Books / Bhagavad Gita

7. Bhagavad Gita — Chapter 7

Chapter 7 (Part 1)

【 Verse 7.1 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय: | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca mayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ | asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu ||

▸ Glossary: śrībhagavānuvāca: Kṛṣṇa says; mayi: in Me; āsaktamanāḥ: mind attached; pārtha: Arjuna, O son of Pritā; yogaṃ: union; yuñjan: so practising; madāśrayaḥ: in My shelter; asaṃśayaṃ: without doubt; samagraṃ: completely; māṃ: to Me; yathā: how, in what manner; jñāsyasi: you can know; tat: that; śṛṇu: hear

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.1 Bhagavān Kṛṣṇa says, Arjuna, Listen to Me, you can know Me completely and without doubt by practicing yoga in true consciousness of Me, with your mind attached to Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.1।।श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन मुझमें आसक्त मनवाला मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा उसको सुन।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.1।। हे पार्थ मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से बिना किसी संशय के जानोगे वह सुनो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.1 मयि on Me? आसक्तमनाः with mind intent? पार्थ O Partha? योगम् Yoga? युञ्जन् practising? मदाश्रयः taking refuge in Me? असंशयम् without doubt? समग्रम् wholly? माम् Me? यथा how? ज्ञास्यसि shall know? तत् that? श्रृणु hear.Commentary He who wishes to attain some result or reward performs the ritual known as Agnihotra or does charity? sinks wells? builds hospitals? resting places? etc.? with Sakama Bhavana (with an inner profit motive) and attains them. But the Yogi on the contrary practises Yoga with a steadfast mind and takes refuge in the Lord alone? with the mind wholly fixed on Him? on His lofty attributes such as omnipotence? omniscience? omnipresence? infinite love? beauty? grace? strength? mercy? inexhaustible wealth? ineffable splendour? pristine glory and purity.The servant of a king? though he constantly serves the king? has not got his mind fixed on him. The mind is ever fixed on his wife and children. Unlike the servant? fix your mind on Me? (the allpervading One)? and take refuge in Me alone. Practise control of the mind in accordance with the instructions given in chapter VI. Then you will know Me and My infinite attributes in full.If you sing the glory and the attributes of the Lord? you will develop love for Him and then your mind will be fixed on Him. Intense love for the Lord is real devotion. You must get full knowledge of the Self without any doubt.He who has taken refuge in the Lord? and he who is trying to fix or has fixed his mind on the Lord cannot bear the separation from the Lord even for a second.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.1. The Bhagavat said O son of Prtha, hear [from Me] how, having your mind attached to Me, practising Yoga and taking refuge in Me, you shall understand Me fully, without any doubt.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.1 "Lord Shri Krishna said: Listen, O Arjuna! And I will tell thee how thou shalt know Me in my Full perfection, practising meditation with thy mind devoted to Me, and having Me for thy refuge.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.1 The Lord said With your mind focussed on Me, having Me for your support and practising Yoga - how you can without doubt know Me fully, hear, O Arjuna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.1 The Blessed Lord said O Partha, hear how you, having the mind fixed on Me, practising the Yoga of Meditation and taking refuge in Me, will know Me with certainly and in fulness.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.1 The Blessed Lord said O Arjuna, hear how you shall without doubt know Me fully, with the mind intent on Me, practising Yoga and taking refuge in Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.1 See comment under 7.2

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.1 The Lord said Listen attentively to My words imparting knowledge to you, by which you will understand Me indubitably and fully - Me, the object of the Yogic contemplation in which you are engaged with a mind so deeply bound to Me by virtue of overwhelming love that it would disintegrate instantaneously the moment it is out of touch with My essential nature, attributes, deeds and glories, and with your very self resting so completely on Me that it would break up when bereft of Me.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.1 O Partha, mayi asaktamanah, having the mind fixed on Me- one whose mind (manah) is fixed (asakta) on Me (mayi) who am the supreme God possessed on the alification going to be spoken of-. Yogam yunjan, practising the Yoga of Meditation, concentrating the mind-. Madasrayah, taking refuge in Me-one to whom I Myself, the supreme Lord, am the refuge (asraya) is madasrayah-. Anyone who hankers after some human objective resorts to some rite such as the Agnihotra etc., austerity or charity, which is the means to its attainment. This yogi, however, accepts only Me as his refuge; rejecting any other means, he keeps his mind fixed on Me alone. Srnu, hear; tat, that, which is being spoken of by Me; as to yatha, how, the process by which; you who, having become thus, jnasyasi, will know; mam, Me; asamsayam, with certainty, without doubt, that the Lord is such indeed; and samagram, in fullness, possessed of such alities as greatness, strength, power, majesty, etc. [Strength-physical; power-mental; etc. refers to omniscience and will.] in their fullness.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.1।। ध्यानाभ्यास का आरम्भ करने के पूर्व साधक जब तक केवल बौद्धिक स्तर पर ही वेदान्त का विचार करता है जैसा कि प्रारम्भ में होना स्वाभाविक है तब तक उसके मन में प्रश्न उठता रहता है कि परिच्छिन्न मन के द्वारा अनन्तस्वरूप सत्य का साक्षात्कार किस प्रकार किया जा सकता है यह प्रश्न सभी जिज्ञासुओं के मन में आता है और इसीलिए वेदान्तशास्त्र इस विषय का विस्तार से वर्णन करता है कि किस प्रकार ध्यान की प्रक्रिया से मन अपनी ही परिच्छिन्नताओं से ऊपर उठकर अपने अनन्तस्वरूप का अनुभव करता है।इस षडाध्यायी के विवेच्य विषय की प्रस्तावना करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार के सिद्धान्त एवं उपायों का समग्रत वर्णन करेंगे जिससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि किस प्रकार सुसंगठित मन के द्वारा आत्मस्वरूप का ध्यान करने से आत्मा की अपरोक्षानुभूति होती है। ध्यान के सन्दर्भ में मन शब्द का प्रयोग होने पर उससे शुद्ध एवं एकाग्र मन का ही अभिप्राय है न कि अशक्त तथा विखण्डित मन। अनुशासित और असंगठित मन जब अपने स्वरूप में समाहित होता है तब साधक का विकास तीव्र गति से होता है। इस प्रकरण कै विषय है आन्तरिक विकास का युक्तियुक्त विवेचन।श्रीभगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.1।। यतो जातं येन स्थितमिदमशेषं प्रविलयं प्रयात्याद्ये यस्मिञ्श्रुतिभिरुदिते जन्तव इमे। भवत्येकं ब्रह्मामलममृतामाराध्य यमहं शिवं रासं कृष्णं तमजमजरं नौम्यखिलगम्।।1।।एवं त्वंपदार्थ निरुप्य तत्पदार्थ निरुपयितुं पूर्वाध्यायान्तेयोगिनामपि सर्वेषां मद्भतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्तातमो मतः इत्युक्तं तत्रेदृशं मदीयं तत्त्वमनेन प्रकारेण मद्भतान्तरात्मा स्यादित्येतद्वक्तुमिच्छुः श्रीमगवानुवाच। मयि वक्ष्यमाणविशेषणे परमेश्वरे आसक्तं मनो यस्य सः। मयि मनआसक्तिसंपादनं तव सुलभमिति सूचयन्नाह पार्थेति। योगं युञ्चन्मःसमाधानं कुर्वन्मदाश्रयः अहमेव परमेश्वर आश्रयो यस्य तु नतु कस्मैचित्पुरुषार्थायेहामुत्रभ्याय राज्यादिर्यज्ञदानादिर्वा आश्रयो यस्य सः त्वमप्यासक्तमना मदाश्रयः सन् असंशयं यथा स्यात्तथा मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि तं वक्ष्यमाणप्रकारं श्रृणु। ननु मदग्ने भवान् स्थितोऽसंशयं मया ज्ञायत एवातः किमिदमुच्यत इत्याशङ्क्याह समग्मिति। समस्तविभतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसंपन्नं सगुणं निर्गुणं च मामसंशयं यथा ज्ञास्यसि तच्छृण्वित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.1।।यद्भक्तिं न विना मुक्तिर्यः सेव्यः सर्वयोगिनाम्। तं वन्दे परमानन्दघनं श्रीनन्दनन्दनम्।।1।।एवं कर्मसंन्यासात्मकसाधनप्रधानेन प्रथमषट्केन ज्ञेयं त्वंपदलक्ष्यं सयोगं व्याख्यायाधुना ध्येयब्रह्मप्रतिपादनप्रधानेन मध्यमेन षट्केन तत्पदार्थों व्याख्यातव्यः। तत्रापियोगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः इति प्रागुक्तस्य भगवद्भजनस्य व्याख्यानाय सप्तमोऽध्याय आरभ्यते। तत्र कीदृशं भगवतो रूपं भजनीयं कथं वा तद्गतोऽन्तरात्मा स्यादित्येतद्वयं प्रष्टव्यमर्जुनेनापृष्टमपि परमकारुणिकतया स्वयमेव विवक्षुः श्रीभगवानुवाच मयि परमेश्वरे सकलजगदायतनत्वादिविविधविभूतिभागिन्यासक्तं विषयान्तरपरिहारेण सर्वदा निविष्टं मनो यस्य तव स त्वं अतएव मदाश्रयो मदेकशरणः राजाश्रयो भार्याद्यासक्तमनाश्च राजभृत्यः प्रसिद्धः मुमुक्षुस्तु मदाश्रयो मदासक्तमनाश्च त्वं त्वद्विधो वा योगं युञ्जन्मनःसमाधानं षष्ठोक्तप्रकारेण कुर्वन् असंशयं यथा भवत्येवं समग्रं सर्वविभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिसंपन्नं मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि तच्छृणूच्यमानं मया।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.1।।पूर्वाध्यायान्ते यो मां भजते स मे युक्ततमो मत इत्युक्तम् तत्र कीदृशं पूर्वोक्तनिष्कामकर्मयोगापेक्षया विलक्षणं तव भजनं केन वा गुणेन पूर्वयोगापेक्षया तस्य युक्ततमत्वमित्येतामर्जुनस्याशङ्कां स्वयमेव परिहरन् भगवानुवाच मयीति। कश्चिद्राजाश्रयो धनमानासक्तमना भवति। अयं तु मदाश्रयेण मामेव परमपुरुषार्थभूतं प्राप्तुमिच्छन्नित्यर्थः। ईदृशो योगं युञ्जन्समाधिमनुतिष्ठन् त्वंपदार्थविवेककाले यद्यपि सार्वज्ञ्यमस्तिसर्वभूतस्थमात्मानम् इत्यादिवचनात्तथापि स्वस्मादन्य ईश्वरोऽस्ति नवेति पातञ्जलकापिलयोस्तार्किकमीमांसकयोर्वा सेश्वरानीश्वरयोर्मतभेदात्संशयः कारणाज्ञानाच्चासमग्रं तत्सार्वज्ञ्यमिति मत्वा आह असंशयं समग्रमिति। मां तत्पदार्थमीश्वरं यथा ज्ञास्यसि तत् तं प्रकारं शृणु। अत्र वक्ष्यमाणरीत्या सर्वं ब्रह्म वासुदेवात्मकमिति भजने वैलक्षण्यं कारणज्ञातृत्वमस्य योगिनः पूर्वयोग्यपेक्षयाधिक्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.1।।भगवद्योगयुक्तात्मा युक्तो रूपप्रबोधने। अतः पार्थाय श्रीकृष्णः स्वरूपज्ञानमुक्तवान्।।1।।पूर्वाध्यायान्तेश्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः 6।47 इति योगसहितस्वभजनकर्त्तुरुत्तमत्वं स्वाभिमतत्वमुक्तं तत्र स्वरूपाज्ञाने भजनं न भवेत् तज्ज्ञानं च योगज्ञानोत्तरभावीति योगस्वरूपमुक्त्वा अथ भजनार्थं स्वरूपज्ञानमाह श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमना इति। हे पार्थ एतच्छ्रवणयोग्य मदाश्रयः मदर्थमेवाऽनन्यशरणः सन् मत्क्रीडार्थं संयोगार्थमाश्रयं कृत्वा योगं युञ्जन् दास्याभ्यासं कुर्वन् असंशयं संशयरहितं यथा स्यात्तथा समग्रं संयोगात्मकं सर्वरससहितं मां यथा ज्ञास्यसि तदिदमग्रे वक्ष्यमाणं ज्ञानस्वरूपं मय्यासक्तमनाः मयि आसक्तं स्वापेक्षारहितं मत्सुखाभिलाषिमनाः शृणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.1।।विज्ञेयमात्मनस्तत्त्वं सयोगं समुदाहृतम्। भजनीयमथेदानीमैश्वरं रूपमीर्यते।।1।।पूर्वाध्यायान्ते मद्गतेनान्तरात्मना यो मां भजते स मे युक्ततमो मत इत्युक्तं तत्र कीदृशस्त्वं यस्य भक्तिः कर्तव्येत्यपेक्षायां स्वस्वरूपं निरूपयिष्यञ्श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमना इति। मयि परमेश्वरे आसक्तमभिनिविष्टं मनो यस्य सः। मदाश्रयोऽहमेवाश्रयो यस्यानन्यशरणः सन्योगं युञ्जन्नभ्यसन् असंशयं यता भवत्येवं मां समग्रं विभूतिबलैश्वर्यादिसहितं यथा ज्ञास्यसि तदिदं मया वक्ष्यमाणं शृणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.1।।पूर्वत्रात्माधिगमनं साङ्ख्ययोगकृतेः फलम्। अथातो महिमज्ञानपूर्वकं भक्तिरुच्यते।।1।।माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः। स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिर्न चान्यथा।।2।।धात्वर्थ उत्तमा सेवा स्नेहोऽर्थो प्रत्ययस्य च। प्रकृतिप्रत्ययार्थात्मा निबन्धे भक्तिरुच्यते।।3।।माहात्म्यविज्ञानमत्र वासुदेवस्य योगिनाम्। अन्ते सिद्धिकरं नान्यदिति तस्योद्यमः पुनः।।4।।पुरुषोत्तममाहात्म्यविज्ञानं साङ्गमुत्तमम्। प्रयाणकाले सर्वस्य भक्तस्य स्मरतः फलम्।।5।।प्रथमं योगधर्मेण महिमज्ञानमुत्तमम्। ततः प्रपत्तिर्ज्ञानं च ज्ञानिनः श्रेष्ठता यतः।।6।।ईश्वरज्ञानवान् श्रेष्ठो नात्मविज्ञानवान् परम्। यतः स्वात्मज्ञानवद्भिरीश्वरः सेव्यतेऽनिशम्।।7।।तत्र कीदृशमाहात्म्योऽहं यस्य सेवा कर्त्तव्या इत्यपराधनिवृत्त्यर्थं स्वमहिमानं निरूपयिष्यन् स्वयं श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमना इति। हे पार्थ मयि परमात्मनि भगवति सर्वधर्माश्रये निरतिशयालौकिकलीले परमनियन्तरि करुणाशीले आसक्तचित्तः योगमुक्तलक्षणं समभ्यसन् मदाश्रयो मत्प्रपन्नः सन् निस्संशयं समग्रं निरतिशयालौकिकगुणपूर्णं निरुपधिमहिमानं यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि तच्छृणु। सूत्रवृत्तिवदिदम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.1।।इस श्लोकद्वारा छठे अध्यायके अन्तमें प्रश्नके बीजकी स्थापना करके फिर स्वयं ही ऐसा मेरा तत्त्व हे इस प्रकार मुझमें स्थित अन्तरात्मावाला हो जाना चाहिये इत्यादि बातोंका वर्णन करनेकी इच्छावाले भगवान् बोले आगे कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त मुझ परमेश्वरमें ही जिसका मन आसक्त हो वह मय्यासक्तमना है और मैं परमेश्वर ही जिसका ( एकमात्र ) अवलम्बन हूँ वह मदाश्रय है हे पार्थ ऐसा मय्यासक्तमना और मदाश्रय होकर तू योगका साधन करताहुआ अर्थात् मनको ध्यानमें स्थित करता हुआ ( जिस प्रकार मुझको संशयरहित समग्ररूपसे जानेगा सो सुन ) जो कोई ( धर्मादि पुरुषार्थोंमेंसे ) किसी पुरुषार्थका चाहनेवाला होता है वह उसके साधनरूप अग्निहोत्रादि कर्म तप या दानरूप किसी एक आश्रयको ग्रहण किया करता है परंतु यह योगी तो अन्य साधनोंको छोड़कर केवल मुझको ही आश्रयरूपसे ग्रहण करता है और मुझमें ही आसक्तचित्त होता है। इसलिये तू उपर्युक्त गुणोंसे सम्पन्न होकर विभूति बल ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न मुझ समग्र परमेश्वरको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा कि भगवान् निस्सन्देह ठीक ऐसा ही है वह प्रकार मैं तुझसे कहता हूँ सुन।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.1।। व्याख्या  मय्यासक्तमनाः मेरेमें ही जिसका मन आसक्त हो गया है अर्थात् अधिक स्नेहके कारण जिसका मन स्वाभाविक ही मेरेमें लग गया है चिपक गया है उसको मेरी याद करनी नहीं पड़ती प्रत्युत स्वाभाविक मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती ही नहीं ऐसा तू मेरेमें मनवाला हो।जिसका उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंका और शब्द स्पर्श रूप रस तथा गन्धका आकर्षण मिट गया है जिसका इस लोकमें शरीरके आराम आदरसत्कार और नामकी ब़ड़ाईमें तथा स्वर्गादि परलोकके भोगोंमें किञ्चिन्मात्र भी खिंचाव आसक्ति या प्रियता नहीं है प्रत्युत केवल मेरी तरफ ही खिंचाव है ऐसे पुरुषका नाम मय्यासक्तमनाः है।साधक भगवान्में मन कैसे लगाये जिससे वह मय्यासक्तमनाः हो जाय इसके लिये दो उपाय बताये जाते हैं (1) साधक जब सच्ची नीयतसे भगवान्के लिये ही जपध्यान करने बैठता है तब भगवान् उसको अपना भजन मान लेते हैं। जैसे कोई धनी आदमी किसी नौकरसे कह दे कि तुम यहाँ बैठो कोई काम होगा तो तुम्हारेको बता देंगे। किसी दिन उस नौकरको मालिकने कोई कम नहीं बताया। वह नौकर दिनभर खाली बैठा रहा और शामको मालिकसे कहता है बाबू मेरेको पैसे दीजिये। मालिक कहता है तुम सारे दिन बैठे रहे पैसे किस बातके वह नौकर कहता है बाबूजी सारे दिन बैठा रहा इस बातके इस तरह जब एक मनुष्यके लिये बैठनेवालेको भी पैसे मिलते हैं तब जो केवल भगवान्में मन लगानेके लिये सच्ची लगनसे बैठता है उसका बैठना क्या भगवान् निरर्थक मानेंगे तात्पर्य यह हुआ कि जो भगवान्में मन लगानेके लिये भगवान्का आश्रय लेकर भगवान्के ही भरोसे बैठता है वह भगवान्की कृपासे भगवान्में मनवाला हो जाता है।(2) भगवान् सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं क्योंकि अगर यहाँ नहीं हैं तो भगवान् सब जगह हैं यह कहना नहीं बनता। भगवान् सब समयमें हैं तो इस समय भी हैं क्योंकि अगर इस समय नहीं हैं तो भगवान् सब समयमें हैं यह कहना नहीं बनता। भगवान् सबमें हैं तो मेरेमें भी हैं क्योंकि अगर मेरेमें नहीं हैं तो भगवान् सबमें हैं यह कहना नहीं बनता। भगवान् सबके हैं तो मेरे भी हैं क्योंकि अगर मेरे नहीं हैं तो भगवान् सबके हैं यह कहना नहीं बनता इसलिये भगवान् यहाँ हैं अभी हैं अपनेमें हैं और अपने हैं। कोई देश काल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना और क्रिया उनसे रहित नहीं है उनसे रहित होना सम्भव ही नहीं है। इस बातको दृढ़तासे मानते हुए भगवन्नाममें प्राणमें मनमें बुद्धिमें शरीरमें शरीरके कणकणमें परमात्मा हैं इस भावकी जागृति रखते हुए नामजप करे तो साधक बहुत जल्दी भगवान्में मनवाला हो सकता है।मदाश्रयः जिसको केवल मेरी ही आशा है मेरा ही भरोसा है मेरा ही सहारा है मेरा ही विश्वास है और जो सर्वथा मेरे ही आश्रित रहता है वह मदाश्रयः है।किसीनकिसीका आश्रय लेना इस जीवका स्वभाव है। परमात्माका अंश होनेसे यह जीव अपने अंशीको ढूँढ़ता है। परन्तु जबतक इसके लक्ष्यमें उद्देश्यमें परमात्मा नहीं होते तबतक यह शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़े रहता है और शरीर जिसका अंश है उस संसारकी तरफ खिंचता है। वह यह मानने लगता है कि इससे ही मेरेको कुछ मिलेगा इसीसे मैं निहाल हो जाऊँगा जो कुछ होगा वह संसारसे ही होगा। परन्तु जब यह भगवान्को ही सर्वोपरि मान लेता है तब यह भगवान्में आसक्त हो जाता है और भगवान्का ही आश्रय ले लेता है।संसारका अर्थात् धन सम्पत्ति वैभव विद्या बुद्धि योग्यता कुटुम्ब आदिका जो आश्रय है वह नाशवान् है मिटनेवाला है स्थिर रहनेवाला नहीं है। वह सदा रहनेवाला नहीं है और सदाके लिये पूर्ति और तृप्ति करानेवाला भी नहीं है। परन्तु भगवान्का आश्रय कभी किञ्चिन्मात्र भी कम होनेवाला नहीं है क्योंकि भगवान्का आश्रय पहले भी था अभी भी है और आगे भी रहेगा। अतः आश्रय केवल भगवान्का ही लेना चाहिये। केवल भगवान्का ही आश्रय अवलम्बन आधार सहारा हो। इसीका वाचक यहाँ मदाश्रयः पद है।भगवान् कहते हैं कि मन भी मेरेमें आसक्त हो जाय और आश्रय भी मेरा हो। मन आसक्त होता है प्रेमसे और प्रेम होता है अपनेपनसे। आश्रय लिया जाता है बड़ेका सर्वसमर्थका। सर्वसमर्थ तो हमारे प्रभु ही हैं। इसलिये उनका ही आश्रय लेना है और उनके प्रत्येक विधानमें प्रसन्न होना है कि मेरे मनके विरुद्ध विधान भेजकर प्रभु मेरी कितनी निगरानी रखते हैं मेरा कितना ख्याल रखते हैं कि मेरी सम्मति लिये बिना ही विधान करते हैं ऐसे मेरे दयालु प्रभुका मेरेपर कितना अपनापन है अतः मेरेको कभी किसी वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदिकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार भगवान्के आश्रित रहना ही मदाश्रयः होना है।योगं युञ्जन् भगवान्के साथ जो स्वतःसिद्ध अखण्ड सम्बन्ध है उस सम्बन्धको मानता हुआ तथा सिद्धिअसिद्धिमें सम रहता हुआ साधक जप ध्यान कीर्तन करनेमें भगवान्की लीला और स्वरूपका चिन्तन करनेमें स्वाभाविक ही अटल भावसे लगा रहता है। उसकी चेष्टा स्वाभाविक ही भगवान्के अनुकूल होती है। यही योगं युञ्जन् कहनेका तात्पर्य है।जब साधक भगवान्में ही आसक्त मनवाला और भगवान्के ही आश्रयवाला होगा तब वह अभ्यास क्या करेगा कौनसा योग करेगा वह भगवत्सम्बन्धी अथवा संसारसम्बन्धी जो भी कार्य करता है वह सब योगका ही अभ्यास है। तात्पर्य है कि जिससे परमात्माका सम्बन्ध हो जाय वह (लौकिक या पारमार्थिक) काम करता है और जिससे परमात्माका वियोग हो जाय वह काम नहीं करता है।असंशयं समग्रं माम् जिसका मन भगवान्में आसक्त हो गया है जो सर्वथा भगवान्के आश्रित हो गया है और जिसने भगवान्के सम्बन्धको स्वीकार कर लिया है ऐसा पुरुष भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है अर्थात् सगुणनिर्गुण साकारनिराकार अवतारअवतारी और शिव गणेश सूर्य विष्णु आदि जितने रूप हैं उन सबको वह जान लेता है।भगवान् अपने भक्तकी बात कहतेकहते अघाते नहीं हैं और कहते हैं कि ज्ञानमार्गसे चलनेवाला तो मेरेको जान सकता है और प्राप्त कर सकता है परंतु भक्तिसे तो मेरा भक्त समग्ररूपको जान सकता है और इष्टका अर्थात् जिस रूपसे मेरी उपासना करता है उस रूपका दर्शन भी कर सकता है।यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु यहाँ यथा (टिप्पणी प0 390.1) पदसे प्रकार बताया गया है कि तू जिस प्रकार जान सके वह प्रकार भी कहूँगा और तत् (टिप्पणी प0 390.2) पदसे बताया गया है कि जिस तत्त्वको तू जान सकता है उसका मैं वर्णन करता हूँ तू सुन।छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः पदोंमें प्रथम पुरुष(वह) का प्रयोग करके सामान्य बात कही था और यहाँ सातवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु पदोंमें मध्यम पुरुष(तू) का प्रयोग करके अर्जुनके लिये विशेषतासे कहते हैं कि तू जिस प्रकार मेरे समग्ररूपको जानेगा वह मेरेसे सुन।इससे पहलेके छः अध्यायोंमें भगवान्के लिये समग्र शब्द नहीं आया है। चौथे अध्यायके तेईसवें श्लोकमेंज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते पदोंमें कर्मके विशेषणके रूपमें समग्र शब्द आया है और यहाँ समग्र शब्द भगवान्के विशेषणके रूपमें आया है। समग्र शब्दमें भगवान्का तात्त्विक स्वरूप सबकासब आ जाता है बाकी कुछ नहीं बचता।विशेष बात(1) इस श्लोकमें आसक्ति केवल मेरेमें ही हो आश्रय भी केवल मेरा ही हो फिर योगका अभ्यास किया जाय तो मेरे समग्ररूपको जान लेगा ऐसा कहनेमें भगवान्का तात्पर्य है कि अगर मनुष्यकी आसक्ति भोगोंमें है और आश्रय रुपयेपैसे कुटुम्ब आदिका है तो कर्मयोग ज्ञानयोग ध्यानयोग आदि किसी योगका अभ्यास करता हुआ भी मेरेको नहीं जान सकता। मेरे समग्ररूपको जाननेके लिये तो मेरेमें ही प्रेम हो मेरा ही आश्रय हो। मेरेसे किसी भी कार्यपूर्तिकी इच्छा न हो। ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये इस कामनाको छोड़कर भगवान् जो करते हैं वही होना चाहिये और भगवान् जो नहीं करना चाहते वह नहीं होना चाहिये इस भावसे केवल मेरा आश्रय लेता है वह मेरे समग्र रूपको जान लेता है। इसलिये भगवान् अर्जुनको कहते हैं कि तू मय्यासक्तमनाः और मदाश्रयः हो जा।(2) परमात्माके साथ वास्तविक सम्बन्धका नाम योगम् है और उस सम्बन्धको अखण्डभावसे माननेका नाम युञ्जन् है। तात्पर्य यह है कि मन बुद्धि इन्द्रियाँ आदिके साथ सम्बन्ध मानकर अपनेमें मैं रूपसे जो एक व्यक्तित्व मान रखा है उसको न मानते हुए परमात्माके साथ जो अपनी वास्तविक अभिन्नता है उसका अनुभव करता रहे।वास्तवमें योगं युञ्जन् की इतनी आवश्यकता नहीं है जितनी आवश्यकता संसारकी आसक्ति और आश्रय छोड़नेकी है। संसारकी आसक्ति और आश्रय छोड़नेसे परमात्माका चिन्तन स्वतःस्वाभाविक होगा और सम्पूर्ण क्रियाएँ निष्कामभावपूर्वक होने लगेंगी। फिर भगवान्को जाननेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना पड़ेगा। इसका तात्पर्य यह है कि जिसका संसारकी तरफ खिंचाव है और जिसके अन्तःकरणमें उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंका महत्त्व बैठा हुआ है वह परमात्माके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान सकता। कारण कि उसकी आसक्ति कामना महत्ता संसारमें है जिससे संसारमें परमात्माके परिपूर्ण रहते हुए भी वह उनको नहीं जान सकता।मनुष्यका जब समाजके किसी बड़े व्यक्तिसे अपनापन हो जाता है तब उसको एक प्रसन्नता होती है। ऐसे ही जब हमारे सदाके हितैषी और हमारे खास अंशी भगवान्में आत्मीयता जाग्रत् हो जाती है तब हरदम प्रसन्नता रहते हुए एक अलौकिक विलक्षण प्रेम प्रकट हो जाता है। फिर साधक स्वाभाविक ही भगवान्में मनवाला और भगवान्के आश्रित हो जाता है।शरणागतिके पर्यायआश्रय अवलम्बन अधीनता प्रपत्ति और सहारा ये सभी शब्द शरणागति के पर्यायवाचक होते हुए भी अपना अलग अर्थ रखते हैं जैसे (1) आश्रय जैसे हम पृथ्वीके आधारके बिना जी ही नहीं सकते और उठनाबैठना आदि कुछ कर ही नहीं सकते ऐसे ही प्रभुके आधारके बिना हम जी नहीं सकते और कुछ भी कर नहीं सकते। जीना और कुछ भी करना प्रभुके आधारसे ही होता है। इसीको आश्रय कहते हैं।(2) अवलम्बन जैसे किसीके हाथकी हड्डी टूटनेपर डाक्टरलोग उसपर पट्टी बाँधकर उसको गलेके सहारेलटका देते हैं तो वह हाथ गलेके अवलम्बित हो जाता है ऐसे ही संसारसे निराश और अनाश्रित होकर भगवान्के गले पड़ने अर्थात् भगवान्को पकड़ लेनेका नाम अवलम्बन है।(3) अधीनता अधीनता दो तरहसे होती है 1कोई हमें जबर्दस्तीसे अधीन कर ले या पकड़ ले और 2हम अपनी तरफसे किसीके अधीन हो जायँ या उसके दास बन जायँ। ऐसे ही अपना कुछ भी प्रयोजन न रखकर अर्थात् केवल भगवान्को लेकर ही अनन्यभावसे सर्वथा भगवान्का दास बन जाना और केवल भगवान्को ही अपना स्वामी मान लेना अधीनता है।(4) प्रपत्ति जैसे कोई किसी समर्थके चरणोंमें लम्बा पड़ जाता है ऐसे ही संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होकर भगवान्के चरणोंमें गिर जाना प्रपत्ति (प्रपन्नता) है।(5) सहारा जैसे जलमें डूबनेवालेको किसी वृक्ष लता रस्से आदिका आधार मिल जाय ऐसे ही संसारमें बारबार जन्ममरणमें डूबनेके भयसे भगवान्का आधार ले लेना सहारा है।इस प्रकार उपर्युक्त सभी शब्दोंमें केवल शरणागतिका भाव प्रकट होता है। शरणागति तब होती है जब भगवान्में ही आसक्ति हो और भगवान्का ही आश्रय हो अर्थात् भगवान्में ही मन लगे और भगवान्में ही बुद्धि लगे। अगर मनुष्य मनबुद्धिसहित स्वयं भगवान्के आश्रित (समर्पित) हो जाय तो शरणागतिके उपर्युक्त सबकेसब भाव उसमें आ जाते हैं।मन और बुद्धिको अपने न मानकर ये भगवान्के ही हैं ऐसा दृढ़तासे मान लेनेसे साधक मय्यासक्तमनाः और मदाश्रयः हो जाता है। सांसारिक वस्तुमात्र प्रतिक्षण प्रलयकी तरफ जा रही है और किसी भी वस्तुसे अपना नित्य सम्बन्ध है ही नहीं यह सबका अनुभव है। अगर इस अनुभवको महत्त्व दिया जाय अर्थात् मिटनेवाले सम्बन्धको अपना न माना जाय तो अपने कल्याणका उद्देश्य होनेसे भगवान्की शरणागति स्वतः आ जायगी। कारण कि यह स्वतः ही भगवान्का है। संसारके साथ सम्बन्ध केवल माना हुआ है (वास्तवमें सम्बन्ध है नहीं) और भगवान्से केवल विमुखता हुई है (वास्तवमें विमुखता है नहीं)। इसलिये माना हुआ सम्बन्ध छोड़नेपर भगवान्के साथ जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है वह प्रकट हो जाता है। सम्बन्ध  पहले श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि तू मेरे समग्र रूपको जैसा जानेगा वह सुन। अब भगवान् आगेके श्लोकमें उसे सुनानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.1 7.2।।मय्यासक्तेति ज्ञानमिति। ज्ञानविज्ञाने ज्ञानक्रिये एव। ततो न किञ्चिदवशिष्यते सर्वस्य ज्ञेयजातस्य ज्ञानक्रियानिष्ठत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.1।।कर्मसंन्यासात्मकसाधनप्रधानं त्वंपदार्थप्रधानं च प्रथमषट्कं व्याख्याय मध्यमषट्कमुपास्यनिष्ठं तत्पदार्थनिष्ठं च व्याख्यातुमारभमाणः समनन्तराध्यायमवतारयति योगिनामिति। अतीताध्यायान्ते मद्गतेनान्तरात्मा यो भजते मामिति प्रश्नबीजं प्रदर्श्य कीदृशं भगवतस्तत्त्वं कथं वा मद्गतान्तरात्मा स्यादित्यर्जुनस्य प्रश्नद्वये जाते स्वयमेव भगवानपृष्टमेतद्वक्तुमिच्छन्नुक्तवानित्यर्थः। परमेश्वरस्य वक्ष्यमाणविशेषणत्वं सकलजगदायतनत्वादिनानाविधविभूतिभागित्वं तत्रासक्तिर्मनसो विषयान्तरपरिहारेण तन्निष्ठत्वम्। मनसो भगवत्येवासक्तौ हेतुमाह योगमिति। विषयान्तरपरिहारे हि गोचरमालोच्यमाने भगवत्येव प्रतिष्ठितं भवतीत्यर्थः। तथापि स्वाश्रये पुरुषो मनः स्थापयति नान्यत्रेत्याशङ्क्याह मदाश्रय इति। योगिनो यदीश्वराश्रयत्वेन तस्मिन्नेवासक्तमनस्त्वमुपन्यस्तं तदुपपादयति यो हीति। ईश्वराख्याश्रयस्य प्रतिपत्तिमेव प्रकटयति हित्वेति। अस्तु योगिनस्त्वदाश्रयप्रतिपत्त्या मनसस्त्वय्येवासक्तिस्तथापि मम किमायातमित्याशङ्क्य द्वितीयार्धं व्याचष्टे यस्त्वमेवमिति। एवंभूतो यथोक्तध्याननिष्ठपुरुषवदेव मय्यासक्तमना यस्त्वं स त्वं तथाविधः सन्नसंशयमविद्यमानः संशयो यत्र ज्ञाने तद्यथा स्यात्तथा मां समग्रं ज्ञास्यसीति संबन्धः। समग्रमित्यस्यार्थमाह समस्तमिति। विभूतिर्नानाविधैश्वर्योपायसंपत्तिः। बलं शरीरगतं सामर्थ्यम्। शक्तिर्मनोगतं प्रागल्भ्यम्। ऐश्वर्यमीशितव्यविषयमीशनसामर्थ्यम्। आदिशब्देन ज्ञानेच्छादयो गृह्यन्ते। असंशयमितिपदस्य क्रियाविशेषणत्वं विशदयन् क्रियापदेन संबन्धं कथयति संशयमिति। विना संशयं भगवत्तत्त्वपरिज्ञानमेव स्फोरयति एवमेवेति। भगवत्तत्त्वे ज्ञातव्ये कथं मम ज्ञानमुपदेक्ष्यति नहि त्वामृते तदुपदेष्टा कश्चिदस्तीत्याशङ्क्याह तच्छृण्विति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.1।।ज्ञानसाधनादन्यदुत्तराध्यायप्रतिपाद्यं वक्तुंयोगे त्विमां शृणु 2।39 इति प्रतिज्ञातमसमाप्य कथमर्थान्तरमुच्यते। इत्याशङ्कां तावत्परिहरति साधनमिति। ज्ञानस्येति शेषः। तत्र तत्र भगवन्महिम्नोऽपि वर्णितत्वेन प्राधान्येनेत्युक्तम्। प्राचुर्येणेत्यर्थः।उक्तं इत्यनेन प्रतिज्ञातसमाप्तिं सूचयति। तच्च प्रतिज्ञान्तरकरणादवगम्यते। इदानीमुत्तरग्रन्थप्रतिपाद्यमाह उत्तरैस्त्विति। अध्यायैरिति वर्तते। अनेन ज्ञानविज्ञानशब्दौ ज्ञेयभगवन्माहात्म्यपराविति सूचितम्। अत्रापि क्वचित्साधनस्योक्तत्वात्प्राधान्येन इत्युक्तम्। सङ्गतिस्तु प्रथमश्लोक एवोक्ता अनेन द्विविधेन योगेन यज्ज्ञातव्यं तच्छृण्वित्युक्तत्वात्।आसक्तमनाः सम्बद्धमनाः इति प्रतीतिनिरासायाह आसक्तेति।अतीव इत्याङोऽर्थः सम्बन्धमात्रस्य योगानङ्गत्वादिति भावः। भगवदाश्रयत्वं सर्वसाधारणं कथं योगिनो विशेषणम्। इत्यत आह मदाश्रय इति। शरणं रक्षकः। इति स्थित इति जानन्निति यावत्।असंशयं समग्रं इत्युभयं भगवद्विशेषणत्वेन भास्करो व्याख्यातवान् संशयरहितं समग्रं कृत्स्नं मां इति। अपरस्तु (शां.) समग्रमित्येवसमग्रं समस्तं विभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसम्पन्नं मां ৷৷. संशयमन्तरेण इति तन्निरासार्थमाह असंशयमिति तच्च समग्रं यथा भवति तथेत्यर्थः। न हि भगवतः संशयराहित्यमिदानीं वक्तव्यम्। न च भगवान्समग्रोऽन्येन केनचिच्छक्यो ज्ञातुम्स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं 10।15 इति वक्ष्यमाणत्वादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.1।।श्रीमद्वरदराजाय नमः। ँ़। साधनं प्राधान्येनोक्तमतीतैरध्यायैः उत्तरैरस्तु षड्भिर्भगवन्माहात्म्यं प्राधान्येनाह मयीति। आसक्तमना अतीव स्नेहयुक्तमनाः। मदाश्रयः भगवानेव सर्वं मया कारयति स एव मे शरणम् तस्मिन्नेवाहं स्थित इति स्थितः। असंशयं समग्रमिति क्रियाविशेषणम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.1।।श्रीभगवानुवाच मयि आभिमुख्येन आसक्तमनाः मत्प्रियत्वातिरेकेण मत्स्वरूपेण गुणैः च चेष्टितेन मद्विभूत्या विश्लेषे सति तत्क्षणाद् एव विशीर्यमाणस्वभावतया मयि सुगाढं बद्धमनाः मदाश्रयः तथा स्वयं च मया विना विशीर्य्यमाणतया मदाश्रयः मदेकाधारः मद्योगं युञ्जन् योक्तुं प्रवृत्तो योगविषयभूतं माम् असंशयं निःसंशयं समग्रं सकलं यथा ज्ञास्यसि येन ज्ञानेन उक्तेन ज्ञास्यसि तद् ज्ञानम् अवस्थितमनाः श्रृणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.1।। मयि वक्ष्यमाणविशेषणे परमेश्वरे आसक्तं मनः यस्य सः मय्यासक्तमनाः हे पार्थ योगं युञ्जन् मनःसमाधानं कुर्वन् मदाश्रयः अहमेव परमेश्वरः आश्रयो यस्य सः मदाश्रयः। यो हि कश्चित् पुरुषार्थेन केनचित् अर्थी भवति स तत्साधनं कर्म अग्निहोत्रादि तपः दानं वा किञ्चित् आश्रयं प्रतिपद्यते अयं तु योगी मामेव आश्रयं प्रतिपद्यते हित्वा अन्यत् साधनान्तरं मय्येव आसक्तमनाः भवति। यः त्वं एवंभूतः सन् असंशयं समग्रं समस्तं विभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसंपन्नं मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि संशयमन्तरेण एवमेव भगवान् इति तत् श्रृणु उच्यमानं मया।।तच्च मद्विषयम्

───────────────────

【 Verse 7.2 】

▸ Sanskrit Sloka: ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत: | यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ||

▸ Transliteration: jñānaṃ te’haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ | yajjñātvā neha bhūyo’nyaj jñātavyamavaśiṣyate ||

▸ Glossary: jñānaṃ: phenomenal knowledge; te: unto you; ahaṃ: I; sa: with; vijñānaṃ: absolute knowledge; idaṃ: this; vakṣyāmi: shall explain; aśeṣataḥ: in full; yat: which; jñātvā: knowing; na: not; iha: in this world; bhūyaḥ: further; anyat: anything more; jñātavyaṃ: knowable; avaśiṣyate: remains to be known

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.2 Let Me explain to you in detail this phenomenal and abso- lute knowledge along with its realization; by knowing which, there shall remain nothing further to be known.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.2।।तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.2।। मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.2 ज्ञानम् indirect knowledge of Sastras? ते to thee? अहम् I? सविज्ञानम् combined with realisation (direct knowledge of the Atman through experience)? इदम् this? वक्ष्यामि will declare? अशेषतः in full? यत् which? ज्ञात्वा having known? न not? इह here? भूयः more? अन्यत् anything else? ज्ञातव्यम् what ought to be known? अवशिष्यते remains.Commentary Jnanam is Paroksha Jnanam or indirect knowledge of Brahman obtained through the study of the Upanishads. Vijnanam is Visesha Jnanam? i.e.? Aparoksha Jnanam obtained through direct Selfrealisation (intuitional wisdom).In this verse the Lord praises knowledge in order to make Arjuna follow His instruction closely with rapt attention? faith and interest. The Lord says I shall teach thee in full. You will attain to omniscience or perfect knowledge of the Self? after knowing which nothing more remains to be known here. If anyone attains the knowledge of the Self? he will know everything. That is the reason why Saunaka? the great householder? approacehd Angirasa respectfully and asked What is that? O Lord? which being known all this becomes known (Cf.XIII.11)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.2. I Shall teach you this knowledge in full together with action; for a person who has known this there remains in this world nothing else to be known.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.2 I will reveal to this knowledge unto thee, and how it may be realised; which, once accomplished, there remains nothing else worth having in this life.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.2 I will declare to you in full, this knowledge (of God) along with the knowledge which makes it distinguished (Vijnana), knowing which nothing else remains to be known.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.2 I shall tell you in detail of this Knowledge which is combined with realization, [From the statement, 'jnasyasi, you will know', in the earlier verse, one may conclude that the Lord is speaking of indirect or theoretical knowledge. The word 'idam, this' rules out such a conclusion; and it has also been said that this Knowledge is 'savijnanam, combined with direct experienece, realization'; it is Consciousness.] after experience which there remains nothing else here to be known again.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.2 I shall declare to thee in full this knowledge combined with realisation, after knowing which nothing more here remains to be known.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.1-2 Mayi etc. Jnanam etc. The words jnana and vijnana mean [respectively] 'knowledge' and 'action'. There remains nothing apart from these [two]. For, all the knowables are rooted in the knowledge and action.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.2 I will declare to you in full this knowledge having Me for its object, along with Vijnana or distinguishing knowledge. Vijnana is that knowledge of God in which His nature is distinguished form all things. I am distinguished from all things, animate and inanimate, as the only Being opposed to all that is evil and endowed with infinitely great manifestation of countless multiples of attributes of all kinds which are auspicious, unsurpassed and without limit. I will declare to you that knowledge which has My essence as its object. Why say much? I shall declare to you that knowledge knowing which nothing else remains to be known again in relation to Myself.

Sri Krsna declares that this knowledge, which will now be taught, is difficult to attain:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.2 Aham, I; vaksyami, shall tell; te, you; asesatah, in detail, fully; of that (Knowledge) about Myself, which is idam, this; jnanam, Knowlege; which is savijnanam, combined with realization, associated with personal enlightenment; yat jnatva, after experiencing which Knowledge; avasisyate, there remains; na anyat, nothing else, anything that can be a means to human ends; jnatavyam, to be known; bhuyah, again; iha, here. (In this way) the Lord praises that Knowledge which is intended to be spoken, in order ot draw the attention of the hearer. Thus, 'he who knows Me in reality becomes omniscient.' This is the idea. Therefore Knowledge is difficult to attain because of its superexcellent result. How so? This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.2।। श्री शंकराचार्य के अनुसार शास्योक्त पदार्थों का परिज्ञान ज्ञान है तथा शास्त्र से ज्ञात तत्त्व का यथार्थ रूप में स्वानुभव होना विज्ञान है। जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे न केवल शास्त्रीय सिद्धांतों का वर्णन करेंगे वरन् प्रवचनकाल में ही वे उसे आत्मानुभव के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा भी देंगे। उनका यह कथन कुछ अविश्वसनीय प्रतीत हो सकता है क्योंकि योग साधना तथा भारतीय दर्शन की अन्य शाखाओं में साधक को लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसकी प्राप्ति के लिये विशेष साधना करनी होती है। परन्तु वेदान्त शास्त्र इनसे भिन्न है क्योंकि इसमें साधक को उसके नित्यसिद्ध स्वरूप का ही बोध कराया गया है न कि स्व्ायं से भिन्न किसी वस्तु का। अत एक सुयोग्य विद्यार्थी को उपदेश ग्रहण के पश्चात् आत्मानुभव के लिये कहीं किसी वन प्रान्त में जाने की आवश्यकता नहीं होती है।यदि शिष्य ज्ञान के लिये आवश्यक गुणों से सम्पन्न है और गुरु के बताये हुए तर्कों को समझने में समर्थ है तो उसे अध्ययन काल में ही आत्मानुभव हो सकता है। यही कारण है कि वेदान्त केवल सुयोग्य विद्यार्थियों को ही पढ़ाया जाता है। उत्तम शिष्य के लिये आत्मानुभूति तत्काल प्राप्य है। उसे कालान्तर अथवा देशान्तर की अपेक्षा नहीं होती।यदि वेदान्त एक पूर्ण शास्त्र है और उपदेश काल में ही आत्मानुभव सिद्ध हो सकता है तो फिर क्या कारण है कि विश्वभर में ऐसे ज्ञानी पुरुष विरले ही होते हैं भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.2।।ज्ञास्यसीत्युक्तं तत्र ज्ञां स्तौति ज्ञानमिति। अत्र भाष्ये तच्च मद्विषयं ज्ञानं ते तुभ्यमहं सविज्ञानं विज्ञानसहितं स्वानुभवेन संयुक्तमिदं वक्ष्यामि कथयिष्याम्यशेषतः कात्स्त्रर्येन। तज्ज्ञानं विवक्षितं स्तोति श्रोतुरभिमुखीकरणाय। यज्ज्ञात्वा यज्ज्ञानं ज्ञात्वा नेह भूयः पुनर्ज्ञातव्यं पुरुषार्थसाधनमवशिष्यते नावशेषो भवतीति मत्तत्त्वशो यः स सर्वज्ञो भवतीत्यर्थ इति। अस्मिन्भाष्ये ज्ञास्यसीत्युक्त्या परोक्षज्ञानशङ्क्यां तन्निवृत्त्यर्थं तदुक्तिप्रकारमेव विवृणोति तच्चेति। इदमपरोक्षज्ञानं चैतन्यम्। तस्य सविज्ञानस्य प्रतिलम्मे किं स्यादित्याशङ्क्याह यज्ज्ञातक्वेति। इदमा चैतन्यस्य परोक्षत्वं व्यावर्त्यते तदेव सविज्ञानमिति विशेषणेन स्फुटयत इति तद्दीकाकृतः। तदेवाह ज्ञाममति। ज्ञानं शुद्धप्रधानंशुद्धप्रज्ञानघनं ब्रह्मसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म इति श्रुतं ते तुभ्यमहं वक्ष्यामि। अशेषतः साधनकलापसहितं किं वचनमात्रजेन परोक्षज्ञानेन शब्दस्य स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वानियमादित्याशङ्क्याह। सविज्ञानमनुभवसहितं दशमस्त्वमसीत्यादौ शब्दादप्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तिदर्शनादित्यन्ये। वस्तुस्तु तच्च मद्विषयं ज्ञानमिति भाष्याद्भाष्यकृतामयमर्थो नाभिप्रेतोः। सविज्ञानमिति मूलान्मूलानुगुणोऽपि न भवति। त्मान्मूलतद्भाष्यानुरोधेन ज्ञानं शास्त्रजन्यं विज्ञानमनुभव इति व्याख्येयम्। यज्ज्ञोत्वेत्यस्य तुयज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव इति श्लोकस्थभाष्यानुसारेण मद्विषयं ज्ञानं शास्त्रजन्यं सविज्ञानं लब्ध्वेत्यर्थं इत्यविरोधः। मद्विषयस्य ज्ञानस्य सकलाधिष्ठानविषयत्वात्। अन्यज्ज्ञातव्यं नावशिष्यतेयेनाश्रुतं श्रुतं भवति इत्यादिश्रुतिरिति भावः। यत्त्विदं मद्विषयं विज्ञानेन सहितमपरोक्षमेव ज्ञानं शास्त्रजन्यं ते तुम्यमहं वक्ष्यामि जज्ज्ञानं नित्यचैतन्यरुपं ज्ञात्वा वेदान्तजन्यमनोवृत्तिविषयीकृत्येति। तत्र यजज्ञानमित्याद्युपेक्ष्यं यच्छब्दस्य प्रस्तुतपरामर्शकत्वेन सविज्ञानस्य ज्ञानस्य यदा परामृष्टस्य चैतन्यरुपार्थकत्वायोगात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.2।।ज्ञास्यसीत्युक्ते परोक्षमेव तज्ज्ञानं स्यादिति शङ्कां व्यावर्तयन्स्तौति श्रोतुराभिमुख्याय इदं मद्विषयं स्वतोऽपरोक्षज्ञानम् असंभावनादिप्रतिबन्धेन फलमजनयत्परोक्षमित्युपचर्यते। असंभावानादिनिरासे तु विचारपरिपाकान्ते तेनैव प्रमाणेन जनितं ज्ञानं प्रतिबन्धाभावात्फलं जनयदपरोक्षमित्युच्यते। विचारपरिपाकनिष्पन्नत्वाच्च तदेव विज्ञानं तेन विज्ञानेन सहितमिदमपरोक्षमेव ज्ञानं शास्त्रजन्यं ते तुभ्यमहं परमाप्तो वक्ष्याम्यशेषतः साधनफलादिसहितत्वेन निरवशेषं कथयिष्यामि। श्रौतीमेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञामनुसरन्नाह यज्ज्ञानं नित्यचैतन्यरूपं ज्ञात्वा वेदान्तजन्यमनोवृत्तिविषयीकृत्येह व्यवहारभूमौ भूयः पुनरपि अन्यत्किंचिदपि ज्ञातव्यं नावशिष्यते। सर्वाधिष्ठानसन्मात्रज्ञानेन कल्पितानां सर्वेषां बाधे सन्मात्रपरिशेषात्तन्मात्रज्ञानेनैव त्वं कृतार्थो भविष्यसीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.2।।एतदेवाह ज्ञानमिति। ज्ञानं शुद्धप्रज्ञानघनं ब्रह्मसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म इति श्रुतेः। ते तुभ्यमहं वक्ष्यामि। अशेषतः साधनकलापसहितम्। किं वचनमात्रजेन परोक्षज्ञानेन शब्दस्य स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वनियमादित्याशङ्क्याह सविज्ञानमनुभवसहितम्। दशमस्त्वमसीत्यादौ शब्दादप्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तिदर्शनात्कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातम् इत्येकविज्ञानात्सर्वविज्ञानप्रतिज्ञां श्रौतीमेव वर्णयति यज्ज्ञात्वेति। जगत्कारणाधिष्ठानस्य ज्ञानरूपस्य ब्रह्मणो ज्ञाने संशयोच्छेदात्सर्वस्यात्ममात्रत्वेन ज्ञातव्यानवशेषो युक्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.2।।ननु योगस्वरूपनिरूपणे पूर्वमपि स्वरूपज्ञानमुक्तमेव पुनरेतज्ज्ञानं किंरूपं इत्याशङ्क्याह ज्ञानं तेऽहमिति। अहं पुरुषोत्तमः ते तव त्वदर्थं ज्ञानं शास्त्रोक्तप्रकारेण मत्स्वरूपविषयं अशेषतः सम्पूर्णं लीलादिसहितं वक्ष्यामि। कीदृशं तत् सविज्ञानं स्वरूपानुभवसहितम्। अनुभवस्वरूपमेवाह इदमिति अनुभूयमानस्वस्वस्पात्मकम्। एतज्ज्ञानान्तरं पुनरन्यज्ज्ञेयं नास्तीत्याह यदिति। यत् स्वस्वरूपानुभवसहितं स्वस्वरूपं ज्ञात्वा इह अस्मिन् मद्भक्तिमार्गे भरतखण्डे अस्मिन्मनुष्यजन्मनि वा ज्ञातव्यं न अवशिष्यते। एतज्ज्ञानेनैव दास्यानुभवो भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.2।।वक्ष्यमाणं स्तौति ज्ञानमिति। ज्ञानं शास्त्रीयं विज्ञानमनुभवस्तत्सहितम्। इदं मद्विषयम्। अशेषतः साकल्येन वक्ष्यामि। यज्ज्ञात्वेह श्रेयोमार्गे वर्तमानस्य पुनरन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्टं न भवति। तेनैव कृतार्थो भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.2।।वक्ष्यमाणं स्तौति ज्ञानमिति। माहात्म्यविषयकं ज्ञानं विज्ञानं विविधतया चिदचिद्रूपतया च तत्तद्विभूतिधर्मरूपतयाऽवान्तरविशेषैश्च यथार्थज्ञानं तेन सहितं अशेषतो वक्ष्यामि। यद्याथात्म्यं ज्ञात्वा भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमविशष्टं न भवति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.2।।वहीं यह अपने स्वरूपका ज्ञान मैं तुझे विज्ञानके सहित अर्थात् अपने अनुभवके सहित निःशेषतःसम्पूर्णतासे कहूँगा। श्रोताको सम्मुख अर्थात् सावधान करनेके लिये जिसका वर्णन करना है उस ज्ञानकी स्तुति करते हैं। जिस ज्ञानको जान लेनेपर फिर इस जगत्में पुरुषार्थका कोई साधन जानना शेष नहीं रहता अर्थात् जो मेरे तत्त्वको जाननेवाला है वह सर्वज्ञ हो

Chapter 7 (Part 2)

जाता है। अतः यह ज्ञान अति उत्तम फलवाला होनेके कारण दुर्लभ है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.2।। व्याख्या  ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः भगवान् कहते हैं कि भैया अर्जुन अब मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा (टिप्पणी प0 392.1) तुम्हें कहूँगा और मैं खुद कहूँगा तथा सम्पूर्णतासे कहूँगा। ऐसे तो हरेक आदमी हरेक गुरुसे मेरे स्वरूपके बारेमें सुनता है और उससे लाभ भी होता है परन्तु तुम्हें मैं स्वयं कह रहा हूँ। स्वयं कौन जो समग्र परमात्मा है वह मैं स्वयं मैं स्वयं मेरे स्वरूपका जैसा वर्णन कर सकता हूँ वैसा दूसरे नहीं कर सकते क्योंकि वे तो सुनकर और अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके ही कहते हैं (टिप्पणी प0 392.2)। उनकी बुद्धि समष्टि बुद्धिका एक छोटासा अंश है वह कितना जान सकती है वे तो पहले अनजान होकर फिर जानकार बनते हैं पर मैं सदा अलुप्तज्ञान हूँ। मेरेमें अनजानपना न है न कभी था न होगा और न होना सम्भव ही है। इसलिये मैं तेरे लिये उस तत्त्वका वर्णन करूँगा जिसको जाननेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा।दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि आप अपनी सबकीसब विभूतियोंको कहनेमें समर्थ हैं वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः तो उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है इसलिये प्रधानतासे कहूँगा प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे (10। 19)। फिर अन्तमें कहते हैं कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप (10। 40)। यहाँ (7। 2 में) भगवान् कहते हैं कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा शेष नहीं रखूँगा अशेषतः। इसका तात्पर्य यह समझना चाहिये कि मैं तत्त्वसे कहूँगा। तत्त्वसे कहनेके बाद कहना जानना कुछ भी बाकी नहीं रहेगा।दसवें अध्यायमें विभूति और योगकी बात आयी कि भगवान्की विभूतियोंका और योगका अन्त नहीं है। अभिप्राय है कि विभूतियोंका अर्थात् भगवान्की जो अलगअलग शक्तियाँ हैं उनका और भगवान्के योगका अर्थात् सामर्थ्य ऐश्वर्यका अन्त नहीं आता। रामचरितमानसमें कहा है निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ।। (उत्तर0 73 ख)तात्पर्य है कि सगुण भगवान्का जो प्रभाव है ऐश्वर्य है उसका अन्त नहीं आता। जब अन्त ही नहीं आता तब उसको जानना मनुष्यकी बुद्धिके बाहरकी बात है। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है उसको मनुष्य सुगमतासे समझ सकता है। जैसे सोनेके गहने कितने होते हैं इसको मनुष्य नहीं जान सकता क्योंकि गहनोंका अन्त नहीं है परन्तु उन सब गहनोंमें तत्त्वसे एक सोना ही है इसको तो मनुष्य जान ही सकता है। ऐसे ही परमात्माकी सम्पूर्ण विभूतियों और सामर्थ्यको कोई जान नहीं सकता परन्तु उन सबमें तत्त्वसे एक परमात्मा ही हैं इसको तो मनुष्य तत्त्वसे जान ही सकता है। परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर उसकी समझ तत्त्वसे परिपूर्ण हो जाती है बाकी नहीं रहती। जैसे कोई कहे कि मैंने जल पी लिया तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि अब संसारमें जल बाकी नहीं रहा। अतः जल पीनेसे जलका अन्त नहीं हुआ है प्रत्युत हमारी प्यासका अन्त हुआ है। इसी तरहसे परमात्मतत्त्वको तत्त्वसे समझ लेनेपर परमात्मतत्त्वके ज्ञानका अन्त नहीं हुआ है प्रत्युत हमारी अपनी जो समझ है जिज्ञासा है वह पूर्ण हुई है उसका अन्त हुआ है उसमें केवल परमात्मतत्त्व ही रह गया है।दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मेरे प्रकट होनेको देवता और महर्षि नहीं जानते और तीसरे श्लोकमें कहा है कि मुझे अज और अनादि जानता है वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। तो जिसे देवता और महर्षि नहीं जानते उसे मनुष्य जान ले यह कैसे हो सकता है भगवान् अज और अनादि हैं ऐसा दृढ़तासे मानना ही जानना है। मनुष्य भगवान्को अज और अनादि मान ही सकता है। परन्तु जैसे बालक अपनी माँके विवाहकी बरात नहीं देख सकता ऐसे ही सब प्राणियोंके आदि तथा स्वयं अनादि भगवान्को देवता ऋषि महर्षि तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त आदि नहीं जान सकते। इसी प्रकार भगवान्के अवतार लेनेको लीलाको ऐश्वर्यको कोई जान नहीं सकता क्योंकि वे अपार हैं अगाध हैं अनन्त हैं। परन्तु उनको तत्त्वसे तो जान ही सकते हैं।परमात्मतत्त्वको जाननेके लिये ज्ञानयोगमें जानकारी(जानने) की प्रधानता रहती है और भक्तियोग में मान्यता(मानने) की प्रधानता रहती है। जो वास्तविक मान्यता होती है वह बड़ी दृढ़ होती है। उसको कोई इधरउधर नहीं कर सकता अर्थात् माननेवाला जबतक अपनी मान्यताको न छोड़े तबतक उसकी मान्यताको कोई छुड़ा नहीं सकता। जैसे मनुष्यने संसार और संसारके पदार्थोंको अपने लिये उपयोगी मान रखा है तो इस मान्यताको स्वयं छोड़े बिना दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। परन्तु स्वयं इस बातको जान ले कि ये सब पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तो इस मान्यताको मनुष्य छोड़ सकता है क्योंकि यह मान्यता असत्य है झूठी है। जब असत्य मान्यताको भी दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता तब जो वास्तविक परमात्मा सबके मूलमें है उसको कोई मान ले तो यह मान्यता कैसे छूट सकती है क्योंकि यह मान्यता सत्य है। यह यथार्थ मान्यता ज्ञानसे कम नहीं होती प्रत्युत ज्ञानके समान ही दृढ़ होती है।भक्तिमार्गमें मानना मुख्य होता है। जैसे दसवें अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि हे महाबाहो अर्जुन मैं तेरे हितके लिये परम (सर्वश्रेष्ठ) वचन कहता हूँ तुम सुनो अर्थात् तुम इस वचनको मान लो। वहाँ भक्तिका प्रकरण है अतः वहाँ माननेकी बात कहते हैं। ज्ञानमार्गमें जानना मुख्य होता है। जैसे चौदहवें अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैं फिर ज्ञानोंमें उत्तम और सर्वोत्कृष्ट ज्ञान कहता हूँ जिसको जाननेसे सबकेसब मुनि परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। वहाँ ज्ञानका प्रकरण है अतः वहाँ जाननेकी बात कहते हैं। भक्तिमार्गमें मनुष्य मान करके जान लेता है और ज्ञानमार्गमें जान करके मान लेता है। अतः पूर्ण होनेपर दोनोंकी एकता हो जाती है।ज्ञान और विज्ञानसम्बन्धी विशेष बात संसार भगवान्से ही पैदा होता है और उनमें ही लीन होता है इसलिये भगवान् इस संसारके महाकारण हैं ऐसा मानना ज्ञान है। भगवान्के सिवाय और कोई चीज है ही नहीं सब कुछ भगवान् ही हैं स्वयं भगवान् ही सब कुछ बने हुए हैं ऐसा अनुभव हो जाना विज्ञान है।अपरा और परा प्रकृति मेरी है इनके संयोगसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और मैं इस सम्पूर्ण जगत्का महाकारण हूँ (7। 4 6) ऐसा कहकर भगवान्ने ज्ञान बताया। मेरे सिवाय अन्य कोई है ही नहीं सूतके धागेमें उसी सूतकी बनी हुई मणियोंकी तरह सब कुछ मेरेमें ही ओतप्रोत है (7। 7) ऐसा कहकर भगवान्ने विज्ञान बताया।जलमें रस चन्द्रसूर्यमें प्रभा मैं हूँ इत्यादि सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मैं हूँ सात्त्विक राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं (7। 8 12) ऐसा कहकर ज्ञान बताया। ये मेरेमें और मैं इनमें नहीं हूँ अर्थात् सब कुछ मैंहीमैं हूँ क्योंकि इनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है ( 7। 12) ऐसा कहकर विज्ञान बताया।जो मेरे सिवाय गुणोंकी अलग सत्ता मान लेता है वह मोहित हो जाता है। परन्तु जो गुणोंसे मोहित न होकर अर्थात् ये गुण भगवान्से ही होते हैं और भगवान्में ही लीन होते हैं ऐसा मानकर मेरे शरण होता है वह गुणमयी मायाको तर जाता है। ऐसे मेरे शरण होनेवाले चार प्रकारके भक्त होते हैं अर्थार्थी आर्त जिज्ञासु और ज्ञानी (प्रेमी)। ये सभी उदार हैं पर ज्ञानी अर्थात् प्रेमी मेरेको अत्यन्त प्रिय है और मेरी आत्मा ही है (7। 13 18) ऐसा कहकर ज्ञान बताया। जिसको सब कुछ वासुदेव ही है ऐसा अनुभव हो जाता है वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है (7। 19) ऐसा कहकर विज्ञान बताया।मेरेको न मानकर जो कामनाओंके कारण देवताओंके शरण हो जाते हैं उनको अन्तवाला फल (जन्ममरण) मिलता है और जो मेरे शरण हो जाते हैं उनको मैं मिल जाता हूँ। जो मुझे अजअविनाशी नहीं जानते उनके सामने मैं प्रकट नहीं होता। मैं भूत भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंको और उनमें रहनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंको जानता हूँ पर मेरेको कोई नहीं जानता। जो द्वन्द्वमोहसे मोहित हो जाते हैं वे बारबार जन्ममरणको प्राप्त होते हैं। जो एक निश्चय करके मेरे भजनमें लग जाते हैं उनके पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वे निर्द्वन्द्व हो जाते हैं (7। 20 28) ऐसा कहकर ज्ञान बताया। जो मेरा आश्रय लेते हैं वे ब्रह्म अध्यात्म कर्म अधिभूत अधिदैव और अधियज्ञको जान जाते हैं अर्थात् चरअचर सब कुछ मैं ही हूँ ऐसा उनको अनुभव हो जाता है (7। 29 30) ऐसा कहकर विज्ञान बताया।यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते विज्ञानसहित ज्ञानको जाननेके बाद जानना बाकी नहीं रहता। तात्पर्य है कि मेरे सिवाय संसारका मूल दूसरा कोई नहीं है केवल मैं ही हूँ मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय (गीता 7। 7) और तत्त्वसे सब कुछ वासुदेव ही है वासुदेवः सर्वम् (7। 19) और कोई है ही नहीं ऐसा जान लेगा तो जानना बाकी कैसे रहेगा क्योंकि इसके सिवाय दूसरा कुछ जाननेयोग्य है ही नहीं। यदि एक परमात्माको न जानकर संसारकी बहुतसी विद्याओंको जान भी लिया तो वास्तवमें कुछ नहीं जाना है कोरा परिश्रम ही किया है। जानना कुछ बाकी नहीं रहता इसका तात्पर्य है कि इन्द्रियोंसे मनसे बुद्धिसे जो परमात्माको जानता है वह वास्तवमें पूर्ण जानना नहीं है। कारण कि ये इन्द्रियाँ मन और बुद्धि प्राकृत हैं इसलिये ये प्रकृतिसे अतीत तत्त्वको नहीं जान सकते। स्वयं जब परमात्माके शरण हो जाता है तब स्वयं ही परमात्माको जानता है। इसलिये परमात्माको स्वयंसे ही जाना जा सकता है मनबुद्धि आदिसे नहीं। सम्बन्ध  भगवान्ने दूसरे श्लोकमें यह बताया कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा जिससे कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। जब जानना बाकी रहता ही नहीं तो फिर सब मनुष्य उस तत्त्वको क्यों नहीं जान लेते इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.1 7.2।।मय्यासक्तेति ज्ञानमिति। ज्ञानविज्ञाने ज्ञानक्रिये एव। ततो न किञ्चिदवशिष्यते सर्वस्य ज्ञेयजातस्य ज्ञानक्रियानिष्ठत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.2।।ज्ञास्यसीत्युक्त्या परोक्षज्ञानशङ्कायां तन्निवृत्त्यर्थं तदुक्तिप्रकारमेव विवृणोति तच्चेति। इदमपरोक्षं ज्ञानं चैतन्यम्। तस्य सविज्ञानस्य प्रतिलम्भे किं स्यादित्याशङ्क्याह यज्ज्ञात्वेति। इदमा चैतन्यस्य परोक्षत्वं व्यावर्त्यते। तदेव सविज्ञानमिति विशेषणेन स्फुटयति। अनवशेषेण तद्वेदनफलोपन्यासेन श्रोतारं तच्छवणप्रवणं करोति तज्ज्ञानमिति। एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानश्रुतिमाश्रित्योत्तरार्धतात्पर्यमाह यज्ज्ञात्वेति। भगवत्तत्त्वज्ञानस्य विशिष्टफलत्वमुक्त्वा फलितमाह अत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.2।।ननु ज्ञानं वक्ष्यते न तूक्तं तत्कथमिदं इति परामर्श इत्यत आह इदमिति। मामिति स्वस्य प्रकृतत्वात् तत्सम्बन्धित्वेन ज्ञानमपि प्रकृतमिति भावः। सविज्ञानं स्वानुभवसंयुक्तं (शां.भा.) इत्येतदपाकर्तुं विज्ञानपदार्थमाह विज्ञानमिति। अस्यैव वक्ष्यमाणत्वादपरस्य तदभावादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.2।।इदं मद्विषयं ज्ञानम्। विज्ञानं विशेषज्ञानम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.2।।अहं ते मद्विषयम् इदं ज्ञानं विज्ञानेन सह अशेषतो वक्ष्यामि। विज्ञानं हि विविक्ताकारविषयं ज्ञानम् यथा अहं मद्व्यतिरिक्तात् समस्तचिदचिद्वस्तुजातात् निखिलहेयप्रत्यनीकतया अनवधिकातिशयासख्येकल्याणगुणगणानन्तमहाविभूतितया च विविक्त तेन विविक्तविषयज्ञानेन सह मत्स्वरूपविषयज्ञानं वक्ष्यामि। किं बहुना यद् ज्ञानं ज्ञात्वा मयि पुनः अन्यद् ज्ञातव्यं न अवशिष्यते।वक्ष्यमाणस्य ज्ञानस्य दुष्प्रापताम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.2।। ज्ञानं ते तुभ्यम् अहं सविज्ञानं विज्ञानसहितं स्वानुभवयुक्तम् इदं वक्ष्यामि कथयिष्यामि अशेषतः कात्स्न्र्येन। तत् ज्ञानं विवक्षितं स्तौति श्रोतुः अभिमुखीकरणाय यत् ज्ञात्वा यत् ज्ञानं ज्ञात्वा न इह भूयः पुनः अन्यत् ज्ञातव्यं पुरुषार्थसाधनम् अवशिष्यते नावशिष्टं भवति। इति मत्तत्त्वज्ञो यः सः सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः। अतो विशिष्टफलत्वात् दुर्लभं ज्ञानम्।।कथमित्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.3 】

▸ Sanskrit Sloka: मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये | यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत: ||

▸ Transliteration: manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye | yatatāmapi siddhānāṃ kaścinmāṃ vetti tattvataḥ ||

▸ Glossary: manuṣyāṇāṃ: of men; sahasreṣu: out of many thousands; kaścit: hardly one; yatati: endeavors; siddhaye: for perfection of self-realization; yatatāṃ: of those so endeavoring; api: indeed; siddhānāṃ: of those who have achieved perfection; kaścit: hardly one; māṃ: Me; vetti: does know; tattvataḥ: in truth

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.3 Out of many thousands of men, hardly one endeavors or strives to achieve perfection of self-realization; of those so en- deavoring, hardly one achieves the perfection of self-realization and of those, hardly one knows Me in truth or reaches that state of oneness with Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.3।।हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.3।। सहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.3 मनुष्याणाम् of men? सहस्रेषु among thousands? कश्चित् some one? यतति strives? सिद्धये for perfection? यतताम् of the striving ones? अपि even? सिद्धानाम् of the successful ones? कश्चित् some one? माम् Me? वेत्ति knows? तत्त्वतः in essence.Commentary Mark how difficult it is to attain to the knowledge of the Self or to how Brahman in essence. Siddhanam literally means those who have attained to perfection (the perfected ones) but here it means only those who strive to attain perfection.Those who purchase diamonds? rubies or pearls are few. Those who study the postgraduate course are few. Even so those who attempt for Selfrealisation and who actually know the Truth in essence are few only. The liberated ones (Jivanmuktas) are rare. Real Sadhakas are also rare. The,knowledge of the Self bestows incalculable fruits on man? viz.? immortality? eternal bliss? perennial joy and everlasting peace. It is very difficult to attain to this knowledge of the Self. But a good and earnest spiritual aspirant (Sadhaka) who is endowed with a strong determination and iron resolve? and who is eipped with the four means to salvation can easily obtain the knowledge of the Self.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.3. Among thousands of men, perchance, one makes effort for the determined knowledge. Among those, having the determined knowledge-even though they make effort-perchance one realises Me correctly.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.3 Among thousands of men scarcely one strives for perfection, and even amongst those who gain occult powers, perchance but one knows me in truth.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.3 Among thousands of men, some one strives for perfection; even among those who strive for perfection, some one only knows Me; and among those who know Me, some one only knows Me in reality.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.3 Among thousands of men a rare one endeavours for perfection. Even of the perfected ones who are diligent, one perchance knows Me in truth.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.3 Among thousands of men, one perchance strives for perfection; even among those successful strivers, only one perchance knows Me in essence.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.3 Manusyanam etc. All [persons] are not fit for this subject. By this statement, [the Bhagavat] has declared that, as the subject is difficult to grasp, it is to be learnt with effort.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.3 'Men', i.e., those who are alified for observing the ?nds of the Sastras - among thousands of such men, only some one strives till the attainment of perfection. Among thousands who strive till the attainment of perfection, some one only, understanding Me, strives to attain success through Me (i.e., through My grace). Among thousands of those who might know Me, some one only knows Me in reality, as I am. In other words, there is no one who is capable of knowing Me as I am, i.e., as distinguished from all other entities, as implied in the expression Vijnana. Sri Krsna will declare later on: 'It is very hard to find such a great-souled person' (7.19), and 'But no one knows Me' (7.26).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.3 Sahasresu manusyanam, among thousands, among a multitude of men; kascit, a rare one; yatati, endeavours; siddhaye, for perfection. [For perfection: for the rise of Knowledge through the purification of the mind.] Siddhanam api, even of the perfected one; yatatam, who are diligent-they (those diligent ones themselves) being (considered to be) verily perfect because they are striving for Liberation; of them-; kascit, one perchance, indeed; vetti, knows; mam, Me; tattvatah, in truth. Having drawn the attention of the hearer by arousing interest, the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.3।। भारतीय आध्यात्मिक साहित्य में भिन्नभिन्न आचार्यों ने विभिन्न प्रकार से बारम्बार इस विचार को दोहराया है कि आत्मज्ञान तथा उसका अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करने वाले साधक विरले ही होते हैं। इसके पूर्व भी हमें यह बताया गया था कि वेदान्त के सिद्धांतों को भी एक आश्चर्य के समान सुना तथा समझा जाता है। उपनिषदों में भी इसीतथ्य का ऋषियों ने वर्णन किया है।यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण के अनुसार आत्मज्ञान की प्राप्ति का उत्तरदायितत्व साधक पर ही निर्भर है। यदि कोई साधक इस अनुभव को प्राप्त नहीं कर पाता है तो उसका एकमात्र कारण आवश्यक पुरुषार्थ का अभाव है। वेदान्त अध्यात्म विषयक विज्ञान होने के कारण हमारे लिए अपने अवगुणों का ज्ञानमात्र पर्याप्त नहीं है वरन् उसकी निवृत्ति के लिए और आत्मबल की वृद्धि के लिए आवश्यक है कि हम वेदान्त ज्ञान को अपने जीवन में उतारने का भी सदैव प्रयत्न करें। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी विरले पुरुष में ही आत्मोन्नति की तीव्र अभिलाषा होती है जिसके लिए वह अपना सर्वस्व अर्पण करने को तत्पर रहता है।सहस्रों मनुष्यों में से जो लोग वेदान्त का श्रवण करते हैं तथा सम्भवत बौद्धिक स्तर पर तत्प्रतिपादित समस्त सिद्धांतों को समझते भी हैं उनमें भी कोईकोई पुरुष ऐसे ही होते हैं जो आध्यात्मिक जीवन पद्धति को पूर्णतया अपनाते हैं ऐसे प्रयत्नशील साधकों में से कोई एक साधक मुझे तत्त्व से जानता है।इसके अनेक कारण हैं। जब शिष्य उत्साहपूर्वक एकाग्रचित्त होकर सद्गुरु के उपदेश का श्रवण करता है तब वह स्वयं किसी सीमा तक ऊँचा उठ भी सकता है। परन्तु हो सकता है कि सत्य के द्वार तक पहुँचकर भी वह किसी सूक्ष्म एवं अज्ञात अभिलाषा अथवा अनजाने गर्व के कारण अपनी प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध कर ले और इस प्रकार सत्य के दर्शन से वंचित ही रह जाय। इस दृष्टि से ईसामसीह की यह घोषणा अर्थपूर्ण है कि एक धनवान् व्यक्ति के स्वर्ग द्वार में प्रवेख करने की अपेक्षा एक ऊँट सुई के छिद्र से सरलता से प्रवेश करके बाहर निकल सकता है। यहाँ धन शब्द से अभिप्राय मन में संचित वासनाओं से है न कि लौकिक सम्पत्ति से। जब तक मन पूर्णत्ाया वासनारहित होकर शुद्ध नहीं हो जाता तब तक वह सत्य के आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता है।भगवान् श्रीकृष्ण की दृष्टि को ध्यान में रखकर इस श्लोक पर विचार करने से उसका अर्थ यह प्रतीत होता है कि विरले लोग ही वेदान्त का श्रवण करके उसके सिद्धांत को यथार्थ रूप में समझ पाते हैं। उनमें भी ऐसे साधकों की संख्या बहुत कम ही होती है जिनमें सत्य एवं शुद्धि का जीवन जीने के लिए लक्ष्य का आवश्यक ज्ञान मन की दृढ़ता शारीरिक सहनशक्ति तथा प्रयत्न की सम्पन्नता हो। अर्जुन तथा गीता के जिज्ञासु लोग ऐसे ही विरले पुरुष हैं जो आत्मज्ञान के अधिकारी हैं। उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण विज्ञान के सहित ज्ञान के उपदेश का वचन देते हैं जिससे आत्मा का साक्षात् अनुभव हो सकता है।इस प्रकार श्रोता में इस ज्ञान के प्रति रुचि उत्पन्न कराकर भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.3।।अतो मद्विषयं तत्त्वज्ञानं सार्वज्ञ्यसंपादकत्वादतिदुर्लभमित्याह मनुष्याणामिति। मनुष्याणामनेकयोनिषु पुण्यवशाल्लब्धदेहानां सहस्त्रेषु असंख्यातेषुशतं सहस्त्रं लक्षं च सर्वमक्षय्यवाचकम् इत्युक्तेः। अक्षय्यमित्यस्यासंख्यातमित्यर्थः। कश्चिदनेकजन्मार्जितपुण्यपुञ्जवशाल्लब्धविवेकादिसाधनो यतते यत्नं श्रवणादिरुपं करोति। यततामपि यतमानानामपि सिद्धानां मुमुक्षणाम्। साधकत्वेऽपि सिद्धत्वकथनं तेषामुत्कर्षद्योतनार्थम्। अपरे तु सिद्धये आत्मज्ञानाय यतते। यततामपि सहस्त्रेषु कश्चिदेव प्रकृष्टपुण्यवशादात्मानं वेत्ति तादृशानामप्यात्मज्ञानसिद्धानां सहस्त्रेषु कश्चिदेव मां परमात्मानं मत्प्रसादेन तत्त्वतो वेत्तीति वर्णयन्ति। अस्मिन्पक्षे मुख्यसिद्धशब्दार्थालाभस्त्वस्त्येवात्मपदाध्याहारस्य कश्चिदत्यस्य वेत्तीत्यस्य चावृत्तेरध्याहारस्य वा क्लेशोऽतिरिच्यते इत्ययं षक्षश्चिन्त्यः। तेषां मध्ये कश्चितेव मां परमेश्वरं तत्त्वतो यथावतस्वाभिन्नत्वेन वेत्ति जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.3।।अतिदुर्लभं चैतन्मदनुग्रहमन्तरेण महाफलं ज्ञानम् यतः मनुष्याणां शास्त्रीयज्ञानकर्मयोग्यानां सहस्रेषु मध्ये कश्चिदेकोऽनेकजन्मकृतसुकृतसमासादितनित्यानित्यवस्तुविवेकः सन् यतति यतते सिद्धये सत्त्वशुद्धिद्वारा ज्ञानोत्पत्तये। यततां यतमानानां ज्ञानाय सिद्धानां प्रागर्जितसुकृतानां साधकानामपि मध्ये कश्चिदेकः श्रवणमनननिदिध्यासनपरिपाकान्ते मामीश्वरं वेत्ति साक्षात्करोति तत्त्वतः प्रत्यगभेदेन तत्त्वमसीत्यादिगुरूपदिष्टमहावाक्येभ्यः। अनेकेषु मनुष्येष्वात्मज्ञानसाधनानुष्ठायी परमदुर्लभः। साधनानुष्ठायिष्वपि मध्ये फलभागी परमदुर्लभ इति किं वक्तव्यमस्य ज्ञानस्य माहात्म्यमित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.3।।एतदेव ज्ञानं दौर्लभ्यप्रदर्शनेन स्तौति मनुष्याणामिति। यततां यतमानानाम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.3।।ज्ञातव्यं कुतो नावशिष्यते इत्यत आह मनुष्याणामिति। पूर्वं तु भगवत्सन्निधानान्निस्सृतानां जीवानां मध्ये मनुष्यत्वं प्राप्तानामेव भजनाधिकारस्तत्प्राप्तिश्च दास्यदानानुग्रहैकसाध्या तत्प्राप्त्यनन्तरं च भावार्थं समर्पितस्य देहस्य तदाप्त्यर्थं लीलया प्राकट्यमतिदुर्लभं तत्रापि भावसेवया प्रीतेन भगवदुक्तस्वस्वरूपज्ञानमतिदुर्लभम्। एतत्सर्वसिद्धिर्यज्ज्ञानेन भवति तज्ज्ञाने न किञ्चिदवशिष्यते तदाह मनुष्याणां सहस्रेषु भजनौपयिकप्राप्तदेहानां सहस्रेषु असङ्ख्यातेषु कश्चित् दुर्लभो मदनुग्रहैकरूपः सिद्धये मत्सिद्धिस्वरूपनिमित्तं यासिद्धिर्द्वितीयस्कन्धे अ.1 उक्ता तदर्थं यतति यत्नवान् भवति। यततामपि यत्नं कुर्वतामपि सिद्धानां मध्ये कश्चित् स्वरमणेच्छादिभावरहितस्तत्स्वरूपात्मकधामरममाणं मां तत्त्वतस्तदनुग्रहैकलभ्यत्वेन वेत्ति जानाति। यत एतज्ज्ञानमतिदुर्लभम्। यज्ज्ञानान्तरं न किञ्चिदवशिष्यते तन्मया त्वदर्थमुच्यत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.3।।मद्भक्तिं विना तु मज्ज्ञानं दुर्लभमित्याह मनुष्याणामिति। असंख्यातानां जीवानां मध्ये मनुष्यव्यतिरिक्तानां श्रेयसि प्रवृत्तिरेव नास्ति मनुष्याणां तु सहस्रेषु मध्ये कश्चिदेव प्रकृष्टपुण्यवशात्सिद्धये आत्मज्ञानाय प्रयतते प्रयत्नं कुर्वतामपि सहस्रेषु कश्चिदेव प्रकृष्टपुण्यवशादात्मानं वेत्ति तादृशानां चात्मज्ञानसिद्धानां सहस्रेषु कश्चिदेव मां परमात्मानं मत्प्रसादेन तत्त्वतो वेत्ति तदेवमतिदुर्लभमपि मज्ज्ञानं तुभ्यमहं वक्ष्यामीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.3।।यतः मनुष्याणामिति। आत्मतत्त्वज्ञानाय कश्चिद्यतति। तादृशानामपि मध्ये मां भगवन्तं परमात्मानं सर्वधर्माश्रयमीश्वरं तत्त्वतः निरतिशयमहिमत्वतः कश्चिदेव व्यासवामदेवशुकादिर्वेत्ति न सर्वः। अतस्तन्मदीयं ज्ञानं ते वक्ष्यामीत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.3।।यह ( दुलर्भ ) कैसे है सो कहते हैं हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही ( मोक्षरूप ) सिद्धिके लिये प्रयत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें भी जो मोक्षके लिये यत्न करते हैं वे ( एक तरहसे ) सिद्ध ही हैं उनमें भी कोई एक ही मुझे तत्त्वसे यथार्थ जान पाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.3।। व्याख्या  मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये (टिप्पणी प0 395.1) हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। तात्पर्य है कि जिनमें मनुष्यपना है अर्थात् जिनमें पशुओंकी तरह खानापीना और ऐशआराम करना नहीं है वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं। उन मनुष्योंमें भी जो नीति और धर्मपर चलनेवाले हैं ऐसे मनुष्य हजारों हैं। उन हजारों मनुष्योंमें भी कोई एक ही सिद्धिके लिये (टिप्पणी प0 395.2) यत्न करता है अर्थात् जिससे बढ़कर कोई लाभ नहीं जिसमें दुःखका लेश भी नहीं और आनन्दकी किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं कमीकी सम्भावना ही नहीं ऐसे स्वतःसिद्ध नित्यतत्त्वकी प्राप्तिके लिये यत्न करता है।जो परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति नहीं चाहता और इस लोकमें धन मान भोग कीर्ति आदि नहीं चाहता अर्थात् जो उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंमें नहीं अटकता और भोगे हुए भोगोंके तथा मानबड़ाई आदरसत्कार आदिके संस्कार रहनेसे उन विषयोंका सङ्ग होनेपर उन विषयोंमें रुचि होते रहनेपर भी जो अपनी मान्यता उद्देश्य विचार सिद्धान्त आदिसे विचलित नहीं होता ऐसा कोई एक पुरुष ही सिद्धिके लिये यत्न करता है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धिके लिये यत्न करनेवाले अर्थात् दृढ़तासे उधर लगनेवाले बहुत कम मनुष्य होते हैं।परमात्मप्राप्तिकी तरफ न लगनेमें कारण है भोग और संग्रहमें लगना। सांसारिक भोगपदार्थोंमें केवल आरम्भमें ही सुख दीखता है। मनुष्य प्रायः तत्काल सुख देनेवाले साधनोंमें ही लगते हैं। उनका परिणाम क्या होगा इसपर वे विचार करते ही नहीं। अगर वे भोग और ऐश्वर्यके परिणामपर विचार करने लग जायँ कि भोग और संग्रहके अन्तमें कुछ नहीं मिलेगा रीते रह जायँगे और उनकी प्राप्तिके लिये किये हुए पापकर्मोंके फलस्वरूप चौरासी लाख योनियों तथा नरकोंके रूपमें दुःखहीदुख मिलेगा तो वे परमात्माके साधनमें लग जायँगे। दूसरा कारण यह है कि प्रायः लोग सांसारिक भोगोंमें ही लगे रहते हैं। उनमेंसे कुछ लोग संसारके भोगोंसे ऊँचे उठते भी हैं तो वे परलोकके स्वर्ग आदि भोगभूमियोंकी प्राप्तिमें लग जाते हैं। परन्तु अपना कल्याण हो जाय परमात्माकी प्राप्ति हो जाय ऐसा दृढ़तासे विचार करके परमात्माकी तरफ लगनेवाले लोग बहुत कम होते हैं। इतिहासमें भी देखते हैं तो सकामभावसे तपस्या आदि साधन करनेवालोंके ही चरित्र विशेष आते हैं। कल्याणके लिये तत्परतासे साधन करनेवालोंके चरित्र बहुत ही कम आते हैं।वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन या दुर्लभ नहीं है प्रत्युत इधर सच्ची लगनसे तत्परतापूर्वक लगनेवाले बहुत कम हैं। इधर दृढ़तासे न लगनेमें संयोगजन्य सुखकी तरफ आकृष्ट होना और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा (टिप्पणी प0 395.3) रखना ही खास कारण है।यततामपि सिद्धानाम् (टिप्पणी प0 395.4) यहाँ सिद्ध शब्दसे उनको लेना चाहिये जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है और जो केवल एक भगवान्में ही लग गये हैं। उन्हींको गीतामें महात्मा कहा गया है। यद्यपि सब कुछ परमात्मा ही है ऐसा जाननेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषको भी (7। 19में) महात्मा कहा गया है तथापि यहाँ तो वे ही महात्मा साधक लेने चाहिये जो आसुरी सम्पत्तिसे रहित होकर केवल दैवी सम्पत्तिका आश्रय लेकर अनन्यभावसे भगवान्का भजन करते हैं (गीता 9। 13)। इसका कारण यह है कि वे यत्न करते हैं यतताम्। इसलिये यहाँ (7। 19 में वर्णित) तत्त्वज्ञ महात्माको नहीं लेना चाहिये।यहाँ यतताम् पदका तात्पर्य मात्र बाह्य चेष्टाओंसे नहीं है। इसका तात्पर्य है भीतरमें केवल परमात्मप्राप्तिकी उत्कट उत्कण्ठा लगना स्वाभाविक ही लगन होना और स्वाभाविक ही आदरपूर्वक उन परमात्माका चिन्तन होना।कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ऐसे यत्न करनेवालोंमें कोई एक ही मेरेको तत्त्वसे जानता है। यहाँ कोई एक ही जानता है ऐसा कहनेका यह बिलकुल तात्पर्य नहीं है कि यत्न करनेवाले सब नहीं जानेंगे प्रत्युत यहाँ इसका तात्पर्य है कि प्रयत्नशील साधकोंमें वर्तमान समयमें कोई एक ही तत्त्वको जाननेवाला मिलता है। कारण कि कोई एक ही उस तत्त्वको जानता है और वैसे ही दूसरा कोई एक ही उस तत्त्वका विवेचन करता है आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः (गीता 2। 29)। यहाँ तथैव चान्यः (वैसे ही दूसरा कोई) कहनेका तात्पर्य न जाननेवाला नहीं है क्योंकि जो नहीं जानता है वह क्या कहेगा और कैसे कहेगा अतः दूसरा कोई कहनेका तात्पर्य है कि जाननेवालोंमेंसे कोई एक उसका विवेचन करनेवाला होता है। दूसरे जितने भी जानकार हैं वे स्वयं तो जानते हैं पर विवेचन करनेमें दूसरोंको समझानेमें वे सबकेसब समर्थ नहीं होते।प्रायः लोग इस (तीसरे) श्लोकको तत्त्वकी कठिनता बतानेवाला मानते हैं। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक तत्त्वकी कठिनताके विषयमें नहीं है क्योंकि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन नहीं है प्रत्युत तत्त्वप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होना और अभिलाषाकी पूर्तिके लिये तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंका मिलना दुर्लभ है कठिन है। यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मैं कहूँगा और तू जानेगा तो अर्जुनजैसा अपने श्रेयका प्रश्न करनेवाला और भगवान्जैसा सर्वज्ञ कहनेका मिलना दुर्लभ है। वास्तवमें देखा जाय तो केवल उत्कट अभिलाषा होना ही दुर्लभ है। कारण कि अभिलाषा होनेपर उसको जाननेकी जिम्मेवारी भगवान्पर आ जाती है।यहाँ तत्त्वतः कहनेका तात्पर्य है कि वह मेरे सगुणनिर्गुण साकारनिराकार शिव शक्ति गणेश सूर्य विष्णु आदि रूपोंमें प्रकट होनेवाले और समयसमयपर तरहतरहके अवतार लेनेवाले मुझको तत्त्वसे जान लेता है अर्थात् उसके जाननेमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता और उसके अनुभवमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी किञ्चिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती। सम्बन्ध  दूसरे श्लोकमें भगवान्ने ज्ञानविज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अब भगवान् ज्ञानविज्ञान कहनेका उपक्रम करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.3।।मनुष्याणामिति। अस्य च वस्तुनः सर्वो न योग्यः इत्यनेन दुर्लभत्वात् यत्नसेव्यतामाह(N यत्नः सेव्यतामित्याह)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.3।।ज्ञानस्य दुर्लभत्वं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति कथमित्यादिना। सहस्रशब्दस्य बहुवाचकत्वमुपेत्य व्याकरोति अनेकेष्विति। सिद्धये सत्त्वशुद्धिद्वारा ज्ञानोत्पत्त्यर्थमित्यर्थः। सिद्ध्यर्थं यतमानानां कथं सिद्धत्वमित्याशङ्क्याह सिद्धा एवेति। सर्वेषामेव तेषां ज्ञानोदयात्तस्य सुलभत्वमित्याशङ्क्याह तेषामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.3।।ननु ज्ञानादिवचनं प्रतिज्ञाय यत्किञ्चित्कथमुच्यते इत्यत आह दौर्लभ्यमिति। श्रोतुरादरजननार्थमिति शेषः। ज्ञानस्य दौर्लभ्ये विज्ञानस्य तत्सुतराम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.3।।दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह मनुष्याणामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.3।।मनुष्याः शास्त्राधिकारयोग्याः तेषां सहस्रेषु कश्चिद् एव सिद्धिपर्यन्तं यतते। सिद्धिपर्यन्तं यतमानानां सहस्रेषु कश्चिद् एव मां विदित्वा मत्तः सिद्धये यतते। मद्विदां सहस्रेषु तत्त्वतो यथावत्स्थितं मां वेत्ति न कश्चिद् इति अभिप्रायः।स महात्मा सुदुर्लभः (गीता 7।19)मां तु वेद न कश्चन (गीता 7।26) इति हि वक्ष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.3।। मनुष्याणां मध्ये सहस्रेषु अनेकेषु कश्चित् यतति प्रयत्नं करोति सिद्धये सिद्ध्यर्थम्। तेषां यततामपि सिद्धानाम् सिद्धा एव हि ते ये मोक्षाय यतन्ते तेषां कश्चित् एव हि मां वेत्ति तत्त्वतः यथावत्।।श्रोतारं प्ररोचनेन अभिमुखीकृत्याह

───────────────────

【 Verse 7.4 】

▸ Sanskrit Sloka: भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च | अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ||

▸ Transliteration: bhūmirāpo’nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhireva ca | ahankāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtiraṣṭadhā ||

▸ Glossary: bhūmiḥ: earth; āpaḥ: water; analah: fire; vāyuḥ: air; khaṃ: ether; manaḥ: mind; buddhiḥ: intelligence; eva: certainly; ca: and; ahaṃkāraḥ: ego; iti: thus; iyaṃ: all these; me: My; bhinnā: separated, various; prakṛtiḥ: external energies; aṣṭadhā: total eight

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.4 Earth, water, fire, air, ether, mind, intelligence and false ego all together these eight constitute My separated external energies.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.4 7.5।।(टिप्पणी प0 396) पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा परा प्रकृतिको जान जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.4।। पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश तथा मन बुद्धि और अहंकार यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.4 भूमिः earth? आपः water? अनलः fire? वायुः air? खम् ether? मनः mind? बुद्धिः intellect? एव even? च and? अहङ्कारः egoism? इति thus? इयम् this? मे My? भिन्ना divided? प्रकृतिः Nature? अष्टधा eightfold.Commentary This eightfold Nature constitutes the inferior Nature or Apara Prakriti. The five gross elements are formed out of the Tanmatras or rootelements through the process of Pancikarana or fivefold mixing. Tanmatras are the subtle rootelements. In this verse? earth? water? etc.? represent the subtle or rudimentary elements out of which the five gross elements are formed.Mind stands here for its cause Ahamkara intellect for its cause the Mahat Ahamkara for the Avyaktam or the unmanifested (MulaPrakriti) united with Avidya which is conjoined with all kinds of Vasanas or latent tendencies. As Ahamkara (Iness) is the cause for all the actions of every individual and as Ahamkara is the most vital principle in man on which all the other Tattvas or principles depend? the Avyaktam combined with the Ahamkara is itself called here Ahamkara? just as food which is mixed with poison is itself called poison.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.4. My nature is divided eightfold, such as the Earth, the Water, the Fire, the Wind, the Ether, the Mind, and also the Intellect and the Ego;

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.4 Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and personality; this is the eightfold division of My Manifested Nature.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.4 Earth, water, fire, air, ether, Manas, Buddhi and ego-sense - thus My Prakrti is divided eightfold.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.4 This Prakrti of Mine is divided eight-fold thus: earth, water, fire, air, space, mind, intellect and also egoism.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.4 Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and egoism thus is My Nature divided eightfold.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.4 See Comment under 7.5

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.4 Know that Prakrti, the material cause of this universe, which consists of endless varieties of objects and means of enjoyment and places of enjoyment, is divided into eightfold substances - earth, water, fire, air and ether, having smell, taste etc., as their attributes, and Manas along with kindred sense organs and the categories Mahat and ego-sense - all belonging to Me.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.4 Iyam, this; prakrtih, Prakrti, [Prakrti here does not mean the Pradhana of the Sankhyas.] the divine power called Maya; me, of Mine, as described; bhinna, is divided; astadha, eight-forl; iti, thus: bhumih, earth-not the gross earth but the subtle element called earth, this being understood from the statement, 'Prakrti (of Mine) is divided eight-fold'. Similarly, the subtle elements alone are referred to even by the words water etc. Apah, water; analah, fire; vayuh, air; kham, space; manah, mind. By 'mind' is meant its source, egoism. By buddhih, intellect, is meant the principle called mahat [Mahat means Hiranyagarbha, or Cosmic Intelligence.] which is the source of egoism. By ahankarah, egoism, is meant the Unmanifest, associated [Associated, i.e. of the nature of.] with (Cosmic) ignorance. As food mixed with position is called poison, similarly the Unmainfest, which is the primordial Cause, is called egoism since it is imbued with the impressions resulting from egoism; and egoism is the impelling force (of all). It is indeed seen in the world that egoism is the impelling cause behind all endeavour.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.4।। वैदिक काल के महान् मनीषियों ने जगत् की उत्पत्ति पर सूक्ष्म विचार करके यह बताया है कि जगत् जड़ पदार्थ (प्रकृति) और चेतनतत्त्व (पुरुष) के संयोग से उत्पन्न होता है। उनके अनुसार पुरुष की अध्यक्षता में जड़ प्रकृति से बनी शरीरादि उपाधियाँ चैतन्ययुक्त होकर समस्त व्यवहार करने में सक्षम होती हैं। एक आधुनिक दृष्टान्त से इस सिद्धांत को स्पष्ट किया जा सकता है।लोहे के बने वाष्प इंजिन में स्वत कोई गति नहीं होती। परन्तु जब उसका सम्बन्ध उच्च दबाब की वाष्प से होता है तब वह इंजिन गतिमान हो जाता है। केवल वाष्प भी किसी यन्त्र की सहायता के बिना अपनी शक्ति को व्यक्त नहीं कर सकती दोनों के सम्बन्ध से ही यह कार्य सम्पादित किया जाता है।भारत के तत्त्वचिन्तक ऋषियों ने वैज्ञानिक विचार पद्धति से इसका वर्णन किया है कि किस प्रकार सनातन पूर्ण पुरुष प्रकृति की जड़ उपाधियों के संयोग से इस नानाविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुआ है।भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में प्रकृति का वर्णन करते हैं तथा अगले श्लोक में चेतन तत्त्व का। यदि एक बार मनुष्य प्रकृति और पुरुष जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट रूप से समझ ले तो वह यह भी सरलता से समझ सकेगा कि जड़ उपाधियों के साथ आत्मा का तादात्म्य ही उसके सब दुखों का कारण है। स्वाभाविक ही इस मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति होने पर वह स्वयं अपने स्वरूप को पहचान सकता है जो पूर्ण आनन्दस्वरूप है। आत्मा और अनात्मा के परस्पर तादात्म्य से जीव उत्पन्न होता है। यही संसारी दुखी जीव आत्मानात्मविवेक से यह समझ पाता है कि वह तो वास्तव में जड़ प्रकृति का अधिष्ठान चैतन्य पुरुष है जीव नहीं।अर्जुन को जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण प्रथम प्रकृति के आठ भागों को बताते हैं जिसे यहाँ अष्टधा प्रकृति कहा गया है। इस विवेक से प्रत्येक व्यक्ति अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप को पहचान सकता है।आकाश वायु अग्नि जल और पृथ्वी वे पंचमहाभूत तथा मन बुद्धि और अहंकार यह है अष्टधा प्रकृति जो परम सत्य के अज्ञान के कारण उस पर अध्यस्त (कल्पित) है। व्यष्टि (एक जीव) में स्थूल पंचमहाभूत का रूप है स्थूल शरीर तथा उनके सूक्ष्म भाव का रूप पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनके द्वारा मनुष्य बाह्य जगत् का अनुभव करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं जिनके द्वारा विषयों की संवेदनाएं मन तक पहुँचती हैं। इन प्राप्त संवेदनाओं का वर्गीकरण तथा उनका ज्ञान और निश्चय करना बुद्धि का कार्य है। इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण मन के द्वारा उनका एकत्रीकरण तथा बुद्धि के द्वारा उनका निश्चय इन तीनों स्तरों पर एक अहं वृत्ति सदा बनी रहती है जिसे अहंकार कहते हैं। ये जड़ उपाधियाँ हैं जो चैतन्य का स्पर्श पाकर चेतनवत् व्यवहार करने में समर्थ होती हैं।इसके पश्चात् अपनी पराप्रकृति बताने के लिए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.4।।यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यत इत्युक्तेन श्रोतारममिमुखीकृत्य तदुपपत्तये चेतनातेतनप्रपञ्चस्य स्वस्मिन्परमात्मन्यध्यस्तत्वहबोधनायाह भूमिरिति। आकाशादिभिः शब्दस्पर्शरुपरगन्धाख्यानि तन्मात्राणि लक्ष्यन्ते। इत्तीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधेति वाक्यशेषात्। मनःशब्देन तत्कारणमहंकारो लक्ष्यते। बुद्धिरित्यहंकारकारणं महत्तत्त्वं गृह्यते। अहंकार इत्यविद्यासंमिश्रमव्यक्तं लक्ष्यते। यथा विषसंमिश्रमन्नं विषमित्युच्यते तथाहंकारवासनावदव्यक्तं मूलकारणमहंकार इत्युच्यते। यत्तु बुद्य्धाहंकारशब्दौ तु स्वार्थावेन मनःशब्देनावशिष्टमव्यक्तं लक्ष्यते इति यत्पक्षान्तरं कैश्चित्प्रदर्शितं कैश्चत्प्रदर्शितं तदरुचिग्रस्तम्। तद्वीजं तु क्रमत्यागप्रसङ्गादि। यत्तु भूम्यादिशब्दैः पञ्चमहाभूतानि सूक्ष्मैः सैकीकृत्य गृह्यन्तेऽहंकारशब्देनैवाहंकारस्तेनैव तत्कार्याणीन्द्रियाण्यपि गृह्यन्ते बुद्धिरिति महत्तत्त्वं मनः शब्देन तु मनसवोन्नेयमव्यक्तरुपं प्रधानमिति। अनेन रुपेण प्रकृतिर्मायाख्या शक्तिरष्टधा भिन्ना विभागं प्राप्ता। चतुर्विशतिभेदभिन्नैवेत्यष्टास्वेवान्तर्भावविवक्ष्याष्टधा भिन्नेत्युक्तम्। तथाच वक्ष्यमाणक्षेत्राध्याये इमामेव प्रकृतिं चतुर्विशतितत्त्वात्मना प्रपञ्चयिष्यतिमहाभून्यहांकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः इत्यपरेवर्णयन्ति। तत्रेदमवधेयम्मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षोडशकस्तु विकारः इति सांख्योक्तप्रकारेणष्टस्वेव प्रकृतित्वव्यवहारो न विकारेषु। अत्रापि इतीयं से भिन्ना प्रकृतिरष्टघेति बचनादष्टौ प्रकृतय एव गृह्यन्ते। विकारस्य तु एतद्योनीनि भूतानिति भूतपदाभिधेयस्य सर्वस्याप्युपादानं क्षेत्राध्याये तु क्षेत्रनिरुपणावसरे इदमुक्तं तत्क्षेत्रमित्यारम्भइच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघाश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् इत्यन्तम्। यत्त्वन्ये नात्राव्यक्तमहदहंकारपञ्चतन्मात्राण्येवाष्टौ सांख्याभिमता एव प्रकृतयो ग्राह्या इति नियमोऽस्ति।मनसा ह्येव पश्यति मनसा श्रृणेति इति मनस इन्द्रियान्तरप्रकृतित्वश्रवणेन नवापि प्रकृतयः। तथाचैवं योज्यम्। इयं मे मम मदभिन्ना प्रकृतिरव्याकृताख्या द्विजसत्तम इतिअव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निष्कले संप्रसीयते इति तस्या अपि प्रभवप्रलययोः स्मरणादिति व्याचख्युस्तत्प्रकृताननुगुणम्। निर्देशानुसरणे तु मनःशब्देनोक्तश्रुत्या तस्य प्रकृतित्वात्तस्यैव ग्रहस्ततग्रहे मूलप्रकृतिग्रहे चोभयोरुपादाने वाष्टघेति विरोधापत्तेः मनसः प्रकृतित्ववर्णनमप्यसंगतम्। उदाहृतश्रुत्या तदलाभात्। मसा करणेनेन्द्रियद्वारकेण पश्यतीति श्रुत्यर्थाभ्युपगमात्। करणं विना द्वारस्याकिंचित्कतत्वात्। किंच विद्यारण्यादिभिराचार्यैर्मनसः श्रोत्राद्युत्पन्नमिति न प्रदर्शितं किंतुवियत्पवनतेजोऽम्बुभुवो भूतानि जज्ञिरे। सत्त्वांशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमाद्धीन्द्रियपञ्चकम्। रजौशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमात्कर्मेन्द्रियाणि तु।। इति भूतेभ्य इन्द्रियाणामुत्पत्तिर्दर्शिता। पुराणेषु तु अहंकारदेव सात्त्विकादिरुपेण त्रिविधात्समनस्कानामिन्द्रियदेवतानां त्वगादीन्द्रियाणां भूतानां च क्रमात्सेति सर्वथापि मनस इन्द्रियंप्रति प्रकृतित्वं नास्ति। यत्र क्वापि मनसस्तत्कल्पकत्वं श्रुयते तत्रापि मनउपाधिकस्यात्मन उपाधिप्रधानस्येति द्रष्टव्यम्।वदन्वाक्पश्यंश्चक्षुः श्रृण्वञश्रोत्रम् इत्यादिश्रुतेः। यदपि प्रकृतेः सादित्वं साधितं तदपि सिद्धान्तविरुद्धम्। मायाविद्यारूपेण द्विविधाया अपि मूलप्रकृतेः सर्वैरपि वेदान्तिभिरनादित्वेन सिद्धान्तित्वात्। तदुत्पत्तिलयवचनानि त्वाविर्भावतिरोभावपराणि। अन्यथा तत्कारणभूतायाः प्रकृतेरावश्यकत्वेनानवस्थापातादिति दिक्। इदीयं यथोक्ता प्रकृतिर्मे मम माया पारमेश्वरी अष्टधा अष्टभिः प्रकारैर्भिन्ना भेदमागता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.4।।एवं प्ररोचनेन श्रोतारमभिमुखीकृत्यात्मनः सर्वात्मकत्वेन परिपूर्णत्वमवतारयन्नादावपरां प्रकृतिमुपन्यस्यति सांख्यैर्हि पञ्चतन्मात्राण्यहंकारो महानव्यक्तमित्यष्टौ प्रकृतयः पञ्च महाभूतानि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि उभयसाधारणं मनश्चेति षोडशविकारा उच्यन्ते। एतान्येव चतुर्विशतितत्त्वानि। तत्र भूमिरापोऽनलो वायुः खमिति पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाख्यपञ्चमहाभूतसूक्ष्मावस्थारूपाणि गन्धरसरूपस्पर्शशब्दात्मकानि

Chapter 7 (Part 3)

