस्मात् ये अन्ये अधिकृताः कर्मणि अनात्मविदः? येषां च मोहनिमित्तः त्यागः संभवति कायक्लेशभयाच्च? ते एव तामसाः त्यागिनः राजसाश्च इति निन्द्यन्ते कर्मिणाम् अनात्मज्ञानां कर्मफलत्यागस्तुत्यर्थम् सर्वारम्भपरित्यागी (गीता 14।25) मौनी संतुष्टो येन केनचित् (गीता 12।19)। अनिकेतः स्थिरमतिः (गीता 12।19) इति गुणातीतलक्षणे च परमार्थसंन्यासिनः विशेषितत्वात्। वक्ष्यति च निष्ठा ज्ञानस्य या परा (गीता 18।50) इति। तस्मात् ज्ञाननिष्ठाः संन्यासिनः न इह विवक्षिताः। कर्मफलत्यागः एव सात्त्विकत्वेन गुणेन तामसत्वाद्यपेक्षया संन्यासः उच्यते? न मुख्यः सर्वकर्मसंन्यासः।।सर्वकर्मसंन्यासासंभवे च न हि देहभृता इति हेतुवचनात् मुख्य एव इति चेत्? न हेतुवचनस्य स्तुत्यर्थत्वात्। यथा त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (गीता 12।12) इति कर्मफलत्यागस्तुतिरेव यथोक्तानेकपक्षानुष्ठानाशक्तिमन्तम् अर्जुनम् अज्ञं प्रति विधानात् तथा इदमपि न हि देहभृता शक्यम् (गीता 18।11) इति कर्मफलत्यागस्तुत्यर्थम् न सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नास्ते इत्यस्य पक्षस्य अपवादः केनचित् दर्शयितुं शक्यः। तस्मात् कर्मणि अधिकृतान् प्रत्येव एषः संन्यासत्यागविकल्पः। ये तु परमार्थदर्शिनः सांख्याः? तेषां ज्ञाननिष्ठायामेव सर्वकर्मसंन्यासलक्षणायाम् अधिकारः? न अन्यत्र? इति न ते विकल्पार्हाः। तच्च उपपादितम् अस्माभिः वेदाविनाशिनम् (गीता 2।21) इत्यस्मिन्प्रदेशे? तृतीयादौ च।।तत्र एतेषु विकल्पभेदेषु --,

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【 Verse 18.4 】

▸ Sanskrit Sloka: निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम | त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविध: सम्प्रकीर्तित: ||

▸ Transliteration: niścayaṁ śṛṇu me tatra tyāge bharatasattama | tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ samprakīrtitaḥ ||

▸ Glossary: niścayaṁ: certainty; śṛṇu: hear; me: from Me; tatra: there; tyāge: in the matter of renunciation; bharata sattama: O best of the Bhāratas; tyāgaḥ: renunciation; hi: certainly; puruṣavyāghra: O tiger among human beings; trividhaḥ: three kinds; samprakīrtitaḥ : is declared

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.4 Arjuna, best of Bhāratas, now listen from Me certainly about renunciation or tyāga; O tiger among men, renunciation or tyāga is declared to be of three kinds.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.4।।(टिप्पणी प0 871.2) हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.4।। हे भरतसत्तम उस त्याग के विषय में तुम मेरे निर्णय को सुनो। हे पुरुष श्रेष्ठ वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.4 निश्चयम् conclusion or the final truth? श्रृणु hear? मे My? तत्र there? त्यागे about abandonment? भरतसत्तम O best of

Chapter 18 (Part 3)

the Bharatas? त्यागः abandonment? हि verily? पुरुषव्याघ्र O best of men? त्रिविधः of three kinds? संप्रकीर्तितः has been declared (to be).Commentary Now the Lord gives His own decisive opinion. It is declared in the scriptures that renunciation is of three kinds? viz.? Sattvic? Rajasic and Tamasic. The Lord alone can teach the truth about the subject. Whoever wants to be liberated from the miseries of this world must understand the real nature of renunciation.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.4. O best of Bharata's descendants ! Listen to My considered view about relinishing : Indeed the act of relinishing is rightly spoken to be three-fold, O best among men !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.4 O best of Indians! Listen to my judgment as regards this problem. It has a threefold aspect.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.4 Listen to My decision, O Arjuna, about abandonment; for abandonment (Tyaga) is declared to be of three kinds.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.4 O the most excellent among the descendants of Bharata, hear from Me the firm conclusion regarding that tyaga. For, O greatest among men, tyaga has been clearly declared to be of three kinds.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.4 Hear from Me the conclusion or the final truth about this abandonment, O best of the Bharatas; abandonment, verily, O best of men, has been declared to be of three kinds.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.4 See Comment under 18.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.4 Regarding contradictory versions on Tyaga among disputants, listen from Me My decision. Tyaga has been described by Me in respect of actions prescribed by the scriptures from three points of view: (1) as referring to fruits, (2) as referring to acts themselves and, (3) as referring to agency. It is contained in the statement, 'Surrendering all your actions to Me with a mind focussed on the self,' and 'Free from desire and selfishness and cured of fever - fight' (3.30). The renunciation of fruits consists in the following manner. 'Heaven and such other results arising from acts do not belong to Me.' Renunciation of acts is complete abandonment of the sense of possession in regard to one's acts. This sense of possession is of the following nature: 'Those acts are mine on account of their being the means for fruits which are to be mine.' Renunciation referring to agency is the renunciation of agency of oneself by ascribing the agency to the Lord of all.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.4 Bharata-sattama, O the most excellent among the descendants of Bharata; srnu, hear, understand; me, from Me, from My statement; niscayam, the firm conclusion; tatra tyage, regarding that tyaga, regarding these alternative veiws on tyaga and sannyasa as they have been shown. Hi, for; purusavyaghra, O greatest among men; tyagah, tyaga; samprakirtitah, has been clearly declared, has been distinctly spoken of in the scriptures; to be trividhah, of three kinds, threefold, under the classes of tamasa (those based on tamas [Tamas: darkness, mental darkness, ignorance; one of the three alities of everything in Nature. Also see 14.8, and note under 2.45.-Tr.], etc. The Lord has used the word tyaga with the idea that the (primary) meanings of tyaga and sannyasa are verily the same. Since it is difficult to comprehend this idea, that the primary meanings of the words tyaga and sannyasa can be threefold under the classification based on tamas etc. in the case of one who is unenlightened and who is alified for rites and duties-but not in the case of one who has realized the supreme Goal-,therefore no one else is capable of speaking the truth in this connection. Hence, listen to the firm conclusion of the Lord with regard to the supreme Truth as revealved by the scriptures. Which, again, is this firm conclusion? In reply the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.4।। इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे त्याग के स्वरूप का सम्पूर्ण विवेचन करेंगे।सामान्य मनुष्य के लिए किसी प्रकार का भी त्याग करना सरल कार्य़ नहीं होता संचय और समृद्धि मानो मन के प्राण ही हैं। इसलिए? स्वाभाविक है कि अर्जुन के श्रेष्ठ गुणों को जागृत करने के लिए भगवान् उसे भरतसत्तम और पुरुषव्याघ्र कहकर सम्बोधित करते हैं।अध्ययन की दृष्टि से त्याग का तीन भागों में वर्गीकरण किया गया है। सम्पूर्ण गीता में यह त्रिविध वर्गीकरण पाया जाता है? और वे तीन वर्ग हैं सात्त्विक? राजसिक और तामसिक।भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.4।।एवं मतभेदेन संन्यासत्यागशब्दार्थयोस्तत्त्वं पृथगुक्त्वा स्वाभिमतं तयोरैक्यं दर्शियितुमाह -- निश्चयमिति। तत्र त्यागे त्यागसंन्यासविकल्पे मे मम वचनान्निश्चयं श्रृण्ववधारय। त्यागसंन्यासवाच्यो योर्थः स एकएवेत्यभिप्रेत्याह। त्यागस्त्रिविधः त्रिप्रकारः तामसादिप्रकारैः संप्रकीर्तितः सम्यक्शास्त्रेषु कथितः हि चस्मात्त्यागसंन्यासशब्दवाच्योऽर्थोधिकृतस्य कर्मिणोऽनात्मज्ञस्य तामसादिभेदेन त्रिविधः शास्त्रेषु संप्रकीर्तितः सर्वशास्त्र्ज्ञादीश्वरादन्येन वक्तुमशक्यः। तस्मादत्र दुर्विज्ञानेऽर्थे परमार्थशास्त्रार्थविषयमैश्वरं निश्चयमध्वसायं श्रुणु। भरतानां क्षत्रियवराणां मध्ये सत्तम साधुतमेति संबोधयन् क्षत्रियवरैः कर्तव्ये त्यागे संन्यासे च मयोत्यमानं निश्चयं श्रृण्विति ध्वनयति। न केवलं क्षत्रियवरैरेव कर्तव्ये त्यागसंन्याससश्ब्दार्थे निश्चयो मयोच्यतेऽपितु पुरुषश्रेष्ठैरन्यैपरि कर्माधिकृतैरज्ञैः कर्तव्ये तस्मन्निति ध्वनयन् संबोधयति पुरुषव्याघ्रेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.4।।निश्चयमिति। एवं विप्रतिपत्तौ तत्र त्वया पृष्टे कर्माधिकारिकर्तृके संन्यासत्यागशब्दाभ्यां प्रतिपादिते त्यागे फलाभिसन्धिपूर्वककर्मत्यागे मे मम वचनान्निश्चयं पूर्वाचार्यैः कृतं शृणु। हे भरतसत्तम? किं तत्र दुर्ज्ञेयमस्तीत्यत आह पुरुषेति। हे पुरुषव्याघ्र पुरुषश्रेष्ठ? हि यस्मात् त्यागः कर्माधिकारिकर्तृकः फलाभिसन्धिपूर्वककर्मत्यागस्त्रिविधस्त्रिप्रकारस्तामसादिभेदेन संप्रकीर्तितः। अथवा विशिष्टाभावरूपस्त्यागो विशेषणाभावाद्विशेष्याभावादुभयाभावाच्च त्रिविधः संप्रकीर्तितः। तथाहि फलाभिसन्धिपूर्वककर्मत्यागः सत्यपि कर्मणि फलाभिसन्धित्यागादेकः? सत्यपि फलाभिसन्धौ कर्मत्यागाद्वितीयः? फलाभिसन्धेः कर्मणश्च त्यागात्तृतीयः। तत्र प्रथमः सात्त्विक आदेयो द्वितीयस्तु हेयो द्विविधो दुःखबुद्ध्या कृतो राजसो विपर्यासेन कृतस्तामसः। एतावान्कर्माधिकारिकर्तृकस्त्यागोऽर्जुनस्य प्रश्नविषयः? तृतीयस्तु कर्मानधिकारिकर्तृको नैर्गुण्यरूपो नार्जुनप्रश्नविषयः। सोऽपि साधनफलभेदेन द्विविधः। तत्र सात्त्विकेन फलाभिसन्धित्यागपूर्वककर्मानुष्ठानरूपेण त्यागेन शुद्धान्तःकरणस्योत्पन्नविविदिषस्यात्मज्ञानसाधनश्रवणाख्यवेदान्तविचारस्य फलाभिसन्धिरहितस्यान्तःकरणशुद्धौ सत्यां तत्साधनस्य कर्मणो वैतुष्ये जात इवावहननस्य परित्यागः स एकः साधनभूतो विविदिषासंन्यास उच्यते? तमग्रे नैष्कर्म्यसिद्धिं परमामिति वक्ष्यति। द्वितीयस्तु जन्मान्तरकृतसाधनाभ्यासपरिपाकादस्मिञ्जन्मन्यादावेवोत्पन्नात्मबोधस्य कृतकृत्यस्य स्वत एव फलाभिसन्धेः कर्मणश्च परित्यागः फलभूतः स विद्वत्संन्यास इत्युच्यते। स तु यस्त्वात्मरतिरेव स्यादित्यादि श्लोकाभ्यां प्राग्व्याख्यातः स्थितप्रज्ञलक्षणादिभिश्च बहुधा प्रपञ्चितः। यस्मादेवं त्यागस्य तत्त्वं दुर्ज्ञेयं त्वया चोक्तं तत्त्वं वेदितुमिच्छामीति? अतो मम सर्वज्ञस्य वचनाद्विद्धीत्यभिप्रायः। संबोधनद्वयेन कुलनिमित्तोत्कर्षः पौरुषनिमित्तोत्कर्षश्च योग्यतातिशयसूचनायोक्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.4।।निश्चयमिति। तत्र कर्मणां त्यागात्त्यागविषये विप्रतिपत्तौ सत्यां प्रथमोपात्ते त्यागे विषये मे मद्वचनान्निश्चयं श्रृणु। हि यस्मात् हे पुरुषव्याघ्र? त्यागः त्रिविधः सात्त्विकराजसतामसभेदेन त्रिप्रकारः परिकीर्तितः शास्त्रे। दृढवैराग्यपूर्वकः कर्मसंन्यासः सात्त्विकः? आयासभयात्तत्त्यागो राजसः? मौढ्यात्तत्त्यागस्तामस इति? तस्माद्गहनत्वात्त्यागो निश्चयेन विचारणीय इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.4।।एवं सर्वेषां तत्त्वाज्ञानेन मतान्युक्त्वा तन्मतेषु तत्त्वज्ञानार्थं तन्मतनिश्चितं स्वमतमाह -- निश्चयमिति। तत्र बहुभिर्बहुधा प्रपञ्चिते त्यागे हे भरतसत्तम सत्कुलोत्पन्नत्वेन श्रवणयोग्य मे मत्तो निश्चयं निर्धारितं शृणु। एवमभिमुखीकृत्याऽऽह -- त्याग इति। हे पुरुषव्याघ्र पुरुषश्रेष्ठ पुरुषस्य भगवद्भजनाधिकारित्वात्तेषु श्रेष्ठत्वोक्तौ व्याघ्रत्वोक्त्या तथा श्रवणानन्तरं करणेन पौरुषप्रकटनसमर्थत्वं ज्ञापयित्वाऽऽह -- त्यागो हीति। त्यागो निश्चयेन त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः सम्यक्प्रकारेण कथितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.4।।एवं मदभेदमुपन्यस्य स्वमतं कथयितुमाह -- निश्चयमिति। तत्रैवं विप्रतिपन्ने त्यागे निश्चयं मे वचनाच्छृणु। त्यागस्य लोकप्रसिद्धत्वात्किमत्र श्रोतव्यमिति मावमंस्था इत्याह -- हे पुरुषव्याघ्र पुरुषश्रेष्ठ? त्यागोऽयं दुर्बोधः। हि यस्मादयं,कर्मत्यागस्तत्त्वविद्भिस्तामसादिभेदेन त्रिविधः सम्यग्विवेकेन प्रकीर्तितः। त्रैविध्यं चनियतस्य तु संन्यासः कर्मणः इत्यादिना वक्ष्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.4।।एवं हि श्रौतो निर्णयः? न तं निश्चिन्वन्तीति स्वयं निर्णयमाह -- निश्चयं श्रृण्विति। स एव त्यागोऽन्यथाकृतश्चेद्गौणो भवेदित्याह। त्रिविधः तामसो राजसः सात्त्विकश्चेति प्रकीर्तितः। उक्तश्लोके वा त्रिविधः कीर्त्तितः।मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्य [3।30] इत्यत्र निराशीः कामशून्यः निर्मम इति फलकर्मणोर्ममतारहितः (भूत्वा) एवं मयि कर्माणि सन्न्यस्य समर्प्य तत्कर्तृत्वं मय्यनुसन्धायतदधीनशक्तिरिदं करोमि इति धिया कृतकर्मसु कर्त्तृत्वममत्त्वफलानां त्यागो यः स सन्न्यास इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.4।।इन विकल्पभेदोंमें --, हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठतम अर्जुन उस पूर्वदर्शित त्यागके विषयमें? अर्थात् त्यागसंन्यास सम्बन्धी विकल्पोंके विषयमें? तू मेरा निश्चय सुन? अर्थात् मेरे वचनोंसे कहा हुआ तत्त्व भली प्रकार समझ। त्याग और संन्यासशब्दका जो वाच्यार्थ है वह एक ही है? इस अभिप्रायसे केवल त्यागके नामसे ही,( प्रश्नका ) उत्तर देते हैं। हे पुरुषसिंह ( उस ) त्यागका शास्त्रोंमें तामस आदि तीन प्रकारके भेदोंसे भली प्रकार निरूपण किया गया है। जिससे कि आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी -- कर्मी पुरुषका ही त्यागसंन्यासशब्दका वाच्यार्थ ( संन्यास ) तामस आदि भेदोंसे तीन प्रकारका होना सम्भव है? परमार्थज्ञानी नहीं यह अभिप्राय समझमें आना बड़ा कठिन है? इसलिये इस विषयमें यथार्थ तत्त्व बतलानेको दूसरा कोई समर्थ नहीं है? अतः तू मुझ ईश्वरका शास्त्रोंके यथार्थ अभिप्रायसे युक्त निश्चय सुन।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.4।। व्याख्या --   निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम -- हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब मैं संन्यास और त्याग -- दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ? उसको तुम सुनो।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः -- हे पुरुषव्याघ्र त्याग तीन तरहका कहा गया है -- सात्त्विक? राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही त्याग है परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उसके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.4।।कर्माधिकृतान्प्रत्येवोक्तविकल्पप्रवृत्तावपि कुतो निर्धारणसिद्धिस्तत्राह -- तत्रेति। तमेव निश्चयं दर्शयितुमादौ त्यागगतमवान्तरविभागमाह -- त्यागो हीति। ननु त्यागसंन्यासयोरुभयोरपि प्रकृतत्वाविशेषे त्यागस्यैवावान्तरविभागाभिधाने संन्यासस्योपेक्षितत्वमापद्येत नेत्याह -- त्यागेति। सात्त्विको राजसस्तामसश्चेत्युक्तेऽर्थे त्रैविध्येऽपि स्वयमेव निश्चयासंभवात्किमत्र भागवतेन निश्चयेनेत्याशङ्क्याह -- यस्मादिति। भगवतोऽन्येनोक्तविभागे तत्त्वानिश्चयाद्भागवतनिश्चयस्य श्रोतव्यतेति निगमयति -- तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.4।।न केवलं मनीषिण इति विशेषणसामर्थ्यादिवमुच्यते? किन्तु भगवताऽपि तदविरोधप्रकारस्य व्युत्पाद्यमानत्वादिति भावेनोत्तरवाक्यतात्पर्यमाह -- तदिति। न तु परमहंसानां यज्ञदानयोरभावात् कथमुच्यतेन त्याज्यं कार्यमेव तत् [18।5] इति तत्राऽऽह यज्ञेति। ननु ज्योतिष्टोमादिकमेव यज्ञो धनदानादिकमेव दानं गृहीत्वा पारमहंस्यमेव कुतो न निराक्रियते इत्यत आह -- अन्यथेति। यतिर्हंसादिः। आस्थातुं प्राप्तुम्। उत्तमाश्रमं पारमहंस्यम्। नन्वेतेषां मध्य इत्येवं व्याख्यानेऽपि कथं परमहंसानां यज्ञादिसम्भव इत्यत आह -- ज्ञानेति। बहुव्रीहित्रयगर्भः कर्मधारयोऽयम्। विद्याभयविषयं दानं येषां ते तथोक्तास्ते परमहंसाः। ननु पारमहंस्ये हि प्रवृत्तः प्रियव्रतो हिरण्यगर्भेण निवारित इति पुराणेषूच्यते [भाग.5।1।1119] तत्कथं पारमहंस्यकर्तव्यता इत्यत आह -- अत इति। उक्तवाक्याविरोधादेव वाक्यत्वाविशेषात् पुराणवाक्येनैव स्मृतेर्बाधः किं न स्यात् इत्याह -- अन्यथेति। एवमयोजने इतरेषां ब्रह्मचारीत्यादीनां गत्यन्तराभावादप्रामाण्यमेव प्रसज्यत इति शेषः। एवं परमहंसानामपि यज्ञादिकर्तव्यतासम्पादनेनेदमपि परास्तम्। यत्केनचिदुक्तम् --,अज्ञान्कर्मण्यधिकारिणोऽधिकृत्य एतत्प्रकरणं प्रवृत्तं? न परमहंसपरिव्राजकानिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.4।।तत्प्रकारं चाह -- निश्चयमित्यादिना। यज्ञभेद उक्तःद्रव्ययज्ञाः [4।28] इत्यादिना। दाने त्वभयदानमन्तर्भवति। एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद्यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः। अन्यथाब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा। यदीच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमाश्रममाश्रयेत् इत्यादिव्यासस्मृतिविरोधः। ज्ञानयज्ञविद्याभयदानब्रह्मचर्यादितपसो हि ते। अतो यद्वचोऽन्यथाप्रतीयतेऽधिकारभेदेन तद्योज्यम्। अन्यथेतरेषां गत्यभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.4।। --,निश्चयं श्रृणु अवधारय मे मम वचनात् तत्र त्यागे त्यागसंन्यासविकल्पे यथादर्शिते भरतसत्तम भरतानां साधुतम। त्यागो हि? त्यागसंन्यासशब्दवाच्यो हि यः अर्थः सः एक एवेति अभिप्रेत्य आह -- त्यागो हि इति। पुरुषव्याघ्र? त्रिविधः त्रिप्रकारः तामसादिप्रकारैः संप्रकीर्तितः शास्त्रेषु सम्यक् कथितः यस्मात् तामसादिभेदेन त्यागसंन्यासशब्दवाच्यः अर्थः अधिकृतस्य कर्मिणः अनात्मज्ञस्य त्रिविधः संभवति? न परमार्थदर्शिनः? इत्ययमर्थः दुर्ज्ञानः? तस्मात् अत्र तत्त्वं न अन्यः वक्तुं समर्थः। तस्मात् निश्चयं परमार्थशास्त्रार्थविषयम् अध्यवसायम् ऐश्वरं मे मत्तः श्रृणु।।कः पुनः असौ निश्चयः इति? आह --,

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【 Verse 18.5 】

▸ Sanskrit Sloka: यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् | यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ||

▸ Transliteration: yajñadānatapaḥ karma na tyājyaṁ kāryameva tat | yajño dānaṁ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām ||

▸ Glossary: yajña: sacrifice; dāna: charity; tapaḥ: penance; karma: activities; na: never; tyājyaṁ: to be given up; kāryaṁ: must be done; eva: certainly; tat: that; yajñaḥ: service; dānaṁ: charity; tapaḥ: austerity; ca: also; eva: certainly; pāvanāni: purifying; manīṣiṇām: even of the great souls

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.5 Acts of enriching sacrifice [tyāga], charity [dāna] and aus- terity [tapaḥ] are not to be given up; they should be performed. Indeed, even the Sages are purified by enriching sacrifice, charity and penance.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.5।।यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ? दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.5।। यज्ञ? दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं है? किन्तु वह निसन्देह कर्तव्य है यज्ञ? दान और तप ये मनीषियों (साधकों) को पवित्र करने वाले हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.5 यज्ञदानतपःकर्म acts of sacrifice? gift and austerity? न not? त्याज्यम् should be abandoned? कार्यम् should be performed? एव indeed? तत् that? यज्ञः sacrifice? दानम् gift? तपः austerity? च and? एव indeed? पावनानि purifiers? मनीषिणाम् of the wise.Commentary Acts of sacrifice? gift and austerity purify the hearts of those who have no desire for rewards. These actions are considered obligatory and ought to be performed. Actions that are skilfully performed lose their power to bind the soul and free it from earthly bondage.Now? O Arjuna? I will explain to thee that skilful way by which actions can destroye their own effect.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.5. The actions of [Vedic] sacrifice, gift and austerity should not be relinished and they must necessarily be performed; for the men of wisdom the [Vedic sacrifice, gift and also austerity are the means of purification.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.5 Acts of sacrifice, benevolence and austerity should not be given up but should be performed, for they purify the aspiring soul.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.5 (a) The acts of sacrifice, gifts and austerities should not be relinished; but should be performed৷৷.

(b). ৷৷.For sacrifices, gifts and austerities are the means of purification for the wise.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.5 The practice of sacrifice, charity and austerity is not to be abandoned; it is surely to be undertaken. Sacrifice, charity and austerity are verily the purifiers of the wise.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.5 Acts of sacrifice, gift and austerity should not be abandoned, but should be performed; sacrifice, gift and also austerity are the purifiers of the wise.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.5 See Comment under 18.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.5 Acts such as sacrifices, gifts, austerities etc., enjoined in the Vedas should not be relinished by the aspirant for release, but should be performed day after day until his death.

Why?

Acts like sacrifices, gifts and austerities associated with the different stations of life, are the means of purification for the wise., i.e., for those given to contemplation. Contemplation is worship. For the aspirants who perform such worship (Upasana) throughout their lives, they (sacrifices etc.) are a help to erase the previous Karmas which stand in the way of the fulfilment of such worship.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.5 Yajna-dana-tapah-karma, the practice of sacrifice, charity and austerity-this threefold practice; na tyajyam, is not to be abandoned; tat, it; is eva, surely; karyam, to be undertaken. Why? Yajnah, sacrifice; danam, charity; and tapah, austerity; are eva, verily; pavanani, the purifiers, the causes of sanctification; manisinam, of the wise, i.e. of those who do not seek results for themselves.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.5।। पूर्व श्लोक में कथित द्वितीय मत को स्वीकारते हुए भगवान् उस पर विशेष बल देते हैं। यज्ञ? दान और तपरूप कर्म करणीय हैं? त्याज्य नहीं। पूर्व अध्याय में हमने देखा था कि इन कर्मों का सम्यक् आचरण करने पर वे अन्तकरण को शुद्धि प्रदान करते हैं? जो आत्मोन्नति और आत्मसाक्षात्कार के लिए आवश्यक है। अविद्याजनित बन्धनों से मुक्ति पाने के इच्छुक साधकों को श्रद्धा भक्ति पूर्वक यज्ञ? दान और तप का आचरण करना चाहिए। इसके द्वारा वे आन्तरिक शान्ति और संतुलन को प्राप्त कर सकते हैं।आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.5।।प्रतिज्ञातं निश्चयं प्रदर्शयन् तत्र हेतुमाह -- यज्ञो दानं तप इत्येतन्त्रिविधं कर्म न त्याज्यं न त्यक्तव्यम्। व्यतिरेकेणोक्तमर्थमन्वयेन द्रढयति। कार्यमेव तत् त्रिविधं कर्म करणीयमेव। चो हेतौ। यस्माद्यज्ञदानतषांस्येव पावनानि विशुद्धिकराणि। पवानान्येवेति वा। मनीषिणां कुशलानां फलाभिसंधिरहितानाम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.5।।कोसौ निश्चयो विप्रतिपत्तिकोटिभूतयोः पक्षयोर्द्वितीयः पक्ष इत्याह द्वाभ्याम् -- यज्ञ इत्यादिना। चो हेतौ। यस्माद्यज्ञदानतपांसि मनीषिणामकृतफलाभिसन्धीनां पावनानि ज्ञानप्रतिबन्धकपापमलक्षालनेन ज्ञानोत्पत्तियोग्यतारूपपुण्यगुणाधानेन च शोधकानि? अकृतफलाभिसन्धीनामेव यज्ञदानतपांस्येव शोधकानि भवन्त्येव। उपाधिशुद्ध्यैवोपहितशुद्धिरत्राभिप्रेता। तस्मादन्तःकरणशुद्ध्यर्थिभिः कर्माधिकृतैर्यज्ञो दानं तप इति यत् फलाभिसंधिरहितं कर्म तन्न त्याज्यं किंतु कार्यमेव तत्। अत्याज्यत्वेन कार्यत्वे लब्धेऽप्यत्यादरार्थं पुनः कार्यमेवेत्युक्तम्। यस्मात्कार्यं कर्तव्यतया शास्त्रविहितं तस्मान्न त्याज्यमेवेति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.5।।सूचीकटाहन्यायेन त्यागस्वरूपकथनात्प्राक् परमतमत्यागपक्षं उपन्यस्यति -- यज्ञेति। यज्ञादिकं कर्म न त्याज्यं किंतु कार्यमेव विष्टिगृहीततेनेव पुंसा अवश्यमनुष्ठेयमेव तत्। अकरणे प्रत्यवायश्रवणात्। चकारो हेत्वर्थः। यस्माद्यज्ञो दानं तपश्चैव मनीषिणां निष्कामानां दम्भादिरहितानां पावनानि चित्तशोधकानि। तथा च श्रुतिःत्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचर्याचार्यकुलवासी तृतीयः सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति इति यज्ञादीनां गृहस्थधर्माणां तपसो वनस्थधर्मस्याचार्यकुलवासस्य ब्रह्मचारिधर्मस्य च पावनत्वं दर्शयति। अत्रापि यज्ञदानशब्देन गृहस्थधर्मा ज्ञेयाः? तप इति वानप्रस्थधर्माः? परिशेषात्कर्मेति ब्रह्मचारिधर्माश्च ज्ञेयाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.5।।त्रिविधत्वं पश्चाद्वक्ष्यति [18।79] पूर्वं निश्चयमाह -- यज्ञदानेति द्वयेन। यज्ञादिकं कर्म न त्याज्यं यतः कार्यमवश्यं कर्त्तव्यं तत् प्रत्यवायपरिहारार्थम्। यज्ञो यजनं? दानं तपश्च मनीषिणां ज्ञानिनां तत्स्वरूपविदुषां स्वरूपज्ञाने कृतान्येतानि पावनान्येव चित्तशोधकानि? अत एतत् त्रितयात्मकं कर्म कार्यम्। एवकारेण नान्यफलाभिलाषया कर्त्तव्यानीति व्यञ्जितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.5।।प्रथमं तावन्निश्चयमाह -- यज्ञदानेति द्वाभ्याम्। मनीषिणां विवेकिनां पावनानि चित्तशुद्धिकराणि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.5।।मीमांसकमतमेकांशतोऽङ्गीकरोति -- यज्ञेति। यज्ञो वै विष्णुः [तै.सं.1।7।4शं.ब्रा.1।3।1] इति श्रुत्या भगवत्स्वरूपो यज्ञः? दानं देवतोद्देशेन द्रव्यविसर्जनात्मकं च? तथा तपः स्वधर्माचरणं तदेतद्भगवद्धर्मपदरूपं श्रौतं कर्म न त्याज्यं मुमुक्षुणाऽपि? अपित्वाप्रायणादन्वहं कार्यमेव वेदोक्तत्वादपि कर्त्तव्यं एकांशेऽपि वेदस्यापरित्यागनियमात्। ननु कुतोऽयं कर्त्तव्यत्वविध्युपदेशः इत्यत आह -- पावनानीति। यज्ञादीनि मनीषिणां यैर्मनीषिभिर्दोषवदित्युक्तं तेषामेव गुणाधायकमिति दोषवदित्यपास्तम्। अतएव भगवदीयेन युधिष्ठिरेणयक्ष्ये विभूतीर्भवतः [भाग.10।7।3] इत्यादेशमादाय कृतमेव पावनार्थत्वात्। एतच्च भगवदीयानां कर्म कर्त्तव्यं न कर्त्तव्यं वा इत्यादिवादसंवादोपन्यासपूर्वकं भाष्ये विस्तृतमिति नेह प्रपञ्च्यते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.5।।वह निश्चय क्या है इसपर कहते हैं --, यज्ञ? दान और तप? ये तीन प्रकारके कर्म त्यागनेयोग्य नहीं हैं अर्थात् इन तीनोंका त्याग करना उचित नहीं है? इन्हें तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ? दान और तप ये तीनों बुद्धिमानोंको अर्थात् फलकामनारहित पुरुषोंको? पवित्र करनेवाले हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.5।। व्याख्या --   यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् -- यहाँ भगवान्ने दूसरोंके मत (18। 3) को ठीक बताया है। भगवान् कठोर शब्दोंसे किसीके मतका खण्डन नहीं करते। आदर देनेके लिये भगवान् दूसरेके मतका वास्तविक अंश ले लेते हैं और उसमें अपना मत भी शामिल कर देते हैं। यहाँ भगवान्ने दूसरेके मतके अनुसार कहा कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्म छोड़ने नहीं चाहिये। इसके साथ भगवान्ने अपना मत बताया कि इतना ही नहीं? प्रत्युत उनको न करते हों तो जरूर करना चाहिये -- कार्यमेव तत्। कारण कि यज्ञ? दान और तप -- तीनों कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् -- यहाँ चैव पदका तात्पर्य है कि नित्य? नैमित्तिक? जीविकासम्बन्धी? शरीरसम्बन्धी आदि जितने भी कर्तव्यकर्म हैं? उनको भी जरूर करना चाहिये क्योंकि वे भी मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।,जो मनुष्य समत्वबुद्धिसे युक्त होकर कर्मजन्य फलका त्याग कर देते हैं? वे मनीषी हैं -- कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः (गीता 2। 51)। ऐसे मनीषियोंको वे यज्ञादि कर्म पवित्र करते हैं। परन्तु जो वास्तवमें मनीषी नहीं हैं? जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं अर्थात् अपने सुखभोगके लिये ही जो यज्ञ? दानादि कर्म करते हैं? उनको वे कर्म पवित्र नहीं करते? प्रत्युत वे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं।इस श्लोकके पूर्वार्धमें यज्ञदानतपःकर्म -- ऐसा समासयुक्त पद दिया है और उत्तरार्धमें यज्ञो दानं तपः -- ऐसे अलगअलग पद दिये हैं? इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने समासयुक्त पदसे यह बताया है कि यज्ञ? दान और तपका त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको जरूर करना चाहिये और अलगअलग पदोंसे यह बताया है,कि इनमेंसे एकएक कर्म भी मनीषीको पवित्र करनेवाला है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.5।।तमेव भगवतो निश्चयं विशेषतो निर्धारयितुं प्रश्नपूर्वकमनन्तरश्लोकप्रवृत्तिं दर्शयति -- कः पुनरिति। यज्ञादीनां कर्तव्यत्वे हेतुमाह -- यज्ञ इति। न केवलमत्याज्यं किंतु कर्तव्यमेवेत्याह -- कार्यमिति। प्रतिज्ञातमेवं विभज्य हेतुं विभजते -- कस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.5।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.5।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.5।। --,यज्ञः दानं तपः इत्येतत् त्रिविधं कर्म न त्याज्यं न त्यक्तव्यम्? कार्यं करणीयम् एव तत्। कस्मात् यज्ञः दानं तपश्चैव पावनानि विशुद्धिकराणि मनीषिणां फलानभिसंधीनाम् इत्येतत्।।

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【 Verse 18.6 】

▸ Sanskrit Sloka: एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च | कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ||

▸ Transliteration: etānyapi tu karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā phalāni ca | kartavyānīti me pārtha niścitaṁ matamuttamam ||

▸ Glossary: etāni: all this; api: certainly; tu: must; karmāṇi: activities; saṅgaṁ: association; tyaktvā: renouncing; phalāni: results; ca: also; kartavyāni: as duty; iti: thus; me: My; pārtha: O son of Pritā; niścitaṁ: definite; mataṁ: opinion; uttamam: the best

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.6 O Pārtha (Arjuna), all these acts of responsibility must also be performed without any expectation of result. That is My final and ultimate opinion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.6।।हे पार्थ (पूर्वोक्त यज्ञ? दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.6।। हे पार्थ इन कर्मों को भी? फल और आसक्ति को त्यागकर करना चाहिए? यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.6 एतानि these? अपि even? तु but? कर्माणि actions? सङ्गम् attachment? त्यक्त्वा leaving? फलानि fruits? च and? कर्तव्यानि should be performed? इति thus? मे My? पार्थ O Arjuna? निश्चितम् certain? मतम् belief? उत्तमम् best.Commentary This is a summary of the doctrine of Karma Yoga enunciated before on several occasions. The fault of defect of Karma is certainly not in the action itself? but in the expectation of reward and attachment.Etani api Even these Sacrifice? charity and austerity also? in the same way as other unselfish actions. Even these refers to acts of sacrifice? charity and austerity. Actions that are performed in an unselfish spirit without attachment and idea of agency? do not stand in the way of your obtaining emancipation. When actions are done without expectation of rewards? Rajas and Tamas are destroyed and the mind is filled with Sattva or purity. Actions done with the spirit of selflessness and with discrimination are instrumental in destroying the bonds of Karma (the law of cause and effect).The Lord said Hear from Me the conclusion or the final truth about renunciation (verse 4 above). Then He said with all the force of His authority that acts of sacrifice? charity and austerity should not be given up as they are purifiers of the wise. Even these actions should be performed? etc.? is only the conclusion of what the Lord has stated in verse 4.The word Api (even) implies that the acts of sacrifice? charity and austerity should be done by an aspirant although they bind one who has attachment to the actions and a desire for their reward.Just as the seeds of trees can be rendered barren by being scorched? so the aspirant burns the fruitbearing tendency of Karma through the abandonment of the desire for the reward.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.6. Even these actions too must be performed by relinishing attachment and fruits : This is my considered best opinion, O son of Prtha !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.6 But they should be done with detachment and without thought of recompense. This is my final judgment.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.6 It is My decided and final view that even these acts should be done, O Arjuna, with relinishment of attachment and the fruits thereof.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.6 But even these actions have to be undertaken by renouncing attachment and (hankering for) results. This is My firm and best conclusion, O Parhta.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.6 But even these actions should be performed leaving aside attachment and the desire for rewards, O Arjuna; this is My certain and best conviction.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.6 See Comment under 18.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.6 Since sacrifices, gifts, austerities etc., are the means for the purification of the wise, therefore, it is My decided and final view that they should be performed as a part of my worship until one's death, renouncing attachment, viz., possessiveness towards actions and their fruits.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.6 Tu, but; api, even; etani, these; karmani, actions, viz sacrifice, charity and austerity, which have been spoken of as purifiers; kartavyani, have to be undertaken; tyaktva, by renouncing; sangam, attachment to them; and by giving up (hankering for) their phalani, results. Iti, this; is me, My; niscitam, firm; and uttamam, best; matam, conculsion. Having promised, 'hear from Me the firm conclusion regarding that (tyaga)' (4) and also adduced the reason that they are purifiers, the utterance, 'Even these actions have to be performed. This is the firm and best conclusion', is only by way of concluding the promised subject-matter; this sentence does not introduce a fresh topic. For it stands to reason that the phrase 'even these' refers to some immediate topic under discussion. The implication of the word api (even) is: 'Even these acts, which are causes of bondage to one who has attachment and who hankers after their results, have to be undertaken by a seeker of Liberation.' But the phrase 'even these' is not used in relation to other acts. Others explain (thus): Since the nityakarmas have no results, therefore (in their case) it is illogical to say, 'by giving up attachment and (hankering for their) results'. The meaning of the phrase etani api (even these) is that, 'even these rites and duties, which are undertaken for desired results and are different from the nityakarmas, have to be undertaken. What to speak of the nityakarmas like sacrifice, charity and austerity!' (Reply:) This is wrong since it has been established by the text, 'sacrifice, charity and austerity are verily the purifiers,' that even the nityakarmas have results. For a seeker of Liberation who wants to give up even the nityakarmas from fear of their being causes of bondage, how can there be any association with actions done for desired results? Moreover, the phrase etani api cannot apply to actions done for desired results (kamyakarmas), since they have been denigrated in, '৷৷.indeed, actions is ite inferior' (2.49), and in, '৷৷.by actions other than that action meant for God' (3.9), and since, on the strength of the texts [Which support the two earlier arguments.], 'the Vedas have the three alities as their object' (2.45), 'Those who are versed in the Vedas, who are drinkers of Soma,৷৷.(pray for the heavenly goal by worshipping) Me' (9.20), and 'they enter into the human world on the exhaustion of their merit' (9.21), it has been definitely stated that actions done for desired results are causes of bondage; and also because they are far removed from the context.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.6।। इन यज्ञ? दान और तपरूप कर्मों का भी पालन करना चाहिए। सम्पूर्ण गीता में संग अर्थात् आसक्ति शब्द का प्रयोग अनेक स्थलों पर हुआ है? जिसका अपना एक विशेष अर्थ है। यह शब्द? कर्तृत्वाभिमानी जीव का अपने कर्मफल के साथ संबंध बताने वाला है। उदाहरणार्थ? नव विवाहित दम्पत्ति को पुत्र की इच्छा होती है। यह सामान्य इच्छा है। परन्तु? यदि वे कहें? हमें पुत्र ही चाहिए? पुत्री नहीं? तो उनका यह आग्रह संग या आसक्ति है। ऐसा आग्रह रखना अविवेक का ही लक्षण है।आसक्ति से अभिभूत पुरुष अपने इष्टफल को प्राप्त करने में अविवेकपूर्ण या आत्मघातक चिन्ताओं से ग्रस्त हो जाता है। फल प्राप्ति के पूर्व ही उसके विषय में चिन्ता और व्याकुलता होने से मनुष्य की कार्यकुशलता समाप्तप्राय हो जाती है। इसलिए भगवान् का उपदेश है कि यज्ञादिक कर्म भी फलासक्ति के बिना करने चाहिए। यह भगवान् श्रीकृष्ण का अपना मत है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि उनका यह सर्वथा मौलिक मत है। वेदों में भी निष्काम कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है।कर्मयोग के जीवन को अपनाने से अन्तकरण की शुद्धि के द्वारा मनुष्य अपने नित्य शुद्धबुद्ध मुक्त स्वरूप का साक्षात्कार कर सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को स्नेहपूर्वक पार्थ कहकर सम्बोधित करते हैं? जो निकट का संबंध बताने वाला नाम है। भगवान् चाहते हैं कि अर्जुन इसी जीवन पद्धति का,अवलम्बन करे।यज्ञादि कर्मों की कर्तव्यता को दर्शाने के पश्चात्? भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.6।। प्रतिज्ञातमर्थपसंहरति। एतानि यज्ञदानतपांसि ससङ्गस्य फलार्थिनो बन्धहेतवोऽपि कर्माणि मुमुक्षुभिः सङ्गं कर्तृत्वाभिनिवेशं फलानि च त्यक्त्वा परित्यज्य चित्तशुद्ध्यर्थ कर्तव्यानीत्येतन्निश्चितं मम परमेश्वरस्य वासुदेवस्य मतम्। यतो ममेदं निश्चितमत उत्तमं सर्वोत्कृष्टम्। उत्तमत्वान्मम निश्चितमितिव वा। त्वया तु मत्संबन्धिना मदीयं निश्चितं मतमेवोपादेयमिति सूचनाय संबोधनं पार्थेति। यत्तु अपिशब्द एवशब्दार्थ इति भाष्यविरुद्धं अन्ये वर्णयन्ति तन्नादर्तव्यम्। सति संभवे स्वार्थत्यागस्यान्याय्यत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.6।।यदि यज्ञदानतपसामन्तःकरणशोधने सामर्थ्यमस्ति तर्हि फलाभिसन्धिना कृतान्यपि तानि तच्छोधकानि भवष्यन्ति कृतं फलाभिसन्धित्यागेनेत्यत आह -- एतान्यपीति। तुशब्दः शङ्कानिराकरणार्थः। यद्यपि काम्यान्यपि शुद्धिमादधति धर्मस्वाभाव्यात्तथापि सा तत्फलभोगोपयोगिन्येव न ज्ञानोपयोगिनी। तदुक्तं वार्तिककृद्भिःकाम्येऽपि शुद्धिरस्त्येव भोगसिद्ध्यर्थमेव सा। विड्वराहादिदेहेन न ह्यैन्द्रं भुज्यते फलं इति। ज्ञानोपयोगिनीं तु शुद्धिमादधति यानि यानि यज्ञादीनि कर्माणि एतानि फलाभिसन्धिपूर्वकत्वेन बन्धनहेतुभूतान्यपि मुमुक्षुभिः सङ्गमहमेवं करोमीति कर्तृत्वाभिनिवेशं फलानि चाभिसन्धीयमानानि त्यक्त्वाऽन्तःकरणशुद्धये कर्तव्यानीति मे मम निश्चितम्। अतएव हे पार्थ? कर्माधिकृतैः कर्माणि त्याज्यानि न त्याज्यानि वेति द्वयोर्मतयोर्न त्याज्यानीति मम निश्चितं मतमुत्तमं श्रेष्ठम्। यदुक्तं निश्चयं शृणु मे तत्रेति सोऽयं निश्चय उपसंहृतःभगवत्पूज्यपादानामभिप्रायोऽयमीरितः। अनिष्णाततया भाष्ये दुरापो मन्दबुद्धिभिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.6।।एवमत्यागपक्षमुक्त्वा औत्सुक्यात्प्रथमं स्वाभिमतं त्यागात्यागसमुच्चयपक्षं दर्शयति -- एतानीति। तुशब्दः पूर्वोपन्यस्तात्पक्षाद्वैलक्षण्यं दर्शयति। अपिशब्द एवशब्दार्थः। एतान्येव कर्माणि यज्ञदानतपांसि संङ्गं त्यक्त्वा अहमेतेषां कर्ता मयावश्यमेतानि कर्तव्यानीत्यभिमानं वयोवर्णाद्यध्यासनिमित्तं त्यक्त्वा एतैः कृतैरहं स्वर्गं वा चित्तशुद्धिं वा ज्ञानं वा प्राप्स्यामीति फलानि च त्यक्त्वा? चकारादेषामकरणे मम प्रत्यवायो भविष्यतीत्येतमप्यभिसन्धिं त्यक्त्वा ब्रह्मनिष्ठेनेवासङ्गस्वभावेन पुरुषेण कर्तव्यानीति एवं प्रकारं मे मम मतम् उत्तमं पूर्वमताच्छ्रेष्ठम्। तत्र हि कर्तृत्वाभिमानरूपेण सङ्गेन प्रत्यवायोत्पादभयाच्च कर्मानुष्ठानं विहितम्। अत्र तु तदभावादसङ्गत्वाद्यंशेन कर्मणां त्यागः स्वरूपेणात्याग इति भेदः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.6।।यथा कृतानि पावनानि भवन्ति तथाऽऽह -- एतानीति। तु पुनः पावनार्थकान्यपि एतानि यज्ञादीनि कर्माणि -- सङ्गं तदभिनिवेशं? च पुनः फलानि स्वर्गसुखादीनि (त्यक्त्वा) मदाज्ञात्वेन कर्त्तव्यानि इति मे निश्चितं पूर्वोक्तमतेषु उत्तमं मतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.6।।येन प्रकारेण कृतान्येतानि पावनानि भवन्ति तं प्रकारं दर्शयन्नाह -- एतानीति। यानि यज्ञादिकर्माणि मया पावनानीत्युक्तं एतान्येव कर्तव्यानि। कथम्। सङ्गं कर्तृत्वाभिनिवेशं त्यक्त्वा केवलमीश्वराराधनतया कर्तव्यानीति फलानि च त्यक्त्वा कर्तव्यानीति च निश्चितं मे मम मतम्। अत एवोत्तमम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.6।।एवं ब्रह्मवादिनां कर्तव्यत्वे प्राप्तेऽपि तु परन्तु सङ्गं स्वकर्तृत्वाभिनिवेशं गुणमयरोचनार्थानि फलानि चोक्तविधया त्यक्त्वा कर्तव्यानीति विचक्षणाभिमतं निश्चितं मे मतम्। उत्तमं चैतत्सर्वमतेष्वित्याह उत्तममिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.6।।जो पवित्र करनेवाले बतलाये गये हैं? ऐसे ये यज्ञ? दान और तपरूप कर्म भी तद्विषयक आसक्ति और फलका त्याग करके ही किये जाने चाहिये? अर्थात् आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक ही इनका अनुष्ठान करना उचित है। यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है। इस विषयमें मेरा निश्चय सुन इस प्रकार प्रतिज्ञा करके और ( उनकी कर्तव्यतामें ) पावनत्वरूप हेतु बतलाकर जो ऐसा कहना है कि? ये कर्म किये जाने चाहिये यह मेरा निश्चित उत्तम मत है यह प्रतिज्ञा किये हुए विषयका उपसंहार ही है? किसी अपूर्व विषयका वर्णन नहीं है क्योंकि एतानि शब्दका आशय प्रकरणमें अत्यन्त निकटवर्ती विषयको ही लक्ष्य कराना होता है। आसक्तियुक्त और फलेच्छुक मनुष्योंके लिये यद्यपि ये ( यज्ञ? दान और तपरूप ) कर्म बन्धनके कारण हैं? तो भी मुमुक्षुको ( फलआसक्तिसे रहित होकर ) करने चाहिये? यही अपि शब्दका अभिप्राय है। यहाँ,( यज्ञ? दान और तपसे अतिरिक्त ) अन्य ( काम्य ) कर्मोंको लक्ष्य करके एतानि के साथ अपि शब्दका,प्रयोग नहीं है। कुछ अन्य टीकाकार कहते हैं कि नित्यकर्मोंके फलका अभाव होनेके कारण उनको फल और आसक्ति छोड़कर कर्तव्य बतलाना नहीं बन सकता? ( अतः ) एतान्यपि इस पदका अभिप्राय यह है कि जो नित्यकर्मोंसे अतिरिक्त काम्य कर्म है वे भी करने चाहिये? फिर यज्ञ? दान और तपरूप नित्यकर्मोंके विषयमें तो कहना ही क्या है। यह अर्थ ( करना ) ठीक नहीं क्योंकि यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि इत्यादि वचनोंसे नित्यकर्मोंका भी फल होता है यह सिद्ध किया गया है। नित्यकर्मोंको भी बन्धनकारक होनेकी आशङ्कासे छोड़नेकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुकी प्रवृत्ति काम्यकर्मोंमें कैसे हो सकती है इसके सिवा सकाम कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं इस कथनमें काम्यकर्मोंकी निन्दा की जानेके कारण और,यथार्थ कर्मके अतिरिक्त अन्य कर्म बन्धन कारक हैं इस कथनसे काम्यकर्म बन्धनकारक माने जानेके कारण? एवं वेद त्रिगुणात्मक (संसार) को विषय करनेवाले हैं तीनों वेदोंको जाननेवाले सोमरस पीनेवाले पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं ऐसा कहा जानेके कारण और साथ ही काम्यकर्मोंका विषय बहुत दूर व्यवधानयुक्त होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि ) एतान्यपि यह कथन काम्यकर्मोंके विषयमें नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.6।। व्याख्या --   एतान्यपि तु कर्माणि ৷৷. निश्चितं मतमुत्तमम् -- यहाँ एतानि पदसे पूर्वश्लोकमें कहे यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंकी तथा अपि पदसे शास्त्रविहित पठनपाठन? खेतीव्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि शारीरिक कर्म और परिस्थितिके अनुसार सामने आये अवश्य कर्तव्यकर्म -- इन सभी कर्मोंको लेना चाहिये। इन समस्त कर्मोंको आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके जरूर करना चाहिये। अपनी कामना? ममता और आसक्तिका त्याग करके कर्मोंको केवल प्राणिमात्रके हितके लिये करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारके लिये और योग अपने लिये हो जाता है। परन्तु कर्मोंको अपने लिये करनेसे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं -- अपने व्यक्तित्वको नष्ट नहीं होने देते।गीतामें कहीं सङ्ग(आसक्ति) के त्यागकी बात आती है और कहीं कर्मोंके फलके त्यागकी बात आती है। इस श्लोकमें सङ्ग और फल -- दोनोंके त्यागकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि गीतामें जहाँ सङ्गके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ फलके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये और जहाँ फलके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ सङ्गके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अर्जुनने त्यागके तत्त्वकी बात पूछी है अतः भगवान्ने त्यागका यह तत्त्व बताया है कि सङ्ग (आसक्ति) और फल -- दोनोंका ही त्याग करना चाहिये? जिससे साधकको यह जानकारी स्पष्ट हो जाय कि आसक्ति न तो कर्ममें रहनी चाहिये और न फलमें ही रहनी चाहिये। आसक्ति न रहनेसे मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि कर्म करनेके औजारों(करणों)में तथा प्राप्त वस्तुओँमें ममता नहीं रहती (गीता 5। 11)।सङ्ग (आसक्ति या सम्बन्ध) सूक्ष्म होता है और फलेच्छा स्थूल होती है। सङ्ग या आसक्तिकी सूक्ष्मता वहाँतक है? जहाँ चेतनस्वरूपने नाशवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ा है। वहीँसे आसक्ति पैदा होती है? जिससे जन्ममरण आदि सब अनर्थ होते -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। आसक्तिका त्याग करनेसे नाशवान्के साथ जोड़े हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और स्वतःस्वाभाविक रहनेवाली असङ्गताका अनुभव हो जाता है।इस विषयमें एक और बात समझनेकी

Chapter 18 (Part 4)

है कि कई दार्शनिक इस नाशवान् संसारको असत् मानते हैं क्योंकि यह पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा? इसलिये वर्तमानमें भी यह नहीं है जैसे -- स्वप्न। कई दार्शनिकोंका यह मत है कि संसार परिवर्तनशील है? हरदम बदलता रहता है? कभी एक रूप नहीं रहता जैसे -- अपना शरीर। कई यह मानते हैं कि परिवर्तनशील होनेपर भी संसारका कभी अभाव नहीं होता? प्रत्युत तत्त्वसे सदा रहता है जैसे -- जल (जल ही बर्फ? बादल? भाप और परमाणुरूपसे हो जाता है? पर स्वरूपसे वह मिटता नहीं)। इस तरह अनेक मतभेद हैं किन्तु नाशवान् जडका अपने अविनाशी चेतनस्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है? इसमें किसी भी दार्शनिकका मतभेद नहीं है। सङ्गं त्यक्त्वा पदोंसे भगवान्ने उसी सम्बन्धका त्याग कहा है।प्रकृति सत् है या असत् है अथवा सत्असत्से विलक्षण है अनादिसान्त है या अनादिअनन्त है इस झगड़ेमें पड़कर साधकको अपना अमूल्य समय खर्च नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इस प्रकृतिसे तथा प्रकृतिके कार्य शरीरसंसारसे अपना सम्बन्धविच्छेद करना चाहिये? जो कि स्वतः हो ही रहा है। स्वतः होनेवाले सम्बन्धविच्छेदका केवल अनुभव करना है कि शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है और स्वयं निर्विकाररूपसे सदा ज्योंकात्यों रहता है।अब प्रश्न यह होता है कि फल क्या है प्रारब्धकर्मके अनुसार अभी हमें जो परिस्थिति? वस्तु? देश? काल आदि प्राप्त हैं? वह सब कर्मोंका प्राप्त फल है और भविष्यमें जो परिस्थिति? वस्तु आदि प्राप्त होनेवाली है? वह सब कर्मोंका अप्राप्त फल है। प्राप्त तथा अप्राप्त फलमें आसक्ति रहनेके कारण ही प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना होती है। इसलिये भगवान्ने त्यक्त्वा फलानि च (टिप्पणी प0 873) कहकर फलोंका त्याग करनेकी बात कही है।कर्मफलका त्याग क्यों करना चाहिये क्योंकि कर्मफल हमारे साथ रहनेवाला है ही नहीं। कारण यह है कि जिन कर्मोंसे फल बनता है? उन कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है अतः उनका फल भी प्राप्त और नष्ट होनेवाला ही है। इसलिये कर्मफलका त्याग करना है। फलके त्यागमें वस्तुतः फलकी आसक्तिका? कामनाका ही त्याग करना है। वास्तवमें आसक्ति हमारे स्वरूपमें है नहीं? केवल मानी हुई है।दूसरी बात? जो अपना स्वरूप होता है? उसका त्याग नहीं होता जैसे -- प्रज्वलित अग्नि उष्णता और प्रकाशका त्याग नहीं कर सकती। जो चीज अपनी नहीं होती? उसका भी त्याग नहीं होता जैसे -- संसारमें अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं परन्तु उनका हम त्याग करें -- ऐसा कहना भी नहीं बनता क्योंकि वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं। इसलिये त्याग उसीका होता है? जो वास्तवमें अपना नहीं है? पर जिसको अपना मान लिया है। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदि हमारे नहीं हैं? फिर भी उनको हम अपना मानते हैं? तो इस अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग करना है। मनुष्यके सामने कर्तव्यरूपसे जो कर्म आ जाय? उसको फल और आसक्तिका त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये -- कर्तव्यानि। कर्मयोगमें विधिनिषेधको लेकर अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है -- ऐसा विचार तो करना ही है परन्तु अमुक काम ब़ड़ा है और अमुक काम छोटा है -- ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है? वहाँ यह कर्म बड़ा है? यह कर्म छोटा है इस कर्मका फल बड़ा है? इस कर्मका फल छोटा है -- ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है? जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है। ,कर्म करना रागपूर्तिके लिये भी होता है और रागनिवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी रागनिवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करता है -- आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते (गीता 6। 3)? न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते (गीता 3। 4)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता? प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली क्रिया? सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला परहितचिन्तन तथा कारणशरीरमें होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं? अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपनेआप हो जाती है (गीता 4। 38)।कर्तव्य शब्दका अर्थ होता है -- जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है? जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है? न कि कर्मजन्य परिस्थितिरूप सुखदुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्य परिस्थिति वह होती है? जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता? नारकीयस्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है? जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी पूर्तिका अधिकार भी नहीं है।भगवान्के द्वारा अपने मतको निश्चितम् कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है? यह मत अटल है अर्थात् यह किञ्चिन्मात्र भी इधरउधर नहीं हो सकता और उत्तमम् कहनेका तात्पर्य है कि,इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है? प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है। सम्बन्ध --   इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.6।।प्रतिज्ञातमर्थमुपसंहरति -- एतान्यपीति। उपसंहारश्लोकाक्षराणि व्याकरोति -- एतानीत्यादिना। अक्षरार्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमाह -- निश्चयमिति। प्रकृतार्थोपसंहारे गमकमाह -- एतान्यपीति। अपिशब्दस्य विवक्षितमर्थं दर्शयति -- सासङ्गस्येति। व्यावर्त्यं कीर्तयति -- नत्विति। एतान्यपीत्यादिवाक्यं न नित्यकर्मविषयमिति मतमुपन्यस्यति -- अन्य इति। न चेदिदं नित्यकर्मविषयं किंविषयं तर्हीत्याशङ्क्य वाक्यमवतार्य व्याकरोति -- एतानीत्यादिना। नित्यानामफलत्वमुपेत्य यच्चोद्यं तदयुक्तमिति दूषयति -- तदसदिति। यत्तु काम्यान्यपि कर्तव्यानीति तन्निरस्यति -- नित्यान्यपीति। किञ्च काम्यानां भगवता निन्दितत्वान्न तेषु मुमुक्षोरनुष्ठानमित्याह -- दूरेणेति। किञ्च मुमुक्षोरपेक्षितमोक्षापेक्षया विरुद्धफलत्वात्काम्यकर्मणां न तेषु तस्यानुष्ठानमित्याह -- यज्ञार्थादिति। काम्यानां बन्धहेतुत्वं निश्चितमित्यत्रैव पूर्वोत्तरवाक्यानुकूल्यं दर्शयति -- त्रैगुण्येति। किञ्च पूर्वश्लोके यज्ञादिनित्यकर्मणां प्रकृतत्वादेतच्छब्देन संनिहितवाचिना परामर्शात्काम्यकर्मणां चकाम्यानां कर्मणाम् इति व्यवहितानां संनिहितपरामर्शकैतच्छब्दाविषयत्वान्न काम्यकर्माण्येतान्यपीति व्यपदेशमर्हतीत्याह -- दूरेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.6।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.6।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.6।। --,एतान्यपि तु कर्माणि यज्ञदानतपांसि पावनानि उक्तानि सङ्गम् आसक्तिं तेषु त्यक्त्वा फलानि च तेषां परित्यज्य कर्तव्यानि इति अनुष्ठेयानि इति मे मम निश्चितं मतम् उत्तमम्।।निश्चयं शृणु मे तत्र (गीता 18।4) इति प्रतिज्ञाय? पावनत्वं च हेतुम् उक्त्वा? एतान्यपि कर्माणि कर्तव्यानि इत्येतत् निश्चितं मतमुत्तमम् इति प्रतिज्ञातार्थोपसंहार एव? न अपूर्वार्थं वचनम्? एतान्यपि इति प्रकृतसंनिकृष्टार्थत्वोपपत्तेः। सासङ्गस्य फलार्थिनः बन्धहेतवः एतान्यपि कर्माणि मुमुक्षोः कर्तव्यानि इति अपिशब्दस्य अर्थः। न तु अन्यानि कर्माणि अपेक्ष्य एतान्यपि इति उच्यते।।अन्ये तु वर्णयन्ति -- नित्यानां कर्मणां फलाभावात् सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च इति न उपपद्यते। अतः एतान्यपि इति यानि काम्यानि कर्माणि नित्येभ्यः अन्यानि? एतानि अपि कर्तव्यानि? किमुत यज्ञदानतपांसि नित्यानि इति। तत् असत्? नित्यानामपि कर्मणाम् इह फलवत्त्वस्य उपपादितत्वात् यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि (गीता 18।5) इत्यादिना वचनेन। नित्यान्यपि कर्माणि बन्धहेतुत्वाशङ्कया जिहासोः मुमुक्षोः कुतः काम्येषु प्रसङ्गः दूरेण ह्यवरं कर्म (गीता 2।49) इति च निन्दितत्वात्? यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र (गीता 3।9) इति च काम्यकर्मणां बन्धहेतुत्वस्य निश्चितत्वात्? त्रैगुण्यविषया वेदाः (गीता 2।45) त्रैविद्या मां सोमपाः (गीता 9।19) क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (गीता 9।21) इति च? दूरव्यवहितत्वाच्च? न काम्येषु एतान्यपि इति व्यपदेशः।।तस्मात् अज्ञस्य अधिकृतस्य मुमुक्षोः --,

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【 Verse 18.7 】

▸ Sanskrit Sloka: नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते | मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित: ||

▸ Transliteration: niyatasya tu sannyāsaḥ karmaṇo nopapadyate | mohāttasya parityāgas tāmasaḥ parikīrtitaḥ ||

▸ Glossary: niyatasya: prescribed duties; tu: but; sannyāsaḥ: renunciation; karmaṇaḥ: ac- tivities; na: never; upapadyate: is deserved; mohāt: by illusion; tasya: of which; parityāgaḥ: renunciation; tāmasaḥ: in the mode of ignorance; parikīrtitaḥ: is declared

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.7 Prescribed duties should never be renounced. If one gives up his prescribed duties through the illusion of renunciation, this is said to be in the state of ignorance.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.7।।नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.7।। नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है मोहवश उसका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.7 नियतस्य obligatory? तु verily? संन्यासः renunciation? कर्मणः of action? न not? उपपद्यते is proper? मोहात् from delusion? तस्य of the same? परित्यागः abandonment? तामसः Tamasic? परिकीर्तितः is declared.Commentary Renunciation of obligatory action is not proper because it is purifying in the case of an ignorant man. Should a man renounce actions that he should perform as a duty? such renunciation can only be of the ality of darkness. Prescribed duties must not be abandoned and if anyone does so? he is certainly deluded by ignorance. Tamas is ignorance.Niyata Prescribed according to ones religion. To hold that a duty is obligatory and then to relinish it is indeed selfcontradictory.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.7. The renunciation of the enjoined action does not stand to reason; and completely relinishing it, out of ignorance is proclaimed, on all sides, as an act of the Tamas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.7 It is not right to give up actions which are obligatory; and if they are misunderstood, it is the result of sheer ignorance.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.7 But the renunciation of obligatory acts is not proper. Abandonment of these through delusion is declared to be Tamasika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.7 The abandoning of daily obligatory acts (nityakamas) is not justifiable. Giving up that through delusion is declared to be based on tamas.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.7 Verily the renunciation of obligatory action is not proper; the abandonment of the same from delusion is declared to be Tamasic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.7 See Comment under 18.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.7 Obligatory acts consist of daily, and occasional ceremonies like the five great sacrifices; their abandonment is not proper, for without actions even the sustenance of the body would be impossible, as already stated: 'From no-work, not even the body can be sustained' (3.8). The sustenance of the body by eating the sacrificial remnants produces perfect knowledge. Otherwise, as declared in the statement, 'But the sinful ones eat sin' (3.13). The satisfaction that comes by eating food which is not the remnant of sacrifice and which is therefore of the form of sin, is productive of erroneous knowledge in the mind. For, as declared in the Sruti, 'The mind consists of food' (Cha. U., 6.5.4), the mind is sustained by food. Also, there is the Sruti text, 'When the food is pure, the mind becomes pure; when the mind is pure, remembrance becomes firmly fixed; and when remembrance is acired, there is release from all knots of the heart' (Ibid., 7.26.2). It is therefore proved by the Sruti that knowledge of the form of direct perception of Brahman, is dependent on the purity of food. Hence the great sacrifices and such other obligatory and occasional rites are worthy of adoption till one's death, as they help in the knowledge of the Brahman. The renunciation of these is therefore not proper. Thus, the relinishment of these acts which produce knowledge through the delusion that they bind the self, is rooted in Tamas.

Tamasika renunciation has its roots in Tamas. Since such renunciation has its roots in ignorance which is the effect of Tamas, such renunciation is said to have its roots in Tamas. For Tamas is the root of ignorance as has been stated: 'From Tamas arise negligence and delusion, and also, ignorance' (14.17). Ignorance is erroneous knowledge which is antagonistic to right knowledge. So, it will be taught, 'That reason which, enveloped in Tamas, regards wrong as right, and which reverses every value, O Arjuna, is Tamasika' (18.32). It is for this reason that the renunciation of obligatory and occasional actions are said to have their roots in erroneous knowledge.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.7 Therefore, sannyasah, the abandoning; niyatasya tu karmanah, of the daily obligatory acts, by the seeker of Liberation who is as yet unenlightened and is fit for rites and duites; na apapadyate, is not justifiable, because what is desired is the purification of unenlightened persons. Parityagah, giving up; tasya, of that, of the daily obligatory duty; mohat, through delusion, through ignorance; parikirtitah, is declared; to be tamasah, based on tamas. Niyata is that duty which must be performed. That an act is niyata (obligatory) and it is relinished is contradictory. Therefore the giving up of that through delusion is declared to be based on tamas, for delusion is tamas. Besides,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.7।। नियत अर्थात् कर्तव्य कर्मों का त्याग अत्यन्त निम्नस्तर का तामस त्याग माना गया है। नित्य और नैमित्तक कर्मों के सम्मिलित रूप को ही नियत कर्म कहते हैं। जब तक मनुष्य अपने समाज के एक सदस्य के रूप में जीवन यापन करता है? तब तक उसे वह समाज? सुरक्षा तथा उन्नति का लाभ भी प्रदान करता है। अत हिन्दू नीति के अनुसार? मनुष्य को अपने कर्तव्यों को त्यागने का कोई अधिकार नहीं है।यदि कोई व्यक्ति अज्ञानवश अपने नैतिक कर्तव्यों का त्याग करता है तब भी वह क्षम्य नहीं है। जैसे? संविधान के और भौतिक जगत् के प्राकृतिक नियमों के पालन के संबंध में नियम का अज्ञान क्षम्य नहीं माना जाता? वैसे ही आध्यात्मिक क्षेत्र में भी यही नियम लागू होता है। अज्ञान और अविवेक के कारण यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य पालन के द्वारा समाज सेवा नहीं करता है? तो उसका यह त्याग मूढ़ अर्थात् तामसिक त्याग है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.7।।स्वाध्यवसायमुक्त्वा त्यागस्य त्रैविध्यं दर्शयितुमारभते। नियतस्य नित्यस्य तु कर्मणः मुमुक्षोरज्ञास्याधिकृतस्य संन्यासः परित्यागो नोपपद्यते नोपपन्नो भवति नियतमवश्यकर्तव्यं त्यज्यते चेति विप्रतिषिद्धत्वात्। मोहात्पावनत्वापरिज्ञानात्तस्य नियतस्यावश्यकर्तव्यतया वेदविहितस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः। मोहश्च तमस्तन्निमित्तकत्वादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.7।।तदेवंयज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे इति स्वपक्षः स्थापितः। इदानींत्याज्यं दोषवदित्येके,कर्म प्राहुर्मनीषिणः इति परपक्षस्य पूर्वोक्तत्यागत्रैविध्यव्याख्यानेन निराकरणमारभते -- नियतस्य त्विति। काम्यस्य कर्मणोऽन्तःकरणशुद्धिहेतुत्वाभावेन बन्धहेतुत्वेन च दोषत्वाद्बन्धनिवृत्तिहेतुबोधार्थिना क्रियमाणस्त्याग उपपद्यत एव। नियतस्य तु नित्यस्य कर्मणः शुद्धिहेतुत्वेनादोषस्य संन्यासस्त्यागो मुमुक्षुणान्तःकरणशुद्ध्यर्थिना नोपपद्यते शास्त्रयुक्तिभ्यां तस्यान्तःकरणशुद्ध्यर्थमवश्यानुष्ठेयत्वात्। तथाचोक्तं प्राक्आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्मकारणमुच्यते इति। ननु दोषवत्त्वं काम्यस्येव नित्यस्यापि दर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादेर्व्रीहिपश्वादिहिंसामिश्रितत्वेन सांख्यैरभिहितम्। नचव्रीहीनवहन्तिअग्नीषोमीयं पशुमालभेत इत्यादिविशेषविधिगोचरत्वात् क्रत्वङ्गहिंसायाःन हिंस्यात्सर्वाभूतानि इति सामान्यनिषेधस्य तदितरपरत्वमिति सांप्रतम्। भिन्नविषयत्वेन विधिनिषेधयोरबाधेनैव समावेशसंभवात्। निषेधेन हि पुरुषस्यानर्थहेतुर्हिंसेत्यभिहितं न त्वक्रत्वर्था सेति विधिना क्रत्वर्था सेत्यभिहितं न त्वनर्थहेतुर्नेति। तथाच क्रतूपकारकत्वपुरुषानर्थहेतुत्वयोरेकत्र संभवात् क्रत्वर्थापि हिंसा निषिद्धैवेति हिंसायुक्तं दर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादि सर्वं दुष्टमेव। विहितस्यापि निषिद्धत्वं निषिद्धस्यापि च विहितत्वं श्येनादिवदुपपन्नमेव। तथाहिश्येनेनाभिचरन्यजेत इत्याद्यभिचारविधिना विहितोऽपि श्येनादिःन हिंस्यात्सर्वाभूतानि इति निषेधविषयत्वादनर्थहेतुरेव? तद्दोषसहिष्णोरेव च रागद्वेषादिवशीकृतस्य तत्राधिकारः? एवं ज्योतिष्टोमादावपि। तथाचोक्तं महाभारतेजपस्तु सर्वधर्मेभ्यः परमो धर्म उच्यते। अहिंसया हि भूतानां जपयज्ञः प्रवर्तते इति। मनुनापिजप्येनैव तु संसिध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः। कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते इति वदता मैत्रीमहिंसां प्रशसंता हिंसाया दुष्टत्वमेव प्रतिपादितम्। अन्तःकरणशुद्धिश्चेदृशेन गायत्रीजपादिना सुतरामुपपत्स्यत इति हिंसादिदोषदुष्टं ज्योतिष्टोमादि नित्यं कर्म दोषासहिष्णुना श्येनादिकमिव कर्माधिकारिणापि त्याज्यमिति प्राप्ते ब्रूमः। न क्रत्वर्था हिंसाऽनर्थहेतुः विधिस्पृष्टे निषेधानवकाशात्। तथाहि विधिना बलवदिच्छाविषयसाधनताबोधरूपां प्रवर्तनां कुर्वताऽनर्थसाधने तदनुपपत्तेः स्वविषयस्य प्रवर्तनागोचरस्यानर्थसाधनत्वाभावोऽप्यर्थादाक्षिप्यते तेन विधिविषयस्य नानर्थहेतुत्वं युज्यते। नहि क्रत्वर्थत्वं साक्षाद्विध्यर्थो येन विरोधो न स्यात् किंतु प्रवर्तनेनैव। प्रवर्तनाकर्मभूता तु पुरुषप्रवृत्तिः पुरुषार्थमेव विषयीकुर्वती क्वचित्क्रतुमपि पुरुषार्थसाधनत्वेन पुरुषार्थभावमापन्नं विषयीकरोतीत्यन्यत्। पुरुषप्रवृत्तिश्च बलवदिच्छोपधानदशायां जायमाना न भाव्यस्यार्थहेतुतामाक्षिपति न वाऽनर्थहेतुतां प्रतिक्षिपति? किंतु यथाप्राप्तमेवावलम्बते। बलवदिच्छाविषये स्वत एव प्रवृत्तेः स्वर्गादौ विध्यनपेक्षणात्। अतएव विहितश्येनफलस्यापि शत्रुवधरूपस्याभिचारस्यानर्थहेतुत्वमुपपद्यत एव? फलस्य विधिजन्यप्रवृत्तिविषयत्वाभावात्। विधिजन्यप्रवृत्तिविषयं तु धात्वर्थं करणं प्रवर्तनावलम्बते सा चानर्थहेतुं न विषयीकरोतीति विशेषविधिबाधितं सामान्यनिषेधवाक्यं रागद्वेषादिमूलाक्रत्वर्थलौकिकहिंसाविषयं? तेन श्येनाग्नीषोमीययोर्वैषम्यादुपपन्नमदुष्टत्वं? ज्योतिष्टोमादेर्विधिस्पृष्टस्यापि निषेधविषयत्वे षोडशिरग्रहणस्याप्यनर्थहेतुत्वापत्तिः? नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णातीति निषेधात्। तस्मान्न किंचिदेतदिति भाट्टदर्शनम्। प्राभाकरं तु दर्शनं फलसाधने रागत एव प्रवृत्तिसिद्धेर्न नियोगस्य प्रवर्तकत्वं? तेन श्येनस्य रागजन्यप्रवृत्तिविषयत्वेन विधेरौदासीन्यान्न तस्यानर्थहेतुत्वं विधिना प्रतिक्षिप्यते। अग्नीषोमीयहिंसायां तु क्रत्वङ्गभूतायां फलसाधनत्वाभावे रागाभावाद्विधिरेव प्रवर्तकः। स च स्वविषयस्यानर्थहेतुतां प्रतिक्षिपतीति प्रधानभूता हिंसानर्थं जनयति न क्रत्वर्थेति न हिंसामिश्रत्वेन ज्योतिष्टोमादेर्दुष्टत्वमिति सममेव। एतावन्मात्रे तु विशेषःचोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः इत्यत्रार्थपदव्यावर्त्यत्वेनाधर्मत्वं श्येनादेः प्राभाकरमते। भाट्टमते तु श्येनफलस्यैवाभिचारस्यानर्थहेतुत्वादधर्मत्वं? श्येनस्य तु विहितस्य समीहितसाधनस्य धर्मत्वमेवार्थपदव्यावर्त्यत्वं तु कलञ्जभक्षणादेर्निषिद्धस्यैवेति। फलतोऽनर्थहेतुत्वेन तु शिष्टानां श्येनादौ न धर्मत्वेन व्यवहारः। तदुक्तंफलतोऽपि च यत्कर्म नानर्थेनानुबध्यते। केवलप्रीतिहेतुत्वात्तद्धर्म इति कथ्यते इति। तार्किकाणां तु दर्शनं कृतिसाध्यत्वमर्थहेतुत्वमनर्थाहेतुत्वं चेति त्रयं विध्यर्थः। तत्र क्रत्वर्थहिंसायां साक्षान्निषेधाभावात्प्रायश्चित्तानुपदेशाच्च कृतिसाध्यत्वार्थहेतुत्ववदनर्थाहेतुत्वमपि विधिना बोध्यत इति न तस्यानर्थहेतुत्वम्। श्येनादेस्त्वभिचारस्य साक्षादेव निषेधात्प्रायश्चित्तोपदेशाच्चानर्थहेतुत्वावगमात्तावन्मात्रं तत्र विधिना न बोध्यत इत्युपपन्नं श्येनाग्नीषोमयोर्वैलक्षण्यम्। औपनिषदैस्तु भाट्टमेव दर्शनं व्यवहारे प्रायेणावलम्बितम्। तथाच भगवद्बादरायणप्रणीतं सूत्रंअशुद्धमिति चेन्न शब्दात् इति ज्योतिष्टोमादिकर्माग्नीषोमीयहिंसादिमिश्रितत्वेन दुष्टमितिचेत् न।अग्नीषोमीयं पशुमालभेत इत्यादिविधिशब्दादित्यक्षरार्थः। जपप्रशंसापरं तु वाक्यं न,क्रत्वर्थहिंसाया अधर्मत्वबोधकं तस्य तत्रातात्पर्यात्। तथाच सांख्यानां विहिते निषिद्धत्वज्ञानमनर्थाहेतावनर्थहेतुज्ञानं धर्मे चाधर्मत्वज्ञानमनुष्ठेये चाननुष्ठेयत्वज्ञानं विपर्यासरूपो मोहः। तस्मान्मोहान्नित्यस्य कर्मणो यः परित्यागः स तामसः परिकीर्तितः। मोहो हि तमः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.7।।प्राक् प्रतिज्ञातं त्यागत्रैविध्यमाह -- नियतस्येति। तुशब्दः पूर्वोक्तपक्षद्वयवैलक्षण्यार्थः। यस्मादधिकृतस्य मुमुक्षोर्नियतस्यावश्यानुष्ठेयस्य कर्मणः संन्यासः स्वरूपेण त्यागो नोपपद्यते न युज्यते। अज्ञस्य शुद्ध्यपेक्षत्वात्। एवं सति यो मोहादज्ञानात्तस्य नियतस्य कर्मणः परित्यागः स तामसः परिकीर्तितः। आवश्यकं च त्यज्यते चेति विप्रतिषेधात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.7।।एवं निश्चितार्थमुक्त्वा पूर्वोक्तत्रैविध्यमाह -- नियतस्येति त्रयेण। नियतस्य तु? नियतस्य भक्त्यङ्गत्वेनोक्तस्य पुनः कर्मणः सन्न्यासस्त्यागो नोपपद्यते न उप समीपे भगवतः पद्यते? प्राप्तो भवतीत्यर्थः। अतस्तादृशकर्मणस्त्याग एव मोक्षार्थक इति मोहात् भ्रमेण यस्तस्य परित्यागः स तामसः अज्ञानात्मकः परिकीर्तितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.7।। प्रतिज्ञातं त्यागस्य त्रैविध्यमिदानीं दर्शयति -- नियतस्येति त्रिभिः। काम्यस्य कर्मणो बन्धकत्वात्संन्यासो युक्तः। नियतस्य तु नित्यस्य पुनः कर्मणः संन्यासस्त्यागो नोपपद्यते? सत्त्वशुद्धिद्वारा मोक्षहेतुत्वात्। अतस्तस्य परित्यागः उपादेयेऽपि त्याज्यमित्येवं लक्षणान्मोहादेव भवेत्। स च मोहस्य तामसत्वात्तामसः परिकीर्तितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.7।।कवीनां मतं दूषयति -- नियतस्येति। कामोपनिबन्धेनापि वेदेन नियन्त्रितस्य नियमविहितस्य तु कर्मणः स्वरूपतस्त्यागः सन्न्यासः कार्य इत्युक्तः कविभिः स नोपपद्यते? ब्रह्मवादिनां वैदिकानां क्वचिदप्यंशे वेदोक्तस्यापरित्यागात्। यदि मोहादज्ञानात्तामसात्तस्य वैदिकस्य कर्मणस्त्यागः श्रौतेन क्रियमाणः स्यात्तदा मोहहेतुकत्वात् स त्यागस्तामसः परिकीर्तितः? तमःकार्यभूतेन मोहेन जायमानत्वात्प्रमादमोहौ तमसो भवतः [14।17] इत्यादिवाक्यात् प्रत्यवायावहश्चेति पर्युपसर्गार्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.7।।अतः आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी मुमुक्षुके लिये --, विहित -- नित्यकर्मोंका संन्यास यानी परित्याग करना नहीं बन सकता? क्योंकि अज्ञानीके लिये नित्यकर्म शुद्धिके हेतु माने गये हैं। अतः मोहसे अज्ञानपूर्वक ( किया हुआ ) उन नित्यकर्मोंका परित्याग ( तामस कहा गया है )। नियत अवश्य कर्तव्यको कहते हैं? फिर उसका त्याग किया जाना अत्यन्त विरुद्ध है? अतः यह मोहनिमित्तक त्याग तामस कहा गया है। मोह ही तम है? यह प्रसिद्ध है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.7।। व्याख्या --   [तीन तरहके त्यागका वर्णन भगवान् इसलिये करते हैं कि अर्जुन कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते थे -- श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके (गीता 2। 5) अतः त्रिविध त्याग बताकर अर्जुनको चेत कराना था? और आगेके लिये मनुष्यमात्रको यह बताना था कि नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना भगवान्को मान्य (अभीष्ट) नहीं है। भगवान् तो सात्त्विक त्यागको ही वास्तवमें त्याग मानते हैं। सात्त्विक त्यागसे संसारके सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है।दूसरी बात? सत्रहवें अध्यायमें भी भगवान् गुणोंके अनुसार श्रद्धा? आहार आदिके तीनतीन भेद कहकर आये हैं? इसलिये यहाँ भी अर्जुनद्वारा त्यागका तत्त्व पूछनेपर भगवान्ने त्यागके तीन भेद कहे हैं।]नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने त्यागके विषयमें अपना जो निश्चित उत्तम मत बताया है? उससे यह तामस त्याग बिलकुल ही विपरीत है और सर्वथा निकृष्ट है? यह बतानेके लिये यहाँ तु पद आया है।नियत कर्मोंका त्याग करना कभी भी उचित नहीं है क्योंकि वे तो अवश्यकर्तव्य हैं। बलिवैश्वदेव आदि यज्ञ करना? कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थधर्मके अनुसार उसको अन्न? जल आदि देना? विशेष पर्वमें या श्राद्धतर्पणके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराना और दक्षिणा देना? अपने वर्णआश्रमके अनुसार प्रातः और सांयकालमें सन्ध्या करना आदि कर्मोंको न मानना और न करना ही नियत कर्मोंका त्याग है।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः -- ऐसे नियत कर्मोंको मूढ़तासे अर्थात् बिना विवेकविचारके छोड़ देना तामस त्याग कहा जाता है। सत्सङ्ग? सभा? समिति आदिमें जाना आवश्यक था? पर आलस्यमें पड़े रहे? आराम करने लग गये अथवा सो गये घरमें मातापिता बीमार हैं? उनके लिये वैद्यको बुलाने या औषधि लानेके लिये जा रहे थे? रास्तेमें कहींपर लोग ताशचौपड़ आदि खेल रहे थे? उनको देखकर खुद भी खेलमें लग गये और वैद्यको बुलाना या ओषधि लाना भूल गये कोर्टमें मुकदमा चल रहा है? उसमें हाजिर होनेके समय हँसीदिल्लगी? खेलतमाशा आदिमें लग गये और समय बीत गया शरीरके लिये शौचस्नान आदि जो आवश्यक कर्तव्य हैं? उनको आलस्य और प्रमादके कारण छोड़ दिया -- यह सब तामस त्यागके उदाहरण हैं।विहित कर्म और नियत कर्ममें क्या अन्तर है शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है? वे सभी विहित कर्म कहलाते हैं। उन सम्पूर्ण विहित कर्मोंका पालन एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता क्योंकि शास्त्रोंमें सम्पूर्ण वारों तथा तिथियोंके व्रतका विधान आता है। यदि एक ही मनुष्य सब वारोंमें या सब तिथियोंमें व्रत करेगा तो फिर वह भोजन कब करेगा इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके लिये सभी विहित कर्म लागू नहीं होते। परन्तु उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण? आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यक होता है? उसके लिये वह नियत कर्म कहलाता है। जैसे ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र -- चारों वार्णोंमें जिसजिस वर्णके लिये जीविका और शरीरनिर्वाहसम्बन्धी जितने भी नियम हैं? उसउस वर्णके लिये वे सभी नियत कर्म हैं।नियत कर्मोंका मोहपूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है तथा सुख और आरामके लिये त्याग,करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है। सुखेच्छा? फलेच्छा तथा आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मोहमें उलझ जाना तामस पुरुषका स्वभाव है? सुखआराममें उलझ जाना राजस पुरुषका स्वभाव है और इन दोनोंसे रहित होकर सावधानीपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करना सात्त्विक पुरुषका स्वभाव है। इस सात्त्विक स्वभाव अथवा सात्त्विक त्यागसे ही कर्म और कर्मफलसे सम्बन्धविच्छेद होता है। राजस और तामस त्यागसे नहीं क्योंकि राजस और तामस त्याग वास्तवमें त्याग है ही नहीं।लोग सामान्य रीतिसे स्वरूपसे कर्मोंको छोड़ देनेको ही त्याग मानते हैं क्योंकि उन्हें प्रत्यक्षमें वही त्याग दीखता है। कौन व्यक्ति कौनसा काम किस भावसे कर रहा है? इसका उन्हें पता नहीं लगता। परन्तु भगवान् भीतरकी कामनाममताआसक्तिके त्यागको ही त्याग मानते हैं क्योंकि ये ही जन्ममरणके कारण हैं (गीता 13। 21)।यदि बाहरके त्यागको ही असली त्याग माना जाय तो सभी मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये क्योंकि उनकी तो सम्पूर्ण वस्तुएँ छूट जाती हैं और तो क्या? अपना कहलानेवाला शरीर भी छूट जाता है और उनको वे वस्तुएँ प्रायः यादतक नहीं रहतीं अतः भीतरका त्याग ही असली त्याग है। भीतरका त्याग होनेसे बाहरसे वस्तुएँ अपने पास रहें या न रहें? मनुष्य उनसे बँधता नहीं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.7।।नित्यकर्मणामवश्यकर्तव्यत्वमुक्तमुपजीव्यापेक्षितं पूरयन्ननन्तरश्लोकमवतारयति -- तस्मादिति। ननु कश्चिन्नियतमपि कर्म त्यजन्नुपलभ्यते तत्राह -- मोहादिति। अज्ञानं पावनत्वापरिज्ञानम्। अज्ञस्य नित्यकर्मत्यागो मोहादित्येतदुपपादयति -- नियतं चेति। नित्यकर्मत्यागस्य मोहकृतत्वे कुतस्तामसत्वमित्याशङ्क्याह -- मोहश्चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.7।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.7।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.7।। --,नियतस्य तु नित्यस्य संन्यासः परित्यागः कर्मणः न उपपद्यते? अज्ञस्य पावनत्वस्य इष्टत्वात्। मोहात् अज्ञानात् तस्य नियतस्य परित्यागः -- नियतं च अवश्यं कर्तव्यम्? त्यज्यते च? इति विप्रतिषिद्धम् अतः मोहनिमित्तः परित्यागः तामसः परिकीर्तितः मोहश्च तमः इति।।

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【 Verse 18.8 】

▸ Sanskrit Sloka: दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्यजेत् | स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||

▸ Transliteration: duḥkhamityeva yat karma kāyakleśabhayāttyajet | sa kṛtvā rājāsaṁ tyāgaṁ nai’va tyāgaphalaṁ labhet ||

▸ Glossary: duḥkhaṁ: unhappy; iti: thus; eva: certainly; yat: that which; karma: work; kāya: body; kleśa: troublesome; bhayāt: out of fear; tyajet: gives up; sa: that; kṛtvā: after doing; rājāsaṁ: in the mode of aggression; tyāgaṁ: renunciation; nai’va: certainly not; tyāga: renounced; phalaṁ: results; labhet: gain

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.8 Anyone who gives up prescribed duties as troublesome, or out of fear, is said to be in the state of aggression, does not benefit from renunciation.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.8।।जो कुछ कर्म है? वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे? तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.8।। जो मनुष्य? कर्म को दुख समझकर शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है? वह पुरुष उस राजसिक त्याग को करके कदापि त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.8 दुःखम् (it is) painful? इति thus? एव even? यत् which? कर्म action? कायक्लेशभयात् from fear of bodily trouble? त्यजेत् abandons? सः he? कृत्वा performing? राजसम् Rajasic? त्यागम् abandonment? न not? एव even? त्यागफलम् the fruit of abandonment? लभेत् obtains.Commentary Phalam Fruit or reward Moksha or emancipation which is the reward of renunciation of all actions accompanied with wisdom.Determination and persistence are reired for the performance of religious duties and actions. One may begin action but may relinish it before it is completed on account of some difficulties or physical suffering. What then is Sattvic renunciation The Lord says --

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.8. He who would, out of fear of bodily exertion, relinish an action, just because it is painful-that person, having [thus] made relinishment, an act of the Rajas (Strand), would not at all gain the fruit of [that] relinishment.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.8 To avoid an action through fear of physical suffering, because it is likely to be painful, is to act from passion, and the benefit of renunciation will not follow.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.8 He who renounces acts as painful from fear of bodily suffering, performs a Rajasika abandonment; he does not gain the fruit of abandonment.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.8 Whatever action one may relinish merely as being painful, from fear of physical suffering, he, having resorted to renunciation based on rajas, will surely not acire the fruits of renunciation.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.8 He who abandons action on account of the fear of bodily trouble (because it is painful), does not obtain the merit of renunciation by doing such Rajasic renunciation.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.8 See Comment under 18.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.8 Although actions constitute the indirect menas for release, yet they produce mental depression, since they can be done only by collecting materials involving painful effort and since they cause bodily strain on account of their reiring strenuous exertion. If, on account of such fear, one decides that the practice of knowledge alone should be tried for perfection in Yoga, and abandons actions like the great sacrifices applicable to one's station in life, he practises renunciation rooted in Rajas. Since that is not the meaning of the Sastras, one cannot win the fruit of renunciation in the form of the rise of knowledge. So it will be shown further one: 'That reason by which one erroneously knows, O Arjuna, is Rajasika' (18.31). In fact, actions do not directly cause purity of the mind but indirectly by winning the grace of God.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.8 Yat, whatever; karma, action; tyajet, one may relinish, eva, merely; iti, as being; kuhkham, painful; [As being impossible to accomplish.] kaya-klesa-bhayat, from fear of physical suffering, out of fear of bodily pain; sah, he; krtva, having resorted; tyagam, to renunciation; rajasam, based on rajas, arising from rajas; will eva, surely; na labhet (shuld rather be labhate), not acire; tyaga-phalam, fruits of renunciation, the result called Liberation, which follows from renunciation of all actions as a conseence of Illumination. Which, again, is the renunciation based on sattva?

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.8।। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य कर्म को दुखदायक समझकर कायाक्लेश के भय से त्याग दे? तो उसका त्याग राजस कहा जायेगा। इसका अभिप्राय यह है कि यदि कर्तव्य कर्म दुखदायक और थकाने वाले न हों? तो रजोगुणी पुरुष उन्हें करने में तत्पर रहेगा? परन्तु कर्मशील पुरुष होकर जो अपनी व्यक्तिगत सुखसुविधाओं का त्याग नहीं कर सकता? उसे श्रेष्ठ और साहसी पुरुष कदापि नहीं कहा जा सकता। ऐसे कर्मों का कोई विशेष पुरस्कार नहीं मिलता। भगवान् तो कहते हैं? वह अपने त्याग का कोई फल प्राप्त नहीं करता है।वस्तुत अपने कर्तव्यों का पालन ही महानतम त्याग है? और विशेषत तब वह और भी अधिक श्रेष्ठ बन जाता है? जब मनुष्य को अपनी शारीरिक सुख सुविधाओं का भी त्याग करना पड़ता है। स्वयं अर्जुन भी युद्ध करने में संकोच करके अपने कर्तव्य से विमुख हो रहा था। इस प्रकार? उसका त्याग राजस श्रेणी का ही कहा जा सकता था।वास्तविक त्याग हमें सदैव आत्माभिव्यक्ति के विशालतर क्षेत्र में पहुँचाता है? जहाँ हम श्रेष्ठतर दिव्य आनन्द का अनुभव कर सकते हैं। त्याग के द्वारा ही एक कली खिलकर फूल बन जाती है? और वह फूल अपनी कोमल पंखुड़ियों और मनमोहक सुगन्ध का त्याग कर ही फल के सम्पन्न पद को प्राप्त होता हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.8।।एवं तामसत्यागप्रकारमुक्त्वा राजसं तमाह -- दुःखमिति। मोहाभावेऽपि दुःखमेवेति मत्वा यत्कर्म कायक्लेशभयाच्छरीरदुःखभयात्त्यजेत्। यदित्यव्ययं वा। यस्त्यजेदित्यर्थः। स राजसं रजोनिर्वत्तं त्यागं कृत्वा ज्ञानपूर्वकस्य सर्वकर्मत्यागस्य फलं मोक्षाख्यं नैव लभेत्। एवकारेणैतादृशत्यागवता मोक्षाशापि न कर्तव्येति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.8।।दुःखमिति। पूर्वोक्तमोहाभावेऽप्यनुपजातान्तःकरणशुद्धितया कर्माधिकृतोऽपि दुःखमेवेदमिति मत्वा कायक्लेशभयान्नित्यं कर्म त्यजेदिति यत् स त्यागो राजसः। दुःखं हि रजोऽतः स मोहरहितोऽपि राजसः पुरुषस्तादृशं राजसं त्यागं कृत्वा नैव त्यागफलं सात्त्विकत्यागस्य फलं ज्ञाननिष्ठालक्षणं नैव लभेन्न लभेत।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.8।।एवं तामसं त्यागमुक्त्वा राजसं त्यागमाह -- दुःखमिति। यः दुःखरूपमेवेदं कर्मेति मत्वा कालक्लेशभयात् यत्त्यजेत् स पुमान् तस्मादेव हेतोः राजसं रजोगुणनिर्वृत्तं त्यागं कृत्वा त्यागफलं चित्तशुद्धिद्वारा मोक्षं नैव लभेत् लभेत।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.8।।राजसमाह -- दुःखमित्येवेति। त्यागो भगवदासक्त्या भगवदर्थक इत्यज्ञात्वा दुःखमित्येव लौकिकराजससुखप्रतिबन्धकं ज्ञात्वा कायक्लेशभयात् आयाससाध्यभयेन यत्कर्म यस्त्यजेत्? स राजसं त्यागं कृत्वा त्यागफलं मत्प्रसादादिरूपं न लभेदेव? न प्राप्नोत्येवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.8।।राजसं त्यागमाह -- दुःखमिति। अकर्त्रात्मबोधं विना केवलं दुःखमित्येवं ज्ञात्वा शरीरायासभयान्नित्यं कर्म त्यजेदिति यत्तादृशस्त्यागो राजसः? दुःखस्य राजसत्वात्। अतस्तं राजसं त्यागं कृत्वा राजसः पुरुषस्त्यागस्य फलं ज्ञाननिष्ठालक्षणं नैव लभत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.8।।प्रसङ्गादेव राजसमप्याह -- दुःखमिति। नियतस्यैव यस्य परम्परया मोक्षसाधनभूतस्यापि दुःखात्मकद्रव्यार्जनसाध्ययज्ञात्मकतया बह्वायासरूपतया च त्यागो राजसः रजोहेतुकत्वाद्राजसं त्यागं कृत्वा तत्फलं ज्ञाननिष्ठालक्षणं न लभेत सत्त्वसञ्जातत्वाज्ज्ञानस्येत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.8।।तथा --, समस्त कर्म दुःखरूप हैं? ऐसा मानकर जो कोई शारीरिक क्लेशके भयसे कर्मोंको छोड़ बैठता है? वह,( ऐसा ) राजस त्याग करके? त्यागका फल अर्थात् ज्ञानपूर्वक किये हुए सर्वकर्मसंन्यासका मोक्षरूप फल? नहीं पाता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.8।। व्याख्या --   दुःखमित्येव यत्कर्म -- यज्ञ? दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है? और उनमें है ही क्या क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है -- इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःखहीदुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर? शास्त्रोंपर? शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धाविश्वास नहीं होता।,कायक्लेशभयात्त्यजेत् -- राजस मनुष्यको शास्त्रमर्यादा और लोकमर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें क्लेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है (टिप्पणी प0 876)। राजस मनुष्यको अपने वर्ण? आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और मातापिता? गुरु? मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भङ्ग करके जैसी मरजी आये? वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि गृहस्थमें आराम नहीं मिलता? स्त्रीपुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं? घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं? खुदको तकलीफ उठानी पड़ती है? इसलिये साधु बन जायँ तो आरामसे रहेंगे? रोटी? कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी? परिश्रम नहीं करना पड़ेगा कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय? जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें? हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके? हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी? इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका कामधन्धा करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं।यहाँ शङ्का होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बारबार देखनेकी बात कही है (गीता 13। 8) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है -- इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है? प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलगअलग है। वहाँ (गीता 13। 8 में) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये? पर कर्तव्यकर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है? उन भोगोंमें बारबार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा? जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्त होगी परन्तु नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा -- यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः (गीता 3। 9)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी? जिससे कल्याण होगा और कर्तव्यमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा? जिससे पतन होगा।कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस -- ये दो भेद होते हैं? पर परिणाम(आलस्य? प्रमाद? अतिनिद्रा आदि) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं? जिसका फल अधोगति होता है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)।एक शङ्का यह भी हो सकती है कि सत्सङ्ग? भगवत्कथा? भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्यकर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है। इसलिये उसका वह कर्तव्यकर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है? उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्यजन्मका ध्येय है अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्यकर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है? प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य? प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य? प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् -- त्यागका फल शान्ति है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल(शान्ति) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है? वह अपने सुखआरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशुपक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुखआरामके लिये शुभकर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती? पर शुभकर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.8।।इतश्च नित्यकर्मत्यागो नाज्ञस्य संभवतीत्याह -- किञ्चेति। ननु मोहं विनैव दुःखात्मकं कर्म कायक्लेशभयात्त्यजति। करणानि हि कार्यं जनयन्ति श्राम्यन्ति च? तथाच न तत्त्यागस्तामसो युक्तस्तत्राह --,दुःखमित्येवेति। यत्कर्म दुःखात्मकमशक्यसाध्यमित्येवालोच्य ततो निवर्तते देहस्येन्द्रियाणां च क्लेशात्मनो भयात्त्यजति स तत्त्यक्त्वा रजोनिमित्तं त्यागं कृत्वापि न तत्फलं मोक्षं लभते? किंतु कृतेनैव राजसेन त्यागेन तदनुरूपं नरकं प्रतिपद्यत इत्याह -- दुःखमित्येवेत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.8।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.8।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.8।। --,दुःखम् इति एव यत् कर्म कायक्लेशभयात् शरीरदुःखभयात् त्यजेत्? सः कृत्वा राजसं रजोनिर्वर्त्यं त्यागं नैव त्यागफलं ज्ञानपूर्वकस्य सर्वकर्मत्यागस्य फलं मोक्षाख्यं न लभेत् नैव लभेत।।कः पुनः सात्त्विकः त्यागः इति? आह --,

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【 Verse 18.9 】

▸ Sanskrit Sloka: कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन | सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्विको मत: ||

▸ Transliteration: kāryam ity eva yat karma niyataṁ kriyate’rjuna | saṅgaṁ tyaktvā phalaṁ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ ||

▸ Glossary: kāryaṁ: must be done; iti: thus; eva: thus; yat: that which; karma: work; ni- yataṁ: prescribed; kriyate :

Chapter 18 (Part 5)

performed; arjuna: O Arjuna; saṅgaṁ: association; tyaktvā: giving up; phalaṁ: result; ca: also; eva: certainly; saḥ: that; tyāgaḥ: renunciation; sāttvikaḥ: in the mode of goodness; mataḥ: in My opinion.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.9 But he who performs what is prescribed, as a matter of duty, without expectation or attachment to the results, his renunciation is of the nature of satva, goodness, O Arjuna.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.9।।हे अर्जुन केवल कर्तव्यमात्र करना है -- ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है? वही सात्त्विक त्याग माना गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.9।। हे अर्जुन कर्म करना कर्तव्य है ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर किया जाता है? वही सात्त्विक त्याग माना गया है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.9 कार्यम् ought to be done? इति thus? एव even? यत् which? कर्म action? नियतम् obligatory? क्रियते is performed? अर्जुन O Arjuna? सङ्गम् attachment? त्यक्त्वा abandoning? फलम् fruit? च and? एव even? सः that? त्यागः abandonment? सात्त्विकः Sattvic (pure)? मतः is regarded.Commentary A man of pure nature performs actions that have fallen to his lot in accordance with his capacity and his inherent nature. He is not filled with the pride that he is the performer of such actions nor does he hope for any gain therefrom.An ignorant man may think that the obligatory duties may produce their fruits for the performer by causing selfpurification and preventing the sin of omission or nonperformance. This sort of thinking and expectation of rewards also must be abandoned. Abandonment of the rewards of actions is praised in this verse.When a man does obligatory duties without agency and with unselfishness and egolessness his,mind is purified? his Antahkarana is prepared for the reception of the divine light or the dawn of Selfknowledge. He gradually becomes fit for devotion to knowledge (JnanaNishtha).The aspirant or seeker after liberation should be prepared to undergo physical sufferings. All acts of selfdiscipline and selfsacrifice entail physical suffering.This? again? is the central teaching of the Gita -- do your duty without attachment and selfish desires.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.9. 'This is a thing to be performed.'-just on that ground whatever usual action is performed relinishing attachment and also fruit-that act of relinishment is deemed to be of the Sattva (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.9 He who performs an obligatory action, because he believes it to be a duty which ought to be done, without any personal desire to do the act or to receive any return - such renunciation is Pure.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.9 When actions are performed as what ought to be done, O Arjuna, renouncing attachment and also fruits, such abandonment is regarded as Sattvika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.9 Whatever obligatory duty is performed just because it is a bounden duty, O Arjuna, by giving up attachment and the result as well,-that renunciation is considered to be based on sattva.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.9 Whatever obligatory action is done, O Arjuna, merely because it ought to be done, abandoning attachment and also the desire for reward, that renunciation is regarded as Sattvic (pure).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.9 See Comment under 18.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.9 When rites like obligatory and occasional ceremonies and the great sacrifices enjoined on one's station and stage in life, are practised for their own sake, as worship of Myself and as a duty, relinishing possessiveness and fruits - such abandonment is regarded as Sattvika. It is noted in Sattva. The idea is that it is rooted in the knowledge of the meaning of the Sastras as it really is. That Sattva generates the knowledge of things as they really are, has been taught in: 'From Sattva arises knowledge' (14.17), and it will be further declared: 'That reason by which one knows action and renunciation, what ought to be done and what ought not to be done, fear and fearlessness, bondage and release, O Arjuna, is Sattvika' (18.30).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.9 Yat, whatever; niyatam karma, daily obligatory duty; kriyate, is performed, accomplished; iti eva, just because; it is karyam, a bounden duty; O Arjuna, tyaktva, by giving up; sangam, attachment; and phalam, the result; ca eva, as well; sah, that; tyagah, renunciation, giving up of attachment and (hankering for) the resutls of daily obligatory duties; matah, is considered; to be sattvikah, based on sattva, arising from sattva. We said that the Lord's utterance is proof of the fruitfulness of daily obligatory duties. Or, even if the niyakarmas be understood (from the Lord's worlds) to be fruitless, still the ignorant man does certainly imagine that the nityakarmas (daily obligatory duites) when performed produce for oneself a result either in the form of purification of the mind or avoidance of evil. As to this, the Lord aborts even that imagination by saying, 'by giving up the result'. Hence it has been well said, 'by giving up attachment and the result'. Objection: Well, is not the threefold relinishment of actions, also called sannyasa, under discussion? As regards this, the renunciation based on tamas and rajas have been stated. Why is the relinishment of attachment and (desire for their) results spoken of here as the third? This is like somody saying, 'Three Brahmanas have come. Of them two are versed in the six auxiliaries [The six auxiliaries are: Siksa (Phonetics), Kalpa (Code of Rituals and Sacrifices), Vyakarana (Grammar), Nirukta (Etymology), Chandas (Meter, Prosody), and Jyotisa (Astronomy).-Tr.] of the Vedas; the third is a Ksatirya!' Reply: This is not wrong, for this is meant as a eulogy on the basis of the common factor of renunciation. Between renunciation of actions and renunciation. of hankering for results, there is, indeed, the similarity of the fact of renunciation. While on this subject, by condemning 'renunciation of actions' on account of its being based on rajas and tamas, the 'renunciation of desire for results of actions' is being praised on account of its being based on sattva, by saying, 'that renunciation is considered to be based on sattva.' The internal organ of a person who is alified for rites and duties, who performs the nityakarmas by giving up attachment and hankering for results, becomes pure on account of its being untainted by attachment to results etc. and refined by the nitya-karmas. When it is pure and tranil, it becomes capable of contemplating on the Self. Since, for that very person whose internal organ has become purified by performing the nityakarmas and who has become ready for the knowledge of the Self, the process by which he can become steadfast in it has to be stated, therefore the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.9।। सात्त्विक पुरुष इस भावना से कर्म करते हैं कि नियत कर्मों का पालन करना कर्तव्य है और उनका त्याग करना अत्यन्त अपमान जनक एवं लज्जास्पद कार्य है। कर्तव्य के त्याग को वे अपनी मृत्यु ही मानते हैं। ऐसे अनुप्राणित पुरुषों का त्याग सात्त्विक कहलाता है।कर्मों में कुछ अपरिहार्य प्रतिबन्ध होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश केवल इतना ही है कि हमको इन प्रतिबन्धों के बिना अपने कर्म करते रहना चाहिए। अभिप्राय यह है कि कर्म फल से आसक्ति होने पर ही वह कर्म हमें बन्धन में बद्ध कर सकता है? अन्यथा नहीं। अत? वास्तविक त्याग फलासक्ति का होना चाहिए? कर्मों का नहीं। इसीलिए? आसक्ति रहित कर्तव्यों के पालन को यहाँ सात्विक त्याग कहा गया है। भगवान् के उपदेशानुसार? अपने मन में स्थित स्वार्थ? कामना? आसक्ति आदि का त्याग ही यथार्थ त्याग है जिसके द्वारा हमें अपने परमानन्द स्वरूप की प्राप्ति होती है। यह त्याग कुछ ऐसा ही है? जैसे हम अन्न को ग्रहण कर क्षुधा का त्याग करते हैं अहंकार और स्वार्थ का त्याग करके कर्तव्यों के पालन से मनुष्य अपनी वासनाओं का क्षय करता है और आन्तरिक शुद्धि को प्राप्त करता है। इस प्रकार? त्याग तो मनुष्य को और अधिक शक्तिशाली और कार्यकुशल बना देता है।किस प्रकार यह सात्त्विक पुरुष आत्मानुभव को प्राप्त करता है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.9।।एवं राजसत्यागप्रकारमुक्त्वा सात्त्विकं तमाह -- कार्यमिति। सङ्गं कर्तत्वाभिनिवेशं फलं च त्यक्त्वा वाहय कार्यं कर्तव्यमित्येव नियतं नित्यं यत्कर्म क्रियते स त्यागः सात्त्विको मतः। ननु नित्यानां विध्युद्देशे फलावश्रवणात्तेषां फलं त्यक्त्वेति कथमुक्तमिति चेत् नित्यानां कर्मणां फलवत्त्वे भगवद्वचनं प्रमाणमिति गृहाण। अन्यथा भगवद्वजनमनर्थकं स्यात्। यद्वा विधिना कृतस्य कर्मण आनर्थक्ये विध्यानर्तक्यप्रसङ्गात्। श्रौतफलाभावेऽपि कर्माधिकृतोज्ञो नित्यं कर्मकृतमात्मसंस्कारं प्रत्यवायपरिहारं च फलं कर्तुः करोतीति कल्पयति तामपि कल्पनां निवारयति भगवान् फलं त्यक्त्वेति। अयमेव त्यागश्चित्तशुद्धिहेतुरिति सूचनार्थमर्जुनेति संबोधनम्। ननु कर्मपरित्यागस्त्रिविधो मत इति त्यागस्य त्रैविध्यं प्रस्तुत्य सङ्गफलत्यागस्य तृतीयत्वेन कथनमयुक्तम्। यथा त्रयो ब्राह्मणा आगतास्तत्र सषडङ्गवेदविदौ द्वौ क्षत्रियस्तृतीय इति तद्वदिति चेन्नैष दोषः। कर्मसंन्यासस्य सङ्गफलत्यागस्य च त्यागसामान्येन राजसतामसत्वेन राजसतामसत्वेन कर्मत्यागनिन्दया सङ्गफलत्यागस्य तृतीयत्वेन प्रदर्शनस्य सात्त्विकत्वेन स्तुत्यर्थत्वादित्येवमाचार्यैः प्रतिज्ञातं त्यागत्रविध्यं त्रिभिः श्लोकैः प्रदर्शितम्। केचित्तु विशिष्टाभावरुपपत्यागो विशेषणाभावाद्विशेष्याभावादुभयाभावाच्च त्रिविधः संप्रकीर्तितः। तथाहि फलाभिसंधिपूर्वककर्मत्यागः सत्यपि कर्मणि फलाभिसंधित्यागादेकः। सत्यपि फलाभिसंधौ कर्मत्यागाद्वितीयः।,फलाभिसंधेः कर्मणश्च त्यागात्तृतीयः। तत्र प्रथमः सात्त्विक आदेयत्वेनात्रैव विधित्सितः। द्वितीयस्तु नैष्कर्म्यसिद्धिं परमामित्यत्र वक्ष्यति इति वर्णयन्ति। अस्मिन्पक्षे एकस्मिन्द्वयोरन्तर्भावं कृत्वा तृतीयः प्रदेशान्तरे प्रक्षिप्त इति प्रतिज्ञाया अनिर्वाहो भगवतो महदकौशलतापादको द्रष्टव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.9।।कर्मत्यागस्तामसो राजसश्च हेयो दर्शितः? कीदृशः पुनरुपादेयः सात्त्विकस्त्याग इत्युच्यते -- विध्युद्देशे फलाश्रवणेऽपि कार्यं कर्तव्यमेवेति बुद्ध्वा नियतं नित्यं कर्मसङ्गं कर्तृत्वाभिनिवेशं फलं च त्यक्त्वैव यत्क्रियतेऽन्तःकरणशुद्धिपर्यन्तं स त्यागः सात्त्विकः सत्त्वनिर्वृत्तो मत आदेयत्वेन संमतः शिष्टानाम्। ननु नित्यानां फलमेव नास्ति कथं फलं त्यक्त्वेत्युक्तम्। उच्यते। अस्मादेव भगवद्वचनान्नित्यानां फलमस्तीति गम्यते निष्फलस्यानुष्ठानासंभवात्। तथाचापस्तम्बःतद्यथाम्रे फलार्थे निमिते छायागन्ध इत्यनूत्पद्यत एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते इत्यानुषङ्गिकं फलं नित्यानां दर्शयति। अकरणे प्रत्यवायस्मृतिश्च। नित्यानां प्रत्यवायपरिहारं फलं दर्शयतिधर्मेण पापमपनुदति तस्माद्धर्मं परमं वदन्ति येन केचन जयेतापि वा दर्वीहोमेनानुपहतमना एव भवति तदाहुर्देवयाजी श्रेयानात्मयाजीत्यात्मयाजीतिह ब्रूयात्सह वा आत्मयाजी यो वेदेदं मेऽनेनाङ्ग ्ँ स ्ँ स्क्रियत इदमनेनाङ्गमुपधीयते इत्यादयः श्रुतयश्च ज्ञानप्रतिबन्धकपापक्षयलक्षणं ज्ञानयोग्यतारूपपुण्योत्पत्तिलक्षणं चात्मसंस्कारं नित्यानां कर्मणां फलं दर्शयन्ति? तदभिसधिं त्यक्त्वा तान्यनुष्ठेयानीत्यर्थः। यदुक्तंत्यागसंन्यासशब्दौ घटपटशब्दाविव न भिन्नजातीयार्थौ किंतु फलाभिसन्धिपूर्वककर्मत्याग एव तयोरर्थ इति। तन्न विस्मर्तव्यम्। तत्र सत्यपि फलाभिसन्धौ मोहाद्वा कायक्लेशभयाद्वा यः कर्मत्यागः स विशेष्याभावकृतो विशिष्टाभावस्तामसत्वेन राजसत्वेन च निन्दितः। यस्तु सत्यपि कर्मणि फलाभिसन्धित्यागः स विशेषणाभावकृतो विशिष्टाभावः सात्त्विकत्वेन स्तूयत इति विशेष्याभावकृते विशेषणाभावकृते च विशिष्टाभावत्वस्य समानत्वान्न पूर्वापरविरोधः। उभयाभावकृतस्तु निर्गुणत्वान्न विरोधमध्ये गणनीय इति चावोचाम। एतेनत्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः इति प्रतिज्ञाय कर्मत्यागलक्षणे द्वे विधे दर्शयित्वा प्रतिज्ञाननुरूपां कर्मानुष्ठानलक्षणां तृतीयां विधामदर्शयतो भगवतः प्रकटमकौशलमापतितं नहि भवति? त्रयो ब्राह्मणा भोजयितव्या द्वौ कठकौण्डिन्यौ तृतीयः क्षत्रिय इति तद्वदिति परास्तम्। तिसृणामपि विधानां विशिष्टाभावरूपेण त्यागसामान्येनैकजातीयतया प्राग्व्याख्यातत्वात्। तस्माद्भगवदकौशलोद्भावनमेव महदकौशलमिति द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.9।।एवं द्वाभ्यां श्लोकाभ्यां तामसराजसौ मुख्यावेव त्यागावुक्तौ। तामसराजसयोरमुख्यत्यागयोरसंभवस्य भगवतैव मोहात्तस्य परित्याग इति कायक्लेशभयाः त्यजेदिति च सूचनात्। नह्येवं संभवति। मूढश्च करोति चेति विप्रतिषेधात्। यदि करोति नैव मूढः? यदि मूढस्तर्हि नैव करोति। एवं यदि कायक्लेशाद्बिभेति नैव करोति? यदि करोति नैव कायक्लेशाद्बिभेति तस्मात्करोति च कायक्लेशाद्बिभेति चेति विप्रतिषिद्धम्। अतस्तामसराजसयोरमुख्यत्यागयोरसंभवात्तौ नैवोक्तौ। सात्त्विकस्त्वमुख्यत्यागः संभवति। यथा स्फटिके जपाकुसुमाश्रिते लौहित्यं विवेकिनां प्रतीतित एवास्ति न वस्तुत एवमात्मनि ईश्वराधीने विवेकिनां कर्तृत्वं प्रतीतित एवास्ति न वस्तुत इति वक्तुं शक्यम्। एवंच कर्तृत्वाभिनिवेशशून्यः पुमान् प्रतीतितः करोत्येव न वस्तुत इति संभवत्यमुख्योऽपि सात्त्विकस्त्याग इति तमेव मुख्यत्यागेऽधिकारहेतुं प्रथममाह -- कार्यमिति। कार्यं कर्तव्यमित्येव यत्कर्म नियतं नित्यं क्रियते हे अर्जुन? सङ्गं फलं च त्यक्त्वैवेत्यवधारणं प्रागुक्तस्यात्यागपक्षस्य व्यावृत्त्यर्थम्। स एवंभूतस्त्यागः सात्त्विको मतः वेदे दृष्टः। तथा च श्रुतिःईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् इति। ईशा ईशेन परमेश्वरेण सर्वकार्यकरणकर्त्रात्मप्रवर्तकेन इदं जगत्स्थावरजंगमं जगत्यां ब्रह्माण्डे स्थितं वास्यमाच्छादितं व्याप्तम्। येन हेतुना सर्वं तदधीनं तेन कारणेन त्यक्तेन त्यागेन कर्तृत्वभोक्तृत्वाभिमानवर्जनेन भुञ्जीथाः विषयान्भुङ्क्ष। मा गृधः गर्धं मा कार्षीः। कस्यस्विद्धनं न कस्यापि तत्र स्वामित्वमस्तीति वृथैव तत्र गर्ध इत्यर्थः। एवं कर्माण्यपि यज्ञादीनि कर्तृत्वाभिमानं त्यक्त्वा कुर्वतस्तव कर्मलेपो न भविष्यति। एतद्व्यतिरेकेण तव उपायान्तरं च नास्तीत्यग्रिममन्त्रेण प्रदर्श्यतेकुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे इति। इदमेव मुख्यं स्वमतं भगवता प्रदर्शितम्। एतान्यपि तु कर्माणीति श्लोके। ननु नित्यानां फलमेव नास्ति किं त्यक्तव्यमिति चेत्। इतएव भगवद्वचनात्तेषामपि फलमस्तीति जानीहि। निष्फलस्य वेदेनानुष्ठापनासंभवात्। तथाचापस्तम्बःतद्यथाम्रे फलार्थं निमित्ते छायागन्धावनूत्पद्येते एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते इति आनुषङ्गिकं फलं नित्यानां दर्शयति। अकरणे प्रत्यवायस्मृत्यापि तेषां प्रत्यवायपरिहारः फलमिति प्रदर्श्यते।धर्मेण पापमपनुदति इत्यादिना च नित्येष्वपि कर्मसु फलं दृश्यते तदेव वक्तव्यमिति न कोऽपि दोषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.9।।सात्त्विकमाह -- कार्यमित्येवेति। नियतं भक्त्यङ्गत्वेन कार्यमित्येव मदाज्ञात्वेनावश्यकर्त्तव्यमेव? एवं ज्ञात्वा सङ्गं त्यक्त्वा तत्कर्तृत्वाभिमानं फलं तज्जं स्वर्गादिसुखं च त्यक्त्वा यत्कर्म क्रियते स त्याग एव सात्त्विकः? मदाज्ञारूपकरणेन स्वार्थफलाभावात् सात्त्विकः। अतएव मतः मत्सम्मत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.9।।सात्त्विकं त्यागमाह -- कार्यमिति। कार्यमित्येवं बुद्ध्वा नियतमवश्यकर्तव्यतया विहितं कर्म सङ्गं फलं च त्यक्त्वा क्रियत इति यत् तादृशस्त्यागः सात्त्विको मतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.9।।विचक्षणाभिमतं त्यागं सात्त्विकतयाऽऽह -- कार्यमिति। नित्यनैमित्तिकमहायज्ञादिवर्णाश्रमविहितं कर्म भगवदाज्ञया तदाराधनरूपत्वात् कर्तव्यमिति यत्क्रियते हेऽर्जुन शुद्धस्वरूप तदप्युक्तप्रकारेणेत्याह -- सङ्गं कर्मणि ममतां फलं च त्यक्त्वेति। स सात्त्विकः सत्त्वहेतुकत्वात्। एवमपि पुष्टिपुरुषोत्तमश्रयण(ग्रहण)मेव सर्वं सन्न्यस्य निर्गुणस्त्यागस्तदाज्ञापरिपालनरूप इत्याचार्याभिमतः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.9।।तो फिर सात्त्विक त्याग कौनसा है हे अर्जुन करना चाहिये -- कर्तव्य है? ऐसा समझकर? जो नित्यकर्म आसक्ति और फल छोड़कर सम्पादन किये जाते हैं। नित्यकर्मोंका फल होता है? इस विषयमें पहले भगवान्के वचनोंका प्रमाण दे चुके हैं। अथवा यों समझो कि यद्यपि नित्यकर्मोंका फल नहीं सुना जाता है? तो भी अज्ञ मनुष्य ऐसी कल्पना कर ही लेता है कि किया हुआ नित्यकर्म अन्तःकरणकी शुद्धि या प्रत्यवायकी निवृत्तिरूप फल देता है? सुतरां फलं त्यक्त्वा इस कथनसे ऐसा कल्पनाका भी निषेध करते हैं। अतः सङ्गं त्यक्त्वा फलं च यह कहना बहुत ही उचित है। वह त्याग अर्थात् नित्यकर्मोंमें आसक्ति और फलका त्याग सात्त्विक -- सत्त्वगुणसे किया हुआ त्याग माना गया,है। पू0 -- तीन प्रकारका कर्मपरित्याग संन्यास है? यह प्रकरण है। उसमें तामस और राजस तो त्याग बतलाये गये? परंतु तीसरे ( सात्त्विक ) त्यागकी जगह ( कर्मोंका त्याग न कहकर ) आसक्ति और फलका त्याग कैसे कहते हैं जैसे कोई कहे कि तीन ब्राह्मण आये हैं? उनमें दो तो वेदके छहों अङ्गोंको जाननेवाले हैं और तीसरा क्षत्रिय है? उसीके समान यह कथन भी प्रकरणविरुद्ध है। उ0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि त्यागमात्रकी समानतासे कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये ऐसा कहा है। कर्मसंन्यासकी और फलासक्तिके त्यागकी? त्यागमात्रमें तो समानता है ही। उनमें ( स्वरूपसे ) कर्मोंके त्यागको राजस और तामस त्याग बतलाकर उसकी निन्दा करके? स त्यागः सात्त्विको मतः इस कथनसे कर्मफल और आसक्तिके त्यागको सात्त्विक त्याग बतलाकर उसकी स्तुति की जाती है। जो अधिकारी? आसक्ति और फलवासना छोड़कर नित्यकर्म करता है? उसका फलासक्ति आदि दोषोंसे दूषित न किया हुआ अन्तःकरण? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानद्वारा संस्कृत होकर विशुद्ध हो जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.9।। व्याख्या --   कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन -- यहाँ कार्यम् पदके साथ इति और एव ये दो अव्यय लगानेसे यह अर्थ निकलता है कि केवल कर्तव्यमात्र करना है। इसको करनेमें कोई फलासक्ति नहीं? कोई स्वार्थ नहीं और कोई क्रियाजन्य सुखभोग भी नहीं। इस प्रकार कर्तव्यमात्र करनेसे कर्ताका उस कर्मसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। ऐसा होनेसे वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता अर्थात् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता। कर्म तथा उसके फलमें आसक्त होनेसे ही बन्धन होता है -- फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)।शास्त्रविहित कर्मोंमें भी देश? काल? वर्ण? आश्रम? परिस्थितिके अनुसार जिसजिस कर्ममें जिसजिसकी नियुक्ति की जाती है? वे सब नियत कर्म कहलाते हैं जैसे -- साधुको ऐसा करना चाहिये? गृहस्थको ऐसा करना चाहिये? ब्राह्मणको अमुक काम करना चाहिये? क्षत्रियको अमुक काम करना चाहिये इत्यादि। उन कर्मोंको प्रमाद? आलस्य? उपेक्षा? उदासीनता आदि दोषोंसे रहित होकर तत्परता और उत्साहपूर्वक करना चाहिये। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रसङ्गमें जगहजगह समाचर शब्द दिया है (गीता 3। 9? 19)।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव -- सङ्गके त्यागका तात्पर्य है कि कर्म? कर्म करनेके औजार (साधन) आदिमें आसक्ति? प्रियता? ममता आदि न हो और फलके त्यागका तात्पर्य है कि कर्मके परिणामके साथ सम्बन्ध न हो अर्थात् फलकी इच्छा न हो। इन दोनोंका तात्पर्य है कि कर्म और फलमें आसक्ति तथा इच्छाका त्याग हो।स त्यागः सात्त्विको मतः (टिप्पणी प0 877) -- कर्म और फलमें आसक्ति तथा कामनाका त्याग करके कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। राजस त्यागमें कायक्लेशके भयसे और,तामस त्यागमें मोहपूर्वक कर्मोंका स्वरुपसे त्याग किया जाता है परन्तु सात्त्विक त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जाता? प्रत्युत कर्मोंको सावधानी एवं तत्परतासे? विधिपूर्वक? निष्कामभावसे किया जाता है। सात्त्विक त्यागसे कर्म और कर्मफलरूप शरीरसंसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। राजस और तामस त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेसे केवल बाहरसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद दीखता है परन्तु वास्तवमें (भीतरसे) सम्बन्धविच्छेद नहीं होता। इसका कारण यह है कि शरीरके कष्टके भयसे कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं? पर अपने सुख और आरामके साथ सम्बन्ध जुड़ा ही रहता है। ऐसे ही मोहपूर्वक कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं? पर मोहके साथ सम्बन्ध जुड़ा रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेपर बन्धन होता है और कर्मोंको तत्परतासे विधिपूर्वक करनेपर मुक्ति (सम्बन्धविच्छेद) होती है। सम्बन्ध --   छठे श्लोकमें एतानि और अपि तु पदोंसे कहे गये यज्ञ? दान? तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंके करनेमें और शास्त्रनिषिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करनेमें क्या भाव होना चाहिये यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.9।।कर्मत्यागस्तामसो राजसश्चेति द्विविधो दर्शितः? संप्रति सात्त्विकं त्यागं प्रश्नपूर्वकं वर्णयति -- कः पुनरिति। कर्तव्यमित्येवेत्येवकारेण नित्यस्य भाव्यान्तरं निषिध्यते। नित्यानां विध्युद्देशे फलाश्रवणात्तेषां फलं त्यक्त्वेत्ययुक्तमित्याशङ्क्याह -- नित्यानामिति। फलं त्यक्त्वेत्यस्य विधान्तरेण तात्पर्यमाह -- अथवेति। नहि विधिना कृतं कर्मानर्थकं विध्यानर्थक्यात्तेन श्रौतफलाभावेऽपि नित्यं कर्म विधितोऽनुतिष्ठन्नात्मानमजानन्ननुपहतमनस्त्वोक्त्या तस्मिन्कर्मण्यात्मसंस्कारं फलं कल्पयति तदकरणे प्रत्यवायस्मृत्या तत्करणं कर्तुरात्मनस्तन्निवृत्तिं करोतीति वा नित्ये कर्मण्युक्तां कल्पनामनुनिष्पादितफलकल्पनां च फलं त्यक्त्वेत्यस्य भगवान्निवारयतीत्यर्थः। नित्यकर्मसु फलत्यागोक्तेः संभवे फलितमाह -- अत इति। कर्मतत्फलत्यागस्य त्यागसंन्यासशब्दाभ्यां प्रकृतस्य त्यागो हीति त्रैविध्यं प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञानुरोधेन द्वे विधे व्युत्पाद्य तृतीयां विधां तद्विरोधेन व्युत्पादयतो भगवतोऽकौशलमापतितमिति शङ्कते -- नन्विति। प्रक्रमप्रतिकूलमुपसंहारवचनमनुचितमित्यत्र दृष्टान्तमाह -- यथेति। पूर्वोत्तरविरोधेन प्राप्तमकौशलं प्रत्यादिशति -- नैष दोष इति। कर्मत्यागफलत्यागयोस्त्यागत्वेन सादृश्यात्कर्मत्यागनिन्दया तत्फलत्यागस्तुत्यर्थमिदं वचनमित्युपगमान्न विरोधोऽस्तीत्युक्तमेव व्यक्तीकुर्वन्नादौ त्यागसामान्यं विशदयति -- अस्तीति। सति सामान्ये निर्देशस्य स्तुत्यर्थत्वं समर्थयते -- तत्रेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.9।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.9।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.9।। --,कार्यं कर्तव्यम् इत्येव यत् कर्म नियतं नित्यं क्रियते निर्वर्त्यते हे अर्जुन? सङ्गं त्यक्त्वा फलं च एव। एतत् नित्यानां कर्मणां फलवत्त्वे भगवद्वचनं प्रमाणम् अवोचाम। अथवा? यद्यपि फलं न श्रूयते नित्यस्य कर्मणः? तथापि नित्यं कर्म कृतम् आत्मसंस्कारं प्रत्यवायपरिहारं वा फलं करोति आत्मनः इति कल्पयत्येव अज्ञः। तत्र तामपि कल्पनां निवारयति फलं त्यक्त्वा इत्यनेन। अतः साधु उक्तम् सङ्गं त्यक्त्वा फलं च इति। सः त्यागः नित्यकर्मसु सङ्गफलपरित्यागः सात्त्विकः सत्त्वनिर्वृत्तः मतः अभिप्रेतः।।ननु कर्मपरित्यागः त्रिविधः संन्यासः इति च प्रकृतः। तत्र तामसो राजसश्च उक्तः त्यागः। कथम् इह सङ्गफलत्यागः तृतीयत्वेन उच्यते यथा त्रयो ब्राह्मणाः आगताः? तत्र षडङ्गविदौ द्वौ? क्षत्रियः तृतीयः इति तद्वत्। नैष दोषः त्यागसामान्येन स्तुत्यर्थत्वात्। अस्ति हि कर्मसंन्यासस्य फलाभिसंधित्यागस्य च त्यागत्वसामान्यम्। तत्र राजसतामसत्वेन कर्मत्यागनिन्दया कर्मफलाभिसंधित्यागः सात्त्विकत्वेन स्तूयते स त्यागः सात्त्विको मतः (गीता 18।9) इति।।यस्तु अधिकृतः सङ्गं त्यक्त्वा फलाभिसंधिं च नित्यं कर्म करोति? तस्य फलरागादिना अकलुषीक्रियमाणम् अन्तःकरणं नित्यैश्च कर्मभिः संस्क्रियमाणं विशुध्यति। तत् विशुद्धं प्रसन्नम् आत्मालोचनक्षमं भवति। तस्यैव नित्यकर्मानुष्ठानेन विशुद्धान्तःकरणस्य आत्मज्ञानाभिमुखस्य क्रमेण यथा तन्निष्ठा स्यात्? तत् वक्तव्यमिति आह --,

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【 Verse 18.10 】

▸ Sanskrit Sloka: न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते | त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय: ||

▸ Transliteration: na dveṣtyakuśalaṁ karma kuśale nā’nuṣajjate | tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṁśayaḥ ||

▸ Glossary: na: never; dveṣti: hates; akuśalaṁ: inauspicious; karma: work; kuśale: in the auspicious; na: nor; anuṣajjate: becomes attached; tyāgī: the renouncer; sat- tva: goodness; samāviṣṭaḥ: absorbed in; medhāvī: intelligent; chinna: cut up; saṁśayaḥ: all doubts

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.10 Those who neither hate disagreeable work nor are attached to pleasant work are in a state of intelligence, goodness and renunciation, free of all doubts.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.10।।जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता? वह त्यागी? बुद्धिमान्? सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.10।। जो पुरुष अकुशल (अशुभ) कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल (शुभ) कर्म में आसक्त नहीं होता? वह सत्त्वगुण से सम्पन्न पुरुष संशयरहित? मेधावी (ज्ञानी) और त्यागी है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.10 न not? द्वेष्टि hates? अकुशलम् disagreeable? कर्म action? कुशले to an agreeable one? न not? अनुषज्जते is attached? त्यागी the abandoner? सत्त्वसमाविष्टः pervaded by purity? मेधावी intelligent? छिन्नसंशयः with his doubts cut asunder.Commentary All actions are eally welcome to the man of renunciation. He is not affected by either pleasure or pain. He is not elated at performing pleasant actions nor does he find unpleasantness when he does disagreeable actions. He does not hate the latter? nor is he attached to the former. Neither has he aversion to painful actions nor attraction to pleasant ones. As he has no attachment to any action or its rewards? he will do any action for the welfare of all beings.Akusalam Karma Disagreeable work or work done with expectation of reward? which becomes the cause of bondage to Samsara? by producing a body. He does not hate an unpleasnt action? thinking? Of what use is itKusale To good ones which include obligatory daily duties. He has no attachment to them even with the notion that they lead to salvation by purifying the heart and conseently giving rise to the dawn of knowledge and devotion to it.When one abandons attachment to action and desire for its reward and performs actions vigorously? his heart is filled with Sattva or purity which produces discrimination between the Real and the unreal? the Eternal and the transient. Then he attains knowledge of the Self which dispels all the doubts caused by ignorance. He now realises that the only means of attaining the spureme bliss or eternal peace or immortality is knowledge of the Self. This rends asunder all his doubts. What is the nature of doubt Does Brahman exist or not Do the Upanishads deal with Saguna Brahman or Nirguna Brahman Is the individual soul identical with the Supreme Being or not Will I be able to realise the Self or not Will any of the Karmas (Prarabdha? Sanchita and Agami) affect me Does this Samsara whose nature is the feelings I do this and I enjoy this belong to the Self or to the mind and intellect What are the means for liberation -- Yoga? devotion? Karma or knowledge of the Self What is Moksha Is it Selfrealisation or the attainment of the Salokya? Samipya? Sarupya and Sayujya states (dwelling in the kingdom of God? proximity to Him? assuming the same form as the Lord and merging in Him)When a man practises Karma Yoga he gets purity of heart and through purity of heart knows himself to be the immutable actionless Self Who is destitute of birth? or remains without acting or causing others to act (Cf.V.13). He attains devotion to the knowledge of the Self and freedom from all actions. The purpose of the Karma Yoga described above has been taught in this verse.Medhavi He who is endowed or united with wisdom. He is a Sthitaprajna. What is Medha? then It is the immediate knowledge of the identity of the individual soul and the Supreme Being by meditation on the right significance of the great sentence (I am Brahman or That thou art)? which,is free from the three kinds of doubts? viz.? Samsaya Bhavana (doubt)? Asambhavana (improbability) and Viparitabhavana (perversion)? and by the practice of the four means and service of the Guru (who is versed in the scriptures and established in Brahman) and hearing the truths from him.Such a Medhavi will not think that prohibited actions which bind an ignorant man will be unfavourable to him. He will never think that they will bind him if he has to perform them? because he is above good and evil? virtue and vice? right and wrong. He has no idea of agency (Kartritva Abhimana) he feels that he is a Kritakritya? one who has accomplished all actions.This does not mean that he will do wrong actions. As his will is one with the cosmic will? whatever action he performs will be in accordance with the scriptures. He will never deviate even a fraction of an inch from the rules of the scriptures. The Lord alone works through his mind and senses as he has no individual will.RagaDvesha (likes and dislikes) are the motives that induce a worldly man to actions. As they are absent in a sage or a Medhavi? he can renounce the fruits of all actions and actions as well.As the ocean remains calm amidst stormy waves? even so a Sattvic man remains calm amidst adverse or stormy conditions of life. He recognises that the happenings of life are inevitable. He acts in a variety of ways but is not disturbed as he has a balanced and disciplined mind.There must be no hatred for unpleasant or disagreeable action that brings physical suffering? danger or unlucky results or untoward conseences? when it is the work that should be done. You will have to accept such work also with a willing heart and work with hear and soul. You must have a profound and comprehensive understanding of its need and meaning also. Arjuna failed to understand in the beginning the deep significance and need of the work given by the Lord. He brought in his own foolish philosophy. He failed to do his bounden duty because? due to ignorance? he thought it was an unpleasant or disagreeable action to kill people but in the end when his eyes were opened by the valuable teachings of the Lord? he understood the need and the meaning of the work although it appeared to him as disagreeable and unpleasant in the beginning? and said My illusion is destroyed. I have gained knowledge through Thy grace? O Krishna. I am firm? my doubts are gone. I will act according to Thy instructions.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.10. The man of relinishment, who is well possessed of the Sattva, is wise and has his doubts destroyed-he hates not the unskilled action and clings not to the skilled action.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.10 The wise man who has attained purity, whose doubts are solved, who is filled with the spirit of self-abnegation, does not shrink from action because it brings pain, nor does he desire it because it brings pleasure.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.10 One who has abandoned, who is imbued with Sattva, who is wise, whose doubts have been dispelled - such a person hates not disagreeable acts nor clings to agreeable ones.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.10 The man of renunciation who has become imbued with sattva, who is wise and freed from doubts, does not hate unbefitting action, nor does he become attached to befitting activity.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.10 The man of renunciation, pervaded by purity, intelligent, and with his doubts cut asunder, does not hate a disagreeable work nor is he attached to an agreeable one.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.10 See Comment under 18.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.10 Thus, 'filled with Sattva,' endowed with right knowledge, i.e., with the knowledge of the reality as it is, and as a conseence of it 'having all doubts shattered' - he alone becomes a renouncer of attachment to work and the fruits of work. He 'neither hates works productive of harmful effects,' nor 'loves others productive of worldly prosperity.' Disagreeable acts are fraught with undesirable fruits; and agreeable acts bring about desirable results such as heaven, sons, cows, food etc. On account of his renouncing all results other than the Brahman and on account of his renouncing the sense of agency, he shows neither love nor hatred for above-mentioned types of works. Here 'sinful acts having undesirable fruits' are only such acts as are inadvertently performed. For it has been taught in the Srutis that nor turning away from bad conduct is antagonistic to the production of knowledge. 'But one who has not ceased from bad conduct, who is not tranil, is not composed, is not of peaceful mind, cannot obtain Him by knowledge' (Ka. U., 1.2.24). Thus, 'the abandonment' according to the Sastras is renunciation of the sense of agency, attachment and fruits of actions, and not total relinishment of actions as such.

He explains this further:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.10 Na devesti, he does not hate; akusalam, unbefitting; karma, action, rites and duties meant for desired results-with the idea, 'What is the usefulness of this which is a cause of transmigration through fresh embodiment?' Na anusajjate, he does not become attached to; kusale, befitting activity, daily obligatory duties, by thinking that this is the cause of Liberation by virtue of its being the cause of purification of the mind, rise of Knowledge and steadfastness in it. That is to say, he does not entertain any liking even for it, because he finds no purpose in it. Who, again, is he? Tyagi, the man of renunciation, who has become so by having given up attachment and rewards of action in the manner stated above. He is a tyagi who performs nityakarmas by relinishing attachment to those acts and (their) results. Again, it is being stated as to when that person does not hate an unbefitting act and does not become attached to a befitting activity: When he has become sattva-samavistah, imbued with sattva, i.e., when he is filled with, possessed of, sattva, which is the means to the knowledge that discriminates between the Self and the not-Self; and hence medhavi, wise-endowed with intelligence (medha), intuitive experience, characterized as knowledge of the Self; one possessed of that is medhavai (wise)-; and owing to the very fact of being wise, chinnasamsayah, freed from doubts-one whose doubts created by ignorance have been sundered, one who is freed from doubts by his firm conviction that nothing but abiding in the ture nature of the Self is the supreme means to the highest Good. The person competent (for rites and duties) who, having gradually become purified in mind through the practice of Karma-yoga in the way described above, has realized as his own Self the actionless Self, which is devoid of modifications like birth etc., he, '৷৷.having given up all actions mentally, remaining at without doing or causing (others) to do anything at all' (cf. 5.13), attains steadfastness in Knowledge, which is characterized as 'actionless-ness'. In this way, the purpose of the aforesaid Karma-yoga has been stated through the present verse. On the other hand, since, for the unenlightened person-who, while being alified (for rites and duties), holds on to the body owing to the erroneous conception that the body is the Self, and who has the firm conviction, 'I am the agent,' because of the persistence of his idea that the Self is the agent-it is not possible to renounce actions totally, therefore he has competence only for performing enjoined duties by giving up fruits of actions. But he is not to renounce them (actions). In order to point out this idea the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.10।। पूर्व श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने यह कहा था कि सात्त्विक पुरुष अपने नियत कर्मों को? केवल कर्तव्य समझकर फलासक्ति को त्यागकर? करता है। प्रथम दृष्टि में? सामान्य पुरुष को त्याग का यह सिद्धांत असंभव ही प्रतीत होगा। संभवत अर्जुन के मुख पर कुछ इसी प्रकार के आश्चर्य भाव को देखकर? भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में सात्त्विक पुरुष का और अधिक स्पष्ट चित्रण करते हैं।सामान्य अज्ञानी जन अतिरेकी स्वभाव के होते हैं। वे जगत् को यथार्थ रूप में कभी नहीं देखते। जगत् की वस्तुओं को वे अपने राग द्वेष से रंजित दृष्टि से देखते हैं। तत्पश्चात्? वे अपनी प्रिय वस्तु को पाने का प्रयत्न करते हैं और अप्रिय को त्यागने के लिए परिश्रम करते हैं। इसके लिए वे शुभाशुभ कर्मों की चिन्ता नहीं करते। प्रिय वस्तु को प्राप्त कराने वाले कर्म में उनकी आसक्ति हो जाती है और अन्य कर्म से द्वेष। इसके परिणामस्वरूप? इष्ट की प्राप्ति पर उन्हें हर्षातिरेक होता है और अनिष्ट की प्राप्ति में वे विषाद के गर्त में गिर जाते हैं। ऐसे लोगों के अन्तकरण में काम? क्रोध? ईर्ष्या आदि अवगुणों का स्थायी निवास होता है। यदाकदा इनमें से कोई व्यक्ति धर्माचरण में प्रवृत्त भी होता है? तो अपने अतिरेकी स्वभाव के कारण धार्मिक कार्य में आसक्त हो जाता है और अन्य लोगों को पतित समझकर उन्हें हेय दृष्टि से देखता है परन्तु? सत्त्वगुणी पुरुष उपर्युक्त समस्त अवगुणों से मुक्त होता है। इसका कारण उसकी विकसित विवेक शक्ति है। आत्मानात्माविवेक के द्वारा वह यह भलीभांति जानता है कि शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धि ये सब अनात्मा हैं तथा जन्ममरण? क्षुधातृषा और शोकमोह ये सब इनके ही धर्म हैं? न कि इन सब को प्रकाशित करने वाले साक्षी आत्मा के? इस ज्ञान के कारण वह अनात्म उपाधियों से तादात्म्य नहीं करता। इसी को यहाँ इस प्रकार कहा गया है कि वह अशुभ से द्वेष और शुभ से राग नहीं करता है। ऐसा पुरुष ही वास्तव में सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत कहा जाता है। अन्य अविवेकी लोग तो शुष्क पर्ण के समान वायु की गति और दिशा के साथ इतस्तत भटकते रहते हैं। विवेकी पुरुष अपने मन का साक्षी बनकर रहता है? जबकि अविवेकी लोग? त्याग के अभाव में? अपने मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य करके दुख भोगते रहते हैं।किसी भी वस्तु के यथार्थ स्वरूप को समझने तथा मिथ्या का त्याग करने के लिए अपने नित्य और पूर्ण स्वरूप का बोध आवश्यक है। वस्तुओं को समझने तथा युक्तियुक्त विचार करने की बुद्धि की इस क्षमता को मेधा शक्ति कहते हैं। केवल इतना ही नहीं? वरन् प्राप्त ज्ञान को धारण एवं आवश्यकतानुसार स्मरण करने की क्षमता भी मेधा ही है। इस शक्ति से सम्पन्न पुरुष मेधावी कहा जाता है। ऐसे मेधावी पुरुष क ो निम्नलिखित तत्त्वों का स्पष्टत ज्ञान होता है (1) अपना कर्मक्षेत्र? (2) वे उपाधियां जिनके द्वारा वह जगत् से सम्पर्क करता है? (3) अपना शुद्ध आनन्द स्वरूप? और (4) जगत् से अपना संबंध। यह मेधावी पुरुष संशय रहित (छिन्न संशय) होता है? क्योंकि वस्तु के अपूर्ण ज्ञान से ही संशय उत्पन्न हो सकता है? अन्यथा नहीं।इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐसे सात्त्विक त्यागी पुरुष जगत् में विरले ही होते हैं। बहुसंख्यक लोग तो अपनी देहादि उपाधियों के साथ तादात्म्य स्थापित करके स्वयं को कर्म का कर्ता मानते हैं और तब उन्हें कर्मफल भोगने के लिए बाध्य होना ही पड़ता है।जो अज्ञानी पुरुष कर्तृत्व के अभिमान तथा देहासक्ति को त्याग नहीं पाता है? उसको कम से कम कर्म फल त्याग करना चाहिए। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.10।।एवं सात्त्विकं त्यागमुक्त्वा योऽधिकृतः सङ्गं फलाभिसन्धिं च त्यक्त्वा कर्म करोति तादृशकर्मानुष्ठानेन संस्कृतात्मा सन् जन्मादिविक्रियारहितत्वेन निष्क्रियमात्मानमात्मत्वेन संबुद्धः सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नासीनो नैष्कर्म्यलक्षणां ज्ञाननिष्ठां प्राप्नोतीत्येतत्पूर्वोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रयोजनमाह -- न द्वेष्टीति। यस्त्यागी पूर्वोक्तसङ्गफलत्यागवान् नित्यकर्मानुष्ठायी यदा सत्त्वसमाविष्टः सङगं फलाभिसंधिं च त्यक्त्वा कर्मानुष्ठानतः सङ्गफलाभ्यामकलुषीक्रियमाणं नित्यैश्च कर्मभिः संस्िक्रयमाणं विशुद्धं समुद्धुद्धसत्त्वमात्मानात्मविवेकविज्ञानत्वन्तःकरणं सत्त्वमत्र ग्राह्यं तेन समाविष्टः संव्याप्तः संयुक्त इति यावत्। अतएव मेधावी ब्रह्मात्मज्ञानलक्षणा प्रज्ञा मेधा तद्वान् मेधावी। मेदावित्यावेद ब्रह्मात्मस्वरुपावस्थानमेव परं निःश्रेयससाधनं नान्यत्किंचिदित्येव निश्चयेन छिन्नोऽविद्याकृतः संशयो यस्य स छिन्नसंशयःतमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति श्रुतेः। स तदा अकुशलमशोभनं काम्यं निषिद्धं च कर्म न द्वेष्टि। काम्यादिकर्मशरीरारम्भादिद्वारेण संसारकारणमतः किमनेनेत्येवं द्वेषं न करोति। कुशले चित्तशुद्य्धादिद्वारा मोक्षहेतुत्वाच्छोभने नित्ये कर्मणि नावुषज्जते। सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तितन्निष्ठाहेतुत्वेन मोक्षकारणमतोऽनेन मदीयं प्रयोजनं सेत्स्यतीत्यनुषङ्गमासक्तिं प्रीतिं न करोतीत्यर्थः। एवंभूतसात्त्विकपरित्यागनिष्ठस्य लक्षणमाह -- सत्त्वसमाविष्टः सात्त्विकत्यागी अकुशलं दुःखावहं शिशिरे प्रातःस्नादिकर्म न द्वेष्टि? कुशले च सुखकरे कर्मणि निदाघे मध्याह्नस्त्रानादौ नानुषज्जते प्रीतिं न करोति। तत्र हेतुः -- मेधावी स्थिरबुद्धिः। यत्र परपरिभवादिमहद्दुःखमपि सह्यते स्वर्गादिसुखं च त्यज्यते तत्र कियदेतत्तात्कालिकं सुखं दुःखं चैवमनुसंधानवानित्यर्थः। अतएव छिन्नः संशयो मिथ्या ज्ञानं दैहिकसुखदुःखयोरुपादित्सापरिजिहीर्षालक्षणं यस्य स इत्यपरे। इतरे तु सतु त्यागी सात्त्विकत्यागकर्ता। तुशब्दस्तामसराजसत्यागकर्ततो विशेषद्योतकः। अकुशलमविवेकिनं मोक्षकथानभिज्ञं देहाभिमानिनम्। अतएवान्तःकरणशुद्धिप्रयोजनककर्माचरणासहिष्णुं किमर्थं वा एतत्कर्माचरसि किंवा पुत्रदारादिनिर्वाहकृत्कर्म त्यजसीत्येवमीदिजल्पन्तं न द्वेष्टि धिक् त्वां परतो गच्छेत्येवमादिचेष्टाभावद्वेषं न करोतीत्यर्थः। तथा कर्मकुशले

Chapter 18 (Part 6)

नित्यनैमित्तिककर्माचरणकुशले तन्मात्रसङ्गत्फलत्यागवति स्वसमाने नानुषज्जतेददाति प्रतिगृणाति गुह्यमाख्याति पृच्छति। भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् इत्युक्तमनुषह्गं न करोति। ननु तस्योभयविधलिङ्गदर्शनात्संशय एव किं न स्यादित्य उक्तं छिन्नसंशयः संशयरहितः। तत्रैव हेतुमाह -- मेधावीति। स्वीकरणानिश्चयधारणावान्। कुतोयं निश्चयस्तस्येत्यत उक्तं असमाविष्ट इति। असमे क्षयिफलान्तरासदृशो निरतिशयानन्दरुपे फले आविष्टो लिप्सावान् अत ईदृग्लक्षणो व्याप्तत्यागी मुख्यः सात्त्विकत्यागी संन्यासीत्यर्थः। एवममुख्यं सात्त्विकं त्यागमुक्त्वा मुख्यं तमाह -- न द्वेष्टि सत्त्वेन सभ्यगाविष्टो व्याप्तस्त्यागी मुख्यः सात्त्विकत्यागी संन्यासीत्यर्थः। अकुशलमसुखप्रदं कर्म त्रिषवणस्त्राननचतुर्गुणशौचभिक्षाटनादिप्रासरुपं न द्वेष्टि। कुशले मिष्टान्नभक्षणादौ नानुज्जते प्रीति न करोति। यद्वा कर्मकुशले सेवादिकर्मकुशले शिष्यादौ नानुषज्जते तत्राकुशलं वा तं न द्वेष्टि। एतेन रागद्वेषशून्यत्वमस्य दर्शितम्? तदपि कुत इत्यपेक्षायामाह -- मेधावीति। ऊहापोहकुशलतया नित्यानित्यवस्तुविवेचनादौ प्रज्ञावान्। अनेन मोहात्तस्य परित्याग इत्युक्तात्तासात्त्यागद्य्वावृत्तिः। मेधावित्वादेव छिन्नसंशयः किं कर्माण्येव मुक्तिसाधनानि उत संन्यास एवेति संशयरहितः। अनेन कार्यमित्येवेत्युक्तादमुख्यसात्त्विकत्यागाद्य्वावृत्तिरेव। त्यागीत्यनेन यज्ञो दानमित्युक्तात्यागात्पूर्वार्धेन कायेत्युक्ताद्राजसात्तयागाद्य्ववृत्तिरित्यन्ये। आचार्योक्तव्याख्यानापेक्षयोदाहृतव्याख्यानत्रयेऽप्यधिकं स्वारस्यं चिन्त्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.10।।सात्त्विकस्य त्यागस्यादौ सत्त्वशुद्धिद्वारेण ज्ञाननिष्ठां फलमाह -- न द्वेष्टीति। यस्त्यागी सात्त्विकेन त्यागेन युक्तः पूर्वोक्तेन प्रकारेण कर्तृत्वाभिनिवेशं फलाभिसन्धिं च त्यक्त्वान्तःकरणशुद्ध्यर्थं विहितकर्मानुष्ठायी स यदा सत्त्वसमाविष्टः सत्त्वेनात्मानात्मविवेकज्ञानहेतुना चित्तगतेनातिशयेन सम्यग्ज्ञानप्रतिबन्धकरजस्तमोमलराहित्येनासमन्तात्फलाव्यभिचारेण समाविष्टो व्याप्तो भवति भगवदर्पितनित्यकर्मानुष्ठानात्पापमलापकर्षलक्षणेन ज्ञानोत्पत्तियोग्यतारूपपुण्यगुणाधानलक्षणेन च संस्कारेण संस्कृतमन्तःकरणं यदा भवतीत्यर्थस्तदा मेधावी शमदमसर्वकर्मोपरमगुरूपसदनादिसामवायिकाङ्गयुक्तेन मनननिदिध्यासनाख्यफलोपकार्यङ्गयुक्तेन च श्रवणाख्यवेदान्तवाक्यविचारेण परिनिष्पन्नं वेदान्तमहावाक्यकरणकं निरस्तसमस्ताप्रामाण्याशङ्कं चिदन्याविषयकमहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्मैक्यज्ञानमेव मेधा तया नित्यं युक्तो मेधावी स्थितप्रज्ञो भवति तदा छिन्नसंशयोऽहं ब्रह्मास्मीति विद्यारूपया मेधया तदविद्योच्छेदे तत्कार्यसंशयविपर्ययशून्यो भवति तदा क्षीणकर्मत्वात् न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म अशोभनं काम्यं निषिद्धं वा कर्म न प्रतिकूलतया मन्यते? कुशले शोभने नित्ये कर्मणि नानुषज्जते न प्रीतिं करोति? कर्तृत्वाद्यभिमानरहितत्वेन कृतकृत्यत्वात्। तथाच श्रुतिःभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति। यस्मादेवं सात्त्विकस्य त्यागस्य फलं तस्मान्महतापि यत्नेन स एवोपादेय इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.10।।एवं मुख्यं सात्त्विकत्यागमुक्त्वाऽमुख्यं तमाह -- न द्वेष्टीति। सत्त्वेन सम्यगाविष्टो व्याप्तस्त्यागी मुख्यः सात्त्विकस्त्यागी संन्यासीत्यर्थः। अकुशलमसुखप्रदं कर्म त्रिषवणस्नानचतुर्गुणशौचभिक्षाटनादिप्रयासरूपं,न द्वेष्टि। कुशले मिष्टान्नभिक्षादौ नानुषज्जते न सङ्गं काकवत्प्रीतिं करोति। यद्वा कर्मकुशले सवादिकर्मकुशले शिष्यादौ न सज्जते तत्राकुशलं वा तं न द्वेष्टि। एतेन रागद्वेषशून्यत्वमस्य दर्शितम्। तदपि कुत इत्यपेक्षायामाह -- मेधावीति। ऊहापोहकुशलतया नित्यानित्यवस्तुविवेचनादौ प्रज्ञावान्। अतएव छिन्नसंशयः किं कर्माण्येव मुक्तिसाधनानि उत संन्यास एवेति विचिकित्सारहितः। एवं च त्यागीत्यनेन यज्ञो दानं तपः कर्म न त्याज्यमित्युक्तादत्यागाद्व्यावृत्तिः। मेधावीत्यनेन मोहात्तस्य परित्याग इत्युक्तात्तामसत्यागाद्व्यावृत्तिः। पूर्वार्धेन रागद्वेषाभावप्रतिपादनेन कायक्लेशभयात्त्यजेदित्युक्ताद्राजसत्यागाद्व्यावृत्तिः। छिन्नसंशय इत्यनेन कार्यमित्येव यत्कर्मेत्युक्तादमुख्यसात्त्विकत्यागाद्व्यावृत्तिः। नह्यसौ कर्मणां तुच्छत्वं संन्यासस्य महाभाग्यत्वं च तत्त्वतो वेद। वेद चेत्क्षणमपि कर्मसु न तिष्ठेत्। नहि दाहोपशमार्थी निकटस्थं जाह्नवीमहाह्रदं जानन्ग्रीष्मोष्मप्रतप्तपाथसि पल्वले क्षणमपि रमेत। संशयच्छेदेऽपि हेतुः सत्त्वसमाविष्ट इति। यतः सत्त्वेनैव कर्त्रा सम्यगाविष्टो यं नत्वयं सत्त्वमाश्रित इति महान्विशेषः। एवं च पूर्वश्लोकोक्तस्य सात्त्विकत्यागरूपस्य कर्मयोगस्य फलभूतोऽयं मुख्यः संन्यासो विविदिषूणामनुष्ठेयोयदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्?एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति इति श्रुतिप्रसिद्धः। भाष्ये तु ननु कर्मपरित्यागस्त्रिविधः संन्यास इति च प्रकृतस्तत्र तामसो राजसश्चोक्तस्त्यागः कथमिह सङ्गफलत्यागस्तृतीयत्वेनोच्यते। यथा त्रयो ब्राह्मणा आगतास्तत्र षडङ्गविदौ द्वौ क्षत्रियस्तृतीय इति तद्वत्। नैष दोषः। त्यागसामान्येन स्तुत्यर्थत्वात्। अस्ति कर्मसंन्यासस्य फलाभिसन्धित्यागस्य च त्यागत्वं सामान्यम्। तत्र राजसतामसत्वेन कर्मत्यागनिन्दया कर्मफलाभिसन्धित्यागः सात्त्विकत्वेन स्तूयते स त्यागः सात्त्विको मत इति ग्रन्थेन त्यागत्रैविध्यं समाधायैवं सङ्गफलत्यागपूर्वकं नित्यकर्मानुष्ठानेन विशुद्धान्तःकरणस्यात्मज्ञानाभिमुखस्य तन्निष्ठाक्रमकथनार्थोऽयं श्लोक इत्युक्तम्। तथैव श्लोकं व्याख्याय पूर्वोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रयोजनमनेन श्लोकेनोक्तमित्युपसंहृतम्। अन्ये तु फलाभिसंधिविशिष्टस्य कर्मणस्त्यागस्त्रिविधः। विशेषणाभावाद्विशेष्याभावादुभयाभावाच्च। आद्योऽत्रैव विधित्सितः? द्वितीयस्तु तामसराजसभेदेन द्विविधोऽप्यत्रैव निन्दितः। तृतीयस्तु कर्मानधिकारिणा विविदिषुणा विदुषा च कर्तुं योग्यो द्विविधः। तत्रान्त्यः स्थितप्रज्ञलक्षणादौ प्राग्व्याख्यातः। आद्यस्तु नैष्कर्म्यसिद्धिं परमामित्यत्र वक्ष्यते। तत्र भाष्ये तिस्रस्त्यागविधाः प्रतिज्ञाय द्वे यथावत्प्रदर्श्य तृतीयापि केनचित्सामान्येन प्रतिपादिता। अत्रतु एकस्यां द्वयोरन्तर्भावं कृत्वा द्वे एव विधे उपपाद्य तृतीया प्रदेशान्तरे प्रक्षिप्तेति प्रकृते प्रतिज्ञाया अनिर्वाह इति विशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.10।।ननु सङ्गं फलं च त्यक्त्वा यत्कर्म करोति तस्य त्यागरूपता सात्त्विकता च कथं सम्पद्यते इत्याशङ्क्याऽऽह -- न द्वेष्टीति। अकुशलं स्वरूपतः क्लेशादिसाधकं पश्चाच्च दुःखाप्तिरूपं तादृशं न द्वेष्टि? किन्तु भगवदाज्ञारूपत्वात्तत्समये पुनः करणादत एव भवेत्। कुशले कृतकर्मजातसुखोऽपि मदाज्ञाव्यतिरिक्तोत्तमत्वज्ञानेन सत्त्वसमाविष्टः सत्त्वात्मकधैर्यवान् न अनुषज्जते नाऽऽसक्तो भवतीत्यर्थः। तत्र हेतुः -- मेधावी बुद्धिमान्? छिन्नसन्देहः मदिच्छयैव सुखदुःखादिज्ञानेन कर्मसु द्वेषासक्तिरहितो यः स त्यागी इति ज्ञातव्य इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.10।।एवंभूतसात्त्विकत्यागपरिनिष्ठितस्य लक्षणमाह -- न द्वेष्टीति। सत्त्वसमाविष्टः सत्त्वेन संव्याप्तः सात्त्विकत्यागी अकुशलं दुःखावहं शिशिरे प्रातःस्नानादिकं कर्म न द्वेष्टि? कुशले च सुखकरे कर्मणि निदाघे माध्याह्नस्नानादौ नानुषज्जते प्रीतिं न करोति। तत्र हेतुःमेधावी स्थिरबुद्धिः। यत्र परपरिभवादि महदपि दुःखं सह्यते स्वर्गादिसुखं च त्यज्यते तत्र कियदेतत्तात्कालिकं सुखं दुःखं चेत्येवमनुसंधानवानित्यर्थः। अतएव छिन्नः संशयो मिथ्याज्ञानं दैहिकसुखदुःखयोरुपादित्सापरिजिहीर्षालक्षणं यस्य सः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.10 -- 18.11।।एवम्भूतस्य लक्षणमाह -- न द्वेष्टीति। सत्त्वसमाविष्टस्त्यागी बुद्धिमान् अकुशलं कर्मानिष्टफलकं? कुशले चेष्टस्वर्गादिफलके कर्मणि नानुषज्जते? त्यक्तात्मसुखातिरिक्तफलत्वात्? त्यक्तकर्तृत्वाच्च। अत्राकुशलं कर्म प्रमादिनमभिप्रेत्योक्तम् नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् [कठो.2।24ना.प.9।19महो.4।69] इति दुश्चरिताविरतस्य प्रमादिनो ज्ञानतोऽप्यात्मसुखानवाप्तिश्रवणात्। अतः कर्मणि कर्तृत्वसङ्गफलानां त्यागः शास्त्रीयः? न तु स्वरूपतस्त्याग इति। तदाह -- नहीति। नहि ध्रियमाणदेहेन कर्माण्यशेषतस्त्यक्तुं शक्यन्त इत्यर्थे शक्यमव्ययम्। देहधारणार्थानां अशनपानादीनां तदनुबन्धानां च कर्मणावर्जनीयत्वात्? तदर्थं च महायज्ञादिकर्माप्यवर्जनीयमेव। तत्र यः तेषु यज्ञादिकर्मसु फलत्यागी -- फलेत्युपलक्षणं कर्तृत्वममतयोरपि -- स एष त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः [महाना.8।14कैव.2] इत्यादौ त्यागीत्यभिधीयते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.10।।विशुद्ध और प्रसन्न अन्तःकरण ही आध्यात्मिक विषयकी आलोचनामें समर्थ होता है। अतः इस प्रकार नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जिसका अन्तःकरण विशुद्ध हो गया है एवं जो आत्मज्ञानके अभिमुख है? उसकी उस आत्मज्ञानमें जिस प्रकार क्रमसे स्थिति होती है? वह कहनी है? इसलिये कहते हैं --, अकुशल -- काम्यकर्मोंसे ( वह ) द्वेष नहीं करता अर्थात् काम्यकर्म पुनर्जन्म देनेवाले होनेके कारण संसारके कारण हैं? इनसे मुझे क्या प्रयोजन है? इस प्रकार उससे द्वेष नहीं करता। कुशलशुभनित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता। अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धि? ज्ञानकी उत्पत्ति और उसमें स्थितिके हेतु होनेसे नित्यकर्म मोक्षके कारण हैं? इस प्रकार उनमें आसक्त नहीं होता। यानी उनमें भी अपना कोई प्रयोजन न देखकर प्रीति नहीं करता। वह कौन है त्यागी? जो कि पूर्वोक्त आसक्ति और फलके त्यागसे सम्पन्न है अर्थात् कर्मोंमें आसक्ति और उनका फल छोड़कर नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला है? ऐसा त्यागी। ऐसा पुरुष किस अवस्थामें? काम्यकर्मोंसे द्वेष नहीं करता और नित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता सो कहते हैं -- जब कि वह सात्त्विक भावसे युक्त होता है। अर्थात् आत्मअनात्मविषयक विवेकज्ञानके हेतुस्वरूप सत्त्वगुणसे भरपूर -- भली प्रकार व्याप्त होता है। इसीलिये वह मेधावी है अर्थात् आत्मज्ञानरूप बुद्धिसे युक्त है। मेधावी होनेके कारण ही छिन्नसंशय है -- अविद्याजनित संशयसे रहित है। अर्थात् आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही परम कल्याणका साधन है? और कुछ नहीं? इस निश्चयके कारण संशयरहित हो चुका है। जो अधिकारी पुरुष? पूर्वोंक्त प्रकारसे कर्मयोगके अनुष्ठानद्वारा क्रमसे विशुद्धान्तःकरण होकर? जन्मादि विकारोंसे रहित और क्रियारहित आत्माको भली प्रकार अपना स्वरूप समझ गया है? वह समस्त कर्मोंको मनसे त्यागकर न कुछ करता और न कराता हुआ रहनेवाला ( आत्मज्ञानी ) निष्कर्मतारूप ज्ञाननिष्ठाको भोगता है। इस प्रकार इस श्लोकद्वारा यह पूर्वोक्त कर्मयोगका फल बतलाया गया है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.10।। व्याख्या --   न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म -- जो शास्त्रविहित शुभकर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता 2। 42 -- 44 9। 20 -- 21) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पापकर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता 16। 7 -- 20)? वे सबकेसब कर्म अकुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है? पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है? पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है? जो शास्त्रविहित काम्यकर्मोंसे तथा शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंसे भी भयंकर है।कुशले नानुषज्जते -- शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है? ऐसे सभी कर्म कुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।त्यागी -- कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता? वही असली त्यागी है (टिप्पणी प0 878)। परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है? जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निर्लिप्तता बनी रहे (गीता 3। 18 4। 18)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता 6। 4)।मेधावी -- जिसके सम्पूर्ण कार्य साङ्गोपाङ्ग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है? उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता 4। 19)। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे लिपायमान न होना बड़ी बुद्धिमत्ता है।इसी मेधावीको चौथे अध्यायके अठारहवें श्लोकमें स बुद्धिमान्मनुष्येषु पदोंसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान् बताया गया है।छिन्नसंशयः -- उस त्यागी पुरुषमें कोई सन्देह नहीं रहता। तत्त्वमें अभिन्नभावसे स्थित रहनेके कारण उसमें किसी तरहका संदेह रहनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। सन्देह तो वहीं रहता है? जहाँ अधूरा ज्ञान होता है अर्थात् कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते।सत्त्वसमाविष्टः -- आसक्ति आदिका त्याग होनेसे उसकी अपने स्वरूपमें? चिन्मयतामें स्वतः स्थिति हो जाती है। इसलिये उसे सत्त्वसमाविष्टः कहा गया है। इसीको पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें तस्माद्ब्रह्मणि ते,स्थिताः पदोंसे परमात्मामें स्थित बताया गया है। सम्बन्ध --   कर्मोंको करनेमें राग न हो और छोड़नेमें द्वेष न हो -- इतनी झंझट क्यों की जाय कर्मोंका सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाय -- इस शङ्काको दूर करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.10।।एवं पूर्वापरविरोधं पराकृत्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- यस्त्विति। फलरागादिनेत्यादिशब्देन कर्मस्वरूपासङ्गो गृह्यते अन्तःकरणमकलुषीक्रियमाणमिति च्छेदः। विशुद्धेऽन्तःकरणे किं स्यादित्याशङ्क्याह -- विशुद्धमिति। मलविकलत्वं विशुद्धत्वं? संस्क्रियमाणत्वं प्रसन्नत्वमिति भेदः। क्रमेण श्रवणाद्यावृत्तिद्वारेणेत्यर्थः। तन्निष्ठेत्यात्मज्ञाननिष्ठोक्ता। काम्यकर्मणि त्याज्यत्वेन द्वेषमभिनयति -- किमिति। उभयत्र द्वेषं प्रीतिं च न करोतीति सामान्येनोक्तं कर्तारं प्रश्नपूर्वकं विशेषतो निर्दिशति -- कः पुनरिति। त्यागीत्युक्तं त्यागिनमभिव्यनक्ति -- पूर्वोक्तेनेति। कर्मणि सङ्गस्य तत्फलस्य च त्यागेनेति यावत्। उक्तमेव त्यागिनं विवृणोति -- यः कर्मणीति। तत्फलं त्यक्त्वेति संबन्धः। काम्ये निषिद्धे च कर्मणि बन्धहेतुरिति न द्वेष्टि नित्ये नैमित्तिके च मोक्षहेतुरिति न प्रीयते। तत्र कालविशेषं पृच्छति -- कदेति। नित्यादिकर्मणा फलाभिसन्धिवर्जितेन क्षपितकल्मषस्य सत्त्वं यथार्थग्रहणसामर्थ्यमुद्बुध्यते तेन समावेशदशायामुक्तप्रीतिद्वेषयोरभावो भवतीत्याह -- उच्यत इति। अतएवेति समुद्बुद्धयथार्थग्रहणसमर्थसमाविष्टत्वादित्यर्थः। छिन्नसंशयत्वमेव विशदयति -- आत्मेति। परं निःश्रेयसं तस्य च साधनं सम्यग्ज्ञानमेवेति योजना। न द्वेष्टीत्यादिना श्लोकेनोक्तमर्थं संक्षिप्यानुवदति -- योऽधिकृत इति। पूर्वोक्तप्रकारेणेति कर्मणि तत्फले च सङ्गत्यागेनेत्यर्थः। कर्मात्मयोगस्यानुष्ठानेन संस्कृतात्मा सन् क्रमेण श्रवणाद्यनुष्ठानद्वारेण कूटस्थं ब्रह्म प्रत्यक्त्वेन संबुद्ध इति संबन्धः। परस्य निष्क्रियत्वे हेतुमाह -- जन्मादीति। उक्तज्ञानवतः सर्वकर्मत्यागद्वारा मुक्तिभाक्त्वं दर्शयति -- स सर्वेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.10।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.10।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.10।। --,न द्वेष्टि अकुशलम् अशोभनं काम्यं कर्म? शरीरारम्भद्वारेण संसारकारणम्? किमनेन इत्येवम्। कुशले शोभने नित्ये कर्मणि सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तितन्निष्ठाहेतुत्वेन मोक्षकारणम् इदम् इत्येवं न अनुषज्जते अनुषङ्गं प्रीतिं न करोति इत्येतत्। कः पुनः असौ त्यागी पूर्वोक्तेन सङ्गफलत्यागेन तद्वान् त्यागी? यः कर्मणि सङ्गं त्यक्त्वा तत्फलं च नित्यकर्मानुष्ठायी सः त्यागी। कदा पुनः असौ अकुशलं कर्म न द्वेष्टि? कुशले च न अनुषज्जते इति? उच्यते -- सत्त्वसमाविष्टः यदा सत्त्वेन आत्मानात्मविवेकविज्ञानहेतुना समाविष्टः संव्याप्तः? संयुक्त इत्येतत्। अत एव च मेधावी मेधया आत्मज्ञानलक्षणया प्रज्ञया संयुक्तः तद्वान् मेधावी। मेधावित्वादेव च्छिन्नसंशयः छिन्नः अविद्याकृतः संशयः यस्य आत्मस्वरूपावस्थानमेव परं निःश्रेयससाधनम्? न अन्यत् किञ्चित् इत्येवं निश्चयेन च्छिन्नसंशयः।।यः अधिकृतः पुरुषः पूर्वोक्तेन प्रकारेण कर्मयोगानुष्ठानेन क्रमेण संस्कृतात्मा सन् जन्मादिविक्रियारहितत्वेन निष्क्रियम् आत्मानम् आत्मत्वेन संबुद्धः? सः सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य (गीता 5।13) नैव कुर्वन् न कारयन् आसीनः नैष्कर्म्यलक्षणां ज्ञाननिष्ठाम् अश्नुते इत्येतत्। पूर्वोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रयोजनम् अनेनैव श्लोकेन उक्तम्।।यः पुनः अधिकृतः सन् देहात्माभिमानित्वेन देहभृत् अज्ञः अबाधितात्मकर्तृत्वविज्ञानतया अहं कर्ता इति निश्चितबुद्धिः तस्य अशेषकर्मपरित्यागस्य अशक्यत्वात् कर्मफलत्यागेन चोदितकर्मानुष्ठाने एव अधिकारः? न तत्त्यागे इति एतम्? अर्थं दर्शयितुम् आह --,

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【 Verse 18.11 】

▸ Sanskrit Sloka: न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत: | यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ||

▸ Transliteration: na hi dehabhṛtā śakyaṁ tyaktuṁ karmāṇyaśeṣataḥ | yastu karma-phala-tyāgī sa tyāgītyabhidhīyate ||

▸ Glossary: na: never; hi: certainly; dehabhṛtā: of the embodied; śakyaṁ: possible; tyak- tuṁ: to renounce; karmāṇi: activities of; aśeṣataḥ: altogether; yastu: anyone who; karma: work; phala: results; tyāgī: renouncer; sa tyāgī: the renouncer; iti: thus; abhidhīyate : it is said

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.11 Human beings cannot give up all activities. Therefore the one who has renounced the fruits of such activity is one who has truly renounced.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.11।।कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है? वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.11।। क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा अशेष कर्मों का त्याग संभव नहीं है? इसलिए जो कर्मफल त्यागी है? वही पुरुष त्यागी कहा जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.11 न not? हि verily? देहभृता by an embodied being? शक्यम् possible? त्यक्तुम् to abandon? कर्माणि actions? अशेषतः entirely? यः who? तु but? कर्मफलत्यागी relinisher of the fruits of actions? सः he? त्यागी relinisher? इति thus? अभिधीयते is called.Commentary He who has assumed a human body and yet grumbles at having to perform actions is verily a fool. Can fire that is endowed with heat as its natural property ever think of getting rid of it So long as you are living in this body you cannot entirely relinish action. Lord Krishna says to Arjuna Nor can anyone? even for an instant remain actionless for helplessly is everyone driven to action by the alities born of Nature (Cf.III.5). Nature (and your own nature? too) will urge you to do actions. You will have to abandon the idea of agency and the fruits of actions. Then you are ite safe. No action will bind you.The ignorant man who identifies himself with the body and who thinks that he is himself the doer of all actions should not abandon actions. It is impossible for him to relinish actions. He will have to perform all the prescribed duties while relinishing their fruits.Dehabhrita A wearer of the body An embodied being? i.e.? he who identifies himself with the body. A man who has discrimination between the Real and the unreal? the Eternal and the transient? cannot be called a bodywearer? because he does not think that he is the doer of actions -- vide chapter II.21 (He who knows Him Who is indestructible? eternal? unborn? undiminishing -- how can that man slay? O Arjuna? or cause to be slain).When the ignorant man who is alified for action does the prescribed duties? relinishing the desire for the fruits of his actions? he is called a Tyagi? although he is active. This title Tyagi is given to him for the sake of courtesy.The relinishment of all actions is possible only for him who has attained Selfrealisation and who is? therefore? not a wearer of the body? i.e.? does not hink that the body is the Self. (Cf.III.5)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.11. Indeed, to relinish actions entirely is not possible for a body-bearing one; but whosoever relinishes the fruits of actions, he is said to be a man of [true] relinishment.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.11 But since those still in the body cannot entirely avoid action, in their case abandonment of the fruit of action is considered as complete renunciation.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.11 For, it is impossible for one who bears a body to abandon actions entirely. But he who gives up the fruits of works, is called the abandoner.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.11 Since it is not possible for one who holds on to a body to give up actions entirely, therefore he, on the other hand, who renounces results on actions is called a man of renunciation.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.11 Verily, it is not possible for an embodied being to abandon actions entirely; but he who relinishes the rewards of actions is verily called a man of renunciation.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.4-11 Niscayam etc. upto abhidhiyate. The conclusion here is this : Due to the manifoldness of the nature of the Strands, that have been defined earlier, the act of relinishment itself is performed with a certain mental disposition which is a modification of the Sattva, the Rajas and the Tamas (the Strands). Because it reflects (is contaminated by) the nature of the person having the same (the said mental dispositon), what is called the real (unalloyed) relinishment is the performance of the actions by the knowers of the Supreme Brahman by giving up desire to achieve fruits and by avoiding the craving and hatred on account of their eanimity to [the pairs of opposites like] success and failure etc. That is why [the Bhagavat] says : 'By the act of relinishment born of the Rajas or of the Tamas (Strands), no connection with the fruit [of relinishment] is attained'. However, for an act of relinishing, born of the Sattva (Strand), there is the fruit in the form of honouring the purport of the scriptures. The application of the term 'relinishment' stands to reason, in fact, only in the case of a sage who has relinished his holding on the multitude of the Strands.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.11 It is impossible for one who has a body and has to nourish it. 'to abandon action entirely'; for eating, drinking etc., reired for nourshing the body and other acts connected therewith are unavoidable. And for the same reason the five great sacrifices etc., are also indispensable. He who has given up the fruits of the five great sacrifices, is said to have renounced; this is referred to in the Srutis such as: 'Only through renunciation do some obtain immortality' (Ma. Na., 8.14). Renunciation of fruits of actions is illustrative; it implies much more. It implies one who has renounced the fruits, agency and attachment to works, as the topic has been begun with the declaration: 'For abandonment (Tyaga) is declard to be of three kinds' (18.4).

This statement may be estioned in the following manner: 'Agnihotra, the full moon and new moon sacrifices, Jyotistoma etc., and also the five great sacrifices are enjoined by the Sastras only for the attainment of their results like heaven. They are not purposeless. Even the injunction with regard to obligatory and occasional ceremonies is enjoined because they yield results, as implied in the following passage: "For householders, Prajapatya ceremony" (V.P., 1.6.37). Therefore, as the performance of actions has to be understood as a means for attaining their respective results, the accruing of agreeable and disagreeable results is inevitable, even though they are performed without any desire for fruits, just as a seed sown must grow into a tree and bear fruit. Hence, actions ought not to be performed by an aspirant for release, because the results are incompatible with release. Sri Krsna answers such objections:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.11 Deha-bhrta, for one who holds on to a body-one who maintains (bibharti) a body (deha) is called a deha-bhrt. One who has self-indentification with the body is called a deha-bhrt, but not a so a man of discrimination; for he has been excluded from the eligibility for agentship by such texts as, 'He who knows this One is indestructible৷৷.' etc. Hence, for that unenlightened person who holds on to the body, he, since; it is na, not; sakyam, possible; tyaktum, to give up, renounce; karmani, actions; asesatah, entirely, totally; therefore the ignorant person who is competent (for rites and duties), yah, who; tu, on the other hand; karma-phala-tyagi, renounces results of actions, relinishes only the hankering for the results of actions while performing the nityakarmas; sah, he; is abhidhiyate, called; tyagi iti, a man of renunciation-even though he continues to be a man of rites and duties. This is said by way of eulogy. Therefore total renunciation of actions is possible only for one who has realized the supreme Truth, who does not hold on to the body, and who is devoid of the idea that the body is the Self. Again, what is that purpose which is accomplished through renunciation of all actions? This is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.11।। कोई भी देहधारी जीवित प्राणी चाहे वह एक कोषीय जीव ही क्यों न हो समस्त कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। कर्म तो जीवन का प्रतीक या लक्षण है। कर्म ही जीवनरूपी पुष्प की सुगन्ध है जहाँ कर्म नहीं है? वहाँ जीवन समाप्त समझा जाता है। कुछ कर्म किये बिना रहना भी अपने आप में एक कर्म ही है। शारीरिक और मानसिक क्रियाएं मरण पर्यन्त होती ही रहती हैं।अत हम देहधारियों को कर्म करने चाहिए या नहीं? ऐसा विकल्प ही संभव नहीं होता। परन्तु हमको कौन से कर्म और किस प्रकार उन्हें करना चाहिए? इस विषय में अवश्य ही विकल्प संभव है। गीता के उपदेशानुसार हमको अपने कर्तव्य कर्म ईश्वरार्पण की भावना से करने चाहिए।अज्ञानी जन देहादि अनात्म उपाधियों को ही अपना स्वरूप समझकर उसमें आसक्त होते हैं तथा उनके कर्मों का कर्ता भी स्वयं को ही मानते हैं। अत ऐसे लोग सात्त्विक त्याग नहीं कर पाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का ऐसे लोगों को यह उपदेश है कि उनको कमसेकम कर्मफलों की आसक्ति त्याग कर कर्मों का आचरण परिश्रम? उत्साह एवं कुशलता के साथ करना चाहिए। कर्मफलत्यागी पुरुष ही वास्तव में त्यागी है? न कि कर्मों को त्यागने वाला व्यक्ति।इस त्याग का क्या प्रयोजन है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.11।।तदेवं सात्त्विकत्यागवतः शुद्धिचित्तस्य सर्वकर्मत्यागे मुख्यसंन्यासेऽधिकारं प्रदर्श्याधिकृतस्य देहाभिमानित्वेन देहभृतोऽज्ञस्याबाधितात्मकर्तृत्वविज्ञानतयाहंकर्तेति निश्चितबुद्धेरशेषकर्मपरित्यागस्याशक्यत्वात्? कर्मफलत्यागेन विहितकर्मानुष्ठान देहभृतोऽज्ञस्याबाधितात्मकर्तृत्वविज्ञानतयाहंकर्तेति निश्चितबुद्धेरशेषकर्मपरित्यागस्याशक्यत्वात्? कर्मफलत्यागेन विहितकर्मानुष्ठान एवाधिकारो न त्याग इत्येमर्थं दर्शयितुमाह -- नहीति। हि यस्माद्देहभृता देहं स्वात्मत्वेन विभर्ति धारयतीति देहभृत् देहाभिमानवान् देनाज्ञेनाशेषतः निःशेषेण सर्वाणि कर्माणि त्यक्तुं संन्यसितुं न शक्यते। तस्माद्यस्तवज्ञो देहभृदधिकृतो विहितानि कर्माणि कुर्वन् तत्फलत्यागी कर्मफलाभिसंधिमात्रसंन्यासी स त्यागीत्यभिधीयते। कर्म्यपि सन् त्यागीति स्तुत्यभिप्रायेणोक्तम्। तथाच परमार्थदर्शिना देहाभिमानशून्येनाशेषकर्मसंन्यासः शक्यते कर्तुमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.11।।तदेवमात्मज्ञानवतः सर्वकर्मत्यागः संभाव्यते कर्मप्रवृत्तिहेत्वो रागद्वेषयोरभावादित्युक्तं संप्रत्यज्ञस्य कर्मत्यागासंभवे हेतुरुच्यते -- नहीति। मनुष्योऽहं ब्राह्मणोऽहं गृहस्थोऽहमित्याद्यभिमानेनाबाधितेन देहं कर्माधिकारहेतुवर्णाश्रमादिरूपं कर्तृभोक्तृत्वाद्याश्रयं स्थूलसूक्ष्मशरीरेन्द्रियसङ्घातं बिभर्ति अनाद्यविद्यावासनावशाद्व्यवहारयोग्यत्वेन कल्पितमसत्यमपि सत्यतया स्वभिन्नमपि स्वाभिन्नतया पश्यन् धारयति पोषयति चेति देहभृदबाधितकर्माधिकारहेतुर्देहाभिमानस्तेन विवेकज्ञानशून्येन देहभृता कर्मप्रवृत्तिहेतुरागद्वेषपौष्कल्येन सततं कर्मसु प्रवर्तमानेन कर्माण्यशेषतो निःशेषेण त्यक्तुं हि यस्मान्न शक्यं न शक्यानि। सत्यां कारणसामग्र्यां कार्यत्यागस्याशक्यत्वात्। तस्मात् यस्त्वज्ञोऽधिकारी सत्त्वशुद्ध्यर्थं कर्माणि कुर्वन्नपि भगवदनुकम्पया तत्कालफलत्यागी। तुशब्दस्तस्य दुर्लभत्वद्योतनार्थः। स त्यागीत्यभिधीयते। गौण्या वृत्त्या स्तुत्यर्थमत्याग्यपि सन्। अशेषकर्मसंन्यासस्तु परमार्थदर्शित्वेनैव देहभृता शक्यते कर्तुमिति स एव मुख्यया वृत्त्या त्यागीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.11।।अमुख्यमेव सात्त्विकं त्यागमनूद्य तत्प्रयोजनमाह द्वाभ्याम् -- नहीति। देहभृता देहाभिमानिना हि यस्मादशेषतः कर्माणि त्यक्तुं न शक्यं अशक्यम्। प्राणयात्रालोपप्रसङ्गात्। तस्मादधिकृतः सन् यः कर्मफलत्यागशीलः। तुशब्द एवार्थे। स एव त्यागीत्युच्यते। यस्त्वशेषतः कर्माणि त्यक्तुं शक्नोति परमार्थदर्शी स मुख्यस्त्यागीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.11।।ननु कर्मफलत्यागे तत्करणं किंप्रयोजनम् इत्यत आह -- न हीति। देहभृता देहाध्यासवता अशेषतः कर्माणि त्यक्तुं न शक्यम्। हीति युक्तश्चायमर्थः। देहाध्यासे फलापेक्षणात् लोकापेक्षणाच्च कथं त्यागः कर्त्तव्यः इति। यतो यस्तु यश्च पुनः कर्मफलत्यागी कृतकर्मणां फलानभिलाषी सत्यागी इति अभिधीयते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.11।।नन्वेवंभूतात्कर्मफलत्यागाद्वरं सर्वकर्मत्यागस्तथा सति कर्मविक्षेपाभावेन ज्ञाननिष्ठा सुखं संपद्यते तत्राह -- नेति। देहभृता देहात्माभिमानवता निःशेषेण सर्वाणि कर्माणि त्यक्तुं नहि शक्यम्। तदुक्तम् -- न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत इत्यादिना। तस्माद्यस्तु कर्माणि कुर्वन्नेव कर्मफलत्यागी स एव मुख्यत्यागीत्यभिधीयते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.10 -- 18.11।।एवम्भूतस्य लक्षणमाह -- न द्वेष्टीति। सत्त्वसमाविष्टस्त्यागी बुद्धिमान् अकुशलं कर्मानिष्टफलकं? कुशले चेष्टस्वर्गादिफलके कर्मणि नानुषज्जते? त्यक्तात्मसुखातिरिक्तफलत्वात्? त्यक्तकर्तृत्वाच्च। अत्राकुशलं कर्म प्रमादिनमभिप्रेत्योक्तम् नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् [कठो.2।24ना.प.9।19महो.4।69] इति दुश्चरिताविरतस्य प्रमादिनो ज्ञानतोऽप्यात्मसुखानवाप्तिश्रवणात्। अतः कर्मणि कर्तृत्वसङ्गफलानां त्यागः शास्त्रीयः? न तु स्वरूपतस्त्याग इति। तदाह -- नहीति। नहि ध्रियमाणदेहेन कर्माण्यशेषतस्त्यक्तुं शक्यन्त इत्यर्थे शक्यमव्ययम्। देहधारणार्थानां अशनपानादीनां तदनुबन्धानां च कर्मणावर्जनीयत्वात्? तदर्थं च महायज्ञादिकर्माप्यवर्जनीयमेव। तत्र यः तेषु यज्ञादिकर्मसु फलत्यागी -- फलेत्युपलक्षणं कर्तृत्वममतयोरपि -- स एष त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः [महाना.8।14कैव.2] इत्यादौ त्यागीत्यभिधीयते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.11।।परंतु जो पुरुष कर्माधिकारी है और शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला होनेके कारण देहधारी अज्ञानी है? आत्मविषयक कर्तृत्वज्ञान नष्ट न होनेके कारण जो मैं करता हूँ ऐसी निश्चित बुद्धिवाला है उससे कर्मका अशेष त्याग होना असम्भव होनेके कारण? उसका कर्मफलत्यागके सहित विहित कर्मोंके अनुष्ठानमें ही अधिकार है? उनके त्यागमें नहीं। यह अभिप्राय दिखलानेके लिये कहते हैं --, देहधारीदेहको धारण करे सो देहधारी? इस व्युत्पत्तिके अनुसार शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला देहभृत् कहा जाता है? विवेकी नहीं। क्योंकि वेदाविनाशिनम् इत्यादि श्लोकोंसे वह ( विवेकी ) कर्तापनके अधिकारसे अलग कर दिया गया है। अतः ( यह अभिप्राय समझना चाहिये कि ) जिस कारण उस देहधारीअज्ञानीसे समस्त कर्मोंका पूर्णतया त्याग किया जाना सम्भव नहीं है? इसलिये जो तत्त्वज्ञानरहित अधिकारी? नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ उन कर्मोंके फलका त्यागी है? अर्थात् कर्मफलकी वासनामात्रको छोड़नेवाला है? वह कर्म करनेवाला होनेपर भी स्तुतिके अभिप्रायसे त्यागी कहा जाता है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि देहात्माभिमानसे रहित परमार्थज्ञानीके द्वारा ही निःशेषभावसे कर्मसंन्यास किया जा सकता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.11।। व्याख्या --   न हि देहभृता (टिप्पणी प0 879.1) शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः -- देहधारी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा कर्मोंका सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है क्योंकि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीरके साथ तादात्म्य (एकता) रखनेवाला क्रियासे रहित कैसे हो सकता है हाँ? यह हो सकता है कि मनुष्य यज्ञ? दान? तप? तीर्थ आदि कर्मोंको छोड़ दे परन्तु वह खानापीना? चलनाफिरना? आनाजाना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि आवश्यक शारीरिक क्रियाओंको कैसे छोड़ सकता हैदूसरी बात? भीतरसे कर्मोंका सम्बन्ध छोड़ना ही वास्तवमें छोड़ना है। बाहरसे सम्बन्ध नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बाहरसे सम्बन्ध छोड़ भी दिया जाय तो वह कबतक छूटा रहेगा जैसे कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है? एक कर्म है क्योंकि इसमें प्रकृतिजन्य कारणशरीरका सम्बन्ध रहता है। इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान होता है।कोई भी देहधारी मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे सम्बन्धविच्छेद नहीं कर सकता (गीता 3। 5)। कर्मोंका आरम्भ किये बिना? निष्कर्मता (योगनिष्ठा) प्राप्त नहीं होती और कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे सिद्धि (सांख्यनिष्ठा) भी प्राप्त नहीं होती (गीता 3। 4)।मार्मिक बातपुरुष (चेतन) सदा निर्विकार और एकरस रहनेवाला है परन्तु प्रकृति विकारी और सदा परिवर्तनशील है। जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो? उसको प्रकृति कहते हैं -- प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।उस प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ जबतक पुरुष अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता रहेगा? तबतक वह कर्मोंका सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि शरीरमें अहंताममता होनेके कारण मनुष्य शरीरसे होनेवाली प्रत्येक क्रियाको अपनी क्रिया मानता है? इसलिये वह कभी किसी अवस्थामें भी क्रियारहित नहीं हो सकता।दूसरी बात? केवल पुरुषने ही प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ा है। प्रकृतिने पुरुषके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। जहाँ विवेक रहता है? वहाँ पुरुषने विवेककी उपेक्षा करके प्रकृतिसे सम्बन्धकी सद्भावना कर ली अर्थात् सम्बन्धको सत्य मान लिया। सम्बन्धको सत्य माननेसे ही बन्धन हुआ है। वह सम्बन्ध दो तरहका होता है -- अपनेको शरीर मानना और शरीरको अपना मानना। अपनेको शरीर माननेसे अहंता और शरीरको अपना माननेसे ममता होती है। इस अहंताममतारूप सम्बन्धका घनिष्ठ होना ही देहधारीका स्वरूप है। ऐसा देहधारी मनुष्य कर्मोंको सर्वथा नहीं छोड़ सकता।यस्तु (टिप्पणी प0 879.2) कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते -- जो किसी भी कर्म और फलके साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखता? वही त्यागी है। जबतक मनुष्य कुशलअकुशलके साथ? अच्छेमन्देके साथ अपना सम्बन्ध रखता है? तबतक वह त्यागी नहीं है।यह पुरुष जिस प्राकृत क्रिया और पदार्थको अपना मानता है? उसमें उसकी प्रियता हो जाती है। उसी,प्रियताका नाम है -- आसक्ति। यह आसक्ति ही वर्तमानके कर्मोंको लेकर कर्मासक्ति और भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छाको लेकर फलासक्ति कहलाती है। जब मनुष्य फलत्यागका उद्देश्य बना लेता है? तब उसके सब कर्म संसारके हितके लिये होने लगते हैं? अपने लिये नहीं। कारण कि उसको यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि कर्म करनेकी सबकीसब सामग्री संसारसे मिली है और संसारकी ही है? अपनी नहीं। इन कर्मोंका भी आदि और अन्त होता है तथा उनका फल भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है परन्तु स्वयं सदा निर्विकार रहता है न उत्पन्न होता है? न नष्ट होता है और न कभी विकृत ही होता है। ऐसा विवेक होनेपर फलेच्छाका त्याग सुगमतासे हो जाता है। फलका त्याग करनेमें उस विवेककी मनुष्यमें कभी अभिमान भी नहीं आता क्योंकि कर्म और उसका फल -- दोनों ही अपनेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहे हैं अतः उनके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तवमें है ही कहाँ इसीलिये भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफलका त्यागी है? वही त्यागी कहा जाता है।निर्विकारका विकारी कर्मफलके साथ सम्बन्ध कभी था नहीं? है नहीं? हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं है। केवल अविवेकके कारण सम्बन्ध माना हुआ था। उस अविवेकके मिटनेसे मनुष्यकी अभिधा अर्थात् उसका नाम त्यागी हो जाता है -- स त्यागीत्यभिधीयते। माने हुए सम्बन्धके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक बात कही जाती है। एक व्यक्ति घरपरिवारको छोड़कर सच्चे हृदयसे साधुसंन्यासी हो जाता है तो उसके बाद घरवालोंकी कितनी ही उन्नति अथवा अवनति हो जाय अथवा सबकेसब मर जायँ? उनका नामोनिशान भी न रहे? तो भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। इसमें विचार करें कि उस व्यक्तिका परिवारके साथ जो सम्बन्ध था? वह दोनों तरफसे माना हुआ था अर्थात् वह परिवारको अपना मानता था और परिवार उसको अपना मानता था। परन्तु पुरुष और प्रकृतिका सम्बन्ध केवल पुरुषकी तरफसे माना हुआ है? प्रकृतिकी तरफसे माना हुआ नहीं जब दोनों तरफसे माना हुआ (व्यक्ति और परिवारका) सम्बन्ध भी एक तरफसे छोड़नेपर छूट जाता है? तब केवल एक तरफसे माना हुआ (पुरुष और प्रकृतिका) सम्बन्ध छोड़नेपर छूट जाय? इसमें कहना ही क्या है सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है -- इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.11।।आत्मज्ञानवतः सर्वकर्मत्यागसंभावनामुक्त्वा तद्धीनस्य तदसंभवे हेतुवचनत्वेनानन्तरश्लोकमवतारयति -- यः पुनरिति। न बाधितमात्मनि कर्तृत्वविज्ञानमस्येत्यज्ञस्तथा तस्य भावस्तत्ता तयेति यावत्? एतमर्थं दर्शयितुमज्ञस्य सर्वकर्मसंन्यासासंभवे हेतुमाहेति योजना। यस्मादित्यस्य तस्मादित्युत्तरेण संबन्धः। विवेकिनोऽपि देहधारितया देहभृत्त्वाविशेषे कर्माधिकारः स्यादित्याशङ्क्याह -- नहीति। कर्तृत्वाधिकारस्तत्पूर्वकं कर्मानुष्ठानं तस्मादिति यावत्। ज्ञानवतो देहधारणेऽपि तदभिमानित्वाभावोऽतःशब्दार्थः। अज्ञस्य सर्वकर्मत्यागायोगमुक्तं हेतूकृत्य फलितमाह -- तस्मादिति। कर्मानुष्ठायिनस्त्यागित्वोक्तिरयुक्तेत्याशङ्क्याह -- कर्म्यपीति। कर्मिणापि फलत्यागेन त्यागित्ववचनं फलत्यागस्तुत्यर्थमित्यर्थः। कस्य तर्हि सर्वकर्मत्यागः संभवतीत्याशङ्क्य विवेकवैराग्यादिमतो देहाभिमानहीनस्येत्युक्तं निगमयति -- तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.11।।ननुइति मे पार्थ [18।6] इति भगवता स्वसिद्धान्तो निष्ठाङ्कितः? अतोन हि देहभृता इति किमुच्यते इत्यत आह -- अन्य इति। सर्वकर्मपरित्यागलक्षणस्त्यागार्थस्त्यागशब्दार्थः। पूर्वपक्षबीजनिरासार्थमिति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.11।।अन्यस्त्यागार्थो न युक्त इत्याह -- न हीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.11।। -- न हि यस्मात् देहभृता? देहं बिभर्तीति देहभृत्? देहात्माभिमानवान् देहभृत् उच्यते? न विवेकी स हि वेदाविनाशिनम् (गीता 2।21) इत्यादिना कर्तृत्वाधिकारात् निवर्तितः। अतः तेन देहभृता अज्ञेन न शक्यं त्यक्तुं संन्यसितुं कर्माणि अशेषतः निःशेषेण। तस्मात् यस्तु अज्ञः अधिकृतः नित्यानि कर्माणि कुर्वन् कर्मफलत्यागी कर्मफलाभिसंधिमात्रसंन्यासी सः त्यागी इति अभिधीयते कर्मी अपि सन् इति स्तुत्यभिप्रायेण। तस्मात् परमार्थदर्शिनैव अदेहभृता देहात्मभावरहितेन अशेषकर्मसंन्यासः शक्यते कर्तुम्।।किं पुनः तत् प्रयोजनम्? यत् सर्वकर्मसंन्यासात् स्यादिति? उच्यते --,

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【 Verse 18.12 】

▸ Sanskrit Sloka: अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम् | भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् ||

▸ Transliteration: aniṣṭamiṣṭaṁ miśraṁ ca trividhaṁ karmaṇaḥ phalam | bhavatyatyāgināṁ pretya na tu sannyāsināṁ kvacit ||

▸ Glossary: aniṣṭaṁ: undesirable; iṣṭaṁ: desirable; miśraṁ ca: or mixture; trividhaṁ: three kinds; karmaṇaḥ: work; phalam: result; bhavati: becomes; atyāgināṁ: of the non-renouncer; pretya: after death; na tu: but not; sannyāsināṁ: of the renounced order; kvacit: at any time

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.12 For one who is not renounced, the three kinds of fruits of action—desirable, undesirable and mixed—acrue after death, but not to one who has renounced.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.12।।कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट? अनिष्ट और मिश्रित -- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.12।। कर्मों के शुभ? अशुभ और मिश्र ये त्रिविध फल केवल अत्यागी जनों को मरण के पश्चात् भी प्राप्त होते हैं परन्तु संन्यासी पुरुषों को कदापि नहीं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.12 अनिष्टम् unwished or disagreeable or evil? इष्टम् wished or agreeable or good? मिश्रम् mixed? च and? त्रिविधम् threefold? कर्मणः of action? फलम् fruit? भवति accrues? अत्यागिनाम् to nonrenouncers? प्रेत्य after death? न not? तु but? संन्यासिनाम् to renouncers? क्वचित् ever.Commentary One fruit (of action) is pleasant? another is unpleasant? while the third is a mixture of both. Those in whom good actions preponderate are rorn as gods. Men of evil lives are rorn into animal or vegetable kingdoms. If their actions are eally good and bad? they are rorn into the human kingodm. These distinctions of good? evil and mixed do not exist for the liberated sage who has gone beyond the bonds of Karma by destroying egoism? by annihilating the idea of agency and by abandoning the hope of rewards of actions.The action of a renouncer does not generate desire or attachment thereto. Therefore? after death he is not born again. The actions that are performed without any desire for the reward can bring no bondage to the man at any time.He who has surrendered the fruits of all his works to the Lord is free from the bondage of Karma. Some kind of action is inevitable and natural to all beings? but the man of renunciation abandons the fruits of actions.Phalam Fruit This is caused by the operation of various external factors. This is brought forth by Avidya (ignornace). It is like jugglery and very delusive. The term Phala denotes something that ickly passes away? something not real? not solid.Karma Action Virtue and vice.Anishtam Disagreeable or evil? such as hell? the animal kingdom? etc.Ishtam Wished or agreeable or good.Misram Good and evil mixed together the human birth.Only the unenlightened who have not renounced the fruits of actions reap these three sorts of fruits. The real Sannyasins who belong to the highest order of Sannyasa (Paramahamsa Parivrajakas) who are ever engaged in meditation on the pure? immortal Self? who are solely devoted to Selfknowledge? and who rest in their own essential nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute do not reap any fruits as the fire of Selfknowledge has burnt ignorance and its effects which are the seeds of Samsara.Only a liberated sage who has attained knowledge of the Self and who has no identification with the body can totally relinish all actions. He knows that the Self is beyond all actions and that action is attributed to the Self by ignorance. The ignorant man who identifies himself with the body cannot abandon actions. He thinks that he is the agent or the doer of all actions and

Chapter 18 (Part 7)

expects to attain the fruits of his actions and so he is born again and again in this world to reap the fruits of these actions.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.12. The three-fold fruit of action, viz., the undesired, the desired and the mixed, accrues [even] after death ot those who are not men of relinishment, but never to those who are men of renunciation.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.12 For those who cannot renounce all desire, the fruit of action hereafter is threefold - good, evil, and partly good and partly evil. But for him who has renounced, there is none.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.12 Undesirable, desirable and mixed - thus threefold is the fruit of work that accrues after death to those who have not renounced; but to those who have renounced, none whatsoever.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.12 The threefold results of actions-the undesirable, the desirable, and the mixed-accrues after death to those who do not resort to renunciation, but never to those who resort to monasticism.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.12 The threefold fruit of action (evil, good and mixed) accrues after death to the non-abandoners, but never to the abandoners.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.12 Anistam etc. To those who are not men of relinishment : to those who are full of [desire for] fruit. Even at the stage of mundane life, where all the five factors do exist for actions, those persons, blind with their ignorance, obstinately burden their own Self with the entire load of agency. Hence they fetter their own Self with their own thinking. But, in fact, there is no bondage for Him (the Self). This is now being taught as :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.12 The 'undesirable result' is Naraka etc., 'the desirable' is heaven etc., 'the mixed' is sons, cows, food etc., which are combined with some undesirable results. Those who have not renounced, namely, those who are devoid of renunciation of agency, possessiveness and fruits - they meet with threefold conseences after death. The meaning of 'after death' (Pretya) may be understood as subseent to the performance of actions. But 'to those who have renounced, none whatsoever,' viz., to those who have relinished the sense of agency etc., no such results antagonistic to release accrue.

Here the purport is this: Agnihotra, the great sacrifices etc. are obligatory throughout life and are reired for attaining the objects of desire; but in regard to release their application is different. Though externally they appear to be the same in their nature in both the conditions, they are different in their fruits by virtue of difference in application. Their application to release is seen in such texts as 'The Brahmanas desire to know Him by the study of the Vedas, by sacrifices, by gifts, by austerities conjoined with fasting' (Br. U., 4.4.22). Here the performance of actions without sense of agency is enforced. Such giving up agency etc., are relevant only with regard to acts that are actually performed. Thus Sannyasa or renouncing of this kind is established in the Sastras. The same is also called Tyaga or giving up.

Sri Krsna now explains the manner of realising that one is non-agent, by attributing all agency to God, who is the Supreme Person and the Inner Ruler, By cultivating this attitude, an aspirant can attain the renunciation of possessiveness with regard to actions and also their fruits. For it is the Supreme Person who performs all actions through the individual selves who belong to Him. The organs, bodies and Pranas of embodied beings are His. They exist for the sake of His own sport as the only purpose. Therefore, even the appeasement of hunger etc., and such other acts which affect the life of the individual souls and their works constitute only the means for accomplishing that purpose, namely, the sport of the Highest Purusa Himself. The purport of the argument is this: The analogy of seeds producing the tree and its fruits is not applicable to the actions of release-seekers. Their actions may look like those of fruit-seekers externally. But as mentally they do not entertain any such purpose, the conseence of their actions can be ite different. The purpose served by their actions is only affording sport for the Supreme Being.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.12 These trividham, threefold-of three kinds; phalam, results; karmanah, of actions characterized as the righteous and the unritheous; anistam, the undesirable, consisting in (birth in) hell, (among) animals, etc.; istam, the desirable, consisting in (birth as) gods and others; and misram, the mixed, having a mixture of the desirable and the undesirable, consisting in (birht as) human beings;-these results that are of these kinds, bhavati, accrues; pretya, after death, after the fall of the body; atyaginam, to those who do not resort to renunciation, to the unilllumined, the men with rites and duties, who are not men of renunciation in the truest sense. The derivative sense of the word phala (pha-la) is this: On accunt of being accomplished through the operation of diverse external accessories, and a result of ignorance, comparable to the charm cast by jugglery, a source of great delusion and appearing as though close to the indwelling Self, it is phalgu (unsubstantial), and as a conseence it undergoes layam (disappearance). (The result that is of this kind accrues to those who do not resort to renunciation). Tu, but; na kvacit, never; sannyasinam, to those who resort tomonasticism for the sake of the highest Reality, to the class of monks called paramahamsas who remain steadfast in Knowledge alone. For, it cannot be that those who are devoted wholly to steadfastness in complete enlightenment do not dig out the seed of transmigration. This is the meaning. Therefore it is only for those who have realized the supreme Truth that it is possible to become a monk who renounces actions totally, because action, accessories and results are superimmpositions on the Self through ignorance. But the renunciation of all actions is not possible for an unenlightened person who perceives the locus (the body etc.), action, agentship and accessories as the Self. This the Lord shows in the following verses:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.12।। सभी कर्मों का फल उनके गुण स्तर पर निर्भर करता है। इसके पूर्व त्रिविध त्याग का वर्णन किया गया था? और अब यहाँ उनके त्रिविध फलों का वर्णन किया जा रहा है।मनुष्य की इच्छा का बाह्य जगत् में भी प्रक्षेपण होता है? उसे कर्म कहते हैं। और प्रत्येक कर्म? कर्ता की मनस्थिति तथा उसके उद्देश्य के अनुसार? अपना संस्कार उस कर्ता के अन्तकरण में अंकित करता है। मानवमन का स्वभाव कर्मों को दोहराने का है। भावी विचार भूतकाल के विचार चिन्हों का ही अनुकरण करते हैं। इस प्रकार? कर्म से वासनायें उत्पन्न होती हैं? और फिर जगत् की घटनाओं के साथ इन वासनाओं के अनुसार? हमारी प्रतिक्रियायें होती हैं। दर्शनशास्त्र में कर्मफल से तात्पर्य केवल लौकिक फल से ही न होकर? हमारे अन्तकरण में अंकित होने वाले कर्मों के संस्कारों से भी है।ये कर्मफल यहाँ त्रिविध बताये गये हैं (1) इष्ट अर्थात् शुभ कल्याणकारी? (2) अनिष्ट अर्थात् अशुभ अनर्थकारी? और (3) मिश्र अर्थात् शुभाशुभ का मिश्ररूप।काल के सतत् प्रवाह में वर्तमान काल निकट भविष्य को निर्धारित करता है। इसलिए स्पष्ट है कि विभिन्न संरचनाओं वाली हमारी वासनायें ही निकट भविष्य की घटनाओं के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं को निर्धारित करेंगी। यदि इसी सिद्धांत को हम अपने वर्तमान देह के मरण के क्षण तक आगे बढ़ायें? तो यह तथ्य स्पष्ट हो जायेगा कि मरणोपरान्त का हमारा देह तथा जन्म देश आदि का निर्धारण उस समय की हमारी वासनाओं के अनुरूप ही होगा। यही सनातन धर्म में प्रतिपादित पुनर्जन्म का सिद्धांत है।शुभ कर्मों के फल उच्चलोक का सुख है और अशुभ कर्मों का फल अशुभ अर्थात् निम्नस्तर का दुखपूर्ण पशु जीवन है। शुभाशुभ के मिश्रण के फलस्वरूप मनुष्य देह की प्राप्ति होती है। इस देह में रहते हुए हम अपने बन्धनों को और अधिक दृढ़ भी कर सकते हैं और उन बन्धनों से पूर्ण मुक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं। अत लक्ष्य का निर्धारण हमें ही करना है। निसन्देह? सभी मनुष्यों के हृदय में सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्ति का आह्वान होता रहता है? परन्तु उसी हृदय में निवास कर रहे अवगुणरूपी पशु भी भौंकते? चीखते? पुकारते और गर्जना करते रहते हैं। वे हमें भ्रमित कर अपने लक्ष्य से दूर ले जाते हैं।यदि मनुष्य अपने श्रेष्ठ आदर्श से तादात्म्य करता है तो उसके अवगुण शनै शनै समाप्त हो जाते हैं। और यदि वह उपाधियों के साथ तथा विषयों में आसक्त होता है? तो उसके अवगुण निरन्तर प्रवृद्ध ही होते जाते हैं जो उसके दिव्य स्वरूप को आच्छादित करते हैं। संक्षेप में? उच्च और नीच के इस शक्ति परीक्षण में निर्णायक तत्त्व मनुष्य का अपना व्यक्तित्व ही होता है।इस श्लोक में कथित त्रिविध फलों से पूर्ण मुक्ति पाने के लिए साधक को अपने त्रिगुणातीत आत्मस्वरूप का बोध प्राप्त करना चाहिए। त्याग और संन्यास के सूक्ष्म भेद को यहाँ स्पष्ट किया गया है। त्याग का अर्थ है? त्रिगुणों से प्रभावित मन की वृत्तियों के साथ होने वाले तादात्म्य का प्रयत्नपूर्वक त्याग तथा संन्यास का अर्थ है उस अहंकार का ही त्याग जो शुभअशुभ कर्मों का कर्ता तथा इष्टानिष्टादि फलों का भोक्त बनता है।सम्पूर्ण गीता में मनुष्य के व्यक्तित्व के पुनर्गठन के सिद्धांत एवं साधनाओं का अत्यन्त सुन्दर और विस्तृत विवेचन किया गया है। उसका सारांश यह है कि (1) सर्वप्रथम अहंकार और स्वार्थ का त्याग कर ईश्वरार्पण की भावना से कर्तव्य पालन करना? (2) इस प्रकार अन्तकरण की शुद्धि प्राप्ति होने पर वेदान्त प्रमाण के द्वारा आत्मस्वरूप का श्रवण एवं मनन करना? और (3) तत्पश्चात् आत्मा के निदिध्यासन द्वारा आत्मसाक्षात्कार करके उसी सत्स्वरूप में निष्ठा प्राप्त करना। आत्मानुभव में भवसागर सूख जाता है। शुद्ध आत्मा में कुछ बनने की क्रिया नहीं है। मन की वासनाओं से वह सदा असंस्पृष्ट रहता है।अब? आगामी श्लोकों में कर्म के स्वरूप का विवेचन किया जा रहा है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.12।।अमुख्यसंन्यासापेक्षया मुख्यासंन्यासस्य विशिष्टं प्रयोजनं किमित्यागाङ्क्षायमाह -- अनिष्टं नरकतिर्यगादिलक्षणम्?,इष्टं देवादिलक्षणम्? मिश्रमिष्टानिष्टसंयुक्तं मनुष्यलक्षणं चैवं त्रिविधं त्रिप्रकारं कर्मणो धर्माधर्मलक्षणस्य फलं बाह्यनेककारकव्यापारनिष्पन्नत्वादनेकं अविद्याकृतत्वात् मिथ्याभूतमिन्द्रजालमायोपमं महामोहकरं प्रत्यगात्मोपसर्पीव फल्गुतया लयमदर्शनं गच्छतीति फलशब्दनिर्वचनात्। तदेवं त्रिविधं फलमत्यागिनामज्ञानां कर्मिणामपरमार्थसंन्यासिनां प्रेत्य शरीरपातादूर्ध्यवं भवति। फलाभिसंधिरहितानां कर्मणां देहपातादूर्ध्वं संचितादिक्रमानुरोधिफलस्यावश्यंभावादिति भावः। संन्यासिनां तु परमार्थसंन्यासिनां परमहंसपरिव्राजकानां केवलज्ञाननिष्ठानमुन्मूलिताविद्यादिसंसारबीजानां क्वचिद्देशे काले वा यथोक्तं फलं न भवति। अतः परमार्थतत्त्वविदः क्रियाकारकफलानामात्मन्यविद्याध्यारोपित्वदर्शिन एवाशेषकर्मसंन्यासित्वं संभवति? नत्वज्ञस्याधिष्ठानादीनि क्रियाकर्तृ़णि कारकाण्यात्मत्वेन पश्यतोऽशेषकर्मसंन्यासित्वमिति भावः। यत्त्वपरे एवंभूतस्य कर्मफलत्यागस्य फलमाह। अनिष्टादिरुपं त्रिविधं फलमत्यागिनां सकामानामेव प्रेत्य परत्र भवति। तेषां त्रिविधकर्मसंभवात् नतु संन्यासिनां क्वचिदपि भवति। संन्याससिशब्देनात्र फलत्यागसाम्यात्क्रकृताः कर्मफलत्यगिनो गृह्यन्ते। अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः स संन्यासी य योगी चेत्येवमादौ च फलत्यागिषु संन्याससिशब्दप्रयोगदर्शनात्। तेषां सात्त्विंकानां पापासंभवात् ईश्वरार्पणेन च पुण्यफलस्य त्यक्तत्वात् त्रिविधमपि कर्मफलं न भवतीत्यर्थ इति वर्णयन्ति तन्नोपादेयम्। संन्याससिशब्दस्य परमार्थसंन्यासिना सर्वकर्मत्यागिनी मुख्यत्वात् कर्मिणि च फलत्यागसाम्येन गौणत्वात् मुख्यार्थस्य चेहाबाधात्तस्यैव संन्यासिशब्देन ग्रहणसंभवे गौणग्रहणस्यगौणग्रहणस्यगौणमुख्ययोर्मुख्ये कार्यसंप्रत्ययः इति शब्दमर्यादाऽपरिज्ञानविजृम्भितत्वात् सत्यां कारणमामग्र्यां कार्योत्पाद इत्यर्थमर्यादाऽज्ञानमूलकत्वाच्च ईश्वरार्पणेन त्यक्तकर्मफलस्यापि सत्त्वशुद्य्धर्थं नित्यानि कर्माण्युतिष्ठतोऽन्तराले मृतस्य प्रागर्जितकर्मरुपकारणमामग्र्या त्रिविधशरीररुपकार्योत्पाद आवश्यक एवेति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.12।।ननु देहभृतः परमात्मज्ञानशून्यस्य कर्मिणोऽपि कर्मफलाभिसन्धित्यागत्वेन गौणसंन्यासिनः परमात्मज्ञानवतो देहाभिमानरहितस्य सर्वकर्मत्यागिनो मुख्यसंन्यासिनश्च कः फले विशेषो यदलाभेन गौणत्वमेकस्य यल्लाभेन च मुख्यत्वमन्यस्य? कर्मफलत्यागित्वं तूभयोरपि तुल्यमित्यन्यो विशेषो वाच्यः उच्यते -- अनिष्टमिति। अत्यागिनां कर्मफलत्यागित्वेऽपि कर्मानुष्ठायिनामज्ञानां गौणसंन्यासिनां प्रेत्य विविदिषापर्यन्तं सत्त्वशुद्धेः प्रागेव मृतानां पूर्वकृतस्य कर्मणः फलं शरीरग्रहणं भवति। मायामयं फल्गुतया लयमदर्शनं गच्छतीति निरुक्तेः। कर्मण इति जात्यभिप्रायमेकवचनमेकस्य त्रिविधफलत्वानुपपत्तेः। तच्च फलं कर्मणस्त्रिविधत्वात्ित्रविधं पापस्यानिष्टं प्रतिकूलवेदनीयं नारकतिर्यगादिलक्षणं? पुण्यस्य इष्टमनुकूलवेदनीयं देवादिलक्षणं? मिश्रस्य तु पापपुण्ययुगलस्य मिश्रमिष्टानिष्टसंयुक्तं मानुष्यलक्षणमित्येवं त्रिविधमित्यनुवादो हेयत्वार्थः। एवं गौणसंन्यासिनां शरीरपातादूर्ध्वं शरीरान्तरग्रहणमावश्यकमित्युक्त्वा मुख्यसंन्यासिनां परमात्मसाक्षात्कारेणाविद्यातत्कार्यनिवृत्तौ विदेहकैवल्यमेवेत्याह -- नतु संन्यासिनां क्वचिदिति। परमात्मज्ञानवतां मुख्यसंन्यासिनां परमहंसपरिव्राजकानां प्रेत्य कर्मणः फलं शरीरग्रहणमनिष्टमिष्टं मिश्रं च क्वचिद्देशे काले वा न भवत्येवेत्यवधारणार्थस्तुशब्दः। ज्ञानेनाज्ञानस्योच्छेदे तत्कार्याणां कर्मणामुच्छिन्नत्वात्। तथाच श्रुतिःभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति। पारमर्षं च सूत्रम्तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात् इति परमात्मज्ञानादशेषकर्मक्षयं दर्शयति। तेन गौणसंन्यासिनां पुनः संसारः मुख्यसंन्यासिनां तु मोक्ष इति फले विशेष उक्तः। अत्र कश्चिदाहअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च इत्यादौ कर्मफलत्यागिषु संन्यासिशब्दप्रयोगात्कर्मिण एवात्र फलत्यागसाम्यात्संन्यासिशब्देन गृह्यन्ते। तेषां च सात्त्विकानां नित्यकर्मानुष्ठानेन निषिद्धकर्मानुष्ठानेन च पापासंभवान्नानिष्टं फलं संभवति। नापीष्टं काम्याननुष्ठानात् ईश्वरार्पणेन फलस्य त्यक्तत्वाच्च। अतएव मिश्रमपि नेति त्रिविधधर्मफलासंभवः। अतएवोक्तंमोक्षार्थी न प्रवर्तेत तत्र काम्यनिषिद्धयोः। नित्यनैमित्तिके कुर्यात्प्रत्यवायजिहासया इति? स वक्तव्यः शब्दस्यार्थस्य च मर्यादा न निरधारि भवतेति। तथाहिगौणमुख्ययोर्मुख्ये कार्यसंप्रत्ययः इति शब्दमर्यादा। यथाअमावास्यायामपराह्णे पिण्डपितृयज्ञेन चरन्ति इत्यत्रामावास्याशब्दः काले मुख्यस्तत्कालोत्पन्ने कर्मणि च गौणःय एवं विद्वानमावास्यां यजते इत्यादौ तत्रामावास्यामिति कर्मग्रहणे पितृयज्ञस्य तदङ्गत्वान्न फलं कल्पनीयमिति विधेर्लाघवमिति पूर्वपक्षितं कात्यायनेनाङ्गं वा समभिव्याहारादिति गौणार्थस्य मुख्यार्थोपस्थितिपूर्वकत्वान्मुख्यार्थस्य चेहाबाधादमावास्याशब्देन काल एव गृह्यते? फलकल्पनागौरवं तूत्तरकालीनं प्रमाणवत्त्वादङ्गीकार्यमिति सिद्धान्तितं जैमिनिनापितृयज्ञः स्वकालत्वादनङ्गं स्यात् इति। एवं स्थिते संन्यासिशब्दस्य सर्वकर्मत्यागिनि मुख्यत्वात्कर्मणि च फलत्यागसाम्येन गौणत्वान्मुख्यार्थस्य चेहाबाधात्तस्यैव संन्यासिशब्देन ग्रहणमिति शब्दमर्यादा सिद्धम्। सत्यां कारणसामग्र्यां कार्योत्पादइति चार्थमर्यादा। तथाहि ईश्वरार्पणेन त्यक्तकर्मफलस्यापि सत्त्वशुद्ध्यर्थं नित्यानि कर्माण्यनुतिष्ठतोऽन्तराले मृतस्य प्रागर्जितैः कर्मभिस्त्रिविधं शरीरग्रहणं केन वार्यते।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः। अन्ततः सत्त्वशुद्धिफलज्ञानोत्पत्त्यर्थं तदधिकारिशरीरमपि तस्यावश्यकमेव। अतएव विविदिषासंन्यासिनः श्रवणादिकं कुर्वतोऽन्तराले मृतस्य योगभ्रष्टशब्दवाच्यस्यशुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते इत्यादिना ज्ञानाधिकारिशरीरप्राप्तिरवश्यंभाविनीति निर्णीतं षष्ठे। यत्र सर्वकर्मत्यागिनोऽप्यज्ञस्य शरीरग्रहणमावश्यकं तत्र,किं वक्तव्यमज्ञस्य कर्मिण इति। तस्मादज्ञस्यावश्यं शरीरग्रहणमित्यर्थमर्यादया सिद्धम्। पराक्रान्तं चैकभविकपक्षनिराकरणे सूरिभिः। तस्माद्यथोक्तं भगवत्पूज्यपादभाष्यकृतं व्याख्यानमेव ज्यायः। तद्रयमत्र निष्कर्षः। अकर्त्रभोक्तृपरमानन्दाद्वितीयसत्यस्वप्रकाशब्रह्मात्मसाक्षात्कारेण निर्विकल्पेन वेदान्तवाक्यजन्येन विचारनिश्चितप्रामाण्येन सर्वप्रकाराप्रामाण्यशङ्काशून्येन ब्रह्मात्मज्ञानेनात्माज्ञाननिवृत्तौ तत्कार्यकर्तृत्वाद्यभिमानरहितः परमार्थसंन्यासी सर्वकर्मोच्छेदाच्छुद्धः केवलः सन्नाविद्याकर्मादिनिमित्तं पुनः शरीरग्रहणमनुभवति सर्वभ्रमाणां कारणोच्छेदेनोच्छेदात्। यस्त्वविद्यावान्कर्तृत्वाद्यभिमानी देहभृत् स त्रिविधो रागादिदोषप्राबल्यात्काम्यनिषिद्धादियथेष्टकर्मानुष्ठायी मोक्षशास्त्रानधिकार्येकः? अपरस्तु यः प्राक्कृतसुकृतवशात्किंचित्प्रक्षीणरागादिदोषः सर्वाणि कर्माणि त्यक्तुमशक्नुवन्निषिद्धानि काम्यानि च परित्यज्य नित्यानि नैमित्तिकानि च कर्माणि फलाभिसंधित्यागेन सत्त्वशुद्ध्यर्थमनुतिष्ठन् गौणसंन्यासी मोक्षशास्त्राधिकारी द्वितीयः। स ततो नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानेनान्तःकरणशुद्ध्या समुपजातविविदिषः श्रवणादिना वेदनं मोक्षसाधनं संपिपादयिषुः सर्वाणि कर्माणि विधितः परित्यज्य ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसर्पति विविदिषासंन्यासिसमाख्यस्तृतीयः। तत्राद्यस्य संसारित्वं सर्वप्रसिद्धं? द्वितीयस्य तुअनिष्टं इत्यादिना व्याख्यातं? तृतीयस्य तुअयतिः श्रद्धयोपेतः इति प्रश्नमुत्थाप्य निर्णीतं षष्ठे अज्ञस्य संसारित्वं। ध्रुवं कारणसामग्र्याः सत्त्वात्। तत्तु कस्यचिज्ज्ञानाननुगुणं कस्यचिज्ज्ञानानुगुणमिति विशेषः। विज्ञस्य तु संसारकारणाभावात्स्वत एव कैवल्यमिति द्वौ पदार्थौ सूत्रितावस्मिञ्श्लोके।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.12।।एवंभूतस्य त्यागस्य फलमाह -- अनिष्टमिति। अनिष्टं नरकतिर्यगादिरूपम्? इष्टं देवतादिरूपम्? मिश्रं मानुषभाव इति कर्मणः कर्मजातीयस्य फलं त्रिविधं प्रेत्य मरणानन्तरमत्यागिनां पूर्वोक्तमुख्यसंन्यासहीनानां भवति मुख्यसंन्यासिनां तु क्वचित्तद्भवति। तेषां कर्तृत्वाभिमानाभावात्। अन्ये तु गौणसंन्यासिनामेवायं कर्मालेप इत्याहुः। तथा च व्याख्यातंकार्यमित्येव यत्कर्म इत्यत्र। अन्यथा संन्यासिनां गौणसंन्यासिनां च विशेषो न स्यात्। न चैवं मुख्यसंन्यासिनां गौणसंन्यासिनां चाविशेषापत्तिरिति वाच्यम्। उभयेषामुत्तरकर्माश्लेषसाम्येऽपि पूर्वकर्मदाहादाहकृतस्य विशेषस्य सत्त्वात्। गौणसंन्यासिनां जन्मान्तरादिकमपि पूर्वकर्मभिरेव भविष्यति आपस्तम्बोक्ताम्रनिदर्शनेन योगभ्रष्टगतिवन्नान्तरीयकं वा न तु तस्य प्रधानं फलं स्वर्गादिभवितुमर्हत्यनुद्दिष्टत्वादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.12।।एवं कर्मफलत्यागिनस्त्यागित्वमुपपाद्याथ कर्मफलत्यागमाह -- अनिष्टमिष्टमिति। कर्मणः फलं त्रिविधम् -- अनिष्टं इष्टं मिश्रं च। तत्रानिष्टं नरकशूकरादियोनिप्राप्तियातनारूपम्? इष्टं देवभावेन स्वर्गादिसुखरूपम्? मिश्रं सन्मनुष्यजन्मराज्यादिभोगरूपम्। तत्ित्रविधं कर्मफलं अत्यागिनां कर्मफलात्यागिनां प्रेत्य परत्र लोके भवति। न तु क्वचिदपि सन्न्यासिनां कर्मफलत्यागिनां भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.12।।एवंभूतस्य कर्मफलत्यागस्य फलमाह -- अनिष्टमिति। अनिष्टं नारकित्वं? इष्टं देवत्वं? मिश्रं मनुष्यत्वं? एवं त्रिविधं पापस्य पुण्यस्य चोभयमिश्रस्य च कर्मणो यत्फलं प्रसिद्धं तत्सर्वमत्यागिनां सकामानामेव प्रेत्य परत्र भवति? तेषां त्रिविधकर्मसंभवात्। नतु संन्यसिनां क्वचिदपि भवति। संन्यासिशब्देनात्र फलत्यागसाम्यात्प्रकृताः कर्मफलत्यागिनोऽपि गृह्यन्ते।अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च इत्येवमादौ च कर्मफलत्यागिषु संन्यासिशब्दप्रयोगदर्शनात्। तेषां सात्त्विकानां पापासंभवादीश्वरार्पणेन च पुण्यफलस्य त्यक्तत्वात्ित्रविधमपि कर्मफलं न भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.12।।ननु तर्हि शास्त्रेषु यज्ञादीनि कर्माणि प्राजापत्यं गृहस्थानां [वि.पु.1।6।37] इत्यादिश्रूयमाणफलसम्बन्धितया विधीयन्ते इत्यतस्तत्फलसाधनस्वभावतयाऽवगतानां कर्मणामनुष्ठाने बीजावापादीनामिवानभिसंहितफलकस्यापीष्टानिष्टरूपफलसम्बन्धोऽवर्जनीय एवेति मोक्षविरोधिफलत्वेन मुमुक्षुणा न कर्मानुष्ठेत्यमित्याशङ्क्याऽऽह -- अनिष्टमिति। अनिष्टं नरकादिफलं? इष्टं स्वर्गादिफलं? मिश्रं पुत्रार्थपश्वन्नादि? त्रिविधं कर्मणः फलं अत्यागिनां उक्तकर्त्यागरहितानां कर्मिणां प्रेत्य भवति कामवासनासलिलसेकेनोद्भवति न तु कामादिपरित्यागिनां भगवदर्पितकर्मिणां क्वचिदपि मोक्षविरोधिफलं भवति। अत्रायमभिप्रायो दर्शितः श्रीरामानुजाचार्यैः -- जीवनाधिकारकामाधिकारयोरिव मोक्षाधिकारे च विनियोगपृथक्त्वेन परिह्रियन्ते यज्ञादिकर्माणि मोक्षविनियोगश्च तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन [बृ.उ.4।4।22] इत्यादिभिः इति। तदेवं क्रियमाणेषु स्वकर्मसु कर्तृत्वफलकामादिपरित्यागः शास्त्रीयः सन्न्यासः? स एव च त्यागः इत्युक्तम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.12।।सर्व कर्मोंका त्याग करनेसे जो फल होता है? वह क्या है इसपर कहते हैं? --, अनिष्ट -- नरक और पशुपक्षी आदि योनिरूप इष्ट -- देवयोनिरूप तथा मिश्र -- इष्ट और अनिष्टमिश्रित मनुष्ययोनिरूप? इस प्रकार यह पुण्यपापरूप कर्मोंका फल तीन प्रकारका होता है। जो पदार्थ बाह्य कर्ता? कर्म? क्रिया आदि अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न हुआ हो और बाजीगरकी मायाके समान? अविद्याजनित? महामोहकारक हो? एवं जीवात्माके आश्रितसा प्रतीत होता हो और साररहित होनेके कारण तत्काल ही लय -- नष्ट हो जाताहो? उसका नाम फल है। यह फल शब्दकी व्याख्या है। ऐसा यह तीन प्रकारका फल? अत्यागियोंको अर्थात् परमार्थसंन्यास न करनेवाले कर्मनिष्ठ अज्ञानियोंको ही? मरनेके पीछे मिलता है। केवल ज्ञाननिष्ठामें स्थित परमहंसपरिव्राजक वास्तविक संन्यासियोंको? कभी नहीं मिलता। क्योंकि ( वे ) केवल सम्यग्ज्ञाननिष्ठ पुरुष? संसारके बीजरूप अविद्यादि दोषोंका मूलोच्छेद नहीं करते? ऐसा कभी नहीं हो सकता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.12।। व्याख्या --   अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् -- कर्मका फल तीन तरहका होता है -- इष्ट? अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है? वह इष्ट कर्मफल है? जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता? वह अनिष्ट कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है? वह मिश्र कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है जैसे -- धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल (अनिष्ट) -- दोनों ही परिस्थितियाँ आती हैं धनसे निर्वाह होता है -- यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है? धन नष्ट हो जाता है? छिन जाता है -- यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता 18। 40) यह जन्म भी दुःखालय (8। 15) और सुखरहित (9। 33)। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो? चाहे अनिष्ट (प्रतिकूल) परिस्थिति हो? वह सर्वथा अनुकूल या प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (18। 48)।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य -- उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं? संन्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म होते हैं? वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है।,इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है? स्वयं(चेतन स्वरूप) के साथ नहीं। परन्तु जब स्वयं उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है? तो फिर वह भोगी नहीं बनता? प्रत्युत त्यागी हो जाता है।अत्यागीका मतलब है -- पीछेके दो (दसवेंग्यारहवें) श्लोकोंमें जिन त्यागियोंकी बात आयी है? उनके समान जो त्यागी नहीं है अर्थात् जिन्होंने कर्मफलका त्याग नहीं किया है? ऐसे अत्यागी मनुष्योंके सामने इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- तीनों कर्मफल अनुकल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें आते रहते हैं? जिनसे वे सुखीदुःखी होते रहते हैं। उनसे सुखीदुःखी होना ही वास्तवमें बन्धन है।वास्तवमें अनुकूलतासे सुखी होना ही प्रतिकूलतामें दुःखी होनेका कारण है क्योंकि परिस्थितिजन्य सुख भोगनेवाला कभी दुःखसे बच ही नहीं सकता। जबतक वह सुख भोगता रहेगा? तबतक वह प्रतिकूल परिस्थितियोंमें दुःखी होता ही रहेगा। चिन्ता? शोक? भय? उद्वेग आदि उसको कभी छोड़ नहीं सकते और वह भी इनसे कभी छूट नहीं सकता।प्रेत्य भवति कहनेका तात्पर्य है कि जो कर्मफलके त्यागी नहीं हैं? उनको इष्ट? अनिष्ट और मिश्र -- ये तीनों कर्मफल मरनेके बाद जरूर मिलते हैं। परन्तु इसके साथ न तु संन्यासिनां क्वचित् पदोंमें कहा गया है कि जो कर्मफलके त्यागी हैं? उनको कहीं भी अर्थात् यहाँ और मरनेके बाद भी कर्मफल नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि अत्यागियोंको मरनेके बाद तो कर्मफल मिलता ही है? पर यहाँ जीतेजी भी कर्मफल मिल सकता है।न तु संन्यासिनां क्वचित् -- संन्यासियों(त्यागियों) को कहीं भी अर्थात् इस लोकमें या परलोकमें? इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। हाँ? पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है? पर वे अपने विवेकके बलसे उन परिस्थितियोंके भोगी नहीं बनते? उनसे सुखीदुःखी नहीं होते अर्थात् सर्वथा निर्लिप्त रहते हैं।संन्यासियों अर्थात् त्यागियोंको फल क्यों नहीं भोगना पड़ता कारण कि वे अपने लिये कुछ भी नहीं करते। उनको अच्छी तरहसे यह विवेक हो जाता है कि अपना जो सत्स्वरूप है? उसके लिये किसी भी क्रिया और वस्तुकी आवश्यकता है ही नहीं। अपने लिये पानेकी इच्छासे साधक कुछ भी करता है तो वह अपने व्यक्तित्वको ही स्थिर रखता है क्योंकि वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग मानता है। जब वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग नहीं मानता अर्थात् सबके हितमें ही अपना हित मानता है? तब वह स्वतः सर्वभूतहिते रताः हो जाता है। फिर उसके स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रियाएँ? सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला परहितचिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही संसारके मात्र प्राणियोंके हितके लिये होती हैं। कारण कि शरीर आदि सबकीसब सामग्री संसारसे अभिन्न है। उस सामग्रीसे अपना हित चाहता है -- यही गलती होती है? जो कि अपनी परिच्छिन्नतामें हेतु है।यहाँ संन्यासिनाम् पदमें त्यागी (कर्मयोगी) और संन्यासी (सांख्ययोगी) -- दोनोंकी एकता की गयी है जैसे -- कर्मयोगी कर्मोंसे असङ्ग रहता है तो सांख्ययोगी भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। कर्मयोगी (निष्कामभावसे) कर्म करते हुए भी फलके साथ सम्बन्ध नहीं रखता तो सांख्ययोगी कर्ममात्रके साथ किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं रखता। कर्मयोगी फलसे सम्बन्धविच्छेद करता है अर्थात् ममताका त्याग करता है तो सांख्ययोगी कर्तृत्वाभिमान अर्थात् अहंताका त्याग करता है। ममताका त्याग होनेपर अहंताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और अहंताका त्याग होनेपर ममताका भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये भगवान्ने कर्मयोगमें ममताके त्यागके बाद अहंताका त्याग बताया है -- निर्ममो निरहंकारः (2। 71) और सांख्ययोगमें अहंताके त्यागके बाद ममताका त्याग बताया है -- अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः ৷৷. (18। 53)। इन दोनोंकी इस त्याग करनेकी प्रक्रियामें तो फरक है परन्तु परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिका कार्य, -- इनमेंसे किसीके भी साथ इन दोनोंका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् तत्त्वमें कर्मयोगी और सांख्ययोगी -- दोनों एक हो जाते हैं।पहले अर्जुनने यह पूछा था कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः भगवान्ने यहाँ संन्यासिनाम् पदसे दोनोंका यह तत्त्व बताया कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है? अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है। ऐसे ही सांख्ययोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है और अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। सांख्ययोगी प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किञ्चिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध नहीं मानता? इसलिये उसके लिये अपने लिये कुछ नहीं करना है -- यह कहना ही नहीं बनता।यहाँ त्यागिनाम् पद न देकर संन्यासिनाम् पद देनेका यह तात्पर्य है कि जो निर्लिप्तता सांख्ययोगसे होती है? वही निर्लिप्तता त्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे भी होती है (गीता 5। 4 -- 5)। दूसरी बात? यहाँतक भगवान्ने कर्मयोगसे निर्लिप्तता बतायी? अब संन्यासिनाम् पद कहकर आगे सांख्ययोगसे निर्लिप्तता बतानेका बीज भी डाल देते हैं।कर्मसम्बन्धी विशेष बातपुरुष और प्रकृति -- ये दो हैं। इनमेंसे पुरुषमें कभी परिवर्तन नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब प्रकृतिकी क्रिया पुरुषका कर्म बन जाता है क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे तादात्म्य हो जाता है। तादात्म्य होनेसे जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त हैं? उनमें ममता होती है और उस ममताके कारण अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। इस प्रकार जबतक कामना? ममता और तादात्म्य रहता है? तबतक जो कुछ परिवर्तनरूप क्रिया होती है? उसका नाम कर्म है।तादात्म्यके टूटनेपर वही कर्म पुरुषके लिये अकर्म हो जाता है अर्थात् वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है? उसमें फलजनकता नहीं रहती -- यह कर्ममें अकर्म है। अकर्मअवस्थामें अर्थात् स्वरूपका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके शरीरसे जो क्रिया होती रहती है? वह अकर्ममें कर्म है (गीता 4। 18)। तात्पर्य यह हुआ कि अपने निर्लिप्त स्वरूपका अनुभव न होनेपर भी वास्तवमें सब क्रियाएँ प्रकृति और उसके कार्य शरीरमें होती हैं परन्तु प्रकृति या शरीरसे अपनी पृथक्ताका अनुभव न होनेसे वे क्रियाएँ कर्म बन जाती हैं (गीता 3। 27 13। 29)।कर्म तीन तरहके होते हैं -- क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध। अभी वर्तमानमें जो कर्म किये जाते हैं? वे क्रियमाण कर्म कहलाते हैं (टिप्पणी प0 882.1)। वर्तमानसे पहले इस जन्ममें किये हुए अथवा पहलेके अनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। सञ्चितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म? आयु और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं? वे प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।क्रियमाण कर्म दो तरहके होते हैं -- शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधिविधानसे किये जाते हैं? वे शुभकर्म कहलाते हैं और काम? क्रोध? लोभ? आसक्ति आदिको लेकर जो शास्त्रनिषिद्ध कर्म किये जाते हैं? वे अशुभकर्म कहलाते हैं।शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक क्रियमाण कर्मका एक तो फलअंश बनता है और एक संस्कारअंश। ये दोनों भिन्नभिन्न हैं।चित्रक्रियमाण कर्म फलअंश संस्कारअंश दृष्ट अदृष्ट तात्कालिक कालान्तिरक लौकिक पारलौकिक शुद्ध अशुद्धक्रियमाण कर्मके फलअंशके दो भेद हैं -- दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं -- तात्कालिक और कालान्तिरक। जैसे? भोजन करते हुए जो रस आता है? सुख होता है? प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और भोजनके परिणाममें आयु? बल? आरोग्य आदिका बढ़ना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है। ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खानेका स्वभाव है? वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है? तब उसको प्रसन्नता होती है? सुख होता है और मिर्चकी तीक्ष्णताके कारण मुँहमें? जीभमें जलन होती है? आँखोंसे और नाकसे पानी निकलता है? सिरसे पसीना निकलता है -- यह दृष्टका तात्कालिक फल है और कुपथ्यके कारण परिणाममें पेटमें जलन और रोग? दुःख आदिका होना -- यह दृष्टका कालान्तिरक फल है।इसी प्रकार अदृष्टके दो भी भेद होते हैं -- लौकिक और पारलौकिक। जीतेजी ही फल मिल जाय -- इस भावसे यज्ञ? दान? तप? तीर्थ? व्रत? मन्त्रजप आदि शुभकर्मोंको विधिविधानसे किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र? धन? यश? प्रतिष्ठा आदि अनुकूलकी प्राप्ति होना और रोग? निर्धनता आदि प्रतिकूलकी निवृत्ति होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल है (टिप्पणी प0 882.2) और मरनेके बाद स्वर्ग आदिकी प्राप्ति हो जाय -- इस भावसे यथार्थ विधिविधान और श्रद्धाविश्वासपूर्वक जो यज्ञ? दान? तप? आदि शुभकर्म किये जायँ तो मरनेके बाद स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति होना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है। ऐसे ही डाका डालने? चोरी करने? मनुष्यकी हत्या करने आदि अशुभकर्मोंका फल यहाँ ही कैद? जुर्माना? फाँसी आदि होना -- यह अदृष्टका लौकिक फल है और पापोंके कारण मरनेके बाद नरकोंमें जाना और पशुपक्षी? कीटपतंग आदि बनना -- यह अदृष्टका पारलौकिक फल है।पापपुण्यके इस लौकिक और पारलौकिक फलके विषयमें एक बात और समझनेकी है कि जिन पापकर्मोंका फल यहीं कैद? जुर्माना? अपमान? निन्दा आदिके रूपमें भोग लिया है? उन पापोंका फल मरनेके बाद भोगना नहीं पड़ेगा। परन्तु व्यक्तिके पाप कितनी मात्राके थे और उनका भोग कितनी मात्रामें हुआ अर्थात् उन पापकर्मोंका फल उसने पूरा भोगा या अधूरा भोगा -- इसका पूरा पता मनुष्यको नहीं लगता क्योंकि मनुष्यके पास इसका कोई मापतौल नहीं है। परन्तु भगवान्को इसका पूरा पता है अतः उनके कानूनके अनुसार उन पापोंका फल यहाँ जितने अंशमें कम भोगा गया है? उतना इस जन्ममें या मरनेके बाद भोगना ही पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये कि मेरा पाप तो कम था? पर दण्ड अधिक भोगना पड़ा अथवा मैंने पाप तो किया नहीं? पर दण्ड मुझे मिल गया कारण कि यह सर्वज्ञ? सर्वसुहृद्? सर्वसमर्थ भगवान्का विधान है कि पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है? वह किसीनकिसी पापका ही फल होता है (टिप्पणी प0 883)।इसी तरह धनसम्पत्ति? मान? आदर? प्रशंसा? नीरोगता आदि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें पुण्यकर्मोंका जितना फल यहाँ भोग लिया है? उतना अंश तो यहाँ नष्ट हो ही गया और जितना बाकी रह गया है? वह परलोकमें फिर भोगा जा सकता है। यदि पुण्यकर्मोंका पूरा फल यहीं भोग लिया गया तो पुण्य यहींपर समाप्त हो जायँगे।क्रियमाणकर्मके संस्कारअंशके भी दो भेद हैं -- शुद्ध एवं पवित्र संस्कार और अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्रविहित कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे शुद्ध एवं पवित्र होते हैं और शास्त्र? नीति? लोकमर्यादाके विरुद्ध कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं? वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं।इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारोंको लेकर स्वभाव (प्रकृति? आदत) बनता है। उन संस्कारोंमेंसे अशुद्ध अंशका सर्वथा नाश करनेपर स्वभाव शुद्ध? निर्मल? पवित्र हो जाता है परन्तु जिन पूर्वकृत कर्मोंसे स्वभाव बना है? उन कर्मोंकी भिन्नताके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंके स्वभावोंमें भी भिन्नता रहती है। इन विभिन्न स्वभावोंके कारण ही उनके द्वारा विभिन्न कर्म होते हैं? पर वे कर्म दोषी नहीं होते? प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मोंसे दुनियाका कल्याण होता है।संस्कारअंशसे जो स्वभाव बनता है? वह एक दृष्टिसे महान् प्रबल होता है -- स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते अतः उसे मिटाया नहीं जा सकता (टिप्पणी प0 884)। इसी प्रकार ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? उसमें कर्म करनेकी मुख्यता रहती है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि जिस कर्मको तू मोहवश नहीं करना चाहता? उसको भी अपने स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगा (गीता 18। 60)।अब इसमें विचार करनेकी एक बात है कि एक ओर तो स्वभावकी महान् प्रबलता है कि उसको कोई छोड़ ही नहीं सकता और दूसरी ओर मनुष्यजन्मके उद्योगकी महान् प्रबलता है कि मनुष्य सब कुछ करनेमें स्वतन्त्र है। अतः इन दोनोंमें किसकी विजय होगी और किसकी पराजय होगी इसमें विजयपराजयकी बात नहीं है। अपनीअपनी जगह दोनों ही प्रबल हैं। परन्तु यहाँ स्वभाव न छोड़नेकी जो बात है? वह जातिविशेषके स्वभावकी बात है। तात्पर्य है कि जीव जिस वर्णमें जन्मा है? जैसा रजवीर्य था? उसके अनुसार बना हुआ जो स्वभाव है? उसको कोई बदल नहीं सकता अतः वह स्वभाव दोषी नहीं है? निर्दोष है। जैसे? ब्राह्मण? क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है? वह स्वभाव नहीं बदल सकता और उसको बदलनेकी आवश्कयकता भी नहीं है तथा उसको बदलनेके लिये शास्त्र भी नहीं कहता। परन्तु उस स्वभावमें जो अशुद्धअंश (रागद्वेष) है? उसको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने मनुष्यको दी है। अतः जिन दोषोंसे मनुष्यका स्वभाव अशुद्ध बना है? उन दोषोंको मिटाकर मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपने स्वभावको शुद्ध बना सकता है। मनुष्य चाहे तो कर्मयोगकी दृष्टिसे अपने प्रयत्नसे रागद्वेषको मिटाकर स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 3। 34)? चाहे भक्तियोगकी दृष्टिसे सर्वथा भगवान्के शरण होकर अपना स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता 18। 62)। इस प्रकार प्रकृति(स्वभाव) की प्रबलता भी सिद्ध हो गयी और मनुष्यकी स्वतन्त्रता भी सिद्ध हो गयी। तात्पर्य यह हुआ कि शुद्ध स्वभावको रखनेमें प्रकृतिकी प्रबलता है और अशुद्ध स्वभावको मिटानेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता है।जैसे? लोहेकी तलवारको पारस छुआ दिया जाय तो तलवार सोना बन जाती है परन्तु उसकी मार? धार और आकार -- ये तीनों नहीं बदलते। इस प्रकार सोना बनानेमें पारसकी प्रधानता रही और मारधारआकार में तलवारकी प्रधानता रही। ऐसे ही जिन लोगोंने अपने स्वभावको परम शुद्ध बना लिया है? उनके कर्म भी सर्वथा शुद्ध होते हैं। परन्तु स्वभावके शुद्ध होनेपर भी वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय? साधनपद्धति? मान्यता आदिके अनुसार आपसमें उनके कर्मोंकी भिन्नता रहती है। जैसे? किसी ब्राह्मणको तत्त्वबोध हो जानेपर भी वह खानपान आदिमें पवित्रता रखेगा और अपने हाथसे बनाया हुआ भोजन ही ग्रहण करेगा क्योंकि उसके,स्वभावमें पवित्रता है। परन्तु किसी हरिजन आदि साधारण वर्णवालेको तत्त्वबोध हो जाय तो वह खानपान आदिमें पवित्रता नहीं रखेगा और दूसरोंकी जूठन भी खा लेगा क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा पड़ा हुआ है। पर ऐसा स्वभाव उसके लिये दोषी नहीं होगा।जीवका असत्के साथ सम्बन्ध जोड़नेका स्वभाव अनादिकालसे बना हुआ है? जिसके कारण वह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ है और बारबार ऊँचनीच योनियोंमें जाता है। उस स्वभावको मनुष्य शुद्ध कर सकता है अर्थात् उसमें जो कामना? ममता और तादात्म्य हैं? उनको मिटा सकता है। कामना? ममता और तादात्म्यके मिटनेके बाद जो स्वभाव रहता है? वह स्वभाव दोषी नहीं रहता। इसलिये उस स्वभावको मिटाना नहीं है और मिटानेकी आवश्यकता भी नहीं है।जब मनुष्य अहंकारका आश्रय छोड़ कर सर्वथा भगवान्के शरण हो जाता है? तब उसका स्वभाव शुद्ध हो जाता है जैसे -- लोहा पारसके स्पर्शसे शुद्ध सोना बन जाता है। स्वभाव शुद्ध होनेसे फिर वह स्वभावज कर्म करते हुए भी दोषी और पापी नहीं बनता (गीता 18। 47)। सर्वथा भगवान्के शरण होनेके बाद भक्तका प्रकृतिके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। फिर भक्तके जीवनमें भगवान्का स्वभाव काम करता है। भगवान् समस्त प्राणियोंके सुहृद् हैं -- सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता 5। 29) तो भक्त भी समस्त प्राणियोंका सुहृद् हो जाता है -- सुहृदः सर्वदेहिनाम् (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)।इसी तरह कर्मयोगकी दृष्टिसे जब मनुष्य रागद्वेषको मिटा देता है? तब उसके स्वभावकी शुद्ध हो जाती है? जिससे अपने स्वार्थका भाव मिटकर केवल दुनियाके हितका भाव स्वतः हो जाता है। जैसे भगवान्का स्वभाव प्राणिमात्रका हित करनेका है? ऐसे ही उसका स्वभाव भी प्राणिमात्रका हित करनेका हो जाता है। जब उसकी सब चेष्टाएँ प्राणिमात्रके हितमें हो जाती हैं? तब उसकी भगवान्की सर्वभूतसुहृत्ताशक्तिके साथ एकता हो जाती है। उसके उस स्वभावमें भगवान्की सुहृत्ताशक्ति कार्य करने लगती है।वास्तवमें भगवान्की यह सर्वभूतसुहृत्ताशक्ति मनुष्यमात्रके लिये समान रीतिसे खुली हुई है परन्तु अपने अहंकार और रागद्वेषके कारण उस शक्तिमें बाधा लग जाती है अर्थात् वह शक्ति कार्य नहीं करती। महापुरुषोंमें अहंकार (व्यक्तित्व) और रागद्वेष नहीं रहते? इसलिये उनमें यह शक्ति कार्य करने लग जाती है।चित्रसञ्चित कर्म फलअंश संस्कारअंश प्रारब्ध स्फुरणाअनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म (फलअंश और संस्कारअंश) अन्तःकरणमें संगृहीत रहते हैं? वे सञ्चित कर्म कहलाते हैं। उनमें फलअंशसे तो प्रारब्ध बनता है और संस्कारअंशसे स्फुरणा होती रहती है। उन स्फुरणाओंमें भी वर्तमानमें किये गये जो नये क्रियमाण कर्म सञ्चितमें भरती हुए हैं? प्रायः उनकी ही स्फुरणा होती है। कभीकभी सञ्चितमें भरती हुए पुराने कर्मोंकी स्फुरणा भी हो जाती है (टिप्पणी प0 885) जैसे किसी बर्तनमें पहले प्याज डाल दें और उसके ऊपर क्रमशः गेहूँ? चना? ज्वार? बाजरा? डाल दें तो निकालते समय जो सबसे पीछे डाला था? वही (बाजरा) सबसे पहले निकलेगा? पर बीचमें कभीकभी प्याजका भी भभका आ जायेगा। परन्तु यह दृष्टान्त पूरा नहीं घटता क्योंकि प्याज? गेहूँ आदि सावयव,पदार्थ हैं और सञ्चित कर्म निरवयव हैं। यह दृष्टान्त केवल इतने ही अंशमें बतानेके लिये दिया है। कि नये क्रियमाण कर्मोंकी स्फुरणा ज्यादा होती है और कभीकभी पुराने कर्मोंकी भी स्फुरणा होती है।इसी तरह जब नींद आती है तो उसमें भी स्फुरणा होती है। नींदमें जाग्रत्अवस्थाके दब जानेके कारण सञ्चितकी वह स्फुरणा स्वप्नरूपसे दीखने लग जाती है? उसीको स्वप्नावस्था कहते हैं (टिप्पणी प0 886)। स्वप्नावस्थामें बुद्धिकी सावधानी न रहनेके कारण क्रम? व्यतिक्रम और अनुक्रम ये नहीं रहते। जैसे? शहर तो दिल्लीका दीखता है और बाजार बम्बईका तथा उस बाजारमें दूकानें कलकत्ताकी दीखती हैं? कोई जीवित आदमी दीख जाता है अथवा किसी मरे हुए आदमीसे मिलना हो जाता है? बातचीत हो जाती है? आदिआदि।जाग्रत्अवस्थामें हरेक मनुष्यके मनमें अनेक तरहकी स्फुरणाएँ होती रहती हैं। जब जाग्रत्अवस्थामें शरीर? इन्द्रियाँ और मनपरसे बुद्धिका अधिकार हट जाता है? तब मनुष्य जैसा मनमें आता है? वैसा बोलने लगता है। इस तरह उचितअनुचितका विचार करनेकी शक्ति काम न करनेसे वह सीधासरल पागल कहलाता है। परन्तु जिसके शरीर? इन्द्रियाँ और मनपर बुद्धिका अधिकार रहता है? वह जो उचित समझता है? वही बोलता है और जो अनुचित समझता है? वह नहीं बोलता। बुद्धि सावधान रहनेसे वह सावचेत रहता है? इसलिये वह चतुर पागल हैइस प्रकार मनुष्य जबतक परमात्मप्राप्ति नहीं कर लेता? तबतक वह अपनेको स्फुरणाओंसे बचा नहीं सकता। परमात्मप्राप्ति होनेपर बुरी स्फुरणाएँ सर्वथा मिट जाती हैं। इसलिये जीवन्मुक्त महापुरुषके मनमें अपवित्र पुरे विचार कभी आते ही नहीं। अगर उसके कहलानेवाले शरीरमें प्रारब्धवश (व्याधि आदि किसी कारणवश) कभी बेहोशी? उन्माद आदि हो जाता है तो उसमें भी वह न तो शास्त्रनिषिद्ध बोलता है और न शास्त्रनिषिद्ध कुछ करता ही है क्योंकि अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे शास्त्रनिषिद्ध बोलना या करना उसके स्वभावमें नहीं रहता।प्रारब्ध कर्म प्रारब्ध कर्म अनुकूल परिस्थिति मिश्रित (अनुकूलप्रतिकूल) परिस्थिति प्रतिकूल परिस्थिति स्वेच्छापूर्वक क्रिया (प्रवृत्ति) अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया स्वेच्छापूर्वक क्रिया अनिच्छापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया,सञ्चितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये सम्मुख होते हैं? उन कर्मोंको प्रारब्ध कर्म कहते हैं (टिप्पणी प0 887)। प्रारब्ध कर्मोंका फल तो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें सामने आता है परन्तु उन प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेके लिये प्राणियोंकी प्रवृत्ति तीन प्रकारसे होती है -- (1) स्वेच्छापूर्वक? (2) अनिच्छा(दैवेच्छा)पूर्वक और (3) परेच्छापूर्वक। उदाहरणार्थ --(1) किसी व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें मुनाफा हो गया। ऐसे ही किसी दूसरे व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें घाटा लग गया। इन दोनोंमें मुनाफा होना और घाटा लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु माल खरीदनेमें उनकी प्रवृत्ति स्वेच्छापूर्वक हुई है।(2) कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो आगे आनेवाली नदीमें बाढ़के प्रवाहके कारण एक धनका टोकरा बहकर आया और उस सज्जनने उसे निकाल लिया। ऐसे ही कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो उसपर वृक्षकी एक टहनी गिर पड़ी और उसको चोट लग गयी। इन दोनोंमें धनका मिलना और चोट लगना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु धनका टोकरा मिलना और वृक्षकी टहनी गिरना -- यह प्रवृत्ति अनिच्छा(दैवेच्छा) पूर्वक हुई है।(3) किसी धनी व्यक्तिने किसी बच्चेको गोद ले लिया अर्थात् उसको पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया? जिससे उसका सब धन उस बच्चेको मिल गया। ऐसे ही चोरोंने किसीका सब धन लूट लिया। इन दोनोंमें बच्चेको धन मिलना और

Chapter 18 (Part 8)