पञ्चतन्मात्राणि लक्ष्यन्ते।बुद्ध्यहंकारशब्दौ तु स्वार्थावेव। मनःशब्देन च परिशिष्टमव्यक्तं लक्ष्यते प्रकृतिशब्दसामानाधिकरण्येन स्वार्थहानेरावश्यकत्वात्। मनःशब्देन वा स्वकारणमहंकारो लक्ष्यते पञ्चतन्मात्रसंनिकर्षात्। बुद्धिशब्दस्त्वहंकारकारणे महत्तत्त्वे मुख्यवृत्तिरेव। अहंकारशब्देन च सर्ववासनावासितमविद्यात्मकमव्यक्तं लक्ष्यते प्रवर्तकत्वाद्यसाधारणधर्मयोगाच्च। इत्युक्तकारेणेयमपरोक्षा साक्षिभास्यत्वात्प्रकृतिर्मायाख्या पारमेश्वरी शक्तिरनिर्वचनीयस्वभावा त्रिगुणात्मिकाऽष्टधा भिन्नाऽष्टभिः प्रकारैर्भेदमागता। सर्वोऽपि जडवर्गोऽत्रैवान्तर्भवतीत्यर्थः। स्वसिद्धान्ते चेक्षणसंकल्पात्मकौ मायापरिणामावेव बुद्ध्यहंकारौ। पञ्चतन्मात्राणि चापञ्चीकृतपञ्चमहाभूतानीत्यसकृदवोचाम।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.4।।एवमेकविज्ञानात्सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय तदुपपत्तये सर्वस्य जडाजडप्रपञ्चस्य ज्ञानात्मकब्रह्मप्रभवत्वमाह त्रिभिः भूमिरिति। अत्र भूम्यादिपदैस्तत्तत्कारणान्येव गृह्यन्ते प्रकृतिरित्यधिकारात् स्थूलभूम्यादेश्च विकृतिमात्रत्वात्। तथा च भूमिरिति गन्धतन्मात्रं आप इति रसतन्मात्रं अनल इति रूपतन्मात्रं वायुरिति स्पर्शतन्मात्रं खमिति शब्दतन्मात्रं मन इति तत्कारणमहंकारः बुद्धिरिति समष्टिबुद्धिर्महत्तत्त्वं अहंकरोत्यनयेत्यहंकारो मूलप्रकृतिः। करणे घञो दुर्लभत्वेऽप्यगत्या बाहुलकात्तद्बोध्यम्। इयं मे मत्तोऽभिन्नाऽपृथक्सिद्धा शुक्तिशकलादिव रजतं अष्टधा अष्टप्रकारा प्रकृतिर्जडप्रपञ्चोपादानभूता। यद्वा नात्राव्यक्तमहदहंकारपञ्चतन्मात्राण्येवाष्टौ सांख्याभिमता एव प्रकृतयो ग्राह्या इति नियमोऽस्ति।मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति इति मनस इन्द्रियान्तरप्रकृतित्वश्रवणेन सन्तु नवापि प्रकृतयः। तथा चैवं योज्यम्। इयं मे मदभिन्ना प्रकृतिरव्याकृताख्या भूम्यादिभेदेनाष्टधेति मूलप्रकृतेरत्र भूम्यादिभिः सह पाठाज्जन्यत्वमवगम्यते न सांख्यानामिवाजन्यत्वम्।तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम इतिअव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निष्कले प्रविलीयते इति च तस्या अपि प्रभवप्रलययोः स्मरणात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.4।।एवं सावधानतया श्रोतव्यत्वेनार्जुनं बोधयित्वा पूर्वप्रतिज्ञातस्वस्वरूपज्ञानार्थं स्वस्य सर्वकर्त्तृत्वं सर्वस्वरूपत्वं चाह भूमिराप इत्यादिभिः। भूमिः आपः अनलः वायुः खम् एवं पञ्च महाभूतानि। मनः सङ्कल्पादिसाधनम् बुद्धिर्ज्ञानात्मिका अहङ्कारोऽभिमानादिरूपः इति। अनेन प्रकारेण इयं मे अष्टधा प्रकृतिर्माया भिन्ना विभागं प्राप्ता। लौकिककार्यार्थमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.4।।एवं श्रोतारमभिमुखीकृत्येदानीं प्रकृतिद्वारा सृष्ट्यादिकर्तृत्वेनेश्वरतत्त्वं प्रतिज्ञातं निरूपयिष्यन्परापरभेदेन प्रकृतिद्वयमाह भूमिरिति द्वाभ्याम्। भूम्यादिशब्दैः पञ्चगन्धादितन्मात्राण्युच्यन्ते मनःशब्देन तत्कारणभूतोऽहंकारः बुद्धिशब्देन तत्कारणभूतं महत्तत्त्वं अहंकारशब्देन तत्कारणमविद्येत्येवमष्टधा भिन्ना। यद्वा भूम्यादिशब्दैः पञ्चमहाभूतानि सूक्ष्मैः सहैकीकृत्य गृह्यन्ते अहंकारशब्देनैवाहंकारस्तेनैव तत्कार्याणीन्द्रियाण्यपि गृह्यन्ते बुद्धिरिति महत्तत्त्वं मनःशब्देन मनसैवोन्नेयमव्यक्तरूपं प्रधानमित्यनेन प्रकारेण मे प्रकृतिर्मायाख्या शक्तिरब्टधा भिन्ना विभागं प्राप्ता। चतुर्विंशतिभेदभिन्नाप्यष्टस्वेवान्तर्भावविवक्षयाष्टधा भिन्नेत्युक्तम्। तथाच वक्ष्यमाणक्षेत्राध्याये इमामेव प्रकृतिं चतुर्विंशतितत्त्वात्मना प्रपञ्चयिष्यतिमहाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.4।।तथाविधं स्वमहिमज्ञानं ब्रह्मवादानुसारेण स्वयमेवोपदिशति भूमिरित्यादिना। तत्रादौ सर्वधर्माश्रयं पुरुषोत्तमापरपर्यायं ब्रह्मैव परं स्वेच्छया सर्वं भवतीति श्रूयते भूमिवत् दुग्धवच्च अतएवक्षीरवद्धि इति सूत्रे व्यवस्थापितम्आत्मकृतेः परिणामात् ब्र.सू.1।4।26 इत्येवं श्रुत्यर्थं व्याख्यायाभिन्ननिमित्तोपादानकारणं तद्ब्रह्मेति भाष्ये निगदितं च। भागवतेऽपि 10।10।3031त्वमेव कालो भगवान्विष्णुपुरव्यय ईश्वरः। त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी।। इति। परापरप्रकृतिरूपेण स्वात्मनाऽसाधारणसृष्ट्यादिकार्यकरणमाहात्म्यं ज्ञापयितुं स्वस्य प्रकृतिद्वयं तावदाह द्वाभ्यां भूमिराप इति। मे निरतिशयानन्तमहिम्नः सम्बन्धिनी संदशभूताऽप्यजा प्रकृतिरित्यष्टधा भिन्ना भूम्यादिरूपेण परिणताऽष्टविधा तत्र पञ्चधा स्थूलभावमिता पञ्चमहाभूतानि स्पष्टान्येव। मनो बुद्धिरहङ्कारश्चेत्यनिरुद्धप्रद्युम्नसङ्कर्षणाधिष्ठानभूता सूक्ष्मा। चित्तं च स्वाभेदाभिप्रायेण नोक्तं दृश्यमानत्वात् स्वस्य भागवतं वा तन्न प्राकृतमिति नोक्तम्। इयं च प्रकृतिः सदंशभूताऽचिदित्युच्यते चित्सम्बन्धे सर्वकार्यकरणक्षमा नान्यथेत्यपरा इयम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.4।।इस प्रकार रुचि बढ़ाकर श्रोताको सम्मुख करके कहते हैं भिन्ना प्रकृतिरष्टधा वह कथन होनेके कारण यहाँ भूमिशब्दसे पृथिवीतन्मात्रा कही जाती है स्थूल पृथ्वी नहीं वैसे ही जल आदि तत्त्व भी तन्मात्रारूपसे कहे जाते हैं। ( इस प्रकार पृथ्वी ) जल अग्नि वायु और आकाश एवं मन यहाँ मनसे उसके कारणभूत अहंकारकाग्रहण किया गया है तथा बुद्धि अर्थात् अहंकारका कारण महत्तत्त्व और अहंकार अर्थात् अविद्यायुक्त अव्यक्त मूलप्रकृति। जैसे विषयुक्त अन्न भी विष ही कहा जाता है वैसे ही अहंकार और वासनासे युक्त अव्यक्त मूलप्रकृति भी अहंकार नामसे कही जाती है क्योंकि अहंकार सबका प्रवर्तक है संसारमें अहंकार ही सबकी प्रवृत्तिका बीज देखा गया है। इस प्रकार यह उपर्युक्त प्रकृति अर्थात् मुझ ईश्वरकी मायाशक्ति आठ प्रकारसे भिन्न है विभागको प्राप्त हुई है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.4।। व्याख्या  भूमिरापोऽनलो वायुः ৷৷. विद्धि मे पराम् परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं (टिप्पणी प0 397.1)। जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं उसका नाम अपरा प्रकृति है और अपना अंश जो जीव है उसको भगवान् परा प्रकृति कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट जड और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ चेतन और परिवर्तनशील है।प्रत्येक मनुष्यका भिन्नभिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतन्त्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है इसलिये इसका नाम प्रकृति है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते क्योंकि यह परमात्माका स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह परमात्मस्वरूप ही है फिर इसकी जीव या प्रकृति संज्ञा नहीं रहती अर्थात् इसमें बन्धनकारक कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं रहता (गीता 18। 17)।यहाँ अपरा प्रकृतिमें पृथ्वी जल तेज वायु आकाश मन बुद्धि और अहंकार ये आठ शब्द लिये गये हैं। इनमेंसे अगर पाँच स्थूल भूतोंसे स्थूल सृष्टि मानी जाय तथा मन बुद्धि और अहंकार इन तीनोंसे सूक्ष्म सृष्टि मानी जाय तो इस वर्णनमें स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि तो आ जाती है पर कारणरूप प्रकृति इसमें नहीं आती। कारणरूप प्रकृतिके बिना प्रकृतिका वर्णन अधूरा रह जाता है। अतः आदरणीय टीकाकारोंने पाँच स्थूल भूतोंसे सूक्ष्म पञ्चतन्मात्राओं (शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध) को लिया है जो कि पाँच स्थूल भूतोंकी कारण हैं। मन शब्दसे अहंकार लिया है जो कि मनका कारण है। बुद्धि शब्दसे महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) और अहंकार शब्दसे प्रकृति ली गयी है। इस प्रकार इन आठ शब्दोंका ऐसा अर्थ लेनसे ही समष्टि अपरा प्रकृतिका पूरा वर्णन होता है क्योंकि इसमें स्थूल सूक्ष्म और कारण ये तीनों समष्टि शरीर आ जाते हैं। शास्त्रोंमें इसी समष्टि प्रकृतिका प्रकृतिविकृतिके नामसे वर्णन किया गया है (टिप्पणी प0 397.2)। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि भगवान्ने यहाँ अपरा और परा प्रकृतिका वर्णन प्रकृतिविकृति की दृष्टिसे नहीं किया है। यदि भगवान् प्रकृतिविकृति की दृष्टिसे वर्णन करते तो चेतनको प्रकृतिके नामसे कहते ही नहीं क्योंकि चेतन न तो प्रकृति है और न विकृति है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने यहाँ जड और चेतनका विभाग बतानेके लिये ही अपरा प्रकृतिके नामसे जडका और परा प्रकृतिके नामसे चेतनका वर्णन किया है।यहाँ यह आशय मालूम देता है कि पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश इन पाँच तत्त्वोंके स्थूलरूपसे स्थूल सृष्टि ली गयी है और इनका सूक्ष्मरूप जो पञ्चतन्मात्राएँ कही जाती हैं उनसे सूक्ष्मसृष्टि ली गयी है। सूक्ष्मसृष्टिके अङ्ग मन बुद्धि और अहंकार हैं।अहंकार दो प्रकारका होता है (1) अहंअहं करके अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम भी अहंकार है जो कि करणरूप है। यह हुई अपरा प्रकृति जिसका वर्णन यहाँ चौथे श्लोकमें हुआ है और (2) अहम्रूपसे व्यक्तित्व एकदेशीयताका नाम भी अहंकार है जो कि कर्तारूप है अर्थात् अपनेको क्रियाओंका करनेवाला मानता है। यह हुई परा प्रकृति जिसका वर्णन यहाँ पाँचवें श्लोकमें हुआ है। यह अहंकार कारणशरीरमें तादात्म्यरूपसे रहता है। इस तादात्म्यमें एक जडअंश है और एक चेतनअंश है। इसमें जो जडअंश है वह कारणशरीर है और उसमें जो अभिमान करता है वह चेतनअंश है। जबतक बोध नहीं होता तबतक यह जडचेतनके तादात्म्यवाला कारणशरीरका अहम् कर्तारूपसे निरन्तर बना रहता है। सुषुप्तिके समय यह सुप्तरूपसे रहता है अर्थात् प्रकट नहीं होता। नींदसे जगनेपर मैं सोया था अब जाग्रत् हुआ हूँ इस प्रकार अहम् की जागृति होती है। इसके बाद मन और बुद्धि जाग्रत् होते हैं जैसे मैं कहाँ हूँ कैसे हूँ यह मनकी जागृति हुई और मैं इस देशमें इस समयमें हूँ ऐसा निश्चय होना बुद्धिकी जागृति हुई। इस प्रकार नींदसे जगनेपर जिसका अनुभव होता है वह अहम् परा प्रकृति है और वृत्तिरूप जो अहंकार है वह अपरा प्रकृति है। इस अपरा प्रकृतिको प्रकाशित करनेवाला और आश्रय देनेवाला चेतन जब अपरा प्रकृतिको अपनी मान लेता है तब वह जीवरूप परा प्रकृति होती है ययेदं धार्यते जगत्।अगर यह परा प्रकृति अपरा प्रकतिसे विमुख होकर परमात्माके ही सम्मुख हो जाय परमात्माको ही अपना माने और अपरा प्रकृतिको कभी भी अपना न माने अर्थात् अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर निर्लिप्तताका अनुभव कर ले तो इसको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। स्वरूपका बोध हो जानेपर परमात्माका प्रेम प्रकट हो जाता है (टिप्पणी प0 398) जो कि पहले अपरा प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेसे आसक्ति और कामनाके रूपमें था। वह प्रेम अनन्त अगाध असीम आनन्दरूप और प्रतिक्षण वर्धमान है। उसकी प्राप्ति होनेसे यह परा प्रकृति प्राप्तप्राप्तव्य हो जाती है अपने असङ्गरूपका अनुभव होनेसे ज्ञातज्ञातव्य हो जाती है और अपरा प्रकृतिको संसारमात्रकी सेवामें लगाकर संसारसे सर्वथा विमुख होनेसे कृतकृत्य हो जाती है। यही मानवजीवनकी पूर्णता है सफलता है।प्रकृतिरष्टधा अपरेयम् पदोंसे ऐसा मालूम देता है कि यहाँ जो आठ प्रकारकी अपरा प्रकृति कही गयी है वह व्यष्टि अपरा प्रकृति है। इसका कारण यह है कि मनुष्यको व्यष्टि प्रकृति शरीरसे ही बन्धन होता है समष्टि प्रकृतिसे नहीं। कारण कि मनुष्य व्यष्टि शरीरके साथ अपनापन कर लेता है जिससे बन्धन होता है।व्यष्टि कोई अलग तत्त्व नहीं है प्रत्युत समष्टिका ही एक क्षुद्र अंश है। समष्टिसे माना हुआ सम्बन्ध ही व्यष्टि कहलाता है अर्थात् समष्टिके अंश शरीरके साथ जीव अपना सम्बन्ध मान लेता है तो वह समष्टिका अंश शरीर ही व्यष्टि कहलाता है। व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है। इस बन्धनसे छुड़ानेके लिये भगवान्ने आठ प्रकारकी अपरा प्रकृतिका वर्णन करके कहा है कि जीवरूप परा प्रकृतिने ही इस अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। यदि धारण न करे तो बन्धनका प्रश्न ही नहीं है।पंद्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको अपना अंश कहा है ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित रहनेवाले मन और पाँचों इन्द्रियोंको खींचता है अर्थात् उनको अपनी मानता है मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति। इसी तरह तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्ररूपसे समष्टिका वर्णन करके छठे श्लोकमें व्यष्टिके विकारोंका वर्णन किया क्योंकि ये विकार व्यष्टिके ही होते हैं समष्टिके नहीं। इन सबसे यही सिद्ध हुआ कि व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बाधक है। इस व्यष्टिसे सम्बन्ध तोड़नेके लिये ही यहाँ व्यष्टि अपरा प्रकृतिका वर्णन किया गया है जो कि समष्टिका ही अङ्ग है। व्यष्टि प्रकृति अर्थात् शरीर समष्टि सृष्टिमात्रके साथ सर्वथा अभिन्न है भिन्न कभी हो ही नहीं सकता।वास्तवमें मूल प्रकृति कभी किसीकी बाधक या साधक (सहायक) नहीं होती। जब साधक उससे अपना सम्बन्ध नहीं मानता तब तो वह सहायक हो जाती है पर जब वह उससे अपना सम्बन्ध मान लेता है तब वह बाधक हो जाती है क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे व्यष्टि अहंता (मैंपन) पैदा होती है। यह अहंता ही बन्धनका कारण होती है।यहाँ इतीयं मे पदोंसे भगवान् यह चेता रहे हैं कि यह अपरा प्रकृति मेरी है। इसके साथ भूलसे अपनापन कर लेना ही बारबार जन्ममरणका कारण है और जो भूल करता है उसीपर भूलको मिटानेकी जिम्मेवारी होती है। अतः जीव इस अपराके साथ अपनापन न करे।अहंतामें भोगेच्छा और जिज्ञासा ये दोनों रहती हैं। इनमेंसे भोगेच्छाको कर्मयोगके द्वारा मिटाया जाता है और जिज्ञासाको ज्ञानयोगके द्वारा पूरा किया जाता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग इन दोनोंमेंसे एकके भी सम्यक्तया पूर्ण होनेपर एकदूसरेमें दोनों आ जाते हैं (गीता 5। 4 5) अर्थात् भोगेच्छाकी निवृत्ति होनेपर जिज्ञासाकी भी पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर भोगेच्छाकी भी निवृत्ति हो जाती है। कर्मयोगमें भोगेच्छा मिटनेपर तथा ज्ञानयोगमें जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर असङ्गता स्वतः आ जाती है। उस असङ्गताका भी उपभोग न करनेपर वास्तविक बोध हो जाता है और मनुष्यका जन्म सर्वथा सार्थक होजाता है।जीवभूताम् वास्तवमें यह जीवरूप नहीं है प्रत्युत जीव बना हुआ है। यह तो स्वतः साक्षात् परमात्माका अंश है। केवल स्थूल सूक्ष्म और कारणशरीररूप प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही यह जीव बना है। यह सम्बन्ध जोड़ता है अपने सुखके लिये। यही सुख इसके जन्ममरणरूप महान् दुःखका खास कारण है।महाबाहो हे अर्जुन तुम बड़े शक्तिशाली हो इसलिये तुम अपरा और परा प्रकृतिके भेदको समझनेमें समर्थ हो। अतः तुम इसको समझो विद्धि।ययेदं धार्यते जगत् (टिप्पणी प0 399) वास्तवमें यह जगत् जगद्रूप नहीं है प्रत्युत भगवान्का ही स्वरूप है वासुदेवः सर्वम् (7। 19) सदसच्चाहम् (9। 19)। केवल इस परा प्रकृति जीवने इसको जगत्रूपसे धारण कर रखा है अर्थात् जीव इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता मानकर अपने सुखके लिये इसका उपोयग करने लग गया। इसीसे जीवका बन्धन हुआ है। अगर जीव संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न मानकर इसको केवल भगवत्स्वरूप ही माने तो उसका जन्ममरणरूप बन्धन मिट जायगा।भगवान्की परा प्रकृति होकर भी जीवात्माने इस दृश्यमान जगत्को जो कि अपरा प्रकृति है धारण कर रखा है अर्थात् इस परिवर्तनशील विकारी जगत्को स्थायी सुन्दर और सुखप्रद मानकर मैं और मेरेरूपसे धारण कर रखा है। जिसकी भोगों और पदार्थोंमें जितनी आसक्ति है आकर्षण है उसको उतना ही संसार और शरीर स्थायी सुन्दर और सुखप्रद मालूम देता है। पदार्थोंका संग्रह तथा उनका उपभोग करनेकी लालसा ही खास बाधक है। संग्रहसे अभिमानजन्य सुख होता है और भोगोंसे संयोगजन्य सुख होता है। इस सुखासक्तिसे ही जीवने जगत्को जगत्रूपसे धारण कर रखा है। सुखासक्तिके कारण ही वह इस जगत्को भगवत्स्वरूपसे नहीं देख सकता। जैसे स्त्री वास्तवमें जननशक्ति है परन्तु स्त्रीमें आसक्त पुरुष स्त्रीको मातृरूपसे नहीं देख सकता ऐसे ही संसार वास्तवमें भगवत्स्वरूप है परंतु संसारको अपना भोग्य माननेवाला भोगासक्त पुरुष संसारको भगवत्स्वरूप नहीं देख सकता। यह भोगासक्ति ही जगत्को धारण कराती है अर्थात् जगत्को धारण करानेमें हेतु है।दूसरी बात मात्र मनुष्योंके शरीरोंकी उत्पत्ति रजवीर्यसे ही होती है जो कि स्वरूपसे स्वतः ही मलिन है। परंतु भोगोंमें आसक्त पुरुषोंकी उन शरीरोंमें मलिन बुद्धि नहीं होती प्रत्युत रमणीय बुद्धि होती है। यह रमणीय बुद्धि ही जगत्को धारण कराती है।नदीके किनारे खड़े एक सन्तसे किसीने कहा कि देखिये महाराज यह नदीका जल बह रहा है और उस पुलपर मनुष्य बह रहे हैं। सन्तने उससे कहा कि देखो भाई नदीका जल ही नहीं खुद नदी भी बह रही है और पुलपर मनुष्य ही नहीं खुद पुल भी बह रहा है। तात्पर्य यह हुआ कि ये नदी पुल तथा मनुष्य बड़ी तेजीसे नाशकी तरफ जा रहे हैं। एक दिन न यह नदी रहेगी न यह पुल रहेगा और न ये मनुष्य रहेंगे। ऐसे ही यह पृथ्वी भी बह रही है अर्थात् प्रलयकी तरफ जा रही है। इस प्रकार भावरूपसे दीखनेवाला यह सारा जगत् प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है परन्तु जीवने इसको भावरूपसे अर्थात् है रूपसे धारण (स्वीकार) कर रखा है। परा प्रकृतिकी (स्वरूपसे) उत्पत्ति नहीं होती पर अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेके कारण यह शरीरकी उत्पत्तिको अपनी उत्पत्ति मान लेता है और शरीरके नाशको अपना नाश मान लेता है जिससे यह जन्मतामरता रहता है। अगर यह अपराके साथ सम्बन्ध न जोड़े इससे विमुख हो जाय अर्थात् भावरूपसे इसको सत्ता न दे तो जगत् सत्रूपसे दीख ही नहीं सकता।इदम् पदसे शरीर और संसार दोनों लेने चाहिये क्योंकि शरीर और संसार अलगअलग नहीं हैं। तत्त्वतः (धातु चीज) एक ही है। शरीर और संसारका भेद केवल माना हुआ है वास्तवमें अभेद ही है। इसलिये तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने इदं शरीरम् पदोंसे शरीरको क्षेत्र बताया (13। 1) परन्तु जहाँ क्षेत्रका वर्णन किया है वहाँ समष्टिका ही वर्णन हुआ है (13। 5) और इच्छाद्वेषादि विकार व्यष्टिके माने गये हैं (13। 6) क्योंकि इच्छा आदि विकार व्यष्टि प्राणीके ही होते हैं। तात्पर्य है कि समष्टि और व्यष्टि तत्त्वतः एक ही हैं। एक होते हुए भी अपनेको शरीर माननेसे अहंता और शरीरको अपना माननेसे ममता पैदा होती है जिससे बन्धन होता है। अगर शरीर और संसारकी अभिन्नताका अथवा अपनी और भगवान्की अभिन्नताका साक्षात् अनुभव हो जाय तो अहंता और ममता स्वतः मिट जाती है। ये अहंता और ममता कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग तीनोंसे ही मिटती हैं। कर्मयोगसे निर्ममो निरहंकारः (गीता 2। 71) ज्ञानयोगसे अहंकारं ৷৷. विमुच्य निर्ममः (गीता 18। 53) और भक्तियोगसे निर्ममो निरहंकारः (गीता 12। 13)। तात्पर्य है कि जडताके साथ सम्बन्धविच्छेद होना चाहिये जो कि केवल माना हुआ है। अतः विवेकपूर्वक न माननेसे अर्थात् वास्तविकताका अनुभव करनेसे वह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है।विशेष बातजैसे गुरुशिष्यका सम्बन्ध होता है तो इसमें गुरु शिष्यको अपना शिष्य मानता है। शिष्य गुरुको अपना गुरु मानता है। इस प्रकार गुरु अलग है और शिष्य अलग है अर्थात् उन दोनोंकी अलगअलग सत्ता दीखती है। परन्तु उन दोनोंके सम्बन्धसे एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है जिसको सम्बन्धकी सत्ता कहते हैं (टिप्पणी प0 400)। ऐसे ही साक्षात् परमात्माके अंश जीवने शरीरसंसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। इस सम्बन्धके कारण एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है जिसको मैंपन कहते हैं। सम्बन्धकी यह सत्ता (मैंपन) केवल मानी हुई है वास्तवमें है नहीं। जीव भूलसे इस माने हुए सम्बन्धको सत्य मान लेता है अर्थात् इसमें सद्भाव कर लेता है और बँध जाता है। इस प्रकार जीव संसारसे नहीं प्रत्युत संसारसे माने हुए सम्बन्धसे ही बँधता है।गुरु और शिष्यमें तो दोनोंकी अलगअलग सत्ता है और दोनों एकदूसरेसे सम्बन्ध मानते हैं परन्तु जीव (चेतन) और संसार (जड) इन दोनोंमें केवल एक जीवकी ही वास्तविक सत्ता है और यही भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानता है। संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है अतः उससे माना हुआ सम्बन्ध भी प्रतिक्षण स्वतः नष्ट हो रहा है। ऐसा होते हुए भी जबतक संसारमें सुख प्रतीत होता है तबतक उससे माना हुआ सम्बन्ध स्थायी प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध सुखासक्तिपर ही टिका हुआ है। संसारसे सुखासक्तिपूर्वक माने हुए सम्बन्धके कारण ही संसार अप्राप्त होनेपर भी प्राप्त और परमात्मा प्राप्त होनेपर भी अप्रप्त प्रतीत हो रहे हैं। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही परमात्माके वास्तविक सम्बन्धका अथवा संसारकी अप्राप्ति और परमात्माकी प्राप्तिका अनुभव हो जाता है।मैंपनको मिटानेके लिये साधक प्रकृति और प्रकृतिके कार्यको न तो अपना स्वरूप समझे न उससे कुछ मिलनेकी इच्छा रखे और न हि अपने लिये कुछ करे। जो कुछ करे वह सब केवल संसारकी सेवाके लिये ही करता रहे। तात्पर्य है कि जो कुछ प्रकृतिजन्य पदार्थ हैं उन सबकी संसारके साथ एकता है अतः उनको केवल संसारका मानकर संसारकी ही सेवामें लगाता रहे। इससे क्रिया और पदार्थोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना स्वरूप अवशिष्ट रह जाता है अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। यह कर्मयोग हुआ। ज्ञानयोगमें विवेकविचारपूर्वक प्रकृतिके कार्य पदार्थों और क्रियाओंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद करनेपर स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकार जडके सम्बन्धसे जो अहंता (मैंपन) पैदा हुई थी उसकी निवृत्ति हो जाती है।भक्तियोगमें मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं तथा मैं शरीरसंसारका नहीं हूँ और शरीरसंसार मेरे नहीं हैं ऐसी दृढ़ मान्यता करके भक्त संसारसे विमुख होकर केवल भगवत्परायण हो जाता है जिससे संसारका सम्बन्ध स्वतः टूट जाता है और अहंताकी निवृत्ति हो जाती है।इस प्रकार कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग इन तीनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक अनुष्ठान करनेपर जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होकर परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि परा प्रकृतिने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये अब आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.4 7.5।।भूमिरिति। अपरेति। इयमिति प्रत्यक्षेण या संसारावस्थायां। सर्वजनपरिदृश्यमाना सा चैकैव सती प्रकाराष्टकेन भिद्यते इति एकप्रकृत्यारब्धत्वादेकमेव विश्वमिति प्रकृतिवादेऽपि अद्वैतं प्रदर्शितम्। सैव जीवत्वं पुरुषत्वं प्राप्ता परा ममैव नान्यस्य च। सा (S omits सा) उभयरूपा वेद्यवेदकात्मकप्रपञ्चोपरचनविचित्रा तत एव स्वात्मविमलमुकुरतलकलितसकलभावभूमिः स्वस्वभावात्मिका सततमव्यभिचारिणी प्रकृतिः। इदं जगत् भूम्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.4।।ज्ञानार्थं प्रयत्नस्य तद्द्वारा ज्ञानलाभस्य तदुभयद्वारेण मुक्तेश्च दुर्लभत्वाभिधानस्य श्रोतृप्ररोचनं फलमिति मत्वाह श्रोतारमिति। आत्मनः सर्वात्मकत्वेन परिपूर्णत्वमवतारयन्नादावपरां प्रकृतिमुपन्यस्यति आहेति। भूमिशब्दस्य व्यवहारयोग्यस्थूलपृथिवीविषयत्वं व्यावर्तयति भूमिरितीति। तत्र हेतुमाह भिन्नेति। प्रकृतिसमभिव्याहाराद्गन्धतन्मात्रं स्थूलपृथिवीप्रकृतिरुत्तरविकारो भूमिरित्युच्यते न विशेष इत्यर्थः। भूमिशब्दवदबादिशब्दानामपि सूक्ष्मभूतविषयत्वमाह तथेति। तेषामपि प्रकृतिसमानाधिकृतत्वाविशेषात्तन्मात्राणां पूर्वपूर्वप्रकृतीनामुत्तरोत्तरविकाराणां न विशेषत्वसिद्धिरित्यर्थः। मनःशब्दस्य संकल्पविकल्पात्मककरणविषयत्वमाशङ्क्याह मन इतीति। न खल्वहंकाराभावे संकल्पविकल्पयोरसंभवात्तदात्मकं मनः संभवतीत्यर्थः। निश्चयलक्षणा बुद्धिरित्यभ्युपगमाद्बुद्धिशब्दस्य निश्चयात्मककरणाविषयत्वमाशङ्क्याह बुद्धिरितीति। नहि हिरण्यगर्भसमष्टिबुद्धिरूपमन्तरेण व्यष्टिबुद्धिः सिध्यतीत्यर्थः। अहंकारस्याभिमानविशेषात्मकत्वेनान्तःकरणप्रभेदत्वं व्यावर्तयति अहंकार इतीति। अविद्यासंयुक्तमित्यविद्यात्मकमित्यर्थः। कथं मूलकारणस्याहंकारशब्दत्वमित्याशङ्क्योक्तमर्थं दृष्टान्तेन स्पष्टयति यथेत्यादिना। मूलकारणस्याहंकारशब्दत्वे हेतुमाह प्रवर्तकत्वादिति। तस्य प्रवर्तकत्वं प्रपञ्चयति अहंकार एवेति। सत्येवाहंकारे ममकारो भवति तयोश्च भावे सर्वाप्रवृत्तिरिति प्रसिद्धमित्यर्थः। उक्तां प्रकृतिमुपसंहरति इतीयमिति। इयमित्यपरोक्षा साक्षिदृश्येति यावत्। ऐश्वरी तदाश्रया तदैश्वर्योपाधिभूता। प्रक्रियते महदाद्याकारेणेति प्रकृतिः। त्रिगुणं जगदुपादानं प्रधानमिति मतं व्युदस्यति मायेति। तस्यास्तत्कार्याकारेण परिणामयोग्यत्वं द्योतयति शक्तिरिति। अष्टधेति। अष्टभिः प्रकारैरिति यावत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.4।।मनुष्याणामितिवदुत्तरमप्यन्यार्थमिति प्रतीतिनिरासार्थं प्रतिज्ञातयोरुभयोः किमादावुच्यते इत्यपेक्षायां चाह प्रतिज्ञातमिति। असङ्गतिपरिहारायानन्यार्थताज्ञापनाय च ज्ञानस्य प्राथम्ये हेतुसूचनाय च प्रतिज्ञातमित्युक्तम्। प्रतिज्ञातत्वेन सङ्गतं प्रतिज्ञातमेव। न तु तदर्थं प्राथम्येन प्रतिज्ञातम्।रसोऽहं इत्यतः प्राक्तनग्रन्थसङ्ग्रहायादिपदम्। महत्तत्त्वमत्र नोपात्तं तत्किं नास्त्येव इत्यत आह महत इति। अहङ्कारेऽहङ्कारशब्दार्थेऽन्तर्भावः। कार्यवाचिनाऽहङ्कारशब्देन कारणस्य महतोऽप्युलक्षणमेव न त्वभाव इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.4।।प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह महतोऽहङ्कार एवान्तर्भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.4।।अस्य विचित्रानन्दभोग्यभोगोपकरणभोगस्थानरूपेण अवस्थितस्य जगतः प्रकृतिः इयं गन्धादिगुणकपृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशादिरूपेण मनःप्रभृतीन्द्रियरूपेण च महदंकाररूपेण च अष्टधा भिन्ना मदीया इति विद्धि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.4।। भूमिः इति पृथिवीतन्मात्रमुच्यते न स्थूला भिन्ना प्रकृतिरष्टधा इति वचनात्। तथा अबादयोऽपि तन्मात्राण्येव उच्यन्ते आपः अनलः वायुः खम्। मनः इति मनसः कारणमहंकारो गृह्यते। बुद्धिः इति अहंकारकारणं महत्तत्त्वम्। अहंकारः इति अविद्यासंयुक्तमव्यक्तम्। यथा विषसंयुक्तमन्नं विषमित्युच्यते एवमहंकारवासनावत् अव्यक्तं मूलकारणमहंकार इत्युच्यते प्रवर्तकत्वात् अहंकारस्य। अहंकार एव हि सर्वस्य प्रवृत्तिबीजं दृष्टं लोके। इतीयं यथोक्ता प्रकृतिः मे मम ऐश्वरी मायाशक्तिः अष्टधा भिन्ना भेदमागता।।

───────────────────

【 Verse 7.5 】

▸ Sanskrit Sloka: अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् | जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ||

▸ Transliteration: apare’yamitastvanyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām | jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat ||

▸ Glossary: aparā: inferior; iyaṃ: this; itaḥ: besides this; tu : but; anyāṃ: another; prakṛtiṃ: energy; viddhi: understand; me: my; parāṃ: superior; jīvabhūtāṃ: the living entities; mahā-bāho: O mighty armed one; yayā: by whom; idaṃ: this; dhāryate: bearing; jagat: the material world

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.5 Besides these external energies, which are inferior in nature, O mighty-armed Arjuna, there is a superior energy of Mine. This comprises all the embodied souls of all the living entities by which this material world is being utilized or exploited.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.4 7.5।।(टिप्पणी प0 396) पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा परा प्रकृतिको जान जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.5।। हे महाबाहो यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीवरूपी पराप्रकृति को जानो जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.5 अपरा lower? इयम् this? इतः from this? तु but? अन्याम् different? प्रकृतिम् nature? विद्धि know? मे My? पराम् higher? जीवभूताम् the very lifeelement? महाबाहो O mightyarmed? यया by which? इदम् this? धार्यते is upheld? जगत् world.Commentary The eightfold Nature described in the previous verse is the inferior Nature. It constitutes the Kshetra or the field or matter. It is impure. It generates evil and causes bondage. But the superior Nature is pure. It is My very Self? Kshetrajna (knower of the field or Spirit) by which life is sustained? and that which enters within the whole world and upholds it. It is the very lifeelement or the principle of Selfconsciousness? by which this universe is sustained.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.5. This is the lower [nature of Mine]. Not different from this is My superior nature which has become the individual Soul and by which this world is maintained. O mighty armed (Arjuna), you must know this.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.5 This is My inferior Nature; but distinct from this, O Valiant One, know thou that my Superior Nature is the very Life which sustains the universe.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.5 This is My lower Prakrti. But, O mighty-armed One, know that My higher nature is another. It is the life-principle (Jiva-bhuta), by which this universe is sustained.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.5 O mighty-armed one, this is the inferior (Prakrti). Know the other Prakrti of Mine which, however, is higher than this, which has taken the from of individual souls, and by which this world is uphelp.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.5 This is the inferior Prakriti, O mighty-armed (Arjuna); know thou as different from it My higher Prakriti (Nature), the very life-element, by which this world is upheld.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.4-5 Bhumih etc. Apard etc. [The demonstrative] 'this' denotes what is being perceived [as objects] through sense-organs by all men at the stage of mundane life. This is only one and at the same time is divided eigth-fold. Therefore the universe is one and unitary, because it is made of one single material cause. By this statement, monism is demonstrated even while following the Prakrti theory. The selfsame Prakrti has become the living one i.e., the personal Soul. Hence it is superior [to what has become eight-fold]. It also belongs to Me alone and not to anybody else. This Prakrti is [thus] two-fold and varied in the form of the universe consisting of the knowables and the knower. That is why this Prakrti (the basic material nature), being the substratum of all beings reflected on the surface of the clean mirror, viz., the Self , is nothing but Self's own nature and [hence] never leaves Him. This world : the Earth etc. [mentioned in the 4th verse].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.5 This is My lower Prakrti. But know My higher Prakrti which is different from this, i.e., whose nature is different from this inanimate Prakrti constituting the objects of enjoyment to animate beings. It is 'higher', i.e., is more pre-eminent compared to the lower Prakrti which is constituted only of inanimate substances. This higher Nature of Mine is the individual self. Know this as My higher Prakrti through which the whole inanimate universe is sustained.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.5 O mighty-armed one, iyam, this; is apara, the inferior (Prakrti)-not the higher, (but)-the impure, the source of evil and having the nature of worldly bondage. Viddhi, know; anyam, the other, pure; prakrtim, Prakrti; me, of Mine, which is essentially Myself; which, tu, however;is param, higher, more exalted; itah, than this (Prakrti) already spoken of; Jiva-bhutam, which has taken the form of the individual souls, which is characterized as 'the Knower of the body (field)', and which is the cause of sustenance of life; and yaya, by which Prakriti; idam, this; jagat, world; dharyate, is upheld, by permeating it.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.5।। अष्टधा प्रकृति अपरा जड़ है। उसे बताने के पश्चात् उससे भिन्न अपनी परा प्रकृति को भगवान् बताते हैं। वह परा प्रकृति जीवरूप अर्थात् चेतन रूप है जिसके कारण ही शरीर मन और बुद्धि अपनेअपने कार्य इस प्रकार करते हैं मानो वे स्वयं ही चेतन हों।इस चेतन की विद्यमानता में ही उपाधियाँ अपना व्यापार कर सकती हैं अन्यथा नहीं। चैतन्य के बिना हमें न बाह्य स्थूल जगत् का और न आन्तरिक सूक्ष्म विचार रूप जगत् का ही अनुभव और ज्ञान हो सकता है। वही जगत् को धारण किये हुए है। उसके अभाव में हमारी दशा एक पाषाण के समान हो जायेगी जिसमें न चेननता है और न बुद्धिमत्ता।भगवान् के इस कथन को कि परा प्रकृति जगत् का आधार है भौतिक विज्ञान की दृष्टि से विचार करके भी सिद्ध किया जा सकता है। हम अपने घर में रहते हैं जिसका आधार है भूमि। उस भूमिभाग का आधार है शहर शहर का राष्ट्र और राष्ट्र का आधार विश्व है विश्व घिरा हुआ है समुद्र के जल से जिसकी स्थिति वायुमण्डल पर निर्भर करती है। यह वायुमण्डल तो सौरमण्डल अथवा ग्रहमण्डल का एक भाग है। सम्पूर्ण विश्व आकाश में स्थित है और आकाश स्थित है मन में स्थित आकाश की कल्पना पर। मन का आधार है बुद्धि का निर्णय। और क्योंकि बुद्धिवृत्तियों का ज्ञान चैतन्य के कारण ही संभव है इसलिए यह चैतन्य ही सम्पूर्ण जगत् का आधार सिद्ध होता है। व्ाही जगत् का अधिष्ठान है।दर्शनशास्त्र में जगत् का अर्थ केवल इन्द्रियगोचर जगत् ही नहीं वरन् मन तथा बुद्धि के द्वारा अनुभूयमान जगत् भी उस शब्द की परिभाषा मे समाविष्ट है। इस प्रकार बाह्य विषय भावनाएं और विचार ये सब जगत् ही हैं। यह सम्पूर्ण जगत् चेतनस्वरूप परा प्रकृति के द्वारा धारण किया जाता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.5।।अचेतनवर्गस्य स्वस्मिन्कल्पितत्वं वक्तुं प्रकृतेरष्टधा परिणाममभिधाय विकारावच्छिन्नस्य कार्यकल्पस्य तथात्वं वक्तुं चैतन्यस्याविद्यावच्छिन्नस्य प्रकृतित्वमुक्तां प्रकृतिमनूद्य दर्शयति अपरेति। अपरा निकृष्टाऽशुद्धत्वात् अनर्थकत्वात् संसारस्वरुपत्वात् बन्धनात्मकत्वात् इयमष्टप्रकारा इतोऽस्या अन्याम्। कथमप्यनन्यत्वव्यावृत्त्यर्थस्तुशब्दः। विशुद्धत्वात् प्रकृतिं परामुत्कृष्टां जीवभूतां क्षेत्रलक्षणां प्राणधारणनिमित्तभूतां ममात्मभूतां विद्धि जानिहि। नहि जीवरहितं जगद्धारयितुं शक्यमित्याशयेन प्रकृत्यन्तरादस्याः प्रकृतेरवान्तविशेषमाह। यया जगदन्तप्रविष्टयाअनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरुपे व्याकरवाणि इति श्रुतेर्धार्यते स्वतो विशीर्यज्जगदचेतनवर्गो विष्टभ्यते यथा महाबाहुना त्वया स्वतो विनश्यत् राज्यं क्षेत्रधर्मं च धारयितुं शक्यते तथेति भूतानां यथा मृन्मयो घटो भृत्प्रकृतिक इति कार्यलिङ्गकमनुमानं प्रमाणयन् तद्द्वारा स्वस्य तत्पदार्थस्याभिन्ननिमित्तोपादानकारणत्वं द्रर्शयति एतदिति। एते परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे प्रकृती योनी कारणभूते येषां सर्वेषां भूतानां कारणभूते तस्मात्स्वप्रकृतिद्वयद्वाराहं सर्वज्ञ ईश्वरो वेदान्तप्रतिपाद्यः कृत्स्त्रस्य समग्रस्य जगतः प्रभवः उत्पत्तिः प्रलयो विनाशः। उत्पत्तिविनाशकारणमित्यर्थः। तथाच भगवतो व्यासस्य सूत्राणिजन्माद्यस्य यतःप्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुरोधात्अभिध्योपदेशाच्च साक्षाच्चोभयाम्रानात्आत्मकृतेः परिणामात्योनिश्च हि गीयते इति पूर्वाधिकरण ब्रह्म जिज्ञास्यमित्युक्तं किलक्षणं पुनस्तद्ब्रह्येत्यत आह भगवान्सूत्रकारः। जन्मोत्पत्तिरादिर्यस्य तदिदं जन्मास्थितिभङ्गं जन्मादि अस्य प्रत्यक्षादिसंनिधापितस्य वित्रित्रस्य जगतो यतो जन्मादि यस्मात्सर्वज्ञात्सर्वशक्तेः कारणद्भवति तद्ब्रह्म। तथाच श्रुतिःयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्तित्यभिसंविशन्ति। तद्ब्रह्म तद्विजिज्ञासस्व इति। तथाच जगज्जन्मादिकारणत्वं ब्रह्मणो लक्षणमुक्तम्। तच्च घटादीनां मृदातिवत्प्रकृतित्वे कुलालादिवन्निमित्वे समानमित्यतो भवति विमर्शः किमात्मकं पुनर्ब्रह्मणः कारणत्वं स्यादिति। तत्र निमित्तकारणत्वमेव केवलं स्यादिति प्रतिभाति। कस्मात् ईक्षापूर्वककर्तृत्वश्रवणात्स ईक्षांचक्रेस प्राणमसृजत् इत्यादिश्रुतिभ्यः। ईक्षापूर्वकं च कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव समानमित्यतो भवति विमर्शः किमात्मकं पुनर्ब्रह्मणः कारणत्वं स्यादिति। तत्र निमित्तकारणत्वमेव केवलं स्यादिति प्रतिभाति। कस्मात् ईक्षापूर्वककर्तृत्वश्रवणात्स ईक्षांचक्रेस प्राणमसृजत् इत्यादि श्रुतिभ्यः। ईक्षापूर्वकं च कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु दृष्टम्। अनेककारकपूर्विका च क्रियाफलसिद्धिर्लोके दृष्टा। सच न्याय आदिकर्तर्यापि युक्तः संक्रामयितुं ईश्वरत्वप्रसिद्धेश्च। ईश्वराणां हि राजवैवस्तवतादीनां निमित्तकारणत्वमेव केवलं प्रतीयते तद्वत्परमेश्वरस्यापि निमित्तकारणत्वमेव प्रतिपत्तुं युक्तम्। कार्य चेदं जगत्सावयममचेतनमशुद्धं च दृश्यते तस्य कारणेनापि तत्सदृशेनैव भाव्यम्। कार्यकारणयोर्मृद्धटादिरुपयोः सादृशयदर्शनात्। ब्रह्म चनिष्करं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् इत्यादिश्रुतिभ्यो नैवंविधमवगभ्यते पारिशेष्यात्ततोऽन्यदुपादानकारणमशुद्य्धादिगुणकं स्मृतिप्रसिद्धमभ्युपेयम्। ब्रह्मकारणत्वश्रुतेर्निमित्तमात्रे पर्यवसानादित्येवंप्राप्ते आह। प्रकृतिश्चोपादानकारणं ब्रह्माभ्युपेयं निमित्तकारणं च। न केवलं निमित्तकारणमेव तत्र हेतुमाह प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्। एवं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ श्रौतौ नोपरुध्येते। प्रतिज्ञा तावत्उततमादेशमप्राक्षो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम् इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञातम्। तत्रोपादानकारणे विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति। कार्यस्योपादातकारणाव्यतिरेकात्। तक्षादिनिमित्तकारणात्प्रासादादेः कार्यस्य लोकेऽव्यतिरेकानुपलब्धेर्नास्ति निमित्तकारणाव्यतिरेकः। कार्यस्य दृष्टान्तोऽपियता सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृतिकेत्येव सत्त्यम् इत्युपादानकारणगोचर एव आम्रायते। एवं यथासंभवं प्रतिवेदान्तं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ प्रकृतित्वप्रसाधनौ प्रत्येतव्यौयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इत्यत्र यत इतीयमपि पञ्चमी प्रकृतिलक्षणे एवापादाने द्रष्टव्या।जनिकर्तुः प्रकृतिः इति विशेषस्मरणात्। निमित्तत्वं तु अधिष्ठात्रन्तराभावादधिगन्तव्यम्। प्रागुत्पत्तेरेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणात्। अधिष्ठात्रन्तराभावादधिन्तव्यम्। प्रागुत्पत्तेरेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणात्। अधिष्टात्रन्तरत्वे एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्यासंभवेन प्रतिज्ञादृष्टान्तोपरोधस्यात्रापि प्रसङ्गाच्च तस्याधिष्ठात्रन्तराभावाद्ब्रह्मणः कर्तुत्वं उपादानान्तराभावात्प्रकृतित्वम्। ब्रह्मणः कर्तृत्वप्रकृतित्वे हेत्वन्तरमाह अभिध्येति।सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेतेतितदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति चाभिध्यापूर्विकायाः स्वातन्त्रयप्रवत्तेः कर्तेति गम्यते। बहु स्यामिति प्रत्यगात्मविषयत्वात्। बहुभवनाभिध्यानस्य प्रकृतिरिति ब्रह्मणः प्रकृतित्वे हेत्वन्तरमाह साक्षादिति।सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकाशदेव समुत्पद्यन्ते आकाशे प्रत्यस्तं यान्ति इति श्रुत्या साक्षाद्ब्रह्मैव कारणमुपादायोभयोः प्रभवप्रलययोराम्रानात्। यद्धि यस्मादुत्पद्यते यस्मिंश्च प्रलीयते तत्तस्योपादानं प्रसिद्धम्। यथा घटरुचकादेः मृत्सुवर्णादि। तत्रैव हेत्वन्तरमाह आत्मकृतेरिति।तदात्मानं स्वयमकुरुत इत्यामनः आत्मानमिति कर्मत्वस्य स्वयमकुरुतेति कर्तृत्वस्य च दर्शनात्। ननु पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वं कथमिति चेतत्राह परिणामादिति। घटादिरुपेण मृदातिवत्पूर्वसिद्धिस्यापि सत आत्मनो विशेषेणात्मना परिणआमात्स्वमिति विशेषणाच्च निमित्तान्तरानपेक्षत्वं च प्रतीयते परिणामादिति पृथक्सूत्रं वा। इतश्च ब्रह्म प्रकृतिःसच्च त्यच्चाभवन्निरुक्तं चानिरुक्तं च इत्यादिना ब्रह्मणएव विकारात्मना परिणामाभ्रानात्। तत्र हेत्वन्तरमाह योनिरिति।कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् इतियद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः इति च वेदान्तरेषु हि यस्माद्योनिश्च ब्रह्म गीयते योनिशब्दश्च प्रकृतिवचनो लोके समधिगतःपृथिवी योनिरोषधिनस्पतीनाम् इति। यत्पुरुक्तं ईक्षापूर्वकं कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु लोके दृष्टं नोपादानेषु इत्यादि तत्प्रत्युत्यते। न लोकवदिह भवितव्यम्। नह्ययमनुमान गम्योऽर्थः शब्दगम्यता चास्यार्थस्यातो यथाशब्दमिह भवितव्यं शब्देश्चेक्षितुरीश्वरस्य प्रकृतित्वं प्रतिपादयतीत्यवोचाम। तथायेन्शचरकारणत्ववादिश्रुत्यनुसारिणीनांअहं कृत्स्त्रस्य जगतः प्रभवः प्रलयसतथायत्तत्सुक्षममविज्ञेयंस ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते। तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम्। अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निर्गुणे संप्रलीयते।। अतश्च संक्षेपमिदं श्रृणुध्वं नारायणः सर्वमिदं पुराणः। स सर्गकाले च करोति सर्वं सैहारकाले च तदत्ति भूयः।।तस्मात्काद्याः प्रवन्ति सर्वे स मूलं शाश्वतिकः स नित्यः इत्याद्यनेकासामीश्वरस्याभिन्ननिमित्तोपादानकारणतायाः प्रतिपादकानां स्मृतीनामेवार्थ उपादेयो नत्वचेतनं प्रधानं स्वतन्त्रं जगतः कारणम्। अण्वादयो जगत उपादानकारणमीश्वरस्तु निमित्तकारणमिति प्रतिपादकानां सांख्यादिस्मृतीनां गीतादिस्मृतीनां वेदानुरोधिनीनामुपादेयत्वावश्यकत्वेन तद्विरोधिनीनामेव हेयत्वौचित्यात्। ननु जगत उपादानं ब्रह्म नोपपद्यते चेतनाादनन्दघनाच्छुद्धाद्ब्रह्मणोऽचोतनस्य सुखदुःखमोहात्मक्सय प्रीतिपरितापविषादादिहेतोः स्वर्गनरकाद्युच्चावचरुपस्याशुद्धस्यात्यन्तविलक्षणत्वाद्विलक्षणानां चोपादानोपादेयभावो लोके नैव दृश्यते। नहि घटादिकार्यं सुवर्णोपादानकं भवति न वा मुकुटादिकार्यं मृदुपादानकं तस्माज्जगत्सदृशमचेतनं प्रधानादिकमेव जगदुपादानमप्युपेयम्।तदैक्षत बहु स्याम् इत्यादिचेतनकारणवादास्तु युक्तिविरोधादचेतनप्रधानपरतया उपचारदीश्वरस्य निमित्त्वमात्रपरतया वा नेया अचेतनेतपि चेतनवदुपचारदर्शनात्। यथामृदब्रवीदापोऽब्रुवन् इतितत्तेज ऐक्षत ता आपः ऐक्षन्त ते हेमे प्राणा अहंश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुः इतिते ह वाचमूचुस्त्वन्न उद्गाय इत्यादिषु श्रुतिषु लोकेऽपि प्रत्यासन्नपतनतां कूलस्यालक्ष्य कूलं पिपतिषतीत्यचेतनेपि चेतनवदुपचारो दृष्ट इति चेदुच्यते। किं यत्किंचिद्वैलक्षण्याज्जगदीश्वरोपादानकं नोपपद्यते उत बहुवैलक्षण्यात्। नाद्यः। चैतनायतनाच्छरीरात्तदनायतनाद्रोमयाच्चतद्विधस्य केशादेः वृश्चिक्य चोत्पत्तिदर्शनात्। न द्वितीयः। उदाहृतप्रकृतिविकारयो रुपादिभेदेन बहुवैलक्षण्यस्योपलभ्यमानत्वात्। किंच ययोः प्रकृतिविकारभावस्तयोः सादृश्यं किमात्यन्तिकं उत यत्कंचिदाद्ये प्रकृतिविकारभाव एव प्रलीयते। द्वितीयेतु शरीरादीनां पार्थिकत्वादिस्वभावस्य केशादिष्वनुवृत्तिरिव ब्रह्मणोऽपि सत्तालक्षणस्य स्वभावस्याकाशादावनुवृप्रलीयते। द्वितीयतु शरीरादीनां पार्थिवत्वादिस्वभावस्य केशादिष्वनुवृत्तिरिव ब्रह्मणोऽपि सत्तालक्षणस्य स्वभावस्याकाशादावनुवृत्तिर्दृश्यत इति नानुपपत्तिः। किं चेश्वरकारणत्वनिषेधकं वैलक्षण्यं किमशेषस्येश्वरस्वभावस्याननुवर्तनं उत यस्य कस्यचित् उत चैतन्यस्य आद्यपक्षद्वये उक्तमेव हेतुद्वयमनुसंधेयम्। न तृतीयः। समस्तस्य वस्तुजातस्येश्वरप्रकृतिकत्वादिनंप्रति यच्चैतन्येनानन्वितं नामीश्वर प्रकृतिकं दृष्टमिति वक्तुमशक्यत्वेन दृष्टान्ताभावात्। ननु यदि चेतनं शुद्धं शब्दादिहीनं ब्रह्म तद्विपरीतस्याचेतनस्याशुस्थूलत्वसावयवत्वपरिच्छिन्नत्वादिधर्मकस्य शब्दादिमतश्च कार्यस्य कारणमिष्टते तर्हि प्रागुत्पत्तेः कार्यासत्त्वप्रसङ्गस्य सत्कायवादिनस्तवानिष्टस्यापत्तिः। किंच प्रलये ईश्वरेणाविभागमापद्यमानं कार्यं स्वीयेन धर्मेण कारणमिति दूषयेदिति ब्रह्मणोऽप्यशुद्य्धादिमत्त्वप्रसङ्गः।अपिचास्मिन्नीश्वरकारणवादेऽपरमप्यसमंजसम्। सर्वस्य विभागस्याविभागगतस्य पुनरुद्भवे नियमकारणाभावाद्भोक्तृभोग्यादिविभागेनोत्पत्तिर्न प्राप्तोतीति। किंच सर्वेषां भोक्तृ़णां ब्रह्मणैक्यप्राप्तानां कर्मादिनिमित्तप्रलयेऽपि पुनरुत्पत्तिस्वीकारे मुक्तानामपि पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः। यदीदं जगत्प्रलये विभक्तमेव तिष्ठतीतिचेत्प्रलयस्यैवासंभवापत्तिरिति चेदुच्यते। यथेदानीं कार्यं कारणात्मना सत्तथा प्रागुत्पत्तेरपीति गम्यते। यत्तूक्तं प्रलय ईश्वरेणाविभागमापन्नमित्यादि तन्न। न दूषयतीत्यत्र दृष्टान्तस्य सत्त्वात्तद्यथा घटादयो मृदादिप्रकृतिका विकारा विभागावस्थायामु़च्चावचमध्यमप्रमेदाः सन्तः पुनः कारणाविभागमापन्ना न कारणं स्वधर्मेण दूषयन्ति कारणे कार्यस्य स्वधर्मेण स्थित्यभ्युपगमप्रसङ्गाच्च। किंच कार्यस्य कारणानन्यत्वं न प्रलये एवापितु त्रिष्वपि कालेषुआत्मैवेदं सर्वब्रह्मैवेदं सर्वं पुरस्तात्सर्वं खल्विदं ब्रह्म इत्येवमादिश्रुतिष्वविशेषेण कार्यस्य कारणानन्यत्वश्रवणात्। कार्यस्य कारणानन्यत्वेऽपि यथा स्वयं प्रसारितया मायया मायावी त्रिष्वपि कालेषु न संस्पृश्यते तस्या अवस्तुत्वात् तथा परमात्मापि संसारमायया न संस्पृश्यत इति कल्पितस्य गुणेन दोषेण वाधिष्टानस्यान्यथात्वायोगात्। यदपि सर्वस्य विभागस्येत्यादि तदपि न। यथा सुषुप्तिसमाध्यादावपि स्वाभाविक्यामविभागप्राप्तौ सत्यां मिथ्याज्ञानपोदितत्वात्। यदपि सर्वस्य पूर्ववद्विभागो भवत्येवमिहापि भविष्यतीत्यदोषात्। एतेन मुक्तानां पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः प्रत्युक्तः सम्यग्ज्ञानेन मिथ्याज्ञानस्यापोदितत्वात्। किंच शब्दादिहीनात्प्रधानादेः शब्दादिमतो जगतो वैलक्षण्यान्न जगत्प्रधादिप्रकृतिकमिति विलक्षणत्वान्नेदं जगत् ब्रह्मप्रकृतिकमित्याद्युक्तदोषाणां प्रधानादिकारणवादेऽपि तुल्यत्वादस्मिन्पक्षे न शङ्कितव्याः। तस्मादीश्वरकारणवाद एव यक्तियुक्तः श्रुतिस्मृतीकमित्याद्युक्तदोषाणां प्रधानादिकारणवादेऽपि तुल्यत्वादस्मिन्पक्षे न शङ्कितव्याः। तस्मादीश्वरकारणवाद एव युक्तयुक्तः श्रुतिस्मृतीहासपुराणतात्पर्यसिद्धः सर्वैर्मुमुक्षुभिरभ्युपेयः। एतेन चेतनकर्तृकमपीक्षणं प्रधानादावौपचारिकंमृदब्रवीत् इत्यादिवदिति प्रत्युक्तम्। मुख्यसंभवे औपचारिकाश्रयणानौचित्यात्।सेयं तैवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्त्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरुपे

Chapter 7 (Part 4)

व्याकरवाणि इति ईक्षितुर्जीवात्मभावेन प्रवेशश्रवणाच्च। मृतब्रवीदित्येवंजातीयकया श्रुत्यापि मृदाद्यभिमानिन्यो वागाद्यभिमानिन्यश्च चेतना देवता वदनसंवदनादिषु चेतनोचितव्यवहारेषु व्यपदिश्यन्ते। कूलं पिपतिषतीत्यत्रापि कूलस्य पतनेच्छाचेतनरुपाधिष्ठानापेक्षाप्रकृतित्वं चेश्वरस्यप्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् इति सूत्रे साधितमेवेति स्पष्टं चेदमाकरे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.5।।एवं क्षेत्रलक्षणायाः प्रकृतेरपरत्वं वदन्क्षेत्रज्ञलक्षणां परां प्रकृतिमाह या प्रागष्टधोक्ता प्रकृतिः सर्वाचेतनवर्गरूपा सेयमपरा निकृष्टा जडत्वात्परार्थत्वात्संसारबन्धरूपत्वाच्च। इतस्त्वचेतनवर्गरूपायाः क्षेत्रलक्षणायाः प्रकृतेरन्यां विलक्षणां तुशब्दाद्यथाकथंचिदप्यभेदायोग्यां जीवभूतां चेतनात्मिकां क्षेत्रलक्षणां मे ममात्मभूतां विशुद्धां परां प्रकृष्टां प्रकृतिं। हे महाबाहो यया क्षेत्रज्ञलक्षणया जीवभूतयाऽन्तरनुप्रविष्टया प्रकृत्येदं जगदचेतनजातं भाव्यते स्वतो विशीर्य उत्तभ्यतेअनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इति श्रुतेः। नहि जीवरहितं धारयितुं शक्यमित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.5।।एवं क्षेत्रात्मिकां प्रकृतिमुक्त्वा क्षेत्रज्ञात्मिकां तामाह अपरेयमिति। इयं प्रागुक्ता सा अपरा अश्रेष्ठा जडत्वात्। इतस्तु विलक्षणामन्यां परां चेतनत्वेन मदनन्यत्वादुत्कृष्टां मे मत्संबन्धिनीं प्रकृतिं जीवभूतां प्राणधारणनिमित्तभूतां क्षेत्रज्ञाख्यां विद्धि जानीहि। हे महाबाहो यया प्रकृत्या अन्तःप्रविष्टया इदं जगत्स्थावरजंगमशरीरात्मकं धार्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.5।।तदेवाह अपरेति। इयं अपरा नीचेत्यर्थः। तु पुनः। हे महाबाहो क्रियासमर्थ एतज्ज्ञानयोग्य इतः सकाशादन्यां परामुत्कृष्टां जीवभूतां में प्रकृतिं विद्धि जानीहि। परत्वमेवाह ययेदमिति। यया इदं परिदृश्यमानं जगद्धार्यते ध्रियते पोष्यते च।अत्रायं भावः भगवान् स्वक्रीडार्थं जगत् सृजति तत्र प्रकृत्या स्वशक्त्या क्रीडाधिकरणभूतजगत्सृष्टिं विधाय तद्भोगार्थं क्रीडार्थकया स्वशक्त्या तद्रूपजीवसृष्टिं कृतवान् तया इदं पूर्वकृतं भोगादिरूपेण धार्यते। तस्माल्लौकिकसृष्टौ जीवरूपेण भगवान् भोगं कुर्वन् क्रीडतीति ज्ञानेन तस्यां बन्धो न स्यात्। एतत्स्वरूपज्ञानाद्रसानुकरणज्ञानं स्यादिति भावः। यद्वा या पूर्वमष्टधोक्ता सा अपरा प्रकृतिः शक्तिः क्रीडार्थं शक्त्यंशभूतेति भावः। संयोगविलासे अनेकधा रसोत्पत्त्यर्थमाविर्भूतेत्यर्थः। अतएव भिन्नातद्विलासेच्छया जाता। इतः सकाशादन्या विप्रयोगे तदन्वेषणार्थ पुनर्दास्यरससिद्ध्यर्थमाविर्भूता जीवभूता दास्यरूपा सा मच्छक्तिस्तां परां केवलमदंशामुत्कृष्टां जानीहि। उत्कृष्टरूपतामेवाह यया इदं जडात्मकं जगद्धार्यते जीवप्राकट्यानन्तरं तद्भावेन सर्वं क्रीडौपयिकत्वेन पोष्यत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.5।।अपरामिमां प्रकृतिमुपसंहरन्परां प्रकृतिमाह अपरेति। अष्टधोक्ता या प्रकृतिरियमपरा निकृष्टा जडत्वात्परार्थत्वाच्च इतः सकाशात्परां प्रकृष्टामन्यां जीवस्वरूपां मे प्रकृतिं विद्धि जानीहि। परत्वे हेतुः यया चेतनया क्षेत्रज्ञरूपया स्वकर्मद्वारेणेदं जगद्धार्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.5।।अपरेति इतस्त्वन्यामजडां चित्स्वरूपां परां भोक्तृत्वेन प्रधानभूतां पुरुषत्वेन निर्दिष्टामत्र जीवभूतां मे प्रकृतिं चिदंशभूतां विद्धि। अत्र जीवः पूर्वमविद्यया क्रियत इत्ययुक्तम्। तथा सति जीवीभूतामिति स्यात्पुत्रीभूतइतिवत्। जीवत्वं च नाविद्याकृतं किन्तु भगवता सहजेच्छया कृतं विभागस्याविद्याकृतत्वे मानाभावात्।सच्चिदानन्दरूपो हि भगवान्पुरुषोत्तमः। एककोटिनिविष्टश्चिद्रूपश्चाक्षरतः परः।। तस्य माया द्विविधेति पूर्वं निरूपितम्। तत्र चिद्रूपस्य या माया सा व्यामोहिका स्वपुरुषं व्यामोहियत्वा जीवतामापादयति। जीवतीति जीवः केवलप्राणधारणप्रयत्नवान् तृतीयस्कन्धे अ.30 मायया जीवतापन्नतया तथानिरूपणात्। स हि मायया व्यामोहितः व्याकुलः सन् सदानन्दकृतसृष्टौ यः सूत्रात्मक आसन्यो दशविधप्राणरूपस्तमवलम्ब्य तिष्ठति तदा जीव इत्युच्यते।जीव प्राणधारणे इति धातोः कर्त्तरि अन्प्रत्ययः। बोधरूपोऽप्ययं आनन्दरूपस्य पृथग्भूतत्वादानन्दार्थं तया व्यामोहितस्तत्सम्बन्धादानन्दो भविष्यतीति बुद्ध्या तया सम्पद्यते।अयं च विभागः बहु स्यां प्रजायेय छां.उ.6।2।3 इतीच्छया। इच्छाऽपि तस्य सर्वभवनसमर्था स्वरूपमेवधर्मरूपेणाभवत् इच्छारूपेणापि भवति। तत्र सदंशस्य क्रियारूपा शक्तिः चिदंशस्य व्यामोहिका माया आनन्दरूपस्य जगत्कारणभूता एतत्ित्रतयरूपा शक्तिः सच्चिदानन्दरूपस्य भावः नत्वतलादिवाच्यः तथा भगवतो भावस्वरूपादेव निर्मितत्वात्। न च सर्वदा भवतीति शङ्कनीयम् आपादकहेतुभूतकालस्य अभावात्। जाते पुनः काले तस्यैव नियामकत्वात्। न सर्वदा भविष्यति पूर्वमेव जातत्वात्। तत्सङ्गे इच्छादीनामपि जातत्वादिच्छादयस्तदंशभूतांस्तान्सदैकरूपान् स्थापयन्ति। तथा च तस्या अंशं प्रतिगृह्णाति स भगवान्। इच्छारूपः स एव कामः सोऽकामयत बृ.उ.1।2।467 इत्युक्तः। तया कृत्वा भेदरूपया सच्चिदानन्दधर्माः स्वयं भिद्यमानाः स्वाश्रयमपि भिन्दन्ति तदा स भगवान् सर्वतः पाणिपादान्तो भवति साकारतां चापद्यते भिन्नोऽपि तथामिलितोऽभिन्न इवाखण्डो भवति तदपेक्षया कार्यरूपस्याल्पत्वात्। तानि त्रीण्यपि रूपाणि पूर्णशब्देनोच्यन्ते। अत एव सद्रूपस्य कार्ये प्रत्येकपर्यवसायित्वम्।प्रजायेय इतीच्छयोत्कर्षापकर्षरूपेण जातः तत्र आनन्द उत्कृष्टः तदेतरौ तं सेवमानौ जातौ ततश्च तयोर्धर्मौ ज्ञानक्रिये भगवच्छक्तिरूपे ज्ञाते तदा स आनन्दज्ञानक्रियाशक्तिमान् जातः तदा चिदंशस्य शक्तिः आनन्दे गतत्वात् ज्ञानधर्मस्य तं व्यामोहयति तदा तस्य जीवत्वम्। सदंशस्तु क्रियाशक्तेर्गतत्वादव्यक्ततामापद्यते। पश्चान्मूलभूतिक्रियांशाभिर्यथायथं अभिव्यज्यते। पश्चात्तस्यां तत्कृतधर्मे वा तिरोहिते स्वयमपि तिरोभवति तदा तस्यां मूलेच्छया जातः शब्दोऽभिव्यक्तस्तिष्ठति जीवभगवद्बुद्धिषु जीवे भगवति च। एवं चिद्रूपोऽपि ज्ञानशक्त्यंशभूतैर्ज्ञानैरभिव्यज्यते तिरोभवति च। प्रयत्नस्तु तस्यापराधीन इति स जीवग्रहणार्थं सर्वदा तिष्ठति। स चेद्भगवांस्तस्मै तां पूर्णां ज्ञानशक्तिं प्रयच्छेत् तदा तां व्यामोहिकां मायां त्यजति प्रयत्नं च स्वरूपे चावतिष्ठति अपराधीनश्च भवति। जगत्कर्तृत्वं तु न भवति तस्य सा मायाशक्तिर्न भवति यतः आनन्दस्यैवोत्कृष्टत्वात्। हीनता तु आपाततो वर्तते आनन्देन सह मिलितस्त्वानन्दोऽपि भवति। स चेत्स्वधर्मेण संगृह्णीयात्। यथोक्तं विष्णुपुराणे 6।7।61विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा। अविद्या कर्मसंज्ञाऽन्या तृतीया शक्तिरिष्यते। इति। इयं प्रक्रिया सर्वश्रुतिवाक्यानुरोधेन श्रुतार्थापत्तिसिद्धा सर्वत्रैवोपयुज्यते अन्यथा प्रक्रियावाक्यानि बाधते इति श्रीमदाचार्योक्तपदव्याख्या। जीवभूतो भगवदंशः ययेदं जगत् शरीरं जडं सदसन्मिश्रितं विराड्रूपं धार्यते तां मे परां प्रकृतिं विद्धि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.5।।यह ( उपर्युक्त ) मेरी अपरा प्रकृति है अर्थात् परा नहीं किंतु निकृष्ट है अशुद्ध है और अनर्थ करनेवाली है एवं संसारबन्धनरूपा है। और हे महाबाहो इस उपर्युक्त प्रकृतिमें दूसरी जीवरूपा अर्थात् प्राणधारणकी निमित्त बनी हुई जो क्षेत्रज्ञरूपा प्रकृति है अन्तरमें प्रवृष्ट हुई जिस प्रकृतिद्वारा यह समस्त जगत् धारण किया जाता है उसको तू मेरी परा प्रकृति जान अर्थात् उसे मेरी आत्मरूपा उत्तम और शुद्ध प्रकृति जान।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.5।। व्याख्या  भूमिरापोऽनलो वायुः ৷৷. विद्धि मे पराम् परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं (टिप्पणी प0 397.1)।   जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं उसका नाम अपरा प्रकृति है और अपना अंश जो जीव है उसको भगवान् परा प्रकृति कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट जड और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ चेतन और परिवर्तनशील है।प्रत्येक मनुष्यका भिन्नभिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतन्त्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है इसलिये इसका नाम प्रकृति है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते क्योंकि यह परमात्माका स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह परमात्मस्वरूप ही है फिर इसकी जीव या प्रकृति संज्ञा नहीं रहती अर्थात् इसमें बन्धनकारक कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं रहता (गीता 18। 17)।यहाँ अपरा प्रकृतिमें पृथ्वी जल तेज वायु आकाश मन बुद्धि और अहंकार ये आठ शब्द लिये गये हैं। इनमेंसे अगर पाँच स्थूल भूतोंसे स्थूल सृष्टि मानी जाय तथा मन बुद्धि और अहंकार इन तीनोंसे सूक्ष्म सृष्टि मानी जाय तो इस वर्णनमें स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि तो आ जाती है पर कारणरूप प्रकृति इसमें नहीं आती। कारणरूप प्रकृतिके बिना प्रकृतिका वर्णन अधूरा रह जाता है। अतः आदरणीय टीकाकारोंने पाँच स्थूल भूतोंसे सूक्ष्म पञ्चतन्मात्राओं (शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध) को लिया है जो कि पाँच स्थूल भूतोंकी कारण हैं। मन शब्दसे अहंकार लिया है जो कि मनका कारण है। बुद्धि शब्दसे महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) और अहंकार शब्दसे प्रकृति ली गयी है। इस प्रकार इन आठ शब्दोंका ऐसा अर्थ लेनसे ही समष्टि अपरा प्रकृतिका पूरा वर्णन होता है क्योंकि इसमें स्थूल सूक्ष्म और कारण ये तीनों समष्टि शरीर आ जाते हैं। शास्त्रोंमें इसी समष्टि प्रकृतिका प्रकृतिविकृतिके नामसे वर्णन किया गया है (टिप्पणी प0 397.2)। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि भगवान्ने यहाँ अपरा और परा प्रकृतिका वर्णन प्रकृतिविकृति की दृष्टिसे नहीं किया है। यदि भगवान् प्रकृतिविकृति की दृष्टिसे वर्णन करते तो चेतनको प्रकृतिके नामसे कहते ही नहीं क्योंकि चेतन न तो प्रकृति है और न विकृति है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने यहाँ जड और चेतनका विभाग बतानेके लिये ही अपरा प्रकृतिके नामसे जडका और परा प्रकृतिके नामसे चेतनका वर्णन किया है।यहाँ यह आशय मालूम देता है कि पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश इन पाँच तत्त्वोंके स्थूलरूपसे स्थूल सृष्टि ली गयी है और इनका सूक्ष्मरूप जो पञ्चतन्मात्राएँ कही जाती हैं उनसे सूक्ष्मसृष्टि ली गयी है। सूक्ष्मसृष्टिके अङ्ग मन बुद्धि और अहंकार हैं।अहंकार दो प्रकारका होता है (1) अहंअहं करके अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम भी अहंकार है जो कि करणरूप है। यह हुई अपरा प्रकृति जिसका वर्णन यहाँ चौथे श्लोकमें हुआ है और (2) अहम्रूपसे व्यक्तित्व एकदेशीयताका नाम भी अहंकार है जो कि कर्तारूप है अर्थात् अपनेको क्रियाओंका करनेवाला मानता है। यह हुई परा प्रकृति जिसका वर्णन यहाँ पाँचवें श्लोकमें हुआ है। यह अहंकार कारणशरीरमें तादात्म्यरूपसे रहता है। इस तादात्म्यमें एक जडअंश है और एक चेतनअंश है। इसमें जो जडअंश है वह कारणशरीर है और उसमें जो अभिमान करता है वह चेतनअंश है। जबतक बोध नहीं होता तबतक यह जडचेतनके तादात्म्यवाला कारणशरीरका अहम् कर्तारूपसे निरन्तर बना रहता है। सुषुप्तिके समय यह सुप्तरूपसे रहता है अर्थात् प्रकट नहीं होता। नींदसे जगनेपर मैं सोया था अब जाग्रत् हुआ हूँ इस प्रकार अहम् की जागृति होती है। इसके बाद मन और बुद्धि जाग्रत् होते हैं जैसे मैं कहाँ हूँ कैसे हूँ यह मनकी जागृति हुई और मैं इस देशमें इस समयमें हूँ ऐसा निश्चय होना बुद्धिकी जागृति हुई। इस प्रकार नींदसे जगनेपर जिसका अनुभव होता है वह अहम् परा प्रकृति है और वृत्तिरूप जो अहंकार है वह अपरा प्रकृति है। इस अपरा प्रकृतिको प्रकाशित करनेवाला और आश्रय देनेवाला चेतन जब अपरा प्रकृतिको अपनी मान लेता है तब वह जीवरूप परा प्रकृति होती है ययेदं धार्यते जगत्।अगर यह परा प्रकृति अपरा प्रकतिसे विमुख होकर परमात्माके ही सम्मुख हो जाय परमात्माको ही अपना माने और अपरा प्रकृतिको कभी भी अपना न माने अर्थात् अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर निर्लिप्तताका अनुभव कर ले तो इसको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। स्वरूपका बोध हो जानेपर परमात्माका प्रेम प्रकट हो जाता है (टिप्पणी प0 398) जो कि पहले अपरा प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेसे आसक्ति और कामनाके रूपमें था। वह प्रेम अनन्त अगाध असीम आनन्दरूप और प्रतिक्षण वर्धमान है। उसकी प्राप्ति होनेसे यह परा प्रकृति प्राप्तप्राप्तव्य हो जाती है अपने असङ्गरूपका अनुभव होनेसे ज्ञातज्ञातव्य हो जाती है और अपरा प्रकृतिको संसारमात्रकी सेवामें लगाकर संसारसे सर्वथा विमुख होनेसे कृतकृत्य हो जाती है। यही मानवजीवनकी पूर्णता है सफलता है।प्रकृतिरष्टधा अपरेयम् पदोंसे ऐसा मालूम देता है कि यहाँ जो आठ प्रकारकी अपरा प्रकृति कही गयी है वह व्यष्टि अपरा प्रकृति है। इसका कारण यह है कि मनुष्यको व्यष्टि प्रकृति शरीरसे ही बन्धन होता है समष्टि प्रकृतिसे नहीं। कारण कि मनुष्य व्यष्टि शरीरके साथ अपनापन कर लेता है जिससे बन्धन होता है।व्यष्टि कोई अलग तत्त्व नहीं है प्रत्युत समष्टिका ही एक क्षुद्र अंश है। समष्टिसे माना हुआ सम्बन्ध ही व्यष्टि कहलाता है अर्थात् समष्टिके अंश शरीरके साथ जीव अपना सम्बन्ध मान लेता है तो वह समष्टिका अंश शरीर ही व्यष्टि कहलाता है। व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है। इस बन्धनसे छुड़ानेके लिये भगवान्ने आठ प्रकारकी अपरा प्रकृतिका वर्णन करके कहा है कि जीवरूप परा प्रकृतिने ही इस अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। यदि धारण न करे तो बन्धनका प्रश्न ही नहीं है।पंद्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको अपना अंश कहा है ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित रहनेवाले मन और पाँचों इन्द्रियोंको खींचता है अर्थात् उनको अपनी मानता है मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति। इसी तरह तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्ररूपसे समष्टिका वर्णन करके छठे श्लोकमें व्यष्टिके विकारोंका वर्णन किया क्योंकि ये विकार व्यष्टिके ही होते हैं समष्टिके नहीं। इन सबसे यही सिद्ध हुआ कि व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बाधक है। इस व्यष्टिसे सम्बन्ध तोड़नेके लिये ही यहाँ व्यष्टि अपरा प्रकृतिका वर्णन किया गया है जो कि समष्टिका ही अङ्ग है। व्यष्टि प्रकृति अर्थात् शरीर समष्टि सृष्टिमात्रके साथ सर्वथा अभिन्न है भिन्न कभी हो ही नहीं सकता।वास्तवमें मूल प्रकृति कभी किसीकी बाधक या साधक (सहायक) नहीं होती। जब साधक उससे अपना सम्बन्ध नहीं मानता तब तो वह सहायक हो जाती है पर जब वह उससे अपना सम्बन्ध मान लेता है तब वह बाधक हो जाती है क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे व्यष्टि अहंता (मैंपन) पैदा होती है। यह अहंता ही बन्धनका कारण होती है।यहाँ इतीयं मे पदोंसे भगवान् यह चेता रहे हैं कि यह अपरा प्रकृति मेरी है। इसके साथ भूलसे अपनापन कर लेना ही बारबार जन्ममरणका कारण है और जो भूल करता है उसीपर भूलको मिटानेकी जिम्मेवारी होती है। अतः जीव इस अपराके साथ अपनापन न करे।अहंतामें भोगेच्छा और जिज्ञासा ये दोनों रहती हैं। इनमेंसे भोगेच्छाको कर्मयोगके द्वारा मिटाया जाता है और जिज्ञासाको ज्ञानयोगके द्वारा पूरा किया जाता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग इन दोनोंमेंसे एकके भी सम्यक्तया पूर्ण होनेपर एकदूसरेमें दोनों आ जाते हैं (गीता 5। 4 5) अर्थात् भोगेच्छाकी निवृत्ति होनेपर जिज्ञासाकी भी पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर भोगेच्छाकी भी निवृत्ति हो जाती है। कर्मयोगमें भोगेच्छा मिटनेपर तथा ज्ञानयोगमें जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर असङ्गता स्वतः आ जाती है। उस असङ्गताका भी उपभोग न करनेपर वास्तविक बोध हो जाता है और मनुष्यका जन्म सर्वथा सार्थक होजाता है।जीवभूताम् वास्तवमें यह जीवरूप नहीं है प्रत्युत जीव बना हुआ है। यह तो स्वतः साक्षात् परमात्माका अंश है। केवल स्थूल सूक्ष्म और कारणशरीररूप प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही यह जीव बना है। यह सम्बन्ध जोड़ता है अपने सुखके लिये। यही सुख इसके जन्ममरणरूप महान् दुःखका खास कारण है।महाबाहो हे अर्जुन तुम बड़े शक्तिशाली हो इसलिये तुम अपरा और परा प्रकृतिके भेदको समझनेमें समर्थ हो। अतः तुम इसको समझो विद्धि।ययेदं धार्यते जगत् (टिप्पणी प0 399) वास्तवमें यह जगत् जगद्रूप नहीं है प्रत्युत भगवान्का ही स्वरूप है वासुदेवः सर्वम् (7। 19) सदसच्चाहम् (9। 19)। केवल इस परा प्रकृति जीवने इसको जगत्रूपसे धारण कर रखा है अर्थात् जीव इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता मानकर अपने सुखके लिये इसका उपोयग करने लग गया। इसीसे जीवका बन्धन हुआ है। अगर जीव संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न मानकर इसको केवल भगवत्स्वरूप ही माने तो उसका जन्ममरणरूप बन्धन मिट जायगा।भगवान्की परा प्रकृति होकर भी जीवात्माने इस दृश्यमान जगत्को जो कि अपरा प्रकृति है धारण कर रखा है अर्थात् इस परिवर्तनशील विकारी जगत्को स्थायी सुन्दर और सुखप्रद मानकर मैं और मेरेरूपसे धारण कर रखा है। जिसकी भोगों और पदार्थोंमें जितनी आसक्ति है आकर्षण है उसको उतना ही संसार और शरीर स्थायी सुन्दर और सुखप्रद मालूम देता है। पदार्थोंका संग्रह तथा उनका उपभोग करनेकी लालसा ही खास बाधक है। संग्रहसे अभिमानजन्य सुख होता है और भोगोंसे संयोगजन्य सुख होता है। इस सुखासक्तिसे ही जीवने जगत्को जगत्रूपसे धारण कर रखा है। सुखासक्तिके कारण ही वह इस जगत्को भगवत्स्वरूपसे नहीं देख सकता। जैसे स्त्री वास्तवमें जननशक्ति है परन्तु स्त्रीमें आसक्त पुरुष स्त्रीको मातृरूपसे नहीं देख सकता ऐसे ही संसार वास्तवमें भगवत्स्वरूप है परंतु संसारको अपना भोग्य माननेवाला भोगासक्त पुरुष संसारको भगवत्स्वरूप नहीं देख सकता। यह भोगासक्ति ही जगत्को धारण कराती है अर्थात् जगत्को धारण करानेमें हेतु है।दूसरी बात मात्र मनुष्योंके शरीरोंकी उत्पत्ति रजवीर्यसे ही होती है जो कि स्वरूपसे स्वतः ही मलिन है। परंतु भोगोंमें आसक्त पुरुषोंकी उन शरीरोंमें मलिन बुद्धि नहीं होती प्रत्युत रमणीय बुद्धि होती है। यह रमणीय बुद्धि ही जगत्को धारण कराती है।नदीके किनारे खड़े एक सन्तसे किसीने कहा कि देखिये महाराज यह नदीका जल बह रहा है और उस पुलपर मनुष्य बह रहे हैं। सन्तने उससे कहा कि देखो भाई नदीका जल ही नहीं खुद नदी भी बह रही है और पुलपर मनुष्य ही नहीं खुद पुल भी बह रहा है। तात्पर्य यह हुआ कि ये नदी पुल तथा मनुष्य बड़ी तेजीसे नाशकी तरफ जा रहे हैं। एक दिन न यह नदी रहेगी न यह पुल रहेगा और न ये मनुष्य रहेंगे। ऐसे ही यह पृथ्वी भी बह रही है अर्थात् प्रलयकी तरफ जा रही है। इस प्रकार भावरूपसे दीखनेवाला यह सारा जगत् प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है परन्तु जीवने इसको भावरूपसे अर्थात् है रूपसे धारण (स्वीकार) कर रखा है। परा प्रकृतिकी (स्वरूपसे) उत्पत्ति नहीं होती पर अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेके कारण यह शरीरकी उत्पत्तिको अपनी उत्पत्ति मान लेता है और शरीरके नाशको अपना नाश मान लेता है जिससे यह जन्मतामरता रहता है। अगर यह अपराके साथ सम्बन्ध न जोड़े इससे विमुख हो जाय अर्थात् भावरूपसे इसको सत्ता न दे तो जगत् सत्रूपसे दीख ही नहीं सकता।इदम् पदसे शरीर और संसार दोनों लेने चाहिये क्योंकि शरीर और संसार अलगअलग नहीं हैं। तत्त्वतः (धातु चीज) एक ही है। शरीर और संसारका भेद केवल माना हुआ है वास्तवमें अभेद ही है। इसलिये तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने इदं शरीरम् पदोंसे शरीरको क्षेत्र बताया (13। 1) परन्तु जहाँ क्षेत्रका वर्णन किया है वहाँ समष्टिका ही वर्णन हुआ है (13। 5) और इच्छाद्वेषादि विकार व्यष्टिके माने गये हैं (13। 6) क्योंकि इच्छा आदि विकार व्यष्टि प्राणीके ही होते हैं। तात्पर्य है कि समष्टि और व्यष्टि तत्त्वतः एक ही हैं। एक होते हुए भी अपनेको शरीर माननेसे अहंता और शरीरको अपना माननेसे ममता पैदा होती है जिससे बन्धन होता है। अगर शरीर और संसारकी अभिन्नताका अथवा अपनी और भगवान्की अभिन्नताका साक्षात् अनुभव हो जाय तो अहंता और ममता स्वतः मिट जाती है। ये अहंता और ममता कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग तीनोंसे ही मिटती हैं। कर्मयोगसे निर्ममो निरहंकारः (गीता 2। 71) ज्ञानयोगसे अहंकारं ৷৷. विमुच्य निर्ममः (गीता 18। 53) और भक्तियोगसे निर्ममो निरहंकारः (गीता 12। 13)। तात्पर्य है कि जडताके साथ सम्बन्धविच्छेद होना चाहिये जो कि केवल माना हुआ है। अतः विवेकपूर्वक न माननेसे अर्थात् वास्तविकताका अनुभव करनेसे वह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है।विशेष बातजैसे गुरुशिष्यका सम्बन्ध होता है तो इसमें गुरु शिष्यको अपना शिष्य मानता है। शिष्य गुरुको अपना गुरु मानता है। इस प्रकार गुरु अलग है और शिष्य अलग है अर्थात् उन दोनोंकी अलगअलग सत्ता दीखती है। परन्तु उन दोनोंके सम्बन्धसे एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है जिसको सम्बन्धकी सत्ता कहते हैं (टिप्पणी प0 400)। ऐसे ही साक्षात् परमात्माके अंश जीवने शरीरसंसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। इस सम्बन्धके कारण एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है जिसको मैंपन कहते हैं। सम्बन्धकी यह सत्ता (मैंपन) केवल मानी हुई है वास्तवमें है नहीं। जीव भूलसे इस माने हुए सम्बन्धको सत्य मान लेता है अर्थात् इसमें सद्भाव कर लेता है और बँध जाता है। इस प्रकार जीव संसारसे नहीं प्रत्युत संसारसे माने हुए सम्बन्धसे ही बँधता है।गुरु और शिष्यमें तो दोनोंकी अलगअलग सत्ता है और दोनों एकदूसरेसे सम्बन्ध मानते हैं परन्तु जीव (चेतन) और संसार (जड) इन दोनोंमें केवल एक जीवकी ही वास्तविक सत्ता है और यही भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानता है। संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है अतः उससे माना हुआ सम्बन्ध भी प्रतिक्षण स्वतः नष्ट हो रहा है। ऐसा होते हुए भी जबतक संसारमें सुख प्रतीत होता है तबतक उससे माना हुआ सम्बन्ध स्थायी प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध सुखासक्तिपर ही टिका हुआ है। संसारसे सुखासक्तिपूर्वक माने हुए सम्बन्धके कारण ही संसार अप्राप्त होनेपर भी प्राप्त और परमात्मा प्राप्त होनेपर भी अप्रप्त प्रतीत हो रहे हैं। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही परमात्माके वास्तविक सम्बन्धका अथवा संसारकी अप्राप्ति और परमात्माकी प्राप्तिका अनुभव हो जाता है।मैंपनको मिटानेके लिये साधक प्रकृति और प्रकृतिके कार्यको न तो अपना स्वरूप समझे न उससे कुछ मिलनेकी इच्छा रखे और न हि अपने लिये कुछ करे। जो कुछ करे वह सब केवल संसारकी सेवाके लिये ही करता रहे। तात्पर्य है कि जो कुछ प्रकृतिजन्य पदार्थ हैं उन सबकी संसारके साथ एकता है अतः उनको केवल संसारका मानकर संसारकी ही सेवामें लगाता रहे। इससे क्रिया और पदार्थोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना स्वरूप अवशिष्ट रह जाता है अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। यह कर्मयोग हुआ। ज्ञानयोगमें विवेकविचारपूर्वक प्रकृतिके कार्य पदार्थों और क्रियाओंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद करनेपर स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकार जडके सम्बन्धसे जो अहंता (मैंपन) पैदा हुई थी उसकी निवृत्ति हो जाती है।भक्तियोगमें मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं तथा मैं शरीरसंसारका नहीं हूँ और शरीरसंसार मेरे नहीं हैं ऐसी दृढ़ मान्यता करके भक्त संसारसे विमुख होकर केवल भगवत्परायण हो जाता है जिससे संसारका सम्बन्ध स्वतः टूट जाता है और अहंताकी निवृत्ति हो जाती है।इस प्रकार कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग इन तीनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक अनुष्ठान करनेपर जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होकर परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि परा प्रकृतिने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये अब आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.4 7.5।।भूमिरिति। अपरेति। इयमिति प्रत्यक्षेण या संसारावस्थायां। सर्वजनपरिदृश्यमाना सा चैकैव सती प्रकाराष्टकेन भिद्यते इति एकप्रकृत्यारब्धत्वादेकमेव विश्वमिति प्रकृतिवादेऽपि अद्वैतं प्रदर्शितम्। सैव जीवत्वं पुरुषत्वं प्राप्ता परा ममैव नान्यस्य च। सा (S omits सा) उभयरूपा वेद्यवेदकात्मकप्रपञ्चोपरचनविचित्रा तत एव स्वात्मविमलमुकुरतलकलितसकलभावभूमिः स्वस्वभावात्मिका सततमव्यभिचारिणी प्रकृतिः। इदं जगत् भूम्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.5।।अचेतनवर्गमेकीकर्तुं प्रकृतेरष्टधा परिणाममभिधाय विकारावच्छिन्नकार्यकल्पं चेतनवर्गमेकीकर्तुं पुरुषस्य चैतन्यस्याविद्याशक्त्यवच्छिन्नस्यापि प्रकृतित्वमुक्तां प्रकृतिमनूद्य दर्शयति अपरेति। निकृष्टत्वं स्पष्टयति अनर्थकरीति। अनर्थकरत्वमेव स्फोरयति संसारेति। कथंचिदप्यनन्यत्वव्यावृत्त्यर्थस्तुशब्दः। अन्यामत्यन्तविलक्षणामिति यावत्। अन्यत्वमेव स्पष्टयति विशुद्धामिति। प्रकृतिशब्दस्यान्यप्रयुक्तस्यार्थान्तरमाह ममेति। प्रकृष्टत्वमेव भोक्तृत्वेन स्पष्टयति जीवभूतामिति। प्रकृत्यन्तरादस्याः प्रकृतेरवान्तरविशेषमाह ययेति। नहि जीवरहितं जगद्धारयितुं शक्यमित्याशयेनाह अन्तरिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.5।।अपरशब्दस्यानेकार्थत्वात् विवक्षितमर्थमाह अपरेति। अनुत्तमत्वस्य सापेक्षत्वात् किमपेक्षयेत्यत आह वक्ष्यमाणामिति। सन्निधानादिति भावः। जीवलक्षणां जीवत्वं प्राप्तमिति व्याख्याननिरासार्थमाह जीवभूतेति। कथं सा जीवभूता इत्यत आह जीवानामिति। प्राणधारिणीत्येवोक्ते स्वप्राणधारिणीतिप्रतीतिः स्यात् तन्निरासार्थमुक्तं जीवानामिति। सर्वजीवदेहेषु स्थित्वा तदीयान्प्राणांस्तत्र धारयतीत्यर्थः। स्वप्राणधारिणी कुतो न स्यात् इत्यत आह चिद्रूपेति। ज्ञानात्मकविग्रहवती। यद्वाजीव प्राणधारणे इत्यतो जीवशब्दस्य यौगिकार्थमुक्त्वा गौणीं वृत्तिमाश्रित्यार्थान्तरमनेनोक्तम्। भूतशब्दस्य सर्वदासत्त्ववाचित्वे प्रयोगं दर्शयति एतदिति। प्रकृतिमपेक्ष्य श्रियः परत्वोपपादनार्थमेतत्भूमिः इत्यादेरभिमतमर्थं पुराणवाक्येन स्थापयति जगाद चेति। देवस्यैव। सृज्यत इति सृष्टिः कार्यं कार्यरूपेणेत्यर्थः। अनेन भूम्यादिशब्दैः पञ्चतन्मात्राण्येवोच्यन्ते न स्थूलानि भूतानि। मन इति तत्कारणमहङ्कारः बुद्धिरिति महत्तत्त्वम् अहङ्कार इत्यविद्यासंयुक्तमव्यक्तंभिन्ना प्रकृतिरष्टधा इति वचनादिति व्याख्यानं निरस्तम्। कार्यरूपेणाष्टधा भिन्नेति व्याख्यानसम्भवेन प्रसिद्धार्थपरित्यागायोगान्महत्यहङ्कारस्यान्तर्भाव इत्येवेति सम्बन्धः। जडेत्यवरत्वोपपादनम्।श्रीः परा इत्यस्योपपादनमियं धार्यते तयेत्यादि। अनन्ता देशतः गुणतश्च। परा मुख्या। अनादिनिधना नत्वव्यक्तवद्विक्रियावती।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.5।।अपराऽनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य जीवभूता श्रीः जीवानां प्राणधारिणी चिद्रूपभूता सर्वदा सती एतन्महइदं महद्भूतम् बृ.उ.2।4।12 इति श्रुतेः। जगाद चप्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा। अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाष्टधा पुनः। महान्बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति ह। अवरा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तथा। चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा। यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः। नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि। ताभ्यामिदं जगत्सर्वं हरिः सुज्ञति भूतराड्। इति नारदीये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.5।।इयं मम अपरा प्रकृतिः इतः तु अन्याम् इतः अचेतनायाः चेतनभोग्यभूतायाः प्रकृतेः विसजातीयाकारां जीवभूतां परं तस्याः भोक्तृत्वेन प्रधानभूतां चेतनरूपां मदीयां प्रकृतिं विद्धि यया इदम् अचेतनं कृत्स्नं जगद् धार्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.5।। अपरा न परा निकृष्टा अशुद्धा अनर्थकरी संसारबन्धनात्मिका इयम्। इतः अस्याः यथोक्तायाः तु अन्यां विशुद्धां प्रकृतिं मम आत्मभूतां विद्धि मे परां प्रकृष्टां जीवभूतां क्षेत्रज्ञलक्षणां प्राणधारणनिमित्तभूतां हे महाबाहो यया प्रकृत्या इदं धार्यते जगत् अन्तः प्रविष्टया।।

───────────────────

【 Verse 7.6 】

▸ Sanskrit Sloka: एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय | अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ||

▸ Transliteration: etadyonī ni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya | ahaṃ kṛ tsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathā ||

▸ Glossary: etad: these two natures; yonīni: source of birth; bhūtāni: everything created; sarvāṇī: all; iti: thus; upadhāraya: know; ahaṃ: I; kṛtsnasya: all-inclusive; jaga- taḥ: of the world; prabhavaḥ: source of manifestation; pralayaḥ: annihilation; tathā: as well as

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.6 Know for certain that everything living is manifested by these two energies of Mine. I am the Creator, the Sustainer and the Destroyer of them.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.6।।अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.6।। यह जानो कि समम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पत्ति वाले हैं। (अत) मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्ति तथा प्रलय स्थान हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.6 एतद्योनीनि those of which these two (Prakritis) are the womb? भूतानि beings? सर्वाणि all? इति thus? उपधारय know? अहम् I? कृत्स्नस्य of the whole? जगतः of the world? प्रभवः source? प्रलयः dissolution? तथा also.Commentary These two Natures? the inferior and the superior? are the womb of all beings. As I am the source of these two Prakritis or Natures also? I am the cause of this universe. The whole universe originates from Me and dissolves in Me.In the Brahma Sutras (chapter 1? section 1? aphorism 2) it is said? Janmadyasya yatah meaning that Brahman is that omniscient and omnipotent cause from which proceed the origin? subsistence and dissolution of this world.Just as the mind is the material cause and also the seer (Drashta) for the objects seen in a dream? so also Isvara is the material cause of this world (UpadanaKarana) and also the seer (Drashta). He is also the efficient or the instrumental cause (NimittaKarana). (Cf.XIV.3)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.6. All beings are born of this womb. Hence keep [them] nearby. I am the origin as well as the dissolution of the entire world.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.6 It is the womb of all being; for I am He by Whom the worlds were created and shall be dissolved.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.6 Know that all beings have these two for the source of their birth. Therefore, I am the origin and the dissolution of the whole universe.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.6 Understand thus that all things (sentient and insentient) have these as their source. I am the origin as also the end of the whole Universe.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.6 Know that these two (Natures) are the womb of all beings. So I am the source and dissolution of the whole universe.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.6 See Comment under 7.7

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.6 Know that all beings from Brahma down to a tuft of grass, who have their origin in these two Prakrtis of Mine, are aggregated forms of the self and of inanimate matter. Irrespective of whether they are existing in a superior or inferior form, the selves and inanimate matter are mixed together in them. On account of their origination in My two Prakrtis, they are Mine. So, know that because the entire universe has its origination in these two Prakrtis which have their origination in Me, I am myself the origin and dissolution of the entire universe. For the same reason, I am its Lord (Sesin).

It is proved on the basis of the Srutis and Smrtis that these two, Prakrti and Purusa (matter and the self), which form the aggregate of all animate and inanimate beings, have the Supreme Person as their cause. This is evident from Sruti and Smrti texts like the following: 'The Mahat resolves into Avyakta, Avyakta into Aksara, Aksara into Tamas, and Tamas becomes one with the Supreme Lord' (Su. U., 2); 'O sage, distinct from the form of Visnu, the Supreme Lord, the two forms, Prakrti and Purusa, arise' (V. P., 1.2.24); and 'What was described by Me as Prakrti in its dual form of the manifest and the unmanifest, and the Purusa do merge in the Supreme Self, and the Supreme Self is the support of all. He is the Supreme Lord named Visnu, exalted in the Vedas and Vedanta' (V. P., 6.4.38-39).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.6 Upadharaya, understand; iti, thus; that sarvani, all; bhutani, things; etat-yonini, have these (etat) as their source (yoni)-things that have these lower and higher Prakrtis, charcterized as the 'field' and the 'Knower of the field (body)', as their source are etat-yonini. Since My two Prakrtis are the source, the cause of all things, therefore, aham, I; am the prabhavah, origin; tatha, as also; the pralayah, end, the termination; krtsnasya, of the whole; jagatah, Universe. The maning is this: I, who am the ominscient God, am the source of the Univese through My two Prakrtis. Since this is so, therefore-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.6।। उपर्युक्त अपरा एवं परा प्रकृतियों के परस्पर संबंध से यह नानाविध वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि व्यक्त होती है। जड़ प्रकृति के बिना चैतन्य की सार्मथ्य व्यक्त नहीं हो सकती और न ही उसके बिना जड़ उपाधियों में चेनवत् व्यवहार की संभावना ही रहती है। बल्ब में स्थित तार में स्वयं विद्युत् ही प्रकाश के रूप मे व्यक्त होती है। प्रकाश की अभिव्यक्ति के लिए विद्युत् और बल्ब दोनों का संबंध होना आवश्यक है। इसी प्रकार सृष्टि के लिए परा और अपरा जड़ और चेतन के संबंध की अपेक्षा होती है।इसी दृष्टि से भगवान् कहते हैं ये दोनों प्रकृतियां भूतमात्र की कारण हैं। एक मेधावी विद्यार्थी को इस कथन का अभिप्राय समझना कठिन नहीं है। बाह्य विषय भावनाएं तथा विचारों के जगत् की न केवल उत्पत्ति और स्थिति बल्कि लय भी चेतन पुरुष में ही होता है। इस प्रकार अपरा प्रकृति पारमार्थिक स्वरूप में पराप्रकृति से भिन्न नहीं है। आत्मा मानो अपने स्वरूप को भूलकर अपरा प्रकृति के साथ तादात्म्य करके जीवभाव के दुखों को प्राप्त होता है। परन्तु उसका यह दुख मिथ्या है वास्तविक नहीं। स्वस्वरूप की पहचान ही अनात्मबन्धन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। परा से अपरा की उत्पत्ति उसी प्रकार होती है जैसे मिट्टी के बने घटों की मिट्टी से। स्ाभी घटों में एक मिट्टी ही सत्य है उसी प्रकार विषय इन्द्रियां मन तथा बुद्धि इन अपरा प्रकृति के कार्यों का वास्तविक स्वरूप चेतन तत्त्व ही है।इसलिये

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.6।।उक्तप्रकृतिद्वये कार्यलिङ्गकमनुमानं प्रमाणयन्स्वस्य तद्द्वारा जगत्सृष्ट्यादिकारणत्वं दर्शयति एते अपरत्वेन परत्वेन च प्रागुक्ते क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे प्रकृती योनिर्येषां तान्येतद्योनीनि भूतानि भवनधर्मकाणि सर्वाणि चेतनाचेतनात्मकानिजनिमन्ति निखिलानीत्येवमुपधारय जानीहि। कार्याणां चिदचिद्ग्रन्थिरूपत्वात्तकारणमपि चिदचिद्ग्रन्थिरूपमनुमिन्वित्यर्थः। एवं क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे ममोपाधिभूते यतः प्रकृती भवतस्ततस्तद्द्वाराहं सर्वज्ञः सर्वेश्वरोऽनन्तशक्तिर्मायोपाधिः कृत्स्नस्य चराचरात्मकस्य जगतः सर्वस्य कार्यवर्गस्य प्रभव उत्पत्तिकारणं प्रलयस्तथा विनाशकारणम् स्वाप्निकस्येव प्रपञ्चस्य मायिकस्य मायाश्रयत्वविषयत्वाभ्यां मायाव्यहमेवोपादानं द्रष्टा चेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.6।।एतदिति। एते परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूपे प्रकृती योनिरुत्पत्तिलयस्थानं येषां भूतानां तानि एतद्योनीनि भूतानि चतुर्विधानि इत्येतदुपधारय सम्यग्जानीहि। किं पातञ्जलानामिव एते प्रकृती ईश्वरादन्ये इत्याशङ्क्याह अहमिति। कृत्स्नस्य स्वस्वप्रकृतिसहितस्य जगतो जडाजडरूपस्य प्रभवः प्रभवत्यस्मादिति प्रभव उत्पत्तिकारणं तथा प्रलीयतेऽस्मिन्निति प्रलयो लयस्थानं च। अतस्ते उभे अपि प्रकृती मत्तो नातिरिच्येते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.6।।एतज्ज्ञानेन किं स्यादित्यत आह एतदिति। सर्वाणि भूतानि स्थावरजङ्गमात्मकानि एतद्योनीनि एते प्रकृती योनी कारणरूपे येषां तथा तदुपधारय उप समीपे हृदये पोषय। एतद्योनिज्ञानेन मत्क्रीडौपयिकत्वं सर्वेषु भविष्यतीति भावः। यतस्तद्योनीनि सर्वाणि ते च मदंशे अतः कृत्स्नस्य सम्पूर्णस्य जगतोऽहं प्रभवः प्रकर्षेण भवत्यस्मादिति प्रभव उत्पत्तिस्थानं मूलकारणमित्यर्थः। तथा प्रकर्षेण लीयते अनेनेति लयस्थानं प्रलयकर्ताऽप्यहमेवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.6।।अनयोः प्रकृतित्वं दर्शयन्स्वस्य तद्द्वारा सृष्ट्यादिकारणत्वमाह एतदिति। एते क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूपे प्रकृती योनी कारणभूते येषां तान्येतद्योनीनि स्थावरजंगमात्मकानि सर्वाणि भूतानीत्युपधारय बुध्यस्व। तत्र जडा प्रकृतिर्देहरूपेण परिणमते। चेतना तु मदंशभूता भोक्तृत्वेन देहेषु प्रविश्य स्वकर्मणा तानि धारयति। ते च मदीये प्रकृती मत्तः संभूते। अतोऽहमेव कृत्स्नस्य सप्रकृतिकस्य जगतः प्रभवः प्रकर्षेण भवत्यस्मादिति प्रभवः। परं कारणमहमित्यर्थः। तथा प्रलीयतेऽनेनेति प्रलयः संहर्ताप्यहमेवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.6।।अनयोरेव प्रकृतित्वं निर्वचनेन ज्ञापयन् स्वस्य तद्वाराऽसाधारणकार्यकारणत्वमाह एतद्योनीनीति। यत एव प्रकृष्टा कृतिरित्यत एतद्योनी एते एव जनिके येषां तानि स्थावरजङ्गमातमकान्युपधारय बुदध्यस्व। तत्र जडा प्रकृतिर्देहादिरूपेण परिणमते चेतना तु मदंशभूता भोक्तृत्वेन क्षेत्रज्ञरूपेण तत्राविश्य व्यामोहिकया तां धारयति इति ते यतो मत्तः कारणभूतात् प्रयोजकाद्वा सम्भूते मद्रूपे अतोऽहमेव जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा घटपटादेर्भूरिव। प्रकृतिपुरुषद्वारा कारणमित्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.6।।यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों परा और अपरा प्रकृति ही जिनकी योनि कारण है ऐसे ये समस्त भूतप्राणी प्रकृतिरूप कारणसे ही उत्पन्न हुए हैं ऐसा जान। क्योंकि मेरी दोनों प्रकृतियाँ ही समस्त भूतोंकी योनि यानी कारण हैं इसलिये समस्त जगत्का प्रभव उत्पत्ति और प्रलय विनाश मैं ही हूँ अर्थात् इन दोनों प्रकृतियोंद्वारा मैं सर्वज्ञ ईश्वर ही समस्त जगत्का कारण हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.6।। व्याख्या  एतद्योनीनि भूतानि (टिप्पणी प0 401.1) जितने भी देवता मनुष्य पशु पक्षी आदि जङ्गम और वृक्ष लता घास आदि स्थावर प्राणी हैं वे सबकेसब मेरी अपरा और परा प्रकृतिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होते हैं।तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके सम्बन्धसे सम्पूर्ण स्थावरजङ्गम प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी है। यही बात सामान्य रीतिसे चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी बतायी है कि स्थावर जङ्गम योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले जितने शरीर हैं वे सब प्रकृतिके हैं और उन शरीरोंमें जो बीज अर्थात् जीवात्मा है वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्माको भगवान्ने परा प्रकृति (7। 5) और अपना अंश (15। 7) कहा है।सर्वाणीत्युपधारय स्वर्गलोक मृत्युलोक पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकोंके जितने भी स्थावरजङ्गम प्राणी हैं वे सबकेसब अपरा और परा प्रकृतिके संयोगसे ही उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि परा प्रकृतिने अपराको अपना मान लिया है (टिप्पणी प0 401.2) उसका सङ्ग कर लिया है इसीसे सब प्राणी पैदा होते हैं इसको तुम धारण करो अर्थात् ठीक तरहसे समझ लो अथवा मान लो।अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा मात्र वस्तुओंको सत्तास्फूर्ति परमात्मासे ही मिलती है इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव (उत्पन्न करनेवाला) और प्रलय (लीन करनेवाला) हूँ।प्रभवःका तात्पर्य है कि मैं ही इस जगत्का निमित्तकारण हूँ क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि मेरे संकल्पसे (टिप्पणी प0 401.3) पैदा हुई है सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति (छान्दोग्य0 6। 2। 3)।जैसे घड़ा बनानेमें कुम्हार और सोनेके आभूषण बनानेमें सुनार ही निमित्तकारण है ऐसे ही संसारमात्रकी उत्पत्तिमें भगवान् ही निमित्तकारण हैं।प्रलयः कहनेका तात्पर्य है कि इस जगत्का उपादानकारण भी मैं ही हूँ क्योंकि कार्यमात्र उपादानकारणसे उत्पन्न होता है उपादानकारणरूपसे ही रहता है और अन्तमें उपादानकारणमें ही लीन हो जाता है।जैसे घड़ा बनानेमें मिट्टी उपादानकारण है ऐसे ही सृष्टिकी रचना करनेमें भगवान् ही उपादानकारण हैं। जैसे घड़ा मिट्टीसे ही पैदा होता है मिट्टीरूप ही रहता है और अन्तमें टूट करके घिसतेघिसते मिट्टी ही बन जाता है और जैसे सोनेके यावन्मात्र आभूषण सोनेसे ही उत्पन्न होते हैं सोनारूप ही रहते हैं और अन्तमें सोना ही रह जाते हैं ऐसे ही यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है भगवान्में ही रहता है और अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाता है। ऐसा जानना ही ज्ञान है। सब कुछ भगवत्स्वरूप है भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं ऐसा अनुभव हो जाना विज्ञान है।कृत्स्नस्य जगतः पदोंमें भगवान्ने अपनेको जडचेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय बताया है। इसमें जड(अपरा प्रकृति) का प्रभव और प्रलय बताना तो ठीक है पर चेतन(परा प्रकृति अर्थात् जीवात्मा) का उत्पत्ति और विनाश कैसे हुआ क्योंकि वह तो नित्य तत्त्व है नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः (गीता 2। 24)। जो परिवर्तनशील है उसको जगत् कहते हैं गच्छतीति जगत्। पर यहाँ जगत् शब्द जडचेतनात्मक सम्पूर्ण संसारका वाचक है। इसमें जडअंश तो परिवर्तनशील है और चेतनअंश सदासर्वथा परिवर्तनरहित तथा निर्विकार है। वह निर्विकार तत्त्व जब जडके साथ अपना सम्बन्ध मानकर तादात्म्य कर लेता है तब वह जड(शरीर) के उत्पत्तिविनाशकको अपना उत्पत्तिविनाश मान लेता है। इसीसे उसके जन्ममरण कहे जाते हैं। इसीलिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अपरा और परा प्रकृतिका भाव तथा प्रलय बताया है।अगर यहाँ जगत् शब्दसे केवल नाशवान् परिवर्तनशील और विकारी संसारको ही लिया जाय चेतनको नहीं लिया जाय तो बड़ी बाधा लगेगी। भगवान्ने कृत्स्नस्य जगतः पदोंसे अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है (टिप्पणी प0 402)। अतः सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्गत स्थावरजङ्गम जडचेतन सभी लिये जायँगे। अगर केवल जडको लिया जायगा तो चेतनभाग छूट जायगा जिससे मैं सम्पूर्ण जगत्का कारण हूँ यह कहना नहीं बन सकेगा और आगे भी बड़ी बाधा लगेगी। कारण कि आगे इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि तीनों गुणोंसे मोहित जगत् मेरेको नहीं जानता तो यहाँ जानना अथवा न जानना चेतनका ही हो सकता है जडका जानना अथवा न जानना होता ही नहीं। इसलिये जगत् शब्दसे केवल जडको ही नहीं चेतनको भी लेना पड़ेगा।ऐसे ही सोलहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भी आसुरी सम्पदावालोंकी मान्यताके अनुसार जगत् शब्दसे जड और चेतन दोनों ही लेने पड़ेंगें क्योंकि आसुरी सम्पदावाले व्यक्ति सम्पूर्ण शरीरधारी जीवोंको असत्य मानते हैं केवल जडको नहीं। इसलिये अगर वहाँ जगत् शब्दसे केवल जड संसार ही लिया जाय तो जगत्को (जड संसारको) असत्य मिथ्या और अप्रतिष्ठित कहनेवाले अद्वैतसिद्धान्ती भी आसुरी सम्पदावालोंमें आ जायँगे जो कि सर्वथा अनुचित है। ऐसे ही आठवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें आये शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः पदोंमें जगत् शब्द केवल जडका ही वाचक मानें तो जडकी शुक्ल और कृष्ण गतिका क्या तात्पर्य होगा गति तो चेतनकी ही होती है। जडसे तादात्म्य करनेके कारण ही चेतनको जगत् नामसे कहा गया है।इन सब बातोंपर विचार करनेसे यह निष्कर्ष निकलता है कि जडके साथ एकात्मता करनेसे जीव जगत् कहा जाता है। परन्तु जब यह जडसे विमुख होकर चिन्मयतत्त्वके साथ अपनी एकताका अनुभव कर लेता है तब यह योगी कहा जाता है जिसका वर्णन गीतामें जगहजगह आया है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपनेको परा और अपरा प्रकृतिरूप सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण बताया। अब भगवान्के सिवाय भी जगत्का और कोई कारण होगा इसका आगेके श्लोकमें निषेध करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.6 7.7।।एतद्योनीनि इति। मत्तः इति। उपधारय अभ्यासाहितानुभवक्रमेण ( अभ्यासानुभव ) आत्मसमीपे कुरु। एवं च त्वमेवोपधारय यत् अहं वासुदेवो भूतः (S K वासुदेवीभूतः) सर्वस्य प्रभवः प्रलयश्च। अहम् ( N omit the sentence अहं प्रदर्शितम्) इत्यनेन प्रकृतिपुरुषपुरुषोत्तमेभ्यो व्यतिरिक्तोऽपि ईश्वरः सर्वथा सर्वानुगतत्वेन स्थित इति सांख्ययोगयोर्नास्ति भेदवादः इति प्रदर्शितम्। सूत्रे मणिगणा इव यथा तन्तुरनवध्रियमाणरूपोऽपि अन्तर्लीनतया स्थितः एवमहं सर्वत्र।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.6।।उक्तप्रकृतिद्वये कार्यलिङ्गकमनुमानं प्रमाणयति एतद्योनीनीति। प्रकृतिद्वयस्य जगत्कारणत्वे कथमीश्वस्य जगत्कारणत्वं तदुपगतमित्याशङ्क्याह अहमिति। एतद्योनीनीत्युक्ते समनन्तरप्रकृतजीवभूतप्रकृतावेतच्छब्दस्याव्यवधानात्प्रवृत्तिमाशङ्क्य व्याकरोति एतदिति। सर्वाणि चेतनाचेतनानि जनिमन्तीत्यर्थः। सर्वभूतकारणत्वेन प्रकृतिद्वयमङ्गीकृतं चेत्कथमहमित्याद्युक्तमित्याशङ्क्याह यस्मादिति। मम प्रकृती परमेश्वरस्योपाधितया स्थिते इत्यर्थः। तर्हि प्रकृतिद्वयं कारणमीश्वरश्चेति जगतोऽनेकविधकारणाङ्गीकरणं स्यादित्याशङ्क्याह प्रकृतीति। अपरप्रकृतेरचेतनत्वात्परप्रकृतेश्चेतनत्वेऽपि किंचिज्ज्ञत्वादीश्वरस्यैव सर्वकारणत्वं युक्तमित्याह सर्वज्ञ इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.6।।नन्वत्रापरपरनिरूपणपूर्वकं भगवतो यत्परतरत्वं वक्तुमभिप्रेतं तत्र शरीरेन्द्रियविषयलक्षणाख्यकार्यस्य जीवानां च तयोरेवान्तर्भाव इति दर्शयितुंएतद्योनीनि इत्युक्तम्

Chapter 7 (Part 5)

इदानीमहं परतर इति वक्तव्यं इदं तुकिमर्थमुच्यते इत्यत आह न केवलमिति। पूर्वं वाक्यभेदेन प्रकृत्योरवरत्वं परत्वंमे इति स्ववशत्वं चोक्त्वाययेदं धार्यते जगत्एतद्योनीनि इति जगदाधारत्वकारणत्वे कथिते तत्रप्रकृती एव भगवद्वशे जगज्जन्मस्थितिलयास्तु प्रकृत्यधीना एव न भगवदधीनाः इति प्रतीतं तन्निरासार्थमेतदित्यर्थः।जगत्प्रतिममैश्वर्यं इत्येतावत् प्रकृतिद्वारकमुपचरितमिति यावत्। प्रकृत्योः कारणत्वादिकं मदायत्तमिति भावः। जगद्धर्मयोः प्रभवप्रलययोः साक्षाद्भगवदैक्यमुच्यत इति प्रतीतिनिरासार्थमाह प्रभवादेरिति। यथा पुत्रादिप्रभवो रिपुप्रलयश्चोपलब्धः सुखहेतुरित्युपलब्धः पित्रादेस्तद्भोक्तृत्वं तथा तद्भोक्तृत्वात्।भगवतः सर्वभोक्तृत्वं कुतः इत्यत आह तथा चेति।सर्वकामः इत्यादेर्द्विरुक्तत्वात् एकं भोगविषयमिति ज्ञायते। काम्यन्त इति कामा द्रव्याणि। गन्धरसशब्दौ गुणान्तरस्याप्युपलक्षकौ। सर्वमिदमभि अभितः आत्तो धृतः स्थित इत्यर्थः। न विद्यते वाक्यमनुग्रहमन्तरेण यस्यासाववाक्यः। न विद्यते आदरः आश्चर्यबुद्धिर्यस्यासौ नादरः अवाक्यश्चासौ नादरश्चेत्यवाक्यनादरः। कारणत्वादिनैवैक्यव्यपदेश इत्येतत्कुतः इत्यत आह आह चेति। सुखरूपस्य सुखकारणस्य। ननुस्रष्टा पाता इत्यादिकमयुक्तं कादाचित्कक्रियावेशे विकारित्वप्रसङ्गात्। भोगेन यद्भाव्यं सुखं तस्य पूर्वमभावेनापूर्णत्वप्रसङ्गाच्चेत्यत आह आगमिष्यदिति। यद्भोगेनागमिष्यत्सुखं तच्च सदाऽप्यस्त्येव। क्रियाश्च शक्तिरूपेण चेति चार्थः। तर्हि कथं भोगेन जातमित्युच्यते इति भावेन पृच्छति अपि त्विति। उत्तरमाह तथापीति। सदा सद्भावेऽपि यद्यपिप्रभवत्यस्मादिति प्रभवः प्रलीयतेऽस्मिन्निति प्रलयः इति शक्यते व्याख्यातुं तथापि महिमातिशयलाभायैवं व्याख्यातम्। एतेनयस्मान्मम प्रकृती योनी सर्वभूतानां ततोऽहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा शां. इति व्याख्यानमपहसितं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.6।।न केवलं ते जगत्प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह अहमिति। प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादेः कारणत्वात्तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि। तथा च श्रुतिः सर्वकामः सर्वकर्मा सर्वगन्धो सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः छां.उ.3।14।2 इति। आह च स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता। यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽस्मीत्यषिभिः स्तुतः। सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः। आगमिष्यत्सुखं चापि तच्चास्त्येव सदाऽपि तु। तथाप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमतीव च। इति नारदीये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.6।।एतच्चेतनाचेतनसमष्टिरूपमदीयप्रकृतिद्वययोनीनि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि उच्चावचभावेन अवस्थितानि चिदचिन्मिश्राणि सर्वाणि भूतानि मदीयानि इति उपधारय मदीयप्रकृतिद्वययोनीनि हि तानि मदीयानि एव। तथा प्रकृतिद्वययोनित्वेन कृत्स्नस्य जगतः तयोः द्वयोः अपि मद्योनित्वेन मदीयत्वेन च कृत्स्नस्य जगतः अहम् एव प्रभवः अहम् एव प्रलयः अहम् एव च शेषी इति उपधारय।तयोः चिदचित्समष्टिभूतयोः प्रकृतिपुरुषयोः अपि परमपुरुषयोनित्वं श्रुतिस्मृतिसिद्धम्।महानव्यक्ते लीयते अव्यक्तमक्षरे अक्षरं तमसि लीयते तमः परे देवे एकीभवति (सु0 उ0 2)विष्णोः स्वरूपात्परतोदिते द्वे रूपे प्रधानं पुरुषश्च (वि0 पु0 1।2।24)प्रकृतिर्या मया ख्याता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी। पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते परमात्मनि।।परमात्मा च सर्वेषामाधारः परमेश्वरः। विष्णुनामा स वेदेषु वेदान्तेषु च गीयते।। (वि0 पु0 6।4।38 39) इत्यादिका हि श्रुतिस्मृतयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.6) एतद्योनीनि एते परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे प्रकृती योनिः येषां भूतानां तानि एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणि इति एवम् उपधारय जानीहि। यस्मात् मम प्रकृती योनिः कारणं सर्वभूतानाम् अतः अहं कृत्स्नस्य समस्तस्य जगतः प्रभवः उत्पत्तिः प्रलयः विनाशः तथा। प्रकृतिद्वयद्वारेण अहं सर्वज्ञः ईश्वरः जगतः कारणमित्यर्थः।।यतः तस्मात्

───────────────────

【 Verse 7.7 】

▸ Sanskrit Sloka: मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ||

▸ Transliteration: mattaḥ parataraṃ nānyat kiñcidasti dhanañjaya | mayi sarvamidaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva ||

▸ Glossary: mattaḥ: beyond Myself; parataraṃ: superior; na: not; anyat kiñcit: anything else; asti: there is; dhanañjaya: O conqueror of wealth; mayi: in Me; sarvaṃ: all that be; idaṃ: which we see; protaṃ: strung; sūtre: on a thread; maṇigaṇāḥ: pearls; iva: likened

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.7 O Dhanañjaya (conqueror of wealth), there is no truth su- perior to Me. Everything rests upon Me, as pearls are strung on a thread.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.7।।हे धनञ्जय मेरेसे बढ़कर (इस जगत्का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं ऐसे ही सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओतप्रोत है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.7।। हे धनंजय मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.7 मत्तः than Me? परतरम् higher? न not? अन्यत् other? किञ्चित् anyone? अस्ति is? धनञ्जय O Dhananjaya? मयि in Me? सर्वम् all? इदम् this? प्रोतम् is strung? सूत्रे on a string? मणिगणाः clusters of gems? इव like.Commentary There is no other cause of the universe but Me. I alone am the the cause of the universe. This illustration of gems and thread illustrates only the idea that all beings and the whole world are threaded on the Lord. The thread is not the cause of the gems. As Brahman is all in all there is nothing whatever higher than It.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.7. There exists nothing beyond Me, O Dhananjaya; all this is strung on Me just as the groups of pearls on a string.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.7 O Arjuna! There is nothing higher than Me; all is strung upon Me as rows of pearls upon a thread.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.7 There is nothing higher than Myself, O Arjuna. All this is strung on Me, as rows of gems on a thread.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.7 O Dhananjaya, there is nothing else whatsoever higher than Myself. All this is strung on Me like pearls on a string.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.7 There is nothing whatsoever higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, as clusters of gems on a string.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.6-7 Etadyonini etc. Mattah etc. Keep them nearby : You should place them in your neihbourhood following the method of experience augmented by practice. Or [it may mean that] You should bear in mind that I, the Vasudeva, am both the origin and destruction of all beings. What is indicated by 'I' is this : Even though [it is viewed that] the Absolute (Isvara) is distinct from the Prakrti, Soul and Supreme Soul, It remains by all means immanent in all; hence there is no room for the theory of dualism of the Sankhya and the Yoga schools. Just as the pearls on the string. Just as the string does exist unobserved in the interior [in a necklace] though its form remains undetected, in the same fashion I remain in all.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.7 I am absolutely superior to all in two ways: 1) I am the cause of both the Prakrtis and I am also their controlling master (Sesin). This controllership over inanimate nature is exercised through the animate Prakrti (the Jivas) who form the inner controller (Sesin) of their bodies which are constituted of inanimate nature. 2) I am supreme to all in another sense also - as the possessor of knowledge, power, strength etc., in an infinite degree. There is no entity other than Me with such attributes of an eal or superior nature.

The aggregate of all the animate and inanimate things, whether in their causal state or in the state of effect, is strung on Me who abides as their Self, as a row of gems on a thread. They depend on Me. And it is proved that the universe of inanimate and animate beings exists as the body with Brahman (i.e. the Supreme Person) as their Self as declared by the Antaryami-brahmana and other texts: 'He whose body is the earth' (Br. U., 3.7-3), 'He whose body is the self' (Br. U. Madh., 3.7.22), and 'He is the inner self of all beings, without evil, He is the Lord in the supreme heaven, He is the one Narayana' (Su. U., 7).

Thus, as everything constitutes the body of the Supreme Person forming only a mode of His who is their Self, the Supreme Person alone exists, and all things (which we speak of as diversity) are only His modes. Therefore all terms used in common parlance for different things, denote Him only. Sri Krsna shows this by coordinating some important ones among these entities with Himself.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.7 O Dhananjaya, asti, there is; na anyat kincit, nothing else whatsoever, no other cause; parataram, higher; mattah, than Me, the supreme God; i.e. I Myself am the source of the world. Since this is so, therefore, sarvam, all; idam, this, all things, the Universe; protam,is strung, woven, connected, i.e. transfixed; mayi, on Me, the supreme God; like cloth in the warp, [Like cloth formed by threads constituting its warp and woof.] and iva, like; maniganah, peals; sutre,on a string. 'What alities are You endowed with, by virtue of which all this is strung on You? This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.7।। इसके पूर्व के श्लोकों में कथित सिद्धान्त को स्वीकार करने पर हमें जगत् की ओर देखने के दो दृष्टिकोण मिलते हैं। एक है अपर अर्थात् कार्यरूप जगत् की दृष्टि से तथा दूसरा इससे भिन्न है पर अर्थात् कारण की दृष्टि से। जैसे मिट्टी की दृष्टि से उसमें विभिन्न रूप रंग वाले घटों का सर्वथा अभाव होता है वैसे ही चैतन्यस्वरूप पुरुष में न विषयों का स्थूल जगत् है और न विचारों का सूक्ष्म जगत्। मुझसे अन्य किञ्चिन्मात्र वस्तु नहीं है।स्वप्न से जागने पर जाग्रत् पुरुष के लिये स्वप्न जगत् की कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती। समुद्र में असंख्य लहरें उठती हुई दिखाई देती हैं परन्तु वास्तव में वहाँ समुद्र के अतिरिक्त किसी का कोई अस्तित्व नहीं होता। उनकी उत्पत्ति स्थिति और लय स्थान समुद्र ही होता है। संक्षेप में कोई भी वस्तु अपने मूल स्वरूप का त्याग करके कदापि नहीं रह सकती है।पहले हमें बताया गया है कि प्रत्येक प्राणी में एक भाग अपरा प्रकृतिरूप है जिसका संयोग आत्मतत्त्व से हुआ है। यहाँ जिज्ञासु मन में शंका उठ सकती है कि क्या मुझमें स्थित आत्मा अन्य प्राणी की आत्मा से भिन्न है यह विचार हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचायेगा कि विभिन्न शरीरों में भिन्नभिन्न आत्मायें हैं अर्थात् आत्मा की अनेकता के सिद्धान्त पर हम पहुँच जायेंगे। .समस्त नामरूपों में आत्मा के एकत्व को दर्शाने के लिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि वे ही इस जगत् के अधिष्ठान हैं। वे सभी रूपों को इस प्रकार धारण करते हैं जैसे कण्ठाभरण में एक ही सूत्र सभी मणियों को पिरोये रहता है। यह दृष्टांत अत्यन्त सारगर्भित है। काव्य के सौन्दर्य के साथसाथ उसमें दर्शनशास्त्र का गम्भीर लाक्षणिक अर्थ भी निहित है। कण्ठाभरण में समस्त मणियाँ एक समान होते हुये दर्शनीय भी होती हैं परन्तु वे समस्त छोटीबड़ी मणियाँ जिस एक सूत्र में पिरोयी होती हैं वह सूत्र हमें दृष्टिगोचर नहीं होता तथापि उसके कारण ही वह माला शोभायमान होती है।इसी प्रकार मणिमोती जिस पदार्थ से बने होते हैं वह उससे भिन्न होता है जिस पदार्थ से सूत्र बना होता है। वैसे ही यह जगत् असंख्य नामरूपों की एक वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि है जिसे इस पूर्णरूप में एक पारमार्थिक सत्य आत्मतत्त्व धारण किये रहता है। एक व्यक्ति विशेष में भी शरीर मन और बुद्धि परस्पर भिन्न होते हुये भी एक साथ कार्य करते हैं और समवेत रूप में जीवन का संगीत निसृत करते हैं। केवल यह आत्मतत्त्व ही इसका मूल कारण है।यह श्लोक ऐसा उदाहरण है जिसमें हमें महर्षि व्यास की काव्य एवं दर्शन की अपूर्व प्रतिभा के दर्शन होते हैं। यहाँ काव्य एवं दर्शन का सुन्दर समन्वय हुआ है।किस प्रकार मुझ में यह जगत् पिरोया हुआ है वह सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.7।।यस्मादेवं तस्मान्मत्तः परमेस्वरात्परतरमन्यत्कारणान्तरं किंचिन्नास्ति न विद्यते अहमेव सर्वस्मात्परः जगत्कारणमित्यर्थः। परतराभावप्रदर्शनेन परम्। अतःसेतून्मानसंबन्धभेदव्यपदेशेभ्यः इति सूत्रोक्ताशङ्कापि परिहृता। परमेश्वरात्परमन्यदस्ति। कुतःअयमात्मा स सेतुः इति सेतोश्चतुष्पादित्याद्युन्मानस्यसता सोभ्य तदा संपन्नो भवति इति संबन्धस्यअथ य एोऽन्तरादित्येय एषोऽन्तरक्षिणि इति भदस्य व्यपदेशेभ्य इति तदर्थः। तथाच सिद्धान्तसूत्राणिसामान्यात्तु बुद्य्धर्थः पादवत्स्थानविशेषात्प्रकाशादिवत्उपपत्तेश्च तथान्यप्रतिषेधात्अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दीदिभ्यः इति। तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। न ब्राह्मणोऽन्यात्किंचिद्भवितुमर्हति प्रमाणाभावात्। नह्यन्यस्यास्तित्वे किंचित्प्रमाणमुपलभामहे। सर्वस्य हि जनिमतो वस्तुजातस्य जन्मादि ब्रह्मणो भवतीति निर्धारितमनन्यत्वं च कारणात्कार्यस्य। नच ब्रह्मव्यतिरिक्तं किंचिदजं संभवतिसदेव सोभ्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् इत्यवधारणादेकविज्ञानेन च सर्वविज्ञानप्रतिज्ञानान्न ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वस्तित्वमवकल्पते। नतु सेत्वादिव्यपदेशो ब्रह्मव्यतिरिक्तत्वं सूचयतीत्युक्तं तत्प्रत्युच्यते। सेतुसामान्यात्सेतुशब्द आत्मनि प्रयुक्त इति श्लिष्यते जगतस्तन्मर्यादानां च विधारकत्वं सेतुसामान्यमात्मनोऽतः सेतुरिव सेतुरिति प्रकृत आत्मा स्तूयते। सेतुं तीर्त्वेत्यपि तरतेरतिक्रमासंभवात्प्राप्नोत्यर्थे एव वर्तते यथा व्याकरणं तीर्ण इति प्राप्त उच्यते नातिक्रान्तस्तद्वत् उन्मादव्यपदेशोऽपि न ब्रह्मव्यरिरिक्तवस्त्वस्तित्वप्रतिपत्त्यर्थः किंतु बुद्य्धर्थ उपासनार्थः पादवत्। यथा मनआकाशयोरध्यात्ममधितैवतं च ब्रह्मप्रतीकयोराम्रातयोश्चत्वारो वाक्प्राणचक्षुःश्रोत्राणीति सनःसंबन्धिनः पादाः कल्पिताः चत्वारश्चाग्निवायुसूर्यदिशः आकाशसंबन्धिनः आध्यानाय तद्वत्। यद्वा व्यवहाराय कार्षापणपादविभागकल्पनावत्। यदप्युक्तं संबन्धव्यपदेशाद्भेदव्यपदेशाच्च परमेश्वरात्परमिति तदप्यसत्। यत एकस्यापि स्थानविशेषापेक्षयैतौ य उपशमः स परमात्मना संबन्ध इत्युपाध्यपेक्षयोपचर्यते न मितत्वापेक्षया तथा भेदव्यपदेशोऽपि ब्रह्मण उपाधिभेदापेक्षयैव न स्वरुपभेदा पेक्षया। तत्र दृष्टान्तमाह प्रकाशवत्। यथैकस्यैव सौर्यादिप्रकाशस्य सूचीपाशादिषूपाध्यपेक्षस्यैव संबन्धभदव्यपदेशो तद्वत् मुख्यएव संबन्धादिः किं न स्यादित्याशङ्क्याह। उपपत्तेश्च उपचारस्यैवोपपत्तेश्च। एवं सेत्वादिव्यपदेशान्तपरपक्षे हेतूनुन्मथ्य संप्रति स्वपक्षं हेत्वन्तरेणोपसंहरति। तथान्यपर्तिषेधादपि न ब्रह्मणः परं बस्त्वन्तरमस्तीति गम्यते। तथाहिस एवाधस्तादहमेवाधस्तादात्मैवाधस्तात्स एवोपरिष्टात्सर्वं तं पदादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद ब्रह्मैवेदं सर्वमात्मैवेदं सर्वं नेह नानास्ति किंचनयस्मात्परं नापरमस्ति किंचित्तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्मम् इत्येवमादीनि स्वप्रकरणस्थानि अन्यार्थत्वेन परिणेतुम शक्यानि ब्रह्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरं वारयन्ति। सर्वान्तरश्रुतेश्च न परमात्मनोऽन्तरोऽन्य आत्मास्तीत्यवधार्यते। अनेन सेत्वादिव्यपदेशनिराकरणेनान्यप्रतिषेधसमाश्रयणेन च सर्वगतत्वमप्यात्मनः सिद्धं भवति।सर्वगतत्वं चास्यायामशब्दादिभ्यो विज्ञायते। आयामशब्दो व्यापिवचनः।यावान्वायमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशःआकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःज्यायान्दिवो ज्यायानन्तरिक्षात्नित्यः सर्वगतः स्थाणुः इत्येवमादयो हि श्रुतिस्मृतिन्यायाः सर्वगतत्वमात्मनो बोधयन्तीति दिग्विजये उत्तरगोग्रहे च राज्ञो भीष्मादींश्च विजित्य धनमाहृतवतस्त्वत्तः परतर एतादृशकर्मकर्ताऽन्यो यथा नास्ति तथा मत्तः परमन्यज्जगत्कारणं नास्तीति ध्वनयन्संबोधयति धनंजयेति। यत एवं तस्मान्मयि परमेश्वरे सर्वमिदं कार्यकारणात्मकं जगत्प्रोतं ग्रथितं यथा सूत्रे मणिगणा ग्रथितास्तद्वत्। अनेन स्थितिहेतुस्वमपि स्वस्यैव दर्शितम्। केचित्तु यस्मादहमेव मायया सर्वस्य जगतो जन्मस्थितिभङ्गहेतुस्तस्मात्परमार्थतो निखिलदृश्याकारपरिणतमायाधिष्ठानात्परमार्थसत्यात्परतरं परमार्थ सत्यं अन्यात्किंचिन्नास्ति। मयि कल्पितं परमार्थतो मत्तो न भिद्यत इत्यर्थः।तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इति न्यायात्। व्यवहारदृष्ट्या तु मयि सद्रूपे स्फरणरुपे च सर्वमिदं जटजातं प्रोतं ग्रथितं मत्सत्तया सदिव मत्सफुरणेन स्फुरदिव व्यवहाराय मायामयाय कल्पते। सर्वस्य चैतन्यगथितत्वमात्रे दृष्टान्तः सूत्रे मणिगणा इव। अथवा सूत्रे तैजसात्मनि हिरण्यगर्भे स्वप्रदृशि स्वप्नप्राप्ता मणिगणा इव इति सर्वांशेऽपि दृष्टान्तो व्याख्यायेय इति वर्णयन्ति। अस्मिन्पक्षेनेह नानास्ति किंचन इतिवन्मत्तोऽन्यत्किंचिन्नास्तीत्येतावतैव मत्तः परमार्थसतोऽन्यद्भिन्नं किंचिद्वस्तु परमार्थसन्नास्तीत्यर्थस्य निर्वाहे मयि सर्वमिदं कल्पितं मनसि स्वप्नपदार्था इवेति वक्तव्ये परतरपदस्य प्रयोजनं प्रोतमित्यादेः स्वारस्यं च चिन्त्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.7।।यस्मादहमेव मायया सर्वस्य जगतो जन्मस्थितिभङ्गहेतुस्तस्मात्परमार्थतः निखिलदृश्याकारपरिणतमायाधिष्ठानात्सर्वभासकान्मत्तः सद्रूपेण स्फुरणरूपेण च सर्वानुस्यूतात्स्वत्प्रकाशपरमानन्दचैतन्यघनात्परमार्थसत्यात्स्वप्नदृश इव स्वाप्निकं मायाविन इव मायिकं शुक्तिशकलावच्छिन्नचैतन्यादिवत्तदज्ञानकल्पितं रजतं परतरं परमार्थसत्यमन्यात्किंचिदपि नास्ति। हे धनंजय मयि कल्पितं परमार्थतो न मत्तो भिद्यत इत्यर्थः।तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इति न्यायात्। व्यवहारदृष्ट्या तु मयि सद्रूपे स्फुरणरूपे च सर्वमिदं जडजातं प्रोतं ग्रथितं मत्सत्तया सदिव मत्स्फुरणेन च स्फुरदिव व्यवहाराय मायामयाय कल्प्यते। सर्वस्य चैतन्यग्रथितत्वमात्रे दृष्टान्तः सूत्रे मणिगणा इवेति। अथवा सूत्रै तैजसात्मनि हिरण्यगर्भे स्वप्नदृशि स्वप्नप्रोता मणिगणा इवेति सर्वांशे दृष्टान्तो व्याख्येयः। अन्ये तुपरमतः सेतून्मानसंबन्धभेदव्यपदेशेभ्यः इति सूत्रोक्तस्य पूर्वपक्षस्योत्तरत्वेन श्लोकमिमं व्याचक्षते। मत्तः सर्वज्ञात्सर्वशक्तेः सर्वकारणात्परतरं प्रशस्यतरं सर्वस्य जगतः सृष्टिसंहारयोः स्वतन्त्रं कारणमन्यन्नास्ति। हे धनंजय यस्मादेवं तस्मान्मयि सर्वकारणे सर्वमिदं कार्यजातं प्रोतं ग्रथितं नान्यत्र। सूत्रे मणिगणा इवेति दृष्टान्तस्तु ग्रथितत्वमात्रे नतु कारणत्वे। कनककुण्डलादिवदिति तु योग्यो दृष्टान्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.7।।एवमेकविज्ञानात्सर्वविज्ञानं प्रकृतमात्मनो जगदुपादानत्वेनोपपाद्य तत एवात्मनो निर्विकारत्वहाने प्राप्ते आह मत्त इति। कारणान्मृदादेः परं पृथग्भूतं घटादि व्यवहारे तयोर्भेदानुभवात्। परतरं तु गवाश्वादिमृदनुपादानकत्वात्। एवं ब्रह्मणः परतरं तदनुपादानकं किञ्चिदपि नास्ति। हे धनंजय एवं प्रपञ्चे ब्रह्माव्यतिरेकं प्रदर्श्य ब्रह्मणि प्रपञ्चव्यतिरेकं सदृष्टान्तमाह मयीति। मयि सद्रूपेण स्फुरणरूपेण च सूत्रवत्सर्वत्रानुस्यूते यदिदं सर्वं मणिगणवत्परस्परव्यावृत्तं तत्प्रोतं तेन व्यावृत्तेभ्योऽनुवृत्तं भिन्नमिति न्यायेन प्रपञ्चातीतोऽहमतो न मम विकारित्वमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.7।।यत उत्पत्तिप्रलयकारणमहमेवातो हे धनञ्जय मद्विभूतिरूप एतज्ज्ञानयोग्य मत्तः परतरं श्रेष्ठं जगत् जगति वा किञ्चित् अहं स इति भेदेनापि अन्यन्नास्ति एवमुत्पत्तिप्रलयकारणेन स्वत उत्तमत्वाभावमन्यस्योक्त्वा स्थितिहेतुत्वेनाऽपि तथा त्वमेवेति स्वस्य स्थितिहेतुत्वमाह मयीति। इदं सर्वं जगत् मयि प्रोतं ग्रथितं मदाश्रयत्वेन तिष्ठतीत्यर्थः। अत्र दृष्टान्तमाह सूत्रे प्रोता मणिगणा इव। अत्रायं भावः मणिगणाः क्रीडास्थजीवाधिदैविकरूपा यथा मयि तिष्ठन्ति तथेदं जगदप्याधिदैविकं मयि तिष्ठतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.7।। यस्मादेवं तस्मात् मत्त इति। मत्तः सकाशात्परतरं श्रेष्ठं जगतः सृष्टिसंहारयोः स्वतन्त्रं कारणं किंचिदपि नास्ति। स्थितिहेतुरप्यहमेवेत्याह मयीति। मयि सर्वमिदं जगत्प्रोतं ग्रथितं आश्रितमित्यर्थः। दृष्टान्तः स्पष्टः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.7।।यस्मादेवं तस्मादेव माहात्म्यं पूर्वं ज्ञातव्यं मत्तः परतरं नान्यदिति। अहमेव पर इत्यर्थः। किञ्चेदं सर्वं प्रोतमाश्रितं मयि तत्र यद्यत्स्वरूपमान्तरं बहिरिदं युष्मदाद्युपलभ्यमानत्वात्सत्त्वं जगत् मत्स्वरूपेणेदं नत्वविद्याकल्पितम्। तत्र दृष्टान्तः सूत्रे मणिगणा इव इत्यात्मशरीरभावेनावस्थानमुक्तं यस्य पृथिवी शरीरं बृ.उ.3।7।3 यस्मात्मा शरीरं श.प.ब्रा.14।5।6।5।30 य एषः ह्येषः सर्वभूतान्तरात्मा मुं.उ.2।1।4 इत्यादौ प्रसिद्धं विज्ञेयम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.7।।ऐसा होनेके कारण मुझ परमेश्वरसे परतर ( अतिरिक्त ) जगत्का कारण अन्य कुछ भी नहीं है अर्थात् मैं ही जगत्का एकमात्र कारण हूँ। हे धनंजय क्योंकि ऐसा है इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् और समस्त प्राणी मुझ परमेश्वरमें दीर्घ तन्तुओंमें वस्त्रकी भाँति तथा सूत्रमें मणियोंकी भाँति पिरोया हुआ अनुस्यूत अनुगत बिंधा हुआ गूँथा हुआ है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.7।। व्याख्या  मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय हे अर्जुन मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है मैं ही सब संसारका महाकारण हूँ। जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है आकाशमें ही रहती है और आकाशमें ही लीन होती है अर्थात् आकाशके सिवाय वायुकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ऐसे ही संसार भगवान्से उत्पन्न होता है भगवान्में स्थित रहता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है अर्थात् भगवान्के सिवाय संसारकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।यहाँ परतरम् कहकर सबका मूल कारण बताया गया है। मूल कारणके आगे कोई कारण नहीं है अर्थात् मूल कारणका कोई उत्पादक नहीं है। भगवान् ही सबके मूल कारण हैं। यह संसार अर्थात् देश काल व्यक्ति वस्तु घटना परिस्थिति आदि सभी परिवर्तनशील हैं। परन्तु जिसके होनेपनसे इन सबका होनापन दीखता है अर्थात् जिसकी सत्तासे ये सभी है दीखते हैं वह परमात्मा ही इन सबमें परिपूर्ण हैं।भगवान्ने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा कि मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा जिसको जाननेके बाद कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते और यहाँ कहते हैं कि मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति। दोनों ही जगह न अन्यत् कहनेका तात्पर्य है कि जब मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं तब मेरेको जाननेके बाद जानना कैसे बाकी रहेगा अतः भगवान्ने यहाँ मयि सर्वमिदं प्रोतम् और आगे वासुदेवः सर्वम् (7। 19) तथा सदसच्चाहम् (9। 19) कहा है।जो कार्य होता है वह कारणके सिवाय अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। वास्तवमें कारण ही कार्यरूपसे दीखता है। इस प्रकर जब कारणका ज्ञान हो जायगा तब कार्य कारणमें लीन हो जायगा अर्थात् कार्यकी अलग सत्ता प्रतीत नहीं होगी और एक परमात्माके सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है ऐसा अनुभव स्वतः हो जायगा।मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव यह सारा संसार सूतमें सूतकी ही मणियोंकी तरह मेरेमें पिरोया हुआ है अर्थात् मैं ही सारे संसारमें अनुस्यूत (व्याप्त) हूँ। जैसे सूतसे बनी मणियोंमें और सूतमें सूतके सिवाय अन्य कुछ नहीं है ऐसे ही संसारमें मेरे सिवाय अन्य कोई तत्त्व नहीं है। तात्पर्य है कि जैसे सूतमें सूतकी मणियाँ पिरोयी गयी हों तो दीखनेमें मणियाँ और सूत अलगअलग दीखते हैं पर वास्तवमें उनमें सूत एक ही होता है। ऐसे ही संसारमें जितने प्राणी हैं वे सभी नाम रूप आकृति आदिसे अलगअलग दीखते हैं पर वास्तवमें उनमें व्याप्त रहनेवाला चेतनतत्त्व एक ही है। वह चेतनतत्त्व मैं ही हूँ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत (गीता 13। 2) अर्थात् मणिरूप अपरा प्रकृति भी मेरा स्वरूप है और धागारूप परा प्रकृति भी मैं ही हूँ। दोनोंमें मैं ही परिपूर्ण हूँ व्याप्त हूँ। साधक जब संसारको संसारबुद्धिसे देखता है तब उसको संसारमें परिपूर्णरूपसे व्याप्त परमात्मा नहीं दीखते। जब उसको परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है तब व्याप्यव्यापक भाव मिटकर एक परमात्मतत्त्व ही दीखता है। इस तत्त्वको बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ कारणरूपसे अपनी व्यापकताका वर्णन किया है। सम्बन्ध  जो कुछ कार्य दीखता है उसके मूलमें परमात्मा ही हैं यह ज्ञान करानेके लिये अब भगवान् आठवेंसे बारहवें श्लोकतकका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.6 7.7।।एतद्योनीनि इति। मत्तः इति। उपधारय अभ्यासाहितानुभवक्रमेण ( अभ्यासानुभव ) आत्मसमीपे कुरु। एवं च त्वमेवोपधारय यत् अहं वासुदेवो भूतः (S K वासुदेवीभूतः) सर्वस्य प्रभवः प्रलयश्च। अहम् ( N omit the sentence अहं प्रदर्शितम्) इत्यनेन प्रकृतिपुरुषपुरुषोत्तमेभ्यो व्यतिरिक्तोऽपि ईश्वरः सर्वथा सर्वानुगतत्वेन स्थित इति सांख्ययोगयोर्नास्ति भेदवादः इति प्रदर्शितम्। सूत्रे मणिगणा इव यथा तन्तुरनवध्रियमाणरूपोऽपि अन्तर्लीनतया स्थितः एवमहं सर्वत्र।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.7।।प्रधानात्परतोऽक्षरात्पुरुषवत्परमात्मनोऽपि परादन्यत्परं स्यादित्याशङ्क्य प्रकृतिद्वयद्वारा सर्वकारणत्वमीश्वरस्योक्तमुपजीव्य परिहरति यतस्तस्मादिति। नान्यदस्ति परमित्यत्र हेतुमाह मयीति। परतरशब्दार्थमाह अन्यदिति। स्वातन्त्र्यव्यावृत्त्यर्थमन्तरशब्दः। निषेधफलं कथयति अहमेवेति। सर्वजगत्कारणत्वेन सिद्धमर्थं द्वितीयार्धव्याख्यानेन विशदयति यस्मादिति। अतो (यथा) दीर्घेषु तिर्यक्षु च पटघटितेषु तन्तुषु पटस्यावगतिरवगम्यते तद्वन्मय्येवानुगतं जगदित्याह दीर्घेति। यथा च मणयः सूत्रेऽनुस्यूतास्तेनैव ध्रियन्ते तदभावे विप्रकीर्यन्ते यथा मयैवात्मभूतेन सर्वं व्याप्तं ततो निकृष्टं विनष्टमेव स्यादिति श्लोकोक्तं दृष्टान्तमाह सूत्र इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.7।।नन्वपरं परं च तत्त्वमुक्त्वा परतरोऽहमिति वक्तव्यंमत्तः इति किमुच्यते इत्यतस्तात्पर्यमाह अहमेवेति। परापरप्रकृत्योः स्वाधीनत्वोक्त्यैव स्वस्य परतरत्वमुक्तप्रायम्। किं त्वपरतत्त्वं यथाऽनेकं भूम्यादिभेदेन तथा च परतत्त्वंमुक्तस्तु स्यात्पराभासः इति वचनात्। तथा परतरमपि किमनेकमुत त्वमेक एव इति जिज्ञासायामहमेव परतर इत्यनेनोच्यत इत्यर्थः। कथमनेनेदं लभ्यते भगवत्प्रतियोगिकाधिक्यवन्निषेधस्यात्र प्रतीतेरित्यतो योजयति मत्त इति। अन्यथा तरपोऽन्यशब्दस्य च वैयर्थ्यादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.7।।अहमेव परतरः मत्तोऽन्यत्परतरं न किञ्चिदपि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.7।।यथा सर्वकारणस्य अपि प्रकृतिद्वयस्य कारणत्वेन सर्वाचेतनवस्तुशेषिणः चेतनस्य अपि शेषित्वेन कारणतया शेषितया च अहं परतरः तथा ज्ञानशक्तिबलादिगुणयोगेन च अहम् एव परतरः मत्तः अन्यत् मद्व्यतिरिक्तं किञ्चिद् ज्ञानबलादिगुणान्तरयोगि परतरं न अस्ति।सर्वम् इदं चिदचिद्वस्तुजातं कार्यावस्थं कारणावस्थं च मच्छरीरभूतं सूत्रे मणिगणवदात्मतया अवस्थिते मयि प्रोतम् आश्रितम्।यस्य पृथिवी शरीरम् (बृ0 उ0 3।7।3)यस्यात्मा शरीरम् (बृ उ 3।7।22)एष सर्वभूतान्तरात्मापहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः (सु0 उ0 7) इति आत्मशरीरभावेन अवस्थानम् च जगद्ब्रह्मणोः अन्तर्यामिब्राह्मणादिषु सिद्धम्।अतः सर्वस्य परमपुरुषशरीरत्वेन आत्मभूतपरमपुरुषप्रकारत्वात् सर्वप्रकारः परमपुरुष एव अवस्थित इति सर्वैः शब्दैः तस्य एव अभिधानम् इति तत्तत्सामानाधिकरण्येन आह रसः अहम् इति चतुर्भिः

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.7।। मत्तः परमेश्वरात् परतरम् अन्यत् कारणान्तरं किञ्चित् नास्ति न विद्यते अहमेव जगत्कारणमित्यर्थः हे धनञ्जय। यस्मादेवं तस्मात् मयि परमेश्वरे सर्वाणि भूतानि सर्वमिदं जगत् प्रोतं अनुस्यूतम् अनुगतम् अनुविद्धं ग्रथितमित्यर्थ दीर्घतन्तुषु पटवत् सूत्रे च मणिगणा इव।।केन केन धर्मेण विशिष्टे त्वयि सर्वमिदं प्रोतमित्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.8 】

▸ Sanskrit Sloka: रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो: | प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु ||

▸ Transliteration: raso’hamapsu kaunteya prabhāsmi śaśisūryayoḥ | praṇavaḥ sarvavedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu ||

▸ Glossary: rasaḥ: taste; ahaṃ: I; apsu: in water; kaunteya: O son of Kuntī; prabhā: light; asmi: I am; śaśisūryayoḥ: in the sun and the moon; praṇavaḥ: the letters a-u-m; sarva: in all; vedeṣu: in the Vedas; śabdaḥ: sound vibration; khe: in the ether; pauruṣaṃ: virility, manliness; nṛṣu: in man

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.8 O Kaunteya (son of Kuntī), I am the taste of water, the radiance of the sun and the moon, the sacred syllable ‘Om’ in the vedic mantras. I am the sound in ether and ability in man.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.8।।हे कुन्तीनन्दन जलोंमें रस हूँ चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मैं हूँ आकाशमें शब्द और मनुष्योंमें पुरुषार्थ मैं हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.8।। हे कौन्तेय जल में मैं रस हूँ चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ सब वेदों में प्रणव (ँ़कार) हूँ तथा आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.8 रसः sapidity? अहम् I? अप्सु in water? कौन्तेय O Kaunteya (son of Kunti)? प्रभा light? अस्मि am (I)? शशिसूर्ययोः in the moon and the sun? प्रणवः the syllable Om? सर्ववेदेषु in all the Vedas? शब्दः sound? खे in ether? पौरुषम् virility? नृषु in men.Commentary In Me all beings and the whole world are woven as a cloth in the warp. In Me as sapidity the water is woven in Me as light? the sun and the moon are woven in Me as the sacred syllable Om all the Vedas are woven in Me as virility all men are woven.The manifestations of the Lord are described in the verses 8? 9? 10 and 11. (Cf.XV.12)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.8. O son of Kunti ! I am the taste in waters; the light in the moon and the sun; the best hymn (OM) in the entire Vedas; the sound that exists in the ether (or the mystic hymnal sound in the entire Vedas-a sound that is in the ether); and the manly vigour in men.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.8 O Arjuna! I am the Fluidity in water, the Light in the sun and in the moon. I am the mystic syllable Om in the Vedic scriptures, the Sound in ether, the Virility in man.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.8 I am the taste in the waters, O Arjuna! I am the light in the sun and the moon; the sacred syllable Om in all the Vedas; sound in the ether; and manhood in men am I.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.8 O son of Kunti, I am the taste of water, I am the effulgence of the moon and the sun; (the letter) Om in all the Vedas, the sound in space, and manhood in men.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.8 I am the sapidity in water, O Arjuna; I am the light in the moon and the sun; I am the syllable Om in all the Vedas, sound in ether and virility in men.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.8 Raso 'ham apsu etc. I am that [basic] taste which has not yet devolped as to have the classification of sweetness and so on, and which is being tasted in all waters. Similarly, the light : That [light] which is devoid of gentleness and fierceness etc. (The sound that exist] in the ether in the sky. The sound that etc. Here the emphasis is on all sounds, as they are attributes of the ether. Or, the passage denotes that empty basic sound which, being exclusively an attribute of th ether; which does not depend on any other external cuases like union and partition [of some objects]; which exists in the ether within the cave of the Brahman; which is ite intelligible to the groups of Yogins with attentive heart (mind); which bears the name Anahata; and which pervades the entire groups of the Vedas - that sound represents the Absolute. Manly vigour ; that lusture by means of which one is identified as a man throughout the earth.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.8 - 7.11 All these entities with their peculiar characteristic are born from Me alone. They depend on Me; inasmuch as they constitute My body, they exist in Me alone. Thus I alone exist while all of them are only My modes.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.8 Kaunteya, O son of Kunti, aham, I; am rasah, the taste, which is the essence of water. The idea is that water is depedent on Me who am its essence. This is how it is to be understood in every case. Just as I am the essence of water, similarly, asmi, I am; the prabha, effulgence; sasi-suryayoh, of the moon and the sun; pranavah, (the letter) Om; sarva-vedesu, in all the Vedas. All the Vedas are established on Me who am that Om. So also (I am) sabdah, the sound; khe, in space, as the essence. Space is established on Me who am that (sound). In the same way, nrsu, in men; (I am) paurusam, manhood- the ality of being man, from which arises the idea of manhood. Men are established on Me who am such.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.8।। See commentary under 7.9.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.8।।नन्वबादीनां रसादिषु प्रोतत्वप्रतीतेस्त्वय्येव सर्वं कथं प्रोतमित्याशङ्क्य रसादिरुपे मय्येवाबादिकं प्रोतमित्याह रस इति।अपां यः सारो रसः पुण्यो गन्धः इति गन्धस्य पुण्यत्वप्रदर्शनं पुण्यत्वप्रदर्शनं रसादेरपि पुण्यत्वोपलक्षणार्थम्। रसः पुण्यो मधुरस्तस्मिन् रसरुपे मयि आपः प्रोताः। कौन्तेयेति संबोधयन् अस्मन्मातुलेये त्वयि कथं सर्वं प्रोतमित्यसंभावनां माकुर्विति ध्वनयति। तथा प्रभा प्रखाशस्तस्मिन्प्रखाशरुपे मयि शशिसूर्यो प्रोतौ तदा सर्ववेदसारभूते प्रणवे ओंकाररुपे मयि सर्वे वेदाः प्रोताः। तथा आकाशानुस्यूते पुण्ये शब्दे शब्दतन्मात्ररुपे मयि आकाशः प्रोतस्तथा पौरुषं पुरुषस्य भावः पुंबुद्धिः पुरुषसारभूता तस्मिन्पौरुषरुपे मयि पुरुषाः प्रोताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.8।।अबादीनां रसादिषु प्रोतत्वप्रतीतेः कथं त्वयि सर्वमिदं प्रोतमिति च न शङ्क्यम् रसादिरूपेण ममैव स्थितत्वादित्याह पञ्चभिः रसः पुण्यो मधुरस्तन्मात्ररूपः सर्वासामपां सारः कारणभूतो योऽप्सु सर्वास्वनुगतः सोऽहं हे कौन्तेय तद्रूपे मयि सर्वा आपः प्रोता इत्यर्थः। एवं सर्वेषु पर्यायेषु व्याख्यातव्यम्। इयं विभूतिराध्यानायोपदिश्यत इति नातीवाभिनिवेष्टव्यम्। तथा प्रभा प्रकाशः शशिसूर्ययोरहमस्मि। प्रकाशसामान्यरूपे मयि शशिसूर्यौ प्रोतावित्यर्थः। तथा प्रणव ओंकारः सर्ववेदेष्वनुस्यूतोऽहंतद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक् इति श्रुतेः। संतृण्णानि ग्रथितानि। सर्वा वाक् सर्वो वेद इत्यर्थः। शब्दः पुण्यस्तन्मात्ररूपः खे आकाशेऽनुस्यूतोऽहम्। पौरुषं पुरुषत्वसामान्यं नृषु पुरुषेषु यदनुस्यूतं तदहम्। सामान्यरूपे मयि सर्वे विशेषाः प्रोताः श्रौतैर्दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैरिति सर्वत्र द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.8।।नन्वेवं प्रपञ्चपरमात्मनोर्मणिसूत्रवदुपादानोपादेयभावोऽपि न स्यात्। नहि उपादानं चाननुवृत्तं चेति घटते मृद्धटादावदर्शनादित्याशङ्क्य स्वप्नमायेन्द्रजालरज्जूरगतुल्यत्वं प्रपञ्चस्योपपाद्योभयमप्यविरुद्धमित्युपदिष्टं चेदयमकस्मादुद्विग्नो भविष्यतीति मत्वा दृष्टान्तान्तरैरेवानुवृत्तिं व्यावृत्तिं चिज्जडयोर्दर्शयति रस इति। यथा रसोऽप्सु एकमप्यप्परमाणुमपरित्यज्यानुस्यूतो दृश्यतेऽतो रसरूपे मयि आपः प्रोताः एवं प्रभायां चन्द्रादयः प्रोताः प्रणवे सर्वे वेदाः प्रोताःतद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक् संतृण्णा इति वाङ्मात्रे प्रणवानुस्यूतिश्रवणात्। संतृण्णानि संग्रथितानि। एवमाकाशे शब्दः सारभूतस्तस्मिन्मयि खं प्रोतम्। सर्वपुरुषेषु सारं पौरुषं शौर्यर्धैर्यादिरूपं तत्र पुरुषाः प्रोताः। एवमग्रेऽपि द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.8।।आधिदैविकरूपेण जगतः स्थितिं स्वस्मिन्नाह रसोऽहमिति पञ्चभिः। हे कौन्तेय मद्भक्त एतज्ज्ञानयोग्य अहमप्सु जलेषु रसरूपः। जले शैत्याद्याह्लादकानन्दादिगुणो मद्रूपस्थरसांशसम्बन्धादाविर्भवतीत्यर्थः। तथा शशिसूर्ययोः प्रभा प्रकाशकतेजोरूपोऽस्मि मद्रूपस्थसंयोगविप्रयोगानन्दरूपतेजस्सम्बन्धेनोभयोस्तद्रूपानन्दप्रकाशकत्वं भवतीति भावः। सर्ववेदेषु शब्दरसात्मके प्रणवे च ओङ्कारत्रिरूपाक्षररूपोऽस्मि शक्तिद्वयसहितपुरुषरूपोऽस्मि तत्सम्बन्धेनैव वेदशब्देषु रसरूपता अत एव श्रुतीनां भावोत्पत्तिः। खे आकाशे शब्दरूपोऽस्मि।अत्रायं भावः आकाशस्वरूपात्मकभगवद्वेणुसम्बन्धेन शब्देष्वानन्दरूपत्वं भवति। नृषु मनुष्येषु पौरुषांशत्वम् पुरुषांशानामेव भजनयोग्यतेति तत्सम्बन्धेनैव सर्वमनुष्याणामुत्तमत्वमुच्यत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.8।। जगतः स्थितिहेतुत्वं प्रपञ्चयति रसोऽहमिति पञ्चभिः। अप्सु रसोऽहम्। रसतन्मात्ररूपया विभूत्या तदाश्रयत्वेनाप्सु स्थितोऽहमित्यर्थः। तथा शशिसूर्ययोः प्रभास्मि। चन्द्रेऽर्के च प्रकाशरूपया विभूत्या तदाश्रयत्वेन स्थितोऽहमित्यर्थः। एवमुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम्। सर्वेषु वेदेषु वैखरीरूपेषु तन्मूलभूतः प्रणव ओंकारोऽस्मि। खे आकाशे शब्दतन्मात्ररूपोऽस्मि। नृषु पुरुषेषु पौरुषमुद्यमोऽस्मि। उद्यमे हि पुरुषास्तिष्ठन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.8।।नन्वेकस्य भगवतः कारणत्वमुपादानत्वेन निमित्तत्वादिना वा तत्रापि तन्मुख्यं गौणं वा इति चेत् उच्यते तस्य मुख्यमेव सर्वकारणत्वं सर्वरूपत्वात्सर्वशक्तित्वात्सहकारिनिरपेक्षत्वाच्च कामधेन्वादिवत्। उक्तं हि श्रीभागवते 6।4।30यस्मिन्यतो येन च यस्य यस्मै यद्यो यथा कुरुते कार्यते वा (च)। परावरेषां परमं प्राक्प्रसिद्धं तद्धीश (तद्ब्रह्म) तद्धेतुरनन्यदेकम् इत्यादि। एकोऽहं बहु स्याम् स आत्मानं स्वयमकुरुत सहैतावानाससर्वनामा स च विश्वरूपः इत्यादिश्रुतिस्मृतिषु मुख्यमेवास्य कारणत्वं सर्वमुक्तम्। तथैव स्वविभूतिमहिमविज्ञानं स्पष्टयति सङ्क्षेपेण चतुर्भिःरसोऽहमप्सु इत्यारभ्यकामोऽस्मि 7।11 इत्यन्तम्। तत्र सप्तविधोऽहं सन् प्रकृतिकार्ये गुणरूपनामात्मना स्थितः चित्प्रकृतिकार्येऽपि तथैवेत्याशयेनाह रसोऽहमिति। अप्सु रसत्वेन स्थितोऽस्मि। प्रभेति रूपभेदः। प्रणवो नामात्मा कः शब्दो गुणाः खे। नृषु मानुषेषु पौरुषं वीर्यम्।यतः सर्वगुणानां सम्मिश्रं रूपं सप्तमोऽप्येको भेदो मध्ये निरूपितः मिश्रितत्वात्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.8।।यह समस्त जगत् किसकिस धर्मसे युक्त आपमें पिरोया हुआ है इसपर कहते हैं जलमें मैं रस हूँ अर्थात् जलका जो सार है उसका नाम रस है उस रसरूप मुझ परमात्मामें समस्त जल पिरोया हुआ है। ऐसे ही और सबमें भी समझना चाहिये। जैसे जलमें मैं रस हूँ वैसे ही चन्द्रमा और सूर्यमें मैं प्रकाश हूँ। समस्त वेदोंमें मैं ओंकार हूँ अर्थात् उस ओंकाररूप मुझ परमात्मामें सब वेद पिरोये हुए हैं। आकाशमें उसका सारभूत शब्द हूँ अर्थात् उस शब्दरूप मुझ ईश्वरमें आकाश पिरोया हुआ है। तथा पुरुषोंमें मैं पौरुष हूँ अर्थात् पुरुषोंमें जो पुरुषत्व है जिससे उनको पुरुष समझा जाता है वह मैं हूँ उस पौरूषरूप मुझ ईश्वरमें पुरुष पिरोये हुए हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.8।। व्याख्या  जैसे साधारण दृष्टिसे लोगोंने रुपयोंको ही सर्वश्रेष्ठ मान रखा है तो रुपये पैदा करने और उनका संग्रह करनेमें लोभी आदमीकी स्वाभाविक रुचि हो जाती है। ऐसे ही देखने सुनने मानने और समझनेमें जो कुछ जगत् आता है उसका कारण भगवान् हैं (7। 6) भगवान्के सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं ऐसा माननेसे भगवान्में स्वाभाविक रुचि हो जाती है। फिर स्वाभाविक ही उनका भजन होता है। यही बात दसवें अध्यायके आठवें श्लोकमें कही है कि मैं सम्पूर्ण संसारका कारण हूँ मेरेसे ही संसारकी उत्पत्ति होती है ऐसा समझकर बुद्धिमान् मनुष्य मेरा भजन करते हैं। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें कहा है कि जिस परमात्मासे सम्पूर्ण जगत्की प्रवृत्ति होती है और जिससे सारा संसार व्याप्त है उस परमात्माका अपने कर्मोंके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है। इसी सिद्धान्तको बतानेके लिये यह प्रकरण आया है।रसोऽहमप्सु कौन्तेय हे कुन्तीनन्दन जलोंमें मैं रस हूँ। जल रसतन्मात्रासे (टिप्पणी प0 403) पैदा होता है रसतन्मात्रामें रहता है और रसतन्मात्रामें ही लीन होता है। जलमेंसे अगर रस निकाल दिया जाय तो जलतत्त्व कुछ नहीं रहेगा। अतः रस ही जलरूपसे है। वह रस मैं हूँ।प्रभास्मि शशिसूर्ययोः चन्द्रमा और सूर्यमें प्रकाश करनेकी जो एक विलक्षण शक्ति प्रभा है (टिप्पणी प0 404) वह मेरा स्वरूप है। प्रभा रूपतन्मात्रासे उत्पन्न होती है रूपतन्मात्रामें रहती है और अन्तमेंरूपतन्मात्रामें ही लीन हो जाती है। अगर चन्द्रमा और सूर्यमेंसे प्रभा निकाल दी जाय तो चन्द्रमा और सूर्य निस्तत्त्व हो जायँगे। तात्पर्य है कि केवल प्रभा ही चन्द्र और सूर्यरूपसे प्रकट हो रही है। भगवान् कहते हैं कि वह प्रभा भी मैं ही हूँ।प्रणवः सर्ववेदेषु सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मेरा स्वरूप है। कारण कि सबसे पहले प्रणव प्रकट हुआ। प्रणवसे त्रिपदा गायत्री और त्रिपदा गायत्रीसे वेदत्रयी प्रकट हुई है। इसलिये वेदोंमें सार प्रणव ही रहा। अगर वेदोंमेंसे प्रणव निकाल दिया जाय तो वेद वेदरूपसे नहीं रहेंगे। प्रणव ही वेद और गायत्रीरूपसे प्रकट हो रहा है। वह प्रणव मैं ही हूँ। शब्दः खे सब जगह यह जो पोलाहट दीखती है यह आकाश है। आकाश शब्दतन्मात्रासे पैदा होता है शब्दतन्मात्रामें ही रहता है और अन्तमें शब्दतन्मात्रामें ही लीन हो जाता है। अतः शब्दतन्मात्रा ही आकाशरूपसे प्रकट हो रही है। शब्दतन्मात्राके बिना आकाश कुछ नहीं है। वह शब्द मैं ही हूँ।पौरुषं नृषु मनुष्योंमें सार चीज जो पुरुषार्थ है वह मेरा स्वरूप है। वास्तवमें नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव करना ही मनुष्योंमें असली पुरुषार्थ है। परन्तु मनुष्योंने अप्राप्तको प्राप्त करनेमें ही अपना पुरुषार्थ मान रखा है जैसे निर्धन आदमी धनकी प्राप्तिमें पुरुषार्थ मानता है अपढ़ आदमी पढ़ लेनेमें पुरुषार्थ मानता है अप्रसिद्ध आदमी अपना नाम विख्यात कर लेनेमें अपना पुरुषार्थ मानता है इत्यादि। निष्कर्ष यह निकला कि जो अभी नहीं है उसकी प्राप्तिमें ही मनुष्य अपना पुरुषार्थ मानता है। पर यह पुरुषार्थ वास्तवमें पुरुषार्थ नहीं है। कारण कि जो पहले नहीं थे प्राप्तिके समय भी जिनका निरन्तर सम्बन्धविच्छेद हो रहा है और अन्तमें जो नहीं में भरती हो जायँगे ऐसे पदार्थोंको प्राप्त करना पुरुषार्थ नहीं है। परमात्मा पहले भी मौजूद थे अब भी मौजूद हैं और आगे भी सदा मौजूद रहेंगे क्योंकि उनका कभी अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको उत्साहपूर्वक प्राप्त करनेका जो प्रयत्न है वही वास्तवमें पुरुषार्थ है। उसकी प्राप्ति करनेमें ही मनुष्योंकी मनुष्यता है। उसके बिना मनुष्य कुछ नहीं है अर्थात् निरर्थक है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.8।।रसोऽहमप्स्विति। सर्वत्रास्वाद्यमानो योऽनुद्भिन्न (N मानयोरनुद्भिन्न ) मधुरादिविभागः सामान्यः सोऽहम्। एवं प्रकाशः मृदुत्वचण्डत्वादिरहितः। खे आकाशे। यः शब्द इति सर्वस्यैव शब्दस्य नभोगुणत्वात् अत्रावधारणम्। अथवा यः केवलं ( SN केवलगगन ) गगनगुणया ध्वनिसंयोगविभागादिसामग्र्यन्तररहितः अवहितहृदयैः ब्रह्मगुहागगनगामी योगिगणैः संवेद्यः अनाहताख्यः सकलश्रुतिग्रामानुगामी ( श्रुतिमार्गानुगामी) तत् भगवतस्तत्त्वम्। पौरुषम् येन तेजसा पुरुषोऽह(य)मिति सार्वभौमं प्रतिपद्यते (N प्रतिपाद्यते)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.8।।अबादीनां रसादिषु प्रोतत्वप्रतीतेस्त्वय्येव सर्वं प्रोतमित्ययुक्तमिति मत्वा पृच्छति केनेति। तत्रोत्तरमुत्तरग्रन्थेन दर्शयति उच्यत इति। सारो मधुरो हेतुरिति यावत्। रसोऽहमिति कथं तत्राह तस्मिन्निति। अप्सु यो रसः सारस्तस्मिन्मयि मधुररसे कारणभूते प्रोता आप इतिवदुत्तरत्र सर्वत्र व्याख्यानं कर्तव्यमित्याह एवमिति। उक्तमर्थं दृष्टान्तं कृत्वा प्रभास्मीत्यादि व्याचष्टे यथेति। चन्द्रादित्ययोर्या प्रभा तद्भूते मयि तौ

Chapter 7 (Part 6)

प्रोतावित्यर्थः। तत्र वाक्यार्थं। कथयति तस्मिन्निति। प्रणवभूते तस्मिन्वेदानां प्रोतत्ववदाकाशे यः सारभूतः शब्दस्तद्रूपे परमेश्वरे प्रोतमाकाशमित्याह तथेति। पौरुषं नृष्विति भागं पूर्ववद्विभजते तथेत्यादिना। पुरुषत्वमेव विशदयति यत इति। पुंस्त्वसामान्यात्मके परस्मिन्नीश्वरे प्रोतास्तद्विशेषास्तदुपादानत्वेन तत्स्वभावत्वादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.8 7.12।।भूमिः 7।4 इत्यादिनेत्यत्रावधेरनुक्तेःरसोऽहं इत्याद्यपि ज्ञानप्रकरणमिति प्रतीतिः स्यात् तन्निरासाय तत्समाप्तिमाह इदमिति। एतावता ग्रन्थेन ज्ञानं निरूपितमित्यर्थ। कुतोऽत्र ज्ञानप्रकरणस्य समाप्तिः इत्यत आह रसोऽहमिति। इतिशब्दाद्यभावेऽपि प्रकरणान्तरारम्भ एव समाप्तिं गमयिष्यति। अलौकिकमाहात्म्यप्रतिपादनादस्य विज्ञानप्रकरणत्वं ज्ञायत इति भावः।प्रभवादेः इत्युक्तन्यायेनैवरसोऽहं इत्यादेरपि व्याख्यानं सिद्धम्। रसादीनां सत्तादिकारणत्वाद्भोक्तृत्वाच्च भगवान् रसादिरिति। नन्वबादयो धर्मिणो भगवदधीनास्तद्भोग्याश्चेत्यङ्गीक्रियते न वा। नेति पक्षेअहं कृत्स्नस्य 7।6 इत्युक्तविरोधः। आद्ये तुअप्सु रसः इत्यादेर्धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणां ग्रहणस्यानुपपत्तिरित्यतः प्रथमं पक्षं तावदङ्गीकरोति अबादयोऽपीति। धर्मिणोऽपि तदधीना एव तद्भोग्याश्चैव। ननु तत्रोक्तो दोष इत्यतः कारणत्वे तावद्विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह तथापीति। यद्यपि धर्मिणोऽपि भगवदधीना एव तथापि धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानं युज्यत इति शेषः। कथं इत्यत आह रसादीति। रसादयश्च ते स्वभावा अबादीनामनागन्तुकधर्माश्चेति रसादिस्वभावास्तेषां साराणामबादिधर्मेषु सङ्ख्यादिषु श्रेष्ठानां च तेषामेवाबादिस्वभावभूतानां तद्धर्मेषु श्रेष्ठानां च रसादीनामिति यावत्। स्वभावत्वेऽबादीनामिति शेषः। सारत्वेऽबादिधर्मेष्विति शेषः। रसादित्वे चेति चार्थः। स भगवानेव। विशेषतोऽपीत्यस्य व्यावर्त्यं न त्विति। अनुबद्धोऽनुषङ्गसिद्धः। तत्सारत्वादिश्चेति। तस्य रसादेरबादिधर्मेषु सारत्वमबादिस्वभावत्वं रसत्वादिकं चेत्यर्थः। यथा लोके कुविन्दादिः पटादिद्रव्येष्वेव व्यापारवाननुभूयते न तु तदीयेषु गन्धरसादिषु गुणेषु तद्धर्मेषु च गन्धत्वादिषु पृथग्व्यापारवान् किन्तु ते पटादिजन्मानुषङ्गिजन्मान एव। न तथा भगवान्। अपित्वबादेधर्मेषु रसादिषु तद्धर्मेषु च स्वभावत्वादिषु पृथक् प्रयत्नवान् नत्वबादिनियमानुषङ्गिसत्तादिकास्त इति दर्शयितुं विशेषशब्दा उपात्ता इत्यर्थः। भोगपक्षेऽपि प्रयोजनमाह भोगश्चेति। अबादिभोगादप्यतिशयेन रसादेर्भोगः परमेश्वरस्येति दर्शयति विशेषशब्दैरिति सम्बन्धः।रसोऽहं इत्याद्यभेदोक्तेरर्थान्तरं सूचयन् तत्रापिविशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह उपासनार्थं चेति। विशेषतः रसादेरिति वर्तते। अर्थवशाद्रसादेरिति सप्तमीत्वेन विपरिणम्यते। रसादयः परमेश्वरोपासने प्रतिमात्वेनात्र विवक्षिताः। प्रतिमायां चाभेदोक्तिः प्रसिद्धा। प्रतिमात्ममबादीनां समानम्। योऽप्सु तिष्ठन् बृ.उ.7।3।4 इत्यादेः। अतः किं विशेषशब्दग्रहणेनेति चेत् अबादिभ्यो विशेषतः रसादिषु भगवदुपासनार्थं तदुपपत्तिरिति।उक्तेऽर्थत्रये प्रमाणमाह उक्तं चेति। तथा चशब्दः अन्योन्यसमुच्चये। एवशब्दस्येश्वर इत्यनेन सम्बन्धः। सर्वत्राबादिषु। ईश्वरो रसादिकं जगदित्युच्यत इत्यर्थः। अबादयोऽबाद्यभिमानिनः। ज्ञानिनां ज्ञानार्थिनां सम्पत्त्यै प्राप्त्यै अन्येषां रसार्थिनाम्। अबादय इति रसादीति च पादयोः सप्तनवाक्षरत्वेऽपि न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति ऐ.ब्रा.1।6 इति वचनाददोषः। स्वभावस्य भगवदधीनत्वमलौकिकमित्यतस्तत्रान्यान्यपि वाक्यानि पठति स्वभाव इति। अस्त्वेवं धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानम् धर्माणां विशेषणोपादानं तु किमर्थमित्यत आह धर्मेति। आदिपदेनपुण्यो गन्धः इत्यस्य ग्रहणम्। कामादिषु विशिष्टंष्वेव भगवानुपास्यः न धर्मविरुद्धेष्वशुचिष्विति ज्ञापनाय कामादीनां धर्माणां धर्माविरुद्धत्वादिविशेषणोपादानमित्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह उक्तं वेति। कामं पुरुषार्थम्। कामरागादेः कामरागादिना। अनिञ्छद्भिः कामादिकम्। गन्धस्य विशेषणोपादाने प्रयोजनान्तरमाह पुण्य इति। पुण्यगन्धस्यैव भगवतो भोगो न दुर्गन्धस्येति ज्ञापयितुमत्र विशेषणोपादानमित्यर्थः। ननु दुर्गन्धं भगवाननुभवति न वा नेति पक्षे सार्वज्ञाभावः आद्ये कथं भोगाभावः उच्यते अनुभूयमाना अपि दुर्गन्धादयो न फलहेतव इत्यभिप्रायः। सुगन्धस्तु सुखहेतुरित्युपपादितम्।शुचिवस्त्वेव भगवतो भोग्यमित्यत्र प्रमाणमाह तथा हीति। अमुमुपासकम्। कुतः तस्य देवत्वात्। तथापि कुतः न ह वै देवमात्रस्य पुण्यभोगनियमे देवोत्तमस्य सुतरां तत्सिद्धि।ऋतं कठो.3।1 इति श्रुतिः कथं प्रकृतोपयोगिनी इत्यत आह ऋतं चेति। कुतः इत्यतः सामान्यविशेषाभिधानादित्याह ऋतमिति। प्रयोगगः शब्दजन्यः। तथा च श्रुतावृतशब्दः पुण्यफलस्योपलक्षक इति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवतो विषयभोगो युक्तः स्यात् न चैवम् तदङ्गीकारे श्रुत्यादिविरोधात्। ऋतं पिबन्तौ इति चात एव छत्रिन्यायेनोपचरितमित्यत आह न चेति। कुतो नेत्यत आह स्थूलेति। श्रुत्यादिषु स्थूलस्य जीवभोग्यस्य विषयस्याभोगोक्तेः सूक्ष्मभोगस्य चाङ्गीकारादिति भावः। सूक्ष्माशने प्रमिते भवेदियं व्यवस्था। तदेव कुतः इत्यत आह आह चेति। गन्धादिषु यो जीवेन्द्रियागोचरः सारभागस्तस्य भोगम्। परमेश्वरोऽस्माच्छारीरादात्मनो जीवादतिशयेन विलक्षणभोग एव भवति। अवतारेषु स्थूलमपि भुङक्ते इतीवशब्दः।ननु प्रविविक्ताहारतरोऽयं जीव एवेत्यत आह न चेति। न हि जीवो जीवादेव विलक्षणाहार इति युज्यत इत्यर्थः। ननु शारीराज्जागरावस्थाज्जीवात्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थः स एव प्रविविक्ताहार इत्यवस्थाभेदोपाधिकं जीवस्य भेदमङ्गीकृत्य व्याख्यास्यामीत्यत आह स्वप्नादिश्चेति।स्वपो नन् अष्टा.3।3।91 इति स्वप्नशब्दः कर्तरि। स्वप्नः सुषुप्तश्च शारीर एव न केवलं जाग्रत् तथाच त्र्यवस्थस्यापि शारीरशब्देन गृहीतत्वात् न ततो भेदः स्वप्नसुषुप्तयोरित्यर्थः। अवस्थात्रयवतोऽपि शारीरत्वं कुतः इत्यत आह शारीर स्त्विति। जाग्रदादिष्वंवस्थासु। अस्तु त्र्यवस्थोऽपि शारीरः तथाप्यस्मादिति विशेषणेनात्र शारीरादिति जाग्रदवस्थो गृह्यते। तस्माच्च स्वप्नाद्यवस्थस्य भेदोक्तिरुक्तविधया सम्भवति। भवत्पक्षेऽपि शारीरादिति जीवे सिद्धेऽस्मादिति विशेषणं व्यर्थं स्यादिति तत्राह अस्मादिति। नैतद्विशेषणसार्थक्यायेश्वरं परित्यज्य जीवोऽत्र ग्राह्यः शारीरादित्येवोक्तावीश्वरस्यापि प्राप्तावीश्वरादेवेश्वरस्य भेदानुपपत्तेः। तद्व्यावृत्त्यर्थं जीवमात्रपरिग्रहाय विशेषणमिति सार्थक्योपपत्तेरित्यर्थः। भवेदेवं यदि शारीरत्वमीश्वरस्यापि स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह शारीराविति। नन्वेवं पक्षद्वयेऽप्युपपत्तावीश्वर एवात्रोच्यते न जीवः इति कुतः विनिगमनमित्यत आह भेदेति। चो हेतौ। भेदश्रुतेः स्वाभाविकभेदरूपे गत्यन्तरे सम्भवति पुरुषभेद एवार्थतया ग्राह्यः न त्ववस्थोपाधिको भेदः।मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये सम्प्रत्ययात् अतो युक्तं विनिगमनम्। न केवलमुक्तव्यवस्था न्यायप्राप्ता किन्त्वागमसिद्धा चेत्याह आह चेति। अभोक्ता च भोक्ता चेत्येतयोर्व्युत्क्रमेणान्धयः।सर्वभूतस्थमात्मानं 6।29 इत्युक्तत्वात्।न त्वहं तेषु 7।12 इति कथमुच्यते इत्यत आह न त्वहमिति।तदनाधारत्वं तदुपजीवनेन स्थित्यभावः। कुत एतत् इत्यत आह उक्तं चेति। न केवलं मुक्तविरोधादिति चार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.8 7.12।।इदं ज्ञानम्। रसोऽहमित्यादिविज्ञानम्। अबादयोऽपि तत एव। तथापि रसादिस्वभावाना सागणां च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियमाकः न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिस्तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति अप्सु रस इत्यादिविशेषशब्दैः। भोगश्च विशेषतो रसादेरिति च उपासनार्थं च।उक्तं च गीताकल्पेरसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च। सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम्। सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः। रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः। अबादयः पार्षदाश्च ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः। रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः इति।स्वभावो जीव एव च।सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् इति च।धर्माविरुद्धःकामरागबिवर्जितम्इत्याद्युपासनार्थम्। उक्तं च गीताकल्पेधर्मारुविद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता। विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता। ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति च इत्यादि पुण्यो गन्ध इति भोगापेक्षया। तथा हि श्रुतिः पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति बृ.उ.1।5।20 ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके कठो.3।1 इत्यादिका। ऋतं च पुण्यम्।ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते इत्यभिधानात्।ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात्सम्प्रयोगगः इति च। नच अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति श्वे.उ.4।6 मुं.3।1।1ऋक्2।3।17।5अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् इत्यादिविरोधि स्थूलानशनोक्तेः। आह च सूक्ष्माशनम्। प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरारादात्मनः।न चात्र जीव उच्यते शारीरादात्मन इति भेदाभिधानात्। स्वप्नादिश्च शारीर एवशारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः इति वचनाद्गारुडे। अस्मादिति त्वीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्।शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौजीवश्चेश्वरसंज्ञितः। अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः इति वचनान्नारदीये भेदश्रुतेश्च। सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यो नत्ववस्थाभेदः। आह च प्रविविक्तभुग्यतो ह्यस्माच्छारीरात्पुरुषोत्तमः। अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात्स एव तु इति गीताकल्पे। न त्वहं तेष्विति तदनाधारत्वमुच्यते। उक्तं च तदाश्रितं जगत्सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः इति गीताकल्पे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.8।।एते सर्वे विलक्षणा भावा मत्त एव उत्पन्नाः मच्छेषभूता मच्छरीरतया मयि एव अवस्थिताः अतः तत्प्रकारः अहम् एव अवस्थितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.8।। रसः अहम् अपां यः सारः स रसः तस्मिन् रसभूते मयि आपः प्रोता इत्यर्थः। एवं सर्वत्र। यथा अहम् अप्सु रसः एवं प्रभा अस्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः ओंकारः सर्ववेदेषु तस्मिन् प्रणवभूते मयि सर्वे वेदाः प्रोताः। तथा खे आकाशे शब्दः सारभूतः तस्मिन् मयि खं प्रोतम्। तथा पौरुषं पुरुषस्य भावः पौरुषं यतः पुंबुद्धिः नृषु तस्मिन् मयि पुरुषाः प्रोताः।।

───────────────────

【 Verse 7.9 】

▸ Sanskrit Sloka: पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ | जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ||

▸ Transliteration: puṇyo gandhaḥ pṛthivyāṃ ca tejaścāsmi vibhāvasau | jīvanaṃ sarvabhūteṣu tapaścāsmi tapasviṣu ||

▸ Glossary: puṇyaḥ: original; gandhaḥ: fragrance; pṛthivyāṃ: in the earth; ca: also; tejaḥ: temperature; ca: also; asmi: I am; vibhāvasau: in the fire; jīvanaṃ: life; sarva: all; bhūteṣu: living entities; tapaḥ: penance; ca: also; asmi: I am; tapasviṣu: in those who practice penance.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.9 I am the original fragrance of the earth, and I am the heat in fire. I am the life of all living beings, and I am the penances of all ascetics.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.9।।पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ अग्निमें तेज मैं हूँ सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.9।। पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.9 पुण्यः sweet? गन्धः fragrance? पृथिव्याम् in earth? च and? तेजः brilliance? च and? अस्मि am (I)? विभावसौ in fire? जीवनम् life? सर्वभूतेषु in all beings? तपः austerity? च and? अस्मि am (I)? तपस्विषु in ascetics.Commentary In Me as odour in the earth woven in Me as brilliance is the fire woven in Me as life all beings are woven in Me as austerity all ascetics are woven. I am the support (Adhishthanam or Asraya) for everything.I am the power or Sakti which helps the ascetics to control the mind and the senses.Krishna says? I am the agreeable odour. If Arjuna had asked Him? Then who is the disagreeable odour? He would have replied? It is also I.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.9. I am the pure smell in the earth; I am also the brilliance in the sun; I am the life in al beings and austerity in the ascetics.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.9 I am the Fragrance of earth, the Brilliance of fire. I am the Life Force in all beings, and I am the Austerity of the ascetics.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.9 I am the pure smell in the earth; I am the brilliance in the fire; I am the life-principle in all beings, and austerity in ascetics.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.9 I am also the sweet fragrance in the earth; I am the brillinace in the fire, and the life in all beings; and I am the austerity of the ascetics.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.9 I am the sweet fragrance in the earth and the brilliance in the fire, the life in all beings, and I am the austerity in ascetics.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.9 Punyah etc. By its own nature pure is that smell which exists in the earth as its exclusive property. The foulness, the excessiveness [of th smell] are due to contamination of other elements. That has been stated [elsewhere] as :

'[A particular thing] becomes hard because of the excess of the properties of the earth; foul-smelling on account of the rise of the fire-properties; and stiff due to liberality (excess) of the properties of water' and so on.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.8 - 7.11 All these entities with their peculiar characteristic are born from Me alone. They depend on Me; inasmuch as they constitute My body, they exist in Me alone. Thus I alone exist while all of them are only My modes.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.9 I am also the punyah, sweet; gandhah, fragrance; prthivyam, in the earth. The earth is dependent on Me who am its fragrance. The natural sweetness of smell in the earth is cited by way of suggesting sweetness of taste of water etc. as well. But foulness of smell etc. is due to contact with particular things, resulting from nescience, unholiness, etc. of worldly people. Ca, and ; asmi, I am; the tejah, brilliance; vibhavasau, in fire; so also (I am) the jivanam, life-that by which all creatures live; sarva-bhutesu, in all beings. And I am the tapah, austerity; tapasvisu, of ascetics. Ascetics are established in Me who am that austerity.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.9।। किस प्रकार परमात्मरूपी सूत्र में नामरूपमय मणि पिरोकर सुन्दर सृष्टिरूप कण्ठाभरण की निर्मिति हुई है इसका वर्णन इन दो श्लोकों में किया गया है। इसके पूर्व भगवान् ने यह कहा था कि परा और अपरा प्रकृतियों के द्वारा मैं ही जगत् का कारण हूँ और मुझसे भिन्न किञ्चिन्मात्र कोई वस्तु नहीं है। वह सनातन तत्त्व क्या है जो सर्वत्र व्याप्त होते हुये भी दृष्टिगोचर नहीं होता इस प्रश्न का उत्तर यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने दिया है।किसी वस्तु का धर्म या स्वरूप वह है जो सदा एक समान बना रहता है और जिसके बिना उस वस्तु का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं हो सकता। यहाँ दिये दृष्टान्त जल में रस सूर्य चन्द्र में प्रकाश समस्त वेदों में प्रणव आकाश में शब्द पृथ्वी में पवित्र गन्ध पुरुषों में पुरुषत्व एवं तपस्वियों में तप आदि ये सब दर्शाते हैं कि आत्मा ही वह तत्त्व है जिसके कारण इन वस्तुओं का अपना विशेष अस्तित्व होता है। संक्षेपत आत्मा समस्त भूतों का जीवन है।भगवान् श्रीकृष्ण कुछ और उदाहरण देते हुये कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.9।।पृथ्वीसारभूते सुरभिगन्धे गन्धतन्मात्रभूते मयि पृथिवी प्रोता। रसादेः पुण्यत्वं स्वभावादेवापुण्यत्वं त्वविद्याधर्माद्यपेक्षं संसारिणां भूतविशेषनिमित्तजं भवति। अग्निसारभूते तेजसि तेजोरुपे मयि विभावसुरग्निः प्रोतः।तथा जीवने सर्वमूतसारभूते आयरुपे अन्नरुपे वा तस्मिंस्तद्रूपे मयि सर्वे भूताः प्रोताः। तपस्विसारभूते तपोरुपे मयि तपस्विनः प्रोताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.9।।पुण्यः सुरभिरविकृतो गन्धः सर्वपृथिवीसामान्यरूपस्तन्मात्राख्यः पृथिव्यामनुस्यूतोऽहम्। चकारो रसादीनामपि पुण्यत्वसमुच्चयार्थः। शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानां हि स्वभावत एव पुण्यत्वमविकृतत्वं प्राणिनामधर्मविशेषात्तु तेषामपुण्यत्वं नतु स्वभावत इति द्रष्टव्यम्। तथा विभावसावग्नौ यत्तेजः सर्वदहनप्रकाशनसामर्थ्यरूपमुष्णस्पर्शसहितं सितभास्वरं रूपं पुण्यं तदहमस्मि। चकाराद्यो वायौ पुण्य उष्णस्पर्शात्तुराणामाप्यायकः शीतस्पर्शः सोऽप्यहमिति द्रष्टव्यम्। सर्वभूतेषु सर्वेषु प्राणिषु जीवनं प्राणधारणमायुरहमस्मि। तद्रूपे मयि सर्वे प्राणिनः प्रोता इत्यर्थः। तपस्विषु नित्यं तपोयुक्तेषु वानप्रस्थादिषु यत्तपः शीतोष्णक्षुत्पिपासादिद्वन्द्वसहनसामर्थ्यरूपं तदहमस्मि। तद्रूपे मयि तपस्विनः प्रोताः विशेषणाभावे विशिष्टाभावात्। तपश्चेति चकारेण चित्तैकाग्र्यमान्तरं जिह्वोपस्थादिनिग्रहलक्षणं बाह्यं च सर्वं तपः समुच्चीयते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.9।।पुण्य इति। रसादिष्वपि द्रष्टव्यम्। अपुण्यस्य सर्वस्याविद्यामात्रविलसितत्वात्। विभावसौ वह्नौ तेजः दहनशक्तिः। जीवन्त्यनेनेति जीवनमन्नं विराजम्। तत्र हि सर्वाणि भूतानि प्रोतानि। अन्ये तु जीवनं आयुरिति व्याचक्षते तपश्चेति। तपो धर्मस्तद्रूपे मयि तपस्विनः प्रोताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.9।।च पुनः पृथिव्यां पुण्यो गन्धोऽस्मि येन गन्धेन पुलिन्द्यादिषु भगवद्रसोत्पत्तिः स्यात् स पुण्यरूपो गन्धस्तत्सम्बन्धेन पृथिव्या गन्धवत्त्वं तद्वत्त्वेनात्रत्यामोदेनाऽऽह्लादकवृन्दावनाधारत्वादिकं चेति भावः। तथा विभावसौ अग्नौ यत्तेजस्तापकत्वं कान्तिस्तदहमस्मि।अत्रायं भावः विप्रयोगतापरूपाग्नेर्ममांशसम्बन्धेनाग्नौ तापस्तेन सर्वपरिपाकं कृत्वा सर्वस्यान्नादेर्मद्भोग्यतासम्पादकत्वं भवतीति भावः। सर्वभूतेषु जीवनं प्राणधारणम् अन्यथा भगवद्वियुक्तानां तेषां तदाधारतां विना कथं स्थितिः स्यात्। तपस्विषु तापप्रयत्नवत्सु तपःक्लेशानन्दरूपोऽस्मि। अन्यथा तदभावे सुखादित्यागेन दुःखे को वा प्रवर्तते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.9।।किंच पुण्य इति। पुण्योऽविकृतो गन्धः। गन्धतन्मात्रं पृथिव्या आश्रयभूतमहमित्यर्थः। यद्वा विभूतिरूपेणाश्रयधत्वस्य विवक्षितत्वात्सुरभिगन्धस्यैवोत्कृष्टतया विभूतित्वात्पुण्यो गन्ध इत्युक्तम्। तथा विभावसावग्नौ यत्तेजः सहजा दीप्तिस्तदहम्। सर्वभूतेषु जीवनं प्राणधारणमायुरहमित्यर्थः। तपस्विषु वानप्रस्थादिषु द्वन्द्वसहनरूपं तपोऽस्मि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.9।।पुण्य इति। सुरभिर्गन्धः पृथिव्यां तेजश्चास्मि विभावसौ। स्पष्टमेव। सर्वभूतेषु जीवनं प्राणनं तपः कायशोधनम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.9।।पृथिवीमें मैं पवित्र गन्ध सुगन्ध हूँ अर्थात् उस सुगन्धरूप मुझ ईश्वरमें पृथिवी पिरोयी हुई है। जल आदिमें रस आदिकी पवित्रताका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ गन्धकी स्वाभाविक पवित्रता ही पृथिवीमें दिखलायी गयी है। गन्धरस आदिमें जो अपवित्रता आ जाती है वह तो सांसारिक पुरुषोंके अज्ञान और अधर्म आदिकी अपेक्षासे एवं भूतविशेषोंके संसर्गसे है ( वह स्वाभाविक नहीं है )। मैं अग्निमें प्रकाश हूँ तथा सब प्राणियोंमें जीवन हूँ अर्थात् जिससे सब प्राणी जीते हैं वह जीवन मैं हूँ और तपस्वियोंमें तप मैं हूँ अर्थात् उस तपरूप मुझ परमात्मामें ( सब ) तपस्वी पिरोये हुए हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.9।। व्याख्या  पुण्यो गन्धः पृथिव्याम् पृथ्वी गन्धतन्मात्रासे उत्पन्न होती है गन्धतन्मात्रारूपसे रहती है और गन्धतन्मात्रामें ही लीन होती है। तात्पर्य है कि गन्धके बिना पृथ्वी कुछ नहीं है। भगवान् कहते हैं कि पृथ्वीमें वह पवित्र गन्ध मैं हूँ।यहाँ गन्धके साथ पुण्यः विशेषण देनेका तात्पर्य है कि गन्धमात्र पृथ्वीमें रहती है। उसमें पुण्य अर्थात् पवित्र गन्ध तो पृथ्वीमें स्वाभाविक रहती है पर दुर्गन्ध किसी विकृतिसे प्रकट होती है।तेजश्चास्मि विभावसौ तेज रूपतन्मात्रासे प्रकट होता है उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। अग्निमें तेज ही तत्त्व है। तेजके बिना अग्नि निस्तत्त्व है कुछ नहीं है। वह तेज मैं ही हूँ।जीवनं सर्वभूतेषु सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक जीवनीशक्ति है प्राणशक्ति है जिससे सब जी रहे हैं। उस प्राणशक्तिसे वे प्राणी कहलाते हैं। प्राणशक्तिके बिना उनमें प्राणिपना कुछ नहीं है। प्राणशक्तिके कारण गाढ़ नींदमें सोता हुआ आदमी भी मुर्देसे विलक्षण दीखता है। वह प्राणशक्ति मैं ही हूँतपश्चास्मि तपस्विषु द्वन्द्वसहिष्णुताको तप कहते हैं। परन्तु वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये कितने ही कष्ट आयें उनमें निर्विकार रहना ही असली तप है। यही तपस्वियोंमें तप है इसीसे वे तपस्वी कहलाते हैं और इसी तपको भगवान् अपना स्वरूप बताते हैं। अगर तपस्वियोंमेंसे ऐसा तप निकाल दिया जाय तो वे तपस्वी नहीं रहेंगे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.9।।पुण्य इति। यो धरायां (S धरायाः) केवलधर्मतया गन्धगुणः स स्वभावपुण्यः। पूत्युत्कटादीनि(SN प्रत्युत्कटत्वादीनि) तु भूतान्तरसंबन्धात्। उक्तं च दृढं भूमिगुणाधिक्याद् दुर्गन्ध्यग्निगुणोदयात्।जडमम्बुगुणौदार्यात् इत्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.9।।मयि सर्वमिदं प्रोतमित्यस्यैव परिमाणार्थं प्रकारान्तरमाह पुण्य इति। पृथिव्यां पुण्यशब्दितो यः सुरभिगन्धः सोऽहमस्मीत्यत्र वाक्यार्थं कथयति तस्मिन्निति। कथं पृथिव्यां गन्धस्य पुण्यत्वं तत्राह पुण्यत्वमिति। यत्तु पृथिव्यां गन्धस्य स्वाभाविकं पुण्यत्वं दर्शितं तदबादिषु रसादेरपि स्वाभाविकपुण्यत्वस्योपलक्षणार्थमित्याह पृथिव्यामिति। प्रथमोत्पन्नाः पञ्चापि गुणाः पुण्या एव सिद्धादिभिरेव भोग्यत्वादिति भावः। कथं तर्हि गन्धादीनामपुण्यत्वप्रतिभानं तत्राह अपुण्यत्वं त्विति। तदेव स्फुटयति संसारिणामिति। गन्धादयः स्वकार्यैर्भूतैः सह परिणममानाः प्राणिनां पापादिवशादपुण्याः संपद्यन्त इत्यर्थः।यच्चाग्नेस्तेजस्तद्भूते मयि श्रोतोऽग्निरित्याह तेज इति। जीवनभूते च मयि सर्वाणि भूतानि प्रोतानीत्याह तथेति। जीवनशब्दार्थमाह येनेति। अन्नरसेनामृताख्येनेत्यर्थः। तपश्चास्मीत्यादेस्तात्पर्यार्थमाह तस्मिन्निति। चित्तैकाग्र्यमनाशकादि वा तपस्तदात्मनीश्वरे प्रोतास्तपस्विनो विशेषणाभावे विशिष्टस्य वस्तुनोऽभावादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.8 7.12।।भूमिः 7।4 इत्यादिनेत्यत्रावधेरनुक्तेःरसोऽहं इत्याद्यपि ज्ञानप्रकरणमिति प्रतीतिः स्यात् तन्निरासाय तत्समाप्तिमाह इदमिति। एतावता ग्रन्थेन ज्ञानं निरूपितमित्यर्थ। कुतोऽत्र ज्ञानप्रकरणस्य समाप्तिः इत्यत आह रसोऽहमिति। इतिशब्दाद्यभावेऽपि प्रकरणान्तरारम्भ एव समाप्तिं गमयिष्यति। अलौकिकमाहात्म्यप्रतिपादनादस्य विज्ञानप्रकरणत्वं ज्ञायत इति भावः।प्रभवादेः इत्युक्तन्यायेनैवरसोऽहं इत्यादेरपि व्याख्यानं सिद्धम्। रसादीनां सत्तादिकारणत्वाद्भोक्तृत्वाच्च भगवान् रसादिरिति। नन्वबादयो धर्मिणो भगवदधीनास्तद्भोग्याश्चेत्यङ्गीक्रियते न वा। नेति पक्षेअहं कृत्स्नस्य 7।6 इत्युक्तविरोधः। आद्ये तुअप्सु रसः इत्यादेर्धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणां ग्रहणस्यानुपपत्तिरित्यतः प्रथमं पक्षं तावदङ्गीकरोति अबादयोऽपीति। धर्मिणोऽपि तदधीना एव तद्भोग्याश्चैव। ननु तत्रोक्तो दोष इत्यतः कारणत्वे तावद्विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह तथापीति। यद्यपि धर्मिणोऽपि भगवदधीना एव तथापि धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानं युज्यत इति शेषः। कथं इत्यत आह रसादीति। रसादयश्च ते स्वभावा अबादीनामनागन्तुकधर्माश्चेति रसादिस्वभावास्तेषां साराणामबादिधर्मेषु सङ्ख्यादिषु श्रेष्ठानां च तेषामेवाबादिस्वभावभूतानां तद्धर्मेषु श्रेष्ठानां च रसादीनामिति यावत्। स्वभावत्वेऽबादीनामिति शेषः। सारत्वेऽबादिधर्मेष्विति शेषः। रसादित्वे चेति चार्थः। स भगवानेव। विशेषतोऽपीत्यस्य व्यावर्त्यं न त्विति। अनुबद्धोऽनुषङ्गसिद्धः। तत्सारत्वादिश्चेति। तस्य रसादेरबादिधर्मेषु सारत्वमबादिस्वभावत्वं रसत्वादिकंचेत्यर्थः। यथा लोके कुविन्दादिः पटादिद्रव्येष्वेव व्यापारवाननुभूयते न तु तदीयेषु गन्धरसादिषु गुणेषु तद्धर्मेषु च गन्धत्वादिषु पृथग्व्यापारवान् किन्तु ते पटादिजन्मानुषङ्गिजन्मान एव। न तथा भगवान्। अपित्वबादेधर्मेषु रसादिषु तद्धर्मेषु च स्वभावत्वादिषु पृथक् प्रयत्नवान् नत्वबादिनियमानुषङ्गिसत्तादिकास्त इति दर्शयितुं विशेषशब्दा उपात्ता इत्यर्थः। भोगपक्षेऽपि प्रयोजनमाह भोगश्चेति। अबादिभोगादप्यतिशयेन रसादेर्भोगः परमेश्वरस्येति दर्शयति विशेषशब्दैरिति सम्बन्धः।रसोऽहं इत्याद्यभेदोक्तेरर्थान्तरं सूचयन् तत्रापि विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह उपासनार्थं चेति। विशेषतः रसादेरिति वर्तते। अर्थवशाद्रसादेरिति सप्तमीत्वेन विपरिणम्यते। रसादयः परमेश्वरोपासने प्रतिमात्वेनात्र विवक्षिताः। प्रतिमायां चाभेदोक्तिः प्रसिद्धा। प्रतिमात्ममबादीनां समानम्। योऽप्सु तिष्ठन् बृ.उ.7।3।4 इत्यादेः। अतः किं विशेषशब्दग्रहणेनेति चेत् अबादिभ्यो विशेषतः रसादिषु भगवदुपासनार्थं तदुपपत्तिरिति।उक्तेऽर्थत्रये प्रमाणमाह उक्तं चेति। तथा चशब्दः अन्योन्यसमुच्चये। एवशब्दस्येश्वर इत्यनेन सम्बन्धः। सर्वत्राबादिषु। ईश्वरो रसादिकं जगदित्युच्यत इत्यर्थः। अबादयोऽबाद्यभिमानिनः। ज्ञानिनां ज्ञानार्थिनां सम्पत्त्यै प्राप्त्यै अन्येषां रसार्थिनाम्। अबादय इति रसादीति च पादयोः सप्तनवाक्षरत्वेऽपि न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति ऐ.ब्रा.1।6 इति वचनाददोषः। स्वभावस्य भगवदधीनत्वमलौकिकमित्यतस्तत्रान्यान्यपि वाक्यानि पठति स्वभाव इति। अस्त्वेवं धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानम् धर्माणां विशेषणोपादानं तु किमर्थमित्यत आह धर्मेति। आदिपदेनपुण्यो गन्धः इत्यस्य ग्रहणम्। कामादिषु विशिष्टंष्वेव भगवानुपास्यः न धर्मविरुद्धेष्वशुचिष्विति ज्ञापनाय कामादीनां धर्माणां धर्माविरुद्धत्वादिविशेषणोपादानमित्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह उक्तं वेति। कामं पुरुषार्थम्। कामरागादेः कामरागादिना। अनिञ्छद्भिः कामादिकम्। गन्धस्य विशेषणोपादाने प्रयोजनान्तरमाह पुण्य इति। पुण्यगन्धस्यैव भगवतो भोगो न दुर्गन्धस्येति ज्ञापयितुमत्र विशेषणोपादानमित्यर्थः। ननु दुर्गन्धं भगवाननुभवति न वा नेति पक्षे सार्वज्ञाभावः आद्ये कथं भोगाभावः उच्यते अनुभूयमाना अपि दुर्गन्धादयो न फलहेतव इत्यभिप्रायः। सुगन्धस्तु सुखहेतुरित्युपपादितम्।शुचिवस्त्वेव भगवतो भोग्यमित्यत्र प्रमाणमाह तथा हीति। अमुमुपासकम्। कुतः तस्य देवत्वात्। तथापि कुतः न ह वै देवमात्रस्य पुण्यभोगनियमे देवोत्तमस्य सुतरां तत्सिद्धि।ऋतं कठो.3।1 इति श्रुतिः कथं प्रकृतोपयोगिनी इत्यत आह ऋतं चेति। कुतः इत्यतः सामान्यविशेषाभिधानादित्याह ऋतमिति। प्रयोगगः शब्दजन्यः। तथा च श्रुतावृतशब्दः पुण्यफलस्योपलक्षक इति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवतोविषयभोगो युक्तः स्यात् न चैवम् तदङ्गीकारे श्रुत्यादिविरोधात्। ऋतं पिबन्तौ इति चात एव छत्रिन्यायेनोपचरितमित्यत आह न चेति। कुतो नेत्यत आह स्थूलेति। श्रुत्यादिषु स्थूलस्य जीवभोग्यस्य विषयस्याभोगोक्तेः सूक्ष्मभोगस्य चाङ्गीकारादिति भावः। सूक्ष्माशने प्रमिते भवेदियं व्यवस्था। तदेव कुतः इत्यत आह आह चेति। गन्धादिषु यो जीवेन्द्रियागोचरः सारभागस्तस्य भोगम्। परमेश्वरोऽस्माच्छारीरादात्मनो जीवादतिशयेन विलक्षणभोग एव भवति। अवतारेषु स्थूलमपि भुङक्ते इतीवशब्दः।ननु प्रविविक्ताहारतरोऽयं जीव एवेत्यत आह न चेति। न हि जीवो जीवादेव विलक्षणाहार इति युज्यत इत्यर्थः। ननु शारीराज्जागरावस्थाज्जीवात्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थः स एव प्रविविक्ताहार इत्यवस्थाभेदोपाधिकं जीवस्य भेदमङ्गीकृत्य व्याख्यास्यामीत्यत आह स्वप्नादिश्चेति।स्वपो नन् अष्टा.3।3।91 इति स्वप्नशब्दः कर्तरि। स्वप्नः सुषुप्तश्च शारीर एव न केवलं जाग्रत् तथाच त्र्यवस्थस्यापि शारीरशब्देन गृहीतत्वात् न ततो भेदः स्वप्नसुषुप्तयोरित्यर्थः। अवस्थात्रयवतोऽपि शारीरत्वं कुतः इत्यत आह शारीर स्त्विति। जाग्रदादिष्वंवस्थासु। अस्तु त्र्यवस्थोऽपि शारीरः तथाप्यस्मादिति विशेषणेनात्र शारीरादिति जाग्रदवस्थो गृह्यते। तस्माच्च स्वप्नाद्यवस्थस्य भेदोक्तिरुक्तविधया सम्भवति। भवत्पक्षेऽपि शारीरादिति जीवे सिद्धेऽस्मादिति विशेषणं व्यर्थं स्यादिति तत्राह अस्मादिति। नैतद्विशेषणसार्थक्यायेश्वरं परित्यज्य जीवोऽत्र ग्राह्यः शारीरादित्येवोक्तावीश्वरस्यापि प्राप्तावीश्वरादेवेश्वरस्य भेदानुपपत्तेः। तद्व्यावृत्त्यर्थं जीवमात्रपरिग्रहाय विशेषणमिति सार्थक्योपपत्तेरित्यर्थः। भवेदेवं यदि शारीरत्वमीश्वरस्यापि स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह शारीराविति। नन्वेवं पक्षद्वयेऽप्युपपत्तावीश्वर एवात्रोच्यते न जीवः इति कुतः विनिगमनमित्यत आह भेदेति। चो हेतौ। भेदश्रुतेः स्वाभाविकभेदरूपे गत्यन्तरे सम्भवति पुरुषभेद एवार्थतया ग्राह्यः न त्ववस्थोपाधिको भेदः।मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये सम्प्रत्ययात् अतो युक्तं विनिगमनम्। न केवलमुक्तव्यवस्था न्यायप्राप्ता किन्त्वागमसिद्धा चेत्याह आह चेति। अभोक्ता च भोक्ता चेत्येतयोर्व्युत्क्रमेणान्धयः।सर्वभूतस्थमात्मानं 6।29 इत्युक्तत्वात्।न त्वहं तेषु 7।12 इति कथमुच्यते इत्यत आह न त्वहमिति। तदनाधारत्वं तदुपजीवनेन स्थित्यभावः। कुत एतत् इत्यत आह उक्तं चेति। न केवलं मुक्तविरोधादिति चार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.8 7.12।।इदं ज्ञानम्। रसोऽहमित्यादिविज्ञानम्। अबादयोऽपि तत एव। तथापि रसादिस्वभावाना सागणां च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियमाकः न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिस्तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति अप्सु रस इत्यादिविशेषशब्दैः। भोगश्च विशेषतो रसादेरिति च उपासनार्थं च।उक्तं च गीताकल्पेरसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च। सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम्। सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः। रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः। अबादयः पार्षदाश्च ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः। रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः इति।स्वभावो जीव एव च।सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् इति च।धर्माविरुद्धःकामरागबिवर्जितम्इत्याद्युपासनार्थम्। उक्तं च गीताकल्पेधर्मारुविद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता। विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता। ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति च इत्यादि पुण्यो गन्ध इति भोगापेक्षया। तथा हि श्रुतिः पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति बृ.उ.1।5।20 ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके कठो.3।1 इत्यादिका। ऋतं च पुण्यम्।ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते इत्यभिधानात्।ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात्सम्प्रयोगगः इति च। नच अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति श्वे.उ.4।6 मुं.3।1।1ऋक्2।3।17।5अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् इत्यादिविरोधि स्थूलानशनोक्तेः। आह च सूक्ष्माशनम्। प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरारादात्मनः।न चात्र जीव उच्यते शारीरादात्मन इति भेदाभिधानात्। स्वप्नादिश्च शारीर एवशारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः इति वचनाद्गारुडे। अस्मादिति त्वीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्।शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः। अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः इति वचनान्नारदीये भेदश्रुतेश्च। सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यो नत्ववस्थाभेदः। आह च प्रविविक्तभुग्यतो ह्यस्माच्छारीरात्पुरुषोत्तमः। अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात्स एव तु इति गीताकल्पे। न त्वहं तेष्विति तदनाधारत्वमुच्यते। उक्तं च तदाश्रितं जगत्सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः इति गीताकल्पे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.9।।एते सर्वे विलक्षणा भावा मत्त एव उत्पन्नाः मच्छेषभूता मच्छरीरतया मयि एव अवस्थिताः अतः तत्प्रकारः अहम् एव अवस्थितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.9।। पुण्यः सुरभिः गन्धः पृथिव्यां च अहम् तस्मिन् मयि गन्धभूते पृथिवी प्रोता। पुण्यत्वं गन्धस्य स्वभावत एव पृथिव्यां दर्शितम् अबादिषु रसादेः पुण्यत्वोपलक्षणार्थम्। अपुण्यत्वं तु गन्धादीनाम् अविद्याधर्माद्यपेक्षं संसारिणां भूतविशेषसंसर्गनिमित्तं भवति। तेजश्च दीप्तिश्च अस्मि विभावसौ अग्नौ। तथा जीवनं सर्वभूतेषु येन जीवन्ति सर्वाणि भूतानि तत् जीवनम्। तपश्च अस्मि तपस्विषु तस्मिन् तपसि मयि तपस्विनः प्रोताः।।

───────────────────

【 Verse 7.10 】

▸ Sanskrit Sloka: बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् | बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ||

▸ Transliteration: bījaṃ māṃ sarvabhūtānāṃ viddhi pārtha sanātanam | buddhirbuddhimatāmasmi tejastejasvināmaham ||

▸ Glossary: bī jaṃ: the seed; māṃ: Me; sarvabhūtānāṃ: of all living entities; viddhi: understand; pārtha: O son of Prithā; sanātanaṃ: original, eternal; buddhiḥ: intelligence; buddhimatāṃ: of the intelligent; asmi: I am; tejaḥ: prowess; tejasvināṃ: of the powerful; ahaṃ: I am

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.10 O Pārtha (son of Prithā), I am the eternal source of all creatures, the intelligence of the intelligent, and the brilliance of all those who are brilliant.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.10।।हे पृथानन्दन सम्पूर्ण प्राणियोंका अनादि बीज मुझे जान। बुद्धिमानोंमें बुद्धि और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.10।। हे पार्थ सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज (कारण) मुझे ही जानो मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.10 बीजम् seed? माम् Me? सर्वभूतानाम् of all beings? विद्धि know? पार्थ O Partha? सनातनम् eternal? बुद्धिः intelligence? बुद्धिमताम् of the intelligent? अस्मि am (I)? तेजः splendour? तेजस्विनाम् of the splendid? अहम् I.Commentary Seed means cause.Tejas also means heroism or bravery.Had Arjuna asked? Who is the seed for Thee? the Lord would have replied? There is no seed for Me. There is no cause for Me. I am the source of everything. I am the causeless Cause. I am the primeval Being.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.10. O son of Prtha ! Know Me as the eternal seed of all beings; I am the intellect of the intellectuals and the brillinace of the brilliant.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.10 Know, O Arjuna, that I am the eternal Seed of being; I am the Intelligence of the intelligent, the Splendour of the resplendent.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.10 Know Me to be, O Arjuna, the primeval seed of all beings. I am the intelligence of the discerning, and the brilliance of the brilliant.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.10 O Partha, know Me to be the eternal Seed of all beings. I am the intellect of the intelligent, I am the courage of the courageous.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.10 Know Me, O Arjuna, as the eternal seed of all beings; I am the intelligence of the intelligent; the splendour of the splendid objects am I.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.10 See Comment under 7.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.8 - 7.11 All these entities with their peculiar characteristic are born from Me alone. They depend on Me; inasmuch as they constitute My body, they exist in Me alone. Thus I alone exist while all of them are only My modes.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.10 O Partha, viddhi, know, mam, Me; to be the sanatanam, eternal; bijam, seed, the source of growth; sarva-bhutanam, of all beings. Besides, I am the buddhih, intellect, the power of discrimination of the mind; buddhimatam, of the intelligent, of people having the power of discrimination. I am the tejah, courage; tejasvinam, of the courageous, of those possessed of that.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.10।। परिपक्व बुद्धि के जिज्ञासुओं के लिये पूर्व के दो श्लोकों में दिये गये उदाहरण तत्त्व को समझने के लिए पर्याप्त हैं किन्तु मन्द बुद्धि के पुरुषों के लिए नहीं। अत यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कुछ और उदाहरण देते हैं। समस्त भूतों का सनातन कारण मैं हूँ। जैसे एक चित्रकार अपने चित्र को और अधिक स्पष्ट और सुन्दर बनाने के लिये नयेनये रंगों का प्रयोग करता है वैसे ही मानो अपने संक्षिप्त कथन से संतुष्ट न होकर भगवान् श्रीकृष्ण और भी अनेक दृष्टान्त देते हैं जिनके द्वारा हम दृश्य जड़ जगत् तथा अदृश्य चेतन आत्मतत्त्व के सम्बन्ध को समझ सकें।बुद्धिमानों की बुद्धि मैं हूँ एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने आदर्शों तथा विचारों के माध्यम से अपने दिव्य स्वरूप को व्यक्त कर पाता है। उस बुद्धिमान् पुरुष के बुद्धि की वास्तविक सार्मथ्य आत्मा के कारण ही संभव है। उसी प्रकार तेजस्वियों का तेज भी आत्मा ही है।दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आत्मा ही बुद्धि उपाधि के द्वारा बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में प्रकट होता है। जैसे विद्युत ही बल्ब में प्रकाश हीटर में उष्णता और रेडियो में संगीत के रूप में व्यक्त होती है।आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.10।।ननु सर्वाणि भूतानि स्वस्वकारणे प्रोतानि खतं तेषां त्वयि प्रोतत्वमित्याशङ्क्याह। बीजं जन्मादिकरणं सर्वभूतानां मां विद्धि जानीहि। यथा सर्वेषां पाण्डवानां युष्माकं साक्षान्माद्या मन्त्रदानेन परम्परया च पृथैव बीजं तथेति द्योतयन्नाह हे पार्थेति। बीजान्तरापेक्षयानवस्थां वारयति। सनातनं चिरन्तरनम्। बुद्धिरन्तःकरणस्य विवेकशक्तिर्बह्य सत्यं जगन्मिथ्येति विवेचनसामर्थ्यं तद्रूपे मयि बुद्धिमन्तः प्रोताः। तथा तेजसि प्रागल्म्यभूते मयि तेजस्विनः प्रोताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.10।।सर्वाणि भूतानि स्वस्वबीजेषु प्रोतानि नतु त्वयीति चेन्नेत्याह यत्सर्वभूतानां स्थावरजङ्गमानामेकं बीजं कारणं सनातनं नित्यं बीजान्तरानपेक्षं नतु प्रतिव्यक्तिभिन्नमनित्यं वा तदव्याकृताख्यं सर्वबीजं मामेव विद्धि नतु मद्भिन्नं हे पार्थ अतो युक्तमेकस्मिन्नेव मयि सर्वबीजे प्रोतत्वं सर्वेषामित्यर्थः। किंच बुद्धिस्तत्त्वातत्त्वविवेकसामर्थ्यं तादृशबुद्धिमतामहमस्मि। बुद्धिरूपे मयि बुद्धिमन्तः प्रोताः। विशेषणाभावे विशिष्टाभावस्योक्तत्वात्। तथा तेजः प्रागल्भ्यं पराभिभवसामर्थ्यं परैश्चानभिभाव्यत्वं तेजस्विनां तथाविधप्रागल्भ्ययुक्तानां यत्तदहमस्मि। तेजोरूपे मयि तेजस्विनः प्रोता इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.10।।बीजं कारणम्। सर्वभूतानां पिण्डब्रह्माण्डात्मकानां बीजे मयि पिण्डादिकं प्रोतम्। कनके कुण्डलादिवत्। सनातनं नित्यं बीजान्तरादनुत्पन्नम्। बुद्धिरूपे मयि बुद्धिमन्तः प्रोताः। तेजः प्रागल्भ्यं तद्रूपे मयि प्रगल्भाः प्रोताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.10।।किञ्चबीजमिति। हे पार्थ मत्कृपाश्रय सर्वभूतानां सनातनं नित्यं बीजं मां विद्धि।अत्रायं भावः पुरुषोत्तमलीलास्थजीवास्तदात्मका एव तदंशा एवात्र प्रकटीकृताः अन्यथा लीलोपयोगिनो न भवेयुः तेन तद्बीजजाता एतेऽपि सेवायोग्या इति सर्वेषां बीजं मां विद्धि तज्ज्ञानं स्वरूपज्ञानप्रयोजकमिति भावः। तथैव बुद्धिमतां मत्स्वरूपज्ञानकुशलप्रयत्नवतां बुद्धिः कौशलमस्मि। तेजस्विनां दुराधर्षिणां तेजो दुराधर्षता अहमस्मि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.10।। किंच बीजमिति। सर्वेषां चराचराणां भूतानां बीजं सजातीयकार्योत्पादनसामर्थ्यं सनातनं नित्यमुत्तरोत्तरसर्वकार्येष्वनुस्यूतं तदेव बीजं मद्विभूतिं विद्धि नतु प्रतिव्यक्ति विनश्यत्। तथा बुद्धिमतां बुद्धिः प्रज्ञाहमस्मि। तेजस्विनां तेजः प्रागल्भ्यमहम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.10।।सर्वभूतानां जीवानां सनातनं यद्बीजं कारणभूतं चैतन्यं तन्मां विद्धि सम्मिश्ररूपमेकं निरूपितम्। बुद्धिमतां तेषां मध्ये या बुद्धिश्चिदात्मिका साऽहमस्मि। तेजस्विनां च तेषां मध्ये तेजोऽस्मि अहमात्मकमित्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.10।।हे पार्थ मुझे तू सब भूतोंका सनातन पुरातन बीज अर्थात् उनकी उत्पत्तिका मूल कारण जान। तथा मैं ही बुद्धिमानोंकी बुद्धि अर्थात् विवेकशक्ति और तेजस्वियों अर्थात् प्रभावशाली पुरुषोंका तेज प्रभाव हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.10।। व्याख्या  बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि (टिप्पणी प0 405) पार्थ सनातनम् हे पार्थ सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातन (अविनाशी) बीज मैं हूँ अर्थात् सबका कारण मैं ही हूँ। सम्पूर्ण प्राणी बीजरूप मेरेसे उत्पन्न होते हैं मेरेमें ही रहते हैं और अन्तमें मेरेमें ही लीन होते हैं। मेरे बिना प्राणीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।जितने बीज होते हैं वे सब वृक्षसे उत्पन्न होते हैं और वृक्ष पैदा करके नष्ट हो जाते हैं। परन्तु यहाँ जिस बीजका वर्णन है वह बीज सनातन है अर्थात् आदिअन्तसे रहित (अनादि एवं अनन्त) है। इसीको नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें अव्यय बीज कहा गया है। यह चेतनतत्त्व अव्यय अर्थात् अविनाशी है। यह स्वयं विकाररहित रहते हुए ही सम्पूर्ण जगत्का उत्पादक आश्रय और प्रकाशक है तथा जगत्का कारण है।गीतामें बीज शब्द कहीं भगवान् और कहीं जीवात्मा दोनोंके लिये आया है। यहाँ जो बीज शब्द आया है वह भगवान्का वाचक है क्योंकि यहाँ कारणरूपसे विभूतियोंका वर्णन है। दसवें अध्यायके उन्तालसीवें श्लोकमें विभूतिरूपसे आया बीज शब्द भी भगवान्का ही वाचक है क्योंकि वहाँ उनको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण कहा गया है। नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें बीज शब्द भगवान्के लिये आया है क्योंकि उसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें सदसच्चाहमर्जुन पदमें कहा गया है कि कार्य और कारण सब मैं ही हूँ। सब कुछ भगवान् ही होनेसे बीज शब्द भगवान्का वाचक है। चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें अहं बीजप्रदः पिता मैं बीज प्रदान करनेवाला पिता हूँ ऐसा होनेसे वहाँ बीज शब्द जीवात्माका वाचक है। बीज शब्द जीवात्माका वाचक तभी होता है जब यह जडके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है नहीं तो यह भगवान्का स्वरूप ही है।बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि बुद्धिमानोंमें बुद्धि मैं हूँ। बुद्धिके कारण ही वे बुद्धिमान् कहलाते हैं। अगर उनमें बुद्धि न रहे तो उनकी बुद्धिमान् संज्ञा ही नहीं रहेगी।तेजस्तेजस्विनामहम् तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। यह तेज दैवीसम्पत्तिका एक गुण है। तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंमें एक विशेष तेज शक्ति रहती है जिसके प्रभावसे दुर्गुणदुराचारी मनुष्य भी सद्गुणसदाचारी बन जाते हैं। यह तेज भगवान्का ही स्वरूप है।विशेष बातभगवान् ही सम्पूर्ण संसारके कारण हैं संसारके रहते हुए भी वे सबमें परिपूर्ण हैं और सब संसारके मिटनेपर भी वे रहते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि सब कुछ भगवान् ही हैं। इसके लिये उपनिषदोंमें सोना मिट्टी और लोहेका दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे सोनेसे बने हुए सब गहने सोना ही हैं मिट्टीसे बने हुए सब बर्तन मिट्टी ही हैं और लोहेसे बने हुए सब अस्त्रशस्त्र लोहा ही हैं ऐसे ही भगवान्से उत्पन्न हुआ सब संसार भगवान् ही है। परन्तु गीतामें भगवान्ने बीजका दृष्टान्त दिया है कि सम्पूर्ण संसारका बीज मैं हूँ। बीज वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको पैदा करके स्वयं नष्ट हो जाता है अर्थात् बीजसे अंकुर निकल आता है अंकुरसे वृक्ष हो जाता है और बीज स्वयं मिट जाता है। परन्तु भगवान्ने अपनेको संसारमात्रका बीज कहते हुए भी यह एक विलक्षण बात बतायी कि मैं अनादि बीज हूँ पैदा हुआ बीज नहीं हूँ बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् (7। 10) और मैं अविनाशी बीज हूँ बीजमव्ययम् (9। 18)। अविनाशी बीज कहनेका मतलब यह है कि संसार मेरेसे पैदा होता है पर मैं मिटता नहीं हूँ जैसाकातैसा ही रहता हूँ।सोना मिट्टी और लोहेके दृष्टान्तमें गहनोंमें सोना दीखता है बर्तनोंमें मिट्टी दीखती है और अस्त्रशस्त्रोंमें लोहा दीखता है पर संसारमें परमात्मा दीखते नहीं। अगर बीजका दृष्टान्त लें तो वृक्षमें बीज नहीं दीखता। जब वृक्षमें बीज आता है तब पता लगता है कि इस वृक्षमें ऐसा बीज है जिससे यह वृक्ष पैदा हुआ है। सम्पूर्ण वृक्ष बीजसे ही निकलता है और बीजमें ही समाप्त हो जाता है। वृक्षका आरम्भ बीजसे होता है और अन्त भी बीजमें ही होता है अर्थात् वह वृक्ष चाहे सौ वर्षोंतक रहे पर उसकी अन्तिम परिणति बीजमें ही होगी बीजके सिवाय और क्या होगा ऐसे ही भगवान् संसारके बीज हैं अर्थात् भगवान्से ही संसार उत्पन्न होता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है। अन्तमें एक भगवान् ही बाकी रहते हैं शिष्यते शेषसंज्ञः (श्रीमद्भा0 10। 3। 25)।वृक्ष दीखते हुए भी यह बीज ही है ऐसा जो जानते हैं वे वृक्षको ठीकठीक जानते हैं और जो बीजको न देखकर केवल वृक्षको देखते हैं वे वृक्षके तत्त्वको नहीं जानते। भगवान् यहाँ बीजं मां सर्वभूतानाम् कहकर सबको यह ज्ञान कराते हैं कि तुम्हारेको जितना यह संसार दीखता है इसके पहले मैं ही था मैं एक ही प्रजारूपसे बहुत रूपोंमें प्रकट हुआ हूँ बहु स्यां प्रजायेय (छान्दोग्य0 6। 2। 3) और इनके समाप्त होनेपर मैं ही रह जाता हूँ। तात्पर्य है कि पहले मैं ही था और पीछे मैं ही रहता हूँ तो बीचमें भी मैं ही हूँ।यह संसार पाञ्चभौतिक भी उन्हींको दीखता है जो विचार करते हैं नहीं तो यह