चोरीमें धनका चला जाना तो उनके शुभअशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं परन्तु गोदमें जाना और चोरी होना -- यह प्रवृत्ति परेच्छापूर्वक हुई है।यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिये कि कर्मोंका फल कर्म नहीं होता? प्रत्युत परिस्थिति होती है अर्थात् प्रारब्ध कर्मोंका फल परिस्थितिरूपसे सामने आता है। अगर नये (क्रियमाण) कर्मको प्रारब्धका फल मान लिया जाय तो फिर ऐसा करो? ऐसा मत करो -- यह शास्त्रोंका? गुरुजनोंका विधिनिषेध निरर्थक हो जायगा। दूसरी बात? पहले जैसे कर्म किये थे? उन्हींके अनुसार जन्म होगा और उन्हींके अनुसार कर्म होंगे तो वे कर्म फिर आगे नये कर्म पैदा कर देंगे? जिससे यह कर्मपरम्परा चलती ही रहेगी अर्थात् इसका कभी अन्त ही नहीं जायेगा।प्रारब्ध कर्मसे मिलनेवाले फलके दो भेद हैं -- प्राप्त फल और अप्राप्त फल। अभी प्राणियोंके सामने जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है? वह प्राप्त फल है और इसी जन्ममें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें आनेवाली है वह अप्राप्त फल है।क्रियमाण कर्मोंका जो फलअंश सञ्चितमें जमा रहता है? वही प्रारब्ध बनकर अनुकूल? प्रतिकूल और मिश्रित परिस्थितिके रूपमें मनुष्यके सामने आता है। अतः जबतक सञ्चित कर्म रहते हैं? तबतक प्रारब्ध बनता ही रहता है और प्रारब्ध परिस्थितिके रूपमें परिणत होता ही रहता है। यह परिस्थिति मनुष्यको सुखीदुःखी होनेके लिये बाध्य नहीं करती। सुखीदुःखी होनेमें तो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जो़ड़ना ही मुख्य कारण है। परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ने अथवा न जोड़नेमें यह मनुष्य सर्वथा स्वाधीन है? पराधीन नहीं है। जो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है? वह अविवेकी पुरुष तो सुखीदुःखी होता ही रहता है। परन्तु जो परिस्थितिके साथ सम्बन्ध नहीं मानता? वह विवेकी पुरुष कभी सुखीदुःखी नहीं होता अतः उसकी स्थिति स्वतः साम्यावस्थामें होती है? जो कि उसका स्वरूप है।कर्मोंमें मनुष्यके प्रारब्धकी प्रधानता है या पुरुषार्थकी अथवा प्रारब्ध बलवान् है या पुरुषार्थ -- इस विषयमें बहुतसी शङ्काएँ हुआ करती हैं। उनके समाधानके लिये पहले यह समझ लेना जरूरी है कि प्रारब्ध और पुरुषार्थ क्या हैमनुष्यमें चार तरहकी चाहना हुआ करती है -- एक धनकी? दूसरी धर्मकी? तीसरी भोगकी और चौथी मुक्तिकी। प्रचलित भाषामें इन्हीं चारोंको अर्थ? धर्म? काम और मोक्षके नामसे कहा जाता है --, (1) अर्थ -- धनको अर्थ कहते हैं। वह धन दो तरहका होता है -- स्थावर और जङ्गम। सोना? चाँदी? रुपये? जमीन? जायदाद? मकान आदि स्थावर हैं और गाय? भैंस? घोड़ा? ऊँट? भेड़? बकरी आदि जङ्गम हैं।(2) धर्म -- सकाम अथवा निष्कामभावसे जो यज्ञ? तप? दान? व्रत? तीर्थ आदि किये जाते हैं? उसको धर्म,कहते हैं।(3) काम -- सांसारिक सुखभोगको काम कहते हैं। वह सुखभोग आठ तरहका होता है -- शब्द? स्पर्श? रूप? रस? गन्ध? मान? बड़ाई और आराम।(क) शब्द -- शब्द दो तरहका होता है -- वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक। व्याकरण? कोश? साहित्य? उपन्यास? गल्प? कहानी आदि वर्णात्मक शब्द हैं (टिप्पणी प0 888.1)। खाल? तार और फूँकके तीन बाजे और तालका आधा बाजा -- ये साढ़े तीन प्रकारके बाजे ध्वन्यात्मक शब्दको प्रकट करनेवाले हैं (टिप्पणी प0 888.2)। इन वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंको सुननेसे जो सुख मिलता है? वह शब्दका सुख है।(ख) स्पर्श -- स्त्री? पुत्र? मित्र आदिके साथ मिलनेसे तथा ठण्डा? गरम? कोमल आदिसे अर्थात् उनका त्वचाके साथ संयोग होनेसे जो सुख होता है? वह स्पर्शका सुख है।(ग) रूप -- नेत्रोंसे खेल? तमाशा? सिनेमा? बाजीगरी? वन? पहाड़? सरोवर? मकान आदिकी सुन्दरताको देखकर जो सुख होता है? वह रूपका सुख है।(घ) रस -- मधुर (मीठा)? अम्ल (खट्टा)? लवण (नमकीन)? कटु (कड़वा)? तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला) -- इन छः रसोंको चखनेसे जो सुख होता है? वह रसका सुख है।(ङ) गन्ध -- नाकसे अतर? तेल? फुलेल? लवेण्डर? पुष्प आदि सुगन्धवाले और लहसुन? प्याज आदि दुर्गन्धवाले पदार्थोंको सूघँनेसे जो सुख होता है? वह गन्धका सुख है।(च) मान -- शरीरका आदरसत्कार होनेसे जो सुख होता है? वह मानका सुख है।(छ) बड़ाई -- नामकी प्रशंसा? वाहवाह होनेसे जो सुख होता है? वह बड़ाईका सुख है।(ज) आराम -- शरीरसे परिश्रम न करनेसे अर्थात् निकम्मे पड़े रहनेसे जो सुख होता है? वह आरामका सुख है।(4) मोक्ष -- आत्मसाक्षात्कार? तत्त्वज्ञान? कल्याण? उद्धार? मुक्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदिका नाम मोक्ष है।इन चारों (अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष) में देखा जाये तो अर्थ और धर्म -- दोनों ही परस्पर एकदूसरेकी वृद्धि करनेवाले हैं अर्थात् अर्थसे धर्मकी और धर्मसे अर्थकी वृद्धि होती है। परन्तु धर्मका पालन कामनापूर्तिके लिये किया जाय तो वह धर्म भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है और अर्थको कामनापूर्तिमें लगाया जाय तो वह अर्थ भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है। तात्पर्य है कि कामना धर्म और अर्थ -- दोनोंको खा जाती है। इसीलिये गीतामें भगवान्ने कामनाको महाशन (बहुत खानेवाला) बताते हुए उसके त्यागकी बात विशेषतासे कही है (3। 37 -- 43)।यदि धर्मका अनुष्ठान कामनाका त्याग करके किया जाय तो वह अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है। ऐसे ही धनको कामनाका त्याग करके दूसरोंके उपकारमें? हितमें? सुखमें खर्च किया जाय तो वह भी अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है।अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारोंमें अर्थ (धन) और काम (भोग) की प्राप्तिमें प्रारब्धकी मुख्यता और पुरुषार्थकी गौणता है? तथा धर्म और मोक्षमें पुरुषार्थकी मुख्यता और प्रारब्धकी गौणता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ -- दोनोंका क्षेत्र अलगअलग है और दोनों ही अपनेअपने क्षेत्रमें प्रधान हैं। इसलिये कहा है -- संतोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्यः स्वध्याये जपदानयोः।।अर्थात् अपनी स्त्री? पुत्र? परिवार? भोजन और धनमें तो सन्तोष करना चाहिये और स्वाध्याय? पाठपूजा? नामजप? कीर्तन और दान करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि प्रारब्धके फल -- धन और भोगमें तो सन्तोष करना चाहिये क्योंकि वे प्रारब्धके अनुसार जितने मिलनेवाले हैं? उतने ही मिलेंगे? उससे अधिक नहीं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और अपना कल्याण करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये क्योंकि यह नया पुरुषार्थ है और इसी पुरुषार्थके लिये मनुष्यशरीर मिला है।कर्मके दो भेद हैं -- शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप)। शुभकर्मका फल अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होना है और अशुभकर्मका फल प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होना है। कर्म बाहरसे किये जाते हैं? इसलिये उन कर्मोंका फल भी बाहरकी परिस्थितिके रूपमें ही प्राप्त होता है। परन्तु उन परिस्थितियोंसे जो सुखदुःख होते हैं? वे भीतर होते हैं। इसलिये उन परिस्थितियोंमें सुखी तथा दुःखी होना शुभाशुभकर्मोंका अर्थात् प्रारब्धका फल नहीं है? प्रत्युत अपनी मूर्खताका फल है। अगर वह मूर्खता चली जाय? भगवान्पर (टिप्पणी प0 889.1) अथवा प्रारब्धपर (टिप्पणी प0 889.2) विश्वास हो जाय तो प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी चित्तमें प्रसन्नता होगी? हर्ष होगा। कारण कि प्रतिकूल परिस्थितिमें पाप कटते हैं? आगे पाप न करनेमें सावधानी आती है और पापोंके नष्ट होनेसे अन्तःकरणकी शुद्ध होती है।साधकको अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये? दुरुपयोग नहीं। अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो अनुकूल सामग्रीको दूसरोंके हितके लिये सेवाबुद्धिसे खर्च करना अनुकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उसका सुखबुद्धिसे भोग करना दुरुपयोग है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करना और मेरे पूर्वकृत पापोंका नाश करनेके लिये? भविष्यमें पाप न करनेकी सावधानी रखनेके लिये और मेरी उन्नति करनेके लिये ही प्रभुकृपासे ऐसी परिस्थिति आयी है -- ऐसा समझकर परम प्रसन्न रहना प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उससे दुःखी होना दुरुपयोग है।मनुष्यशरीर सुखदुःख भोगनेके लिये नहीं है। सुख भोगनेके स्थान स्वर्गादिक हैं और दुःख भोगनेके स्थान नरक तथा चौरासी लाख योनियाँ हैं। इसलिये वे भोगयोनियाँ हैं और मनुष्य कर्मयोनि है। परन्तु यह कर्मयोनि उनके लिये है जो मनुष्यशरीरमें सावधान नहीं होते? केवल जन्ममरणके सामान्य प्रवाहमें ही पड़े हुए हैं। वास्तवमें मनुष्यशरीर सुखदुःखसे ऊँचा उठनेके लिये अर्थात् मुक्तिकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये इसको कर्मयोनि न कहकर साधनयोनि ही कहना चाहिये।प्रारब्धकर्मोंके फलस्वरूप जो अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति आती है? उन दोनोंमें अनुकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें तो मनुष्य स्वतन्त्र है? पर प्रतिकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें मनुष्य परतन्त्र है अर्थात् उसका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जा सकता। कारण यह है कि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंका हित करने? उन्हें सुख देनेके फलस्वरूप बनी है और प्रतिकूल परिस्थिति दूसरोंको दुःख देनेके फलस्वरूप बनी है। इसको एक दृष्टान्तसे इस प्रकार समझ सकते हैं -- श्यामलालने रामलालको सौ रुपये उधार दिये। रामलालने वायदा किया कि अमुक महीने मैं ब्याजसहित,रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत गया? पर रामलालने रुपये नहीं लौटाये तो श्यामलाल रामलालके घर पहुँचा और बोला -- तुमने वायदेके अनुसार रुपये नहीं दिये अब दो। रामलालने कहा -- अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं? परसों दे दूँगा। श्यामलाल तीसरे दिन पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये तो रामलालने कहा -- अभी मैं आपके पैसे नहीं जुटा सका? परसों आपके रुपये जरूर दूँगा। तीसरे दिन फिर श्यामलाल पहुँचा और बोला -- रुपये दो तो रामलाल ने कहा -- कल जरूर दूँगा। दूसरे दिन श्यामलाल फिर पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये रामलालने कहा -- रुपये जुटे नहीं? मेरे पास रुपये हैं नहीं? तो मैं कहाँसे दूँ परसों आना। रामलालकी बातें सुनकर श्यामलालको गुस्सा आ गया और परसोंपरसों करता है? रुपये देता नहीं -- ऐसा कहकर उसने रामलालको पाँच जूते मार दिये। रामलालने कोर्टमें नालिश (शिकायत) कर दी। श्यामलालको बुलाया गया और पूछा गया -- तुमने इसके घरपर जाकर जूता मारा है तो श्यामलालने कहा -- हाँ साहब? मैंने जूता मारा है। मैजिस्ट्रेटने पूछा -- क्यों मारा श्यामलालने कहा -- इसको मैंने रुपये दिये थे और इसने वायदा किया था कि मैं इस महीने रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत जानेपर मैंने इसके घरपर जाकर रुपये माँगे तो कलपरसों? कलपरसों कहकर इसने मुझे बहुत तंग किया। इसपर मैंने गुस्सेमें आकर इसे पाँच जूते मार दिये। तो सरकार पाँच जूतोंके पाँच रुपये काटकर शेष रुपये मुझे दिला दीजिये। मैजिस्ट्रेटने हँसकर कहा -- यह फौजदारी कोर्ट है। यहाँ रुपये दिलानेका कायदा (नियम) नहीं है। यहाँ दण्ड देनेका कायदा है। इसलिये आपको जूता मारनेके बदलेमें कैद या जुर्माना भोगना ही पड़ेगा। आपको रुपये लेने हों तो दीवानी कोर्टमें जाकर नालिश करो? वहाँ रुपये दिलानेका कायदा है क्योंकि वह विभाग अलग है। इस तरह अशुभकर्मोंका फल जो प्रतिकूल परिस्थिति है? वह फौजदारी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग नहीं कर सकते और शुभकर्मोंका फल जो अनुकूल परिस्थिति है? वह दीवानी है? इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग किया जा सकता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके शुभअशुभकर्मोंका विभाग अलगअलग है। इसलिये शुभकर्मों (पुण्यों) और अशुभकर्मों(पापों)का अलगअलग संग्रह होता है। स्वभाविकरूपसे ये दोनों एकदूसरेसे कटते नहीं अर्थात् पापोंसे पुण्य नहीं कटते और पुण्योंसे पाप नहीं कटते। हाँ? अगर मनुष्य पाप काटनेके उद्देश्यसे (प्रायश्चित्तरूपसे) शुभकर्म करता है? तो उसके पाप कट सकते हैं।संसारमें एक आदमी पुण्यात्मा है? सदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा है? दुराचारी है और सुख भोग रहा है -- इस बातको लेकर अच्छेअच्छे पुरुषोंके भीतर भी यह शङ्का हो जाया करती है कि इसमें ईश्वरका न्याय कहाँ है (टिप्पणी प0 890)। इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा है? यह पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पापका फल है? अभी किये हुए पुण्यका नहीं। ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा है? यह भी पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पुण्यका फल है? अभी किये हुए पापका नहीं।इसमें एक तात्त्विक बात और है। कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती है? उससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती है? उससे दुःख ही होता है -- ऐसी बात है नहीं। जैसे? अनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान होता है? छोटोंसे घृणा होती है? अपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती है? असहिष्णुता होती है? अन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वक्तपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है। इस तरह सुखसामग्री और धनसम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता। परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह,भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है। ऐसे ही किसी विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोगसामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धनसम्पत्ति आदि सामग्री नहीं है? बेचारा बड़ा दुःखी है परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है। वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती। इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है। सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन और सन्तापका है।पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता है परन्तु पाप भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है क्योंकि भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्के अर्पण कैसे हो सकते हैं और अर्पण करनेवाला भी भगवान्के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्के अर्पण कैसे कर सकता है प्रत्युत भगवान्की आज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्के अर्पण होते हैं। इस विषयमें एक कहानी आती है।एक राजा अपनी प्रजासहित हरिद्वार गया। उसके साथमें सब तरहके लोग थे। उनमें एक चमार भी था। उस चमारने सोचा कि ये बनिये लोग बड़े चतुर होते हैं। ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं। अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायँ ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा। जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दानपुण्यका संकल्प कराने लगा? तब उस बनियेने कहा -- मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार दिये थे? आज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ पण्डेने संकल्प भरवा दिया। चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दिया? कितना बुद्धिमान् है मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा। जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू किया? तब चमारने कहा -- अमुक बनियेने मुझै सौ रुपये उधार दिये थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ। उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया। इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दानपुण्य कर दियासब घर पहुँचे। समयपर खेती हुई। ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ। ब्राह्मण देवताने बनियेसे कहा -- सेठ आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लो? इससे आपको नफा भी हो सकता है। मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है। बनियेने कहा -- ब्राह्मण देवता जब मैं हरिद्वार गया था? तब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये। ब्राह्मण बोला -- सेठ मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैं? दान नहीं लिये। इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहता? ब्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ। सेठने कहा -- आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं। मैंने सौ रुपये भगवान्के अर्पण कर दिये हैं? इसलिये मैं तू लूँगा नहीं। अब ब्राह्मण और क्या करता वह अपने घर लौट गया।अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थे? वह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला -- लाओ मेरे रुपये। तुम्हारा अनाज हुआ है? सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो। चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये। अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला -- मैंने तो अमुक सेठकी तरह गङ्गाजीमें खड़े होकर सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये? तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे बनिया बोला -- तेरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकता क्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोड़नेसे कैसे छूट जायगा मैं तो अपने सौ रुपये ब्याजसहित पूरे लूँगा लाओ मेरे रुपये ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया।इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा है? वह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता। ऐसे ही हम भगवदाज्ञानुसार शुभकर्मोंको तो भगवान्के अर्पण करके उनके बन्धनसे छूट सकते हैं? पर अशुभकर्मोंका फल तो हमारेको भोगना ही पड़ेगा। इसलिये शुभ और अशुभकर्मोंमें एक कायदा? कानून नहीं है। अगर ऐसा नियम बन जाय कि भगवान्के अर्पण करनेसे ऋण और पापकर्म छूट जायँ तो फिर सभी प्राणी मुक्त हो जायँ परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। हाँ? इसमें एक मार्मिक बात है कि अपनेआपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेपर अर्थात् सर्वथा भगवान्के शरण हो जानेपर पापपुण्य सर्वथा नष्ट हो जाते हैं (गीता 18। 66)।दूसरी शङ्का यह होती है कि धन और भोगोंकी प्राप्ति प्रारब्ध कर्मके अनुसार होती है -- ऐसी बात समझमें नहीं आती क्योंकि हम देखते हैं कि इन्कमटैक्स? सेल्सटैक्स आदिकी चोरी करते हैं तो धन बच जाता है और टैक्स पूरा देते हैं तो धन चला जाता है तो धनका आनाजाना प्रारब्धके अधीन कहाँ हुआ यह तो चोरीके ही अधीन हुआइसका समाधान इस प्रकार है। वास्तवमें धन प्राप्त करना और भोग भोगना -- इन दोनोंमें ही प्रारब्धकी प्रधानता है। परन्तु इन दोनोंमें भी किसीका धनप्राप्तिका प्रारब्ध होता है? भोगका नहीं और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? धनप्राप्तिका नहीं तथा किसीका धन और भोग दोनोंका ही प्रारब्ध होता है। जिसका धनप्राप्तिका प्रारब्ध तो है? पर भोगका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास लाखों रुपये रहनेपर भी बीमारीके कारण वैद्य? डॉक्टरके मना करनेपर वह भोगोंको भोग नहीं सकता? उसके खानेमें रूखासूखा ही मिलता है। जिसका भोगका प्रारब्ध तो है? पर धनका प्रारब्ध नहीं है? उसके पास धनका अभाव होनेपर भी उसके सुखआराममें किसी तरहकी कमी नहीं रहती (टिप्पणी प0 891)। उसको किसीकी दयासे? मित्रतासे? कामधंधा मिल जानेसे प्रारब्धके अनुसार जीवननिर्वाहकी सामग्री मिलती रहती है।अगर धनका प्रारब्ध नहीं है तो चोरी करनेपर भी धन नहीं मिलेगा? प्रत्युत चोरी किसी प्रकारसे प्रकट हो जायगी तो बचा हुआ धन भी चला जायगा तथा दण्ड और मिलेगा। यहाँ दण्ड मिले या न मिले? पर परलोकमें तो दण्ड जरूर मिलेगा। उससे वह बच नहीं सकेगा। अगर प्रारब्धवश चोरी करनेसे धन मिल भी जाय तो भी उस धनका उपभोग नहीं हो सकेगा। वह धन बीमारीमें? चोरीमें? डाकेमें? मुकदमेमें? ठगाईमें चला जायगा। तात्पर्य यह है कि वह धन जितने दिन टिकनेवाला है? उतने ही दिन टिकेगा और फिर नष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं? इन्कमटैक्स आदिकी चोरी करनेके जो संस्कार भीतर पड़े हैं? वे संस्कार जन्मजन्मातरतक उसे चोरी करनेके लिये उकसाते रहेंगे और वह उनके कारण दण्ड पाता रहेगा।अगर धनका प्रारब्ध है तो कोई गोद ले लेगा अथवा मरता हुआ कोई व्यक्ति उसके नामसे वसीयतनामा लिख देगा अथवा मकान बनाते समय नींव खोदते ही जमीनमें गड़ा हुआ धन मिल जायगा? आदिआदि। इस प्रकार प्रारब्धके अनुसार जो धन मिलनेवाला है? वह किसीनकिसी कारणसे मिलेगा ही (टिप्पणी प0 892)। परन्तु मनुष्य प्रारब्धपर तो विश्वास करता नहीं? कमसेकम अपने पुरुषार्थपर भी विश्वास नहीं करता कि हम मेहनतसे कमाकर खा लेंगे। इसी कारण उसकी चोरी आदि दुष्कर्मोंमें प्रवृत्ति हो जाती है? जिससे हृदयमें जलन रहती है? दूसरोंसे छिपाव करना पड़ता है? पकड़े जानेपर दण्ड पाना पड़ता है? आदिआदि। अगर मनुष्य विश्वास और सन्तोष रखे तो हृदयमें महान् शान्ति? आनन्द? प्रसन्नता रहती है तथा आनेवाला धन भी आ जाता है और जितना जीनेका प्रारब्ध है? उतनी जीवननिर्वाहकी सामग्री भी किसीनकिसी तरह मिलती ही रहती है।जैसे व्यापारमें घाटा लगना? घरमें किसीकी मृत्यु होना? बिना कारण अपयश और अपमान होना आदि प्रतिकूल परिस्थितिको कोई भी नहीं चाहता? पर फिर भी वह आती ही है? ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी आती ही है? उसको कोई रोक नहीं सकता। भागवतमें आया है -- सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च। देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः।।(श्रीमद्भा0 11। 8। 1)राजन् प्राणियोंको जैसे इच्छाके बिना प्रारब्धानुसार दुःख प्राप्त होते हैं? ऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे। जैसे धन और भोगका प्रारब्ध अलगअलग होता है अर्थात् किसीका धनका प्रारब्ध होता है और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है? ऐसे ही धर्म और मोक्षका पुरुषार्थ भी अलगअलग होता है अर्थात् कोई धर्मके लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्षके लिये पुरुषार्थ करता है। धर्मके अनुष्ठानमें शरीर? धन आदि वस्तुओँकी मुख्यता रहती है और मोक्षकी प्राप्तिमें भाव तथा विचारकी मुख्यता रहती है।एक करना होता है और एक होना होता है। दोनों विभाग अलगअलग हैं। करनेकी चीज है -- कर्तव्य और होनेकी चीज है -- फल। मनुष्यका कर्म करनेमें अधिकार है? फलमें नहीं -- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता 2। 47)। तात्पर्य यह है कि होनेकी पूर्ति प्रारब्धके अनुसार अवश्य होती है? उसके लिये यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये -- ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करनेमें शास्त्र तथा लोकमर्यादाके अनुसार कर्तव्यकर्म करना चाहिये। करना पुरुषार्थके अधीन है और होना प्रारब्धके अधीन है। इसलिये मनुष्य करनेमें स्वाधीन है और होनेमें पराधीन है। मनुष्यकी उन्नतिमें खास बात है -- करनेमें सावधान रहे और होनेमें प्रसन्न रहे। क्रियमाण? सञ्चित और प्रारब्ध -- तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका क्या उपाय हैप्रकृति और पुरुष -- ये दो हैं। प्रकृति सदा क्रियाशील है? पर पुरुषमें कभी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध माननेवाला प्रकृतिस्थ पुरुष ही कर्ताभोक्ता बनता है। जब वह प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लेता है अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है? तब उसपर कोई भी कर्म लागू नहीं होता।प्रारब्धसम्बन्धी अन्य बातें इस प्रकार हैं --(1) बोध हो जानेपर भी ज्ञानीका प्रारब्ध रहता है -- यह कथन केवल अज्ञानियोंको समझानेमात्रके लिये है। कारण कि अनुकूल या प्रतिकूल घटनाका घट जाना ही प्रारब्ध है। प्राणीको सुखी या दुःखी करना प्रारब्धका काम नहीं है? प्रत्युत अज्ञानका काम है। अज्ञान मिटनेपर मनुष्य सुखीदुःखी नहीं होता। उसे केवल अनुकूलताप्रतिकूलताका ज्ञान होता है। ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत सुखदुःखरूप विकार होना दोषी है। इसलिये वास्तवमें ज्ञानीका प्रारब्ध नहीं होता।(2) जैसा प्रारब्ध होता है? वैसी बुद्धि बन जाती है। जैसे? एक ही बाजारमें एक व्यापारी मालकी बिक्री कर देता है और एक व्यापारी माल खरीद लेता है। बादमें जब बाजारभाव तेज हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नफा होता है और जब बाजारभाव मन्दा हो जाता है? तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नफा होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है। अतः खरीदने और बेचनेकी बुद्धि प्रारब्धसे बनती है अर्थात् नफा या नुकसानका जैसा प्रारब्ध होता है? उसीके अनुसार पहले बुद्धि बन जाती है? जिससे प्रारब्धके अनुसार फल भुगताया जा सके। परन्तु खरीदने और बेचनेकी क्रिया न्याययुक्त की जाय अथवा अन्याययुक्त की जाय -- इसमें मनुष्य स्वतन्त्र है क्योंकि यह क्रियमाण (नया कर्म) है? प्रारब्ध नहीं।(3) एक आदमीके हाथसे गिलास गिरकर टूट गया तो यह उसकी असावधानी है या प्रारब्धकर्म करते समय तो सावधान रहना चाहिये? पर जो (अच्छा या बुरा) हो गया? उसे पूरी तरहसे प्रारब्ध -- होनहार ही मानना चाहिये। उस समय जो यह कहते हैं कि यदि तू सावधानी रखता तो गिलास न टूटता -- इससे यह समझना चाहिये कि अब आगेसे मुझे सावधानी रखनी है कि दुबारा ऐसी गलती न हो जाय। वास्तवमें जो हो गया? उसे असावधानी न मानकर होनहार मानना चाहिये। इसलिये करनेमें सावधान और होनेमें प्रसन्न रहे। ,(4) प्रारब्धसे होनेवाले और कुपथ्यसे होनेवाले रागमें क्या फरक हैकुपथ्यजन्य रोग दवाईसे मिट सकता है परन्तु प्रारब्धजन्य रोग दवाईसे नहीं मिटता। महामृत्युञ्जय आदिका जप और यज्ञयागादि अनुष्ठान करनेसे प्रारब्धजन्य रोग भी कट सकता है? अगर अनुष्ठान प्रबल हो तो।रोगके दो प्रकार हैं -- आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग)। आधिके भी दो भेद हैं -- एक तो शोक? चिन्ता आदि और दूसरा पागलपन। चिन्ता? शोक आदि तो अज्ञानसे होते हैं और पागलपन प्रारब्धसे होता है। अतः ज्ञान होनेपर चिन्ताशोकादि तो मिट जाते हैं? पर प्रारब्धके अनुसार पागलपन हो सकता है। हाँ? पागलपन होनेपर भी ज्ञानीके द्वारा कोई अनुचित? शास्त्रनिषिद्ध क्रिया नहीं होती।(5) आकस्मिक मृत्यु और अकाल मृत्युमें क्या फरक है कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर जाय? अचानक ऊपरसे गिरकर मर जाय? पानीमें डूबकर मर जाय? हार्टफेल होनेसे मर जाय? किसी दुर्घटना आदिसे मर जाय? तो यह उसकी आकस्मिक मृत्यु है। स्वाभाविक मृत्युकी तरह आकस्मिक मृत्यु भी प्रारब्धके अनुसार (आयु पूरी होनेपर) होती है।कोई व्यक्ति जानकर आत्महत्या कर ले अर्थात् फाँसी लगाकर? कुएँमें कूदकर? गाड़ीके नीचे आकर? छतसे कूदकर? जहर खाकर? शरीरमें आग लगाकर मर जाय? तो यह उसकी अकाल मृत्यु है। यह मृत्यु आयुके रहते हुए ही होती है। आत्महत्या करनेवालेको मनुष्यकी हत्याका पाप लगता है। अतः यह नया पापकर्म है? प्रारब्ध नहीं। मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है अतः उसको आत्महत्या करके नष्ट करना बड़ा भारी पाप है।कई बार आत्महत्या करनेकी चेष्टा करनेपर भी मनुष्य बच जाता है? मरता नहीं। इसका कारण यह है कि उसका दूसरे मनुष्यके प्रारब्धके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ रहता है अतः उसके प्रारब्धके कारण वह बच जाता है। जैसे? भविष्यमें किसीका पुत्र होनेवाला है और वह आत्महत्या करनेका प्रयास करे तो उस (आगे होनेवाले) लड़केका प्रारब्ध उसको मरने नहीं देगा। अगर उस व्यक्तिके द्वारा भविष्यमें कोई विशेष अच्छा काम होनेवाला हो? लोगोंका उपकार होनेवाला हो अथवा इसी जन्ममें? इसी शरीरमें प्रारब्धका कोई उत्कट भोग (सुखदुःख) आनेवाला हो? तो आत्महत्याका प्रयास करनेपर भी वह मरेगा नहीं।(6) एक आदमीने दूसरे आदमीको मार दिया तो यह उसने पिछले जन्मके वैरका बदला लिया और मरनेवालेने पुराने कर्मोंका फल पाया? फिर मारनेवालेका क्या दोषमारनेवालेका दोष है। दण्ड देना शासकका काम है? सर्वसाधारणका नहीं। एक आदमीको दस बजे फाँसी मिलनी है। एकदूसरे आदमीने उस (फाँसीकी सजा पानेवाले) आदमीको जल्लादोंके हाथोंसे छुड़ा लिया और ठीक दस बजे उसे कत्ल कर दिया ऐसी हालतमें उस कत्ल करनेवाले आदमीको भी फाँसी होगी कि यह आज्ञा तो राज्यने जल्लादोंको दी थी? पर तुम्हें किसने आज्ञा दी थीमारनेवालेको यह याद नहीं है कि मैं पूर्वजन्मका बदला ले रहा हूँ? फिर भी मारता है तो यह उसका दोष है। दूसरेको मारनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मरना कोई भी नहीं चाहता। दूसरेको मारना अपने विवेकका अनादर है। मनुष्यमात्रको विवेकशक्ति प्राप्त है और उस विवेकके अनुसार अच्छे या बुरे कार्य करनेमें वह स्वतन्त्र है। अतः विवेकका अनादर करके दूसरेको मारना अथवा मारनेकी नीयत रखना दोष है।यदि पूर्वजन्मका बदला एकदूसरे ऐसे ही चुकाते रहें तो यह श्रृङ्खला कभी खत्म नहीं होगी और मनुष्य कभी मुक्त नहीं हो सकेगा। पिछले जन्मका बदला अन्य (साँप आदि) योनियोंमें लिया जा सकता है। मनुष्ययोनि बदला लेनेके लिये नहीं है। हाँ? यह हो सकता है कि पिछले जन्मका हत्यारा व्यक्ति हमें स्वाभाविक ही अच्छा नहीं लगेगा? बुरा लगेगा। परन्तु बुरे लगनेवाले व्यक्तिसे द्वेष करना या उसे कष्ट देना दोष है क्योंकि यह नया कर्म है।जैसा प्रारब्ध है? उसीके अनुसार उसकी बुद्धि बन गयी? फिर दोष किस बातकाबुद्धिमें जो द्वेष है? उसके वशमें हो गया -- यह दोष है। उसे चाहिये कि वह उसके वशमें न होकर विवेकका आदर करे। गीता भी कहती है कि बुद्धिमें जो रागद्वेष रहते हैं (3। 40)? उनके वशमें न हो -- तयोर्न वशमागच्छेत् (3। 34)।(7) प्रारब्ध और भगवत्कृपामें क्या अन्तर हैइस जीवको जो कुछ मिलता है? वह प्रारब्धके अनुसार मिलता है? पर प्रारब्धविधानके विधाता स्वयं भगवान् हैं। कारण कि कर्म जड होनेसे स्वतन्त्र फल नहीं दे सकते? वे तो भगवान्के विधानसे ही फल देते है। जैसे? एक आदमी किसीके खेतमें दिनभर काम करता है तो उसको शामके समय कामके अनुसार पैसे मिलते हैं? पर मिलते हैं खेतके मालिकसे।पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे मिलते हैं क्यापैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं? बिना काम किये पैसे पैसा देगा कौन यदि कोई जंगलमें जाकर दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायँगे नहीं मिल सकते। उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे काम किया और किसकी जिम्मेवारी रही।अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता? चतुरता और उत्साहसे करता है? पर करता है केवल मालिककी प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे भी दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है। ऐसे ही भगवान् मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं। अगर कोई मनुष्य भगवान्की आज्ञाके अनुसार? उन्हींकी प्रसन्नताके लिये सब कार्य करता है? उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा अधिक ही देते हैं परन्तु जो भगवान्के सर्वथा समर्पित होकर सब कार्य करता है? उस भक्तके भगवान् भी भक्त बन जाते हैं (टिप्पणी प0 894) संसारमें कोई भी नौकरको अपना मालिक नहीं बनाता परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है। ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत -- उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं? उनकी बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है। वे इस बातको समझ ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं। सम्बन्ध --   जिस प्रकार कर्मयोगमें कर्मोंका अपने साथ सम्बन्ध नहीं रहता? ऐसे ही सांख्यसिद्धान्तमें भी कर्मोंका अपने साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता -- इसका विवेचन आगे करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.12।।उक्ताधिकारिणः सर्वकर्मसंन्यासासंभवेऽपि फलाभावे कुतस्तस्य कर्तव्यतेति शङ्कते -- किं पुनरिति। गौणस्य मुख्यस्य वा संन्यासस्य फलं पिपृच्छिषितमिति विकल्पयति -- उच्यत इति। सर्वकर्मत्यागो नाम तदनुष्ठानेऽपि तत्फलाभिसन्धित्यागः। स चामुख्यसंन्यासस्तस्य फलमाह -- अनिष्टमिति। मुख्ये तु संन्यासे सर्वकर्मत्यागे सम्यग्धीद्वारा सर्वसंसारोच्छित्तिरेव फलमित्याह -- नत्विति। पादत्रयं व्याकरोति -- अनिष्टमित्यादिना। तिर्यगादीत्यादिपदमवशिष्टनिकृष्टयोनिसंग्रहार्थं?,देवादीत्यादिपदमवशिष्टोत्कृष्टयोनिग्रहणायेति विभागः। फलशब्दं व्युत्पादयति -- बाह्येति। करणद्वारकमनेकविधत्वमुक्त्वा मिथ्यात्वमाह -- अविद्येति। तत्कृतत्वेन दृष्टिमात्रदेहत्वे दृष्टान्तमाह -- इन्द्रेति। प्रतीतितो रमणीयत्वं सूचयति -- महामोहेति। अविद्योत्थस्याविद्याश्रितत्वादात्माश्रितत्वं वस्तुतो नास्तीत्याह -- प्रत्यगिति। उक्तं फलं कर्मिणामिष्यते चेदमुख्यसंन्यासफलोक्तिपरत्वं पादत्रयस्य कथमिष्टमित्याशङ्क्याह -- अपरमार्थेति। फलाभिसंधिविकलानां कर्मिणां देहपातादूर्ध्वं कर्मानुरोधिफलमावश्यकमित्यर्थः। कर्मिणामेव सतामफलाभिसंधीनाममुख्यसंन्यासित्वात्तदीयामुख्यसंन्यासस्य फलमुक्त्वा चतुर्थपादं व्याचष्टे -- नत्विति। अमुख्यसंन्यासमनन्तरप्रकृतं व्यवच्छिनत्ति -- परमार्थेति। तेषां प्रधानं धर्ममुपदिशति -- केवलेति। क्वचिद्देशे काले वा नास्ति यथोक्तं फलं तेषामिति संबन्धः। तर्हि परमार्थसंन्यासोऽफलत्वान्नानुष्ठियेतेत्याशङ्क्य तस्य मोक्षावसायित्वान्मैवमित्याह -- नहीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.12।।कर्मफलाभावो नाम संसारनिवृत्तिरेव? सा कथं त्यागफलत्वेनोच्यते इत्यत आह -- त्यागमिति। उपपादितमेतत्त्यागाच्छान्तिः [12।12] इत्यत्र।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.12।।त्यागं स्तौति -- अनिष्टमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.12।। --,अनिष्टं नरकतिर्गयादिलक्षणम्? इष्टं देवादिलक्षणम्? मिश्रम् इष्टानिष्टसंयुक्तं मनुष्यलक्षणं च? तत् त्रिविधं त्रिप्रकारं कर्मणः,धर्माधर्मलक्षणस्य फलं बाह्यानेककारकव्यापारनिष्पन्नं सत् अविद्याकृतम् इन्द्रजालमायोपमं महामोहकरं प्रत्यगात्मोपसर्पि इव -- फल्गुतया लयम् अदर्शनं गच्छतीति फलनिर्वचनम् -- तत् एतत् एवंलक्षणं फलं भवति अत्यागिनाम् अज्ञानां कर्मिणां अपरमार्थसंन्यासिनां प्रेत्य शरीरपातात् ऊर्ध्वम्। न तु संन्यासिनां परमार्थसंन्यासिनां परमहंसपरिव्राजकानां केवलज्ञाननिष्ठानां क्वचित्। न हि केवलसम्यग्दर्शननिष्ठा अविद्यादिसंसारबीजं न उन्मूलयन्ति कदाचित् इत्यर्थः। अतः परमार्थदर्शिनः एव अशेषकर्मसंन्यासित्वं संभवति? अविद्याध्यारोपितत्वात् आत्मनि क्रियाकारकफलानाम् न तु अज्ञस्य अधिष्ठानादीनि क्रियाकर्तृकारकाणि आत्मत्वेनैव पश्यतः अशेषकर्मसंन्यासः संभवति।।तदेतत् उत्तरैः श्लोकैः दर्शयति --,

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【 Verse 18.13 】

▸ Sanskrit Sloka: पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे | साङ् ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ||

▸ Transliteration: pañcai’tāni mahābāho kāraṇāni nibodha me | sāṅkhye kṛtānte proktāni siddhaye sarvakarmaṇām ||

▸ Glossary: pañca: five; etāni: all these; mahābāho: O mighty-armed one; kāraṇāni: causes; nibodha: just understand; me: from Me; sāṁkhya: in the Sāṅkhya philosophy; kṛtānte: after performance; proktāni: said; siddhaye: perfection; sarva: all; kar- maṇām: actuated.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.13,14 Learn from Me Arjuna, the five causes that bring about the accomplishment of all action, as described in Sāṅkhya philosophy. These are: physical body that is the seat of action; the attributes of nature or guṇa, which is the doer; the eleven organs of perception and action by the life forces and finally the Divine.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.13।।हे महाबाहो कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं? इनको तू मेरेसे समझ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.13।। हे महाबाहो समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए ये पांच कारण सांख्य सिद्धांत में कहे गये हैं? जिनको तुम मुझसे भलीभांति जानो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.13 पञ्च five? एतानि these? महाबाहो O mightyarmed? कारणानि causes? निबोध learn? मे from Me? सांख्ये in the Sankhya? कृतान्ते which is the end of all actions? प्रोक्तानि as declared? सिद्धये for the accomplishment? सर्वकर्मणाम् of all actions.Commentary The Self has no connection whatevr with activity. Nature does everything. The Self is the silent witness. He remains indifferent. The whole superstructure of human activity is the result of the five welldefined causes which are enumerated in the following verse.Etani These Which are going to be mentioned.Sankhya Vedanta Knowledge of the Self as taught in the Vedanta (the Upanishads) puts an end to all actions. This is the reason why the term Kritante (the end of actions) is used here. When the knowledge of the Self arises? all actions terminate. This is taught in chapter II? verse 46 To the Brahman who has known the Self al the Vedas are of so much use as is a reservoir of water in a place where there is a flood everywhere. Again? in verse 33 of chapter IV? it is said All actions in their entirety? O Arjuna? culminate in knowledge. Vedanta? therefore? which imparts knowledge of the Self? is the end of action. A liberated sage who has attained the knowledge of the Self in accordance with the instructions laid down in the Vedanta becomes a Kritakritya (one who has done everything and has nothing more to do).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.13. O mighty-armed one ! Learn from Me these following five causes that have been declared in the conclusion of deliberations [on proper knowledge], for the accomplishment of all actions.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.13 I will tell thee now, O Mighty Man, the five causes which, according to the final decision of philosophy, must concur before an action can be accomplished.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.13 Learn from Me, O Arjuna, these five causes for the accomplishment of all acts, as described in Sankhya-krtanta - the science of the exact understanding of things for the accomplishment of works.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.13 O mighty-armed one, learned from Me these [Another reading is etani.-Tr.] five factors for the accomplishment of all actions, which have been spoken of in the Vedanta in which actions terminate.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.13 Learn from Me, O mighty-armed Arjuna, these five causes as declared in the Sankhya system for the accomplishment of all actions.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.13 See Comment under 18.17

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.13 'Sankhya' means Buddhi (reasoning). 'Sankhya-krtanta' means that which is determined after due deliberations by the Buddhi in accordance with the Vedas on the nature of the things as they are. Learn them from Me. There are five causes for the accomplishment of all actions. But the understanding according to the Vedas (Vaidiki-buddhi) is that the Supreme Self alone is the agent working through body, senses, Pranas and the individual self, as asserted in the following Srutis: 'He who, dwelling in the self, who rules the self from within your self, the Inner Ruler, immortal' (Br. U. Madh., 3.7.22), and 'He who has penetrated the interior, is the Ruler of all creatures and the Self of all' (Tai. A., 3.11.3).

Sri Krsna nows sets forth the five causes:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.13 O mighty-armed one, nibodha, learn; me, from Me; imani, these; panca, five; karanani, factors, accessories, which are going to be stated-for drawing the attention of his (Arjuna's) mind and for showing the difference among these categories [Categories: locus (body) etc], the Lord praises those accessories in the succeeding verses as fit for being known-; siddhaye, for the accomplishment; sarva-karmanam, of all actions; proktani, which have been spoken of; sankhye, in Vedanta-sankhya is that scripture where the subject-matters [In the sentence, 'Thou art That', the word Thou means the individual Self, and That means Brahman. The comprehension of their unity, and also 'hearing, reflection and meditation' are referred to as the subject-matters.] to be known are fully (samyak) stated (khyayante)-; krtante, in which actions terminate. Krtante alifies that very word (Vedanta). Krtam mean action. That in which occurs the culmination (anta) of that krtam is krtantam, i.e. the termination of actions. In the texts, '৷৷.as much utility as a man has in a well' (2.46), and 'O son of Prtha, all actions in their totality culminate in Knowledge' (4.33), the Lord shows the cessation of all actions when the knowledge of the Self dawns. Hence (it is said): '৷৷.which have been spoken of in that Vedanta where actions culminate and which is meant for the knowledge of the Self.' Which are they? This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.13।। त्रिविध त्याग के सन्दर्भ में भगवान् श्रीकृष्ण ने निरहंकार और निसंग भाव से कर्म करने वाले पुरुष को सात्विक त्यागी कहा था। अत स्वाभाविक ही है कि अर्जुन के मन में कर्म के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण प्रस्तुत खण्ड में? कर्म के स्थूल रूप तथा प्रेरणा? उद्देश्य आदि सूक्ष्म स्वरूप का भी वर्णन करते हैं।किसी भी लौकिक अथवा आध्यात्मिक कर्म को सम्पादित करने के लिए पाँच कारणों की अपेक्षा होती है। ये मानों कर्म के अंग हैं? जिनके बिना कर्म की सिद्धि नहीं हो सकती। यदि मनुष्य अपने कर्मों को अनुशासित और सुनियोजित कर आन्तरिक सांस्कृतिक विकास को सम्पादित करना चाहता हो? तो उसे अत्याधिक साहस? प्रयोजन का सातत्य? आत्मविश्वास तथा बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है। इसलिए भगवान् यहाँ अर्जुन को महाबाहो के नाम से सम्बोधित कर उसकी शूरवीरता का आह्वान करते हैं।कर्मसम्पादन के लिए आवश्यक पाँच कारणों का वर्णन सांख्य दर्शन में किया गया है। यहाँ सांख्य शब्द से तात्पर्य वेदान्त से है कपिल मुनि जी के सांख्य दर्शन से नहीं? क्योंकि उसमें इनका वर्णन नहीं किया गया है। इस श्लोक में प्रयुक्त कृतान्त शब्द सांख्य का विशेषण है। कृतान्त का अर्थ है कर्मों का अन्त। वेदान्त में उपदिष्ट आत्म ज्ञान के होने पर अहंकार का अन्त हो जाता है और उसी के साथ उसके कर्मों की समाप्ति हो जाती है।इसलिए? वेदान्त का विशेषण कृतान्त कहा गया हैं। अगले श्लोक में उन पाँच कारणों को बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.13।।एवं परमार्थसंन्यासिनां त्रिविधकर्मफलाभावमुक्त्वा परमार्थसंन्यासाधिकारकारणस्यात्मन्यकर्तृत्वज्ञानस्यावश्यकतां बोधयितुमाह -- पञ्चैतानीत्यादिना। एतानि वक्ष्यमाणानि कारणानि निर्वर्तकानि निबोध मद्वजनाज्जनीहि। ज्ञात्वा च महाबाहुसाध्ये कायिके युद्धे कर्मणि कर्तृत्वाभिमानं परित्यजेति ध्वनयन्संबोधयति -- महाबाहो इति। देषामवश्यज्ञातव्यताज्ञापनाय तानि स्तौति -- सांख्य इति। त्वंपदार्थ आत्मा तत्पदार्थो ब्रह्म तयोरैक्यधीः तदुपयोगिनश्च शमदमादयो ज्ञातव्यः पदार्थाः संख्यायन्ते व्युत्पाद्यन्ते यस्मिन्वेदान्तशास्त्रे तत्सांख्यं। सांख्यं विशिनष्टि -- कृतान्ते कृतस्य कर्मणोऽन्तः परिसमाप्तिर्यत्र इत्यात्मज्ञाने जाते सर्वकर्मणां निवृत्तेर्दर्शितत्वात् आत्मज्ञानार्थकस्य सांख्यस्यापि कृतान्तत्वं। तस्मिन्प्रोक्तानि सर्वेषां कर्मणां सिद्धये निष्पत्त्यर्थ कथितानीत्यर्थः। संख्या मोचकं ज्ञानं तत्संबन्धिनि तज्जनके सांख्येऽकृतान्तेऽकृतो वेदोऽपौरुषेयत्वात्तस्यान्ते वेदान्ते इत्यर्थस्तु प्रश्लेषं विनैवार्थसंभवमभिप्रेत्याचार्यैर्न प्रदर्शितः। यत्तु संख्यायन्ते गण्यन्ते तत्त्वान्यस्मिन्निति सांख्यं कृतोऽन्तो निर्णयो यस्मिन्निति कृतान्तं सांख्यशास्त्रमेव तस्मिन्नत्यपरे वर्णयन्ति तन्नोपादेयम्। सांख्यशास्त्रे अधिष्ठानादीनां कारणत्वेनानुक्तत्वात्। भिन्नाः भोक्तार आत्मान इति प्रतिपादकस्य सांख्यशास्त्रस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वशून्य एक एवात्मेति स्वसिद्धान्तविरुद्धस्य स्वोक्तेऽर्थे प्रमाणत्वेनोपन्थासायोगाच्च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.13।।तत्रात्मज्ञानरहितस्य संसारित्वे हेतुः कर्मत्यागासंभव उक्तोनहि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः इति। तत्राज्ञस्य कर्मत्यागासंभवे को हेतुः कर्महेतावधिष्ठानादिपञ्चके तादात्म्यभिमान इतीममर्थं चतुर्भिः श्लोकैः प्रपञ्चयति। तत्र प्रथमेनाधिष्ठानादीनि पञ्च वेदान्तप्रमाणमूलानि हेयत्वार्थमवश्यं ज्ञातव्यानीत्याह -- पञ्चैतानीति। इमानि वक्ष्यमाणानि पञ्च सर्वकर्मणां सिद्धये निष्पत्तये कारणानि निर्वर्तकानि हे महाबाहो? मे मम परमात्परस्य सर्वज्ञस्य वचनान्निबोध बोद्धुं सावधानो भव। नह्यत्यन्तदुर्ज्ञानान्येतान्यनवहितचेतसा शक्यन्ते ज्ञातुमिति चेतःसमाधानविधानेन तानि स्तौति। महाबाहुत्वेन च सत्पुरुष एव शक्तो ज्ञातुमिति सूचयति स्तुत्यर्थमेव। किमेतान्यप्रमाणकान्येव तव वचनाज्ज्ञेयानि नेत्याह -- सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानीति। निरतिशयपुरुषार्थप्राप्त्यर्थं सर्वानर्थनिवृत्त्यर्थं च ज्ञातव्यानि। जीवो ब्रह्म तयोरैक्यं तद्बोधोपयोगिनश्च श्रवणादयः पदार्थाः संख्यायन्ते व्युत्पाद्यन्तेऽस्मिन्निति सांख्यं वेदान्तशास्त्रं तस्मिन्नात्मवस्तुमात्रप्रतिपादके किमर्थमनात्मभूतान्यवस्तूनि लोकसिद्धानि च कर्मकारणानि पञ्च प्रतिपाद्यन्त इत्यतः शास्त्रविशेषणं कृतान्त इति। कृतमिति कर्मोच्यते तस्यान्तः परिसमाप्तिस्तत्त्वज्ञानोत्पत्त्या यत्र तस्मिन्कृतान्ते शास्त्रे प्रोक्तानि प्रसिद्धान्येव लोकेऽनात्मभूतान्येवात्मतया मिथ्याज्ञानारोपेण गृहीतान्यात्मतत्त्वज्ञानेन बाधसिद्धये हेयत्वेनोक्तानि। यदा ह्यन्यधर्म एव कर्मात्मन्यविद्ययाऽध्यारोपितमित्युच्यते तदा शुद्धात्मज्ञानेन तद्बाधात्कर्मणोऽन्तः कृतो भवति। अत आत्मनः कर्मासंबन्धप्रतिपादनायानात्मभूतान्येव पञ्च कर्मकारणानि वेदान्तशास्त्रे मया कल्पितान्यनूदितानीति नाद्वैतात्ममात्रतात्पर्यहानिस्तेषां तदङ्गत्वेनैवेतरप्रतिपादनादिहापि च सर्वकर्मान्तत्वं ज्ञानस्य प्रतिपादितंसर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते इति। तस्माज्ज्ञानशास्त्रस्य कर्मान्तत्वमुपपन्नम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.13।।नन्वात्मनः कर्मालेपनिमित्तं यदकर्तृत्वानुसंधानं तत्किं योषिदग्निदृष्ट्यादिवदाहार्यमुत वास्तवमेव सदविद्याध्यस्तकर्तृत्वेनावृतमिति शास्त्रदृष्ट्या कर्तृत्वतिरोधानेनाकर्तृत्वमेव भाव्यत इत्याशङ्क्याग्नित्वेन दृष्टायां योषिति दग्धृत्वादर्शनेनेव कल्पितेनाकर्तृत्वेन वास्तवस्य कर्मालेपस्यासंभवादाद्यं निरस्य द्वितीयमुपपादयिष्यन् पीठिकामारचयति -- पञ्चेति। हे महाबाहो? सर्वकर्मणां सिद्धये इमानि वक्ष्यमाणानि पञ्च कारणानि निर्वर्तकानि मे मद्वचनान्निबोध बुध्यस्व। स्ववचने विश्वासोत्पादनार्थं कारणानां समूलत्वमाह

Chapter 18 (Part 9)

सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानीति।,सम्यग्विविच्य ख्यायन्ते प्रकटीक्रियन्ते तत्त्वान्यात्मानात्मपदार्थरूपाणि यस्मिंस्तत्सांख्यं वेदान्तशास्त्रम्। तदेव विशिनष्टि। कृतान्ते कृतस्य कर्मणोऽन्तः परिसमाप्तिर्यस्मिन्।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते इत्यात्मज्ञाने सति सर्वकर्मणां समाप्तिदर्शनात् तस्मिन्सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.13।।ननु सङ्गफलपरित्यागेऽपि कर्मकर्त्तुः फलं तु सम्भावितमेव? भोजनतृप्तिवदौषधार्थभक्षितमादकद्रव्यजोन्मादवत्? अतः कथं फलं न भवेत् इत्याशङ्क्याऽऽह -- पञ्चैतानीति श्लोकपञ्चकेन। हे महाबाहो फलत्यागक्रियाकरणसमर्थ सर्वकर्मणां सिद्धये फलाप्तये साङ्ख्ये त्यागात्यागनिर्णायके कृतान्ते कृतस्य कर्मणोऽन्तः समाप्तिर्यत्र स कृतान्तो वेदान्तस्तस्मिन् प्रोक्तानि। एतान्यग्रे प्रोच्यमानानि पञ्च कारणानि मे मत्तो निबोध जानीहि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.13।।ननु कर्म कुर्वतः कर्मफलं कथं न भवेदित्याशङ्क्य सङ्गत्यागिनो निरहंकारस्य सतः कर्मफलेन लेपो नास्तीत्युपपादयितुमाह -- पञ्चैतानीति पञ्चभिः। सर्वकर्मणां सिद्धये निष्पत्तये इमानि वक्ष्यमाणानि पञ्च कारणानि मे वचनान्निबोध जानीहि। आत्मनः कर्तृत्वाभिमाननिवृत्यर्थमवश्यमेतानि ज्ञातव्यानीत्येवं तेषां स्तुत्यर्थमाह -- सांख्य इति। सम्यक् ख्यायते ज्ञायते परमात्माऽनेनेति सांख्यं तत्त्वज्ञानं तस्मिन्कृतं कर्म तस्यान्तः समाप्तिरस्मिन्निति कृतान्तस्तस्मिन्वेदान्तसिद्धान्त इत्यर्थः। यद्वा संख्यायन्ते गण्यन्ते तत्त्वानि यस्मिन्निति सांख्यं? कृतः अन्तो निर्णयो यस्मिन्निति कृतान्तं सांख्यशास्त्रमेव तस्मिन्प्रोक्तानि अतः सम्यङ्निबोधेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.13।।इदानीं भगवत्कर्तृत्वानुसन्धानपूर्वकम्। स्वकर्तृत्वानुसन्धानपरिहार उदीर्यते।।1।।कर्तृत्वं स्वस्य मनुते सत्सु कर्तृषु पञ्चसु। स यथा निन्द्यते लोके तथा कृष्णेन शास्त्रतः।।2।।पश्येद्गुणानां हेतुत्वं यदा,दैवस्य वा हरेः। तत एवेह ममतात्यागः स्यात्फलकर्मणोः।।3।।तत्रान्तर्यामिपुरुषे (षः स्वकीयैः करणादिभिः) कर्तृत्वं मुख्यतः स्थितम्। (जीवात्मना स्वलीलार्थं कर्माण्यारभते ततः)। स्वातन्त्र्यात्परतन्त्रे तु गौणमेवाभ्युपेयते।।4।।अतो ब्रह्मगतं कर्तृत्वादि जीवे तदंशतः। सर्वं कर्मफलं (चापि पुरुषस्य परस्य तत्) चौर्प्यं पुरुषेण परत्र तत्। इति तत्त्वं भगवता भाष्यमाभाष्यतेऽन्ततः।।5।।पञ्चेति। कृतान्ते सिद्धान्ते कृतनिर्णये वा साङ्ख्ये प्रोक्तानि सिद्धान्तीकृत्योक्तानि सर्वकर्मणां सिद्धये पञ्चैतानि कारणानि निबोध मे मम सकाशादवधेहि। साङ्ख्ये हि वेदानुरोधेन सूत्रनिबन्धो दृश्यते? तदनुरोधे शरीरेन्द्रियप्राणजीवात्मोपकरणं परमात्मानमन्तर्यामिणमुत्तमं कर्त्तारं प्रत्याययति य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति? यमात्मा न वेद? यस्यात्मा शरीरं स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः [श.प.14।5।30] अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा [तै.उ.3।11चित्त्यु.11।1] इत्यादौ स्वातन्त्र्येण नियमनादिकर्तृत्वं केवलस्य परमात्मनो बोध्यते इति। तदेककर्तृत्वं तदंशभूते जीवात्मनि सततं शुद्धं? अन्यत्तु प्राकृतं निषिध्यते तदेतदग्रे स्फुटीभविष्यति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.13।।इसलिये क्रिया? कारक और फल आदि आत्मामें अविद्यासे आरोपित होनेके कारण परमार्थदर्शी,( आत्मज्ञानी ) ही सम्पूर्ण कर्मोंका अशेषतः त्यागी हो सकता है। कर्म करनेवाले अधिष्ठान ( शरीर ) कर्ताक्रिया आदि कारकोंको? आत्मभावसे देखनेवाला अज्ञानी? सम्पूर्ण कर्मोंका अशेषतः त्याग नहीं कर सकता। यह बात अगले श्लोकसे दिखलाते हैं -- हे महाबाहो इनआगे कहे जानेवाले पाँच कारणोंको अर्थात् कर्मके साधनोंको? तू मुझसे जान। अगले उपदेशमें अर्जुनके चित्तको लगानेके लिये और अधिष्ठानादिके ज्ञानकी कठिनता दिखानेके लिये? उन पाँचों कारणोंको जाननेयोग्य बतलाकर? उनकी स्तुति करते हैं। जिस शास्त्रमें जाननेयोग्य पदार्थोंकी संख्या ( गणना ) की जाय उसका नाम सांख्य अर्थात् वेदान्त है। कृतान्त भी उसीका विशेषण है। कृत कर्मको कहते हैं ? जहाँ उसका अन्त अर्थात् जहाँ कर्मोंकी समाप्ति हो जाती है वह कृतान्त है -- यानी कर्मोंका अन्त है। यावानर्थ उदपाने सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने,परिसमाप्यते इत्यादि वचन भी आत्मज्ञान उत्पन्न होनेपर समस्त कर्मोंकी निवृत्ति दिखलाते हैं। इसलिये ( कहते हैं कि ) उस आत्मज्ञानप्रद कृतान्त -- सांख्यमें यानी वेदान्तशास्त्रमें समस्त कर्मोंकी सिद्धिके लिये कहे हुए ( उन पाँच कारणोंको तू मुझसे सुन )।,

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.13।। व्याख्या --   पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि -- हे महाबाहो जिसमें सम्पूर्ण कर्मोंका अन्त हो जाता है? ऐसे सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण विहित और निषिद्ध कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बताये गये हैं। स्वयं (स्वरूप) उन कर्मोंमें हेतु नहीं है।निबोध मे -- इस अध्यायमें भगवान्ने जहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन आरम्भ किया है? वहाँ निबोध क्रियाका प्रयोग किया है (18। 13? 50)? जब कि दूसरी जगह श्रृणु क्रियाका प्रयोग किया है (18। 4? 19? 29? 36? 45? 64)। तात्पर्य यह है कि सांख्यसिद्धान्तमें तो निबोध पदसे अच्छी तरह समझनेकी बात कही है और दूसरी जगह श्रृणु पदसे सुननेकी बात कही है। अतः सांख्यसिद्धान्तको गहरी रीतिसे समझना चाहिये। अगर उसे अपनेआप (स्वयं) से गहरी रीतिसे समझा जाय? तो तत्काल तत्त्वका अनुभव हो जाता है।सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् -- कर्म चाहे शास्त्रविहित हों? चाहे शास्त्रनिषिद्ध हों? चाहे शारीरिक हों? चाहे मानसिक हों? चाहे वाचिक हों? चाहे स्थूल हों और चाहे सूक्ष्म हों -- इन सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये पाँच हेतु कहे गये हैं। जब पुरुषका इन कर्मोंमें कर्तृत्व रहता है? तब कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह दोनों होते हैं? और जब पुरुषका इन कर्मोंके होनेमें कर्तृत्व नहीं रहता? तब कर्मसिद्धि तो होती है? पर कर्मसंग्रह नहीं होता? प्रत्युत क्रियामात्र होती है। जैसे? संसारमात्रमें परिवर्तन होता है अर्थात् नदियाँ बहती हैं? वायु चलती है? वृक्ष बढ़ते हैं? आदिआदि क्रियाएँ होती रहती है? परन्तु इन क्रियाओँसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् ये क्रियाएँ पापपुण्यजनक अथवा बन्धनकारक नहीं होतीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह होता है। कर्तृत्वाभिमान मिटनेपर क्रियामात्रमें अधिष्ठान? करण? चेष्टा और दैव -- ये चार हेतु ही होते हैं (गीता 18। 14)।यहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन हो रहा है। सांख्यसिद्धान्तमें विवेकविचारकी प्रधानता होती है? फिर भगवान्ने सर्वकर्मणां सिद्धये वाली कर्मोंकी बात यहाँ क्यों छेड़ी कारण कि अर्जुनके सामने युद्धका प्रसङ्ग है। क्षत्रिय होनेके नाते युद्ध उनका कर्तव्यकर्म है। इसलिये कर्मयोगसे अथवा सांख्ययोगसे ऐसे कर्म करने चाहिये? जिससे कर्म करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहे -- यह बात भगवान्को कहनी है। अर्जुनने सांख्यका तत्त्व पूछा है? इसलिये भगवान् सांख्यसिद्धान्तसे कर्म करनेकी बात कहना आरम्भ करते हैं।अर्जुन स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करना चाहते थे अतः उनको यह समझाना था कि कर्मोंका ग्रहण और त्याग -- दोनों ही कल्याणमें हेतु नहीं हैं। कल्याणमें हेतु तो परिवर्तनशील नाशवान् प्रकृतिसे अपरिवर्तनशील अविनाशी अपने स्वरूपका सम्बन्धविच्छेद ही है। उस सम्बन्धविच्छेदकी दो प्रक्रियाएँ हैं -- कर्मयोग और सांख्ययोग। कर्मयोगमें तो फलका अर्थात् ममताका त्याग मुख्य है और सांख्ययोगमें अहंताका त्याग मुख्य है। परन्तु ममताके त्यागसे अहंताका और अहंताके त्यागसे ममताका त्याग स्वतः हो जाता है। कारण कि अहंतामें भी ममता होती है जैसे -- मेरी बात रहे? मेरी बात कट न जाय -- यह मैंपनके साथ भी मेरापन है। इसलिये ममता(मेरापन)को छोड़नेसे अहंता(मैंपन) छूट जाती है (टिप्पणी प0 895)। ऐसे ही पहले अहंता होती है? तब ममता होती है अर्थात् पहले मैं होता है? तब मेरापन होता है। परन्तु जहाँ अहंता(मैंपन)का ही त्याग कर दिया जायगा? वहाँ ममता (मेरापन) कैसे रहेगी वह भी छूट ही जायगी। सम्बन्ध --   सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु कौनसे हैं अब यह बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.13।।नन्वपरमार्थसंन्यासवदविशेषादज्ञानां परमार्थसंन्यासोऽपि किं न स्यात्त्यागस्य सुकरत्वात्तत्राह -- अतः परमार्थेति। तस्य सम्यग्दर्शनादविद्यानिवृत्तौ तदारोपितक्रियाकारकादिनिवृत्तेरिति हेत्वर्थः। विद्यावतः सर्वकर्मसंन्यासित्वसंभावनामुक्त्वैवकारव्यावर्त्यं दर्शयति -- नत्विति। अविदुषोऽशेषकर्मणां तद्धेतूनां च रागादीनां त्यागायोगे कारकेष्वधिष्ठानादिष्वात्मत्वदर्शनं हेतुमाह -- क्रियेति। कथमधिष्ठानादीनां क्रियाकर्तृत्वं कथं वा विदुषस्तेष्वात्मत्वधीरित्याशङ्क्यानन्तरश्लोकचतुष्टयस्य तात्पर्यमाह -- तदेतदिति। कर्मार्थानामधिष्ठानादीनामप्रामाणिकत्वाशङ्कामादावुद्धरति -- पञ्चेति। उत्तरत्रेत्यधिष्ठानादिषु वक्ष्यमाणेष्वित्यर्थः। वस्तूनां तेषामेव वैषम्यं दिदर्शयिषितं नहि चेतःसमाधानादृते ज्ञातुं शक्यते। सांख्यशब्दं व्युत्पादयति -- ज्ञातव्या इति। आत्मा त्वंपदार्थस्तत्पदार्थो ब्रह्म तयोरैक्यधीस्तदुपयोगिनश्च श्रवणादयः पदार्थास्ते संख्यायन्ते व्युत्पाद्यन्ते। कृतान्तशब्दस्य वेदान्तविषयत्वं विभजते -- कृतमित्यादिना। वेदान्तस्य तत्त्वधीद्वारा कर्मावसानभूमित्वे वाक्योपक्रमानुकूल्यं दर्शयति -- यावानिति। उदपाने कूपादौ यावानर्थः स्नानादिस्तावानर्थः समुद्रे संपद्यतेऽतो यथा कूपादिकृतं कार्यं सर्वं समुद्रेऽन्तर्भवति तथा सर्वेषु वेदेषु कर्मार्थेषु यावत्फलं तावज्ज्ञानवतो ब्राह्मणस्य ज्ञानेऽन्तर्भवति? ज्ञानं प्राप्तस्य कर्तव्यानवशेषादित्यर्थः। तत्रैव वाक्यान्तरमनुक्रामति -- सर्वमिति। उदाहृतवाक्ययोस्तात्पर्यमाह -- आत्मेति। आत्मज्ञाने सति सर्वकर्मनिवृत्तावपि कथं वेदान्तस्य कृतान्तत्वमित्याशङ्क्याह -- अत इति। तानि मद्वचनतो निबोधेति पूर्वेण संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.13।।पञ्चेत्यादेः प्रकृतेन सङ्गत्यप्रतीतेस्तामाह -- पुनरिति। न केवलं काम्यानां कर्मणां न्यासः सन्न्यासः? किन्तु कर्तृत्वाभिमानत्यागश्चेत्येवं प्रागुक्तं सन्न्यासं पुनः प्रपञ्चयितुं आत्मनोऽकर्तृत्वे क्रियानिष्पत्तिप्रसङ्गादङ्गीकार्ये कर्तृत्वे कथं तदभिमानत्यागो युक्तः इत्याशङ्कापरिहारार्थमात्यव्यतिरिक्तान्येव कर्मकारणान्याहेत्यर्थः। साङ्ख्यशब्दः कापिलतन्त्रे रूढः। कृतं कर्म तस्यान्तो निवृत्तिर्यत्रोच्य इत्युपनिषत्सु कृतान्तशब्दं कश्चिद्व्याख्यातवान्? तदुभयं निवर्तयितुमाह -- साङ्ख्य इति। ज्ञानार्थः सिद्धान्तो ज्ञानसिद्धान्तः सिद्धान्त इति शास्त्रं लक्ष्यते? कापिलतन्त्रस्य निन्दितत्वात् उपनिषत्स्वपि कर्मत्यागाप्रतिपादनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.13।।पुनः सन्न्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह -- पञ्चेत्यादिना। साङ्क्ष्ये कृतान्ते ज्ञानसिद्धान्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.13।। -- पञ्च एतानि वक्ष्यमाणानि हे महाबाहो? कारणानि निर्वर्तकानि निबोध मे मम इति। उत्तरत्र चेतःसमाधानार्थम्? वस्तुवैषम्यप्रदर्शनार्थं च। तानि च कारणानि ज्ञातव्यतया स्तौति -- सांख्ये ज्ञातव्याः पदार्थाः संख्यायन्ते यस्मिन् शास्त्रे तत् सांख्यं वेदान्तः। कृतान्ते इति तस्यैव विशेषणम्। कृतम् इति कर्म उच्यते? तस्य अन्तः परिसमाप्तिः यत्र सः कृतान्तः? कर्मान्तः इत्येतत्। यावानर्थ उदपाने (गीता 2।46) सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते (गीता 4।33) इति आत्मज्ञाने सञ्जाते सर्वकर्मणां निवृत्तिं दर्शयति। अतः तस्मिन् आत्मज्ञानार्थे सांख्ये कृतान्ते वेदान्ते प्रोक्तानि कथितानि सिद्धये निष्पत्त्यर्थं सर्वकर्मणाम्।।कानि तानीति? उच्यते --,

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【 Verse 18.14 】

▸ Sanskrit Sloka: अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् | विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ||

▸ Transliteration: adhiṣṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ ca pṛthagvidham | vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṁ caivātra pañcamam ||

▸ Glossary: adhiṣṭhānaṁ: place; tathā : also; kartā: worker; karaṇaṁ ca: and instruments; pṛthagvidham: different kinds; vividhāś ca: varieties; pṛthak: separately; ceṣṭā: endeavor; daivaṁ: the supreme; ca: also; eva: certainly; atra: here; pañcamam: five

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.13,14 Learn from Me Arjuna, the five causes that bring about the accomplishment of all action, as described in Sāṅkhya philosophy. These are: physical body that is the seat of action; the attributes of nature or guṇa, which is the doer; the eleven organs of perception and action by the life forces and finally the Divine.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.14।।इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलगअलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.14।। अधिष्ठान (शरीर)? कर्ता? विविध करण (इन्द्रियादि)? विविध और पृथक्पृथक् चेष्टाएं तथा पाँचवा हेतु दैव है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.14 अधिष्ठानम् the seat or body? तथा also? कर्ता the doer? करणम् the senses? च and? पृथग्विधम् of different? विविधाः various? च and? पृथक् different? चेष्टाः functions? दैवम् the presiding deity? च and? एव even? अत्र here? पञ्चमम् the fifth.Commentary Now listen to the characteristics of these five? of which the body is the first. It is termed the support or the seat. The body is the seat of desire? hatred? happiness? misery? knowledge and the like. The individual soul experiences through the body the pleasure and pain that arise through contact with matter. Egoism is the agent or the doer or the enjoyer. Nature does actions but through delusion the individual soul takes to himself the credit of their execution and? therefore? he is called the agent.Karta The enjoyer putting on the nature or properties of the limiting adjuncts with which he comes into contact.Karanam prithagvidham Various organs such as the organ of hearing? by which the individual soul hears the sound? etc. organs of knowledge and action and the mind.Daivam The presiding deity such as the Sun and the other gods by whose help the eye and the other organs perform their respective functions destiny.Cheshta Play of energy in the organs or the senses during the action.Absence of any of these factors will make action impossible.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.14. The basis, as well as the agent, and diverse instruments, and distinct activity of various kinds and Destiny, which is certainly the fifth [factor].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.14 They are a body, a personality, physical organs, their manifold activity and destiny.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.14 The seat of action and likewise the agent, the various kinds of organs, the different and distinctive functions of vital air and also the fifth among these, Divinity.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.14 The locus as also the agent, the different kinds of organs, the many and distinct activities, and, the divine is here the fifth.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.14 The seat (body), the doer, the various senses, the different functions of various sorts, and the presiding deity, also, the fifth.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.14 See Comment under 18.17

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.14 - 18.15 For all actions, performed through body, words or mind, whether they be authorized by the Sastras or not, the causes are these five. (1) The body, which is a conglomeration of the 'great elements,' is known as the seat, since it is governed by the individual self. (2) The agent is the individual self. That this individual self is the knower and the agent is established in the Vedanta-Sutras: 'For this reason, (the individual self) is the knower' (2.3.18) and 'The agent, on account of the scripture having a purport' (2.3.33.). (3) The organs of various kinds are the five motor organs like that of speech, hands, feet etc., along with the mind. They are of various kinds, viz., they have different functions in completing an action. (4) The different and distinctive functions of vital air - here the expression 'functions' (Cesta) means several functions. Distinctive are the functions of this fivefold vital air which sustains the body and senses through its divisions of Prana, Apana etc. (5) Divinity is the fifth among these causes. The purport is this: Among these, which constitute the conglomeration of causes of work the Divinity is the fifth. It is the Supreme Self, the Inner Ruler, who is the main cause in completing the action.

It has been already affirmed: 'I am seated in the hearts of all. From Me are memory, knowledge and their removal also' (15.15), and He will say further: 'The Lord, O Arjuna, lives in the heart of every being casuing them to spin round and round by His power as if set on a wheel' (18.61). The agency of the individual self is dependent on the Supreme Self as established in the aphorism: 'But from the Supreme, because the scripture says so' (B. S., 2.3.41).

Now an objection may be raised in this way: If the agency of the individual self is dependent on the Supreme Self and the individual self cannot be charged with moral responsibility, then the scriptures containing injunctions and prohibitions become useless, as the individual self cannot be enjoined to act in regard to any action. The objection is disposed off by the author of the Vedanta-Sutras in the aphorism: 'But with a view to the effects made on account of the purposelessness of injunctions and prohibitions' (2.3.42).

The purport is this: By means of his senses, body etc., granted by the Supreme Self - having Him for their support, empowered by Him, and thus deriving power from Him - the individual self begins, of his own free will, the effort for directing the senses etc., for the purpose of performing actions conditioned by his body and organs. The individual self Itself, of Its own free will, is responsible for activity, since the Supreme Self, abiding within, causes It to act only by granting His permission, just as works such as moving heavy stones and timber are collectively the labour of many persons and they are together responsible for the effect. But each one of them (severally) also is responsible for it. In the same way each individual is answerable to Nature's law in the form of positive and negative ?ndments.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.14 Adhisthanam, the locus, the body, which is the seat, the basis, of the manifestation of desire, hatred, happiness, sorrow, knowledge, etc.; tatha, as also karta, the agent, the enjoyer [The individual Self which has intelligence etc. as its limiting adjuncts, due to which it appears to possess their characteristics and become identified with them.] who has assumed the characteristics of the limiting adjuncts; prthak vidham, the different kinds of; karanam, organs, the ears etc. which, twelve [The five organs of knowledge (eyes, ears, nose, tongue and skin), the five organs of actions (hands, feet, speech, organ of excertion and that of generation), the mind and the intellect.] in number, are of different kinds for the experience of sound etc.; the vividhah, many; and prthak, distinct; cesta, activities connected with air-exhalation, inhalation, etc.; ca eva, and; daivam, the divine, i.e. the Sun and the others who are the presiding deities of the eye etc.; is atra, here, in relation to these four; pancamam, the fifth-completing the five.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.14।। भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिये हुए वचन को पूर्ण करते हुए इस श्लोक में कर्मसिद्धि के पाँच कारणों का नामोल्लेख करते हैं। यहाँ प्रस्तुत शब्दों के अर्थ बताने में गीता के व्याख्याकारों में थोड़ा अन्तर मिलता है। तथापि यह अन्तर विशेष महत्त्व का नहीं है।प्रत्येक कर्म स्थूल शरीर (अधिष्ठान) की सहायता से ही करना पड़ता है? क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का यही निवास स्थान है। यह शरीर स्वत कुछ भी कर्म नहीं कर सकता। इस शरीर को धारण करने वाला जीव (कर्ता) ही विषयों की इच्छाएं करता है और फिर उनकी पूर्ति के लिए कर्म करता है। विषय ग्रहण के लिए उसे ज्ञानेन्द्रियों की आवश्यकता होती है? जिन्हें यहाँ करण शब्द से इंगित किया गया है। इन करणों के बिना कर्ता जीव इस जगत् का न ज्ञान प्राप्त कर सकता है और न ही भोग।श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में पृथक् चेष्टा का अर्थ प्राणापानादि बताते हैं। वेदान्त सिद्धांत से परिचित विद्यार्थियों को इतना स्पष्टीकरण पर्याप्त है। परन्तु सामान्य लोगों को उसका अर्थ समझने में कठिनाई होती है। प्राणिक क्रियाओं के फलस्वरूप ही शरीर का स्वास्थ्य बना रहता है? जिससे कि मनुष्य कर्म करने में समर्थ होता है। अत? इस श्लोक को समझने की दृष्टि से हम चेष्टा शब्द का अर्थ कर्मेन्द्रिय ले सकते हैं। जैसा कि गीता में ही अनेक स्थानों पर कहा जा चुका है? हमारी इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता हैं जिनके अनुग्रह से श्रोत्र नेत्रादि इन्द्रियाँ स्वविषय ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। इन देवताओं को यहाँ दैव शब्द से इंगित किया ग्ाया है।सारांश में? कर्म सम्पादन के पाँच कारण हैं (1) शरीर? (2) कर्ता जीव?(3) ज्ञानेन्द्रियाँ? (4) कर्मेन्द्रियाँ? तथा (5) दैव अर्थात् अधिष्ठातृ देवता।भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.14।।कानि तानीत्यपेक्षायामाह -- अधिष्ठानं इच्छोद्वेषसुखदुःखज्ञानादीनामभिव्यक्तेराश्रयो देहः। तथा कर्ता उपाधिलक्षणो बुद्य्धाद्युपाध्यनुविधायी तद्धर्मानात्मनि पश्यन्नुपहित उपाधिप्रधानो भोक्ता। करकणं च श्रोत्रादिशब्दाद्युपलब्धये पृथग्विधं नानाप्रकारं ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च मनोबुद्धिश्चेति द्वादशसंख्यं। विविधाश्च पृथक् चेष्टाः वायवीयाः प्राणपानाद्याः। अत्र चतुर्षु दैवमेव पञ्चमं चक्षुराद्यनुग्राहकमादित्यादिदैवं सर्वप्रेरकोऽन्तर्यामीति त्वात्मनः कर्तृत्वव्यावृत्तये परमात्मनः कर्तृत्वप्रतिपादनमयुक्तमित्यभिफ्रेत्याचार्यैर्न प्रदर्शितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.14।।प्रमाणमूलानि कर्मकारणानि पञ्चात्मनोऽकर्तृसिद्ध्यर्थं हेयत्वेन ज्ञातव्यानीत्युक्ते कानि तानीत्यपेक्षायां तत्स्वरूपमाह द्वितीयेन -- अधिष्ठानमिति। इच्छाद्वेषसुखदुःखचेतनाभिव्यक्तेराश्रयोऽधिष्ठानं शरीरं तथा कर्ता यथाधिष्ठानमनात्मा भौतिकं मायाकल्पितं स्वाप्नगृहरथादिवत् तथा कर्ताऽहं करोमीत्याद्यभिमानवान् ज्ञानशक्तिप्रधानापञ्चीकृतपञ्चमहाभूतकार्योऽहंकारोऽन्तःकरणं बुद्धिर्विज्ञानमित्यादिपर्यायशब्दवाच्यस्तादात्म्याध्यासेनात्मनि कर्तृत्वादिधर्माध्यारोपहेतुरनात्मा भौतिको मायाकल्पितश्चेति तथाशब्दार्थः। स्थूलशरीरस्य लोकायतिकैरात्मत्वेन परिगृहीतस्याप्यन्यैः परीक्षकैरनात्मत्वेन निश्चयात्तद्दृष्टान्तेन तार्किकादिभिरात्मत्वेन परिगृहीतस्य कर्तुरप्यनात्मत्वनिश्चयः सुकर इत्यर्थः। करणं च श्रोत्रादिशब्दाद्युपलब्धिसाधनम्। चशब्दस्तथेत्यनुकर्षार्थः। पृथग्विधं नानाप्रकारं पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि मनो बुद्धिश्चेति द्वादशसंख्यं कारणवर्गं मनो बुद्धिश्चेति वृत्तिविशेषौ वृत्तिमांस्त्वहंकारः कर्तैव। चिदाभासस्तु सर्वत्रैवाविशिष्टो विविधा नानाप्रकाराः पञ्चधा पञ्चधा वा प्रसिद्धाः। चशब्दस्तथेत्यनुकर्षार्थः।,पृथक् असंकीर्णाश्चेष्टाः क्रियारूपाः क्रियाशक्तिप्रधानाः पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतकार्याः क्रियाप्राधान्येन वायवीयत्वेन व्यपदिश्यमानाः प्राणापानव्यानोदानसमानाः नागकूर्मकृकलदेवदत्तधनंजयाख्याश्च तदन्तर्भूता एव। अत्र च सुषुप्तावन्तःकरणस्य कर्तुर्लयेऽपि प्राणव्यापारदर्शनाद्भेदव्यपदेशाच्चान्तःकरणादत्यन्तभिन्न इव प्राण इति केचित्। क्रियाशक्तिज्ञानशक्तिमदेकमेव जीवत्वोपाधिभूतमपञ्चीकृतपञ्चमहाभूतकार्यं क्रियाशक्तिप्राधान्येन प्राण इति? ज्ञानशक्तिप्राधान्येन चान्तःकरणमिति व्यपदिश्यत इत्यभियुक्ताः।स ईक्षांचक्रे कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत इति श्रुतावुत्क्रान्त्याद्युपाधित्वं प्राणस्योक्तं? तथासधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ध्यायतीव लेलायतीव इत्यादिश्रुतावुत्क्रान्त्याद्युपाधित्वं बुद्धेरुक्तं? स्वतन्त्रोपाधिभेदे च जीवभेदप्रसङ्गस्तस्माद्बुद्धिप्राणयोरेकत्वेनैवोत्क्रान्त्याद्युपाधित्वं युक्तं? भेदव्यपदेशश्च शक्तिभेदात् सुषुप्तौ च ज्ञानशक्तिभागलयेऽपि क्रियाशक्तिभागदर्शनमेकत्वेऽपि न विरुद्धमनुभवसिद्धत्वात् दृष्टिसृष्टिलयेन सर्वलयेऽपि प्राणव्यापारवच्छरीरस्य सुषुप्तोऽयमित्येवंरूपेण परैः कल्पितत्वाच्च। तस्मादुभयथापि व्यपदेशभेद उपपन्नः। दैवं चानुग्राहकदेवताजातम्। चशब्दस्तथेत्यनुकर्षणार्थः। अत्र कारणवर्गे पञ्चमं पञ्चसंख्यापूरणम्। एवशब्दस्तथाशब्देन संबध्यमानोऽनात्मत्वभौक्तिकत्वकल्पितत्वाद्यवधारणार्थः पञ्चानामपि। तत्र शरीरस्य कर्तृकरणक्रियाधिष्ठानस्य देवता पृथिवीयत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं दिशः श्रोत्रं मनश्चन्द्रं पृथिवीं शरीरम् इति श्रुतौ वागाद्यधिष्ठात्र्यग्न्यादिभिः सह शरीराधिष्ठातृत्वेन पृथिवीपाठात्कर्तुरहंकारस्याधिष्ठात्री देवता रुद्रः पुराणादिप्रसिद्धः। करणानां चाधिष्ठात्र्यो देवताः सुप्रसिद्धाः। श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणानां दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्िवनः। वाक्पाणिपादपायूपस्थानां वह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रप्रजापतयो मनोबुद्ध्योश्चन्द्रबृहस्पती इति। पञ्चप्राणानां क्रियारूपाणां सद्योजातवामदेवाघोरतत्पुरुषेशानाः पुराणप्रसिद्धाः। भाष्ये दैवमादित्यादिचक्षुराद्यनुग्राहकमित्यधिष्ठानादिदेवतानामप्युपलक्षणम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.14।।तान्येव पञ्च गणयति -- अधिष्ठानमिति। अधिष्ठानमिच्छाद्वेषसुखदुःखज्ञानादीनामभिव्यक्तेराश्रयो देहः तस्यानात्मत्वं चार्वाकव्यतिरिक्तसमस्तवादिसिद्धम्। तथा कर्ता बुद्धिविशिष्टश्चिदाभासः प्रमाता नामाहंप्रत्ययविषयोऽहंकारस्तथेत्यनेन तद्वदेवानात्मत्वेन ज्ञेय इत्युक्तम्। देहस्यैव सृष्टौ प्रलये च तस्याप्युत्पत्तिविनाशयोर्दर्शनात्। एतच्च विशेषणनाशाद्विशिष्टनाशं विशेषणोत्पत्त्या च विशिष्टोत्पत्तिमभिप्रेत्य श्रूयतेविज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति इति।यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेतस्मादात्मनः सर्व एत आत्मानो व्युच्चरन्ति इति च। विशिष्टस्य चानतिरेकादर्शनादनात्मत्वं सिद्धम्। करणं च शब्दाद्युपलब्धिसाधनं पृथग्विधं द्वादशविधं पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि मनो बुद्धिश्च। तथा विविधाश्च पृथक् चेष्टा वायवीयाः प्राणनादिरूपाः। दैवं पुण्यपापरूपं तत्तत्करणानुग्राहकसूर्यादिदेवतारूपम् पञ्चमं पञ्चानां पूरणम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.14।।एवं प्रतिज्ञाय तान्येवाह -- अधिष्ठानमिति। अधिष्ठानं लिङ्गशरीरं? कर्ता कर्तृत्वात्मकाभिमानरूपोऽहङ्कारः? करणं चेन्द्रियाणि? पृथग्विधं अनेकप्रकारकम्। चकारेण स्वाधिदैविकसहितम्। विविधाः कार्यकारणफलादिभिरनेकप्रकारकाः। पृथग्भूताः भिन्नरूपेण जाताः प्राणादीनां चेष्टा व्यापाराः। अत्र एतन्मध्य एव सर्वप्रेरकोऽन्तर्यामी दैवं पञ्चमं मुख्यं कारणमित्यर्थः। एवकारेण,तदविरोधेनान्येषां कारणत्वमुक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.14।।तान्येवाह -- अधिष्ठानमिति। अधिष्ठानं शरीरं? कर्ता चिज्जडग्रन्थिरहंकारः? पृथग्विधमनेकप्रकारं करणं,चक्षुःश्रोत्रादि? विविधाश्च कार्यतः स्वरूपतश्च पृथग्भूताश्चेष्टाः प्राणापानादीनां व्यापाराः। अत्र चैतेष्वेव पञ्चमं दैवं च कारणं चक्षुराद्यनुग्राहकमादित्यादिसर्वप्रेरकोऽन्तर्यामी वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.14 -- 18.15।।तथाहि अधिष्ठानमिति। शरीरवाङ्मनोभिरिति न्याय्यं शास्त्रीयं? विपरीतं निषिद्धं वा? अन्यत्सर्वं कर्म शारीरं वाचिकं मानसं च तस्य पञ्चते हेतवो भवन्ति। तान्याह -- अधिष्ठानं प्रथमं शरीरं कारणं? कर्ता जीवात्मा सांहकारो ज्ञाता संज्ञात एवकर्ता शास्त्रार्यवत्त्वात् [ब्र.सू.2।3।33] इति सूत्रात् करणं च समनस्कं चक्षुश्श्रोत्रादिज्ञानकर्मभेदात् पृथग्विधं गृहीतं कार्यस्वरूपतो विविधःश्चेष्टः प्राणादीनां वृत्तयोऽत्र कर्मणि हेतवः। दैवं च पञ्चमं अदृष्टमिति केचित् (माध्वाः)। वस्तुतस्तु पञ्चसङ्ख्यापूरणमुत्तममन्तर्यामिरूपं कर्ममात्रनिष्पत्तौ प्रधानं? हेतुरित्यर्थः। उक्तं हि पाक् भगवता पुरुषोत्तमेन स्वान्तरे स्वरूपमाहात्म्यंहृदि सर्वस्य धिष्ठितं [13।18] इति। श्रीमदाचार्यैरप्युक्तं -- कृष्णात्परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोषवर्जितम् इति। तथा च सूत्रेष्वपि तदन्तरात्मायत्तजीवात्मदेहेन्द्रियादेः कर्त्तृत्वंपरानुवृत्तेः इत्युपपादितंयथा च तक्षोभयथा [ब्र.सू.2।3।40] इति।अत्र भाष्यकारः -- ननु कर्मकारिणां कर्त्तृत्वभोक्तृत्वभेदो दृश्यते तथा च कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्भेदो भविष्यतीति चेत्? न यथा तक्षा रथं निर्माय तत्रारूढो विहरति पीठं वा स्वतो न व्याप्रियते वास्यादिद्वारेण वा? चकारादन्ये स्वार्थकर्त्तारः। अन्यार्थमपि करोतीति चेत्प्रकृतेऽपि सर्वहितार्थं प्रयतमानत्वात्। न च कर्तृत्वमात्रं दुःखरूपं पयःपानादेः सुखरूपत्वात्। तथा च स्वार्थं परार्थं कर्त्तृत्त्वं कारयितृत्वं च सिद्धम्। अन्यच्च -- परात्तु तच्छ्रुतेः [ब्र.सू.2।3।41] इति। कर्तृत्वं ब्रह्मगतमेव तत्सम्बन्धादेव जीवं कर्तृत्वं? तदंशत्वात् ऐश्वर्यादिवत् न तु जडैकगतं इति। अतः नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा [बृ.उ.3।7।23] इति सर्वकर्त्तृत्वं घटते। कुत एतत् श्रुतेः तस्यैव कर्तृकारयितृत्वश्रवणात् यमुन्निनीषति तं साधु कर्म कारयति यमधोनिनीषति तमसाधु कारयति इतिसर्वकर्ता? सर्वभोक्ता? सर्वनियन्ता इति सर्वरूपत्वान्न भगवति दोषः। तथाच सूत्रं -- कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः [ब्र.सू.2।3।42] ननु वैषम्यनैर्घृण्ययोर्न परिहारः? अनादित्वेन स्वस्यैव कारयितृत्वादिति पक्षं तुशब्दो निवारयति प्रयत्नपर्यन्तं जीवकृत्यं अग्रे तस्याऽशक्यत्वात् स्वयमेव कारयति। यथा पुत्रं यतमानं बालं वा पदार्थगुणदोषौ वर्णयन्नपि तत्प्रयत्नाभिनिवेशं दृष्ट्वा तथैव कारयति सर्वत्र तत्कारणत्वाय तदानीं फलदातृत्वे या इच्छा तामेवानुवदतिउन्निनीषति अधोनिनीषति इति। अन्यथा विहितप्रतिषिद्धयोर्वैयर्थ्यापत्तिः? अप्रामाणिकत्वं च। फलदाने कर्मापेक्षः कर्मकारणे प्रयत्नापेक्षः कामे प्रवाहापेक्ष इति मर्यादारक्षार्थं वेदांश्चकार? ततो न ब्रह्मणि दोषगन्धोऽपि? न चानीश्वरत्वं मर्यादामार्गस्य तथैव निर्णयात् यत्रान्यथा स पुष्टिमध्ये इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.14।।वे ( पाँच कारण ) कौनसे हैं सो बतलाते हैं --, अधिष्ठान -- इच्छाद्वेष? सुखदुःख और ज्ञान आदिकी अभिव्यक्तिका आश्रय शरीर? कर्ता -- उपाधिस्वरूप भोक्ता जीव? भिन्नभिन्न प्रकारके कारण -- शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाले श्रोत्रादि अलगअलग बारह करण? नाना प्रकारकी चेष्टाएँ -- श्वासप्रश्वास आदि अलगअलग वायुसम्बन्धी क्रियाएँ और इन चारोंके साथ पाँचवाँ -- पाँचकी संख्याको पूर्ण करनेवाला कारण दैव है। अर्थात् चक्षु आदि इन्द्रियोंके अनुग्राहक सूर्यादि देव हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.14।। व्याख्या --   अधिष्ठानम् -- शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है? वह देश -- ये दोनों अधिष्ठान हैं।कर्ता -- सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों? चाहे व्यष्टि हों परन्तु उन क्रियाओँका कर्ता स्वयं नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है -- ऐसा अविवेककी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है? तब वह कर्ता बन जाता है (टिप्पणी प0 896)। ऐसा कर्ता ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।करणं च पृथग्विधम् -- कुल तेरह करण हैं। पाणि? पाद? वाक्? उपस्थ और पायु -- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र? चक्षु? त्वक्? रसना और घ्राण -- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ -- ये दस बहिःकरण हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- ये तीन अन्तःकरण हैं।विविधाश्च पृथक्चेष्टाः -- उपर्युक्त तेरह करणोंकी अलगअलग चेष्टाएँ होती हैं जैसे -- पाणि (हाथ) -- आदानप्रदान करना? पाद (पैर) -- आनाजाना? चलनाफिरना? वाक् -- बोलना? उपस्थ -- मूत्रका त्याग करना? पायु (गुदा) -- मलका त्याग करना? श्रोत्र -- सुनना? चक्षु -- देखना? त्वक् -- स्पर्श करना? रसना -- चखना? घ्राण -- सूँघना? मन -- मनन करना? बुद्धि -- निश्चय करना और अहंकार -- मैं ऐसा हूँआदि अभिमान करना।दैवं चैवात्र पञ्चमम् -- कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम दैव है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है? वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभकर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभकर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है? उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है? उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है? पुस्तकें पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ -- जैसे संस्कार होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है।इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया जायगा इसलिये अधिष्ठान पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा इसलिये कर्ता पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा? इसलिये करण पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी इसलिये चेष्टा पद आया है। कर्ता अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा? संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा? इसलिये दैव पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.14।।कर्मार्थान्यधिष्ठानादीनि मानमूलत्वाज्ज्ञेयानीत्युक्तमिदानीं प्रश्नपूर्वकं विशेषतस्तानि निर्दिशति -- कानीत्यादिना। प्रतीकमादाय -- व्याकरोति -- अधिष्ठानमिति। उपाधिलक्षणो बुद्ध्यादिरुपाधिस्तल्लक्षणस्तत्स्वभावो बुद्ध्याद्यनुविधायी तद्धर्मानात्मनि पश्यन्नुपहितस्तत्प्रधान इत्यर्थः। तत्र कार्यलिङ्गकमनुमानं सूचयति -- शब्दादीति। ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च? पञ्च कर्मेन्द्रियाणि मनोबुद्धिश्चेति द्वादशसंख्यत्वम्। चेष्टाया विविधत्वान्नानाप्रकारत्वं तदेव स्पष्टयति -- वायवीया इति। पृथक्त्वमसंकीर्णत्वम्। नहि प्राणापानादिचेष्टानां मिथः संकरोस्ति। दैवमेवेति विशदयति -- आदित्यादीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.14 -- 18.15।।अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतमिति वक्ष्यति? तत्प्रबोधनायाधिष्ठानं निर्दिशति -- अधिष्ठानमिति। आदिपदेन भूम्यादि। कर्ता जीव इति व्याख्यानमसदिति भावेनाऽऽह -- कर्तेति। शंरीरवाङ्मनोभिः क्रियमाणानां कर्मणां कर्ता कथं विष्णुः इत्यत आह -- स हीति। उक्तमुपपादितम्। तथापि जीवोऽत्र कर्ता किं न स्यात् इत्यत आह -- जीवस्य चेति। अपराधीनत्वाभिप्रायेणेदं निराकरणं? पराधीनं कर्तृत्वमङ्गीकृत्यान्यत्र जीवो व्याख्यात इत्यविरोधः। भावसाधनताप्रतीतिनिरासार्थमाह -- करणमिति। आदिपदेन स्रुवादि। भावसाधनार्थस्य साध्यत्वाच्चेष्टाग्रहणेन च गृहीतत्वाच्च। वायवीयाः प्राणापानाद्याश्चेष्टाः (शां.) इत्यसत्। द्रव्याभिधाने चेष्टात्वानुपपत्तेः। प्राणनाद्यभिधाने साध्यत्वात्कारकत्वानुपपत्तेरित्याशयवानाह -- चेष्टा इति। क्रियाणां साधकत्वात्कथं कारकत्वं इत्यत आह -- हस्तादीति। सावान्तरव्यापारं हि करणं कारकमुच्यते। तत्राधिष्ठानादिपदैर्व्यापारिणो निर्दिश्यन्ते। क्रियाशब्देन त्ववान्तरा व्यापाराः। कारकाश्रिताभिरवान्तरक्रियाभिः प्रधानक्रियाजननं च प्रसिद्धमेवेत्यर्थः।नन्वत्र कारकाभिधानप्रसङ्गेऽधिष्ठानाद्येवोक्तं कर्मसम्प्रदानापादानानि कुतो नोक्तानि अधिष्ठानादीनां सर्वक्रियानुगमात् कर्मादीनां तदभावादिति ब्रूमः। तथा च वक्ष्यति -- शरीरवाङ्मनोभिर्यत् [18।15] इति। एवं तर्हि चेष्टाऽपि न वक्तव्या। ध्यानादिजनने करणस्य मनसश्चेष्टाभावेनानुगमादित्यत आह -- ध्यानादेरपीति। आदिपदेन स्मरणं गृह्यते? ज्ञात एवार्थे ध्यानं भवति? ज्ञानं चात्मेन्द्रियसन्निकृष्टेनैव मनसा जायते? सन्निकर्षश्च मानसचेष्टाजन्यः? अतो ध्यानादेरपि मनस्सम्बन्धिनी चेष्टा कारणं भवतीति भावः। ननु नियतपूर्वक्षणे सत्कारणं न च ध्यानादिपूर्वक्षणे मनसि क्रियाऽस्ति चिरातीतत्वात्। मनोनैश्चल्यसाध्यत्वाद्ध्यानादेः। न च सन्निकर्षज्ञानद्वारा करणं तस्यापि चिरातीतत्वादित्यत आह -- पूर्वतनीति। पूर्वतनी चिरातीताऽपि मानसी क्रिया सन्निकर्षद्वारा ध्यानादिहेतुसंस्कारकारणत्वेन भवति? ध्यानादेः कारणसंस्कारस्य स्थायित्वादित्यर्थः। दैवमन्तर्यामिव्यापार इति कश्चित्? तदसत् कर्तेत्यनेनैवोक्तत्वात्। चक्षुराद्यनुग्राहकाः सूर्यादय इत्यपरः [वें.ब्र.] तदप्यसत् करणादिशब्दैरेव गृहीतत्वादिति भावेनाऽऽह -- दैवमदृष्टमिति। उक्तमर्थं श्रुतिसम्मत्याऽपि समर्थयते -- तथा चेति। देह इत्युपलक्षणम्। हेतुः कारणम्। कर्म हेत्विति क्वचित्पाठः? तत्र छान्दसो लिङ्गव्यत्ययः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.14 -- 18.15।।अधिष्ठानं देहादिः। कर्ता विष्णुः स हि सर्वकर्तेत्युक्तम् जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम्। करणमिन्द्रियादि च। चेष्टाः क्रियाः हस्तादिक्रियाभिर्होमादिकर्माणि जायन्ते। ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम्। पूर्वतनी चेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति। दैवमदृष्टम्। तथा चायास्यश्रुतिः -- देहो ब्रह्मार्थेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.14।। --,अधिष्ठानम् इच्छाद्वेषसुखदुःखज्ञानादीनाम् अभिव्यक्तेराश्रयः अधिष्ठानं शरीरम्? तथा कर्ता उपाधिलक्षणः भोक्ता? करणं च श्रोत्रादिशब्दाद्युपलब्धये पृथग्विधं नानाप्रकारं तत् द्वादशसंख्यं विविधाश्च पृथक्चेष्टाः वायवीयाः प्राणापानाद्याः दैवं चैव दैवमेव च अत्र एतेषु चतुर्षु पञ्चमं पञ्चानां पूरणम् आदित्यादि चक्षुराद्यनुग्राहकम्।।

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【 Verse 18.15 】

▸ Sanskrit Sloka: शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर: | न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव: ||

▸ Transliteration: śarīra-vāṅ-manobhir yat karma prārabhate naraḥ | nyāyyaṁ vā viparītaṁ vā pañcai ‘te tasya hetavaḥ ||

▸ Glossary: śarīra: body; vāk: speech; manobhiḥ: by the mind; yat: anything; karma: work; prārabhate: begins; naraḥ: a person; nyāyyaṁ: right; vā: or; viparītaṁ: the opposite; vā: or; pañca: five; ete: all these; tasya: its; hetavaḥ: causes

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.15 These five factors are responsible for whatever right or wrong actions a man performs by deed, word and thought.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.15।।मनुष्य? शरीर? वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है? उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.15।। मनुष्य अपने शरीर? वाणी और मन से जो कोई न्याय्य (उचित) या विपरीत (अनुचित) कर्म करता है? उसके ये पाँच कारण ही हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.15 शरीरवाङ्मनोभिः by (his) body? speech and mind? यत् whatever? कर्म action? प्रारभते performs? नरः man? न्याय्यम् right? वा or? विपरीतम् the reverse? वा or? पञ्च five? एते these? तस्य its? हेतवः causes.Commentary Nyayyam Right Not opposed to Dharma conformable to the scriptures justifiable.Viparitam The opposite What is opposite to Dharma and opposed to the scriptures unjustifiable.Even those actions? -- acts like winking and the like which are necessary conditions of life? are indicated by the term the right and the reverse? as they are effects of past Dharma and Adharma.Tasya Hetavah Its Causes The causes of every action.An objector argues In the previous verse it is said that the body? actor? various organs? etc.? are the necessary factors of every action. Why do you then make a distinction in actions by saying whatever action a man does by the body? speech and mindOur answer is In the performance of every action? one of the three -- body? speech or mind -- has a more prominent share than the others while seeing? hearing and other activities which accompany or go along with life are subordinate to that one.Therefore all actions are classified under three groups and are spoken of as done by the body or speech or mind. The fruit of an actions also is enjoyed through the body? speech and mind and one of the three takes a more prominent share than the rest. Therefore? it is proper to say Whatever action a man performs with his body? speech and mind৷৷.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.15. O Arjuna ! Whatever action is undertaken with the body, speech or the mind, whether it is lawful or otherwise, its factors are these five.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.15 Whatever action a man performs, whether by muscular effort or by speech or by thought, and whether it be right or wrong, these five are the essential causes.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.15 For whatever action a man undertakes by his body, speech and mind, whether right or wrong, i.e., enjoined or forbidden by the Sastras, the following five are its causes:

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.15 Whatever action a man performs with the body, speech and mind, be it just or its reverse, of it these five are the cuases.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.15 Whatever action a man performs with his body, speech and mind whether right or the reverse these five are its causes.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.15 See Comment under 18.17

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.14 - 18.15 For all actions, performed through body, words or mind, whether they be authorized by the Sastras or not, the causes are these five. (1) The body, which is a conglomeration of the 'great elements,' is known as the seat, since it is governed by the individual self. (2) The agent is the individual self. That this individual self is the knower and the agent is established in the Vedanta-Sutras: 'For this reason, (the individual self) is the knower' (2.3.18) and 'The agent, on account of the scripture having a purport' (2.3.33.). (3) The organs of various kinds are the five motor organs like that of speech, hands, feet etc., along with the mind. They are of various kinds, viz., they have different functions in completing an action. (4) The different and distinctive functions of vital air - here the expression 'functions' (Cesta) means several functions. Distinctive are the functions of this fivefold vital air which sustains the body and senses through its divisions of Prana, Apana etc. (5) Divinity is the fifth among these causes. The purport is this: Among these, which constitute the conglomeration of causes of work the Divinity is the fifth. It is the Supreme Self, the Inner Ruler, who is the main cause in completing the action.

It has been already affirmed: 'I am seated in the hearts of all. From Me are memory, knowledge and their removal also' (15.15), and He will say further: 'The Lord, O Arjuna, lives in the heart of every being casuing them to spin round and round by His power as if set on a wheel' (18.61). The agency of the individual self is dependent on the Supreme Self as established in the aphorism: 'But from the Supreme, because the

Chapter 18 (Part 10)

scripture says so' (B. S., 2.3.41).

Now an objection may be raised in this way: If the agency of the individual self is dependent on the Supreme Self and the individual self cannot be charged with moral responsibility, then the scriptures containing injunctions and prohibitions become useless, as the individual self cannot be enjoined to act in regard to any action. The objection is disposed off by the author of the Vedanta-Sutras in the aphorism: 'But with a view to the effects made on account of the purposelessness of injunctions and prohibitions' (2.3.42).

The purport is this: By means of his senses, body etc., granted by the Supreme Self - having Him for their support, empowered by Him, and thus deriving power from Him - the individual self begins, of his own free will, the effort for directing the senses etc., for the purpose of performing actions conditioned by his body and organs. The individual self Itself, of Its own free will, is responsible for activity, since the Supreme Self, abiding within, causes It to act only by granting His permission, just as works such as moving heavy stones and timber are collectively the labour of many persons and they are together responsible for the effect. But each one of them (severally) also is responsible for it. In the same way each individual is answerable to Nature's law in the form of positive and negative ?ndments.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.15 Yat, whatever; karma, action; narah, a man; prarabhate, performs; with these three-sarira-van-manobhih, with the body, speech and mind; be it nyayyam, just, rigtheous, conforming to the scriptures; va, or; viparitam, its reverse, not conforming to the scriptures, unrighteous; and even such activities like closing the eyes etc. whch are conseent on the fact of living (i.e. instinctive acts)-they also are certainly the result of righteous and unrighteous acts done in earlier lives, and hence they are understood by the very, use of the words 'just and its reverse'-; tasya, of it, of all activities without exception; ete, these; panca, five, as mentioned; are the hetavah, causes. Objection: Well, are not the locus etc. the cause of all actions? Why is it said, '৷৷.performs with the body, speech and mind'? Reply: This fault does not arise. All actions described as 'enjoined' or 'prohibited' are mainly based on the three, body etc. Seeing, hearing, etc., which are characteristics of life and are subsidiaries to these (body etc.) [Seeing etc. are accomplished by the eye etc., which are part and parcel of the body etc.] , are divided into three groups and spoken of in, 'performs with the body,' etc. Even at the time of reaping the fruits (of actions), they are experienced mainly through these (three). Hence, there is no contradiction with the assertion that the five are the causes.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.15।। न्याय्य और विपरीत कर्मों से तात्पर्य क्रमश धर्म के अनुकूल और प्रतिकूल कर्मों से है। निरपवाद रूप से सब प्रकार कर्मों की सिद्धि के लिए शरीरादि पाँच कारणों की आवश्यकता होती है।यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि कर्मों के पञ्चविध कारणों का वर्णन केवल बोनट के नीचे स्थित इंजन का ही है? पेट्रोल का नहीं। पेट्रोल के बिना इंजन कार्य नहीं कर सकता और न ही केवल पेट्रोल के द्वारा यात्रा सफल और सुखद हो सकती है। इंजन और पेट्रोल के सम्बन्ध से वाहन में गति आती है और तब स्वामी की इच्छा के अनुसार चालक उसे गन्तव्य तक पहुँचा सकता है। इस उदाहरण को समझ लेने पर भगवान् श्रीकृष्ण के कथन का अभिप्राय स्पष्ट हो जायेगा।अकर्म चैतन्य स्वरूप आत्मा देहादि उपाधियों से तादात्म्य करके जीव के रूप में अनेक प्रकार की इच्छाओं से प्रेरित होकर उचितअनुचित कर्म करता है। इन समस्त कर्मों के लिए पूर्वोक्त पाँच कारणों की आवश्यकता होती है।पूर्व के दो श्लोकों का निष्कर्ष यह है कि मनुष्य का कर्तृत्वाभिमान मिथ्या है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.15।।पञ्चानां स्वरुपमुक्त्वा कर्महेतुत्वमाह -- शरीरेति। यत्कर्म न्याय्यं वा धर्म्यं शास्त्रीयं विपरीतं वाऽधर्म्यमशास्त्रीयं य़च्चापि। निमिषितचेष्टादिजीवनहेतुः तदपि पर्वकृतधर्मादेरेव कार्यमिति न्याय्यविपरीतयोर्ग्रहणेन ग्राह्यं यज्ञ्याय्यादि कर्म शरीरवाङ्ग्नोभिस्त्रिर्भिर्नरः प्रारभ्ते निर्वर्तयति यस्य सर्वसस्यैव कर्मणः पञ्चैते यथोक्ता अधिष्ठानादयो हेतवः कारणानि। ननु पञ्चैतानीत्यादिनाधिष्ठानादीनि सर्वकर्मणां निवर्तकान्युक्तानि अत्रतु शरीरवाङ्गनोभिः कर्म प्रारभत इत्युक्तमतः पूर्वापरविरोध इतिचेत्। नैष दोषः। शरीराद्यारभ्ये त्रिविधे कर्मणि पञ्चानामधिष्ठानादीनां हेतुत्वस्तय विवक्षणात् दर्शनश्रवणादि च जीवनलक्षणत्रिविधकर्मण्येवान्तर्भवतीति त्रिधैव राशीकृतमुच्यते। ननु फलोपभोगकाले कारणान्तरापेक्षासंभवात्कथं पञ्चानामेवाधिष्ठानादीनां तत्र हेतुत्वमितिचेत् अपेक्षितस्य सर्वस्यापि कारणस्यैतेष्वेवान्तर्भावात्पञ्चानां हेतुत्वं न विरुध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.15।।स्वरूपमुक्त्वा तेषां पञ्चानां कर्महेतुत्वमाह तृतीयेन। शारीरं वाचिकं मानसिकं च विधिप्रतिषेधलक्षणं त्रिविधं कर्म धर्मशास्त्रेषु प्रसिद्धमक्षपादेन चोक्तंप्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः इति बुद्धिर्मनोऽतः प्राधान्याभिप्रायेणोच्यते। शरीरेण वाचा मनसा वा यत्कर्म प्रारभते निर्वर्तयति नरो मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्य कीदृशं कर्म न्याय्यं वा? शास्त्रीयं धर्म विपरीतं वाऽशास्त्रीयमधर्मं यच्च निमिषितचेष्टितादि जीवनहेतुरन्यद्वा विहितप्रतिषिद्धसमं तत्सर्वं पूर्वकृतधर्माधर्मयोरेव कार्यमिति न्याय्यविपरीतयोरेवान्तर्भूतम्। पञ्चैते यथोक्ता अधिष्ठानादयस्तस्य सर्वस्यैव कर्मणो हेतवः कारणानि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.15।।शरीरेति। न्याय्यं धर्म्यं शास्त्रीयम्। विपरीतमन्याय्यमधर्म्यमशास्त्रीयम्। ननु शरीरादिभिस्त्रिभिरारभ्यते पञ्चैते तस्य हेतव इति च विप्रतिषिद्धमुच्यते। नैष दोषः। अत्रापि शरीरपदेनाधिष्ठानस्य नरपदेन कर्तुर्वाङ्मन इति करणस्यारभत इति चेष्टानां न्याय्यमिति धर्माधर्मरूपस्य दैवस्य च संग्रहात्। सर्वेषु कर्मसु पञ्चानां समानेऽप्युपयोगे विधिप्रतिषेधलक्षणं त्रिविधमेव कर्म शास्त्रे प्रसिद्धमिति। इदं शारीरं कर्मेदं मानसमिदं वाचिकमिति व्यपदेशो देहादीनां प्राधान्यापेक्ष इति न कश्चिद्विरोधः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.15।।पञ्चानामेव सर्वकर्महेतुत्वमाह -- शरीरेति। कर्म त्रिविधं शारीरं? वाचनिकं? मानसिकम्। अतः शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म नरो मनुष्यः प्रारभते न्याय्यं वा मदाज्ञया मदिच्छारूपं? विपरीतं स्वफलभोगार्थरूपं विपरीतमन्याय्यं वा प्रारभते तस्यैते पूर्वोक्ता पञ्च हेतवः? कारणरूपा इत्यर्थः। विकल्पवाचकवाशब्दद्वयेन मदिच्छाज्ञानाभावे न्याय्यस्य वेदोक्तत्वेनावश्यप्राप्तस्याऽपि विपरीतत्वं तज्ज्ञाने विपरीतस्याऽपि न्याय्यत्वमिति ज्ञापितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.15।।एतेषामेव सर्वकर्महेतुत्वमाह -- शरीरेति। यथोक्तैः पञ्चभिः प्रारभ्यमाणं कर्म त्रिष्वेवान्तर्भाव्यशरीरवाङ्मनोभिरित्युक्तं शारीरं वाचिकं मानसं च त्रिविधं कर्मेति प्रसिद्धेः। शरीरादिभिर्यद्यत्कर्म धर्म्य वाऽधर्म्यं वा करोति नरस्तस्य सर्वस्य कर्मण एते पञ्च हेतवः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.14 -- 18.15।।तथाहि अधिष्ठानमिति। शरीरवाङ्मनोभिरिति न्याय्यं शास्त्रीयं? विपरीतं निषिद्धं वा? अन्यत्सर्वं कर्म शारीरं वाचिकं मानसं च तस्य पञ्चते हेतवो भवन्ति। तान्याह -- अधिष्ठानं प्रथमं शरीरं कारणं? कर्ता जीवात्मा सांहकारो ज्ञाता संज्ञात एवकर्ता शास्त्रार्यवत्त्वात् [ब्र.सू.2।3।33] इति सूत्रात् करणं च समनस्कं चक्षुश्श्रोत्रादिज्ञानकर्मभेदात् पृथग्विधं गृहीतं कार्यस्वरूपतो विविधःश्चेष्टः प्राणादीनां वृत्तयोऽत्र कर्मणि हेतवः। दैवं च पञ्चमं अदृष्टमिति केचित् (माध्वाः)। वस्तुतस्तु पञ्चसङ्ख्यापूरणमुत्तममन्तर्यामिरूपं,कर्ममात्रनिष्पत्तौ प्रधानं? हेतुरित्यर्थः। उक्तं हि पाक् भगवता पुरुषोत्तमेन स्वान्तरे स्वरूपमाहात्म्यंहृदि सर्वस्य धिष्ठितं [13।18] इति। श्रीमदाचार्यैरप्युक्तं -- कृष्णात्परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोषवर्जितम् इति। तथा च सूत्रेष्वपि तदन्तरात्मायत्तजीवात्मदेहेन्द्रियादेः कर्त्तृत्वंपरानुवृत्तेः इत्युपपादितंयथा च तक्षोभयथा [ब्र.सू.2।3।40] इति।अत्र भाष्यकारः -- ननु कर्मकारिणां कर्त्तृत्वभोक्तृत्वभेदो दृश्यते तथा च कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्भेदो भविष्यतीति चेत्? न यथा तक्षा रथं निर्माय तत्रारूढो विहरति पीठं वा स्वतो न व्याप्रियते वास्यादिद्वारेण वा? चकारादन्ये स्वार्थकर्त्तारः। अन्यार्थमपि करोतीति चेत्प्रकृतेऽपि सर्वहितार्थं प्रयतमानत्वात्। न च कर्तृत्वमात्रं दुःखरूपं पयःपानादेः सुखरूपत्वात्। तथा च स्वार्थं परार्थं कर्त्तृत्त्वं कारयितृत्वं च सिद्धम्। अन्यच्च -- परात्तु तच्छ्रुतेः [ब्र.सू.2।3।41] इति। कर्तृत्वं ब्रह्मगतमेव तत्सम्बन्धादेव जीवं कर्तृत्वं? तदंशत्वात् ऐश्वर्यादिवत् न तु जडैकगतं इति। अतः नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा [बृ.उ.3।7।23] इति सर्वकर्त्तृत्वं घटते। कुत एतत् श्रुतेः तस्यैव कर्तृकारयितृत्वश्रवणात् यमुन्निनीषति तं साधु कर्म कारयति यमधोनिनीषति तमसाधु कारयति इतिसर्वकर्ता? सर्वभोक्ता? सर्वनियन्ता इति सर्वरूपत्वान्न भगवति दोषः। तथाच सूत्रं -- कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः [ब्र.सू.2।3।42] ननु वैषम्यनैर्घृण्ययोर्न परिहारः? अनादित्वेन स्वस्यैव कारयितृत्वादिति पक्षं तुशब्दो निवारयति प्रयत्नपर्यन्तं जीवकृत्यं अग्रे तस्याऽशक्यत्वात् स्वयमेव कारयति। यथा पुत्रं यतमानं बालं वा पदार्थगुणदोषौ वर्णयन्नपि तत्प्रयत्नाभिनिवेशं दृष्ट्वा तथैव कारयति सर्वत्र तत्कारणत्वाय तदानीं फलदातृत्वे या इच्छा तामेवानुवदतिउन्निनीषति अधोनिनीषति इति। अन्यथा विहितप्रतिषिद्धयोर्वैयर्थ्यापत्तिः? अप्रामाणिकत्वं च। फलदाने कर्मापेक्षः कर्मकारणे प्रयत्नापेक्षः कामे प्रवाहापेक्ष इति मर्यादारक्षार्थं वेदांश्चकार? ततो न ब्रह्मणि दोषगन्धोऽपि? न चानीश्वरत्वं मर्यादामार्गस्य तथैव निर्णयात् यत्रान्यथा स पुष्टिमध्ये इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.15।।मन? वाणी और शरीरसे अर्थात् इन तीनोंके द्वारा मनुष्य जो कुछ न्याययुक्त -- धर्ममयशास्त्रीय अथवा धर्मविरुद्ध -- अशास्त्रीय कर्म करता है? उन सबके ये उपर्युक्त पाँच हेतु यानी कारण हैं। जीवनके लिये जो कुछ आँख खोलनेमूँदने आदिकी भी चेष्टाएँ की जाती हैं? वे भी? पहले किये हुए पुण्य और पापका ही परिणाम हैं। अतः न्याय और विपरीत ( अन्याय ) के ग्रहणसे ऐसी समस्त चेष्टाओंका भी ग्रहण हो जाता,है। पू0 -- जब कि अधिष्ठानादि ही समस्त कर्मोंके कारण हैं? तब यह कैसे कहा जाता है कि मन? वाणी और शरीरसे कर्म करता है उ0 -- यह दोष नहीं है। विहित और निषेधरूप सारे कर्म शरीर? वाणी और मन इन्हीं तीनोंकी प्रधानतासे होनेवाले हैं? तथा देखनासुनना आदि जीवननिमित्तक चेष्टाएँ भी उन्हीं कर्मोंकी अङ्गभूत हैं? इसलिये समस्त कर्मोंको तीन भागोंमें बाँटकर ऐसा कहते हैं कि जो कुछ भी शरीर आदिद्वारा कर्म करता है ( क्योंकि ) फलभोगके समय भी शरीर आदि प्रधान कारणोंद्वारा ही फल भोगा जाता है। सुतरां उपर्युक्त अधिष्ठानादि पाँच कारणोंकी हेतुता ठीक है? इसमें विरोध नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.15।। व्याख्या --   शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म ৷৷. पञ्चैते तस्य हेतवः -- पीछेके (चौदहवें) श्लोकमें कर्मोंके होनेमें जो अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं? वे पाँचों हेतु इन पदोंमें आ जाते हैं जैसे -- शरीर पदमें अधिष्ठान आ गया? वाक् पदमें बहिःकरण और मन पदमें अन्तःकरण आ गया? नरः पदमें कर्ता आ गया? और प्रारभते पदमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चेष्टा आ गयी। अब रही दैव की बात। यह दैव अर्थात् संस्कार अन्तःकरणमें ही रहता है परन्तु उसका स्पष्ट रीतिसे पता नहीं लगता। उसका पता तो उससे उत्पन्न हुई वृत्तियोंसे और उसके अनुसार किये हुए कर्मोंसे ही लगता है।मनुष्य शरीर? वाणी और मनसे जो कर्म आरम्भ करता है अर्थात् कहीं शरीरकी प्रधानतासे? कहीं वाणीकी प्रधानतासे और कहीं मनकी प्रधानतासे जो कर्म करता है? वह चाहे न्याय्य -- शास्त्रविहित हो? चाहे विपरीत, -- शास्त्रविरुद्ध हो? उसमें ये (पूर्वश्लोकमें आये) पाँच हेतु होते हैं।शरीर? वाणी और मन -- इन तीनोंके द्वारा ही सम्पूर्ण कर्म होते हैं। इनके द्वारा किये गये कर्मोंको ही कायिक? वाचिक और मानसिक कर्मकी संज्ञा दी जाती है। इन तीनोंमें अशुद्धि आनेसे ही बन्धन होता है। इसीलिये इन तीनों(शरीर? वाणी और मन) की शुद्धिके लिये सत्रहवें अध्यायके चौदहवें? पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें क्रमशः कायिक? वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि शरीर? वाणी और मनसे कोई भी शास्त्रनिषिद्ध कर्म न किया जाय? केवल शास्त्रविहित कर्म ही किये जायँ? तो वह तप हो जाता है। सत्रहवें अध्यायके ही सत्रहवें श्लोकमें अफलाकाङ्क्षिभिः पद देकर यह बताया है कि निष्कामभावसे किया हुआ तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक तप बाँधनेवाला नहीं होता? प्रत्युत मुक्ति देनेवाला होता है। परन्तु राजसतामस तप बाँधनेवाले होते हैं।इन शरीर? वाणी आदिको अपना समझकर अपने लिये कर्म करनेसे ही इनमें अशुद्धि आती है? इसलिये इनको शुद्ध किये बिना केवल विचारसे बुद्धिके द्वारा सांख्यसिद्धान्तकी बातें तो समझमें आ सकती हैं परन्तु कर्मोंके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है -- ऐसा स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। ऐसी हालतमें साधक शरीर आदिको अपना न समझे और अपने लिये कोई कर्म न करे तो वे शरीरादि बहुत जल्दी शुद्ध हो जायँगे अतः चाहे कर्मयोगकी दृष्टिसे इनको शुद्ध करके इनसे सम्बन्ध तोड़ ले? चाहे सांख्ययोगकी दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।जिस समष्टिशक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं? उसी समष्टिशक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण स्वयं उन क्रियाओंमेंसे खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है? वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता? वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे? बचपनसे जवान होना? श्वासका आनाजाना? भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतःस्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पापपुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं -- ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध --   भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है? उनमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.15।।पञ्चानामधिष्ठानादीनामुक्तानां सर्वकर्मसिद्ध्यर्थत्वं स्फुटयति -- शरीरेति। ननु जीवनकृतं निमेषोन्मेषादिकर्मान्तरं साधारणमस्ति तत्कथं राशिद्वयकरणमिति तत्राह -- यच्चेति। अधिष्ठानादीनां कर्ममात्रहेतुत्वं प्रतिज्ञाय शारीरादित्रिविधकर्महेतुत्वोक्तिरयुक्तेति शङ्कते -- नन्विति। पूर्वापरविरोधं परिहरति -- नैष दोष इति। ननु जीवनकृतानि स्वाभाविकानि कर्माणि दर्शनादीनि विधिनिषेधबाह्यत्वान्न देहादिनिर्वर्त्यानीत्याशङ्क्याह -- तदङ्गतयेति। तस्य देहादित्रयस्य प्रधानस्याङ्गं चक्षुरादि तन्निष्पाद्यत्वेन,जीवनकृतं दर्शनादि प्रधानकर्मण्यन्तर्भूतमिति त्रैविध्यमविरुद्धमित्यर्थः। देहाद्यारम्भे त्रिविधे कर्मणि सर्वकर्मान्तर्भावेऽपि कथं पञ्चानामेवाधिष्ठानादीनां तत्र हेतुत्वं फलोपभोगकाले कारणान्तरापेक्षासंभवादित्याशङ्क्य जन्मकालभाविनो भोगकालभाविनश्च सर्वस्य कारणस्य तेष्वेवान्तर्भावान्मैवमित्याह -- फलेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.14 -- 18.15।।अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतमिति वक्ष्यति? तत्प्रबोधनायाधिष्ठानं निर्दिशति -- अधिष्ठानमिति। आदिपदेन भूम्यादि। कर्ता जीव इति व्याख्यानमसदिति भावेनाऽऽह -- कर्तेति। शंरीरवाङ्मनोभिः क्रियमाणानां कर्मणां कर्ता कथं विष्णुः इत्यत आह -- स हीति। उक्तमुपपादितम्। तथापि जीवोऽत्र कर्ता किं न स्यात् इत्यत आह -- जीवस्य चेति। अपराधीनत्वाभिप्रायेणेदं निराकरणं? पराधीनं कर्तृत्वमङ्गीकृत्यान्यत्र जीवो व्याख्यात इत्यविरोधः। भावसाधनताप्रतीतिनिरासार्थमाह -- करणमिति। आदिपदेन स्रुवादि। भावसाधनार्थस्य साध्यत्वाच्चेष्टाग्रहणेन च गृहीतत्वाच्च। वायवीयाः प्राणापानाद्याश्चेष्टाः (शां.) इत्यसत्। द्रव्याभिधाने चेष्टात्वानुपपत्तेः। प्राणनाद्यभिधाने साध्यत्वात्कारकत्वानुपपत्तेरित्याशयवानाह -- चेष्टा इति। क्रियाणां साधकत्वात्कथं कारकत्वं इत्यत आह -- हस्तादीति। सावान्तरव्यापारं हि करणं कारकमुच्यते। तत्राधिष्ठानादिपदैर्व्यापारिणो निर्दिश्यन्ते। क्रियाशब्देन त्ववान्तरा व्यापाराः। कारकाश्रिताभिरवान्तरक्रियाभिः प्रधानक्रियाजननं च प्रसिद्धमेवेत्यर्थः।नन्वत्र कारकाभिधानप्रसङ्गेऽधिष्ठानाद्येवोक्तं कर्मसम्प्रदानापादानानि कुतो नोक्तानि अधिष्ठानादीनां सर्वक्रियानुगमात् कर्मादीनां तदभावादिति ब्रूमः। तथा च वक्ष्यति -- शरीरवाङ्मनोभिर्यत् [18।15] इति। एवं,तर्हि चेष्टाऽपि न वक्तव्या। ध्यानादिजनने करणस्य मनसश्चेष्टाभावेनानुगमादित्यत आह -- ध्यानादेरपीति। आदिपदेन स्मरणं गृह्यते? ज्ञात एवार्थे ध्यानं भवति? ज्ञानं चात्मेन्द्रियसन्निकृष्टेनैव मनसा जायते? सन्निकर्षश्च मानसचेष्टाजन्यः? अतो ध्यानादेरपि मनस्सम्बन्धिनी चेष्टा कारणं भवतीति भावः। ननु नियतपूर्वक्षणे सत्कारणं न च ध्यानादिपूर्वक्षणे मनसि क्रियाऽस्ति चिरातीतत्वात्। मनोनैश्चल्यसाध्यत्वाद्ध्यानादेः। न च सन्निकर्षज्ञानद्वारा करणं तस्यापि चिरातीतत्वादित्यत आह -- पूर्वतनीति। पूर्वतनी चिरातीताऽपि मानसी क्रिया सन्निकर्षद्वारा ध्यानादिहेतुसंस्कारकारणत्वेन भवति? ध्यानादेः कारणसंस्कारस्य स्थायित्वादित्यर्थः। दैवमन्तर्यामिव्यापार इति कश्चित्? तदसत् कर्तेत्यनेनैवोक्तत्वात्। चक्षुराद्यनुग्राहकाः सूर्यादय इत्यपरः [वें.ब्र.] तदप्यसत् करणादिशब्दैरेव गृहीतत्वादिति भावेनाऽऽह -- दैवमदृष्टमिति। उक्तमर्थं श्रुतिसम्मत्याऽपि समर्थयते -- तथा चेति। देह इत्युपलक्षणम्। हेतुः कारणम्। कर्म हेत्विति क्वचित्पाठः? तत्र छान्दसो लिङ्गव्यत्ययः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.14 -- 18.15।।अधिष्ठानं देहादिः। कर्ता विष्णुः स हि सर्वकर्तेत्युक्तम् जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम्। करणमिन्द्रियादि च। चेष्टाः क्रियाः हस्तादिक्रियाभिर्होमादिकर्माणि जायन्ते। ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम्। पूर्वतनी चेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति। दैवमदृष्टम्। तथा चायास्यश्रुतिः -- देहो ब्रह्मार्थेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.15।। --,शरीरवाङ्मनोभिः यत् कर्म त्रिभिः एतैः प्रारभते निर्वर्तयति नरः? न्याय्यं वा धर्म्यं शास्त्रीयम्? विपरीतं वा अशास्त्रीयम् अधर्म्यं यच्चापि निमिषितचेष्टितादि जीवनहेतुः तदपि पूर्वकृतधर्माधर्मयोरेव कार्यमिति न्याय्यविपरीतयोरेव ग्रहणेन गृहीतम्? पञ्च एते यथोक्ताः तस्य सर्वस्यैव कर्मणो हेतवः कारणानि।।ननु एतानि अधिष्ठानादीनि सर्वकर्मणां निर्वर्तकानि कथम् उच्यते शरीरवाङ्मनोभिः यत् कर्म प्रारभते इति नैष दोषः विधिप्रतिषेधलक्षणं सर्वं कर्म शरीरादित्रयप्रधानम् तदङ्गतया दर्शनश्रवणादि च जीवनलक्षणं त्रिधैव राशीकृतम् उच्यते शरीरादिभिः आरभते इति। फलकालेऽपि तत्प्रधानैः साधनैः भुज्यते इति पञ्चानामेव हेतुत्वं न विरुध्यते इति।।

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【 Verse 18.16 】

▸ Sanskrit Sloka: तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य: | पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति: ||

▸ Transliteration: tatraivam sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ | paśyatyakṛtabuddhitvān na sa paśyati durmatiḥ ||

▸ Glossary: tatra: there; evaṁ: certainly; sati: being; kartāraṁ: of the worker; ātmānaṁ: the self; kevalaṁ: only; tu: but; yaḥ: anyone; paśyati: sees; akṛta buddhitvāt: due to unintelligence; na: never; saḥ: he; paśyati: sees; durmatiḥ: foolish

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.16 Those who think they, their spirit, are the doers, are ignorant and do not see things as they are.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.16।।परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है? वह दुर्मति ठीक नहीं समझता क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.16।। अब इस स्थिति में जो पुरुष असंस्कृत बुद्धि होने के कारण? केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता समझता हैं? वह दुर्मति पुरुष (यथार्थ) नहीं देखता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.16 तत्र there (the case)? एवम् thus? सति being? कर्तारम् as the agent? आत्मानम् the Self? केवलम् alone? तु verily? यः who? पश्यति sees? अकृतबुद्धित्वात् owing to untrained understanding? न not? सः he? पश्यति sees? दुर्मतिः of perverted intelligence.Commentary The Self is always actionless. He is unattached like ether. He is always the silent witness. He is the spectator of activity. The egoistic man of little understanding only thinks that he is the real agent? and so he is bound by actions. He takes birth again and again to reap the fruits of his actions. For him who considers the body as consciousness? God or the Self? it naturally follows that the Self is the agent or the doer. He who identifies himself with the body? who has taken the body as the pure Self? has cast a net over himself? and he leads a deluded life of utter ignorance. He is bound by the fetters or bonds of Karma. He is ever shut up in the prisonhouse of this body.He who has not united himself with the Buddhi? who has got an impure or untrained understanding? who regards the Self as the actor or the agent is certainly a man of perverted intelligence. He is deluded. He is really a blind man. He sees not though he has eyes. He does not behold the essence of things. He has no idea of the supreme Principle (the Self) Which is Itself actionless? Which ever stands as a silent witness of the activities of all minds and all organs of all beings? Which moves the minds? organs and the lifeforce and the bodies to action? just as the magnet makes the iron pieces move. He does not behold the truth about the Self and action.Durmati Evilminded person A man of perverted intellect or undeveloped reason. He thinks that he alone is the doer or agent. He does not understand anything. He has no knowledge of the,actionless? pure? selfluminous Self.The ignorant man of untrained understanding identifies himself with the five causes and regards the pure actionless Self as the agent or doer of the actions which are really done by these five causes. What is the reason for this Why does he regard them so Because he is not endowed with a pure and subtle intellect his understanding (Buddhi) has not been trained in the practice of Vedanta he is not eipped with the four means of salvation his intellect has not been trained by the teachings of the preceptor or the spiritual teacher in the methods of logical reasoning.He who considers that the pure actionless Self is the agent or the doer is certainly a man of untrained understanding. He has no knowledge of the actionless Self and action. Therefore? he is a man of perverted intelligence. His intellect works or moves in the wrong direction. His intellect moves in the sensual grooves or avenues. It runs like the vicious horse and leads to birth and death. The technie of Buddhi Yoga taught in the Gita enables one effectively to prevent this.He does not perceive or cognise the Truth though he has eyes. Though he sees? he sees the external? gross? illusory? everchanging? perishable objects only. He does not behold the one immortal? unchanging? allblissful essence? which is the basis or substratum of everything. He is like the man with jaundiced eyes? who sees all objects tinged with yellow colur? or like the man suffering from diplopia who beholds many moons? or like the man who thinks that the moon moves when the clouds move? or like the man who? seated in a train? imagines that the trees are moving when it is the train that is really moving. (Cf.V.15XIII.30)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.16. But this being the case, whosoever views himself as the sole agent (cause of actions) due to his imperfect intellect - he, the defective-minded one, does not view [things rightly].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.16 But the fool who supposes, because of his immature judgment, that it is his own Self alone that acts, he perverts the truth and does not see rightly.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.16 Such being the case, he who sees only the self as the agent on account of the uncultivated understanding - he, of wicked mind, does not see at all.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.16 This being the case, anyone, who, owing to the imperfection of his intellect, perceives the absolute Self as the agent, that man does not perceive (properly), and has a perverted intellect.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.16 Now, such being the case, verily he who owing to untrained understanding looks upon his Self, which is isolated, as the agent, he of perverted intelligence, sees not.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.16 See Comment under 18.17

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.16 In fact, the agency of the individual self is subject to the consent of Supreme Self; such being the case, if the 'individual self regards Itself as the agent,' It is of wicked or perverse mind. For, It does not perceive the agent as It really is, since It possesses an 'uncultivated understanding,' namely, an understanding which does not reveal the real state of affairs.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.16 Tatra is used for connecting with the topic under discussion. Tatra evam sati, this being the case, when actions are thus accomplished by the five causes mentioned above;-this portion has to be connected with 'perverted intellect' by way of causality [Actions are done by the body etc., but since a person thinks that the Self is the agent, therefore he is said to have a perverted intellect.]-yah, tu, anyone, an unenlightened person, who; pasyati, perceives; kevalam, the absolute, pure; atmanam, Self; as the kartaram, agent-thinking, 'I myself am the agent of the actions being done by them', as a conseence of imagining the Self as identified with them; why?-akrta-buddhitvat, owing to the imperfection of his intellect, owing to his intellect not having been refined by the instructions of Vedanta and the teachers, and by reasoning-. Even the person who, believing in the Self as distinct from the body etc., looks upon the distinct [Ast. omits anyam (distinct).-Tr.], absolute Self as the agent, he, too, is surely of imperfect intellect. Hence, owing to his having an imperfect intellect, sah, that man; na, does not; pasyati, perceive (properly) either the truth about the Self or about actions. This is the meaning. Therefore he is a durmatih, man of perverted intellect, in the sense that his intellect is contemptible, perverse, corrupted, and the cause of repeatedly undergoing births and deaths. He does not perceive even while seeing-like the man suffering from Timira seeing many moons, or like one thinking the moon to be moving when (actually) the clouds are moving, or like the one seated on some conveyance (e.g. palanin), thinking oneself to be moving when others (the bearers) are moving. Who, again, is the man of right intellect who perceives correctly? This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.16।। पूर्व श्लोक में हमने देखा कि आत्मा की उपस्थिति में शरीरादि जड़ उपाधियाँ कार्य करती हैं? परन्तु आत्मा अकर्ता ही रहता है। आत्मा और अनात्मा के इस विवेक के अभाव में अज्ञानी जन स्वयं को कर्ता और भोक्ता रूप जीव ही समझते हैं। जीव दशा में रागद्वेष? प्रवृत्तिनिवृत्ति? लाभहानि और सुखदुख अवश्यंभावी हैं। जिस क्षण कोई पुरुष आत्मा और अनात्मा के भेद को तथा अविद्या से उत्पन्न मिथ्या अहंकार को समझ लेता है? उसी क्षण इस मिथ्या जीव का अस्तित्व दिवा स्वप्न के भूत के समान समाप्त हो जाता है।तत्रैवं सति सभी प्रकार के उचित और अनुचित कर्म शरीर? कर्ता? दशेन्द्रियाँ तथा दैव की सहायता से ही होते हैं? परन्तु इन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा नित्य शुद्ध और अकर्ता ही रहता है। अज्ञानी जन इस आत्मा को ही कर्ता समझ लेते हैं।इस प्रकार के विपरीत ज्ञान के कारणों का निर्देश? यहाँ अकृतबुद्धि और दुर्मति इन दो शब्दों से किया गया है। अकृतबुद्धि का अर्थ है वह पुरुष जिसने अपनी बुद्धि को शास्त्र? आचार्योपदेश तथा न्याय (तर्क) के द्वारा सुसंस्कृत नहीं किया है तथा दुर्मति का अर्थ है दुष्टरागद्वेषादि युक्त बुद्धि का पुरुष। इस कथन का अभिप्राय यह हुआ कि जो पुरुष अपने चित्त को शुद्ध कर आत्मविचार करता है? वह अपने में ही यह साक्षात् अनुभव करता है? कि शरीरादि जड़ उपाधियाँ ही कार्य करके थकान का अनुभव करती हैं? अकर्ता आत्मा नहीं।विपरीत ज्ञान का वर्णन करने के पश्चात् अब यथार्थ ज्ञान का वर्णन करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.16।।एवमधिष्ठानादीनां सर्वकर्मणि हेतुत्वमुक्त्वाऽविदुष आत्मन्यकर्तरि कर्तृत्वदृष्टिमनुवदति -- तत्रैवं सतीति। एवं यथोक्तैः पञ्चभिर्हेतुभिः सर्वस्मिन्कर्मणि निर्वर्त्ये सति केवलं शुद्धमसंहतं अकर्तारमात्मानमात्मानोऽनन्यत्वेन,कल्पितैरधिष्ठानादिभिःक्रियमाणस्य कर्मणोऽहमेव कर्तेति कर्तारं योऽकृतबुद्धित्वात् वेदान्तचार्योपदेशन्यायैरसंस्कृतबुद्धित्वात्पश्यति अतः स दुर्मतिः नैव पश्यति। योऽपि देहातिरिक्तात्मवादी तार्किकादिः केवलमकर्तारं शुद्धमात्मानं कर्तारं पश्यत्यसावप्यकृतबुद्धित्वान्न पश्यति आत्मनः। कर्मणो वा तत्त्वम्। अतो दुरमतिः कुत्सिता विपरीता दुष्टाऽस्त्रं जननमरणाप्राप्तिहेतुभूता मतिरस्येति। स पश्यन्नपि न पश्यति। यथा तैमिरिकोऽनेकचन्द्रं यथावान्येषु धावत्स्वेवासनास्थि आत्मनं धावन्तं पश्यति तथाधिष्ठानादिषु क्रियाकर्तुषु तद्गतः स्वात्मानमकर्तारं पश्यति स दुर्मतिरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.16।।इदानीमेतेषामेव कर्मकर्तृत्वादात्मनो न कर्तृत्वमित्यधिष्ठानादिनिरूपणफलमाह -- तत्रैवमिति। तत्र कर्मणि प्रागुक्तसर्वस्मिन्नेवं सत्यधिष्ठानादिपञ्चहेतुके सति तैर्निर्वर्त्यमाने आत्मानं सर्वजडप्रपञ्चस्य भासकं सत्तास्फूर्तिरूपं स्वप्रकाशपरमानन्दमबाध्यं केवलमसङ्गोदासीनमकर्तारमविक्रियमद्वितीयं तु एव परमार्थतोऽविद्यया त्वधिष्ठानादौ प्रतिबिम्बितमादित्यमिव तोये तद्भासकमनन्यत्वेन परिकल्प्य तोयचलनेनादित्यश्चलतीतिवदधिष्ठानादिकर्मणोऽहमेव कर्तेति साक्षिणमपि सन्तं कर्तारं क्रियाश्रयं यः पश्यत्यविद्यया कल्पयति रज्जुमिव भुजङ्गं स एवं पश्यन्नपि न पश्यत्यात्मानं तत्त्वेन स्वरूपाज्ञानकृतत्वादध्यासस्य स भ्रान्त्या विपरीतमेव पश्यति न यथातत्त्वमित्यत्र को हेतुरत आह -- अकृतबुद्धित्वादिति। शास्त्राचार्योपदेशन्यायैरनुपजनितविवेकबुद्धित्वात्। नहि रज्जुतत्त्वसाक्षात्काराभावे भुजङ्गभ्रमं कश्चन बाधते एवं शास्त्राचार्योपदेशन्यायैः परिनिष्ठितेअहमस्मिसत्यं ज्ञानमनन्तम्अकर्त्रभोक्तृपरमानन्दमनवस्थमद्वयं ब्रह्म इति साक्षात्कारेऽनुपजनिते कुतो मिथ्याज्ञानतत्कार्यबोधः। एतादृशं साक्षात्कारं गुरुमुपसृत्य वेदान्तवाक्यविचारेण कुतो न जनयतीत्यत आह -- दुर्मतिरिति। दुष्टा विवेकप्रतिबन्धकपापेन मलिना मतिर्यस्य सः? अतोऽशुद्धबुद्धित्वान्नित्यनित्यावस्तुविवेकादिशून्यत्वेन तत्त्वज्ञानायोग्यत्वादकर्तारमपि कर्तारं केवलमप्यकेवलमात्मानमविद्यया कल्पयन्संसारी कर्माधिकारी देहभृदकृतबुद्धिः कर्मकर्तृषु तादात्म्याभिमानात्कर्मत्यागासमर्थः सर्वदा जननमरणप्रबन्धेनानिष्टमिष्टं मिश्रं च कर्मफलमनुभवति। एतेन यस्तार्किको देहादिव्यतिरिक्तमात्मानमेव कर्तारं केवलं पश्यति सोऽप्यकृतबुद्धित्वेन व्याख्यातः। अन्यस्त्वाह। आत्मा केवलो न कर्ता किंत्वधिष्ठानादिभिः संहतः सन् परमार्थतः कर्तैव कर्तारमात्मानं,केवलं पश्यन् दुर्मतिरिति केवलशब्दप्रयोगादिति। तन्न। परमार्थतः सर्वक्रियाशून्यस्यासङ्गस्यात्मनोऽधिष्ठानादिभिः संहतत्वानुपपत्तेर्जलसूर्यकादिवत्त्वाविद्यकेन संहतत्वेन कर्तृत्वमपि तादृशमेवाधिष्ठानादीनामप्याविद्यकत्वाच्च। केवलशब्दस्तु स्वभावसिद्धमात्मनोऽसङ्गाद्वितीयरूपत्वमनुवदति कर्तृत्वदर्शिनो दुर्मतित्वहेतुत्वेनेत्यदोषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.16।।एतत्प्रतिपादनफलं कर्तृत्वस्यारोपितत्वसिद्धिरकर्तृत्वस्य स्वाभाविकत्वसिद्धिश्चेति द्वाभ्यां श्लोकाभ्यां दर्शयति -- तत्रेति। तत्र तस्मिन्कर्मणि। एवमुक्तरीत्या पञ्चभिर्निर्वर्त्ये सति। केवलं त्वकर्तारमप्यात्मानं चेतनम्साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च इति श्रुतेः अधिष्ठानादिपञ्चकप्रचारदर्शिनमुदासीनमपि यः कर्तारं कर्तृत्वाश्रयं पश्यति स दुर्मतिः पापाभिभूतमतिर्न पश्यति। अन्ध एव सः। अदर्शने हेतुः अकृतबुद्धित्वादिति। शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृता बुद्धिर्यस्य स कृतबुद्धिस्तद्विपरीतोऽकृतबुद्धिस्तस्य भावस्तत्त्वं तस्मात्। यथा स्वमुखस्योदपात्रसंसर्गिकत्वं पश्यता जलचाञ्चल्यमपि तत्रारोप्यत एवमात्मनो बुद्धिसंसृष्टत्वं पश्यता बुद्धिधर्मः कर्तृत्वादिरप्यात्मन्यारोप्यत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.16।।किमतो यद्येवमत आह -- तत्रेति। तत्र सर्वकर्मसु पञ्च हेतवो मत्प्रेरिता इत्येवं सति स केवलमेकं आत्मानं जीवं? तुशब्देन अकर्तारं? योऽकृतबुद्धित्वात् गुरूपदेशप्राप्तविवेकाभावात् दुर्मतिः दुर्बुद्धिः स्वमौढ्येन पश्यति? स न पश्यति आत्मानं मां चेति भावः। एवं यः कर्म करोति तस्य तत्फलतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.16।।ततः किमत आह -- तत्रेति। तत्र सर्वस्मिन्कर्मणि एते पञ्च हेतव इत्येवं सति केवलं निरुपाधिकमसङ्गमात्मानं तु यः कर्तारं पश्यति शास्त्राचार्योपदेशत्यागेनासंस्कृतबुद्धित्वाद्दुर्मतिरसौ सम्यङ्न पश्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.16।।तत्रैवं सति पञ्चहेतुके कर्मणि सति वस्तुतः प्रकृतिपुरुषप्रयोजकभूतपरमात्मानुमतिपूर्वके जीवात्मनः कर्तृत्वे सति तत्र कर्मणि केवलमात्मानं स्वमेव कर्तारं पश्यति यः स परं विपरीतमतिः अकृतबुद्धित्वात् यथावस्थितं कर्तारं न पश्यति यतः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.16।।तत्र शब्द प्रकरणसे सम्बन्ध जोड़ता है। ऐसा होनेसे? यानी पहले बतलाये हुए पाँच कारणोंद्वारा ही समस्त कर्म सिद्ध होते हैं? इसलिये? जो अज्ञानी पुरुष? वेदान्त और आचार्यके उपदेशद्वारा तथा तर्कद्वारा संस्कृतबुद्धि न होनेके कारण? उन अधिष्ठानादि पाँचों कारणोंके साथ अविद्यासे आत्माकी एकता मानकर? उनके द्वारा किये हुए कर्मोंका मैं ही कर्ता हूं इस प्रकार केवलशुद्ध आत्माको ( उन कर्मोंका ) कर्ता समझता है? ( वह वास्तवमें कुछ भी नहीं समझता )। तथा आत्माको शरीरादिसे अलग माननेवाला भी? जो शरीरादिसे अलग केवल आत्माको ही कर्ता समझता है? वह भी अकृतबुद्धि ही है। अतः असंस्कृतबुद्धि होनेके कारण वह भी वास्तवमें आत्माका या कर्मका तत्त्व नहीं समझता? यह अभिप्राय है। इसलिये वह दुर्बुद्धि है। जिसकी बुद्धि कुत्सित? विपरीत? दुष्ट और बारम्बार जन्ममरण देनेमें कारणरूप हो उसे दुर्बुद्धि कहते हैं ऐसा मनुष्य देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता। जैसे तिमिररोगवाला अनेक चन्द्र देखता है? या जैसे बालक दौड़ते हुए बादलोंमें चन्द्रमाको दौड़ता हुआ देखता है? अथवा जैसे ( पालकी आदि ) किसी सवारीपर चढ़ा हुआ मनुष्य दूसरोंके चलनेमें अपना चलना समझता है ( वैसे ही उसका समझना है )।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.16।। व्याख्या --   तत्रैवं सति ৷৷. पश्यति दुर्मतिः -- जितने भी कर्म होते हैं? वे सब अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव -- इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है? उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है -- अकृतबुद्धित्वात् अर्थात् उसने विवेकविचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड और चेतनका? प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है? अलगाव है? उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।यहाँ आये अकृतबुद्धित्वात् और दुर्मतिःपदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है। अकृतबुद्धित्वात् पद हेतुके रूपमें आया है और दुर्मतिः पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता? तो वह दुर्मति नहीं रहता।केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता -- न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) परन्तु तादात्म्यके कारण मैं नहीं करता हूँ -- ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें अकृतबुद्धि ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है? वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है।केवलम् पद कर्मयोग और सांख्ययोग -- दोनोंमें ही आया है। प्रकृति और पुरुषके विवेकको लेकर कर्मयोग और सांख्ययोग चलते हैं। कर्मयोगमें सब क्रियाएँ शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही होती हैं? पर उनके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता अर्थात् उनमें ममता नहीं होती। ममता न होनेसे शरीर? मन आदिकी संसारके साथ जो एकता है? वह एकता अनुभवमें आ जाती है। एकताका अनुभव होते ही स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें केवलैः पद शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ दिया गया है -- कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि (गीता 5। 11)।सांख्ययोगमें विवेकविचारकी प्रधानता है। जितने भी कर्म होते हैं? वे सब पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अपनेको कर्ता मान लेता है। विवेकसे मोह मिट जाता है। मोह मिटनेसे वह अपनेको कर्ता कैसे मान सकता है अर्थात् उसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसलिये सांख्ययोगमें केवलम् पद स्वरूपके साथ दिया गया है -- केवलम् आत्मानम्।अब इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि कर्मयोगमें केवल शब्द शरीर? मन आदिके साथ रहनेसे शरीर? मन? बुद्धि आदिके साथ अहम् भी संसारकी सेवामें लग जायगा तथा स्वरूप ज्योंकात्यों रह जायगा और सांख्ययोगमें स्वरूपके साथ केवल रहनेसे मैं निर्लेप हूँ? मैं शुद्धबुद्धमुक्त हूँ इस प्रकार सूक्ष्मरीतिसे अहम् की गंध रह जायगी। मैं निर्लेप रहूँ मेरेमें कर्तृत्व नहीं है -- ऐसी स्थिति बहुत कालतक रहनेसे यह अहम् भी अपनेआप गल जायगा अर्थात् अपने कारण प्रकृतिमें लीन हो जायगा। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मति ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.16।।क्रियाकर्तृत्वमधिष्ठानादीनामापाद्याविदुषस्तेष्वात्मदृष्टिमनुवदति -- तत्रेति। तत्पदपरामर्शयोग्यं प्रकृतं सर्वं कर्म प्रतीकमादाय पूर्वेण सहाक्षरार्थं कथयति -- एवमिति। अधिष्ठानादीनामुक्तरीत्या कर्तृत्वे सत्यन्यगतं कर्तृत्वमात्मनो यतोऽध्यारोप्य पश्यति अतो दुर्मतिरित्यात्मनि कर्तृत्वं पश्यन्नित्याह -- तत्रैवमिति। कर्तारमित्यादि व्याचष्टे -- तत्रेत्यादिना। तेष्वधिष्ठानादिषु तैरधिष्ठानादिभिरारोपितात्मभावैरित्यर्थः। अकर्तारमात्मानं कर्तारं पश्यतीत्यत्र प्रश्नद्वारा हेतुमाह -- कस्मादिति। ननु शास्त्रसंस्कृतबुद्धिरेवातिरिक्तात्मवादी कर्तृत्वं तस्यानुमन्यते नासौ कर्तृत्वमात्मनि पश्यन्नपि भवत्यकृतबुद्धिस्तत्राह -- योऽपीति। तस्यापि शास्त्रपूर्वकमाचार्योपदेशेन तदनुसारिन्यायैश्चानाहितबुद्धित्वादकृतबुद्धित्वं सिद्धमित्यर्थः। कौटस्थ्यमात्मनस्तत्त्वं याथात्म्यं कर्मणोऽपि तत्त्वमविद्याकृताधिष्ठानादिकृतत्वेनात्मास्पर्शित्वमात्मकर्मणोस्तत्त्वदर्शनाभावोऽतःशब्दार्थः। दुष्टत्वं स्पष्टीकर्तुं दुर्मतित्वं विवृणोति -- जननेति। अहं कर्तेत्यात्मदर्शनवतोऽपि नाविदुषस्तद्दर्शनमस्तीत्यत्र दृष्टान्तमाह -- यथेति। तिमिरोपहतचक्षुरनेकं चन्द्रं पश्यन्नपि तत्त्वतो न तं पश्यत्येवमविद्वानात्मानं कर्तारं पश्यन्नपि तत्त्वतो न तं पश्यतीत्यर्थः। अधिष्ठानादिष्वविद्यया संबद्धात्मनः स्वात्मनि तद्गतक्रियारोपे दृष्टान्तमाह -- यथावेति। अन्येषु वाहकेषु पुरुषेषु धावनकर्तृषु वाहने स्थितः स्वात्मानं प्रधावनकर्तारमविवेकादभिमन्यते तथाधिष्ठानादिषु क्रियाकर्तृषु तद्गतं स्वात्मानं कर्तारं मन्यमानो दुर्मतिरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.16।।न चैवं जीवस्य कर्मकारणेष्वनन्तर्भावे व्याख्यायमानेतत्रैवं सति इत्युत्तरवाक्ये केवलमिति न युज्यते? एकाकिनमात्मानं कारणत्वेन मन्यमानस्य निन्दयाऽस्य सहायस्य कारणत्वप्रतीतेरित्यत आह -- केवलमिति। नात्र केवलशब्द एकाकिवचनः? किन्तु निष्क्रियत्ववाची तदुक्तिश्च निन्दोपपादनार्थेति भावः। केवलशब्दस्य निष्क्रियार्थत्वं कुतः इत्यत आह -- एनमिति। तत्रैवायास्यश्रुतावेवोक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.16।।केवलं निष्क्रियम्। एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद्वदन्ति हीति तत्रैव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.16।। --,तत्र इति प्रकृतेन संबध्यते। एवं सति एवं यथोक्तैः पञ्चभिः हेतुभिः निर्वर्त्ये सति कर्मणि। तत्रैवं सति इति दुर्मतित्वस्य हेतुत्वेन संबध्यते। तत्र एतेषु आत्मानन्यत्वेन अविद्यया परिकल्पितैः क्रियमाणस्य कर्मणः अहमेव कर्ता इति कर्तारम् आत्मानं केवलं शुद्धं तु यः पश्यति अविद्वान् कस्मात् वेदान्ताचार्योपदेशन्यायैः अकृतबुद्धित्वात् असंस्कृतबुद्धित्वात् योऽपि देहादिव्यतिरिक्तात्मवादी आत्मानमेव केवलं कर्तारं पश्यति? असावपि अकृतबुद्धिः अतः अकृतबुद्धित्वात् न सः पश्यति आत्मनः तत्त्वं कर्मणो वा इत्यर्थः। अतः दुर्मतिः? कुत्सिता विपरीता दुष्टा अजस्रं जननमरणप्रतिपत्तिहेतुभूता मतिः अस्य इति दुर्मतिः। सः पश्यन्नपि न पश्यति? यथा तैमिरिकः अनेकं चन्द्रम्? यथा वा अभ्रेषु धावत्सु चन्द्रं धावन्तम्? यथा वा वाहने उपविष्टः अन्येषु धावत्सु आत्मानं धावन्तम्।।कः पुनः सुमतिः यः सम्यक् पश्यतीति? उच्यते --,

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【 Verse 18.17 】

▸ Sanskrit Sloka: यस्य नाहङ् कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते | हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ||

▸ Transliteration: yasya nāhaṅkṛto bhāvo buddhir yasya na lipyate | hatvā ‘pi sa imāl lokān na hanti na nibadhyate ||

▸ Glossary: yasya: of one who; nā: never; ahaṁkṛtaḥ: ego; bhāvaḥ: nature; buddhiḥ: intel- ligence; yasya: one who; na: never; lipyate: is attached; hatvā ‘pi: even killing; saḥ: he; imān: this; lokān: world; na: never; hanti: kills; na: never; nibadhyate: becomes entangled

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.17 One who is egoless, whose intelligence is not of at- tachment, though he may kill, is not the slayer and is never bound by his actions.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.17।।जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती? वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.17।। जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती? वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.17 यस्य whose? न not? अहंकृतः egoistic? भावः the

Chapter 18 (Part 11)

notion? बुद्धिः intelligence? यस्य of whom? न not? लिप्यते is tainted? हत्वा having slain? अपि even? सः he? इमान् these? लोकान् people? न not? हन्ति slays? न not? निबध्यते is bound.Commentary I will explain to thee? O Arjuna? the characterisitics of the man who has transcended activity? and who has gone beyond the bonds of Karma.When selfishnes and egoism are destroyed? when desire and personal gain are renounced? actions cannot bind a man. He knows that the Self is not destroyed when the body perishes. He has no idea of agency. The act of killing itself? in his case? becomes one necessary for the peace and harmony of the world. His killing without desire is like the killing of a murderer by the executioner and the judge on behalf of the community for the preservation of peace and harmony in the world.He who has a trained intellect? pure understanding and developed reason? who has a knowledge of the scriptures? who has devoted himself to the study of the scriptures? who is eipped with the knowledge of logic? who is well trained by the instructions of his preceptor? is absolutely free from the egoistic notion that I am the agent or the doer. He knows perfectly well that Nature or Guna or ones own nature does everything. He thus thinks I am the silent witness of all activities. I am not the doer. These five (the body? the actor? etc.) which are superimposed on the pure? actionless Self through ignorance are the causes of all actions. I do not do anything. The senses move amongst the senseobjects. The alities (Gunas) move in their counterparts in the senses which are also the products of the Gunas. I know the essence of the divisions of the alities and their functions. I am in essence without limbs. How can action or work be ascribed to me I am without hands? without legs? without feet? without breath and without mind. I am ever pure? spotless and immovable and immutable. He will never repent thus I have done a wrong action. I ought to have done like this. I have done an evil action. I will go to hell. He is always wise. He can,never do a wrong action. His will has become one with the cosmic will. His will has become blended with the will of the Lord. Whatever he does is done by the Lord only. He has no will of his own. He sees rightly. Though he kills? he does not commit the act of killing. He is not bound by the fruit of a vicious action as an effect of that act. He is beyond good and evil? beyond the pairs of opposites? as he has knowledge of the Self.An objector says The statement that though he kills these people? he does not kill? is selfcontradictory.We say This objection is really not tenable. From the worldly point of view the Lord says though he kills? because man identifies the Self with the body? etc.? and thinks I am the killer. From the transcendental point of view explained above? the Lord says? He kills not? he is not bound.Another objector says The Self acts in conjunction with the body? etc.? -- He who looks upon his Self Which is isolated? as the agent৷৷. (XVIII.16)We say This objection also cannot stand. As the omnipresent ether is not affected by reason of its subtlety? even so the Self? seated everywhere in the body? is not affected. This immortal? immutable? changeless? formless? attributeless Self? though seated in the body? does not act and is not affected? just as the crystal is not affected by the red colour of the flower that comes into contact with it? just as the sun is not affected by the diseases of the eye. A thing that changes only can join with others and become the agent. The Self is always isolated? independent and free. This Self is immutable (II.25). The alities move amidst the alities (III.28). Though seated in the body? He does not act (XIII.31). Actions are wrought by the alities (III.27). You will find in the Brihadaranyaka were. By reasoning also we may establish the same conclusion thusThe Self is indivisible? allpervading? infinite? limbless? without parts? independent? ever free and immutable. Therefore the actions of the body can never be ascribed to the agency of the Self.Verily the actions of one cannot go to another who has not done them. Just as blue colour cannot belong to the sky? silver to the motherofpearl? water to mirage? so also what is ascribed to the Self by ignorance cannot really belong to It. The changes that occur in the body pertain to the body but not to the pure actionless Self which is always the spectator or the silent witness. Therefore? it is right to say that the wise man who is free from egoism and all impurities of the mind? neither kills nor is he bound though he kills.In chapter II.19? the Lord stated the proposition -- He slayeth not? nor is he slain. In chapter II.20? He said The Self is unborn? eternal? ancient the Self is not slain when the body is killed. The Lord has touched here and there that the Self is not affected by works? that there is no necessity for the wise man of doing actions. He concludes that the sage kills not? nor is he bound? and sums up the teaching of the Gita. The teaching of the Gita has been concluded in this verse. The Sannyasins who are free from egoism are not affected by Karma. The threefold fruits of action? viz.? evil? good and mixed (see verse 12 above) do not accrue to them. Those worldlyminded persons who work with egoism and expectation of fruits are tainted by the works. They are forced to experience the fruits of their actions and to take birth again and again. (Cf.II.19V.7)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.17. He, whose mental disposition is not dominated by the sense 'I', and whose intellect is not stained - he, even if he slays these worlds, does not [really] slay any and he is not fettered.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.17 He who has no pride, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.17 He who is free from the notion 'I am the doer,' and whose understanding is not tainted - slays not, though he slays all these men, nor is he bound.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.17 He who has not the feeling of egoism, whose intellect is not tainted, he does not kill, nor does he become bound-even by killing these creatures!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.17 He who is free from the egoistic notion, whose intelligence is not tainted (by good or evil), though he slays these people, he slayeth not, nor is he bound (by the action).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.13-17 Panca etc. upto na nibadhyate Conclusion : the established end, because here a decision is arrived at. Basis : the material object Destiny : the good and bad result [of actions] previously accumulated. These five viz., the basis etc., constitute the entire assembly of factors and hence they are the causes for each action.

But other [commentators give an etymology of] adhisthana 'basis' to mean 'That by which all actions are governed'; and on that ground they believe that it denotes that action which exists in the intellect; which comes ot be due to the Rajas, and is being prone to transform itself into the pentad of (the mental dispositions viz.) the content, the faith, the happiness, the desire to know and the aversion to know; which is referable by the term karma-yoga (that which yokes man into activity); and which is described at times by the term prayatna 'effort'.

Agent : the ascertainer characterised by the intellect. Instrument : [the personal instruments viz.] the mind, the eye etc., and also the external ones like sword etc. Activity : the activity of upper life-breath, nether life-breath etc. The effects of the righteous and unrighteous acts are indicated by the term Destiny. All the dispositions located in the intellect are indicated by these two. Still other commentators, however, take Basis to be the Absolute Lord.

Due to his imperfect intellect : because of his having indecisive knowledge. But he, who performs actions with the stability due to disappearance of th I-sense (limited) and [a stability] refined by hundreds of reasoning, as detailed earlier - he does not get the fetter, because he is a man of perfect intellect. This is what is intended [in the passage under study].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.17 He who, through the contemplation of the agency of the Supreme Being, is free from the self-conceit, 'I alone do everything'; he whose understanding is not therefore tainted, and has come to be informed by the understanding; 'As I am not the agent of this work, its fruit is not connected with me; so this work does not belong to me' - such a person, though he slays all these men, not merely Bhisma, etc., does not slay them. Therefore, he is not bound by the actions known as battle. The meaning is that the fruits of such actions do not accrue to him.

Sri Krsna now teaches how action is induced. For this he differentiates actions generated by Sattva and the other Gunas. The object is to inculcate the desirability of the Sattvika type. For, only meditation on the self not being the agent, brings about the growth of Sattva.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.17 Yasya, he who, the person whose intellect is refined by the instructions of the scriptures and the teachers, and reason; who has na, not; ahankrtah bhavah, the feeling of egoism, in whom does not occur the notion in the form, 'I am the agent'; i.e., he who sees thus: 'These five, viz locus etc. (14), imagined in the Self through ignorance, are verily the agents of all actions; not I. But I am the absolute, unchanging witness of their functions, 'Without vita force, without mind, pure, superior to the (other) superior immutable (Maya)" (Mu. 2.1.1)'; yasya, whose; buddhih, intellect, the internal organ, which is the limiting adunct of the Self; is na, not; lipyate, tainted, does not become regretful thinking, 'I have done this; as a result, I shall enter into hell'; whose intellect does not become thus tainted, he has a good intellect and he perceives (rightly). Api, even; hatva, by killing; iman, these; lokan, creatures, i.e. all living beings; sah he; does not hanti, kill-he does not perform the act of killing; nor does he nibadhyate, become bound, nor even does he become connected with its result, the fruit of an unrighteous action. Objection: Even if this be a eulogy, is it not contradictory to say, 'even by killing he does not kill'? Reply: This defect does not arise; for this becomes logical from the ordinary and the enlightened points of view. By adopting the empirical point of view (which consists in thinking), 'I am the slayer', by identifying the body with the Self, the Lord says, 'even by killing'; and, by taking His stand on the supreme Truth as explained above (the Lord says), 'he does not kill, nor does he become bound'. Thus both these surely become reasonable. Objection; Is it not that the Self certainly does act in combination with the locus etc., which conclusion follows from the use of the word kevala (absolute) in the text, 'the absolute Self as the agent' (16)? Reply: There is not such fault, because, the Self being changeless by nature, there is no possiblity of Its becoming united with the locus etc. For it is only a changeful entity that can possibly be united with another, or come to have agentship through combination. But, for the changeless Self there can be no combination with anything whatsoever. Hence, agentship through combination is not logical. Therefore, the absoluteness of the Self being natural, the word kevalam is merely a reiteration of an established fact. And the changelessness of the Self is well known from the Upanisads, the Smrtis and logic. As to that, in the Gita itself this has been established more than once in such texts as, 'It is said that৷৷.This is unchangeable' (2.25), 'Actions are being done by the gunas themselves' (see 3.27), 'this ৷৷.supreme Self does not act৷৷.although existing in the body' (13.31), and in the Upanisads also in such texts as, 'It thinks, as it were, and shakes, as it were' (Br. 4.3.7). And from the standpoint of reason also, the royal path is to hold that the true nature of the Self is that It is partless, independent of others and changeless. Even if mutability (of the Self) be accepted, It should have a change that is Its own. The functions of the locus etc. cannot be attributed to the agency of the Self. Indeed, an action done by someone else cannot be imputed to another by whom it has not been done! As for what is imputed (on somody) through ignorance, that is not his. As the ality of silver is not of nacre, or as surface or dirt attributed through ignorance to the sky by foolish people is not of the sky, similarly, the changes in the locus etc. also are verily their own, and not of the Self. Hence it has been well said that the enlightened person 'does not kill, nor is he bound', becuase of the absence of his being tainted by the idea that actions are done by himself. [Some translate this portion thus: '৷৷.because of the absence of the thought 'I am doing', and also due to the taintlessness of the mind'; or, '৷৷.in the absence of egotism and of all taint in the mind'.-Tr.] After having declared, 'This One does not kill, nor is It killed' (2.19); having stated the immutability of the Self through such texts as, 'Never is this One born' (2.20) , etc., which adduce the reason for this; having briefly stated at the commencement of the Scripture-in, 'he who knows this One as indestructible' (2.21)-that the enlightened man has no eligibility for rites and duties; and having deliberated in various places on that (cessation) which has been mooted in the middle (of the Scripture), the Lord, by way of summarizing the purport of the Scripture, concludes here by saying that the enlightened person 'does not kill, nor does he become bound.' If this be so, then it becomes established that the three kinds of results of actions, viz the undesirable etc., do not accrue to the monks, since it is reasonable that, because of the illogicality of their entertaining the idea of being embodied, all actions resulting from ignorance become abandoned (by them). And hence, as a conseence of a reversal of this, it becomes inevitable that the results do accrue to others. Thus, this is how the purport of the scripture Gita has been summed up. In order that this which is the essence of the teachings of all the Vedas should be. understood after deliberation by the learned ones possessing a sharp intellect, it has been explained by us in accordance with the scriptures and reasoning, in various places by dealing with it topically. Thereafter, now is being stated what promts actions:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.17।। कर्म का नियम यह है कि जो कर्म का कर्ता होता है वही फल का भोक्ता भी होता है। हम यह देख चुके हैं कि केवल जड़ उपाधियाँ कर्म नहीं कर सकतीं और न केवल चैतन्य स्वरूप आत्मा ही कर्ता हो सकता है। दोनों के परस्पर सम्बन्ध से कर्ताभिमानी जीव केवल अविद्या से ही उत्पन्न हो सकता है क्योंकि परस्पर विरोधी धर्मी जड़ उपाधि और चेतन आत्मा के मध्य कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं हो सकता। अत स्पष्ट है कि आत्मा को न जानकर अनात्मा के सम्बन्ध से जीव भाव को प्राप्त होकर मनुष्य शुभाशुभ कर्मों का कर्ता बनता है और उसकी बुद्धि पाप पुण्यरूपी फलों से लिप्त भी होती है। अज्ञान दशा में यही बन्धन अपरिहार्य है।इस श्लोक में सम्यक् ज्ञान प्राप्त पुरुष का वर्णन किया गया है। आत्मज्ञानी पुरुष का अहंकार अर्थात् जीवभाव ही समाप्त हो जाता है। तब उसकी बुद्धि कौन से विषयों में आसक्त होगी अथवा गुण दोषों से दूषित होगी यह सर्वथा असम्भ्व है। इसी तथ्य को यहाँ इस प्रकार बताते हैं कि वह पुरुष इन लोकों को मारकर भी? (वास्तव में)? न मारता है न बँधता है।उपर्युक्त कथन में कोई विरोध नहीं हैं? क्योंकि मारने की क्रिया शरीरादि लौकिक दृष्टि से कही गई है और मारता नहीं है यह आत्मदृष्टि से कहा गया है। जब भगवान् श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष हत्या करके भी वास्तव में हत्या नहीं करता है? तब इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि सभी ज्ञानी पुरुष हत्या जैसे हीन कर्मों में प्रवृत्त होते हैं इस वाक्य का अभिप्राय केवल इतना ही है कि कर्तृत्वाभिमान के अभाव में मनुष्य को किसी भी कर्म का बन्धन नहीं हो सकता। लोक में भी हम देखते हैं कि एक हत्यारे व्यक्ति को मृत्युदण्ड दिया जाता है? और रणभूमि पर शत्रु की हत्या करने वाले वीर सैनिक को महावीर चक्र प्रदान किया जाता है हत्या का कर्म दोनों में समान होते हुए भी अहंकार और स्वार्थ के भाव और अभाव के कारण दोनों के फलों में अन्तर होता है। जिसका अहंकार पूर्णतया नष्ट हो जाता है? ऐसे ज्ञानी पुरुष को किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं होता है।अब इसके पश्चात् गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण? कर्म के प्रवर्तक या प्रेरक तत्त्वों का और कर्म संग्रह का वर्णन करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.17।।कः पुनः सुमतिः यः सम्यक्पश्यतीत्यपेक्षायामाह -- यस्येति। यस्य शास्त्राचार्योपदेशन्यासंस्कृतबुद्धित्वादहंकृतोऽहंकर्तेत्येवंलक्षणो भावो भावनाप्रत्ययः एते एव पञ्चाधिष्ठानदयोऽविद्ययात्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारो नाहमहं तु तद्य्वापराणां साक्षिभूतोअप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः?केवलोऽविक्रियश्चे त्येवं पश्यतोऽहंकृतो भावो नास्तीत्यर्थः। बुद्धिर्यस्य न लिप्यते बुद्धिरन्तःकरणं यस्यात्मन उफाधिभूता न लिप्यतेऽहमकार्ष तेनाहं नरकं गमिष्टामिति क्लेशशालिनी न भवतीत्यर्थः। स सुमतिः कृतबुद्धिः सम्यक् द्रष्टा इमान्प्रत्यक्षादिनानुभूयमानान् लोकान्प्राणिनो हत्वापि न हन्ति हननक्रियां न करोति कर्तृत्वाभिमानरहितत्वात्। न निंबध्यते नापि तत्कार्येण हननक्रियाफलेन संबध्यते निर्लिप्तबुद्धित्वात्। भावः सद्भावः अहंकृतोऽहमिति व्यपदेशार्हो न? अहंकारबाधेन शुद्धस्वरुपमात्रपरिशेषादिति वाहंकृतोऽहंकारस्य भावस्तत्तादात्म्यं यस्य न विवेकेन बाधितत्वादितिवेति केचित्। यस्य नाहंकृत इति समानाधिकरणे षष्ठ्यौ। ततश्च यस्य लिङ्गलक्षणस्योपाधेरहंकारात्मिकां वृत्तिमनुत्पादयतोऽहमध्यसशून्यस्वभावः सत्ता। यद्वाहमहंकृतिं करोतीत्यहंकृदन्तःकरणं यस्य संबन्धिनोऽहंकृतोऽन्तःकरणस्य न भावः न स्थितिः। अहंकृतिशून्यं यस्यान्तःकरणमित्यर्थः। तथाहमा कृतोऽहमध्यासमूलक इतियावत्। एवंविधो भावः पदार्थो ममेत्यध्यासरुपो यस्य लिङ्गात्मनो नास्तीत्युभयविधाध्यासशून्यत्वमुक्तं भवति। यस्य प्रमातुर्भावः प्रत्ययमात्रस्वरुप आत्मा नाहंकृतः अहमिव कृतोऽहंकारतादात्म्यप्रापितोऽहंकृतस्तथा न यस्य बुद्धिर्लिप्यते आत्मभावेन रञ्जिता न भवति यस्य बुद्धेर्व्यतिरिक्तमात्मानं पश्यतो बुद्धिधर्माः कर्तृत्वादयो नात्मनि प्रतीयन्ते इति कर्त्रात्मवादितार्किकनिरासः। यस्यच आत्मधर्माश्यैतन्यादयो बुद्धौ न संसृज्यन्ते इति बुद्धमेव चेतनां वदतो बौद्धस्य निरासः। चिदचितोरन्योन्यस्मिन्नन्योन्यधर्माध्यासो यस्य नास्तीत्यर्थ इत्यन्ते। यस्य बुद्धिः शास्त्राचार्यसमाहिता तैलधारेवाविच्छिन्ना न लिप्यते विजातीयप्रत्ययलेपं न प्राप्नोति स पश्यतीति स विद्वानिति पूर्वश्लोकस्य पश्यतिपदानुषङ्गेण योज्यम्। कथंपुनरयमेवंविध इति ज्ञेयमित्याशङ्क्य चेष्टालिङ्गकमनुमानमाह -- हत्वापीति। हन्धातुनात्र तदुपाया लक्ष्यन्ते अवस्थितानिति चाध्याह्नियन्ते। ततश्च हिंसोपायभूतान्पाषाणप्रहरणादीनुपायान्कृत्वावस्थितनिमाँल्लोकान्स्वयं न हन्ति अहंममाभिमानशून्यत्वादित्यर्थः। अतश्च न निबध्यते नास्य बन्धो जीवन्मुक्तत्वादिरितीतरे। हत्वापि न हन्ति न निबध्यत इतिवाक्यशेषे हेतुत्वेन प्रतीयमानस्य यस्येत्यादेः? एतत्फलभूतेन प्रतीयमानस्य हत्वापीत्यादे श्च पूर्वपरानुगुण्येन व्याख्यानं कृतवतां सर्वज्ञानां मार्गप्रदर्शकानां भाष्यकृतामुदाहृतयत्किंत्कल्पनाकरणेन न्यूनता नापादनीया। ननु यद्यपि स्तुरिरियं तथापि हत्वापि न हन्तीति विप्रतिषिद्धमुच्यामानं कथमुपद्यत इतिचेत् देहाद्यात्मबुद्य्धा हन्ताहमिति हि लोकैर्द़्दश्यते। नाहं कर्ता किंतु तद्य्वापारसाक्षी क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयविनिर्मुक्तः शुद्धःसन् कार्यकारणासंबद्धोऽद्वितीयोऽविक्रिय इत्येवं हि विद्वान्पश्यति लौकिकीं पारमार्थिकीं च दृष्टिमाश्रित्य तदुभयमुपपद्यत एवेति गृहाण। तथाच यः केवलमात्मानं अकर्तारं कर्तारं पश्यति स दुर्मतिः। यस्तु यथाभूतं आत्मानमकर्तारं पश्यति स सुमतिरिति द्वयोः संपिण्डितार्थः। ननुआत्मानं केवलं तु यः इति केवलपदप्रयोगादधिष्ठानादिविशिष्टः करोत्येव आत्मा। एवंविशिष्टस्य कर्तत्वे सति केवलमात्मानं यः कर्तारं पश्यति स दर्मतिरितिचेन्न। श्रुतिदधिष्ठानादिविशिष्टः करोत्येव आत्मा। एवंविशिष्टस्य कर्तृत्वे सति केवलमात्मानं यः कर्तारं पश्यति स दुर्मतिरितिचेन्न। श्रुतिस्मृत्यादिभिरात्मनोऽविक्रियस्वभावत्वप्रतिपादनात्। तथाच श्रुतिःअसङ्गो ह्ययं पुरुषःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्चअप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परःअज आत्मा महान्ध्रुवःनिष्फलं निष्क्रियंध्यायतीव लेलायतीव इत्येवमाद्या। स्मृतयश्चकथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कंअविकार्योऽयमुच्यतेप्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यतेशरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इत्येवमाद्याः। न्यायाश्च न तावदात्मास्वतो विक्रियते निरवयवत्वादाकाशवत्। नापि परतोऽसङ्गस्याविकार्यस्य स्वतन्त्रस्य परतो विक्रियावत्त्वायोगात्। किंचात्मनो विक्रियावत्त्वाभ्युपगमे तस्य स्वनिष्ठाविक्रिया अधिष्ठानादिनिष्ठा वा। नाद्यः। श्रुत्यादिभिरात्मनोऽविक्रियत्वप्रतिपादनात्। न द्वितीयः। अन्यनिष्ठाविक्रियाऽन्यस्मिन्निति विप्रतिषिद्धत्वात्। अविद्यया गमितमपि नान्यनिष्ठत्वमन्यस्य यथा रजतत्वं न शुक्तिकायां यथा तलमलिनत्वं बाहैर्गमितमविद्यया नाकाशस्य तथाधिष्ठानादिविक्रियापि तेषामेव नात्मनस्तस्मादविक्रियस्यात्मनः केनचित्संहननं संहत्य वा कर्तत्वं संभवतीति केवलत्वामात्मनः स्वाभाविकं केवलशब्दोऽनुवदति। नायं हन्ति न हन्यत इति प्रतिज्ञाय न जायत इत्यादिना हेतुवचनेनाविक्रियत्वमुक्त्वा वेदाविनाशिनमिति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ संक्षेपत उक्त्वा तत्रतत्र प्रसङ्गं कृत्वा प्रसारितं न हन्ति न निबध्यत इत्युपसंहरति।,एवंसति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्त्वाविद्याकृताशेषकर्मसंन्यासेपपत्तेः परमार्थसंन्यासिनामनिष्टादित्रिविधं कर्मणः फलं न भवतीत्युपपन्नं तद्विपर्ययश्चेतरेषां भवतीत्येतच्चापरिहार्यमित्येष गीताशास्त्रस्यार्थ उपसंहृतः। स एष वेदार्थसारो निपुणमतिभिः पण्डितैर्विचार्ये प्रतिपत्तव्य इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.17।।तदेवं चतुर्भिः श्लोकैःअनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य इति चरणत्रयं व्याख्यातम्। इदानींनतु संन्यासिनां क्वचित् इति तुरीयं चरणमेकेन व्याचष्टे -- यस्येति। यस्य पूर्वोक्तविपरीतस्य पुण्यैः कर्मभिः क्षपितेषु विवेकविरोधिपापेषु नित्यानित्यवस्तुविवेकादिसाधनचतुष्टयं प्राप्तवतः शास्त्राचार्योपदेशन्यायजनिताकर्त्रभोक्तृस्वप्रकाशपरमानन्दाद्वितीयब्रह्मात्मसाक्षात्कारस्याज्ञाने सकार्ये बाधिते न भवत्यहं कर्तेत्येवंरूपो भावः प्रत्ययो यस्य भावः सद्भावोऽहंकृतोऽहमिति व्यपदेशार्हो नाहंकारबाधेन शुद्धस्वरूपमात्रपरिशेषादिति वाहंकृतोऽहंकारस्य भावस्तत्तादात्म्यं यस्य न विवेकेन बाधितत्वादिति वा बाधितानुवृत्तावप्येत एव पञ्चाधिष्ठानादयो मायया मयि सर्वात्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारो मया स्वप्रकाशचैतन्येनासङ्गेन कल्पितसंबन्धेन प्रकाश्यमानाः। अहं तु न कर्ता किंतु कर्तृतद्व्यापाराणां साक्षिभूतः क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयनिर्मुक्तः शुद्धः सर्वकार्यकारणासंबद्धः कूटस्थनित्यो निर्द्वयः सर्वविकारशून्यःअसङ्गो ह्ययं पुरुषःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्चअप्राणो ह्यमनाः शुद्धोऽक्षरात्परतः परःअज आत्मा महान्ध्रुवःसलिल एको द्रष्टाऽद्वैतःअजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् इत्यादिश्रुतिभ्यः।अविकार्योयमुच्यतेप्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जतेशरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। तस्मान्नाहं कर्तेत्येवं परमार्थदृष्टेर्बुद्धिरन्तःकरणं यस्य न लिप्यते नानुशयिनी भवति। इदमहमकार्षमेतत्फलं भोक्ष्य इत्यनुसन्धानं कर्तृत्ववासनानिमित्तं लेपोऽनुशयः। स च पुण्ये कर्मणि हर्षरूपः पापे पश्चात्तापरूपः। ईदृशेन द्विविधेनापि लेपेन बुद्धिर्न युज्यते कर्तृत्वाभिमानबाधात्। तथाच ज्ञानिनं प्रकृत्य श्रुतिःएतमुहैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः। तदेतदृचाभ्युक्तम्। एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्। तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन इति। पापकेनेति पुण्यस्याप्युपलक्षणम्। वर्धते कनीयानिति च पुण्यपापयोः परितोषपरितापाभिप्रायम्। एवं यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते स पूर्वोक्तदुर्मतिविलक्षणः सुमतिः परमार्थदर्शी पश्यत्यकर्तारमात्मानं केवलं सकर्तृकत्वाभिमानाभावादनिष्टादित्रिविधकर्मफलभागी न भवतीत्येतावति शास्त्रार्थेऽहंकाराभावबुद्धिलेपाभावौ स्तोतुमाह -- हत्वेति। हत्वा हिंसित्वापि न इमाँल्लोकान्सर्वान्प्राणिनो न हन्ति हननक्रियायाः कर्ता न भवत्यकर्तृस्वरूपसाक्षात्कारान्न निबध्यते। नापि तत्कार्येणाधर्मफलेन संबध्यते। अत्र नाहंकृतो भाव इत्यस्य फलं न हन्तीति? बुद्धिर्न लिप्यत इत्यस्य फलं न निबध्यत इति अनेन च कर्मालेपप्रदर्शनेऽतिशयमात्रमुक्तं नतु सर्वप्राणिहननं संभवति हत्वापीति कर्तृत्वाभ्यनुज्ञाबाधितकर्तृत्वदृष्ट्या लौकिक्या? न हन्तीति कर्तृत्वनिषेधः शास्त्रीयया परमार्थदृष्ट्येति न विरोधः। शास्त्रादौ नायं हन्ति न हन्यत इति सर्वकर्मासंस्पर्शित्वमात्मनः प्रतिज्ञाय न जायत इत्यादिहेतुवचनेन साधयित्वा वेदाविनाशिनमित्यादिना विदुषः सर्वकर्माधिकारनिवृत्तिः संक्षेपेणोक्ता मध्ये च तेन तेन प्रसङ्गेन प्रसारितेह शास्त्रार्थे तावत्त्वप्रदर्शनायोपसंहृता न हन्ति न निबध्यत इति। एवं चाविद्याकल्पितानामधिष्ठानाद्यनात्मकृतानां सर्वेषामपि कर्मणामात्मविद्यया समुच्छेदोपपत्तेः परमार्थसंन्यासिनामनिष्टादि त्रिविधं कर्मफलं न भवतीत्युपपन्नम्। परमार्थसंन्यासश्चाकर्त्रात्मसाक्षात्कार एव। जनकादीनामेतादृशसंन्यासित्वेऽपि बलवत्प्रारब्धकर्मवशाद्बाधितानुवृत्त्या परपरिकल्पनया वा कर्मदर्शनं न विरुद्धं परमहंसानामीदृशानां भिक्षाटनादिवत्। अतएव ज्ञानफलभूतो विद्वत्संन्यास उच्यते। साधनभूतस्तु विविदिषासंन्यासोऽनेवंविधोऽपि प्रथममुत्तरकाले ज्ञानोत्पत्तावेवंविधो भवतीति वक्ष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.17।।द्वितीयं प्रयोजनमाह -- यस्येति। यस्य प्रमातुर्भावः प्रत्ययमात्रस्वरूप आत्मा नाहंकृतः अहमिव कृतः अहंकारतादात्म्यं प्रापितोऽहंकृतस्तथा न। यस्य बुद्धिर्न लिप्यते आत्मभावेन रञ्जिता न भवति। यस्य बुद्धेर्व्यतिरिक्तमात्मानं पश्यतो बुद्धिधर्माः कर्तृत्वादयो नात्मनि प्रतीयन्त इति कर्त्रात्मवादितार्किकनिरासः। यस्य च आत्मधर्माश्चैतन्यादयो बुद्धौ न संसृज्यन्त इति बुद्धिमेव चेतनां वदतो बौद्धस्य निरासः। चिदचितोरन्योन्यस्मिन्नन्योन्यधर्माध्यासो बाध्यत इति दुःखादिसंसर्गनिषेधेन भोक्तृत्वाभावो दर्शितः।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते इति तु स्तुतिमात्रम्। कर्तृत्वस्यैव बाधेन हन्तृत्वायोगात्? दग्धपटवत्कर्तृत्वानुवृत्तावपि हननक्रियायां प्रवर्तकस्य रागद्वेषादेरभावाच्च। एतेनात्मनस्तात्त्विकमकर्तृत्वं भावयता कृतं कर्मातात्त्विककर्तृत्वाभिमाननिमित्तं स्वफलं प्रस्तोतुं नार्हतीति दर्शितम्। नहि रज्जुसर्पे रज्जुबुद्धिं कृत्वा प्रहरतः सर्पक्षोभजं दंशनादिफलं भवति। सर्पे तु तथा कुर्वतस्तद्भवत्येव तद्वदिदमपि ज्ञेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.17।।अथ गुरूपदेशकृतबुद्धेर्मदाज्ञयाऽवश्यकर्त्तव्यत्वेन मदिच्छया जायमानत्वेन चाहङ्काररहितस्य कर्मफलाभावं कैमुतिकन्यायेन प्रदर्शयन्नाह -- यस्येति। अहङ्कृतःअहं कर्ता इत्येतादृशो मिथ्याभिनिवेशरूपो भावो यस्य नास्ति। किञ्च यस्य बुद्धिर्मदिच्छया ज्ञातसुखदुःखफलेषु कृतकर्मजज्ञाने न लिप्यते न सज्जते? स इमाँल्लोकानासुरान् मदिच्छया हत्वाऽपि लोकैर्हन्तृत्वेन परिदृश्यमानोऽपि न हन्ति? किन्तु मदिच्छयैव हन्ति अतएव तेन कर्मणा न निबध्यते? बन्धनं न प्राप्नोतीत्यर्थः। यत्र विपरीतकर्मबन्धनाभावस्तत्र विहितकर्मणा मत्सेवादिप्रतिबन्धकफलाप्रतिबन्धे किं वाच्यम् इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.17।।कस्तर्हि सुमतिः यस्य कर्मलेपो नास्तीत्युक्तमित्यपेक्षायामाह -- यस्येति। अहमिति कुतोऽहं कर्तेत्येवंभूतो भावोऽभिप्रायो यस्य नास्ति। यद्वा अहंकृतोऽहंकारस्य भावः कर्तृत्वाभिनिवेशो यस्य नास्ति। शरीरादीनामेव कर्मकर्तृत्वालोचनादित्यर्थः। अतएव यस्य बुद्धिर्न लिप्यते इष्टानिष्टबुद्ध्या कर्मसु न सज्जते स एवंभूतो देहादिव्यतिरिक्तात्मदर्शी इमाँल्लोकान्सर्वानपि प्राणिनो लोकदृष्ट्या हत्वापि विविक्ततया स्वदृष्ट्या न हन्ति। नच तत्फलैर्निबध्यते बन्धनं न प्राप्नोति। किं पुनः सत्त्वशुद्धिद्वारा परोक्षज्ञानोत्पत्तिहेतुभिः कर्मभिस्तस्य बन्धशङ्केत्यर्थः। तदुक्तम्ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.17।।यस्येति। अधिष्ठानादौ परमात्मनि मुख्यकर्तृकत्वानुसन्धानतोऽहङ्कृतो भावः स्वस्मिन् कर्तृत्वाभिमानकृतो मानसो विकारो न भवति? बुद्धिश्च न लिप्यते फलादौ? स हत्वाऽपीमाँल्लोकान् न हन्ति न केवलं भीष्मादीनित्यर्थः। ततस्तेन कर्मणा न निबद्ध्यते तत्फलं नानुभवतीत्यर्थः। तदुक्तं -- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि [5।10] इति। अत्र कर्तृत्वादिकं साक्षात्कर्तरि परदेवतायां निर्दोषपूर्णविग्रहे ब्रह्मण्यनुसन्धायेति ज्ञेयम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.17।।तो फिर जो वास्तवमें देखता है ( ऐसा ) सुबुद्धि कौन है इसपर कहते हैं --, शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे तथा न्यायसे जिसका अन्तःकरण भली प्रकार शुद्धसंस्कृत हो गया है? ऐसे जिस पुरुषके अन्तःकरणमें मैं कर्ता हूँ इस प्रकारकी भावनाप्रतीति नहीं होती? जो ऐसा समझता है कि,अविद्यासे आत्मामें अध्यारोपित? ये अधिष्ठानादि पाँच हेतु ही समस्त कर्मोंके कर्ता हैं? मैं नहीं हूँ? मैं तो केवल उनके व्यापारोंका साक्षीमात्र प्राणोंसे रहित? मनसे रहित? शुद्ध श्रेष्ठ? अक्षरसे भी पर केवल और अक्रिय आत्मस्वरूप हूँ। तथा जिसकी बुद्धि यानी आत्माका उपाधिस्वरूप अन्तःकरण? लिप्त नहीं होता -- अनुताप नहीं करता? यानी,मैंने अमुक कार्य किया है उससे मुझे नरकमें जाना पड़ेगा इस प्रकार जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती वह सुबुद्धि है वही वास्तवमें देखता है। ऐसा ज्ञानी इन समस्त लोकोंको अर्थात् सब प्राणियोंको मारकर भी ( वास्तवमें ) नहीं मारता अर्थात् हननक्रिया नहीं करता और उसके परिणामसे अर्थात् पापके फलसे भी नहीं बँधता। पू0 -- यद्यपि यह ( ज्ञानकी ) स्तुति है? तो भी यह कहना सर्वथा विपरीत है कि मारकर भी नहीं मारता,। उ0 -- यह दोष नहीं है? क्योंकि लौकिक और पारमार्थिक इन दो दृष्टियोंकी अपेक्षासे ऐसा कहना बन सकता है। शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करके मैं मारनेवाला हूँ ऐसा माननेवाले लौकिक मनुष्योंकी दृष्टिका आश्रय लेकर मारकर भी यह कहा है और पूर्वोक्त पारमार्थिक दृष्टिका आश्रय लेकर न मारता है और न बँधता है यह कहा है। इस प्रकार ये दोनों कथन बन सकते हैं। पू0 -- कर्तारमात्मानं केवलं तु इस कथनमें केवलशब्दका प्रयोग होनेसे यह पाया जाता है कि आत्मा,( अकेला कर्म नहीं करता? पर ) अधिष्ठान आदि अन्य हेतुओंके साथ सम्मिलित होकर निःसंदेह कर्म करता है। उ0 -- यह दोष नहीं है? क्योंकि अविक्रियस्वभाववाला होनेके कारण? आत्माका अधिष्ठानादिसे संयुक्त होना नहीं बन सकता। विकारवान् वस्तुका ही अन्य पदार्थोंके साथ संघात हो सकता है और विकारी पदार्थ ही संहत होकर कर्ता बन सकता है। निर्विकार आत्माका? न तो किसीके साथ संयोग हो सकता है और न संयुक्त होकर उसका कर्तृत्व ही बन सकता है। इसलिये ( यह समझना चाहिये कि ) आत्माका केवलत्व स्वाभाविक है? अतः यहाँ केवल शब्दका अनुवादमात्र किया गया है। आत्माका अविक्रियत्व श्रुतिस्मृति और न्यायसे प्रसिद्ध है। गीतामें भी यह विकाररहित कहलाता है,सब कर्म गुणोंसे ही किये जाते हैं आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी नहीं करता इत्यादि वाक्योंद्वारा अनेक बार प्रतिपादित है और मानो ध्यान करता है? मानो चेष्टा करता है इस प्रकारकी श्रुतियोंमें भी प्रतिपादित है। तथा न्यायसे भी यही सिद्ध होता है? क्योंकि आत्मतत्त्व अवयवरहित? स्वतन्त्र और विकाररहित है। ऐसा मानना ही राजमार्ग है। यदि आत्माको विकारवान् मानें तो भी इसका स्वकीय विकार ही अपना हो सकता है। अधिष्ठानादिके किये हुए कर्म आत्मकर्तृक नहीं हो सकते क्योंकि अन्यके कर्मोंको बिना किये ही अन्यके पल्ले बाँध देना उचित नहीं है। जो अविद्यासे आरोपित किये जाते हैं? वे वास्तवमें उसके नहीं होते। जैसे सीपमें आरोपित चाँदीपन सीपका नहीं होता एवं जैसे मूर्खोंद्वारा आकाशमें आरोपित की हुई तलमलीनता आकाशकी नहीं हो सकती? वैसे ही अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंके विकार भी उनके ही हैं? आत्माके नहीं। सुतरां यह ठीक ही कहा है कि मैं कर्ता हूँ ऐसी भावनाका और बुद्धिके लेपका अभाव होनेके कारण? पूर्ण ज्ञानी न मारता है और न बँधता है। दूसरे अध्यायमें यह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है इस प्रकार प्रतिज्ञा करके? न जायते इत्यादि हेतुयुक्त वचनोंसे आत्माका अविक्रियत्व बतलाकर? फिर वेदाविनाशिनम् इस श्लोकसे उपदेशके आदिमें विद्वान्के लिये संक्षेपमें कर्माधिकारकी निवृत्ति कहकर? जगहजगह? प्रसङ्ग लाकर बीचबीचमें जिसका विस्तार किया गया है? ऐसी कर्माधिकारकी निवृत्तिका? अब शास्त्रके अर्थका संग्रह करनेके लिये विद्वान् न मारता है और न बँधता है इस कथनसे उपसंहार करते हैं। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि विद्वान्में देहधारीपनका अभिमान न होनेके कारण उसके अविद्याकर्तृक समस्त कर्मोंका संन्यास हो सकता है? इसलिये संन्यासियोंको अनिष्ट आदि तीन प्रकारके कर्मफल नहीं मिलते। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि दूसरे ( कर्माधिकारी ) इससे विपरीत होते हैं। इस कारण उनको तीन प्रकारके कर्मफल ( अवश्य ) मिलते हैं। इस प्रकार यह गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार किया गया। ऐसा यह समस्त वेदोंके अर्थका सार? निपुणबुद्धिवाले पण्डितोंद्वारा विचारपूर्वक धारण किया जाने योग्य है। इस विचारसे हमने जगहजगह प्रकरणोंका विभाग करके? शास्त्रन्यायानुसार इस तत्त्वको दिखलाया है।।17।।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.17।। व्याख्या --   यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते -- जिससे मैं करता हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें मेरको फल मिलेगा -- ऐसे स्वार्थभावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये -- जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध -- ये सभी क्रियाएँ एक प्रकाशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओँको न करनेवाला है और न करानेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सत्ताके बिना विहित और निषिद्ध -- कोई भी क्रिया नहीं होती परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करानेवाली है -- ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है? उसमें मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और अमुक चीज चाहिये? अमुक चीज नहीं चाहिये अमुक घटना होनी चाहिये? अमुक घटना नहीं होनी चाहिये -- ऐसा बुद्धिमें लेप (द्वन्द्वमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- ये दोनों ही नहीं हैं? इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।प्रकृतिका कार्य स्वतःस्वाभाविक ही चल रहा है? परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है -- ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है? उसमें मैं करता हूँ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता क्योंकि अंहकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें फल मेरेको मिले ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं(कर्ता)में रहता है क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते -- वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले? तो भी वह मारता नहीं क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बँधता भी नहीं क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है? तब कर्ता? करण और कर्म -- तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा? केवल सबका प्रकाशक? आश्रय? सामान्य चेतन ही रहा? फिर वह कैसे किसको मारे और कैसे किससे बँधे उसका मारना और बँधना सम्भव ही नहीं है (गीता 2। 19)।सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है -- ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है? उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है? उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे? किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसङ्ग है। इसलिये भगवान्ने हत्वापि पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। अपि पदका भाव हैं -- कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः (गीता 4। 20) कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते (गीता 6। 31) सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है। तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें साङ्गोपाङ्ग प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्त नहीं है? उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्योंकीत्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथाव क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रियाविभाग प्रकृतिमें है? स्वरूपमें नहीं।वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय? प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है? और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है? उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।अहम् दो प्रकारका होता है -- अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन(सत्तामात्र) का भान होता है? इसको अहंस्फूर्ति कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें मैं अमुक नाम? वर्ण? आश्रम आदिका हूँ -- ऐसा आरोप करता है? यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर मैं करता हूँ -- ऐसा भाव उत्पन्न होता है? इसको अहंकृति कहते हैं।अहम् को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुणदोषका आरोप नहीं होता।,अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुणदोषका आरोप होता है? जिससे शुभअशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है? वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बँधता है।न हन्ति न निबध्यते (न मारता है और न बँधता है) का क्या भाव है एक निर्विकल्पअवस्था होती है और एक निर्विकल्पबोध होता है। निर्विकल्पअवस्था साधनसाध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्पअवस्थासे भी असङ्गता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्पबोधका अनुभव होता है। निर्विकल्पबोध साधनसाध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी भी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्पबोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं? होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्पबोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते? यही न हन्ति न निबध्यते का भाव है।अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और उन क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंके फलरूपसे जो पदार्थ मिलते हैं? उनका भी संयोगवियोग होता है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थ -- दोनोंके साथ संयोगवियोग होता रहता है। संयोगवियोग होनेपर भी स्वयं तो प्रकाशकरूपसे ज्योंकात्यों ही रहता है। विवेकविचारसे ऐसा अनुभव होनेपर अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप नहीं रहता। सम्बन्ध --   ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते? प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है -- यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.17।।विपरीतदृष्टेर्दुर्मतित्वं शिष्ट्वा सम्यग्दृष्टेः सुमतित्वं प्रश्नपूर्वकमाह -- कः पुनरित्यादिना। अहं कर्तेत्यात्मनि कर्तृत्वप्रत्ययाभावे कुत्र कर्तृत्वधीरित्याशङ्क्याह -- एत इति। कथं तर्हि कर्तृत्वधीरात्मनीत्याशङ्क्याधिष्ठानादीनां तद्व्यापाराणां च साक्षित्वादित्याह -- अहं त्विति। आत्मनो न स्वतोऽस्ति क्रियाशक्तिमत्त्वमित्यत्र प्रमाणमाह -- अप्राणो हीति। नापि तस्य स्वतो ज्ञानशक्तिमत्त्वमित्याह -- अमना इति। उपाधिद्वयासंबन्धे शुद्धत्वं फलितमाह -- शुभ्र इति। कारणसंबन्धादशुद्धिमाशङ्क्योक्तं -- अक्षरादिति। कार्यकारणयोरात्मास्पर्शित्वेन पार्थक्ये सद्वितीयत्वमाशङ्क्य तयोरवस्तुत्वान्मैवमित्याह -- केवल इति। जन्मादिसर्वविक्रियारहितत्वेन कौटस्थ्यमाह -- अविक्रिय इति। बुद्धिर्यस्येत्यादि व्याचष्टे -- बुद्धिरिति। नानुशायिनी नानुशयवती। न क्लेशशालिनीत्यर्थः। द्वितीयपादस्याक्षरार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह -- इदमिति। पापं कर्मेदमा परामृश्यते। लोकानां प्राणसंबन्धाभावे कुतो हिंसेत्याशङ्क्याह -- प्राणिन इति। विरुद्धार्थोक्त्या स्तुतिरपि न युक्तेति शङ्कते -- नन्विति। विरोधं परिहरति -- नैष दोष इति। लौकिकदृष्टिमवष्टभ्य हत्वापीति निर्देशं विशदयति -- देहादीति। तात्त्विकीं दृष्टिमास्थाय न हन्तीत्यादि निर्देशमुपपादयति -- यथेति। नाहं कर्ता किंतु कर्तृतद्व्यापारयोः साक्षी क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयविनिर्मुक्तः शुद्धः सन् कार्यकारणासंबन्धोऽद्वितीयोऽविक्रिय इत्येवं पारमार्थिकदृष्टेर्यथादर्शितत्वं द्रष्टव्यम्। हत्वापीत्येतन्न हन्तीत्यादि चोभयं दृष्टिद्वयावष्टम्भादुपपन्नमित्युपसंहरति -- तदुभयमिति। केवलमेवात्मानं कर्तारं पश्यन्दुर्मतिरित्यत्रात्मविशेषणसमर्पककेवलशब्दसामर्थ्यादात्मनो विशिष्टस्य कर्तृत्वमिति शङ्कते -- नन्विति।

Chapter 18 (Part 12)

आत्मनो वैशिष्ट्यायोगान्न विशिष्टस्यापि कर्तृत्वमिति दूषयति -- नैष दोष इति। अविक्रियस्वाभाव्येऽपि कथमात्मनोऽसंहतत्वमित्याशङ्क्याह -- विक्रियेति। अधिष्ठानादिभिरात्मनः संहननेऽपि न कर्तृत्वमविक्रियस्य क्रियान्वयव्याघातादित्याह -- संहत्येति। संहतत्वानुपपत्तिं व्यक्तीकरोति -- नत्विति। असंहतत्वे फलितमाह -- इति नेति। कथं तर्हि केवलत्वमात्मनि केवलशब्दादुक्तं तदाह -- अत इति। अकर्तृत्वमात्मनोऽभ्युपपन्नं नास्याविक्रियत्वमुपैतीत्याशङ्क्याह -- अविक्रियत्वं चेति। तत्र स्मृतिवाक्यान्युदाहरति -- अविकार्योऽयमिति। नायं हन्ति न हन्यत इत्यादिवाक्यमादिशब्दार्थः। उक्तवाक्यानामात्माविक्रियत्वे तात्पर्यं सूचयति -- असकृदिति। निष्कलं निष्क्रियं शान्तमित्यादि वाक्यं श्रुतावादिशब्दार्थः? यानि वाक्यानि तैरात्मनोऽविक्रियत्वं दर्शितमिति योजना? न्यायतश्च तद्दर्शितमिति पूर्वेण संबन्धः। न्यायमेव दर्शयति -- निरवयवमिति। न तावेदात्मा स्वतो विक्रियते निरवयवत्वादाकाशवन्नापि परतोऽसङ्गस्याकार्यस्य पराधीनत्वायोगादित्यर्थः। किंचात्मनः स्वनिष्ठा वा,विक्रियाधिष्ठानादिनिष्ठा वा? नाद्यः स्वनिष्ठविक्रियानुपपत्तेरात्मनो दर्शितत्वादित्याशयेनाह -- विक्रियावत्त्वेति। सा चायुक्तेत्युक्तमिति शेषः। द्वितीयं दूषयति -- नेत्यादिना। अधिष्ठानादिकृतमपि कर्म तद्योगादात्मन्यागच्छतीत्याशङ्क्य तदागमनं वास्तवमाविद्यं वेति विकल्प्याद्यं दूषयति -- नहीति। द्वितीयं निरस्यति -- यत्त्विति। आत्मन्यविद्याप्रापितं कर्म नात्मीयमित्येतद्दृष्टान्ताभ्यामुपपादयति -- यथेत्यादिना। आत्मनोऽविक्रियत्वेन कर्तृत्वाभावे फलितमाह -- तस्मादिति। ननु प्रागेवात्मनोऽविक्रियत्वं प्रतिपादितं तदिह कस्मादुच्यते तत्राह -- नायमिति। शास्त्रादौ प्रतिज्ञातं हेतुपूर्वकं संक्षिप्योक्त्वा मध्ये तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा प्रसारितां कर्माधिकारनिवृत्तिमिहोपसंहरतीति संबन्धः। प्रतिज्ञातस्य हेतुनोपपादितस्यान्ते निगमनं किमर्थमित्याशङ्क्याह -- शास्त्रार्थेति। कर्माधिकारो विदुषो नेति स्थिते तस्य देहाभिमानाभावे सत्यविद्योत्थसर्वकर्मत्यागसिद्धेरनिष्टमिष्टं मिश्रं चेति त्रिविधं कर्मफलं संन्यासिनां नेति प्रागुक्तं युक्तमेवेति परमप्रकृतमुपसंहरति -- एवंचेति। ये पुनरविद्वांसो देहाभिमानिनस्तेषां त्रिविधं कर्मफलं संभवत्येवेति हेतुवचनसिद्धमर्थं निगमयति -- तद्विपर्ययाच्चेति। अधिष्ठानादिकृतं कर्म नात्मकृतमविदुषामेव कर्माधिकारो देहाभिमानित्वेन तत्त्यागायोगाद्देहाभिमानाभावात्तु विदुषां कर्माधिकारनिवृत्तिरित्युपसंहृतमर्थं संक्षिप्याह -- इत्येष इति। उक्तश्च गीतार्थो वेदार्थत्वादुपादेय इत्याह -- स एष इति। कथमयमर्थो वेदार्थोऽपि प्रतिपत्तुं शक्यते तत्राह -- निपुणेति। भाष्यकृता मानयुक्तिभ्यां विभज्यानुक्तत्वान्नास्यार्थस्योपादेयत्वमित्याशङ्क्याह -- तत्रेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.17।।अवश्यं चैतदेवं यावतोत्तरश्लोके स्वात्मानकारणं जानतः स्तुतिः क्रियते? अन्यथा सहायस्य कारणत्वं जानतः स्तुतिः क्रियते? अन्यथा सहायस्य कारणत्वं जानतः स्तुतिः क्रियेतेति भावेनाऽऽह -- तदिति। स्वात्मनो निष्क्रियत्वज्ञानम्। ननु निरहङ्कारस्यापि इन्द्रादेर्वृत्रवधादिनेषद्बन्धो दृश्यते तत्कथमेतत् इत्यत आह -- यस्त्विति। इयं च कल्पना वक्तुराप्तत्वादिना युज्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.17।।तज्ज्ञानं स्तौति -- यस्येति। यस्त्वीषद्बध्यते स ईषदहङ्कारी च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.17।। -- यस्य शास्त्राचार्योपदेशन्यायसंस्कृतात्मनः न भवति अहंकृतः अहं कर्ता इत्येवंलक्षणः भावः भावना प्रत्ययः -- एते एव पञ्च अधिष्ठानादयः अविद्यया आत्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारः? न अहम्? अहं तु तद्व्यापाराणां साक्षिभूतः अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः (मु0 उ0 2।1।2) केवलः अविक्रियः इत्येवं पश्यतीति एतत् -- बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य आत्मनः,उपाधिभूता न लिप्यते न अनुशयिनी भवति -- इदमहमकार्षम्? तेन अहं नरकं गमिष्यामि इत्येवं यस्य बुद्धिः न लिप्यते -- सः सुमतिः? सः पश्यति। हत्वा अपि सः इमान् लोकान्? सर्वान् इमान् प्राणिनः इत्यर्थः? न हन्ति हननक्रियां न करोति? न निबध्यते नापि तत्कार्येण अधर्मफलेन संबध्यते।।ननु हत्वापि न हन्ति इति विप्रतिषिद्धम् उच्यते यद्यपि स्तुतिः। नैष दोषः? लौकिकपारमार्थिकदृष्ट्यपेक्षया तदुपपत्तेः। देहाद्यात्मबुद्ध्या हन्ता अहम् इति लौकिकीं दृष्टिम् आश्रित्य हत्वापि इति आह। यथादर्शितां पारमार्थिकीं दृष्टिम् आश्रित्य न हन्ति न निबध्यते इति। एतत् उभयम् उपपद्यते एव।।ननु अधिष्ठानादिभिः संभूय करोत्येव आत्मा? कर्तारमात्मानं केवलं तु (गीता 18।16) इति केवलशब्दप्रयोगात्। नैष दोषः? आत्मनः अविक्रियस्वभावत्वे अधिष्ठानादिभिः संहतत्वानुपपत्तेः। विक्रियावतो हि अन्यैः संहननं संभवति? संहत्य वा कर्तृत्वं स्यात्। न तु अविक्रियस्य आत्मनः केनचित् संहननम् अस्ति इति न संभूय कर्तृत्वम् उपपद्यते। अतः केवलत्वम् आत्मनः स्वाभाविकमिति केवलशब्दः अनुवादमात्रम्। अविक्रियत्वं च आत्मनः श्रुतिस्मृतिन्यायप्रसिद्धम्। अविकार्योऽयमुच्यते (गीता 2।25) गुणैरेव कर्माणि क्रियन्ते शरीरस्थोऽपि न करोति (गीता 13।31) इत्यादि असकृत् उपपादितं गीतास्वेव तावत्। श्रुतिषु च ध्यायतीव लेलायतीव इत्येवमाद्यासु। न्यायतश्च -- निरवयवम् अपरतन्त्रम् अविक्रियम् आत्मतत्त्वम् इति राजमार्गः। विक्रियावत्त्वाभ्युपगमेऽपि आत्मनः स्वकीयैव विक्रिया स्वस्य भवितुम् अर्हति? न अधिष्ठानादीनां कर्माणि आत्मकर्तृकाणि स्युः। न हि परस्य कर्म परेण अकृतम् आगन्तुम् अर्हति। यत्तु अविद्यया गमितम्? न तत् तस्य। यथा रजतत्वं न शुक्तिकायाः यथा वा तलमलिनत्वं बालैः गमितम् अविद्यया? न आकाशस्य? तथा अधिष्ठानादिविक्रियापि तेषामेव? न आत्मनः। तस्मात् युक्तम् उक्तम् अहंकृतत्वबुद्धिलेपाभावात् विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति। नायं हन्ति न हन्यते (गीता 2।19) इति प्रतिज्ञाय न जायते (गीता 2।20) इत्यादिहेतुवचनेन अविक्रियत्वम् आत्मनः उक्त्वा? वेदाविनाशिनम् (गीता 2।21) इति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ संक्षेपतः उक्त्वा? मध्ये प्रसारितां तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा इह उपसंहरति शास्त्रार्थपिण्डीकरणाय विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति। एवं च सति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्तौ अविद्याकृताशेषकर्मसंन्यासोपपत्तेः संन्यासिनाम् अनिष्टादि त्रिविधं कर्मणः फलं न भवति इति उपपन्नम् तद्विपर्ययाच्च इतरेषां भवति इत्येतच्च अपरिहार्यम् इति एषः गीताशास्त्रार्थः उपसंहृतः। स एषः सर्ववेदार्थसारः निपुणमतिभिः पण्डितैः विचार्य प्रतिपत्तव्यः इति तत्र तत्र प्रकरणविभागेन दर्शितः अस्माभिः शास्त्रन्यायानुसारेण।।अथ इदानीं कर्मणां प्रवर्तकम् उच्यते --,

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【 Verse 18.18 】

▸ Sanskrit Sloka: ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना | करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसंग्रह: ||

▸ Transliteration: jñānaṁ jñeyaṁ parijñātā trividhā karmacodanā | karaṇaṁ karma karteti trividhaḥ karmasaṁgrahaḥ ||

▸ Glossary: jñānaṁ: knowledge; jñeyaṁ: objective; parijñātā: the knower; trividhā: three kinds; karma: work; codanā: impetus; karaṇaṁ: the senses; karmā: work; kartā: the doer; iti: thus; trividhaḥ: three kinds; karma: work; saṁgrahaḥ: accumulation

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.18 Knowledge, object of the knowledge and the subject of the knowledge, the knower, are the three factors that stimulate action; the senses, the action and the performer comprise the three components of action.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.18।।ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण? कर्म और कर्ता -- इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.18।। ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता ये त्रिविध कर्म प्रेरक हैं और? करण? कर्म? कर्ता ये त्रिविध कर्म संग्रह हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.18 ज्ञानम् knowledge? ज्ञेयम् the knowable? परिज्ञाता the knower? त्रिविधा threefold? कर्मचोदना impulse to action? करणम् the organ? कर्म the action? कर्ता the agent? इति thus? त्रिविधः threefold? कर्मसंग्रहः the basis of action.Commentary Knowledge? the knower and the thing to be known? are together the seed of this world. This is known as the Triputi or the traid. It is the conjunction of these three that impels a man to threefold action? viz.? mental? verbal and physical. This triad is the driving force of all the activities of man. He rejoices at the sight of palatable sweetmeats and delicious fruits but is terrified at the sight of a cobra or tiger. The sight of pleasant or unpleasant objects affects him and he attempts either to possess the agreeable objects or to avoid the disagreeable ones.The Antahkarana (the inner instrument) consists of the mind? intellect? subconscious mind and egoism. The ear? the skin? the tongue? the nose and the eye are the five organs of knowledge. The individual soul? propelled by these five senses? is led into activity. He does actions with the help of the five organs of action? viz.? speech? hands? feet? genitals and anus.Jnanam Any knowledge knowledge in general knowledge of worldly objects? etc.Jneyam The object to be known objects in general.Parijnata The knower? the experiencer or the enjoyer? putting on the nature of the limiting adjuncts? a creature of ignorance.This triad forms the threefold impulse to all action? to action in general. The performance of an action in order to get a thing or to avoid an object is possible only when there is the conjunction of the three? viz.? knowledge? knowable and knower.Karanam The organ That by which something is done. The actions done by the five causes of action? viz.? the body? etc.? which are grouped under the three classes according to their respective seats? viz.? mind? speech and body? are all due to the interplay of the organ? etc.Karta The agent or the doer he who sets the organs in motion or action and puts on the nature of the limiting adjunct or vehicle in which he acts. All actions inhere in these three (the organ? the doer and the action itself) and they are? therefore? said to form the basis or the threefold constituents of action.As action? the various factors of action and the fruits are all made up of the Gunas? the Lord describes them in the following verses.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.18. The instrument of knowledge, the object-of-knowledge, and the knowing subject-the prompting-in-action, consisting of these three-fold elements is [itself] the proper grasping of action with three-fold elements viz., the instrument, the object and the agent.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.18 Knowledge, the knower and the object of knowledge, these are the three incentives to action; and the act, the actor and the instrument are the threefold constituents.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.18 Knowledge, object of knowledge and the knower are the threefold incitements to action. The instrument, the act and the agent are the threefold constituents of action.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.18 Knowledge, the object the knowledge and the knower-this is the threefold inducement to action. The comprehension of actions comes under three heads-the instruments, the object and the subject.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.18 Knowledge, the knowable and the knower form the threefold impulse to action; the organ, the action and the agent form the threefold basis of action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.18 Jnanam etc. Prompting-in-action : the will to exert. At that time those things which - because they exist in one's thought alone - are referable by the terms knowledge, obect-of-knowledge and knowing-subject; at the time of that will (to exert) taking the form 'I shall enjoy it; for it is caused by me' as well as at the time of executing th act, the very same things-because they are fully absorbed [in desire for fruits] - get the names instrument, object and agent. Therefore, because there is no such absorption [in desire for fruits] in the case of the men of Yoga, there is no room in their action for the expressions instrument etc.; rather they exist only as knowledge etc. This is the purport here. Now [the Lord] speaks to explain, in brief, the classification of all these six items, basing on the classification of the Strands :-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.18 (i) 'Knowledge' means this knowledge about the acts which ought to be performed. (ii) The 'object of knowledge' is the act which ought to be performed. (iii) 'The knower' is the person who knows that act. The meaning is that the injunction to do acts, like Jyotistoma etc., is a combination of knowledge, object of knowledge, and the knower. Among these, action itself, which is the object of knowledge, is briefly described as threefold - these being the instrument, action and the agent. The instrument forms the materials etc., which are the means. The action consists of the sacrifice etc. The agent is the performer.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.18 Jnanam, knowledge (-being derived in the sense of 'that through which something is known', jnana means knowledge concerning all things in general-): so also jneyam, the object of knowledge (-that also is a reference to all objects in general-); similarly, parijnata, the knower, the experiencer, a product of ignorance, who partakes of the nature of the limiting adjuncts;-thus, this tripartite group formed by these is the trividha, threefold; karma-codana, inducement ot action, inducer of all actions in general. For, it is when the three, viz knowledge etc., combine that commencement of all actions meant either for acceptance or rejection [Acceptance, rejection or indifference.] are possible. After that, what are initiated by the five, viz locus etc., and are grouped in three ways according to the differences of their being based on speech, mind and body become comprehended under the three, viz instrument etc. This is what is being stated: Karma-sangrahah, the comprehension [It is well know that actions are based on the three-instrument etc.] of actions; iti, comes under; trividhah, three heads, three classes; viz karanam, the instrument (-derived in the sense of that through which anything is done-), i.e. the external (organs) (ear etc.) and the internal (organs) (intellect etc.); karma, the object (-derivatively meaning that which is most cherished by the subject and is achieved through an act-); and karta, the subject (agent), who employs the instrument etc., who partakes of the nature of the limiting adjuncts. Sangrahah is derived thus: that in which something is comprehended. The comprehension of action (karma) is karma-sangrahah. Indeed, action becomes included in these three. Hence is this 'threefold comprehension of action'. Now then, since action, instrument and result are all constituted by the gunas, it becomes necessary to state the three fold variety in them based on the differences among the gunas, viz sattva, rajas and tamas. Hence it is begun:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.18।। कर्म के स्वरूप का युक्तियुक्त विवेचन करते हुए? भगवान् श्री कृष्ण ने कर्म के सम्पादन के पाँच कारणों का वर्णन किया है तथा उनसे भिन्न अकर्ता आत्मा का भी निर्देश किया है। उसी विषय का विस्तार करते हुए? अब वे कर्म के त्रिविध प्रेरक तथा जिससे कर्म संभव होता है वह त्रिविध कर्म संग्रह बताते हैं।प्रत्येक कर्म का प्रेरक है? विषय ज्ञान। इस ज्ञान की सिद्धि के लिए जिन तीन तत्त्वों की आवश्यकता होती है? वे हैं ज्ञाता? ज्ञेय अर्थात् ज्ञान का विषय तथा ज्ञान अर्थात् जानने की क्रिया से प्राप्त हुआ ज्ञान। ज्ञाता? ज्ञेय और ज्ञान इन तीनों को वेदान्त की शब्दावली में त्रिपुटी कहते हैं। इन तीनों के संबंध से ही कर्म के प्रवर्तक विषय का ज्ञान होता है।कर्म की प्रेरणा तीन प्रकार से हो सकती है (1) ज्ञाता के मन में उत्पन्न हुई इच्छा के रूप में? या (2) ज्ञेय वस्तु के प्रलोभन से? अथवा (3) पूर्वानुभूत भोग (ज्ञात सुख) की स्मृति से। इन तीनों के अतिरिक्त कर्म का प्रेरक अन्य कोई कारण नहीं है।अन्तकरण में कर्म की प्रेरणा उत्पन्न होने के पश्चात् उसको पूर्ण करने के लिए कर्ता? करण और कर्म नामक त्रिपुटी की आवश्यकता होती है? जिसे यहाँ त्रिविध कर्मसंग्रह कहा गया है। कामना से प्रेरित जीव कर्म के क्षेत्र में कर्तृत्वाभिमान (मैं कर्ता हूँ) के साथ प्रवेश करता है। यहाँ जीव कर्ता कहलाता है। यह कर्ता जीव जिस फल या लक्ष्य की कामना करता है? उसे यहाँ कर्म शब्द से इंगित किया गया है। यहाँ कर्म का तात्पर्य फल से है।कर्ता जीव को फल (कर्म) प्राप्त करने के लिए क्रिया करनी पड़ती है। क्रिया के ये साधन करण कहे जाते हैं? जिनमें ज्ञानेन्द्रियाँ? कर्मेन्द्रियाँ तथा मन बुद्धि का भी समावेश है। इस प्रकार? कर्ता? कर्म और करण ये कर्म की त्रिपुटी अथवा कर्मसंग्रह कहे जाते हैं।इन तीनों में से किसी एक के भी अभाव में कर्म संभव नहीं हो सकता।समस्त जगत् त्रिगुणात्मिका प्रकृति का कार्य है। इसलिए? ज्ञान? कर्म और कर्ता में भी त्रिगुणों के कारण त्रिविध भेद उत्पन्न होते हैं? जिनका? अब वर्णन किया जायेगा। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.18।।आत्मनः कर्तत्वं फलसंबन्धित्वं च नास्तीत्युक्तं तदेवोपपादयितुं कर्मणां प्रवर्तकमाह -- ज्ञानमिति। ज्ञायतेऽनेनेति करणव्युत्पत्त्याऽविशेषेण सर्वविषं ज्ञानमात्रमुच्यते। तथा ज्ञेयमपि सामान्येनैव ज्ञातव्यं सर्वमुच्यते। तथा परिज्ञाताऽविद्याकल्पितोपाधिप्रधानो भोक्तेत्येवं त्रिविधा कर्मचोदना। कर्मणां प्रवर्तकं त्रिविधमित्यर्थः। करणं क्रियतेऽनेनेति बाह्यं श्रोत्राद्याभ्यन्तरं बुद्य्धादि। कर्मेप्सततमं कर्तुः क्रियया व्याप्यमानम्। कर्ता स्वतन्त्रः स्वाचन्त्र्यं च कारकाप्रयोज्यस्य तत्प्रयोक्तृत्वं तत्प्रयोक्तृत्वं तत्प्रयोक्तृत्वं अविद्याकल्पितोपाधिप्रधानो व्यापारयति इति त्रिविधः कर्मसंग्रहः संगृह्यतेऽस्मिन्निति संग्रहः कर्मणास्त्रिषु समवेतत्वात् अयं त्रिविधः कर्मसंग्रहः। ज्ञानादीनां हि त्रयणां सन्निपाते हानोपादानोपेक्षाप्रयोजनः सर्वकर्मारम्भो भवतीति ज्ञानादिरुपा त्रिविधा कर्मचोदनोच्यते। ततश्च पञ्चभिरधिष्ठानादिभिरारब्धं वाङ्गनःकायाशयभेदेन त्रिधा राशीभूतं त्रुषु करणादिषु संगृह्यत इति करणादिरुपस्त्रिविधः कर्मसंग्रह उच्यत इति भावः। अत्र भाष्यस्यास्य सामान्यरुपत्वात्तदविरोधेन व्याख्यानान्तराण्यपि निर्दुष्टान्युपादेयानि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.18।।पूर्वमधिष्ठानादिपञ्चकस्य क्रियाहेतुत्वेनात्मनः सर्वकर्मासंस्पर्शित्वमुक्तं? संप्रति तमेवार्थं ज्ञानज्ञेयादिप्रक्रियारचनया त्रैगुण्यभेदव्याख्यया च विवरीतुमुपक्रमते -- ज्ञानं ज्ञेयमिति। ज्ञानं विषयप्रकाशक्रिया। ज्ञेयं तस्य कर्म। परिज्ञाता तस्याश्रयो भोक्तान्तःकरणोपाधिपरिकल्पितः। एतेषां त्रयाणां,सन्निपाते हि हानोपादानादिसर्वकर्मारम्भः स्यादत एतत्त्रयं सर्वेषां कर्मणां प्रवर्तकं तदेतदाह त्रिविधा कर्मचोदनेति। चोदनेति प्रवर्तकमुच्यतेचोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनमाहुः इति शाबरे?चोदना चोपदेशश्च विधिश्चैकार्थवाचिनः इति भाट्टे च वचने क्रियाप्रवर्तकवचनत्वं यद्यपि चोदनापदशक्यतया प्रतीयते तथापि वचनत्वं विहाय प्रवर्तकमात्रमिह लक्ष्यते ज्ञानादिषु वचनत्वाभावात्। एवंच प्रेरणीयत्वं प्रेरकत्वं चानात्मन एव नात्मन इत्यभिप्रायः। तथा करणं साधकतमं बाह्यं श्रोत्राद्यन्तस्थं बुद्ध्यादि। कर्म कर्तुरीप्सिततमं क्रियया व्याप्यमानमुत्पाद्यमाप्यं विकार्यं संस्कार्यं च। कर्ता च इतरकारकाप्रयोज्यत्वे सति सकलकारकाणां प्रयोक्ता क्रियाया निर्वर्तकश्चिदचिद्ग्रन्थिरूप इति त्रिविधस्त्रिप्रकारः कर्म संगृह्यते समवैत्यत्रेति कर्मसंग्रहः कर्माश्रयश्चकारार्थादितिशब्दात्संप्रदानमपादानमधिकरणं च राशित्रयान्तर्भूतं। एवं कारकषट्कमेव त्रिविधं क्रियाया आश्रयो नतु कूटस्थ आत्मेत्यर्थः। कर्मप्रेरकस्य कर्माश्रयस्य च कारकरूपत्वात्त्रैगुण्यात्मकत्वाच्चाकारकस्वभावो गुणातीतश्चात्मा सर्वकर्मासंस्पर्शीत्यभिप्रायः। अथवा ज्ञानं प्रेरणारूपं लिङादिशब्दजन्यं? ज्ञेयं तस्य ज्ञानस्य विषयत्वेन लिङादिशब्दस्वरूपं प्रेरकं? परिज्ञाता तस्य ज्ञानस्याश्रयः प्रेरणीय इत्येवं त्रिविधा कर्मचोदना कर्म क्रिया पुरुषव्यापाररूपा भावना तद्विषया चोदना प्रेरणा विधिरूपा शाब्दीभावनेत्यर्थः। तथा करणं सेतिकर्तव्यताकं साधनं धात्वर्थः? कर्म भाव्यं स्वर्गादिफलं? कर्ता फलकामनावान्पुरुषः क्रियाया निर्वर्तक इत्येवं त्रिविधः कर्मसंग्रहः कर्मणः पुंव्यापाररूपस्यार्थभावनायाः संग्रहः संक्षेपः। तदेवमर्थभावनारूपपुंप्रयत्नस्य विधेयस्याभावाच्छब्दभावनारूपो विधिर्न शुद्धमात्मानं गोचरयति कारकाश्रयत्वाद्विधिविधेययोगः। तदुक्तंत्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इति। कारकाणां च त्रैगुण्यरूपत्वमनन्तरमेव व्याख्यास्यत इत्यभिप्रायः। अत्र प्रसङ्गाद्विधिश्चिन्त्यते प्रवृत्तिहेतुत्वेन। प्रेरणा तावत्सर्वलोकानुभवसिद्धा। राज्ञा प्रेरितो बालेन प्रेरितो ब्राह्मणेन प्रेरितोऽहमिति हि प्रवर्तमाना वक्तारो भवन्ति। सा च प्रवर्तना प्रवर्तकराजादिनिष्ठा। तत्रोत्कृष्टस्य निकृष्टंप्रति प्रवर्तना आज्ञा प्रेषणेति चोच्यते। निकृष्टस्योत्कृष्टंप्रति प्रवर्तना याञ्चा अध्येषणेति चोच्यते। समस्य समं प्रत्युत्कर्षनिकर्षौदासीन्येन प्रवर्तना अनुज्ञाऽनुमतिरिति चोच्यते। ते चाज्ञादयो ज्ञानविशेषा इच्छाविशेषा वा चेतनधर्मा एव लोके प्रसिद्धाः? वेदे तु विधिनाहंप्रेरितः करोमीति व्यवहर्तारो भवन्ति। तत्र स्वयमचेतनत्वादपौरुषेयत्वाच्च वैदिकस्य विधेर्न चेतनधर्मेणाज्ञादिना प्रेरकता संभवत्यतः स्वधर्मेणैव साभ्युपगन्तव्या गत्यन्तरासंभवात्। स एव च धर्मश्चोदना प्रवर्तना प्रेरणा विधिरुपदेशः शब्दभावनेति चोच्यते। तत्र केचिदलौकिकमेव शब्दव्यापारं कल्पयन्ति। अन्ये तु क्लृप्तेनैवोपपत्तौ नालौकिककल्पनां सहन्ते। प्रवर्तना हि प्रवृत्तिहेतुर्व्यापारः। विधिशब्दस्य चाख्यातत्वेन दशलकारसाधारणेनोपाधिना पुरुषप्रवृत्तिरूपार्थभावनांप्रति वाचकत्वं तज्ज्ञानहेतुत्वमिति यावत्। सा च ज्ञातैवानुष्ठातुं शक्यत इति तद्धीहेतोरपि शब्दस्य तद्धेतुत्वं परंपरया भवत्येव। तत्र विधिशब्दस्य पुरुषप्रवृत्तिरूपभावनाज्ञानहेतुर्व्यापारः पुरुषप्रवृत्तिवाचकस्तद्वाचकशक्तिमत्तया विधिशब्दज्ञानं स एव च तस्य प्रवृत्तिहेतुर्व्यापार इति प्रवर्तनाभिधानीयकं लभते। ज्ञानद्वारेणैव शब्दस्य प्रवृत्तिजनकत्वात् ज्ञानजनकव्यापारातिरिक्तव्यापारकल्पने मानाभावात् ज्ञानजनकश्च व्यापारस्तस्य स्वज्ञानं शक्तिज्ञाने शक्तिविशिष्टस्वज्ञानं च। तत्राद्ययोरन्यतरस्य शब्दभावनात्वं तृतीयस्य तु तत्र करणत्वमिति विवेकः। एवं स्थिते निष्कर्षः -- विधिना स्वज्ञानं जन्यते प्रवर्तनात्वेनाभिधीयतेपीति विधिज्ञानमेव शब्दभावना तस्यां च पुरुषप्रवृत्तिरूपार्थभावनैव भाव्यतयान्वेति। करणतया च प्रवृत्तिवाचकशक्तिमद्विधिज्ञानमेव भावनासाध्यस्यापि फलावच्छिन्नां भावनां प्रति करणत्वं फलकरणत्वादेव यागस्येव स्वर्गभावनां प्रति न विरुध्यते। तथाच पुरुषः स्वप्रवृत्तिं भावयेत्। केनेत्यपेक्षायां पुरुषप्रवृत्तिवाचकशक्तिमत्तया ज्ञातेन विधिशब्देनेतिकरणांशपूरणं। कथमित्याकाङ्क्षायां अर्थवादैः स्तुत्वेतीतिकर्तव्यतांशपूरणं? इयं गौः क्रय्येति लौकिके विधौ बहुक्षीरा जीवद्वत्सा स्त्र्यपत्या समांसमीनेत्यादिलौकिकार्थवादवत्। समां समां प्रतिवर्षं प्रसूयते सा गौः। नन्वाख्यातत्वेन विधिशब्दादुपस्थिता पुरुषप्रवृत्तिर्भाव्यतयान्वेतु? करणं तु कथमनुपस्थिमन्वेति। उच्यते। विधिशब्दस्तावच्छ्रवणेनोपस्थापितस्तस्य पुरुषप्रवृत्तिवाचकशक्तिरपि स्मरणेनोपस्थापिता तदुभयवैशिष्ट्यं तन्निष्ठाज्ञातता च मनसेति वाचकशक्तिमत्तया ज्ञातो विधिशब्द उपस्थित एव। अनेन यच्छक्नुयात्तद्भावयेदिति प्रतिशब्दं स्वाध्यायविधितात्पर्याच्छब्दातिरिक्तेनोपस्थितमपि शाब्दबोधे भासत एव यथा ज्योतिष्टोमादि नामधेयं यथावा लिङ्गविनियोज्यो मन्त्रः। तदुक्तमाचार्यैरुद्भिदधिकरणेअनुपस्थितिविशेषमाविशिष्टे बुद्धिर्न भवति न त्वनभिहितविशेषणेति एवमर्थवादानामुपस्थितिः। श्रोत्रेण प्राशस्त्यस्य तु तैरेव लक्षणया तदुभयनिष्ठज्ञाततायास्तु,मनसेत्यर्थवादैः प्रशस्तत्वेन ज्ञात्वेतीतिकर्तव्यतांशान्वयोऽप्युपपन्न एव। ननु किं प्राशस्त्यम्। न तावत्फलसाधनत्वं? तस्ययागेन भावयेत्स्वर्गम् इत्यर्थभावनान्वयवशेन विधिवाक्यादेव लब्धत्वान्नान्यत्प्रवृत्तावनुपयोगात्। उच्यते। बलवदनिष्टाननुबन्धित्वं प्राशस्त्यं तच्च नेष्टहेतुत्वज्ञानाल्लभ्यते। इष्टहेतावपि कलञ्जभक्षणादावनिष्टहेतुत्वस्यापि दर्शनात्। विहितश्येनफलस्य च शत्रुवधायानिष्टानुबन्धित्वं दृष्टं? अतो यावत्साधनस्य फलस्य चानिष्टहेतुत्वं नोच्यते तावदिष्टहेतुत्वेन ज्ञातेऽपि तत्र पुरुषो न प्रवर्तते। अतएवोक्तंफलतोऽपि च यत्कर्म नानर्थेनानुबध्यते। केवलप्रीतिहेतुत्वात्तद्धर्म इति कथ्यते इति। अतः स्वतः फलतो वानर्थाननुबन्धित्वरूपप्राशस्त्यबोधनेनार्थवादा विधिशक्तिमुत्तम्भन्ति। क उत्तम्भः स्वतः फलतो वार्थाननुबन्धित्वशङ्कायाः प्रवृत्तिप्रतिबन्धिकाया विगमः। इदमेव च विधेः प्रवृत्तिजनने साहाय्यमर्थवादैः क्रियत इति विधिरर्थवादसाकाङ्क्षः। एवमर्थवादा अप्यभिधया गौण्या वा वृत्त्या भूतमर्थं वदन्तोऽपि स्वाध्यायविध्यापादितप्रयोजनवत्त्वलाभाय विधिसाकाङ्क्षाः सोऽयं नष्टाश्वदग्धरथवत्संप्रयोगः? यथैकस्य दग्धस्य रथस्य जीवद्भिरश्वैरन्यस्य विद्यमानस्य रथस्याविद्यमानाश्वस्य संप्रयोगः परस्परस्यार्थवत्त्वाय तथार्थवादानां प्रयोजनांशो विधिना पूर्यते विधेश्च शब्दभावनाया इतिकर्तव्यतांशोऽर्थवादैरिति। तदिदमुभयोः श्रवणे पूर्णमेव वाक्यमेकस्य श्रवणे त्वन्यस्य कल्पनया पूरणीयम्। यथावसन्ताय कपिञ्जलानालभेत इति विधावर्थवादांशोऽश्रुतोऽपि कल्प्यतेप्रतितिष्ठन्ति ह वा य एता रात्रीरुपयन्ति इत्याद्यर्थवादे विध्यंशः। तथाच सूत्रंविधिना त्वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः इति। विधिना स्तुतिसाकाङ्क्षेण प्रयोजनसाकाङ्क्षाणामर्थवादानामेकवाक्यत्वाद्विधीनां विधेयानां स्तुत्यर्थेन स्तुतिप्रयोजनेन स्तुतिरूपे(च्छालाक्षणिकेन)ण प्रयोजनसाकाङ्क्षेण लाक्षणिकेनार्थेन वानर्थक्याभावादर्थवादा धर्मे प्रमाणानि स्युरिति तस्यार्थः। ननु य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकास्त एव चामीषामर्था इति न्यायाद्विधिशब्दस्य लोके यत्र शक्तिर्गृहीता वेदेऽपि तदर्थकेनैव तेन भवितव्यं? लोके च प्रेषणादिपुरुषधर्मवाचित्वं क्लृप्तमिति वेदे शब्दभावनावाचित्वं कथमुपपद्यते। उच्यते। लोकवेदयोरैकरूप्यमेव। तथाहि लोके प्रेषणादिकं न तेन तेन रूपेण विधिपदवाच्यं अननुगमेन नानार्थत्वप्रसङ्गात्तद्वदेव भावनावाचित्वोपपत्तेश्च? किंतु प्रेषणाध्येषणानुज्ञास्वस्तिप्रवर्तनात्वमेकं? तच्च शब्दव्यापारेऽपि तुल्यमिति तदेव लिङादिपदवाच्यं तच्च लौकिकशब्दे नास्त्येव। तत्र राजादीनामेव प्रवर्तकत्वात्। प्रवर्तकव्यापार एव हि प्रेषणात्वेन इत्यादिना न विधिपदवाच्यं किंतु प्रवर्तनात्वेन वाच्यं। प्रवर्तना प्रवर्तकत्वं च राजादेरिव वेदस्याप्यनुभवसिद्धम्। ननु वेदेऽपि प्रवर्तनावानीश्वरः कल्प्यतां लोके राजादिवत्तदुक्तंविधिरेव तावद्गर्भ इव श्रुतिकुमार्याः पुंयोगे मानम् इति। न? वेदस्यापौरुषेयत्वात्। नहि वेदस्य कर्ता पुरुषो लोके वेदे वा प्रसिद्धः। तत्कल्पने च तज्ज्ञानप्रामाण्यापेक्षया वेदप्रामाण्ये निरपेक्षत्वेन स्थितं स्वतःप्रामाण्यं भग्नं स्यात्। बुद्धवाक्येऽपि प्रामाण्यप्रसङ्गाच्च। ईश्वरवचनत्वे समानेऽपि बुद्धवाक्यं न प्रमाणं वेदवाक्यं तु प्रमाणमिति सुभगाभिक्षुकन्यायप्रसङ्गः। महाजनानामुभयसिद्धत्वाभावेन तत्परिग्रहापरिग्रहाभ्यामपि विशेषानुपपत्तेः। ईश्वरप्रेरणायाः लोकवेदसाधारणत्वेन लोकेऽपि राजादीनां प्रेरकत्वं स्यात्। ईश्वरप्रेरणायां स्थितायामेव राजादिरप्यसाधारणतया प्रेरक इति चेत् हन्त सा तिष्ठतु न वा? किं त्विहाप्यसाधारणः प्रेरको वेद एव राजादिस्थानीय इत्यागतं मार्गे। ईश्वरप्रेरणायाः साधारणाया असाधारणप्रेरणासहकारेणैव प्रवर्तकत्वात्। किंच ईश्वरप्रेरणायां सर्वोऽपि विहितं कुर्यादेव ननु कश्चिदपि लङ्घ्येत्। निषिद्धेऽपि चेश्वरप्रेरणास्त्येव। अन्यथा न कोऽपि तत्र प्रवर्तेतेति तदपि विहितं स्यात्। तथाचोक्तंअज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः। ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा। तस्माद्राजादिरिव वेदोऽपि स्वप्रवर्तनां ज्ञापयन्निच्छोपहारमुखेन प्रवर्तयतीति सिद्धं लोकवेदयोरैकरूप्यम्। पूर्वमीमांसकानां स्वतन्त्रो वेदो? ब्रह्ममीमांसकानां तु ब्रह्मविवर्तस्तत्परतन्त्रो वेद इति यद्यपि विशेषस्तथापि श्वसिततुल्यत्वेन वेदस्यापौरुषेयत्वमुभयेषामपि समानम्। अत्र च प्रवृत्त्यनुकूलव्यापारवत्त्वं प्रवर्तनात्वं सखण्डोऽखण्डो वोपाधिस्तस्मिन् विधिपदशक्येऽपि तदाश्रयविशेषोपस्थितिर्गवादितुल्यैवानुकूलव्यापारत्वं वा शक्यं प्रवृत्त्यंशस्त्वाख्यातत्वेन शक्त्यन्तरलभ्यैव दण्डीत्यत्र संबन्धिनि मतुबर्थे प्रकृत्यर्थं दण्डांशवत् फलसाधनताबोध एव प्रेरणा तामेव कुर्वन् प्रेरको विधिरतः फलसाधनतैव प्रेरणात्वेन विधिपदशक्येति मण्डनाचार्याः। फलसाधनता चार्थभावनान्वयलभ्येत्युक्तं प्राक्। इममेव च पक्षं पार्थसारथिप्रभृतयः पण्डिताः प्रतिपन्नाः। औपनिषदानामपि केषांचिदिष्टसाधनतावादोऽनेनैव मतेनोपपादनीयः। इष्टसाधनत्वं स्वरूपेणैव लिङादिपदशक्यं न प्रेरणात्वेनेति तार्किकाः। तन्न। गौरवादन्यलभ्यत्वादन्वयायोग्यत्वाच्च,इच्छाविषयसाधनत्वापेक्षया प्रवर्तनात्वमतिलघ्विच्छातद्विषययोरप्रवेशात्। इच्छाज्ञानस्यापि प्रवृत्तिज्ञानवत् प्रवृत्तिहेतुत्वापातात् वस्तुगत्या य इच्छाविषयस्तत्साधनमितिशब्देन प्रतिपादयितुमशक्यत्वात् साधनत्वमात्रस्यैव शक्यत्वे च तेनैव प्रत्ययेनोपस्थापितया प्रवृत्त्या सह श्रुत्या तदन्वयसंभवे पदान्तरोपस्थापितस्वर्गेण सहवाक्येन तदन्वयासंभवात् प्रवर्तनात्व एव पर्यवसानं श्रुत्या वाक्यस्य बाधात् प्रत्ययश्रुतेः पदश्रुतितोऽपि बलीयस्त्वेन पशुना यजेतेत्यत्र प्रकृत्यर्थं पशुं विहाय प्रत्ययार्थेन करणेन सहैवैकत्वस्यान्वयादेकं करणं पशुरिति वचनव्यक्त्या क्रत्वङ्गत्वमेकत्वस्य स्थितं किमु वक्तव्यं पदान्तरसमभिव्याहाररूपाद्वाक्याद्बलीयस्त्वमिति। वाक्यार्थान्वयलभ्यत्वाच्च नेष्टसाधनत्वं पदार्थः। तथाहि प्रवर्तनाकर्मभूता पुरुषप्रवृत्तिरूपार्थभावना किं केन कथमित्यंशत्रयवती विधिना लघुत्वेन प्रतिपाद्यत इत्युक्तं प्राक्। अपुरुषार्थकर्मिकायां च तस्यां प्रवर्तनानुपपत्तेरेकपदोपस्थापितमप्यपुरुषार्थं धात्वर्थं विहाय भिन्नपदोपात्तमन्यविशेषणमपि कथमिदमसंबन्धेन साध्यतान्वययोग्यं स्वर्गमेव पुरुषार्थं स्वाभाव्यतयालम्बते। स्वर्गं कामयते स्वर्गकाम इति कर्मण्यणि द्वितीयाया अन्तर्भूतत्वात् यजतेरकर्मकत्वेन स्वर्गमित्युक्तेनानन्वयाच्च। अतएव यत्र कामिपदं न श्रूयते तत्रापि तत्कल्प्यते यथाप्रतितिष्ठन्ति ह वा य एता रात्रीरुपयन्ति इत्यादौ प्रतिष्ठाकामा रात्रिसत्रमुपेयुरित्यादि। एवंच लब्धभाव्यायां तस्यां समानपदोपस्थापितो धात्वर्थ एव करणतयान्वेति भाव्यांशस्य कर्मिविषयेणाविरुद्धत्वात्? सुब्विभक्तियोग्ये धात्वर्थनामधेये ज्योतिष्टोमादौ तृतीयाश्रवणात्? यत्र नामधेये द्वितीया श्रूयते तत्रापि व्यत्ययानुशासनेन तृतीयाकल्पनात्। तदुक्तं महाभाष्यकारैरग्निहोत्रं जुहोतीति तृतीयार्थे द्वितीयेति। अतएव तैः प्रकृतिप्रत्ययौ प्रत्ययार्थं सह ब्रूतस्तयोः प्रत्ययार्थः प्राधान्येन प्रकृत्यर्थो गुणत्वेनेति प्रत्ययार्थं भावनां प्रति धात्वर्थस्य गुणत्वेन करणत्वमुक्तम्? आख्यातं क्रियाप्रधानमिति वदद्भिर्निरुक्तकारैरप्येतदेवोक्तं। भावार्थाधिकरणे च तथैव स्थितम्। तेन सर्वत्र प्रत्ययार्थं प्रति धात्वर्थस्य करणत्वेनैवान्वयनियमः। अतएव गुणविशिष्टधात्वर्थविधौ धात्वर्थानुवादेन केवलगुणविधौ च मत्वर्थलक्षणाविधेर्विप्रकृष्टविषयत्वं च। यथा? सोमेन यजेतेति विशिष्टविधौ सोमवता यागेनेति? दध्ना जुहोतीति गुणविधौ दधिमता होमेनेति। नामधेयान्वये तु सामानाधिकरण्योपपत्तेर्धात्वर्थमात्रविधानाच्च न मत्वर्थलक्षणा न वा विधिविप्रकर्षः। तदेवंज्योतिष्टोमेन यजेत स्वर्गकामः इत्यत्राख्यातार्थो भावयेदिति किमित्याकाङ्क्षायां कर्मिविषयं स्वर्गमिति विधिश्रुतेर्बलीयस्त्वादाकाङ्क्षाया उत्कटत्वाच्च। तथाच स्थितं षष्ठाद्ये। ततः केनेत्यपेक्षिते यागेनेति तृतीयान्तपदसमानाधिकरणत्वात् करणत्वेनैवान्वयनियमाच्च किंनाम्नेत्यपेक्षिते ज्योतिष्टोमेनेति तन्नाम्नेत्यर्थः। शब्दादनुपस्थितोऽपि ज्योतिष्टोमशब्दो भासत एव शाब्दबोधे श्रवणेनोपस्थापितस्तात्पर्यवशान्नामधेयान्वये च न विभक्त्यर्थो द्वारं नञि वाच्यार्थान्वय इव? तेन मत्वर्थलक्षणमन्तरेणैव ज्योतिष्टोमशब्दवतेत्यन्वयलाभः। तथाच कविप्रयोगः?हिमालयो नाम नगाधिराजः इति हिमालयनामवानित्यर्थः। एवमिहप्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबती त्यादावगृहीतसङ्गतिकैकपदवति वाक्ये मधुकरादिपदं स्वरूपेणैव भासते नामधेयवन्नार्थमुपस्थापयति प्रागगृहीतसङ्गतिकत्वात्। अतएव मधुकरशब्दवाच्य इत्यपि लक्षणानन्वयः शक्यज्ञानपूर्वकत्वाल्लक्ष्यज्ञानस्य। स्वरूपतस्तु शब्दे भाते वाच्यवाचकसंबन्धः पश्चात्कल्प्यते संसर्गनिर्वाहायेति। तदयं वाक्यार्थः -- ज्योतिष्टोमनाम्ना यागेन स्वर्गमिष्टं भावयेदिति। कथमित्यपेक्षिते श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्याभिः सामवायिकारादुपकारकाङ्गग्रामपूर्त्येति? विकृतौ प्रकृतिवदित्युपबन्धेन नित्ये यथाशक्तीत्युपबन्धेन मुख्यालाभे प्रतिनिधायापीति यावन्न्यायलभ्यं तत्पूरणम्। एवंच यागस्य स्वर्गावच्छिन्नभावनाकरणत्वेन स्वर्गकारणत्वं करणत्वेन च साक्षात्कर्तृव्यापारविषयत्वरूपं कृतिसाध्यत्वं श्रुत्यर्थाभ्यां लभ्यत इति तदुभयमपि न लिङादिपदवाच्यम्।अप्राप्ते शास्त्रमर्थवत् इति न्यायादनन्वयाच्चेष्टसाधनमिति समासे गुणभूतमिष्टपदं स्वर्गकाम इति समासान्तरगुणभूतेन स्वर्गपदेन कथमन्वियादिष्टस्वर्गसाधनमिति। नहि राजपुरुषो वीरपुत्र इत्यत्र वीरपदराजपदयोरन्वयोस्ति पदार्थः पदार्थेनान्वेति नतु पदार्थैकदेशेनेति न्यायात्। करणविभक्त्यन्तज्योतिष्टोमादिनामधेयानन्वयप्रसङ्गादिदोषाश्चास्मिन्पक्षे द्रष्टव्याः। एतेनेष्टसाधनत्वमनिष्टसाधनत्वं कृतिसाध्यत्वमिति त्रयमपि विध्यर्थ इत्यपास्तमतिगौरवादर्थवादानां सर्वथा वैयर्थ्यापत्तेश्च। अतएव कृतिसाध्यत्वमात्रं विध्यर्थ इत्यपि न? भावनाकरणत्वेनार्थलभ्यत्वादित्युक्तेः। अलौकिको नियोगस्त्वलौकिकत्वादेव न विध्यर्थः। पराक्रान्तं चात्र सूरिभिः। तस्मादनन्यलभ्या लघुता च प्रेरणैव लिङादिपदवाच्येति स्थितं। प्रवर्तकं तु ज्ञानं वाक्यार्थमर्यादालभ्यमन्यदेव सर्वेषामपि वादिनां आख्यातार्थ एवंच विशेष्यतया भासते न धात्वर्थो न नामार्थः स्वर्गकामो वेति चोक्तप्रायमेव। तेन च यागानुकूलकृतिमान्स्वर्गकाम,इति तार्किकमतं पुरुषविशेष्यकवाक्यार्थज्ञानमपास्तम्। संक्षेपेण मतं भाट्टमिदमत्रोपपादितम्। यद्वक्तव्यमिहान्यत्तदनुसन्धेयमाकरात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.18।।समाप्तः सात्त्विकत्यागोपपादनोपयोगी आत्मनोऽकर्तृत्वोपपादनप्रकारः। अत्राह सांख्यः -- यदुक्तं पञ्चैते? तस्य हेतव इति? यच्चोक्तं न हन्तीति तन्मृष्यामहे। नह्यपरिणामी चेतनः परिस्पन्दात्मकस्य कायिकादिभेदेन त्रिविधस्य कर्मणः कर्ता भवतीति वक्तुं युज्यते। यत्तु न निबध्यत इति भोक्तृत्वमुक्तमपि प्रत्याख्यातं तन्न मृष्यामहे। नहि कुलालादयः स्वप्रयुक्ता एव घटादीन्निर्वर्तयन्ति किंतु भोक्तृपुरुषप्रयुक्ताः। अन्यथा भोक्तृ़णामभावे व्यर्थैव तत्प्रवृत्तिरित्यापतति। एवं प्रधानमात्राभूताः कर्त्रादयः पुरुषस्य भोगापवर्गसाधनप्रयुक्ताः,सर्वाणि कर्माणि निर्वर्तयन्ति। तस्मात्पुरुषस्य भोक्तृस्वभावत्वादकर्तृत्वानुसंधानपूर्वकमपि कृतं कर्म भोक्त्राऽवश्यमेव भोक्तव्यमिति सात्त्विकत्यागेऽपि कर्मालेपवचनमसंगतमिति। अत्र प्रतिविधत्ते -- ज्ञानं ज्ञेयमिति। ज्ञानं ज्ञायते प्रकाश्यते वस्तुतत्त्वमनेनेति प्रत्यक्षादिप्रमाणजन्यो घटादिप्रकाशः स च वर्तमानोऽतीतो वा। ज्ञेयं बोधविषयो घटादिः। परिज्ञाता विषयी साभासधीरूपो यो भोक्तेत्युच्यते। एवंरूपप्रकारत्रयवती त्रिविधा कर्मणां चोदना। त्रयं समुच्चितं सत्कर्मणि प्रवर्तकमित्यर्थः। सत्यपि ज्ञेये ज्ञातरि वा ज्ञाने प्रवृत्त्यनुपपत्तेः। ज्ञाने ज्ञातरि च सति देशकालव्यवहिते ज्ञेये प्रवृत्त्यनुपपत्तेः। सत्यपि संस्कारात्मके ज्ञाने ज्ञेये च सन्निहिते तथापि सुषुप्तौ प्रमात्रभावात्प्रवृत्त्यदर्शनादेतत्त्रयं त्रिदण्डविष्टम्भवदन्योन्यापेक्षं सत् हानोपादानोपेक्षाबुद्धिरूपं कार्यं जनयित्वा हानाद्यनुकूले व्यापारे प्रवर्तयतीति कर्तृपदाभिधेयमित्यर्थः। चोदनेति कर्तरि नन्द्यादिल्युप्रत्ययान्तत्वे चोदनाशब्दः कर्तृवाची। लिङ्गं त्वविवक्षितम्। लिङ्गमशिष्यं लोकाश्रयत्वाल्लिङ्गस्येति वा। तथा करणमिन्द्रियम्। कर्म तेन यत्क्रियमाणं विषयग्रहणम्। कर्ता पूर्वोक्त एव परिज्ञाता। एतत्त्रयं समुदितं सत् कर्मसंग्रहः कर्मणः ईप्सिततमस्य भोग्यस्य संग्रहः संगृह्यतेऽस्मिन्निति संश्लेषस्थानं भोक्तेत्यर्थः। सत्यपि भोक्तरि करणे च क्रियां विना भोगासंभवात् क्रियायाश्चाश्रयं विना स्वरूपालाभादाश्रयस्य करणं विना भोक्तृत्वाङ्गकर्तृत्वानुपपत्तैश्चैतत्त्रयं मिलितं सत् भोक्तेत्युच्यत इत्यर्थः। तथा च श्रुतिःआत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः इति। इन्द्रियं प्रसिद्धम्। मन इत्यनेन बुद्धिरेव गृह्यते। युक्तं इन्द्रियद्वारा मतेर्भोग्येन सह संबन्धक्रिया। इन्द्रियं च मनश्च युक्तं चेति विग्रहे इन्द्रियमनोयुक्तमिति द्वन्द्वैकवद्भावः। एतत्त्रयं भोक्ता आत्मेत्याहुर्मनीषिण इति श्रुत्यर्थः। एवं हि श्रुतिस्मृत्योर्व्याख्याने तयोर्मूलमूलिभावो युज्यते नान्यथा। तथा च कर्तृवत् भोक्तुरपि अनात्मगणपतितत्वाद्भोक्तृत्वं भोगकर्तृत्वमिति निर्वचनाद्यः कर्ता स एव भोक्तेति प्रतिपादनादहमकर्ताऽभोक्तेति चानुसंधानपूर्वकं कर्माणि कुर्वतः कर्तृत्वभोक्तृत्वकृतः कर्मलेपो नास्तीति सिद्धम्। भाष्यस्य चायमेवार्थः। ये तु करणं क्रियायाः साधकतमं दशविधं बाह्यं मनोबुद्धिरूपमान्तरम्। कर्म कर्तुरीप्सिततमं क्रियया व्याप्यमानं उत्पाद्यमाप्यं विकार्यं संस्कार्यं चेति चतुर्विधम्। कर्ता कारकान्तरप्रयोजकश्चिदचिद्ग्रन्थिः। एतत्त्रयं कर्मसंग्रहः। कर्माश्रयः कर्तेत्यर्थः। तथा ज्ञानं विषयप्रकाशनशक्तिः। ज्ञेयं विषयः। परिज्ञाता ज्ञानाश्रयो भोक्ता। एतत्त्रयं कर्मणि प्रवर्तकमिति व्याचक्षते। तेषामपि आत्मा न कर्ता नापि सांख्यानामिव भोक्तृत्वेन प्रकृतेः प्रवर्तक इत्येवाशयः। तथापि क्रियया व्याप्यमानस्य वक्ष्यमाणसात्त्विकादिभेदानर्हस्य घटादिरूपस्य कर्मणः कर्तृकोटौ प्रवेशायोगः। तस्य क्रियाश्रयत्वमात्रविवक्षायां प्रकृते तत्कथनानुपयोगश्च स्पष्टः। तथा अस्माकं तु घटादिव्यापकक्रियायाः कर्मशब्दवाच्यत्वं मुख्यम्। कर्तृकोटिप्रवेशश्च क्रियाक्रियावतोर्धर्मधर्मिणोरभेदापेक्षया युज्यते। तथा ज्ञानं प्रकाशनक्रियेति मते क्रियारूपेऽस्मिन्प्रवर्तकज्ञानान्तरस्यापेक्षेति तत्र तत्रान्यस्यान्यस्यापेक्षेत्यनवस्था दुर्निवारा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.18।।किञ्च। कर्मप्रेरणमपि त्रिगुणात्मकं? तत्फलं च त्रिगुणं त्रिगुणानामेव कर्तृ़णां भवति? निर्गुणस्य च फलाननुसन्धानेन मदाज्ञया करणात्तत्तत्फलानधिकारित्वादपि बन्धो नास्तीत्याह -- ज्ञानमिति। ज्ञानं फलस्वरूपावबोधपूर्वकात्माधीनत्वेनाऽवबोधः? ज्ञेयं फलसाधकं कर्म? परिज्ञाता ज्ञानज्ञेययोः स्वरूपज्ञस्तदाश्रयभूतो जीवः। एवं ज्ञानादित्रयमधिकृत्य कर्मचोदना कर्मप्रेरणा त्रिविधा। एवं करणं साधकं? कर्म तत्फलकक्रिया? कर्त्ता क्रियाप्रवृत्तिमान्? इति अमुना प्रकारेण कर्मसङ्ग्रहः कर्म संगृह्यतेऽस्मिन्निति कर्म सङ्ग्रहः। करणादित्रयमपि कारकं? क्रियाश्रयात्मकः सोऽपि त्रिविधः। अनेन निर्गुणानधिकारित्वं निरूपितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.18।।हत्वापि न हन्ति न निबध्यते इत्येतदेवोपपादयितुं कर्मचोदनायाः कर्माश्रयस्य च कर्मफलादीनां च त्रिगुणात्मकत्वान्निर्गुणस्यात्मनस्तत्संबन्धो नास्तीत्यभिप्रायेण कर्मचोदनां कर्माश्रयं चाह -- ज्ञानमिति। ज्ञानमिष्टसाधनमेतदिति बोधः। ज्ञेयमिष्टसाधनं कर्म। परिज्ञाता एवंभूतज्ञानाश्रयः। एवं त्रिविधा कर्मचोदना। चोद्यते प्रवर्त्यते येनेति चोदना। ज्ञानादित्रितयं कर्मप्रवृत्तिहेतुरित्यर्थः। यद्वा चोदनेति विधिरुच्यते। तदुक्तं भट्टैःचोदना चोपदेशश्च विधिश्चैकार्थवाचिनः इति। ततश्चायमर्थःउक्तलक्षणं त्रिगुणात्मकं ज्ञानादित्रयमवलम्ब्य कर्मविधिः प्रवर्तत इति। तदुक्तम्त्रैगुण्यविषया वेदाः इति। तथाच करणं साधतकमम्। कर्म च कर्तुरीप्सिततमम्। कर्ता क्रियानिर्वर्तकः। कर्म संगृह्यतेऽस्मिन्निति कर्मसंग्रहः। करणादित्रिविधं कारकं क्रियाश्रय इत्यर्थः। संप्रदानादिकारकत्रयं तु परंपरया क्रियानिर्वर्तकमेव केवलं नतु साक्षात्क्रियाया आश्रयः। अतः करणादित्रितयमेव क्रियाश्रय इत्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.18।।ज्ञानमिति। अत उक्तमिदं सर्वं सत्त्ववृद्ध्यैव भवति सर्वस्येति सत्त्वस्योपादेयताज्ञापनाय सर्वत्र सत्त्वादिगुणकृतं वैचित्र्यं प्रपञ्चयिष्यन् कर्मचोदनाप्रकारं तावदाह -- ज्ञानमिति। ज्ञेयं साधनं कर्तव्यकर्मविषयकं? कर्त्तव्यं कर्म? परिज्ञाता एवंविधकर्मज्ञः? इति त्रिविधः कर्मविधिरुच्यते। तदुक्तं भट्टैः -- चोदना चोपदेशश्च विधिश्चैकार्थवाचिनः इति। एवं वेदे त्रिगुणमयः कर्मविधिरित्यर्थः। अतएवोक्तं -- त्रैगुण्यविषया वेदाः [2।45] इति। तत्र साधितः कर्मसंग्रहोऽपि त्रिविधः करणं कर्म कर्तेति करणं साधनभूतमिन्द्रियादिकं द्रव्यादिकं च? कर्म यागादि? कर्त्ता तदनुष्ठाता।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.18।।इस प्रकार शास्त्रके आशयका उपसंहार करके अब कर्मोंका प्रवर्तक बतलाया जाता है --, ज्ञान -- जिसके द्वारा कोई पदार्थ जाना जाय। यहाँ ज्ञान शब्दसे सामान्यभावसे सर्व पदार्थविषयक ज्ञान कहा गया है। वैसे ही ज्ञेय अर्थात् जाननेमें आनेवाला पदार्थ? यह भी सामान्य भावसे समस्तका ही वर्णन है। तथा परिज्ञाता अर्थात् उपाधियुक्त अविद्याकल्पित भोक्ता? इस प्रकार जो यह इन तीनोंका समुदाय है? यही सामान्यभावसे समस्त कर्मोंकी प्रवर्तक तीन प्रकारकी कर्मचोदना है। क्योंकि उक्त ज्ञान आदि तीनोंके सम्मिलित होनेपर ही त्याग और ग्रहण आदि जिनके प्रयोजन हैं? ऐसे समस्त कर्मोंका आरम्भ होता है। अब अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंसे जिसकी उत्पत्ति है तथा मन? वाणी और शरीररूप आश्रयोंके भेदसे जिसके तीन वर्ग किये गये हैं? ऐसे समस्त कर्म? करण आदि तीन कारकोंमें संगृहीत हैं। यह बात बतलायी जाती है -- करण -- जिसके द्वारा कर्म किया जाय? अर्थात् श्रोत्रादि दस बाह्य इन्द्रियाँ और बुद्धि आदि चार,अन्तःकरण। कर्म -- जो कर्ताका अत्यन्त इष्ट हो और क्रियाद्वारा सम्पादन किया जाय। कर्ता -- श्रोत्रादि करणोंको अपनेअपने व्यापारमें नियुक्त करनेवाला उपाधिस्वरूप जीव। इस प्रकार यह त्रिविध कर्मसंग्रह है। जिनमें कुछ संगृहीत किया जाय उसका नाम संग्रह है? अतः कर्मोंके संग्रहका नाम कर्मसंग्रह है क्योंकि इन तीन कारकोंमें ही कर्म संगृहीत है। इसलिये यह तीन प्रकारका कर्मसंग्रह है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.18।। व्याख्या --   [इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मोंके बननेमें पाँच हेतु बताये -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव (संस्कार)। इन पाँचोंमें भी मूल हेतु है -- कर्ता। इसी मूल हेतुको मिटानेके लिये भगवान्ने सोलहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव रखनेवालेकी बड़ी निन्दा की और सत्रहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव न रखनेवालेकी बड़ी प्रशंसा की। कर्तृत्वभाव बिलकुल न रहे? यह साफसाफ समझानेके लिये ही अठारहवाँ श्लोक कहा गया है।]ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना -- ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है। ज्ञान को सबसे पहले कहनेमें यह भाव है कि हरेक मनुष्यकी कोई भी प्रवृत्ति होती है तो प्रवृत्तिसे पहले ज्ञान होता है। जैसे? जल पीनेकी प्रवृत्तिसे पहले प्यासका ज्ञान होता है? फिर वह जलसे प्यास बुझाता है। जल आदि जिस विषयका ज्ञान होता है? वह ज्ञेय कहलाता है और जिसको ज्ञान होता है? वह परिज्ञाता कहलाता है। ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- तीनों होनेसे ही कर्म करनेकी प्रेरणा होती है। यदि इन तीनोंमेंसे एक भी न हो तो कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं होती।परिज्ञाता उसको कहते हैं? जो परितः ज्ञाता है अर्थात् जो सब तरहकी क्रियाओंकी स्फुरणाका ज्ञाता है। वह केवल ज्ञाता मात्र है अर्थात् उसे क्रियाओंकी स्फुरणामात्रका ज्ञान होता है? उसमें अपने लिये कुछ चाहनेका अथवा उस क्रियाको करनेका अभिमान आदि बिलकुल नहीं होता।कोई भी क्रिया करनेकी स्फुरणा एक व्यक्तिविशेषमें ही होती है। इसलिये शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन विषयोंको लेकर सुननेवाला? स्पर्श करनेवाला? देखनेवाला? चखनेवाला और सूँघनेवाला -- इस तरह अनेक कर्ता हो सकते हैं परन्तु उन सबको जाननेवाला एक ही रहता है? उसे ही यहाँ,परिज्ञाता कहा है।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः -- कर्मसंग्रहके तीन हेतु हैं -- करण? कर्म तथा कर्ता। इन तीनोंके,सहयोगसे