Chapter 7 (Part 7)

पाञ्चभौतिक भी नहीं दीखता। जैसे कोई कह दे कि ये अपने सबकेसब शरीर पार्थिव (पृथ्वीसे पैदा होनेवाले) हैं इसलिये इनमें मिट्टीकी प्रधानता है तो दूसरा कहेगा कि ये मिट्टी कैसे हैं मिट्टीसे तो हाथ धोते हैं मिट्टी तो रेता होती है अतः ये शरीर मिट्टी नहीं हैं। इस तरह शरीर मिट्टी होता हुआ भी उसको मिट्टी नहीं दीखता। परन्तु यह जितना संसार दीखता है इसको जलाकर राख कर दिया जाय तो अन्तमें एक मिट्टी ही हो जाता है।विचार करें कि इन शरीरोंके मूलमें क्या है माँबापमें जो रजवीर्यरूप अंश होता है जिससे शरीर बनता है वह अंश अन्नसे पैदा होता है। अन्न मिट्टीसे पैदा होता है। अतः ये शरीर मिट्टीसे ही पैदा होते हैं और अन्तमें मिट्टीमें ही लीन हो जाते हैं। अन्तमें शरीरकी तीन गतियाँ होती हैं चाहे जमीनमें गाड़ दिया जाय चाहे जला दिया जाय और चाहे पशुपक्षी खा जायँ। तीनों ही उपायोंसे वह अन्तमें मिट्टी हो जाता है। इस तरह पहले और आखिरमें मिट्टी होनेसे बीचमें भी शरीर या संसार मिट्टी ही है। परन्तु बीचमें यह शरीर या संसार देखनेमें मिट्टी नहीं दीखता। विचार करनेसे ही मिट्टी दीखता है आँखोंसे नहीं। इसी तरह यह संसार विचार करनेसे परमात्मस्वरूप दीखता है। विचार करें तो जब भगवान्ने यह संसार रचा तो कहींसे कोई सामान नहीं मँगवाया जिससे संसारको बनाया हो और बनानेवाला भी दूसरा नहीं हुआ है। भगवान् आप ही संसारको बनानेवाले हैं और आप ही संसार बन गये। शरीरोंकी रचना करके आप ही उनमें प्रविष्ट हो गये तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् (तैत्तिरीयोपनिषद् 2। 6)। इन शरीरोंमें जीवरूपसे भी वे ही परमात्मा हैं। अतः यह संसार भी परमात्माका स्वरूप ही है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.10 7.11।।बीजमिति। बलमिति। बीजं सूक्ष्ममादिकारणम् ( सूक्ष्मादिकारणम्)। कामरागविवर्जितं बलं सकलवस्तुधारणसमर्थम् ऊर्जोरूपम् ( omits रूपम्)। कामः ( S omits कामः) इच्छा संविन्मात्ररूपा यस्या घटपटादिभिर्धर्मरूपैर्नास्ति विरोधः। इच्छा हि सर्वज्ञ भगवच्छक्तितया अनुयायिनी न क्वचिद्विरुध्यते धर्मैस्तु आगन्तुकैर्घटपटादिभिर्भिद्यते ( S घटादिभिर्भि ) इति तदुपासकतया शुद्धसंवित्स्वभावत्वं ज्ञानिनः। उक्तं च शिवोपनिषदि इच्छायामथ वा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् (V 98 ) इतिजाते एव न तु बाह्यप्रसृते इत्यर्थ। एवं व्याख्यानं त्यक्त्वा ये परस्परानुपघातकं त्रिवर्गं सेवेत इत्याशयेन व्याचक्षते ते संप्रदायक्रममजानानाः भगवद्रहस्यं च व्याचक्षणा नमस्कार्या एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.10।।ननु सर्वाणि भूतानि स्वकारणे प्रोतानि कथं तेषां त्वयि प्रोतत्वं तत्राह बीजमिति। बीजान्तरापेक्षयानवस्थां वारयति सनातनमिति। चैतन्यस्याभिव्यञ्जकं तत्त्वनिश्चयसामर्थ्यं बुद्धिस्तद्वतां या बुद्धिस्तद्भूते मयि सर्वे बुद्धिमन्तः प्रोता भवन्तीत्याह कि़ञ्चेति। प्रागल्भ्यवतां यत्प्रागल्भ्यं तद्भूते मयि तद्वन्तः प्रोता इत्याह तेज इति। तद्धि प्रागल्भ्यं यत्पराभिभवसामर्थ्यं परैश्चाप्रधृष्यत्वम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.8 7.12।।भूमिः 7।4 इत्यादिनेत्यत्रावधेरनुक्तेःरसोऽहं इत्याद्यपि ज्ञानप्रकरणमिति प्रतीतिः स्यात् तन्निरासाय तत्समाप्तिमाह इदमिति। एतावता ग्रन्थेन ज्ञानं निरूपितमित्यर्थ। कुतोऽत्र ज्ञानप्रकरणस्य समाप्तिः इत्यत आह रसोऽहमिति। इतिशब्दाद्यभावेऽपि प्रकरणान्तरारम्भ एव समाप्तिं गमयिष्यति। अलौकिकमाहात्म्यप्रतिपादनादस्य विज्ञानप्रकरणत्वं ज्ञायत इति भावः।प्रभवादेः इत्युक्तन्यायेनैवरसोऽहं इत्यादेरपि व्याख्यानं सिद्धम्। रसादीनां सत्तादिकारणत्वाद्भोक्तृत्वाच्च भगवान् रसादिरिति। नन्वबादयो धर्मिणो भगवदधीनास्तद्भोग्याश्चेत्यङ्गीक्रियते न वा। नेति पक्षेअहं कृत्स्नस्य 7।6 इत्युक्तविरोधः। आद्ये तुअप्सु रसः इत्यादेर्धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणां ग्रहणस्यानुपपत्तिरित्यतः प्रथमं पक्षं तावदङ्गीकरोति अबादयोऽपीति। धर्मिणोऽपि तदधीना एव तद्भोग्याश्चैव। ननु तत्रोक्तो दोष इत्यतः कारणत्वे तावद्विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह तथापीति। यद्यपि धर्मिणोऽपि भगवदधीना एव तथापि धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानं युज्यत इति शेषः। कथं इत्यत आह रसादीति। रसादयश्च ते स्वभावा अबादीनामनागन्तुकधर्माश्चेति रसादिस्वभावास्तेषां साराणामबादिधर्मेषु सङ्ख्यादिषु श्रेष्ठानां च तेषामेवाबादिस्वभावभूतानां तद्धर्मेषु श्रेष्ठानां च रसादीनामिति यावत्। स्वभावत्वेऽबादीनामिति शेषः। सारत्वेऽबादिधर्मेष्विति शेषः। रसादित्वे चेति चार्थः। स भगवानेव। विशेषतोऽपीत्यस्य व्यावर्त्यं न त्विति। अनुबद्धोऽनुषङ्गसिद्धः। तत्सारत्वादिश्चेति। तस्य रसादेरबादिधर्मेषु सारत्वमबादिस्वभावत्वं रसत्वादिकंचेत्यर्थः। यथा लोके कुविन्दादिः पटादिद्रव्येष्वेव व्यापारवाननुभूयते न तु तदीयेषु गन्धरसादिषु गुणेषु तद्धर्मेषु च गन्धत्वादिषु पृथग्व्यापारवान् किन्तु ते पटादिजन्मानुषङ्गिजन्मान एव। न तथा भगवान्। अपित्वबादेधर्मेषु रसादिषु तद्धर्मेषु च स्वभावत्वादिषु पृथक् प्रयत्नवान् नत्वबादिनियमानुषङ्गिसत्तादिकास्त इति दर्शयितुं विशेषशब्दा उपात्ता इत्यर्थः। भोगपक्षेऽपि प्रयोजनमाह भोगश्चेति। अबादिभोगादप्यतिशयेन रसादेर्भोगःपरमेश्वरस्येति दर्शयति विशेषशब्दैरिति सम्बन्धः।रसोऽहं इत्याद्यभेदोक्तेरर्थान्तरं सूचयन् तत्रापि विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह उपासनार्थं चेति। विशेषतः रसादेरिति वर्तते। अर्थवशाद्रसादेरिति सप्तमीत्वेन विपरिणम्यते। रसादयः परमेश्वरोपासने प्रतिमात्वेनात्र विवक्षिताः। प्रतिमायां चाभेदोक्तिः प्रसिद्धा। प्रतिमात्ममबादीनां समानम्। योऽप्सु तिष्ठन् बृ.उ.7।3।4 इत्यादेः। अतः किं विशेषशब्दग्रहणेनेति चेत् अबादिभ्यो विशेषतः रसादिषु भगवदुपासनार्थं तदुपपत्तिरिति।उक्तेऽर्थत्रये प्रमाणमाह उक्तं चेति। तथा चशब्दः अन्योन्यसमुच्चये। एवशब्दस्येश्वर इत्यनेन सम्बन्धः। सर्वत्राबादिषु। ईश्वरो रसादिकं जगदित्युच्यत इत्यर्थः। अबादयोऽबाद्यभिमानिनः। ज्ञानिनां ज्ञानार्थिनां सम्पत्त्यै प्राप्त्यै अन्येषां रसार्थिनाम्। अबादय इति रसादीति च पादयोः सप्तनवाक्षरत्वेऽपि न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति ऐ.ब्रा.1।6 इति वचनाददोषः। स्वभावस्य भगवदधीनत्वमलौकिकमित्यतस्तत्रान्यान्यपि वाक्यानि पठति स्वभाव इति। अस्त्वेवं धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानम् धर्माणां विशेषणोपादानं तु किमर्थमित्यत आह धर्मेति। आदिपदेनपुण्यो गन्धः इत्यस्य ग्रहणम्। कामादिषु विशिष्टंष्वेव भगवानुपास्यः न धर्मविरुद्धेष्वशुचिष्विति ज्ञापनाय कामादीनां धर्माणां धर्माविरुद्धत्वादिविशेषणोपादानमित्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह उक्तं वेति। कामं पुरुषार्थम्। कामरागादेः कामरागादिना। अनिञ्छद्भिः कामादिकम्। गन्धस्य विशेषणोपादाने प्रयोजनान्तरमाह पुण्य इति। पुण्यगन्धस्यैव भगवतो भोगो न दुर्गन्धस्येति ज्ञापयितुमत्र विशेषणोपादानमित्यर्थः। ननु दुर्गन्धं भगवाननुभवति न वा नेति पक्षे सार्वज्ञाभावः आद्ये कथं भोगाभावः उच्यते अनुभूयमाना अपि दुर्गन्धादयो न फलहेतव इत्यभिप्रायः। सुगन्धस्तु सुखहेतुरित्युपपादितम्।शुचिवस्त्वेव भगवतो भोग्यमित्यत्र प्रमाणमाह तथा हीति। अमुमुपासकम्। कुतः तस्य देवत्वात्। तथापि कुतः न ह वै देवमात्रस्य पुण्यभोगनियमे देवोत्तमस्य सुतरां तत्सिद्धि।ऋतं कठो.3।1 इति श्रुतिः कथं प्रकृतोपयोगिनी इत्यत आह ऋतं चेति। कुतः इत्यतः सामान्यविशेषाभिधानादित्याह ऋतमिति। प्रयोगगः शब्दजन्यः। तथा च श्रुतावृतशब्दः पुण्यफलस्योपलक्षक इति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवतो विषयभोगो युक्तः स्यात् न चैवम् तदङ्गीकारे श्रुत्यादिविरोधात्। ऋतं पिबन्तौ इति चात एव छत्रिन्यायेनोपचरितमित्यत आह न चेति। कुतो नेत्यत आह स्थूलेति। श्रुत्यादिषु स्थूलस्य जीवभोग्यस्य विषयस्याभोगोक्तेः सूक्ष्मभोगस्य चाङ्गीकारादिति भावः। सूक्ष्माशने प्रमिते भवेदियं व्यवस्था। तदेव कुतः इत्यत आह आह चेति। गन्धादिषु यो जीवेन्द्रियागोचरः सारभागस्तस्य भोगम्। परमेश्वरोऽस्माच्छारीरादात्मनो जीवादतिशयेन विलक्षणभोग एव भवति। अवतारेषु स्थूलमपि भुङक्ते इतीवशब्दः।ननु प्रविविक्ताहारतरोऽयं जीव एवेत्यत आह न चेति। न हि जीवो जीवादेव विलक्षणाहार इति युज्यत इत्यर्थः। ननु शारीराज्जागरावस्थाज्जीवात्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थः स एव प्रविविक्ताहार इत्यवस्थाभेदोपाधिकं जीवस्य भेदमङ्गीकृत्य व्याख्यास्यामीत्यत आह स्वप्नादिश्चेति।स्वपो नन् अष्टा.3।3।91 इति स्वप्नशब्दः कर्तरि। स्वप्नः सुषुप्तश्च शारीर एव न केवलं जाग्रत् तथाच त्र्यवस्थस्यापि शारीरशब्देन गृहीतत्वात् न ततो भेदः स्वप्नसुषुप्तयोरित्यर्थः। अवस्थात्रयवतोऽपि शारीरत्वं कुतः इत्यत आह शारीर स्त्विति। जाग्रदादिष्वंवस्थासु। अस्तु त्र्यवस्थोऽपि शारीरः तथाप्यस्मादिति विशेषणेनात्र शारीरादिति जाग्रदवस्थो गृह्यते। तस्माच्च स्वप्नाद्यवस्थस्य भेदोक्तिरुक्तविधया सम्भवति। भवत्पक्षेऽपि शारीरादिति जीवे सिद्धेऽस्मादिति विशेषणं व्यर्थं स्यादिति तत्राह अस्मादिति। नैतद्विशेषणसार्थक्यायेश्वरं परित्यज्य जीवोऽत्र ग्राह्यः शारीरादित्येवोक्तावीश्वरस्यापि प्राप्तावीश्वरादेवेश्वरस्य भेदानुपपत्तेः। तद्व्यावृत्त्यर्थं जीवमात्रपरिग्रहाय विशेषणमिति सार्थक्योपपत्तेरित्यर्थः। भवेदेवं यदि शारीरत्वमीश्वरस्यापि स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह शारीराविति। नन्वेवं पक्षद्वयेऽप्युपपत्तावीश्वर एवात्रोच्यते न जीवः इति कुतः विनिगमनमित्यत आह भेदेति। चो हेतौ। भेदश्रुतेः स्वाभाविकभेदरूपे गत्यन्तरे सम्भवति पुरुषभेद एवार्थतया ग्राह्यः न त्ववस्थोपाधिको भेदः।मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये सम्प्रत्ययात् अतो युक्तं विनिगमनम्। न केवलमुक्तव्यवस्था न्यायप्राप्ता किन्त्वागमसिद्धा चेत्याह आह चेति। अभोक्ता च भोक्ता चेत्येतयोर्व्युत्क्रमेणान्धयः।सर्वभूतस्थमात्मानं 6।29 इत्युक्तत्वात्।न त्वहं तेषु 7।12 इति कथमुच्यते इत्यत आह न त्वहमिति। तदनाधारत्वं तदुपजीवनेन स्थित्यभावः। कुत एतत् इत्यत आह उक्तं चेति। न केवलं मुक्तविरोधादिति चार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.8 7.12।।इदं ज्ञानम्। रसोऽहमित्यादिविज्ञानम्। अबादयोऽपि तत एव। तथापि रसादिस्वभावाना सागणां च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियमाकः न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिस्तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति अप्सु रस इत्यादिविशेषशब्दैः। भोगश्च विशेषतो रसादेरिति च उपासनार्थं च।उक्तं च गीताकल्पेरसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च। सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम्। सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः। रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः। अबादयः पार्षदाश्च ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः। रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः इति।स्वभावो जीव एव च।सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् इति च।धर्माविरुद्धःकामरागबिवर्जितम्इत्याद्युपासनार्थम्। उक्तं च गीताकल्पेधर्मारुविद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता। विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता। ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति च इत्यादि पुण्यो गन्ध इति भोगापेक्षया। तथा हि श्रुतिः पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति बृ.उ.1।5।20 ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके कठो.3।1 इत्यादिका। ऋतं च पुण्यम्।ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते इत्यभिधानात्।ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात्सम्प्रयोगगः इति च। नच अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति श्वे.उ.4।6 मुं.3।1।1ऋक्2।3।17।5अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् इत्यादिविरोधि स्थूलानशनोक्तेः। आह च सूक्ष्माशनम्। प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरारादात्मनः।न चात्र जीव उच्यते शारीरादात्मन इति भेदाभिधानात्। स्वप्नादिश्च शारीर एवशारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः इति वचनाद्गारुडे। अस्मादिति त्वीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्।शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः। अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः इति वचनान्नारदीये भेदश्रुतेश्च। सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यो नत्ववस्थाभेदः। आह च प्रविविक्तभुग्यतो ह्यस्माच्छारीरात्पुरुषोत्तमः। अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात्स एव तु इति गीताकल्पे। न त्वहं तेष्विति तदनाधारत्वमुच्यते। उक्तं च तदाश्रितं जगत्सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः इति गीताकल्पे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.10।।एते सर्वे विलक्षणा भावा मत्त एव उत्पन्नाः मच्छेषभूता मच्छरीरतया मयि एव अवस्थिताः अतः तत्प्रकारः अहम् एव अवस्थितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.10।। बीजं प्ररोहकारणं मां विद्धि सर्वभूतानां हे पार्थ सनातनं चिरन्तनम्। किञ्च बुद्धिः विवेकशक्तिः अन्तःकरणस्य बुद्धिमतां विवेकशक्तिमताम् अस्मि तेजः प्रागल्भ्यं तद्वतां तेजस्विनाम् अहम्।।

───────────────────

【 Verse 7.11 】

▸ Sanskrit Sloka: बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् | धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||

▸ Transliteration: balaṃ balavatāṃ cāhaṃ kāmarāgavivarjitaṃ | dharmāviruddho bhūteṣu kāmo’smi bharatarṣabha ||

▸ Glossary: balaṃ: strength; balavatāṃ: of the strong; cāham: I am; kāma: desire; rāga: attachment; vivarjitaṃ: devoid of; dharma: religious principle; aviruddhaḥ: not against the religious principles; bhūteṣu: in all beings; kāmaḥ: lust; asmi: I am; Bhārata ṛṣabha: O Lord of the Bhāratas

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.11 I am the strength of the strong, and I am procreative energy in living beings, devoid of lust and in accordance with religious principles, O Bharatarṣabha (Lord of Bhārata).

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.11।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुष्योंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.11।। हे भरत श्रेष्ठ मैं बलवानों का कामना तथा आसक्ति से रहित बल हूँ और सब भूतों में धर्म के अविरुद्ध अर्थात् अनुकूल काम हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.11 बलम् strength? बलवताम् of the strong? अस्मि am (I)? कामरागविवर्जितम् devoid of desire and attachment? धर्माविरुद्धः unopposed to Dharma? भूतेषु in beings? कामः desire? अस्मि am (I)? भरतर्षभ O Lord of the Bharatas.Commentary Kama Desire for those objects that come in contact with the senses.Raga attachment for those objects that come in contact with the senses.I am that strength which is necessary for the bare sustenance of the body. I am not the strength which generates desire and attachment for sensual objects as in the case of worldlyminded persons. I am the desire which is in accordance with the teachings of the scriptures or the code prescribing the duties of life. I am the desire for moderate eating and drinking? etc.? which are,necessary for the sustenance of the body and which help one in the practice of Yoga.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.11. Of the strong, I am the strength that is free from desire and attachment. O best of the Bharatas, in [all] beings I am the desire which is not opposed to attributes.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.11 I am the Strength of the strong, of them who are free from attachment and desire; and, O Arjuna, I am the Desire for righteousness.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.11 In the strong, I am strength, devoid of desire and passion. In all beings, I am the desire which is not forbidden by law (Dharma), O Arjuna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.11 And of the strong I am the strength which is devoid of passion and attachment. Among creatures I am desire which is not contrary to righteousness, O scion of the Bharata dyansty.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.11 Of the strong, I am the strength devoid of desire and attachment, and in (all) beings, I am the desire unopposed to Dharma, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.10-11 Bijam etc. Balam etc. The seed : the subtle prime cause. The strength, free from desire and attachment : It is of the nature of vigour and is capable of supporting all that exist. Deire : the Will, which is nothing but Pure Consciousness and which is not opposed to any of the attributes (its objects) like pot, cloth etc. For, the Will, because it is the [conscious] energy of the Bhagavat, is immanent in all and nowhere is it opposed, eventhough it is being differentiated (i.e. the wills or desires are classified) on account of its attributes like pot, cloth etc., which are [only] accidental. Thus the wise, because they are devoted to this Will, are of the nature of Pure Consciousness. That has been said also in the Sivopanisad as -

'[A man of wisdom] would concentrate his mind on the Will or [Self] Consciousness that arises'. (VB, 98)

[Here in this otation] that arises means 'that has just risen but has not yet spread outside.'

Ignoring this way of interpretation [of the Gita passage] some interpret it so as to bring out the idea 'He would enjoy the group of the three, not hindering mutually'. These (commentators) are ignorant of the customs (karma) sanctioned by the traditions; yet they interpret the secret about the Absolute ! No doubt they deserve [our] salutation.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.8 - 7.11 All these entities with their peculiar characteristic are born from Me alone. They depend on Me; inasmuch as they constitute My body, they exist in Me alone. Thus I alone exist while all of them are only My modes.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.11 I am the balam, strength, ability, virility; balavatam, of the strong. That strength, again, is kama-raga-vivarjitam, devoid of passion and attachment. Kamah is passion, hankering for things not at hand. Ragah is attachment, fondness for things acired. I am the strength that is devoid of them and is necessary merely for the maintenance of the body etc., but not that strength of the worldly which causes hankering and attachment. Further, bhutesu, among creatures; I am that kamah, desire-such desires as for eating, drinking, etc. which are for the mere maintenance of the body and so on; which is dharma-aviruddhah, not contrary to righteousness, not opposed to scriptural injunctions; bharatarsabha, O scion of the Bharata dynasty. Moreover,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.11।। सामान्य बुद्धिमत्ता के और मन्दबुद्धि के लोगों को अनेक उदाहरण देने के पश्चात् यहाँ इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण उस अत्यन्त मेधावी पुरुष के लिये तत्त्व का निर्देश करते हैं जिसमें यह क्षमता हो कि वह इस दिये हुये निर्देश पर सूक्ष्म विचार कर सके।बलवानों का बल मैं हूँ केवल इतने ही कथन में पूर्व कथित दृष्टान्तों की अपेक्षा कोई अधिक विशेषता नहीं दिखाई पड़ती। परन्तु बल शब्द को दिये गये विशेषण से इसको विशेष महत्त्व प्राप्त हो जाता है। सामान्यत मनुष्य में जब कामना व आसक्ति होती है तब वह अथक परिश्रम करते हुये दिखाई देता है और अपनी इच्छित वस्तु को पाने के लिये सम्पूर्ण शक्ति लगा देता है।कामना और आसक्ति इन दो प्रेरक वृत्तियों के बिना किसी बल की हम कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। यद्यपि सतही दृष्टि से काम और राग में हमें भेद नहीं दिखाई देता है तथापि शंकराचार्य अपने भाष्य में उसे स्पष्ट करते हुये कहते हैं. अप्राप्त वस्तु की इच्छा काम है और प्राप्त वस्तु में आसक्ति राग कहलाती है। मन की इन्हीं दो वृत्तियों के कारण व्यक्ति या परिवार समाज या राष्ट्र अपनी सार्मथ्य को प्रकट करते हैं। हड़ताल और दंगे उपद्रव और युद्ध इन सबके पीछे प्रेरक वृत्तियां हैं काम और राग। श्रीकृष्ण कहते हैं मैं बलवानों का काम और राग से वर्जित बल हूँ। स्पष्ट है कि यहाँ सामान्य बल की बात नहीं कही गयी है।इस कथन से मानों उन्हें सन्तोष नहीं होता है और इसलिये वे आगे और कहते हैं प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम मैं हूँ। जिसके कारण वस्तु का अस्तित्व होता है वह उसका धर्म कहलाता है। मनुष्य का अस्तित्व चैतन्य आत्मा के बिना नहीं हो सकता अत वह उसका वास्तविक धर्म या स्वरूप है। व्यवहार में जो विचार भावना और कर्म उसके दिव्य स्वरूप के विरुद्ध नहीं है वे धर्म के अन्तर्गत आते हैं। जिन विचारों एवं कर्मों से अपने आत्मस्वरूप को पहचानने में सहायता मिलती है उन्हें धर्म कहा जाता है और इसके विपरीत कर्म अधर्म कहलाते हैं क्योंकि वे उसकी आत्मविस्मृति को दृढ़ करते हैं। उनके वशीभूत होकर मनुष्य पतित होकर पशुवत् व्यवहार करने लगता है।धर्म की परिभाषा को ध्यान में रखकर इस श्लोक के अध्ययन से उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। धर्म के अविरुद्ध कामना से तात्पर्य साधक की उस इच्छा तथा क्षमता से है जिसके द्वारा वह अपनी दुर्बलताओं को समझकर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करता है और आत्मोन्नति की सीढ़ी पर ऊपर चढ़ता जाता है। भगवान् के कथन को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि मैं साधक नहीं वरन् उसमें स्थित आत्मज्ञान की प्रखर जिज्ञासा हूँ।अब तक के उपदेश तथा दृष्टान्तों का क्या यह अर्थ हुआ कि आत्मा वास्तव में अनात्म जड़ उपाधियों के बन्धन में आ गया है परिच्छिन्न उपाधि अपरिच्छिन्न आत्मा को कैसे सीमित कर सकती है इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.11।।बलं सामर्थ्यमोजस्तस्मिन्कामरागविवर्जिते कामोऽप्राप्तेषु विषयेषु प्राप्त्यभिलाषः रागः प्राप्तेषु तेषु रज्जनात्मकः प्रेम्णोऽतिशयः। क्रोधार्थो वा रागशब्दो व्याख्येयः। अस्मिन्पक्षे लक्षणादोष इति बोध्यम्। तद्रहिते देहधारणमात्रप्रयोजने बलभूते मयि बलवन्तः प्रोताः। तथा धर्मेण शास्त्रविहितेनाविरुद्धे देहधारणार्थेऽशनपानादिविषये कामे तद्रूपे मयि कामवतां भूतानां प्रोतत्वम्। भरतर्षमेति संबोधयन् भरतैः क्षत्रियवरैः सेवितं युद्धात्मकधर्मस्य साधकं कामरागविवर्जितं क्षत्रधर्मेण युद्धेन देहधारणमात्रप्रयोजनकं मद्विभूत्यात्मकं बलं स्वधर्मेण शत्रून्विजित्य धर्माविरुद्धं अन्नपानादिविषयं कामं च मद्विभूतिरुपं भरतानां मध्ये श्रेष्टत्वं त्युक्तुं नार्हसीति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.11।।अप्राप्तो विषयः प्राप्तिकारणाभावेऽपि प्राप्यतामित्याकारश्चित्तवृत्तिविशेषः कामः प्राप्तो विषयः क्षयकारणे सत्यपि न क्षीयतामित्येवमाकारश्चित्तवृत्तिविशेषो रञ्जनात्मा रागस्ताभ्यां विशेषेण वर्जितं सर्वथा तदाकाररजस्तमोविरहितं यत्स्वधर्मानुष्ठानाय देहेन्द्रियादिधारणसामर्थ्यं सात्त्विकं बलं बलवतां तादृशसात्त्विकबलयुक्तानां संसारपराङ्मुखानां तदहमस्मि। तद्रूपे मयि बलवन्तः प्रोता इत्यर्थः। चशब्दस्तुशब्दार्थे भिन्नक्रमः। कामरागविवर्जितमेव बलं मद्रूपत्वेन ध्येयं नतु संसारिणां कामरागकारणं बलमित्यर्थः। क्रोधार्थो वा रागशब्दो व्याख्येयः। धर्मो धर्मशास्त्रं तेनाविरुद्धोऽप्रतिषिद्धो धर्मानुकूलो वा यो भूतेषु प्राणिषु कामः शास्त्रानुमतजायापुत्रवित्तादिविषयोऽभिलाषः सोऽहमस्मि। हे भरतर्षभ शास्त्राविरुद्धकामभूते मयितथाविधकामयुक्तानां भूतानां प्रोतत्वमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.11।।बलरूपे मयि बलवन्तः प्रोताः। कामरागविवर्जितं कामस्तृष्णा रागो रञ्जना। तौ हि आविद्यकौ। अतो निरवद्यस्य बलं तद्वर्जितम्। एवं धर्माविरुद्धकामरूपे मयि ईदृशाः कामवन्तः प्रोताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.11।।किञ्च बलवतां मद्वशीकरणलक्षणवतां बलं वशीकरणलक्षणमहम्। चकारेण तद्रूपोऽपि। कीदृशं बलं कामरागविवर्जितं वशीकृते मयि स्वाभिलाषत्वं स्वरञ्जनादिवर्जनम् किन्तु मदभिलाषादिभावः। तथा हे भरतर्षभ सत्कुलोत्पन्न तथा कामभावयोग्य धर्माविरुद्धः धर्मेण अविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि। अत्रायं भावः लौकिककामस्तु धर्मविरुद्धोऽस्ति यतोऽयं रसः स्वाऽविवाहितायामेव भवति प्रकटः सर्वधर्मविरुद्ध एव। अलौकिकस्तु रसात्मको धर्मरूप इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.11।।किंच बलमिति। कामोऽप्राप्ते वस्तुन्यभिलाषो राजसः रागः पुनरभिलषितेऽर्थे प्राप्तेऽपि पुनरधिकेऽर्थे चित्तरञ्जनात्मकस्तृष्णापरपर्यायस्तामसः ताभ्यां विवर्जितं बलवतां बलमस्मि। सात्त्विकं स्वधर्मानुष्ठानसामर्थ्यमहमित्यर्थः। स्वधर्मेणाविरुद्धः स्वदारेषु पुत्रोत्पत्तिमात्रोपयोगी कामोऽहम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.11।।बलमिति। क्रियाशक्तिरूपं तदपि न प्रवृत्त्यात्मकमित्याह कामरागाविवर्जितमिति। तथैव कामोऽस्मि स च लोके धर्मविरोधीति तद्व्यावृत्त्यर्थमाह धर्माविरुद्ध इति। एते सप्तसप्त तत्तद्वयभेदा निरूपिताः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.11।।बलवानोंका जो कामना और आसक्तिसे रहित बल ओज सामर्थ्य है वह मैं हूँ। ( अभिप्राय यह कि ) अप्राप्त विषयोंकी जो तृष्णा है उसका नाम काम है और प्राप्त विषयोंमें जो प्रीतितन्मयता है उसका नाम राग है उन दोनोंसे रहित केवल देह आदिको धारण करनेके लिये जो बल है वह मैं हूँ। जो संसारी जीवोंका बल कामना और आसक्तिका कारण है वह मैं नहीं हूँ। तथा हे भरतश्रेष्ठ प्राणियोंमें जो धर्मसे अविरुद्ध शास्त्रानुकूल कामना है जैसे देहधारणमात्रके लिये खानेपीनेकी इच्छा आदि वह ( इच्छारूप) काम भी मैं ही हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.11।। व्याख्या  बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् कठिनसेकठिन काम करते हुए भी अपने भीतर एक कामनाआसक्तिरहित शुद्ध निर्मल उत्साह रहता है। काम पूरा होनेपर भी मेरा कार्य शास्त्र और धर्मके अनुकूल है तथा लोकमर्यादाके अनुसार सन्तजनानुमोदित है ऐसे विचारसे मनमें एक उत्साह रहता है। इसका नाम बल है। यह बल भगवान्का ही स्वरूप है। अतः यह बल ग्राह्य है।गीतामें भगवान्ने खुद ही बलकी व्याख्या कर दी है। सत्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कामरागबलान्विताः पदमें आया बल कामना और आसक्तिसे युक्त होनेसे दुराग्रह और हठका वाचक है। अतः यह बल भगवान्का स्वरूप नहीं है प्रत्युत आसुरी सम्पत्ति होनेसे त्याज्य है। ऐसे ही सिद्धोऽहं बलवान्सुखी (गीता 16। 14) और अहंकारं बलं दर्पम् (गीता 16। 18 18। 53) पदोंमें आया बल भी त्याज्य है। छठे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें बलवद्दृढम् पदमें आया बल शब्द मनका विशेषण है। वह बल भी आसुरी सम्पत्तिका ही है क्योंकि उसमें कामना और आसक्ति है। परन्तु यहाँ (7। 11 में) जो बल आया है वह कामना और आसक्तिसे रहित है इसलिये यह सात्त्विक उत्साहका वाचक है और ग्राह्य है। सत्रहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आयुःसत्त्वबलारोग्य ৷৷. पदमें आया बल शब्द भी इसी सात्त्विक बलका वाचक है।धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन मनुष्योंमें (टिप्पणी प0 407.1) धर्मसे अविरुद्ध अर्थात् धर्मयुक्त काम (टिप्पणी प0 407.2) मेरा स्वरूप है। कारण कि शास्त्र और लोकमर्यादाके अनुसार शुभभावसे केवल सन्तानउत्पत्तिके लिये जो काम होता है वह काम मनुष्यके अधीन होता है। परंतु आसक्ति कामना सुखभोग आदिके लिये जो काम होता है उस काममें मनुष्य पराधीन हो जाता है और उसके वशमें होकर वह न करनेलायक शास्त्रविरुद्ध काममें प्रवृत्त हो जाता है। शास्त्रविरुद्ध काम पतनका तथा सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका हेतु होता है।कृत्रिम उपायोंसे सन्ततिनिरोध कराकर केवल भोगबुद्धिसे काममें प्रवृत्त होना महान् नरकोंका दरवाजा है। जो सन्तानकी उत्पत्ति कर सके वह पुरुष कहलाता है और जो गर्भ धारण कर सके वह स्त्री कहलाती है (टिप्पणी प0 407.3)। अगर पुरुष और स्त्री आपरेशनके द्वारा अपनी सन्तानोत्पत्ति करनेकी योग्यता(पुरुषत्व और स्त्रीत्व) को नष्ट कर देते हैं वे दोनों ही हिजड़े कहलानेयोग्य हैं। नपुंसक होनेके कारण देवकार्य (हवनपूजन आदि) और पितृकार्य (श्राद्धतर्पण) में उनका अधिकार नहीं रहता (टिप्पणी प0 407.4)। स्त्रीमें मातृशक्ति नष्ट हो जानेके कारण उसके लिये परम आदरणीय एवं प्रिय माँ सम्बोधनका प्रयोग भी नहीं किया जा सकता। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह या तो शास्त्र और लोकमर्यादाके अनुसार केवल सन्तानोत्पत्तिके लिये कामका सेवन करे अथवा ब्रह्मचर्यका पालन करे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.10 7.11।।बीजमिति। बलमिति। बीजं सूक्ष्ममादिकारणम् ( सूक्ष्मादिकारणम्)। कामरागविवर्जितं बलं सकलवस्तुधारणसमर्थम् ऊर्जोरूपम् ( omits रूपम्)। कामः ( S omits कामः) इच्छा संविन्मात्ररूपा यस्या घटपटादिभिर्धर्मरूपैर्नास्ति विरोधः। इच्छा हि सर्वज्ञ भगवच्छक्तितया अनुयायिनी न क्वचिद्विरुध्यते धर्मैस्तु आगन्तुकैर्घटपटादिभिर्भिद्यते ( S घटादिभिर्भि ) इति तदुपासकतया शुद्धसंवित्स्वभावत्वं ज्ञानिनः। उक्तं च शिवोपनिषदि इच्छायामथ वा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् (V 98 ) इतिजाते एव न तु बाह्यप्रसृते इत्यर्थ। एवं व्याख्यानं त्यक्त्वा ये परस्परानुपघातकं त्रिवर्गं सेवेत इत्याशयेन व्याचक्षते ते संप्रदायक्रममजानानाः भगवद्रहस्यं च व्याचक्षणा नमस्कार्या एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.11।।यच्च बलवतां बलं तद्भूते मयि तेषां प्रोतत्वमित्याह बलमिति। कामक्रोधादिपूर्वकस्यापि बलस्यानुमतिं वारयति तच्चेति। कामरागयोरेकार्थत्वमाशङ्क्यार्थभेदमावेदयति कामस्तृष्णेत्यादिना। विशेषणसामर्थ्यसिद्धं व्यावर्त्य दर्शयति नत्विति। शास्त्रार्थाविरुद्धकामभूते मयि तथाविधकामवतां भूतानां प्रोतत्वं विवक्षित्वाह कि़ञ्चेति। धर्माविरुद्धं काममुदाहरति यथेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.8 7.12।।भूमिः 7।4 इत्यादिनेत्यत्रावधेरनुक्तेःरसोऽहं इत्याद्यपि ज्ञानप्रकरणमिति प्रतीतिः स्यात् तन्निरासाय तत्समाप्तिमाह इदमिति। एतावता ग्रन्थेन ज्ञानं निरूपितमित्यर्थ। कुतोऽत्र ज्ञानप्रकरणस्य समाप्तिः इत्यत आह रसोऽहमिति। इतिशब्दाद्यभावेऽपि प्रकरणान्तरारम्भ एव समाप्तिं गमयिष्यति। अलौकिकमाहात्म्यप्रतिपादनादस्य विज्ञानप्रकरणत्वं ज्ञायत इति भावः।प्रभवादेः इत्युक्तन्यायेनैवरसोऽहं इत्यादेरपि व्याख्यानं सिद्धम्। रसादीनां सत्तादिकारणत्वाद्भोक्तृत्वाच्च भगवान् रसादिरिति। नन्वबादयो धर्मिणो भगवदधीनास्तद्भोग्याश्चेत्यङ्गीक्रियते न वा। नेति पक्षेअहं कृत्स्नस्य 7।6 इत्युक्तविरोधः। आद्ये तुअप्सु रसः इत्यादेर्धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणां ग्रहणस्यानुपपत्तिरित्यतः प्रथमं पक्षं तावदङ्गीकरोति अबादयोऽपीति। धर्मिणोऽपि तदधीना एव तद्भोग्याश्चैव। ननु तत्रोक्तो दोष इत्यतः कारणत्वे तावद्विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह तथापीति। यद्यपि धर्मिणोऽपि भगवदधीना एव तथापि धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानं युज्यत इति शेषः। कथं इत्यत आह रसादीति। रसादयश्च ते स्वभावा अबादीनामनागन्तुकधर्माश्चेति रसादिस्वभावास्तेषां साराणामबादिधर्मेषु सङ्ख्यादिषु श्रेष्ठानां च तेषामेवाबादिस्वभावभूतानां तद्धर्मेषु श्रेष्ठानां च रसादीनामिति यावत्। स्वभावत्वेऽबादीनामिति शेषः। सारत्वेऽबादिधर्मेष्विति शेषः। रसादित्वे चेति चार्थः। स भगवानेव। विशेषतोऽपीत्यस्य व्यावर्त्यं न त्विति। अनुबद्धोऽनुषङ्गसिद्धः। तत्सारत्वादिश्चेति। तस्य रसादेरबादिधर्मेषु सारत्वमबादिस्वभावत्वं रसत्वादिकंचेत्यर्थः। यथा लोके कुविन्दादिः पटादिद्रव्येष्वेव व्यापारवाननुभूयते न तु तदीयेषु गन्धरसादिषु गुणेषु तद्धर्मेषु च गन्धत्वादिषु पृथग्व्यापारवान् किन्तु ते पटादिजन्मानुषङ्गिजन्मान एव। न तथा भगवान्। अपित्वबादेधर्मेषु रसादिषु तद्धर्मेषु च स्वभावत्वादिषु पृथक् प्रयत्नवान् नत्वबादिनियमानुषङ्गिसत्तादिकास्त इति दर्शयितुं विशेषशब्दा उपात्ता इत्यर्थः। भोगपक्षेऽपि प्रयोजनमाह भोगश्चेति। अबादिभोगादप्यतिशयेन रसादेर्भोगः परमेश्वरस्येति दर्शयति विशेषशब्दैरिति सम्बन्धः।रसोऽहं इत्याद्यभेदोक्तेरर्थान्तरं सूचयन् तत्रापि विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह उपासनार्थं चेति। विशेषतः रसादेरिति वर्तते। अर्थवशाद्रसादेरिति सप्तमीत्वेन विपरिणम्यते। रसादयः परमेश्वरोपासने प्रतिमात्वेनात्र विवक्षिताः। प्रतिमायां चाभेदोक्तिः प्रसिद्धा। प्रतिमात्ममबादीनां समानम्। योऽप्सु तिष्ठन् बृ.उ.7।3।4 इत्यादेः। अतः किं विशेषशब्दग्रहणेनेति चेत् अबादिभ्यो विशेषतः रसादिषु भगवदुपासनार्थं तदुपपत्तिरिति।उक्तेऽर्थत्रये प्रमाणमाह उक्तं चेति। तथा चशब्दः अन्योन्यसमुच्चये। एवशब्दस्येश्वर इत्यनेन सम्बन्धः। सर्वत्राबादिषु। ईश्वरो रसादिकं जगदित्युच्यत इत्यर्थः। अबादयोऽबाद्यभिमानिनः। ज्ञानिनां ज्ञानार्थिनां सम्पत्त्यै प्राप्त्यै अन्येषां रसार्थिनाम्। अबादय इति रसादीति च पादयोः सप्तनवाक्षरत्वेऽपि न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति ऐ.ब्रा.1।6 इति वचनाददोषः। स्वभावस्य भगवदधीनत्वमलौकिकमित्यतस्तत्रान्यान्यपि वाक्यानि पठति स्वभाव इति। अस्त्वेवं धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानम् धर्माणां विशेषणोपादानं तु किमर्थमित्यत आह धर्मेति। आदिपदेनपुण्यो गन्धः इत्यस्य ग्रहणम्। कामादिषु विशिष्टंष्वेव भगवानुपास्यः न धर्मविरुद्धेष्वशुचिष्विति ज्ञापनाय कामादीनां धर्माणां धर्माविरुद्धत्वादिविशेषणोपादानमित्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह उक्तं वेति। कामं पुरुषार्थम्। कामरागादेः कामरागादिना। अनिञ्छद्भिः कामादिकम्। गन्धस्य विशेषणोपादाने प्रयोजनान्तरमाह पुण्य इति। पुण्यगन्धस्यैव भगवतो भोगो न दुर्गन्धस्येति ज्ञापयितुमत्र विशेषणोपादानमित्यर्थः। ननु दुर्गन्धं भगवाननुभवति न वा नेति पक्षे सार्वज्ञाभावः आद्ये कथं भोगाभावः उच्यते अनुभूयमाना अपि दुर्गन्धादयो न फलहेतव इत्यभिप्रायः। सुगन्धस्तु सुखहेतुरित्युपपादितम्।शुचिवस्त्वेव भगवतो भोग्यमित्यत्र प्रमाणमाह तथा हीति। अमुमुपासकम्। कुतः तस्य देवत्वात्। तथापि कुतः न ह वै देवमात्रस्य पुण्यभोगनियमे देवोत्तमस्य सुतरां तत्सिद्धि।ऋतं कठो.3।1 इति श्रुतिः कथं प्रकृतोपयोगिनी इत्यत आह ऋतं चेति। कुतः इत्यतः सामान्यविशेषाभिधानादित्याह ऋतमिति।प्रयोगगः शब्दजन्यः। तथा च श्रुतावृतशब्दः पुण्यफलस्योपलक्षक इति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवतो विषयभोगो युक्तः स्यात् न चैवम् तदङ्गीकारे श्रुत्यादिविरोधात्। ऋतं पिबन्तौ इति चात एव छत्रिन्यायेनोपचरितमित्यत आह न चेति। कुतो नेत्यत आह स्थूलेति। श्रुत्यादिषु स्थूलस्य जीवभोग्यस्य विषयस्याभोगोक्तेः सूक्ष्मभोगस्य चाङ्गीकारादिति भावः। सूक्ष्माशने प्रमिते भवेदियं व्यवस्था। तदेव कुतः इत्यत आह आह चेति। गन्धादिषु यो जीवेन्द्रियागोचरः सारभागस्तस्य भोगम्। परमेश्वरोऽस्माच्छारीरादात्मनो जीवादतिशयेन विलक्षणभोग एव भवति। अवतारेषु स्थूलमपि भुङक्ते इतीवशब्दः।ननु प्रविविक्ताहारतरोऽयं जीव एवेत्यत आह न चेति। न हि जीवो जीवादेव विलक्षणाहार इति युज्यत इत्यर्थः। ननु शारीराज्जागरावस्थाज्जीवात्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थः स एव प्रविविक्ताहार इत्यवस्थाभेदोपाधिकं जीवस्य भेदमङ्गीकृत्य व्याख्यास्यामीत्यत आह स्वप्नादिश्चेति।स्वपो नन् अष्टा.3।3।91 इति स्वप्नशब्दः कर्तरि। स्वप्नः सुषुप्तश्च शारीर एव न केवलं जाग्रत् तथाच त्र्यवस्थस्यापि शारीरशब्देन गृहीतत्वात् न ततो भेदः स्वप्नसुषुप्तयोरित्यर्थः। अवस्थात्रयवतोऽपि शारीरत्वं कुतः इत्यत आह शारीर स्त्विति। जाग्रदादिष्वंवस्थासु। अस्तु त्र्यवस्थोऽपि शारीरः तथाप्यस्मादिति विशेषणेनात्र शारीरादिति जाग्रदवस्थो गृह्यते। तस्माच्च स्वप्नाद्यवस्थस्य भेदोक्तिरुक्तविधया सम्भवति। भवत्पक्षेऽपि शारीरादिति जीवे सिद्धेऽस्मादिति विशेषणं व्यर्थं स्यादिति तत्राह अस्मादिति। नैतद्विशेषणसार्थक्यायेश्वरं परित्यज्य जीवोऽत्र ग्राह्यः शारीरादित्येवोक्तावीश्वरस्यापि प्राप्तावीश्वरादेवेश्वरस्य भेदानुपपत्तेः। तद्व्यावृत्त्यर्थं जीवमात्रपरिग्रहाय विशेषणमिति सार्थक्योपपत्तेरित्यर्थः। भवेदेवं यदि शारीरत्वमीश्वरस्यापि स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह शारीराविति। नन्वेवं पक्षद्वयेऽप्युपपत्तावीश्वर एवात्रोच्यते न जीवः इति कुतः विनिगमनमित्यत आह भेदेति। चो हेतौ। भेदश्रुतेः स्वाभाविकभेदरूपे गत्यन्तरे सम्भवति पुरुषभेद एवार्थतया ग्राह्यः न त्ववस्थोपाधिको भेदः।मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये सम्प्रत्ययात् अतो युक्तं विनिगमनम्। न केवलमुक्तव्यवस्था न्यायप्राप्ता किन्त्वागमसिद्धा चेत्याह आह चेति। अभोक्ता च भोक्ता चेत्येतयोर्व्युत्क्रमेणान्धयः।सर्वभूतस्थमात्मानं 6।29 इत्युक्तत्वात्।न त्वहं तेषु 7।12 इति कथमुच्यते इत्यत आह न त्वहमिति। तदनाधारत्वं तदुपजीवनेन स्थित्यभावः। कुत एतत् इत्यत आह उक्तं चेति। न केवलं मुक्तविरोधादिति चार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.8 7.12।।इदं ज्ञानम्। रसोऽहमित्यादिविज्ञानम्। अबादयोऽपि तत एव। तथापि रसादिस्वभावाना सागणां च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियमाकः न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिस्तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति अप्सु रस इत्यादिविशेषशब्दैः। भोगश्च विशेषतो रसादेरिति च उपासनार्थं च।उक्तं च गीताकल्पेरसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च। सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम्। सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः। रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः। अबादयः पार्षदाश्च ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः। रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः इति।स्वभावो जीव एव च।सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् इति च।धर्माविरुद्धःकामरागबिवर्जितम्इत्याद्युपासनार्थम्। उक्तं च गीताकल्पेधर्मारुविद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता। विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता। ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति च इत्यादि पुण्यो गन्ध इति भोगापेक्षया। तथा हि श्रुतिः पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति बृ.उ.1।5।20 ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके कठो.3।1 इत्यादिका। ऋतं च पुण्यम्।ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते इत्यभिधानात्।ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात्सम्प्रयोगगः इति च। नच अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति श्वे.उ.4।6 मुं.3।1।1ऋक्2।3।17।5अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् इत्यादिविरोधि स्थूलानशनोक्तेः। आह च सूक्ष्माशनम्। प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरारादात्मनः।न चात्र जीव उच्यते शारीरादात्मन इति भेदाभिधानात्। स्वप्नादिश्च शारीर एवशारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः इति वचनाद्गारुडे। अस्मादिति त्वीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्।शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः। अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः इति वचनान्नारदीये भेदश्रुतेश्च। सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यो नत्ववस्थाभेदः। आह च प्रविविक्तभुग्यतो ह्यस्माच्छारीरात्पुरुषोत्तमः। अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात्स एव तु इति गीताकल्पे। न त्वहं तेष्विति तदनाधारत्वमुच्यते। उक्तं च तदाश्रितं जगत्सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः इति गीताकल्पे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.11।।एते सर्वे विलक्षणा भावा मत्त एव उत्पन्नाः मच्छेषभूता मच्छरीरतया मयि एव अवस्थिताः अतः तत्प्रकारः अहम् एव अवस्थितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.11।। बलं सामर्थ्यम् ओजो बलवताम् अहम् तच्च बलं कामरागविवर्जितम् कामश्च रागश्च कामरागौ कामः तृष्णा असंनिकृष्टेषु विषयेषु रागो रञ्जना प्राप्तेषु विषयेषु ताभ्यां कामरागाभ्यां विवर्जितं देहादिधारणमात्रार्थं बलं सत्त्वमहमस्मि न तु यत्संसारिणां तृष्णारागकारणम्। किञ्च धर्माविरुद्धः धर्मेण शास्त्रार्थेन अविरुद्धो यः प्राणिषु भूतेषु कामः यथा देहधारणमात्राद्यर्थः अशनपानादिविषयः स कामः अस्मि हे भरतर्षभ।।किञ्च

───────────────────

【 Verse 7.12 】

▸ Sanskrit Sloka: ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये | मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ||

▸ Transliteration: ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye | matta eveti tānviddhi na tvahaṃ teṣu te mayi ||

▸ Glossary: ye: all those; ca: and; eva: certainly; sāttvikāḥ: in goodness; bhāvāḥ: states of being; rājasāḥ: mode of passion; tāmasāḥ: mode of ignorance; ca: and; ye: although; mattaḥ: from Me; eva: certainly; iti: thus; tān: those; viddhi: try to know; na: not; tu: but; ahaṃ: I; teṣu: in those; te: they; mayi: unto Me

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.12 All states of being—be they of goodness (sāttvika), pas- sion (rajas) or ignorance (tamas)—all emanate from Me. I am independent of them but they are dependent on Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.12।।(और तो क्या कहें) जितने भी सात्त्विक राजस और तामस भाव हैं वे सब मेरेसे ही होते हैं ऐसा समझो। पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.12।। जो भी सात्त्विक (शुद्ध) राजसिक (क्रियाशील) और तामसिक (जड़) भाव हैं उन सबको तुम मेरे से उत्पन्न हुए जानो तथापि मैं उनमें नहीं हूँ वे मुझमें हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.12 ये whatever? च and? एव even? सात्त्विकाः pure? भावाः natures? राजसाः active? तामसाः inert? च and? ये whatever? मत्तः from Me? एव even? इति thus? तान् them? विद्धि know? न not? तु indeed? अहम् I? तेषु in them? ते they? मयि in Me.Commentary This is a world of the three Gunas? viz.? Sattva (purity)? Rajas (passion) and Tamas (inertia). All sentient and insentient objects are the aggregate of these three alities of Nature. One ality predominates in them and the predominant ality imparts to the object its distinctive character or definite properties.In the gods? sages milk and green gram? Sattva is predominant. In Gandharvas (a class of celestials)? kings? warriors and chillies? Rajas is predominant. In demons? Sudras? garlic? onion and meat? Tamas is predominant.Though these beings and objects proceed from Me? I am not in them they are in Me. I am independent. I am the support for them they depend on Me just as the superimposed snake depends on the rope. The snake is in the rope? but the rope is never in the snake. The waves belong to the ocean but the ocean does not belong to the waves. (Cf.IX.4and6)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.12. Whatever beings are there [in the universe]-whether they are of the Sattva or of Rajas or of Tamas (Strands)- be sure that they are from Me; I am not in them, but they are in Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.12 Whatever be the nature of their life, whether it be pure or passionate or ignorant, they are all derived from Me. They are in Me, but I am not in them.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.12 Know that all those states of Sattva, Rajas and Tamas are from Me alone. But I am not in them; they are in Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.12 Those things that indeed are made of (the ality of ) sattva, and those things that are made of (the ality of) rajas and tamas, know them to have sprung from Me alone. However, I am not in them; they are in Me!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.12 Whatever beings (and objects) that are pure, active and inert, know that they proceed from Me. They are in Me, yet I am not in them.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.12 See Comment under 7.13

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.12 Why should this be declared with particular illustrations? The reason is as follows: Whatever entities exist in the world partaking of the alities of Sattva, Rajas and Tamas in the forms of bodies, senses, objects of enjoyment and their causes - know them all to have originated from Me alone, and they abide in Me alone, as they constitute My body. 'But I am not in them.' That is, I do not depend for My existence on them at any time. In the case of other beings, though the body depends for its existence on the self, the body serves some purpose of the self in the matter of Its sustenance. To Me, however, there is no purpose at all of that kind served by them constituting My body. The meaning is that they merely serve the purpose of My sport.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.12 Ye bhavah, those things; sattvikah eva, that indeed are made of (the ality of) sattva; and ye rajasah, those that are made (of the ality) of rajas; and tamasah, those that are made of (the ality of) tamas-whatever things are made (of sattva, rajas and tamas) according to the creatures's own actions: viddhi, know; tan, them, all without exception; mattah eva iti, to have sprung from Me alone when they come into being. Although they originate from Me, still, tu, however; aham, I; am na tesu, not in them-I am not subject to them, not under their control, as are the transmigrating bengs. Te, they, again; mayi, are in Me, subject to Me, under My control. [For sattva, rajas, and tamas see note under 2.45 as also Chapters 14, 17 and 18.-Tr.] 'The world does not know Me, the supreme Lord, even though I am of this kind, and am eternal, pure, intelligent and free by nature, [See note on p.4.-Tr.] the Self of all beings, free from all alities, the cause of burning away

Chapter 7 (Part 8)

the seed of the evil of transmigration!'-in this way the Lord expresses regret. And what is the source of that ignorance in the world? That is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.12।। मुझमें सम्पूर्ण जगत् पिरोया हुआ है जैसे सूत्र में मणियाँ अपने इस कथन के साथ प्रारम्भ किये गये प्रकरण का उपसंहार भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में करते हैं।हमें जगत् में ज्ञान क्रिया और जड़त्व इन तीनों का अनुभव होता है। इन्हें ही क्रमश सत्त्व रज और तमोगुण का कार्य कहा जाता है। वेदान्त में जिसे माया कहा गया है वह इन तीनों गुणों का संयुक्त रूप है जिसके अधीन प्राणियों की प्रवृत्तियाँ भिन्नभिन्न प्रकार की दिखाई देती हैं। मनुष्य की भावनाएं और विचार इन गुणों से प्रभावित होते हैं जिनके अनुसार ही मनुष्य अपने शरीर मन और बुद्धि से कार्य करता है।उपर्युक्त विवेचन को ध्यान में रखकर इस श्लोक के अध्ययन से यह अर्थ स्पष्ट होता है कि इन तीन गुणों से उत्पन्न जो कोई भी वस्तु प्राणी या स्थिति है वह सब आत्मा से (मुझ से) उत्पन्न होती है। पूर्व वर्णित सिद्धांत को ही यहाँ शास्त्रीय भाषा में दोहराया गया है। पारमार्थिक सत्यस्वरूप चैतन्य आत्मा पर अपरा प्रकृति का अध्यास हुआ है यह कोई वास्तविकता नहीं। त्रिगुणजनित भावों की सत्य से उत्पत्ति उसी प्रकार की है जैसे मिट्टी से घट समुद्र से तरंग और स्वर्ण से आभूषण की।इस श्लोक का सुन्दर अन्तिम वाक्य एक पहेली के समान है। इस प्रकार का लेखन हिन्दू दार्शनिकों की विशेषता है जो अध्ययनकर्ता को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है। ऐसे कथन विद्यार्थी को और अधिक सूक्ष्म और गहन विचार करने के लिए और उसका वास्तविक अभिप्राय समझने के लिए आमन्त्रित करते हैं। मैं उनमें नहीं हूँ वे मुझमें हैं।केवल वाच्यार्थ की दृष्टि से उपर्युक्त कथन त्रुटिपूर्ण ही समझा जायेगा क्योंकि यदि क ख में नहीं है तो ख क में कैसे हो सकता है यदि मैं उनमें नहीं हूँ तो वे भी मुझमें नहीं हो सकते। परन्तु भगवान का कथन है मैं उनमें नहीं हूँ वे मुझमें हैं। इस सुन्दर एवं मधुर विरोधाभास से यह स्पष्ट हो जाता है कि पुरुष और प्रकृति का संबंध कारण और कार्य का नहीं बल्कि अधिष्ठान और अध्यस्त का है। पुरुष पर प्रकृति का आभास अध्यास के कारण होता है। खंभे में यदि प्रेत का आभास हो तो यही कहा जायेगा कि प्रेत खंभे में है परन्तु खंभा प्रेत में नहीं।श्री शंकराचार्य इस वाक्य का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखते हैं मैं उनमें नहीं हूँ का अर्थ है मैं उन पर आश्रित नहीं हूँ जब कि उनका अस्तित्व मुझ पर आश्रित है। जैसे जल का अस्तित्व तरंग पर आश्रित नहीं है किन्तु तरंग जल पर आश्रित होती है। तरंग के होने से जल को किसी प्रकार का दोष या बन्धन नहीं प्राप्त होता। उसी प्रकार जड़ प्रकृति का अस्तित्व चेतन पुरुष के कारण सिद्ध होता है परन्तु पुरुष सब परिच्छेदों से सदा मुक्त ही रहता है।अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण खेद व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जगत् के लोग उनके वास्तविक नित्यमुक्त स्वरूप को नहीं जानते हैं। लोगों के इस अज्ञान का क्या कारण है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.12।।किंच थे सात्त्विकाः सत्त्वोद्भूताः भावाः पदार्थाः राजसाः रजउद्भूताःस तामसास्तमउद्भूताश्च ये किचित्प्राणिनां स्वकर्मवशाज्जयन्ते तान्सर्वान्मत्तएव जातानिति विद्धि जानीहि। तर्हि संसारिणा मिव तवापि तदधीनत्वं स्यात्तथाच् त्वय्यपि विक्रियावत्त्वाद्दूष्यत्वप्रसक्तिरित्याशङ्क्याह नत्वहं तेषु। यद्यपि मत्तस्ते जायन्ते तथाप्यहं संसारिण इव तदधीनो न भवामि। ननु तेऽपि किं स्वतन्त्राः नेत्याह ते मयि मद्वशाः। मयि कल्पितत्वान्वान्मदधीनसत्तास्फूर्तिका इत्यर्थः। तथाचाधिष्ठानस्य मम कल्पितगुणदोषासंस्पर्शित्वं कल्पितस्य च मदधीनसत्तास्फूर्तिकत्वमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.12।।किमेवं परिगणनेन ये चान्येऽपि भावाश्चित्तपरिणामाः सात्त्विकाः शमदमादयः ये च राजसा हर्षदर्पादयः ये च तामसाः शोकमोहादयः प्राणिनामविद्याकर्मादिवशाज्जायन्ते तान्मत्त एव जायमानानितिअहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभव इत्याद्युक्तप्रकारेण विद्धि समस्तानेव। अथवा सात्त्विका राजसास्तामसाश्च भावाः सर्वेऽपि जडवर्गा व्याख्येयाः विशेषहेत्वभावात्। एवकारश्च समस्तावधारणार्थः। एवमपि न त्वहं तेषु मत्तो जातत्वेऽपि तद्वशस्तद्विकाररूषितो रज्जुखण्ड इव कल्पितसर्पविकाररूषितोऽहं न भवामि संसारीव। ते तु भावा मयि रज्ज्वामिव सर्पादयः कल्पिता मदधीनसत्तास्फूर्तिका मदधीना इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.12।।सात्विकाः धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यादयः राजसाः लोभप्रवृत्त्यादयः तामसाः निद्रालस्यादयः तान्सर्वान्मत्त एव रसतन्मात्रादिरूपात्सूत्रात्मनो निर्गता इति विद्धि। नन्वेवं तव सर्वजगदात्मनो विकारित्वापत्त्या कौटस्थ्यहानिरित्याशङ्क्याह नत्वहं तेषु ते मयीति। येष्वबादयः प्रोतास्तेषु सूत्रावयवभूतेषु रसादिष्वनृतजडरूपेष्वबाधितात्मचिन्मात्ररूपो घटशरावोदञ्चनादाविव मृत् नास्मि। अनृतस्यास्य सत्तास्फुरणे एव स्वकीये प्रयच्छामि नत्वनृतात्मा भवामीत्यर्थः। ते तु मय्येवाध्यस्ता मदनन्याः यथा रज्ज्वामध्यस्ताः सर्पादयो रज्ज्वनन्याः।तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इतिन्यायात्। अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाभावः। नखल्वनन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः किंतु भेदं निषेधामः। कुतः आरम्भणशब्दात्वाचारम्भणं विकारो नामधेयम् इतिविकारस्य वागालम्बनत्वेन स्वप्नमायेन्द्रजालिकविषयसाम्यश्रुतेः। नह्यात्मनो विचित्रप्रपञ्चात्मत्वे ते मयीत्यंशाविरोधेऽपि नत्वहं तेष्वित्यंशे विरोधपरिहारो युज्यते। कार्यस्य कारणात्मकत्वावश्यंभावात्। तस्माद्विवर्तवादाश्रयेणैव ब्रह्मणो जगदुपादानत्वकूटस्थत्वे निर्वहत इति साधूक्तं नत्वहं तेषु ते मयीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.12।।किञ्च ये चैवेति। ये च पुनः सात्त्विका एव भावा मत्सम्बन्धिदर्शनेन रोमाञ्चादयः राजसात्मकविक्षेपादयः न पुनस्तामसा विप्रयोगस्वरूपस्मरणे मूर्छाभ्रमादयस्ते सर्व एव। इति अमुना प्रकारेण तान् मत्त एव विद्धि जानीहि। तेषु तत्सामर्थ्येन अहं तत्प्रकारेण न प्रकटो भवामि किन्तु ते मयि प्रकटीभवन्तीत्यर्थः। अत्रायं भावः एते गुणा रसार्थं मया प्रकटिताः स्वरसात्मकगुणसाफल्याय मत्सम्बन्धेन स्वयमुद्बुद्धरसाः सन्तः सेवां कुर्वन्तीति ते मयि सन्ति नत्वहं जीववत्तेषूत्पन्नेषु रसयुक्तो भवामीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.12।। किंच ये चेति। ये चान्येऽपि सात्त्विका भावाः शमदमादयः राजसाश्च द्वेषदर्पादयः तामसाश्च शोकमोहादयः प्राणिनां स्वकर्मवशाज्जायन्ते तान्सर्वान्मत्त एव जातानिति विद्धि। मदीयप्रकृतिगुणत्रयकार्यत्वात्। एवमपि तेष्वहं न वर्ते। जीववत्तदधीनोऽहं न भवामीत्यर्थः। ते तु मदधीनाः सन्तो मयि वर्तन्त इत्यर्थ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.12।।मत्तः परतरं नान्यदिति प्रागुक्तं स्पष्टयति भगवानेकेन ये चैविति। प्राकृता अप्येते मत्त एव मत्सत्प्रकृतिगुणकार्यत्वात् मम च प्रकृत्यादिकारणत्वेन मुख्यकर्तृत्वं उपादानगोचरापरोक्षाज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्वात्। एवमपि तेष्वहं न वर्ते जीववत्तदायत्तो न भवामीत्यर्थः। नशब्दोऽत्रापि सम्बध्यते। तेऽपि मयि न किन्तु मदुपादेयप्रकृतावेव ते वर्तन्ते। अहं तु मूलरूपेण तत्कर्त्तैवेत्यर्थः। अथवा ते मयि इति परम्परया तेषां मदाश्रितत्वात्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.12।।तथा जो सात्त्विक सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए भाव पदार्थ हैं और जो राजस रजोगुणसे उत्पन्न हुए एवं तामस तमोगुणसे उत्पन्न हुए भाव पदार्थ हैं उन सबको अर्थात् प्राणियोंके अपने कर्मानुसार ये जो कुछ भी भाव उत्पन्न होते हैं उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न हुए जान। यद्यपि वे मुझसे उत्पन्न होते हैं तथापि मैं उनमें नहीं हूँ अर्थात् संसारी मनुष्योंकी भाँति मैं उनके वशमें नहीं हूँ परंतु वे मुझमें हैं यानी मेरे वशमें हैं मेरे अधीन हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.12।। व्याख्या  ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ये जो सात्त्विक राजस और तामस भाव (गुण पदार्थ क्रिया) हैं वे भी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिमात्रमें जो कुछ हो रहा है मूलमें सबका आश्रय आधार और प्रकाशक भगवान् ही हैं अर्थात् सब भगवान्से ही सत्तास्फूर्ति पाते हैं।सात्त्विक राजस और तामस भाव भगवान्से ही होते हैं इसलिये इनमें जो कुछ विलक्षणता दीखती है वह सब भगवान्की ही है अतः मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ नहीं। यदि उसकी दृष्टि भगवान्की तरफ जायगी तो वह मुक्त हो जायगा और यदि उसकी दृष्टि सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ जायगी तो वह बँध जायगा।सात्त्विक राजस और तामस इन भावोंके (गुण पदार्थ और क्रियामात्रके) अतिरिक्त कोई भाव है ही नहीं। ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं। यहाँ शङ्का होती है कि अगर ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं तो हमलोग जो कुछ करें वह सब भगवत्स्वरूप ही होगा फिर ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये यह विधिनिषेध कहाँ रहा इसका समाधान यह है कि मनुष्यमात्र सुख चाहता है दुःख नहीं चाहता। अनुकूल परिस्थिति विहितकर्मोंका फल है और प्रतिकूल परिस्थिति निषिद्धकर्मोंका फल है। इसलिये कहा जाता है कि विहितकर्म करो और निषिद्धकर्म मत करो। अगर निषिद्धको भगवत्स्वरूप मानकर करोगे तो भगवान् दुःखों और नरकोंके रूपमें प्रकट होंगे। जो अशुभ कर्मोंकी उपासना करता है उसके सामने भगवान् अशुभरूपसे ही प्रकट होते हैं क्योंकि दुःख और नरक भी तो भगवान्के ही स्वरूप हैं।जहाँ करने और न करनेकी बात होती है वहीं विधि और निषेध लागू होता है। अतः वहाँ विहित ही करना चाहिये निषिद्ध नहीं करना चाहिये। परंतु जहाँ मानने और जाननेकी बात होती है वहाँ परमात्माको ही मानना चाहिये और अपनेको अथवा संसारको जानना चाहिये।जहाँ माननेकी बात है वहाँ परमात्माको ही मानकर उनके मिलनेकी उत्कण्ठा बढ़ानी चाहिये। उनको प्राप्त और प्रसन्न करनेके लिये उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये तथा उनकी आज्ञा और सिद्धान्तोंके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिये। भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कार्य करेंगे तो उनको प्रसन्नता कैसे होगी और विरुद्ध कार्य करनेवालेको उनकी प्राप्ति कैसे होगी जैसे किसी मनुष्यके मनके विरुद्ध काम करनेसे वह राजी कैसेहोगा और प्रेमसे कैसे मिलेगाजहाँ जाननेकी बात है वहाँ संसारको जानना चाहिये। जो उत्पत्तिविनाशशील है सदा साथ रहनेवाला नहीं है वह अपना नहीं है और अपने लिये भी नहीं है ऐसा जानकर उससे सम्बन्धविच्छेद करना चाहिये। उसमें कामना ममता आसक्ति नहीं करनी चाहिये। उसका महत्त्व हृदयसे उठा देना चाहिये। इससे सत्तत्त्व प्रत्यक्ष हो जायगा और जानना पूर्ण हो जायगा। असत् (नाशवान्) वस्तु हमारे साथ रहनेवाली नहीं है ऐसा समझनेपर भी अगर समयसमयपर उसको महत्त्व देते रहेंगे तो वास्तविकता (सत्वस्तु) की प्राप्ति नहीं होगी।मत्त एवेति तान्विद्धि उन सबको तू मेरेसे ही उत्पन्न होनेवाला समझ अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ। कार्य और कारण ये दोनों भिन्न दीखते हुए भी कार्य कारणसे अपनी भिन्न एवं स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। अतः कार्य कारणरूप ही होता है। जैसे सोनेसे गहने पैदा होते हैं तो वे सोनेसे अलग नहीं होते अर्थात् सोना ही होते हैं। ऐसे ही परमात्मासे पैदा होनेवाली अनन्त सृष्टि परमात्मासे भिन्न स्वतन्त्र सत्ता नहीं रख सकती।मत्त एव कहनेका तात्पर्य है कि अपरा और परा प्रकृति मेरा स्वभाव है अतः कोई उनको मेरेसे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकता। सातवें अध्यायके परिशिष्टरूप नवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि कल्पके आदिमें प्रकृतिको वशमें करके मैं बारबार सृष्टिकी रचना करता हूँ (9। 8) और आगे कहते हैं कि मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति चराचर संसारको रचती है (9। 10) ये दोनों बातें एक ही हुईं। चाहे प्रकृतिको लेकर भगवान् रचना करें चाहे भगवान्की अध्यक्षतामें प्रकृति रचना करे इन दोनोंका तात्पर्य एक ही है। भगवान् रचना करते हैं तो प्रकृतिको लेकर ही करते हैं तो मुख्यता भगवान्की ही हुई और प्रकृति भगवान्की अध्यक्षतामें रचना करती है तो भी मुख्यता भगवान्की ही हुई। इसी बातको यहाँ कहा है कि मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ (7। 6) और इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि सात्त्विक राजस और तामस ये भाव मेरेसे ही होते हैं।भगवान्ने विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके जाननेवालेकी दुर्लभता बताते हुए जो प्रकरण आरम्भ किया उसमें अपरा और परा प्रकृतिका कथन किया। अपरा और परा प्रकृतियोंको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण बताया क्योंकि इनके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं। फिर अपनेको इन अपरा और पराका कारण बताया मत्तः परतरं नान्यत् (7। 7)। यही बात विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए यहाँ कही है कि सात्त्विक राजस और तामस भावोंको मेरेसे ही होनेवाला ज्ञान।न त्वहं तेषु ते मयि मैं उनमें नहीं हूँ और वे मेरेमें नहीं हैं। तात्पर्य है कि उन गुणोंकी मेरे सिवाय कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है अर्थात् मैंहीमैं हूँ मेरे सिवाय और कुछ है ही नहीं। वे सात्त्विक राजस और तामस जितने भी प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ हैं वे सबकेसब उत्पन्न और नष्ट होते हैं। परन्तु मैं उत्पन्न भी नहीं होता और नष्ट भी नहीं होता। अगर मैं उनमें होता तो उनका नाश होनेपर मेरा भी नाश हो जाता परन्तु मेरा कभी नाश नहीं होता इसलिये मैं उनमें नहीं हूँ। अगर वे मेरेमें होते तो मैं जैसा अविनाशी हूँ वैसे वे भी अविनाशी होते परंतु वे तो नष्ट होते हैं और मैं रहता हूँ इसलिये वे मेरेमें नहीं हैं।जैसे बीज ही वृक्ष शाखाएँ पत्ते फूल आदिके रूपमें होता है परंतु वृक्ष शाखाएँ पत्ते आदिमें बीजको खोजेंगे तो उनमें बीज नहीं मिलेगा। कारण कि बीज उनमें तत्त्वरूपसे विद्यमान रहता है। ऐसे ही सात्त्विक राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं परन्तु उन भावोंमें मेरेको खोजोगे तो उनमें मैं नहीं मिलूँगा (गीता 7। 13)। कारण कि मैं उनमें मूलरूपसे और तत्त्वरूपसे विद्यमान हूँ। अतः मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं अर्थात् सब कुछ मैंहीमैं हूँ।जैसे बादल आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं आकाशमें ही रहते हैं और आकाशमें ही लीन होते हैं परंतु आकाश ज्योंकात्यों निर्विकार रहता है। न आकाशमें बादल रहते हैं और न बादलोंमें आकाश रहता है। ऐसे ही आठवें श्लोकसे लेकर यहाँतक जितनी (सत्रह) विभूतियाँ बतायी गयी हैं वे सब मेरेसे ही उत्पन्न होती हैं मेरेमें ही रहती हैं और मेरेमें ही लीन हो जाती हैं। परंतु वे मेरेमें नहीं हैं और मैं उनमें नहीं हूँ। मेरे सिवाय उनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस दृष्टिसे सब कुछ मैं ही हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्के सिवाय जितने सात्त्विक राजस और तामस भाव अर्थात् प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ दिखायी देती हैं उनकी सत्ता मानकर और उनको महत्ता देकर ये मनुष्य उनमें फँस रहे हैं। अतः भगवान् उन मनुष्योंका लक्ष्य इधर कराते हैं कि इन सब पदार्थों और क्रियाओंमें सत्ता और महत्ता मेरी ही है।विशेष बातसत्त्वगुण रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले तरहतरहके जितने भाव (प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ) हैं वे सबकेसब भगवान्की शक्ति प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं। परंतु प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेके कारण इन गुणोंको भगवान्ने मत्त एव मेरेसे ही होते हैं ऐसा कहा है। तात्पर्य यह है कि प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेसे ये सभी भाव भगवान्से उत्पन्न होते हैं और भगवान्में ही लीन हो जाते हैं पर परा प्रकृति (जीवात्मा) ने इनके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया अर्थात् इनको अपना और अपने लिये मान लिया यही परा प्रकृतिद्वारा जगत्को धारण करना है। इसीसे वह जन्मतामरता रहता है। अब उस बन्धनका निवारण करनेके लिये यहाँ कहते हैं कि सात्त्विक राजस और तामस ये सब भाव मेरेसे ही होते हैं। इसी रीतिसे दसवें अध्यायमें कहा है भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः (10। 5) अर्थात् प्राणियोंके ये अलगअलग प्रकारवाले (बीस) भाव मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं और अहं सर्वस्य प्रभवतो मत्तः सर्वं प्रवर्तते (10। 8) अर्थात् सबका प्रभव मैं हूँ और सब मेरेसे प्रवृत्त होते हैं। पंद्रहवें अध्यायमें भी कहा है कि स्मृति ज्ञान आदि सब मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च (15। 15)। जब सब कुछ परमात्मासे ही उत्पन्न होता है तब मनुष्यके साथ उन गुणोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। अपने साथ गुणोंका सम्बन्ध न माननेसे यह मनुष्य बँधता नहीं अर्थात् वे गुण उसके लिये जन्ममरणके कारण नहीं बनते।गीतामें जहाँ भक्तिका वर्णन है वहाँ भगवान् कहते हैं कि सब कुछ मैं ही हूँ सदसच्चाहमर्जुन (9। 19) और अर्जुन भी भगवान्के लिये कहते हैं कि आप सत् और असत् भी हैं तथा उनसे पर भी हैं सदसत्तत्परं यत् (11। 37)। ज्ञानी (प्रेमी) भक्तके लिये भी भगवान् कहते हैं कि उसकी दृष्टिमें सब कुछ वासुदेव ही है वासुदेवः सर्वम् (7। 19)। कारण यह है कि भक्तिमें श्रद्धा और मान्यताकी मुख्यता होती है तथा भगवान्में दृढ़ अनन्यता होती है। भक्तिमें अन्यका अभाव होता है। जैसे उत्तम पतिव्रताको एक पतिके सिवाय संसारमें दूसरा कोई पुरुष दीखता ही नहीं ऐसे ही भक्तको एक भगवान्के सिवाय और कोई दीखता ही नहीं केवल भगवान् ही दीखते हैं।गीतामें जहाँ ज्ञानका वर्णन है वहाँ भगवान् बताते हैं कि सत् और असत् दोनों अलगअलग हैं नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः (2। 16)। ऐसे ही ज्ञानमार्गमें शरीरशरीरी देहदेही क्षेत्रक्षेत्रज्ञ प्रकृतिपुरुष दोनोंको अलगअलग जाननेकी बात बहुत बार आयी है जैसे प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि (13। 19) क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानम् (13। 2) क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् (13। 26) क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नम् (13। 33) क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा (13। 34)। कारण यह है कि ज्ञानमार्गमें विवेककी प्रधानता होती है। अतः वहाँ नित्यअनित्य अविनाशीविनाशी आदिका विचार होता है और फिर अपना स्वरूप बिलकुल निर्लिप्त है ऐसा बोध होता है।साधकमें श्रद्धा और विवेक दोनों ही रहने चाहिये। भक्तिमार्गमें श्रद्धाकी मुख्यता होती है और ज्ञानमार्गमें विवेककी मुख्यता होती है। ऐसा होनेपर भी भक्तिमार्गमें विवेकका और ज्ञानमार्गमें श्रद्धाका अभाव नहीं है। भक्तिमार्गमें मानते हैं कि सात्त्विक राजस और तामस भाव भगवान्से ही होते हैं (7। 12) और ज्ञानमार्गमें मानते हैं कि सत्त्व रज और तम ये तीनों गुण प्रकृतिसे ही होते हैं सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः (14। 5)। दोनों ही साधक अपनेमें निर्विकारता मानते हैं कि ये गुण अपने नहीं हैं और दोनों ही जहाँ एक तत्त्वको प्राप्त होते हैं वहाँ न द्वैत कह सकते हैं न अद्वैत न सत् कह सकते हैं न असत्।भक्तिमार्गवाले भगवान्के साथ अनन्य प्रेमसे अभिन्न होकर प्रकृतिसे सर्वथा रहित हो जाते हैं और ज्ञानमार्गवाले प्रकृति एवं पुरुषका विवेक करके प्रकृतिसे बिलकुल असम्बद्ध अपने स्वरूपका साक्षात् अनुभव करके प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित हो जाते हैं। सम्बन्ध  भगवान्ने पहले बारहवें श्लोकमें कहा कि ये सात्त्विक राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। इस विवेचनसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा निर्लिप्त हैं। ऐसे ही भगवान्का शुद्ध अंश यह जीव भी निर्लिप्त है। इसपर यह प्रश्न होता है कि यह जीव निर्लिप्त होता हुआ भी बँधता कैसे है इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.12 7.13।।ये चेति। त्रिभिरिति। सत्त्वादीनि मन्मयानि न त्वहं तन्मयः। अत एव च भगवन्मयः सर्वं भगवद्भावेन संवेदयते न तु नानाविधपदार्थविज्ञाननिष्ठो भगवत्तत्त्वं प्रतिपद्यते इति सकलमानसावर्जक एष क्रमः। अनेनैव चाशयेन वक्ष्यते वासुदेवः सर्वम् इति (K adds another इति) ज्ञानेन यो बहुजन्मोपभोगजनितकर्मसमतासमनन्तरसमुत्पन्नपरशक्तिपातानुगृहीतान्तःकरण असौ प्रतिपद्यते भगवत्तत्त्वं(S omits भगवत्तत्त्वम्) ननु (K omits ननु) सर्वं वासुदेवः इति बुद्ध्या स महात्मा स च दुर्लभ इति। एवं ह्यबुद्ध्यमानं ( N हि बुद्ध्यमानम्) प्रत्युत सत्त्वादिभिर्गुणैः मोहितमिदं जगत् गुणातीतं वासुदेवतत्त्वं नैवोपलभते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.12।।चिदानन्दयोरभिव्यञ्जकानां भावानामीश्वरात्मत्वाभिधानादन्येषामतदात्मत्वप्राप्तावुक्तं कि़ञ्चेति। प्राणिनां त्रैविध्ये हेतुं दर्शयन्वाक्यार्थमाह ये केचिदिति। तर्हि पितुरिव पुत्राधीनत्वं त्वत्तो जायमानात्तदधीनत्वं तवापि स्यादिति विक्रियावत्त्वदूष्यत्वप्रसक्तिरित्याशङ्क्याह यद्यपीति। मम परमार्थत्वात्तेषां कल्पितत्वान्न तद्गुणदोषौ मयि स्यातामित्यर्थः। तेषामपि तद्वदेव स्वतन्त्रतासंभवात्किमिति कल्पितत्वमित्याशङ्क्याह ते पुनरिति। त्रिविधानां भावानां न स्वातन्त्र्यमीश्वरकार्यत्वेन तदधीनत्वात्तथा न कल्पितस्याधिष्ठानसत्ताप्रतीतिभ्यामेव तद्वत्त्वात्तन्मात्रत्वसिद्धिरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.8 7.12।।भूमिः 7।4 इत्यादिनेत्यत्रावधेरनुक्तेःरसोऽहं इत्याद्यपि ज्ञानप्रकरणमिति प्रतीतिः स्यात् तन्निरासाय तत्समाप्तिमाह इदमिति। एतावता ग्रन्थेन ज्ञानं निरूपितमित्यर्थ। कुतोऽत्र ज्ञानप्रकरणस्य समाप्तिः इत्यत आह रसोऽहमिति। इतिशब्दाद्यभावेऽपि प्रकरणान्तरारम्भ एव समाप्तिं गमयिष्यति। अलौकिकमाहात्म्यप्रतिपादनादस्य विज्ञानप्रकरणत्वं ज्ञायत इति भावः।प्रभवादेः इत्युक्तन्यायेनैवरसोऽहं इत्यादेरपि व्याख्यानं सिद्धम्। रसादीनां सत्तादिकारणत्वाद्भोक्तृत्वाच्च भगवान् रसादिरिति। नन्वबादयो धर्मिणो भगवदधीनास्तद्भोग्याश्चेत्यङ्गीक्रियते न वा। नेति पक्षेअहं कृत्स्नस्य 7।6 इत्युक्तविरोधः। आद्ये तुअप्सु रसः इत्यादेर्धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणां ग्रहणस्यानुपपत्तिरित्यतः प्रथमं पक्षं तावदङ्गीकरोति अबादयोऽपीति। धर्मिणोऽपि तदधीना एव तद्भोग्याश्चैव। ननु तत्रोक्तो दोष इत्यतः कारणत्वे तावद्विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह तथापीति। यद्यपि धर्मिणोऽपि भगवदधीना एव तथापि धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानं युज्यत इति शेषः। कथं इत्यत आह रसादीति। रसादयश्च ते स्वभावा अबादीनामनागन्तुकधर्माश्चेति रसादिस्वभावास्तेषां साराणामबादिधर्मेषु सङ्ख्यादिषु श्रेष्ठानां च तेषामेवाबादिस्वभावभूतानां तद्धर्मेषु श्रेष्ठानां च रसादीनामिति यावत्। स्वभावत्वेऽबादीनामिति शेषः। सारत्वेऽबादिधर्मेष्विति शेषः। रसादित्वे चेति चार्थः। स भगवानेव। विशेषतोऽपीत्यस्य व्यावर्त्यं न त्विति। अनुबद्धोऽनुषङ्गसिद्धः। तत्सारत्वादिश्चेति। तस्य रसादेरबादिधर्मेषु सारत्वमबादिस्वभावत्वं रसत्वादिकंचेत्यर्थः। यथा लोके कुविन्दादिः पटादिद्रव्येष्वेव व्यापारवाननुभूयते न तु तदीयेषु गन्धरसादिषु गुणेषु तद्धर्मेषु च गन्धत्वादिषु पृथग्व्यापारवान् किन्तु ते पटादिजन्मानुषङ्गिजन्मान एव। न तथा भगवान्। अपित्वबादेधर्मेषु रसादिषु तद्धर्मेषु च स्वभावत्वादिषु पृथक् प्रयत्नवान् नत्वबादिनियमानुषङ्गिसत्तादिकास्त इति दर्शयितुंविशेषशब्दा उपात्ता इत्यर्थः। भोगपक्षेऽपि प्रयोजनमाह भोगश्चेति। अबादिभोगादप्यतिशयेन रसादेर्भोगः परमेश्वरस्येति दर्शयति विशेषशब्दैरिति सम्बन्धः।रसोऽहं इत्याद्यभेदोक्तेरर्थान्तरं सूचयन् तत्रापि विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह उपासनार्थं चेति। विशेषतः रसादेरिति वर्तते। अर्थवशाद्रसादेरिति सप्तमीत्वेन विपरिणम्यते। रसादयः परमेश्वरोपासने प्रतिमात्वेनात्र विवक्षिताः। प्रतिमायां चाभेदोक्तिः प्रसिद्धा। प्रतिमात्ममबादीनां समानम्। योऽप्सु तिष्ठन् बृ.उ.7।3।4 इत्यादेः। अतः किं विशेषशब्दग्रहणेनेति चेत् अबादिभ्यो विशेषतः रसादिषु भगवदुपासनार्थं तदुपपत्तिरिति।उक्तेऽर्थत्रये प्रमाणमाह उक्तं चेति। तथा चशब्दः अन्योन्यसमुच्चये। एवशब्दस्येश्वर इत्यनेन सम्बन्धः। सर्वत्राबादिषु। ईश्वरो रसादिकं जगदित्युच्यत इत्यर्थः। अबादयोऽबाद्यभिमानिनः। ज्ञानिनां ज्ञानार्थिनां सम्पत्त्यै प्राप्त्यै अन्येषां रसार्थिनाम्। अबादय इति रसादीति च पादयोः सप्तनवाक्षरत्वेऽपि न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति ऐ.ब्रा.1।6 इति वचनाददोषः। स्वभावस्य भगवदधीनत्वमलौकिकमित्यतस्तत्रान्यान्यपि वाक्यानि पठति स्वभाव इति। अस्त्वेवं धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानम् धर्माणां विशेषणोपादानं तु किमर्थमित्यत आह धर्मेति। आदिपदेनपुण्यो गन्धः इत्यस्य ग्रहणम्। कामादिषु विशिष्टंष्वेव भगवानुपास्यः न धर्मविरुद्धेष्वशुचिष्विति ज्ञापनाय कामादीनां धर्माणां धर्माविरुद्धत्वादिविशेषणोपादानमित्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह उक्तं वेति। कामं पुरुषार्थम्। कामरागादेः कामरागादिना। अनिञ्छद्भिः कामादिकम्। गन्धस्य विशेषणोपादाने प्रयोजनान्तरमाह पुण्य इति। पुण्यगन्धस्यैव भगवतो भोगो न दुर्गन्धस्येति ज्ञापयितुमत्र विशेषणोपादानमित्यर्थः। ननु दुर्गन्धं भगवाननुभवति न वा नेति पक्षे सार्वज्ञाभावः आद्ये कथं भोगाभावः उच्यते अनुभूयमाना अपि दुर्गन्धादयो न फलहेतव इत्यभिप्रायः। सुगन्धस्तु सुखहेतुरित्युपपादितम्।शुचिवस्त्वेव भगवतो भोग्यमित्यत्र प्रमाणमाह तथा हीति। अमुमुपासकम्। कुतः तस्य देवत्वात्। तथापि कुतः न ह वै देवमात्रस्य पुण्यभोगनियमे देवोत्तमस्य सुतरां तत्सिद्धि।ऋतं कठो.3।1 इति श्रुतिः कथं प्रकृतोपयोगिनी इत्यत आह ऋतं चेति। कुतः इत्यतः सामान्यविशेषाभिधानादित्याह ऋतमिति। प्रयोगगः शब्दजन्यः। तथा च श्रुतावृतशब्दः पुण्यफलस्योपलक्षक इति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवतो विषयभोगो युक्तः स्यात् न चैवम् तदङ्गीकारे श्रुत्यादिविरोधात्। ऋतं पिबन्तौ इति चात एव छत्रिन्यायेनोपचरितमित्यत आह न चेति। कुतो नेत्यत आह स्थूलेति। श्रुत्यादिषु स्थूलस्य जीवभोग्यस्य विषयस्याभोगोक्तेः सूक्ष्मभोगस्य चाङ्गीकारादिति भावः। सूक्ष्माशने प्रमिते भवेदियं व्यवस्था। तदेव कुतः इत्यत आह आह चेति। गन्धादिषु यो जीवेन्द्रियागोचरः सारभागस्तस्य भोगम्। परमेश्वरोऽस्माच्छारीरादात्मनो जीवादतिशयेन विलक्षणभोग एव भवति। अवतारेषु स्थूलमपि भुङक्ते इतीवशब्दः।ननु प्रविविक्ताहारतरोऽयं जीव एवेत्यत आह न चेति। न हि जीवो जीवादेव विलक्षणाहार इति युज्यत इत्यर्थः। ननु शारीराज्जागरावस्थाज्जीवात्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थः स एव प्रविविक्ताहार इत्यवस्थाभेदोपाधिकं जीवस्य भेदमङ्गीकृत्य व्याख्यास्यामीत्यत आह स्वप्नादिश्चेति।स्वपो नन् अष्टा.3।3।91 इति स्वप्नशब्दः कर्तरि। स्वप्नः सुषुप्तश्च शारीर एव न केवलं जाग्रत् तथाच त्र्यवस्थस्यापि शारीरशब्देन गृहीतत्वात् न ततो भेदः स्वप्नसुषुप्तयोरित्यर्थः। अवस्थात्रयवतोऽपि शारीरत्वं कुतः इत्यत आह शारीर स्त्विति। जाग्रदादिष्वंवस्थासु। अस्तु त्र्यवस्थोऽपि शारीरः तथाप्यस्मादिति विशेषणेनात्र शारीरादिति जाग्रदवस्थो गृह्यते। तस्माच्च स्वप्नाद्यवस्थस्य भेदोक्तिरुक्तविधया सम्भवति। भवत्पक्षेऽपि शारीरादिति जीवे सिद्धेऽस्मादिति विशेषणं व्यर्थं स्यादिति तत्राह अस्मादिति। नैतद्विशेषणसार्थक्यायेश्वरं परित्यज्य जीवोऽत्र ग्राह्यः शारीरादित्येवोक्तावीश्वरस्यापि प्राप्तावीश्वरादेवेश्वरस्य भेदानुपपत्तेः। तद्व्यावृत्त्यर्थं जीवमात्रपरिग्रहाय विशेषणमिति सार्थक्योपपत्तेरित्यर्थः। भवेदेवं यदि शारीरत्वमीश्वरस्यापि स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह शारीराविति। नन्वेवं पक्षद्वयेऽप्युपपत्तावीश्वर एवात्रोच्यते न जीवः इति कुतः विनिगमनमित्यत आह भेदेति। चो हेतौ। भेदश्रुतेः स्वाभाविकभेदरूपे गत्यन्तरे सम्भवति पुरुषभेद एवार्थतया ग्राह्यः न त्ववस्थोपाधिको भेदः।मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये सम्प्रत्ययात् अतो युक्तं विनिगमनम्। न केवलमुक्तव्यवस्थान्यायप्राप्ता किन्त्वागमसिद्धा चेत्याह आह चेति। अभोक्ता च भोक्ता चेत्येतयोर्व्युत्क्रमेणान्धयः।सर्वभूतस्थमात्मानं 6।29 इत्युक्तत्वात्।न त्वहं तेषु 7।12 इति कथमुच्यते इत्यत आह न त्वहमिति। तदनाधारत्वं तदुपजीवनेन स्थित्यभावः। कुत एतत् इत्यत आह उक्तं चेति। न केवलं मुक्तविरोधादिति चार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.8 7.12।।इदं ज्ञानम्। रसोऽहमित्यादिविज्ञानम्। अबादयोऽपि तत एव। तथापि रसादिस्वभावाना सागणां च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियमाकः न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिस्तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति अप्सु रस इत्यादिविशेषशब्दैः। भोगश्च विशेषतो रसादेरिति च उपासनार्थं च।उक्तं च गीताकल्पेरसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च। सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम्। सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः। रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः। अबादयः पार्षदाश्च ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः। रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः इति।स्वभावो जीव एव च।सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् इति च।धर्माविरुद्धःकामरागबिवर्जितम्इत्याद्युपासनार्थम्। उक्तं च गीताकल्पेधर्मारुविद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता। विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता। ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति च इत्यादि पुण्यो गन्ध इति भोगापेक्षया। तथा हि श्रुतिः पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति बृ.उ.1।5।20 ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके कठो.3।1 इत्यादिका। ऋतं च पुण्यम्।ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते इत्यभिधानात्।ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात्सम्प्रयोगगः इति च। नच अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति श्वे.उ.4।6 मुं.3।1।1ऋक्2।3।17।5अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् इत्यादिविरोधि स्थूलानशनोक्तेः। आह च सूक्ष्माशनम्। प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरारादात्मनः।न चात्र जीव उच्यते शारीरादात्मन इति भेदाभिधानात्। स्वप्नादिश्च शारीर एवशारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः इति वचनाद्गारुडे। अस्मादिति त्वीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्।शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः। अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः इति वचनान्नारदीये भेदश्रुतेश्च। सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यो नत्ववस्थाभेदः। आह च प्रविविक्तभुग्यतो ह्यस्माच्छारीरात्पुरुषोत्तमः। अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात्स एव तु इति गीताकल्पे। न त्वहं तेष्विति तदनाधारत्वमुच्यते। उक्तं च तदाश्रितं जगत्सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः इति गीताकल्पे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.12।।किं विशिष्य अभिधीयते सात्त्विकाः राजसाः तामसाः च जगति भोग्यत्वेन देहत्वेन इन्द्रियत्वेन तत्तद्धेतुत्वेन च अवस्थिता ये भावाः तान् सर्वान् मत्त एव उत्पन्नान् विद्धि ते मच्छरीरतया मयि एव अवस्थिता इति च। न तु अहं तेषु न अहं कदाचिद् अपि तदायत्तस्थितिः अन्यत्र आत्मायत्तस्थितित्वे अपि शरीरस्य शरीरेण आत्मनः स्थितौ अपि उपकारो विद्यते मम तु तैः न कश्चित् तथाविध उपकारः केवलं लीला एव प्रयोजनम् इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.12।। ये चैव सात्त्विकाः सत्त्वनिर्वृत्ताः भावाः पदार्थाः राजसाः रजोनिर्वृत्ताः तामसाः तमोनिर्वृत्ताश्च ये केचित् प्राणिनां स्वकर्मवशात् जायन्ते भावाः तान् मत्त एव जायमानान् इति एवं विद्धि सर्वान् समस्तानेव। यद्यपि ते मत्तः जायन्ते तथापि न तु अहं तेषु तदधीनः तद्वशः यथा संसारिणः। ते पुनः मयि मद्वशाः मदधीनाः।।एवंभूतमपि परमेश्वरं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वभूतात्मानं निर्गुणं संसारदोषबीजप्रदाहकारणं मां नाभिजानाति जगत् इति अनुक्रोशं दर्शयति भगवान्। त़च्च किंनिमित्तं जगतः अज्ञानमित्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.13 】

▸ Sanskrit Sloka: त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत् | मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम् ||

▸ Transliteration: tribhirguṇamayair bhāvairebhiḥ sarvamidaṃ jagat I mohitaṃ nābhijānāti māmebhyaḥ paramavyayam ||

▸ Glossary: tribhiḥ: three; guṇamayaiḥ: by the three gunas; bhāvaiḥ: state of being; ebhiḥ: all these; sarvaṃ: the whole world; idaṃ: this; jagat: universe; mohitaṃ: de- luded; nābhijānāti: do not know; māṃ: Me; ebhyaḥ: above these; paraṃ: the Supreme; avyayaṃ: immutable

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.13 The whole world is deluded by the three modes (good- ness, passion and ignorance), and thus does not know Me. I am above the modes and unchangeable

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.13।।इन तीनों गुणरूप भावोंसे मोहित यह सब जगत् इन गुणोंसे पर अविनाशी मेरेको नहीं जानता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.13।। त्रिगुणों से उत्पन्न इन भावों (विकारों) से सम्पूर्ण जगत् (लोग) मोहित हुआ इन (गुणों) से परे अव्यय स्वरूप मुझे नहीं जानता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.13 त्रिभिः by three? गुणमयैः composed of Gunas? भावैः by natures? एभिः by these? सर्वम् all? इदम् this? जगत् world? मोहितम् deluded? न not? अभिजानाति knows? माम् Me? एभ्यः from them? परम् higher? अव्ययम् immutable.Commentary Persons of this world are deluded by the three alities of Nature or Maya. Affection? attachment and infatuated love are all modifications of these alities. On account of delusion created by these three alities they are not able to break the worldly ties and to turn the mind towards the Supreme Soul? the Lord of the three alities.Avyayam Immutable or unchangeable or inexhaustible or imperishable. The Self is of one homogeneous essence. It has not got the six changes or modifications (Shad Bhava Vikaras) which the body has? viz.? existence? birth? growth? modification? decay and death. (Cf.VII.25)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.13. Being duluded by these three beings of the Strands, this entire world does not recognise Me Who am eternal and transcending these [Strands].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.13 The inhabitants of the world, misled by those natures which the Qualities have engendered, know not that I am higher than them all, and that I do not change.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.13 The entire universe is deluded by these three states originating from the Gunas (of Prakrti), and fails to recognise Me, who am beyond them and immutable.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.13 All this world, deluded as it is by these three things made of the gunas (alities), does not know Me who am transcendental to these and undecaying.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.13 Deluded by these Natures (states or things) composed of the three alities of Nature all this world does not know Me as distinct from them and immutable.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.12-13 Ye ca etc. Tribhih etc. The [Strands] Sattva etc., are derived from Me, and not I from them. That is why he who has achieved his identity with the Bhagavat (the Absolute), properly realises all [objects] as being the Bhagavat [Himself]. On the other hand, the person who is established in the knowledge of objects of umpteen varieties does not understand the reality of the Bhagavat. This krama (traditional order) pleases the mind of all. With this idea only the Lord is going to declare presently 'Vasudeva is all'. There the meaning is this : He, whose internal organ is favoured by the descent of the Supreme Energy or grace (Sakti-pata) that arises after [teaching the stage of] eableness of effects of actions (karma-samata) that is brought about by the enjoyment [of effects] through many births; and who realises the reality of Bhagavat, with conviction 'verily all is Vasudeva' - that person is the great Soul and he is difficult to find. But, not knowing in this manner and, on the contrary, being duluded by the Strands, Sattva etc., this world, fails to perceive the reality of Vasudeva, transcending the Strands. [The Lord] declares why the persons established exclusively in the Sattva etc. (Strands), are not conscious of the real nature of the Bhagavat :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.13 Now, in this way, the whole universe, consisting of animate and inanimate entities belonging to Me, evolves from time to time from Me only, is absorbed in Me, and abides in Me alone. It constitutes My body and has Me for its self. Whether in the causal state or in the state of effect, it is I who have all these entities as My modes, because all entities form My body. Thus, in regard to all these modes, I am superior to them, as I am their cause, principal, and as I possess a complex of countless auspicious attributes like knowledge, strength etc. In every way I remain as the highest being. There exists none higher than Myself.

Such being the case, I am superior to these entities composed of the alities of Sattva, Rajas and Tamas - superior to them by My extraordinary attributes and by having these various modes for My enjoyment. I am the highest and immutable, i.e., I form a unity in Myself. This world constituted of gods, men, animals and immovables, and deluded by the three Gunas of Prakrti and its evolutes are inferior and transient. The forms of bodies, senses and objects of enjoyment comprising the world are there in accordance with their past Karmas. No one in the world knows Me.

How is it possible that all experiencing beings think as enjoyable objects which are inferior, constituted of the Gunas and are transient, while You exist - You who are of the nature of unbounded and abundant bliss, who has an eternal unchanging form and who is the source of the enjoyableness of even the objects of the world? Sri Krsna replies:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.13 Sarvam, all; idam, this; jagat, world, the aggregate of creatures; mohitam, deluded as it is-made to have indiscrimination; hih, by these; aforesaid tribhih, three; bhavaih, things, in the forms of attachment, repulsion, delusion, etc; and gunamayaih, made of the gunas, of the transformations of the gunas; na abhijanati, does not know; mam, Me; who am param, transcendental to, distinct, different; hyah, from these gunas as referred to above; and am avyayam, undecaying, i.e. free from all (the six kinds of) changes in things, viz birth etc. [See note on p.38.-Tr.] How, again, do they cross over this divine Maya of Visnu, constituted by the three gunas? That is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.13।। प्रश्न यह है कि यदि त्रिगुणों से परे कोई परम अव्यय तत्त्व है तो सामान्य मनुष्य उसे क्यों नहीं जान पाता है पूर्ण साक्षात्कार न भी सहज हो तब भी कम से कम उसके अस्तित्व के विषय में तो उसे शंका नहीं होनी चाहिए इसका उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।त्रिगुणों से उत्पन्न राग द्वेषादि विकारों के कारण मनुष्य अपने दिव्य स्वरूप को भूलकर उपाधियों के साथ तादात्म्य स्थापित करके केवल विषयोपभोग का ही जीवन जीते हैं। स्वाभाविक है कि इस आसक्ति के कारण स्वस्वरूप की ओर इनका ध्यान तक नहीं जाता। एक बार स्तम्भ में प्रेत का आभास होने पर वह स्तम्भ उससे आच्छादित हो जाता है। यह एक तथ्य है कि जब तक यह आभास बना रहता है तब तक स्तम्भ का एक इञ्च भाग भी मोहित व्यक्ति को नहीं दिखाई देता इसी प्रकार माया से उत्पन्न उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण आत्मा को मानो जीवभाव प्राप्त हो जाता है। यह जीव बाह्य जगत् में व्यस्त और आसक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने में स्वयं को असमर्थ पाता है। स्वयं में स्वयं के साथ स्वयं का चल रहा लुकाछिपी का यह खेल विचित्र एवं रहस्यमय है जिसके कारण यह अपने लिए और जगत् के लिए अनन्त दुख और विक्षेप उत्पन्न करता रहता है।अगले श्लोक में इस आवरण शक्ति की परिभाषा का वर्णन किया गया है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.13।।एवंभूतमपि मामीश्वरं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वात्मानं निर्गुणं संसारमूलोच्छेदाय जगन्नाभिजानातीत्याकोशं दर्शयन्स्वाज्ञाने निमित्तमाह त्रिभिरिति। त्रिभिस्त्रविधैः गुणमयैर्गुणविकारैः भावैः पदार्थे रागद्वेषमोहादिभिः सर्वमिदं जगत्चराचरात्मकं मोहितं विवेकाच्छादकमोहं प्रापितं सन्मामेभ्यो गुणतद्विकारेभ्यः परमतिरिक्तमत एवाव्ययं व्ययरहितम्। जन्मादिसर्वभाविकारविवर्जितमित्यर्थः। नाभिजानाति। स्वाभिन्नत्वेन न साक्षात्करोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.13।।तव परमेश्वरस्य स्वातन्त्र्ये नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वे च सति कुतो जगतस्त्वदात्मकस्य संसारित्वं एवंविधमत्स्वरूपापरिज्ञानादिति चेत् तदेव कुत इत्यत आह एभिः प्रागुक्तैस्त्रिभिस्त्रिविधैर्गुणमयैः सत्त्वरजस्तमोगुणविकारैर्भावैः सर्वैरपि भवनधर्मभिः सर्वमिदं जगत्प्राणिजातं मोहितं विवेकायोग्यत्वमापादितं सदेभ्यो गुणमयेभ्यो भावेभ्यः परं एषां कल्पनाधिष्ठानमत्यन्तविलक्षणमव्ययं सर्वविक्रियाशून्यमप्रपञ्चमानन्दघनमात्मप्रकाशमव्यवहितमपि मां नाभिजानाति। ततश्च स्वरूपापरिचयात्संसरतीवेत्यहो दौर्भाग्यमविवेकिजनस्येत्यनुक्रोशं दर्शयति भगवान्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.13।।कथं तर्हि स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्चबाधेन जना आत्मानं नावगच्छन्तीत्याशङ्क्याह त्रिभिरिति। एभिः पूर्वोक्तैस्त्रिभिस्त्रिविधैर्भावैः प्रकाशप्रवृत्तिनियमाद्यैर्गुणमयैः सत्वरजस्तमोगुणविकारैः इदं चराचरं प्राणिजातं जगच्छब्दवाच्यं मोहितं सत् एभ्यो गुणेभ्यः परं मां न जानाति। यथा रज्ज्वां सर्पभ्रमेण व्याकुलः सर्पात्परां रज्जुं न जानाति तद्वत्। परत्वे हेतुः अव्ययम्। एते भावाः परिणामित्वाद्व्ययवन्तः अहं तु तद्विपरीतः साक्षीत्यव्ययः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.13।।एवं लीलया रसार्थं प्रकटितान् गुणान् मयि दृष्ट्वा सर्वे मोहं प्राप्य मां न जानन्तीत्याह त्रिभिरिति। एभिः परिदृश्यमानैर्मत्सम्बन्धेन स्नेहलीलारसतः प्रकटभूतैस्त्रिभिः सात्त्विकादिभिर्गुणमयैर्मद्गुणात्मकैर्भावैर्भावनात्मकैरिदं परिदृश्यमानमधिकरणात्मकमाध्यात्मिकं जगत् मामेभ्यः पूर्वोक्तभावेभ्यः परमुत्कृष्टं केवलं रसात्मकमत एवाव्ययं विप्रयोगादिभावेषु न्यूनतादिरहितं नाभिजानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.13।।एवंभूतं त्वां परमेश्वरमयं जनः किमिति न जानातीत्यत आह त्रिभिरिति। त्रिभिस्त्रिविधैरेभिः पूर्वोक्तैः गुणमयैः कामलोभादिभिर्गुणविकारैः भावै स्वभावैर्मोहितमिदं जगत् अतो मां नाभिजानाति। कथंभूतम्। एभ्यो भावेभ्यः परं एभिरसंस्पृष्टम्। एतेषां नियन्तारमत एवाव्ययम्। निर्विकारमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.13 7.14।।परमेतदसंस्पष्टं मां वेदान्तवेद्यं न जगद्वेदेह गुणतन्त्रत्वादित्याह त्रिभिरिति। भावैस्त्रिभिः पदार्थैः। त्रित्व गुणमयत्वाभिप्रायेण। मोहितं जगदिदमावृतं एभ्यस्त्रिगुणात्मकेभ्यो भावेभ्यो मूलभूतगुणेभ्यो वा परमव्ययं विनाशरहितं मां न जानाति। प्रकृतेर्गुणा एव बन्धकाः। सत्त्वरजस्तमोमयैः भावैः सर्वं जगन्मोहितं मम मायागुणा एव हि परिणता अपि स्वरूपावरणे विक्षेपे च हेत्वन्तरभूताः भगवज्ज्ञानसाधनप्रतिकूलाः प्रत्युत बन्धरूपाः जीवेऽविद्याकृताध्यासदार्ढ्यकारणभूताश्चसर्वाध्यासनिवृत्तौ हि सर्वथा न भवेद्यथा। सा च विद्योदये सा च न शब्दात्सुविचारितात्। मर्यादाभङ्ग एव स्यात्प्रमाणानां तथा सति। गजानुमानं नैव स्यात्साङ्कर्यं वा तथा भवेत्। दशमस्त्वमसीत्यादौ देहादिविषयत्वतः। शब्दस्य साहचर्येण चक्षुषैव भवेन्मतिः। स्मारकत्वमतो वाक्ये सङ्ख्याज्ञानं पुराः यतः। अध्यासस्यानिवृत्तत्वान्न विविक्तात्मदर्शनम्। मनसा शक्यते कर्त्तुं नान्यथा सर्वदा भवेत्। प्रत्यक्षेणापि विज्ञानं मायया ज्ञानकाशया। स्वप्नबोधरीत्या हि किमु शब्दं निवारयेत्। सर्वज्ञस्वं सर्वभावज्ञानं चापाततः फलम्। सर्वो न ब्रह्म सर्वं तु वामदेवस्तथा जगौ। अवयुज्यागर्भवासात्सूर्याद्यनुवदन्मुहुः। ज्ञानदुर्बलवाक्यत्वात्पाषण्डवचनं मतम्। सत्ये युगेऽतिमहतां भवत्येतन्न चान्यथा। स्वप्नो जागरणं चैव यथा ह्यन्योन्यवैरिणौ। विद्याविद्ये तथा स्यातां न तु सर्वात्मना लयः। इदमेव विनिश्चित्य श्रीकृष्णोऽर्जुनमाह वै। मामेवेति। एवकारेण सर्वेषामनुपायत्वमाह ज्ञानादीनां सर्वेषां भगवदधीनत्वात्।विश्वासं सर्वतस्त्यक्त्वा कृष्णमेव भजेद्बुधः इति श्रीमदाचार्योक्तानुसारेण प्रपत्तिमार्गरीत्या ये भजन्ते मां पुरुषोत्तममेव ते मायां तरन्ति। इयं च दैवी माया प्रकृते नासुरी अन्यस्याज्ञानविशेषेण स्वकृतिसाध्येन च बाधितत्वनियमात् अतएव दुरत्यया। यद्वा धात्वन्वर्था दैवी गुणमयी च। ममेति मदधीनभक्तहितकारिण्येषा भवतीति एतां मायां त एव जगति स्थिता मदीया निर्गुणात्मकास्तीर्णा इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.13।।ऐसा जो साक्षात् परमेश्वर नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव एवं सब भूतोंका आत्मा गुणोंसे अतीत और संसाररूप दोषके बीजको भस्म करनेवाला मैं हूँ उसको जगत् नहीं पहचानता इस प्रकार भगवान् खेद प्रकट करते हैं और जगत्का यह अज्ञान किस कारणसे है सो बतलाते हैं गुणोंमें विकाररूप सात्त्विक राजस और तामस इन तीनों भावोंसे अर्थात् उपर्युक्त राग द्वेष और मोह आदि पदार्थोंसे यह समस्त जगत् प्राणिसमूह मोहित हो रहा है अर्थात् विवेकशून्य कर दिया गया है अतः इन उपर्युक्त गुणोंसे अतीत विलक्षण अविनाशी विनाशरहित तथा जन्मादि सम्पूर्ण भावविकारोंसे रहित मुझ परमात्माको नहीं जान पाता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.13।। व्याख्या  त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः ৷৷. परमव्ययम् सत्त्व रज और तम तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न और लीन होती रहती हैं। उनके साथ तादात्म्य करके मनुष्य अपनेको सात्त्विक राजस और तामस मान लेता है अर्थात् उनका अपनेमें आरोप कर लेता है कि मैं सात्त्विक राजस और तामस हो गया हूँ। इस प्रकार तीनों गुणोंसे मोहित मनुष्य ऐसा मान ही नहीं सकता

Chapter 7 (Part 9)

कि मैं परमात्माका अंश हूँ। वह अपने अंशी परमात्माकी तरफ न देखकर उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वृत्तियोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है यही उसका मोहित होना है। इस प्रकार मोहित होनेके कारण वह मेरा परमात्माके साथ नित्यसम्बन्ध है इसको समझ ही नहीं सकता।यहाँ जगत् शब्द जीवात्माका वाचक है। निरन्तर परिवर्तनशील शरीरके साथ तादात्म्य होनेके कारण ही यह जीव जगत् नामसे कहा जाता है। तात्पर्य है कि शरीरके जन्मनेमें अपना जन्मना शरीरके मरनेमें अपना मरना शरीरके बीमार होनेमें अपना बीमार होना और शरीरके स्वस्थ होनेमें अपना स्वस्थ होना मान लेता है इसीसे यह जगत् नामसे कहा जाता है। जबतक यह शरीरके साथ अपना तादात्म्य मानेगा तबतक यह जगत् ही रहेगा अर्थात् जन्मतामरता ही रहेगा कहीं भी स्थायी नहीं रहेगा।गुणोंकी भगवान्के सिवाय अलग सत्ता माननेसे ही प्राणी मोहित होते हैं। अगर वे गुणोंको भगवत्स्वरूप मानें तो कभी मोहित हो ही नहीं सकते।तीनों गुणोंका कार्य जो शरीर है उस शरीरको चाहे अपना मान लें चाहे अपनेको शरीर मान लें दोनों ही मान्यताओंसे मोह पैदा होता है। शरीरको अपना मानना ममता हुई और अपनेको शरीर मानना अहंता हुई। शरीरके साथ अहंताममता करना ही मोहित होना है। मोहित हो जानेसे गुणोंसे सर्वथा अतीत जो भगवत्तत्त्व है उसको नहीं जान सकता। यह उस भगवत्तत्त्वको तभी जान सकता है जब त्रिगुणात्मक शरीरके साथ इसकी अहंताममता मिट जाती है। यह सिद्धान्त है कि मनुष्य संसारसे सर्वथा अलग होनेपर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे सर्वथा अभिन्न होनेपर भी परमात्माको जान सकता है। कारण इसका यह है कि त्रिगुणात्मक शरीरसे यह स्वयं सर्वथा भिन्न है और परमात्माके साथ यह स्वयं सर्वथा अभिन्न है।अस्वाभाविकमें स्वाभाविक भाव होना ही मोहित होना है। जो प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले तीनों गुणोंसे परे हैं अत्यन्त निर्लिप्त हैं और नित्यनिरन्तर एकरूप रहनेवाले हैं ऐसे परमात्मा स्वाभाविक हैं। परमात्माकी यह स्वाभाविकता बनायी हुई नहीं है कृत्रिम नहीं है अभ्याससाध्य नहीं है प्रत्युत स्वतःस्वाभाविक है। परंतुशरीर तथा संसारमें अहंताममता अर्थात् मैं और मेराभाव उत्पन्न हुआ है एवं नष्ट होनेवाला है यह केवल माना हुआ है इसलिये यह अस्वाभाविक है। इस अस्वाभाविकको स्वाभाविक मान लेना ही मोहित होना है जिसके कारण मनुष्य स्वाभाविकताको समझ नहीं सकता।जीव पहले परमात्मासे विमुख हुआ या पहले संसारके सम्मुख (गुणोंसे मोहित) हुआ इसमें दार्शनिकोंका मत यह है कि परमात्मासे विमुख होना और संसारसे सम्बन्ध जोड़ना ये दोनों अनादि हैं इनका आदि नहीं है। अतः इनमें पहले या पीछेकी बात नहीं कही जा सकती। परन्तु मनुष्य यदि मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे उसे केवल भगवान्में ही लगाना शुरू कर दे तो यह संसारसे ऊपर उठ जाता है अर्थात् इसका जन्ममरण मिट जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह मनुष्य प्रभुकी दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके ही बन्धनमें पड़ा है। अपनी स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके नष्ट होनेवाले पदार्थोंमें उलझ जानेसे यह परमात्मतत्त्वको जान नहीं सकता।परमव्ययम् पदसे भगवान् कहते हैं कि मैं इन गुणोंसे पर हूँ अर्थात् इन गुणोंसे सर्वथा रहित असम्बद्ध निर्लिप्त हूँ। मैं न कभी किसी गुणसे बँधा हुआ हूँ और न गुणोंके परिवर्तनसे मेरेमें कोई परिवर्तन ही होता है। ऐसे मेरे वास्तविक स्वरूपको गुणोंसे मोहित प्राणी नहीं जान सकते। सम्बन्ध  अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनेको न जान सकनेमें हेतु बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.12 7.13।।ये चेति। त्रिभिरिति। सत्त्वादीनि मन्मयानि न त्वहं तन्मयः। अत एव च भगवन्मयः सर्वं भगवद्भावेन संवेदयते न तु नानाविधपदार्थविज्ञाननिष्ठो भगवत्तत्त्वं प्रतिपद्यते इति सकलमानसावर्जक एष क्रमः। अनेनैव चाशयेन वक्ष्यते वासुदेवः सर्वम् इति (K adds another इति) ज्ञानेन यो बहुजन्मोपभोगजनितकर्मसमतासमनन्तरसमुत्पन्नपरशक्तिपातानुगृहीतान्तःकरण असौ प्रतिपद्यते भगवत्तत्त्वं(S omits भगवत्तत्त्वम्) ननु (K omits ननु) सर्वं वासुदेवः इति बुद्ध्या स महात्मा स च दुर्लभ इति। एवं ह्यबुद्ध्यमानं ( N हि बुद्ध्यमानम्) प्रत्युत सत्त्वादिभिर्गुणैः मोहितमिदं जगत् गुणातीतं वासुदेवतत्त्वंनैवोपलभते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.13।।सतीश्वरस्य स्वातन्त्र्ये नित्यशुद्धत्वादौ च कुतो जगतस्तदात्मकस्य संसारित्वमित्याशङ्क्य तदज्ञानादित्याह एवंभूतमपीति। यद्यप्रपञ्चोऽविक्रियश्च त्वं कस्मात्त्वामात्मभूतं स्वयंप्रकाशं सर्वो जनस्तथा न जानातीति मत्वा शङ्कते तच्चेति। श्लोकेनोत्तरमाह उच्यत इति। एभ्यः परमित्यप्रपञ्चकत्वमुच्यते। अव्ययमिति सर्वविक्रियाराहित्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.13।।ननु विज्ञाननिरूपणं प्रारभ्यत्रिभिः इत्यादिकं किमर्थमुच्यते इत्यत आह तर्हीति।ये चैव 7।12 इति। विज्ञाननिरूपणोपसंहारवाक्ये सत्त्वादिगुणनिर्वृतानां भगवान्कारणमाश्रयश्च तदनाश्रयश्चेत्युक्तम्। पृ.371 तेनैव गुणातीत इति चोक्तप्रायम्। तस्यायमाक्षेपः। एवं गुणातीततया सगुणश्च ज्ञायस इति शेषः। एवमनुपलम्भविपरीतोपलम्भाभ्यामुक्तमसदिति भावः। विकारार्थतानिरासार्थमाह तादात्म्येति। मयटस्तादात्म्यार्थत्वं कुतः इत्यत आह तच्चेति। तादात्म्ये प्रयोगं दर्शयितुमुपोद्धातमाह न हीति। कार्यभूतेत्युपलक्षणम्। गुणप्राचुर्यादिकमपि तस्यां न सम्भवति। ततः किं इत्यत आह गुणेति।दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया 7।14 इति मायाया गुणमयीत्वमुच्यते। न च तत्र विकाराद्यर्थता सम्भवति ततः परिशेषतः तादात्म्यार्थता ग्राह्येत्यर्थः। अस्तु मयटस्तादातम्ये शक्तिः। अत्र विकारार्थतां परित्यज्य तद्ग्रहणे को हेतुः इति चेत् उच्यते विकारार्थताग्रहणेमामेभ्यः परं इत्यत्र गुणकार्येभ्य एव भगवतः परत्वमुक्तं स्यात् न तु गुणेभ्यः। अतस्तत्सङ्ग्रहाय तादात्म्यार्थताग्रहणम्। एवं तर्हि गुणेभ्य एव परत्वमुक्तं स्यात् न तु गुणकार्येभ्योऽपीति समानमित्यत आह सिद्धं चेति। सिद्धं प्रमितम्। ततश्चगुणात्मकैः इत्युक्ते गुणानां तत्कार्याणां चोपादाने सति उभयपरत्वमुक्तं भवति कार्यधर्मादेरिति। कार्यद्रव्यस्योपादानेन गुणक्रियाजातिपूर्वाणां धर्माणां गुण्यादिभिरित्यर्थः। भावशब्दस्यानेकार्थत्वात्तस्य विवक्षितमर्थमाह भावैरिति। एवं सति सर्वपरत्वलाभादिति भावः। नन्वेवमप्येभिरिति पुरोवर्तिनामेव ग्रहणात् न सर्वपरत्वसिद्धिरित्यत आह सर्व इति। प्रमितपरामर्शोऽयं न पुरोवर्तिमात्रस्येति भावः। जगन्मोहितमित्यलं किमिदमित्यनेनेत्यत आह ज्ञानीति। व्यवहारपतितमित्यर्थः। ननु भगवद्विषयस्य सगुणत्वमोहस्य कथं गुणात्मकाः पदार्थाः कारणं इत्यत आह गुणमयेति। देहत्वादिहेतुनेति शेषः। मायेति गुणमयानां ग्रहणम्। मोहितो जनः। अत्र प्रमाणमाह जगाद चेति। आदिपदेनेन्द्रियादिग्रहणम्। यदर्थं तादात्म्यार्थग्रहणं कृतं तदाह एभ्य इति। ननु भगवतो गुणातीतत्वे प्रमिते तदर्थोऽयं श्रमः सफलः स्यात्। तदेव कुतः इत्यत आह गुणेभ्यश्चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.13।।तर्हि कथमेवं न ज्ञायते इत्यत आह त्रिभिरिति। तादात्म्यार्थे मयट्। तच्चोक्तम्तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा इति। न हि गुणकार्यभूता माया।गुणमयी 7।14 इति च वक्ष्यति। सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः इत्यादि व्यासयोगे। भावैः पदार्थैः। सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत एवेति दर्शयति एभिरिति। ज्ञानिव्यावृत्त्यर्थंइदं इति। गुणमयदेहादिकं दृष्ट्वेश्वरदेहेऽपि तादृश इति मायामोहित इत्यर्थः। जगाद च व्यासयोगेगौणान्ब्रह्मादिदेहादीन्दृष्ट्वा विष्णोरपीदृशः। देहादिरिति मन्वानो मोहितोऽज्ञो जनो भृशम् इति। एभ्यो गुणमयेभ्यःगुणेभ्यश्च परं 14।19 इति वक्ष्यमाणत्वात्। केवलो निर्गुणश्च श्वे.उ.6।11 इत्यादिश्रुतिभ्यश्च त्रैगुण्यवर्जितमिति चोक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.13।।तदेवं चेतनाचेतनात्मकं कृत्स्नं जगत् मदीयं काले काले मत्त एव उत्पद्यते मयि च प्रलीयते मयि एव अवस्थितं मच्छरीरभूतं मदात्मकं च इति अहम् एव कार्यावस्थायां कारणावस्थायां च सर्वशरीरतया सर्वप्रकारः अवस्थितः। अतः कारणत्वेन शेषित्वेन च ज्ञानाद्यसंख्येयकल्याणगुणगणैः च अहम् एव सर्वैः प्रकारैः परतरः। मत्तः अन्यत् केन अपि कल्याणगुणगणेन परतरं न विद्यते। एवंभूतं मां त्रिभ्यः सात्त्विकराजसतामसगुणमयेभ्यः भावेभ्यः परं मदसाधारणैः कल्याणगुणगणैः तत्तद्भोग्यताप्रकारैः च परम् उत्कृष्टतमम् अव्ययं सदा एकरूपम् अपि तैः एव त्रिभिः गुणमयैः निहीनतरैः क्षणविध्वंसिभिः पूर्वकर्मानुगुणदेहेन्द्रियभोग्यत्वेन अवस्थितैः पदार्थैः मोहितं देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मना अवस्थितम् इदं जगत् न अभिजानाति।कथं स्वत एव अनवधिकातिशयानन्दे नित्ये सदा एकरूपे लौकिकवस्तुभोग्यताप्रकारैः च उत्कृष्टतमे त्वयि स्थिते अपि अत्यन्तनिहीनेषु गुणमयेषु अस्थिरेषु भावेषु सर्वस्य भोक्तृवर्गस्य भोग्यत्वबुद्धिः उपजायते इत्यत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.13।। त्रिभिः गुणमयैः गुणविकारैः रागद्वेषमोहादिप्रकारैः भावैः पदार्थैः एभिः यथोक्तैः सर्वम् इदं प्राणिजातं जगत् मोहितम् अविवेकितामापादितं सत् न अभिजानाति माम् एभ्यः यथोक्तेभ्यः गुणेभ्यः परं व्यतिरिक्तं विलक्षणं च अव्ययं व्ययरहितं जन्मादिसर्वभावविकारवर्जितम् इत्यर्थः।।कथं पुनः दैवीम् एतां त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं मायामतिक्रामति इत्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.14 】

▸ Sanskrit Sloka: दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया | मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ||

▸ Transliteration: daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā | māmeva ye prapadyante māyāmetām taranti te ||

▸ Glossary: daivī: transcendental; hi: certainly; eṣā: this; guṇamayī: consisting of the three modes of material nature; mama: My; māyā: energy; duratyayā: very difficult to overcome; māṃ: unto Me; eva: certainly; ye: those; prapadyante: surrender; māyāṃetāṃ: this illusory energy; taranti: overcome; te: they

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.14 My Divine energy, consisting of the three modes of material nature, is difficult to overcome. But those who surrender unto Me can cross beyond it with ease.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.14।।क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है। जो केवल मेरे ही शरण होते हैं वे इस मायाको तर जाते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.14।। यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं वे इस माया को पार कर जाते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.14 दैवी divine? हि verily? एषा this? गुणमयी made of Gunas? मम My? माया illusion? दुरत्यया difficult to cross over? माम् to Me? एव even? ये who? प्रपद्यन्ते take refuge? मायाम् illusion? एताम् this? तरन्ति cross over? ते they.Commentary Maya is the Upadhi or the causal body (Karana Sarira) of Isvara. It is the material cause of this universe. It is inherent in the Lord. It is constituted of the three alities? viz.? Sattva? Rajas and Tamas. Those who completely devote themselves to the Lord alone after renouncing all formal religion (Dharma) cross over this illusion which deludes all beings. They attain liberation or Moksha.Isvara is the Lord of Maya (illusion). He has perfect control over it. Avidya is the Upadhi (limiting adjunct) of the Jiva (individual soul). The Jiva is a slave of this ignorance. Ignorance is the veil that has screened the Jiva from Satchidananda Brahman or the ExistenceKnowledgeBliss Absolute. When the veil is removed by the dawn of knowledge of the Self the Jiva loses his characteras a Jiva or an individual soul and becomes identical with Brahman. (Cf.XV.3and4)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.14. This is My play (daivi), trick-of-Illusion composed of the Strands and is hard to cross over. Those, who resort to Me alone-they cross over the trick-of-Illusion.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.14 Verily, this Divine Illusion of Phenomenon manifesting itself in the Qualities is difficult to surmount. Only they who devote themselves to Me and to Me alone can accomplish it.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.14 (a) For this divine Maya or Mine consisting of the three Gunas (assumed for purposes of sport) is hard to overcome৷৷.

(b) ৷৷. But those who take refuge in Me (Prapadyante) alone shall pass beyond the Maya.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.14 Since this divine Maya of Mine which is constituted by the gunas is difficult to cross over, (therefore) those who take refuge in Me alone cross over this Maya.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.14 Verily, this divine illusion of Mine, made up of the (three) alities (of Nature) is difficult to cross over; those who take refuge in Me alone, cross over this illusion.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.14 Daivi etc. Deva means 'one who plays'. What is born of (or exists in) him is daivi 'play'. Hence, the meaning is : 'This is My play'. Due to this [play-trick], the [Strands] Sattva etc., even though they are not really different from the Supreme Brahman, the Pure Consciousness, manifest as different from That. This [differentiation] itself accounts for their secondary nature i.e., the nature of being an object of enjoyment i.e., being dependent on the existence of the enjoyer. This peculiarity of dual-nature is inexplicable for the persons of mundane life. Hence to them it is a trick-of-Illusion. Therefore, those who have realised the light of the Brahman, the Supreme Reality, and find the universe as not distinct from that [Brahman], they [alone] cross over the trick-off-Illusion which is of the nature of manifesting in duality and is in the form of the dependent status of the Strands, Sattva etc. This is the idea indicated by 'alone' in 'Me alone'. On the other hand those who would find just the manifestation of duality as they [appear to] exist - they do not across over the trick-of-Illusion. Thus it is rightly said 'I am not in them (in the beings of the Sattva etc.) etc.'

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.14 (a) This Maya of Mine consists of the three Gunas, Sattva, Rajas and Tamas. Because it is created by Me, the Divine, for purpose of sport, it is divine in its power and therefore difficult to overcome.

The word Maya is used for the effects of the three Gunas, because it has got the power of generating wonderful effects as in the case of the magic of Asuras and Raksasas. See the passages: 'Then the excellent discus, the flaming Sudarsana, was despatched by the Lord to defend the boy. The thousand Mayas or wonderfully created weapons of the evil-designed Sambara were foiled one after another, by that ickly moving discus, for protecting the body of the boy' (V. P., 1.19. 19-20).

Here the term Maya does not signify the sense of 'false'. Even with regard to magicians, when the term, Mayavin (one who possesses Maya) is used, there is origination of real impressions with the aid of certain incantations, herbs etc., though the objects created are illusory things. Accordingly the term Maya denotes the incantations, herbs etc., which have got the power of creating real impressions. Inasmuch as the sense of the term should be invariable, following the usage in all cases, the term Maya can be applied to the illusory objects, only in a secondary sense, while its primary sense in regard to the real impressions generated in the mind. It is just like in the statement 'The cots cry.'

The Maya of the Lord, which is absolutely real and which consists of the Gunas, is alone taught in the texts like, 'Know then Maya to be the Prakrti and the possessor of the Maya to be the great Lord' (Sve. U., 4.10). It not only obscures the essential nature of the Lord but also creates the condition of the mind that sees its objects as enjoyable. Therefore, the entire universe, deluded by the Lord's Maya, does not know the Lord who is of the nature of boundless beatitude. (On the other hand they feel objects set forth by Maya as enjoyable).

Sri Krsna teaches the way of deliverance from Maya:

(b) But those who take refuge in Me alone - Me whose resolves are always true, who has supreme compassion, and who is the refuge of all beings without exception and without consideration of their particular status - such persons shall pass beyond this Maya of Mine consisting of the three Gunas. The meaning is that they worship Me alone, renouncing the Maya.

Why, then do all not take recourse to refuge in the Lord which is conducive to the worship of the Lord?

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.14 Hi, since; esa, this, aforesaid; daivi, divine; Maya mama, of Mine, of God, of Visnu, which (Maya) is My own; and which is guna-mayi, constituted by the gunas; is duratyaya, difficult to cross over; therefore, this being so, ye, those who; wholeheartedly prapadyante, take refuge; mam eva, in Me alone, in Me who am the Master of Maya and who am their own Self, by giving up all forms of rites and duties; te, they; taranti, cross over; etam, this; mayam, Maya, which deludes all beings. That is to say, they become freed from the bondage of the world. 'If it is that those who resort to You cross over this Maya, why then do not all take refuge in You alone?' This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.14।। भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि अहंकार से युक्त आत्मकेन्द्रित पुरुष के लिए मेरी माया से उत्पन्न मोह को पार कर पाना दुस्तर है। यदि कोई चिकित्सक रोगी के रोग को पहचान कर कहे कि इस रोग के निवारण के लिए कोई औषधि नहीं है तो कोई भी रोगी सावधानी उत्साह तथा श्रद्धा के साथ चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार नहीं करेगा। इसी प्रकार यदि भवरोगियों के चिकित्सक भगवान् श्रीकृष्ण रोग का कारण माया को बताकर उसे दुस्तर घोषित करें तो कौन व्यक्ति श्रद्धा के साथ उनके निराशावादी उपदेश का अनुकरण करेगा भगवान् श्रीकृष्ण इस कठिनाई अथवा दोष को जानते हैं और इसलिए तत्काल ही साधक के मन की शंका को दूर करते हैं। यदा कदा रोगी को उसके रोग की गम्भीरता का भान कराने के लिए चिकित्सक को कठोर भाषा का प्रयोग करना पड़ता है ठीक उसी प्रकार यहाँ श्रीकृष्ण अनेक विशेषणों के द्वारा हमें इस रोग की वह भयंकरता बताने का प्रयत्न करते हैं जिसके कारण हम अपने परमात्म स्वरूप को भूलकर संसारी जीवभाव को प्राप्त हो गये हैं रोग तथा उपचार को बताकर भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण स्वास्थ्य का आश्वासन भी देते हैं।जो साधक मेरी शरण में आते हैं वे माया को तर जाते हैं। शरण से तात्पर्य भगवान् के स्वरूप को पहचान कर तत्स्वरूप बन जाना है। इसका सम्पादन कैसे किया जा सकता है इसका विवेचन पूर्व के ध्यानयोग नामक अध्याय में किया जा चुका है। एकाग्र चित्त होकर आत्मस्वरूप का ध्यान करना यह साक्षात् साधन है और ध्यान के लिए आवश्यक योग्यता प्राप्त करने के उपाय भी पहले बताये गये हैं।यदि आपकी शरण में आने से माया को पार किया जा सकता है तो फिर सब लोग आपकी शरण में क्यों नहीं आते हैं इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.14।।तर्ह्यनादिसिद्धां त्रिगुणात्मिका दैवीं मायां जीवमोहिनीं केनोपायेनातिक्रामन्तीत्यपैक्षायामाह दैवी हीति। देवस्य ममेश्वरस्य स्वभूता त्रिगुणमयी त्रिगुणात्मिका माया प्रकृतिःमायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्। सा प्रकृतिर्मायाविद्यारुपेण द्विधामाया चाविद्या च स्वयमेव भवति इति श्रुतेः। तदुक्तंतमोरजःसत्त्वगुणा प्रकृतिर्दिविधा मता। सत्त्वशुद्य्धविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते।।मायाबिम्बो वशीकृत्य तां स्यात्सर्वज्ञ ईश्वरः। अविद्यावशगस्त्वन्यस्तद्वैचित्र्यादनेकधा।। इति। तथाच माया प्रकृतिरविद्या मायामयी ईश्वरमधिष्ठानत्वेनाश्रित्य जीवान्मोहयति। तथाच शारीरकं भाष्यंअविद्यात्मिका हि बीजशक्तिरव्यक्तशब्दनिर्देश्या परमेश्वराश्रया मायामयी महासुषुप्तिर्यस्यां स्वरुपबोधरहिताः वस्तु न जानामीत्यत्र तथैवानुभवात्। नचाविद्यायां सत्यां जीवपरमात्मविभागः। सति चैतस्मिन्जीवाश्रया परमात्मविषया विद्येतीतरेताश्रय इति वाच्यम्। जीवाविद्ययोर्बीजाङ्कुरवदनादित्वात्। नन्वेतद्दृष्टान्तेन जीवानित्यत्वमिति चेन्न। उत्तरोत्तरजीवाभिव्यक्तीनां पूर्वपूर्वभ्रमनिमित्तत्वाश्रयणात्। नन्वविद्याया जीवाश्रितत्वे स्वस्य च तदाश्रितत्वे आत्माश्रय इति चेन्न। अनादित्वेनोत्पत्त्यभावात्। जीवस्य स्तवःप्रतीत्य तद्दलादविद्याया अपि प्रतीतिसंभवात्। नन्वेवमपि स्वस्कन्धारुढारोहणवत्स्वाश्रिताश्रितत्वं विरुद्धमितिचेन्न। जीवाविद्ययोरमूर्तत्वेन कुण्डबदरवदधरोत्तरीभावायोग्यत्वेनावच्छेद्यावच्छेदकत्वाश्रयणात्। अविद्यावच्छेदकोपाधिकं जीवत्वमिति जीवोविद्ययावच्छिद्यते। नन्विदमपीतरेतराश्रयग्रस्तमिति चेन्न। एवंविधस्थरेऽयोन्याश्रयस्यादोषात्। प्रमेयत्वावगाहि प्रमाणं निरुपकप्रमेयावच्छेद्यं प्रमेयं च स्वविशेषणीभूतप्रमाणावच्छेद्यमित्येवमादिप्ववच्छेद्यावच्छेदकत्वस्यान्योन्याश्रयतन्त्रस्य दृष्ट्वात्। जीवाविद्ययोरधिष्टानं तु ब्रह्म तस्यैव सर्वप्रपञ्चविवर्ताधिष्टनत्वात्। तदुक्तम् अधिष्ठानं विवर्तानामाश्रयो ब्रह्मशुक्तिवत्। जीवाविद्यादिकानां स्यादिति सर्वमनाकुलम्।। इति। अतएव भगवताप्युक्तंदैवी ह्येषा गुणमयी मम मायेति। शुक्तिरेव यथा रजतरुपेणावभासते तथा पर एवात्मा अनाद्यविद्यावच्चेदलब्धजीवभावभेदेनावभासते। सएव च देहेन्द्रियादिभिरवच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते। तादृशां च जीवानामविद्या नतु सर्वोपाधिविहीनस्य परमात्मनः। नन्वस्वतन्त्रोऽन्येन कारग्रहे प्रवेश्यते। परमात्मा तु सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च कस्मादकस्मात्संसारी संपद्यत इतिचेन्न। शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावस्य निर्मृष्टनिखिलाविद्यातद्वासनस्येति हि यस्मादेषानुभवसिद्धा अकस्मादपलापानर्हा गुणमयी सत्त्वरजस्तमोमयी। प्रधानस्येव मायायाः स्वातन्त्रयनिरासार्थं दैवीत्युक्तम्। देवस्येयं स्वभूता दैवी। कल्य देवस्येयं च केत्यपेक्षायां मम माया इत्युक्तम्। दुरत्ययां दुःखेनात्ययोऽतिक्रमणं यस्याः सा। अतिक्रमणे तर्हि क उपाय इत्यपेक्षायामाह मामिति। मामेव स्वात्मभूतम्। एवकारेण मायाया व्यावृत्तिविंवक्ष्यते। ये प्रपद्यन्ते सर्वात्मना प्रपन्ना भवन्ति ते मत्प्रसादाल्लब्धबुद्धियोगा मायामेतां दुरत्ययां सर्वभूतमोहिनीं तरन्ति अतिक्रामन्ति। संसारबन्धनान्मुच्यन्त इत्यर्थः। ते मत्प्रसादाल्लब्धबुद्धियोगा मायामेतां दुरत्ययां सर्वभूतमोहिनीं तरन्ति अतिक्रामन्ति। संसारबन्धनान्मुच्यन्त इत्यर्थः। अत्रेदमवधेयम् अनादिरनिर्वाच्या भूतप्रकृतिश्चिन्मात्रसंबन्धिनी माया। तस्यां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः। तस्या एवावरणविक्षेपशक्तिमदविद्याभिधानेषु परिच्छिन्नानन्तप्रदेशेषु चित्प्रतिबिम्बो जीव इति केचित्।जीवेशावाभासेन करोतिमायाय चाविद्या च स्वयमेव भवति इति श्रुतिसिद्धौ मूलप्रकृतेस्त्रिगुणात्मिकाया द्वौ रुपभेदौ रजस्तमोनभिभूतशुद्धसत्त्वप्रधाना माया तदभिभूतमलिनसत्त्वप्रधानाऽविद्येति मायाविद्याभेदं परिकल्पयित्वा मायाप्रतिबिम्ब ईश्वरोऽविद्याप्रतिबिम्बो जीव इति केचिद्वर्णयन्ति। एकैव मूलप्रकृतिर्विक्षेपप्रधानान्येन मायाशब्दितेश्वरोपाधिः। आवरणप्रधान्येनाविद्याऽज्ञानशब्दिता जीवोपाधिरिति केचित्।कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः इति श्रुतिमनुसृत्यविद्यायां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः अन्तःकरणे चित्प्रतिबिम्बो जीव इति केचित्। एवमुक्तेष्वेतेष जीवेश्वरयोः प्रतिबिम्बविशेषत्वपक्षेषु यद्विम्बस्थानीयं ब्रह्म तन्मुक्तप्राप्यम्। अन्येतु जीव ईश्वरः शुद्धा चिदिति त्रैविध्यप्रक्रियां विहाय वस्तुत एकस्यैवाकाशस्य घटाकाशजलाशमहाकाशमेघाकशभेदाच्चातुर्विध्यमिवैकस्यैव चैतन्यस्य कूटस्थजीवब्रह्मेश्वरभेदेन चातुर्विध्यं परिकल्प्य धीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिरीश्वरः अन्तःकरणोपाधिर्जीव इति दर्शयन्ति। अन्येतुविभेदजनकेऽज्ञाने नाशमान्त्यतिकं गते। आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति।। इति समृत्या एकस्यैवाज्ञानस्य जीवेश्वरविभागोपाधिध्वप्रतिपादनाद्विम्बप्रतिबिम्बभावेन जीवेश्वरयोर्विभागो नोभयोरपि प्रतिबिम्बभावेनोपाधिद्वयमन्तरेणोभयोः प्रतिबिम्बत्वायोगात्। तत्रापि प्रतिबिम्बो जीवः बिम्बस्थानीय ईश्वर इति। सच प्रतिबिम्बभूतो जीव एवाविद्योपाधिक एकमेव तदज्ञानं तदज्ञानकल्पितं च सर्वं जगत्तस्य स्वप्रदर्शनवद्यावदविद्यं सर्वो व्यवहारः। बुद्धमुक्तव्यवस्थापि नास्ति जीवस्यैकत्वात्। शुकमुक्त्यादिकमपि स्वाप्नपुरुषान्तरमुक्त्यादिकमिव कल्पितमिति वर्णयन्ति। परेतु रुपानुपहितप्रतिबिम्बो न युक्तः। सुतरां नीरुपे। ननु नीरुपस्य गगनस्य जलादौ प्रतिबिम्बानुभवान्नीरुपस्य न प्रतिबिम्ब इति नास्ति नियम इति चेन्न। आलोकप्रतिबिम्बे गगनप्रतिबिम्बत्वव्यवहारस्य भ्रममात्रमूलकत्वात्। ध्वनिधर्माणामुदात्तादिस्वराणां संनिधिमात्रेण व्यञ्जकतया वुर्णेष्वारोपोपपत्त्या वर्णप्रतिबिम्बोपाधिकत्वपल्पनााय निष्प्रमाणकत्वेन ध्ववौ वर्णप्रतिबिम्बत्ववादोऽप्ययुक्तः। तस्माच्चाक्षुषस्यैव चाक्षुष एव प्रतिबिम्बइति नियमस्य न क्वापि भङ्गोऽस्ति। चन्दनखण्डादिप्रतिबिम्बे चाक्षुषगुणानामेवानुभवात्। तदाग्राणेऽपि सौरभाननुभवाच्च। मुखादिप्रतिबिम्बेऽपि चाक्षुषगुणानामेवोपलम्भो नतु मुकोच्चारितशब्दस्य। ननु गुहादिषु प्रतिध्वनिरुपस्य ध्वनिप्रतिबिम्बस्योपलम्भ इति चेन्न। पञ्चीकरणप्रक्रियायां दुन्दुभिसमुद्रतवावानलझंझामारुदादिध्वनीनां पृथिव्यादिशब्दत्वेन प्रतिध्वनेरेवाकाशगुणत्वात्तस्यान्यशब्दप्रतिबिम्त्वानुपपत्तेः। नच वर्णात्मकप्रतिशब्दस्य पूर्ववर्णप्रतिबिम्बत्वमिति वाच्यम्। मूलध्वनिवदेव प्रतिध्वनेरपि वर्णाभिव्यञ्चकत्वोपपत्तेः। तस्मात् घटाकाशवदन्तःकरणाद्यवच्छिन्नं चैतन्यं जीवः। तदनवच्छिन्न ईश्वर इति। नचैवंयो विज्ञाने तिष्ठन्विज्ञानमन्तरो यमयति इत्यादिश्रुत्या ईश्वरस्यान्तर्यामिभावेन विकारान्तरावस्थानबोधकया विरोधः। ब्रह्माण्डान्तर्वर्तितत्तदन्तःकरणोपाधिभिस्तदन्तर्वर्तिचैतन्यस्य सर्वात्मना जीवभावेनावच्छेदात् तदवच्छेदरहितचैतन्यात्मकस्येश्वरस्य ब्रह्माण्डान्तः सत्त्वानापत्तेः। प्रतिबिम्बपक्षे तु जलगतस्वाभाविकाकाशे सत्येव प्रतिबिम्बाकाशदर्शनादेकत्र द्विगुणीकृत्य वृत्तिरुपपद्यत इति वाच्यम्। अविद्याश्रयत्वान्तःकरणसंवलितत्वाद्युपाधिकाज्जीवादविद्याविषयत्वान्तःकरणासंवलितत्वाद्युपाधिकस्यान्तर्यामिणो भेदेनावस्थानस्योपपत्त्या श्रुतिविरोधाभावात्। प्रतिबिम्बपक्षे तु अन्तर्यामिब्राह्मणस्यासामञ्जस्यं बहिस्थपाषाणादिवत् जलान्तर्वर्तिपाषाणादेः जले प्रतिबिम्बादर्शनादुपाध्यनन्तर्गतस्यैव चैतन्यस्य प्रतिबिम्ब इत्यवश्याङ्गीकर्तव्यत्वेन बिम्बभूतस्य विकारान्तरावस्थानायोगात्। एकत्र द्विगुणीकृत्यवृत्तिरित्यपि न।षडस्माकमनादयः इति सिद्धान्ते जीवेश्वरभिन्नत्वेनाभ्युपगतस्य जीवादिसर्वप्रपञ्चविवर्ताधिष्ठात्वेन सर्वगतस्य शुद्धचैतन्यस्याप्यन्तःकरणे सत्त्वस्यावर्जनीयत्वेन जीवोऽन्तर्यामी शुद्धतैतन्यं चेति एकत्र त्रिगुणीकृत्य वृत्तेरुपपादनीयत्वापत्तेः। नचावच्छेदपक्षेयथा स्वयंज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भेदरुपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽध्यमात्माअतएव चोपमा सूर्यकादिवत् इति श्रुतिसूत्रविरोध इति वाच्यम्। भाष्यकारैरेवअतएवेति सूत्रं व्याख्याय सूर्यादिवदात्मनः प्रतिबिम्बो न युज्यते इति तदाक्षेपकत्वेनअम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्तवम् इति सूत्रं व्याख्यातततो वृद्धिह्नासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् इति सूत्रेणोक्तानुपपत्त्या आत्मनः प्रतिबिम्बनमनुपपन्नमित्यङ्गीकृत्यैव श्रुतिषु सूर्यादि प्रतिबिम्बोपादानस्य तात्पर्यान्तरवर्णनपरताया उक्तत्वात्। तथाच भाष्यंयत एव चायमात्मा चैतन्यस्वरुपो निर्विशेषो वाङ्यनसातीतः परप्रतिषेधोपदेश्योऽत एव चास्योपाधिनिमित्तामपारमार्थिकीं विशेषवत्तामभिप्रेत्य जलसूर्यकादिवदित्युपमा दीयते शास्त्रेषुयथा ह्ययं ज्योतिः इत्यादि।एक एव तु भूतात्मा भूतेभूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्।। इतिचैवमादिषु। अत्र प्रत्यवस्थीयते न जलसूर्यकादितुल्यत्वमिहोपपद्यते तद्वदग्रहणात् सूर्यादिभ्यो मूर्तेभ्यः पृथग्भूतं विप्रकृष्ठं देशम्। मूर्तं च जलं गृह्यते। तत्र युक्तः सूर्यादिप्रतिबिम्बोदय न त्वात्मा मूर्तो न चास्मात्पृथग्भूता विप्रकृष्टेशाश्चोपाधयः सर्वगतत्वात्सर्वानन्यत्वाच्च। तस्मादयुक्त उक्तोऽयं दृष्टान्त इति। अत्र प्रतिविधीयते युक्त एव त्वयं दृष्टान्तो विवक्षितांशसंभवात्। नहि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः किंचित्क्वचिद्विवक्षितमंशं मुक्त्वा सर्वसारुप्यं केनचिद्दर्शयितुं शक्यते सर्वसारुप्ये हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभावोच्छेद एव स्यात्। नचेदं स्वमनीषया जलसूर्यकादिदृष्टान्तप्रणयनं शास्त्रप्रणीतस्य त्वस्य प्रयोजकमात्रमुपन्यस्यते किं पुनरत्र विवक्षितं सारुप्यमिति। तदुच्यते वृद्धिह्रासभाक्त्वमिति। जलगतं हि सूर्यप्रतिबिम्ब जलवृद्धौ वर्धते जलह्रासे ह्रसति जलचलने चलति जलभेदे भिद्यते इत्येवं जलधर्मानुविधायि भवति नतु परमार्थतः सूर्यस्य तथात्वमस्त्येवं परमार्थतोऽविकृतमेकरुपमपि सद्ब्रह्म देहाद्युपाध्यन्तर्भावाद्भजत इवोपाधिधर्मान्वृद्धिह्रासादीनेवमुभयोर्दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः सामञ्जस्यादविरोध इति। बृहदारण्यकभाष्येऽपि प्रवेशपदार्थस्यान्यथोपपादनेन प्रतिबिम्बपक्षदूषणं स्थरीकृतम्। तैत्तिरीयकभाष्येऽपितत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् इति वाक्ये प्रवेशविचारावसरे जलसूर्यकादिप्रतिबिम्बवत्प्रवेशः स्यादितिचेन्न। अपरिच्छिन्नत्वादमर्तूत्वाच्च परिच्छिन्नस्य मूर्तस्यान्यस्यान्यत्र प्रसादास्वाभाविके जलादौ सूर्यकादिप्रतिबिम्बवत्प्रवेशः स्यादितिचेन्न। अपरिच्छिन्नत्वादमूर्तत्वातच्च परिच्छिन्नस्य मूर्तस्यान्यस्यान्यत्र प्रसादस्वाभाविके जलादौ सूर्यकदिप्रतिबिम्बोदयः स्यात्। नत्वात्मनोऽमूर्त्वादाकाशादिकारणस्यात्मनो व्यापकत्वात्तद्विप्रकृष्टदेशप्रतिबिम्बाधारवक्त्वभावाच्च प्रतिबिम्बवत्प्रेवेशो न युक्त इति प्रतिबिम्बभावेन प्रवेशनिराकरणं भाष्यकृद्भिः कृतम्। एवंच प्रतिबिम्बपक्षे श्रुतिसूत्रभाष्यविरोधोऽवच्चेदपक्षे तु तदभाव इति। अस्मिन्पक्षे श्रुतिसूत्रभाष्यानुग्रहोऽप्यस्ति। तथाहिघटसंवृतमाकाशं नीयमाने यथा घटे। घटो नीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः इति जीवस्य नभोपमशब्देन घटसंवृताकाशतुल्यत्वमभिधायिन्या श्रुत्यावच्छिन्नचैतन्यस्यैव जीवरुपत्वमुक्तम्।अंशो नानाव्यपदेशात् इति सूत्रेण जीव ईश्वरस्यांशो भवितुमर्हति। यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गोऽश इवांशः। नहि निरवयवस्य मुख्योऽशः संभवति कस्मात्पुनर्निरवयवत्वात्स एव न भवतिनानाव्यपदेशात्।य आत्मनि तिष्टन्नात्मानमन्तरो यमयति इतिचैवमादिको भेदनिर्देशो नासति भेदे संभवतीति भाष्येण च जीवचैतन्यस्य घटाकाशवदन्तःकरणावच्छिन्नत्वरुपमंशत्वं विवक्षितम्। यद्यपिआभास एव च इतिसूत्रेण आभास एवएष जीवः परस्यात्मनो जलसूर्यकादिवत्प्रतिपत्तव्यः इति तद्भाष्येण च तन्निराकरणं च न संभवतीति किंचिदनुरोधेन कस्मिंश्चिद्य्धाख्यातव्ये प्रतिबिम्बत्वनिराकरणस्ययुक्तियुक्त्त्वे न आभास इति सूत्रे भाष्यकृद्भिरपि भुत्योपपत्त्या प्रतिबिम्बत्वस्यासमर्थितत्वात्। तदेव सूत्रं तद्भाष्यं च वृद्धिह्रासभाक्त्वमिति सूत्रोक्तन्यायात्।अतश्च यथा नैकस्मिञ्जलसूर्यके कम्पमाने जलसूर्यकान्तरं कम्पते एवं नैकस्मिञ्जीवे कर्मफलसंबन्धिनि जीवान्तरस्य तत्संबन्ध इति तदधिकरणभाष्ये प्रतिबिम्बस्य दृष्टान्तत्वेनोक्तत्वाच्च प्रतिबिम्बसादृश्यप्रतिपादनपरं व्याख्येयम्। तस्मात्प्रतिबिम्बासंभवादिवच्छेदपक्षे विरोधाभावत्साधकस्य सत्त्वाच्च अवच्छेद्यचैतन्यस्य प्रतिबिम्बपक्षेऽपि संमतत्वेनोभयसंप्रतिपन्नत्वेन लाघवात्तस्यैव जीवत्वकल्पनौचित्यात्। सर्वगतस्य चैतन्यस्यान्तःकरणादिनावच्छेदोऽवश्यंभावीत्यावश्यकत्वाद्वच्छेदो जीव इति। स चानेकः अन्तःकरणादीनां नानाभूतानां जीवोपाधित्वाभ्युपगमात्। तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्।यथाग्रेः क्षुद्रा विस्फलिघङ्ग व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्व एत आत्मानो व्युच्चरन्ति इत्यादिश्रुतेः प्रतिषेधादिति चेन्न। शारीरादित्याधिकरणे बद्धमुक्त्वप्रतिपादकभाष्यस्य नैकस्मिञ्जीवे कर्मफलसंबन्धिनि जीवान्तरस्य तत्संबन्ध इतिआभास इति सूत्रस्थस्य सच स्वात्मभूतानिव घटाकाशस्थानीयानविद्योपस्थापितनामरुपकृकार्यकरणसंघातानुरोधिनो जीवाख्यान्विज्ञानात्मनः प्रतीष्टे इति।तदनन्यत्वं इत्यधिकरणस्थस्य जीवात्मापि पुण्यापुण्यकर्मा सुखदुःखभुक् प्रतिशरीरं प्रविभक्त इति जीवात्मनामुत्पत्तिप्रलयाबुच्येते। इति नात्मेत्यधिकरणस्थस्य च भाष्यस्यमामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते इत्यादिस्मृतेः।एवं जीवाश्चितो भावा भवभावनयोहिताः। ब्रह्मणः कलिताकारल्लक्षशोऽप्यथ कोटिशः।।असंख्याताः पुरा जाता जायन्ते चापि चाद्य भोः। उत्पतिष्यन्ति चैवाम्बुकणौघा इव निर्झरात्।।स्ववासनावशावेशादाशाविवशतां गताः। दशास्वतिविचित्रासु स्वयं निगडिताशयाः।।भविष्यञ्जातयः केचित्केचिद्भूतभवोद्भवाः। वर्तमानभवाः केचित्केचित्त्वभवतां गताः।।(अभवतां विदेहमुक्तिमिति टीकाकाराः)। जीवन्मुक्ता भ्रमन्तीह केचित्कल्याणभाजनाः। चिरमुक्ताः स्थिताः केचिन्नूनं परिणताः परे।।(परेपरमात्मनि परिणतास्तद्भावं प्राप्ता विदेहमुक्ता इति व्याख्यातारः)। केचिच्चिरेण कालेन भविष्यन्मुक्ततः शिवाः। केचिद्विशन्ति चिद्भावाः केवली भावमात्मनः।। केवलीभावं केवल्यमित्यादीतिहासस्य चास्मिन्पक्षे एवाञ्जस्यं नत्वेकजीववादे। नच नानाजीववादेऽपि ब्रह्मैव स्वाविद्यया नानान्तःकरणभावेन परिणतया नानाजीवभावं प्राप्य संसरति स्वविद्यया मुच्यत इत्यभिप्रायकत्वेपपत्तेः। नच जीवत्वोपाधिभूताया अविद्याया एकत्वाज्जीवैक्यसिद्धिरिति वाच्यम्। रूपं रुपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रुपं प्रतिचक्षणाय।इन्द्रो मायाभिः पुरुरुप ईयते ित्यादिश्रुत्या अविद्याया नानात्वाभ्युपगमात्। तदेकत्वश्रुत्यादीनां जात्यभिप्रायकत्वेपपत्तेः। अविद्याया एकत्वेऽपिकार्योपाधिरयं जीवः इतिश्रुत्यनुसारेणान्तःकरणानामेव जीवत्वोपाधित्वोपगमसंभवाच्च। अविद्याया नानात्वपक्षे विनिगमकाभावादनेकतन्त्वारब्धपटतुल्यः सर्वाविद्याकृतः प्रपञ्च इत्येके तत्ततज्ञानकृतप्रातिभासिकरजतवत्तत्तदविद्यकृतो वियदादिप्रपञ्चः प्रतिपुरुषं भिन्नः एक्यप्रत्ययस्तु शुक्तिरुप्यैक्यप्रत्ययवदित्यन्ये जीवाश्रितादविद्यानिचयाद्भिन्नाः परमेस्वराश्रिता मायैव प्रपञ्चकारणं जीवानामविद्यास्तु आवरणमात्रे प्रातिभासिकसृष्टौ चोपयुज्यन्ते।नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः इत्यादिवचने मायापदं सर्वे वयमतःपरंकामात्मानः स्वर्गपराःभोगैश्वर्यप्रसक्तानांकृपणाः फलहेतवःकर्मजं बुद्धियुक्ता हि या निसा सर्वभातानांज्ञानयोगगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनांकर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयःये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहंएवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिःयत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यतेज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनःतद्धुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुररावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाःपण्डिताः समदर्शिनःइहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनःलभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति तेन मां दुष्कृतिनो मूढाः चतुर्विधा भजन्ते मांजरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्त्रंतत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाःमत्स्थानि सर्वभूतानिमहात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताःएवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासतेअन्ये त्वेवमजानन्तःयज्ज्ञात्व मुनयः सर्वेनिर्मानमोहा जितसङ्गदोषाःविमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषःयतन्तो योगिनश्चैनंनष्टात्मानोऽल्पबुद्धयःत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनाम् इत्यादिभगवद्वचनेभ्योऽपि जीवानामनेकत्वमध्यवसीयते।क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारतप्रकृतिं पुरुषं चैव विद्य्धनादी उभावपिममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः इत्यादिवचनेष्वेकवचनं तु जात्यभिप्रायम्।एवमनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्यवालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते इत्यादिश्रुतिष्वपि।एको देवः सर्वभूतेषु गूढः इत्यादिश्रुतिस्तु परमात्मैकत्वप्रतिपादिका नतु जीवैकत्वप्रतिपादिका।केवलो निर्गुणश्च इत्यादिविशेषणेभ्यस्तथा च भाष्यंभेदस्तुपाधिनिमित्तो मिथ्याज्ञानकल्पितो न पारमार्थिकः।एको देवः सर्वभूतेषु गूढः इत्यादिश्रुतिभ्य इत्यलं प्रासङ्गिकेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.14।।ननु यथोक्तानादिसिद्धमायागुणत्रयबद्धस्य जगतः स्वातन्त्र्याभावेन तत्परिवर्जनासामर्थ्यान्न कदाचिदपि मायातिक्रमः स्याद्वस्तुविवेकासामर्थ्यहेतोः सदातनत्वादित्याशङ्क्य भगवदेकशरणतया तत्त्वज्ञानद्वारेण मायातिक्रमः संभवतीत्याह दैवीएको देवः सर्वभूतेषु गूढः इत्यादिश्रुतिप्रतिपादिते स्वतोद्योतनवति देवे स्वप्रकाशचैतन्यानन्दे निर्विभागे तदाश्रयतया तद्विषयतया च कल्पिताआश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्विभागचितिरेव केवला इत्युक्तेः। एषा साक्षिप्रत्यक्षत्वेनापलापानर्हा। हिशब्दाद्भ्रमोपादात्वादर्थापत्तिसिद्धा च। गुणमयी सत्त्व रजस्तमोगुणत्रयात्मिका। त्रिगुणरज्जुरिवातिदृढत्वेन बन्धनहेतुः मम मायाविनः परमेश्वरस्य सर्वजगत्कारणस्य सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेः स्वभूता स्वाधीनत्वेन जगत्सृष्ट्यादिनिर्वाहिका माया तत्त्वप्रतिभासप्रतिबन्धेनातत्त्वप्रतिभासहेतुरावरणविक्षेपशक्तिद्वयवत्यविद्या सर्वप्रपञ्चप्रकृतिः।मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इति श्रुतेः। अत्रैवं प्रक्रिया जीवेश्वरजगद्विभागशून्ये शुद्धे चैतन्येऽध्यस्तानादिरविद्या सत्त्वप्राधान्येन स्वच्छदर्पण इव मुखाभासं चिदाभासमागृह्णाति। ततश्च बिम्बस्थानीयः परमेश्वर उपाधिदोषानास्कन्दितः प्रतिबिम्बस्थानीयश्च जीव उपाधिदोषास्कन्दिकतः। ईश्वराच्च जीवभोगायाकाशादिक्रमेण शरीरेन्द्रियसंघातस्तद्भोग्यश्च कृत्स्नः प्रपञ्चो जायत इति कल्पना भवति। बिम्बप्रतिबिम्बमुखानुगतमुखवच्चेशजीवानुगतं मायोपाधि चैतन्यं साक्षीति कल्प्यते। तेनैव च स्वाध्यस्ता माया तत्कार्यं च कृत्स्नं प्रकाश्यते। अतः साक्ष्यभिप्रायेण दैवीति बिम्बेश्वराभिप्रायेण तु ममेति भगवतोक्तम्। यद्यप्यविद्याप्रतिबिम्ब एक एव जीवस्तथाप्यविद्यागतानामन्तःकरणसंस्काराणां भिन्नत्वात्तद्भेदेनान्तःकरणोपाधेस्तस्यात्र भेदव्यपदेशोमामेव ये प्रपद्यन्तेदुष्कृतिनो मूढा न प्रपद्यन्तेचतुर्विधा भजन्ते माम् इत्यादिः। श्रुतौ चतद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् इत्यादिः। अन्तःकरणोपाधिभेदापर्यालोचने तु जीवत्वप्रयोजकोपाधेरेकत्वादेकत्वेनैवात्र व्यपदेशः।क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषुप्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपिममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः इत्यादिः। श्रुतौ चब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्एको देवः सर्वभूतेषु गूढःअनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्यवालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्प्यते।। इत्यादिः। यद्यपि दर्पणगतश्चैत्रप्रतिबिम्बः स्वं परं च न जानात्यचेतनांशस्यैव तत्र प्रतिबिम्बितत्वात्तथापि चित्प्रतिबिम्बश्चित्त्वादेव स्वं परं च जानाति। प्रतिबिम्बपक्षे बिम्बचैतन्य एवोपाधिस्थत्वमात्रस्य कल्पित्वात् आभासपक्षे तस्यानिर्वचनीयत्वेऽपि जडविलक्षणत्वात्। स च यावत्स्वबिम्बैक्यमात्मनो न जानाति तावज्जलसूर्य इव जलगतम्पादिकमुपाधिगतं विकारसहस्रमनुभवति। तदेतदाह दुरत्ययेति। बिम्बभूतेश्वरैक्यसाक्षात्कारमन्तरेणात्येतुं तरितुमशक्येति दुरत्यया। अतएव जीवोऽन्तःकरणावच्छिन्नत्वात्तत्संबन्धमेवाक्ष्यादिद्वारा भासयन् किंचिज्ज्ञो भवति। ततश्च जानामि करोमि भुञ्जे चेत्यनर्थशतभाजनं भवति। स चेद्बिम्बभूतं भगवन्तमनन्तशक्तिं मायानियन्तारं सर्वविदं सर्वफलदातारमनिशमानन्दघनमूर्तिमनेकानवतारान्भक्तानुग्रहाय विदधतमाराधयति परमगुरुमशेषकर्मसमर्पणेन तदा बिम्बसमर्पितस्य प्रतिबिम्बे प्रतिफलनात्सर्वानपि पुरुषार्थानासादयति। एतदेवाभिप्रेत्य प्रह्नादेनोक्तंनैवात्मनः प्रभुरयं निजलाभपूर्णो मानं जनादविदुषः करुणो वृणीते। यद्यज्जनो भगवते विदधीत मानं तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः।। इति। दर्पणप्रतिबिम्बितस्य मुखस्य तिलकादिश्रीरपेक्षिता चेद्बिम्बभूते मुखे समर्पणीया। सा स्वयमेव तत्र प्रतिफलति नान्यः कश्चित्तत्प्राप्तावुपायोऽस्ति यथा तथा बिम्बभूतेश्वरे समर्पितमेव तत्प्रतिबिम्बभूतो जीवो लभते नान्यः कश्चित्तस्य पुरुषार्थलाभेऽस्त्युपाय इति दृष्टान्तार्थः। तस्य यदा भगवन्तमनन्तमनवरतमाराधयतोऽन्तःकरणं ज्ञानप्रतिबन्धकपापेन रहितंज्ञानानुकूलपुण्येन चोपचितं भवति तदातिनिर्मले मुकुरमण्डल इव मुखमतिस्वच्छेऽन्तःकरणे सर्वकर्मत्यागशमदमादिपूर्वकगुरूपसदनवेदान्तवाक्यश्रवणमनननिदिध्यासनैः संस्कृते तत्त्वमसीति गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्यकरणिकाहंब्रह्मास्मीत्यनात्माकारशून्या निरुपाधिचैतन्याकारा साक्षात्कारात्मिका वृत्तिरुदेति। तस्यां च प्रतिफलितं चैतन्यं सद्य एव स्वविषयाश्रयामविद्यामुन्मूलयति दीप इव तमः। ततस्तस्या नाशात्तया वृत्त्या सहाखिलस्य कार्यप्रपञ्चस्य नाशः। उपादाननाशादुपादेयनाशस्य सर्वतन्त्रसिद्धत्वात्। तदेतदाह भगवान्मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते इति।आत्मेत्येवोपासीत तदात्मानमेवावेत्तमेव धीरो विज्ञायतमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति इत्यादिश्रुतिष्विवेहापि मामेवेत्येवकारोऽन्यानुपरक्तप्रतिपत्त्यर्थः। मामेव सर्वोपाधिविरहितं चिदानन्दसदात्मानमखण्डं ये प्रपद्यन्ते वेदान्तवाक्यजन्यया निर्विकल्पसाक्षात्काररूपया निर्वचनानर्हशुद्धचिदाकारत्वधर्मविशिष्टया सर्वसुकृतफलभूतया निदिध्यासनपरिपाकप्रसूतया चेतोवृत्त्या सर्वाज्ञानतत्कार्यविरोधिन्या विषयीकुर्वन्ति ये ते केचिदेतां दुरतिक्रमणीयामपि मायामखिलानर्थजन्मभुवमनायासेनैव तरन्ति अतिक्रामन्ति।तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत आत्मा ह्येषां स भवति इति श्रुतेः। सर्वोपाधिनिवृत्त्या सच्चिदानन्दघनरूपेणैव तिष्ठन्तीत्यर्थः। बहुवचनप्रयोगो देहेन्द्रियादिसंघातभेदनिबन्धनात्मभेदभ्रान्त्यनुवादार्थः। प्रपश्यन्तीति वक्तव्ये प्रपद्यन्त इत्युक्तेऽर्थे मदेकशरणाः सन्तो मामेव भगवन्तं वासुदेवमीदृशमनन्तसौन्दर्यसारसर्वस्वमखिलकलाकलापनिलयमभिनवपङ्कजशोभाधिकचरणकमलयुगुलप्रभमनवरतवेणुवादननिरतवृन्दावनक्रीडासक्तमानसहेलोद्धृतगोवर्धनाख्यमहीधरं गोपालं निषूदितशिशुपालकंसादिदुष्टसंघमभिनवजलदशोभासर्वस्वहरणचरणपरमानन्दघनमयमूर्तिमतिवैरिञ्चमनवरतमनुचिन्तयन्तो दिवसानतिवाहयन्ति ते मत्प्रेममहानन्दसमुद्रमग्नमनस्तया समस्तमायागुणविकारैर्नाभिभूयन्ते किंतु मद्विलासविनोदकुशला एते मदुन्मूलनसमर्था इति शङ्कमानेव माया तेभ्योऽपसरति वारविलासिनीव क्रोधनेभ्यस्तपोधनेभ्यः। तस्मान्मायातरणार्थी मामीदृशमेव सन्ततमनुचिन्तयेदित्यप्यभिप्रेतं भगवतः। श्रुतयः स्मृतयश्चात्रार्थे प्रमाणीकर्तव्याः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.14।।देवस्य जीवरूपेण लीलया क्रोडतो मम संबन्धिनीयं दैवी हि प्रसिद्धा पिण्डब्रह्माण्डरूपेण वितता एषा मम चिन्मात्रस्य माया मामहं न जानामीति साक्षिप्रत्यक्षत्वेनापलापानर्हा अनृतस्य प्रपञ्चस्येन्द्रजालादेरिवप्रकाशिका गुणमयी सत्वरजस्तमोगुणमयी दुरत्यया दुरतिक्रमा। ये मामेव सर्वभूतस्थं भगवन्तं वासुदेवं प्रपद्यन्ते विषयीकुर्वन्ति त एवैतां मायां तरन्ति। अधिष्ठानज्ञानेनैव समूलस्य भ्रमस्योच्छेदो भवति नतु ज्ञानान्तरेण वा वृत्तिनिरोधेन वेत्यर्थः। अयमर्थः जीवेश्वरविभागशून्ये शुद्धचिन्मात्रे कल्पितो मायादर्पणश्चित्प्रतिबिम्बरूपं जीवं वशीकृत्य बिम्बचैतन्यमनुरुध्य प्रचलति। अयस्कान्तमनुरुध्येव लोहशलाका। इदमेव ईश्वराधीनत्वं मायायाः। ईश्वरस्य च मायाद्वारा सर्वस्रष्टृत्वमपि। तथा च श्रुतिःतस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः इति। तथाचैकैव माया जीवेश्वरयोरुपाधिर्दर्पण इव बिम्बप्रतिबिम्बयोर्बिम्बप्रतिबिम्बभावानाक्रान्तमुभयानुस्यूतं शुद्धचिन्मात्रमन्यत्तृतीयं मुक्तप्राप्यम्। जीवेश्वरौ च उपाधिपक्षपातदशायामल्पज्ञत्वसर्वज्ञत्वशास्यत्वशासितृत्वादिभावं भजेते। तावेव तदभावे उपाधिप्रचारदर्शिनौ उदासीनबोधरूपतया जीवसाक्षीश्वरसाक्षीतिशब्दाभ्यां व्यवह्रियेते। एवं च जीव ईश्वराराधनावाप्तप्रत्यक्तत्वज्ञानेन मायायां नष्टायां तत्कार्यस्यापि नाशेन साक्ष्याभावात्साक्षित्वमपि परित्यज्य बिम्बप्रतिबिम्बानुस्यूतं शुद्धं तृतीयं चैतन्यं प्राप्नोतीति तदिदमुक्तं दैवी मायेति। मम मायेति चैकस्या एव जीवेश्वरसंबन्धित्वं जीवस्येश्वरभजनेन मायातरणमिति च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.14।।नन्वेवं चेदस्माभिः कथं ज्ञातव्य इत्याकाङ्क्षायामाह दैवीति। एषा मम गुणमयी मद्गुणात्मिका दैवी केषुचिद्भाग्यवत्सु रसदानेच्छया प्रकटीकृतक्रीडात्मिका माया अलौकिकसामर्थ्येनान्यथाभावोत्पादनसमर्था। अतएव दुरत्यया दुःखेनापि जेतुमशक्या। एतादृशीमपि ये मामेव केवलमनन्यभावेन पुरुषोत्तमं प्रपद्यन्ते प्रपन्ना भवन्ति ते एतां मायां मोहनात्मिकां तरन्ति। मां जानन्तीत्यर्थः।मामेव ये इत्यत्रैवकारेणमाम् इत्येकवचनेन च भावात्मकतया केवलं पुरुषोत्तमत्वेन स्वभजनं दास्यभावेनोक्तं न तु लीलादिसहितदर्शनेन स्वरमणेच्छादिकतया। एतेन त्वमपि तथा प्रपन्नो भवेत्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.14।।के तर्हि त्वां जानन्तीत्यत आह दैवी हीति। दैवी अलौकिकी अत्यद्भुतेत्यर्थः।

Chapter 7 (Part 10)

गुणमयी सत्त्वादिगुणविकारात्मिका मम परमेश्वरस्य शक्तिर्माया दुरत्यया दुस्तरा। हि प्रसिद्धमेतत्। तथापि ये मामेवेत्येवकारेणाव्यभिचारिण्या भक्त्या प्रपद्यन्ते भजन्ति ते मायामेतां दुस्तरामपि तरन्ति। ततो मां जानन्तीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.13 7.14।।परमेतदसंस्पष्टं मां वेदान्तवेद्यं न जगद्वेदेह गुणतन्त्रत्वादित्याह त्रिभिरिति। भावैस्त्रिभिः पदार्थैः। त्रित्व गुणमयत्वाभिप्रायेण। मोहितं जगदिदमावृतं एभ्यस्त्रिगुणात्मकेभ्यो भावेभ्यो मूलभूतगुणेभ्यो वा परमव्ययं विनाशरहितं मां न जानाति। प्रकृतेर्गुणा एव बन्धकाः। सत्त्वरजस्तमोमयैः भावैः सर्वं जगन्मोहितं मम मायागुणा एव हि परिणता अपि स्वरूपावरणे विक्षेपे च हेत्वन्तरभूताः भगवज्ज्ञानसाधनप्रतिकूलाः प्रत्युत बन्धरूपाः जीवेऽविद्याकृताध्यासदार्ढ्यकारणभूताश्चसर्वाध्यासनिवृत्तौ हि सर्वथा न भवेद्यथा। सा च विद्योदये सा च न शब्दात्सुविचारितात्। मर्यादाभङ्ग एव स्यात्प्रमाणानां तथा सति। गजानुमानं नैव स्यात्साङ्कर्यं वा तथा भवेत्। दशमस्त्वमसीत्यादौ देहादिविषयत्वतः। शब्दस्य साहचर्येणचक्षुषैव भवेन्मतिः। स्मारकत्वमतो वाक्ये सङ्ख्याज्ञानं पुराः यतः। अध्यासस्यानिवृत्तत्वान्न विविक्तात्मदर्शनम्। मनसा शक्यते कर्त्तुं नान्यथा सर्वदा भवेत्। प्रत्यक्षेणापि विज्ञानं मायया ज्ञानकाशया। स्वप्नबोधरीत्या हि किमु शब्दं निवारयेत्। सर्वज्ञस्वं सर्वभावज्ञानं चापाततः फलम्। सर्वो न ब्रह्म सर्वं तु वामदेवस्तथा जगौ। अवयुज्यागर्भवासात्सूर्याद्यनुवदन्मुहुः। ज्ञानदुर्बलवाक्यत्वात्पाषण्डवचनं मतम्। सत्ये युगेऽतिमहतां भवत्येतन्न चान्यथा। स्वप्नो जागरणं चैव यथा ह्यन्योन्यवैरिणौ। विद्याविद्ये तथा स्यातां न तु सर्वात्मना लयः। इदमेव विनिश्चित्य श्रीकृष्णोऽर्जुनमाह वै। मामेवेति। एवकारेण सर्वेषामनुपायत्वमाह ज्ञानादीनां सर्वेषां भगवदधीनत्वात्।विश्वासं सर्वतस्त्यक्त्वा कृष्णमेव भजेद्बुधः इति श्रीमदाचार्योक्तानुसारेण प्रपत्तिमार्गरीत्या ये भजन्ते मां पुरुषोत्तममेव ते मायां तरन्ति। इयं च दैवी माया प्रकृते नासुरी अन्यस्याज्ञानविशेषेण स्वकृतिसाध्येन च बाधितत्वनियमात् अतएव दुरत्यया। यद्वा धात्वन्वर्था दैवी गुणमयी च। ममेति मदधीनभक्तहितकारिण्येषा भवतीति एतां मायां त एव जगति स्थिता मदीया निर्गुणात्मकास्तीर्णा इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.14।।तो फिर इस देवसम्बन्धिनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको मनुष्य कैसे तरते हैं इसपर कहते हैं क्योंकि यह उपर्युक्त दैवी माया अर्थात् मुझ व्यापक ईश्वरकी निज शक्ति मेरी त्रिगुणमयी माया दुस्तर हैअर्थात् जिससे पार होना बड़ा कठिन है ऐसी है। इसलिये जो सब धर्मोंको छोड़कर अपने ही आत्मा मुझ मायापति परमेश्वरकी ही सर्वात्मभावसे शरण ग्रहण कर लेते हैं वे सब भूतोंको मोहित करनेवाली इस मायासे तर जाते हैं वे इसके पार हो जाते हैं अर्थात् संसारबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.14।। व्याख्या  दैवी ह्येषा गुणमयी (टिप्पणी प0 411) मम माया दुरत्यया सत्त्व रज और तम इन तीन गुणोंवाली दैवी (देव अर्थात् परमात्माकी) माया बड़ी ही दुरत्यय है। भोग और संग्रहकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य इस मायासे सम्बन्धविच्छेद नहीं कर सकते।दुरत्यय कहनेका तात्पर्य है कि ये मनुष्य अपनेको कभी सुखी और कभी दुःखी कभी समझदार और कभी बेसमझ कभी निर्बल और कभी बलवान् आदि मानकर इन भावोंमें तल्लीन रहते हैं। इस तरह आनेजानेवाले प्राकृत भावों और पदार्थोंमें ही तादात्म्य ममता कामना करके उनसे बँधे रहते हैं और अपनेको इनसे रहित अनुभव नहीं कर सकते। यही इस मायामें दुरत्ययपना है।यह गुणमयी माया तभी दुरत्यय होती है जब भगवान्के सिवाय गुणोंकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता मानी जाय। अगर मनुष्य भगवान्के सिवाय गुणोंकी अलग सत्ता और महत्ता नहीं मानेगा तो वह इस गुणमयी मायासे तर जायगा।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते मनुष्योंमेंसे जो केवल मेरी ही शरण होते हैं वे इस मायाको तर जाते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि केवल मेरी ही तरफ रहती है तीनों गुणोंकी तरफ नहीं। जैसा कि पहले वर्णन किया है सत्त्व रज और तम ये तीनों गुण न मेरेमें हैं और न मैं उनमें हूँ। मैं तो निर्लिप्त रहकर सभी कार्य करता हूँ। इस प्रकार जो मेरे स्वरूपको जानते हैं वे गुणोंमें नहीं फँसते इस मायासे तर जाते हैं। वे गुणोंका कार्य मनबुद्धिका किञ्चिन्मात्र भी सहारा नहीं लेते। क्यों नहीं लेते क्योंकि वे इस बातको जानते हैं कि प्रकृतिका कार्य होनेसे मनबुद्धि भी तो प्रकृति हैं। प्रकृतिकी क्रियाशीलता प्रकृतिमें ही है। जैसे प्रकृति हरदम प्रलयकी तरफ जा रही है ऐसे ही ये मनबुद्धि भी तो प्रलयकी तरफ जा रहे हैं। अतः उनका सहारा लेना परतन्त्रा ही है। ऐसी परतन्त्रता बिलकुल न रहे और परा प्रकृति (जो कि परमात्माका अंश है) केवल परमात्माकी तरफ आकृष्ट हो जाय तथा अपरासे सर्वथा विमुख हो जाय यही भगवान्के सर्वथा शरण होनेका तात्पर्य है।यहाँ मामेव कहनेका तात्पर्य है कि वे अनन्यभावसे केवल मेरे ही शरण होते हैं क्योंकि मेरे सिवाय दूसरीकोई सत्ता है ही नहीं।कई साधक मेरे शरण तो हो जाते हैं परन्तु केवल मेरे ही शरण नहीं होते। इसलिये कहा कि जो मामेव केवल मेरी ही शरण लेते हैं वे तर जाते हैं। मायाकी शरण न ले अर्थात् हमारे पास रुपयेपैसे चीजवस्तु आदि सब रहें पर हम इनको अपना आधार न मानें इनका आश्रय न लें इनका भरोसा न करें इनको महत्त्व न दें। इनका उपयोग करनेका हमें अधिकार है। इनपर कब्जा करनेका हमें अधिकार नहीं है। इनपर कब्जा कर लेना ही इनके आश्रित होना है। आश्रित होनेपर इनसे अलग होना कठिन मालूम देता है यह वास्तवमें दुरत्ययपना है। इस दुरत्ययपनासे छूटनेके लिये ही उपाय बताते हैं मामेव च प्रपद्यन्ते।शरीर इन्द्रियाँ आदि सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानकर भगवान्की और भगवान्के लिये ही मानकर भगवान्के भजनमें उनके आज्ञापालनमें लगा देना है। अपनेको इनसे कुछ नहीं लेना है। इनको भगवान्में लगा देनेका फल भी अपनेको नहीं लेना है क्योंकि जब भगवान्की वस्तु सर्वथा भगवान्के अर्पण कर दी अर्थात् उसमें भूलसे जो अपनापन कर लिया था वह हटा लिया तब उस समर्पणका फल हमारा कैसे हो सकता है यह सब सामग्री तो भगवान्की सेवाके लिये ही भगवान्से मिली है। अतः इसको उनकी सेवामें लगा देना हमारा कर्तव्य है हमारी ईमानदारी है। इस ईमानदारीसे भगवान् बड़े प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी कृपासे मनुष्य मायाको तर जाते हैं।अपने पास अपनी करके कोई वस्तु है नहीं। भगवान्की दी हुई वस्तुओंको अपनी मानकर अपनेमें अभिमान किया था यह गलती थी। भगवान्का तो बड़ा ही उदार एवं प्रेमभरा स्वभाव है कि वे जिस किसीको कुछ देते हैं उसको इस बातका पता ही नहीं लगने देते कि यह भगवान्की दी हुई है प्रत्युत जिसको जो कुछ मिला है उसको वह अपनी और अपने लिये ही मान लेता है। यह भगवान्का देनेका एक विलक्षण ढंग है। उनकी इस कृपाको केवल भक्तलोग ही जान सकते हैं। परन्तु जो लोग भगवान्से विमुख होते हैं वे सोच ही नहीं सकते कि इन वस्तुओंको हम सदा पासमें रख सकते हैं क्या अथवा वस्तुओंके पास हम सदा रह सकते हैं क्या इन वस्तुओंपर हमारा आधिपत्य चल सकता है क्या इसलिये वे अनन्यभावसे भगवान्के शरण नहीं हो सकते।इस श्लोकका भाव यह हुआ कि जो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं अर्थात् जो केवल दैवी सम्पत्तिवाले होते हैं वे भगवान्की गुणमयी मायाको तर जाते हैं। परन्तु जो भगवान्के शरण न होकर देवता आदिके शरण होते हैं अर्थात् जो केवल आसुरी सम्पत्तिवाले (प्राणपिण्डपोषणपरायण सुखभोगपरायण) होते हैं वे भगवान्की गुणमयी मायाको नहीं तर सकते। ऐसे आसुर स्वभाववाले मनुष्य भले ही ब्रह्मलोकतक चले जायँ तो भी उनको (ब्रह्मलोकतक गुणमयी माया होनेसे) वहाँसे लौटना ही पड़ता है जन्मनामरना ही पड़ता है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि मेरे शरण होनेवाले सभी मायासे तर जाते हैं। अतः सबकेसब प्राणी मेरे शरण क्यों नहीं होते इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.14।।कथं खलु सत्त्वादिमात्रस्थिता भगवतस्तत्त्वं न विदुः इत्याह दैवीति। देवः क्रीडाकरः तत्र भवा दैवी क्रीडा ममेयमित्यर्थः। तेन सत्त्वादीनां वस्तुतः संविन्मात्रपरब्रह्मानतिरिक्ततायामपि यत् तदरिक्ततावगमनं ( N तदतिरिक्तभावगमनम्) तदेव गुणत्वं भोक्तृतत्त्वपारतन्त्र्यं भोग्यत्वम्। तच्च भेदात्मकं रूपं संसारिभिरनिर्वाच्यतया तान् प्रति मायारूपम्। अतो ये परमार्थब्रह्मप्रकाशविदः ते तदनतिरिक्तं विश्वं पश्यन्तो गुणाना सत्त्वादीनां गुणतालक्षणां भेदावभासस्वभावां मायाम् अतितरन्ति इति मामेव इत्येवकारस्याशयः। ये तु यथास्थित ( यथास्थितभेद ) भेदावभासमात्रं विदुः ते मायां नातिक्रामन्ति (S नातिवर्तन्ते) । तद्युक्तमुक्तम् न त्वहं तेषु इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.14।।यथोक्तानादिसिद्धमायापारवश्यपरिवर्जनायोगाज्जगतो न कदाचिदपि तत्त्वबोधसमुदयसंभावनेत्याशङ्कते कथं पुनरिति। भगवदेकशरणतया तत्त्वज्ञानद्वारेण मायातिक्रमः संभवतीति परिहरति उच्यत इति। कथं दुरत्ययत्वेन तदत्ययः स्यादिति तत्राह मामेवेति। प्रधानस्येव स्वातन्त्र्यं मायाया व्युदस्यति देवस्येति। अस्वातन्त्र्ये मायात्वानुपपत्तिं हिशब्दद्योतितां हेतूकरोति यस्मादिति। अनुभवसिद्धा सा नाकस्मादपलापमर्हतीत्याह एषेति। जगतस्तत्त्वप्रतिपत्तिप्रतिबन्धभूता गुणाः सत्त्वादयः। ममेति प्रागुक्तमेव मायायाः संबन्धमनूद्य विधित्सितं दुरत्ययत्वं विभजते दुःखेनेति। मामेवेत्यादि व्याचष्टे तत्रेति। तस्मिन्मायारूपे यथोक्तरीत्या दुरत्यये सतीति यावत्। मामेवेत्येवकारेण मायया वेद्यकोटिनिवेशाभावो विवक्ष्यते सर्वात्मना कर्मानुष्ठानादिव्यग्रतामन्तरेणेत्यर्थः। मायातिक्रमे मोहातिक्रमो भवतीति मत्वा विशिनष्टि सर्वेति। मायातत्प्रयुक्तमोहयोरतिक्रमेऽपि कथं पुरुषस्य पुरुषार्थसिद्धिरित्याशङ्क्याह संसारेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.14।।उपायाभावानुमानाभासाभ्यामनुपलम्भो विपरीतोपलम्भश्चेत्युक्तम् अतः किमुत्तरेण वाक्येनेत्यत आह कथमिति। भगवान्गुणमयविग्रह इत्ययं न मोहः बाधकप्रत्ययाभावात्। ज्ञानिनां सम्यक्प्रत्ययो बाधक इत्युक्तमिति चेत् न बहुतरज्ञानविरोधेन कतिपयज्ञानानामेव यथार्थत्वापत्तेः। ननूत्तरकाले बाधकप्रत्ययो भविष्यति चेत् न अनादौ काले जातस्योत्तरत्राप्यसम्भवादिति भावः। ननु बाधकप्रत्ययाभावाद्यथार्थ एवायं प्रत्यय इति शङ्कायां किमेतदसङ्गतमुच्यते इत्यत आह अयमिति।एषा इत्यनुवादेनमोहिका इति व्याख्यातं मोहितमिति धात्वर्थमात्रं परामृश्य योग्यप्रत्ययसम्बन्धेन व्याख्यानात्। गुणमयी तदभिमानिनी दुर्गा या हि तमोगुणेनैवंविधं मोहं जनयति। अनुमानं तु निमित्तमात्रम्। ततः किम् इत्यत आह सा चेति। सा च दुरत्यया तत्कृतमोहं कोऽपि नात्येतुं शक्नोति न कस्यापि बाधकप्रत्ययो भवति। कुतो दुरत्यया इत्यतोऽतिशक्तेरिति हेतुरध्याहृत्योक्तः। कुतोऽतिशक्तित्वम् इत्यतोदैवी इत्येतद्धेतुगर्भमिति व्याख्यातम् देवसम्बन्धित्वादिति। सम्बन्धित्वं परमप्रियत्वम्। स च देवस्यातिशक्तित्वे तत्सम्बन्धिन्यास्तत्स्यात् तदेव कुतः इत्यतो देवशब्दार्थो निरुक्तः। सृष्ट्यादीति। सृष्ट्यादिश्च सा क्रीडा च प्रथमादिपदेन स्थित्यादेः सङ्ग्रहः द्वितीयेन विजिगीषादेः। क्रीडादिमत्वेनातिशक्तिर्न सिध्यतीति क्रीडा व्याख्याता। देवशब्दस्य क्रीडादिमत्त्वमर्थः। कुतः इत्यत आह तथा हीति। देवशब्दे या प्रकृतिस्तदर्थमित्यर्थः। प्रत्ययंस्तु इगुपधलक्षणस्य कस्य बाधकः पचाद्यच्।दैवी इत्यनेन निराकाङ्क्षत्वान्ममेति व्यर्थमित्यत आह कथमिति। तस्यैव व्याख्यार्थमेतदिति भावः। त्वदीयत्वेऽपि कथं दैवीत्यतः शेषं पूरयति अहं हीति। आशयवर्णनसमाप्ताविति शब्दः। अत्र प्रमाणमाह अब्रवीच्चेति। उत्तरस्य प्रकृतोपयोगितया सङ्गतिमाह तर्हीति। यदि न केवलमनुमानं किन्तु भगवतोपोद्बोलिता माया मोहहेतुस्तर्हीत्यर्थः। ततश्च ज्ञानिव्यावृत्त्यर्थं यदिदमित्युक्तं तदसदिति भावः। ननु मायात्ययोपायस्यासम्भावनाशङ्कायां तदुपाय एव वक्तव्यः न तूपायान्तरप्रतिषेधः। अतोऽनुपपन्नमव धारणमित्यतआह अन्यदिति। स्वप्रतिपत्तावित्थम्भावसूचक एवैवशब्दो नोपायान्तरप्रतिषेधपर इत्यर्थः। एवं तर्हि गुर्वादिवन्दनाभावः प्राप्त इत्यतोऽभिप्रायमाह गुर्वादीति। भागवता एत इत्यादिबुद्ध्या वन्दनादि कुर्वन्तीति यावत्। एतन्मध्यमभक्तानां चरित्रमुक्तम् उत्तमानां त्वाह स एवेति। भगवानेव तत्र गुर्वादिषु। द्वयं प्रमाणेनोपपादयति आह चेति। अहं च सा सम्पत्तिश्च मदुपाधितया मत्प्रतिमात्वेन। चैत्यं चित्स्थम्। स्वगतिं स्वज्ञानम्। व्यनङ्क्षि व्यञ्जयसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.14।।कथमनादिकाले मोहानत्ययो बहूनामित्यत आह दैवीति। अयमाशयः माया ह्येषा मोहिका सा च सृष्ट्यादिक्रीडादिमद्देवसम्बन्धित्वादतिशक्तेर्दुरत्यया। तथा हि देवताशब्दार्थं पठन्तिदिवु क्रीडाविजिगीषावव्यवहारद्युतिस्तुतिमदमोदस्वप्नकान्तिगतिषु धा.पा.दि.1 इति। कथं दैवी मदीयत्वात्। अहं हि देव इति। अब्रवीच्चश्रीभूदुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी। तच्छक्त्यनन्तांशहीनाऽथापि तस्याश्रयात्प्रभोः। अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलाऽपि हि। तेषां दुरत्ययाऽप्येषा विना विष्णुप्रसादतः इति च व्यासयोगे। तर्हि न कथञ्चिदत्येतुं शक्यते इत्यात आह मामेवेति। अन्यत्सर्वं परित्यज्य मामेव ये प्रपद्यन्ते गुर्वादिवन्दनं च मय्येव समर्पयन्ति स एव च तत्र स्थित्वा गुर्वादिर्भवतीत्यादि पश्यन्ति। आह च नारदीये मत्सम्पत्त्या तु गुर्वादीन् भजन्ते मध्यमा नराः। मदुपाधितया तांश्च सर्वभूतानि चोत्तमाः इति।आचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनङ्क्षि इति च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.14।।मम एषा गुणमयी सत्त्वरजस्तमोमयी माया यस्माद् दैवी देवेन क्रीडाप्रवृत्तेन मया एव निर्मिता तस्मात्सर्वैः दुरत्यया दुरतिक्रमा।अस्याः मायाशब्दवाच्यत्वम् आसुरराक्षसास्त्रादीनाम् इव विचित्रकार्यकरत्वेन यथा चततो भगवता तस्य रक्षार्थं चक्रमुत्तमम्। आजगाम समाज्ञप्तं ज्वालामालि सुदर्शनम्।।तेन मायासहस्रं तच्छम्बरस्याशुगामिना। बालस्य रक्षता देहमेकैकांशेन सूदितम्।। (वि0 पु0 1।19।1920) इत्यादौ।अतो मायाशब्दो न मिथ्यार्थवाची। ऐन्द्रजालिकादिषु अपि केनचिद् मन्त्रौषधादिना मिथ्यार्थविषयायाः पारमार्थिक्या एव बुद्धेः उत्पादकत्वेन मायावी इति प्रयोगः। तथा मन्त्रौषधादिः एव च तत्र माया सर्वप्रयोगेषु अनुगतस्य एकस्य एव शब्दार्थत्वात्। तत्र मिथ्यार्थेषु मायाशब्दप्रयोगो मायाकार्यबुद्धिविषयत्वेन औपचारिकःमञ्चाः क्रोशन्ति इतिवत्।एषा गुणमयी पारमार्थिकी भगवन्माया एवमायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् (श्वेता0 4।10) इत्यादिषु अभिधीयते।अस्याः कार्यं भगवत्स्वरूपतिरोधानं स्वस्वरूपभोग्यत्वबुद्धिः च अतो भगवन्मायया मोहितं सर्वं जगद् भगवन्तम् अनवधिकातिशयानन्दस्वरूपं न अभिजानाति।मायाविमोचनोपायाम् आह माम् एव सत्यसंकल्पं परमकारुणिकम् अनालोचितविशेषाशेषलोकशरण्यं ये शरणं प्रपद्यन्ते ते एतां मदीयां गुणमयीं मायां तरन्ति। मायाम् उत्सृज्य माम् एव उपासत इत्यर्थः।किमिति भगवदुपासनापादिनीं भगवत्प्रपत्तिं सर्वे न कुर्वन्ति इत्यत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.14।। दैवी देवस्य मम ईश्वरस्य विष्णोः स्वभावभूता हि यस्मात् एषा यथोक्ता गुणमयी मम माया दुरत्यया दुःखेन अत्ययः अतिक्रमणं यस्याः सा दुरत्यया। तत्र एवं सति सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेव मायाविनं स्वात्मभूतं सर्वात्मना ये प्रपद्यन्ते ते मायाम् एतां सर्वभूतमोहिनीं तरन्ति अतिक्रामन्ति ते संसारबन्धनात् मुच्यन्ते इत्यर्थः।।यदि त्वां प्रपन्नाः मायामेतां तरन्ति कस्मात् त्वामेव सर्वे न प्रपद्यन्ते इत्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.15 】

▸ Sanskrit Sloka: न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: | माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: ||

▸ Transliteration: na māṃ duṣkṛ tino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ | māyayāpahṛtajñānā āsuraṃ bhāvamāśritāḥ ||

▸ Glossary: na: not; māṃ: unto Me; duṣkṛtinaḥ: miscreants; mūḍhāḥ: foolish; prapadyante: surrender; nara adhamāḥ: lowest among mankind; māyayā : by the illusory energy; apahṛta: stolen by illusion; jñānāḥ: knowledge; āsuraṃ: demonic; bhāvaṃ: nature; āśritāḥ: accepting.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.15 Those miscreants who are foolish, lowest among mankind, whose knowledge is stolen by māyā, illusion, and who have taken shelter in demonic nature, do not surrender unto Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.15।।मायाके द्वारा अपहृत ज्ञानवाले आसुर भावका आश्रय लेनेवाले और मनुष्योंमें महान् नीच तथा पापकर्म करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.15।। दुष्कृत्य करने वाले मूढ नराधम पुरुष मुझे नहीं भजते हैं माया के द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है वे आसुरी भाव को धारण किये रहते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.15 न not? माम् to Me? दुष्कृतिनः evildoers? मूढाः the deluded? प्रपद्यन्ते seek? नराधमाः the lowest of men?,मायया by Maya? अपहृतज्ञानाः deprived of knowledge? आसुरम् belonging to demons? भावम् nature? आश्रिताः having taken to.Commentary These three kinds of people have no discrimination between right and wrong? the Real and the unreal. They commit murder? robbery? theft and other kinds of atrocious actions. They speak untruth and injure others in a variety of ways. Those who follow the ways of the demons take the body as the Self like Vivochana and worship it with flowers? scents? unguents? nice clothes and palatable foods of various sorts. They are deluded souls. They try to nourish their body and do various sorts of evil actions to attain this end. Therefore they do not worship Me. Ignorance is the root cause of all these evils. (Cf.XVI.16and20)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.15. The deluded evil-doers, the vilest men, who are robbed of knowledge by the trick-of-Illusion and have taken refuge in the demoniac nature-they do not resort to Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.15 The sinner, the ignorant, the vile, deprived of spiritual perception by the glamour of Illusion, and he who pursues a godless life - none of them shall find Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.15 The evil-doers, the foolish, the lowest of men, those persons deprived of knowledge by delusion (Maya) and those who are dominated by demoniac nature - they do not seek refuge in Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.15 The foolish evildoers, who are the most depraved among men, who are deprived of (their) wisdom by Maya, and who resort to demoniacal ways, do not take refuge in Me.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.15 The evil-doers and the deluded who are the lowest of men do not seek Me; they whose knowledge is destroyed by illusion follow the ways of demons.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.15 Na mam etc. Those who do not take refuge with attention in Me, even while their body remains fit for the purpose, they are evil-doers and the basest of men, deluded, demoniac, i.e. given to darkness (ignorance). Hence, this is only the power of the trick-of-illusion.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.15 'Evil-doers', those who commit evil deeds, do not resort to Me. They are of four types, according to the degree of their evil deeds: (i) the foolish, (ii) the lowest of men, (iii) those persons deprived of knowledge by Maya, and (iv) those given to demoniac nature. 'The foolish' are those who have misconceived knowledge. True knowledge consists in understanding that the self is dependent on the Lord and exists for Him. But 'the foolish' think they are independent and also that all enjoyable things of the world are their own and for their enjoyment. 'The lowest of men' are those who are incapable of turning towards Me, even though My essential nature is known to them generally. 'Persons who are deprived of knowledge by Maya' are those who, though possessing knowledge about Me and My manifestations, are moved by deceitful reasonings to contend that such knowledge is inconsistent and impossible. 'Those of demoniac nature' are those who have positive knowledge about Myself and My manifestation but hate Me. The intensity of sinfulness in these types in the order in which they are successively placed.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.15 Mudhah, the foolish; duskrtinah, evildoers, sinners; who are nara-adhamah, the most depraved among men; who are also apa-hrta-jnanah, deprived of, despoiled of (their) wisdom; mayaya, by Maya; and asritah, who resort to; asuram bhavam, demoniacal, ways, such as cruelty, untruthfulness, etc.; na, do not; prapadyante, take refuge; man, in Me, the supreme God.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.15।। पूर्व श्लोक में कहा गया है कि मेरे भक्त माया को तर जाते हैं तो इस श्लोक में बता रहे हैं कि कौन से लोग हैं जो मेरी भक्ति नहीं करते हैं। इन दो प्रकार के लोगों का भेद स्पष्ट किये बिना जिज्ञासु साधक सम्यक् प्रकार से यह नहीं जान सकता कि मन की कौन सी प्रवृत्तियां मोह के लक्षण हैं।दुष्कृत्य करने वाले मूढ नराधम लोग ईश्वर की भक्ति नहीं करते हैं जिसका कारण यह है कि उनके विवेक का माया द्वारा हरण कर लिया जाता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि मनुष्य के उच्च विकास का लक्षण उसकी विवेकवती बुद्धि है। इस बुद्धि के द्वारा वह अच्छाबुरा उच्चनीच नैतिकअनैतिक का विवेक कर पाता है। बुद्धि ही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अज्ञानजनित जीवभाव के स्वप्न से जागकर अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है।विषयों के द्वारा जो व्यक्ति क्षुब्ध नहीं होता उसमें ही यह विवेकशक्ति प्रभावशाली ढंग से कार्य कर पाती है। मनुष्य में देहात्मभाव जितना अधिक दृढ़ होगा उतनी ही अधिक विषयाभिमुखी उसकी प्रवृत्ति होगी। अत विषयभोग की कामना को पूर्ण करने हेतु वह निंद्य कर्म में भी प्रवृत्त होगा। इस दृष्टि से पाप कर्म का अर्थ है मनुष्यत्व की उच्च स्थिति को पाकर भी स्वस्वरूप के प्रतिकूल किये गये कर्म। स्थूल देह को अपना स्वरूप समझकर मोहित हुए पुरुष ही पापकर्म करते हैं। ऐसे लोगों को यहाँ मूढ़ और आसुरी भाव का मनुष्य कहा गया है। गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरीभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।परन्तु जो पुण्यकर्मी लोग हैं वे चार प्रकार से मेरी भक्ति करते हैं। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.15।।यदि त्वां प्रपन्ना एतां मायां तरन्ति तर्हि कस्मात्त्वामेव परमेश्वरं सर्वे न प्रपद्यन्त इत्याकाङ्क्षायामाह नेति। दुष्कृतिनः पापकरिणोऽतएव विमूढाः संमोहं अतएव नराणां स्वधर्मपराणां मध्येऽधमा निकृष्टाः यतो माययापहृतं मुषितं विवेकज्ञानं येषां ते आसुरं भावं हिंसानृतादिलक्षणमाश्रिता मां परमेश्वरं न प्रतिपद्यन्तं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.15।।यद्येवं तर्हि किमिति निखिलानर्थमूलमायोन्मूलनाय भगवन्तं भवन्तमेव सर्वे न प्रतिपद्यन्ते चिरसंचितदुरितप्रतिबन्धादित्याह भगवान् दुष्कृतिनो दुष्कृतेन पापेन सह नित्ययोगिनः। अतएव नरेषु मध्येऽधमा इह साधुभिर्गर्हणीयाः परत्र चानर्थसहस्रभाजः कुतो दुष्कृतमनर्थहेतुमेव सदा कुर्वन्ति यतो मूढा इदमर्थसाधनमिदमनर्थसाधनमिति विवेकशून्याः। सति प्रमाणे कुतो न विविञ्चन्ति यतो माययाऽपहृतज्ञानाः शरीरेन्द्रियसंघाततादात्म्यभ्रान्तिरूपेण परिणतया मायया पूर्वोक्तयापहृतं प्रतिबद्धं ज्ञानं विवेकसामर्थ्यं येषां ते तथा। अतएव तेदम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च इत्यादिनाग्रे वक्ष्यमाणमासुरं भावं हिंसानृतादिस्वभावमाश्रिता मत्प्रतिपत्त्ययोग्याः सन्तो न मां सर्वेश्वरं प्रपद्यन्ते न भजन्ते। अहो दौर्भाग्यं तेषामित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.15।।कुतस्तर्हि सर्वे त्वां प्रपद्य मायां न तरन्तीत्याशङ्क्याह न मामिति। यतो दुष्कृतिनोऽतश्चित्तशुद्ध्यभावान्मूढाः आत्मानात्मविवेकहीनाः। अतएव नराधमा मां न प्रपद्यन्ते। कुतो दुष्कृतिनः। यतो माययाऽपहृतं तिरस्कृतं ज्ञानमखण्डसंविद्रूपं ब्रह्म येषां ते अपहृतज्ञानाः। एतेन मायाया आवरणशक्तिरुक्ता। किंच आसुरमसुराणां विरोचनादीनां भावं चित्ताभिप्रायंआत्मैवेह महय्यः इत्यादिना श्रुतं देहेन्द्रियसंघात एव सम्यक्संतर्पणीय इत्येवंविधमाश्रिताः। एतेन मायाया विक्षेपशक्तिरुक्ता। तदेवं मायया स्वरूपानन्दमावृत्य देहात्मभ्रमे जनिते सति तदभिमानाद्देहादिपुष्ट्यर्थं दुष्कृतं कुर्वन्ति तेन च मूढाः सन्तो नराधमा मां न प्रपद्यन्ते। सर्वानर्थमूलं मायैवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.15।।नन्वेवं सति कथं न सर्वे प्रपन्ना भवन्ति इत्याह न मामिति। मां दुष्कृतिनो दुष्टकर्मकर्त्तारः पापाः मूढाः पशुवद्विवेकरहिताः नराधमाः नरेषु अधमाः केवलं वैचित्र्यार्थं जगत्पूरणार्थं सृष्टाः मां न प्रपद्यन्ते। ननूपदेशादिना कथं न पापकर्मादित्यागेन प्रपद्यन्ते इत्यत आह माययेति। मायया अपहृतं गुरूपदेशादिजनितं ज्ञानं येषाम्। मायेतिपदेन ज्ञाननाशनसामर्थ्यमुक्तम्। अत एव देवीपुराणेज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति मा.पु.78।42सप्तश.1।55 इत्युक्तम्। ननु भगवत्प्रपत्तीच्छूनां कथं न भगवान् रक्षतीत्यत आह आसुरं भावमाश्रिताः मद्विरोध्यासुरसङ्गेन तद्भावं प्राप्ताः अतो मया न रक्ष्यन्त इति भावः। एतेन दुस्सङ्गराहित्येन प्रपत्तिः कार्येत्युपदिष्टम्। अतएव दुस्सङ्गनिषधः श्रीभागवतेन तथाऽस्य भवेन्मोहः 3।31।35सङ्गस्तेव्वपि ते प्रार्थ्यः 3।25।24 इत्यादिभिरुक्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.15।।किमिति तर्हि सर्वे त्वामेव न भजन्ति तत्राह न मामिति। नरेषु येऽधमास्ते मां न प्रपद्यन्ते न भजन्ति। अधमत्वे हेतुः मूढा विवेकशून्याः। तत्कुतः दुष्कृर्तिनः पापशीलाः। अतो माययापहृतं निरस्तं शास्त्राचार्योपदेशाभ्यां जातमपि ज्ञानं येषां ते तथा अतएवदम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च इत्यादिना वक्ष्यमाणमासुरं भावं स्वभावं प्राप्ताः सन्तो न मां भजन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.15।।किमिति तर्हि सर्वे त्वामेव न प्रपद्यन्ते मायातारकत्वादित्याह न मां दुष्कृतिन इति। सत्यं तेषां दुष्कृतिरेव प्रतिबन्धिका। आसुरं भावमाश्रिता इति कायमनोदोषा उक्ताः। मायावादमार्गेऽभिनिवेशाद्वा आसुरं भावं वक्ष्यमाणमाश्रिताः अतएव माययाऽपहृतो विवेकस्तत्त्वनिश्चयो येषां ते तथातत्त्वतो विमुखो भवेत् इति मोहवाक्यात्। अतएव च नराधमा मां न प्रपद्यन्ते भगवन्मूर्त्तिद्वेषिणः प्रत्युत भवन्तीत्यग्रे वक्ष्यति भगवान्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.15।।यदि आपके शरण हुए मनुष्य इस मायासे तर जाते हैं तो फिर सभी आपकी शरण क्यों नहीं लेते इसपर कहते हैं जो कोई पापकर्म करनेवाले मूढ़ और नराधम हैं अर्थात् मनुष्योंमें अधम नीच हैं एवं मायाद्वारा जिनका ज्ञान छीन लिया गया है वे हिंसा मिथ्याभाषण आदि आसुरी भावोंके आश्रित हुए मनुष्य मुझ परमेश्वरकी शरणमें नहीं आते।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.15।। व्याख्या  न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः जो दुष्कृती और मूढ़ होते हैं वे भगवान्के शरण नहीं होते। दुष्कृती वे ही होते हैं जो नाशवान् परिवर्तनशील प्राप्त पदार्थोंमें ममता रखते हैं और अप्राप्त पदार्थोंकी कामना रखते हैं। कामना पूरी होनेपर लोभ और कामनाकी पूर्तिमें बाधा लगनेपर क्रोध पैदा होता है। इस तरह जो कामना में फँसकर व्यभिचार आदि शास्त्रनिषिद्ध विषयोंका सेवन करते हैं लोभमें फँसकर झूठ कपट विश्वासघात बेईमानी आदि पाप करते हैं और क्रोध के वशीभूत होकर द्वेष वैर आदि दुर्भावपूर्वक हिंसा आदि पाप करते हैं वे दुष्कृती हैं।जब मनुष्य भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता मानकर उसको महत्त्व देते हैं तभी कामना पैदा होती है। कामनापैदा होनेसे मनुष्य मायासे मोहित हो जाते हैं और हम जीते रहें तथा भोग भोगते रहें यह बात उनको जँच जाती है। इसलिये वे भगवान्के शरण नहीं होते प्रत्युत विनाशी वस्तु पदार्थ आदिके शरण हो जाते हैं।तमोगुणकी अधिकता होनेसे सारअसार नित्यअनित्य सत्असत् ग्राह्यत्याज्य कर्तव्यअकर्तव्य आदिकी तरफ ध्यान न देनेवाले भगवद्विमुख मनुष्य मूढ़ हैं। दुष्कृती और मूढ़ पुरुष परमात्माकी तरफ चलनेका निश्चय ही नहीं कर सकते फिर वे परमात्माकी शरण तो हो ही कैसे सकते हैंनराधमाः कहनेका मतलब है कि वे दुष्कृती और मूढ़ मनुष्य पशुओंसे भी नीचे हैं। पशु तो फिर भी अपनी मर्यादामें रहते हैं पर ये मनुष्य होकर भी अपनी मर्यादामें नहीं रहते हैं। पशु तो अपनी योनि भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहे हैं और ये मनुष्य होकर (जिनको कि परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये मनुष्यशरीर दिया) पाप अन्याय आदि करके नरकों और पशुयोनियोंकी तरफ जा रहे हैं। ऐसे मूढ़तापूर्वक पाप करनेवाले प्राणी नरकोंके अधिकारी होते हैं। ऐसे प्राणियोंके लिये भगवान्ने (गीता 16। 19 20 में) कहा है कि द्वेष रखनेवाले मूढ़ क्रूर और संसारमें नराधम पुरुषोंको मैं बारबार आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। वे आसुरी योनियोंको प्राप्त होकर फिर घोर नरकोंमें जाते हैं।माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः भगवान्की जो तीनों गुणोंवाली माया है (गीता 7। 14) उस मायासे विवेक ढक जानेके कारण जो आसुर भावको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण और प्राणोंका पोषण करनेमें लगे हुए हैं वे मेरेसे सर्वथा विमुख ही रहते हैं। इसलिये वे मेरे शरण नहीं होते।दूसरा भाव यह है कि जिनका ज्ञान मायासे अपहृत है उनकी वृत्ति पदार्थोंके आदि और अन्तकी तरफ जाती ही नहीं। उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंको प्रत्यक्ष नश्वर देखते हुए भी वे रुपयेपैसे सम्पत्ति आदिके संग्रहमें और मान योग्यता प्रतिष्ठा कीर्ति आदिमें ही आसक्त रहते हैं और उनकी प्राप्ति करनेमें ही अपनी बहादुरी और उद्योगकी सफलता इतिश्री मानते हैं। इस कारण वे यह समझ ही नहीं सकते कि जो अभी नहीं है उसकी प्राप्ति होनेपर भी अन्तमें वह नहीं ही रहेगा और उसके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं रहेगा।असु नाम प्राणोंका है। प्राणोंको प्रत्यक्ष ही आनेजानेवाले अर्थात् क्रियाशील और नाशवान् देखते हुए भी वे उन प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे रहते हैं। जीवननिर्वाहमें काम आनेवाली सांसारिक वस्तुओंको ही वे महत्त्व देते हैं। उन वस्तुओंसे भी बढ़कर वे रुपयेपैसोंको महत्त्व देते हैं जो कि स्वयं काममें नहीं आते प्रत्युत वस्तुओंके द्वारा काममें आते हैं। वे केवल रुपयोंको ही आदर नहीं देते प्रत्युत उनकी संख्याको बहुत आदर देते हैं। रुपयोंकी संख्या अभिमान बढ़ानेमें काम आती है। अभिमान सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका आधार और सम्पूर्ण दुःखों एवं पापोंका कारण है (टिप्पणी प0 413)। ऐसे अभिमानको लेकर ही जो अपनेको मुख्य मानते हैं वे आसुर भावको प्राप्त हैं।विशेष बातयहाँ भगवान्ने कहा है कि दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं हो सकते और नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कहा है कि सुदुराचारी मनुष्य भी अगर अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है तथा निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त होता है यह कैसे इसका समाधान यह है कि वहाँ (9। 30) में अपि चेत् पद आये हैं जिनका अर्थ होता है दुराचारीकी प्रवृत्ति परमात्माकी तरफ स्वाभाविक नहीं होती परन्तु अगर वह भगवान्के शरण हो जाय तो उसके लिये भगवान्की तरफसे मना नहीं है। भगवान्की तरफसे किसी भी जीवके लिये किञ्चिन्मात्र भी बाधा नहीं है क्योंकि भगवान् प्राणिमात्रके लिये सम हैं। उनका किसी भी प्राणीमें रागद्वेष नहीं होता (गीता 9। 29)। दुराचारीसेदुराचारी मनुष्य भी भगवान्के द्वेषका विषय नहीं है। सब प्राणियोंपर भगवान्का प्यार और कृपा समान ही है।वास्तवमें दुराचारी अधिक दयाका पात्र है। कारण कि वह अपना ही महान् अहित कर रहा है भगवान्का कुछ भी नहीं बिगाड़ रहा है। इसलिये किसी कारणवशात् कोई आफत आ जाय बड़ा भारी संकट आ जाय और उसका कोई सहारा न रहे तो वह भगवान्को पुकार उठेगा। ऐसे ही किसी सन्तको उसने दुःख दिया और संतके हृदयमें कृपा आ जाय तो उस सन्तकी कृपासे वह भगवान्में लग जाय अथवा किसी ऐसे स्थानमें चला जाय जहाँ अच्छेअच्छे बड़े विलक्षण दयालु महात्मा रह चुके हैं और उनके प्रभावसे उसका भाव भाव बदल जाय अथवा किसी कारणवशात् उसका कोई पुराना विलक्षण पुण्य उदय हो जाय तो वह अचानक चेत सकता है और भगवान्के शरण हो सकता है। ऐसा पापी पुरुष अगर भगवान्में लगता है तो बड़ी दृढ़तासे लगता है। कारण कि उसके भीतर कोई अच्छाई नहीं होती इसलिये उसमें अच्छेपनका अभिमान नहीं होता।तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवान्की व्यापकता और कृपा समान है। सदाचार और दुराचार तो उन प्राणियोंके किये हुए कार्य हैं। मूलमें तो वे प्राणी सदा भगवान्के शुद्ध अंश हैं। केवल दुराचारके कारण उनकी भगवान्में रुचि नहीं होती। अगर किसी कारणवशात् रुचि हो जाय तो भगवान् उनके किये हुएको न देखकर उनको स्वीकार कर लेते हैं रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।।(मानस 1। 29। 3) जैसे माँका हृदय अपने सम्बन्धसे बालकोंपर समान ही रहता है। उनके सदाचारदुराचारसे उनके प्रति माँका व्यवहार तो विषम होता है पर हृदय विषम नहीं होता कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति। माँ तो एक जन्मको और एक शरीरको देनेवाली होती है परन्तु प्रभु तो सदा रहनेवाली माँ हैं। प्रभुका हृदय तो प्राणिमात्रपर सदैव द्रवित रहता ही है। प्राणी निमित्तमात्र भी शरण हो जाय तो प्रभु विशेष द्रवित हो जाते हैं। भगवान् कहते हैं जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही।। तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।(मानस 5। 48। 1 2)इसका तात्पर्य है कि जो चराचर प्राणियोंके साथ द्वेष करनेवाला है वह अगर कहीं भी आश्रय न मिलनेसे भयभीत होकर सर्वथा मेरा ही आश्रय लेकर मेरे शरण हो जाता है तो उसमें होनेवाले मद मोह कपट नाना छल आदि दोषोंकी तरफ न देखकर केवल उसके भावकी तरफ देखकर मैं उसको बहुत जल्दी साधु बना लेता हूँ।धर्मका आश्रय रहनेसे धर्मात्मा पुरुषके भीतर अनन्यभाव होनेमें कठिनता रहती है। परन्तु दुरात्मा पुरुष जब किसी कारणसे भगवान्के सम्मुख होता है तब उसमें किसी प्रकारके शुभकर्मका आश्रय न होनेसे केवल भगवत्परायणता ही बल रहता है। यह बल बहुत शीघ्र पवित्र करता है। कारण कि यह बल खुदका होता है अर्थात् किसी तरहका आश्रय न रहनेसे उसकी खुदकी पुकार होती है। इस पुकारसे भगवान् बहुत शीघ्र पिघल जाते हैं। ऐसी पुकार होनेमें पुण्यात्मापापात्मा विद्वान्मूर्ख सुजातिकुजाति आदिका होना कारण नहीं है प्रत्युत संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होना ही खास कारण है। यह निराशा हरेक मनुष्यको हो सकती है।दूसरी बात भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि दुष्कृती पुरुष मेरे शरण नहीं होते क्योंकि उनका स्वभाव मेरे विपरीत होता है। उनमेंसे अगर कोई मेरे शरण हो जाय तो मैं उससे प्यार करनेके लिये हरदम तैयार हूँ। भगवान्की कृपालुता इतनी विलक्षण है कि भगवान् भी अपनी कृपाके परवश होकर जीवका शीघ्र कल्याण कर देते हैं। अतः यहाँके और वहाँके प्रसङ्गमें विरोध नहीं है प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपालुता ही प्रकट होती है।सुकृती और दुष्कृती (टिप्पणी प0 414) का होना उनकी क्रियाओंपर निर्भर नहीं है प्रत्युत भगवान्के सम्मुख और विमुख होनेपर निर्भर है। जो भगवान्के सम्मुख है वह सुकृती है और जो भगवान्से विमुख है वह दुष्कृती है। भगवान्के सम्मुख होनेका जैसा माहात्म्य है वैसा माहात्म्य सकामभावपूर्वक किये गये यज्ञ दान तप तीर्थ व्रत आदि शुभ कर्मोंका भी नहीं है। यद्यपि यज्ञ दान तप आदि क्रियाएँ भी पवित्र हैं पर जो अपनेको सर्वथा अयोग्य समझकर और अपनेमें किसी तरही पवित्रता न देखकर आर्तभावसे भगवान्के सम्मुख रो पड़ता है उसकी पवित्रता भगवत्कृपासे बहुत जल्दी होती है। भगवत्कृपासे होनेवाली पवित्रता अनेक जन्मोंमें किये हुए शुभ कर्मोंकी अपेक्षा बहुत ही विलक्षण होती है। इसी तरहसे शुभ कर्म करनेवाले सुकृती भी शुभ कर्मोंका आश्रय छोड़कर भगवान्को पुकार उठते हैं तो उनका भी शुभ कर्मोंका आश्रय न रहकर एक भगवान्का आश्रय हो जाता है। केवल भगवन्का ही आश्रय होनेके कारण वे भी भगवान्के प्यारे भक्त हो जाते हैं।एक कृति होती है और एक भाव होता है। कृतिमें बाहरकी क्रिया होती है और भाव भीतरमें होता है। भावके पीछे उद्देश्य होता है और उद्देश्यके पीछे भगवान्की तरफ अनन्यता होती है। वह अनन्यता कृतियों और भावोंसे बहुत विलक्षण होती है क्योंकि वह स्वयंकी होती है। उस अनन्यताके सामने कोई दुराचार टिक ही नहीं सकता। वह अनन्यता दुराचारीसेदुराचारी पुरुषको भी बहुत जल्दी पवित्र कर देती है। वास्तवमें यह जीव परमात्माका अंश होनेसे पवित्र तो है ही। केवल दुर्भावों और दुराचारोंके कारण ही इसमें अपवित्रता आती है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि दुष्कृती पुरुष मेरे शरण नहीं होते। तो फिर शरण कौन होते हैं इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.15।।न मामिति। ये च मां सत्यपि ( S omits अपि) अधिकारिणि काये नाद्रियन्ते ते दुष्कृतिनः नराधमाः मूढाः आसुराः तामसाः इति मायामहिमैवायम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.15।।भगवन्निष्ठाया मायातिक्रमहेतुत्वे तदेकनिष्ठत्वमेव सर्वेषामुचितमिति पृच्छति यदीति। पापकारित्वेनाविवेकभूयस्तया हिंसानृतादिभूयस्त्वाद्भूयसां जन्तूनां न भगवन्निष्ठत्वसिद्धिरित्याह उच्यत इति। मौढ्यं पापकारित्वे हेतुरतएव निकर्षः। संमुषितमिव तिरस्कृतं ज्ञानं स्वरूपचैतन्यमेषामिति ते तथा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.15 7.16।।उत्तरवाक्यं प्रकृतानुपयुक्तमित्यत आह तर्हीति। यदि त्वत्प्रतिपत्तिर्मायातरणोपायस्तर्हीत्यर्थः। त्वां प्रपद्येति शेषः। तथा चमामेव 7।14 इत्युक्तमसदिति भावः। दुष्कृतित्वादीनां प्रयोजनान्तराभावात् हेतुत्वेनान्वये स्थिते किं ते पञ्चापि साक्षाद्भगवदप्रतिपत्तिहेतवः किं वा हेतुहेतुमद्भावेन इत्यपेक्षायामाह दुष्कृतित्वादिति। मूढाः मिथ्याज्ञानिनः विपर्ययस्याधर्मकार्यत्वप्रसिद्धेः। अत एव मूढत्वादेव। देवानामुत्तममध्यममनुष्याणां च केवलमिथ्याज्ञानित्वाभावात्। अधिष्ठानयाथात्म्याज्ञानस्य विपर्ययहेतुत्वप्रसिद्धेरपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः। अत एव नराधमत्वादेव। जीवत्रैविध्यविवक्षायां नराधमानामसुरेष्वन्तर्भावस्य प्रसिद्धत्वात् आसुरभावाश्रयणान्न मां प्रपद्यन्त इत्यर्थः। नन्वासुरो भावो हि हिंसानृतादिलक्षणोऽन्यैर्व्याख्यातः (शं.) तद्रहिताश्च क्षपणकादयो न भगवन्तं प्रपद्यन्ते तत्कथमस्य हेतुत्वमित्यत आह स चेति। एतेषामन्यतमः सर्वेवप्यस्तीति भावः। ननु मुक्तौ योग्यानामयोग्यानां च भगवन्तमप्रतिपद्यमानानां एते धर्मा वक्तव्याः तत्र मुक्तियोग्यानां सम्यग्ज्ञानस्वभावात् तत्कथमपहृतज्ञानत्वं इत्यत आह अपहार इति। आगमवाक्यमपि सज्जीवविषयं मुक्तियोग्यानामसुर भावाश्रयणप्रवृत्त्याद्यज्ञानेनोक्तम्। प्रकारान्तरेण घटयितुमाह असुष्विति। इन्द्रियेषु तत्प्रीणन् एव रताः। असौ इति जातावेकवचनम्। पदसन्धेर्विवक्षाधीनत्वादसन्धिर्न दोषः। त्रिभिरित्यत्र भगवतो गौणविग्रहत्वज्ञानस्य कारणमुक्तम्। अत्र तु स्वदोषादेव न मां प्रपद्यन्ते। न तु मत्प्रपत्तेर्मायातरणोपायत्वाभावादित्यतो महान्भेदः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.15 7.16।।तर्हि सर्वेऽपि किमिति नात्याययन्नित्यत आह न मामिति। दुष्कृतित्वान्मूढाः अत एव नराधमाः। अपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः अत एवासुरं भावमाश्रिताः। स च वक्ष्यतेप्रवृत्तिं निवृत्तिं च 16।7 इत्यादिना। अपहारोऽभिभवः। उक्तं चैतद्व्यासयोगेज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यधिभूयते इति। असुषु रता असुराः तच्चोक्तं नारदीये ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.15।।मां दुष्कृतिनः पापकर्माणो दुष्कृततारतम्यात् चतुर्विधा न प्रपद्यन्ते मूढा नराधमाः मायया अपहृतज्ञाना आसुरं भावम् आश्रिताः इति। मूढाः विपरीतज्ञाना पूर्वोक्तप्रकारेण मत्स्वरूपापरिज्ञानात् प्राकृतेषु एव विषयेषु सक्ताः पूर्वोक्तप्रकारेण भगवच्छेषतैकरसम् आत्मानं भोग्यजातं च स्वशेषतया मन्यमानाः।नराधमाः सामान्येन ज्ञाते अपि मत्स्वरूपे मदौन्मुख्यानर्हाः।मायया अपहृतज्ञानाः तु मद्विषयं मदैश्वर्यविषयं च ज्ञानं प्रस्तुतम् येषां तदसंभावनापादिनीभिः कूटयुक्तिभिःअपहृतं ते तथोक्ताः।आसुरं भावम् आश्रिताः तु मद्विषयं मदैश्वर्यविषयं च ज्ञानं सुदृढम् उपपन्नं येषां द्वेषाय एव भवति ते आसुरं भावम् आश्रिताः। उत्तरोत्तराः पापिष्ठतमाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.15।। न मां परमेश्वरं नारायणं दुष्कृतिनः पापकारिणः मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः नराणां मध्ये अधमाः निकृष्टाः। ते च मायया अपहृतज्ञानाः संमुषितज्ञानाः आसुरं भावं हिंसानृतादिलक्षणम् आश्रिताः।।ये पुनर्नरोत्तमाः पुण्यकर्माणः

───────────────────

【 Verse 7.16 】

▸ Sanskrit Sloka: चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन | आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ||

▸ Transliteration: caturvidhā bhajante māṃ janāḥ sukṛtino’rjuna | ārto jijñāsurarthārthī jñānī ca bharatarṣabha ||

▸ Glossary: caturvidhāḥ: four kinds of; bhajante: render services; māṃ: unto Me; janāḥ: persons; sukṛtinaḥ: those who are pious; arjuna: O Arjuna; ārtaḥ: the dis- tressed; jijñāsuḥ: the inquisitive; arthārthī : one who desires material gain; jñānī: one who knows things as they are; ca: also; bharatarṣabha: O great one amongst the descendants of Bhārata.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.16 O Bharatarṣabha, best among Bhārata, four kinds of pious men begin to render devotional service unto Me. They are: the distressed, the desirer of wealth, the inquisitive, and those searching for knowledge of the Absolute.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.16।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी आर्त जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.16।। हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन उत्तम कर्म करने वाले (सुकृतिन) आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के लोग मुझे भजते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.16 चतुर्विधाः four kinds? भजन्ते worship? माम् Me? जनाः people? सुकृतिनः virtuous? अर्जुन O Arjuna? आर्तः the distressed? जिज्ञासुः the seeker of knowledge? अर्थार्थी the seeker of wealth? ज्ञानी the wise? च and? भरतर्षभ O lord of the Bharatas.Commentary The distressed is he who is suffering from a chronic and incurable disease? he whose life is in jeopardy on account of earthake? volcanic eruption? thunder? attack by a dacoit or enemy or tiger? etc. When Draupadi and Gajendra were in great distress they worshipped the Lord. These are the instances of Aarta Bhakti.Jijnasu is the enirer. He is dissatisfied with this world. There is a void in his life. He always feels that sensual pleasure is not the highest form of happiness and there is yet pure eternal bliss unmixed with grief and pain? which is to be found within. Janaka and Uddhava were devotees of this type.Seeker of wealth is he who craves for money? wife? children? position? name and fame. Sugriva? Vibhishana? Upamanyu and Dhruva were all devotees of this type.The wise are the men of knowledge who have attained to Selfillumination. Sukadeva was a JnaniBhakta.Kamsa? Sishupala and Ravana thought of the Lord constantly on account of fear and hatred (VairaBhakti). Hence they are also regarded as devotees.Be devoted to God? whatever be your motive. Devotion will purify the motive in due course.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.16. Men of good action who worship Me always are of four types: the afflicted, the seeker of knowledge, the seeker of wealth and the man of wisdom, O best among the Bharatas !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.16 O Arjuna! The righteous who worship Me are grouped by stages: first, they who suffer, next they who desire knowledge, then they who thirst after truth, and lastly they who attain wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.16 Four types of men of good deeds worship Me, O Arjuna, These are the distressed, the seekers after knowledge, the wealth-seekers, and the men of knowledge.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.16 O Arjuna, foremost of the Bharata dynasty, four classes of people of virtuous deeds adore Me: the afflicted, the seeker of Knowledge, the seeker of wealth and the man of Knowledge.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.16 Four kinds of virtuous men worship Me, O Arjuna, and they are the distressed, the seekr of knowledge, the seekr of wealth and the wise, O lord of the Bharatas.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.16 See Comment under 7.19

▸ English

Chapter 7 (Part 11)

Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.16 'Men of good deeds,' i.e., those who have meritorious Karmas to their credit, and who resort to Me and worship Me alone - they too are divided into four types according to the degrees of their good deeds, each subseent type being better than the preceding, because of the greatness of their good deeds and gradation in respect of their knowledge.