Chapter 18 (Part 13)

कर्म पूरा होता है। जिन साधनोंसे कर्ता कर्म करता है? उन क्रिया करनेके साधनों(इन्द्रियों आदि)को करण कहते हैं। खानापीना? उठनाबैठना? चलनाफिरना? आनाजाना आदि जो चेष्टाएँ की जाती हैं? उनको कर्म कहते हैं। करण और क्रियासे अपना सम्बन्ध जोड़कर कर्म करनेवालेको कर्ता कहते हैं। इस प्रकार इन तीनोंके मिलनेसे ही कर्म बनता है।भगवान्को यहाँ खास बात यह बतानी है कि कर्मसंग्रह कैसे होता है अर्थात् कर्म बाँधनेवाला कैसे होता है कर्म बननेके तीन हेतु बताते हुए भगवान्का लक्ष्य मूल हेतु कर्ता को बतानेमें है क्योंकि कर्मसंग्रहका खास सम्बन्ध कर्तासे है। यदि कर्तापन न हो तो कर्मसंग्रह नहीं होता? केवल क्रियामात्र होती है।कर्मसंग्रहमें करण हेतु नहीं है क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। कर्ता जैसा कर्म करना चाहता है? वैसा ही कर्म होता है? इसलिये कर्म भी कर्मसंग्रहमें खास हेतु नहीं है। सांख्यसिद्धान्तके अनुसार खास बाँधनेवाला है -- अहंकृतभाव और इसीसे कर्मसंग्रह होता है। अहंकृतभाव न रहनेसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् कर्म फलजनक नहीं होता। इस मूलका ज्ञान करानेके लिये ही भगवान्ने करण और कर्मको पहले रखकर कर्ताको कर्मसंग्रहके पासमें रखा है? जिससे यह खयालमें आ जाय कि बाँधनेवाला कर्ता ही है। सम्बन्ध --   गुणातीत होनेके उद्देश्यसे अब आगेके श्लोकसे त्रिगुणात्मक पदार्थोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.18।।शास्त्रार्थोपसंहारानन्तर्यमथेत्युक्तमिदानीमिति प्रवर्तकोपदेशापेक्षावस्थोक्ता। कर्मणां? येषु विदुषां नाधिकारोऽविदुषां चाधिकारस्तेषामित्यर्थः। ज्ञानशब्दस्य करणव्युत्पत्त्या ज्ञानमात्रार्थत्वमाह -- ज्ञानमिति। ज्ञेयशब्दस्यापि तद्वदेव ज्ञातव्यमात्रार्थत्वमाह -- तथेति। उपाधिलक्षणत्वं तत्प्रधानत्वमुपहितत्वं तस्यावस्तुत्वार्थमविद्याकल्पितविशेषणम्। एतदेव त्रयं सर्वकर्मप्रवर्तकमित्याह -- इत्येतदिति। सर्वकर्मणां प्रवर्तकमित्यध्याहर्तव्यम्। चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनमिति भाष्यानुसारेण चोदनाशब्दार्थमाह -- प्रवर्तिकेति। सर्वकर्मणामिति पूर्वेण संबन्धः। त्रैविध्यं ज्ञानादिना प्रागुक्तं? कर्मणां चोदनेति विग्रहः। तेषां सर्वकर्मप्रवर्तकत्वमनुभवेन साधयति -- ज्ञानादीनामिति। हानोपादानादीत्यादिपदेनोपेक्षा विवक्षिता। करणमित्यादेस्तात्पर्यमाह -- तत इति। ज्ञानादीनां प्रवर्तकत्वादित्यर्थः। उक्तेऽर्थे श्लोकभागमवतारयति -- इत्येतदिति। बाह्यमन्तःस्थं च द्विविधं करणं करणव्युत्पत्त्या कथयति -- करणमिति। उक्तलक्षणं कर्मैव स्फुटयति -- कर्तुरिति। स्वतन्त्रो हि कर्ता स्वातन्त्र्यं च कारकाप्रयोज्यस्य तत्प्रयोक्तृत्वमित्याह -- कर्तेति। कथमुक्ते त्रिविधे कर्म संगृह्यते तत्राह -- कर्मेति। कर्मणो हि प्रसिद्धं कारकाश्रयत्वमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.18।।यदि न जीवस्य कारणत्वं कथं तर्हि तज्ज्ञानादेरुत्तरवाक्ये कर्मणां मूलकारणत्वमुच्यते ज्ञानादित्रयं कर्मणां प्रवर्त्तकमितीत्याशङ्क्य तस्यार्थान्तरं विवक्षुस्तन्निवर्त्यामाशङ्कामाह -- एवं तर्हीति। यदि जीवो न कर्मणां कारणमित्यर्थः। विधिः श्रौतः स्मार्तश्च। न प्रवर्तेत ततश्च तद्वैयर्थ्यप्रसङ्ग इति शेषः। एवं तर्हीत्युक्तस्यैव विवरणम् -- अकर्तृत्वादिति। जीवस्य घटवदिति शेषः। ननु ज्ञानादिरूपेण कर्मचोदनायास्त्रैविध्यमयुक्तम्? अनुपयुक्तं च कथमुच्यते नियोक्तुः प्रेरणं हि विधिः? न च तज्ज्ञानादित्रयरूपम्। न चानेनोक्तशङ्कानिवृत्तिरित्यत आह -- त्रिविधेति। स्पष्टप्रतीत्यर्थोऽनुवादः। इत्यत्रेति शेषः। एतत् ज्ञानादिकम्। कर्मविधिः प्रवर्तते? जीवं प्रतीति शेषः। इतिशब्दो हेतौ। त्रिविधेत्युच्यते कर्मचोदना निमित्तकनैमित्तिकभावेनाभेदोपचार इत्यर्थः। कर्मकारणानामुक्तत्वात्किमिदं पुनरुच्यते इत्यत आह -- कारणानीति। तर्हि कर्मसङ्ग्रह इति कथं कारणसङ्ग्रहः इति वक्तव्यत्वादित्यत आह -- कर्मेति। कर्मशब्देन तत्कारणानि लक्ष्यन्त इत्यर्थः। यदि पञ्चानां कारणानामयं सङ्ग्रहस्तर्हि कस्य कुत्रान्तर्भावः इत्यत आह -- अधिष्ठानादीति। आदिपदेन दैवपदोक्तमदृष्टं गृह्यते।कांस्यपात्र्याभुङक्तेदैवेन कृतमन्यथा इत्यादिवत्साधकतमत्वेन विवक्षितत्वात्विवक्षातः कारकाणि भवन्ति इति वचनात्। न चादिपदेन चेष्टायाः सङ्ग्रहः तत्र कारकान्तर्भावस्यैवौचित्यात्? कर्मेति पृथग्ग्रहणाच्च। न च कर्मादृष्टम्कर्म चेष्टा इत्यन्यत्र व्याख्यातत्वात्।कर्तुरीप्सिततमं कर्म [अष्टा.1।4।49] इति कश्चित्। तदसत्? पञ्चसु कारणेषु तस्यागृहीतत्वात्।श्लोकार्थे श्रुतिसम्मतिं चाऽऽह -- तथा हीति। कर्मेत्यावर्तनीयम्। तत्रैकं व्यस्तम्? परं समस्तम्। ननुज्ञानं ज्ञेयं इत्यनेन कथमुक्तशङ्कानिरासः इत्यत आह -- अकर्तृत्वेऽपीति। अपराधीनकर्तृत्वाभावेऽपि जीवस्य न तं प्रति विधिवैयर्थ्यम्। कुतः इति हेतोरित्यन्वयः। विधिशब्देन तत् ज्ञानमुपलक्ष्यते इच्छेत्यनेन प्रयत्नोऽपि। उक्तकारणैरधिष्ठानादिभिः। अनेन ज्ञानं विधिविषयं चेच्छाप्रयत्नलक्षणमधिष्ठानादिलक्षणं पुरुषार्थलक्षणं च परिज्ञाता सर्वज्ञ ईश्वरश्च सर्वप्रेरको जीवे सन्निहितोऽस्ति। अतस्तं प्रति कर्मचोदनेत्यर्थः सूचितो भवति। एतदुक्तं भवति -- नापराधीनकर्तृत्वं विधिविषयत्वे प्रयोजकं येन जीवं प्रति कमविधिवैयर्थ्यं स्यात्। तथा सतीश्वरस्याऽपि विधिविषयत्वापातात्? किन्तु यस्य स्वसम्बन्धितया विधिज्ञानं कर्म तत्फलं चोद्दिश्येच्छा,तदनुगुणश्च प्रयत्नोऽधिष्ठानादिसन्निधानं कर्मसम्बन्धः फलभाक्त्वं चास्ति। तं प्रति कर्मविधयः प्रवर्तन्ते। अस्ति चेदं समस्तं परमेश्वरप्रसादायत्तं जीव इति कथं न तं प्रति कर्मविधयः स्युः एतत्सङ्ग्रहवाक्यमुत्तरवाक्यैर्विव्रीयते। नन्वीश्वरश्चेत्प्रेरको जीवशरीरेऽभ्युपगतस्तदा तत्प्रसादादेवेच्छाप्रयत्नयोरुत्पादनात्। किन्तु विधिज्ञानमङ्गीक्रियत इत्यत आह -- ईश्वरेति। इच्छति प्रयतते चेति शेषः। अनेन विधिद्वारेश्वरप्रसादादिच्छोत्पत्त्येतद्विवृतं भवति।उक्तकारणैः कर्म भवतीत्युक्तम्? तेनाधिष्ठानादीनां स्वव्यापारे स्वातन्त्र्यं प्राप्तं तन्निरासार्थमाह -- यदि चेति। ईश्वरेणैव कर्म अधिष्ठानादीनि निमित्तमात्राणि कृत्वा कारितं भवति। अत्र णिचं प्रयुञ्जानस्य स्वातन्त्र्यं चेति वक्ष्यमाणाभिप्रायः। कर्मद्वारा पुरुषार्थो भवतीति पुरुषार्थसाधने कर्मणां प्राधान्यं प्राप्तमत आह -- फलं चेति। ईश्वरेणैवेति वर्तते? यद्वायदि च इत्यादिना वाक्यद्वयेन विधिविषयतासिद्धये कर्मफलसम्बन्धस्य काकतालीयता निराक्रियते। इदं च नेश्वरमुक्तजडेषु विध्यविषयेष्वस्ति? किन्तु संसारिष्वेवेति भवति प्रयोजकम्। एवमेकं गीतोक्तं कारणमुक्त्वा भाष्यकारः कारणान्तरं चाऽऽह -- वस्तुत इति। वस्तुतः परमार्थतः। अभिमानिकमहङ्कारकारितं भ्रान्तिप्रतीतम्। तस्य जीवस्य? एवेत्यवधारणेनास्य जीवं प्रति विधिप्रवृत्तौ प्रयोजकत्वं समर्थयते। परमेश्वरकृतासु क्रियासु स्वस्य स्वातन्त्र्यं मन्यमानस्यापराधिनो विधिबन्धलक्षणो दण्ड इति भावः। प्रकारान्तरमाह -- स्वातन्त्र्यं चेति। तस्येति वर्तते। स्यादिदं विधिप्रवृत्ति(प्रवृत्तिविधि इति पाठः कृष्णाचार्याणाम्)वैयर्थ्यम्। यदि जीवस्य क्रियास्वातन्त्र्यलक्षणं कर्तृत्वं सर्वथा न स्यात्। न चैवम्? ईश्वरायत्तस्य तस्याङ्गीकारात् अपराधीनापेक्षया तदभावोक्तेः। न चैवं जडतौल्यमित्यत आह -- जडमपेक्ष्येति। अधिकमिति शेषः। जडं हि तदा परकृतेन नोदनादिना क्रियावद्भवति। न त्वागन्तुककारणमन्तरेण स्वेच्छया जीवस्त्वनादिसिद्धया परमेश्वरप्रसादायत्तया सत्तातुल्यया क्रियाशक्त्या कर्तेति युक्तस्तं प्रति कर्मविधिरिति। नन्वेतत्सर्वं कुतः प्रमाणात्प्रतिपत्तव्यं इत्यत आह -- सर्वं चेति। अनुभवेनोक्तप्रमाणैश्च विधिज्ञाने सतीच्छोत्पत्तिरित्यादिकं अनुभवसिद्धम्।ईश्वरप्रसादात् इत्यादिकं तुयथानियुक्तोऽस्मि इत्याद्युदाहृतागमसिद्धम्। पृथक् पुनः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.18।।एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः? अकर्तृत्वादित्यत आह -- ज्ञानमिति। त्रिविधा कर्मचोदना एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति त्रिविधेत्युच्यते। कारणानि सङ्क्षिप्याऽऽह -- करणमिति। कर्मसंग्रहः कर्मकारणसंग्रहः। अधिष्ठानादि कारण एवान्तर्भूतम्।तथा ह्यृग्वेदखिलेषु -- ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानिनं च ह्यपेक्ष्य विधिरुत्थितः। करणं चैव कर्ता च कर्मकारणसंग्रह इति। अकर्तृत्वेऽपि विधिद्वारेश्वरप्रसादादिच्छोत्पत्त्योक्तकारणैः कर्मद्वारा पुरुषार्थो भवतीति। ईश्वराधीनत्वेऽपि विधिद्वारा नियतस्तेनैव।यदि चेच्छादिर्जायते तर्हि कारितमेवेश्वरेण। फलं च नियतम्। वस्तुतोऽकर्तृत्वेऽपि आभिमानिकं कर्तृत्वं तस्यैव। स्वातन्त्र्यं च जडमपेक्ष्यैवेति न प्रवृत्तिविधिवैयर्थ्यम्। सर्वं चैतदनुभवोक्तप्रमाणसिद्धमिति न पृथक् प्रमाणमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.18।। --,ज्ञानं ज्ञायते अनेन इति सर्वविषयम् अविशेषेण उच्यते। तथा ज्ञेयं ज्ञातव्यम्? तदपि सामान्येनैव सर्वम् उच्यते। तथा परिज्ञाता उपाधिलक्षणः अविद्याकल्पितः भोक्ता। इति एतत् त्रयम् अविशेषेण सर्वकर्मणां प्रवर्तिका त्रिविधा त्रिप्रकारा कर्मचोदना। ज्ञानादीनां हि त्रयाणां संनिपाते हानोपादानादिप्रयोजनः सर्वकर्मारम्भः स्यात्। ततः पञ्चभिः अधिष्ठानादिभिः आरब्धं वाङ्मनःकायाश्रयभेदेन त्रिधा राशीभूतं त्रिषु करणादिषु संगृह्यते इत्येतत् उच्यते -- करणं क्रियते अनेन इति बाह्यं श्रोत्रादि? अन्तःस्थं बुद्ध्यादि? कर्म ईप्सिततमं कर्तुः क्रियया व्याप्यमानम्? कर्ता करणानां व्यापारयिता उपाधिलक्षणः? इति त्रिविधः त्रिप्रकारः कर्मसंग्रहः? संगृह्यते अस्मिन्निति संग्रहः? कर्मणः संग्रहः कर्मसंग्रहः? कर्म एषु हि त्रिषु समवैति? तेन अयं त्रिविधः कर्मसंग्रहः।।अथ इदानीं क्रियाकारकफलानां सर्वेषां गुणात्मकत्वात् सत्त्वरजस्तमोगुणभेदतः त्रिविधः भेदः वक्तव्य इति आरभ्यते --,

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【 Verse 18.19 】

▸ Sanskrit Sloka: ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत: | प्रोच्यते गुणसङ् ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ||

▸ Transliteration: jñānaṁ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ | procyate guṇa-sañkhyāne yathāvac chṛṇu tānyapi ||

▸ Glossary: jñānaṁ: knowledge; karma: work; ca: also; kartā: worker; ca: also; tridha: three kinds; eva: certainly; guṇabhedataḥ: in terms of different modes of material nature; procyate: is said; guṇasañkhyāne: in terms of different modes; yathāvat: as they act; śṛṇu: hear; tāni: all of them; api: also

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.19 According to the science of guṇas, there are three types in knowledge, action, and performers of action. Listen as I describe them.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.19।।गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीनतीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं? उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.19।। ज्ञान? कर्म और कर्ता भी गुणों के भेद से सांख्यशास्त्र (गुणसंख्याने) में त्रिविध ही कहे गये हैं उनको भी तुम मुझ से यथावत् श्रवण करो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.19 ज्ञानम् knowledge? कर्म action? च and? कर्ता actor? च and? त्रिधा of three kinds? एव only? गुणभेदतः according to the distinction of Gunas? प्रोच्यते are declared? गुणसंख्याने in the science of Gunas (Sankhya philosophy)? यथावत् duly? श्रृणु hear? तानि them? अपि also.Commentary The three alities overpower the whole of creation with their special nature and bring it entirely under their control. The nature of action? the actor and his knowledge are threefold according to the Gunas that is predominant. If all the three are Sattvic? then the action will not bind the man.Karta The doer of the actions.The science of the Gunas here referred to is Kapilas system of philosophy. Though the Sankhya system is opposed to Vedanta with reference to the Supreme Truth? viz.? the oneness or nonduality of Brahman? yet it is an authority on the science of the Gunas.I shall describe knowledge? action and actor? as also their various distinctions caused by different Gunas? scientifically and rationally. Hear My teachings? O Arjuna? with rapt attention. You will be immensely benefited.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.19. The instrument of knowledge, the object and the agent are just three kinds because of the differences in the Strands-thus it is declared in enumerating the Strands. These also you must listen to [from Me] as they are.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.19 The knowledge, the act and the doer differ according to the Qualities. Listen to this too:

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.19 Knowledge, act and agent are declared in the science of Gunas to be of three kinds, according to the difference in the Gunas. Listen about them also as they are.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.19 Knowledge, action and agent are stated in the teaching about the gunas to be only of three kinds according to the differences of the gunas. Hear about them also as they are.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.19 Knowledge, action and actor are declared in the science of the Gunas (Sankhya philosophy) to be of three kinds only, according to the distinction of the Gunas. Of these also, hear duly.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.19 Jnanam etc. In enumerating the Strands : In the consdered conclusion of the Sankhya where the Strands are decided numerically, these instruments of knowledge etc., are declared to be of three types. that you must listen to. This is what is conveyed by the association of words (or ideas) here. By instrument-of-knowledge (Jnanam) the two-fold instruments viz. that of knowledge and of activity, are spoken of. Similarly object (karman) speaks of both the object of knowledge and the object of activity and agent (kartr) refers to both the knower and the performer. Now the three verses. Sarvabhutesu etc. (20-22) speak of the three-foldness of the instrument of knowledge. That is why the Instrumental Yena is employed. The nature of all the instruments of knowledge and of action is described by this much of portion. The three-foldness of object of both the types viz. the object of knowledge and the object of action is described by the tripple verses Niyatam etc. (23-25). The three-fold nature of the agent of both the categories viz. the knower and the doer is briefly explained by the three verses Muktasangah etc. (26-28). The three types of the intellect is examined by three verses, Pravrttim etc. (30-32), in order to explain the different nature of the two-fold instruments (i.e. of knowledge and of action). By this means the three-fold nature of other instrumetns is also indicated. The instrument reires technical know-how, and this technical know-how, of course, consists of the pentad that includes content and so on. However, because faith [included in this pentad] has already been dealt with (XVII, 2ff.), and because the desire to know and the aversion to know [both belonging to the pentad] are obtained by inference through the firmness and happiness [of the pentad], the three-fold division of the last two is explained by the verses Dhrtya yaya etc. (33-35) and Sukham tu idanim etc. (36-39). All this [the Lord] declares [one by one] ;-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.19 The knowledge of action which ought to be done, the act to be performed, and the performer of the act are threefold, each of them being divided in accordance with Sattva etc., Listen about these, which are differentiated according to the Gunas.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.19 Jnanam, knowledge; karma, action-not the objective case in the technical sense, which is defined as 'that which is most cheirshed by the subject'; and karta, agent, the accomplisher of actions; procyate, are stated; guna-sankhyane, in the teaching about the gunas, in the philosophy of Kapila; to be eva, only (-only is used for emphasis, by way of showing that they have no classification other than that based on the gunas-); tridha, of three kinds; guna-bhedatah, according to the differences of the gunas, i.e. according to the differences of sattva etc. Even that philosophy teaching about the gunas is certainly vaild so far as it concerns the experiencer of the gunas, though it is contradictory so far as the non-duality of the supreme Reality, Brahman, is concerned. Those followers of Kapila are acknoweldge authorities in the ascertainment of the functions of the gunas and their derivatives. Hence, that scripture, too, is being referred to by way of eulogy of the subject-matter going to be spoken of. Therefore there is no contradiction. Srnu, hear; tani, about them; api, also; yathavat, as they are, as established by reason and as propounded in the scriptures. Hear about knowledge etc. and all their diversities created by the differences of the gunas. The idea is , 'Concentrate your mind on the subject going to be taught.' And now the threefold classification of knowledge is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.19।। आगामी श्लोकों में विवेच्य विषय को यहाँ केवल सूचित किया गया है। चतुर्दश अध्याय में प्रकृति के सत्त्व? रज और तम इन तीन गुणों के लक्षण? व्यापार एवं प्रभाव का विस्तृत वर्णन किया गया था। इन तीन गुणों में से किसी एक के आधिक्य के कारण अथवा इनके विभिन्न अनुपात में संयोग से? या फिर इनके प्राधान्य के क्रमपरिवर्तन के कारण ही विभिन्न व्यक्तियों के स्वभाव तथा कार्यों में इतना वैचित्र्य दिखाई देता है। इतना ही नहीं? अपितु किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी समयसमय पर इन गुणों के कारण परिवर्तन होता रहता है।यहाँ गुणसंख्याने शब्द से कपिल मुनि जी का सांख्यशास्त्र अभिप्रेत है। सांख्य दर्शन में त्रिगुणों के व्यापार का विशेष वर्णन किया गया है। यथावत् का अर्थ है यथान्याय और यथाशास्त्र? अर्थात् शास्त्र और युक्ति से युक्त। अर्जुन तो उपदेश का श्रवण कर ही रहा था? तथापि शृणु कहने का अर्थ यह प्रतीत होता है कि भगवान् चाहते हैं कि अर्जुन आगे के विषय को विशेष ध्यान देकर सुने। विवेच्य विषय का विशेष महत्त्व है।सर्वप्रथम त्रिविध ज्ञान बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.19।।क्रियाकारकफलानामात्मसंबन्धो नास्तीति दर्शयितुं तेषां सर्वेषां त्रिगुणात्मकत्वात् सत्त्वरजस्तमोगुणभेदेन त्रैविध्यप्रतिपादमारभ्यते -- ज्ञानमिति। कर्मशब्देन क्रिया ग्राह्या वक्ष्यमाणानुरोधात्। ननु कर्तुरीप्सिततमं कर्मेति पारिभाषिकं कर्म कारकं कर्ता च क्रियाणां निर्वतर्कः गुणभेदतः सत्त्वादिगुणभेदेन त्रिधैव गुणसंख्याने प्रोच्यते। अवधारणं गुणव्यतिरेकेण विविधान्तरं ज्ञानादिषु नास्तीति निर्धारणार्थम्। गुणाः सत्त्वादयः सभ्यक्कार्यभेदेन ख्यायन्ते प्रतिपाद्यन्तेऽस्मिन्निति गुणसंख्यानं कापिलशास्त्रं यद्यपि परमार्थब्रह्मैकत्वविषये विरुध्यते तथापि तेषां कापिलानां गुणागौणव्यापारनिरुपणेऽभि युक्तात्वात्तच्छास्त्रमपि वक्ष्यमाणस्तुत्यर्थत्वेनोपादीयते। वक्ष्यमाणार्थस्य तन्त्रान्तरेऽपि प्रसिद्धकथनं स्तुतिः। तानि ज्ञानादीनि अपिशब्दात्तद्भेदजातानि च गुणभेदकृतानि श्रृणु। वक्ष्यमाणेऽर्थे मनःसमाधानं कुर्वित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.19।।इदानीं ज्ञानज्ञेयज्ञातरूपस्य करणकर्मकर्तृरूपस्य च त्रिकद्वयस्य त्रिगुणात्मकत्वं वक्तव्यमिति तदुभयं संक्षिप्य त्रिगुणात्मकत्वं प्रतिजानीते -- ज्ञानं कर्म चेति। ज्ञानं प्राग्व्याख्यातम्। ज्ञेयमप्यत्रैवान्तर्भूतं ज्ञानोपाधिकत्वाज्ज्ञेयत्वस्य। कर्म क्रिया त्रिविधः कर्मसंग्रह इत्यत्रोक्ता। चकारात् करणकर्मकारकयोरत्रैवान्तर्भावः क्रियोपाधिकत्वात्कारकत्वस्य। कर्ता क्रियाया निर्वर्तकश्चकाराज्ज्ञाता च। कर्तुः क्रियोपाधिकत्वेऽपि पृथक् त्रैगुण्यकथनं कुतार्किकभ्रमकल्पितात्मत्वनिवारणार्थम्। ते हि कर्तैवात्मेति मन्यन्ते। गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि सम्यक् कार्यभेदेन व्याख्यायन्ते प्रतिपाद्यन्तेऽस्मिन्निति गुणसंख्यानं कापिलं तस्मिन् ज्ञानं क्रिया च कर्ता च गुणभेदतः सत्त्वरजस्तमोभेदेन त्रिधैव प्रोच्यते। एवकारो विधान्तरनिवारणार्थः। यद्यपि कापिलं शास्त्रं परमार्थब्रह्मैकत्वविषये न प्रमाणं तथाप्यपरमार्थगुणगौणभेदनिरूपणे व्यावहारिकं प्रामाण्यं भजत इति वक्ष्यमाणार्थस्तुत्यर्थं गुणसंख्याने प्रोच्यत इत्युक्तम्। तन्त्रान्तरेऽपि प्रसिद्धमिदं न केवलस्मिन्नेव तन्त्र इति स्तुतिर्यथावद्यथाशास्त्रं शृणु श्रोतुं सावधानो भव। तानि विज्ञानादीन्यपिशब्दात्तद्भेदजातानि च गुणभेदकृतान्यत्र चैवमपौनरुक्त्यं द्रष्टव्यम्। चतुर्दशेऽध्याये तत्र सत्त्वं निर्मलत्वादित्यादिना गुणानां बन्धहेतुत्वप्रकारो निरूपितो गुणातीतस्य जीवन्मुक्तत्वनिरूपणाय सप्तदशे पुनर्यजन्ते सात्त्विका देवानित्यादिना गुणकृतत्रिविधस्वभावनिरूपणेनासुरं रजस्तमःस्वभावं परित्यज्य सात्त्विकाहारादिसेवया दैवः सात्त्विकः स्वभावः संपादनीय इत्युक्तमिह तु स्वभावतो गुणातीतस्यात्मनः क्रियाकारकफलसंबन्धो नास्तीति दर्शयितुं तेषां सर्वेषां त्रिगुणात्मकत्वमेव न रूपान्तरमस्ति येनात्मसंबन्धिता स्यादित्युच्यत इति विशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.19।।पूर्वश्लोकोक्ते ज्ञानादिषट्के परिज्ञाता कर्ता चैक एवेति परिशिष्टाः पञ्च तेषां सर्वेषां प्राकृतत्वेन त्रिगुणात्मकत्वे प्राप्ते ज्ञेयकरणयोर्जडयोर्घटकुठारकल्पयोः परिसंख्यार्थं त्रयाणामेव प्रत्येकं त्रिविधत्वं विवरीतुं प्रतिजानीते -- ज्ञानमिति। ज्ञानं कर्म कर्ता चेति त्रयमेव गुणभेदतस्त्रिधा न तु ज्ञेयकरणे। गुणसंख्याने कापिले शास्त्रे। यद्यपि तत्र एकस्यां प्रमदायां भर्तुः सुखं जायते तं प्रति तस्याः सत्त्वोद्भूतत्वात्? तामविन्दतश्चैत्रस्य दुःखं जायते तं प्रति तस्याः रजोद्भूतत्वात्। तस्यामेव सपत्न्या द्वेषस्तां प्रति तस्यास्तमोद्भूतत्वात्। प्रमदयैव सर्वे भावा व्याख्याता इति कापिलानां ज्ञेयकरणयोरपि त्रैविध्यं प्रसिद्धम्। तथापि प्रमदादय एकस्यैव पुंसो निमित्तभेदेन प्रीतिदुःखद्वेषविषया अपि भवन्तीति पूर्वोक्तव्यवस्थाया निर्मूलत्वात्। प्रीत्यादीनां कर्तृसमवायितया प्रतीयमानानामालम्बनभूतायाः प्रमदायाः प्रीत्याद्यात्मकत्वं कल्पयितुं न शक्यत इति न भगवता तयोस्त्रिविधत्वं व्याख्यायते। अक्षरार्थः स्पष्टः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.19।।अथ ज्ञानादित्रयमपि त्रिगुणभेदेन प्रत्येकं त्रिविधमस्तीत्याह -- ज्ञानमिति। ज्ञानं साधनं? कर्म क्रिया? कर्त्ता पुरुषः? एतत्त्रयमपि गुणभेदेन सात्त्विकादिभेदतस्त्रिधैव। गुणसङ्ख्याने गुणाः कार्यभेदेन सङ्ख्यायन्ते निरूप्यन्ते गण्यन्ते वा अस्मिन्निति साङ्ख्यशास्त्रे प्रोच्यन्ते तान्यपि तत्रोक्तानि यथावत् मदुक्तानि शृणु। साङ्ख्यप्रोक्तानि तान्यपि शृण्वित्युक्त्या सप्तदशाध्याये स्वोक्तत्रैविध्यस्य निर्गुणाधिकारसम्पादकानि कर्माणि भवन्ति? न त्वेतानीति स्वरूपवैजात्यज्ञानार्थं श्रोतव्यानीति ज्ञापितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.19।।ततः किमत आह -- ज्ञानमिति। गुणाः सम्यक्कार्यभेदेन ख्यायन्ते प्रतिपाद्यन्तेऽस्मिन्निति गुणसंख्यानं सांख्यशास्त्रं तस्मिन्? ज्ञानं कर्म च क्रिया कर्ता च प्रत्येकं सत्त्वादिगुणभेदेन त्रिधैवोच्यते। तान्यपि ज्ञानादीनि वक्ष्यमाणानि यथावच्छृणु। त्रिधैवेत्येवकारो गुणत्रयोपाधिव्यतिरेकेणात्मनः स्वतःकर्तृत्वादिप्रतिषेधार्थः। चतुर्दशेऽध्यायेतत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् इत्यादिना गुणानां बन्धकत्वप्रकारो निरूपितः। सप्तदशेऽध्यायेयजन्ते सात्त्विका देवान् इत्यादिना गुणकृतत्रिविधस्वभावनिरूपणेन रजस्तमःस्वभावं परित्यज्य सात्त्विकाहारादिसेवया सात्त्विकस्वभावः संपादनीय इत्युक्तम्। इह तु क्रियाकारकफलादीनामात्मसंबन्धो नास्तीति दर्शयितुं सर्वेषां त्रिगुणात्मकत्वमुच्यत इति विशेषो ज्ञातव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.19।।ज्ञानमिति। पूर्वोक्तं ज्ञानं कर्म चानुष्ठीयमानं कर्त्ता तदनुष्ठाता सत्त्वादिगुणभेदतस्त्रिधैवोच्यते। गुणसङ्ख्याने साङ्ख्य इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.19।।क्रिया? कारक और फल सभी त्रिगुणात्मक हैं? अतः सत्त्व? रज और तम इन तीनों गुणोंके भेदसे उन सबका त्रिविध भेद बतलाना है। सो आरम्भ करते हैं --, यहाँ कर्म शब्दका अर्थ क्रिया है? कर्ताका अत्यन्त इष्ट पारिभाषिक शब्द कारकरूप कर्म नहीं। ज्ञान? कर्म और कर्ता अर्थात् क्रिया करनेवाला -- ये तीनों ही? गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रोंमें अर्थात् कपिलमुनिप्रणीत शास्त्रमें गुणोंके भेदसे यानी सात्त्विक आदि भेदसे? प्रत्येक तीनतीन प्रकारके बतलाये गये हैं। यहाँ त्रिधाके साथ एव शब्द जोड़कर यह आशय प्रकट किया गया है? कि उक्त तीनों पदार्थ गुणोंसे अतिरिक्त अन्य जातिके नहीं हैं। वह गुणोंकी संख्या करनेवाला कापिलशास्त्र यद्यपि परमार्थब्रह्मकी एकताके विषयमें (भगवान्के सिद्धान्तसे) विरुद्ध है तो भी गुणोंके भोक्ता ( जीव ) के विषयमें तो प्रमाण है ही। वे कापिलसांख्यके अनुयायी? गुण और गुणके व्यापारका निरूपण करनेमें निपुण हैं। इसलिये उनका शास्त्र भी आगे कहे हुए अभिप्रायकी स्तुति करनेके लिये प्रमाणरूपसे ग्रहण किया जाता है? सुतरां कोई विरोध नहीं है। उनको अर्थात् ज्ञान? कर्म और कर्ताको तथा गुणोंके अनुसार किये हुए उनके सात्त्विक आदि समस्त भेदोंको? तू यथावत् -- जैसा शास्त्रमें न्यायानुसार कहा है उसी प्रकार सुन अर्थात् आगे कही जानेवाली बातमें चित्त लगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.19।। व्याख्या --   प्रोच्यते गुणसंख्याने -- जिस शास्त्रमें गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना की गयी है? उसी शास्त्रके अनुसार मैं तुम्हें ज्ञान? कर्म तथा कर्ताके भेद बता रहा हूँ।ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः -- पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्मकी प्रेरणा होनेमें तीन हेतु बताये तथा तीन ही हेतु कर्मके बननेमें बताये। इस प्रकार कर्मसंग्रह होनेतकमें कुल छः बातें बतायीं (टिप्पणी प0 901)। अब इस श्लोकमें भगवान् ज्ञान? कर्म तथा कर्ता -- इन तीनोंका विवेचन करनेकी ही बात कहते हैं। कर्मप्रेरकविभागमेंसे विवेचन करनेके लिये केवल ज्ञान लिया गया है? क्योंकि किसी भी कर्मकी प्रेरणामें पहले ज्ञान ही होता है। ज्ञानके बाद ही कार्यका आरम्भ होता है। कर्मसंग्रहविभागमेंसे केवल कर्म और कर्ता लिये गये हैं। यद्यपि कर्मके होनेमें कर्ता मुख्य है? तथापि साथमें कर्मको भी लेनेका कारण यह है कि कर्ता जब कर्म करता है? तभी कर्मसंग्रह होता है। अगर कर्ता कर्म न करे तो कर्मसंग्रह होगा ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मप्रेरणामें ज्ञान तथा कर्मसंग्रहमें कर्म और कर्ता मुख्य हैं। इन तीनों -- (ज्ञान? कर्म और कर्ता -- ) के सात्त्विक होनेसे ही मनुष्य निर्लिप्त हो सकता है? राजस और तामस होनेसे नहीं। अतः यहाँ कर्मप्रेरकविभागमें ज्ञाता और ज्ञेय को तथा कर्मसंग्रहविभागमें करण को नहीं लिया गया है।कर्मप्रेरकविभाग के ज्ञाता और ज्ञेय का विवेचन क्यों नहीं किया कारण कि ज्ञाता जब क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है? तब वह कर्ता कहलाता है और उस कर्ताके तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) भेदोंके अन्तर्गत ही ज्ञाताके भी तीन भेद हो जाते हैं। परन्तु ज्ञाता जब ज्ञप्तिमात्र रहता है? तब उसके तीन भेद नहीं होते क्योंकि उसमें गुणोंका सङ्ग नहीं है। गुणोंका सङ्ग होनेसे ही उसके तीन भेद होते हैं। इसलिये वृत्तिज्ञान ही सात्त्विक? राजस तथा तामस होता है।जिसे जाना जाय? उस विषयको ज्ञेय कहते हैं। जाननेके विषय अनेक हैं? इसलिये इसके अलग भेद नहीं किये गये। परन्तु जाननेयोग्य सब विषयोंका एकमात्र लक्ष्य सुख प्राप्त करना ही रहता है। जैसे? कोई विद्या पढ़ता है? कोई धन कमाता है? कोई अधिकार पानेकी चेष्टा करता है तो इन सब विषयोंको जानने? पानेकी चेष्टाका लक्ष्य एकमात्र सुख ही रहता है। विद्या पढ़नेमें यही भाव रहता है कि ज्यादा पढ़कर ज्यादा धन कमाऊँगा? मान पाऊँगा और उनसे मैं सुखी होऊँगा। ऐसे ही हरेक कर्मका लक्ष्य परम्परासे सुख ही रहता है। इसलिये भगवान्ने ज्ञेयके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस सुख के नामसे आगे (18 । 36 -- 39में) किये हैं।ऐसे ही भगवान्ने करणके भी तीन भेद नहीं किये क्योंकि इन्द्रियाँ आदि जितने भी करण हैं? वे सब साधनमात्र हैं। इसलिये उनके तीन भेद नहीं होते। परन्तु इन सभी करणोंमें बुद्धि की ही प्रधानता है क्योंकि मनुष्य करणोंसे जो कुछ भी काम करता है? उसको वह बुद्धिपूर्वक (विचारपूर्वक) ही करता है। इसलिये भगवान्ने करणके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस बुद्धिके नामसे आगे (18। 30 -- 32 में) किये हैं।बुद्धिको दृढ़तासे रखनेमें धृति बुद्धिकी सहायक बनती है। ज्ञानयोगकी साधनामें भगवान्ने दो जगह (6। 25 में तथा 18। 51में) बुद्धिके साथ धृति पद भी दिया है। इससे यह मालूम देता है कि ज्ञानमार्गमें बुद्धिके साथ धृतिकी विशेष आवश्यकता है। इसलिये भगवान्ने धृतिके भी तीन भेद (18। 33 -- 35 में) बताये हैं।त्रिधैव पदमें यह भाव है कि ये भेद तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) ही होते हैं? कम और ज्यादा नहीं होते अर्थात् न दो होते हैं और न चार होते हैं। कारण कि सत्त्व? रज और तम -- ये तीन गुण ही प्रकृतिसे उत्पन्न हैं -- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः (गीता 14। 5)। इसलिये इन तीनों गुणोंको लेकर तीन ही भेद होते हैं।यथावत् -- गुणसंख्यानशास्त्रमें इस विषयका जैसा वर्णन हुआ है? वैसाकावैसा तुम्हें सुना रहा हूँ अपनी तरफसे कुछ कम या अधिक करके नहीं सुना रहा हूँ।श्रृणु -- इस विषयको ध्यानसे सुनो। कारण कि सात्त्विक? राजस और तामस -- इन तीनोंमेंसे सात्त्विक चीजें तो कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्मतत्त्वका बोध करानेवाली हैं? राजस चीजें जन्ममरण देनेवाली हैं और तामस चीजें पतन करनेवाली अर्थात् नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली हैं। इसलिये इनका वर्णन सुनकर सात्त्विक चीजोंको ग्रहण तथा राजसतामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।तानि -- इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।अपि -- इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर यस्य नाहंकृतो भावो ৷৷. न हन्ति न निबध्यते (18। 17) -- इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा। सम्बन्ध --   अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.19।।अनन्तरश्लोकदशकतात्पर्यमाह -- अथेति। ज्ञानादिप्रस्तावानन्तर्यमथशब्दार्थः। इदानीं प्रस्तुतज्ञानाद्यवान्तरभेदापेक्षायामित्यर्थः। तेषां गुणभेदात्त्रैविध्ये हेतुमाह -- गुणात्मकत्वादिति। वक्तव्यो वक्ष्यमाणश्लोकनवकेनेति शेषः। एवं स्थिते प्रथममवान्तरभेदप्रतिज्ञा क्रियत इत्याह -- इत्यारभ्यत इति। कर्तुरीप्सिततमं कर्मेति यत्तत्परिभाष्यते तन्नात्र कर्मशब्दवाच्यमित्याह -- नेति। गुणातिरेकेण विधान्तरं ज्ञानादिषु नेति निर्धारयितुमवधारणमित्याह -- गुणेति। ज्ञानादीनां प्रत्येकं गुणभेदप्रयुक्ते त्रैविध्ये प्रमाणमाह -- प्रोच्यत इति। नतु कापिलं पातञ्जलमित्यादि शास्त्रं विरुद्धार्थत्वादप्रमाणं कथमिह प्रमाणीक्रियते तत्राह -- तदपीति। विषयविशेषे विरोधेऽपि प्रकृतेऽर्थे प्रामाण्यमविरुद्धमित्यर्थः। यद्यपि कापिलादयो गुणवृत्तिविचारे गौणव्यापारस्य भोगादेर्निरूपणे च निपुणास्तथापि कथं तदीयं शास्त्रमत्र प्रमाणीकृतमित्याशङ्क्याह -- ते हीति। ज्ञानादिषु प्रत्येकमवान्तरभेदो वक्ष्यमाणोऽर्थस्तस्य तन्त्रान्तरेऽपि प्रसिद्धिकथनं स्तुतिस्तादर्थ्येन कापिलादिमतोपादानमिहोपयोगीत्यर्थः। तृतीयपादस्याविरुद्धार्थत्वं निगमयति -- नेति। यथावदित्यादिव्याचष्टे -- यथान्यायमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.19।।ज्ञानं कर्मेत्यादेः प्रकृतोपयोगाप्रतीतेस्तं दर्शयन्नाह -- पुनरिति। मोक्षसाधनं प्रागपि गुणभेदानामुक्तत्वात्पुनरित्युक्तम्। गुणसङ्ख्यानशब्देन कापिलं शास्त्रमुच्यत इति भावेनाऽऽह -- गुणेति। तच्च वैदिकमभिप्रेतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.19।।पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह -- ज्ञानमित्यादिना। गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.19।। --,ज्ञानं कर्म च? कर्म क्रिया? न कारकं पारिभाषिकम् ईप्सिततमं कर्म? कर्ता च निर्वर्तकः क्रियाणां त्रिधा एव? अवधारणं गुणव्यतिरिक्तजात्यन्तराभावप्रदर्शनार्थं गुणभेदतः सत्त्वादिभेदेन इत्यर्थः। प्रोच्यते कथ्यते गुणसंख्याने कापिले शास्त्रे तदपि गुणसंख्यानशास्त्रं गुणभोक्तृविषये प्रमाणमेव। परमार्थब्रह्मैकत्वविषये यद्यपि विरुध्यते? तथापि ते हि कापिलाः गुणगौणव्यापारनिरूपणे अभियुक्ताः इति तच्छास्त्रमपि वक्ष्यमाणार्थस्तुत्यर्थत्वेन उपादीयते इति न विरोधः। यथावत् यथान्यायं यथाशास्त्रं श्रृणु तान्यपि ज्ञानादीनि तद्भेदजातानि गुणभेदकृतानि श्रृणु? वक्ष्यमाणे अर्थे मनःसमाधिं कुरु इत्यर्थः।।ज्ञानस्य तु तावत् त्रिविधत्वम् उच्यते --,

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【 Verse 18.20 】

▸ Sanskrit Sloka: सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते | अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम् ||

▸ Transliteration: sarvabhūteṣu yenaikaṁ bhāvamavyayamīkṣate | avibhaktaṁ vibhakteṣu taj jñānaṁ viddhi sāttvikam ||

▸ Glossary: sarvabhūteṣu: in all living entities; yena: by whom; ekaṁ: one; bhāvaṁ: situation; avyayaṁ: imperishable; īkṣate: does see; avibhaktaṁ: undivided; vibhakteṣu: in the numberless divided; tat: that; jñānaṁ: knowledge; viddhi: know; sāttvikam: in the mode of goodness

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.20 That knowledge by which one imperishable reality is seen in all Existence, undivided in the divided, is knowledge in the state of goodness.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.20।।जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव(सत्ता) को देखता है? उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.20।। जिस ज्ञान से मनुष्य? विभक्त रूप में स्थित समस्त भूतों में एक अविभक्त और अविनाशी (अव्यय) स्वरूप को देखता है? उस ज्ञान को तुम सात्त्विक जानो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.20 सर्वभूतेषु in all beings? येन by which? एकम् one? भावम् reality? अव्ययम् indestructible? ईक्षते (one) sees? अविभक्तम् inseparable? विभक्तेषु in the separated? तत् that? ज्ञानम् knowledge? विद्धि know? सात्त्विकम् Sattvic (pure).Commentary That knowledge that sees no difference in all objects that are perceived? is pure. The seer beholds the one allpervading imperishable substance or essence behind the seeming diversity of the objects. He beholds unity in diversity? one in many? all in one. He sees that all the diverse objects are rooted in the One.Bhavam Reality The One Self.Sarvabhuteshu In all beings From the Unmanifested down to the insentient and unmoving objects.Avyayam Indestructible inexhaustible unchangeable that which cannot be exhausted either in itself or in its properties immutable.Just as the ether is indivisible? so also the Self is indivisible. The Self is the same in all bodies. It is the common consciousness in all bodies. It is not different in different bodies. It is one homogeneous indivisible essence or substance in all bodies? in all beings. Know thou? O Arjuna? this direct and right perception of the nondual Self as Sattvic (pure). (Cf.IV.35VI.29XIII.16?28XVIII.30)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.20. That instrument-of-knowledge, by means of which one perceives in all beings the singular immutable Existence, the Unclassified in the classified ones - that you must know to be born of the Sattva (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.20 That knowledge which sees the One Indestructible in all beings, the One Indivisible in all separate lives, may be truly called Pure Knowledge.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.20 Know that Knowledge to be Sattvika by which one sees in all beings, one immutable existence undivided in the divided.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.20 Know that knowledge to be originating from sattva through which one sees a single, undecaying, undivided Entity in all the diversified things.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.20 That by which one sees the one indestructible Reality in all beings, not separate in all the separate beings know thou that knowledge to be Sattvic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.20 See Comment under 18.22

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.20 The self (Atman), which is of the form of knowledge, is alike and uniform, though distinct, in all beings, even though they may externally, and from the point of view of duty, be distinguished as Brahmanas, Ksatriyas, householders, celibates, fair, tall etc. The immutable selves in all these perishing forms or bodies are unaffected by the fruits of actions. Such knowledge of the immutability of the self in all changing beings, is Sattvika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.20 Viddhi, know; tat, that; jnanam, knowledge, realization of the Self as non-dual, complete realization; to be sattvikam, originating from sattva; yena, through which knowledge; iksate, one sees; ekam, a single; avyayam, undecaying-that which does not undergo mutation either in itself or by the mutation of its alities-' i.e. eternal and immutable; bhavam, Entity-the word bhava is used to imply an entity-, i.e. the single Reality which is the Self; sarvabhutesu, in all things, in all things begining from the Unmanifest to the unmoving things; and through which knowledge one sees that Entity to be avibhaktam, undivided; in every body, vibhaktesu, in all the deversified things, in the different bodies. The idea is: that Reality which is the Self remains, like Space, undivided. Being based on rajas and tamas, those that are the dualistic philosophies are incomplete, and hence are not by themselves adeate for the eradication of worldly existence.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.20।। प्रस्तुत प्रकरण में ज्ञान? कर्म और कर्ता का जो त्रिविध वर्गीकरण किया जा रहा है? उसका उद्देश्य अन्य लोगों के गुणदोष को देखकर उनका वर्गीकरण करने का नहीं है। यह तो साधक के अपने आत्मनिरीक्षण के लिए है। आत्मविकास के इच्छुक साधक को यथासंभव सत्त्वगुण में निष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। आत्मनिरीक्षण के द्वारा हम अपने अवगुणों को समझकर उनका तत्काल निराकरण कर सकते हैं।सात्त्विक ज्ञान के द्वारा हम भूतमात्र में स्थित एक अव्यय सत्य को देख सकते हैं। यद्यपि उपाधियाँ असंख्य हैं? तथापि उनका सारभूत आत्मतत्त्व एक ही है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ द्वैत्प्रपंच के अदर्शन को सात्त्विक ज्ञान नहीं कहा गया है? वरन् समस्त भेदों को देखते हुए भी उनके एक मूलस्वरूप को पहचानने को सात्त्विक ज्ञान कहा गया है। उदाहरणार्थ? तरंगों को नहीं देखना जल का ज्ञान नहीं कहा जा सकता? बल्कि विविध तरंगों को देखते हुए भी उनके एक जलस्वरूप को पहचानना ज्ञान है।यद्यपि विभिन्न एवं विभक्त उपाधियों के कारण प्रतिदेह आत्मतत्त्व भिन्न प्रतीत होता है? किन्तु वास्तव में आत्मतत्त्व एक? अखण्ड और अविभाज्य है। कैसे जैसे? विभिन्न घट उपाधियों के कारण सर्वगत आकाश विभक्त हुआ प्रतीत होता है? परन्तु स्वयं आकाश सदैव अखण्ड और अविभक्त ही रहता है। जिस ज्ञान के द्वारा हम उस एकमेव अद्वितीय परमात्मा के इस विलास को समझ पाते हैं? वही ज्ञान सात्त्विक है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.20।।तत्र ज्ञानस्य त्रैविध्यं विभजन्नादौ तस्य सात्त्विकत्वमाह -- सर्वभूतेष्वव्यक्तादिस्थावरान्तेषु विभक्तेषु देहादिभेदेन विभागवत्सु एकमद्वितीयं भावं परमार्थवस्तु सच्चिदानन्दरुपमव्ययं स्वात्मना धर्मेण वा न व्येतीत्यव्ययं कूटस्थं नित्यमविभक्तं प्रतिदेहं विभागशन्यं व्योमवन्निरन्तरं येन ज्ञानेनोपनिषत्सिद्धान्तजन्येनाद्वैतवादी पश्यति तद्द्वैतात्मदर्शनं सम्यग्ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि विजानीहि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.20।।एवं ज्ञानस्य कर्मणः कर्तुश्च प्रत्येकं त्रैविध्ये ज्ञातव्यत्वेन प्रतिज्ञाते प्रथमं ज्ञानत्रैविध्यं निरूपयति त्रिभिः श्लोकैस्तत्राद्वैतवादिनां सात्त्विकं ज्ञानमाह -- सर्वभूतेष्विति। सर्वेषु भूतेषु अव्याकृतहिरण्यगर्भविराट्संज्ञेषु बीजसूक्ष्मस्थूलरूपेषु समष्टिव्यष्ट्यात्मकेषु। सर्वेष्वित्यनेनैव निर्वाहे भूतेष्वित्यनेन भवनधर्मकत्वमुच्यते तेनोत्पत्तिविनाशशीलेषु दृश्यवर्गेषु विभक्तेषु परस्परव्यावृत्तेषु नानारसेष्वव्ययमुत्पत्तिविनाशादिसर्वविक्रियाशून्यमदृश्यमविभक्तमव्यावृत्तं सर्वत्रानुस्यूतमधिष्ठानतया बाधावधितया च एकमद्वितीयं भावं परमार्थसत्तारूपं स्वप्रकाशानन्दमात्मानं येनान्तःकरणपरिणामभेदेन वेदान्तवाक्यविचारपरिनिष्पन्नेनेक्षते साक्षात्करोति तन्मिथ्याप्रपञ्चबाधकमद्वैतात्मदर्शनं सात्त्विकं सर्वसंसारोच्छित्तिकारणं ज्ञानं विद्धि। द्वैतदर्शनं तु राजसं तामसं च संसारकारणं न सात्त्विकमित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.20।।एवं ज्ञानादित्रयस्य त्रैविध्यं वक्तुं प्रतिज्ञाय ज्ञानत्रैविध्यं तावदाह -- सर्वभूतेष्विति। यथा कटककुण्डलादिषु व्यावर्तमानेषु तत्त्वविवेकं काञ्चनमेवेदमिति पश्यति। एवं येन ज्ञानेन सर्वभूतेषु विभक्तेषु नानानामरूपभेदभिन्नेषु अव्ययमपरिणामिनमेकं भावं चिन्मात्ररूपं ईक्षते सर्वं ब्रह्मैवेदमिति पश्यति तज्ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि। ऐकात्म्यज्ञानमेव सात्त्विकमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.20।।एवं कथनं प्रतिज्ञाय पूर्वं ज्ञानत्रैविध्यमाह तत्र प्रथमं सात्त्विकत्वं ज्ञानस्याऽऽह -- सर्वभूतेष्विति। येन ज्ञानेन सर्वेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु विभक्तेषु वैचित्र्यार्थं नानारूपैः परस्परं भिन्नेषु अविभक्तमनुस्यूतं एकं भावं भगवत्क्रीडारूपम्? अतएव अव्ययं निर्विकारम्? ईक्षते आलोचनात्मकतया पश्यति तज्ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.20।।तत्र ज्ञानस्य सात्त्विकादि त्रैविध्यमाह -- सर्वभूतेष्विति त्रिभिः। सर्वेषु भूतेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु विभक्तेषु परस्परं व्यावृत्तेषु अविभक्तमनुस्यूतं एकमव्ययं निर्विकारं भावं परमात्मतत्त्वं येन ज्ञानेनेक्षते आलोचयति तज्ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.20।।सर्वभूतेष्विति। येन ज्ञानेन विप्रक्षत्त्रब्रह्मचारिगृह्यादिरूपेण विभक्तेष्वपि कर्माधिकारिषु ब्राह्मणत्वाद्याकारेषु नैकगुणेषु नैकेष्वेकाकारमात्माख्यं भावं तथाप्यव्ययं व्ययस्वभावेष्वप्यविकृतं फलादिसङ्गानर्हं कर्माधिकारसमयेऽपि समीक्षते तज्ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि। अतएवोक्तं श्रीमद्भागवते -- [6।16।9]एष,नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एष सर्वाश्रयः स्वदृक् इति। अत्र सर्वाश्रय एक एवात्माऽणुर्जीवोऽव्यय एतज्ज्ञानं सात्त्विकमिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.20।।पहले ( तीन श्लोकोंद्वारा ) ज्ञानके तीन भेद कहे जाते हैं। जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य? अव्यक्तसे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंमें एकभाव -- एक आत्मवस्तु? जो कि अपने स्वरूपसे या धर्मसे कभी क्षय नहीं होता? ऐसा अविनाशी और कूटस्थ नित्यतत्त्व देखता है। यहाँ भाव शब्द वस्तुवाचक है। तथा ( जिस ज्ञानके द्वारा ) उस आत्मतत्त्वको अलगअलग प्रत्येक शरीरमें विभागरहित अर्थात् आकाशके समान समभावसे स्थित देखता है? उस ज्ञानको अर्थात् अद्वैतभावसे आत्मसाक्षात्कार कर लेनेको तू सात्त्विक ज्ञान पूर्ण ज्ञान जान। जो द्वैतदर्शनरूप अयथार्थ ज्ञान है? वे राजसतामस हैं? अतः वे संसारका उच्छेद करनेमें साक्षात् हेतु नहीं हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.20।। व्याख्या --   सर्वभूतेषु येनैकं ৷৷. अविभक्तं विभक्तेषु -- व्यक्ति? वस्तु आदिमें जो है पन दीखता है? वह उन व्यक्ति? वस्तु आदिका नहीं है? प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्मका ही है। उन व्यक्ति? वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो

Chapter 18 (Part 14)

रहा है। कोई भी व्यक्ति? वस्तु आदि ऐसी नहीं है? जिसमें परिवर्तन न होता हो परन्तु अपनी अज्ञता(बेसमझी)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है? ज्ञान हो जाता है? तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है? जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता 13। 27)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलगअलग वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति? घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता 13। 16)। तात्पर्य यह है कि अलगअलग वस्तु? व्यक्ति आदिका अलगअलग ज्ञान और यथायोग्य अलगअलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें रागद्वेष नहीं होते।तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् -- उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं? वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान वास्तविक बोध कहलाता है? जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेयतत्त्व बताया है -- ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते (गीता 13। 12)।मार्मिक बातसंसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है? इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान मैंसे होता है। वह मैं बुद्धि? इन्द्रियाँ और विषय -- इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस मैंका भी एक प्रकाशक है? जिसमें मैंका भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है? जब कि मैं एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे मैंका भान होता है? वैसे ही तू? यह और वह का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है परन्तु व्यक्तिविशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं।इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये -- मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं? जो विभक्त हैं परन्तु इनका जो प्रकाशक है? वह अवभिक्त (विभागरहित) है।बोलनेवाला? मैं? उसके सामने सुननेवाला तू और पासवाला यह तथा दूरवाला वह कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको मैं कहता है? सामनेवालेको तू कहता है? पासवालेको यह कहता है और दूरवालेको वह कहता है। जो तू बना हुआ था? वह मैं हो जाय तो मैं बना हुआ तू हो जायगा और यह तथा वह वही रहेंगे। इसी प्रकार यह कहलानेवाला अगर मैं बन जाय तो तू कहलानेवाला यह बन जायगा और मैं कहलानेवाला तू बन जायगा। वह परोक्ष होनेसे अपनी जगह ही रहा। अब वह कहलानेवाला मैं बन जायगा तो उसकी दृष्टिमें मैं? तू और यह कहलानेवाले सब वह हो जायँगे (टिप्पणी प0 903)। इस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह का भान हो रहा है। दृष्टिमें चारों ही बन सकते हैं।इससे यह सिद्ध हुआ कि मैं? तू? यह और वह -- ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले नहीं हैं? वास्तविक नहीं हैं। अगर वास्तविक होते तो एक ही रहते। वास्तविक तो इन सबका प्रकाशक और आश्रय है? जिसके प्रकार मैं? तू? यह और वह -- ये यारों ही एकदूसरेकी उस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही नहीं हैं? प्रत्युत उसीसे इन चारोंको सत्ता मिलती है। अपनी मान्यताके कारण मैं? तू? यह? वह का तो भान होता है? पर प्रकाशकका भान नहीं होता। वह प्रकाशक सबको प्रकाशित करता है? स्वयंप्रकाशस्वरूप है और सदा ज्योंकात्यों रहता है। मैं? तू? यह और वह -- यह सब विभक्त प्राणियोंका स्वरूप है और जो वास्तविक प्रकाशक है? वह विभागरहित है। यही वास्तवमें सात्त्विक ज्ञान है।विभागवाली? परिवर्तनशील और नष्ट होनेवाली जितनी वस्तुएँ हैं? यह ज्ञान उन सबका प्रकाशक है और स्वयं भी निर्मल तथा विकाररहित है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् (गीता 14। 6)। इसलिये इस ज्ञानको सात्त्विक कहा जाता है।वास्तवमें यह सात्त्विक ज्ञान प्रकाश्यकी दृष्टि(सम्बन्ध)से प्रकाशक और विभक्तकी दृष्टिसे अविभक्त कहा जाता है। प्रकाश्य और विभक्तसे रहित होनेपर तो यह निर्गुण? निरपेक्ष वास्तविक ज्ञान ही है। सम्बन्ध --   अब राजस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.20।।ज्ञानादीनां प्रत्येकं त्रैविध्यं ज्ञातव्यं प्रतिज्ञाय ज्ञानत्रैविध्यार्थं श्लोकत्रयमवतारयति -- ज्ञानस्येति। तत्र सात्त्विकं ज्ञानमुपन्यस्यति -- सर्वेति। भूतानि कार्यकारणात्मकान्युपाधिजातानि? अद्वितीयमखण्डैकरसं प्रत्यगात्मभूतमबाधितं तत्त्वं ज्ञेयत्वेन विवक्षितमित्याह -- एकमिति। विवक्षितमव्ययत्वं संक्षिपति -- कूटस्थेति। प्रतिदेहमविभक्तमित्युक्तं व्यनक्ति -- विभक्तेष्विति। तज्ज्ञानमित्यादिव्याकरोति -- अद्वैतेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.20।।एकं भावमिति सामान्येनोक्तम् कोऽसावेको भावः इत्याकाङ्क्षायामाह -- एकमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.20।।एकं भावं विष्णुम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.20।। --,सर्वभूतेषु अव्यक्तादिस्थावरान्तेषु भूतेषु येन ज्ञानेन एकं भावं वस्तु -- भावशब्दः वस्तुवाची? एकम् आत्मवस्तु इत्यर्थः अव्ययं न व्येति स्वात्मना स्वधर्मेण वा? कूटस्थम् इत्यर्थः ईक्षते पश्यति येन झानेन? तं च भावम् अविभक्तं प्रतिदेहं विभक्तेषु देहभेदेषु न विभक्तं तत् आत्मवस्तु? व्योमवत् निरन्तरमित्यर्थः तत् ज्ञानं साक्षात् सम्यग्दर्शनम् अद्वैतात्मविषयं सात्त्विकं विद्धि इति।।यानि द्वैतदर्शनानि तानि असम्यग्भूतानि राजसानि तामसानि च इति न साक्षात् संसारोच्छित्तये भवन्ति --,

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【 Verse 18.21 】

▸ Sanskrit Sloka: पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् | वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ||

▸ Transliteration: pṛthaktvena tu yajjñānaṁ nānābhāvān pṛthagvidhān | vetti sarveṣu bhūteṣu taj jñānaṁ viddhi rājasam ||

▸ Glossary: pṛthaktvena: because of division; tu: but; yajjñānaṁ: which knowledge; nānābhāvān: various situations; pṛthagvidhān: differently; vetti: one who knows; sarveṣu: in all; bhūteṣu: living entities; tajjñānaṁ: that knowledge; viddhi: must be known; rājasam: in terms of aggression

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.21 The knowledge by which one sees different realities of various types among all beings as separate from one another; such knowledge is in the mode of aggression.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.21।।परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलगअलग अनेक भावोंको अलगअलग रूपसे जानता है? उस ज्ञानको तुम राजस समझो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.21।। जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त भूतों में नाना भावों को पृथक्पृथक् जानता है? उस ज्ञान को तुम राजस जानो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.21 पृथक्त्वेन as different from one another? तु but? यत् which? ज्ञानम् knowledge? नानाभावान् various entities? पृथग्विधान् of distinct kinds? वेत्ति knows? सर्वेषु (in) all? भूतेषु in beings? तत् that? ज्ञानम् knowledge? विद्धि know? राजसम् Rajasic.Commentary Knowledge which sees As knowledge cannot be an agent? this should be interpreted to mean knowledge by which one sees.Entities Selves or souls.Different from one another Regarding them as different in different bodies.The knowledge that is led by the idea of separateness is passionate. Enveloping as it does the manifold creation with the veil of separateness? it deludes even the wise man. Owing to passionate knowledge? beings appear to be separate and the perception of unity is also lost sight of. That knowledge which beholds multiplicity in created objects and differentiates them as being small or great? according to their form and size? is of passionate nature and tainted. A man with passionate knowledge sees diversity everywhere. He beholds the many only.Now I will explain to thee? O Arjuna? knowledge that is of the ality of darkness? in order that thou mayest avoid it.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.21. That instrument-of-knowledge, by means of which one considers the varied natures of different sorts in all beings as [really] different-that is regarded to be of the Rajas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.21 The knowledge which thinks of the manifold existence in all beings as separate - that comes from Passion.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.21 But that knowledge which sees all beings, by reason of their individuality, as entities of distinct nature - know that knowledge to be Rajasika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.21 But know that knowledge to be originating from rajas which, amidst all things, apprehends the different entities of various kinds as distinct [As possessing distinct selves.].

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.21 But that knowledge which sees in all beings various entities of distinct kinds as different from one another know thou that knowledge to be Rajasic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.21 See Comment under 18.22

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.21 Whatever knowledge perceives in Brahmana etc., at the time of work, the entity known as the Atman as of diverse nature because the bodies of those beings are tall or fair and are fit to attain the fruits of work - know that knowledge to be Rajasika. The point is this: It is not a condemnation of the plurality of Atman. The Atman, though distinct, is uniform everywhere. The bodily attributes do not affect it. The knowledge lacking this understanding is stigmatised as Rajasa.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.21 Tu, but; viddhi, know; tat, that; jnanam, knowledge; to be rajasam, originating from rajas; yat, which; sarvesu bhutesu, amidst all things; vetti, apprehends-since knowledge cannot be an agent of hends-since knowledge cannot be an agent of action, therefore the meaning implied is, 'that, knowledge৷৷.through which one apprehends৷৷.'-; nana-bhavan, the different entities; prthagvidhan, of various kinds, i.e., those possessing diverse characteristics and different from oneself; prthakrvena, as distinct, as separate in each body.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.21।। जब हम इन्द्रिय? मन और बुद्धि के माध्यम से जगत् का अवलोकन करते हैं? तब? निसन्देह उसमें हमें असंख्य प्रकार के भेद दृष्टिगोचर होते हैं। परन्तु जो वस्तु जिस रूप में दिखाई देती है? उसके उसी रूप को सत्य समझ लेना अविवेक का लक्षण है। राजसी पुरुष का मन सदैव चंचल और अस्थिर रहने के कारण वह कभी शान्त मन से विचार नहीं कर पाता और यही कारण है कि वह दृष्टिगोचर भेद? जैसे वनस्पति? पशु? मनुष्य आदि को परस्पर सर्वथा भिन्न और सत्य मान लेता है। ऐसे ज्ञान को राजस ज्ञान कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.21।।एवमद्वैतवादिनां सात्त्विकमुपादेयमुक्त्वा तार्किकाणां तद्राजसं हेयमाह -- पृथक्त्वेन त्विति। तुशब्दः संसारोच्छत्तिहेतुभूतात्पूर्वोक्तात्सात्त्विकाज्ज्ञानात्तदुच्छत्त्यहेतुभूतस्य प्रत्युत तत्कारणस्य वैलक्षण्यद्योतनार्थः। पृथक्त्वेन प्रतिशरीरमन्यत्वेन हेतुना पृथग्विधान् भिन्नलक्षणान् नानाभावान् भिन्नात्मनः सर्वेषु भूतेषु यज्ज्ञानं राजसं रजोनिर्वत्तं विद्धि। यत्पृथकत्वेन स्थितेषु भूतेष्विति तु दूरान्वयदोषेणआध्याहारदोषेण च ग्रस्तत्वादाचार्यैरुपेक्षितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.21।।पृथक्त्वेनेति। तुशब्दः प्रागुक्तसात्त्विकव्यतिरेकप्रदर्शनार्थः। पृथक्त्वेन भेदेन स्थितेषु सर्वभूतेषु देहादिषु नानाभावान् प्रतिदेहमन्यानात्मनः पृथग्विधान् सुखदुःखित्वादिरूपेण परस्परविलक्षणान्। येन ज्ञानेन वेत्तीति वक्तव्ये यज्ज्ञानं वेत्तीति करणे कर्तृत्वोपचारादेधांसि पचन्तीतिवत्कर्तुरहंकारस्य तद्वृत्त्यभेदाद्वा तज्ज्ञानं विद्धि राजसमिति पुनर्ज्ञानपदमात्मभेदज्ञानं अनात्मभेदज्ञानं च परामृशति। तेनात्मनां परस्परं भेदस्तेषामीश्वराद्भेदस्तेभ्य ईश्वरादन्योन्यतश्चाचेतनवर्गस्य भेद इत्यनौपाधिकभेदपञ्चकज्ञानं कुतार्किकाणां राजसमेवेत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.21।।भेदज्ञाने राजसत्वमाह -- पृथक्त्वेनेति। यत्पृथक्त्वेन भिन्नत्वेन। ज्ञानं तद्राजसमिति संबन्धः।,पृथक्त्वेनेत्येतद्विवृणोति। सर्वेषु भूतेषु पाञ्चभौतिकत्वेनाविशिष्टेषु नानाभावान् सुरनरतिर्यक्स्थावरत्वभेदेन नानात्वानि। बहुवचनमत्यन्तभेदप्रदर्शनार्थम्। पृथग्विधान् एकजातीयेष्वपि नरादिषु प्रत्येकं विभिन्नप्रकारान् यज्ज्ञानं वेत्ति विषयीकरोतीति। येन ज्ञानेन वेत्तीति वक्तव्ये एधांसि पचन्तीतिवद्यज्ज्ञानं वेत्तिति करणे कर्तृत्वोपचारो बोध्यः। तेनात्मनां परस्परभेदस्तेषामीश्वराद्भेदस्तेभ्य ईश्वरादन्योन्यतश्च जडवर्गस्य भेद इत्यनौपाधिकभेदपञ्चकज्ञानं कुतार्किकाणां राजसमेवेत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.21।।राजसमाह -- पृथक्त्वेनेति। ज्ञानस्य सात्त्विकात्मकत्वाद्वक्ष्यमाणज्ञानस्य शब्दमात्रसाम्यज्ञापनाय तुशब्दः। पृथक्त्वेन क्रीडामयैकराहित्येन तु नानाभावान् अनेकान् जीवान् पृथग्विधान् नानाभिलाषरूपान् सुखिदुःखीत्यादिपशुपक्षिमनुजतृणस्तम्बादीन् सर्वेषु भूतेषु येन पश्यति तज्ज्ञानं राजसं विक्षिप्तमानसात्मकं विद्धि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.21।।राजसं ज्ञानमाह -- पृथक्त्वेनेति। पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानमित्यस्यैव विवरणं सर्वेषु भूतेषु देहेषु नानाभावान्वस्तुत एवानेकान्क्षेत्रज्ञान् पृथग्विधान्सुखीदुःखीत्यादिरूपेण विलक्षणान् येन ज्ञानेन वेत्ति तज्ज्ञानं राजसं विद्धि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.21।।पृथक्त्वेनेति स्पष्टम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.21।।और जो ज्ञान? सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्नभिन्न प्रकारके भिन्नभिन्न भावोंको? आत्मासे अलग विलक्षण पृथक्रूपसे देखता है? अर्थात् प्रत्येक शरीरमें अलगअलग अपनेसे दूसरा आत्मा समझता है? उस ज्ञानको तू राजस यानी रजोगुणसे उत्पन्न हुआ जान। ज्ञानमें कर्तापन होना असम्भव है? इसलिये जो ज्ञान देखता है इसका आशय यह है कि जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य देखता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.21।। व्याख्या --   पृथक्त्वेन तु (टिप्पणी प0 904.1) यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् -- राजस ज्ञानमें राग की मुख्यता होती है -- रजो रागात्मकं विद्धि (गीता 14। 7)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है? उसमें किसीके प्रति आसक्ति? प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य? देवता? यक्षराक्षस? पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि जितने भी चरअचर प्राणी हैं? उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति? स्वभाव? नाम? रूप? गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलगअलग समझता है।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् -- इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलगअलग शरीरोंमें अन्तःकरण? स्वभाव? इन्द्रियाँ? प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलगअलग मानता है? वह ज्ञान राजस कहलाता है। राजस ज्ञानमें जडचेतनका विवेक नहीं होता। सम्बन्ध --   अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.21।।द्वैतदर्शनान्यपि कानिचिद्भवन्ति सत्त्वनिर्वृत्तानि सम्यञ्चीत्याशङ्क्याह -- यानीति। तेषामसम्यक्त्वे हेतुमाह -- राजसानीति। प्रतिदेहमन्यत्वेन भिन्नात्मनो येन ज्ञानेन जानाति तज्ज्ञानं राजसमिति व्याचष्टे -- भेदेनेति। पृथक्त्वं पृथग्विधत्वं च पुनरुक्तमित्याशङ्क्य हेतुहेतुमत्त्वेन विभागं विवक्षित्वाह -- भिन्नेति। ज्ञानस्य ज्ञानकर्तृत्वमयुक्तमित्याशङ्क्याह -- येनेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.21।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.21।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. ,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.21।। --,पृथक्त्वेन तु भेदेन प्रतिशरीरम् अन्यत्वेन यत् ज्ञानं नानाभावान् भिन्नान् आत्मनः पृथग्विधान् पृथक्प्रकारान् भिन्नलक्षणान् इत्यर्थः? वेत्ति विजानाति यत् ज्ञानं सर्वेषु भूतेषु? ज्ञानस्य कर्तृत्वासंभवात् येन ज्ञानेन वेत्ति इत्यर्थः? तत् ज्ञानं विद्धि राजसं रजोगुणनिर्वृत्तम्।।

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【 Verse 18.22 】

▸ Sanskrit Sloka: यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् | अतत्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ||

▸ Transliteration: yat tu kṛtsnavad ekasmin kārye saktaṁ ahaitukam | atattvārthavadalpaṁ ca tat tāmasamudāhṛtam ||

▸ Glossary: yat: that which; tu: but; kṛtsnavat: all in all; ekasmin: in one; kārye: work; saktaṁ: attached; ahaitukam: without cause; atattvārthavat: without reality; alpaṁ: very meager; ca: and; tat: that; tāmasaṁ: in the mode of darkness; udāhṛtam: is spoken

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.22 The irrational, baseless, and worthless knowledge by which one clings to one single effect as if it is everything, such knowledge is in the mode of darkness of ignorance.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.22।।किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित? वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है? वह तामस कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.22।। और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्य (शरीर) में ही आसक्त हो जाता है? मानो वह (कार्य ही) पूर्ण वस्तु हो तथा जो (ज्ञान) हेतुरहित (अयुक्तिक)? तत्त्वार्थ से रहित तथा संकुचित (अल्प) है? वह (ज्ञान) तामस है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.22 यत् which? तु but? कृत्स्नवत् as if it were the whole? एकस्मिन् one single? कार्ये to effect? सक्तम् attached? अहैतुकम् without reason? अतत्त्वार्थवत् without foundation in Truth? अल्पम् trivial? च and? तत् that?,तामसम् Tamasic (dark)? उदाहृतम् is declared.Commentary The knowledge which regards that each and every object or being exists by itself and is perfect by itself? is Tamasic.One single effect Such as the body? thinking it to be the Self? or an idol? taking it for God? and thinking that there is nothing higher than that.The naked Jains consider that the soul which dwells in the body is of the same size as that of the body. Some regard that Isvara is a mere piece of stone or wood. Such knowledge is really not based on reason. It does not see things in their true light. It is narrow (Alpam) as it is not founded on reason. It produces very small results too. It extends over a limited area and is not allcomprehensive. This knowledge is said to be Tamasic? as it is found in Tamasic persons who are devoid of the power of discrimination.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.22. That [instrument-of-knowledge], because of which, one, not realising the whole, gets indulged, without reason, in a particular activity, and which is unconcerned with the real nature of things and is insignificant - that is declared to be of the Tamas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.22 But that which clings blindly to one idea as if it were all, without logic, truth or insight, that has its origin in Darkness.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.22 But that knowledge is declared to be Tamasika which clings to one single act as if it were the whole, which is not founded on reason, and which is untrue and insignificant.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.22 But that (knowledge) is said to be born of tamas which is confined to one form as though it were all, which is irrational, not concern with truth and triivial.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.22 But that which clings to one single effect as if it were the whole, without reason, without foundation in Truth, and trivial that is declared to be Tamasic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18-20-22 Sarvabhutesu etc. upto samudahrtam. In the classified ones : i.e., [classified] as gods, human beings, etc. Considers as [really] different : i.e., with the thought 'Here on this depends my pleasure; here in that lies my displeasure'. Without reason : To take recourse to wrath, desire etc., slavishly under the influence of one's own addiction and also without examining the cause, in named as a thing born of the Tamas (Strand).

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.22 But that knowledge which clings to a 'single type of act' as what ought to be done, viz., act in the form of the worship of ghosts or evil spirits yielding very small fruits, as if it yielded all fruits; that work 'not founded on any reason for having attachment,' because it is not a source of all fruits; 'untrue' because it is based on a false view of things such as seeing differentiation in the nature of the Atman; 'insignificant', because the worship of ghosts and evil spirits yields poor results - for such reasons knowledge of this kind is declared to be Tamasika.

After having thus classified the threefold division of knowledge relating to work according to Gunas in respect of a person who is alified for work, Sri Krsna explains the triple division of the acts that ought to be done, according to Gunas.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.22 But tat, that knowledge; is udahrtam, said to be; tamasam, born of tamas; yat, which is; saktam, confined; ekasmin, to one; karye, from, to one body or to an external image etc., krtsnavat, as though it were all, as though it comprehended everything, thinking, 'The Self, or God, is only this much; there is nothing beyond it,'-as the naked Jainas hold that the soul conforms to and has the size of the body, or (as others hold) that God is merely a stone or wood-, remaining confined thus to one form; ahaitukam, which is irrational, bereft of logic; a-tattvarthavat, not concerned with truth-tattvartha, truth, means some-thing just as it is; that (knowledge) which has this (truth) as its object of comprehension is tattvarthavat; that without this is ; a-tattvarthavat-; and which, on account of the very fact of its being irrational, is alpam, trivial, because it is concerned with trifles or is productive of little result. This kind of knowledge is indeed found in non-discriminating creatures in whom tamas predominates. Now is being stated the threehold division of action:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.22।। तमोगुण के आधिक्य से अभिभूत बुद्धि किसी एक परिच्छिन्न कार्य में इस प्रकार आसक्त होती है मानो वह कार्य ही सम्पूर्ण सत्य हो। वह कभी कारण का विचार ही नहीं करती। तामसिक लोगों का यह ज्ञान अत्यन्त निम्नस्तरीय है। प्राय ऐसे लोग कट्टरवादी तथा अपने धर्म? भक्ति? जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों के विषय में अत्यन्त हठवादी होते हैं। वे जगत् का तथा अन्य घटनाओं के कारण का कभी अन्वेषण नहीं करते हैं। श्री शंकराचार्य कहते हैं कि इनका ज्ञान निर्युक्तिक होता है अर्थात् किसी प्रामाणिक युक्ति पर आश्रित नहीं होता।ऐसी भ्रमित कट्टरवादी और पूर्वाग्रहों से युक्त बुद्धि के द्वारा अवलोकन करते हुए तामसी लोग जगत् को कभी यथार्थ रूप में नहीं देख पाते। इतना ही नहीं? वरन् वे अपनी कल्पनाओं को जगत् पर थोपकर उसे सर्वथा विपरीत रूप में भी देखते हैं। वास्तव में? तमोगुणी लोग जगत् को मात्र अपने भोग का विषय ही मानते हैं। वे विश्व के अधिष्ठान परमात्मा की सर्वथा उपेक्षा करते हैं। मान और दम्भ के कारण उनका ज्ञान संकुचित होता है।सारांशत? द्वैतप्रपंच को देखते हुए उसके अद्वैत स्वरूप को पहचानना सात्त्विक ज्ञान है नामरूपमय सृष्टि के भेदों को ही देखना और उन्हें सत्य मानना राजस ज्ञान है और अपूर्ण को ही पूर्ण मानना तामस ज्ञान है।हमें इसका विस्मरण नहीं होना चाहिए कि पूर्वोक्त तथा आगे भी कथनीय त्रिविध वर्गीकरण का प्रयोजन अन्य लोगों के विश्लेषण के लिए न होकर? आत्मनिरीक्षण के लिए हैं। साधक को समयसमय पर स्वयं का मूल्यांकन करते रहना चाहिए।अब? कर्म की त्रिविधता का वर्णन करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.22।।राजसं ज्ञानमुदाहृत्य तामसं तदाह -- यत्त्विति। तुशब्दो राजसाद्वैलक्षण्यद्योतानार्थः। यत्तु ज्ञानमेकस्मिन्कार्ये देहे बहिर्वा प्रतिमादौ कृत्स्त्रवत्समस्तवत्परिपूर्णवत् एतावानेवात्मा ईश्वरो नातः परमस्तीति यथा चार्वाकादीनां शरीरानुर्तिदेहतपरिमाणो जीव ईश्वरो वा पाषाणदार्वादिमात्र इत्येवमभिनिवेशयुक्तं यतोऽहेतुकमुपपत्तिशून्यमहेतुकत्वादतत्त्वादतत्त्वार्थवत् यथाभूतोऽर्थस्तत्त्वार्थः सोऽस्य ज्ञेयभूतोऽस्तीति तत्त्वार्थवत् न तत्त्वार्थवदतत्त्वार्थवत्। तत एवाल्पं चाल्पविषयत्वादल्पफलत्वाद्वा तत्तामसानां प्राणिनां अविवेकिनां परिदृश्यमानमीदृशं ज्ञां हेयं तत्तामसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.22।।यत्त्विति। तुशब्दो राजसाद्भिनत्ति बहुषु भूतकार्येषु विद्यमाने एकस्मिन्कार्ये विकारे भूतदेहे प्रतिमादौ वा अहैतुकं हेतुरुपपत्तिस्तद्रहितमन्येषां भूतकार्याणामात्मत्वाभावे कथमेकस्य तादृशस्यात्मत्वमित्यनुसंधानशून्यं कृत्स्नवत्परिपूर्णवत्सक्तं एतावानेवात्मा ईश्वरो वा नातः परमस्तीत्यभिनिवेशेन लग्नं यथा दिगम्बराणां सावयवो देहपरिमाण आत्मेति? यथा चार्वाकाणां देह एवात्मेति एवं पाषाणदार्वादिमात्र ईश्वर इत्येकस्मिन्कार्ये सक्तमहेतुकत्वादेवातत्त्वार्थवन्न तत्त्वार्थालम्बनं अल्पंच नित्यत्वविभुत्वाग्रहात् ईदृशं नित्यविभुदेहातिरिक्तात्मतद्व्यतिरिक्तेश्वरग्राहितार्किकज्ञानविलक्षणमनित्यपरिच्छिन्नदेहाद्यात्माभिमानरूपं चार्वाकादीनां यज्ज्ञानं तत्तामसमुदाहृतं तामसानां प्राकृतजनानामीदृशज्ञानदर्शिभिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.22। यत्तु ज्ञानमेकस्मिन्कार्ये देहे प्रतिमादौ वा कृत्स्नवत्परीपूर्णवदेतावानेवात्मा ईश्वरो वेति सक्तमभिनिवेशयुक्तम्। अहैतुकं निरुपपत्तिकम्। अतत्त्वार्थवत् परमार्थावलम्बनशून्यम्। अल्पं तुच्छविषयत्वादल्पफलत्वाच्च। यदेवंभूतं ज्ञानं तत्तामसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.22।।तामसं ज्ञानमाह -- यत्त्विति। यत् एकस्मिन् कार्ये भक्ते लीलास्वरूपे वा कृत्स्नवत् पूर्णवत्? न तु सर्वलीलासामग्र्यादिविशिष्टार्विभूतभगवदनुभवानन्दभगवद्रूपत्वेन सक्तम्? असक्तम्? अहैतुकं भगवदाकारत्वेन,तत्स्मारकानन्दानुभवोपपत्तिरहितम्? अतत्त्वार्थवत् भगवदाविर्भाववियुक्तम्? अल्पं परिच्छिन्नं स्वरूपतः फलतश्च तज्ज्ञानं तामसं निष्फलं विपरीतफलं वा उदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.22।।तामसं ज्ञानमाह -- यत्त्विति। एकस्मिन्कार्ये देहे प्रतिमादौ वा कृत्स्नवत्परिपूर्णवत्सक्तमेतावानेवात्मा ईश्वरो वेत्यभिनिवेशयुक्तम्? अहैतुकं निरुपपत्तिकम्? अतत्त्वार्थवत्परमार्थावलम्बनशून्यम्? अतएवाल्पं तुच्छम् अल्पविषयत्वादल्पफलत्वाच्च। यदेवंभूतं ज्ञानं तत्तामसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.22।।यत्त्विति। एकस्मिन्कार्ये कर्त्तव्ये कर्मणि प्रेतभूतगणाद्याराधनरूपेऽत्यल्पफले निषप्रयोजनं कृत्स्नफलवत्सक्तं तत्तामसम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.22।।जो ज्ञान? किसी एक कार्यमें? शरीरमें या शरीरसे बाहर प्रतिमादिमें? सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्ण ज्ञानकी भाँति आसक्त है? अर्थात् ( यह समझता है कि ) यह आत्मा या ईश्वर इतना ही है इससे परे और कुछ भी नहीं है? जैसे दिगम्बर जैनियोंका ( माना हुआ ) आत्मा शरीरमें रहनेवाला और शरीरके बराबर है और पत्थर या काष्ठ ( की प्रतिमा ) मात्र ही ईश्वर है? इसी प्रकार जो ज्ञान किसी एक कार्यमें ही आसक्त है। तता जो हेतुरहित -- युक्तिरहित और तत्त्वार्थसे भी रहित है। यथार्थ अर्थका नाम तत्त्वार्थ है? ऐसा तत्त्वार्थ जिस ज्ञानका ज्ञेय हो? वह ज्ञान तत्त्वार्थयुक्त होता है और जो तत्त्वार्थयुक्त न हो वह अतत्त्वार्थवत् अर्थात् तत्त्वार्थसे रहित होता है। एवं जो हेतुरहित होनेके कारण ही अल्प है अथवा अल्पविषयक होनेसे या अल्प फलवाला होनेसे अल्प है? वह ज्ञान तामस कहा गया है क्योंकि अविवेकी तामसी प्राणियोंमें ही ऐसा ज्ञान देखा जाता है।।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.22।। व्याख्या --   यत्तु (टिप्पणी प0 904.2) कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम् -- तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पाञ्चभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था? मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा मैं भोगी? बलवान् और सुखी हूँ मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ मेरे समान दूसरा कौन है इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है -- इत्यज्ञानविमोहिताः (16। 15)।अहैतुकम् -- तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है? शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है? दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्योंकात्यों रहता है अतः यह शरीर और तू एक कैसे हो सकते हैं -- इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता।अतत्त्वार्थवदल्पं च -- यह शरीर और मैं दोनों अलगअलग हैं -- इस वास्तविक ज्ञान(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको ज्ञान कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है. अतः भगवान्ने ज्ञान पद न देकर यत् और तत् पदसे ही काम चलाया है।तत्तामसमुदाहृतम् -- युक्तिरहित? अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना तामस कहा गया है।जब तामस समझ ज्ञान है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ज्ञान कहनेमें संकोच हुआ है? तो फिर इसका वर्णन ही क्यों किया गया कारण कि भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें ज्ञानके त्रिविध भेद कहनेका उपक्रम किया है? इसलिये सात्त्विक और राजसज्ञानका वर्णन करनेके बाद तामस समझको भी कहनेकी आवश्यकता थी। सम्बन्ध --   अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.22।।सक्तत्वमेव व्यनक्ति -- एतावानिति। एकस्मिन्कार्ये ज्ञानस्य सक्तत्वमेव दृष्टान्तेन साधयति -- यथेत्यादिना। यन्निर्युक्तिकत्वं तदेव ज्ञानस्याभासत्वे कारणमित्याह -- अहैतुकत्वादिति। स्वरूपतो विषयतश्चाभासत्वं फलतो वेत्याह -- अल्पेमिति। तामसं ज्ञानमुक्तलक्षणमित्यत्रानुभवं प्रमाणयति -- तामसानां हीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.22।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.22।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. ,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.22।। --,यत् (तु गी0 में) ज्ञानं कृत्स्नवत् समस्तवत् सर्वविषयमिव एकस्मिन् कार्ये देहे बहिर्वा प्रतिमादौ सक्तम् एतावानेव आत्मा ईश्वरो वा? न अतः परम् अस्ति इति? यथा नग्नक्षपणकादीनां शरीरान्तर्वर्ती देहपरिमाणो जीवः? ईश्वरो वा पाषाणदार्वादिमात्रम्? इत्येवम् एकस्मिन् कार्ये सक्तम्? अहैतुकं हेतुवर्जितं निर्युक्तिकम्? अतत्त्वार्थवत् अयथाभूतार्थवत्? यथाभूतः अर्थः तत्त्वार्थः? सः अस्य ज्ञेयभूतः अस्तीति तत्त्वार्थवत्? न तत्त्वार्थवत् अतत्त्वार्थवत् अहैतुकत्वादेव अल्पं च? अल्पविषयत्वात् अल्पफलत्वाद्वा। तत् तामसम् उदाहृतम्। तामसानां हि प्राणिनाम् अविवेकिनाम् ईदृशं ज्ञानं दृश्यते।।अथ इदानीं कर्मणः त्रैविध्यम् उच्यते --,

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【 Verse 18.23 】

▸ Sanskrit Sloka: नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषत: कृतम् | अफलप्रेप्सुना कर्म यतत्सात्विकमुच्यते ||

▸ Transliteration: niyataṁ saṅgarahitam arāgadveṣataḥ kṛtam | aphalaprepsunā karma yat tat sāttvikamucyate ||

▸ Glossary: niyataṁ: regulative; saṅgarahitaṁ: without attachment; arāgadveṣataḥ: without love or hatred; kṛtam: done; aphalaprepsunā: without fruitive result; karma: acts; yat: which; tat: that; sāttvikaṁ: in the mode of goodness; ucyate: is called

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.23 Obligatory duty performed without likes and dislikes and without selfish motives and attachment to the fruit, is in the mode of goodness.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.23।।जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ हो? वह सात्त्विक कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.23।। जो कर्म (शास्त्रविधि से) नियत और संगरहित है? तथा फल को न चाहने वाले पुरुष के द्वारा बिना किसी राग द्वेष के किया गया है? वह (कर्म) सात्त्विक कहा जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.23 नियतम् ordained? सङ्गरहितम् free from attachment? अरागद्वेषतः without love or hatred? कृतम् done? अफलप्रेप्सुना by one not desirous of the fruit? कर्म action? यत् which? तत् that? सात्त्विकम् Sattvic (pure)? ुच्यते is declared.Commentary Niyatam Ordained Obligatory. One is not excited to perform an obligatory action through love or hatred.This is a pure act. The performer of such pure action experiences great joy. He does his duty or any other work wholeheartedly not caring for the reward but offering it willingly at the feet of the Lord. He works in accordancw with the dictates of the scriptures. Now I will explain to thee? O Arjuna? the nature of action which is Rajasic or passionate. Do thou listen to Me with rapt attention.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.23. The object that has been acired with determination, without attachment and without desire or hatred, by one who does not crave to reap the fruit [of his action] - that is declared to be of the Sattva (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.23 An obligatory action done by one who is disinterested, who neither likes nor dislikes it, and gives no thought to the consequences that follow, such an action is Pure.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.23 That obligatory act is said to be Sattvika which is done without attachment, without desire or aversion, by one who seeks no fruit.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.23 The daily obligatory action which is performed without attachment and without likes or dislikes by one who does not hanker for rewards, that is said to be born of sattva.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.23 An action which is ordained, which is free from attachment, and which is done without love or hatred by one who is not desirous of any reward that action is declared to be Sattvic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.23 See Comment under 18.25

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.23 'Obligatory act' is that which is appropriate to one's own station and stage of life. Doing it 'without attachment' means devoid of attachment to agency etc., and 'without desire or aversion' means that it is not done through desire to win fame and aversion to win notoriety, i.e., is performed without ostentation - when obligatory works are performed in the above-mentioned way by one who is not after their fruits, they are said to be Sattvika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.23 Niyatam, the daily obligatory; karma, action; yat, which; is krtam, performed; sanga-rahitam, without attachment; araga-dvesatah, without likes or dislikes; aphala-prepsuna, by one who does not hanker for rewards, by an agent who is the opposite of one who is desirous of the fruits of action; tat, that (action); ucyate, is said to be; sattvikam, born of sattva.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.23।। त्रिविध कर्मों में सात्त्विक कर्म सर्वश्रेष्ठ है? जो कर्ता के मन में शान्ति तथा उसके कर्मक्षेत्र में सामञ्जस्य उत्पन्न करता है। प्राय मनुष्य फल में आसक्त होकर अपने व्यक्तिगत राग और द्वेष से प्रेरित होकर कर्म करता है। परन्तु यहाँ कहा गया है कि नियत अर्थात् कर्तव्य कर्म को अनासक्त भाव से तथा राग द्वेष से रहित होकर करने पर ही वह सात्त्विक कर्म कहलाता है। सात्त्विक पुरुष कर्म को इसीलिए करता है? क्योंकि कर्म कर्तव्य है और वही ईश्वर की पूजा है। ऐसी भावना और प्रेरणा से युक्त होने पर मनुष्य अपनी ही सामान्य कार्यकुशलता एवं श्रेष्ठता से कहीं अधिक ऊँचा उठ जाता है। अर्पण की भावना से किये गये कर्मों में राग और द्वेष का प्रश्न ही नहीं उठता।समस्त साधु सन्तों का सेवाकार्य इस तथ्य का प्रमाण है। अनेक अवसरों पर हम भी इसी भावना से कर्म करते हैं। ऐसा विशिष्ट उदाहरण? उस अवसर का है जब हमारे पैर में कोई चोट लग जाती है। उस समय हम झुक कर पैर को देखने लग जाते हैं और शरीर के समस्त अंग उसकी सेवा में जुट जाते हैं। इस सेवा कार्य में हम यह नहीं कह सकते कि हमें अपने पैर से अन्य अंगों की अपेक्षा अधिक प्रेम है। मनुष्य अपने सम्पूर्ण शरीर में निवास करता है और उसके लिए शरीर के सभी अंग समान होते हैं।इसी प्रकार? जो सात्त्विक पुरुष एकमेव अद्वितीय? सच्चित्स्वरूप सर्वव्यापी परमात्मा को आत्मस्वरूप में पहचान लेता है? तो उस पुरुष के लिए कोढ़ी और राजकुमार? स्वस्थ और अस्वस्थ? दरिद्र और सम्पन्न ये सभी लोग अपने आध्यात्मिक शरीर के विभिन्न अंगों के समान ही प्रतीत होते हैं। ऐसा पुरुष अनुप्राणित आनन्द और कृतार्थता की भावना से जगत् की सेवा करता है।इस प्रकार? सात्त्विक कर्मों की पूर्णता उनके करने में ही होती है। फलप्राप्ति का विचार भी उसमें उत्पन्न नहीं होता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.23।।एवं ज्ञानत्रैविध्यं विभज्य कर्मत्रैविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विक कर्मोदाहरति। नियतं नित्यमवश्यकर्तव्यतया विहितं सङ्गरहितमासक्तिवर्जितमभिनिवेशशून्यमरागद्वेषतः कृतं रागो विषयप्रेप्साकारणभूता रञ्जनात्मिका चित्तवृत्तिः तत्प्रयुक्तेन द्वेषप्रयुक्तेन च कृतं रागद्वेषतः कृतं तद्विपरीतमरागद्वेषतः कृतं फलं प्रेपसतीति फलप्रेप्सुः फलतृष्णः तद्विपरीतेनाऽफलप्रेप्सुना कर्त्रा यत्कर्म कृतं तत्सात्त्विकमुच्यते। फल्गु च लीयते चेति फलं क्रियया प्राप्यं अनात्मवस्तु तंदन्यदफलमनागन्तुकं परिपूर्णमविनाशि आत्मतत्त्वं तत्प्रेप्सुना कृतंविविदिषन्ति यज्ञेन इति श्रुत्या आत्मलाभार्थं यज्ञादेर्विनियोगादित्यन्ये। आचार्यैस्तु कामेप्सुनेत्युत्तराननुरोधक्लिष्टकल्पनाग्रस्तोऽयं पक्ष इत्यभिप्रेत्योपेक्षितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.23।।तदेवमौपनिषदानामद्वैतात्मदर्शनं सात्त्विकमुपादेयं मुमुक्षुभिर्द्वैतदर्शिनां तु नित्यविभु परस्परविभिन्नात्मदर्शनं राजसमनित्यपरिच्छिन्नात्मदर्शनं च तामसं हेयमुक्तं? संप्रति त्रिविधं कर्मोच्यते -- नियतमिति। नियतं यावदङ्गोपसंहारासमर्थानामपि फलावश्यंभावव्याप्तं नित्यमिति यावत्। सङ्गोऽहमेव महायाज्ञिक इत्याद्यभिमानरूपोऽहंकारापरपर्यायो राजसो गर्वविशेषस्तेन शून्यं सङ्गरहितं यावदज्ञानं तु कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रवर्तनोऽहंकारोऽनुवर्तत एव सात्त्विकस्यापि तद्रहितस्य तत्त्वविदो न कर्माधिकार इत्युक्तमसकृत्। रागो राजसन्मानादिकमनेन लप्स्य इत्यभिप्रायः? द्वेषः शत्रुमनेन पराजेष्य इत्यभिप्रायस्ताभ्यां न कृतमरागद्वेषतः कृतमफलप्रेप्सुना फलाभिलाषरहितेन कर्त्रा यत्कृतं कर्म यागदानहोमादि तत्सात्त्विकमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.23।।अथ कर्मत्रैविध्यमाह -- नियतमित्यादिना। नियतं नित्यम् सङ्गरहितमभिमानवर्जितम्। राग इष्टे प्रीतिर्द्वेषोऽनिष्टेऽप्रीतिस्ताभ्यां कृतमिष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारार्थं कृतं रागाद्वेषतः कृतं तदन्यदरागद्वेषतः कृतं निष्काममित्यर्थः। फल्गु च लीयते चेति फलं क्रियया प्राप्यमनात्मवस्तु तदन्यदफलमनागन्तुकं परिपूर्णमविनाशि आत्मतत्त्वं तत्प्रेप्सुना कृतंविविदिषन्ति यज्ञेन इति श्रुत्या आत्मलाभार्थं यज्ञादेर्विनियोगात्। तत्कर्म सात्त्विकमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.23।।एवं ज्ञानस्वरूपमुक्त्वा त्रिविधकर्मरूपमाह -- नियतमिति। नियतं नित्यं? सङ्गरहितम् अज्ञानासक्तिरहितम्? अरागद्वेषतः कृतं संसारानुरागेण शत्रुमारणाद्यर्थं द्वेषेण रहितम्? अफलप्रेप्सुना फलानभिलाषेण भगवत्तोषहेतुत्वेन कृतं कर्म (यत्) तत् सात्त्विकमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.23।।इदानीं त्रिविधं कर्माह -- नियतमिति त्रिभिः। नियतं नित्यतया विहितं? सङ्गरहितमभिनिवेशशून्यं? अरागद्वेषतः पुत्रादिप्रीत्या वा शत्रुद्वेषेण वा यत्कृतं न भवति फलं प्राप्तुमिच्छतीति फलप्रेप्सुस्तद्विलक्षणेन निष्कामेण कर्त्रा यत्कृतं कर्म,तत्सात्त्विकमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.23।।इदानीमनुष्ठेयकर्मणो गुणतस्त्रैविध्यमाह -- नियतमिति। श्रुतौ स्ववर्णाश्रमोदितं कर्त्तृत्वादिसङ्गरहितं रागद्वेषौ कीर्त्यकीर्त्तिविषयौ तदभावतः कृतमिति ममत्वपरित्यागपूर्वकं अफलप्रेप्सुना यत्कृतं कर्म तत्सात्त्विकम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.23।।अब कर्मके तीन भेद कहे जाते हैं --, जो कर्म नियत -- नित्य है तथा सङ्ग -- आसक्तिसे रहित है और फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना रागद्वेषके किया गया है? वह सात्त्विक कहा जाता है। जो कर्म रागसे या द्वेषसे प्रेरित होकर किया जाता है? वह रागद्वेषसे किया हुआ कहलाता है और जो उससे विपरीत है वह बिना रागद्वेषके किया हुआ है। जो कर्ता कर्मफलको चाहता है? वह कर्मफलप्रेप्सु अर्थात् कर्मफलकी तृष्णावाला होता है और जो उससे विपरीत है वह कर्मफलको न चाहनेवाला है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.23।। व्याख्या --   नियतं सङ्गरहितम् ৷৷. सात्त्विकमुच्यते -- जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है? उसके लिये वह कर्म नियत हो जाता है।यहाँ नियतम् पदसे एक तो कर्मोंका स्वरूप बताया है और दूसरे? शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।सङ्गरहितम् पदका तात्पर्य है कि वह नियतकर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता? पर उनकी भी ऋतु आनेपर पत्तोंका झड़ना? नये पत्तोंका निकलना? शाखा कटनेपर घावका मिल जाना? शाखाओंका बढ़ना? फलफूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप ही होती हैं ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़नाघटना? खानापीना? चलनाफिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप हो रही हैं। इन क्रियाओँके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है? न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है? तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है? वह सङ्गरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है। ,यहाँ सांख्यप्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे अरागद्वेषतः कृतम् पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ सङ्गरहितम् पदका अर्थ कर्तृत्वअभिमानरहित लिया गया है (टिप्पणी प0 905)।अरागद्वेषतः कृतम् पदोंका तात्पर्य है कि रागद्वेषसे रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा कर्म करनेके जितने साधन (शरीर? इन्द्रियाँ? अन्तःकरण आदि) हैं? उनमें भी रागद्वेष न हो।अरागद्वेषतः पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया है और अफलप्रेप्सुना पदसे भविष्यमें रागका अभाव बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छासे रहित

Chapter 18 (Part 15)

मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असङ्गतापूर्वक कर्म किया जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है? जबतक अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? तब यह कर्म अकर्म हो जाता है। सम्बन्ध --   अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.23।।त्रिविधं कर्म वक्तुमनन्तरश्लोकत्रयमित्याह -- अथेति। तत्र सात्त्विकं कर्म निरूपयति -- नियतमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.23।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.23।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.23।। --,नियतं नित्यं सङ्गरहितम् आसक्तिवर्जितम् अरागद्वेषतःकृतं रागप्रयुक्तेन द्वेषप्रयुक्तेन च कृतं रागद्वेषतःकृतम्? तद्विपरीतम् अरागद्वेषतःकृतम्? अफलप्रेप्सुना फलं प्रेप्सतीति फलप्रेप्सुः फलतृष्णः तद्विपरीतेन अफलप्रेप्सुना कर्त्रा कृतं कर्म यत्? तत् सात्त्विकम् उच्यते।।

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【 Verse 18.24 】

▸ Sanskrit Sloka: यत्तुकामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुन: | क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ||

▸ Transliteration: yat tu kāmepsunā karma sāhaṁkāreṇa vā punaḥ | kriyate bahulāyāsaṁ tad rājasamudāhṛtam ||

▸ Glossary: yat: that which; tu: but; kāmepsunā: with fruitive result; karma: work; sāhaṁkāreṇa: with ego; vā: or; punaḥ: again; kriyate: performed; ba- hulāyāsaṁ: with great labor; tat: that; rājasaṁ: in the mode of passion; udāhṛtam: is said to be

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.24 Action performed with ego, with selfish motives, and with too much effort, is in the mode of aggression.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.24।।परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है? वह राजस कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.24।। और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा फल की कामना वाले? अहंकारयुक्त पुरुष के द्वारा किया जाता है? वह कर्म राजस कहा गया है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.24 यत् which? तु but? कामेप्सुना by one longing for desires? कर्म action? साहङ्कारेण with egoism? वा or? पुनः again? क्रियते is performed? बहुलायासम् with much effort? तत् that? राजसम् Rajasic (passionate)? उदाहृतम् is declared.Commentary A passionate man performs various selfish actions. He boasts of his actions in public. Passion prompts him to do them. He can never work without expectation of a reward.Kamepsuna? phalepsuna The Rajasic or passionate man expects pleasures as fruits of action. A liberated sage alone is absolutely free from egoism. He will not dream even of a reward for the action? because all his desires are gratified when he realises Brahman. He is an Aptakama. (Aptakamasya ka spriha) How can there be longing or craving in a sage in whom all desires are gratified or burnt by the fire of SelfknowledgeEven the performer of a pure act? who has no knowledge of the Self is egoistic. If such be the case? the Rajasic and Tamasic workers are much more egoistic. In worldly parlance we speak of a learned Pundit This Pundit is a very modest? unassuming? and egoless Brahmana.Now listen? O Arjuna? to the characteristics of action that is of darkness.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.24. The object which is abundant in afflictions; and which is further reired by one who craves to attain the desired thing with the feeling of 'I'-that is considered to be of the Rajas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.24 But even though an action involve the most strenuous endeavour, yet if the doer is seeking to gratify his desires, and is filled with personal vanity, it may be assumed to originate in Passion.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.24 But that act is said to be Rajasika which is performed with great effort by one who seeks to gratify his desires and under the prompting of egoism.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.24 But that action is said to be born of rajas which is done by one desirous of results or by one who is egotistic, and which is highly strenuous.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.24 But that action which is done by one longing for the fulfilment of desires or gain with egoism or with much effort that is declared to be Rajasic (passionate).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.24 See Comment under 18.25

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.24 But whatever act is performed by one who seeks to gratify his desires, viz., by one who desires the results of his action and with the feeling of egoism, viz., has the misconceived notion that oneself is the agent; and with a great deal of effort - such an act is of the nature of Rajas. Here va (or) is used in the sense of ca (and). Whatever action is performed by one who possesses the misconceived notion, 'This action demanding enormous effort is performed entirely by me' - it is said to be Rajasika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.24 But tat, that; karma, action; udahrtam, is said to be; rajasam, born of rajas; yat, which; is kriyate, done; kamepsuna by one desirous of results; va, or; saahankarena, by one who is egotistic; and bahulaayasam, which is highly strenuous, accomplished by the agent with great effort. 'Egotistic' is not used in contrast to knowledge of Truth. What then? It is used in contrast to the absence of egotism in an ordinary person versed in the Vedic path. For in the case of the knower of the Self, who is not egotistic in the real sense, there is no estion of his being desirous of results or of being an agent of actions reiring great effort. Even of actions born of sattva, the agent is one who has not realized the Self and is possessed of egoism; what to speak of actions born of rajas and tamas! In common parlance, a person versed in the Vedic path, even though not possessing knowledge of the Self, is spoken of as being free from egotism thus-'This Brahmana is free from egotism'. Therefore, 'sahan-karena va' is said in contrast to him only. Punah (again) is used to complete the meter.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.24।। राजसिक कर्म मैं कर्ता हूँ की भावना से प्रेरित? अहंकार से युक्त स्वार्थ और परिश्रम से परिपूर्ण होते हैं। इनका कर्ता अत्याधित तनाव और दबाव में रहता है।इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है। राजनीतिक नेताओं? सामाजिक कार्यकर्ताओं? बड़ेबड़े उद्योगपतियों अत्यधिक चिन्तित पालकों? कट्टर धर्म प्रचारकों? धर्म परिवर्तन कराने वाली मिशनरियों तथा अन्धाधुन्ध धन कमाने वालों के प्राय समस्त कर्म राजस श्रेणी में ही आते हैं। कभीकभी तो वे तमोगुण के स्तर तक भी गिर जाते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.24।।सात्त्विकं कर्मोकत्वा राजसं तदुदाहरति -- यत्त्विति। सात्त्विकाद्वैलक्षण्यद्योतकस्तुः। कामेप्सुना फलेप्सुना साहंकारेण वा पुनः मत्समः कोऽन्यः श्रोत्रियोऽस्तीत्येवमहंकाराभिनिवेशेन तत्त्वज्ञानवतो निरहंकारस्य कर्मकर्तृत्वमपेक्ष्य साहंकारेणेति न भ्रमितव्यं तस्य कर्मण्यनधिकृतत्वात्। किंतु मत्सदृशोऽन्यः श्रोत्रियो नास्तीत्यभिमानरहितोऽनात्मविदपि लोके निरहंकार इत्युच्यमानो यस्तमपेक्ष्य साहंकारेण वा पुनरित्युच्यते। बहुलायासं महता आयासेन क्लेशेन निर्वर्त्यं यत्कर्म क्रियते तद्राजसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.24।।यत्त्विति। तुः सात्त्विकाद्भिनत्ति। कामेप्सुना फलकामेन कर्त्रा साहंकारेण प्रागुक्तसङ्गात्मकगर्वयुक्तेन च। वाशब्दः समुच्चये। पुनरित्यनियतं यावत्कामनं काम्यावृत्तेः बहुलायासं सर्वाङ्गोपसंहारेण क्लेशावहं यत्काम्यं कर्म क्रियते तद्राजसमुदाहृतम्। अत्र संर्वैर्विशेषणैः सात्त्विकसर्वविशेषणव्यतिरेको दर्शितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.24।।यत्तु कामेप्सुना फलार्थिना साहंकारेण। यद्यपि सात्त्विकोऽप्यनात्मवित्साहंकारस्तथाप्यहमेव कर्मकुशलो महान् श्रोत्रिय इत्यभिमानोऽहंकारस्तद्वता साहंकारेण। वा शब्दश्चार्थे। क्रियते बहुलायासमतिश्रमकरं तत्कर्म राजसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.24।।राजसं कर्माऽऽह -- यत्त्विति। यत् पुनः कर्म कामेप्सुना फलप्राप्त्यभिलाषेण वा? फलाभिलाष৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷.रहितेन साहङ्कारेण लोकेषु स्वमहत्त्वख्यापनाय पुनः बहुलायासं अतिक्लेशयुक्तं शारीरोपद्रवसहितं क्रियते तत् कर्म राजस मुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.24।।राजसं कर्माह -- यत्त्विति। यत्तु कर्म कामेप्सुना फलं प्राप्तुमिच्छता? साहंकारेण वा मत्समः कोऽन्यः श्रोत्रियोऽस्तीत्येवं निरूढाहंकारयुक्तेन च क्रियते? यच्च पुनर्बहुलायासमतिक्लेशयुक्तं तत्कर्म राजसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.24।।यत्त्विति। कामेप्सुना फलेप्सुना कर्तृत्वाद्यहङ्कारपूर्वकेन वाममेदं फलजनकं कर्म इति बहुल आयासो यत्र तद्राजसम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.24।।जो कर्म? भोगरूप फलकी इच्छावाले पुरुषद्वारा या अहंकारयुक्त पुरुषद्वारा ( किया जाता है )। इस श्लोकमें साहंकारेण पद तत्त्वज्ञानकी अपेक्षासे नहीं है। तो क्या है वेदशास्त्रको जाननेवाले लौकिक निरहंकारीकी अपेक्षासे है क्योंकि जो वास्तविक निरहंकारी आत्मवेत्ता है? उसमें तो फलेच्छुकता और बहुत परिश्रमयुक्त कर्तृत्वकी आशंका ही नहीं हो सकती। सात्त्विक कर्मका भी कर्ता? आत्मतत्त्वको न जाननेवाला अहंकारयुक्त मनुष्य ही होता है? फिर राजसतामस कर्मोंके कर्ताकी तो बात ही क्या है संसारमें आत्मतत्त्वको न जाननेवाला भी? वेदशास्त्रका ज्ञाता पुरुष निरहंकारी कहा जाता है। जैसे अमुक ब्राह्मण निरहंकारी है ऐसा प्रयोग होता है। सुतरां ऐसे पुरुषकी अपेक्षासे ही इस श्लोकमें साहंकारेण वा यह वचन कहा गया है। पुनः शब्द पादपूर्ण करनेके लिये है। तथा जो कर्म बहुत परिश्रमसे युक्त है? अर्थात् करनेवाला जिसको बहुत परिश्रमसे कर पाता है? वह कर्म राजस कहा गया है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.24।। व्याख्या --   यत्तु (टिप्पणी प0 906) कामेप्सुना कर्म -- हम कर्म करेंगे तो हमें पदार्थ मिलेंगे? सुखआराम मिलेगा? भोग मिलेंगे? आदरसम्मानबड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छावाले व्यक्तिके द्वारा कर्म किया जाय।साहंकारेण -- लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग देखते हैं और वाहवाह करते हैं तो अभिमान आता है और जहाँ लोग सामने नहीं होते? वहाँ (एकान्तमें) कर्म करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता? विशेषता देखकर अभिमान आता है। जैसे -- दूसरे आदमी हमारी तरह सुचारुरूपसे साङ्गोपाङ्ग कार्य नहीं कर सकते हमारेमें काम करनेकी जो योग्यता? विद्या? चतुरता आदि है? वह हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी हम जो भी काम करते हैं? उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं? आदिआदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस कहलाता है।वा पुनः -- आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया जाय -- इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह कर्म राजस हो जाता है? यह बतानेके लिये यहाँ वा पुनः पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और अहंकार -- इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म राजस हो जाता है? तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस हो ही जायगा। क्रियते बहुलायासम् -- कर्म करते समय हरेक व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है? पर जिस व्यक्तिमें शरीरके सुखआरामकी इच्छा मुख्य होती है? उसको कर्म करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है? पर शारीरिक सुखआरामकी इच्छा मुख्य नहीं है? अर्थात् सुखआराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है? उसको कर्म करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है शरीरकी तरफ नहीं। तात्पर्य है कि शरीरके सुखआरामकी मुख्यता होनेसे फलेच्छाकी अवहेलना हो जाती है और फलेच्छाकी मुख्यता होनेसे शरीरके सुखआरामकी अवहेलना हो जाती है।लोगोंके सामने कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक मिलनेसे और शरीरके सुखआरामकी मुख्यता न होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें परिश्रम नहीं मालूम देता। परन्तु एकान्तमें कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक न मिलनेसे और शरीरके सुखआरामकी मुख्यता होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।तद्राजसमुदाहृतम् -- ऐसे फलकी इच्छावाले मनुष्यके द्वारा अहंकार और परिश्रमपूर्वक किया हुआ जो कर्म है? वह राजस कहा गया है। सम्बन्ध --   अब तामस कर्मका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.24।।राजसं कर्म निर्दिशति -- यत्त्विति। फलप्रेप्सुना कर्त्रा यत्कर्म क्रियते तद्राजसमित्युत्तरत्र संबन्धः। तत्त्वज्ञानवता निरहंकारेण साहंकारेण तत्वज्ञेन क्रियते कर्मेति विवक्षां वारयति -- साहंकारेणेति। तत्त्वज्ञानवता निरहंकारेण कृतं कर्मापेक्ष्य साहंकारेणाज्ञेन कृतमेतत्कर्मेति न विवक्ष्यते चेत्तर्हि किमत्र विवक्षितमिति पृच्छति -- किं तर्हीति। यो हि दुरितरहितः श्रोत्रियो लोकादनपेतस्तस्य यदहंकारवर्जितं कर्म तदपेक्षयेदं साहंकारेण कृतं कर्मेत्युक्तमित्याह -- लौकिकेति। ननु तत्त्वज्ञानवतो निरहंकारस्य कर्मकर्तृत्वमपेक्ष्य साहंकारेणेत्यादि किं नेष्यते तत्राह -- यो हीति। विशेषणान्तरवशादेव तत्त्वविदो निवारितत्वान्न तदपेक्षमिदं विशेषणमित्यर्थः। साहंकारस्यैव राजसे कर्मणि कर्तृत्वमित्येतत्कैमुतिकन्यायेन साधयति -- सात्त्विकस्येति। नन्वात्मविदोऽन्यस्य निरहंकारत्वायोगात्कथं तदपेक्षया साहंकारेणेत्युक्तं तत्राह -- लोक इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.24।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.24।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.24।। --,यत्तु कामेप्सुना कर्मफलप्रेप्सुना इत्यर्थः? कर्म साहंकारेण (वा गी0) इति न तत्त्वज्ञानापेक्षया। किं तर्हि लौकिकश्रोत्रियनिरहंकारापेक्षया। यो हि परमार्थनिरहंकारः आत्मवित्? न तस्य कामेप्सुत्वबहुलायासकर्तृत्वप्राप्तिः अस्ति। सात्त्विकस्यापि कर्मणः अनात्मवित् साहंकारः कर्ता? किमुत राजसतामसयोः। लोके अनात्मविदपि श्रोत्रियो निरहंकारः उच्यते निरहंकारः अयं ब्राह्मणः इति। तस्मात् तदपेक्षयैव साहंकारेण वा इति उक्तम्। पुनःशब्दः पादपूरणार्थः। क्रियते बहुलायासं कर्त्रा महता आयासेन निर्वर्त्यते? तत् कर्म राजसम् उदाहृतम्।।

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【 Verse 18.25 】

▸ Sanskrit Sloka: अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् | मोहादारभ्यते कर्म यतत्तामसमुच्यते ||

▸ Transliteration: anubandhaṁ kṣayaṁ hiṁsām anapekṣya ca pauruṣam | mohād ārabhyate karma yat tat tāmasamucyate ||

▸ Glossary: anubandhaṁ: future bondage; kṣayaṁ: destruction; hiṁsām: violence; ana- pekṣya: without consideration of consequences; ca: also; pauruṣam: ability; mohāt: by illusion; ārabhyate: begun; karma: work; yat: which; tat: that; tāma- saṁ: in the mode of ignorance; ucyate: is said to be

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.25 Action that is undertaken because of delusion, disregard- ing consequences, loss, injury to others, as well as one’s own ability, is in the mode of ignorance.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.25।।जो कर्म परिणाम? हानि? हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है? वह तामस कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.25।। जो कर्म परिणाम? हानि? हिंसा और सार्मथ्य (पौरुषम्) का विचार न करके केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है? वह कर्म तामस कहलाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.25 अनुबन्धम् conseence? क्षयम् loss? हिंसाम् injury? अनपेक्ष्य without regard? च and? पौरुषम् (ones own) ability? मोहात् from delusion? आरभ्यते is undertaken? कर्म action? यत् which? तत् that? तामसम् Tamasic (dark)? उच्यते is said.Commentary Tamasic acts cause harm to others. A Tamasic man reflects not at all whether he has the capacity to perform these useless actions? but continues to act blindly. With utter thoughtlessness he sets aside any reflection as to the difficulty of performing the action and what the result of it would be. He carries it on in his own egoistical manner. He does not discriminate between the good and the bad? or what is ones own and what belongs to another.Kshayam Loss of power and of wealth? resulting from the performance of an action.Himsa Injury to living beings.Paurusham Ones own ability or capacity to complete the work.Now listen to the characteristics that pertain to the pure agent. The Lord proceeds to deal with the distinction among the agents.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.25. The object which is gained, due to ignorance, without considering the result, the loss, the injury to others and the strength [of one's own]-that is declared to be of the Tamas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.25 An action undertaken through delusion, and with no regard to the spiritual issues involved, or the real capacity of the doer, or to the injury which may follow, such an act may be assumed to be the product of Ignorance.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.25 That act is said to be Tamasika which is undertaken through delusion, without regard to conseences, loss, injury and one's own capacity.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.25 That action is said to be born of tamas which is undertaken out of delusion, (and) without consideration of its conseence, loss, harm and ability.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.25 That action which is undertaken from delusion, without a regard for the conseences, loss, injury and (one's own) ability that is declared to be Tamasic (dark).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.23-25 Niyatam etc. : upto Tamasam ucyate. With determination : i.e., it is a thing to be acired. Abundant in offlictions : spread through by nescience etc. Due to ignorance : i.e. due to that which is born of addiction.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.25 'Anubandha' or conseence is here the pain which follows when a work is performed. 'Loss' means loss of wealth involved in doing that act. 'Injury' is the pain caused to living beings when the work is carried out. 'Capacity' is the ability of completing the act. Whenever an act is begun without consideration of these and from delusion, viz., due to ignoring the agency of the Supreme Person - that act is said to be Tamasika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.25 Tat, that; karma, action; yat, which; is arabhyate, undertaken; mohat, out of delusion, non-discrimination; anapeksya, without consideration of; its anubandham, conseence, the result which accrues later; ksayam, loss-that losss which is incurred in the form of loss of energy or loss of wealth in the course of any action; himsam, harm, suffering to creatures; and paurusam, ability, prowess-one's own ability fest as, 'I shall be able to complete this task';-without consideration of these, from 'conseence' to 'ability', ucyate, is said to be; tamasam, born of tamas.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.25।। तमोगुणी पुरुष कर्म प्रारम्भ करने के पूर्व इस बात का विचार ही नहीं करता कि उस कर्म का परिणाम (अनुबन्ध) क्या होगा तथा उसके करने में कितनी शारीरिक? आर्थिक आदि शक्तियों का क्षय अर्थात् ह्रास होगा। उसे इस बात की भी कोई चिन्ता नहीं होती कि उसके कर्म के कारण कितनी हिंसा हो रही है अथवा लोगों को कष्ट हो रहा है। ऐसे प्रमादी और उत्तरदायित्वहीन लोगों के कर्म मोहवश अर्थात् किसी भ्रान्त धारणा और हीन उद्देश्य से प्रेरित होते हैं। उदाहरणार्थ? मद्यपान? दुसाहसपूर्ण द्यूत? भ्रष्टाचार आदि ये सब तामस कर्म हैं। ऐसे कर्मों के कर्ता केवल क्षणभर के वैषयिक सुख की संवेदना ही चाहते हैं।राजस कर्म के निराशा और दुखरूप फल को प्राप्त होने में कुछ काल की आवश्यकता होती है? परन्तु तामस कर्म का दुखरूप फल तत्काल ही प्राप्त होता है। जबकि सात्त्विक कर्म का फल सदैव आनन्द ही होता है।आगामी श्लोकों में? भगवान् श्रीकृष्ण तीन प्रकार के कर्ताओं का वर्णन करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.25।।राजसं कर्मोदाहृत्य कर्मोदाहृत्य तामसं तदाह -- अनुबन्धमिति। अनुबध्यत इत्यनुबन्धः पश्चाद्भाविस्तु तं क्षयं शक्त्यर्थादेर्नाशं हिंसां प्राणिपीडां च पौरुषं पुरुषकारमारब्धसमाप्तिसामर्थ्यमित्येतान्यनुबन्धादीन्यनवेक्ष्यापर्यालोच्य मोहादविवेकाद्यत्कर्म प्रारभ्यते तत्तामसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.25।।अनुबन्धेनेति। अनुबन्धं पश्चाद्भाव्यशुभं? क्षयं शरीरसामर्थ्यस्य धनस्य सेनायाश्च नाशम्? हिंसां प्राणिपीडाम्? पौरुषमात्मसामर्थ्यं चानवेक्ष्यापर्यालोच्य मोहात्केवलाविवेकादेवारभ्यते यत्कर्म यथा दुर्योधनेन युद्धं तत्तामसमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.25।।अनुबध्यतेऽनेनेत्यनुबन्धः फलम्। क्षयं शक्तेरर्थानां च नाशम्। हिंसां परपीडाम्। पौरुषं स्वसामर्थ्यम्। अनवेक्ष्यानालोच्य केवलमोहादविवेकतो यदारभ्यते कर्म तत्तामसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.25।।तामसं कर्माऽऽह -- अनुबन्धमिति। अनुबन्धम्? अनु कर्मकरणानन्तरं बन्धस्तज्जनितशुभाशुभफलरूपत्वं? क्षयं व्यर्थदेहात्मकमोक्षसाधनव्ययं? हिंसामात्मनः संसारपातनरूपां? पौरुषं पुरुषार्थमोक्षं चकारेण धर्ममपि अनवेक्ष्य अपर्यालोच्य मोहात् स्वसुखभोगभ्रमात् कर्म तामसं विपरीतफलात्मकमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.25।।तामसं कर्माह -- अनुबन्धमिति। अनुबध्यत इत्यनुबन्धः पश्चाद्भाविशुभाशुभम्? क्षयं वित्तव्ययं? हिंसां परपीडां च? पौरुषं स्वसामर्थ्यं वा? अनवेक्ष्य अपर्यालोच्य केवलं मोहादेव यत्कर्मारभ्यते तत्तामसमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.25।।अनुबन्धो दुःखं तदविचार्य मोहाद्यत्कर्म प्रारभ्यते तत्तामसमुदाहृतम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.25।।अनुबन्धको -- अन्तमें होनेवाला जो परिणाम है उसे अनुबन्ध कहते हैं? उसको? क्षयकोकर्मके करनेमें जो शक्तिका या धनका क्षय होता है उसको? हिंसाकोप्राणियोंकी पीड़ाको और पौरुषको -- अमुक कर्मको मैं समाप्त कर सकता हूँ ऐसी अपनी सामर्थ्यको? इस प्रकार अनुबन्धसे लेकर पौरुषतकके इन समस्त भावोंकी अपेक्षा न करके -- इनकी परवा न करके? जो धर्म मोहसे -- अज्ञानसे आरम्भ किया जाता है? वह तामस -- तमोगुणपूर्वक किया हुआ कहा जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.25।। व्याख्या --   अनुबन्धम् -- जिसको फलकी कामना होती है? वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है? परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरे प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा? कितना अहित होगा -- इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।क्षयम् -- इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी धन और समयका कितना खर्चा होगा इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान? निन्दा? तिरस्कार आदि होगा? मेरा लोकपरलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।हिंसाम् -- इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव? आचरण? वेशभूषा? खानपान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी इससे मेरा और दुनियाका कितना अधःपतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।अनवेक्ष्य च पौरुषम् -- इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है? कितना बल? सामर्थ्य है मेरे पास कितना समय है? कितनी बुद्धि है? कितनी कला है? कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष(पुरुषार्थ) को न,देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते -- तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम? उससे होनेवाले नुकसान? हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके? जब जैसा मनमें भाव आया? उसी समय बिना विवेकविचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म तामस कहलाता है। सम्बन्ध --   अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.25।।संप्रति तामसं कर्मोदाहरति -- अनुबन्धमित्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.25।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.25।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.25।। --,अनुबन्धं पश्चाद्भावि यत् वस्तु सः अनुबन्धः उच्यते तं च अनुबन्धम्? क्षयं यस्मिन् कर्मणि क्रियमाणे शक्तिक्षयः अर्थक्षयो वा स्यात् तं क्षयम्? हिंसां प्राणिबाधां च अनपेक्ष्य च पौरुषं पुरुषकारम् शक्नोमि इदं कर्म समापयितुम् इत्येवम् आत्मसामर्थ्यम्? इत्येतानि अनुबन्धादीनि अनपेक्ष्य पौरुषान्तानि मोहात् अविवेकतः आरभ्यते कर्म यत्? तत् तामसं तमोनिर्वृत्तम् उच्यते।।इदानीं कर्तृभेदः उच्यते --,

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【 Verse 18.26 】

▸ Sanskrit Sloka: मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित: | सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते ||

▸ Transliteration: muktasaṅgo’nahaṁvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ | siddhyasiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate ||

▸ Glossary: muktasaṅgaḥ: liberated from all material association; anahaṁvādī: without false ego; dhṛtyutsāha: with great enthusiasm; samanvitaḥ: qualified in that way; siddhi: perfection; asiddhyoḥ: failure; nirvikāraḥ: without change; kartā: worker; sāttvikaḥ: in the mode of goodness; ucyate: is said to be

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.26 The performer who is free from attachment, non-egotis- tic, endowed with resolve and enthusiasm, and unperturbed in success or failure is called sātvika.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.26।।जो कर्ता रागरहित? अनहंवादी? धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है? वह सात्त्विक कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.26।। जो कर्ता संगरहित? अहंमन्यता से रहित? धैर्य और उत्साह से युक्त एवं कार्य की सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (विफलता) में निर्विकार रहता है? वह कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.26 मुक्तसङ्गः who is free from attachment? अनहंवादी nonegoistic? धृत्युत्साहसमन्वितः endowed with firmness and enthusiasm? सिद्ध्यसिद्ध्योः in success or failure? निर्विकारः unaffected? कर्ता an agent? सात्त्विकः Sattvic (pure)? उच्यते is called.Commentary A pure agent does his actions with his whole heart without feeling proud at the performance. He looks for the proper time and place and in accordance with the behests of the scriptures determines whether such actions are worth doing or not. He develops courage and a powerful will. He never seeks physical comforts. He is ite prepared to sacrifice his life for a noble cause. He is neither elated by success nor grieved by failure. He always keeps a balanced mind when he does any action. O Arjuna? that man is a pure agent who? while working? exhibits such alities.Siddhi Success attainment of the fruit of action performed.Nirvikarah Unaffected as having been urged to act merely by the authority of the scriptures? not by a desire for the sake of the reward.Now I will tell thee? O Arjuna? of the characteristics of a passionate agent.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.26. The agent who is free from attachment; who does not make any speech of egoism; who is full of contentment and enthusiasm; and who does not change [mentally] in success or in failure-that agent is said to be of the Sattva (Strand) nature.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.26 But when a man has no sentiment and no personal vanity, when he possesses courage and confidence, cares not whether he succeeds or fails, then his action arises from Purity.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.26 That agent is said to be Sattvika who is free from attachment, who does not make much of himself, who is endued with steadiness and zeal and is untouched by success and failure.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.26 [Ast. introduces this verse with 'Idanim kartrbhedah ucyate, Now is being stated the distinctions among the agents.'-Tr.] The agent who is free from attachment [Attachment to results or the idea of agentship.], not egotistic, endowed with fortitude and diligence, and unperturbed by success and failure is said to be possessed of sattva.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.26 An agent who is free from attachment, non-egoistic, endowed with firmness and enthusiasm, and unaffected by success or failure, is called Sattvic (pure).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.26 See Comment under 18.28

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.26 'Muktasangah' is one who is free from attachment to fruits. 'Anahamvadi' is one who is devoid of the feeling of being the agent. He is endued with 'steadiness and zeal.' 'Steadiness' is perseverance in regard to an act that has been begun in spite of the pain that is inevitable till the completion of the work. 'Zeal' is the possession of an active mind. One who is enduded with these, and whose mind remains firm, untouched by success and failure in war etc., and also in gathering the material reisities for the work on hand - such an agent is, of Sattvika nature.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.26 Karta, the agent; who is mukta-sangah, free from attachment-one by whom attachment has been given up; anahamvadi, not egotisic, not given to asserting his ego; dhrti-utsaha-samanvitah, endowed with fortitude and diligenc; and nirvikarah, unperturbed; siddhi-asiddhyoh, by success and failure, in the fruition and non-fruition of any action under-taken-led only by the authority of the scriptures, not by attachment to results etc. [Etc. stands for attachment to work.];-the agent who is such, he is ucyate, said to be; sattvikah, possessed of sattva.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.26।। अब तक भगवान् श्रीकृष्ण ने त्रिविध ज्ञान और कर्म का वर्णन किया था। कर्म का तीसरा अंग है? कर्ता जीव? जो कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है। प्रकृति के तीन गुण हम सबके मानसिक जीवन एवं बौद्धिक क्षमताओं को प्रभावित करते हैं। स्वाभाविक ही है? कि किसी एक गुण के आधिक्य या प्राधान्य से हमारे कर्तृत्व में भी समयसमय पर परिवर्तन होता रहता है। अत यहाँ कर्ता का भी तीन भागों में वर्गीकरण किया गया है। सर्वप्रथम? भगवान् श्रीकृष्ण सात्त्विक कर्ता का वर्णन करते हैं।मुक्तसंग और अनहंवादी ये दो विशेषण सात्त्विक कर्ता के हैं। जो पुरुष कर्म के फल? जगत् की वस्तुओं तथा व्यक्तियों से आसक्ति रहित है? वह सात्त्विक कर्ता है। वह जानता है कि स्वयं से भिन्न किसी भी वस्तु में वह सुख नहीं है? जो उसके जीवन को पूर्ण और कृतार्थ कर सके। इसलिए वह किसी में आसक्ति नहीं रखता। अहंवादी का अर्थ है वह पुरुष? जो अपनी उपलब्धियों और सफलताओं का कर्ता स्वयं को ही मानकर सदैव गर्वयुक्त भाषण करता है? परन्तु सात्त्विक पुरुष में यह अहंमन्यता नहीं होती? क्योंकि उसका यह दृढ़ एवं निश्चयात्मक ज्ञान होता है कि कोई भी उपलब्धि एक अकेले पुरुष की कभी नहीं हो सकती।ईश्वर प्रदत्त क्षमताएं? प्राकृतिक नियम तथा अन्य जनों के सहयोग से ही सफलता सम्पादित की जा सकती है। इस ज्ञान के कारण उसे कभी यह गर्व नहीं होता कि उसने कोई अभूतपूर्व कार्य किया है। वह अपने अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है।ऐसे मुक्तसंग और अनहंवादी पुरुष में असीम धैर्य और कार्य के प्रति उत्साह होता है। धृति मनुष्य की वह क्षमता है? जिसके कारण कार्य करने में कितने ही विघ्न और कठिनाइयाँ आने पर भी? मनुष्य साहस के साथ उनका सामना करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। वह प्रयत्नशील पुरुष सदा सफलता के मार्ग पर उत्साह के साथ आगे बढ़ता जाता है।सात्त्विक कर्ता का विशेष गुण है? कार्य की सिद्धिअसिद्धि में हर्ष शोकादि विकारों से मुक्त रहना। इस सन्दर्भ में? मुझे जिस उदाहरण का स्मरण होता है? वह चिकित्सालय में कार्य करती हुई लगनशील परिचारिका का है। उसे सामान्यत किसी रोगी से आसक्ति नहीं होती उसे यह अभिमान नहीं होता कि वह स्वयं रोगी का उपचार कर रही है? क्योंकि वस्तुत वह कार्य चिकित्सक का होता है। धैर्य और उत्साह के बिना वह अपने सेवा कार्य को सतत नहीं कर सकती। और उसी प्रकार? उसे उपचार की सफलता या विफलता के विषय में अनावश्यक चिन्ता नहीं होती। रोगी के स्वस्थ हो जाने अथवा उसकी मृत्यु हो जाने से वह परिचारिका अति हर्षित या अति दुखी नहीं हो जाती। वह जानती है कि चिकित्सालय तो सफलता और विफलता तथा जन्म और मृत्यु का क्षेत्र है। वह तटस्थ भाव से अपने सेवा कार्य में रत रहती है।उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न पुरुष सात्त्विक कर्ता कहा जाता है। ऐसा पुरुष अपने कार्य क्षेत्र में अपनी समस्त क्षमताओं का सम्पूर्ण सदुपयोग करता है? क्योंकि आसक्ति आदि भावांे में उसकी शक्तियों का वृथा अपव्यय नहीं होता। स्वाभाविक ही है कि ऐसे सात्त्विक कर्ता को चिरस्थायी सफलता प्राप्त होती है और उसके कार्यों से जगत् का भी कल्याण होता है।सात्त्विक कर्ता को यह विवेक होता है कि शरीर? मन और बुद्धि उपाधियाँ चैतन्यस्वरूप आत्मा के सम्बन्ध से ही अपना कार्य करने में सक्षम होकर जगत् की सेवा कर सकती हैं। चैतन्य के बिना वे घर के एक कोने में रखी छड़ी की तरह असहाय रहती हैं।परमात्मा के पावन संकल्प की अभिव्यक्ति के लिए बुद्धि की क्षमता? हृदय का सौन्दर्य और शरीर की सार्मथ्य आदि सभी माध्यम हैं। अत? यदि इन उपाधियों में सामञ्जस्य न हो? तो आत्मा की अभिव्यक्ति अपने शुद्ध स्वरूप में नहीं हो सकती। सात्त्विक कर्ता को अपने आत्मस्वरूप का सदैव भान बना रहता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.26।।अधुना कर्तृत्रैविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विकं कर्तारमाह -- मुक्तसङ्गो मुक्तः परित्यक्तः सङ्गः फलाभिसंधिर्येन सः अनहंवादी नाहंवदनशीलः कर्ताहमेतादृशगुणसंपन्नः सर्वोत्तम इति वदनशीलो न भवति। धृतिर्विघ्नाद्युपस्थानेऽपि कायादेर्धारणं धैर्यमिति यावत्। उत्साह उद्यमस्ताभ्यां सम्यगन्वितः कदापि कथमपि धृत्युत्साहरहितो न भवतीत्यर्थः। सिद्य्धसिद्य्धोः क्रियमाणस्य कर्मणः फलसिद्धौ सदसिद्धौ च निर्विकारः हर्षविषादशून्यः केवलं शास्त्रप्रमाणप्रयुक्तो न फलरागा दिना यः कर्ता स सात्त्विक उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.26।।इदानीं त्रिविधः कर्तोच्यते -- मुक्तसङ्ग इति। मुक्तसङ्गस्त्यक्तफलाभिसन्धिः? अनहंवादी कर्ताहमिति वदनशीलो न भवति स्वगुणश्लाघाविहीनो वा? धृतिर्विघ्नाद्युपस्थितावपि प्रारब्धापरित्यागो हेतुरन्तःकरणवृत्तिविशेषः? धैर्यं उत्साह इदमहं करिष्याम्येवेति निश्चयात्मिका बुद्धिर्धृतिहेतुभूता ताभ्यां संयुक्तो धृत्युत्साहसमन्वितः? कर्मणः क्रियमाणस्य फलस्य सिद्धावसिद्धौ च हर्षशोकाभ्यां हेतुभ्यां यो विकारो वदनविकासम्लानत्वादिस्तेन रहितः सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः केवलं शास्त्रप्रमाणप्रयुक्तो न फलरागेण? अत एवंभूतः कर्ता सात्त्विक उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.26।।कर्तृत्रैविध्यमाह -- मुक्तेत्यादिना। मुक्तसङ्गस्त्यक्ताभिनिवेशः। अनहंवादी पूर्वोक्ताहंकारोक्तिरहितः। धृतिर्धैर्यम्। उत्साहः साधयिष्याम्येवेति बुद्धिनिश्चयः ताभ्यां समन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योः कर्मण आरब्धस्येति शेषः। निर्विकारो हर्षविषादशून्यः कर्ता सात्त्विक उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.26।।कर्म निरूप्य कर्तारं त्रिविधमाह -- मुक्तसङ्ग इति। मुक्तसङ्गः त्यक्तासक्तिः? अनहंवादी साभिमानोक्तिशून्यः? धृत्युत्साहसमन्वितः धृतिर्धैर्यं दुःखादिसहनरूपम्? उत्साहः उत्तमत्वज्ञानेनोद्यमस्ताभ्यां समन्वितो युक्तः? सिद्ध्यसिद्ध्योः कृतकर्मफलाफलयोर्निर्विकारः हर्षविषादरहितः? एतादृशः कर्त्ता सात्त्विक उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.26।।कर्तारं त्रिविधमाह -- मुक्तसङ्ग इति त्रिभिः। मुक्तसङ्गस्त्यक्ताभिनिवेशः? अनहंवादी गर्वोक्तिरहितः? धृतिर्धैर्यम्? उत्साह उद्यमः? ताभ्यां समन्वितः संयुक्तः? आरब्धस्य कर्मणः सिद्धावसिद्धौ च निर्विकारो हर्षविषादशून्यः एवंभूतः कर्ता सात्त्विक उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.26।।कर्तुस्त्रैविध्यमाह -- मुक्तसङ्ग इति। मुक्तः सङ्गः फलादिविषयको येन अनहंवादी कर्तृत्वाभिमानरहितः कर्मसिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः सात्त्विक उच्यते कर्तेति। साङ्ख्ययोगसारमुपदिशन्वक्ति भगवान् त्वमपि तथा भवेत्यभिप्रायेण।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.26।।जो कर्ता मुक्तसङ्ग है -- जिसने आसक्तिका त्याग कर दिया है? जो निरहंवादी है -- जिसका मैं कर्ता हूँ ऐसे कहनेका स्वभाव नहीं रह गया है? जो धृति और उत्साहसे युक्त है -- धृति यानी धारणाशक्ति,और उत्साह यानी उद्यम -- इन दोनोंसे जो युक्त है? तथा जो किये हुए कर्मके फलकी सिद्धि होने या न होनेमें निर्विकार है। जो ऐसा कर्ता है? वह सात्त्विक कहा जाता है। जो केवल शास्त्रप्रमाणसे ही कर्ममें प्रयुक्त होता है? फलेच्छा या आसक्ति आदिसे नहीं? वह निर्विकार कहा जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.26।। व्याख्या --   मुक्तसङ्गः -- जैसे सांख्ययोगीका कर्मोंके साथ राग नहीं होता? ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है।कामना? वासना? आसक्ति? स्पृहा? ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? परिस्थिति? घटना आदिमें आसक्ति लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।अनहंवादी -- पदार्थ? वस्तु? परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है -- यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरीसम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता? अभिमान तो रहता ही नहीं? प्रत्युत मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ? मेरेमें यह अभिमान नहीं है? मैं निर्विकार हूँ? मैं सम हूँ? मैं सर्वथा निष्काम हूँ? मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ -- इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।धृत्युत्साहसमन्वितः -- कर्तव्यकर्म करते हुए विघ्नबाधाएँ आ जायँ? उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले? लोगोंमें निन्दा हो जाय? तो भी विघ्नबाधा आदि न आनेपर जैसा धैर्य रहता है? वैसा ही धैर्य विघ्नबाधा आनेपर भी नित्यनिरन्तर बना रहे -- इसका नाम धृति है और सफलताहीसफलता मिलती चली जाय? उन्नति होती चली जाय? लोगोंमें मान? आदर? महिमा आदि बढ़ते चले जायँ -- ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी? सफलताके प्रति उत्साह रहता है? वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता? अवनति? निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे -- इसका नाम उत्साह है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः -- सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये? अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे साङ्गोपाङ्ग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति? समझ? समय? सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो फल प्राप्त हो अथवा न हो? तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता? हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार रहना है।कर्ता सात्त्विक उच्यते -- ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे रहित? धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।इस श्लोकमें छः बातें बतायी गयी हैं -- सङ्ग? अहंवदनशीलता? धृति? उत्साह? सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित? बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है। सम्बन्ध --   अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.26।।इदानीं कर्तृत्रैविध्यं ब्रुवन्नादौ सात्त्विकं कर्तारं दर्शयति -- मुक्तेति। सङ्गो नाम फलाभिसन्धिर्बा कर्तृत्वाभिमानो वा? नाहंवदनशीलः कर्ताहमिति वदनशीलो न भवतीत्यर्थः। धारणं धैर्यम्। क्रियमाणस्य कर्मणो यदि फलानभिसन्धिस्तर्हि नानुष्ठानविश्रम्भः संभवेदित्याशङ्क्याह -- केवलमिति। फलरागादिनेत्यादिशब्देन कर्मरागो गृह्यते। अयुक्त इति च्छेदः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.26।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.26।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.26।। --,मुक्तसङ्गः मुक्तः परित्यक्तः सङ्गः येन सः मुक्तसङ्गः? अनहंवादी न अहंवदनशीलः? धृत्युत्साहसमन्वितः धृतिः धारणम् उत्साहः उद्यमः ताभ्यां समन्वितः संयुक्तः धृत्युत्साहसमन्वितः? सिद्ध्यसिद्ध्योः क्रियमाणस्य कर्मणः फलसिद्धौ असिद्धौ च सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः? केवलं शास्त्रप्रमाणेन प्रयुक्तः न फलरागादिना यः सः निर्विकारः उच्यते। एवंभूतः कर्ता यः सः सात्त्विकः उच्यते।।

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【 Verse 18.27 】

▸ Sanskrit Sloka: रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि: | हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित: ||

▸ Transliteration: rāgī karmaphalaprepsur lubdho hiṁsātmako ‘śuciḥ | harṣaśokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ ||

▸ Glossary: rāgī: very much attached; karmaphala: to the fruit of the work; prepsuḥ: de- siring; lubdhaḥ: greedy; hiṁsātmakaḥ: and always envious; aśuciḥ: unclean; harṣaśokānvitaḥ: complicated, with joy and sorrow; kartā: such a worker; rājasaḥ: in the mode of passion; parikīrtitaḥ: is declared

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.27 The performer who is impassioned, who desires the fruits of work, who is greedy, violent, impure, and affected by joy and sorrow, is called aggressive.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.27।।जो कर्ता रागी? कर्मफलकी इच्छावाला? लोभी? हिंसाके स्वभाववाला? अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है? वह राजस कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.27।। रागी? कर्मफल का इच्छुक? लोभी? हिंसक स्वभाव वाला? अशुद्ध और हर्षशोक से युक्त कर्ता राजस कहलाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.27 रागी passionate? कर्मफलप्रेप्सुः desirous of the fruit of action? लुब्धः greedy? हिंसात्मकः cruel? अशुचिः impure? हर्षशोकान्वितः moved by joy and sorrow? कर्ता agent? राजसः Rajasic (passionate)? परिकीर्तितः is

Chapter 18 (Part 16)

called.Commentary A passionate agent is the abode of sins and of greed of the whole world. Wherever he imagines that he may gain worldly fruit he will strive wholeheartedly to obtain it. Whatsoever he gains he keeps strictly to himself and his family. If he attains the fruits of his actions he rejoices. If he fails in his attempt he is overcome by grief.Lubdhah Greedy Thirsting for others property not sharing ones own wealth with deserving persons.Himsatmakah Doing injury to others.Asuchih Impure Having no external and internal purity. (Internal purity is freedom from lust?,anger? greed and pride the heart is filled with compassion? complacency? forgiveness? dispassion? love? etc.)Harshasokanvitah Joy on the attainment of what is desirable? pleasant or agreeable sorrow on the attainment of what is not desirable? pleasant or agreeable? and on having to part with what is desirable. He will be elated with joy when he attains success he will be overcoming by grief when he fails in his undertaking.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.27. The agent, who is a man of passion; who craves for the fruit of his action, and is avaricious; who is injurious by nature, is impure and is overpowered by joy and griefthat agent is proclaimed to be of the Rajas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.27 In him who is impulsive, greedy, looking for reward, violent, impure, torn between joy and sorrow,it may be assumed that in him Passion is predominant.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.27 That doer is called Rajasika who is passionate, who seeks the fruits of his acts, who is greedy, harmful, impure and who is moved by delight and grief.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.27 The agent who has attachment, who is desirous of the results of actions, covetous, cruel by nature, unclean and subject to joy and sorrow is declared to be possessed of rajas.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.27 Passionate, desiring to obtain the reward of actions, greedy, cruel, impure, moved by joy and sorrow, such an agent is said to be Rajasic (passionate).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.27 See Comment under 18.28

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.27 The 'passionate' doer is one who aspires for fame; 'who seeks the fruits of his acts' is one who longs for the fruits of his acts; the 'greedy' is he who does not spend the wealth reired for the act; the 'harmful' is one, who while acting, hurts others; the 'impure', is one who lacks the purity reired for the act; who is moved by 'delight and grief' in war etc., is one who is elated or depressed by success or failure in victory (or the opposite) - a doer who fulfils these conditions is declared to be Rajasika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.27 Karta, the agent; ragi, who has attachment; karma-phala-prepsuh, who is desirous of the results of actions; lubdhah, covetous, greedy for other's property, and does not part with his own (when) at holy places; himsatmakah, cruel by nature, having a nature that cuases pain to others; asucih, unclean, devoid of internal and external cleanliness; and harsa-soka-anvitah, subject to joy and sorrow, affected by these two, joy and sorrow-joy at the acisition of desired objects, sorrow at getting undesired objects and losing coverted objects; and elation and dejection may occur to that very person from his actions being aided or hindered; one who is subject to those-; parikirtitah, is declared to be; rajasah, possessed of rajas.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.27।। इस श्लोक में राजस कर्ता का सम्पूर्ण चित्रण किया गया है। उसके लिए प्रयुक्त विशेषणों को भी विशेष क्रम दिया गया है? जो अध्ययन करने योग्य है।इन्द्रियगोचर विषय को सत्य? सुन्दर एवं सुख का साधन समझने से उसके प्रति राग उत्पन्न होता है। यही राग अधिक तीव्र होने पर प्रेप्सा अर्थात् इच्छा का रूप धारण करता है। इसे यहाँ कर्मफल प्रेप्सु शब्द से दर्शाया गया है। कामना से अभिभूत पुरुष को इच्छित वस्तु प्राप्त हो जाने पर? उससे ही सन्तोष न होकर? उसका लोभ उत्पन्न होता है। वह पुरुष लुब्ध अर्थात् लोभी बन जाता है। संस्कृत की उक्ति है लोभात् पापस्य कारणम् अर्थात् लोभ से पाप के कारणों का उद्भव होता है यह लोभी पुरुष अपने लाभ के लिए हिंसा करने में भी प्रवृत्त हो सकता है। उसे लोगों के कष्ट और पीड़ा की कोई चिन्ता नहीं होती। वह अशुचि अर्थात् दुष्ट स्वभाव का बन जाता है। येनकेन प्रकारेण वह अपने ही स्वार्थ की सिद्धि चाहता है। और अन्त में? जब इष्ट अनिष्ट फलों की प्राप्ति होती है? तब उसे हर्षातिरेक या शोकाकुलता होना स्वाभाविक और अवश्यंभावी है। यह है? राजस कर्ता का सम्पूर्ण चित्रण।हम देखते हैं कि सामान्यत नैतिक एवं धार्मिक आचरण करने वाला व्यक्ति भी जब कभी काम के भूत से अभिभूत हो जाता है? तब उसके सद्गुण लुप्तप्राय हो जाते हैं और तत्पश्चात् उसके कर्म प्रतिशोधपूर्ण तथा योजनाएं दुष्ट और हिंसक होती हैं। ऐसा राजस कर्ता जीवन में दुख ही भोगता रहता है।अब? तामस कर्ता का वर्णन करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.27।।सात्त्विककर्तारमुदाहृत्य राजसं तमाह -- रागी रागवान् कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलपशुस्वर्गाद्यर्थी? लुब्धः परद्रव्येषु संजाततृष्णः तीर्थादौ स्वद्रव्यापरित्यागी च? हिंसात्मकः वृत्तिच्छेदादिना परपीडाकरस्वभावः? अशुचिर्बाह्यान्तःशौचवर्जितः इष्टप्राप्तावनिष्टवियोगे च हर्षः अनिष्टप्राप्ताविष्टवियोगे च शोकः ताभ्यां हर्षशोकाभ्यामन्वितो युक्तः? तस्यैव कर्मणः संपत्तिविपत्त्योर्जाताभ्यां हर्षशोकाभ्यामन्वित इतिवा एवंविधो यः कर्ता स राजसः परिकीर्तितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.27।।रागी कामाद्याकुलचित्तः? अतएव कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलार्थी? लुब्धः परद्रव्याभिलाषी धर्मार्थं स्वद्रव्यत्यागासमर्थश्च? स्वाभिप्रायप्रकटनेन परवृत्तिच्छेदनं हिंसा तदात्मकस्तत्स्वभावः स्वाभिप्रायाप्रकटने तु नैष्कृतिक इति भेदः? अशुचिः शास्त्रोक्तशौचहीनः? सिद्ध्यसिद्ध्योः कर्मफलस्य हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.27।।रागी विषयलोलुपः। अतएव कर्मणः फलं प्रेप्सतीति कर्मफलप्रेप्सुः। लुब्धः परद्रव्यादौ संजाततृष्णस्तीर्थादौ वा द्रव्यापरित्यागी। हिंसात्मकः परपीडाकरस्वभावः। अशुचिर्बाह्यान्तःशौचवर्जित इष्टानिष्टप्राप्तौ हर्षशोकान्वितश्च यः कर्ता स राजसः परिकीर्तितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.27।।राजसमाह -- रागीति। रागी स्वसम्बन्धित्वज्ञानभ्रमेण तदर्थप्रयत्नेन लौकिकासक्तः? कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलाभिलाषप्रवृत्तिमान्? लुब्धः बहुफलाल्पकर्मश्रुतप्रामाण्यविधृतसर्वाभिलाषप्रवृत्तः? हिंसात्मकः परपीडनस्वभावः? अशुचिः स्नानाचमनादिशौचविहीनः? हर्षशोकान्वितः फलसिद्धौ हर्षः असिद्धौ शोकस्ताभ्यामन्वितः? एतादृशः कर्त्ता राजसः विक्षिप्तस्वभावः परिकीर्तितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.27।।राजसं कर्तारमाह -- रागीति। रागी पुत्रादिप्रीतिमान्? कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलकामी? लुब्धः परस्वाभिलाषी? हिंसात्मको मारकस्वभावः? अशुचिर्विहितशौचशून्यः? लाभालाभयोर्हर्षशोकाभ्यामन्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.27।।रागीति। कर्मफलप्रेप्सुस्तादृशः कोऽपि लुब्धो हिंसात्मकः कर्ता न तत्फलं राज्यस्वर्गादि लभते किन्तु हर्षशोकौ ताभ्यामन्वित इति राजसः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.27।।जो कर्ता रागी है -- जिसमें राग यानी आसक्ति विद्यमान है? जो कर्मफलको चाहनेवाला है -- कर्मफलकी इच्छा रखता है? जो लोभी यानी दूसरोंके धनमें तृष्णा रखनेवाला है और तीर्थादि ( उपर्युक्त देशकाल ) में भी अपने धनको खर्च करनेवाला नहीं है। तथा जो हिंसात्मक -- दूसरोंको कष्ट पहुँचानेके स्वभाववाला? अशुचि -- बाहरी और भीतरी दोनों प्रकारका शुद्धिसे रहित और हर्षशोकसे लिप्त यानी इष्ट पदार्थकी प्राप्तिमें हर्ष एवं अनिष्टकी प्राप्ति और इष्टके वियोगमें होनेवाला शोक -- इन दोनों प्रकारके भावोंसे युक्त है? -- ऐसे पुरुषको ही कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धिमें हर्षशोक हुआ करते हैं? अतः जो कर्ता उन दोनोंसे युक्त है? वह राजस कहा जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.27।। व्याख्या --   रागी -- रागका स्वरूप रजोगुण होनेके कारण भगवान्ने राजस कर्ताके लक्षणोंमें,सबसे पहले रागी पद दिया है। रागका अर्थ है -- कर्मोंमें? कर्मोंके फलोंमें तथा वस्तु? पदार्थ आदिमें मनका खिंचाव होना? मनकी प्रियता होना। इन चीजोंका जिसपर रंग चढ़ जाता है? वह रागी होता है।कर्मफलप्रेप्सुः -- राजस मनुष्य कोई भी काम करेगा तो वह किसी फलकी चाहनाको लेकर ही करेगा जैसे -- मैं ऐसाऐसा अनुष्ठान कर रहा हूँ? दान दे रहा हूँ? उससे यहाँ धन? मान? बड़ाई आदि मिलेंगे और परलोकमें स्वर्गादिके भोग? सुख आदि मिलेंगे मैं ऐसीऐसी दवाइयोंका सेवन कर रहा हूँ तो उनसे मेरा शरीर नीरोग रहेगा? आदि।लुब्धः -- राजस मनुष्यको जितना जो कुछ मिलता है? उसमें वह संतोष नहीं करता? प्रत्युत जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई की तरह और मिलता रहे? और मिलता रहे अर्थात् आदर? सत्कार? महिमा आदि अधिकसेअधिक होते रहें धन? पुत्र? परिवार आदि अधिकसेअधिक बढ़ते रहें -- इस प्रकारकी लाग लगी रहती है? लोभ लगा रहता है।हिंसात्मकः -- वह हिंसाके स्वभाववाला होता है। अपने स्वार्थके लिये वह दूसरोंके नुकसानकी? दुःखकी परवाह नहीं करता। वह ज्योंज्यों अधिक भोगसामग्री इकट्ठी करके भोग भोगता है? त्योंहीत्यों दूसरे अभावग्रस्त लोगोंके हृदयमें जलन पैदा होती है। अतः दूसरोंके दुःखकी परवाह न करना तथा भोग भोगना हिंसा ही है।तामस कर्म (18। 25) और राजस कर्ता -- दोनोंमें हिंसा बतानेका तात्पर्य यह है कि मूढ़ता रहनेके कारण तामस मनुष्यकी क्रियाएँ विवेकपूर्वक नहीं होतीं अतः चलनेफिरने? उठनेबैठने आदिमें उसके द्वारा हिंसा होती है। राजस मनुष्य अपने सुखके लिये बढ़ियाबढ़िया भोग भोगता है तो उसको देखकर जिनको वे भोग नहीं मिलते? उनके हृदयमें जलन होती है? यह हिंसा उस भोग भोगनेवालेको ही लगती है। कारण कि कोई भी भोग बिना हिंसाके होता ही नहीं। तात्पर्य है कि तामस मनुष्यके द्वारा तो कर्ममें हिंसा होती है और राजस मनुष्य स्वयं हिंसात्मक होता है।अशुचिः -- रागी पुरुष भोगबुद्धिसे जिन वस्तुओं? पदार्थों आदिका संग्रह करता है? वे सब चीजें अपवित्र हो जाती हैं। वह जहाँ रहता है? वहाँका वायुमण्डल अपवित्र हो जाता है। वह जिन कपड़ोंको पहनता है? उन कपड़ोंमें भी अपवित्रता आ जाती है। यही कारण है कि आसक्तिममतावाले मनुष्यके मरनेपर उसके कपड़े आदिको कोई रखना नहीं चाहता। जिस स्थानपर उसके शवको जलाया जाता है? वहाँ कोई भजनध्यान करना चाहे तो उसका मन नहीं लगेगा। वहाँ भूलसे कोई सो जायगा तो उसको प्रायः खराबखराब स्वप्न आयेंगे। तात्पर्य यह है कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी तरफ आकृष्ट होते ही आसक्तिममतारूप मलिनता आने लगती है? जिससे मनुष्यका शरीर और शरीरकी हड्डियाँतक अधिक अपवित्र हो जाती हैं।हर्षशोकान्वितः -- उसके सामने दिनमें कितनी बार सफलताविफलता? अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति? घटना आदि आते रहते हैं? उनको लेकर वह हर्षशोक? रागद्वेष? सुखदुःख आदिमें ही उलझा रहता है।कर्ता राजसः परिकीर्तितः -- उपर्युक्त लक्षणोंवाला कर्ता राजस कहा गया है। सम्बन्ध --   अब तामस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.27।।राजसं कर्तारं कथयति -- रागीति। कर्मविषयो रागः? कर्मफलप्रेप्सुरिति फलरागस्य पृथक्कथनात्। स्वाभिप्रायाप्रकटीकरणपूर्वकं परपीडनं परविच्छेदनं तेन स्वार्थपर इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.27।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.27।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.27।। --,रागी रागः अस्य अस्तीति रागी? कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलार्थी इत्यर्थः? लुब्धः परद्रव्येषु संजाततृष्णः? तीर्थादौ च स्वद्रव्यापरित्यागी वा? हिंसात्मकः परपीडाकरस्वभावः? अशुचिः बाह्याभ्यन्तरशौचवर्जितः? हर्षशोकान्वितः इष्टप्राप्तौ हर्षः अनिष्टप्राप्तौ इष्टवियोगे च शोकः ताभ्यां हर्षशोकाभ्याम् अन्वितः संयुक्तः? तस्यैव च कर्मणः संपत्तिविपत्तिभ्यां हर्षशोकौ स्याताम्? ताभ्यां संयुक्तो यः कर्ता सः राजसः परिकीर्तितः।।

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【 Verse 18.28 】

▸ Sanskrit Sloka: अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस: | विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ||

▸ Transliteration: ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko ‘lasaḥ | viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate ||

▸ Glossary: ayuktaḥ: without reference to scriptural injunctions; prākṛtaḥ: materialistic; stabdhaḥ: obstinate; śaṭhaḥ: deceitful; naiṣkṛtikaḥ: expert in insulting others; alasaḥ: lazy; viṣādī: morose; dīrghasūtrī: procrastinating; ca: also; kartā: worker; tāmasa: in the mode of ignorance; ucyate: is said to be

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.28 The performer who is undisciplined, vulgar, stubborn, wicked, malicious, lazy, depressed, and procrastinating is called ignorant or tamasic.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.28।।जो कर्ता असावधान? अशिक्षित? ऐंठअकड़वाला? जिद्दी? उपकारीका अपकार करनेवाला? आलसी? विषादी और दीर्घसूत्री है? वह तामस कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.28।। अयुक्त? प्राकृत? स्तब्ध? शठ? नैष्कृतिक? आलसी? विषादी और दीर्घसूत्री कर्ता तामस कहा जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.28 अयुक्तः unsteady? प्राकृतः vulgar? स्तब्धः unbending? शठः cheating? नैष्कृतिकः malicious? अलसः lazy? विषादी desponding? दीर्घसूत्री procrastinating? च and? कर्ता agent? तामसः Tamasic (dark)? उच्यते is said.Commentary Owing to his vulgar nature he is not able to discriminate between proper and improper actions. His heart is filled with vanity. He will never prostrate himself before the deity or a sage. He is very stiff and unbending in his demeanour. He is the very embodiment of deceit? the abode of the passion for gambling and all such vices. He is ever ready to do evil actions. When an opportunity for his doing good occurs? he is utterly slothful and inactive? but he is very alert in doing evil.Prakritah Vulgar Quite uncultured in intellect one who is childish.Stabdhah Unbending (like a stick)? not bowing down to anybody.Shathah Cheating concealing his real nature.Naishkritikah Creating arrels and disputes among the people.Alasah Lazy Not doing even that which ought to be done.Dirghasutri Postponing duties too long always slothful not performing even in a month what ought to be done today or tomorrow.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.28. The agent, who does not exert, is vulgar, obstinate and deceitful; who is a man of wickedness and is lazy, sorrowful, and procrastinating - that agent is said to be of the Tamas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.28 While he whose purpose is infirm, who is low-minded, stubborn, dishonest, malicious, indolent, despondent, procrastinating - he may be assumed to be in Darkness.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.28 That doer is said to be Tamasika who is unalified, unrefined, stubborn, depraved, dishonest, indolent, despondent and dilatory.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.28 The agent who is unsteady, naive, unbending, deceitful, wicked, [A variant reading is naikrtikah.-Tr.] lazy, morose and procrastinating is said to be possessed of tamas.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.28 Unsteady, vulgar, unbending, cheating, malicious, lazy, desponding and procrastinating such an agent is called Tamasic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.26-28 Muktasangah etc. upto Tamasa ucyate. He who does not make speech of egoism : He who does not claim 'I am the agent' i.e., he who is different from the one who claims so by natural inclination, or claims as such with an intention that 'I should do so', or claims so in an efficient manner. This nini (suffix employed in anahamvadi) does not prohibit for a Yogin, the speech 'I do' under the influence of the cover of the mundane life. Who is overpowered by joy and grief : i.e., at the time of success and failure [respectively]. Wickedness : cruelty.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.28 'Ayukta' is the doer who is unalified for acts enjoined by the Sastras; the meaning is that he is engaged in perverse acts; who is 'unrefined', means one uninstructed; who is 'stubborn', means one who is not disposed to act; who is 'depraved' means one who has the taste for black magic etc; who is dishonest is one who is treacherous; who is 'indolent' is one who is not inclined to carry out actions undertaken; who is 'despondent' is one given to excessive despondency; and one who is 'dilatory', is a person who, while engaged in black magic, etc., pays malevolent attention to produce long-standing evil to others - such a doer is declared to be Tamasika.

Thus, has been told the threefold division in terms of the Gunas of the knowledge about the work that ought to be performed, and about the agent of work. Now, Sri Krsna describe s the threefold division of Buddhi and Dhrti (fortitude) on the basis of Gunas. These faculties give the determinate knowledge of all realities in existence and of all ends of human life (Purusarthas).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.28 The agent who is ayuktah, unsteady; prakrtah, naive, of very unrefined intelligence, like a child; stabdhah, unbending like a staff-he does not bend down to anyone; sathah, deceitful, cunning, hiding his own powers; naiskrtikah, wicked, given to destroying the livelihood of others; alasah, lazy, not inclined even to his own duties; visadi, morose, ever in a mood of dejection; and dirghasutri, procrastinating, postponing duties for long, [Ast. adds here, 'sarvada mandasvabhavah, always slow by nature'.-Tr.] not accomplishing even in a month what is to be done today or tomorrow;-one who is such, he ucyate, is said to be; tamasah, possessed of tamas.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.28।। यहाँ तामस ज्ञान से प्रेरित होकर तामस कर्म करने वाले तामस कर्ता का विस्तृत वर्णन किया गया है।अयुक्त जिसका मन? बुद्धि के साथ युक्त न हो वह व्यक्ति अयुक्त कहलाता है। बुद्धि के मार्गदर्शन की उपेक्षा करके तामसिक कर्ता अपनी मनमानी ही करता है? बुद्धिमानी नहीं प्राकृत अत्यन्त असभ्य और असंस्कृत बुद्धि का पुरुष प्राकृत कहा जाता है। सुसंस्कृत पुरुष वह है? जो अपने मन की निम्नस्तरीय प्रवृत्तियों को अपने वश में रखता है। किन्तु तामसी पुरुष अयुक्त होने के कारण प्राकृत स्वभाव का होता है। उसे अपने ऊपर किसी भी प्रकार का संयम नहीं होता। बुद्धि का दर्पण दर्शाने पर भी वह स्वीकार नहीं करता कि दर्पण में प्रतिबिम्बित असभ्यता आदि अवगुण उसके अपने ही हैं।स्तब्ध एक दण्ड के समान वह कभी किसी के आगे नम्रभाव से नतमस्तक नहीं होता। वह ऐसा हठी और दुराग्रही होता है कि किसी के सदुपदेश का वह श्रवण भी नहीं करना चाहता? पालन करना तो दूर की बात है। किसी का भी उपदेश उसे सहन नहीं होता है।शठ अर्थात् मायावी। तामस कर्ता पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता? क्यों कि वह अपने वास्तविक उद्देश्यों को गुप्त रखकर लोगों की वंचना करने के लिए अन्य प्रकार के कार्य करता है। प्रवंचना के ऐसे कार्यों से समाज के लोगों को दुख और कष्ट भोगने पड़ते हैं।नैष्कृतिक श्री शंकराचार्य इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं? तामसिक कर्ता परवृत्तिच्छेदनपर अर्थात् दूसरे की आजीविका का नाश करने वाला होता है। अन्य लोगों के साथ लड़ाई झगड़ा करने पर सदैव उतारू रहता है और शत्रुता और बदले की भावना रखता है।अलस तामस कर्ता सहज ही किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता? कर्तव्य कर्म में भी नहीं। बिना परिश्रम के फलोपभोग की उसकी कामना रहती है। ऐसा आलसी पुरुष विचार करने में भी असमर्थ होता है। लंका के तीन बन्धु विभीषण? रावण और कुम्भकर्ण क्रमश सात्त्विक? राजसिक और तामसिक कर्ताओं के प्रतीक हैं।विषादी सदा उदास रहता है। किसी भी वस्तु या व्यक्ति से वह सन्तुष्ट नहीं रहता। जीवन की चुनौतियों का सामना करने की न उसमें क्षमता होती हैं और न दृढ़ता। इसलिए? वह किसी ऐसे सुरक्षित स्थान पर निवास करना चाहता है? जहाँ जगत् की समस्याएं न हों और वह निर्विघ्न रूप से विषयोपभोग,कर सके।दीर्घसूत्री वह पुरुष जो तत्काल करने योग्य कर्म को कल करेंगे ऐसा कहतेकहते एक मास के पश्चात् भी नहीं करता है? दीर्घसूत्री कहलाता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है? तो उसे कार्यान्वित कर नहीं पाता।इस प्रकार? तीन श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण ने त्रिविध कर्ताओं के आन्तरिक स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है। यह सदैव ध्यान रहे कि उपर्युक्त चित्रण परपरीक्षण के लिए न होकर आत्मनिरीक्षण एवं आत्मसुधार के लिए है।भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.28।।एवं राजसं कर्तारमुदाहृत्य तामसं तमाह -- अयुक्तो विषयेषु विक्षिप्तचित्तत्वादसमाहितः? प्राकृतोऽत्यन्तासंस्कृतबुद्धिर्बालिशः? स्तब्धः कस्मैचिद्दण्डवन्न नमति सर्वदाऽनम्रो मन्दस्वभावः? शठः शक्तिगूहनकारी मायावी? नैकृतिकः परवृत्तिच्छेदनपरः? अलसः कर्तव्येष्वप्रवृत्तिशीलः? विषादी सर्वदा खिन्नस्वभावः? दीर्धं सूत्रायुतुं शीलमस्येति दीर्घसूत्री कर्तव्यानां दीर्घप्रसारणस्वभावः एवं क्रियमाणे सत्यनिष्टमिदं कथंचिदापद्येत? यदा पुनरेवं क्रियते तदात्वनिष्टमेव संभावानोपनीतमित्येवं शङ्कासहस्त्रव्याप्तचित्तत्वेनातिमन्थरप्रवृत्तिशीलः यदद्य श्वो वा कर्तव्यं तन्मासेनापि न करोति एवंविधो यः कर्ता स तामस उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.28।।अयुक्त इति। अयुक्तः सर्वदा विषयापहृतचित्तत्वेन कर्तव्येष्वनवहितः? प्राकृतः शास्त्रासंस्कृतबुद्धिर्बालसमः? स्तब्धो गुरुदेवतादिष्वप्यनम्रः? शठः परवञ्चनार्थमन्यथाजानन्नप्यन्यथावादी? नैकृतिकः स्वस्मिन्नुपकारित्वभ्रममुत्पाद्य परवृत्तिच्छेदनेन स्वार्थपरः? अलसोऽवश्यकर्तव्येष्वप्यप्रवृत्तिशीलः? विषादी सततमसंतुष्टस्वभावत्वेनानुशोचनशीलः? दीर्घसूत्री निरन्तरशङ्कासहस्रकवलितान्तःकरणत्वेनातिमन्थरप्रवृत्तिर्यदद्यकर्तव्यं तन्मासेनापि करोति नवेत्येवंशीलश्च? कर्ता तामस उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.28।।अयुक्तोऽनवहितः। प्राकृतोऽत्यन्तमसंस्कृतबुद्धिर्बालसमः। स्तब्धो दण्डवन्न नमति कस्मैचित्। शठः शक्तिगूहनकारी। नैष्कृतिको वञ्चकः परावमानी वा। अलसः अप्रवृत्तिशीलः कर्तव्येष्वपि। विषादी सर्वदा अवसन्नस्वभावः। दीर्घसूत्री चिरकारी। एकाहसाध्यं कार्यं मासेनापि न करोतीत्यर्थः। य एवंभूतः स कर्ता तामस उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.28।।तामसमाहअयुक्त इति। अयुक्तः पूर्वापरानुसन्धानरहितः? प्राकृतः प्रकृतिजन्यसद्भावरहितः? स्तब्धः अनम्रः? शठो धूर्तः? नैकृतिकः सर्वावमानी कृतावमानी वा? अलसः अनुद्यमी? विषादी अकार्यशोचनस्वभावः? दीर्घसूत्री क्षणसाध्यकार्यस्य माससम्पादनशील एतादृशः कर्त्ता तामस उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.28।।तामसं कर्तारमाह -- अयुक्त इति। अयुक्तोऽनवहितः? प्राकृतो विवेकशून्यः? स्तब्धोऽनम्रः? शठः शक्तिगूहनकारी? नैष्कृतिकः परावमानी? अलसोऽनुद्यमशीलः? विषादी शोकशीलः? यदद्य वा श्वो या कार्यं तन्मासेनापि न संपादयति यः स दीर्घसूत्री? एवंभूतः कर्ता तामस उच्यते। कर्तृत्रैविध्येनैव ज्ञातुरपि त्रैविध्यमुक्तं भवति। कर्मत्रैविध्येन च ज्ञेयस्यापि त्रैविध्यमुक्तं वेदितव्यम्। बुद्धेस्त्रैविध्येन करणस्यापि त्रैविध्यमुक्तं भविष्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.28।।अयुक्त इति। शास्त्रीयकर्माधिकारी सन् योऽयुक्तः विकर्मस्थः अनधिगतविद्यः स्तब्धः आरम्भशिथिलः शठः अभिचारादिकर्मरुचिः वञ्चकः कर्मस्वलसो दुःखी दीर्घं सूत्रं कर्त्तव्यता यस्य तथा तामस उच्यते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.28।।जो कर्ता अयुक्त है -- जिसका चित्त समाहित नहीं है? जो बालकके समान प्राकृत -- अत्यन्त संस्कारहीन बुद्धिवाला है? जो स्तब्ध है -- दण्डकी भाँति किसीके सामने नहीं झुकता? जो शठ अर्थात् अपनी सामर्थ्यको गुप्त रखनेवाला कपटी है? जो नैष्कृतिक -- दूसरोंकी वृत्तिका छेदन करनेमें तत्पर और आलसी है -- जिसका कर्तव्यकार्यमें भी प्रवृत्त होनेका स्वभाव नहीं है? जो विषादी -- सदा शोकयुक्त स्वभाववाला और दीर्घसूत्री है -- कर्तव्यमें बहुत विलम्ब करनेवाला है अर्थात् आज या कल कर लेनेयोग्य कार्यको महीनेभरमें भी समाप्त नहीं कर पाता? जो ऐसा कर्ता है वह तामस कहा जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.28।। व्याख्या --   अयुक्तः -- तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता 14। 8)। इस कारण किस समयमें कौनसा काम करना चाहिये किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है -- इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही,नहीं। इसलिये वह अयुक्त अर्थात् असावधान कहलाता है।प्राकृतः -- जिसने शास्त्र? सत्सङ्ग? अच्छी शिक्षा? उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है? माँबापसे जैसा पैदा हुआ है? वैसाकावैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यकी शिक्षासे रहित रहा है? ऐसा मनुष्य प्राकृत अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।स्तब्धः -- तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन? वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्णआश्रममें बड़ेबूढ़े माता? पिता? गुरु? आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन? वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता? प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य स्तब्ध अर्थात् ऐंठअकड़वाला कहलाता है।शठः -- तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको? अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह शठ अर्थात् जिद्दी कहलाता है (टिप्पणी प0 909)।अनैष्कृतिकः -- जिनसे कुछ उपकार पाया है? उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है? वह नैष्कृतिक कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता? प्रत्युत उनका अपकार करता है? इसलिये वह अनैष्कृतिक कहलाता है।अलसः -- अपने वर्णआश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्यकर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्यको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता? प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़ेपड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।विषादी -- यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा? आलस्य? प्रमाद आदिमें मेरी शक्तिका? मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है? तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख? अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे विषादी कहा गया है।दीर्घसूत्री -- अमुक काम किस तरीकेसे बढ़िया और जल्दी हो सकता है -- इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारुरूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य दीर्घसूत्री कहलाता है।कर्ता तामस उच्यते -- उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता तामस कहलाता है।विशेष बातछब्बीसवें? सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयीं हैं? वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है? उन गुणोंके अनुसार ही कर्मोंका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है? वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं? वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है? वैसे ही कर्म? करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक? राजस अथवा तामस होगा तो कर्म आदि भी सात्त्विक? राजस अथवा तामस होंगे।सात्त्विक कर्ता अपने कर्म? बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असङ्गतापूर्वक परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है -- दुःखान्तं च निगच्छति (गीता 18। 36)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्वभोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजसतामस कर्ता राजसतामस कर्म? बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजसतामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मतत्त्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजसतामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जडताका बन्धन भी अधिक होता है।अब यहाँ शङ्का हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है? पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है? कर्तृत्वाभिमान नहीं है? लेप (फलेच्छा) नहीं है? वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिनजिन वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है? उन सबमें निर्मलता आ जाती है क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् (गीता 14। 6)।दूसरी बात? पतञ्जलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है -- प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्। (योगदर्शन 2। 18)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे रागात्मक ही मानती है -- रजो रागात्मकं विद्धि (14। 7)। वास्तवमें देखा जाय तो राग ही बाँधनेवाला है? क्रिया नहीं।गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं -- सात्त्विक? राजस और तामस (18। 23 -- 25)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म सात्त्विक हो जायँगे? भाव राजस होगा तो वे कर्म राजस हो जायँगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म तामस हो जायँगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है। सम्बन्ध --   सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मोंके विचारमें बुद्धि और धृति -- इन कर्मसंग्राहक करणोंकी प्रधानता होनेसे अब आगे उनके भेद बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.28।।दीर्घं सूत्रयितुं शीलमस्येति व्युत्पत्तिं गृहीत्वा विवक्षितमर्थमाह -- कर्तव्यानामिति। एवं क्रियमाणे सत्यनिष्टमिदं कथंचिदापद्येत यदा पुनरेवं क्रियते तदा त्वनिष्टमेव संभावनोपनीतमिति चिन्तापरंपरायां मन्थरप्रवृत्तिरित्यर्थः। तदेव स्पष्टयति -- यदद्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.28।।दीर्घसूत्रित्वं कथं तामसत्वे हेतुः इत्यतः सप्रमाणकं व्याचष्टे -- परेति। दीर्घकालकृतं चिरातीतकालकृतम्। अनुचितं वचनायोग्यं? परोपद्रवहेतुत्वात्। दोषान्मात्सर्यादेः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.28।।परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमप्यनुचितं यः सूचयति स दीर्घसूत्री।परेण यः कृतो दोषो दीर्घकालकृतोऽपि वा। यस्तस्य सूचको दोषाद्दीर्घसूत्री स उच्यते इत्यभिधानात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.28।। --,अयुक्तः न युक्तः असमाहितः? प्राकृतः अत्यन्तासंस्कृतबुद्धिः बालसमः? स्तब्धः दण्डवत् न नमति कस्मैचित्? शठः मायावी शक्तिगूहनकारी? नैष्कृतिकः परविभेदनपरः? अलसः अप्रवृत्तिशीलः कर्तव्येष्वपि? विषादी विषादवान् सर्वदा अवसन्नस्वभावः? दीर्घसूत्री च कर्तव्यानां दीर्घप्रसारणः? सर्वदा मन्दस्वभावः? यत् अद्य श्वो वा कर्तव्यं तत् मासेनापि न करोति? यश्च एवंभूतः? सः कर्ता तामसः उच्यते।।

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【 Verse 18.29 】

▸ Sanskrit Sloka: बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु | प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ||

▸ Transliteration: buddherbhedaṁ dhṛteś cai ‘va guṇatastrividhaṁ śṛṇu | procyamānamaśeṣeṇa pṛthaktvena dhanañjaya ||

▸ Glossary: buddheḥ: of intelligence; bhedaṁ: differences; dhṛteḥ: of steadiness; ca: also; eva: certainly; guṇataḥ: by the modes of material nature; trividhaṁ: the three kinds of; śṛṇu: just hear; procyamānaṁ: as described by Me; aśeṣeṇa: in detail; pṛthaktvena: differently; dhanañjaya: O winner of wealth

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.29 Now hear Me explain, fully and separately, the threefold division of intellect and resolve, based on modes of material Nature, O Dhanañjaya.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.29।।हे धनञ्जय अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलगअलगरूपसे सुन? जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.29।। हे धनंजय मेरे द्वारा अशेषत और पृथकत कहे जाने वाले? गुणों के कारण उत्पन्न हुए बुद्धि और धृति के त्रिविध भेद को सुनो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.29 बुद्धेः of intellect? भेदम् division? धृतेः of firmness? च and? एव even? गुणतः according to alities? त्रिविधम् threefold? श्रृणु hear? प्रोच्यमानम् as I declare? अशेषेण fully? पृथक्त्वेन distinctly? धनञ्जय O Dhananjaya.Commentary Dhananjaya The coneror of wealth Arjuna is so called because he acired much material and spiritual wealth during his tours of conest (Digvijaya) to the four arters of the earth.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.29. You must listen [from Me] to the three-fold division of the intellect and also of content both being expounded completely and individually, [by Me] basing on the Strands, O Dhananjaya !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.29 Reason and conviction are threefold, according to the Quality which is dominant. I will explain them fully and severally, O Arjuna!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.29 Hear now, the threefold division of Buddhi (reason) and Dhrti (fortitude), O Arjuna, according to the Gunas, fully and severally to be set forth.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.29 O Dhananjaya, listen to the classification of the intellect as also of fortitude, which is threefold according to the gunas, while it is being stated elaborately and severally.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.29 Hear thou the threefold division of intellect and firmness according to the Gunas, as I declare them fully and distinctly, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.29 Buddheh etc. Intellect : the faculty of resolving. Content : satisfaction. After having performed either good or wicked action, everyone, at the end, feels 'what is to be necessarily performed has been performed; so why furhter more ?' Or else what could be the cause for [one's] retiring from that action ?' Therefore in every one there is content. This is the meaning intended here. The word-meaning, that is not clearly known-that alone is certainly explained [hereinafter].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.29 'Buddhi' is the knowledge in the form of discriminative determination. 'Dhrti' is the resolution to hold on with perseverance to what has been undertaken even against all obstacles. Of these two, hear now the threefold division according to Sattva and other Gunas.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.29 O Dhananjaya, srnu, listen; bhedam, to the classification; buddheh, of the intellect; ca eva, as also; the classification dhrteh, of fortitude; trividham, which is threefold; gunatah, according to the gunas, sattva etc. -this much is an apporistic statement-; procyamanam, while it is being stated; asesena, elaborately, just as it is, without omitting anything; and prthaktvena, severally. Arjuna is called Dhananjaya because, in the course of his expedition to coner all the qaurters. he won immense human and divine wealth (dhana).

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.29।। कर्म संपादन के तीन संघटक तत्त्व हैं ज्ञान? कर्म और कर्ता। पूर्व के नौ श्लोंको में इन तीनों के त्रिविध वर्गीकरण का वर्णन किया गया था। ज्ञान से प्रेरित होकर जब कर्ता जगत् में कर्म करता है तब? निसन्देह? एक कार्य विशेष सम्पन्न होता है। परन्तु कार्य सम्पादन के लिए प्रयत्नों के सातत्य की जो आवश्यकता होती है? उसकी पूर्ति दो तत्त्वों के द्वारा होती हैं? और वे तत्त्व हैं बुद्धि और धृति। ये दोनों तत्त्व मानो ईन्धन और प्रेरक बल हैं।बुद्धि से तात्पर्य मनुष्य की उस क्षमता से है? जिसके द्वारा वह कर्म की कर्तव्यता तथा बाह्य घटनाओं के अर्थ आदि को समझता है। धृति का अर्थ है धारणशक्ति। लक्ष्य प्राप्ति में अनेक विघ्न आते हैं? जिनको पार करके लक्ष्य को पाने के लिए धृति की आवश्यकता होती है। इन दोनों बुद्धि और धृति के अभाव में तो मनुष्य केवल शुष्क पर्ण के समान इतस्तत भटकता रहेगा।प्रथम? बुद्धि के त्रिविध भेद को बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.29।।एवं ज्ञानस्य बुद्धिवृत्तेः कर्मणः क्रियायाः कर्तुः बुद्ध्युपहितस्य च त्रैविध्यमुक्त्वा वृत्तिमत्या बुद्धेस्तदृत्तेश्च धृत्याख्यायास्त्रैविध्यं वक्तुमारभते। बुद्धेर्वृत्तिमत्या धृतेश्च तदृत्तेर्गुणतः सात्त्वादिगुणतस्त्रिविधभेदं मया प्रोच्यमानं कथ्यमानमशेषेण निःशेषतः पृथक्त्वेन हेयोपादेयविवेकतः श्रुणु श्रोतुं सावधानो भव। दिग्विजये मानुषं दैवं च प्रभूतं धनं यया बुद्य्धा धृत्या च त्वं जितवानसि सा त्वयान्यैश्च तनादिसमस्तपुरुषार्थसिद्धये विजयहेतुभूता उपादेयेति बोधनाय मया प्रोज्यमानं बुद्धेर्धृतेश्च त्रिविधं भेदं श्रृण्विति द्योतनाय संबोधयति धनंजयेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.29।।तदेवंज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः इति व्याख्यातम्। संप्रति धृत्युत्साहसमन्वित इत्यत्र सूचितयोर्बुद्धिधृत्योस्त्रैविध्यं प्रतिजानीते -- बुद्धेरिति। बुद्धेरध्यवसायादिवृत्तिमत्या धृतेश्च तद्वृत्तेः सत्त्वादिगुणतस्त्रिविधमेव भेदं मया त्वां प्रति त्यक्तालस्येन परमाप्तेन प्रोच्यमानमशेषेण निरवशेषं पृथक्त्वेन हेयोपादेयविवेकेन शृणु श्रोतुं सावधानो भव। हे धनंजयेति दिग्विजये प्रसिद्धं महिमानं सूचयन्प्रोत्साहयति। अत्रेदं चिन्त्यते -- किमत्र बुद्धिशब्देन वृत्तिमात्रमभिप्रेतं किंवा वृत्तिमदन्तःकरणम्। प्रथमे ज्ञानं पृथङ्ग वक्तव्यम्। द्वितीये कर्ता पृथङ्ग वक्तव्यः। वृत्तिमदन्तःकरणस्यैव कर्तृत्वात् ज्ञानधृत्योः पृथक्कथनवैयर्थ्यं च। नचेच्छादिपरिसंख्यार्थं तत्? वृत्तिमदन्तःकरणत्रैविध्यकथनेन सर्वासामपि तद्वृत्तीनां त्रैविध्यस्य विवक्षितत्वात्।,उच्यते? अन्तःकरणोपहितश्चिदाभासः कर्ता। इहतूपहितान्निष्कृष्य उपाधिमात्रं करणत्वेन विवक्षितं सर्वत्र करणोपहितस्य कर्तृत्वात्। यद्यपि चकामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव इति श्रुत्यनूदितानां सर्वासामपि वृत्तीनां त्रैविध्यं विवक्षितं तथापि धीधृत्योस्त्रैविध्यं पृथगुक्तं ज्ञानशक्तिक्रियाशक्त्युपलक्षणार्थं नतु परिसंख्यार्थमिति रहस्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.29।।बुद्धिधृती त्रैविध्येन व्याख्यातुमाह -- बुद्धेरिति। तत्र बुद्धिविशिष्टश्चिदाभासः कर्ता ज्ञानं च प्रागुक्तम्। अत्रतु केवला बुद्धिर्वृत्तिमती तदीयवृत्त्यन्तरोपलक्षणार्थं तद्वृत्तिविशेषो धृतिश्चत्रैविध्येन कथ्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.29।।ज्ञानं ज्ञेयं [18।18] इत्यत्र ज्ञेयपरिज्ञात्रोश्चोल्लेखः कृतः? सोऽत्र कर्तृत्रैविध्ये परिज्ञातुः प्रवेशः कर्मत्रैविध्ये च ज्ञेयस्य। करणस्य निरूपणार्थं बुद्धेर्धृतेश्च त्रैविध्ये प्रतिजानीते -- बुद्धेरिति। बुद्धेरिन्द्रियात्मिकाया धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं भेदं पृथक्त्वेन भिन्नत्वेन -- मयेति शेषः -- प्रोच्यमानं अशेषेण हे धनञ्जय सर्वत्रोत्कर्षयुक्त शृणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.29।।इदानीं बुद्धेर्धृतेश्चापि त्रैविध्यं प्रतिजानीते -- बुद्धिरिति। स्पष्टार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.29।।अथ कर्तृत्रैविध्येनैव ज्ञातुरपि त्रैविध्यमुक्तं तथा कर्मस्थले कर्मत्रैविध्येन च ज्ञेयस्यापि त्रैविध्यं बुद्धेः त्रैविध्येन करणस्याप्युक्तमिति निश्चयरूपाया बुद्धेर्धृतेश्च गुणतस्त्रैविध्यं प्रतिजानन्नाह -- बुद्धेरिति। गुणतस्त्रिविधं भेदं शृणु। तत्रापि पृथक्त्वेनोभयोर्भेदं शृणु।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.29।।हे धनञ्जय बुद्धिके और धृतिके भी सत्त्वादि गुणोंके अनुसार तीनतीन प्रकारके भेद तू विभागपूर्वक सम्पूर्णतासे यथावत् कहे हुए सुन। यह सूत्ररूपसे कहना है। दिग्विजयके समय अर्जुनने मनुष्योंका और देवोंका बहुतसा धन जीता था? इसलिये उसका नाम धनञ्जय हुआ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.29।। व्याख्या --   [इसी अध्यायके अठारहवें श्लोकमें कर्मसंग्रहके तीन हेतु बताये गये हैं -- करण? कर्म और कर्ता। इनमेंसे कर्म करनेके जो इन्द्रियाँ आदि करण हैं? उनके सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीन भेद नहीं होते। उन इन्द्रियोंमें बुद्धिकी ही प्रधानता रहती है और सभी इन्द्रियाँ बुद्धिके अनुसार ही काम करती हैं। इसलिये यहाँ बुद्धिके भेदसे करणोंके भेद बता रहे हैं।बुद्धिके निश्चयको? विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारणशक्तिका नाम धृति है। धारणशक्ति अर्थात् धृतिके बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। इसलिये बुद्धिके साथहीसाथ धृतिके भी तीन भेद बताने आवश्यक हो गये (टिप्पणी प0 911.1)।मनुष्य जो कुछ भी करता है? बुद्धिपूर्वक ही करता है अर्थात् ठीक सोचसमझकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। उस कार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी उसको धैर्यकी बड़ी भारी आवश्यकता होती है। उसकी बुद्धिमें विचारशक्ति तेज है और उसे धारण करनेवाली शक्ति -- धृति श्रेष्ठ है? तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती। जब बुद्धि अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहती है? तब मनुष्यका कार्य सिद्ध हो जाता है।अभी साधकोंके लिये कर्मप्रेरक और कर्मसंग्रहका जो प्रकरण चला है? उसमें ज्ञान? कर्म और कर्ताकी ही खास आवश्यकता है। ऐसे ही साधक अपनी साधनामें दृढ़तापूर्वक लगा रहे? इसके लिये बुद्धि और धृतिके भेदको जाननेकी विशेष आवश्यकता है क्योंकि उनके भेदको ठीक जानकर ही वह संसारसे ऊँचा उठ सकता है। किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिको धारण करके साधक संसारसे ऊँचा उठ सकता है और किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिके रहनेसे उसे ऊँचा उठनेमें बाधा लग सकती है -- यह जानना साधकके लिये बहुत जरूरी है। इसलिये भगवान्ने उन दोनोंके भेद बताये हैं। भेद बतानेमें भगवान्का भाव यह है कि सात्त्विकी बुद्धि और धृतिसे ही साधक ऊँचा उठ सकता है? राजसीतामसी बुद्धि और धृतिसे नहीं।]धनञ्जय -- जब पाण्डवोंने राजसूय यज्ञ किया था? तब अर्जुन अनेक राजाओंको जीतकर बहुतसा धन लेकर आये थे। इसीसे उनका नाम धनञ्जय पड़ा था। अब भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अपनी साधनामें सात्त्विकी बुद्धि और धृतिको ग्रहण करके गुणातीत तत्त्वकी प्राप्ति करना ही वास्तविक धन है इसलिये तुम इस वास्तविक धनको धारण करो? इसीमें तुम्हारे धनञ्जय नामकी सार्थकता है।बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि भी एक है और धृति भी एक है परन्तु गुणोंकी प्रधानतासे उस बुद्धि और धृतिके भी सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीनतीन भेद हो जाते हैं। उनका मैं ठीकठीक विवेचन करूँगा और थोड़ेमें बहुत विशेष बात

Chapter 18 (Part 17)

कहूँगा? उनको तुम मन लगाकर? ध्यान देकर ठीक तरहसे सुनो।धृति श्रोत्रादि करणोंमें नहीं आयी है। इसलिये भगवान् चैव पदका प्रयोग करके कह रहे हैं कि जैसे बुद्धिके तीन भेद बताऊँगा? ऐसे ही धृतिके भी तीन भेद बताऊँगा। साधारण दृष्टिसे देखनेपर तो धृति भी बुद्धिका ही एक गुण दीखती है। बुद्धिका एक गुण होते हुए भी धृति बुद्धिसे अलग और विलक्षण है क्योंकि धृति स्वयं अर्थात् कर्तामें रहती है। उस धृतिके कारण ही मनुष्य बुद्धिका ठीकठीक उपयोग कर सकता है। धृति जितनी श्रेष्ठ अर्थात् सात्त्विकी होगी? साधककी (साधनमें) बुद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी। साधनमें बुद्धिकी स्थिरताकी जितनी आवश्यकता है? उतनी आवश्यकता मनकी स्थिरताकी नहीं है। हाँ? एक अंशमें अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्तिमें मनकी स्थिरताकी आवश्यकता है परन्तु पारमार्थिक उन्नतिमें तो बुद्धिके अपने उद्देश्यपर स्थिर रहनेकी ही ज्यादा आवश्यकता है (टिप्पणी प0 911.2)। साधककी बुद्धि भी सात्त्विकी हो और धृति भी सात्त्विकी हो? तभी साधक अपने साधनमें दृढ़तासे लगा रहेगा। इसलिये इन दोनोंके ही भेद जाननेकी आवश्यकता है।पृथक्त्वेन -- उनके भेद अलगअलग ठीक तरहसे कहूँगा अर्थात् बुद्धि और धृतिके विषयमें भी क्याक्या भेद होते हैं? उनको भी कहूँगा।प्रोच्यमानमशेषेण -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि और धृतिके विषयमें जाननेकी जोजो आवश्यक बाते हैं? उन सबको मैं पूरापूरा कहूँगा? जिसके बाद फिर जानना बाकी नहीं रहेगा।, सम्बन्ध --   अब भगवान् सात्त्विकी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.29।।ज्ञानादीनां प्रत्येकं त्रैविध्यमुक्त्वा वृत्तिमत्या बुद्धेस्तद्वृत्तेश्च धृत्याख्यायास्त्रैविध्यं सूचयति -- बुद्धेरिति। सूत्रविवरणं प्रतिजानीते -- प्रोच्यमानमिति। अर्जुनस्य धनंजयत्वं व्युत्पादयति -- दिगिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.29।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.29।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.29।। --,बुद्धेः भेदं धृतेश्चैव भेदं गुणतः सत्त्वादिगुणतः त्रिविधं श्रृणु इति सूत्रोपन्यासः। प्रोच्यमानं कथ्यमानम् अशेषेण निरवशेषतः यथावत् पृथक्त्वेन विवेकतः धनंजय? दिग्विजये मानुषं दैवं च प्रभूतं धनं जितवान्? तेन असौ धनंजयः अर्जुनः।।

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【 Verse 18.30 】

▸ Sanskrit Sloka: प्रवृत्तिंच निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये | बन्धं मोक्षं च या वेत्तिबुद्धि: सा पार्थ सात्विकी ||

▸ Transliteration: pravṛttiṁ ca nivṛttiṁ ca kāryakārye bhayābhaye | bandhaṁ mokṣaṁ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī ||

▸ Glossary: pravṛttiṁ: the path of work; ca: also; nivṛttiṁ: the path of renunciation; ca: and; kārya: work that is to be done; akārye: prohibited action; bhaya: fearful; abhaye: fearlessness; bandhaṁ: obligation; mokṣaṁ ca: and liberation; yā: that which; vetti: knows; buddhiḥ: understanding; sā: that; pārtha: O son of Pritā; sāttvikī: in the mode of goodness

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.30 O Arjuna, that intellect is in the mode of goodness which understands the path of work and the path of renunciation, right and wrong action, fear and fearlessness, bondage and liberation.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.30।।हे पृथानन्दन जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको? कर्तव्य और अकर्तव्यको? भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है? वह बुद्धि सात्त्विकी है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.30।। हे पार्थ जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति? कार्य और अकार्य? भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष को तत्त्वत जानती है? वह बुद्धि सात्विकी है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.30 प्रवृत्तिम् action? the path of work? च and? निवृत्तिम् the path of renunciation? च and? कार्याकार्ये what ought to be done and what ought not to be done? भयाभये fear and fearlessness? बन्धम् bondage? मोक्षम् liberation? च and? या which? वेत्ति knows? बुद्धिः intellect? सा that? पार्थ O Arjuna? सात्त्विकी Sattvic.Commentary The threefold nature of knowledge has been described already (verse 22 above). Now the threefold nature of the intellect is described. Knowledge is different from the intellect.Pravritti Action The cause of bondage the path of action. Nivritti Inaction The cause of liberation the path of renunciation the path of Sannyasa.Karyakarye The pure intellect knows what ought to be done and what ought not to be done at,particular places and times it knows the actions that produce visible or invisible results? that are enjoined or prohibited by the scriptures. It guides a man who relies on the scriptural ordinances for his daily conduct of life.Bhayabhaye Fear and fearlessness The cause of fear and fearlessness either visible or invisible.Bandham moksham Bondage and liberation together with their causes.Knowledge is a Vritti (function or state) of the intellect whereas intellect is what functions or undergoes the change of state. Even firmness is only a particular Vritti (modification or state) of the intellect. (Cf.XVIII.20)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.30. The intellect which knows the activity and the cessation from the activity, the proper and improper actions, the fear and non-fear, and the bondage and emancipation-that intellect is considered to be of the Sattva (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.30 That intellect which understands the creation and dissolution of life, what actions should be done and what not, which discriminates between fear and fearlessness, bondage and deliverance, that is Pure.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.30 That Buddhi, O Arjuna, which knows activity and renunciation, what ought to be done and what ought not to be done, fear and fearlessness, bondage and release - that (Buddhi) is Sattvika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.30 O Partha, that intellect is born of sattva which understands action and withdrawal, duty and what is not duty, the sources of fear and fearlessness, and bondage and freedom.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.30 The intellect which knows the path of work and renunciation, what ought to be done and what ought not to be done, fear and fearlessness, bondage and liberation that intellect is Sattvic (pure), O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.30 See Comment under 18.32

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.30 'Activity' is that Dharma which is the means for wordly prosperity. 'Renunciation' is that Dharma which is the means for release. The Buddhi which knows both these as they are, is Sattviki-buddhi. Further, such a Buddhi is capable of distinguishing between what ought to be done and what ought not to be done by persons of different stations in life, having as their duty activity or renunciation at particular places or times. Such a Buddhi helps them to know 'This ought to be done and this ought not to be done.' Such a Buddhi discerns transgression of the Sastras as the cause of fear and observance of the Sastras as the cause of fearlessness. It enables one to distinguish between bondage and release, the true nature of Samsara and deliverance from it. The Buddhi that functions in these ways is Sattvika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.30 O Partha, sa, that; buddhih, intellect; is sattviki, born of sattva; ya, which; vetti, understands; pravrttim, action, the path of rites and duties, which is the cause of bondage; and nivrttim, withdrawal, the path of renunciation, which is the cause of Liberation-since action and withdrawal are mentioned in the same sentence along with bondage and freedom, therefore they mean 'the path of rites and duties and of renunciation'-; karya-akarye, duty and what is not duty, i.e. what is enjoined or prohibited, [Ast. adds laukike vaidike va (ordinary or Vedic injunctions and prohibitions) after vihita-pratisiddhe; and it adds sastrabuddheh before kartavya-akartavye-what ougth to be done or ought not to be done by one who relies on the scriptures.-Tr.] what ought to be done or ought not to be done, action and inaction. With regard to what? With regard to action leading to seen or unseen, results, undertaken according to place, time, etc. Bhaya-adhaye, the sources of fear and fearlessness, i.e. the cuases of fear and fearlessness, with regard to seen or unseen objects; bandham, bondage, along with its cause; and moksam, freedom, along with its cause. In this context, knowing is a function of the intellect; but the intellect is the possesser of the function. Fortitude also is only a particular function of the intellect.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.30।। वह बुद्धि सर्वोच्च मानी जाती है? जो अपने कार्यक्षेत्र की वस्तुओं? व्यक्तियों एवं घटनाओं को यथार्थ रूप में तत्परता से समझ सकती है। बुद्धि के अनेक कार्य हैं? जैसे निरीक्षण? विश्लेषण? वर्गीकरण? संकल्पना? कामना? स्मरण करना इत्यादि तथापि इन सब में जिस क्षमता की आवश्यकता होती है? वह है विवेक की क्षमता। विवेक के बिना यथार्थ निरीक्षण? निर्णय आदि असंभव हैं। अत बुद्धि का मुख्य कार्य है? विवेक।प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दो शब्दों के परिभाषिक अर्थ क्रमश कर्ममार्ग और संन्यास मार्ग हैं। एक साधक को इन दोनों के वास्तविक स्वरूप को समझकर स्वयं की अभिरुचि एवं क्षमता के अनुसार किसी एक मार्ग का यथायोग्य अनुरक्षण करना चाहिये। अन्यथा कोई साधक कर्म में ही आसक्त होकर रह जायेगा? तो अन्य साधक संन्यास के नाम पर केवल पलायन ही करेगंे।कार्य और अकार्य सत्य और मिथ्या का विवेक करने वाली बुद्धि का प्रयोजन? कार्य और अकार्य अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक करना भी है। मनुष्य को यह जानना आवश्यक होता है कि कौन से कर्म कर्तव्य और उचित हैं तथा कौन से कर्म निषिद्ध और अनुचित हैं। इस विवेक के न होने पर मनुष्य कभीकभी क्रोधावेश या मिथ्या अभिमान के कारण अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे देता है? जिसका उसे कालान्तर में पश्चाताप होता है। अर्जुन ने भी मानसिक उन्माद की स्थिति में इस विवेक को खो दिया था? जिसका मुख्य कारण उसका मित्र? बन्धु? परिवार से अत्याधिक स्नेह ही था।भय और अभय मूढ़ लोग अत्याधिक विषयासक्ति के कारण अवैध? अनैतिक और अधार्मिक कार्य करने से भयभीत नहीं होते परन्तु शास्त्रों का अध्ययन और आत्मानुसंधान जैसे श्रेष्ठ कार्यों में प्रवृत्त होने में उन्हें भय प्रतीत होता है। संन्यास और वैराग्य जैसे शब्दों से भी उन्हें डर लगता है। अत वह बुद्धि सात्त्विक है? जो भय और अभय के कारणों का सम्यक् प्रकार से विवेक कर सकती है।बन्ध और मोक्ष अपने सच्चिदानन्दस्वरूप के अज्ञान से ही हम विषयों से सुख प्राप्ति की कामना करके कर्म में प्रवृत्त होते हैं। कर्मफल के उपभोग से वासनाएं उत्पन्न होती हैं? जो पुन हमें कर्म में प्रवृत्त करती रहती हैं। ये अज्ञानजनित वासनाएं ही हमारे बन्धन को दृढ़ करती हैं। अत आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान के नाश से ही हमें मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। जो बुद्धि बन्धन के कारण और मोक्ष के साधन को तत्त्वत जानती है? वही सात्त्विक बुद्धि है।सारांशत? प्रवृत्ति और निवृत्ति? कार्याकार्य? भयाभय और बन्धमोक्ष के स्वरूप को यथावत् पहचानने वाली बुद्धि सात्त्विक है।सात्त्विक बुद्धि मरुस्थल में भी सुन्दर उपवन की रचना कर सकती है और विफलता की प्रत्येक आशंका से सफलता का सम्पादन कर सकती है। बुद्धि और धृति के बिना जीवन में प्राप्त होने वाले सुअवसर भी विपत्ति के कारण बन जाते हैं अथवा धूलि में मिल जाते हैं। सात्त्विक बुद्धि घोरतम त्रासदियों को श्रेष्ठतम सुख समृद्धियों में परिवर्तित कर सकती है।राजसी बुद्धि क्या है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.30।।तत्र बुद्धेस्त्रैविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विकीं बुद्धिमुदाहरति -- प्रवृत्तिं च निवृत्तिं चेति। यस्मिन्वाक्ये बन्धमोक्षावुच्येते तस्मिन्नेव प्रवृत्तिनिवृत्त्योरुक्तत्वात्। कर्ममार्गस्य बन्धहेतुत्वात् निवृत्तिमार्गस्य मोक्षहेतुत्वाच्च प्रवृत्तिनिवृत्ती कर्मसंन्यासमार्गावित्यवगम्यते। तथाच प्रवृत्तिः प्रवर्तनं बन्धहेतुः कर्ममार्गः? निवृत्तिः संन्यासहेतुर्मोक्षमार्गः? प्रवृत्तिं शास्त्रविहितविषयां? निवृत्तिं तत्प्रतिषिद्धविषयामित्यपि बोध्यम्। कार्याकार्ये कर्तव्याकर्तव्ये देशकालाद्यपेक्षया दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणां करणाकरणे। विमेत्यस्मादीति भयं भयकारणं तद्विपरीतमभयमभयकारणं भयं चाभयं च भयाभये। भयं दुःखमभयं सुखमिति तु सात्त्विक्या बुद्धेर्दुःखानुभवस्यायोग्यत्वं? भयं प्रवृत्तिमार्गे अभयं निवृत्तिमार्गे इति विवक्षायामध्याहारदोषं चाभिप्रेत्याचार्यैर्न व्याख्यातम्। बन्धं सहेतुकं मोक्षं च सहेतुकं या वेत्ति सा बुद्धिः सात्त्विकी। करणे कर्तत्वोपचारात्प्रथमा। सात्त्विक्या बुद्य्धा युक्तायाः पृथायाः पुत्रस्त्वमपि तथैव भवितुं योग्योऽसीति सूचनार्थं पार्थेति संबोधनम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.30।।तत्र बुद्धेस्त्रैविध्यमाह त्रिभिः -- प्रवृत्तिं चेति। प्रवृत्तिं कर्ममार्गं? निवृत्तिं संन्यासमार्गं? कार्यं प्रवृत्तिमार्गे कर्मणां करणम्। अकार्यं निवृत्तिमार्गे कर्मणामकरणम्? भयं प्रवृत्तिमार्गे गर्भवासादिदुःखं? अभयं निवृत्तिमार्गे तदभावं? बन्धं प्रवृत्तिमार्गे मिथ्याज्ञानकृतं कर्तृत्वाद्यभिमानम्? मोक्षं निवृत्तिमार्गे तत्त्वज्ञानकृतमज्ञानतत्कार्याभावं च यो वेत्ति। करणे कर्तृत्वोपचारात् यया वेत्ति कर्ता बुद्धिः सा प्रमाणजनितनिश्चयवती हे पार्थ? सात्त्विकी। बन्धमोक्षयोरन्ते कीर्तनात्तद्विषयमेव प्रवृत्त्यादि व्याख्यातम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.30।।प्रवृत्तिनिवृत्ती शास्त्रविहितप्रतिषिद्धविषयेयजेत स्वर्गकामः?न सुरां पिबेत् इत्यादिरूपे। कार्यं कृतिसाध्यं स्वर्गादि। अकार्यं नित्यसिद्धं तेन नित्यानित्यवस्तुनी उक्ते। भयाभये कार्याकार्यनिमित्ते। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति यया वेत्तीति पूर्ववत्करणे कर्तृत्वोपचारः। बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.30।।एवं सावधानं कृत्वा बुद्धित्रैविध्यमाह -- प्रवृत्तिमिति त्रयेण। प्रवृत्तिं भगवदिङ्गितधर्मे? निवृत्तिं तदभावरूपे अधर्मे। कार्याकार्ये सत्परिपन्थ्यभावे देशे भजनं कार्यम्? अतथाभूते वा भजनातिरिक्तं सर्वमेवाकार्यम्। तथा भगवत्सम्बन्धरहितसम्बन्धे भयं भगवद्विस्मरणात्मकमृत्युरूपं? तत्सम्बन्धिन्यभयं भयाभावं? बन्धं भगवत्सेवाङ्गाभावकर्मणि? मोक्षं सेवादिकर्मणि? इति या बुद्धिर्वेत्ति जानाति? हे पार्थ तथाज्ञानयोग्य सा बुद्धिः सात्त्विकी सत्त्वसम्बन्धिनी? ज्ञातव्येति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.30।।तत्र बुद्धेस्त्रैविध्यमाह -- प्रवृत्तिं चेति त्रिभिः। प्रवृत्तिं च धर्मे निवृत्तिं चाधमें। यस्मिन् देशे काले च यत्कार्यमकार्यं च भयाभये कार्याकार्यनिमित्तावर्थानर्थौ कथं बन्धः कथं वा मोक्ष इति या बुद्धिरन्तःकरणं वेत्ति सा सात्त्विकी। यया पुमान् वेत्तीति वक्तव्ये करणे कर्तृत्वोपचारः काष्ठानि पचन्तीतिवत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.30।।तथा हि प्रवृत्तिं चेति त्रिभिः। प्रवृत्तिरभ्युदयसाधनभूतो धर्मः? निवृत्तिर्मोक्षसाधनभूतो धर्मः? ताबुभौ यथास्थितौ बुद्धिर्वेत्ति या सा सात्विको। अत्रमनसस्तु परा बुद्धिः [3।42] इत्युक्त्या बुद्धेः परत्वाभिप्रायेण रथो गच्छतीतिवद्वा वेत्तृत्वमुच्यते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.30।।जो बुद्धि? प्रवृत्तिको -- बन्धनके हेतुरूप कर्ममार्गको और निवृत्तिको -- मोक्षके हेतुरूप संन्यासमार्गको जानती है। बन्ध और मोक्षके साथ प्रवृत्ति और निवृत्तिकी समानवाक्यता है? इससे यह निश्चय होता है कि प्रवृत्ति और निवृत्तिका अर्थ कर्म मार्ग और संन्यासमार्ग ही है। तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको -- विधि और प्रतिषेधको? यानी करनेयोग्य और न करनेयोग्यको ( भी जानती है )। यह कहना किसके सम्बन्धमें है देशकाल आदिकी अपेक्षासे जिनके दृष्ट और अदृष्ट फल होते हैं? उन कर्मोंके सम्बन्धमें। तथा जो बुद्धि भय और अभयको(जानती है )। जिससे मनुष्य भयभीत होता है? उसका नाम भय है और उससे विपरीतका नाम अभय है उन दोनोंको? यानी दृष्टादृष्टविषयक जो भय और अभय हैं उन दोनोंके कारणोंको जानता है? एवं हेतुसहित बन्धन और मोक्षको भी जानती है? हे पार्थ वह बुद्धि सात्त्विकी है। पहले जो ज्ञान कहा गया है? वह बुद्धिकी एक वृत्तिविशेष है और बुद्धि वृत्तिवाला है। धृति भी बुद्धिकी वृत्तिविशेष ही है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.30।। व्याख्या --   प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च -- साधकमात्रकी प्रवृत्ति और निवृत्ति -- ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कभी वह संसारका कामधंधा करता है? तो यह प्रवृत्तिअवस्था है और कभी संसारका कामधंधा छोड़कर एकान्तमें भजनध्यान करता है? तो यह निवृत्तिअवस्था है। परन्तु इन दोनोंमें सांसारिक कामनासहित प्रवृत्ति और वासनासहित निवृत्ति (टिप्पणी प0 912) -- ये दोनों ही अवस्थाएँ प्रवृत्ति हैं अर्थात् संसारमें लगानेवाली हैं? तथा सांसारिक कामनारहित प्रवृत्ति और वासनारहित निवृत्ति -- ये दोनों ही अवस्थाएँ निवृत्ति हैं अर्थात् परमात्माकी तरफ ले जानेवाली हैं। इसलिये साधक इनको ठीकठीक जानकर,कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्तिको ही ग्रहण करें।वास्तवमें गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति भी यदि अपने सुख? आराम आदिके लिये की जायँ तो वे दोनों ही प्रवृत्ति हैं क्योंकि वे दोनों ही बाँधनेवाली हैं अर्थात् उनसे अपना व्यक्तित्व नहीं मिटता। परन्तु यदि कामनावासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति -- दोनों केवल दूसरोंके सुख? आराम और हितके लिये ही की जायँ? तो वे दोनों ही निवृत्ति हैं क्योंकि उन दोनोंसे ही अपना व्यक्तित्व नहीं रहता। वह अव्यक्तित्व कब नहीं रहता जब प्रवृत्ति और निवृत्ति जिसके प्रकाशसे प्रकाशित होती हैं तथा जो प्रवृत्ति और निवृत्तिसे रहित है? उस प्रकाशक अर्थात् तत्त्वकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति की जाय। प्रवृत्ति तो की जाय प्राणिमात्रकी सेवाके लिये और निवृत्ति की जाय परम विश्राम अर्थात् स्वरूपस्थितिके लिये।कार्याकार्ये -- शास्त्र? वर्ण? आश्रमकी मर्यादाके अनुसार जो काम किया जाता है? वह कार्य है और शास्त्र आदिकी मर्यादासे विरुद्ध जो काम किया जाता है वह अकार्य है।जिसको हम कर सकते हैं? जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे जीवका जरूर कल्याण होता है? वह कार्य अर्थात् कर्तव्य कहलाता है और जिसको हमें नहीं करना चाहिये तथा जिससे जीवका बन्धन होता है? वह अकार्य अर्थात् अकर्तव्य कहलाता है। जिसको हम नहीं कर सकते? वह अकर्तव्य नहीं कहलाता? वह तो अपनी असामर्थ्य है।भयाभये -- भय और अभयके कारणको देखना चाहिये। जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका अनिष्ट होनेकी सम्भावना है? वह कर्म भय अर्थात् भयदायक है और जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका हित होनेकी सम्भावनना है? वह कर्म अभय अर्थात् सबको अभय करनेवाला है।मनुष्य जब करनेलायक कार्यसे च्युत होकर अकार्यमें प्रवृत्त होता है? तब उसके मनमें अपनी मनबड़ाईकी हानि और निन्दाअपमान होनेकी आशङ्कासे भय पैदा होता है। परन्तु जो अपनी मर्यादासे कभी विचलित नहीं होता? अपने मनसे किसीका भी अनिष्ट नहीं चाहता और केवल परमात्मामें ही लगा रहता है? उसके मनमें सदा अभय बना रहता है। यह अभय ही मनुष्यको सर्वथा अभयपद -- परमात्माको प्राप्त करा देता है।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति -- जो बाहरसे तो यज्ञ? दान? तीर्थ? व्रत आदि उत्तमसेउत्तम कार्य करता है परन्तु भीतरसे असत् जड? नाशवान् पदार्थोंको और स्वर्ग आदि लोकोंको चाहता है? उसके लिये वे सभी कर्म बन्ध अर्थात् बन्धनकारक ही हैं। केवल परमात्मासे ही सम्बन्ध रखना? परमात्माके सिवाय कभी किसी अवस्थामें असत् संसारके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध न रखना मोक्ष अर्थात् मोक्षदायक है।अपनेको जो वस्तुएँ नहीं मिली हैं? उनकी कामना होनेसे मनुष्य उनके अभावका अनुभव करता है। वह अपनेको उन वस्तुओंके परतन्त्र मानता है और वस्तुओंके मिलनेपर अपनेको स्वतन्त्र मानता है। वह समझता तो यह है कि मेरे पास वस्तुएँ होनेसे मैं स्वतन्त्र हो गया हूँ? पर हो जाता है उन वस्तुओंके परतन्त्र वस्तुओंके अभाव और वस्तुओंके भाव -- इन दोनोंकी परतन्त्रतामें इतना ही फरक पड़ता है कि वस्तुओंके अभावमें परतन्त्रता दीखती है? खटकती है और वस्तुओंके होनेपर वस्तुओंकी परतन्त्रता परतन्त्रताके रूपमें दीखती ही नहीं क्योंकि उस समय मनुष्य अन्धा हो जाता है। परन्तु हैं ये दोनों ही परतन्त्रता? और परतन्त्रता ही बन्धन है। अभावकी परतन्त्रता प्रकट विष है और भावकी परतन्त्रता छिपा हुआ मीठा विष है? पर हैं दोनों ही विष। विष तो मारनेवाला ही होता है।निष्कर्ष यह निकला कि सांसारिक वस्तुओंकी कामनासे ही बन्धन होता है और परमात्माके सिवाय किसी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? देश? काल आदिकी कामना न होनेसे मुक्ति होती है (टिप्पणी प0 913)। यदि मनमें कामना है तो वस्तु पासमें हो तो बन्धन और पासमें न हो तो बन्धन यदि मनमें कामना नहीं है तो वस्तु पासमें हो तो मुक्त और पासमें न हो तो मुक्तिबुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी -- इस प्रकार जो प्रवृत्तिनिवृत्ति? कार्यअकार्य? भयअभय और बन्धमोक्षके वास्तविक तत्त्वको जानती है? वह बुद्धि सात्त्विकी है।इनके वास्तविक तत्त्वको जानना क्या है प्रवृत्तिनिवृत्ति? कार्यअकार्य? भयअभय और बन्धमोक्ष -- इनको गहरी रीतिसे समझकर? जिसके साथ वास्तवमें हमारा सम्बन्ध नहीं है? उस संसारके साथ सम्बन्ध न मानना और जिसके साथ हमारा स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है? ऐसे (प्रवृत्तिनिवृत्ति आदिके आश्रय तथा प्रकाशक) परमात्माको तत्त्वसे ठीकठीक जानना -- यही सात्त्विकी बुद्धिके द्वारा वास्तविक तत्त्वको ठीकठीक जानना है। सम्बन्ध --   अब राजसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.30।।तत्रादौ सात्त्विकीं बुद्धिं निर्दिशति -- प्रवृत्तिं चेति। प्रवृत्तिराचरणमात्रम्? अनाचरणमात्रं च निवृत्तिरिति किं नेष्यते तत्राह -- बन्धेति। यस्मिन्वाक्ये बन्धमोक्षावुच्येते तस्मिन्नेव प्रवृत्तिनिवृत्त्योरुक्तत्वात् कर्ममार्गस्य बन्धहेतुत्वान्मोक्षहेतुत्वाच्च संन्यासमार्गस्य तावेवात्र ग्राह्यावित्यर्थः।,करणाकरणयोर्निर्विषयत्वायोगाद्विषयापेक्षामवतार्य योग्यं विषयं निर्दिशति -- कस्येति। अनिष्टसाधनं भयमिष्टसाधनमभयमिति विभजते -- भयेति। बन्धादिमात्रज्ञानस्य बुद्ध्यन्तरेऽपि संभवाद्विशेषणम्। ननु बुद्धिशब्दितस्य ज्ञानस्य प्रागेव त्रैविध्यप्रतिपादनात्किमिति बुद्धेरिदानीं त्रैविध्यं प्रतिज्ञाय व्युत्पाद्यते तत्राह -- ज्ञानमिति। तर्हि ज्ञानेन गतत्वान्न पुनर्धृतिर्व्युत्पादनीयेत्याशङ्क्याह -- धृतिरपीति। विशेषशब्देन ज्ञानाद्व्यावृत्तिरिष्टा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.30।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.30।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.30।। --,प्रवृत्तिं च प्रवृत्तिः प्रवर्तनं बन्धहेतुः कर्ममार्गः शास्त्रविहितविषयः? निवृत्तिं च निर्वृत्तिः मोक्षहेतुः संन्यासमार्गः -- बन्धमोक्षसमानवाक्यत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्ती कर्मसंन्यासमार्गौ इति अवगम्यते -- कार्याकार्ये विहितप्रतिषिद्धे लौकिके वैदिके वा शास्त्रबुद्धेः कर्तव्याकर्तव्ये करणाकरणे इत्येतत् कस्य देशकालाद्यपेक्षया दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणाम्। भयाभये बिभेति अस्मादिति भयं चोरव्याघ्रादि? न भयं अभयम्? भयं च अभयं च भयाभये? दृष्टादृष्टविषययोः भयाभययोः कारणे इत्यर्थः। बन्धं सहेतुकं मोक्षं च सहेतुकं या वेत्ति विजानाति बुद्धिः? सा पार्थ सात्त्विकी। तत्र ज्ञानं बुद्धेः वृत्तिः बुद्धिस्तु वृत्तिमती। धृतिरपि वृत्तिविशेषः एव बुद्धेः।।

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【 Verse 18.31 】

▸ Sanskrit Sloka: यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च | अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी ||

▸ Transliteration: yayā dharmamadharmaṁ ca kāryaṁ cākāryam eva ca | ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī ||

▸ Glossary: yayā: by which; dharmaṁ: right conduct; adharmaṁ: what is not right con- duct; ca: and; kāryaṁ: work; ca: also; akāryaṁ: what ought not to be done; eva: certainly; ca: also; ayathāvat: not perfectly; prajānāti: knows; buddhiḥ: intelligence; sā: that; pārtha: O son of Pritā; rājasī: in the mode of passion

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.31 That intellect is in the mode of passion that cannot dis- tinguish between principles of right conduct and wrong doing, and right and wrong action, O Pārtha (Arjuna).

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.31।।हे पार्थ मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको? कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता? वह बुद्धि राजसी है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.31।। हे पार्थ जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को यथावत् नहीं जानता है? वह बुद्धि राजसी है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.31 यया by which? धर्मम् Dharma? अधर्मम् Adharma? च and? कार्यम् what ought to be done? च and? अकार्यम् what ought not to be done? एव even? च and? अयथावत् wrongly? प्रजानाति understands? बुद्धिः intellect? सा that? पार्थ O Partha? राजसी Rajasic (passionate).Commentary There is no proper eivalent in the English language for the word Dharma. Duty? righteousness? virtue? law are very poor translations of the word. That which elevates you and takes you to the goal? i.e.? Brahman or the Self? is Dharma. That which hurls you down into the dark abyss of ignorance is Adharma. What is ordained in the scriptures is Dharma what is prohibited by them is Adharma. A Rajasic intellect is not able to distinguish between right and wrong or to understand the difference between righteous and unrighteous actions.Ayathavat Wrongly Contrary to what is determined by all authorities or men of wisdom or to the highest knowledge.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.31. The intellect, by means of which one decides incorrectly the righteous and the unrighteous ones and what is a proper action and also an improper onethat intellect is of the Rajas (Strand), O son of Prtha !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.31 The intellect which does not understand what is right and what is wrong, and what should be done and what not, is under the sway of Passion.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.31 The Buddhi which gives an erroneous knowledge of Dharma and Adharma (its opposite) and also of what ought to be done and what ought not to be done, O Arjuna, is Rajasika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.31 O Partha, that intellect is born of rajas with which one wrongly understands virtue and vice as also what ought to be done and ought not to be done.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.31 That, by which one wrongly understands Dharma and Adharma and also what ought to be done and what ought not to be done that intellect, O Arjuna, is Rajasic (passionate).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.31 See Comment under 18.32

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.31 That Buddhi by which one does not know exactly the twofold Dharma previously mentioned and its opposite, and what ought to be done and what ought not to be done by those intent on them in accordance with place, time and conditions - that Buddhi is Rajasika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.31 O Partha, sa, that; buddhih, intellect; is rajasi, born of rajas; yaya, with which; prajanati, one understands; ayathavat, wrongly, not truly, not by discerning it from all points of view; dharmam, virtue, as prescribed by the scritpures; and adharmam, vice, what is prohibited by them; [By dharma and adharma are implied the seen and the unseen results of actions as revealed by the scriptures; karya and akarya respectively refer to the actual doing of what ought to be done and the not doing of what ought not to be done.] ca eva, as also; karyam, what ought to be done; and akaryam, what ought not to be done-those very 'duty' and 'what is not duty' as stated earlier.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.31।। जहाँ सात्त्विक बुद्धि प्रत्येक पदार्थ को यथार्थ रूप में जानती है? वहाँ राजसी बुद्धि का पदार्थ ज्ञान सन्देहात्मक? अस्पष्ट या कुछ विकृत रूप में होता है। इसका कारण है पूर्वाग्रह और दृढ़ राग और द्वेष।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.31।।सात्त्विकीं बुद्धिमुक्त्वा राजसीं तामाह -- यया बुद्य्धा धर्मं शास्त्रचोदितं अधर्म च तत्प्रतिषिद्धं कार्यं च,कर्तव्यमकार्यमेव चाकर्तव्यं अयथावत् न यथावत्प्रजानाति सर्वतो निर्णयेन न प्रजानाति सा बुद्धिः पार्थ? राजसी। पृथापुत्रस्य तव नेयं युक्तेति संबोधनाशयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.31।।ययेति। धर्मं शास्त्रविहितं? अधर्मं शास्त्रप्रतिषिद्धमदृष्टार्थमुभयम्? कार्यं चाकार्यं च दृष्टार्थमुभयं अयथावदेव प्रजानाति यथावन्न जानाति किंस्विदिदमिदमित्थं नवेति चानध्यवसायं संशयं वा भजते यया बुद्ध्या सा राजसी बुद्धिः। अत्र तृतीयानिर्देशादन्यत्रापि करणत्वं व्याख्येयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.31।।अयथावत् संदेहास्पदत्वेन। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.31।।राजसीमाह -- ययेति। यथा बुद्ध्या धर्मं भगवदिच्छारूपम्? अधर्मं अनिच्छात्मकं? कार्यं भगवद्भजनम्? अकार्यं तदतिरिक्तं कर्म? अयथावत् सन्दिग्धम्? अन्यथा वा प्रजानाति? हे पार्थ सा बुद्धिः,राजसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.31।।राजसीं बुद्धिमाह -- ययेति। अयथावत्संदेहास्पदत्वेनेत्यर्थः। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.31।।यया धर्ममिति। पूर्वोक्तं द्विविधं धर्मं तद्विरुद्धं च प्रजानाति? न यथावत् सा राजसी बुद्धिः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.31।।हे पार्थ जिस बुद्धिके द्वारा मनुष्य शास्त्रविहित धर्मको और शास्त्रप्रतिषिद्ध अधर्मको? एवं पूर्वोक्त कर्तव्य और अकर्तव्यको? यथार्थरूपसे -- सर्वतोभावसे निर्णयपूर्वक? नहीं जानता? वह बुद्धि राजसी है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.31।। व्याख्या --   यया धर्ममधर्मं च -- शास्त्रोंने जो कुछ भी विधान किया है? वह धर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा दी है और जिससे परलोकमें सद्गति होती है? वह धर्म है। शास्त्रोंने जिसका निषेध किया है? वह अधर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा नहीं दी है और जिससे परलोकमें दुर्गति होती है? वह अधर्म है। जैसे? अपने मातापिता? बड़ेबूढ़ोंकी सेवा करनेमें? दूसरोंको सुख पहुँचानेमें? दूसरोंका हित करनेकी चेष्टामें अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार? सामर्थ्य आदिको लगा देना धर्म है। ऐसे ही कुआँबावड़ी खुदवाना? धर्मशालाऔषधालय बनवाना? प्याऊसदावर्त चलाना देश? ग्राम? मोहल्लेके अनाथ तथा गरीब बालकोंकी और समाजकी उन्नतिके लिये अपनी कहलानेवाली चीजोंको आवश्यकतानुसार उनकी ही समझकर निष्कामभावसे उदारतापूर्वक खर्च करना धर्म है। इसके विपरीत अपने स्वार्थ? सुख? आरामके लिये दूसरोंकी धनसम्पत्ति? हक? पद? अधिकार छीनना दूसरोंका अपकार? अहित? हत्या आदि करना अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको दुःख देना अधर्म है।वास्तवमें धर्म वह है? जो जीवका कल्याण कर दे और अधर्म वह है? जो जीवको बन्धनमें डाल दे।कार्यं चाकार्यमेव च -- वर्ण? आश्रम? देश? काल? लोकमर्यादा? परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रोंने हमारे लिये जिस कर्मको करनेकी आज्ञा दी है? वह कर्म हमारे लिये कर्तव्य है। अवसरपर प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन न करना तथा न करनेलायक कामको करना अकर्तव्य है। जैसे? भिक्षा माँगना यज्ञ? विवाह आदि कराना और उनमें दानदक्षिणा लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये तो कर्तव्य हैं? पर क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये अकर्तव्य हैं। इसी प्रकार शास्त्रोंने जिनजिन वर्ण और आश्रमोंके लिये जोजो कर्म बताये हैं? वे सब उनउनके लिये कर्तव्य हैं और जिनके लिये निषेध किया है? उनके लिये वे सब अकर्तव्य हैं।जहाँ नौकरी करते हैं? वहाँ ईमानदारीसे अपना पूरा समय देना? कार्यको सुचारुरूपसे करना? जिस तरहसे मालिकका हित हो? ऐसा काम करना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये कर्तव्य हैं। अपने स्वार्थ? सुख और आराममें फँसकर कार्यमें पूरा समय न लगाना? कार्यको तत्परतासे न करना? थोड़ीसी घूस (रिश्वत) मिलनेसे मालिकका बड़ा नुकसान कर देना? दसपाँच रुपयोंके लिये मालिकका अहित कर देना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये अकर्तव्य हैं।राजकीय जितने अफसर हैं? उनको राज्यका प्रबन्ध करनके लिये? सबका हित करनेके लिये ही ऊँचे पदपर,रखा जाता है। इसीलिये अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके जिस प्रकार सब लोगोंका हित हो सकता है? सबको सुख? आराम? शान्ति मिल सकती है -- ऐसे कामोंको करना उनके लिये कर्तव्य है। अपने तुच्छ स्वार्थमें आकर राज्यका नुकसान कर देना? लोगोंको दुःख देना आदि उनके लिये अकर्तव्य है।सात्त्विकी बुद्धिमें कही हुई प्रवृत्तिनिवृत्ति? भयअभय और बन्धमोक्षको भी यहाँ एव च पदोंसे ले लेना चाहिये।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी -- राग होनेसे राजसी बुद्धिमें स्वार्थ? पक्षपात? विषमता आदि दोष आ जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए बुद्धि धर्मअधर्म? कार्यअकार्य? भयअभय? बन्धमोक्ष आदिके वास्तविक तत्त्वको ठीकठीक नहीं जान सकती। अतः किसी वर्णआश्रमके लिये किस परिस्थितिमें कौनसा धर्म कहा जाता है और कौनसा अधर्म कहा जाता है वह धर्म किस वर्णआश्रमके लिये कर्तव्य हो जाता है और किसके लिये अकर्तव्य हो जाता है किससे भय होता है और किससे मनुष्य अभय हो जाता है इन बातोंको जो बुद्धि ठीकठीक नहीं जान सकती? वह बुद्धि राजसी है।जब सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? क्रिया? पदार्थ आदिमें राग (आसक्ति) हो जाता है? तो वह राग दूसरोंके प्रति द्वेष पैदा करनेवाला हो जाता है। फिर जिसमें राग हो जाता है उसके दोषोंको और जिसमें द्वेष हो जाता है? उसके गुणोंको मनुष्य नहीं देख सकता। राग और द्वेष -- इन दोनोंमें संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। संसारके साथ सम्बन्ध जुड़नेपर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। ऐसे ही परमात्मासे अलग रहनेपर मनुष्य परमात्माको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे अभिन्न होकर ही परमात्माको जान सकता है। वह अभिन्नता चाहे प्रेमसे हो? चाहे ज्ञानसे हो।परमात्मासे अभिन्न होनेमें सात्त्विकी बुद्धि ही काम करती है क्योंकि सात्त्विकी बुद्धिमें विवेकशक्ति जाग्रत् रहती है। परन्तु राजसी बुद्धिमें वह विवेकशक्ति रागके कारण धुँधलीसी रहती है। जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती? ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्मअधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। राजसी बुद्धि होनेपर मनुष्य जिसजिस विषयमें प्रवेश करता है? उसको उस विषयको समझनेमें कठिनता पड़ती है। उस विषयके गुणदोषोंको ठीकठीक समझे बिना वह ग्रहण और त्यागको अपने आचरणमें नहीं ला सकता अर्थात् वह ग्राह्य वस्तुका ग्रहण नहीं कर सकता और त्याज्य वस्तुका त्याग नहीं कर सकता। सम्बन्ध --   अब तामसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.31।।कार्याकार्ययोर्धर्माधर्माभ्यां पौनरुक्त्यं परिहरति -- पूर्वोक्ते इति। पूर्वश्लोके कार्याकार्यशब्दाभ्यां दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणां करणाकरणे निर्दिष्टे तयोरेवात्रापि ग्रहान्न धर्माधर्माभ्यां पूर्वपर्यायाभ्यां गतार्थतेत्यर्थः। या (सा) बुद्धिर्यया बुद्ध्या बोद्धा निर्णयेन न जानातीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.31।।यया धर्ममधर्मं चेति राजस्या बुद्धेर्धर्मादिविषयायाः अयथार्थज्ञानहेतुत्वमुच्यत,इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थमाह -- यथार्थत्वेति। अयथावत्प्रजानातीत्यस्य यथार्थज्ञानजनननियमाभावे तात्पर्यमित्यर्थः। प्रतीत एवार्थः किं न स्यात् इत्यत आह -- अन्यथेति।राजस्याः इति षष्ठ्यन्तमनुवर्तते।तामस्याः इति पञ्चमी? भेदाभावाद्भेदाभावप्रसङ्गात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.31।।यथार्थत्वानियमाभावे राजस्याः। अन्यथा तामस्याः? भेदाभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.31।। --,यया धर्मं शास्त्रचोदितम् अधर्मं च तत्प्रतिषिद्धं कार्यं च अकार्यमेव च पूर्वोक्ते एव कार्याकार्ये अयथावत् न यथावत् सर्वतः निर्णयेन न प्रजानाति? बुद्धिः सा पार्थ? राजसी।।

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【 Verse 18.32 】

▸ Sanskrit Sloka: अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता | सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी ||

▸ Transliteration: adharmaṁ dharmamiti yā manyate tamasā ’vṛtā | sarvārthānviparītāṁśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī ||

▸ Glossary: adharmaṁ: what is not right conduct; dharmaṁ: right conduct; iti: thus; yā: which; manyate: thinks; tamasā: by ignorance; avṛtā: covered; sarvārthān: all things; viparītāṁ: the wrong direction; ca: also; buddhiḥ: intelligence; sā: that; pārtha: O son of Pritā; tāmasī: the mode of ignorance

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.32 That intellect is in the mode of ignorance that accepts unrighteousness as righteousness and thinks everything to be that which it is not, O Pārtha.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.32।।हे पृथानन्दन तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है? वह तामसी है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.32।। हे पार्थ तमस् (अज्ञान अन्धकार) से आवृत जो बुद्धि अधर्म को ही धर्म मानती है और सभी पदार्थों को विपरीत रूप से जानती है? वह बुद्धि तामसी है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.32 अधर्मम् Adharma? धर्मम् Dharma? इति thus? या which? मन्यते thinks? तमसा by darkness? आवृता enveloped? सर्वार्थान् all things? विपरीतान् perverted? च and? बुद्धिः intellect? सा that? पार्थ O Partha? तामसी Tamasic (dark).Commentary That intellect which regards righteous acts as evil? and considers right things to be false? which treats everything in a contrary sense and looks upon virtues as if they were vices and takes everything that the scriptures declare to be good as being entirely wrong? is Tamasic. It views all things in a perverted light.Thus? O Arjuna? I have explained to thee the three aspects of the intellect. Now listen to the explanation of the characteristics of the three aspects of firmness.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.32. The intellect which, containing darkness (ignorance), conceives the unrighteous one as righteous and all things topsy-turvy-that intellect is deemed to be of the Tamas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.32 And that which, shrouded in Ignorance, thinks wrong right, and sees everything perversely, O Arjuna, that intellect is ruled by Darkness.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.32 That Buddhi, O Arjuna, which, enveloped in darkness, regards Adharma as Dharma and which reverses every value, is Tamasika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.32 O Parhta, that intellect is born of tamas which, being covered by darkness, considers vice as virtue, and verily perceives all things contrary ot what they are.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.32 That, which, enveloped in darkness, sees Adharma as Dharma and all things perverted that intellect, O Arjuna, is Tamasic (dark).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.30-32 Pravrttim etc. upto Tamasi mata. Incorrectly ; not properly.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.32 That Buddhi is of the nature of Tamas which is 'enveloped in Tamas' and 'reverses every value.' The meaning is that it regards Adharma as Dharma and Dharma as Adharma, existent as non-existent, and non-existent as existent, and higher truth as the lower and the lower truth as the higher, and thus reverses every value.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.32 O Partha, sa, that; buddhih, intellect; tamasi, is born of tamas; ya, which; tamasavrta, being covered by darkness; manyate, considers, understands; adharmam, vice, what is prohibited; iti, as; dharmam, virtue, what is prescribed; and ca, verily; perceives sarvarthan, all things, all objects of knowledge without exception; viparitan, contrary to what they are.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.32।। सात्त्विक बुद्धि का पदार्थ ज्ञान यथार्थ होता है? तो राजसी बुद्धि का सन्देहात्मक किन्तु तामसी बुद्धि तो वस्तु को उसके मूलस्वरूप से सर्वथा विपरीत रूप में जानती है। धर्म को अधर्म और अधर्म को धर्म मानना इस बुद्धि का कार्य है। वस्तुत तामसी बुद्धि कोई बुद्धि ही नहीं कही जा सकती। वह तो विपरीत ज्ञानों की एक गठरी ही है। विपरीत निष्कर्षों पर पहुँचने की इसकी क्षमता अद्भुत है इसका कारण है? अज्ञानावरण का अन्धकार और अहंकार का अंधोन्माद।अगले श्लोक में त्रिविध धृति का वर्णन करते हैं हे पार्थ योग के द्वारा जिस अव्याभिचारिणी धृति (धारणा) से मनुष्य मन? प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है? वह धृति,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.32।।राजसीं बुद्धिमुक्त्वा तामसीं तामाह -- अधर्मं प्रतिषिद्धं धर्मं विहितमिति या मन्यते जानाति तमसाऽविवेकेनावृता वेष्टिता सती सर्वार्थानेव ज्ञेयपदार्थान् विपरीतांश्च विपरीतमेव विजानाति साबद्धिस्तामसी। पार्थ? तव नेयमुचितेति संबोधनाशयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.32।।अधर्ममिति। तमसा विशेषदर्शनविरोधिना दोषेणावृता या बुद्धिरधर्मं धर्ममिति मन्यतेऽदृष्टार्थे सर्वत्र विपर्यस्यति तथा सर्वार्थान्सर्वान्दृष्टप्रयोजनानपि ज्ञेयपदार्थान् विपरीतानेव मन्यते सा विपर्यवती बुद्धिस्तामसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.32।।अधर्ममिति। विपरीतग्राहिणी बुद्धिस्तामसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.32।।तामसीमाह -- अधर्ममिति। या तमसा अज्ञानेनाऽऽवृता सती अधर्मं भगवदिच्छाननुरूपमकर्तव्यं धर्मं फलदातृ कर्तव्यमिति मन्यते? च पुनः सर्वार्थान् अकार्यकार्याभयभयादीन् विपरीतान् मन्यते? हे पार्थ सा बुद्धिस्तामसी मन्तव्येत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.32।।तामसीं बुद्धिमाह -- अधर्ममिति। विपरीतग्राहिणी बुद्धिस्तामसीत्यर्थः। बुद्धिरन्तःकरणं पूर्वोक्तम्। ज्ञानं तु तद्वृत्तिः। धृतिरपि तद्वृत्तिरेव। यद्वा -- अन्तःकरणस्य धर्मिणो बुद्धिरप्यध्यवसायलक्षणाद्वृत्तिरेव। इच्छाद्वेषादीनां तद्वृत्तीनां बहुत्वेऽपि धर्माधर्मभयाभयसाधनत्वेन प्राधान्यादेतासां त्रैविध्यमुक्तम्। उपलक्षणं चैतदन्यासाम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.32।।अधर्ममिति। तमसा अज्ञानेनाऽऽवृता सर्वार्थान्विपरीतान्मन्यते सा तामसी।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.32।।हे पार्थ जो तमोगुणसे आवृत हुई बुद्धि अधर्मको -- निषिद्ध कार्यको? धर्म मान लेती है? यानी शास्त्रविहित मान लेती है? तथा जाननेयोग्य अन्यान्य समस्त पदार्थोंको भी? जो विपरीत ही समझती है? वह तामसी है।

▸ Hindi Commentary By Swami

Chapter 18 (Part 18)

Ramsukhdas: ।।18.32।। व्याख्या --   अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता -- ईश्वरकी निन्दा करना शास्त्र? वर्ण? आश्रम और लोकमर्यादाके विपरीत काम करना मातापिताके साथ अच्छा बर्ताव न करना सन्तमहात्मा? गुरुआचार्य आदिका अपमान करना झूठ? कपट? बेईमानी? जालसाजी? अभक्ष्य भोजन? परस्त्रीगमन आदि शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंको धर्म मानना -- यह सब अधर्मको धर्म मानना है।अपने शास्त्र? वर्ण? आश्रमकी मर्यादामें चलना मातापिताकी आज्ञाका पालन करना तथा उनकी तनमनधनसे सेवा करना संतमहात्माओंके उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बनाना धार्मिक ग्रन्थोंका पठनपाठन करना दूसरोंकी सेवाउपकार करना शुद्धपवित्र भोजन करना आदि शास्त्रविहित कर्मोंको उचित न मानना -- यह धर्मको अधर्म मानना है।तामसी बुद्धिवाले मनुष्योंके विचार होते हैं कि शास्त्रकारोंने? ब्राह्मणोंने अपनेको बड़ा बता दिया और,तरहतरहके नियम बनाकर लोगोंको बाँध दिया? जिससे भारत परतन्त्र हो गया जबतक ये शास्त्र रहेंगे? ये धार्मिक पुस्तकें रहेंगी? तबतक भारतका उत्थान नहीं होगा? भारत परतन्त्रताकी बेड़ीमें ही जकड़ा हुआ रहेगा? आदिआदि। इसलिये वे मर्यादाओंको तोड़नेमें ही धर्म मानते हैं।सर्वार्थान्विपरीतांश्च -- आत्माको स्वरूप न मानकर शरीरको ही स्वरूप मानना ईश्वरको न मान करके दृश्य जगत्को ही सच्चा मानना दूसरोंको तुच्छ समझकर अपनेको ही सबसे बड़ा मानना दूसरोंको मूर्ख समझकर अपनेको ही पढ़ालिखा? विद्वान् समझना जितने संतमहात्मा हो गये हैं? उनकी मान्यताओंसे अपनी मान्यताको श्रेष्ठ मानना सच्चे सुखकी तरफ ध्यान न देकर वर्तमानमें मिलनेवाले संयोगजन्य सुखको ही सच्चा मानना न करनेयोग्य कार्यको ही अपना कर्तव्य समझना अपवित्र वस्तुओंको ही पवित्र मानना -- यह सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानना है।बुद्धिः सा पार्थ तामसी -- तमोगुणसे आवृत जो बुद्धि अधर्मको धर्म? धर्मको अधर्म और अच्छेको बुरा? सुलटेको उलटा मानती है? वह बुद्धि तामसी है। यह तामसी बुद्धि ही मनुष्यको अधोगतिमें ले जानेवाली है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)। इसलिये अपना उद्धार चाहनेवालेको इसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। सम्बन्ध --   अब भगवान् सात्त्विकी धृतिके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.32।।धर्मशब्दो नपुंसकलिङ्गोऽपीत्यभिप्रेत्य धर्ममित्युक्तम्। तमसावृता अविवेकेन वेष्टितेत्यर्थः। कार्याकार्यादीनुक्ताननुक्तांश्च संग्रहीतुं सर्वार्थानित्युक्तं तद्व्याचष्टे -- सर्वानेवेति। विपरीतांश्चेति चकारमवधारणे गृहीत्वा विपरीतानेवेत्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.32।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.32।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.32।। --,अधर्मं प्रतिषिद्धं धर्मं विहितम् इति या मन्यते जानाति तमसा आवृता सती? सर्वार्थान् सर्वानेव ज्ञेयपदार्थान् विपरीतांश्च विपरीतानेव विजानाति? बुद्धिः सा पार्थ? तामसी।।

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【 Verse 18.33 】

▸ Sanskrit Sloka: धृत्या यया धारयते मन:प्राणेन्द्रियक्रिया: | योगेनाव्यभिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्विकी ||

▸ Transliteration: dhṛtyā yayā dhārayate manaḥ-prāṇendriya-kriyāḥ | yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī ||

▸ Glossary: dhṛtyā: determination; yayā: by which; dhārayate: continued; manaḥ: mind; prāṇa: life energy; indriya: senses; kriyāḥ: activities; yogena: uniting with God; avyabhicāriṇyā: without any break; dhṛtiḥ: such determination; sā: that; pārtha: O son of Pritā; sāttvikī: in the mode of goodness

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.33 Consistent and continuous determination in controlling the mind, breath and senses for uniting with the Divine is goodness, Pārtha.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.33।।हे पार्थ समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है? वह धृति सात्त्विकी है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.33।। सात्त्विकी है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.33 धृत्या by firmness? यया (by) which? धारयते holds? मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः the functions of the mind? the Prana and the senses? योगेन by Yoga? अव्यभिचारिण्या unswerving? धृतिः firmness? सा that? पार्थ O Arjuna? सात्त्विकी Sattvic (pure).Commentary When firmness is awakened in the mind? the activities of the mind? the lifeforce and the senses are brought under control. The senses are withdrawn into the mind. The Prana and the Apana pass into the Sushumna Nadi.Yoga Samadhi or concentration of the mind. You cannot restrain the mind? the lifeforce and the senses by mere firmness. You can control them only by firmness which is ever accompanied by concentration of the mind.When the mind? the lifeforce and the senses are curbed by unwarvering firmness? they cannot run towards external sensual objects? they cannot do any mischief? they cannot move in ways which are opposed to the scriptures? they will be absorbed into their respective causes and their outgoing tendencies will be totally checked.This firmness is not repression or suppression? but an intelligent sublimation and inner transformation.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.33. The unfailing content because of which one restrains, with Yoga, the activities of mind, the living breath and the senses-that content is considered to be of the Sattva (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.33 The conviction and steady concentration by which the mind, the vitality and the senses are controlled - O Arjuna! They are the product of Purity.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.33 That Dhrti (fortitude or persisting perseverance) by which one maintains the unswerving activities of the mind and vital force and these sense-organs through Yoga - that Dhrti is of the nature of Sattva.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.33 O Partha, the firmness that is unfailing through concentration, with which one restrains the functions of the mind, vital forces and the organs, that firmness is born of sattva.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.33 The unwavering firmness by which, through Yoga, the functions of the mind, the life-force and the senses are restrained that firmness, O Arjuna, is Sattvic (pure).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.33 See Comment under 18.35

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.33 That Dhrti by which one through unswerving Yoga sustains the activities of the mind and the vital force and the sense-organs is said to be of the nature of Sattva. 'Yoga is worship of the Lord which forms the means for release. The meaning is that the Dhrti or fortitude by means of which one sustains the activities of the mind and other organs in the practice of Yoga (worship) until one's object is accomplished, is of the nature of Sattva.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.33 O Partha, dhrtya, the firmness; (-is connected with the remote word) avyabhicarinya, that is unfailing; yogena, through concentration, i.e. (the firmness that is) ever associated with samadhi (absorption in Brahman); yaya, with which; dharayate, one restrains;-what?-manah-prana-indriya-kriyah, the functions of the mind, vital forces and organs-restrains them from tending towards the path opposed to the scriptures-. Indeed, when restrained with firmness, they do not incline towards objects prohibited by the scriptures. Sa, that; dhrtih, firmness, which is of this kind; is sattviki, born of sattva. What is mean is that when one restrains the functions of the mind, vital forces and organs with unfailing firmness, one does so through yoga, concentration.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.33।।,विचाराधीन खण्ड में तीन प्रकार की धृतियों का वर्णन किया गया है। मनुष्य की वह क्षमता धृति कहलाती है? जिसके द्वारा वह अपने इच्छित और निर्धारित लक्ष्य को अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देता। इसी धारणाशक्ति की सहायता से वह? लक्ष्य प्राप्ति के पथ पर पर्वताकार विघ्नों के आने पर भी अपने प्रयोजन का सातत्य बनाये रखता है। धृति हमारे लक्ष्य को चित्रित करती है? उसे दृष्टि से ओझल नहीं होने देती? हमें प्रयत्नशील बनाती है तथा बाधाओं के उत्पन्न होने पर हममें वह ऐसी गुप्त शक्तियों का संगठन करती है? जिससे कि हम साहस? शौर्य और दृढ़ता के साथ उन बाधाओं का सामना कर सकें। धृति शब्द के द्वारा उपर्युक्त समस्त आशयों को इंगित समझना चाहिए।मनुष्य को जीवन में? चेतना? गौरव और अभूतपूर्व सफलता प्रदान करने में समर्थ यह धारणाशक्ति (धृति) उन विलासी लोगों में नहीं पायी जाती? जो सदैव विषयोपभोग में रमते हैं और जिनमें आत्मसंयम का सर्वथा अभाव होता है। विपरीत विचार तथा मिथ्या जीवन जीने वाले विघटित व्यक्तित्व के पुरुषों में धृति संभव नहीं है। त्रिगुणों के भेद से यहाँ धृति का तीन भागों सात्विक? राजसिक और तामसिक में वर्गीकरण किया गया है। परन्तु सब में? ध्यान देने योग्य बात यह है कि धृति का अर्थ धारणा ही है? जिसके कारण विभिन्न व्यक्ति अपनी बुद्धि के द्वारा निश्चित किये गये लक्ष्य को दृढ़ता से धारण किये रहते हैं।जिस धृति द्वारा एक साधक अपने मन? इन्द्रियों तथा उनकी क्रियाओं को योगाभ्यास तथा एक लक्ष्यानुसंधान की सहायता से संयमित करता है? वह सात्त्विक धृति है।कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ स्वभावत विषयाभिमुखी होती हैं। केवल मन ही उनका संयमन कर सकता है। परन्तु संयमन के इस कार्य के लिए मन को आवश्यक शक्ति और उत्साह प्राप्त करने हेतु एक लक्ष्य का होना अनिवार्य हो जाता है। निम्नस्तरीय भोगों से निवृत्त होने के लिए लक्ष्य का उच्च और श्रेष्ठ होना भी आवश्यक है? अन्यथा इन्द्रियसंयम असंभव है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ ध्यान योग की अपरिहार्यता पर विशेष बल देते हैं।अखण्ड आत्मानुसंधान की साधना से साधक को स्थिरता और संतुलन? शान्ति और सन्तोष प्राप्त होता है। इनकी सार्मथ्य से ही वह इन्द्रियसंयम में सफल हो सकता है। परन्तु इन समस्त उपलब्धियों का मूल है? धृति अर्थात् धारणा शक्ति या धैर्य। श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होने वाली धृति सात्त्विकी कहलाती है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.33।।एवं बुद्धेस्त्रैविध्यं विभज्य धृतेस्त्रैविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विकीं धृतिमाहधृत्या यया योगेन समाधानेनाव्यभिचारिण्या नित्यसमाध्यनुगतया मनःप्राणेन्द्रियाणां क्रियाश्चेष्टा उच्छास्त्रमार्गप्रवृत्तीर्धारयति। धृत्या हि धार्यमाणा उच्छास्त्रविषया न भवन्ति। एतदुक्तं भवति। उक्तक्रिया धार्यमाणा योगेन ब्रह्मणि समाधानेनैकाग्र्येणाऽव्यभिचारिण्या धृत्या धारयतीत्येवंलक्षणा या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.33।।इदानीं धृतेस्त्रैविध्यमाह त्रिभिः -- धृत्येत्यादिना। योगेन समाधिनाऽव्यभिचारिण्याऽविनाभूतया समाधिव्याप्तया यया धृत्या प्रयत्नेन मनसः प्राणस्येन्द्रियाणां च क्रियाश्चेष्टा धारयते उच्छास्त्रप्रवृत्तेर्निरुणद्धि यस्यां सत्यामवश्यं समाधिर्भवति यया च धार्यमाणा मनआदिक्रियाः शास्त्रमतिक्रम्य नार्थान्तरमवगहान्ते धृतिः सा पार्थ? सात्त्विकी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.33।।यया धृत्या अव्यभिचारिण्या समाध्यनुगतया मनःप्राणेन्द्रियाणां क्रियाश्चेष्टाः संकल्पं श्वासप्रश्वासौ शब्दादिग्रहणं च योगेन चित्तवृत्तिनिरोधेन ऐकाग्र्येण वा संयत्तास्तास्तथैव निरोधावस्थायामैकाग्र्यावस्थायां वा धारयते चिरमवस्थापयति सा धृतिः पार्थ? सात्त्विकी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.33।।अथ धृतेस्त्रैविध्यमाह -- धृत्येति। यया अव्यभिचारिण्या विषयान्तराभिलाषरहितया धृत्या? योगेन सर्वतो मनस्सङ्गनिवृत्तिपूर्वकभगवदेकपरचित्तेन मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः मनसश्चाञ्चल्यरूपाः? प्राणस्य क्षुदुद्बोधरूपा इन्द्रियाणां विषयाभिलाषरूपाः? क्रियाः धारयते नियच्छति? हे पार्थ सा धृतिः सात्त्विकी उच्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.33।।इदानीं धृतेस्त्रैविध्यमाह -- धृत्येति त्रिभिः। योगेन चित्तैकाग्र्येण हेतुनाव्यभिचारिण्या विषयान्तरमधारयन्त्या यया धृत्या मनसः प्राणस्येन्द्रियाणां च क्रिया धारयते नियच्छति सा धृतिः सात्त्विकी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.33।।धृतैस्त्रैविध्यमाह। धृतिर्नाम देहादेर्धारणक्रिया? तत्र सात्त्विकी धृतिः सा यया योगेनाव्यभिचारिण्या योगमार्गीयाङ्गत्रिदुःखसहनशीलया मोक्षोन्मुख्या।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.33।।धृति शब्दके साथ दूर पड़े हुए अव्यभिचारिणी शब्दका सम्बन्ध है। जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा? अर्थात् सदा समाधिमें लगी हुईजिस धारणाके द्वारा? समाधियोगसे मन? प्राण और इन्द्रियोंकी सब क्रियाएँ धारण की जाती हैं? अर्थात् मन? प्राण और इन्द्रियोंकी सब चेष्टाएँ जिसके द्वारा शास्त्रविरुद्ध प्रवृत्तिसे रोकी जाती हैं? ( वह धृति सात्त्विकी है )। ( सात्त्विकी ) धृतिद्वारा धारण की हुई ( इन्द्रियाँ ) ही शास्त्रविरुद्ध विषयमें प्रवृत्त नहीं होतीं। कहनेका तात्पर्य यह है कि धारण करनेवाला मनुष्य? जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा समाधियोगसे मन? प्राण और इन्द्रियोंकी चेष्टाओंको धारण किया करता है? हे पार्थ वह इस प्रकारकी धृति सात्त्विकी है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.33।। व्याख्या --   धृत्या यया धारयते ৷৷. योगेनाव्यभिचारिण्या -- सांसारिक लाभहानि? जयपराजय? सुखदुःख? आदरनिरादर? सिद्धिअसिद्धिमें सम रहनेका नाम योग (समता) है।परमात्माको चाहनेके साथसाथ इस लोकमें सिद्धि? असिद्धि? वस्तु? पदार्थ? सत्कार? पूजा आदि और परलोकमें सुखभोगको चाहना व्यभिचार है और इस लोक तथा परलोकके सुख? भोग? वस्तु? पदार्थ आदिकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा न रखकर केवल परमात्माको चाहना अव्यभिचार है। यह अव्यभिचार जिसमें होता है? वह धृति अव्यभिचारिणी कहलाती है।अपनी मान्यता? सिद्धान्त? लक्ष्य? भाव? क्रिया? वृत्ति? विचार आदिको दृढ़? अटल रखनेकी शक्तिका नाम धृति है। योग अर्थात् समतासे युक्त इस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओँको धारण करता है।मनमें रागद्वेषको लेकर होनेवाले चिन्तनसे रहित होना? मनको जहाँ लगाना चाहें? वहाँ लग जाना और जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाना आदि मनकी क्रियाओंको धृतिके द्वारा धारण करना है।प्राणायाम करते हुए रेचकमें पूरक न होना? पूरकमें रेचक न होना और बाह्य कुम्भकमें पूरक न होना तथा आभ्यन्तर कुम्भकमें रेचक न होना अर्थात् प्राणायामके नियमसे विरुद्ध श्वासप्रश्वासोंका न होना ही धृतिके द्वारा प्राणोंकी क्रियाओँको धारण करना है।शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन विषयोंको लेकर इन्द्रियोंका उच्छृङ्खल न होना? जिस विषयमें जैसे प्रवृत्त होना चाहें? उसमें प्रवृत्त होना और जिस विषयसे निवृत्त होना चाहें? उसमें निवृत्त होना ही धृतिके द्वारा इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करना है।धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी -- जिस धृतिसे मन? प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओँपर आधिपत्य हो जाता है? हे पार्थ वह धृति सात्त्विकी है। सम्बन्ध --   अब राजसी धृतिके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.33।।इदानीं धृतित्रैविध्यं व्युत्पिपादयिषुरादौ सात्त्विकीं धृतिं व्युत्पादयति -- धृत्येति। निर्दिष्टानां चेष्टानां कथं धृत्या धारणं तत्राह -- ता इति। तदेवानुभवेन साधयति -- धृत्या हीति। ध्रियतेऽनयेति धृतिर्यत्नविशेषस्तया धृत्या धार्यमाणा यथोपदिष्टाश्चेष्टाः शास्त्रमतिक्रम्य नार्थान्तरावगाहिन्यो भवन्तीत्यर्थः। धृतिमेव समाध्यविनाभूतत्वेन विशिनष्टि -- योगेनेति। ननु धृतेर्नियमेन समाध्यनुगतत्वं कथमुक्तक्रियाधारणोपयोगीत्याशङ्क्याह -- एतदिति। उक्तक्रियाधारयमाणो योगेन ब्रह्मणि समाधानेनैकाग्र्येणाव्यभिचारिण्याविनाभूतया धृत्या धारयत्यन्यथ तदविनाभावाभावे नियमेन तद्धारणासिद्धेरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.33।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.33।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.33।। --,धृत्या यया -- अव्यभिचारिण्या इति व्यवहितेन संबन्धः? धारयते किम् मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः मनश्च प्राणाश्च इन्द्रियाणि च मनःप्राणेन्द्रियाणि? तेषां क्रियाः चेष्टाः? ताः उच्छास्त्रमार्गप्रवृत्तेः धारयते धारयति -- धृत्या हि धार्यमाणाः उच्छास्त्रमार्गविषयाः न भवन्ति -- योगेन समाधिना? अव्यभिचारिण्या? नित्यसमाध्यनुगतया इत्यर्थः। एतत् उक्तं भवति -- अव्यभिचारिण्या धृत्या मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः धार्यमाणाः योगेन धारयतीति। या एवंलक्षणा धृतिः? सा पार्थ? सात्त्विकी।।

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【 Verse 18.34 】

▸ Sanskrit Sloka: यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन | प्रसङ्गेन फलाकाङ् क्षी धृति: सा पार्थ राजसी ||

▸ Transliteration: yayā tu dharma kāmārthān dhṛtyā dhārayate ‘rjuna | prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī ||

▸ Glossary: yayā: by which; tu: but; dharma kāmārthān: for the three goals in life, right conduct, sense pleasure and wealth; dhṛtyā: by determination; dhārayate: continuously; arjuna: O Arjuna; prasaṅgena: for that; phalākāṅkṣī: desiring fruitive results; dhṛtiḥ: determination; sā: that; pārtha: O son of Pritā; rājasī: in the mode of passion

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.34 Craving for results of action while clinging to goals of proper conduct, pleasure and wealth is the state of passion, Arjuna.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.34।।हे पृथानन्दन अर्जुन फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म? काम (भोग) और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है? वह धृति राजसी है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.34।। हे पृथापुत्र अर्जुन कर्मफल का इच्छुक पुरुष अति आसक्ति (प्रसंग) से जिस धृति के द्वारा धर्म? अर्थ और काम (इन तीन पुरुषार्थों) को धारण करता है? वह धृति राजसी है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.34 यया (by) which? तु but? धर्मकामार्थान् Dharma (duty)? desire and wealth? धृत्या by firmness? धारयते holds? अर्जुन O Arjuna? प्रसङ्गेन on account of attachment? फलाकाङ्क्षी desirous of the fruit of action? धृतिः firmness? सा that? पार्थ O Arjuna? राजसी Rajasic (passionate).Commentary The man of Rajasic firmness imagines that he will achieve the threefold aim of life and clings to it passionately. He is desirous of getting the rewards of his actions. He endeavours to attain Dharma? wealth and pleasure. The firmness of such a person is Rajasic or passionate.Now listen? O Arjuna? to the third kind of firmness -- the Tamasic type.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.34. O Arjuna ! The content by which one restrains one's bounden duty, pleasure and wealth, and conseently desiring the fruits [of action]-that content is of the Rajas (Strand), O son of Prtha !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.34 The conviction which always holds fast to rituals, to self-interest and wealth, for the sake of what they may bring forth - that comes from Passion.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.34 That Dhrti, O Arjuna, by which one, who is desirous of fruits, longs for them with intense attachment, and holds fast to duty, desire and wealth - that Dhrti is Rajasika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.34 But, O Partha, the firmness with which one holds on to righteousness, covetable things and wealth, being desirous of their fruits as the occasion for each arises, that firmness is born of rajas.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.34 But that, O Arjuna, by which, on account of attachment and desire for reward, one holds fast to Dharma (duty), enjoyment of pleasures and earning of wealth that firmness, O Arjuna, is Rajasic (passionate).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.34 See Comment under 18.35

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.34 That Dhrti by which a person who, desirous of fruits, i.e., through intense attachment holds fast to duty, desires, and wealth, is of the nature of Rajas. By the terms 'Dharma-kam'artha,' the activities of the mind, vital force and senses as a means for the attainment of Dharma (duty) Kama (pleasure) and Artha (wealth) are signified. Even in the expression, 'One desirous of fruits,' that term indicates duty, desire and wealth, on account of the Rajasika nature of the aspirant. Therefore, what is said amounts to this: the Dhrti by which one maintains activities of the mind etc., with the purpose of attaining duty; desire and wealth, is of the nature of Rajas.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.34 Tu, but, O Partha; the dhrtya, firmness; yaya, with which; a person dharayate, holds on to; dharma-kama-arthan, righteousness, covetable things and wealth-entertains the conviction in the mind that these ought to be pursued always; and becomes phala-akanksi, desirous of their fruits; prasangena, as the occasion for each arises, according as the situation arises for holding on to any one of dharma etc.; sa, that; dhrtih, firmness; is rajasi, born of rajas.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.34।। मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ हैं अर्थात् प्रयत्नों के द्वारा प्राप्त करने योग्य लक्ष्यधर्म (पुण्य)? अर्थ? काम और मोक्ष। जिस सातत्य के साथ मनुष्य धर्म? अर्थ और काम को धारण करता है? वह राजसी धृति कहलाती है। यहाँ मोक्ष का अनुल्लेख ध्यान देने योग्य है। राजसी पुरुष को संसार बन्धनों से सदैव के लिए मुक्त होने की इच्छा नहीं होती।राजसी पुरुष का धर्माचरण भी पुण्यप्राप्ति के द्वारा स्वर्गादि लोकों के सुख भोग के लिए ही होता है। अर्थ से तात्पर्य धन? सत्ता? अधिकार आदि से है? तथा काम का अर्थ विषयोपभोग है। रजोगुणी पुरुष की यह दृढ़ धारणा होती है कि इन्द्रियों के विषय ही सुख का साधन हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.34।।सात्त्विकीं धृतिमुक्त्वा राजसीं तामाह -- यया तु धृत्या धर्मार्थकामान्धारयते मनसि नित्यकर्तव्यतारुपानवधारयति नतु शुद्धब्रह्म मोक्षाख्यमिति ध्वनयन्नाह -- हेऽर्जुनेति। प्रसङ्गेन यस्य यस्य धर्मादेर्धारणप्रसङ्गस्तेनतेन प्रसङ्गेन फलाकाङक्षी। प्रकर्षेण सङ्गः कर्तृत्वाभिनिवेशस्तेनेति केचित्। प्रसङ्गेन धर्मादेः संबन्धनेत्यन्ये। आचार्योस्तु प्रसिद्धार्तपरित्यागे विनिगमकविरहमभिप्रेत्यैवं न व्याख्यातम्। यः पुरुषः प्रसङ्गेन फलाकाङक्षीसन् यया धृत्या धर्मादीन्धारयते तस्य सा धृतिः हे पार्थे? राजसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.34।।यया त्विति। तुः सात्त्विक्या भिनत्ति। प्रसङ्गेन कर्तृत्वाद्यभिनिवेशेन फलाकाङ्क्षी सन् यया धृत्या धर्मं काममर्थं च धारयते नित्यं कर्तव्यतयावधारयति नतु मोक्षं कदाचिदपि। धृतिः सा पार्थ? राजसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.34।।यया धृत्या धर्मादीन् धारयतेऽनुरोध्यतया निश्चिनोति प्रसङ्गेन धर्मादेः संबन्धेन फलाकाङ्क्षी च भवति पुरुषो धृतिः सा पार्थ राजसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.34।।राजसीमाह -- ययेति। तु पुनः? हे अर्जुन नाम्नैव मुक्त्यधिकारिन् यया धृत्या फलाकाङ्क्षी फलाभिलाषयुक्तः सन् प्रसङ्गेन फलप्रसङ्गेन -- न तु मद्भजनौपयिकत्वेन -- धर्मार्थकामान् धारयते पोषयति तद्बुद्ध्युक्तसाधनैः हे पार्थ सा धृतिः राजसी रजस्सम्बन्धिस्वभोगादिरूपफला? उच्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.34।।राजसीं धृतिमाह -- यया त्विति। यया तु धृत्या धर्मार्थकामान्प्राधान्येन धारयते न विमुञ्चति तत्प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी च भवति सा राजसी धृतिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.34।।यया धृत्या त्रिवर्गं धारयते प्रसङ्गेन कर्तृत्वाभिनिवेशनेन फलाकाङ्क्षी सन् सा राजसी।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.34।।हे अर्जुन जिस धृतिके द्वारा मनुष्य धर्म? काम और अर्थोंको धारण करता है? अर्थात् जिस धृतिद्वारा मनुष्य इन सबको मनमें अवश्यकर्तव्यरूपसे निश्चय किया करता है। तथा जिसजिस धर्म? अर्थ आदिके धारण करनेका प्रसङ्ग आता है? उसउस प्रसङ्गसे ही जो मनुष्य फल चाहनेवाला है? हे पार्थ उसकी जो धृति है वह राजसी होती है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.34।। व्याख्या --   यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या ৷৷. सा पार्थ राजसी -- राजसी धारणशक्तिसे मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये धर्मका अनुष्ठान करता है? काम अर्थात् भोगपदार्थोंको भोगता है और अर्थ अर्थात् धनका संग्रह करता है।अमावस्या? पूर्णिमा? व्यतिपात आदि अवसरोंपर दान करना? तीर्थोंमें अन्नदान करना पर्वोंपर उत्सव मनाना तीर्थयात्रा करना धार्मिक संस्थाओंमें चन्दाचिट्ठाके रूपमें कुछ चढ़ा देना कभी कथाकीर्तन? भगवतसप्ताह आदि करवा लेना -- यह सब केवल कामनापूर्तिके लिये करना ही धर्म को धारण करना है (टिप्पणी प0 916)।सांसारिक भोगपदार्थ तो प्राप्त होने ही चाहिये क्योंकि भोगपदार्थोंसे ही सुख मिलता है? संसारमें कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है? जो भोगपदार्थोंकी कामना न करता हो यदि मनुष्य भोगोंकी कामना न करे तो उसका जीवन ही व्यर्थ है -- ऐसी धारणके साथ भोगपदार्थोंकी कामनापूर्तिमें ही लगे रहना काम को धारण करना है।धनके बिना दुनियामें किसीका भी काम नहीं चलता धनसे ही धर्म होता है यदि पासमें धन न हो तो आदमी धर्म कर ही नहीं सकता जितने आयोजन किये जाते हैं? वे सब धनसे ही तो होते हैं आज जितने आदमी बड़े कहलाते हैं? वे सब धनके कारण ही तो बड़े बने हैं धन होनेसे ही लोग आदरसम्मान करते हैं जिसके पास धन नहीं होता? उसको संसारमें कोई पूछता ही नहीं अतः धनका खूब संग्रह करना चाहिये -- इस प्रकार धनमें ही रचेपचे रहना अर्थ को धारण करना है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस पुरुष शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार जो कुछ भी शुभ काम करता है? उसमें उसकी यही कामना रहती है कि इस कर्मका मुझे इस लोकमें सुख? आराम? मान? सत्कार आदि मिले और परलोकमें सुखभोग? मिले। ऐसे फलकी कामनावाले तथा संसारमें अत्यन्त आसक्त मनुष्यकी धारणशक्ति राजसी होती है। सम्बन्ध --   अब तामसी धृतिके लक्षण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.34।।राजसीं धृतिं दर्शयति -- यया त्विति। तेषां धारणप्रकारमभिनयति -- मनसीति। फलाकाङ्क्षीति कस्य विशेषणं तत्राह -- यः पुरुष इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.34।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.34।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.34।। --,यया तु धर्मकामार्थान् धर्मश्च कामश्च अर्थश्च धर्मकामार्थाः तान् धर्मकामार्थान् धृत्या यया धारयते मनसि नित्यमेव कर्तव्यरूपान् अवधारयति हे अर्जुन? प्रसङ्गेन यस्य यस्य धर्मादेः धारणप्रसङ्गः तेन तेन प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी च भवति यः पुरुषः? तस्य धृतिः या? सा पार्थ? राजसी।।

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【 Verse 18.35 】

▸ Sanskrit Sloka: यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च | न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा पार्थ तामसी ||

▸ Transliteration: yayā svapnaṁ bhayaṁ śokaṁ viṣādaṁ madameva ca | na vimuñcati durmedhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī ||

▸ Glossary: yayā: by which; svapnaṁ: dream; bhayaṁ: fearfulness; śokaṁ: lamentation; viṣādaṁ: moroseness; madaṁ: delusion; eva: certainly; ca: also; na: never; vimuñcati: is liberated; durmedhā: unintelligent; dhṛtiḥ: determination; sā: that; pārtha: O son of Pritā; tāmasī: in the mode of ignorance

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.35 Ignorant resolve which cannot go beyond dreaming, fear, grief, despair and, delusion—such is in darkness, Pārtha.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.35।।हे पार्थ दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा? भय? चिन्ता? दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता? वह धृति तामसी है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.35।। हो पार्थ दुर्बुद्धि पुरुष जिस धारणा के द्वारा? स्वप्न? भय? शोक? विषाद और मद को नहीं त्यागता है? वह धृति तामसी है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.35 यया by which? स्वप्नम् sleep? भयम् fear? शोकम् grief? विषादम् despair? मदम् conceit? एव indeed? च and? न not? विमुञ्चति abandons? दुर्मेधाः a stupid man? धृतिः firmness? सा that? पार्थ O Arjuna? तामसी Tamasic (dark).Commentary The man who is an embodiment of darkness is made up of every possible kind of evil. He is very indolent and sinful. He is inordinately addicted to sleep. He considers these to be only proper. He experiences sorrow on account of his evil actions. As he is very much attached to the body he entertains great fear. He is ever discontented at heart. He is lustful and selfconceited. He does not know how to behave. He is rude and insolent. He indulges much in sensual pleasures.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.35. The content, whery a foolish man does not give up his sleep, fear, grief, despondency and also arrogancethat content is deemed to be of the Tamas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.35 And that which clings perversely to false idealism, fear, grief, despair and vanity is the product of Ignorance.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.35 That Dhrti by which a foolish person does not give up sleep, fear, grief, depression and passion, O Arjuna, is of the nature of Tamas.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.35 That firmness is considered [Some editions read partha in place of mata (considered).-Tr.] to be born of tamas due to which a person with a corrupt intellect does not give up sleep, fear, sorrow, despondency as also sensuality.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.35 That, by which a stupid man does not abandon sleep, fear, grief, despair and also conceit that firmness, O Arjuna, is Tamasic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.33-35 Dhrtya etc. upto Tamasi mata. One restrains the activities of his mind, living breath and senses, with Yoga : i.e., thinking 'What is the use for me by enjoying etc. ? Let me be delighted in the Self by all means.' Conseently : not with much indulgence. That content whery one fixes pleasure as his goal only in sleep, fight etc.-that content is of the Tamas (Strand).