(i) The 'distressed' is one who has lost his position in life and his wealth, and who wishes to regain them (ii) He who 'aspires for wealth' is one who desires for wealth which he has not till then attained. Between them the difference is very little, as both of them seek wealth. (iii) He 'who seeks after knowledge' is one who wishes to realise the real nature of the self (in Its pure state) as an entity different from the Prakrti. He is called 'one who seeks to secure knowledge,' because knowledge alone is the essential nature of the self. (iv) And the 'man of knowledge' is he who knows that, it is the essential nature of the self to find happiness only as the Sesa (subsidiary or liege) of the Lord, as taught in the text beginning with, 'But know that which is other than this (lower nature) to be the higher Prakrti' (7.5). Without stopping with the knowledge of the self as different from the Prakrti, he desires to attain the Lord. He thinks that the Lord alone is the highest aim to reach.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.16 Again, O Arjuna, foremost of the Bharata dynasty, caturvidhah, four classes; of janah, people; who are eminent among human beings and are pious in actions, and are sukrtinah, of virtuous deeds; bhajante, adore; mam, Me; artah, the afflicted-one who is overcome by sorrow, who is in distress, ['One who, being in distress and seeking to be saved from it, takes refuge (in Me).'] being over-whelmed by thieves, tigers, disease, etc.; jijnasuh, the seeker of Knowledge, who wants to know the reality of the Lord; artharthi, the seeker of wealth; and jnani, the man of Knowledge, [i.e. one who, already having intellectual knowledge, aspires for Liberation.] who knows the reality of Visnu.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.16।। समस्त पदार्थ एवं ऊर्जा का स्रोत आत्मा ही होने के कारण जड़ पदार्थों में यदि क्रिया होते दिखाई दे तो उसका प्रेरक स्रोत भी आत्मा ही होना चाहिए। वाष्प इंजन का प्रत्येक भाग लोहे का बना होता है और फिर भी यदि उसमें रेल के डिब्बों को खींचने की सार्मथ्य होती है तो निश्चय ही उस सार्मथ्य का स्रोत लोहे से भिन्न होना चाहिए। ठीक इसी प्रकार समस्त मनुष्य शरीर मन और बुद्धि के माध्यम से जो सार्मथ्य प्रकट करते हैं वह आत्मचैतन्य के कारण ही संभव होता है। योगी हो या भोगी दोनों को कार्य करने के लिए आत्मचैतन्य का ही आह्वान करना पड़ता है। चाहे वे पीड़ा और कष्ट के समय सान्त्वना की कामना करें या विषय उपभोगों की इच्छा करें इन सबके लिए आत्मा की चेतनता आवश्यक होती है।एक विशेष दशा मे कार्य करने के लिए आत्मा का आह्वान करना ही भजन या प्रार्थना है। प्रार्थना विधि में भक्त स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित करके ईश्वर के अनुग्रह की कामना करता है। इसको समझने के लिए हम विद्युत् का दृष्टान्त ले सकते हैं। विद्युत् पंखा हीटर रेडियो आदि स्वयं कुछ कार्य नहीं कर सकते। विद्युत् शक्ति के इनमें प्रवाहित होने पर ये अपनेअपने कार्य के द्वारा समाज की सेवा कर पाते हैं। यही विद्युत् शक्ति का आह्वान है।स्पष्ट है कि सभी यन्त्रों के लिए विद्युत् आवश्यक है लेकिन उसका उपयोग किस यन्त्र के लिए करना है वह हमारी इच्छा पर निर्भर करता है। शीत ऋतु के दिनों में पंखा चलाकर हमें और अधिक कष्ट उठाना पड़े तो उसका दोष विद्युत् को नहीं दिया जा सकता और न ही उसे क्रूर कहा जा सकता है। विखण्डित मन में जब चैतन्य व्यक्त होता है तो मन के अवगुणों के लिए आत्मा को दोष नहीं दिया जा सकता।इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि एक मात्र आत्मा ही चैतन्य स्वरूप है। भगवान् यहाँ कहते हैं कि पापी हो या पुण्यात्मा मूढ़ हो या बुद्धिमान आलसी हो या क्रियाशील भीरु हो या साहसी सब मुझे ही भजते हैं और मैं उन सबके हृदय में व्यक्त होता हूँ। शरीर मन या बुद्धि से कार्य करने के लिए सभी मनुष्यों को जाने या अनजाने मेरा आह्वान करना पड़ता है।इस श्लोक में पुण्यकर्मी भक्तों का चार प्रकार से वर्गीकरण किया गया है। वे हैं (क) आर्त आर्त का सामान्य अर्थ है दुख से पीड़ित व्यक्ति। दुखार्त भक्त अपने कष्ट के निवारण के लिए भक्ति करता है। यह सामान्य दुख के विषय में हुआ किन्तु ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जिन्हें जीवन में सब प्रकार की सुखसुविधाएं उपलब्ध होने पर भी वे एक प्रकार की आन्तरिक अशान्ति का अनुभव करते हैं। इस अशान्ति की निवृत्ति भगवत्स्वरूप की प्राप्ति से ही होती है। ऐसे आर्त भक्त भी मेरा भजन करते हैं।(ख) जिज्ञासु जो साधक शास्त्राध्ययन के द्वारा मुझे जानना चाहते हैं वे जिज्ञासु भक्त हैं।(ग) अर्थार्थी किसीनकिसी कार्यक्षेत्र में इष्ट फल को प्राप्त करने के लिए जो लोग कर्म करते हुए मेरे अनुग्रह की कामना करते हैं उन्हें अर्थार्थी कहते हैं। कामना की पूर्ति इनका लक्ष्य होता है।(घ) ज्ञानी उपर्युक्त तीनों से भिन्न ज्ञानी भक्त विरला ही होता है जो न किसी फल की इच्छा रखता है और न मुझसे कोई अपेक्षा। वह स्वयं को ही मुझे अर्पित कर देता है। वह मेरे स्वरूप को पहचान कर मेरे साथ एकत्व को प्राप्त हो जाता है।इन चर्तुविध भक्तों में सर्वश्रेष्ठ कौन है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.16।।के पुनस्त्वां प्रतिपद्यन्ते इत्यपेक्षायामाह चतुर्विधा इति। सुकृतिनः पुण्यकर्माणो जना नरोत्तमा मां भजन्ति। तेज पुण्यतारम्येन चतुर्विधाः। आर्तो रोगादिजनितपीडापरिगृहीतः जिज्ञासुः भगवत्तत्त्वं ज्ञातुमिच्छुः अर्थार्थी धनादिकामः ज्ञानी विष्णुतत्त्ववित्। चकारज्ज्ञानिनो निष्कामत्वं सूचयति। अर्जुनेति संबोधयन् सुकृततर्मणा स्वच्छतामापन्नस्यैव मद्भजनभाजनतेति ध्वनयति। सुकृतं च स्ववर्णाश्रमाविरोधि स्वकुलपरंपरागतं तथाच मद्भजनाधिकारकारकं क्षत्रियस्य विहितं स्वकुलपरंपरागतं युद्ध कर्तुमर्हसीति द्योतयन्नाह भरतर्षभेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.16।।ये त्वासुरभावहिताः पुण्यकर्माणो विवेकिनस्ते पुण्यकर्मतारतम्येन चतुर्विधाः सन्तो मामेव भजन्ते क्रमेण च कामनाराहित्येन मत्प्रसादान्मायां तरन्तीत्याह ये सुकृतिनः पूर्वजन्मकृतपुण्यसंचया जनाः सफलजन्मानस्त एव नान्ये ते मां भजन्ते सेवन्ते। हे अर्जुन ते च त्रयः सकामा एकोऽकाम इत्येवं चतुर्विधाः। आर्तः आर्त्या शत्रुव्याध्याद्यापदाग्रस्तस्तन्निवृत्तिमिच्छन् यथा मखभङ्गेन कुपित इन्द्रे वर्षति व्रजवासी जनः यथा वा जरासन्धकारागारवर्ती राजनिचयः द्यूतसभायां वस्त्राकर्षणे द्रौपदी च ग्राहग्रस्तो गजेन्द्रश्च। जिज्ञासुरात्मज्ञानार्थी मुमुक्षुः यथा मुचुकुन्दः यथा वा मैथिलो जनकः श्रुतदेवश्च निवृत्ते मौसले यथा चोद्धवः। अर्थार्थी इह वा परत्र वा यद्भोगोपकरणं तल्लिप्सुः। तत्रेह यथा सुग्रीवो बिभीषणश्च यथा चोपमन्युः परत्र यथा ध्रुवः। एते त्रयोऽपि भगवद्भजनेन मायां तरन्ति। तत्र जिज्ञासुर्ज्ञानोत्पत्त्या साक्षादेव मायां तरति आर्तोऽर्थार्थी च जिज्ञासुत्वं प्राप्येति विशेषः। आर्तस्यार्थार्थिनश्च जिज्ञासुत्वसंभवाज्जिज्ञासोश्चार्तत्वज्ञानोपकरणार्थार्थित्वसंभवादुभयोर्मध्ये जिज्ञासुरुद्दिष्टः। तदेते त्रयः सकामा व्याख्याताः। निष्कामश्चतुर्थ इदानीमुच्यते ज्ञानी च ज्ञानं भगवत्तत्त्वसाक्षात्कारस्तेन नित्ययुक्तो ज्ञानी तीर्णमायो निवृत्तसर्वकामः। चकारो यस्य कस्यापि निष्कामप्रेमभक्तस्य ज्ञानिन्यन्तर्भावार्थः। हे भरतर्षभ त्वमपि जिज्ञासुर्वा ज्ञानी वेति कतमोऽहं भक्त इति माशङ्किष्ठा इत्यर्थः। तत्र निष्कामभक्तो ज्ञानी यथा सनकादिर्यथा नारदो यथा प्रह्लादो यथा पृथुर्यथा वा शुकः। निष्कामः शुद्धप्रेमभक्तो यथा गोपिकादिर्यथा वाऽक्रूरयुधिष्ठिरादिः। कंसशिशुपालादयस्तु भयाद्द्वेषाच्च संततभगवच्चिन्तापरा अपि न भक्ताः भगवदनुरक्तेरभावात्। भगवदनुरक्तिरूपायास्तु भक्तेः स्वरूपं साधनं भेदास्तथाऽभक्तानामपि भगवद्भक्तिरसायनेऽस्माभिः सविशेषं प्रपञ्चिता इतीहोपरम्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.16।।येतु सत्यपि देहाद्यध्यासे मत्तो बिभ्यति मत्प्रीत्यर्थं सुकृतमेवाचरन्ति तेऽपि चतुर्विधा न केवलं सर्वे मदेककामा इत्याशयेनाह चतुर्विधा इति। आर्तः पीडितः पीडापरिहारार्थी। जिज्ञासुः स्वाज्ञाननाशार्थी। अर्थार्थी धनाद्यर्थी। ज्ञानी चेति चतुर्विधा मां भजन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.16।।एवं दुष्टकर्मकर्त्तारो न भजन्तीत्युक्तं तर्हि के भजन्ति इत्याकाङ्क्षायामाह चतुर्विधा इति। हे अर्जुन सावधानतया श्रोतव्यत्वेन सम्बोध्य सुकृतिनः पूर्वजन्मसञ्चितपुण्यराशयो जनाः मां भजन्ति। अन्यथा भजने प्रवृत्तिरेव न स्यात्। अतएवनराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रजायते इति श्रीभागवते उक्तम्। ते च चतुर्विधाः। चतुर्विधत्वं प्रकटयति आर्त इति। आर्तः संसारक्लेशादियुक्तः तन्निवृत्त्यर्थं धर्मरूपेण मां भजति। जिज्ञासुः कामात्मकमत्स्वरूपज्ञानेच्छुः कामरूपेण मां भजति। अर्थार्थी मत्सेवौपयिकसाधनसम्पत्त्यर्थरूपेण मां भजति। च पुनः। ज्ञानी शास्त्रार्थज्ञानवान्न मोक्षरूपेण मां भजति। भरतर्षभ इति सम्बोधनं सत्कुलोत्पन्नानामेव भजनप्रवृत्तिर्भवतीति ज्ञापनार्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.16।।सुकृतिनस्तु मां भजन्ति ते च सुकृततारतम्येन चतुर्विधा इत्याह चतुर्विधा इति। पूर्वजन्मसु ये कृतपुण्या जनास्ते मां भजन्ति। ते तु चतुर्विधाःआर्तो रोगाद्यभिभूतः। स यदि पूर्वं कृतपुण्यस्तर्हि मां भजति अन्यथा क्षुद्रदेवताभजनेन संसरति। एवमुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम्। जिज्ञासुरात्मज्ञानेच्छुः अर्थार्थी अत्र वा परत्र वा भोगसाधनभूतार्थलिप्सुः ज्ञानी च आत्मवित्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.16।।सुकृतिनस्तु भजन्त्येवेत्याह चतुर्विधा इति। सुकृतिरेव तत्र प्रवर्तिकेति सुकृतिन इत्युक्तम्। ते च सेवकाः सुकृतिनस्त एव तारतम्येन चतुर्विधाः स्थूलरीत्येति। तदाह आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी चेति। यदार्त्यादिनाऽपि भगवत्सम्बन्धित्वं ते सुकृतिनो ज्ञेयाः यथा गजेन्द्रशौनकध्रुवशुकादयः एतेन तेषामर्त्यादिना भजने पूर्वसुकृतिरेव हेतुरिति गम्यते। यत्र च भजनं दृश्यते सुकृतिश्च हेतुर्न भवति ते च गोप्यादयः पुष्टिमार्गीया भक्ताः। यद्यपि ते कामाद्युपाधिकाः स्नेहवन्तस्तथापि तत्रालौकिकभगवत्स्वरूपात्मकतद्वत्वान्न स्नेहस्य प्राकृतत्वं न च जन्मान्तरीयसुकृतिसाध्यः स इति वाच्यम् तथागमकवाक्याभावात् प्रत्युत सर्वकृतिनिषेधवाक्यसत्त्वाच्च। तथाहिते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः। अव्रतातप्ततपसो मत्सङ्गात् (सत्सङ्गात्) मामुपागाताः भाग.11।12।7 इत्यादि पूर्वजन्मन्यपि स्नेहार्थं साधनकरणाभावादित्याशयः। किञ्च स्वस्य साक्षात्कृतस्य सर्वफलभूतस्य प्रमेयबलेन स्वसङ्गस्य प्राशस्त्यमप्युक्तं साधकतमत्वं चव्याधः कुब्जा व्रजे गोप्यः भाग.11।12।6 इत्यत्र इत्थं च स्वरूपानुग्रहेतरसाधनासाध्यस्वप्राप्तिरुक्ताकेवलेनैव भावेन गोप्यो गावः खगा नगाः भाग.11।12।8 इत्यादिना दृढीकृता च। तद्विषयास्ते उभयदृष्टादृष्टसाधनरहिताः साधनफलात्मकभगवत्स्वरूपानुग्रहबलेनैवालौकिककामस्नेहवन्त इति तेषामेतेषु चतुर्विधेषु चकारेण समावेशः परप्रतिपादितः (मधुसूदनसरस्वतीभिः प्रतिपादितः) न घटत इति वयं अवोचाम। इदं तुभक्त्या ह्यनन्यया शक्यः 11।54 इत्यादौ सिद्धमिति न प्रतन्यते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.16।।परंतु जो पुण्यकर्म करनेवाले नरश्रेष्ठ हैं ( वे क्या करते हैं सो बतलाते हैं ) हे भारत आर्त अर्थात् चोर व्याघ्र रोग आदिके वशमें होकर किसी आपत्तिसे युक्त हुआ जिज्ञासु अर्थात् भगवान्का तत्त्व जाननेकी इच्छावाला अर्थार्थी यानी धनकी कामनावाला और ज्ञानी अर्थात् विष्णुके तत्त्वको जाननेवाला हे अर्जुन ये चार प्रकारके पुण्यकर्मकारी मनुष्य मेरा भजनसेवन करते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.16।। व्याख्या  चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन सुकृती पवित्रात्मा मनुष्य अर्थात् भगवत्सम्बन्धी काम करनेवाले मनुष्य चार प्रकारके होते हैं। ये चारों मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् स्वयं मेरे शरण होते हैं।पूर्वश्लोकमें दुष्कृतिनः पदसे भगवान्में न लगनेवाले मनुष्योंकी बात आयी थी। अब यहाँ सुकृतिनः पदसे भगवान्में लगनेवाले मनुष्योंकी बात कहते हैं। ये सुकृती मनुष्य शास्त्रीय सकाम पुण्यकर्म करनेवाले नहीं हैं प्रत्युत भगवान्से अपना सम्बन्ध जोड़कर भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेवाले हैं। सुकृती मनुष्य दो प्रकारके होते हैं एक तो यज्ञ दान तप आदि और वर्णआश्रमके शास्त्रीय कर्म भगवान्के लिये करते हैं अथवा उनको भगवान्के अर्पण करते हैं और दूसरे भगवन्नामका जप तथा कीर्तन करना भगवान्की लीला सुनना तथा कहना आदि केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म करते हैं।जिनकी भगवान्में रुचि हो गयी है वे ही भाग्यशाली हैं वे ही श्रेष्ठ हैं और वे ही मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। वह रुचि चाहे किसी पूर्व पुण्यसे हो गयी हो चाहे आफतके समय दूसरोंका सहारा छूट जानेसे हो गयी हो चाहे किसी विश्वसनीय मनुष्यके द्वारा समयपर धोखा देनेसे हो गयी हो चाहे सत्सङ्ग स्वाध्याय अथवा विचार आदिसे हो गयी हो किसी भी कारणसे भगवान्में रुचि होनेसे वे सभी सुकृती मनुष्य हैं।जब भगवान्की तरफ रुचि हो जाय वही पवित्र दिन है वही निर्मल समय है और वही सम्पत्ति है। जब भगवान्की तरफ रुचि नहीं होती वही काला दिन है वही विपत्ति है कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।(मानस 5। 32। 2)भगवान्ने कृपा करके भगवत्प्राप्तिरूप जिस उद्देश्यको लेकर जिन्हें मानवशरीर दिया है वे जनाः (जन) कहलाते हैं। भगवान्का संकल्प मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये बना है अतः मनुष्यमात्र भगवान्की प्राप्तिका अधिकारी है। तात्पर्य है कि उस संकल्पमें भगवान्ने मनुष्यको अपने उद्धारकी स्वतन्त्रता दी है जो कि अन्य प्राणियोंको नहीं मिलती क्योंकि वे भोगयोनियाँ हैं और यह मानवशरीर कर्मयोनि है। वास्तवमें केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही होनेके कारण मानवशरीरको साधनयोनि ही मानना चाहिये। इसलिये इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके मनुष्य शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंको छोड़कर अगर भगवत्प्राप्तिके लिये ही लग जाय तो उसको भगवत्कृपासे अनायास ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है। परन्तु जो मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके विपरीत मार्गपर चलते हैं वे नरकों और चौरासी लाख योनियोंमें जाते हैं। इस तरह सबके उद्धारके भावको लेकर भगवान्ने कृपा करके जो मानवशरीर दिया है उस शरीरको पाकर भगवान्का भजन करनेवाले सुकृती मनुष्य ही जनाः अर्थात् मनुष्य कहलानेयोग्य हैं।आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ अर्थार्थी आर्त जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी ये चार प्रकारके भक्त भगवान्का भजन करते हैं अर्थात् भगवान्के शरण होते हैं।(1) अर्थार्थी भक्त जिनको अपनी न्याययुक्त सुखसुविधाकी इच्छा हो जाती है अर्थात् धनसम्पत्ति वैभव आदिकी इच्छा हो जाती है परन्तु उसको वे केवल भगवान्से ही चाहते हैं दूसरोंसे नहीं ऐसे भक्त अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं।चार प्रकारके भक्तोंमें अर्थार्थी आरम्भिक भक्त होता है। पूर्वसंस्कारोंसे उसकी धनकी इच्छा रहती है और वह धनके लिये चेष्टा भी करता है पर वह समझता है कि भगवान्के समान धनकी इच्छा पूरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। ऐसा समझकर वह धनप्राप्तिके लिये तत्परतापूर्वक भगवन्नामका जपकीर्तन भगवत्स्वरूपका ध्यान आदि करता है। धन प्राप्त करनेके लिये उसका भगवान्पर ही विश्वास निष्ठा होती है।जिसको धनकी इच्छा तो है पर उसकी प्राप्तिके लिये वह सांसारिक उपायोंका सहारा लेता है और कभी धनके लिये भगवान्को भी याद कर लेता है वह केवल अर्थार्थी अर्थात् अर्थका भक्त है भगवान्का भक्त नहीं है। कारण कि उसमें धनकी इच्छा ही मुख्य है। परन्तु जिसमें भगवान्के सम्बन्धकी मुख्यता है वह क्रमशः भगवान्की तरफ ही बढ़ता चला जाता है। भगवान्में लगे रहनेसे उसकी धनकी इच्छा बहुत कम हो जाती है और समय पाकर मिट भी जाती है। यही भगवान्का अर्थार्थी भक्त है। इसमें मुख्यता ध्रुवजीका नाम लिया जाता है।एक दिन बालक ध्रुवके मनमें राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई पर छोटी माँने बैठने नहीं दिया। उसने ध्रुवसे कहा कि तूने भजन नहीं किया है तू अभागा है और अभागिनके यहाँ ही तूने जन्म लिया है अतः तू राजाकी गोदमें बैठनेका अधिकारी नहीं है। ध्रुवने छोटी माँकी कही हुई सब बात अपनी माँसे कह दी। माँने कहा कि बेटा तेरी छोटी माँने ठीक ही कहा है क्योंकि भजन न तूने किया और न मैंने ही किया। इसपर ध्रुवने माँसे कहा कि माँ अब तो मैं भजन करूँगा। ऐसा कहकर वे भगवद्भजन करनेके लिये घरसे निकल पड़े और माँने भी बड़ी हिम्मत करके ध्रुवको जंगलमें जानेके लिये आज्ञा दे दी। रास्तेमें जाते हुए नारदजी महाराज मिल गये। नारदजीने ध्रुवसे कहा कि अरे भोले बालक तू अकेला कहाँ जा रहा हैयों भगवान् जल्दी थोड़े ही मिलते हैं तू जंगलमें कहाँ रहेगा वहाँ बड़ेबड़े जंगली जानवर हैं। वे तेरेको खा जायँगे। वहाँ तेरी माँ थोड़े ही बैठी है तू मेरे साथ चल। राजा मेरी बात मानते हैं। मैं तेरा और तेरी माँका प्रबन्ध करवा दूँगा। नारदजीकी बातोंको सुनकर ध्रुवकी भगवद्भजनमें और दृढ़ता हो गयी कि देखो भगवान्की तरफ चलनेसे नारदजी भी इतनी बात कहते हैं। अब ये मेरेको घर चलनेके लिये कहते हैं पर पहले ये कहाँ गये थे ध्रुवने नारदजीसे कहा कि महाराज मैं तो अब भगवान्का भजन ही करूँगा। ध्रुवजीका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर नारदजीने उनको द्वादशाक्षर मन्त्र (ँ़ नमो भगवते वासुदेवाय) दिया और चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान बताकर मधुवनमें जाकर भजन करनेकी आज्ञा दी।ध्रुवजीने मधुवनमें जाकर ऐसी निष्ठासे भजन किया कि उनकी निष्ठाको देखकर छः महीनेकी अवधिके भीतरहीभीतर भगवान् ध्रुवके सामने प्रकट हो गये। भगवान्ने ध्रुवजीको राजगद्दीका वरदान दिया पर इस वरदानसे ध्रुवजी विशेष राजी नहीं हुए। भजनसे अन्तःकरण शुद्ध होनेके कारण उनको धन(राज्य) के लिये भगवान्की तरफ चलनेमें बड़ी लज्जा हुई कि मैंने बड़ी गलती कीतात्पर्य यह हुआ कि ध्रुवजीको तो पहले राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई पर उन्होंने उस इच्छाकी पूर्तिका मुख्य उपाय भगवान्का भजन ही माना। भजन करनेसे उनको राज्य मिल गया और इच्छा मिट गयी। इस तरह अर्थार्थी भक्त केवल भगवान्की तरफ ही लगता है।आजकल जो धनप्राप्तिके लिये झूठ कपट बेईमानी आदि करते हैं वे भी धनके लिये समयसमयपर भगवान्को पुकारते हैं। वे अर्थार्थी तो हैं पर भगवान्के भक्त नहीं हैं। वे तो झूठ कपट बेईमानी आदिके भक्त हैं क्योंकि उनका पापके बिना झूठकपटके बिना काम नहीं चलता इस तरह झूठकपट आदिपर जितना विश्वास है उतना विश्वास भगवान्पर नहीं है।जो केवल भगवान्के ही परायण हैं और जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्का ही भजन करते हैं परन्तु कभीकभी पूर्वसंस्कारोंसे अथवा किसी कारणसे जिनमें अपने शरीर आदिके लिये अनुकूल परिस्थितिकी इच्छा हो जाती है वे भी अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं। उनकी अनुकूलताकी इच्छा ही अर्थार्थीपन है।(2) आर्त भक्त प्राणसंकट आनेपर आफत आनेपर मनके प्रतिकूल घटना घटनेपर जो दुःखी होकर अपना दुःख दूर करनेके लिये भगवान्को पुकारते हैं और दुःखको दूर करना केवल भगवान्से ही चाहते हैं दूसरे किसी उपायको काममें नहीं लेते वे आर्त भक्त कहलाते हैं। आर्त भक्तोंमें उत्तरका दृष्टान्त लेना ठीक बैठता है (टिप्पणी प0 417.1)। कारण कि जब उसपर आफत आयी तब उसने भगवान्के सिवाय अन्य किसी उपायका सहारा नहीं लिया। अन्य उपायोंकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं गयी। उसने केवल भगवान्का ही सहारा लिया (टिप्पणी प0 417.2)। तात्पर्य यह हुआ कि सकामभाव रहनेपर भी आर्त भक्त उसकी पूर्ति केवल भगवान्से ही चाहते हैं। जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्के परायण हैं और अनुकूलताकी वैसी इच्छा नहीं करते पर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर इच्छा हो जाती है कि भगवान्ने ऐसा क्यों किया यह प्रतिकूलता मिट जाय तो बहुत अच्छा है। इस प्रकार प्रतिकूलता मिटानेका भाव पैदा होनेसे वे भी आर्त भक्त कहलाते हैं।(3) जिज्ञासु भक्त जिसमें अपने स्वरूपको भगवत्तत्त्वको जाननेकी जोरदार इच्छा जाग्रत् हो जाती है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है भगवत्तत्त्व क्या है इस प्रकार तत्त्वको जाननेके लिये शास्त्र गुरु अथवा पुरुषार्थ (श्रवण मनन निदिध्यासन आदि उपायों) का भी आश्रय न रखते हुए केवल भगवान्के आश्रित होकर उस तत्त्वको केवल भगवान्से ही जो जानना चाहते हैं वे जिज्ञासु भक्त कहलाते हैं।जिज्ञासु भक्त वही होता है जिसका जिज्ञास्य केवल भगवत्तत्त्व और उपाय केवल भगवद्भक्ति ही होती है अर्थात् उपेय और उपायमें अनन्यता होती है।जिज्ञासु भक्तोंमें उद्धवजीका नाम लिया जाता है। भगवान्ने उद्धवजीको दिव्यज्ञानका उपदेश दिया था जो उद्धवगीता (श्रीमद्भागवत 11। 7 30) के नामसे प्रसिद्ध है।जो भगवान्में अपनापन करके भगवान्के भजनमें ही तल्लीन रहते हैं परन्तु कभीकभी सङ्गसे संस्कारोंसे मनमें यह भाव पैदा हो जाता है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है भगवत्तत्त्व क्या है वे भी जिज्ञासु कहलाते हैं।(4) ज्ञानी (प्रेमी) भक्त अर्थार्थी आर्त और जिज्ञासु तीनों भक्तोंसे ज्ञानी भक्तकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ च अव्यय आया है।ज्ञानी भक्तको अनुकूलसेअनुकूल और प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति घटना व्यक्ति वस्तु आदि सब भगवत्स्वरूप ही दीखते हैं अर्थात् उसको अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति केवल भगवल्लीला ही दीखती है। जैसे भगवान्में अपने लिये अनुकूलता प्राप्त करने प्रतिकूलता हटाने बोध प्राप्त करने आदि किसी तरहकी कभी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा होती ही नहीं वे तो केवल भक्तोंके प्रेममें ही मस्त रहते हैं ऐसे ही ज्ञानी (प्रेमी) भक्तोंमें किञ्चिन्मात्र भी कोई इच्छा नहीं होती वे केवल भगवान्के प्रेममें ही मस्त रहते हैं।ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तोंमें गोपिकाओंका नाम प्रसिद्ध है। देवर्षि नारदजीने भी यथा व्रजगोपिकानाम् (भक्तिसूत्र 21) कहकर गोपियोंको प्रेमी भक्तोंका आदर्श माना है। कारण कि गोपियोंमें अपने सुखका सर्वथा त्याग था। प्रियतम भगवान्का सुख ही उनका सुख था।यहाँ एक बात समझनेकी है कि धनकी इच्छा दुःख दूर करनेकी इच्छा और जिज्ञासापूर्तिकी इच्छाको लेकर जो भगवान्की तरफ लगते हैं उनमें तो भगवान्का प्रेम जाग्रत् हो जाता है और वे भक्त कहलाते हैं। परन्तु जिनकी यह भावना रहती है कि अन्य उपायोंसे धन मिल सकता है दुःख दूर हो सकता है जिज्ञासापूर्ति हो सकती है उनका भगवान्के साथ सम्बन्ध न होनेसे उनमें प्रेम जाग्रत् नहीं होता और उनकी भक्त संज्ञा नहीं होती।संतोंकी वाणीमें आता है कि प्रेम तो केवल भगवान् ही करते हैं भक्त केवल भगवान्में अपनापन करता है। कारण कि प्रेम वही करता है जिसे कभी किसीसे कुछ भी लेना नहीं है। भगवान्ने जीवमात्रके प्रति अपनेआपको सर्वथा अर्पित कर रखा है और जीवसे कभी कुछ भी प्राप्त करनेकी इच्छाकी कोई सम्भावना ही नहीं रखी है। इसलिये भगवान् ही वास्तवमें प्रेम करते हैं। जीवको भगवान्की आवश्यकता है इसलिये जीव भगवान्से अपनापन ही करता है। जब अपनेआपको सर्वथा भगवान्के अर्पित करनेपर भक्तमें कभी कुछ भी पानेकी कोई अभिलाषा नहीं रहती तब वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त कहा जाता है। अपनेआपको सर्वथ भगवान्के अर्पित कर देनेसे उस भक्तकी सत्ता भगवान्से किञ्चिन्मात्र भी अलग नहीं रहती प्रत्युत उसकी जगह केवल भगवान्की सत्ता ही रह जाती है।विशेष बात(1)चार लड़के खेल रहे थे। इतनेमें उनके पिताजी चार आम लेकर आये। उनको देखते ही एक लड़का आम माँगने लग गया और एक लड़का आम लेनेके लिये रो पड़ा। पिताजीने उन दोनोंको एकएक आम दे दिया।तीसरा लड़का न तो रोता है और न माँगता है केवल आमकी तरफ देखता है और चौथा लड़का आमकी तरफ न देखकर जैसे पहले खेल रहा था वैसे ही मस्तीसे खेल रहा है। उन दोनोंको भी पिताजीने एकएक आम दे दिया। इस प्रकार चारों ही लड़कोंको आम मिलता है। यहाँ आम माँगनेवाला लड़का अर्थार्थी है रोनेवाला लड़का आर्त है केवल आमकी तरफ देखनेवाला जिज्ञासु है और आमकी परवाह न करके खेलमें लगे रहनेवाला लड़का ज्ञानी है। ऐसे ही अर्थार्थी भक्त भगवान्से अनुकूलता माँगता है आर्त भक्त भगवान्से प्रतिकूलता दूर कराना चाहता है जिज्ञासु भक्त भगवान्को जानना चाहता है और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त भगवान्से कुछ भी नहीं चाहता।अर्थार्थी आर्त जिज्ञासु और ज्ञानी ये चारों ही भक्त भगवन्निष्ठ हैं। अतः इनको योगभ्रष्ट पुरुषों (गीता 6। 41 42) में नहीं लिया जा सकता। ऐसे ही अर्थार्थी और आर्त ये दोनों सकाम पुरुषोंसे अलग हैं क्योंकि इन दोनों भक्तोंमें भगवान्का आश्रय मुख्य है। सकाम पुरुष कामनापूर्तिमें ही लगे रहनेके कारण हृतज्ञानाः हैं (गीता 7। 20) इसलिये उनको आसुरी सम्पत्तिवाले पुरुषोंमें लिया गया है। यद्यपि अर्थार्थी आदि भक्तोंमें जो कुछ न्यूनाधिकता है वह कामनाके कारण ही है परन्तु कामना होते हुए भी वे हृतज्ञानाः नहीं हैं। उनको तो भगवान्ने सुकृतिनः और उदाराः (7। 18) कहा है।जो भगवान्के शरण होते हैं उनमें सकामभाव भी हो सकता है परन्तु उनमें मुख्यता भगवन्निष्ठ होनेकी ही होती है। इसलिये उनकी भगवान्के साथ जितनीजितनी घनिष्ठता होती जाती है उतनाउतना ही उनमें सकामभाव मिटता जाता है और विलक्षणता आती जाती है। इसलिये उनको भगवान्ने उदाराः कहा है और ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् (7। 18)।(2)भगवान्के साथ अपनापन माननेके समान दूसरा कोई साधन नहीं है कोई योग्यता नहीं है कोई बल नहीं है कोई अधिकारिता नहीं है। भगवान्का प्राणिमात्रपर अपनापन सदासे है और सदा ही रहेगा। उस अपनेपनको केवल प्राणी ही भूला है और उसने भूलसे संसारके साथ अपनापन मान लिया है। अतः इस भूलसे किये हुए अपनेपनको हटाना है और प्रभुके साथ जो स्वतःसिद्ध अपनापन है उसको मानना है। प्रभुको अपना माननेमें मन बुद्धि आदि किसीकी सहायता नहीं लेनी पड़ती जबकि दूसरे साधनोंमें मन बुद्धि आदिकी सहायता लेनी पड़ती है।भगवान्के साथ अपनापन होनेपर अर्थात् मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं ऐसा दृढ़तासे मान लेनेपर साधक भक्तको अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें भावोंकी गुणोंकी कमी भी दीख सकती है पर भगवान्के साथ अपनापन होनेसे वह टिकेगी नहीं। दूसरी बात साधक भक्तमें कुछ गुणोंकी कमी रहनेपर भी भगवान्की दृष्टि केवल अपनेपनपर ही जाती है गुणोंकी कमीपर नहीं। कारण कि भगवान्के साथ हमारा जो अपनापन है वह वास्तविक है।भगवान्का अपनापन तो दुष्टसेदुष्ट मनुष्यपर भी वैसा ही है। इसलिये सोलहवें अध्यायमें आसुरी प्रकृतिवालोंका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि क्रूर द्वेष करनेवाले नराधम दुष्टोंको मैं आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। इस प्रकार भगवान् उनको आसुरी योनियोंमें गिराकर शुद्ध करते हैं। जैसे माता अपने बच्चेको स्नान कराती है तो उसकी सम्मति नहीं लेती ऐसे ही उनको शुद्ध करनेके लिये भगवान् उनकी सम्मति नहीं लेते क्योंकि भगवान्का उनपर अपनापन है। भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध पहलेसे ही है। फिर भी कोई कामना उत्पन्न हो जाती है तो भक्तका भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध मुख्य होता है और कामना गौण होती है। इस दृष्टिसे ये भक्त पहली श्रेणीके हैं।भगवान्का सम्बन्ध तो पहलेसे ही है पर समयसमयपर कामना उत्पन्न हो जाती है जिसकी पूर्ति दूसरोंसे चाहते हैं। जब दूसरोंसे कामनाकी पूर्ति नहीं होती तब अन्तमें भगवान्से चाहते हैं। इस तरह अनन्यताकी कमी होनेके कारण ये भक्त दूसरी श्रेणीके हैं।जहाँ केवल कामनापूर्तिके लिये ही भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध किया जाय वहाँ कामना मुख्य होती है और भगवान्का सम्बन्ध गौण होता है। इस दृष्टिसे ये भक्त तीसरी श्रेणीके हैं।मार्मिक बातकामना दो तरहकी होती है पारमार्थिक और लौकिक।(1) पारमार्थिक कामना पारमार्थिक कामना दो तरहकी होती है मुक्ति(कल्याण) की और भक्ति(भगवत्प्रेम) की।जो मुक्तिकी कामना है उसमें तत्त्वको जाननेकी इच्छा होती है जिसे जिज्ञासा कहते हैं। यह जिज्ञासा जिसमें होती है वह जिज्ञासु होता है। गहरा विचार किया जाय तो जिज्ञासा कामना नहीं है क्योंकि वह अपने स्वरूपको अर्थात् तत्त्वको जानना चाहता है जो वास्तवमें उसकी आवश्यकता है। आवश्यकता उसको कहते हैं जो जरूर पूरी होती है और पूरी होनेपर फिर दूसरी आवश्यकता पैदा नहीं होती (टिप्पणी प0 419.1)। यह आवश्यकता सत्विषयकी होती है।दूसरी कामना प्रभुप्रेमप्राप्तिकी होती है। उसको प्राप्ति तो कहते हैं पर वास्तवमें वह प्राप्ति अपने लिये नहीं होती प्रत्युत प्रभुके लिये ही होती है। उसमें अपना किञ्चिन्मात्र प्रयोजन नहीं रहता प्रभुके समर्पित होनेका ही प्रयोजन रहता है। प्रेमी तो अपनेआपको प्रभुके समर्पित कर देता है जो कि उसीका अंश है (टिप्पणी प0 419.2)।उपर्युक्त दोनों ही पारमार्थिक कामनाएँ वास्तवमें कामना नहीं हैं।(2) लौकिक कामना लौकिक कामना भी दो तरहकी होती है सुख प्राप्त करनेकी और दुःख दूर करनेकी।शरीरको आराम मिले जीतेजी मेरा आदरसत्कार होता रहे और मरनेके बाद मेरा नाम अमर हो जाय मेरा स्मारक बन जाय कोई ग्रन्थ बना दे जिसको लोग देखते रहें पढ़ते रहें और यह जान जायँ कि ऐसा कोई विलक्षण पुरुष हुआ है मरनेके बाद स्वर्ग आदिमें भोग भोगते रहें आदिआदि लौकिक सुखप्राप्तिकी कामनाएँ होती हैं। ऐसी कामनाओंसे तो वासना ही बढ़ती है जिससे बन्धन और पतन ही होता है उद्धार नहीं होता। यह कामना आसुरी सम्पत्ति है इसलिये यह त्याज्य है।दूसरी कामना दुःख दूर करनेकी है। दुःख तीन प्रकारके हैं आधिदैविक आधिभौतिक और आध्यात्मिक।अतिवृष्टि अनावृष्टि सरदीगरमी वायु आदिसे जो दुःख होता है उसको आधिदैविक कहते हैं। यह दुःख देवताओंके अधिकारसे होता है।सिंह साँप चोर आदि प्राणियोंसे जो दुःख होता है उसको आधिभौतिक कहते हैं।शरीर और अन्तःकरणको लेकर जो दुःख होता है वह आध्यात्मिक होता है (टिप्पणी प0 420.1)।इन दुःखोंको दूर करनेकी और सुख प्राप्त करनेकी जो कामना होती है वह सर्वथा निरर्थक है क्योंकि उस कामनाकी पूर्ति नहीं होती। पूर्ति हो भी जाती है तो दूसरी नयी कामना पैदा हो जाती है और अन्तमें अपूर्ति ही बाकी रहती है। इसलिये इन दोनों कामनाओंकी पूर्ति किसी भी मनुष्यकी कभी भी नहीं हुई न होती है और न भविष्यमें ही पूरी होनेवाली है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों भक्तोंमेंसे ज्ञानी भक्तकी विशेषताका विशद वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.16 7.19।।चतुर्विधा इत्यादि सुदुर्लभ इत्यन्तम्। ये तु मां भजन्ते ते सुकृतिनः। ते च चत्वारः। सर्वे चैते उदाराः। यतः अन्ये कृपणबुद्धयः आर्त्तिनिवारणम् अर्थादि च तुल्यपाणिपादोदरशरीरसत्त्वेभ्योऽधिकतरं वा आत्मन्यूनेभ्यो मार्गयन्ते। ज्ञान्यपेक्षया तु ते न्यूनसत्त्वाः यतः तेषां तावत्यपि भेदोऽस्ति भगवतः इदमहमभिलष्यामि इति भेदस्य स्फुटप्रतिभासात्। ज्ञानी तु मामेवाभेदतया अवलम्बते इति (S omits इति) ततोऽहमभिन्न एव। तस्य च अहमेव प्रियः न तु फलम्। अत एव स वासुदेव एव सर्वम् इत्येव (S वासुदेवः सर्वमेवम्) दृढप्रतिपत्तिपवित्रीकृतहृदयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.16।।केषां तर्हि तन्निष्ठता सुकरेति तत्राह ये पुनरिति। ते भजन्ते भगवन्तमिति शेषः। ये त्वां भजन्ते ते किं सर्वे मायां तरन्ति नैव प्रार्थनावैचित्र्यादित्याह चतुर्विधा इति। आपन्नस्तन्निवृत्तिमिच्छन्निति शेषः।तत्त्वविदिति। शब्दज्ञानवानात्मतत्त्वसाक्षात्कारमात्रार्थी मुमुक्षुरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.15 7.16।।उत्तरवाक्यं प्रकृतानुपयुक्तमित्यत आह तर्हीति। यदि त्वत्प्रतिपत्तिर्मायातरणोपायस्तर्हीत्यर्थः। त्वां प्रपद्येति शेषः। तथा चमामेव 7।14 इत्युक्तमसदिति भावः। दुष्कृतित्वादीनां प्रयोजनान्तराभावात् हेतुत्वेनान्वये स्थिते किं ते पञ्चापि साक्षाद्भगवदप्रतिपत्तिहेतवः किं वा हेतुहेतुमद्भावेन इत्यपेक्षायामाह दुष्कृतित्वादिति। मूढाः मिथ्याज्ञानिनः विपर्ययस्याधर्मकार्यत्वप्रसिद्धेः। अत एव मूढत्वादेव। देवानामुत्तममध्यममनुष्याणां च केवलमिथ्याज्ञानित्वाभावात्। अधिष्ठानयाथात्म्याज्ञानस्य विपर्ययहेतुत्वप्रसिद्धेरपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः। अत एव नराधमत्वादेव। जीवत्रैविध्यविवक्षायां नराधमानामसुरेष्वन्तर्भावस्य प्रसिद्धत्वात् आसुरभावाश्रयणान्न मां प्रपद्यन्त इत्यर्थः। नन्वासुरो भावो हि हिंसानृतादिलक्षणोऽन्यैर्व्याख्यातः (शं.) तद्रहिताश्च क्षपणकादयो न भगवन्तं प्रपद्यन्ते तत्कथमस्य हेतुत्वमित्यत आह स चेति। एतेषामन्यतमः सर्वेवप्यस्तीति भावः। ननु मुक्तौ योग्यानामयोग्यानां च भगवन्तमप्रतिपद्यमानानां एते धर्मा वक्तव्याः तत्र मुक्तियोग्यानां सम्यग्ज्ञानस्वभावात् तत्कथमपहृतज्ञानत्वं इत्यत आह अपहार इति। आगमवाक्यमपि सज्जीवविषयं मुक्तियोग्यानामसुर भावाश्रयणप्रवृत्त्याद्यज्ञानेनोक्तम्। प्रकारान्तरेण घटयितुमाह असुष्विति। इन्द्रियेषु तत्प्रीणन् एव रताः। असौ इति जातावेकवचनम्। पदसन्धेर्विवक्षाधीनत्वादसन्धिर्न दोषः। त्रिभिरित्यत्र भगवतो गौणविग्रहत्वज्ञानस्य कारणमुक्तम्। अत्र तु स्वदोषादेव न मां प्रपद्यन्ते। न तु मत्प्रपत्तेर्मायातरणोपायत्वाभावादित्यतो महान्भेदः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.15 7.16।।तर्हि सर्वेऽपि किमिति नात्याययन्नित्यत आह न मामिति। दुष्कृतित्वान्मूढाः अत एव नराधमाः। अपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः अत एवासुरं भावमाश्रिताः। स च वक्ष्यतेप्रवृत्तिं निवृत्तिं च 16।7 इत्यादिना। अपहारोऽभिभवः। उक्तं चैतद्व्यासयोगेज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यधिभूयते इति। असुषु रता असुराः तच्चोक्तं नारदीये ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.16।।सुकृतिनः पुण्यकर्माणो मां शरणम् उपगम्य माम् एव भजन्ते। ते चे सुकृततारतम्येन चतुर्विधाः सुकृतगरीयस्त्वेन प्रतिपत्तिवैशेष्याद् उत्तरोत्तराधिकतमाः भवन्ति।आर्त्तः प्रतिष्ठाहीनो भ्रष्टैश्वर्यः पुनस्तत्प्राप्तिकामः। अर्थार्थी अप्राप्तैश्वर्यतया ऐश्वर्यकामः तयोः मुखभेदमात्रम् ऐश्वर्यविषयतया ऐक्याद् एक एव अधिकारः।जिज्ञासुः प्रकृतिवियुक्तात्मस्वरूपावाप्तीच्छुः ज्ञानम् एव अस्य स्वरूपम् इति जिज्ञासुः इति उक्तम्।ज्ञानी चइतस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् (गीता 7।5) इत्यादिना अभिहितभगवच्छेषतैकरसात्मस्वरूपवित् प्रकृतिवियुक्तकेवलात्मनि अपर्यवस्यन् भगवन्तं प्रेप्सुः भगवन्तम् परमप्राप्यं मन्वानः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.16।। चतुर्विधाः चतुःप्रकाराः भजन्ते सेवन्ते मां जनाः सुकृतिनः पुण्यकर्माणः हे अर्जुन। आर्तः आर्तिपरिगृहीतः तस्करव्याघ्ररोगादिना अभिभूतः आपन्नः जिज्ञासुः भगवत्तत्त्वं ज्ञातुमिच्छति यः अर्थार्थी धनकामः ज्ञानी विष्णोः तत्त्वविच्च हे भरतर्षभ।।

───────────────────

【 Verse 7.17 】

▸ Sanskrit Sloka: तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते | प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय: ||

▸ Transliteration: teṣāṃ jñānī nityayukta eka-bhaktir viśiṣyate | priyo hi jñānino’tyartham ahaṃ sa ca mama priyaḥ ||

▸ Glossary: teṣāṃ: of them; jñānī: the wise; nityayuktaḥ: ever steadfast; eka bhaktiḥ: whose devotion is to the one; viśiṣyate: better; priyaḥ: dear; hi: verily; jñāninaḥ: of the wise; atyarthaṃ: exceedingly; ahaṃ: I; saḥ: he; ca: and; mama: to me; priyaḥ: dear

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.17 Of these, the wise one who is in full knowledge and ever united with Me through single-minded devotion is the best. I am very dear to him, and he is dear to Me

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.17।।उन चार भक्तोंमें मेरेमें निरन्तर लगा हुआ अनन्यभक्तिवाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानी भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह भी मेरेको अत्यन्त प्रिय है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.17।। उनमें भी मुझ से नित्ययुक्त अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.17 तेषाम् of them? ज्ञानी the wise? नित्ययुक्तः ever steadfast? एकभक्तिः whose devotion is to the One? विशिष्यते excels? प्रियः dear? हि verily? ज्ञानिनः of the wise? अत्यर्थम् exceedingly? अहम् I? सः he? च and? मम of Me? प्रियः dear.Commentary Ekabhaktih means unswerving? singleminded devotion to the Supreme Being.The JnaniBhakta is beyond all cults or creeds or formal religion or rules of society. As the wise man is constantly harmonised and as he is devoted to the One? he is regarded as superior to all the other devotees. As I am his very Self or Antaratma? I am extremely dear to him. Everybody loves his own Self most. The Self is very dear to everybody. The wise man is My very Self and he is ear to Me also. (Cf.II.49IX.29XII.14?17and19)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.17. Of them, the man of wisdom, being always attached [to Me] with single-pointed devotion excels [others]. For, I am dear to the man of wisdom above all personal gains and he is dear to Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.17 Of all of these, he who has gained wisdom, who meditates on Me without ceasing, devoting himself only to Me, he is the best; for by the wise man I am exceedingly beloved and the wise man, too, is beloved by Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.17 Of these, the man of knowledge, being ever with Me in Yoga and devoted to the One only, is the foremost; for I am very dear to the man of knowledge and he too is dear to Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.17 Of them, the man of Knowledge, endowed with constant steadfastness and one-pointed devotion, excels. For I am very much dear to the man of Knowledge, and he too is dear to Me.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.17 Of them the wise, ever steadfast and devoted to the One, excels (is the best); for I am exceedingly dear to the wise and he is dear to Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.17 See Comment under 7.19

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.17 Of these four, 'the man of knowledge' is the foremost. Why? Because of being ever with Me in Yoga and devoted to the One only. To the man of knowledge the attainment of Myself being the only end in view, he is ever with Me. As for the others, they contemplate on Me only until the fulfilment of their desires. But to the man of knowledge, there is single-minded devotion to Me only. Unlike him, the others, want only the objects of their desire and they are devoted to Me only as a means for gaining them. Hence he, the man of knowledge, alone is the foremost. Further I am very dear to the man of knowledge. Here the term 'artha' in relation to the expression 'athyartham' denotes 'what cannot be expressed adeately.' That is, even I, the omniscient and omnipotent, is unable to express how much I am dear to the Jnanin, since there is no such limit as 'this much' for this love. Such is the meaning. As in the case of Prahlada, the foremost among men of knowledge, it is said: 'But he with his thoughts firmly fixed on Krsna while being bitten by the great serpents, felt no pain from the wounds, being immersed in rapturous recollections of Him' (V. P., 1.17.39). I reciprocate this love infinitely.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.17 Tesam, of them, among the four; jnani, the man of Knowledge, the knower of Reality, is nitya-yuktah, endowed with constant steadfastness as a result of being a knower of Reality; and he also becomes eka-bhaktih, endowed with one-pointed devotion, because he finds no one else whom he can adore. Conseently, that person of one-pointed devotion visisyate, excels, becomes superior, i.e. he surpasses (the others). Hi, since; I, the Self, am priyah, dear; jnaninah, to the man of Knowledge; therefore aham, I; am atyartham, very much; priyah, dear to him. It is indeed a well known fact in the world that the Self is dear. The meaning, therefore, is that Vasudeva, being the Self of the man of Knowledge, is dear to him. And sah, he, the man of Knowledge, being the very Self of Me who am Vasudeva; is very much priyah, dear; mama, to Me. 'If that be so, then the other three-the afflicted and the others-are not dear to Vasudeva?' 'This is not so!' 'What then?'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.17।। चतुर्विध भक्तों की परस्पर तुलना करके भगवान् कहते हैं कि जो ज्ञानी भक्त मुझसे नित्ययुक्त है और आत्मस्वरूप के साथ जिसकी अनन्य भक्ति है वह सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि आत्मतत्त्व से भिन्न किसी अन्य विषय में उसका मन विचरण नहीं करता है। जब तक साधक को अपने ध्येय का स्वरूप निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता है तब तक मन की एकाग्रता भी प्राप्त नहीं की जा सकती है। एक भक्ति का अर्थ है साधक के मन में आत्मसाक्षात्कार की ही एक वृत्ति बनी रहना।एक भक्ति को पाने के लिए साधक को अपने मन की विषयाभिमुखी प्रवृत्तियों को विषय से निवृत्त करना आवश्यक होता है। ज्ञानी व्यक्ति किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए नहीं वरन् अपने मन की उन प्रवृत्तियों को नष्ट करने के लिए ईश्वर का आह्वान करता है जिसके कारण उसके मन की शक्ति का जगत् के मिथ्या आकर्षणों में व्यर्थ अपव्यय होता है। अत स्वाभाविक है कि आत्मस्वरूप में स्थित भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञानी पुरुष को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिसके मन में आत्मानुभूति के अतिरिक्त अन्य कोई कामना ही नहीं रहती।ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ। प्रेम का मापदण्ड है प्रियतम के साथ हुआ तादात्म्य। वास्तव में आत्मसमर्पण की धुन पर ही प्रेम का गीत गाया जाता है। निस्वार्थता प्रेम का आधार है। प्रेम की मांग है समस्त कालों एवं परिस्थितियों में बिना किसी प्रतिदान की आशा के सर्वस्व दान। प्रेम के इस स्वरूप को समझने पर ही ज्ञात होगा कि ज्ञानी भक्त का प्रेम ही वास्तविक शुद्ध और पूर्ण प्रेम होता है।एकपक्षीय प्रेम की परिसमाप्ति कभी पूर्णत्व में नहीं हो सकती। यहाँ भगवान् स्पष्ट कहते हैं ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और मुझे वह अत्यन्त प्रिय है। इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है। प्रेम का यह सनातन नियम है कि वह निष्काम होने पर न केवल पूर्णता को प्राप्त होता है वरन् उसमें एक दुष्ट को भी आदर्श बनाने की विचित्र सार्मथ्य होती है।यह एक सुविचारित एवं सुविदित तथ्य है कि यदि किसी व्यक्ति का मन किसी एक विशेष भावना जैसे दुख द्वेष मत्सर करुणा से भर जाता है तो उसके समीपस्थ लोगों के मन पर भी उस तीव्र भावना का प्रभाव पड़ता है। अत यदि हम किसी को निस्वार्थ शुद्ध प्रेम दे सकें तो हमारे दुष्ट शत्रु का भी हृदय परिवर्तित हो सकता है। यह नियम है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य भगवान् के इस कथन में स्पष्ट होता है कि ज्ञानी को मैं और मुझे ज्ञानी अत्यन्त प्रिय है।तब क्या आर्तादि भक्त भगवान् वासुदेव को प्रिय नहीं है ऐसी बात नहीं फिर क्या कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.17।।तेभ्यो ज्ञानिनः श्रैष्ठ्यमाह। तेषां चतुर्णा मध्ये ज्ञानी विशिष्यते आधिक्यं प्राप्नोति। यतस्तत्त्ववित्त्वान्नित्ययुक्तः कदापि मद्भजनं न त्यजति। यतएकमेवाद्वितीयं ब्रह्मतत्त्वमसि इत्यादि श्रुत्या निर्णीते प्रत्यगभिन्ने मयि भगवति वासुदेवे भक्तिर्वृत्तिसंततिरुपा यस्य सः। प्रेमास्पदे वस्तुनि भक्तिर्भवति प्रेमास्पदश्च श्रुत्या लोकप्रसिद्य्धा चात्मा। हि यस्मादहं ज्ञानिन आत्मस्वादत्यर्थं अत्यन्तं प्रियः। स च ज्ञानी मम वासुदेवस्यात्मैवातो ममात्यन्तं प्रियः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.17।।चतुर्विधानामपि सुकृतित्वे नियतेऽपि सुकृताधिक्येन निष्कामतया प्रेमाधिक्यात् चतुर्विधानां तेषां मध्ये ज्ञानीतत्त्वज्ञानवान्निवृत्तसर्वकामो विशिष्यते सर्वतोऽतिरिच्यते। सर्वोत्कृष्ट इत्यर्थः। यतो नित्ययुक्तो भगवति प्रत्यगभिन्ने सदा समाहितचेता विक्षेपकाभावात्। अतएवैकभक्तिरेकस्मिन्भगवत्येव भक्तिरनुरक्तिर्यस्य स तथा तस्यानुरक्तिविषयान्तराभावात्। हि यस्मात् प्रियो निरुपाधिप्रेमास्पदमत्यर्थमत्यन्तमतिशयेन ज्ञानिनोऽहं प्रत्यगभिन्नः परमात्मा सच तस्मादत्यर्थं मम परमेश्ववरस्य प्रियः। आत्मा प्रियोऽतिशयेन भवतीति श्रुतिलोकयोः प्रसिद्धमेवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.17।।किं सर्वेऽपि समा एते सुकृतिन इति साधारण्येन विशेषणादत आह तेषामिति। तेषां मध्ये ज्ञानी विशिष्यते। यतो नित्ययुक्तः। आर्तादयो हि कामिनः कामपूर्तौ न मद्भजने युक्ता भवन्ति अयंतु नित्ययुक्त एकभक्तिश्चैकभावेन भजनं करोति। तथाहि आर्ता रोगिणः सूर्यं भजन्ते जिज्ञासवः सरस्वतीं अर्थार्थिनः कुबेरादीनिति तेषां तत्तत्कामार्थित्वेनानेकभक्तित्वं दृश्यते। तस्य नित्ययुक्तत्वे एकभक्तित्वे च हेतुः हि यतः ज्ञानिनोऽहमत्यर्थं प्रियः आत्मत्वादेव। आत्मा च प्रियः निरुपाधिप्रेमगोचरत्वात्तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मादान्तरो यदयमात्मा इति श्रुतेश्च। सच ज्ञानी मम प्रियो भक्तानां दुर्लभत्वादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.17।।एवं चतुर्विधानुक्चैतेषु ज्ञानी

Chapter 7 (Part 12)

मोक्षार्थं भजनकर्त्ता उत्तम इत्याह तेषामिति। तेषां पूर्वोक्तचतुर्विधानां मध्ये ज्ञानी नित्ययुक्तः नित्यं मया युक्त इत्यर्थः। एतेभ्यश्चतुर्विधेभ्योऽपि एकभक्तिरनन्यत्वेनैकान्तभजनकृत् दासवत् स विशिष्यते उत्तमत्वेनेत्यर्थः। तस्य विशेष्यधर्ममाह प्रिय इति। हीति निश्चयेन ज्ञानिनः सकाशात् अत्यर्थं सर्वभावे अहमेव तस्य प्रियः। अतएव श्रीभागवते भगवद्वाक्यंमदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.17।।एतेषां मध्ये ज्ञानी श्रेष्ठ इत्याह तेषामिति। तेषां मध्ये ज्ञानी विशिष्टः। तत्र हेतवः नित्ययुक्तः। सदा मन्निष्ठः एकस्मिन्मय्येव भक्तिर्यस्य सः। ज्ञानिनो देहाद्यभिमानाभावेन चित्तविक्षेपाभावान्नित्ययुक्तत्वमेकान्तभक्तित्वं च संभवति नान्यस्य। अतएव हि तस्याहमत्यन्तं प्रियः स च मम। तस्मादेतैर्नित्ययुक्तत्वादिभिश्चतुर्भिर्हेतुभिः स उत्तम इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.17।।एतेषां मध्ये मुमुक्षुः मम ज्ञानी श्रेष्ठो मत इत्याह तेषां ज्ञानीति। नित्यं योग उक्तलक्षणस्तद्वान् नित्ययुक्तः। तादृशश्च मदीयमहिमज्ञानवान् तथा मय्येव पुरुषोत्तमे परमात्मनि विभावेकस्मिन् एका निरपेक्षा भक्तिर्यस्य। इतरेषां तु स्वाभिलषिते तत्साधकत्वेन वा मयि वेत्यत एव स विशिष्टो भवति। न केवलं स विशिष्टः किन्तु प्रियः परस्परमित्याह प्रियो हीति। अहं ज्ञानिनोऽत्यर्थं प्रियः प्रेमविषयः स च ममेति भजनात्ज्ञानी चेद्भजते कृष्णं तस्मान्नास्त्यधिकः परः इति निबन्धवाक्यात्। सर्वेषां ममताविषयाणां मध्ये स्वात्मा प्रियः आनन्दरूपत्वात् स आत्मा परमानन्दपरमात्मांशत्वादित्यर्थः। परमात्मनि प्रियत्वम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.17।।उन चार प्रकारके भक्तोंमें जो ज्ञानी है अर्थात् यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है वह तत्त्ववेत्ता होनेके कारण सदा मुझमें स्थित है और उसकी दृष्टिमें अन्य किसी भजनेयोग्य वस्तुका अस्तित्व न रहनेके कारण वह केवल एक मुझ परमात्मामें ही अनन्य भक्तिवाला होता है। इसलिये वह अनन्य प्रेमी ( ज्ञानी भक्त ) श्रेष्ठ माना जाता है। ( अन्य तीनोंकी अपेक्षा ) अधिक उच्च कोटिका समझा जाता है। क्योंकि मैं ज्ञानीका आत्मा हूँ इसलिये उसको अत्यन्त प्रिय हूँ। संसारमें यह प्रसिद्ध ही है कि आत्मा ही प्रिय होता है। इसलिये ज्ञानीका आत्मा होनेके कारण भगवान् वासुदेव उसे अत्यन्त प्रिय होता है। यह अभिप्राय है। तथा वह ज्ञानी भी मुझ वासुदेवका आत्मा ही है अतः वह मेरा अत्यन्त प्रिय है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.17।। व्याख्या  तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः उन (अर्थार्थी आर्त जिज्ञासु और ज्ञानी) भक्तोंमें ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है क्योंकि वह नित्ययुक्त है अर्थात् वह सदासर्वदा केवल भगवान्में ही लगा रहता है। भगवान्के सिवाय दूसरे किसीमें वह किञ्चिन्मात्र भी नहीं लगता। जैसे गोपियाँ गाय दुहते दही बिलोते धान कूटते आदि सभी लौकिक कार्य करते हुए भी भगवान् श्रीकृष्णमें चित्तवाली रहती हैं (टिप्पणी प0 420.2) ऐसे ही वह ज्ञानी भक्त लौकिक और पारमार्थिक सब क्रियाएँ करते समय सदासर्वदा भगवान्से जुड़ा रहता है। भगवान्का सम्बन्ध रखते हुए ही उसकी सब क्रियाएँ होती हैं।एकभक्तिर्विशिष्यते उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तका आकर्षण केवल भगवान्में होता है। उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं रहती। इसलिये वह श्रेष्ठ है।अर्थार्थी आदि भक्तोंमें पूर्वसंस्कारोंके कारण जबतक व्यक्तिगत इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं तबतक उनकी एकभक्ति नहीं होती अर्थात् केवल भगवान्में प्रेम नहीं होता। परन्तु उन भक्तोंमें इन इच्छाओंको नष्ट करनेका भाव भी होता रहता है और इच्छाओंके सर्वथा नष्ट होनेपर सभी भक्त भगवान्के प्रेमी और भगवान्के प्रेमास्पद हो जाते हैं। वहाँ भक्त और भगवान्में द्वैतका भाव न रहकर प्रेमाद्वैत (प्रेममें अद्वैत) हो जाता है।ऐसे तो चारों भक्त भगवान्में नित्यनिरन्तर लगे रहते हैं परन्तु तीन भक्तोंके भीतरमें कुछनकुछ व्यक्तिगत इच्छा रहती है जैसे अर्थार्थी भक्त अनुकूलताकी इच्छा करते हैं आर्त भक्त प्रतिकूलताको मिटानेकी इच्छा करते हैं और जिज्ञासु भक्त अपने स्वरूपको या भगवत्तत्त्वको जाननेकी इच्छा करते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती अतः वह एकभक्ति है।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः उस ज्ञानी प्रेमी भक्तको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ। उसमें अपनी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा नहीं है केवल मेरेमें प्रेम है। इसलिये वह मेरेको अत्यन्त प्यारा है।वास्तवमें तो भगवान्का अंश होनेसे सभी जीव स्वाभाविक ही भगवान्को प्यारे हैं। भगवान्के प्यारमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है। जैसे माता अपने बच्चोंका पालन करती है ऐसे ही भगवान् बिना किसी कारणके सबका पालनपोषण और प्रबन्ध करते हैं। परन्तु जो मनुष्य किसी कारणसे भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं उनकी उस सम्मुखताके कारण भगवान्में उनके प्रति एक विशेष प्रियता हो जाती है।जब भक्त सर्वथा निष्काम हो जाता है अर्थात् उसमें लौकिकपारलौकिक किसी तरहकी भी इच्छा नहीं रहती तब उसमें स्वतःसिद्ध प्रेम पूर्णरूपसे जाग्रत् हो जाता है। पूर्णरूपसे जाग्रत् होनेका अर्थ है कि प्रेममें किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं रहती। प्रेम कभी समाप्त भी नहीं होता क्योंकि वह अनन्त और प्रतिक्षण वर्धमान है। प्रतिक्षण वर्धमानका तात्पर्य है कि प्रेममें प्रतिक्षण अलौकिक विलक्षणताका अनुभव होता रहता है अर्थात्इधर पहले दृष्टि गयी ही नहीं इधर हमारा खयाल गया ही नहीं अभी दृष्टि गयी इस तरह प्रतिक्षण भाव और अनुभव होता ही रहता है। इसलिये प्रेमको अनन्त बताया गया है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना अत्यन्त प्यारा बताया तो इससे यह असर पड़ता है कि भगवान्ने दूसरे भक्तोंका आदर नहीं किया। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.16 7.19।।चतुर्विधा इत्यादि सुदुर्लभ इत्यन्तम्। ये तु मां भजन्ते ते सुकृतिनः। ते च चत्वारः। सर्वे चैते उदाराः। यतः अन्ये कृपणबुद्धयः आर्त्तिनिवारणम् अर्थादि च तुल्यपाणिपादोदरशरीरसत्त्वेभ्योऽधिकतरं वा आत्मन्यूनेभ्यो मार्गयन्ते। ज्ञान्यपेक्षया तु ते न्यूनसत्त्वाः यतः तेषां तावत्यपि भेदोऽस्ति भगवतः इदमहमभिलष्यामि इति भेदस्य स्फुटप्रतिभासात्। ज्ञानी तु मामेवाभेदतया अवलम्बते इति (S omits इति) ततोऽहमभिन्न एव। तस्य च अहमेव प्रियः न तु फलम्। अत एव स वासुदेव एव सर्वम् इत्येव (S वासुदेवः सर्वमेवम्) दृढप्रतिपत्तिपवित्रीकृतहृदयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.17।।चतुर्विधानां तेषां सुकृतिनां भगवदभिमुखानां तुल्यत्वमाशङ्क्याह तेषामिति। तस्य विशिष्यमाणत्वे हेतुमाह प्रियो हीति। नित्ययुक्तत्वं भगवत्यात्मनि सदा समाहितचेतस्त्वम् असारे संसारे भगवानेव सारः सोऽहमस्मीत्येकस्मिन्नद्वितीये स्वस्मादत्यन्तमभिन्ने भगवति भक्तिः स्नेहविशेषोऽस्येत्येकभक्तिः। तस्याधिक्ये हेतुं विवृणोति प्रियो हीत्यादिना। भगवतो ज्ञानिनश्च परस्परं प्रेमास्पदत्वे प्रसिद्धिं प्रमाणयति प्रसिद्धं हीति। आत्मनो ज्ञानिनं प्रति प्रियत्वेऽपि भगवतो वासुदेवस्य कथं तं प्रति प्रियत्वमित्याशङ्क्याह तस्मादिति। अहं ज्ञानिनो निरुपाधिकप्रेमास्पदं परमपुरुषार्थत्वेनात्मत्वेन च गृहीतत्वादित्यर्थः। ज्ञानिनोऽपि भगवन्तं प्रति प्रियत्वं प्रकटयति स चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.17।।एका भक्तिर्यस्येति विग्रहे भक्तिशब्दस्य प्रियादित्वात्तस्मिन्परतः पूर्वपदस्य पुंवद्भावो न सिध्यतीत्यालोच्याह एकस्मिन्नेवेति।अस्य इत्यध्याहार्यम्। तथापि वैयधिकरण्यात् बहुव्रीहिर्न सिद्ध्यतीति चेत् न आगमसिद्धत्वाच्चेत्याह तच्चेति। यस्येत्युपस्कर्तव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.17।।एकस्मिन्नेव भक्तिरित्येकभक्तिः। तच्चोक्तं गारुडे मय्येव भक्तिर्नान्यत्र एकभक्तिः स उच्यते इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.17।।तेषां ज्ञानी विशिष्यते कुतः नित्ययुक्त एकभक्तिः इति च। तस्य हि मदेकप्राप्यस्य मया योगो नित्यः। इतरयोस्तु यावत्स्वाभिलषितप्राप्ति मया योगः। तथा ज्ञानिनो मयि एकस्मिन् एव भक्तिः इतरयोः तु स्वाभिलषिते तत्साधनत्वेन मयि च। अतः स एव विशिष्यते।किं च प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम् अहम् अत्र अत्यर्थशब्दो अभिधेयवचनः ज्ञानिनः अहं यथा प्रियः तथा मया सर्वज्ञेन सर्वशक्तिना अपि अभिधातुं न शक्यते इत्यर्थः प्रियत्वस्य इयत्तारहितत्वात्। यथा ज्ञानिनाम् अग्रेसरस्य प्रह्लादस्य स त्वासक्तमतिः कृष्णे देश्यमानो महोरगैः। न विवेदात्मनो गात्रं तत्स्मृत्याह्लादसंस्थितः (वि0 पु0 1।17।39) इति सः अपि तथा एव मम प्रियः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.17।। तेषां चतुर्णां मध्ये ज्ञानी तत्त्ववित् तत्त्ववित्त्वात् नित्ययुक्तः भवति एकभक्तिश्च अन्यस्य भजनीयस्य अदर्शनात् अतः स एकभक्तिः विशिष्यते विशेषम् आधिक्यम् आपद्यते अतिरिच्यते इत्यर्थः। प्रियो हि यस्मात् अहम् आत्मा ज्ञानिनः अतः तस्य अहम् अत्यर्थं प्रियः प्रसिद्धं हि लोके आत्मा प्रियो भवति इति। तस्मात् ज्ञानिनः आत्मत्वात् वासुदेवः प्रियो भवतीत्यर्थः। स च ज्ञानी मम वासुदेवस्य आत्मैवेति मम अत्यर्थं प्रियः।। न तर्हि आर्तादयः त्रयः वासुदेवस्य प्रियाः न किं तर्हि

───────────────────

【 Verse 7.18 】

▸ Sanskrit Sloka: उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् | आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ||

▸ Transliteration: udārāḥ sarva evaite jñānītvātmaiva me matam | āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṃ gatim ||

▸ Glossary: udārāḥ: noble; sarve: all; eva: certainly; ete: these; jñānī: one who is in knowl- edge; tu: but; ātmā eva: just like Myself; me: My; mataṃ: opinion; āsthitaḥ: situated; saḥ: he; hi: certainly; yuktātmā: engaged in devotional service; māṃ: unto Me; eva: certainly; anuttamāṃ: the highest goal; gatiṃ: destination

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.18 All these devotees are indeed noble; one who knows Me, dwells in Me. Being engaged in My mission, he attains Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.18।।पहले कहे हुए सबकेसब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.18।। (यद्यपि) ये सब उत्कृष्ट हैं परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.18 उदाराः noble? सर्वे all? एव surely? एते these? ज्ञानी the wise? तु but? आत्मा Self? एव very? मे My? मतम् opinion? आस्थितः is established? सः he? हि verily? युक्तात्मा steadfastminded? माम् Me? एव verily? अनुत्तमाम्,the supreme? गतिम् goal.Commentary Are not the other three kinds of devotees dear to the Lord They are. They are all noble souls. But the wise man is exceedingly dear because he has a steady mind he has fixed his mind on Brahman. He does not want any worldly object? but only the Supreme Being. He seeks Brahman alone as the supreme goal. He practises Ahamgraha Upasana (meditation on the Self as the all). He tries to realise that he is identical with the Supreme Self. Therefore I regard a wise man as My very Self. (Cf.II.49)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.18. All these are noble persons, indeed. But the man of wisdom is considered as the very Soul of [Mine]. For, with his self (mind) that has mastered the Yoga, he has resorted to nothing but Me as his most supreme goal.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.18 Noble-minded are they all, but the wise man I hold as my own Self; for he, remaining always at peace with Me, makes me his final goal.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.18 All these are indeed generous (udarah), but I deem the man of knowledge to be My very self; for he, integrated, is devoted to Me alone as the highest end.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.18 All of these, indeed, are noble, but the man of Knowledge is the very Self. (This is) My opinion. For, with a steadfast mind, he is set on the path leading to Me alone who am the super-excellent Goal.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.18 Noble indeed are all these; but I deem the wise man as My very Self; for, steadfast in mind he is established in Me alone as the supreme goal.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.18 See Comment under 7.19

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.18 Because they worship Me alone, all these are generous i.e., benefactors. For, those who receive from Me anything, however small they are, I consider them as contributing everything to Me (and thus as benefactors). But I deem the man of knowledge to be My very self. I consider Myself as depending on him for My support. Why is it so? Because this person considers Me to be the highest and finds it impossible to support himself without Me; I also find it impossible to be without him. Thus, verily, he is My self.

The attainment of this state of mind reires innumerable auspicious births. It is attained after gaining the knowledge of the real nature of the self and the self feels that Its happiness consists in being a dependant (Sesa) of Myself.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.18 Sarve, ete, all of these three, without exception; are eva, indeed, udarah, noble, i.e.; they are verily dear to Me. For, no devotee of Mine can become disagreeable to Me who am Vasudeva. But the man of Knowledge becomes very much dear. This is the difference. Why is this so? In answer the Lord says: Tu but; jnani, the man of Knowledge; is atma eva, the very Self, not different from Me. This is me, My; matam, opinion, conviction. Hi, for; yuktatma, with a steadfast mind-having his mind absorbed in the idea, 'I am verily Vasudeva, the Lord, and none else', that man of Knowledge asthitah, is set on the path leading to, he is engaged in ascending to, going to; mam eva, Me alone, to the supreme Brahman; who am the anuttamam gatim, super-excellent Goal to be reached. The man of Knowledge is being eulogized again:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.18।। विशाल हृदय के भक्तानुग्रहकारक भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि जो कोई भी भक्त मेरी भक्ति करता है वह अन्य जनों की अपेक्षा उत्कृष्ट ही है फिर चाहे वह अपने कष्ट निवारणार्थ मेरा भक्त हो अथवा वह अर्थार्थी हो। किसानकिसी प्रकार से वह मुझ अनन्तस्वरूप की ओर ही अग्रसर हो रहा होता है। अत वह उत्कृष्ट है। तथापि इन चतुर्विध भक्तों में ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है।हम सब जानते हैं कि किसी मन्त्री का मित्र होना और स्वयं ही मन्त्री बनना इन दोनों में बहुत अन्तर है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन्त्री की मित्रता प्राप्त होने मात्र से भी मनुष्य को समाज में एक विशेष प्रभावपूर्ण स्थान प्राप्त होता है परन्तु मन्त्री पद की समस्त गरिमा एवं अधिकार तो स्वयं मन्त्री बनने पर ही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार किसी फल विशेष के लिए ईश्वर की आराधना करना उसका आह्वान करना निश्चय ही एक दैवी गुण है किन्तु ज्ञानी पुरुष निष्काम होकर मन और बुद्धि के अतीत अपने परमात्मस्वरूप को पहचान कर परिच्छिन्न अहंकार को ही समाप्त कर देता है और परमात्मा के साथ वह एकत्वभाव को प्राप्त हो जाता है।तत्पश्चात् ऐसा ज्ञानी पुरुष सदा आत्मस्वरूप में ही स्थित होता है। इसलिए अन्य भक्तों की तुलना में ज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ है यह श्रीकृष्ण का मत है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.18।। तर्हि किमार्तादयस्तवाप्रियाः न आत्मत्वेनात्यर्थमिति विशेषणादित्याह उदारा इति। उदाराः सर्व एते त्रयोऽप्यन्यभ्य आर्तादिभ्यः। आर्त्यादिनिवृत्त्यर्थमितरदेवतादिभक्तेभ्य उत्कृष्टाः मम प्रिया एवेत्यर्थः। नहि कश्चिदार्तो वा जिज्ञासुर्वाऽर्थार्थी आर्तादिभ्यः। आर्त्यादिनिवृत्त्यर्थमितरदेवतादिभक्तेभ्य उत्कृष्टाः मम प्रिया एवेत्यर्थः। नहि कश्चिदार्थो वा जिज्ञासुर्वाऽर्थार्थी वा मद्भक्तो मम वासुदेवस्याप्रियो भवति। परंतुये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाभ्यहम् इत्युक्तत्वात् यो यदर्थ मां भजति तमहमपि तत्फलदानेन भजामि। यस्तु निष्कामी प्रेमातिशयेन मां भजति तमहमपि तथैव भजाम्यतो ज्ञानी इत्यर्थं प्रियो भवतीति विशेषः। तत्कुत इति तत्राह। ज्ञानी तु ममात्मैव नान्यो यत इति मे मतं निश्चयः।ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। तुशब्दस्तेभ्यो विशेषद्योतनार्थः। ज्ञानी त्वात्मैवेत्यत्र हेतुमाह आस्थित इति। हि यस्मात्स ज्ञानी अहमेव भगवान्वासुदेवो नान्योऽहमस्मीत्येवं युक्तः समाहित आत्मा चित्तं यस्य सः मामेव परं ब्रह्मानुत्तमां गतिं निरतिशयं गन्तव्यं गन्तुं प्रवृत्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.18।।तत्किमार्तादयस्तव न प्रियाः न अत्यर्थमिति विशेषणादित्याह एते आर्तादयः सकामा अपि मद्भक्ताः सर्वे त्रयोऽप्युदारा एव उत्कृष्टा एव पूर्वजन्मार्जितानेकसुकृतराशित्वात्। अन्यथा हि मां न भजेयुरेव। आर्तस्य जिज्ञासोरर्थार्थिनश्च मद्विमुखस्य क्षुद्रदेवताभक्तस्यापि बहुलमुपलम्भात्। अतो मम प्रिया एव ते। नहि ज्ञानवानज्ञो वा कश्चिदपि भक्तो ममाप्रियो भवति किंतु यस्य यादृशी मयि प्रीतिर्ममापि तत्र तादृशी प्रीतिरिति स्वभावसिद्धमेवैतत्। तत्र सकामानां त्रयाणां काम्यमानमपि प्रियमहमपि प्रियः। ज्ञानिनस्तु प्रियान्तरशून्यस्याहमेव निरतिशयप्रीतिविषयः। अतः सोऽपि मम निरतिशयप्रीतिविषय इति विशेषः। अन्यथा हि मम कृतज्ञता न स्यात् कृतघ्नता च स्यात्। अतएवात्यर्थमिति विशेषणमुपात्तं प्राक्। तथा हियदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति इत्यत्र तरबर्थस्य विवक्षितत्वाद्विद्यादिव्यतिरेकेण कृतमपि कर्म वीर्यवद्भवत्येव तथात्यर्थं ज्ञानी भक्तो मम प्रिय इत्युक्तेर्योज्ञानव्यतिरेकेण भक्तः सोऽपि प्रिय इति पर्यवस्यत्येव अत्यर्थमिति विशेषणस्य विवक्षितत्वात्। उक्तंहिये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् इति। अतो मामात्मत्वेन ज्ञानवाञ्ज्ञानी आत्मैव न मत्तो भिन्नः किं त्वहमेव स इति मम मतं निश्चयः। तुशब्दः सकामभेददर्शित्रितयापेक्षया निष्कामत्वभेदादर्शित्वविशेषद्योतनार्थः। हि यस्मात्स ज्ञानी युक्तात्मा सदा मयि समाहितचित्तः सन् मां भगवन्तमनन्तमानन्दघनमात्मानमेवानुत्तमां सर्वोत्कृष्टां गतिं गन्तव्यं परमं फलमास्थितोऽङ्गीकृतवान् नतु मद्भिन्नं किमपि फलं स मन्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.18।।उदारा इति। सर्वेऽप्येते उदारा उत्कृष्टा एव। ज्ञानी तु ममात्मैवेति मम मतं निश्चितम्। हि यतः स युक्तात्मा अहमेव भगवान्वासुदेव इत्यभेदेन मयि समाहितचित्तो मामेवानुत्तमां श्रेष्ठां गतिमास्थितो नतु मत्तोऽन्यदारोग्यादिकं कामयमानो मद्भक्तिं करोति। किंतर्हि मत्प्राप्त्यर्थमेव मां भजत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.18।।नन्वेषु चतुर्विधेषु ज्ञानी उत्तम उक्तस्ततोऽपि भक्तस्तदा पूर्वोक्तानां किं फलं इत्यपेक्षायामाह उदारा इति। एते सर्व एव स्वार्थपरित्यागेन मदर्थधर्मादित्रयभजनकर्त्तारः उदाराः मोक्षाधिकारिणः। तु पुनः ज्ञानी आत्मैव मदात्मक एव मुक्त एवेत्यर्थ इति मे मतम्। हीति निश्चयेन। अनन्यमनसा सर्वत्यागेन अनुत्तमां न विद्यते उत्तमा यस्यास्तादृशीं गतिं प्राप्य स्थानं ज्ञात्वा मामेवास्थितः स युक्तात्मा मत्संयोगयुक्तो दास्यादिभावेनेत्यर्थः। स उत्तम इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.18।। तर्हि किमितरे त्रयस्त्वद्भक्ताः संसरन्ति नहि नहीत्याह उदारा इति। सर्वेऽप्येत उदारा महान्तः। मोक्षभाज एवेत्यर्थः। ज्ञानी पुरात्मैवेति मे मतं निश्चयः। हि यस्मात् स ज्ञानी युक्तात्मा मदेकचित्तः सन् न विद्यत उत्तमा यस्यास्तामनुत्तमां सर्वोत्तमां गतिं मामेवास्थित आश्रितवान्। मद्व्यतिरिक्तमन्यत्फलं न मन्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.18।।तर्हि किमितरे त्वद्भक्तास्त्रिविधाः संसृताः इति नहि नहीत्याह उदाराः सर्व इति। एते मद्भक्ताः सर्व एवोदारा देवान्तरोपासकेभ्यो महान्तो वदान्याश्च मत्तो यत्किञ्चित् गृह्णन्ति मम सर्वसमर्पकाः प्रथमं अन्यथा फलसिद्धिर्न स्यात्। परं व्यावहारिकरीत्या तद्भजनं प्राकृतमिति न तत्र प्रियत्वमुक्तम्। संसृतिरपि प्राकृतानामिव न भविष्यति यथा कथञ्चिद्भजनात्। उक्तं च भागवते 1।5।17त्यक्त्वा स्वधम चरणाम्बुजं इत्युपक्रम्ययत्र क्व वाऽभद्रमभूदमुष्य किं को वाऽर्थ आप्तो भजतां स्वधर्मतः इत्यादिनाकामं क्रोधं भयंस्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधते यान्ति तन्मयतां हि ते भाग.10।29।15 इति चान्ते तन्मयत्वफलमननादुदारास्ते। यथाकथञ्चित्कार्यापेक्षयापि भगवत्सम्बन्धिभावे प्रवृत्तिरुचिततरेति सङ्क्षेपः। मम महिमतत्त्वज्ञानी पुनरात्मैवेति मे मतम्। ब्रह्मवादानुरोधि भगवन्मतं वा आस्थितः आश्रितः मामेवानुत्तमां गतिं मुक्तिं फलभूतामास्थितश्च मे मतः। तत्रात्मत्वं मन्ये। तदधीन इत्यर्थसिद्धम्। तत उत्तमः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.18।।तो फिर क्या आर्त आदि तीन प्रकारके भक्त आप वासुदेवके प्रिय नहीं हैं यह बात नहीं तो क्या बात है ये सभी भक्त उदार हैं श्रेष्ठ हैं। अर्थात् वे तीनों भी मेरे प्रिय ही हैं। क्योंकि मुझ वासुदेवको अपना कोई भी भक्त अप्रिय नहीं होता परंतु ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय होता है इतनी विशेषता है। ऐसा क्यों है सो कहते हैं ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है वह मुझसे अन्य नहीं है यह मेरा निश्चय है क्योंकि वह योगारूढ़ होनेके लिये प्रवृत्त हुआ ज्ञानी स्वयं मैं ही भगवान् वासुदेव हूँ दूसरा नहीं ऐसा युक्तात्मा समाहितचित्त होकर मुझ परम प्राप्तव्य गतिस्वरूप परब्रह्ममें ही आनेके लिये प्रवृत्त है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.18।। व्याख्या  उदाराः सर्व एवैते ये सबकेसब भक्त उदार हैं श्रेष्ठ भाववाले हैं। भगवान्ने यहाँ जो उदाराः शब्दका प्रयोग किया है उसमें कई विचित्र भाव हैं जैसे (1) चौथे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि भक्त जिस प्रकार मेरे शरण होते हैं उसी प्रकार मैं उनका भजन करता हूँ। भक्त भगवान्को चाहते हैं और भगवान् भक्तको चाहते हैं। परन्तु इन दोनोंमें पहले भक्तने ही सम्बन्ध जोड़ा है और जो पहले सम्बन्ध जोड़ता है वह उदार होता है। तात्पर्य यह है कि भगवान् सम्बन्ध जोड़ें या न जोड़ें इसकी भक्त परवाह नहीं करता। वह तो अपनी तरफसे पहले सम्बन्ध जोड़ता है और अपनेको समर्पित करता है। इसलिये वह उदार है।(2) देवताओंके भक्त सकामभावसे विधिपूर्वक यज्ञ दान तप आदि कर्म करते हैं तो देवताओंको उनकी कामनाके अनुसार वह चीज देनी ही पड़ती है क्योंकि देवतालोग उनका हितअहित नहीं देखते। परन्तु भगवान्का भक्त अगर भगवान्से कोई चीज माँगता है तो भगवान् अगर उचित समझें तो वह चीज दे देते हैं अर्थात् देनेसे उसकी भक्ति बढ़ती हो तो दे देते हैं और भक्ति न बढ़ती हो संसारमें फँसावट होती हो तो नहीं देते। कारण कि भगवान् परम पिता हैं और परम हितैषी हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपनी कामनाकी पूर्ति हो अथवा न हो तो भी वे भगवान्का ही भजन करते हैं भगवान्के भजनको नहीं छोड़ते यह उनकी उदारता ही है।(3) संसारके भोग और रुपयेपैसे प्रत्यक्ष सुखदायी दीखते हैं और भगवान्के भजनमें प्रत्यक्ष जल्दी सुख नहीं दीखता फिर भी संसारके प्रत्यक्ष सुखको छोड़कर अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करनेकी लालसाको छोड़कर भगवान्का भजन करते हैं यह उनकी उदारता ही है।(4) भगवान्के दरबारमें माँगनेवालोंको भी उदार कहा जाता है यहि दरबार दीनको आदर रीति सदा चलि आई। (विनयपत्रिका 165। 5) अर्थात् कोई कुछ माँगता है कोई धन चाहता है कोई दुःख दूर करना चाहता है ऐसे माँगनेवाले भक्तोंको भी भगवान् उदार कहते हैं यह भगवान्की विशेष उदारता ही है।(5) भक्तोंका लौकिकपारलौकिक कामनापूर्तिके लिये अन्यकी तरफ किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं जाता। वे केवल भगवान्से ही कामनापूर्ति चाहते हैं। भक्तोंका यह अनन्यभाव ही उनकी उदारता है।ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् यहाँ तु पदसे ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी विलक्षणता बतायी है कि दूसरे भक्त तो उदार हैं ही पर ज्ञानीको उदार क्या कहें वह तो मेरा स्वरूप ही है। स्वरूपमें किसी निमित्तसे किसी कारणविशेषसे प्रियता नहीं होती प्रत्युत अपना स्वरूप होनेसे स्वतःस्वाभाविक प्रियता होती है।प्रेममें प्रेमी अपनेआपको प्रेमास्पदपर न्योछावर कर देता है अर्थात् प्रेमी अपनी सत्ता अलग नहीं मानता। ऐसे ही प्रेमास्पद भी स्वयं प्रेमीपर न्योछावर हो जाते हैं। उनको इस प्रेमाद्वैतकी विलक्षण अनुभूति होती है। ज्ञानमार्गका जो अद्वैतभाव है वह नित्यनिरन्तर अखण्डरूपसे शान्त सम रहता है। परन्तु प्रेमका जो अद्वैतभाव है वह एकदूसरेकी अभिन्नताका अनुभव कराता हुआ प्रतिक्षण वर्धमान रहता है। प्रेमका अद्वैतभाव एक होते हुए भी दो हैं और दो होते हुए भी एक है। इसलिये प्रेमतत्त्व अनिर्वचनीय है। शरीरके साथ सर्वथाअभिन्नता (एकता) मानते हुए भी निरन्तर भिन्नता बनी रहती है और भिन्नताका अनुभव होनेपर भी भिन्नता बनी रहती है। इसी तरह प्रेमतत्त्वमें भिन्नता रहते हुए भी अभिन्नता बनी रहती है और अभिन्नताका अनुभव होनेपर भी अभिन्नता बनी रहती है।जैसे नदी समुद्रमें प्रविष्ट होती है तो प्रविष्ट होते ही नदी और समद्रके जलकी एकता हो जाती है। एकता होनेपर भी दोनों तरफसे जलका एक प्रवाह चलता रहता है अर्थात् कभी नदीका समुद्रकी तरफ और कभी समुद्रका नदीकी तरफ एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। ऐसे ही प्रेमीका प्रेमास्पदकी तरफ और प्रेमास्पदका प्रेमीकी तरफ प्रेमका एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। उनका नित्ययोगमें वियोग और वियोगमें नित्ययोग इस प्रकार प्रेमकी एक विलक्षण लीला अनन्तरूपसे अनन्तकालतक चलती रहती है। उसमें कौन प्रेमास्पद है और कौन प्रेमी है इसका खयाल नहीं रहता। वहाँ दोनों ही प्रेमास्पद हैं और दोनों ही प्रेमी हैं। यही ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् पदोंका तात्पर्य है।आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् क्योंकि जिससे उत्तम गति कोई हो ही नहीं सकती ऐसे सर्वोपरि मेरेमें ही उसकी श्रद्धा विश्वास और दृढ़ आस्था है। तात्पर्य है कि उसकी वृत्ति किसी अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको लेकर मेरेसे हटती नहीं प्रत्युत एक मेरेमें ही लगी रहती है।केवल भगवान् ही मेरे हैं इस प्रकार मेरेमें उसका जो अपनापन है उसमें अनुकूलताप्रतिकूलताको लेकर किञ्चिन्मात्र भी फरक नहीं पड़ता प्रत्युत वह अपनापन दृढ़ होता और बढ़ता ही चला जाता है।वह युक्तात्मा है अर्थात् वह किसी भी अवस्थामें मेरेसे अलग नहीं होता प्रत्युत सदा मेरेसे अभिन्न रहता है। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें कहे हुए ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी वास्तविकता और उसके भजनका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.16 7.19।।चतुर्विधा इत्यादि सुदुर्लभ इत्यन्तम्। ये तु मां भजन्ते ते सुकृतिनः। ते च चत्वारः। सर्वे चैते उदाराः। यतः अन्ये कृपणबुद्धयः आर्त्तिनिवारणम् अर्थादि च तुल्यपाणिपादोदरशरीरसत्त्वेभ्योऽधिकतरं वा आत्मन्यूनेभ्यो मार्गयन्ते। ज्ञान्यपेक्षया तु ते न्यूनसत्त्वाः यतः तेषां तावत्यपि भेदोऽस्ति भगवतः इदमहमभिलष्यामि इति भेदस्य स्फुटप्रतिभासात्। ज्ञानी तु मामेवाभेदतया अवलम्बते इति (S omits इति) ततोऽहमभिन्न एव। तस्य च अहमेव प्रियः न तु फलम्। अत एव स वासुदेव एव सर्वम् इत्येव (S वासुदेवः सर्वमेवम्) दृढप्रतिपत्तिपवित्रीकृतहृदयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.18।।ज्ञानी चेदत्यर्थमीश्वरस्य प्रियो भवति तर्हि विशेषणसामर्थ्यादितरेषामप्रियत्वं प्राप्तमिति शङ्कते न तर्हीति। तेषां भगवन्तं प्रति प्रियत्वमत्र विवक्षितमित्याह नेति। अत्यर्थमिति विशेषणस्य तर्हि किं प्रयोजनमिति पृच्छति किं तर्हीति। सर्वेषां भगवदभिमुखत्वादुत्कर्षेऽपि ज्ञानिनि तदतिरेकमङ्गीकृत्य विशेषणमित्याह उदारा इति। किं तत्र प्रमाणमित्याशङ्क्येश्वरज्ञानमित्याह मे मतमिति। ज्ञानी त्वात्मैवेत्यत्र हेतुमाह आस्थित इति। सर्वशब्दस्य ज्ञानिव्यतिरिक्तविषयत्वमाह त्रयोऽपीति। ज्ञानिव्यतिरिक्तानां भगवदभिमुखत्वेऽपि ज्ञानाभावापराधान्न भगवत्प्रीतिविषयतेत्याशङ्क्याह नहीति। कस्तर्हि ज्ञानवति विशेषस्तत्राह ज्ञानी त्विति। तमेव विशेषं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति तत्कस्मादित्यादिना। सर्वमात्मानं पश्यतोऽपि तस्य तव कथं यथोक्तो निश्चयः स्यादित्याशङ्क्यास्थित इत्येतद्व्याकरोति आरोढुमिति। आरोहे हेतुं सूचयति स ज्ञानीति। आरोढुं प्रवृत्तत्वमेव स्फुटयति मामेवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.18।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.18।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.18।।सर्वे एव एते माम् एव उपासते इति उदाराः वदान्याः ये मत्तो यत् किञ्चिद् अपि गृह्णन्ति ते हि मम सर्वस्वदायिनः। ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतं तदायत्तात्मधारणः अहम् इति मन्ये।कस्माद् एवं यस्माद् अयं मया विना आत्मधारणासंभावनया माम् एव अनुत्तमं प्राप्यम् आस्थितः अतः तेन विना मम अपि आत्मधारणं न संभवति ततो मम अपि आत्मा हि सः।न अल्पसंख्यासंख्यातानां पुण्यजन्मनां फलम् इदं यन्मच्छेषतैकरसात्मयाथात्म्यज्ञानपूर्वकं मत्प्रपदनम् अपि तु

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.18।। उदाराः उत्कृष्टाः सर्व एव एते त्रयोऽपि मम प्रिया एवेत्यर्थः। न हि कश्चित् मद्भक्तः मम वासुदेवस्य अप्रियः भवति। ज्ञानी तु अत्यर्थं प्रियो भवतीति विशेषः। तत् कस्मात् इत्यत आह ज्ञानी तु आत्मैव न अन्यो मत्तः इति मे मम मतं निश्चयः। आस्थितः आरोढुं प्रवृत्तः सः ज्ञानी हि यस्मात् अहमेव भगवान् वासुदेवः न अन्योऽस्मि इत्येवं युक्तात्मा समाहितचित्तः सन् मामेव परं ब्रह्म गन्तव्यम् अनुत्तमां गतिं गन्तुं प्रवृत्त इत्यर्थः।।ज्ञानी पुनरपि स्तूयते

───────────────────

【 Verse 7.19 】

▸ Sanskrit Sloka: बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते | वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ||

▸ Transliteration: bahūnāṃ janmanām ante jñānavānmāṃ prapadyate | vāsudevaḥ sarvamiti sa mahātmā sudurlabhaḥ ||

▸ Glossary: bahūnāṃ: many; janmanāṃ: births; ante: after; jñānavān: he possessing knowl- edge; māṃ: unto Me; prapadyate: surrenders; vāsudevaḥ: cause of all causes; sarvaṃ: all; iti: thus; saḥ: such; mahātmā : great soul; sudurlabhaḥ: very rare.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.19 After many births and deaths, he who knows Me surrenders to Me, knowing Me to be the cause of all causes and all that is. Such a great soul is very rare.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.19।।बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें सब कुछ परमात्मा ही है ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.19।। बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि यह सब वासुदेव है ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.19 बहूनाम् of many? जन्मनाम् of births? अन्ते in the end? ज्ञानवान् the wise? माम् to Me? प्रपद्यते approaches? वासुदेवः Vaasudeva? सर्वम् all? इति thus? सः he? महात्मा the great soul? सुदुर्लभः (is) very hard to find.Commentary Vaasudeva is a name of Lord Krishna as He is the son of Vasudeva. He is the allpervading Brahman.The aspirant gradually evolves through Yogic practices? selfless service? devotion and constant meditation in many births and ultimately attains the inner Self. He realises that all is Vaasudeva. It is very difficult to find such a great soul? who has attained to perfection. No one is eal to him. That is the reason why the Lord has said? One in a thousand perchance strives for perfection even among those successful strivers? only one perchance knows Me in essence. (Cf.VII.3.)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.19. At the end of many births, one attains Me with the conviction that 'All is Vasudeva' - that noble Soul is very difficult to get.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.19 After many lives, at last the wise man realises Me as I am. A man so enlightened that he sees God everywhere is very difficult to find.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.19 At the end of many births, the man of knowledge finds refuge in Me, realising that 'Vasudeva is all.' It is very hard to find such a great-souled person.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.19 At the end of many births the man of Knowledge attains Me, (realizing) that Vasudeva is all. Such a high-souled one is very rare.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.19 At the end of many births the wise man comes to Me, realising that all this is Vaasudeva (the innermost Self); such a great soul (Mahatma) is very hard to find.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.16-19 Caturvidhah etc., upto sudurlabhah. Those who worship Me are men of good action. They are of four types. All these are noble ones. For, other persons, mean-minded as they are, beg a cure of their affliction, and money etc., from persons who have hands, feet, stomach, body and intelligence (or bodily strength) that are eal to their (the beggers) own, or even from those who are very much inferior. But, by comparison with the man of wisdom, [the other three under estion] are of inferior intelligence. For, they entertain, at that sage too, a sense of duality. Becuase, a sense of duality 'I seek this from the Bhagavat' is clearly discernible in them. On the other hand, the man of wisdom hangs on Me alone with a sense of identity [of him with Me]. Hence, I am verily indentical with him. It is I alone, and not [any other] gain, that is dear to him. That is why he is having a mind purified by the firm conviction 'All is nothing but Vasudeva'.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.19 Further after passing through innumerable auspicious births, one gets the knowledge: 'I find my sole joy as a Sesa of Vasudeva. I find my essence, existence and activities to be dependent on Him. He is superior over all others on account of His innumerable auspicious attributes.' Conseent to this knowledge he resorts to Me, i.e., meditates on Me, realising, 'Vasudeva alone is my highest end and also the means for attaining it, and whatever other desire remains in the mind, He alone is all that too for me'. Such a great-souled person, i.e., great-minded man is hard to find. It is very hard to find such persons in this world. This is the only meaning of the statement that 'Vasudeva is all,' because of the topic having been begun with the statements: 'For I am very dear to the man of knowledge' (7.17) and 'For he, integrated, is devoted to Me alone as the highest end' (7.18). It is so, also because that Jnanin whose traits are given here, possesses the same alities as the man of knowledge described earlier.