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.35 That Dhrti by which a foolish person does not give up, i.e. persists in, sleep, and sensuous indulgence through the activities of the mind, vital force etc., - that Dhrti is of the nature of Tamas. The terms fear, grief and depression indicate the objects generating fear, grief etc. That Dhrti by which one maintains the activities of the mind, the vital force etc., as a means for these, is of the nature of Tamas.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.35 That firmness is mata, considered to be; tamasi, born of tamas; yaya, due to which; durmedha, a person with a corrupt intellect; na vimuncati, does not give up-indeed, holds fast to; svapnam, sleep; bhayam, fear; sokam, sorrow; visadam, despondency; eva ca, as also; madam, sensuality, enjoyment of objects-mentally holding these as things that must always be resorted to, considering them to be greatly important to himself, like a drunkard thinking of wine. The threefold division of action as also of agents according to the differences of the gunas has been stated. After that, now is being stated the threefold division of results and happiness:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.35।। इस श्लोक में वर्णित तामसी धृति को समझना कठिन नहीं है? क्योंकि हममें से अधिकांश लोगों की धृति इसी श्रेणी की है निद्रा भयादि को धारण करने वाली धृति तामसी कही गयी है।स्वप्न यह शब्द उस मन की प्रक्षेपित कल्पनाओं को इंगित करता है? जो प्राय निद्रावस्था में डूबा रहता है। अनुभव की वह अवस्था स्वप्न है? जहाँ वास्तव में वस्तुओं का अभाव होते हुए भी मनकल्पित मिथ्या विषयों का भोग होता है। तमोगुणी लोग बाह्य वस्तुओं पर अपने मन के द्वारा सुन्दरता एवं सुख का आरोप करके फिर उनकी प्राप्ति के लिए परिश्रम और संघर्षरत रहते हैं।भय ऐसे अविवेकी लोग व्यर्थ में ही अन्धकारमय भविष्य की कल्पना करके उससे भयभीत होते हैं। संभव है कि वह भयप्रद घटना कभी घटित ही न हो? किन्तु उसका काल्पनिक भय ही मनुष्य के सन्तुलन? संयम एवं सन्तोष को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है। हममें से कितने ही लोगों ने इस प्रकार के भय का अनुभव अपने जीवन में किया होगा। कुछ लोगों को भय होता है कि कल वे मरने वाले हैं? और प्रतिदिन वे पूर्व के समान ही स्वस्थ व्यक्ति के रूप में ही जागते हैं मानसिक दृष्टि से? ऐसे लोग भयोन्माद के रोगी होते हैं। और जिस दृढ़ता से वे इस भय ग्रन्थि को ग्रहण किये रहते हैं? वह वास्तव में अपूर्व होती है।शोक? विषाद और मद मनुष्य की सार्मथ्य को क्षीण करने वाले ये तीन कारण हैं। तामसी पुरुष इन्हें धारण करके एक प्रकार की आन्तरिक रिक्तता और थकान का अनुभव करता है। अतीत में हुई अनिष्ट घटना का मनुष्य को शोक होता है भविष्य को अन्धकारमय देखकर उसका मन विषाद से भर जाता है और वर्तमान काल मे कामुकतापूर्ण अनैतिक जीवन का गर्व करने में ही मूढ़ पुरुष को मद का अनुभव होता है।उपर्युक्त स्वप्नादि पाँच जीवन मूल्यों को धारण करने वाले पुरुष दुर्मेधा हैं और ऐसे पुरुषों की धृति तामसी कही जाती है।इसके पश्चात्? अब? कर्म के फल सुख का वर्णन करते हैं? जो भी त्रिविध है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.35।।राजसीं धुतिं व्युत्पाद्य तामसीं तां व्युत्पादयति -- ययेत्ति। दुर्मेधाः दुष्टा कुत्सिता मेधा बुद्धिर्यस्य स दुर्बुद्धिर्यया धृत्या स्वप्नं निद्रां भयं त्रासं शोकं प्रियवियोगनिमित्तं संतापं विषादं विषण्णतामिन्द्रियखिन्नतां विषयेसेवात्मनो बहुमन्यमानो मत्त इव यो मदमेव च मनसि नित्यमेव कर्तव्यरुपतया कुर्वन्न विमुञ्चति धारयत्येव सा धृतिः पार्थ? तामसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.35।।यया स्वप्नमिति। स्वप्नं निद्रां? भयं त्रासं? शोकं इष्टवियोगनिमित्तं संतापं? विषादमिन्द्रियावसादं? मदमशास्त्रीयविषयसेवोन्मुखत्वं च यया न विमुञ्चत्येव किंतु सदैव कर्तव्यतया मन्यते दुर्मेधा विवेकासमर्था धृतिः सा पार्थ? तामसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.35।।स्वप्नं निद्राम्। भयं त्रासम्। शोकं प्रसिद्धम्। विषादं विषण्णताम्। मदमशास्त्रीयविषयसेवया चित्तस्य विवशत्वम्। एतान्न विमुञ्चति धारयत्येव यया धत्या सा धृतिः पार्थ? तामसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.35।।तामसीमाह -- ययेति। दुर्मेधाः दुर्बुद्धिः यया आग्रहरूपया स्वप्नं निद्रां मोहरूपां? भयं भगवदिच्छाज्ञानेन शत्रुचौरादिभ्यो मृत्युतो वा? शोकं भगवत्कृतार्थस्यासमीचीनज्ञानेन चिन्तनं? विषादं सखेदं? मदं स्वाज्ञानरूपम् -- एवकारेण मांसादिभक्षणं च -- न विमुञ्चति विशेषेण सदोषत्वज्ञानाभावेनापि करणम् एवं या न त्यजति हे पार्थ सा धृतिस्तामसी निष्फलेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.35।।तामसीं धृतिमाह -- ययेति। दुष्टा अविवेकबहुला मेधा यस्य स दुर्मेधाः पुरुषः यया धृत्या स्वप्नादीन्न विमुञ्चति पुनःपुनरावर्तयति। स्वप्नोऽत्र निद्रा। सा धृतिस्तामसी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.35।।यया स्वप्नमिति। स्वप्नादीन्न विमुञ्चति तान्प्रति प्रयुक्ता मनःप्राणेन्द्रियक्रिया वा न विमुञ्चति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.35।।जिस धृतिके द्वारा मनुष्य स्वप्न -- निद्रा? भय -- त्रास? शोक -- दुःख और मदको नहीं छोड़ता। अर्थात् विषयसेवनको ही अपने लिये बहुत बड़ा पुरुषार्थ मानकर उन्मत्तकी भाँति मदको ही मनमें सदा कर्तव्यरूपसे समझता हुआ जो कुत्सित बुद्धिवाला मनुष्य इन सबको नहीं छोड़ता। यानी धारण ही किये रहता है। उसकी जो धृति है? वह तामसी मानी गयी है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.35।। व्याख्या --   यया स्वप्नं भयं ৷৷. सा पार्थ तामसी -- तामसी धारणशक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा? बाहर और भीतरका भय? चिन्ता? दुःख और घमण्ड -- इनका त्याग नहीं करता? प्रत्युत इन सबमें रचापचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है? कभी मृत्यु? बीमारी? अपयश? अपमान? स्वास्थ्य? धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है? कभी शोकचिन्तामें डूबा रहता है? कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है।निद्रा? भय? शोक आदिके सिवाय प्रमाद? अभिमान? दम्भ? द्वेष? ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा? दूसरोंका अपकार करना? उनको कष्ट देना? उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचोंको भी एव च पदोंसे मान लेना चाहिये।इस प्रकार निद्रा? भय आदिको और दुर्गुणदुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है।भगवान्ने तैंतीसवेंचौंतीसवें श्लोकोंमें धारयते पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण,करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्टा है? जिसकी बुद्धिमें अज्ञता? मूढता भरी हुई है? ऐसा मिलन अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा? भय? शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचापचा रहता है।सात्त्विकी? राजसी और तामसी -- इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतिमें तो क्रमशः फलाकाङ्क्षी और दुर्मेधाः पदसे कर्ताका उल्लेख किया है? पर सात्त्विकी धृतिमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतिमें कर्ता निर्लिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता परन्तु राजसी और तामसी धृतिमें कर्ता लिप्त होता है।विशेष बातमानवशरीर विवेकप्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है? उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है? त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति(धारणशक्ति) में यह विवेक साफसाफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतिमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता फिर भी इस लोकमें सुखआराम? मानआदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले? भोग मिले -- इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामस भावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा? भय आदि तामसभावोंमें ही रचापचा रहता है।पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें? चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है? यह सब क्रिया ही है। क्रिया तो शरीरोंमें होती है? पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है -- ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं(चेतनस्वरूप) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा लक्ष्य होता है? उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है? वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार पार्थ सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि पृथानन्दन लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजसतामसभाव न आने पायें -- इसके लिये निरन्तर सजग रहो, सम्बन्ध --   मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुखकर्मसंग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.35।।तामसीं धृतिं व्याचष्टे -- ययेति। शोकं प्रियवियोगनिमित्तं संतापम्। विषण्णतामिन्द्रियाणां ग्लानिम्। विषयसेवा कुमार्गप्रवृत्तेरुपलक्षणमुक्तं? स्वप्नादिमदान्तं सर्वमेव कर्तव्यतयात्मनो बहु मन्यमानो मनसि नित्यमेव कुर्वन्दुर्मेधा न विमुञ्चति किंतु धारयत्येवेति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.35।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.35।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.35।। --,यया स्वप्नं निद्रां भयं त्रासं शोकं विषादं विषण्णतां मदं विषयसेवाम् आत्मनः बहुमन्यमानः मत्त इव मदम् एव च मनसि नित्यमेव कर्तव्यरूपतया कुर्वन् न विमुञ्चति धारयत्येव दुर्मेधाः कुत्सितमेधाः पुरुषः यः? तस्य धृतिः या? सा तामसी मता।।गुणभेदेन क्रियाणां कारकाणां च त्रिविधो भेदः उक्तः। अथ इदानीं फलस्य सुखस्य त्रिविधो भेदः उच्यते --,

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【 Verse 18.36 】

▸ Sanskrit Sloka: सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ | अभ्यासाद्रमते यत्र दु:खान्तं च निगच्छति ||

▸ Transliteration: sukhaṁ tvidānīṁ trividhaṁ śṛṇu me bharatarṣabha | abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṁ ca nigacchati ||

▸ Glossary: sukhaṁ: happiness; tu: but; idānīṁ: now; trividhaṁ: three kinds; śṛṇu: hear; me: from Me; bharatarṣabha: O best amongst the Bhāratas; abhyāsāt: by practice; ramate: enjoyer; yatra: where; duḥkha: distress; antaṁ: end; ca: also; nigacchati: gains;

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.36,37 And now hear from Me, O Arjuna, about three kinds of pleasure. The pleasure that one enjoys from spiritual practice results in cessation of all sorrows. The pleasure that appears as poison in the beginning, but is like nectar in the end, comes by the grace of Self-knowledge and is in the mode of goodness.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.36।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है? ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है? वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.36।। हे भरतश्रेष्ठ अब तुम त्रिविध सुख को मुझसे सुनो? जिसमें (साधक पुरुष) अभ्यास से रमता है और दुखों के अन्त को प्राप्त होता है (जहाँ उसके दुखों का अन्त हो जाता है।)।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.36 सुखम् pleasure? तु indeed? इदानीम् now? त्रिविधम् threefold? श्रृणु hear? मे of Me? भरतर्षभ O lord of the Bharatas? अभ्यासात् from practice? रमते rejoices? यत्र in which? दुःखान्तम् the end of pain? च and? निगच्छति (he) attains to.Commentary A little of this pleasure experienced by the Self must result in the cessation of pain. This pleasure is threefold in its nature and I will describe its aspects in turn? O Arjuna. (Cf.VI.20?30).

Chapter 18 (Part 19)

English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.36. O best among the Bharatas ! Now from Me you must also listen to the three-fold happiness where one gets delighted by practice, and attains the end of suffering.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.36 Hear further the three kinds of pleasure. That which increases day after day delivers one from misery,

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.36 Now hear from Me, O Arjuna, the threefold division of pleasure৷৷. that in which a man rejoices by long practice and in which he comes to the end of pain;

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.36 Now hear from Me, O scion of the Bharata dynasty, as regards the three kinds of joy: That in which one delights owing to habit, and certainly attains the cessation of sorrows; [S. and S.S. take the second line of this verse along with the next verse referring to sattvika happiness.-Tr.]

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.36 And now hear from Me, O Arjuna, of the threefold pleasure, in which one rejoices by practice and surely comes to the end of pain.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.36 See Comment under 18.39

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.36 Now, hear about the pleasure to which the knowledge, action, agent etc., already mentioned are all subservient and which is threefold according to the Gunas. ৷৷. That pleasure in which a person, through long practice extending over a long time, gradually attains to incomparable joy and never again is engulfed by the pain of life in Samsara.

Sri Krsna explains the same:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.36 Idanim, now; srnu, hear; me, from Me i.e. be attentive to what I say; tu, as regards; the trividham, three kinds of; sukham, joy, O scion of the Bharata dynasty. Yatra, that in which; ramate, one delights, derives pleasure; abhyasat, owing to habit, due to freent repetition; and in the experinece of which joy one nigacchati, certainly attains; duhkhantam, the cessation of sorrow-.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.36।। इस अध्याय में प्रतिपादित विचारों के विकास क्रम में सर्वप्रथम कार्य सम्पादन के तीन तत्त्वों ज्ञान? कर्ता और कर्म का वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् कर्म के प्रेरक? नियामक और मार्गनिर्देशक दो तत्त्वों? बुद्धि और धृति का विस्तृत विवेचन किया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण ने इन सब के त्रिविध भेदों को पृथक्पृथक् रूप से दर्शाया है।प्रत्येक कर्ता अपने कर्मक्षेत्र में? अपने ज्ञान से निर्देशित बुद्धि से शासित और धृति से लक्ष्य को धारण करके कर्म करता है। इस प्रकार कार्य की शारीरिक एवं प्राणिक संरचना का विश्लेषण एवं निरीक्षण पूर्ण होता है। अब? विचार्य विषय है कार्य का मनोविज्ञान। मनुष्य किस लिए कर्म करता है प्राणियों की प्रवृत्तियों का अवलोकन करने से यह ज्ञात होता है कि प्रत्येक प्राणी केवल सुख प्राप्ति के लिए ही कर्म में प्रवृत होता है। गर्भ से लेकर शवागर्त तक? प्राणियों के समस्त प्रयत्न सतत सुख प्राप्त करने के लिए ही होते हैं।इस प्रकार? यद्यपि सबका एक लक्ष्य सुख ही है? तथापि ज्ञान? कर्ता? कर्म बुद्धि और धृति में भेद होने से विभिन्न लोगों के द्वारा अपनाये गये सुख प्राप्ति के मार्ग भी भिन्नभिन्न होते हैं। सात्त्विक? राजसिक और तामसिक लोग विविध कर्मों के द्वारा अपनेअपने सुख की खोज करते हैं।कर्म के संघटकों में भेद होने के कारण उन विभिन्न प्रकार के कर्मों से प्राप्त सुखों में भेद होना अनिवार्य है। प्रस्तुत प्रकरण में सुख के तीन प्रकारों का वर्गीकरण किया गया है।अभ्यासात् इस अध्याय में वर्णित वर्गीकरण को समझकर एक सच्चे साधक को आत्मनिरीक्षण की सार्मथ्य प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार? अपने दुखों के कारण को समझने से उनका परित्याग कर वह अपने जीवन को पुर्नव्यवस्थित कर सकता है। ऐसे अभ्यास से उसके दुखों का सर्वथा अन्त हो जाना संभव है।सात्त्विक सुख क्या है भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.36।।एवं क्रियाणां कारकाणां च गुणतस्त्रिविधो भेद उक्तोऽथेदानीं फलस्य च सुखस्य त्रिविधं भेदं वक्तुमारभते। सुखं तु इदानीं त्रिविधं मे मम वचनाच्छृणु अवधारय। त्रिविधस्यापि सुखस्य सामान्यलक्षणमाह -- अभ्यासादावृत्तेर्यन्न सात्त्विकादिसुखे रमते यत्र रममाणश्च दुःखस्यान्तमवसानं च निगच्छति निश्चयेन प्राप्नेति। भरतर्षमेतिसंबोधयन् सुखस्य त्रैविध्यं मम वचनाच्छ्रुत्वा सात्त्विकं सुखमनुभवितुं योग्योऽसीति सूचयति। तत्र सात्त्विकं सुखमाह सार्धेन। यत्र यस्मिन्सुखेऽभ्यासादतिपरिचयाद्रमते नतु विषयसुखइव सहसा रतिं प्राप्नोतीत्यपरे। भाष्यस्य समानतया न तद्विरोधः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.36।।एवं क्रियाणां कारणानां च गुणतस्त्रैविध्यमुक्त्वा तत्फलस्य सुखस्य त्रैविध्यं प्रतिजानीते श्लोकार्धेन -- सुखं त्विति। मे मम वचनात् शृणु हेयोपादेयविवेकार्थं व्यासङ्गान्तरनिवारणेन मनः स्थिरीकुरु। हे भरतर्षभेति योग्यता दर्शिता। सात्त्विकं सुखमाह सार्धेन -- अभ्यासादिति। यत्र समाधिसुखेऽभ्यासादतिपरिचयाद्रमते परितृप्तो भवति नतु विषयसुख इव सद्यएव यस्मिन् रममाणश्च दुःखस्य सर्वस्याप्यन्तमवसानं नितरां गच्छति नतु विषयसुख इवान्ते महद्दुःखम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.36।।गुणभेदेन क्रियाणां कारकाणां च त्रैविध्यमुक्तं तत्फलस्य सुखस्य त्रैविध्यमाह -- सुखं त्वित्यादिना। अभ्यासात्पौनःपुन्येन सेवनात्। यत्र सात्त्विके राजसे तामसे वा सुखे रमते रतिं प्राप्नोति। यया रत्या दुःखस्य पुत्रशोकादेरप्यन्तमवसानं निगच्छति निश्चयेन प्राप्नोति तत्सुखं त्रिविधं श्रृणु। यदा त्वयमप्यर्थः सात्त्विकसुखस्यैव लक्षणार्थस्तदा यत्र समाधिसुखे अभ्यासाद्रमते न तु विषयसुख इव रागात् दुःखान्तं मोक्षं च निगच्छतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.36।।एवं धृतित्रैविध्यमुक्त्वा तस्याः सुखफलात्मकत्वात् मुखत्रैविध्यकथनं प्रतिजानीते -- सुखमिति। इदानीं धृतिज्ञानानन्तरं सुखं पुनस्त्रिविधं? हे भरतर्षभ सुखश्रवणयोग्य मे मत्तः शृणु। एवं प्रतिज्ञाय तत्त्रैविध्यमाह -- अभ्यासादिति। अभ्यासात् निरन्तरानुशीलनात् यत्र यस्मिन् रमते आनन्दानुभवं प्राप्नोति? नत्वाऽऽपाततो विषयसुख इव क्षणमात्रानुभवमाप्नोति? च पुनः यदनुशीलने दुःखान्तं संसारान्तं नितरां गच्छति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.36।।सुखस्य त्रैविध्यं प्रतिजानीते अर्धेन -- सुखमिति। स्पष्टार्थः। तत्र सात्त्विकं सुखमाह -- अभ्यासादिति सार्धेन। यत्र यस्मिन्सुखे अभ्यासादतिपरिचयाद्रमते नतु विषयसुख इव सहसा रतिं प्राप्नोति। यस्मिन् रममाणश्च दुःखस्यान्तमवसानं नितरां गच्छति प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.36।।सुखस्य त्रैविध्यं प्रतिजानन्नाह -- सुखमिति। यत्र सुखे चिरकालाभ्यासात्क्रमेण निरतिशयां रतिं मन्यते सांसर्गिकदुःखस्य चान्तं च नितरां गच्छति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.36।।गुणभेदके अनुसार क्रियाओं और कारकोंके तीनतीन प्रकारके भेद कहे अब फलस्वरूप सुखके तीन तरहके भेद कहे जाते हैं --, हे भरतर्षभ अब तू मुझसे तीन तरहके सुखको भी सुन? अर्थात् सुननेके लिये चित्तको समाहित कर। जिस सुखमें मनुष्य अभ्याससे रमता है अर्थात् जिस सुखके अनुभवमें बारम्बार आवृत्ति करनेसे मनुष्यका प्रेम हुआ करता है और जहाँ मनुष्य ( अपने ) दुःखोंका अन्त पाता है अर्थात् जहाँ उसके सारे दुःखोंकी निःसन्देह निवृत्ति हो जाया करती है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.36।। व्याख्या --   भरतर्षभ -- इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तुम राजसतामस सुखोंमें लुब्ध? मोहित होनेवाले नहीं हो क्योंकि तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है क्योंकि स्वर्गकी उर्वशीजैसी सुन्दरी अप्सराको भी तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है? उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम गुडाकेश हुआ है।सुखं तु इदानीम् -- ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बतानेके बाद यहाँ तु पदका प्रयोग,करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं? उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्नबाधा है? तो वह है -- सुखकी इच्छा।सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य -- ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय? तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं? अगर समाधिका सुख भी लिया जाय? तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है -- सुखसङ्गेन बध्नाति (गीता 14। 6)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता? प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता 5। 21 6। 21? 28)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय स्वतःस्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष खयाल करानेके लिये भगवान् यहाँ तु पदका प्रयोग करते हैं।यहाँ इदानीम् कहनेका का तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते है अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग? ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही होता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।त्रिविधं श्रृणु मे -- लोग रातदिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया वह सुख तीन प्रकारका होता है? उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजसतामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजसतामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।अभ्यासाद्रमते यत्र -- सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतःस्वाभाविक ही आकर्षण होता है।राजसतामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर? मनबुद्धिका भोगसंग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य? अभिमानजन्य? प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं? उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं? दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है श्रवणमनन भी अभ्यास है? शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है? और राजसीतामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है? उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम अभ्यास है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है? पर रमण करना बाधक है।यहाँ अभ्यासाद्रमते पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय? प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि? प्रियता? प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।दुःखान्तं च निगच्छति -- उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्योंज्यों रुचि? प्रियता बढ़ती जाती है? त्योंत्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता? सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता 2। 65)।च अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा? तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है -- आत्मबुद्धिप्रसादजम्। जो उत्पन्न होनेवाला होता है? वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है? गुणातीत हो जाता है।आत्मबुद्धिप्रसादजम् -- जिस बुद्धिमें सांसारिक मान? बड़ाई? आदर? धनसंग्रह? विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता? केवल परमात्मविषय विचार ही रहता है? उस बुद्धिकी प्रसन्नता (गीता 2। 64) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है? वह सुख सात्त्विक है।यत्तदग्रे विषमिव -- यहाँ यत्तत् कहनेका भाव यह है कि यत् -- जो सात्त्विक सुख है तत् -- वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है? जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है? उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है -- अग्ने विषमिव। तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं -- उसका रस अभी मिला नहीं इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है? प्रत्युत राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे? बालकको खेलकूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृङ्खलता? खेलकूद छूट जाता है? तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एकदो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि? प्रियता होने लगती है।वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है? जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है? जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन? सत्सङ्ग? कथाकीर्तन? साधनभजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान? कर्म? बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं? उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट? परिश्रम? कठिनता आदि मालूम ही नहीं देते।परिणामेऽमृतोपमम् -- साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता? ज्ञानकी दीप्ति? शान्ति? निर्विकारता आदि सद्भावसद्गुण प्रकट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 919)। इन सद्गुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 5। 21)।परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जडतासे सम्बन्धविच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् -- सत्सङ्ग? स्वाध्याय? संकीर्तन? जप? ध्यान? चिन्तन आदिसे जो सुख होता है? वह मान? बड़ाई? आराम? रुपये? भोग आदि विषयेन्द्रियसम्बन्धका नहीं है और प्रमाद? आलस्य? निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है। सम्बन्ध --   अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.36।।वृत्तमनूद्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- गुणेत्यादिना। क्रियाकारकाणां गुणतस्त्रैविध्योक्त्यनन्तरं फलस्य सुखस्य त्रैविध्योक्त्यवसरे सतीत्याह -- इदानीमिति। हेयोपादेयभेदार्थं त्रैविध्यं समाधानमैकाग्र्यं मम वचनादिति शेषः। यत्रेत्युभयत्र संबध्यते तत्ित्रविधं सुखमिति पूर्वेण संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.36।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.36।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.36।। --,सुखं तु इदानीं त्रिविधं शृणु? समाधानं कुरु इत्येतत्? मे मम भरतर्षभ। अभ्यासात् परिचयात् आवृत्तेः रमते रतिं प्रतिपद्यते यत्र यस्मिन् सुखानुभवे दुःखान्तं च दुःखावसानं दुःखोपशमं च निगच्छति निश्चयेन प्राप्नोति।।

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【 Verse 18.37 】

▸ Sanskrit Sloka: यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् | तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ||

▸ Transliteration: yat tad agre viṣaṁ iva pariṇāme ‘mṛtopamam | tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktaṁ ātma-buddhi-prasādajam ||

▸ Glossary: yat: that which; tat: that; agre: in the beginning; viṣaṁ iva: like poison; pariṇāme: at the end; amṛta: nectar; upamam: compared to; tat: that; sukhaṁ: happiness; sāttvikaṁ: in the mode of goodness; proktaṁ: is said; ātma: self; buddhi: intelligence; prasādajam: satisfactory

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.36,37 And now hear from Me, O Arjuna, about three kinds of pleasure. The pleasure that one enjoys from spiritual practice results in cessation of all sorrows. The pleasure that appears as poison in the beginning, but is like nectar in the end, comes by the grace of Self-knowledge and is in the mode of goodness.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.37।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है? ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है? वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.37।। जो सुख प्रथम (प्रारम्भ में) विष के समान (भासता) है? परन्तु परिणाम में अमृत के समान है? वह आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न सुख सात्त्विक कहा गया है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.37 यत् which? तत् that? अग्रे at first? विषम् poison? इव like? परिणामे in the end? अमृतोपमम् like nectar? तत् that? सुखम् pleasure? सात्त्विकम् Sattvic? प्रोक्तम् is declared (to be)? आत्मबुद्धिप्रसादजम् born of the purity of ones own mind due to Selfrealisation.Commentary Agree vishma iva In the beginning it is attended with much pain as one has to abandon the sensual objects and comforts and practise severe austerities and rigorous Sadhana. He has to undergo a severe ordeal when he practises Yama? Niyama? Tapas and various other vows. He has to cultivate dispassion or indifference to sensual pleasures. This gives him much pain at first. The practice of concentration and meditation also gives pain the beginning. Subjugation of the senses is also very troublesome. Nux vomica is very bitter. One feels much discomfort when he takes a mixture that contains nux vomica. But he derives much pleasure in the end when he gets vigour and good appetite and when his dyspepsia is cured. Even so the aspirant drinks the nectar of immortality in the end? attains the highest knowledge? rejoices in the,Self to his hearts content and enjoys supreme peace and eternal bliss.Proktam It is declared by the wise.Atmabuddhiprasadajam Born as purity of ones own intellect or born of the direct? perfect and clear knowledge of Brahman or the immortal? selfluminous? eternal and supreme Self or the Absolute. The individual self experiences Sattvic happiness when it realises union with the highest Self.The pleasure so born is Sattvic. (Cf.VI.1?2)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.37. [The happiness] which is like poison at its time but is like nectar at the time of its result-that happiness, born of serenity of the Soul and intellect, you must know to be of the Sattva (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.37 Which at first seems like poison but afterwards acts like nectar - that pleasure is Pure, for it is born of Wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.37 That which is like a poison at first but becomes like elixir in the end, born from the serene state of mind focusing on the self - such pleasure is said to be Sattvika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.37 That which is like poison in the beginning, but comparable to nectar in the end, and which, arises from the purity of one's intellect-that joy is spoken of as born of sattva.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.37 That which is like poison at first but in the end like nectar that happiness is declared to be Sattvic, born of the purity of one's own mind due to Self-realisation.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.37 See Comment under 18.39

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.37 That pleasure, which 'at the beginning,' i.e., at the time of beginning of Yoga, is 'like poison,' i.e., is painful because it reires strenuous efforts and because the distinct nature of the self is not yet experienced, but which after long practice fructifies in the blissful experience of the self - that joy born of a serene state of mind 'focusing on the self' is Sattvika. The Buddhi concerning the self is 'Atama-buddhi.' When all objects are withdrawn from that Buddhi it becomes serene (Prasanna). The joy born of the experience of the self in its distinct nature, when all objects are withdrawn from the Buddhi, becomes 'like elixir'. That joy is said to be Sattvika.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.37 Yat, that joy which is; iva, like; visam, poison, a source of pain; agre, in the beginning-when it first comes in the early stages of (acisition) of knowledge, detachment, meditation and absorption, since they involve great struggle; but amrtopamam, comparable to nectar; pariname, in the end, when it arises from the maturity of knowledge, detachment, etc.; and which atma-buddhi-prasadajam, arises from the purity (prasada), trasparence like water, of one's intellect (atma-buddhi); tat, that; sukham, joy; is proktam, spoken of, by the learned ones ;as sattvikam, born of sattva. Or, the phrase atma-buddhi-prasadajam may mean 'arising from the high degree of clearness of that atma-buddhi (knowledge of or connected with the Self)'; therefore it is born of sattva.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.37।। जो प्रथम विष के समान है यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि वास्तव में सात्त्विक सुख कभी विष के समान नहीं होता है? परन्तु मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति बहिर्मुखी होने के कारण उसे ज्ञान? वैराग्य? ध्यान आदि सात्त्विक सुख के साधनों का अभ्यास करने में कठिनाई अनुभव होती है। इसलिए ऐसे दुर्बल व्यक्ति को यह सात्त्विक सुख प्रारम्भ में विष के समान दुखदायी प्रतीत होता है? किन्तु यह वास्तविकता नहीं है। उदाहरणार्थ बालकों को खेलकूद में आसक्ति होने के कारण पाठशाला का अध्ययन दुखदायी प्रतीत होता है।परिणाम में अमृत के समान है परिणाम में अर्थात् जब ज्ञान? वैराग्य आदि साधनाभ्यास में परिपक्वता आने पर वास्तविक मनशान्ति का अनुभव होता है तब वह अमृत के समान आनन्दायक होता है। यह सुख सात्त्विक कहा गया है।आत्म बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न प्राय लोग प्रसाद का अर्थ कर्मकाण्डीय पूजा की सम्पन्नता होने पर वितरित किया जाने वाला भोज्य प्रसाद ही समझते हैं। परन्तु यहाँ प्रसाद का अर्थ व्यापक और गम्भीर है।आत्मानुसंधान के द्वारा आत्मस्वरूप में समाहित बुद्धि आत्म बुद्धि कहलाती है। उस बुद्धि के प्रसाद का अर्थ है? प्रसन्नता? निर्मलता। बुद्धि के शान्त? शुद्ध और स्थिर होने पर? जो सुख की अनुभूति होती है? वही आत्मबुद्धि प्रसादज सात्त्विक सुख है। ऐसा सर्वश्रेष्ठ सुख केवल सुशिक्षित? सुसंस्कृत और सात्त्विक पुरुषों को ही प्राप्त होता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.37।।सुखस्य त्रैविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विकं सुखमाह -- यत्तदिति। यत्सुखमग्रे पूर्वं प्रथमसन्निपाते ज्ञानवैराग्यध्यानसमाध्यारम्भेऽत्यन्तायासपूर्वकत्वाद्विषमिव दुःखात्मकमिव भवति परिणामे ज्ञानादिपरिपाकेऽमृतोपमं तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं विद्वद्भिः कथितम्। आत्मनो बुद्धिरात्मबुद्धिरात्मबुद्धेः प्रसादो नैर्मल्यं सकार्यरजस्मभोमलत्यागेन सलिलवत्स्वच्छतयावस्थानं ततो जातमात्मबुद्धिप्रसादजम्। आत्मविषया आत्मालम्बना बुद्धिर्वा आत्मबुद्धिस्तत्प्रसादात्प्रकर्षाद्वा जातम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.37।।तदेव विवृणोति -- यत्तदिति। यदग्रे ज्ञानवैराग्यध्यानसमाध्यारम्भेऽत्यन्तायासनिर्वाह्यत्वाद्विषयमिव द्वेषविशेषावहं भवति। परिणामे ज्ञानवैराग्यादिपरिपाके त्वमृतोपमं प्रीत्यतिशयास्पदं भवति। आत्मविषया बुद्धिरात्मबुद्धिस्तस्याः प्रसादो निद्रालस्यादिराहित्येन स्वच्छतयावस्थानं ततो जातमात्मबुद्धिप्रसादजम्। नतु राजसमिव विषयेन्द्रियसंयोगजं नवा तामसमिव निद्रालस्यादिजमीदृशं यदनात्मबुद्धिनिवृत्त्यात्मबुद्धिप्रसादजं समाधिसुखं तत्सात्त्विकं प्रोक्तं योगिभिः। अपर आह अभ्यासादावृत्तेर्यत्र रमते प्रीयते यत्र च दुःखावसानं प्राप्नोति तत्सुखं तच्च त्रिविधं गुणभेदेन शृण्विति तत्पदाध्याहारेण पूर्णस्य श्लोकस्यान्वयः। यत्तदग्र,इत्यादिश्लोकेन तु सात्त्विकसुखलक्षणमिति। भाष्यकाराभिप्रायोप्येवम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.37।।यत्तत्प्रसिद्धं सर्वप्राणिप्रेमास्पदम्। अग्रे समारम्भकाले मनःप्राणेन्द्रियस्पन्दनिरोधेन यज्ञे संज्ञप्यमानस्य पशोरिव जायमानं विषमिवातितीव्रवेदनाकरम्। परिणामे सात्त्विक्या धृत्या निरुद्धासु मन आदिक्रियासु अमृतोपममत्याह्लादकरम्। आत्मनः स्वस्यैव बुद्धेः प्रसादो नैर्मल्यं रजस्तमोमलराहित्यं तस्मादाविर्भूतं न तु विषयसङ्गजं निद्रालस्यादिजं वा तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.37।।किञ्च। यत्तत् वक्तुमशक्यमनुभवैकवेद्यम् अग्रे प्रथमं विषमिव लौकिकसुखपरित्यागे जीवितहरणवत् कटुतया परिभाति? परिणामे फलपरिपाकदशायां अमृतोपममतिमधुरं मोक्षतुल्यं वा आत्मबुद्धिप्रसादजम् आत्मसम्बन्धिनी मदंशसम्बन्धिनी या बुद्धिस्तत्प्रसादो नाम रजस्तमोजविकारराहित्येन शुद्धत्वं तज्जं तत्सुखं सात्त्विकं सत्त्वसम्बन्धजं प्रोक्तम्। तज्ज्ञैरिति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.37।।कीदृशं तत् -- यत्तदिति। यत्तत्किमपि अग्रे प्रथमं विषमिव मनःसंयमाधीनत्वाद्दुःखावहमिव भवति। परिणामे त्वमृतसदृशम्। आत्मविषया बुद्धिरात्मबुद्धिस्तस्याः प्रसादेन रजस्तमोमलत्यागेन स्वच्छतयावस्थानं ततो जातं यत्सुखं तत्सात्त्विकं प्रोक्तं योगिभिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.37।।तदेव विशिनष्टि -- यत्तदिति। सुखं अग्रे योगोपक्रमवेलायां बह्वायाससाध्यत्वाद्विविक्तात्मस्वरूपानुभवाभावात् विषमिव दुःखस्वरूपमिव भवति? परिणामेऽमृतोपमं परिपाके स्वात्मस्वरूपाविर्भावे सुखरूपम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.37।।जो ऐसा सुख है? वह पहलेपहल -- ज्ञान? वैराग्य? ध्यान और समाधिके आरम्भकालमें? अत्यन्त श्रमसाध्य होनेके कारण? विषके सदृश -- दुःखात्मक होता है। परंतु परिणाममें वह ज्ञानवैराग्यादिके परिपाकसे उत्पन्न हुआ सुख? अमृतके समान है। वह आत्मबुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न हुआ सुख? विद्वानोंद्वारा सात्त्विक बतलाया गया है। अपनी बुद्धिका नाम आत्मबुद्धि है? उसका जो जलकी भाँति स्वच्छ निर्मल हो जाना है? वह आत्मबुद्धिप्रसाद है? उससे उत्पन्न हुआ सुख आत्मबुद्धिप्रसादजन्य सुख है। अथवा? आत्मविषयक या आत्माको अवलम्बन करनेवाली बुद्धिका नाम आत्मबुद्धि है? उसके प्रसादकी अधिकतासे उत्पन्न सुख आत्मबुद्धिप्रसादसे उत्पन्न है? इसीलिये वह सात्त्विक है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.37।। व्याख्या --   भरतर्षभ -- इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तुम राजसतामस सुखोंमें लुब्ध? मोहित होनेवाले नहीं हो क्योंकि तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है क्योंकि स्वर्गकी उर्वशीजैसी सुन्दरी अप्सराको भी तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है? उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम गुडाकेश हुआ है।सुखं तु इदानीम् -- ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बतानेके बाद यहाँ तु पदका प्रयोग,करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं? उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्नबाधा है? तो वह है -- सुखकी इच्छा।सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य -- ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय? तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं? अगर समाधिका सुख भी लिया जाय? तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है -- सुखसङ्गेन बध्नाति (गीता 14। 6)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता? प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता 5। 21 6। 21? 28)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय स्वतःस्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष खयाल करानेके लिये भगवान् यहाँ तु पदका प्रयोग करते हैं।यहाँ इदानीम् कहनेका का तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते है अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग? ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृतिके तीनतीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही होता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।त्रिविधं श्रृणु मे -- लोग रातदिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया वह सुख तीन प्रकारका होता है? उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजसतामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजसतामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।अभ्यासाद्रमते यत्र -- सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतःस्वाभाविक ही आकर्षण होता है।राजसतामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर? मनबुद्धिका भोगसंग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य? अभिमानजन्य? प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं? उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं? दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है श्रवणमनन भी अभ्यास है? शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है? और राजसीतामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है? उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम अभ्यास है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है? पर रमण करना बाधक है।यहाँ अभ्यासाद्रमते पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय? प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि? प्रियता? प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।दुःखान्तं च निगच्छति -- उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्योंज्यों रुचि? प्रियता बढ़ती जाती है? त्योंत्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता? सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता 2। 65)।च अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा? तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है -- आत्मबुद्धिप्रसादजम्। जो उत्पन्न होनेवाला होता है? वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है? गुणातीत हो जाता है।आत्मबुद्धिप्रसादजम् -- जिस बुद्धिमें सांसारिक मान? बड़ाई? आदर? धनसंग्रह? विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता? केवल परमात्मविषय विचार ही रहता है? उस बुद्धिकी प्रसन्नता (गीता 2। 64) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है? वह सुख सात्त्विक है।यत्तदग्रे विषमिव -- यहाँ यत्तत् कहनेका भाव यह है कि यत् -- जो सात्त्विक सुख है तत् -- वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है? जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है? उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है -- अग्ने विषमिव। तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं -- उसका रस अभी मिला नहीं इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है? प्रत्युत राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे? बालकको खेलकूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृङ्खलता? खेलकूद छूट जाता है? तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एकदो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि? प्रियता होने लगती है।वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है? जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है? जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन? सत्सङ्ग? कथाकीर्तन? साधनभजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान? कर्म? बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं? उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट? परिश्रम? कठिनता आदि मालूम ही नहीं देते।परिणामेऽमृतोपमम् -- साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता? निर्मलता? ज्ञानकी दीप्ति? शान्ति? निर्विकारता आदि सद्भावसद्गुण प्रकट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 919)। इन सद्गुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 5। 21)।परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जडतासे सम्बन्धविच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् -- सत्सङ्ग? स्वाध्याय? संकीर्तन? जप? ध्यान? चिन्तन आदिसे जो सुख होता है? वह मान? बड़ाई? आराम? रुपये? भोग आदि विषयेन्द्रियसम्बन्धका नहीं है और प्रमाद? आलस्य? निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है। सम्बन्ध --   अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.37।।तत्र सात्त्विकं सुखमादेयत्वेन दर्शयति -- यत्तदिति। प्रथमसंनिपातं विभजते -- ज्ञानेति। कुतस्तस्य दुःखात्मकत्वं तत्राह -- अत्यन्तेति। दुःखात्मकत्वे दृष्टान्तमाह -- विषमिवेति। ज्ञानादिपरिपाकावस्थापरिणामस्तस्मिन् सति ततो जातमिति योजना। तत्रैव हेत्वन्तरमाह -- आत्मन इति। आत्मबुद्धिशब्दस्यार्थान्तरमाह -- आत्मविषयेति। अन्तःकरणनैर्मल्याद्वा सम्यग्ज्ञानप्रकर्षाद्वा जातत्वादिति तच्छब्दार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.37।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.37।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.37।। --,यत् तत् सुखम् अग्रे पूर्वं प्रथमसंनिपाते ज्ञानवैराग्यध्यानसमाध्यारम्भे अत्यन्तायासपूर्वकत्वात् विषमिव दुःखात्मकं भवति? परिणामे ज्ञानवैराग्यादिपरिपाकजं सुखम् अमृतोपमम्? तत् सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं विद्वद्भिः? आत्मनः बुद्धिः आत्मबुद्धिः? आत्मबुद्धेः प्रसादः नैर्मल्यं सलिलस्य इव स्वच्छता? ततः जातं आत्मबुद्धिप्रसादजम्। आत्मविषया वा आत्मावलम्बना वा बुद्धिः आत्मबुद्धिः? तत्प्रसादप्रकर्षाद्वा जातमित्येतत्। तस्मात् सात्त्विकं तत्।।

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【 Verse 18.38 】

▸ Sanskrit Sloka: विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||

▸ Transliteration: viṣayendriya-saṁyogadyat tad agre ‘mṛtopamam | pariṇāme visam iva tat sukhaṁ rājasaṁ smṛtam ||

▸ Glossary: viṣaya: objects of the senses; indriya: senses; saṁyogat: combination; yat: which; tat: that; agre: in the beginning; amṛtopamam: just like nectar; pariṇāme: at the end; visamiva: like poison; tat: that; sukhaṁ: happiness; rājasaṁ: in the mode of passion; smṛtam: is considered

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.38 Sensual pleasures that appear as nectar in the beginning, but become poison in the end, are in the mode of passion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.38।।जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है? वह सुख राजस कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.38।। जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है? वह प्रथम तो अमृत के समान? परन्तु परिणाम में विष तुल्य होता है? वह सुख राजस कहा गया है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.38 विषयेन्द्रियसंयोगात् from the contact of the senseorgans with the objects? यत् which? तत् that? अग्रे at first? अमृतोपमम् like nectar? परिणामे in the end? विषम् poison? इव like? तत् that? सुखम् pleasure? राजसम् Rajasic? स्मृतम् is declared.Commentary Sensual pleasure is mixed with pain? fear and sin. A small grain of sensual pleasure is mixed with a mountain of pain. He who indulges in sensual pleasures will have to experience pain also? side by side. He is afraid of losing the objects that give him pleasure. He is attached to them. Attachment is death. It brings him again and again to this world of death. Fear and attachment coexist with sensual pleasure. He has to exert a lot to get money. He can obtain the objects through money. During exertion he commits many sinful acts and he will have to suffer in hell. The next birth will be of a very low nature. He tells lies and cheats people to obtain money. The senses also lose their vigour through indulgence in sensual pleasure. He loses his strength? vigour? wealth and energy. His intellect becomes dull? weak? impure? turbid and perverted. He loses his money and proper understanding. (Cf.V.22)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.38. [The happiness] which is like nectar at its time due to the contact between the senses and sense-objects; but which is like poison at the time of its result-that is considered to be of the Rajas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.38 That which as first is like nectar, because the senses revel in their objects, but in the end acts like poison - that pleasure arises from Passion.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.38 That pleasure which arises from the contact of senses with their objects, which is like elixir at first but like poison in the end, is said to be Rajasika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.38 That joy is referred to as born of rajas which, arising from the contact of the organs and (their) objects, is like nectar in the beginning, but like poison at the end.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.38 That happiness which arises from the contact of the sense-organs with the objects, which is at first like nectar, and in the end like poison that is declared to be Rajasic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.38 See Comment under 18.39

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.38 That which at the 'beginning,' i.e., at the time of experience looks like elixir because of the contact of senses with their objects agreable to them, but 'at the end,' i.e., when satiation or further incapacity to enjoy due to over-indulgence in them occurs, looks life poison - that pleasure is said to be Rajasika. In this latter state these so-called enjoyments cause the misery of Naraka.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.38 Tat, that; sukham, joy; is smrtam, referred to; as rajasam, born of rajas; yat, which; visaya-indriya-samyogat, arising from the contact of the organs and (their) objects; is amrtopamam, like nectar; agre, in the beginning, in the intial moments; but iva, like; visam, poison; pariname, at the end-at the end of full enjoyment of the objects (of the senses), because it causes loss of strength, vigour, beauty, wisdom, [Prajna, the capacity to understand whatever is heard.] retentive faculty, wealth and diligence, and because it is the cause of vice and its conseent hell etc.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.38।। इस श्लोक में दी गई परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि राजस सुख सात्त्विक सुख के ठीक विपरीत लक्षण वाला है।इन्द्रियों के विषयो के साथ प्रत्यक्ष संयोग होने पर ही राजस सुख की प्राप्ति हो सकती है। दुर्भाग्य से इन दोनों का यह संयोग नित्य वहीं बना रह सकता? क्योंकि विषय अनित्य और परिवर्तनशील होते हैं। इसी प्रकार? विषयों से सम्पर्क करने वाली इन्द्रियाँ? मन और बुद्धि अनित्य ही हैं। अत भोग्य विषय और भोक्ता इन्द्रियादि दोनों के ही अनित्य होने पर उनके मध्य नित्य संयोग रहना असंभव है। उस स्थिति में? राजस सुख नित्य कैसे हो सकता है कोई भी मनुष्य इस क्षणिक वैषयिक सुख का भी

Chapter 18 (Part 20)

पूर्णत और यथेष्ट भोग नहीं कर सकता? क्योंकि भोगकाल में भी उसे भय और चिन्ता लगी रहती है कि कहीं यह सुख शीघ्र ही समाप्त न हो जाय। केवल राजसी स्वभाव के लोग ही इस प्रकार के सुखों में रम सकते हैं? जो कि वास्तव में दुख के कारण ही होते हैं। विवेकी पुरुष इसमें नहीं रमते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.38।।सात्त्विकं सुखसमुदाहृत्य राजसं तद्य्वुत्पादयति। यत्सुखं विषयेन्द्रियसंयोगाज्जायतेऽग्रे प्रथमे क्षणेऽमृतोपममभृतसदृशं परिणामे तदुपभोगान्ते विषमिव बलवीर्यरसप्रज्ञादिहानिहेतुत्वादधर्मतज्जनितनरकादिहेतुत्वाच्च विषतुल्यं तत्सुखं हेयं राजसं स्मृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.38।।विषयेति। विषयाणामिन्द्रियाणां च संयोगाज्जातं न त्वात्मबुद्धिप्रसादात् यत्तत् यदतिप्रसिद्धं स्रक्चन्दनवनितासङ्गादिसुखमग्रे प्रथमारम्भे मनःसंयमादिक्लेशाभावादमृतोपमं परिणामे त्वैहिकपारत्रिकदुःखावहत्वाद्विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.38।।राजसं सुखमाह -- विषयेति। अग्रे भोगकाले। परिणामे विषमिव वियोगकाले। इहामुत्र च दुःखप्रदत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.38।।राजसमाह -- विषयेन्द्रियेति। विषयाणामिन्द्रियाणां च संयोगात् तत् प्रसिद्धं स्रग्गन्धवस्त्राभरणस्त्रीसङ्गादिरूपं भगवत्सम्बन्धरहितसुखं अग्रे प्रथमं आपाततः अमृतोपमं अतिमिष्टतमं? परिणामे फलदशायां विषमिव भगवद्विस्मृतिकारकत्वेन जीवहरणैकस्वभावं तत्सुखं राजसं स्मृतं? प्रसिद्धमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.38।।राजसं सुखमाह -- विषयेन्द्रियेति। विषयाणामिन्द्रियाणां च संयोगाद्यत्तत्प्रसिद्धं स्त्रीसङ्गादि सुखममृतमुपमा यस्य तादृशं भवत्यग्रे प्रथमम्। परिणामे तु विषतुल्यमिहामुत्र च दुःखहेतुत्वात्तत्सुखं राजसं स्मृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.38।।विषयेति। स्पष्टमेवोपलभ्यते विषयस्य रूपादेः इन्द्रियैः संयोगाद्यत्तत्सुखममृतोपममग्रे प्रथमं परिणामे विपाके विषमिव दुःखरूपम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.38।।जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे उत्पन्न होता है? वह पहले -- प्रथम क्षणमें? अमृतके सदृश होता है? परंतु परिणाममें विषके समान है। अभिप्राय यह है कि बल? वीर्य? रूप? बुद्धि? मेधा? धन और उत्साहकी हानिका कारण होनेसे? तथा अधर्म और उससे उत्पन्न नरकादिका हेतु होनेसे? वह परिणाममें -- अपने उपभोगका अन्त होनेके पश्चात्? विषके सदृश होता है अतः ऐसा सुख राजस माना गया है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.38।। व्याख्या --   विषयेन्द्रियसंयोगात् -- विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख है? उसमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि यह प्राणी किसी भी योनिमें जाता है? वहाँ उसको विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला सुख मिलता ही है। शब्द? स्पर्श आदि पाँचों विषयोंका सुख पशुपक्षी? कीटपतङ्ग आदि सभी प्राणियोंको मिलता है। अतः उस सुखमें प्राणिमात्रका स्वाभाविक अभ्यास रहता है। मनुष्यजीवनमें भी बचपनसे देखा जाय तो अनुकूलतामें राजी होना और प्रतिकूलतामें नाराज होना स्वाभाविक ही होता आया है। इसलिये इस राजस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है।यत्तदग्रेऽमृतोपमम् -- राजस सुखको आरम्भमें अमृतकी तरह कहनेका भाव यह है कि सांसारिक विषयोंकी प्राप्तिकी सम्भावनाके समय मनमें जितना सुख होता है? उतना सुख? मस्ती और राजीपन विषयोंके मिलनेपर नहीं रहता। मिलनेपर भी आरम्भमें (संयोग होते ही) जैसा सुख होता है? थोड़े समयेके बाद वैसा सुख नहीं रहता और उस विषयको भोगतेभोगते जब भोगनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है? उस समय सुख नहीं होता? प्रत्युत विषयभोगसे अरुचि हो जाती है। भोग भोगनेकी शक्ति क्षीण होनेके बाद भी अगर विषयोंको भोगा जाय तो दुःख? जलन पैदा हो जाती है? चित्तमें सुख नहीं रहता? इसलिये यह राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है।अमृतकी तरह कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब मन विषयोंमें खींचता है? तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। विषयों और भोगोंकी बातें सुननेमें जितना रस आता है? उतना भोगोंमें नहीं आता। इसलिये गीतामें आया है -- यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः (2। 42) राजस पुरुष स्वर्गके भोगोंका सुख सुनते हैं तो उनको वह सुख बड़ा प्रिय लगता है और वे उसके लिये ललचा उठते हैं। तात्पर्य है कि वे स्वर्गके सुख दूरसे सुनकर ही बड़े प्रिय लगते हैं परन्तु स्वर्गमें जाकर सुख भोगनेसे उनको उतना सुख नहीं मिलता और वह उतना प्रिय भी नहीं लगता परिणामे विषमिव -- आरम्भमें विषय बड़े सुन्दर लगते हैं? उनमें बड़ा सुख मालूम देता है परन्तु उनको भोगतेभोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत हो जाता है? उस सुखमें बिलकुल अरुचि हो जाती है? तब वही सुख जहरकी तरह मालूम देता है।संसारमें जितने प्राणी कैदमें पड़े हैं? जितने चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़े हैं? उसका कारण देखा जाय तो उन्होंने विषयोंका भोग किया है? उनसे सुख लिया है? इसीसे वे कैद? नरक आदिमें दुःख पा रहे हैं क्योंकि राजस सुखका परिणाम दुःख होता ही है -- रजसस्तु फलं दुःखम् (गीता 14। 16)।आज भी जो लोग घबरा रहे हैं? दुःखी हो रहे हैं? वे सब पदार्थोंके रागके कारण ही दुःख पा रहे हैं। जो धनी होकर फिर निर्धन हो गया है? वह जितना दुःखी और संतप्त है? उतना दुःख और सन्ताप स्वाभाविक निर्धनको नहीं है क्योंकि उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक नहीं पड़े हैं। परन्तु धनीने राजस सुख अधिक भोगा है? उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक पड़े हैं? इसलिये उसको धनके अभावका दुःख ज्यादा है। जैसे? जो मनुष्य तरहतरहकी सामग्री भोजन करनेवाला है? उसके भोजनमें कभी थोड़ीसी भी कमी रह जाय तो उसको वह कमी बड़ी खटकती है कि आज भोजनमें चटनी नहीं है? खटाई नहीं है? मिठाई नहीं है? अमुकअमुक चीज नहीं है -- इस प्रकार नहींनहींका ही ताँता लगा रहता है। परन्तु साधारण आदमी बाजरेकी रूखीसूखी रोटी खाकर भी मौजसे रहता है? उसको भोजनमें किसी चीजकी कमी खटकती ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि पदार्थोंके संयोगसे जितना ज्यादा सुख लिया है? उतना ही उसके अभावका अनुभव होता है। अभावके अनुभवमें दुःख ही होता है। जिस पदार्थकी कामना होती है? उसकी प्राप्तिके लिये मनुष्य उद्योग करते हैं। उद्योग करनेपर भी वस्तु मिलेगी या नहीं मिलेगी? इसमें संदेह रहता है। वस्तु न मिले तो उसके अभावका दुःख होता है? और वस्तु मिल जाय तो उस वस्तुको और भी अधिक प्राप्त करनेकी इच्छा हो जाती है। इस प्रकार इच्छापूर्ति नयी इच्छाका कारण बन जाती है और इच्छापूर्ति तथा फिर इच्छाकी उत्पत्ति -- यह चक्कर चलता ही रहता है? इसका कभी अन्त नहीं आता। तात्पर्य यह है कि इच्छा कभी मिटती नहीं और इच्छाके रहते हुए अभाव खटकता रहता है। यह अभाव ही विषकी तरह है अर्थात् दुःखदायी है।जब राजस सुख परिणाममें विषकी तरह है? तो फिर राजस सुख लेनेवाले जितने लोग हैं? उन सबको सुखभोगके अन्तमें मर जाना चाहिये परन्तु राजस सुख विषकी तरह मारता नहीं? प्रत्युत विषकी तरह अरुचिकारक हो जाता है। उसमें पहले जैसी रुचि होती है? वैसी रुचि अन्तमें नहीं रहती अर्थात् वह सुख विषकी तरह हो जाता है? साक्षात् विष नहीं होता।राजस सुख विषकी तरह क्यों होता है कारण कि विष तो एक जन्ममें ही मारता है? पर राजस सुख कई जन्मोंतक मारता है। राजस सुख लेनेवाला रागी पुरुष शुभ कर्म करके यदि स्वर्गमें भी चला जाता है? तो वहाँ भी उसको सुख? शान्ति नहीं मिलती। स्वर्गमें भी अपनेसे ऊँची श्रेणीवालोंको देखकर ईर्ष्या होती है कि ये हमारेसे ऊँचे क्यों हो गये समान पदवालोंको देखकर दुःख होता है कि ये हमारे समान पदपर आकर क्यों बैठ गये और नीची श्रेणीवालोंको देखकर अभिमान आता है कि हम इनसे ऊँचे हैं इस प्रकार उसके मनमें ईर्ष्या? दुःख और अभिमान होते ही रहते हैं? फिर उसके मनमें सुख कहाँ और शान्ति कहाँ इतना ही नहीं? पुण्योंके क्षीण हो जानेपर उसको पुनः मृत्युलोकमें आना पड़ता है -- क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (गीता 9। 21)। यहाँ आकर फिर शुभ कर्म करता है और फिर स्वर्गमें जाता है। इस प्रकार जन्ममरणके चक्करमें चढ़ा ही रहता है -- गतागतं कामकामा लभन्ते (9। 21)। यदि वह रागके कारण पापकर्मोंमें लग जाता है तो परिणाममें चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़ता हुआ न जाने कितने जन्मोंतक जन्मतामरता रहता है? जिसका कोई अन्त नहीं आता। इसलिये इस सुखको विषकी तरह कहा गया है।तत्सुखं राजसं स्मृतम् -- सात्त्विक सुखके लिये तो (सैंतीसवें श्लोकमें) प्रोक्तम् पद कहा है? पर राजस सुखके लिये यहाँ स्मृतम् पद कहनेका तात्पर्य है कि पहले भी मनुष्यने राजस सुखका फल दुःख पाया है परन्तु रागके कारण वह संयोगकी तरफ पुनः ललचा उठता है। कारण कि संयोगका प्रभाव उसपर पड़ा हुआ है और परिणामके प्रभावको वह स्वीकार नहीं करता। अगर वह परिणामके प्रभावको स्वीकार कर ले? तो फिर वह राजस सुखमें फँसेगा नहीं। स्मृति? शास्त्र? पुराण आदिमें ऐसे बहुतसे इतिहास आते हैं? जिनमें मनुष्योंके द्वारा राजस सुखके कारण बहुत दुःख पानेकी बात आयी है। इसी बातको स्मरण करानेके लिये यहाँ स्मृतम् पद आया है।जिसकी वृत्ति जितनी सात्त्विक होती है? वह उतना ही हरेक विषयके परिणामकी तरफ देखता है। अभीके तात्कालिक सुखकी तरफ वह ध्यान नहीं देता। परंतु राजसी वृत्तिवाला परिणामकी तरफ देखता ही नहीं? उसकी वृत्ति तात्कालिक सुखकी तरफ ही जाती है। इसलिये वह संसारमें फँसा रहता है। राजस पुरुषको संसारका सम्बन्ध वर्तमानमें तो अच्छा मालूम देता है परन्तु परिणाममें यह हानिकारक है -- ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते (गीता 5। 22)। इसलिये साधकको संसारसे विरक्त हो जाना चाहिये राजस सुखमें नहीं फँसना चाहिये।, सम्बन्ध --   अब तामस सुखका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.38।।राजसं सुखं हेयत्वाय कथयति -- विषयेति। बलं सङ्घातसामर्थ्यं? वीर्यं पराक्रमकृतं यशः? रूपं शरीरसौन्दर्यं? प्रज्ञा श्रुतार्थग्रहणसामर्थ्यं? मेधा गृहीतार्थस्याविस्मरणेन धारणशक्तिः? धनं गोहिरण्यादि? उत्साहस्तु कार्यं प्रत्युपक्रमादिः? एतेषां नाशकत्वाद्वैषयिकं सुखं विषसममित्यर्थः। तत्रैव हेत्वन्तरमाह -- अधर्मेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.38।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.38।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.38।। --,विषयेन्द्रियसंयोगात् जायते यत् सुखम् तत् सुखम् अग्रे प्रथमक्षणे अमृतोपमम् अमृतसमम्? परिणामे विषमिव? बलवीर्यरूपप्रज्ञामेधाधनोत्साहहानिहेतुत्वात् अधर्मतज्जनितनरकादिहेतुत्वाच्च परिणामे तदुपभोगपरिणामान्ते विषमिव? तत् सुखं राजसं स्मृतम्।।

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【 Verse 18.39 】

▸ Sanskrit Sloka: यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन: | निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ||

▸ Transliteration: yadagre cānubandhe ca sukhaṁ mohanamātmanaḥ | nidrālasyapramādotthaṁ tat tāmasamudāhṛtam ||

▸ Glossary: yat: that which; agre: in the beginning; ca: also; anubandhe: by binding; ca: also; sukhaṁ: happiness; mohanaṁ: illusion; ātmanaḥ: of the self; nidrā: sleeping; ālasya: laziness; pramāda: illusion; utthaṁ: produced of; tat: that; tāmasaṁ: in the mode of ignorance; udāhṛtam: is said to be

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.39 Pleasure that is delusion from beginning to end and born out of sleep, laziness and illusion is said to be of the nature of ignorance.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.39।।निद्रा? आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है? वह सुख तामस कहा गया है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.39।। जो सुख प्रारम्भ में और परिणाम (अनुबन्ध) में भी आत्मा (मनुष्य) को मोहित करने वाला होता है? वह निद्रा? आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.39 यत् which? अग्रे at first? च and? अनुबन्धे in the seel? च and? सुखम् pleasure? मोहनम् delusive? आत्मनः of the self? निद्रालस्यप्रमादोत्थम् arising from sleep? indolence and heedlessness? तत् that? तामसम् Tamasic? उदाहृतम् is declared.Commentary Anubandhe In the conseence after the termination. The pleasure that is begotten by evil habits like drinking liors and eating worthless things is delusive of the self. The man becomes oblivious of the path he ought to tread. Such pleasure is verily of the nature of darkness.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.39. The happiness which, [both] at the beginning and subseently, is of the nature of deluding the Self; and which results from sleep, indolence and heedleness-that is stated to be of the Tamas (Strand).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.39 While the pleasure which from first to last merely drugs the senses, which springs from indolence, lethargy and folly - that pleasure flows from Ignorance.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.39 That pleasure which, at the beginning and at the end, deludes the self, through sleep, sloth and error - is declared to be Tamasika.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.39 That joy is said to be born of tams which, both in the beginning and in the seel, is delusive to oneself and arises from sleep, laziness and inadvertence.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.39 That happiness which at first as well as in the seel deludes the self, and which arises from sleep, indolence and heedlessness that is declared to be Tamasic.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.36-39 Sukham etc. upto udahrtam. At its time : at the time of its practice (use). Like poison (1st) : Because it is extremely difficult to give up the attachment for sense-objects cultivated during hundreds of [previous] life-periods. That has been said in the revealed literature as :

'[The path of sprituality] is the edge of a razor, painful and difficult to cross over etc.'

The serenity of intellect (or mind) results from serenity in the Self, as there exists nothing else to be aspired for. The [Rajasic] happiness springs from the mutual contact between the sense-objects and senses, just as in the case of the eye due to its contact with colur. That happiness which is due to sleep, indolence and heedlessness, explained earlier, is of the Tamas (Strand).

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.39 Pleasure of the Tamasika type causes delusion to the self at the beginning and the end of enjoyment. Here 'delusion' means the absence of knowledge about things as they are. Pleasure springing from sleep, sloth and error are the cause of it. Even at the time of experience, sleep etc., are the cause of delusion. It is clear how sleep causes delusion. 'Sloth' is indolence in sensory operations. When sensory activities are slow, dimness of knowledge results. 'Error' is heedlessness regarding what ought to be done. From this also occurs the dimness of knowledge. Thus, these two also cause delusion. Such pleasure is declared to be Tamasika. Therefore what is meant is this: subduing Rajas and Tamas, the Sattva alone should be allowed to develop by the aspirant for relase.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.39 That joy is udahrtam, said to be; tamasam, born of tamas; yat, which; both agre, in the beginning; ca, and; anubandhe, in the seel, after the end (of enjoyment); is mohanam, delusive; atmanah, to oneself; and nidra-alasya-pramada-uttham, arises from sleep, laziness and inadvertence. Therefore, now is begun a verse in order to conclude this section [The section showing that all things in the whole of creation are under the influence of the three gunas.].

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.39।। जो सुख मनुष्य को मोहित करने वाला होता है और जो उसकी संस्कृति को विकृति में परिवर्तित कर देता है वह तामस सुख माना गया है। मोह का अर्थ है आत्मा और अनात्मा के भेद का अभाव।तामस सुख के स्रोत हैं? निद्रा? आलस्य और प्रमाद। निद्रा का अर्थ सर्वविदित निद्रावस्था तो है ही? किन्तु वेदान्त दर्शन के अनुसार स्वस्वरूप के अज्ञान की अवस्था भी निद्रा कहलाती है। इस आत्म अज्ञान के कारण ही मनुष्य विषय भोगों में सुख की खोज करता है और उसमें ही आसक्त हो जाता है।आलस्य क्रियाशीलता रजोगुण का धर्म है और उसके विपरीत आलस्य तमोगुण का धर्म है। तामसी पुरुष की कर्म को टालने की प्रवृत्ति होती है और इस प्रकार आलस्य में ही वह अपने समय को व्यतीत कर देता है। यही उसका सुख है। ऐसा पुरुष विचार करने में भी आलसी होता है। इसलिए वह जीवन में यथार्थ निर्णय नहीं ले पाता।प्रमाद यह सत्त्वगुण के लक्षण सजगता और विवेक के सर्वथा विपरीत लक्षण है। प्रमादशील मनुष्य अपने हृदय के उच्च गुणों के आह्वान की अवहेलना और उपेक्षा करके निम्न स्तर के भोगों में रमता है। फलत वह दिन प्रतिदिन पशु के स्तर तक गिरता जाता है।निद्रा? आलस्य और प्रमाद से प्राप्त होने वाला सुख प्रारम्भ और अन्त में मनुष्य को मोहित करने वाला होता है और ऐसा सुख तामस माना गया है।प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.39।।राजसं सुखमुक्त्वा तामसं तदुदाहरति। यत्सुखमग्रे च प्रथमे क्षणेऽनुबन्धे चावसानोत्तरकाले। चाभ्यां प्रथमक्षणादुत्तरावस्थासु अनुबन्धात्पूर्वावस्थासु चात्मनो मोहकरं निद्रालस्यप्रमादेभ्यः समुत्तिष्ठतीति निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्सुखं हेयं तामसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.39।।यदग्रे चेति। अग्रे प्रथमारम्भे चानुबन्धे परिणामे च यत्सुखमात्मनो मोहकरं निद्रालस्ये प्रसिद्धे? प्रमादः कर्तव्यार्थावधानमन्तरेण मनोराज्यमात्रं तेभ्य एवोत्तिष्ठति नतु सात्त्विकमिव बुद्धिप्रसादजं न वा राजसमिव विषयेन्द्रियसंयोगजं तन्निद्रालस्यप्रमादोत्थं तामसं सुखमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.39।।अग्रे आरम्भे अनुबन्धे परिणामे। मोहनं मोहकरम्। आत्मनो बुद्धेः। यतो निद्रादिजम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.39।।तामसमाह -- यदग्रे इति। यत् अग्रे प्रथमं च पुनः अनुबन्धे पश्चात् परिणामदशायां च निद्रालस्यप्रमादोत्थं निद्रा इन्द्रियापटुत्वेन सुखदुःखाभावात्मकानन्ददशात्मिका? आलस्यं क्रियाकरणेन शैथिल्येन स्थितिः? सुखाभिमानः प्रमादः कर्त्तव्यपूजाध्ययनकर्मानवधाने तूष्णींस्थितिरूपाज्ञानस्यानन्दभ्रमः? एतेभ्य उत्थितम्? आत्मनो जीवस्य मोहनं मोहकारकं भगवद्विस्मरणकारकं सुखं तामसं निष्फलं समुदाहृतं सम्यक्प्रकारेण उदाहृतम् ज्ञानिभिरिति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.39।।तामसं सुखमाह -- यदिति। अग्रे प्रथमक्षणेऽनुबन्धे च पश्चादपि यत्सुखमात्मनो मोहकरम्। तदेवाह। निद्रा चालस्यं च प्रमादश्च कर्तव्यार्थावधानराहित्येन मनोराज्यमेतेभ्य उत्तिष्ठति यत्सुखं तत्तामसमुदाहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.39।।यदग्रे चानुबन्धेऽनुभवान्तकाले आत्मनो मोहनं तत्तामसं? अतो मुमुक्षुणा सर्वथा रजस्तमसी अभिभूय सत्त्वमेवोपादेयमिति तत्त्वम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.39।।जो सुख आरम्भमें और परिणाममें भी अर्थात् उपभोगके पीछे भी? आत्माको मोहित करनेवाला होता है तथा निद्रा? आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ है? अर्थात् जो निद्रा? आलस्य और प्रमाद इन तीनोंसे उत्पन्न होता है? वह सुख तामस कहा गया है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.39।। व्याख्या --   निद्रालस्यप्रमादोत्थम् -- जब राग अत्यधिक बढ़ जाता है? तब वह तमोगुणका रूप धारण कर लेता है। इसीको मोह कहते हैं। इस मोह(मूढता)के कारण मनुष्यको अधिक सोना अच्छा लगता है। अधिक सोनेवाले मनुष्यको गाढ़ नींद नहीं आती। गाढ़ नींद न आनेसे तन्द्रा ज्यादा आती है और स्वप्न भी ज्यादा आते हैं। तन्द्रा और स्वप्नमें तामस मनुष्यका बहुत समय बरबाद हो जाता है। परन्तु तामस मनुष्यको इसीसे ही सुख मिलता है? इसलिये इस सुखको निद्रासे उत्पन्न बताया है।जब तमोगुण अधिक बढ़ जाता है? तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर वह आलस्यमें समय बरबाद कर देता है। आवश्यक काम सामने आनेपर वह कह देता है कि फिर कर लेंगे? अभी तो आराम कर रहे हैं। इस प्रकार आलस्यअवस्थामें उसको सुख मालूम देता है। परन्तु निकम्मा रहनेके कारण उसकी इन्द्रियों और अन्तःकरणमें शिथिलता आ जाती है? मनमें संसारका फालतू चिन्तन होता रहता है और मनमें अशान्ति? शोक? विषाद? चिन्ता? दुःख होते रहते हैं।जब इससे भी अधिक तमोगुण बढ़ जाता है? तब मनुष्य प्रमाद करने लग जाता है। वह प्रमाद दो तरहका होता है -- अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद। घर? परिवार? शरीर आदिके आवश्यक कामोंको न करना और निठल्ले बैठे रहना अक्रिय प्रमाद (टिप्पणी प0 922) है। व्यर्थ क्रियाएँ (देखना? सुनना? सोचना आदि) करना बीड़ी? सिगरेट? शराब? भाँग? तम्बाकू? खेलतमाशा आदि दुर्व्यसनोंमें लगना और चोरी? डकैती? झूठ? कपट? बेईमानी? व्यभिचार? अभक्ष्यभक्षण आदि दुराचारोंमें लगना सक्रिय प्रमाद है।प्रमादके कारण तामस पुरुषोंको निरर्थक समय बरबाद करनेमें तथा झूठ? कपट? बेईमानी आदि करनेमें सुख मिलता है। जैसे कामधंधा करनेवाले पैसे (मजदूरी या वेतन) तो पूरे ले लेते हैं? पर काम पूरा और ठीक ढंगसे नहीं करते। चिकित्सकलोग रोगियोंका ठीक ढंगसे इलाज नहीं करते? जिससे रोगीलोग बारबार आते रहें और पैसे देते रहें। दूध बेचनेवाले पैंसोंके लोभमें दूधमें पानी मिलाकर बेचते हैं। पैसे अधिक देनेपर भी वे पानी मिलाना नहीं छोड़ते। ऐसे पापरूप प्रमादसे उनको घोर नरकोंकी प्राप्ति होती है।जब तमोगुणी प्रमादवृत्ति आती है? तब वह सत्त्वगुणके विवेकज्ञानको ढक देती है और जब तमोगुणी निद्राआलस्यवृत्ति आती है? तब वह सत्त्वगुणके प्रकाशको ढक देती है। विवेकज्ञानके ढकनेपर प्रमाद होता है तथा प्रकाशके ढकनेपर आलस्य और निद्रा आती है। तामस पुरुषको निद्रा? आलस्य और प्रमाद -- तीनोंसे सुख मिलता है? इसलिये तामस सुखको इन तीनोंसे उत्पन्न बताया गया है।विशेष बातनिद्रा दो प्रकारकी होती है -- युक्तनिद्रा और अतिनिद्रा।,(1) युक्तनिद्रा -- निद्रामें एक विश्राम मिलता है। विश्रामसे शरीर? मन? बुद्धि? अन्तःकरणमें नीरोगता? स्फूर्ति? स्वच्छता? निर्मलता और ताजगी आती है। ताजगी आनेसे साधनभजन करनेमें और सांसारिक काम करनेमें भी शक्ति मिलती है और उत्साह रहता है। इसलिये युक्तनिद्रा दोषी नहीं है? प्रत्युत सबके लिये आवश्यक है। भगवान्ने भी युक्तनिद्राको आवश्यक बताया है -- युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा (गीता 6। 17)।ताजगीमात्रके लिये निद्रा साधकके लिये आवश्यक है। जिस साधकके रागपूर्वक सांसारिक संकल्प नहीं होते? उसको नींद बहुत जल्दी आ जाती है और जो ज्यादा संकल्पशील है? उसको नींद जल्दी नहीं आती। इससे यह सिद्ध हुआ कि संसारका जो सम्बन्ध है? वह निद्राका सुख भी नहीं लेने देता। निद्रा आवश्यक क्यों है कारण कि निद्रामें जो स्थिर तत्त्व है? वह साधकको साधनमें प्रवृत्त करनेमें और सांसारिक कार्य करनेमें बल देता है? इसलिये निद्रा आवश्यक है।यद्यपि नींद तामसी है? तथापि नींदका जो बेहोशीपना है? वह त्याज्य है और जो विश्रामपना है? वह ग्राह्य है। परन्तु हरेक आदमी बेहोशीके बिना विश्रामपना ग्रहण नहीं कर सकता अतः उनके लिये नींदका बेहोशीभाग भी ग्राह्य है। हाँ? जो साधना करके ऊँचे उठ गये हैं? उनको नींदके बेहोशीभागके बिना भी जाग्रत्सुषुप्तिमें विश्राम मिल जाता है। कारण कि जाग्रत्अवस्थामें संसारके चिन्तनका सर्वथा त्याग होकर परमात्मतत्त्वमें स्थिति हो जाती है तो महान् विश्राम? सुख मिलता है इस स्थितिसे भी असङ्ग होनेपर वास्तविक तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।जो साधक हैं? उनको विश्रामके लिये नहीं सोना चाहिये। उनका तो यही भाव होना चाहिये कि पहले कामधंधा करते हुए भगवान्का भजन करते थे? अब लेटेलेटे भजन करना है।(2) अतिनिद्रा -- समयपर सोना और समयपर जागना युक्तनिद्रा है और अधिक सोना अतिनिद्रा है। अतिनिद्राके आदि और अन्तमें शरीरमें आलस्य भरा रहता है। शरीरमें भारीपन रहता है। अधिक नींद लेनेका स्वभाव होनेसे हरेक कार्यमें नींद आती रहती है।चौदहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने पहले प्रमादको? दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें निद्राको रखा है -- प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत। परन्तु यहाँ पहले निद्राको? दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें प्रमादको रखा है -- निद्रालस्यप्रमादोत्थम्। इस व्यतिक्रमका कारण यह है कि वहाँ इन तीनोंके द्वारा मनुष्यको बाँधनेका प्रसङ्ग है और यहाँ मनुष्यका पतन करनेका प्रसङ्ग है। बाँधनेके विषयमें प्रमाद सबसे अधिक बन्धनकारक है अतः इसको सबसे पहले रखा है। कारण कि प्रमाद निषिद्ध आचरणोंमें प्रवृत्त करता है? जिससे अधोगति होती है। आलस्य केवल अच्छी प्रवृत्तिको रोकनेवाला होनेसे इसको दो नम्बरमें रखा है। निद्रा आवश्यक होनेसे बन्धनकारक नहीं है? प्रत्युत अतिनिद्रा ही बन्धनकारक है अतः इसको तीसरे नम्बरमें रखा है। यहाँ उससे उलटा क्रम रखनेका अभिप्राय है कि सबके लिये आवश्यक होनेसे निद्रा इतना पतन करनेवाली नहीं है। निद्रासे अधिक आलस्य पतन करता है और आलस्यसे भी अधिक प्रमाद पतन करता है। कारण कि मनुष्य ज्यादा नींद लेगा तो वृक्ष आदि मूढ़ योनियोंकी प्राप्ति होगी परन्तु आलस्य और प्रमाद करेगा तो कर्तव्यच्युत होकर दुराचार करनेसे नरकमें जाना पड़ेगा (टिप्पणी प0 923.1)।यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः -- निद्रा? आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है। इस सुखमें न तो आरम्भमें विवेक रहता है और न परिणाममें विवेक रहता है अर्थात् यह सुख विवेकको जाग्रत् नहीं होने देता। पशुपक्षी? कीटपतंग आदिमें भी विवेकशक्ति जाग्रत् न रहनेसे वे क्रियाके आरम्भ और परिणामको सोच नहीं पाते। ऐसे ही जिस सुखके कारण मनुष्य यह सोच ही नहीं सकता कि इस निद्रा आदिसे उत्पन्न हुए सुखका परिणाम हमारे लिये क्या होगा उससे क्या लाभ होगा क्या हानि होगी क्या हित होगा क्या अहित होगा उस सुखको तामस कहा गया है -- ,तत्तामसमुदाहृतम्।विशेष बात(1) प्रकृति और पुरुष -- दोनों अनादि हैं? और ये दो हैं इस प्रकार इनकी पृथक्ताका विवेक भी अनादि है। यह विवेक पुरुषमें ही रहता है? प्रकृतिमें नहीं। जब यह पुरुष इस विवेकका अनादर करके अविवेकके कारण प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब इस सम्बन्धके कारण पुरुषमें राग पैदा हो जाता है (टिप्पणी प0 923.2)।जब राग बहुत सूक्ष्म रहता है? तब विवेक प्रबल रहता है। जब राग बढ़ जाता है? तब विवेक दब जाता है? मिटता नहीं। पर विवेक ठीक तरहसे जाग्रत् हो जाय तो फिर राग टिकता नहीं अर्थात् रागका अभाव हो जाता है और उस समय पुरुष मुक्त कहलाता है।उस रागके कारण मनुष्यकी प्रकृतिजन्य सुखमें आसक्ति हो जाती है। उस आसक्तिके रहते हुए जब मनुष्य किसी कारणवश सात्त्विक सुखको प्राप्त करना चाहता है? तब राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें उसे कठिनता मालूम देती है -- यत्तदग्रे विषमिव। परन्तु जब राग मिट जाता है? तब वह सुख अमृतकी तरह हो जाता है -- परिणामेऽमृतोऽपमम्।रागके कारण ही रजोगुणी सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है। पर वह सुख परिणाममें प्राणीके लिये जहरकी तरह अनिष्टकारक अर्थात् महान् दुःखरूप हो जाता है। प्रकृतिजन्य सुखकी आसक्ति होनेपर दुःखी परम्पराका कोई अन्त नहीं आता।जब वही राग तमोगुणका रूप धारण कर लेता है? तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर मनुष्य नींद और आलस्यमें समय बरबाद कर देता है तथा आवश्यक कर्तव्यसे विमुख होकर अकर्तव्यमें लग जाता है। परन्तु तामस पुरुषको इन्हींमें सुख मालूम देता है। इसलिये यह तामस सुख आदि और अन्तमें मोहित करनेवाला है।(2) जो प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है? वह वास्तवमें नहीं है। पर जो नहीं को प्रकाशित करनेवाला तथा उसका आधार है? वह वास्तवमें है तत्त्व है। उसी तत्त्वको सच्चिदानन्द कहते हैं। निरन्तर सत्तारूपसे रहनेके कारण उसे सत् कहते हैं? ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे चित् कहते हैं और आनन्दस्वरूप होनेके कारण उसे आनन्द कहते हैं। उस सच्चिदानन्द परमात्माका ही अंश होनेसे यह प्राणी भी सच्चिदानन्दस्वरूप है। परन्तु जब प्राणी असत् वस्तुकी इच्छा करता है कि अमुक वस्तु मुझे मिले? तब उस इच्छासे स्वतःस्वाभाविक आनन्द -- सुख ढक जाता है। जब असत् वस्तुकी इच्छा मिट जाती है? तब उस इच्छाके मिटते ही वह स्वतःस्वाभाविक सुख प्रकट हो जाता है।नित्यनिरन्तर रहनेवाला जो सुखरूप तत्त्व है? उसमें जब सात्त्विकी बुद्धि तल्लीन हो जाती है? तब बुद्धिमें स्वच्छता? निर्मलता आ जाती है। उस स्वच्छ और निर्मल बुद्धिसे अनुभवमें आनेवाला यह स्वाभाविक सुख ही सात्त्विक कहलाता है। बुद्धिसे भी जब सम्बन्ध छूट जाता है? तब वास्तविक सुख रह जाता है। सात्त्विकी बुद्धिके सम्बन्धसे ही उस सुखकी सात्त्विक संज्ञा होती है। बुद्धिसे सम्बन्ध छूटते ही उसकी सात्त्विक संज्ञा नहीं रहती।मनमें जब किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा होती है? तब वह वस्तु मनमें बस जाती है अर्थात् मन और बुद्धिका उसके साथ सम्बन्ध हो जाता है। जब वह मनोवाञ्छित वस्तु मिल जाती है? तब वह वस्तु मनसे,निकल जाती है अर्थात् वस्तुका मनमें जो खिंचाव था? वह निकल जाता है। उसके निकलते ही अर्थात् वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद होते ही वस्तुके अभावका जो दुःख था? वह निवृत्त हो जाता है और नित्य रहनेवाले स्वतःसिद्ध सुखका तात्कालिक अनुभव हो जाता है। वास्तवमें यह सुख वस्तुके मिलनेसे नहीं हुआ है? प्रत्युत रागके तात्कालिक मिटनेसे हुआ है? पर राजस पुरुष भूलसे उस सुखको वस्तुके मिलनेसे होनेवाला मान लेता है। वास्तवमें देखा जाय तो वस्तुका संयोग बाहरसे होता है और प्रसन्नता भीतरसे होती है। भीतरसे जो प्रसन्नता होती है? वह बाहरके संयोगसे पैदा नहीं होती? प्रत्युत भीतर (मनमें) बसी हुई वस्तुके साथ जो सम्बन्ध था? उस वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर पैदा होती है। तात्पर्य यह है कि वस्तुके मिलते ही अर्थात् बाहरसे वस्तुका संयोग होते ही भीतरसे उस वस्तुसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और सम्बन्धविच्छेद होते ही नित्य रहनेवाले स्वाभाविक सुखका आभास हो जाता है।जब नींदमें बुद्धि तमोगुणमें लीन हो जाती है? तब बुद्धिकी स्थिरताको लेकर वह सुख प्रकट हो जाता है। कारण कि तमोगुणके प्रभावसे नींदमें जाग्रत् और स्वप्नके पदार्थोंकी विस्मृति हो जाती है। पदार्थोंकी स्मृति दुःखोंका कारण है। पदार्थोंकी विस्मृति होनेसे निद्रावस्थामें पदार्थोंका वियोग हो जाता है तो उस वियोगके कारण स्वाभाविक सुखका आभास होता है? इसीको निद्राका सुख कहते हैं। परन्तु बुद्धिकी मलिनतासे वह स्वाभाविक सुख जैसा है? वैसा अनुभवमें नहीं आता। तात्पर्य है कि बुद्धिके तमोगुणी होनेसे बुद्धिमें स्वच्छता नहीं रहती और स्वच्छता न रहनेसे वह सुख स्पष्ट अनुभवमें नहीं आता। इसलिये निद्राके सुखको तामस कहा गया है (टिप्पणी प0 924)।इन सबका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक मनुष्यको संसारसे विमुख होकर तत्त्वमें बुद्धिके तल्लीन होनेसे सुख होता है राजस मनुष्यको रागके कारण अन्तःकरणमें बसी हुई वस्तुके बाहर निकलनेसे सुख होता है और तामस मनुष्यको वस्तुओंके लिये किये जानेवाले कर्तव्यकर्मोंकी विस्मृतिसे और निरर्थक क्रियाओंमें लगनेसे सुख होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो नित्यनिरन्तर रहनेवाला सुखरूप तत्त्व है? वह असत्के सम्बन्धसे आच्छादित रहता है। विवेकपूर्वक असत्से सम्बन्धविच्छेद हो जानेपर? रागवाली वस्तुओंके मनसे निकल जानेपर और बुद्धिके तमोगुणमें लीन हो जानेपर जो सुख होता है? वह उसी सुखका आभास है। तात्पर्य यह हुआ कि संसारसे विवेकपूर्वक विमुख होनेपर सात्त्विक सुख? भीतरसे वस्तुओंके निकलनेपर राजस सुख और मूढ़तासे निद्राआलस्यमें संसारको भूलनेपर तामस सुख होता है परन्तु वास्तविक सुख तो प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेदसे ही होता है। इन सुखोंमें जो प्रियता? आकर्षण और (सुखका) भोग है? वही पारमार्थिक उन्नतिमें बाधा देनेवाला और पतन करनेवाला है। इसलिये पारमार्थिक उन्नति चाहनेवाले साधकोंको इन तीनों सुखोंसे सम्बन्धविच्छेद करना अत्यन्त आवश्यक है। सम्बन्ध --   बीसवेंसे उन्तालीसवें श्लोकतक भगवान्ने गुणोंकी मुख्यताको लेकर ज्ञान? कर्म आदिके तीनतीन भेद बताये। अब इनके सिवाय गुणोंको लेकर सृष्टिकी सम्पूर्ण वस्तुओंके भी तीनतीन भेद होते हैं -- इसका लक्ष्य कराते हुए भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकरणका उपसंहार करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.39।।तामसं सुखं त्यागार्थमेवोदाहरति -- यदग्रे चेति। अनुबन्धशब्दार्थमाह -- अवसानेति। मोहनं मोहकरम्। तदुत्पत्तिहेतुमाह -- निद्रेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.39।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.39।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.39।। --,यत् अग्रे च अनुबन्धे च अवसानोत्तरकाले च सुखं मोहनं मोहकरम् आत्मनः निद्रालस्यप्रमादोत्थं निद्रा च आलस्यं च प्रमादश्च तेभ्यः समुत्तिष्ठतीति निद्रालस्यप्रमादोत्थम्? तत् तामसम् उदाहृतम्।।अथ इदानीं प्रकरणोपसंहारार्थः श्लोकः आरभ्यते --,

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【 Verse 18.40 】

▸ Sanskrit Sloka: न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन: | सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै: ||

▸ Transliteration: na tad asti pṛthivyāṁ vā divi deveṣu vā punaḥ | sattvaṁ prakṛti-jair-muktaṁ yad ebhiḥ syāt tribhirguṇaiḥ ||

▸ Glossary: na: not; tad: that; asti: there is; pṛthivyāṁ: within the universe; vā: or; divi: in the higher planetary system; deveṣu: amongst the demigods; vā: or; punaḥ: again; sattvaṁ: existence; prakṛtijaiḥ: under the influence of material nature; muktaṁ: liberated; yat: that; ebhiḥ: by this; syāt: so becomes; tribhiḥ: by three; guṇaiḥ : modes of material nature

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.40 No one, either here or among the celestials in the higher planetary systems, is free from these three states of material nature.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.40।।पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है? जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.40।। पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग के देवताओं में ऐसा कोई प्राणी (सत्त्वं अर्थात् विद्यमान वस्तु) नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त (रहित) हो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.40 न not? तत् that? अस्ति is? पृथिव्याम् on the earth? वा or? दिवि in heaven? देवेषु among the gods? वा or? पुनः again? सत्त्वम् being? प्रकृतिजैः born of Prakriti (matter)? मुक्तम् freed? यत् which? एभिः from these? स्यात् may be? त्रिभिः from three? गुणैः by alities.Commentary The Gunas form the warp and woof of everything as threads do in the case of cloth.Here in the world of mortals or there in the heavenworld? there is no creature that is not bound by the three alities of Nature. Can there be a cloth without threads Can there be a man without blood and bones Can there be a mountain without stones Even so there is not a single creature in the whole universe into whose composition the three alities of matter do not enter. The whole of creation is wrought of these three alities. They have given rise to the Trinity (Brahma? Vishnu and Siva). In the world of mortals the triplicity of agent? action and fruit owe their origin to them. They are the cause of the different functions of the four castes. This Samsara has been compared to the peepul tree in chapter XV.1. This Samsara is made up of the three alities and is kept up by the force of ignorance.Action? instruments of action and fruits have set the wheel of Samsara in motion and this wheel is revolving from beginningless time. It is only a liberated sage who has attained knowledge of the Self who puts a check to this wheel? goes beyond the cause and the effect? and breaks the bonds of Karma.Cut this mysterious tree of Samsara with the strong sword of nonattachment? transcend the three Gunas and rest in your own essential divine nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.40. Whether on the earth, or again among the gods in the heaven, there exists not a single being, which is free from these three Strands, born of the Material-Nature.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.40 There is nothing anywhere on earth or in the higher worlds which is free from the three Qualities - for they are born of Nature.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.40 There is no creature, either on earth or again among the gods in heaven, that is free from these three Gunas born of Prakrti.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.40 There is no such entity in the world or, again, among the gods in heaven, which can be free from these three gunas born of Nature.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.40 There is no being on earth or again in heaven among the gods, that is liberated from the three alities born of Nature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.40 Na tad asti etc. In this manner, the agent, the object and the instrument, the intellect and content, and happiness are classified under different heads of the Sattva etc. Because they have a mutual relationship of subordinate-and-principal or of the oppressed-and-opressor or of the togetherness; becuase they have modifications occuring either together or in a specific seence; and because they, on that account, have varieties beyond all counting; they are capable of bringing forth fruits (results) of umpteen variety. This (statement) logically demonstrates in detail the uncomprehensibility of actions (their results) which has been indicated earlier (above IV, 17ff.). All these beings, starting from the gods down to the immovables, do not transcend the relation with the traid of the Strands. Indeed it has been said -

'Commencing from Brahma (personal god) down to the [insignificant] worm, no one is really happy; all, without exception, having desire to live, undertake different acts of agitation (or commit different frauds to appear to be happy).'

Indeed the real happiness is [only] to him whose mind has gone beyond the Strands and not to anyone else. This is what is intended here. So far, the three-fold nature of each of the six items and also of the content etc., has been explained. 'Among them, he who is occupied with the group of the Sattva (Strand) and who has attained the divine wealth is fit for the subject under study; and you are of that sort' - telling in this manner, Arjuna has been encouraged.

Now the following is declared : If you engage yourself in the action with this reslove for correct knowledge, then because of your undertaking of your own righteous action and because of your sanctity through wisdom, there is no bondage of aciton for you. On the other hand, if you don't follow this, [even] then there must necessarily be some activity in you; because your birth itself stands to that effect. Since, being controlled by its own intrinsic nature, everything, though it may have, for a short while, its nature concealed due to some fault, regains its own nature that becomes perceivable when the concealing agent disappears. For example, the nature of the castes is of this nature. Thus when an effort necessarily takes place, there would be [for its agent] its fruit. This [the Bhagavat] says-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.40 There is no Sattva or creature born either among men etc., on the earth or among the gods in heaven, from Brahma down to immobile things, and having their basis in Prakrti, that is free from the dominance of the three Gunas of Prakrti.

'Tyaga', which has been determined as forming the means for release in the Sruti texts like 'By Tyaga alone do they attain immortality' (Ma. Na., 8.14), is of the same meaning as of the word 'Sannyasa'. It is rooted in the relinishment of the sense of agency in actions that are being performed.

The relinishment of the results and of possessiveness in actions, and the relinguishing of agency are to be gained by ascribing the agency to the Supreme Person. As all these are the effects of the increase of Sattva-guna, the differences of the effects of Sattva, Rajas and Tamas have been described at length with a view to instruct that Sattva is to be cultivated.

Now Sri Krsna, with a view to inculcate that actions done including their fruits, as a means to release and attainment of Him, must be of the nature of the worship of the Supreme Person, and that the fruit thereof is the attainment of Him - describes the actions obligatory for the alified classes of the people such as Brahmanas, differentiated by virtue of the natural alities arising from the Gunas such as Sattva, as also the occupations prescribed for those classes.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.40 Na asti, there is no; tat, such; sattvam, entity, living creatures like men and others, or non-living things; prthivyam, in the world; va punah, or, again; an entity devesu, among the gods; divi, in heaven; yat, which; syat, can be [-this is connected with the preceding portion 'na tat, there is no such (entity)'-]; muktam, free; hih, from these; trubhih, three; gunaih, gunas, sattva etc.; prakrti-jaih, born of Nature. It has been said that the entire transmigratory state together with its roots, characterized by action, agent and resuls-consisting of the gunas, sattva, rajas and tamas-, and projected by ignorance, is an evil. And this also has been said through the imagery of the Tree in the verse, '৷৷.which has its roots upward' etc. (15.1). It has been further said that, 'after felling that (Tree), with the strong sword of detachment, thereafter, that State has to be sought for' (15.3-4). And, as to that, since all things consist of the three gunas, there arises the impossibility of the eradication of the cause of worldly existence. Hence, it has to be shown how it can be eradicated. Besides, the purport of the scripture Gita has to be summed up, and it has also to be shown that the import of all the Vedas and the Smrtis, which must be put into practice by those who long for the Goal of human life, is verily this much. Hence begin the verses, 'The duties of the Brahmanas, the Ksatriyas and the Vaisyas৷৷.', etc.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.40।। उपर्युक्त श्लोक के साथ सभी प्राणियों पर? और विशेष रूप से मनुष्य के व्यक्तित्व पर? पड़ने वाले तीन गुणों के प्रभाव का विवेचन समाप्त होता है। इस सम्पूर्ण प्रकरण में विभिन्न मनुष्यों के विभिन्न व्यक्तित्व और उनके व्यवहार की विविधता का भी मनोवैज्ञानिक स्पष्टीकरण दिया गया है। ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि और धृति के विस्तृत विश्लेशण के द्वारा मनुष्यों का वर्णन किया गया है।इस प्रकरण में एक मात्र प्रयोजन हमारा मार्गदर्शन करना है। इसके अध्ययन के द्वारा हम अपनी स्थिति? अपने आन्तरिक तथा बाह्य व्यवहार को भलीभांति जान सकते हैं।यदि हम अपने को राजस या तामस की श्रेणी में पाते हैं तो हम आत्म विकास के साधकों को तत्काल सजग होकर सत्त्वगुण में निष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। स्मरण रहे? और मैं पुन दोहराता हूँ कि हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि पूर्वोक्त समस्त वर्गीकरण परपरीक्षण के लिए न होकर आत्मनिरीक्षण तथा आत्मानुशासन के लिए हैं।इन तीन गुणों के वर्णन का कारण यह है कि सम्पूर्ण विश्व पृथ्वी और स्वर्ग में

Chapter 18 (Part 21)

कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है? जो प्रकृति के इन त्रिगुणों से रहित हो। स्वयं प्रकृति ही त्रिगुणात्मिका है। इसलिए? उससे उत्पन्न हुए समस्त प्राणी भी उसके गुणों से युक्त हैं। कोई भी व्यक्ति त्रिगुणों की सीमा का उल्लंघन करके जगत् में कार्य नहीं कर सकता।परन्तु? कोई भी दो प्राणी बाह्य जगत् में समान रूप से व्यवहार नहीं करते हैं। इसका कारण है दोनों में इन तीन गुणों के अनुपात की भिन्नता। इस त्रिगुणात्मिका प्रकृति को ही वेदान्त में माया कहते हैं? जो प्रत्येक जीव को विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करती है और जिसके वश में सभी जीव रहते हैं।चाय के प्रत्येक प्याले में तीन संघटक तत्त्व होते हैं चाय का अर्क? दूध और चीनी? परन्तु प्याले में इन तीनों के मिश्रण का भिन्नभिन्न अनुपात होने पर उन प्यालों के चाय के स्वाद में भी विविधता होगी। जो पुरुष त्रिगुणातीत आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है? केवल वही पुरुष सर्वाधिष्ठान एक परमात्मा को पहचान सकता है। वही पुरुष इस नामरूपमय सृष्टि को परमात्मा की लीला के रूप में देख सकता है। इसलिए? प्रतिदिन? प्रतिक्षण हम आत्मनिरीक्षण करके अपनी स्थिति को जानने का प्रयत्न करें। राजसी व तामसी स्थिति से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में स्थित होने का हमको प्रयत्न करना चाहिए। शुद्ध सत्त्वगुण में निष्ठा प्राप्त होने पर ही हम सत्त्वातीत आत्मा का अनुभव प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं।इन तीन गुणों के आधार पर ही भगवान् श्रीकृष्ण ने सभी मनुष्यों का सात्त्विक? राजसिक और तामसिक तीन विभागों में वर्गीकरण किया है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में गुण प्राधान्य के आधार पर मनुष्यों का चतुर्विध विभाजन किया गया है जो चातुर्र्वण्य के नाम से प्रसिद्ध है। यह वर्गीकरण मानव मात्र का होने के कारण उसकी प्रयोज्यता सार्वभौमिक है? न कि केवल भारतवर्ष तक ही सीमित है। यह चतुर्विध विभाजन केवल अनुवांशिक गुण अथवा जन्म के संयोग के आधार पर न होकर प्रत्येक व्यक्ति के अपने विशिष्ट गुणों के अनुसार है। निम्न तालिका से यह विभाजन स्पष्ट हो जायेगा उपर्युक्त विभाजन सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है। अर्वाचीन भाषा में इन चार वर्णों का नामकरण इस प्रकार किया जा सकता है (1) रचनात्मक विचार करने वाले चिन्तक? (2) राजनीतिज्ञ? (3) व्यापारी वर्ग? और (4) श्रमिक वर्ग। इसमें एक बात स्पष्ट देखी जा सकती है कि किस प्रकार वेतनभोगी श्रमिक अपने नियोक्ता स्वामी (व्यापारी) से भयभीत होता है? व्यापारी वर्ग राजनीतिज्ञों से आशंकित रहता है और राजनीतिज्ञ लोग? साहसी और स्वतन्त्र विचार करने वाले चिन्तकों से भयकम्पित होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन की शिखर वार्ता के सन्दर्भ में चातुर्र्वण्य का वर्णन करने का अपना प्रयोजन है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते हैं कि वह क्षत्रिय वर्ण का है और? इसलिए? धर्मयुद्ध से पलायन करना उसे शोभा नहीं देता। उसका कर्तव्य धर्म पालन एवं धर्म रक्षण करना है। ब्राह्मणों के स्वभाव अर्थात् सत्त्वाधिक्य को प्राप्त किये बिना वह सफलतापूर्वक ध्यानाभ्यास नहीं कर सकता। अत? अर्जुन के लिए वासनाक्षय का एक मात्र साधन रह जाता है क्षत्रिय धर्म का पालन करना।अगले श्लोकों में वर्णाश्रम धर्म का विस्तृत विवेचन किया गया है। स्वभाव से प्राप्त धर्म तथा आश्रम अर्थात् जीवन की स्थिति (ब्रह्मचर्य? गृहस्थ? वानप्रस्थ? संन्यास) के अनुकूल कर्तव्यों का यहाँ वर्णन करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.40।।क्रियाकारकफलानां प्रत्येकं सात्त्विकादिभेदेन त्रैविध्यमुक्त्वा किंचिदेभिस्त्रिभिर्गुणैर्मुक्तमपि भविष्यतीत्याकाङ्क्षानुपपत्तयेऽनुक्तमपि संगृह्णन्प्रकरणार्थमुपसंहरति। न तदस्ति पृथिव्यां वा मनुष्यादिसत्त्वं प्राणिजातमन्यद्वाऽप्राणिजातं स्थावरादि दिवि देवेषु वा पुनः प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैः एभिस्त्रिभिर्गुणैः सत्त्वादिभिः मुक्तं,परित्यक्तं यत्स्यात्तन्नास्तीत्यर्थः। अदिवीति परलोकत्वसादृश्यादब्राह्मण इतिवत्। पातालादिपरमितीतरे। आचार्यैस्तु तृतीयवाशब्दाभावात्पृथिवीविवरात्मकस्य पातालस्यापि पृथिवीशब्देन संग्रहसंभवात्प्रत्योजनशून्यक्लिष्टकल्पनाया अयुक्तत्वाच्चैवं न व्याख्यातम्। तथाच क्रियाकारकफललक्षणः सर्वोऽपि संसारः सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकोऽविद्यापरिकल्पितः समूलोऽनर्थः आत्मज्ञानेनाविद्यानिवृत्त्या इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.40।।इदानीमनुक्तमपि संगृह्णन्प्रकरणार्थमुपसंहरति भगवान् -- न तदस्तीति। सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिस्ततो जातैर्वैषम्यावस्थां प्राप्तैः प्रकृतिजैर्नतु साक्षाद्गुणानां प्रकृतिजत्वमस्ति तद्रूपत्वात्तस्माद्वैषम्यावस्थैव तदुत्पत्तिरुपचारात्। अथवा प्रकृतिर्माया तत्प्रभवैस्तत्कल्पितैः प्रकृतिजैरेभिस्त्रिभिर्गुणैर्बन्धनहेतुभिः सत्त्वादिभिर्मुक्तं हीनं सत्त्वं प्राणिजातमप्राणि वा यत्स्यात् तत्पुनः पृथिव्यां मनुष्यादिषु दिवि देवेषु वा नास्ति। क्वापि गुणत्रयरहितमनात्मवस्तु नास्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.40।।प्रकरणार्थमुपसंहरत्यनुक्तमपि संगृह्णन् -- न तदस्तीति। सत्त्वं प्राणिजातम्। इदमुपलक्षणं जडस्यापि। सर्वस्य त्रिगुणविकारत्वात्। प्रकृतिजैर्जन्मान्तरीयधर्माधर्मसंस्कारजैः मायाप्रभवैर्वा। शेषं स्पष्टम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.40।।एवं यज्ञादीनां सर्वेषां त्रिविधरूपमुक्त्वाऽप्यथ स्वसम्बन्धातिरिक्तस्य त्रिगुणात्मकतां सर्वस्याऽऽह -- न तदस्तीति। एभिः प्रकृतिजैः प्रकृत्युद्भवैस्त्रिभिः सात्त्विकादिभिर्गुणैर्मुक्तं रहितं सत्त्वं प्राणिजातं यत्स्थावरादिकमन्यद्वा पृथिव्यां मनुष्येषु? वाशब्देन नागादिलोकेषु च दिवि देवलोके वा पुनः देवेषु स्यात् तत्,नास्तीत्यर्थः। सात्त्विकादिष्वपि त्रैविध्यमस्तीतिवा पुनः इत्यनेन केवलसात्त्विकत्वाद्देवेष्वसम्भावितत्वादस्त्येवेति निर्धारितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.40।।अनुक्तमपि संगृह्णन्प्रकरणार्थमुपसंहरति -- न तदस्तीति। एभिः प्रकृतिसंभवैः सत्त्वादिभिस्त्रिभिर्गुणैर्मुक्तं हीनं सत्त्वं प्राणिजातमन्यद्वा यत्स्यात्तत्पृथिव्यां मनुष्यलोकादिषु दिवि देवेषु च क्वापि नास्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.40।।किमन्यद्वाच्यं प्राणिषु सर्वं प्राकृतत्रिगुणमयमेवेत्याह -- न तदस्तीति। दिवि ब्रह्मलोकपर्यन्तं दिव्येषु प्राकृतैर्गुणैर्मुक्तं सत्त्वं किमपि नास्ति? पृथिव्यां च तथा न देवेष्वधस्तादादिषु पृथिव्यामवतीर्य द्योतमानमहिमस्वपि च तथा न किन्तु क्रियया सगुणत्वमस्त्येवेति पृथग्वा बोध्यम्। (यतोऽप्राकृतमपि भागवतं गुणत्रयमस्ति प्राकृतगुणकार्यनाशकं मन्तव्यं अन्यथा प्रकृतिजैर्गुणैर्मुक्तं सत्वं पृथिव्यादिषु नास्तीति न वदेत्? तस्यैवाप्रसिद्धत्वात् गुणावताराश्च भगवतोऽप्राकृता न भवेयुः स तस्य सत्त्वसम्बन्धः कथं भवेद्भेदाभावे अतस्त्रयो गुणा ब्रह्मविष्णुशिवेष्वेव प्रतिष्ठिताः? अत्र सच्चिदानन्दधर्मत्वात् क्वचिद्विष्णोः सत्त्वमाधारत्वेनादत्ते यदि न केवलोऽवतरतीति) अतएव भगवतो लीला लोकवत्सगुणापि निरूपिताभूगोगोप्यादीनां चापि इति सुबोधिन्यां स्थितम्। वस्तुतस्तुलोकवत्तु लीलाकैवल्यं [ब्र.सू.2।1।33] इति व्यासेन सूत्रितमेवं चानुकरणे तथा स्वरूपतो गुणातीतत्वमित्यवसेयम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.40।।इसके उपरान्त अब प्रकरणका उपसंहार करनेवाला श्लोक कहा जाता है --, ऐसा कोई सत्त्व? अर्थात् मनुष्यादि प्राणी या अन्य कोई भी प्राणरहित वस्तुमात्र? पृथिवीमें? स्वर्गमें अथवा देवताओंमें भी नहीं है? जो कि इन प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्वादि तीनों गुणोंसे मुक्त अर्थात् रहित हो। ऐसा कोई नहीं है इस पूर्वके पदसे इस वाक्यका सम्बन्ध है। क्रिया? कारक और फल ही जिसका स्वरूप है? ऐसा यह सारा संसार सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंका ही विस्तार है? अविद्यासे कल्पित है और अनर्थरूप है? ( पंद्रहवें अध्यायमें ) वृक्षरूपकी कल्पना करके ऊर्ध्वमूलम् इत्यादि वाक्योंद्वारा मूलसहित इसका वर्णन किया गया है। तथा यह भी कहा है कि उसको दृढ़ असङ्गशस्त्रद्वारा छेदन करके उसके पश्चात् उस परम पदको खोजना चाहिये। उसमें यह शङका होती है कि तब तो सब कुछ तीनों गुणोंका ही कार्य होनेसे संसारके कारणकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिये जिस उपायसे उसकी निवृत्ति हो? वह बतलाना चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.40।। व्याख्या --   [इस अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहा तो भगवान्ने पहले त्याग -- कर्मयोगका वर्णन किया। उस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान्ने कहा कि जो त्यागी नहीं हैं? उनको अनिष्ट? इष्ट और मिश्र -- यह तीन प्रकारका कर्मोंका फल मिलता है और जो संन्यासी हैं? उनको कभी नहीं मिलता। ऐसा कहकर तेरहवें श्लोकसे संन्यास -- सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करके पहले कर्मोंके होनेमें अधिष्ठानादि पाँच हेतु बताये। सोलहवेंसत्रहवें श्लोकोंमें कर्तृत्व माननेवालोंकी निन्दा और कर्तृत्वका त्याग करनेवालोंकी प्रशंसा की। अठारहवें श्लोकमें कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रहका वर्णन किया। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है? वह न कर्मप्रेरक है और न कर्मसंग्राहक। कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रह तो प्रकृतिके गुणोंके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही होते हैं। फिर गुणोंके अनुसार ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुखके तीनतीन भेदोंका वर्णन किया। सुखका वर्णन करते हुए यह बताया कि प्रकृतिके साथ यत्किञ्चित् सम्बन्ध रखते हुए ऊँचासेऊँचा जो सुख होता है? वह सात्त्विक होता है। परंतु जो स्वरूपका वास्तविक सुख है? वह गुणातीत है? विलक्षण है? अलौकिक है (गीता 6। 21)।सात्त्विक सुखको आत्मबुद्धिप्रसादजम् कहकर भगवान्ने उसको जन्य (उत्पन्न होनेवाला) बताया। जन्य वस्तु नित्य नहीं होती। इसलिये उसको जन्य बतानेका तात्पर्य है कि उस जन्य सुखसे भी ऊपर उठना है अर्थात् प्रकृति और प्रकृतिके तीनों गुणोंसे रहित होकर उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है? जो कि सबका अपना स्वाभाविक स्वरूप है। इसलिये कहते हैं -- ]न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः -- यहाँ पृथिव्याम् पदसे मृत्युलोक और पृथ्वीके नीचेके अतल? वितल आदि सभी लोकोंका? दिवि पदसे स्वर्ग आदि लोकोंका? देवेषु पदको प्राणिमात्रके उपलक्षणके रूपमें उनउन स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्य? देवता? असुर? राक्षस? नाग? पशु? पक्षी? कीट? पतंग? वृक्ष आदि सभी चरअचर प्राणियोंका? और वा पुनः पदोंसे अनन्त ब्रह्माण्डोंका संकेत किया गया है। तात्पर्य यह हुआ कि त्रिलोकी और अनन्त ब्रह्माण्ड तथा उनमें रहनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है? जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो अर्थात् सबकेसब त्रिगुणात्मक हैं -- सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्ित्रभिर्गुणैः।प्रकृति और प्रकृतिका कार्य -- यह सबकासब ही त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील है। इनसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही बन्धन होता है और इनसे सम्बन्धविच्छेद करनेसे ही मुक्ति होती है क्योंकि स्वरूप असङ्ग है। स्वरूप स्व है और प्रकृति पर है। प्रकृतिसे सम्बन्ध जुड़ते ही अहंकार पैदा हो जाता है? जो कि पराधीनताको पैदा करनेवाला है। यह एक विचित्र बात है कि अहंकारमें स्वाधीनता मालूम देती है? पर है वास्तवमें पराधीनता कारण कि अहंकारसे प्रकृतिजन्य पदार्थोंमें आसक्ति? कामना आदि पैदा हो जाती है? जिससे पराधीनतामें भी स्वाधीनता दीखने लग जाती है। इसलिये प्रकृतिजन्य गुणोंसे रहित होना आवश्यक है।प्रकृतिजन्य गुणोंमें रजोगुण और तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुण बढ़ानेकी आवश्यकता है। सत्त्वगुणमें भी प्रसन्नता और विवेक तो आवश्यक है परन्तु सात्त्विक सुख और ज्ञानकी आसक्ति नहीं होनी चाहिये क्योंकि सुख और ज्ञानकी आसक्ति बाँधनेवाली है। इसलिये इनकी आसक्तिका त्याग करके सत्त्वगुणसे ऊँचा उठे। इससे ऊँचा उठनेके लिये ही यहाँ गुणोंका प्रकरण आया है।साधकको तो सात्त्विक ज्ञान? कर्म? कर्ता? बुद्धि? धृति और सुख -- इनपर ध्यान देकर इनके अनुरूप अपना जीवन बनाना चाहिये और सावधानीसे राजसतामसका त्याग करना चाहिये। इनका त्याग करनेमें सावधानी ही साधन है। सावधानीसे सब साधन स्वतः प्रकट होते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद करनेमें सात्त्विकता बहुत आवश्यक है। कारण कि इसमें प्रकाश अर्थात् विवेक जाग्रत् रहता है? जिससे प्रकृतिसे मुक्त होनेमें बड़ी सहायता मिलती है। वास्तवमें तो इससे भी असङ्ग होना है। सम्बन्ध --   त्यागके प्रकरणमें भगवान्ने यह बताया कि नियत कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है। उनका मूढ़तापूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है शारीरिक क्लेशके भयसे नियत कर्मोंका त्याग करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है और फल एवं आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है (18। 7 -- 9)। सांख्ययोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताते हुए जहाँ सात्त्विक कर्मका वर्णन हुआ है? वहाँ नियत कर्मको कर्तृत्वाभिमानसे रहित? रागद्वेषसे रहित और फलेच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा किये जानेका उल्लेख किया है (18। 23)। उन कर्मोंमें किस वर्णके लिये कौनसे कर्म नियत कर्म हैं और उन नियत कर्मोंको कैसे किया जाय -- इसको बतानेके लिये और साथ ही भक्तियोगकी बात बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.40।।क्रियाकारकफलात्मनः संसारस्य प्रत्येकं सात्त्विकादिभेदेन त्रैविध्यमुक्त्वा संसारान्तर्भूतमेव किंचिद्गुणत्रयास्पृष्टमपि क्वचिद्भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- अथेति। संसारस्य सर्वस्यैव गुणत्रयसंस्पृष्टत्वं प्रकरणम्? अन्यद्वाऽप्राणीत्यत्राप्राणिशब्देन प्रसिद्ध्या स्थावरादि गृह्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.40।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.40।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.40।। --,न तत् अस्ति तत् नास्ति पृथिव्यां वा मनुष्यादिषु सत्त्वं प्राणिजातम् अन्यद्वा अप्राणि? दिवि देवेषु वा पुनः सत्त्वम्? प्रकृतिजैः प्रकृतितः जातैः एभिः त्रिभिः गुणैः सत्त्वादिभिः मुक्तं परित्यक्तं यत् स्यात्? न तत् अस्ति इति पूर्वेण संबन्धः।।सर्वः संसारः क्रियाकारकफललक्षणः सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकः अविद्यापरिकल्पितः समूलः अनर्थः उक्तः? वृक्षरूपकल्पनया च ऊर्ध्वमूलम् (गीता 15।1) इत्यादिना? तं च असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा (गीता 15।3) ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम् (गीता 15।4) इति च उक्तम्। तत्र च सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वात् संसारकारणनिवृत्त्यनुपपत्तौ प्राप्तायाम्? यथा तन्निवृत्तिः स्यात् तथा वक्तव्यम्? सर्वश्च गीताशास्त्रार्थः उपसंहर्तव्यः? एतावानेव च सर्ववेदस्मृत्यर्थः पुरुषार्थम् इच्छद्भिः अनुष्ठेयः इत्येवमर्थम् ब्राह्मणक्षत्रियविशाम् इत्यादिः आरभ्यते --,

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【 Verse 18.41 】

▸ Sanskrit Sloka: ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप | कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: ||

▸ Transliteration: brāhmaṇa-kṣatriya-viśāṁ śūdrāṇāṁ ca parantapa | karmāṇi pravibhaktāni svabhāva-prabhavair-guṇaiḥ ||

▸ Glossary: brāhmaṇa: the brāhmaṇas; kṣatriya: the kṣatriyas; visāṁ: the vaiśyas; śūdrāṇāṁ: the śūdras; ca: and; parantapa: O subduer of the enemies; karmāṇi: activities; pravibhaktāni: are divided; svabhāva: own nature; prabhavaiḥ: born of; guṇaiḥ: by the modes of material nature

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.41 Brāhmaṇas, kṣatriyas, vaiśyas and śūdras are divided in the work they do based on their nature, Parantapa (Arjuna).

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.41।।हे परंतप ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.41।। हे परन्तप ब्राह्मणों? क्षत्रियों? वैश्यों और शूद्रों के कर्म? स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त किये गये हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.41 ब्राह्मणक्षत्रियविशाम् of Brahmanas? Kshatriyas and Vaisyas? शूद्राणाम् of Sudras? च as also? परंतप O Parantapa? कर्माणि duties? प्रविभक्तानि are distributed? स्वभावप्रभवैः born of their own nature? गुणैः by alities.Commentary Brahmanas? Kshatriyas and Vaisyas are alified to practise the Vedic rites. The members of the fourth class? O Arjuna? have no claim to these rites? for their profession is to serve the members of the first three. They are not allowed to study the Vedas or perform Yajnas. There is organisation of mankind into the four castes and each mans life is divided into four stages? according to the nature of the Gunas and the degree of the growth or evolution. I will now explain the specific duties of these castes according to the alities by means of which? freeing themselves from the grip of birth and death? they can attain Selfrealisation or knowledge of the Self. Passion (Rajas) slightly mingled with Tamas causes the growth of the merchant caste (the Vaisya). Rajas mixed with Tamas is the cause of the appearance of the Sudra.The one human race has been divided into four castes based upon the three alities. The duties are allotted to each according to the alities born of Nature.Nature (Svabhava) is Isvaras Prakriti (Maya) constituted of the three alities -- Sattva? Rajas and Tamas.The Brahmanas nature is Sattva. So he is serene. The nature of the Kshatriya is Rajas and Sattva. Sattva in his case is subordinate to Rajas. Rajas predominates. Therefore he possesses lordliness. The nature of the Vaisya is Rajas and Tamas. Tamas is subordinate to Rajas. So he does various sorts of activities or business to earn money. The nature of the Sudra is Tamas? with subordinate Rajas. He is dull.Karma is action arising from and fashioned by past thoughts and desires. The Gunas cannot manifest themselves without a cause. Nature is the tendency? Samskara or Vasana in living beings. This is acired by them in the past births. This manifests itself in the present birth and produces its effects. This nature is the source of the Gunas. Every man or woman is born with his or her own Svabhava (nature). The Gunas operate according to the respective natural tendencies of man which impel him to perform his own duties as their natural effects. The duties are allottted to the four classes or castes in accordance with the Gunas of individuals. (Cf.IV.13)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.41. The duties of the Brahmanas, the Ksatriyas, the Vaisyas, and of the Sudras are properly classified according to the Strands which are the sources of their nature, O scorcher of foes !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.41 O Arjuna! The duties of spiritual teachers, the soldiers, the traders and the servants have all been fixed according to the dominant Quality in their nature.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.41 The duties of the Brahmanas, Ksatriyas, Vaisyas and the Sudras are clearly divided, O Arjuna, according to Gunas, born of their nature.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.41 O scorcher of enemies, the duties of the Brahmanas, the Ksatriyas and the Vaisyas, as also of the Sudras have been fully classified according to the gunas born from Nature.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.41 Of Brahmanas, Kshatriyas and Vaisyas, as also of Sudras, O Arjuna, the duties are distributed according to the alities born of their own nature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.41 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.41 The nature of Brahmanas, Ksatriyas, Vaisyas, and Sudras are due to their respective inherent dispositions. The meaning is that their past Karma has been the cause of determining births as Brahmanas etc. The Sattva and other Gunas are the result of such Karma. The Sattva-guna is born from the inherent nature of the Brahmana becoming dominant by suppressing the alities of Rajas and Tamas. The ality of Rajas originates from the inherent nature of the Ksatriyas becoming dominant by suppressing alities of Sattva and Tamas. Tamoguna arises from the inherent nature of the Vaisya, becoming dominant in a little way by suppressing Sattva and Rajas. The duties and works assigned to them according to the Gunas constituting their inherent nature, are expounded and allotted by the Sastras in the order described. For the Sastras analyse that the Brahmanas etc., possess such and such attributes and such and such are their duties and occupations.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.41 Parantapa, O scorcher of enemies; karmani, the duties; brahmana-ksatriya-visam, of the Brahmanas, the Ksatriyas and the Vaisyas; ca, as also; sudranam, of the Surdras-the Sudras have not been included with the others (in the compund word) because, owing to their having a single birth, [Sudras have no right to be invested with the sacred thread which, in the case of the other three castes, symbolizes a second birth.] they have no right to (the study of) the Vedas; pravibhaktani, have been fully classified, have been prescribed by making distinctions among them;-according to what?-gunahi, according to the gunas; svabhava-prabhavaih, born from Nature. Nature means the Praktrti of God, His Maya consisting of the three gunas. 'Born from Nature' means 'born of these three gunas. In accordnace with these the duties such as control of the internal organs, etc. of the Brahmanas and others have been classified. Or (the meaning is): The source of the nature of the Brahmanas is the ality of sattva. Similarly, the source of the nature of the Ksatriyas is rajas, with sattva as a subordinate (ality); the source of the nature of the Vaisyas is rajas, with tamas as the subordinate (ality); the source of the nature of the Sudras is tamas, with rajas as the subordinate (ality); for the natures of the four are seen to be tranillity. lordliness, industriousness and dullness respectively. Or, svabhava (nature) means the (individual) tendencies of creatures earned in their past lives, which have become manifest in the present life for yielding their own results. The gunas which have that svabhava as their source (prabhava) are svabhava-prabhavah gunah. Since the manifestation of the gunas cannot logically be uncaused, therefore a specific cause [i.e. the tendencies are the efficient cause, and Nature is the material cause.] has been posited by saying that Nature is the cause. Thus, the duties such as control of the internal organs etc. have been classified in keeping with the effects of the gunas, sattva, rajas and tamas, which are born of Nature, born of Prakrti. Objection: Well, are not the duties like controlling the internal organs etc. of the Brahmanas and others classified and enjoined by the scriptures? Why is it said that they are classified according to the gunas sattva etc.? Reply: This objection is not valid. For, the duties like controlling the internal organs etc. of the Brahmanas and others have been classified even by the scriptures verily in keeping with the specific alities sattva etc.; certainly, not without reference to the gunas. Hence, though the duties have been divided by the scriputres, they are said to have been classified according to the gunas. Which, again, are those duties? They are being spoken of:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.41।। प्रकृति के तीन गुणों का विस्तृत वर्णन करने के पश्चात्? भगवान् श्रीकृष्ण उन गुणों के आधार पर ही मानव समाज का ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों में विवेकपूर्ण विभाजन करते हैं।इन चार वर्णों के लोगों में कर्तव्यों का विभाजन प्रत्येक वर्ग के लोगों के स्वभावानुसार किया गया है। स्वभाव का अर्थ प्रत्येक मनुष्य के अन्तकरण के विशिष्ट संस्कार हैं? जो किसी गुण विशेष के आधिक्य से प्रभावित हुए रहते हैं। कर्तव्यों के इस विभाजन में व्यक्ति के स्वभाव एवं व्यवहार को ध्यान में रखा जाता है। किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता या हीनता का मापदण्ड उस व्यक्ति की शरीर रचना अथवा उसके केशों का वर्ण नहीं हो सकता श्रेष्ठता का मापदण्ड केवल उसका स्वभाव और व्यवहार ही हो सकता है।मनुष्यों के स्वभावों में विभिन्नता होने के कारण उनको सौंपे गये अधिकारों एवं कर्तव्यों में विभिन्नता होना स्वाभाविक ही है। अत ब्राह्मणादि चारों वर्णों के कर्तव्य परस्पर भिन्न भिन्न हैं तथापि सबका लक्ष्य समाजधारणा एवं सबकी आध्यात्मिक प्रगति ही है। प्रत्येक वर्ण के लिए शास्त्रों में विधान किये हुए कर्तव्यों का पालन? यदि उसउस वर्ण का व्यक्ति करता है तो वह व्यक्ति क्रमश तमस एवं रजस से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में स्थित हो सकता है। तत्पश्चात् ही त्रिगुणातीत आत्मस्वरूप की अनुभूति में निष्ठा संभव होगी।प्रत्येक व्यक्ति के ज्ञान कर्म? कर्तव्य? बुद्धि एवं धृति के अध्ययन से ही उसका वर्ण निश्चित किया जा सकता है। इस सन्दर्भ में? जब किसी पुरुष को सात्त्विक कहा जाता है? तो इसका अर्थ केवल इतना ही है कि सामान्यत उसमें सात्त्विक गुण का आधिक्य रहता है। कभीकभी सात्त्विक पुरुष में रजोगुण का अथवा तमोगुणी पुरुष में सत्त्वगुण का आधिक्य हो सकता है। कोई भी व्यक्ति केवल एक गुण से निर्मित नहीं है।आज भारतवर्ष में समाज की जो स्थिति है? उसमें इस चातुर्र्वण्य का वास्तविक स्वरूप बहुत कुछ लुप्त हो गया है। अब? केवल अनुवांशिक जन्मसिद्ध अधिकार और बाह्य शारीरिक भेद के आधार पर ही जातियाँ तथा अनेक उपजातियाँ उत्पन्न हो गयी हैं। एक सच्चा ब्राह्मण पुरुष वही है जो सत्त्वगुण प्रधान है? जिसमें इन्द्रियसंयम और मनसंयम है और जो आत्मस्वरूप का निदिध्यासन करने में समर्थ है। परन्तु आज का ब्राह्मण वर्ग मात्र जन्म के आधार पर अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करता है? और यह दुर्भाग्य है कि उसे कोई सम्मान प्राप्त नहीं होता? क्योंकि अपने आप को उस सम्मान के योग्य बनाने का वह कभी प्रयत्न ही नहीं करता है।चार वर्णों के कर्मों में? सर्वप्रथम ब्राह्मण का कर्म बताते हुए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.41।।एवं क्रियादिलक्षणस्य संसारस्य त्रिगुणात्मकत्वप्रतिपादकेन प्रकरणेन चतुर्दशसप्तदशाध्यायोक्तोऽर्थ उपसंहृतः चोर्ध्वमूलमधःशाखमित्यादिनाऽविद्यापरिकल्पितं संसारं वृक्षरुपेणाभिधायअसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा। ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः इत्यसङ्गस्त्रेण विषयवैराग्येण तस्य छेदनं कृत्वा परमात्मान्वेष्टव्य इत्युक्तम्। तत्र सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वे त्रिगुणात्मकस्य संसारवृक्षस्य कथं छेदोऽसङ्गशस्त्रस्यैवानुपपत्तेरित्याशङ्कायां स्वस्वाधिकारविहितैर्वर्णाश्रमधर्मैः परितोष्यमाणात्परमेश्वरादसङ्गशस्त्रलाभ इति वदितुमेतावानेव सर्ववेदार्थः परमपुरुषार्थमिच्छद्भिननुष्ठेय इति च गीताशास्त्रार्थ उपसंहर्तव्य इत्येवमर्थमुत्तरं प्रकरणमारभ्यते। तत्रेदं सूत्रम् -- त्रयाणां समासकरणं द्विजत्वेन वेदाध्ययनादितुल्यधर्मत्वकथनार्थम्। शूद्राणामिति पृथक्करणमेकजातित्वेन वेदानधिकारित्वज्ञापनार्थम्। तथाच वसिष्ठःचत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां त्रयो त्वाचार्य उच्यते इति। तथा प्रतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्य स्थाननिशेषाच्चब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहूराजन्यः कृतः। ऊरु तदस्य यद्वैश्यः पध्भां सूद्रो अजायत र्दिशति। शूद्राणां च कर्माणि शमदमादीनि प्रविभक्तानि इतरेतविभागेन व्यवस्थितानि। कैरित्यपेक्षायामाह -- स्वभावप्रभवैर्गुणैः ईश्वरस्य त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः स्वभावः स प्रभवः कारणं येषां तैर्गुणैः। यद्वा स्वभावस्य प्रभवास्तैस्तथाच ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुणः प्रभवः कारणं? तथा क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः प्रभवः? वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रजः प्रभवः? शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमः प्रभवः। शान्त्यैश्वर्येहामूढस्वभावदर्शनाच्चतुर्णाम्। अथवा जन्मान्तरकृतसंस्कारः प्राणिनां वर्तमानजन्मनि स्वकार्याभिमुखत्वेनाभिव्यक्तः स्वभावः स प्रभवो येषां तैः प्रकृत्युद्वोधितैर्गुणैः स्वकार्यानुरुप्येण ब्राह्मणादीनां शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि शास्त्रेणापि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षयैव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि नतु गुणानपेक्षयेति शास्त्रविभक्तान्यपि तानि गुणविभक्तान्युच्यन्ते। क्षत्रियस्वभावजं शत्रुतापनरुपं कर्म त्यक्तुमशक्यमङगीकर्तुं योग्योऽसीति सूचयति परंतपेति संबोधनेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.41।।तदेवं सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकः क्रियाकारकफललक्षणः सर्वः संसारो मिथ्याज्ञानकल्पितोऽनर्थश्चतुर्दशाध्यायोक्त उपसंहृतः। पञ्चदशे च वृक्षरूपककल्पनया तमुक्त्वाअश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा। ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः इत्यसङ्गशस्त्रेण विषयवैराग्येण तस्य छेदनं कृत्वा परमात्मान्वेष्टव्य इत्युक्तं? तत्र सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वे त्रिगुणात्मकस्य संसारवृक्षस्य कथं छेदोऽसङ्गशस्त्रस्यैवानुपपत्तेरित्याशङ्कायां स्वस्वाधिकारविहितैर्वर्णाश्रमधर्मैः परितोष्यमाणात्परमेश्वरादसङ्गशस्त्रलाभ इति वदितुमेतावानेव सर्ववेदार्थः परमपुरुषार्थमिच्छद्भिरनुष्ठेय इति च गीताशास्त्रार्थ उपसंहर्तव्य इत्येवमर्थमुत्तरं प्रकरणमारभ्यते। तत्रेदं सूत्रम् -- ब्राह्मणेति। त्रयाणां समासकरणं द्विजत्वेन वेदाध्ययनादितुल्यधर्मत्वकथनार्थम्। शूद्राणामिति पृथक्करणमेकजातित्वेन वेदानधिकारित्वज्ञानपनार्थम्। तथाच वसिष्ठःचत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां त्रयो वर्णा द्विजातयो ब्राह्मणक्षत्रियवैश्याः तेषांमातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जीबन्धने। अत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते इति। तथा प्रतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्यं स्थानविशेषाच्चब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहूराजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत इत्यपि निगमो भवतिगायत्र्या ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यं न केनचिच्छन्दसा शूद्रमित्यसंस्कारो विज्ञायते इतिशूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिः इति च गौतमः। हे परन्तप शत्रुतापन? तेषां चतुर्णामपि वर्णानां कर्माणि प्रकर्षेण विभक्तानीतरेतरविभागेन व्यवस्थितानि। कैः स्वभावप्रभवैर्गुणैर्ब्राह्मण्यादिस्वभावस्य प्रभवैर्हेतुभूतैर्गुणैः सत्त्वादिभिः। तथाहि ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुण एव प्रभवः प्रशान्तत्वात्। क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रज ईश्वरभावात्। वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रज ईहास्वभावत्वात्। शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमो मूढस्वभावत्वात्। अथवा मायाख्या प्रकृतिः स्वभावस्तत उपादानात्प्रभवो येषां तैः। प्राग्भवीयः संस्कारो वर्तमाने भवे स्वफलाभिमुखत्वेनाभिव्यक्तः स्वभावः स निमित्तत्वेन प्रभवो येषामिति वा। शास्त्रस्यापि पुरुषस्वभावसापेक्षत्वाच्छास्त्रेण प्रविभक्तान्यपि गुणैः प्रविभक्तानीत्युच्यन्ते।आख्यातानामर्थं बोधयतामधिकारिशक्तिः सहकारिणी इति न्यायात्। तथाहि गौतमःद्विजातीनामध्ययनमिज्या दानं ब्राह्मणस्याधिकाः प्रवचनयाजनप्रतिग्रहाः। पूर्वेषु नियमस्तु राज्ञोऽधिकं रक्षणं सर्वभूतानां न्याय्यदण्डत्वं? वैश्यस्याधिकं कृषिवणिक्पाशुपाल्यं कुसीदं च? शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिस्तस्यापि सत्यं कामः अक्रोधः शौचमाचमनार्थे पाणिपादप्रक्षालनमेवैके श्राद्धकर्म भृत्यभरणं स्वदारवृत्तिः परिचर्योत्तरेषामिति। अत्र साधारणा असाधारणाश्च धर्मा उक्ताः। पूर्वेष्वध्ययनेज्यादानेषु नियमोऽवश्यकर्तव्यत्वं नतु प्रवचनयाजनप्रतिग्रहेषु वृत्त्यर्थत्वादित्यर्थः। वणिक् वाणिज्यं? कुसीदं वृद्ध्यै धनप्रयोगः? उत्तरेषामिति श्रेष्ठानां द्विजातीनामित्यर्थः। वसिष्ठोऽपिषट्कर्माणि ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यज्ञो याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति? त्रीणि राजन्यस्याध्ययनं यज्ञो दानं च शस्त्रेण च प्रजापालनं स्वधर्मस्तेन जीवेत्। एतान्येव त्रीणि वैश्यस्य कृषिर्वणिक्पाशुपाल्यं कुसीदं,च। तेषां परिचर्या शूद्रस्येति। आपस्तम्बोऽपिचत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां पूर्वः पूर्वो जन्मतः श्रेयान् स्वकर्म ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यज्ञो याजनं दानं प्रतिग्रहणं दायाद्यं शिलोञ्छाद्यन्यच्चाप्यपरिगृहीतमेतान्येव। क्षत्रियस्याध्यापनयाजनप्रतिग्रहणानीति परिहाय युद्धदण्डादिकानि। क्षत्रियवत् वैश्यस्य दण्डयुद्धवर्जं कृषिगोरक्षवाणिज्याधिकं? परिचर्या शूद्रस्येतरेषां वर्णानाम् इति। मनुरपिअध्यापनं चाध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्।।प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिं च क्षत्रियस्य समादिशत्।।पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव व। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च। एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूया।। इति। एवं चतुर्णामपि वर्णानां गुणभेदेन कर्माणि प्रविभक्तानि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.41।।एवं पञ्चदशे संसाराश्वत्थमसङ्गशस्त्रेण च्छित्त्वा परं पदं परिमार्गितव्यमित्युक्तं तत्रात्मनोऽसङ्गत्वोपपादनाय क्रियाकारकफललक्षणस्य कृत्स्नस्य संसारस्य त्रिगुणात्मकत्वमुक्तम्। नह्यात्मानात्मनोर्गुणातीतगुणात्मकयोः सङ्गः संभवति। नह्याकाशान्तर्वर्तिपृथिव्यादिगुणेन गन्धादिनाकाशः संसृज्यते तद्वदित्युक्तम्। समाप्तः शास्त्रार्थः। अथेदानीं सर्वगीताशास्त्रार्थमुपसंहर्तुमसङ्गशस्त्राप्त्युपायं च प्रदर्शयितुं प्रकरणान्तरमारभते -- ब्राह्मणेत्यादिना। शूद्राणामसमासकरणं वेदानधिकारात्। प्रविभक्तानि असंकीर्णानि। तत्र हेतुमाह स्वभावप्रभवैर्गुणैः। स्वभाव ईश्वरस्य प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका सैव प्रभवो हेतुर्येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवास्तैः। यद्वा ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुण एव प्रभवः शान्तत्वात्। क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः ईश्वरस्वभावत्वात्। वैश्यस्वभावस्य तम उपसर्जनं रजः कृष्यादिस्वभावत्वात्। शूद्रस्वभावस्य रज उपसर्जनं तमः शुश्रूषास्वभावत्वात्। अथवा स्वभावः प्राग्भवीयः संस्कारस्तत्प्रभवैर्न तु जातिमात्रप्रभवैः पक्षिणामाकाशगमनवत्। अतएव जात्यन्तरव्यावृत्तानां धर्माणां शमादिषु पाठो न दृश्यते। नहि शूद्राद्व्यावृत्तं,त्रैवर्णिकानामध्ययनादिकं वा इतरद्वयाद्व्यावृत्तं ब्राह्मणानामध्यापनादिकं वा इह पठ्यते। किंतु सर्वे सर्वजातीयानां साधारणा धर्माः शमादयो दृश्यन्ते। यथाहि द्रोणादिषु ब्राह्मणेष्वपि शौर्यादिकं भरतादिषु क्षत्रियेष्वपि शमादिकं दृष्टम् एवमितरत्र। तस्माद्यस्मिन्कस्मिंश्चिद्वर्णे शमादयो दृश्यन्ते स शूद्रोऽप्येतैर्लक्षणैर्ब्राह्मण एव ज्ञातव्यः। यत्र च ब्राह्मणेऽपि शूद्रधर्मा दृश्यन्ते स शूद्र एव। तथा चारण्यके सर्पभूतं नहुषं प्रति युधिष्ठिरवाक्यम्सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा। दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः। तथायत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः। यत्रैतन्न भवेत्सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् इति। जातिधर्मास्तु मनुना दर्शिताःअध्यापनं चाध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्। प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिं च क्षत्रियस्य समासतः। पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च। एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया। इति। तस्मात् शमादयो यत्राब्राह्मणे ब्राह्मणे वा दृश्यन्ते स एव ब्राह्मण इत्यत्र विवक्षितम्।स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः इत्यत्र तु मनूक्तान्यध्यापनादीन्येव स्वकर्माणि ग्राह्याणि न तु शमदमादीनि। नहि ज्ञानविज्ञानवतोऽन्या संसिद्धिर्लब्धव्यास्ति। तस्माच्छमदमादयो ब्रह्मिष्ठस्यैव ब्राह्मणस्य लक्षणमिति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.41।।नन्वेवं चेत्सर्वं त्रिगुणात्मकमेव तदा गुणात्मकस्य जीवस्य त्रिगुणात्मकबन्धकक्रियादिकरणात् कथं मोक्षः इत्याशङ्क्य शास्त्रद्वारा जीवोद्धारं कर्तुं शास्त्रस्वरूप ज्ञानार्थं प्रसङ्गादर्जुनाय गीतामाहात्म्यतः पूर्वोक्तमुपसंहरन् मोक्षप्रकरणमारभते -- ब्राह्मणेत्यादि यावदध्यायसमाप्ति। हे परन्तप परमुत्कृष्टं तपो यस्येत्यनेन श्रवणयोग्यतोक्ता। ब्राह्मणक्षत्ित्रयविशां त्रैवर्णिकानां च पुनः शूद्राणां -- वेदानधिकृतत्वाछूद्राणां भिन्नतया कथनम् -- स्वभावः स्वस्य मम यो भावः सात्त्विकादिभेदेन विचित्रदर्शनेच्छा तेन प्रभव उत्पत्तिर्येषां तैरेतादृशैर्गुणैः कर्माणि प्रविभक्तानि प्रकर्षेण विभागतः सात्त्विकादेर्विहितानीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.41।।ननु च यद्येवं सर्वमपि क्रियाकारकफलादिकं प्राणिजातं च त्रिगुणात्मकमेव कथं तर्ह्यस्य मोक्ष इत्यपेक्षायां स्वस्वाधिकारविहितैः कर्मभिः परमेश्वराराधनात्तत्प्रसादलब्धज्ञानेनेत्येवं सर्वगीतार्थसारं संगृह्य प्रदर्शयितुं प्रकरणान्तरमारभते -- ब्राह्मणेत्यादि यावदध्यायसमाप्ति। हे परंतप शत्रुतापन? ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां विशां च शूद्राणां च कर्माणि प्रविभक्तानि प्रकर्षेण विभागतो विहितानि। शूद्राणां स्वभावात्पृथक्करणं द्विजत्वाभावेन वैलक्षण्यात्। विभागोपलक्षणमाह -- स्वभावः सात्त्विकादिः प्रभवति प्रादुर्भवति येभ्यस्तैर्गुणैरुपलक्षणभूतैः। यद्वा स्वभावः पूर्वजन्मसंस्कारस्तस्मात्प्रादुर्भूतैरित्यर्थः। तत्र सत्त्वप्रधाना ब्राह्मणाः? सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानाः क्षत्रियाः? तमउपसर्जनरजःप्रधाना वैश्याः? रजउपसर्जनतमःप्रधानाः शूद्राः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.41।।एवं च त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः [महाना.8।14कैव.2] इति मोक्षसाधनतया निर्दिष्टः त्यागः सन्न्यासशब्दार्थः? न तदन्यः स च कर्तृत्वकामफलानां न्यासरूपः स्वस्मिन् तत्कर्तृत्वत्यागश्च परपुरुषान्तर्यामिकर्तृकत्वाद्यनुसन्धानेनेति सर्वं सगुणनिरूपणे सत्त्वगुणवृद्धिकार्यमिति तथोक्तम् इदानीमेवम्भूतकर्माधिकारिणां ब्राह्मणादीनां स्वभावानुसारिसत्त्वादिगुणभेदभिन्नवृत्त्या सह कर्त्तव्यकर्मस्वरूपं निरूपयति ब्राह्मणक्षत्ित्रयविशामिति। स्वभावः सहजः संस्कारात्मकस्तत्प्रभवैर्गुणैर्विभद्यंते? तत्र स्वभावप्रभवैर्गुणैः सात्त्विका ब्राह्मणाः सृष्टाः? सात्त्विकराजसाः क्षत्ित्रयाः? तामसराजसा वैश्याः? तामसाः शूद्राः एषामपि व्यत्यये निजपूर्वकृतिरेव हेतुरिति हे परन्तप पुरा तथा प्रविभक्तानि कर्माणि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.41।।तथा सम्पूर्ण गीताशास्त्रका इस प्रकार उपसंहार भी किया जाना चाहिये कि परम पुरुषार्थकी सिद्धि चाहनेवालोंके द्वारा अनुष्ठान किये जानेयोग्य यह इतना ही समस्त वेद और स्मृतियोंका अभिप्राय है अतः इस अभिप्रायसे ये ब्राह्मणक्षत्रियविशाम् इत्यादि श्लोक आरम्भ किये जाते हैं --, हे परन्तप ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- इन तीनोंके और शूद्रोंके भी कर्म विभक्त किये हुए हैं अर्थात् परस्पर विभागपूर्वक निश्चित किये हुए हैं। ब्राह्मणादिके साथ शूद्रोंको मिलाकरसमास करके न कहनेका अभिप्राय यह है कि शूद्र द्विज न होनेके कारण वेदपठनमें उनका अधिकार नहीं है। किसके द्वारा विभक्त किये गये हैं स्वभावसे उत्पन्न हुए गुणोंके द्वारा। स्वभाव यानी ईश्वरकी प्रकृति -- त्रिगुणात्मिका माया? वह माया जिन गुणोंके प्रभवका यानी उत्पत्तिका कारण है? ऐसे स्वभावप्रभव गुणोंके द्वारा ब्राह्मणादिके? शम आदि कर्म विभक्त किये गये हैं। अथवा यों समझो कि ब्राह्मणस्वभावका कारण सत्त्वगुण है? वैसे ही क्षत्रियस्वभावका कारण सत्त्वमिश्रित रजोगुण है? वैश्यस्वभावका कारण तमोमिश्रित रजोगुण है और शूद्रस्वभावका कारण रजोमिश्रित तमोगुण है। क्योंकि उपर्युक्त चारों वर्णोंमें ( गुणोंके अनुसार ) क्रमसे शान्ति? ऐश्वर्य? चेष्टा और मूढ़ता -- ये अलगअलग स्वभाव देखे जाते हैं। अथवा यों समझो कि प्राणियोंके जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंके संस्कार? जो वर्तमान जन्ममें अपने कार्यके अभिमुख होकर व्यक्त हुए हैं? उनका नाम स्वभाव है। ऐसा स्वभाव जिन गुणोंकी उत्पत्तिका कारण है? वे,स्वभावप्रभव गुण हैं। गुणोंका प्रादुर्भाव बिना कारणके नहीं बन सकता। इसलिये स्वभाव उनकी उत्पत्तिका कारण है यह कहकर कारणविशेषका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार स्वभावसे उत्पन्न हुए अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंद्वारा अपनेअपने कार्यके अनुरूप शमादि कर्म विभक्त किये गये हैं। पू0 -- ब्राह्मणादि वर्णोंके शम आदि कर्म तो शास्त्रद्वारा विभक्त हैं? अर्थात् शास्त्रद्वारा निश्चित किये गये हैं फिर यह कैसे कहा जाता है? कि सत्त्व आदि तीनों गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं उ0 -- यह दोष नहीं है? क्योंकि शास्त्रद्वारा भी ब्राह्मणादिके शमादि कर्म सत्त्वादि गुणभेदोंकी अपेक्षासे ही विभक्त किये गये हैं? बिना गुणोंकी अपेक्षासे नहीं। अतः शास्त्रद्वारा विभक्त किये हुए भी कर्म? गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं? ऐसा कहा जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.41।। व्याख्या --   ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप -- यहाँ ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- इन तीनोंके लिये एक पद और शूद्रोंके लिये अलग एक पद देनेका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- ये द्विजाति हैं और शूद्र द्विजाति नहीं है। इसलिये इनके कर्मोंका विभाग अलगअलग है और कर्मोंके अनुसार शास्त्रीय अधिकार भी अलगअलग है।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः -- मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है? उसके अन्तःकरणमें उस कर्मके संस्कार पड़ते हैं और उन संस्कारोंके अनुसार उसका स्वभाव बनता है। इस प्रकार पहलेके अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंके अनुसार मनुष्यका जैसा स्वभाव होता है? उसीके अनुसार उसमें सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न होती है। इन गुणवृत्तियोंके तारतम्यके अनुसार ही ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके कर्मोंका विभाग किया गया है (गीता 4। 13)। कारण कि मनुष्यमें जैसी गुणवृत्तियाँ होती हैं? वैसा ही वह कर्म करता है।विशेष बात(1) कर्म दो तरहके होते हैं -- (1) जन्मारम्भक कर्म और (2) भोगदायक कर्म। जिन कर्मोंसे ऊँचनीच योनियोंमें जन्म होता है? वे जन्मारम्भक कर्म कहलाते हैं और जिन कर्मोंसे सुखदुःखका भोग होता है? वे भोगदायक कर्म कहलाते हैं। भोगदायक कर्म अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको पैदा करते हैं? जिसको गीतामें अनिष्ट? इष्ट और मिश्र नामसे कहा गया है (18। 12)।गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो मात्र कर्म भोगदायक होते हैं अर्थात् जन्मारम्भक कर्मोंसे भी भोग होता है और भोगदायक कर्मोंसे भी भोग होता है। जैसे? जिसका उत्तम कुलमें जन्म होता है? उसका आदर होता है? सत्कार होता है और जिसका नीच कुलमें जन्म होता है? उसका निरादर होता है? तिरस्कार होता है। ऐसे ही अनुकूल परिस्थितिवालेका आदर होता है और प्रतिकूल परिस्थितिवालेका निरादर होता है। तात्पर्य है कि आदर और निरादररूपसे भोग तो जन्मारम्भक और भोगदायक -- दोनों कर्मोंका होता है। परन्तु जन्मारम्भक कर्मोंसे जो जन्म होता है? उसमें आदरनिरादररूप भोग गौण होता है क्योंकि आदरनिरादर कभीकभी हुआ करते हैं? हरदम नहीं हुआ करते और भोगदायक कर्मोंसे जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है? उसमें परिस्थितिका भोग मुख्य होता है क्योंकि परिस्थिति हरदम आती रहती है।भोगदायक कर्मोंका सदुपयोगदुरुपयोग करनेमें मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है अर्थात् वह अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी भी हो सकता है और उसको साधनसामग्री भी बना सकता है। जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी होते हैं? वे मूर्ख होते हैं और जो उसको साधनसामग्री बनाते हैं? वे बुद्धिमान् साधक होते हैं। कारण कि मनुष्यजन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है अतः इसमें जो भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आती है? वह सब साधनसामग्री ही है।अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको साधनसामग्री बनाना क्या है अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो उसको दूसरोंकी सेवामें? दूसरोंके सुखआराममें लगा दे? और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग कर दे। दूसरोंकी सेवा करना और सुखेच्छाका त्याग करना -- ये दोनों साधन हैं।(2) शास्त्रोंमें आता है कि पुण्योंकी अधिकता होनेसे जीव स्वर्गमें जाता है और पापोंकी अधिकता होनेसे नरकोंमें जाता है तथा पुण्यपाप समान होनेसे मनुष्य बनता है। इस दृष्टिसे किसी भी वर्ण? आश्रम? देश? वेश आदिका कोई भी मनुष्य सर्वथा पुण्यात्मा या पापात्मा नहीं हो सकता।पुण्यपाप समान होनेपर जो मनुष्य बनता है? उसमें भी अगर देखा जाय तो पुण्यपापोंका तारतम्य रहता है अर्थात् किसीके पुण्य अधिक होते हैं और किसीके पाप अधिक होते हैं (टिप्पणी प0 927)। ऐसे ही गुणोंका विभाग भी है। कुल मिलाकर सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ऊर्ध्वलोकमें जाते हैं? रजोगुणकी प्रधानतावाले मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोकमें आते हैं? और तमोगुणकी प्रधानतावाले अधोगतिमें जाते हैं। इन तीनोंमें भी गुणोंके तारतम्यसे अनेक तरहके भेद होते हैं।सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मण? रजोगुणकी प्रधानता और सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रिय? रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणतासे वैश्य तथा तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्र होता है। यह तो सामान्य रीतिसे गुणोंकी बात बतायी। अब इनके अवान्तर तारतम्यका विचार करते हैं -- रजोगुणप्रधान मनुष्योंमें

Chapter 18 (Part 22)

सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ब्राह्मण हुए। इन ब्राह्मणोंमें भी जन्मके भेदसे ऊँचनीच ब्राह्मण माने जाते हैं और परिस्थितिरूपसे कर्मोंका फल भी कई तरहका आता है अर्थात् सब ब्राह्मणोंकी एक समान अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति नहीं आती। इस दृष्टिसे ब्राह्मणयोनिमें भी तीनों गुण मानने पड़ेंगे। ऐसे ही क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र भी जन्मसे ऊँचनीच माने जाते हैं और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी कई तरहकी आती है। इसलिये गीतामें कहा गया है कि तीनों लोकोंमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है? जो तीनों गुणोंसे रहित हो (18। 40)।अब जो मनुष्येतर योनिवाले पशुपक्षी आदि हैं? उनमें भी ऊँचनीच माने जाते हैं जैसे गाय आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कुत्ता? गधा? सूअर आदि नीच माने जाते हैं। कबूतर आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कौआ? चील आदि नीच माने जाते हैं। इन सबको अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी एक समान नहीं मिलती। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगति? मध्यगति और अधोगतिवालोंमें भी कई तरहके जातिभेद और परिस्थितिभेद होते हैं। सम्बन्ध --   अब भगवान् ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.41।।प्रकरणार्थमुपसंहृतमनुवदति -- सर्व इति। तस्यानेकात्मकत्वेन हेयत्वं सूचयति -- क्रियेति। निर्गुणादात्मनो वैलक्षण्याच्च तस्य हेयतेत्याह -- सत्त्वेति। अनर्थत्वाच्च तस्य त्याज्यत्वमनर्थत्वं चाविद्याकल्पितत्वेनावस्तुनो वस्तुवद्भानादित्याह -- अविद्येति। न केवलमष्टादशे संसारो दर्शितः? किंतु पञ्चदशेपीत्याह -- वृक्षेति। चकारादुक्तः संसार इत्यनुकृष्यते। संसारध्वस्तिसाधनं सम्यग्ज्ञानं च तत्रैवोक्तमित्याह -- असङ्गेति। वृत्तमनूद्यानन्तरसंदर्भतात्पर्यमाह -- तत्र चेति। उक्तो निवर्तयिषितः संसारः सतिसप्तम्या परामृश्यते? सर्वो हि संसारो गुणत्रयात्मकः। नच गुणानां प्रकृत्यात्मकानां संसारकारणीभूतानां निवृत्तिर्युक्ता प्रकृतेर्नित्यत्वादित्याशङ्कायां स्वधर्मानुष्ठानात्तत्त्वज्ञानोत्पत्त्या गुणानामज्ञानात्मकानां निवृत्तिर्यथा भवति तथा स्वधर्मजातं वक्तव्यमित्युत्तरग्रन्थप्रवृत्तिरित्यर्थः। तत्तद्वर्णप्रयुक्तधर्मजातानुपदेशे चोपसंहारप्रकरणप्रकोपः स्यादित्याह -- सर्वश्चेति। उपसंहृते गीताशास्त्रार्थे यद्यपि सर्वो वेदार्थः स्मृत्यर्थश्च सर्व उपसंहृतस्तथापि मुमुक्षुभिरनुष्ठेयमस्ति वक्तव्यमवशिष्टमित्याशङ्क्याह -- एतावानिति। अनुष्ठेयपरिमाणनिर्धारणवदुक्तशङ्कानिवर्तनं शास्त्रार्थोपसंहारश्चेत्येतदुभयं चकारार्थः। संप्रतिवर्णचतुष्टयस्यानुष्ठेयं धर्मजातं संकीर्णमिति सूत्रमुपन्यस्यति -- ब्राह्मणेति। उपनयनसंस्कारवत्त्वे सति वेदाधिकारित्वं समानमिति त्रयाणां समासकरणम्। इतरेषामसमासे हेतुमाह -- शूद्राणामिति। एकजातित्वमुपनयनवर्जितत्वं कर्मणामसंकीर्णत्वेन व्यवस्थापकं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति -- केनेत्यादिना। स्वभावप्रभवैर्गुणैरित्यस्यार्थान्तरमाह -- अथवेति। उक्तव्यवस्थायां कार्यदर्शनं प्रमाणयति -- प्रशान्तीति। स्वभावशब्दस्यार्थान्तरमाह -- अथवेति। किमिति गुणाभिव्यक्तेरुक्तवासनाधीनत्वं तत्राह -- गुणेति। ननु नास्ति गुणप्रादुर्भावस्य निष्कारणत्वं प्रकृतिजैर्गुणैरिति प्रकृतेर्गुणकारणत्वाभिधानादत आह -- स्वभाव इति। वासनाकारणमिति गुणव्यक्तेर्निमित्तकारणत्वं विवक्षितं प्रकृतिस्तूपादानमिति भावः। उक्तमुपसंहरति -- एवमिति। स्वभावप्रभवैः सत्त्वादिगुणैर्ब्राह्मणादीनां कर्माणि प्रविभक्तानीत्युक्तमाक्षिपति -- नन्विति। शास्त्रस्य धर्मविभागहेतोः सत्त्वादिविशेषापेक्षयैव विभागज्ञापकत्वादुभयत्र विभागहेतुत्वोक्तिरविरुद्धेति परिहरति -- नैष दोष इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.41।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.41।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.41।। --,ब्राह्मणाश्च क्षत्रियाश्च विशश्च ब्राह्मणक्षत्रियविशः? तेषां ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च -- शूद्राणाम् असमासकरणम् एकजातित्वे सति वेदानधिकारात् -- हे परंतप? कर्माणि प्रविभक्तानि इतरेतरविभागेन व्यवस्थापितानि। केन स्वभावप्रभवैः गुणैः? स्वभावः ईश्वरस्य प्रकृतिः त्रिगुणात्मिका माया सा प्रभवः येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवाः? तैः? शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि ब्राह्मणादीनाम्। अथवा ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुणः प्रभवः कारणम्? तथा क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः प्रभवः? वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रजः प्रभवः? शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमः प्रभवः? प्रशान्त्यैश्वर्येहामूढतास्वभावदर्शनात् चतुर्णाम्। अथवा? जन्मान्तरकृतसंस्कारः प्राणिनां वर्तमानजन्मनि स्वकार्याभिमुखत्वेन अभिव्यक्तः स्वभावः? सः प्रभवो येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवाः गुणाः गुणप्रादुर्भावस्य निष्कारणत्वानुपपत्तेः। स्वभावः कारणम् इति च कारणविशेषोपादानम्। एवं स्वभावप्रभवैः प्रकृतिभवैः सत्त्वरजस्तमोभिः गुणैः स्वकार्यानुरूपेण शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि।।ननु शास्त्रप्रविभक्तानि शास्त्रेण विहितानि ब्राह्मणादीनां शमादीनि कर्माणि कथम् उच्यते सत्त्वादिगुणप्रविभक्तानि इति नैष दोषः शास्त्रेणापि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षयैव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि? न गुणानपेक्षया? इति शास्त्रप्रविभक्तान्यपि कर्माणि गुणप्रविभक्तानि इति उच्यते।।कानि पुनः तानि कर्माणि इति? उच्यते --,

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【 Verse 18.42 】

▸ Sanskrit Sloka: शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||

▸ Transliteration: śamo damastapaḥ śaucaṁ kṣāntirārjavameva ca | jñānaṁ vijñānam āstikyaṁ brahmakarma svabhāvajaṁ ||

▸ Glossary: śamaḥ: peacefulness; damaḥ: self-control; tapaḥ: austerity; śaucaṁ: purity; kṣāntiḥ: tolerance; ārjavaṁ: honesty; eva: certainly; ca: and; jñānaṁ: knowl- edge; vijñānaṁ: wisdom; āstikyaṁ: belief in God; brahma: of a brahmana; karma: duty; svabhāvajaṁ: born of his own nature

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.42 The nature of Brāhmaṇa is characterized by their calm- ness, discipline, austerity, tolerance, honesty, knowledge, wis- dom and belief in God.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.42।।मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना धर्मपालनके लिये कष्ट सहना बाहरभीतरसे शुद्ध रहना दूसरोंके अपराधको क्षमा करना शरीर? मन आदिमें सरलता रखना वेद? शास्त्र आदिका ज्ञान होना यज्ञविधिको अनुभवमें लाना और परमात्मा? वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सबकेसब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.42।। शम? दम? तप? शौच? क्षान्ति? आर्जव? ज्ञान? विज्ञान और आस्तिक्य ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.42 शमः serenity? दमः selfrestraint? तपः austerity? शौचम् purity? क्षान्तिः forgiveness? आर्जवम् uprightness? एव even? च and? ज्ञानम् knowledge? विज्ञानम् realisation? आस्तिक्यम् belief in God? ब्रह्मकर्म (are) the duties of Brahmanas? स्वभावजम् born of nature.Commentary Sama is control of the mind. Dama is control of the senses. Serenity and selfrestraint have already been explained in XVII.2. Austerity of the three kinds has also been explained in XVII.14 to 16.Astikyam Faith in the words of the Guru? in the teachings of the scriptures? in the existence of God? in the life beyond or hereafter and in ones own Self.The mind is absorbed in the Self. This gives peace. Selfrestraint is the helpmate of peace. In obeying the inunctions of the scriptures alone you will attain peace and spiritual progress. You must not argue too much. You must have reverence for and faith in the teaching.As the sandalwood tree is fragrant with its own sweet scent? as a Champaka tree is adorned by its lovely flowers? so also a Brahmana is adorned by these nine virtues which are inseparable from him.Now? O Arjuna? listen to the duties of a Kshatriya.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.42. Quietude, self-control, as well as purity, for-bearance, and also straightforwardness, knowledge, wisdom, and faith in another world are the duties of the Brahmanas, born of their nature.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.42 Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness, as well as uprightness, knowledge, wisdom and faith in God - these constitute the duty of a spiritual Teacher.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.42 Control of the senses and the mind, austerity, purity, forbearance, uprightness, knowledge, special knowledge, and faith - all these constitute the duty of Brahmana born of his inherent nature.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.42 The natural duties of the Brahmanas are the control of the internal and external organs, austerity, purity, forgiveness, straightforwardness, knowledge as also wisdom [Knowledge refers to the understanding of subjects presented by the scriptures; wisdom means making them matters of one's own experience.] and faith.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.42 Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness and also uprightness, knowledge, realisation and belief in God are the duties of the Brahmanas, born of (their own) nature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.42 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.42 'Sama' is the control of the external sense-organs. 'Dama' is the control of the mind. 'Tapas' is the chastisement of the body by controlling enjoyments, as enjoined by the Sastras. 'Sauca' is fitness for performing acts as enjoined by the Sastras. 'Ksanti' is preserving the composure of the mind, though injured by others. 'Arjava' is straightforwardness expressing itself in correct outward manifestation to others in consonance with one's own mind. 'Jnana' is knowledge about the real nature of the higher and lower truths. 'Vijnana' is the knowledge pertaining to exceptional attributes belonging to the Supreme Reality. 'Astikya' or faith is firm conviction in the truth of all things enjoined in the Vedas. The meaning is that it is unshakable by any reason whatever.

'Astikya' is positive conviction in the truth to the following effect: (1) The Lord Vasudeva, the Supreme Person, is signified by the term, Supreme Brahman. (2) He is devoid of even the slightest trace or evil. (3) He possesses countless hosts of auspicious and excellent attributes such as knowledge, strength etc., boundless and natural. (4) To reveal His nature is the sole purpose of the whole of Vedas and the Vedanta and He can be known only through them. (5) He is the sole cause of the universe (6) He is the foundation of the entire universe. (7) He is the actuator of all. (8) All actions taught in the Vedas form His worship. (9) When worshipped through them, He confers fruits known as Dharma, Artha, Kama and Moksa.

That such is the meaning has been declared in the following text: 'Indeed I am to be known from all the Vedas' (15.15); 'I am the origin of all; from Me proced everything' (10.8), 'All this is strung on Me' (7.7), 'Knowing me as the enjoyer of all sacrifices and austerities ৷৷. he attains peace' (10.29), There is nothing greater than myself, Arjuna (7.7) 'He from whom proceeds the activity of all beings and by whom all this is pervaded - by worshipping Him with his duty, will a man reach perfection' (18.46); and 'He who knows Me as unborn, without a beginning and the great Lord of the worlds ৷৷.' (10.3)

Such are the duties of the Brahmana arising from his inherent nature.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.42 Svabhavajam brahma-karma, the natural duties of the Brhamanas, of the Brahmana caste; are samah, control of the internal organs; damah, control of the external organs-these bear the meanings as explained earlier (see 6.3, 10.4, 16.1); tapah, austerity-bodily austerity, as explained before (17.14); saucam, purity, as already explained (in 13.7, 16.3); ksantih, forgiveness; arjavam, straightforwardness, simplicity; jnanam, knowledge; eva ca, as also vijnanam, wisdom; astikyam, faith, the idea of truth [Truth of the scritpures, existence of God, etc. In place of asti-bhavah Ast reads astika-bhavah, the feeling of conviction with regard to the existence of God and the other world. Tr.] respect for the teaching of the scriptures. By svabhavajam (natural) is conveyed the very same idea as was expressed in 'classified according to the gunas born from Nature' (41).

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.42।। इस श्लोक में सत्त्वगुण प्रधान ब्राह्मण के कर्तव्यों की सूची प्रस्तुत की गयी है। यद्यपि यहाँ कर्म शब्द का प्रयोग किया गया है? परन्तु इस सूची में केवल आन्तरिक गुणों का ही उल्लेख मिलता है। इसका अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण का कर्तव्य इन गुणों को स्वयं में सम्पादित कर उनमें दृढ़ निष्ठा प्राप्त करना है। ये गुण उसके स्वाभाविक लक्षण बन जाने चाहिए।शम इसका अर्थ है मनसंयम। मन की विषयाभिमुखी प्रवृत्ति का संयमन शम कहलाता है।दम विषय ग्रहण करने वाली ज्ञानेन्द्रियों तथा प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाली कर्मेन्द्रियों पर संयमन होना दम है।तप पूर्व अध्याय में शरीर? वाणी और मन के तप का वर्णन किया गया था। तप के आचरण से हमारी शक्तियों का अपव्यय अवरुद्ध हो जाता है। इस प्रकार संचित की गयी शक्ति का आत्मविकास की साधना में सदुपयोग किया जा सकता है।शौच बाह्य वातावरण? अपने वस्त्र? शरीर तथा मन की शुद्धि को शौच कहते हैं। ब्राह्मण को स्वच्छता के प्रति सतत सजग रहना चाहिए।क्षान्ति इसका अर्थ है क्षमा। किसी के अपराध अथवा दुर्व्यवहार करने पर भी उसे क्षमा करना क्षान्ति है। ऐसा व्यक्ति किसी से द्वेष नहीं करेगा और सब के साथ समान भाव से रहेगा।आर्जवम् हृदय के सरल? निष्कपट भाव को आर्जव कहते हैं। इस ऋजुता के कारण पुरुष निर्भय बन जाता है। उच्च जीवन मूल्यों को जीने के विषय में वह निम्नस्तरीय जीवन के साथ कभी समझौता नहीं करता।उपर्युक्त शमादि छ गुणों द्वारा ब्राह्मण पुरुष का जगत् में आचरण एवं व्यवहार स्पष्ट किया गया है। दूसरी पंक्ति में उसके आध्यात्मिक जीवन का चित्रण किया गया है।ज्ञान इस शब्द से यहाँ शास्त्रों का ज्ञान इंगित किया गया है। इसमें शास्त्र के सिद्धांत? भौतिक जगत्? जगत् का अनुभव करने वाली उपाधियाँ तथा उनके धर्म और कार्य? जीवन का लक्ष्य इत्यादि का सैद्धांतिक ज्ञान समाविष्ट है।विज्ञान उपनिषत्प्रतिपादित आत्मज्ञान का अनुभव स्वानुभव कहलाता है। ज्ञान का उपदेश दिया जा सकता है? परन्तु विज्ञान का नहीं। स्वसंवेद्य आत्मा का अनुभव अन्य व्यक्ति के द्वारा दिया जाना असंभव है। इसके लिए ब्राह्मण को स्वयं ही प्रयत्न करना होगा।आस्तिक्य वेदान्त प्रमाण में श्रद्धा हुए बिना उसमें उपदिष्ट लक्ष्य में आस्तिक्य भाव उत्पन्न नहीं हो सकता? और इस आस्तिकता के बिना उपर्युक्त किसी भी कर्म को करने में प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अत इस श्रद्धा का होना अनिवार्य है। श्रद्धा से ज्ञान और तत्पश्चात्? ज्ञान से विज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। इस श्लोक में कथित गुणों को सम्पादित करना ही ब्राह्मण का कर्तव्य है।भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.42।।कानि पुनस्तानि कर्माणीत्यपेक्षायां तानि व्युत्पादयितुमादौ ब्राह्मणस्य कर्माणि दर्शयति। शमः अन्तःकरणोपरमः। तमः बाह्यकरणोपरमः। तपः यथोक्तं शारीरादि। शौचं बाह्याभ्यन्तरभेदेन प्राग्व्याख्यातम्। क्षमा क्षान्तिः आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा मनसि विकारराहित्यम्। आर्जवं ऋजुत्वम्। ज्ञानं शास्त्रीयं आत्मादिपदार्थज्ञानम्। विज्ञानं शास्त्रार्थस्यानुभवारुढतापादनम्। आस्तिक्यमास्तिकस्वभाव आगमोक्तार्थेषु श्रद्दधानता। ब्रह्मकर्म ब्राह्मणजातेः कर्म स्वभावजं स्वभावप्रभवेण गुणेन सत्त्वगुणेन प्रविभक्तमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.42।।तत्र ब्राह्मणस्य स्वाभाविकगुणकृतानि कर्माण्याह -- शम इति। शमोऽन्तःकरणोपरमः। दमो बाह्यकरणोपरमः प्रागुक्तः। तपः शारीरादिदेवद्विजगुरुप्राज्ञेत्यादावुक्तम्। शौचमपि बाह्याभ्यन्तरभेदेन प्रागुक्तम्। क्षान्तिः क्षमा आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा मनसि विकारराहित्यं प्राग्व्याख्यातम्। आर्जवमकौटिल्यं प्रागुक्तम्। ज्ञानं साङ्गवेदतदर्थविषयम्। विज्ञानं कर्मकाण्डे यज्ञादिकर्मकौशल्यं? ब्रह्मकाण्डे ब्रह्मात्मैक्यानुभवः। आस्तिक्यं सात्त्विकी श्रद्धा प्रागुक्ता। एतच्छमादिनवकं स्वभावजं सत्त्वगुणस्वभावकृतं ब्रह्मकर्म ब्राह्मणजातेः कर्म। यद्यपि चतुर्णामपि वर्णानां सात्त्विकावस्थायामेते धर्माः संभवन्ति तथापि बाहुल्येन ब्राह्मणे संभवन्ति सत्त्वस्वभावत्वात्। तस्य सत्त्वोद्रेकदेशेन त्वन्यत्रापि कदाचिद्भवन्तीति शास्त्रान्तरे साधारणधर्मतयोक्ताः। तथाच विष्णुःक्षमा सत्यं दमः शौचं दानमिन्द्रियसंयमः। अहिंसा गुरुशुश्रूषा तीर्थानुसरणं दया।।आर्जवं लोभशून्यत्वं देवब्राह्मणपूजनम्। अनभ्यसूया च तथा धर्मः सामान्य उच्यते।। सामान्यश्चतुर्णामपि वर्णानाम्। तथा प्रायेण चतुर्णामप्याश्रमाणामित्यर्थः। तथा बृहस्पतिःदया क्षमाऽनसूया च शौचानायासमङ्गलम्। अकार्पण्यमस्पृहत्वं सर्वसाधारणानि च।। परे वा बन्धुवर्गे वा मित्रे द्वेष्टरि वा सदा। आपन्ने रक्षितव्यं तु दयैषा परिकीर्तिता।।बाह्ये चाध्यात्मिके चैव दुःखे चोत्पादिते क्वचित्। न कुप्यति न वा हन्ति सा क्षमा परिकीर्तिता।।न गुणान्गुणिनो हन्ति स्तौति मन्दगुणानपि। नान्यदोषेषु रमते साऽनसूया प्रकीर्तिता।।अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिर्गुणैः। स्वधर्मे च व्यवस्थानं शौचमेतत्प्रकीर्तितम्।।शरीरं पीड्यते येन सुशुभेनापि कर्मणा। अत्यन्तं तन्न कर्तव्यमनायासः स उच्यते।।प्रशस्ताचरणं नित्यमप्रशस्तविसर्जनम्। एतद्धि मङ्गलं प्रोक्तं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।।स्तोकादपि प्रदातव्यमदीनेनान्तरात्मा। अहन्यहनि यत्किंचिदकार्पण्यं हि तत्स्मृतम्।।यथोत्पन्नेन संतोषः कर्तव्यो ह्यर्थवस्तुना। परस्याचिन्तयित्वार्थं साऽस्पृहा परिकीर्तिता।। एत एवाष्टावात्मगुणत्वेन गौतमेन पठिताःअथाष्टावात्मगुणाः दया सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहा इति। तथा महाभारतेसत्यं दमस्तपः शौचं संतोषो ह्रीः क्षमार्जवम्। ज्ञानं शमो दया ध्यानमेष धर्मः सनातनः।।सत्यं भूतहितं प्रोक्तं मनसो दमनं दमः। तपः स्वधर्मवर्तित्वं शौचं संकरवर्जनम्। संतोषो विषयत्यागो ह्रीरकार्यनिवर्तनम्। क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वमार्जवं समचित्तता। ज्ञानं तत्त्वार्थसंबोधः शमश्चित्तप्रशान्तता। दया भूतहितैषित्वं ध्यानं निर्विषयं मनः।। देवलःशौचं दानं तपः श्रद्धा गुरुसेवा क्षमा दया। विज्ञानं विनयः सत्यमिति धर्मसमुच्चयः।। तथाव्रतोपवासनियमैः शरीरोत्तापनं तपः। प्रत्यंयो धर्मकार्येषु तया श्रद्धेत्युदाहृता।।नास्ति ह्यश्रद्दधानस्य कर्मकृत्यप्रयोजनम्। यत्पुनर्वैदिकीनां च लौकिकीनां च सर्वशः।।धारणं सर्वविद्यानां विज्ञानमिति कीर्त्यते। विनयं द्विविधं प्राहुः शश्वद्दमशमाविति।। शेषं व्याख्यातप्रायमिति वचनानि न लिखितानि। याज्ञवल्क्यःइज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम्। अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्।। इति। इयं च सर्वा दैवीसंपत्प्राग्व्याख्याता ब्राह्मणस्य स्वाभाविकीतरेषां तु नैमित्तिकीति न विरोधः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.42।।ब्राह्मणकर्माण्याह -- शम इति। अन्तःकरणनिग्रहः शमः। बाह्येन्द्रियनिग्रहो दमः। तपः पूर्वोक्तं शारीरादिभेदेन त्रिविधम्। शौचं बाह्यं मृज्जलाभ्यां आभ्यन्तरं भावशुद्धिः। क्षान्तिः क्षमा। आर्जवमकौटिल्यम्। ज्ञानं शास्त्रीयं कर्म ब्रह्मविषयम्। विज्ञानं तदनुष्ठानानुभवात्मकम्। आस्तिक्यं श्रद्धा एतन्नवकं ब्रह्मकर्म ब्राह्मणत्वजात्यभिव्यञ्जकं कर्म। स्वभावजं प्राचीनधर्मसंस्कारजम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.42।।तत्र प्रथमं ब्राह्मणस्य स्वाभाविकानि कर्माण्याह -- शम इति। शमः शान्तिः मत्परैकचित्तत्वं? दम इन्द्रियोपसंयमः? तपः शरीरक्लेशः? शौचं बाह्याभ्यन्तरभेदेन द्विविधं? क्षान्तिः क्षमा? आर्जवं सरलता। एवकारेण कुटिलेष्वपि चेत्यर्थः। ज्ञानं शास्त्रीयं? विज्ञान अनुभवः? आस्तिक्यं प्रमाणोक्तफलोत्कर्षे अस्तीति निश्चयबुद्धिः? एवमेतत्सर्वं ब्राह्मणस्य स्वभावजं स्वभावाज्जातं कर्म।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.42।।तत्र ब्राह्मणस्य स्वाभाविकानि कर्मण्याह -- शम इति। शमश्चित्तोपरमः? दमो बाह्येन्द्रियोपरमः? तपः पूर्वोक्तं शारीरादि? शौचं बाह्याभ्यन्तरम्? क्षान्तिः क्षमा? आर्जवमवक्रता? ज्ञानं शास्त्रीयम्? विज्ञानमनुभवः? आस्तिक्यमस्तिपरलोक इति निश्चयः। एतच्छमादि ब्राह्मणस्य स्वभावाज्जातं कर्म।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.42।।तत्र ब्राह्मणस्य स्वाभाविकवृत्ति कर्माऽऽह -- शम इत्यादि। ज्ञानं श्रौतम्। विज्ञानं परमात्मज्ञानम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.42।।वे कर्म कौनसे हैं यह बतलाया जाता है --, जिनके अर्थकी व्याख्या पहले की जा चुकी है वे शम और दम तथा पहले कहा हुआ शारीरिकादिभेदसे तीन प्रकारका तप? एवं पूर्वोक्त ( दो प्रकारका ) शौच? क्षान्तिक्षमा? आर्जवअन्तःकरणकी सरलता तथा ज्ञान? विज्ञान और आस्तिकता अर्थात् शास्त्रके वचनोंमें श्रद्धा विश्वास -- ये सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं अर्थात् ब्राह्मणजातिके कर्म हैं। जो बात स्वभावजन्य गुणोंसे कर्म विभक्त किये गये हैं इस वाक्यसे कही थी? वही यहाँ स्वभावजम् पदसे कही गयी है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.42।। व्याख्या --   शमः -- मनको जहाँ लगाना चाहें? वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें? वहाँसे हट जाय -- इस प्रकार मनके निग्रहको शम कहते हैं।दमः -- जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें? तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें? तब वहाँसे हटा लें -- इसी प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना दम है।तपः -- गीतामें शरीर? वाणी और मनके तपका वर्णन आता है (17। 14 -- 16)? उस तपको लेते हुए भी यहाँ वास्तवमें तप का अर्थ है -- अपने धर्मका पालन करते हुए जो कष्ट हो अथवा कष्ट आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहना अर्थात् कष्टके आनेपर चित्तमें प्रसन्नताका होना।शौचम् -- अपने मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदिको पवित्र रखना तथा अपने खानपान? व्यवहार आदिकी पवित्रता रखना -- इस प्रकार शौचाचारसदाचारका ठीक पालन करनेका नाम शौच है।क्षान्तिः -- कोई कितना ही अपमान करे? निन्दा करे? दुःख दे और अपनेमें उसको दण्ड देनेकी योग्यता? बल? अधिकार भी हो? फिर भी उसको दण्ड न देकर उसके क्षमा माँगे बिना ही उसको प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देनेका नाम क्षान्ति है।आर्जवम् -- शरीर? वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और मनमें छल? कपट? छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधासादापन हो? उसका नाम आर्जव है।ज्ञानम् -- वेद? शास्त्र? पुराण? इतिहास आदिका अच्छी तरह अध्ययन होना और उनके भावोंका ठीक तरहसे बोध होना तथा कर्तव्यअकर्तव्यका बोध होना ज्ञान है। विज्ञानम् -- यज्ञमें स्रुक्? स्रुवा आदि वस्तुओंका किस अवसरपर किस विधिसे प्रयोग करना चाहिये -- इसका अर्थात् यज्ञविधिका तथा अनुष्ठान आदिकी विधिका अनुभव कर लेने (अच्छी तरह करके देख लेने) का नाम विज्ञान है।आस्तिक्यम् -- परमात्मा? वेदादि शास्त्र? परलोक आदिका हृदयमें आदर हो? श्रद्धा हो और उनकी सत्यतामें कभी सन्देह न हो तथा उनके अनुसार अपना आचरण हो? इसका नाम आस्तिक्य है।ब्रह्मकर्म स्वभावजम् -- ये शम? दम आदि ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म (गुण) हैं अर्थात् इन कर्मों(गुणों)को धारण करनेमें ब्राह्मणको परिश्रम नहीं पड़ता।जिन ब्राह्मणोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है? जिनकी वंशपरम्परा परम शुद्ध है और जिनके पूर्वजन्मकृत कर्म भी शुद्ध हैं? ऐसे ब्राह्मणोंके लिये ही शम? दम आदि गुण स्वाभाविक होते हैं और उनमें किसी गुणके न होनेपर अथवा किसी गुणमें कमी होनेपर भी उसकी पूर्ति करना उन ब्राह्मणोंके लिये सहज होता है।चारों वर्णोंकी रचना गुणोंके तारतम्यसे की गयी है? इसलिये गुणोंके अनुसार उसउस वर्णमें वेवे कर्म स्वाभाविक प्रकट हो जाते हैं और दूसरे कर्म गौण हो जाते हैं। जैसे ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेसे उसमें शम? दम आदि कर्म (गुण) स्वाभाविक आते हैं तथा जीविकाके कर्म गौण हो जाते हैं और दूसरे वर्णोंमें रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता होनेसे उन वर्णोंके जीविकाके कर्म भी स्वाभाविक कर्मोंमें सम्मिलित हो जाते हैं। इसी दृष्टिसे गीतामें ब्राह्मणके स्वभावज कर्मोंमें जीविकाके कर्म न कह करके शम? दम आदि कर्म (गुण) ही कहे गये हैं। सम्बन्ध --   अब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.42।।प्रविभक्तानि कर्माण्येव प्रश्नद्वारा विविच्य दर्शयति -- कानीत्यादिना। अन्तःकरणोपशमः शमो दमो बाह्यकरणोपरतिरित्युक्तं स्मारयति -- यथेति। त्रिविधं तपः सप्तदशे दर्शितमित्याह -- तप इति। शौचमपि बाह्यान्तरभेदेन प्रागेवोक्तमित्याह -- शौचमिति। क्षमा नामाक्रुष्टस्य ताडितस्य वा मनसि विकारराहित्यं? ज्ञानं शास्त्रीयपदार्थज्ञानं? विज्ञानं शास्त्रार्थस्य स्वानुभवायत्तत्वापादनं त्रिधा व्याख्यातं स्वभावशब्दार्थमुपेत्याह -- यदुक्तमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.42।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.42।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.42।। --,शमः दमश्च यथाव्याख्यातार्थौ? तपः यथोक्तं शारीरादि? शौचं व्याख्यातम्? क्षान्तिः क्षमा? आर्जवम् ऋजुता एव च ज्ञानं विज्ञानम्? आस्तिक्यम् आस्तिकभावः श्रद्दधानता आगमार्थेषु? ब्रह्मकर्म ब्राह्मणजातेः कर्म स्वभावजम् -- यत् उक्तं स्वभावप्रभवैर्गुणैः प्रविभक्तानि इति तदेवोक्तं स्वभावजम् इति।।

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【 Verse 18.43 】

▸ Sanskrit Sloka: शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ||

▸ Transliteration: śauryaṁ tejo dhṛtir dākṣyaṁ yuddhe cāpyapalāyanam | dānamīśvarabhāvaś ca kṣātraṁ karma svabhāvajam ||

▸ Glossary: śauryaṁ: heroism; tejaḥ: power; dhṛtir: determination; dākṣyaṁ: resource- fulness; yuddhe: in battle; ca: and; api: also; apalāyanam: not fleeing; dānam: generosity; īśvara: leadership; bhāvaḥ: nature; ca: and; kṣātraṁ: kṣatriya; karma: duty; svabhāvajam: born of his own nature

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.43 Kṣatriya are characterized by their qualities of heroism, vigor, firmness, dexterity, steadfastness in battle, leadership and generosity.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.43।।शूरवीरता? तेज? धैर्य? प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता? युद्धमें कभी पीठ न दिखाना? दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.43।। शौर्य? तेज? धृति? दाक्ष्य (दक्षता)? युद्ध से पलायन न करना? दान और ईश्वर भाव (स्वामी भाव) ये सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.43 शौर्यम् prowess? तेजः splendour? धृतः firmness? दाक्ष्यम् dexterity? युद्धे in battle? च and? अपि also? अपलायनम् not fleeing? दानम् generosity? ईश्वरभावः lordliness? च and? क्षात्रम् of Kshatriyas? कर्म action? स्वभावजम् born of nature.Commentary It is the first duty of Kshatriya (man of the warrior class or of royal blood) to be brave and chivalrous. Bravery is that sublime virtue through which one is naturally strong? vigorous and courageous. In the face of the most terrible calamity the mind will not be in the least perturbed. The Kshatriya is firm under any unfavourable or trying conditions or circumstances. He does not get the least depression of spirit even when he is in adverse circumstances. It is the skill by which the reason finds out its path amidst all untoward circumstances and eventually attains its goal. This is firmness? fortitude or courage.Dakshya Promptness He is able to decide rightly on the spot in matters that deman prompt attention doing without confusion? of duties which present themselves all of a sudden and demand prompt action.As the sunflower always turns its face towards the sun so does he always face his enemies. He will ever avoid turning his back to them on the field of battle. He is absolutely fearless. Just as a tree gives away its flowers and fruits freely to whoever desires them? as the jasmine sends out its sweet fragrace in every direction? so will a Kshatriya generously give to another whatever may be asked of him. His charity is boundless.Lordliness A Kshatriya king enjoys sovereignty over his subjects owing to the sure protection he grants them? exercises ruling power over his subjects who are to be ruled? and raises the rod of chastisement to punish the unrighteous or the wicked.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.43. Heroic deed, fiery energy, firmness, dexterity, and also non-feeling form battle, giving gifts, overlordship, are the duties of the Ksatriyas, born of their nature.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.43 Valour, glory, firmness, skill, generosity, steadiness in battle and ability to rule - these constitute the duty of a soldier. They flow from his own nature.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.43 Valour, invincibility, steadiness, adroitness and non-fleeing in battle, generosity and lordliness are the duties of a Ksatriya born of his inherent nature.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.43 The natural duties of the Ksatriyas are heroism, boldness, fortitude, capability, and also not retreating from battle, generosity and lordliness.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.43 Prowess, splendour, firmness, dexterity and also not fleeing from battle, generosity and lordliness are the duties of the Kshatriyas, born of (their own) nature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.43 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.43 'Valour' is the ability of plunging into a battle without fear. 'Invincibility' is the capacity to remain undefeated by others. 'Steadiness' is the capacity to complete a work that has been started despite obstacles. 'Adroitness' is the ability in executing all works. 'Apalayana' is not fleeing in a battle though one is convinced of one's death. 'Generosity' is parting with one's own possessions to others even to its entirety. 'Lordliness' is the capacity to govern all others. This is the duty of a Ksatriya born of his inherent nature.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.43 Svabhavajam, the natural; ksatra-karma, [A variant reading is ksatram karma.-Tr.] enjoined duties of the Ksatriyas, of the Ksatriya caste; are sauryam, heroism; tejah, boldness; dhrtih, fortitude, as is seen in the case of one who is not depressed under all circumstances, being sustained by doggedness; daksyam, capability engagement without confusion in duties which suddenly present them-selves; api ca, and also; apalayanam, not retreating; yuddhe, from battle, not fleeing from enemies; danam, generosity, being free in the distribution of gifts; isvarabhavah, lordliness, manifesting (exercising) rulership over those who have to be ruled.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.43।। क्षत्रिय पुरुष में रजोगुण की प्रधानता होती है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण? किसी क्षत्रिय कुल में जन्मे व्यक्ति को ही क्षत्रिय नहीं कहते हैं। एक सच्चे क्षत्रिय पुरुष में जो गुण होते हैं? उनकी ही यहाँ गणना की गयी है। गीता में वर्णों का विभाजन मनुष्य के आन्तरिक स्वभाव एवं बाह्य आचरण के आधार पर किया गया है।शौर्य तेज से सम्पन्न व्यक्ति ही प्रजा का पालन एवं शासन करने में समर्थ होता है।धृति अपने लक्ष्य को दृढ़ता से धारण करना धृति है। मार्ग में कितने ही विघ्नों के आने पर भी अपने पथ से विचलित न होने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है? जिसे ही धृति कहते हैं।दाक्ष्य अर्थात् दक्षता। सैनिक प्रशिक्षण की भाषा में इसे सावधान का आदेश कहा जाता है। दक्षता का अर्थ है प्राप्त परिस्थिति का तत्काल और यथार्थ मल्यांकन करने की क्षमता। इसमें निर्णय के अनुसार तत्काल उसे कार्यान्वित करने की क्षमता का भी समावेश है। एक सच्चे क्षत्रिय की दक्षता अन्य लोगों के लिए ईर्ष्या का विषय बन जाती है।युद्ध से अपलायन उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न पुरुष जीवन संघर्षों में सहज ही अपनी पराजय स्वीकार नहीं कर लेता। यहाँ युद्ध शब्द का वाच्यार्थ ही नहीं लेना चाहिए। जीवन में जो भी कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं? उन सबका साहस के साथ सामना करना यहाँ अभिप्रेत है। न्याय्य लक्ष्य के विरुद्ध खड़ी होने वाली परिस्थितियों से पलायन न करना क्षत्रिय का धर्म है।दान कोई भी शासन या राजा तभी लोकप्रिय बनता है? जब वह मुक्तहस्त से दान करता है। वर्तमान समय में भी सभी प्रजातान्त्रिक राज्यों की सरकारें अपने बजट में कुछ धन की मात्रा सुरक्षित रखती हैं? जिस पर किसी प्रकार का विवाद या मतदान नहीं होता। क्षत्रिय पुरुष के कृपण होने पर उसे अपने कार्य में सफलता नहीं मिल सकती? क्योंकि उसकी सफलता उसके मित्रों एवं समर्थकों की संख्या पर निर्भर करती है। एक न्यायप्रिय क्षत्रिय को दयापूर्वक असहाय लोगों की मुक्तहस्त से सहायता करनी चाहिए।ईश्वरभाव अपनी सार्मथ्य पर दृढ़विश्वास के बिना कोई भी पुरुष शासन नहीं कर सकता। प्रजा के नेता में इतना दृढ़ आत्मविश्वास होना चाहिए कि उसके विश्वास से अन्य दुर्बल हृदय के लोगों का भी आत्मविश्वास जागृत हो उठे। इस प्रकार का ईश्वर भाव एक क्षत्रिय के लिए आवश्यक गुण है। उसकी शक्तिशाली उपस्थिति से ही आसपास के वातावरण में विद्युत् शक्ति कासा संचार हो जाना चाहिए। मात्र मुकुट या राजवस्त्रों से ही कोई पुरुष राजा नहीं बन सकता। राजमुकुट? राजवस्त्र एवं राजसिंहासन को अपने योग्य शासन का चयन कर सकने की अद्भुत कला प्राप्त है। ईश्वरभाव क्षत्रिय का सबसे प्रमुख लक्षण है।उपर्युक्त आठ गुणों को क्षात्र कर्म कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि एक क्षत्रिय पुरुष को इन गुणों को सम्पादित करके इन्हें धारण करना चाहिए। लौकिक सत्ता के धारक नेता अध्यात्म के पथ प्रदर्शक नहीं बन सकते। परन्तु एक सच्चे शासक में यह सूक्ष्म क्षमता होनी चाहिए कि वह आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को अपनी शासन प्रणाली में सम्मिलित कर सके और राष्ट्र के विविध कार्यक्षेत्रों में उन्हें व्यवहारिक रूप प्रदान कर सके।अगले श्लोक में वैश्य और शूद्र के कर्म बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.43।।ब्राह्मणस्य कर्मोदाहृत्य क्षत्रियस्य तदाह। शौर्य शूरस्य भावो विक्रमो बलवत्तरानपि प्रहर्तुं प्रवृत्तिः। तेजः प्रागल्भ्यं परैरधर्षणीयत्वम्। धृतिः धारणं यया धृत्यात्मिकया चित्तवृत्त्या सर्वावस्थासु देहेन्द्रियसंघातस्यानवसादो भवति। दक्षस्य भावो दाक्ष्यं सहसा प्रत्युपस्थितेषु कार्येषु अव्यामोहेन बोधकौशल्यम्। युद्धेचाप्यपलायनं शत्रुभ्योऽपराङ्गुखत्वं चकारात्पराङगुखस्याहननम्। दानं देयेषु वस्तुषु मुक्तहस्तता। ईश्वरभावश्च ईश्वरस्य भाव ईशितव्यान प्रति प्रभुशक्तिप्रकटीकरणम्। अनुक्तसमुच्चयार्थश्चः। क्षात्रं क्षत्रियजातेर्विहितं करम स्वभावजं स्वभावप्रभवेन सत्त्वोपसर्जनरजोगुणेन प्रविभक्तमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.43।।क्षत्रियस्य गुणस्वभावकृतानि कर्माण्याह -- शौर्यमिति। शौर्यं विक्रमो बलवत्तरानपि प्रहर्तुं प्रवृत्तिः। तेजः प्रागल्भ्यं परैरधर्षणीयत्वम्। धृतिर्महत्यामपि विपदि देहेन्द्रियसंघातस्यानवसादः। दाक्ष्यं दक्षभावः सहसा प्रत्युत्पन्नेषु कार्येष्वव्यामोहेन प्रवृत्तिः। युद्धे चाप्यपलायनमपराङ्मुखीभावः। दानमसंकोचेन वित्तेषु स्वस्वत्वपरित्यागेन परस्वत्वापादनम्। ईश्वरभावः प्रजापालनार्थमीशितव्येष्वर्थेषु प्रभुशक्तिप्रकटीकरणं च क्षत्रकर्म क्षत्रियजातेर्विहितं कर्म स्वभावजं सत्त्वोपसर्जनरजोगुणस्वभावजम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.43।।शौर्यं पराक्रमः। तेजः प्रागल्भ्यम्। धृतिर्धैर्यं। दाक्ष्यं युद्धे कौशलमुत्साहो वा। दानमौदार्यम्। ईश्वरभावः उन्मार्गवर्तिनां नियमनशक्तिः। एतत्क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.43।।क्षत्ित्रयस्याऽऽह -- शौर्यमिति। शौर्यं पराक्रमः? तेजः प्रगल्भता? धृतिर्धैर्यं? दाक्ष्यं सर्वकर्मकौशलं? युद्धे चापि अपलायनं अपराङ्मुखता। अपिशब्देन सर्वत्राऽपलायनत्वं? चकारेण द्यूतादपीति। दानं दानशीलता? च पुनः ईश्वरभावः नियमनैकस्वभावत्वम्? एतत् क्षात्त्रं कर्म क्षत्ित्रयस्य स्वभावजं स्वस्वभावाज्जातं कर्म।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.43।।क्षत्रियस्य स्वाभाविकानि कर्माण्याह -- शौर्यमिति। शौर्यं पराक्रमः? तेजः प्रागल्भ्यम्? धृतिर्धैर्यम्? दाक्ष्यं कौशलं? युद्धे चाप्यपलायनपराङ्मुखता? दानमौदार्यम्? ईश्वरभावो नियमनशक्तिः? एतत्क्षत्रियस्य स्वभावजं कर्म।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.43।।क्षत्ित्रयस्य तदाह -- शौर्यमिति। धृतिर्धैर्यमक्लैब्यमिति यावत्। युद्धे दाक्ष्यम्। ईश्वरभाव ऐश्वर्यम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.43।।शौर्यशूरवीरता? तेज दूसरोंसे न दबनेका स्वभाव? धृति -- धारणाशक्ति? जिस शक्तिसे उत्साहित हुए मनुष्यका सभी अवस्थाओंमें अनवसाद ( नाश या शोकका अभाव ) होता है? दक्षता -- सहसा प्राप्त हुए बहुतसे कार्योंमें बिना घबड़ाहटके प्रवृत्त होनेका स्वभाव तथा युद्धमें न भागनाशत्रुको पीठ न दिखानेका भाव। दान -- देनेयोग्य पदार्थोंको खुले हाथ देनेका स्वभाव और ईश्वरभाव यानी जिनका शासन करना है? उनके प्रति प्रभुत्व प्रकट करना। ये सब क्षत्रियोंके कर्म अर्थात् क्षत्रियजातिके लिये विहित उनके स्वाभाविक कर्म हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.43।। व्याख्या --   शौर्यम् -- मनमें अपने धर्मका पालन करनेकी तत्परता हो? धर्ममय युद्ध (टिप्पणी प0 928) प्राप्त होनेपर युद्धमें चोट लगने? अङ्ग कट जाने? मर जाने आदिका किञ्चिन्मात्र भी भय न हो? घाव होनेपर भी मनमें प्रसन्नता और उत्साह रहे तथा सिर कटनेपर भी पहलेजैसे ही अस्त्रशस्त्र चलाता रहे? इसका नाम शौर्य है।तेजः -- जिस प्रभाव या शक्तिके सामने पापीदुराचारी मनुष्य भी पाप? दुराचार करनेमें हिचकते हैं? जिसके सामने लोगोंकी मर्यादाविरुद्ध चलनेकी हिम्मत नहीं होती अर्थात् लोग स्वाभाविक ही मर्यादामें चलते हैं? उसका नाम तेज है।धृतिः -- विपरीतसेविपरीत अवस्थामें भी अपने धर्मसे विचलित न होने और शत्रुओंके द्वारा धर्म तथा नीतिसे विरुद्ध अनुचित व्यवहारसे सताये जानेपर भी धर्म तथा नीतिविरुद्ध कार्य न करके धैर्यपूर्वक उसी मर्यादामें चलनेका नाम धृति है।दाक्ष्यम् -- प्रजापर शासन करनेकी? प्रजाको यथायोग्य व्यवस्थित रखनेकी और उसका संचालन करनेकी विशेष योग्यता? चतुराईका नाम दाक्ष्य है।युद्धे चाप्यपलायनम् -- युद्धमें कभी पीठ न दिखाना? मनमें कभी हार स्वीकार न करना? युद्ध छोड़कर कभी,न भागना -- यह युद्धमें अपलायन है।दानम् -- क्षत्रियलोग दान करते हैं तो देनेमें कमी नहीं रखते? बड़ी उदारतापूर्वक देते हैं। वर्तमानमें दानपुण्य करनेका स्वभाव वैश्योंमें देखनेमें आता है परन्तु वैश्य लोग देनेमें कसाकसी करते हैं अर्थात् इतनेसे ही काम चल जाय तो अधिक क्यों दिया जाय -- ऐसा द्रव्यका लोभ उनमें रहता है। द्रव्यका लोभ रहनेसे धर्मका पालन करनेमें बाधा आ जाती है? कमी आ जाती है? जिससे सात्त्विक दान (गीता 17। 20) देनेमें कठिनता पड़ती है। परन्तु क्षत्रियोंमें दानवीरता होती है। इसलिये यहाँ दान शब्द क्षत्रियोंके स्वभावमें आया है।ईश्वरभावश्च -- क्षत्रियोंमें स्वाभाविक ही शासन करनेकी प्रवृत्ति होती है। लोगोंके नीति? धर्म और मर्यादाविरुद्ध आचरण देखनेपर उनके मनमें स्वाभाविक ही ऐसी बात आती है कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहें हैं और उनको नीति? धर्मके अनुसार चलानेकी इच्छा होती है। अपने शासनद्वारा सबको अपनीअपनी मर्यादाके अनुसार चलानेका भाव रहता है। इस ईश्वरभावमें अभिमान नहीं होता क्योंकि क्षत्रियजातिमें नम्रता? सरलता आदि गुण देखनेमें आते हैं। क्षात्रं कर्म स्वभावजम् -- जो मात्र प्रजाकी दुःखोंसे रक्षा करे? उसका नाम क्षत्रिय है -- क्षतात् त्रायत इति क्षत्रियः। उस क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म हैं? वे क्षात्रकर्म कहलाते हैं। सम्बन्ध --   अब वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.43।।शूरस्य भावो विक्रमो बलवत्तरानपि प्रहर्तुं प्रवृत्तिः? प्रागल्भ्यं परैरधर्षणीयत्वम्। महत्यामपि विपदि देहेन्द्रियोत्तम्भनी चित्तवृत्तिर्धृतिरिति व्याचष्टे -- सर्वावस्थास्विति। दक्षस्य भावमेव विभजते -- सहसेति। स्वभावस्तु पूर्ववत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.43।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.43।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.43।। --,शौर्यं शूरस्य भावः? तेजः प्रागल्भ्यम्? धृतिः धारणम्? सर्वावस्थासु अनवसादः भवति यया धृत्या उत्तम्भितस्य? दाक्ष्यं दक्षस्य भावः? सहसा प्रत्युत्पन्नेषु कार्येषु अव्यामोहेन प्रवृत्तिः? युद्धे चापि अपलायनम् अपराङ्मुखीभावः शत्रुभ्यः? दानं देयद्रव्येषु मुक्तहस्तता? ईश्वरभावश्च ईश्वरस्य भावः? प्रभुशक्तिप्रकटीकरणम् ईशितव्यान् प्रति? क्षात्रं कर्म क्षत्रियजातेः विहितं कर्म क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।

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【 Verse 18.44 】

▸ Sanskrit Sloka: कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ||

▸ Transliteration: kṛṣi gaurakṣya vāṇijyaṁ vaiśya-karma svabhāvajam | paricaryātmakaṁ karma śūdrasyā api śvabhāvajam ||

▸ Glossary: kṛṣi: plowing; gaurakṣyaṁ: protecting cows; vāṇijyaṁ: trade; vaiśya: vaiśyas; karma: duty; svabhāvajam: born of his own nature; paricaryā: service; at- makaṁ: nature; karma: duty; śūdrasyā: of the śūdra; api: also; svabhāvajaṁ: born of his own nature

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.44 Those who are good at cultivation, cattle rearing, and trade are known as Vaiśya. Those who are very good in service are classed as śūdra.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.44।।खेती करना? गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सबकेसब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं? तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.44।। कृषि? गौपालन तथा वाणिज्य ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं? और शूद्र का स्वाभाविक कर्म है परिचर्या अर्थात् सेवा करना।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.44 कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यम् agriculture? cattlerearing and trade? वैश्यकर्म the duties of Vaisya? स्वभावजम् born of nature? परिचर्यात्मकम् consisting of service? कर्म action? शूद्रस्य of the Sudra? अपि also? स्वभावजम् born of nature.Commentary When a man performs his duties rightly according to his caste and order of life his heart is purified and he goes to heaven. Apastambha Dharma Sutra declares? Men of severla,castes and orders? each devoted to his respective duties? reap the fruits of their actions after death? and then by the residual Karma attain to births in superior Dharma? span of life? learning? conduct? wealth? happiness and intelligence (2?2?2?3). There is a vivid description in the Puranas also of the different results and worlds which men of the four castes and orders obtain by discharging their respective duties.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.44. Ploughing, cattle-tending and trading are the actions of the Vaisyas, born of their nature. The action, in the form of

Chapter 18 (Part 23)

service, is of the Sudras, born of their nature.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.44 Agriculture, protection of the cow and trade are the duty of a trader, again in accordance with his nature. The duty of a servant is to serve, and that too agrees with his nature.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.44 Agriculture, cattle-breeding and trade are the duties of the Vaisya born of his nature৷৷. And the duty of a Sudra is one of service, born of his nature.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.44 The natural duties of the Vaisyas are agriculture, cattle-rearing and trade. Of the Sudras, too, the natural duty is in the form of service.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.44 Agriculture, cattle-rearing and trade are the duties of the Vaisya (merchant), born of (their own) nature; and action consisting of service is the duty of the Sudra (servant-class), born of (their own) nature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.44 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.44 'Agriculture' is cultivation to produce crops. The meaning of 'cattle breeding' is the protection and rearing of cattle. 'Trade' is the activity causing the amassing of wealth through buying and selling. This is the duty of Vaisya born of his inherent nature.

The duty of a Sudra, born of his inherent nature, is service to the three Orders mentioned earlier.

All these have been described to stress that the occupational activities of the four stations are auxiliary to the performance of sacrifices etc., which are ordained by the Sastra. Sacrifices etc., are common to the first three stations. Control of the senses etc., are common to those who, among the first three stations, are anxious for release. As a Brahmana possesses preponderance of Sattva, and as the control of the senses, mind etc., can be performed by him easily and naturally, control of the senses etc., have been prescribed as his duty. As control of the mind, senses etc., can be performed only with difficulty by the Ksatriyas and the Vaisyas owing to the preponderance of Rajas and Tamas respectively in them, these have not been stated as their duty. The occupation of a Brahmana is officiating as priest in sacrifices, teaching the Vedas and receiving gifts. The occupation of a Ksatriya is protecting the people and that of the Vaisyas is farming etc., as mentioned before. The duty and occupation of the Sudra is service to the three stations.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.44 Svabyavajam, the natural; vaisya-karma, duties of the Vaisyas, of the Vaisya caste; are krsi-gauraksyavanijyam, agriculture, cattle rearing and trade: Krsi is tilling of land. Orre who rears cattle (go) is goraksa; the abstract form of that word is gauraksyam, animal-huandry. Vanijyam means the occupation of a trader, consisting of buying and selling. Sudrasya, of the Sudra; api, too; svabhavajam, the natural; karma, duty; is paricaryatmakam, in the form of service. When rightly pursued, the natural result of these duties enjoined for the castes is the attainment of heaven-which act is evident from such Smrti texts as, 'People belonging to the castes and stages of life, who are true to their own duties, experience after death the fruit of their actions. And after that, as a result of the remnants of their merits they are born in some excellent region, caste and family, with greater piety, longevity, learning, conduct, wealth, happiness and intelligence' (Ap. Dh. Su. 2.2.2.3), etc. And in the Puranas also it is particularly mentioned that poeple belonging to the (different) castes and stages of life come to have specific results in the form of different worlds. But this result that is going to be stated follows from a different cause:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.44।। प्रत्येक मनुष्य में गुणों की तारतम्यता किसी विशिष्ट अनुपात में होती है और इसलिए प्रत्येक मनुष्य का अपना विशिष्ट स्वभाव भी होता है। इसी कारण एक मनुष्य जिस कार्य विशेष को कुशलतापूर्वक कर सकता है? उसी कार्य को अन्य व्यक्ति उतनी कुशलता से नहीं कर पाता। रजोगुणी क्षत्रिय को सात्त्विक ब्राह्मण के समान ध्यानाभ्यास करना संभव नहीं होता। उसी प्रकार वैश्य और शूद्र भी क्षत्रिय के शूरवीरतापूर्ण कर्मों को नहीं कर पायेंगे। सामाजिक जीवन में सर्वोच्च प्रतिष्ठा के पद तक पहुँचने के लिए सभी मनुष्यों को पूर्णत एकरूप अवसर प्राप्त नहीं हो सकते। तथापि? एक सामाजिक व्यवस्था सभी मनुष्यों को अपनेअपने स्वभाव के अनुसार विकसित हाेने के लिए तुल्य अवसर प्रदान कर सकती है। इस सिद्धांत या व्यवस्था को सफल बनाने हेतु विभिन्न व्यक्तित्व (वर्णों) के मनुष्यों के लिए भिन्नभिन्न कर्तव्यों का विधान किया गया है।वैश्य वृत्ति का पुरुष कृषि? गौपालन तथा वाणिज्य के क्षेत्र में स्फूर्ति और प्रेरणा से कार्य करके अपने दोषों से मुक्त हो सकता है। दोषमुक्ति से तात्पर्य वासनाक्षय से है। वाणिज्यादि कर्मों में उसकी स्वाभाविक अभिरुचि होती है। उसी प्रकार अर्पण की भावना से सबकी सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।प्रत्येक मनुष्य के आन्तरिक स्वभाव के अनुसार उसका वर्ण और कर्म निर्धारित किया जा सकता है। अपने स्वभाव के विपरीत कर्म में नियुक्त किये जाने पर मनुष्य न केवल उस कर्म क्षेत्र में दुर्व्यवस्था उत्पन्न करता है? वरन् अपनी स्वयं की भी हानि कर लेता है। उदाहरणार्थ यदि किसी क्षत्रिय से कहा जाये कि वह सेवाभाव पूर्वक पंखा झलने का कार्य करे? तो वह सम्भवत विनम्रता से उसे स्वीकार कर लेगा परन्तु तत्काल ही अपने स्वभाववश किसी दूसरे व्यक्ति को पंखा लाने की आज्ञा देगा इसी प्रकार यदि किसी वैश्य को मन्दिर का पुजारी बना दिया जाये? तो वह पवित्र स्थान? शीघ्र ही? किसी व्यापारिक केन्द्र से भी निम्न स्तर का बन जायेगा और यदि उसके हाथों में राजसत्ता सौंप दी जाये? तो वह अपने स्वभाव से विवश उस प्राप्त अधिकार द्वारा लाभदायक व्यापार करना प्रारम्भ कर देगा जनता इसे ही भ्रष्टाचार कहती है हम सबको आत्मनिरीक्षण के द्वारा अपना वर्ण और कर्म निर्धारित करना चाहिए। किसी भी उच्चवर्गीय पुरुष को निम्नवर्णीय मनुष्यों की ओर अनादर भाव से देखने का अधिकार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति यथाशक्ति समाज की सेवा करता है। ईश्वरार्पण की भावना से समाज की सेवा करते हुए प्रत्येक मनुष्य को आत्मविकास तथा पूर्णत्व प्राप्ति के लिए साधनारत रहना चाहिए।इसी विषय में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.44।।क्षात्रं कर्म व्युत्पाद्य वैश्यशूद्रयोस्तद्दर्शयति। कृषिर्भूमेर्विलेखनम्। गां रजतीति गोरक्षः तस्य भावो गौरक्ष्यं पाशुपाल्यम्। वाणिज्यं क्रयविक्रयादिलक्षणं वणिक्कर्म कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यजातेः कर्मस्वभावजं स्वभावप्रभवेन तमउपसर्जनरजोगुणेन प्रविभक्तम्। परिचर्यात्मकं द्विजातिशूश्रूषास्वभावं कर्म शूद्रस्य शूद्रजातेरपि स्वभावजं स्वभावप्रभवेन रजउपसर्जनतमोगुणेन प्रविभक्तमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.44।।कृषीति। कृषिरन्नोत्पत्त्यर्थं भूमेर्विलेखनम्। गोरक्षस्य भावो गौरक्ष्यं पाशुपाल्यम्। वाणिज्यं वणिजः कर्म क्रयविक्रयादिलक्षणम्। कुसीदमप्यत्रान्तर्गमनीयं वैश्यकर्म वैश्यजातेः कर्म स्वभावजं तमउपसर्जनरजोगुणस्वभावजम्। परिचर्यात्मकं द्विजातिशुश्रूषात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजं रजउपसर्जनतमोगुणस्वभावजम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.44।।वैश्यशूद्रयोः कर्माण्याह -- कृषीति। स्पष्टार्थः श्लोकः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.44।।वैश्यस्याऽऽह -- कृषीति। कृषिः कर्षणं? गोरक्ष्यं पशुपालनं? वाणिज्यं क्रयविक्रयात्मकम्? एतत् वैश्यस्य स्वभावाज्जातं कर्म। शूद्रस्याऽऽह -- परिचर्यात्मकमिति। त्रैवर्णिकसेवनात्मकं शूद्रस्यापि स्वभावजं स्वभावाज्जातं कर्म? यद्वा मत्परिचर्यात्मकं कर्म सर्वेषां पूर्वोक्तानां शूद्रस्यापीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.44।।वैश्यशूद्रयोः कर्माह -- कृषीति। कृषिः कर्षणम्? गाः रक्षतीति गोरक्षस्तस्य भावो गौरक्ष्यं पाशुपाल्यमित्यर्थः। वाणिज्यं क्रयविक्रयादि? एतद्वैश्यस्य स्वभावजं कर्म। त्रैवर्णिकपरिचर्यात्मकं शूद्रस्यापि स्वभावजं कर्म।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.44।।वैश्यशूद्रयोराह -- कृषीति। कुसीदस्य वाणिज्ये निवेशनान्न पृथगुक्तिः द्विजपरिचर्यात्मकं शूद्रस्येति मर्यादा इयं परिचर्यां भगवति कृता चेत्सर्वेषां उत्तमफलदा भवेत्यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः इति वाक्यात्। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.44।।कृषि? गोरक्षा और वाणिज्य -- भूमिमें हल चलानेका नाम कृषि है? गौओंकी रक्षा करनेवाला गोरक्ष है? उसका भाव गौरक्ष्य यानी पशुओंको पालना है तथा क्रयविक्रयरूप वणिक् कर्मका नाम वाणिज्य है ये तीनों वैश्यकर्म हैं अर्थात् वैश्यजातिके स्वाभाविक कर्म हैं। वैसे ही शूद्रका भी? परिचर्यात्मक अर्थात् सेवारूप कर्म? स्वाभाविक है। जातिके उद्देश्यसे कहे हुए इन कर्मोंका भलीप्रकार अनुष्ठान किये जानेपर स्वर्गकी प्राप्तिरूप स्वाभाविक फल होता है। क्योंकि अपने कर्मोंमें तत्पर हुए वर्णाश्रमावलम्बी मरकर? परलोकमें कर्मोंका फल भोगकर? बचे हुए कर्मफलके अनुसार श्रेष्ठ देश? काल? जाति? कुल? धर्म? आयु? विद्या? आचार? धन? सुख और मेधा आदिसे युक्त? जन्म ग्रहण करते हैं इत्यादि स्मृतिवचन हैं और पुराणमें भी वर्णाश्रमियोंके लिये अलगअलग लोकप्राप्तिरूप फलभेद बतलाया गया है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.44।। व्याख्या --   कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् -- खेती करना? गायोंकी रक्षा करना? उनकी वंशवृद्धि करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये कर्म वैश्यमें स्वाभाविक होते हैं।शुद्ध व्यापार करनेका तात्पर्य है -- जिस देशमें? जिस समय? जिस वस्तुकी आवश्यकता हो? लोगोंके हितकी भावनासे उस वस्तुको (जहाँ वह मिलती हो? वहाँसे ला करके) उसी देशमें पहुँचाना प्रजाकी आवश्यक वस्तुओंके अभावकी पूर्ति कैसे हो? वस्तुओंके अभावमें कोई कष्ट न पाये -- इस भावसे सच्चाईके साथ वस्तुओंका वितरण करना।,भगवान् श्रीकृष्ण (नन्दबाबाको लेकर) अपनेको वैश्य ही मानते हैं (टिप्पणी प0 929)। इसलिये उन्होंने स्वयं गायों और बछड़ोंको चराया। मनु महाराजने वैश्यवृत्तिमें पशूनां रक्षणम् (मनुस्मृति 1। 90) (पशुओंकी रक्षा करना) कहा है? पर यहाँ भगवान् (उपर्युक्त पदोंसे) अपने जातिभाईयोंसे मानो यह कहते हैं कि तुम लोग सब पशुओंका पालन? उनकी रक्षा न कर सको तो कमसेकम गायोंका पालन और उनकी रक्षा जरूर करना। गायोंकी वृद्धि न कर सको तो कोई बात नहीं परन्तु उनकी रक्षा जरूर करना? जिससे हमारा गोधन घट न जाय। इसलिये वैश्यसमाजको चाहिये कि वह गायोंकी रक्षामें अपना तनमनधन लगा दे? उनकी रक्षा करनेमें अपनी शक्ति बचाकर न रखे।गोरक्षासम्बन्धी विशेष बातमनुष्योंके लिये गाय सब दृष्टियोंमें पालनीय है। गायसे अर्थ? धर्म? काम और मोक्ष -- इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है। आजके अर्थप्रधान युगमें तो गाय अत्यन्त ही उपयोगी है। गोपालनसे? गायके दूध? घी? गोबर आदिसे धनकी वृद्धि होती है। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः यहाँ खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है? उतनी प्रधानता अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती है? पर खेतींमें जितना काम बैल कर सकता है? उतना भैंसा नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है? पर वह धूप सहन नहीं कर सकता। धूपमें,चलनेसे वह जीभ निकाल देता है? जब कि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता? जबकि बैलमें सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते हैं। ऐसे ही ऊँटसे भी खेती की जाती है? पर ऊँट भैंसेसे भी कम होते हैं और बहुत महँगे होते हैं। खेती करनेवाला हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल अच्छेअच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी महँगे हो गये हैं? तो भी वे ऊँटजितने महँगे नहीं हैं। यदि घरोंमें गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं? खरीदने नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं? वे खेतीमें काम नहीं आ सकते क्योंकि उनके कन्धे न होनेसे उनपर जुआ नहीं रखा जा सकता।गाय पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली हवा भी पवित्र होती है। गायके गोबरगोमूत्र भी पवित्र होते हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग? हैजा आदि भयंकर बीमारियाँ नहीं आतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता? जितना सीमेण्ट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है। गोबरमें जहर खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाहक्रिया करनेके लिये उसको गङ्गाके किनारे ले गये। वहाँपर एक साधु रहते थे। उन्होंने पूछा कि इस व्यक्तिको क्या हुआ लोगोंने कहा कि यह साँप काटनेसे मरा है।साधुने कहा कि यह मरा नहीं है? तुमलोग गायका गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने उस व्यक्तिकी नासिकाको छोड़कर उसके पूरे शरीरमें (नीचेऊपर) गोबरका लेप कर दिया। आधे घण्टेके बाद गोबरका फिर दूसरा लेप किया। इससे उस व्यक्तिके श्वास चलने लगे और वह जी उठा। हृदयके रोगोंको दूर करनेके लिये गोमूत्र बहुत उपयोगी है। छोटी बछड़ीका गोमूत्र रोज तोलादोतोला पीनेसे पेटके रोग दूर हो जाते हैं। एक सन्तको दमाकी शिकायत थी? उनको गोमूत्रसेवनसे बहुत फायदा हुआ है। आजकल तो गोबर और गोमूत्रसे अनेक रोगोंकी दवाइयाँ बनायी जा रही हैं। गोबरसे गैस भी बनने लगी है।खेतोंमें गोबरगोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है? वह भी पवित्र होता है। खेतोंमें गायोंके रहनेसे? गोबर और गोमूत्रसे जमीनकी जैसी पुष्टि होती है? वैसी पुष्टि विदेशी रासायनिक खादोंसे नहीं होती। जैसे? एक बार अंगूरकी खेती करनेवालेने बताया कि गोबरकी खाद डालनेसे अंगूरके गुच्छे जितने बड़ेबड़े होते हैं? उतने विदेशी खाद डालनेसे नहीं होते। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊशक्ति नष्ट हो जाती है। परन्तु गोबरगोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊशक्ति ज्योंकीत्यों बनी रहती है। विदेशोंमें रासायनिक खादसे बहुतसे खेत खराब हो गये हैं? जिन्हें उपजाऊ बनानेके लिये वे लोग भारतसे गोबर मँगवा रहे हैं और भारतसे गोबरके जहाज भरकर विदेशोंमें जा रहे हैं।हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं। अतः उनका दूध भी सात्त्विक होता है? जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण होती है और स्वभाव शान्ति? सौम्य होता है। विदेशी गायोंका दूध तो ज्यादा होता है? पर उन गायोंमें गुस्सा बहुत होता है। अतः उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव क्रूर होता है। भैंसका दूध भी ज्यादा होता है? पर वह दूध सात्त्विक नहीं होता। उससे सात्त्विक बल नहीं आता। सैनिकोंके घोड़ोंको गायका दूध पिलाया जाता है? जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध पिलाया? जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परन्तु जब नदी पार करनेका काम पड़ा तो वे घोड़े पानीमें बैठ गये। भैंस पानीमें बैठा करती है अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है? पर उस दूधका दही? मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट? कुत्ता? गधा आदिको अस्पृश्य बताया गया है।सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म? चूड़ाकर्म? उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका? उसके दूध? घी? गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थानशुद्धिके लिये गोबर का ही चौका लगाया जाता है। श्राद्धकर्ममें गायके दूधकी खीर बनायी जाती है। नरकोंसे,बचनेके लिये गोदान किया जाता है। धार्मिक कृत्योंमें पञ्चगव्य काममें लाया जाता है? जो गायके दूध? दही? घी? गोबर और गोमूत्र -- इन पाँचोंसे बनता है।कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही प्रधानता थी। पौष्टिक? वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध और घीका मुख्य स्थान है।निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है। गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान् श्रीकृष्णने भी बिना जूतीके गोचारणकी लीला की थी? इसलिये उनका नाम गोपाल पड़ा। प्राचीनकालमें ऋषिलोग वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध? घीसे उनकी बुद्धि प्रखर? विलक्षण होती थी? जिससे वे बड़ेबड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन ग्रन्थोंको ठीकठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूधघीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम आयु भी है। बड़ेबड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे इतिहास? पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है अगर इसी तरह गोहत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी? तब क्या दशा होगी? कितनी आफतें आयेंगी -- इसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। जब गायें खत्म हो जायेंगी? तब गोबर नहीं रहेगा और गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी। जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी खेती न होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा लोगोंको शरीरनिर्वाहके लिये अन्नजल और वस्त्र भी मिलना मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध? घी? गोबर आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी अकाल? अनावृष्टि? भूकम्प? आपसी कलह आदिके होनेमें गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना? उनको कत्लखानोंमें जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है।गायोंकी रक्षाके लिये भाईबहनोंको चाहिये कि वे गायोंका पालन करें? उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही दूधघी खायें? भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबरगैसका प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ बनायी जाएँ? दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचरभूमियाँ हैं? उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचरभूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्यानितिका विरोध किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या बन्द करे।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् -- चारों वर्णोंकी सेवा करना? सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा? अड़चन न आये? सबको सुखआराम हो -- इस भावसे अपनी बुद्धि? योग्यता? बलके द्वारा सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है।यहाँ एक शङ्का पैदा होती है कि भगवान्ने चारों वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व? रज और तम -- इन तीन गुणोंको कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ है? वहाँपर उसके अज्ञान? प्रमाद? आलस्य? निद्रा? अप्रकाश? अप्रवृत्ति और मोह -- ये सात अवगुण बताये हैं (गीता 14। 8 13। 17)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा कैसे होगी क्योंकि वह आलस्य? प्रमाद आदिमें पड़ा रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे विधान कियायदि इस शङ्कापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें जाते हैं? रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात् मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं (गीता 14। 18)। इसमें भी वास्तवमें न देखा जाय तो रजोगुणके बढ़नेपर जो मरता है? वह कर्मप्रधान मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है -- रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते (गीता 14। 15)। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यमात्र रजःप्रधान (रजोगुणकी प्रधानतावाला) है। रजःप्रधानवालोंमें जो सात्त्विक? राजस और तामस -- तीन गुण होते हैं? उन तीनों गुणोंसे ही चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। इसलिये कर्म करना सबमें मुख्य होता है और इसीको लेकर मनुष्योंको कर्मयोनि कहा गया है तथा गीतामें भी चारों वर्णोंके कर्मोंके लिये स्वभावज कर्म? स्वभावनियत कर्म आदि पद आये हैं। अतः शूद्रका परिचर्या अर्थात् सेवा करना स्वभावज कर्म है? जिसमें उसे परिश्रम नहीं होता।मनुष्यमात्र कर्मयोनि होनेपर भी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यमें विवेकविचारका विशेष तारतम्य रहता है और शुद्धि भी रहती है परन्तु शूद्रमें मोहकी प्रधानता रहनेसे उसमें विवेक बहुत दब जाता है। इस दृष्टिसे शूद्रके सेवाकर्ममें विवेककी प्रधानता न होकर आज्ञापालनकी प्रधानता रहती है -- अग्या सम न सुसाहिब सेवा (मानस 2। 301। 2)। इसलिये चारों वर्णोंकी आज्ञाके अनुसार सेवा करना? सुखसुविधा जुटा देना शूद्रके लिये स्वाभाविक होता है।शुद्रोंके कर्म परिचर्यात्मक अर्थात् सेवास्वरूप होते हैं। उनके शारीरिक? सामाजिक? नागरिक? ग्रामणिक आदि सबकेसब कर्म ठीक तरहसे सम्पन्न होते हैं? जिनसे चारों ही वर्णोंके जीवननिर्वाहके लिये सुखसुविधा? अनुकूलता और आवश्यकताकी पूर्ति होती है।स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्यचेतन जीवात्मा और जड प्रकृति -- दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न है। चेतन स्वाभाविक ही निर्विकार अर्थात् परिवर्तनरहित है और प्रकृति स्वाभाविक ही विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है। अतः इन दोनोंका स्वभाव भिन्नभिन्न होनेसे इनका सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है किंतु चेतनने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उस सम्बन्धकी सद्भावना कर ली है अर्थात् सम्बन्ध है ऐसा मान लिया है। इसीको गुणोंका सङ्ग कहते हैं? जो जीवात्माके अच्छीबुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है -- कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। इस सङ्गके कारण? गुणोंके तारतम्यसे जीवका ब्राह्मणादि वर्णमें जन्म होता है। गुणोंके तारतम्यसे जिस वर्णमें जन्म होता है? उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म स्वाभाविक? सहज होते हैं जैसे -- ब्राह्मणके लिये शम? दम आदि क्षत्रियके लिये शौर्य? तेज आदि वैश्यके लिये खेती? गौरक्षा आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये कर्म स्वतःस्वाभाविक होते हैं। तात्पर्य है कि चारों वर्णोंको इन कर्मोंको करनेमें परिश्रम नहीं होता क्योंकि गुणोंके अनुसार स्वभाव और स्वभावके अनुसार उनके लिये कर्मोंका विधान है। इसलिये इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक ही रुचि होती है। मनुष्य इन स्वाभाविक कर्मोंको जब अपने लिये अर्थात् अपने स्वार्थ? भोग और आरामके लिये करता है? तब वह उन कर्मोंसे बँध जाता है। जब उन्हीं कर्मोंको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक संसारके हितके लिये करता है? तब कर्मयोग हो जाता है? और उन्हीं कर्मोंसे सब संसारमें व्यापक परमात्माका पूजन करता है अथवा भगवत्परायण होकर केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म (जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि) करता है? तब वह भक्तियोग हो जाता है। फिर प्रकृतिके गुणोंका सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जानेपर केवल एक परमात्मतत्त्व ही रह जाता है? जिसमें सिद्ध महापुरुषके स्वरूपकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रता? अखण्डता? निर्विकारताकी अनुभूति रह जाती है। ऐसा होनेपर भी उसके शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अपनेअपने वर्ण? आश्रमकी मर्यादाके अनुसार निर्लिप्ततापूर्वक शास्त्रविहित कर्म स्वाभाविक होते हैं? जो कि संसारमात्रके लिये आदर्श होते हैं। प्रभुकी तरफ आकृष्ट होनेसे प्रतिक्षण प्रेम बढ़ता रहता है? जो अनन्त आनन्दस्वरूप है।जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे ऊँचनीच योनियोंमें जितने भी शरीर मिलते हैं? वे सब गुण और कर्मके अनुसार ही मिलते हैं। गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। अतः स्थूलशरीरकी दृष्टिसे विवाह? भोजन आदि कर्म जन्मकी प्रधानतासे ही करने चाहिये अर्थात् अपनी जाति या वर्णके अनुसार ही भोजन? विवाह आदि कर्म होने चाहिये।दूसरी बात? जिस प्राणीका सांसारिक भोग? धन? मान? आराम? सुख आदिका उद्देश्य रहता है? उसके लिये वर्णके अनुसार कर्तव्यकर्म करना और वर्णकी मर्यादामें चलना आवश्यक हो जाता है। यदि वह वर्णकी मर्यादामें नहीं चलता? तो उसका पतन हो जाता है (टिप्पणी प0 932)। परन्तु जिसका उद्देश्य केवल परमात्मा ही है? संसारके भोग आदि नहीं? उसके लिये सत्सङ्ग? स्वाध्याय? जप? ध्यान? कथा? कीर्तन? परस्पर विचारविनिमय आदि भगवत्सम्बन्धी काम मुख्य होते हैं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें प्राणीके पारमार्थिक भाव? आचरण आदिकी मुख्यता है? जाति या वर्णकी नहीं।तीसरी बात? जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्तिका है? वह भगवत्सम्बन्धी कार्योंको मुख्यतासे करते हुए भी वर्णआश्रमके अनुसार अपने कर्तव्यकर्मोंको पूजनबुद्धिसे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ ही करता है।आगे छियालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बड़ी श्रेष्ठ बात बतायी है कि जिससे सम्पूर्ण संसार पैदा हुआ है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? उस परमात्माका ही लक्ष्य रखकर? उसके प्रीत्यर्थ ही पूजनरूपसे अपनेअपने वर्णके अनुसार कर्म किये जायँ। इसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। देवता? असुर? पशु? पक्षी आदिका स्वतः अधिकार नहीं है परन्तु उनके लिये भी परमात्माकी तरफसे निषेध नहीं है। कारण कि सभी परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके सभी अधिकारी हैं। प्राणिमात्रका भगवान्पर पूरा अधिकार है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आपसके व्यवहारमें अर्थात् रोटी? बेटी और शरीर आदिके साथ बर्ताव करनेमें तो जन्म की प्रधानता है और परमात्माकी प्राप्तिमें भाव? विवेक और कर्म की प्रधानता है। इसी आशयको लेकर भागवतकारने कहा है कि जिस मनुष्यके वर्णको बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है? वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझ लेना चाहिये (टिप्पणी प0 933.1)। अभिप्राय यह है कि ब्राह्मणके शमदम आदि जितने लक्षण हैं? वे लक्षण या गुण स्वाभाविक ही किसीमें हों तो जन्ममात्रसे नीचा होनेपर भी उसको नीचा नहीं मानना चाहिये। ऐसे ही महाभारतमें युधिष्ठिर और नहुषके संवादमें आया है कि जो शूद्र आचरणोंमें श्रेष्ठ है? उस शूद्रको शूद्र नहीं मानना चाहिये और जो ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे रहित है? उस ब्राह्मणको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये (टिप्पणी प0 933.2) अर्थात् वहाँ कर्मोंकी ही प्रधानता ली गयी है? जन्मकी नहीं।शास्त्रोंमें जो ऐसे वचन आते हैं? उन सबका तात्पर्य है कि कोई भी नीच वर्णवाला साधारणसेसाधारण मनुष्य अपनी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है? इसमें संदेहकी कोई बात नहीं है। इतना ही नहीं? वह उसी वर्णमें रहता हुआ शम? दम आदि जो सामान्य धर्म हैं? उनका साङ्गोपाङ्ग पालन करता हुआ अपनी श्रेष्ठताको प्रकट कर सकता है। जन्म तो पूर्वकर्मोंके अनुसार हुआ है? इसमें वह बेचारा क्या कर सकता है परन्तु वहीं (नीच वर्णमें) रहकर भी वह अपनी नयी उन्नति कर सकता है। उस नयी उन्नतिमें प्रोत्साहित करनेके लिये ही शास्त्रवचनोंका आशय मालूम देता है कि नीच वर्णवाला भी नयी उन्नति करनेमें हिम्मत न हारे। जो ऊँचे वर्णवाला होकर भी वर्णोचित काम नहीं करता? उसको भी अपने वर्णोचित काम करनेके लिये शास्त्रोंमें प्रोत्साहित किया है जैसे -- ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।(श्रीमद्भा0 11। 17। 42) जिन ब्राह्मणोंका खानपान? आचरण सर्वथा भ्रष्ट है? उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये -- ऐसा स्मृतिमें आया है (मनु0 4। 30। 192)। परन्तु जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं? जो भगवान्के भक्त हैं? उन ब्राह्मणोंकी भागवत आदि पुराणोंमें और महाभारत? रामायण आदि इतिहासग्रन्थोंमें बहुत महिमा गायी गयी है।भगवान्का भक्त चाहे कितनी ही नीची जातिका क्यों न हो? वह भक्तिहीन विद्वान् ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है (टिप्पणी प0 933.3)।ब्राह्मणको विराट्रूप भगवान्का मुख? क्षत्रियको हाथ? वैश्यको ऊरु (मध्यभाग) और शूद्रको पैर बताया गया है। ब्राह्मणको मुख बतानेका तात्पर्य है कि उनके पास ज्ञानका संग्रह है? इसलिये चारों वर्णोंको पढ़ाना? अच्छी शिक्षा देना और उपदेश सुनाना -- यह मुखका ही काम है। इस दृष्टिसे ब्राह्मण ऊँचे माने गये।क्षत्रियको हाथ बतानेका तात्पर्य है कि वे चारों वर्णोंकी शत्रुओंसे रक्षा करते हैं। रक्षा करना मुख्यरूपसे हाथोंका ही काम है जैसे -- शरीरमें फोड़ाफुंसी आदि हो जाय तो हाथोंसे ही रक्षा की जाती है शरीरपर चोट आती हो तो रक्षाके लिये हाथ ही आड़ देते हैं? और अपनी रक्षाके लिये दूसरोंपर हाथोंसे ही चोट पहुँचायी जाती है आदमी कहीं गिरता है तो पहले हाथ ही टिकते हैं। इसलिये क्षत्रिय हाथ हो गये। अराजकता फैल जानेपर तो जन? धन? आदिकी रक्षा करना चारों वर्णोंका धर्म हो जाता है।वैश्यको मध्यभाग कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पेटमें अन्न? जल? औषध आदि डाले जाते हैं तो उनसे शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको खुराक मिलती है और सभी अवयव पुष्ट होते हैं? ऐसे ही वस्तुओंका संग्रह करना? उनका यातायात करना? जहाँ जिस चीजकी कमी हो वहाँ पहुँचाना? प्रजाको किसी चीजका अभाव न होने देना वैश्यका काम है। पेटमें अन्नजलका संग्रह सब शरीरके लिये होता है और साथमें पेटको भी पुष्टि मिल जाती है क्योंकि मनुष्य केवल पेटके लिये पेट नहीं भरता। ऐसे ही वैश्य केवल दूसरोंके लिये ही संग्रह करे? केवल अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मण आदिको दान देता है? क्षत्रियोंको टैक्स देता है? अपना पालन करता है और शूद्रोंको मेहनताना देता है। इस प्रकार वह सबका पालन करता है। यदि वह संग्रह नहीं करेगा? कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य नहीं करेगा तो क्या देगाशूद्रको चरण बतानेका तात्पर्य है कि जैसे चरण सारे शरीरको उठाये फिरते हैं और पूरे शरीरकी सेवा चरणोंसे ही होती है? ऐसे ही सेवाके आधारपर ही चारों वर्ण चलते हैं। शूद्र अपने सेवाकर्मके द्वारा सबके आवश्यक कार्योंकी पूर्ति करता है।उपर्युक्त विवेचनमें एक ध्यान देनेकी बात है कि गीतामें चारों वर्णोंके उन स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन है? जो कर्म स्वतः होते हैं अर्थात् उनको करनेमें अधिक परिश्रम नहीं पड़ता। चारों वर्णोंके लिये और भी दूसरे कर्मंका विधान है? उनको स्मृतिग्रन्थोंमें देखना चाहिये और उनके अनुसार अपने आचरण बनाने चाहिये (गीता 16। 24)।वर्तमानमें चारों वर्णोंमें गड़बड़ी आ जानेपर भी यदि चारों वर्णोंके समुदायोंको इकट्ठा करके अलगअलग समुदायमें देखा जाय तो ब्राह्मणसमुदायमें शम? दम आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। क्षत्रियसमुदायमें शौर्य? तेज आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? वैश्य और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। वैश्यसमुदायमें व्यापार करना? धनका उपार्जन करना? धनको पचाना (धनका भभका ऊपरसे न दीखने देना) आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे? उतने ब्राह्मण? क्षत्रिय और शूद्रसमुदायमें नहीं मिलेंगे। शूद्रसमुदायमें सेवा करनेकी प्रवृत्ति जितनी अधिक मिलेगी? उतनी ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्यसमुदायमें नहीं मिलेगी। तात्पर्य यह है कि आज सभी वर्ण मर्यादारहित और उच्छृङ्खल होनेपर भी उनके स्वभावज कर्म उनके समुदायोंमें विशेषतासे देखनेमें आते हैं अर्थात् यह चीज व्यक्तिगत न,दीखकर समुदायगत देखनेमें आती है।जो लोग शास्त्रके गहरे रहस्यको नहीं जानते? वे कह देते हैं कि ब्राह्मणोंके हाथमें कलम रही? इसलिये उन्होंने ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है ऐसा लिखकर ब्राह्मणोंको सर्वोच्च कह दिया। जिनके पास राज्य था? उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमलोग कुछ नहीं हैं क्या तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- नहींनहीं? ऐसी बात नहीं। आपलोग भी हैं? आपलोग दो नम्बरमें हैं। वैश्योंने ब्राह्मणोंसे कहा -- क्यों महाराज हमारे बिना कैसे जीविका चलेगी आपकी ब्राह्मणोंने कहा -- हाँ? हाँ? आपलोग तीसरे नम्बरमें हैं। जिनके पास न राज्य था? न धन था? वे ऊँचे उठने लगे तो ब्राह्मणोंने कह दिया -- आपके भाग्यमें राज्य और धन लिखा नहीं है। आपलोग तो इन ब्राह्मणों? क्षत्रियों और वैश्योंकी सेवा करो। इसलिये चौथे नम्बरमें आप लोग हैं। इस तरह सबको भुलावेमें डालकर विद्या? राज्य और धनके प्रभावसे अपनी एकता करके चौथे वर्णको पददलित कर दिया -- यह लिखनेवालोंका अपना स्वार्थ और अभिमान ही है।इसका समाधान यह है कि ब्राह्मणोंने कहीं भी अपने ब्राह्मणधर्मके लिये ऐसा नहीं लिखा है कि ब्राह्मण सर्वोपरि हैं? इसलिये उनको बड़े आरामसे रहना चाहिये? धनसम्पत्तिसे युक्त होकर मौज करनी चाहिये इत्यादि? प्रत्युत ब्राह्मणोंके लिये ऐसा लिखा है कि उनको त्याग करना चाहिये? कष्ट सहना चाहिये तपश्चर्या करनी चाहिये। गृहस्थमें रहते हुए भी उनको धनसंग्रह नहीं करना चाहिये? अन्नका संग्रह भी थोड़ा ही होना चाहिये -- कुम्भीधान्य अर्थात् एक घड़ा भरा हुआ अनाज हो? लौकिक भोगोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये? और जीवननिर्वाहके लिये किसीसे दान भी लिया जाय तो उसका काम करके अर्थात् यज्ञ? होम? जप? पाठ आदि करके ही लेना चाहिये। गोदान आदि लिया जाय तो उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये।यदि कोई ब्राह्मणको श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहे तो वह श्राद्धके पहले दिन दे? जिससे ब्राह्मण उसके पितरोंका अपनेमें आवाहन करके रात्रिमें ब्रह्मचर्य और संयमपूर्वक रह सके। दूसरे दिन वह यजमानके पितरोंका पिण्डदान? तर्पण ठीक विधिविधानसे करवाये। उसके बाद वहाँ भोजन करे। निमन्त्रण भी एक ही यजमानका स्वीकार करे और भोजन भी एक ही घरका करे। श्राद्धका अन्न खानेके बाद गायत्रीजप आदि करके शुद्ध होना चाहिये। दान लेना? श्राद्धका भोजन करना ब्राह्मणके लिये ऊँचा दर्जा नहीं है। ब्राह्मणका ऊँचा दर्जा त्यागमें है। वे केवल यजमानके पितरोंका कल्याण भावनासे ही श्राद्धका भोजन और दक्षिणा स्वीकार करते हैं? स्वार्थकी भावनासे नहीं अतः यह भी उनका त्याग ही है।ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये ऋत? अमृत? मृत? सत्यानृत और प्रमृत -- ये पाँच वृत्तियाँ बतायी हैं (टिप्पणी प0 935.1) --,(1) ऋतवृत्ति सर्वोच्च वृत्ति मानी गयी है। इसको शिलोञ्छ या कपोतवृत्ति भी कहते हैं। खेती करनेवाले खेतमेंसे धान काटकर ले जायँ? उसके बाद वहाँ जो अन्न (ऊमी? सिट्टा आदि) पृथ्वीपर गिरा पड़ा हो? वह भूदेवों (ब्राह्मणों) का होता है अतः उनको चुनकर अपना निर्वाह करना शिलोञ्छवृत्ति है अथवा धान्यमण्डीमें जहाँ धान्य तौला जाता है? वहाँ पृथ्वीपर गिरे हुए दाने भूदेवोंके होते हैं अतः उनको चुनकर जीवननिर्वाह करना कपोतवृत्ति है।(2) बिना याचना किये और बिना इशारा किये कोई यजमान आकर देता है तो निर्वाहमात्रकी वस्तु लेना अमृतवृत्ति है। इसको अयाचितवृत्ति भी कहते हैं।(3) सुबह भिक्षाके लिये गाँवमें जाना और लोगोंको वार? तिथि? मुहूर्त आदि बताकर (इस रूपमें काम करके) भिक्षामें जो कुछ मिल जाय? उसीसे अपना जीवननिर्वाह करना मृतवृत्ति है।(4) व्यापार करके जीवननिर्वाह करना सत्यानृतवृत्ति है।(5) उपर्युक्त चारों वृत्तियोंसे जीवननिर्वाह न हो तो खेती करे? पर वह भी कठोर विधिविधानसे करे जैसे -- एक बैलसे हल न चलाये? धूपके समय हल न चलाये आदि? यह प्रमृतवृत्ति है।उपर्युक्त वृत्तियोंमेंसे किसी भी वृत्तिसे निर्वाह किया जाय? उसमें पञ्चमहायज्ञ? अतिथिसेवा करके यज्ञशेष भोजन करना चाहिये (टिप्पणी प0 935.2)।श्रीमद्भगवद्गीतापर विचार करते हैं तो ब्राह्मणके लिये पालनीय जो नौ स्वाभाविक धर्म बताये गये हैं? उनमें जीविका पैदा करनेवाला एक भी धर्म नहीं है। क्षत्रियके लिये सात स्वाभाविक धर्म बताये हैं। उनमें युद्ध करना और शासन करना -- ये दो धर्म कुछ जीविका पैदा करनेवाले हैं। वैश्यके लिये तीन धर्म बताये हैं -- खेती? गोरक्षा और व्यापार ये तीनों ही जीविका पैदा करनेवाले हैं। शूद्रके लिये एक सेवा ही धर्म बताया है? जिसमें पैदाहीपैदा होती है। शूद्रके लिये खानपान? जीवननिर्वाह आदिमें भी बहुत छूट दी गयी है।भगवान्ने स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः (गीता 18। 45) पदोंसे कितनी विचित्र बात बतायी है कि शम? दम आदि नौ धर्मोंके पालनसे ब्राह्मणका जो कल्याण होता है? वही कल्याण शौर्य? तेज आदि सात धर्मोंके पालनसे क्षत्रियका होता है? वही कल्याण खेती? गोरक्षा और व्यापारके पालनसे वैश्य होता है और वही कल्याण केवल सेवा करनेसे शूद्रका हो जाता है।आगे भगवान्ने एक विलक्षण बात बतायी है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र अपनेअपने वर्णोचित कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके परम सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं -- स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (18। 46)। वास्तवमें कल्याण वर्णोचित कर्मोंसे नहीं होता? प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक पूजनसे ही होता है। शूद्रका तो स्वाभाविक कर्म ही परिचर्यात्मक अर्थात् पूजनरूप है अतः उसका पूजनके द्वारा पूजन होता है अर्थात् उसके द्वारा दुगुनी पूजा होती है इसलिये उसका कल्याण जितनी जल्दी होगा? उतनी जल्दी ब्राह्मण आदिका नहीं होगा।शास्त्रकारोंने उद्धार करनेमें छोटेको ज्यादा प्यार दिया है क्योंकि छोटा प्यारका पात्र होता है और बड़ा अधिकारका पात्र होता है। बड़ेपर चिन्ताफिक्र ज्यादा रहती है? छोटेपर कुछ भी भार नहीं रहता। शूद्रको भाररहित करके उसकी जीविका बतायी गयी है और प्यार भी दिया गया है।वास्तवमें देखा जाय तो जो वर्णआश्रममें जितना ऊँचा होता है? उसके लिये शास्त्रोंके अनुसार उतने ही कठिन नियम होते हैं। उन नियमोंका साङ्गोपाङ्ग पालन करनेमें कठिनता अधिक मालूम देती है। परन्तु जो वर्णआश्रममें नीचा होता है? उसका कल्याण सुगमतासे हो जाता है। इस विषयमें विष्णुपुराणमें एक कथा आती है -- एक बार बहुतसे ऋषिमुनि मिलकर श्रेष्ठताका निर्णय करनेके लिये भगवान् वेदव्यासजीके पास गये। व्यासजीने सबको आदरपूर्वक बिठाया और स्वयं गङ्गामें स्नान करने चले गये। गङ्गामें स्नान करते हुए उन्होंने कहा -- कलियुग? तुम धन्य हो स्त्रियों? तुम धन्य हो शूद्रों? तुम धन्य हो जब व्यासजी स्नान करके ऋषियोंके पास आये तो ऋषियोंने कहा -- महाराज आपने कलियुग? स्त्रियों और शूद्रोंको धन्यवाद कैसे दिया तो उन्होंने कहा कि कलियुगमें अपने धर्मका पालन करनेसे स्त्रियाँ और शूद्रोंका कल्याण जल्दी और सुगमतापूर्वक हो जाता है।यहाँ एक और बात सोचनेकी है कि जो अपने स्वार्थका काम करता है? वह समाजमें और संसारमें आदरका पात्र नहीं होता। समाजमें ही नहीं? घरमें भी जो व्यक्ति पेटू और चट्टू होता है? उसकी दूसरे निन्दा करते हैं। ब्राह्मणोंने स्वार्थदृष्टिसे अपने ही मुँहसे अपनी (ब्राह्मणोंकी) प्रशंसा? श्रेष्ठताकी बात नहीं कही है। उन्होंने,ब्राह्मणोंके लिये त्याग ही बताया है। सात्त्विक मनुष्य अपनी प्रशंसा नहीं करते? प्रत्युत दूसरोंकी प्रशंसा? दूसरोंका आदर करते हैं। तात्पर्य है कि ब्राह्मणोंने कभी अपने स्वार्थ और अभिमानकी बात नहीं कही। यदि वे स्वार्थ और अभिमानकी बात कहते तो वे इतने आदरणीय नहीं होते? संसारमें और शास्त्रोंमें आदर न पाते। वे जो आदर पाते हैं? वह त्यागसे ही पाते हैं।इस प्रकार मनुष्यको शास्त्रोंका गहरा अध्ययन करके उपर्युक्त सभी बातोंको समझना चाहिये और ऋषिमुनियोंपर? शास्त्रकारोंपर झूठा आक्षेप नहीं करना चाहिये।ऊँचनीच वर्णोंमें प्राणियोंका जन्म मुख्यरूपसे गुणों और कर्मोंके अनुसार होता है -- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गीता 4। 13) परन्तु ऋणानुबन्ध? शाप? वरदान? सङ्ग आदि किसी कारणविशेषसे भी ऊँचनीच वर्णोंमें जन्म हो जाता है। उन वर्णोंमें जन्म होनेपर भी वे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार ही आचरण करते हैं। यही कारण है कि ऊँचे वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी उनके नीच आचरण देखे जाते हैं? जैसे धुन्धुकारी आदि और नीच वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी वे महापुरुष होते हैं? जैसे विदुर? कबीर? रैदास आदि।आज जिस समुदायमें जातिगत? कुलपरम्परागत? समाजगत और व्यक्तिगत जो भी शास्त्रविपरीत दोष आये हैं? उनको अपने विवेकविचार? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदिके द्वारा दूर करके अपनेमें स्वच्छता? निर्मलता? पवित्रता लानी चाहिये? जिससे अपने मनुष्यजन्मका ध्येय सिद्ध हो सके। सम्बन्ध --   स्वभावज कर्मोंका वर्णन करनेका प्रयोजन क्या है -- इसको अब आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.44।।वैश्यशूद्रयोः कर्म विवक्षयानुवदति -- कृषीति। स्पष्टार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.44।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.44।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.44।। --,कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं कृषिश्च गौरक्ष्यं च वाणिज्यं च कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यम्? कृषिः भूमेः विलेखनम्? गौरक्ष्यं गाः रक्षतीति गोरक्षः तस्य भावः गौरक्ष्यम्? पाशुपाल्यम् इत्यर्थः? वाणिज्यं वणिक्कर्म क्रयविक्रयादिलक्षणं वैश्यकर्म वैश्यजातेः कर्म वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं शुश्रूषास्वभावं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।एतेषां जातिविहितानां कर्मणां सम्यगनुष्ठितानां स्वर्गप्राप्तिः फलं स्वभावतः? वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायुःश्रुतवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते इत्यादिस्मृतिभ्यः (आ. स्मृ. 2।2।2।3) पुराणे च वर्णिनाम् आश्रमिणां च लोकफलभेदविशेषस्मरणात्। कारणान्तरात्तु इदं वक्ष्यमाणं फलम् --,

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【 Verse 18.45 】

▸ Sanskrit Sloka: स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: | स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||

▸ Transliteration: sve sve karmaṇy abhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ | svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ||

▸ Glossary: sve: own; sve: own; karmaṇi: in work; abhirataḥ: following; saṁsiddhiṁ: per- fection; labhate: achieves; naraḥ: a man; svakarma: by his own duty; nirataḥ: engaged; siddhiṁ: perfection; yathā: as; vindati: attains; tat: that; śṛṇu: listen

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.45 One can attain the highest perfection by devotion to one’s natural work. Listen to Me how one attains perfection while engaged in one’s natural work.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.45।।अपनेअपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि(परमात्मा)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.45।। अपनेअपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.45 स्वे in own? स्वे in own? कर्मणि to duty? अभिरतः devoted? संसिद्धिम् perfection? लभते attains? नरः a man? स्वकर्मनिरतः engaged in his own duty? सिद्धिम् perfection? यथा how? विन्दति finds? तत् that? श्रृणु hear.Commentary This is the division of labour for which each caste is fitted according to its own nature. The duty prescribed is your sole support? and the highest service you can render to the Supreme is to carry it out wholeheartedly? without expectation of fruits? with the attitutde of dedication to the Lord. This will surely lead you to the Supreme. All the impurities of the mind will be washed away by the performance of ones own duty and you will be fit for Selfknowledge.Sve sve karmani Each devoted to his own duty in accordance with his nature (Guna) or caste. It is impossible to attain Moksha by works alone but works purify the heart and prepare the aspirant for receiving the divine light.The attitude of worshipfulness is prescribed for work

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.45. A man, devoted to his own respective action, attains success. Devoted to one's own action, how one attains success that you must hear from Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.45 Perfection is attained when each attends diligently to his duty. Listen and I will tell you how it is attained by him who always minds his own duty.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.45 Devoted to his duty, man attains perfection. Hear now how one devoted to his own duty attains perfection.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.45 Being devoted to his own duty, man attains complete success. Hear that as to how one devoted to his own duty achieves success.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.45 Each man devoted to his own duty attains perfection. How he attains perfection while being engaged in his own duty, hear now.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.45 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.45 When one is devoted to his own duty in a way mentioned earlier, he attains perfection i.e., the supreme state. When a person is devoted to his duty, how he attains perfection, i.e., attains the supreme state, listen.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.45 Sve sve karmani abhiratah, being devoted to his own duty, which has different characteristics as stated above; narah, man, the person alified therefor; labhate, attains; samsiddhim, complete success, characterized as the ability for steadfastness in Knowledge, which follows from the elimination of the impurities of body and mind as a result of fulfilling his own duty. Does the complete success follow merely from the fulfilment of one's own duty? No. How then? Srnu, hear; tat, that; yatha, as to how, through what means;

Chapter 18 (Part 24)

sva-karma-niratah, one devoted to his own duty; vindati, acheives; siddim, success.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.45।। अपने स्वभाव एवं विकास की स्थिति को पहचान कर प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वाभाविक कर्म का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। इसी कर्तव्य पालन से प्रथम चित्तशुद्धि एवं तदुपरान्त परमात्मस्वरूप की अनुभूति की संसिद्धि प्राप्त हो सकती है।केवल सतही दृष्टिकोण से अवलोकन करने पर मनुष्यों का उपर्युक्त चतुर्विध वर्गीकरण स्पष्टत बोधगम्य नहीं हो सकता। परन्तु जीवन में श्रेष्ठ उपलब्धियों को प्राप्त किये महान् पुरुषों के जीवन चरित्र इस वर्गीकरण की सत्यता का बारम्बार उद्घोष करते हैं। एक छोटे से बालक ने भेड़ पालन के कार्य को अस्वीकार कर दिया और पेरिस जा पहुँचा? जो कालान्तर में विश्व में नेपोलियन के नाम से प्रसिद्ध महानतम सेनापति बना। गोल्डस्मिथ या कीट्स व्यापारिक कार्य द्वारा आराम एवं सुखसुविधाओं का जीवन जीने की अपेक्षा किसी अटारी में रहते हुए काव्य रचना करना अधिक पसन्द करेगा। प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुरूप कार्यक्षेत्र में कर्म करते हुए ही सुख एवं पूर्णता का अनुभव करता है।मानव के लौकिक व्यवहार? मानसिक स्वभाव एवं बौद्धिक अभिरुचि के आधार पर किया गया यह विवकपूर्ण वर्गीकरण केवल भारत में ही नहीं? वरन् सर्वत्र प्रयोज्य (लागू करने योग्य) है। जीवन में इसकी प्रयोज्यता तथा मनुष्य के विकास के लिए इसकी उपादेयता सार्वभौमिक है।अब भगवान् श्रीकृष्ण सिद्धि प्राप्ति की साधना बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.45।।एतेषां जातिविहितानां कर्मणां सभ्यगनुतिष्ठानां मोक्षापेक्षामन्तरेण विहितत्वादेवानुष्ठानात्स्वर्गप्राप्तिः फलंसर्व एते पुण्यलोका भवन्ति वर्णा आश्रमाः स्वकर्मनिष्ठाः प्रत्येकं कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायुःश्रुतवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्तेयस्तु सभ्यक्करोत्येतं गृहस्थः परमं विधम्। तद्वर्णबन्धमुक्तोऽसौ लोकानाप्नोत्यनुत्तमान्। यस्त्वेतां नियतं चर्यां वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः। स दहत्यग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च,शाश्वतान्। मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितबुद्धियुक्तः। अर्निधनं ज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः इत्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणेभ्यः। एतेषामेव मोक्षापेक्षया सभ्यगनुष्ठितानां यत्फलं तद्वक्तुभारभते। स्वेस्वे यथोक्तभेदे कर्मम्यभिरतः तत्परोऽधिकृतः पुरुषः संसिद्धिं स्वकर्मानुष्ठानादशुद्धिक्षये सति कायेन्द्रियमनसां ज्ञानानिष्ठायोग्यतालक्षणां लभते प्राप्नोति। कथं लभते इत्यपेक्षायामाह -- स्वकर्मनिरतः यथा येन प्रकारेण सिद्धिमुक्तलक्षणां विन्दति लभते तत्तथा श्रुणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.45।।तदेवं वर्णानां स्वभावजा गौणाख्या गुणधर्मा अभिहिताः। अन्येऽपि धर्माः शास्त्रेष्वाम्नाताः। तदुक्तं भविष्यपुराणेधर्माच्छ्रेयः समुद्दिष्टं श्रेयोऽभ्युदयलक्षणम्। स तु पञ्चविधः प्रोक्तो वेदमूलः सनातनः।।वर्णधर्मः स्मृतस्त्वेक आश्रमाणामतः परम्। वर्णाश्रमस्तृतीयस्तु गौणो नैमित्तिकस्तथा।।वर्णत्वमेकमाश्रित्य यो धर्मः संप्रवर्तते। वर्णधर्मः स उक्तस्तु यथोपनयनं नृप।।यस्त्वाश्रमं समाश्रित्य अधिकारः प्रवर्तते। स खल्वाश्रमधर्मः स्याद्भिक्षादण्डादिको यथा।।वर्णत्वमाश्रमत्वं च योऽधिकृत्य प्रवर्तते। स वर्णाश्रमधर्मस्तु मौञ्ज्याद्या मेखला यथा।।यो गुणेन प्रवर्तेत गुणधर्मः स उच्यते। यथा मूर्धाभिषिक्तस्य प्रजानां परिपालनम्।।निमित्तमेकमाश्रित्य यो धर्माः संप्रवर्तते। नैमित्तिकः स विज्ञेयः प्रायश्चित्तविधिर्यथा।। अधिकारोऽत्र धर्मः। चतुर्विधं धर्ममाह हारीतःअथाश्रमिणां धर्मः पृथग्धर्मो विशेषधर्मः समानधर्मः कृत्स्नधर्मश्चेति। पृथगाश्रमानुष्ठानात्पृथग्धर्मो यथा चातुर्वर्ण्यधर्मः स्वाश्रमविशेषानुष्ठानात्? विशेषधर्मो यथा नैष्ठिकयायावरानुज्ञापिकचातुराश्रम्यसिद्धानां सर्वेषां यः समानो धर्मः स समानधर्मो नैष्ठिकः कृत्स्नधर्म इति। नैष्ठिको ब्रह्मचारिविशेषः। यायावरो गृहस्थविशेषः। आनुज्ञापिको वानप्रस्थविशेषः। चातुराश्रम्यसिद्धो यतिविशेषः सर्वेषामिति वर्णानामाश्रमाणां च।।तत्राद्यो यथा महाभारतेआनृशंस्यमहिंसा चाप्रमादः संविभागिता। श्राद्धकर्मातिथेयं च सत्यमक्रोध एव च।।स्वेषु दारेषु संतोषः शौचं नित्याऽनसूयता। आत्मज्ञानं तितिक्षा च धर्मः साधारणो नृप।। सर्वाश्रमसाधारणस्तु प्रागुदाहृतः। निष्ठा संसारसमाप्तिस्तत्प्रयोजनो नैष्ठिकः। मोक्षहेत्वात्मज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकपरिहाराय निष्कामकर्मानुष्ठानं कृत्स्नधर्म इत्यर्थः। आश्रमाश्च शास्त्रेषु चत्वार आम्नाताः। यथाह गौतमःतस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवते ब्रह्मचारी गृहस्थो भिक्षुर्वैखानस इति। आपस्तम्बःचत्वार आश्रमा गार्हस्थ्यमाचार्यकुलं मौनं वानप्रस्थ्यमिति तेषु सर्वेषु यथोपदेशमव्यग्रो वर्तमानः क्षेमं गच्छति इति। वसिष्ठःचत्वार आश्रमा ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थपरिव्राजकास्तेषां वेदमधीत्य वेदौ वेदान्वाऽविशीर्णब्रह्मचर्यो यमिच्छेत्तमावसेदिति। एवं तेषां पृथग्धर्मा अप्याम्नाताः। तथा फलमप्यज्ञानामाम्नातम्। यथाह मनुःश्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन्हि मानवः। इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम्।।अनुत्तमं सुखमिति यथाप्राप्ततत्तत्फलोपलक्षणार्थम्। आपस्तम्बःसर्ववर्णानां स्वधर्मानुष्ठाने परमपरिमितं सुखं ततः परिवृत्तौ कर्मफलशेषेण जातिं रूपं वर्णं वृत्तं मेधां प्रज्ञां द्रव्याणि धर्मानुष्ठानमिति प्रतिपद्यन्ते। गौतमःवर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुःश्रुतवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते विष्वञ्चो विपरीता नश्यन्ति। अत्र शेषशब्देन भुक्तज्योतिष्टोमादिकर्मातिरिक्तं चित्रादिकर्मानुशयशब्दितमुच्यते नतु पूर्वकर्मण एकदेश इति स्थितम्।कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवंच इत्यत्र भट्टैरप्युक्तम्। गौतमीयेऽपितच्छेषस्तस्माच्चित्राद्यपेक्षयेति। विष्वञ्चः सर्वतोगामिनो यथेष्टचेष्टा विपरीता नरकादौ जन्म प्रतिपद्य विनश्यन्ति कृमिकीटादिभावेन सर्वपुरुषार्थेभ्यो भ्रंशन्त इत्यर्थः। हारीतःकाम्यैः केचिद्यज्ञदानैस्तपोभिर्लब्ध्वा लोकान्पुनरायान्ति जन्म। कामैर्मुक्ताः सत्ययज्ञाः सुदानास्तपोनिष्ठाश्चाक्षयान्यान्ति लोकान्।। अत्र कामनासदसद्भावनिबन्धनः फलभेदो दर्शितः भविष्यपुराणेफलं विनाप्यनुष्ठानं नित्यानामिष्यते स्फुटम्। काम्यानां स्वफलार्थं तु दोषघातार्थमेव तु।।नैमित्तिकानां करणे त्रिविधं कर्मणां फलम्। क्षयं केचिदुपात्तस्य दुरितस्य प्रचक्षते।।अनुत्पत्तिं तथा चान्ये प्रत्यवायस्य मन्वते। नित्यं क्रियां तथा चान्ये आनुषङ्गिफलं विदुः।। अन्ये आपस्तम्बादयः।तद्यथाऽम्रे फलार्थे निमिते इत्यादिवचनैरानुषङ्गिकफलतां नित्यकर्मणो विदुः। श्रुतिश्चत्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचर्यादाचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्निति गृहस्थवानप्रस्थब्रह्मचारिण उक्त्वासर्व एते पुण्यलोका भवन्ति इति तेषामन्तःकरणशुद्ध्यभावे मोक्षाभावमुक्त्वा शुद्धान्तःकरणानामेषामेव परिव्राजकभावेन ज्ञाननिष्ठया मोक्षमाह ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेतीति। तदेवं स्थिते ब्रह्मचारी गृहस्थो वानप्रस्थो वा मुमुक्षुः फलाभिसन्धित्यागेन भगवदर्पणबुद्ध्या स्वे स्वे तत्तद्वर्णाश्रमविहिते नतु स्वेच्छामात्रकृते कर्मणि श्रुतिस्मृत्युदितेऽभिरतः सम्यगनुष्ठानपरः संसिद्धिं देहेन्द्रियसंघातस्याशुद्धिक्षयेन सम्यग्ज्ञानोत्पत्तियोग्यतां लभते नरो वर्णाश्रमाभिमानी,मनुष्यो मनुष्याधिकारत्वात्कर्मकाण्डस्य। देवादीनां वर्णाश्रमाभिमानित्वाभावाद्युक्तएव तद्धर्मेष्वनधिकारः। वर्णाश्रमाभिमानानपेक्षे तूपासनादावधिकारस्तेषामप्यस्तीति साधितं देवताधिकरणे। ननु बन्धहेतूनां कर्मणां कथं मोक्षहेतुत्वमुपासनाविशेषादित्याह -- स्वकर्मनिरतः सिद्धिमुक्तलक्षणां यथा येन प्रकारेण विन्दति तच्छृणु। श्रुत्वा तं प्रकारमवधारयेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.45।।कर्मप्रविभागफलमाह -- स्वे स्वे इति। स्वे स्वे मन्वादिभिरुक्तेऽध्यापनादौ असाधारणे शमदमादौ साधारणे च कर्मणि अभिरतो निष्ठावन् संसिद्धिं ज्ञानयोग्यतां लभते नरः। एतदेव विवरीतुं प्रतिजानीते -- स्वेति। सिद्धिं वक्ष्यमाणां मुख्यसंन्यासलक्षणां नैष्कर्म्यसिद्धिं यथा येन प्रकारेण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.45।।यदर्थं कर्म निरूपितं तदाह -- स्वे स्व इति। स्वे स्वे स्वस्वविहिते कर्मणि अभिरतः प्रीतियुक्तो नरो मनुष्यः संसिद्धिं सम्यक् सिद्धिं मत्प्रसादात्मिकां लभते प्राप्नोति। ननु प्रीतिमात्रेण कथं सिद्धिः इत्यत आह -- स्वकर्मेति सार्द्धेन। स्वकर्मनिरतः स्वविहितकर्मनिष्ठो यथा येन प्रकारेण सिद्धिं विन्दति जानाति तं प्रकारं शृणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.45।।एवंभूतस्य ब्राह्मणादिकर्मणो ज्ञानहेतुत्वमाह -- स्वे स्व इति। स्वस्वाधिकारविहितकर्मण्यभिरतः परिनिष्ठितो नरः संसिद्धिं ज्ञानयोग्यतां लभते। कर्मणां ज्ञानप्राप्तिप्रकारमाह -- स्वकर्मेति सार्धेन। स्वकर्मपरिनिष्ठितो यथा येन प्रकारेण तत्त्वज्ञानं लभते तं प्रकारं श्रृणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.45।।एवंविधस्य स्वस्वकर्मणः स्वसंसिद्धिहेतुत्वमाह -- स्वे स्व इत्यर्द्धेन। अनेन परधर्मो व्यावर्त्तितः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.45।।परंतु दूसरे कारणसे ( उनका प्रकारान्तरसे अनुष्ठान करनेपर ) यह अब बतलाया जानेवाला फल होता है --, कर्माधिकारी मनुष्य? उक्त लक्षणोंवाले अपनेअपने कर्मोंमें अभिरत -- तत्पर हुआ? संसिद्धि लाभ करता है अर्थात अपने कर्मो का अनुष्ठान करनेसे अशुद्धिका क्षय होनेपर? शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है। तो क्या अपने कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे ही साक्षात् संसिद्धि मिल जाती है नहीं। तो किस तरह मिलती है अपने कर्मोंमें तत्पर हुआ मनुष्य? जिस प्रकार सिद्धि लाभ करता है? वह तू सुन।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.45।। व्याख्या --   स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः -- गीताके अध्ययनसे ऐसा मालूम होता है कि मनुष्यकी जैसी स्वतःसिद्ध स्वाभाविक प्रकृति (स्वभाव) है? उसमें अगर वह कोई नयी उलझन पैदा न करे? रागद्वेष न करे तो वह प्रकृति उसका स्वाभाविक ही कल्याण कर दे। तात्पर्य है कि प्रकृतिके द्वारा प्रवाहरूपसे अपनेआप होनेवाले जो स्वाभाविक कर्म हैं? उनका स्वार्थत्यागपूर्वक प्रीति और तत्परतासे आचरण करे परन्तु कर्मोंके प्रवाहके साथ न राग हो? न द्वेष हो और न फलेच्छा हो। रागद्वेष और फलेच्छासे रहित होकर क्रिया करनेसे करनेका वेग शान्त हो जाता है और कर्ममें आसक्ति न होनेसे नया वेग पैदा नहीं होता। इससे प्रकृतिके पदार्थों और क्रियाओँके साथ निर्लिप्तता (असंगता) आ जाती है। निर्लिप्तता होनेसे प्रकृतिकी क्रियाओंका प्रवाह स्वाभाविक ही चलता रहता है और उनके साथ अपना कोई सम्बन्ध न रहनेसे साधककी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है? जो कि प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभिवक है। अपने स्वरूपमें स्थिति होनेपर उसका परमात्माकी तरफ स्वाभाविक आकर्षण हो जाता है। परन्तु यह सब होता है कर्मोंमें अभिरति होनेसे? आसक्ति होनेसे नहीं।कर्मोंमें एक तो अभिरति होती है और एक आसक्ति होती है। अपने स्वाभाविक कर्मोंको केवल दूसरोंके हितके लिये तत्परता और उत्साहपूर्वक करनेसे अर्थात् केवल देनेके लिये कर्म करनेसे मनमें जो प्रसन्नता होती है? उसका नाम अभिरति है। फलकी इच्छा से कुछ करना अर्थात् कुछ पानेके लिये कर्म करना आसक्ति है। कर्मोंमें अभिरतिसे कल्याण होता है और आसक्तिसे बन्धन होता है।इस प्रकरणके स्वे स्वे कर्मणि? स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य? स्वभावनियतं कर्म? सहजं कर्म आदि पदोंमें कर्म शब्द एकवचनमें आया है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य प्रीति और तत्परतापूर्वक चाहे एक कर्म करे? चाहे अनेक कर्म करे? उसका उद्देश्य केवल परमात्मप्राप्ति होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक ही होती है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको लेकर मनुष्य जितने भी कर्म करता है? वे सब कर्म अन्तमें उसी उद्देश्यमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् उसी उद्देश्यकी पूर्ति करनेवाले हो जाते हैं। जैसे गङ्गाजी हिमालयसे निकलकर गङ्गासागरतक जाती हैं तो नद? नदियाँ? झरने? सरोवर? वर्षका जल -- ये सभी उसकी धारामें मिलकर गङ्गासे एक हो जाते हैं? ऐसे ही उद्देश्यवालेके सभी कर्म उसके उद्देश्यमें मिल जाते हैं। परन्तु जिसकी कर्मोंमें आसक्ति है? वह एक कर्म करके अनेक फल चाहता है अथवा अनेक कर्म करके एक फल चाहता है अतः उसका उद्देश्य एक परमात्माकी प्राप्तिका न होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक नहीं होती (गीता 2। 41)।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु -- अपने कर्मोंमें प्रीतिपूर्वक तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य परमात्माको जैसे प्राप्त होता है? वह सुनो अर्थात् कर्ममात्र परमात्मप्राप्तिका साधन है? इस बातको सुनो और सुन करके ठीक तरहसे समझो।विशेष बातमालिककी सुखसुविधाकी सामग्री जुटा देना? मालिकके दैनिक कार्योंमें अनुकूलता उपस्थित कर देना आदि कार्य तो वेतन लेनेवाला नौकर भी कर सकता है और करता भी है। परन्तु उसमें क्रिया की (कि इतना काम करना है) और समय की (कि इतने घंटे काम करना है) प्रधानता रहती है। इसलिये वह कामधंधा सेवा नहीं बन सकता। यदि मालिकका वह कामधन्धा आदरपूर्वक सेव्यबुद्धिसे? महत्त्वबुद्धिसे किया जाय तो वह सेवा हो जाता है।सेव्यबुद्धि? महत्त्वबुद्धि चाहे जन्मके सम्बन्धसे हो? चाहे विद्याके सम्बन्धसे चाहे वर्णआश्रमके सम्बन्धसे हो चाहे योग्यता? अधिकार? सद्गुणसदाचारके सम्बन्धसे। जहाँ महत्त्वबुद्धि हो जाती है? वहाँ सेव्यको सुखआराम कैसे मिले सेव्यकी प्रसन्नता किस बातमें है सेव्यका क्या रुख है क्या रुचि है -- ऐसे भाव होनेसे जो भी काम किया जाय? वह सेवा हो जाता है।सेव्यका वही काम पूजाबुद्धि? भगवद्बुद्धि? गुरुबुद्धि आदिसे किया जाय और पूज्यभावसे चन्दन लगाया जाय? पुष्प चढ़ाये जायँ? माला पहनायी जाय? आरती की जाय? तो वह काम पूजन हो जाता है। इससे सेव्यके चरणस्पर्श अथवा दर्शनमात्रसे चित्तकी प्रसन्नता? हृदयकी गद्गदता? शरीरका रोमाञ्चित होना आदि होते हैं और सेव्यके प्रति विशेष भाव प्रकट होते हैं। उससे सेव्यकी सेवामें कुछ शिथिलता आ सकती है परन्तु भावोंके बढ़नेपर अन्तःकरणशुद्धि? भगवत्प्रेम? भगवद्दर्शन आदि हो जाते हैं।मालिकका समयसमयपर कामधंधा करनेसे नौकरको पैसे मिल जाते हैं और सेव्यकी सेवा करनेसे सेवकको अन्तःकरणशुद्धिपूर्वक भगवत्प्राप्ति हो जाती है परन्तु पूजाभावके बढ़नेसे तो पूजकको तत्काल भगवत्प्राप्ति हो जाती है। तात्पर्य है कि चरणचाँपी तो नौकर भी करता है? पर उसको सेवाका आनन्द नहीं मिलता क्योंकि उसकी दृष्टि पैसोंपर रहती है। परन्तु जो सेवाबुद्धिसे चरणचाँपी करता है? उसको सेवामें विशेष आनन्द मिलता है क्योंकि उसकी दृष्टि सेव्यके सुखपर रहती है। पूजामें तो चरण छूनेमात्रसे शरीर रोमाञ्चित हो जाता है और अन्तःकरणमें एक पारमार्थिक आनन्द होता है। उसकी दृष्टि पूज्यकी महत्तापर और अपनी लघुतापर रहती है। ऐसे देखा जाय तो नौकरके कामधंधेसे मालिकको आराम मिलता है? सेवामें सेव्यको विशेष आराम तथा सुख मिलता है और पूजामें पूजकके भावसे पूज्यको प्रसन्नता होती है। पूजामें शरीरके सुखआरामकी प्रधानता नहीं होती।अपने स्वभावज कर्मोंके द्वारा पूजा करनेसे पूजकका भाव बढ़ जाता है तो उसके स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरसे होनेवाली (चेष्टा? चिन्तन? समाधि आदि) सभी छोटीबड़ी क्रियाएँ सब प्राणियोंमें व्यापक परमात्माकी पूजनसामग्री बन जाती है। उसकी दैनिकचर्या अर्थात् खानापीना आदि सब क्रियाएँ भी पूजनसामग्री बन जाती हैं।जैसे ज्ञानयोगीका मैं कुछ भी नहीं करता हूँ यह भाव हरदम बना रहता है? ऐसे ही अनेक प्रकारकी,क्रियाएँ करनेपर भी भक्तके भीतर एक भगवद्भाव हरदम बना रहता है। उस भावकी गाढ़तामें उसका अहंभाव भी छूट जाता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.45।।शमादिपरिचर्यान्तकर्मणां विभज्योक्तानामभ्युदयं फलमादावुपन्यस्यति -- एतेषामिति। स्वभावतो विहितत्वादेव मोक्षापेक्षामन्तरेणानुष्ठानादित्यर्थः। तत्र प्रमाणमाह -- वर्णा इति। शेषशब्देन भुक्तकर्मणोऽतिरिक्तं कर्मानुशयशब्दितमुच्यते? प्रत्येकं देशादिभिर्विशिष्टशब्दः संबध्यते? आदिशब्देनतद्यथाम्रे फलार्थे निमिते,छायागन्धाद्यनूत्पद्यत एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति इति स्मृतिर्गृह्यते। इतश्चोक्तानां कर्मणां स्वर्गफलत्वं युक्तमित्याह -- पुराणे चेति। उक्तंहियस्तु सम्यक्करोत्येवं गृहस्थः परमं विधिम्। तद्वर्णबन्धमुक्तोऽसौ लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् इति।यस्त्वेतां नियतश्चर्यां वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः। स दहत्यग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च शाश्वतान् इति। मोक्षाश्रमो यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितबुद्धियुक्तः। अनिन्धनज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः इति च।सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति इति श्रुतिश्चकारार्थः। यदि पुनर्मोक्षापेक्षयोक्तानि कर्माण्यनुष्ठीयेरंस्तदा मोक्षफलत्वं तेषां सेत्स्यतीत्याह -- कारणान्तरादिति। तदेव कारणान्तरं यन्मोक्षापेक्षया तेषामनुष्ठानं मोक्षोपायेषु शमादिषु सात्त्विकेषु ब्राह्मणधर्मेषु क्षत्रियादीनामनधिकाराद्ब्राह्मणानामेव मोक्षो न क्षत्रियादीनामित्याशङ्क्याह -- स्वे स्व इति। यथा स्वे कर्मण्यभिरतस्य बुद्धिशुद्धिद्वारा ज्ञाननिष्ठायोग्यतया प्राप्तज्ञानस्य मोक्षोपपत्तेर्ब्राह्मणातिरिक्तस्यापि ज्ञानवतो मुक्तिरिति मत्वा पूर्वार्धं व्याचष्टे -- स्वे स्वे इत्यादिना। संसिद्धिशब्दस्य मोक्षार्थत्वं गृहीत्वा स्वधर्मनिष्ठत्वमात्रेण तल्लाभे तादर्थ्येन संन्यासादिविधानानर्थक्यमिति मन्वानः शङ्कते -- किमिति। न तावन्मात्रेण साक्षान्मोक्षो ज्ञाननिष्ठायोग्यता वेति परिहरति -- नेति। तर्हि कथं स्वधर्मनिष्ठस्य संसिद्धिरिति पृच्छति -- कथं तर्हीति। उत्तरार्धेनोत्तरमाह -- स्वकर्मेति। तच्छृणु तं प्रकारमेकाग्रचेता भूत्वा श्रुत्वावधारयेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.45।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.45।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.45।। --,स्वे स्वे यथोक्तलक्षणभेदे कर्मणि अभिरतः तत्परः संसिद्धिं स्वकर्मानुष्ठानात् अशुद्धिक्षये सति कायेन्द्रियाणां ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां संसिद्धिं लभते प्राप्नोति नरः अधिकृतः पुरुषः किं स्वकर्मानुष्ठानत एव साक्षात् संसिद्धिः न कथं तर्हि स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा येन प्रकारेण विन्दति? तत् शृणु।।

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【 Verse 18.46 】

▸ Sanskrit Sloka: यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: ||

▸ Transliteration: yataḥ pravṛttirbhūtānāṁ yena sarvamidaṁ tatam | svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṁ vindati mānavaḥ ||

▸ Glossary: yataḥ: from whom; pravṛttiḥ: the emanation; bhūtānāṁ: of all living entities; yena: by whom; sarvaṁ: all; idaṁ: this; tatam: is pervaded; svakarmaṇā: in his own duties; taṁ: Him; abhyarcya: by worshiping; siddhiṁ: perfection; vindati: achieves; mānavaḥ: a man

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.46 One attains perfection by worshipping the supreme Being from whom all beings originate and by whom all this universe is pervaded through performance of one’s natural duty for Him.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.46।।जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.46।। जिस (परमात्मा) से भूतमात्र की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है? उस (परमात्मा) की स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.46 यतः from whom? प्रवृत्तिः (is) the evolution? भूतानाम् of beings? येन by whom? सर्वम् all? इदम् this? ततम् is pervaded? स्वकर्मणा with his own duty? तम् Him? अभ्यर्च्य worshipping? सिद्धिम् perfection? विन्दति attains? मानवः man.Commentary The performance by a man of his own duty is simply carrying into effect the intention of the Supreme from Whom the whole of the creation emanates. When a man worships Him? the Supreme Being? with the flowers of his action? then He is immensely pleased and being thus gratified by such worship He confers on Him? as a boon? dispassion and discrimination.Pravritti Evolution or activity it proceeds from the Lord? the Antaryamin? the Inner Ruler.Bhutanam Beings living creatures.Svakarmana With his own duty each according to his caste as described above.Man attains perfection by worshipping the Lord by performing his own duty? i.e.? he becomes alified for the dawn of Selfknowledge (for Jnana Yoga).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.46. That, whence the activities of the beings arise; by which this universe is pervaded-worshipping That by one's own prescribed action, a man attains success.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.46 Man reaches perfection by dedicating his actions to God, Who is the source of all being, and fills everything.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.46 He from whome arise the activity of all beings and by whom all this is pervaded - by worshipping Him with his own duty man reaches perfection.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.46 A human being achieves success by adoring through his own duties Him from whom is the origin of creatures, and by whom is all this pervaded.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.46 He from Whom all the beings have evolved and by Whom all this is pervaded worshipping Him with his own duty, man attains perfection.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.46 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.46 He from whom arise all activities as origination of all beings and by whom all this is pervaded, by worshipping Him, i.e., Myself, who abide in Indra and other divinites as the Inner Ruler, man attains perfection, consisting in the attainment of Myself by My grace. It has been told before that everything originates from Me and all this is pervaded by Me, in texts like the following: 'I am the origin and dissolution of the whole universe' (7.6), 'There is nothing higher than Myself, O Arjuna' (7.7), 'This entire universe is pervaded by Me in an unmanifest form' (9.4), 'Under My supervision, the Prakrti gives birth to all mobile and immobile entities' (9.10) and 'I am the origin of all; from Me proceed everything' (10.8).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.46 Manavah, a human being; vindati, achieves; siddhim, success, merely in the form of the ability for steadfastness in Knowledge; abhyarcya, by adoring, worshipping; svakarmana, with his own duties stated above, as allotted to each caste; tam, Him, God; yatah, from whom, from which God; comes pravrttih, origin,-or, from which internal Ruler comes the activities; ;bhutanam, of creatures, of living beings; and yena, by whom, by which God; is tatam, pervaded; sarvam, all; idam, this world. Since this is so, therefore,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.46।। जब मनुष्य अपने स्वभाव (वर्ण) तथा स्वधर्म (आश्रम? जैसे ब्रह्मचर्य? गृहस्थ आदि) के अनुसार कर्म करता है तब उसकी पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय होता जाता है। यह वासना निवृत्ति तथा इसके फलस्वरूप प्राप्त होने वाली चित्त की शुद्धि और शान्ति तभी संभव होती है? जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वरार्पण की भावना से कर्म करना सीख लेता है।लौकिक कर्तव्यों में यह नियम देखा जाता है कि जिस स्रोत से हमें कार्य करने की शक्ति और फल प्राप्ति होती है? उसके प्रीत्यर्थ कर्म करना हमारा कर्तव्य समझा जाता है। उदाहरणार्थ? सरकारी नौकरी करने वालों का कर्तव्य होता है कि अपने पद का कार्यभार सम्भालते हुए सरकार के लिए कार्य करें? क्योंकि सरकार ही उन्हें कार्य करने का अधिकार और वेतन प्रदान करती है। यदि कोई मनुष्य उस सरकार की शक्ति को विस्मृत कर अपने अधिकार का उपयोग स्वार्थसिद्धि में करता है? तो वह कर्म उसके लिए बन्धन कारक बन जाता है। इसके विपरीत अर्पण की भावना से कार्य करने पर बन्धन तो होते ही नहीं? अपितु उनकी पदोन्नति भी होती है। इसी प्रकार? हमको उस परमेश्वर का स्मरण करते हुए अपने कर्म करने चाहिए? जिससे हमें इन्द्रियाँ? मन आदि उपाधियों तथा उनकी क्षमताओं का प्राप्ति हुई है। हमारा कर्तव्य पालन ही ईश्वर की पूजा हो। इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण का यही उपदेश है कि सभी वर्णाश्रमों के मनुष्यों को अपने कर्तव्यों के पालन द्वारा जगत्कारण परमात्मा का पूजन करना चाहिए।ईश्वरार्पण की भावना से कार्य करने में अहंकार सर्वथा लुप्त हो जाता है। अहंकार के अभाव में पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय होता है और नवीन बन्धनकारक वासनाएं उत्पन्न नहीं होती। इस प्रकार? कर्म के नियमानुसार लौकिक फल की प्राप्ति तो होती ही है? किन्तु उसके अतिरिक्त चित्त की शुद्धि भी प्राप्त होती है। जिसका अन्तकरण शुद्ध होता है? वही पुरुष परमात्मस्वरूप की अनुभूति को प्राप्त हो सकता है। यही वास्तविक सिद्धि है।इस प्रकार हम देखते हैं कि अपने कर्म के पालन में पूजन की भावना आ जाने पर हमारा कार्यक्षेत्र ही मन्दिर या तीर्थस्थान बन सकता है।स्वकर्म पालन में ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है इसलिए

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.46।।तमेव प्रकारं दर्शयति -- यतः यस्मात् जगज्जनकादन्तर्यामिणो भूतानां। प्रवृत्तिरुत्पत्तिश्चेष्टा वा स्यात्। येनेश्वरेण सर्वं कृत्स्त्रमिदं ततं व्याप्तं कार्यस्य कारणसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावात्। तं परमात्मानं स्वकर्मणा प्रतिवर्ण पूर्वोक्तेन अभ्यर्च्य सभ्यक् पूजयित्वा आराध्य मानवोऽधिकृतो मनुष्यः सिद्धिं केवलज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां विन्दति लभते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.46।।यत इति। यतो मायोपाधिकचैतन्यानन्दघनात्सर्वज्ञात्सर्वशक्तेरीश्वरादुपादानान्निमित्ताच्च सर्वान्तर्यामिणः प्रवृत्तिरुत्पत्तिर्मायामयी स्वाप्नरथादीनामिव भूतानां भवनधर्मणामाकाशादीनां येन चैकेन सद्रूपेण स्फुरणरूपेण च सर्वमिदं दृश्यजातं त्रिष्वपि कालेषु ततं व्याप्तं स्वात्मन्येवान्तर्भावितं कल्पितस्याधिष्ठानानतिरेकात्। तथाच श्रुतिःयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते? येन जातानि जीवन्ति? यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति? तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मेति। अत्र यत इति प्रकृतौ पञ्चमी। यतो येनेति चैकत्वं विवक्षितम्। आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्? आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते इति च। तस्य निर्णयवाक्यंमायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इत्यादि श्रुत्यन्तराच्च मायोपाधिलाभः।यः सर्वज्ञः सर्ववित् इत्यादि श्रुत्यन्तरात्सर्वज्ञत्वादिलाभः। एवं श्रौत एवायमर्थो भगवता प्रकाशितः।यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् इति तमन्तर्यामिणं भगवन्तं स्वकर्मणा प्रतिवर्णाश्रमं विहितेनाभ्यर्च्य तोषयित्वा तत्प्रसादादैकात्म्यज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिमन्तःकरणशुद्धिं विन्दति मानवो? देवादिस्तूपासनामात्रेणेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.46।।तमेव प्रकारमाह -- यत इति। प्रवृत्तिः कायवाङ्मनोनिर्वर्त्या चेष्टा। यतो हेतोरन्तर्यामिणः।येन वागभ्युद्यते इत्यादिश्रुतेः। येन इदं सर्वं दृश्यं ततं व्याप्तं उपादानत्वात्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य संतर्प्य सिद्धिं मोक्षं विन्दति लभते मानवः। मनुष्याधिकारिकत्वाच्छास्त्रस्य। परमेश्वरे नित्यकर्मणामर्पणमेव मोक्षद्वारमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.46।।तं प्रकारमेवाऽऽह -- यत इति। यतो भगवतः भूतानां प्राणिनां प्रवृत्तिरुत्पत्तिर्भवति? सर्वकर्मसु वा यतः प्रवृत्तिः प्रकर्षेण वर्तनमनुसरणं भवति? येन कारणरूपेण इदं सर्वं विश्वं ततं व्याप्तं? तं भगवन्तं स्वकर्मणा आत्मकर्मणा भक्त्या अभ्यच्य सम्पूज्य मानवः मनोर्जातो मनुष्यः सद्धर्मरूपः सिद्धिं विन्दति लभत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.46।।तमेवाह -- यत इति। यतोऽन्तर्यामिणः परमेश्वराद्भूतानां प्राणिनां प्रवृत्तिश्चेष्टा भवति। येन च कारणात्मना सर्वमिदं विश्वं ततं व्याप्तं तमीश्वरं स्वकर्मणाऽभ्यर्च्य पूजयित्वा सिद्धिं लभते मनुष्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.46।।तत्प्रकारमाह सार्द्धेन -- स्वकर्मेति। स्पष्टम्।यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी [15।4] ब्रह्मणा येनाक्षरेण भगवत्स्वरूपेणेदं ततं तमेवाभ्यर्च्य? न तु देवान्तरं? तदा सिद्धिं मुक्तिं प्राप्नोति स्वकर्मणेति द्रढयति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.46।।जिस अन्तर्यामी ईश्वरसे समस्त प्राणियोंकी प्रवृत्ति यानी उत्पत्ति या चेष्टा होती है और जिस ईश्वरसे यह सारा जगत् व्याप्त है? उस ईश्वरको प्रत्येक वर्णके लिये पहले बतलाये हुए अपने कर्मोंद्वारा पूजकर -- उसकी आराधना करके मनुष्य केवल ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.46।। व्याख्या --   यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् -- जिस परमात्मासे संसार पैदा हुआ है? जिससे सम्पूर्ण संसारका संचालन होता है? जो सबका उत्पादक? आधार और प्रकाशक है और जो सबमें परिपूर्ण है अर्थात् जो परमात्मा अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्तिसे पहले भी था? जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके लीन होनेपर भी रहेगा और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रहते हुए भी जो रहता है तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है? उसी परमात्माका अपनेअपने स्वभावज (वर्णोचित स्वाभाविक) कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य -- मनुस्मृतिमें ब्राह्मणोंके लिये छः कर्म बताये गये हैं -- स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना? स्वयं यज्ञ करना और दूसरोंसे यज्ञ कराना तथा स्वयं दान लेना और दूसरोंको दान देना (टिप्पणी प0 938.1) (इनमें पढ़ाना? यज्ञ कराना और दान लेना -- ये तीन कर्म जीविकाके हैं और पढ़ना? यज्ञ करना और दान देना -- ये तीन कर्तव्यकर्म हैं)। उपर्युक्त शास्त्रनियत छः कर्म और शमदम आदि नौ स्वभावज कर्म तथा इनके अतिरिक्त खानापीना? उठनाबैठना आदि जितने भी कर्म हैं? उन कर्मोंके द्वारा ब्राह्मण चारों वर्णोंमें व्याप्त परमात्माका पूजन करें। तात्पर्य है कि परमात्माकी आज्ञासे? उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।ऐसे ही क्षत्रियोंके लिये पाँच कर्म बताये गये हैं -- प्रजाकी रक्षा करना? दान देना? यज्ञ करना? अध्ययन करना और विषयोंमें आसक्त न होना (टिप्पणी प0 938.2)। इन पाँच कर्मों तथा शौर्य? तेज आदि सात स्वभावज कर्मोंके द्वारा और खानापीना आदि सभी कर्मोंके द्वारा क्षत्रिय सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें।वैश्य यज्ञ करना? अध्ययन करना? दान देना और ब्याज लेना तथा कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य (टिप्पणी प0 939.1) -- इन शास्त्रनियत और स्वभावज कर्मोंके द्वारा और शूद्र शास्त्रविहित तथा स्वभावज कर्म सेवा (टिप्पणी प0 939.2) के द्वारा सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें अर्थात् अपने शास्त्रविहित? स्वभावज और खानापीना? सोनाजागना आदि सभी कर्मोंके द्वारा भगवान्की आज्ञासे? भगवान्की प्रसन्नताके लिये भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जोजो कर्तव्यकर्म बताये गये हैं? वे सब संसाररूप परमात्माकी पूजाके लिये ही हैं। अगर साधक अपने कर्मोंके द्वारा भावसे उस परमात्माका पूजन करता है? तो उसकी मात्र क्रियाएँ परमात्माकी पूजा हो जाती है। जैसे? पितामह भीष्मने (अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए) अर्जुनके सारथि बने हुए भगवान्की अपने युद्धरूप कर्मके द्वारा (बाणोंसे) पूजा की। भीष्मके बाणोंसे भगवान्का कवच टूट गया? जिससे भगवान्के शरीरमें घाव हो गये और हाथकी अंगुलियोंमें छोटेछोटे बाण लगनेसे अंगुलियोंसे लगाम पकड़ना कठिन हो गया। ऐसी पूजा करके अन्तसमयमें शरशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्म अपने बाणोंद्वारा पूजित भगवान्का ध्यान करते हैं -- युद्धमें मेरे तीखे बाणोंसे जिनका कवच टूट गया है? जिनकी त्वचा विच्छिन्न हो गयी है? परिश्रमके कारण जिनके मुखपर स्वेदकण सुशोभित हो रहे हैं? घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई रज जिनकी सुन्दर अलकावलिमें लगी हुई है? इस प्रकार बाणोंसे अलंकृत भगवान् कृष्णमें मेरे मनबुद्धि लग जायँ (टिप्पणी प0 939.3)।,लौकिक और पारमार्थिक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन तो करना चाहिये? पर उन कर्मोंमें और उनको करनेके करणोंउपकरणोंमें ममता नहीं रखनी चाहिये। कारण कि जिन वस्तुओं? क्रियाओँ आदिमें ममता हो जाती है? वे सभी चीजें अपवित्र हो जानेसे (टिप्पणी प0 939.4) पूजासामग्री नहीं रहतीं (अपवित्र फल? फूर आदि भगवान्पर नहीं चढ़ते)। इसलिये मेरे पास जो कुछ है? वह सब उस सर्वव्यापक परमात्माका ही है?,मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्तिसे उनका पूजन करना है -- इस भावसे जो कुछ किया जाय? वह सबकासब परमात्माका पूजन हो जाता है। इसके विपरीत उन क्रियाओँ? वस्तुओँ आदिको मनुष्य जितनी अपनी मान लेता है? उतनी ही वे (अपनी मानी हुई) क्रियाएँ? वस्तुएँ (अपवित्र होनेसे) परमात्माके पूजनसे वञ्चित रह जाती हैं।सिद्धिं विन्दति मानवः -- सिद्धिको प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि अपने कर्मोंसे परमात्माका पूजन करनेवाला मनुष्य प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर स्वतः अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर पहले जो परमात्माके समर्पण किया था? उस संस्कारके कारण उसका प्रभुमें अनन्यप्रेम जाग्रत् हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी पाना बाकी नहीं रहता।यहाँ मानवः पदका तात्पर्य केवल ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य? शूद्र और ब्रह्मचारी? गृहस्थ? वानप्रस्थ? संन्यास -- इन वर्णों और आश्रमों आदिसे ही नहीं है? प्रत्युत हिन्दू? मुसलमान? ईसाई? बौद्ध? पारसी? यहूदी आदि सभी जातियों और सम्प्रदायोंसे है। किसी भी जाति? सम्प्रदाय आदिके कोई भी व्यक्ति क्यों न हों? सबकेसब ही परमात्माके पूजनके अधिकारी हैं क्योंकि सभी परमात्माके अपने हैं। जैसे घरमें स्वभाव आदिके भेदसे अनेक तरहके बालक होते हैं? पर उन सबकी माँ एक ही होती है और उन बालकोंकी तरहतरहकी जितनी भी क्रियाएँ होती हैं? उन सब क्रियाओंसे माँ प्रसन्न होती रहती है क्योंकि उन बालकोंमें माँका अपनापन होता है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख हुए मनुष्योंकी सभी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं और प्रसन्न होते हैं।इसी अध्यायके सत्तरवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि कोई भी मनुष्य हम दोनोंके संवादका अध्ययन करेगा? उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे? अध्ययन करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे ही जो उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओँसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है? उसकी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं।विशेष बातकर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असङ्गता होती है और भक्तियोगमें संसारसे असङ्गतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है।कर्मयोगी तो अपने पास शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि जो कुछ संसारका जडअंश है? उसको स्वार्थ? अभिमान? कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर उनसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? और जो स्वतःस्वाभाविक असङ्गता है? वह प्रकट हो जाती है।भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समयसमयपर किये गये पारमार्थिक कर्मों(जप? ध्यान आदि) के द्वारा सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है।इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको सुख पहुँचानेमें लग जाता है? तो क्रियाओँको करनेका वेग मिटकर स्वयंमें असङ्गता आ जाती है और भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाएँ परमात्माकी पूजनसामग्री बन जानेसे जडतासे विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम बढ़ जाता है।भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपनेआपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके,अनन्यतापूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खानापीना? कामधंधा आदि लौकिक और जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती हैं। उसकी लौकिकपारमार्थिक क्रियाओंमें केवल बाहरसे भेद देखनेमें आता है परन्तु वास्तवमें कोई भेद नहीं रहता।कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- ये दोनों अन्तमें एक हो जाते हैं। जैसे? कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है और ज्ञानयोगी विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण करनेके प्रकारमें अन्तर है? पर असङ्गतामें दोनों एक हो जाते हैं (टिप्पणी प0 940)। इस असङ्गतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- दोनों स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किञ्चिन्मात्र भी कर्मोंका बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्यपालनके लिये ही कर्तव्यकर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते हैं (गीता 4। 23)? और ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (गीता 4। 37)। परन्तु इस स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे जिसको उपरति हो जाती है? उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट हो सकता है। , सम्बन्ध --   स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय? तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये -- इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.46।।तमेव प्रकारं स्फुटयति -- यत इति। यतःशब्दार्थं यस्मादित्युक्तं व्यक्तीकरोति -- यस्मादिति। प्राणिनामुत्पत्तिर्यस्मादीश्वरात्तेषां चेष्टा च यस्मादन्तर्यामिणो येन च सर्वं व्याप्तं मृदेव घटादिकार्यस्य कारणातिरिक्तस्वरूपाभावात्तं स्वकर्मणाभ्यर्च्य मानवः संसिद्धिं विन्दतीति संबन्धः। नहि ब्राह्मणादीनां यथोक्तधर्मनिष्ठया साक्षान्मोक्षो लभ्यते तस्य ज्ञानैकलभ्यत्वात्किंतु तन्निष्ठानां शुद्धबुद्धीनां कर्म,सुफलमपश्यतामीश्वरप्रसादासादितविवेकवैराग्यवतां संन्यासिनां ज्ञाननिष्ठयोग्यतावतां ज्ञानप्राप्त्या मुक्तिरित्यभिप्रेत्याह -- केवलमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.46।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.46।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.46।। --,यतः यस्मात् प्रवृत्तिः उत्पत्तिः चेष्टा वा यस्मात् अन्तर्यामिणः ईश्वरात् भूतानां प्राणिनां स्यात्? येन ईश्वरेण सर्वम् इदं ततं जगत् व्याप्तम् स्वकर्मणा पूर्वोक्तेन प्रतिवर्णं तम् ईश्वरम् अभ्यर्च्य पूजयित्वा आराध्य केवलं ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिं विन्दति मानवः मनुष्यः।।यतः एवम्? अतः --,

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【 Verse 18.47 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||

▸ Transliteration: śreyān svadharmo viguṇaḥ paradharmāt svanuṣṭhitāt | svabhāva-niyataṁ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||

▸ Glossary: śreyān: better; svadharmaḥ: one’s own rightful conduct; viguṇaḥ: imperfectly performed; paradharmāt: another’s conduct; svanuṣṭhitāt: perfectly done; svabhāvaniyataṁ: prescribed duties according to one’s nature; karma: work; kurvan: performing; na: never; āpnoti: achieve; kilbiṣam: sinful reactions

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.47 It is better to engage in one’s rightful conduct [svadharma], even though one may not perform it to perfection, rather than to accept another’s conduct and perform it perfectly. Responsibility prescribed according to one’s nature, are never affected by sinful reactions.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.47।।अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.47।। सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.47 श्रेयान् better? स्वधर्मः ones own duty? विगुणः (though) destitute of merits? परधर्मात् that the duty of another? स्वनुष्ठितात् (than) well performed? स्वभावनियतम् ordained by his own nature? कर्म action? कुर्वन् doing? न not? आप्नोति (he) incurs? किल्बिषम् sin.Commentary Just as a poisonous substance does not harm the worm born in that substance? so he who does his Svadharma (the duty ordained according to his own nature) does not incur any sin.What is poison to the whole world is sweet to a worm and yet sugarcane juice that is sweet causes its death. So a mans appointed duty which frees him from bondage must? therefore? be practised however difficult it may seem to be. If you try to do the duty of another it will bring,danger. He who has no knowledge of the Self cannot remain even for a moment without doing action. (Cf.III.35)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.47. Better is one's own prescribed duties, [born of one's nature, even though] it is devoid of ality, than another's duty well executed; the doer of duty, dependent on (or prescribed according to) one's own nature, does not incur sin.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.47 It is better to do one's own duty, however defective it may be, than to follow the duty of another, however well one may perform it. He who does his duty as his own nature reveals it, never sins.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.47 Better is one's own duty, though ill done, than the duty of another, though well-performed৷৷৷৷৷৷ When one does the duty ordained by his own nature, he incurs no stain.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.47 One's own duty, (though) defective, is superior to another's duty well performed. By performing a duty as dictated by one's own nature, one does not incur sin.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.47 Better is one's own duty (though) destitute of merits, than the duty of another well performed. He who does the duty ordained by his own nature incurs no sin.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.47 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.47 One's proper Dharma is that which is suitable for performance by oneself, in the form of worshipping Myself, relinishing agency etc., as has been taught. For, Karma Yoga, consisting in the activities of sense organs, is easy to perform by one in association with Prakrti. Thus, Karma Yoga, even if it is defective in some respects, is better than the Dharma of another, i.e., than Jnana-yoga, even for a person capable of controlling his senses, which is an attainment liable to negligence, because it consists of control over all sense-organs; for, though this may be well performed occasionaly, one is always liable to deflection from it.

He explains the same:

As Karma consists of the activities of the sense-organs, it is ordained by Nature for one who is conjoined with Prakrti, i.e., the body. So by performing Karma Yoga one does not incur any stain. But Jnana Yoga is liable to negligence, because it reires the control of the senses from the very beginning for its performance. One intent on it is likely to incur stain from negligence. [Thus we are reminded about what was mentioned in the third chapter - that Karma Yoga alone is greater.]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.47 Svadharmah, one's own duty; though vigunah, defective-the word though has to be supplied-; is sreyan, superior to, more praiseworthy than; paradharmat, another's duty; su-anusthitat, well performed. Kurvan, by performing; karma, a duty; svabhavaniyatam, as dictated by one's own nature-this phrase means the same as svabhavajam (born from Nature) which has been stated earlier-; na apnoti, one does not incur; kilbisam, sin. As poison is not harmful to a worm born it it, so one does not incur sin by performing a duty dictated by one's own nature. It has been siad that, as in the case of a worm born in poison, a

Chapter 18 (Part 25)

person does not incur sin while performing his duties which have been dictated by his own nature; and that someone else's duty is fraught with fear; also that, one who does not have the knoweldge of the Self, (he) surely cannot remain even for a moment without doing work (cf. 3.5). Hence-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.47।। इस श्लोक की प्रथम पंक्ति का विस्तृत विवेचन तृतीय अध्याय में किया जा चुका है। स्वधर्म से तात्पर्य स्वयं के वर्ण एवं कर्तव्य कर्मों से है। वर्ण शब्द का स्पष्टीकरण किया जा चुका है। यह देखा जाता है कि मनुष्य के मन में रागद्वेष होने के कारण उसे अपना कर्म गुणहीन और अन्य पुरुष का कर्म श्रेष्ठ प्रतीत हो सकता है। उसके मन में ऐसी भावना के उदय होने पर वह स्वधर्म को त्यागकर परधर्म के आचरण में प्रवृत्त होता है। परन्तु? स्वभाव के प्रतिकूल होने के कारण वह उस नवीन कार्य में तो विफल होता ही है? साथ ही उसके मन में रागद्वेषों का अर्थात् वासनाओं का बन्धन और अधिक दृढ़ हो जाता है। इसलिए? भगवान् कहते हैं? सम्यक् अनुष्ठित परधर्म से गुणरहित होने पर भी स्वधर्म का पालन ही श्रेष्ठतर है।स्वभाव नियत कर्माचरण से किल्विष अर्थात् पाप नहीं लगता। इसका अर्थ है स्वधर्म पालन से नवीन बन्धनकारक वासनाएं उत्पन्न नहीं होतीं।गीता का यह अन्तिम अध्याय भगवान् श्रीकृष्ण के सुन्दर प्रवचन का उपसंहार है। अत? स्वाभाविक है कि यह सम्पूर्ण गीता का सारांश है। पूर्व अध्यायों में? अर्जुन के रोग के उपचार के लिए? जिन मुख्य सिद्धांतों का विवेचन किया गया था उनकी यहाँ पुनरावृत्ति की गई है।स्वधर्म पालन के उपदेश में दी गई युक्ति यह है कि स्वकर्माचरण पापोत्पत्ति का कारण नहीं बनता? यद्यपि हो सकता है कि उसमें कुछ दोष भी हो। इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि (1) विषैले सर्प का विष स्वयं सर्प का नाश नहीं करता (2) मदिरा में रहने वाला जीवित जीवाणु स्वयं मदोन्मत्त नहीं हो जाते और (3) मलेरिया के मच्छर स्वयं मलेरिया से पीड़ित नहीं होते। उसी प्रकार? किसी भी मनुष्य का स्वभाव उसके लिए दोषयुक्त या हानिकारक नहीं होता यदि सर्प के विष को मदिरा में मिला दिया जाये? तो वे जीवाणु नष्ट हो जायेंगे। ठीक इसी प्रकार? यदि ब्राह्मण के कर्म में क्षत्रिय पुरुष प्रवृत्त होता है? तो वह आत्मनाश ही कर लेगा। अर्जुन क्षत्रिय्ा था शुद्ध सत्त्वगुण के अभाव में यदि वह वनों में जाकर ध्यानाभ्यास करता तो वह उसमें कदापि सफल नहीं होता।सारांशत? अपने स्वभाव के प्रतिकूल कार्यक्षेत्र में प्रवृत्त होने से कोई लाभ नहीं होता है। इस जगत् में प्रत्येक वस्तु का निश्चित स्थान है। प्रत्येक प्राणी या मनुष्य का अपना महत्त्व है और कोई भी व्यक्ति तिरस्करणीय नहीं है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी ऐसे कार्य विशेष को कर सकता है? जिसे दूसरा व्यक्ति नहीं कर सकता। परमेश्वर की सृष्टि में बहुतायत अथवा निरर्थकता कहीं नहीं है। एक तृण की पत्ती भी? किसी काल या स्थान में? व्यर्थ ही उत्पन्न नहीं हुई है।क्या हमारा कर्म दोषयुक्त होने पर भी उसका पालन करना चाहिए भगवान् उत्तर में कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.47।।यतः स्वकर्मणां परमात्माभ्यर्च्य सिद्धिं लभते तस्मात्स्वोधर्मः स्वधर्मो विगुणोऽसभ्यगनुष्ठितोऽपि परधर्मात्स्वनुष्ठितात्सभ्यगनुष्ठितात् श्रेयान्प्रशस्यतरः। ननु युद्धादिलक्षणं स्वधर्मं कुर्वन्नापि हिंसानिमित्तं पापं प्राप्नोति तत्कथं स्वधर्मः श्रेयानिति तत्राह स्वभावनियतं कर्मशौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायन मित्यादि कर्म स्वभावजं कुर्वन् किल्बिषं नाप्नोति। यथा विषजः कृमिः विषकृतं दोषं न प्रतिपद्यते तथायमधिकृतः पुरुषो दोषवदपि स्वभावनियतं कुर्वन् पापं नाप्नोतीत्यर्थः। तदुक्तंश्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः इति। एतेन तर्हि दोषरहितमेव भिक्षाटनादि सर्वैरनुष्ठीयतामतो न पापप्राप्न्याशङ्केति न शङ्कनीयम्। तर्हि पापप्राप्तिशङ्कां परिहर्तुमकर्मनिष्ठतैव सर्वैः कुतो न संपाद्यत इति शङ्कापि न कर्तव्या।नहि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।नहि देहभृताशक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः इत्यनात्मज्ञेनाकर्मनिष्ठतायाः संपादयितुमशक्यत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.47।।श्रेयानिति। यतः स्वधर्म एव मनुष्याणां भगवत्प्रसादहेतुरतः परधर्मात्सम्यगनुष्ठितादपि श्रेयान्प्रशस्यतरः स्वधर्मो विगुणोऽसम्यगनुष्ठितोऽपि। तस्मात्क्षत्रियेण सता त्वया स्वधर्मो युद्धादिरेवानुष्ठेयो न परधर्मो भिक्षाटनादिरित्यभिप्रायः। ननु स्वधर्मोऽपि युद्धादिर्बन्धुवधादिप्रत्यवायहेतुत्वान्नानुष्ठेय इति चेन्नेत्याह -- स्वभावेति। स्वभावनियतं पूर्वोक्तं शौर्यं तेज इत्यादि स्वभावजं युद्धादि कर्म कुर्वन् किल्बिषं पापं बन्धुवधादिनिमित्तं न प्राप्नोति। तथाच प्राग्व्याख्यातं सुखदुःखे समे कृत्वेत्यत्र विहितज्योतिष्टोमाङ्गपशुहिंसाया इव विहितयुद्धाङ्गबन्धुहिंसाया अपि प्रत्यवायहेतुत्वाभावात्। तथाचोक्तमधस्तात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.47।।स्वकर्मणेति विशेषणस्य फलमाह -- श्रेयानिति। स्वधर्मो विगुणः किंचिदङ्गहीनोऽपि श्रेयान् प्रशस्यतरः। किमपेक्ष्य श्रेयान्। परधर्मात्स्वनुष्ठितात् सम्यग्विहितादपि। उक्तं चस्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः इति। स्वभावनियतं पूर्वोक्तत्रिविधस्वभावाज्जातं कर्म कुर्वन् किल्बिषं दोषं नाप्नोति। विषकृमेर्विषमिव न दोषकरम्। तस्मात्तव भैक्ष्यं हिंसाशून्यमपि न युक्तम्। किंतु हिंसायुक्तोऽपि स्वधर्म एव प्रशस्यतरः। धर्मत्वेन विहितेऽस्मिन्नग्नीषोमीयपश्वालम्भे इव कृते सति न किल्बिषप्रसङ्गोऽस्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.47।।स्वकर्मार्चने विशेषमाह -- श्रेयानिति। स्वनुष्ठितात् सुष्ठु अनुष्ठितात् परधर्मात् कर्ममार्गीयात् विगुणोऽपि स्वधर्मः श्रेयान्? श्रेष्ठ इत्यर्थः। ननु विगुणत्वात् कथं श्रेष्ठत्वं इत्यत आह -- स्वभावेति। स्वभावनियतं भगवद्भावनियमोक्तं कर्म कुर्वन् वैगुण्यजमन्यत्यागजं च किल्बिषं न आप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.47।।स्वकर्मणेति विशेषणस्य फलमाह -- श्रेयानिति। विगुणोऽपि स्वधर्मः सम्यगनुष्ठितादपि परधर्माच्छ्रेयाञ्छ्रेष्ठः। नच बन्धुवधादियुक्ताद्युद्धादेः स्वधर्माद्भिक्षाटनादिपरधर्मः श्रेष्ठ इति मन्तव्यम्। यतः स्वभावेन पूर्वोक्तेन नियतं नयमेनोक्तं कर्म कुर्वन्किल्बिषं नाप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.47।।श्रेयानिति। विगुणोऽपि स्वधर्मः स्वनुष्ठितात्परधर्माच्छ्रेष्ठः? श्रेयस्कर इति वा स्वभावो यो यो विप्रक्षत्त्रादेस्तेन नियतं कर्म कुर्वन् -- यथा क्षत्ित्रयस्य युद्धादि तदेव स्वाभाविकं तव कर्म युद्धादिकमुचितमिति भावः। अन्यथा तु किल्बिषं प्राप्नोति। एवं च कर्मनिष्ठैव ज्यायसीति तृतीयोक्तं व्याख्यायोपदिशति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.47।।ऐसा होनेके कारण --, अपना गुणरहित भी धर्म? दूसरेके भली प्रकार अनुष्ठान किये हुए धर्मसे श्रेष्ठतर है। जैसे विषमें उत्पन्न हुए कीड़ेके लिये विष दोषकारक नहीं होता? उसी प्रकार स्वभावसे नियत किये हुए कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। जो बात पहले स्वभावजम् इस पदसे कही थी? वही यहाँ स्वभावनियतम् इस पदसे कही गयी है। स्वभावसे नियत कर्मका नाम स्वभावनियत है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.47।। व्याख्या --   श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् -- यहाँ स्वधर्म शब्दसे वर्णधर्म ही मुख्यतासे लिया गया है।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाला मनुष्य स्व को अर्थात् अपनेको जा मानता है? उसका धर्म (कर्तव्य) स्वधर्म है। जैसे कोई अपनेको मनुष्य मानता है? तो मनुष्यताका पालन करना उसके लिये स्वधर्म है। ऐसे ही कर्मोंके अनुसार अपनेको कोई विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको साधक मानता है? तो साधन करना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको भक्त? जिज्ञासु और सेवक मानता है तो भक्ति? जिज्ञासा और सेवा उसका स्वधर्म हो जायगा। इस प्रकार जिसकी जिस कार्यमें नियुक्ति हुई है और जिसने जिस कार्यको स्वीकार किया है? उसके लिये उस कार्यको साङ्गोपाङ्ग करना स्वधर्म है।ऐसे ही मनुष्य जन्म और कर्मके अनुसार अपनेको जिस वर्ण और आश्रमका मानता है? उसके लिये उसी वर्ण और आश्रमका धर्म स्वधर्म हो जायगा। ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है तो यज्ञ कराना? दान लेना? पढ़ाना आदि जीविकासम्बन्धी कर्म उसके लिये स्वधर्म हैं। क्षत्रियके लिये युद्ध करना? ईश्वरभाव आदि वैश्यके लिये कृषि? गौरक्षा? व्यापार आदि और शूद्रके लिये सेवा -- ये जीविकासम्बन्धी कर्म स्वधर्म हैं। ऐसा अपना स्वधर्म अगर दूसरोंके धर्मकी अपेक्षा गुणरहित है अर्थात् अपने स्वधर्ममें गुणोंकी कमी है? उसका अनुष्ठान करनेमें कमी रहती है तथा उसको कठिनतासे किया जाता है परन्तु दूसरेका धर्म गुणोंसे परिपूर्ण है? दूसरेके धर्मका अनुष्ठान साङ्गोपाङ्ग है और करनेमें बहुत सुगम है तो भी अपने स्वधर्मका पालन करना ही सर्वश्रेष्ठ है।शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंका विधान किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म स्वधर्म हैं और उन्हीं कर्मोंका जिस वर्णके लिये निषेध किया है? उस वर्णके लिये वे कर्म परधर्म हैं। जैसे यज्ञ कराना? दान लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये शास्त्रकी आज्ञा होनेमें स्वधर्म हैं परन्तु वे ही कर्म क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये शास्त्रका निषेध होनेसे परधर्म हैं। परन्तु आपत्कालको लेकर शास्त्रोंने जीविकासम्बन्धी जिन कर्मोंका निषेध नहीं किया है? वे कर्म सभी वर्णोंके लिये स्वधर्म हो जाते हैं। जैसे आपत्कालमें अर्थात् आपत्तिके समय वैश्यके खेती? व्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म ब्राह्मणके लिये भी स्वधर्म हो जाते हैं (टिप्पणी प0 941)।ब्राह्मणके शम? दम आदि जितने भी स्वभावज कर्म हैं? वे सामान्य धर्म होनेसे चारों वर्णोंके लिये स्वधर्म हैं। कारण कि उनका पालन करनेके लिये सभीको शास्त्रकी आज्ञा है। उनका किसीके लिये भी निषेध नहीं है।मनुष्यशरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इस दृष्टिसे मनुष्यमात्र साधक है। अतः दैवीसम्पत्तिके जितने भी सद्गुणसदाचार हैं? वे सभीके अपने होनेसे मनुष्यमात्रके लिये स्वधर्म हैं। परन्तु आसुरीसम्पत्तिके जितने भी दुर्गुणदुराचार हैं? वे मनुष्यमात्रके लिये न तो स्वधर्म हैं और न परधर्म ही हैं वे तो सभीके लिये निषिद्ध हैं? त्याज्य हैं क्योंकि वे अधर्म हैं। दैवीसम्पत्तिके गुणोंको धारण करनेमें और आसुरीसम्पत्तिके पापकर्मोंका त्याग करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं? सभी सबल हैं? सभी अधिकारी हैं कोई भी परतन्त्र? निर्बल तथा अनधिकारी नहीं है। हाँ? यह बात अलग है कि कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है और कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है। जैसे? किसीके स्वभावमें दया मुख्य होती है और किसीके स्वभावमें उपेक्षा मुख्य होती है? किसीका स्वभाव स्वतः क्षमा करनेका होता है और किसीका स्वभाव माँगनेपर क्षमा करनेका होता है? किसीके स्वभावमें उदारता स्वाभाविक होती है और किसीके स्वभावमें उदारता विचारपूर्वक होती है? आदि। ऐसा भेद रह सकता है।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् -- शास्त्रोंमें विहित और निषिद्ध -- दो तरहके वचन आते हैं। उनमें विहित कर्म करनेकी आज्ञा है और निषिद्ध कर्म करनेका निषेध है। उन विहित कर्मोंमें भी शास्त्रोंने जिस वर्ण? आश्रम? देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? संयोग? वियोग आदिको लेकर अलगअलग जो कर्म नियुक्त किये हैं? उस वर्ण? आश्रम आदिके लिये वे नियत कर्म कहलाते हैं।सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंको लेकर जो स्वभाव बनता है? उस स्वभावके अनुसार जो कर्म नियत किये जाते हैं? वे स्वभावनियत कर्म कहलाते हैं। उन्हींको स्वभावप्रभव? स्वभावज? स्वधर्म? स्वकर्म और सहज कर्म कहा है।तात्पर्य यह है कि जिस वर्ण? जातिमें जन्म लेनेसे पहले इस जीवके जैसे गुण और कर्म रहे हैं? उन्हीं गुणों और कर्मोंके अनुसार उस वर्णमें उसका जन्म हुआ है। कर्म तो करनेपर समाप्त हो जाते हैं? पर गुणरूपसे उनके संस्कार रहते हैं। जन्म होनेपर उन गुणोंके अनुसार ही उसमें गुण और पालनीय आचरण स्वाभाविक ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनको न तो कहींसे लाना पड़ता है और न उनके लिये परिश्रम ही करना पड़ता है। इसलिये उनको स्वभावज और स्वभावनियत कहा है।यद्यपि सर्वारम्भा ही दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः (गीता 18। 48) के अनुसार कर्ममात्रमें दोष आता ही है? तथापि स्वभावके अनुसार शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? उन कर्मोंको अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे किया जाय? तो उस वर्णके व्यक्तिको उन कर्मोंका दोष (पाप) नहीं लगता। ऐसे ही जो केवल शरीरनिर्वाहके लिये कर्म करता है? उसको भी पाप नहीं लगता -- शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् (गीता 4। 21)।विशेष बातयहाँ एक बड़ी भारी शङ्का पैदा होती है कि एक आदमी कसाईके घर पैदा होता है तो उसके लिये कसाईका कर्म सहज (साथ ही पैदा हुआ) है? स्वाभाविक है। स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता? तो क्या कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये अगर उसको कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये? तो फिर निषिद्ध आचरण कैसे छूटेगा कल्याण कैसे होगाइसका समाधान है कि स्वभावनियत कर्म वह होता है? जो विहित हो? किसी रीतिसे निषिद्ध नहीं हो अर्थात् उससे किसीका भी अहित न होता हो। जो कर्म किसीके लिये भी अहितकारक होते हैं? वे सहज कर्ममें नहीं लिये जाते। वे कर्म आसक्ति? कामनाके कारण पैदा होते हैं। निषिद्ध कर्म चाहे इस जन्ममें बना हो? चाहे पूर्वजन्ममें बना हो? है वह दोषवाला ही। दोषभाग त्याज्य होता है क्योंकि दोष आसुरीसम्पत्ति है और गुण दैवीसम्पत्ति है। पहले जन्मके संस्कारोंसे भी दुर्गुणदुराचोंमें रुचि हो सकती है? पर वह रुचि दुर्गुणदुराचार करनेमें बाध्य नहीं करती। विवेक? सद्विचार? सत्सङ्ग? शास्त्र आदिके द्वारा उस रुचिको मिटाया जा सकता है।युक्तिसे भी देखा जाय तो कोई भी प्राणी अपना अहित नहीं चाहता? अपनी हत्या नहीं चाहता। अतः किसीका अहित करनेका? हत्या करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मनुष्य अपने लिये अच्छा काम चाहता है तो उसे दूसरोंके लिये भी अच्छा काम करना चाहिये। शास्त्रोंमें भी देखा जाय तो यही बात है कि जिसमें दोष होते हैं? पाप होते हैं? अन्याय होते हैं? वे कर्म वैकृत हैं? प्राकृत नहीं हैं अर्थात् वे विकारसे पैदा हुए हैं? स्वभावसे नहीं। तीसरे अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पापकर्म करता है तो भगवान्ने कहा कि कामनाके वशमें होकर भी मनुष्य पाप करता है (3। 36 -- 37)। कामनाको लेकर? क्रोधको लेकर? स्वार्थ और अभिमानको लेकर जो कर्म किये जाते हैं? वे कर्म शुद्ध नहीं होते? अशुद्ध होते हैं।परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो कर्म किये जाते हैं? उन कर्मोंमें भिन्नता तो रहती है? पर वे दोषी नहीं होते। ब्राह्मणके घर जन्म होगा तो ब्राह्मणोचित कर्म होंगे? शूद्रके घर जन्म होगा तो शूद्रोचित कर्म होंगे? पर दोषीभाग किसीमें भी नहीं होगा। दोषीभाग सहज नहीं है? स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं? पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये? वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा जैसे पहले रहता था? वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है? जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एकएकसे विचित्र कर्म होते हैं? पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव रागद्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है।पहलेके किसी पापकर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है? पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति? आयु और भोग बताया गया है? नया कर्म नहीं बताया गया -- सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः। (योगदर्शन 2। 13)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका? अपने इष्टके नामका जप करे? तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है? वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपनेआप ग्लानि होगी? उपरति होगी। बिना कहेसुने उसमें सद्गुण स्वाभाविक आयेंगे।रामचरितमानसमें शबरीके प्रसङ्गमें आता है -- भगवान् रामने शबरीसे कहा -- नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। (3। 35। 4)। फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा -- सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें (3। 36। 4)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है? इसका शबरीको पता ही नहीं है परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्सङ्ग? भजन? ध्यान आदि,करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है? वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं? वे दूसरोंको तो बता देंगे? पर आचरणमें वे गुण तभी आयेंगे? जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेंगे। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध? निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है? कोई निर्बल नहीं है? कोई अयोग्य नहीं है? कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सद्गुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थोंके संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है।उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्यशरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है? सबल है? योग्य है? समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं? कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है -- साधन धाम मोच्छ कर द्वारा (मानस 7। 43। 4)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके? तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.47।।स्वधर्मानुष्ठानस्य बुद्धिशुद्ध्यादिद्वारा मोक्षावसायित्त्वात्तदनुष्ठानमावश्यकमित्याह -- यत इति। ननु युद्धादिलक्षणं स्वधर्मं कुर्वन्नपि हिंसाधीनं पापं प्राप्नोति तत्कथं स्वधर्मः श्रेयानिति तत्राह -- स्वभावेति। स्वकीयं वर्णाश्रमं निमित्तीकृत्य विहितं स्वभावजमित्यधस्तादुक्तमित्याह -- यदुक्तमिति। विग्रहात्मकमपि विहितं कर्म कुर्वन्पापं नाप्नोतीत्यत्र दृष्टान्तमाह -- तथेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.47।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.47।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.47।। --,श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वो धर्मः स्वधर्मः? विगुणोऽपि इति अपिशब्दो द्रष्टव्यः? परधर्मात्। स्वभावनियतं स्वभावेन नियतम्? यदुक्तं स्वभावजमिति? तदेवोक्तं स्वभावनियतम् इति यथा विषजातस्य कृमेः विषं न दोषकरम्? तथा स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषं पापम्।।स्वभावनियतं कर्म कुर्वाणो विषजः इव कृमिः किल्बिषं न आप्नोतीति उक्तम् परधर्मश्च भयावहः इति? अनात्मज्ञश्च न हि कश्चित्क्षणमपि अकर्मकृत्तिष्ठति (गीता 3।5) इति। अतः --,

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【 Verse 18.48 】

▸ Sanskrit Sloka: सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् | सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: ||

▸ Transliteration: sahajaṁ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet | sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenā gnirivā vṛtāḥ ||

▸ Glossary: sahajaṁ: born simultaneously; karma: work; kaunteya: O son of Kuntī; sa- doṣaṁ: with fault; api: although; na: never; tyajet: to be given up; sarvāram- bhāḥ: any venture; hi: certainly; doṣeṇa: with fault; dhūmenāgniḥivāvṛtāḥ: being covered like the smoke around the fire

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.48 Every work has some defect, just as fire is covered by smoke. One should not give up the work that is born of his own nature, even if such work is full of fault, O Kaunteya (Arjuna).

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.48।।हे कुन्तीनन्दन दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसीनकिसी दोषसे युक्त हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.48।। हे कौन्तेय दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि सभी कर्म दोष से आवृत होते है? जैसे धुयें से अग्नि।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.48 सहजम् which is born? कर्म action? कौन्तेय O Kaunteya? सदोषम् with fault? अपि even? न not? त्यजेत् (one) should abandon? सर्वारम्भाः all undertakings? हि for? दोषेण by evil? धूमेन by smoke? अग्निः fire? इव like? आवृताः are enveloped.Commentary Sahajam Born with oneself born with the birth of man.Sadosham Faculty for everything is constituted of the three Gunas.All undertakings Ones own as well as others duties.If a Vaisya or a Kshatriya does the duties of a Brahmana he will not in any way be benefited. Anothers duty brings in fear. Therefore it is not proper to perform anothers duty. It is not possible for any man who has no knowledge of the Self to relinish action totally therefore he should not abandon action.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.48. O son of Kunti ! One should not give up the nature-born duty, even if it is (appears to be) defective. For, all beginnings are enveloped by harm just as the fire by smoke.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.48 The duty that of itself falls to one's lot should not be abandoned, though it may have its defects. All acts are marred by defects, as fire is obscured by smoke.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.48 One should not relinish one's works, O Arjuna, though it may be imperfect; for, all enterprises are enveloped by imperfections as fire by smoke.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.48 O son of Kunti, one should not give up the duty to which one is born, even though it be faulty. For all undertakings are surrounded with evil, as fire is with smoke.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.48 One should not abandon, O Arjuna, the duty to which one is born, though faulty; for, all undertakings are enveloped by evil, as fire by smoke.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.48 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.48 So, one should not relinish one's works, understanding that they are natural, are easy to perform and not liable to negligence. Such thoughts coupled with the idea that there are imperfections in them should not lead you to abandon them. The meaning is that though one is fit for Jnana Yoga, one should perform Karma Yoga only. All enterprises, be they of Karma or Jnana, are indeed enveloped by imperfections, by pain, as fire by smoke. But still there is this difference: Karma Yoga is easy and does not involve negligence, but Jnana Yoga is contrary to this.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.48 Kaunteya, O son of Kunti; na tyajet, one should not give up;-what?-the karma, duty; sahajam, to which one is born, which devolves from the very birth; api, even though; it be sadosam, faulty, consisting as it is of the three gunas. Hi, for; sarva-arambhah, all undertakings (-whatever are begun are arambhah, i.e. 'all actions', according to the context-), being constituted by the three gunas (-here, the fact of being constituted by the three gunas is the cause-); are avrtah, surrounded; dosena, with evil; iva, as;; agnih, fire; is dhumena, with smoke, which comes into being concurrently. One does not get freed from evil by giving up the duty to which one is born-called one's own duty-, even though (he may be) fulfilling somody else's duty. Another's duty, too, is fraught with fear. The meaning is: Since action cannot be totally given up by an unelightened person, therefore he should not relinish it. Opponent: Well, is it that one should not abandon action because it cannot be given up completely, or is it because evil [Evil resulting from discarding daily obligatory duties.] follows from the giving up of the duty to which one is born? Counter-objection: What follows from this? Opponent: If it be that the duty to which one is born should not be renounced because it is impossible to relinish it totally, then the conclusion that can be arrived at is that complete renunciation (of duty) is surely meritorious! Counter-objection: Truly so. But, may it not be that total relinishment is itself an impossibility? Is a person ever-changeful like the gunas of the Sankhyas, or is it that action itself is the agent, as it is in the case of the momentary five [Rupa (from), vedana (feeling), vijnana (momentary consciousness), sanjna (notion), samskara (mental impressions)-these have only momentary existence. In their case there can be no distinction between action and agent, simply due to the fact of their being momentary.] forms of mundane consciousness propounded by the Buddhists? In either case there can be no complete renunciation of action. Then there is also a third standpoint (as held by the Vaisesikas): When a thing acts it is active, and inactive when that very thing does not act. If this be the case here, it is possible to entirely give up actions. But the speciality of the third point of view is that a thing is not ever-changing, nor is action itself the agent. What then? A nonexistent action originates in an existing thing, and an existing action gets destroyed. The thing-in-itself continues to exist along with its power (to act), and that itself is the agent. This is what the followers of Kanada say. [Their view is that agentship consists in 'possessing the power to act', not in being the substratum of action.] What is wrong with this point of view. Vedantin: The defect indeed lies in this that, this veiw is not in accord with the Lord's view. Objection: How is this known? Vedantin: Since the Lord as said, 'Of the unreal there is no being৷৷.,' etc. (2.16). The view of the followers of Kanada is, indeed, this that the non-existent becomes existent, and the existent becomes nonexistent. Objection: What defect can there be if it be that this view, even though not the view of the Lord, yet conforms to reason? Vedantin: The answer is: This is surely faulty since it contradicts all valid evidence. Objection: How? Vedantin: As to this, if things like a dvyanuka (dyad of two anus, atoms) be absolutely nonexistent before origination, and after origination continue for a little while, and again become absolutely non-existent, then, in that acase, the existent which was verily nonexistent comes into being, [Here Ast. adds, 'sadeva asattvam apadyate, that which is verily existent becomes nonexistent'.-Tr.] a non-entity becomes an entity, and an entity becomes a non-entity! If this be the view, then the non-enity that is to take birth is comparable to the horns of a hare before it is born, and it comes into being with the help of what are called material (inherent), non-mateial (non-inherent) and efficient causes. But it cannot be said that nonexistence has origination in this way, or that it depends on some cause, since this is not seen in the case of nonexistent things like horns of a hare, etc. If such things as pot etc. which are being produced be of the nature of (potentially) existing things, then it can be accepted that they originate by depending on some cause which merely manifests them. [According to Vedanta, before origination a thing, e.g. a pot, remains latent in its material cause, clay for instance, with its name and form unexpressed, and it depends on other causes for the manifestation of name and form.] Moreover, if the nonexistent becomes existent, and the existent becomes non-existent, then nobody will have any faith while dealing with any of the means of valid knowledge objects of such knowledge, because the conviction will be lacking that the existent is existent and the nonexistent is nonexistent! Further, when they speak of origination, they (the Viasesikas) hold that such a thing as a dvyanuka (dyad) comes to have relationship with its own (material) causes (the two atoms) and existence, and that it is nonexistent before origination; but later on, depending on the operation of its own causes, it becomes connected with its own causes, viz the atoms, as also with existence, through the inherent (or inseparable) relationship called samavaya. After becoming connected, it becomes an existent thing by its inherent relationship with its causes. [The effect (dyad) has inherent relationship with existence after its material causes (the two atoms) come into association.] It has to be stated in this regard as to how the nonexistent can have an existent as its cuase, or have relationship with anything. For nobody can establish through any valid means of knowledge that a son of a barren woman can have any existence or relationship or cause. Vaisesika: Is it not that relationship of a non-existent thing is not at all established by the Vaisesikas? Indeed, what is said by them is that only existent entities like dvyanuka etc. have the relationship in the form of samavaya with their own causes. Vedantin: No, for it is not admitted (by them) that anything has existence before the (samavaya) relationship (occurs). It is surely not held by the Vaisesikas that a pot etc. have any existence before the potter, (his) stick, wheel, etc. start functioning. Nor do they admit that clay itself takes the shape of a pot etc. As a result, it has to be admitted (by them) as the last aternative that nonexistence itself has some relationship! Vaisesika: Well, it is not contradictory even for a nonexistent thing to have the relationship in the form of inherence. Vedantin: No, because this is not seen in the case of a son of a barren woman etc. If the antecedent nonexistence (prag-abhava) of the pot etc. alone comes into a relationship with its own (material) cause, but not so the nonexistence of the son of a barren woman etc. though as nonexistence both are the same, then the distinction between the (two) nonexistences has to be explained. Through such descriptions ( of abhava, nonexistence) as nonexistence of one, nonexistence of two, nonexistence of all, antecedent nonexistence, nonexistence after destruction, mutual nonexistence and absolute non-existence, nobody can show any distinction (as regards nonexistence itself)! There being no distinction, (therefore, to say that:) 'it is only the "antecedent nonexistence" of the pot which takes the form of the pot through the (action of) the potter and others, and comes into a relationship with the existing pot-halves which are its own (material) causes and becomes fit for all empirical processes [Such as production, destruction, etc.] but the "nonexistence after destruction" of that very pot does not do so, though it, too, is nonexistence. Hence, the "nonexistence after destruction", etc. [Etc. stands for 'mutual nonexistence (anyonya-abhava)' and 'absolute nonexistence (atyanta-abhava)'.] are not fit for any empirical processes, whereas only the "antecedent nonexistence" of things called dvyanuka etc. is fit for such empirical processes as origination etc.'-all this is incongruous, since as nonexistence it is indistinguishable, as are 'absolute nonexistence' and 'nonexistence after destruction'. Vaisesika: Well, it is not at all said by us that the 'antecedent nonexistence' becomes existent. Vedantin: In that case, the existent itself becomes existent , as for instance, a pot's becoming a pot, or a cloth's becoming a cloth. This, too, like nonexistence becoming existent, goes against valid evidence. Even the theory of transformation held by the Sankhyas does not differ from the standpoint of the Vaisesikas, since they believe in the origination of some new attribute [i.e. in the origination of a transformation that did not exist before.] and its destruction. Even if manifestation and disappearance of anything be accepted, yet there will be contradiction with valid means of knowledge as before in the explanation of existence or nonexistence of manifestation and disappearance. Hery is also refuted the idea that origination etc. (of an effect) are merely particular states of its cuase. As thelast alternative, it is only the one entity called Existence that is imagined variously through ignorance to be possessed of the states of origination, destruction, etc. like an actor (on a stage). This veiw of the Lord has been stated in the verse, 'Of the unreal there is no being৷৷.' (2.16). For, the idea of existence is constant, while the others are inconstant. Objection: If the Self be immutable, then how does the 'renunciation of all actions' become illogical? Vedantin: If the adjuncts (i.e. body and organs) be real or imagined through ignorance, in either case, action, which is their attribute, is surely superimposed on the Self through ignorance. From this point of view it has been said that an unenlightened person is incapable of totally renouncing actions even for a moment (cf. 3.5). The enlightened person, on the other hand, can indeed totally renounce actions when ignorance has been dispelled through Illumination; for it is illogical that there can (then) remain any trace of what has been superimposed through ignorance. Indeed, no trace remains of the two moons, etc. superimposed by the vision affected by (the disease called) Timira when the desease is cured. This being so, the utterance, 'having given up all actions mentally' (5.13), etc. as also, 'Being devoted to his own duty' (45) and 'A human being achieves 'success by adoring Him through his own duties (46), becomes justifiable. What was verily spoken of as the success arising from Karma (-yoga), characterized as the fitness for steadfastness in Knowledge,-the fruit of that (fitness), characterized as 'steadfastness in Knowledge' consisting in the perfection in the form of the state of one (i.e. a monk) free from duties, has to be stated. Hence the (following) verse is begun:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.48।। स्वभाव (वर्ण) और स्वधर्म (आश्रम) का इतना वर्णन करने के पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण विचाराधीन सिद्धांत के एक अत्यन्त सूक्ष्म पक्ष का विवेचन करते हैं। उनका उपदेश सामान्य है? जिसकी उपादेयता सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है। भगवान् का यह उपदेश है कि सहज कर्म के सदोष होने पर भी उसका त्याग नहीं करना चाहिए।शीघ्रता में केवल सतही दृष्टि से इस श्लोक का अध्ययन करने पर कोई भी पाठक इसे आध्यात्मिकता नहीं मानेगा। परन्तु ध्यानपूर्वक अध्ययन करने पर? सहज शब्द से इस श्लोक की गुत्थी सुलझ जाती है। सहज शब्द का अर्थ है जन्म के साथ। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म अपनी पूर्वार्जित वासनाओं के साथ ही होता है। अत सहज कर्म से तात्पर्य उन वासनाओं से है जिनके साथ मनुष्य का जन्म होता है। भगवान् श्रीकृष्ण का यह कथन है कि उन कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए? जो मनुष्य की सहज अर्थात् स्वाभाविक वासनाओं से प्रेरित होते हैं? परन्तु उन्होंने यह नहीं कहा कि जिस दूषित वातावरण में मनुष्य का जन्म होता है उस वातावरण के दोषयुक्त कमर्ों को उसे करना चाहिए।दो प्रकार की शक्तियां हमारे कर्मों को प्रेरित और नियमित? सीमित और निश्चित करती हैं (1) आन्तरिक मानसिक स्वभाविक से उत्पन्न होने वाली प्रवृत्तियाँ? तथा (2) बाह्य वातावरण तथा विषयों से उत्पन्न होने वाली नयेनये प्रलोभन। मनुष्य को अपनी स्वाभाविक वासनाओं के सदोष होने पर भी उनका अनुसरण करना चाहिए? परन्तु उसी समय? उसमें बाह्य प्रलोभनों का त्याग करने का साहस और क्षमता होनी चाहिए।जिन संस्कारों के साथ हमारा जन्म हुआ है? उसके अनुसार हमको कर्म करने चाहिए। परन्तु स्मरण रहे कि ये कर्म निरहंकार और निस्वार्थ भाव से ही किये जाने चाहिए। बाह्य जगत् के प्रलोभन हमारे प्रलोभन को दूषित नहीं कर सकें? इसकी हमें सावधानी रखनी चाहिए। इस तथ्य पर भगवान् श्रीकृष्ण विशेष बल देते हैं। गीता के अनुसार? मनुष्य परिस्थितियों का स्वामी है? दास नहीं। जिस मात्रा में मनुष्य अपने स्वामित्व को दृढ़तापूर्वक व्यक्त कर पायेगा? उसी मात्रा में उसका विकास संभव होगा।क्या सभी कर्म दोष से आवृत नहीं हैं भगवान् श्रीकृष्ण का युक्तिवाद यह है कि जब सभी कर्म दोषयुक्त हैं? तो स्वकर्म का त्याग कर परधर्म का आचरण क्यों करना चाहिए यह सर्वथा अनुपयुक्त है। दूसरी बात यह है कि अहंकारपूर्वक कर्म करने पर ही वे बन्धन कारक होते हैं? अन्यथा नहीं। अत साधक को निरहंकार भाव से सहज कर्म का पालन करना चाहिए। इस तथ्य को यहाँ आरम्भ शब्द से इंगित किया गया है। इसके पूर्व? हम आरम्भ शब्द का वास्तविक अर्थ देख चुके हैं कि कर्तृत्वाभिमान रहितकर्म। कर्तृत्व का अभिमान ही वासनाओं को उत्पन्न करके कर्म को दोषयुक्त बना देता है।अज्ञान अवस्था में यह दोष अपरिहार्य है? जैसे अग्नि के साथ धूम्र। परन्तु यदि चूल्हे को बाहर खुले वातावरण में रखा जाये? तो धुंआ नष्ट हो जाता है और अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। इसी प्रकार? ईश्वर का स्मरण करके निरहंकार भाव से जगत् कर्म करने पर अहंकार के अभाव में वासनाओं का आवरण नष्ट होकर स्वयं का शुद्ध चैतन्य स्वरूप स्पष्ट अनुभव होता है।सहज कर्म के पालन का फल क्या है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.48।।अतः सहजं जन्मनैवोत्पन्नं स्वभावजं कर्म न त्यजेत्। कुन्तीपुत्रेण क्षत्रियवरेण त्वया युद्धे अपलायनादि सहजं कर्म न त्याज्यमिति संबोधनाशयः। दोषवत्सहजमपि कर्म परित्यज्य निर्दोषमन्यदीयं कर्म कुतो नाश्रयणीयमित्याशङ्क्य दोषरहितस्य कर्मणएवाभावदित्याह -- सर्वारम्भा हि यस्मादारभ्यन्त इत्यारम्भाः सर्वकर्माणि त्रिगुणात्मकत्वात्सहजेन धूमेनाग्निरिवावृताः व्याप्ताः सदोषा इत्यर्थः। तथाच सहजस्य स्वधर्माख्यस्य कर्मणः परित्यागेन परधर्मानुष्ठानेऽपि सर्वकर्मणां दोषवत्त्वाद्दोषान्नैवमुच्यते। भयावहश्च परधर्मः। नच शक्यतेऽज्ञेनाशेषतः कर्म त्युक्तं यतस्तस्मान्न त्यजेदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.48।।यस्मादेवं विहितहिंसादेर्न प्रत्यवायहेतुत्वं परधर्मश्च भयावहः सामान्यदोषेण च सर्वकर्माणि दुष्टानि तस्मादज्ञो वर्णाश्रमाभिमानी -- सहजमिति। हे कौन्तेय? सहजं स्वभावजं कर्म सदोषमपि विहितहिंसायुक्तमपि ज्योतिष्टोमयुद्धादि न त्यजेदन्तःकरणशुद्धेः प्राग्भवानन्यो वा। नह्यनात्मज्ञः कश्चित्क्षणमपि कर्माण्यकृत्वा स्थातुं शक्नोति। नच परधर्माननुतिष्ठन्नपि दोषान्मुच्यते। सर्वारम्भाः स्वधर्माः परधर्माश्च सर्वे हि यस्माद्दोषेण त्रिगुणात्मकत्वेन सामान्येनावृता व्याप्ताः सदोषा एव। तथाच प्राग्व्याख्यातंपरिणामतापसंस्कारैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः इति। तस्मादगत्यानात्मज्ञः कर्माणि कुर्वन्विषजकृमिरिव विषं सहजं कर्म युद्धादि त्रिगुणात्मकत्वेन सामान्येन बन्धुवधादिनिमित्तत्वेन विशेषेण च सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वकर्मत्यागासमर्थत्वात् सर्वकर्मत्यागसमर्थस्तु शुद्धान्तःकरणस्त्यजेदेवेत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.48।।किं च सहजं स्वाभाविकं क्षात्रं कर्म सदोषं हिंसामिश्रमपि न त्यजेत्। हि यस्मात्सर्वारम्भाः सर्वाणि कर्माणि दोषेण हिंसादिना आवृता एव। यस्माच्च परधर्मो भयावहस्तस्मात्स्वकर्म न त्यजेदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.48।।यतो विगुणोऽपि भगवद्धर्मः श्रेष्ठः? अतो भगवत्कर्म न त्याज्यमित्याह -- सहजमिति। हे कौन्तेय स्त्रीत्वदोषसाहित्येऽपि भक्तगुणानुगृहीत सहजं स्वाभाविकं भगवत्क्रीडेच्छया सह जातं कर्म सदोषमपि लौकिकमपि पुरुषं स्वस्मिन् प्रवृत्तिं न त्यजेत्। अतः सर्वथा सिद्धिप्रापकं कुर्यादेवेत्यर्थः। कुतो न त्यजेदित्यत आह -- सर्वेति। हि निश्चयेन सर्वारम्भाः धूमेन अग्निरिव दोषेण मत्सम्बन्धाभावरूपेण आवृताः? अतस्तानि स्वदोषेणैव त्यागं कारयन्ति यथा धूमावृतोऽग्निरार्द्रेन्धनं नाग्नितां सम्पादयति? धूमावृतत्वान्न सुखसेव्यो भवति? निर्धूमस्तु तद्विपरीतत्वात्तथात्वं करोति? एवं मत्कर्माऽपि निर्दोषत्वान्न त्यजेदिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.48।।यदि पुनः सांख्यदृष्ट्या स्वधर्मे हिंसालक्षणं दोषं मत्वा परधर्मं श्रेष्ठं मन्यसे तर्हि सदोषत्वं परधर्मेऽपि तुल्यमित्याशयेनाह -- सहजमिति। सहजं स्वभावविहितं कर्म सदोषमपि न त्यजेत्। हि यस्मात् सर्वेऽप्यारम्भा दृष्टादृष्टार्थानि सर्वाण्यपि कर्माणि दोषेण केनचिदावृता व्याप्ता एव। यथा सहजेन धूमेनाग्निरावृतस्तद्वत्। अतो यथाग्नेर्धूमरूपं दोषमपाकृत्य प्रताप एव तमःशीतादिनिवृत्तये सेव्यते तथा कर्मणोऽपि दोषांशं विहाय गुणांश एव सत्त्वशुद्धये सेव्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.48।।यदि पुनः साङ्ख्यदृष्ट्या स्वधर्मे हिंसालक्षणं दोषं मत्वा परधर्मं श्रेयांसं मन्यसे तर्हि परधर्मेऽपि सदोषत्वं तुल्यमेव भवतीत्यतः कर्मनिष्ठैव ज्यायसीति पूर्वोक्तं स्मारयति -- सहजमिति। भगवता वर्णोद्भावेन सहैव सृष्टम्मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह इति भागवतात् [11।5।2] सहजं कर्म सदोषमपि न त्यजेत्। ज्ञानित्वेऽपि कर्मकरणं श्रेयः लोकसङ्ग्रहस्य सिद्धत्वात्। यद्वा दोषपदं दुःखवचनम्? तथा च सर्वस्य ज्ञानस्य कर्मणो वाऽऽरम्भाः पूर्वं दुःखेनावृताः हीत्युक्तम्। यतःयत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपोमं [18।37] इति। तत्र दृष्टान्तः -- धूमेनावृतः पूर्वमग्निरिवान्ते प्रकाश एवेति तथेति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.48।।उपर्युक्त श्लोकमें यह बात कही कि स्वभावनियत कर्मोंको करनेवाला मनुष्य? विषमें जन्मे हुए कीड़ेकी भाँति पापको प्राप्त नहीं होता? तथा ( तीसरे अध्यायमें ) यह भी कहा है कि दूसरेका धर्म भयावह है और कोई भी अज्ञानी बिना कर्म किये क्षणभर भी नहीं रह सकता। इसलिये --, जो जन्मके साथ उत्पन्न हो उसका नाम सहज है। वह क्या है कर्म। हे कौन्तेय त्रिगुणमय होनेके कारण जो दोषयुक्त है? ऐसे दोषयुक्त भी अपने सहजकर्मको नहीं छोड़ना चाहिये। क्योंकि सभी आरम्भजो आरम्भ किये जाते हैं उनका नाम आरम्भ है? अतः यहाँ प्रकरणके अनुसार सर्वारम्भका तात्पर्य समस्त कर्म है। सा स्वधर्म या परधर्मरूप जो कुछ भी कर्म है? वे सभी तीनों गुणोंके कार्य हैं। अतः त्रिगुणात्मक होनेके कारण? साथ जन्मे हुए धुएँसे अग्निकी भाँति दोषसे आवृत हैं। अभिप्राय यह है कि स्वधर्म नामक सहजकर्मका परित्याग करनेसे और परधर्मका ग्रहण करनेसे भी? दोषसे छुटकारा नहीं हो सकता और परधर्म भयावह भी है तथा अज्ञानीद्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका पूर्णतया त्याग होना सम्भव भी नहीं है सुतरां सहजकर्मको नहीं छोड़ना चाहिये। ( यहाँ यह विचार करना चाहिये कि ) क्या कर्मोंका अशेषतः त्याग होना असम्भव है? इसलिये उनका त्याग नहीं करना चाहिये? अथवा सहज कर्मका त्याग करनेमें दोष है इसलिये पू0 -- इसमें क्या सिद्ध होगा उ0 -- यदि यह बात हो कि अशेषतः त्याग

Chapter 18 (Part 26)

होना अशक्य है? इसलिये सहजकर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये? तब तो यही सिद्ध होगा कि कर्मोंका अशेषतः त्याग करनेमें गुण ही है। पू0 -- यह ठीक है? परंतु यदि कर्मोंका पूर्णतया त्याग हो ही नहीं सकता ( तो फिर गुणदोषकी बात ही क्या है ) उ0 -- तो क्या सांख्यवादियोंके गुणोंकी भाँति आत्मा सदा चलनस्वभाववाला है अथवा बौद्धमतावलम्बियोंके प्रतिक्षणमें नष्ट होनेवाले ( रूप? वेदना? विज्ञान? संज्ञा और संस्काररूप ) पञ्च स्कन्धोंकी भाँति क्रिया ही कारक है इन दोनों ही प्रकारोंसे कर्मोंका अशेषतः त्याग नहीं हो सकता। हाँ? तीसरा एक पक्ष और भी है कि जब आत्मा कर्म करता है तब तो वह सक्रिय होता है और जब कर्म नहीं करता? तब वही निष्क्रिय होता है? ऐसा मान लेनेसे कर्मोंका अशेषतः त्याग भी हो सकता है। इस तीसरे पक्षमें यह विशेषता है? कि न तो आत्मा नित्य चलनस्वभाववाला माना गया है? और न क्रियाको ही कारक माना गया है? तो फिर क्या है? कि अपने स्वरूपमें स्थित द्रव्यमें ही अविद्यमान क्रिया उत्पन्न हो जाती है और विद्यमान क्रियाका नाश हो जाता है शुद्ध द्रव्य? क्रियाकी शक्तिसे युक्त होकर स्थित रहता है और वही कारक है। इस प्रकार वैशेषिकमतावलम्बी कहते हैं। पू0 -- इस पक्षमें क्या दोष है उ0 -- इसमें प्रधान दोष तो यही है कि यह मत भगवान्को मान्य नहीं है। पू0 -- यह कैसे जाना जाता है। उ0 -- इसीलिये कि भगवान् तो असत् वस्तुका कभी भाव नहीं होता इत्यादि वचन कहते हैं और वैशेषिकमतवादी असत्का भाव और सत्का अभाव मानते हैं। पू0 -- भगवान्का मत न होनेपर भी यदि न्याययुक्त हो तो इसमें क्या दोष है उ0 -- बतलाते हैं ( सुनो ) सब प्रमाणोंसे इस मतका विरोध होनेके कारण भी यह मत दोषयुक्त है। पू0 -- किस प्रकार उ0 -- यदि यह माना जाय कि द्व्यणुक आदि द्रव्य उत्पत्तिसे पहले अत्यन्त असत् हुए ही उत्पन्न हो जाते हैं और किञ्चित् काल स्थित रहकर फिर अत्यन्त ही असत् भावको प्राप्त हो जाते हैं? तब तो यही मानना हुआ कि असत् ही सत् हो जाता है अर्थात् अभाव भाव हो जाता है और भाव अभाव हो जाता है। अर्थात् ( यह मानना हुआ कि ) उत्पन्न होनेवाला अभाव? उत्पत्तिसे पहले शश -- श्रृङ्गकी भाँति सर्वथा असत् होता हुआ ही? समवायि? असमवायि और निमित्त नामक तीन कारणोंकी सहायतासे उत्पन्न होता है। परंतु अभाव इस प्रकार उत्पन्न होता है अथवा कारणकी अपेक्षा रखता है -- यह कहना नहीं बनता क्योंकि खरगोशके सींग आदि असत् वस्तुओंमें ऐसा नहीं देखा जाता। हाँ? यदि यह माना जाय कि उत्पन्न होनेवाले घटादि भावरूप हैं और वे अभिव्यक्तिके किसी कारणकी सहायतासे उत्पन्न होते हैं? तो यह माना जा सकता है। तथा असत्का सत् और सत्का असत् होना मान लेनेपर तो किसीका प्रमाणप्रमेयव्यवहारमें कहीं विश्वास ही नहीं रहेगा क्योंकि ऐसा मान लेनेसे फिर यह निश्चय नहीं होगा कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है। इसके सिवा वे उत्पन्न होता है इस वाक्यसे द्व्यणुक आदि द्रव्यका अपने कारण और सत्तासे सम्बन्ध होना बतलाते हैं अर्थात् उत्पत्तिसे पहले कार्य असत् होता है? फिर अपने कारणके व्यापारकी अपेक्षासे,( सहायतासे ) अपने कारणरूप परमाणुओंसे और सत्तासे समवायरूप सम्बन्धके द्वारा संगठित हो जाता है और संगठित होकर कारणसे मिलकर सत् हो जाता है। इसपर उनको बतलाना चाहिये कि असत्का कारण सत् कैसे हो सकता है और असत्का किसीके साथ सम्बन्ध भी कैसे हो सकता है क्योंकि वन्ध्यापुत्रकी सत्ता? उसका किसी सत् पदार्थके साथ सम्बन्ध अथवा उसका कारण? किसीके भी द्वारा प्रमाणपूर्वक सिद्ध नहीं किया जा सकता। पू0 -- वैशेषिकमतवादी अभावका सम्बन्ध नहीं मानते। वे तो भावरूप द्व्यणुक आदि द्रव्योंका ही अपने कारणके साथ समवायरूप सम्बन्ध बतलाते हैं। उ0 -- यह बात नहीं है क्योंकि ( उनके मतमें ) कार्यकारणका सम्बन्ध होनेसे पहले कार्यकी सत्ता नहीं मानी गयी। अर्थात् वैशेषिकमतावलम्बी कुम्हार और दण्डचक्र आदिकी क्रिया आरम्भ होनेसे पहले घट आदिका अस्तित्व नहीं मानते और यह भी नहीं मानते कि मिट्टीको ही घटादिके आकारकी प्राप्ति हुई है। इसलिये अन्तमें असत्का ही सम्बन्ध मानना सिद्ध होता है। पू0 -- असत्का भी समवायरूप सम्बन्ध होना विरुद्ध नहीं है। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि वन्ध्यापुत्र आदिका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं देखा जाता। अभावकी समानता होनेपर भी यदि कहो कि घटादिके प्रागभावका ही अपने कारणके साथ सम्बन्ध होता है? वन्ध्यापुत्रादिके अभावका नहीं? तो इनके अभावोंका भेद बतलाना चाहिये। एकका अभाव? दोका अभाव? सबका अभाव? प्रागभाव? प्रध्वंसाभाव? अन्योन्याभाव? अत्यन्ताभाव इन लक्षणोंसे कोई भी अभावकी विशेषता नहीं दिखला सकता। फिर किसी प्रकारकी विशेषता न होते हुए भी यह कहना कि घटका प्रागभाव ही कुम्हार आदिके द्वारा घटभावको प्राप्त होता है तथा उसका कपालनामक अपने कारणरूप भावसे सम्बन्ध होता है और वह सब व्यवहारके योग्य भी होता है। परंतु उसी घटका जो प्रध्वंसाभाव है? वह अभावत्वमें समान होनेपर भी सम्बन्धित नहीं होता। इस तरह प्रध्वंसादि अभावोंको किसी भी अवस्थामें व्यवहारके योग्य न मानना और केवल द्व्यणुक आदि द्रव्यनामक प्रागभावको ही उत्पत्ति आदि व्यवहारके योग्य मानना? असमञ्जसरूप ही है क्योंकि अत्यन्ताभाव और प्रध्वंसाभावके समान ही प्रागभावका भी अभावत्व है? उसमें कोई विशेषता नहीं है। पू0 -- हमने प्रागभावका भावरूप होना नहीं बतलाया है। उ0 -- तब तो तुमने भावका ही भावरूप हो जाना कहा है? जैसे घटका घटरूप हो जाना वस्त्रका वस्त्ररूप हो जाना परंतु यह भी अभावके भावरूप होनेकी भाँति ही प्रमाणविरुद्ध है। सांख्यमतावलम्बियोंका जो परिणामवाद है? उसमें अपूर्व धर्मकी उत्पत्ति और विनाश स्वीकार किया जानेके कारण? वह भी ( इस विषयमें ) वैशेषिकमतसे कुछ विशेषता नहीं रखता। अभिव्यक्ति ( प्रकट होना ) और तिरोभाव ( छिप जाना ) स्वीकार करनेसे भी? अभिव्यक्ति और तिरोभावकी विद्यमानता और अविद्यमानताका निरूपण करनेमें? पहलेकी भाँति ही प्रमाणसे विरोध होगा। इस विवेचनसे कारणका कार्यरूपमें स्थित होना ही उत्पत्ति आदि हैं ऐसा निरूपण करनेवाले मतका भी खण्डन हो जाता है। इन सब मतोंका खण्डन हो जानेपर अन्तमें यही सिद्ध होता है कि एक ही सत्य तत्त्व ( आत्मा ) अविद्याद्वारा नटकी भाँति उत्पत्ति? विनाश आदि धर्मोंसे अनेक रूपमें कल्पित होता है। यही भगवान्का अभिप्राय नासतो विद्यते भावः इस श्लोकमें बतलाया गया है क्योंकि सत्प्रत्ययका व्यभिचार नहीं होता और अन्य ( असत् ) प्रत्ययोंका व्यभिचार होता है ( अतः सत् ही एकमात्र तत्त्व है )। पू0 -- यदि ( भगवान्के मतमें ) आत्मा निर्विकार है तो ( वे ) यह कैसे कहते हैं कि अशेषतः कर्मोंका त्याग नहीं हो सकता उ0 -- शरीरइन्द्रियादिरूप गुण चाहे सत्य वस्तु हों? चाहे अविद्याकल्पित हों? जब कर्म उन्हींका धर्म है? तब आत्मामें तो वह अविद्याध्यारोपित ही है। इस कारण कोई भी अज्ञानी अशेषतः कर्मोंका त्याग क्षणभर भी नहीं कर सकता यह कहा गया है। परंतु विद्याद्वारा अविद्या निवृत्त हो जानेपर ज्ञानी तो कर्मोंका अशेषतः त्याग कर ही सकता है क्योंकि अविद्या नष्ट होनेके उपरान्त? अविद्यासे अध्यारोपित वस्तुका अंश बाकी नहीं रह सकता। ( यह प्रत्यक्ष ही है कि ) तिमिररोगसे विकृत हुई दृष्टिद्वारा अध्यारोपित दो चन्द्रमा आदिका कुछ भी अंश? तिमिररोग नष्ट हो जानेपर? शेष नहीं रहता। सुतरां सब कर्मोंको मनसे छोड़कर इत्यादि कथन ठीक ही हैं। तथा अपनेअपने कर्मोंमें लगे हुए मनुष्य संसिद्धिको प्राप्त होते हैं मनुष्य अपने कर्मोंसे उसकी पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है -- ये कथन भी ठीक हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.48।। व्याख्या --   [पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो कर्म नियत किये हैं? उन कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावनियत कर्मोंमें भी पापक्रिया होती है। अगर पापक्रिया न होती तो पापको प्राप्त नहीं होता यह कहना नहीं बनता। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि जो सहज कर्म हैं? उनमें कोई दोष भी आ जाय तो भी उनका त्याग नहीं करना चाहिये क्योंकि सबकेसब कर्म धुएँसे अग्निकी तरह दोषसे आवृत हैं। ]सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् -- स्वभावनियतकर्म सहजकर्म कहलाते हैं जैसे -- ब्राह्मणके शम? दम आदि क्षत्रियके शौर्य? तेज आदि वैश्यके कृषि? गौरक्ष्य आदि और शूद्रके सेवाकर्म -- ये सभी सहजकर्म हैं। जन्मके बाद शास्त्रोंने पूर्वके गुण और कर्मोंके अनुसार जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? वे शास्त्रनियत कर्म भी सहजकर्म कहलाते हैं जैसे ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना और कराना? पढ़ना और पढ़ाना आदि क्षत्रियके लिये यज्ञ करना? दान करना आदि वैश्यके लिये यज्ञ करना आदि और शूद्रके लिये सेवा।सहज कर्ममें ये दोष हैं --,(1) परमात्मा और परमात्माका अंश -- ये दोनों ही स्व हैं तथा प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर आदि -- ये दोनों ही पर हैं। परन्तु परमात्माका अंश स्वयं प्रकृतिके वश होकर परतन्त्र हो जाता है अर्थात् क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और उस क्रियाको यह अपनेमें मान लेता है तो परतन्त्र हो जाता है। यह प्रकृतिके परतन्त्र होना ही महान् दोष है।(2) प्रत्येक कर्ममें कुछनकुछ आनुषङ्गिक अनिवार्य हिंसा आदि दोष होते ही हैं।(3) कोई भी कर्म किया जाय? वह कर्म किसीके अनुकूल और किसीके प्रतिकूल होता ही है। किसीके प्रतिकूल होना भी दोष है।(4) प्रमाद आदि दोषोंके कारण कर्मके करनेमें कमी रह जाना अथवा करनेकी विधिमें भूल हो जाना भी दोष है।अपने सहजकर्ममें दोष भी हो? तो भी उसको नहीं छोड़ना चाहिये। इसका तात्पर्य है कि जैसे ब्राह्मणके कर्म जितने सौम्य हैं? उतने ब्राह्मणेतर वर्णोंके कर्म सौम्य नहीं हैं। परन्तु सौम्य न होनेपर भी वे कर्म दोषी नहीं,माने जाते अर्थात् ब्राह्मणके सहज कर्मोंकी अपेक्षा क्षत्रिय? वैश्य आदिके सहज कर्मोंमें गुणोंकी कमी होनेपर भी उस कमीका दोष नहीं लगता और अनिवार्य हिंसा आदि भी नहीं लगते? प्रत्युत उनका पालन करनेसे लाभ होता है। कारण कि वे कर्म उनके स्वभावके अनुकूल होनेसे करनेमें सुगम हैं और शास्त्रविहित हैं।ब्राह्मणके लिये भिक्षा बतायी गयी है। देखनेमें भिक्षा निर्दोष दीखती है? पर उसमें भी दोष आ जाते हैं। जैसे किसी गृहस्थके घरपर कोई भिक्षुक खड़ा है और उसी समय दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है तो गृहस्थको भार लगता है। भिक्षुकोंमें परस्पर ईर्ष्या होनेकी सम्भावना रहती है। भिक्षा देनेवालेके घरमें पूरी तैयारी नहीं है तो उसको भी दुःख होता है। यदि कोई गृहस्थ भिक्षा देना नहीं चाहता और उसके घरपर भिक्षुक चला जाय तो उसको बड़ा कष्ट होता है। अगर वह भिक्षा देता है तो खर्चा होता है और नहीं देता है तो भिक्षुक निराश होकर चला जाता है। इससे उस गृहस्थको पाप लगता है और बेचारा उसमें फँस जाता है। इस प्रकार यद्यपि भिक्षामें भी दोष होते हैं? तथापि ब्राह्मणको उसे छोड़ना नहीं चाहिये।क्षत्रियके लिये न्याययुक्त युद्ध प्राप्त हो जाय तो उसको करनेसे क्षत्रियको पाप नहीं लगता। यद्यपि युद्धरूप कर्ममें दोष हैं क्योंकि उसमें मनुष्योंको मारना पड़ता है? तथापि क्षत्रियके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे दोष नहीं लगता। ऐसे ही वैश्यके लिये खेती करना बताया गया है। खेती करनेमें बहुतसे जन्तुओंकी हिंसा होती है। परन्तु वैश्यके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे हिंसाका इतना दोष नहीं लगता। इसलिये सहज कर्मोंको छोड़ना नहीं चाहिये।सहज कर्मोंको करनेमें दोष (पाप) नहीं लगता -- यह बात ठीक है परन्तु इन साधारण सहज कर्मोंसे मुक्ति कैसे हो जायगी वास्तवमें मुक्ति होनेमें सहज कर्म बाधक नहीं हैं। कामना? आसक्ति? स्वार्थ? अभिमान आदिसे ही बन्धन होता है और पाप भी इन कामना आदिके कारणसे ही होते हैं। इसलिये मनुष्यको निष्कामभावपूर्वक भगवत्प्रीत्यर्थ सहज कर्मोंको करना चाहिये? तभी बन्धन छूटेगा।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः -- जितने भी कर्म हैं? वे सबकेसब सदोष ही हैं जैसे -- आग सुलगायी जाय तो आरम्भमें धुआँ होता ही है। कर्म करनेमें देश? काल? घटना? परिस्थिति आदिकी परतन्त्रता और दूसरोंकी प्रतिकूलता भी दोष है? परन्तु स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने आज्ञा दी है। उस आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि भैया तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है? वह तेरा धर्म है क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है? इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है (गीता 2। 31)। सम्बन्ध --   अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.48।।इतश्च विहितं कर्म दोषवदपि कर्तव्यं प्रकारान्तरासंभवादित्युक्तानुवादपूर्वकं कथयति -- स्वभावेत्यादिना। नहि कृमिर्विषजो विषनिमित्तं मरणं प्रतिपद्यते तथायऽमधिकृतः पुरुषो दोषवदपि विहितं कर्म कुर्वन्पापं नाप्नोतीत्युक्तमित्यर्थः। तर्हि दोषरहितमेव भिक्षाटनादि सर्वैरनुष्ठीयतामतो न पापप्राप्त्याशङ्केत्याशङ्क्याह -- परेति। उक्तमित्यनुवर्तते। तर्हि पापप्राप्तिशङ्कां परिहर्तुमकर्मनिष्ठत्वमेव सर्वेषां स्यादित्याशङ्क्य ज्ञानाभावान्नैवमित्याह -- अनात्मज्ञ इति। पूर्ववदत्रापि संबन्धः। प्रकारान्तरासंभवकृतं फलमाह -- अतइति। सह जायत इति सहजं स्वभावनियतं नित्यं कर्म तद्विहितत्वान्निर्दोषमपि हिंसात्मकतया सदोषमित्यत्र हेतुमाह -- त्रिगुणेति। सत्त्वादिगुणत्रयारब्धतया हिंसादिदोषवदपि कर्म विहितमत्याज्यमित्यर्थः। कर्मणां दोषवत्त्वं प्रपञ्चयति -- सर्वेति। आरम्भशब्दस्य कर्मव्युत्पत्त्या स्वपरसर्वकर्मार्थत्वे कर्मणां प्रकृतत्वं हेतुमाह -- प्रकरणादिति। दोषेणेत्यादि व्याचष्टे -- ये केचिदिति। ते सर्वे दोषेणावृता इति संबन्धः। सर्वकर्मणां दोषावृतत्वे हिशब्दोपात्तं यस्मादित्युक्तं हेतुमेवाभिनयति -- त्रिगुणात्मकत्वमिति। स्वभावनियतस्य कर्मणो दोषवत्त्वात्तत्त्यागद्वारा परधर्ममातिष्ठमानस्यापि नैव दोषाद्विमोकः संभवति। न च परधर्मोऽनुष्ठातुं शक्यते भयावहत्वान्नच तर्हि कर्मणोऽशेषतोऽननुष्ठानमेवाज्ञस्याशेषकर्मत्यागायोगादतः सहजं कर्म सदोषमपि न त्याज्यमिति वाक्यार्थमाह -- सहजस्येति। सहजं कर्म सदोषमपि न त्यजेदित्यत्र विचारमवतारयति -- किमिति। नहि कश्चिदिति न्यायादिति शेषः। दोषो विहितनित्यत्यागे प्रत्यवायः। संदिग्धस्य प्रयोजनस्य विचार्यत्वादुक्ते संदेहे प्रयोजनं पृच्छति -- किञ्चात इति। तत्राद्यमनूद्य फलं दर्शयति -- यदीति। अशक्यार्थानुष्ठानस्य गुणत्वेन प्रसिद्धत्वात्प्रसिद्धं हि महोदधिमगस्त्यस्य चुलुकीकृत्य पिबतो गुणवत्त्वं तदाह -- एवं तर्हीति। अशेषकर्मत्यागस्य गुणवत्त्वेऽपि प्रागुक्तन्यायेन तदयोगात्तस्याशक्यानुष्ठानतेति शङ्कते -- सत्यमिति। चोद्यमेव विवृण्वन्नाद्यं,विभजते -- किमिति। सत्त्वादिगुणवदात्मनो नित्यप्रचलितत्वेनाशेषतस्तेन न कर्म त्यक्तुं शक्यं नापि रूपविज्ञानवेदनासंज्ञासंस्कारसंज्ञानां क्षणध्वंसिनां स्कन्धानामिव क्रियाकारकभेदाभावात्कारकस्यैवात्मनः क्रियात्वमित्युक्ते कर्माशेषतस्त्यक्तुं शक्यमुभयत्रापि स्वभावभङ्गादित्याह -- उभयथेति। पक्षद्वयानुरोधेनाशेषकर्मत्यागायोगे वैशेषिकश्चोदयति -- अथेति। कदाचिदात्मा सक्रियो निष्क्रियश्च कदाचिदिति स्थिते फलितमाह -- तत्रेति। उक्तमेव पक्षं पूर्वोक्तपक्षद्वयाद्विशेषदर्शनेन विशदयति -- अयं त्विति। आगमापायित्वे क्रियायास्तद्वतो द्रव्यस्य कथं स्थायितेत्याशङ्क्याह -- शुद्धमिति। क्रियाशक्तिमत्त्वेऽपि क्रियावत्त्वाभावे कथं कारकत्वं क्रियां कुर्वत् कारणं कारकमित्यभ्युपगमादित्याशङ्क्याह -- तदेवेति। क्रियाशक्तिमदेव कारकं न क्रियाधिकरणं परस्पराश्रयादित्यर्थः। वैशेषिकपक्षे दोषाभावादस्ति सर्वैः स्वीकार्यतेत्युपसंहरति -- इत्यस्मिन्निति। भगवन्मतानुसारित्वाभावादस्य पक्षस्य त्याज्यतेति दूषयति -- अयमेवेति। भगवन्मताननुसारित्वमस्याप्रामाणिकमिति शङ्कते -- कथमिति। भगवद्वचनमुदाहरन् परपक्षस्य तदनुगुणत्वाभावमाह -- यत इति। परेषामपि मतमेतदनुगुणमेव किं न स्यादित्याशङ्क्याह -- काणादानां हीति। भगवन्मतानुगुणत्वाभावेऽपि न्यायानुगुणत्वेन दोषरहितं काणादानां मतमुपादेयमेव तर्हि काणादमतविरोधादुपेक्ष्यते भगवन्मतमिति शङ्कते -- अभागवतत्वेऽपीति। न्यायवत्त्वमसिद्धमिति दूषयति -- उच्यत इति। सर्वप्रमाणानुसारिणो मतस्य न तद्विरोधितेत्याक्षिपति -- कथमिति। वैशेषिकमतस्य सर्वप्रमाणविरोधं प्रकटयन्नादौ तन्मतमनुवदति -- यदीति। असतो जन्म सतश्च नाश इति स्थिते फलितमाह -- तथाचेति। उक्तमेव वाक्यं व्याकरोति -- अभाव इति। सदेवासत्त्वमापद्यत इत्युक्तं व्याचष्टे -- भावश्चेति। इति मतमिति शेषः। तत्रैवाभ्युपगमान्तरमाह -- तत्रेति। प्रकृतं मतं सप्तम्यर्थः। इत्यभ्युपगम्यत इति शेषः। परकीयमभ्युपगमं दूषयति -- नचेति। एवमिति परपरिभाषानुसारेणेत्यर्थः। अदर्शनादुत्पत्तेरपेक्षायाश्चेति शेषः। कथं तर्हि त्वन्मतेऽपि घटादीनां कारणापेक्षाणामुत्पत्तिर्न हि भावानां कारणापेक्षोत्पत्तिर्वा युक्तेति तत्राह -- भावेति। घटादीनामस्मत्पक्षे प्रागपि कारणात्मना सतामेवाव्यक्तनामरूपाणामभिव्यक्तिसामग्रीमपेक्ष्य पृथगभिव्यक्तिसंभवान्न किंचिदनवद्यमित्यर्थः। असत्कार्यवादे दोषान्तरमाह -- किञ्चेति। परमते मानमेयव्यवहारे क्वचिदपि विश्वासो न कस्यचिदित्यत्र हेतुमाह -- सत्सदेवेति। नहि सत्तथैवेति निश्चितं तस्यैव पुनरसत्त्वप्राप्तेरिष्टत्वान्न चासत्तथैवेति निश्चयस्तस्यैव सत्त्वप्राप्तेरुपगमादतो यन्मानेन सदसद्वा निर्णीतं तत्तथेति विश्वासाभावान्मानवैफल्यमित्यर्थः। इतश्चासत्कार्यवादो न युक्तिमानित्याह -- किञ्चेति। तदेव हेत्वन्तरं स्फोरयितुं परमतमनुवदति -- उत्पद्यत इतीति। परकीयं वचनमेव व्याचष्टे -- प्रागिति। संबद्धं सदित्यनेन कारणसंबन्धे सति कार्यस्य सत्तासंबन्धो भवतीत्युक्तं तदेव स्फुटयति -- कारणेति। परमतमेवमनुभाष्य दूषयति -- तत्रेति। कार्यस्यासतोऽपि कारणं संभवति तस्य च कार्येण संबन्धः सिध्यतीत्याशङ्क्याह -- नहीति। असत्त्वादेवासतः संबन्धाभावे कारणस्य सतोऽपि न तेन संबन्धोऽनुमातुं शक्यते सदसतोः संबन्धासंभवादित्यर्थः। कार्यस्यात्यन्तासत्त्वानभ्युपगमात्कारणसंबन्धः स्यादिति शङ्कते -- नन्विति। सतामेव द्व्यणुकादीनां कारणसंबन्धं शङ्कितं दूषयति -- न संबन्धादिति। अनभ्युपगममेव विशदयति -- नहीति। सदेव कारणं कार्याकारमापद्य कार्यव्यवहारं निर्वहतीत्यभ्युपगमान्नास्ति संबन्धानुपपत्तिरित्याशङ्क्यापराद्धान्तान्मैवमित्याह -- नचेति। कार्यस्य कारणसंबन्धात्पूर्वं सत्त्वाभावे परिशेषसिद्धमर्थं दर्शयति -- ततश्चेति। तत्र चानुपपत्तिरुक्तेति शेषः। संबन्धिनोः सदसतोरेवासंयोगेऽपि समवायः सदसतोः संभवेदिति तस्य नित्यत्वादन्यतरसंबन्धाभावेऽपि स्थितेरावश्यकत्वादिति शङ्कते -- नन्विति। सदसतोर्मिथः संबन्धस्यादृष्टत्वान्नेति निराचष्टे -- न वन्ध्येति। घटादिप्रागभावस्यात्यन्ताभावत्वाभावाद्वन्ध्यापुत्रादिविलक्षणतया स्वकारणसंबन्धः सिध्यतीत्याशङ्क्याह -- घटादेरिति। उभयत्राभावस्वभावाविशेषेऽपि कस्यचित्कारणसंबन्धो नेतरस्येति विशेषे हेत्वभावान्न प्रागभावस्य कारणसंबन्धः संभवतीत्यर्थः। घटादिप्रागभावस्य सप्रतियोगिकत्वं वन्ध्यापुत्रादेर्नैवमिति विशेषमाशङ्क्य दूषयति -- एकस्येति। प्रागभावस्यैवप्रध्वंसाभावादेरपि सप्रतियोगिकत्वाविशेषे स्वकारणेन संबन्धाविशेषः स्यादित्यर्थः। प्रागभावप्रध्वंसाभावयोर्विशेषाभावे फलितमाह -- असति चेति। कपालशब्दो घटकारणीभूतमृदवयवविषयः? सर्वो व्यवहारो घटाश्रितो जन्मनाशादिव्यवहारः। प्रध्वंसाभावस्तु घटस्यैवाभावत्वे सत्यपि न घटत्वमापद्यते नापि कारणेन संबध्यते न चोत्पत्त्यादिव्यवहारयोग्यो भवतीत्येतदयुक्तं प्रागभावेनास्य विशेषाभावादित्याह -- नत्विति। असमञ्जसमित्यनेनेतिशब्दः संबध्यते। असमञ्जसान्तरमाह -- प्रध्वंसादीति। अन्योन्याभावात्यन्ताभावावादिपदार्थौ। क्वचिदिति देशकालयोर्ग्रहणं? व्यवहारो जन्मादिरेव? प्रागभावो,नोत्पत्त्यादिव्यवहारयोग्योऽभावत्वात्प्रध्वंसादिवदित्यर्थः। प्रागभावस्य घटाभावानभ्युपगमादनुमानं सिद्धसाधनमिति शङ्कते -- नन्विति। अभावस्य भावापत्त्यनभ्युपगमे भावस्यैव भावापत्तिरित्यनिष्टं स्यादिति दूषयति -- भावस्यैवेति। तस्य तदापत्तेरयोग्यत्वे दृष्टान्तमाह -- यथेति। अभावस्य भावापत्तिरनिष्टेति दार्ष्टान्तिकं स्पष्टयति -- एतदपीति। आरम्भवादोक्तं दोषं परिणामवादेऽपि संचारयति -- सांख्यस्येति। धर्मः परिणामः। असतोऽपूर्वपरिणामस्योत्पत्तेः सतश्च पूर्वपरिणामस्य नाशादसदसदेव सच्च सदेवेति व्यवस्थात्रापि दुर्घटेत्यर्थः। ननु कार्यं कारणात्मना प्रागपि सदेवाव्यक्तं कारकव्यापाराद्व्यज्यते तेन व्यक्त्यव्यक्त्योर्जन्मनाशव्यवहारान्मतान्तराद्विशेषसिद्धिस्तत्राह -- अभिव्यक्तीति। कारकव्यापारात्प्रागनभिव्यक्तिवदभिव्यक्तेः सत्त्वमसत्त्वं वा सत्त्वे कारकव्यापारवैयर्थ्यात्तद्विषयप्रमाणविरोधो द्वितीये पक्षान्तरवदत्यन्तासतस्तन्निर्वर्त्यत्वायोगे स एव दोषः कारकव्यापारादूर्ध्वं व्यक्तिवदव्यक्तेरपि सत्त्वे स एव दोषोऽसत्त्वेपि सतोऽसत्त्वानङ्गीकारान्मानमेयव्यवहारे न क्वापि विश्वासः सत्सदेवासदसदेवेत्यनिर्धारणादित्यर्थः। सांख्यपक्षप्रतिक्षेपन्यायेन पक्षान्तरमपि प्रतिक्षिप्तमित्याह -- एतेनेति। कारणस्यैव कार्यरूपापत्तिरुत्पत्तिस्तस्यैव तद्रूपत्यागेन स्वरूपापत्तिर्नाश इत्येतदपि न पूर्वरूपे स्थिते नष्टे च परस्य पररूपापत्तेरनुपपत्तेः? न च प्राप्तं रूपं स्थितेन नष्टेन वा त्यक्तुं शक्यमित्यर्थः। आरम्भवादे परिणामवादेषु चोत्पत्त्यादिव्यवहारानुपपत्तौ परिशेषायातं दर्शयति -- पारिशैष्यादिति। एकस्यानेकविधविकल्पानुपपत्तिमाशङ्क्याह -- अविद्ययेति। अस्यापि मतस्य भगवन्मतानुरोधित्वाभावादविशिष्टा त्याज्यतेत्याशङ्क्याह -- इतीदमिति। उक्तमेव भगवन्मतं विशदयति -- सत्प्रत्ययस्येति। सदेकमेव वस्तु स्यादिति शेषः। इतरेषां विकारप्रत्ययानां रजतादिधीवदर्थव्यभिचारादविद्यया तदेव सद्वस्त्वनेकधा विकल्प्यत इत्याह -- व्यभिचाराच्चेति। इति मतं श्लोके दर्शितमिति संबन्धः। आत्मनश्चेदविक्रियत्वं भगवतेष्टं तर्हि सर्वकर्मपरित्यागोपपत्तेः सहजस्यापि कर्मणस्त्यागसिद्धिरिति शङ्कते -- कथमिति। किं कार्यकारणात्मनां गुणानामकल्पितानां कल्पितानां वा कर्म धर्मत्वेनेष्टं द्विधापि निःशेषकर्मत्यागो विदुषोऽविदुषो वा नाद्य इत्याह -- यदीत्यादिना। अविद्यारोपितमेव गुणशब्दितकार्यकारणारोपद्वारा कर्मेति शेषः। द्वितीयं प्रत्याह -- विद्वांस्त्विति। आरोपशेषवशाद्विदुषोऽपि नाशेषकर्मत्यागसिद्धिरित्याशङ्क्याह -- अविद्येति। तामेवानुपपत्तिं दृष्टान्तेन स्पष्टयति -- नहीति। विदुषोऽशेषकर्मत्यागे पाञ्चमिकमपि वचोऽनुकूलमित्याह -- एवंचेति। अविदुषः सर्वकर्मत्यागायोगे च प्रकृताध्यायस्थमेव वाक्यमनुगुणमित्याह -- स्वे स्व इति। वाक्यान्तरमपि तत्रैवार्थे युक्तार्थमित्याह -- स्वकर्मणेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.48।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.48।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.48।। --,सहजं सह जन्मनैव उत्पन्नम्। किं तत् कर्म कौन्तेय सदोषमपि त्रिगुणात्मकत्वात् न त्यजेत्। सर्वारम्भाः आरभ्यन्त इति आरम्भाः? सर्वकर्माणि इत्येतत् प्रकरणात् ये केचित् आरम्भाः स्वधर्माः परधर्माश्च? ते सर्वे हि यस्मात् -- त्रिगुणात्मकत्वम् अत्र हेतुः -- त्रिगुणात्मकत्वात् दोषेण धूमेन सहजेन अग्निरिव? आवृताः। सहजस्य कर्मणः स्वधर्माख्यस्य परित्यागेन परधर्मानुष्ठानेऽपि दोषात् नैव मुच्यते भयावहश्च परधर्मः। न च शक्यते अशेषतः त्यक्तुम् अज्ञेन कर्म यतः? तस्मात् न त्यजेत् इत्यर्थः।।किम् अशेषतः त्यक्तुम् अशक्यं कर्म इति न त्यजेत् किं वा सहजस्य कर्मणः त्यागे दोषो भवतीति किं च अतः यदि तावत् अशेषतः त्यक्तुम् अशक्यम् इति न त्याज्यं सहजं कर्म? एवं तर्हि अशेषतः त्यागे गुण एव स्यादिति सिद्धं भवति। सत्यम् एवम् अशेषतः त्याग एव न उपपद्यते इति चेत्? किं नित्यप्रचलितात्मकः पुरुषः? यथा सांख्यानां गुणाः किं वा क्रियैव कारकम्? यथा बौद्धानां स्कन्धाः क्षणप्रध्वंसिनः उभयथापि कर्मणः अशेषतः त्यागः न संभवति। अथ तृतीयोऽपि पक्षः -- यदा करोति तदा सक्रियं वस्तु। यदा न करोति? तदा निष्क्रियं तदेव। तत्र एवं सति शक्यं कर्म अशेषतः त्यक्तुम्। अयं तु अस्मिन् तृतीये पक्षे विशेषः -- न नित्यप्रचलितं वस्तु? नापि क्रियैव कारकम्। किं तर्हि व्यवस्थिते द्रव्ये अविद्यमाना क्रिया उत्पद्यते? विद्यमाना च विनश्यति। शुद्धं तत् द्रव्यं शक्तिमत् अवतिष्ठते। इति एवम् आहुः काणादाः। तदेव च कारकम् इति। अस्मिन् पक्षे को दोषः इति। अयमेव तु दोषः -- यतस्तु अभागवतं मतम् इदम्। कथं ज्ञायते यतः आह भगवान् नासतो विद्यते भावः (गीता 2।16) इत्यादि। काणादानां हि असतः भावः? सतश्च अभावः? इति इदं मतम् अभागवतम्। अभागवतमपि न्यायवच्चेत् को दोषः इति चेत्? उच्यते -- दोषवत्तु इदम्? सर्वप्रमाणविरोधात्। कथम् यदि तावत् द्व्यणुकादि द्रव्यं प्राक् उत्पत्तेः अत्यन्तमेव असत्? उत्पन्नं च स्थितं कञ्चित् कालं पुनः अत्यन्तमेव असत्त्वम् आपद्यते? तथा च सति असदेव सत् जायते? सदेव असत्त्वम्? आपद्यते? अभावः भावो भवति? भावश्च अभावो भवति तत्र अभावः जायमानः प्राक् उत्पत्तेः शशविषाणकल्पः समवाय्यसमवायिनिमित्ताख्यं कारणम् अपेक्ष्य जायते इति। न च एवम्? अभावः उत्पद्यते? कारणं च अपेक्षते इति शक्यं वक्तुम्? असतां शशविषाणादीनाम् अदर्शनात्। भावात्मकाश्चेत् घटादयः उत्पद्यमानाः? किञ्चित् अभिव्यक्तिमात्रेकारणम् अपेक्ष्य उत्पद्यन्ते इति शक्यं प्रतिपत्तुम्। किं च? असतश्च सतश्च सद्भावे असद्भावे न क्वचित् प्रमाणप्रमेयव्यवहारेषु विश्वासः कस्यचित् स्यात्? सत् सदेव असत् असदेव इति निश्चयानुपपत्तेः। किं च? उत्पद्यते इति द्व्यणुकादेः द्रव्यस्य स्वकारणसत्तासंबन्धम् आहुः। प्राक् उत्पत्तेश्च असत्? पश्चात् कारणव्यापारम् अपेक्ष्य स्वकारणैः परमाणुभिः सत्तया च समवायलक्षणेन संबन्धेन संबध्यते। संबद्धं सत् कारणसमवेतं सत् भवति। तत्र वक्तव्यं कथम् असतः स्वं कारणं भवेत् संबन्धो वा केनचित् स्यात् न हि वन्ध्यापुत्रस्य स्वं कारणं संबन्धो वा केनचित् प्रमाणतः कल्पयितुं शक्यते।।ननु नैवं वैशेषिकैः अभावस्य संबन्धः कल्प्यते। द्व्यणुकादीनां हि द्रव्याणां स्वकारणसमवायलक्षणः संबन्धः सतामेव उच्यते इति। न संबन्धात् प्राक् सत्त्वानभ्युपगमात्। न हि वैशेषिकैः कुलालदण्डचक्रादिव्यापारात् प्राक् घटादीनाम् अस्तित्वम् इष्यते। न च मृद एव घटाद्याकारप्राप्तिम् इच्छन्ति। ततश्च असत एव संबन्धः पारिशेष्यात् इष्टो भवति।।ननु असतोऽपि समवायलक्षणः संबन्धः न विरुद्धः। न वन्ध्यापुत्रादीनाम् अदर्शनात्। घटादेरेव प्रागभावस्य स्वकारणसंबन्धो भवति न वन्ध्यापुत्रादेः? अभावस्य तुल्यत्वेऽपि इति विशेषः अभावस्य वक्तव्यः। एकस्य अभावः? द्वयोः अभावः? सर्वस्य अभावः? प्रागभावः? प्रध्वंसाभावः? इतरेतराभावः? अत्यन्ताभावः इति लक्षणतो न केनचित् विशेषो दर्शयितुं शक्यः। असति च विशेषे घटस्य प्रागभावः एव कुलालदिभिः घटभावम् आपद्यते संबध्यते च भावेन कपालाख्येन? संबद्धश्च सर्वव्यवहारयोग्यश्च भवति? न तु घटस्यैव प्रध्वंसाभावः अभावत्वे सत्यपि? इति प्रध्वंसाद्यभावानां न क्वचित् व्यवहारयोग्यत्वम्? प्रागभावस्यैव द्व्यणुकादिद्रव्याख्यस्य उत्पत्त्यादिव्यवहारार्हत्वम्? इत्येतत् असमञ्जसम् अभावत्वाविशेषात् अत्यन्तप्रध्वंसाभावयोरिव।।ननु नैव अस्माभिः प्रागभावस्य भावापत्तिः उच्यते। भावस्यैव तर्हि भावापत्तिः यथा घटस्य घटापत्तिः? पटस्य वा पटापत्तिः। एतदपि अभावस्य भावापत्तिवदेव प्रमाणविरुद्धम्। सांख्यस्यापि यः परिणामपक्षः सोऽपि अपूर्वधर्मोत्पत्तिविनाशाङ्गीकरणात् वैशेषिकपक्षात् न विशिष्यते। अभिव्यक्तितिरोभावाङ्गीकरणेऽपि अभिव्यक्तितिरोभावयोः विद्यमानत्वाविद्यमानत्वनिरूपणे पूर्ववदेव प्रमाणविरोधः। एतेन कारणस्यैव संस्थानम् उत्पत्त्यादि इत्येतदपि प्रत्युक्तम्।।पारिशेष्यात् सत् एकमेव वस्तु अविद्यया उत्पत्तिविनाशादिधर्मैः अनेकधा नटवत् विकल्प्यते इति। इदं भागवतं मतम् उक्तम् नासतो विद्यते भावः (गीता 3।16) इत्यस्मिन् श्लोके? सत्प्रत्ययस्य अव्यभिचारात्? व्यभिचाराच्च इतरेषामिति।।कथं तर्हि आत्मनः अविक्रियत्वे अशेषतः कर्मणः त्यागः न उपपद्यते इति यदि वस्तुभूताः गुणाः? यदि वा अविद्याकल्पिताः? तद्धर्मः कर्म? तदा आत्मनि अविद्याध्यारोपितमेव इति अविद्वान् न हि कश्चित् क्षणमपि अशेषतः त्यक्तुं शक्नोति इति उक्तम्। विद्वांस्तु पुनः विद्यया अविद्यायां निवृत्तायां शक्नोत्येव अशेषतः कर्म परित्यक्तुम्? अविद्याध्यारोपितस्य शेषानुपपत्तेः। न हि तैमिरिकदृष्ट्या अध्यारोपितस्य द्विचन्द्रादेः तिमिरापगमेऽपि शेषः अवतिष्ठते। एवं च सति इदं वचनम् उपपन्नम् सर्वकर्माणि मनसा (गीता 5।13) इत्यादि? स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः (गीता 18।45) स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (गीता 18।46) इति च।।या कर्मजा सिद्धिः उक्ता ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणा? तस्याः फलभूता नैष्कर्म्यसिद्धिः ज्ञाननिष्ठालक्षणा च वक्तव्येति श्लोकः आरभ्यते --,

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【 Verse 18.49 】

▸ Sanskrit Sloka: असक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह: | नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ||

▸ Transliteration: asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ | naiṣkarmyasiddhiṁ paramāṁ sannyāsenādhigacchati ||

▸ Glossary: asaktabuddhiḥ: unattached intelligence; sarvatra: everywhere; jitātmā: control of the mind; vigataspṛhaḥ: without material desires; naiṣkarmyasiddhiṁ: perfection through the realisation of state of Brahman; paramāṁ: supreme; saṁyāsena: by the renounced order of life; adhigacchati: attains

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.49 One whose intelligence is always free from selfish attachment, who has controlled the mind and who is free from desires, by practicing renunciation [sannyāsa], attains the ultimate state of perfection of selfless work or actionlessness [naiṣkarma siddhi].

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.49।।जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है? जिसने शरीरको वशमें कर रखा है? जो स्पृहारहित है? वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.49।। सर्वत्र आसक्ति रहित बुद्धि वाला वह पुरुष जो स्पृहारहित तथा जितात्मा है? संन्यास के द्वारा परम नैर्ष्कम्य सिद्धि को प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.49 असक्तबुद्धिः whose intellect is unattached? सर्वत्र eveywhere? जितात्मा who has subdued his self? विगतस्पृहः whose desire has fled? नैष्कर्म्यसिद्धिम् the perfection consisting in freedom from action? परमाम् the supreme? संन्यासेन by renunciaion? अधिगच्छति (he) attains.Commentary The mind of one who is free from attachment to wife? son? body and property? who has controlled his senses and the mind? who has no desire for the body? for life and for sensual pleasure? turns inwards towards God or the immortal Self. It is not attracted by the sensual objects of the world. It is filled with dispassion and discrimination.He gradually gets himself established in his own Self which is of the nature of ExistenceKnowledgeBliss. Such a person who has knowledge of the Self attains to the highest perfection? to pefect freedom from action by renunciation.Ignorance is destroyed by the attainment of the knowledge of the Self. There is cessation of activity. One may perform actions for the solidarity of the world and yet he will not be bound by actions as he has attained absolute freedom from action through the knowledge of the Self. The fire of knowledge has burnt the fruitbearing effects of Karmas or actions. He has no idea of agency as he is absolutely free from egoism? as he has identified himself with the Supreme Being.Naishkarmya siddhi may also mean the attainment of the state of Naishkarmya. In this exalted? magnanimous? ineffable state of divine splendour and glory? one remains as the actionless Self. This is the state of immediate liberation of the Vedantins (Kaivalya Moksha or Sadyomukti). This marvellous state is attained by renunciation or right knowledge or by the renunciation of all actions brought about by the attainment of the knowledge of the Self. Mentally renouncing all actions and selfcontrolled? the embodied one rests happily in the ninegated? city? neither acting nor causing others to act. (Cf.V.13)Now the Lord teaches in the next verse how a man who? having attained perfection as described above in verse 46? by doing his duty in the service of the Lord can attain perfect freedom from action. He gets discrimination? practises constant meditation and rests in the knowledge of the immutable Self.,(Cf.III.4and19)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.49. He, whose mind entertains no attachment to anything, who is self-conered and is free from craving-he attains by means of renunciation the supreme success of actionlessness.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.49 He whose mind is entirely detached, who has conquered himself, whose desires have vanished, by his renunciation reaches that stage of perfect freedom where action completes itself and leaves no seed.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.49 He whose understanding is on all sides unattached, whose self is conered, who is free from desires - he attains by renunciation the supreme perfection transcending all activity.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.49 He whose intellect remains unattached to everything, who has conered his internal organs and is desireless, attains through monasticism the supreme perfection consisting in the state of one free from duties.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.49 He whose intellect is unattached everywhere, who has subdued his self, from whom desire has fled, he by renunciation, attains the supreme state of freedom from action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.49 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.49 He whose understanding is, on all sides, without attachments, concerning fruits etc., whose 'self is conered,' i.e., who has conered his mind; who, by contemplating on the agency of the Supreme Person, is free from the habit of attributing agency to the self; and who is thus eipped with Sannyasa which has been positively determined to be the same as Tyaga - such a man, performing actions, attains supreme perfection which is free from all activities. The meaning is that he attains devotion to Dhyana which is the consummation of even Jnana Yoga; he attains Dhyana Yoga (Yoga of meditation) consisting in the complete cessation of sensory activity, which is going to be described hereafter.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.49 Asakta-buddhih, he whose intellect, the internal organ, remains unattached; sarvatra, to everything, with regard to son, wife and others who are the cuases of attachment; jitatma, who has conered his internal organs; and vigata-sprhah, who is desireless, whose thirst for his body, life and objects of enjoyment have been eradicated;-he who is such a knower of the Self, adhigaccahti, attains; sannyasena, through monasticism, through perfect knowledge or through renunciation of all actions preceded by this knowledge; the paramam, supreme, most excellent; naiskarmya-siddhim, perfection consisting in the state of one free from duties. One is said to be free from duties from whom duties have daparted as a result of realizing that the actionless Brahman is his Self; his state is naiskarmyam. That siddhi (perfection) which is this naiskarmya is naiskarmya-siddhi. Or, this phrase means 'achievement of naiskarmya', i.e., achievement of the state of remaining established in one's own real nature as the actionless Self-which is different from the success arising from Karma (-yoga), and is of the form of being established in the state of immediate Liberation. Accordingly has it been said, '৷৷.having given up all actions mentally,৷৷.without doing or causing (others) to do anything at all' (5.13). The stages through which one who has attained success-which has the aforesaid characteristics and which arises from the performance of one's own duties mentioned earlier as worship of God-, and in whom has arisen discriminative knowledge, achieves perfection-in the form of exclusive adherence to Knowledge of the Self and consisting in the state of one free from duties-have to be stated. With this is view the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.49।। हमको यह स्मरण रखना चाहिए कि सम्पूर्ण गीतोपदेश उस अर्जुन के लिए दिया गया था? जो युद्ध भूमि पर कर्तव्य की विशालता को देखकर संभ्रमित हो गया था। वह युद्ध से पलायन कर? जंगलों में स्वकल्पित धारणा के अनुसार संन्यास का जीवन जीना चाहता था। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है कि सांसारिक जीवन तथा उसके कर्तव्यों से दूर भागना संन्यास नहीं है। इस श्लोक में भगवान् श्री कृष्ण नैर्ष्कम्य सिद्धि की परिभाषा देते हैं? जिसका साधन संन्यास है। संन्यास का अर्थ है शरीर? मन और बुद्धि उपाधियों के साथ हुए अपने तादात्म्य का त्याग करना। अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में निष्ठा प्राप्त करना ही नैर्ष्कम्य सिद्धि है।जब हम अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर देते हैं? तब कर्तृत्व भोक्तृत्व अभिमानी जीव की उत्पत्ति होती है। तत्पश्चात् हमारा समस्त व्यवहार जीव के रूप में ही होता है। लौकिक जगत् में भी? मद्यपान से उन्मत्त पुरुष में इस प्रकार की आत्मविस्मृति देखी जाती है। वह अपने व्यक्तित्व और पद को विस्मृत कर किसी अन्य रूप में ही व्यवहार करने लगता है। इस मादक उन्मत्तता में वह अपनी शिक्षादीक्षा? सभ्यता और संस्कृति को अपमानित करता हुआ निन्दनीय व्यवहार करता है। जब तक उस मादक पेय का प्रभाव बना रहता है? तब तक वह इसी प्रकार निन्द्य व्यवहार करता रहता है।आत्म अज्ञान के कारण अभिमानी जीव की उत्पत्ति होती है। आत्मज्ञान से इस अज्ञान का नाश हो जाने पर जीव को अपने परिपूर्ण सच्चिदानन्द स्वरूप का अनुभव होता है। उस पूर्ण के पूर्ण अनुभव में अपूर्णता का भान कहाँ और अपूर्णता न हो? तो कामना की भी उत्पत्ति नहीं हो सकती। कामना के अभाव में विचारों का संचलन ही अवरुद्ध हो जाता है? और इस प्रकार सुख की प्राप्ति के लिए कर्म करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह स्थिति परम नैर्ष्कम्य सिद्धि कही जा सकती है।वेदान्त दर्शन में वर्णित नैर्ष्कम्य सिद्धि परमानन्द के अनुभव की वह स्थिति है? जिसमें अज्ञान? काम? विचार और कर्म का सर्वथा अभाव है। वेदान्तरूपी अध्यात्मिकमनोविज्ञान में हम कह सकते हैं कि अज्ञान कर्म का प्रपितामह है अत यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वस्वरूप में संस्थिति ही नैर्ष्कम्य सिद्धि है। इसे ही निर्विकल्प अथवा निष्कामत्व की स्थिति भी कहते हैं।इस श्लोक में गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण यह स्पष्ट घोषणा करते हैं कि नैर्ष्कम्य की परम सिद्धि को प्राप्त होने का साधन ज्ञानलक्षण संन्यास है। जीवन संघर्षों से तुच्छ प्रकार के अशोभनीय पलायन के द्वारा इस पूर्णत्व की स्थिति को प्राप्त नहीं किया जा सकता। स्वधर्म के पालन द्वारा हमको चित्तशुद्धि प्राप्त करनी चाहिए और तदुपरान्त ही संन्यास अर्थात् आत्मबोध के द्वारा स्वस्वरूप में दृढ़स्थिति प्राप्त की जा सकती है। क्षत्रिय होने के नाते अर्जुन का युद्ध से विरत होना उपयुक्त नहीं था। अत भगवान् श्रीकृष्ण उसे उसके स्वधर्म में प्रवृत्त करते हैं।सर्वत्र असक्त बुद्धि यह सुविदित तथ्य है कि विषयों में आसक्त पुरुष को कभी मनशान्ति नहीं प्राप्त होती। आसक्ति के कारण मन क्षुब्ध रहता है और दुर्बल शरीर मन की इच्छा के अनुसार काम करते हुए थक जाता है। मुण्डन किया हुआ मस्तक अर्थात् वह बुद्धि जो समस्त प्रकार की आसक्तियों से मुक्त है? वही उस परमात्मा को प्रकट कर सकती है? जो समस्त उपाधियों को चेतना प्रदान करता है। यह वास्तविक नैर्ष्कम्य सिद्धि है और एक साधन सम्पन्न उत्तम अधिकारी ही इसे प्राप्त कर सकता है।अर्जुन की संन्यास की इच्छा बन्धुमित्र परिवार के प्रति आसक्ति के कारण उत्पन्न हुई थी? अनासक्ति से नहीं। इसलिए? वह इच्छा मिथ्या ही थी।जितात्मा और विगतस्पृह जिस पुरुष के मन में विषयभोग की किंचिन्मात्र भी लालसा नहीं रह गयी है (विगतस्पृह)? केवल वही पुरुष जितात्मा अर्थात् पूर्ण आत्मसंयमी बन सकता है।मन और बुद्धि में ही क्रमश कर्तृत्व और भोकतृत्व के अभिमान निवास करते हैं। इन दोनों अभिमानों का संयुक्त रूप ही जीव कहलाता है। संसार में इस जीव का अस्तित्व बने रहने के कारण विषयों में उसकी स्पृहा है। सम्यक् विवेचन द्वारा यह जानकर कि विषयों में सुख नहीं होता? यह स्पृहा नष्ट की जा सकती है। उसी प्रकार? आत्मा और अनात्मा के विवेक के द्वारा आत्मबोध होने पर जीवभाव का भी अन्त हो जाता है। गीता इस बात को बारम्बार दोहराते हुए कभी नहीं थकती कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए आत्मसंयम एवं स्पृहा समाप्ति अपरिहार्य गुण हैं। यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि नैर्ष्कम्य सिद्धि कोई अप्राप्त और नवीन स्थिति की प्राप्ति नहीं है? वरन् अज्ञान जनित आसक्तियों के त्याग से अपने स्वरूप की पहचान मात्र है। यह स्वत सिद्ध साध्य की सिद्धि है।भगवान् श्रीकृष्ण आगे कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.49।।ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणायाः कर्मजायाः सिद्धेः फलभूतां ज्ञाननिष्ठालक्षणां नैष्कर्म्यसिद्धिमाह -- असक्तेति। सर्वत्र सक्तिनिमित्तेषु पुत्रदारादिष्वसक्तबुद्धिरसक्ता सङ्गरहिता बुद्धिरन्तःकरणं यस्य स यतो जितो वशीकृत आत्मान्तःकरणं यस्य स जितात्मा। अतएव विगता स्पृहा देहजीवभोगेषु तृष्णा यस्मात्स य एवंभूत आत्मज्ञः स नैष्कर्म्यसिद्धिं निर्गतानि कर्माणि यस्मात् निष्क्रयात्मसंबोधात् स निष्कर्मा तस्य भावो नैष्कर्म्यं तच्च तत्सिद्धिश्च सा नैष्कर्म्यस्य निष्क्रियात्मस्वरुपावस्थानलक्षणस्य सिद्धिर्निवृत्तिरिति वा तां परमां कर्मजायाः सिद्धेः प्रकृष्टां सद्योमुक्त्यवस्थानरुपां संन्यासंन सभ्यग्दर्शनेन तत्पूर्वकेण वा सर्वकर्मसंन्यासंनाधिगच्छति प्राप्नोति। तदुक्तंसर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.49।।कः पुनः सर्वकर्मत्यागासमर्थो यो नित्यानित्यवस्तुविवेकजेनेहामुत्रार्थभोगवैराग्येण शमदमादिसंपन्नः कर्मजां सिद्धिमशुद्धिपरिक्षयद्वारा मुमुक्षुः शुद्धब्रह्मात्मैक्यजिज्ञासां प्राप्तः स स्वेष्टमोक्षहेतुब्रह्मात्मैक्यज्ञानसाधनवेदान्तवाक्यश्रवणादि कर्तुं सर्वविक्षेपनिवृत्त्या तच्छेषभूतं सर्वकर्मसंन्यासं श्रुतिस्मृतिविहितं कुर्यादेव।तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत् इति श्रुतेःसत्यानृते सुखदुःखे वेदानिमं लोकममुं च परित्यज्यात्मानमन्विच्छेत् इति स्मृतेश्च उपरतस्त्यक्तसर्वकर्मा भूत्वात्मानं पश्येत्। आत्मदर्शनाय वेदान्तवाक्यानि विचारयेदिति श्रुत्यर्थः। एतादृश एवब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति इति श्रुत्या धर्मस्कन्धत्रयविलक्षणत्वेन प्रतिपादितः परमहंसपरिव्राजकः परमहंसपरिव्राजकं कृतकृत्यं गुरुमुपसृत्य वेदान्तवाक्यविचारसमर्थो यमुद्दिश्यअथातो ब्रह्मजिज्ञासा इत्यादिचतुर्लक्षणमीमांसा भगवता बादरायणेन समारम्भि। कीदृशोऽसावित्याह -- असक्तेति। सर्वत्र पुत्रदारादिषु सक्तिनिमित्तेष्वप्यसक्तबुद्धिरहमेषां ममैत इत्यभिष्वङ्गरहिता बुद्धिर्यस्य सः। यतो जितात्मा विषयेभ्यः प्रत्याहृत्य वशीकृतान्तःकरणः। विषयरागे सति कथं,प्रत्याहरणं तत्राह। विगतस्पृहो देहजीवितभोगेष्वपि वाञ्छारहितः सर्वदृश्येषु दोषदर्शनेन नित्यबोधपरमानन्दरूपमोक्षगुणदर्शनेन च सर्वतो विरक्त इत्यर्थः। य एवं शुद्धान्तःकरणःस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः इति वचनप्रतिपादितां कर्मजामपरमां सिद्धिं ज्ञानसाधनवेदान्तवाक्यविचाराधिकारलक्षणां ज्ञाननिष्ठायोग्यतां प्राप्तः स संन्यासेन शिखायज्ञोपवीतादिसहितसर्वकर्मत्यागेन हेतुना तत्पूर्वकेण विचारेणेत्यर्थः। नैष्कर्म्यसिद्धिं निष्कर्म ब्रह्म तद्विषयं विचारपरिनिष्पन्नं ज्ञानं नैष्कर्म्यं तद्रूपां सिद्धिं परमां कर्मजाया अपरमसिद्धेः फलभूतामधिगच्छति साधनपरिपाकेण प्राप्नोति। अथवा संन्यासेनेतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया। सर्वकर्मसंन्यासरूपां नैष्कर्म्यसिद्धिं ब्रह्मसाक्षात्कारयोग्यतां नैर्गुण्यलक्षणां सिद्धिं परमां पूर्वस्याः सिद्धेः सात्त्विक्याः फलभूतामधिगच्छतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.49।।स्वकर्मणामीश्वरे समर्पणं कर्तव्यमित्युक्त्वानन्तरश्लोकद्वयेन स्वकर्मणामावश्यकत्वमुक्त्वा तेषां परमेश्वरेऽर्पणेन किं फलं स्यादित्यत आह -- असक्तेति। संन्यासेनकार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।,सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः इति पूर्वोक्तेनामुख्यसात्त्विकत्यागेन। असक्तबुद्धिः पुत्रदारादिषु सक्तिपदेषु आसक्तिवर्जिता बुद्धिर्यस्य सोऽसक्तबुद्धिः विरक्त इत्यर्थः। अतएव जितात्मा शान्तचित्तः। विगतस्पृहः विशेषेण गता स्पृहा तृष्णा यस्य तादृशो भूत्वा नैष्कर्म्यसिद्धिं कात्स्न्र्येन स्वरूपतः कर्मत्यागलक्षणां पारिव्राज्यसिद्धिं परमां पूर्वोक्तामुख्यत्यागापेक्षयातिश्रेष्ठां न द्वेष्ट्यकुशलं कर्मेति श्लोके व्याख्यातां अधिगच्छति प्राप्नोति।

Chapter 18 (Part 27)

Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.49।।यतो मत्कर्म सदोषमपि न त्यजेत्? अन्यानि च स्वफलभोगं कारयित्वा त्यजन्ति ततः स्वयमेव तत्त्यागः कर्त्तव्यस्तेन च सिद्धिं प्राप्नुयादित्याह -- असक्तेति। सर्वत्र सर्वकर्मादिषु असक्तबुद्धिः असक्ता न संसक्ता बुद्धिर्यस्य तादृशः? जितात्मा वशीकृतान्तःकरणः? विगतस्पृहः फलाभिलाषरहितः सन्न्यासेन परमामुत्कृष्टां नैष्कर्म्यसिद्धिं कर्मनिवृत्तिफलरूपां सिद्धिं अधिगच्छति प्राप्नोतीत्यर्थः। आसक्त्याद्यभिलाषान्ताभावकथनेनैतद्युक्तस्त्यागेनाऽपि सिद्धिं न प्राप्नोति तत्कर्मनिष्ठयैव भवतीति व्यञ्जितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.49।।ननु कथं कर्मणि क्रियमाणे दोषांशप्रहाणेन गुणांश एव संपत्स्यत इत्यपेक्षायामाह -- असक्तेति। असक्ता सङ्गशून्या बुद्धिर्यस्य? जितात्मा निरहंकारः? विगतस्पृहो विगता स्पृहा फलविषयेच्छा यस्मात्स एवंभूतेनस त्यागः सात्त्विको मत इत्येवं पूर्वोक्तेन कर्मासक्तितत्फलयोस्त्यागलक्षणेन संन्यासेन नैष्कर्म्यसिद्धिं सर्वकर्मनिवृत्तिलक्षणां सत्त्वशुद्धिमधिगच्छति। यद्यपि सङ्गफलयोस्त्यागेन कर्मानुष्ठानमपि नैष्कर्म्यमेव? कर्तृत्वाभिनिवेशाभावात्। तदुक्तम् -- नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्वित् इत्यादिश्लोकचतुष्टयेन? तथाप्यनेनोक्तलक्षणेन संन्यासेन परमां नैष्कर्म्यसिद्धिम्सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी इत्येवंलक्षणां पारमहंस्यापरपर्यायां प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.49।।पूर्वोक्तप्रकारमेव पुनरनुस्मारयति -- असक्तबुद्धिरिति। सर्वकर्मणां फलादिषु सक्तिरहितं चित्तं यस्येत्यर्थें साङ्ख्यमुपादेयम्। जितात्मा विगतस्पृह इति योगसारं? भगवद्व्यतिरिक्ते स्पृहारहित इति वा भक्तिरुपादेयतयोक्ता। एवं सन्न्यासेन परमां सिद्धिं नैष्कर्म्यरूपां पूर्वसूत्रितामधिगच्छति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.49।।ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताप्राप्तिरूप जो कर्मजनित सिद्धि कही गयी है? उसकी फलभूत ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि भी कही जानी चाहिये। इसलिये अगला श्लोक आरम्भ किया जाता है --, जो सर्वत्र असक्तबुद्धि है -- पुत्र? स्त्री आदि जो आसक्तिके स्थान हैं? उन सबमें जिसका अन्तःकरण आसक्तिसे -- प्रीतिसे रहित हो चुका है। जो जितात्मा है -- जिसका आत्मा यानी अन्तःकरण जीता हुआ है अर्थात् वशमें किया हुआ है। जो स्पृहारहित है -- शरीर? जीवन और भोगोंमें भी जिसकी स्पृहा -- तृष्णा नष्ट हो गयी है। जो ऐसा आत्मज्ञानी है? वह परम नैष्कर्म्यसिद्धिको ( प्राप्त करता है )। निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है यह ज्ञान होनेके कारण जिसके सर्वकर्म निवृत्त हो गये हैं वह निष्कर्मा है। उसके भावका नाम नैष्कर्म्य है और निष्कर्मतारूप सिद्धिका नाम नैष्कर्म्यसिद्धि है। अथवा निष्क्रिय आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप निष्कर्मताका सिद्ध होना ही नैष्कर्म्यसिद्धि है। ऐसी जो कर्मजनित सिद्धिसे विलक्षण और सद्योमुक्तिमें स्थित होनारूप उत्तम सिद्धि है? उसको संन्यासके द्वारा? यानी यथार्थ ज्ञानसे अथवा ज्ञानपूर्वक सर्वकर्मसंन्यासके द्वारा? लाभ करता है ऐसा ही कहा भी है कि सब कर्मोंको मनसे छोड़कर न करता हुआ और न करवाता हुआ रहता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.49।। व्याख्या --   संन्यास(सांख्य) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये -- यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं --,(1) असक्तबुद्धिः सर्वत्र -- जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? क्रिया? पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती।(2) जितात्मा -- जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य? प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता? प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया? घटना? आदिसे हटना,चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है? वह जितात्मा कहलाता है।(3) विगतस्पृहः -- जीवनधारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है? उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम स्पृहा है जैसे -- सागपत्ती कुछ मिल जाय? रूखीसूखी रोटी ही मिल जाय? कुछनकुछ खाये बिना हम कैसे जी सकते हैं जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं सांख्ययोगका साधक इन जीवननिर्वाहसम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता।तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जडताका त्याग करना पड़ता है। उस जडताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है? और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है? तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति -- ऐसा असक्तबुद्धि? जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता? तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किञ्चिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक? स्वतःसिद्ध निष्कर्मता -- निर्लिप्तता है? वह प्रकट हो जाती है। सम्बन्ध --   अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.49।।विदुषः सर्वकर्मत्यागेऽपि नाविदुषस्तथेत्युक्तम्? इदानीमुक्तमनूद्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- या च कर्मजेति। चोऽवधारणार्थो भिन्नक्रमो वक्तव्य इत्यत्र संबध्यते। साधनान्युपदिशन्नैष्कर्म्यसिद्धिं व्यपदिशति -- असक्तेति। पुत्रादिविषये चेतसः सङ्गाभावेऽपि तस्यास्वाधीनत्वमाशङ्क्याह -- जितात्मेति। असक्तिमुक्त्वा स्पृहाभावं वदता पुनरुक्तिरिष्टेत्याशङ्क्याह -- देहेति। उक्तमनूद्य तत्फलं लम्भयति -- य एवमिति। कर्मणां निर्गतौ हेतुमाह -- निष्क्रियेति। सम्यग्ज्ञानार्थत्वेन नैष्कर्म्यसिद्धिशब्दं व्याख्यायार्थान्तरमाह -- नैष्कर्म्यस्येति। प्रकर्षमेव प्रकटयति -- कर्मजेति। संन्यासस्य श्रुतिस्मृत्योः सम्यग्दर्शनत्वाप्रसिद्धेरयुक्तं तादात्म्यमित्याशङ्क्य पक्षान्तरमाह -- तत्पूर्वकेणेति। संन्यासान्नैष्कर्म्यप्राप्तिरित्यत्र वाक्योपक्रमानुकूल्यमाह -- तथाचेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.49।।नैष्कर्म्यसिद्धिं मोक्षमिति केचित्? तदसत् तदनन्तरं मां विशते इति वाक्यशेषविरोधादिति भावेनान्यथा व्याचष्टे -- नैष्कर्म्येति। नैष्कर्म्यार्था सिद्धिर्नैष्कर्म्यसिद्धिः। सा च योगस्येत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.49।।नैष्कर्म्यसिद्धिं? नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.49।। -- असक्तबुद्धिः असक्ता सङ्गरहिता बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य सः असक्तबुद्धिः सर्वत्र पुत्रदारादिषु आसक्तिनिमित्तेषु? जितात्मा जितः वशीकृतः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः जितात्मा? विगतस्पृहः विगता स्पृहा तृष्णा देहजीवितभोगेषु यस्मात् सः विगतस्पृहः? यः एवंभूतः आत्मज्ञः सः नैष्कर्म्यसिद्धिं निर्गतानि कर्माणि यस्मात् निष्क्रियब्रह्मात्मसंबोधात् सः निष्कर्मा तस्य भावः नैष्कर्म्यम्? नैष्कर्म्यं च तत् सिद्धिश्च सा नैष्कर्म्यसिद्धिः? निष्कर्मत्वस्य वा निष्क्रियात्मरूपावस्थानलक्षणस्य सिद्धिः निष्पत्तिः? तां नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां प्रकृष्टां कर्मजसिद्धिविलक्षणां सद्योमुक्त्यवस्थानरूपां संन्यासेन सम्यग्दर्शनेन तत्पूर्वकेण वा सर्वकर्मसंन्यासेन अधिगच्छति प्राप्नोति। तथा च उक्तम् -- सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नास्ते (गीता 5।13) इति।।पूर्वोक्तेन स्वकर्मानुष्ठानेन ईश्वराभ्यर्चनरूपेण जनितां प्रागुक्तलक्षणां सिद्धिं प्राप्तस्य उत्पन्नात्मविवेकज्ञानस्य केवलात्मज्ञाननिष्ठारूपा नैष्कर्म्यलक्षणा सिद्धिः येन क्रमेण भवति? तत् वक्तव्यमिति आह --,

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【 Verse 18.50 】

▸ Sanskrit Sloka: सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे | समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ||

▸ Transliteration: siddhiṁ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me | samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā ||

▸ Glossary: siddhiṁ: perfection; prāptaḥ: achieving; yathā: as; brahma: the supreme; tathā: so; apnoti: achieves; nibodha: try to understand; me: from Me; samāsena: summarily; eva: certainly; kaunteya: O son of Kuntī; niṣṭhā: stage; jñānasya: of knowledge; yā: which; parā: transcendental

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.50 Understand from Me, how one who has achieved this perfection, can attain the Supreme state of Truth, Brahman, by acting in the way I shall now summarize, Kaunteya.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.50।।हे कौन्तेय सिद्धि(अन्तःकरणकी शुद्धि) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको? जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है? जिस प्रकारसे प्राप्त होता है? उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.50।। सिद्धि को प्राप्त पुरुष किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है? तथा ज्ञान की परा निष्ठा को भी तुम मुझसे संक्षेप में जानो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.50 सिद्धिम् perfection? प्राप्तः attained? यथा as? ब्रह्म Brahman (the Eternal)? तथा so? आप्नोति obtains? निबोध learn? मे of Me? समासेन in brief? एव even? कौन्तेय O son of Kunti? निष्ठा state? ज्ञानस्य of knowledge? या or? परा highest.Commentary When a man has the good fortune to hear the words of wisdom from a teacher? dualism and egoism vanish and his mind rests in union with the Supreme Being. The need for action no longer exists for such a man. Nothing further remains for him to do. He has become a Kritakritya (a man of total fulfilment? or one who has done all that there is to be done).The aspirant obtains the grace of the Lord by worshipping Hims with his proper duty. The Lord gives him dispassion? discrimination? devotion to knowledge. The Lord removes his veil of ignorance. To these ever harmonious? worshipping in love? I give the Yoga of discrimination by which they come unto Me. Out of My mere compassion for them? I? dwelling within their Self? destroy the darkness born of ignorance by the luminous lamp of knowledge. (X.10and11)The perfection is JnanaNishtha or devotion to knowledge by which he attains Selfrealisation or becomes identical with the Supreme Being when the veil of ignorance is rent asunder. The way to the attainment of this devotion to knowledge will be described only in a succint manner. The process or method of Selfrealisation will be described only in brief in the following verses.The actual technie has to be learnt direct from a Guna.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.50. Having attained the success, how he attains the Brahman, an attainment which is confirmed to be the final beatitude of true knowledge-that you must learn from Me briefly.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.50 I will now state briefly how he, who has reached perfection, finds the Eternal Spirit, the state of Supreme Wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.50 Learn from me in brief, O Arjuna, how, one who has attained perfection, attains the brahman (or the self), who is the supreme consummation of knowledge.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.50 Understand for certain from Me, in brief indeed, O son of Kunti, that process by which one who has achieved success attains Brahman, which is the supreme consummation of Knowledge.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.50 Learn from Me in brief, O Arjuna, how he who has attained perfection reaches Brahman (the Eternal), that supreme state of knowledge.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.50 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.50 One who has attained 'perfection', viz., one who has attained perfection in meditation generated by the Karma Yoga performed day after day till death - how, in what way, he attains the brahman, learn this from Me in brief. It is the same Brahman who is described as the supreme consummation of knowledge. The meaning is that the self is the supreme consummation, the supreme end, of knowledge which is of the nature of meditation.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.50 Nibodha, understand for certain; me, from Me, from My utterance-. Is it elaborately? The Lord says, no, samasena, in brief; eva, indeed, O son of Kunti, how siddhim praptah, one who has achieved success, one who, by worshipping God through one's duties, has achieved success in the form of fitness of the body and organs for steadfastness in Knowledge, which comes from His grace; (-the reiteration of the phrase siddhim praptah is meant for introducing what follows; what is that succeeding subject for which this reiteration stands is being answered:) yatha tatha, that process by which, that process in the form of steadfastness in Knowledge, by which that process of aciring steadfastness in Knowledge by which; apnoti, attains; brahma, Brahman, th supreme Self-. In order to point out-as 'It is this'-the realization of Brahman which was promised in, 'that process by which one৷৷.attains Brahman,' the Lord says; ya, which; is the para, supreme; nistha, consummation, i.e. the supreme culmination; jnanasya, of Knowledge. Of what? Of the knowledge of Brahman. Of what kind is it? It is of the same kind as the realization of the Self. Of what kind is that? As is the Self. Of what nature is It? As has been described by the Lord and the Upanisadic texts, and established through reason. Objection: Is it not that knowledge takes the form of its object? But it is not admitted anywhere that the Self is an object, or even that It has form. Pseudo-Vedantin: Is it not heard of in such texts as, 'radiant like the sun' (Sv. 3.8), 'Of the nature of effulgence' (Ch. 3.14.2) and 'Self-effulgent' (Br. 4.3.9), that the Self has form? Objection: No, because those sentences are meant for refuting the idea that the Self is of the nature of darkness. When the Self is denied of possessing forms of substance, ality, etc., the contingency arises of the Self's being of the nature of darkness. The sentences, 'radiant like the sun,' etc. are meant for ruting this. And this follows from the specific denial of from by saying, 'Formless' (Ka. 1.3.15), and from such texts as, 'His form does not exist within the range of vision; nobody sees Him with the eye' (Ka. 2.3.9: Sv. 4.20), 'soundless, touchless' (ka. 1.3.15), etc. which show that the Self is not an object of perception. Therefore it remains unproved that there can be any knowledge which takes the form of the Self. How, then, can there be the knowledge of the Self? For, all knowledge that there can be with regard to objects assumes their respective forms. And it has been said that the Self has no form. Moreover, if both knowledge and the Self be formless, then how can there be the consummation [Firmness in Self-realization.] of the (repeated) contemplation on that (knowledge of the Self)? Vedantin: No. Since it can be established that the Self is supremely taintless, pure and subtle, and it can also be established that the intellect can have taintlessness etc. like the Self, therefore it stands to reason that the intellect can take a form resembling the consciousness of the Self. The mind becomes impressed with the semblance of the intellect; the organs become impressed with the semblance of the mind; and the body becomes impressed with the semblance of hte organs. Hence it is that the idea of the body itself being the Self is held by ordinary people. The Lokayatikas (materialists), who hold that the body is identical with consciousness, say that a person is a body endowed with consciousness; so also there are others who say that the organs are identical with consciousness; there are others who say that the mind is identical with consciousness, and still others who say that the intellect is identical with consciousness. Some accept as the Self the Unmanifest [The inmost Ruler (antaryamin), possessing a semblance of Consciousness.], called the Undifferentiated, which is more internal than that (intellect) and is within the domain of (primordial) ignorance. Indeed, in every case, beginning from the intellect to the body, the cause of mis-conceived Selfhood is the semblance of the Consciousness that is the Self. Hence, knowledge about the Self is not a subject for injunction. What then? Only the eradication of the superimposition of name, form, etc., which are not the Self, is what has to be undertaken, but not the knowledge of the Self that is Consciousness. For it is the Self which is experienced as possessed of the forms of all the various objects that are superimposed (on It) through ignorance. It is evidently because of this that the Buddhists who uphold the view of (momentary) consciousness have concluded that there is no substance at all apart from (momentary) consciousness, and that it is not in need of any other valid proof since they hold that it is self-cognized. Therefore, what is to be undertaken is only the elimination of the superimposition on Brahman through ignorance, but no effort is needed for knowing Brahman (Consciousness), for It is ite self-evident! It is because the intellect is distracted by particular appearances of name and form imagined through ignorance that Brahman, even though self-evident, easily realizable, nearer than all else and identical with oneself, appears to be concealed, difficult to realize, very far and different, But to those whose intellect has become free from external appearances and who have obtained the grace of a teacher and serenity of mind, there is nothing more blissful, manifest, well known, easily realized and nearer to oneself than this Self. And thus it has been declared, 'directly realizable, righteous,' etc. (9.2). However, some wiseacres assert that the intellect cannot comprehend the entity called the Self since It is formless; hence, complete steadfastness in Knowledge is impossible. This is truly so for those who have not associated with a traditional line of teachers; who have not heard the Upanisads; whose intellects are too much engrossed with external objects; and who have not applied themselves diligently to the perfect means of knowledge. For those, on the other hand, who are the opposite of these, it is absolutely impossible to have the idea of reality with regard to empirical objects, which are within the realm of duality involving the knower and the known, because in their case there is no perception of any other thing apart from the Consciousness that is the Self. We have already said how this is certainly so and not otherwise. It has been stated by the Lord also, 'That during which creatures keep awake, it is night to the seeing sage' (2.69). Therefore, the cessation of the perception of differences in the form of external things is alone the cause of resting in the reality of the Self. For, that which is called the Self is never an object which is not well known, attainable, rejectable or acceptable to anyone at any time. Were that Self to be indeed not self-evident, all activities would become meaningless. [According to Ast. the latter portion of this sentence is: svarthah sarvah pravrttayah vyarthah prasajyeran, all activities meant for one's own benefit would become meaningless.-Tr.]. For it cannot be imagined that they could be undertaken for unconscious objects like the body etc. Besides, it cannot be that pleasure is for pleasure's sake, or that sorrow is for sorrow's sake. Moreover, all empirical dealings are meant for culminating in the realization of the Self. [According to B.S. 3.4.26, 'On the strength of the Upanisadic sanction of sacrifices etc. all religious activities as well are necessary৷৷.', sacrifices etc. are meant for leading to the realization of the Self, without which they would become meaningless.] Therefore, just as for knowing one's own body there is no need of any other (external) means of knowledge so also there is no need of any other means of knowledge, for the realization of the Self which is innermost (in relation to the body etc.). Hence it is established that steadfastness in the knowledge of the Self is a fact very well known to the discriminating people. Even to those who hold that knowledge is formless and not cognized by direct perception, cognition of an object is dependent on knowledge. Hence it has to be admitted that knowledge is as immediate as pleasure etc. And this follows also from the impossibility of a desire to know (knowledge). Had knowledge been not self-evident, it could have been sought for like any object of knowledge. And in that case, as [This is Ast.'s reading; others read tatha.-Tr.] a knower seeks to perceive through knowledge such objects of knowledge as pot etc., similarly the knower would have sought to perceive knowledge through another knowledge! But this is not the case. Therefore knowledge is ite self-revealing, and for the very same reason the knower also is self-revealed. Hence, effort is not needed for knowledge, but only for the removal of the notion of what is not-Self. [In place of anatma-buddhi-nivrttau, Ast. has 'anatmani atma-buddhi-nivrttau, for the termination of thinking what is not the Self as the Self'.-Tr.] Conseently, steadfastness in Knowledge is easy of accomplishment. It is being stated how this supreme consummation of Knowledge is to be attained:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.50।। पूर्व श्लोक में नैर्ष्कम्य सिद्धि के लक्ष्य को इंगित किया गया है। अब उस साधना के विवेचन का प्रकरण प्रारम्भ होता है? जिसके अभ्यास से परमात्मस्वरूप में दृढ़निष्ठा प्राप्त हो सकती है। इस श्लोक में आगे के कथनीय विषय की प्रस्तावना की गयी है। सिद्धि को प्राप्त पुरुष से तात्पर्य उस साधक से है? जिसने स्वधर्माचरण से अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त कर ली है। ऐसा ही साधक ब्रह्मप्राप्ति का अधिकारी होता है। आगे के कुछ श्लोक हमें स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का स्मरण कराते हैं? जिनका वर्णन गीता के द्वितीय अध्याय में किया गया था।ध्यानाभ्यास का विस्तृत विवेचन षष्ठाध्याय में किया जा चुका है। अत यहाँ केवल संक्षेप में ही वर्णन किया जायेगा।भगवान् श्रीकृष्ण आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.50।।पूर्वोक्तेन स्वकर्मानुष्ठानेनेश्वराभ्यर्जनरुपेण जनितां केवलज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिं प्राप्तस्योत्पन्नात्मविवेकविज्ञानस्य केवलात्मज्ञाननिष्ठा नैष्कर्म्यलक्षणा प्रकृष्टा सिद्धिर्येन क्रमेण भवति तं श्रावयितुमाह। सिद्धिं स्वकर्मणेश्वरमभ्यर्च्य तत्प्रसादजां कायादीनां ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिं प्राप्तः यथा येन प्रकारेण ज्ञाननिष्ठारुपेण ब्रह्म परमात्मानं प्राप्नोति तथा तं प्रकारं ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिक्रमं मे मम वचनान्निबोध त्वं निश्चयेनावधारय। किं विस्तरेण? नेत्याह -- समासेनैव संक्षेपेणैव। यं प्रकारमाश्रित्य मातृगर्भेण न संबध्यते तन्निबोधेति द्योतनार्थ कौन्तेयेति संबोधनम्। प्रतिज्ञातां ब्रह्मप्राप्तिमिदन्तया दर्शयितुमाह -- निष्ठेति। या ब्रह्माप्राप्तिर्ज्ञानस्यात्मज्ञानस्य परा निष्ठा परा परिसमाप्तिः।अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयमुच्यते।क्षेत्रज्ञं तापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।न जायते म्रियते वासदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयंसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मतत्त्वमसि इत्यादिभगद्वाक्यैरुपनिषद्वाक्यैश्चोक्तः कुटस्थत्वमसङ्गत्वमित्यादिन्यायाच्च प्रदर्शितो य आत्मा तस्य ज्ञानं तु न साकारवस्तुविषयकज्ञानवद्भवितुमर्हति। आत्मन आकारवत्त्वस्यानिष्टत्वात्।न संदृशे तिष्ठति रुपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम्अशब्दमस्पर्शमरुपं इत्यादिश्रुतेः।आदित्यवर्णो भारुपः स्वयंज्योतिः इत्यादिवाक्यानि तु द्रव्यगुणाद्याकारप्रतिषेधे आत्मनस्तमोरुपत्वे प्राप्ते तत्प्रतिषेधार्थानि। नन्वेवं तर्हि कथं निराकारस्यात्मनो ज्ञानं यतो यद्विषयं भवति यज्ज्ञानं तत्तदाकारं ज्ञानात्मनोश्चोभयोर्निराकारत्वेन कथमात्मज्ञानस्य पौनःपुन्येनानुसंधानात्मिका भावना निष्ठेतिचेदुच्यते। आत्मज्ञानमित्यात्मविषयं ज्ञानं न विधीयते?,चैतन्यस्वरुपस्यात्मनः सुप्रसिद्धत्वेनाज्ञातत्वाभावात्। नहि यस्य चैतन्याभासता बुद्य्धादिदेहान्ते आत्मत्वभ्रान्तिकारणं तस्याज्ञातत्वं शक्यं वक्तुम्। तस्मान्नामरुपाद्यनात्माध्यारोपणनिवृत्तिरेव प्रयत्नेन कार्या। बाह्याकारभेदनिवृत्तेरेवात्मस्वरुपावलम्बने कारणत्वात्। नात्मचैतन्यविज्ञानं तस्यात्यन्तप्रसिद्धत्वात्। नन्वत्यन्तप्रसिद्धं सुविज्ञेयमासन्नतममात्मभूतमप्यप्रसिद्धं दुर्विज्ञेयमतिदूरमन्यदिव ब्रह्म सर्वेषां कथं प्रतिभातीतिचेत्। अविद्याकल्पितनामरुपविशेषाकारापहृतबुद्धित्वेनाविवेकित्वात्तेषामिति गृहाण। बाह्याकारनिवृत्तबुद्धीनां विवेकिनां तु लब्धगुर्वात्मप्रसादानां नातःपरं सुप्रसिद्धं सुविज्ञेयं स्वासन्नमस्ति। तथाचोक्तं -- प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययं इति। एतेन निराकारत्वादत्मवस्तुनो बुद्धिरुपैत्यतो दुःसाध्या सभ्यग्ज्ञाननिष्ठेति केषांचित्पण्डितंमन्यानामुक्तरपास्ता। गुरुसंप्रदायवतां श्रुतवेदान्तानां बहिर्विषयेष्वनासक्तबुद्धीनां सभ्यक्प्रमाणेषु कृतश्रमाणां चैतन्यात्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्यानुपलब्धेर्लौकिकग्राह्यग्राहकद्वैतवस्तुनि सद्धुरत्यन्तदुःसंपाद्यत्वात्। तदुक्तंयस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः इत ज्ञानमप्यत्यन्तं प्रसिद्धमेव सुखादिवदभ्युपगन्तव्यम्। येषां? निराकारं ज्ञानमप्रत्यक्षं तेषामपि ज्ञानवशेनैव ज्ञेयावगतेर्दर्शनात्। ज्ञेयवज्ज्ञानस्य जिज्ञासानुपपत्तेश्च। तथाच ज्ञानस्य ज्ञातुश्चात्यन्तप्रसिद्धत्वादात्मज्ञाने यत्नो न कर्तव्यः किं त्वनात्मन्यात्मबुद्धिनिवृत्तावेवेति संक्षेपः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.50।।प्रागुक्तसाधनसंपन्नस्य सर्वकर्मसंन्यासिनो ब्रह्मज्ञानोत्पत्तौ साधनक्रममाह -- सिद्धिमिति। स्वकर्मणेश्वरमाराध्य तत्प्रसादजां सर्वकर्मत्यागपर्यन्तां ज्ञानोत्पत्तियोग्यतारूपां सिद्धिमन्तःकरणशुद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म प्राप्नोति येन प्रकारेण शुद्धमात्मानं साक्षात्करोति तथा तं प्रकारं निबोध मे मद्वचनादवधारयानुष्ठातुम्। किमतिविस्तरेण नेत्याह समासेन संक्षेपेणैव नतु विस्तरेण हे कौन्तेय? तदवधारणे किं स्यादित्यत आह -- निष्ठेति। निष्ठा ज्ञानस्य या परा ज्ञानस्य विचारपरिनिष्पन्नस्य निष्ठा परिसमाप्तिर्यदनन्तरं साधनान्तरं नानुष्ठेयमस्ति। परा श्रेष्ठा सर्वान्त्या वा साक्षान्मोक्षहेतुत्वात्। तां सिद्धिं प्राप्तस्य ब्रह्मप्राप्तिरूपां ज्ञाननिष्ठां परां संक्षेपेण निबोधेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.50।।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दतीत्येतत्प्रतिज्ञातमुपपादितम्। इदानीं नैष्कर्म्यसिद्धिं प्राप्तोऽपि परिव्राट् वशीकारसंज्ञकवैराग्यवान् यथा ब्रह्म प्राप्नोति तथा वक्तुं प्रतिजानीते -- सिद्धिमिति। सिद्धिं नैष्कर्म्यसिद्धिं निबोध बुध्यस्व। मे मद्वचनात्समासेन संक्षेपेणैव हे कौन्तेय? या यत्प्राप्यं ब्रह्म। विधेयापेक्षं स्त्रीत्वम्। ज्ञानस्य परा निष्ठा यदपेक्षयाऽन्यज्ज्ञेयं आन्तरतरं नास्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.50।।अथ सिद्धिप्राप्तेः फलमाह -- सिद्धिमिति। सिद्धिं पूर्वोक्तां प्राप्तः सन् यथा येन प्रकारेण ब्रह्म प्राप्नोति तं प्रकारं मे मत्तः समासेनैव सङ्क्षेपेणैव निबोध जानीहि। यां प्राप्तिः ज्ञानस्य परा उत्कृष्टा निष्ठा? स्थितिरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.50।।एवंभूतस्य परमहंसस्य ज्ञाननिष्ठया ब्रह्मभावप्रकारमाह -- सिद्धिं प्राप्त इति षड्भिः। नैष्कर्म्यसिद्धिं प्राप्तः सन् यथा येन प्रकारेण ब्रह्म प्राप्नोति तथा तं प्रकारं संक्षेपेणैव मे वचनान्निबोध।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.50।।ज्ञानस्य या परा निष्ठा तां सिद्धिं प्राप्तोऽपि जीवन्नेवेह यथाऽऽत्मनाऽक्षरब्रह्मप्राप्तो भवति तथा मत्तो निबोध।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.50।।पूर्वोक्त स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरार्चनरूप साधनसे उत्पन्न हुई? ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिकी योग्यतारूप सिद्धिको? जो प्राप्त कर चुका है और जिसमें आत्मविषयक विवेकज्ञान उत्पन्न हो गया है? उस पुरुषको? जिस क्रमसे केवल आत्मज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि मिलती है? वह ( क्रम ) बतलाना है? अतः कहते हैं --, सिद्धिको प्राप्त हुआ? अर्थात् अपने कर्मोंद्वारा ईश्वरकी पूजा करके? उसकी कृपासे उत्पन्न हुई शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिका योग्यतारूप सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष -- यह पुनरुक्ति आगे कहे जानेवाले वचनोंके साथ सम्बन्ध जो़ड़नेके लिये है। वे आगे कहे जानेवाले वचन कौनसे हैं जिनके लिये पुनरुक्ति है सो बतलाते हैं -- जिस ज्ञाननिष्ठारूप प्रकारसे ( साधक ब्रह्मको) -- परमात्माको पाता है? उस प्रकारको ? यानी ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिके क्रमको? तू मेरे वचनोंसे निश्चयपूर्वक समझ। क्या ( उसका ) विस्तारपूर्वक ( वर्णन करेंगे ) इसपर कहते हैं कि नहीं। हे कौन्तेय समाससे अर्थात् संक्षेपसे ही? जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है? उसे समझ। इस वाक्यसे जिस ब्रह्मप्राप्तिके लिये प्रतिज्ञा की थी? उसे इदंरूपसे ( स्पष्ट ) दिखानेके लिये कहते हैं कि ज्ञानकी जो परानिष्ठा है उसको सुन। अन्तिम अवधिपरिसमाप्तिका नाम निष्ठा है। ऐसी जो ब्रह्मज्ञानकी परमावधि है ( उसको सुन )। वह ( ब्रह्मज्ञानकी निष्ठा ) कैसी है जैसा कि आत्मज्ञान है। वह कैसा है जैसा आत्मा है। वह,( आत्मा ) कैसा है जैसा भगवान्ने बतलाया है तथा जैसा उपनिषद्वाक्योंद्वारा कहा गया है और जैसा न्यायसे सिद्ध है। पू0 -- ज्ञान विषयाकार होता है? परंतु आत्मा न तो कहीं भी विषय माना जाता है और न आकारवान् ही। उ0 -- किंतु आदित्यवर्ण प्रकाशस्वरूप स्वयंज्योति इस तरह आत्माका आकारवान् होना तो श्रुतिमें कहा है। पू0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि वे वाक्य तमःस्वरूपत्वका निषेध करनेके लिये कहे गये हैं। अर्थात् आत्मामें द्रव्यगुण आदिके आकारका प्रतिषेध करनेपर जो आत्माके अन्धकाररूप माने जानेकी आशङ्का होती है? उसका प्रतिषेध करनेके लिये ही आदित्यवर्णम् इत्यादि वाक्य हैं क्योंकि अरूपम् आदि वाक्योंसे विशेषतः रूपका प्रतिषेध किया गया है और इसका ( आत्माका ) रूप इन्द्रियोंके सामने नहीं ठहरता? इसको ( आत्माको ) कोई भी आंखोंसे नहीं देख सकता यह अशब्द है? अस्पर्श है इत्यादि वचनोंसे भी आत्मा किसीका विषय नहीं है? यह बात कही गयी है। सुतरां जैसा आत्मा है वैसा ही ज्ञान है यह कहना युक्तियुक्त नहीं है। तब फिर आत्माका ज्ञान कैसे होता है क्योंकि सभी ज्ञान? जिसको विषय करते हैं उसीके आकारवाले होते हैं और आत्मा निराकार है ऐसा कहा है। फिर ज्ञान और आत्मा दोनों निराकार होनेसे उसमें भावना और निष्ठा कैसे हो सकती है उ0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्माका अत्यन्त निर्मलत्व? स्वच्छत्व और सूक्ष्मत्व सिद्ध है और बुद्धिका भी आत्माके सदृश निर्मलत्व आदि सिद्ध है? इसलिये उसका आत्मचैतन्यके आकारसे आभासित होना बन सकता है। बुद्धिसे आभासित मन? मनसे आभासित इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंसे आभासित स्थूल शरीर है। इसलिये सांसारिक मनुष्य देहमात्रमें ही आत्मदृष्टि करते हैं। देहात्मवादी लोकायतिक? चेतनाविशिष्ट शरीर ही आत्मा है ऐसा कहते हैं? दूसरे? इन्द्रियोंको चेतन कहनेवाले हैं तथा कोई मनको और कोई बुद्धिको चेतन कहनेवाले हैं। कितने ही? उस बुद्धिके भी भीतर व्याप्त? अव्यक्तकोअव्याकृतसंज्ञक अविद्यावस्थ ( चिदाभास ) को आत्मरूपसे समझनेवाले हैं। बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त सभी जगह आत्मचैतन्यका आभास ही उनमें आत्माकी भ्रान्तिका कारण है। अतः ( यह सिद्ध हुआ कि ) आत्मविषयक ज्ञान विधेय नहीं है। तो क्या विधेय है नामरूप आदि अनात्मा वस्तुओंका जो आत्मामें अध्यारोप है उसकी निवृत्ति ही कर्तव्य है। आत्मचैतन्यका विज्ञान प्राप्त करना नहीं है क्योंकि ज्ञान? अविद्याद्वारा आरोपित समस्त पदार्थोंके आकारमें ही विशेषरूपसे ग्रहण किया हुआ है। यही कारण है कि विज्ञानवादी बौद्ध विज्ञानसे अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ही नहीं है इस प्रकार मानते हैं और उस ज्ञानको स्वसंवेद्य माननेके कारण प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं मानते। सुतरां ब्रह्ममें जो अविद्याद्वारा अध्यारोप किया गया है? उसका निराकरणमात्र कर्तव्य है। ब्रह्मज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है क्योंकि ब्रह्म तो अत्यन्त प्रसिद्ध ही है। ब्रह्म यद्यपि अत्यन्त प्रसिद्ध? सुविज्ञेय? अति समीप और आत्मस्वरूप है तो भी वह विवेकरहित मनुष्योंको? अविद्याकल्पित नामरूपके भेदसे उनकी बुद्धि भ्रमित हो जानेके कारण? अप्रसिद्ध? दुर्विज्ञेय? अति दूर और दूसरासा प्रतीत हो रहा है। परंतु जिनकी बाह्याकार बुद्धि निवृत्त हो गयी है? जिन्होंने गुरु और आत्माकी कृपा लाभ कर ली है? उनके लिये इससे अधिक सुप्रसिद्ध? सुविज्ञेय? सुखस्वरूप और अपने समीप कुछ भी नहीं है। प्रत्यक्षउपलब्ध धर्ममय इत्यादि वाक्योंसे भी यही बात कही गयी है। कितने ही अपनेको पण्डित माननेवाले यों कहते हैं कि आत्मतत्त्व निराकार होनेके कारण उसको बुद्धि नहीं पा सकती अतः सम्यक् ज्ञाननिष्ठा दुःसाध्य है। ठीक है? जो गुरुपरम्परासे रहित हैं? जिन्होंने वेदान्तवाक्योंको ( विधिपूर्वक ) नहीं सुना है? जिनकी बुद्धि सांसारिक विषयोंमें अत्यन्त आसक्त हो रही है? जिन्होंने यथार्थ ज्ञान करानेवाले प्रमाणोंमें परिश्रम नहीं किया है? उनके लिये यही बात है। परंतु जो उनसे विपरीत हैं? उनके लिये तो? लौकिक ग्राह्यग्राहक भेदयुक्त,वस्तुओंमें सद्भाव सम्पादन करना ( इनको सत्य समझना ) अत्यन्त कठिन है क्योंकि उनको आत्मचैतन्यसे अतिरिक्त दूसरी वस्तुकी उपलब्धि ही नहीं होती। यह ठीक इसी तरह है? अन्यथा नहीं है। यह बात हम पहले सिद्ध कर आये हैं और भगवान्ने भी कहा है कि जिसमें सब प्राणी जागते हैं? ज्ञानी मुनिकी वही रात्रि है इत्यादि। सुतरां आत्मस्वरूपके अवलम्बनमें? बाह्य नानाकार भेदबुद्धिकी निवृत्ति ही कारण है क्योंकि आत्मा कभी किसीके भी लिये अप्रसिद्ध? प्राप्तव्य? त्याज्य या उपादेय नहीं हो सकता। आत्माको अप्रसिद्ध मान लेनेपर तो सभी प्रवृत्तियोंको निरर्थक मानना सिद्ध होगा। इसके सिवा न तो यह कल्पना की जा सकती है कि अचेतन शरीरादिके लिये ( सब कर्म किये जाते हैं ) और न यही कि सुखके लिये सुख है या दुःखके लिये दुःख है क्योंकि सारे व्यवहारका प्रयोजन अन्तमें आत्माके ज्ञानका विषय बन जाना है। इसलिये? जैसे अपने शरीरको जाननेके लिये अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है? वैसे ही आत्मा उससे भी अधिक अन्तरतम होनेके कारण आत्माको जाननेके लिये प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं है अतः यह सिद्ध हुआ कि विवेकियोंके लिये आत्मज्ञाननिष्ठा सुप्रसिद्ध है। जिनके मतमें ज्ञान निराकार और अप्रत्यक्ष है उनको भी? ज्ञेयका बोध ( अनुभव ) ज्ञानके ही अधीन होनेके कारण? सुखादिकी तरह ही ज्ञान अत्यन्त प्रसिद्ध है? यह मान लेना चाहिये। तथा ज्ञानको जाननेके लिये जिज्ञासा नहीं होती इसलिये भी ( यह मान लेना चाहिये कि ज्ञान प्रत्यक्ष है ) यदि ज्ञान अप्रत्यक्ष होता? तो अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी तरह उसको भी जाननेके लिये इच्छा की जाती? अर्थात् जैसे ज्ञाता ( पुरुष ) घटादिरूप ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञानके द्वारा अनुभव करना चाहता है? उसी तरह उस ज्ञानको भी अन्य ज्ञानके द्वारा जाननेकी इच्छा करता? परंतु यह बात नहीं है। सुतरां ज्ञान अत्यन्त प्रत्यक्ष है और इसीलिये ज्ञाता भी अत्यन्त ही प्रत्यक्ष है। अतः ज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है? किंतु अनात्मबुद्धिकी निवृत्तिके लिये ही कर्तव्य है इसीलिये ज्ञाननिष्ठा सुसंपाद्य है।।50।।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.50।। व्याख्या --   सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे -- यहाँ सिद्धि नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है? जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये असक्तबुद्धिः? जितात्मा और विगतस्पृहः पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किञ्चिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना? ममता और आसक्ति नहीं रही? उसके लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है।लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी? अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है क्योंकि इसमें पराधीनता होती है? किसी बातकी कमी रहती है? और किसी वस्तु? परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी कामना पैदा न हो? वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे? वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है? प्रत्युत एक बन्धन ही है।अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है? उसको मुझसे समझ -- निबोध मे। कारण कि सांख्ययोगकी जो सारसार बातें हैं? वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है।निबोध पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें निबोध पद आया है।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा -- सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है? जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती? वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है? उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सारसार बातें,कहूँगा। सम्बन्ध --   ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये साधनसामग्रीकी आवश्यकता है? उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.50।।ज्ञानप्राप्तियोग्यतावतो जातसम्यग्धियस्तत्फलप्राप्तौ मुक्तावुक्तायां वक्तव्यशेषो नास्तीत्याशङ्क्याह -- पूर्वोक्तेनेति। क्रमाख्यं वस्तु तदित्युच्यते। सिद्धिं प्राप्त इत्युक्तमेव कस्मादनूद्यते तत्राह -- तदनुवाद इति। उत्तरमेव प्रश्नपूर्वकं स्फोरयति -- किं तदित्यादिना। ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिक्रमस्य विस्तरेणोक्तौ दुर्बोधत्वमाशङ्क्य परिहरति -- किमिति। चतुर्थपादस्य पूर्वेणासङ्गतिमाशङ्क्याह -- यथेति। निष्ठायाः सापेक्षत्वात्प्रतिसंबन्धि प्रतिनिर्देष्टव्यमित्याह -- कस्येति। या ब्रह्मज्ञानस्य परा निष्ठा सा प्रकृतस्य ज्ञानस्य निष्ठेत्याह -- ब्रह्मेति। तस्य परा निष्ठा न प्रसिद्धेति कृत्वा साधनानुष्ठानाधीनतया साध्येति मत्वा पृच्छति -- कीदृशीति। प्रसिद्धमात्मज्ञानमनुरुध्य ब्रह्मज्ञाननिष्ठा सुज्ञानेत्याह -- यादृशमिति। तत्रापि प्रसिद्धिरसिद्धेति शङ्कते -- कीदृगिति। अर्थेनैव विशेषो हीति न्यायेनोत्तरमाह -- यादृश इति। तस्मिन्नपि विप्रतिपत्तेरप्रसिद्धिमभिसंधाय पृच्छति -- कीदृश इति। भगवद्वाक्यान्युपनिषद्वाक्यानि चाश्रित्य परिहरति -- यादृश इति। न जायते म्रियते वेत्यादीनि वाक्यानि। कूटस्थत्वमसङ्गत्वमित्यादिन्यायः। ज्ञानस्य,विषयाकारत्वादात्मनश्चाविषयत्वादनाकारत्वाच्च तदाकारज्ञानायोगादात्मप्रसिद्धावपि नात्मज्ञानप्रसिद्धिरिति शङ्कते -- नन्विति। आकारवत्त्वमात्मनः श्रुतिसिद्धमिति सिद्धान्ती शङ्कते -- नन्वादित्येति। उक्तवाक्यानामन्यार्थत्वदर्शनेन पूर्ववादी परिहरति -- नेत्यादिना। संग्रहवाक्यं प्रपञ्चयति -- द्रव्येति। इतश्चाकारवत्त्वमात्मनो नास्तीत्याह -- अरूपमिति। यदात्मनो विषयत्वाभावात्तद्विषयं ज्ञानं न संभवतीत्युक्तं तदुपपादयति -- अविषयत्वाच्चेति। आत्मनोऽविषयत्वे श्रुतिमुदाहरति -- नेत्यादिना। संदृशे सम्यग्दर्शनविषयत्वायास्यात्मनो रूपं न तिष्ठतीत्यर्थः। तदेव करणागोचरत्वेनोपपादयति -- नेति। शब्दादिशून्यत्वाच्चात्मा विषयो न भवतीत्याह -- अशब्दमिति। आत्मनो विषयत्वाकारवत्त्वयोरभावे फलितमाह -- तस्मादिति। ज्ञानस्यात्माकारत्वाभावे सत्यात्मज्ञानमिति व्यपदेशासिद्धिरित्येकदेशी शङ्कते -- कथं तर्हीति। कात्रानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह -- सर्वं हीति। आत्मनोऽपि तर्हि विषयत्वेन ज्ञानस्य तदाकारत्वं स्यादित्याशङ्क्याह -- निराकारश्चेति। आत्मनो विषयत्वराहित्यं चकारार्थः। आत्मवत्तज्ज्ञानस्यापि तर्हि निराकारत्वं भविष्यतीत्यत्राह -- ज्ञानेति। तच्छब्देनात्मज्ञानं गृह्यते। तस्य भावना पौनःपुन्येनानुसन्धानं तस्यानिष्ठा समाप्तिरात्मसाक्षात्कारदार्ढ्यं नचैतत्सर्वमात्मनो ज्ञानस्य वा निराकारत्वे सिध्यतीत्यर्थः। ज्ञानात्मनोः साम्योपन्यासेन सिद्धान्ती समाधत्तेनेत्यादिना। यथोक्तसाम्यानुसारादात्मचैतन्याभासव्याप्ता ज्ञानपरिणामवती बुद्धिः साभासबुद्धिव्याप्तं मनः साभासमनोव्याप्तानीन्द्रियाणि साभासेन्द्रियव्याप्तः स्थूलो देहः। तत्र लौकिकभ्रान्तिं प्रमाणयति -- अत इति। आत्मदृष्टेर्देहमात्रे दृष्टत्वात्तत्र चैतन्याभासव्याप्तिरिन्द्रियद्वारा कल्प्यत इन्द्रियेषु च तद्दृष्टिदर्शनाच्चैतन्याभासवत्त्वं मनोद्वारा सिध्यति मनसि चात्मदृष्टेश्चैतन्याभासवत्त्वं बुद्धिद्वारा लभ्यते बुद्धौ चात्मदृष्टेरज्ञानद्वारा चैतन्याभाससिद्धिरित्यर्थः। देहे लौकिकमात्मत्वदर्शनं न्यायाभावादुपेक्षितमित्याशङ्क्याह -- देहेति। तथापि कथमिन्द्रियाणां न्यायहीनमात्मत्वमिष्टमित्याशङ्क्याह -- तथेति। तथापि मनसो यदात्मत्वं तन्न्यायशून्यमित्याशङ्क्याह -- अन्य इति। बुद्धेरात्मत्वमपि न्यायोपेतमिति सूचयति -- अन्ये बुद्धीति। देहादौ बुध्यन्ते परमात्मत्वबुद्धिर्नान्यत्रेति नियमं वारयति -- ततोऽपीति। तत्र हि साभासेऽन्तर्यामिणि कारणोपासकानामात्मत्वधीरस्तीत्यर्थः। बुद्ध्यादौ देहान्ते लौकिकपरीक्षकाणामात्मत्वभ्रान्तौ साघारणं कारणमाह -- सर्वत्रेति। आत्मज्ञानस्य लौकिकपरीक्षकप्रसिद्धत्वादेव विधिविषयत्वमपि परेष्टं परास्तमित्याह -- इत्यत इति। ज्ञानस्य विधेयत्वाभावे किं कर्तव्यं द्रष्टव्यादिवाक्यैरित्याशङ्क्याह -- किंतर्हीति। आत्मज्ञानस्याविधेयत्वे प्रागुक्तमतःशब्दितं हेतुं विवृणोति -- अविद्येति। देहेन्द्रियमनोबुद्ध्यव्यक्तैरुपलभ्यमानैः सहोपलभ्यते चैतन्यं नान्यथा तेषामुपलम्भो जडत्वादित्यत्र विज्ञानवादिभ्रान्तिं प्रमाणयति -- अतएवेति। सर्वं ज्ञेयं ज्ञानव्याप्तमेव ज्ञायते तेन ज्ञानातिरिक्तं नास्त्येव वस्तु? संमतं हि स्वप्नदृष्टं वस्तु ज्ञानातिरिक्तं नास्तीति ते भ्राम्यन्तीत्यर्थः। ज्ञानस्यापि ज्ञेयत्वाज्ज्ञातृ वस्त्वन्तरमेष्टव्यमित्याशङ्क्याह -- प्रमाणान्तरेति। ज्ञानस्य स्वेनैव ज्ञेयत्वोपगमनेनातिरिक्तप्रमाणनिरपेक्षतां च प्रतिपन्ना इति संबन्धः। ब्रह्मात्मनि ज्ञानस्य सिद्धत्वेनाविधेयत्वे फलितमाह -- तस्मादिति। यत्नोऽत्र भावना। ब्रह्मणस्तज्ज्ञानस्य चात्यन्तप्रसिद्धत्वे कथं ब्रह्मण्यन्यथा प्रथा लौकिकानामित्यत्राह -- अविद्येति। यथाप्रतिभासं दुर्विज्ञेयत्वादिरूपमेव ब्रह्म किं न स्यात्तत्राह -- बाह्येति। गुरुप्रसादः शुश्रूषया तोषितबुद्धेराचार्यस्य करुणातिरेकादेव तत्त्वं बुध्यतामिति निरवग्रहोऽनुग्रहः? आत्मप्रसादस्त्वधिगतपदशक्तिवाक्यतात्पर्यस्य श्रौतयुक्त्यनुसंधानादात्मनो मनसो विषयव्यावृत्तस्य प्रत्यगेकाग्रतया तत्प्रावण्यमिति विवेकः। आत्मज्ञानस्यात्मद्वारा प्रसिद्धत्वे वाक्योपक्रमं प्रमाणयति -- तथाचेति। आत्मनो निराकारत्वात्तस्मिन्बुद्धेरप्रवृत्तेः सम्यग्ज्ञाननिष्ठा न सुसंपाद्येति मतमुत्थापयति -- केचित्त्विति। बहिर्मुखानामन्तर्मुखानां वा ब्रह्मणि सम्यग्ज्ञाननिष्ठा दुःसाध्येति विकल्प्याद्यमनूद्याङ्गीकरोति -- सत्यमिति। पूर्वपूर्वविशेषणमुत्तरोत्तरविशेषणे हेतुत्वेन योजनीयम्। द्वितीयं दूषयति -- तद्विपरीतानामिति। अद्वैतनिष्ठानां द्वैतविषये सम्यग्बुद्धेरतिशयेन दुःसंपाद्यत्वे हेतुमाह -- आत्मेति। तद्व्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्यासत्त्वं कथमित्याशङ्क्याह -- तथाचेति। अद्वैतमेव वस्तु द्वैतं त्वाविद्यकं नान्यथा

Chapter 18 (Part 28)

तात्त्विकमित्येतदेवमेव यथा स्यात्तथोक्तवन्तो वयं तत्र तत्राध्यायेष्विति योजना। अन्तर्निष्ठानामद्वैतदर्शिनां द्वैते नास्ति सद्बुद्धिरित्यत्र भगवतोऽपि संमतिमाह -- उक्तंचेति। परमतं निराकृत्य प्रकृतमुपसंहरन्नात्मनो निराकारत्वे ज्ञानस्य तदालम्बनत्वे किं कारणमित्याशङ्क्याह -- तस्मादिति। नन्वात्मा कथंचित्सम्यग्ज्ञानक्रियासाध्यश्चेत्तस्य हेयोपादेयान्यतरकोटिनिवेशात्प्राप्तं स्वर्गादिवत्िक्रयासाध्यत्वेनाप्रसिद्धत्वं नेत्याह -- नहीति। आत्मत्वादेव प्रसिद्धत्वेन प्राप्तत्वादनात्मवत्तस्य हेयोपादेयत्वयोरयोगान्न क्रियासाध्यतेत्यर्थः। आत्मनश्चेदृते क्रियामसिद्धत्वं,तदा सर्वप्रवृत्तीनामभ्युदयनिःश्रेयसार्थानामात्मार्थत्वायोगादर्थिनोऽभावे स्वार्थत्वमप्रामाणिकं स्यादित्याह -- अप्रसिद्धे हीति। ननु प्रवृत्तीनां स्वार्थत्वं देहादीनामन्यतमस्यार्थित्वेन तादर्थ्यादित्याशङ्क्य घटादिवदचेतनस्यार्थित्वायोगान्नैवमित्याह -- न चेति। ननु प्रवृत्तीनां फलावसायितया सुखदुःखयोरन्यतरार्थत्वान्न स्वार्थत्वं तत्राह -- न चेति। प्रवृत्तीनां सुखदुःखार्थत्त्वेऽपि तयोः स्वार्थत्वासिद्धेरर्थित्वेनात्मा सिध्यतीत्यर्थः। किञ्च सर्वापेक्षान्यायादात्मावगत्यवसानः सर्वो व्यवहारः? नचात्मन्यप्रसिद्धे यज्ञादिव्यवहारस्य तज्ज्ञानार्थत्वं तेनात्मप्रसिद्धिरेष्टव्येत्याह -- आत्मेति। नन्वात्माप्रसिद्धोऽपि प्रमाणद्वारा प्रसिध्यति यत्सिध्यति तत्प्रमाणादेवेति न्यायात्तत्राह -- तस्मादिति। मानमेयादिसर्वव्यवहारस्यात्मावगत्यन्तत्वोपगमात्प्रागेव प्रमाणप्रवृत्तेरात्मप्रसिद्धेरेष्टव्यत्वादित्यर्थः। आत्मावगतेरेवं स्वाभाविकत्वे विवेकवतामारोपनिवृत्त्या ज्ञाननिष्ठा सुप्रसिद्धेत्युपसंहरति -- इत्यात्मेति। नन्वनाकारामेवानुमिमीमहे बुद्धिमिति वदतामनाकारमप्रत्यक्षमिच्छतां प्रागर्थावगतेरप्रसिद्धमेव ज्ञानं नेत्याह -- येषामिति। सुखादिवन्नित्यानुभवगम्यं ज्ञानं नानुमेयं विषयावगत्या तदनुमितावितरेतराश्रयादिति भावः। इतश्च ज्ञानं प्रसिद्धमन्यथा तत्र जिज्ञासाप्रसङ्गान्नच ज्ञाने जिज्ञासा प्रसिद्धा प्रसिद्धे च तदयोगादित्याह -- जिज्ञासेति। तदेव प्रपञ्चयति -- अप्रसिद्धं चेदिति। दृष्टान्तमेव व्याचष्टे -- यथेति। दार्ष्टान्तिकं विवृणोति -- तथेति। इष्टापत्तिं निराचष्टे -- नचेति। ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेण ज्ञेयत्वमेतच्छब्दार्थः। अनवस्थापत्तेरित्यर्थः। ज्ञाने जिज्ञासानुपपत्तौ फलितमाह -- अत इति। प्रसिद्धेऽपि ज्ञाने ज्ञातर्यात्मनि किमायातं तदाह -- ज्ञातापीति। ज्ञानस्य विना ज्ञातारमपर्यवसानादित्यर्थः। ज्ञानस्य प्रसिद्धत्वे तत्र भावनापर्यायो विधिर्नास्तीत्याह -- तस्मादिति। कुत्र तर्हि प्रयत्नाख्या भावनेत्याशङ्क्याह -- किंत्विति। अविषये निराकारे चात्मनि ज्ञाननिष्ठाया दुःसंपाद्यत्वाभावे फलितं निगमयति -- तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.50।।सिद्धिं प्राप्तः इति योगसिद्धिप्राप्त्यनन्तरं ब्रह्मप्राप्तावुपायकथनं प्रतिज्ञायत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थं व्याचष्टे -- यथेति।ब्रह्माप्नोति इत्यनुवादमात्रम्। तथा तमुपायम्। प्रतीत एवार्थः किं न स्यात् इति चेत्? न सिद्धेर्ज्ञाननिष्ठात्मकत्वेनाभिधानात्। ज्ञानस्य च ब्रह्मप्राप्तावनपेक्षत्वादिति भावेन निष्ठेत्येतद्व्याचष्टे -- येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.50।।यथा येनोपायेन सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्माप्नोति तथा निबोध। या सिद्धिर्ज्ञानस्य परा निष्ठा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.50।। --,सिद्धिं प्राप्तः स्वकर्मणा ईश्वरं समभ्यर्च्य तत्प्रसादजां कायेन्द्रियाणां ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिं प्राप्तः -- सिद्धिं प्राप्तः इति तदनुवादः उत्तरार्थः। किं तत् उत्तरम्? यदर्थः अनुवादः इति? उच्यते -- यथा येन प्रकारेण ज्ञाननिष्ठारूपेण ब्रह्म परमात्मानम् आप्नोति? तथा तं प्रकारं ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिक्रमं मे मम वचनात् निबोध त्वं निश्चयेन अवधारय इत्येतत्। किं विस्तरेण न इति आह -- समासेनैव संक्षेपेणैव हे कौन्तेय? यथा ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोधेति। अनेन या प्रतिज्ञाता ब्रह्मप्राप्तिः? ताम् इदंतया दर्शयितुम् आह -- निष्ठा ज्ञानस्य या परा इति। निष्ठा पर्यवसानं परिसमाप्तिः इत्येतत्। कस्य ब्रह्मज्ञानस्य या परा। कीदृशी सा यादृशम् आत्मज्ञानम्। कीदृक् तत् यादृशः आत्मा। कीदृशः सः यादृशो भगवता उक्तः? उपनिषद्वाक्यैश्च न्यायतश्च।।ननु विषयाकारं ज्ञानम्। न ज्ञानविषयः? नापि आकारवान् आत्मा इष्यते क्वचित्। ननु आदित्यवर्णम् भारूपः स्वयंज्योतिः इति आकारवत्त्वम् आत्मनः श्रूयते। न तमोरूपत्वप्रतिषेधार्थत्वात् तेषां वाक्यानाम् -- द्रव्यगुणाद्याकारप्रतिषेधे आत्मनः तमोरूपत्वे प्राप्ते तत्प्रतिषेधार्थानि आदित्यवर्णम् (गीता 8।9) इत्यादीनि वाक्यानि। अरूपम् इति च विशेषतः रूपप्रतिषेधात्। अविषयत्वाच्च -- न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् (श्वे0 उ0 4।20) अशब्दमस्पर्शम् (क0 उ0 1।3।15) इत्यादैः। तस्मात् आत्माकारं ज्ञानम् इति अनुपपन्नम्।।कथं तर्हि आत्मनः ज्ञानम् सर्वं हि यद्विषयं यत् ज्ञानम्? तत् तदाकारं भवति। निराकारश्च आत्मा इत्युक्तम्। ज्ञानात्मनोश्च उभयोः निराकारत्वे कथं तद्भावनानिष्ठा इति न अत्यन्तनिर्मलत्वातिस्वच्छत्वातिसूक्ष्मत्वोपपत्तेः आत्मनः। बुद्धेश्च आत्मवत् नैर्मल्याद्युपपत्तेः आत्मचैतन्याकाराभासत्वोपपत्तिः। बुद्ध्याभासं मनः? तदाभासानि इन्द्रियाणि? इन्द्रियाभासश्च देहः। अतः लौकिकैः देहमात्रे एव आत्मदृष्टिः क्रियते।।देहचैतन्यवादिनश्च लोकायतिकाः चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः इत्याहुः। तथा अन्ये इन्द्रियचैतन्यवादिनः? अन्ये मनश्चैतन्यवादिनः? अन्ये बुद्धिचैतन्यवादिनः। ततोऽपि आन्तरम् अव्यक्तम् अव्याकृताख्यम् अविद्यावस्थम् आत्मत्वेन प्रतिपन्नाः केचित्। सर्वत्र बुद्ध्यादिदेहान्ते आत्मचैतन्याभासता आत्मभ्रान्तिकारणम् इत्यतश्च आत्मविषयं ज्ञानं न विधातव्यम्। किं तर्हि नामरूपाद्यनात्माध्यारोपणनिवृत्तिरेव कार्या? आत्मचैतन्यविज्ञानं कार्यम्? अविद्याध्यारोपितसर्वपदार्थाकारैः विशिष्टतया दृश्यमानत्वात् इति। अत एव हि विज्ञानवादिनो बौद्धाः विज्ञानव्यतिरेकेण वस्त्वेव नास्तीति प्रतिपन्नाः? प्रमाणान्तरनिरपेक्षतां च स्वसंविदि तत्वाभ्युपगमेन। तस्मात् अविद्याध्यारोपितनिराकरणमात्रं ब्रह्मणि कर्तव्यम्? न तु ब्रह्मविज्ञाने यत्नः? अत्यन्तप्रसिद्धत्वात्। अविद्याकल्पितनामरूपविशेषाकारापहृतबुद्धीनाम् अत्यन्तप्रसिद्धं सुविज्ञेयम् आसन्नतरम् आत्मभूतमपि? अप्रसिद्धं दुर्विज्ञेयम् अतिदूरम् अन्यदिव च प्रतिभाति अविवेकिनाम्। बाह्याकारनिवृत्तबुद्धीनां तु लब्धगुर्वात्मप्रसादानां न अतः परं सुखं सुप्रसिद्धं सुविज्ञेयं स्वासन्नतरम् अस्ति। तथा चोक्तम् -- प्रत्यक्षावगमं धर्म्यम् (गीता 9।2) इत्यादि।।केचित्तु पण्डितंमन्याः निराकारत्वात् आत्मवस्तु न उपैति बुद्धिः। अतः दुःसाध्या सम्यग्ज्ञाननिष्ठा इत्याहुः। सत्यम् एवं गुरुसंप्रदायरहितानाम् अश्रुतवेदान्तानाम् अत्यन्तबहिर्विषयासक्तबुद्धीनां सम्यक्प्रमाणेषु अकृतश्रमाणाम्। तद्विपरीतानां तु लौकिकग्राह्यग्राहकद्वैतवस्तुनि सद्बुद्धिः नितरां दुःसंपाधा? आत्मचैतन्यव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्य अनुपलब्धेः? यथा च एतत् एवमेव? न अन्यथा इति अवोचाम उक्तं च भगवता यस्या जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः (गीता 2।69) इति। तस्मात् बाह्याकारभेदबुद्धिनिवृत्तिरेव आत्मस्वरूपावलम्बनकारणम्। न हि आत्मा नाम कस्यचित् कदाचित् अप्रसिद्धः प्राप्यः हेयः उपादेयो वा अप्रसिद्धे हि तस्मिन् आत्मनि स्वार्थाः सर्वाः प्रवृत्तयः व्यर्थाः प्रसज्येरन्। न च देहाद्यचेतनार्थत्वं शक्यं कल्पयितुम्। न च सुखार्थं सुखम्? दुःखार्थं दुःखम्। आत्मावगत्यवसानार्थत्वाच्च सर्वव्यवहारस्य। तस्मात् यथा स्वदेहस्य परिच्छेदाय न प्रमाणान्तरापेक्षा? ततोऽपि आत्मनः अन्तरतमत्वात् तदवगतिं प्रति न प्रमाणान्तरापेक्षा इति आत्मज्ञाननिष्ठा विवेकिनां सुप्रसिद्धा इति सिद्धम्।।येषामपि निराकारं ज्ञानम् अप्रत्यक्षम्? तेषामपि ज्ञानवशेनैव ज्ञेयावगतिरिति ज्ञानम् अत्यन्तप्रसिद्धं सुखादिवदेव इति अभ्युपगन्तव्यम्। जिज्ञासानुपपत्तेश्च -- अप्रसिद्धं चेत् ज्ञानम्? ज्ञेयवत् जिज्ञास्येत। यथा ज्ञेयं घटादिलक्षणं ज्ञानेन ज्ञाता व्याप्तुम् इच्छति? तथा ज्ञानमपि ज्ञानान्तरेण ज्ञातव्यम् आप्तुम् इच्छेत्। न एतत् अस्ति। अतः अत्यन्तप्रसिद्धं ज्ञानम्? ज्ञातापि अत एव,प्रसिद्धः इति। तस्मात् ज्ञाने यत्नो न कर्तव्यः? किं तु अनात्मनि आत्मबुद्धिनिवृत्तावेव। तस्मात् ज्ञाननिष्ठा सुसंपाद्या।।सा इयं ज्ञानस्य परा निष्ठा उच्यते? कथं कार्या इति --,

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【 Verse 18.51 】

▸ Sanskrit Sloka: बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च | शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ||

▸ Transliteration: buddhyā viśuddhayā yukto dhṛtyātmānaṁ niyamya ca | śabādīnviṣayāṁstyaktvā rāgadveṣau vyudasya ca ||

▸ Glossary: buddhyā: by the intelligence; viśuddhayā: fully purified; yuktaḥ: such engagement; dhṛtyā: determination; atmānaṁ: self; niyamya: regulated; ca: also; śabdādīn: the sense objects, such as sound, etc.; viṣayān: sense objects; tyaktvā: giving up; rāga: attachment; dveṣau: hatred; vyudasya: having laid aside; ca: also;

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.51,52,53 Endowed with purified intellect; subduing the mind with firm resolve; turning away from the objects of senses; giving up likes and dislikes; living in solitude; eating lightly; controlling the mind, speech, and organs of action; ever absorbed in meditation; taking refuge in detachment; and relinquishing egotism, violence, pride, lust, anger, and proprietorship, one becomes peaceful, free from the notion of “I” and “mine”, and fit for attaining oneness with the Supreme Being.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.51।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त? वैराग्यके आश्रित? एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके? शरीरवाणीमनको वशमें करके? शब्दादि विषयोंका त्याग करके और रागद्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है? वह अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.51।। विशुद्ध बुद्धि से युक्त? धृति से आत्मसंयम कर? शब्दादि विषयों को त्याग कर और रागद्वेष का परित्याग कर৷৷৷৷।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.51 बुद्ध्या with an intellect? विशुद्धया pure? युक्तः endowed? धृत्या by firmness? आत्मानम् the self? नियम्य controlling? च and? शब्दादीन् sound and other? विषयान् senseobjects? त्यक्त्वा relinishing? रागद्वेषौ attraction and hatred? व्युदस्य abandoning? च and.Commentary The lower self should be controlled with firmness by the Self of pure intellect. The turbulent senses and the mind should be subdued with the help of the pure intellect or reason. Pure reason is a great power. Whenever the senses raise their heads and hiss? they should be hammered by the powerful rod of pure intellect or reason. Reason is the faculty of determination.Pure intellect The intellect that is free from lust? anger? greed? pride? doubt? misconception? etc. It is like a clear mirror. A pure intellect is Brahman Itself. It can be easily merged in Brahman. When the pure intellect is merged in Brahman? the reflected intelligence? Chidabhasa or Jiva? is also absorbed in Brahman. The Jiva becomes identical with Brahman? just as the ether in the pot becomes one with the universal ether when the pot is broken.The self The aggregate of the body and the senses.The aspirant withdraws the senses from their respective objects again and again through the repeated practice of Pratyahara (abstraction) and Dama (selfrestraint). Gradually the senses are fixed in the Self. Their outgoing tendencies are totally curbed. The aspirant attains supreme control of the senses by constant meditation? by the practice of dispassion he coners Raga (attachment)? and through the practice of pure love or cosmic love or divine Preme he coners hatred.He abandons all luxuries. He keeps only those objects which are necessary for the bare maintenance of the body. He has neither attachment nor hatred even for those objects which are necessary for that purpose.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.51. He, who has got a totally pure intellect by fully controlling his self (mind) with firmness, and renouncing sense-objects, sound etc., and driving out desire and hatred;

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.51 Guided always by pure reason, bravely restraining himself, renouncing the objects of sense and giving up attachment and hatred;

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.51 Endowed by a purified understanding, subduing the mind by steadiness, relinishing sound and other objectts of the senses and casting aside love and hate;

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.51 Being endowed with a pure intellect, and controlling oneself with fortitude, rejecting the objects-beginning from sound [Sound, touch, form and colour, taste and smell.-Tr.], and eliminating attachment and hatred;

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.51 Endowed with a pure intellect, controlling the self by firmness, relinishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.51 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.51 - 18.53 'Endowed with a purified understanding' means endowed with the Buddhi capable of understanding the self as it is in reality; 'subduing the mind by steadiness' means making the mind fit for meditation by turning away from external and internal objects; 'relinishing sound and other objects of senses' means keeping them far away, casting aside love and hate occasioned by them (i.e., the sense objects).

'Resorting to solitude' means living in a lonely place free from hindrances to meditation; 'eat but little' means eating neither too much nor too little; 'restraining speech, body and mind' means directing the operations of body, speech and mind to meditation; 'ever engaged in the Yoga of meditation' means being like this, i.e., constantly engaged in the Yoga of meditation day after day until death; 'taking refuge in dispassion' means developing aversion to all objects except the one entity to be meditated upon, by considering the imperfections of all objects and thus cultivating detachment to everything.

Forsaking 'egoism' means abandoning the tendency to consider what is other than the self, as well as neutralising the power of forcible Vasnas (tendencies) which nourish (egoism), and the resulting pride, desire, wrath and possessiveness. 'With no feeling of mine' means free from the notion that what does not belong to oneself belongs to oneself; 'Who is tranil' means, who finds sole happiness in experiencing the self. One who has become like this and performs the Yoga of meditation becomes worthy for the state of Brahman. The meaning is that, freed from all bonds, he experiences the self as It really is.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.51 Yuktah, being endowed; buddhya, with an intellect-which is identical with the faculty of determination; visuddhaya, pure, free from maya (delusion); and niyamya, controlling, subduing; atmanam, oneself, the aggregate of body and organs; dhrtya, with fortitude, with steadlines; tyaktva, rejecting; visayan, the objects; sabdadin, beginning from sound -from the context it follows that 'rejecting the objects' means rejecting all things which are meant for pleasure and are in excess of those meant only for the mere maintenance of the body; and vyudasya, eliminating; raga-dvesau, attachment and hatred with regard to things which come to hand for the maintenance of the body-. Therefore,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.51।। विशुद्ध बुद्धि से युक्त अर्थात् जिसका अन्तकरण शुद्ध है। विषयार्जन और विषयोपभोग की वासनाओं से मुक्त अन्तकरण ही शुद्ध कहलाता है। विशुद्ध बुद्धि से तात्पर्य सात्त्विकी बुद्धि से भी है।ध्यानाभ्यास के समय साधक का आन्तरिक सामञ्जस्य और शान्ति दो कारणों से नष्ट हो सकती है। (1) इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण से? अथवा (2) मन द्वारा पूर्वानुभूत भोगों के स्मरण अर्थात् भोगस्मृति से। साधक को सात्त्विकी धृति से मन को संयमित करना चाहिए अर्थात् ध्यान के समय विषयभोगों का स्मरण नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार? शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध इन विषयों को त्यागने का अर्थ यह है कि यदि इन्द्रिय द्वारा कोई विषय ग्रहण किया भी जाता है? तो उसका चिन्तन प्रारम्भ नहीं करना चाहिए। यह तभी संभव होगा? जब साधक अपने व्यक्तिगत रागद्वेषों से मुक्त होगा। इन सबको सम्पादित करने के लिए मन के चारों ओर ज्ञान की प्राचीर (दीवार) निर्म्ात करनी चाहिए। ज्ञान से ही मन को अपने वश में किया जा सकता है। मनसंयम और इन्द्रियसंयम को क्रमश शम और दम भी कहते हैं।ध्यानाभ्यास के साधक के विषय में? और आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.51।। ब्रह्मप्राप्तेः ब्रह्मज्ञानस्य परस्याः निष्ठायाः समापोपिताऽतद्धर्मनिवृत्तिद्वारा ब्रह्मणि परिसमाप्तेः सुसंपाद्यायाः प्रतिज्ञातं क्रमं दर्शयति। बुद्य्धा व्यवसायात्मिकया व्यवसायश्च ब्रह्मात्मज्ञानादेव मोक्षः सचावश्यं संपादनीय इति निश्चयः। विशुद्धया मायारहितया युक्तः संपन्नः धृत्या धैर्यणात्मानं कार्यकरणसंघातं नियम्य वशीकृत्य षष्ठाध्यायादावुक्तानामनुक्तानां ततोऽधिकान्सुखार्थास्त्यक्त्वेत्यर्थः। विषयमात्रेत्यागे देहस्थित्यनुपपत्त्या ज्ञाननिष्ठाया असिद्धिप्रसङ्गात्। स्यादित्यध्याहृतेन ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यनेन वा संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.51।।सेयं ज्ञाननिष्ठा सप्रकारोच्यते -- बुद्ध्येति। विशुद्धया सर्वसंशयविपर्ययशून्यया बुद्ध्याऽहं ब्रह्मास्मीति वेदान्तवाक्यजन्यया बुद्धिवृत्त्या युक्तः सदा तदन्वितो धृत्या धैर्येणात्मानं शरीरेन्द्रियसङ्घातं नियम्योन्मार्गप्रवृत्तेर्निवार्यात्मप्रवणं कृत्वा। चशब्देन योगशास्त्रोक्तं साधनान्तरं समुच्चीयते। शब्दादीञ्शब्दस्पर्शरूपरसगन्धात् विषयान्भोगेन बन्धहेतून् सामर्थ्याज्ज्ञाननिष्ठार्थशरीरस्थितिमात्रप्रयोजनानुपयुक्ताननिषिद्धानपि त्यक्त्वा शरीरस्थितिमात्रार्थेषु च तेषु रागद्वेषौ व्युदस्य परित्यज्य चकारादन्यदपि ज्ञानविक्षेपकं परित्यज्य। विविक्तसेवीत्यत्र स्यादित्यध्याहृतेन ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यन्तेनान्वयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.51।।तमेव ब्रह्मप्राप्तिप्रकारमाह त्रिभिः -- बुद्ध्येति। बुद्ध्या वेदान्तश्रवणमननपरिपाकोत्थयाऽहं ब्रह्मास्मीति परोक्षनिश्चयरूपया विशुद्धया सर्वभूतेषु मैत्र्यादिभावनया सम्यग्विशोधितया। धृत्या धैर्येण योगक्षेमादिनिमित्तवैयग्र्यराहित्येन। आत्मानं देहेन्द्रियसंघातं नियम्य। दृढासनो भूत्वेत्यर्थः। चकारात्प्राणं च नियम्य। शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा। तत इन्द्रियाणि प्रत्याहृत्येत्यर्थः। प्रत्याहृतकरणोऽप्यन्तर्मनसैव विषयान्स्मरति तत्परित्यागमाह -- रागद्वेषौ व्युदस्य चेति। संकल्पं त्यक्त्वेत्यर्थः। स हि विषयं परिकल्प्य तत्र रागं जनयतीति प्रसिद्धम्। यथाचाक्षपादाचार्यसूत्रंदोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः संकल्पकृताः इति। दोषो रागादिः। चकारादयमहमस्मीत्येतमपि भावं व्युदस्येति ज्ञेयम्। ततो ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभावाय तं प्राप्तुं कल्पते योग्यो भवतीति तृतीयेन संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.51।।तदेवाऽऽह -- बुद्ध्येति। विशुद्धया सर्वसङ्गरहितमदेकनिष्ठया बुद्ध्या युक्तो धृत्या मदिच्छाज्ञाने दुःखाद्याभासेऽपि मल्लीलाज्ञानात्मकधैर्येण आत्मानं जीवं नियम्य वशीकृत्य -- चकारेणाऽचलं कृत्वा -- शब्दादीन् विषयान् इन्द्रियेभ्यस्त्यक्त्वा च पुनः रागद्वेषौ मित्रशत्रुज्ञानरूपौ व्युदस्य दूरीकृत्य ब्रह्मभूयाय कल्पत इति तृतीयश्लोकेनान्वयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.51।।तदेवाह -- बुद्ध्येति। उक्तेन प्रकारेण विशुद्धया पूर्वोक्तया सात्त्विक्या बुद्ध्या युक्तः? धृत्या सात्त्विक्या आत्मानं तामेव बुद्धिं नियम्य निश्चलां कृत्वा? शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा तद्विषयौ रागद्वेषौ च व्युदस्यबुद्ध्या विशुद्धया युक्तः इत्यादीनांब्रह्मभूयाय कल्पते इति तृतीयेनान्वयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.51 -- 18.53।।तथा हि बुद्ध्येति त्रिभिः। बुद्ध्या यथोक्तकर्मफलादित्यागाद्विशुद्धया साङ्ख्यमार्गीयया युक्तः योगेनाव्यभिचारिण्या धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च स्वान्तर्यामिध्यानैकनिष्ठः सर्वत्रानात्मत्वदृष्ट्या वैराग्यं समुपाश्रितः कर्मस्वहम्ममत्वरहितः शान्त इति पूर्वसूत्रितस्य भाष्यं फलितं तथाभूत आनन्दांशाविर्भूतो ब्रह्मभूयाय अक्षरब्रह्मात्मभावाय कल्पते? स्वात्मानंब्रह्माहमस्मि इति यथावदनुभवतीत्यर्थः। इतीयं स्वज्ञानस्य परा निष्ठा भगवद्गुणसाराविर्भावात्तद्व्यपदेशः प्राज्ञवदिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.51।।वह ज्ञानकी परा निष्ठा किस प्रकार करनी चाहिये सो कहते हैं --, विशुद्ध -- कपटरहित निश्चयात्मिका बुद्धिसे संपन्न पुरुष? धैर्यसे कार्यकरणके संघातरूप आत्माको,( शरीरको ) संयम करके -- वशमें करके शब्दादि विषयोंको? अर्थात् शब्द जिनका आदि है ऐसे सभी विषयोंको छोड़कर? प्रकरणके अनुसार यहाँ यह अभिप्राय है कि केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये जिन विषयोंकी आवश्यकता है? उनसे अतिरिक्त सुखभोगके लिये जो अधिक विषय हैं? उन सबको छोड़कर तथा शरीरस्थितिके निमित्त प्राप्त हुए विषयोंमें भी? रागद्वेषका अभाव करकेत्याग करके।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.51।। व्याख्या --   बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध --   उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.51।।ब्रह्मज्ञानस्य परां निष्ठां प्रतिष्ठापितामनूद्य श्लोकान्तरमवतारयितुं पृच्छति -- सेयमिति। येयं ब्रह्मज्ञानस्य परा निष्ठा समारोपिता तद्धर्मनिवृत्तिद्वारा ब्रह्मणि परिसमाप्तिर्ज्ञानसंतानरूपोच्यते सा कार्या सुसंपाद्येति यदुक्तं तत्कथं केनोपायेनेति प्रश्नार्थः। पृष्टमुपायभेदमुदाहरति -- बुद्ध्येति। अध्यवसायो ब्रह्मात्मत्वनिश्चयः? मायारहितत्वं संशयविपर्ययशून्यत्वम्। शब्दादिसमस्तविषयत्यागे देहस्थितिरपि दुःस्था स्यादित्याशङ्क्याह -- सामर्थ्यादिति। विषयमात्रत्यागे देहस्थित्यनुपपत्तेर्ज्ञाननिष्ठासिद्धिप्रसङ्गादित्यर्थः। देहस्थित्यर्थत्वेनानुज्ञातेष्वर्थेषु प्राप्तं रागादि ज्ञाननिष्ठाप्रतिबन्धकं व्युदस्यति -- शरीरेति। परित्यज्य विविक्तसेवी स्यादिति संबन्धः। बुद्धेर्वैशारद्यं यत्नेन कार्यं करणनियमनम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.51।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.51।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.51।। --,बुद्ध्या अध्यवसायलक्षणया विशुद्धया मायारहितया युक्तः संपन्नः? धृत्या धैर्येण आत्मानं कार्यकरणसंघातं नियम्य च नियमनं कृत्वा वशीकृत्य? शब्दादीन् शब्दः आदिः येषां तान् विषयान् त्यक्त्वा? सामर्थ्यात् शरीरस्थितिमात्रहेतुभूतान् केवलान् मुक्त्वा ततः अधिकान् सुखार्थान् त्यक्त्वा इत्यर्थः? शरीरस्थित्यर्थत्वेन प्राप्तेषु रागद्वेषौ व्युदस्य च परित्यज्य च।।ततः --,

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【 Verse 18.52 】

▸ Sanskrit Sloka: विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस: | ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित: ||

▸ Transliteration: viviktasevī laghvāśī yat-avāk-kāyamānasaḥ | dhyāna-yoga-paro nityaṁ vairāgyaṁ samupāśritaḥ ||

▸ Glossary: viviktasevī: living in a secluded place; laghvāśī: eating a small quantity; yatavāk: control of speech; kāya: body; mānasaḥ: control of the mind; dhyānayogaparaḥ: always absorbed in trance; nityaṁ: twenty-four hours a day; vairāgyaṁ: detachment; samupāśritaḥ: taken shelter of;

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.51,52,53 Endowed with purified intellect; subduing the mind with firm resolve; turning away from the objects of senses; giving up likes and dislikes; living in solitude; eating lightly; controlling the mind, speech, and organs of action; ever absorbed in meditation; taking refuge in detachment; and relinquishing egotism, violence, pride, lust, anger, and proprietorship, one becomes peaceful, free from the notion of “I” and “mine”, and fit for attaining oneness with the Supreme Being.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.52।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त? वैराग्यके आश्रित? एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके? शरीरवाणीमनको वशमें करके? शब्दादि विषयोंका त्याग करके और रागद्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है? वह अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.52।। विविक्त सेवी? लघ्वाशी (मिताहारी) जिसने अपने शरीर? वाणी और मन को संयत किया है? ध्यानयोग के अभ्यास में सदैव तत्पर तथा वैराग्य पर समाश्रित।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.52 विविक्तसेवी dwelling in solitude? लघ्वाशी eating but little? यतवाक्कायमानसः speech? body and mind subdued? ध्यानयोगपरः engaged in meditation and concentration? नित्यम् always? वैराग्यम् dispassion? समुपाश्रितः resorting to.Commentary Solitude has its own charms. The spiritual vibrations in solitude are wonderfully elevating. Meditation will come by itself without exertion. All saints and sages who have attained Selfrealisation have remained in solitude for a number of years. You will have good meditation if you sit on the bank of a river? in a cave or on the seashore or in a jungle. During the Christmas and Easter holidays you can all enjoy the peace of solitude. It is very necessary to live in solitude at least for a month or a fortnight in a year for the householders. Instead of wasting time? energy and money in Calcutta or any other city? during the holidays? live in holy places like Rishikesh? Uttarakasi or Naimisaranya drink the nectar of peace in such places by doing Anushthana (intense and systematic spiritual practice) or Japa of a Mantra and attain immortality. If you once taste the bliss of solitude you will never forget it. Every year you will attempt to taste it again. He who takes too much food (a glutton) is ite unfit for meditation or the spiritual path. Too much food will produce laziness? a halfsleepy state and deep sleep also. Eat to live. Eat in moderation. You will have a light body and light? cheerful and serene mind. This will help you in your practice of meditation. Observe Mauna or the vow of silelnce for a week or a month. Observe the vow for two hours daily. Control the body. Practise Ahimsa and Brahmacharya. Meditate on the Self or on the Lord Hari with four hands? or on Lord Krishna? Rama or Siva. Be regular in your meditation and gradually increase the period of meditation from 15 minutes to 3 or 6 hours at a sitting. If you are a wholetimed aspirant? spend the whole time in meditation. If you are not able to do this? do Likhita Japa (writing the Mantra) and Kirtan (singing the Names and glories of the Lord). Study religious books in the interval. Only advanced aspirants can meditate for a long time. Watch the mind and cultivate dispassion. Energy will leak out through the senses if you are careless and nonvigilant. If energy leaks out? you cannot have good meditation. Dispassion is indifference to sensual enjoyments herein and hereafter? absence of desire for visible and invisible objects. You must have steady? lasting and sustained dispassion. It should not wane. It should be a constant attitude of the mind. You must be fully established in dispassion.In doing the Anushthana for 40 days live on milk and fruits or light diet. Take only 3 or 4 articles of food. Take one meal only. Sleep on the floor. Observe celibacy and the vow of silence. Do not come out of the room. Speak little if you do not observe perfect silence. Do the Anushthana on the banks of the Ganga or any sacred river. Try to do one or several Purascharanas of your Ishta Mantra. If there are five letters (syllables in English) in the Mantra? 500?000 repetitions of the Mantra will constitute one Purascharana.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.52. Who enjoys solitude, eats lightly, has controlled his speech-organ, body and mind; who is permanently devoted to the meditation-Yoga; and who has taken shelter in the perennial desirelessness;

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.52 Enjoying solitude, abstemiousness, his body, mind and speech under perfect control, absorbed in meditation, he becomes free - always filled with the spirit of renunciation.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.52 Resorting to solitude, eating but little, restraining speech, body and mind, ever engaged in the Yoga of meditation and taking refuge in dispassion;

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.52 One who resorts to solitude, eats sparingly, has speech, body and mind under control, to whom meditation and concentration are ever the highest (duty), and who is possessed of dispassion;

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.52 Dwelling in solitude, eating but little, with speech, body and mind subdued, always engaged in meditation and concentration, resorting to dispassion.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.52 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.51 - 18.53 'Endowed with a purified understanding' means endowed with the Buddhi capable of understanding the self as it is in reality; 'subduing the mind by steadiness' means making the mind fit for meditation by turning away from external and internal objects; 'relinishing sound and other objects of senses' means keeping them far away, casting aside love and hate occasioned by them (i.e., the sense objects).

'Resorting to solitude' means living in a lonely place free from hindrances to meditation; 'eat but little' means eating neither too much nor too little; 'restraining speech, body and mind' means directing the operations of body, speech and mind to meditation; 'ever engaged in the Yoga of meditation' means being like this, i.e., constantly engaged in the Yoga of meditation day after day until death; 'taking refuge in dispassion' means developing aversion to all objects except the one entity to be meditated upon, by considering the imperfections of all objects and thus cultivating detachment to everything.