For, it has been said that the two Prakrtis, the animate and the inanimate, have their sole essence in being the Sesa (dependants) of the Supreme Person in the verses beginning with 'Earth, water' (7.4) and ending with, 'Ego-sense, thus My Prakrti is divided eightfold. This is my lower (Prakrti). But know that which is other than this (lower nature) and forms the life-principle to be the higher Prakrti' (7.4-5). Then take the beginning from 'I am the origin and dissolution of the whole universe. There is nothing higher than Myself, O Arjuna' (7.6-7), and ending with, 'Know that all the states of Sattva, Rajas and Tamas are from Me alone. But I am not in them. They are in Me' (7.12). It has been declared in these texts that the two Prakrtis, both in their states of cause and effect, depend upon Him for their essence, existence and activities and that the Supreme Person is superior to everything in all respects. Therefore the knower of this truth alone is here spoken of as a man of knowledge or as one knowing 'All this is Vasudeva.' [The purpose of this explanation is to eliminate any pure monistic slant to this passage.]

Sri Krsna now explains the rarity of finding such a person of knowledge.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.19 Ante, at the end, after the completion; bahunam, of many; janmanam, births, which becme the repository for accumulating [Ast. omits this word.-Tr.] the tendencies leading to Knowledge; jnanavan, the man of Knowledge, who has got hiis Knowledge matured; directly prapadyate, attains; mam, Me, Vasudeva, who am the inmost Self; (realizing)-in what way?-iti, that; Vasudeva is sarvam, all. Sah, such a one, who realizes Me [Here Ast. adds the word Narayana.-Tr.] thus as the Self of all; is mahatma, a high-souled one. There is none else who can eal or excel him. Therefore he is su-durlabhah, very rare among thousands of men, as it has been said (in verse 3). The reason why one does not realize that all this is verily Vasudeva, the Self, is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.19।। सर्वोच्च ज्ञान को प्राप्त हुए श्रेष्ठ महात्मा पुरुष जगत् में विरले ही होते हैं यह भगवान् श्रीकृष्ण का कथन है। हिन्दू धर्म के पतन काल में इस प्रकार के कथन को अत्यन्त निराशावादी माना जाने लगा। परन्तु थोड़े विचार से ही इस प्रकार के निष्कर्ष का दोष स्पष्ट हो जायेगा। सृष्टि में समस्त चेतन जीवों की तुलना में मानव की संख्या अत्यन्त कम अनुपात में है। मनुष्यजाति में भी सभी परिपक्व बुद्धि एवं उच्च भावनाओं से सम्पन्न नहीं होते हैं।अन्तकरण के श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न होने पर भी बहुत कम लोग हैं जो गम्भीरतापूर्वक शास्त्राध्ययन करते हैं और शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान को अपने जीवन में जीने वालों की संख्या तो नगण्य ही होती है। अनेक लोगों को केवल बौद्धिक ज्ञान से ही सन्तोष हो जाता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विकास के चरम लक्ष्य आत्मानुभूति तक पहुँचने वाले ज्ञानी पुरुष विरले ही होंगे।डार्विन के समान प्राचीन काल में ऋषियों ने सभी प्राणियों का निरीक्षण करके यह पाया कि प्राणी का अपने निम्न स्तर से उच्च स्तर तक का विकास होने के लिए दीर्घकालावधि की अपेक्षा होती है जिसमें विभिन्न परिस्थितियों एवं जन्मों से गुजरते हुए वह विकास के श्रेष्ठतर रूप को प्राप्त करता है। यह कालावधि करोड़ों वर्ष की हो सकती है। इससे हम कल्पना कर सकते हैं कि अहंकार को हटाकर अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा प्राप्त हो सकने वाले विकास के सर्वोच्च लक्ष्य सम्पूर्ण आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए कितने जन्मों की तपस्या होनी चाहिए। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम इसी वर्तमान जन्म में ही जीवन के इस सर्वोच्च लक्ष्य ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते। गीता का कथन निराशाजनक नहीं वरन् उत्साहवर्धक है। यहाँ बताये गये असंख्य जन्म ज्ञान प्राप्ति के पूर्व के हैं पश्चात् के नहीं। यदि मनुष्य अपने जीवन की अनेक उपलब्धियों से भी असन्तुष्ट होकर जीवन का वास्तविक लक्ष्य जानने का प्रयत्न करता है तो यह स्वयं ही विकास की एक अवस्था है। तत्पश्चात् शास्त्रों के अध्ययन में उसकी प्रवृत्ति हो और तत्प्रतिपादित सिद्धांतों को ग्रहण करने की सार्मथ्य हो तो स्पष्ट है कि वह आत्मदेव के मन्दिर के द्वार तक पहुँच गया है। अत और अधिक लगन से प्रयत्न करने पर इसी जन्म में वह मानव जन्म के परम पुरुषार्थ आत्मसंस्थिति को प्राप्त हो सकता है। साधक को साधना में अग्रसर होने के लिए उत्साहित करना ही भगवान् के उक्त कथन का एक मात्र प्रयोजन है।यह सब आत्मा या वासुदेव ही है इस ज्ञान को प्राप्त न करने का कारण वे अगले श्लोक में बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.19।।ज्ञानी अतिदुर्लभ इति पुनरपि तं स्तौति। बहूनां ज्ञानार्थ पुण्यसंस्काराश्रयणामन्ते सर्वपुण्यसंस्कारपरिपाकरुपे चरमजन्मनि लब्धपरिपाकज्ञानो मां वासुदेवं प्रत्यगात्मनं प्रपद्यते। कथं प्रपद्यत आह। वासुदेवः सर्वमिति। यदिदं सर्वं चराचरात्मकं भ्रान्त्या भाति तत्सर्वं किमपि वासुदेवातिरिक्तं न भवतिवाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यंतदनन्त्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इत्यादिश्रुतिसूत्रेभ्यः सर्वाधिष्टानं मां ज्ञात्वा मामेव परमात्मानं निरतिशयनिरुपाधिप्रेमविषयत्वेन भजति स महात्मा न तत्समोऽभ्यधिको वान्योऽस्तीत्यर्थः। अतः सुदुर्लभः अतिशयेन दुर्लभः। तदुक्तंमनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.19।।यस्मादेवं तस्मात् बहूनां जन्मनां किंचित्किंचित्पुण्योपचयहेतूनामन्ते चरमे जन्मनि सर्वसुकृतविपाकरूपे वासुदेवः सर्वमिति ज्ञानवान्सन्मां निरुपाधिप्रेमास्पदं प्रपद्यते सर्वदा समस्तप्रेमविषयत्वेन भजते। सकलमिदमहं च वासुदेव इति दृष्ट्या सर्वप्रेम्णां मय्येव पर्यवसायित्वात्। अतः स एव ज्ञानपूर्वकमद्भक्तिमान्महात्मात्यन्तशुद्धान्तःकरणत्वाज्जीवन्मुक्तः सर्वोत्कृष्टो न तत्समोऽन्योऽस्ति अधिकस्तु नास्त्येव अतः सुदुर्लभो मनुष्याणां सहस्रेषु दुःखेनापि लब्धुमशक्यः अतः स निरतिशयमत्प्रीतिविषय इति युक्तमेवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.19।।किंच वासुदेवः सर्वमिति ज्ञानवान् यो बहूनां जन्मनामन्ते चरमजन्मनि मां प्रपद्यते सम्यग्दर्शनेनापरोक्षीकरोति स महात्मा ब्रह्मभूतः सुदुर्लभ इति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.19।।ये पूर्वोक्तास्ते कथं मोक्षमनुभवन्ति इत्याकाङ्क्षायामाह बहूनामिति। बहूनां जन्मनां धर्मादित्रययुक्तानामन्ते अन्तिमजन्मनि ज्ञानवान् भवति। ततो मां प्रपद्यते मुक्तो भवतीत्यर्थः। यस्तु भक्त उक्तः स तु दुर्लभ इत्याह वासुदेव इति। सर्वमैहिकं पारलौकिकं च वासुदेवः स महात्मा महान् मदर्थमेव अहमेव वा आत्मा तादृशः स दुर्लभोऽप्राप्य इत्यर्थः। यद्वा दुःखेन क्लेशेन भगवानिव लभ्य इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.19।।एवंभूतो मद्भक्तोऽतिदुर्लभ इत्याह बहूनामिति। बहूनां जन्मनां किंचित्किंचित्पुण्योपचयेनान्ते चरमे जन्मनि ज्ञानवान्सन्सर्वमिदं चराचरं वासुदेव एवेति सर्वात्मदृष्ट्या मां प्रपद्यते भजति अतः स महात्माऽपरिच्छिन्नदृष्टिः सुदुर्लभः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.19।।एवम्भूतोऽतिदुर्लभ इत्याह बहूनामिति। आत्मज्ञानं तु कदाचिदेकजन्मन्यपि सिद्धं भवति भगवज्ज्ञानं तु न तथेति ततोऽपि प्रपत्तिभक्तिरतिदुर्लभा सा चेद्भवति स महादुर्लभः। यो बहूनां जन्मनामन्ते चरमजन्मनि पूर्वसुकतसञ्चयेन यत्सन्तुष्टभगवता दत्तं स्वज्ञानं तद्वान् भवति स दुर्लभः। तादृशोऽपि मां पुरुषोत्तमं परमात्मानं प्रपन्नो विज्ञानवानतिदुर्लभः यतो ज्ञानमपि तस्य नात्मैकविषयकं किन्तु भगवत्सर्वविषयकं तदाह वासुदेवः सर्वमिति।कृष्ण एवाखण्डं(ण्डः)सर्वं इत्यभेदज्ञानवान्। तथैतदुक्तं निबन्धे अखण्डाद्वैतभाने तु सर्वं ब्रह्मैव नान्यथा। ज्ञानाद्विकल्पबुद्धिस्तु बाध्यते न स्वरूपतः। भिन्नत्वं नैव युज्येत ब्रह्मोपादानतः क्वचित्। वाचारम्भणमात्रत्वाद्भेदः केनोपजायते इति। अतएव महात्माऽपरिच्छिन्नात्मा एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानवान् स सुदुर्लभःसुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने इति श्रीभागवते षष्ठस्कन्धे () रुद्रोक्तेः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.19।।फिर भी ज्ञानीकी स्तुति करते हैं ज्ञानप्राप्तिके लिये जिनमें संस्कारोंका संग्रह किया जाय ऐसे बहुतसे जन्मोंका अन्तसमाप्ति होनेपर ( अन्तिम जन्ममें ) परिपक्व ज्ञानको प्राप्त हुआ ज्ञानी अन्तरात्मारूप मुझ वासुदेवको सब कुछ वासुदेव ही है इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त होता है। जो इस प्रकार सर्वात्मरूप मुझ परमात्माको प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त हो जाता है वह महात्मा है उसके समान याउससे अधिक और कोई नहीं है अतः कहा है कि हजारों मनुष्योंमें भी ऐसा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है।

▸ Hindi

Chapter 7 (Part 13)

Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.19।। व्याख्या  बहूनां जन्मनामन्ते मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है। भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर देकर उसे जन्ममरणके प्रवाहसे अलग होकर अपनी प्राप्तिका पूरा अधिकार दिया है। परन्तु यह मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके रागके कारण फिर पुराने प्रवाहमें अर्थात् जन्ममरणके चक्करमें चला जाता है। इसलिये भगवान् कहते हैं अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि (गीता 9। 3)। जहाँ भगवान् आसुरी योनियों और नरकोंके अधिकारियोंका वर्णन करते हैं वहाँ दुर्गुणदुराचारोंके कारण भगवत्प्राप्तिकी सम्भावना न दीखनेपर भी भगवान् कहते हैं मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् (गीता 16। 20) अर्थात् मेरेको प्राप्त किये बिना ही ये प्राणी अधम गतिको चले गये अर्थात् वे मरनेके बाद मनुष्ययोनिमें भी चले जाते तो कमसेकम मनुष्य तो रह जाते पर वे मेरी प्राप्तिका पूरा अधिकार प्राप्त करके भी अधम गतिको चले गयेसंतोंकी वाणीमें और शास्त्रोंमें आता है कि मनुष्यजन्म केवल अपना कल्याण करनेके लिये मिला है विषयोंका सुख भोगनेके लिये तथा स्वर्गकी प्राप्तिके लिये नहीं (टिप्पणी प0 422)। इसलिये गीतानें स्वर्गकी प्राप्ति चाहनेवालोंको मूढ़ और तुच्छ बुद्धिवाले कहा है अविपश्चितः (2। 42) और अल्पमेधसाम् (7। 23)।यह मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म भी है और अन्तिम जन्म भी है। सम्पूर्ण जन्मोंका आरम्भ मनुष्यजन्मसे ही होता है अर्थात् मनुष्यजन्ममें किये हुए पाप चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें भोगनेपर भी समाप्त नहीं होते बाकी ही रहते हैं इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म है। मनुष्यजन्ममें सम्पूर्ण पापोंका नाश करके सम्पूर्ण वासनाओंका नाश करके अपना कल्याण कर सकते हैं भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है।भगवान्ने आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि जो मनुष्य अन्तसमयमें जिसजिस भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है उसउस भावको ही वह प्राप्त होता है। इस तरह मनुष्यको जिस किसी भावका स्मरण करनेमें जो स्वतन्त्रता दी गयी है इससे मालूम होता है कि भगवान्ने मनुष्यको पूरा अधिकार दिया है अर्थात् मनुष्यके उद्धारके लिये भगवान्ने अपनी तरफसे यह अन्तिम जन्म दिया है। अब इसके आगे यह नये जन्मकी तैयारी कर ले अथवा अपना उद्धार कर ले इसमें यह सर्वथा स्वतन्त्र है (टिप्पणी प0 423)। इस बातको लेकर गीता मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्तिका अधिकारी मानती है और डंकेकी चोटके साथ खुले शब्दोंमें कहती है कि वर्तमानका दुराचारीसेदुराचारी पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनिमें जन्मा हुआ पापयोनि और चारों वर्णवाले स्त्रीपुरुष ये सभी भगवान्का आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो सकते हैं (गीता 9। 30 33)। गीताने (9। 32 में) ऐसा विचित्र पापयोनि शब्द कहा है जिसमें शूद्रसे भी नीचे कहे और माने जानेवाले चाण्डाल यवन आदि तथा पशुपक्षी कीटपतंग वृक्षलता आदि सभी लिये जा सकते हैं। हाँ यह बात अलग है कि पशुपक्षी आदि मनुष्येतर प्राणियोंमें परमात्माकी तरफ चलनेकी योग्यता नहीं है परन्तु परमात्माके अंश होनेसे उनके लिये परमात्माकी तरफसे मना नहीं है। उनमेंसे बहुतसे प्राणी भगवान् और संतमहापुरुषोंकी कृपासे तथा तीर्थ और भगवद्धामके प्रभावसे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। देवता भोगयोनि हैं वे भोगोंमें ही लगे रहते हैं इसलिये उनको अपना उद्धार करना है ऐसा विचार नहीं होता। परन्तु वे अगर किसी कारणसे भगवान्की तरफ लग जायँ तो उनका भी उद्धार हो जाता है। इन्द्रको भी ज्ञान प्राप्त हुआ था ऐसा शास्त्रोंमें आता है।भगवान्की तरफसे मनुष्यमात्रका जन्म अन्तिम जन्म है। कारण कि भगवान्का यह संकल्प है कि मेरे दिये हुए इस शरीरसे यह अपना कल्याण कर ले। अतः यह अपना कोई संकल्प न रखकर केवल निमित्तमात्र बन जाय तो भगवान्के संकल्पसे इसका कल्याण हो जाय। जैसे ग्यारहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे मया हतांस्त्वं जहि। तू चिन्ता मत कर मा व्यथिष्ठाः। तू युद्ध कर तेरी विजय होगी युध्यस्व जेतासि। इसी तरहसे भगवान्ने कृपा करके मनुष्यशरीर दिया है। अगर मनुष्य भगवान्से विमुख होकर संसारके रागमें न फँसे तो भगवान्के उस संकल्पसे अनायास ही मुक्त हो जाय।भगवान्का संकल्प ऐसा नहीं है कि साधककी इच्छाके बिना उसका कल्याण हो जाय अर्थात् जैसे शाप या वरदान दिया जाता है वैसा यह संकल्प नहीं है। तो फिर कैसा है यह संकल्प भगवान्ने मनुष्यको अपना कल्याण करनेकी स्वतन्त्रता इन मनुष्यजन्ममें दी है। अगर यह प्राणी उस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे अर्थात् भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चले कमसेकम अपने विवेकके विरुद्ध न चले तो उससे भगवान् और शास्त्रोंके अनुकूल चलना स्वाभाविक होगा। कारण कि भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चलनेपर दो अवस्थाओंमेंसे एक अवस्था स्वाभाविक होगी या तो वह शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिसे कुछ नहीं करेगा या केवल भगवान् और शास्त्रके अनुकूल ही करेगा।कुछ नहीं करनेकी अवस्थामें अर्थात् कुछ करनेकी रुचि न रहनेकी अवस्थामें मन बुद्धि इन्द्रियों आदिके साथ सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। कारण कि कुछनकुछ करनेकी इच्छासे ही कर्तृत्वाभिमान उत्पन्न होकर अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और अपने लिये करनेसे फलके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। कुछ भी न करनेसे न कर्तृत्वअभिमान होगा और न फलेच्छा होगी प्रत्युत स्वरूपमें स्वतः स्थिति होगी।शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेकी अवस्थामें करनेका प्रवाह मिट जाता है और क्रिया तथा पदार्थसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। क्रिया और पदार्थसे सम्बन्धविच्छेद होनेसे नयी कामना होगी नहीं और पुराना राग मिट जायगा तो स्वतः बोध हो जायगा तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति (गीता 4। 32)।गीतामें आया है निष्कामभावसे विधिपूर्वक अपने कर्तव्यकर्मका पालन किया जाय तो अनादिकालसे बने हुए सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (4। 23)। ज्ञानयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे तर जाता है (4। 36)। भगवान् भक्तको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर देते हैं (18। 66)। जो भगवान्को अजअनादि जानता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है (10। 3)। इस प्रकार कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग तीनों योगोंसे पाप नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य यह निकला कि अन्तिम मनुष्यजन्म केवल कल्याणके लिये ही मिला है।मनुष्यजन्ममें सत्सङ्ग मिल जाय गीताजैसे ग्रन्थसे परिचय हो जाय भगवन्नामसे परिचय हो जाय तो साधकको यह समझना चाहिये कि भगवान्ने बहुत विशेषतासे कृपा कर दी है अतः अब तो हमारा उद्धार होगा ही अब आगे हमारा जन्ममरण नहीं होगा। कारण कि अगर हमारा उद्धार नहीं होना होता तो ऐसा मौका नहीं मिलता। परन्तु भगवान्की कृपासे उद्धार होगा ही इसके भरोसे साधन नहीं छोड़ना चाहिये प्रत्युत तत्परता और उत्साहपूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। समय सार्थक बने कोई समय खाली न जाय ऐसी सावधानी हरदम रखनी चाहिये। परन्तु अपने कल्याणकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये क्योंकि अबतक जिसने इतना प्रबन्ध किया है वही आगे भी करेगा। जैसे किसीने भोजनके लिये निमन्त्रण दे दिया आसन बिछा दिया आसनपर बैठा दिया पत्तल दे दी लोटेमें जल भरकर पासमें रख दिया। अब कोई चिन्ता करे कि यह व्यक्ति भोजन देगा कि नहीं देगा तो यह बिलकुल गलतीकी बात है। कारण कि अगर भोजन नहीं देना होता तो वह निमन्त्रण क्यों देता भोजनकी तैयारी क्यों करता परन्तु जब उसने निमन्त्रण दिया है बुलाया है तैयारी की है तब उसको भोजन देना ही पड़ेगा। हम भोजनकी चिन्ता क्यों करें अब तो बस ज्योंज्यों भोजनके पदार्थ आयें त्योंत्यों उनको पाते जायँ। ऐसे ही भगवान्ने हमको मनुष्यशरीर दिया है और उद्धारकी सब सामग्री (सत्सङ्ग भगवन्नाम आदि) जुटा दी है तो हमारा उद्धार होगा ही अब तो हम संसारसमुद्रके किनारे आ गये हैं ऐसा दृढ़ विश्वास करके निमित्तमात्र बनकर साधन करना चाहिये।जिसके पूर्वजन्मोंके पुण्य होते हैं वही भगवान्की तरफ चल सकता है अगर ऐसा माना जाय तो पूर्वजन्मोंके पापपुण्योंका फल तो पशुपक्षीकीटपतंग आदि योनिवाले प्राणी भोगते ही हैं फिर मनुष्यमें और उन प्राणियोंमें क्या फरक रहेगा भगवान्का कृपा करके मनुष्यशरीर देना कहाँ सार्थक होगा तथा मनुष्यजन्मकी विलक्षणता महिमा क्या होगी मनुष्यजन्मकी महिमा तो इसीमें है कि मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर अपने कल्याणके मार्गमें लग जाय (टिप्पणी प0 424.1)।वासुदेवः सर्वम् (टिप्पणी प0 424.2) महासर्गके आदिमें एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें हो जाते हैं सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति (छान्दोग्य0 6। 2। 3) और अन्तमें अर्थात् महाप्रलयमें एक भगवान् ही शेष रह जाते हैं शिष्यते शेषसंज्ञः (श्रीमद्भा0 10। 3। 25)। इस प्रकार जब आदि और अन्तमें एक भगवान् ही रहते हैं तब बीचमें दूसरा कहाँसे आया क्योंकि संसारकी रचना करनेमें भगवान्के पास अपने सिवाय कोई सामग्री नहीं थी वे तो स्वयं संसारके रूपसे प्रकट हुए हैं। इसलिये यह सब वासुदेव ही है।जो चीज आदि और अन्तमें होती है वही चीज मध्यमें भी होती है। जैसे सोनेके गहने आदिमें सोना थे और अन्तमें सोना रहेंगे तो गहनोंमें दूसरी चीज कहाँसे आयेगी केवल सोनाहीसोना है। मिट्टीसे बननेवाले बर्तन पहले मिट्टी थे और अन्तमें मिट्टी हो जायँगे तो बीचमें मिट्टीके सिवाय क्या है केवल मिट्टीहीमिट्टी है। खाँड़से बने हुए खिलौने पहले खाँड़ थे और अन्तमें खाँड़ ही हो जायँगे तो बीचमें खाँड़के सिवाय क्या है केवल खाँड़हीखाँड़ है। इसी तरह सृष्टिके पहले भगवान् थे और अन्तमें भगवान् ही रहेंगे तो बीचमें भगवान्के सिवाय क्या है केवल भगवान्हीभगवान् हैं। जैसे सोनेको चाहे गहनोंके रूपमें देखें चाहे पासेके रूपमें देखें चाहे वर्कके रूपमें देखें है वह सोना ही। ऐसे ही संसारमें अनेक रूपोंमें अनेक आकृतियोंमें एक भगवान् ही हैं।जबतक मनुष्यकी दृष्टि गहनोंकी तरफ उसकी आकृतियोंकी तरफ रहती है उसीको महत्त्व देती है तबतक यह सोना ही है इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही जबतक मनुष्यकी दृष्टि संसारकी तरफ रहती है उसीको महत्त्व देती है तबतक सब कुछ भगवान् ही हैं इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। परन्तु जब गहनोंकी तरफ दृष्टि नहीं रहती तब गहनोंमें सोनेकी भावना नहीं होती प्रत्युत यह सोना ही है ऐसी भावना होती है। ऐसे ही जब संसारकी तरफ दृष्टि नहीं रहती तब संसारमें भगवान्की भावना नहीं होती प्रत्युत सब कुछ भगवान् ही हैं भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं ऐसी भावना होती है। कारण कि संसारमें भगवान्की भावना करनेसे संसारकी सत्ता साथमें रहती है अर्थात् संसारकी भावना रखते हुए उसकी सत्ता मानते हुए उसमें भगवान्की भावना करते हैं। अतः जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं संसारको महत्त्व देते हैं तबतक संसारमें भगवान्की भावना करते रहनेपर भी वासुदेवः सर्वम् का अनुभव नहीं होता।ब्रह्मभूत मनुष्य निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है (5। 24) ब्रह्मभूत योगीको उत्तम सुख मिलता है (6। 27) ब्रह्मभूत भगवान्की पराभक्तिको प्राप्त होता है और उस भक्तिसे तत्त्वको जानकर उसमें प्रवेश करता है (18। 54 55) गीताकी दृष्टिसे ये तीनों ही अवस्थाएँ हैं। अवस्थाओंमें परिवर्तन होता है। परन्तु वासुदेवः सर्वम् यह अवस्था नहीं है प्रत्युत वास्तविक तत्त्व है। इसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।यह जो कुछ संसार दीखता है सब भगवान्का ही स्वरूप है। भगवान्के सिवाय इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता थी नहीं है नहीं और कभी होगी भी नहीं। अतः देखने सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है वह सबकासब भगवत्स्वरूप ही है। भगवान्की आज्ञा है मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः।अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा।।(श्रीमद्भा0 11। 13। 24)मनसे वाणीसे दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है वह सब मैं ही हूँ। मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है। यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक समझ लीजिये।इस आज्ञाके अनुसार ही उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमीका जीवन हो जाता है। वह सब जगह भगवान्को ही देखता है यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति (गीता 6। 30)। वह सब कुछ करता हुआ भी भगवान्में ही रहता है सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते (गीता 6। 31)।किसीको एक जगह भी अपनी प्रिय वस्तु मिल जाती है तो उसको बड़ी प्रसन्नता होती है फिर जिसको सब जगह ही अपने प्यारे इष्टदेवका अनुभव होता है (टिप्पणी प0 425) उसकी प्रसन्नताका आनन्दका क्या ठिकाना उस आनन्दमें विभोर होकर भगवान्का प्रेमी भक्त कभी हँसता है कभी रोता है कभी नाचता है और कभी चुप होकर शान्त हो जाता है (टिप्पणी प0 426)। इस तरह उसका जीवन अलौकिक आनन्दसे परिपूर्ण हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी करना जानना और पाना बाकी नहीं रहता। वह सर्वथा पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसके लिये किसी भी अवस्थामें किसी भी परिस्थितिमें कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता।जो भक्तिमार्गपर चलता है वह यह सत् है और यह असत् है इस विवेकको लेकर नहीं चलता। उसमें विवेकज्ञानकी प्रधानता नहीं रहती। उसमें केवल भगवद्भावकी ही प्रधानता रहती है। केवल भगवद्भावकी प्रधानता रहनेके कारण उसके लिये यह सब संसार चिन्मय हो जाता है। उसकी दृष्टिमें जडता रहती हीनहीं। भगवान्में तल्लीनता होनेसे भक्तका शरीर भी जड नहीं रहता प्रत्युत चिन्मय हो जाता है जैसे मीराबाईका शरीर (चिन्मय होनेसे) भगवान्के विग्रहमें लीन हो गया था।ज्ञानमार्गमें जहाँ सत्असत्का विवेक होता है वहाँ परिणाममें सत्असत् दोकी सत्ता नहीं रहती केवल सत्स्वरूप ही रह जाता है। परन्तु भक्तिमार्गमें सत्असत् सब कुछ भगवत्स्वरूप ही हो जाता है। फिर भक्त भगवत्स्वरूप संसारकी सेवा करता है। सेवामें पहले तो सेवा सेवक और सेव्य ये तीन होते हैं। परन्तु जब भगवद्भावकी अत्यधिक गाढ़ता हो जाती है तब सेवकभावकी विस्मृति हो जाती है। फिर भक्त स्वयं सेवारूप होकर सेव्यमें लीन हो जाता है। केवल एक भगवत्तत्त्व ही शेष रह जाता है। इस तरह भगवद्भावमें तल्लीन हुए भगवान्के प्रेमी भक्त जहाँकहीं भी विचरते हैं वहाँ उनके दर्शन स्पर्श भाषण आदिका प्राणियोंपर बड़ा असर पड़ता है।जबतक मनुष्योंकी पदार्थोंमें भोगबुद्धि रहती है तबतक उनको उन पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप समझमें नहीं आता। परन्तु जब भोगबुद्धि सर्वथा हट जाती है तब केवल भगवत्स्वरूप ही देखनेमें आ जाता है।मार्मिक बातवासुदेवः सर्वम् इस तत्त्वको समझनेके दो प्रकार हैं (1) संसारका अभाव करके परमात्माको रखना अर्थात् संसार नहीं है और परमात्मा है (2) सब कुछ भगवान्हीभगवान् हैं। इसमें जो परिवर्तन दीखता है वह भी भगवान्का ही स्वरूप है क्योंकि भगवान्के सिवाय उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।उपर्युक्त दोनों ही प्रकार साधकोंके लिये हैं। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें आकर्षण (राग) है उसको यह सब कुछ नहीं है केवल परमात्मा ही है इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें किञ्चिन्मात्र भी आकर्षण नहीं है और जो केवल भगवान्के स्मरण चिन्तन जप कीर्तन आदिमें लगा रहता है उसको संसाररूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। वास्तवमें देखा जाय तो ये दोनों प्रणालियाँ तत्त्वसे एक ही हैं। इन दोनोंमें फरक इतना ही है कि जैसे सोनेमें गहने और गहनोंके नाम रूप आकृति आदि अलगअलग होते हुए भी सब कुछ सोनाहीसोना जानना। जहाँपर संसारका अभाव करके परमात्माको तत्त्वसे जानना है वहाँ विवेक की प्रधानता है और जहाँ संसारको भगवत्स्वरूप मानना है वहाँ भाव की प्रधानता है। निर्गुणके उपासकोंमें विवेककी प्रधानता होती है और सगुणके उपासकोंमें भावकी प्रधानता होती है।संसारका अभाव करके परमात्मतत्त्वको जानना भी तत्त्वसे जानना है और संसारको भगवत्स्वरूप मानना भी तत्त्वसे जानना है। कारण कि वास्तवमें तत्त्व एक ही है। फरक इतना ही है कि ज्ञानमार्गमें जाननेकी प्रधानता रहती है और भक्तिमार्गमें माननेकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानमार्गमें माननेको भी जाननेके अर्थमें लिया है इति मत्वा न सज्जते (गीता 3। 28) और भक्तिमार्गमें जाननेको भी माननेके अर्थमें लिया है (5। 29 9। 13 10। 3 7 24 27 41)। इसमें एक खास बात समझनेकी है कि परमात्माको जानना और मानना दोनों ही ज्ञान हैं तथा संसारको सत्ता देकर संसारको जानना और मानना दोनों ही अज्ञान हैं।संसारको तत्त्वसे जाननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर परमात्माका अनुभव हो जाता है। ऐसे ही संसार भगवत्स्वरूप है ऐसा दृढ़तासे माननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और फिर संसाररूपसे न दीखकर भगवत्स्वरूप दीखने लग जाता है। तात्पर्य है कि परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेपर जानना और मानना दोनों एक हो जाते हैं।इति ज्ञानवान्मां प्रपद्यते जो प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारकी सत्ताको मानते हैं वे अज्ञानी हैं मूढ़ हैं परन्तु जिनकी दृष्टि कभी न बदलनेवाले भगवत्तत्त्वकी तरफ रहती है वे ज्ञानवान् हैं असम्मूढ़ हैं।ज्ञानवान् कहनेका तात्पर्य है कि वह तत्त्वसे समझता है कि सब जगह सबमें और सबके रूपमें वस्तुतः एक भगवान् ही हैं। ऐसे ज्ञानवान्को ही आगे पन्द्रहवें अध्यायके उन्नसीवें श्लोकमें सर्ववित् कहा गया है।ज्ञानवान्की शरणागति अर्थार्थी आर्त और जिज्ञासु भक्तोंकी तरह नहीं है। भगवान्ने ज्ञानीको अपनी आत्मा बताया है ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् (गीता 7। 18)। जब ज्ञानी भगवान्की आत्मा हुआ तो ज्ञानीकी आत्मा भगवान् हुए। अतः एक भगवत्तत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ता ही नहीं रही। इसलिये ज्ञानीकी शरणागति उन तीनों भक्तोंसे विलक्षण होती है। उसके अनुभवमें एक भगवत्तत्त्वके सिवाय कोई दूसरी सत्ता होती ही नहीं यही उसकी शरणागति है।भगवान्की दृष्टिमें अपने सिवाय कोई अन्य तत्त्व है ही नहीं मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव (गीता 7। 7)। जैसे सूतकी मालामें मणियोंकी जगह सूतकी गाँठ लगा दी तो मालामें सूतके सिवाय अन्य क्या रहा केवल सूत ही रहा। हाँ दीखनेमें गाँठ अलग दीखती हैं और धागा अलग दीखता है परन्तु तत्त्वसे एक ही चीज (सूत) है। ऐसे ही परमात्मा संसारमें व्यापक दीखते हैं परन्तु तत्त्वसे परमात्मा और संसार एक ही है। उनमें व्याप्यव्यापकका भाव नहीं है। अतः सब कुछ एक वासुदेव ही है ऐसा जिसको अनुभव होता है वह भी भगवत्स्वरूप ही हुआ। भगवत्स्वरूप हो जाना ही उसकी शरणागति है।स महात्मा सुदुर्लभः बहुतसे मनुष्य तो हमें परमात्माकी प्राप्ति करनी है इस तरफ दृष्टि ही नहीं डालते और ऐसा चाहते ही नहीं। जो इस तरफ दृष्टि डालते हैं वे भी उत्कण्ठापूर्वक अनन्यभावसे अपने जीवनको सफल करनेमें नहीं लगते। जो अपना कल्याण करनेमें लगते हैं वे भी मूर्खताके कारण परमात्मप्राप्तिसे निराश होकर अपने असली अवसरको खो देते हैं जिससे वे परम लाभसे वञ्चित रह जाते हैं।इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मनुष्योंमें हजारों और हजारोंमें कोई एक मनुष्य वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है। यत्न करनेवाले उन सिद्धोंमें भी कोई एक मनुष्य सब कुछ वासुदेव ही है ऐसा तत्त्वसे जानता है। ऐसा तत्त्वसे जाननेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि परमात्मा दुर्लभ हैं प्रत्युत सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिके लिये लगनेवाले दुर्लभ हैं। सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिके लिये लगनेपर मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्ति हो सकती है क्योंकि उसकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है।संसारमें सबकेसब मनुष्य धनी नहीं हो सकते। सांसारिक भोगसामग्री सबको समान रीतिसे नहीं मिल सकती। परन्तु जो परमात्मतत्त्व भगवान् शंकरको प्राप्त है सनकादिकोंको प्राप्त है नारद वसिष्ठ आदि देवर्षिमहर्षियोंको प्राप्त है वही तत्त्व सब मनुष्योंको समानरूपसे अवश्य प्राप्त हो सकता है। इसलिये मनुष्यको ऐसा दुर्लभ अवसर कभी नहीं खोना चाहिये।भगवान्की यह एक अलौकिक विलक्षणता है कि वे भूखेके लिये अन्नरूपसे प्यासेके लिये जलरूपसे और विषयीके लिये शब्द स्पर्श रूप रस और गन्धरूपसे बनकर आते हैं। वे ही मनबुद्धिइन्द्रियाँ बनकर आते हैं। वे ही संकल्पविकल्प बनकर आते हैं। वे ही व्यक्ति बनकर आते हैं। परन्तु साथहीसाथ दुःखरूपसे आकर मनुष्यको चेताते हैं कि अगर तुम इन वस्तुओंको भोग्य मानकर इनके भोक्ता बनोगे तो इसके फलस्वरूप तुमको दुःखहीदुःख भोगना पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको शर्म आनी चाहिये कि मैं भगवान्को भोगसामग्री बनाता हूँ मेरे सुखके लिये भगवान्को सुखकी सामग्री बनना पड़ता है भगवान् कितने विचित्रदयालु हैं कि यह प्राणी जो चाहता है भगवान् वैसे ही बन जाते हैंदेखने सुनने और समझनेमें जो कुछ आ रहा है और जो मनबुद्धिइन्द्रियोंका विषय नहीं है वह सब भगवान् ही हैं और भगवान्का ही है ऐसा मान ले वास्तविकतासे अनुभव कर ले तो मनुष्य विलक्षण हो जाता है स महात्मा सुदुर्लभः हो जाता है।एक वैरागी बाबाजी थे। वे गणेशजीका पूजन किया करते थे। उनके पास सोनेकी बनी हुई एक गणेशजीकी और एक चूहेकी मूर्ति थी। वे दोनों मूर्तियाँ तौलमें बराबर थीं। एक बार बाबाजीने तीर्थोंमें जानेका विचार किया और वे उन मूर्तियोंकी बिक्री करनेके लिये सुनारके पास गये। सुनारने उन दोनों मूर्तियोंको तौलकर दोनोंके बराबर दाम बता दिये तो बाबाजी सुनारपर बिगड़ गये कि तू क्या कह रहा है गणेशजी तो देवता हैं और चूहा उनका वाहन है पर तू दोनोंका बराबर मूल्य बता रहा है यह कैसे हो सकता है सुनार बोला कि बाबाजी मैं गणेश और चूहेको नहीं खरीदता हूँ मैं तो सोना खरीदता हूँ सोनेका जितना वजन होगा उसके अनुसार ही उसका मूल्य होगा। अगर सुनार गणेश और चूहेको देखेगा तो उसको सोना नहीं दीखेगा और अगर सोनेको देखेगा तो उसको गणेश और चूहा नहीं दीखेगा। इसलिये सुनार न गणेशको देखता है न चूहेको वह तो केवल सोनेको ही देखता है। ऐसे ही भगवान्के साथ अभिन्न हुआ महात्मा संसारको नहीं देखता वह तो केवल भगवान्को ही देखता है।कोई एक सन्त रास्तेमें चलतेचलते किसी खेतमें लघुशङ्का करनेको बैठे। उस खेतके मालिकने उनको देखा तो मतीरा (तरबूजा) चुरानेवाला यही आदमी है ऐसा समझकर पीछेसे आकर उनके सिरपर लाठी मार दी। फिर देखा कि ये तो कोई बाबाजी हैं अतः हाथ जोड़कर बोला महाराज मैंने आपको जाना नहीं और चोर समझकर लाठी मार दी इसलिये महाराज मुझे माफ करो। सन्तने कहा माफ क्या करना तूने मेरेको तो मारा नहीं तूने तो चोरको मारा है। उसने कहा अब क्या करूँ महाराज सन्तने कहा तेरी जैसी मरजी हो वैसे कर। उसने सन्तको बैलगाड़ीमें ले जाकर अस्पतालमें भरती कर दिया। वहाँ मलहमपट्टी करनेके बाद कोई आदमी दूध लेकर आया और बोला महाराज दूध पी लो। सन्तने कहा तू ब़ड़ा चालाकहोशियार है। तेरे विचित्रविचित्र रूप हैं। तू विचित्रविचित्र लीलाएँ करता है। पहले तो तूने लाठीसे मारा और अब कहता है दूध पी लो वह आदमी डर गया और कहने लगा बाबाजी मैंने नहीं मारा है। सन्त बोले बिलकुल झूठी बात है। मैं पहचानता हूँ तू ही था। तूने ही मारा है। तेरे सिवाय और कौन आये कहाँसे आये और कैसे आये पहले तो मारा लाठीसे और अब आया दूध पिलाने मैं दूध पी लूँगा पर था तू ही। इस तरह बाबाजी तो अपनी वासुदेवः सर्वम् वाली भाषामें बोल रहे थे और वह सोच रहा था कि बाबाजी कहीं फँसा न दें तात्पर्य यह है कि सन्त केवल भगवान्को ही देखते हैं कि लाठी मारनेवाला मरहमपट्टी करनेवाला दूध पिलानेवाला सब वह ही है।महात्माओंकी महिमाजहाँ सन्तमहात्माओंका वर्णन आता है वहाँ कहा गया है (1) जो उँचे दर्जेके तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं वे अभिन्नभाव और अखण्डरूपसे केवल अपने स्वरूपमें अथवा भगवत्तत्त्वमें स्थित रहते हैं। उनके जीवनसे उनके दर्शनसे उनके चिन्तनसे उनके शरीरका स्पर्श की हुई वायुके स्पर्शसे जीवोंका कल्याण होता रहता है।(2) जो मनुष्य उन महापुरुषोंकी महिमाको नहीं जानते उनके सामने वे महापुरुष अपने भावोंसे नीचे उतरते हैं तो कुछ कह देते हैं जैसे सन्तमहात्माओंने ऐसा किया है उनके किये हुए आचरणों और कहे हुए वचनोंके अनुसार ही शास्त्र बनते हैं आदि।(3) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो कह देते हैं कि सन्तमहात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये।(4) जिनसे उपर्युक्त बातका पालन नहीं होता उन साधकोंके सामने वे स्वयं ऐसा विधान कर देते हैं कि ऐसा करना चाहिये ऐसा नहीं करना चाहिये।(5) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो ऐसा करो और ऐसा मत करो ऐसी आज्ञा दे देते हैं।सन्तोंकी आज्ञामें जो सिद्धान्त भरा हुआ है वह आज्ञापालकमें उतर आता है। उनकी आज्ञापालनके बिना भी उनके सिद्धान्तका पालन करनेवालोंका कल्याण हो जाता है परन्तु वे महात्मा आज्ञाके रूपमें जिसको जो कुछ कह देते हैं उसमें एक विलक्षण शक्ति आ जाती है। आज्ञापालन करनेवालेको कोई परिश्रम नहीं पड़ता और उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक वैसे आचरण होने लगते हैं।(6) जो उनकी आज्ञाका पालन नहीं करते ऐसे नीच दर्जेके साधकोंको वे कहींकहीं कभीकभी शाप या वरदान दे देते हैं।इस परम्परामें देखा जाय तो (1) जो कुछ नहीं करते निरन्तर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं यह उन सन्तमहापुरुषोंका ऊँचा दर्जा हो गया (2) शास्त्रोंने ऐसा कहा सन्तमहात्माओंने ऐसा किया इस तरह संकेत करनेसे उन सन्तोंका दूसरा दर्जा हो गया (3) सन्तमहात्माओंकी आज्ञा पालन करना चाहिये ऐसा कहनेसे सन्तोंका तीसरा दर्जा हो गया (4) ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये इस तरहका विधान करनेसे उन सन्तोंका चौथा दर्जा हो गया (5) तुम ऐसा करो और ऐसा मत करो ऐसा कहना उन सन्तोंके पाँचवें दर्जेकी बात हो गयी (6) शाप और वरदान देना उन सन्तोंके छठे दर्जेकी बात हो गयी। इन सब दर्जोंमें सन्तमहापुरुषोंका जो नीचे उतरना है उसमें उनकी क्रमशः अधिकाधिक दयालुता है। वे शाप और वरदान दे दें ताड़ना कर दें इसमें उन सन्तोंका दर्जा तो नीचे हुआ पर इसमें उनका अत्यधिक त्याग है। कारण कि उन्होंने जीवोंके उद्धारके लिये ही नीचा दर्जा स्वीकार कर लिया है। इसमें उनका लेशमात्र भी अपना स्वार्थ नहीं है।ऐसे ही भगवान् भी अपने स्वरूपमें नित्यनिरन्तर स्थित रहते हैं यह उनके ऊँचे दर्जेकी बात है परन्तु वे ही भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण कृपाके परवश होकर जीवोंका उद्धार करनेके लिये अवतार लेकर आदर्श लीला करते हैं। उनकी लीलाओंको देखनेसुननेसे लोगोंका उद्धार होता है। भगवान् और भी नीचे उतरते हैं तो उपदेश देते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो आज्ञा दे देते हैं। और भी नीचे उतरते हैं तो शासन करके लोगोंको सही रास्तेपर लाते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो शाप और वरदान दे देते हैं अथवा उसके और संसारके हितके लिये उसका शरीरसे वियोग भी करा देते हैं। सम्बन्ध  जो भगवान्की महत्ताको समझकर भगवान्की शरण होते हैं ऐसे भक्तोंका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक करनेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें देवताओंके शरण होनेवाले मनुष्योंका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.16 7.19।।चतुर्विधा इत्यादि सुदुर्लभ इत्यन्तम्। ये तु मां भजन्ते ते सुकृतिनः। ते च चत्वारः। सर्वे चैते उदाराः। यतः अन्ये कृपणबुद्धयः आर्त्तिनिवारणम् अर्थादि च तुल्यपाणिपादोदरशरीरसत्त्वेभ्योऽधिकतरं वा आत्मन्यूनेभ्यो मार्गयन्ते। ज्ञान्यपेक्षया तु ते न्यूनसत्त्वाः यतः तेषां तावत्यपि भेदोऽस्ति भगवतः इदमहमभिलष्यामि इति भेदस्य स्फुटप्रतिभासात्। ज्ञानी तु मामेवाभेदतया अवलम्बते इति (S omits इति) ततोऽहमभिन्न एव। तस्य च अहमेव प्रियः न तु फलम्। अत एव स वासुदेव एव सर्वम् इत्येव (S वासुदेवः सर्वमेवम्) दृढप्रतिपत्तिपवित्रीकृतहृदयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.19।।उत्तरश्लोकस्य गतार्थत्वं परिहरति ज्ञानीति। ज्ञानार्थसंस्कारो वासना तत्तज्जन्मनि पुण्यकर्मानुष्ठानजनिता बुद्धिशुद्धिस्तदाश्रयाणां तद्वतामनन्तानां जन्मनामिति यावत्। ज्ञानवत्त्वं प्राक्तनेष्वपि जन्मसु संभावितमित्याशङ्क्याह प्राप्तेति। ज्ञानवतो भगवत्प्रतिपत्तिं प्रश्नद्वारा विवृणोति कथमिति। यथोक्तज्ञानस्य तद्वतश्च दुर्लभत्वं सूचयति य एवमिति। महत्सर्वोत्कृष्टमात्मशब्दितं वैभवमस्येति महात्मा। महात्मत्वे फलितमाह अत इति। तत्र वाक्योपक्रमानुकूल्यं कथयति मनुष्याणामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.19।।बहूनां जन्मनां इत्यत्र ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं भगवत्प्रतिपत्तौ बहुजन्मव्यवधानमुच्यत इति निरासार्थमाह बहूनामिति। प्रतीतमेव किं न स्यात् इत्यत आह तच्चेति। ततस्तदैव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.19।।बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्भवति। तच्चोक्तं ब्राह्म बहुभिर्जन्मभिर्ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.19।।बहूनां जन्मनां पुण्यजन्मनाम् अन्ते अवसाने वासुदेवशेषतैकरसः अहं तदायत्तस्वरूपस्थितिप्रवृत्तिः च स च असंख्येयैः कल्याणगुणैः परतरः इति ज्ञानवान् भूत्वा वासुदेव एव मम परमप्राप्यं प्रापकं च अन्यदपि यन्मनोरथवर्ति स एव मम् तत् सर्वम् इति मां यो प्रपद्यते माम् उपास्ते स महात्मा महामनाः सुदुर्लभः दुर्लभतरः लोके।वासुदेवः सर्वम् इत्यस्य अयम् एव अर्थः।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहम् (गीता 7।17)आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् (गीता 7।18) इति प्रकमात्।ज्ञानवान् च अयम् उक्तलक्षण एव अस्य एव पूर्वोक्तज्ञानित्वात्।भूमिरापः इति आरभ्य अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा। अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.19।। बहूनां जन्मनां ज्ञानार्थसंस्काराश्रयाणाम् अन्ते समाप्तौ ज्ञानवान् प्राप्तपरिपाकज्ञानः मां वासुदेवं प्रत्यगात्मानं प्रत्यक्षतः प्रपद्यते। कथम् वासुदेवः सर्वम् इति। यः एवं सर्वात्मानं मां नारायणं प्रतिपद्यते सः महात्मा न तत्समः अन्यः अस्ति अधिको वा। अतः सुदुर्लभः मनुष्याणां सहस्रेषु इति हि उक्तम्।।आत्मैव सर्वो वासुदेव इत्येवमप्रतिपत्तौ कारणमुच्यते

───────────────────

【 Verse 7.20 】

▸ Sanskrit Sloka: कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता: | तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया ||

▸ Transliteration: kāmais tais tair hṛta-jñānāḥ prapadyante’nyadevatāḥ | taṃ taṃ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā ||

▸ Glossary: kāmaiḥ: by desires; taiḥ: by those; taiḥ: by those; hṛta: distorted; jñānāḥ: knowledge; prapadyante: surrender; anya: other; devatāḥ: deities; taṃ-taṃ: that; niyamaṃ: rules; āsthāya: following; prakṛtyā: by nature; niyatāḥ: con- trolled; svayā: by their own.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.20 Those whose discrimination has been distorted by various desires, surrender unto deities. They follow specific rules and regulations of worship according to their own nature.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.20।।उनउन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है ऐसे वे मनुष्य अपनीअपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर (देवताओंके) उनउन नियमोंको धारण करते हुए उनउन देवताओंके शरण हो जाते हैं (टिप्पणी प0 429.1)।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.20।। भोगविशेष की कामना से जिनका ज्ञान हर लिया गया है ऐसे पुरुष अपने स्वभाव से प्रेरित हुए अन्य देवताओं को विशिष्ट नियम का पालन करते हुए भजते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.20 कामैः by desires? तैः तैः by this or that? हृतज्ञानाः those whose wisdom has been rent away? प्रपद्यन्ते approach? अन्यदेवताः other gods? तम् तम् this or that? नियमम् rite? आस्थाय having followed? प्रकृत्या by nature? नियताः led? स्वया by ones own.Commentary Those who desire wealth? children? the (small) Siddhis? etc.? are deprived of discrimination. They devote themselves to other minor gods such as Indra? Mitra? Varuna? etc.? impelled or driven by their own nature or Samskaras acired in their previous births. They perform some kinds of rites to propitiate these lower deities. (Cf.IX.23)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.20. Being robbed of their wisdom by innumerable desires [and] being controlled by their own nature, persons take refuge in other deities by following one or the other religious regulations.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.20 They in whom wisdom is obscured by one desire or the other, worship the lesser Powers, practising many rites which vary according to their temperaments.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.20 Controlled by their inherent nature, and deprived of knowledge by various desires, worldly-minded men resort to other gods, observing various disciplines.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.20 People, deprived of their wisdom by desires for various objects and guided by their own nature, resort to other deities following the relevant methods.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.20 Those whose wisdom has been rent away by this or that desire, go to other gods, following this or that rite, led by their own nature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.20 See Comment under 7.23

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.20 All men of this world are 'controlled', i.e., constantly accompanied by their own nature consisting in the Vasanas (subtle impressions) resulting from relation with the objects formed of the Gunas. Their knowledge about My essential nature is robbed by various Karmas, i.e., by objects of desire corresponding to their Vasanas (subtle impressions) born of their Karmas and constituted of Gunas. In order to fulfil these various kinds of desires they take refuge in, i.e., seek and worship, other divinities who are regarded as different from Me, such as Indra and others, observing various disciplines, i.e., practising rituals which are specially meant to propitiate only these divinities.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.20 People, hrta-jnanah, deprived of their wisdom, deprived of their discriminating knowledge; taih taih kamaih, by desires for various objects, such as progeny, cattle, heaven, etc.; and niyatah, guided, compelled; svaya prakrtya, by their own nature, by particular tendencies gathered in the past lives; prapadyante, resort; anya-devatah, to other deities, who are different from Vasudeva, the Self; asthaya, following taking the help of; tam tam niyamam,the relevant methods-those processes that are well known for the adoration of the concerned deities.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.20।। विवेक सार्मथ्य मानव जन्म की विशेषता है और यह सर्वथा असंभव है कि विवेक के प्रखर और सजग होने पर मनुष्य को आत्मज्ञान न हो सके। परन्तु मन की बहिर्मुखी प्रवृत्तियां और विषयभोग की कामनायें उसके विवेक को आच्छादित कर देती हैं।देवता शब्द के अनेक अर्थ हैं जैसे प्रकृति के नियमों के अधिष्ठाता देवता इन्द्र वरुण आदि इन्द्रियां किसी कार्य क्षेत्र में निहित उत्पादन क्षमता आदि। यहाँ इनमें से कोई भी अर्थ लेकर इस श्लोक का अध्ययन करने पर यही ज्ञात होता है कि भोगी पुरुष इनकी आराधना केवल वैषयिक सुख को प्राप्त करने के लिए ही करता है। वह कामना से प्रेरित होकर तत्पूर्ति के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न करता रहता है।शान्त मन में आत्मा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट और स्थिर दिखाई देता है परन्तु कामनाओं के स्रोतों से प्रवाहित होने वाली विचारों की धारायें उसमें विक्षेप उत्पन्न करके प्रतिबिम्ब को भी विचलित कर देती हैं। मन के क्षुब्ध होने पर बुद्धि की विवेक सार्मथ्य लुप्त हो जाती है और स्वभावत फिर मनुष्य सत्य असत्य का विवेक नहीं कर पाता है। जब मनुष्य की बुद्धि का आलोक कामना के मेघों से आवृत हो जाता है तब आसक्तियों और अवगुणों के उलूक मन के जंगल में शोर मचाने लगते हैं।मन में इच्छा के उदय मात्र से मनुष्य का पतन नहीं होता बल्कि पतन का कारण है उत्पन्न इच्छा के साथ उसका तादात्म्य। इस तादात्म्य के द्वारा मनुष्य अनजाने में अपनी इच्छाओं को बढ़ावा देकर असंख्य विक्षेपों को जन्म देता हुआ स्वयं उनका शिकार बन जाता है।अन्न के सूक्ष्म तत्त्व का ही रूप वृत्ति (विचार) है और इसलिए वह स्वयं जड़ है। वृत्तिरूप मन आत्मा से चेतनता प्राप्त करता है और कामी व्यक्ति से सार्मथ्य। विचारों के अनुसार कर्म होता है। एक बार मनुष्य के मन में कोई कामना दृढ़ हो जाये तो वह यह विवेक खो देता है कि उस कामनापूर्ति से उसे नित्य शाश्वत सुख मिलेगा या नहीं। क्षणिक सुख की आसक्ति के कारण वह अन्यान्य देवताओं को सन्तुष्ट करने में व्यस्त रहता है।अब यह भी सर्वविदित तथ्य है कि प्रत्येक देवता को सन्तुष्ट करने के विशेष नियम होते हैं। इन्द्रादि देवताओं को यज्ञयागादि के द्वारा इन्द्रियों के शब्दादि विषयों के द्वारा तथा कार्यक्षेत्र की उत्पादन क्षमता को व्यक्त करने के लिए उचित उपकरणों और उनके योग्य उपयोग के द्वारा सन्तुष्ट करके इष्ट फल प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए यहाँ कहा गया है कि वे अन्यान्य देवताओं को विशिष्ट नियमों का पालन करके भजते हैं।एक वासुदेव को त्यागकर लोग अन्य देवताओं को क्यों भजते हैं इसका कारण श्लोक की दूसरी पंक्ति में बताया गया है कि प्रकृत्या नियत स्वया। प्रत्येक मनुष्य अपनी पूर्व संचित वासनाओं के अनुसार भिन्नभिन्न विषयों की ओर आकर्षित होकर तदनुसार कर्म करता है। यह धारणा कि स्वर्ग में बैठा कोई ईश्वर हमारे मन में इच्छाओं को उत्पन्न कराकर हमें पाप और पुण्य के कर्मों में प्रवृत्त करता है केवल निराशावादी निर्बल और आलसी लोगों की ही हो सकती है। बुद्धिमान साहसी और उत्साही पुरुष जानते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपने विचारों के अनुसार अपने वातावरण कार्यक्षेत्र आदि का निर्माण करता है।संक्षेप में एक मूढ़ पुरुष शाश्वत सुख की आशा में वैषयिक क्षणिक सुखों की मृगमरीचिका के पीछे दौड़ता रहता है जबकि विवेकी पुरुष उसकी व्यर्थता पहचान कर पारमार्थिक सत्य के मार्ग पर अग्रसर होता है।भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.20।।चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन इति चतुर्धात्वं सुकृतिनामुक्त्वा तेषां मध्ये ज्ञानिन उत्कर्षं निरुप्येतरेषामपि तेषां स्वभक्तानां परंपरया मोक्षभाक्त्वादुदाराः सर्व एवैते इत्युक्तम्। तत्र वासुदेवः सर्वमिति आत्मैव सर्वमित्येवं साक्षात्परंपरया वाऽप्रतिपत्तौ कारणमाह। यथाकथंचिदपि स्वाभिमुखानामुदारतासूचनाय। कामैस्तैस्तैः पुत्रपशुस्वर्गादिविषयैरिति भा्ये। आदिपदात्कीर्तिशत्रुयमोहनस्तम्भनापकर्षणवशीकरणमारणोच्चाटनादयो गृह्यन्ते। तैस्तैः कामैः हृतमपहृतं विवेकज्ञानं येषां ते हृतं भगवतो वासुदेवाद्विमुखीकृत्य तत्तत्फलदातृत्वाभिमतक्षुद्रदेवताभिमुख्यं नीतं ज्ञानमन्तःकरणं येषामिति वा। अस्मिन्पक्षे उक्तार्थस्यान्यदेवता वासुदेवान्मत्तः प्रत्यगभिन्नादन्या देवता अन्यदेवता इति तेषां प्रतीतेरनुवादः। तं तं नियमं जपोपवासादिरुपं तत्तद्देवतारधने प्रसिद्धमास्थाय आश्रित्य इन्द्रादीन्प्रपद्यन्ते। तत्तन्नियमविशेषाश्रयणे हेतुमाह। प्रकृत्या स्वया स्वकीयया प्रकृतिः स्वभावः सच जन्मान्तरार्जितानेकदुष्कृतजिन्यः संस्कारस्तया नियताः नियमिताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.20।।तदेवमार्तादिभक्तत्रयापेक्षया ज्ञानिनो भक्तस्योत्कर्षःतेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते इत्यत्र प्रतिज्ञातो व्याख्यातः। अधुना तु सकामत्वे भेददर्शित्वे च समेऽपि देवतान्तरभक्तापेक्षयार्तादीनां त्रयाणां स्वभक्तानामुत्कर्ष उदाराः सर्व एवैत इत्यत्र प्रतिज्ञातो भगवता व्याख्यायते यावदध्यायसमाप्ति। समानेऽप्यायासे सकामत्वे भेददर्शित्वे च मद्भक्ता भूमिकाक्रमेण सर्वोत्कृष्टं मोक्षाख्यं फलं लभन्ते। क्षुद्रदेवताभक्तास्तु क्षुद्रमेव पुनः पुनः संसरणरूपं फलम्। अतः सर्वेऽप्यार्ता जिज्ञासवोऽर्थार्थिनश्च मामेव प्रपन्नाः सन्तोऽनायासेन सर्वोत्कृष्टं मोक्षाख्यं फलं लभन्तामित्यभिप्रायः परमकारुणिकस्य भगवतः। तत्र परमपुरुषार्थफलमपि भगवद्भजनमुपेक्ष्य क्षुद्रफले क्षुद्रदेवताभजने पूर्ववासनाविशेष एवासाधारणो हेतुरित्याह मोहनस्तम्भनाकर्षणवशीकरणमारणोच्चाटनादिविषयैर्भगवत्सेवया लब्धुमशक्यत्वेनाभिमतैस्तैस्तैः क्षुद्रैः कामैरभिलाषैर्हृतमपहृतं भगवतो वासुदेवाद्विमुखीकृत्य तत्तत्फलदातृत्वाभिमतक्षुद्रदेवताभिमुख्यं नीतं ज्ञानमन्तःकरणं येषां तेऽन्यदेवत भगवतो वासुदेवादन्याः क्षुद्रदेवतास्तं तं नियमं जपोपवासप्रदक्षिणानमस्कारादिरूपं तत्तद्देवताराधने प्रसिद्धं नियममास्थायाश्रित्य प्रपद्यन्ते भजन्ते तत्तत्क्षुद्रफलप्राप्तीच्छया क्षुद्रदेवतामध्येऽपि केचित्कांचिदेव भजन्ते स्वया प्रकृत्या नियता असाधारणया पूर्वाभ्यासवासनया वशीकृताः सन्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.20।।अन्ये तु तैस्तैः कामैः पुत्रपश्वादिविषयैर्हृतज्ञानाः हृतं दूरीकृतं ज्ञानं विवेको येषां ते। अन्यदेवताः अहमेतस्या आराधनेनेदं फलमवाप्नवानीति भेदबुद्ध्या प्रपद्यन्ते इन्द्रादीन् तं तं नियमं चतुर्दश्युपवासादिकमास्थाय स्वया प्रकृत्या वक्ष्यमाणविधया दैव्या आसुर्या वा नियता निगृहीताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.20।।स कथं दुर्लभः इत्यत आह कामैरिति। तैस्तैः कामैः पूर्वोक्तैःआर्तः 7।16 इत्यादित्रिरूपैर्हृतज्ञानाः सन्तोऽन्यदेवताः क्षुद्राः शिवादयो भूतप्रेतादयश्च स्वया प्रकृत्या कृत्वा तं तं नियमं देवताराधने उपवासादिलक्षणमास्थाय प्रपद्यन्ते। अत्रायमर्थः कामनार्थं मत्सेवायां प्रवृत्ताः न तु मोक्षार्थं भक्त्यर्थं वा अहं तु मोक्षभक्त्यननुरूपं कामितफलं न ददामि तत्फलमननुभूय तैः कामैः हृतं मत्स्वरूपज्ञानं येषां तादृशाः सन्तः स्वया प्रकृत्या नियताः प्रकृत्यंशत्वाच्छीघ्रं तत्फलदा अन्यदेवता भजन्ति। अतएवयो यदंशः स तं भजेत् इत्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.20।।तदेवं कामिनोऽपि सन्तः कामप्राप्तये परमेश्वरं मामेव भजन्ति ते कामान्प्राप्य शनैर्मुच्यन्त इत्युक्तम्। ये त्वत्यन्तं राजसास्तामसाश्च कामाभिभूताः क्षुद्रदेवताः सेवन्ते ते संसरन्तीत्याह कामैरिति चतुर्भिः। ये तु तैस्तैः पुत्रकीर्तिशत्रुजयादिविषयैः कामैरपहृतविवेकाः सन्तः अन्याः क्षुद्राः भूतप्रेतयक्षादिदेवता भजन्ति। किं कृत्वा तत्तद्देवताराधने यो यो नियम उपवासादिलक्षणस्तं तं नियमं स्वीकृत्य तत्रापि स्वकीयया प्रकृत्या पूर्वाभ्यासवासनया नियताः सन्तो देवताविशेषं भजन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.20।।तदेवमलौकिकमहिमानं मां यथाकथञ्चिदपि ये प्रपद्यन्ते ते सिद्धिं प्राप्यान्ते तरन्ति अनावृतवस्तुमहिम्नस्तथात्वादित्युक्तम्। ये तु मां न प्रपद्यन्ते ते आसुरमार्गीया अन्यदेवता एव प्रपद्यन्ते। प्राकृतकामाद्यर्थं ते मायामोहिताः संसरन्तीत्याह कामैरिति सार्धैस्त्रिभिः। स्वया प्रकृत्या राजसतामसस्वभावेन नियता बद्धा मदीयया (स्वनिष्ठया मायया) वा बद्धाः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.20।।यह सर्व जगत् आत्मस्वरूप वासुदेव ही है इस प्रकार न समझमें आनेका कारण बतलाते हैं पुत्र पशु स्वर्ग आदि भोगोंकी प्राप्तिविषयक नाना कामनाओंद्वारा जिनका विवेकविज्ञान नष्ट हो चुका है वे लोग अपनी प्रकृतिसे अर्थात् जन्मजन्मान्तरमें इकट्ठे किये हुए संस्कारोंके समुदायरूप स्वभावसे प्रेरित हुए अन्य देवताओंको अर्थात् आत्मस्वरूप मुझ वासुदेवसे भिन्न जो देवता हैं उनको उन्हींकी आराधनाके लिये जोजो नियम प्रसिद्ध हैं उनका अवलम्बन करके भजते हैं अर्थात् उनकी शरण लेते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.20।। व्याख्या   कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः उनउन अर्थात् इस लोकके और परलोकके भोगोंकी कामनाओंसे जिनका ज्ञान ढक गया है आच्छादित हो गया है। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये जो विवेकयुक्त मनुष्यशरीर मिला है उस शरीरमें आकर परमात्माकी प्राप्ति न करके वे अपनी कामनाओंकी पूर्ति करनेमें ही लगे रहते हैं।संयोगजन्य सुखकी इच्छाको कामना कहते हैं। कामना दो तरहकी होती है यहाँके भोग भोगनेके लिये धनसंग्रहकी कामना और स्वर्गादि परलोकके भोग भोगनेके लिये पुण्यसंग्रहकी कामना।धनसंग्रहकी कामना दो तरहकी होती है पहली यहाँ चाहे जैसे भोग भोगें चाहे जब चाहे जहाँ और चाहे जितना धन खर्च करें सुखआरामसे दिन बीतें आदिके लिये अर्थात् संयोगजन्य सुखके लिये धनसंग्रहकी कामना होती है और दूसरी मैं धनी हो जाऊँ धनसे मैं बड़ा बन जाऊँ आदिके लिये अर्थात् अभिमानजन्य सुखके लिये धनसंग्रहकी कामना होती है। ऐसे ही पुण्यसंग्रहकी कामना भी दो तरहकी होती है पहली यहाँ मैं पुण्यात्मा कहलाऊँ और दूसरी परलोकमें मेरेको भोग मिलें। इन सभी कामनाओंसे सत्असत् नित्यअनित्य सारअसार बन्धमोक्ष आदिका विवेक आच्छादित हो जाता है। विवेक आच्छादित होनेसे वे यह समझ नहीं पाते कि जिन पदार्थोंकी हम कामना कर रहे हैं वे पदार्थ हमारे साथ कबतक रहेंगे और हम उन पदार्थोंके साथ कबतक रहेंगेप्रकृत्या नियताः स्वया कामनाओंके कारण विवेक ढका जानेसे वे अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित रहते हैं अर्थात् अपने स्वभावके परवश रहते हैं। यहाँ प्रकृति शब्द व्यक्तिगत स्वभावका वाचक है समष्टि प्रकृतिका वाचक नहीं। यह व्यक्तिगत स्वभाव सबमें मुख्य होता है स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते। अतः व्यक्तिगत स्वभावको कोई छोड़ नहीं सकता या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते। परन्तु इस स्वभावमें जो दोष हैं उनको तो मनुष्य छोड़ ही सकता है अगर उन दोषोंको मनुष्य छोड़ नहीं सकता तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही क्या हुई मनुष्य अपने स्वभावको निर्दोष शुद्ध बनानेमें सर्वथा स्वतन्त्र है। परन्तु जबतक मनुष्यके भीतर कामनापूर्तिका उद्देश्य रहता है तबतक वह अपने स्वभावको सुधार नहीं सकता और तभीतक स्वभावकी प्रबलता और अपनेमें निर्बलता दीखती है। परन्तु जिसका उद्देश्य कामना मिटानेका हो जाता है वह अपनी प्रकृति(स्वभाव) का सुधार कर सकता है अर्थात् उसमें प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती।तं तं नियममास्थाय कामनाओंके कारण अपनी प्रकृतिके परवश होनेपर मनुष्य कामनापूर्तिके अनेक उपायोंको और विधियों (नियमों) को ढूँढ़ता रहता है। अमुक यज्ञ करनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक तप करनेसे अमुक दान देनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक मन्त्रका जप करनेसे आदिआदि उपाय खोजता रहता है। उन उपायोंकी विधियाँ अर्थात् नियम अलगअलग होते हैं। जैसे अमुक

Chapter 7 (Part 14)

कामनापूर्तिके लिये अमुक विधिसे यज्ञ आदि करना चाहिये और अमुक स्थानपर करना चाहिये आदिआदि। इस तरह मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करता है।प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करके मनुष्य अन्य देवताओंकी शरण लेते हैं भगवान्की शरण नहीं लेते। यहाँ अन्यदेवताः कहनेका तात्पर्य है कि वे देवताओंको भगवत्स्वरूप नहीं मानते हैं प्रत्युत उनकी अलग सत्ता मानते हैं इसीसे उनको अन्तवाला (नाशवान्) फल मिलता है अन्तवत्तु फलं तेषाम् (गीता 7। 23)। अगर वे देवताओंकी अलग सत्ता न मानकर उनको भगवत्स्वरूप ही मानें तो फिर उनको अन्तवाला फल नहीं मिलेगा प्रत्युत अविनाशी फल मिलेगा।यहाँ देवताओंकी शरण लेनेमें दो कारण मुख्य हुए एक कामना और एक अपने स्वभावकी परवशता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.20 7.23।।कामैरित्यादि मामपीत्यन्तम्। ये पुनः स्वेन स्वेनोत्तमादिकामनास्वभावेन विचित्रेणपरिच्छिन्नमनसस्ते कामनापहृतचेतनाः (N चेतस)) तत्समुचितामेव ममैवावान्तरतनुं देवताविशेषमुपासते। अतो मत एव कामफलमुपाददते (S पासते)। किं तु तस्यान्तोऽस्ति निजयैव वासनया परिमितीकृतत्त्वात्। अत एवेन्द्रादिभावनातात्पर्येण यागादि कुर्वन्तस्तथाविधमेव फलमुपाददते। मत्प्राप्तिपरास्तु मामेव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.20।।किमिति तर्हि सर्वेषां प्रत्यग्भूते भगवति यथोक्तज्ञानं नोदेतीत्याशङ्क्य न मामित्यत्रोक्तं हृदि निधाय ज्ञानानुदये हेत्वन्तरमाह आत्मैवेति। कामैर्नानाविधैरपहृतविवेकविज्ञानस्य देवतान्तरनिष्ठत्वमेव प्रत्यग्भूतपरदेवताप्रतिपत्त्यभावे कारणमित्याह कामैरिति। देवतान्तरनिष्ठत्वे हेतुमाह तं तमिति। प्रसिद्धो नियमो जपोपवासप्रदक्षिणानमस्कारादिः। नियमविशेषाश्रयणे कारणमाह प्रकृत्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.20।।ननु मूलप्रकृतेः सर्वत्रैकत्वात्कथं स्वयेति प्रातिस्विकत्वमुच्यते इत्यत आह प्रकृत्येति। स्वभाव एवेत्येवशब्दसम्बन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.20।।प्रकृत्या स्वभावेन।स्वभावः प्रकृतिश्चैव संस्कारो वासनेति च इत्यभिधानात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.20।।सर्वे एव हि लौकिकाः पुरुषाः स्वया प्रकृत्या पापवासनया गुणमयभावविषयया नियता नित्यान्विताः तैः तैः स्ववासनानुरूपैः गुणमयैः एव कामैः इच्छाविषयभूतैः हृतमत्स्वरूपविषयज्ञानाः तत्तत्कामसिद्ध्यर्थम् अन्यदेवताः मद्व्यक्तिरिक्ताः केवलेन्द्रादिदेवताः तं तं नियमम् आस्थाय तत्तद्देवताविशेषमात्रप्रीणनाय असाधारणं नियमम् आस्थाय प्रपद्यन्ते ता एव आश्रित्य अर्चयन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.20।। कामैः तैस्तैः पुत्रपशुस्वर्गादिविषयैः हृतज्ञानाः अपहृतविवेकविज्ञानाः प्रपद्यन्ते अन्यदेवताः प्राप्नुवन्ति वासुदेवात् आत्मनः अन्याः देवताः तं तं नियमं देवताराधने प्रसिद्धो यो यो नियमः तं तम् आस्थाय आश्रित्य प्रकृत्या स्वभावेन जन्मान्तरार्जितसंस्कारविशेषेण नियताः नियमिताः स्वया आत्मीयया।।तेषां च कामिनाम्

───────────────────

【 Verse 7.21 】

▸ Sanskrit Sloka: यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति | तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ||

▸ Transliteration: yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati | tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tāmeva vidadhāmyaham ||

▸ Glossary: yaḥ: that; yaḥ: that; yāṃ: which; yāṃ: which; tanuṃ: form of the deities; bhaktaḥ: devotee; śraddhayā: with faith; arcituṃ: to worship; icchati: desires; tasya: of that; tasya: of that; acalāṃ: steady; śraddhāṃ: faith; tāṃ: him; eva: surely; vidadhāmi: give; ahaṃ: I

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.21 I am in everyone’s heart as the super soul. As soon as one desires to worship some deity, I make his faith steady so that he can devote himself to that particular deity.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.21।।(टिप्पणी प0 430) जोजो भक्त जिसजिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है उसउस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.21।। जोजो (सकामी) भक्त जिसजिस (देवता के) रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है उसउस (भक्त) की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.21 यः who? यः who? याम् which? याम् which? तनुम् form? भक्तः devotee? श्रद्धया with faith? अर्चितुम् to worship? इच्छति desires? तस्य तस्य of him? अचलाम् unflinching? श्रद्धाम् faith? ताम् that? एव surely? विदधामि make? अहम् I.Commentary Tanu or body is used here in the sense of a Devata (god).The Lord? the indweller of all beings? makes the faith of that devotee who worships the lesser divinities? which is born of the Samskaras of his previous birth? steady and unswerving. (Cf.IV.11IX.22and23)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.21. Whatever may be the form [of the deity] a devotee-whosoever he may be-desires to worship with faith, I assume that form which is firm and is according to [his] faith.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.21 But whatever the form of worship, if the devotee have faith, then upon his faith in that worship do I set My own seal.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.21 Whichever devotee seeks to worship with faith whatever form, I make that very faith steadfast.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.21 Whichever form (of a deity) any devotee wants to worship with faith, that very firm faith of his I strengthen.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.21 Whatsoever form any devotee desires to worship with faith that (same) faith of his I make firm and unflinching.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.21 See Comment under 7.23

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.21 These divinities too constitute My body as taught in the Sruti text like: 'He who, dwelling in the sun, whom the sun does not know, whose body is the sun' (Br. U., 3.7.9). Whichever devotee seeks to worship with faith whatever form of Mine, such as the Indra, although not knowing these divinities to be My forms, I consider his faith as being directed to My bodies or manifestations, and make his faith steadfast, i.e., make it free from obstacles.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.21 Yam yam, whichever; tanum, form of a deity; yah, any covetous person- among these people with desires; who, being endowed sraddhaya, with faith; and being a bhaktah, devotee; icchati, wants; arcitum, to worship; tam eva, that very; acalam, firm, steady; sraddham, faith; tasya, of his, of that particular covetous person-that very faith with which he desires to worship whatever form of a deity, in which (worship) he was earlier engaged under the impulsion of his own nature-; [Ast. takes the portion 'svabhavatah yo yam devata-tanum sraddhaya arcitum icchati' with the next verse.-Tr.] vidadhami, I strengthen.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.21।। इस अध्याय के प्रारम्भिक भाग में ही आत्मानात्म विवेक (जड़चेतन का विभाजन) करके भगवान् श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है कि किस प्रकार उनमें समस्त नामरूप पिरोये हुए हैं। उसके पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार त्रिगुणात्मिका मायाजनित विकारों से मोहित होकर मनुष्य अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को नहीं पहचान पाता। आत्मचैतन्य के बिना शरीर मन और बुद्धि की जड़ उपाधियाँ स्वयं कार्य नहीं कर सकती हैं।जगत् में देखा जाता है कि सभी भक्तजन एक ही रूप में ईश्वर की आराधना नहीं करते। प्रत्येक भक्त अपने इष्ट देवता की पूजा के द्वारा सत्य तक पहुँचने का प्रयत्न करता है। भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट घोषणा करते हैं कि कोई भी भक्त किसी भी स्थान पर मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा या गिरजाघर में एकान्त में या सार्वजनिक स्थान में किसी भी रूप में ईश्वर की पूजा श्रद्धा के साथ करता है उसकी उस श्रद्धा को उसके इष्ट देवता में मैं स्थिर करता हूँ। गीता के मर्म को जानने वाला सच्चा विद्यार्थी कदापि कट्टरपंथी पृथकतावादी या असहिष्णु नहीं हो सकता। ईश्वर के सभी सगुण रूपों का अधिष्ठान एक परम सत्य ही है जहाँ से भक्त के हृदय में भक्तिरूपी पौधा पल्लवित पुष्पित और फलित होने के लिए श्रद्धारूपी जल प्राप्त करता है क्योंकि भगवान् स्वयं कहते हैं मैं उस श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।आध्यात्मदृष्टि से विचार करने पर इस श्लोक का और अधिक गम्भीर अर्थ भी स्पष्ट हो जाता है।मनुष्य जिस विषय का निरन्तर चिन्तन करता रहता है उसमें वह दृढ़ता से आसक्त और स्थित हो जाता है। अखण्ड चिन्तन से मन में उस विषय के संस्कार दृढ़ हो जाते हैं और फिर उसके अनुसार ही उस मनुष्य की इच्छायें और कर्म होते हैं। इसी नियम के अनुसार सतत आत्मचिन्तन करने से भी मनुष्य अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है।सारांशत भगवान् का कथन हैं कि जैसा हम विचार करते हैं वैसा ही हम बनते हैं। अत यदि कोई व्यक्ति दुर्गुणों का शिकार हो गया हो अथवा अन्य व्यक्ति दैवी गुणों से संपन्न हो तो यह दोनों के भिन्नभिन्न विचारों का ही परिणाम समझना चाहिए। विचार प्रकृति का अंग है विचारों के अनुरूप जगत् होता है जिसका एक अधिष्ठान है सर्वव्यापी आत्मतत्त्व।सतत समृद्ध हो रही श्रद्धा के द्वारा मनुष्य किस प्रकार इष्ट फल को प्राप्त करता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.21।।ननु तत्तत्कामैर्हृतज्ञानानामपि तेषां तत्तद्देवतानुग्रहात्क्रमेण विवेके लब्धे त्वयि वासुदेवे भक्तिर्मविष्यतीति चेत्तत्राह य इति। यः कामी यां यां देवतातनुं श्रद्धया संयुक्तो भक्तः सन्नर्चितुं पूजयितुमिच्छति तस्य तस्य कामिनः श्रद्धां यया भक्तः सन्नर्चितुमिच्छति तामेवाचलां स्थिरां विदधामि करोमि। यां यां तनुमिति यच्छब्धान्वयस्तु यो यां देवतातनुमर्चितुमिच्छतीत्यादिवदद्भिराचार्यौरुत्तरश्लोकस्थ तस्या इत्यनेन दर्शितः। एतेन यां देवतातनुं प्रति श्रद्धां विदधामि तामेव श्रद्धामिति व्याख्याने यच्छब्दान्वयः स्पष्टस्तस्मात्प्रतिशब्दमध्याहृत्य व्याख्यातमिति प्रत्युक्तम्। तामेव श्रद्धामिति भाष्यकृद्य्धाख्याने प्रतिशब्दाध्याहारं विनैव उक्तरीत्या यच्छब्दान्वयस्य स्पष्टत्वेननैवंवदतामज्ञताया अतिस्फटत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.21।।तत्तद्देवताप्रसादात्तेषामपि सर्वेश्वरे भगवति वासुदेवे भक्तिर्भविष्यतीति न शङ्कनीयम्। यतः तेषां मध्ये यो यः कामी यां यां तनुं देवतामूर्तिं श्रद्धया जन्मान्तरवासनाबलप्रादुर्भूतया भक्त्या संयुक्तः सन्नर्चितुं अर्चयितुमिच्छति प्रवर्तते। चौरादिकस्यार्चयतेर्णिजभावपक्षे रूपमिदम्। तस्य तस्य कामिनस्तामेव देवतातनुं प्रति श्रद्धां पूर्ववासनावशात्प्राप्तां भक्तिमचलां स्थिरां विदधामि करोम्यहमन्तर्यामी नतु मद्विषयां श्रद्धां तस्य तस्य करोमीत्यर्थः। तामेव श्रद्धामिति व्याख्याने यच्छब्दानन्वयः स्पष्टस्तस्मात्प्रतिशब्दमध्याहृत्य व्याख्यातम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.21।।किंच यो यो भक्तः सात्विको राजसस्तामसो वा यां यां तनुं तादृशीमेव देवादिरूपां यक्षरक्षोरूपां भूतप्रेतरूपां वा मूर्तिं श्रद्धया तादृश्यैवार्चितुमिच्छति तस्य तस्य भक्तस्य तामेव श्रद्धां सात्त्विकीं राजसीं तामसीं वाहं सर्वेश्वरोऽचलां विदधामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.21।।अतोऽहमपि तान् स्वरूपरसदानायोग्यांस्तद्देवताभजने दृढान् करोमीत्याह यो य इति। यो यो भक्तो यां यां तनुं यां यां देवतामूर्तिं श्रद्धया स्वकामसिद्ध्यर्थं शुद्धान्तःकरणेन अर्चितुमिच्छति तस्य भक्तस्य तामेव श्रद्धामचलां शास्त्रज्ञानादिना वा चालयितुमयोग्यामहमेव विदधामि करोमि पोषयामि चेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.21।।यो यो यां यामिति। तेषां मध्ये यो यो भक्तः यां यां तनुं देवतारूपां मदीयामेव मूर्तिं श्रद्धयार्चितुमिच्छति प्रवर्तते तस्य तस्य भक्तस्य तत्तन्मूर्तिविषयां तामेव श्रद्धामचलां दृढामहमन्तर्यामी विदधामि करोमि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.21।।ता अपि देवता मदीयाः शरीरभूताः य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं बृ.उ.3।7।9 इत्यादिश्रुतिभिस्तथाप्रतिपादनात्। तदजानन्नेव यो यो यां यां इति तस्याजानतोऽपि मच्छरीरभूतविषयकैषा श्रद्धेत्यहमोकोऽनुसन्धाय तां श्रद्धामेवाचलां विदधामि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.21।।उन कामी पुरुषोंमेंसे जोजो सकाम भक्त जिसजिस देवताके स्वरूपका श्रद्धा और भक्तियुक्त होकर अर्चनपूजन करना चाहता है उसउस भक्तकी देवताविषयक उस श्रद्धाको मैं अचल स्थिर कर देता हूँ। अभिप्राय यह कि जो पुरुष पहले स्वभावसे ही प्रवृत्त हुआ जिस श्रद्धाद्वारा जिस देवताके स्वरूपका पूजन करना चाहता है (उस पुरुषकी उसी श्रद्धाको मैं स्थिर कर देता हूँ )।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.21।। व्याख्या    यो यो यां यां तनुं भक्तः ৷৷. तामेव विदधाम्यहम्   जोजो मनुष्य जिसजिस देवताका भक्त होकर श्रद्धापूर्वक यजनपूजन करना चाहता है उसउस मनुष्यकी श्रद्धा उसउस देवताके प्रति मैं अचल (दृढ़) कर देता हूँ। वे दूसरोंमें न लगकर मेरेमें ही लग जायँ ऐसा मैं नहीं करता। यद्यपि उनउन देवताओंमें लगनेसे कामनाके कारण उनका कल्याण नहीं होता फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूँ तो जो मेरेमें श्रद्धाप्रेम रखते हैं अपना कल्याण करना चाहते हैं उनकी श्रद्धाको मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूँगा अर्थात् अवश्य करूँगा। कारण कि मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता 5। 29)।इसपर यह शङ्का होती है कि आप सबकी श्रद्धा अपनेमें ही दृढ़ क्यों नहीं करते इसपर भगवान् मानो यह कहते हैं कि अगर मैं सबकी श्रद्धाको अपने प्रति दृढ़ करूँ तो मनुष्यजन्मकी स्वतन्त्रता सार्थकता ही कहाँ रही तथा मेरी स्वार्थपरताका त्याग कहाँ हुआ अगर लोगोंको अपनेमें ही लगानेका मेरा आग्रह रहे तो यह कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि ऐसा बर्ताव तो दुनियाके सभी स्वार्थी जीवोंका स्वाभाविक होता है। अतः मैं इस स्वार्थपरताको मिटाकर ऐसा स्वभाव सिखाना चाहता हूँ कि कोई भी मनुष्य पक्षपात करके दूसरोंसे केवल अपनी पूजाप्रतिष्ठा करवानेमें ही न लगा रहे और किसीको पराधीन न बनाये।अब दूसरी शङ्का यह होती है कि आप उनकी श्रद्धाको उन देवताओंके प्रति दृढ़ कर देते हैं इससे आपकी साधुता तो सिद्ध हो गयी पर उन जीवोंका तो आपसे विमुख होनेसे अहित ही हुआ इसका समाधान यह है कि अगर मैं उनकी श्रद्धाको दूसरोंसे हटाकर अपनेमें लगानेका भाव रखूँगा तो उनकी मेरेमें अश्रद्धा हो जायगी। परन्तु अगर मैं अपनेमें लगानेका भाव नहीं रखूँगा और उनको स्वतन्त्रता दूँगा तो उस स्वतन्त्रताको पानेवालोंमें जो बुद्धिमान् होंगे वे मेरे इस बर्तावको देखकर मेरी तरफ ही आकृष्ट होंगे। अतः उनके उद्धारका यही तरीका बढ़िया है।अब तीसरी शङ्का यह होती है कि जब आप स्वयं उनकी श्रद्धाको दूसरोंमें दृढ़ कर देते हैं तो फिर उस श्रद्धाको कोई मिटा ही नहीं सकता। फिर तो उसका पतन ही होता चला जायगा इसका समाधान यह है कि मैं उनकी श्रद्धाको देवताओंके प्रति ही दृढ़ करता हूँ दूसरोंके प्रति नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं तो उनकी इच्छाके अनुसार ही उनकी श्रद्धाको दृढ़ करता हूँ और अपनी इच्छाको बदलनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है योग्य है। इच्छाको बदलनेमें वे परवश निर्बल और अयोग्य नहीं हैं। अगर इच्छाको बदलनेमें वे परवश होते तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही कहाँ रही और इच्छा (कामना) का त्याग करनेकी आज्ञा भी मैं कैसे दे सकता था जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् (गीता 3। 43)

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.20 7.23।।कामैरित्यादि मामपीत्यन्तम्। ये पुनः स्वेन स्वेनोत्तमादिकामनास्वभावेन विचित्रेण परिच्छिन्नमनसस्ते कामनापहृतचेतनाः (N चेतस)) तत्समुचितामेव ममैवावान्तरतनुं देवताविशेषमुपासते। अतो मत एव कामफलमुपाददते (S पासते)। किं तु तस्यान्तोऽस्ति निजयैव वासनया परिमितीकृतत्त्वात्। अत एवेन्द्रादिभावनातात्पर्येण यागादि कुर्वन्तस्तथाविधमेव फलमुपाददते। मत्प्राप्तिपरास्तु मामेव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.21।।तत्तद्देवताप्रसादात्कामिनामपि सर्वेश्वरे सर्वात्मके वासुदेवे क्रमेण भक्तिर्भविष्यतीत्याशङ्क्याह तेषां चेति। स्वभावतो जन्मान्तरीयसंस्कारवशादित्यर्थः। भगवद्विहितया स्थिरया श्रद्धया संस्काराधीनया देवताविशेषमाराधयतोऽपि भगवदनुग्रहादेव फलप्राप्तिरित्याह यो यो यां यामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.21 7.22।।रामकृष्णादिरूपां भगवत्तनुमिति प्रतीतिनिरासायाह यां यामिति। कुत एतत्अन्तवत्तु फलं तेषां 7।23 इति तद्भक्तानामन्तवत्फलवचनात्। तस्य च ब्रह्मादिग्रहणे सम्भवाद्भगवद्ग्रहणे चाम्सम्भवादिति भावेनाह उक्त चेति। फलस्येति शेषः। गम्यत इति गतिः इत्यादेः प्रश्नस्य परिहाररूपवाक्यसन्दर्भाच्च। बहुत्वादनुदाहरणमिति भावः। अनन्तफलत्वं मूलरूपभक्तानामस्तु अवतारतनुभक्तानामन्तवत्फलाङ्गीकारे को विरोधः इत्यत आह अवतार इति। कुत्र चावतारे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.21 7.22।।यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम्। उक्तं च नारदीयेअन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता इति।मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः म.भा.12।334।3 इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु।अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते त्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.21।।ता अपि देवताः मदीयाः तनवःय आदित्ये तिष्ठन्यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरम् (बृ0 उ0 3।7।9) इत्यादिश्रुतिभिः प्रतिपादिताः मदीयाः तनवः। इति अजानन् अपि यो यो यां यां मदीयाम् इन्द्रादिकां तनुं भक्तः श्रद्धया अर्चितुम् इच्छति तस्य तस्य अजानतः अपि मत्तनुविषया एषा श्रद्धा इति अहम् एव अनुसन्धाय ताम् एव अचलां निर्विघ्नां विदधामि अहम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.21।। यः यः कामी यां यां देवतातनुं श्रद्धया संयुक्तः भक्तश्च सन् अर्चितुं पूजयितुम् इच्छति तस्य तस्य कामिनः अचलां स्थिरां श्रद्धां तामेव विदधामि स्थिरीकरोमि।।ययैव पूर्वं प्रवृत्तः स्वभावतो यः यां देवतातनुं श्रद्धया अर्चितुम् इच्छति

───────────────────

【 Verse 7.22 】

▸ Sanskrit Sloka: स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते | लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान् ||

▸ Transliteration: sa tayā śraddhayā yuktas tasyārādhanamīhate | labhate ca tataḥ kāmān mayaiva vihitānhi tān ||

▸ Glossary: saḥ: he; tayā: with that; śraddhayā: with faith; yuktaḥ: endowed; tasya: his; ārādhanaṃ: worship; īhate: endeavors; labhate: obtains; ca: and; tataḥ: from that; kāmān: desires; mayā: by Me; eva: alone; vihitān: bestowed; hi: for; tān: those.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.22 Endowed with such a faith, he endeavors to worship a particular demigod and obtains his desires; In reality, these benefits are granted by Me alone.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.22।।उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धासे युक्त होकर वह मनुष्य (सकामभावपूर्वक) उस देवताकी उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है परन्तु वह कामनापूर्ति मेरे द्वारा विहित की हुई ही होती है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.22।। वह (भक्त) उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उससे मेरे द्वारा विधान किये हुये इच्छित भोगों को निसन्देह प्राप्त करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.22 सः he? तया with that? श्रद्धया with faith? युक्तः endowed? तस्य of it? आराधनम् worship? ईहते engages in? लभते obtains? च and? ततः from that? कामान् desires? मया by Me? एव surely? विहितान् ordained? हि verily? तान् those.Commentary The last two words Hi and Tan are taken as one word? Hitan meaning benefits. This is another interpretation. The devotee who worships the lesser gods attains the objects of his desire (minor psychic powers? etc.). Those objects are ordained by the Lord only as He alone knows exactly the relation between the actions and their results or rewards and as He is the Inner Ruler of all beings. Unwise or undiscriminating people only take recourse to the means of getting these finite rewards which can hardly give entire satisfaction. Pitiable indeed is their lot They have,no power of eniry (VicharaSakti) or right understanding. They get hold of pieces of glass instead of attaining the jewel of the Self? of incalculabe value.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.22. Endowed with that faith, he seeks to worship that deity and therefrom receives his desired objects that are ordained by none but Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.22 If he worships one form alone with real faith, then shall his desires be fulfilled through that only; for thus have I ordained.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.22 Endowed with that faith, he worships that form and thence gets the objects of his desire, granted in reality by Me alone.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.22 Being imbued with that faith, that person engages in worshipping that form, and he gets those very desired results therefrom as they are dispensed by Me alone.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.22 Endowed with that faith, he engages in the worship of that (form) and from it he obtains his desire, these being verily ordained by Me (alone).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.22 See Comment under 7.23

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.22 He, endowed with that faith without obstacles, performs the worship of Indra and other divinities. Thence, i.e., from the worship of Indra and other divinities, who constitute My body, he attains the objects of his desire, which are in reality granted by Me alone. Although he does not know at the time of worship that divinities like Indra, who are his objects of worship, are My body only, and that worship of them is My worship, still, inasmuch as this worship is, in reality, My worship, he attains his objects of desire granted by Me alone.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.22 Yuktah,being endued; taya, with that; sraddhaya, faith, as granted by Me; sah, that person; ihate, engages in; radhanam, i.e. aradhanam, worshipping; tasyah, that form of the deity. And labhate, he gets; tan hi, those very; kaman, desired results; tatah, there-from, from that form of the deity which was worshipped; as vihitan, they are dispensed, meted out; maya eva, by Me alone, who am the omniscient, supreme God, because I am possessed of the knowledge of the apportionment of the results of actions. The meaning his that he surely gets those desired results since they are ordained by God. If the reading be hitan (instead of hi tan), then the beneficence (-hita means beneficent-) of the desired result should be interpreted in a figurative sense, for desires cannot be beneficial to anyone!

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.22।। वह भक्त उस श्रद्धा से युक्त होकर अपने इष्ट देवता की आराधना करता है जिसके फलस्वरूप वह देवता उसकी इच्छा को पूर्ण करता है। परन्तु भगवान् कहते हैं कि वास्तव में कर्मफलदाता वे ही हैं। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमात्मा ही समस्त जगत् का आदि कारण होने से मनुष्य को कर्म करने की और देवताओं को फल प्रदान करने की सार्मथ्य उन्हीं से प्राप्त होती है। इष्टानिष्ट फलों की प्राप्ति से सुख दुखादि का अनुभव अन्तकरण में होता है जिसे आत्मचैतन्य प्रकाशित करता है। उसके बिना इस प्रकार का कोई अनुभव प्राप्त नहीं हो सकता।श्रद्धा के साथ किये हुये पूजन से ईश्वर द्वारा विधान किये हुए नियम के अनुसार फल प्राप्त होता है। यहाँ श्रीकृष्ण अपने परमात्म स्वरूप के साथ तादात्म्य करके कहते हैं वे इष्ट फल मेरे द्वारा ही दिये जाते हैं।अविवेकी लोग अनित्य भोगों की कामना करते हैं इसलिए उन्हें कभी शाश्वत शान्ति प्राप्त नहीं होती अत कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.22।।यो यां देवतातनुं अर्चितुमिच्छति स तया मद्विहितयाऽचलया श्रद्धया युक्तः तस्या देवतातन्वा राधनं आराधनमर्जनमीहते चेष्टते करोति। ततस्तस्या आराधितायाः देवतातन्वाः सकाशादवश्यं कामानीप्सितान् लभते च। हि यस्मान्मया कर्मफलविभागज्ञेन भगवता विहिताः निर्मिताः। अतस्तान् हि स्फुटमेतदिति तु तत्तद्देवतास्वातन्ज्ञत्र्यप्रतिपादकशास्त्रे लोके चास्यास्फुटत्वादाचार्यैर्न व्याख्यातम्। हितानिति पदच्छेदे तु वस्तुतोऽहितानां कामानां हितत्वमौपचारिकं कल्पनीयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.22।।स कामी तया मद्विहितया स्थिरया श्रद्धया युक्तस्तस्या देवतातन्वा राधनं पूजनमीहते निर्वर्तयति। उपसर्गरहितोऽपि राधयतिः पूजार्थः। सोपसर्गत्वे ह्याकारः श्रुयेत। लभते च ततस्तस्या देवतातन्वाः सकाशात्कामानीप्सितांस्तान्पूर्वसंकल्पितान्।हि प्रसिद्धम्। मयैव सर्वज्ञेन सर्वकर्मफलदायिना तत्तद्देवतान्तर्यामिणा विहितांस्तत्तत्फलविपाकसमये निर्मितान् हितान्मनःप्रियानित्यैकपद्यं वा। अहितत्वेऽपि हिततया प्रतीयमानानित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.22।।ततश्च स तया श्रद्धया युक्तः सन् तस्या मूर्तेराराधनं ससाधनं वशीकरणमीहते इच्छति। ततश्च कामान्विषयांल्लभते। मयैव विहितानाज्ञापितान्। हितानीप्सितान्। एतेन सर्वासां देवतानां स्वाज्ञावशवर्तित्वं दर्शितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.22।।ततः स मत्कृतश्रद्धया तस्याऽऽराधनं करोतीत्याह स तयेति। स तया मत्कृतया श्रद्धया युक्तस्तस्या मूर्तेराराधनमीहते करोति। ततः श्रद्धातः स्वशुद्धान्तःकरणतस्तान् कामान् स्वमनोरथरूपान् मयैव विहितान् निर्मितान् अन्यया मदाज्ञां विना देवादीनां न सामर्थ्यम् अतो मयैव निश्चयेन विहिताँल्लभते प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.22।। ततश्च स तयेति। स भक्तस्तया दृढया श्रद्धया तस्यास्तनोराराधनमीहते करोति। ततश्च ये संकल्पिताः कामास्तान्कामान् ततो देवताविशेषाल्लभते किंतु मयैव तत्तद्देवतान्तर्यामिणा विहितान्निर्मितान् हि स्फुटमेव तत्तद्देवतानामपि मदधीनत्वान्मममूर्तित्वाच्चेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.22।।ततश्च स तयेति। ततो मदङ्गभूतादुपास्यदेवात् लभते कामान् मयैवाङ्गिना विहितान्निर्मितान् प्राप्नोति। यद्यप्याराधनकालेऽपि मामेवमवयविनमविजानंस्तामेव भजते स भक्तस्तथापि वस्तुतो मदाराधनत्वात् मन्निर्मितमेव फलं तल्लभते। यथा शरीरं पुरुषदत्तं वस्तुत आत्मदत्तमित्यात्मभजनस्यैव मुख्यत्वं युक्तं शाखिमूलसेचनवदिति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.22।।मेरे द्वारा स्थिर की हुई उस श्रद्धासे युक्त हुआ वह उसी देवताके स्वरूपकी सेवा पूजा करनेमें तत्पर होता है। और उस आराधित देवविग्रहसे कर्मफलविभागके जाननेवाले मुझ सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा निश्चित किये हुए इष्ट भोगोंको प्राप्त करता है। वे भोग परमेश्वरद्वारा निश्चित किये होते हैं इसलिये वह उन्हें अवश्य पाता है यह अभिप्राय है। यहाँपर यदि हितान् ऐसा पदच्छेद करें तो भोगोंमे जो हितत्व है उसको औपचारिक समझना चाहिये क्योंकि वास्तवमें भोग किसीके लिये भी हितकर नहीं हो सकते।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.22।। व्याख्या  स तया श्रद्धया युक्तः ৷৷. मयैव विहितान्हि तान् मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे सम्पन्न हुआ वह मनुष्य उस देवताकी आराधनाकी चेष्टा करता है और उस देवतासे जिस कामनापूर्तिकी आशा रखता है उस कामनाकी पूर्ति होती है। यद्यपि वास्तवमें उस कामनाकी पूर्ति मेरे द्वारा ही की हुई होती है परन्तु वह उसको देवतासे ही पूरी की हुई मानता है। वास्तवमें देवताओंमें मेरी ही शक्ति है और मेरे ही विधानसे वे उनकी कामनापूर्ति करते हैं।जैसे सरकारी अफसरोंको एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि तुमलोग अमुक विभागमें अमुक अवसरपर इतना खर्च कर सकते हो इतना इनाम दे सकते हो। ऐसे ही देवताओंमें एक सीमातक ही देनेकी शक्ति होती है अतः वे उतना ही दे सकते हैं अधिक नहीं। देवताओंमें अधिकसेअधिक इतनी शक्ति होती है कि वे अपनेअपने उपासकोंको अपनेअपने लोकोंमें ले जा सकते हैं। परन्तु अपनी उपासनाका फल भोगनेपर उनको वहाँसे लौटकर पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता 8। 16)।यहाँ मयैव कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें स्वतः जो कुछ संचालन हो रहा है वह सब मेरा ही किया हुआ है। अतः जिस किसीको जो कुछ मिलता है वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है। कारण कि मेरे सिवाय विधान करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अगर कोई मनुष्य इस रहस्यको समझ ले तो फिर वह केवल मेरी तरफ ही खिंचेगा। सम्बन्ध  अब भगवान् उपासनाके अनुसार फलका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.20 7.23।।कामैरित्यादि मामपीत्यन्तम्। ये पुनः स्वेन स्वेनोत्तमादिकामनास्वभावेन विचित्रेण परिच्छिन्नमनसस्ते कामनापहृतचेतनाः (N चेतस)) तत्समुचितामेव ममैवावान्तरतनुं देवताविशेषमुपासते। अतो मत एव कामफलमुपाददते (S पासते)। किं तु तस्यान्तोऽस्ति निजयैव वासनया परिमितीकृतत्त्वात्। अत एवेन्द्रादिभावनातात्पर्येण यागादि कुर्वन्तस्तथाविधमेव फलमुपाददते। मत्प्राप्तिपरास्तु मामेव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.22।।ईहते निर्वर्तयतीत्यर्थः। आराधितदेवताप्रसादात्फलप्राप्तौ किमीश्वरेणेत्याशङ्क्य तस्य सर्वज्ञस्य कर्मफलविभागाभिज्ञस्य तत्तद्देवताधिष्ठातृत्वात्तस्यैव फलदातृत्वमित्याह सर्वज्ञेनेति।एको बहूनां यो विदधाति कामान् इत्यादिश्रुतिमाश्रित्य हि तानिति पदद्वयं व्याचष्टे यस्मादिति। हितानित्येकं पदमिति पक्षं प्रत्याह हितानिति। मुख्यत्वसंभवे किमित्यौपचारिकत्वमित्याशङ्क्याह नहीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.21 7.22।।रामकृष्णादिरूपां भगवत्तनुमिति प्रतीतिनिरासायाह यां यामिति। कुत एतत्अन्तवत्तु फलं तेषां 7।23 इति तद्भक्तानामन्तवत्फलवचनात्। तस्य च ब्रह्मादिग्रहणे सम्भवाद्भगवद्ग्रहणे चाम्सम्भवादिति भावेनाह उक्त चेति। फलस्येति शेषः। गम्यत इति गतिः इत्यादेः प्रश्नस्य परिहाररूपवाक्यसन्दर्भाच्च। बहुत्वादनुदाहरणमिति भावः। अनन्तफलत्वं मूलरूपभक्तानामस्तु अवतारतनुभक्तानामन्तवत्फलाङ्गीकारे को विरोधः इत्यत आह अवतार इति। कुत्र चावतारे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.21 7.22।।यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम्। उक्तं च नारदीयेअन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता इति।मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः म.भा.12।334।3 इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु।अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते त्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.22।।स तया निर्विघ्नया श्रद्धया युक्तः तस्य इन्द्रादेः आराधनं प्रति ईहते चेष्टते ततः मत्तनुभूतेन्द्रादिदेवताराधनात् तान् एव हि स्वाभिलषितान् कामान् मया एव विहितान् लभते।यद्यपि आराधनकाले इन्द्रादयो मदीयाः तनवः तत एव तदर्चनं च मदाराधनम् इति न जानाति तथापि तस्य वस्तुतो मदाराधनत्वाद् आराधकाभिलषितम् अहम् एव विदधामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.22।। स तया मद्विहितया श्रद्धया युक्तः सन् तस्याः देवतातन्वाः राधनम् आराधनम् ईहते चेष्टते। लभते च ततः तस्याः आराधितायाः देवतातन्वाः कामान् ईप्सितान् मयैव परमेश्वरेण सर्वज्ञेन कर्मफलविभागज्ञतया विहितान् निर्मितान् तान् हियस्मात् ते भगवता विहिताः कामाः तस्मात् तान् अवश्यं लभते इत्यर्थः। हितान् इति पदच्छेदे हितत्वं कामानामुपचरितं कल्प्यम् न हि कामा हिताः कस्यचित्।।यस्मात् अन्तवत्साधनव्यापारा अविवेकिनः कामिनश्च ते अतः

───────────────────

【 Verse 7.23 】

▸ Sanskrit Sloka: अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् | देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ||

▸ Transliteration: antavattu phalaṃ teṣāṃ tadbhavatyalpamedhasām | devāndevayajo yānti madbhaktā yānti māmapi ||

▸ Glossary: antavat tu: limited and temporary; phalaṃ: fruits; teṣāṃ: their; tat: that; bhavati: becomes; alpa medhasāṃ: of those of small intelligence; devān: demigods’ planets; devayajaḥ: worshipers of demigods; yānti: achieve; mad: My; bhaktāḥ: devotees; yānti: attain; māṃ: to Me; api: surely

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.23 Men of limited intelligence worship the demigods and their fruits are limited and temporary. Those who worship the demigods go only to the planets of the demigods, but My devotees reach My supreme planet.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.23।।परन्तु उन अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको उन देवताओंकी आराधनाका फल अन्तवाला (नाशवान्) ही मिलता है। देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरेको ही प्राप्त होते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.23।। परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.23 अन्तवत् finite? तु verily? फलम् the fruit? तेषाम् of them? तत् that? भवति is? अल्पमेधसाम् those of small intelligence? देवान् to the gods? देवयजः the worshippers of the gods? यान्ति go to? मद्भक्ताः My devotees? यान्ति go to? माम् Me? अपि also.Commentary The exertion in the two kinds is the same and yet people do not attempt to worship the Supreme Being in order to attain the maximum benefits or the infinite reward (liberation or Moksha). The reward obtained by men of small understandng and petty intellect who worship the minor deities is small? perishable and temporary.Yajnas (Vedic rituals)? Homas (rituals in which oblations are offered into the sacred fire) and Tapas (penance) of various sorts can bestow only temporary rewards on the performer. Liberation from the wheel of transmigration alone will give everlasting bliss and eternal peace.Those who worship Indra and others are Sattvic devotees those who worship Yakshas and Rakshasas (demoniacal beings) are Rajasic devotees and those who worship the Bhutas and Pretas (discarnate spirits) are Tamasic devotees.The knowledge of those who worship the small deities is partial and incomplete. It cannot lead to liberation. (Cf.IX.25)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.23. But, that fruit of those men of poor intellect is finite. Those, who perform sacrifices, aiming at the gods, go to gods, and My devotees go to Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.23 The fruit that comes to men of limited insight is, after all, finite. They who worship the Lower Powers attain them; but those who worship Me come unto Me alone.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.23 But limited is the fruit gained by these men of small understanding. The worshippers of the gods will go to the gods but My devotees will come to Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.23 That result of theirs who are of poor intellect is indeed limited. The worshippers of gods go to the gods. My devotees go to Me alone.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.23 Verily the reward (fruit) that accrues to those men of small intelligence is finite. The worshippers of the gods go to them, but My devotees come to Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.20-23 Kamaih etc. upto man api. On the other hand, those persons, whose minds are conditioned by a variety of their own respective desires for the best and so on (or the desires that may be classified as the best and so on) - they have thier thinking faculty carried away by their desires, and worship a particular deity who possesses nothing but My intermediate body that suits only to those devotees' desires. Hence, they obtain their desired result from Me alone. But, that result has an end of its own, because it is limited by the mental impressions of their own. Therefore those who perform sacrifice etc., with the aim of becming Indra etc., (or of attaining the houses of Indra etc.) gain their desired fruit accordingly. On the other hand, those whose chief aim is to attain Me, they gain Me alone. But, while the Absolute-being is immanent in all, how is it that the fruit achieved by the worshippers of other deities is limited ? The answer is given as :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.23 The men of 'small understanding' means those whose understanding is poor, who worship only Indra and other divinities. The fruit of their worship is small and finite. Why? The worshippers of divinities like Indra go to the divinities. And Indra and other divinities possess limited joy and live only for a limited time. So if they attain eality of enjoyment with them, they also fall down along with them in due course; but My devotees, knowing that their acts are of the nature of My worship, renouncing attachment for finite, fruits, reach Me, having for their purpose the pleasing of Me alone. That is, they never more return to Samsara. For Sri Krsna teaches later on: 'But on reaching Me there is no rirth, O Arjuna' (8.16).