Forsaking 'egoism' means abandoning the tendency to consider what is other than the self, as well as neutralising the power of forcible Vasnas (tendencies) which nourish (egoism), and the resulting pride, desire, wrath and possessiveness. 'With no feeling of mine' means free from the notion that what does not belong to oneself belongs to oneself; 'Who is tranil' means, who finds sole happiness in experiencing the self. One who has become like this and performs the Yoga of meditation becomes worthy for the state of Brahman. The meaning is that, freed from all bonds, he experiences the self as It really is.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.52 Vivikta-sevi, one who resorts to solitude, is habituated to repairing into such solitary places as a forest, bank of a river, mountain caves, etc.; laghuasi, eats sparingly, is habituated to eating a little-repairing to solitary places and eating sparingly are nentioned here since they are the causes of tranillity of mind through the elimination of defects like sleep etc.-; the person steadfast in Knowledge, yata-vak-kaya-manasah, who has speech, body and mind under control. Having all his organs withdrawn thus, dhyana-yoga-parah nityam, one to whom meditation and concentration are ever the highest (duty)-meditation is thinking of the real nature of the Self, and concentration is making the mind one-pointed with regard to the Self itself; one to whom these meditation and concentration are the highest (duty) is dhyana-yoga-parah-. Nityam, (ever) is used to indicate the absence of other duties like repetition of mantra [A formula of prayer sacred to any deity.-V.S.A.] etc. Samupasritah, one who is fully possessed, i.e. ever possessed; of vairagyam, dispassion, absence of longing for objects seen or unseen-. Further,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.52।। विविक्तसेवी पूर्व श्लोक में वर्णित गुणों से युक्त साधक को एकान्त में जाना चाहिए। एकान्तवासीस्वभाव के साधक को विवक्तसेवी कहते हैं। एकान्त के लिए किसी वनउपवन में ही जाने की आवश्यकता नहीं है। इससे तात्पर्य ऐसे स्थान से है? जहाँ बाह्य विक्षेपों की संख्या न्यूनतम हो। कोई व्यक्ति अपने घर में भी ऐसे समय का चयन कर सकता है? जब वहाँ विक्षेपों के कारण नहीं होते हैं।लघ्वाशी इस शब्द का अर्थ है मिताहारी। अत्यधिक भोजन करने से शरीर स्थूल और बुद्धि मन्द हो जाती है। समस्त साधकों के लिए परिमितता तो एक नियम ही है।यतवाक्कायमानस वाणी और शरीर से तात्पर्य कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों से है। इन दोनों के वश में होने पर मन का संयम भी सरल हो जाता है। विषयग्रहण? तत्पश्चात् होने वाली प्रतिक्रियायें तथा मन को संयत करने का अर्थ इन सब कर्मों में अहंकार भाव का त्याग करना है।ध्यानयोगपर मन वृत्तिरूपी है। अत मन कभी निरालम्ब नहीं रह सकता। उसकी विषयाभिमुखी प्रवृत्ति को अवरुद्ध करने का एकमात्र उपाय यह है कि उसे चिन्तन के लिए कोई श्रेष्ठ ध्येय उपलब्ध कराया जाये। जिस मात्रा में वह उस ध्येय में समाहित होता जायेगा? उसी मात्रा में उसकी बहिर्मुखी प्रवृत्ति भी शान्त होती जायेगी। विषयों से निवृत्त करके मन को परमात्मा के स्वरूप में स्थित या समाहित करने का प्रयत्न ही ध्यानयोग कहा जाता है। साधक को इसकी साधना में सदैव तत्पर रहना चाहिए? क्योंकि मन के उपशमन का यही सर्वश्रेष्ठ साधन है।वैराग्य से युक्त वैराग्य राग का विरोधी नहीं है। राग का विरोधी तो द्वेष है। राग और द्वेष इन दोनों से ही मुक्त होना वैराग्य है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि विषयों में सुख नहीं है? तब उसका मन स्वत ही विषयों से विरत हो जाता है। वैराग्यशाली पुरुष विषयों से दूर नहीं भागता? वरन् वे विषय ही ऐसे पुरुष से निराश होकर भाग जाते हैं जैसेजैसे मनुष्य का विकास होता जाता है? वैसेवैसे उसकी अभिरुचियों में भी परिवर्तन आता है और उन परिवर्तनों के साथ ही अपनी पूर्व रुचियों की वस्तुओं में उसका कोई आकर्षण नहीं रह जाता। उदाहरणार्थ? जब तक कोई मनुष्य भोगी और विलासी प्रवृत्ति का होता है? उसका मित्र परिवार भी समान गुणों वाला रहता है। परन्तु जब वह राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में रुचि लेने लगता है? तब उसका घर राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भरा रहने लगता है। कुछ समय बाद विचारों में और अधिक पक्वता आने पर वह पुरुष आध्यात्मिक स्वभाव का बन जाता है। उस स्थिति में सत्तावार्ता में रमने वाले राजनीतिज्ञ और ईर्ष्या तथा प्रतिस्प्ार्धा के भाव से पूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता भी वहाँ से निवृत्त हो जाते हैं। अब उनका स्थान तत्त्वचिन्तक और आध्यात्मिक पुरुष ले लेते हैं। इस उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार मन के विकसित होने पर निम्न स्तर की वस्तुएं स्वत निवृत्त हो जाती हैं। यह वास्तविक वैराग्य है। इस वैराग्य में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.52।।ततः विविक्तदेशसेवी वनगिरिगुहानदीपुलिनादीन्विविक्तान् जनसमुदायशून्यान् देशान्सेवितुं शीलमस्येति विविक्तदेशसेवी एतादृशस्य चित्तं विक्षेपाभावादेकाग्रं सत्प्रसन्नं भवति। निद्रादिदोषनिबन्धचित्ताप्रसादनिवृत्त्यार्थमाह -- लघ्वाशी हितमितमेध्याशनशीलः। यतानि वशीकृतानि वाक्कायमानसानि यस्य स ज्ञाननिष्ठाः यतवाक्कायमानसः। एवमुपरतसर्वकरणः सन्

Chapter 18 (Part 29)

ध्यानयोगपरो ध्यानमात्मस्वरुपचिन्तनं? मनस आत्मस्वरुपविषय एकाग्रीकरणं योगः ध्यानयोगौ परत्वेन कर्तव्यौ यस्य स नित्यं सदैव ध्यायोगपरः। मन्त्रजपप्रदक्षिणप्रणामद्यन्यकर्तव्याभावप्रदर्शनार्थं नित्यग्रहणम्। ध्यानयोग्यपरत्वसिद्य्धर्थमाह। वैराग्यं विरागभावं दृष्टादृष्टेष्टविषयेषु वैतृष्णयं समुपाश्रितः सम्यङ् निश्चलत्वेन नित्यमेवाश्रितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.52।।विविक्तसेवीति। विविक्तं जनसंमर्दरहितं पवित्रं च यदरण्यगिरिगुहादि तत्सेवितुं शीलं यस्य स चित्तैकाग्र्यसम्पत्त्यर्थं तद्विक्षेपकारिरहित इत्यर्थः। लघ्वाशी लघु परिमितं हितं मेध्यं चाशितुं शीलं यस्य सः। निद्रालस्यादि चित्तलयकारिरहित इत्यर्थः। यतानि संयतानि वाक्कायमानसानि येन सः। यमनियमासनादिसाधनसंपन्न इत्यर्थः। ध्यानयोगपरो नित्यं चित्तस्यात्माकारप्रत्ययावृत्तिर्ध्यानम्? आत्माकारप्रत्ययेन निर्वृत्तिकतापादनं योगः? नित्यं सदैव तत्परस्तयोरनुष्ठानपरो नतु मन्त्रजपतीर्थयात्रादिपरः कदाचिदित्यर्थः। वैराग्यं दृष्टादृष्टविषयेषु स्पृहाविरोधि चित्तपरिणामं समुपाश्रितः सम्यङ्निश्चलत्वेन नित्यमाश्रितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.52।।केन साधनजातेनैवंभूतो भवतीत्यत आह -- विविक्तेति। यत्तच्छब्दाध्याहारेण योज्यम्। नित्यमिति सर्वत्र संबन्धनीयम्। यो नित्यं विविक्तसेवी एकान्तशीली। लघ्वाशी मिताशनशीलश्च। तथा नित्यं वैराग्यं रागाभावं समुपाश्रितश्च। तथा नित्यं ध्यानयोगः षष्ठाध्यायोक्तस्तत्परश्च यो नित्यं भवति स यतवाक्कायमानसो भवति। यतकाय आसनदार्ढ्येन। यतवाग् विषयेभ्य इन्द्रियाणां प्रत्याहरणेन। यतमानसः सर्वसंकल्पत्यागेन। अत्र चतुर्भिः साधनैर्यतवाक्कायमानसत्वं साध्यम्। नित्यं विविक्तसेवादिशीलः सन् यतवाक्कायमानसो भूत्वा ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्युत्तरेणान्वयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.52।।किञ्च। विविक्तसेवी एकान्ते मत्सेवनपरः? लब्धाशी लब्धः प्राप्तो यो मत्प्रसादो लाभरूपस्तद्भोजनकृत्। यतवाक्कायमानसः यतानि वशीकृतानि कायवाङ्मनांसि येन सः। तथा हि -- वचनेन मन्नामकथाद्यतिरिक्तं न वदति? कायश्च मत्सेवातिरिक्तकार्ये नोपयाति? मनोऽपि मदन्यन्न स्मरति। नित्यं ध्यानयोगपरः। ध्यानेन यो योगो मत्संयोगस्तस्मिन् परस्तत्परः वैराग्यं सर्ववस्तुदोषालोचनात्मकं समुपाश्रितः सम्यक् उप समीपे आश्रितः। अनेन विकारसत्त्वेऽपि तद्राहित्यं निरूपितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.52।।किंच -- विविक्तेति। विविक्तसेवी शुद्धदेशावस्थायी लध्वाशी मितभोजी एतैरुपायैर्यतवाक्कायमानसः संयतवाग्देहचित्तो भूत्वा नित्यं सर्वदा ध्यानेन यो योगो ब्रह्मसंस्पर्शस्तत्परः सन् ध्यानाविच्छेदार्थं पुनः पुनर्दृढं वैराग्यं सम्यगुपाश्रितो भूत्वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.51 -- 18.53।।तथा हि बुद्ध्येति त्रिभिः। बुद्ध्या यथोक्तकर्मफलादित्यागाद्विशुद्धया साङ्ख्यमार्गीयया युक्तः योगेनाव्यभिचारिण्या धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च स्वान्तर्यामिध्यानैकनिष्ठः सर्वत्रानात्मत्वदृष्ट्या वैराग्यं समुपाश्रितः कर्मस्वहम्ममत्वरहितः शान्त इति पूर्वसूत्रितस्य भाष्यं फलितं तथाभूत आनन्दांशाविर्भूतो ब्रह्मभूयाय अक्षरब्रह्मात्मभावाय कल्पते? स्वात्मानंब्रह्माहमस्मि इति यथावदनुभवतीत्यर्थः। इतीयं स्वज्ञानस्य परा निष्ठा भगवद्गुणसाराविर्भावात्तद्व्यपदेशः प्राज्ञवदिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.52।।उसके बाद --, विविक्त देशका सेवन करनेवालाअर्थात् वन? नदीतीर? पहाड़की गुफा आदि एकान्त देशका सेवन करना ही जिसका स्वभाव है ऐसा? और हलका आहार करनेवाला होकर? एकान्तसेवन और हलका भोजन यह दोनों निद्रादि दोषोंके निवर्तक होनेसे चित्तकी स्वच्छतामें हेतु हैं? इसलिये इनका ग्रहण किया गया है। तथा मन? वाणी और शरीरको वशमें करनेवाला होकर? अर्थात् जिस ज्ञाननिष्ठ यतिके काया? मन और वाणी तीनों जीते हुए होते हैं? वह यतवाक्कायमानस होता है -- इस प्रकार सब इन्द्रियोंको कर्मोंसे उपराम करके? तथा नित्य ध्यानयोगके परायण रहता हुआ आत्मस्वरूपचिन्तनका नाम ध्यान है और आत्मामें चित्तको एकाग्र करनेका नाम योग है? यह दोनों प्रधानरूपसे जिसके कर्तव्य हों उसका नाम ध्यानयोगपरायण है? उसके साथ नित्य पदका ग्रहण मन्त्रजप आदि अन्य कर्तव्योंका अभाव दिखानेके लिये किया गया है। तथा इस लोक और परलोकके भोगोंमें तृष्णाका अभावरूप जो वैराग्य है? उसके आश्रित होकर अर्थात् सदा वैराग्यसम्पन्न होकर।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.52।। व्याख्या --   बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध --   उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.52।।देहस्थितिहेत्वतिरिक्तविषयत्यागो देहस्थित्यर्थेष्वपि तेषु रागद्वेषवर्जनमित्युपायभेदे सिद्धे सन्त्युपायान्तराण्यपि यत्नसाध्यानीत्याह -- तत इति। चित्तैकाग्र्यप्रसादार्थं विविक्तसेवित्वं व्याकरोति -- अरण्येति। निद्रादिदोषनिवृत्त्यर्थं लघ्वाशित्वं विशदयति -- लघ्विति। लघु परिमितं हितं मेध्यं चाशितुं शीलमस्येति तथोच्यते। विशेषणयोस्तात्पर्यं विवृणोति -- विविक्तेति। निद्रादीत्यादिशब्दादालस्यप्रमादादयो बुद्धिविक्षेपका विवक्षिताः। वक्ष्यमाणध्यानयोगयोरुपायत्वेन विशेषणान्तरं विभजते -- वाक्चेति। वागादिसंयमस्यावश्यकत्वद्योतनार्थं स्यादित्युक्तम्। संयतवागादिकरणग्रामस्यानायासेन कर्तव्यमुपदिशति -- एवमिति। मन्त्रजपादीत्यादिपदेन प्रदक्षिणप्रणामादयो ध्यानयोगप्रतिबन्धका गृहीताः। उक्तयोरेव ध्यानयोगयोरुपायत्वेनोक्तं विरागभावं विभजते -- दृष्टेति। सम्यक्त्वमेव व्यनक्ति -- नित्यमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.52।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.52।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.52।। --,विविक्तसेवी अरण्यनदीपुलिनगिरिगुहादीन् विविक्तान् देशान् सेवितुं शीलम् अस्य इति विविक्तसेवी? लघ्वाशी लघ्वशनशीलः -- विविक्तसेवालघ्वशनयोः निद्रादिदोषनिवर्तकत्वेन चित्तप्रसादहेतुत्वात् ग्रहणम् यतवाक्कायमानसः वाक् च कायश्च मानसं च यतानि संयतानि यस्य ज्ञाननिष्ठस्य सः ज्ञाननिष्ठः यतिः यतवाक्कायमानसः स्यात्। एवम् उपरतसर्वकरणः सन् ध्यानयोगपरः ध्यानम् आत्मस्वरूपचिन्तनम्? योगः आत्मविषये एकाग्रीकरणम् तौ परत्वेन कर्तव्यौ यस्य सः ध्यानयोगपरः नित्यं नित्यग्रहणं मन्त्रजपाद्यन्यकर्तव्याभावप्रदर्शनार्थम्? वैराग्यं विरागस्य भावः दृष्टादृष्टेषु विषयेषु वैतृष्ण्यं समुपाश्रितः सम्यक् उपाश्रितः नित्यमेव इत्यर्थः।।किं च --,

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【 Verse 18.53 】

▸ Sanskrit Sloka: अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् | विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ||

▸ Transliteration: ahaṁkāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ parigraham | vimucya nirmamaḥ śānto brahmabhūyāya kalpate ||

▸ Glossary: ahaṁkāraṁ: false ego; balaṁ: false strength; darpaṁ: false pride; kāmaṁ: lust; krodhaṁ: anger; parigraham: acceptance of material things; vimucya: being delivered; nirmamaḥ: without proprietorship; sāntaḥ: peaceful; brahmabhūyāya: to become self-realized; kalpate: is understood

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.51,52,53 Endowed with purified intellect; subduing the mind with firm resolve; turning away from the objects of senses; giving up likes and dislikes; living in solitude; eating lightly; controlling the mind, speech, and organs of action; ever absorbed in meditation; taking refuge in detachment; and relinquishing egotism, violence, pride, lust, anger, and proprietorship, one becomes peaceful, free from the notion of “I” and “mine”, and fit for attaining oneness with the Supreme Being.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.53।।जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त? वैराग्यके आश्रित? एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके? शरीरवाणीमनको वशमें करके? शब्दादि विषयोंका त्याग करके और रागद्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है? वह अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.53।। अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह को त्याग कर ममत्वभाव से रहित और शान्त पुरुष ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बन जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.53 अहङ्कारम् egoism? बलम् strength? दर्पम् arrogance? कामम् desire? क्रोधम् anger? परिग्रहम् covetousness? विमुच्य having abandoned? निर्ममः without mineness? शान्तः peaceful? ब्रह्मभूयाय for becoming Brahman? कल्पते (he) is fit.Commentary Egoism Identifying the Self with the body? etc. This is the error of mistaking the physical body for the pure immortal Self.Balam That strength which is combined or united with passion? desire and attachment? and not the physical or other strength. Physical strength is natural. It is not possible to abandon this physical strength.Darpam Arrogance? insolence? selfassertive Rajasic vehemence this follows the state of exaltion.,Man becomes arrogant when he possesses wealth or much learning. When he becomes arrogant he violates Dharma and does wicked deeds.The aspirant even abandons the things which are necessary for the bare maintenance of the body. He becomes a ParamahamsaParivrajaka? a wandering or itinerant ascetic. He has no attachment to his body. He knows that even the body does not belong to him.Santa Peaceful? tranil? serene.Such an aspirant who has devotion to Selfknowledge? and who is endowed with the above virtues is fit to become Brahman.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.53. Relinshing egotism, violence, pride, desire, wrath, and the sense of possession-he, the unselfish and calm one, is capable of becoming the Brahman.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.53 Having abandoned selfishness, power, arrogance, anger and desire, possessing nothing of his own and having attained peace, he is fit to join the Eternal Spirit.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.53 Forsaking egoism, power, pride, desire, wrath and possession, with no feeling of 'mine' and tranil - he becomes worthy for the state of brahman.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.53 (That person,) having discarded egotism, force, pride, desire, anger and superfluous possessions, free from the idea of possession, and serene, is fit for becoming Brahman.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.53 Having abandoned egoism, strength, arrogance, desire, anger and covetousness, and free from the notion of 'mine' and peaceful, he is fit for becoming Brahman.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.53 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.51 - 18.53 'Endowed with a purified understanding' means endowed with the Buddhi capable of understanding the self as it is in reality; 'subduing the mind by steadiness' means making the mind fit for meditation by turning away from external and internal objects; 'relinishing sound and other objects of senses' means keeping them far away, casting aside love and hate occasioned by them (i.e., the sense objects).

'Resorting to solitude' means living in a lonely place free from hindrances to meditation; 'eat but little' means eating neither too much nor too little; 'restraining speech, body and mind' means directing the operations of body, speech and mind to meditation; 'ever engaged in the Yoga of meditation' means being like this, i.e., constantly engaged in the Yoga of meditation day after day until death; 'taking refuge in dispassion' means developing aversion to all objects except the one entity to be meditated upon, by considering the imperfections of all objects and thus cultivating detachment to everything.

Forsaking 'egoism' means abandoning the tendency to consider what is other than the self, as well as neutralising the power of forcible Vasnas (tendencies) which nourish (egoism), and the resulting pride, desire, wrath and possessiveness. 'With no feeling of mine' means free from the notion that what does not belong to oneself belongs to oneself; 'Who is tranil' means, who finds sole happiness in experiencing the self. One who has become like this and performs the Yoga of meditation becomes worthy for the state of Brahman. The meaning is that, freed from all bonds, he experiences the self as It really is.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.53 (That person) vimucya, having discarded; ahan-karam, egotism, thinking of the body, organs, etc. as the ego; balam, force-which is associated with desire and attachment; not the other kind of strength consisting in the fitness of the body etc., becuase being natural it cannot be descarded-; darpam, pride, which follows elation and leads to transgresson of righteousness-for the Smrti says, 'An elated person becomes proud; a proud man transgresses righteousness' (Ap. Dh. Su. 1.13.4); kamam, desire; krodham, anger, aversion; parigraham, superfluous possessions-even after removing the defects in the organs and the mind, there arises the possibility of acceptance of gifts either for the maintenance of the body or for righteous duties; discarding them as well, i.e. becoming a mendicant of the param-hamsa class; nirmamah, free from the idea of possession, becoming devoid of the idea of 'me' and 'mine' even with regard to so much as one's body and life; and for the very same reason, santah, serene, withdrawn; the monk who is effortless and steadfast in Knowledge, kalpate, becomes fit; brahma-bhuyaya, for becoming Brahman.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.53।। पूर्व श्लोक में उपादेय (ग्रहण करने योग्य) गुणों का उल्लेख किया गया था। इस श्लोक में हेय? अर्थात् त्याज्य दुर्गुणों की सूची प्रस्तुत की गयी है। ध्यान की सफलता के लिए इन दुर्गुणों का परित्याग आवश्यक है।अहंकार देहेन्द्रियादि अनात्म उपाधियों को ही अपना स्वरूप समझकर उनके कर्मों में कर्तृत्वाभिमान अहंकार कहलाता है।बल कामना और आसक्ति से अभिभूत पुरुष का बल यहाँ अभिप्रेत है? स्वधर्मानुष्ठान की सार्मथ्य नहीं।दर्प अर्थात् गर्व। यह गर्व ही मनुष्य को धर्म मार्ग से भ्रष्ट कर देता है। धर्म के अतिक्रमण का यह कारण है।काम और क्रोध विषय भोग की इच्छा काम है तथा प्रतिबन्धित काम ही क्रोध का रूप धारण करता है।परिग्रहम् विषयासक्त पुरुष की प्रवृत्ति अधिकाधिक धन और भोग्यवस्तुओं का संग्रह करने में होती है। उचित या अनुचित साधनों के द्वारा आवश्यकता से अधिक केवल भोग के लिए वस्तुएं एकत्र करना परिग्रह कहलाता है।वस्तुत? ये समस्त अवगुण परस्पर सर्वथा भिन्न नहीं हैं। एक अहंकार ही इन विभिन्न वृत्तियों में व्यक्त होता है। अहंकार के साथ ही ममत्व भाव भी जुड़ा रहता है। भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि साधक को अहंकार और ममत्व का परित्याग कर देना चाहिए। इनके परित्याग से साधक का मन शान्त और शुद्ध बन जाता है। यह शान्ति शवागर्त की अथवा मरुस्थल की उदास शान्ति नहीं? वरन् ज्ञान द्वारा अपने स्वरूप की पहचान होने से प्राप्त हुई शान्ति है।इस प्रकार? यहाँ वर्णित ध्यान के अनुकूल गुणों से सम्पन्न साधक उत्तम अधिकारी कहलाता है। ऐसा साधक ही ब्रह्मप्राप्ति के योग्य होता है। इस श्लोक में यह नहीं कहा गया है कि ऐसा साधक ब्रह्म ही बन जाता है? वरन् वह ब्रह्मज्ञान का अधिकारी बन जाता है। आत्म साक्षात्कार की यह पूर्व तैयारी है।इस प्रकार क्रम से

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.53।।किंच देहादिष्वहंकरणमहंकारस्ते देहे आत्मत्वाभिमानं बलं कामरागादिप्रयुक्तं सामर्थ्यं नेतरच्छरीरादिसामर्थ्यं स्वाभाविकत्वेन तत्त्यागस्याशक्यत्वात्? दर्पो हर्षान्तरभावी धर्मातिक्रमहेतुः।हृष्टो दृप्यति दृप्तो धर्ममतिक्रामति इति स्मरणात्। तंच काममिच्छां वैराक्यशब्देन लब्धस्यापि कामत्यागस्य पुनर्वचनं तस्मिन्नधिकयन्त्रः कर्तव्य इति बोधनाय प्रकृष्टत्वख्यापनार्थं इच्छितपदार्थालाभप्रयुक्तं क्रोधं परिग्रहमिन्द्रियमनोगतदोषत्यागेऽपि शरीरधारणप्रसङ्गेन धर्मानुष्ठाननिमित्तेन वा प्राप्तं बाह्यपरिग्रहं च विमुच्य परित्यज्य परमहंसपरिव्राजको भूत्वा देहजीवनमात्रेऽपि विगतममभावो निर्ममोऽतएव शान्तः उपरतः संहृतायासो यतिर्ज्ञानानिष्ठो ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय ब्रह्मणोऽनुसंधानपरिपाकपर्यन्तजाय साक्षात्काराय कल्पते समर्थो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.53।।अहंकारमिति। अहंकारं महाकुलप्रसूतोऽहं महतां शिष्योऽतिविरक्तोऽस्मि नास्ति द्वितीयो मत्सम इत्यभिमानं? बलमसदाग्रहं न शारीरं? तस्य स्वाभाविकत्वेन त्यक्तुमशक्यत्वात्। दर्पं हर्षजन्यं मदं धर्मातिक्रमकरणंहृष्टो दृप्यति दृप्तो धर्ममतिक्रामतीति स्मृतेः। कामं विषयाभिलाषम्। वैराग्यं समुपाश्रित इत्यनेनोक्तस्यापि कामत्यागस्य पुनर्वचनं यत्नाधिक्यार्थम्। क्रोधं द्वेषम्। परिग्रहं शरीरधारणार्थकमस्पृहत्वेऽपि परोपनीतं बाह्योपकारणं विमुच्य त्यक्त्वा शिखायज्ञोपवीतादिकमपि दण्डमेकं कमण्डलुं कौपीनाच्छादनं च शास्त्राभ्यनुज्ञातं स्वशरीरयात्रार्थमादाय परमहंसपरिव्राजको भूत्वा निर्ममो देहजीवनमात्रेऽपि ममकाररहितः? अतएवाहंकारममकाराभावादपगतहर्षविषादत्वात् शान्तश्चित्तविक्षेपरहितो यतिर्ज्ञानसाधनपरिपाकक्रमेण ब्रह्मभूयाय ब्रह्मसाक्षात्काराय कल्पते समर्थो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.53।।एवं यतवाक्कायमानसस्य योगिनो योगजाः सिद्धय उपतिष्ठन्ति। ताश्च श्रुतौ दर्शिताःपृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तत्र रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् इति। तथायं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान्। तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः इति च। संविभाति संकल्पयति। लोकं लोचनीयमतीतानागतमर्थजातम्। कामान् काम्यमानान्विषयान्। जयते उपलभते इति श्रुतिपदानामर्थः। तथानाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् इति। प्रज्ञानेन शास्त्राचार्योपदेशजेन ज्ञानेन दुश्चरितादिसेवनाद्विरक्तः शान्तो जितचित्तः समाहितो निरुद्धचित्तवृत्तिरप्यशान्तमानसो योगैश्वर्यासक्तचित्तः एनमात्मानं न प्राप्नुयादिति श्रुत्यर्थः। तदिदमाह -- अहंकारमिति। यदा तु योगी यतमानसोऽस्मितामात्रप्रत्ययो भवति तदा सैवास्मितावस्थितिर्विषयाभिमुखाहंकार इत्युच्यते? विषयविमुखा त्वस्मितेति ततस्तमहंकारं निगृह्णीयात्। तदनिग्रहे योगी बलं सत्यसंकल्पत्वादिसामर्थ्यमात्मनः पश्यन् दर्पं करोति न मत्तुल्योऽन्योऽस्तीति मन्यते। ततश्च दृप्तो धर्ममतिक्रामतीत्यापस्तम्बवचनाद्दिव्यान्कामानिच्छति। तत्र केनचिन्निमित्तेन कामप्रतिबन्धे सति क्रोधवान्भवति। ततः परोत्सादनाय भूयांसं शिष्यादिपरिग्रहं संपादयति ततो नश्यतीति। तस्मात्सर्वानर्थमूलभूतमहंकारमेव विमुच्य तत इतरान्सर्वान् विमुञ्चति। अहंकारविमोकेऽपि निर्ममत्वं तत्प्रदर्शितेषु विषयेषु ममताशून्यत्वे सत्यहंकारः शिथिलीभूतो विषयवैमुख्यं प्राप्य स्वकारणेऽस्मितायां विलीयते। ततः शान्तोऽस्मिताया अपि प्रलयान्निरिन्धनाग्निवदुपरतो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.53।।किञ्च -- अहङ्कारमिति। स्वज्ञानादिरूपं बलं सामर्थ्यं? दर्पं गर्वं? कामं विषयभोगरूपं? क्रोधं निष्ठुरवाक्यरूपं? परिग्रहं गृहस्त्र्यपत्यादिकं? निर्ममो ममतारहितः सन् विमुच्य त्यक्त्वा शान्तो भगवदनुभवाश्लिष्टो ब्रह्मभूयाय ब्रह्मात्मकस्वरूपावस्थानाय ब्राह्मेण ৷৷. [ब्र.सू.4।4।5] इत्यादिसूत्रोक्तरीत्या कल्पते समर्थो भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.53।।किंच -- अहंकारमिति। ततश्च विरक्तोऽहमित्याद्यहंकारं बलं दुराग्रहं दर्पं योगबलादुन्मार्गप्रवृत्तिलक्षणं प्रारब्धवशात्प्राप्यमाणेष्वपि विषयेषु कामं क्रोधं परिग्रहं च विमुच्य विशेषेण त्यक्त्वा बलादापन्नेषु निर्ममः सन् शान्तः परामुपशान्तिं प्राप्तो ब्रह्मभूयाय ब्रह्माहमिति नैश्चल्येनावस्थानाय कल्पते योग्यो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.51 -- 18.53।।तथा हि बुद्ध्येति त्रिभिः। बुद्ध्या यथोक्तकर्मफलादित्यागाद्विशुद्धया साङ्ख्यमार्गीयया युक्तः योगेनाव्यभिचारिण्या धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च स्वान्तर्यामिध्यानैकनिष्ठः सर्वत्रानात्मत्वदृष्ट्या वैराग्यं समुपाश्रितः कर्मस्वहम्ममत्वरहितः शान्त इति पूर्वसूत्रितस्य भाष्यं फलितं तथाभूत आनन्दांशाविर्भूतो ब्रह्मभूयाय अक्षरब्रह्मात्मभावाय कल्पते? स्वात्मानंब्रह्माहमस्मि इति यथावदनुभवतीत्यर्थः। इतीयं स्वज्ञानस्य परा निष्ठा भगवद्गुणसाराविर्भावात्तद्व्यपदेशः प्राज्ञवदिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.53।।तथा --, अहंकार? बल और दर्पको छोड़कर शरीरइन्द्रियादिमें अहंभाव करनेका नाम अहंकार है। कामना और आसक्तिसे युक्त जो सामर्थ्य है उसका नाम बल है यहाँ शरीरादिकी साधारण सामर्थ्यका नाम बल नहीं है? क्योंकि वह स्वाभाविक है इसलिये उसका त्याग अशक्य है? हर्षके साथ होनेवाला और धर्मउल्लङ्घनका कारण जो गर्व है उसका नाम दर्प है क्योंकि स्मृतिमें कहा है कि हर्षयुक्त पुरुष दर्प करता है? दर्प करनेवाला धर्मका उल्लङ्घन किया करता है इत्यादि। तथा इच्छाका नाम काम है? द्वेषका नाम क्रोध है? इनका और परिग्रहका भी त्याग करके अर्थात् इन्द्रिय और मनमें रहनेवाले दोषोंका त्याग करनेके पश्चात् भी? शरीरधारणके प्रसङ्गसे या धर्मानुष्ठानके निमित्तसे जो बाह्य संग्रहकी प्राप्ति होती है उसका भी परित्याग करके? तथा परमहंस परिव्राजक ( संन्यासी ) होकर? एवं देहजीवनमात्रमें भी ममतारहित और इसीलिये जो शान्त -- उपरतियुक्त है? ऐसा जो सब परिश्रमोंसे रहित ज्ञाननिष्ठ यति है? वह ब्रह्मरूप होनेके योग्य होता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.53।। व्याख्या --   बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह (टिप्पणी प0 947.1) कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो (टिप्पणी प0 947.2)। अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध --   उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.53।।ज्ञाननिष्ठस्य यतेर्विशेषणान्तरं समुच्चिनोति -- किञ्चेति। नित्यं ध्यानयोगपरत्वे समुच्चितं कारणान्तरं विवृणोति -- अहंकरणमिति। सामर्थ्यमात्रे बलशब्दादुपलभ्यमाने किमिति विशेषवचनमित्याशङ्क्याह -- स्वाभाविकत्वेनेति। उक्तेर्थे मानमाह -- हृष्ट इति। वैराग्यशब्देन लब्धस्यापि कामत्यागस्य पुनर्वचनं प्रकृष्टत्वख्यापनार्थम्। अहंकारादित्यागे परिग्रहप्राप्त्यभावात्तत्त्यागोक्तिरयुक्तेत्याशङ्क्याह -- इन्द्रियेति। परिग्रहाभावे ममत्वविषयाभावान्निर्ममत्वं कथमित्याशङ्क्याह -- देहेति। अहंकारममकारयोरभावेन प्राप्तामन्तःकरणोपरतिमनुवदति -- अतएवेति। उक्तमनूद्य जीवन्नेवासौ ब्रह्मीभवतीति फलितमाह -- यः संहृतेति। ज्ञाननिष्ठपदादूर्ध्वं स शब्दो द्रष्टव्यः। ब्रह्मणो भवनमनुसन्धानपरिपाकपर्यन्तं साक्षात्करणं तदर्थमिति यावत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.53।।ब्रह्मभूयाय ब्रह्मत्वायेति प्रतीतिनिरासार्थं व्याचष्टे -- ब्रह्मेति। इत्यर्थ इति शेषः। भावो न जन्मादीत्याशयेन विवृणोति -- ब्रह्मणीति। इयमपि न मुक्तिर्ब्रह्मभूत इति पुनर्भक्त्यादिलाभश्रवणादिति भावेनाऽऽह -- सर्वदेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.53।।ब्रह्मभूयाय कल्पते। ब्रह्मणि भावो ब्रह्मभूयम्? ब्रह्मणि स्थितिः। सर्वदा तन्मनस्कतेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.53।। --,अहंकारम् अहंकरणम् अहंकारः देहादिषु तम्? बलं सामर्थ्यं कामरागसंयुक्तम् -- न इतरत् शरीरादिसामर्थ्यं स्वाभाविकत्वेन तत्त्यागस्य अशक्यत्वात् -- दर्पं दर्पो नाम हर्षानन्तरभावी धर्मातिक्रमहेतुः हृष्टो दृप्यति दृप्तो धर्ममतिक्रामति इति स्मरणात् तं च? कामम् इच्छां क्रोधं द्वेषं परिग्रहम् इन्द्रियमनोगतदोषपरित्यागेऽपि शरीरधारणप्रसङ्गेन धर्मानुष्ठाननिमित्तेन वा बाह्यः परिग्रहः? प्राप्तः तं च विमुच्य परित्यज्य? परमहंसपरिव्राजको भूत्वा? देहजीवनमात्रेऽपि निर्गतममभावः निर्ममः? अत एव शान्तः उपरतः? यः संहृतहर्षायासः यतिः ज्ञाननिष्ठः ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय कल्पते समर्थो भवति।।अनेन क्रमेण --,

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【 Verse 18.54 】

▸ Sanskrit Sloka: ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ् क्षति | सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||

▸ Transliteration: brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati | samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṁ labhate parāṁ ||

▸ Glossary: brahmabhūtaḥ: being one with the Absolute; prasannātmā: fully joyful; na: never; śocati: laments; na: never; kāṅkṣati: desires; samaḥ: equally disposed; sarveṣu: all; bhūteṣu: living entities; madbhaktiṁ: My devotion; labhate: gains; parāṁ: transcendental

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.54 Absorbed in the supreme Being, the serene one neither grieves nor desires. Becoming impartial to all beings, one ob- tains My highest devotional love.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.54।।वह ब्रह्मभूतअवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.54।। ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है)? प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक? समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.54 ब्रह्मभूतः having become Brahman? प्रसन्नात्मा sereneminded? न not? शोचति (he) grieves? न not? काङ्क्षति desires? समः the same? सर्वेषु all? भूतेषु in beings? मद्भक्तिम् devotion unto Me? लभते obtains? पराम् supreme.Commentary Brahmabhutah Having attained to Brahman. His attainment of perfect freedom or oneness with the Supreme is described in the next verse.He is tranilminded. He is in a state of balance and eanimity. There is nothing connected with the little personality that may cause him to grieve or prompt him to feel desire. When this state is attained? the multiplicity of objects gradually disappears and he perceives only unity everywhere. The waking and dream consciousness that gives rise to false knowledge gradually passes away.He does not grieve about his bodily wants. If he fails in his attempt to fulfil them? he does not grieve either. He always keeps evenness of mind in success and failure. He has no longing for any object that is not attained.Na sochati na kankshati can also be interpreted as he neither grieves nor exults.Samah sarveshu bhuteshu may also mean he puts himself in the position of others and feels for others. If anyone is in acute agony or distress? he himself feels that he is affected. His heart is very tender and soft. He is extremely compassionate and merciful. He considers that the pleasure and pain of all beings are his own. If others rejoice he also rejoices if others are in distress? he also is distressed. His heart is so much expanded that he feels for all. Jealousy? narrowness of heart? pettymindedness? the idea of separateness? all barriers that separate man from man? prejudices of all sorts and dislike for others -- all vanished in toto. He has cosmic love. He is a cosmic benefactor. He is the friend of all. This state of expansion is beyond description. One has to experience it for oneself. Such a devotee or aspirant attains supreme devotion to Me? the fourth or the highest of the four kinds of devotion mentioned in verse 16 of chapter VII? viz.? devotion of knowledge of the man of wisdom. (Cf.II.70)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.54. Having become the Brahman, the serene-minded one neither grieves nor rejoices; remaining eal to all beings, he gains the highest devotion to Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.54 And when he becomes one with the Eternal, and his soul knows the bliss that belongs to the Self, he feels no desire and no regret, he regards all beings equally and enjoys the blessing of supreme devotion to Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.54 Having realised the state of Brahman, tranil, he neither grieves nor craves. Regarding all beings alike, he attains supreme devotion to Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.54 One who has become Brahman and has attained the blissful Self does not grieve or desire. Becoming the same towards all beings, he attains supreme devotion to Me.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.54 Becoming Brahman, serene in the Self, he neither grieves nor desires, the same to all beings, he obtains supreme devotion to Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.54 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.54 'Having realised the state of Brahman,' means having got from revelation an understanding of the nature of the self as consisting of unlimited knowledge and of being a Sesa (subservient being) to Me. Subservience to Me has been posited in, 'Know that which is other than this (Prakrti or lower Nature) to be the higher Prakrti of Mine' (7.5). One who is 'tranil' means one who is not contaminated by various forms of grief (the five Klesas of Yoga-sutras), and does not grieve about any being other than Myself, nor desires anything other than Myself. On the other hand, he becomes eally indifferent to all beings other than Myself as worthless as straw and

Chapter 18 (Part 30)

attains supreme Bhakti for Me. He attains 'supreme devotion' to Me, which is of the form of an experience which makes Me dear beyond all description - Me the Lord of all, to whom creation, protection and dissolution of the universe is a sport, who is devoid of the slightest trace of evil, who is the sole seat of countless hosts of auspicious attributes which are excellent and unlimited; and who is the ocean of the elixir of beauty; who is the Lord of Sri; who is Lotus-eyed; and who is the self's own Lord.

Sri Krsna declares the fruits of this (devotion):

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.54 Brahma-bhutah, one who has become Brahman, attained Brahman through the above process; and prasanna-atma, [Prasada means the manifestation of the supreme Bliss of the Self as a result of the total cessation of all evils. Prasanna-atma is one who has attained this in the present life itself.] has attained the blissful Self, the indwelling Self; na, does not; socati, grieve-does not lament for the loss of something or the lack of some ality in oneself; nor kanksati, desire. By saying 'he does not grieve nor desire', this nature of one who has attained Brahman is being restated. For it does not stand to reason that in the case of a knower of Brahman there can be any hankering for something unattained. Or, (in place of kanksati) teh reading may be na hrsyati, does not become elated. Becoming samah, the same; sarvesu bhutesu, towards all being-i.e., he verily judges what is happiness and sorrow in all beings by the same standard as he would apply to himself (cf. 6.32); but the meaning is not 'seeing the Self alike in all beings', for this will be spoken of in (the next verse), 'Through devotion he knows Me'-; he, the one who is of this kind and steadfast in Knowledge, labhate, attains; param, supreme; madbhaktim, devotion to Me, to the supreme Lord; (he attains) devotion which is described as Knowledge, as the 'fourth' in, '৷৷.four classes of people৷৷.adore Me' (7.16). Then,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.54।। अहंकार और उसकी विभिन्न अभिव्यक्तियों के परित्याग से साधक का मन शान्त हो जाता है। प्राय मन के असंयमित होने तथा जीवन के त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन के कारण ही अन्तकरण में विक्षेप और संभ्रम उत्पन्न होते हैं। उनकी निवृत्ति से मन आपेक्षिक शान्ति को प्राप्त करता है। प्रयत्नपूर्वक प्राप्त की गयी शान्ति स्वरूपानुभव से स्वाभाविक बन जाती है।कृत्रिम शान्ति को स्वाभाविक शान्ति में परिवर्तित करने के लिए शारीरिक प्रयत्नों की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए तो मन की सतत सजगता की ही अपेक्षा होती है। प्राय यह देखा जाता है कि कर्तृत्व के अभिमान का त्याग करने पर भी? साधक में यदि वैराग्य की कुछ न्यूनता हो? तो उसके मन में भोक्तृत्व का अभिमान उत्पन्न हो जाता है। इसी भोक्तृत्वाभिमान के कारण अनेक साधकगण पुन भोगों में आसक्त हो जाते हैं। इसीलिए? साधक को अत्यधिक सजग रहना चाहिए। कर्तृत्व और भोक्तृत्व इन दोनों का नाश होना अनिवार्य है।इस श्लोक में प्रयुक्त ब्रह्मभूत शब्द उस साधक को दर्शाता है? जिसने अध्यात्म शास्त्र का श्रवण और मनन करके अपने ब्रह्मस्वरूप को पहचान लिया है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि उसने ब्रह्मस्वरूप में निष्ठा प्राप्त कर ली है? तथापि? इस ज्ञान के कारण मन के विक्षेपों की संख्या घटती जाती है। उपाधितादात्म्य से ही विक्षेप उत्पन्न होते हैं? परन्तु विवेकी पुरुष का प्रयत्न उस तादात्म्य की निवृत्ति के लिए ही होता है। जिस मात्रा में वह अपने विवेकी स्वरूप का भान बनाये रखने में समर्थ होता है? उसी मात्रा में उसका अन्तकरण प्रसन्न? अर्थात् शान्त? शुद्ध और स्थिर रहता है।उपर्युक्त गुणों को सम्पादित कर लेने पर साधक की विषयोपभोग की इच्छा समाप्त प्राय हो जाती है। वह भोग की आकांक्षा नहीं करता ( न कांक्षति)। इच्छा के न होने पर शोक का भी अभाव हो जाता है (न शोचति)। इष्ट फल के प्राप्त न होने पर अथवा उसके नष्ट हो जाने पर दुख अवश्यंभावी है। परन्तु विवेकी साधक इन दोनों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। इच्छा? शोक आदि अहंकार के धर्म है? शुद्ध आत्मा के नहीं।जिस विवेकी साधक का सुख बाह्यविषयनिरपेक्ष हो जाता है? वह अपने उस आत्मस्वरूप का दर्शन करता है? जो भूतमात्र की आत्मा है। अत वह समस्त भूतों के प्रति सम हो जाता है।उक्त गुणों से युक्त साधक मेरी परा भक्ति को प्राप्त कर लेता है। इसके पूर्व? एक सम्पूर्ण अध्याय में भक्तियोग का विस्तृत विवेचन किया गया था। भक्ति प्रेमस्वरूप है। प्रेम का मापदण्ड है? प्रियतम के साथ तादात्म्य उस के साथ पूर्णत एकरूप हो जाना। इस पूर्ण तादात्म्य के लिए साधक का उपाधियों के साथ तादात्म्य तथा विषय संग सर्वथा समाप्त हो जाना चाहिए। प्रस्तुत प्रकरण के तीन श्लोकों में उल्लिखित गुणों से युक्त पुरुष ही परमात्मा की परा भक्ति का अधिकारी होता है।साधना के अन्तिम सोपान को अगले श्लोक में बताया गया है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.54।।अनेन क्रमेण ब्रह्मभूतः ब्रह्मभवनसमर्थत्वाद् ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा प्रसन्नः कर्तत्वादिविनिर्मुक्तः आविर्भूतानन्द आत्मा प्रत्यगात्मा यस्य स लब्धात्मप्रसादः न शोचति किंचिदर्थवैकल्यमात्मनो वैगुण्यं चोद्दिश्य न शोचति न संतप्यते। न काङ्क्षति अप्राप्तं वस्तु ब्रह्मभूतस्य शोकाकाङ्क्षयोरनुपपन्नत्वात्तस्य स्वभावोऽनुद्यते न शोचति न काङ्क्षतीति। न हृष्यतीति वा पाठः। रमणीयं प्राप्य न प्रमोदते तस्य मिथ्यात्वेन निश्चयादित्यर्थः। सर्वेषु भूतेषु समः सुखं दुःखं वा आत्मौपम्येन सभमेव पश्यतीत्यर्थः। नत्वात्मसमदर्शनमिह ग्राह्यम्। भक्त्या मामभिजानातीति तस्य वक्ष्यमाणत्वात्। य एवंभूतः स मद्विषयां भक्तिं,आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी चेत्यत्रोक्तां चतुर्थी ज्ञानलक्षणाम्।तेषां ज्ञानी नित्युक्त एकभक्तिर्विशिष्यते इत्युक्तां परामनुत्तमां लभते प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.54।।केन क्रमेण ब्रह्मभूयाय कल्पत इति तदाह -- ब्रह्म भूत इति। ब्रह्मभूतोऽहं ब्रह्मास्मीति दृढनिश्चयवान् श्रवणमननाभ्यासात्। प्रसन्नात्मा शुद्धचित्तः शमदमाद्यभ्यासात्। अतएव न शोचति नष्टं? न,काङ्क्षत्यप्राप्तम्। अतएव निग्रहानुग्रहयोरनारम्भात् समः सर्वेषु भूतेष्वात्मौपम्येन सर्वत्र सुखं दुःखं च पश्यतीत्यर्थः। एवंभूतो ज्ञाननिष्ठो यतिर्मद्भक्तिं मयि भगवति शुद्धे परमात्मनि भक्तिमुपासनां मदाकारचित्तवृत्त्यावृत्तिरूपां परिपाकनिदिध्यासनाख्यां श्रवणमननाभ्यासफलभूतां लभते परां श्रेष्ठामव्यवधानेन साक्षात्कारफलां? चतुर्विधा भजन्ते मामित्यत्रोक्तस्य भक्तिचतुष्टयस्यान्त्यां ज्ञानलक्षणमिति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.54।।अस्यैवं शान्तस्य केवलस्य योगिनो व्युत्थानावस्थामाह -- ब्रह्मभूत इति। यो हि सुप्तौ वा निपतितो योगी व्युत्थाने जडदेहस्तमोग्रस्तचित्त इव तन्द्रालुरुत्तिष्ठति ब्रह्मभूतस्तु प्रसन्नात्मा प्रसन्नचेताः लघुशरीरः अमृतेनेव समाधिसुखेन तृप्तस्तदेकप्रवणो न शोचति नष्टम्। नाप्यप्राप्तं काङ्क्षति दारादिकम्। सर्वेषु भूतेषु चतुर्विधेषु समः ब्रह्मैवेदं सर्वमिति बुद्ध्या वैषम्यवर्जितः सन् परां मद्भक्तिं द्वैतदृष्टिविवर्जितां भावनां लभते। पातञ्जलयोगी तु न व्युत्थाने परां दृष्टिं लभते भेददर्शित्वात्। अयं च भक्तः श्रीभागवते दर्शितःसर्वभूतेषु येनैकं भगवद्भावमीक्षते। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमःइति। सोऽयं चतुर्थो भक्तोज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् इति भगवतापि दर्शितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.54।।ब्रह्मात्मावस्थितेः फलमाह -- ब्रह्मभूत इति। ब्रह्मात्मावस्थितः? प्रसन्नः आनन्दयुक्त आत्मा चेतो यस्य तादृशः सन्? नष्टपदार्थेषु भगवल्लीलाज्ञानेन न शोचति? प्राप्तव्यं तदिच्छां विना न काङ्क्षति। सर्वेषु भूतेषु कार्यात्मकस्वरूपज्ञानेन समः परां प्रेमलक्षणां मद्भक्तिं लभते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.54।।ब्रह्माहमित्येवं नैश्चल्येनावस्थानस्य फलमाह -- ब्रह्मभूत इति। ब्रह्मभूतो ब्रह्मण्यवस्थितः प्रसन्नचित्तो नष्टं न शोचति। न चाप्राप्तं काङ्क्षति देहाद्यभिमानाभावात्। अतएव सर्वेष्वपि भूतेषु समः सन् रागद्वेषादिकृतविक्षेपाभावात्सर्वभूतेषु मद्भावनालक्षणां परां मद्भक्तिं लभते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.54।।स ब्रह्मभूतः सर्वनिरपेक्षः शुक इव परां ज्ञानादपि फलरूपां मम पुरुषोत्तमस्य क्षराक्षरातीतस्य भक्तिं नवविधां प्रेमलक्षणां लभते? आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः,[5।7।10] इत्यादिभागवतवाक्यात्। अत्रमद्भक्तिं इत्यनेनाक्षरब्रह्मात्मत्वज्ञानिनो जीवन्मुक्तस्यापि पुरुषोत्तमभक्तिरेवातिशयितपुरुषार्थो भगवताऽऽभिमतः? न त्वक्षरब्रह्मैक्यं साङ्ख्यादिनेति गम्यते। अन्यथैवं नोक्तं स्यात्। न चेहब्रह्मभूयाय कल्पते इत्येव न ब्रह्मरूप इत्यतोविशते तदनन्तरं [18।55] इत्यैक्यमेवायातीति वाच्यम्? अग्रेब्रह्मभूतः इति सिद्धनिर्देशस्तदनन्तरं प्रत्युत तस्य भक्तिलाभकथनात्? तयाऽक्षरातीतपुरुषोत्तमतत्त्वाभिज्ञानतः पुरुषोत्तमस्वरूपप्रवेशोक्तेश्च अतोऽक्षरज्ञानरूपं प्रमाणमार्गादधिकोऽयं प्रमेयमार्गः पुरुषोत्तमसम्बन्धपर्यवसायीति।अक्षरब्रह्ममार्गे हि अक्षरब्रह्मोपासनम्? ततः श्रवणादीच्छा? ततः श्रवणादिसिद्ध्यर्थकज्ञानतोऽक्षरात्मैक्यफलम्। भगवन्मार्गे तु भगवदीयस्वधर्माचरणद्वारा श्रीपुरुषोत्तमभजनं तत्कृपयाक्षरात्मब्रह्मभावेऽपि श्रवणकीर्तनसेवनादिभिः पुनरपि श्रीशुकोद्धवादेरिव पुरुषोत्तमभक्त्या प्रवेश एव एकं कामिकं फलमिति भेदः। अतएववदन्ति तत्तत्त्वविदः [भाग.1।2।11] इत्यत्र यशोदोत्सङ्गलालितं पुरुषोत्तमतत्त्वं भगवानिति सात्वतः? उपासतेअक्षरं ब्रह्म इति साङ्ख्याः?परमात्मा इति योगिन इत्युक्तम्। ते च यथायथं निर्गुणसगुणभक्तिज्ञानकर्मभावधीविषयाः। निर्गुणपरभक्तिविषयस्तु पुष्टिपुरुषोत्तम एव गुणातीतः लोकवेदाप्रथितः। इदं सर्वंगतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः [ब्र.सू.3।3।29] इति सूत्रे विचारितं भाष्यकारेणेति ततोऽवगन्तव्यम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.54।।इस क्रमसे --, ब्रह्मको प्राप्त हुआ? प्रसन्नात्मा अर्थात् जिसको अध्यात्मप्रसाद लाभ हो चुका है ऐसा पुरुष? न शोक करता है और न आकाङ्क्षा ही करता है। अर्थात् न तो किसी पदार्थकी हानिके? या निजसम्बन्धी विगुणताके उद्देश्यसे सन्ताप करता है और न किसी वस्तुको चाहता ही है। न शोचति न काङ्क्षति इस कथनसे ब्रह्मभूत पुरुषके स्वभावका अनुवादमात्र किया गया है। क्योंकि ब्रह्मवेत्तामें अप्राप्त विषयोंकी आकाङ्क्षा बन ही नहीं सकती। अथवा न काङ्क्षति की जगह,न हृष्यति ऐसा पाठ समझना चाहिये। तथा जो सब भूतोंमें सम है अर्थात् अपने सदृश सब भूतोंमें सुख और दुःखको जो समान देखता है। इस वाक्यमें आत्माको समभावसे देखना नहीं कहा है क्योंकि वह तो भक्त्या मामभिजानाति इस पदसे आगे कहा जायगा। ऐसा ज्ञाननिष्ठ पुरुष? मुझ परमेश्वरकी भजनरूप पराभक्तिको पाता है? अर्थात् चतुर्विधा भजन्ते माम् इसमें जो चतुर्थ भक्ति कही गयी है उसको पाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.54।। व्याख्या --   ब्रह्मभूतः -- जब अन्तःकरणमें विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब अन्तःकरणकी अहंकार? घमंड आदि वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं अर्थात् उनका त्याग हो जाता है। फिर अपने पास जो वस्तुएँ हैं? उनमें भी ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे सुख और भोगबुद्धिसे वस्तुओंका संग्रह नहीं होता। जब सुख और भोगबुद्धि मिट जाती है? तब अन्तःकरणमें स्वतःस्वाभाविक ही शान्ति आ जाती है।इस प्रकार साधक जब असत्से ऊपर उठ जाता है? तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बन जाता है। पात्र बननेपर उसकी ब्रह्मभूतअवस्था अपनेआप हो जाती है। इसके लिये उसको कुछ करना नहीं पड़ता। इस अवस्थामें मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ और ब्रह्म मेरा स्वरूप है ऐसा उसको अपनी दृष्टिसे अनुभव हो जाता है। इसी अवस्थाको यहाँ (और गीता 5। 24 में भी) ब्रह्मभूतः पदसे कहा गया है।प्रसन्नात्मा -- जब अन्तःकरणमें असत् वस्तुओंका महत्त्व हो जाता है? तब उन वस्तुओंको प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है और अशान्ति (हलचल) पैदा हो जाती है। परन्तु जब असत् वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब साधकके चित्तमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता रहती है। अप्रसन्नताका कारण मिट जानेसे फिर कभी अप्रसन्नता होती ही नहीं। कारण कि सांख्ययोगी साधकके अन्तःकरणमें अपनेसहित संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव अटल रहता है।न शोचति न काङ्क्षति -- उस प्रसन्नताकी पहचान यह है कि वह शोकचिन्ता नहीं करता। सांसारिक कितनी ही बड़ी हानि हो जाय? तो भी वह शोक नहीं करता और अमुक परिस्थिति प्राप्त हो जाय -- ऐसी इच्छा भी नहीं करता। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली तथा आनेजानेवाली परिवर्तनशील परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ आदिके बननेबिगड़नेसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता। जो परमात्मामें अटलरूपसे स्थित है? उसपर आनेजानेवाली परिस्थितियोंका असर हो ही कैसे सकता हैसमः सर्वेषु भूतेषु -- जबतक साधकमें किञ्चिन्मात्र भी हर्षशोक? रागद्वेष आदि द्वन्द्व रहते हैं? तबतक वह सर्वत्र व्याप्त परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव नहीं कर सकता। अभिन्नताका अनुभव न होनेसे वह अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें सम नहीं देख सकता। परन्तु जब साधक हर्षशोकादि द्वन्द्वोंसे सर्वथा रहित हो जाता है? तब परमात्माके साथ स्वतःस्वाभाविक अभिन्नता (जो कि सदासे ही थी) का अनुभव हो जाता है। परमात्माके साथ अभिन्नता होनेसे? अपना कोई व्यक्तित्व (टिप्पणी प0 948) (व्यक्तित्व उसे कहते हैं? जिसमें मनुष्य अपनी सत्ता अलग मानता है और जिससे बन्धन होता है) न रहनेसे अर्थात् मैं हूँ इस रूपसे अपनी कोई अलग सत्ता न रहनेसे वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम है -- समोऽहं सर्वभूतेषु (गीता 9। 29)? ऐसे ही वह भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है।वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम किस प्रकार होता है जैसे -- मनोराज्य और स्वप्नमें जो नाना सृष्टि होती है? उसमें मन ही अनेक रूप धारण करता है अर्थात् वह सृष्टि मनोमयी होती है। मनोमयी होनेसे जैसे सब सृष्टिमें मन है और मनमें सब सृष्टि है? ऐसे ही सब प्राणियोंमें (आत्मरूपसे) वह है और उसमें सम्पूर्ण प्राणी हैं (गीता 6। 29)। इसीको यहाँ समः सर्वेषु भूतेषु कहा है।मद्भक्तिं लभते पराम् -- जब समरूप परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव होनेसे साधकका सर्वत्र समभाव हो जाता है? तब उसका परमात्मामें प्रतिक्षण वर्धमान एक विलक्षण आकर्षण? खिंचाव? अनुराग हो जाता है। उसीको यहाँ पराभक्ति कहा है।पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जैसे ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद ब्रह्मनिर्वाणकी प्राप्ति बतायी है -- स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति? ऐसे ही यहाँ ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद पराभक्तिकी प्राप्ति बतायी है। सम्बन्ध --   अब आगेके श्लोकमें पराभक्तिका फल बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.54।।अपेक्षितं पूरयन्नुत्तरश्लोकमवतारयति -- अनेनेति। बुद्ध्या विशुद्धयेत्यादिरत्र क्रमः? ब्रह्मप्राप्तो जीवन्नेव निवृत्ताशेषानर्थो निरतिशयानन्दं ब्रह्मात्मत्वेनानुभवन्नित्यर्थः। अध्यात्मं प्रत्यगात्मा तस्मिन्प्रसादः सर्वानर्थनिवृत्त्या परमानन्दाविर्भावः स लब्धो येन जीवन्मुक्तेन स तथा। न शोचतीत्यादौ तात्पर्यमाह -- ब्रह्मभूतस्येति। प्राप्तव्यपरिहार्याभावनिश्चयादित्यर्थः। स्वभावानुवादमुपपादयति -- नहीति। तस्याप्राप्तविषयाभावान्नापि परिहार्यापरिहारप्रयुक्तः शोकः परिहार्यस्यैवाभावादित्यर्थः। पाठान्तरे तु रमणीयं प्राप्य न प्रमोदते तदभावादित्यर्थः। विवक्षितं समदर्शनं विशदयति -- आत्मेति। ननु सर्वेषु भूतेष्वात्मनः समस्य निर्विशेषस्य दर्शनमत्राभिप्रेतं किं नेष्यते तत्राह -- नात्मेति। उक्तविशेषणवतो जीवन्मुक्तस्य ज्ञाननिष्ठा प्रागुक्तक्रमेण प्राप्ता सुप्रतिष्ठिता भवतीत्याह -- एवंभूत इति। श्रवणमनननिदिध्यासनवतः शमादियुक्तस्याभ्यस्तैः श्रवणादिभिर्ब्रह्मात्मन्यपरोक्षं मोक्षफलं ज्ञानं सिध्यतीत्यर्थः। आर्तादिभक्तित्रयापेक्षया ज्ञानलक्षणा भक्तिश्चतुर्थीत्युक्ता। तत्र सप्तमस्थवाक्यमनुकूलयति -- चतुर्विधा इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.54।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.54।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.54।। -- ब्रह्मभूतः ब्रह्मप्राप्तः प्रसन्नात्मा लब्धाध्यात्मप्रसादस्वभावः न शोचति? किञ्चित् अर्थवैकल्यम्? आत्मनः वैगुण्यं वा उद्दिश्य न शोचति न संतप्यते न काङ्क्षति? न हि अप्राप्तविषयाकाङ्क्षा ब्रह्मविदः उपपद्यते अतः ब्रह्मभूतस्य अयं स्वभावः अनूद्यते -- न शोचति न काङ्क्षति इति। न हृष्यति इति वा पाठान्तरम्। समः सर्वेषु भूतेषु? आत्मौपम्येन सर्वभूतेषु सुखं दुःखं वा सममेव पश्यति इत्यर्थः। न आत्मसमदर्शनम् इह? तस्य वक्ष्यमाणत्वात् भक्त्या मामभिजानाति (गीता 18।55) इति। एवंभूतः ज्ञाननिष्ठः? मद्भक्तिं मयि परमेश्वरे भक्तिं भजनं पराम् उत्तमां ज्ञानलक्षणां चतुर्थीं लभते? चतुर्विधा भजन्ते माम् (गीता 7।16) इति हि उक्तम्।।ततः ज्ञानलक्षणया --,

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【 Verse 18.55 】

▸ Sanskrit Sloka: भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वत: | ततो मां तत्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ||

▸ Transliteration: bhaktyā mām abhijānāti yāvān yaścāsmi tattvataḥ | tato māṁ tattvato jñātvā viśate tad-anantaram ||

▸ Glossary: bhaktyā: by pure devotional service; mām: Me; abhijānāti: one can know; yāvān: as much as; yaścāsmi: as I am; tattvataḥ: in truth; tataḥ: thereafter; māṁ: Me; tattvataḥ: by truth; jñātvā: knowing; viśate: enters; tadanantaram: thereafter

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.55 By devotion one truly understands what and who I am in essence. Having known Me in essence, one immediately merges with Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.55।।उस पराभक्तिसे मेरेको? मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.55।। (उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है? अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.55 भक्त्या by devotion? माम् Me? अभिजानाति (he) knows? यावान् what? यः who? च and? अस्मि (I) am? तत्त्वतः in truth? ततः then? माम् Me? तत्त्वतः in truth? ज्ञात्वा having known? विशते (he) enters? तत् that? अनन्तरम् afterwards.Commentary My devotee? O Arjuna? who has attained to union with Me through singleminded and unflinching devotion is verily My very Self. Devotion culminates in knowledge. Devotion begins with two and ends in one. ParaBhakti (supreme devotion) and Jnana are one. Devotion is the mother. Knowledge is the son. By devotion he knows that I am allpervading pure,consciousness he knows that I am nondual? unborn? decayless? causeless? selfluminous? indivisible? unchanging he knows that I am destitute of all the differences caused by the limiting adjuncts he knows that I am the support? source? womb? basis? and substratum of everything he knows that I am the ruler of all beings he knows that I am the Supreme Purusha? the controller of Maya? and that this world is a mere appearance. Thus knowing Me in truth or in essence? he enters into Me soon after attaining Selfknowledge.The act of knowing and the act of entering are not two distinct acts. Knowing is becoming. Knowing is attaining Selfknowledge. To know That is to become That. Entering is knowing or beoming That. Entering is the attainment of Selfknowledge or Selfrealisation. These are all jugglery of words only. Knowing and entering are synonymous terms. It is very difficult to understand or comprehend transcendental spiritual matters. The teachers use various terms or expressions? analogies? similes? parables? stories? etc. to make the aspirant grasp the matter clearly and lucidly. Words are imperfect and languages are defective. They cannot fully express the inner spiritual experiences. The teacher somehow or other expresses to the students or aspirants these spiritual ideas. The aspirant himself will have to realise the Self. That is beyond the reach of words of expressions or analogies of similes. How can there be similes for that nondual Brahman These words are a sort of help or prop for the aspirants to lean upon in the beginning to understand spiritual matters. When he realises the Self? these words are of no value to him. He himself becomes an embodiment of knowledge.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.55. Through devotion he comes to know of Me : Who I am and how, in fact, I am-having correctly known Me, he enters Me. Then afterwards,

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.55 By such devotion, he sees Me, who I am and what I am; and thus realising the Truth, he enters My Kingdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.55 Through devotion, he comes to know Me fully - who and what I am in reality, who I am and how I am. Knowing Me thus in truth, he forthwith enters into Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.55 Through devotion he knows Me in reality, as to what and who I am. Then, having known Me in truth, he enters (into Me) immediately after that (Knowledge).

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.55 By devotion he knows Me in truth, what and who I am; then having known Me in truth, he forthwith enters into the Supreme.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.55 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.55 Through such devotion, he knows 'who I am,' i.e., knows My own essence and My nature, and 'what I am,' i.e., in My attributes and glory. Knowing Me truly, he rises to a higher level than this Bhakti, and aciring knowledge of the truth, enters into Me through devotion. The meaning is that he attains Me by means of infinite and unsurpassed Bhakti which develops subseent in time to the vision of the nature, attributes and glory of the Lord in reality. Here the term 'Tatah' (through) denotes that devotion is the cause of attainment; for it has been stated to be the cause of entrance n the text, 'But by singel-minded devotion it is possible ৷৷.' (11.54).

In this way, the crowning development has been told starting from the disinterested performance of periodical and occasional rites suitable for the various stations and stages of life, which are to be performed to propitiate the Supreme Person. Sri Krsna now explains that even for actions meant for attaining desired objects (Kamya-karmas) the crowning stage is the same as for these described above, provided they too are done not for fulfilling one's desires but as offerings to propitiate the Supreme Person.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.55 Bhaktya, through devotion, through that devotion described as Knowledge; abhijanati, he knows; mam, Me; tattvatah, in reality; as to yavan, what I am, with the extensive differences created by limiting adjuncts; and yah asmi, who I am when all distinctions create by the limiting adjuncts are destroyed-Me who am the supreme Person comparable to space [In points of all-pervasiveness and non-attachment.] and one-without-a-second, absolute, homogeneous Consciousness, birthless, ageless, immortal, fearless and deathless. Tatah, then; jnatva, having known; mam, Me, thus; tattvatah, in truth; visate, he enters into Me, Myself; tadanantaram, immediately after that (Knowledge). Here, by saing, 'having known, he enters without delay', it is not meant that the acts of 'knowing' and 'entering immediately after' are different. What then? What is meant is the absolute Knowledge itself that has to no other result, [In place of phalantarabhava-jnana-matram eva, Ast. reads 'phalantarbhavat jnanamatram eva, absolute Knowledge itself, since there is no other result'.-Tr.] for it has been said, 'And৷৷.understand Me to be the "Knower of the field", (13.2). Opponent: Has it not been contradictory to say, he knows Me through that which is the supreme steadliness (nistha) in Knowledge? Vedantin: If it be asked, How it is contradictory? Opponent: The answer is: Whenever any Knowledge of something arises in a knower, at that very moment the knower knows that object. Hence, he does not depend on steadfastness in Knowledge which consists in the repetition of the act of knowing. And therefore, it is contradictory to say one knows not through knowledge, but through steadfastness in knowledge which is a repetition of the act of knowing. Vedantin: There is no such fault, since the culmination of Knowledge-which (Knowledge) is associated with the causes of its unfoldment and maturity, and which has nothing to contradict it- in the conviction that one's own Self has been realized is what is referred to by the word nistha (consummation): When knowledge-which concerns the identity of the 'Knower of the field' and the supreme Self, and which remains associated with the renunciation of all actions that arise from the perception of the distinction among their accessories such as agent etc., and which unfolds from the instruction of the scriptures and teachers, depending on purity of the intellect etc. and humility etc. which are the auxiliary cuases of the origin and maturity of Knowledge-continues in the form of the conviction that one's own Self has been realized, then that continuance is called the supreme steadfastness (nistha) in Knowledge. This steadfastness in Knowledge that is such has been spoken of as the highest, the fourth kind of devotion in relation to the three other devotions viz of the afflicted, etc. (cf. 7.16). Through that highest devotion one realizes the Lord in truth. Immediately after that the idea of difference between the Lord and the Knower of the field vanishes totally. There-fore the statement, 'one knows Me through devotion in the form of steadfastness in Knowledge', is not contradictory. And, in this sense, all the scriptures-consisting of Vedanta (Upanisads etc.), History, Mythology and Smrtis-, as for instance, 'Knowing (this very Self the Brahmanas) renounce৷৷.and lead a mendicant's life' (Br. 3.5.1), 'Therefore they speak of monasticism as excellent among these austerities' (Ma. Na. 24.1), 'Monasticism verily became supreme' (ibid. 21.2), which enjoin renunciation become meaningful. Thus, monasticism means renunciation of rites and duties. There are also the texts, 'Having renounced the Vedas as well as this world and the next' (Ap. Dh. Su. 2.9.13), and 'Give up religion and irreligion' (Mbh. Sa. 329.40; 331.44), etc. And here (in the Gita) also various relevant) passages have been pointed out. In is not porper that those texts should be meaningless. Nor are they merely eulogistic, since they occur in their own contexts. Besides, Liberation consists in being established in the changeless real nature of the indwelling Self. Indeed, it is not possible that one who wants to go to the eastern sea and the other who wants to go in the opposite direction to the western sea can have the same course! And steadfastness in Knowledg consists in being totally absorbed in maintaining a current of thought with regard to the indwelling Self. And that is opposed to coexistence with duties, like going to the western sea. It has been the conclusion of those versed in the valid means of knowledge that the difference between them is as wide as that between a mountain and a mustard seed! Therefore it is established that one should have recourse to steadfastness in Knowledge only, by relinishing all rites and duties. The fruit of the attainment of success from the Yoga of Devotion consisting in worshiping the Lord with one's own actions is the ability to remain steadfast in Knowledge, from which, follows stead-fastness in Knowledge, culminating in the result, Liberation. That Yoga of Devotion to the Lord is now being praised in this concluding section dealing with the purport of the Scripture, with a veiw to generating a firm conviction with regard to it (the purport of the Scripture):

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.55।। परमात्मा से परम प्रेम अर्थात् पूर्ण तादात्म्य ही परा भक्ति है। उस परा भक्ति से ही साधक भक्त परमात्मा को तत्त्वत समझ सकता है। शास्त्र के श्रवण? अध्ययन आदि से प्राप्त किया गया ज्ञान प्राय परोक्ष होता है। जब वह ज्ञान? विज्ञान अर्थात् स्वानुभव बन जाता है? केवल तभी परमात्मा का यथार्थ बोध होता है।यावान् (मैं कितना हूँ) इसका अर्थ यह है कि परा भक्ति के द्वारा एक भक्त भगवान् के उपाधिकृत विस्तार को समझ लेता है। भगवान् की विभूतियों का वर्णन दसवें अध्याय में किया जा चुका है।यश्च अस्मि (मैं क्या हूँ) एक परम भक्त यह भी जान लेता है कि भगवान् का वास्तविक स्वरूप समस्त उपाधियों से वर्जित? निर्गुण? निर्विशेष है। सारांशत? भगवान् को तत्त्वत जानने का अर्थ उनके सर्वव्यापक एवं सर्वातीत इन दोनों ही स्वरूप को जानना है।हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि सम्पूर्ण गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अपने लिए जो मैं शब्द का प्रयोग करते हैं? वह अपने परमात्म स्वरूप की दृष्टि से ही कहते हैं? वसुदेव के पुत्र के रूप में नहीं। अत जब वे कहते हैं वह (साधक) मुझमें प्रवेश करता है? तब उसका अर्थ किसी गृह में प्रवेश के समान न होकर साधक की आत्मानुभूति से है। भक्त का आत्मस्वरूप भगवान् के परमात्मस्वरूप से भिन्न नहीं है। यहाँ कथित प्रवेश ऐसा ही है? जैसे स्वप्न द्रष्टा जाग्रत् पुरुष में प्रवेश करता है। इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि एक साधन सम्पन्न उत्तम अधिकारी निदिध्यासन के द्वारा परमात्मा का अनुभव आत्मरूप से ही करता है? उससे भिन्न रहकर नहीं।जगत् के प्राणियों की सेवा के बिना ईश्वर की सेवा पूर्ण नहीं होती। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.55।।ततश्च ज्ञानलक्षणया भक्त्या मामभिजनाति यावानहमुपाधिकृतवस्थारभेदो यश्चास्मि विध्वस्तसर्वोपाधिभेद उत्तमः पुरुष आकाशवदसङ्गो निर्विकारस्तं मामद्वैतचैतन्यमात्रैकरसमजरममरमभयमनिधनं भक्त्या तत्त्वतोऽभिजानाति ततो मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं मामेव विशते प्राप्नोति। अत्र ज्ञानप्रवेशक्रिये भिन्ने न विवक्षिते। भेदोक्तिस्त्वौपचारिकी ततो मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं मामेव विशते प्राप्नोति। अत्र ज्ञानप्रवेशक्रिये भिन्ने न विवक्षिते। भेदोक्तित्वौपचारिकी बोध्या। ब्रह्मप्राप्तिस्तु ज्ञानान्नातिरिच्यते। क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धीति ब्रह्मात्मनोरभेदस्योक्तत्वात्। भक्त्या निदिध्यासनात्मिकया मामद्वितीयमात्मानमभिजानाति साक्षात्करोति तदनन्तरं बलवत्प्रारब्धकर्मभोगेन देहपातानन्तरं नतु ज्ञानान्तरमेव। क्त्वाप्रत्येनैव तल्लाभे तदनन्तरमित्यस्य वैयर्थ्यापातादिति केचित्। इतरे तु विशत्यात्मनि स्वसिद्धयेऽनिर्वचनीयसंबन्धेनेति विशत् सर्वानर्थमूलमज्ञानं तस्मै तत्सविलासमुन्मूलयितुं ज्ञात्वाऽपरोक्षीकृत्य तदनन्तरं अनतरं भेदस्तच्छून्यं शाश्वतं पदमव्ययमाप्राप्नोतीत्युत्तर श्लोकस्थानुषङ्गेण व्याख्येयमिति वदन्ति। तत्तवतो याथात्म्येन ज्ञात्वा साक्षात्कृत्य ततो व्याप्तः ब्रह्मभावं गतो भवतीत्यर्थः।ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। यद्वा तत इति कारणब्रह्मभावापत्तिः सार्वात्भ्यरुपा प्रथममुक्ता। अनन्तरं कारणभावापत्तेरनुपदमेव तद्ब्रह्म तत्पदाभिधेयं शुद्धं ब्रह्म विशते। दर्पणाद्यपाये प्रतिबिम्बो विम्बमिव प्रविशतीत्यर्थ इत्यन्ये। तदेतद्य्वाख्यानत्रयमपि सर्वज्ञैराचार्यैः ध्यानयोगपरो नित्यमित्यत्र निदिध्यासनस्योक्तत्वाद्भक्तिं इत्यस्य परामिति विशेषणस्य च वैयर्थ्यं तच्छब्देनाप्रस्तुतपरामर्शस्यानुषङ्गाध्याहारादिक्लेशव्याप्तायाः कुकल्पनायाश्चानौचित्यमभिप्रेत्य त्यक्त्वादुपेक्ष्यम्। तथाचायमर्थःआचार्यावान्पुरुषो वेद इति श्रुत्या शास्त्रानुसार्याचार्योपदेशेन ज्ञानोत्पत्तिः। तस्य च परिपाके असंभावनादिप्रध्वंसे हेतुभूतमुपदेशस्यैव महकारिकारणं बुद्धिविशुद्धत्वादि अमानित्वादिगणं चापेक्ष्य तस्मादेवोपदेशाज्जनितस्य क्षेत्रज्ञपरात्मैकत्वज्ञानस्य कारकभेदबुद्धिनिबन्धनसर्वकर्मसंन्याससहितस्य स्वात्मानुभवरुपेण स्वात्मन्येव सर्वकल्पनारहितस्य यदवस्थानं सा ज्ञानस्य परा निष्ठेत्युच्यते? सेयं ज्ञाननिष्ठा आर्तदिभक्तित्रयापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिरित्युक्त्वा तया परया भक्त्या भगवन्तं तत्त्वतोऽभिजानाति यदनन्तमेवेश्वरक्षेत्रज्ञभेदबुद्धिरशेषं ततो निवर्तते। क्त्वाप्रत्ययेनोक्तमानन्तर्यमव्यवहितं नतु किंचिद्य्ववधानयुक्तमिति बोधनायानन्तरमित्युक्तमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.55।।भक्त्येति। ततश्च भक्त्या निदिध्यासनात्मिकया ज्ञाननिष्ठया मामद्वितीयमात्मानमभिजानाति साक्षात्करोति। यावान् विभुर्नित्यश्च यश्च परिपूर्णसत्यज्ञानानन्दघनः सदा विध्वस्तसर्वोपाधिरखण्डैकरस एकस्तावन्तं चाभिजानाति। ततो मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वाहमस्म्यखण्डानन्दाद्वितीयं ब्रह्मेति साक्षात्कृत्य विशते अज्ञानतत्कार्यनिवृत्तौ सर्वोपाधिशून्यतया सद्रूप एव भवति। तदनन्तरं बलवत्प्रारब्धकर्मभोगेन देहत्यागानन्तरं नतु ज्ञानानन्तरमेव। क्त्वाप्रत्ययेनैव तल्लाभे तदनन्तरमित्यस्य वैयर्थ्यापातात् तस्मात्तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति श्रुत्यर्थ एवात्र दर्शितो भगवता। यद्यपि ज्ञानेनाज्ञानं निवर्तितमेव दीपेनेव तमस्तस्य तद्विरोधिस्वभावत्वात्तथापि तदुपादेयमहंकारदेहादि निरुपादानमेव यावत्प्रारब्धकर्मभोगमनुवर्तते दृष्टत्वादेव। नहि दृष्टेनुपपन्नं नाम। तार्किकैरपि हि समवायिकारणनाशाद्द्रव्यनाशमङ्गीकुर्वद्भिर्निरुपादानं द्रव्यं क्षणमात्रं तिष्ठतीत्यङ्गीकृतम्। नित्यपरमाणुसमवेतद्व्यणुकनाशे त्वसमवायिकारणनाशादेव द्रव्यनाशः समवायनिरूपितकारणनाशत्वमुभयोरनुगतमिति नानुगमः। येत्वसमवायिकारणनाशमेव सर्वत्र कार्यद्रव्यनाशकमिच्छन्ति तेषामाश्रयनाशस्थले क्षणद्वयमनुपादानं कार्यं तिष्ठति। एवंच तत्रैव प्रतिबन्धसन्निपते बहुकालावस्थितिः केन वार्येत। प्रारब्धकर्मणश्च प्रतिबन्धकत्वं श्रुतिसिद्धमन्तःकरणदेहाद्यवस्थित्यन्यथानुपपत्तिसिद्धं च। एवं शिष्यसेवकाद्यदृष्टमपि तत्प्रतिबन्धकं तदभावमपेक्ष्य च पूर्वसिद्ध एवाज्ञाननाशस्तत्कार्यमन्तःकरणादिकं नाशयतीति न पुनर्ज्ञानापेक्षा। तदुक्तंतीर्थे श्वपचगृहे वा नष्टस्मृतिरपि परित्यजन्देहम्। ज्ञानसमकालमुक्तः कैवल्यं याति हतशोकः। इति। न जानामीत्यादिप्रत्ययस्तु तस्य निवृत्ताज्ञानस्याप्यज्ञाननाशजनितात्तदनुपादानात्साक्षादात्माश्रयादेवाज्ञानसंस्कारात्तत्त्वज्ञानसंस्कारनिर्वर्त्यादन्तःकरणस्थित्यवधेरिति विवरणकृतः अहं ब्रह्मास्मीति चरमसाक्षात्कारानन्तरमहं ब्रह्म न भवामि न जानामीत्यादिप्रत्ययो नास्त्येव। यदि परं घटं न जानामीत्यादिप्रत्ययः स्यात्तदुपपादनाय चेयं संस्कारकल्पनेति नानुपपन्नम्। अज्ञानलेशपदेनाप्ययमेव संस्कारो विवक्षितः। नहि सावयवमज्ञानं येन कियन्नश्यति कियत्तिष्ठतीति वाच्यम्। अनिर्वचनीयत्वात्। एकदेशाभ्युपगमे तु तन्निवृत्त्यर्थं पुनश्चरमं ज्ञानमपेक्षितमेव। तच्च मृतिकाले दुर्घटमिति तत्त्वज्ञानसंस्कारनाश्यता तस्याभ्युपेया। ततश्च संस्कारपक्षान्न कोऽपि विशेष इति पूर्वोक्तैव कल्पना श्रेयसी। ईदृशजीवन्मुक्त्यपेक्षया च प्राग्भगवतोक्तंउपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः इति स्थितप्रज्ञलक्षणानि च व्याख्यातानि। तस्मात्साधूक्तं विशते तदनन्तरमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.55।।अस्या अद्वैतात्मतत्त्वज्ञानलक्षणाया भक्तेः फलमाह -- भक्त्येति। मां उक्तविधया भक्त्या ज्ञानी अभितः साकल्येन जानाति। साकल्यमेवाह -- यावानिति। किमहमणुपरिमाणो वा देहसंमितो वा तार्किकाणामिवाकाशवत्सकलमूर्तद्रव्यसंयोगित्वलक्षणविभुत्वाश्रयो वा सप्रपञ्चाद्वैतवादिनामिव स्वगतभेदवान्वाऽखण्डैकरसो वेति परिमाणतस्तत्त्वतो मां तत्पदार्थं जानाति तथा यश्चास्मीति। देहेन्द्रियप्राणमनसामन्यतमः कियत्कालस्थायी वा क्षणिकविज्ञानरूपो वा शून्यं वा कर्ता भोक्ता वा जडो वा जडाजडरूपो वा चिद्रूपो वा कर्तृत्वभोक्तृत्ववर्जित आनन्दघनो वेति तत्त्वतः सर्वसंशयराहित्येन मामजरममरमभयमशोकं जानाति। तथा च श्रुतिःभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति आत्मदर्शने सति सर्वसंशयोच्छेदं दर्शयति। एवंक्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत इत्युक्तेः सर्वक्षेत्रेष्वेकं मां विभुं सच्चिदानन्दघनं तत्त्वतो ज्ञात्वा सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं याथात्म्येन ज्ञात्वा साक्षात्कृत्य ततो व्याप्तो ब्रह्मभावं गतो भवतीत्यर्थः।ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। यद्वा तत इति कारणब्रह्मभावापत्तिः सार्वात्म्यरूपा प्रथममुक्ता।य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवतिस एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् इत्यादिश्रुतिभ्यो मुक्तानां सार्वात्म्यावगमात्। ततमं तततमम्। एकस्तकारश्छान्दस्यां प्रक्रियायां लुप्तो द्रष्टव्य इति श्रुतिभाष्यम्। अनन्तरं कारणभावापत्तेरनुपदमेव तत् ब्रह्म तच्छब्दाभिधेयम्तदिति वा एतस्य महतो भूतस्य नाम भवति इति श्रुतेः। शुद्धं ब्रह्म विशते दर्पणापाये प्रतिबिम्बो बिम्बमिव प्रविशति। कार्योपाधिनीं जीवानां कारणोपाधीश्वरप्राप्तिद्वारैव निष्कलब्रह्मप्राप्तिरित्यावेदितं प्रागेव। यद्वा मां ज्ञात्वा तद्विशत इत्येतावतैव ज्ञानप्रवेशयोः पौर्वापर्ये सिद्धे तदनन्तरमिति पदेन तच्छब्देन बुद्धिस्थं देहं परामृश्य तत्पातानन्तरमिति व्याख्येयम्। यतो जातेऽपि तत्त्वज्ञाने यावद्देहपातं प्रारब्धकर्मणां प्रतिबन्धाद्विदेहकैवल्यं न प्राप्यते। अन्यथा ज्ञानसमकालमेव देहपातापत्तिः स्यात्।विमुक्तश्च विमुच्यतेभूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः इति मुक्तस्य मुक्तिं निवृत्तायाश्च मायायाः पुनर्निवृत्तिं वदज्जीवन्मुक्तिशास्त्रं बाधितं स्यात्। यथा तार्किकाणां नष्टेऽपि समवायिकारणे पटादिकं क्षणमात्रमवतिष्ठते एवमस्माकमप्यनादिकालाया देहाद्युपादानभूताया अविद्याया विनाशेऽपि किंचित्कालं देहादिप्रतिभानं युज्यते। ईदृशमेव जीवन्मुक्तमपेक्ष्य भगवतोक्तंउपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः इति। स्थितप्रज्ञलक्षणस्मृतिरपि तल्लक्षणाभिधित्सयैव प्रववृते इति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.55।।भक्तिलाभफलमाह -- भक्त्येति। ततस्तदनन्तरं भक्त्या भजनेन वा अगणितानन्दलीलारूपो यश्च केवलमानन्दरसरूपोऽस्मि तादृशं मां तत्त्वतः कारणात्मकधर्मैः अभिजानाति सर्वथा जानाति। तदनन्तरं तत्त्वतो ज्ञात्वा मां लीलाकर्त्तारं विशते? आनन्दरूपो भवतीत्यर्थः। यद्वा मां ज्ञात्वा विशते लीलास्विति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.55।।ततश्च -- भक्त्या मामिति। तया च परया भक्त्या तत्त्वतो मामभिजानाति। कथंभूतम्? यावान् सर्वव्यापी यश्चास्मि सच्चिदानन्दघनस्तथाभूतम्। ततश्च मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं तस्य ज्ञानस्याप्युपरमे सति मां विशते। परमानन्दरूपो भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.55।।भक्त्येति। स मदीयया भक्त्या निर्गुणया निर्गुणविषयकत्वात्परया मामेकं निर्गुणं पुरुषोत्तममभिजानाति तत्त्वतः यावान्यश्चास्मीति। यादृशैश्वर्याद्यनन्तालौकिकगुणविशिष्टो यादृशलीलापरिकरसहितः प्राकृतगुणसृष्टिरहितो ब्रह्मपरमात्मा भगवानिति भेदेन ततो नामविस्तृतोऽस्मि यथातथा मामभिजानाति? एवं अभिज्ञानमुक्तं भागवतचतुश्श्लोक्यांयावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः [भाग.2।9।31] इत्यादि। तदनन्तरं तत्त्वतो मां पुरुषोत्तमं ज्ञात्वेत्यनुवादः तत्त्वतो वा पुरुषोत्तमं मां विशते प्रवेश एव फलंनिर्गुणा मुक्तिरस्माद्धि सगुणा साऽन्यसेवया इति निबन्धेअलौकिकसामर्थ्यं सायुज्यं सेवोपयोगिदेहो वा वैकुण्ठादिषु इति सेवाफले च निरूपितम्। अथवाऽऽविशते पुरुषोत्तमाविष्टो भवति। अतएवोक्तमाचार्यैः सुबोधिन्यांशुको भावनया गोकुले स्थित्वाऽऽह य एतदिति स भगवान् इति च। तेन ब्रह्मभूतोऽपि शुकः श्रीपुरुषोत्तमभक्तितत्त्वज्ञानतः श्रीपुरुषोत्तमाविष्ट एव तल्लीलामध्यपाती भवतीत्यवसीयते। तदनन्तरं तेन नान्तरं भेदो यथा भवति तथेति वा। तथा च श्रुतिः -- ब्रह्मविदाप्नोति परं [तैत्ति.2।1।1] य(त)दक्षरे परमे व्योमन् [महाना.1।2] यो वेद निहितं गुहायां [तै.उ.2।1।1] सोऽश्नुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिता [तैत्ति.2।1।1] इति। एतेनाक्षरमार्गात् भगवन्मार्गे वैलक्षण्यं यत्र भगवानेव प्रमाणं प्रमेयं चेति दर्शितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.55।।उसके बाद उस ज्ञानलक्षणा --, भक्तिसे मैं जितना हूँ और जो हूँ? उसको तत्त्वसे जान लेता है। अभिप्राय यह है कि मैं जितना हूँ? यानी उपाधिकृत विस्तारभेदसे जितना हूँ और जो हूँ? यानी वास्तवमें समस्त उपाधिभेदसे रहित? उत्तमपुरुष और आकाशकी तरह ( व्याप्त ) जो मैं हूँ? उस अद्वैत? अजर? अमर? अभय और निधनरहित मुझको तत्त्वसे जान,लेता है। फिर मुझे इस तरह तत्त्वसे जानकर तत्काल मुझमें ही प्रवेश कर जाता है। यहाँ ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इस कथनसे ज्ञान और उसके अनन्तर प्रवेशक्रिया? यह दोनों भिन्नभिन्न विवक्षित नहीं हैं। तो क्या है फलान्तरके अभावका ज्ञानमात्र ही विवक्षित है क्योंकि क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही समझ ऐसे कहा गया है। पू0 -- यह कहना विरुद्ध है कि ज्ञानकी जो परा निष्ठा है उससे मुझे जानता है। यदि कहो कि विरुद्ध कैसे है तो बतलाते हैं? जब ज्ञाताको जिस विषयका ज्ञान होता है? वह उसी समय उस विषयको जान लेता है? ज्ञानकी बारम्बार आवृत्ति करनारूप ज्ञाननिष्ठाकी अपेक्षा नहीं करता। इसलिये वह ( ज्ञेय पदार्थको ) ज्ञानसे नहीं जानता? ज्ञानावृत्तिरूप ज्ञाननिष्ठासे जानता है यह कहना विरुद्ध है। उ0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि अपनी उत्पत्ति और परिपाकके हेतुओंसे युक्त एवं विरोधरहित ज्ञानका जो अपने स्वरूपानुभवमें निश्चयरूपसे पर्यवसान -- स्थित हो जाना है? उसीको निष्ठा शब्दसे कहा गया है। अभिप्राय यह है कि ज्ञानकी उत्पत्ति और परिपाकके हेतु? जो विशुद्धबुद्धि आदि और अमानित्वादि सहकारी कारण हैं? उनकी सहायतासे? शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न हुआ? जो मैं कर्ता हूँ? मेरा यह कर्म है इत्यादि कारकभेदबुद्धिजनित समस्त कर्मोंके संन्याससहित क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकताका ज्ञान है? उसका जो अपने स्वरूपके अनुभवमें निश्चयरूपसे स्थित रहना है? उसे परा ज्ञाननिष्ठा कहते हैं। वही यह ज्ञाननिष्ठा आर्त आदि तीन भक्तियोंकी अपेक्षासे चतुर्थ परा भक्ति कही गयी है। उस,( ज्ञाननिष्ठारूप ) परा भक्तिसे भगवान्को तत्त्वसे जानता है जिससे उसी समय ईश्वर और क्षेत्रज्ञविषयक भेदबुद्धि पूर्णरूपसे निवृत्त हो जाती है। इसलिये ज्ञाननिष्ठारूप भक्तिसे मुझे जानता है यह कहना विरुद्ध नहीं होता। ऐसा मान लेनेसे वेदान्त? इतिहास? पुराण और स्मृतिरूप समस्त निवृत्तिविधायक शास्त्र? सार्थक हो जाते हैं अर्थात् उन सबका अभिप्राय सिद्ध हो जाता है। आत्माको जानकर ( तीनों तरहकी एषणाओंसे ) विरक्त होकर फिर भिक्षाचरण करते हैं? पुरुषार्थका अन्तरंग साधन होनेके कारण संन्यास ही इन सब तपोंमें अधिक कहा गया है? अकेला संन्यास ही उन सबको उल्लंघन कर जाता है? कर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है? वेदोंको तथा इस लोक और परलोकको परित्याग करके? धर्मअधर्मको छोड़ इत्यादि शास्त्रवाक्य हैं। तथा यहाँ भी ( संन्यासपरक ) बहुतसे वचन दिखाये गये हैं। उन सब वचनोंको व्यर्थ मानना उचित नहीं और अर्थवादरूप मानना भी ठीक नहीं क्योंकि वे अपने प्रकरणमें स्थित हैं। इसके सिवा अन्तरात्माके अविक्रियस्वरूपमें निश्चयरूपसे स्थित हो जाना ही मोक्ष है। इसलिये भी,( पूर्वोक्त बात ही सिद्ध होती है ) क्योंकि पूर्वसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेका उसके प्रतिकूल पश्चिमसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेके साथ समान मार्ग नहीं हो सकता। अन्तरात्मविषयक प्रतीतिका निरन्तरता रखनेके आग्रहका नाम ज्ञाननिष्ठा है। उसका कर्मोंके साथ रहना,( पूर्वकी ओर जानेकी इच्छावालेके लिये ) पश्चिमसमुद्रकी ओर जानेकी

Chapter 18 (Part 31)

मार्गकी भाँति विरुद्ध है। प्रमाणवेत्ताओने उनका पर्वत और राईके समान भेद निश्चित किया है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ही ज्ञाननिष्ठा करनी चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.55।। व्याख्या --   भक्त्या मामभिजानाति -- जब परमात्मतत्त्वमें आकर्षण? अनुराग हो जाता है? तब साधक स्वयं उस परमात्माके सर्वथा समर्पित हो जाता है? उस तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है। फिर उसका अलग कोई (स्वतन्त्र) अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् उसके अहंभावका अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिये उसको प्रेमस्वरूपा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाती है। उस भक्तिसे परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है।,ब्रह्मभूतअवस्था हो जानेपर संसारके सम्बन्धका तो सर्वथा त्याग हो जाता है? पर मैं ब्रह्म हूँ? मैं शान्त हूँ? मैं निर्विकार हूँ? ऐसा सूक्ष्म अहंभाव रह जाता है। यह अहंभाव जबतक रहता है? तबतक परिच्छिन्नता और पराधीनता रहती है। कारण कि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति पर है इसलिये पराधीनता रहती है। परमात्माकी तरफ आकृष्ट होनेसे? पराभक्ति होनेसे ही यह अहंभाव मिटता है (टिप्पणी प0 949.1)। इस अहंभावके सर्वथा मिटनेसे ही तत्त्वका वास्तविक बोध होता है।यावान् -- सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको समग्ररूप सुननेकी आज्ञा दी कि मेरेमें जिसका मन आसक्त हो गया है? जिसको मेरा ही आश्रय है? वह अनन्यभावसे मेरे साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध रखते हुए मेरे जिस समग्ररूपको जान लेता है? उसको तुम सुनो। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें कही कि जरामरणसे मुक्ति पानके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं? वे ब्रह्म? सम्पूर्ण अध्यात्म और सम्पूर्ण कर्मको अर्थात् सम्पूर्ण निर्गुणविषयको जान लेते हैं और अधिभूत? अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको अर्थात् सम्पूर्ण सगुणविषयको जान लेते हैं।इस प्रकार निर्गुण और सगुणके सिवाय राम? कृष्ण? शिव? गणेश? शक्ति? सूर्य आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होकर परमात्मा लीला करते हैं? उनको भी जान लेना -- यही पराभक्तिसे यावान् अर्थात् समग्ररूपको जानना है।यश्चास्मि तत्त्वतः -- वे ही परमात्मा अनेक रूपोंमें? अनेक आकृतियोंमें? अनेक शक्तियोंको साथ लेकर? अनेक कार्य करनेके लिये बारबार प्रकट होते हैं? और वे ही परमात्मा अनेक सम्प्रदायोंमें अपनीअपनी भावनाके अनुसार अनेक इष्टदेवोंके रूपमें कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूँ -- इसे तत्त्वसे जान लेता है।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् -- ऐसा मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल (टिप्पणी प0 949.2) मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नताका जो भाव था? वह सर्वथा मिट जाता है।तत्त्वसे जाननेपर उसमें जो अनजानपना था? वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है।विशेष बातजीवका परमात्मामें प्रेम (रति? प्रीति या आकर्षण) स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब वह परमात्मासे विमुख हो जाता है और उसका संसारमें आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही वासना? स्पृहा? कामना? आशा? तृष्णा आदि नामोंसे कहा जाता है।इस वासना आदिका जो विषय (प्रकृतिजन्य पदार्थ) है? वह क्षणभङ्गुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं? नित्य और अपरिवर्तनशील है। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे यह परिवर्तनशीलमें आकृष्ट हो जाता है। इससे इसको मिलता तो कुछ नहीं? पर कुछ मिलेगा -- इस भ्रम? वासनाके कारण यह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ महान् दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिये भगवान्ने योग बताया है। वह योग जडतासे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव करा देता है।गीतामें मुख्यरूपसे तीन योग कहे हैं -- कर्मयोग? ज्ञानयोग और भक्तियोग। इन तीनोंपर विचार किया जाय तो भगवान्का प्रेम तीनों ही योगोंमें है। कर्मयोगमें उसको कर्तव्यरति कहते हैं अर्थात् वह रति कर्तव्य होती है -- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः (18। 45)। [कर्मयोगकी यह रति अन्तमें आत्मरतिमें परिणत हो जाती है (गीता 2। 55 3। 17) और जिस कर्मयोगीमें भक्तिके संस्कार हैं? उसकी यह रति भगवद्रतिमें परिणत हो जाती है।] ज्ञानयोगमें उसी प्रेमको आत्मरति कहते हैं अर्थात् वह रति स्वरूपमें होती है -- योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः (5। 24)। और भक्तियोगमें उसी प्रेमको भगवद्रति कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान्में होती है (टिप्पणी प0 950.1) -- तुष्यन्ति च रमन्ति च (10। 9)। इस प्रकार इन तीनों योगोंमें रति होनेपर भी गीतामें भगवद्रति की विशेषरूपसे महिमा गायी गयी है।तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे भी योगी (समतावाला) श्रेष्ठ है (गीता 6। 46)। तात्पर्य यह है कि जडतासे सम्बन्ध रखते हुए बड़ा भारी तप करनेपर? बहुतसे शास्त्रोंका (अनेक प्रकारका) ज्ञानसम्पादन करनेपर और यज्ञ? दान? तीर्थ आदिके बड़ेबड़े अनुष्ठान करनेपर जो कुछ प्राप्त होता है? वह सब अनित्य ही होता है? पर योगीको नित्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। अतः तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे योगी श्रेष्ठ है। इस प्रकारके कर्मयोगी? ज्ञानयोगी? हठयोगी? लययोगी आदि सब योगियोंमें भी भगवान्ने भक्तियोगी को सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता 6। 47)। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी पराभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है। उसी समग्ररूपका वर्णन यहाँ यावान् पदसे हुआ है (टिप्पणी प0 950.2)।इस प्रकरणके आरम्भमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है -- यह कहनेकी प्रतिज्ञा की और बताया कि ध्यानयोगके परायण होनेसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे अहंकार आदिका त्याग करके ममतारहित होकर शान्त होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र होते ही उसकी ब्रह्मभूतअवस्था हो जाती है। ब्रह्मभूतअवस्था होनेपर संसारके सम्बन्धसे जो रागद्वेष? हर्षशोक आदि द्वन्द्व होते थे? वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। सम होनेपर,पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रीति है। उस प्रीतिसे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्वमें प्रवेश हो जाता है -- विशते तदनन्तरम्।अनन्यभक्तिसे तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकता है? उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है (गीता 11। 54) परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट तो होता है? पर भगवान् उसको दर्शन देनेमें बाध्य नहीं होते। कारण कि उसकी साधना पहलेसे ही विवेकप्रधान रही है? इसलिये उसको दर्शनकी इच्छा नहीं होती। दर्शन न होनेपर भी उसमें कोई कमी नहीं रहती अतः कमी माननी नहीं चाहिये।यहाँ उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाना ही अनिर्वचनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेमको नारदभक्तिसूत्रमें प्रतिक्षण वर्धमान कहा है (टिप्पणी प0 951)। इस प्रेममें सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात् उसके लिये करना? जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये न करनेका राग रहता है? न जाननेकी जिज्ञासा रहती है? न जीनेकी आशा रहती है? न मरनेका भय रहता है और न पानेका लालच ही रहता है।जबतक भगवान्में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होता? तबतक ब्रह्मभूतअवस्थामें भी मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंकार रहता है। जबतक लेशमात्र भी अहंकार रहता है? तबतक परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंभाव तबतक जन्ममरणका कारण नहीं बनता? जबतक उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंका सङ्ग नहीं होता क्योंकि गुणोंका सङ्ग होनेसे ही बन्धन होता है -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। उदाहरणार्थ -- गाढ़ नींदसे जगनेपर साधारण मनुष्यमात्रको सबसे पहले यह अनुभव होता है कि मैं हूँ। ऐसा अनुभव होते ही जब नाम? रूप? देश? काल जाति आदिके साथ स्वयंका सम्बन्ध जुड़ जाता है? तब मैं हूँ यह अहंभाव शुभअशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है? जिससे जन्ममरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जेका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूतअवस्था रहती है? उसके सात्त्विक ज्ञान (18। 20) में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल मैं ब्रह्म हूँ अथवा सब कुछ एक परमात्मा ही है -- ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी? मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है? स्मृति आ गयी है। गुणातीत हो जानेपर अर्थात् गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर विस्मृति और स्मृति -- ऐसी दो अवस्थाएँ नहीं होतीं अर्थात् नींदमें भूल हो गयी और अब स्मृति आ गयी -- ऐसा अनुभव नहीं होता? प्रत्युत नींद तो केवल अन्तःकरणमें आयी थी? अपनेमें नहीं? अपना स्वरूप तो ज्योंकात्यों रहा -- ऐसा अनुभव रहता है। तात्पर्य यह है कि निद्राका आना और उससे जगना -- ये दोनों प्रकृतिमें ही हैं? ऐसा उसका स्पष्ट अनुभव रहता है। इसी अवस्थाको चौदहवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा है कि प्रकाश अर्थात् नींदसे जगना और मोह अर्थात् नींदका आना -- इन दोनोंमें गुणातीत पुरुषके किञ्चिन्मात्र भी रागद्वेष नहीं होते। सम्बन्ध --   पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उन्चासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यानप्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.55।।ननु समाधिसाध्येन परमभक्त्यात्मकेन ज्ञानेन किमपूर्वमवाप्यते तत्राह -- तत इति। भक्त्या समाधिजन्यया मां ब्रह्माभिमुख्येन प्रत्यक्तया जानाति व्याप्नोतीत्यर्थः। तदेव ज्ञानं भक्तिपराधीनं विवृणोति -- यावानिति। आकाशकल्पत्वमनवच्छिन्नत्वमसङ्गत्वं च। चैतन्यस्य विषयसापेक्षत्वं प्रतिक्षिपति -- अद्वैतमिति। ये तु द्रव्यबोधात्मत्वमात्मनो मन्यन्ते तान्प्रत्युक्तं -- चैतन्यमात्रेति। आत्मनि तन्मात्रेऽपि धर्मान्तरमुपेत्य धर्मधर्मित्वं प्रत्याह -- एकरसमिति। सर्वविक्रियाराहित्योक्त्या कौटस्थ्यमात्मनो व्यवस्थापयति -- अजमिति। उक्तविक्रियाभावे तद्धेत्वज्ञानासंबन्धं हेतुमाह -- अभयमिति। तत्त्वज्ञानमनूद्य तत्फलं विदेहकैवल्यं लम्भयति -- तत इति। तत्त्वज्ञानस्य तस्मादनन्तरप्रवेशक्रियायाश्च भिन्नत्वं प्राप्तं प्रत्याह -- नात्रेति। भिन्नत्वाभावे का गतिर्भेदोक्तेरित्याशङ्क्यौपचारिकत्वमाह -- किं तर्हीति। प्रवेश इति शेषः। ब्रह्मप्राप्तिरेव फलान्तरमित्याशङ्क्य ब्रह्मात्मनोर्भेदाभावान्न ज्ञानातिरिक्ता तत्प्राप्तिरित्याह -- क्षेत्रज्ञं चेति। ज्ञाननिष्ठया परया भक्त्या मामभिजानातीत्युक्तमाक्षिपति -- नन्विति। विरुद्धत्वं स्फोरयितुं पृच्छति -- कथमिति। विरोधस्फुटीकरणं प्रतिजानीते -- उच्यत इति। तत्र ज्ञानस्योत्पत्तेरेव विषयाभिव्यक्तिरित्याह -- यदेति। एवकारनिरस्यं दर्शयति -- न ज्ञानेति। इत्यावयोः सिद्धमिति शेषः। ज्ञानस्योत्पत्तेरेव विषयाभिव्यक्तत्वेऽपि कथं प्रकृते विरोधधीत्याशङ्क्याह -- ततश्चेति। विरुद्धमिति शेषः। शङ्कितं विरोधं निरस्यति -- नैष दोष इति। उक्तमेव हेतुं प्रपञ्चयति -- शास्त्रेति। यो हि शास्त्रानुसार्याचार्योपदेशस्तेन ज्ञानोत्पत्तिःआचार्यवान्पुरुषो वेद इति श्रुतेः। तस्याश्च परिपाकः संशयादिप्रतिबन्धध्वंसस्तत्र हेतुभूतमुपदेशस्यैव सहकारिकारणं यद्बुद्धिशुद्ध्यादि तदपेक्ष्य तस्मादेवोपदेशाज्जनितं यदैक्यज्ञानं तस्य कारकभेदबुद्धिनिबन्धनानि यानि सर्वाणि कर्माणि तेषां संन्यासेन सहितस्य फलरूपेण स्वात्मन्येव सर्वप्रकल्पनारहिते यदवस्थानं सा ज्ञानस्य परा निष्ठेति व्यवह्रियते प्रामाणिकैरित्यर्थः। यदि यथोक्ता परा ज्ञाननिष्ठा कथं तर्हि सा चतुर्थी भक्तिरित्युक्तेति तत्राह -- सेयमिति। यथोक्तया भक्त्या भगवत्तत्त्वज्ञानं सिध्यतीत्याह -- तयेति। तत्त्वज्ञानस्य फलमाह -- यदनन्तरमिति। ज्ञाननिष्ठारूपाया भगवद्भक्तेस्तत्त्वज्ञानानतिरेकात्तत्फलस्य चाज्ञाननिवृत्तेस्तन्मात्रत्वाद्भेदोक्तेश्चौपचारिकत्वात्प्रकृतं वाक्यमविरुद्धमित्युपसंहरति -- अत इति। औपदेशिकैक्यज्ञानस्य सर्वकर्मसंन्याससहितस्य स्वरूपावस्थानात्मकस्य परमपुरुषार्थौपयिकत्वमित्यस्मिन्नर्थे मानमाह -- अत्र चेति। तदेव शास्त्रमुदाहरति -- विदित्वेत्यादिना। दर्शितानि वाक्यानि सर्वकर्माणि मनसेत्यादीनि। नन्वेषां वाक्यानामविवक्षितार्थत्वान्नास्ति स्वार्थे प्रामाण्यमित्याशङ्क्याध्ययनविध्युपात्तत्वाद्वेदवाक्यानां तदनुरोधित्वाच्चेतरेषां नैवमित्याह -- नचेति। तथापि सोऽरोदीदित्यादिवन्न स्वार्थे मानतेत्याशङ्क्याह -- नचार्थवादत्वमिति। इतश्च मुमुक्षोरपेक्षितमोक्षौपयिकज्ञाननिष्ठस्य संन्यासेऽधिकारो न कर्मनिष्ठायामित्याह -- प्रत्यगिति। ज्ञाननिष्ठस्य कर्मनिष्ठाविरुद्धेत्यत्र दृष्टान्तमाह -- नहीति। ज्ञाननिष्ठास्वरूपानुवादपूर्वकं कर्मनिष्ठया तस्याः सहभावित्वं विरुद्धमिति दार्ष्टान्तिकमाह -- प्रत्यगात्मेति। कथं ज्ञानकर्मणोर्विरोधधीरित्याशङ्क्य कर्मणां ज्ञाननिवर्त्यत्वस्य श्रुतिस्मृतिसिद्धत्वादित्याह -- पर्वतेति। अन्तरवानुभयोरेकधर्मिनिष्ठत्वेन साङ्कर्याभावसंपादकभेदवानित्यर्थः। ज्ञानकर्मणोरसमुच्चये फलितमुपसंहरति -- तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.55।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.55।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.55।। -- भक्त्या माम् अभिजानाति यावान् अहम् उपाधिकृतविस्तरभेदः? यश्च अहम् अस्मि विध्वस्तसर्वोपाधिभेदः उत्तमः पुरुषः आकाशकल्पः? तं माम् अद्वैतं चैतन्यमात्रैकरसम् अजरम् अभयम् अनिधनं तत्त्वतः अभिजानाति। ततः माम् एवं तत्त्वतः ज्ञात्वा विशते तदनन्तरं मामेव ज्ञानानन्तरम्। नात्र ज्ञानप्रवेशक्रिये भिन्ने विवक्षिते ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इति। किं तर्हि फलान्तराभावात् ज्ञानमात्रमेव? क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि (गीता 13।2) इति उक्तत्वात्।।ननु विरुद्धम् इदम् उक्तम् ज्ञानस्य या परा निष्ठा तया माम् अभिजानाति (गीता 18।50) इति। कथं विरुद्धम् इति चेत्? उच्यते -- यदैव यस्मिन् विषये ज्ञानम् उत्पद्यते ज्ञातुः? तदैव तं विषयम् अभिजानाति ज्ञाता इति न ज्ञाननिष्ठां ज्ञानावृत्तिलक्षणाम् अपेक्षते इति अतश्च ज्ञानेन न अभिजानाति? ज्ञानावृत्त्या तु ज्ञाननिष्ठया अभिजानातीति। नैष दोषः ज्ञानस्य स्वात्मोत्पत्तिपरिपाकहेतुयुक्तस्य प्रतिपक्षविहीनस्य यत् आत्मानुभवनिश्चयावसानत्वं तस्य निष्ठाशब्दाभिलापात्। शास्त्राचार्योपदेशेन ज्ञानोत्पत्तिहेतुं सहकारिकारणं बुद्धिविशुद्धत्वादि अमानित्वादिगुणं च अपेक्ष्य जनितस्य क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्वज्ञानस्य कर्तृत्वादिकारकभेदबुद्धिनिबन्धनसर्वकर्मसंन्याससहितस्य स्वात्मानुभवनिश्चयरूपेण यत् अवस्थानम्? सा परा ज्ञाननिष्ठा इति उच्यते। सा इयं ज्ञाननिष्ठा आर्तादिभक्तित्रयापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिरिति उक्ता। तया परया भक्त्या भगवन्तं तत्त्वतः अभिजानाति? यदनन्तरमेव ईश्वरक्षेत्रज्ञभेदबुद्धिः अशेषतः निवर्तते। अतः ज्ञाननिष्ठालक्षणतया भक्त्या माम् अभिजानातीति वचनं न विरुध्यते। अत्र च सर्वं निवृत्तिविधायि शास्त्रं वेदान्तेतिहासपुराणस्मृतिलक्षणं न्यायप्रसिद्धम् अर्थवत् भवति -- विदित्वा৷৷৷৷ व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति (बृह0 उ0 3।5।1) तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः (ना0 उ0 2।79) न्यास एवात्यरेचयत् (ना0 उ0 2।78) इति। संन्यासः कर्मणां न्यासः वेदानिमं च लोकममुं च परित्यज्य (आप0 ध0 1।23।13) त्यज धर्ममधर्मं च ( महा0 शा0 329।40) इत्यादि। इह च प्रदर्शितानि वाक्यानि। न च तेषां वाक्यानाम् आनर्थक्यं युक्तम् न च अर्थवादत्वम् स्वप्रकरणस्थत्वात्? प्रत्यगात्माविक्रियस्वरूपनिष्ठत्वाच्च मोक्षस्य। न हि पूर्वसमुद्रं जिगिमिषोः प्रातिलोम्येन प्रत्यक्समुद्रजिगमिषुणा समानमार्गत्वं संभवति। प्रत्यगात्मविषयप्रत्ययसंतानकरणाभिनिवेशश्च ज्ञाननिष्ठा सा च प्रत्यक्समुद्रगमनवत् कर्मणा सहभावित्वेन विरुध्यते। पर्वतसर्षपयोरिव अन्तरवान् विरोधः प्रमाणविदां निश्चितः। तस्मात् सर्वकर्मसंन्यासेनैव ज्ञाननिष्ठा कार्या इति सिद्धम्।।स्वकर्मणा भगवतः अभ्यर्चनभक्तियोगस्य सिद्धिप्राप्तिः फलं ज्ञाननिष्ठायोग्यता? यन्निमित्ता ज्ञाननिष्ठा मोक्षफलावसाना सः भगवद्भक्तियोगः अधुना स्तूयते शास्त्रार्थोपसंहारप्रकरणे शास्त्रार्थनिश्चयदार्ढ्याय --,

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【 Verse 18.56 】

▸ Sanskrit Sloka: सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: | मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ||

▸ Transliteration: sarvakarmāṇy api sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ | mat-prasādād avāpnoti śāśvataṁ padamavyayam ||

▸ Glossary: sarva: all; karmāṇi: activities; api: although; sadā: always; kurvāṇaḥ: per- forming; mat: under My; vyapāśrayaḥ: protection; mat: My; prasādāt: mercy; avāpnoti: achieves; śāśvataṁ: eternal; padaṁ: abode; avyayam: imperishable

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.56 My devotee occupied in everyday life still reaches under My protection the imperishable ultimate abode through my mercy, through devotion to Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.56।।मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.56।। जो पुरुष मदाश्रित होकर सदैव समस्त कर्मों को करता है? वह मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से शाश्वत? अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.56 सर्वकर्माणि all actions? अपि also? सदा always? कुर्वाणः doing? मद्व्यपाश्रयः taking refuge in Me? मत्प्रसादात् by My grace? अवाप्नोति obtains? शाश्वतम् the eternal? पदम् state or abode? अव्ययम् indestructible.Commentary Worshipping Me with the flowers of his good actions he reaches the imperishable Brahmic seat of ineffable splendour through My grace. He attains union with Me and enjoys the supreme bliss. If by chance he commits some prohibited actions? still? as in the Ganga (Indias most holy river) the waters of the drains and roads find union? so My devotee? becoming united with Me? is unaffected by these prohibited actions.Worship of the Lord through ones duties purifies the heart of the aspirant and prepares him for the devotion to knowledge which eventually leads him to the attainment of Selfrealisation. The Yoga of Devotion is eulogised here.All actions Good actions and even the prohibited actions. He who takes shelter in Me? Vaasudeva? the Lord? with his whole self centred in Me attains the eternal abode of Vishnu? by the grace of the Lord.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.56. Performing all [his] actions all the time and taking refuge in Me, he attains, through My Grace, the eternal, changeless state.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.56 Relying on Me in all his action and doing them for My sake, he attains, by My Grace, Eternal and Unchangeable Life.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.56 Taking refuge in Me and performing all works constantly, one, by My grace, attains the eternal and immutable realm.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.56 Ever engaging even in all actions, one to whom I am the refuge, attains the eternal, immutable State through My grace.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.56 Doing all actions always having taken refuge in Me, by My grace he obtains the eternal indestructible state of being.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.56 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.56 'Taking refuge in Me' means leaving agency etc., to Me. He who performs 'all works constantly' means works that are not only obligatory and occasional acts but even those meant to fulfil desires (Kamya Karmas) - he attains, by My grace, the eternal realm which is immutable. 'Pada' means that which is attained. The meaning is that he attains Me. [The idea is that the performance of even those ritualistic actions enjoined for those having the fulfilment of certain desires in view, even these actions, if done without any such desire but only as the worship of the Supreme Person - the have the same effect as the performance of the enjoined daily and occasional rituals to which no effect except the purification of the self is offered by the Sastras.]

Since it is so, therefore:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.56 Sada, ever; kurvanah api, engaging even in; sarva-karmani, all actions, even the prohibited ones; madvyapasrayah, one to whom I am the refuge, to whom I, Vasudeva the Lord, am the refuge, i.e. one who has totally surrendered himself to Me; even he, apnoti, attains; the sasvatam, eternal; avyayam, immutable; padam, State of Visnu; mat-prasadat, through My, i.e. God's, grace. Since this is so, therefore,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.56।। गीता का तत्त्वज्ञान अत्यन्त जीवन्त और शक्तिशाली है। सरल और सामान्य प्रतीत होने वाला? भगवान् का यह दिव्य गान मानो शक्ति के किसी विस्फोटक पदार्थ का भंडार है जिसे सम्यक् ज्ञान द्वारा विस्फोटित किया जा सकता है।इसके उपदेशानुसार जीवन जीने की उष्णता पाकर वह भण्डार फूट पड़ता है। उसके विस्फोट से एक साधक के श्रेष्ठ एवं दिव्य व्यक्तित्व की संभावनाओं पर जमी हुई अज्ञान की वे समस्त पर्तें ध्वस्त हो जाती हैं। गीता के अनुसार? केवल निष्क्रिय समर्पण अथवा कर्मकाण्ड का अनुष्ठान ही भक्ति नहीं है। कर्तृत्व और भोक्तृत्व के अभिमान का परित्याग कर परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करना भक्ति है। भगवान् श्रीकृष्ण इस बात पर भी विशेष बल देते हैं कि साधक को अपने ज्ञान एवं अनुभव को व्यावहारिक जीवन में भी जीने का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए।भगवान् श्रीकृष्ण के मतानुसार धर्म की पूर्णता विषयों से केवल विरति और निजानुभूति में ही नहीं हैं। उनका यह निश्चित मत है कि ज्ञानी पुरुष को आत्मानुभव के पश्चात् पुन व्यावहारिक जगत् में आकर कर्म करने चाहिए। परन्तु ये कर्म निजानुभव की शान्ति और आनन्द से सुरभित हों? जिससे कि यह मन्द और म्लान जगत् तेजोमय और कान्तिमय बन जाये। इसलिए? परम भक्त बनने के लिए एक और आवश्यक गुण का वर्णन इस श्लोक में किया गया है।निस्वार्थ समाज सेवा के अधिकार पत्र के बिना? गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण न तो किसी भक्त का स्वागत करना चाहते हैं और न किसी को अपना दर्शन देना चाहते हैं। उनकी यह स्पष्ट घोषणा है? जो पुरुष मदाश्रित होकर समस्त कर्म करता है? वह मेरे प्रसाद से अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है।ईश्वरार्पण की भावना से ही कर्तृत्वाभिमान को त्यागा जा सकता है। इस भावना से कर्तव्य पालन करने वाले साधक को ईश्वर का प्रसाद? अर्थात् अनुग्रह (कृपा) प्राप्त होता है।अपनी कृपा से भिन्न ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं है? ईश्वर ही स्वयं अपनी कृपा है और उसकी कृपा ही वह स्वयं है। अत कृपाप्राप्ति का अभिप्राय यह है कि जिस मात्रा में साधक का अन्तकरण शान्त? शुद्ध? स्थिर और सुगठित होगा? उसी मात्रा में उसे परमात्मनुभूति स्पष्ट होगी। परमात्मा नित्य (शाश्वत) और अविकारी (अव्यय) है। इसलिए? भगवान् कहते हैं कि उत्तम साधक उनकी कृपा से शाश्वत? अव्यय पद को प्राप्त होता है।प्रस्तुत प्रकरण में? भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञान? भक्ति एवं कर्म मार्गों को इंगित किया है। इन सबका लक्ष्य एक ही है साधक का साध्य के साथ एकत्व का अनुभव। सम्पूर्ण साधना गीतोपदेश का सार है। कर्म? भक्ति और ज्ञान की संयुक्त रूप में साधना करने से हमारे व्यक्तित्व के शारीरिक? मानसिक एवं बौद्धिक इन तीनों पक्षों में सामञ्जस्य आ जाता है। कर्मयोग? भक्तियोग एवं ज्ञानयोग का क्रमश शरीर? मन और बुद्धि के स्तर पर पालन करने के लिए गीता में उपदेश दिया गया है। इस प्रकार? द्रष्टामन्ताज्ञाता रूप जीव को अपने आत्मस्वरूप में पूर्ण स्थिति सिद्ध कराने में गीतोपदेश का प्रमुख योगदान है। हिन्दुओं की औपनिषदिक संस्कृति के पुनरुत्थान में गीता का महत्वपूर्ण स्थान है।इस प्रकार? ब्रह्मप्राप्ति की साधना का क्रमबद्धविवेचन करने के पश्चात्? उपदेश देते हैं कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.56।।एवं शुद्धान्तःकरणस्य संन्यासधिकारिणो ब्रह्मप्राप्तिक्रममभिधायानात्मज्ञस्याशुद्धान्तःकरणस्य संन्यासनधिकारिणो ब्रह्मप्राप्तिसाधनं भगवद्भक्तियोग्यं तत्र तत्र प्रतिपादतं शास्त्रार्थोपसंहारप्रकरणे शास्त्रार्थनिश्चयदार्ढ्याय स्तौति -- सर्वकर्माणीति। सर्वाणि नित्यनैमित्तिकादीनि प्रतिषिद्धान्पि सदा कुर्वाणोऽनुतिष्ठन्नपि मद्य्वपाश्रयोऽहं वासुदेव ईश्वरो व्यपाश्रय आश्रयणीयो यस्य स मद्य्वपाश्रयो मय्यर्पितसर्वात्मभावः मत्प्रासादान्ममेश्वरस्य प्रसादात् शाश्वतं नित्यमव्ययमपक्षयशून्यं पदं वैष्णवमवाप्नोति। निषिद्धान्यप्याचरन् शाश्वतं पदमव्ययमवाप्नोतीत्युक्त्या पापस्यापि मोक्षफलहेतुत्वं स्यादित्याशङ्कानिरासाय मद्य्वपाश्रयः मत्प्रसादादित्युक्तम्। तथाच येन भक्तियोगेन प्रसादितादौश्वरात्सर्वक्रमाण्यनुतिष्ठतोऽपि वैष्णवपदप्राप्तितस्य माहात्म्यं किं वक्तव्य मिति भाव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.56।।ननु योऽनात्मज्ञोऽशुद्धान्तःकरणः सोऽन्तःकरणशुद्धिपर्यन्तं सहजं कर्म न त्यजेत्। यस्तु शुद्धान्तःकरणः स नैष्कर्म्यसिद्धिं संन्यासेनाधिगच्छतीत्युक्तं संन्यासश्च ब्राह्मणेनैव कर्तव्यो न क्षत्रियवैश्याभ्यामिति प्रागुक्तं भगवताकर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय इत्यत्र। तत्र शुद्धान्तःकरणेन क्षत्रियादिना किं कर्माण्यनुष्ठेयानि किं सर्वकर्मसंन्यासः कर्तव्यः। नाद्यःआरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते इत्यादिना योगमन्तःकरणशुद्धिमारूढस्य कर्मानुष्ठाननिषेधात्। न द्वितीयः।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः इत्यादिना ब्राह्मधर्मस्य सर्वकर्मसंन्यासस्य क्षत्रियादिकं प्रति निषेधात्। नच कर्मानुष्ठानकर्मत्यागयोरन्यतरमन्तरेण तृतीयः प्रकारोऽस्ति। तस्मादुभयोरपि प्रतिषिद्धत्वे गत्यन्तराभावेन चावश्यकर्तव्ये प्रतिषेधातिक्रमे कर्मत्याग एव श्रेयान् बन्धहेतुपरित्यागेन मोक्षसाधनपौष्कल्यान्नतु कर्माण्यनुष्ठेयानि चित्तविक्षेपहेतुत्वेन मोक्षसाधनज्ञानप्रतिबन्धकत्वादित्यभिप्रायमर्जुनस्यालक्ष्याह भगवान् -- सर्वकर्माण्यपीति। यः पूर्वोक्तः कर्मभिः शुद्धान्तःकरणः सोऽवश्यं भगवदेकशरणो भगवदेकशरणतार्पयन्तत्वादन्तःकरणशुद्धेः? एतादृशश्चेद्ब्राह्मणः संन्यासप्रतिबन्धरहितः सर्वकर्माणि संन्यस्यतु नाम संसारविमोक्षस्तु तस्य भगवदेकशरणस्य भगवत्प्रसादादेव। एतादृशश्चेत्क्षत्रियादिः संन्यासानधिकारी स करोतु नाम कर्माणि किंतु मद्व्यपाश्रयोऽहं भगवान्वासुदेव एव व्यपाश्रयः शरणं यस्य स मदेकशरणो,मय्यर्पितसर्वात्मभावः संन्यासानधिकारात्सर्वकर्माणि सर्वाणि कर्माणि वर्णाश्रमधर्मरूपाणि लौकिकानि प्रतिषिद्धानि वा सदा कुर्वाणो मत्प्रसादान्ममेश्वरस्यानुग्रहादवाप्नोति। हिरण्यगर्भवन्मद्विज्ञानोत्पत्त्या शाश्वतं नित्यं पदं वैष्णवमव्ययमपरिणाम्येतादृशो भगवदेकशरणः करोत्येव न प्रतिषिद्धानि कर्माणि। यदि कुर्यात्तथापि मत्प्रसादात्प्रत्यवायानुत्पत्त्या मद्विज्ञानेन मोक्षभाग्भवतीति भगवदेकशरणतास्तुत्यर्थं सर्वकर्माणि सर्वदा कुर्वाणोऽपीत्यनूद्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.56।।ननुतद्यथैषीकातूलमग्नौ प्रोतं दूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते इति पूर्वकर्मणां ज्ञानेन प्रायश्चित्तेनेव सत्यपि नाशश्रवणे ज्ञानोत्तरकालीनानां कर्मणां नाशाभावात् ज्ञानोत्तरमपि देहधारणे स्वाभाविकानां कर्मणां वर्जनस्यासंभवादवश्यं ज्ञानिनोऽपि बन्धः स्यादित्याशङ्क्याह -- सर्वकर्माणीति। मद्व्यपाश्रयोऽहमेव प्रज्ञानघनः प्रत्यगात्मा व्यपाश्रय आश्रयो यस्य स मद्व्यपाश्रयो ज्ञानी। सर्वकर्माणि विहितानि निषिद्धानि वा सदाऽसकृत्कुर्वाणोऽपि मत्प्रसादान्मदनुग्रहात् शाश्वतं नित्यं अव्ययं परमसर्वोत्कृष्टं पदं पदनीयं मोक्षमवाप्नोति। न तु ज्ञानोत्तरमपि क्रियमाणैः कर्मभिर्बध्यते।तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् इति?न ह वा एवविदि किंचन राज आध्वंसतेतं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन इत्यादिशास्त्रेण तत्त्वज्ञानिनः कर्मालेपश्रवणात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.56।।एवं स्वकर्मफलमुक्त्वा स्वसम्बन्धिकर्मफलमाह -- सर्वकर्माण्यपीति। सदा निरन्तरं मद्व्यपाश्रयः अहमेवाश्रयणीयो यस्य तादृशः सन् सर्वकर्माण्यपि मदाज्ञारूपेण? न तु फलाभिलाषेण कुर्वाणो मत्प्रसादात् शाश्वतमनादि? अव्ययमविनाशि? एतादृशं पदमक्षरमवाप्नोति? प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.56।।स्वकर्मभिः परमेश्वराराधनादुक्तं मोक्षप्रकारमुपसंहरति -- सर्वकर्माणीति। सर्वकर्माणि नित्यनैमित्तिकानि काम्यानि च कर्माणि पूर्वोक्तक्रमेण मद्व्यपाश्रयः सन् कुर्वाणोऽहमेव व्यपाश्रय आश्रयणीयो नतु स्वर्गादिफलं यस्य सः मत्प्रसादाच्छाश्वतमनादि अव्ययं नित्यं सर्वोत्कृष्टं वैष्णवं पदं प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.56।।इदानीं सर्वेषामपि कर्मणामुक्तिविधयाऽनुष्ठीयमानानां तु सतामेष एव विपाक इत्याह -- सर्वेति। यो भगवन्मार्गीयत्वादृशः सर्वाणि लौकिकानि वैदिकानि च स्वधर्मरूपाणि कर्माणि मदधीनः सन्कुर्वाणः भगवानेवान्तर्यामी प्रेरयति? तदिच्छया कृतं कर्म बन्धकं न भवतीति भगवन्तं मामाश्रितः स मत्प्रसादान्मत्कृपातः नित्यं पदं ब्रह्माक्षरं धामाप्नोति। इदमप्येकं परं फलं भक्तितत्त्वज्ञानतः पुरुषोत्तमसायुज्यमित्याशयेनअव इत्युपसर्गः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.56।।अपने कर्मोंद्वारा भगवान्की पूजा करनारूप भक्तियोगकी सिद्धि? अर्थात् फल? ज्ञाननिष्ठाकी योग्यता है। जिस ( भक्तियोग ) से होनेवाली ज्ञाननिष्ठा? अन्तमें मोक्षरूप फल देनेवाली होती है? उस भगवद्भक्तियोगकी अब शास्त्राभिप्रायके उपसंहारप्रकरणमें? शास्त्रअभिप्रायके निश्चयको दृढ़ करनेके लिये स्तुति की जाती है --, सदा सब कर्मोंको करनेवाला अर्थात् निषिद्ध कर्मोंको भी करनेवाला जो मद्व्यपाश्रय भक्त है -- जिसका मैं वासुदेव ही पूर्ण आश्रय हूँ? ऐसा मुझे ही अपना सब कुछ अर्पण कर देनेवाला जो भक्त है? वह भी मुझ ईश्वरके अनुग्रहसे? विष्णुके शाश्वत -- नित्य -- अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.56।। व्याख्या --   मद्व्यपाश्रयः -- कर्मोंका? कर्मोंके फलका? कर्मोंके पूरा होने अथवा न होनेका? किसी घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है? अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता? किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता? सर्वथा मेरे आश्रित रहता है? ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता 12। 7) उसको अपने जीवननिर्वाह या साधनसम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता 9। 22) -- यह मेरा सदाका एक विधान है? नियम है? जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता 9। 30 -- 32)।सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणः -- यहाँ कर्माणि पदके साथ सर्व और कुर्वाणः पदके साथ सदा पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर? वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है? उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है? उसी पदको लौकिक? पारलौकिक? सामाजिक? शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है।हरेक व्यक्तिको यह बात तो समझमें आ जाती है कि जो एकान्तमें रहता है और साधनभजन करता है? उसका कल्याण हो जाता है परन्तु यह बात समझमें नहीं आती कि जो सदा मशीनकी तरह संसारका सब काम करता है? उसका कल्याण कैसे होगा उसका कल्याण हो जाय? ऐसी कोई युक्ति नहीं दीखती क्योंकि ऐसे तो सब लोग कर्म करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं? मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं? पर उन सबका कल्याण होता हुआ दीखता नहीं और शास्त्र भी ऐसा कहता नहीं इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं -- मत्प्रसादात्। तात्पर्य यह है कि जिसने केवल मेरा ही आश्रय ले लिया है? उसका कल्याण मेरी कृपासे हो जायगा? कौन है मना करनेवालायद्यपि प्राणिमात्रपर भगवान्का अपनापन और कृपा सदासर्वदा स्वतःसिद्ध है? तथापि यह मनुष्य जबतक असत् संसारका आश्रय लेकर भगवान्से विमुख रहता है? तबतक भगवत्कृपा उसके लिये फलीभूत नहीं होती अर्थात् उसके काममें नहीं आती। परन्तु यह मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर ज्योंज्यों दूसरा आश्रय छोड़ता जाता है? त्योंहीत्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता चला जाता है? और ज्योंज्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों भगवत्कृपाका अनुभव होता जाता है। जब सर्वथा भगवान्का आश्रय ले लेता है? तब उसे भगवान्की कृपाका पूर्ण अनुभव हो जाता है।अवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् -- स्वतःसिद्ध परमपदकी प्राप्ति अपने कर्मोंसे? अपने पुरुषार्थसे अथवा अपने साधनसे नहीं होती। यह तो केवल भगवत्कृपासे ही होती है। शाश्वत अव्ययपद सर्वोत्कृष्ट है। उसी परमपदको भक्तिमार्गमें परमधाम? सत्यलोक? वैकुण्ठलोक? गोलोक? साकेतलोक आदि कहते हैं और ज्ञानमार्गमें विदेहकैवल्य? मुक्ति? स्वरूपस्थिति आदि कहते हैं। वह परमपद तत्त्वसे एक होते हुए भी मार्गों और उपासनाओंका भेद होनेसे उपासकोंकी दृष्टिसे भिन्नभिन्न कहा जाता है (गीता 8। 21 14। 27)। भगवान्का चिन्मय लोक एक देशविशेषमें होते हुए भी सब जगह व्यापकरूपसे परिपूर्ण है। जहाँ भगवान् हैं? वहीं उनका लोक भी है क्योंकि भगवान् और उनका लोक तत्त्वसे एक ही हैं। भगवान् सर्वत्र विराजमान हैं अतः उनका लोक भी सर्वत्र विराजमान (सर्वव्यापी) है। जब भक्तकी अनन्य निष्ठा सिद्ध हो जाती है? तब परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और वही लोक उसके सामने प्रकट हो जाता है अर्थात् उसे यहाँ जीतेजी ही उस लोककी दिव्य लीलाओंका अनुभव होने लगता है। परन्तु जिस भक्तकी ऐसी धारणा रहती है कि वह दिव्य लोक एक देशविशेषमें ही है? तो उसे उस लोककी प्राप्ति शरीर छोड़नेपर ही होती है। उसे लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं और कहींकहीं स्वयं भगवान् भी आते हैं। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.56।।तर्हि ज्ञाननिष्ठस्यैव मोक्षसंभवान्न कर्मानुष्ठानसिद्धिरित्याशङ्क्याह -- स्वकर्मणेति। तामेव सिद्धिप्राप्तिं विशिनष्टि -- ज्ञानेति। ज्ञाननिष्ठायोग्यतायै स्वकर्मानुष्ठानं भगवदर्चनरूपं कर्तव्यमित्यर्थः। ज्ञाननिष्ठायोग्यतापि किमर्थेत्याशङ्क्य ज्ञाननिष्ठासिद्ध्यर्थेत्याह -- यन्निमित्तेति। ज्ञाननिष्ठापि कुत्रोपयुक्तेत्यत्राह -- मोक्षेति। स्वकर्मणा भगवदर्चनात्मनो भक्तियोगस्य परम्परया मोक्षफलस्य कार्यत्वेन विधेयत्वे विध्यपेक्षितां स्तुतिमवतारयति -- स भगवदिति। ज्ञाननिष्ठा कर्मनिष्ठेत्युभयं प्रतिज्ञाय तत्र तत्र विभागेन प्रतिपादितं किमितीदानीं कर्मनिष्ठा पुनः स्तुत्या कर्तव्यतयोच्यते तत्राह -- शास्त्रार्थेति। तत्रतत्रोक्तस्यैव कर्मानुष्ठानस्य प्रकरणवशादिहोपसंहारः। स च शास्त्रार्थनिश्चयस्य दृढतां द्योतयतीत्यर्थः। यद्यपि कस्यचित्कर्मानुष्ठायिनो बुद्धिशुद्धिद्वारा कैवल्यं सिध्यति तथापि पापबाहुल्यात्कर्मानुष्ठायिनोऽपि कस्यचिद्बुद्धिशुद्ध्यभावे कैवल्यासिद्धिरित्याशङ्क्याह -- सर्वकर्माणीति। सर्वशब्दानुरोधादीश्वराराधनस्तुतिपरत्वेन श्लोकं व्याचष्टे -- प्रतिषिद्धान्यपीति। नित्यनैमित्तिकवदित्यपेरर्थः। निषिद्धाचरणस्य प्रामादिकत्वं व्यावर्तयति -- सदेति। अनुतिष्ठन्वैष्णवं पदमाप्नोतीति संबन्धः। पापकर्मकारिणो यथोक्तपदप्राप्तौ पापस्यापि मोक्षफलत्वमुपगतं स्यादित्यत्राह -- मद्व्यपाश्रय इति। तस्यैव तात्पर्यमाह -- मयीति। तर्हि ज्ञानस्य मोक्षहेतुत्वमुपेक्षितं स्यादित्यत्राह -- सोऽपीति। प्रसादोऽनुग्रहः सम्यग्ज्ञानोदयः पदं पदनीयमुपनिषत्तात्पर्यगम्यमव्ययमपक्षयरहितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.56।।उत्तरग्रन्थस्य सङ्गतिं सूचयंस्तात्पर्यमाह -- पुनरिति। उपसंहरति? शास्त्रमिति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.56।।पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति -- सर्वकर्माणीत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.56।। --,सर्वकर्माण्यपि प्रतिषिद्धान्यपि सदा कुर्वाणः अनुतिष्ठन् मद्व्यपाश्रयः अहं वासुदेवः ईश्वरः व्यपाश्रयणं यस्य सः मद्व्यपाश्रयः मय्यर्पितसर्वभावः इत्यर्थः। सोऽपि मत्प्रसादात् मम ईश्वरस्य प्रसादात् अवाप्नोति शाश्वतं नित्यं वैष्णवं पदम् अव्ययम्।।यस्मात् एवम् --,

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【 Verse 18.57 】

▸ Sanskrit Sloka: चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: | बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव ||

▸ Transliteration: cetasā sarvakarmāṇi mayi sannyasya matparaḥ | buddhiyogam upāśritya maccittaḥ satataṁ bhava ||

▸ Glossary: cetasā: by intelligence; sarvakarmāṇi: all kinds of activities; mayi: unto Me; sannyasya: giving up; matparaḥ: My protection; buddhiyogaṁ: devotional activities; upāśritya: taking shelter of; maccittaḥ: consciousness; satataṁ: always; bhava: just become

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.57 While being engaged in activities just depend upon Me, and being fully conscious of Me, work always under My protection.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.57।।चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके? मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.57।। मन से समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करके मत्परायण होकर बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम सतत मच्चित्त बनो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.57 चेतसा mentally? सर्वकर्माणि all actions? मयि in Me? संन्यस्य resigning? मत्परः having Me as the highest goal? बुद्धियोगम् the Yoga of discrimination? उपाश्रित्य resorting to? मच्चित्तः with the mind fixed on Me? सततम् always? भव be.Commentary Do thou? O Arjuna? surrender all thy actions to Me whilst at the same time fixing thy mind on discrimination. Then through that discrimination thou wilt see thy Self as separate from the body and activity and existing in My pure Being. Chetasa Mentally with the discriminative faith that knowledge finally leads to liberation when the heart is purified through selfless works done with the spirit of offering to God.Sarvakarmani All actions producing visible and invisible results.Me The Lord As taught in verse 27 of chapter IX Whatever thou doest? whatever thou eatest? etc.? do thou dedicate all thy actions to Me.Matparah Taking Me? Vaasudeva? as the supreme goal? and his whole self centred in Me.Resorting to Buddhi Yoga As thy sole refuge steadymindedness.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.57. [Hence] renouncing by mind all actions in Me, O descendant of Bharata, and taking hold of the knowledge-Yoga, you must always be with your thought-organ [turned] towards Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.57 Surrender then thy actions unto Me, live in Me, concentrate thine intellect on Me, and think always of Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.57 Surrendering all acts to me by your mind, thinking of Me as the goal, and resorting to Buddhi-yoga, focus your thought ever on Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.57 Mentally surrendering all actions to Me and accepting Me as the supreme, have your mind ever fixed on Me by resorting to the concentration of your intellect.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.57 Mentally renouncing all actions in Me, having Me as the highest goal, resorting to the Yoga of discrimination do thou ever fix thy mind on Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.57 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.57 'By your mind' means with thought which considers the self as belonging to Me and as controlled by Me. For, it has been declared: 'Surrendering all your acts to Me with a mind focussed on the self' (3.30). Surrendering all acts to Me along with agentship and the object of worship and regarding 'Me as the goal,' i.e., constantly contemplating that I alone am to be attained as the goal; performing all acts; and resorting to Buddhi-Yoga - focus your mind on Me always. Buddhi Yoga here implies the mental attitude special to the seeker of salvation in regard to agency of works, the fruits etc.

Thus

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.57 Cetasa, mentally, with a discriminating intellect; sannyasya, surrendering; sarva-karmani, all actions meant for seen or unseen results; mayi, to Me, to God, in the manner described in, 'Whatever you do, whatever you eat' (9.27); and matparah, accepting Me as the supreme-you to whom I, Vasudeva, am the supreme, are matparah; becoming so; satatam, ever; maccittah bhava, have your kind fixed only on Me; upasritya, by resorting-resorting implies not taking recourse to anything else-; buddhi-yogam, to the concentration of your intellect. Having the intellect (buddhi) concentrated on Me is buddhi-yoga.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.57।। मन से अर्थात् ज्ञानपूर्वक समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करो। इस वाक्य का अर्थ है कर्मों में कर्तृत्वाभिमान और फलासक्ति का त्याग करके केवल ईश्वरार्पण की भावना से कर्म करो। इस सिद्धांत का विस्तृत विवेचन इसके पूर्व किया जा चुका है।मत्पर भव जिस पुरुष के लिए मैं अर्थात् परमात्मा ही परम लक्ष्य है? वह पुरुष मत्पर कहा जाता है। ईश्वर को ही जीवन का लक्ष्य समझे बिना हममें ईश्वरार्पण की भावना नहीं आ सकती। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को ईश्वर परायण होने का उपदेश देते हैं।बुद्धियोग कर्मयोग में अर्पण बुद्धि अर्थात् भावना का महत्व होने से उसे ही भगवान् श्रीकृष्ण ने बुद्धियोग की संज्ञा प्रदान की है। इसका भी विवेचन किया जा चुका है।मच्चित्तभव जिसका मन मुझ परमात्मा में स्थित है वह मच्चित है। मुझमें कर्मों का संन्यास करके तथा मत्पर बनो? इन दो वाक्यों से क्रमश कर्म एवं ज्ञान योग इंगित किया गया है? और अब मच्चित शब्द से भक्ति को सूचित कर रहे हैं।मानसिक जीवन का यह नियम है कि जैसा हम चिन्तन करते हैं? वैसे ही हम बनते हैं। इस नियमानुसार जो भक्त सतत कृष्ण तत्त्व का चिन्तन करता है वह स्वयं श्रीकृष्ण परमात्मा स्वरूप बन जाता है। यही अव्यय आत्मस्वरूप है।यदि कोई मनुष्य भगवान् के इस उपदेश को अस्वीकार करता है? तो उसकी क्या गति होगी सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.57।।यतो भक्तियोगस्यैवं माहात्म्यं तस्मान्मप्रसादार्थं भवता मदाराघने प्रयतितव्यमित्याह -- चेतसेति। चेतसा विवेकबुद्य्धा सर्वकर्माणि दृष्टादृष्टार्थानि मयि संन्यस्ययत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषु ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् इत्युक्तन्यायेन समर्प्य मत्परोऽहं वासुदेवएव परः प्रकृष्टः प्राप्यो यस्य नतु स्वर्गादिः स मत्परः सन् बुद्धियोगं समाहितबुद्धित्वं सिद्य्धसिद्धिजन्याभ्यां हर्षविषादाभ्यां अक्षुभितबुद्धित्वमुपाश्रित्यानन्यशरणत्वेनाङगीकृत्य मच्चित्तो मय्येव चित्तं यस्य स त्वं सततं सर्वदा मच्चित्तो भव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.57।।यस्मान्मदेकशरणतामात्रं मोक्षसाधनं न कर्मानुष्ठानं कर्मसंन्यासो वा तस्मात्क्षत्रियस्त्वं -- चेतसीति। चेतसा विवेकबुद्ध्या सर्वकर्माणि दृष्टादृष्टार्थानि मयीश्वरे संन्यस्ययत्करोषि यदश्नासि इत्युक्तन्यायेन समर्प्य मत्परोऽहं भगवान्वासुदेव एव परः प्रियतमो यस्य स मत्परः सन् बुद्धियोगं पूर्वोक्तसमत्वबुद्धिलक्षणं योगं बन्धहेतोरपि कर्मणो मोक्षहेतुत्वसंपादकमुपाश्रित्यानन्यशरणतया स्वीकृत्य मच्चित्तो मयि भगवति वासुदेव एव चित्तं यस्य न राजनि कामिन्यादौ वा स मच्चित्तः सततं भव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.57।।एवं वर्णाश्रमादिधर्मपुरस्कारेण ससाधना सफला च ब्रह्मविद्या निरूपिता। अस्याः प्राप्तये पुनः साधनत्वेन भक्तिमेव विधत्ते -- चेतसेति। चेतसा विवेकबुद्ध्या सर्वाणि कर्माणि नित्यनैमित्तिकानि मयि भगवति,वासुदेवे संन्यस्ययत्करोषि यदश्नासि इत्युक्तरीत्या समर्प्य मत्परः अहमेव परः प्राप्यो यस्य न तु मद्भक्त्या अर्थादीन्प्रार्थयानः। बुद्धियोगं पूर्वोक्तं सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वलक्षणं बन्धहेतोरपि कर्मणो

Chapter 18 (Part 32)

मोक्षहेतुत्वसंपादकं उपाश्रित्य आश्रित्य मच्चित्तः मदेकशरणः सततं सर्वदा भव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.57।।यस्मान्मदाश्रितस्य कर्मकरणेऽपि तद्बाधरहितं फलं भवत्यतस्त्वमप्येवं कुर्वित्याह -- चेतसेति। चेतसा बहिरप्रदर्शयन् निष्कपटतया सर्वकर्माणि सन्न्यस्य मयि सम्यक् प्रकारेण स्थापयित्वा समर्प्येति यावत्। मदाज्ञया कुर्वाणो मत्परः अहमेव परो मुख्यः प्राप्यो यस्यैतादृशः सन् बुद्ध्या व्यवसायात्मिकया योगमुक्तप्रकारं उपाश्रित्य सतृतं निरन्तरं मच्चित्तः मय्येव चित्तं यस्य तादृशो भव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.57।।यस्मादेवं तस्मात् -- चेतसेति। सर्वकर्माणि चेतसा मयि संन्यस्य समर्प्य मत्परः अहमेव परः प्राप्यः पुरुषार्थो यस्य सः व्यवसायात्मिकया बुद्ध्या योगमाश्रित्य सततं कर्मानुष्ठानकालेऽपिब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः इति न्यायेन मय्येव चित्तं यस्य तथाभूतो भव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.57।।अतस्त्वमपि चेतसा योगभक्तिवासितेन मयि साक्षात्कर्त्तरि परदेवतायां सन्न्यस्यानुसन्धाय त्यागार्थकत्वेऽपिदण्डिपुरुषं त्यज इतिवद्विशेषणपरित्यागविषयक एव? न तु विशेष्यपरित्यागविषयक इति कर्तृत्वादित्यागपूर्वं मत्परःनाहं कर्ता? मदन्तर्यामी मुख्यकर्ता सर्वं करोति? अहं तु तदधीनः? स यथा प्रेरयति तथा करोमि इति भावेन मदुक्तकारितया वा मत्परः? उक्तसाङ्ख्ययोगाश्रयं बुद्धियोगमुपाश्रित्य सततं मच्चित्तो भव।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.57।।जब कि यह बात है इसलिये --, तू दृष्ट और अदृष्ट फलवाले समस्त कर्मोंको विवेकबुद्धिसे अर्थात् यत्करोषि यदश्नासि इस श्लोकमें बतलाये हुए भावसे? मुझ ईश्वरमें समर्पण करके तथा मेरे परायण होकर? अर्थात् मैं वासुदेव ही जिसका पर,( परमगति ) हूँ ऐसा होकर? मुझमें बुद्धिको स्थिर करनारूप बुद्धियोगका आश्रय लेकर -- बुद्धियोगके अनन्यशरण होकर? निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो? अर्थात् जिसका निरन्तर मुझमें ही चित्त रहे? ऐसा हो।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.57।। व्याख्या --   [इस श्लोकमें भगवान्ने चार बातें बतायी हैं --,(1) चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य -- सम्पूर्ण कर्मोंको चित्तसे मेरे अर्पण कर दे।(2) मत्परः -- स्वयंको मेरे अर्पित कर दे।(3) बुद्धियोगमुपाश्रित्य -- समताका आश्रय लेकर संसारसे सम्बन्धविच्छेद कर ले।(4) मच्चितः सततं भव -- निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा अर्थात् मेरे साथ अटल सम्बन्ध कर ले।]चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य -- चित्तसे कर्मोंको अर्पित करनेका तात्पर्य है कि मनुष्य चित्तसे यह दृढ़तासे मान ले कि मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि और संसारके व्यक्ति? पदार्थ? घटना? परिस्थिति आदि सब भगवान्के ही हैं। भगवान् ही इन सबके मालिक हैं। इनमेंसे कोई भी चीज किसीकी व्यक्तिगत नहीं है। केवल इन वस्तुओंका सदुपयोग करनेके लिये ही भगवान्ने व्यक्तिगत अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकारको भी भगवान्के अर्पण कर देना है।शरीर? इन्द्रियाँ? मन आदिसे जो कुछ शास्त्रविहित सांसारिक या पारमार्थिक क्रियाएँ होती हैं? वे सब भगवान्की मरजीसे ही होती हैं। मनुष्य तो केवल अहंकारके कारण उनको अपनी मान लेता है। उन क्रियाओँमें जो अपनापन है? उसे भी भगवान्के अर्पण कर देना है क्योंकि वह अपनापन केवल मूर्खतासे माना हुआ है? वास्तवमें है नहीं। इसलिये उनमें अपनेपनका भाव बिलकुल उठा देना चाहिये और उन सबपर भगवान्की मुहर लगा देनी चाहिये।मत्परः -- भगवान् ही मेरे परम आश्रय हैं? उनके सिवाय मेरा कुछ नहीं है? मेरेको करना भी कुछ नहीं है? पाना भी कुछ नहीं है? किसीसे लेना भी कुछ नहीं है अर्थात् देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिसे मेरा किञ्चिन्मात्र कोई प्रयोजन नहीं है -- ऐसा अनन्यभाव हो जाना ही भगवान्के परायण होना है।एक बात खास ध्यान देनेकी है -- रुपयेपैसे? कुटुम्ब? शरीर आदिको मनुष्य अपना मानते हैं और मनमें यह समझते हैं कि हम इनके मालिक बन गये? हमारा इनपर आधिपत्य है परन्तु वास्तवमें यह बात बिलकुल झूठी है? कोरा वहम है और बड़ा भारी धोखा है। जो किसी चीजको अपनी मान लेता है? वह उस चीजका गुलाम बन जाता है और वह चीज उसका मालिक बन जाती है। फिर उस चीजके बिना वह रह नहीं सकता। अतः जिन चीजोंको मनुष्य अपनी मान लेता है? वे सब उसपर चढ़ जाती हैं और वह तुच्छ हो जाता है। वह चीज चाहे रुपया हो? चाहे कुटुम्बी हो? चाहे शरीर हो? चाहे विद्याबुद्धि आदि हो। ये सब चीजें प्राकृत हैं और अपनेसे भिन्न हैं? पर हैं। इनके अधीन होना ही पराधीन होना है।भगवान् स्वकीय हैं? अपने हैं। उनको मनुष्य अपना मानेगा? तो वे मनुष्यके वशमें हो जायँगे। भगवान्के हृदयमें भक्तका जितना आदर है? उतना आदर करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है। भगवान् भक्तके दास हो जाते हैं और उसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं -- मैं तो हूँ भगतनका दास भगत मेरे मुकुटमणि? परन्तु संसार मनुष्यका दास बनकर उसे अपना मुकुटमणि नहीं बनायेगा। वह तो उसे अपना दास बनाकर पददलित ही करेगा। इसलिये केवल भगवान्के शरण होकर सर्वथा उन्हींके परायण हो जाना चाहिये।बुद्धियोगमुपाश्रित्य -- गीताभरमें देखा जाय तो समताकी बड़ी भारी महिमा है। मनुष्यमें एक समता आ गयी तो वह ज्ञानी? ध्यानी? योगी? भक्त आदि सब कुछ बन गया। परन्तु यदि उसमें समता नहीं आयी तो अच्छेअच्छे लक्षण आनेपर भी भगवान् उसको पूर्णता नहीं मानते। वह समता मनुष्यमें स्वाभाविक रहती है। केवल आनेजानेवाली परिस्थितियोंके साथ मिलकर वह सुखीदुःखी हो जाता है। इसलिये उनमें मनुष्य सावधान रहे कि आनेजानेवाली परिस्थितिके साथ मैं नहीं हूँ। सुख आया? अनुकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और सुख चला गया? अनुकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। ऐसे ही दुःख आया? प्रतिकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और दुःख चला गया? प्रतिकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। अतः सुखदुःखमें? अनुकूलताप्रतिकूलतामें? हानिलाभमें मैं सदैव ज्योंकात्यों रहता हूँ। परिस्थितियोंके बदलनेपर भी मैं नहीं बदलता? सदा वही रहता हूँ। इस तरह अपनेआपमें स्थित रहे। अपनेआपमें स्थित रहनेसे सुखदुःख आदिमें समता हो जायगी। यह समता ही भगवान्की आराधना है -- समत्वमाराधनमच्युतस्य (विष्णुपुराण 1। 17। 90)। इसीलिये यहाँ भगवान् बुद्धियोग अर्थात् समताका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं।मच्चित्तः सततं भव -- जो अपनेको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है? उसका चित्त भी सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित हो जाता है। फिर उसपर भगवान्का जो स्वतःस्वाभाविक अधिकार है? वह प्रकट हो जाता है और उसके चित्तमें स्वयं भगवान् आकर विराजमान हो जाते हैं। यही मच्चित्तः होना है।मच्चित्तः पदके साथ सततम् पद देनेका अर्थ है कि निरन्तर मेरेमें (भगवान्में) चित्तवाला हो जा। भगवान्का निरन्तर चिन्तन तभी होगा? जब मैं भगवान्का हूँ इस प्रकार अहंता भगवान्में लग जायगी। अहंता भगवान्में लग जानेपर चित्त स्वतःस्वाभाविक भगवान्में लग जाता है। जैसे? शिष्य बननेपर मैं गुरुका हूँ इस प्रकार अहंता गुरुमें लग जानेपर गुरुकी याद निरन्तर बनी रहती है। गुरुका सम्बन्ध अहंतामें बैठ जानेके कारण इस सम्बन्धकी याद आये तो भी याद है और याद न आये तो भी याद है क्योंकि स्वयं निरन्तर रहता है। इसमें भी देखा जाय तो गुरुके साथ उसने खुद सम्बन्ध जोड़ा है परन्तु भगवान्के साथ इस जीवका स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। उस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा।,साधक कोई भी सांसारिक कामधंधा करे? तो उसमें यह एक सावधानी रखे कि अपने चित्तको उस कामधंधेमें द्रवित न होने दे? चित्तको संसारके साथ घुलनेमिलने न दे अर्थात् तदाकार न होने दे? प्रत्युत उसमें अपने चित्तको कठोर रखे। परन्तु भगवन्नामका जप? कीर्तन? भगवत्कथा? भगवच्चिन्तन आदि भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें चित्तको द्रवित करता रहे? तल्लीन करता रहे? उस रसमें चित्तको तरान्तर करता रहे (टिप्पणी प0 954.1)। इस प्रकार करते रहनेसे साधक बहुत जल्दी भगवान्में चित्तवाला हो जायगा।प्रेमसम्बन्धी विशेष बातचित्तसे सब कर्म भगवान्के अर्पण करनेसे संसारसे नित्यवियोग हो जाता है (टिप्पणी प0 954.2) और भगवान्के परायण होनेसे नित्ययोग (प्रेम) हो जाता है। नित्ययोगमें योग? नित्ययोगमें वियोग? वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें वियोग -- ये चार अवस्थाएँ चित्तकी वृत्तियोंको लेकर होती हैं। इन चारों अवस्थाओंको इस प्रकार समझना चाहिये -- जैसे? श्रीराधा और श्रीकृष्णका परस्पर मिलन होता है? तो यह नित्ययोगमें योग है। मिलन होनेपर भी श्रीजीमें ऐसा भाव आ जाता है कि प्रियतम कहीं चले गये हैं और वे एकदम कह उठती हैं कि प्यारे तुम कहाँ चले गये तो यह नित्ययोगमें वियोग है। श्यामसुन्दर सामने नहीं हैं? पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दीख रहे हैं? तो यह वियोगमें नित्ययोग है। श्यामसुन्दर थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये? पर मनमें ऐसा भाव है कि बहुत समय बीत गया? श्यामसुन्दर मिले नहीं? क्या करूँ कहाँ जाऊँ श्यामसुन्दर कैसे मिलें तो यह वियोगमें वियोग है। वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें भगवान्के साथ नित्ययोग ज्योंकात्यों बना रहता है? वियोग कभी होता ही नहीं? हो सकता ही नहीं और होनेकी संभावना भी नहीं। इसी नित्ययोगको प्रेम कहते हैं क्योंकि प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों अभिन्न रहते हैं। वहाँ भिन्नता कभी हो ही नहीं सकती। प्रेमका आदानप्रदान,करनेके लिये ही भक्त और भगवान्में संयोगवियोगकी लीला हुआ करती है।यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान किस प्रकार है जब प्रेमी और प्रेमास्पद परस्पर मिलते हैं? तब प्रियतम पहले चले गये थे? उनसे वियोग हो गया था अब कहीं ये फिर न चले जायँ (टिप्पणी प0 954.3) इस भावके कारण प्रेमास्पदके मिलनेमें तृप्ति नहीं होती? सन्तोष नहीं होता। वे चले जायँगे -- इस बातको लेकर मन ज्यादा खिंचता है। इसलिये इस प्रेमको प्रतिक्षण वर्धमान बताया है।प्रेम(भक्ति)में चार प्रकारका रस अथवा रति होती है -- दास्य? सख्य? वात्सल्य और माधुर्य। इन रसोंमें दास्यसे सख्य? सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्यरस श्रेष्ठ है क्योंकि इनमें क्रमशः भगवान्के ऐश्वर्यकी विस्मृति ज्यादा होती चली जाती है। परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक भी रस पूर्णतामें पहुँच जाता है? तब उसमें दूसरे रसोंकी कमी नहीं रहती अर्थात् उसमें सभी रस आ जाते हैं। जैसे? दास्यरस पूर्णतामें पहुँच जाता है तो उसमें सख्य? वात्सल्य और माधुर्य -- तीनों रस आ जाते हैं। यही बात अन्य रसोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। कारण यह है कि भगवान् पूर्ण हैं? उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है। अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है। इसलिये भगवान्के साथ किसी भी रीतिसे रति हो जायगी तो वह पूर्ण हो जायगी? उसमें कोई कमी नहीं रहेगी।दास्य रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे स्वामी हैं और मैं उनका सेवक हूँ। मेरेपर उनका पूरा अधिकार है। वे चाहे जो करें? चाहे जैसी परिस्थितिमें रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें। मेरेपर अत्यधिक अपनापन होनेसे ही वे बिना मेरी सम्मति लिये ही मेरे लिये सब विधान करते हैं।सख्य रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे सखा हैं और मैं उनका सखा हूँ। वे मेरे प्यारे हैं और मैं उनका प्यारा हूँ। उनका मेरेपर पूरा अधिकार है और मेरा उनपर पूरा अधिकार है। इसलिये मैं उनकी बात मानता हूँ? तो मेरी भी बात उनको माननी पड़ेगी।वात्सल्य रतिमें भक्तका अपनेमें स्वामिभाव रहता है कि मैं भगवान्की माता हूँ या उनका पिता हूँ अथवा उनका गुरु हूँ और वह तो हमारा बच्चा है अथवा शिष्य है इसलिये उसका पालनपोषण करना है। उसकी निगरानी भी रखनी है कि कहीं वह अपना नुकसान न कर ले जैसे -- नन्दबाबा और यशोदा मैया कन्हैयाका खयाल रखते हैं और कन्हैया वनमें जाता है तो उसकी निगरानी रखनेके लिये दाऊजीको साथमें भेजते हैंमाधुर्य (टिप्पणी प0 955) रतिमें भक्तको भगवान्के ऐश्वर्यकी विशेष विस्मृति रहती है अतः इस रतिमें भक्त भगवान्के साथ अपनी अभिन्नता (घनिष्ठ अपनापन) मानता है। अभिन्नता माननेसे उनके लिये सुखदायी सामग्री जुटानी है? उन्हें सुखआराम पहुँचाना है? उनको किसी तरहकी कोई तकलीफ न हो -- ऐसा भाव बना रहता है।प्रेमरस अलौकिक है? चिन्मय है। इसका आस्वादन करनेवाले केवल भगवान् ही हैं। प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों ही चिन्मयतत्त्व होते हैं। कभी प्रेमी प्रेमास्पद बन जाता है और कभी प्रेमास्पद प्रेमी हो जाता है। अतः एक चिन्मयतत्त्व ही प्रेमका आस्वादन करनेके लिये दो रूपोंमें हो जाता है।प्रेमके तत्त्वको न समझनेके कारण कुछ लोग सांसारिक कामको ही प्रेम कह देते हैं। उनका यह कहना बिलकुल गलत है क्योंकि काम तो चौरासी लाख योनियोंके सम्पूर्ण जीवोंमें रहता है और उन जीवोंमें भी जो भूत? प्रेत? पिशाच होते हैं? उनमें काम (सुखभोगकी इच्छा) अत्यधिक होता है। परन्तु प्रेमके अधिकारी जीवन्मुक्त महापुरुष ही होते हैं।काममें लेनेहीलेनेकी भावना होती है और प्रेममें देनेहीदेनेकी भावना होती है। काममें अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करने -- उनसे सुख भोगनेका भाव रहता है और प्रेममें अपने प्रेमास्पदको सुख पहुँचाने तथा सेवापरायण रहनेका भाव रहता है। काम केवल शरीरको लेकर ही होता है और प्रेम स्थूलदृष्टिसे शरीरमें दीखते हुए भी वास्तवमें चिन्मयतत्त्वसे ही होता है। काममें मोह (मूढ़भाव) रहता है और प्रेममें मोहकी गन्ध भी नहीं रहती। काममें संसार तथा संसारका दुःख भरा रहता है और प्रेममें मुक्ति तथा मुक्तिसे भी विलक्षण आनन्द रहता है। काममें जडता(शरीर? इन्द्रियाँ? आदि) की मुख्यता रहती है और प्रेममें चिन्मयता(चेतन स्वरूप) की मुख्यता रहती है। काममें राग होता है और प्रेममें त्याग होता है। काममें परतन्त्रता होती है और प्रेममें परतन्त्रताका लेश भी नहीं होता अर्थात् सर्वथा स्वतन्त्रता होती है। काममें वह मेरे काममें आ जाय ऐसा भाव रहता है और प्रेममें मैं उसके काममें आ जाऊँ ऐसा भाव रहता है। काममें कामी भोग्य वस्तुका गुलाम बन जाता है और प्रेममें स्वयं भगवान् प्रेमीके गुलाम बन जाते हैं। कामका रस नीरसतामें बदलता है और प्रेमका रस आनन्दरूपसे प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। काम खिन्नतासे पैदा होता है और प्रेम प्रेमास्पदकी प्रसन्तासे प्रकट होता है। काममें अपनी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। और प्रेममें प्रेमास्पदकी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। काममार्ग नरकोंकी तरफ ले जाता है और प्रेममार्ग भगवान्की तरफ ले जाता है। काममें दो होकर दो ही रहते हैं अर्थात् द्वैधीभाव (भिन्नता या भेद) कभी मिटता नहीं और प्रेममें एक होकर दो होते हैं अर्थात् अभिन्नता कभी मिटती नहीं (टिप्पणी प0 956)। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें दी हुई आज्ञाको अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें क्रमशः अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे दृढ़ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.57।।परमेश्वरप्रसादस्यैवं माहात्म्यं यतः सिद्धं तस्मात्तत्प्रसादार्थं भवता प्रयतितव्यमित्याह -- यस्मादिति। भगवत्प्रसादादासादितसम्यग्ज्ञानादेव मुक्तिर्न कर्ममात्रादिति ज्ञानं विवेकबुद्धिः। आश्रयशब्दार्थमाह -- अनन्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.57।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.57।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.57।। -- चेतसा विवेकबुद्ध्या सर्वकर्माणि दृष्टादृष्टार्थानि मयि ईश्वरे संन्यस्य यत् करोषि यदश्नासि (गीता 9।27) इति उक्तन्यायेन? मत्परः अहं वासुदेवः परो यस्य तव सः त्वं मत्परः सन् मय्यर्पितसर्वात्मभावः बुद्धियोगं समाहितबुद्धित्वं बुद्धियोगः तं बुद्धियोगम् उपाश्रित्य आश्रयः अनन्यशरणत्वं मच्चित्तः मय्येव चित्तं यस्य तव सः त्वं मच्चित्तः सततं सर्वदा भव।।

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【 Verse 18.58 】

▸ Sanskrit Sloka: मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि | अथ चेत्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ||

▸ Transliteration: maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāt tariṣyasi | atha cet tvam ahaṁkārān na śroṣyasi vinaṅkṣyasi ||

▸ Glossary: mat: My; cittaḥ: consciousness; sarva: all; durgāṇi: impediments; mat: My; prasādāt: My mercy; tariṣyasi: you will overcome; atha: therefore; cet: if; tvaṁ: you; ahaṁkārāt: by false ego; na: not; śroṣyasi: do not hear; vinaṅkṣyasi: then lose yourself

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.58 When your mind becomes fixed on Me, you shall overcome all difficulties by My grace. But if you do not listen to Me due to ego, you shall perish.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.58।।मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.58।। मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे? तो तुम नष्ट हो जाओगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.58 मच्चित्तः fixing thy mind on Me? सर्वदुर्गाणि all obstacles? मत्प्रसादात् by My grace? तरिष्यसि (thou) shalt overcome? अथ now? चेत् if? त्वम् thou? अहङ्कारात् from egoism? न not? श्रोष्यसि (thou) wilt hear? विनङ्क्ष्यसि (thou) shalt perish.Commentary When thy mind? O Arjuna? through onepointed devoion is fixed on Me? thou shalt by My grace cross over all difficulties and obstacles. But shouldst thou not take My teaching to heart and through pride disregard it? thou shalt be ruined.Difficulties Obstacles? snares? pitfalls? temptations on the spiritual path and various sorts of other difficulties of Samsara? diseases? etc.Egosim The idea that thou art a learned man. Thou shouldst not think I am independent. I know everything. I am a wise man. Why should I take the advice of another

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.58. Having your thought-organ turned towards Me, you shall pass over all obstacles by Me Grace. On the other hand, if you don't give up your sense of ego, you will not liberated yourself, [instead] you will perish.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.58 Fix but thy mind on Me, and by My grace thou shalt overcome the obstacles in thy path. But if, misled by pride, thou wilt not listen, then indeed thou shalt be lost.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.58 Focusing your thought on Me, you shall, by My grace, cross over all difficulties. If, however, out of self-conceit, you do not heed Me, you shall perish.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.58 Having your mind fixed on Me, you will cross over all difficulties through My grace. If, on the other hand, you do not listen out of egotism, you will get destroyed.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.58 Fixing thy mind on Me, thou shalt by My grace overcome all obstacles; but if from egoism thou wilt not hear Me, thou shalt perish.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.58 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.58 Thus, focusing your thought on Me, if you can perform all acts, you will, by My grace, cross over all difficulties of Samsara. If, however, out of 'self-conceit,' i.e., out of the feeling, 'I know well what is to be done and what is not to be done' - out of such a feeling, if you do not heed My words, you shall perish. Except Myself, there is none who knows what ought and what ought not to be done by all living beings; there is also none other than Myself who is in the position of a law-giver to them.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.58 Maccittah, having your mind fixed on Me; tarisyasi, you will cross over; sarva-durgani, alldifficulties, all cuases of transmigration which are difficult to overcome; mat-prasadat, through My grace. Atha cet, if, on the other hand; tvam, you; na srosyasi, will not listen to, will not accept, My words; ahankarat, out of egotism, thinking 'I am learned'; then vinanksyasi, you will get destroyed, will court ruin. And this should not be thought of by you-'I am independent. Why should I follow another's bidding?'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.58।। सारांशत? साधक को सतत ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य कर्म करते रहने चाहिए। सतत अभ्यास करने पर शरीर और मन भी ऐसी अनुप्राणित बुद्धि का साथ देने लगते हैं? जो ईश्वर के अखण्ड स्मरण में रमती है।भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं? मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों को पार कर जाओगे। हमारे जीवन में आने वाले अधिकांश विघ्न या प्रतिबन्ध केवल काल्पनिक होते हैं। मिथ्या भय और वृथा चिन्ता संभ्रमित मन के लक्षण हैं। मन के परमात्मस्वरूप में समाहित होने से प्राप्त होने वाले फल को ही कृपा कहते हैं। यहाँ कथित कृपा का अर्थ यह नहीं है कि करुणासागर भगवान् भक्त विशेष पर ही अपनी कृपा की वर्षा करते हैं? और अन्य जनों पर नहीं। भगवान् तो स्वयं कृपास्वरूप ही हैं। उनकी कृपा सर्वव्यापी है। आवश्यकता केवल हमारे अन्तकरण को शुद्ध करने की तथा विवेक को जाग्रत करने की है। शुद्धता और विवेक होने पर परमात्मा शुद्ध स्वरूप में प्रकट हो जाता है? जो साधक के हृदय में पहले से ही विद्यमान था। सूर्य का प्रकाश किसी से पक्षपात नहीं करता। परन्तु जो व्यक्ति अपने घर के द्वार और वातायन सदैव बन्द रखता है? वह सूर्य प्रकाश से वंचित रह जाता है। इसमें सूर्य को दोष नहीं दिया जा सकता।इस श्लोक की द्वितीय पंक्ति में भगवान् श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि अहंकारवश उनके उपदेश का पालन न करने पर मनुष्य अपना नाश ही कर लेगा। प्राकृतिक नियम अपरिवर्तनीय होते हैं उनके न नेत्र होते हैं न श्रोत्र। वे अपना काम लयबद्ध करते रहते हैं। जो मनुष्य इन नियमें को पहचान कर उनका पूर्ण पालन करता है? वही सुखी रहता है।यदि अहंकारवश तुम नहीं सुनोगे? तो तुम नष्ट हो जाओगे यह किसी क्रूर सत्ताधारी की मानव जाति को भयभीत करके उससे आज्ञा पालन करवाने के लिए दी गई धमकी नहीं है।अन्य धर्मों में दी गई नरक की धमकी के साथ इसकी तुलना नहीं करनी चाहिए। यह वस्तु स्थिति का कथन मात्र है। यदि न्यूटन भी अपने घर की छत से कूद पड़ता तो गुरुत्वाकर्षण की शक्ति निःक्ष्ड़ त्द्धड़श्चत रूप से उस पर भी अपना प्रभाव दिखाती ही प्रकृति के नियमों में एक निश्चितता है। बन्धन और मोक्ष? इन दो विकल्पों में से मनुष्य किसी का भी चयन करने में स्वतन्त्र है। मोक्षमार्ग का यहाँ वर्णन किया जा चुका है। प्रस्तुत कथन में भगवान् की केवल निर्मम स्पष्टवक्तृता तथा साधक के कल्याण की भावना ही स्पष्ट होती है। अपने इस स्पष्ट कथन से वे किसी बात को बनाना या बिगाड़ना नहीं चाहते।अन्तप्रेरणा की सौम्य एवं मधुर वाणी से हमें सदैव जीवन की सत्य पद्धति का मार्गदर्शन मिलता रहता है। परन्तु मनुष्य का अहंकार और स्वार्थ उस मधुर वाणी की उपेक्षा करके विषयोपभोग के निम्नस्तरीय जीवन का ही अनुकरण करता है। फलत वह अपने ही अनियन्त्रित मनोवेगों तथा अशुद्ध विचारों द्वारा दण्डित किया जाता है। अत यहाँ चेतावनी दी गई है कि तुम नष्ट हो जाओगे। यहाँ नाश का यह अर्थ है कि ऐसा अहंकारी पुरुष जीवन के परम पुरुषार्थ को नहीं प्राप्त कर सकता।अपने कथन को और अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.58।।ततः किमित्यपेक्षायामाह -- मञ्चित्तः सर्वदुर्गाणि संसारहेतुभूताज्ञानादीनि मत्प्रसादात्तरिष्यस्यतिक्रमिष्यसि। व्यतिरेके दोषमाह -- अथ चेद्यदि मदुक्तमहंकारात् पण्डितेन मया स्वबुद्य्धा यद्विचारितं तदेव सभ्यगित्यभिमानान्न श्रोष्यसि न ग्रहीष्यसि ततस्त्वं विनङ्क्ष्यसि विनाशं गमिष्यसि पुरुषार्थाद्भ्रष्टो भविष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.58।।ततः किं स्यादिति तदाह -- मच्चित्त इति। मच्चित्तस्त्वं सर्वदुर्गाणि दुस्तराणि कामक्रोधादीनि संसारदुःखसाधनानि मत्प्रसादात्स्वव्यापारमन्तरेणैव तरिष्यस्यनायासेनैवातिक्रमिष्यसि। अथचेत् यदि तु त्वं मदुक्ते विश्वासमकृत्वाहंकारात्पण्डितोऽहमिति गर्वान्न श्रोष्यसि मद्वचनार्थं न करिष्यसि ततो विनङ्क्ष्यसि पुरुषार्थाद्भ्रष्टो भविष्यसि कामकारेण संन्यासाद्याचरन्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.58।।एतस्य भक्तियोगस्य करणे गुणमकरणे दोषं चाह -- मच्चित्त इति। दुर्गाणि आध्यात्मिकाधिभौतिकादीनि संकटानि। अहंकारात्स्वपाण्डित्याभिमानात् न श्रोष्यसि मद्वाक्यं तर्हि विनङ्क्ष्यसि पुरुषार्थशून्यो भविष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.58।।तादृग्भूते फलमाह -- मच्चित्त इति। मच्चित्तः सन् सर्वदुर्गाणि ऐहिकपारलौकिकसङ्कटस्थानानि कर्मकरणेऽपि साधनयुक्तोऽपि मदाज्ञाकरणात् मत्प्रसादात् तरिष्यसि। विपक्षे बाधकमाह -- अथेति। अथ भिन्नप्रकारेण अहङ्कारात् स्वज्ञानाभिमानेनावश्यं कर्मभोगनैयत्यादकरणार्थं चेत् त्वं न श्रोष्यसि तदा विनङ्क्ष्यसि मत्सम्बन्धाद्भ्रश्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.58।।ततो यद्भविष्यति तच्छृणु -- मच्चित्त इति। मच्चित्तः सन् मत्प्रसादात्सर्वाण्यपि दुर्गाणि दुस्तराणि सांसारिकाणि दुःखानि तरिष्यसि। विपक्षे दोषमाह -- अथ चेद्यदि पुनस्त्वमहकाराज्ज्ञातृत्वाभिमानान्मदुक्तमेतन्न श्रोष्यसि तर्हि विनङ्क्ष्यसि पुरुषार्थाद्भश्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.58।।ततो यद्भावि तदवधेहि? मच्चित्तः सर्वदुर्गाणीति। सर्वकृच्छ्राणि सङ्कटरूपाणि तरिष्यसि। अथ चेदिति उपपत्तिः। मतान्तरस्थितिमाशङ्क्य न श्रोष्यसि तर्हि नष्टो भविष्यसि? प्राकृत इव।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.58।।मुझमें चित्तवाला होकर तू समस्त कठिनाइयोंको अर्थात् जन्ममरणरूप संसारके समस्त कारणोंको मेरे अनुग्रहसे तर जायगा -- सबसे पार हो जायगा। परंतु यदि तू मेरे कहे हुए वचनोंको अहंकारसे मैं पण्डित हूँ ऐसा समझकर? नहीं सुनेगाग्रहण नहीं करेगा? तो नष्ट हो जायगा -- नाशको प्राप्त हो जायगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.58।। व्याख्या --   मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि -- भगवान् कहते हैं कि मेरेमें चित्तवाला होनेसे तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न? बाधा? शोक? दुःख आदिको तर जायगा अर्थात् उनको दूर करनेके लिये तुझे कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा।भगवद्भक्तने अपनी तरफसे सब कर्म भगवान्के अर्पण कर दिये? स्वयं भगवान्के अर्पित हो गया? समताके आश्रयसे संसारकी संयोगजन्य लोलुपतासे सर्वथा विमुख हो गया और भगवान्के साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया। यह सब कुछ हो जानेपर भी वास्तविक तत्त्वकी प्राप्तिमें यदि कुछ कमी रह जाय या सांसारिक लोगोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता देखकर अभिमान आ जाय अथवा इस प्रकारके कोई सूक्ष्म दोष रह जायँ? तो उन दोषोंको दूर करनेकी साधकपर कोई जिम्मेवारी नहीं रहती? प्रत्युत उन दोषोंको? विघ्नबाधाओंको दूर करनेकी पूरी जिम्मेवारी भगवान्की हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं -- मत्प्रसादात्तरिष्यसि अर्थात् मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नबाधाओँको तर जायगा। इसका तात्पर्य यह निकला कि भक्त अपनी तरफसे? उसको जितना समझमें आ जाय? उतना पूरी सावधानीके साथ कर ले? उसके बाद जो कुछ कमी रह जायगी? वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।मनुष्यका अगर कुछ अपराध हुआ है तो वह यही हुआ है कि उसने संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया और भगवान्से विमुख हो गया। अब उस अपराधको दूर करनेके लिये वह अपनी ओरसे संसारका सम्बन्ध तोड़कर भगवान्के सम्मुख हो जाय। सम्मुख हो जानेपर जो कुछ कमी रह जायगी? वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी। अब आगेका सब काम भगवान् कर लेंगे। तात्पर्य यह हुआ कि भगवत्कृपा प्राप्त करनेमें संसारके साथ किञ्चित् भी सम्बन्ध मानना और भगवान्से विमुख हो जाना -- यही बाधा थी। वह बाधा उसने मिटा दी तो अब पूर्णताकी प्राप्ति भगवत्कृपा अपनेआप करा देगी।जिसका प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ सम्बन्ध है? उसपर ही शास्त्रोंका विधिनिषेध? अपने वर्णआश्रमके अनुसार कर्तव्यका पालन आदि नियम लागू होते हैं और उसको उनउन नियमोंका पालन,जरूर करना चाहिये। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके सम्बन्धको लेकर ही पापपुण्य होते हैं और उनका फल सुखदुःख भी भोगना पड़ता है। इसलिये उसपर शास्त्रीय मर्यादा और नियम विशेषतासे लागू होते हैं। परन्तु जो प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा ही विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है? वह शास्त्रीय विधिनिषेध और वर्णआश्रमोंकी मर्यादाका दास नहीं रहता। वह विधिनिषेधसे भी ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसपर विधिनिषेध लागू नहीं होते क्योंकि विधिनिषेधकी मुख्यता प्रकृतिके राज्यमें ही रहती है। प्रभुके राज्यमें तो शरणागतिकी ही मुख्यता रहती है।जीव साक्षात् परमात्माका अंश है (गीता 15। 7)। यदि वह केवल अपने अंशी परमात्माकी ही तरफ चलता है तो उसपर देव? ऋषि? प्राणी? मातापिता आदि आप्तजन और दादापरदादा आदि पितरोंका भी कोई ऋण नहीं रहता (टिप्पणी प0 957) क्योंकि शुद्ध चेतन अंशने इनसे कभी कुछ लिया ही नहीं। लेना तभी बनता है? जब वह जड शरीरके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और सम्बन्ध जोड़नेसे ही कमी आती है नहीं तो उसमें कभी कमी आती ही नहीं -- नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)। जब उसमें कभी कमी आती ही नहीं? तो फिर वह उनका ऋणी कैसे बन सकता है यही सम्पूर्ण विघ्नोंको तरना हैसाधनकालमें जीवननिर्वाहकी समस्या? शरीरमें रोग आदि अनेक विघ्नबाधाएँ आती हैं परन्तु उनके आनेपर भी भगवान्की कृपाका सहारा रहनेसे साधक विचलित नहीं होता। उसे तो उन विघ्नबाधाओंमें भगवान्की विशेष कृपा ही दीखती है। इसलिये उसे विघ्नबाधाएँ बाधारूपसे दीखती ही नहीं? प्रत्युत कृपारूपसे ही दीखती हैं।पारमार्थिक साधनमें विघ्नबाधाओंके आनेकी तथा भगवत्प्राप्तिमें आड़ लगनेकी सम्भावना रहती है। इसके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरा आश्रय लेनेवालेके दोनों काम मैं कर दूँगा अर्थात् अपनी कृपासे साधनकी सम्पूर्ण विघ्नबाधाओंको भी दूर कर दूँगा और उस साधनके द्वारा अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा।अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि -- भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण आत्मीयतापूर्वक अर्जुनसे कह रहे हैं कि अथ -- पक्षान्तरमें मैंने जो कुछ कहा है? उसे न मानकर अगर अहंकारके कारण अर्थात् मैं भी कुछ जानता हूँ? करता हूँ तथा मैं कुछ समझ सकता हूँ? कुछ कर सकता हूँ आदि भावोंके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा? मेरे इशारेके अनुसार नहीं चलेगा? मेरा कहना नहीं मानेगा? तो तेरा पतन हो जायगा -- विनङ्क्ष्यसि।यद्यपि अर्जुनके लिये यह किञ्चिन्मात्र भी सम्भव नहीं है कि वह भगवान्की बात न सुने अथवा न माने? तथापि भगवान् कहते हैं कि चेत् -- अगर तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि अगर तू अज्ञता अर्थात् अनजानपनेसे मेरी बात न सुने अथवा किसी भूलके कारण न सुने? तो यह सब क्षम्य है परन्तु यदि तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा क्योंकि अहंकारसे मेरी बात न सुननेसे तेरा अभिमान बढ़ जायगा? जो सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका मूल है।पहले चौथे अध्यायमें भगवान् स्वयं अपने श्रीमुखसे कहकर आये हैं कि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है -- भक्तोऽसि मे सखा चेति (4। 3) और फिर नवें अध्यायमें उन्होंने कहा है कि हे अर्जुन तू प्रतिज्ञा कर कि मेरे भक्तका पतन नहीं होता -- कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति (9। 31)। इससे सिद्ध हुआ कि अर्जुन भगवान्के भक्त हैं अतः वे कभी भगवान्से विमुख नहीं हो सकते और उनका पतन भी कभी नहीं हो सकता। परन्तु वे अर्जुन भी यदि भगवान्की बात नहीं सुनेंगे तो भगवान्से विमुख हो जायँगे और भगवान्से विमुख होनेके कारण उनका भी पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि भगवान्से विमुख होनेके कारण ही प्राणिका पतन होता है अर्थात् वह जन्ममरणके चक्करमें पड़ता है (गीता 9। 3 16। 20)।विशेष बातइसी अध्यायके छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने प्रथम पुरुष अवाप्नोति का प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये कहा कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है? और यहाँ मध्यम पुरुष तरिष्यसि का प्रयोग करके अर्जुनके लिये कहते हैं कि मेरी कृपासे तू विघ्नबाधाओंको तर जायगा। इन दोनों बातोंका तात्पर्य यह है कि भगवान्की कृपामें जो शक्ति है? वह शक्ति किसी साधनमें नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि साधन न करें? प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना मनुष्यका स्वाभाविक धर्म होना चाहिये क्योंकि मनुष्यजन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्यजन्मको प्राप्त करके भी जो परमात्माको प्राप्त नहीं करता? वह यदि ऊँचेसेऊँचे लोकोंमें भी चला जाय? तो भी उसे लौटकर संसार(जन्ममरण)में आना ही पड़ेगा (टिप्पणी प0 958) (गीता 8। 16)। इसलिये जब यह मनुष्यशरीर प्राप्त हुआ है? तो फिर मनुष्यको जीतेजी ही भगवत्प्राप्ति कर लेनी चाहिये और जन्ममरणसे रहित हो जाना चाहिये। कर्मयोगीके लिये भी भगवान्ने कहा है कि समतायुक्त पुरुष इस जीवितअवस्थामें ही पुण्य और पाप -- दोनोंसे रहित हो जाता है (गीता 2। 50)। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मबन्धनसे सर्वथा रहित होना अर्थात् जन्ममरणसे रहित होना मनुष्यमात्रका परम ध्येय है।दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मैं अपनी कृपासे भक्तोंके अन्तःकरणमें ज्ञान प्रकाशित कर देता हूँ? और ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैंने अपनी कृपासे ही विराट्रूप दिखाया है। उसी कृपाको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जायगी (18। 56) और मेरी कृपासे ही सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा (18। 58)। परमपदको प्राप्त होनेपर किसी प्रकारकी विघ्नबाधा सामने आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। फिर भी सम्पूर्ण विघ्नबाधाओंको तरनेकी बात कहनेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनके मनमें यह भय बैठा था कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा युद्धके कारण कुलपरम्पराके नष्ट होनेसे पितरोंका पतन हो जायगा और इस प्रकार अनर्थपरम्परा बढ़ती ही जायगी हमलोग राज्यके लोभमें आकर इस महान् पापको करनेके लिये तैयार हो गये हैं? इसलिये मैं शस्त्र छोड़कर बैठ जाऊँ और धृतराष्ट्रके पक्षके लोग मेरेको मार भी दें? तो भी मेरा कल्याण ही होगा (गीता 1। 36 -- 46)। इन सभी बातोंको लेकर और अनेक जन्मोंके दोषोंको भी लेकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको? पापोंको तर जायगा -- सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। भगवान्ने बहुवचनमें दुर्गाणि पद देकर भी उसके साथ सर्व शब्द और जोड़ दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि मेरी कृपासे तेरा किञ्चिन्मात्र भी पाप नहीं रहेगा कोई भी बन्धन नहीं रहेगा और मेरी कृपासे सर्वथा शुद्ध होकर तू परमपदको प्राप्त हो जायगा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.58।।किमतो भवति तदाह -- मच्चित्त इति। भीत्यापि प्रवर्तेतेति मन्वानो विपर्यये दोषमाह -- अथ चेदिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.58।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.58।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.58।। --,मच्चितः सर्वदुर्गाणि सर्वाणि दुस्तराणि संसारहेतुजातानि मत्प्रसादात् तरिष्यसि अतिक्रमिष्यसि। अथ चेत् यदि त्वं मदुक्तम् अहंकारात् पण्डितः अहम् इति न श्रोष्यसि न ग्रहीष्यसि? ततः त्वं विनङ्क्ष्यसि विनाशं गमिष्यसि।।इदं च त्वया न मन्तव्यम् स्वतन्त्रः अहम्? किमर्थं परोक्तं करिष्यामि इति --,

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【 Verse 18.59 】

▸ Sanskrit Sloka: यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे | मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ||

▸ Transliteration: yad ahaṁkāram āśritya na yotsya iti manyase | mithyaiṣa vyavasāyas te prakṛtis tvāṁ niyokṣyati ||

▸ Glossary: yat: therefore; ahaṁkāram: false ego; āśritya: taking shelter; na: not; yotsye: shall fight; iti: thus; manyase: think; mithyaiṣa: this is all false; vyavasāyaste: your determination; prakṛtiḥ: material nature; tvāṁ: you; niyokṣyati: will engage you

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.59 If due to ego you think: ‘I shall not fight,’ your resolve is useless, and your own nature will compel you.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.59।।अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है क्योंकि तेरी क्षात्रप्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.59।। और अहंकारवश तुम जो यह सोच रहे हो? मैं युद्ध नहीं करूंगा? यह तुम्हारा निश्चय मिथ्या है? (क्योंकि) प्रकृति (तुम्हारा स्वभाव) ही तुम्हें (बलात् कर्म में) प्रवृत्त करेगी।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.59 यत् if? अहङ्कारम् egoism? आश्रित्य having taken refuge in? न not? योत्स्ये (I) will fight? इति thus? मन्यसे (thou) thinkest? मिथ्या vain? एषः this? व्यवसायः resolve? ते thy? प्रकृतिः nature? त्वाम् thee? नियोक्ष्यति will compel.Commentary This strong determination of thy mind will be rendered utterly futile by thy inner nature thy nature will constrain thee thy nature as a warrior will compel thee to fight. It is a mere illusion to say that thou art Arjuna? that these are thy relatives and that to kill them will be a sin.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.59. In case, holding fast to the sense of ego, you think (decide) 'I shall not fight', that resolve of yours will be just useless. [For] your own natural condition will incite you [to fight].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.59 If thou in thy vanity thinkest of avoiding this fight, thy will shall not be fulfilled, for Nature herself will compel thee.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.59 If, in your self-conceit, you think, 'I will not fight,' your resolve is in vain. Nature will compel you.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.59 That you think 'I shall not fight', by relying on egotism,-vain is this determination of yours. (Your) nature impel you!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.59 If, filled with egoism, thou thinkest: "I will not fight", vain is this, thy resolve; Nature will compel thee.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.59 See Comment under 18.60

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.59 If, in your 'self-conceit,' i.e., under a false sense of independence that you know what is good for you and what is not - if, not heeding My ?nd, you think, 'I will not fight,' then this resolve based on your sense of independence will be in vain. For Nature will compel you to go against your resolve - you who are ignorant and who adversely react to my sovereignty.

He elucidates the same:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.59 Yat, that; manyase, you think, resolve; this-'na yotsye, I shall not fight'; asritya, by relying; on ahankaram, egotism, mithya, vain; is esah, this; vyava-sayah, determination; te, of yours; because prakrtih, nature, your own nature of a Ksatriya; niyoksyati, will impell; ;tvam, you!

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.59।। सत्य के सामान्य कथन की ओर मनुष्य विशेष ध्यान नहीं देता। इस कारण सत्य के उस ज्ञान को वह आत्मसात् नहीं कर पाता। परन्तु यदि उसी सामान्य कथन को मनुष्य को अपने जीवन से सम्बन्धित अनुभवों में प्रयुक्त कर दर्शाया जाये? तो वह उस ज्ञान को अर्जित कर आत्मसात् कर लेता है। वह ज्ञान उसका अपना नित्य अनुभव बन जाता है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण पूर्वोक्त दार्शनिक सिद्धांत को अर्जुन की तात्कालिक समस्या के सन्दर्भ में उसे समझाना चाहते हैं।यदि अपने अभिमान के कारण अर्जुन यह सोचता है कि वह युद्ध नहीं करेगा? तो उसका यह निश्चय व्यर्थ है उसका क्षत्रिय स्वभाव व्यक्त होने के लिए सदैव अवसर की प्रतीक्षा करता रहेगा? और उपयुक्त अवसर पाकर वह अर्जुन को कर्म करने को बाध्य किये बिना नहीं रहेगा। प्रकृति तुम्हें प्रवृत्त करेगी। जिसने लवण भक्षण किया है? उसे शीघ्र ही प्यास लगेगी। युद्ध से निवृत्त होने में अर्जुन जो मिथ्या तर्क प्रस्तुत करता है? वह वस्तुत प्राप्त परिस्थितियों के साथ उसके द्वारा किये गये समझौते को ही दर्शाता है।यदि अर्जुन तत्कालीन अस्थायी वैराग्य अथवा पलायन की भावना के कारण युद्ध से विरत हो जाता है? तो भी प्राकृतिक नियमामुसार? कालान्तर में उसका स्वभाव ही उसे कर्म करने के लिए बाध्य करेगा और उस समय संभव है कि उसे अपने स्वभाव को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त क्षेत्र न मिले? जिससे वह अपनी वासनाओं का क्षय कर सके।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.59।।स्वतन्त्रोऽहं परोक्तं न करिष्यामीति त्वया न मन्तव्यं परतन्त्रत्वात्तवेत्याशयेनाह -- यदिति। यच्चैतत्त्वमहंकारं मिथ्यभिमानमाश्रित्य न योत्स्ये युद्धं न करिष्यामीति मन्यसे निश्चयं करोषि एष ते व्यवसायोऽहं स्वतन्त्रोऽनर्थहेतुभूतं युद्धं न करिष्यामीति निश्चयो मिथ्या भ्रममूलको निष्फलं। यतः प्रकृतिः क्षत्रियस्वभावस्त्वां क्षत्रियं नियोक्ष्यति बलात्कारेण युद्धे प्रेरयष्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.59।।यदिति। त्वं चाहंकारं धार्मिकोऽहं क्रूरं कर्म न करिष्यामीति मिथ्याभिमानमाश्रित्य न योत्स्ये युद्धं न करिष्यामीति मन्यसे यत् स मिथ्या निष्फल एष व्यवसायो निश्चयस्ते तव। यस्मात्प्रकृतिः क्षत्रजात्यारम्भको रजोगुणस्वभावस्त्वां नियोक्ष्यति प्रेरयिष्यति युद्धे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.59।।स्वतन्त्रोऽहं त्वदुक्तं न करिष्यामीत्याशङ्क्याह -- यदिति। यत् यदि अहंकारं गर्वमाश्रित्य न योत्स्ये युद्धं न करिष्ये इति मन्यसे एष ते तव व्यवसायो निश्चयो मिथ्या। यतः प्रकृतिः क्षात्रस्वभावस्त्वां नियोक्ष्यति।प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति इति चोक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.59।।किञ्च -- यदहङ्कारमिति। यत् पूर्वोक्तं गुर्वादिहननाद्यधर्मरूपं अहङ्कारं तदज्ञानमाश्रित्य मद्वाक्याश्रवणेन न योत्स्ये न युद्धं करिष्यामीति मन्यसे अध्यवस्यसे? एष ते व्यवसायो निश्चयो मिथ्या? असद्रूपो निष्फल इत्यर्थः। पराधीनत्वादित्याह -- प्रकृतिः मदधीना मदाज्ञाविमुखं त्वां नियोक्ष्यति युद्धे प्रवर्त्तयिष्यतीत्यर्थः।अत्रायं भावः -- मदाज्ञाविमुखस्य प्राकृतत्वेन ज्ञाते प्रकृतिनियोज्यत्वं? मदाज्ञाप्रवर्तमानस्य तदनियोज्यत्वम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.59।।कामं विनङ्क्ष्यामि नतु बन्धुभिर्युद्धं करिष्यामीति चेत्तत्राह -- यदिति। मदुक्तमनादृत्य केवलमहंकारमवलम्ब्य युद्धं न करिष्यामीति त्वं यन्मन्यसेऽध्यवस्यसि एष तेऽध्यवसायो मिथ्यैव? अस्वतन्त्रत्वात्तव। तदेवाह -- प्रकृतिस्त्वां रजोगुणरूपेण,परिणता सती नियोक्ष्यति युद्धे प्रवर्तयिष्यत्येव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.59।।तथाहि यदिति। न योत्स्य इति मन्यसे। एष ते व्यवसायो मिथ्या व्यर्थ एव। तदा मदाज्ञाकारी प्रकृतिर्बहिरङ्गा शक्तिर्गौणस्वभावरूपा त्वां नियोक्ष्यत्येव।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.59।।तुझे यह भी नहीं समझना चाहिये कि मैं स्वतन्त्र हूँ? दूसरेका कहना क्यों करूँ --, जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह मान रहा है -- ऐसा निश्चय कर रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा सो यह तेरा निश्चय मिथ्या है क्योंकि तेरी प्रकृति -- तेरा क्षत्रियस्वभाव तुझे युद्धमें नियुक्त कर देगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.59।। व्याख्या --   यदहंकारमाश्रित्य -- प्रकृतिसे ही महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है -- मैं शरीर हूँ। इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है? बदलनेवाली है? इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता 3। 5)।जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है? तो फिर वह यह कैसे रह सकता है कि मैं अमक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना -- इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो करना भी कर्म है और न करना भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता? उससे निर्लिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है)? तो फिर उसके लिये करना और न करना -- ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे? ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के शरण हो गया है? उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।न योत्स्य इति मन्यसे -- दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की -- शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) और उसके बाद अर्जुनने साफसाफ कह

Chapter 18 (Part 33)

दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- न योत्स्ये (2। 9)। यह बात भगवानको अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी तरफसे साफसाफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी कारण कि वास्तविक शरणागत होनेपर मैं यह करूँगा? यह नहीं करूँगा ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागत होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे? वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (2। 10)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया? नहीं तो भगवान् वहींपर यह कह देते कि जैसा चाहता है? वैसा कर -- यथेच्छसि तथा कुरु (18। 63) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि मैं युद्ध नहीं करूँगा भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों -- न योत्स्ये का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है? मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो युद्ध नहीं करूँगा ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागत होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता 7। 14)। यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है? जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता 7। 13) क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है।यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं? उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं? पर हो जाते हैं उनके गुलाम परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते? उन पदार्थोंके परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थों और क्रियाओँको अपनी मान्यता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है? और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती -- यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं? वे मौतके मार्ग(संसार)में बह जाते हैं -- निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि (9। 3)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? तो तेरा यह कहना? तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्रप्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।मिथ्यैष व्यवसायस्ते -- व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है -- वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है? उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है? उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती है? और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है? उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा? ऐसा तेरा (क्षात्रप्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है? झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये? प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं।यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है? तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है? नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारीसेदुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि,मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति -- इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है -- शूरवीरता? युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता 18। 43)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी? अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.59।।स्वातन्त्र्ये सति भीतेरवकाशो नास्तीत्याशङ्क्याह -- इदं चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.59।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.59।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.59।। --,यदि चेत् त्वम् अहंकारम् आश्रित्य न योत्स्ये इति न युद्धं करिष्यामि इति मन्यसे चिन्तयसि निश्चयं करोषि? मिथ्या एषः व्यवसायः निश्चयः ते तव यस्मात् प्रकृतिः क्षत्रियस्वभावः त्वां नियोक्ष्यति।।यस्माच्च --,

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【 Verse 18.60 】

▸ Sanskrit Sloka: स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा | कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ||

▸ Transliteration: svabhāvajena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇa | kartuṁ necchasi yan mohāt kariṣyasyavaśo ‘pi tat ||

▸ Glossary: svabhāvajena: by one’s own nature; kaunteya: O son of Kuntī; nibaddhaḥ: conditioned; svena: by one’s own; karmaṇa: activities; kartuṁ: to do; na: not; icchasi: like; yat: that; mohāt: by illusion; kariṣyasi: you will act; avaśo: imper- ceptibly; api: even; tat: that

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.60 O Kaunteya, you are controlled by your own natural conditioning. Therefore, you shall do even against your will, what you do not wish to do out of delusion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.60।।हे कुन्तीनन्दन अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता? उसको तू (क्षात्रप्रकृतिके) परवश होकर करेगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.60।। हे कौन्तेय तुम अपने स्वाभाविक कर्मों से बंधे हो? (अत) मोहवशात् जिस कर्म को तुम करना नहीं चाहते हो? वही तुम विवश होकर करोगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.60 स्वभावजेन born of (thy) own nature? कौन्तेय O son of Kunti? निबद्धः bound? स्वेन (thy) own? कर्मणा by action? कर्तुम् to do? न not? इच्छसि (thou) wishest? यत् which? मोहात् from delusion? करिष्यसि (thou) shalt do? अवशः helpless? अपि also? तत् that.Commentary Thou art endowed? O Arjuna? with martial alities? prowess? valour? skill? etc. Thou art? therefore? bound by these innate alities. Thou wilt be forced to fight by thy own nature. Nature will constrain thee to fight? much against thy will.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.60. O son of Kunti ! Being bound fully by your own duty, born of your own nature, and also being [hence] not independent, you would perform what you do not wish to perform, because of your-delusion.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.60 O Arjuna! Thy duty binds thee. From thine own nature has it arisen, and that which in thy delusion thou desire not to do, that very thing thou shalt do. Thou art helpless.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.60 O Arjuna, bound by your own duty born out of your own inner disposition, and having no control over your own will, you will be compelled to do that very thing which you now desire not to do through delusion.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.60 Being bound by your own duty born of nature, O son of Kunti, you, being helpless, will verily do that which you do not wish to do owing to indiscrimination.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.60 O Arjuna, bound by thy own Karma (action) born of thy own nature, that which from delusion thou wishest not to do, even that thou shalt do helplessly.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.41-60 Brahmana - etc. upto avasopitat. Surely the intrinsic nature of the Brahmanas etc., does not voilate what has been difined (above) by way of classifying their duties. Therefore, as far as you are concerned, you have the intrinsic ality of the Ksatriya (warrior), and your nature i.e., intrinsic ality, does, without fail, assume the part of the inciter of yourself, even though you don't like it. For, a person who acts simply being incited by that (natural condition), there is the strong bondage of the merit or demerit. Therefore, perform actions following the means of correct knowledge, taught by Me. In that case, the bondage would disappear. The intention of the principal sentence (statement of the entire passage under study) is to help to get this idea. The meaning of the subordinate sentences (statements) is evident.

Briefly (verse 50) : in short. Knowledge : i.e. the one which has been explained earlier. Nistha conveys, avoiding verbal jugglary, the meaning 'what has been determined'. He who is endowed with intellect totally pure etc. : All this has been almost explained already. Hence, no more trouble is taken [to comment upon it].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.60 For, heroism is the duty of a Ksatriya born of his nature. Impelled by your own duty of heroism born of your own nature, you will lose self-control when you get the taunts of your enemies. Unable to suffer it, you will be compelled to engage them in battle, which, now, out of delusion and ignorance, you do not desire to do.

All beings have been ordained by Me to follow their Prakrti acired by their previous Karmas. Listen about it:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.60 And because of nibaddhah, being securely bound; svena, by your own; karmana, duty; svabhavajena, born of nature [Svabhava means those tendencies which are created by good bad actions performed in previous births, and which become the cause of performance of duties, renunciation, experience of happiness, sorrow, etc. in the present birth.-S.]-herosim etc. as stated (in 43); O son of Kunti, you avasah, being helpless, under another's control; karisyasi api, will verily do; tat, that duty; yat, which duty; you na, do not; icchasi, wish; kartum, to do; mohat, owing to indiscrimination. For,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.60।। भगवान् श्रीकृष्ण का? सारांश में? कथन यह है मैं तुम्हें इसलिये युद्ध में प्रवृत्त नहीं कर रहा हूँ कि मुझे तुमसे सहानुभूति नहीं है? वरन् इसलिये कि इसके अतिरिक्त तुम्हारे लिए अन्य कोई मार्ग ही नहीं रहा है। तुम्हारे लिये कोई विकल्प ही नहीं है। यद्यपि तुम दुराग्रह कर रहे हो कि तुम युद्ध नहीं करोगे? किन्तु यह तुम्हारा केवल मोह और भ्रम ही है। तुम्हें युद्ध करना ही पड़ेगा? क्योंकि तुम्हारा स्वभाव अपना प्रभाव अवश्य दिखायेगा। इस प्रकरण में भगवान् श्रीकृष्ण ने बारम्बार कहा है? तुम मेरा सतत् स्मरण करो। इसका अर्थ क्या है किस प्रकार हम ईश्वर का स्मरण करें क्या इसका अर्थ ईश्वर का ध्यान करना है हमारा परमेश्वर के साथ क्या संबंध होना चाहिये क्या हम उन्हें कोई ऐतिहासिक पुरुष मानें? अथवा सदैव हमारे हृदय में वास करने वाले आत्मतत्त्व के रूप में उन्हें जाने एक लगनशील विद्यार्थी के मन में उठने वाले प्रश्नों के उत्तर अगले श्लोक में दिये गये हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.60।।प्रकृतिपादतन्त्र्यं विशदयति -- स्वभावजेन शौर्यादिना यथोक्तेन स्वेन स्वकीयेन कर्मणा निबद्धः निश्चयेन बद्धः यस्मोहादविवेकात्कर्तुं नेच्छसि तदवशोऽपि परवशएव करिष्यसि। यस्माच्चैवं तस्मात्कुर्वन्तीपुत्रस्य क्षत्रियशिरोमणेरस्मत्संबन्धिनस्तव युद्धवैमुख्यं नोचितमिति सूचयन्संबोधयति हे कौन्तेयेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.60।।प्रकृतिं विवृणोति -- स्वभावजेनेति। स्वभावजेन पूर्वोक्तक्षत्रियस्वभावजेन शौर्यादिना स्वेनानागन्तुकेन कर्मणा निबद्धो वशीकृतस्त्वं हे कौन्तेय? यद्बन्धुवधादिनिमित्तं युद्धं मोहात्स्वतन्त्रोऽहं यथेच्छामि तथा संपादयिष्यामीति भ्रमात् कर्तुं नेच्छसि तदवशोऽप्यनिच्छन्नपि स्वाभाविककर्मपरतन्त्रः परमेश्वरपरतन्त्रश्च करिष्यस्येव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.60।।प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यतीत्येतदेव व्याचष्टे -- स्वभावजेनेति। स्वभावजेन पूर्वोक्तेन शौर्यादिना अवशोऽपि परवश एव तत्करिष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.60।।किञ्च -- स्वभावजेनेति। हे कौन्तेय स्नेहपात्र स्वभावजेन मत्क्रीडोत्पन्नेन स्वेन क्षात्त्रकर्मणा शौर्यादिरूपेण निबद्धो यन्त्रितो यत् मोहात् युद्धं कर्तुं नेच्छसि? तत् अवशोऽपि करिष्यसि अतो मदाज्ञयैव कुर्वित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.60।।किंच -- स्वभावेति। स्वभावः क्षत्रियत्वे हेतुः पूर्वकर्मसंस्कारस्तस्माज्जातेन स्वकीयेन कर्मणा शौर्यादिना पूर्वोक्तेन निबद्धो यन्त्रितस्त्वं मोहाद्यत्कर्म युद्धलक्षणं कर्तुं नेच्छसि? अवशोऽपि तत्कर्म करिष्यस्येव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.60।।तदुपपादयति -- स्वभावजेनेति। इदं च द्वितीयतृतीयाद्यध्यायार्थविवरणं स्वभावः प्राकृतस्तज्जेन क्षात्त्रकर्मणा निबद्धः अवशः करिष्यस्येव।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.60।।क्योंकि --, हे कौन्तेय तू उपर्युक्त शूरवीरता आदि अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा निबद्ध हुआ -- दृढ़तासे बँधा हुआ है? इसलिये जो कर्म तू मोहसे -- अविवेकके कारण नहीं करना चाहता है? वही कर्म विवश होकर करेगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.60।। व्याख्या --   स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा -- पूर्वजन्ममें जैसे कर्म और गुणोंकी वृत्तियाँ रही हैं? इस जन्ममें जैसे मातापितासे पैदा हुए हैं अर्थात् मातापिताके जैसे संस्कार रहे हैं? जन्मके बाद जैसा देखासुना है? जैसी शिक्षा प्राप्त हुई है और जैसे कर्म किये हैं -- उन सबके मिलनेसे अपनी जो कर्म करनेकी एक आदत बनी है? उसका नाम स्वभाव है। इसको भगवान्ने स्वभावजन्य स्वकीय कर्म कहा है। इसीको स्वधर्म भी कहते हैं -- स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि (गीता 2। 31)।कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् -- स्वभावजन्य क्षात्रप्रकृतिसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता? उसको तू परवश होकर करेगा। स्वभावके अनुसार ही शास्त्रोंने कर्तव्यपालनकी आज्ञा दी है। उस आज्ञामें यदि दूसरोंके कर्मोंकी अपेक्षा अपने कर्मोंमें कमियाँ अथवा दोष दीखते हों? तो भी वे दोष बाधक (पापजनक) नहीं होते -- श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। (गीता 3। 35 18। 47)। उस स्वभावज कर्म (क्षात्रधर्म)के अनुसार तू युद्ध करनेके लिये परवश है। युद्धरूप कर्तव्यको न करनेका तेरा विचार मूढ़तापूर्वक किया गया है।जो जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं? उनका स्वभाव सर्वथा शुद्ध होता है। अतः उनपर स्वभावका आधिपत्य नहीं रहता अर्थात् वे स्वभावके परवश नहीं होते फिर भी वे किसी काममें प्रवृत्त होते हैं? तो अपनी प्रकृति(स्वभाव) के अनुसार ही काम करते हैं। परन्तु साधारण मनुष्य प्रकृतिके परवश होते हैं? इसलिये उनका स्वभाव उनको जबर्दस्ती कर्ममें लगा देता है (गीता 3। 33)। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरा क्षात्रस्वभाव भी तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा परन्तु उसका फल तेरे लिये बढ़िया नहीं होगा। यदि तू शास्त्र या सन्तमहापुरुषोंकी आज्ञासे अथवा मेरी आज्ञासे युद्धरूप कर्म करेगा? तो वही कर्म तेरे लिये कल्याणकारी हो जायगा। कारण कि शास्त्र अथवा मेरी आज्ञासे कर्मोंको करनेसे? उन कर्मोंमें जो रागद्वेष हैं? वे स्वाभाविक ही मिटते चले जायँगे क्योंकि तेरी दृष्टि आज्ञाकी तरफ रहेगी? रागद्वेषकी तरफ नहीं। अतः वे कर्म बन्धनकारक न होकर कल्याणकारक ही होंगे।विशेष बातगीतामें प्रकृतिकी परवशताकी बात सामान्यरूपसे कई जगह आयी है (जैसे -- 3। 5 8। 19 9। 8 आदि) परन्तु दो जगह प्रकृतिकी परवशताकी बात विशेषरूपसे आयी है -- प्रकृतिं यान्ति भूतानि (3। 33) और यहाँ प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति (18। 59) (टिप्पणी प0 960)। इससे स्वभावकी प्रबलता ही सिद्ध होती है क्योंकि कोई भी प्राणी जिसकिसी योनिमें भी जन्म लेता है? उसकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव उसके साथमें रहता है। अगर उसका स्वभाव परम शुद्ध हो अर्थात् स्वभावमें सर्वथा असङ्गता हो तो उसका जन्म ही क्यों होगा यदि उसका जन्म होगा तो उसमें स्वभावकी मुख्यता रहेगी -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। जब स्वभावकी ही मुख्यता अथवा परवशता रहेगी और प्रत्येक क्रिया स्वभावके अनुसार ही होगी? तो फिर शास्त्रोंका विधिनिषेध किसपर लागू होगा गुरुजनोंकी शिक्षा किसके काम आयेगी और मनुष्य दुर्गुणदुराचारोंका त्याग करके सद्गुणसदाचारोंमें कैसे प्रवृत्त होगाउपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गङ्गाजीके उपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गङ्गाजीके प्रवाहको रोक तो नहीं सकता? पर उसके प्रवाहको मोड़ सकता है? घुमा सकता है। ऐसे ही मनुष्य अपने वर्णोचित स्वभावको छोड़ तो नहीं सकता? पर भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर उसको रागद्वेषसे रहित परम शुद्ध? निर्मल बना सकता है। तात्पर्य यह हुआ कि स्वभावको शुद्ध बनानेमें मनुष्यमात्र सर्वथा सबल और स्वतन्त्र है? निर्बल और परतन्त्र नहीं है। निर्बलता और परतन्त्रता तो केवल रागद्वेष होनेसे प्रतीत होती है।अब इस स्वभावको सुधारनेके लिये भगवान्ने गीतामें कर्मयोग और भक्तियोगकी दृष्टिसे दो उपाय बताये हैं --,(1) कर्मयोगकी दृष्टिसे -- तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि मनुष्यके खास शत्रु रागद्वेष ही हैं। अतः रागद्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये अर्थात् रागद्वेषको लेकर कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये? प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। शास्त्रके आज्ञानुसार अर्थात् शिष्य गुरुकी? पुत्र मातापिताकी? पत्नी पतिकी और नौकर मालिककी आज्ञाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक सब कर्म करता है तो उसमें रागद्वेष नहीं रहते। कारण कि अपने मनके अनुसार कर्म करनेसे ही रागद्वेष पुष्ट होते हैं। शास्त्र आदिकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेसे और कभी दूसरा नया कार्य करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा न होनेसे हम वह कार्य नहीं करते तो उससे हमारा राग मिट जायगा और कभी कार्यको न करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा होनेसे हम वह कार्य प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उससे हमारा द्वेष मिट जाता है।(2) भक्तियोगकी दृष्टिसे -- जब मनुष्य ममतावाली वस्तुओंके सहित स्वयं भगवान्के शरण हो जाता है? तब उसके पास अपना करके कुछ नहीं रहता। वह भगवान्के हाथकी कठपुतली बन जाता है। फिर भगवान्की आज्ञाके अनुसार? उनकी इच्छाके अनुसार ही उसके द्वारा सब कार्य होते हैं? जिससे उसके स्वभावमें रहनेवाले रागद्वेष मिट जाते हैं।तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोगमें रागद्वेषके वशीभूत न होकर कार्य करनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता 3। 34) और भक्तियोगमें भगवान्के सर्वथा अर्पित होनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता 18। 62)। स्वभाव शुद्ध होनेसे बन्धनका कोई प्रश्न ही नहीं रहता।मनुष्य जो कुछ कर्म करता है? वह कभी रागद्वेषके वशीभूत होकर करता है और कभी सिद्धान्तके अनुसार करता है। रागद्वेषपूर्वक कर्म करनेसे रागद्वेष दृढ़ हो जाते हैं और फिर मनुष्यका वैसा ही स्वभाव बन जाता है। सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेसे उसका सिद्धान्तके अनुसार ही करनेका स्वभाव बन जाता है। जो मनुष्य परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर शास्त्र और महापुरुषोंके सिद्धान्तके अनुसार कर्म करते हैं और जो परमात्माको प्राप्त हो गये हैं -- उन दोनों(साधकों और सिद्ध महापुरुषों) के कर्म दुनियाके लिये आदर्श होते हैं? अनुकरणीय होते हैं (गीता 3। 21)। सम्बन्ध --   जीव स्वयं परमात्माका अंश है और स्वभाव अंश है स्वयं स्वतःसिद्ध है और स्वभाव खुदका बनाया हुआ है स्वयं चेतन है और स्वभाव जड है -- ऐसा होनेपर भी जीव स्वभावके परवश कैसे हो जाता है इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.60।।इतश्च त्वया युद्धान्न वैमुख्यं कर्तुमुचितमित्याह -- यस्माच्चेति। स्वभावजेन स्वेन कर्मणा निबद्धस्त्वमिति संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.60।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.60।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.60।। --,स्वभावजेन शौर्यादिना यथोक्तेन कौन्तेय निबद्धः निश्चयेन बद्धः स्वेन आत्मीयेन कर्मणा कर्तुं न इच्छसि यत् कर्म? मोहात् अविवेकतः करिष्यसि अवशोऽपि परवश एव तत् कर्म।।यस्मात् --,

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【 Verse 18.61 】

▸ Sanskrit Sloka: ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति | भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ||

▸ Transliteration: īśvaraḥ sarvabhūtānāṁ hṛddeśe ‘rjuna tiṣṭhati | bhrāmayan sarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayā ||

▸ Glossary: īśvaraḥ: the Supreme Lord; sarvabhūtānāṁ: of all living entities; hṛddeśe: in the heart; arjuna: O Arjuna; tiṣṭhati: resides; bhrāmayan: causing to travel; sarvabhūtāni : all living entities; yantra: machine; ārūḍhāni: being so placed; māyayā: under the illusion

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.61 The Supreme Lord resides in everyone’s heart, O Arjuna, and is directing the activities of all living entities who are acting as machines under the illusion of the material world.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.61।।हे अर्जुन ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.61।। हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.61 ईश्वरः the Lord? सर्वभूतानाम् of all beings? हृद्देशे in the hearts? अर्जुन O Arjuna? तिष्ठति dwells? भ्रामयन् causing to revolve? सर्वभूतानि all beings? यन्त्रारूढानि mounted on a machine? मायया by illusion.Commentary Isvara The Lord the Ruler of the universe Narayana.The Lord abides in the hearts of all beings. It is He Who has given a gift of this marvellous machine to you. It is by His power that all bodies move. The Lord is the real Actor within.By Maya By causing illusion.He causes all beings to revolve like wooden dolls mounted on a machine. (Cf.X.20.XIII.18)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.61. O Arjuna ! This Lord dwells in the heart of all beings, causing, by His trick-of-Illusion, all beings to whirl round [as if they are] mounted on a [revolving] mechanical contrivance.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.61 God dwells in the hearts of all beings, O Arjuna! He causes them to revolve as it were on a wheel by His mystic power.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.61 The Lord, O Arjuna, abides in the heart of every being, spinning them round and round, mounted on a wheel as it were, by His power.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.61 O Arjuna, the Lord resides in the region of the heart of all creatures, revolving through Maya all the creatures (as though) mounted on a machine!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.61 The Lord dwells in the hearts of all beings, O Arjuna, causing all beings, by His illusive power, to revolve as if mounted on a machine.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.61 See Comment under 18.62

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.61 Lord Vasudeva, who is the ruler over all, lives in 'the heart of all beings,' i.e., in the region from which arises all knowledge which is at the root of all secular and spiritual activities. How and doing what does He exist? He exists enabling, by His Maya (power), 'all beings who are mounted, as it were, on the machine Prakrti' in the form of body and senses created by Himself, to act in accordance with their Gunas of Sattva and others. It was already expressed in 'And I am seated in the hearts of all. From Me are memory, knowledge and their removal also' (15.15) and in 'From Me proceed everything' (10.8). The Srutis also proclaim 'He who, dwelling in the self' (Br. U. Madh., 3.7.22).

He now explains the way to get rid of the Maya:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.61 Arjuna, O Arjuna-one whose self is naturally white (pure), i.e. one possessing a pure internal organ. This follows from the Vedic text, 'The day is dark and the day is arjuna (white) (Rg. 6.9.1). Isvarah, the Lord , Narayana the Ruler; tisthati, resides, remains seated; hrd-dese, in the region of the heart; sarva-bhutanam, of all creatures, of all living beings. How does He reside? In answer the Lord says: bhramayan, revolving; mayaya, through Maya, through delusion; sarva-bhutani, all the creatures; as though yantra-arudhani, mounted on a machine-like man' etc., made of wood, mounted on a machine. The word iva (as though) has to be thus understood here. Bhramayan, revolving, is to be connected with tisthati, resides (conveying the idea, 'resides৷৷.while revolving').

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.61।। भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश सुस्पष्ट एवं सर्वथा सन्देह रहित है। गीताचार्य कहते हैं? मेरा स्मरण ईश्वर अर्थात् सम्पूर्ण विश्व के शासक के रूप में करो। ईश्वर ही नियामक और नियन्ता है। उसकी उपस्थिति में ही जगत् की समस्त घटनाएं घट सकती हैं? अन्यथा नहीं। जैसै कि वाष्प इंजन का ईश्वर वाष्प है? जिसके बिना इंजन में गति नहीं आ सकती।ईश्वर का स्मरण केवल सगुणसाकार अर्थात् शक्ति के मानवीय रूप में ही नहीं करना चाहिये? जैसे कैलाशपति? शिवजी? या वैकुण्ठवासी विष्णु या स्वर्ग में स्थित पिता के रूप में। ईश्वर तो भूतमात्र के हृदय में निवास कर रहा अंतरयामी है। इसकी पहचान हृदय में ही हो सकती है। जिस प्रकार विशाल महानगरी में किसी व्यक्ति से मिलने के लिये उसके निवासस्थान का पता बताया जाता है? उसी प्रकार? यहाँ? भगवान् श्रीकृष्ण अपना स्थानीय पता बता रहे हैंहृदय शब्द से तात्पर्य शारीरिक अंग रूप हृदय से नहीं है। दर्शनशास्त्र में हृदय का अर्थ लाक्षणिक है? शाब्दिक नहीं। प्रेम? करुणा? धृति? उत्साह? स्नेह? कोमलता? क्षमा? उदारता जैसे दैवी गुणों से सम्पन्न मन ही हृदय कहलाता है। परमेश्वर ही चेतनता और शक्ति का स्रोत है? जो अपनी शक्ति प्राणीमात्र को प्रदान करता है। समस्त प्राणी ईश्वर के ही चारों ओर इस प्रकार घूमते रहते हैं? जैसे कठपुतलियां किसी के हाथों में बन्धी खेल करती है। कठपुतलियों की अपनी कोई सार्मथ्य? शक्ति या भावना नहीं होती? वे जो कुछ खेल करती दिखाई देती हैं? वह सब अदृश्य हाथ की शक्ति है जो उन कठपुतलियों को धारण किये रहता है।पारमर्थिक दृष्टि से? ईश्वर का अर्थ चैतन्यस्वरूप ब्रह्म है। इस चैतन्य के सम्बन्ध से ही शरीर? मन आदि जड़ उपाधियाँ कार्य करने में सक्षम होती हैं। अन्यथा? जड़ पदार्थ में स्वयं न कर्म करने की शक्ति है और न वस्तुओं को जानने की। इस दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ यह होगा कि चैतन्यस्वरूप आत्मा की उपस्थिति में प्राणीमात्र अपनेअपने स्वभाव के अनुसार यत्रतत्र भ्रमण करते रहते हैं। इसी तथ्य को यहाँ इस प्रकार कहा गया है कि ईश्वर अपनी माया से भूतमात्र को घुमाता है।इसी श्लोक का दूसरा अर्थ निम्न प्रकार से होगा। समष्टि माया में व्यक्त चैतन्यस्वरूप परमात्मा ही ईश्वर कहलाता है? जो सर्वज्ञसर्वशक्तिमान् है। वह ईश्वर अपनी माया से समस्त जीवों को घुमाता है इसका अर्थ यह हुआ कि वह ईश्वर समस्त जीवों को उनके कर्मानुसार फल प्रदान करता है। ईश्वर के बिना व्यष्टि जीवों का अस्तित्व संभव ही नहीं है। समस्त जीवों को कर्म और ज्ञान की शक्तियां ईश्वर से ही प्राप्त होती हैं। इस प्रकार? वेदान्त के सिद्धांत को समझकर इस श्लोक के अध्ययन से यहाँ प्रयुक्त रूपक का अर्थ स्पष्ट हो जाता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.61।।स्वभावपारातन्त्र्यमुक्त्वेदानीमन्तर्यामिपारतन्त्र्यमाह। ईश्वर ईशनशीलः नारायणः सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां हृद्देशे तिष्ठति सर्वत्र स्थितोऽपि हृदयेऽभिवक्ततया तिष्ठति।अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च इति श्रुतौ अर्जुनशब्दस्य शुक्लशब्दापर्यायताय प्रयोगदर्शनात् शुक्लान्तरात्मस्वभावो विशुद्धन्तःकरणोऽर्जुनस्तं संबोधयन्नर्जुनस्य तवाविवेकेन निबन्धनं स्वस्वातन्त्र्याध्यारोफणं नोचतम्? किंतु ईश्वरप्रेरितः सर्वं करोमीति परिज्ञानमिति सूचयति। किं कुर्वन् तिष्ठतीत्याकाङ्क्षायामाह -- भ्रामयन् भ्रमणं कारयन् सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि यन्त्राण्यारुढान्यधिष्ठितानीव यथा मायावी दारुकृतपुरुषादीनि यन्त्रारुढानि मायया छद्मना भ्रामयंस्तिष्ठति तद्वदीश्वरो यन्त्रसदृश शरीरारुढानि भूतानीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.61।।स्वभावाधीनतामुक्त्वेश्वराधीनतां विवृणोति -- ईश्वर इति। ईश्वर ईशनशीलो नारायणः सर्वान्तर्यामीयः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति।यच्च किंचिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः इत्यादिश्रुतिसिद्धः सर्वभूतानां सर्वेषां प्राणिनां हृद्देशेऽन्तःकरणे तिष्ठति सर्वव्यापकोऽपि तत्राभिव्यज्यते सप्तद्वीपाधिपतिरिव राम उत्तरकोसलेषु। हेऽर्जुन हे शुक्ल शुद्धान्तःकरण? एतादृशमीश्वरं त्वं ज्ञातुं योग्योसीति द्योत्यते। किं कुर्वंस्तिष्ठति भ्रामयन्नितस्ततश्चालयन् सर्वभूतानि परतन्त्राणि मायया छद्मना यन्त्रारूढानीव सूत्रसंचारादियन्त्रमारूढानि दारुनिर्मितपुरुषादीन्यत्यन्तपरतन्त्राणि यथा मायावी भ्रामयति तद्वदित्यर्थशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.61।।कोऽसौ परो यद्वशेऽहमस्मीत्यत आह -- ईश्वर इति। ईश्वर ईशनशीलोऽन्तर्यामी पृथिव्यादीनामस्माकं च सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां हृद्देशे बुद्धिगुहायां सर्वप्राणिप्रवर्तकस्तिष्ठति। कीदृशः। सर्वभूतानि भ्रामयन्नूर्ध्वाधोमार्गेषु संचारयन् काष्ठपुत्तिका इव सूत्रधारः यन्त्रारूढानि यन्त्रमिव यन्त्रं उत्क्रमणादिसाधनं सर्वप्राणाद्यात्मकं लिङ्गं तदारूढानि मायया स्वशक्त्या भ्रामयन्निति संबन्धः। हे अर्जुन शुक्ल विशुद्धान्तःकरण? सेश्वरोऽसीति भावः। अत्राहंकारपूर्वकं यः कर्म करोति यश्च ईश्वरपरवशोऽहंकरोमीति बुद्ध्या करोति तयोरत्यन्तवैलक्षण्यप्रदर्शनार्थो मन्त्रो भाष्ये उदाहृतःअहश्च कृष्णमहरर्जुनं च विवर्तेते रजसी वेद्याभिः इति भारद्वाजार्षंअहश्च कृष्णमहरर्जुनं चइत्याग्निमारुतस्य प्रतिपत् इति ब्राह्मणेन आग्निमारुते शस्त्रे विनियुक्ता प्रथमेयमृक्। यस्मिन् दिवसे सोमः सूयते यागार्थं तदेव जन्मसाफल्यदिनं मुख्यमहःशब्दवाच्यम्। अन्यत्तु दिनमदिनमेव निष्फलत्वात्। तथा च स्मृतिःदशभिर्जन्मभिर्वेदा आधानं शतजन्मभिः। सहस्रैर्जन्मभिः सोमं ब्राह्मण्यं पातुमर्हति इति सोमयागस्य दौर्लभ्यं दर्शयति। तदयमहःशब्दः कालवचनोऽपि सौम्ये कर्मणि वर्तते। यथा दर्शपौर्णमासशब्दौ। तत्रैवं सति अहः यागः कृष्णं अविदुषा कृतं अप्रकाशमिव भवति। तथाऽहरर्जुनं स्वच्छं तदेव विदुषा कृतं प्रकाशरूपमिव भवति। ते एते उभे अपि विद्वदविद्वत्कृते अहनी रजसी प्रवृत्तिरूपत्वात् रजोगुणकार्ये अपि वेद्याभिर्विद्याभिः कर्माङ्गावबद्धोपासनारूपा वा परमेश्वरे सर्वकर्मार्पणरूपा वा अहंकरोमीत्यभिमानरूपा वा विद्या विज्ञानानि ताभिर्विवर्तेते वैपरीत्येन वर्तेते। सोपासनं कर्म श्वेतं परमात्मतत्त्वप्रकाशकं बन्धविच्छेदहेतुः? मूढकृतं कर्म कृष्णं स्वरूपावरकं बन्धहेतुरित्यर्थः। तदेवं भगवान् पार्थं अर्जुनेति संबोधयन् एतस्य स्वच्छान्तःकरणत्वद्योतनेन शुक्ले धर्मेऽधिकारं दर्शयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.61।।नन्वीश्वराज्ञाव्यतिरेकेण प्रकृतिकर्मणोः कथं तथात्वं इत्यत आह -- ईश्वर इति। हे अर्जुन वृक्षजातीयनामत्वेन ज्ञानानर्ह ईश्वरो नियामकस्तत्त्वेन सर्वभूतानां हृद्देशे हृदयमध्ये तिष्ठति मायया सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि शरीरारूढानि भ्रामयँस्तिष्ठति यथा दारुयन्त्रारूढानि कृत्रिमभूतानि सूत्रधारश्चालयति तथा मायया भ्रामयंस्तिष्ठतीति वाऽर्थः। अत ईश्वरप्रेरितानेव प्रकृतिः कर्म च साधकतया प्रेरयतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.61।।तदेवं श्लोकद्वयेन सांख्यादिमतेन प्रकृतिपारतन्त्र्यं स्वभावपारतन्त्र्यं कर्मपारतन्त्र्यं चोक्तम्। इदानीं स्वमतमाह -- ईश्वर इति द्वाभ्याम्। सर्वभूतानां हृदयमध्ये ईश्वरोऽन्तर्यामी तिष्ठति। किं कुर्वन् सर्वाणि भूतानि मायया निजशक्त्या भ्रामयन् तत्तत्कर्मसु प्रवर्तयन् यथा दारुयन्त्रमारूढानि कृत्रिमाणि भूतानि सूत्रधारो लोके भ्रामयति तद्वदित्यर्थः। यद्वा यन्त्राणि शरीराणि आरूढानि भूतानि देहाभिमानिनो जीवान् भ्रामयन्नित्यर्थः। तथाच श्वेताश्वतराणां मन्त्रःएको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च इति। अन्तर्यामिब्राह्मणं चय आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः इत्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.61।।इदानीं प्राकृतभूतजातनियन्तृरूपेण मया सर्वं भूतजातं प्राकृतकर्मानुगुणलीलया प्रकृत्यनुवर्त्तने नियमितं भवतीति ब्रह्मसूत्रसिद्धान्तमाह -- ईश्वर इति। ईश्वरः सर्वनियमनशीलो वासुदेवः सर्वेषां प्राकृतानां भूतानां लीलयोच्चनीचभावेन स्वात्मना सृष्टानां प्रकृत्या संसृष्टानां आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तानां हृद्देशे हृदयाकाशे तिष्ठति। तत्रान्तर्यामिस्वरूपेण स्थितोऽपि निर्लेप इत्याशयेनेश्वर इत्युक्तम्। उपाधिस्थाने स्थितस्य तदसंस्पृष्टत्वमीश्वरत्वादित्यर्थः। अतएव आकाशवत्सर्वगतः [शां.उ.2।1।3] एको देवः सर्वभूतेषु गूढः ৷৷. साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च [श्वेता.6।11ब्रह्मो.3गोपालो.3।19राधो.4।1] इति श्रूयते। स च चेताः स्वयम्प्रकाशकः स्वप्रकाशश्च प्रदीपवत् यन्त्रारूढानि यन्त्रे इवारूढानि मायया भ्रामयन् भवति। भ्रामणं हि प्रेरणं? यन्त्रं च स्वनिर्मितं देहेन्द्रियादिरूपं? तत्रारूढांश्चेतनांस्तद्गुणानुगुण्येन प्रवर्त्तयंस्तिष्ठति। इदं चसर्वस्य चाऽहं हृदि सन्निविष्टः [15।15] इत्यस्य भाष्यरूपम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.61।।क्योंकि --, हे अर्जुन ईश्वर अर्थात् सबका शासन करनेवाला नारायण समस्त प्राणियोंके हृदयदेशमें स्थित है। जो शुक्ल स्वच्छशुद्ध अन्तरात्मास्वभाववाला हो अर्थात् पवित्र अन्तःकरणयुक्त हो उसका नाम अर्जुन है क्योंकि,अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च इस कथनमें अर्जुनशब्द शुद्धताका वाचक देखा गया है। वह ( ईश्वर ) कैसे स्थित है सो कहते हैं -- समस्त प्राणियोंको? यन्त्रपर आरूढ़ हुईचढ़ी हुई कठपुतलियोंकी भाँति? भ्रमाता हुआ -- भ्रमण कराता हुआ स्थित है। यहाँ इव ( भाँति ) शब्द अधिक समझना चाहिये? अर्थात् जैसे यन्त्रपर आरूढ़ कठपुतली आदिको ( खिलाड़ी ) मायासे भ्रमाता हुआ स्थित रहता है? उसी तरह ईश्वर सबके हृदयमें स्थित है? इस प्रकार इसका सम्बन्ध है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.61।। व्याख्या --   ईश्वरः सर्वभूतानां ৷৷. यन्त्रारूढानि मायया -- इसका तात्पर्य यह है कि जो ईश्वर सबका शासक? नियामक? सबका भरणपोषण करनेवाला और निरपेक्षरूपसे सबका संचालक है? वह अपनी,शक्तिसे उन प्राणियोंको घुमाता है? जिन्होंने शरीरको मैं औरमेरा मान रखा है।जैसे? विद्युत्शक्तिसे संचालित यन्त्र -- रेलपर कोई आरूढ़ हो जाता है? चढ़ जाता है तो उसको परवशतासे रेलके अनुसार ही जाना पड़ता है। परन्तु जब वह रेलपर आरूढ़ नहीं रहता? नीचे उतर जाता है? तब उसको रेलके अनुसार नहीं जाना पड़ता। ऐसे ही जबतक मनुष्य शरीररूपी यन्त्रके साथ मैं और मेरेपनका समबन्ध रखता है? तबतक ईश्वर उसको उसके स्वभाव (टिप्पणी प0 962) के अनुसार संचालित करता रहता है और वह मनुष्य जन्ममरणरूप संसारके चक्रमें घूमता रहता है।शरीरके साथ मैंमेरेपनका सम्बन्ध होनेसे ही रागद्वेष पैदा होते हैं? जिससे स्वभाव अशुद्ध हो जाता है। स्वभावके अशुद्ध होनेपर मनुष्य प्रकृति अर्थात् स्वभावके परवश हो जाता है। परन्तु शरीरसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर जब स्वभाव रागद्वेषसे रहित अर्थात् शुद्ध हो जाता है? तब प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती। प्रकृति(स्वभाव)की परवशता न रहनेसे ईश्वरकी माया उसको संचालित नहीं करती।अब यहाँ यह शङ्का होती है कि जब ईश्वर ही हमारेको भ्रमण करवाता है? क्रिया करवाता है? तब यह काम करना चाहिये और यह काम नहीं करना चाहिये -- ऐसी स्वतंन्त्रता कहाँ रही क्योंकि यन्त्रारूढ़ होनेके कारण हम यन्त्रके और यन्त्रके संचालक ईश्वरके अधीन हो गये? परतन्त्र हो गये? फिर यन्त्रका संचालक (प्रेरक) जैसा करायेगा? वैसा ही होगा इसका समाधान इस प्रकार इस प्रकार है -- जैसे? बिजलीसे संचालित होनेवाले यन्त्र अनेक तरहके होते हैं। एक ही बिजलीसे संचालित होनेपर भी किसी यन्त्रमें बर्फ जम जाती है और किसी यन्त्रमें अग्नि जल जाती है अर्थात् उनमें एकदूसरेसे बिलकुल विरुद्ध काम होता है। परन्तु बिजलीका यह आग्रह नहीं रहता कि मैं तो केवल बर्फ ही जमाऊँगी अथवा केवल अग्नि ही जलाऊँगी। यन्त्रोंका भी ऐसा आग्रह नहीं रहता कि हम तो केवल बर्फ ही जमायेंगे अथवा केवल अग्नि ही जलायेंगे? प्रत्युत यन्त्र बनानेवाले कारीगरने यन्त्रोंको जैसा बना दिया है? उसके अनुसार उनमें स्वाभाविक ही बर्फ जमती है और अग्नि जलती है। ऐसे ही मनुष्य? पशु? पक्षी? देवता? यक्ष राक्षस आदि जितने भी प्राणी हैं? सब शरीररूपी यन्त्रोंपर चढ़े हुए हैं और उन सभी यन्त्रोंको ईश्वर संचालित करता है। उन अलगअलग शरीरोँमें भी जिस शरीरमें जैसा स्वभाव है? उस स्वभावके अनुसार वे ईश्वरसे प्रेरणा पाते हैं और कार्य करते हैं। तात्पर्य यह है कि उन शरीरोंसे मैंमेरेपनका सम्बन्ध माननेवालेका जैसा (अच्छा या मन्दा) स्वभाव होता है? उससे वैसी ही क्रियाएँ होती हैं। अच्छे स्वभाववाले (सज्जन) मनुष्यके द्वारा श्रेष्ठ क्रियाएँ होती हैं और मन्दे स्वभाववाले (दुष्ट) मनुष्यके द्वारा खराब क्रियाएँ होती हैं। इसलिये अच्छी या मन्दी क्रियाओंको करानेमें ईश्वरका हाथ नहीं है? प्रत्युत खुदके बनाये हुए अच्छे या मन्दे स्वभावका ही हाथ है।जैसे बिजली यन्त्रके स्वभावके अनुसार ही उसका संचालन करती है? ऐसे ही ईश्वर प्राणीके (शरीरमें स्थित) स्वभावके अनुसार उसका संचालन करते हैं। जैसा स्वभाव होगा? वैसे ही कर्म होंगे। इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि स्वभावको सुधारनेमें और बिगाड़नेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं? कोई भी परतन्त्र नहीं है। परन्तु पशु? पक्षी? देवता आदि जितने भी मनुष्येतर प्राणी हैं? उनमें अपने स्वभावको सुधारनेका न अधिकार है और न स्वतन्त्रता ही है। मनुष्यशरीर अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है? इसलिये इसमें अपने स्वभावको सुधारनेका पूरा अधिकार? पूरी स्वतन्त्रता है। उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके स्वभाव सुधारनेमें और स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके स्वभाव बिगाड़नेमें मनुष्य स्वयं ही हेतु है। ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयदेशमें रहता है -- यह कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें सब जगह जल रहनेपर भी जहाँ कुआँ होता है? वहींसे जल प्राप्त होता है ऐसे ही परमात्मा सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण होते हुए भी हृदयमें प्राप्त होते हैं अर्थात् हृदय सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिका विशेष स्थान है। ऐसे ही तीसरे अध्यायमें सर्वव्यापी परमात्माको यज्ञ(निष्कामकर्म) में स्थित बताया गया है तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् (गीता 3। 15)।विशेष बातसाधककी प्रायः यह भूल होती है कि वह भजन? कीर्तन? ध्यान आदि करते हुए भी भगवान् दूर हैं वे अभी नहीं मिलेंगे यहाँ नहीं मिलेंगे अभी मैं योग्य नहीं हूँ भगवान्की कृपा नहीं है आदि भावनाएँ बनाकर भगवान्की दूरीकी मान्यता ही दृढ़ करता रहता है। इस जगह साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि जब भगवान् सभी प्राणियोंमें मौजूद हैं तो मेरेमें भी हैं। वे सर्वत्र व्यापक हैं तो मैं जो जप करता हूँ उस जपमें भी भगवान् हैं मैं श्वास लेता हूँ तो उस श्वासमें भी भगवान् हैं मेरे मनमें भी भगवान् हैं? बुद्धिमें भी भगवान् हैं मैं जो मैंमैं कहता हूँ? उस मैं में भी भगवान् हैं। उस मैं का जो आधार है? वह अपना स्वरूप भगवान्से अभिन्न है अर्थात् मैंपन तो दूर है? पर भगवान् मैंपनसे भी नजदीक हैं। इस प्रकार अपनेमें भगवान्को मानते हुए ही भजन? जप? ध्यान आदि करने चाहिये।अब शङ्का यह होती है कि अपनेमें परमात्माको माननेसे मैं और परमात्मा दो (अलगअलग) हैं -- यह द्वैतापत्ति होगी। इसका समाधान यह है कि परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं होती? प्रत्युत अहंकार(मैंपन) को स्वीकार करनेसे जो अपनी अलग सत्ता प्रतीत होती है? उसीसे द्वैतापत्ति होती है। परमात्माको अपना और और अपनेमें माननेसे तो परमात्मासे अभिन्नता होती है? जिससे प्रेम प्रकट होता है।जैसे? गङ्गाजीमें बाढ़ आ जानेसे उसका जल बहुत बढ़ जाता है और फिर पीछे वर्षा न होनेसे उसका जल पुनः कम हो जाता है परन्तु उसका जो जल गड्ढेमें रह जाता है अर्थात् गङ्गाजीसे अलग हो जाता है? उसकोगङ्गोज्झ कहते हैं। उस गङ्गोज्झको मदिराके समान महान् अपवित्र माना गया है। गङ्गाजीसे अलग होनेके कारण वह गंदा हो जाता है और उसमें अनेक कीटाणु पैदा हो जाते हैं? जो कि रोगोंके कारण हैं। परन्तु फिर कभी जोरकी बाढ़ आ जाती है? तो वह गङ्गोज्झ वापस गङ्गाजीमें मिल जाता है। गङ्गाजीमें मिलते ही उसकी एकदेशीयता? अपवित्रता? अशुद्धि आदि सभी दोष जाते हैं और वह पुनः महान् पवित्र गङ्गाजल बन जाता है।ऐसे ही यह मनुष्य जब अहंकारको स्वीकार करके परमात्मासे विमुख हो जाता है? तब इसमें परिच्छिन्नता? पराधीनता? जडता? विषमता? अभाव? अशान्ति? अपवित्रता आदि सभी दोष (विकार) आ जाते हैं। परन्तु जब यह अपने अंशी परमात्माके सम्मुख हो जाता है? उन्हींकी शरणमें चला जाता है अर्थात् अपना अलग कोई व्यक्तित्व नहीं रखता? तब उसमें आये हुए भिन्नता? पराधीनता आदि सभी दोष मिट जाते हैं। कारण कि स्वयं (चेतन स्वरूप) में दोष नहीं हैं दोष तो अहंता(मैंपन) को स्वीकार करनेसे ही आते हैं। सम्बन्ध --   अब भगवान् यन्त्रारूढ़ हुए प्राणियोंकी परवशताको मिटानेका उपाय बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.61।।इतोऽपि त्वया युद्धं कर्तव्यमेवेत्याह -- यस्मादिति। अर्जुनशब्दस्योक्तार्थत्वे श्रुतिमुदाहरति -- अहश्चेति।अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च विवर्तेते रजसी वेद्याभिः इत्यत्र किंचिदहस्तावत्कृष्णमस्वच्छं कलुषितमिव लक्ष्यते किंचित्पुनरहरर्जुनमतिस्वच्छं शुद्धस्वभावमुपलभ्यते। एवमर्जुनशब्दस्य शुक्लशब्दपर्यायतया प्रयोगदर्शनादुक्तार्थत्वमुचितमित्यर्थः। यन्त्रारूढानीवेति कथमुच्यते तत्राह -- इवशब्द इति। तदेव प्रपञ्चयति -- यथेति। दारुमयानि यन्त्राणि यथा लौकिको मायावी मायया भ्रामयन्वर्तते तथेश्वरोऽपि सर्वाणि भूतानि भ्रामयन्नेव हृदये तिष्ठतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.61।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.61।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.61।। -- ईश्वरः ईशनशीलः नारायणः सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां हृद्देशे हृदयदेशे अर्जुन शुक्लान्तरात्मस्वभावः विशुद्धान्तःकरणः -- अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च (ऋ. सं. 6।9।1) इति दर्शनात् -- तिष्ठति स्थितिं लभते। तेषु सः कथं तिष्ठतीति? आह -- भ्रामयन् भ्रमणं कारयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि यन्त्राणि आरूढानि अधिष्ठितानि इव -- इति इवशब्दः अत्र द्रष्टव्यः -- यथा दारुकृतपुरुषादीनि यन्त्रारूढानि। मायया च्छद्मना भ्रामयन् तिष्ठति इति संबन्धः।।

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【 Verse 18.62 】

▸ Sanskrit Sloka: तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत | तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ||

▸ Transliteration: tameva śaraṇaṁ gaccha sarvabhāvena bhārata | tatprasādātparāṁ śāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śāśvatam ||

▸ Glossary: taṁ: unto Him; eva: certainly; śaraṇaṁ: surrender; gaccha: go; sarvabhāvena: in all respects; bhārata: O son of Bhārata; tatprasādāt: by His grace; parāṁ: supreme;

Chapter 18 (Part 34)

śāntiṁ: in peace; sthānaṁ: abode; prāpsyasi: you will get; śāśvatam: eternal

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.62 Surrender to Him completely with all your being. By His grace you will attain supreme peace and the eternal abode.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.62।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परमशान्ति(संसारसे सर्वथा उपरति) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.62।। हे भारत तुम सम्पूर्ण भाव से उसी (ईश्वर) की शरण में जाओ। उसके प्रसाद से तुम परम शान्ति और शाश्वत स्थान को प्राप्त करोगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.62 तम् to Him? एव even? शरणम् गच्छ take refuge? सर्वभावेन with all thy being? भारत O Bharata? तत्प्रसादात् by His grace? पराम् supreme? शान्तिम् peace? स्थानम् the abode? प्राप्स्यसि (thou) shalt obtain? शाश्वतम् eternal.Commentary Do total and perfect surrender to the Lord. Do not keep any secret desires for silent gratification. Desire and egoism are the two chief obstacles that stand in the way of selfsurrender. Kill them ruthlessly.Run to the Lord for shelter with all thy being for freeing thyself from the troubles? afflictions and sorrows of Samsara. Take the Lord as the sole refuge. Then by His grace? thou shalt obtain supreme peace and attain to the supreme? eternal Abode.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.62. To Him alone you must go for refuge with all your thought, O descendant of Bharata ! Through My Grace you will attain the success, the eternal abode.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.62 With all thy strength, fly unto Him and surrender thyself, and by His grace shalt thou attain Supreme Peace and reach the Eternal Home.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.62 Seek refuge in Him alone, O Arjuna, with the whole of your being. By His grace, you shall find supreme peace and eternal abode.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.62 Take refuge in Him alone with your whole being, O scion of the Bharata dynasty. Through His grace you will attain the supreme Peace and the eternal Abode.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.62 Fly unto Him for refuge with all thy being, O Arjuna; by His grace thou shalt obtain supreme peace (and) the eternal abode.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.61-62 Isvarah etc. Tam eva etc. This Lord, the Supreme Self, must be taken hold of as refuge. When that Supreme Ruler, the [real] Agent-of-all-actions, the [real] Knower, the very Self of your own, is reflected upon, there (in the heart) the [effects of] actions do not enjoy any locus standi. Indeed, the deer-calves which are of wavering mind [by nature] and are noted only for their power of running away to escape, do not take recourse to their skill in pursuing freely their [usual] activities while there dwells in the [nearby] cave a loin-calf, the glory of whose valour has been made evident by the accessories in the form of the heaps of pearls scattered from the elephants' temples broken upon with the very sharp edges of his (lion-calf's) excellent claws.

By the cocluding statement that commences 'To Him alone you must go for refuge' and [runs] as 'Through My Grace etc.', the Bhagavat indicates the Lord Supreme Self, and Vasudeva krsna to be identical.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.62 Such being the case, take refuge with all your heart (Sarvabhavena), by every disposition of your body, senses and mind (Sarvatmana) in Him - Him, the ruler of all, who has become your charioteer out of compassion for dependents, and who orders you, 'Act thus' and so on. Even if you do not do so now, fighting in battle etc., is inevitable for you who are ignorant and actuated by His Maya, but then you will get ruined. Therefore, fight etc., in the manner which has been explained by Him. Such is the meaning.

Acting in this way, you will attain supreme peace, release from all bondage, and the eternal abode. Hundreds of Srutis declare it: 'That supreme place of Visnu which the sages see' (Rg. S., 1.2.6.5); 'They become meritorious and reach this heaven where Devas and Sadhyas dwell' (Tai. A., 3.12); 'Where dwell the ancient sages, the first-born' (Tai.Sam., 4.7.13.1); 'The supreme place above the paradise in the heart of the Supreme Heaven' (Ma. Na., 8.14); 'He who is in the Supreme Heaven and presides over this' (Rg. S., 8.7.17.7); 'Now that light which shines above this Supreme Heaven' (Cha. U., 3.13.7); and 'He reaches the end of the journey, the Highest abode of Visnu' (Ka. U., 3.9).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.62 Gaccha saranam, take refuge; tam eva, in Him, the Lord alone; sarva-bhavena, with your whole being, for getting rid of your mundane sufferings, O scion of the Bharata dynasty. Tat-prasadat, through His grace, through God's grace; prapsyasi, you will attain; param, the supreme; santim, Peace, the highest Tranillity; and the sasvatam, eternal; sthanam, Abode, the supreme State of Mine who am Visnu.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.62।। ईशावास्योपनिषद् के प्रथम मन्त्र का भावार्थ यह है कि यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए? नामरूपों के भेद से दृष्टि हटाकर अनन्त परमात्मा का आनन्दानुभव करो किसी के धन का लोभ मत करो। गीतादर्शन का सारतत्त्व भी यही है। अहंकार का त्याग करके अपने कर्त्तव्य करो यह तो मानो गीता का मूल मंत्र ही है। आत्मा और अनात्मा के मिथ्या सम्बन्ध से ही कर्तृत्वाभिमानी जीव की उत्पत्ति होती है। यह जीव ही संसार के दुखों को भोगता रहता है। अत? इससे अपनी मुक्ति के लिए अहंकार का परित्याग करना चाहिए। यहाँ प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि अहंकार का त्याग कैसे करें इसके उत्तर में ईश्वरार्पण की भावना का वर्णन किया गया है। पूर्वश्लोक में ही ईश्वर के स्वरूप को दर्शाया गया है। इसलिए? अब? भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं? तुम उसी हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाओ।शरण में जाने का अर्थ है अभिमान एवं फलासक्ति का त्याग करके? कर्माध्यक्षकर्मफलदाता ईश्वर का सतत स्मरण करते हुए कर्म करना। इसके फलस्वरूप चित्त की शुद्धि प्राप्त होगी? जो आत्मज्ञान में सहायक होगी। आत्मज्ञान की दृष्टि से शरण का अर्थ होगा समस्त अनात्म उपाधियों के तादात्म्य को त्यागकर आत्मस्वरूप ईश्वर के साथ एकत्व का अनुभव करना। यह शरणागति अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व के साथ ही हो सकती है (सर्वभावेन)? अधूरे हृदय से नहीं। राधा? हनुमान और प्रह्लाद जैसे भक्त इसके उदाहरण हैं।चित्त की शुद्धि और आत्मानुभूति ही ईश्वर की कृपा अथवा प्रसाद है। जिस मात्रा में? अनात्मा के साथ हमारा तादात्म्य निवृत्त होगा? उसी मात्रा में हमें ईश्वर का यह प्रसाद प्राप्त होगा।भारत भरतवंश में जन्म लेने के कारण अर्जुन का नाम भारत था। शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार इसका अर्थ है वह पुरुष जो भा अर्थात् प्रकाश (ज्ञान) में रत है। आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश में रमने वाले ऋषियों के कारण ही यह देश भारत कहा गया है।प्रकरण का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.62।।यस्मीदश्वर एव तत्तत्कर्मफलप्रदाता भ्रामयति तस्मात्तमेव ईश्वरं शरणं आश्रयं संसारार्ति हरणार्थं सर्वभावेन सर्वात्मना मनसा वाचा कर्मणा च गच्छ आश्रय। हेभारतेति संबोधयन् उत्तमवंशोद्भवस्त्वं योग्योऽसीति द्योतयति। तत्प्रसादातात्तस्य सभ्यगाराधितस्येश्वरस्य प्रसादादनुग्रहात्परां प्रकृष्टां शान्तिं अविद्योपशमरुपां सर्वानार्थनिवृत्तिस्थानं च मुक्तास्तिष्ठन्ति यस्मिन्निति स्थानं मम विष्णोः परम पदं शाश्वतं सदैकरसमवाप्यस्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.62।।ईश्वरः सर्वभूतानि परतन्त्राणि प्रेरयति चेत्प्राप्तं विधिप्रतिषेधशास्त्रस्य सर्वस्य पुरुषकारस्य चानर्थक्यमित्यत्राह -- तमेवेति। तमेवेश्वरं शरणंनामाश्रयं संसारसमुद्रोत्तरणार्थं गच्छ आश्रय। सर्वभावेन सर्वात्मना मनसा वाचा कर्मणा च। हे भारत? तत्प्रसादात्तस्यैवेश्वरस्यानुग्रहात्तत्त्वज्ञानोत्पत्तिपर्यन्तात्परां शान्तिं सकार्याविद्यानिवृत्तिं स्थानमद्वितीयस्वप्रकाशपरमानन्दरूपेणावस्थानं शाश्वतं नित्यं प्राप्स्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.62।।तमेव ईश्वरं सर्वभावेन सर्वात्मना शरणमाश्रयं गच्छ श्रयस्व। तत्प्रसादात् तदनुग्रहात्परां शान्तिमुपरतिं समाधिमितियावत्। तथा च सूत्रंसमाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् इति। स्थानं च परं विष्णोः पदं मोक्षं शाश्वतं नित्यं प्राप्स्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.62।।मामज्ञात्वा मदाज्ञां चेन्न करोषि तदा हृदयस्थितेश्वरस्यैव शरणं गच्छेत्याह -- तमेवेति। हे भारत सत्कुलोत्पन्नत्वादहङ्काररहित तं पूर्वोक्तं हृदयस्थितमेव ईश्वरं सर्वभावेन सङ्कल्पविकल्पान् परित्यज्य सर्वात्मना शरणं गच्छ? ततस्तत्प्रसादात् परां शान्तिं शाश्वतं नित्यं स्थानं पूर्वश्लोकोक्तमक्षरात्मकं प्राप्स्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.62।।तमिति। यस्मादेवं सर्वे जीवाः परमेश्वरपरतन्त्रास्तस्मादहंकारं परित्यज्य सर्वभावेन सर्वात्मना तमीश्वरमेव शरणं गच्छ। ततस्तस्यैव प्रसादात्परमामुपशान्तिं स्थानं च पारमेश्वरं शाश्वतं नित्यं प्राप्स्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.62।।अतस्तमेव सर्वनियन्तारं सर्वेश्वरं शरण्यं गच्छ सर्वात्मना। अन्यथा मत्प्रकृतिप्रेरितेन तु त्वया युद्धकरणमनिवार्यं भविष्यत्येवेति वरं मदुक्तकरणम्। मत्प्रसादादेव परां शान्तिं शाश्वतं स्थानं च प्राप्स्यसि। अतो भगवदाज्ञातः स्वधर्मकरणं मतं तथा सति न बन्धः स्यात्तदीयस्येति निर्णयः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.62।।हे भारत तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें जा अर्थात् संसारके समस्त क्लेशोंका नाश करनेके लिये मन? वाणी और शरीरद्वारा सब प्रकारसे उस ईश्वरका ही आश्रय ग्रहण कर। फिर उस ईश्वरके अनुग्रहसे परम -- उत्तम शान्तिको? अर्थात् उपरतिको और शाश्वत स्थानको अर्थात् मुझ विष्णुके परम नित्यधामको प्राप्त करेगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.62।। व्याख्या --   [मनुष्यमें प्रायः यह एक कमजोरी रहती है कि जब उसके सामने संतमहापुरुष विद्यमान रहते हैं? तब उसका उनपर श्रद्धाविश्वास एवं महत्त्वबुद्धि नहीं होती (टिप्पणी प0 963) परन्तु जब वे चले जाते हैं? तब पीछे वह रोता है? पश्चात्ताप करता है। ऐसे ही भगवान् अर्जुनके रथके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं। वे ही भगवान् जब अर्जुनसे कहते हैं कि शरणागत भक्त मेरी कृपासे शाश्वत पदको प्राप्त हो जाता है और तू भी मेरेमें चित्तवाला होकर मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा? तब अर्जुन कुछ बोले ही नहीं। इससे यह सम्भावना भी हो सकती है कि भगवान्के वचनोंपर अर्जुनको पूरा विश्वास न हुआ हो। इसी दृष्टिसे भगवान्को यहाँ अर्जुनके लिये अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें जानेकी बात कहनी पड़ी।]तमेव शरणं गच्छ -- भगवान् कहते हैं कि जो सर्वव्यापक ईश्वर सबके हृदयमें विराजमान है और सबका संचालक है? तू उसीकी शरणमें चला जा। तात्पर्य है कि सांसारिक उत्पत्तिविनाशशील पदार्थ? वस्तु? व्यक्ति? घटना परिस्थिति आदि किसीका किञ्चिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल अविनाशी परमात्माका ही आश्रय ले ले।पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि मनुष्य जबतक शरीररूपी यन्त्रके साथ मैंमेरापनका सम्बन्ध रखता है तबतक ईश्वर अपनी मायासे उसको घुमाता रहता है। अब यहाँ एव पदसे उसका निषेध करते हुए भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शरीररूपी यन्त्रके साथ किञ्चिन्मात्र भी मैंमेरापनका सम्बन्ध न रखकर तू केवल उस ईश्वरकी शरणमें चला जा।सर्वभावेन -- सर्वभावसे शरणमें जानेका तात्पर्य यह हुआ कि मनसे उसी परमात्माका चिन्तन हो? शारीरिक क्रियाओंसे उसीका पूजन हो? उसीका प्रेमपूर्वक भजन हो और उसके प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्नता हो। वह विधान चाहे शरीर? इन्द्रियाँ? मन आदिके अनुकूल हो? चाहे प्रतिकूल हो? उसे भगवान्का ही किया हुआ मानकर खूब प्रसन्न हो जाय कि अहो भगवान्की मेरेपर कितनी कृपा है कि मेरेसे बिना पूछे ही? मेरे मन? बुद्धि आदिके विपरीत जानते हुए भी केवल मेरे हितकी भावनासे? मेरा परम कल्याण करनेके लिये उन्होंने ऐसा विधान किया हैतत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् -- भगवान्ने पहले यह कह दिया था कि मेरी कृपासे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है (18। 56) और मेरी कृपासे तू सम्पूर्ण विघ्नोंसे तर जायगा (18। 58)। वही बात यहाँ कहते हैं कि उस अन्तर्यामी परमात्माकी कृपासे तू परमशान्ति और शाश्वत स्थान(पद)को प्राप्त कर लेगा।गीतामें अविनाशी परमपदको हीपरा शान्ति नामसे कहा गया है। परन्तु यहाँ भवगान्नेपरा शान्ति औरशाश्वत स्थान (परमपद) -- दोनोंका प्रयोग एक साथ किया है। अतः यहाँपरा शान्ति का अर्थ संसारसे सर्वथा उपरति औरशाश्वत स्थान का अर्थ परमपद लेना चाहिये।भगवान्ने तमेव शरणं गच्छ पदोंसे अर्जुनको सर्वव्यापी ईश्वरकी शरणमें जानेके लिये कहा है। इससे यह शङ्का हो सकती है कि क्या भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हैं क्योंकि अगर भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर होते? तो अर्जुनकोउसीकी शरणमें जा -- ऐसा (परोक्ष रीतिसे) नहीं कहते।इसका समाधान यह है कि भगवान्ने सर्वव्यापक ईश्वरकी शरणागतिको तो गुह्याद्गुह्यतरम् (18। 63) अर्थात् गुह्यसे गुह्यतर कहा है? पर अपनी शरणागतिको सर्वगुह्यतमम् (18। 64) अर्थात् सबसे गुह्यतम कहा है। इससे सर्वव्यापक ईश्वरकी अपेक्षा भगवान् श्रीकृष्ण बड़े ही सिद्ध हुए।भगवान्ने पहले कहा है कि मैं अजन्मा? अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ (4। 6) मैं सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंका भोक्ता हूँ? सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ और सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद हूँ -- ऐसा मुझे माननेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है (5। 29) परन्तु जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और सबका मालिक नहीं मानते? उनका पतन होता है (9। 24)। इस प्रकार अन्वयव्यतिरेकसे भी भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सिद्धि हो जाता है।इस अध्यायमें ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (18। 61) पदोंसे अन्तर्यामी ईश्वरको सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया है और पंद्रहवें अध्यायमें सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः (15। 15) पदोंसे अपनेको सबके हृदयमें स्थित बताया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण दो नहीं हैं?,एक ही हैं।जब अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण एक ही हैं? तो फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको तमेंव शरणं गच्छ क्यों कहा इसका कारण यह है कि पहले छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने अपनी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदकी प्राप्ति होनेकी बात कही और सत्तावनवेंअट्ठावनवें श्लोकोंमें अर्जुनको अपने परायण होनेकी आज्ञा देकरमेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा -- यह बात कही। परन्तु अर्जुन कुछ बोले नहीं अर्थात् उन्होंने कुछ भी स्वीकार नहीं किया। इसपर भगवान्ने अर्जुनको धमकाया कि यदि अहंकारके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। उनसठवें और साठवें श्लोकमें कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- इस प्रकार अहंकारका आश्रय लेकर किया हुआ तेरा निश्चय भी नहीं टिकेगा और तुझे स्वभावज कर्मोंके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा। भगवान्के इतना कहनेपर भी अर्जुन कुछ बोले नहीं। अतः अन्तमें भगवान्को यह कहना पड़ा कि यदि तू मेरी शरणमें नहीं आना चाहता तो सबके हृदयमें स्थित जो अन्तर्यामी परमात्मा हैं? उसीकी शरणमें तू चला जा।वास्तवमें अन्तर्यामी ईश्वर और भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा अभिन्न हैं अर्थात् सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं और भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर हैं। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि तू उस अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें चला जा। ऐसा कहनेपर भी अर्जुन कुछ नहीं बोले। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको चेतानेके लिये उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.62।।ईश्वरः सर्वाणि भूतानि प्रेरयति चेत्प्राप्तकैवल्यस्यापि पुरुषकारस्यानर्थक्यमित्याशङ्क्याह -- तमेवेति। सर्वात्मना मनोवृत्त्या वाचा कर्मणा चेत्यर्थः। ईश्वरस्यानुग्रहात्तत्त्वज्ञानोत्पत्तिपर्यन्तादिति शेषः। मुक्तास्तिष्ठन्त्यस्मिन्निति स्थानम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.62।।ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति [18।61]तमेव शरणं गच्छ तत्प्रसादात् इत्यादिरूपात्परोक्षवचनात्कृष्णस्यानीश्वरत्वं प्रतीयते। तन्निराकर्तुमाह -- परोक्षेति। निश्चितार्थत्वाभिप्रायेणान्यथासिद्धमिति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.62।।परोक्षवचनं तु द्रोणं प्रति भीमवचनवत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.62।। --,तमेव ईश्वरं शरणम् आश्रयं संसारार्तिहरणार्थं गच्छ आश्रय सर्वभावेन सर्वात्मना हे भारत। ततः तत्प्रसादात् ईश्वरानुग्रहात् परां प्रकृष्टां शान्तिम् उपरतिं स्थानं च मम विष्णोः परमं पदं प्राप्स्यसि शाश्वतं नित्यम्।।

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【 Verse 18.63 】

▸ Sanskrit Sloka: इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया | विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ||

▸ Transliteration: iti te jñānamākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayā | vimṛśyai tadaśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru ||

▸ Glossary: iti: thus; te: unto you; jñānaṁ: knowledge; ākhyātaṁ: described; guhyāt: confidential; guhyataraṁ: still more confidential; mayā: by Me; vimṛśya: by deliberation; etat: that; aśeṣeṇa: fully; yathā: as you; icchasi: you like; tathā: that; kuru: perform

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.63 I have explained the knowledge that is the secret of secrets. After fully reflecting on this, do as you wish.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.63।।यह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है? वैसा कर।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.63।। इस प्रकार समस्त गोपनीयों से अधिक गुह्य ज्ञान मैंने तुमसे कहा इस पर पूर्ण विचार (विमृश्य) करने के पश्चात् तुम्हारी जैसी इच्छा हो? वैसा तुम करो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.63 इति thus? ते to thee? ज्ञानम् wisdom? आख्यातम् has been declared? गुह्यात् than the secret? गुह्यतरम् more secret? मया by Me? विमृश्य reflecting over? एतत् this? अशेषेण fully? यथा as? इच्छसि (thou) wishest? तथा so? कुरु act.Commentary Thus has wisdom? more profound than all secrets? been declared to thee by Me. This teaching is well known as the Gita? the essence of all the Vedas. If anyone follows it and lives in the spirit of this teaching he will certainly attain supreme peace? highest knowledge and immortality. There is no doubt about this. I have revealed the mystery of this secret treasure to thee as thou art dear to Me? O Arjuna.It The teaching declared above. Reflect fully over everything that has been taught to thee.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.63. Thus the [path of] wisdom, a better secret than all the secrets has been expounded to you by Me; comprehend it fully and then act as you please.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.63 Thus have I revealed to thee the Truth, the Mystery of mysteries. Having thought it over, thou art free to act as thou wilt.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.63 Thus the knowledge, the mystery of mysteries, has been declared to you be Me. Reflecting on it fully, do what you will.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.63 To you has been imparted by Me this knowledge [Derived in the instrumental sense of 'means of knowledge'; i.e. the scripture Gita.] which is moe secret than any secret. Pondering over this as a whole, do as you like.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.63 Thus has wisdom, more secret than secrecy itself, been declared unto thee by Me; having reflected over it fully, then act as thou wishest.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.63 Iti te etc. : The [path of] wisdom has been taught to you. It is a better secret than the secret literature i.e., the last portion of the Vedas (the Upanisads), as it reveals the supreme Non-duality (Advaita-philosophy). Comprehend it fully and then : Deliberate on the purport of it and then. The purport has been, no doubt, elucidated by us by taking-by-horn-method (directly) whenever occasion arose. Yet, a clear reflection of the entire subject matter is shown here. Because it is the choicest one, the mind is never satisfied, when it is being elucidated and listened to. The most secret thing is being determined here. The method by which that is known, you must listen to now - so He says :-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.63 Thus, in this manner, has been set forth everything that is to be acired by those aspirants for release - the mystery of mysteries, concerning Karma Yoga, Jnana Yoga and Bhakti Yoga. Reflecting on it fully, do what you wish to do according to your alification - i.e., follow Karma Yoga, or Jnana Yoga or Bhakti Yoga according to your liking. Such is the meaning.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.63 Te, to you; akhyatam, has been imparted, spoken of; maya, by Me who am the omniscient God; iti, this; jnanam, knowledge; which is guhyataram, more secret; guhyat, than any secret-i.e. it is extremely profound, mystical. Vimrsya, pondering over, contemplating on; etat, this, the Scripture as imparted; asesena, as a whole, and also on all the subjects dealt with; kuru, do; yatha icchasi tatha, as you like. 'Once again, hear what is beng said by Me:'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.63।। प्रस्तुत श्लोक कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर दिये गये गीताप्रवचन का अन्तिम श्लोक माना जा सकता है। संस्कृत में इति शब्द के साथ किसी कथन अथवा उद्धरण की समाप्ति की जाती है। इस दृष्टि से भगवान् श्रीकृष्ण अपने उपदेश को यहीं पर सम्पूर्ण करते हैं।गुह्यात् गुह्य तरम् गुह्य या रहस्य उसे कहते हैं? जो अधिकांश लोगों को अज्ञात होता है? किन्तु कुछ विरले लोग उसे जानते हैं। यद्यपि वह अज्ञात होता है? तथपि अज्ञेय नहीं। उसका ज्ञान आप्त पुरुषों (जानकर लोगों) से प्राप्त किया जा सकता है। गीता में आत्मज्ञान का उपदेश दिया गया है। आत्मा द्रष्टा है इसलिए वह कभी इन्द्रिय? मन और बुद्धि द्वारा दृश्यरूप में नहीं जाना जा सकता। इसलिए? कोई व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो? वह स्वयं अपनी बुद्धि के द्वारा आत्मा के शुद्ध स्वरूप का आभास तक नहीं पा सकता। इसके लिए गुरु के उपदेश की नितान्त आवश्यकता होती है। सर्वथा इन्द्रिय अगोचर होने के कारण ही यह आत्मज्ञान समस्त लौकिक रहस्यों से भी अधिक गूढ़ है।गुह्य शब्द का अर्थ यह नहीं होता कि इस ज्ञान का उपदेश किसी को देना ही नहीं चाहिए। परन्तु भारत के पतन काल में कतिपय लोगों ने इसे अपनी वैयक्तिक सम्पत्ति समझकर गुह्य शब्द की आड़ में अन्य लोगों को इस ज्ञान से वंचित रखा। परन्तु यदि हम अपने धर्मशास्त्रों का समुचित अध्ययन करें? तो यह ज्ञात होगा कि उदार हृदय के ऋषियों ने किसी भी स्थान पर ऐसे रूढ़िवादी लोगों के मत का अनुमोदन नहीं किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस पुरुष में सूक्ष्म ज्ञान को ग्रहण करने की मानसिक और बौद्धिक क्षमता नहीं होती? वह इसका अधिकारी नहीं होता। अनधिकारी को सर्वोच्च ज्ञान देने पर वह उसे विपरीत समझकर तथा दोषपूर्ण जीवन जीकर स्वयं की ही हानि कर सकता है।इस पर पूर्ण विचार करके केवल श्रवण या पठन से ही मनुष्य को पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। ज्ञान सन्देह रहित तथा विपर्यय (मिथ्या धारणाओं) से रहित होना चाहिए। इसलिए? आचार्य से प्राप्त किये गये ज्ञान पर युक्तियुक्त मनन और चिन्तन करने की आवश्यकता होती है। प्रत्येक साधक को स्वयं ही मनन करके प्राप्त ज्ञान की सत्यता का निश्चय करना होता है। भगवान् श्रीकृष्ण नहीं चाहते कि अर्जुन उनके उपदेश को विचार किये बिना ही स्वीकार कर ले। इसलिए? यहाँ वे कहते हैं? इस पर पूर्ण विचार करके? जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा तुम करो।यथेच्छसि तथा कुरु भगवान् श्रीकृष्ण? कर्मयोग की जीवनपद्धति को स्वीकार करने के विषय में अन्तिम निर्णय अर्जुन पर ही छोड़ देते हैं। प्रत्येक पुरुष को स्वेच्छा से ही ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। इसमें किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि सभी नवीन जन्मों में सहजता या स्वत प्रवृत्ति अमूल्य गुण माना जाता है। जीवन के समस्त सिद्धांतों? तथ्यों एवं उपायों को अर्जुन के समक्ष प्रस्तुत करने के पश्चात्? भगवान् श्रीकृष्ण उसे विचारपूर्वक निर्णय लेने के लिए आमन्त्रित करते हैं। अध्यात्म के आचार्यों को चाहिए कि वे किसी प्रकार भी अपने शिष्यों को बाध्य न करें। भारतवर्ष में इस प्रकार बाध्य करके कभी धर्म प्रचार नहीं किया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.63।।शास्त्रमुपसंहर्तुमिच्छन्नाह -- इतीति। इत्येतत्ते तुभ्यं ज्ञायतेनेनेति ज्ञानं गीताशास्त्रं गुह्याद्गोप्याद्हुह्यतरं अतिशयेन गोप्यं रहस्यं मया सर्वज्ञेनाप्ततमेन शास्त्रयोनिना आख्यातं कथितम्। एतद्यथोक्तशास्त्रमशेषेण समस्तं विमृश्य विमर्शनमालोचनं कृत्वा यथेच्छसि तथा कुरु नत्वेतत्सा कत्येनाविमृश्यैवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.63।।सर्वगीतार्थमुपसंहरन्नाह -- इतीति। इत्यनेन प्रकारेण ते तुभ्यमत्यन्तप्रियाय ज्ञानमात्ममात्रविषयं मोक्षसाधनं गुह्याद्गुह्यतरं परमरहस्यादपि संन्यासान्तात्कर्मयोगाद्रहस्यतरं तत्फलभूतत्वादाख्यातं समन्तात् कथितं मया सर्वज्ञेन परमाप्तेन। अतो विमृश्य पर्यालोच्य एतन्मयोपदिष्टं गीताशास्त्रमशेषेण सामस्त्येन सर्वैकवाक्यतया ज्ञात्वा स्वाधिकारानुरूपेण यथेच्छसि तथा कुरु न त्वेतदविमृश्यैव कामकारेण यत्किंचिदित्यर्थः।,अत्र चैतावदुक्तम्। अशुद्धान्तःकरणस्य मुमुक्षोर्मोक्षसाधनज्ञानोत्पत्तियोग्यताप्रतिबन्धकपापक्षयार्थं फलाभिसन्धिपरित्यागेन भगवदर्पणबुद्ध्या वर्णाश्रमधर्मानुष्ठानं? ततः शुद्धान्तःकरणस्य विविदिषोत्पत्तौ गुरुमुपसृत्य ज्ञानसाधनवेदान्तवाक्यविचाराय ब्राह्मणस्य सर्वकर्मसंन्यासः? ततो भगवदेकशरणतया विविक्तसेवादिज्ञानसाधनाभ्यासाच्छ्रवणमनननिदिध्यासनैरात्मसाक्षात्कारोत्पत्त्या मोक्ष इति। क्षत्रियादेस्तु संन्यासानधिकारिणो मुमुक्षोरन्तःकरणशुद्ध्यनन्तरमपि भगवदाज्ञापालनाय लोकसंग्रहाय च यथाकथंचित्कर्माणि कुर्वतोऽपि भगवदेकशरणतया पूर्वजन्मकृतसंन्यासादिपरिपाकाद्वा हिरण्यगर्भन्यायेन तदपेक्षणाद्वा भगवदनुग्रहमात्रेणेहैव तत्त्वज्ञानोत्पत्त्याऽग्रिमजन्मनि ब्राह्मणजन्मलाभेन संन्यासादिपूर्वकज्ञानोत्पत्त्या वा मोक्ष इति। एवं विचारिते च नास्ति मोहावकाश इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.63।।सर्वगीतार्थमुपसंहरति -- इतीति। इति एवंप्रकारं ते तुभ्यं मया सर्वज्ञेन परमकारुणिकेन ज्ञानम् आख्यातम्। गुह्यान्मन्त्रतन्त्ररसायनरूपाद्गुह्यतरमतिशयितं रहस्यम्। एतद्यथोक्तं शास्त्रार्थजातं विमृश्य सम्यगालोच्य यथेच्छसि तथा कुरु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.63।।अथ सकलगीताशास्त्रार्थमुपसंहरन्नाह -- इतीति। इति अमुना प्रकारेण ते तव मया सर्वकर्त्रा सर्वात्मना गुह्यात् गोप्यात् गुह्यतरं गोप्यतरं मन्त्रबीजवत् सर्वशास्त्रज्ञानसारात्मकं ज्ञानमाख्यातं आ समन्तात् ससाधनं प्रसिद्धतयोक्तमित्यर्थः। एतत् मदुपदिष्टगीताशास्त्रार्थं अशेषेण पूर्वापरानुसन्धानेन विमृश्य पर्यालोच्य यथा कर्तुमिच्छसि उत्तमत्वेन तथा कुरु। एतद्विमर्शात् तदाज्ञाकरणे एव बुद्धिर्भविष्यतीत्याशयेनयथेच्छसि इत्युक्तमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.63।।सर्वगीतार्थमुपसंहरन्नाह -- इतीति। इति अनेन प्रकारेण तुभ्यं सर्वज्ञेन परमकारुणिकेन मया ज्ञानमाख्यातमुपदिष्टम्। कथंभूतम् गुह्याद्गोप्याद्रहस्यमन्त्रयोगादिज्ञानादपि गुह्यतरं एतन्मयोपदिष्टं गीताशास्त्रशेषतो विमृश्य पर्यालोच्य पश्चाद्यथेच्छसि तथा कुरु। एतस्मिन्पर्यालोचिते सति तव मोहो निवर्तिष्यत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.63।।सर्वगीतार्थमुपसंहरन्नाह -- इतीति। निरतिशयकरुणावरुणालयेनाख्यातं ज्ञानं यत्तद्भगवता गीतं ज्ञानं (गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत् -- ) संग्राममूर्द्धनि इति भागवतेऽपि [1।15।30] ज्ञानपदवाच्यं सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं इदमिति ज्ञायते। अतो विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.63।।मुझ सर्वज्ञ ईश्वरने तुझसे यह गुह्यसे भी गुह्य अत्यन्त गोपनीय रहस्ययुक्त ज्ञान कहा है। इस उपर्युक्त शास्त्रको? अर्थात् ऊपर कहे हुए समस्त अर्थको पूर्णरूपसे विचारकरइसके विषयमें भलीप्रकार आलोचना करके? तेरी जैसी इच्छा हो वैसे ही कर।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.63।। व्याख्या --   इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया -- पूर्वश्लोकमें सर्वव्यापक अन्तर्यामी परमात्माकी जो शरणागति बतायी गयी है? उसीका लक्ष्य यहाँ इति पदसे कराया गया है। भगवान् कहते हैं कि यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तेरे लिये कह दिया है। कर्मयोग गुह्य है और अन्तर्यामी निराकार परमात्माकी शरणागतिगुह्यतर है (टिप्पणी प0 965.1)।विमृश्यैतदशेषेण -- गुह्यसेगुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान बताकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मैंने पहले जो भक्तिकी बातें कही हैं? उनपर तुम अच्छी तरहसे विचार कर लेना। भगवान्ने इसी अध्यायके सत्तावनवेंअट्ठावनवें श्लोकोंमें अपनी भक्ति(शरणागति) की जो बातें कही हैं? उन्हें एतत् पदसे लेना चाहिये। गीतामें जहाँजहाँ भक्तिकी बातें आयी हैं? उन्हें अशेषेण पदसे लेना चाहिये (टिप्पणी प0 965.2)।विमृश्यैतदशेषेण कहनेमें भगवान्की अत्यधिक कृपालुताकी एक गुढ़ाभिसन्धि है कि कहीं अर्जुन मेरेसे विमुख न हो जाय? इसलिये यदि यह मेरी कही हुई बातोंकी तरफ विशेषतासे खयाल करेगा तो असली बात अवश्य ही इसकी समझमें आ जायगी और फिर यह मेरेसे विमुख नहीं होगा।यथेच्छसि तथा कुरु -- पहले कही सब बातोंपर पूरापूरा विचार करके फिर तेरी जैसी मरजी आये? वैसा कर। तू जैसा करना चाहता है? वैसा कर -- ऐसा कहनेमें भी भगवान्की आत्मीयता? कृपालुता और हितैषिता ही प्रत्यक्ष दीख रही है।पहले वक्ष्याम्यशेषतः (7। 2)? इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे (9। 1) वक्ष्यामि हितकाम्यया (10। 1) आदि श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके हितकी बात कहते आये हैं? पर इन वाक्योंमें भगवान्की अर्जुनपर सामान्य कृपा है।न श्रोष्यति विनङ्क्ष्यसि (18। 58) -- इस श्लोकमें अर्जुनको धमकानेमें भगवान्की विशेष कृपा और अपनेपनका भाव टपकता है।यहाँ यथेच्छसि तथा कुरु कहकर भगवान् जो अपनेपनका त्याग कर रहे हैं? इसमें तो भगवान्कीअध्यधिक कृपा और आत्मीयता भरी हुई है। कारण कि भक्त भगवान्का धमकाया जाना तो सह सकता है? पर भगवान्का त्याग नहीं सह सकता। इसलिये न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि आदि कहनेपर भी अर्जुनपर इतना असर नहीं पड़ा जितना यथेच्छसि तथा कुरु कहनेपर पड़ा। इसे सुनकर अर्जुन घबरा गये कि भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे हैं क्योंकि मैंने यह बड़ी भारी गलती की कि भगवान्के द्वारा प्यारसे समझाने? अपनेपनसे धमकाने और अन्तर्यामीकी शरणागतिकी बात कहनेपर भी मैं कुछ बोला नहीं? जिससे भगवान्कोजैसी मरजी आये? वैसा कर -- यह कहना पड़ा। अब तो मैं कुछ भी कहनेके लायक नहीं हूँ ऐसा सोचकर अर्जुन बड़े दुःखी हो जाते हैं? तब भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सर्वगुह्यतम वचनोंको कहते हैं? जिसका वर्णन आगेके श्लोकमें है। सम्बन्ध --   पूर्वश्लोकमें भगवान् विमृश्यैतदेषेण पदसे अर्जुनको कहा कि मेरे इस पूरे उपदेशका सार निकाल लेना। परन्तु भगवान्के सम्पूर्ण उपदेशका सार निकाल लेना अर्जुनके वशकी बात नहीं थी क्योंकि अपने उपदेशका सार निकालना जितना वक्ता जानता है? उतना श्रोता नहीं जानता दूसरी बात? जैसी मरजी आये? वैसा कर -- इस प्रकार भगवान्के मुखसे अपने त्यागकी बात सुनकर अर्जुन बहुत डर गये? इसलिये आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् अपने प्रिय सखा अर्जुनको आश्वासन देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.63।।शास्त्रमुपसंहर्तुमिच्छन्नाह -- इति ते ज्ञानमिति। ज्ञानं करणव्युत्पत्त्या गीताशास्त्रम्? यथेच्छसि तथा कुरु ज्ञानं कर्म वा यदिष्टं तदनुतिष्ठेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.63।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.63।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.63।। --,इति एतत् ते तुभ्यं ज्ञानम् आख्यातं कथितं गुह्यात् गोप्यात् गुह्यतरम् अतिशयेन गुह्यं रहस्यम् इत्यर्थः? मया सर्वज्ञेन ईश्वरेण। विमृश्य विमर्शनम् आलोचनं कृत्वा एतत् यथोक्तं शास्त्रम् अशेषेण समस्तं यथोक्तं च अर्थजातं यथा इच्छसि तथा कुरु।।भूयोऽपि मया उच्यमानं श्रृणु --,

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【 Verse 18.64 】

▸ Sanskrit Sloka: सर्वगुह्यतमं भूय: शृणु मे परमं वच: | इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ||

▸ Transliteration: sarva-guhyatamaṁ bhūyaḥ śṛṇu me paramaṁ vacaḥ | iṣṭo ‘si me dṛḍhamiti tato vakṣyāmi te hitam ||

▸ Glossary: sarvaguhyatamaṁ: the most confidential of all; bhūyaḥ: again; śṛṇu: just hear; me: from Me; paramaṁ: the supreme; vacaḥ: instruction; iṣṭo ‘si: you are very dear to Me; me: of Me; dṛḍhaṁ: very; iti: thus; tataḥ: therefore; vakṣyāmi: I am speaking; te: for your; hitam: benefit

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.64 Because you are My dear friend, I express this truth to you. This is the most confidential of all knowledge. Hear this from Me. It is for your benefit.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.64।।सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय है? इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.64।। पुन एक बार तुम मुझसे समस्त गुह्यों में गुह्यतम परम वचन (उपदेश) को सुनो। तुम मुझे अतिशय प्रिय हो? इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारे हित की बात कहूंगा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.64 सर्वगुह्यतमम् the most secret of all? भूयः again? श्रृणु hear? मे My? परमम् supreme? वचः word? इष्टः beloved? असि (thou) art? मे of Me? दृढम् dearly? इति thus? ततः therefore? वक्ष्यामि (I) will speak? ते thy? हितम् what is good.Commentary Now listen once more with rapt attention to My words. Thou art very dear to Me. Thou art a sincere aspirant. Therefore I am telling thee this most mysterious truth. Hear from Me this mystery of all mysteries. I shall tell it to you again to make a deep impression on your mind? although it has been declared more than once. I do not hope to get any reward from thee. Thou art My most beloved friend and disciple. Therefore I will speak what is good for thee? the means of attaining Selfrealisation. This is the supreme good or the highest of all kinds of good for thee.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.64. Yet again, you must listen to My ultimate (or supreme) message which is the highest secret of all. You are My dear one and have a firm intellect. Hence I shall tell you what is good to you :

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.64 Only listen once more to My last word, the deepest secret of all; thou art My beloved, thou are My friend, and I speak for thy welfare.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.64 Hear again My supreme word, the most secret of all; as you are exceedingly loved by Me, I am telling what is good for you.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.64 Listen again to My highest utterance which is the profoundest of all. Since you are ever dear to Me, therefore I shall speak what is beneficial to you.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.64 Hear thou again My supreme word, most secret of all; because thou art dearly beloved of Me, I will tell thee what is good.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.64 See Comment under 18.65

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.64 It has been said that Bhakti Yoga is the most secret of all secrets, in such texts as 'I will declare to you, who does not cavil, this most mysterious knowledge' (9.1). Hear again My supreme word concerning it (i.e., Bhakti Yoga). As you are exceedingly dear to Me, therefore, I shall declare what is good for you.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.64 Srnu, listen; bhuyah, again; to me, My; paramam, highest; vacah, utternace; which is sarva-guhyatamam, profundest of all, most secret of all secrets, though it has been repeatedly stated. Neither from fear nor even for the sake of money am I speaking! What then? Iti, since, considering that; asi, you are; drdham, ever, unwaveringly; istah, dear; me, to Me; tatah, therefore, for that reason; vaksyami, I shall speak; what is hitam, beneficial; te, to you, what is the highest means of attaining Knowledge. That is indeed the most beneficial of all beneficial things. 'What is that (You are going to tell me)?' In answer the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.64।। सम्भवत? जब भगवान् ने यह देखा कि अर्जुन अभी तक कुछ निश्चित निर्णय नहीं ले पा रहा है? तब स्नेहवश वे पुन अपने उपदेश के मुख्य सिद्धांत को दोहराने का वचन देते हैं। इस पुनरुक्ति का प्रमुख कारण केवल मित्रप्रेम और अर्जुन के हित की कामना ही है।वह गुह्यतम उपदेश क्या है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.64।।अतिगम्भीरस्य गीताशास्त्रस्य पौर्वापर्येण विमर्शनद्वारा प्रतिपत्तुमसमर्थं प्रति स्वयमेव करुणानिधिः श्रीभगवान्वासुदेवस्तस्य सारं संगृह्य कथयति। तथा भूयोपि मयोच्यमानं सर्वगुह्यतमं सर्वगुह्येभ्योऽन्तरहस्यमुक्तमप्यसकृद् भूयः पुनः मे मम परमं प्रकृष्टं वचो वाक्यं श्रुणु। यत्तु पर्वं गह्यात्मकर्मयोगादगुह्यतरं ज्ञानमाख्यातं अधुना तु कर्मयोगात् तत्फलभूतज्ञानायोगाच्च सर्वस्मादतिशयेन गह्यतमिति तु नार्दतव्यम्। पूर्वस्मिन्शलोके ज्ञानं करणव्युत्पत्त्या गीताशास्त्रपरमिति व्याख्यातत्वात्।इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे इत्यादौ ज्ञानस्य गुह्यतमत्वाभिधानायाऽत्र ज्ञानादपि गुह्यतममन्यदित्यभिधानस्यानुचितत्वाच्च किमर्थं पुनः पुनः श्रावयसीतिचेन्न भयान्नाप्यर्थकारणाद्वा वक्ष्यामि? किंतु दृढमव्यभिचारेणात्यन्तं मे मम इष्टः प्रियोऽसि तत्तस्मात्कारणाद्वक्ष्यामि कथयिष्यामि ते तव हितं परं ज्ञानप्राप्तिसाधनं तद्धि सर्वहितानां हिततमम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.64।।अतिगम्भीरस्य गीताशास्त्रस्याशेषतः पर्यालोचनंविना क्लेशनिवृत्तेरभावात्तथाविधक्लेशनिवृत्तये कृपया स्वयमेव तस्य सारं संक्षिप्य कथयति -- सर्वगुह्यतममिति। पूर्वं हि गुह्यात्कर्मयोगात् गुह्यतरं ज्ञानमाख्यातम्? अधुना तु कर्मयोगात्तत्फलभूतज्ञानाच्च सर्वस्मादतिशयेन गुह्यं रहस्यं गुह्यतमं परमं सर्वतः प्रकृष्टं मे मम वचो वाक्यं भूयस्तत्रतत्रोक्तमपि त्वदनुग्रहार्थं पुनर्वक्ष्यमाणं शृणु। न लाभपूजाख्यात्याद्यर्थं त्वां ब्रवीमि तु इष्टः प्रियोसि मे मम दृढमतिशयेन इति यतस्ततस्तेनैवेष्टत्वेन वक्ष्यामि कथयिष्याम्यपृष्टोऽपि सन्नहं ते तव हितं परमं श्रेयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.64।।एवं यथेष्टकरणमभ्यनुज्ञायापि अतिवात्सल्याच्छ्लोकद्वयेनैव कृत्स्नं शास्त्रार्थमुपदेक्ष्यंस्तद्ग्रहणे ऐकाग्र्यमस्य संपादयितुमाह -- सर्वेति। सर्वेभ्यो गुह्येभ्यः अतिशयितं गुह्यं सर्वगुह्यतमं भूयः पुनरसकृदुक्तमपि मे मम वचनं शृणु। परमं परमार्थविषयत्वात्। न लोभान्नापि भयात्त्वां वक्ष्यामि। किं तर्हि मे मम इष्टोऽसि,परमाप्तोऽसि इति हेतोः द़ृढं अतिशयितं ते तव हितं यतस्ततो वक्ष्यामि। तव इष्टत्वात् विद्यायाश्च हितत्वात् तद्वचनं आप्ते त्वयि अवश्यं वक्तव्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.64।।विमृश्यकारित्वमीश्वरोक्तावसम्भावितमिति विचारेण शोचन्तमर्जुनं कृपया तद्द्वारा च लोकानुद्दिधीर्षुर्निश्चितार्थं स्वयमेवाह -- सर्वगुह्येति। सर्वगुह्येऽतिगुह्यं गोप्यं गुह्यतमं मे परमं फलरूपं वचो भूयः पूर्वमुक्तमपि तत्प्रकरणेषु इदानीमेकीकृत्य पुनर्वक्ष्यमाणं शृणु। एवं सारभूतमेकीकृत्याकथने हेतुमाह -- इष्टोऽसीति। मे मम दृढमत्यन्तम् अप्रियकरणेऽपि अन्यथाभावरहितः इष्टः प्रियोऽसि? ततः कारणात्ते हितं वक्ष्यामि कथयामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.64।।अतिगम्भीरं गीताशास्त्रमशेषतः पर्यालोचयितुमशक्नुवतः कृपया स्वयमेव तस्य सारं संगृह्य कथयति -- सर्वगुह्यतममितित्रिभिः। सर्वेभ्योऽपि गुह्येभ्यो गुह्यतमं मे वचः तत्रतत्रोक्तमपि भूयः पुनः पुनरपि वक्ष्यमाणं श्रृणु। पुनः पुनः कथने हेतुमाह -- दृढमत्यन्तं मे मम त्वमिष्टः प्रियोऽसीति मत्वा। तत एव हेतोस्ते हितं वक्ष्यामि। यद्वा त्वं ममेष्टोऽसि मया वक्ष्यमाणं च दृढं सर्वप्रमाणोपेतमिति निश्चित्य ततस्ते वक्ष्यामीत्यर्थः। दृढमतिरिति केचित्पठन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.64।।एतस्याशेषतो दुर्ज्ञेयत्वात् स्वयमेवातिमात्रमनुगृह्णन् स्वीयाय स्वतत्त्वमुपदिशति -- सर्वगुह्यतममिति। अत्रभूयः इति पदमिदं गुह्यतममिति गुह्यतमं शास्त्रं इत्यादौ स्वस्यैव मूलपुरुषोत्तमतायामुक्तायामप्यस्य मयि नरादिबुद्ध्यापादनपूर्वकमन्य एव कश्चन पुरुषोत्तमोऽन्तर्यामिरूपो निर्गुण एतद्वचसाऽऽज्ञाय भजनीय इति सन्देहवारणायोक्तम्। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.64।।फिर भी मैं जो कुछ कहता हूँ उसे सुन --, सर्व गुह्योंमें अत्यन्त गुह्य -- रहस्ययुक्त मेरे परम उत्तम वचन तू फिर भी सुन अर्थात् जो वचन मैंने पहले अनेक बार कहे हैं उनको तू फिरसे सुन। मैं ( जो कुछ कहूँगा वह ) भयसे अथवा स्वार्थके लिये नहीं कहूँगा किंतु तू मेरा दृढ़ ऐकान्तिक प्रिय है? यह समझकर -- केवल इसी कारणसे तेरे हितकी बात अर्थात् परम ज्ञानप्राप्तिका साधन कहूँगा क्योंकि यही साधन सब हितोंमें उत्तम हित है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.64।। व्याख्या --   सर्वगुह्यतमं भूयः श्रुणु मे परमं वचः -- पहले तिरसठवें श्लोकमें भगवान्ने गुह्य (कर्मयोगकी) और गुह्यतर (अन्तर्यामी निराकारकी शरणागतिकी) बात कही और इदं तु ते गुह्यतमम् (9। 1) तथा इति गुह्यतमं शास्त्रम् (15। 20) -- इन पदोंसे गुह्यतम (अपने प्रभावकी) बात कह दी? पर सर्वगुह्यतम बात गीतामें पहले कहीं नहीं कही। अब यहाँ अर्जुनकी घबराहटको देखकर भगवान् कहते हैं कि मैं सर्वगुह्यतम अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय बात फिर कहूँगा? तू मेरे परम? सर्वश्रेष्ठ वचनोंको सुन।इस श्लोकमें सर्वगुह्यतमम् पदसे भगवान्ने बताया कि यह हरेकके सामने प्रकट करनेकी बात नहीं है और सड़सठवें श्लोकमें इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन पदसे भगवान्ने बताया कि इस बातको असहिष्णु और अभक्तसे कभी मत कहना। इस प्रकार दोनों तरफसे निषेध करके बीचमें (छियासठवें श्लोकमें) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम बातको रखा है। दोनों तरफसे निषेध करनेका तात्पर्य है कि यह गीताभरमें अत्यन्त रहस्यमय खास उपदेश है। (टिप्पणी प0 966)दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें धर्मसम्मूढचेताः कहकर अर्जुन अपनेको धर्मका निर्णय करनेमें अयोग्य समझते हुए भगवान्से पूछते हैं? उसके शिष्य बनते हैं और शिक्षा देनेके लिये कहते हैं। अतः भगवान् यहाँ (18। 66 में) कहते हैं कि तू धर्मके निर्णयका भार अपने

Chapter 18 (Part 35)

ऊपर मत ले? वह भार मेरेपर छोड़ दे -- मेरे ही अर्पण कर दे और अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। फिर तेरेको जो पाप आदिका डर है? उन सब पापोंसे मैं तुझे मुक्त कर दूँगा। तू सब चिन्ताओंको छोड़ दे। यही भगवान्का सर्वगुह्यतम परम वचन है।भूयः श्रृणु का तात्पर्य है कि मैंने यही बात दूसरे शब्दोंमें पहले भी कही थी? पर तुमने ध्यान नहीं दिया। अतः मैं फिर वही बात कहता हूँ। अब इस बातपर तुम विशेषरूपसे ध्यान दो।यह सर्वगुह्यतमवाली बात भगवान्ने पहले मत्परः ৷৷. मच्चित्तः सततं भव (18। 57) और मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादत्तरिष्यसि (18। 58) पदोंसे कह दी थी परन्तु सर्वगुह्यतमम् पद पहले नहीं कहा? और अर्जुनका भी उस बातपर लक्ष्य नहीं गया। इसलिये अब फिर उस बातपर अर्जुनका लक्ष्य करानेके लिये और,उस बातका महत्त्व बतानेके लिये भगवान् यहाँ सर्वगुह्यतमम् पद देते हैं।इष्टोऽसि मे दृढमिति -- इससे पहले भगवान्ने कहा था कि जैसी मरजी आये? वैसा कर। जो अनुयायी है? आज्ञापालक है? शरणागत है? उसके लिये ऐसी बात कहनेके समान दूसरा क्या दण्ड दिया जा सकता है अतः इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें भय पैदा हो गया कि भगवान् मेरा त्याग कर रहे हैं। उस भयको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो (टिप्पणी प0 967.1)।यदि अर्जुनके मनमें भय या संदेह न होता? तो भगवान्कोतुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो -- यह कहकर सफाई देनेकी क्या जरूरत थी सफाई देना तभी बनता है? जब दूसरेके मनमें भय हो? सन्देह हो? हलचल हो। इष्टः कहनेका दूसरा भाव यह है कि भगवान् अपने शरणागत भक्तको अपना ईष्टदेव मान लेते हैं। भक्त सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्को अपना इष्ट मानता है? तो भगवान् भी उसको अपना इष्ट मान लेते हैं क्योंकि भक्तिके विषयमें भगवान्का यह कानून है -- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् (गीता 4। 11) अर्थात् जो भक्त जैसे मेरे शरण होते हैं? मैं भी उनको वैसे ही आश्रय देता हूँ। भगवान्की दृष्टिमें भक्तके समान और कोई श्रेष्ठ नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं -- तुम्हारेजैसे प्रेमी भक्त मुझे जितने प्यारे हैं? उतने प्यारे न ब्रह्माजी हैं? न शंकरजी हैं? न बलरामजी हैं और तो क्या? मेरे शरीरमें निवास करनेवाली लक्ष्मीजी और मेरी आत्मा भी उतनी प्यारी नहीं है (टिप्पणी प0 967.2)।दृढम् कहनेका तात्पर्य है कि जब तुमने एक बार कह दिया कि मैं आपके शरण हूँ (2। 7) तो अब तुम्हें बिलकुल भी भय नहीं करना चाहिये। कारण कि जो मेरी शरणमें आकर एक बार भी सच्चे हृदयसे कह देता है कि मैं आपका ही हूँ ? उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय (सुरक्षित) कर देता हूँ -- यह मेरा व्रत है (टिप्पणी प0 967.3)। ततो वक्ष्यामि ते हितम् -- तू मेरा अत्यन्त प्यारा मित्र है? इसलिये अपने हृदयकी अत्यन्त गोपनीय और अपने दरबारकी श्रेष्ठसेश्रेष्ठ बात तुझे कहूँगा। दूसरी बात? मैं जो आगे शरणागतिकी बात कहूँगा? उसका यह तात्पर्य नहीं है कि मेरी शरणमें आनेसे मुझे कोई लाभ हो जायगा? प्रत्युत इसमें केवल तेरा ही हित होगा। इससे सिद्ध होता है कि प्राणिमात्रका हित केवल इसी बातमें है कि वह किसी दूसरेका सहारा न लेकर केवल भगवान्की ही शरण ले।भगवान्की शरण होनेके सिवाय जीवका कहीं भी? किञ्चन्मात्र भी हित नहीं है। कारण यह है कि जीव साक्षात् परमात्माका अंश है। इसलिये वह परमात्माको छोड़कर किसीका भी सहारा लेगा तो वह सहारा टिकेगा नहीं। जब संसारकी कोई भी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? अवस्था आदि स्थिर नहीं है? तो फिर उनका सहारा कैसे स्थिर रह सकता है उनका सहारा तो रहेगा नहीं? पर चिन्ता? शोक? दुःख आदि रह जायँगे जैसे? अग्निसे अङ्गार दूर हो जाता है तो वह काला कोयला बन जाता है -- कोयला होय नहीं उजला? सौ मन साबुन लगाय। पर वही कोयला जब पुनः अग्निसे मिल जाता है? तब वह अङ्गार (अग्निरूप) बन जाता है और चमक उठता है। ऐसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है तो बारबार जन्मतामरता और दुःख पाता रहता है? पर जब यह भगवान्के सम्मुख हो जाता है अर्थात् अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें हो जाता है? तब यह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है? तथा संसारमात्रका कल्याण करनेवाला हो जाता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.64।।गीताशास्त्रस्य पौर्वापर्येण विमर्शनद्वारा तात्पर्यार्थं प्रतिपत्तुमसमर्थं प्रत्याह -- भूयोऽपीति। किमर्थमिच्छन्पुनःपुनरभिदधासीत्याशङ्क्याह -- न भयादिति। हितमिति साधारणनिर्देशे कथं परममित्यादिविशेषणमित्याशङ्क्याह -- तद्धीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.64।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.64।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.64।। --,सर्वगुह्यतमं सर्वेभ्यः गुह्येभ्यः अत्यन्तगुह्यतमम् अत्यन्तरहस्यम्? उक्तमपि असकृत् भूयः पुनः श्रृणु मे मम परमं प्रकृष्टं वचः वाक्यम्। न भयात् नापि अर्थकारणाद्वा वक्ष्याभि किं तर्हि इष्टः प्रियः असि मे मम दृढम् अव्यभिचारेण इति कृत्वा ततः तेन कारणेन वक्ष्यामि कथयिष्यामि ते तव हितं परमं ज्ञानप्राप्तिसाधनम्? तद्धि सर्वहितानां हिततमम्।।किं तत् इति? आह --,

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【 Verse 18.65 】

▸ Sanskrit Sloka: मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||

▸ Transliteration: manmanā bhava madbhakto madyājī māṁ namaskuru | māmevaiṣyasi satyaṁ te pratijāne priyo ‘si me ||

▸ Glossary: manmanāḥ: thinking of Me; bhava: just become; madbhaktaḥ: My devotee; madyājī: My worshiper; māṁ: unto Me; namaskuru: offer your obeisances; mām: unto Me; eva: certainly; eṣyasi: come; satyaṁ: truly; te: to you; pratijāne: I promise; priyaḥ: dear; asi: you are; me: Mine

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.65 Always think of Me and become My devotee. Worship Me and offer your homage unto Me. Thus you will certainly attain to Me. This I promise you because you are My very dear friend.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.65।।तू मेरा भक्त हो जा? मेरेमें मनवाला हो जा? मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.65।। तुम मच्चित? मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ? (क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.65 मन्मनाः with mind fixed on Me? भव be? मद्भक्तः devoted to Me? मद्याजी sacrifice to Me? माम् to Me? नमस्कुरु bow down? माम् to Me? एव even? एष्यसि (thou) shalt come? सत्यम् truth? ते to thee? प्रतिजाने (I) promise? प्रियः dear? असि (thou) art? मे of Me.Commentary Develop onepointedness of mind. Fix thy thought on Me. If the mind wanders bring it again and again to the centre or point or object of meditation? through constant practice. Offer all thy actions to Me. Let thy tongue utter My name. Let thy hands work for Me. Let thy feet move for Me. Let all thy actions be for Me. Give up hatred towards any living creature. Bow down to Me. Then thou wilt attain Me.The Lord gives Arjuna His definite word of promise or solemn declaration. Having received My grace thou wilt gain complete knowledge of Me and that in itself will indeed lead to thy absorption into My Being.O Arjuna? looking up to Me alone as thy aim and the sole refuge? thou shalt assuredly come to,Me.Have faith in the words of the Lord and make a solemn promise. Take the Lord as your sole refuge. You will attain final emancipation.The secret of devotion is to take the Lord as your sole refuge. In the next verse the Lord proceeds to speak of the gist of selfsurrender. (Cf.IX.34XII.8)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.65. Be with your mind fixed in Me; be My devotee; offer oblation to Me and render salutation to Me; you shall come to Me alone. Really I promise you, (because) you are dear to Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.65 Dedicate thyself to Me, worship Me, sacrifice all for Me, prostrate thyself before Me, and to Me thou shalt surely come. Truly do I pledge thee; thou art My own beloved.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.65 Focus your mind on Me. Be My devotee. Be My worshipper. Prostrate before Me. You shall come to Me alone. I promise you, trully; for you are dear to Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.65 Have your mind fixed on Me, be My devotee, be a sacrificer to Me and bow down to Me. (Thus) you will come to Me alone. (This) truth do I pormise to you. (For) you are dear to Me.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.65 Fix thy mind on Me, by devoted to Me, sacrifice to Me, bow down to Me. Thou shalt come even to Me; truly do I promise unto thee, (for) thou art dear to Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.64-65 Sarva - etc. Manmanah etc, By the portion 'Be with your mind fixed in Me' etc., it is determined that in the scriptures the importance completely lies only in dedicating [everything] to the Brahman; and it is declared that this present scripture (the Holy Bhagavatgita) is of use [only] in the case of one who cultivates [the attitude of] dedication to the Brahman. Also He says -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.65 What is enjoined in Vedanta texts such as 'I know the Great Person of the radiance of the sun, who is beyond this Prakrti. Knowing Him thus, one becomes here immortal; there is no path for immortality' (Sve. U., 3.8); what is designated by words such as knowledge (Vedanta), meditation (Dhyana) and worship (Upasana); what is of the form of direct perception (Darsana) having the character of continuous succession of memory of a surpassingly loving nature to the worshipped - it is this that is enjoined herein by the words 'Focus your mind on Me,' 'Be My devotee.' It means, be one to whom I am incomparably dear. Since I am the object of superabundant love, meditate on Me, i.e., practise the succession of memory of unsurpassed love of Me. Such is the meaning. Be My worshipper (yaji). Here also the expression, 'Be My devotee' is applicable. Yajna is worship. Worship Me as one exceedingly dear to you. Worship (Aradhana) is complete subservience to the Lord. Prostrate before Me. Prostration means bowing down. The meaning is: Bow down humbly before Me with great love.

Renouncing thus all ego-centredness, you shall come to Me. I make this solemn promise to you. Do not take it as a mere flattery. For you are dear to Me. It has been already stated, 'For I am inexpressibly dear to the man of knowledge and dear is he to Me' (7.17). He in whom there is surpassing love for Me, I hold him also as surpassingly dear to Me. Conseently, not being able to bear separation from him, I myself will enable him to attain Me. It is this truth alone that has been solemnly declared to you in the expression that 'you shall come to Me alone.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.65 Bhava manmana, have your mind fixed on Me; be mad-bhaktah, My devotee; be a madyaji,sacrificer to Me, be engaged in sacrifices to Me; namaskuru, bow down; mam, to Me. Offer ever your salutations to Me alone. Continuing thus in them, by surrendering all ends, means and needs to Vasudeva only, esyasi, you will come; mam, to Me; eva, alone. (This) satyam, truth: do I pratijane, promise; te, to you, i.e. in this matter I make this true promise. For, asi, you are; priyah, dear; me, to Me. The idea conveyed by the passage is: Having thus understood that the Lord is true in His pormise, and knowing for certain that liberation is the unfailing result of devotion to the Lord, one should have dedication to God as his only supreme goal. Having summed up surrender to God as the highest secret of steadiness in Karma-yoga, there-after, with the idea that complete realization, which is the fruit of adherence to Karma-yoga and which has been enjoined in all the Upanisads, has to be spoken about, the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.65।। भगवत्प्राप्ति के लिए आवश्यक चार गुणों को बताकर? भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वासन देते हैं? तुम मुझे प्राप्त होगे। जब कभी तत्त्वज्ञान के सिद्धांत को संक्षेप में ही कहा जाता है? तब वह इतना सरल प्रतीत होता है कि सामान्य विद्यार्थीगण उसे गम्भीरता से समझने का प्रयत्न नहीं करते अथवा उसकी सर्वथा उपेक्षा कर देते हैं। इस प्रकार की त्रुटि का परिहार करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण पुन विशेष बल देकर कहते हैं? मैं तुम्हें सत्य वचन देता हूँ।बारम्बार उपदेश देने का कारण यह है कि तुम मेरे प्रिय हो। आध्यात्मिक उपदेश देने में प्रेम की भावना ही समीचीन उद्देश्य है। शिष्य के प्रति प्रेम न होने पर? गुरु के उपदेश में न प्रेरणा होती है और न आनन्द। एक व्यावसायिक अध्यापक तो केवल वेतनभोगी होता है। ऐसा अध्यापक न अपने विद्यार्थी वर्ग को न प्रेरणा दे सकता है और न स्वयं अपने हृदय में कृतार्थता का आनन्द अनुभव कर सकता है? जो कि अध्यापन का वास्तविक पुरस्कार है।किंचित परिवर्तन के साथ यह श्लोक इसके पूर्व भी एक अध्याय में आ चुका है। यहाँ भगवान् स्पष्ट घोषणा करते हैं कि वे विशुद्ध सत्य का ही प्रतिपादन कर रहे हैं।मन्मना भव मन का कार्य संकल्प करना है। अत इसका अर्थ है तुम अपने मन के द्वारा मेरी प्राप्ति का ही संकल्प करो।मद्भक्त ईश्वर की प्राप्ति का संकल्प केवल संकल्प की अवस्था में ही नहीं रह जाना चाहिए। इस संकल्प को निश्चयात्मक भक्ति में परिवर्तित करने की आवश्यकता होती है अत तुम मेरे भक्त बनो।मद्याजी भक्ति प्रेमस्वरूप है। और जहाँ प्रेम होता है वहाँ पूजा का होना स्वाभाविक है। ईश्वर जगत् का कारण होने से सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है। इसलिए ईश्वर की पूजा का अर्थ है जगत् की निस्वार्थ भाव से सेवा करना। भगवान् श्रीकृष्ण यही उपदेश देते हुए कहते हैं? तुम मद्याजी अर्थात् मेरे,पूजक बनो।मां नमस्कुरु गर्व और अभिमान से युक्त पुरुष किसी को विनम्र भाव से प्रणाम नहीं कर सकता है। मुझे नमस्कार करो इस उपदेश का अभिप्राय कर्तृत्वादि अहंकार का त्याग करने से है।परमात्मा के गुणों को सम्पादित करने के लिए साधक में नम्रता? श्रद्धा? भक्ति जैसे गुणों का प्रचुरता होनी चाहिए। जल के समान ही ज्ञान का प्रवाह ऊंची सतह से नीची सतह की ओर बढ़ता है। इस श्लोक में वर्णित भक्ति से सम्पन्न कोई भी साधक भगवत्प्राप्ति का अधिकारी बन सकता है।तुम मुझे प्राप्त होगे यह भगवान् श्रीकृष्ण का सत्य आश्वासन है। श्री शंकराचार्य जी कहते हैं? कर्मयोग की साधना का परम रहस्य ईश्वरार्पण बुद्धि है। उस साधना के विषय का उपसंहार करने के पश्चात्? अब कर्मयोग के फलभूत आत्मदर्शन का वर्णन करना शेष है? जो समस्त उपनिषदों का सार है? अत भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.65।।किं तदित्यपेक्षायामाह -- मन्मना मयि भवति वासुदेवे मनो यस्य स मच्चित्तो भव सर्वदा मामेव चिन्तय। मद्भक्तो मच्छ्रवणकीर्तनादिमद्भजनो भव। मद्याजी मद्यजनशीलो भव। मां नमस्कुरु नमस्कारमपि मामेव कुरु। तत्रैव वर्तमानो मयि वासुदेव एव समर्पितसाध्यसाधनप्रयोजनो मामेवैष्यसि आगमिष्यसि मदभेदज्ञानं प्राप्यस्यसि। अस्मिन्नर्थे सत्यं ते तव प्रतिजाने सत्यां प्रतिज्ञां करोमि। यतः प्रियोऽसि मे। तथाच मम भगवतः सत्यप्रतिज्ञत्वं बुद्ध्वा मद्भक्तेरवश्भावि मत्प्राप्तिफलत्वमवधार्य मच्छरणैकपरायणो भवेति वाक्यार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.65।।तदेवाह -- मन्मना भवेति। मयि भगवति वासुदेवे मनो यस्य स मन्मना भव सदा मां चिन्तय। द्वेषेण कंसशिशुपालादिरपि तथात आह। मद्भक्तः प्रेम्णा मय्यनुरक्तो मद्विषयेणानुरागेण सदा मद्विषयं मनः कुर्विति विधीयते। त्वद्विषयोऽनुराग एव केन स्यादित्यत आह। मद्याजी मां यष्टुं पूजयितुं शीलं यस्य स सदा मत्पूजापरो भव। पूजोपकरणाभावे तु मां नमस्कुरु कायेन वाचा मनसा च प्रह्वीभवनेनाराधय। इदं चार्चनवन्दनाद्यन्येषामपि भागवतधर्माणामुपलक्षणम्। तथाचोक्तं श्रीभागवतेश्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्। इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियते भगवत्यद्वा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्।। इति। एतच्च भक्तिरसायने व्याख्यातं विस्तरेण। एवं सदा भागवतधर्मानुष्ठानेन मय्यनुरागोत्पत्त्या मन्मनाः सन् मां भगवन्तं वासुदेवमेव एष्यसि प्राप्स्यसि वेदान्तवाक्यजनितेन मद्बोधेन। त्वंचात्र संशयं माकार्षीः। सत्यं यथार्थं तुभ्यं प्रतिजाने सत्यामेव प्रतिज्ञां करोम्यस्मिन्नर्थे। यतः प्रियोऽसि मे। प्रियस्य प्रतारणा नोचितैवेति भावः। सत्यं ते प्रारब्धकर्मणोऽन्ते सति मामेष्यसीति वा। अनुवादापेक्षया विश्वासदार्ढ्यप्रयोजनं प्रथमं व्याख्यातमेव श्रेयः। अनेन यत्पूर्वमुक्तंयतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः। इति तद्व्याख्यातं मच्छब्देनेश्वरत्वप्रकटनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.65।।तदेव गुह्यतमं हितमाह -- मन्मना इति। अहं प्रत्यगात्मानन्दैकघनः परिपूर्णस्तदाकारं मनो यस्य स मन्मनाः भव। एतेन ब्राह्मात्माभेदोऽपि साक्षात्करणीय इत्युत्तरषट्कार्थ उक्तः। कथमेवंविधा ज्ञाननिष्ठा लभ्यतेऽत आह -- मद्भक्तो भव। एतेन भगवदुपासनात्मको मध्यमषट्कार्थ उक्तः। कथमल्पपुण्यस्य भक्तिरुदेष्यतीत्यत आह -- मद्याजी भगवदर्थकर्मकरणशीलो भव। एतेन कर्मप्रधान आद्यषट्कार्थो विवृतः। ननु यस्य भगवद्याजित्वं न संभवति दारिर्द्यात्स्त्र्याद्यभावाद्वा तस्य भगवद्भक्तिदौर्लभ्याद्ब्रह्माकारा चेतोवृत्तिदुर्लभतरेत्याशङ्क्याह -- मां नमस्कुरु प्राकृतभक्त्यैव प्रतिमादौ भगवन्तं सर्वोपचारसमर्पणेन नमस्कारादिना सम्यगाराधयेत्यर्थः। तथाचाश्वलायनो नमस्कारस्यैव यज्ञत्वमुदाहरतियो नमसा स्वध्वरः इति यज्ञो वै नम इति हि ब्राह्मणं भवति इति च। एवमुक्तस्य सोपानत्रयारूढस्य फलमाह -- मामिति। मामेव तत्पदार्थं सर्वजगत्कारणं सर्वेश्वरं सर्वशक्तिमखण्डैकरसं त्वं एष्यसि प्राप्स्यसि बिम्ब इव प्रतिबिम्बं? घटाकाश इव महाकाशम्। अस्मिन्नर्थे शपथं करोति। ते तव पुरः सत्यं अबाधितार्थभूतं प्रतिजाने प्रतिज्ञां करोमि मामेवैष्यसीति। प्रियोऽसि मे यतस्त्वं मे मम प्रियोऽसि अतः प्रतारणानर्हे त्वयि सत्यमेवाहं ब्रवीमीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.65।।एवं प्रतिज्ञाय तत्स्वरूपमाह -- मन्मना इति। मन्मनाः मय्येव मनो यस्य तादृशो भव? मद्भक्तः मयि स्नेहयुक्तो भव? मद्याजी मत्पूजनशीलो भव? मां नमस्कुरु मयि सर्वाधिक्यज्ञानवान् भवेत्यर्थः। एवम्भूतः सन् सत्यं सत्यरूपं मामेव एष्यसि प्राप्स्यसि? नात्र सन्देहः कर्त्तव्यः यतो मे मम प्रियोऽसि अतस्ते तुभ्यं प्रतिजाने प्रतिज्ञां करोमि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.65।।तदेवाह -- मन्मना इति। मन्मना भव? मच्चित्तो भव? ममैव भक्तो भव? मद्याजी मद्यजनशीलो भव? मामेव नमस्कुरु एवं वर्तमानस्त्वं मत्प्रसादाल्लब्धज्ञानेन मामेवैष्यसि प्राप्स्यसि अत्र च संशयं माकार्षीः। त्वं हि मे प्रियोऽसि अतः सत्यं यथाभवत्येवं तुभ्यमहं प्रतिजाने प्रतिज्ञां करोमि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.65।।तथाहि -- मन्मना इति। हे पार्थ निस्सन्दिग्धतया सर्ववेदान्तवेद्ये स्वाश्रितवात्सल्यजलधौ त्वत्सारथ्यकर्मणि स्थितेमय्येव मन आधत्स्व [12।8] इति पूर्ववाक्यैकार्थतामनुसन्दधानः मन्मना एव? मद्भक्त एव? मद्याजी एवेति त्रिकाण्डार्थभूतमत्परायण एव भव। एवकारोऽप्यत्र प्रत्येकमभिसम्बन्ध्यः? स चान्यभजनादिवारणार्थः पूर्ववदनुषज्जते। एवं सति मामेवैष्यसीत्यहं प्रतिजाने सत्यं यतस्त्वं मे प्रियोऽसि। नहि प्रीतिविषयस्याग्रे वञ्चनमुचितमिति मुख्यभक्तिमार्ग उपदिष्टः पूर्ववत्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.65।।वे वचन कौनसे हैं सो कहते हैं --, तू मुझमें मनवाला अर्थात् मुझमें चित्तवाला हो? मेरा भक्त अर्थात् मेरा ही भजन करनेवाला हो और मेरा ही पूजन करनेवाला हो? तथा मुझे ही नमस्कार कर? अर्थात् नमस्कार भी मुझे ही किया कर। इस प्रकार करता हुआ? अर्थात् मुझ वासुदेवमें ही ( अपने ) समस्त साध्य? साधन और प्रयोजनको समर्पण करके तू मुझे ही प्राप्त होगा। इस विषयमें मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्रिय है। कहनेका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार भगवान्को सत्यप्रतिज्ञ जानकर तथा भगवान्की भक्तिका फल निःसन्देह -- ऐकान्तिक मोक्ष है -- यह समझकर? मनुष्यको केवल एकमात्र भगवान्की शरणमें ही तत्पर हो जाना चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.65।। व्याख्या --   मद्भक्तः -- साधकको सबसे पहले मैं भगवान्का हूँ इस प्रकार अपनी अहंता(मैंपन) को बदल देना चाहिये। कारण कि बिना अहंताके बदले साधन सुगमतासे नहीं होता।,अहंताके बदलनेपर साधन सुगमतासे? स्वाभाविक ही होने लगता है। अतः साधकको सबसे पहले मद्भक्तः होना चाहिये।किसीका शिष्य बननेपर व्यक्ति अपनी अहंताको बदल देता है कि मैं तो गुरु महाराजका ही हूँ। विवाह हो जानेपर कन्या अपनी अहंताको बदल देती है कि मैं तो ससुरालकी ही हूँ ? और पिताके कुलका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है। ऐसे ही साधकको अपनी अहंता बदल देनी चाहिये कि मैं तो भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है। [अहंताके बदलनेपर ममता भी अपनेआप बदल जाती है।]मन्मना भव -- उपर्युक्त प्रकारसे अपनेको भगवान्का मान लेनेपर भगवान्में स्वाभाविक ही मन लगने लगता है। कारण कि जो अपना होता है? वह स्वाभाविक ही प्रिय लगता है और जहाँ प्रियता होती है? वहाँ स्वाभाविक ही मन लगता है। अतः भगवान्को अपना माननेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्रिय लगते हैं। फिर मनसे स्वाभाविक ही भगवान्के नाम? गुण? प्रभाव? लीला आदिका चिन्तन होता है। भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान बड़ी तत्परतासे और लगनपूर्वक होता है।मद्याजी -- अहंता बदल जानेपर अर्थात् अपनेआपको भगवान्का मान लेनेपर संसारका सब काम भगवान्की सेवाके रूपमें बदल जाता है अर्थात् साधक पहले जो संसारका काम करता था? वही काम अब भगवान्का,काम हो जाता है। भगवान्का सम्बन्ध ज्योंज्यों दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों उसका सेवाभाव पूजाभावमें परिणत होता जाता है। फिर वह चाहे संसारका काम करे? चाहे घरका काम करे? चाहे शरीरका काम करे? चाहे ऊँचानीचा कोई भी काम करे? उसमें भगवान्की पूजाका ही भाव बना रहता है। उसकी यह दृढ़ धारणा हो जाती है कि भगवान्की पूजाके सिवाय मेरा कुछ भी काम नहीं है।मां नमस्कुरु -- भगवान्के चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम करके सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाय। मैं प्रभुके चरणोंमें ही पड़ा हुआ हूँ -- ऐसा मनमें भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय? उसमें भगवान्का मङ्गलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहे।भगवान्के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा? वह मङ्गलमय ही होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझमें आये या न आये -- यह बात दूसरी है? पर भगवान्का विधान तो मेरे लिये कल्याणकारी ही है? इसमें कोई सन्देह नहीं। अतः जो कुछ होता है? वह मेरे कर्मोंका फल नहीं है? प्रत्युत भगवान्के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हितके लिये भेजा हुआ विधान है। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद होनेसे जो कुछ विधान करते हैं? वह जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं। इसलिये भगवान् अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर प्राणियोंके पुण्यपापोंका नाश करके? उन्हें परम शुद्ध बनाकर अपने चरणोंमें खींच रहे हैं -- इस प्रकार दृढ़तासे भाव होना ही भगवान्के चरणोंमें नमस्कार करना है।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे -- भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार मेरा भक्त होनेसे? मेरेमें मनवाला होनेसे? मेरा पूजन करनेवाला होनेसे और मुझे नमस्कार करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरेमें ही निवास करेगा (टिप्पणी प0 969) -- ऐसी मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्यारा है।प्रियोऽसि मे कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का जीवमात्रपर अत्यधिक स्नेह है। अपना ही अंश होनेसे कोई भी जीव भगवान्को अप्रिय नहीं है। भगवान् जीवोंको चाहे चौरासी लाख योनियोंमें भेंजें? चाहे नरकोंमें भेजें? उनका उद्देश्य जीवोंको पवित्र करनेका ही होता है। जीवोंके प्रति भगवान्का जो यह कृपापूर्ण विधान है? यह भगवान्के प्यारका ही द्योतक है। इसी बातको प्रकट करनेके लिये भगवान् अर्जुनको जीवमात्रका प्रतिनिधि बनाकर प्रियोऽसि मे वचन कहते हैं।जीवमात्र भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। केवल जीव ही भगवान्से विमुख होकर प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले संसार(धनसम्पत्ति? कुटुम्बी? शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? प्राण आदि) को अपना मानने लगता है? जबकि संसारने कभी जीवको अपना नहीं माना है। जीव ही अपनी तरफसे संसारसे सम्बन्ध जोड़ता है। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और जीव नित्य अपरिवर्तनशील है। जीवसे यही गलती होती है कि वह प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। यही कारण है कि सम्बन्धीके न रहनेपर भी उससे माना हुआ सम्बन्ध रहता है। यह मान हुआ सम्बन्ध ही अनर्थका हेतु है। इस सम्बन्धको मानने अथवा न माननेमें सभी स्वतन्त्र हैं। अतः इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करके? जिनसे हमारा वास्तविक और नित्यसम्बन्ध है? उन भगवान्की शरणमें चले जाना चाहिये। सम्बन्ध --   पीछेके दो श्लोकोंमें अर्जुनको आश्वासन देकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने उपदेशकी अत्यन्त गोपनीय सार बात बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.65।।तदेव प्रश्नद्वारा विवृणोति -- किं तदित्यादिना। उत्तरार्धं व्याचष्टे -- तत्रेति। एवमुक्तया रीत्या वर्तमानस्त्वं तस्मिन्नेव वासुदेवे भगवत्यर्पितसर्वभावो मामेवागमिष्यसीति संबन्धः। सत्यप्रतिज्ञाकरणे हेतुमाह -- यत इति। इदानीं वाक्यार्थं श्रेयोऽर्थिनां प्रवृत्त्युपयोगित्वेन संगृह्णाति -- एवमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.65।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.65।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.65।। --,मन्मनाः भव मच्चित्तः भव। मद्भक्तः भव मद्भजनो भव। मद्याजी मद्यजनशीलो भव। मां नमस्कुरु नमस्कारम् अपि ममैव कुरु। तत्र एवं वर्तमानः वासुदेवे एव समर्पितसाध्यसाधनप्रयोजनः मामेव एष्यसि आगमिष्यसि। सत्यं ते तव प्रतिजाने? सत्यां प्रतिज्ञां करोमि एतस्मिन् वस्तुनि इत्यर्थः यतः प्रियः असि मे। एवं भगवतः सत्यप्रतिज्ञत्वं बुद्ध्वा भगवद्भक्तेः अवश्यंभावि मोक्षफलम् अवधार्य भगवच्छरणैकपरायणः भवेत् इति वाक्यार्थः।।कर्मयोगनिष्ठायाः परमरहस्यम् ईश्वरशरणताम् उपसंहृत्य? अथ इदानीं कर्मयोगनिष्ठाफलं सम्यग्दर्शनं सर्ववेदान्तसारविहितं वक्तव्यमिति आह --,

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【 Verse 18.66 】

▸ Sanskrit Sloka: सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ||

▸ Transliteration: sarvadharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja | ahaṁ tvāṁ sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||

▸ Glossary: sarvadharmān: all principles of right conduct; parityajya: abandoning; mām: unto Me; ekaṁ: only; śaraṇaṁ: surrender; vraja: go; ahaṁ: I; tvāṁ: you; sarva: all; pāpebhyaḥ: from sinful reactions; mokṣayiṣyāmi: deliver; mā: not; śucaḥ: worry

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.66 Abandon all principles and concepts of right conduct and simply surrender unto Me. I shall deliver you from all sinful reaction. Have no worry.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.66।।सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा? चिन्ता मत कर।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.66।। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ? मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा? तुम शोक मत करो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.66 सर्वधर्मान् all duties? परित्यज्य having abandoned? माम् to Me? एकम् alone? शरणम् refuge? व्रज take? अहम् I? त्वा thee? सर्वपापेभ्यः from all sins? मोक्षयिष्यामि will liberate? मा dont? शुचः grieve.Commentary This is the answer given by the Lord to the estion put by Arjuna in chapter II? verse 7 I ask Thee which may be the better tell me that decidedly. I am Thy disciple? suppliant to Thee teach me.All Dharmas Righteous deeds? including Adharma all actions? righteous or unrighteous? as absolute freedom from all actions is intended to be taught here.Taking refuge in Me alone implies the knowledge of unity without any thought of duality knowing that there is nothing else except Me? the Self of all? dwelling the same in all. If thou art established in this faith? I shall liberate thee from all sins? from all bonds of Dharma and Adharma by manifesting Myself as thy own Self.To behold forms is the Dharma of the eye. The support or substratum of all forms is Brahman. When you look at an object behold Brahman Which is the one essence and abandon the form as it is illusory and unreal. Have the same attitude towards the other objects which pertain to the other senses.Give up the JivaDharma (the notions I am the doer o actions? I enjoy. I am a Brahmana. I am a Brahmachari. I am endowed with a little knowledge and power? etc. and get yourself established in BrahmaBhavana (the understanding or knowledge I am Brahman). This is what is meant by taking refuge in Lord Krishna? according to the Vedantins.Work ceaselessly for the Lord but surrender the fruits of all actions to the Lord. Take the Lord as your sole refuge. Live for Him. Work for Him. Serve Him in all forms. Think of Him only. Meditate on Him alone. See Him in all forms. Think of Him only. Meditate on Him alone. See Him everywhere. Worship Him in your heart. Consecrate your life? all actions? feelings and thoughts to the Lord. You will rest in Him. You will attain union with Him. You will attain immortal supreme peace and eternal bliss. This is the view of another school of thought.Sri Sankara very strongly refutes the idea that knowledge in conjunction with Karma (action) produces or leads to liberation. He says that Karma and knowledge may not go together in the same man? that karma helps the man to get purification of the heart? and that right knowledge of the Self alone will give him absolute freedom from Samsara. He says that work and knowledge are like darkness and light? that action is possible only in this universe of illusory phenomena which is the projection of ignorance and knowledge dispels this ignorance. (Cf.III.30IX.22)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.66. Abandoning all attributes, come to Me as your sole refuge; I shall rescue you from all sins; don't be sorrowful.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.66 Give up then thy earthly duties, surrender thyself to Me only. Do not be anxious; I will absolve thee from all thy sin.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.66 Completely relinishing all Dharmas, seek Me alone for refuge. I will release you from all sins. Grieve not:

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.66 Abandoning all forms of rites and duties, take refuge in Me alone. I sahll free you from all sins. (Therefore) do not grieve.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.66 Abandoning all duties, take refuge in Me alone: I will liberate thee from all sins; grieve not.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.66 Sarvadharman etc. Abandoning all attributes : This act of slaying the kinsmen and the like that arises incidentally while fighting a war - not owning those acts as your own attribute by your thought 'I am the doer of all these'; also giving up by mind, the notion 'If the act of slaying the teacher etc., is avoided, merit will accrue to me'. come to Me: Come to Me alone, the Agent-of-all-actions, the Supreme Lord, the Sovereign. As your Refuge : as the Guardian of all your natural impulses. On that account I, the Omniscient, shall rescue you from all the sins. Don't be sorrowful : Don't get perplexed 'What to be done'.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.66 'Relinishing all Dharmas means the complete relinishment of the sense of agency, possessiveness, fruits etc., in the practising of Karma, Jnana and Bhakti Yogas in the way instructed, and the realising of Me as the agent, object of worship, the means and the end. It means that relinishment is not of all devotional duties but only of the sense of agency and the fruits. This is the Sastraic relinishment of all Dharmas. It is firmly established in the beginning of this chapter commencing from, 'Listen regarding My decision, O Arjuna, about abandonment; for abandonment is declared to be of three kinds' (18.4), and 'Renouncing attachments and also the fruit, such abandonment is regarded as Sattvika ৷৷. for it is impossible for one who bears the body to abandon acts entirely. But he who gives up the fruits of works, is called the abandoner' (18.9-11).

If you practise such abandonment of the sense of agency and fruits, I will release you from all 'sins' - i.e., I will release you from all evil incompatible with the attainment of Myself, consisting of innumerable acts of the nature of doing what ought not to be done and not doing what ought to be done. These piled up from beginningless times from the obstruction in the way. Grieve not, you should not despair; for I shall release you from all these obstructions.

Another (alternative) explanation is this: Bhakti Yoga is possible only for those people to whom the Lord is exceedingly dear and who are free from all evils. Those evils are so huge in their case that the expiatory rites which could wash them off, could not be performed in the limited time of one's life span. Ajuna therefore thought that he was unfit for commencing Bhakti Yoga. To remove the grief of Arjuna the Lord said: 'Completely relinishing all Dharmas, seek Me alone for refuge.' Expiatory rites can be taken here as what is meant by Dharma, Completely forsake these rites (Dharmas) appropriate for the removal of numerous and varied sins piled up from beginningless time and obstructing the starting of Bhakti Yoga. The expiatory rites consist of practices like Krcchra, Candrayana, Kusmanda, Vaisvanara, Vratapati, Pavitresti, Trvrit, Agnistoma etc., which are of manifold varieties, and which are difficult to perform on account of the brevity of life. So in order to succeed in commencing Bhakti Yoga, seek Me alone for refuge. I am supremely compassionate, the refuge of all without considering the differences of character among them, and am an ocean of tenderness for those dependent on Me. I will release you from all evil, the nature of which has been explained as incompatible with the commencement of Bhakti Yoga. Grieve not. [Both these interpretations of this famous verse are said to teach only Bhakti Yoga and not Prapatti. But the estion will rise in one's mind - why should it not be so taken?]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.66 Sarva-dharman, all forms of rites and duties: Here the word dharma (righteousness) includes adharma (unrighteousness) as well; for, what is intended is total renunciation of all actions, as is enjoined in Vedic and Smrti texts like, 'One who has not desisted from bad actions' (Ka. 1.2.24), 'Give up religions and irreligion' (Mbh. Sa. 329.40), etc. Parityajya, abandoning all rites and duties; [Being a Ksatriya, Arjuna is not alified for steadfastness in Knowledge through monasticism in the primary sense. Still, the Gita being meant for mankind as a whole, monasticism is spoken of here by accepting Arjuna as a representative man.] saranam vraja, take refuge; mam ekam, in Me alone, the Self of all, the same in all, existing in all beings, the Lord, the Imperishable, free from being in the womb, birth, old age and death-by knowing that I am verily so. That is, know it for certain that there is nothing besides Me. By revealing My real nature, aham, I; moksayisyami, shall free; tva, you, who have this certitude of understanding; sarva-paphyah, from all sins, from all bondages in the form of righteousness and unrighteousness. It has also been stated, 'I, residing in their hearts, destroy the dark-ness born of ignorance with the luminous lamp of Knowledge' (10.11). Therefore, ma, do not; sucah, grieve, i.e. do not sorrow. In this scripture, the Gita, has knowledge been established as the supreme means to Liberation, or is it action, or both? Why does the doubt arise? (Because) the passages like, '৷৷.by realizing which one attains Immortality' (13.12), 'Then, having known Me in truth, he enters (into Me) immediately after that (Knowledge)' (55), etc. point to the attainment of Liberation through Knowledge alone. Texts like, 'Your right is for action alone' (2.47), '(you undertake) action itself (4.15), etc. show that actions have to be under-taken as a matter of compulsory duty. Since both Knowledge and action are thus enjoined as duties, therefore the doubt may arise that they, in combination as well, may become the cause of Liberation. Objection: What, again, would be the result of this iniry? Vedantin: Well, the resut will verily be this: The ascertainment of one of these as the cuase of the highest good. Hence this has to be investigated more extensively. Knowledge of the Self, however, is exclusively the cause of the highest good; for, through the removal of the idea of differences, it culminates in the result that is Liberation. The idea of distinction among action, agent and result is ever active with regard to the Self because of ignorance. This ignorance in the form, 'My work; I am the agent; I shall do this work for that resut', has been at work from time without beginning. The dispeller of this ignorance is this Knowledge regarding the Self-in the form, 'I am the absolute, non agent, free from action and result; there is none else other than myself because, when it (Knowledge) arises it despels the idea of differences which is the cause of engagement in action. The word 'however' above is used for ruling out the other two alternatives. This refutes the two other alternative views by showing that the highest good cannot be attained through mere actions, nor by a combination of Knowledge and action. Besides, since Liberation is not a product, therefore it is illogical that it should have action as its means. Indeed, an eternal entity cannot be produced by either action of Knowledge. Objection: In that case, ever exclusive Knowledge is purposeless. Vedantin: No, since Knowledge, being the destroyer of ignorance, culminates in Liberation which is directly experienced result. The fact that Knowledge, which removes the darkness of ignorance, culminates in Liberation as its result is directly perceived in the same way as is the result of the light of a lamp which removes ignorance the form of sanke etc. and darkness from objects such as rope etc. Indeed, the result of light amounts to the mere (awareness of the) rope, free from the wrong notions of snake etc. So is the case with Knowledge. As in the case of the acts like 'cutting down', 'producing fire by friction' etc., in which accessories such as the agent and others operate, and which have perceivable results, there is no possiblity of (the agent etc.) engaging in any other activity giving some other result apart from 'splitting into two', 'seeing (or lighting of) fire' etc, similarly, in the case of the agent and the other factors engaged in the 'act' of steadfastness in Knowledge which has a tangible result, there is no possibility of (their) engagement in any other action which has a result different from that in the form of the sole existence of the Self. Hence, steadfastness in Knowledge combined with action is not logical. Objection: May it not be argued that this is possible like the acts of eating and Agnihotra sacrifice etc.? [As such a common action as eating can go hand in hand with such Vedic rites as the Agnihotra-sacrifice, so, actions can be combined with Knowledge.] Vedantin: No, since it is unreasonable that, when Knowledge which resutls in Liberation is attained, there can remain a hankering for results of actions. Just as there is no desire for an action or its result [Action, i.e. digging etc.; result, i.e. bathing etc.] in connection with a well, pond, etc. when there is a flood all around, similarly when Knowledge which has Liberation for its result is attained there can be no possibility of hankering for any other result or any action which leads to it. Indeed, when somody is engaged in actions aimed at winning a kingdom, there can be no possibility of his engaging in any activity for securing a piece of land, or having a longing for it! Hence, action does not constitute the means to the highest good. Nor do Knowledge and action in combination. Further, Knowledge which has Liberation as its result can have no dependence on the assistance of action, because, being the remover of ignorance, it is opposed (to action). Verily, darkness cannot be the dispeller of darkness. Therefore Knowledge alone is the means to the highest good. Objection: Not so, because from non-performance of nityakarmas one incurs sin. Besides, freedom (of the Self) is eternal. As for the view that Liberation is attainable through Knowledge alone, it is wrong. For, if nityakarmas [As also the occasional duties (naimittika-karmas).] which are prescribed by the Vedas are not performed, then one will incur evil in the form of going to hell etc. Counter-objection: If this be so, then, since Liberation cannot come from action, will there not arise the contingency of there being no Liberation at all? Pseudo-Vedantin: Not so, for Liberation is eternal. as a result of performing nityakarmas there will not be incurring of evil, and as a result of not doing any prohibited action (nisiddha-karma) there will not be any possibility of birth in an undesirable body; from relinishing actions

Chapter 18 (Part 36)

meant for desired results (kamya-karmas) there will be no possibility of being born in some desirable body. Since there is no cause to produce another body when the present body falls after the results of actions that produced this body get exhausted by experiencing them, and since one does not have attachment etc., therefore Liberation consists in the mere continuance of the Self in Its own natural state. Thus, Liberation is attained without effort. Objection: May it not be argued that, since in the case of actions done in many past lives-which are calculated to yield such results as attainment of heaven, hell, etc. but have not commenced bearing results-there is no possiblity of their being experienced, therefore they cannot be exhausted? Pseudo-Vedantin: No, since the suffering of pain from the effort involved in the nityakarmas can reasonably be (considered to be) the experiencing of their [i.e. of actions done in past lives, which have not commenced bearing their fruits.-Tr.] results. Or, since the nityakarmas, like expiations, may be considered as being meant for eliminating the sins incurred earlier, and since actions that have begun bearing their fruits get exhausted merely through their being experienced, therefore Liberation is attained without effort-provided no fresh actions are performed. Vedantin: No, since there is the Upanisadic text, 'Knowing Him alone, one goes beyond death; there is no other way to go by' (Sv. 3.8), which states that for Liberation there is no other path but enlightenment; also because there is the Upanisadic statement that Liberation for an unenlightened person is as impossible as the rolling up of the sky like leather (Sv. 6.20); and since it is mentioned in the Puranas and the Smrtis that Liberation follows only from Knowledge. (From your view) it also follows that there is no possibility of the exhaustion of the results of virtuous deeds which have not as yet begun yielding their fruits. And, as there is the possibility of the persistence of sins which were incurred in the past but have not yet commenced yielding results, similarly there can be the possibility of the persistence of virtues which have not yet begun bearing fruits. And so, if there be no scope of their being exhausted without creating another body, then there is no possibility of Liberation. And since attachment, hatred and delusion, which are the causes of virtue and vice, cannot be eradicated through any means other than Knowledge, therefore the eradication of virtue and vice becomes impossible. Besides, since the Sruti [See Ch. .2.23.1 and Br. 1.5.16-Tr.] mentions that nityakarmas have heaven as their result, and there is the Smrti text, 'Persons belonging to castes and stages of life, and engaged in their own duties' ['৷৷.attain to a high, immeasurable happiness.'-Tr.] (Ap. Dh. Su. 2.2.2.3), etc., therefore the exhaustion of (the fruits of) actions (through nityakarmas) is not possible. As for those who say, 'The nityakarmas, being painful in themselves, must surely be the result of evil deeds done in the past; but apart from being what they are, they have no other result because this is not mentioned in the Vedas and they are enjoined on the basis of the mere fact that one is alive'-(this is) not so, because actions which have not become operative cannot yield any result. Besides, there is no ground for experiencing a particular conseence in the form of pain [Pain involved in the performance of nityakarmas.] The statement, that the pain one suffers from the effort involved in performing the nityakarmas is the result of sinful acts done in past lives, is false. Indeed, it does not stand to reason that the result of any action which did not become operative at the time of death to yield its fruit is experienced in a life produced by some other actions. Otherwise, there will be no reason why the fruit of some action that is to lead to hell should not be experienced in a life that is produced by such actions as Agnihotra etc. and is meant for enjoying the result in the form of heaven! Besides, that (pain arising from the effort in performing nityakarmas) cannot be the same as the conseence in the form of the particular suffering arising from sin. Since there can be numerous kinds of sins with results productive of various kinds of sorrows, therefore, if it be imagined that their (sins') result will be merely in the form of pain arising from the effort in undertaking the nityakarmas, then it will certainly not be possible to suppose that they (the sins incurred in the past) are the causes of such obstacles as the pairs of opposites (heat and cold, etc.), disease etc., and that the result of sins incurred in the past will be only the pain arising from the exertion in performing nityakarmas, but not the sufferings like carrying stones on the head etc. Further, it is out of context to say this, that the pain resulting from the effort in performing nityakarmas is the result of sinful acts done in the past. Objection: How? Vedantin: What is under discussion is that the sin committed in the past, which has not begun to bear fruit, cannot be dissipated. In that context you say that pain resulting from the effort in undertaking nityakarmas is the result of action which has begun bearing fruit, not of that which has not yet commenced yielding fruit! On the other hand, if you think that all sins committed in the past have begun yielding their results, then it is unreasonable to specify that the pain resulting from the exertion in performing the nitya-karmas is their only result. And there arises the contingency of the injunction to perform nityakarmas becoming void, because the sinful deed which has begun bearing fruit can ligically be dissipated only be experiencing its result. Further, if pain be the result of nityakarmas enjoined by the Vedas, then it is seen to arise from the very effort in undertaking nityakarmas-as in the case of excercise etc. To imagine that it is the result of something else is illogical. [The pain arising from bodily excercise is the result of the excercise itself, and not the result of any past sin! Similarly, the pain resulting from undertaking nityakarmas is the conseence of that performance itself, and need not be imagined to be the result of any past sin.] And if the nityakarmas have been enjoined simply on the basis of a person's being alive, it is unreasonable that it should be the result of sins committed in the past, any more than expiation is. An expiation that has been enjoined following a particular sinful act is not the result of that sin! On the other hand, if the suffering arising from expiation be the reslut of that very sin which is its cause, then the pain from the effort in performing nityakarmas, though prescribed merely on the fact of one's being alive, may become the fruit of that very fact of one's being alive-which was itself the occasion (for enjoining the nityakarmas)-, because both the nityakarmas and expiatory duties are indistinguishable so far as their being occasioned by something is concerned. Moreover, there is the other fact: There can be no such distinction that only the pain resulting from the performance of nityakarmas is the result of past sinful deeds, but not so the pain from performing kamya-karmas (rites and duties undertaken for desired results), because the pain in performing Agnihotra-sacrifice etc. is the same when it is performed as a nityakarma or as a kamya-karma. Thus the latter also may be the result of past sinful acts. This being the case, it is untenable to assume on the ground of circumstantial inference that, since no result is enjoined in the Vedas for nityakarmas and since its prescription cannot be justified on any other ground, therefore pain from the effort in performing nityakarmas is the result of sinful past deeds. Thus, the (Vedic) injunction being unjustifiable otherwise, it can be inferred that nityakarmas have got some result other than the pain arising from the effort in undertaking them. It also involves this contradiction: It is contradictory to say that through the performance of nityakarma a result of some other action is experienced. And when this is admitted, it is again a contradiction to say that that very experience is the result of the nityakarma, and yet that niyakarma has no result! Moreover, when Agnihotra and other sacrifices are performed for desirable results (Kamya-Agnihotra), then the Agnihotra etc. which are performed as nityakarma (Nitya-Agnihotra) become accomplished simultaneously (on a account of its being a part ofthe former). Hence, since the Kamya-Agnihotra (as an act) is dependent on and not different from the Nitya-Agnihotra, therefore the result of the Agnihotra and other sacrifices performed with a desire for results will get exhausted through the suffering involved in the exertion in undertaking it (the Nitya-Agnihotra). On the other hand, if the result of Kamya-Agnihotra etc. be different, viz heaven etc., then even the suffering arising from the exertion in performing them ought to be necessarily different (from the suffering involved in the Nitya-Agnihotra). And that is not the fact, because it contradicts what is directly perceived; for the pain resulting from the effort in performing only the Nitya-(-Agnihotra) does not differ from the pain resulting from the exertion in undertaking the Kamya (-Agnihotra). Besides, there is this other consideration: Actions which have not been enjoined or prohibited (by the scriptures) produce immediate results. But those enjoined or prohibited by the scriptures do not produce immediate results; were they to do so, then there would be no effort even with regard to heaven etc. and injunctions concerning unseen results. And it cannot be imagined that only the fruit of (Nitya-) Agnihotra etc. gets exhausted through the suffering arising from the effort in performing them, but the Kamya (-Agnihotra) has exalted results like heaven etc. merely as a conseence of the fact of desire for results, though as acts there is no essential difference between them (the Nitya and the Kamya) and there is no additional subsidiary part, processes of performance, etc. (in the kamya-Agnihotra). Therefore, it can never be established that nitya-karmas have no unseen results. And hence, enlightenment alone, not the performance of nityakarmas, is the cuase of the total dissipation of actions done through ignorance, be they good or bad. For, all actions have for their origin ignorance and desire. Thus has it been established (in the following passages) that action (rites and duties) is meant for the ignorant, and steadfastness in Knowledge-after renunciation of all actions-is meant for the enlightened: 'both of them do not know' (2.19); 'he who knows this One as indestructible, eternal' (2.21); 'through the Yoga of Knowledge for the men of realization; through the Yoga of Action for the yogis' (3.3); 'the ignorant, who are attached to work' (3.26); 'But৷৷.the one who is a knower৷৷.does not become attached, thinking thus: "The organs rest on the objects of the organs"' (3.28); 'The embodied man৷৷.having given up all actions mentally, continues' (5.13); 'Remaining absorbed in the Self, the knower of Reality should think, "I certainly do not do anything"' (5.8); i.e; the unenlightened person thinks, 'I do'; 'For (the sage) who wishes to ascend (to Dhyana-yoga), action is said to be the means৷৷.when he has ascended (when he is established in the Yoga of Meditation), inaction alone is said to be the means' (6.3); 'noble indeed' are all the three (classes of) unenlightened persons, 'but the man of Knowledge is the very Self. (This is) My opinion' (7.18); the unenlightened who perform their rites and duties, 'who are desirous of pleasures, attain the state of going and returning' (9.21); 'becoming non-different from Me and meditative' (9.22) and endowed with steadfast devotion, they worship (Me) the Self which has been described as comparable to space and taintless; and 'I grant that possession of wisdom by which they reach Me' (10.10); i.e., the unenlightened persons who perform rites and duties 'do not reach Me.' Those who perform works for the Lord and who, though they be the most devout, are ignorant persons performing rites and duties,-they remain involved in practices which, in a descending order, culminate in giving up the fruit of actions (cf. 12.6-11). But those who meditate on the indefinable Immutable take recourse to the disciplines stated in the passages beginning with 'He who is not hateful towards any creature' (12.13) and ending with that Chapter, and also resort to the path of Knowledge presented in the three chapters beginning with the Chapter on the 'field'. The three results of actions, viz the undesirable etc. (cf. 12), do not accrue only to the mendicants belonging to the Order of Paramahamsas (the highest Order of monks)-who have renounced all actions that originate from the five causes beginning with the locus (cf. 14), who possess the knowledge of the oneness and non-agentship of the Self (17,20), who continue in the supreme steadfastness in Knowledge, who know the real nature of the Lord, and who have taken refuge in the unity of the real nature of the Lord with the Self. It does accrue to the others who are not monks, the ignorant persons who perform rites and duties. Such is this distinction made in the scripture Gita with regard to what is duty and what is not. Objection: May it not be argued that it cannot be proved that all actions are due to ignorance? Reply: No, (it can be proved,) as in the case of slaying a Brahmin. Although the nityakarmas are known from the scriptures, still they are meant only for the ignorant. As such an action as killing a Brahmin, even though known to be a source of evil from the scripture prohibiting it, is still perpetrated by one who has defects such as ignorance, passion, etc.-because impulsion to any action is otherwise not possible-, so also is it with regard to the nitya, naimittika and kamya actions. Objection: May it not be held that impulsion to nityakarma etc. is not possible if the Self be not known as a distinct entity? [Unless one knows the Self to be distinct from the body etc. he will not perform the nityakarmas etc. meant for results in the other worlds, viz heaven etc. (Tr.:) In place of vyatiriktatmani, Ast. reads 'deha-vyatiriktatmani, the Self which is distinct from the body'.] Reply: No, since it is seen that with regard to actions which are of the nature of motion and are accomplished by the not-Self, one engages in them with the idea, 'I do.' [The actionless Self is not the agent of the movements of the body etc. Still agentship is superimposed on It through ignorance.] Objection: Can it not be said that the notion of egoism with regard to the aggregate of body etc. occurs in a figurative sense; it is not false? Reply: No, since its effects [i.e. the effects of the notion of egoism.] also will become figurative. Objection: The notion of 'I' with regard to the aggregate of one's own body etc. occurs in a figurative sense. As with regard to one's own son it is said (in the Veda), 'It is you yourself who is called the son' (Sa. Br. 14.9.4.26), and in common parlance also it is said, 'This cow is my very life', so is the case here. [As the use of the word 'I' with regard to a son is figurative, so also with regard to the body.] This is certainly not a false notion. However, a false notion (of identity) occurs in the case of a stump and a man, when the distinction between them is not evident (due to darkness). Reply: A figuratively expressed notion cannot lead to an effect in the real sense, because that (notion) is used for the eulogy of its basis with the help of a word of comparison which remains understood. As for instance, such sentences as, 'Devadatta is a lion', 'The boy is a fire'-implying 'like a lion', 'like a fire', on the basis of the similarity of cruelty, the tawny colour, etc.-are meant only for eulogizing Devadatta and the boy who are the basis (i.e. the subjects of the two sentences). But no action of a lion or a fire is accomplished because of the use of the figurative words or ideas. On the contrary, one experiences the evil effects of false notions. [Therefore the idea of 'I' with regard to one's body etc. does not occur in a secondary sense, but it does so falsely.] And with regard to the subjects of the figurative notions, one understands, 'This Devadatta cannot be a lion; this boy cannot be a fire.' Similarly, actions done by the aggregate of body etc., which is the 'Self' in a figurative sense, cannot be held to have been done by the Self which is the real subject of the notion of 'I'. For, actions done by the figurative lion or fire cannot be considered to have been accomplished by the real lion or fire. Nor is any action of the real lion and fire accomplished through the (figurative) cruelty or tawnyaness; for, their purpose is fully served by being used for eulogy. And those who are praised know, 'I am not a lion; I am not fire; and neither is the work of a lion or fire mine.' So the more ligical notion is, 'The action of the aggregate (of body etc.) do not belong to me who am the real Self', and not, 'I am the agent; it is my work.' As for the assertion made by some that the Self acts through Its own memory, deisre and effort, which are the causes of activity-that is not so, for they are based on false knowledge. Memory, desire, effort, etc. indeed follow from the tendencies born from the experience of the desirable and the undesirable results of actions (-which actions themselves arise from the notions of the 'desirable' and the 'undesirable') caused by false knowledge. [False knowledge gives rise to the ideas of the desirable and the undesirable. From these arise desire and repulsion. Actions which follow give rise to the experience of their desirable and undesirable results. Such experiences create impressions in the mind, from which are born memory etc.] Just as in this life virtue, vice and the experience of their results are cuased by the identification (of the Self) with the aggregate of body etc. and attraction, repulsion, etc., so also was it in the previous birth, and even in the life preceding that. Thus it can be inferred that past and future mundane existence is without beginning and is a product of ignorance. And from this it becomes proved that the absolute cessation of mundane existence is caused by steadfastness in Knowledge, accompanied by renunciation of all rites and duties. Besides, since self-identification with the body is nothing but ignorance, therefore, when the (ignorance) ceases, there remains so possibility of re-birth, and so, mundane existence becomes impossible. The identification of the Self with the aggregate of body etc. is nothing but ignorance, because in common life it is not seen that anybody who knows, 'I am different from cattle etc., and the cattle etc. are different from me', entertains the notion of 'I' with regard to them. However, mistaken perceiving a stump to be a man, one may out of indiscrimination entertain the idea of 'I' with regard to the aggregate of body etc.; not so when perceiving them as distinct. As for that notion of considering the son to be oneself-as mentioned in, 'It is you yourself who is called the son' (Sa. Br. 14.9.4.26)-, that is a metaphor based on the relationship between the begotten and the begetter. And no real action like eating etc.can be accomplished through something considered metaphorically as the Self, just as actions of the real lion or fire (cannot be accomplished) by someone metaphorically thought of to be a lion or fire. Objection: Since an injunction relating to an unseen result is valid, therefore, may it not be said that the purposes of the Self are accomplished by the body and organs which are figuratively considered to be the Self? Reply: No, since the thinking of them as the Self is the result of ignorance. The body, organs, etc. are not the Self in a figurative sense. Objection: How then? Reply: Although the Self is devoid of relationship, still, by an ascription of relationship (to the Self), they (body etc.) come to be regarded as the Self, verily through a false notion. For, this identification (of body etc.) with the Self exists so long as the false notion is there, and ceases to exist when it is not there. So long as ignorance lasts, identification of the Self with the aggregate of body and organs is seen only in the case of non-discriminating, immature, ignorant poeple who say, 'I am tall', 'I am fair'. But in the case of discriminating persons who possess the knowledge, 'I am different from the aggregate of body etc.', there does not arise the idea of egoism with regard to the body etc. at that time (i.e. simultaneously with that knowledge). Hence, since it (i.e. identification of the Self with the body etc.) ceases in the absence of the false notion, therefore it is a creation of that (false notion), and not a figurative notion. It is only when the common and the uncommon features of the lion and Devadatta, or of fire and the boy, are known distinctly, that a figurative notion or verbal expression can occur; not when the common and the uncommon features are unknown. As for the argument that (the figurative notion should be accepted) on the authority of the Vedas, we say, 'No', because their validity concerns unseen results. The validity of the Vedas holds good only with regard to matters concerning the relation between ends and means of Agnihotra etc., which are not known through such valid means of knowledge as direct perception; but not with regard to objects of direct perception etc., because the validity of the Vedas lies in revealing what is beyond direct perception. Therefore it is not possible to imagine that the idea of egism with regard to the aggregate of body etc., arising from an obviously of false knowledge, is a figurative notion. Surely, even a hundred Vedic texts cannot become valid if they assert that fire is cold or non-luminous! Should a Vedic text say that fire is cold or non-luminous, even then one has to assume that the intended meaning of the text is different, for otherwise (its) validity cannot be maintained; but one should not assume its meaning in a way that might contradict some other valid means of knowledge or contradict its own statement. Objection: May it not be said that since actions are undertaken by one possessed of a false idea of agentship, therefore, when the agent ceases to be so ['According to you (the Vedantin), an ignorant man alone can be an agent. Therefore, when he becomes illumined, he will cease to be ignorant and conseently the Vedas will cease to be valid for him.'] the Vedas will become invalid? Reply: No, since the Vedas become logically meaningful in respect of knowledge of Brahman. [Though the Vedic injunctions about rituals etc. be inapplicable in the case of an enlightened person, still they have empirical validity before enlightenment. Besides, the Vedas have real validity with regard to the knowledge of Brahman.] Objection: May it not be said that there arises the contingency of the Vedic texts enjoining knowledge of Brahman becoming as invalid as those texts enjoining rites and duties? Reply: No, since there cannot possibly be any notion which can remove (the knowledge of Brahman). Unlike the manner in which the idea of egoism with regard to the aggregate of body etc. is removed after the realization of the Self from hearing the Vedic injunctions regarding the knowledge of Brahman, the realization of the Self in the Self can never be removed in any way in that manner by anything whatsoever-just as the knowledge that fire is hot and luminous is irremovable-, since (Self-) realization is inseparable from its result (i.e. cessation of ignorance). Besides, the Vedic texts enjoining rites (and duties) etc. are not invalid, because they, through the generation of successively newer tendencies by eliminating the successively preceding tendencies, are meant for creating the tendency to turn towards the indwelling Self. [The Vedic injunctions make people up rituals etc. by giving up their earlier worldly tendencies. Thery their minds become purified. The purified mind then aspires to know the indwelling Self. Thus, since the ritualistic injunctions are meant for making a person turn towards the knowledge ofthe indwelling Self, they are not invalid.] Although the means be unreal (in itself), still it may be meaningful in relation to the truth of the purpose it serves, as are the eulogistic sentences (arthavada) [See note on p. 40.-Tr.] occuring along with injunctions. Even in the world, when it becomes necessary to make to child or a lunatic drink milk etc. it is said that it will help growth of hair [Cuda, lit. hair on the top of the head; or single lock of hair left on the crown of the head after tonsure. See V.S.A.] etc.! Before the dawn of Knowledge, the (ritualistic) Vedic texts concerned with a different situation [The situation obtaining before the dawn of Self-knowledge.] are also as valid in themselves as are direct perception etc. occuring due to Self-identification with the body etc. On the other hand, as for your view 'The Self, though inactive by Itself, acts through Its mere proximity; and that itself constitutes agentship of the Self in the primary sense. Just as it is well known that a king, though not himself engaged in a battle, is, merely by virtue of his being in charge, said to be fighting when his soldiers are fighting, and that he is victorious or defeated; similarly, as the ?nder of an army acts through his mere orders, and it is seen that the results of the actions accrue to the king or to the ?nder; or, just as the actions of the priests are ascribed to the sacrificer,-in that very manner are the actions done by the body etc. ought to be of the Self because the result of those actions accrues to the Self. And, as the agentship of a magnet which, in fact, is not active, is attributed to it in the primary sense because it causes a piece of iron to move, similar is the agentship of the Self'-that is wrong, since it will amunt to an inactive entity becoming an agent. Objection: May not agentship be of various kinds? Reply: No, for in the case of the 'king' and others it is seen that they have agentship even in the primary sense. As for the king, he fights even through his personal engagement. And he has agentship in the primary sense by virtue of making (his) warriors fight, distributing wealth, and also reaping the fruits of victory or defeat. Similarly, the agentship of a sacrificer is primary by virtue of his offering the main oblation and giving gifts due to the priests. Therefore it is understood that the agentship which is attributed to an inactive entity is figurative. If primary agentship consisting in their personal engagement is not perceived in the case of the king, a sacrificer and others, then it could be assumed that they have primary agentship owing to the mere fact of their presence, just as a magnet has by virtue of making the iron move. But in the case of the king and others it is not perceived that they have no personal engagement in that way. Therefore, even the agentship owing to mere presence is a figurative one. And if that be so, the connection with the result of such agentship will also be figurative. No action in the primary sense is performed by an agent figuratively thought to be so. Hence the assertion is certainly wrong that owing to the activities of the body etc. the actionless Self becomes an agent and experiencer. But everything becomes possible due to error. This is just as it happens in dream or in jugglery! Besides, in deep sleep, absorption in Brahman, etc. where the current of the mistaken idea of Self-identity with the body etc. ceases, evils like agentship, enjoyership, etc. are not perceived. Therefore this delusion of mundane existence is surely due to false knowledge; but it is not reality. Conseently, it is established that it ceases absolutely as a result of full enlightenment. Having summed up in this chapter the import of the whole of the scripture Gita, and having again summarized it specially here at the end (in verse 66) for the sake of emphasizing the purport of the Scripture, now after that, the Lord states the rules for handing down the Scripture:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.66।। भगवद्गीता के समस्त श्लोकों में यह श्लोक सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी अत्यधिक विवादास्पद बन गया है। इस श्लोक की व्याख्या करने में सभी अनुवादकों? भाष्यकारों समीक्षकों और टीकाकारों ने अपनी सम्पूर्ण क्षमता एवं मौलिकता की पूँजी लगा दी है। व्यापक आशय के इस महान् श्लोक के माध्यम से प्रत्येक दार्शनिक ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। श्री रामानुजाचार्य के अनुसार सम्पूर्ण गीता का यह चरम श्लोक है।धर्म शब्द हिन्दू संस्कृति का हृदय है। विभिन्न सन्दर्भों में इस शब्द का प्रयोग किन्हीं विशेष अभिप्रायों से किया जाता है। यही कारण है कि भारतवर्ष के निवासियों ने इस पवित्र भूमि की आध्यात्मिक सम्पदा का आनन्द उपभोग किया और यहाँ के धर्म को सनातन धर्म की संज्ञा प्रदान की।हिन्दू धर्म शास्त्रों में प्रयुक्त धर्म शब्द की सरल और संक्षिप्त परिभाषा है अस्तित्व का नियम। किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण वस्तु का वस्तुत्व सिद्ध होता है? अन्यथा नहीं? वह गुण उस वस्तु का धर्म कहलाता है। उष्णता के कारण अग्नि का अग्नित्व सिद्ध होता है? उष्णता के अभाव में नहीं? इसलिए? अग्नि का धर्म उष्णता है। शीतल अग्नि से अभी हमारा परिचय होना शेष है मधुरता चीनी का धर्म है? कटु चीनी मिथ्या हैजगत् की प्रत्येक वस्तु के दो धर्म होते हैं (1) मुख्य धर्म (स्वाभाविक) और (2) गौण धर्म (कृत्रिम या नैमित्तिक) गौण धर्मों के परिवर्तन अथवा अभाव में भी पदार्थ यथावत् बना रह सकता है? परन्तु अपने मुख्य (स्वाभाविक) धर्म का परित्याग करके क्षणमात्र भी वह नहीं रह सकता। अग्नि की ज्वाला का वर्ण या आकार अग्नि का गौण धर्म है? जबकि उष्णता इसका मुख्य धर्म है। किसी पदार्थ का मुख्य धर्म ही उसका धर्म होता है।इस दृष्टि से मनुष्य का निश्चित रूप से क्या धर्म है उसकी त्वचा का वर्ण? असंख्य और विविध प्रकार की भावनाएं और विचार? उसका स्वभाव (संस्कार)? उसके शरीर? मन और बुद्धि की अवस्थाएं और क्षमताएं ये सब मनुष्य के गौण धर्म ही है जबकि उसका वास्तविक धर्म चैतन्य स्वरूप आत्मतत्त्व है। यही आत्मा समस्त उपाधियों को सत्ता और चेतनता प्रदान करता है। इस आत्मा के बिना मनुष्य का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। इसलिए? मनुष्य का वास्तविक धर्म सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा है।यद्यपि नैतिकता? सदाचार? जीवन के समस्त कर्तव्य? श्रद्धा? दान? विश्व कल्याण की इच्छा इन सब को सूचित करने के लिए भी धर्म शब्द का प्रयोग किया जाता है तथापि मुख्य धर्म की उपयुक्त परिभाषा को समझ लेने पर इन दोनों का भेद स्पष्ट हो जाता है। सदाचार आदि को भी धर्म कहने का अभिप्राय यह है कि उनका पालन हमें अपने शुद्ध धर्म का बोध कराने में सहायक होता है। उसी प्रकार? सदाचार के माध्यम से ही मनुष्य का शुद्ध स्वरूप अभिव्यक्त होता है। इसलिए? हमारे धर्मशास्त्रों में ऐसे सभी शारीरिक? मानसिक एवं बौद्धिक कर्मों को धर्म की संज्ञा दी गयी है? जो आत्मसाक्षात्कार में सहायक होते हैं।इसमें सन्देह नहीं है कि गीता के कतिपय श्लोकों में? भगवान् श्रीकृष्ण ने साधकों को किसी निश्चित जीवन पद्धति का अवलम्बन करने का आदेश दिया है और यह भी आश्वासन दिया है कि वे स्वयं उनका उद्धार करेंगे। उद्धार का अर्थ भगवत्स्वरूप की प्राप्ति है। परन्तु इस श्लोक के समान कहीं भी उन्होंने इतने सीधे और स्पष्ट रूप में? अपने भक्त के मोक्ष के उत्तरदायित्व को स्वीकार करने की अपनी तत्परता व्यक्त नहीं की हैं।ध्यानयोग के साधकों को तीन गुणों को सम्पादित करना चाहिए। वे हैं (1) ज्ञानपूर्वक ध्यान के द्वारा सब धर्मों का त्याग? (2) मेरी (ईश्वर की) ही शरण में आना? और? (3) चिन्ता व शोक का परित्याग करना। इस साधना का पुरस्कार मोक्ष है मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा। यह आश्वासन मानवमात्र के लिये दिया गया है। गीता एक सार्वभौमिक धर्मशास्त्र है यह मनुष्य की बाइबिल है? मानवता का कुरान और हिन्दुओं का शक्तिशाली धर्मग्रन्थ है।सर्वधर्मान् परित्यज्य (सब धर्मों का परित्याग करके) हम देख चुके हैं कि अस्तित्व का नियम धर्म है? और कोई भी वस्तु अपने धर्म का त्याग करके बनी नहीं रह सकती। और फिर भी? यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को समस्त धर्मों का परित्याग करने का उपदेश दे रहे हैं। क्या इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म की हमारी परिभाषा त्रुटिपूर्ण हैं अथवा? क्या इस श्लोक में ही परस्पर विरोधी कथन है इस पर विचार करने की आवश्यकता है।आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण मनुष्य अपने शरीर? मन और बुद्धि से तादात्म्य करके एक परिच्छिन्न? र्मत्य जीव का जीवन जीता है। इन उपाधियों से तादात्म्य के फलस्वरूप उत्पन्न द्रष्टा? मन्ता? ज्ञाता? कर्ता? भोक्ता रूप जीव ही संसार के दुखों को भोगता है। वह शरीरादि उपाधियों के जन्ममरणादि धर्मों को अपने ही धर्म समझता है। परन्तु? वस्तुत? ये हमारे शुद्ध स्वरूप के धर्म नहीं हैं। वे गौण धर्म होने के कारण उनका परित्याग करने का यहाँ उपदेश दिया गया है। इनके परित्याग का अर्थ अहंकार का नाश ही है।इसलिए? समस्त धर्मों का त्याग करने का अर्थ हुआ कि शरीर? मन और बुद्धि की जड़ उपाधियों के साथ हमने जो आत्मभाव से तादात्म्य किया है अर्थात् उन्हें ही अपना स्वरूप समझा है? उस मिथ्या तादात्म्य का त्याग करना। आत्मनिरीक्षण और आत्मशोधन ही भगवान् श्रीकृष्ण के कथन का गूढ़ अभिप्राय हैं।मामेकं शरणं ब्रज (मेरी ही शरण में आओ) मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति की विरति तब तक संभव नहीं होती है? जब तक कि हम उसकी अन्तर्मुखी प्रवृत्ति को विकसित करने के लिए कोई श्रेष्ठ आलम्बन प्रदान नहीं करते हैं। अपने एकमेव अद्वितीय सच्चिदानन्द आत्मा के ध्यान के द्वारा हम अनात्म उपाधियों से अपना तादात्म्य त्याग सकते हैं।साधना के केवल निषेधात्मक पक्ष को ही बताने से भारतीय दार्शनिकों को सन्तोष नहीं होता है निषेधात्मक आदेशों की अपेक्षा विधेयात्मक उपदेशों में वे अधिक विश्वास रखते हैं। भारतीय दर्शन की स्वभावगत विशेषता है? उसकी व्यावहारिकता। और इस श्लोक में हमें यही विशेषता देखने को मिलती है। भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट घोषणा करते हैं? तुम मेरी शरण में आओ? मैं तुम्हें मोक्ष प्रदान करूंगा।मा शुच (तुम शोक मत करो) उपर्युक्त दो गुणों को सम्पादित कर लेने पर साधक को ध्यानाभ्यास में एक अलौकिक शान्ति का अनुभव होता है। परन्तु यह शान्ति भी स्वरूपभूत शान्ति नहीं है। तथापि ऐसे शान्त मन का उपयोग आत्मस्वरूप में दृढ़ स्थिति पाने के लिए करना चाहिए। परन्तु दुर्भाग्य से? आत्मसाक्षात्कार की व्याकुलता या उत्कण्ठा ही इस शान्ति को भंग कर देती है। चिन्ता का स्पर्श पाकर एक स्वाप्निक सेतु के समान यह शान्ति लुप्त हो जाती है। बाह्य विषयों तथा शरीरादि उपाधियों से मन के ध्यान को निवृत्त करके उसे आत्मस्वरूप में समाहित कर लेने पर साधक को साक्षात्कार की उत्कण्ठा का भी त्याग कर देना चाहिए। ऐसी उत्कण्ठा भी चरम उपलब्धि में बाधक बन सकती है।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि (मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा) जो हमारे मन में विक्षेप उत्पन्न करके हमारी शक्तियों को बिखेर देता है? वह पाप कहलाता है। हमारे कर्म ही हमारी शक्ति का ह्रास कर सकते हैं? क्योंकि मन और बुद्धि की सहायता के बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता। संक्षेप में? कर्म मनुष्य के अन्तकरण में वासनाओं को अंकित करते जाते हैं? जिन से प्रेरित होकर मनुष्य बारम्बार कर्म में प्रवृत्त होता है।शुभ वासनाएं शुभ विचारों को जन्म देती हैं? तो अशुभ वासनाओं से अशुभ विचार ही उत्पन्न होते हैं। वृत्ति रूप मन है? अत जब तक शुभ या अशुभ वृत्तियों का प्रवाह बना रहता है? तब तक मन का भी अस्तित्व यथावत् बना रहता है। इसलिए वासनाक्षय का अर्थ ही वृत्तिशून्यता है? और यही मनोनाश भी है। मन और बुद्धि के अतीत हो जाने का अर्थ ही शुद्ध चैतन्य स्वरूप कृष्णतत्व का साक्षात्कार करना है।जिस मात्रा में एक साधक अनात्मा से तादात्म्य का त्याग करने और आत्मानुसंधान करने में सफल होता है? उसी मात्रा में वह इस आत्मदर्शन को प्राप्त करता है। इस नवप्राप्त अनुभव में? वह अपनी सूक्ष्मतर वासनाओं के प्रति अधिकाधिक जागरूक होता जाता है। वासनाओं का यह भान अत्यन्त पीड़ादायक होता है। अत? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ आश्वासन देते हैं? तुम शोक मत करो। मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा। मन को विचलित करने वाली? कर्मों की प्रेरक? इच्छा और विक्षेपों को उत्पन्न करने वाली ये वासनाएं ही पाप हैं।यह श्लोक महत्वपूर्ण है। कारण यह है कि यहाँ स्वयं सर्वशक्तिमान् भगवान् ही ऐसे साधक की सहायता करने के लिए तत्परता दिखाते हैं? जो उत्साह के साथ सर्वसंभव प्रयत्नों के द्वारा अपना योगदान देने को उत्सुक है। साधनाकाल में? यदि साधक अपने मन में दुर्दम्य आशावाद का स्वस्थ वातावरण बनाये रख पाता है? तो अध्यात्म मार्ग में उसकी प्रगति निश्चित होती है।इसके विपरीत? जिस साधक का मन नैराश्य और रुदन? विषाद और अवसाद से भरा रहता है वह कभी पूर्ण हृदय से आवश्यक प्रयत्न कर ही नहीं कर सकता है और? स्वाभाविक ही है कि उसके आत्मविकास का लक्ष्य कहीं दूरदूर तक भी दृष्टिगोचर नहीं होता है। गूढ़ अभिप्रायों एवं व्यापक आशयों से पूर्ण यह एक श्लोक ही अपने आप में इस दार्शनिक काव्य गीता का उपसंहार है।इस अध्याय में सम्पूर्ण गीताशास्त्र के तत्त्वज्ञान का उपसंहार किया गया है। शास्त्रसिद्धांत पर विशेष बल देने के प्रयोजन से? इस श्लोक में पुन संक्षेप में उसका वर्णन करने के पश्चात्? अब शास्त्रसम्प्रदाय की विधि का वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.66।।परमेश्वरयजनात्मकं कर्मयोगं तन्निष्ठायाः परमरहस्यं ईश्वरशरणतालक्षणं भक्तियोगं चोपसंहृत्याथेदानीमुभयफलभूतं सम्यग्दर्शनं सर्ववेदान्तप्रतिपादितं तत्रतत्र विस्तरेम प्रोक्तमुपसंहरति -- सर्वधर्मान् सर्वे च ते धर्माश्च सर्वधर्माः तान्। धर्मशब्देनात्राधर्मोऽपि गृह्यते। नैष्कर्म्यस्य विवक्षिकत्वात्नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि पज्ञानेनैनमाप्नुयात्त्यज धर्ममधर्मं च इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः सर्वधर्मान् सर्वाणि कर्माणि परित्यज्य संन्यस्य मामेकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थमीश्वरमच्युतं गर्भजन्मजरावर्जितमहमेवैतादृशः परमात्मैत्येवमेकं शरणं व्रज। न मत्तोऽन्यदस्तीत्यवधारयेत्यर्थः। अहं त्वामेवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वेभ्यो धर्माधर्मबन्धनरुपेभ्यो मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशकरणेन। उक्तंच दशमेनाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानादीपेन भास्वता इति। अतो मा शुचः शोकं माकार्षीरित्यर्थः। यत्तु कश्चित्प्रललापस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः इत्यत्र कर्मनिष्ठा कर्मसंन्यासपर्यन्तोपसंहृताततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इत्यत्र,संन्यासपूर्वकश्रवणादिपरिपाकसहितज्ञाननिष्ठोपसंहृता। अधुना तुईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठतितमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन इति यदुक्तं तद्विवृण्वन् भगवद्भक्तिनिष्ठामुभयसाधनत्वादुभयफलभूतत्वाच्चान्ते उपसंहरति -- सर्वधर्मोनिति। सर्वान्वर्णाश्रमादिधर्मानविद्यमानान् विद्यमानान्वा परित्यज्य शरणत्वेनानादृत्य मामीश्वरमेकमद्वितीयं सर्वधर्माणामधिष्ठातारं फलदातारं च शरणं व्रज। धर्माः सन्तु न सन्तु वा कुं तैरन्यमापेक्षैः। भगवदनुग्रहादेव अन्यनिरपेक्षादहं कृतार्थो भविष्यामिति निश्चयेन परमानन्दधनमूर्तिमनन्तं श्रीवासुदेवमेव भगवन्तमनुक्षणभावनया भजस्व। इदमेव परमं तत्त्वं नातोऽधिकमस्तीति विचारपूर्वकेण प्रेमप्रकर्षेण सर्वानात्मचिन्ताशून्यया मनोवृत्त्या तैलधारावदनविच्छिन्नया सततं चिन्तयेत्यर्थः। अत्र मामेकं शरणं व्रजेति सर्वशरणतापरित्यागे लब्धे सर्वधर्मान्परित्यज्येति निषेधानुवादस्तत्कार्यकारितालाभाव। यज्ञायज्ञीये साम्निऐरं कृत्वाद्गेयम् इत्यत्रन गिरागिरेति ब्रूयात् इचिवत् तथाच ममैव सर्वधर्मकारित्वान्मदेकशरणस्य नास्ति धर्मापेक्षेत्यर्थः। एतेनेदमपास्तम्। सर्वधर्मान्परित्यज्येत्युक्तेनाधर्माणां परित्यागो न लभ्यतेऽतो धर्मपदं कर्मपरमिति। न ह्यत्र कर्मत्यागो विधीयतेऽपितु विद्यमानेऽपि कर्मणि तत्रानादरेण भगवदेकशरणतामात्रं ब्रह्मचारिगृहस्थावानप्रस्थभिक्षूणां साधारण्येन विधीयते। तत्र सर्वधर्मान्परित्यज्येति तेषां स्वधर्मादरसंभवेन तन्निवारणार्थे अधर्मे चानर्थफले कस्याप्यादरामावात् त्यागवचनमनर्थकमेव शास्त्रान्तरप्राप्तत्वाच्च तस्मात्सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यनुवादएव सर्वेषां तच्छास्त्राणां परमरहस्यमीश्वरशरणतैवेति तत्रैव परिसमाप्तिर्भगवता कृता। तामन्तरेण संन्यासस्यापि स्वफलापर्यवसायित्वात् अर्जुनं च क्षत्रियं संन्यासनधिकारिणंप्रति संन्यासोपदेशायोगात्। अर्जुनव्याजेनान्यस्योपदेशे तु वक्ष्यामि

Chapter 18 (Part 37)

ते हितं त्वा मोक्षयिष्यासि सर्वपापेभ्यस्त्वं माशुचः इत्युपक्रमोपसंहारौ न स्याताम्। तस्मात्संन्यासधर्मेष्वप्यनादरेण भगवदेकशरणतामात्रे तात्पर्यं भगवतः। यस्मात्त्वं मदेकशरणः। सर्वधर्मानादरेणातोऽहं सर्वकार्यकारित्वात्त्वां सर्वपापेभ्यो बन्धुवधादिनिमित्तेभ्यः संसारहेतुभ्यो मोक्षयिष्यामि प्रायश्चित्तं विनैवधर्मेण पापमपनुदति इतिश्रुतेर्धर्मस्थानीयत्वाच्च मम। अतो माशुचः युद्धे प्रवृत्तस्य मम बन्धुवधादिनिमित्तप्रत्यवायात्कथं निस्तारः स्यादिति शोकं माकार्षीरित्यादि तन्नादर्तव्यम्। श्रीमतां सर्वज्ञानां भगवदात्मत्वात्? भगवदभिप्रायविदां भगवतां भाष्यकृतामभिप्रायापरिज्ञानविजृम्भितत्वात्। तथाहि सप्तदशाध्यायान्तगीताशास्त्रार्थोपसंहारत्मकेऽस्मिन्नध्याये प्रतिपादितेन कर्मादिना एतदध्यायन्तसमस्तशास्त्रोपसंहारो नोपपद्यते। नहिस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः इत्यत्र कर्मनिष्टानिरुपणस्य समाप्तिर्द्दश्यतेसर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्य्वपाश्रयः। चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः इत्युक्तत्वात्तस्मात्तत्रतत्र प्रतिपादितं कर्मयोगं भक्तियोगं ज्ञानं चास्मिन्नध्याये संग्रहेणोपपाद्य सर्वशास्त्रन्त उपसंहरतीत्येवयुक्तम्। अन्यथाबुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चितः मततं भव। मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तारिष्यसि इत्यत्र भक्तियोग उपसंहृत इत्यपि कुतो न स्यात्। तस्मात्कर्मयोगादिप्रतिपादनपरिसमाप्तावेव यथासंभवं उपसंहारवर्णनं युक्तं नतु यत्रकुत्रचित्।तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। तदामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते। नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।इदं तु ते गुह्यतमंनैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासंनाधिगच्छति इत्यादिना प्रतिपादितायाः समस्तवेदान्ततात्पर्यभूतायाः कर्मयोगभक्तियोगफलभूतायाः संन्यासपूर्वकायाः ज्ञाननिष्ठाया उपसंहारस्य शास्त्रान्ते कर्तव्यत्वावश्यकत्वेन सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यनेन सर्वकर्मसंन्यासस्य स्पष्टतया प्रतीयमानत्वेन च तादृशज्ञाननिष्ठोपसंहारस्य युक्ततामभिप्रतेयाचार्यैः सैवास्मिन्श्लोक उपसंहृता। ईश्वराभिप्राय ईश्वरेणैव ज्ञायते नतु वराकैरस्मदादिभि। विष्णुशिवयोरेकात्मत्वं परमात्मत्वं च श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादिसिद्धम्। तमेव शरणं गच्छेत्यस्य विवरणमनेन क्रियत इत्यपि न। असंदिग्धार्थस्य संदिग्धार्थेन विवरणायोगात्। सर्वधर्मान्परित्यजयेति तु तत्रतत्रार्जुनं निमित्तीकृत्य संन्यासपूर्वकज्ञाननिष्ठाप्रतिपादनमिवार्जनस्य क्षत्रियत्वादुक्तसंन्यासद्वारा ज्ञाननिष्ठायामनधिकारेऽपि तु तत्रतत्रार्जुनं निमित्तीकृत्य संन्यासपूर्वकज्ञाननिष्ठाप्रतिपादनमिवार्जनस्य क्षत्रियत्वादुक्तसंन्यासद्वारा ज्ञाननिष्ठायामनाधिकारेऽपि तं पुरस्कृत्याधिकारिभ्यस्तस्योपदिदिक्षितत्वान्न विरुध्यतेऽर्जुनं निमित्तीकृत्य लोकोपकाराय भगवतः प्रवृत्तिरिति संमतम्। अन्यथा क्षत्रियस्यार्जुनस्य श्रोतुर्यस्मिन्नधिकारस्तस्यैव वक्तव्यत्वे संन्यासपूर्विकायाः ज्ञाननिष्ठायाः वर्णनमनर्थकं स्यात्। वस्तुतोऽर्जुनस्य स्वविग्रहस्य सर्वज्ञत्वोनोपदेशानर्थक्यं च भवेत्। अपिच तं प्रति सर्वधर्मपरितायगकथनं भगवतः पूर्वापरविरुद्धम्।कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि।कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयःन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्रुतेस्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरःस्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणुस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवःश्रेयान्तस्वधर्मो विगुणःसहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्य्वपाश्रयःस्वभावजेन कौन्तेय इत्यादिना तत्रतत्र कर्मापरित्यागमत्याग्रहेण प्रतिपाद्यत्रैवं कथने परस्परविरोधस्य स्पष्टत्वात्। एतेन सर्वधर्मान्परित्यज्य शरणत्वेनानादृत्य धर्माः सन्तु न सन्तु वा किंतौरित्यादिवर्णनमपास्तम्।यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणांमत्कर्मकृन्मत्परमःस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य इत्यादिवचनानां विरोधस्यास्मिन्नश्रुतकल्पनेऽपि तुल्यत्वात्। कर्माधिकृतेनाज्ञेन वेदविहितं धर्ममनादृत्य मद्रूपोपासनं कार्यमिति सर्वस्मिन्गीताशास्त्रे क्वाप्यनुक्तत्वेन तदुपसंहारवर्णनस्यानुचितत्वाच्च।अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायांरताःमामनुस्मर युध्य चश्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे ते,उल्लङ्घन प्रवर्तते। आज्ञानङ्गो मम द्रोहो मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः।।र्णआश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारणम्। तस्मात्सदाचारवता पुरुषेण जनार्दनः। आराध्याते स्ववर्णोक्तधर्मानुष्ठानकारिणा इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः कर्मसमुच्चितोपासनायां वैशिष्ट्यबोधनाच्च। यत्र तु कर्मणो निन्दा पुराणादिषु श्रुयते न सा भगवदाराधनलक्षणस्य निष्कामकर्मणो वेदविहितस्य नियतस्यापितु भगवत्पराङ्गुस्वेनानुष्ठानस्य सकामस्य। तस्मादर्जुनेन सर्वकर्मत्यागाः कर्तव्य इति भगवतो नाभिप्रेतम् किंतु त्यागाधिकारिभिः कर्ममात्रं संन्यस्याहमेव भगवान्स वासुदेवः नतु मत्तोऽन्योस्तीति ज्ञाननिष्ठा सम्यक् संपादनीयेति वक्ष्यामि ते हितं त्वां मोक्षयिष्यामि सर्वपापेभ्यस्त्वं माशुच इति चोपक्रमोपसंहारात्।तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्षयन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः इत्यादिवत् अर्जुनव्याजेनान्यस्ंयोपदेशेति न विरुध्यते। यदपि सर्वपापेभ्यः बन्धुवादिनिमित्तेभ्य इत्यादि तदपि साहसमात्रम्।धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादो अग्नीषोमीयपशुहिंसावद्युद्धे सत्रुहननरुपाया विहिताया हिंसायाः पापजनकत्वाभावस्यात्याग्रहेण स्वेनैव स्थापित्वात्। यदप्यत्रेत्यादि तदपि बालविमोहनमात्रम्। उक्तयुक्त्या मामेकं शरणं व्रजेत्यत्राचार्योक्तार्थस्यैव विवक्षितत्वात्। मामेकं शरणं व्रज स्वधर्माचरणादिना मामेवाराधय नतु देवतान्तरमित्यर्थस्यापि संभवेन सर्वधर्मत्यागस्य लाभायोगाच्च। यदप्येते नेदमपास्तमित्यादि तदपि तुच्छमेव।नाविरतो दुश्चरितात्त्यज धर्मधर्में च इति भाष्योदाहृतश्रुतिस्मृत्यनवलोकनविजृम्भितत्वात्। तथाच सर्वस्याप्यज्ञस्य कामिनो विषयरागावशादधर्माचरणं दृश्यते शरीरस्थतिमात्रविषयकामनया तदाचरणं संन्यासाधिकारिणोऽपि संभाव्य तत्परित्यागवचनस्य श्रुतिस्मृत्यनुरोधेन सार्थक्यम्। अधर्मेऽनर्थफले कस्याप्यादरो नास्तीति वक्तुमशक्यं लोके तदादरस्योपलभ्यमानत्वादन्यथा न सुरां पिबेत् न कलञ्जं भजयेदित्यादि निषेधवाक्यानां वैयर्थ्यं स्यात्। तस्मादत्रार्जुनं निमित्तीकृत्याधिकारिभ्यो वेदविहितकर्मत्यागो गीताशास्त्रे उपपाद्य तदन्ते उपसंह्नियते। भगवदेकशरणतायाः तमेव शरणं गच्छेत्यनेनोक्तत्वात्।मन्मना भव भद्भक्तो मद्याजी त्यनेन भक्तियोगस्य कर्मयोगस्य चोपसंहृतत्वात्। यत्तु संन्यासशास्त्रेण प्रतिषिद्धशास्त्रेण च लब्धत्वान्नात्र सर्वधर्मत्यागो विधीयते इति तत्र विधिनिषेधरुपेण वेदेन प्राप्तत्वात्। तदर्थप्रतिपादकस्मृतीतिहासपुराणानां वैयर्थ्यप्रसङ्गदित्यास्तां तावत्। एवमन्येषामपि कुकल्पना भाष्यविरुद्धाः सभ्यग्विचार्य नराकर्तव्याः।गोभाराहरणार्थिना सुविहता वेदार्थनाशे रता येऽनाद्यं जगतां निदानममलं शास्त्रस्य योनिं विभुम्। यत्कारुण्यकटाक्षतोऽभिलषितं पूर्णं ममाप्यद्भूतं तं वन्दे परमामृतं शिवमहं कृष्णं गुरुणां गुरुम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.66।।अधुना तु ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे तिष्ठति तमेव सर्वभावेन शरणं गच्छेति यदुक्तं तद्विवृणोति -- सर्वधर्मान्प्ररित्यज्येति। केचिद्वर्णधर्माः केचिदाश्रमधर्माः केचित्सामान्यधर्मा इत्येवं सर्वानपि धर्मान्परित्यज्य विद्यमानानविद्यमानान्वा शरणत्वेनानादृत्य मामीश्वरमेकमद्वितीयं सर्वधर्माणामधिष्ठातारं फलदातारं च शरणं व्रज। धर्माः सन्तु न सन्तु वा किं तैरन्यसापेक्षैः। भगवदनुग्रहादेव त्वन्यनिरपेक्षादहं कृतार्थो भविष्यामीति निश्चयेन परमानन्दघनमूर्तिमनन्तं श्रीवासुदेवमेव भगवन्तमनुक्षणं भावनया भजस्व। इदमेव परमं तत्त्वं नातोऽधिकमस्तीति विचारपूर्वकेण प्रेमप्रकर्षेण सर्वानात्मचिन्ताशून्यया मनोवृत्त्या तैलधारावदविच्छिन्नया सततं चिन्तयेत्यर्थः। अत्र मामेकं शरणं ब्रजेत्यनेनैव सर्वधर्मशरणतापरित्यागे लब्धे सर्वधर्मान्परित्यज्येति निषेधानुवादस्तु कार्यकारितालाभाययज्ञायज्ञीये साम्नि ऐरं कृत्वोद्भेयमित्यत्र न गिरा गिरेतिब्रूयात् इतिवत्। तथाच ममेव सर्वधर्मकार्यकारित्वान्मदेकशरणस्य नास्ति धर्मापेक्षेत्यर्थः। एतेनेदमपास्तं सर्वधर्मान्परित्यज्येत्युक्ते नाधर्माणां परित्यागो लभ्यते अतो धर्मपदं कर्ममात्रपरमिति। नह्यत्र कर्मत्यागो विधीयते अपितु विद्यमानेऽपि कर्मणि तत्रानादरेण भगवदेकशरणतामात्रं ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थभिक्षूणां साधारण्येन विधीयते। तत्र सर्वधर्मान्परित्यज्येति तेषां स्वधर्मादरसंभवेन तन्निवारणार्थम्। अधर्मे चानर्थफले कस्याप्यादराभावात्तत्परित्यागवचनमनर्थकमेव? शास्त्रान्तरप्राप्तत्वाच्च।,तस्माद्वर्णाश्रमधर्माणामभ्युदयहेतुत्वप्रसिद्धेर्मोक्षहेतुत्वमपि स्यादिति शङ्कानिराकरणार्थमेवैतद्वच इति न्याय्यम्। नच सर्वधर्माधर्मपरित्यागोऽत्र विधीयते संन्यासशास्त्रेण प्रतिषेधशास्त्रेण च लब्धत्वादेव। नचेदमपि संन्यासशास्त्रं भगवदेकशरणतया विधित्सितत्वात्। तस्मात्सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यनुवाद एव। सर्वेषां तु शास्त्राणां परमं रहस्यमीश्वरशरणतैवेति तत्रैव शास्त्रपरिसमाप्तिर्भगवता कृता। तामन्तरेण संन्यासस्यापि स्वफलापर्यवसायित्वात्। अर्जुनं च क्षत्रियं संन्यासानधिकारिणं प्रति संन्यासोपदेशायोगात्। अर्जुनव्याजेनान्यस्योपदेशे तुवक्ष्यामि ते हितं त्वा मोक्षयिष्यामि सर्वपापेभ्यस्त्वं? मा शुचः इति चोपक्रमोपसंहारौ न स्याताम्। तस्मात्संन्यासधर्मेष्वप्यनादरेण भगवदेकशरणतामात्रे तात्पर्यं भगवतः। यस्मात्त्वं मदेकशरणः सर्वधर्मानादरेण? अतोऽहं सर्वधर्मकार्यकारित्वात्त्वां सर्वपापेभ्यो बन्धुवधादिनिमित्तेभ्यः संसारहेतुभ्यो मोक्षयिष्यामि प्रायश्चित्तं विनैव।धर्मेण पापमपनुदति इति श्रुतेर्धर्मस्थानीयत्वाच्च मम। अतो मा शुचः युद्धे प्रवृत्तस्य मम बन्धुवधादिनिमित्तप्रत्यवायात्कथं निस्तारः स्यादिति शोकं माकार्षीः।।भाष्यकारैर्निरस्तानि दुर्मतानीह विस्तरात्। ग्रन्थव्याख्यानमात्रार्थी न तदर्थमहं यते।।तस्यैवाहं ममैवासौ स एवाहमिति त्रिधा। भगवच्छरणत्वं स्यात्साधनाभ्यासपाकतः।।विशेषो वर्णितोऽस्माभिः सर्वो भक्तिरसायने। ग्रन्थविस्तरभीरुत्वाद्दिङ्मात्रमिह कथ्यते।।तत्राद्यं मृदु यथासत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः।। द्वितीयं मध्यं यथाहस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते।। तृतीयमवधिमात्रं यथासकलमिदमहं च वासुदेवः परमपुमान्परमेश्वरः स एकः। इति मतिरचला भवत्यनन्ते हृदयगते व्रज तान्विहाय दूरात्।। इति दूतं प्रति यमवचनम्। अम्बरीषप्रह्लादगोपीप्रभृतयश्चास्यां भूमिकायामुदाहर्तव्याः। अस्मिन् हि गीताशास्त्रे निष्ठात्रयं साध्यसाधनभावापन्नं विवक्षितमुक्तं च बहुधा। तत्र कर्मनिष्ठा सर्वकर्मसंन्यासपर्यन्तोपसंहृतास्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः इत्यत्र। संन्यासपूर्वकश्रवणादिपरिपाकसहिता ज्ञाननिष्ठोपसंहृताततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इत्यत्र। भगवद्भक्तिनिष्ठा तूभयसाधनभूतोभयफलभूता च भवतीत्यन्त उपसंहृतासर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज इत्यत्र। भाष्यकृतस्तु सर्वधर्मान्परित्यज्येति सर्वकर्मसंन्यासानुवादेन मामेकं शरणं व्रजेति ज्ञाननिष्ठोपसंहृतेत्याहुः। भगवदभिप्रायवर्णने के वयं वराकाःवचो यद्गीताख्यं परमपुरुषस्यागमगिरां रहस्यं तद्व्याख्यामनतिनिपुणः को वितनुताम्। अहं त्वेतद्बाल्यं यदिह कृतवानस्मि कथमप्यहेतुस्नेहानां तदपि कुतकायैव महताम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.66।।एवं नमनयजनभजनमननक्रमेण सांख्यनिष्ठा उक्ता या पूर्वं ध्यानेनात्मनि पश्यन्तीत्यनेन श्लोकेन दर्शिता। इदानींअन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः इति केवलोपास्तिनिष्ठा योगाख्योक्ता तामाह -- सर्वेति। सर्वेषां वर्णानामाश्रमाणां देहेन्द्रियबुद्धीनां च धर्मानग्निहोत्रादीन् सुखदुःखादींश्च त्यक्त्वा मामेकं सर्वेश्वरं सर्वशक्तिं सोपाधिं निरुपाधिं वाऽखण्डैकरसमानन्दघनं परमात्मानम्। शरणं शृणाति हिनस्त्यविद्यादीन्क्लेशादीन् शरणमाश्रयः परायणं गच्छ प्राप्नुहि। मदेकशरणो भवेत्यर्थः। अत्र अन्नं भुक्त्वैव तृप्यति नतु जलमात्रं पीत्वेतिवद्धेतुत्वं क्त्वाप्रत्ययार्थः। सर्वधर्मपरित्यागेन मां शरणं व्रजेत्यर्थः। यथोक्तम्अनात्मदर्शनेनैव परात्मानमुपास्महे इति। एतस्य भगवच्छरणीकरणस्य फलमाह -- अहंत्वेति। अहं प्रत्यगात्मा सूर्याद्यन्तर्यामी नारायणः सकलपाप्मविनिर्मुक्तः सम्यग्ज्ञातः सन् त्वा त्वां सर्वपापेभ्यः संचितक्रियमाणेभ्यो गोत्रवधादिजेभ्यो मोक्षयिष्यामि। मा शुचः शोकं माकार्षीः। तथाहि। तत्त्वज्ञानफलं पापास्पर्शः शोकतरणं च सर्वश्रुतिस्मृतिप्रसिद्धम्। आदित्यान्तर्वर्तिनं नारायणं प्रकृत्य च्छान्दोग्ये श्रूयतेस एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेदतरति शोकमात्मवित्तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः इति। उदितः ऊर्ध्वमितो गतः पापान्युत्क्रम्य गतो,निष्पाप इति श्रुतिपदार्थः। वर्णाश्रमधर्मसंन्यासपूर्वकं षष्ठाध्यायेनोक्तेन योगेन देहादीनां धर्मांश्च त्यक्त्वा निर्विकल्पमात्मानं साक्षात्कुर्वतो न कर्मलेप इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.66।।नन्वेतत्कथं सिद्ध्येत् इत्याशङ्क्याऽऽह -- सर्वधर्मानिति। सर्वधर्मान् चोदनालक्षणान् परित्यज्य कर्त्तव्योत्तमत्वलक्षणज्ञानाभावेन त्यक्त्वा मामेकं मुख्यं पुरुषोत्तमं शरणं व्रज इत्यर्थः।धर्मान् इति बहुवचनेनमामेकं इत्येकवचनेन च तत्रायाससाध्यत्वं साङ्गानुष्ठेयत्वम्? अत्र सुखसेव्यत्वं सर्वफलदानसामर्थ्यं च,ज्ञापितम्। सर्वधर्मपदेन लौकिकालौकिकधर्मत्यागयुक्तो भवेत्यसङ्कुचितवृत्त्या। विशेषेणास्यार्थस्तुश्रीमद्विठ्ठलेश्वरैरस्मत्प्रभुचरणैर्निरूपित इति नात्र प्रपञ्च्यते। एवं सर्वधर्मत्यागेन शरणागतौ पूर्वोक्तं सिद्ध्यतीत्यर्थः। ननु पूर्वजन्मसञ्चितपापप्रतिबन्धकतया कथं सर्वधर्मत्यागः शरणागतिर्वा सेत्स्यति इत्यत आह -- अहमिति। अहं त्वां पूर्वोक्तस्वेष्टत्वात् सर्वपापेभ्यः प्रतिबन्धकरूपेभ्यो मोक्षयिष्यामि मोचयिष्यामि? प्रतिबन्धकपापादिस्मरणेन मा शुचः शोकं माकार्षीः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.66।।ततोऽपि गुह्यतममाह -- सर्वेति। मद्भक्त्यैव सर्वं भविष्यतीति दृढविश्वासेन विधिकैकर्यं त्यक्त्वा मदेकशरणो भव। एवंवर्तमानः कर्मत्यागनिमित्तं पापं स्यादीति मा शुचः शोकं माकार्षीः। यतस्त्वा त्वां मदेकशरणं सर्वपापेभ्योऽहं मोक्षयिष्यामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.66।।अथैतदप्यशक्तोऽसि मुख्यं कर्तुमिह चेत्तर्हि तुभ्यं तदनुकल्पमेवाहमुपदिशन्नेवाऽऽह (अत इदानीं तव तु मयि मुख्यकर्तरि परदेवतायां परमात्मनि धर्मकर्मभारं सन्न्यस्य मदेकशरणतया मदुक्तकारित्वमुचितं एवं च मोक्षोऽपीत्याह) -- सर्वधर्मान्परित्यज्येति। अत्र सर्वधर्मपरित्यागमनूद्य शरणगमनं विधीयते तेन सर्वपदेन शरणमार्गीयविरोधिधर्मा उच्यन्ते? तेषां परित्यागस्तदविरोधिनां विधानं सूच्यतेमन्मनाः इत्यनेन सङ्गतिसम्भवात्। यद्वा मयि धर्मिणि गृहीते धर्माः पुनर्नोपादेयाःस्वराडिव निपानखनित्रमिन्द्र -- इति न्यायात्। अथवामय्येव मन आधत्स्व इत्यत्रैवकारेणेतरभजनं वार्यते? तेनात्रापीतरभजनरूपान्सर्वधर्मान् परित्यज्य इति मर्यादामार्गीयस्यार्जुनस्येतरभजननिरतस्य पुष्टौ निवेशनार्थमितरभजनरूपधर्मपरित्याग उच्यते,भगवता। अतएव तथाभूतस्य तस्य तत्त्यागे पापसम्भावनाऽपि भवति। तत्र पुष्टिपुरुषोत्तमस्वरूपभावमाविष्कुर्वन्नाहअहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुचः इति सर्वनिरोधार्थावतारत्वादित्याशयः।एतच्च सर्वं न्यासादेशेषु धर्मत्यजनवचनतोऽकिञ्चनाधिक्रियोक्तेति वेदान्ताचार्यपद्ये निरूपितम्। तथाहि अष्टादशाध्याये भगवदुक्तेषु न्यासादेशेषुसर्वधर्मान्परित्यज्य इति धर्मत्यजनवचनतोऽकिञ्चनाधिक्रियोक्ता सर्वधर्मपरित्यागतः? न किञ्चन परमात्मातिरिक्तं येषां किन्तु हरिरेव परमात्मा सर्वं तेषामधिकार उक्तो न्यासादेशेष्वित्यर्थः। कार्पण्यं वा साधनबलराहित्याद्दैन्यम्। दीना हिबहव इह विहङ्गा भिक्षुचर्यां चरन्तो धर्मादिसाधनबलाशारहिता गोपिका इव भगवदेकशरणा भवन्ति इति कार्पण्यं न्यासादेशेष्वङ्गमुक्तम्। मदितरभजनापेक्षणं वेति। अनन्या हि कक्षीवदादय इव मदितरभजनधर्मापेक्षणं व्यपोह्य मदाज्ञप्तकारिण इति दुस्साध्येच्छोद्यमौ वा दुःसाध्या द्रोणभीष्मादिमारणपापप्रायश्चित्तरूपा धर्मास्तेषु इच्छोद्यमौ व्यपोढुं त्याजयितुं तत्त्याग उक्त इति। अत्र विशेषस्तु श्रीविठ्ठलेश्वरप्रभुचरणकृतितोऽवगन्तव्यः। प्रकृतेमोचयिष्यामि इति वक्तव्येमोक्षयिष्यामि इत्युक्त्या सकलधर्ममर्यादाभिनिविष्टचेतसेऽर्जुनाय स्वाश्रितजनपोषकेणाक्लिष्टकर्मणा भगवता निरतिशयानुग्रहरूपारणस्वीकाररूपोऽन्यतो मोक्षो दत्त इति ज्ञायते।अयमेव हि सन्न्यासः साङ्ख्ये योगे च भक्तितः। उक्तो भगवदर्थेन हरिं गृह्णीत कर्मणा।।1।।एवं च गायमानं मामापन्नः शरणं भवान्। करोतु मन्निगमितं निजधर्ममहैतुकम्।।2।।इति श्रीकृष्णवाक्येषु सत्यं तत्त्वं प्रतीयते। मर्यादापुष्टिमार्गाधिष्ठाता यत्पुरुषोत्तमः।।3।।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.66।।कर्मयोगनिष्ठाके परम रहस्य ईश्वरशरणागतिका उपसंहार करके? उसके पश्चात् अब कर्मयोगनिष्ठाका फलस्वरूप? समस्त वेदान्तोंमें कहा हुआ यथार्थ ज्ञान कहना है? इसलिये ( भगवान् ) बोले --, समस्त धर्मोंको? अर्थात् जितने भी धर्म हैं उन सबको? यहाँ नैष्कर्म्य ( कर्माभाव ) का प्रतिपादन करना है? इसलिये धर्म शब्दसे अधर्मका भी ग्रहण किया जाता है। जो बुरे चरित्रोंसे विरक्त नहीं हुआ धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़ इत्यादि श्रुतिस्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है। सब धर्मोंको छोड़कर -- सर्व कर्मोंका संन्यास करके? मुझ एककी शरणमें आ? अर्थात् मैं जो कि सबका आत्मा? समभावसे सर्व भूतोंमें स्थित? ईश्वर? अच्युत तथा गर्भ? जन्म? जरा और मरणसे रहित हूँ? उस एकके इस प्रकार शरण हो। अभिप्राय यह कि मुझ परमेश्वरसे अन्य कुछ है ही नहीं ऐसा निश्चय कर। तुझ इस प्रकार निश्चयवालेको मैं अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराके? समस्त धर्माधर्मबन्धनरूप पापोंसे मुक्त कर दूँगा। पहले कहा भी है कि -- मैं हृदयमें स्थित हुआ प्रकाशमय ज्ञानदीपकसे (अज्ञानजनित अन्धकारका) नाश करता हूँ इसलिये तू शोक न कर अर्थात् चिन्ता मत कर।( शास्त्रके उपसंहारका प्रकरण ), यह विचार करना चाहिये कि इस गीताशास्त्रमें निश्चय किया हुआ? परम कल्याण ( मोक्ष ) का साधन ज्ञान है या कर्म? अथवा दोनों पू0 -- यह सन्देह क्यों होता है उ0 -- जिसको जानकर अमरता प्राप्त कर लेता है तदनन्तर मुझे तत्त्वसे जानकर मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है इत्यादि वाक्य तो केवल ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति दिखला रहे हैं तथा तेरा कर्ममें ही अधिकार है तू कर्म ही कर इत्यादि वाक्य कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यता दिखला रहे हैं। इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनोंकी कर्तव्यताका उपदेश होनेसे ऐसा संशय भी हो सकता है कि सम्भवतः दोनों समुच्चित ( मिलकर ) ही मोक्षके साधन होंगे। पू0 -- परंतु इस मीमांसाका फल क्या होगा उ0 -- यही कि इन तीनोंमेंसे किसी एकको ही परम कल्याणका साधन निश्चय करना। अतः इसकी विस्तारपूर्वक मीमांसा कर लेनी चाहिये।( सिद्धान्तका प्रतिपादन ), केवल आत्मज्ञान ही परम कल्याण ( मोक्ष ) का हेतु ( साधन ) है क्योंकि भेदप्रतीतिका निवर्तक होनेके कारण? कैवल्य ( मोक्ष ) की प्राप्ति ही उसकी अवधि है। आत्मामें क्रिया? कारक और फलविषयक भेदबुद्धि अविद्याके कारण सदासे प्रवृत्त हो रही है। कर्म मेरे हैं? मैं उनका कर्त्ता हूँ? मैं अमुक फलके लिये यह कर्म करता हूँ यह अविद्या अनादिकालसे प्रवृत्त हो रही है। यह केवल? ( एकमात्र ) अकर्ता? क्रियारहित और फलसे रहित आत्मा मैं हूँ? मुझसे भिन्न और कोई भी नहीं है ऐसा आत्मविषयक ज्ञान इस अविद्याका नाशक है क्योंकि यह उत्पन्न होते ही? कर्मप्रवृत्तिकी हेतुरूप भेदबुद्धिका नाश करनेवाला है। उपर्युक्त वाक्यमें तु शब्द दोनों पक्षोंकी निवृत्तिके लिये है अर्थात् मोक्ष न तो केवल कर्मसे मिलता है और न ज्ञानकर्मके समुच्चयसे ही। इस प्रकार तु शब्द दोनों पक्षोंका खण्डन करता है। मोक्ष अकार्य अर्थात् स्वतःसिद्ध है? इसलिये कर्मोंको उसका साधन मानना नहीं बन सकता क्योंकि कोई भी नित्य ( स्वतःसिद्ध ) वस्तु कर्म या ज्ञानसे उत्पन्न नहीं की जाती।, पू0 -- तब तो केवल ज्ञान भी व्यर्थ ही है उ0 -- यह बात नहीं है क्योंकि अविद्याका नाशक होनेके कारण उसकी मोक्षप्राप्तिरूप फलपर्यन्तता प्रत्यक्ष है। अर्थात् जैसे दीपकके प्रकाशका? रज्जु आदि वस्तुओंमें होनेवाली सर्पादिकी भ्रान्तिको और अन्धकारको? नष्ट कर देना ही फल है और जैसे उस प्रकाशका फल सर्पविषयक विकल्पको हटाकर? केवल रज्जुको प्रत्यक्ष कराके? समाप्त हो जाता है? वैसे ही अविद्यारूप अन्धकारके नाशक आत्मज्ञानका भी फल? केवल,आत्मस्वरूपको प्रत्यक्ष कराके ही समाप्त होता देखा गया है। जिनका फल प्रत्यक्ष है? ऐसी जो लकड़ीको चीरना अथवा अरणीमन्थनद्वारा अग्नि उत्पन्न करना आदि क्रियाएँ हैं? उनमें लगे हुए कर्ता आदि कारकोंकी? जैसे अलगअलग टुकड़े हो जाना? अथवा अग्नि प्रज्वलित हो जाना आदि फलसे अतिरिक्त किसी अन्य फल देनेवाले कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती? वैसे ही जिसका फल प्रत्यक्ष है? ऐसी ज्ञाननिष्ठारूप क्रियामें लगे हुए ज्ञाता आदि कारकोंकी भी आत्मकैवल्यरूप फलसे अतिरिक्त फलवाले किसी अन्य कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः ज्ञाननिष्ठा कर्मसहित नहीं हो सकती। यदि कहो कि भोजन और अग्निहोत्र आदि क्रियाओंके समान ( इसमें भी समुच्चय ) हो सकता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि जिसका फल कैवल्य ( मोक्ष ) है? उस ज्ञानके प्राप्त होनेके पश्चात् कर्मफलकी इच्छा नहीं रह सकती? जैसे सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जानेपर कूपतालाब आदिकी जलके लिये चाह नहीं रहता? उसी प्रकार मोक्ष जिसका फल है? ऐसे ज्ञानकी प्राप्ति होनेके बाद क्षणिक सुखरूप फलान्तरकी या उसकी साधनभूत क्रियाकी इच्छुकता नहीं रह सकती। क्योंकि जो मनुष्य राज्य प्राप्त करा देनेवाले कर्ममें लगा हुआ है उसकी प्रवृत्ति? क्षेत्रप्राप्ति ही जिसका फल है ऐसे कर्ममें नहीं होती और उस कर्मके फलकी इच्छा भी नहीं होता। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि परम कल्याणका साधन न तो कर्म है और न ज्ञानकर्मका समुच्चय ही है तथा कैवल्य ( मोक्ष ) ही जिसका फल है? ऐसे ज्ञानको कर्मोंकी सहायता भी अपेक्षित नहीं है क्योंकि ज्ञान अविद्याका नाशक है इसलिये उसका कर्मोंसे विरोध है। यह प्रसिद्ध ही है कि अन्धकारका नाशक अन्धकार नहीं हो सकता। इसलिये केवल ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है। पू0 -- यह सिद्धान्त ठीक नहीं क्योंकि नित्यकर्मोंके न करनेसे प्रत्यवाय होता है और मोक्ष नित्य है। भाव यह कि -- पहले जो यह कहा गया कि केवल ज्ञानसे ही मोक्ष मिलता है? ठीक नहीं क्योंकि वेदशास्त्रमें कहे हुए नित्यकर्मोंके न करनेसे नरकादिकी प्राप्तिरूप प्रत्यवाय होगा। यदि कहो कि ऐसा होनेसे तो कर्मोंसे छुटकारा ही न होगा? अतः मोक्षके अभावका प्रसङ्ग आ जायगा? तो ऐसा दोष नहीं है क्योंकि मोक्ष नित्यसिद्ध है। नित्यकर्मोंका आचरण करनेसे तो प्रत्यवाय न होगा? निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग कर देनेसे अनिष्ट ( बुरे ) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी? काम्यकर्मोंका त्याग कर देनेके कारण इष्ट ( अच्छे ) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी तथा वर्तमान शरीरको उत्पन्न करनेवाले कर्मोंका? फलके उपभोगसे क्षय हो जानेपर? इस शरीरका नाश हो जानेके पश्चात्? दूसरे शरीरकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं रहनेसे तथा शरीरसम्बन्धी आसक्ति आदिके न करनेसे? जो स्वरूपमें स्थित हो जाना है वही कैवल्य है? अतः बिना प्रयत्नके ही कैवल्य सिद्ध हो जायगा। उ0 -- किंतु भूतपूर्व अनेक जन्मोंके किये हुए जो स्वर्गनरक आदिकी प्राप्तिरूप फल देनेवाले अनेक अनारब्धफल -- सञ्चित कर्म हैं? उनके फलका उपभोग न होनेके कारण? उनका तो नाश नहीं होगा -- ऐसा कहें तो पू0 -- यह बात नहीं है क्योंकि नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखभोगको? उस कर्मोंके फलका उपभोग माना जा सकता है। अथवा प्रायश्चित्तकी भाँति नित्य कर्म भी पूर्वकृत पापका नाश करनेवाले मान लिये जायँगे तथा प्रारब्धकर्मका फलभोगसे नाश हो जायगा? फिर नये कर्मोंका आरम्भ न करनेसे कैवल्य,बिना यज्ञके सिद्ध हो जायगा। उ0 -- यह सिद्धान्त ठीक नहीं है क्योंकि उस ( परमात्मा ) को जानकर ही मनुष्य मृत्युसे तरता है मोक्षप्राप्तिके लिये दूसरा मार्ग नहीं है इस प्रकार मोक्षके लिये विद्याके अतिरिक्त अन्य मार्गका अभाव बतलानेवाली श्रुति है तथा जैसे चमड़ेकी भाँति आकाशको लपेटना असम्भव है? उसी प्रकार अज्ञानीकी मुक्ति असम्भव बतलानेवाली भी श्रुति है? एवं पुराण और स्मृतियोंमें भी यही कहा गया है कि ज्ञानसे ही कैवल्यकी प्राप्ति होती है। इसके सिवा ( उस सिद्धान्तमें ) जिनका फल मिलना आरम्भ नहीं हुआ ऐसे पूर्वकृत पुण्योंके नाशकी उत्पत्ति न होनेसे भी? यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् जिस प्रकार पूर्वकृत सञ्चित पुण्योंका होना सम्भव है? उसी प्रकार सञ्चित पापोंका होना भी सम्भव है ही अतः देहान्तरको उत्पन्न किये बिना उनका क्षय सम्भव न होनेसे ( इस पक्षके अनुसार ) मोक्ष सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसके सिवा? पुण्यपापके कारणरूप राग? द्वेष और मोह आदि दोषोंका? बिना आत्मज्ञानके मूलोच्छेद होना सम्भव न होनेके कारण भी? पुण्यपापका उच्छेद होना सम्भव नहीं। तथा श्रुतिमें नित्यकर्मोंका पुण्यलोककी प्राप्तिरूप फल बतलाया जानेके कारण और अपने कर्मोंमें स्थित वर्णाश्रमावलम्बी इत्यादि स्मृतिवाक्योंद्वारा भी यही बात कही जानेके कारण भी कर्मोंका क्षय ( मानना ) सिद्ध नहीं होता। तथा जो यह कहते हैं कि नित्यकर्म दुःखरूप होनेके कारण पूर्वकृत पापोंका फल ही है? उनका अपने स्वरूपसे अतिरिक्त और कोई फल नहीं है क्योंकि श्रुतिमें उनका कोई फल नहीं बतलाया गया तथा उनका,विधान जीवननिर्वाह आदिके लिये किया गया है। उनका कहना ठीक नहीं है क्योंकि जो कर्म फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए? उनका फल होना असम्भव है और नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम? अन्य कर्मका फलविशेष है यह बात भी सिद्ध नहीं की जा सकेगी। तुमने जो यह कहा? कि पूर्वजन्मकृत पापकर्मोंका फल? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखके द्वारा भोगा जाता है? सो ठीक नहीं क्योंकि मरनेके समय जो कर्म भविष्यमें फल देनेके लिये अङ्कुरित नहीं हुए उनका फल दूसरे कर्मोंद्वारा उत्पन्न हुए शरीरमें भोगा जाता है? यह कहना युक्तियुक्त नहीं है। यदि ऐसा न हो तो स्वर्गरूप फलका भोग करनेके लिये अग्निहोत्रादि कर्मोंसे उत्पन्न हुए जन्ममें? नरकके कारणभूत कर्मोंका फल भोगा जाना भी? युक्तिविरुद्ध नहीं होगा। इसके सिवा यह ( नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होनेवाला परिश्रमरूप दुःख ) पापोंकी फलरूप दुःखविशेष सिद्ध न हो सकनेके कारण भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं है क्योंकि भिन्नभिन्न प्रकारके दुःखसाधनरूप फल देनेवाले? अनेक ( सञ्चित) पापोंके होनेकी सम्भावना होते हुए भी? नित्यकर्म अनुष्ठानके परिश्रममात्रको ही उन सबका फल मान लेनेपर? शीतोष्णादि द्वन्द्वोंकी अथवा रोगादिकी पीड़ासे होनेवाले दुःखोंको पापोंका फल नहीं माना जा सकेगा तथा यह हो भी कैसे सकता है कि नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम ही पूर्वकृत पापोंका फल है? सिरपर पत्थर आदि ढोनेका दुःख उसका फल नहीं इसके सिवा? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख पूर्वकृत पापोंका फल है? यह कहना प्रकरणविरुद्ध भी है। पू0 -- कैसे उ0 -- जो पूर्वकृत पाप? फल देनेके लिये अङ्कुरित नहीं हुए हैं? उनका क्षय नहीं हो सकता ऐसा प्रकरण है? उसमें तुमने? फल देनेके लिये प्रस्तुत हुए पूर्वकृत पापोंका ही फल? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख बतलाया है? जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत नहीं हुए हैं उनका फल नहीं बतलाया। यदि तुम यह मानते हो? कि पूर्वकृत सभी पाप कर्म? फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं? तो फिर नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका परिश्रमरूप दुःख ही उनका फल है? यह विशेषण देना अयुक्त ठहरता है। और नित्यकर्मविधायक शास्त्रको भी व्यर्थ माननेका प्रसङ्ग आ जाता है। क्योंकि फल देनेके लिये अङ्कुरित हुए पापोंका तो उपभोगसे ही क्षय हो जायगा ( उनके लिये नित्यकर्मोंकी क्या आवश्यकता है )। इसके सिवा ( वास्तवमें ) वेदविहित नित्यकर्मोंसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख यदि कर्मका फल हो तो वह उन ( विहित नित्यकर्मों ) का ही फल होना चाहिये क्योंकि वह व्यायाम आदिकी भाँति? उनके ही अनुष्ठानसे होता हुआ दिखलायी देता है? अतः यह कल्पना करना कि वह किसी अन्य कर्मका फल है युक्तियुक्त नहीं है। नित्यकर्मोंका विधान जीवनादिके लिये किया गया है इसलिये भी नित्यकर्मोंको प्रायश्चित्तकी भाँति पूर्वकृत पापोंका फल मानना युक्तियुक्त नहीं है। जिस पापकर्मके लिये जो प्रायश्चित विहित है? वह उस पापका फल नहीं है। तथापि यदि ऐसा मानें? कि प्रायश्चित्तरूप दुःख ( जिसके लिये प्रायश्चित्त किया जाय ) उस पापरूप निमित्तका ही फल होता है? तो जीवनादिके लिये किये जानेवाले नित्यकर्मोंका परिश्रमरूप दुःख भी? जीवन आदि हेतुओंका ही फल सिद्ध होगा क्योंकि नित्य और प्रायश्चित्त ये दोनों ही किसीनकिसी निमित्तसे किये जानेवाले हैं? इनमें कोई भेद नहीं है। इसके सिवा दूसरा दोष यह भी है कि नित्यकर्मके परिश्रमकी और काम्यअग्निहोत्रादि कर्मके परिश्रमकी समानता होनेके कारण? नित्यकर्मका परिश्रम ही पूर्वकृत पापका फल है? काम्यकर्मानुष्ठानका परिश्रमरूप दुःख उसका फल नहीं है? ऐसा माननेके लिये कोई विशेष कारण नहीं है? अतः वह काम्यकर्मका परिश्रमरूप दुःख भी? पूर्वकृत पापका ही फल माना जायगा। ऐसा होनेसे नित्यकर्मोंका फल नहीं बतलाया गया है और उनके अनुष्ठानका विधान किया गया है? उस विधानकी अन्य प्रकारसे उपपत्ति न होनेके कारण? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला दुःख? पूर्वकृत पापोंका ही फल है? इस प्रकारकी जो अर्थापत्तिकी कल्पना की गयी थी? उसका खण्डन हो गया। इस तरह प्रकारान्तरसे नित्यकर्मोंके विधानकी अनुपपत्ति होनेसे और नित्यकर्मोंका अनुष्ठानसम्बन्धी परिश्रमरूप दुःखके सिवा दूसरा फल होता है? ऐसा अनुमान होनेसे भी ( यह पक्ष खण्डित हो जाता है )। इसके सिवा ऐसा माननेमें विरोध होनेके कारण भी ( यह पक्ष कट जाता है )। नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हुए दूसरे कर्मोंका फल भोगा जाता है? ऐसा मान लेनेसे यह कहना होता है कि वह उपभोग ही नित्यकर्मका फल है। और साथ ही यह भी प्रतिपादन करते जाते हो कि नित्यकर्मका फल नहीं है अतः यह कथन परस्पर विरुद्ध होता है। इसके अतिरिक्त ( तुम्हारे मतानुसार ) काम्यअग्निहोत्रादिका अनुष्ठान करते हुए तन्त्रसे नित्यअग्निहोत्रादि भी उन्हींके साथ अनुष्ठित हो जाते हैं। अतः उस परिश्रमरूप दुःखभोगसे ही काम्यअग्निहोत्रादिका फल भी क्षीण हो जायगा क्योंकि वह उसके अधीन है। यदि ऐसा मानें कि काम्यअग्निहोत्रादिका स्वर्गादि प्राप्तिरूप दूसरा ही फल होता है तो उनके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखको भी नित्यकर्मके परिश्रमसे भिन्न मानना आवश्यक होगा। परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध होनेके कारण यह नहीं हो सकता। क्योंकि काम्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाले परिश्रमरूप दुःखसे? केवल नित्यकर्मअनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखका भेद नहीं है। इसके सिवा दूसरी बात यह भी है कि जो कर्म न विहित हो और न प्रतिषिद्ध हो? वही तत्काल फल देनेवाला होता है? शास्त्रविहित या प्रतिषिद्ध कर्म तत्काल फल देनेवाला नहीं होता। यदि ऐसा होता तो स्वर्ग आदि लोकोंका प्रतिपादन करनेमें और अदृष्ट फलोंके बतलानेमें शास्त्रकी प्रवृत्ति नहीं होती। कर्मत्वमें किसी प्रकारका भेद न होनेपर तथा अंग और इतिकर्तव्यता आदिकी कोई विशेषता न होनेपर भी? केवल नित्यअग्निहोत्रादिका फल तो अनुष्ठानजनित परिश्रमरूप दुःखके उपभोगसे क्षय हो जाता है और फलेच्छुकतामात्रकी अधिकतासे काम्यअग्निहोत्रादिका स्वर्गादि महाफल होता है? ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। सुतरां नित्यकर्मोंका अदृष्ट फल नहीं होता यह बात कभी भी सिद्ध नहीं हो सकती। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि अविद्यापूर्वक होनेवाले सभी शुभाशुभ कर्मोंका? अशेषतः नाश करनेवाला हेतु? विद्या ( ज्ञान ) ही है? नित्यकर्मका अनुष्ठान नहीं। क्योंकि सभी कर्म अविद्या और कामनामूलक हैं। ऐसा ही हमने सिद्ध किया है? कि अज्ञानीका विषय कर्म है और ज्ञानीका विषय सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठा है। उभौ तौ न विजानीतः वेदाविनाशिनं नित्यम् ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् तत्त्ववित्तु गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते, नैव किंचित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् इत्यादि वाक्योंके अर्थसे यही सिद्ध होता है? कि अज्ञानी ही,मैं कर्म करता हूँ ऐसा मानता है ( ज्ञानी नहीं )। आरुरुक्षुके लिये कर्म कर्तव्य बतलाये हैं और आरूढके लिये अर्थात् योगस्थ पुरुषके लिये उपशम कर्तव्य बतलाया है। तथा ( ऐसा भी कहा है कि ) तीनों प्रकारके अज्ञानी भक्त भी उदार हैं? पर ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है? ऐसा मैं मानता हूँ। कर्म करनेवाले सकाम अज्ञानी लोग आवागमनको प्राप्त होते हैं और अनन्य भक्त नित्ययुक्त होकर चिन्तन करते हुए आत्मस्वरूप? आकाशके सदृश? मुझ निष्पाप परमात्माकी उपासना किया करते हैं। उनको मैं वह बुद्धियोग देता हैं जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म करनेवाले अज्ञानी भगवान्को प्राप्त नहीं होते। भगवदर्थ कर्म करनेवाले जो युक्ततम होनेपर भी कर्मी होनेके नाते अज्ञानी हैं? वे चित्तसमाधानसे लेकर कर्मफलत्यागपर्यन्त उत्तरोत्तर हीन बतलाये हुए साधनोंसे युक्त होते हैं। तथा जो अनिर्देश्य अक्षरके उपासक हैं वे अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् आदिसे लेकर? बारहवें अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त बतलाये हुए साधनोंसे सम्पन्न और तेरहवें अध्यायसे लेकर तीन अध्यायोंमें बतलाये हुए ज्ञानसाधनोंसे भी युक्त होते हैं। अधिष्ठानादि पाँच जिसके कारण हैं? ऐसे समस्त कर्मोंका जो संन्यास करनेवाले हैं? जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्वको जाननेवाले हैं? जो ज्ञानकी परानिष्ठामें स्थित हो गये हैं? जो भगवत्स्वरूप और आत्माके एकत्वज्ञानकी शरण हो चुके हैं ऐसे भगवान्के तत्त्वको जाननेवाले परमहंस परिव्राजकोंको इष्टअनिष्ट और मिश्र -- ऐसा त्रिविध कर्मफल नहीं मिलता। इनसे अन्य जो संन्यास न करनेवाले कर्म परायण अज्ञानी हैं उनको कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है यही गीताशास्त्रमें कहे हुए कर्तव्य और अकर्तव्यका विभाग है। पू0 -- सभी कर्मोंको अविद्यामूलक मानना युक्तिसङ्गत नहीं है। उ0 -- नहीं? ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्मोंकी भाँति ( सभी कर्म अविद्यामलूक हैं ) नित्यकर्म यद्यपि शास्त्रप्रतिपादित हैं तो भी वे अविद्यायुक्त पुरुषके ही कर्म हैं। जैसे प्रतिषेधशास्त्रसे कहे हुए भी अनर्थके कारणरूप ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्म अविद्या और कामनादि दोषोंसे युक्त पुरुषके द्वारा ही हो सकते हैं क्योंकि दूसरी तरह उनमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उसी प्रकार नित्यनैमित्तिक और काम्य आदि कर्म भी? अविद्या और कामनासे युक्त मनुष्यसे ही हो सकते हैं। पू0 -- परंतु आत्माको शरीरसे पृथक् समझे बिना नित्यनैमित्तिक आदि कर्मोंमें प्रवृत्तिका होना असम्भव है। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं? क्योंकि आत्मा जिसका कर्ता नहीं है ऐसे चलनरूप कर्ममें ( अज्ञानियोंकी ) मैं करता हूँ ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है। यदि कहो कि शरीर आदिमें जो अहंभाव है वह गौण है? मिथ्या नहीं है। तो ऐसा कहना ठीक नहीं? क्योंकि ऐसा माननेसे उनके कार्यमें भी गौणता सिद्ध होगी। पू0 -- जैसे हे पुत्र तू मेरा आत्मा ही है इस श्रुतिवाक्यके अनुसार? अपने पुत्रमें अहंभाव होता है तथा संसारमें भी जैसे यह गौ मेरा प्राण ही है इस प्रकार प्रिय वस्तुमें अहंभाव होता देखा जाता है? उसी प्रकार अपने शरीरादि संघातमें भी अहंभाव गौण ही है। यह प्रतीति मिथ्या नहीं है। मिथ्या प्रतीति तो वह है कि जो स्थाणु और पुरुषके भेदको न जानकर स्थाणुमें पुरुषकी प्रतीति होती है। उ0 -- ( यह कहना ठीक नहीं? क्योंकि ) गौण प्रयोग लुप्तोपमा शब्दद्वारा अधिकरणकी स्तुति करनेके लिये होता है? इसलिये गौण प्रतीतिसे मुख्यके कार्यकी सिद्धि नहीं होती। जैसे कोई कहे कि देवदत्त सिंह है? या बालक अग्नि है? तो उसका यह कहना? देवदत्त सिंहके सदृश क्रूर और बालक अग्निके समान पिङ्गल ( गौर ) वर्ण? इस प्रकारकी समानताके कारण देवदत्त और बालकरूप अधिष्ठानकी स्तुतिके लिये ही है। क्योंकि गौण शब्द या गौण ज्ञानसे कोई सिंहका कार्य ( किसीको भक्षण कर जाना ) या अग्निका कार्य ( किसीको जला डालना ) सिद्ध नहीं किया जा सकता। परंतु मिथ्या प्रत्ययका कार्य ( जन्ममरणरूप ) अनर्थ? ( मनुष्य ) अनुभव कर रहा है। इसके सिवा गौण प्रतीतिके विषयको मनुष्य ऐसा जानता भी है कि वास्तवमें यह देवदत्त सिंह नहीं है और यह बालक अग्नि नहीं है। ( यदि उपर्युक्त प्रकारसे शरीरादि संघातमें भी आत्मभाव गौण होता तो ) शरीरादिके संघातरूप गौण आत्माद्वारा किये हुए कर्म? अहंभावके मुख्य विषय आत्माके किये हुए नहीं माने जाते। क्योंकि गौण सिंह,( देवदत्त ) और गौण अग्नि ( बालक ) द्वारा किये हुए कर्म मुख्य सिंह और अग्निके नहीं माने जाते। तथा उस क्रूरता और पिङ्गलताद्वारा कोई मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता? क्योंकि वे केवल स्तुतिके लिये कहे हुए होनेसे हीनशक्ति हैं। जिनकी स्तुति की जाती है वे ( देवदत्त और बालक ) भी यह जानते हैं कि मैं सिंह नहीं हूँ? मैं अग्नि नहीं हूँ तथा सिंहका कर्म मेरा नहीं है? अग्निका कर्म मेरा नहीं है। इसी प्रकार ( यदि शरीर आदिमें गौण भावना होती तो ) संघातके कर्म मुझ मुख्य आत्माके नहीं हैं -- ऐसी ही प्रतीति होनी चाहिये थी? ऐसी नहीं कि मैं कर्ता हूँ? मेरे कर्म हैं ( सुतरां यह सिद्ध हुआ कि शरीरमें आत्मभाव गौण नहीं? मिथ्या है )। जो ऐसा कहते हैं कि अपने स्मृति? इच्छा और प्रयत्न इन कर्महेतुओंके द्वारा आत्मा कर्म किया करता है? उनका कथन ठीक नहीं क्योंकि ये सब मिथ्या प्रतीतिपूर्वक ही होनेवाले हैं। अर्थात् स्मृति? इच्छा और प्रयत्न आदि सब मिथ्या प्रतीतिसे होनेवाले? इष्टअनिष्टरूप अनुभूत कर्मफलजनित संस्कारोंको? लेकर ही होते हैं। जिस प्रकार इस वर्तमान जन्ममें धर्म? अधर्म और उनके फलोंका अनुभव ( सुखदुःख ) शरीरादि संघातमें आत्मबुद्धि और रागद्वेषादिद्वारा किये हुए होते हैं? वैसे ही भूतपूर्व जन्ममें और उससे पहलेके जन्मोंमें भी थे।इस न्यायसे यह अनुमान करना चाहिये कि यह बीता हुआ और आगे होनेवाला ( जन्ममरणरूप ) संसार अनादि एवं अविद्याकर्तृक ही है। इससे यह सिद्ध होता है? कि ज्ञाननिष्ठामें सर्वकर्मोंके संन्याससे संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है क्योंकि देहाभिमान अविद्यारूप है अतः उसकी निवृत्ति हो जानेपर शरीरान्तरकी प्राप्ति न होनेके कारण,( जन्ममरणरूप ) संसारकी प्राप्ति नहीं हो सकती। शरीरादि संघातमें जो आत्माभिमान है वह अविद्यारूप है क्योंकि संसारमें भी मैं गौ आदिसे अन्य हूँ और गौ आदि वस्तुएँ मुझसे अन्य हैं ऐसा जाननेवाला कोई भी मनुष्य उनमें ऐसी बुद्धि नहीं करता कि यह मैं हूँ। न जाननेवाला ही स्थाणुमें पुरुषकी भ्रान्तिके समान अविवेकके कारण? शरीरादि संघातमें मैं हूँ ऐसा आत्मभाव कर सकता है पर विवेकपूर्वक जाननेवाला नहीं कर सकता। तथा पुत्रमें जो हे पुत्र तू मेरा आत्मा ही है ऐसी आत्मबुद्धि है? वह जन्यजनकसम्बन्धके कारण होनेवाली गौण बुद्धि है? उस गौण आत्मा ( पुत्र ) से भोजन आदिकी भाँति कोई मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। जैसे कि गौण सिंह और गौण अग्निरूप देवदत्त और बालकद्वारा? मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता। पू0 -- स्वर्गादि अदृष्ट पदार्थोंके लिये कर्मोंका विधान करनेवाली श्रुतिका प्रमाणत्व होनेसे? यह सिद्ध होता है कि शरीरइन्द्रिय आदि गौण आत्माओंके द्वारा मुख्य आत्माके कार्य किये जाते हैं। उ0 -- ऐसा कहना ठीक नहीं? क्योंकि उनका आत्मत्व अविद्याकर्तृक है। अर्थात् शरीर? इन्द्रिय आदि गौण आत्मा नहीं हैं ( किंतु मिथ्या हैं )। पू0 -- तो फिर ( इनमें आत्मभाव ) कैसे होता है उ0 -- मिथ्या प्रतीतिसे ही सङ्गरहित आत्माकी सङ्गति मानकर? इनसे आत्मभाव किया जाता है क्योंकि उस मिथ्याप्रतीतिके रहते हुए ही उनमें आत्मभावकी सत्ता है? उसके अभावसे आत्मभावनाका भी अभाव हो जाता है। अभिप्राय यह कि मूर्ख अज्ञानियोंका ही अज्ञानकालमें मैं बड़ा हूँ ? मैं गौर हूँ इस प्रकार शरीरइन्द्रिय आदिके संघातमें आत्माभिमान देखा जाता है। परंतु मैं शरीरादि संघातसे अलग हूँ ऐसा समझनेवाले विवेकशीलोंकी? उस समय शरीरादि संघातमें अहंबुद्धि नहीं होती। सुतरां? मिथ्याप्रतीतिके अभावसे देहात्मबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण? यह सिद्ध होता है कि शरीरादिमें आत्मबुद्धि अविद्याकृत ही है? गौण नहीं। जिनकी समानता और विशेषता अलगअलग समझ ली गयी है? ऐसे सिंह और देवदत्तमें या अग्नि और बालक आदिमें ही गौण प्रतीति या गौण शब्दका प्रयोग हो सकता है जिनकी समानता और विशेषता नहीं समझी गयी उनमें नहीं। तुमने जो कहा कि श्रुतिको प्रमाणरूप माननेसे यह पक्ष सिद्ध होता है कि वह भी ठीक नहीं क्योंकि उसकी प्रमाणता अदृष्टविषयक है। अर्थात् प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध न होनेवाले अग्निहोत्रादिके? साध्य? साधन और सम्बन्धके विषयमें ही श्रुतिकी प्रमाणता है प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध हो जानेवालेविषयोंमें नहीं। क्योंकि श्रुतिकी प्रमाणता अदृष्ट विषयको दिखलानेके लिये ही है ( अर्थात् अप्रत्यक्ष विषयको बतलाना ही उसका काम है )। सुतरां देहादिसंघातमें? प्रत्यक्ष ही मिथ्या ज्ञानसे होनेवाली अहंप्रतीतिको? गौण मानना नहीं बन सकता। क्योंकि अग्नि ठण्डा है या अप्रकाशक है ऐसा कहनेवाली सैकड़ों श्रुतियाँ भी प्रमाणरूप नहीं मानी जा सकतीं। यदि श्रुति ऐसा कहे कि अग्नि ठण्डा है अथवा अप्रकाशक है तो ऐसा मान लेना चाहिये कि श्रुतिको कोई और ही अर्थ अभीष्ट है। क्योंकि अन्य प्रकारसे उसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं हो सकती। परंतु प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंके विरुद्ध या श्रुतिके अपने वचनोंके विरुद्ध श्रुतिके अर्थकी कल्पना करना उचित नहीं। पू0 -- कर्म मिथ्या ज्ञानयुक्त पुरुषद्वारा ही किये जानेवाले हैं? ऐसा माननेसे वास्तवमें कर्ताका अभाव हो जानेके कारण श्रुतिकी अप्रमाणता ( अनर्थकता ) ही सिद्ध होती है ऐसा कहें तो उ0 -- नहीं? क्योंकि ब्रह्मविद्यामें उसकी सार्थकता सिद्ध होती है। पू0 -- कर्मविधायक श्रुतिकी भाँति ब्रह्मविद्याविधायक श्रुतिकी अप्रमाणताका प्रसङ्ग आ जायगा? ऐसा माने तो उ0 -- यह ठीक नहीं? क्योंकि उसका कोई बाधक प्रत्यय नहीं हो सकता। अर्थात् जैसे ब्रह्मविद्याविधायक श्रुतिद्वारा आत्मसाक्षात्कार हो जानेपर? देहादि संघातमें आत्मबुद्धि बाधित हो जाती है? वैसे आत्मामें ही होनेवाला आत्मभावका बोध किसीके द्वारा किसी भी कालमें किसी प्रकार भी बाधित नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह आत्मज्ञान स्वयं ही फल है? उससे भिन्न किसी अन्यफलकी प्राप्ति नहीं है? जैसे अग्नि उष्ण और प्रकाशस्वरूप है। इसके सिवा ( वास्तवमें ) कर्मविधायक श्रुति भी अप्रामाणिक नहीं है? क्योंकि वह पूर्वपूर्व ( स्वाभाविक ) प्रवृत्तियोंको रोकरोककर उत्तरोत्तर नयीनयी ( शास्त्रीय ) प्रवृत्तिको उत्पन्न करती हुई ( अन्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा साधकको ) अन्तरात्माके सम्मुख करनेवाली प्रवृत्ति उत्पन्न करती है। अतः उपाय मिथ्या होते हुए भी? उपेयकी सत्यतासे? उसकी सत्यता ही है जैसे कि विधिवाक्यके अन्तमें कहे जानेवाले अर्थवादवाक्योंकी सत्यता मानी जाती है। लोकव्यवहारमें भी ( देखा जाता है कि ) उन्मत्त और बालक आदिको दूध आदि पिलानेके लिये चोटी बढ़ने आदिकी बात कही जाती है। तथा आत्मज्ञान होनेसे पहले? देहाभिमाननिमित्तक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके प्रमाणत्वकी भाँति प्रकारान्तरमें स्थित,( कर्मविधायक ) श्रुतियोंकी साक्षात् प्रमाणता भी सिद्ध होती है। तुम जो यह मानते हो? कि आत्मा स्वयं क्रिया न करता हुआ भी सन्निधिमात्रसे कर्म करता है? यही आत्माका मुख्य कर्तापन है। जैसे राजा स्वयं युद्ध न करते हुए भी सन्निधिमात्रसे ही अन्य योद्धाओंके युद्ध करनेसे राजा युद्ध करता है ऐसे कहा जाता है तथा वह जीत गया? हार गया ऐसे भी कहा जाता है। इसी प्रकार सेनापति भी केवल वाणीसे ही आज्ञा करता है। फिर भी राजा और सेनापतिका उस क्रियाके फलसे सम्बन्ध होता देखा जाता है। तथा जैसे ऋत्विक्के कर्म यजमानके माने जाते हैं? वैसे ही देहादि संघातके कर्म आत्मकृत हो सकते हैं? क्योंकि उनका फल आत्माको ही मिलता है। तथा जैसे भ्रामक ( भ्रमण करानेवाला चुम्बक ) स्वयं क्रिया नहीं करता? तो भी वह लोहेका चलानेवाला है? इसलिये उसीका मुख्य कर्तापन है? वैसे ही आत्माका मुख्य कर्तापन है। ऐसा मानना ठीक नहीं? क्योंकि ऐसा माननेसे न करनेवालेको कारक माननेका प्रसङ्ग आ जायगा। यदि कहो कि कारक तो अनेक प्रकारके होते हैं? तो भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं क्योंकि राजा आदिका मुख्य कर्तापन भी देखा जाता है। अर्थात् राजा अपने निजी व्यापारद्वारा भी युद्ध करता है। तथा योद्धाओंसे युद्ध कराने और उन्हें धन देनेसे भी निःसन्देह उसका मुख्य कर्तापन है? उसी प्रकार जयपराजय आदि फलभोगोंमें भी उसकी मुख्यता है। वैसे ही यजमानका भी प्रधान आहुति स्वयं देनेके कारण और दक्षिणा देनेके कारण निःसन्देह मुख्य कर्तृत्व है। इससे यह निश्चित होता है कि क्रियारहित वस्तुमें जो कर्तापनका उपचार है वह गौण है। यदि राजा और यजमान आदिमें स्वव्यापाररूप मुख्य कर्तापन न पाया जाता तो उनका सन्निधिमात्रसे भी मुख्य कर्तापन माना जा सकता था? जैसे कि लोहेको चलानेमें चुम्बकका सन्निधिमात्रसे मुख्य कर्तापन माना जाता है? परंतु चुम्बककी भाँति राजा और यजमानका स्वव्यापार उपलब्ध न होता होऐसी बात नहीं है। सुतरां सन्निधिमात्रसे जो कर्तापन है वह भी गौण ही है। ऐसा होनेसे उसके फलका सम्बन्ध भी गौण ही होगा? क्योंकि गौण कर्ताद्वारा मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। अतः यह मिथ्या ही कहा जाता है कि निष्क्रिय आत्मा देहादिकी क्रियासे कर्ताभोक्ता हो जाता है। परंतु भ्रान्तिके कारण सब कुछ हो सकता है। जैसे कि स्वप्न और मायामें होता है। परंतु शरीरादिमें,आत्मबुद्धिरूप अज्ञानसन्ततिका विच्छेद हो जानेपर? सुषुप्ति और समाधि आदि अवस्थाओंमें कर्तृत्व? भोक्तृत्व आदि अनर्थ उपलब्ध नहीं होता। इससे यह सिद्ध हुआ? कि यह संसारभ्रम मिथ्या ज्ञाननिमित्तक ही है? वास्तविक नहीं? अतः पूर्ण तत्त्वज्ञानसे उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.66।।वृत्तमनूद्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- कर्मयोगेति। धर्मविशेषणादधर्मानुज्ञां वारयति -- धर्मेति। ज्ञाननिष्ठेन मुमुक्षुणा धर्माधर्मयोस्त्याज्यत्वे श्रुतिस्मृती उदाहरति -- नाविरत इति। मामेकमित्यादेस्तात्पर्यमाह -- न

Chapter 18 (Part 38)

मत्तोऽन्यदिति। अर्जुनस्य क्षत्रियत्वादुक्तसंन्यासद्वारा ज्ञाननिष्ठायां मुख्यानधिकारेऽपि तं पुरस्कृत्याधिकारिभ्यस्तस्योपदिदिक्षितत्वादविरोधमभिप्रेत्याह -- अहं त्वेति। उक्तेऽर्थे दाशमिकं वाक्यमनुकूलयति -- उक्तंचेति। ईश्वरस्य त्वदीयबन्धननिरसनद्वारा त्वत्पालयितृत्वान्न ते शोकावकाशोऽस्तीत्याह -- अत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.66।।सर्वधर्मान् परित्यज्येति वर्णाश्रमविहितानामपि सर्वधर्माणां परित्यागो विधीयत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थमाह -- धर्मेति। प्रतीत एवार्थः किं न स्यात् इत्यत आह -- कथमिति। अस्मिञ्छास्त्रे क्रियत इति शेषः। अशाब्दोऽऽयमर्थ इति चेत्? न धर्मशब्दस्य स्वकार्यफलोपलक्षणत्वात्। एवमेव भगवता व्याख्यातत्वाच्चेत्याह -- यस्त्विति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.66।।धर्मत्यागः फलत्यागः। कथमन्यथा युद्धविधिः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते [18।11] इति चोक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.66।। -- सर्वधर्मान् सर्वे च ते धर्माश्च सर्वधर्माः तान् -- धर्मशब्देन अत्र अधर्मोऽपि गृह्यते? नैष्कर्म्यस्य विवक्षितत्वात्? नाविरतो दुश्चरितात् (क0 उ0 1।2।24) त्यज धर्ममधर्मं च (महा0 शान्ति0 329।40) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः -- सर्वधर्मान् परित्यज्य संन्यस्य सर्वकर्माणि इत्येतत्। माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थितम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणवर्जितम् अहमेव इत्येवं शरणं व्रज? न मत्तः अन्यत् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः। अहं त्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यः मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशीकरणेन। उक्तं च नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता (गीता 10।11) इति। अतः मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः।।अस्मिन्गीताशास्त्रे परमनिःश्रेयससाधनं निश्चितं किं ज्ञानम्? कर्म वा? आहोस्वित् उभयम् इति। कुतः संशयः यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते (गीता 13।12) ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् (गीता 18।55) इत्यादीनि वाक्यानि केवलाज्ज्ञानात् निःश्रेयसप्राप्तिं दर्शयन्ति। कर्मण्येवाधिकारस्ते (गीता 2।47) कुरु कर्मैव (गीता 4।15) इत्येवमादीनि,कर्मणामवश्यकर्तव्यतां दर्शयन्ति। एवं ज्ञानकर्मणोः कर्तव्यत्वोपदेशात् समुच्चितयोरपि निःश्रेयसहेतुत्वं स्यात् इति भवेत् संशयः कस्यचित्। किं पुनरत्र मीमांसाफलम् ननु एतदेव -- एषामन्यतमस्य परमनिःश्रेयससाधनत्वावधारणम् अतः विस्तीर्णतरं मीमांस्यम् एतत्।।आत्मज्ञानस्य तु केवल्य निःश्रेयसहेतुत्वम्? भेदप्रत्ययंनिवर्तकत्वेन कैवल्यफलावसानत्वात्। क्रियाकारकफलभेदबुद्धिः अविद्यया आत्मनि नित्यप्रवृत्ता -- मम कर्म? अहं कर्तामुष्मै फलायेदं कर्म करिष्यामि इति इयम् अविद्या अनादिकालप्रवृत्ता। अस्या अविद्यायाः निवर्तकम्? अयमहमस्मि केवलोऽकर्ता अक्रियोऽफलः न मत्तोऽन्योऽस्ति कश्चित् इत्येवंरूपम् आत्मविषयं ज्ञानम् उत्पद्यमानम्? कर्मप्रवृत्तिहेतुभूतायाः भेदबुद्धेः निवर्तकत्वात्। तुशब्दः पक्षव्यावृत्त्यर्थः -- न केवलेभ्यः कर्मभ्यः? न च ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां निःश्रेयसप्राप्तिः इति पक्षद्वयं निवर्तयति। अकार्यत्वाच्च निःश्रेयसस्य कर्मसाधनत्वानुपपत्तिः। न हि नित्यं वस्तु कर्मणा ज्ञानेन वा क्रियते। केवलं ज्ञानमपि अनर्थकं तर्हि न? अविद्यानिवर्तकत्वे सति दृष्टकैवल्यफलावसानत्वात्। अविद्यातमोनिवर्तकस्य ज्ञानस्य दृष्टं कैवल्यफलावसानत्वम्। रज्ज्वादिविषये सर्पाद्यज्ञानतमोनिवर्तकप्रदीपप्रकाशफलवत्। विनिवृत्तसर्पादिविकल्परज्जुकैवल्यावसानं हि प्रकाशफलम् तथा ज्ञानम्। दृष्टार्थानां च च्छिदिक्रियाग्निमन्थनादीनां व्यापृतकर्त्रादिकारकाणां द्वैधीभावाग्निदर्शनादिफलात् अन्यफले कर्मान्तरे वा व्यापारानुपपत्तिः यथा? तथा दृष्टार्थायां ज्ञाननिष्ठाक्रियायां व्यापृतस्य ज्ञात्रादिकारकस्य आत्मकैवल्यफलात् कर्मान्तरे प्रवृत्तिः अनुपपन्ना इति न ज्ञाननिष्ठा कर्मसहिता उपपद्यते। भुज्यग्निहोत्रादिक्रियावत्स्यात् इति चेत्? न कैवल्यफले ज्ञाने क्रियाफलार्थित्वानुपपत्तेः। कैवल्यफले हि ज्ञाने प्राप्ते? सर्वतःसंप्लुतोदकफले कूपतटाकादिक्रियाफलार्थित्वाभाववत्? फलान्तरे तत्साधनभूतायां वा क्रियायाम् अर्थित्वानुपपत्तिः। न हि राज्यप्राप्तिफले कर्मणि व्यापृतस्य क्षेत्रमात्रप्राप्तिफले व्यापारः उपपद्यते? तद्विषयं वा अर्थित्वम्। तस्मात् न कर्मणोऽस्ति निःश्रेयससाधनत्वम्। न च ज्ञानकर्मणोः समुच्चितयोः। नापि ज्ञानस्य कैवल्यफलस्य कर्मसाहाय्यापेक्षा? अविद्यानिवर्तकत्वेन विरोधात्। न हि तमः तमसः निवर्तकम्। अतः केवलमेव ज्ञानं निःश्रेयससाधनम् इति। न नित्याकरणे प्रत्यवायप्राप्तेः? कैवल्यस्य च नित्यत्वात्। यत् तावत् केवलाज्ज्ञानात् कैवल्यप्राप्तिः इत्येतत्? तत् असत् यतः नित्यानां कर्मणां श्रुत्युक्तानाम् अकरणे प्रत्यवायः नरकादिप्राप्तिलक्षणः स्यात्। ननु एवं तर्हि कर्मभ्यो मोक्षो नास्ति इति अनिर्मोक्ष एव। नैष दोषः नित्यत्वात् मोक्षस्य। नित्यानां कर्मणाम् अनुष्ठानात् प्रत्यवायस्य अप्राप्तिः? प्रतिषिद्धस्य च अकरणात् अनिष्टशरीरानुपपत्तिः? काम्यानां च वर्जनात् इष्टशरीरानुपपत्तिः? वर्तमानशरीरारम्भकस्य च कर्मणः फलोपभोगक्षये पतिते अस्मिन् शरीरे देहान्तरोत्पत्तौ च कारणाभावात् आत्मनः रागादीनां च अकरणे स्वरूपावस्थानमेव कैवल्यमिति अयत्नसिद्धं कैवल्यम् इति। अतिक्रान्तानेकजन्मान्तरकृतस्य स्वर्गनरकादिप्राप्तिफलस्य अनारब्धकार्यस्य उपभोगानुपपत्तेः क्षयाभावः इति चेत्? न नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखोपभोगस्य तत्फलोपभोगत्वोपपत्तेः। प्रायश्चित्तवद्वा पूर्वोपात्तदुरितक्षयार्थं नित्यं कर्म। आरब्धानां च कर्मणाम् उपभोगेनैव क्षीणत्वात् अपूर्वाणां च कर्मणाम् अनारम्भे अयत्नसिद्धं कैवल्यमिति। न तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वे0 उ0 3।8) इति विद्याया अन्यः पन्थाः मोक्षाय न विद्यते इति श्रुतेः? चर्मवदाकाशवेष्टनासंभववत् अविदुषः मोक्षासंभवश्रुतेः? ज्ञानात्कैवल्यमाप्नोति इति च पुराणस्मृतेः अनारब्धफलानां पुण्यानां कर्मणां क्षयानुपपत्तेश्च। यथा पूर्वोपात्तानां दुरितानाम् अनारब्धफलानां संभवः? तथा पुण्यानाम् अनारब्धफलानां स्यात्संभवः। तेषां च देहान्तरम् अकृत्वा क्षयानुपपत्तौ मोक्षानुपपत्तिः। धर्माधर्महेतूनां च रागद्वेषमोहानाम् अन्यत्र आत्मज्ञानात् उच्छेदानुपपत्तेः धर्माधर्मोच्छेदानुपपत्तिः। नित्यानां च कर्मणां पुण्यफलत्वश्रुतेः? वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः (आ0 स्मृ0 2।2।2।3) इत्यादिस्मृतेश्च कर्मक्षयानुपपत्तिः।।ये तु आहुः -- नित्यानि कर्माणि दुःखरूपत्वात् पूर्वकृतदुरितकर्मणां फलमेव? न तु तेषां स्वरूपव्यतिरेकेण अन्यत् फलम् अस्ति? अश्रुतत्वात्? जीवनादिनिमित्ते च विधानात् इति। न? अप्रवृत्तानां कर्मणां फलदानासंभवात् दुःखफलविशेषानुपपत्तिश्च स्यात्। यदुक्तं पूर्वजन्मकृतदुरितानां कर्मणां फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखं भुज्यत इति? तदसत्। न हि मरणकाले फलदानाय अनङ्कुरीभूतस्य कर्मणः फलम् अन्यकर्मारब्धे जन्मनि उपभुज्यते इति उपपत्तिः। अन्यथा स्वर्गफलोपभोगाय अग्निहोत्रादिकर्मारब्धे जन्मनि नरककर्मफलोपभोगानुपपत्तिः न स्यात्। तस्य दुरितस्य दुःखविशेषफलत्वानुपपत्तेश्च -- अनेकेषु हि दुरितेषु संभवत्सु भिन्नदुःखसाधनफलेषु नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखमात्रफलेषु कल्प्यमानेषु द्वन्द्वरोगादिबाधनं निर्निमित्तं न हि शक्यते कल्पयितुम्? नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखमेव पूर्वोपात्तदुरितफलं न शिरसा पाषाणवहनादिदुःखमिति। अप्रकृतं च इदम् उच्यते -- नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखं पूर्वकृतदुरितकर्मफलम् इति। कथम् अप्रसूतफलस्य हि पूर्वकृतदुरितस्य क्षयः न उपपद्यत इति प्रकृतम्। तत्र प्रसूतफलस्य कर्मणः फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखम् आह भवान्? न अप्रसूतफलस्येति। अथ सर्वमेव पूर्वकृतं दुरितं प्रसूतफलमेव इति मन्यते भवान्? ततः नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखमेव फलम् इति विशेषणम् अयुक्तम्। नित्यकर्मविध्यानर्थक्यप्रसङ्गश्च? उपभोगेनैव प्रसूतफलस्य दुरितकर्मणः क्षयोपपत्तेः। किं च? श्रुतस्य नित्यस्य कर्मणः दुःखं चेत् फलम्? नित्यकर्मानुष्ठानायासादेव तत् दृश्यते व्यायामादिवत् तत् अन्यस्य इति कल्पनानुपपत्तिः। जीवनादिनिमित्ते च विधानात्? नित्यानां कर्मणां प्रायश्चित्तवत्? पूर्वकृतदुरितफलत्वानुपपत्तिः। यस्मिन् पापकर्मणि निमित्ते यत् विहितं प्रायश्चित्तम् न तु तस्य पापस्य तत् फलम्। अथ तस्यैव पापस्य निमित्तस्य प्रायश्चित्तदुःखं फलम्? जीवनादिनिमित्तेऽपि नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखं जीवनादिनिमित्तस्यैव फलं प्रसज्येत? नित्यप्रायश्चित्तयोः नैमित्तिकत्वाविशेषात्। किं च अन्यत -- नित्यस्य काम्यस्य च अग्निहोत्रादेः अनुष्ठानायासदुःखस्य तुल्यत्वात् नित्यानुष्ठानायासदुःखमेव पूर्वकृतदुरितस्य फलम्? न तु काम्यानुष्ठानायासदुःखम् इति विशेषो नास्तीति तदपि पूर्वकृतदुरितफलं प्रसज्येत। तथा च सति नित्यानां फलाश्रवणात् तद्विधानान्यथानुपपत्तेश्च नित्यानुष्ठानायासदुःखं पूर्वकृतदुरितफलम् इति अर्थापत्तिकल्पना च अनुपपन्ना? एवं विधानान्यथानुपपत्तेः अनुष्ठानायासदुःखव्यतिरिक्तफलत्वानुमानाच्च नित्यानाम्। विरोधाच्च विरुद्धं च इदम् उच्यते -- नित्यकर्मणि अनुष्ठीयमाने अन्यस्य कर्मणः फलं भुज्यते इति अभ्युपगम्यमाने स एव उपभोगः नित्यस्य कर्मणः फलम् इति? नित्यस्य कर्मणः फलाभाव इति च विरुद्धम् उच्यते। किं च? काम्याग्निहोत्रादौ अनुष्ठीयमाने नित्यमपि अग्निहोत्रादि तन्त्रेणैव अनुष्ठितं भवतीति तदायासदुःखेनैव काम्याग्निहोत्रादिफलम् उपक्षीणं स्यात्? तत्तन्त्रत्वात्। अथ काम्याग्निहोत्रादिफलम् अन्यदेव स्वर्गादि? तदनुष्ठानायासदुःखमपि भिन्नं प्रसज्येत। न च तदस्ति? दृष्टविरोधात् न हि काम्यानुष्ठानायासदुःखात् केवलनित्यानुष्ठानायासदुःखं भिन्नं दृश्यते। किं च अन्यत् -- अविहितमप्रतिषिद्धं च कर्म तत्कालफलम्? न तु शास्त्रचोदितं प्रतिषिद्धं वा तत्कालफलं भवेत्। तदा स्वर्गादिष्वपि अदृष्टफलाशासने उद्यमो न स्यात् -- अग्निहोत्रादीनामेव कर्मस्वरूपाविशेषे अनुष्ठानायासदुःखमात्रेण उपक्षयः नित्यानाम् स्वर्गादिमहाफलत्वं काम्यानाम्? अङ्गेतिकर्तव्यताद्याधिक्ये तु असति? फलकामित्वमात्रेणेति न शक्यं कव्यापितुं। तस्माच्च न नित्यानां कर्मणाम् अदृष्टफलाभावः कदाचिदपि उपपद्यते। अतश्च अविद्यापूर्वकस्य कर्मणः विद्यैव शुभस्य अशुभस्य वा क्षयकारणम् अशेषतः? न नित्यकर्मानुष्ठानम्। अविद्याकामबीजं हि सर्वमेव कर्म। तथा च उपपादितमविद्वद्विषयं कर्म? विद्वद्विषया च सर्वकर्मसंन्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठा -- उभौ तौ न विजानीतः (गीता 2।19) वेदाविनाशिनं नित्यम् (गीता 2।21) ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् (गीता 3।3) अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् (गीता 3।26) तत्त्ववित्तु महाबाहो৷৷৷৷ गुणा गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते (गीता 3।28) सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते (गीता 5।13) नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ? अर्थात् अज्ञः करोमि इति आरुरुक्षोः कर्म कारणम्? आरूढस्य योगस्थस्य शम एव कारणम् उदाराः त्रयोऽपि अज्ञाः? ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् (गीता 7।18) अज्ञाः कर्मिणः गतागतं कामकामाः लभन्ते अनन्याश्चिन्तयन्तो मां नित्ययुक्ताः यथोक्तम् आत्मानम् आकाशकल्पम् उपासते ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते (गीता 10।10)? अर्थात् न कर्मिणः अज्ञाः उपयान्ति। भगवत्कर्मकारिणः ये युक्ततमा अपि कर्मिणः अज्ञाः? ते उत्तरोत्तरहीनफलत्यागावसानसाधनाः अनिर्देश्याक्षरोपासकास्तु अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् (गीता 12।13) इति आध्यायपरिसमाप्ति उक्तसाधनाः क्षेत्राध्यायाद्यध्यायत्रयोक्तज्ञानसाधनाश्च। अधिष्ठानादिपञ्चकहेतुकसर्वकर्मसंन्यासिनां आत्मैकत्वाकर्तृत्वज्ञानवतां परस्यां ज्ञाननिष्ठायां वर्तमानानां भगवत्तत्त्वविदाम्अनिष्टादिकर्मफलत्रयं परमहंसपरिव्राजकानामेव लब्धभगवत्स्वरूपात्मैकत्वशरणानां न भवति भवत्येव अन्येषामज्ञानां कर्मिणामसंन्यासिनाम् इत्येषः गीताशास्त्रोक्तकर्तव्यार्थस्य विभागः।।अविद्यापूर्वकत्वं सर्वस्य कर्मणः असिद्धमिति चेत्? न ब्रह्महत्यादिवत्। यद्यपि शास्त्रावगतं नित्यं कर्म? तथापि अविद्यावत एव भवति। यथा प्रतिषेधशास्त्रावगतमपि ब्रह्महत्यादिलक्षणं कर्म अनर्थकारणम् अविद्याकामादिदोषवतः भवति? अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तेः? तथा नित्यनैमित्तिककाम्यान्यपीति। देहव्यतिरिक्तात्मनि अज्ञाते प्रवृत्तिः नित्यादिकर्मसु अनुपपन्ना इति चेत्? न चलनात्मकस्य कर्मणः अनात्मकर्तृकस्य अहं करोमि इति प्रवृत्तिदर्शनात्। देहादिसंघाते अहंप्रत्ययः गौणः? न मिथ्या इति चेत्? न तत्कार्येष्वपि गौणत्वोपपत्तेः। आत्मीये देहादिसंघाते अहंप्रत्ययः गौणः यथा आत्मीये पुत्रे आत्मा वै पुत्रनामासि (तै0 सं0 2।11) इति? लोके च मम प्राण एव अयं गौः इति? तद्वत्। नैवायं मिथ्याप्रत्ययः। मिथ्याप्रत्ययस्तु स्थाणुपुरुषयोः अगृह्यमाणविशेषयोः। न गौणप्रत्ययस्य मुख्यकार्यार्थता? अधिकरणस्तुत्यर्थत्वात् लुप्तोपमाशब्देन। यथा सिंहो देवदत्तः अग्निर्माणवकः इति सिंह इव अग्निरिव क्रौर्यपैङ्गल्यादिसामान्यवत्त्वात् देवदत्तमाणवकाधिकरणस्तुत्यर्थमेव? न तु सिंहकार्यम् अग्निकार्यं वा गौणशब्दप्रत्ययनिमित्तं किञ्चित्साध्यते मिथ्याप्रत्ययकार्यं तु अनर्थमनुभवति इति। गौणप्रत्ययविषयं जानाति नैष सिंहः देवदत्तः? तथा नायमग्निर्माणवकः इति। तथा गौणेन देहादिसंघातेन आत्मना कृतं कर्म न मुख्येन अहंप्रत्ययविषयेण आत्मना कृतं स्यात्। न हि गौणसिंहाग्निभ्यां कृतं कर्म मुख्यसिंहाग्निभ्यां कृतं स्यात्। न च क्रौर्येण पैङ्गल्येन वा मुख्यसिंहाग्न्योः कार्यं किञ्चित् क्रियते? स्तुत्यर्थत्वेन उपक्षीणत्वात्। स्तूयमानौ च जानीतः न अहं सिंहः न अहम् अग्निः इति न हि सिंहस्य कर्म मम अग्नेश्च इति। तथा न संघातस्य कर्म मम मुख्यस्य आत्मनः इति प्रत्ययः युक्ततरः स्यात् न पुनः अहं कर्ता मम कर्म इति। यच्च आहुः आत्मीयैः स्मृतीच्छाप्रयत्नैः कर्महेतुभिरात्मा कर्म करोति इति? न तेषां मिथ्याप्रत्ययपूर्वकत्वात्। मिथ्याप्रत्ययनिमित्तेष्टानिष्टानुभूतक्रियाफलजनितसंस्कारपूर्वकाः हि स्मृतीच्छाप्रयत्नादयः। यथा अस्मिन् जन्मनि देहादिसंघाताभिमानरागद्वेषादिकृतौ धर्माधर्मौ तत्फलानुभवश्च? तथा अतीते अतीततरेऽपि जन्मनि इति अनादिरविद्याकृतः संसारः अतीतोऽनागतश्च अनुमेयः। ततश्च सर्वकर्मसंन्याससहितज्ञाननिष्ठायाम् आत्यन्तिकः संसारोपरम इति सिद्धम्। अविद्यात्मकत्वाच्च देहाभिमानस्य? तन्निवृत्तौ देहानुपपत्तेः संसारानुपपत्तिः। देहादिसंघाते आत्माभिमानः अविद्यात्मकः। न हि लोके गवादिभ्योऽन्योऽहम्? मत्तश्चान्ये गवादयः इति जानन् तान् अहम् इति मन्यते कश्चित्। अजानंस्तु स्थाणौ पुरुषविज्ञानवत् अविवेकतः देहादिसंघाते कुर्यात् अहम् इति प्रत्ययम्? न विवेकतः जानन्। यस्तु आत्मा वै पुत्र नामासि (तै. सं. 2।11) इति पुत्रे अहंप्रत्ययः? स तु जन्यजनकसंबन्धनिमित्तः गौणः। गौणेन च आत्मना भोजनादिवत् परमार्थकार्यं न शक्यते कर्तुम्? गौणसिंहाग्निभ्यां मुख्यसिंहाग्निकार्यवत्।।अदृष्टविषयचोदनाप्रामाण्यात् आत्मकर्तव्यं गौणैः देहेन्द्रियात्मभिः क्रियत एव इति चेत्? न अविद्याकृतात्मत्वात्तेषाम्। न च गौणाः आत्मानः देहन्द्रियादयः किं तर्हि मिथ्या प्रत्ययेनैव अनात्मानः सन्तः आत्मत्वमापाद्यन्ते? तद्भावे भावात्? तदभावे च अभावात्। अविवेकिनां हि अज्ञानकाले बालानां दृश्यते दीर्घोऽहम् गौरोऽहम् इति देहादिसंघाते अहंप्रत्ययः। न तु विवेकिनाम् अन्योऽहं देहादिसंघातात् इति जानतां तत्काले देहादिसंघाते अहंप्रत्ययः भवति। तस्मात् मिथ्याप्रत्ययाभावे अभावात् तत्कृत एव? न गौणः। पृथग्गृह्यमाणविशेषसामान्ययोर्हि सिंहदेवदत्तयोः अग्निमाणवकयोर्वा गौणः प्रत्ययः शब्दप्रयोगो वा स्यात्? न अगृह्यमाणविशेषसामान्ययोः। यत्तु उक्तम् श्रुतिप्रामाण्यात् इति? तत् न तत्प्रामाण्यस्य अदृष्टविषयत्वात्। प्रत्यक्षादिप्रमाणानुपलब्धे हि विषये अग्निहोत्रादिसाध्यसाधनसंबन्धे श्रुतेः प्रामाण्यम्? न प्रत्यक्षादिविषये? अदृष्टदर्शनार्थविषयत्वात् प्रामाण्यस्य। तस्मात् न दृष्टमिथ्याज्ञाननिमित्तस्य अहंप्रत्ययस्य देहादिसंघाते गौणत्वं कल्पयितुं शक्यम्। न हि श्रुतिशतमपि शीतोऽग्निरप्रकाशो वा इति ब्रुवत् प्रामाण्यमुपैति। यदि ब्रूयात् शीतोऽग्निरप्रकाशो वा इति? तथापि अर्थान्तरं श्रुतेः विवक्षितं,कल्प्यम्? प्रामाण्यान्यथानुपपत्तेः? न तु प्रमाणान्तरविरुद्धं स्ववचनविरुद्धं वा। कर्मणः मिथ्याप्रत्ययवत्कर्तृकत्वात् कर्तुरभावे श्रुतेरप्रामाण्यमिति चेत्? न ब्रह्मविद्यायामर्थवत्त्वोपपत्तेः।।कर्मविधिश्रुतिवत् ब्रह्मविद्याविधिश्रुतेरपि अप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेत्? न बाधकप्रत्ययानुपपत्तेः। यथा ब्रह्मविद्याविधिश्रुत्या आत्मनि अवगते देहादिसंघाते अहंप्रत्ययः बाध्यते? तथा आत्मन्येव आत्मावगतिः न कदाचित् केनचित् कथंचिदपि बाधितुं शक्या? फलाव्यतिरेकादवगतेः? यथा अग्निः उष्णः प्रकाशश्च इति। न च एवं कर्मविधिश्रुतेरप्रामाण्यम्? पूर्वपूर्वप्रवृत्तिनिरोधेन उत्तरोत्तरापूर्वप्रवृत्तिजननस्य प्रत्यगात्माभिमुख्येन प्रवृत्त्युत्पादनार्थत्वात्। मिथ्यात्वेऽपि उपायस्य उपेयसत्यतया सत्यत्वमेव स्यात्? यथा अर्थवादानां विधिशेषाणाम् लोकेऽपि बालोन्मत्तादीनां पयआदौ पाययितव्ये चूडावर्धनादिवचनम्। प्रकारान्तरस्थानां च साक्षादेव वा प्रामाण्यं सिद्धम्? प्रागात्मज्ञानात् देहाभिमाननिमित्तप्रत्यक्षादिप्रामाण्यवत्। यत्तु मन्यसे -- स्वयमव्याप्रियमाणोऽपि आत्मा संनिधिमात्रेण करोति? तदेव मुख्यं कर्तृत्वमात्मनः यथा राजा युध्यमानेषु योधेषु युध्यत इति प्रसिद्धं स्वयमयुध्यमानोऽपि संनिधानादेव जितः पराजितश्चेति? तथा सेनापतिः वाचैव करोति क्रियाफलसंबन्धश्च राज्ञः सेनापतेश्च दृष्टः। यथा च ऋत्विक्कर्म यजमानस्य? तथा देहादीनां कर्म आत्मकृतं स्यात्? फलस्य आत्मगामित्वात्। यथा च भ्रामकस्य लोहभ्रामयितृत्वात् अव्यापृतस्यैव मुख्यमेव कर्तृत्वम्? तथा च आत्मनः इति। तत् असत् अकुर्वतः कारकत्वप्रसङ्गात्। कारकमनेकप्रकारमिति चेत्? न राजप्रभृतीनां मुख्यस्यापि कर्तृत्वस्य दर्शनात्। राजा तावत् स्वव्यापारेणापि युध्यते योधानां च योधयितृत्वे धनदाने च मुख्यमेव कर्तृत्वम्? तथा जयपराजयफलोपभोगे। यजमानस्यापि प्रधानत्यागे दक्षिणादाने च मुख्यमेव कर्तृत्वम्। तस्मात् अव्यापृतस्य कर्तृत्वोपचारो यः? सः गौणः इति अवगम्यते। यदि मुख्यं कर्तृत्वं स्वव्यापारलक्षणं नोपलभ्यते राजयजमानप्रभृतीनाम्? तदा संनिधिमात्रेणापि कर्तृत्वं मुख्यं परिकल्प्येत यथा भ्रामकस्य लोहभ्रामणेन? न तथा राजयजमानादीनां स्वव्यापार नोपलभ्यते। तस्मात् संनिधिमात्रेण कर्तृत्वं गौणमेव। तथा च सति तत्फलसंबन्धोऽपि गौण एव स्यात्। न गौणेन मुख्यं कार्यं निर्वर्त्यते। तस्मात् असदेव एतत् गीयते देहादीनां व्यापारेण अव्यापृतः आत्मा कर्ता भोक्ता च स्यात् इति। भ्रान्तिनिमित्तं तु सर्वम् उपपद्यते? यथा स्वप्ने मायायां च एवम्। न च देहाद्यात्मप्रत्ययभ्रान्तिसंतानविच्छेदेषु सुषुप्तिसमाध्यादिषु कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यनर्थः उपलभ्यते। तस्मात् भ्रान्तिप्रत्ययनिमित्तः एव अयं संसारभ्रमः? न तु परमार्थः इति सम्यग्दर्शनात् अत्यन्त एवोपरम इति सिद्धम्।।सर्वं गीताशास्त्रार्थमुपसंहृत्य अस्मिन्नध्याये? विशेषतश्च अन्ते? इह शास्त्रार्थदार्ढ्याय संक्षेपतः उपसंहारं कृत्वा? अथ इदानीं शास्त्रसंप्रदायविधिमाह --,

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【 Verse 18.67 】

▸ Sanskrit Sloka: इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन | न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ||

▸ Transliteration: idaṁ te nā ‘tapaskāya nā ‘bhaktāya kadācana | na cā ‘śuśrūṣave vācyaṁ na ca māṁ yo ‘bhyasūyati ||

▸ Glossary: idaṁ: this; te: you; na: never; atapaskāya: one who is not austere; na: never; abhaktāya: one who is not a devotee; kadācana: at any time; na: never; ca: also; aśuśrūṣave: one who is not engaged in devotional service; vācyaṁ: to be spoken; na: never; ca: also; māṁ: unto Me; yaḥ: anyone; abhyasūyati: envious

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.67 This knowledge should never be spoken by you to one who is devoid of austerity, who is without devotion, who does not desire to listen, or who speaks ill of Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.67।।यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना अभक्तको कभी मत कहना जो सुनना नहीं चाहता? उसको मत कहना और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है? उससे भी मत कहना।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.67।। यह ज्ञान ऐसे पुरुष से नहीं कहना चाहिए? जो अतपस्क (तपरहित) है? और न उसे जो अभक्त है उसे भी नहीं जो अशुश्रुषु (सेवा में अतत्पर) है और उस पुरुष से भी नहीं कहना चाहिए? जो मुझ (ईश्वर) से असूया करता है? अर्थात् मुझ में दोष देखता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.67 इदम् this? ते by thee? न not? अतपस्काय to one who is devoid of austerity? न not? अभक्ताय to one who is not devoted? कदाचन never? न not? च and? अशुश्रूषवे to one who does not render service or who does not desire to listen? वाच्यम् to be spoken? न not? च and? माम् Me? यः who? अभ्यसूयति cavils at.Commentary This The scripture which has been taught to you.Service To the Guru.The scripture can be taught to him who does not speak ill of the Lord? who is a man of austerities? who is devoted? who is thirsting to hear and who renders service to his Guru.One who cavils at Me He who disregards Me taking Me for an ordinary man? who does not like to be told that I am the Lord.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.67. This [knowledge] is for you, and it should never be imparted to one who does not observe austerities; to him who has no devotion; to him who has no desire to listen; and to him who is indignant towards Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.67 Speak not this to one who has not practised austerities, or to him who does not love, or who will not listen, or who mocks.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.67 Never should this be told by you to one who is not austere, who is not a devotee, nor to one who has no wish to listen, nor certainly to him who traduces Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.67 This (that I have taught) you should not ever be taught to one who is devoid of austerities and to one who is not a devotee; also, neither to one who does not render service, nor as well to one who cavils at Me.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.67 This is never to be spoken by thee to one who is devoid of austerities or devotion, nor to one who does not render service or who does not desire to listen, nor to one who cavils at Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.67 Idam etc. If the secrecy of this knowledge is maintained it would yield success, because It is out of reach of all [ordinary] persons. When the knot of sin is cut off through observing austerities, then only the results of good act is ready to become ripe. Hence, austerity comes first. Due to austerity, faith is born. The same (faith) is devotion here. The faith, even if it is born, does not grow well, in case it becomes visible only for a moment and then perishes like lightning. Therefore to help its growth, the desire to listen to is [next]. In the case of certain person, even all this arises with regard to the useless knowledge of the dry Sankhya (reasoning) system that admits no Supreme Lord. Even with regard to a system that adimts the Supreme Lord, it may, n the case of another person-on account of his craving for fruit of action-emerge by raising the fruit-of-action alone to the status of importance and by humbling down one's own Worshipful Self to the role of an instrument in achieving that fruit It has been declared :

'The agent also [is an auxiliary], because he is for the action [enjoined].' (JS, III, i, 6); and
'Actions also [are auxiliary] because they are for the purpose of fruits.' (JS, III, i, 4).

Thus in both the instances there is indignation, meaning 'disregard' with the Bhagavat (Self) - This is the purport.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.67 I have taught you this most secret doctrine. This should not be imparted by you to someone who has not practised austere disciplines. Never should this be taught to someone who is not devoted to Me and to you, the teacher (i.e., when you have to play the role of a teacher of this doctrine). The meaning is that it should not be taught by you to someone who, though practising austerities, is not a devotee and does not serve Me. It is also never to be taught to one who has no wish to listen, even though he is a devotee. Nor should it be imparted to one who traduces Me, that is, who - when My nature, glories and attributes are described - discovers defects in them. The differences of case (from ablative to nominative form) is to teach that the last one is the most despicable character.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.67 Idam, this Scripture; which has been taught by Me te, to you, for your good, for terminating mundane existence; an vacyam, should not be taught (-na is connected with the remote word vacyam-); atapaskaya, to one who is devoid of austerities. It should kadacana, never, under any condition whatsoever; be taught abhaktaya, to one who is not a devotee, who is devoid of devotion to his teacher and God, even if he be a man of austerity. Neither should it be taught even asurusave, to one who does not redner service-even though he may be a devotee and a man of austerity. Na ca, nor as well; to him yah, who; abhyasuyati, cavils; mam, at Me, at Vasudeva-thinking that I am an ordinary person; to him who, not knowing My Godhood, imputes self-adulation etc. to Me and cannot tolerate Me. He too is unfit; to him also it should not be imparted. From the force of the context it is understood that the Scripture should be taught to one who has devotion to the Lord, is austere, renders service, and does not cavil. As to that, since it is seen (in a Smrti)-'to one who is intelligent or to one who is austere'-that there is an option between the two, it follows that this should be imparted either to an austere person given to service and devotion, or to an intelligent person endowed with them. It should not be imparted to an austere or even an intelligent person if he lacks service and devotion. It should not be taught to one who cavils at the Lord, even though he be possessed of all the good alities. And it should be taught to one whoserves his teacher and is devout. This is the rule for transmitting the Scripture. Now the Lord states the fruit derived by one who transmits the Scripture:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.67।। प्राय अध्यात्मशास्त्र के समस्त ग्रन्थों के अन्तिम भाग में शास्त्रसंप्रदाय की विधि अर्थात् ज्ञान के अधिकारी का वर्णन किया जाता है। इसी महान् परम्परा का अनुसरण करते हुए? इस श्लोक में? भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह ज्ञान किसे नहीं देना चाहिए। इसी के द्वारा यहाँ इसका भी बोध कराया गया है कि ज्ञान के योग्य अधिकारी में कौन से गुण होने चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि इन गुणों के उल्लेख से गीता की ज्ञान निधि के चारों ओर प्राचीरें खड़ी की गई हैं। कोई यह न समझे कि कतिपय लोगों की स्वार्थसिद्धि के लिए और उन्हें इस ज्ञाननिधि के व्यापार का एकाधिकार प्रदान करने के लिए इस सम्प्रदाय विधि का निर्माण किया गया है।यहाँ उल्लिखित गुणों के अध्ययन से ज्ञात होगा कि साधक के आन्तरिक व्यक्तित्व के सुगठन के लिए इन गुणों का होना आवश्यक है। साधन सम्पन्न साधक ही इस ज्ञान का ग्रहण? धारण एवं स्मरण करने में समर्थ होता है। वही इस ज्ञानानन्द का अनुभव एवं अर्जन करके उसे अपने जीवन में प्रकट कर सकता है।यह ज्ञान ऐसे पुरुष को नहीं देना चाहिए जो (1) तपरहित है शरीर? वाणी और मन का संयम ही तप है जिसके द्वारा हम समस्त शक्तियों का संचय कर सकते हैं। संयमरूपी तप से रहित पुरुष में इस ज्ञान को ग्रहण करने की मानसिक और बौद्धिक क्षमता ही नहीं होती। इसलिए? तप रहित व्यक्ति से ज्ञान नहीं कहना चाहिए? क्योंकि इससे उस व्यक्ति को कोई लाभ नहीं होगा। इस कथन में रंचमात्र भी पूर्वाग्रह और दुराग्रह नहीं है। यह कथन इसी प्रकार का है कि? कृपया चट्टानों पर बीजारोपण मत करो। कारण यह है कि कृषक को इससे कोई फसल प्राप्त नहीं होगी।(2) जो अभक्त है तपयुक्त हो किन्तु भक्त न हो? तो उस पुरुष से भी यह ज्ञान नहीं कहना चाहिए। जो साधक अपने लक्ष्य के साथ तादात्म्य नहीं कर सकते? उससे प्रेम नहीं कर सकते? वे इस ज्ञान के अधिकारी नहीं हैं। प्रेम के अभाव में त्याग और उत्साह संभव नहीं है। प्रेमालिंगन में अपने आदर्श को बांध लेना ही भक्ति है।(3) जो अशुश्रुषु (सेवा में अतत्पर) है यदि कोई पुरुष तपस्वी और भक्त है? परन्तु गुरुसेवा और जनसेवा करने में संकोच करता है? तो वह भी योग्य विद्यार्थी नहीं कहा जा सकता। भगवान् श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण गीता में निस्वार्थ सेवा पर विशेष बल दिया है? क्योंकि चित्तशुद्धि का वही सर्वश्रेष्ठ साधन है। स्वार्थी लोग कभी भी इस ज्ञान को ग्रहण नहीं कर पाते हैं और न ही उसके आनन्द का अनुभव कर सकते हैं।(4) जो मुझे से असूया अर्थात् मुझमें दोष देखता है गुणों में दोष देखना असूया है? जो लोग ईश्वर? गुरु और शास्त्रप्रमाण में भी दोष देखते हैं? वे किस प्रकार आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं मुझसे असूया का अर्थ परमात्मा से असूया है। उसी प्रकार? तत्त्वज्ञान का अनादर करने वाले लोग भी अभ्यसूयक कहलाते हैं। बल प्रयोग के द्वारा कराये गये धर्म परिवर्तन से उस मत के अनुयायियों का संख्याबल तो बढ़ाया जा सकता है? परन्तु? ऐसे प्रयोग से आत्मविकास नहीं कराया जा सकता। किसी के भी ऊपर धर्म को नहीं थोपना चाहिए। यदि तत्त्वज्ञान के प्रति मन में तिरस्कार का भाव है? तो बुद्धि से उसे समझने पर भी हम उसे अपने जीवन म्ों कार्यान्वित नहीं कर सकते हैं। इसलिए? असूया युक्त पुरुष इस ज्ञान का अधिकारी नहीं है।इस प्रकार के श्लोकों का प्रयोजन साधकों को साधन मार्ग दर्शाना होता है। गीता के अध्ययन से तत्काल ही किसी लाभ की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। रातोरात व्यक्तित्व का सुगठन नहीं किया जा सकता। गीता इस प्रकार के चमत्कार का आश्वासन नहीं देती।इस श्लोक का अभिप्राय यह हुआ कि तप? भक्ति? सेवाभाव और आदर से युक्त पुरुष ही आत्मज्ञान का उत्तम अधिकारी है। यदि हम शास्त्र के अध्ययन से अधिक लाभान्वित नहीं होते हैं? तो? निश्चय ही हममें किसी आवश्यक गुण का अभाव होना चाहिए। उस स्थिति में आत्मनिरीक्षण के द्वारा हम आत्मशोधन करें। जैसे? दर्पण पर जमी धूल को स्वच्छ कर देने से प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई देता है? उसी प्रकार अन्तकरण के शुद्ध और स्थिर होने पर आत्मानुभव स्पष्ट होता है।अब? संप्रदाय के प्रवर्तक एवं प्रचारक को प्राप्त होने वाले फल को बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.67।।एवं सप्तदशाध्यायान्तगीताशास्त्रार्थं सर्वं प्रतिपत्तिससौकर्यार्थमस्मिन्नध्याये विस्तरेणोपसंहृत्यान्ते मन्मना भवेति द्वाभ्यां पुनः स्वशास्त्रदार्ढ्याय संक्षेपतस्तस्योपसंहारं कृत्वाथेदानीं शास्त्रसंप्रदायविधिमाह -- इदमिति। इदं शास्त्रं संसारविच्छित्तिहेतुभूतं तव हिताय मयोक्ताम्। अतपस्काय उक्तशारीरादितपोरहिताय न वाच्यं कदाचन कस्यंचिदप्यवस्थायापति सर्वैः सबंध्यते। तपस्विनेऽप्यभक्ताय गुरौ देवे च भक्तिरहिताय कदाचन न वाच्यं विशेषणद्वययुक्तायाप्यशुश्रूषवे शुश्रूषावर्जिताय कदापि न वाज्यम्। यो मां वासुदेवं मनुष्यं प्राकृतं मत्वाऽभ्यसूयति आत्मप्रशंसादिदोषाध्योरोपणेन मतस्वरुपानभिज्ञो ममेश्वरत्वं न सहते तस्मै ममेश्वरत्वासहिष्णवेऽतापस्विनेऽतपस्विनेऽभक्तायाशुश्रूषवेऽपि कदाचन न वाच्यम्। तपस्विने भक्ताय शुश्रूषवेऽनसूयवे शास्त्रं वाच्यमिति प्रतिषेधासामर्थ्याद्गभ्यते। तत्र मेधाविनी तपस्विने वेति स्मृत्यन्तरे मेधावितपस्विनेर्विकल्पदर्शात्। शुश्रूषाभक्तियुक्ताय भगवत्यसूयारहिताय तपस्विने वाच्यम्। शुश्रूषाभक्त्यनसूयासहिताय मेधाविने वा वाच्यम्। शूश्रूषाभिक्तिवियुक्ताय तपस्विने मेधाविने यपि न वाच्यम्। भगवत्यसूयायुक्ताय समस्तगुणवतेऽपि न वाच्यम्। गुरुशुश्रूषाभक्त्यनसूयायुक्ताय तपस्विने मेधाविने वा वाच्यमित्येष शास्त्रसंप्रदायविधिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.67।।समाप्तः शास्त्रार्थः। शास्त्रसंप्रदायविधिमधुना कथयति -- इदमिति। इदं गीताख्यं सर्वशास्त्रार्थरहस्यं ते तव संसारविच्छित्तये मयोक्तं नातपस्कायासंयेतेन्द्रियाय न वाच्यम्। कदाचन कस्यामप्यवस्थायामिति पर्यायत्रयेऽपि संबध्यते। तपस्विनेऽप्यभक्ताय गुरौ देवे च भक्तिरहिताय न वाच्यं कदाचन तपस्विने भक्तायाप्यशुश्रूषवे शुश्रूषां परिचर्यामकुर्वते च न वाच्यम्। कदाचन चशब्दो वाच्यं कदाचनेति पदद्वयाकर्षणार्थः। नच मां योऽभ्यसूयति मां भगवन्तं वासुदेवं मनुष्यमसर्वज्ञत्वादिगुणकं मत्वाभ्यसूयत्यात्मप्रशंसादिदोषाध्यारोपणेनेश्वरत्वमसहमानो द्वेष्टि यस्तस्मै श्रीकृष्णोत्कर्षासहिष्णवेऽतपस्विने भक्तायाशुश्रूषवेऽपि न वाच्यं कदाचनेत्यनुकर्षणार्थश्चकारः। तपस्विने भक्ताय शुश्रूषवे श्रीकृष्णानुरक्ताय च वाच्यमित्यर्थः। एकैकविशेषणाभावेऽप्ययोग्यताप्रतिपादनार्थाश्चत्वारो नकाराः। मेधाविने तपस्विने वेत्यन्यत्र विकल्पदर्शनात्। शुश्रूषा गुरुभक्तिभगवदनुरक्तियुक्ताय तपस्विने तद्युक्ताय मेधाविने वा वाच्यं मेधातपसोः पाक्षिकत्वेऽपि भगवदनुरक्तिगुरुभक्तिशुश्रूषाणां नियम एवेति भाष्यकृतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.67।।एवं श्लोकद्वयेनज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इति सांख्ययोगौ द्वितीयाध्याये दर्शितावुपसंहृत्य विद्यासंप्रदायविधिमाह -- इदमिति। अतपस्काय तप आलोचनं तद्रहिताय। अयत्नशीलायेत्यर्थः। अभक्ताय श्रद्धाहीनाय। अशुश्रूषवे गुरुसेवामकुर्वते। मां परमात्मानं योऽभ्यसूयति मदीयगुणासहिष्णुतया मयि दोषारोपपरो भवति तस्मै। नञः प्रत्येकं संबद्धत्वादेतेषां विशेषणानामन्यतमाभावेऽपि कदाचन महत्यपि संकटे इदं न वाच्यं नोपदेष्टव्यम्। अत्रविद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायानृजवेऽयताय न मा ब्रूयाऽवीर्यवती तथा स्याम्।यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः इति श्रवणादसूयारहितायार्जवोपेतायाभ्यासशीलाय गुरुपरमेश्वराराधनपराय च एतद्रहस्य देयं नान्यस्मा इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.67।।एवं सकलशास्त्रार्थगीतार्थतत्त्वमुपदिश्य लोकोद्धारार्थमेतदुपदेशनेन मार्गप्रवर्तनार्थमधिकारिणमाह -- इदं ते इति। इदं सर्वशास्त्ररहस्यं ते त्वया अतपस्काय स्वाचारहीनाय न वाच्यम्। न च अभक्ताय मद्भक्तिरहिताय कदाचन वाच्यम्।कदाचन इतिपदेनाभक्तसंसर्गिणे भक्तायाऽपि न वाच्यमिति ज्ञापितम्। न च पुनः अशुश्रूषवे श्रवणेच्छारहिताय? अनासक्तायेत्यर्थः। यद्वा मत्परिचर्याहीनाय च न वाच्यम्। यो मां पुरुषोत्तमं बाहिर्मुख्येण अभ्यसूयति दोषारोपपूर्वकं कौटिल्येन निन्दति तस्मै च न च वाच्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.67।।एवं गीतार्थतत्त्वमुपदिश्य तत्संप्रदायप्रवर्तने नियममाह -- इदमिति। इदं गीतार्थतत्त्वं ते त्वयाऽतपस्काय स्वधर्मानुष्ठानहीनाय न वाच्यं? न चाभक्ताय गुरौ ईश्वरे च भक्तिशून्याय कदाचिदपि न वाच्यं? न चाशुश्रूषवे परिचर्यामकुर्वत वाच्यं? मां परमेश्वरं योऽभ्यसूयति मनुष्यदृष्ट्या दोषारोपेण निन्दति तस्मै च न वाच्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.67।।एवं स्वगीतार्थमुपदिश्य तत्सम्प्रदायप्रवर्तने नियमयति -- इदमिति। गीतं ज्ञानं ते त्वयाऽतपस्काय न वाच्यम्। एवमन्यत्स्पष्टम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.67।।इस अठारहवें अध्यायमें समस्त गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार करके फिर विशेषरूपसे इस अन्तिम श्लोकमें शास्त्रके अभिप्रायको दृढ़ करनेके लिये संक्षेपसे उपसंहार करके? अब शास्त्रसम्प्रदायकी विधि बतलाते हैं। तेरे हितके लिये अर्थात् संसारका उच्छेद करनेके लिये? कहा हुआ यह शास्त्र? तपरहित मनुष्यको नहीं सुनाना चाहिये। इस प्रकार वाच्यम् इस व्यवधानयुक्त पदसे न का सम्बन्ध है। तपस्वी होनेपर भी जो अभक्त हो अर्थात् गुरु या देवतामें भक्ति रखनेवाला न हो उसे कभीकिसी अवस्थामें भी नहीं सुनाना चाहिये। भक्त और तपस्वी होकर भी जो शुश्रूषु ( सुननेका इच्छुक ) न हो उसे भी नहीं सुनाना चाहिये। तथा जो मुझ वासुदेवको प्राकृत मनुष्य मानकर? मुझमें दोषदृष्टि करता हो? मुझे ईश्वर न जाननेसे? मुझमें आत्मप्रशंसादि दोषोंका अध्यारोप करके? मेरे ईश्वरत्वको सहन न कर सकता हो वह भी अयोग्य है? उसे भी,( यह शास्त्र ) नहीं सुनाना चाहिये। अथपित्तिसे यह निश्चय होता है कि यह शास्त्र भगवान्में भक्ति रखनेवाले? तपस्वी? शुश्रूषायुक्त और दोषदृष्टिरहित पुरुषको ही सुनाना चाहिये। अन्य स्मृतियोंमें मेधावीको या तपस्वीको? इस प्रकार इन दोनोंका विकल्प देखा जाता है? इसलिये यह समझना चाहिये कि शुश्रूषा और भक्तियुक्त तपस्वीको अथवा इन तीनों गुणोंसे युक्त मेधावीको यह शास्त्र सुनाना चाहिये। शुश्रूषा और भक्तिसे रहित तपस्वी या मेधावी किसीको भी नहीं सुनाना चाहिये। भगवान्में दोषदृष्टि रखनेवाला तो यदि सर्वगुणसम्पन्न हो? तो भी उसे नहीं सुनाना चाहिये। गुरु शुश्रूषा और भक्तियुक्त पुरुषको ही सुनाना चाहिये। इस प्रकार यह शास्त्रसम्प्रदायकी विधि है।,

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.67।। व्याख्या --   इदं ते नातपस्काय -- पूर्वश्लोकमें आये सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम वचनके लिये यहाँ इदम् पद आया है।अपने कर्तव्यका पालन करते हुए स्वाभाविक जो कष्ट आ जाय? विपरीत परिस्थिति आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नामतप है। तपके बिना अन्तःकरणमें पवित्रता नहीं आती? और पवित्रता आये बिना अच्छी बातें धारण नहीं होतीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो तपस्वी नहीं है? उसको यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये।जो सहिष्णु अर्थात् सहनशील नहीं है? वह भी अतपस्वी है। अतः उसको भी यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। यह सहिष्णुता चार प्रकारकी होती है --,(1) द्वन्द्वसहिष्णुता -- रागद्वेष? हर्षशोक? सुखदुःख? मानअपमान? निन्दास्तुति आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाना -- ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः (गीता 7। 28) द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः गीता (15। 5)।(2) वेगसहिष्णुता -- काम? क्रोध? लोभ? द्वेष आदिके वेगोंको उत्पन्न न होने देना -- कामक्रोधोद्भवं वेगम् (गीता 5। 23)।(3) परमतसहिष्णुता -- दूसरोंके मतकी महिमा सुनकर अपने मतमें सन्देह न होना और उनके मतसे उद्विग्न न होना (टिप्पणी प0 987.1) -- एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति (गीता 5। 5)।(4) परोत्कर्षसहिष्णुता -- अपनेमें योग्यता? अधिकार? पद? त्याग? तपस्या आदिकी कमी है? तो भी दूसरोंकी योग्यता? अधिकार आदिकी प्रसंशा सुनकर अपनेमें कुछ भी विकार न होना -- विमत्सरः (गीता 4। 22) हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तः (गीता 12। 15)।ये चारों सहिष्णुताएँ सिद्धोंकी हैं। ये सहिष्णुताएँ जिसका लक्ष्य हों? वही तपस्वी है और जिसका लक्ष्य न हों? वही अतपस्वी है।ऐसे अतपस्वी अर्थात् असहिष्णु (टिप्पणी प0 987.2) को सर्वगुह्यतम रहस्य न सुनानेका मतलब है किसम्पूर्ण धर्मोंको मेरेमें अर्पण करके तू अनन्यभावसे मेरी शरण आ जा -- इस बात को सुनकर उसके मनमें कोई विपरीत भावना या दोष आ जाय? तो वह मेरी इस सर्वगुह्यतम बातको सह नहीं सकेगा और इसका निरादर करेगा? जिससे उसका पतन हो जायगा।दूसरा भाव यह है कि जिसका अपनी वृत्तियों? आचरणों? भावों आदिको शुद्ध करनेका उद्देश्य नहीं है? वह यदि मेरीतू मेरी शरणमें आ जा? तो मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा? तू चिन्ता मत कर -- इन बातोंको सुनेगा तोमैं चिन्ता क्यों करूँ चिन्ता भगवान् करेंगे ऐसा उल्टा समझकर दुर्गणदुराचारोंमें लग जायगा और अपना अहित कर लेगा। इससे मेरी सर्वगुह्यतम् बातका दुरुपयोग होगा। अतः इसे कुपात्रको कभी मत सुनाना।नाभक्ताय कदाचन -- जो भक्तिसे रहित है? जिसका भगवान्पर भरोसा? श्रद्धाविश्वास और भक्ति न होनेसे उसकी यह विपरीत धारणा हो सकती है किभगवान् जो आत्मश्लाघी हैं? स्वार्थी हैं और दूसरोंको वशमें करना चाहते हैं। जो दूसरोंको अपनी आज्ञामें चलाना चाहता है? वह दूसरोंको क्या निहाल करेगा उसके शरण होनेसे क्या लाभ आदिआदि। इस प्रकार दुर्भाव करके वह अपना पतन कर लेगा। इसलिये ऐसे,अभक्तको कभी मत कहना।न चाशुश्रूषवे वाच्यम् -- जो इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता? इसकी उपेक्षा करता है? उसको भी कभी मत सुनाना क्योंकि बिना रुचिके? जबर्दस्ती सुनानेसे वह इस बातका तिरस्कार करेगा? उसको सुनना अच्छा नहीं लगेगा? उसका मन इस बातको फेंकेगा। यह भी उसके द्वारा एक अपराध होगा। अपराध करनेवालेका भला नहीं होता। अतः जो सुनना नहीं चाहता? उसको मत सुनाना।न च मां योऽभ्यसूयति -- जो गुणोंमें दोषारोपण करता है? उसको भी मत सुनाना क्योंकि उसका अन्तःकरण अत्यधिक मलिन होनेके कारण वह भगवान्की बात सुनकर उलटे उनमें दोषारोपण ही करेगा।दोषदृष्टि रहनेसे मनुष्य महान् लाभसे वञ्चित हो जाता है और अपना पतन कर लेता है। अतः दोषदृष्टि करना बड़ा भारी दोष है। यह दोष श्रद्धालुओंमें भी रहता है। इसलिये साधकको सावधान होकर इस भयंकर दोषसे बचते रहना चाहिये। भगवान्ने भी (गीता 3। 31में) जहाँ अपना मत बताया? वहाँ श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः पदोंसे यह बात कही कि श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य कर्मोंसे छूट जाता है। ऐसे ही गीताके माहात्म्य (गीता 18। 71) में भी श्रद्धावाननसूयश्च पदोंसे यह बताया कि श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य केवल गीताको सुननेमात्रसे वैकुण्ठ आदि लोकोंको चला जाता है।इस गोपनीय रहस्यको दूसरोंसे मत कहना -- यह कहनेका तात्पर्य दूसरोंको इस गोपनीय तत्त्वसे वञ्चित रखना नहीं है? प्रत्युत जिसकी भगवान् और उनके वचनोंपर श्रद्धाभक्ति नहीं है? वह भगवान्को स्वार्थी समझकर (जैसे साधारण मनुष्य अपने स्वार्थके लिये ही किसीको स्वीकार करते हैं)? भगवान्पर दोषारोपण करके महान् पतनकी तरफ न चला जाय? इसलिये उसको कहनेका निषेध किया है। सम्बन्ध --  गीताजीका यह प्रभाव है कि जो प्रचार करेगा? उससे बढ़कर मेरा प्यारा कोई नहीं होगा -- यह बात भगवान् आगेको दो श्लोकोंमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.67।।पूर्वापरालोचनातो गीताशास्त्रं व्याख्यायोपसंहृत्य तत्तात्पर्यार्थं निर्धारितमपि विचारद्वारा निर्धारयितुं विचारमवतारयति -- अस्मिन्निति। किंशब्दार्थमेव त्रेधा विभजते -- ज्ञानमिति। निमित्ताभावे संशयस्याभासत्वान्न निरस्येति मत्वा पृच्छति -- कुत इति। तत्तदर्थावद्योतकानेकवाक्यदर्शनं तन्निमित्तमित्याह -- यज्ज्ञात्वेति। कर्मणामवश्यकर्तव्यत्वोपलम्भात्तेभ्योऽपि निःश्रेयसप्राप्तिर्भातीत्याह -- कर्मण्येवेति। तथापि समुच्चयप्रापकं नास्तीत्याशङ्क्याह -- एवमिति। सत्यां सामग्र्यां कार्यमवश्यंभावीत्युपसंहरति -- इति भवेदिति। संदिग्धं सफलं च विचार्यमिति स्थितेरसति फले संदिग्धमपि न विचार्यमिति बुद्ध्या पृच्छति -- किं पुनरिति। प्रत्येकं ज्ञानकर्मणोः समुच्चितयोर्वा मुक्तिं प्रति परमसाधनतेत्यवधारणमेव विचारफलमिति परिहरति -- नन्विति। संदेहप्रयोजनयोर्विचारप्रयोजकयोर्भावाद्विचारद्वारा परममुक्तिसाधनं निर्धारणीयमिति निगमयति -- अत इति। एवं विचारमवतार्य सिद्धान्तं संगृह्णाति -- आत्मेति। संग्रहवाक्यं विवृण्वन्नादावात्मज्ञानापोह्यामविद्यां दर्शयति -- क्रियेति। आश्रयोक्त्या तदनादित्वमाह -- आत्मनीति। तामेवाविद्यामनाद्यविद्योत्थामनर्थात्मिकां प्रपञ्चयति -- ममेति। अनाद्यविद्याकार्यत्वात्प्रवाहरूपेणानादित्वमस्या विवक्षित्वा विशिनष्टि -- अनादीति। तत्र कारणाविद्यानिवर्तकत्वमात्मज्ञानस्योपन्यस्यति -- अस्या इति। ननु नेदमुत्पन्नं ज्ञानं निवर्तयत्यविरोधेनोत्पन्नत्वान्न चानुत्पन्नमलब्धात्मकस्यार्थक्रियाकारित्वाभावात्तत्राह -- उत्पद्यमानमिति। कथं तस्य कारणाविद्यानिवर्तकत्वमित्याशङ्क्य कार्याविद्यानिवर्तकत्वदृष्टेरित्याह -- कर्मेति। आत्मज्ञानस्येत्यादिसंग्रहवाक्ये तुशब्दद्योत्यविशेषाभावात्तदानर्थक्यमाशङ्क्याह -- तुशब्द इति। पक्षद्वयव्यावर्तकत्वमेवास्य स्फुटयति -- नेत्यादिना। इतश्च कर्मासाध्यता मुक्तेरित्याह -- अकार्यत्वाच्चेति।एष नित्यो महिमा इति श्रुतेर्नित्यत्वेन मोक्षस्याकार्यत्वान्न तत्र हेत्वपेक्षेत्युपपादयति -- नहीति। ज्ञानेनापि मोक्षो न क्रियते चेत्तर्हि केवलमपि ज्ञानं मुक्त्यनुपयुक्तमिति कुतस्तस्य तत्र हेतुत्वधीरित्याशङ्कते -- केवलेति। ज्ञानानर्थक्यं दूषयति -- नेति। तदेव प्रपञ्चयति -- अविद्येति। यदुक्तमविद्यानिवर्तकज्ञानस्य कैवल्यफलावसायित्वं दृष्टमिति तत्र दृष्टान्तमाह -- रज्ज्वादीति। उक्ते विषये तमोनिवर्तकप्रकाशस्य कस्मिन्फले पर्यवसानं तत्राह -- विनिवृत्तेति। प्रदीपप्रकाशस्य सर्पभ्रमनिवृत्तिद्वारा रज्जुमात्रे पर्यवसानवदात्मज्ञानस्यापि तदविद्यानिवृत्त्यात्मकैवल्यावसानमिति दार्ष्टान्तिकमाह -- तथेति। ज्ञात्रादीनां ज्ञाननिष्ठाहेतूनां कर्मान्तरे प्रवृत्तिसंभवात्कर्मसहितैव सा कैवल्यावसायिनीति चेत्तत्राह -- दृष्टार्थायामिति। कर्मसाहित्यं ज्ञाननिष्ठाया दृष्टान्तेन साधयन्नाशङ्कते -- भुजीति। भुजिक्रियाया लौकिक्या वैदिक्याश्चाग्निहोत्रादिक्रियायाः सहानुष्ठानवदग्निहोत्रादिक्रियाया ज्ञाननिष्ठायाश्च साहित्यमित्यर्थः। भुजिफले तृष्णाख्ये प्राप्तेऽपि स्वर्गादौ तद्धेतौ चाग्निहोत्रादावर्थित्वदृष्टेर्युक्तं तत्र साहित्यं न तथा मुक्तिफलज्ञाननिष्ठालाभे स्वर्गादौ तद्धेतौ वा कर्मण्यर्थित्वं तेन

Chapter 18 (Part 39)

ज्ञाननिष्ठाकर्मणोर्न साहित्यमिति परिहरति -- नेत्यादिना। संग्रहवाक्यं विवृणोति -- कैवल्येति। ज्ञाने फलवति लब्धे फलान्तरे तद्धेतौ च नार्थितेत्यत्र दृष्टान्तमाह -- सर्वत इति। सर्वत्र संप्लुतं व्याप्तमुदकमिति समुद्रोक्तिस्तत्फलं स्नानादि तस्मिन्प्राप्ते न तडागादिनिर्माणक्रियायां तदधीने च स्नानादौ कस्यचिदर्थित्वं तथा प्रकृतेपीत्यर्थः। निरतिशयफले ज्ञाने लब्धे सातिशयफले कर्मणि नार्थित्वमित्येतद्दृष्टान्तेन स्फुटयति -- नहीति। कर्मणः सातिशयफलत्वमुक्तमुपजीव्य फलितमाह -- तस्मान्नेति। ज्ञानकर्मणोः साहित्यासंभवमपि पूर्वोक्तं निगमयति -- नचेति। नहि प्रकाशतमसोरिव मिथो विरुद्धयोस्तयोः साक्षादेकस्मिन्फले साहित्यमित्यर्थः। ननु ज्ञानमेव मोक्षं साधयदात्मसहायत्वेन कर्मापेक्षते,करणस्योपकरणापेक्षत्वात्तत्राह -- नापीति। ज्ञानमुत्पत्तौ यज्ञाद्यपेक्षमपि नोत्पन्नं फले तदपेक्षं स्वोत्पत्तिनान्तरीयकत्वेन मुक्तेस्तन्मात्रायत्तत्वादित्यर्थः। यदुक्तमितिकर्तव्यत्वेन ज्ञानं कर्मापेक्षमिति तत्राह -- अविद्येति। ज्ञानस्याज्ञाननिवर्तकत्वात्तत्र कर्मणो विरुद्धतया सहकारित्वायोगान्न फले तदपेक्षेत्यर्थः। कर्मणोऽपि ज्ञानवदज्ञाननिवर्तकत्वे कुतो विरुद्धतेत्याशङ्क्याह -- नहीति। केवलस्य समुच्चितस्य वा कर्मणो मोक्षे साक्षादनन्वये फलितमाह -- अत इति। केवलं ज्ञानं मुक्तिसाधनमित्युक्तं तन्निषेधयन्नाशङ्कते -- नेत्यादिना। निषेध्यमनूद्य नञर्थमाह -- यत्तावदिति। नित्याकरणे प्रत्यवायाप्राप्तेरिति हेतुं प्रपञ्चयति -- यत इति। ज्ञानवतोऽपि नित्यानुष्ठानस्यावश्यकत्वान्न केवलज्ञानस्य कैवल्यहेतुतेत्यर्थः। कैवल्यस्य च नित्यत्वादित्यस्य व्यावर्त्यं दर्शयति -- नन्विति। यदि नित्यनैमित्तिककर्माणि श्रौतान्यकरणे प्रत्यवायकारीण्यवश्यानुष्ठेयान्येवं तर्हि तेभ्यः समुच्चितेभ्योऽसमुच्चितेभ्यश्च मोक्षो नेत्युक्तत्वात्केवलज्ञानस्य चातद्धेतुत्वादनिबन्धना मुक्तिर्न सिध्येदित्यर्थः। कैवल्यस्य चेत्यादि व्याकुर्वन्ननिर्मोक्षप्रसङ्गं प्रत्यादिशति -- नैष दोष इति। मुक्तेर्नित्यत्वेनायत्नसिद्धेर्न तदभावशङ्केत्युक्तं प्रपञ्चयति -- नित्यानामिति। काम्यकर्मवशादिष्टशरीरापत्तिं शङ्कित्वोक्तं -- काम्यानां चेति। आरब्धकर्मवशात्तर्हि देहान्तरं नेत्याह -- वर्तमानेति। तर्हि देहान्तरं शेषकर्मणा स्यादित्याशङ्क्य कर्माशयस्यैकभविकत्वान्नेत्याह -- पतितेऽस्मिन्निति। रागादिना कर्मान्तरं ततो देहान्तरं च भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- रागादीनां चेति। आत्मनः स्वरूपावस्थानमिति संबन्धः। अतीतासंख्यजन्मभेदेष्वर्जितस्य कर्मणो नानाफलस्यानारब्धस्य भोगेन विनाक्षयात्ततो देहान्तरारम्भादैकभविकत्वस्याप्रामाणिकत्वान्न मुक्तेरयत्नसिद्धतेति चोदयति -- अतिक्रान्तेति। नोक्तकर्मनिमित्तं देहान्तरं शङ्कितव्यमित्याह -- नेति। नित्यनैमित्तिककर्माणि श्रौतान्यवश्यमनुष्ठेयानि तदनुष्ठाने च महानायासस्ततो दुःखोपभोगस्तस्योक्तानारब्धकर्मफलभोगत्वोपगमान्न ततो देहान्तरमित्याह -- नित्येति। नित्यादिना दुरितनिवृत्तावप्यविरोधान्न सुकृतनिवृत्तिस्ततो देहान्तरमित्याशङ्क्य सुकृतस्य नित्यादेरन्यत्वेनारब्धत्वे च न्यायविरुद्धस्य तस्यासिद्धत्वात्ततो देहान्तरायोगान्नित्यादेरनन्यत्वे च न तस्य फलान्तरमिति मत्वा यथा प्रायश्चित्तमुपात्तदुरितनिबर्हणार्थं न फलान्तरापेक्षं तथेदं सर्वमपि नित्यादिकर्मोपात्तपापनिराकरणार्थं तस्मिन्नेव पर्यवस्यन्न देहान्तरारम्भकमिति पक्षान्तरमाह -- प्रायश्चित्तवदिति। तथापि प्रारब्धवशादेव देहान्तरं शङ्क्यते नानाजन्मारम्भकाणामपि तेषां यावदधिकारन्यायेन संभवादित्याशङ्क्याह -- आरब्धानां चेति। पूर्वार्जितकर्मणामेवं क्षीणत्वेऽपि कानिचित्पूर्वकर्माणि देहान्तरमारभेरन्नित्याशङ्क्याह -- अपूर्वाणां चेति। विना ज्ञानं कर्मणैव मुक्तिरिति पक्षं श्रुत्यवष्टम्भेन निराचष्टे -- नेत्यादिना। विद्यतेऽयनायेति श्रुतेरिति संबन्धः। एवकारार्थं विवृण्वन्नेत्यादिभागं व्याकरोति -- अन्य इति।यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति इति श्रुतिमर्थतोऽनुवदति -- चर्मवदिति। श्रौतार्थे स्मृतिं संवादयति -- ज्ञानादिति। किञ्च त्वदीयन्यायस्यानुग्राह्यमानहीनत्वेनाभासतया पुण्यकर्मणामनारब्धफलानां क्षयाभावे देहान्तरारम्भसंभवान्न ज्ञानं विना मुक्तिरित्याह -- अनारब्धेति। तथाविधानां कर्मणां नास्ति संभावनेत्याशङ्क्याह -- यथेति। अनारब्धफलपुण्यकर्माभावेऽपि कथं मोक्षानुपपत्तिरिति तत्राह -- तेषां चेति। इतश्च कर्मक्षयानुपपत्त्या मोक्षानुपपत्तिरिति तत्राह -- धर्मेति।कर्मणा पितृलोकः इति श्रुतिमाश्रित्य कर्माक्षये हेत्वन्तरमाह -- नित्यानामिति। स्मृत्यापि यथोक्तमर्थं समर्थयति -- वर्णा इति। प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टजात्यादिभाजो जन्म प्रतिपद्यन्त इत्येतदादिपदार्थः। यत्तु नित्यानुष्ठानायासदुःखभोगस्य तत्फलभोगत्वमिति तदिदानीमनुभवति -- ये त्विति। नित्यान्यनुष्ठीयमानान्यायासपर्यन्तानीति शेषः। तथापि नित्यानां काम्यानामिव स्वरूपातिरिक्तं फलमाशङ्क्य विध्युद्देशे तदश्रवणान्मैवमित्याह -- नत्विति। विध्युद्देशे फलाश्रुतौ तत्कामनाया निमित्तस्याभावान्न नित्यानि विधीयेरन्नित्याशङ्क्याह -- जीवनादीति। न नित्यानां विध्यसिद्धिरिति शेषः। अनुभाषितं दूषयति -- नेत्यादिना। तदेव विवृण्वन्निषेध्यमनूद्य नञर्थमाह -- यदुक्तमिति। अप्रवृत्तानामित्यादिहेतुं प्रपञ्चयति -- नहीति। कर्मान्तरारब्धेऽपि देहे दुरितफलं नित्यानुष्ठानायासदुःखं भुज्यतां कानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह -- अन्यथेति। यदुक्तं दुःखफलविशेषानुपपत्तिश्च स्यादिति तदुपपादयति -- तस्येति। संभावितानि तावदनन्तानि संचितानि दुरितानि तानि च नानादुःखफलानि यदि तानि नित्यानुष्ठानायासरूपं दुःखं तन्मात्रफलानि कल्प्येरंस्तदा तेष्वेवं कल्प्यमानेषु सत्सु नित्यस्यानुष्ठितस्यायासमासादयतो यो दुरितकृतो दुःखविशेषो न तत्फलं दुरितफलानां दुःखानां बहुत्वादतो नित्यं कर्म यथाविशेषं तं दुरितकृतदुःखविशेषफलकमित्यक्तमित्यर्थः। किञ्च नित्यानुष्ठानायासदुःखमात्रफलानि चेद्दुरितानि कल्प्यन्ते,तदा द्वन्द्वशब्दितरागादिबाधस्य रोगादिबाधायाश्च दुरितनिमित्तत्वानुपपत्तेः सुकृतकृतत्वस्य चासंभवादनुपपत्तिरेवोदीरितबाधायाः स्यादित्याह -- द्वन्द्वेति। इतश्च नित्यानुष्ठानायासदुःखमेव दुरितफलमित्ययुक्तमित्याह -- नित्येति। दुःखमिति न शक्यते कल्पयितुमिति पूर्वेण संबन्धः। यदि तदेव तत्फलं न तर्हि शिरसा पाषाणवहनादिदुःखं दुरितकृतं नच तत्कारणं सुकृतं दुःखस्यातत्कार्यत्वादतस्तदाकस्मिकं स्यादित्यर्थः। नित्यानुष्ठानायासदुःखमुपात्तदुरितफलमित्येतदप्रकृतत्वाच्चायुक्तं वक्तुमित्याह -- अप्रकृतं चेति। तदेव प्रपञ्चयितुं पृच्छति -- कथमिति। तत्रादौ प्रकृतमाह -- अप्रसूतेति। तथापि कथमस्माकमप्रकृतवादित्वं तत्राह -- तत्रेति। प्रसूतफलत्वमप्रसूतफलत्वमिति प्राचीनदुरितगतविशेषानुपगमादविशेषेण सर्वस्यैव तस्य प्रसूतफलत्वान्नित्यानुष्ठानायासदुःखफलत्वसंभवान्नाप्रकृतवादितेति शङ्कते -- अथेति। पूर्वोपात्तदुरितस्याविशेषेणारब्धफलत्वे विशेषणानर्थक्यमिति परिहरति -- तत इति। दुरितमात्रस्यारब्धफलत्वेनानारब्धफलस्य तस्योक्तफलविशेषवत्त्वानुपपत्तेरित्यर्थः। पूर्वोपात्तदुरितमारब्धफलं चेद्भोगेनैव तत्क्षयसंभवात्तन्निवृत्त्यर्थं नित्यं कर्म न विधातव्यमिति दोषान्तरमाह -- नित्येति। इतश्च नित्यानुष्ठानायासदुःखं नोपात्तदुरितफलमित्याह -- किञ्चेति। तदेव स्फोरयति -- श्रुतस्येति।यथा व्यायामगमनादिकृतं दुःखं नान्यस्य दुरितस्येष्यते तत्फलत्वसंभवात्तथा नित्यस्यापि श्रुत्युक्तस्यानुष्ठितस्यायासपर्यन्तस्य फलान्तरानुपगमादनुष्ठानायासदुःखमेव चेत्फलं तर्हि तस्मादेव तद्दर्शनात्तस्य न दुरितफलत्वं कल्प्यं नित्यफलत्वसंभवादित्यर्थः। दुःखफलत्वे नित्यानामननुष्ठानमेव श्रेयः स्यादित्याशङ्क्याह -- जीवनादिति। नित्यानां दुरितफलत्वानुपपत्तौ हेत्वन्तरमाह -- प्रायश्चित्तवदिति। दृष्टान्तं प्रपञ्चयति -- यस्मिन्निति। तथा जीवनादिनिमित्ते विहितानां नित्यानां दुरितफलत्वासिद्धिरिति शेषः। सत्यं प्रायश्चित्तं न निमित्तस्य पापस्य फलं किंतु तदनुष्ठानायासदुःखं तस्य पापस्य फलमिति शङ्कते -- अथेति। प्रायश्चित्तानुष्ठानायासदुःखस्य निमित्तभूतपापफलत्वे जीवनादिनिमित्तमित्याद्यनुष्ठानायासदुःखमपि जीवनादेरेव फलं स्यान्नोपात्तदुरितस्येति परिहरति -- जीवनादिति। प्रायश्चित्तदुःखस्य तन्निमित्तपापफलत्ववज्जीवनादिनिमित्तकर्मकृतमपि दुःखं जीवनादिफलमित्यत्र हेतुमाह -- नित्येति। इतश्च नित्यानुष्ठानायासदुःखमेवोपात्तदुरितफलमित्याशङ्क्य वक्तुमित्याह -- किञ्चेति। काम्यानुष्ठानायासदुःखमपि दुरितफलमित्युपगमात्प्रसङ्गस्येष्टत्वमाशङ्क्याह -- तथाचेति। विहितानि तावन्नित्यानि नच तेषु फलं श्रुतं नच विना फलं विधिस्तेन दुरितनिबर्हणार्थानि नित्यानीत्यर्थापत्त्या कल्प्यते नच सा युक्ता काम्यानुष्ठानादपि दुरितनिवृत्तिसंभवादित्यर्थः। किञ्च नित्यान्यनुष्ठानायासदुःखातिरिक्तफलानि विहितत्वात्काम्यवदित्यनुमानान्न तेषां दुरितनिवृत्त्यर्थतेत्याह -- एवमिति। काम्यादिकर्म दृष्टान्तयितुमेवमित्युक्तम्। स्वोक्तिव्याघाताच्च नित्यानुष्ठानाद्दुरितफलभोगोक्तिरयुक्तेत्याह -- विरोधाच्चेति। तदेव प्रपञ्चयति -- विरुद्धं चेति। इदंशब्दार्थमेव विशदयति -- नित्येति। अन्यस्य कर्मणो दुरितस्येति यावत्। स एवेति। यदनन्तरं यद्भवति तत्तस्य कार्यमिति नियमादित्यर्थः। इतश्च नित्यानुष्ठाने दुरितफलभोगो न सिध्यतीत्याह -- किञ्चेति। काम्यानुष्ठानस्य नित्यानुष्ठानस्य च यौगपद्यान्नित्यानुष्ठानायासदुःखेन दुरितफलभोगवत्काम्यफलस्यापि मुक्तत्वसंभवादिति हेतुमाह -- तत्तन्त्रत्वादिति। नित्यकाम्यानुष्ठानयोर्यौगपद्येऽपि नित्यानुष्ठानायासदुःखादन्यदेव काम्यानुष्ठानफलं श्रुतत्वादिति शङ्कते -- अथेति। काम्यानुष्ठानफलं नित्यानुष्ठानायासदुःखाद्भिन्नं चेत्तर्हि काम्यानुष्ठानायासदुःखं नित्यानुष्ठानायासदुःखं च मिथो भिन्नं स्यादित्याह -- तदनुष्ठानेति। प्रसङ्गस्येष्टत्वमाशङ्क्य निराचष्टे -- नचेति। दृष्टविरोधमेव स्पष्टयति -- नहीति। आत्माज्ञानवदग्निहोत्रादीनां मोक्षे साक्षादन्वयो नेत्यत्रान्यदपि कारणमस्तीत्याह -- किञ्चान्यदिति। तदेव कारणं विवृणोति -- अविहितमिति। यत्कर्म मर्दनभोजनादि तन्न शास्त्रेण विहितं निषिद्धं वा तदनन्तरफलं तथानुभवादित्यर्थः। शास्त्रीयं कर्म तु नानन्तरफलमानन्तर्यस्याचोदितत्वादतो ज्ञाने दृष्टफले नादृष्टफलं कर्म सहकारि भवति? नापि स्वयमेव दृष्टफले मोक्षे कर्म प्रवृत्तिक्षममिति विवक्षित्वाह -- नत्विति। शास्त्रीयस्याग्निहोत्रादेरपि फलानन्तर्ये स्वर्गादीनामनन्तरमनुपलब्धिर्विरुद्ध्येत ततस्तेष्वदृष्टेऽपि तथाविधफलापेक्षया प्रवृत्तिरग्निहोत्रादिषु न स्यादित्याह -- तदेति। किञ्च नित्यानामग्निहोत्रादीनां नादृष्टं फलं तेषामेव काम्यानां तादृक्फलं नच हेतुं विनायं विभागो भावीत्याह -- अग्निहोत्रादीनामिति। फलकामित्वमात्रेणेति। न स्यादिति पूर्वेण संबन्धः। यानि नित्यान्यग्निहोत्रादीनि यानि च काम्यानि तेषामुभयेषामेव कर्मस्वरूपविशेषाभावेऽपि नित्यानां तेषामनुष्ठानायासदुःखमात्रेण क्षयो न फलान्तरमस्ति?,तेषामेव काम्यानामङ्गाद्याधिक्याभावेऽपि फलकामित्वमधिकारिण्यस्तीत्येतावन्मात्रेण स्वर्गादिमहाफलत्वमित्ययं विभागो न प्रमाणवानित्यर्थः। उक्तविभागायोगे फलितमाह -- तस्मान्नेति। काम्यवन्नित्यानामपि पितृलोकाद्यदृष्टफलवत्त्वे दुरितनिवृत्त्यर्थत्वायोगात्तादर्थ्येनात्मविद्यैवाभ्युपगन्तव्येत्याह -- अतश्चेति। शुभाशुभात्मकं कर्म सर्वमविद्यापूर्वकं चेदशेषतस्तर्हि तस्य क्षयकारणं विद्येत्युपपद्यते न तु सर्वं कर्माविद्यापूर्वकमिति सिद्धमित्याशङ्क्याह -- अविद्येति। तत्र हि शब्दद्योतितां युक्तिं दर्शयति -- तथेति। इतश्चाविद्वद्विषयं कर्मेत्याह -- अविद्वदिति। अधिकारिभेदेन निष्ठाद्वयमित्यत्र वाक्योपक्रममनुकूलयन्नात्मनि कर्तृत्वं कर्मत्वं चारोपयन्न जानात्यात्मानमिति वदता कर्माज्ञानमूलमिति दर्शितमित्याह -- उभाविति। आत्मानं याथातथ्येन जानन्कर्तृत्वादिरहितो भवतीति ब्रुवता कर्मसंन्यासे ज्ञानवतोऽधिकारित्वं सूचितमित्याह -- वेदेति। निष्ठाद्वयमधिकारिभेदेन बोद्धव्यमित्यत्रैव वाक्यान्तरमाह -- ज्ञानेति। न बुद्धिभेदं जनयेदित्यत्र चाविद्यामूलत्वं कर्मणः सूचयता कर्मनिष्ठा विद्वद्विषयानुमोदितेत्याह -- अज्ञानामिति। यदुक्तं विद्वद्विषया संन्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठेति तत्रतत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः इत्यादि वाक्यमुदाहरति -- तत्त्ववित्त्विति। तत्रैव वाक्यान्तरं पठति -- सर्वेति। विदुषो ज्ञाननिष्ठेत्यत्रैव पाञ्चमिकं वाक्यान्तरमाह -- नैवेति। तत्रैवार्थसिद्धमर्थं कथयति -- अज्ञ इति। मन्यत इति संबन्धः। अज्ञस्य चित्तशुद्ध्यर्थं कर्म शुद्धचित्तस्य कर्मसंन्यासो ज्ञानप्राप्तौ हेतुरित्यत्र वाक्यान्तरमाह -- आरुरुक्षोरिति। यथोक्ते विभागे साप्तमिकं वाक्यमनुगुणमित्याह -- उदारा इति। एवं त्रयीधर्ममित्यादि नावमिकं वाक्यमविद्वद्विषयं कर्मेत्यत्र प्रमाणयति -- अज्ञा इति। विदुषः संन्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठेत्यत्रैव नावमिकं वाक्यान्तरमाह -- अनन्या इति। मामित्येतद्व्याचष्टे -- यथोक्तमिति। तेषां सततयुक्तानामित्यादि दाशमिकं वाक्यं तत्रैव प्रमाणयति -- ददामीति। विद्यावतामेव भगवत्प्राप्तिनिर्देशादितरेषां तदप्राप्तिः सूचितेत्यर्थसिद्धमर्थमाह -- अर्थादिति। ननु भगवत्कर्मकारिणां युक्ततमत्वात्कर्मिणोऽपि भगवन्तं यान्तीत्याशङ्क्याह -- भगवदिति। ये मत्कर्मकृदित्यादिन्यायेन भगवत्कर्मकारिणस्ते यद्यपि युक्ततमास्तथापि कर्मिणोऽज्ञाः सन्तो न भगवन्तं सहसा गन्तुमर्हन्तीत्यर्थः। तेषामज्ञत्वे गमकं दर्शयति -- उत्तरोत्तरेति। चित्तसमाधानमारभ्य फलत्यागपर्यन्तं पाठक्रमेणोत्तरोत्तरं हीनसाधनोपादानादभ्यासासमर्थस्य भगवत्कर्मकारित्वाभिधानाद्भगवत्कर्मकारिणामज्ञत्वं विज्ञातमित्यर्थः। ये त्वक्षरमनिर्देश्यमित्यादिवाक्यावष्टम्भेन विद्वद्विषयत्वं संन्यासपूर्वकज्ञाननिष्ठाया निर्धारयति -- अनिर्देश्येति। उक्तसाधनास्तेन ते संन्यासपूर्वकज्ञाननिष्ठायामधिक्रियेरन्निति शेषः। किञ्च त्रयोदशे यान्यमानित्वादीनि चतुर्दशे च प्रकाशं च प्रवृत्तिं चेत्यादीनि यानि पञ्चदशे च यान्यसङ्गत्वादीन्युक्तानि तैः सर्वैः साधनैः सहिता भवन्त्यनिर्देश्याक्षरोपासकास्ततोऽपि ते ज्ञाननिष्ठायामेवाधिक्रियेरन्नित्याह -- क्षेत्रेति। निष्ठाद्वयमधिकारिभेदेन प्रतिष्ठाप्य ज्ञाननिष्ठानामनिष्टमिष्टं मिश्रमिति त्रिविधं कर्मफलं न भवति किंतु मुक्तिरेव कर्मनिष्ठानां तु त्रिविधं कर्मफलं न मुक्तिरिति शास्त्रार्थविभागमभिप्रेतमुपसंहरति -- अधिष्ठानादीति। यदुक्तमविद्याकामबीजं सर्वं कर्मेति तन्न शास्त्रावगतस्य कर्मणोऽविद्यापूर्वकत्वानुपपत्तेरित्याक्षिपति -- अविद्येति। दृष्टान्तेन समाधत्ते -- नेति। तत्राभिमतां प्रतिज्ञां विभजते -- यद्यपीति। उक्तं दृष्टान्तं व्याचष्टे -- यथेति। अविद्यादिमतो ब्रह्महत्यादि कर्मेत्यत्र हेतुमाह -- अन्यथेति। दार्ष्टान्तिकं गृह्णाति -- तथेति। तान्यप्यविद्यादिमतो भवन्तीत्यविद्यादिपूर्वकत्वं तेषामेषितव्यमित्यर्थः। पारलौकिककर्मसु देहाद्यतिरिक्तात्मज्ञानं विना प्रवृत्त्ययोगान्न तेषामविद्यापूर्वकतेति शङ्कते -- व्यतिरिक्त इति। सत्यपि व्यतिरिक्तात्मज्ञाने पारमार्थिकात्मज्ञानाभावान्मिथ्याज्ञानादेव नित्यादिकर्मसु प्रवृत्तेरविद्यापूर्वकत्वं तेषामप्रतिहतमिति परिहरति -- नेत्यादिना। कर्मणश्चलनात्मकत्वान्नात्मकर्तृकत्वं तस्य निष्क्रियत्वाद्देहादिसंघातस्य तु सक्रियत्वात्तत्कर्तृकं कर्म युक्तं तथापि संघातेऽहमभिमानद्वाराहं करोमीत्यात्मनो मिथ्याधीपूर्विका कर्मणि प्रवृत्तिर्दृष्टा तेनाविद्यापूर्वकत्वं तस्य युक्तमित्यर्थः। यदुक्तं देहादिसंघातेऽहमभिमानस्य मिथ्याज्ञानत्वं तदाक्षिपति -- देहादीति। अहंधियो गौणत्वे तत्पूर्वककर्मस्वपि गौणत्वापत्तेरात्मनोऽनर्थाभावात्तन्निवृत्त्यर्थं हेत्वन्वेषणं न स्यादिति दूषयति -- नेति। एतदेव प्रपञ्चयन्नादौ चोद्यं प्रपञ्चयति -- आत्मीयेति। तत्र श्रुत्यवष्टम्भेन दृष्टान्तमाह -- यथेति। दर्शितश्रुतेरात्मीये पुत्रेऽहंप्रत्ययो गौणो यथा संघातेऽप्यात्मीयेऽहंप्रत्ययस्तथा युक्त इत्यर्थः। भेदधीपूर्वकत्वं गौणधियो लोके प्रसिद्धमित्याह -- लोके चेति। लोकवेदानुरोधेनात्मीये संघातेऽहंधीरपि गौणी स्यादिति दार्ष्टान्तिकमाह -- तद्वदिति। मिथ्याधियोऽपि भेदधीपूर्वकत्वसंभवादात्मीये संघातेऽहंधियो मिथ्यात्वमेव किं न स्यादित्याशङ्क्याह -- नैवायमिति। भेदधीपूर्वकत्वाभावे कथं मिथ्याधीरुदेतीत्याशङ्क्याह -- मिथ्येति।,अधिष्ठानारोप्ययोर्विवेकाग्रहात्तदुत्पत्तिरित्यर्थः। देहादावहंधियो गौणतेति चोद्ये विवृते तत्कार्येष्वपीत्यादिपरिहारं विवृणोति -- नेत्यादिना। हेतुभागं विभजते -- यथेति। सिंहो देवदत्त इति वाक्यं देवदत्तः सिंह इवेत्युपमया देवदत्तं क्रौर्याद्यधिकरणं स्तोतुं प्रवृत्तमग्निर्माणवक इत्यपि वाक्यं माणवकोऽग्निरिवेत्युपमया माणवकस्य पैङ्गल्याधिकरणस्य स्तुत्यर्थमेव न तथा मनुष्योऽहमिति वाक्यस्याधिकरणस्तुत्यर्थता भातीत्यर्थः। देवदत्तमाणवकयोरधिकरणत्वं कथमित्याशङ्क्याह -- क्रौर्येति। किञ्च गौणशब्दं तत्प्रत्ययं च निमित्तं कृत्वा सिंहकार्यं न किंचिद्देवदत्ते साध्यते नापि माणवके किंचिदग्निकार्यं मिथ्याधीकार्यं त्वनर्थमात्मानुभवत्यतो न देहादावहंधीर्गौणीत्याह -- नत्विति। इतोऽपि देहादौ नाहंधीर्गौणीत्याह -- गौणेति। यो देवदत्तो माणवको वा गौण्या धियो विषयस्तं परो नैष सिंहो नायमग्निरिति जानाति नैवमविद्वानात्मनः संघातस्य च सत्यपि भेदे संघातस्यानात्मत्वं प्रत्येत्यतो न संघातेऽहंशब्दप्रत्ययौ गौणावित्यर्थः। संघाते तयोर्गौणत्वे दोषान्तरं समुच्चिनोति -- तथेति। तथा सत्यात्मनि कर्तृत्वादिप्रतिभासासिद्धिरिति शेषः। गौणेन कृतं न मुख्येन कृतमित्युदाहरणेन स्फुटयति -- नहीति। यद्यपि देवदत्तमाणवकाभ्यां कृतं कार्यं मुख्याभ्यां सिंहाग्निभ्यां न क्रियते तथापि देवदत्तगतक्रौर्येण मुख्यसिंहस्य माणवकनिष्ठपैङ्गल्येन मुख्याग्नेरिव च संघातगतेनापि जडत्वेनात्मनो मुख्यस्य किंचित्कार्यं कृतं भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- नचेति। देहादावहंधियो गौणत्वायोगे हेत्वन्तरमाह -- स्तूयमानाविति। देवदत्तमाणवकयोः सिंहाग्निभ्यां भेदधीपूर्वकं तद्व्यापारवत्त्वाभावधीवदात्मनोऽपि मुख्यस्य संघाताद्भेदधीद्वारा तदीयव्यापारराहित्यमात्मनि दृष्टं स्यादित्यर्थः। व्यावर्त्यं दर्शयति -- न पुनरिति। संघातेऽहंधियो मिथ्याधीत्वेऽपि न तत्कृतमात्मनि कर्तृत्वं किं चात्मीयैर्ज्ञानेच्छाप्रयत्नैरस्य कर्तृत्वं वास्तवमिति मतमनुवदति -- यच्चेति। ज्ञानादिकृतमपि कर्तृत्वं मिथ्याधीकृतमेव ज्ञानादीनां मिथ्याधीकार्यत्वादिति दूषयति -- न तेषामिति। तदेव प्रपञ्चयति -- मिथ्येति। मिथ्याज्ञानं निमित्तं कृत्वा किंचिदिष्टं किंचिदनिष्टमित्यारोप्य तद्द्वारानुभूते तस्मिन्प्रेप्साजिहासाभ्यां क्रियां निर्वर्त्य तयेष्टमनिष्टं च फलं भुक्त्वा तेन संस्कारेण तत्पूर्विकाः स्मृत्यादयः स्वात्मनि क्रियां कुर्वन्तीति युक्तं कर्तृत्वस्य मिथ्यात्वमित्यर्थः। अतीतानागतजन्मनोरिव वर्तमानेऽपि जन्मनि कर्तृत्वादिसंसारस्य वस्तुत्वमाशङ्क्याह -- यथेति। विमतौ कालावविद्याकृतसंसारवन्तौ कालत्वाद्वर्तमानकालवदित्यर्थः। संसारस्याविद्याकृतत्वे फलितमाह -- ततश्चेति। तस्याविद्यत्वेन विद्यापोह्यत्वे हेत्वन्तरमाह -- अविद्येति। कुतोऽस्याविद्याकृतत्वं धर्माधर्मकृतत्वसंभवादित्याशङ्क्याह -- देहादीति। आत्मनो धर्मादिकर्तृत्वस्याविद्यत्वान्नाविद्यां विना कर्मिणां देहाभिमानः संभवत्यतश्चात्मनः संघातेऽहमभिमानस्याविद्याविद्यमानतेत्यर्थः। आत्मनो देहाद्यभिमानस्याविद्यकत्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यां साधयन्व्यतिरेकं दर्शयति -- नहीति। अन्वयं दर्शयन्व्यतिरेकमनुवदति -- अजानन्निति। पुत्रे पितुरहंधीवदात्मीये देहादावहंधीर्गौणीत्युक्तमनुवदति -- यस्त्विति। तत्र दृष्टान्तश्रुतेर्गौणात्मविषयत्वमुक्तमङ्गीकरोति -- स त्विति। तर्हि देहादावपि तथैव स्वकीये स्यादहंधीर्गौणीत्याशङ्क्याह -- गौणेनेति। नहि स्वकीयेन पुत्रादिना गौणात्मना पितृभोजनादिकार्यं क्रियते तथा देहादेरपि गौणात्मत्वे तेन कर्तृत्वादिकार्यमात्मनो न वास्तवं सिद्ध्यतीत्यर्थः। गौणात्मना मुख्यात्मनो नास्ति वास्तवं कार्यमित्यत्र दृष्टान्तमाह -- गौणेति। नहि गौणसिंहेन देवदत्तेन मुख्यसिंहकार्यं क्रियते नापि गौणाग्निना माणवकेन मुख्याग्निकार्यं दाहपाकादि तथा देहादिना गौणात्मना मुख्यात्मनो न वास्तवं कार्यं कर्तृत्वादि कर्तुं शक्यमित्यर्थः। स्वर्गकामादिवाक्यप्रामाण्यादात्मनो देहाद्यतिरेकज्ञानात्तस्य च केवलस्याकर्तृत्वात्तत्कर्तव्यं कर्म गौणैरेव देहाद्यात्मभिः संपाद्यते नहि सत्येव श्रौतातिरेकज्ञाने देहादावात्मत्वमात्मनो मुख्यं युक्तमिति चोदयति -- अदृष्टेति। न देहादीनामात्मत्वं गौणं तदीयात्मत्वस्याविद्यत्वेन मुख्यत्वादतो न गौणात्मभिरात्मकर्तव्यं कर्म क्रियते किंतु मिथ्यात्मभिरिति परिहरति -- नाविद्येति। तदेव विवृण्वन्नञर्थं स्फुटयति -- न गौणा इति। कथं तर्हि देहादिविषयात्मत्वप्रथेत्याशङ्क्याविद्याकृतेत्यादिहेतुं विभजते -- कथं तर्हीति। देहादीनामनात्मनामेव सतामात्मत्वं मिथ्याप्रत्ययकृतमित्यत्रान्वयव्यतिरेकावुदाहरति -- तद्भाव इति। उक्तेऽन्वये शास्त्रीयसंस्कारशून्यानामनुभवं प्रमाणयति -- अविवेकिनामिति। व्यतिरेकेऽपि दर्शिते शास्त्राभिज्ञानामनुभवमनुकूलयति -- नत्विति। अन्वयव्यतिरेकाभ्यामनुभवानुसारिणां सिद्धमर्थमुपसंहरति -- तस्मादिति। तत्कृत एव देहादावहंप्रत्यय इति शेषः। किञ्च व्यवहारभूमौ भेदग्रहस्य गौणत्वव्यापकत्वात्तस्य प्रकृतेऽभावान्न देहादावहंशब्दप्रत्ययौ गौणावित्याह -- पृथगिति। अदृष्टविषयचोदनाप्रामाण्यात्कर्तुरात्मनो व्यतिरेकावधारणात्तस्य देहादावहमभिमानस्य गौणतेत्युक्तमनुवदति -- यत्त्विति।,श्रुतिप्रामाण्यस्याज्ञातार्थविषयत्वान्मानान्तरसिद्धे व्यतिरिक्तात्मनि चोदनाप्रामाण्याभावान्न तदवष्टम्भेन देहादावात्माभिमानस्य गौणतेत्युत्तरमाह -- न तदिति। श्रुतिप्रामाण्यस्यादृष्टविषयत्वं स्पष्टयति -- प्रत्यक्षादीति। अज्ञातार्थज्ञापकं प्रमाणमिति स्थितेर्न ज्ञाते श्रुतिप्रामाण्यमित्याह -- अदृष्टेति। अज्ञातसाध्यसाधनसंबन्धबोधिनः शास्त्रस्यातिरिक्तात्मन्यौदासीन्ये फलितमाह -- तस्मादिति। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां दृष्टो मिथ्याज्ञाननिमित्तो देहादिसंघातोऽहंप्रत्ययस्तस्येति यावत्। अन्यविषयत्वाच्चोदनाया नातिरिक्तात्मविषयतेत्युक्तमिदानीं तद्विषयत्वाङ्गीकारेऽपि न तन्निर्वोढुं शक्यं प्रत्यक्षविरोधादित्याह -- नहीति। अपौरुषेयायाः श्रुतेरसंभावितदोषाया मानान्तरविरोधेऽपि प्रामाण्यमप्रत्याख्येयमित्यभिप्रेत्याह -- यदीति। स्वार्थं बोधयन्त्याः श्रुतेरविरोधापेक्षत्वाद्विरुद्धार्थवादित्वे तत्परिहाराय विवक्षितमर्थान्तरमविरुद्धं तस्याः स्वीकर्तव्यं विरोधे तत्प्रामाण्यानुपपत्तेरित्याह -- तथापीति। अविरोधमवधा[धी]र्य श्रुत्यर्थकल्पना न युक्तेति व्यावर्त्यमाह -- नत्विति। अविद्यावत्कर्तृकं कर्मेति त्वयोपगमादुत्पन्नायां विद्यायामविद्याभावे तदधीनकर्तुरभावादन्तरेण कर्तारमनुष्ठानासिद्धौ कर्मकाण्डाप्रामाण्यमित्यध्ययनविधिविरोधः स्यादिति शङ्कते -- कर्मण इति। कर्मकाण्डश्रुतेर्विद्योदयात्पूर्वं व्यावहारिकप्रामाण्यस्य तात्त्विकप्रामाण्याभावेऽपि संभवाद्ब्रह्मकाण्डश्रुतेश्च तात्त्विकप्रामाण्यस्य ब्रह्मविद्याजनकत्वेनोपपन्नत्वान्नाध्ययनविधिविरोध इति परिहरति -- न ब्रह्मेति। कर्मकाण्डश्रुतेस्तात्त्विकप्रामाण्याभावे ब्रह्मकाण्डश्रुतेरपि तदसिद्धिरविशेषादिति शङ्कते -- कर्मेति। उत्पन्नाया ब्रह्मविद्याया बाधकाभावेन प्रमाणत्वात्तद्धेतुश्रुतेस्तात्त्विकं प्रामाण्यमिति दूषयति -- न बाधकेति। ब्रह्मविद्याया बाधकानुपपत्तिं दृष्टान्तेन साधयति -- यथेति। देहादिसंघातवदित्यपेरर्थः। लौकिकावगतेरिवात्मावगतेरपि फलाव्यतिरेकमुदाहरणेन स्फोरयति -- यथेति। फलमज्ञाननिवृत्तिः। कर्मविधिश्रुतिवदित्युक्तं दृष्टान्तं विघटयति -- न चेति। अनादिकालप्रवृत्तस्वाभाविकप्रवृत्तिव्यक्तीनां प्रतिबन्धेन यागाद्यलौकिकप्रवृत्तिव्यक्तीर्जनयति? कर्मकाण्डश्रुतिस्तज्जननं च चित्तशुद्धिद्वारा प्रत्यगात्माभिमुख्यप्रवृत्तिमुत्पादयति? तथाच कर्मविधिश्रुतीनां पारंपर्येण प्रत्यगात्मज्ञानार्थत्वात्तात्त्विकप्रामाण्यसिद्धिरित्यर्थः। नन्वेवमपि श्रुतेर्मिथ्यात्वाद्धूमाभासवदप्रामाण्यमिति चेन्नेत्याह -- मिथ्यात्वेऽपीति। स्वरूपेणासत्यत्वेऽपि सत्योपेयद्वारा प्रामाण्यमित्यत्र दृष्टान्तमाह -- यथेति। मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणानां श्रुतेऽर्थे प्रामाण्याभावेऽपि शेषिविध्यनुरोधेन प्रामाण्यवत्प्रकृतेऽपि श्रुतेः स्वरूपेणासत्याया विषयसत्यतयाः सत्यत्वे प्रामाण्यमविरुद्धमित्यर्थः वाक्यस्य शेषिविध्यनुरोधेन प्रामाण्यं नालौकिकमित्याह -- लोकेऽपीति। कर्मकाण्डश्रुतीनामुक्तरीत्या परंपरया प्रामाण्येऽपि साक्षात्प्रामाण्यमुपेक्षितमित्याशङ्क्याह -- प्रकारान्तरेति। आत्मज्ञानोदयात्प्रागवस्था प्रकारान्तरं? तत्र स्थितानां कर्म श्रुतीनामज्ञातसंबन्धबोधकत्वेन साक्षादेव प्रामाण्यमिष्टमित्यर्थः। ज्ञानात्पूर्वं कर्मश्रुतीनां व्यावहारिकप्रामाण्ये दृष्टान्तमाह -- प्रागिति। प्रातीतिककर्तृत्वस्याविद्यकत्वेऽपि श्रुतिप्रामाण्यमप्रत्यूहमित्युक्तं संप्रति कर्तृत्वस्य प्रकारान्तरेण पारमार्थिकत्वमुत्थापयति -- यत्त्विति। स्वव्यापाराभावे संनिधिमात्रेण कुतो मुख्यं कर्तृत्वमित्याशङ्क्य दृष्टान्तमाह -- यथेति। स्वयमयुध्यमानत्वे कथं तत्फलवत्त्वमित्याशङ्क्य प्रसिद्धिवशादित्याह -- जित इति। कायिकव्यापाराभावेऽपि कर्तृत्वस्य मुख्यत्वे दृष्टान्तमाह -- सेनापतिरिति। तस्यापि फलवत्त्वं राजवदविशिष्टमित्याह -- क्रियेति। अन्यकर्मणान्यस्य संनिहितस्य मुख्ये कर्तृत्वे वैदिकमुदाहरणमाह -- यथा चेति। कथमृत्विजां कर्म यजमानस्येत्याशङ्क्याह -- तत्फलस्येति। स्वव्यापारादृते संनिधेरेवान्यव्यापारहेतोर्मुख्यकर्तृत्वे दृष्टान्तान्तरमाह -- यथाचेति। क्रियां कुर्वत्कारणं कारकमित्यङ्गीकारविरोधान्नैतदिति दूषयति -- तदसदिति। कारकविशेषविषयत्वेनाङ्गीकारोपपत्तिरिति शङ्कते -- कारकमिति। स्वव्यापारमन्तरेण न किंचिदपि कारकमिति परिहरति -- न राजेति। दर्शनमेव विशदयति -- राजेति। तथा राज्ञो युद्धे योधयितृत्वेन धनदानेन च मुख्यं कर्तृत्वं तथा फलभोगेऽपि मुख्यमेव तस्य कर्तृत्वमित्याह -- तथेति। यदुक्तमृत्विक्कर्म यजमानस्येति तत्राह -- यजमानस्यापीति। स्वव्यापारादेव मुख्यं कर्तृत्वमिति स्थिते फलितमाह -- यस्मादिति। तदेव प्रपञ्चयति -- यदीति। तर्हि संनिधानादेव मुख्यं कर्तृत्वं राजादीनामुपगतमिति नेत्याह -- न तथेति। राजादीनां स्वव्यापारवत्त्वे पूर्वोक्तं सिद्धमित्याह -- तस्मादिति। राजप्रभृतीनां संनिधेरेव कर्तृत्वस्य गौणत्वे जयादिफलवत्त्वस्यापि सिद्धं गौणत्वमित्याह -- तथा चेति। तत्र पूर्वोक्तं हेतुत्वेन स्मारयति -- नेति। अन्यव्यापारेणान्यस्य मुख्यकर्तृत्वाभावे फलितमुपसंहरति -- तस्मादिति। कथं तर्हि त्वयात्मनि कर्तृत्वादि स्वीकृतं नहि बुद्धेस्तदिष्टं कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वादिति न्यायात्तत्राह -- भ्रान्तीति। कर्तृत्वाद्यात्मनि भ्रान्तमित्येतदुदाहरणेन स्फोरयति -- यथेति। मिथ्याज्ञानकृतमात्मनि,कर्तृत्वादीत्यत्र व्यतिरेकं दर्शयति -- नचेति। उक्तव्यतिरेकफलं कथयति -- तस्मादिति। संसारभ्रमस्याविद्याकृतत्वे सिद्धे परमप्रकृतमुपसंहरति -- इति सम्यगिति। शास्त्रतात्पर्यार्थं विचारद्वारा निर्धार्यानन्तरश्लोकमवतारयति -- सर्वमिति। प्रकृते खल्वष्टादशाध्याये गीताशास्त्रार्थं सर्वं प्रतिपत्तिसौकर्यार्थमुपसंहृत्यान्ते च सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यादौ विशेषस्तस्य संक्षेपेणोपसंहारं कृत्वा संप्रदायविधिवचनस्यावसरे सतीदानीमिति योजना। किमिति विस्तरेणोपसंहृतः शास्त्रार्थः संक्षिप्योपसंह्रियते तत्राह -- शास्त्रार्थेति। संक्षेपविस्तराभ्यामुक्तोऽर्थः सर्वेषां दृढतया बुद्धिमधिरोहतीत्यर्थः। हितायेत्येतदेव व्याचष्टे -- संसारेति। कदाचनेति सर्वैः संबध्यते। प्रतिषेधसामर्थ्यसिद्धमर्थं कथयति -- भगवतीति। अर्थसिद्धेऽर्थे स्मृत्यन्तरमनुसृत्य मेधावित्वमन्तर्भावयति -- तत्रेति। विकल्पदर्शनात्तेषूक्तेषु विशेषणेषु मेधावित्वमपि प्रविशतीत्यर्थः। विकल्पपक्षे कथमधिकारिप्रतिपत्तिरिति तत्राह -- शुश्रूषेति। ताभ्यां युक्ताय भगवत्यसूयारहिताय तपस्विने वाच्यमिति संबन्धः। तद्युक्ताय शुश्रूषाभक्त्यनसूयासहितायेत्यर्थः। तपस्वित्वं मेधावित्वं वा निरपेक्षमधिकारिविशेषणमिति शङ्कां शातयति -- शूश्रूषेति। भगवद्विषयासूयाराहित्ये तात्पर्यं सूचयति -- भगवतीति। कस्मै तर्हि वाच्यमेतदित्याशङ्क्य पूर्वोक्तसर्वगुणसंपन्नायेत्याह -- गुरुशुश्रूषेति। अनुक्तेतरविशेषणोपलक्षणार्थमुभयग्रहणम्। मेधाविनस्तपस्वित्वं नातीवापेक्षते सर्वमन्यद्बाधकाभावादपेक्षितमेवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.67।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.67।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.67।। --,इदं शास्त्रं ते तव हिताय मया उक्तं संसारविच्छित्तये अतपस्काय तपोरहिताय न वाच्यम् इति व्यवहितेन संबध्यते। तपस्विनेऽपि अभक्ताय गुरौ देवे च भक्तिरहिताय कदाचन कस्यांचिदपि अवस्थायां न वाच्यम्। भक्तः तपस्वी अपि सन् अशुश्रूषुः यो भवति तस्मै अपि न वाच्यम्। न च यो मां वासुदेवं प्राकृतं मनुष्यं मत्वा अभ्यसूयति आत्मप्रशंसादिदोषाध्यारोपणेन ईश्वरत्वं मम अजानन् न सहते? असावपि अयोग्यः? तस्मै अपि न वाच्यम्। भगवति अनसूयायुक्ताय तपस्विने भक्ताय शुश्रूषवे वाच्यं शास्त्रम् इति,सामर्थ्यात् गम्यते। तत्र मेधाविने तपस्विने वा इति अनयोः विकल्पदर्शनात् शुश्रूषाभक्तियुक्ताय तपस्विने तद्युक्ताय मेधाविने वा वाच्यम्। शुश्रूषाभक्तिवियुक्ताय न तपस्विने नापि मेधाविने वाच्यम्। भगवति असूयायुक्ताय समस्तगुणवतेऽपि न वाच्यम्। गुरुशुश्रूषाभक्तिमते च वाच्यम् इत्येषः शास्त्रसंप्रदायविधिः।।संप्रदायस्य कर्तुः फलम् इदानीम् आह --,

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【 Verse 18.68 】

▸ Sanskrit Sloka: य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति | भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय: ||

▸ Transliteration: ya idaṁ paramaṁ guhyaṁ mad-bhakteṣv abhidhāsyati | bhaktiṁ mayi parāṁ kṛtvā māmevaiṣyaty asaṁśayaḥ ||

▸ Glossary: yaḥ: anyone; idaṁ: this; paramaṁ: most; guhyaṁ: confidential; mat: Mine; bhakteṣu: amongst devotees of; abhidhāsyati: explains; bhaktiṁ: devotional service; mayi: unto Me; parāṁ: transcendental; kṛtvā: having done; mām: unto Me; eva: certainly; eṣyati: comes; asaṁśayaḥ: without doubt

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.68 One who communicates the supreme secret to the devotees performs the highest devotional service to Me, and at the end he will without doubt, come back to Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.68।।मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद(गीताग्रन्थ) को मेरे भक्तोंमें कहेगा? वह मुझे ही प्राप्त होगा -- इसमें कोई सन्देह नहीं है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.68।। जो पुरुष मुझसे परम प्रेम (परा भक्ति) करके इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश मेरे भक्तों को देता है? वह निसन्देह मुझे ही प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.68 यः who? इमम् this? परमम् supreme? गुह्यम् secret? मद्भक्तेषु in My devotees? अभिधास्यति shall declare? भक्तिम् devotion? मयि in Me? पराम् supreme? कृत्वा having done? माम् to Me? एव even? एष्यति shall come? असंशयः doubtless.Commentary This supreme secret The teachings of the Gita as taught above in the form of a dialogue between Lord Krishna and Arjuna. Why is it called a supreme secret Because it helps one to attain immortality or freedom from the whell of birth and death.He alone? who has devotion? is alified to receive the teachings of the Gita.Teach with the faith that he is thus doing service to the Lord? the Supreme Teacher.Doubtless may also mean freedom from doubts.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.68. Whosoever shall declare this highest secret to My devotees, he, cultivating an utmost devotion towards Me, and not entertaining any doubt, shall reach Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.68 But he who teaches this great secret to My devotees, his is the highest devotion, and verily he shall come unto Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.68 He who proclaims among My devotees this supreme mystery, shall come to Me, aciring supreme devotion towards Me. There is no doubt about this.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.68 He who, entertaining supreme devotion to Me, will speak of this highest secret, to My devotees will without doubt reach Me alone.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.68 He who with supreme devotion to Me will teach this supreme secret to My devotees, shall doubtlessly come to Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.68 See Comment under 18.72

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.68 Whose expounds or elucidates this supreme mystery to My devotees, he, aciring supreme devotion towards Me, will reach Me only. There is no doubt about this.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.68 Yah, he who; abhi-dhasyati, will speak of, i.e., will present with the help of the text and its meaning, as I have done to you; imam, this; paramam, highest-that which has Liberation as its purpose; guhyam, secret, as spoken of above-(i.e.) the text in the form of a conversation between Kesava and Arjuna; madbhaktesu, to My devotees-. How will present? This is being stated: Krtva, entertaining; param, supreme; bhaktim, devotion; mayi, to Me, i.e., entertainting an idea thus-'A service is being rendered by me to the Lord who is the supreme Teacher'-. Tho him comes this result: esyati, he will reach; mam, Me; eva, alone. He is certainly freed. No doubt should be entertained in this regard. By the repetition of (the word) bhakti (devotion) [In the word madbhaktesu.], it is understood that one becomes fit for being taught (this) Scripture by virtue of devotion alone to Him. Besides,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.68।। भगवान् श्रीकृष्ण इस विचाराधीन श्लोक में ज्ञान प्रदाता आचार्य की स्तुति करते हैं। जो आचार्य गीतोपदिष्ट ज्ञान की यथार्थ व्याख्या करके श्रोतृ वर्ग को श्रीकृष्ण की जीवन पद्धति में प्रवृत्त कर सकता है? वही श्रेष्ठ उपदेष्टा है। आन्तरिक हो या बाह्य? अवगुण का नाश करो। यही भगवान् श्रीकृष्ण का प्रमुख सिद्धांत है। ऐसे शक्तिशाली सिद्धांत पर निर्मित संस्कृति का प्रचार करने के लिए केवल पाण्डित्य ही पर्याप्त नहीं? वरन् उस आचार्य में श्रीकृष्ण की क्षमता भी आवश्यक है। इसलिए वे श्रेष्ठ आचार्य को गौरवान्वित करते हैं। जिन साधकों में सम्पूर्ण और शक्तिशाली जीवन जीने की आध्यात्मिक पिपासा है? उन्हें भगवद्गीता विशेष आकर्षक और अर्थवान् प्रतीत होती है। अत? यहाँ कहते हैं? इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश ऐसे भक्तों को देना चाहिए। भक्ति का अर्थ है आदर्श के साथ तादात्म्य। जो भक्तगण गीतोपदिष्ट जीवन पद्धति के साथ तादात्म्य स्थापित करके तदनुसार अपना जीवन निर्मित कर सकते हैं? वे इस ज्ञान के अधिकारी हैं।यदि शिष्य साधन भक्ति से युक्त होना चाहिए तो गुरु को परम भक्त अर्थात् पराभक्ति से युक्त होना आवश्यक है। ऐसा ब्रह्मनिष्ठ आचार्य जो योग्य शिष्यों को यथार्थ ज्ञान प्रदान करता है? वह? निसन्देह? मुझे प्राप्त होता है।एक सुशिक्षित पुरुष अपनी कृतज्ञता की भावना के कारण स्वयं को ज्ञान की देवी का ऋणी अनुभव करता है। वस्तुत? हमारी संस्कृति में इसे ऋषि ऋण कहा गया है। इस ऋण से मुक्त होने के लिए हमें ऋषियों के उपदेश का अध्ययन तदनुसार आचरण एवं ग्रहण किये ज्ञान का अध्यापन करना चाहिए। यह हमारा कर्तव्य है।दर्शन ही प्रत्येक संस्कृति का अधिष्ठान होता है। हिन्दू संस्कृति का पुनरुत्थान एवं गौरवमय पुनर्प्रतिष्ठान तभी संभव होगा? जब उपनिषदों से प्रतिपादित तत्त्वज्ञान के द्वारा वह पोषित की जायेगी। हमारी संस्कृति के जनक? महान् ऋषिगण इस रहस्य को जानते थे। इसलिए उन्होंने अपने शिष्यों से इस ज्ञान का प्रचार करने के लिए सदैव आग्रह किया है। केवल इसी माध्यम से सामान्य जनों के हृदय को ज्ञानालोक से आलोकित किया जा सकता है। संस्कृति की उन्नति का भी यही प्रमुख साधन है।यदि कोई विद्यार्थी इस ज्ञान और संस्कृति का अल्पांश भी समझता है? परन्तु उसका प्रसार करने का प्रयत्न नहीं करता है? तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसमें न बुद्धि की गतिशीलता है और न प्रेरणा की तरलता। परन्तु जो पुरुष गीता के सिद्धांतों का उपदेश देने में समर्थ है? उसका यहाँ अभिनन्दन करते हैं और उसे सर्वोच्च पुरस्कार का आश्वासन देते है कि वह? निसन्देह? मुझे प्राप्त होगा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.68।।एवं संप्रदायस्य विधिमुक्त्वा तस्य कर्तुः फलमाह -- य इति। इमं यथोक्तं केशवार्जनयोः संवादरुपं ग्रन्थम्। इदमिति पाठस्त्वाचार्यैरव्याख्यातातत्वादनादरणीयः। य इमं निःश्रेयसार्थत्वात्परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं रहस्यार्थविषयत्वात्। मद्भक्तेषु मयि भक्तिमत्सु योऽध्यापकोऽभिधास्यति ग्रन्थतोऽर्थताश्चाध्यापयिष्यति। यथा मयि वासुदेवे नित्यभक्ते त्वयि मया ग्रन्थतोऽर्थतश्च स्थापितस्तथा मद्भक्तेषु यो ग्रन्थमिमं स्थापयिष्यति स भक्तिं मयि परां कृत्वा भगवतः परमगुरोः शुश्रूषा मया क्रियत इत्येवं कृत्वा मामेवैष्यति नान्यम्। मुक्तो भविष्यत्येवेत्यर्थः। अत्र संशयो न कर्तव्यः। मद्भक्तेष्विति भक्तेः पुनर्ग्रहणं भक्तिमात्रेण शास्त्रसंप्रदाने पात्रं भवतीति गम्यते। भक्तिं परामद्वैतलक्षणामुपासनां कुत्वेति तु गीताशास्त्रप्रदानलक्षणभक्तेः फलं वक्तुं प्रवृत्तस्येतरभक्तिफलकथनमनुचितमित्यभिप्रेत्याचार्यैर्न व्याख्यातम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.68।।एवं संप्रदायस्य विधिमुक्त्वा तस्य कर्तुः फलमाह -- य इदमिति। यः संप्रदायस्य प्रवर्तकः इममावयोः संवादरूपं ग्रन्थम्। परमं निरतिशयपुरुषार्थसाधनं गुह्यं रहस्यार्थत्वात्सर्वत्र प्रकाशयितुमन्वहं मद्भक्तेषु मां भगवन्तं वासुदेवं प्रत्यनुरक्तेष्वभिधास्यत्यभितो ग्रन्थतोऽर्थतश्च धास्यति स्थापयिष्यति। भक्तेः पुनर्ग्रहणात्पूर्वोक्तविशेषणत्रयरहितस्यापि भगवद्भक्तिमात्रेण पात्रता सूचिता भवति। कथमभिधास्यति तत्राह -- भक्तिमिति। भक्तिं मयि परां कृत्वा भगवतः परमगुरोः शुश्रूषैवेयं मया क्रियत इत्येवं कृत्वा निश्चित्य योऽभिधास्यति स मामेवैष्यति मां भगवन्तं वासुदेवमेष्यत्येवाचिरान्मोक्षत एवं संसारादत्र संशयो न कर्तव्यः। अथवा मयि परां भक्तिं कृत्वाऽसंशयो निःसंशयः सन्मामेष्यत्येवेति वा मामेवैष्यति नान्यमिति यथाश्रुतमेव वा,योज्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.68।।एवं संप्रदायविधिमुक्त्वा संप्रदायकर्तुः फलमाह -- य इदमिति। इदं परमं गुह्यं यो भक्तिहीनो मानपूजाद्यर्थी सन् मद्भक्तेष्वभिधास्यति सोऽपि ततएव पुण्यान्मयि परमेश्वरे चिदेकरसे परां भक्तिमद्वैतलक्षणामुपासनां कृत्वा तत्रादरं प्राप्य तामनुष्ठाय च मामेवैष्यति मुक्तिं प्राप्स्यतीत्यर्थः। असंशयः सशयोऽत्र नास्ति। स्मर्यते हि अजामिलादीनां भक्तिगन्धहीनानामपि पुत्रसंकेतिनेन नारायणेतिनाम्ना,स्नेहवशादाह्वयतां तावन्मात्रतुष्टेन भगवता सद्गतिर्दत्ता किमु वक्तव्यं यो वाचा एतावच्छास्त्ररहस्यं प्रतिपादयति तस्य भक्तिलाभादिक्रमेण कृतकृत्यत्वं भविष्यतीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.68।।एवमेतद्दोषयुक्तेभ्यो न वाच्यं? एतद्दोषरहितेभ्यश्च सर्वथा वाच्यमित्येतदुपदेशनफलमाह -- य इदमिति। यः कश्चन दुर्लभः मद्भक्तिरसाविष्टं इमं पूर्वश्लोकोक्तं परमं सर्वोत्कृष्टं गुह्यं गोप्यं मद्भक्तेषु पूर्वोक्तदोषरहिततद्गुणसुसम्पन्नेषु अभिधास्यति वक्ष्यति श्रोता वक्ता चैतच्छ्रवणेन असंशयः सन्देहरहितः सन् परां सर्वोत्कृष्टां पूर्वोक्तां मयि भक्ितं कृत्वा मामेव एष्यति? प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.68।।एतैर्दोषैर्विरहितेभ्यो मद्भक्तेभ्योगीताशास्त्रोपदेष्टुः फलमाह -- य इति। मद्भक्तेष्वभिधास्यति मद्भक्तेभ्यो यो वक्ष्यति स मयि परां भक्तिं करोति। ततो निःसंशयः सन् मामेव प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.68।।एतद्दोषरहितास्तु मद्भक्ता एव? नान्य इति तेभ्यो दाने फलमाह -- य इदमिति। मद्भक्तेष्वभिधास्यति स मामेवैष्यति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.68।।अब इस शास्त्रपरम्पराको चलानेवालोंके लिये फल बतलाते हैं --, जो मनुष्य? परम कल्याण जिसका फल है ऐसे इस उपर्युक्त कृष्णार्जुनसंवादरूप अत्यन्त गोप्य गीताग्रन्थको मुझमें भक्ति रखनेवाले भक्तोंमें सुनावेगा -- ग्रन्थरूपसे या अर्थरूपसे स्थापित करेगा? अर्थात् जैसे मैंने तुझे सुनाया है वैसे ही सुनावेगा -- यहाँ भक्तिका पुनः ग्रहण होनेसे यह पाया जाता है कि मनुष्य केवल भगवान्की भक्तिसे ही शास्त्र प्रदानका पात्र हो जाता है। कैसे सुनावेगा सो बतलाते हैं। मुझमें पराभक्ति करके? अर्थात् परमगुरु भगवान्की मैं यह सेवा करता हूँ ऐसा समझकर? ( जो इसे सुनावेगा ) उसका यह फल है कि वह मुझे ही प्राप्त हो जायगा अर्थात् निःसंदेह मुक्त हो जायगा -- इसमें संशय नहीं,करना चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.68।। व्याख्या --   भक्तिं मयि परां कृत्वा -- जो मेरेमें पराभक्ति करके इस गीताको कहता है। इसका तात्पर्य है कि जो रुपये? मानबड़ाई? भेंटपूजा? आदरसत्कार आदि किसी भी वस्तुके लिये नहीं कहता? प्रत्युत भगवान्में भक्ति हो जाय? भगवद्भावोंका मनन हो जाय? इन भावोंका प्रचार हो जाय? इनकी आवृत्ति हो जाय? सुनकर लोगोंका दुःख? जलन? सन्ताप आदि दूर हो जाय? सन्ताप आदि दूर हो जाय? सबका कल्याण हो जाय -- ऐसे उद्देश्यसे कहता है। इस प्रकार भगवान्की भक्तिका उद्देश्य रखकर कहना ही परमभक्ति करते कहना है।इसी अध्यायके चौवनवें श्लोकमें कही गयी पराभक्तिमें अन्तर है। वहाँ मदभक्तिं लभते पराम् पदोंसे कहा गया है कि ब्रह्मभूत होनेके बाद सांख्ययोगी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् भगवान्से जो अनादिकालका सम्बन्ध है? उसकी स्मृति हो जाती है। परन्तु यहाँ सांसारिक मानबड़ाई आदि किसीकी भी किञ्चिन्मात्र कामना न रखकर केवल भगवद्भक्तिकी? भगवत्प्रेमकी अभिलाषा रखना पराभक्ति है? इसलिये यहाँ भक्तिं मयि परां कृत्वामेरेमें पराभक्ति करके -- ऐसा कहा गया है।य इदं परमं गुह्यम् -- इन पदोंसे पूरी गीताका परमगुह्य संवाद लेना चाहिये? जो कि गीताग्रन्थ कहलाता है। परमं गुह्यम् पदोंमें ही गुह्य? गुह्यतर? गुह्यतम और सर्वगुह्यतम -- ये सब बातें आ जाती हैं।मद्भक्तेष्वभिधास्यति -- जिसकी भगवान् और उनके वचनोंमें पूज्यबुद्धि है? आदरबुद्धि है? श्रद्धाविश्वास है और सुनना चाहता है? वह भक्त हो गया। ऐसे मेरे भक्तोंमें जो इस संवादको कहेगा? वह मेरेको प्राप्त होगा।पीछेके श्लोकमें नाभक्ताय पदमें एकवचन दिया और यहाँ भद्भक्तेषु पदमें बहुवचन दिया। इसका तात्पर्य है कि जहाँ बहुतसेश्रोता सुनते हों? वहाँ पहले बताये दोषोंवाला कोई व्यक्ति बैठा हो तो वक्ताके लिये पहले कहा निषेध लागू नहीं पड़ेगा क्योंकि वक्ता केवल उस (दोषी) व्यक्तिको गीता सुनाता ही नहीं। जैसे कोई कबूतरोंको अनाजके दाने डालता है और कबूतर दाने चुगते हैं। यदि उनमें कोई कौआ आकर दाने चुगने लग जाय तो उसको उड़ाया थोड़े ही जा सकता है क्योंकि दाना डालनेवालेका लक्ष्य कबूतरोंको दाना डालना ही रहता है? कौओंको नहीं ऐसे ही कोई गीताका प्रवचन कर रहा है और उस प्रवचनको सुननेके लिये बीचमें कोई नया व्यक्ति आ जाय अथवा कोई उठकर चल दे तो वक्ताका ध्यान उसकी तरफ नहीं रहता। वक्ताका ध्यान तो सुननेवाले लोगोंकी तरफ होता है और उन्हींको वह सुनाता है।मामेवैष्यत्यसंशयः -- अगर गीता सुनानेवालेका केवल मेरा ही उद्देश्य होगा तो वह मेरेको प्राप्त हो जायगा? इसमें कोई सन्देहकी बात नहीं है। कारण कि गीताकी यह एक विचित्र कला है कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्मोंसे भी परमात्माका निष्कामभावपूर्वक पूजन करता हुआ परमात्माको प्राप्त हो जाता है (18। 46)? और जो खानापीना? शौचस्नान आदि शारीरिक कार्योंको भी भगवान्के अर्पण कर देता है? वह भी शुभअशुभ फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त होकर भगवान्को प्राप्त हो जाता है (9। 2728)। तो फिर जो केवल भगवान्की भक्तिका लक्ष्य करके गीताका प्रचार करता है? वह भगवान्को प्राप्त हो जाय? इसमें कहना ही क्या है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.68।।शास्त्रसंप्रदायप्रवृत्त्यर्थमुत्तरश्लोकप्रवृत्तिं दर्शयति -- संप्रदायस्येति। य इत्यध्यापको निर्दिश्यते। परमत्वं ग्रन्थस्य निरतिशयपुरुषार्थसाधनत्वमित्याह -- परममिति। गोप्यत्वमस्य रहस्यार्थविषयत्वात्। यथोक्तसंवादस्य ग्रन्थतोऽर्थतश्च भक्तेषु स्थापने दृष्टान्तमाह -- यथेति। मयि वासुदेवे भगवति? अनन्यभक्ते त्वयि यथा मया ग्रन्थोऽर्थतः स्थापितस्तथा मद्भक्तेष्वन्येष्वपि यो ग्रन्थमिमं स्थापयिष्यति तस्येदं फलमित्युत्तरत्र संबन्धः। नाभक्तायेति भक्तेरधिकारिविशेषणत्वोक्तेर्मद्भक्तेष्विति पुनर्भक्तिग्रहणमनर्थकमित्याशङ्क्याह -- भक्तेरिति। शुश्रूषादिसहकारिराहित्यं केवलशब्दार्थः। यद्यपि मात्रशब्देन सूचितमेतत्तथापीतरेण स्फुटीकृतमित्यविरोधः। प्रश्नपूर्वकमभिधानप्रकारमभिनयति -- कथमित्यादिना। भगवति भक्तिकरणप्रकारं प्रकटयति -- भगवत इति। यच्छब्दापेक्षितं पूरयति -- तस्येति। मामेष्यत्येवेत्यन्वयं गृहीत्वा व्याचष्टे -- मुच्यत एवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.68।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.68।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.68।। --,यः इमं यथोक्तं परमं परमनिःश्रेयसार्थं केशवार्जुनयोः संवादरूपं ग्रन्थं गुह्यं गोप्यतमं मद्भक्तेषु मयि भक्ितमत्सु अभिधास्यति वक्ष्यति? ग्रन्थतः अर्थतश्च स्थापयिष्यतीत्यर्थः? यथा त्वयि मया। भक्तेः पुनर्ग्रहणात् भक्ितमात्रेण केवलेन शास्त्रसंप्रदाने पात्रं भवतीति गम्यते। कथम् अभिधास्यति इति? उच्यते

Chapter 18 (Part 40)

-- भक्तिं मयि परां कृत्वा भगवतः परमगुरोः अच्युतस्य शुश्रूषा मया क्रियते इत्येवं कृत्वेत्यर्थः। तस्य इदं फलम् -- मामेव एष्यति मुच्यते एव। असंशयः अत्र संशयः न कर्तव्यः।।किं च --,

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【 Verse 18.69 】

▸ Sanskrit Sloka: न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: | भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि ||

▸ Transliteration: na ca tasmānmanuṣyeṣu kaścin me priya kṛttamaḥ | bhavitā na ca me tasmād anyaḥ priyataro bhuvi ||

▸ Glossary: na: never; ca: and; tasmāt: therefore; manuṣyeṣu: among mankind; kaścit: anyone; me: My; priyakṛttamaḥ: more dear; bhavitā: will become; na: nor; ca: and; me: My; tasmāt: than him; anyaḥ: other; priyataraḥ: dearer; bhuvi: in this world

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.69 No other person shall do a more pleasing service to Me, and no one on the earth shall be more dear to Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.69।।उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.69।। न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा प्रिय इस पृथ्वी पर दूसरा कोई होगा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.69 न not? च and? तस्मात् than he? मनुष्येषु among men? कश्चित् any? मे of Me? प्रियकृत्तमः one who does dearer service? भविता shall be? न not? च and? मे of Me? तस्मात् than he? अन्यः another? प्रियतरः dearer? भुवि on the earth.Commentary He who hands down this Gita to My devotees does immense service to Me. He is very dear to Me. There is none in the present generation who des dearer service to Me? nor shall there be in future also in this world.Bhuvi On earth in this world.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.69. And, excepting him there would be none among men who is the best performer of what is dear to Me; and other than him there shall be none else who is dearer to Me on earth.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.69 Nor is there among men any who can perform a service dearer to Me than this, or any man on earth more beloved by Me than he.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.69 Not among men is there any one who does dearer service to Me than he. Nor shall there be another on earth dearer to Me than he.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.69 And as compared with him, none else among human beings is the best accomplisher of what is dear to Me. Moreover, nor will there be anyone else in the world dearer to Me than he.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.69 Nor is there any among men who does dearer service to Me, nor shall there be another on earth dearer to Me than he.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.69 See Comment under 18.72

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.69 There never exists nor has existed anyone other than such a person as described, who does greater service to Me than he. In the future too, there will not be another such. The first reference is to those who are not worthy to hear the Gita. It is meant to teach that explaining it to them is more displeasing to the Lord than not teaching to those who are worthy.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.69 Ca, and; tasmat, as compared with him, with the one who hands down the Scripture; na kascit, none else; manusyesu, among human beings; is priya-krt-tamah, the best accomplisher of what is dear; me, to Me, i.e., among the present human beings, surely none else other than him exists who is a better accomplisher of what I cherish. Moreover, na bhavita, nor will there be in future; anyah, anyone else, a second person; bhuvi, in he world, here; priyatarah, dearer; tasmat, than him. [It may be argued that, since for a seeker of Liberation meditation is the best means for It, therefore he will have no inclination to transmit scriptural teachings. To this the Lord's answer is: One longing for Liberation has a duty to impart this scriptural teaching to one possessing the aforesaid alities.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.69।। यह भी आचार्य की स्तुति है। यहाँ भगवान् बताते हैं कि किस प्रकार ऐसा श्रेष्ठ आचार्य भगवत्स्वरूप को प्राप्त होता है। गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण विशेष बल देकर कहते हैं? उसके तुल्य इस जगत् में मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला और कोई नहीं है। केवल इतना ही नहीं? अपितु भविष्य में भी? उससे अधिक मेरा प्रिय इस पृथ्वी पर कोई न होगा।सम्पूर्ण गीता? में अनेक स्थानों पर इस मनोवैज्ञानिक सत्य को दोहराया गया है कि ध्येयवस्तु से भिन्न समस्त वृत्तियों का परित्याग करके यदि कोई साधक अपने मन को ध्येयवस्तु में एकाग्र या समाहित कर लेता है? तो वह स्वयं ध्येयस्वरूप बनकर अनन्त आत्मा का अनुभव कर सकता है। जो साधक गीता के अध्ययन और चिन्तनमनन में ही अपने समय का सदुपयोग करता है तथा उसी का प्रचार प्रसार करता है? तो उसके मन में उस ज्ञान के प्रति अत्यधिक आदर और सम्मान जागृत होता है। फलत? वह उसके सारतत्त्व से तादात्म्य करके परम शान्ति का अनुभव करता है? जो परमात्मा का स्वरूप ही है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं? ऐसे पुरुष से बढ़कर मेरा कोई प्रिय नहीं है क्योंकि वह ईश्वर के स्वरूप के ज्ञान का प्रचार करता है। इससे अधिक मेरा अतिशय प्रिय कार्य कोई नहीं है।इस सन्दर्भ में? यह ध्यान रहे कि गीताज्ञान के प्रचार के लिए हमें स्वयं उसमें पूर्ण प्रवीणता प्राप्त करने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ ज्ञान हम ग्रहण कर पाते हैं? उसका तत्काल ही प्रेमपूर्वक प्रचार ऐसे लोगों में करना चाहिए? जो इस विषय से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। प्रचार के साथ ही? हमें इस ज्ञान के अनुसार ही जीवन यापन करना चाहिए ऐसा पुरुष मुझे अतिशय प्रिय है। यह भगवान् श्रीकृष्ण का आश्वासन है।न केवल उपदेशक? वरन् इस ज्ञान का निष्ठावान् जिज्ञासु विद्यार्थी भी अभिनन्दन का पात्र है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.69।।किंच -- नचेति। तस्मान्मद्भक्तेभ्यो गीताशास्त्रव्याख्यातुः सकाशादन्यो मनुष्येषु मध्यें कश्चिदपि मम प्रियकृत्तमोऽत्यन्तं परितोषकर्ता नास्ति। नच कालातरे भविता भविष्यति। ममापि तस्मादयः प्रियतरोऽधुनो भुवि तवान्नास्ति। नच कालान्तरेऽपि भविष्यतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.69।।किंच -- नचेति। तस्माद्भक्तेषु शास्त्रसंप्रदायकृतः सकाशादन्यो मनुष्येषु मध्ये कश्चिदपि मे मम प्रियकृत्तमोऽतिशयेन प्रियकृत् मद्विषयप्रीत्यतिशयवान्नास्ति वर्तमाने काले? नापि प्रागासीत्तादृक्कश्चित्? नच कालान्तरे भविता भविष्यति? ममापि तस्मादन्यः प्रियतरः प्रीत्यतिशयविषयः कश्चिदप्यासीन्नाधुना च भुवि लोकेऽस्मिन्नास्ति नच कालान्तरे भवितेत्यावृत्त्या योज्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.69।।ननु अश्रद्धया कृतं सर्वं व्यर्थमिति त्वयैवोक्तं कथमभक्तस्याप्येतच्छास्त्राभिधानतो भक्त्यादिलाभः संभवेदित्याशङ्क्याह -- न चेति। तस्मादेतच्छास्त्रप्रवर्तकादन्यो मनुष्येषु मे मम प्रियकृत्तमो न च कश्चिदस्ति। इयमेव मम महती वाचिकी भक्तिस्तां कृत्वा सोपानारोहक्रमेण मे मम प्रियतरो भविता भविष्यति।अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः इति। न च भुवि एतस्मादन्यत्परमार्थसाधनमस्तीति भावः। अक्षरार्थः स्पष्टः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.69।।ननु कथमेतत्कथनश्रवणमात्रेण त्वां प्राप्नोति इत्यत आह -- न चेति। तस्मादेतद्वक्तुः सकाशात् मनुष्येषु अधिकारिषु मे प्रियकृत्तमः प्रियकर्तृषु मध्ये अतिशयितो नच? नास्तीत्यर्थः। मद्भक्तानां मत्सङ्गार्थयत्नप्रर्दशकत्वादिति भावः। च पुनः तस्मात् श्रोतुः सकाशात् श्रुत्वा मदाज्ञप्तसेवादिकरणात् अन्यो भुवि प्रियतरो भविता नेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.69।।किंच -- नचेति। तस्मान्मद्भक्तेभ्यो गीताशास्त्रव्याख्यातुः सकाशादन्यो मनुष्येषु मध्यें कश्चिदपि मम प्रियकृत्तमोऽत्यन्तं परितोषकर्ता नास्ति। नच कालातरे भविता भविष्यति। ममापि तस्मादन्यः प्रियतरोऽधुना भुवि तावन्नास्ति। नच कालान्तरेऽपि भविष्यतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.69।।किञ्च -- न च तस्मादिति। मे प्रियकृत्कश्चित्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.69।।तथा --, उस गीताशास्त्रकी परम्परा चलानेवाले भक्तसे बढ़कर? मेरा अधिक प्रिय कार्य करनेवाला? मनुष्योंमें? कोई भी नहीं है। अर्थात् वह मेरा अतिशय प्रिय करनेवाला है? वर्तमान मनुष्योंमें उससे बढ़कर प्रियतम कार्य करनेवाला और कोई नहीं है? तथा भविष्यमें भी इस भूलोकमें उससे बढ़कर प्रियतर कोई दूसरा नहीं होगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.69।। व्याख्या --   न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः -- जो अपनेमें लौकिकपारलौकिक प्राकृत पदार्थोंकी महत्ता? लिप्सा? आवश्यकता रखता है और रखना चाहता है? वह पराभक्ति ( 18। 68) के अन्तर्गत नहीं आ सकता। पराभक्तिके अन्तर्गत नहीं आ सकता है? जिसका प्राकृत पदार्थोंको प्राप्त करनेका किञ्चिन्मात्र भी उद्देश्य नहीं है और जो भगवत्प्राप्ति? भगवद्दर्शन? भगवत्प्रेम आदि पारमार्थिक उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है। ऐसा पुरुष ही भगवद्गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। यदि उसमें कभी मानबड़ाई आदिकी इच्छा आ भी जाय तो वह टिकेगी नहीं क्योंकि मानबड़ाई आदि प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं है।भगवान्के भक्तोंमें गीताका प्रचार करनेवाले उपर्युक्त अधिकारी मनुष्यके लिये ही तस्मात् पद देकर भगवान् कहते हैं कि मनुष्योंमें उसके समान मेरा प्रियकृत्तम अर्थात् अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है क्योंकि गीताप्रचारके समान दूसरा मेरा कोई प्रिय कार्य है ही नहीं।प्रियकृत्तमः पदमें जो कृत् पद आया है? उसका तात्पर्य है कि गीताका प्रचार करनेमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है? मानबड़ाई? आदरसत्कार आदिकी कोई कामना नहीं है केवल भगवत्प्रीत्यर्थ गीताके भावोंका प्रचार करता है। इसलिये वह प्रियकृत्तम -- भगवान्का अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला है।मनुष्योंमें प्रियकृत्तम कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का अत्यन्त प्यारा बननेके लिये मनुष्योंको ही अधिकार है। संसारमें कामनाओंकी पूर्ति कर लेना कोई महत्त्वकी? बहादुरीकी बात नहीं है। देवता? पशुपक्षी? नारकीय जीव? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि सभी योनियोंमें कामनाकी पूर्ति करनेका अवसर मिलता है परन्तु कामनाका त्याग करके परमात्माकी प्राप्ति करनेका अवसर तो केवल मनुष्ययोनिमें ही मिलता है। इस मनुष्ययोनिको प्राप्त करके परमात्माकी प्राप्ति करनेमें? परमात्माका अत्यन्त प्यारा बननेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि -- जिसमें अपनी मानबड़ाईकी वासना है? कुछ स्वार्थभाव भी है और जिसका अपना उद्धार करनेका तथा गीताके अनुसार जीवन बनानेका उद्देश्य वैसा (प्रियकृत्तमके समान) नहीं बना है परन्तु जिसके हृदयमें गीताका विशेष आदर है और गीताका पाठ करवाना? गीता कण्ठस्थ,करवाना? गीता मुद्रित करवाकर उसकी सस्ती बिक्री करना आदि किसी तरहसे गीताका प्रचार करता है और लोगोंको गीतामें लगाता है? उसके समान पृथ्वीमण्डलपर मेरा दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा।अपने धर्म? सम्प्रदाय? सिद्धान्त आदिका प्रचार करनेवाला व्यक्ति भगवान्का प्रिय तो हो सकता है? पर प्रियतर नहीं होगा। प्रियतर तो किसी तरहसे गीताका प्रचार करनेवाला ही होगा।भगवद्गीतामें अपना उद्धार करनेकी ऐसीऐसी विलक्षण? सुगम और सरल युक्तियाँ बतायी गयी हैं? जिनको मनुष्यमात्र अपने आचरणोंमें ला सकता है। तात्पर्य यह है कि जो गीताका आदर करता है? ऐसा मनुष्य हिंदू? मुसलमान? ईसाई? यहूदी? पारसी? बौद्ध आदि किसी भी धर्मको माननेवाला क्यों न हो किसी भी देश? वेश? वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो अपनी रुचिके अनुसार किसी भी शैली? उपाय? सिद्धान्त? साधनको माननेवाला क्यों न हो? वह यदि अपना किसी तरहका आग्रह न रखकर? पक्षपातविषमताको छोड़कर? किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेवाली चेष्टाका त्याग करके? मनमें किसी भी लौकिकपारलौकिक उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुकी कामना न रखकर? अपना सम्प्रदाय? अपनी टोनी बनानेका उद्देश्य न रखकर? केवल अपने कल्याणका उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार चलता है (अकर्तव्यका सर्वथा त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्यका लोकहितार्थ? निष्कामभावपूर्वक पालन करता है)? तो वह भी जीविकासम्बन्धी और खानापीना? सोनाजागना आदि शरीरसम्बन्धी सब काम करते हुए परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है? महान् आनन्द? महान् सुखको (गीता 6। 22) प्राप्त कर सकता है।गीता वेश? आश्रम? अवस्था? क्रिया आदिका परिवर्तन करनेके लिये नहीं कहती? प्रत्युत परिमार्जन करनेके लिये कहती है अर्थात् केवल अपने भाव और उद्देश्यको शुद्ध बनानेके लिये कहती है। गीताकी ऐसी युक्तियोंको जो भगवान्की तरफ चलनेवाले भक्तोंमें कहेगा? उससे उन भक्तोंको पारमार्थिक मार्गमें बढ़नेकी युक्तियाँ मिलेंगी? शंकाओंका समाधान होगा? साधनकी उलझनें सुलझेंगी? पारमार्थिक मार्गकी बाधाएँ दूर होंगी? जिससे वे उत्साहसे सुगमतापूर्वक बहुत ही जल्दी अपने लक्ष्यको प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये वह भगवान्को सबसे अधिक प्यारा होगा क्योंकि भगवान् जीवके उद्धारसे बड़े राजी होते हैं? प्रसन्न होते हैं। सम्बन्ध --  जिसमें गीताका प्रचार करनेकी योग्यता नहीं है? वह क्या करे इसको भगवान् आगे के श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.69।।ननु सर्वेषां मुक्तिसाधनानां ध्यानस्य श्रेष्ठत्वात्तन्निष्ठस्य मुमुक्षोर्नास्ति विद्यासंप्रदाने प्रवृत्तिरिति तत्राह -- किञ्चेति। इतश्च विद्यासंप्रदानं मुमुक्षुणा यथोक्तविशेषणवते कर्तव्यमित्यर्थः। वर्तमानेषु मध्ये त्वत्तोऽन्यो नास्त्येव प्रियकृत्तमो नाप्यतीतेषु तादृक्कश्चिदासीदिति शेषः। तस्माद्विद्यासंप्रदायकर्तुः सकाशादित्यर्थः। ध्याननिष्ठस्य श्रेष्ठत्वेऽपि स्वसंप्रदायप्रवक्तुः श्रेष्ठतमत्वादुचिता विद्यासंप्रदाने प्रवृत्तिरिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.69।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.69।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.69।। --,न च तस्मात् शास्त्रसंप्रदायकृतः मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये कश्चित् मे मम प्रियकृत्तमः अतिशयेन प्रियकरः? अन्यः प्रियकृत्तमः? नास्त्येव इत्यर्थः वर्तमानेषु। न च भविता भविष्यत्यपि काले तस्मात् द्वितीयः अन्यः प्रियतरः प्रियकृत्तरः भुवि लोकेऽस्मिन् न भविता।।योऽपि --,

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【 Verse 18.70 】

▸ Sanskrit Sloka: अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो: | ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति: ||

▸ Transliteration: adhyeṣyate ca ya imaṁ dharmyaṁ saṁvādamāvayoḥ | jñānayajñena tenāham iṣṭaḥ syāmiti me matiḥ ||

▸ Glossary: adhyeṣyate: will study; ca: also; yaḥ: he; imaṁ: this; dharmyaṁ: sacred; saṁvādaṁ: conversation; āvayoḥ: of ours; jñāna: knowledge; yajñena: by sacrifice; tena: by him; ahaṁ: I; iṣṭaḥ: worshiped; syām: shall be; iti: thus; me: My; matiḥ: opinion

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.70 I declare that One who studies this sacred dialogue worships Me by sacrifice of his intelligence.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.70।।जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा? उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.70।। जो पुरुष? हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का पठन करेगा? उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा ऐसा मेरा मत है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.70 अध्येष्यते shall study? च and? यः who? इमम् this? धर्म्यम् sacred? संवादम् dialogue? आवयोः of ours? ज्ञानयज्ञेन by the sacrifice of wisdom? तेन by him? अहम् I? इष्टः worshipped? स्याम् (I) shall have been? इति thus? मे My? मतिः conviction. Commentary There are four kinds of sacrifice -- Vidhi? Japa? Upamsu and Manasa. Vidhi is ritual. Japa is recitation of a Mantra. Upamsu is Japa done in a whisper. Of the four kinds? JnanaYajna or the wisdomsacrifice comes under Manasa and is? therefore? the highest. The Gita is eulogised as a JnanaYajna. He who studies this scripture with faith and devotion will attain the fruit that is eal to that of performing JnanaYajna or meditation on a deity and the like.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.70. Whosoever would learn this sacred dialogue of both of us, by him I am worshipped (delighted) through the knowledge-sacrifice : This is My opinion

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.70 He who will study this spiritual discourse of ours, I assure thee, he shall thereby worship Me at the altar of Wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.70 And he who will study his dialogue of ours which is consistent with Dharma, by him I shall be worshipped through the sacrifice of knowledge; such is My view.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.70 And he who will study this sacred conversation between us two, which is conducive to virtue, by him I shall be adored through the Sacrifice in the form of Knowledge. This is My judgement.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.70 And he who will study this sacred dialogue of ours, by him I shall have been worshipped by the sacrifice of wisdom, such is My conviction.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.70 See Comment under 18.72

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.70 He who will study the dialogue between us, which is consistent with the path to realisation, by him I shall be worshipped through the sacrifice of knowledge. Such is My view. The meaning is that whateve sacrifice of knowledge is taught herein, by that I shall become worshipped by the mere fact of its study.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.70 Ca, and; even he yah, who; adhyesyate, will study; imam, this; samvadam, conversation, the text in the form of a dialogue; between avayoh, us two; which is dharmyam, conducive to virtue, not divorced from virtue; tena, by him; this will be accomplished through that study; aham, I; syam, shall be; istah, adored; jnana-yajnena, through the Sacrifice in the form of Knowledge. Iti, this is me, My; matih, judgement. As compared with the various sacrifices, viz rituals, loud prayer, prayer uttered in a low voice and mental prayer, the Sacrifice in the from of Knowledge is the best [See 4.33.] because it is mental. Hence, the study of the scripture Gita is praised as that Sacrifice in the form of Knowledge. Or, this (verse) may merely be a judgement about the result. The idea is that the result of the study is comparable to the result of the Sacrifice in the form of the knowledge of gods and others. Now, this is the reward for the hearer:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.70।। गीता के समस्त उपदेष्टाओं को गौरवान्वित करने के पश्चात्? अब भगवान् श्रीकृष्ण उन विद्यार्थियों की भी प्रशंसा करते हैं? जो इस पवित्र भगवद्गीता का पठन करते हैं। अनन्तस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण और परिच्छिन्न जीवरूप अर्जुन के इस संवादरूप जीवन के तत्त्वज्ञान का अपना एक प्रबल आकर्षण है। जो लोग केवल इसका सतही पठन करते हैं? वे भी शनैशनै इसकी पावन गहराइयों में खिंचे चले जाते हैं। ऐसा पाठक अनजाने में ही आत्मदेव की तीर्थयात्रा पर चल पड़ता है? और फिर स्वाभाविक ही है कि ज्ञानयज्ञ के द्वारा वह आत्मविकास प्राप्त करता हैकर्मकाण्ड की यज्ञविधि में? एक यज्ञकुण्ड में अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अग्नि देवता का आह्वान किया जाता है। तत्पश्चात् यजमान उसमें द्रव्यरूप आहुतियाँ अर्पण करता है। इसी साम्य से? गीता में इस मौलिक शब्द ज्ञानयज्ञ का प्रयोग किया गया है। अध्यात्मशास्त्रों के अध्ययन तथा उनके तात्पर्यार्थ पर चिन्तन मनन करने से साधकों के मन में ज्ञानाग्नि प्रज्वलित होती है। इस ज्ञानाग्नि में एक विवेकी साधक अपने अज्ञान? मिथ्या धारणाएं एवं दुष्प्रवृत्तियों की आहुतियाँ प्रदान करता है। रूपक की भाषा में प्रयुक्त इस शब्द ज्ञानयज्ञ का यही आशय है। इसलिए? जो साधकगण श्रवण? मनन और निदिध्यासन के द्वारा प्रज्वलित ज्ञानाग्नि में अपने अहंकार? स्वार्थ एवं अन्य वासनाओं की आहुतियां देकर शुद्ध हो जाते हैं? वे पुरुष निश्चय ही? ईश्वर के महान पूजक और भक्त है। वे सर्वथा अभिनन्दन के पात्र हैं।अब? इस ज्ञान के श्रोता की भी प्रशंसा करते हुए उसे प्राप्त होने वाले फल को बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.70।।पठतः दानकर्तुरध्यापकस्य फलमुक्त्वाऽध्येतुस्तदाह -- अध्येष्यते इति। योऽध्येता धर्म्यं धर्मादनपेतमिममावयोः संवादमध्येष्यते च पठिष्यति तेन अध्येत्रा ज्ञानज्ञेनाहमिष्टः स्यां श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानंयज्ञ इति सर्वयज्ञेभ्यः श्रेष्ठमत्वेनाभिहितस्य देवतादिविषयज्ञानयज्ञस्य फलकैवल्यं तत्तुल्यं देवताद्यात्मत्वमस्य फलं भवतीत्यर्थः। तेनाध्येत्रा ज्ञानयज्ञफलतुल्यफलेनाध्ययनेनाहमिष्टः पूजितः स्यां भवेयमिति मे मम मतिर्निश्चयः। फलविधिरेवायं नत्वर्थवादः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.70।।अध्यापकस्य फलमुक्त्वाऽध्येतुः फलमाह -- अध्येष्यतेचेति। आवयोः संवादमिमं ग्रन्थं धर्म्यं धर्मादनपेतं योऽध्येष्यते जपरूपेण पठिष्यति ज्ञानयज्ञेन ज्ञानात्मकेन यज्ञेन चतुर्थाध्यायोक्तेन द्रव्ययज्ञादिश्रेष्ठेनाहं सर्वेश्वरस्तेनाध्येत्रा इष्टः पूजितः स्यामिति मे मतिर्मम निश्चयः। यद्यप्यसौ गीतार्थमबुध्यमान एव जपति तथापि तच्छृण्वतो मम मामेवासौ प्रकाशयतीति बुद्धिर्भवति। अतो जपमात्रादपि ज्ञानयज्ञफलं मोक्षं लभते। सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तिद्वारार्थानुसन्धानपूर्वकं पठतस्तु साक्षादेव मोक्ष इति किमु वक्तव्यमिति फलविधिरेवायं नार्थवादः।श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप इति प्रागुक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.70।।अध्यापकस्य फलमुक्त्वाऽध्येतुः फलमाह -- अध्येष्यते चेति। ज्ञानयज्ञेन निर्विकल्पसमाधिना इष्टः पूजितः स हि धर्ममेघनामा पुष्कलपुण्यवृष्टिकरस्तद्वदेतस्य शास्त्रस्याध्ययनमपीत्यर्थः। इति मे मम सर्वेश्वरस्य मतिः। तेनात्र स्तुतिमात्रमेतदिति न मन्तव्यं किंतु भूतार्थवाद एवायमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.70।।एवमुपदेष्टुः श्रोतुश्च फलमुक्त्वा पाठकर्तुः फलमाह -- अध्येष्यत इति। आवयोः श्रीकृष्णार्जुनयोः धर्म्यं धर्मयुक्तं धर्मोत्पादकं वा संवादं सोत्तरप्रत्युत्तरं गीतात्मकं सम्यक्प्रकारेण वदनात्मकं यश्च अध्येष्यते ध्यानं कृत्वा जपरूपेण पठिष्यति? तेनाध्ययनेन सर्वयज्ञश्रेष्ठेन ज्ञानयज्ञेन ज्ञानात्मकमद्यजनेन अहं तस्य इष्टः प्रियः स्यां? भवेयमित्यर्थः। इति एवम्प्रकारिका मे मम मतिः बुद्धिरित्यर्थः। स्वमतित्वकथनेनैतत्पाठस्याऽऽवश्यकत्वं करणे च स्वप्रसादावश्यकत्वं ज्ञापितमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.70।।पठतः फलमाह -- अध्येष्यत इति। आवयोः कृष्णार्जुनयोः इमं धर्म्यं धर्मादनपेतं संवादं योऽध्येष्यते जपरूपेण पठिष्यति तेन पुंसा सर्वयज्ञेभ्यः श्रेष्ठेन ज्ञानयज्ञेनाहमिष्टः स्यां भवेयमिति मे मतिः। यद्यप्यसौ गीतार्थमबुध्यमान एव केवलं,जपति तथापि मम तच्छ्रण्वतो मामेवासौ प्रकाशयतीति बुद्धिर्भवति। यथा लोके यदृच्छयापि कश्चित्कदाचित्कस्यचिन्नाम गृह्णाति तदासौ मामेवायमाह्वयतीति मत्वा तत्पार्श्वमागच्छति? तथाहमपि तस्य सन्निहितो भवेयम्। अतएव अजामिलक्षत्रबन्धुप्रमुखानां कथंचिन्नामोच्चारणमात्रेण प्रसन्नोऽस्मि? तथैवास्यापि प्रसन्नो भवेयमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.70।।अध्येतुः फलं निर्दिशति -- अध्येष्यत इति। अर्थमजानतोऽपि पुंसो नामवत्पाठमात्रात् फलदोऽयं संवाद इति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.70।।जो भी कोई --, जो मनुष्य? हम दोनोंके संवादरूप इस धर्मयुक्त गीताग्रन्थको पढ़ेगा? उसके द्वारा यह होगा कि मैं ज्ञानयज्ञसे ( पूजित होऊँगा )? विधियज्ञ? जपयज्ञ? उपांशुयज्ञ और मानसयज्ञ -- इन चार यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ मानस है इसलिये श्रेष्ठतम है। अतः उस ज्ञानयज्ञकी समानतासे गीताशास्त्रके अध्ययनकी स्तुति करते हैं। अथवा यों समझो कि यह फलविधि है यानी इसका फल देवतादिविषयक ज्ञानयज्ञके समान होता है। उस अध्ययनसे मैं ( ज्ञानयज्ञद्वारा ) पूजित होता हूँ? ऐसा मेरा निश्चय है।,

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.70।। व्याख्या --   अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः -- तुम्हारा और हमारा यह संवाद शास्त्रों? सिद्धान्तोंके साररूप धर्मसे युक्त है। यह बहुत विचित्र बात है कि परस्पर साथ रहते हुए तुम्हारेहमारे बहुत वर्ष बीत गये परन्तु हम दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ ऐसा धर्ममय संवाद तो कोई विलक्षण? अलौकिक अवसर आनेपर ही होता है।जबतक मनुष्यकी संसारसे उकताहट न हो? वैराग्य या उपरति न हो और हृदयमें जोरदार हलचल न मची हो? तबतक उसकी असली जिज्ञासा जाग्रत् नहीं होती। किसी कारणवश जब यह मनुष्य अपने कर्तव्यका निर्णय करनेके लिये व्याकुल हो जाता है? जब अपने कल्याणके लिये कोई रास्ता नहीं दीखता? बिना समाधानके और कोई सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदि किञ्चिन्मात्र भी अच्छी नहीं लगती? एकमात्र हृदयका सन्देह दूर करनेकी धुन (चटपटी) लग जाती है? एक ही जोरदार जिज्ञासा होती है और दूसरी तरफसे मन सर्वथा हट जाता है? तब यह मनुष्य जहाँसे प्रकाश और समाधान मिलनेकी सम्भावना होती है? वहाँ अपना हृदय खोलकर बात पूछता है? प्रार्थना करता है? शरण हो जाता है? शिष्य हो जाता है।पूछनेवालेके मनमें जैसीजैसी उत्कण्ठा बढ़ती है? कहनेवालेके मनमें वैसीवैसी बड़ी विचित्रता और विलक्षणतासे समाधान करनेवाली बातें पैदा होती हैं। जैसे दूध पीनेके समय बछड़ा जब गायके थनोंपर मुहँसे,बारबार धक्का मारता है और थनोंसे दूध खींचता है? तब गायके शरीरमें रहनेवाला दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें जोरदार दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें जोरदार जिज्ञासा होनेसे जब जिज्ञासु बारबार प्रश्न करता है? तब कहनेवालेके मनमें नयेनये उत्तर पैदा होते हैं। सुननेवालेको ज्योंज्यों नयी बातें मिलती हैं? त्योंत्यों उसमें सुननेकी नयीनयी उत्कण्ठा पैदा होती रहती है। ऐसा होनेपर ही वक्ता और श्रोता -- इन दोनोंका संवाद बढ़िया होता है।अर्जुनने ऐसी उत्कण्ठासे पहले कभी बात नहीं पूछी और भगवान्के मनमें भी ऐसी बातें कहनेकी कभी नहीं आयी। परन्तु जब अर्जुनने जिज्ञासापूर्वक स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ৷৷. (2। 54) -- यहाँसे पूछना प्रारम्भ किया? वहींसे उन दोनोंका प्रश्नोत्तररूपसे संवाद प्रारम्भ हुआ है। इसमें वेदों तथा उपनिषदोंका सार और भगवान्के हृदयका असली भाव है? जिसको धारण करनेसे मनुष्य भयंकरसेभयंकर परिस्थितिमें भी अपने मनुष्यजन्मके ध्येयको सुगमतापूर्वक सिद्ध कर सकता है। प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी घबराये नहीं? प्रत्युत प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते हुए उसका सदुपयोग करे अर्थात् अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करे क्योंकि प्रतिकूलता पहले किये पापोंका नाश करने और आगे अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करनेके लिये ही आती है। अनुकूलताकी इच्छा जितनी ज्यादा होगी? उतनी ही प्रतिकूल अवस्था भयंकर होगी। अनुकूलताकी इच्छाका ज्योंज्यों त्याग होता जायगा? त्योंत्यों अनुकूलताका राग और प्रतिकूलताका भय मिटता जायगा। राग और भय -- दोनोंके मिटनेसे समता आ जायगी। समता परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। गीतामें समताकी बात विशेषतासे बतायी गयी और गीताने इसीको योग कहा है। इस प्रकार कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग? ध्यानयोग? प्राणायाम आदिकी विलक्षणविलक्षण बातोंका इसमें वर्णन हुआ है।अध्येष्यते का तात्पर्य है कि इस संवादको कोई ज्योंज्यों पढ़ेगा? पाठ करेगा? याद करेगा? उसके भावोंको समझनेका प्रयास करेगा? त्योंहीत्यों उसके हृदयमें उत्कण्ठा बढ़ेगी। वह ज्योंज्यों समझेगा? त्योंत्यों उसकी शङ्काका समाधान होगा। ज्योंज्यों समाधान होगा? त्योंत्यों इसमें अधिक रुचि पैदा होगी। ज्योंज्यो रुचि अधिक पैदा होगी? त्योंत्यों गहरे भाव उसकी समझमें आयेंगे और फिर वे भाव उसके आचरणोंमें? क्रियाओंमें? बर्तावमें आने लगेंगे। आदरपूर्वक आचरण करनेसे वह गीताकी मूर्ति बन जायगा? उसका जीवन गीतारूपी साँचेमें ढल जायगा अर्थात् वह चलतीफिरती भगवद्गीता हो जायगी। उसको देखकर लोगोंको गीताकी याद आने लगेगी जैसे निषादराज गुहको देखकर माताओंको और दूसरे लोगोंको लखनलालकी याद आती है (टिप्पणी प0 991)।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्याम -- यज्ञ दो प्रकारके होते हैं -- द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ। जो यज्ञ पदार्थों और क्रियाओंकी प्रधानतासे किया जाता है? वहद्रव्ययज्ञ कहलाता है और उत्कण्ठासे केवल अपनी आवश्यक वास्तविकताको जाननेके लिये जो प्रश्न किये जाते हैं? विज्ञ पुरुषोंद्वारा उनका समाधान किया जाता है? उनका गहरा विचार किया जाता है? विचारके अनुसार अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव किया जाता है तथा वास्तविक तत्त्वको जानकर ज्ञातज्ञातव्य हो जाता है? वहज्ञानयज्ञ कहलाता है। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारेहमारे संवादका कोई पाठ करेगा तो मैं उसके द्वारा भी ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इसमें कारण यह है कि जैसे प्रेमी भक्तको कोई भगवान्की बात सुनाये? उसकी याद दिलाये तो वह बड़ा प्रसन्न होता है? ऐसे ही कोई गीताका पाठ करे? अभ्यास करे तो भगवान्को अपने अनन्य भक्तकी? उसकी उत्कण्ठापूर्वक जिज्ञासाकी और उसे दिये हुए उपदेशकी याद आ जाती है और वे बड़े प्रसन्न होते हैं एवं उस पाठ? अभ्यास आदिको ज्ञानयज्ञ मानकर उससे पूजित होते हैं। कारण कि पाठ? अभ्यास आदि करनेवालेके हृदयमें उसके भावोंके अनुसार भगवान्का नित्यज्ञान विशेषतासे स्फुरित होने लगता है।इति मे मतिः -- ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जब कोई गीताका पाठ करता है तो मैं उसको सुनता हूँ क्योंकि मैं सब जगह रहता हूँ -- मया ततमिदं सर्वम् (गीता 9। 4) और सब जगह ही मेरे कान हैं -- सर्वतःश्रुतिमल्लोके (गीता 13। 13)। अतः उस पाठको सुनते ही मेरे हृदयमें विशेषतासे ज्ञान? प्रेम? दया,आदिका समुद्र लहराने लगता है और गीतोपदेशकी यादमें मेरी बुद्धि सराबोर हो जाती है। वह पूजन करता है -- ऐसी बात नहीं है? वह तो पाठ करता है परन्तु मैं उससे पूजित हो जाता हूँ अर्थात् उसको ज्ञानयज्ञका फल मिल जाता है।दूसरा भाव यह है कि पाठ करनेवाला यदि उतने गहरे भावोंमें नहीं उतरता? केवल पाठमात्र या यादमात्र करता है तो भी उससे मेरे हृदयमें तेरे और मेरे सारे संवादकी (उत्कण्ठापूर्वक किये गये तेरे प्रश्नोंकी और मेरे दिये हुये गहरे वास्तविक उत्तरोंकी) एक गहरी मीठीमीठी स्मृति बारबार आने लगती है। इस प्रकार गीताका अध्ययन करनेवाला मेरी बड़ी भारी सेवा करता है? ऐसा मैं मान लेता हूँ।विदेशमें किसी जगह एक जलसा हो रहा था। उसमें बहुतसे लोग इकट्ठे हुए थे। एक पादरी उस जलसेमें एक लड़केको ले आया। वह लड़का पहले नाटकमें काम किया करता था। पादरीने उस लड़केको दसपन्द्रह मिनटका एक बहुत बढ़िया व्याख्यान सिखाया। साथ ही ढंगसे उठना? बैठना? खड़े होना? इधरउधर ऐसाऐसा देखना आदि व्याख्यानकी कला भी सिखायी। व्याख्यानमें बड़े ऊँचे दर्जेकी अंग्रेजीका प्रयोग किया गया था। व्याख्यानका विषय भी बहुत गहरा था। पादरीने व्याख्यान देनेके लिये उस बालकको मेजपर खड़ा कर दिया। बच्चा खड़ा हो गया और बड़े मिजाजसे दायेंबायें देखने लगा और बोलनेकी जैसीजैसी रिवाज है? वैसेवैसे सम्बोधन देकर बोलने लगा। वह नाटकमें रहा हुआ था? उसको बोलना आता ही था अतः वह गंभीरतासे? मानो अर्थोंको समझते हुएकी मुद्रामें ऐसा विलक्षण बोला कि जितने सदस्य बैठे थे? वे सब अपनीअपनी कुर्सियोंपर उछलने लगे। सदस्य इतने प्रसन्न हुए कि व्याख्यान पूरा होते ही वे रुपयोंकी बौछार करने लगे। अब वह बालक सभाके ऊपरहीऊपर घुमाया जाने लगा। उसको सब लोग अपनेअपने कन्धोंपर लेने लगे। परन्तु उस बालकको यह पता ही नहीं था कि मैंने क्या कहा है वह तो बेचारा ज्यादा पढ़ालिखा न होनेसे अंग्रेजीके भावोंको भी पूरा नहीं समझता था? पर सभावाले सभी लोग समझते थे। इसी प्रकार कोई गीताका अध्ययन करता है? पाठ करता है तो वह भले ही उसके अर्थको? भावोंको न समझे? पर भगवान् तो उसके अर्थको? भावोंको समझते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं उसके अध्ययनरूप? पाठरूप ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाता हूँ। सभामें जैसे बालकके व्याख्यानसे सभापति तो खुश हुआ ही? पर उसके साथसाथ सभासद् भी बड़े खुश हुए और उत्साहपूर्वक बच्चेका आदर करने लगे? ऐसे ही गीता पाठ करनेवालेसे भगवान् ज्ञानयज्ञसे पूजित होते हैं तथा स्वयं वहाँ निवास करते हैं? साथहीसाथ प्रयोग आदि तीर्थ? देवता? ऋषि? योगी? दिव्य नाग? गोपाल? गोपिकाएँ? नारद? उद्धव आदि भी वहाँ निवास करते हैं (टिप्पणी प0 992.1)। सम्बन्ध --  जो गीताका प्रचार और अध्ययन भी न कर सके? इसके लिये आगेके श्लोकमें उपाय बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.70।।संप्रदायप्रवक्तुः सर्वाधिकं फलंस वक्ता विष्णुरित्युक्तो न स विश्वाधिदैवतम् इति न्यायेनोक्त्वा संप्रत्यध्येतुर्विवक्षितं फलमाह -- योऽपीति। यथोक्तस्य शास्त्रस्य योऽप्यध्येता तेनेदं कृतं स्यादिति संबन्धः। तदेवाह -- अध्येष्यत इति। तेनेदं कृतमित्यत्रेदंशब्दार्थं विशदयति -- ज्ञानेति। तेनाहमिष्टः स्यामिति संबन्धः। चतुर्विधानां यज्ञानां मध्ये ज्ञानयज्ञस्यश्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः इति विशिष्टत्वाभिधानात्तेनाहमिष्टः स्यामित्यध्ययनस्य स्तुतिरभिमतेत्याह -- विधीति। पक्षान्तरमाह -- फलेति। फलविधिमेव प्रकटयति -- देवतादीति। यद्धि ज्ञानयज्ञस्य फलं कैवल्यं तेन तुल्यमस्याध्येतुः संपद्यते तच्च देवताद्यात्मत्वमित्यर्थः। कथमध्ययनादेव सर्वात्मत्वं फलं लभ्यतेतस्मात्सर्वमभवत इति श्रुतिस्तत्राह -- तेनेति। तेनाध्येत्रा ज्ञानयज्ञतुल्येनाध्ययनेन भगवानिष्टस्तथाच तज्ज्ञानादुक्तं फलमविरुद्धमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.70।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.70।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.70।। --,अध्येष्यते च पठिष्यति यः इमं धर्म्यं धर्मादनपेतं संवादरूपं ग्रन्थं आवयोः? तेन इदं कृतं स्यात्। ज्ञानयज्ञेन -- विधिजपोपांशुमानसानां यज्ञानां ज्ञानयज्ञः मानसत्वात् विशिष्टतमः इत्यतः तेन ज्ञानयज्ञेन गीताशास्त्रस्य अध्ययनं स्तूयते फलविधिरेव वा? देवतादिविषयज्ञानयज्ञफलतुल्यम् अस्य फलं भवतीति -- तेन अध्ययनेन अहम् इष्टः पूजितः स्यां भवेयम् इति मे मम मतिः निश्चयः।।अथ श्रोतुः इदं फलम् --,

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【 Verse 18.71 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नर: | सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ||

▸ Transliteration: śraddhāvānanasūyaś ca śṛṇuyādapi yo naraḥ | so ‘pi muktaḥ śubhāṁl lokān prāpnuyāt puṇyakarmaṇām ||

▸ Glossary: śraddhāvān: faithful; anasūyaś ca: and not envious; śṛṇuyāt: does hear; api: certainly; yaḥ: who; naraḥ: a man; saḥ: he; api: also; muktaḥ: being liberated; śubhān: auspicious; lokān: planets; prāpnuyāt: attains; puṇyakarmaṇām: of those with merit

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.71 One who listens with faith and without envy becomes free from sinful reactions and attains to the planets where those of merit dwell.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.71।।श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीताग्रन्थको सुन भी लेगा? वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.71।। तथा जो श्रद्धावान् और अनसुयु (दोषदृष्टि रहित) पुरुष इसका श्रवणमात्र भी करेगा? वह भी (पापों से) मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के शुभ (श्रेष्ठ) लोकों को प्राप्त कर लेगा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.71 श्रद्धावान् full of faith? अनसूयः free from malice? च and? श्रृणुयात् may hear? अपि also? यः who? नरः man? सः he? अपि also? मुक्तः liberated? शुभान् happy? लोकान् worlds? प्राप्नुयात् shall attain? पुण्यकर्मणाम् of those of righteous deeds.Commentary Liberated from sin.Punyakarmanam Of those who have done Agnihotra and such other sacrifices.He too Much more so who understands the teachings of the Gita? lives in its spirit and who practises the most valuable spiritual instructions contained in it.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.71. A man who would at least hear to [this] with faith and without indignation-he too, freed [from sins], will attain the auspicious worlds of men of meritorius acts.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.71 Yea, he who listens to it with faith and without doubt, even he, freed from evil, shalt rise to the worlds which the virtuous attain through righteous deeds.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 18.71 And the man who listens to it with faith and without cavilling, he too shall be released, and shall reach the auspicious realms of those who have performed virtuous deeds.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.71 Any man who, being reverential and free from cavilling, might even hear (this), he too, becoming free, shall attain the blessed worlds of those who perform virtuous deeds.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.71 Also the man who hears this, full of faith and free from malice, he, too, liberated, shall attain to the happy worlds of those of righteous deeds.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.71 See Comment under 18.72

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.71 A man who, with faith and without cavilling, hears the Gita when faught by a alified teacher, he too is, by such hearing, released from all evil incompatible with devotional life. He shall reach the Lokas, i.e., the realms of the hosts of My devotees who have done virtuous acts, and who will facilitate the growth of devotion in these new arrivals and lead them ultimately to liberation.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.71 Yah narah, any man who; being sraddhavan, reverential; and anasuyah, free from cavilling; srnuyat api, might even hear this text-the word even suggests that one who knows the meaning (of the Scripture) hardly needs to be mentioned-; sah api, he too; becoming muktah, free from sin; prapnuyat, shall attain; subhan, the blessed, auspicious; lokan, worlds; punya-karmanam, of those who perform virtuous deeds, of those who perform rites like Agnihotra etc. In order to ascertaini whether or not the disciple has comprehended the meaning of the Scripture, the Lord asks (the following estion), the intention of the estioner beings, 'If it is known that it has not been comprehended, I shall again make him grasp it through other means.' Hery is shown the duty of the teacher that a student should be made to achieve his goal by taking the help of a different method.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.71।। गीता का विषय दूर से दर्शन करके केवल प्रशंसा करने योग्य नहीं है। गीतोपदिष्ट ज्ञान से पूर्णतया लाभान्वित होने के लिए साधक का व्यक्तित्व सभी स्तरों पर सुगठित होना आवश्यक है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ दो गुणों का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं जिनसे सम्पन्न श्रोता को श्रवण का सर्वाधिक आनन्द प्राप्त होगा।श्रद्धावान् श्रद्धा का अर्थ अन्धविश्वास नहीं है। बुद्धि की वह क्षमता श्रद्धा है? जिसके द्वारा मनुष्य (1) शास्त्रीय शब्दों के सूक्ष्म आशय को समझ पाता है? (2) समझकर उनको धारण कर सकता है (3) उन्हें पूर्णतया आत्मसात् करने में समर्थ होता है और? (4) इस प्रकार? प्राप्त ज्ञान के अनुसार अपने जीवन को निर्मित कर सकता है। स्वाभाविक है कि श्रद्धावान् पुरुष गुरु के उपदेश से सर्वाधिक लाभान्वित होता है। अज्ञात वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उचित प्रमाण की आवश्यकता होती है और उस प्रमाण के सत्यत्व के विषय में विश्वास की भी। उस विश्वास के बिना ज्ञान की ओर प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। प्रमाण में यह विश्वास श्रद्धा कहलाता है।अनसुयु जैसा कि अनेक स्थानों पर कहा जा चुका है? अनसुयु का अर्थ है वह पुरुष जो गुणों में दोष नहीं देखता है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हिन्दू धर्म में दर्शनशास्त्र के अध्येताओं को समीक्षा या समालोचना करने की स्वतन्त्रता प्रदान नहीं की गई है। इसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि शास्त्र के श्रवण या अध्ययन के पूर्व ही हमें उसके विषय में पूर्वाग्रह नहीं बना लेने चाहिए। पूर्वाग्रहों से दूषित बुद्धि सत्य का यथार्थ ज्ञान कदापि नहीं प्राप्त कर सकती।उक्त दोनों गुणों से सम्पन्न श्रोता को सर्वाधिक लाभ होगा। वह पापों से मुक्त होकर पुण्यकर्मी लोगों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त करता है। इसका अर्थ यह है कि ऐसा श्रोता पुरुष अपनी वासनाओं से मुक्त होकर आंतरिक शांति और आनन्द का अनुभव करता है। आनन्द का साम्राज्य हमारे हृदय में ही स्थित है। उसकी प्राप्ति के लिए सुदूर स्थित कहीं स्वर्ग में जाने की आवश्यकता नहीं है। अभी और यहीं आनन्द की प्राप्ति होती है यह वेदान्त का सत्य वचन है।आचार्य का यह कर्तव्य है कि वह यह देखें कि शिष्य ने यथावत् ज्ञान ग्रहण किया है अथवा नहीं। यदि उपदिष्ट साधन मार्ग शिष्य की उन्नति के लिए अनुकूल या पर्याप्त नहीं है? तो आचार्य को ऐसे शिष्य की सहायता करनी चाहिए जिससे कि वह शिष्य अपना सन्तुलन प्राप्त कर सके।इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.71।।प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरपि फलं कथयति। श्रद्धावान् श्रद्दधानोऽनसूयश्च पौरुषेयत्वात् श्रुतितो निकृष्टमिदमिति दोषदृष्टिरसूया तद्रहितः सन्निमं ग्रन्थं यो नरो यः कश्चिच्छ्रणुयादपि। नरशब्देनैतच्छ्रवणेनापि यो हीनो नासौ नरः किंतु पशुरिति सूचयति। सोऽपि मुक्तः पातकाद्रहितः पुण्यकर्मणामग्निहोत्राश्वमेधादिपुण्यकर्मवतां लोकान् शुभान्प्रशस्तान्प्राप्नुयात्। अपिशब्दात्किमुतार्थज्ञानवान्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.71।।प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरिदानीं फलं कथयति -- श्रद्धावानिति। यो नरः कश्चिदप्यन्यस्योच्चैर्जपतः कारुणिकस्य सकाशात् श्रद्धावान् श्रद्धायुक्तस्तथा किमर्थमयमुच्चैर्जपत्यबद्धं वा जपतीति दोषदृष्ट्याऽसूयया रहितोऽनसूयश्च केवलं शृणुयादिमं ग्रन्थमपिशब्दात् किमुतार्थज्ञानवान् सोऽपि केवलाक्षरमात्रश्रोतापि मुक्तः पापैः शुभान् प्रशस्तान् लोकान् पुण्यकर्मणामश्वमेधादिकृतां प्राप्नुयात् ज्ञानवतस्तु किं वाच्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.71।।प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरपि फलमाह -- श्रद्धावानिति। शृणुयादपि अक्षरश्रवणं कुर्यादपि किमु वक्तव्यमादरेणार्थग्रहणं यः कुर्यात्स उक्तं फलं प्राप्नुयादिति। स्पष्टार्थः श्लोकः। तथाचोक्तं श्रीभागवते -- वासुदेवकथाप्रश्नः पुरुषांस्त्रीन्पुनाति हि। वक्तारं प्रच्छकं श्रोतृ़ंस्तत्पादसलिलं यथा इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.71।।एवंरूपज्ञानेनैकस्य पठतो योऽन्यः कश्चिच्छृणोति तस्यापि फलतीत्याह -- श्रद्धावानिति। यो नरः श्रद्धावान्एतच्छ्रवणेनाहं कृतार्थो भविष्यामि इत्यत्यादरयुक्तः शृणुयादप्यर्थानवबोधेनापि स शुभान् मोक्षप्रापकान् लोकान् प्राप्नुयात्। च पुनः अनसूयः किमिति दम्भार्थमुच्चैः पाषण्डी पठतीत्याद्यसूयारहितः सम्यक् गीतां पठतीत्याद्यनुमोदते मनसि सोऽपि मुक्तः संसारात् पुण्यकर्मणां लोकान् स्वर्गादीन् प्राप्नुयात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.71।।अन्यस्य जपतो योऽन्यः कश्चिच्छृणोति तस्यापि फलमाह -- श्रद्धावानिति। यो नरः श्रद्धायुक्तः केवलं श्रृणुयादपि श्रद्धावानपि कश्चित्किमर्थमुच्चर्जपति

Chapter 18 (Part 41)

अबद्धं जपतीति वा दोषदृष्टिं करोति तद्व्यावृत्त्यर्थमाह। अनसूयश्च असूयारहितो यः श्रृणुयात्सोऽपि सर्वैः पापैर्मुक्तः सन् अश्वमेधादिपुण्यकृताँल्लोकान्प्राप्नुयात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.71।।श्रद्धावानिति। स्पष्टार्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.71।।तथा श्रोताको यह ( आगे बतलाया जानेवाला ) फल मिलता है --, जो मनुष्य? इस ग्रन्थको श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिरहित होकर केवल सुनता ही है? वह भी पापोंसे मुक्त होकर? पुण्यकारियोंके अर्थात् अग्निहोत्रादि श्रेष्ठकर्म करनेवालोंके? शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है। अपिशब्दसे यह पाया जाता है कि अर्थ समझनेवालेकी तो बात ही क्या है। शिष्यने शास्त्रका अभिप्राय ग्रहण किया या नहीं यह विवेचन करनेके लिये भगवान् पूछते हैं। इसमें पूछनेवालेका यह अभिप्राय है कि शास्त्रका अभिप्राय श्रोताने ग्रहण नहीं किया है -- यह मालूम होनेपर? फिर किसी और उपायसे ग्रहण कराऊँगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.71।।व्याख्या -- श्रद्धावाननसूयश्च৷৷. पुण्यकर्मणाम् -- गीताकी बातोंको जैसा सुन ले? उसको प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसाकावैसा माननेवालेका नाम श्रद्धावान् है? और उन बातोंमें कहीं भी? किसी भी विषयमें किञ्चिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम अनसूयः है। ऐसा श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है।यहाँ दो बार अपि पद देनेका तात्पर्य है कि जो गीताका प्रचार करता है? अध्ययन करता है? उसके लिये तो कहना ही क्या है पर जो सुन भी लेता है? वह मनुष्य भी पापोंसे छूटकर शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।मनुष्यकी वाणीमें प्रायः भ्रम? प्रमाद? लिप्सा और कारणापाटव -- ये चार दोष होते हैं (टिप्पणी प0 992.2)। अतः मनुष्यकी वाणी सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकती। परन्तु भगवान्की दिव्य वाणीमें इन चारोंमेंसे कोई भी दोष नहीं रह सकता क्योंकि भगवान् निर्दोषताकी परावधि हैं अर्थात् भगवान्से बढ़कर निर्दोषता किसीमें,कभी होती ही नहीं। इसलिये भगवान्के वचनोंमें किसी प्रकारके संशयकी सम्भावना ही नहीं है। अतः गीता सुननेवालेको कोई विषय समझमें कम आये? विचारद्वारा कोई बात न जँचे? तो समझना चाहिये कि इस विषयको समझनेमें मेरी बुद्धिकी कमी है? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ -- इस भावको दृढ़तासे धारण करनेपर असूयादोष मिट जाता है। भगवान्में अत्यधिक श्रद्धाविश्वासपूर्वक भक्ति होनेपर भी असूयादोष नहीं रहता।चैतन्य महाप्रभुका एक भक्त था। वह रोज गीताका पाठ करते हुए मस्त हो जाता था? गद्गद हो जाता था और रोने लगता था। वह शुद्ध पाठ नहीं करता था। उसके पाठमें अशुद्धियाँ आती थीं। उसके विषयमें किसीने चैतन्य महाप्रभुसे शिकायत कर दी किदेखिये प्रभु वह बड़ा पाखण्ड करता है पाठ तो शुद्ध करता नहीं और रोता रहता है। चैतन्य महाप्रभुने उसको अपने पास बुलाकर पूछा -- तुम गीताका पाठ करते हो? तो क्या उसका अर्थ जानते हो उसने कहा -- नहीं प्रभु फिर पूछा -- तो फिर तुम रोते क्यों हो उसने कहा -- मैं जब अर्जुन उवाच पढ़ता हूँ तो अर्जुन भगवान्से पूछ रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है और जब मैं श्रीभगवानुवाच पढ़ता हूँ? तो भगवान् अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर दे रहे हैं -- ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष,दीखता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका आपसमें संवाद हो रहा है -- ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है परन्तु अर्जुन क्या पूछते हैं और भगवान् क्या उत्तर देते हैं? यह मेरी समझमें नहीं आता। मैं तो उन दोनोंके दर्शन करकरके राजी होता हूँ। उसकी ऐसी श्रद्धाभक्ति देखकर चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकारकी श्रद्धाभक्तिवाला मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले? तो उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं रहता। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है।यहाँ पुण्यकर्मणाम् पदसे सकामभावपूर्वक यज्ञ? अनुष्ठान आदि पुण्यकर्म करनेवालोंको नहीं लेना चाहिये क्योंकि भगवान्ने उनको ऊँचा नहीं माना है? प्रत्युत उनके बारेमें कहा है कि वे बारबार आवागमनको प्राप्त होते हैं (गीता 9। 21)। यहाँ उन पुण्यकर्मा भक्तोंको लेना चाहिये? जिनको भगवान्का प्रेमदर्शन आदिकी प्राप्ति होती है। ऐसे पुण्यकर्मा भक्तोंको अपनेअपने इष्टके अनुसार वैकुण्ठ? साकेत? गोलोक? कैलास आदि जिन दिव्य लोकोंकी प्राप्ति होती है? असूयादोषरहित श्रद्धावान् पुरुषको गीता सुननेमात्रसे उन लोकोंकी प्राप्ति हो जाती है। सम्बन्ध --  पूर्वश्लोकमें गीता सुननेका माहात्म्य बताकर अब अर्जुनकी क्या स्थिति है? क्या दशा है? आदि सब कुछ जानते हुए भी भगवान् भगवद्गीताश्रवणके माहात्म्यको सबके सामने प्रकट करनेके उद्देश्यसे आगेके श्लोकमें अर्जुनसे प्रश्न करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.71।।प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरिदानीं फलं कथयति -- अथेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.71।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.71।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।1.1।।धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.71।। --,श्रद्धावान् श्रद्दधानः अनसूयश्च असूयावर्जितः सन् इमं ग्रन्थं श्रृणुयादपि यो नरः? अपिशब्दात् किमुत अर्थज्ञानवान्? सोऽपि पापात् मुक्तः शुभान् प्रशस्तान् लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् अग्निहोत्रादिकर्मवताम्।।शिष्यस्य शास्त्रार्थग्रहणाग्रहणविवेकबुभुत्सया पृच्छति। तदग्रहणे ज्ञाते पुनः ग्राहयिष्यामि उपायान्तरेणापि इति प्रष्टुः अभिप्रायः। यत्नान्तरं च आस्थाय शिष्यस्य कृतार्थता कर्तव्या इति आचार्यधर्मः प्रदर्शितो भवति --,

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【 Verse 18.72 】

▸ Sanskrit Sloka: कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा | कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय ||

▸ Transliteration: kaccid etac chrutaṁ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā | kaccid ajñāna-saṁmohaḥ pranaṣṭaste dhanañjaya ||

▸ Glossary: kaccit: whether; etat: this; śrutaṁ: heard; pārtha: O son of Prithā; tvaya: by you; ekāgreṇa: with full attention; cetasā: by the mind; kaccit: whether; ajñāna: ignorant; saṁmohaḥ: illusion; pranaṣṭaḥ: dispelled; te: of you; dhanañjaya: O conqueror of wealth (Arjuna)

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.72 O Pārtha, did you listen to this with single-minded attention? Has your delusion born of ignorance been completely destroyed, Dhanañjaya?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.72।।हे पृथानन्दन क्या तुमने एकाग्रचित्तसे इसको सुना और हे धनञ्जय क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.72।। हे पार्थ क्या इसे (मेरे उपदेश को) तुमने एकाग्रचित्त होकर श्रवण किया और हे धनञ्जय क्या तुम्हारा अज्ञान जनित संमोह पूर्णतया नष्ट हुआ

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.72 कच्चित् whether? एतत् this? श्रुतम् heard? पार्थ O son of Kunti (Arjuna)? त्वया by thee? एकाग्रेण onepointed? चेतसा by mind? कच्चित् whether? अज्ञानसंमोहः the delusion of ignorance? प्रनष्टः has been destroyed? ते thy? धनञ्जय O Dhananjaya.Commentary It is the duty of the spiritual teacher or preceptor to make the aspirant understand the teaching of the scripture and to enable him to attain the goal of life (Moksha). If the student has not grasped the subject he will have to explain it in some other way with similes? analogies and illustrations. That is the reason why Lord Krishna asks Arjuna Has the delusion of thy ignorance been destroyedThis What I have told thee.Have you heard it? O Arjuna? with onepointed mind Have you grasped My teachingDelusion of ignorance The absence of discrimination which is caused by ignorance and which is natural. The destruction of delusion is the aim of all this endeavour on your part to hear the scripture and the exertion on My part as the teacher.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.72. O son of Prtha ! Has this been heared by you with attentive mind ? O Dhananjaya ! Has your strong delusion, born of ignorance, been totally destroyed ?

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.72 O Arjuna! Hast thou listened attentively to My words? Has thy ignorance and thy delusion gone?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 1.1 Dhrtarastra said On the holy field of Kuruksetra, gathered together eager for battle, what did my people and the Pandavas do, O Sanjaya?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.72 O Partha, has this been listened to by you with a one-pointed mind? O Dhananjaya, has your delusion caused by ignorance been destroyed?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.72 Has this been heard, O Arjuna, with one-pointed mind? Has the delusion of thy ignorance been destroyed, O Dhananjaya?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.68-72 Ya idam etc. upto Dhananjaya. The very act of explaining this among My devotees is itself an act of cultivating devotion towards Me. Whosoever shall declare etc : Whosoever directs the mind [of the devotees] by face to face method, following the best procedure prescribed in the scriptures; i.e., he who shall impart [this knowledge] - he becomes one with Me. This is an injunction [concerning the result] and not a sentence of praise. Likewise is [the case] in other places also.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.72 O Arjuna, have you heard attentively all that I have taught? Has your delusion caused by ignorance, been dispelled - that ignorance deluded by which you said, 'I shall not fight'?

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.72 O Partha, kaccit etat, has this that has been said by Me; been srutam, listened to, grasped through hearing; ekagrena, with a none-pointed; cetasa, mind? Or have you been inattentive? O Dhananjaya, kaccit, has; te, your; ajnana-sammohah, delusion caused by ignorance, bewilderment, natural indiscrimination; been pranastah, destroyed, for which purpose has there been this effort on your part for hearing the Scripture, and on My part, the effort of being a teacher?

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.72।। गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन से प्रश्न पूछकर यह जानना चाहते हैं कि उनके उपदेश से वह कितना लाभान्वित हुआ है। यद्यपि उन्हें अपने उपदेश की अमोघता के प्रति कोई सन्देह नहीं था? तथापि वे किसी सफल चिकित्सक के समान? भवरोग से पीड़ित अर्जुन के ही प्रसन्न मुख से स्वास्थ्य लाभ की वार्ता सुनना चाहते हैं।क्या तुमने मेरे उपदेश को एकाग्र चित्त होकर सुना यह प्रश्न ही सूक्ष्म रूप से दर्शाता है कि यदि तुमने एकाग्रचित्त से वस्तुओं? व्यक्तियों और परिस्थितियों की कारण परम्परा का श्रवण किया होगा? तो इस ज्ञान को पूर्णतया समझा भी होगा। वेदान्त का अध्ययन हमारी दृष्टि को व्यापक और विशाल बनाता है। इस ज्ञान के प्रकाश में हम पूर्व परिचित जगत् को ही नवीन दृष्टिकोण से पहचानने लगते हैं। इस नवीन दृष्टि में जगत् की पूर्वपरिचित समस्त कुरूपताएं लुप्त हो जाती हैं।क्या तुम्हारा अज्ञान जनित संमोह नष्ट हो गया स्वस्वरूप के अज्ञान के कारण हमारे मन में अनेक मिथ्या धारणाएं दृढ़ हो जाती हैं। इन्हीं के कारण जगत् की ओर देखने का हमारा दृष्टिकोण विकृत हो जाता है और उस स्थिति में हमारे निर्णय भी त्रुटिपूर्ण सिद्ध होते हैं। अर्जुन इसी अज्ञानजनित संभ्रम से पीड़ित था? जिसका विस्तृत वर्णन गीता के प्रारम्भिक अध्यायों में किया गया है।शरीर के रक्षार्थ किसी विषाक्त या दूषित अंग का छेदन करना कोई अपराध नहीं है? वरन् वह शरीर के लिए जीवन प्रदायक वरदान है। सांस्कृतिक अधपतन के उस काल में कौरवों ने धर्म और संस्कृति के विरुद्ध शस्त्र उठाये थे। उस समय धर्म की रक्षा के लिए वीर अर्जुन का आह्वान किया गया था। परन्तु अज्ञानजनित संमोह के वशीभूत? अर्जुन सम्पूर्ण स्थिति का ही त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करके युद्ध से विरत होने लगा। इस भ्रम का कारण सत्य का अज्ञान था। यथार्थ ज्ञान से यह अज्ञान अपने सम्पूर्ण विकारों (विपरीत धारणाओं) के साथ तत्काल समाप्त हो जाता है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण के प्रश्न का औचित्य सिद्ध होता है।सत्य का ज्ञान मनुष्य की कर्म कुशलता के रूप में व्यक्त होता है और उसकी पूर्णता समाज की सेवा में ही है। यदि अर्जुन ने भगवान् के उपदेश को समझ लिया है? तो वह चुनौती का सामना करने में कदापि संकोच नहीं करेगा। यही भगवान् के मन का अकथित अभिप्राय प्रतीत होता है।भगवान् के प्रश्न का उत्तर देते हुए

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.72।।तं तु प्रयत्नमास्थाय सर्वप्रकारेण शिष्यं कृतार्थः कर्तव्य इत्याचार्य धर्मं दर्शियितुं उपदिष्टार्थाग्रहणे ज्ञाते पुनर्ग्रहयिष्याम्युपायान्तरेणेत्यभिप्रायवान् शिष्यस्य शास्त्रार्थग्रहणं विवत्सुः पृच्छसि -- कच्चिदिति प्रशस्तप्रश्नार्थे। एकाग्रेण चेतसा चित्तेन त्वया एतन्मयोक्तं किं तेऽज्ञाननाशात्प्रनष्टः प्रकर्षेण पुनरुत्पत्तिविरोधित्वेन नष्टः यदर्थोऽयं तव शास्त्रश्रवणायसो मम चोपदेष्टृत्वायासः प्रकृतः। हे पार्थेति संबोधयन् स्त्रीस्वभावशोकमोहनिवर्तकमेतत्त्वयैकाग्रेण चेतसा श्रुतमिति सुचयति। यदि त्वया न श्रुतं स्यात्तर्हि पुनर्मया वक्तव्यं पृथापुत्रेण प्रेमास्पदेन त्वया यावन्नावधारितं तावन्मया पुनः श्रावणीयमिति वा संबोधनाशयः। मदाज्ञया लोकोद्धरार्थ त्वया स्त्रीस्वभावौ शोकमोहावङ्गीकृतौ लोकोद्धापोपायस्य च मया प्रोक्तस्यैतस्य त्वयैकाग्रेण मनसा श्रुत्वादिदानीं तौ विहाय स्वस्वभावमाविर्भावयेति तत्पृच्छेति सूचयति। गूढाभिसंधिपक्षेवीरोऽन्तो धनंजयः इत्यत्रोक्तेन धनंजयेन स्वनाम्ना संबोधयन् मदवतारस्य तवाज्ञाननिमित्तकमोहाभावन्मदाज्ञया लोकोपकारायाङ्गीकृतोऽज्ञानसंमोहः कच्चित्प्रनष्टः अज्ञाननिमित्तकसंमोहप्रणाशनसामर्थ्यं मदुपदेशस्याति कच्चिदिति ध्वनयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.72।।शिष्यस्य ज्ञानोत्पत्तिपर्यन्तं गुरुणा कारुणिकेन प्रयासः कार्य इति गुरोर्धर्मं शिक्षयितुं सर्वथापि पुनरुपदेशापेक्षा नास्तीति ज्ञापनाय पृच्छति -- कच्चिदिति। कच्चिदिति प्रश्ने। एतन्मयोक्तं गीताशास्त्रमेकाग्रेण व्यासङ्गरहितेन चेतसा हे पार्थ? त्वया किं श्रुतमर्थतोऽवधारितं कच्चित्। किमज्ञानसंमोहोऽज्ञाननिमित्तः संमोहो विपर्ययोऽज्ञाननाशात् प्रनष्टः प्रकर्षेण पुनरुत्पत्तिविरोधित्वेन नष्टस्ते तव धनञ्जय? यदि स्यात्पुनरुपदेशं करिष्यामीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.72।।सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञोऽपि भगवाँल्लोकशिक्षार्थं शिष्यस्य ज्ञानं जातं नवेति पृच्छति। अन्यथा पुनः पुनः स्वयमेत्य उपदेशं कृतवता प्रभुणा निदाघ इव मयायं शतकृत्वोऽप्युपदेशेन कृतार्थः कर्तव्य इत्याशयेनाह -- कच्चिदिति। कच्चिदिति कामप्रवेदने। हे पार्थ? एतत्त्वया एकाग्रेण चेतसा श्रोतव्यं शब्दतोऽर्थतश्च बोद्धव्यमिति मम कामोऽस्ति ततस्त्वां पृच्छामि किमिदं त्वया श्रुतमिति। श्रुतवतोऽपि तव अज्ञानकृतः संमोहो विपर्ययः अनात्मन्यात्मधीरूपः स्वधर्मे युद्धे चाधर्मधीरूप इति स द्विविधोऽपि नष्टः क्वचित्। मच्छ्रमसाफल्यमिच्छुस्त्वामहं पृच्छामीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.72।।एवं संसारमुक्तिः शुभलोकप्राप्तिश्च मोहनाशो भवति? स च भगवन्मुखाच्छ्रवणेऽर्जुनस्यैव ततः पुनर्युद्धादिकरणात्तदा कथमन्यस्य भवेत् इति बहिर्मुखशङ्कामपनुदन् भगवानर्जुनं पृच्छति -- कश्चिदेतदिति। हे पार्थ श्रद्धयैतच्छ्रवणयोग्य कच्चिदिति प्रश्नार्थः। त्वया एकाग्रेण चेतसा प्रणिहितेन मनसा एतन्मयोक्तं श्रुतं तेन श्रवणेन हे धनञ्जय ते अज्ञानसम्मोहः अज्ञानेन मत्स्वरूपेङ्गिताज्ञानेन जनितो यः सम्मोहः आसुरमारणजपापोत्पत्तिरूपः सम्यक्प्रकारको मोहो भ्रमो नष्टः। ते तवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.72।।सम्यग्बोधानुत्पत्तौ पुनरुषदेक्ष्यामीत्याशयेनाह -- कच्चिदिति। कच्चिदिति प्रश्नार्थे। अज्ञानसंमोहः तत्त्वाज्ञानकृतो विपर्ययः। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.72।।कच्चिदिति प्रश्नतः सावधानं करोति। कच्चिदज्ञानसम्मोहस्ते नष्टः (प्रणष्टः) इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.72।।इसके द्वारा आचार्यका या कर्तव्य प्रदर्शित किया जाता है? कि दूसरे उपायको स्वीकार करके किसी भी प्रकारसे? शिष्यको कृतार्थ करना चाहिये --, हे पार्थ क्या तूने मुझसे कहे हुए इस शास्त्रको एकाग्रचित्तसे सुना सुनकर बुद्धिमें स्थिर किया अथवा सुनाअनसुना कर दिया हे धनंजय क्या तेरा अज्ञानजनित मोह -- स्वाभाविक अविवेकताचित्तका मूढ़भाव सर्वथा नष्ट हो गया? जिसके लिये कि तेरा यह शास्त्रश्रवणविषयक परिश्रम और मेरा वक्तृत्वविषयक परिश्रम हुआ है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.72।। व्याख्या --   कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा -- एतत् शब्द अत्यन्त समीपका वाचक होता है और यहाँ अत्यन्त समीप इकहत्तरवाँ श्लोक है। उनहत्तरवेंसत्तरवें श्लोकोंमें जो गीताका प्रचार और अध्ययन करनेवालेकी महिमा कही है? उस प्रचार और अध्ययनका तो अर्जुनके सामने कोई प्रश्न ही नहीं था। इसलिये पीछेके (इकहत्तरवें) श्लोकका लक्ष्य करके भगवान् अर्जुनसे कहते हैं किमनुष्य श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुने -- यह बात तुमने ध्यानपूर्वक सुनी कि नहीं अर्थात् तुमने श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुनी कि नहींएकाग्रेण चेतसा कहनेका तात्पर्य है कि गीतामें भी जिस अत्यन्त गोपनीय रहस्यको अभी पहले चौंसठवें श्लोकमें कहनेकी प्रतिज्ञा की? सड़सठवें श्लोकमें इदं ते नातपस्काय कहकर निषेध किया और मेरे वचनोंमें जिसको मैंने परम वचन कहा? उस सर्वगुह्यतम शरणागतिकी बात (18। 66) को तुमने ध्यानपूर्वक सुना कि नहीं उसपर खयाल किया कि नहींकच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय -- भगवान् दूसरा प्रश्न करते हैं कि तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ कि नहीं अगर मोह नष्ट हो गया तो तुमने मेरा उपदेश सुन लिया और अगर मोह नष्ट नहीं हुआ,तो तुमने मेरा यह रहस्यमय उपदेश एकाग्रतासे सुना ही नहीं क्योंकि यह एकदम पक्का नियम है कि जो दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक गीताके उपदेशको सुनता है? उसका मोह नष्ट हो ही जाता है।पार्थ सम्बोधन देकर भगवान् अपनेपनसे? बहुत प्यारसे पूछ रहे हैं कि तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि नहीं पहले अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको सुननेके उन्मुख करनेके लिये पार्थ सम्बोधन देकर सबसे प्रथम बोलना आरम्भ किया और कहा कि हे पार्थ युद्धके लिये इक्ट्ठे हुए इन कुटुम्बियोंको देखो। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनके अन्तःकरणमें छिपा हुआ जो कौटुम्बिक मोह है? वह जाग्रत् हो जाय और उस मोहसे छूटनेके लिये उनको चटपटी लग जाय? जिससे वे केवल मेरे सम्मुख होकर सुननेके लिये तत्पर हो जायँ। अब यहाँ उसी मोहके दूर होनेकी बातका उपसंहार करते हुए भगवान् पार्थ सम्बोधन देते हैं।धनञ्जय सम्बोधन देकर भगवान् कहते हैं कि तुम लौकिक धनको लेकर धनञ्जय (राजाओंके धनको जीतनेवाले) बने हो। अब इस वास्तविक तत्त्वरूप धनको प्राप्त करके अपने मोहका नाश कर लो और सच्चे अर्थोंमेंधनञ्जय बन जाओ। सम्बन्ध --  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो प्रश्न किया था? उसका उत्तर अर्जुन आगेके श्लोकमें देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.72।।आचार्येण शिष्याय यावदज्ञानसंशयविपर्यासस्तावदनेकधोपदेष्टव्यमिति दर्शयितुं भगवानर्जुनं,पृष्टवानित्याह -- शिष्यस्येति। प्रष्टुरभिप्रायं प्रकटयति -- तदग्रहण इति। शिष्यश्चेदुक्तं गृहीतुं नेष्टे तर्हि तं प्रत्यौदासीन्यमाचार्यस्योचितं तस्य मन्दबुद्धित्वादित्याशङ्क्याह -- यत्नान्तरमिति। कच्चिदिति कोमलप्रश्ने। तमेव व्याचष्टे -- किमेतदिति। द्वितीयं किंपदं पूर्वस्य व्याख्यानतया संबध्यते। कच्चिदिति द्वितीयं प्रश्नं विभजते -- किं प्रनष्ट इति। मोहप्रणाशस्य प्रसंगं दर्शयति -- यदर्थ इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.72।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.72।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।1.2।।धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.72।। --,कच्चित् किम् एतत् मया उक्तं श्रुतं श्रवणेन अवधारितं पार्थ? त्वया एकाग्रेण चेतसा चित्तेन किं वा अप्रमादतः कच्चित् अज्ञानसंमोहः अज्ञाननिमित्तः संमोहः अविविक्तभावः अविवेकः स्वाभाविकः किं प्रणष्टः यदर्थः अयं शास्त्रश्रवणायासः तव? मम च उपदेष्टृत्वायासः प्रवृत्तः? ते तुभ्यं हे धनंजय।।अर्जुन उवाच --,

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【 Verse 18.73 】

▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव ||

▸ Transliteration: Arjuna uvāca | naṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvat-prasādān mayā’cyuta | sthito ‘smi gata-sandehaḥ kariṣye vacanaṁ tava ||

▸ Glossary: Arjuna uvāca: Arjuna says; naṣṭaḥ: dispelled; mohaḥ: illusion; smṛtiḥ: mem- ory; labdhā: regained; tvatprasādāt: by Your mercy; mayā: by me; acyuta: O infallible Kṛṣṇa; sthitaḥ: situated; asmi: I am; gata: removed; sandehaḥ: all doubts; kariṣye: I shall execute; vacanaṁ: order; tava: Your

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.73 Arjuna says: O dear Acyuta (infallible lord), my illusion is now gone. I have regained my memory by Your Grace, and I am now firm and free from doubt, and ready to act as per your instructions.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.73।।अर्जुन बोले -- हे अच्युत आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.73।। अर्जुन ने कहा -- हे अच्युत आपके कृपाप्रसाद से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गयी है? अब मैं संशयरहित हो गया हूँ और मैं आपके वचन (आज्ञा) का पालन करूँगा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.73 नष्टः is destroyed? मोहः delusion? स्मृतिः memory (knowledge)? लब्धा has been gained? त्वत्प्रसादात् through Thy grace? मया by me? अच्युत O Krishna? स्थितः अस्मि I remain? गतसन्देहः freed from doubts? करिष्ये (I) will do? वचनम् word? तव Thy.Commentary Moha Delusion This is the strongest weapon of Maya to take the Jivas in Her clutch. It is born of ignorance. It is the cause of the whole evil of Samsara. It is as hard to cross as the ocean.Smritih I have attained knowledge of the true nature of the Self. The whole aim of Sadhana or spiritual practice and the study of scriptures is the annihilation of delusion and the attainment of the knowledge of the Self. When one gets it? the three knots or ties of ignorance? viz.? ignorance? delusion (desire) and action are destroyed? all the doubts are cleared? and all the Karmas are destroyed.To him who beholds the Self in all beings? what delusion is there? what grief (Isavasya Upanishad? 7)I shall do Thy word Arjuna means to say? I am firm in Thy ?nd. Through Thy grace I have achieved the end of life. I have nothing more to do.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.73. Arjuna said My delusion is destroyed; recollection is gained by me through your Grace, O Acyuta ! I stand firm, free of doubts; I shall excute your ?nd.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.73 Arjuna replied: My Lord! O Immutable One! My delusion has fled. By Thy Grace, O Changeless One, the light has dawned. My doubts are gone, and I stand before Thee ready to do Thy will."

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.73 Arjuna said O Acyuta, (my) delusion has been destroyed and memory has been regained by me through Your grace. I stand with my doubt removed; I shall follow Your instruction.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.73 Arjuna said Destroyed is my delusion as I have gained my knowledge (memory) through Thy grace, O Krishna. I remain freed from doubts. I will act according to Thy word.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.73 Nastah etc. By the passage '[My] delusion is destroyed etc', it is indicated that [after hearing the Lord's instruction], only an inclination to fight has risen in Arjuna, but the perfect realisation of the Brahman is not yet born in him. While indicating so, [the sage Vyasa] provides a scope for the would-be subject matter for the Anugita.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.73 Arjuna said 'Delusion' or misapprehension is perverted knowledge. By Your grace it has been destroyed. 'Smrti' or memory is the knowledge of things as they really are. I have acired that. Misapprehension here is the misconception that the self is the Prakrti (body-mind) which is the non-self in reality. It consists in one not apprehending that all intelligent and non-intelligent entities, by reason of their forming the body of the Supreme Being, have Him as their Atman and are thus ensouled by Him. The misapprehension also consists in the lack of knowledge that actions, obligatory and occasional, do not cause bondage but actually form a means for the propitiation of the Supreme Being. All such misapprehensions are now destroyed.

The various phases of knowledge that cleared the misunderstanding may be catalogued as follows: (1) The self is different from Prakrti and is therefore devoid of the alities of Prakrti. Its nature is that of the knower of Prakrti. (2) The self is a Sesa (sub-ordinate and servant) of the Supreme Person and is ruled by Him. The true knowledge about the Supreme Person is that He is what is signified by the expression Supreme Brahman. (3) He is the great ocean of all auspicious, excellent attributes such as knowledge, strength, glory, valour, power, brilliance etc., which are unbounded and natural. His essence consists solely of auspiciousness. He is antagonistic to all that is evil without exception. The origin, sustentation and dissolution of the entire universe are His sport. (4) You (Sri Krsna) are Vasudeva, the Supreme Person, known from the Vedanta, and who can be reached only by worship, which has taken the form of Bhakti. (5) Bhakti can be achieved by the control of the senses and the mind, the abandonment of prohibited acts and the performance of occasional and obligatory acts as solely intended for the goal of the satisfaction of the Supreme Person. Bhakti has to be developed day after day through the regular practice of the discriminatory knowledge of the higher and lower truths. All this has been attained by me (Arjuna).

Therefore I stand steadfast, freed from the doubts and devoid of the depression rooted in perverted knowledge nourished by compassion and love for relatives. Now I shall fulfil Your words, concerned with fighting etc., which ought to be done by me. I shall fight as instructed by You. Such is the meaning.

Sanjaya now relates to Dhrtarastra who had estioned him earlier as to what his sons and the Pandavas were doing in the battle:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.73 O Acyuta, (my) mohah, born of ignorance and the cause of all evil in the form of mundane existence, and difficult to cross like an ocean;l nastah has been destroyed. And smrtih, memory, regarding the reality of the Self-on the acisition of which follows the loosening of all the bonds; labdha, has been regained, tvat-prasadat, through Your grace maya, by me, who am dependent on Your grace. By this estion about the destruction of delusion and the answer to it, it becomes conclusively revealed that the fruit derived from understanding the import of the entire Scripture is this much alone-which is the destruction of delusion arising from ignorance and the regaining of the memory about the Self. And similarly, in the Upanisadic text beginning with 'I grieve because I am not a knower of the Self' (Ch. 7.1.3), it is shown that all bonds become destroyed when the Self is realized. There are also the words of the Upanisadic verses, 'The knot of the heart gets untied' (Mu. 2.2.8); 'at that time (or to that Self) what delusion and what sorrow can there be for that seer of oneness?' (Is.7). Now then, sthitah, asmi, I stand under Your ?nd; gata-sandehah, with (my) doubts removed. Karisye, I shall follow; tava, Your; vacanam, instruction. By Your grace I have achieved the goal of life. The idea is, there is no duty, as such, for me. The teaching of the Scripture is concluded. There-after, now in order to show the connection (of this) with the (main) narrative-.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.73।। अर्जुन स्वीकार करता है कि उसका मोह नष्ट हो गया है। मुझे स्मृति प्राप्त हो गयी है इस वाक्य से यह दर्शाया गया है कि उसके मोह की निवृत्ति भगवान् के उपदेश को केवल अन्धश्रद्धा से ग्रहण कर लेने में नहीं हुई है? वरन् पूर्ण विचार करके प्राप्त ज्ञान से हुई है। उसके अन्दर का वीरत्व जागृत हो गया है और उसका सम्मोहावस्था समाप्त हो गयी है।जब हम गीता दर्शन के वास्तविक अभिप्राय को पूर्णतया समझ लेते हैं? केवल तभी हम में ज्ञान की जागृति होती है और हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाते हैं। पूर्णत्व तो हमारा आत्मस्वरूप ही है। उसे किसी देशान्तर या कालान्तर में किसी बाह्य शक्ति के हस्तक्षेप की सहायता से प्राप्त नहीं करना है। केवल अज्ञान के कारण हम स्वयं को जीव समझ कर दुख और कष्ट भोग रहे हैं। जीव दशा के कष्टों को भोगते समय भी वस्तुत हम पूर्ण आत्म स्वरूप ही होते हैं। अत आवश्यकता केवल सम्यक् आत्मज्ञान की ही है? आत्मा तो नित्योपलब्ध स्वरूप ही है। मनुष्य का देवत्व जागृत होने से उसके अन्दर का पशुत्व समाप्त हो जाता है।अपूर्ण ज्ञान की स्थिति में ही मन में शोक? मोह? भय? निराशा? दुर्बलता आदि अनेक सन्देह उत्पन्न होते हैं। अब? अर्जुन को पूर्ण ज्ञान होने के कारण वह सन्देह रहित (गतसन्देह) भी हो गया है। आत्मज्ञान की दृष्टि से? युद्धभूमि का पुनर्निरीक्षण एवं पुनर्मूल्यांकन करने पर उसे? अब? अपने कर्तव्य को निश्चित करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। वह अपने निर्णय की स्पष्ट घोषणा करता है? मैं आपके आदेश का पालन करूंगा। आत्मस्वरूप श्रीकृष्ण ही विशुद्ध बुद्धि के रूप में व्यक्त होते हैं। अत समस्त साधकों को अपने अहंकार का त्याग करके अपनी विशुद्ध बुद्धि के निर्णयों का सदैव पालन करना चाहिए। यही आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ है? और समापान भी।यहाँ गीताशास्त्र की परिसमाप्ति होती है। अब? गीताचार्य और गीता की स्तुति करते हुए तथा महाभारत की कथा का संबंध बताते हुए

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.73।।भगवदनुग्रहात्स्वस्य कृतार्थताकथनेन भगवन्तं परितोषयिष्यन्नर्जुन उवाच। नष्टो मोहोऽज्ञानजन्यः समस्तसंसारहेतुः सागर इव दुस्तरः नष्टः नाशं गतः? स्मृतिश्च त्वत्प्रसादान्मया लब्धा अच्युताभिन्नत्वात्स्वरुपात्कदाप्यप्रच्युतः जरामरणादिवर्जितकर्तृत्वभोक्तृत्वादिविनिर्मुक्त इत्यात्मतत्त्वविषया सर्वग्रन्थ्यादिविप्रमोक्षहेतुभूता स्मृतिर्लब्धेति सूचयन्संबोधयति -- अच्युतेति। स्वयं ज्योतिषि प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मण्यविद्याभ्रमं विद्यापनयति नाविदितं प्रकाशयतीति बोधयितुं स्मृतिर्लब्धेत्युक्तं। अज्ञानसंमोहनाशः आत्मस्मृतिप्रतिलाभश्चेत्येतावदेव सर्वशास्त्रज्ञानफलमित्यनेन प्रश्नप्रतिवचनेन निश्चितं दर्शितम्। एतादृशस्य सर्वशास्त्रार्थज्ञानफलस्य संप्राप्तौ तवोपदेशस्य सामर्थ्यमस्तीति लोकोपकारः सम्यक् त्वया संपादित इति गूढाभिसंधिः। आत्मज्ञाने सति सर्वग्रन्थ्यादिविप्रमोहश्च श्रुतावुक्तः। तथाच श्रुतिःभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः इत्याद्या। अथेदानीं धर्मतत्त्वे च गतसंदेहः मुक्तसंशयः त्वच्छासने स्थितोऽस्मि। तव वचनमहं करिष्ये। त्वत्प्रसादात्कृतार्थस्य मम न किंचित्कर्तव्यमस्तीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.73।।एवं पृष्टः कृतार्थत्वेन पुनरुपदेशानपेक्षतामात्मन अर्जुन उवाच -- नष्टो मोह इति। नष्ट उच्छिन्नो मोहोऽज्ञानकृतो विपर्ययः तन्नाशकमाह। स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मया यस्मात्त्वदुपदेशादात्मज्ञानं लब्धं सर्वसंशयानाक्रान्ततया प्राप्तमतः सर्वप्रतिबन्धशून्येनात्मज्ञानेन मोहो नष्ट इत्यर्थः। हेऽच्युत? आत्मत्वेन निश्चितत्वात्वियोगायोग्यस्मृतिलम्भने सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः इति श्रुत्यर्थमनुभवन्नाह -- स्थितोऽस्मीति। स्थितोस्मि गतसंदेहो निवृत्तसर्वसंदेहः स्थितोऽस्मि युद्धकर्तव्यतारूपे त्वच्छासने। यावज्जीवं च करिष्ये वचनं तव भगवतः परमगुरोराज्ञां पालयिष्यामीति प्रयाससाफल्यकथनेन भगवन्तमर्जुनः परितोषयामास। अनेन गीताशास्त्राध्यायिनो भगवत्प्रसादादवश्यं मोक्षफलपर्यन्तं ज्ञानं भवतीति शास्त्रफलमुपसंहृतं तद्धास्य विजज्ञावितिवत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.73।।एवं पृष्टः स्वस्य कृतकृत्यतां ज्ञापयन्नर्जुन उवाच -- नष्टो मोह इति। मोहः पूर्वोक्तो द्विविधोऽपि नष्टः। स्मृतिरयमहमस्मि परंब्रह्मेत्यात्मानुसंधानरूपा आत्मतत्त्वविषया लब्धा। यस्य लाभेन सर्वहृदयग्रन्थीनांयावान्यश्चास्मि तत्त्वतः इत्यत्रोदाहृतानां चिज्जडैक्यभ्रमप्रभवानां विमोक्षो भवति। तथा च श्रूयतेवियोगायोग्यस्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः इति। त्वत्प्रसादान्मयाच्युत स्मृतिर्लब्धेति संबन्धः। स्थितोऽस्मि त्वच्छासने इति शेषः। गतसंदेहो नष्टसंदेह इत्यनेनानात्मन्यात्मधीरूपो मोहो नष्ट इति दर्शितम्। करिष्ये वचनं तवेत्यनेन स्वधर्मे युद्धे चाधर्मधीरूपोऽपि मोहो नष्ट इति दर्शितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.73।।एवं प्रश्ने नष्टमोहः सन् अर्जुन उत्तरं प्राह -- नष्टो मोह इति। अज्ञानकृतो मोहो नष्टः? त्वदुक्ितश्रवणेनेति शेषः। अधिकमपि जातं हे अच्युत सर्वत्र च्युतिरहित मया अहङ्काराज्ञानसहितेन त्वत्प्रसादात् स्मृतिः तत्स्वरूपात्मिका लब्धा प्राप्ता।प्रसादात् इति कथनेन साधनालभ्यतोक्ता। अहो दासस्य प्रभ्वाज्ञाकरणमेव धर्मः? न त्वन्योऽपि धर्माधर्मविचारः। एवं गतसन्देहः संस्तवाग्रे दासत्वेन स्थितोऽस्मि इदानीं,तव वचनं पूर्वोक्तं युद्धादिरूपं सर्वधर्मत्यागरूपं त्वद्भक्तेष्वेतदुपदेशरूपं च करिष्ये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.73।।कृतार्थः सन्नर्जुन उवाच -- नष्ट इति। आत्मविषयो मोहो नष्टः। यतोऽयमहमस्मीति स्वरूपानुसंधानरूपा स्मृतिस्त्वप्रसादान्मया लब्धा। अतः स्थितोऽस्मि युद्धायोपस्थितोऽस्मि। गतो धर्मविषयः संदेहो यस्य सोऽहं तवाज्ञां करिष्य इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.73।।अर्जुन उवाच -- नष्टो मोह इति। विपरीतं ज्ञानं आत्मानात्माविवेकविषयकं विनष्टं मम। स्मृतिश्च यथावस्थितत्त्वज्ञानं त्वत्प्रसादाल्लब्धा। तत्रानात्मनि प्रकृतितत्कार्ये स्वात्माभिमानरूपो मोहः परमपुरुषस्वरूपतया तदात्मकस्य सर्वस्य चिदचिद्वस्तुनः अतदात्माभिमानरूपश्च नित्यादिकर्मणो भगवदर्थतया तत्प्राप्त्युपायभूतस्य बन्धकत्वावगतिरूपश्च सर्वो नष्टः। आत्मनः प्राकृतस्वभावरहितज्ञातृत्वैकस्वरूपज्ञानं तथा परमात्मनोऽक्षरब्रह्मैक्यज्ञानं तदुत्तमस्य पुरुषोत्तमस्यालौकिकगुणगणस्य प्रभोग्नुग्रहभक्त्यैव प्राप्तिः परमपुरुषार्थः। स च वासुदेवः पुरुषोत्तमस्त्वमिति ज्ञानं च स्मृतिरूपं लब्धं? त्वत्प्रसादान्मोहः साङ्ख्योपदेशेन गतः? स्मृतिर्योगोपदेशेन लब्धा। प्रसादो भक्तिरिति वा। अतो गतसन्देहस्तव वचनं युद्धादिकर्तव्यताविषयं करिष्ये।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.73।।अर्जुन बोला -- हे अच्युत मेरा अज्ञानजन्य मोह? जो कि समस्त संसाररूप अनर्थका कारण था और समुद्रकी भाँति दुस्तर था? नष्ट हो गया है। और हे अच्युत आपकी कृपाके आश्रित होकर मैंने आपकी कृपासे आत्मविषयक ऐसी स्मृति भी प्राप्त कर ली है कि जिसके प्राप्त होनेसे समस्त ग्रन्थियाँ -- संशय विच्छिन्न हो जाते हैं। इस मोहनाशविषयक प्रश्नोत्तरसे यह बात निश्चितरूपसे दिखलायी गयी है कि जो यह अज्ञानजनित मोहका नाश और आत्मविषयक स्मृतिका लाभ है? बस? इतना ही समस्त शास्त्रोंके अर्थज्ञानका फल है। इसी तरह ( छान्दोग्य ) श्रुतिमें भी मैं आत्माको न जाननेवाला शोक करता हूँ इस प्रकार प्रकरण उठाकर आत्मज्ञान होनेपर समस्त ग्रन्थियोंका विच्छेद बतलाया है। तथा हृदयकी ग्रन्थि विच्छिन्न हो जाती है वहाँ एकताका अनुभव करनेवालेको कैसा मोह और कैसा शोक इत्यादि मन्त्रवर्ण भी हैं। अब मैं संशयरहित हुआ आपकी आज्ञाके अधीन खड़ा हूँ। मैं आपका कहना करूँगा। अभिप्राय यह है कि मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ ( अब ) मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.73।। व्याख्या --   नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत -- अर्जुनने यहाँ भगवान्के लिये अच्युत सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य है कि जीव तो च्युत हो जाता है अर्थात् अपने स्वरूपसे विमुख हो जाता है तथा पतनकी तरफ चला जाता है परन्तु भगवान् कभी भी च्युत नहीं होते। वे सदा एकरस रहते हैं। इसी बातका द्योतन करनेके लिये गीतामें अर्जुनने कुल तीन बार अच्युत सम्बोधन दिया है। पहली बार (गीता 1। 21 में) अच्युत सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्से कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथ खड़ा करो। ऐसी आज्ञा देनेपर भी भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। दूसरी बार (11। 42 में) इस सम्बोधनसे अर्जुन्ने भगवान्के विश्वरूपकी स्तुतिप्रार्थना की? तो भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। अन्तिम बार यहाँ (18। 73 में) इस सम्बोधनसे अर्जुन संदेहरहित होकर कहते हैं कि अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा? तो भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुनकी तो आदि? मध्य और अन्तमें तीन प्रकारकी अवस्थाएँ हुईँ? पर भगवान्की आदि? मध्य और अन्तमें एक ही अवस्था रही अर्थात् वे एकरस ही बने रहे।दूसरे अध्यायमें अर्जुनने शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् (2। 7) कहकर भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी। इस श्लोकमें उस शरणागतिकी पूर्णता होती है।दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा कितेरेको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं सम्पूर्ण संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ इस बातको सुनते ही अर्जुनके मनमें एक विशेष भाव पैदा हुआ कि भगवान् कितने विलक्षण हैं भगवान्की विलक्षणताकी ओर लक्ष्य जानेसे अर्जुनको एक प्रकाश मिला। उस प्रकाशकी प्रसन्नतामें अर्जुनके मुखसे यह बात निकल पड़ी किमेरा मोह चला गया -- मोहोऽयं विगतो मम (11। 1)। परन्तु भगवान्के विराट्रूपको देखकर जब अर्जुनके हृदयमें भयके कारण हलचल पैदा हो गयी? तब भगवान्ने कहा कि यह तुम्हारा मूढ़भाव है? तुम व्यथित और मोहित मत होओ -- मा ते व्यथा मा च विमूढभावः (11। 49)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुनका मोह तब नष्ट नहीं हुआ था। अब यहाँ सर्वज्ञ भगवान्के पूछनेपर अर्जुन कह रहे हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे तत्त्वकी अनादि स्मृति प्राप्त हो गयी -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा (टिप्पणी प0 995.1)।अन्तःकरणकी स्मृति और तत्त्वकी स्मृतिमें बड़ा अन्तर है। प्रमाणसे प्रमेयका ज्ञान होता है (टिप्पणी प0 995.2) परन्तु परमात्मतत्त्व अप्रमेय है। अतः परमात्मा प्रमाणसे व्याप्य नहीं हो सकता अर्थात् परमात्मा प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला तत्त्व नहीं है। परन्तु संसार सबकासब प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला है और प्रमाण प्रमाताके अन्तर्गत आनेवाला है (टिप्पणी प0 995.3)।प्रमाता एक होता है और प्रमाण अनेक होते हैं। प्रमाणोंके बारेमें कई प्रत्यक्ष? अनुमान? आगम -- ये तीन मुख्य प्रमाण मानते हैं कई प्रत्यक्ष? अनुमान? उपमान और शब्द -- ये चार प्रमाण मानते हैं और कई इन चारोंके सिवाय अर्थापत्ति? अनुपलब्धि और ऐतिह्य -- ये तीन प्रमाण और भी मानते हैं। इस प्रकार प्रमाणोंके माननेमें अनेक मतभेद हैं परन्तु प्रमाताके विषयमें किसीका कोई मतभेद नहीं है। ये प्रत्यक्ष? अनुमान आदि प्रमाण वृत्तिरूप होते हैं परन्तु प्रमाता वृत्तिरूप नहीं होता? वह तो स्वयं अनुभवरूप होता है।अब इसस्मृति शब्दकी जहाँ व्याख्या की गयी है? वहाँ उसके ये लक्षण बताये हैं -- (1) अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः। (योगदर्शन 1। 11), अनुभूत विषयका न छिपाना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है। (2) संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः। (तर्कसंग्रह)संस्कारमात्रसे जन्य हो और ज्ञान हो? उसको स्मृति कहते हैं।यह स्मृति अन्तःकरणकी एकवृति है। यह वृत्ति प्रमाण? विपर्यय? विकल्प? निद्रा और स्मृति -- पाँच प्रकारकी होती है तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं -- क्लिष्ट और अक्लिष्ट। संसारकी वृत्तिरूप स्मृतिक्लिष्ट होती है अर्थात् बाँधनेवाली होती है? और भगवत्सम्बन्धी वृत्तिरूप स्मृतिअक्लिष्ट होती है अर्थात् क्लेशको दूर करनेवाली होती है। इन सब वृत्तियोंका कारणअविद्या है। परन्तु परमात्मा अविद्यासे रहित है। इसलिये परमात्माकी स्मृतिस्वयंसे ही होती है? वृत्ति या करणसे नहीं। जब परमात्माकी स्मृति जाग्रत् होती है तो फिर उसकी कभी विस्मृति नहीं होती? जबकि अन्तःकरणकी वृत्तिमें स्मृति और विस्मृति -- दोनों होती हैं।परमात्मतत्त्वकी विस्मृति या भूल तो असत् संसारको सत्ता और महत्ता देनेसे ही हुई है। यह विस्मृति अनादिकालसे है। अनादिकालसे होनेपर भी इसका अन्त हो जाता है। जब

Chapter 18 (Part 42)

इसका अन्त हो जाता है और अपने स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होती है? तब इसको स्मृतिर्लब्धा कहते हैं अर्थात् असत्के सम्बन्धके कारण जो स्मृति सुषुप्तिरूपसे थी? वह जाग्रत् हो गयी। जैसे एक आदमी सोया हुआ है और एक मुर्दा पड़ा हुआ है -- इन दोनोंमें महान् अन्तर है? ऐसे ही अन्तःकरणकी स्मृतिविस्मृति दोनों ही मुर्देकी तरह जड हैं? पर स्वरूपकी स्मृति सुप्त है? जड नहीं। केवल जडका आदर करनेसे सोये हुएकी तरह ऊपरसे वह स्मृति लुप्त रहती है अर्थात् आवृत रहती है। उस आवरणके न रहनेपर उस स्मृतिका प्राकट्य हो जाता है तो उसे स्मृतिर्लब्धा कहते हैं अर्थात् पहलेसे जो तत्त्व मौजूद है? उसका प्रकट होना स्मृति है? और आवरण हटनेका नाम लब्धा है।साधकोंकी रुचिके अनुसार उसी स्मृतिके तीन भेद हो जाते हैं -- (1) कर्मयोग अर्थात् निष्कामभावकी स्मृति? (2) ज्ञानयोग अर्थात् अपने स्वरूपकी स्मृति और (3) भक्तियोग अर्थात् भगवान्के सम्बन्धकी स्मृति। इस प्रकार इन तीनों योगोंकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है क्योंकि ये तीनों योग स्वतःसिद्ध और नित्य हैं। ये तीनों योग जब वृत्तिके विषय होते हैं? तब ये साधन कहलाते हैं परन्तु स्वरूपसे ये तीनों नित्य हैं। इसलिये नित्यकी प्राप्तिको स्मृति कहते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि इन साधनोंकी विस्मृति हुई है? अभाव नहीं हुआ है।असत् संसारके पदार्थोंको आदर देनेसे अर्थात् उनको सत्ता और महत्ता देनेसे राग पैदा हुआ -- यहकर्मयोग की विस्मृति (आवरण) है। असत् पदार्थोंके सम्बन्धसे अपने स्वरूपकी विमुखता हुई अर्थात् अज्ञान हुआ -- यहज्ञानयोग की विस्मृति है। अपना स्वरूप साक्षात् परमात्माका अंश है। इस परमात्मासे विमुख होकर,संसारके सम्मुख होनेसे संसारमें आसक्ति हो गयी। उस आसक्तिसे प्रेम ढक गया -- यहभक्तियोग की विस्मृति है।स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखताका नाश होना यहाँस्मृति है। उस स्मृतिका प्राप्त होना अप्राप्तका प्राप्त होना नहीं है? प्रत्युत नित्यप्राप्तका प्राप्त होना है। नित्य स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर फिर उसकी विस्मृति होना सम्भव नहीं है क्योंकि स्वरूपमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं। वह सदा निर्विकार और एकरस रहता है। परन्तु वृत्तिरूप स्मृतिकी विस्मृति हो सकती है क्योंकि वह प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील है।इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि संसार तथा शरीरके साथ अपने स्वरूपको मिला हुआ समझनाविस्मृति है और संसार तथा शरीरसे अलग होकर अपने स्वरूपका अनुभव करनास्मृति है। अपने स्वरूपकी स्मृति स्वयंसे होती है। इसमें करण आदिकी अपेक्षा नहीं होती जैसे -- मनुष्यको अपने होनेपनका जो ज्ञान,होता है? उसमें किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। जिसमें करण आदिकी अपेक्षा होती है? वह स्मृति अन्तःकरणकी एक वृत्ति ही है।स्मृति तत्काल प्राप्त होती है। इसकी प्राप्तिमें देरी अथवा परिश्रम नहीं है। कर्ण कुन्तीके पुत्र थे। परन्तु जन्मके बाद जब कुन्तीने उनका त्याग कर दिया? तब अधिरथ नामक सूतकी पत्नी राधाने उनका पालनपोषण किया। इससे वे राधाको ही अपनी माँ मानने लगे। जब सूर्यदेवसे उनको यह पता लगा कि वास्तवमें मेरी माँ कुन्ती है? तब उनको स्मृति प्राप्त हो गयी। अबमैं कुन्तीका पुत्र हूँ -- ऐसी स्मृति प्राप्त होनेमें कितना समय लगा कितना परिश्रम या अभ्यास करना पड़ा कितना जोर आया पहले उधर लक्ष्य नहीं था? अब उधर लक्ष्य हो गया -- केवल इतनी ही बात है।स्वरूप निष्काम है? शुद्धबुद्धमुक्त है और भगवान्का है। स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखतासे ही जीव सकाम? बद्ध और सांसारिक होता है। ऐसे स्वरूपकी स्मृति वृत्तिकी अपेक्षा नहीं रखती अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तिसे स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होना सम्भव नहीं है। स्मृति तभी जाग्रत् होगी? जब अन्तःकरणसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होगा। स्मृति अपने ही द्वारा अपनेआपमें जाग्रत् होती है। अतः स्मृतिकी प्राप्तिके लिये किसीके सहयोगकी या अभ्यासकी जरूरत नहीं है। कारण कि जडताकी सहायताके बिना अभ्यास नहीं होता? जबकि स्वरूपके साथ जडताका लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। स्मृति अनुभवसिद्ध है? अभ्याससाध्य नहीं है। इसलिये एक बार स्मृति जाग्रत् होनेपर फिर उसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी पड़ती।स्मृति भगवान्की कृपासे जाग्रत् होती है। कृपा होती है भगवान्के सम्मुख होनेपर और भगवान्की सम्मुखता होती है संसारमात्रसे विमुख होनेपर। जैसे अर्जुनने कहा कि मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा -- करिष्ये वचनं तव? ऐसे ही संसारका आश्रय छोड़कर केवल भगवान्के शरण होकर कह दे किहे नाथ अब मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा।तात्पर्य है कि इस स्मृतिकी लब्धिमें साधककी सम्मुखता और भगवान्की कृपा ही कारण है। इसलिये अर्जुनने स्मृतिके प्राप्त होनेमें केवल भगवान्की कृपाको ही माना है। भगवान्की कृपा तो मात्र प्राणियोंपर अपारअटूटअखण्डरूपसे है। जब मनुष्य भगवान्के सम्मुख हो जाता है? तब उसको उस कृपाका अनुभव हो जाता है।त्वत्प्रसादात् मयाच्युत पदोंसे अर्जुन कह रहे हैं कि आपने विशेषतासे जो सर्वगुह्यतम तत्त्व बताया? उसकी मुझे विशेषतासे स्मृति आ गयी कि मैं आपका ही था? आपका ही हूँ और आपका ही रहूँगा। यह जो स्मृति आ गयी है? यह मेरी एकाग्रतासे सुननेकी प्रवृत्तिसे नहीं आयी है अर्थात् यह मेरे एकाग्रतासे सुननेका फल नहीं है? प्रत्युत यह स्मृति तो आपकी कृपासे ही आयी है। पहले मैंने शरण होकर शिक्षा देनेकी प्रार्थना की थी और फिर यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा परन्तु मेरेको जबतक वास्तविकताका बोध नहीं हुआ? तबतक आप मेरे पीछे पड़े ही रहे। इसमें तो आपकी कृपा ही कारण है। मेरेको जैसा सम्मुख होना चाहिये? वैसा मैं सम्मुख नहीं हुआ हूँ परन्तु आपने बिना कारण मेरेपर कृपा की अर्थात् मेरेपर कृपा करनेके लिये आप अपनी कृपाके परवश हो गये? वशीभूत हो गये और बिना पूछे ही आपने शरणागतिकी सर्वगुह्यतम बात कह दी (18। 64 -- 66)। उसी अहैतुकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हुआ है।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव -- अर्जुन कहते हैं कि मूलमें मेरा जो यह सन्देह था कि युद्ध करूँ या न करूँ (न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः 2। 6)? वह मेरा सन्देह सर्वथा नष्ट हो गया है और मैं अपनी वास्तविकतामें स्थित हो गया हूँ। वह संदेह ऐसा नष्ट हो गया है कि न तो युद्ध करनेकी मनमें रही और न युद्ध न करनेकी ही मनमें रही। अब तो यही एक मनमें रही है कि आप जैसा कहें? वैसा मैं करूँ अर्थात् अब,तो बस? आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा -- करिष्ये वचनं तव। अब मेरेको युद्ध करने अथवा न करनेसे किसी तरहका किञ्चिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है। अब तो आपकी आज्ञाके अनुसार लोकसंग्रहार्थ युद्ध आदि जो कर्तव्यकर्म होगा? वह करूँगा।अब एक ध्यान देनेकी बात है कि पहले कुटुम्बका स्मरण होनेसे अर्जुनको मोह हुआ था। उस मोहके वर्णनमें भगवान्ने यह प्रक्रिया बतायी थी कि विषयोंके चिन्तनसे आसक्ति? आसक्तिसे कामना? कामनासे क्रोध? क्रोधसे मोह? मोहसे स्मृतिभ्रंश? स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन होता है (गीता 2। 6263)। अर्जुन भी यहाँ उसी प्रक्रियाको याद दिलाते हुए कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मोहसे जो स्मृति भ्रष्ट होती है? वह स्मृति मिल गयी है -- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा। स्मृति नष्ट होनेसे बुद्धिनाश हो जाता है? इसके उत्तरमें अर्जुन कहते हैं कि मेरा सन्देह चला गया है -- गतसन्देहः। बुद्धिनाशसे पतन होता है? उसके उत्तरमें कहते हैं कि मैं अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हूँ -- स्थितोऽस्मि। इस प्रकार उस प्रक्रियाको बतानेमें अर्जुनका तात्पर्य है कि मैंने आपके मुखसे ध्यानपूर्वक गीता सुनी है? तभी तो आपने सम्मोहका कहाँ प्रयोग किया है और सम्मोहकी परम्परा कहाँ कही है? वह भी मेरेको याद है। परन्तु मेरे मोहका नाश होनेमें तो आपकी कृपा ही कारण है।यद्यपि वहाँका और यहाँका -- दोनोंका विषय भिन्नभिन्न प्रतीत होता है क्योंकि वहाँ विषयोंके चिन्तन करने आदि क्रमसे सम्मोह होनेकी बात है और यहाँ सम्मोह मूल अज्ञानका वाचक है? फिर भी गहरा विचार किया जाय तो भिन्नता नहीं दीखेगी। वहाँका विषय ही यहाँ आया है।दूसरे अध्यायके इकसठवेंसे तिरसठवें श्लोकतक भगवान्ने यह बात बतायी कि इन्द्रियोंको वशमें करके अर्थात् संसारसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होनेसे बुद्धि स्थिर हो जाती है। परन्तु मेरे परायण न होनेसे मनमें स्वाभाविक ही विषयोंका चिन्तन होता है। विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन ही होता है क्योंकि यह आसुरीसम्पत्ति है। परन्तु यहाँ उत्थानकी बात बतायी है कि संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख होनेसे मोह नष्ट हो जाता है क्योंकि यह दैवीसम्पत्ति है। तात्पर्य यह हुआ कि वहाँ भगवान्से विमुख होकर इन्द्रियों और विषयोंके परायण होना पतनमें हेतु है और यहाँ भगवान्के सम्मुख होनेपर भगवान्के साथ वास्तविक सम्बन्धकी स्मृति आनेमें भगवत्कृपा ही हेतु है।भगवत्कृपासे जो काम होता है? वह श्रवण? मनन? निदिध्यासन? ध्यान? समाधि आदि साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधन किया जाता है? उस साधनमें अपना सूक्ष्म व्यक्तित्व अर्थात् अहंभाव रहता है। वह व्यक्तित्व साधनमें अपना पुरुषार्थ न मानकर केवल भगवत्कृपा माननेसे ही मिटता है।मार्मिक बातअर्जुनने कहा कि मुझे स्मृति मिल गयी -- स्मृतिर्लब्धा। तो विस्मृति किसी कारणसे हुई जीवने असत्के साथ तादात्म्य मानकर असत्की मुख्यता मान ली? इसीसे अपने सत्स्वरूपकी विस्मृति हो गयी। विस्मृति होनेसे इसने असत्की कमीको अपनी कमी मान ली? अपनेको शरीर मानने (मैंपन) तथा शरीरको अपना मानने (मेरापन) के कारण इसने असत् शरीरकी उत्पत्ति और विनाशको अपनी उत्पत्ति और विनाश मान लिया एवं जिससे शरीर पैदा हुआ? उसीको अपनी उत्पादक मान लियाअब कोई प्रश्न करे कि भूल पहले हुई कि असत्का सम्बन्ध पहले हुआ अर्थात् भूलसे असत्का सम्बन्ध हुआ कि असत्के सम्बन्धसे भूल हुई तो इसका उत्तर है कि अनादिकालसे जन्ममरणके चक्करमें पड़े हुए जीवको जन्ममरणसे छुड़ाकर सदाके लिये महान् सुखी करनेके लिये अर्थात् केवल अपनी प्राप्ति करानेके लिये भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर दिया। भगवान्का अकेलेमें मन नहीं लगा -- एकाकी न रमते (बृहदारण्यक 1। 4। 3)? इसलिये उन्होंने अपने साथ खेलनेके लिये मनुष्यशरीरकी रचना की। खेल तभी होता है? जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र होते हैं। अतः भगवान्ने मनुष्यशरीर देनेके साथसाथ इसे स्वतन्त्रता भी दी और विवेक (सत्असत्का ज्ञान) भी दिया। दूसरी बात? अगर इसे स्वतन्त्रता और विवेक न मिलाता? तो यह पशुकी तरह ही होता? इसमें मनुष्यताकी किञ्चिन्मात्र भी कोई विशेषता नहीं होती। इस विवेकके कारण असत्को असत् जानकर भी मनुष्यने मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया और असत्में (संसारके भोग और संग्रहके सुखमें) आसक्त हो गया। असत्में आसक्त होनेसे ही भूल हुई है।असत्को असत् जानकर भी यह उसमें आसक्त क्यों होता है कारण कि असत्के सम्बन्धसे प्रतीत होनेवाले तात्कालिक सुखकी तरफ तो यह दृष्टि रखता है? पर उसका परिणाम क्या होगा? उस तरफ अपनी दृष्टि रखता ही नहीं। (जो परिणामकी तरफ दृष्टि रखते हैं? वे संसारी होते हैं।) इसलिये असत्के सम्बन्धसे ही भूल पैदा हुई है। इसका पता कैसे लगता है जब यह अपने अनुभवमें आनेवाले असत्की आसक्तिका त्याग करके परमात्माके सम्मुख हो जाता है? इससे सिद्ध हुआ कि परमात्मासे विमुख होकर जाने हुए असत्में आसक्ति होनेसे ही यह भूल हुई है।असत्को महत्त्व देनेसे होनेवाली भूल स्वाभाविक नहीं है। इसको मनुष्यने खुद पैद किया है। जो चीज स्वाभाविक होती है? उसमें परिवर्तन भले ही हो? पर उसका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु भूलका अत्यन्त अभाव होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस भूलको मनुष्यने खुद उत्पन्न किया है क्योंकि जो वस्तु मिटनेवाली होती है? वह उत्पन्न होनेवाली ही होती है। इसलिये इस भूलको मिटानेका दायित्व भी मनुष्यपर ही है? जिसको वह सुगमतापूर्वक मिटा सकता है। तात्पर्य है कि अपने ही द्वारा उत्पन्न की हुई इस भूलको मिटानेमें मनुष्यमात्र समर्थ और सबल है। भूलको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने पूरी दे रखी है। भूल मिटते ही अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति अपनेआपमें ही जाग्रत् हो जाती है और मनुष्य सदाके लिये कृतकृत्य? ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है।अबतक मनुष्यने अनेक बार जन्म लिया है और अनेक बार कई वस्तुओं? व्यक्तियों? परिस्थितियों? अवस्थाओं? घटनाओं आदिका मनुष्यको संयोग हुआ है परन्तु उन सभीका उससे वियोग हो गया और वह स्वयं वही रहा। कारण कि वियोगका संयोग अवश्यम्भावी नहीं है? पर संयोगका वियोग अवश्यम्भावी है। इससे सिद्ध हुआ कि संसारसे वियोगहीवियोग है? संयोग है ही नहीं। अनादिकालसे वस्तुओं आदिका निरन्तर वियोग ही होता चला आ रहा है? इसलिये वियोग ही सच्चा है। इस प्रकार संसारसे सर्वथा वियोगका अनुभव हो जाना हीयोग है -- तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् (गीता 6। 23)। यह योग नित्यसिद्ध है। स्वरूप अथवा परमात्माके साथ हमारा नित्ययोग है (टिप्पणी प0 998) और शरीरसंसारके साथ नित्यवियोग है। संसारके संयोगकी सद्भावना होनेसे ही वास्तवमें नित्ययोग अनुभवमें नहीं आता। सद्भावना मिटते ही नित्ययोगका अनुभव हो जाता है? जिसका कभी वियोग हुआ ही नहीं।संसारसे संयोग मानना हीविस्मृति है और संसारसे नित्यवियोगका अनुभव होना अर्थात् वास्तवमें संसारके साथ मेरा संयोग था नहीं? होगा नहीं और हो सकता भी नहीं -- ऐसा अनुभव होना हीस्मृति है। सम्बन्ध --  पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें अर्थ पदसे श्रीकृष्णार्जुनसंवादके रूपमें गीताका आरम्भ हुआ था? अब आगेके श्लोकमें इति पदसे उसकी समाप्ति करते हुए सञ्जय इस संवादकी महिमा गाते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.73।।प्रेमोपदिष्टात्मज्ञानस्य अज्ञानसंदेहविपर्यासरहितस्य पृष्टस्य भगवदनुग्रहप्राप्तिकथनेन भगवन्तं परितोषयिष्यन्नर्जुनो विज्ञापितवानित्याह -- अर्जुन इति। अज्ञानोत्थस्याविवेकस्य नष्टत्वमेव स्पष्टयति -- समस्त इति। स्वयंज्योतिषि प्रतीचि ब्रह्मण्यविद्याभ्रमं विद्यापनयति नाविदितं प्रकाशयतीति मत्वाह -- स्मृतिश्चेति। स्मृतिलाभे किं स्यादिति चेत्तदाह -- यस्या इति। मोहनाशे स्मृतिप्रतिलम्भे चासाधारणं कारणमाह -- त्वत्प्रसादादिति। प्रकृतेन प्रश्नप्रतिवचनेन लब्धमर्थं कथयति -- अनेनेति। यदुक्तं स्मृतिप्रतिलम्भादशेषतो हृदयग्रन्थीनां विप्रमोक्षः स्यादिति तत्र प्रमाणमाह -- तथाचेति। ज्ञानादज्ञानतत्कार्यनिवृत्तौ श्रुत्यन्तरमपि संवादयति -- भिद्यत इति। भगवदनुग्रहादज्ञानकृतमोहदाहानन्तरमात्मज्ञाने प्रतिलब्धे त्वदाज्ञाप्रतीक्षोऽहमित्युत्तरार्धं व्याकरोति -- अथेति। तव वचनं करिष्येऽहमित्यत्र तात्पर्यमाह -- अहमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.73।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.73।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।1.3।।धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.73।। -- नष्टः मोहः अज्ञानजः समस्तसंसारानर्थहेतुः? सागर इव दुरुत्तरः। स्मृतिश्च आत्मतत्त्वविषया लब्धा? यस्याः लाभात् सर्वहृदयग्रन्थीनां विप्रमोक्षः त्वत्प्रसादात् तव प्रसादात् मया त्वत्प्रसादम् आश्रितेन अच्युत। अनेन मोहनाशप्रश्नप्रतिवचनेन सर्वशास्त्रार्थज्ञानफलम् एतावदेवेति निश्चितं दर्शितं भवति? यतः ज्ञानात् मोहनाशः आत्मस्मृतिलाभश्चेति। तथा च श्रुतौ अनात्मवित् शोचामि (छा0 उ0 7।1।3) इति उपन्यस्य आत्मज्ञानेन सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः उक्तः भिद्यते हृदयग्रन्थिः (मु0 उ0 2।2।8) तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः (ई0 उ0 7) इति च मन्त्रवर्णः। अथ इदानीं त्वच्छासने स्थितः अस्मि गतसंदेहः मुक्तसंशयः। करिष्ये वचनं तव। अहं त्वत्प्रसादात् कृतार्थः? न मे कर्तव्यम् अस्ति इत्यभिप्रायः।।परिसमाप्तः शास्त्रार्थः। अथ इदानीं कथासंबन्धप्रदर्शनार्थं संजयः उवाच --,संजय उवाच --,

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【 Verse 18.74 】

▸ Sanskrit Sloka: सञ्जय उवाच | इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन: | संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ||

▸ Transliteration: sañjaya uvāca | ityahaṁ vāsudevasya pārthasya ca mahātmanaḥ | saṁvādam imam aśrauṣam adbhutaṁ roma-harṣaṇam ||

▸ Glossary: Sañjaya uvāca: Sañjaya said; iti: thus; ahaṁ: I; vāsudevasya: of Kṛṣṇa; pārthasya: of Arjuna; ca: also; mahātmanaḥ: two great souls; saṁvādaṁ: discussion; imaṁ: this; aśrauṣaṁ: heard; adbhutaṁ: wonder; romaharṣaṇam: hair standing on end

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.74 Sañjaya said: Thus have I heard the conversation of two great souls, Kṛṣṇa and Arjuna. And so wonderful is that message that my hair stands on end.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.74।।सञ्जय बोले -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.74।। संजय ने कहा -- इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमान्चक संवाद का वर्णन किया।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.74 इति thus? अहम् I? वासुदेवस्य of Krishna? पार्थस्य of Arjuna? च and? महात्मनः highsouled? संवादम् dialogue? इमम् this? अश्रौषम् (I) have heard? अद्भुतम् wonderful? रोमहर्षणम् which causes the hair to stand on end.Commentary Wonderful because it deals with Yoga and transcendental spiritual matters that pertain to the mysterious immortal Self.Whenever good? higher emotions manifest themselves in the heart the hair stands on end. Devotees often experience this horripilation.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.74. Sanjaya said Thus I have heard this wonderful and thrilling dailogue of Vasudeva and the mighty-minded son of Prtha.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.74 Sanjaya told: "Thus have I heard this rare, wonderful and soul-stirring discourse of the Lord Shri Krishna and the great-souled Arjuna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.74 Sanjaya said I thus heard this conversation of Vasudeva and of the great-souled Partha, which is unie and makes one's hair stand on end.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.74 Sanjaya said Thus I have heard this wonderful dialogue between Krishna and the high-souled Arjuna, which causes the hair to stand on end.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.74 See Comment under 18.78

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.74 Sanjaya said Thus, in this way have I been hearing, this wondrous and thrilling dialogue, as it took place between Vasudeva, the son of Vasudeva, and His paternal aunt's son Arjuna, who is a Mahatman, one possessed of a great intelligence, and who has resorted to the feet of Sri Krsna.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.74 Aham, I; iti, thus; asrausam, heard; imam, this; samvadam, conversation, as has been narrated; vasudevasya, of Vasudeva; and mahatmanah, parthasya, of the great-soulded Partha; which is adbhutam, unie, extremely wonderful; and roma-harsanam, makes one's hair stand on end.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.74।। गीतोपदेश का प्रारम्भ होने के पूर्व? अर्जुन ने कहा था? मैं युद्ध नहीं करूंगा। और? उपदेश की समाप्ति पर उसने? पूर्व श्लोक में? यह घोषणा की? मैं आपके वचन का पालन करूंगा। इस प्रकार रोग का उपचार पूर्ण हुआ और उसके साथ ही गीताशास्त्र की परिसमाप्ति होती है। इस सन्दर्भ में? ईसामसीह के कथन का स्मरण होता है। प्राणदण्ड की शूली को ढोते हुए वे जा रहे थे लोगों की व्यंगोक्तियों से क्षणभर के लिये वे अर्जुन की स्थिति में पहुंच गये। परन्तु? तत्काल मोह मुक्त होकर उन्होंने घोषणा की हे प्रभु आपकी इच्छा पूर्ण होगी। अर्जुन के और ईसामसीह के वाक्यों में कितनी साम्यता है।मैंने भगवान् वासुदेव और अर्जुन का संवाद सुना अध्यात्म की सांकेतिक भाषा के अनुसार वासुदेव का अर्थ है? सर्वव्यापी चैतन्यस्वरूप आत्मा तथा पार्थ का अर्थ है? जड़ उपाधियों से तादात्म्य किया जीव। जब यह जीव इस मिथ्या तादात्म्य का परित्याग कर देता है? तब वह अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करता है। आत्मानात्म के विवेक की कला ही गीताशास्त्र का प्रतिपाद्य विषय है।अद्भुत श्रीकृष्णार्जुन के संवाद रूप में श्रवण किये गये तत्त्वज्ञान को? संजय? अद्भुत और विस्मयकारी विशेषण देता है। सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ग्राह्य होने के कारण कोई भी दर्शनशास्त्र आश्चर्यमय नहीं होता है। परन्तु गीता के तत्त्वज्ञान की अद्भुतता भी कुछ अपूर्व ही है। जो अर्जुन पूर्णतया विघटित और विखण्डित हो चुका था? वही अर्जुन इस ज्ञान को प्राप्त कर सुगठित? पूर्ण और शक्तिशाली बन गया। यह एक उदाहरण ही गीता की कल्याणकारी शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी कारण गीता को एक अनन्य और अलौकिक आभा प्राप्त हुई है।गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का स्वामी है? दास नहीं। उसमें स्वामित्व की यह क्षमता पहले से ही विद्यमान है। जब यह सत्य उद्घाटित किया जाता है? तब संजय के लिए यह स्वाभाविक है कि वह आनन्दविभोर होकर इसे अद्भुत कह उठे।महात्मा अर्जुन संजय इस श्लोक में अर्जुन को गौरवान्वित करता है? पार्थसारथि भगवान् श्रीकृष्ण को नहीं। भाव यह है कि यदि कोई छोटा बालक कठिन काम करके दिखाता है? तो वह स्तुति और अभिनन्दन का पात्र होता है। परन्तु वही कार्य कोई नवयुवक कर के दिखाये? तो उसमें कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं होती। इसी प्रकार? सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीकृष्ण के लिए गीता का उपदेश देना बच्चों का खेल है? जबकि मोह और भ्रम में फँसे हुए अर्जुन का उस स्थिति से बाहर निकल कर आना? वास्तव में एक उपलब्धि है। उसका यह साहस और वीरत्व प्रशंसनीय है।संजय की सहानुभूति सदैव पाण्डवों के साथ ही थी। परन्तु वह धृतराष्ट्र का नमक खा रहा था? इसलिए अपने स्वामी के साथ निष्ठावान रहना उसका कर्तव्य था। उस समय की राजनीति के अनुसार केवल धृतराष्ट्र ही इस युद्ध को रोक सकता था और? इसलिए? संजय यथासंभव सूक्ष्म संकेत करता है कि अर्जुन पुन अपनी वीरतपूर्ण स्थिति में आ गया है? जिसका परिणाम होगा धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्रों का विनाश? वृद्धावस्था में पुत्रवियोग की पीड़ा और असम्मान का कलंकित जीवन। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि लड़खड़ाते धृतराष्ट्र की अन्धता केवल नेत्रों की ही नहीं? वरन् मन और बुद्धि की भी थी? क्योंकि संजय के अनुनय विनय के नैतिक संकेतों का उस अन्ध राजा के बधिर कानों पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता है।महर्षि वेदव्यास के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करते हुए संजय कहता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.74।।परिसमाप्तः कृष्णपार्थसंवादात्मकः शास्त्रार्थोऽथेदानीं कथासंबन्धप्रदर्शनार्थं संजय उवाच -- इत्यहं वासुदेवस्य सर्वात्मनः सर्वज्ञस्य सर्वेश्वरस्य पार्थस्य पृथापुत्रस्य च महात्मनोऽक्षुद्रस्वभावस्य भगवदनुग्रहीतस्य सभ्यग्वांद संवादं गुरुशिष्यवचनेन प्रश्नप्रतिवचनाभिधानमिमं त्वां प्रत्युक्तं अद्भुतमत्यन्तविस्मयकरं रोमाणि हृष्यन्ति पुलकीभवन्त्यनेनेति रोमहर्षणं हर्षनिमित्तकरोमाञ्चकरं अश्रौषं श्रुतवानस्मि। अतिधन्यो वसुदेवो यद्गृहे स्वयं भगवानतीर्णः? पृथा च धन्या यस्याः पुत्रः परमभागवतो भगवदनुगृहीतः ध्वनितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.74।।समाप्तः शास्त्रार्थः। कथासंबन्धमिदानीमनुसंदधानः संजय उवाच -- इत्यहमिति। अद्भुतं चेतसो विस्मयाख्यविकारकरं लोकेष्वसंभाव्यमानत्वात् लोमहर्षणं शरीरस्य रोमाञ्चाख्यविकारकरं तेनातिपरिपुष्टत्वं विस्मयस्य दर्शितं स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.74।।समाप्तः शास्त्रार्थः। इदानीं कथाप्रबन्धमेवानुवर्तयन्संजय उवाच -- इतीति। अद्भुतं चेतसो विस्मयकरम्। रोमहर्षणं रोमाञ्चोद्भेदजनकम्। शेषं स्पष्टम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.74।।एवं धृतराष्ट्रपृष्टश्रीकृष्णार्जुनसंवादं सफलमशेषतः कथयित्वा भगवति सासूयत्वात् धृतराष्ट्रस्य फलाभावकथनार्थं स्वस्य च तदग्रे कथनावश्यकत्वाय स्वस्य श्रवणानन्दभवनकारणज्ञापनाय स्तुतकथानुसन्धानेन सञ्जय उवाच -- इतीति। इति अमुना प्रकारेण अहं त्वदीयत्वेन द्वेषसम्बन्धयुक्तोऽपि वासुदेवस्य मोक्षदातुः महात्मनो भगवद्भक्तस्य पार्थस्य च इमं मया पूर्वोक्तं संवादम् उत्तरप्रत्युत्तररूपं अद्भुतम्? अलौकिकं रोमहर्षणं रोमहर्षकरम् आनन्दोद्बोधकं अश्रौषं श्रुतवानस्मि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.74।।तदेवं धृतराष्ट्रं प्रति श्रीकृष्णार्जुनसंवादं कथयित्वा प्रस्तुतां कथामनुसंदधानः संजय उवाच -- इतीति। रोमहर्षणं रोमाञ्चकरं संवादमश्रौषं श्रुतवानहम्। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.74।।तदेवं धृतराष्ट्रं प्रति श्रीकृष्णार्जुनसंवादमुक्त्वा प्रस्तुतकथामनुसन्दधानः सञ्जय उवाच --,इत्यहमिति। उभयोः संवादमिममश्रौषम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.74।।शास्त्रका अभिप्राय समाप्त हो चुका। अब कथाका सम्बन्ध दिखलानेके लिये संजय बोला --, इस प्रकार मैंने यह उपर्युक्त अद्भुत -- अत्यन्त विस्मयकारक रोमाञ्च करनेवाला श्रीवासुदेव भगवान् और महात्मा अर्जुनका संवाद सुना।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.74।। व्याख्या --   इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः -- सञ्जय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह संवाद सुना? जो कि अत्यन्त अद्भुत? विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्षके मारे रोमाञ्चित करनेवाली है।यहाँ इति पदका तात्पर्य है कि पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः पदोंसे सञ्जय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताका आरम्भ करते हैं और यहाँ इति पदसे उस संवादकी समाप्ति करते हैं।अर्जुनके लिये महात्मनः विशेषण देनेका तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं? जिनकी आज्ञाका पालन स्वयं भगवान् करते हैं अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कर दो (गीता 1। 21)? तो भगवान् दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कर देते हैं (गीता 1। 24)। गीतामें अर्जुन जहाँजहाँ प्रश्न करते हैं? वहाँवहाँ भगवान् बड़े प्यारसे और बड़ी विलक्षण रीतिसे प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुनके और भगवान् वासुदेवके संवादको मैंने सुना है।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् -- इस संवादमें अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है शास्त्रोंमें प्रायः ऐसी बात आती है कि संसारकी निवृत्ति करनेसे ही मनुष्य पारमार्थिक मार्गपर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्योंमें भी प्रायः ऐसी ही धारण बैठी हुई है कि घर? कुटुम्ब आदिको छोड़कर साधुसंन्यासी होनेसे ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति? अवस्था? घटना? काल आदि क्यों न हो? उसीके सदुपयोगसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं? वह परिस्थिति बढ़ियासेबढ़िया हो या घटियासेघटिया? सौम्यसेसौम्य हो या घोरसेघोर विहित युद्धजैसी प्रवृत्ति हो? जिसमें दिनभर मनुष्योंका गला काटना पड़ता है? उसमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है? मुक्ति हो सकती है (टिप्पणी प0 999)। कारण कि जन्ममरणरूप बन्धनमें संसारका राग ही कारण है (गीता 13। 21)। उस रागको मिटानेमें परिस्थितिका सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थितिमें रागद्वेष न करके अपने कर्तव्यका पालन करता है? वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता 5। 3)। यही इस संवादमें अद्भुतपना है।भगवान्का स्वयं अवतार लेकर मनुष्यजैसा काम करते हुए अपनेआपको प्रकट कर देना औरमेरी शरणमें आ जा यह अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात कह देना -- यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाला? प्रसन्न करनेवाला? आनन्द देनेवाला है। सम्बन्ध --  पारमार्थिक मार्गमें सच्चे साधकको जिसकिसीसे लाभ होता है? उसकी वहि कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अतः सञ्जय भी आगेके तीन श्लोकोंमें व्यासजीकी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.74।।शास्त्रार्थे समाप्ते सत्यस्यामवस्थायां संजयवचनं कुत्रोपयुक्तमिति तदाह -- परिसमाप्त इति। वासुदेवस्य सर्वज्ञस्य सर्वेश्वरस्य कृतार्थस्य पार्थस्य पृथासुतस्यार्जुनस्य महात्मनोऽक्षुद्रबुद्धेः सर्वाधिकारिगुणसंपन्नस्य सम्यञ्चं वादं संवादं गुरुशिष्यभावेन प्रश्नप्रतिवचनाभिधानमिममनुक्रान्तमद्भुतं विस्मयकरं रोमाणि हृष्यन्ति पुलकीभवन्त्यनेनेति रोमहर्षणमाह्लादकं यथोक्तं श्रुतवानस्मीत्याह -- इत्येवमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.74।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.74।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।1.4।।धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.74।। --,इति एवम् अहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः संवादम् इमं यथोक्तम् अश्रौषं श्रुतवान् अस्मि अद्भुतम् अत्यन्तविस्मयकरं रोमहर्षणं रोमाञ्चकरम्।।तं च इमम् --,

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【 Verse 18.75 】

▸ Sanskrit Sloka: व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् | योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत: स्वयम् ||

▸ Transliteration: vyasā-prasādāc chrutavān etad guhyam ahaṁ param | yogaṁ yogeśvarāt kṛṣnāt sākṣāt kathayataḥ svayam ||

▸ Glossary: vyasāprasādāt: by the mercy of Vyāsadeva; śrutavān: heard; etat: this; guhyaṁ: confidential; ahaṁ: I; param: the supreme; yogaṁ: mysticism; yogeśvarāt: from the master of all mysticism; kṛṣnāt: from Kṛṣṇa; sākṣāt: directly; kathayataḥ: speaking; svayam: personally

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.75 By the mercy of Vyāsa, I have heard these most confidential words directly from Kṛṣṇa, the master of all mysticism, who was speaking personally to Arjuna.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.75।।व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग (गीताग्रन्थ) को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.75।। व्यास जी की कृपा से मैंने इस परम् गुह्य योग को साक्षात् कहते हुए स्वयं योगोश्वर श्रीकृष्ण भगवान् से सुना।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.75 व्यासप्रसादात् through the grace of Vyasa? श्रुतवान् have heard? एतत् this? गुह्यम् secret? अहम् I? परम् supreme? योगम् Yoga? योगेश्वरात् from the Lord of Yoga? कृष्णात् from Krishna? साक्षात् directly? कथयतः declaring? स्वयम् Himself.Commentary Through the grace of Vyasa By obtaining the divine eye from him.Yoga This dialogue between Krishna and Arjuna? I have heard it direct from Him. This dialogue is called Yoga because it treats of Yoga and it leads to the attainment of union with the Lord.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.75. Through the grace of Vyasa, I have heard this highly secret supreme Yoga from Krsna, the Lord of the Yogins, while He was Himself imparting it personally.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.75 Through the blessing of the sage Vyasa, I listened to this secret and noble science from the lips of its Master, the Lord Shri Krishna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.75 Through the favour of Vyasa I heard this secret concerning the supreme Yoga from Krsna, the Lord of yogas, while He Himself was actually speaking!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.75 Through the grace of Vyasa I have heard this supreme and most secret Yoga direct from Krishna, the Lord of Yoga, Himself declaring it.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.75 See Comment under 18.78

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.75 By the grace of Vyasa i.e., by the benefit of the divine sense of perception, granted by him, I have heard this supreme mystery called Yoga from Sri Krsna himself - Sri Krsna who is the treasure-house of knowledge, strength, sovereignty, valour, power and brilliance.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.75 And vyasa-prasadat, through the favour of Vyasa, by having received divine vision from him; aham, I; srutvan, heard; etat [The Commentator uses etam in the masculine gender, in place of etat in the text, because it refers to the masculine word samvada.] (should rather be etam), this; guhyam, secret dialogue, such as it is; concerning the param, supreme; Yogam, Yoga-or, this dialogue itself is the Yoga because it is meant for it-; krsnat, from Krsna; yogeswarat, from the Lord of yogas; kathayatah, while He was speaking; svayam, Himself; saksat, actually; not indirectly through others.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.75।। महाभारत युद्ध के प्रारम्भ होने के पूर्व? महर्षि व्यास जी ने धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि का वरदान देने की अपनी इच्छा प्रकट की थी। परन्तु धृतराष्ट्र में उस वरदान को स्वीकार करने का साहस नहीं था। अत धृतराष्ट्र के अनुरोधानुसार युद्ध का सम्पूर्ण वृतान्त जानने के लिए संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की गयी। इस प्रकार? संजय सम्पूर्ण युद्धभूमि को देख सकने तथा वहाँ के संवादों को सुनने में भी समर्थ हुआ था। वैभवशाली राज प्रासाद में बैठकर वही अन्ध धृतराष्ट्र को युद्ध का वृतान्त सुनाता था। श्रीकृष्णार्जुन के संवाद के द्वारा परम् गुह्य ज्ञान के श्रवण का सुअवसर पाकर संजय कृतार्थ हो गया था। स्वाभाविक है कि वह सिद्ध कवि महर्षि व्यास जी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है और वह मन ही मन महाभारत के रचयिता? अतुलनीय सिद्ध कवि वेदव्यासजी को प्रणाम करता है।साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुना ऐसी बात नहीं है कि संजय ने इसके पूर्व कभी औपनिषदिक ज्ञान को सुना ही नहीं था? जिससे वह इस अवसर पर विस्मयविमुग्ध हो जाय। उसके आनन्द का कारण यह था कि उसे इस ज्ञान का श्रवण करने का ऐसा अवसर मिला? जब साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही इस ज्ञान का उपदेश अपने मुखारविन्द से दे रहे थे।यहाँ? पुन? संजय का प्रयत्न धृतराष्ट्र को यह सूचित करना है कि गीताचार्य श्रीकृष्ण कोई देवकीपुत्र गोपबाल ही नहीं थे? वरन् वे सर्वशक्तिमान् परमात्मा ही थे। स्वयं उन्होंने ने ही अर्जुन को मोहनिद्रा से जगाया था और वे अपने भक्त के रथ के सारथी के रूप में कार्य भी कर रहे थे। वह अन्ध राजा को स्मरण कराता है कि यद्यपि धृतराष्ट्र पुत्रों की सेना पाण्डवों की सेना से अधिक विशाल और शास्त्रास्त्रों से सुसज्जित थी? तथापि उसका विनाश अवश्यंभावी था? क्योंकि उन्हें अपने शत्रुपक्ष में स्वयं अनन्त परमात्मा का ही सामना करना था।संजय आगे कहता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.75।।व्यवहितस्त्वं कथं श्रुतवानित्यपेक्षायामाह -- व्यासप्रसादाल्लब्धदिव्येन्द्रियोऽहं इमं संवादं गुह्यमतिरहस्यं परं योगार्थत्वादयं संवादोऽपि योगस्तं चित्तवृत्तिनिरोधस्य योगस्याङ्गत्वाद्वा एष योगस्तं श्रुत्तवान् योगेश्वरात् कृष्णात्साक्षात्स्वयं कथयतः नतु परंपरातः। योगानामीश्वरादित्युक्त्या व्यवहितेन मया येन योगसामर्थ्येन श्रुतं तत् तस्यैव योगेश्वरस्य सामर्थ्यं नतु ममेति सूचयति। कृष्णादित्यनेन कृष्णप्रसाद एव कृष्णद्वैपायनप्रसादो नत्वन्य इति ध्वनयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.75।।व्यवहितस्यापि भगवदर्जुनसंवादस्य श्रवणयोग्यतामात्मन आह -- व्यासप्रसादादिति। व्यासदत्तदिव्यचक्षुःश्रोत्रादिलाभरूपात् व्यासप्रसादादिमं परं गुह्यं योगं योगाव्यभिचारिहेतुं संवादं योगेश्वरात्कृष्णात्स्वयं स्वेन पारमेश्वरेण रूपेण कथयतः साक्षादेवाहं श्रुतवानस्मि न परंपरयेति स्वभाग्यमभिनन्दति। अत्रेममिति पुंलिङ्गपाठो भाष्यकारैर्व्याख्यात एतदिति नपुंसकलिङ्गपाठस्यैव,योगसामानाधिकरण्येन व्याख्यानमिदमिति तद्व्याख्यातारः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.75।।कथमयं त्वया दूरस्थयोरपि वासुदेवार्जुनयोः संवादः श्रुत इत्यत आह -- व्यासप्रसादादिति। भगवता व्यासेन दिव्यं चक्षुः श्रोत्रादिकं मह्यं दत्तं येनाहं व्यवहितं विप्रकृष्टं वा सर्वं करतलामलकवद्विजानामि। अतो व्यासप्रसादादेतच्छास्त्रं परं गुह्यं गोप्यं अहं श्रुतवान्। योगं चपश्य मे योगमैश्वरम् इति प्रतिज्ञापूर्वकं प्रदर्शितं वैश्वरूप्यं तमपि दृष्टवानिति शेषः। स्वयं कथयत इत्युक्तेअस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः इति श्रुतेः स्वनिःश्वसितं वेदं शिष्याचार्यपरंपरया कथयत इत्यायाति तदर्थं साक्षात्कथयत इति। सृष्ट्यादौ ब्रह्माणं प्रतीव इदानीमर्जुनं प्रति साक्षात्कथयतः श्रुतवानहमित्यर्थः। तेन भगवदनुग्रहपात्रतया ब्रह्मणा समत्वं स्वस्य द्योत्यते। अत्र एतद्योगमित्यभेदेनान्वये तु गुह्यपदापेक्षया एतद्योगमिति पुंनपुंसकलिङ्गयोरपि सामानाधिकरण्यं शक्यं च यत्किंचिदश्नतापि क्षुदुपहन्तुमित्यादाविव पूर्वप्रवृत्तलिङ्गसंस्कारप्राबल्यादुत्तरत्र भिन्नलिङ्गविशेष्यलाभेऽपि पूर्वसंस्कारो न निवर्तत इति सामानाधिकरण्यं विलिङ्गयोरपि वक्तुं शक्यमिति ज्ञेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.75।।ननु द्वेषभावसम्बन्धे सति कथं श्रुतं इत्यत आह -- व्यासप्रसादादिति। व्यासस्य भगवज्ज्ञानावतारस्य प्रसादात् चक्षुश्श्रोत्रादिकं व्यासेनालौकिकं दिव्यं दत्तं? तेन श्रुतवानस्मि। किं तदिति श्रुतं इत्यत आह। एतत् परिदृश्यमानं गुह्यं गोप्यं परं सर्वोत्कृष्टं योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् स्वयं कथयतःश्रुतवानस्मि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.75।।आत्मनस्तच्छ्रवणे संभावनामाह -- व्यासप्रसादादिति। भगवता व्यासेन दिव्यं चक्षुःश्रोत्रादि मह्यं दत्तम्? अतो व्यासस्य प्रसादादेतदहं श्रुतवानस्मि। किं तदित्यपेक्षायामाह परं योगम्। परत्वमाविष्करोति। योगेश्वराच्छ्रीकृष्णात्स्वयमेव साक्षात्कथयतः श्रुतवानिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.75।।ननु कथमेवं त्वया श्रुतोऽयं संवाद इति चेत्तत्राऽऽह -- व्यासप्रसादादिति। दिव्यचक्षुः श्रोत्रादि मह्यं दत्तं? वासुदेवेनार्जुनाय इव। तदेतत्परमं गुह्यं योगं साक्षात्स्वयं कथयतो योगेश्वरात्कृष्णाद्धेतोः परं अनेन कृष्णसम्बन्धात्परत्वमुक्तं तेन साक्षाद्भगवद्वाक्यत्वमेव सिद्ध्यतिया स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिस्सृता? इति गीतामाहात्म्यवाक्यात्वेदाः श्रीकृष्णवाक्यानि इति श्रीमदाचार्योक्तेश्च। तेनैतदर्जुनस्य प्रबोधकं जातमित्यर्थः। न चेश्वरानुगीतोपदेश एवार्जुनस्य प्रबोधक इति वाच्यं? एतच्छेषभूतत्वादिति गृहाण।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.75।।और इसे --, मैंने ( भगवान् ) व्यासजीकी कृपासे उनसे दिव्यचक्षु पाकर इस परम गुह्य संवादको और परम योगको,( सुना ) अथवा ( यों समझो कि ) योगविषयक होनेसे यह संवाद ही योग है? अतः इस संवादरूप योगको मैंने योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे? साक्षात् स्वयं कहते हुए सुना है? परम्परासे नहीं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.75।। व्याख्या --   व्यासप्रसादात् श्रुतवान् -- सञ्जयने जब भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका पूरा संवाद सुना? तब वे बड़े प्रसन्न हुए। अब उसी प्रसन्नतामें वे कह रहे हैं कि ऐसा परम गोपनीय योग मैंने भगवान् व्यासजीकी कृपासे सुना व्यासजीकी कृपासे सुननेका तात्पर्य यह है कि भगवान्ने यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया (10। 1)? इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् (18। 64)? मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे (18। 65)? अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः (18। 66) आदिआदि प्यारे वचनोंसे अपना हृदय खोलकर अर्जुनसे जो बातें कही हैं? उन बातोंको सुननेमें केवल व्यासदेवजीकी कृपा ही है अर्थात् सब बातें मैंने व्यासजीकी कृपासे ही सुनी हैं।एतद् गुह्यं परं योगम् -- समस्त योगोंके महान् ईश्वरके द्वारा कहा जानेसे यह गीताशास्त्रयोग अर्थात् योगशास्त्र है। यह गीताशास्त्र अत्यन्त श्रेष्ठ और गोपनीय है। इसके समान श्रेष्ठ और गोपनीय दूसरा कोई संवाद देखनेसुननेमें नहीं आता।जीवका भगवान्के साथ जो नित्यसम्बन्ध है? उसका नामयोग है। उस नित्ययोगकी पहचान करानेके लिये कर्मयोग? ज्ञानयोग आदि योग कहे गये हैं। उन योगोंके समुदायका वर्णन गीतामें होनेसे गीता भीयोग,अर्थात् योगशास्त्र है।योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् -- सञ्जयके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही है। इसलिये वे हर्षोल्लासमें भरकर कह रहे हैं कि इस योगमें मैंने समस्त योगोंके महान् ईश्वर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे सुना है। सञ्जयको योगेश्वरात्? कृष्णात्? साक्षात्? कथयतः? स्वयम् -- ये पाँच शब्द कहनेकी क्या आवश्यकता थी सञ्जय इन शब्दोंका प्रयोग करके यह कहना चाहते हैं कि मैंने यह संवाद परम्परामें नहीं सुना है और किसीने मुझे सुनाया हैऐसी बात भी नहीं इसको तो मैंने खुद भगवान्के कहतेकहते सुना है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.75।।प्रकृष्टं संवादं कथमश्रौषीरिति चेत्तत्राह -- तं चेति। एतत्पदं संवादपरत्वात्पुंल्लिङ्गत्वेन नेतव्यमित्याह -- एतमिति। परमपुरुषार्थौपयिकत्वात्परत्वं परं गुह्यमतिशयेन गुह्यं रहस्यमिति वा। योगो ज्ञानं कर्म च तदर्थत्वादयं संवादो योग उक्तः? अथवा चित्तवृत्तिनिरोधस्य योगस्याङ्गत्वादयं संवादो योग इत्याह -- संवादमिति। योगानामीश्वरो योगेश्वरस्तदनुग्रहहेतुत्वाद्योगतत्फलयोस्ततः साक्षादव्यवधानेन श्रुतवान्न परंपरयेत्याह -- योगेश्वरादिति। स्वयं स्वेन परमेश्वरेणातिरस्कृतज्ञानैश्वर्यरूपेण कथयतो व्याचक्षाणादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.75।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.75।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।1.5।।धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं

Chapter 18 (Part 43)

तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्। अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.75।। --,व्यासप्रसादात् ततः दिव्यचक्षुर्लाभात् श्रुतवान् इमं संवादं गुह्यतमं परं योगम्? योगार्थत्वात् ग्रन्थोऽपि योगः? संवादम् इमं योगमेव वा योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम्? न परम्परया।।

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【 Verse 18.76 】

▸ Sanskrit Sloka: राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् | केशवार्जुनयो: पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु: ||

▸ Transliteration: rājan saṁsmṛtya-saṁsmṛtya saṁvādam imam adbhutam | keśavārjunayoḥ puṇyaṁ hṛṣyāmi ca muhur-muhuḥ ||

▸ Glossary: rājan: O King; saṁsmṛtya: remembering; saṁsmṛtya: remembering; saṁvādaṁ: discussion; imaṁ: this; adbhutam: wonderful; keśava: Lord Kṛṣṇa; arjunayoḥ: and Arjuna; puṇyaṁ: pious; hṛṣyāmi: taking pleasure; ca: also; muhurmuhuḥ: always, repeatedly

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.76 O King, as I repeatedly recall this wondrous and holy dialogue between Keśava (Kṛṣṇa) and Arjuna, I take pleasure, being thrilled at every moment.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.76।।हे राजन् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस पवित्र और अद्भुत संवादको याद करकरके मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.76।। हे राजन् भगवान् केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पुण्य (पवित्र) संवाद को स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.76 राजन् O King? संस्मृत्य having remembered? संस्मृत्य having remembered? संवादम् the dialogue? इमम् this? अद्भुतम् wonderful? केशवार्जुनयोः between Kesava and Arjuna? पुण्यम् holy? हृष्यामि (I) rejoice? च and? मुहुः again? मुहुः again.Commentary Rajan King Dhritarashtra to whom the Gita is narrated by Sanjaya.Punyam Holy because the mere hearing of the dialogue destroys a multitude of sins and makes the hearer pious and Godfearing and turns his mind towards God.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.76. O king ! By recollecting and recollecting this wonderful pious dialogue of Kesava and Arjuna, I feel also delighted again and again.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.76 O King! The more I think of that marvellous and holy discourse, the more I lose myself in joy.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.76 And, O king, while repeatedly remembering this unie, sacred dialogue between Kesava and Arjuna, I rejoice every moment.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.76 O King, remembering this wonderful and holy dialogue between Krishna and Arjuna, I rejoice again and again.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.76 See Comment under 18.78

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.76 Remembering this auspicious and wondrous dialogue between Sri Krsna and Arjuna, directly heard by me, I rejoice again and again.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.76 And, rajan, O king, Dhrtarastra; after having heard, samsmrtya samsmrtya, while repeatedly remembering; imam, this; adbhuttam, unie; samvadam, dialogue; kesava-arjunayoh, between Kesava and Arjuna; which is punyam, sacred, removes sin even when heard; hrsyami, I rejoice; muhuh, muhuh, every moment.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.76।। ईश्वरीय काव्य गीता को श्रवण करके संजय इस श्लोक में अपनी स्पष्ट प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहता है कि भगवान् केशव और मानव अर्जुन सम्पूर्ण एवं अपूर्ण? उच्च एवं निम्न के मध्य यह संवाद अद्भुत और पुण्यपवित्र है।संजय द्वारा श्रवण किया गया गीता का ज्ञान इतना गम्भीर और आकर्षक रूप से बोधगम्य था कि वह उसे पुन पुन स्मरण करके अपने हृदय में बारम्बार हर्षित हो रहा था।गीता जीवन जीने की कला को बताने वाली सूचनाओं की निर्देशिका है अत? यहाँ भी महर्षि व्यास जी अप्रत्यक्ष रूप से हमें साधनमार्ग का संकेत करते हैं। संस्मृत्य (स्मरण करके) शब्द के द्वारा वे यह दर्शाते हैं कि साधक को श्रवण करने के पश्चात्? बारम्बार मनन? अर्थात् प्राप्त ज्ञान पर चिन्तन करना चाहिए। सम्यक् ज्ञान का फल हर्ष होगा।गर्भ से शवागर्त तक की निरर्थक जीवन यात्रा में? जब मनुष्य कोई निश्चित दिव्य लक्ष्य देख लेता है? तब वह प्रसन्न हो जाता है। गीता का अध्ययन न केवल हमारे दैनिक जीवन को ही अर्थवन्त बना देता है? वरन् सम्पूर्ण जगत् को एक सुनिश्चित आशा और आनन्द का सन्देश भी देता है। गीता हमें जीवन की अन्धेरी गलियों से उठाकर? अपने आन्तरिक साम्राज्य के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित कर देती है। वह मनुष्य को अपनी आन्तरिक परिस्थितियों का सम्राट बना देती है। अज्ञान की दशा में मनुष्य के जीवन का अर्थ केवल वस्तुओं और प्राणियों के आविर्भाव और तिरोभाव रूपी मृत्यु का विक्षिप्त नृत्य ही होता है परन्तु गीताज्ञान से शिक्षित पुरुष उसी दिन प्रतिदिन के सामान्य जीवन में एक लय को पहचानता है? सुन्दरता का अवलोकन करता है और मधुर संगीत का श्रवण करता है।विश्वरूप दर्शन का स्मरण करते हुए संजय कहता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.76।।किंचेममेव केशवार्जुनयोः संवादमद्भुतं पुण्यं श्रवणमात्रेणापि पापहरं श्रुत्वा संस्मृत्य संस्मृत्य पुनः पुनः स्मृत्वा,मुहुर्मुहुः प्रतिक्षणं हृष्यामि रोमाञ्चितो भवामि हर्षं प्राप्नोमीति वा। तयोः संवादं श्रुतवान् त्वमपि वैरं विहाय कृष्णभक्तिमत्यादरेणाङ्गीकुर्वन्नत्यन्तदीप्तिमानत्यन्तहृष्टो वास्तवो राजा भवेति बोधयन् संबोधयति हे राजन्निति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.76।।राजन्निति। पुण्यं श्रवणेनापि सर्वपापहरं केशवार्जुनयोरिमं संवादमद्भुतं न केवलं श्रुतवानस्मि किंतु संस्मृत्य संस्मृत्य। संभ्रमे द्विरुक्तिः। मुहुर्मुहुर्वारंवारं हृष्यामि च हर्षं प्राप्नोमि च। प्रतिक्षणं रोमाञ्चितो भवामीति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.76।।केशवार्जुनसंवादश्रवणजं विश्वरूपाख्ययोगदर्शनजं चाह्लादं क्रमेण श्लोकद्वयेनाह -- राजन्निति। हे राजन् हे धृतराष्ट्र? पुण्यं पुण्यकरं पापहरं चेत्यर्थात्। संस्मृत्यसंस्मृत्येति संभ्रमे द्विरुक्तिः। शेषं स्पष्टार्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.76।।किञ्च -- राजन्निति। हे राजन् इमं केशवार्जुनयोः संवादं अद्भुतं लौकिकोपपत्तिरहितं पुण्यजनकं संस्मृत्य संस्मृत्य सादरं संस्मृत्य सादरं संस्मृत्य मुहुर्मुहुः वारंवारं हृष्यामि हर्षं प्राप्नोमि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.76।।किंच -- राजन्निति। हृष्यामि रोमाञ्चितो भवामि हर्षं प्राप्नोमीति वा। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.76।।राजन्निति। केशवार्जुनयोः संवादमिममद्भुतं स्मृत्वाऽहं मुहुर्महुर्हृष्यामि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.76।।हे राजन् धृतराष्ट्र केशव और अर्जुनके इस ( परम ) पवित्र -- सुननेमात्रसे पापोंका नाश करनेवाले? अद्भुत संवादको सुनकर और बारम्बार स्मरण करके? मैं प्रतिक्षण बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.76।। व्याख्या --   राजन्संस्मृत्य ৷৷. मुहुर्मुहुः -- सञ्जय कहते हैं कि हे महाराज भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह बहुत अलौकिक? विलक्षण संवाद हुआ है। इसमें कितना रहस्य भरा हुआ है कि घोरसेघोर युद्धरूप क्रिया करते हुए भी ऊँचीसेऊँची पारमार्थिक सिद्धि हो सकती है मनुष्यमात्र हरेक परिस्थितिमें अपना उद्धार कर सकता है। इस प्रकारके संवादको याद करकरके मैं बड़ा हर्षित हो रहा हूँ? प्रसन्न हो रहा हूँ।श्रीभगवान् और अर्जुनके इस अद्भुत संवादकी महिमा भी बहुत विलक्षण है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन सदा साथमें रहनेपर भी इन दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ। युद्धके समय अर्जुन घबरा गये क्योंकि एक तरफ तो उनको कुटुम्बका मोह तंग कर रहा था और दूसरी तरफ वे क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना अवश्य कर्तव्य समझते थे। मनुष्यकी जब किसी एक सिद्धान्तपर? एक मतपर स्थिति नहीं होती? तब उसकी व्याकुलता बड़ी विचित्र होती है (टिप्पणी प0 1000)। अर्जुन भीयुद्ध करना श्रेष्ठ है या युद्ध न करना श्रेष्ठ है -- इन दोनोंमेंसे एक निश्चित निर्णय नहीं कर सके। इसी व्याकुलताके कारण अर्जुन भगवान्की तरफ खिंच गये? उनके सम्मुख हो गये। सम्मुख होनेसे भगवान्की कृपा उनको विशेषतासे प्राप्त हुई। अर्जुनकी अनन्य भावना? उत्कण्ठाके कारण भगवान् योगमें स्थित हो गये अर्थात् ऐश्वर्य आदिमें स्थित न रहकर केवल अपने प्रेमतत्त्वमें सराबोर हो गये और उसी स्थितिमें अर्जुनको समझाया। इस प्रकार उत्कट अभिलषासम्पन्न अर्जुन और अलौकिक अटलयोगमें स्थित भगवान्के संवादका क्या महिमा कहें उसकी महिमाको कहनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.76।।यथोक्तं संवादं भगवतः श्रुत्वा किमुपेक्षसे नेत्याह -- राजन्निति। पुण्यत्वं साधयति -- श्रवणादपीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.76।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.76।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।1.6।।धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.76।। --,हे राजन् धृतराष्ट्र? संस्मृत्य संस्मृत्य प्रतिक्षणं संवादम् इमम् अद्भुतं केशवार्जुनयोः पुण्यम् इमं श्रवणेनापि पापहरं श्रुत्वा हृष्यामि च मुहुर्मुहुः प्रतिक्षणम्।।

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【 Verse 18.77 】

▸ Sanskrit Sloka: तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे: | विस्मयो मे महानराजन्हृष्यामि च पुन: पुन: |

▸ Transliteration: tacca saṁsmṛtya-saṁsmṛtya rūpam atyadbhutaṁ hareḥ | vismayo me mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ-punaḥ ||

▸ Glossary: tat: that; ca: also; saṁsmṛtya: remembering; saṁsmṛtya: remembering; rūpaṁ: form; ati: great; adbhutaṁ: wonderful; hareḥ: of Lord Kṛṣṇa; vismayaḥ: wonder; me: my; mahān: great; rājan: O King; hṛṣyāmi: enjoying; ca: also; punaḥ-punaḥ: repeatedly

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.77 O King, when I remember the wonderful form of Lord Kṛṣṇa, I am struck with even greater wonder, and I rejoice again and again.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.77।।हे राजन् भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद करकरके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.77।। हे राजन श्री हरि के अति अद्भुत रूप को भी पुन पुन स्मरण करके मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.77 तत् that? च and? संस्मृत्य having remembered? संस्मृत्य having remembered? रूपम् the form? अत्यद्भुतम् the most wonderful? हरेः of Hari? विस्मयः wonder? मे my? महान् great? राजन् O King? हृष्यामि (I) rejoice? च and? पुनः again? पुनः again.Commentary Form The Cosmic Form. (Cf.XI)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.77. O great king ! On recalling in the mind that extremely wonderful supreme form of Hari, I am amazed and I feel joyous again and again.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.77 As memory recalls again and again the exceeding beauty of the Lord, I am filled with amazement and happiness.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.77 O king, repeatedly recollecting that greatly extraordinary form of Hari, I am struck with wonder. And I rejoice again and again.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.77 And, remembering again and again, also that most wonderful form of Hari, great is my wonder, O King; and I rejoice again and again.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.77 See Comment under 18.78

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.77 Great amazement is caused in me, stirred by joy born of the repeated remembrance of that most marvellous and sovereign form of the Lord revealed to Arjuna and directly witnessed by me. I rejoice again and again.

Why say more?

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.77 And, rajan, O King; samsmrtya samsmrtya, repeatedly recollecting; tat, that; ati-adbhutam, greatly extraordinary; rupam, form, the Cosmic form; hareh, of Hari; mahan vismayah me, I am struck with great wonder. And hrsyami, I rejoice; punah punah, again and again.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.77।। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दर्शाया था जिसका यहाँ संजय स्मरण कर रहा है। सहृदय व्यक्ति के लिए यह विश्वरूप इतना ही प्रभावकारी है? जितना कि गीता का ज्ञान एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए अविस्मरणीय है। वेदों में वर्णित विराट् पुरुष का दर्शन चौंका देने वाला है और गीता में? निसन्देह वह अति प्रभावशाली है। परन्तु कोई आवश्यक नहीं है कि यह महर्षि व्यास जी की केवल काव्यात्मक कल्पना ही हो दूसरे भी अनेक लोग हैं? जिनके अनुभव भी प्राय इसी के समान ही हैं।यदि गीता का तत्त्वज्ञान? मानव जीवन के गौरवशाली प्रयोजन को उद्घाटित करते हुए मनुष्य के बौद्धिक पक्ष को अनुप्राणित और हर्षित करता है? तो प्रत्येक नामरूप? अनुभव और परिस्थिति में मन्दस्मित वृन्दावनबिहारी भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन प्रेमरस से मदोन्मत्त भक्तों के हृदयों को जीवन प्रदायक हर्ष से आह्लादित कर देता है।मेरा ऐसा विचार है कि यदि संजय को स्वतन्त्रता दी जाती? तो उसने श्रीमद्भगवद्गीता पर एक सम्पूर्ण संजय गीता की रचना कर दी होती जब ज्ञान के मौन से बुद्धि हर्षित होती है? और प्रेम के आलिंगन में हृदय उन्मत्त होता है? तब मनुष्य अनुप्राणित कृतकृत्यता के भाव में आप्लावित हो जाता है।कृतकृत्यता के सन्तोष का वर्णन करने में भाषा एक दुर्बल माध्यम है इसलिए? अपनी मन की प्रबलतम भावना का और अधिक विस्तार किये बिना? संजय अपने दृढ़विश्वास को? गीता के इस अन्तिम एक श्लोक में? सारांशत घोषित करता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.77।।यत्तु विश्वरुपं सगुणमर्जुनाय भगवान्ध्यानार्थं दर्शितवान् तच्च हरेरत्यद्भुतं रुपं संस्मृत्य मे महान् विस्मयो भवति। हृष्यामि च पुनः पुनः हरेः यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुरित्यर्जुनसंशयस्य विश्वरुपप्रदर्शनेन हरणे प्रवत्तस्य सर्वोपसंहरणं प्रदर्शनयतः विश्वरुपं श्रुत्वापि त्वं तु द्रोहं परित्यज्य संध्यर्थमुद्यतः सन् न सज्जस इत्याश्यर्यमिति ध्वनयन्नाह हे राजन्निति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.77।।यद्विश्वरूपाख्यं सगुणं रूपमर्जुनाय ध्यानार्थं भगवान्दर्शयामास तदिदानीमनुसंदधानमाह -- तच्चेति। तदिति विश्वरूपं हे राजन्? मम महान्विस्मयोऽतएव हृष्यामि चाहं स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.77।।तच्चेति। रूपं विश्वरूपम्। एतद्दर्शने हिब्रह्माणमीशम् इति देशतो विप्रकृष्टं?वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति इति कालतो व्यवहितं भीष्मादिक्षयं च करतलामलकवद्दृष्टवान्। तच्च जगतो मिथ्यात्वमन्तरेण न संभवतीति प्रतिपादितं वेदान्तकतकेअतीतानागतं वस्तु वीक्ष्यते करबिल्ववत्। योगी संकल्पमात्रोत्थमिति शास्त्रेषु डिण्डिमाः 1 मायायां सर्वदा सर्वं सर्वावस्थमिदं जगत्। अस्तीति तदुपाधिश्चित्सार्वात्म्यात्सर्वमीक्षते 2 आरम्भपरिणामाभ्यां स्वेन रूपेण यन्न सत्। अतीतानागतं वस्तु योगी तद्वीक्षतां कथम् 3 संकल्पमात्रभातं वस्त्वतीतादि यदीष्यते। नष्टस्त्रीदर्शनाभं तत्स्याद्योगिज्ञानमप्रमा 4 योगिसंकल्पमात्रेण तस्योत्पत्तिर्यदीष्यते। ईशसंकल्पमात्रेण सर्वोत्पत्तिस्तदेष्यताम् 5 आरम्भे परिणामे वा देशकालाद्यतिक्रमः। नैव दृष्टः क्वचित्सोऽयं स्वप्नमायादिषु स्फुटः 6 युगपद्गृह्यते कुम्भो नानादेशस्थयोगिभिः। जलसूर्य इवास्माभिस्तेनासौ कल्पितः स्फुटम् 7 योगिभिर्गृह्यमाणत्वाद्धटः सर्वत्र सर्वदा। सन्नेवास्तीति चेत्कार्यं कथमीदृग्विधं भवेत् 8 व्यावृत्तं हीष्यते कार्यं युगपद्भिन्नदेशता। चेत्कल्पनां विनास्येष्टा दृष्टान्तस्तत्र नास्ति वः 9 तस्मान्नाणुभिरारब्धभित्तिवन्नापि गव्यवत्। प्रकृतेः परिणामो वा जगत्किंत्विन्द्रजालवत् 10 सत्यं बद्धदृशामिन्द्रजालं विश्वं पराक्दृशाम्। अधिष्ठानादृते शुद्धदृशां नास्त्येव तद्वयम्। इति 11 स्पष्टार्थो मूलश्लोकः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.77।।किञ्च तच्चेति। तत् अत्यद्भुतं अलौकिकरूपं संस्मृत्य? च पुनः हरेः सर्वदुःखहर्तुः पुरुषोत्तमसम्बन्धिरूपं संस्मृत्य मे विस्मयो महान् जातः? कथं त्वदीया जेष्यन्तीति। मूलभूतस्वरूपदर्शनेन सर्वे मोक्षं प्राप्स्यन्तीति पुनः पुनः वारं वारमादरेण हृष्यामि। यद्वा -- हरेः अत्यद्भुतं पुरुषोत्तमत्वेनानुभवैकवेद्यं तत्संस्मृत्य स्मरणं कृत्वा पुनः संस्मृत्य ध्यानं कृत्वा मे महान् विस्मयः? यतःक्वाहं तुच्छो जीवः? क्व तद्दर्शनं इति त्वत्सम्बन्धेन दर्शनं जातमतः सम्बोधयति -- राजन्निति। किञ्च पुनः हृष्यामि आनन्दं प्राप्नोमि। भगवद्दर्शने हर्षस्तवाप्यनुभवसिद्ध इति तज्ज्ञत्वेन महत्सम्बोधयति -- राजन्निति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.77।।किंच -- तच्चेति। तदिति विश्वरूपं निर्दिशति। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.77।।किञ्च तच्चेति। हे राजन् हरेः सर्वधर्माश्रयस्य विभोर्निरुपममहिम्नः पुरुषोत्तमस्य कृष्णस्य सर्वदुःखहर्तुंर्दुष्टसंहर्तुश्च। तदुक्तं परमाद्भुतमनेकधर्माश्रयमक्षरं कालमायातिगमैश्वरं निरुपममहिमधाम विश्वरूपं संस्मृत्य मे विस्मयो भवति मया साक्षात्कृतत्वात्? च पुनः पुनः स्मृत्वा? स्मृत्वाऽहं हृष्यामि। अनेन दैवस्यैवं हर्षः? नान्यस्येति सूचितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.77।।तथा हे राजन् हरिके उस अति अद्भुत विश्वरूपको भी बारम्बार याद करके? मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.77।। व्याख्या --   तच्च संस्मृत्य ৷৷. पुनः पुनः -- सञ्जयने पीछेके श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादको तोअद्भुत बताया? पर यहाँ भगवान्के विराट्रूपकोअत्यन्त अद्भुत बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि संवादको तो अब भी पढ़ सकते हैं? उसपर विचार कर सकते हैं? पर उस विराट्रूपके दर्शन अब नहीं हो सकते। अतः वह रूप अत्यन्त अद्भुत है।ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें सञ्जयने भगवान्को महायोगेश्वरः कहा था। यहाँ विस्मयो मे महान् पदोंसे कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूपको याद करनेसे महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात? अर्जुनको,तो भगवान्ने कृपासे द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया? पर मेरेको तो व्यासजीकी कृपासे देखनेको मिल गयायद्यपि भगवान्ने रामावतारमें कौसल्या अम्बाको विराट्रूप दिखाया और कृष्णावतारमें यशोदा मैयाको तथा कौरवसभामें दुर्योधन आदिको विराट्रूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ोंमें बड़ेबड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओँका महान् संहार हो रहा है। इस प्रकारके अत्यन्त अद्भुत रूपको याद करके सञ्जय कहते हैं कि राजन् यह सब जो व्यासजी महाराजकी कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है। नहीं तो ऐसा रूप मेरेजैसेको कहाँ देखनेको मिलता सम्बन्ध --  गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गूढ़ाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणआम क्या होगा अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी आगेके श्लोकमें सञ्जय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.77।।यत्तु विश्वरूपाख्यं रूपं स्वगुणमर्जुनाय भगवान्दर्शितवान्ध्यानार्थं तदिदानीं स्तौति -- तच्चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।18.77।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।18.77।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।1.7।।धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.77।। --,त़च्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपम् अत्यद्भुतं हरेः विश्वरूपं विस्मयो मे महान् राजन्? हृष्यामि च पुनः पुनः।।किं बहुना --,

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【 Verse 18.78 】

▸ Sanskrit Sloka: यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: | तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||

▸ Transliteration: yatra yogeśvaraḥ kṛṣṇo yatra pārtho dhanurdharaḥ | tatra śrīrvijayo bhūtir dhruvā nītirmatirmama ||

▸ Glossary: yatra: where; yogeśvaraḥ: the master of mysticism; kṛṣṇaḥ: Lord Kṛṣṇa; yatra: where; pārthaḥ: the son of Pritā; dhanurdharaḥ: the carrier of the bow and arrow; tatra: there; śrīḥ: opulence; vijayaḥ: victory; bhūtiḥ: exceptional power; dhruvā: certain; nītiḥ: morality; matirmama: is my opinion.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 18.78 Wherever there is Yogeśvara Kṛṣṇa, the Master of all mystics, and wherever there is Pārtha, the supreme carrier of bow and arrow, there will certainly be opulence, victory, extraordinary power, and morality. That is my opinion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।18.78।।जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं? वहाँ ही श्री? विजय? विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।18.78।। जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री? विजय? विभूति और ध्रुव नीति है? ऐसा मेरा मत है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 18.78 यत्र wherever? योगेश्वरः the Lord of Yoga? कृष्णः Krishna? यत्र wherever? पार्थः Arjuna? धनुर्धरः the archer? तत्र there? श्रीः prosperity? विजयः victory? भूतिः happiness? ध्रुवा firm? नीतिः policy? मतिः conviction? मम my.Commentary This verse is called the Ekasloki Gita? i.e.? Bhagavad Gita in one verse. Repetition of even this one verse bestows the benefits of reading the whole of the scripture.Wherever On that side on which.Yogesvarah The Lord of Yoga. Krishna is called the Lord of Yogas as the seed of all Yogas comes forth from Him.Dhanurdharah The wielder of the bow called the Gandiva. There On the side of the Pandavas.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the eighteenth discourse entitledThe Yoga of Liberation by Renunciation.OM SHANTIH SHANTIH SHANTIH ,,

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 18.78. Where Krsna, the Lord of Yogins remains, where the son of Prtha holds his bow, there lie fortune, victory, prosperity and firm justice-so I believe.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 18.78 Wherever is the Lord Shri Krishna, the Prince of Wisdom, and wherever is Arjuna, the Great Archer, I am more than convinced that good fortune, victory, happiness and righteousness will follow"

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 18.78 Where there is Krsna, the Lord of yogas, and where there is Partha, the wielder of the bow, there are fortune, victory, prosperity and unfailing prudence. Such is my conviction.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 18.78 Wherever is Krishna, the Lord of Yoga; wherever is Arjuna, the wielder of the bow; there are prosperity, victory, happiness and firm policy; such is my conviction.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 18.74-78 Ityaham etc. upto matir mama While concluding the [Krsna-Arjuna] dialogue with Sanjaya's speech, the [sage Vyasa] teaches this : What leads to the Absolute Brahman is nothing but the recollection of the purport of the dialoguea recollection that is led finally to the status of the highly vivid, direct cognition admitting no differentiation [between its subject and object], resulting from the continuity helped by the series of incessant contemplations [on the purport of the dialogue] according to the method of firmly fixing. Thus, only through the recollection of the dialogue of the Bhagavat and Arjuna, the Reality could be reached and due to that come fortunes, voctories and prosperity.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 18.78 Wherever there is Sri Krsna, the son of Vasudeva, the 'Yogesvara' who is the ruler of the various manifestations of Nature pertaining to all intelligent and non-intelligent entities that have high and low forms, and on whose volition depend the differences in the essential natures, existences and the activities of all things other than Himself, and wherever there is Arjuna, the archer, who is his paternal aunt's son and who took sole refuge at His feet - in such places there always will be present fortune, victory, wealth and sound morality. Such is my firm conviction.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 18.78 To be brief, yatra, where, the side on which; there is Krsna, yogeswarah, the Lord of yogas-who is the Lord of all the yogas and the source of all the yogas, since they originate from Him; and yatra, where, the side on which; there is Partha, dhanurdharah, the wielder of the bow, of the bow called Gandiva; tatra, there, on that side of the Pandavas; are srih, fortune; vijayah, victory; and there itself is bhutih, prosperity, great abundance of fortune; and dhruva, unfailing; nitih, prudence. Such is me, my ; matih, conviction.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।18.78।। सात सौ एक श्लोकों वाली श्रीमद्भगवद्गीता का यह अन्तिम श्लोक है। अधिकांश व्याख्याकारों ने इस श्लोक पर पर्याप्त विचार नहीं किया है और इसकी उपयुक्त व्याख्या भी नहीं की है। प्रथम दृष्टि में इसका शाब्दिक अर्थ किसी भी बुद्धिमान पुरुष को प्राय निष्प्राण और शुष्क प्रतीत होगा। आखिर इस श्लोक में संजय केवल अपने विश्वास और व्यक्तिगत मत को ही तो प्रदर्शित कर रहा है? जिसे गीता के पाठक स्वीकार करे ही? ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है। संजय का कथन यह है कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन हैं? वहाँ समृद्धि (श्री)? विजय? विस्तार और अचल नीति है? यह मेरा मत है।यदि संजय का उद्देश्य अपने व्यक्तिगत मत को हम पर थोपने का होता? और इस श्लोक में किसी विशेष सत्य का प्रतिपादन नहीं किया होता? तो? सार्वभौमिक शास्त्र के रूप में गीता को प्राप्त मान्यता समाप्त हो गयी होती।पूर्ण सिद्ध महर्षि व्यास इस प्रकार की त्रुटि कभी नहीं कर सकते थे? इस श्लोक का गम्भीर आशय है? जिसमें अकाट्य सत्य का प्रतिपादन किया गया है।योगेश्वर श्रीकृष्ण सम्पूर्ण गीता में? श्रीकृष्ण चैतन्य स्वरूप आत्मा के ही प्रतीक हैं। यह आत्मतत्त्व ही वह अधिष्ठान है? जिस पर विश्व की घटनाओं का खेल हो रहा है। गीता में उपदिष्ट विविध प्रकार की योग विधियों में किसी भी विधि से अपने हृदय में उपस्थित उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार किया जा सकता है।धनुर्धारी पार्थ इस ग्रन्थ में? पृथापुत्र अर्जुन एक भ्रमित? परिच्छिन्न? असंख्य दोषों से युक्त जीव का प्रतीक है। जब वह अपने प्रयत्न और उपलब्धि के साधनों (धनुष बाण) का परित्याग करके शक्तिहीन आलस्य और प्रमाद में बैठ जाता है? तो निसन्देह? वह किसी प्रकार की सफलता या समृद्धि की आशा नहीं कर सकता। परन्तु जब वह धनुष् धारण करके अपने कार्य में तत्पर हो जाता है? तब हम उसमें धनुर्धारी पार्थ के दर्शन करते हैं? जो सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए तत्पर है।इस प्रकार? योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन के इस चित्र से आदर्श जीवन पद्धति का रूपक पूर्ण हो जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति से सम्पन्न कोई भी पुरुष जब अपने कार्यक्षेत्र में प्रयत्नशील हो जाता है? तो कोई भी शक्ति उसे सफलता से वंचित नहीं रख सकती। संक्षेप में? गीता का यह मत है कि आध्यात्मिकता को अपने व्यावहारिक जीवन में जिया जा सकता है? और अध्यात्म का वास्तविक ज्ञान जीवन संघर्ष में रत मनुष्य के लिए अमूल्य सम्पदा है।आज समाज में सर्वत्र एक दुर्व्यवस्था और अशांति फैली हुई दृष्टिगोचर हो रही है। वैज्ञानिक उपलब्धियों और प्राकृतिक शक्तियों पर विजय प्राप्त कर लेने पर भी? आज का मानव? जीवन की आक्रामक घटनाओं के समक्ष दीनहीन और असहाय हो गया है। इसका एकमात्र कारण यह है कि उसके हृदय का योगेश्वर उपेक्षित रहा है। मनुष्य की उन्नति का मार्ग है? लौकिक सार्मथ्य और आध्यात्मिक ज्ञान का सुखद मिलन। यही गीता में उपदिष्ट मार्ग है। मनुष्य के सुखद जीवन के विषय में श्री वेद व्यास जी की यही कल्पना है। केवल भौतिक उन्नति से जीवन में गति और सम्पत्ति तो आ सकती है? परन्तु मन में शांति नहीं। आन्तरिक शांति रहित समृद्धि एक निर्मम और घोर अनर्थ हैपरन्तु यह श्लोक दूसरे अतिरेक को भी स्वीकार नहीं करता है। कुरुक्षेत्र के समरांगण में युद्ध के लिए तत्पर धनुर्धारी अर्जुन के बिना योगेश्वर श्रीकृष्ण कुछ नहीं कर सकते थे। केवल आध्यात्मिकता की अन्तर्मुखी प्रवृत्ति से हमारा भौतिक जीवन गतिशील और शक्तिशाली नहीं हो सकता। सम्पूर्ण गीता में व्याप्त समाञ्जस्य के इस सिद्धांत को मैंने यथाशक्ति एवं यथासंभव सर्वत्र स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। मनुष्य के चिरस्थायी सुख का यही एक मार्ग है।संजय इसी मत की पुष्टि करते हुए कहता है कि जिस समाज या राष्ट्र के लोग संगठित होकर कार्य करने? विपत्तियों को सहने और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तत्पर हैं (धनुर्धारी अर्जुन)? और इसी के साथ ये लोग अपने हृदय में स्थित आत्मतत्त्व के प्रति जागरूक हैं (योगेश्वर श्रीकृष्ण)? तो ऐसे राष्ट्र में समृद्धि? विजय? भूति (विस्तार) और दृढ़ नीति होना स्वाभाविक और निश्चित है।समृद्धि? विजय? विस्तार और दृढ़ नीति का उल्लिखित क्रम भी तर्कसिद्ध है। विश्व इतिहास के समस्त विद्यार्थियों की इसकी युक्तियुक्तता स्पष्ट दिखाई देती है। अर्वाचीन काल और राजनीति के सन्दर्भ में? हम यह जानते हैं कि किसी एक विवेकपूर्ण दृढ़ राजनीति के अभाव में कोई भी सरकार राष्ट्र को प्रगति के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ा सकती। दृढ़ नीति के द्वारा ही राष्ट्र की प्रसुप्त क्षमताओं का विस्तार सम्भव होता है? और केवल तभी परस्पर सहयोग और बन्धुत्व की भावना से किसी प्रकार की उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है। दृढ़ नीति और क्षमताओं के विस्तार के साथ विजय कोई दूर नहीं रह जाती। और इन तीनों की उपस्थिति में राष्ट्र का समृद्धशाली होना निश्चित ही है। आधुनिक राजनीति के सिद्धांतों में भी इससे अधिक स्वस्थ सिद्धांत हमें देखने को नहीं मिलता है।अत यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल संजय का ही व्यक्तिगत मत नहीं है? वरन् सभी आत्मसंयमी तत्त्वचिन्तकों का भी यह दृढ़ निश्चय है।गीता के अनेक व्याख्याकार? हमारा ध्यान गीता के प्रारम्भिक श्लोक के प्रथम शब्द धर्म तथा इस अन्तिम श्लोक के अन्तिम शब्द मम की ओर आकर्षित करते हैं। इन दो शब्दों के मध्य सात सौ श्लोकों के सनातन सौन्दर्य की यह माला धारण की गई है। अत इन व्याख्याकारों का यह मत है कि गीता का प्रतिपाद्य विषय है मम धर्म अर्थात् मेरा धर्म। मम धर्म से तात्पर्य मनुष्य के तात्विक स्वरूप और उसके लौकिक कर्तव्यों से है। जब इन दोनों का गरिमामय समन्वय किसी एक पुरुष में हो जाता है? तब उसका जीवन आदर्श बन जाता है। इसलिए? गीता के अध्येताओं को चाहिए कि उनका जीवन आत्मज्ञान? प्रेमपूर्ण जनसेवा एवं त्याग के समन्वय से युक्त हो। यही आदर्श जीवन है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्याय।।इस प्रकार? श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त होता है।इस अन्तिम अध्याय का शार्षक मोक्षसंन्यासयोग है। यह नाम हमें वेदान्त के अस्पर्शयोग का स्मरण कराता है? जिसकी परिभाषा भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में दी है। जीवन के असत् मूल्यों का परित्याग करने का अर्थ ही अपने स्वत सिद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप का साक्षात्कार करना है। हममें स्थित पशु का त्याग (संन्यास) करना ही? हममें स्थित दिव्यतत्त्व का मोक्ष है।मेरे सद्गुरु स्वामी तपोवनजी महाराज को समर्पित।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।18.78।।द्वयोरपि कृष्णार्जुनयोः परनारायणयोः संवादस्य प्रामाण्यार्थ जयाशाशातनार्थं च परममुत्कर्षं दर्शयति -- यत्रेति। यत्र यस्मिन्पक्षे योगेश्वरो योगानां कर्मयोगादीनामघटितघटनापटीयसीनां मायाशक्तीनां चेश्वरः कृष्णःकृषिर्भूवाचकः शब्दोणश्च निर्वृतिवाचकः। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते इत्युक्तः सच्चिदानन्दघनोऽघाकर्षणश्च यत्र यस्मिन्पक्षे? यत्र च पार्थोऽर्जुनो धनुर्धरोगाण्डीवधन्वास्ति तत्र तस्मिन्पाण्डवानां पक्षे श्रीः लक्ष्मीः विजयः परम उत्कर्षः विभूतिः गजादिरुपेण विस्तारः ध्रुवाऽव्यभिचारिणीति सर्वत्र संबन्धनीयम्। नीतिः नयः एतत्सर्वं तस्मिन्पक्षेऽस्तीति मम मतिः निश्चयः।इति श्रीमत्परमहंससपरिब्राजकाचार्यश्रीबालस्वामिशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारमूनुधनपतिविदुषा सारस्वतेन विरचितायां श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां अष्टादशोऽध्यायः।।18।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।18.78।।एवंच सति स्वपुत्रे विजयादिसंभावनां परित्यजेत्याह -- यत्रेति। यत्र यस्मिन् युधिष्ठिरपक्षे योगेश्वरः सर्वयोगसिद्धीनामीश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिर्भगवान्कृष्णो भक्तदुःखकर्षणस्तिष्ठति नारायणो यत्र पार्थो धनुर्धरो यत्र गाण्डीवधन्वा तिष्ठत्यर्जुनो नरस्तत्र नरनारायणाधिष्ठिते तस्मिन् युधिष्ठिरपक्षे श्री राजलक्ष्मीर्विजयः शत्रुपराजयनिमित्त उत्कर्षो भूतिरुत्तरोत्तरं राजलक्ष्म्या विवृद्धिर्ध्रुवाऽवश्यंभाविनीति सर्वत्रान्वयः। नीतिर्नयः एवं मम मतिर्निश्चयस्तस्माद्वृथा पुत्रविजयाशां त्यक्त्वा भगवदनुगृहीतैर्लक्ष्मीविजयादिभाग्भिः पाण्डवैः सह सन्धिरेव विधीयतामित्यभिप्रायः।वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने।।काण्डत्रयात्मकं शास्त्रं गीताख्यं येन निर्मितम्। आदिमध्यान्तषट्केषु तस्मै भगवते नमः।।श्रीगोविन्दमुखारविन्दमधुना मिष्टं महाभारते गीताख्यं परमं रहस्यमृषिणा व्यासेन विख्यापितम्।व्याख्यातं भगवत्पदैः प्रतिपदं श्रीशङ्कराख्यैः पुनर्विस्पष्टं मधुसूदनेन मुनिना स्वज्ञानशुद्ध्यै कृतम्।।इह योऽस्ति विमोहयन्मनः परमानन्दघनः सनातनः। गुणदोषभृदेष एव नस्तृणतुल्यो यदयं स्वयं जनः।।श्रीरामविश्वेश्वरमाधवानां प्रसादमासाद्य मया गुरूणाम्। व्याख्यानमेतद्विहितं सुबोधं समर्पितं तच्चरणाम्बुजेषु।। ,

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।18.78।।यस्मादनन्तैश्वर्यो भगवांस्तदनुगृहीतोऽर्जुनश्च युधिष्ठिरपक्षेऽस्ति अतस्त्वया जयाशा न कार्येत्याह -- यत्रेति। यत्र पक्षे। ध्रुवेति सर्वत्र संबध्यते। श्रीर्दिव्यसभादिशोभा। विजयः प्रसिद्धः। भूतिरैश्वर्यं सर्वनियन्तृत्वम्। नीतिर्नयश्च एतत्सर्वं तत्र तस्मिन्पक्षे ध्रुवमिति मम मतिः। अतः पाण्डवैः सह संधिरेव कर्तव्य इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।18.78।।एवं गीताश्रवणेन भगवद्दर्शनानन्दितचित्तेन स्वमतिनिश्चितार्थमनुवदति तथात्वज्ञानेन शरणागमनार्थम् -- यत्रेति। यत्र येषां पक्षे योगानां सर्वसाधनानामीश्वरो नियामकः तत्र श्रीः लक्ष्मीः? यत्र यस्मिन्नर्थे पार्थः पृथायाः क्षत्ित्रयायाःयदर्थे क्षत्ित्रयासुत इति वाक्यवक्त्र्याः पुत्रो महाशूरो भगवदीयश्च धनुर्धरः ससामग्रीकः तत्र विजयः शत्रूणां पराजयपूर्वकमुत्कर्षः? यत्रैव लक्ष्मीस्तत्रैव भूतिस्तदंशरूपा राज्यलक्ष्मीः ध्रुवा निश्चला? यत्र विजयस्तत्र नीतिर्नय इत्यर्थः। इत्येवंरूपा मे मतिः मद्बुद्धिनिश्चयः।अत्रायं भावः -- यत्र श्रीकृष्णार्जुनौ पक्षे भवतः तत्र श्यादिकं भवति? तत्र साक्षात्तावेव यत्र तत्र किं वाच्यमिति भावः। अतस्तवापि संरम्भादित्यागेन शरणगमनमेव सर्वार्थसाधकमिति भावः। स्वमतित्ववाचकस्येति प्रतिजानीमः।श्रीकृष्णानन्यभक्तस्य गीताश्रवणतः परा। दृढा भक्तिर्भवेद्गीतासारस्त्वेवं हि बुद्ध्यताम्।।1।।शास्त्रार्थरूपमज्ञात्वा कृतं न फलदं भवेत्। हरिर्भजनसिद्ध्यर्थं गीताशास्त्रमथाब्रवीत्।।2।।अर्जुनाय प्रसङ्गेन सर्वोद्धारप्रयत्नवान्। तस्माज्ज्ञात्वा हि गीतार्थं कृष्णः सेव्यो हि सर्वदा।।3।।अतस्तदर्थं गीतार्थो निगूढो विनिरूपितः। श्रीमदाचार्यपादाब्जभक्त्या लब्धो ह्यनन्यया।।4।।श्रीमदाचार्यपादेषु गीतार्थकुसुमाञ्जलिः। न्यस्तस्तेन प्रसीदन्तु ते सदा मयि किङ्करे।।5।।पुष्टिमार्गीयभक्तानां विहारार्थं सुनिर्मला। कृता श्रीकृष्णभावाब्धिगीतामृततरङ्गिणी।।6।।अनन्यैकैव भक्तिर्हि कार्या श्रीकृष्णतुष्टये। विद्याष्टादशकेनापि सर्वथैवोच्यते यतः।।7।।इत्येवाष्टादशाध्यायैर्गीताशास्त्रं हरिः स्वयम्। प्रकटीकृतवाँल्लोके दयालुर्देवकीसुतः।।8।।अत्र युक्तमयुक्तं वा जीवबुद्ध्या ह्यलेखि यत्। तत् क्षमन्तु सदाऽऽचार्याः स्वाङ्गीकृतिबलान्मयि।।9।।कृष्णो जलधरश्यामो बभौ राजीवलोचनः। श्यामाऽपि यस्य वामांसे विद्युल्लेखेव राजते।।10।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।18.78।।अतस्त्वं पुत्राणां राज्यादिशङ्कां परित्यजेत्याशयेनाह -- यत्रेति। यत्र येषां पाण्डवानां पक्षे योगेश्वरः श्रीकृष्णो वर्तते? यत्र च पार्थो गाण्डीवधनुर्धरः तत्रैव श्री राज्यलक्ष्मीः? तत्रैव च विजयः तत्रैव च भूतिरुत्तरोत्तराभिवृद्धिश्च? तत्रैव नीतिर्नयोऽपि ध्रुवा निश्चितेति सर्वत्र संबद्ध्यते। इति मम मतिर्निश्चयः। अत इदानीमपि तावत्सपुत्रस्त्वं श्रीकृष्णं शरणमुपेत्य पाण्डवान्प्रसाद्य सर्वस्वं च तेभ्यो निवेद्य पुत्रप्राणरक्षणं कुर्विति भावः। भगवद्भक्तियुक्तस्य तत्प्रसादात्मबोधतः। सुखं बन्धविमुक्तिः स्यादिति गीतार्थसंग्रहः।।1।।तथाहिपुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया?भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन इत्यादौ भगवद्भक्तेर्मोक्षं प्रति साधकतमत्वश्रवणात्तदेकान्तभक्तिरेव तत्प्रसादोत्थज्ञानावान्तरव्यापारमात्रयुक्ता मोक्षहेतुरिति स्फुटं प्रतीयते। ज्ञानस्य भक्त्यवान्तरव्यापारत्वमेव युक्तम्।तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते?भद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते इत्यादिवचनात्तत्त्वज्ञानमेव भक्तिरित्युक्तम्।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्। भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः इत्यादौ भेदेन निर्देशात्। न चैवं सतितमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इत्यादि श्रुतिविरोधः शङ्कनीयः? भक्त्यवान्तरव्यापारत्वाज्ज्ञानस्य। न हि काष्ठैः पचतीत्युक्ते ज्वालानामसाधनत्वमुक्तं भवति। किंचयस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनाम्देहान्ते देवः परं ब्रह्म तारकं व्याचष्टेयमेवैष वृणुते तेन लभ्यः इत्यादि श्रुतिस्मृतिपुराणवचनान्येवं सति समंजसानि भवन्ति तस्माद्भक्तिरेव मोक्षहेतुरिति सिद्धम्।।तेनैव दत्तया मत्या तद्गीताविवृतिः कृता। स एव परमानन्दस्तया प्रीणातु माधवः।।1।।परमानन्दपादाब्जरजःश्रीधारिणाधुना। श्रीधरस्वामियतिना कृता गीतासुबोधिनी।।2।।स्वप्रागल्भ्यबलाद्विलोड्य भगवद्गीतां तदन्तर्गतं तत्त्वं प्रेप्सुरुपैति किं गुरुकृपापीयूषदृष्टिं विना।अम्बु स्वाञ्जलिना निरस्य जलधेरादित्सुरन्तर्मणीनावर्तेषु न किं निमज्जति जनः सत्कर्णधारं विना।।3।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।18.78।।अतो राजंस्त्वमेवं सर्वमालोच्य निस्संशयो भव? किंबहुना यत्रेति। यत्र योगेश्वरः कृष्णः? यत्र पार्थो धनुर्धरः? तत्र श्रीः राज्यलक्ष्मीः? विजयो ध्रुवा निश्चिता नीतिः? अन्यत्रैवं न? भगवतः श्रीपतित्वात् अर्जुनस्य विजयत्वात्? तत्संयोगे एव सर्वं ध्रुवं नीतिश्चेति मे मतिः। अन्येषामेवं भातु मा भातु वा? ममत्वेवं प्रतिभातीत्यर्थः।यावत्तदुक्तमार्गेण श्रीकृष्णः शरणं मम। नरो न भावयेद्भक्त्या तावन्मोहो न नश्यति।।1।।साङ्ख्यबुद्ध्या नात्मभिन्ने स्वात्मन्यवगते क्रिया। भगवत्यर्पिता कार्या तथा योगधियाऽपि च।।2।।सापि भक्त्या गमयति श्रीकृष्णस्याक्षरं पदम्। तत्रापि पुष्टिभक्त्या हि हरितत्त्वावबोधनम्।।3।।तत्प्रवेशः फलं काम्यं भगवांस्तु परं फलम्। सन्न्यस्य सर्वधर्मान्वा शरणं भावयेत्प्रभुम्।।4।।तदाज्ञा धर्मतः सिद्धिरिति गीतार्थसङ्ग्रहः। विवेकधैर्यहेतुभ्यामाश्रयोऽयं निरूपितः।।5।।तथासति स्थिता राज्ये भगवद्धर्मतेति च।।6।।कर्मान्तर्गतमेव यत्र विमलं ज्ञानं विशुद्धं परं साक्षाच्छ्रीपुरुषोत्तमैकविषयं भक्तिश्च निर्हेतुका।मर्यादा भुवि पुष्टिरुद्भवमिता गत्या प्रपत्त्यात्मनः सर्वत्यागत एव सेयममला गीता समुद्भासते।।6।।या वेदार्थपराद्ध्य्ररत्नविलसन्मञ्जूषिका दूषिका निस्सत्त्वस्य च यन्त्रिणा भगवता पार्थार्थमुद्धाटिता।स्वस्नेहाद्विमतान्तरालतिमिरे श्रीवल्लभाग्नेर्मया प्रादुर्भावितदीपिकात इह सा सन्दृश्यतां भो बुधाः।।7।।श्रीवल्लभविभुचरणाम्बुजयुगविलसद्रजस्सनाथेन। कृतया तुष्यतु रमया सह हरिरनया सतत्त्वदीपिकाया।।8।।,

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।18.78।।बहुत कहनेसे क्या समस्त योग और उनके बीज उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं? अतः भगवान् योगेश्वर हैं। जिस पक्षमें ( वे ) सब योगोंके ईश्वर श्रीकृष्ण हैं तथा जिस पक्षमें गाण्डीव धनुर्धारी पृथापुत्र अर्जुन है? उस पाण्डवोंके पक्षमें ही श्री? उसीमें विजय? उसीमें विभूति अर्थात् लक्ष्मीका विशेष विस्तार और वहीं अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।18.78।। व्याख्या --

Chapter 18 (Part 44)

यत्र योगेश्वरः कृष्णो पार्थो धनुर्धरः -- सञ्जय कहते हैं कि राजन जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले? उनको सम्मति देनेवाले? सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर? महान् बलशाली? महान् ऐश्वर्यवान्? महान् विद्यावान्? महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञाका पालन करनेवाले? भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्तगाण्डीवधनुर्धारी अर्जुन हैं? उसी पक्षमें श्री? विजय? विभूति और अचल नीति -- ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है।भगवान्ने जब अर्जुनको दिव्य दृष्टि दी? उस समय सञ्जयने भगवान्को महायोगेश्वरः (टिप्पणी प0 1001) कहा था? अब उसी महायोगेश्वरकी याद दिलाते हुए यहाँ योगेश्वरः कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं। गीतामें भगवान्के लियेमहायोगेश्वर?योगेश्वर आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियोंको सिखानेवाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता क्योंकि उनका योग स्वतःसिद्ध है। सर्वज्ञता? ऐश्वर्य? सौन्दर्य? माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण हैं? वे सबकेसब भगवान्में स्वतः रहते हैं? वे गुण भगवान्में नित्य रहते हैं? असीम रहते हैं। ऐसे पिताका पिता? फिर पिताका पिता -- यह परम्परा अन्तमें जाकर परमपिता परमात्मामें समाप्त होती है? ऐसे ही जितने भी गुण हैं? उन सबकी समाप्ति परमात्मामें ही होती है।पहले अध्यायमें जब युद्धकी घोषणाका प्रसङ्ग आया? तब कौरवपक्षमें सबसे पहले भीष्मजीने शङ्ख बजाया। भीष्मजी कौरवसेनाके अधिपति थे? इसलिये उनका शङ्ख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डवसेनामें सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शङ्ख बजाकर युद्धकी घोषणा करते हैं लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो सबसे पहले शङ्ख बजानेका भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता। फिर भी वे शङ्ख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डवसेनामें सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बरमें अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनोंने पाण्डवसेनामें सबसे पहले शङ्ख बजाये। तात्पर्य यह हुआ कि सञ्जयने जैसे आरम्भमें (शङ्खवादनक्रियामें) दोनोंकी मुख्यता प्रकट की? ऐसे ही यहाँ अन्तमें इन दोनोंका नाम लेकर दोनोंकी मुख्यता प्रकट करते हैं।गीताभरमें पार्थ सम्बोधनकी अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुनके लिये इतनी संख्यामें और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्को पार्थ सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसी रीतिसे अर्जुनको भी कृष्ण सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीतामें कृष्ण सम्बोधनकी आवृत्ति नौ बार हुई है। भगवान्के सम्बोधनोंमें इतनी संख्यामें दूसरे किसी भी सम्बोधनकी आवृत्ति नहीं हुई। अन्तमें गीताका उपसंहार करते हुए सञ्जयने भी कृष्ण और पार्थ ये दोनों नाम लिये हैं।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम -- लक्ष्मी? शोभा? सम्पत्ति -- ये सब श्री शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान् कृष्ण हैं? वहाँ श्री रहेगी ही।विजय नाम अर्जुनका भी है और शूरवीरता आदिका भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे? वहाँ शूरवीरता? उत्साह आदि क्षात्रऐश्वर्य रहेंगे ही।ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण होंगे? वहाँ विभूति -- ऐश्वर्य? महत्ता? प्रभाव? सामर्थ्य आदि सबकेसब भगवद्गुण रहेंगे ही और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे? वहाँ ध्रुवा नीति -- अटल नीति? न्याय? धर्म आदि रहेंगे ही।वास्तवमें श्री? विजय? विभूति और ध्रुवा नीति -- ये सब गुण भगवान्में और अर्जुनमें हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यताको लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन -- ये दोनों जहाँ रहेंगे? वहाँ अनन्त ऐश्वर्य? अनन्त माधुर्य? अनन्त सौशील्य? अनन्त सौजन्य? अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही।धृतराष्ट्रका विजयकी गूढ़ाभिसन्धिरूप जो प्रश्न है? उसका उत्तर सञ्जय यहाँ सम्यक् रीतिसे दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रोंकी विजय निश्चित है? इसमें कोई सन्देह नहीं है। ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः प्रीतये पार्थसारथेः। अङ्गीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सलः।। नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे (टिप्पणी प0 1002) संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्।।इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।18।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।18.78।।द्वयोरपि कृष्णार्जुनयोर्नरनारायणयोः संवादस्य प्रामाण्यार्थं परममुत्कर्षं दर्शयति -- किं बहुनेति। कथं सर्वेषां योगानामीश्वरो भगवानिति तत्राह -- तत्प्रभवत्वादिति। सर्वयोगो ज्ञानं कर्म च तस्य बीजं शास्त्रीयं ज्ञानवैराग्यादि तद्धि भगवदधीनं तदनुग्रहविहीनस्य तदयोगादतो योगतत्फलयोर्भगवदनुग्रहायत्तत्वाद्भगवतो योगेश्वरत्वमित्यर्थः। श्रीर्लक्ष्मीर्विजयः परम उत्कर्षः। राज्ञो धृतराष्ट्रस्य स्वपुत्रेषु विजयाशां शिथिलीकृत्य पाण्डवेषु जयप्राप्तिमैकान्तिकीमुपसंहरति -- इत्येवमिति। उपायोपेयभावेन निष्ठाद्वयस्य प्रतिष्ठापितत्वात्कर्मनिष्ठा परंपरया ज्ञाननिष्ठाहेतुः? ज्ञाननिष्ठा तु साक्षादेव मोक्षहेतुरिति शास्त्रार्थमुपसंहर्तुमितीत्युक्तम्।काण्डत्रयात्मकं शास्त्रं पदवाक्यार्थगोचरम्। आदिमध्यान्तषट्केषु व्याख्याया गोचरीकृतम्।।1।।संक्षेपविस्तराभ्यां यो लक्षणैरुपपादितः। सोऽर्थोऽन्तिमेन संक्षिप्य लक्षणेन विवक्षितः।।2।।गीताशास्त्रमहार्णवोत्थममृतं वैकुण्ठकण्ठोद्भवं श्रीकण्ठापरनामवन्मुनिकृतं निष्ठाद्व्यद्योतितम्।निष्ठा यत्र मतिप्रसादजननी साक्षात्कृतं कुर्वती मोक्षे पर्यवसास्यति प्रतिदिनं सेवध्वमेतद्बुधाः।।3।।प्राचामाचार्यपादानां पदवीमनुगच्छता। गीताभाष्ये कृता टीका टीकतां पुरुषोत्तमम्।।4।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यशुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यभगवदानन्दगिरिविरचितेश्रीगीताभाष्यविवेचनेऽष्टादशोऽध्यायः।।18।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।18.78।। --,यत्र यस्मिन् पक्षे योगेश्वरः सर्वयोगानाम् ईश्वरः? तत्प्रभवत्वात् सर्वयोगबीजस्य? कृष्णः? यत्र पार्थः यस्मिन् पक्षे धनुर्धरः गाण्डीवधन्वा? तत्र श्रीः तस्मिन् पाण्डवानां पक्षे श्रीः विजयः? तत्रैव भूतिः श्रियो विशेषः विस्तारः भूतिः? ध्रुवा अव्यभिचारिणी नीतिः नयः? इत्येवं मतिः मम इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य,श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येअष्टादशोऽध्यायः।।।।श्रीमद्भगवद्गीताशास्त्रं संपूर्णम्।।,