Now Sri Krsna declares: 'But these others (i.e., who worship Indra etc.) regard as insignificant even My incarnations among men and other beings in order to make Myself easy for all to resort to.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.23 Since those non-discriminating men with desires are engaged in disciplines for limited results, therefore, tat phalam, that result; tesam, of theirs; alpamedhasam, who are of poor intellect, of poor wisdom; antavat tu bhavati, is limited, ephemeral, indeed. Deva-yajah, the worshippers of gods; yanti, go; devan, to the gods. Madbhaktah, My devotees; yanti, to; mam api, to Me alone. 'Thus, though the effort needed is the same, they do not resort to me alone for the unlimited result. Alas! they are surely in a pitiable condition.' In this manner the Lord expresses his compassion. 'Why do they not take refuge in Me alone?' The answer is:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.23।। नाशवान् भोगों की इच्छा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य जो कर्म करता है वह अनित्य होने से उसका फल भी क्षणभंगुर ही होता है। स्वर्ण से बने आभूषण स्वर्ण ही होंगे। कार्य का गुणधर्म पूर्णतया कारण पर निर्भर करता है।देशकाल से परिच्छिन्न कर्मों से प्राप्त फल अनित्य ही होगा चाहे वह सुख हो या दुख। सुख का अन्त दुख का प्रारम्भ है। अत जब कोई इच्छा पूर्ण हो जाती है तब यद्यपि क्षणमात्र के लिए सुख का आभास भी होता है परन्तु शीघ्र ही उसके समाप्त होने पर दुख का कटु अनुभव मनुष्य को होता है।भगवान् श्रीकृष्ण सामान्य नियम बताते हैं कि देवपूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं। जिस नियम का जो अधिष्ठाता देवता है या जिस क्षेत्र में जो उत्पादन क्षमता है उसका आह्वान करने पर मनुष्य केवल उसी फल को प्राप्त कर सकता है।इसी प्रकार मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं। परिच्छिन्न भोगों के लिए मनुष्य इतना अधिक प्रयत्न करके अन्त में क्षणिक फल को ही प्राप्त करता है। यदि वही प्रयत्न वह दैवी जीवन जीने में करे तो उसे नित्य आनन्दस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है। किन्तु मन की बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के कारण वह अनात्म उपाधियों से तादात्म्य करके बाह्य वैषयिक जगत् में ही रमता है।विवेकी पुरुष विषयोपभोग की तुच्छता और व्यर्थता को पहचान कर उनसे विरक्त हो जाते हैं। विवेक और वैराग्य से सम्पन्न होकर जब वे आत्मस्वरूप का ध्यान करते हैं तब उन्हें परम आनन्दस्वरूप की वह अनुभूति होती है जो शरीर मन और बुद्धि तीनों के परे है नित्य है।गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने जो मैं शब्द का प्रयोग किया है वह उस अनन्त तत्त्व को सूचित करता है जो व्यष्टि और समष्टि का अधिष्ठान है। अत वे कहते हैं कि मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं तब उनका तात्पर्य ऐतिहासिक पुरुष देवकी पुत्र कृष्ण से नहीं वरन् चैतन्यस्वरूप पुरुष से होता है। इस दृष्टि से आत्मवित् आत्मस्वरूप ही बन जाता है। यही भगवान् श्रीकृष्ण के कथन का वास्तविक अभिप्राय है।तब क्या कारण है कि सामान्य जन आपको प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करता उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.23।।समानेऽप्यायासेऽन्तवत्फलासाधने तत्तद्देवताराधने प्रवर्तन्ते नतु मामेव भगवन्तं सर्वात्मानं तत्तत्कर्मफलप्रदं वासुदेवमनन्तफलाय प्रतिपद्यन्त इत्यहो तेषामल्पबुद्धितेत्यनुक्रोशं दर्शयन्नाह अन्तवदिति। तेषां तत्तद्देवताराधनापराणामल्पमेधसांअथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम् इति श्रुतेरल्पे द्वैते मेधा बुद्धिर्येषां ते भेदबुद्धय इत्यर्थः। अल्पेऽन्तवत्फले बुद्धिर्येषामिति वा अल्पे परिच्छिन्ने देवतान्तरे बुद्धिर्येषामिति वा अनल्पानन्तफलाय वासुदेव एव भजनीयो नतु अन्तवत्फलाय देवतान्तरमिति विवेक्तुमक्षमत्वात्स्वल्पा बुद्धिर्येषामिति वा फलमन्तवद्विनासि तु एव भवति तन्मया दत्तमपि। तदेवाह। यतो देवयज इन्द्राद्यर्चका देवानन्तवतो यान्ति गच्छन्ति। मद्भक्तास्वार्तादयस्त्रयोऽपि तत्तदीप्सितं लब्धवा क्रमेण मां वासुदेवं सच्चिदानन्दघनमनन्तं मोक्षाभिधेयमपि यान्ति गच्छन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.23।।यद्यपि सर्वा अपि देवताः सर्वात्मनो ममैव तनवस्तदाराधनमपि वस्तुतो मदाराधनमेव सर्वत्रापि च फलदातान्तर्याम्यहमेव तथापि साक्षान्मद्भक्तानां च तेषां च वस्तुविवेकाविवेककृतं फलवैषम्यं भवतीत्याह अल्पमेधसां मन्दप्रज्ञत्वेन वस्तुविवेकासमर्थानां तेषां तत्तद्देवताभक्तानां तन्मया विहितमपि तत्तद्देवताराधनजं फलं अन्तवदेव विनाश्येव नतु मद्भक्तानां विवेकिनामिवानन्तं फलं तेषामित्यर्थः। कुत एवं यतो देवानिन्द्रादीनन्तवत एव देवजयो मदन्यदेवताराधनपरा यान्ति प्राप्नुवन्ति। मद्भक्तास्तु त्रयः सकामाः प्रथमं मत्प्रसादादभीष्टान्कामान्प्राप्नुवन्ति। अपिशब्दप्रयोगात्ततो मदुपासनापरिपाकान्मामनन्तमानन्दघनमीश्वरमपि यान्ति प्राप्नुवन्ति। अतः समानेऽपि सकामत्वे मद्भक्तानामन्यदेवताभक्तानां च महदन्तरं तस्मात्साधूक्तमुदाराः सर्व एवैत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.23।।अल्पमेधसांअथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यन्मनुतेऽन्यद्विजानाति तदल्पम् इति श्रुतेः द्वैतमल्पं तत्रैव मेधा येषां ते। बाह्यार्थाभिलाषिणामित्यर्थः। तेषां तत्फलमन्तवत् सर्वस्य बाह्यार्थस्यान्तवत्त्वादेव। तुशब्दोऽभेदेनेश्वरभक्तेभ्यो विभेदार्थः। यतो देवयजो देवान्यजन्ते इति देवयजस्ते देवानन्तयुक्तानेव यान्ति। एवं यक्षरक्षोभक्ता यक्षादीनेव यान्ति। भूतप्रेतभक्ताश्च भूतादीनेवेत्यपि द्रष्टव्यम्। मद्भक्तास्तु मामेवानन्तं यान्ति। अतस्तेऽनन्तफलभाज इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.23।।तर्हि त्वन्निर्मितफलाप्त्या चोत्तमत्वमेव तत्फलस्य कथं न इत्यत आह अन्तवत्त्विति। तु पुनः मन्निर्मितमपि फलं तेषामल्पमतिमतां भक्तिं विहाय कामपरत्वात् अन्तवत् विनाशयुक्तं भवतीत्यर्थः। तच्छब्देन तद्बुद्ध्यनुसारेण मया तत्फलं विधीयत इति व्यज्यते। ननु देवा अपि त्वदंशास्तद्भजने कथं नोत्तमफलम् इत्यत आह देवानिति देवयजः৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ पूर्वोक्तप्रकारेण स्वकामितफलाप्त्यर्थं देवभजनकर्त्तारः। अथवा देवत्वेन तद्भजनकर्त्तारः न तु मदंशत्वेन स्फुरितस्तमानाः৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷. अतो देवान् यान्ति मत्सायुज्यकामाभावे प्राप्नुवन्ति। कामनायां तु तदेव प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। अन्यदेवेषु देवत्वेन भजनकर्त्तारस्तत्सायुज्यमेव प्राप्नुवन्ति। कामनायां तु तदपि न प्राप्नुवन्त्यतः कामनयाऽपि

Chapter 7 (Part 15)

मद्भजनमुत्तममित्याह मद्भक्ता इति। मद्भक्ताः मद्भजनकर्तारो मामपि यान्ति। कामनयाऽपि प्रवृत्ताः पूर्वोक्तप्रकारेण। मामपि प्राप्नुवन्ति। अतएवउदाराः सर्व एवैते 7।18 इति पूर्वमुक्तम्। अतोऽग्रे तेषां मोक्षः। अक्षरसायुज्यमपि प्राप्नुवन्ति। अतएव हरिवंशेअपत्यं द्रविणं दारा हारा हर्म्यं हया गजाः। सुखानि स्वर्गमोक्षौ च न दूरे हरिभक्तितः।।इति। इदमेवापिशब्देन व्यज्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.23।।तदेव यद्यपि सर्वा अपि देवता ममैव मूर्तयः अतस्तदाराधनमपि वस्तुतो मदाराधनमेव तत्तत्फलदातापि चाहमेव तथापि साक्षान्मद्भक्तानां च तेषां फलवैषम्यं भवतीत्याह अन्तवत्त्विति। अल्पमेधसां परिच्छिन्नदृष्टीनां मया दत्तमपि तत्फलमन्तवद्विनाशि भवति। तदेवाह। देवान्यजन्तीति देवयजः ते देवानन्तवतो यान्ति। मद्भक्तास्तु मामनाद्यन्तं तं परमानन्दं प्राप्नुवन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.23।।अतो भावभेदात्फलभेद इत्याह अन्तवदिति। तुशब्दो भेदं सूचयति। यतोऽल्पमेधसां इन्द्रादिमात्राङ्गयाजिनां शाखाफलपत्रान्यतरसेचकानामिव तेषां फलमल्पमन्तवद्विनाशि च भवति वदति चदेवान्देवयजो यान्ति इत्यादौ तत्तद्देवसायुज्यं चाप्याप्तव्यमेवेति। यागे तु श्रौते देवानां भगवदङ्गभूतत्वज्ञानपूर्वकमाराधनमिति न विरोधः। भक्तौ तु केवलं तदङ्गिन एवाराधने सर्वाराधनं भवतीति भावेन मूलरूपत्वादिति ज्ञेयम् किंबहुना यो यं भजते श्रद्धया तं तमेवतीत्यभिप्रायेण मद्भक्ता यान्ति मामपीत्युक्तम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.23।।क्योंकि वे कामी और अविवेकी पुरुष विनाशशील साधनकी चेष्टा करनेवाले होते हैं इसलिये उन अल्पबुद्धिवालोंका वह फल नाशवान् विनाशशील होता है। देवयाजी अर्थात् जो देवोंका पूजन करनेवाले हैं वे देवोंको पाते हैं और मेरे भक्त मुझको ही पाते हैं। अहो बड़े दुःखकी बात है कि इस प्रकार समानपरिश्रम होनेपर भी लोग अनन्त फलकी प्राप्ति के लिये केवल मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें नहीं आते। इस प्रकार भगवान् करुणा प्रकट करते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.23।। व्याख्या  अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् देवताओंकी उपासना करनेवाले अल्पबुद्धियुक्त मनुष्योंको अन्तवाला अर्थात् सीमित और नाशवान् फल मिलता है। यहाँ शङ्का होती है कि भगवान्के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिये फिर उनको अनित्य फल क्यों मिलता है इसका समाधान यह है कि एक तो उनमें नाशवान् पदार्थोंकी कामना है और दूसरी बात वे देवताओंको भगवान्से अलग मानते हैं। इसलिये उनको नाशवान् फल मिलता है। परन्तु उनको दो उपायोंसे अविनाशी फल मिल सकता है एक तो वे कामना न रखकर (निष्कामभावसे) देवताओंकी उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल जायगा और दूसरा वे देवताओंको भगवान्से भिन्न न समझकर अर्थात् भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायगी तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो सकती है।यहाँ तत् कहनेका तात्पर्य है कि फल तो मेरा विधान किया हुआ ही मिलता है पर कामना होनेसे वह नाशवान् हो जाता है।यहाँ अल्पमेधसाम् कहनेका तात्पर्य है कि उनको नियम तो अधिक धारण करने पड़ते हैं तथा विधियाँ भी अधिक करनी पड़ती हैं पर फल मिलता है सीमित और अन्तवाला। परन्तु मेरी आराधना करनेमें इतने नियमोंकी जरूरत नहीं है तथा उतनी विधियोंकी भी आवश्यकता नहीं है पर फल मिलता है असीम और अनन्त। इस तरह देवताओंकी उपासनामें नियम हों अधिक फल हो थोड़ा और हो जाय जन्ममरणरूप बन्धन और मेरी आराधनामें नियम हों कम फल हो अधिक और हो जाय कल्याण ऐसा होनेपर भी वे उन देवताओंकी उपासनामें लगते हैं और मेरी उपासनामें नहीं लगते। इसलिये उनकी बुद्धि अल्प है तुच्छ है।देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं। यहाँ अपि पदसे यह सिद्ध होता है कि मेरी उपासना करनेवालोंकी कामनापूर्ति भी हो सकती है और मेरी प्राप्ति तो हो ही जाती है अर्थात् मेरे भक्त सकाम हों या निष्काम वे सबकेसब मेरेको ही प्राप्त होते हैं। परन्तु भगवान्की उपासना करनेवालोंकी सभी कामनाएँ पूरी हो जायँ यह नियम नहीं है। भगवान् उचित समझें तो पूरी कर भी दें और न भी करें अर्थात् उनका हित होता हो तो पूरी कर देते हैं और अहित होता हो तो कितना ही पुकारनेपर तथा रोनेपर भी पूरी नहीं करते।यह नियम है कि भगवान्का भजन करनेसे भगवान्के नित्यसम्बन्धकी स्मृति हो जाती है क्योंकि भगवान्का सम्बन्ध सदा रहनेवाला है। अतः भगवान्की प्राप्ति होनेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना पड़ता यद्गत्वा न निवर्तन्ते (15। 6)। परन्तु देवताओंका सम्बन्ध सदा रहनेवाला नहीं है क्योंकि वह कर्मजनित है। अतः देवतालोककी प्राप्ति होनेपर संसारमें लौटकर आना ही पड़ता है क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (9। 21)।मेरा भजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं इसी भावको लेकर भगवान्ने अर्थार्थी आर्त जिज्ञासु और ज्ञानी इन चारों प्रकारके भक्तोंको सुकृती और उदार कहा है (7। 16 18)।यहाँ मद्भक्ता यान्ति मामपि का तात्पर्य है कि जीव कैसे ही आचरणोंवाला क्यों न हो अर्थात् वह दुराचारीसेदुराचारी क्यों न हो आखिर है तो मेरा ही अंश। उसने केवल आसक्ति और आग्रहपूर्वक संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया है। अगर संसारकी आसक्ति और आग्रह न हो तो उसे मेरी प्राप्ति हो ही जायगी।विशेष बातसब कुछ भगवत्स्वरूप ही है और भगवान्का विधान भी भगवत्स्वरूप है ऐसा होते हुए भी भगवान्से भिन्न संसारकी सत्ता मानना और अपनी कामना रखना ये दोनों ही पतनके कारण हैं। इनमेंसे यदि कामनाका सर्वथा नाश हो जाय तो संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जायगा और यदि संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जाय तो कामना मिट जायगी। फिर मात्र क्रियाओँके द्वारा भगवान्की सेवा होने लग जायगी। अगर संसारका भगवत्स्वरूप दीखना और कामनाका नाश होना दोनों एक साथ हो जायँ तो फिर कहना ही क्या है सम्बन्ध  यद्यपि देवताओंकी उपासनाका फल सीमित और अन्तवाला होता है फिर भी मनुष्य उसमें क्यों उलझ जाते हैं भगवान्में क्यों नहीं लगते इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.20 7.23।।कामैरित्यादि मामपीत्यन्तम्। ये पुनः स्वेन स्वेनोत्तमादिकामनास्वभावेन विचित्रेण परिच्छिन्नमनसस्ते कामनापहृतचेतनाः (N चेतस)) तत्समुचितामेव ममैवावान्तरतनुं देवताविशेषमुपासते। अतो मत एव कामफलमुपाददते (S पासते)। किं तु तस्यान्तोऽस्ति निजयैव वासनया परिमितीकृतत्त्वात्। अत एवेन्द्रादिभावनातात्पर्येण यागादि कुर्वन्तस्तथाविधमेव फलमुपाददते। मत्प्राप्तिपरास्तु मामेव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.23।।प्रेक्षापूर्वकारिणि कामानां हितत्वाभावे हेतुमाह यस्मादिति। किञ्च ये कामिनस्ते न विवेकिनस्ततश्चाविवेकपूर्वकत्वात्कामानां कुतो हितत्वाशङ्केत्याह अविवेकिन इति। कामानामनन्तफलत्वेन हितत्वमाशङ्क्याह अत इति। तेषामविवेकपूर्वकत्वमतःशब्दार्थः। तुशब्दोऽवधारणार्थः। कामफलस्य विनाशित्वेकिमिति कामनिष्ठत्वं जन्तूनामित्याशङ्क्य प्रज्ञामान्द्यादित्याह अल्पेति। किं तर्हि साधनमनन्तफलायेत्याशङ्क्य भगवद्भक्तिरित्याह मद्भक्ता इति। अक्षरार्थमुक्त्वा श्लोकस्य तात्पर्यार्थमाह एवमिति। देवताप्राप्तौ चेति शेषः। मामवेत्यादौ देवताविशेषं प्रपद्यन्तेऽन्तवत्फलायेति वक्तव्यम्। उक्तवैपरीत्ये कारणमविवेकातिरिक्तं नास्तीत्यभिप्रेत्याह अहो खल्विति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.23।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.23।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.23।।तेषाम् अल्पमेधसाम् अल्पबुद्धीनाम् इन्द्रादिमात्रयाजिनां तदाराधनफलं स्वल्पम् अन्तवत् च भवति। कुतः देवान् देवयजो यान्ति यत इन्द्रादीन् देवान् तद्याजिनो यान्ति। इन्द्रादयो हि परिच्छिन्नभोगाः परिमितकालवर्तिनश्च। ततः तत्सायुज्यं प्राप्ताः तैः सह प्रच्यवन्ते।मद्भक्ता अपि तेषाम् एव कर्मणां मदाराधनरूपतां ज्ञात्वा परिच्छिन्नफलसङ्गं त्यक्त्वा मत्प्रीणनैकप्रयोजनाः माम् एव प्राप्नुवन्ति न च पुनर्निवर्तन्तेमामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते (गीता 8।16) इति वक्ष्यते।इतरे तु सर्वसमाश्रयणीयत्वाय मम मनुष्यादिषु अवतारम् अपि अकिञ्चित्करं कुर्वन्ति इत्याह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.23।। अन्तवत् विनाशि तु फलं तेषां तत् भवति अल्पमेधसां अल्पप्रज्ञानाम्। देवान्देवयजो यान्ति देवान् यजन्त इति देवयजः ते देवान् यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि। एवं समाने अपि आयासे मामेव न प्रपद्यन्ते अनन्तफलाय अहो खलु कष्टं वर्तन्ते इत्यनुक्रोशं दर्शयति भगवान्।।किंनिमित्तं मामेव न प्रपद्यन्ते इत्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.24 】

▸ Sanskrit Sloka: अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय: | परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ||

▸ Transliteration: avyaktaṃ vyaktimāpannaṃ manyante māmabuddhayaḥ | paraṃ bhāvamajānanto mamāvyayam anuttamam ||

▸ Glossary: avyaktaṃ: nonmanifested; vyaktiṃ: personality; āpannaṃ: achieved; manyante: think; māṃ: unto Me; abuddhayaḥ: less intelligent persons; paraṃ: supreme; bhāvaṃ: state of being; ajānantaḥ: without knowing; mama: My; avyayaṃ: imperishable; anuttamaṃ: the finest.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.24 Unintelligent men, who do not know Me perfectly, think that I, the supreme personality of godhead, the Bhagavān, who was impersonal before, have become a human being now. They do not know that I am imperishable and supreme, even when I assume the body.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.24।।बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त (मनइन्द्रियोंसे पर) मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर धारण करनेवाला मानते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.24।। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम (सर्वोत्तम) अव्यय परम भाव को न जानते हुए मुझ अव्यक्त को व्यक्त मानते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.24 अव्यक्तम् the unmanifested? व्यक्तिम् to manifestation? आपन्नम् come to? मन्यन्ते think? माम् Me? अबुद्धयः the foolish? परम् the highest? भावम् nature? अजानन्तः not knowing? मम My? अव्ययम् immutable? अनुत्तमम् most excellent.Commentary The ignorant take Lord Krishna as a common mortal. They think that He has taken a body like ordinary human beings from the unmanifested state on account of the force of Karma of the previous birth. They have no knowledge of His higher? imperishable and selfluminous nature as the Highest Self. They think that He has just now come into manifestation? though He is selfexistent? eternal? beginningless? endless? birthless? deathless? changeless? infinite and unmanifest.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.24. The men of poor intellect, are not conscious of the higher, changeless and supreme nature of Mine; and hence, they regard Me, the Unmanifest, to be a manifest one.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.24 The ignorant think of Me, who am the Unmanifested Spirit, as if I were really in human form. They do not understand that My Superior Nature is changeless and most excellent.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.24 Not knowing My higher nature, immutable and unsurpassed, the ignorant think of Me as an unmanifest entity who has now become manifest.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.24 The unintelligent, unaware of My supreme state which is immutable and unsurpassable, think of Me as the unmanifest that has become manifest.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.24 The foolish think of Me, the Unmanifest, as having manifestation, knowing not My higher, immutable and most excellent nature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.24 Avyaktam etc. Becuase of their poor intellect, these [worshippers of other deities] do not at all recognise the unmanifest and ultimately true nature of Mine. On the contrary, they conceive Me merely as one, possessing only a manifest form with a particular knowledge and a particular innage nature, all suitable to their own desires. [They think] not otherwise. That is why, no name or form [of a deity] is insisted upon [by the Lord].

However, this is the established view [of the teachers of the school] in this regard : If a person holds fast to a specific form of a deity in order to get rid of desires, that [itself] results in his becoming pure and emancipated. If the case is reversed, [the result] would be a contrary one.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.24 Ignorant people do not know My higher nature, immutable and unsurpassed. They do not know that it is I, who is worshipped through all rites, who is the Lord of all, and whose nature is beyond speech and mind, that has incarnated as the son of Vasudeva, without abandoning My divine nature, out of My supreme compassion and parental love for those who resort to Me and in order that I may be the refuge of all. They consider Me as only a worldly prince who was not manifest before and who has now become manifest by Karma and has secured a special form. Therefore, they do not resort to Me, nor do they worship Me.

Why is He not manifest (to them)? Sri Krsna says:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.24 Abuddhayah, the unintelligent, the non-discriminating ones; ajanantah, unaware; mama, of My; param, supreme; bhavam, state, My reality as the supreme Self; which is avyayam, immutable, undecaying; and anuttanam, unsurpassable; manyante, think; mam, of Me; as avyaktam, the unmanifest, the invisible; apannam, that has become; vyaktim, manifest, visible, at present [At present, after being embodied as an Incarnation.]-though I am the ever well-known God. They think so because they are unaware of My reality. This is the idea. What is the reason for their ignorance? This is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.24।। समस्त नामरूपों की वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि में प्रकाशित हो रहे परम सत्य को ग्रहण करने की विवेकसार्मथ्य जिनमें नहीं है वे लोग अव्यय अविनाशी आत्मतत्त्व का सााक्षात् नहीं कर पाते। अनित्य दृश्यमान जगत् में अत्यन्त आसक्ति के कारण वे यह नहीं जान पाते कि यह सम्पूर्ण नामरूपमय जगत् सूत्र में मणियों के समान परमात्मा में पिरोया हुआ है।जिस चैतन्य के प्रकाश में सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित हो रहा है उस परम सत्य को ही यहाँ अव्यक्त शब्द से इंगित किया गया है। इस शब्द का लक्ष्यार्थ समझना आवश्यक है। जो वस्तु इन्द्रियगोचर है या मन और बुद्धि के द्वारा जानी जा सकती है जैसे भावना या विचार वह व्यक्त कहलाती है। अत इन तीनों उपाधियों के द्वारा जिसे जाना नहीं जा सकता वह वस्तु अव्यक्त है।आत्मतत्त्व ही अव्यक्त हो सकता है क्योंकि वही एकमात्र चेतन तत्त्व है जिसके कारण इन्द्रियां मन और बुद्धि स्वविषयों को ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आत्मा इन सबका द्रष्टा है और इसलिए कभी दृश्यरूप में नहीं जाना जा सकता। वह अव्यक्त है।बहिर्मुखी प्रवृत्ति के लोग केवल स्थूल भौतिक रूप को ही देख पाते हैं। अविवेक के कारण वे गुरु अथवा अवतार के शरीर को और सार्मथ्य को देखकर उतने मात्र को ही सनातन सत्य समझ लेते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि चित्त की एकाग्रता के लिए अथवा उपासना के लिए किसी उपास्य की प्रतीक या प्रतिमा के रूप में आवश्यकता होती है किन्तु वह प्रतिमा स्वयं परमार्थ सत्य नहीं हो सकती। यदि वही सत्य वस्तु होती तो पाषाण से मूर्ति बनाने के पश्चात् या गुरु के पास पहुँचने मात्र से साधक को सत्य की प्राप्ति हो जाने से उसे और कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती मूर्ति पूजा का प्रयोजन चित्त की शुद्धि एवं एकाग्रता प्राप्त करना है जिसके द्वारा ध्यान का अभ्यास करके आत्मा का साक्षात् अनुभव किया जा सकता है।यह श्लोक स्पष्ट रूप से हमें बताता है कि बोतल को औषधि सममझना शरीर को ही गुरु और मूर्ति को ही भगवान् समझ लेना व्यर्थ है सभी श्वेत काष्ठ चन्दन नहीं और आकाश में प्रत्येक चमकीली वस्तु तारा नहीं होती। हो सकता है कि किसी ऊँचे स्तम्भ से आ रहे प्रकाश को देखकर अतिमूढ़ पुरुष उसे सूर्य समझ ले परन्तु कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति उसकी धारणा को गम्भीरता से नहीं लेगा। अवतार का सिद्धांत हिन्दू धर्म में स्वीकार किया जाता है। किसीनकिसी मात्रा में प्रत्येक व्यक्ति ही अवतार कहा जा सकता है। एक ही सत्य सर्वत्र सबमें व्याप्त है। मन और बुद्धि की उपाधियों में वह व्यक्त होता है। जितना ही अधिक शुद्ध और स्थिर अन्तकरण होगा उतना ही अधिक चैतन्य का प्रकाश उसमें व्यक्त होगा।जिस पुरुष का अन्तकरण अत्यन्त शुद्ध एवं स्थिर होता है और जिसने अपरा प्रकृति पर पूर्ण विजय पा ली होती है वह ऋषि मुनि या पैगम्बर कहलाता है। ये पुरुष आत्मस्वरूप को पहचानकर कि वही भूतमात्र की आत्मा है उसमें स्थित होकर दिव्य जीवन जीते हैं। उनके शरीर मन और बुद्धि को ही परम सत्य समझना ऐसी ही त्रुटि है जैसे कि तरंगों को ही समुद्र समझ लेना है यही कारण है कि भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ ऐसे अविवेकी लोगों के लिए अबुद्धय जैसे कठोर शब्द का प्रयोग करते हैं।यह अज्ञान किस निमित्त से है इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.24।।तर्हि सर्वेऽपि देवतान्तरभजनं विहाय त्वामेव कुतो न प्रतिपद्यन्त इत्याशङ्क्य मदप्रतिपत्तौ मत्परमेश्वरभावाज्ञानमेव निमित्तमित्याह। अव्यक्तमप्रकाशं लीलाविग्रहग्रहणात्पूर्वं इदानीं तद्ग्रहणावस्थायां व्यक्तिमापन्नं प्रकाशमागतं मां मन्यन्ते अबुद्धयो विवेकहीनाः। अबुद्धय इत्येतदुक्तं विवृणोति। ममाव्ययं व्ययरहितमनुत्तमं निरतिशयं परं भावं परमात्मस्वरुपं सोपाधिनिरुपाध्यात्मकमजानन्तोऽविवेकिनो नित्यसिद्धमीश्वरमपि सन्तं मां पूर्वमसन्तमधुनैवोत्पन्नं मन्यन्ते इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.24।।एवं भगवद्भजनस्य सर्वोत्तमफलत्वेऽपि कथं प्रायेण प्राणिनो भगवद्विमुखा इत्यत्र हेतुमाह भगवान् अव्यक्तं देहग्रहणात्प्राक् कार्याक्षमत्वेन स्थितमिदानीं वसुदेवगृहे व्यक्तिं भौतिकदेहावच्छेदेन कार्यक्षमतां प्राप्तं किंचिज्जीवमेव मन्यन्ते मामीश्वरमप्यबुद्धयो विवेकशून्याः। अव्यक्तं सर्वकारणमपि मां व्यक्तिं कार्यरूपतां मत्स्यकूर्माद्यनेकावताररूपेण प्राप्तिमिति वा। कथं ते जीवास्त्वां न विचिन्वन्ति। तत्राबुद्धय इत्युक्तं हेतुं विवृणोति परं सर्वकारणरूपमव्ययं नित्यं मम भावं स्वरूपं सोपाधिकजानन्तस्तथा निरुपाधिकमप्यनुत्तमं सर्वोत्कृष्टमनतिशयाद्वितीयपरमानन्दघनमनन्तं मम स्वरूपजानन्तो जीवानुकारिकार्यदर्शनाज्जीवमेव कंचिन्मां मन्यन्ते ततो मामीश्वरत्वेनाभिमतं विहाय प्रसिद्धं देवतान्तरमेव भजन्ते। ततश्चान्तवदेव फलं प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। अग्रे च वक्ष्यतेअवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.24।।एवं तर्हि कुतस्त्वामेव सर्वे न प्रतिपद्यन्त इत्याशङ्क्याज्ञानादित्याह अव्यक्तमिति। अव्यक्तं सर्वोपाधिशून्यत्वेनास्पष्टमपि वासुदेवशरीरेण व्यक्तिमापन्नमस्मदादिवच्छरीराभिमानिनं मामबुद्धयो मन्यन्ते। यतो मम परं भावं परत्वमुत्कृष्टत्वमजानन्तः। उत्कृष्टत्वमेव विशिनष्टि। अव्ययं न व्येतीत्यव्ययमविनाशिनम्। अनुत्तमं यस्मादन्यदुत्कृष्टं च नास्ति। निरतिशयमखण्डैश्वर्यरूपमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.24।।तर्हि कथं न सर्वे त्वामेव भजन्ति इत्यत आह अव्यक्तमिति। अबुद्धयः कामहृतज्ञाना अव्यक्तं न विद्यते व्यक्तो लौकिकवत् प्रकटो व्यवहारो यस्य व्यक्तिर्जात्यादिर्वा यस्य तादृशं पुरुषोत्तमं व्यक्तिमापन्नं मनुष्यादिभावेन जगति प्रकटं लौकिकत्वेन अन्यदेवसमं मनुष्यादिसमं वा मन्यन्ते। कुतः इत्याकाङ्क्षायामाह परमिति। मम पुरुषोत्तमस्य अव्ययं नाशरहितं लीलात्मकं केषुचित्। भाग्यवत्सु प्रकटीभूय तद्रसपोषार्थं तत्समानाकारेण लीलारूपमजानन्तः। किञ्च अनुत्तमं न विद्यते उत्तमो यस्मात्तादृशं परं भावंपुरुषोत्तमात्मकमजानन्तो मां तथा मन्यन्ते। अतः स्वकामितफलक्षिप्रप्रसादार्थमन्यदेवता एव भजन्ति न तु मामित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.24।। ननु च समाने प्रयासे महति च फलविशेषे सति सर्वेऽपि किमिति देवान्तरं हित्वा त्वामेव न भजन्ति तत्राह अव्यक्तमिति। अव्यक्तं प्रपञ्चातीतं मां व्यक्तिं मनुष्यमत्स्यकूर्मादिभावं प्राप्तमल्पबुद्धयो मन्यन्ते। तत्र हेतुः। मम परं भावं स्वरूपमजानन्तः। कथंभूतम्। अव्ययं नित्यम्। न विद्यत उत्तमो यस्मात्तं भावं। अतो जगद्रक्षार्थं लीलयाविष्कृतनानाविशुद्धोर्जितसत्त्वमूर्तिं मां परमेश्वरं स्वकर्मनिर्मितभौतिकदेहं देवतान्तरसमं पश्यन्तो मन्दमतयो मां नातीवाद्रियन्ते प्रत्युत क्षिप्रफलं देवतान्तरमेव भजन्ति ते चोक्तप्रकारेणान्तवत्फलं प्राप्नुवन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.24।।मद्भजने देवान्तरभजने च तैषां मत्स्वरूपमाहात्म्याज्ञानमेव हेतुरित्याह अव्यक्तमिति। यतोऽक्षरमैश्वर्यं अप्रकटं वा व्यक्तिरहितं वा मानुषलोके स्वेच्छया स्वगताशेषालौकिकसौन्दर्यं दुर्विभाव्यं व्यक्तिमापन्नं निराकारं मन्यन्ते वा मानयन्ति प्राकृतं व्यक्तिमापन्नं वा मन्यन्तेऽबुद्धयोऽतः तथा मानने हेतुः मम सदानन्दमात्रस्याचिन्त्यैश्वर्यस्य परं भावमंशांशिभावेनावस्थितिभावमानन्दमात्रत्वलक्षणं वाऽजानन्त इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.24।।वे मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें क्यों नहीं आते सो बतलाते हैं मेरे अविनाशी निरतिशय परम भावको अर्थात् परमात्मस्वरूपको न जाननेवाले बुद्धिरहित विवेकहीन मनुष्य मुझको यद्यपि मैं नित्यप्रसिद्ध सबका ईश्वर हूँ तो भी ऐसा समझते हैं कि यह पहले प्रकट नहीं थे अब प्रकट हुए हैं। अभिप्राय यह कि मेरे वास्तविक प्रभावको न समझनेके कारण वे ऐसा मानते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.24।। व्याख्या  अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं ৷৷. ममाव्ययमनुत्तमम् जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरेमें श्रद्धाभक्ति नहीं है वे अल्पमेधाके कारण अर्थात् समझकी कमीके कारण मेरेको साधारण मनुष्यकी तरह अव्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् जन्मनेमरनेवाला मानते हैं। मेरा जो अविनाशी अव्ययभाव है अर्थात् जिससे बढ़कर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता और जो देश काल वस्तु व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत सदा एकरूप रहनेवाला निर्मल और असम्बद्ध है ऐसे मेरे अविनाशी भावको वे नहीं जानते और मेरा अवतार लेनेका जो तत्त्व है उसको नहीं जानते। इसलिये वे मेरेको साधरण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नहीं करते प्रत्युत देवताओंकी उपासना करते हैं।अबुद्धयः पदका यह अर्थ नहीं है कि उनमें बुद्धिका अभाव है प्रत्युत बुद्धिमें विवेक रहते हुए भी अर्थात् संसारको उत्पत्तिविनाशशील जानते हुए भी इसे मानते नहीं यही उनमें बुद्धिरहितपना है मूढ़ता है।दूसरा भाव यह है कि कामनाको कोई रख नहीं सकता कामना रह नहीं सकती क्योंकि कामना पहले नहीं थी और कामनापूर्तिके बाद भी कामना नहीं रहेगी। वास्तवमें कामनाकी सत्ता ही नहीं है फिर भी उसका त्याग नहीं कर सकते यही अबुद्धिपना है।मेरे स्वरूपको न जाननेसे वे अन्य देवताओंकी उपासनामें लग गये और उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी कामनामें लग जानेसे वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरेसे विमुख हो गये। यद्यपि वे मेरेसे अलग नहीं हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नहीं हो सकता तथापि कामनाके कारण ज्ञान ढक जानेसे वे देवताओंकी तरफ खिंच जाते हैं। अगर वे मेरेको जान जाते तो फिर केवल मेरा ही भजन करते।(1) बुद्धिमान् मनुष्य वे होते हैं जो भगवान्के शरण होते हैं। वे भगवान्को ही सर्वोपरि मानते हैं।(2) अल्पमेधावाले मनुष्य वे होते हैं जो देवताओंके शरण होते हैं। वे देवताओंको अपनेसे बड़ा मानते हैं जिससे उनमें थोड़ी नम्रता सरलता रहती है।(3) अबुद्धिवाले मनुष्य वे होते हैं जो भगवान्को देवताजैसा भी नहीं मानते किन्तु साधारण मनुष्यजैसा ही मानते हैं। वे अपनेको ही सर्वोपरि सबसे बड़ा मानते हैं (गीता 16। 14 15)। यही तीनोंमें अन्तर है।परं भावमजानन्तः का तात्पर्य है कि मैं अज रहता हुआ अविनाशी होता हुआ और लोकोंका ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृतिको वशमें करके योगमायासे प्रकट होता हूँ इस मेरे परमभावको बुद्धिहीन मनुष्य नहीं जानते।अनुत्तमम् कहनेका तात्पर्य है कि पन्द्रहवें अध्यायमें जिसको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम बताया है अर्थात् जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नहीं ऐसे मेरे अनुत्तम भावको वे नहीं जानते।विशेष बातइस (चौबीसवें) श्लोकका अर्थ कोई ऐसा करते हैं कि (ये) अव्यक्तं मां व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः अर्थात् जो सदा निराकार रहनेवाले मेरेको केवल साकार मानते हैं वे निर्बुद्धि हैं क्योंकि वे मेरे अव्यक्त निर्विकार और निराकार स्वरूपको नहीं जानते। दूसरे कोई ऐसा अर्थ करते हैं कि (ये) व्यक्तिमापन्नं माम् अव्यक्तं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः अर्थात् मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हुआ हूँ ऐसे मेरेको केवल निराकार मानते हैं वे निर्बुद्धि हैं क्योंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भावको नहीं जानते।उपर्युक्त दोनों अर्थोंमेंसे कोई भी अर्थ ठीक नहीं है। कारण कि ऐसा अर्थ माननेपर केवल निराकारको माननेवाले साकाररूपकी और साकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे और केवल साकार माननेवाले निराकाररूपकी और निराकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे। यह सब एकदेशीयपना ही है। पृथ्वी जल तेज आदि जो महाभूत हैं जो कि विनाशी और विकारी हैं वे भी दोदो तरहके होते हैं स्थूल और सूक्ष्म। जैसे स्थूलरूपसे पृथ्वी साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है जल बर्फ बूँदें बादल और भापरूपसे साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है तेज (अग्नितत्त्व) काठ और दियासलाईमें रहता हुआ निराकार है और प्रज्वलित होनेसे साकार है इत्यादि। इस तरहसे भौतिक सृष्टिके भी दोनों रूप होते हैं और दोनों होते हुए भी वास्तवमें वह दो नहीं होती। साकार होनेपर निराकारमें कोई बाधा नहीं लगती और निराकार होनेपर साकारमें कोई बाधा नहीं लगती। फिर परमात्माके साकार और निराकार दोनों होनेमें क्या बाधा है अर्थात् कोई बाधा नहीं। वे साकार भी हैं और निराकार भी हैं सगुण भी हैं और निर्गुण भी हैं।गीता साकारनिराकार सगुणनिर्गुण दोनोंको मानती है। नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने अपनेको अव्यक्तमूर्ति कहा है। चौथे अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मैं अज होता हुआ भी प्रकट होता हूँ अविनाशी होता हुआ भी अन्तर्धान हो जाता हूँ और सबका ईश्वर होता हुआ भी आज्ञापालक (पुत्र और शिष्य) बन जाता हूँ। अतः निराकार होते हुए साकार होनेमें और साकार होते हुए निराकार होनेमें भगवान्में किञ्चिन्मात्र भी अन्तर नहीं आता। ऐसे भगवान्के स्वरूपको न जाननेके कारण लोग उनके विषयमें तरहतरहकी कल्पनाएँ किया करते हैं। सम्बन्ध  भगवान्को साधारण मनुष्य माननेमें क्या कारण है इसपर आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.24।।ननु सर्वगते भगवत्तत्त्वे किमिति देवतान्तरोपासकानां मितं फलम् उच्यते अव्यक्तमिति। ते खलु अल्पबुद्धित्त्वात् मत्स्वरूपं पारमार्थिकम् अविद्यमानव्यक्तिकं न प्रत्यभिजानीते। अपि तु निजकामनासमुचिताकारविशिष्टज्ञानस्वभावं (N स्वभावां) व्यक्तिमेवापन्नं विदन्ति नान्यथा। अत एव न नाम्नि आकारे वा कश्चिद्ग्रहः। किंतु सिद्धान्तोऽयमत्र यः कामनापरिहारेण यत्किञ्चिद्देवतारूपमालम्बते तस्य तत् शुद्धमुक्तभावेन (S मुक्तभावे) पर्यवस्यति। विपर्ययात्तु विपर्ययः (SN add इति) ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.24।।भगवद्भजनस्योत्तमफलत्वेऽपि प्राणिनां प्रायेण तन्निष्ठत्वाभावे प्रश्नपूर्वकं निमित्तं निवेदयति किंनिमित्तमित्यादिना। अप्रकाशं शरीरग्रहणात्पूर्वमिति शेषः। इदानीं लीलाविग्रहपरिग्रहावस्थायामित्यर्थः। प्रकाशस्य तर्हि कादाचित्कत्वं भगवति प्राप्तं नेत्याह नित्येति। कथं तर्हि भगवन्तमागन्तुकप्रकाशं मन्यन्ते तत्राबुद्धय इत्युत्तरम्। तद्विवृणोति परमिति। परमनुत्तममिति विशेषणद्वयं सोपाधिकनिरुपाधिकभावार्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.24।।अव्यक्तं इति श्लोकस्य प्रकृतेन साक्षात्सङ्गत्यभावात् तं सङ्गमयितुमाह क इति। अन्येभ्यो ब्रह्मादिभ्यः। येन तान् प्राप्तानामन्तवत्फलत्वेऽपि त्वां प्राप्तानामनन्तफलतेति शङ्काशेषः। कथमनेनोक्तशङ्कापरिहारः इत्यत आह कार्येति। अनेन यथाश्रुतं पदं पठित्वा व्याख्यातम्। वस्तुतःअव्यक्तं मां इत्यनुवादादव्यक्तोऽहमिति यत्सिद्धं तस्येदं व्याख्यानमिति ज्ञातव्यम्। इदानीमुत्तरस्य सङ्गतिमाह तद्वानिति। कार्यदेहादिमान् इवेति मृदूक्तिः वस्तुतस्त्वेवेति। अतो न तद्वर्जित इति शेषः। प्रकृतोपयोगितया व्याचष्टे कार्येति। भगवतः कार्यदेहादिवर्जितत्वं तद्वत्ताप्रतीतिश्चाज्ञानमूलेत्येतत्कुतः येन वाक्यद्वयमुक्तार्थं स्यात् इत्यतोऽर्थद्वये क्रमेण प्रमाणान्याह तच्चेति। कार्यात्कारणाच्च। इदमपरं रूपं परं तु रूपमजानन्त इति प्रतीतिनिरासार्थमाह भावमिति। याथार्थ्यं प्रमाणाव्यभिचरितस्वरूपम्। अत एव परम्। कुतोऽयमर्थः समाख्यानादित्याह तथेति। यद्यप्ययमर्थःत्रिभिः 7।13 इत्यत्रोक्तस्तथापि प्रसङ्गात् पुनरुक्त इत्यदोषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.24।।को विशेषस्तवान्येभ्यः इत्यत आह अव्यक्तमिति। कार्यदेहादिवर्जितम्। तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह व्यक्तिमापन्नमिति। कार्यदेहाद्यापन्नम्। तच्चोक्तम् सदसतः परम् न तस्य कार्यम् अपाणिपादः श्वे.उ.3।19आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदैहिकम् इत्यादौ। भावं याथार्थ्यम्। तथाऽब्रवीत् याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः इत्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.24।।सर्वैः कर्मभिः आराध्यः अहं सर्वेश्वरः वाङ्मनसापरिच्छेद्यस्वरूपस्वभावः परमकारुण्याद् आश्रितवात्सल्यात् च सर्वसमाश्रयणीयत्वाय अजहत्स्वभाव एव वसुदेवसूनुः अवतीर्ण इति मम एवं परं भावम् अव्ययम् अनुत्तमम् अजानन्तः प्राकृतराजसूनुसमानम् इतः पूर्वम् अनभिव्यक्तम् इदानीं कर्मवशाद् जन्मविशेषं प्राप्य व्यक्तिम् आपन्नं प्राप्तं माम् अबुद्धयो मन्यन्ते अतो मां न श्रयन्ते न कर्मभिः आराधयन्ति च।कुत एवं न प्रकाश्यते इति अत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.24।। अव्यक्तम् अप्रकाशं व्यक्तिम् आपन्नं प्रकाशं गतम् इदानीं मन्यन्ते मां नित्यप्रसिद्धमीश्वरमपि सन्तम् अबुद्धयः अविवेकिनः परं भावं परमात्मस्वरूपम् अजानन्तः अविवेकिनः मम अव्ययं व्ययरहितम् अनुत्तमं निरतिशयं मदीयं भावमजानन्तः मन्यन्ते इत्यर्थः।।तदज्ञानं किंनिमित्तमित्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.25 】

▸ Sanskrit Sloka: नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत: | मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ||

▸ Transliteration: nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ | mūḍhoyaṃ nābhijānāti loko māmajamavyayam ||

▸ Glossary: na: nor; ahaṃ: I; prakāśaḥ: manifest; sarvasya: to everyone; yoga māyā: internal potency; samāvṛtaḥ: covered; mūḍhaḥ: foolish; ayaṃ: this; na: not; abhijānāti: can understand; lokaḥ: such less intelligent persons; māṃ: Me; ajaṃ: unborn; avyayaṃ: immutable.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.25 I am never revealed to the foolish and unintelligent, cov- ered as I am by My divine power ; the ignorant do not know Me, unborn and eternal.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.25।।जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते (मानते) उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.25।। अपनी योगमाया से आवृत्त मैं सबको प्रत्यक्ष नहीं होता हूँ। यह मोहित लोक (मनुष्य) मुझ जन्मरहित अविनाशी को नहीं जानता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.25 न not? अहम् I? प्रकाशः manifest? सर्वस्य of all? योगमायासमावृतः veiled by YogaMaya? मूढः deluded? अयम् this? न not? अभिजानाति knows? लोकः world? माम् Me? अजम् unborn? अव्ययम् imperishable.Commentary I am not manifest to all the people? but I am certainly manifest to the chosen few who are My devotees? who have taken sole refuge in Me alone. I am not visible to those who are deluded by the three Gunas and the pairs of opposites? and who are screened off by this universe which is a manifestation of the alities of Nature? My YogaMaya or My creative illusion. This veils the understanding of the worldlyminded people. So they are not able to behold the Lord Who keeps Maya under His perfect control.YogaMaya is the union of the three alities of Nature. The illusion or veil spread thery is called YogaMaya. The worldly people are deluded by the illusion born of the union of the three alities. Therefore? they are not able to know the Lord Who is unborn and immutable.This YogaMaya is under the perfect control of the Lord. Isvara is the wielder of Maya. Therefore it cannot obscure His own knowledge? just as the illusion created by the juggler cannot obstruct his,own knowledge or deceive him. The illusion which binds the worldly people cannot in the least affect the Lord Who has kep Maya under his perfect subjugation. (Cf.VII.13IX.5X.7XI.8)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.25. Being surrounded by the trick-of-yoga-Illusion, I am not clear to all; [and hence] this deluded world [of perceivers] does not recognise Me, the unborn and the undying.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.25 I am not visible to all, for I am enveloped by the illusion of Phenomenon. This deluded world does not know Me as the Unborn and the Imperishable.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.25 Veiled by My Maya, I am not manifest to all. This deluded world does not recognize Me as the unborn and immutable.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.25 Being enveloped by yoga-maya, I do not become manifest to all. This deluded world does not know Me who am birthless and undecaying.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.25 I am not manifest to all (as I am) veiled by the Yoga-Maya. This deluded world does not know Me, the unborn and imperishable.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.25 See Comment under 7.26

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.25 Concealed by the Maya called Yogamaya, I am associated with a human form and other generic structures which are special to individual selves. Because of this I am not manifest to all. The foolish, by seeing in Me merely the human or the other generic structures, do not know that My powers are greater than those of Vayu and Indra, that My lustre is more brilliant than that of sun and fire, that though visible to all, I am unborn, immutable, the cause of all the worlds, the Lord of all, and that I have assumed a human form, so that all who want can take refuge in Me.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.25 Yoga-maya-samavrtah, being enveloped by yoga-maya-Yoga means the combination, the coming together, of the (three) gunas; that (combination) is itself maya, yoga-maya; being enveloped, i.e. veiled, by that yoga-maya; aham, I; na prakasah, do not become manifest; sarvasya, to all, to the world. The idea is that I become manifest only to some devotees of Mine. For this very reason, ayam, this; mudhah, deluded; lokah, world; na abhijanati, does not know; mam, Me; who am ajam, birthless; and avyayam, undecaying. [In verse 13 the reason for the non-realization of the supreme, unalified Brahman was stated. The present verse states the reason for the non-realization of the alified Brahman.] 'That yoga-maya, because of My being covered by which the world does not know Me- that yoga-maya, since it belongs to Me, does not obstruct the knowlege of Me who am God, the possessor of maya, just as the magic of any other magician does not cover his knowledge.' Since this is so, therefore-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.25।। यदि समस्त जगत् के अधिष्ठान के रूप में कोई दिव्य तत्त्व विद्यमान है तो फिर क्या कारण है कि सब लोगों के द्वारा सर्वत्र सदा वह अनुभव नहीं किया जाता क्यों हम परिच्छिन्न जीव के समान व्यवहार करते हैं और अपने अनन्त स्वरूप को पहचान नहीं पाते संक्षेप में मुझमें और मेरे स्वरूप के मध्य कौन सा आवरण पड़ा हुआ है जब जिज्ञासु साधकगण वेदान्त प्रतिपादित सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं तो स्वाभाविक ही उनके मन में इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं।भगवान् कहते हैं यह मोहित जगत् मुझ अजन्मा अविनाशी को नहीं जानता है क्योंकि उनके लिए मैं त्रिगुणात्मिका योगमाया से आच्छादित रहता हूँ। जब वेदान्त के प्रारम्भिक विद्यार्थी माया को एक बाह्य वस्तु के रूप में समझने का प्रयत्न करते हैं तब उसे समझने में अत्यन्त कठिनाई होती है। परन्तु जब वे अध्यात्म दृष्टि से विचार करते हैं अर्थात् अपने ही अन्तकरण में माया किस प्रकार कार्य करती है ऐसा विचार करते हैं तो माया का सिद्धांत स्पष्ट हो जाता है। माया प्रिज्म (आयत) के समान ऐसी उपाधि है जिसके माध्यम से अवर्ण अद्वैत स्वरूप तत्त्व जब व्यक्त होता है तब सप्तरंगी प्रकाश के समान वह नानाविधि सृष्टि के रूप में प्रतीत होता है।व्यष्टि (एक व्यक्ति) में कार्य कर रही माया को ही अविद्या कहते हैं। ऋषियों ने इस अविद्या का जो कि जीव के सब दुखों का कारण है सूक्ष्म अध्ययन किया और यह उद्घाटित किया कि यह तीन गुणों से युक्त है जो मनुष्य को प्रभावित करते हैं। ये तीन गुण हैं सत्त्व रज और तम जो एक आयत का (प्रिज्म) का सा काम करते हैं और जिनके माध्यम से हमें इस बहुविधि सृष्टि का अनुभव होता है। रजोगुण का कार्य है विक्षेप और तमोगुण का कार्य बुद्धि पर पड़ा आवरण है।त्रिगुणों के विकारों से मोहित और भ्रान्त पुरुष को आत्मा का साक्षात् ज्ञान नहीं होता। उस आत्मज्ञान के लिए गुरु के उपदेश तथा स्वयं की साधना की आवश्यकता होती है। किसी ग्रामीण अनपढ़ व्यक्ति के लिए बल्ब में विद्युत का अभाव प्रतीत होता है क्योंकि वह अव्यक्त होती है। उसके प्रवाह को प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए सैद्धांतिक ज्ञान तथा प्रत्यक्ष प्रयोग की अपेक्षा होती है। एक बार विद्युत शक्ति के गुणधर्म का ज्ञान हो जाने पर यदि वह मनुष्य उसी बल्ब में प्रकाश देखे तो उसे अव्यक्त विद्युत का ज्ञान तत्काल हो जाता है इसी प्रकार आत्मसंयम श्रवण मनन और निदिध्यासन के द्वारा जब साधक का क्षुब्ध मन प्रशान्त हो जाता है तब आवरण के अभाव में वह मुझ अजन्मा अविनाशी स्वरूप को पहचान लेता है। अज्ञानी जीव विषयउपभोगों में नित्य सुख की खोज तभी तक करता है जब तक आवरण और विक्षेप की निवृत्ति नहीं हो जाती।कामाग्नि में सुलगते निराशा में जकड़े असन्तोष से कुचले और आत्मनाश के भय से व्याकुल उन्मत्त और संत्तप्त मनों में समता और एकाग्रता कदापि नहीं हो सकती कि वे क्षणभर के लिए भी आत्मा का शुद्ध स्वरूप अनुभव कर सकें। योगमाया से मोहित यह जगत् मुझ अव्यय स्वरूप को नहीं जानता। मानो नाम और रूप की इस सृष्टि ने आत्मा को आवृत्त कर दिया है। यह आवरण उसी प्रकार का है जैसे प्रेत स्तम्भ को मृगमरीचिका रेत को और तरंगे समुद्र को आच्छादित कर देती हैं जीवन की अज्ञान दशा के विपरीत श्रीकृष्ण अपने स्वरूप को बताते हुए कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.25।।स्वाज्ञाने निमित्तमाह नेति। अहं परमेश्वरः सर्वस्य लोकस्य परमेश्वरेण रुपेण प्रकटो न भवामि। किंतु केषांचित्स्वभक्तानां सैव माया तया। यद्वा योगो भगवतश्चित्तसमाधिस्तत्कृता माया। भगवत्संकल्पवशवर्तिनीति यावत्। उभयथाप्यनाद्यनिर्वाच्यमज्ञानं तया योगमायया समावृतः संच्छन्नः। आच्छादित इति यावत्। हे योग योगिन्। अर्शआद्यच्प्रत्ययान्तोऽयं योगशब्दः। अहं तत्पदार्थः सर्वस्य योगिनस्त्वंपदार्थमात्राभिज्ञस्य न प्रकाशोऽस्मि। तत्र हेतुः मायया समावृत इत्यन्येषां पक्षस्तु अगतिकगत्याश्रयणात्मिकयाऽरूच्या ग्रस्तः अतोऽनाद्यनिर्वाच्याज्ञानेन मूढो मोहं गतोऽयं लोको मद्विमुखः मामजमव्ययं नाभिजानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.25।।ननु जन्मकालेऽपि सर्वयोगिध्येयं श्रीवैकुण्ठस्थमैश्वरमेव रूपमाविर्भावितवति संप्रति च श्रीवत्सकौस्तुभवनमालाकिरीटकुण्डलादिदिव्योपकरणशालिनि कम्बुकमलकौमोदकीचक्रवरधारिचतुर्भुजे श्रीमद्वैनतेयवाहने निखिलसुरलोकसंपादितराजराजेश्वराभिषेकादिमहावैभवे सर्वसुरासुरजेतरि विविधदिव्यलीलाविलासशीले सर्वावतारशिरोमणौ साक्षाद्वैकुण्ठनायके निखिललोकदुःखनिस्ताराय भुवमवतीर्णे विरिञ्चिप्रपञ्चासंभविनिरतिशयसौन्दर्यसारसर्वस्वमूर्तौ बाललीलाविमोहितविधातरि तरणिकिरणोज्ज्वलव्यपीताम्बरे निरुपमश्यामसुन्दरे करदीकृतपारिजातार्थपराजितपुरन्दरे बाणयुद्धविजितशशाङ्कशेखरे समस्तसुरासुरविजयिनरकप्रभृतिमहादैतेयप्रकरप्राणपर्यन्तसर्वस्वहारिणि श्रीदामादिपरमरङ्कमहावैभवकारिणि षोडशसहस्रदिव्यरूपधारिण्यपरिमेयगुणगरिमणि महामहिमनिनारदमार्क्रण्डेयादिमहामुनिगणस्तुते त्वयि कथमविवेकिनोऽपि मनुष्यबुद्धिर्जीवबुद्धिर्वेत्यर्जुनाशङ्कामपनिनीषुराह भगवान् अहं सर्वस्य लोकस्य न प्रकाशः स्वेन रूपेण प्रकटो न भवामि किंतु केषांचिन्मद्भक्तानामेव प्रकटो भवामीत्यभिप्रायः। कथं सर्वस्य लोकस्य न प्रकट इत्यत्र हेतुमाह योगमायासमावृतः योगो मम संकल्पस्तद्वशवर्तिनी माया योगमाया तयाऽयमभक्तो जनो मां स्वरूपेण न जानात्वितिसंकल्पानुविधायिन्या मायया सम्यगावृतः। सत्यपि ज्ञानकारणे ज्ञानविषयत्वायोग्यः कृतः। अतो यदुक्तं परं भावमजानन्त इति तत्र मम संकल्प एव कारणमित्युक्तं भवति। अतो मम मायया मूढ आवृतज्ञानः सन्नयं चतुर्विधभक्तविलक्षणो लोकः सत्यपि ज्ञानकारणे मामजमव्ययमनाद्यनन्तं परमेश्वरं नाभिजानाति किंतु विपरीतदृष्ट्या मनुष्यमेव कंचिन्मन्यत इत्यर्थः। विद्यमानं वस्तुस्वरूपमावृणोत्यविद्यमानं च किंचिद्दर्शयतीति लौकिकमायायामपि प्रसिद्धमेतत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.25।।कुतस्त्वद्विषयमज्ञानं लोकस्येत्यत आह नाहमिति। हे योग योगिन्। अर्शआद्यच्प्रत्ययान्तोऽयं योगशब्दः। अहं तत्पदार्थः सर्वस्य योगिनस्त्वंपदार्थमात्राभिज्ञस्य न प्रकाशोऽस्मि। तत्र हेतुः मायासमावृत इति। भाष्ये तु योगो युक्तिर्गुणानां घटनं सैव योगमाया चित्तसमाधिर्वा योगो भगवतस्तत्कृता मायेति। भगवत्संकल्पवशवर्तिनी मायेत्यर्थः। उत्तरार्धः स्पष्टार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.25।।ननु मनुष्या विवेकादिसहिताः कथं न त्वां जानन्ति इत्यत आह नाहमिति। अहं सर्वस्य साधारणस्य प्रकाशः प्रकटो न भवामि किन्तु कस्यचिद्भक्तस्यैव। तत्र हेतुमाह योगमायासमावृत इति। योगार्थमेव या माया अन्तरङ्गा दासीभूता शक्तिस्तया आवृतो रसार्थमाच्छन्नः। अतो मूढो भक्त्यालोचनादिज्ञानशून्योऽयं परिदृश्य৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷मानो मां पश्यन्नपि स्वरूपज्ञानरहितो लोको बहिर्दृष्टिर्मामजं जन्मरहितं लीलया प्रकटमव्ययं नित्यं नाभिजानाति अभितः सर्वभावेन न जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.25।।तेषां स्वाज्ञाने हेतुमाह नाहमिति। सर्वस्य लोकस्य नाहं प्रकाशः प्रकटो न भवामि किंतु मद्भक्तानामेव। यतो योगमायया समावृतः। योगो युक्तिः मदीयः कोऽप्यचिन्त्यप्रज्ञाविलासः स एव माया अघटमानघटनाचातुर्यं अनया संच्छन्नः अतएव मत्स्वरूपज्ञाने मूढः सन्नयं लोकः अजमव्ययं च मां न जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.25।।कुत एवं न प्रकाशस इत्यत्राह नाहमिति। नाहं प्रकाशः सर्वस्य संसृतस्य किन्तु स्वभक्तानामेव यतोऽहं योगमायासमावृतः अंशांशिभावावस्थित्यादिसर्वभवनरूपा योगशक्तिरेवान्येषां व्यामोहिका माया तयासम्यगासमन्ताद्वृतः।वृञ् वरणे इतिधातोः लोको वा योगमायासमावृतो न जानाति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.25।।उनका वह अज्ञान किस कारणसे है सो बतलाते हैं तीनों गुणोंके मिश्रणका नाम योग है और वही माया है उस योगमायासे आच्छादित हुआ मैं समस्त प्राणिसमुदायके लिये प्रकट नहीं रहता हूँ अभिप्राय यह कि किन्हींकिन्हीं भक्तोंके लिये ही मैं प्रकट होता हूँ। इसलिये यह मूढ़ जगत् ( प्राणिसमुदाय ) मुझ जन्मरहित अविनाशी परमात्माको नहीं जानता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.25।। व्याख्या  मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् मैं अज और अविनाशी हूँ अर्थात् जन्ममरणसे रहित हूँ। ऐसा होनेपर भी मैं प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ अर्थात् जब मैं अवतार लेता

Chapter 7 (Part 16)

हूँ तब अज (अजन्मा) रहता हुआ ही अवतार लेता हूँ और अव्ययात्मा रहता हुआ ही अन्तर्धान हो जाता हूँ। जैसे सूर्य भगवान् उदय होते हैं तो हमारे सामने आ जाते हैं और अस्त होते हैं तो हमारे नेत्रोंसे ओझल हो जाते हैं छिप जाते हैं ऐसे ही मैं केवल प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ। जो मेरेको इस प्रकार जन्ममरणसे रहित मानते हैं वे तो असम्मूढ़ हैं (गीता 10। 3 15। 19)। परन्तु जो मेरेको साधारण प्राणियोंकी तरह जन्मनेमरनेवाला मानते हैं वे मूढ़ हैं (गीता 9। 11)।भगवान्को अज अविनाशी न माननेमें कारण है कि इस मनुष्यका भगवान्के साथ जो स्वतः अपनापन है उसको भूलकर इसने शरीरको अपना मान लिया कि यह शरीर ही मैं हूँ और यह शरीर मेरा है। इसलिये उसके सामने परदा आ गया जिससे वह भगवान्को भी अपने समान ही जन्मनेमरनेवाला मानने लगा।मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी नहीं जानते। उनके न जाननेमें दो कारण हैं एक तो मेरा योगमायासे छिपा रहना और एक उनकी मूढ़ता। जैसे किसी शहरमें किसीका एक घर है और वह अपने घरमें बंद है तथा शहरके सबकेसब घर शहरकी चहारदीवारी (परकोटे) में बंद हैं। अगर वह मनुष्य बाहर निकलना चाहे तो अपने घरसे निकल सकता है पर शहरकी चहारदीवारीसे निकलना उसके हाथकी बात नहीं है। हाँ यदि उस शहरका राजा चाहे तो वह चहारदीवारीका दरवाजा भी खोल सकता है और उसके घरका दरवाजा भी खोल सकता है। अगर वह मनुष्य अपने घरका दरवाजा नहीं खोल सकता तो राजा उस दरवाजेको तोड़ भी सकता है। ऐसे ही यह प्राणी अपनी मूढ़ताको दूर करके अपने नित्य स्वरूपको जान सकता है। परन्तु सर्वथा भगवत्तत्त्वका बोध तो भगवान्की कृपासे ही हो सकता है। भगवान् जिसको जनाना चाहें वही उनको जान सकता है सोइ जानइ जेहि देहु जनाई (मानस 2। 127। 2)। अगर मनुष्य सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् उसके अज्ञानको भी दूर कर देते हैं और अपनी मायाको भी दूर कर देते हैं।नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः उन सबके सामने अर्थात् उस मूढ़ समुदायके सामने मैं भगवद्रूपसे प्रकट नहीं होता। कारण कि वे मेरेको अजअविनाशी भगवद्रूपसे जानना अथवा मानना ही नहीं चाहते प्रत्युत वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवहेलना करते हैं। अतः उनके सामने मैं अपने भगवत्स्वरूपसे कैसे प्रकट होऊँ तात्पर्य है कि जो मेरेको अजअविनाशी नहीं मानते प्रत्युत मेरेको जन्मनेमरनेवाला मानते हैं उनके सामने मैं अपनी योगमायामें छिपा रहता हूँ और सामान्य मनुष्यजैसा ही रहता हूँ। परन्तु जो मेरेको अज अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर मानते हैं मेरेमें श्रद्धाविश्वास रखते हैं उनके भावोंके अनुसार मैं उनके सामने प्रकट रहता हूँ।भगवान्की योगमाया विचित्र विलक्षण अलौकिक है। मनुष्योंका भगवान्के प्रति जैसा भाव होता है उसके अनुसार ही वे योगमायासमावृत भगवान्को देखते हैं (टिप्पणी प0 435)।यहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मेरेको अजअविनाशी नहीं जानते वे मूढ़ हैं और दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा है कि देवता और महर्षि मेरे प्रभवको नहीं जानते। इसपर शङ्का होती है कि भगवान्को अजअविनाशी नहीं जानना और उनके प्रभवको नहीं जानना ये दोनों बातें तो एक ही हो गयीं परन्तु यहाँ न जाननेवालोंको मूढ़ बताया है और वहाँ उनको मूढ़ बताया है ऐसा क्यों इसका समाधान है कि भगवान्के प्रभवको अर्थात् प्रकट होनेको न जानना दोषी नहीं है क्योंकि वहाँ भगवान्ने स्वयं कहा है कि मैं सब तरहसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ। जैसे बालक अपने पिताके जन्मको कैसे देख सकता है क्योंकि वह उस समय पैदा ही नहीं हुआ था। वह तो पितासे पैदा हुआ है। अतः उसका पिताके जन्मको न जानना दोषी नहीं है। ऐसे ही भगवान्के प्रकट होनेके हेतुओँको पूरा न जानना देवताओँ और महर्षियोंके लिये कोई दोषी नहीं है। भगवान्के प्रकट होनेको कोई सर्वथा जान ही नहीं सकता। इसलिये वहाँ देवताओं और महर्षियोंको मूढ़ नहीं बताया है। मनुष्य भगवान्को अजअविनाशी जान सकते हैं अर्थात् मान सकते हैं। अगर वे भगवान्को अजअविनाशी नहीं मानते तो यह उनका दोष है। इसलिये उनको यहाँ मूढ़ कहा है। सम्बन्ध  जो भगवान्को अजअविनाशी नहीं मानते उनके ही सामने मायाका परदा रहता है पर भगवान्के सामने वह परदा नहीं रहता इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.25 7.26।।नाहमिति। वेदाहमिति। सर्वेषां नाहं गोचरतां प्राप्नोमि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.25।।अविवेकरूपमज्ञानं भगवन्निष्ठाप्रतिबन्धकमुक्तं तस्मिन्नपि निमित्तं प्रश्नपूर्वकमनाद्यज्ञानमुपन्यस्यति तदीयमज्ञानमित्यादिना। त्रिभिर्गुणमयैरित्यनौपाधिकरूपस्याप्रतिपत्तौ कारणमुक्तमत्र तु सोपाधिकस्यापीति विशेषं गृहीत्वा व्याचष्टे नाहमिति। तर्हि भगवद्भक्तिरनुपयुक्तेत्याशङ्क्याह केषांचिदिति। सर्वस्य लोकस्य न प्रकाशोऽहमित्यत्र हेतुमाह योगेति। अनाद्यनिर्वाच्याज्ञानाच्छन्नत्वादेव मद्विषये लोकस्य मौढ्यं ततश्च मदीयस्वरूपविवेकाभावान्मन्निष्ठत्वराहित्यमित्याह अतएवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.25।।तथापिनाहं प्रकाशः इति पुनरुक्तिरित्यतस्तात्पर्यमाह अज्ञानं चेति। येनाज्ञानेन मामन्यथा मन्यन्ते तदज्ञानं च मदिच्छाधीनमेव न स्वतन्त्रं येन तया निन्दया मम खेदः स्यादिति भावः।योग एव माया इति व्याख्यानं (शं.) असदिति भावेनाह योगेनेति। सामर्थ्यमेवोपायः।युज्यते येन योगोऽसावुपायः शक्तिरेव च इति वचनाद्योगशब्दस्योभयार्थत्वेन द्वन्द्वैकवद्भावः किं न स्यात् इति चेत् न मायया चेत्यस्य वैयर्थ्यापत्तेः तस्या अप्युपायविशेषत्वात्। अत एवोपायार्थत्वं गृहीत्वा सामर्थ्येति तद्व्याख्यानं कृतम्। इदं तात्पर्यं श्लोके न प्रतीयत इत्यत आह मयैवेति। उक्तार्थस्थापनाय पुराणसम्मतिमाह तथेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.25।।अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह नाहमिति। योगेन सामर्थ्योपायेन मायया च। मयैव मूढो नाभिजानाति। तथाहि पाद्मे आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम्। स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः इति च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.25।।क्षेत्रज्ञासाधारणमनुष्यत्वादिसंस्थानयोगाख्यमायया समावृतः अहं न सर्वस्यं प्रकाशः। मयि मनुष्यत्वादिसंस्थानदर्शनमात्रेण मूढः अयं लोको माम् अतिवाय्विन्द्रकर्माणम् अतिसूर्याग्नितेजसम् उपलभ्यमानम् अपि अजम् अव्ययं निखिलजगदेककारणं सर्वेश्वरं मां सर्वसमाश्रयणीयत्वाय मनुष्यत्वसंस्थानम् आस्थितं न अभिजानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.25।। न अहं प्रकाशः सर्वस्य लोकस्य केषांचिदेव मद्भक्तानां प्रकाशः अहमित्यभिप्रायः। योगमायासमावृतः योगः गुणानां युक्ितः घटनं सैव माया योगमाया तया योगमायया समावृतः संछन्नः इत्यर्थः। अत एव मूढो लोकः अयं न अभिजानाति माम् अजम् अव्ययम्।।यया योगमायया समावृतं मां लोकः नाभिजानाति नासौ योगमाया मदीया सती मम ईश्वरस्य मायाविनो ज्ञानं प्रतिबध्नाति यथा अन्यस्यापि मायाविनः मायाज्ञानं तद्वत्।।यतः एवम् अतः

───────────────────

【 Verse 7.26 】

▸ Sanskrit Sloka: वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन | भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ||

▸ Transliteration: vedāhaṃ samatī tāni vartamānāni cārjuna | bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṃ tu veda na kaścana ||

▸ Glossary: veda: know; ahaṃ: I; sama: equally; atītāni: past; vartamānāni: present; ca: and; arjuna: O Arjuna; bhaviṣyāṇi: future; ca: also; bhūtāni: living entities; māṃ: Me; tu: but; veda: knows; na: not; kaścana: anyone

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.26 O Arjuna, as the supreme personality of Godhead, I know all that has happened, all that is happening, and all that is to happen. I also know all living entities; but no one knows Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.26।।हे अर्जुन जो प्राणी भूतकालमें हो चुके हैं जो वर्तमानमें हैं और जो भविष्यमें होंगे उन सब प्राणियोंको तो मैं जानता हूँ परन्तु मेरेको कोई (मूढ़ मनुष्य) नहीं जानता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.26।। हे अर्जुन पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा भविष्य में होने वाले भूतमात्र को मैं जानता हूँ परन्तु मुझे कोई भी पुरुष नहीं जानता हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.26 वेद know? अहम् I? समतीतानि the past? वर्तमानानि the present? च and? अर्जुन O Arjuna? भविष्याणि the future? च and? भूतानि beings? माम् Me? तु verily? वेद knows? न not? कश्चन any one.Commentary Persons who are deluded by the three alities of Nature do not know the Lord. As they lack in the knowledge of His real nature? they do not adore Hi. But the Lord knows through His omniscience the beings of the past? the present and the future. He who worships the Lord with singleminded devotion knows Him in essence. He has knowledge of His real nature.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.26. O Arjuna, I know the beings that are gone off, that are present and are yet to be born; but no one, knows Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.26 I know, O Arjuna, all beings in the past, the present and the future; but they do not know Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.26 I know all beings, O Arjuna, past, present and those to come; but no one knows Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.26 O Arjuna, I know the past and the present as also the future beings; but no one knows Me!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.26 I know, O Arjuna, the beings of the past, the present and the future, but no one knows Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.25-26 Naham etc. Vadaham etc. I am not perceivable to all. But the actions themselves, if performed, would beget emancipation at the time of dissolution [of the world]. otherwise, how does the total dissolution come to be there ? When this doubt arises, [the Bhagavat] commences [to answer] as :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.26 I know all being that have passed away, those that live now and those that will hereafter. But no one knows Me. Among the beings existing in the three-fold divisions of time whom I look after, no one understands Me as of the nature described and as Vasudeva incarnated to be a refuge for all. So no one resorts to Me. Therefore, the one who knows Me really (Jnanin) is extremely difficult to be found. Such is the meaning.

So also:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.26 O Arjuna, aham, I, however; veda, know; samatitani, the past beings; and vartamanani, the present. I know ca, also; bhavisyani, the future; bhutani, beings. Tu, but; na kascana, no one; veda, knows; mam, Me. Except the one person who is My devotee and has taken refuge in Me, no one adores Me, jus because he does not know My reality. 'What, again,is the obstruction to knowing Your reality, being prevented by which the creatures that are born do not know You?' In anticipation of such a estion, the Lord says this:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.26।। विश्व के सभी धर्मों में ईश्वर को सर्वज्ञ माना गया है किन्तु केवल वेदान्त में ही सर्वज्ञता का सन्तोषजनक विवेचन मिलता है। उपनिषदों के सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में गीता का विशेष स्थान है जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तव में सर्वज्ञता का अर्थ क्या है।आत्मा ही वह चेतन तत्त्व है जो मनबुद्धि की समस्त वृत्तियों का प्रकाशित करता है। बाह्य भौतिक जगत् का ज्ञान हमें तभी होता है जब इन्द्रियां विषय ग्रहण करती हैं जिसके फलस्वरूप मन में विषयाकार वृत्तियां उत्पन्न होती हैं। इन वृत्तियों का वर्गीकरण करके विषय का निश्चय करने का कार्य बुद्धि का है। मन और बुद्धि की वृत्तियां नित्य चैतन्य स्वरूप आत्मा से ही प्रकाशित होती हैं।सूर्य का प्रकाश जगत् की समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करता है। जब मेरे नेत्र या श्रोत रूप या शब्द को प्रकाशित करते हैं तब मैं कहता हूँ कि मैं देखता हूँ या मैं सुनता हूँ। संक्षेप में वस्तु का भान होने का अर्थ है उसे जानना और जानने का अर्थ है प्रकाशित करना। जैसे सूर्य को जगच्चक्षु कहा जा सकता है क्योंकि उसके अभाव में हमारी नेत्रेन्द्रिय निष्प्रयोजन होकर गोलक मात्र रह जायोगी वैसे ही आत्मा को सर्वत्र सदा सबका ज्ञाता कहा जा सकता है। आत्मा की सर्वज्ञता भगवान् के इस कथन में कि मैं भूत वर्तमान और भविष्य के भूतमात्र को जानता हूँ स्पष्ट हो जाती है।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आत्मा न केवल वर्तमान का ज्ञाता है बल्कि अनादिकाल से जितने विषय भावनाएं एवं विचार व्यतीत हो चुके है उन सबका भी प्रकाशक वही था और अनन्तकाल तक आने वाले भूतमात्र का ज्ञाता भी वही रहेगा विद्युत से पंखा घूमता है परन्तु पंखा विद्युत को गति नहीं दे सकता एक व्यक्ति दूरदर्शी यन्त्र से नक्षत्रों का निरीक्षण करता है किन्तु वह यन्त्र उस द्रष्टा व्यक्ति का निरीक्षण नहीं कर सकता इन्द्रिय मन और बुद्धि को चेतना प्रदान करने वाले द्रष्टा आत्मा को किस प्रकार कोई जान सकता है भगवान् श्रीकृष्ण इस आत्मदृष्टि से कहते हैं यद्यपि मैं सबको सर्वत्र सदा जानता हूँ लेकिन मुझे कोई भी नहीं जानता है।वेदान्त में वर्णित पारमार्थिक दृष्टि से तो आत्मा को ज्ञाता या द्रष्टा भी नहीं कहा जा सकता जैसे शुद्ध तार्किक दृष्टि से यह कहना गलत होगा कि सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है। हमें रात्रि के अन्धकार में वस्तुएं दिखाई नहीं देतीं इस कारण दिन में उनके दृष्टिगोचर होने पर सूर्य को प्रकाशित करने के धर्म से युक्त मानते हैं। तथापि नित्य प्रकाश स्वरूप सूर्य की दृष्टि से ऐसा कोई क्षण नहीं है जब वह वस्तुओं को प्रकाशित करके उन्हें अनुग्रहीत न करता हो। अत यह कहना कि सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है उतना ही अर्थहीन है जितना यह कथन कि आजकल मैं श्वासोच्छ्वास में अत्यन्त व्यस्त हूँ आत्मा का ज्ञातृत्व औपाधिक है अर्थात् माया की उपाधि से उसे प्राप्त हुआ है। शुद्ध सत्त्वगुण प्रधान माया में व्यक्त आत्मा या ब्रह्मा को ही वेदान्त में ईश्वर कहा जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण सत्य का साकार रूप या ईश्वर का अवतार हैं और इसलिए उनका स्वयं को सर्वज्ञ घोषित करना समीचीन ही है।परन्तु दुर्भाग्य से आत्मकेन्द्रित र्मत्य जीव परिच्छिन्न संकीर्ण और सीमित मन तथा बुद्धि के छिद्र से जगत् को देखते हुए समष्टि की तालबद्ध लय को पहचान नहीं पाता। जो व्यक्ति स्वनिर्मित अज्ञान के बन्धनों को तोड़कर विश्व के साथ तादात्म्य कर सकता है वही व्यक्ति श्रीकृष्ण के दृष्टिकोण को निश्चय ही समझ सकता है उसका अनुभव कर सकता है। जो व्यक्ति सफलतापूर्वक समष्टि मन के साथ तादात्म्य प्राप्त कर जीता है वह व्यक्ति अपने तथा तत्पश्चात् आने वाले युग का कृष्ण ही है।यदि सभी औपाधिक ज्ञानों का प्रकाशक आत्मा ही है तो किन प्रतिबन्धों के कारण आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो पाता है भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.26।।मायया त्वमावृतश्चेत्तवापि लोकस्येव ज्ञानप्रतिबन्धः स्यादित्याशङ्कयाह वेदेति। अहमप्रतिबद्धज्ञानशक्तिः समतीतानि समतिक्रान्तानि वर्तमानानि भविष्याणि च भूतानि चराचरात्मकानि सर्वाणि वेद जानामि। त्वमपि योगद्यभ्यासेन स्वच्छान्तःकरणः सन् ज्ञातुं शक्तोऽसि। अगं तु नित्यशुद्धः सर्वोपाधिधर्माभिमानमलशून्यो जानामीति किमु वक्त्वयमितति सूचयन्संबोधयति अर्जुनेति। मां तु परमात्मानं मद्भक्तं मच्छरणमेकं त्यक्त्वा न कश्चन वेद जानाति। तथाच यया मायया समावृतं मां लोको नाभिजानाति नासौ मदीया सती ममेश्वरस्य मायाविनो ज्ञानं प्रतिबध्नाति मायात्वात् लौकिकमायावत्। यद्वा नाहं मायय प्रतिबन्द्धज्ञानं मायावित्वात् लौकिकमायाविवदिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.26।।अतो मायया स्वाधीनया सर्वव्यामोहकत्वात्स्वयं चाप्रतिबद्धज्ञानात्वात् अहमप्रतिबद्धसर्वविज्ञानो मायया सर्वांल्लोकान्मोहयन्नपि समतीतानि चिरविनष्टानि वर्तमानानि च भविष्याणि च। एवं कालत्रयवर्तीनि भूतानि स्थावरजङ्गमानि सर्वाणि वेद जानामि। हे अर्जुन अतोऽहं सर्वज्ञः परमेश्वर इत्यत्र नास्ति संशय इत्यर्थः। मां तु। तुशब्दो ज्ञानप्रतिबन्धद्योतनार्थः। मां सर्वदर्शनमपि मायाविनमिव मन्मायामोहितः कश्चन कोऽपि मदनुग्रहभाजनं मद्भक्तं विना न वेद मन्मायामोहितत्वात्। अतो मत्तत्त्ववेदनाभावादेव प्रायेण प्राणिनो मां न भजन्त इत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.26।।ननु त्वदभिन्नं लोकं त्वन्माया मोहयति चेत्त्वां कुतो न मोहयतीत्यत आह वेदाहमिति। सत्यम्। सत्यपि लोकस्य मम चाभेदे औपाधिकभेदस्य सत्त्वादुपाधिधर्माभिमानित्वाल्लोको मूढः तदभावाच्चाहं सर्वज्ञ इति विशेषः। अक्षरार्थः स्पष्टः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.26।।ननु याँस्त्वं स्वसेवार्थं प्रकटीकृतान् पुनः स्वकीयत्वेन न जानासि तदा माया तान् व्यामोहयति उतान्यथा वा इत्याशङ्क्याह वेदाहमिति। अहं समतीतानि सेवामकृत्वा नष्टानि वर्त्तमानानि साम्प्रतं सेवां कुर्वाणानि भविष्याणि सेवार्थं प्रकटानि यानि भूतानि मत्सत्तया प्रकटानि स्थावरजङ्गमानि त्रिकालवर्तीनि मदीयत्वेन वेद जानामि। तु पुनः मज्ज्ञानानन्तरमपि कश्चन त्रिकालवर्तिषु मां प्रभुत्वेन न वेद। न जानातीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.26।।सर्वोत्तमं मत्स्वरूपमजानन्त इत्युक्तम् तदेव स्वस्य सर्वोत्तमत्वमनावृतज्ञानशक्तित्वेन दर्शयन्नन्येषामज्ञानमेवाह वेदेति। समतीतानि विनष्टानि वर्तमानानि भावीनि च त्रिकालवर्तीनि भूतानि स्थावरजंगमानि सर्वाण्यहं वेद जानामि मायाश्रयत्वान्मम तस्याः स्वाश्रयव्यामोहकत्वाभावादिति प्रसिद्धम्। मां तु न कोऽपि वेत्ति मन्मायामोहितत्वात्। प्रसिद्धं हि लोके मायायाः स्वाश्रयाधीनत्वमन्यमोहकत्वं च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.26।।सर्वोत्तमं मत्स्वरूपं अजानन्त इत्युक्तं तदेव स्वसर्वोत्तमत्वं परत्वमनावृतज्ञानादिशक्तिमत्त्वेन दर्शयन्नन्येषामज्ञानमाह वेदाहमिति। अतीतानि वर्त्तमानान्यनागतानि च सर्वाणि भूतानि जानामि। मां तु कश्चन न जानाति। मयाऽनुसन्धीयमानेषु कालत्रयवर्त्तिषु मामेवंविधमहिमानं वासुदेवं सर्वमुक्त्यर्थमवतीर्णं ज्ञात्वा मामेव प्रपद्यमानो न कश्चिदुपलभ्यत इत्यर्थः। अतो भगवन्मार्गीयो ज्ञानी दुर्लभ एव।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.26।।जिस योगमायासे छिपे हुए मुझ परमात्माको संसार नहीं जानता वह योगमाया मेरी ही होनेके कारण मुझ मायापति ईश्वरके ज्ञानका प्रतिबन्ध नहीं कर सकती जैसे कि अन्य मायावी ( बाजीगर ) पुरुषोंकी माया भी उनके ज्ञानको ( आच्छादित नहीं करती ) इसलिये हे अर्जुन जो पूर्वमें हो चुके हैं उन प्राणियोंको एवं जो वर्तमान हैं और जो भविष्यमें होनेवाले हैं उन सब भूतोंको मैं जानता हूँ। परंतु मेरे शरणागत भक्तको छोड़कर मुझे और कोई भी नहीं जानता और मेरे तत्त्वको न जाननेके कारण ही ( अन्य जन ) मुझे नहीं भजते।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.26।। व्याख्या  वेदाहं समतीतानि ৷৷. मां तु वेद न कश्चन यहाँ भगवान्ने प्राणियोंके लिये तो भूत वर्तमान और भविष्यकालके तीन विशेषण दिये हैं परन्तु अपने लिये अहं वेद पदोंसे केवल वर्तमानकालका ही प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान्की दृष्टिमें भूत भविष्य और वर्तमान ये तीनों काल वर्तमान ही हैं। अतः भूतके प्राणी हों भविष्यके प्राणी हों अथवा वर्तमानके प्राणी हों सभी भगवान्की दृष्टिमें वर्तमान होनेसे भगवान् सभीको जानते हैं। भूत भविष्य और वर्तमान ये तीनों काल तो प्राणियोंकी दृष्टिमें हैं भगवान्की दृष्टिमें नहीं। जैसे सिनेमा देखनेवालोंके लिये भूत वर्तमान और भविष्यकालका भेद रहता है पर सिनेमाकी फिल्ममें सब कुछ वर्तमान है ऐसे ही प्राणियोंकी दृष्टिमें भूत वर्तमान और भविष्यकालका भेद रहता है पर भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ वर्तमान ही रहता है। कारण कि सम्पूर्ण प्राणी कालके अन्तर्गत हैं और भगवान् कालसे अतीत हैं। देश काल वस्तु व्यक्ति घटना परिस्थिति आदि बदलते रहते हैं और भगवान् हरदम वैसेकेवैसे ही रहते हैं। कालके अन्तर्गत आये हुए प्राणियोंका ज्ञान सीमित होता है और भगवान्का ज्ञान असीम है। उन प्राणियोंमें भी कोई योगका अभ्यास करके ज्ञान बढ़ा लेंगे तो वे युञ्जान योगी होंगे और जिस समय जिस वस्तुको जानना चाहेंगे उस समय उसी वस्तुको वे जानेंगे। परन्तु भगवान् तो युक्त योगी हैं अर्थात् बिना योगका अभ्यास किये ही वे मात्र जीवोंको और मात्र संसारको सब समय स्वतः जानते हैं।भूत भविष्य और वर्तमानके सभी जीव नित्यनिरन्तर भगवान्में ही रहते हैं भगवान्से कभी अलग हो ही नहीं सकते। भगवान्में भी यह ताकत नहीं है कि वे जीवोंसे अलग हो जायँ अतः प्राणी कहीं भी रहें वे कभी भी भगवान्की दृष्टिसे ओझल नहीं हो सकते।मां तु वेद न कश्चन का तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें कहे हुए मूढ़ समुदायमेंसे मेरेको कोई नहीं जानता अर्थात् जो मेरेको अज और अविनाशी नहीं मानते प्रत्युत मेरेको साधारण मनुष्यजैसा जन्मनेमरनेवाला मानते हैं उन मूढ़ोंमेंसे मेरेको कोई भी नहीं जानता पर मैं सबको जानता हूँ।जैसे बाँसकी चिक दरवाजेपर लटका देनेसे भीतरवाले तो बाहरवालोंको पूर्णतया देखते हैं पर बाहरवाले केवल दरवाजेपर टँगी हुई चिकको ही देखते हैं भीतरवालोंको नहीं। ऐसे ही योगमायारूपी चिकसे अच्छी तरहसे आवृत होनेके कारण भगवान्को मूढ़ लोग नहीं देख पाते पर भगवान् सबको देखते हैं।यहाँ एक शङ्का होती है कि भगवान् जब भविष्यमें होनेवाले सब प्राणियोंको जानते हैं तो किसकी मुक्ति होगी और कौन बन्धनमें रहेगा यह भी जानते ही हैं क्योंकि भगवान्का ज्ञान नित्य है। अतः वे जिनकी मुक्ति जानते हैं उनकी तो मुक्ति होगी और जिनको बन्धनमें जानते हैं वे बन्धनमें ही रहेंगे। भगवान्की इस सर्वज्ञतासे तो मनुष्यकी मुक्ति परतन्त्र हो गयी मनुष्यके प्रयत्नसे साध्य नहीं रही।इसका समाधान यह है कि भगवान्ने अपनी तरफसे मनुष्यको अन्तिम जन्म दिया है। अब इस जन्ममें मनुष्य अपना उद्धार कर ले अथवा पतन कर ले यह उसके ऊपर निर्भर करता है (गीता 7। 27 8। 6)। उसके उद्धार अथवा पतनका निर्णय भगवान् नहीं करते।इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान् यह कह आये हैं कि बहुत जन्मोंके इस अन्तिम मनुष्यजन्ममें जो सब कुछ वासुदेव ही है ऐसे मेरे शरण होता है वह महात्मा दुर्लभ है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यशरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको यह स्वतन्त्रता है कि वे अपने अनन्त जन्मोंके सञ्चित कर्मसमुदायका नाश करके भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं अपनी मुक्ति कर सकते हैं। अगर यही माना जाय कि कौनसा प्राणी आगे किस गतिमें जायगा ऐसा भगवान्का संकल्प है तो फिर अपना उद्धार करनेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता ही नहीं रहेगी और ऐसा करो ऐसा मत करो यह भगवान् सन्त शास्त्र गुरु आदिका उपदेश भी व्यर्थ हो जायेगा। इसके सिवाय जोजो मनुष्य जिसजिस देवताकी उपासना करना चाहता है उसउस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धा दृढ़ कर देता हूँ (7। 21) और अन्तसमयमें मनुष्य जिसजिस भावका स्मरण करके शरीर छोड़ता है वह उसउसको ही प्राप्त होता है (8। 6) इस तरह उपासना और अन्तकालीन स्मरणमें स्वतन्त्रता भी नहीं रहेगी जो भगवान्ने मनुष्यमात्रको दे रखी है।बिना कारण कृपा करनेवाले प्रभु जीवको मनुष्यशरीर देते हैं (टिप्पणी प0 436) जिससे यह जीव मनुष्यशरीर पाकर स्वतन्त्रतासे अपना कल्याण कर ले। गीतामें ग्यारहवें अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें जैसे भगवान्ने अर्जुनसे कहा मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् अर्थात् मेरे द्वारा ये पहले ही मारे जा चुके हैं तू केवल निमित्तमात्र बन जा। ऐसे ही मनुष्यमात्रको विवेक और उद्धारकी पूरी सामग्री देकर भगवान्ने कहा है कि तू अपना उद्धार कर ले अर्थात् अपने उद्धारमें तू केवल निमित्तमात्र बन जा मेरी कृपा तेरे साथ है। इस मनुष्यशरीररूपी नौकाको पाकर मेरी कृपारूपी अनुकूल हवासे जो भवसागरको नहीं तरता अर्थात् अपना उद्धार नहीं करता वह आत्महत्यारा है मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा (श्रीमद्भा0 11। 20। 17)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि जो परमात्माको सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण देखता है वह अपनी हत्या नहीं करता इसलिये वह परमगतिको प्राप्त होता है (13। 28)। इससे भी यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यशरीर प्राप्त होनेपर अपना उद्धार करनेका अधिकार सामर्थ्य समझ आदि पूरी सामग्री मिलती है। ऐसा अमूल्य अवसर पाकर भी जो अपना उद्धार नहीं करता वह अपनी हत्या करता है और इसीसे वह जन्ममरणमें जाता है। अगर यह जीव मनुष्यशरीर पाकर शास्त्र और भगवान्से विरुद्ध न चले तथा मिली हुई सामग्रीका ठीकठीक उपयोग करे तो इसकी मुक्ति स्वतःसिद्ध है। इसमें कोई बाधा लग ही नहीं सकती।मनुष्यके लिये यह खास बात है कि भगवान्ने कृपा करके जो सामर्थ्य समझ आदि सामग्री दी है उसका मैं दुरुपयोग नहीं करूँगा भगवान्के सिद्धान्तके विरुद्ध नहीं चलूँगा ऐसा वह अटल निश्चय कर ले और उस निश्चयपर डटा रहे। अगर अपनी असामर्थ्यसे कभी दुरुपयोग भी हो जाय तो मनमें उसकी जलन पैदा हो जाय और भगवान्से कह दे कि हे नाथ मेरेसे गलती हो गयी अब ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा। हे नाथ ऐसा बल दो जिससे कभी आपके सिद्धान्तसे विपरीत न चलूँ तो उसका प्रायश्चित हो जाता है और भगवान्से मदद मिलती है।मनुष्यकी असामर्थ्य दो तरहसे होती है एक असामर्थ्य यह होती है कि वह कर ही नहीं सकता जैसे किसी नौकरसे कोई मालिक यह कह दे कि तुम इस मकानको उठाकर एक मीलतक ले जाकर रख दो तो वह यह काम कर ही नहीं सकता। दूसरी असामर्थ्य यह होती है कि वह कर तो सकता है और करना चाहता भी है फिर भी समयपर प्रमादवश नहीं करता। यह असामर्थ्य साधकमें आती रहती है। इसको दूर करनेके लिये साधक भगवान्से कहे कि हे नाथ मैं ऐसा प्रमाद फिर कभी न करूँ ऐसी मेरेको शक्ति दो। भगवान्की ही दी हुई स्वतन्त्रताके कारण भगवान् ऐसा संकल्प कभी कर ही नहीं सकते कि इस जीवके इतने जन्म होंगे। इतना ही नहीं चरअचर अनन्त जीवोंके लिये भी भगवान् ऐसा संकल्प नहीं करते कि उनके अनेक जन्म होंगे। हाँ यह बात जरूर है कि मनुष्यके सिवाय दूसरे प्राणियोंके पीछे परम्परासे कर्मफलोंका ताँता लगा हुआ है जिससे वे बारबार जन्मतेमरते रहते हैं। ऐसी परम्परामें पड़े हुए जीवोंमेंसे कोई जीव किसी कारणसे मनुष्यशरीरमें अथवा किसी अन्य योनिमें भी प्रभुके चरणोंकी शरण हो जाता है तो भगवान् उसके अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट कर देते हैं कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।। सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।(मानस 5। 44। 1) सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह कहा कि मुझे कोई भी नहीं जानता तो भगवान्को न जाननेमें मुख्य कारण क्या है इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.25 7.26।।नाहमिति। वेदाहमिति। सर्वेषां नाहं गोचरतां प्राप्नोमि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.26।।मायया भगवानावृतश्चेत्तस्यापि लोकस्यैव ज्ञानप्रतिबन्धः स्यादित्याशङ्क्याह ययेति। नहीयं माया मायाविनो विज्ञानं प्रतिबध्नाति मायात्वाल्लौकिकमायावत् अथवा नेश्वरो मायाप्रतिबद्धज्ञानो मायावित्वाल्लौकिकमायाविवदित्यर्थः। भगवतो मायाप्रतिबद्धज्ञानत्वाभावेन सर्वज्ञत्वमप्रतिबद्धं सिद्धमित्याह यत इति। लोकस्य मायाप्रतिबद्धविज्ञानत्वादेव भगवदाभिमुख्यशून्यत्वमित्याह मां त्विति। कालत्रयपरिच्छिन्नसमस्तवस्तुपरिज्ञाने प्रतिबन्धो नेश्वरस्यास्तीति द्योतनार्थस्तुशब्दः। मां त्विति लोकस्य भगवत्तत्त्वविज्ञानप्रतिबन्धं द्योतयति। तर्हि तद्भक्तिर्विफलेत्याशङ्क्याह मद्भक्तमिति। तर्हि सर्वोऽपि त्वद्भक्तिद्वारा त्वां ज्ञास्यति नेत्याह मत्तत्त्वेति। विवेकवतो मद्भजनं नतु विवेकशून्यस्य सर्वस्यापीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.26।।अकस्मात्स्वस्य सार्वज्ञं किमित्युच्यते इत्यत आह नेति। यवनिकाद्युभयभागवर्तिनोः परस्पराज्ञानवत्तवापि भूतविषये ज्ञानं न स्यादिति शङ्कानिरासार्थमिति शेषः। तथापिमां तु वेद न कश्चन इति पुनरुक्तमित्यत आह न कश्चनेति। असमर्थो लोको न जानातु अतिसमर्थस्तु ब्रह्मादिर्ज्ञास्यतीति शङ्कानिरासार्थमेतदुक्तम्। कश्चनेति विशेषणादिति भावः। तर्हिज्ञानी च भरतर्षभ 7।16 इत्यादिविरोध इत्यत उक्तम् स्वेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.26।।न मां माया बध्नातीत्याह वेदेति। न कश्चनातिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.26।।अतीतानि वर्तमानानि अनागतानि च सर्वाणि भूतानि अहं वेद जानामि मां तु वेद न कश्चन। मया अनुसन्धीयमानेषु कालत्रयवर्तिषु भूतेषु माम् एवंविधं वासुदेवं सर्वसमाश्रयणीयतया अवतीर्णं विदित्वा माम् एव समाश्रयम् न कश्चिद् उपलभ्यत इत्यर्थः। अतो ज्ञानी सुदर्लभ एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.26।। अहं तु वेद जाने समतीतानि समतिक्रान्तानि भूतानि वर्तमानानि च अर्जुन भविष्याणि च भूतानि वेद अहम्। मां तु वेद न कश्चन मद्भक्तं मच्छरणम् एकं मुक्त्वा मत्तत्त्ववेदनाभावादेव न मां भजते।।केन पुनः मत्तत्त्ववेदनप्रतिबन्धेन प्रतिबद्धानि सन्ति जायमानानि सर्वभूतानि मां न विदन्ति इत्यपेक्षायामिदमाह

───────────────────

【 Verse 7.27 】

▸ Sanskrit Sloka: इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत | सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ||

▸ Transliteration: icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata | sarvabhūtāni saṃmohaṃ sarge yānti parantapa ||

▸ Glossary: icchā: desire; dveṣa: hate; samutthena: born; dvandva: duality; mohena: overcome; bhārata: O scion of Bhārata; sarva: all; bhūtāni: living entities; saṃmohaṃ: into delusion; sarge: in creation; yānti: go; parantapa: O conqueror of enemies.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.27 O scion of Bhārata (Arjuna), O conqueror of the foe, Parantapa, all living entities are born into delusion, overcome by the dualities of attachment and aversion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.27।।हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्वमोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्ममरणको प्राप्त हो रहे हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.27।। हे परन्तप भारत इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह से भूतमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह (अविवेक) को प्राप्त होते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.27 इच्छाद्वेषसमुत्थेन arisen from desire and aversion? द्वन्द्वमोहेन by the delusion of the pairs of opposites? भारत O Bharata? सर्वभूतानि all beings? संमोहम् to delusion? सर्गे at birth? यान्ति are subject? परन्तप O Parantapa (scorcher of the foes).Commentary Where there is pleasure there is Raga or attachment where there is pain there is Dvesha or aversion. There is the instinct in man to preserve his body. Man wishes to attain those objects which help the preservation of the body. He wishes to get rid of those objects which give pain to the body and the mind. On account of delusion caused by the pairs of opposites? desire and aversion spring up and man cannot get the knowledge of the things as they are? even of this external universe of senseexperience and it needs no saying that in a man whose intellect is overwhelmed by desire and aversion there cannot arise the transcendental knowledge of the innermost Self.Raga (attraction) and Dvesha (repulsion)? pleasure and pain? heat and cold? happiness and misery? joy and sorrow? success and failure? censure and priase? honour and dishonour are the Dvandvas or the pairs of opposites. Desire and aversion (or attraction and repulsion) induce delusion in all beings and serve as obstacles to the dawn of the knowledge of the Self.He whose intellect is obscured by the delusion caused by the pairs of opposites is not able to realise I am the Self. Therefore he does not adore Me as the Self.He who is a victim of RagaDvesha loses the power of discrimination. He wishes that pleasant objects should last for ever and that disagreeable or unpleasant objects should disappear immediately. How could this be Objects that are conditioned in time? space and causation will perish. That which is agreeable and pleasant now will become disagreeable and unpleasant after some time. The mind is ever fluctuating. It demands variety and gets disgusted with monotony.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.27. O descendant of Bharata, O scorcher of foes ! At the time of creation, all beings get delusion because of the illusion of pairs [of opposites] arising from desire and hatred.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.27 O brave Arjuna! Man lives in a fairy world, deceived by the glamour of opposite sensations, infatuated by desire and aversion.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.27 By the delusion of the pairs of opposites springing from desire and hate, O Arjuna, all beings are deluded as soon as they are born.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.27 O scion of the Bharata dynasty, O destroyer of foes, due to the delusion of duality arising from likes and dislikes, all creatures become bewildered at the time of their birth.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.27 By the delusion of the pairs of opposites arising from desire and aversion, O Bharata, all beings are subject to delusion at birth, O Parantapa.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.27 Iccha-etc. [At the time of destruction] he (the personal Soul) is led to expand exceedingly, while he still remains unconcious on account of his desire, aversion, agner, dellusion etc. On account of this, the entire world takes recourse to the sleeping stage while it continues to exist in its entirity within the stomach of the Prakrti (the Prime Casue); and to exist just being (temporarily) not capable of performing its activities. For, as long as there is delusion, the mental impressions are to be experienced, as in the case of the sleeping stage in the night time every day. But on that account no emancipation is gained. For, when the experience of loss of unconsciousness is over (i.e., when consciousness is regained), again the mundane life with its varieties of activites is found.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.27 As soon as beings are born they are deluded. This delusion springs from sense experiences described as pairs of opposites like heat and cold. Such reactions spring from desire and hate.

The purport is this: Desire and hatred for the pairs of opposites like pleasure and pain, which are constituted of Gunas, have their origin in the Jivas from the past experiences they had in their previous births. The subtle impressions or Vasanas of these previous experiences manifest again as instinctive desire and hatred towards similar objects in every succeeding birth of the Jivas. The delusive force of these impressions make them deluded from the very beginning. It becomes their nature to have love or hatred for such objects, in place of having happiness and misery at union with or separation from Me. The Jnanin, however, feels happiness when he is in union with Me and misery when separated from Me. No other being is born with such a nature as found in the Jnanin.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.27 Iccha-dvesa-samutthena, by what arises from likes and dislikes: iccha, likes, and dvesa, dislikes, are iccha-dvesau; anything arising from them is icchadvesa-samutthah. (Creatures are duluded) by that. By what? When that is thus sought to be known in particular, the Lord answers: dvandva-mohena, by the delusion of duality. Delusion (moha) that originates from duality (advandva) is dvandva-moha. Those very likes and dislikes, which are mutually opposed like heat and cold, which relate to happiness and sorrow and their causes, and which come into association with all beings in due course, are termed as duality (and this deludes all creatures). As regards them, when likes and dislikes arise from the experience of happiness, sorrow and their causes, then, by bringing the wisdom of all beings under their control, they create bewilderment which is the cause of the impediment to the rise of knowledg about the reality of Self, the suprem Truth. Indeed, exact knowledg about objects even in the external world does not arise in one whose mind is overpowered by the defects, viz likes and dislikes. It goes without saying that knowledge of the indwelling Self, beset with many obstacles as it is, does not arise in a completely bewildered person whose intelligence has been overcome by them. Therefore, bharata, O scion of the Bharata dynasty; owing to that delusion of duality arising from likes and dislikes, sarvabhutani, all creatures become deluded. Parantapa, O destroyer of foes; they yanti sammoham, become bewildered, come under delusion; sarge, at the time of their birth, i.e. at the time of their origination. The idea is that all creatures that come into being do so prepossessed by delusion. 'Since this is so, therefore all creatures, being deluded and having their wisdom obstructed by that delusion of duality, do not know Me who am their Self. Hence, they do not adore Me as their Self.' 'Who, again, are those that, becoming free from the delusion of duality, come to know You, and adore You as the Self in accordance with the scriptures?' In order to elaborate the subject enired about, it is being said:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.27।। एक अत्यन्त वैज्ञानिक एवं सूक्ष्म दार्शनिक सत्य को इस श्लोक में सूचित किया गया है। इस तथ्य का वर्णन करने में कि क्यों और कैसे यह जीव आत्मा के शुद्ध स्वरूप को नहीं जान पाता है भगवान् श्रीकृष्ण मूलभूत उन सिद्धांतों को बताते हैं जो आधुनिक जीवशास्त्रियों ने जीव के विकास के सम्बन्ध में शोध करके प्रस्तुत किये हैं।आत्मसुरक्षा की सर्वाधिक प्रबल स्वाभाविक प्रवृत्ति के वशीभूत मनुष्य जगत् में जीने का प्रयत्न करता है। सुरक्षा की यह प्रवृत्ति बुद्धि में उन वस्तुओं की इचछाओं के रूप में व्यक्त होती है जिनके द्वारा मनुष्य अपने सांसारिक जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने की अपेक्षा रखता है।प्रिय वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा को इच्छा कहते हैं। यदि कोई वस्तु या व्यक्ति इस इच्छापूर्ति में बाधक बनता है तो उसकी ओर मन की प्रतिक्रिया द्वेष या क्रोध के रूप में व्यक्त होती है। इच्छा और द्वेष की दो शक्तियों के बीच होने वाले शक्ति परीक्षण में दुर्भाग्यशाली जीव छिन्नभिन्न होकर मरणासन्न व्यक्ति की असह्य पीड़ा को भोगता है। स्वाभाविक ही ऐसा व्यक्ति सदा प्रिय की ओर प्रवृत्ति और द्वेष की ओर से निवृत्ति में व्यस्त रहता है। शीघ्र ही वह व्यक्ति अत्याधिक व्यस्त और पूर्णतया भ्रमित होकर थक जाता है। मन में उत्पन्न होने वाले विक्षेप दिनप्रतिदिन बढ़ते हुए अशान्ति की वृद्धि करते हैं। इन्हीं विक्षेपों के आवरण के फलस्वरूप मनुष्य को अपने सत्यस्वरूप का दर्शन नहीं हो पाता।अत आत्मा की अपरोक्षानुभूति का एकमात्र उपाय है मन को संयमित करके उसके विक्षेपों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना। विश्व के सभी धर्मों में जो क्रिया प्रधान भावना प्रधान या विचार प्रधान आध्यात्मिक साधनाएं बतायी जाती हैं उन सबका प्रयोजन केवल मन को पूर्णतया शान्त करने का ही है। परम शान्ति का क्षण ही आत्मानुभूति आत्मप्रकाश और आत्ममिलन का क्षण होता है।परन्तु दुर्भाग्य है कि प्राणीमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह को प्राप्त होते हैं दैवी करुणा से भरे स्वर में भगवान् श्रीकृष्ण का यह कथन है। दुखपूर्ण प्रारब्ध को मनुष्य का यह कोई नैराश्यपूर्ण समर्पण नहीं है कि जिससे मुक्ति पाने में वह जन्म से ही अशक्त बना दिया गया हो। ईसाई धर्म के समान कृष्ण धर्म किसी व्यक्ति को पाप का पुत्र नहीं मानता। यमुना कुञ्ज विहारी दुर्दम्य आशावादी आशा के संदेशवाहक जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ मात्र दार्शनिक सत्य को ही व्यक्त कर रहे हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी देह विशेष और उपलब्ध वातावरण में जन्म लेने की त्रासदी अपनी अतृप्त वासनाओं और प्रच्छन्न कामनाओं की परितृप्ति के लिए स्वयं ही निर्माण करता है।इस मोह जाल से मुक्ति पाना और सम्यक् ज्ञान को प्राप्त करना जीवन का पावन लक्ष्य है। गीता भगवान् द्वारा विरचित काव्य है जो विपरीत ज्ञान में फंसे लोगों को भ्रमजाल से निकालकर पूर्णानन्द में विहार कराता है।सत्य के साधकों के गुण दर्शाने के लिए भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.27।।भगवत्तत्वापरिज्ञाने मूलज्ञानं निमित्तमुक्त्वा तत्र प्रतिबन्धकान्तरमाह। इच्छाद्वेषाभ्यां रागद्वेषाभ्यासमनुकूलप्रतिकूलविषयाभ्यामुत्थितेन शीतोष्णसुखदुःखनिमित्तेन मोहेन चित्त्व्याकुलतापादकेन सर्वाणि भूतानि सर्गे उत्पत्ति काले प्राप्ते संमोहमतिमूढतां यान्ति गच्छन्ति। इत्छाद्वेषवशीकृतचित्तस्य बाह्यपदार्थोष्वपि यथा भूतार्थविषयं ज्ञानं नोत्पद्यते ताभ्यामाविष्टुबद्धेः संमूढस्य प्रत्गात्मनि बहुप्रतिबन्धे सति तन्नेत्पद्यत इति किमु वक्तव्यमिति भारत परंतपेति संबोधनद्वेयेनोत्तमवंशोद्भवत्वात् स्वतः शत्रुतापनत्वेनोत्कृष्टशक्तिमत्वाच्च उक्तप्रतिबन्धेन संमोहं गन्तुमयोग्योऽसीत सूचयति। यत्तु केन पुनर्निमित्तेनातीतादीनिं भूतानि न जानन्तीत्याशङ्क्याह इच्छेति। इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन शोभनाशोभनसत्यासत्यनित्यानित्यात्मानात्मसु विपर्यय स्तेन सर्वभूतानि सर्गे सृष्टिविषये संमोहमविवेकं यान्ति। अयं भावः यो हि सृष्टे रुपमानन्दस्वरुपं च तत्त्वतो जानाति स ब्रह्मवित् सर्वज्ञत्वादतीतादीञ्जानाति। सृष्टौ च सर्वेषां मोहोऽस्ति अशोभने स्त्र्यादौ शोभनाध्यासादसत्ये प्रप़ञ्चे सत्यत्वाध्यासात् सत्ये चात्मनोऽसङ्गत्वेऽसत्यत्वाध्यासात् अनित्ये स्वर्गादौ नित्यत्वाध्यासादनात्मनि देहादावात्मत्वाध्यासात्। अतो विपर्ययेण सृष्टिज्ञानं प्रतिबद्धम्। तेन च सार्वज्ञ्यं न जायतेऽस्मदादीनामिति तच्चिन्त्यम्। मां तु वेद न कश्चनेत्युक्त्या त्वदवेदनं केन प्रतिबन्धेनेति प्रश्नेनैवेतच्छ्लोकावतरणस्यौचित्येन तदनुसारिव्याख्यानस्यैव न्याय्यत्वात्। उत्तरश्लोके भजन्ते मां दृढव्रता इतिवाक्यशेषविरोधाच्च। विष्णुतत्त्वज्ञानाज्ज्ञातव्यान्तरानवशेषेऽपि ईश्वरवत्रैकालिकखिलज्ञानस्यालाभाच्चेति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.27।।योगमायां भगवत्तत्त्वविज्ञानप्रतिबन्धे हेतुमुक्त्वा देहेन्द्रियसंघाताभिमानातिशयपूर्वकं भोगाभिनिवेशं हेत्वन्तरमाह इच्छाद्वेषाभ्यामनुकूलप्रतिकूलविषयाभ्यां समुत्थितेन शीतोष्णसुखदुःखादिद्वन्द्वनिमित्तेन मोहेन अहं सुखी अहं दुःखीत्यादिविपर्ययेण सर्वाण्यपि भूतानि संमोहं विवेकायोग्यत्वं सर्गे स्थूलदेहोत्पत्तौ सत्यां यान्ति। हे भारत हे परंतपेति संबोधनद्वस्य कुलमहिम्ना स्वरूपशक्त्या च त्वां द्वन्द्वमोहाख्यः शत्रुर्नाभिभवितुमलमिति भावः। नहीच्छाद्वेषररितं किंचिदपि भूतमस्ति नच ताभ्यामाविष्टस्य बहिर्विषयमपि ज्ञानं संभवति पुनरात्मविषयम्। अतो रागद्वेषव्याकुलान्तःकरणत्वात्सर्वाण्यपिभूतानि मां परमेश्वरमात्मभूतं न जानन्ति अतो न भजन्ते भजनीयमपि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.27।।केन पुनर्निमित्तेनातीतादीनि भूतानि न जानन्तीत्याशङ्क्याह इच्छेति। इच्छा रागः द्वेषस्ताभ्यां समुत्थितो द्वन्द्वमोहः शोभनाशोभनसत्यासत्यनित्यानित्यात्मानात्मसु विपर्ययः अशोभने शोभनबुद्धिः शोभने वा अशोभनबुद्धिरित्येवंरूपस्तेन। हे भारत भरतान्वय सर्वभूतानि सर्गे सृष्टिविषये मोहमविवेकं यान्ति हे परंतप। अयं भावः यो हि सृष्टेरुपादानं स्वरूपं च तत्त्वतो जानाति स ब्रह्मवित् सर्वज्ञत्वादतीतादीञ्जानाति सृष्टौ च सर्वेषां मोहोऽस्ति अशोभने स्त्र्यादौ शोभनाध्यासात् असत्ये प्रपञ्चे सत्यत्वाध्यासात् सत्ये चात्मनोऽसङ्गत्वेऽसत्यत्वाध्यासात् अनित्ये स्वर्गादौ नित्यत्वाध्यासात् अनात्मनि देहादावात्माध्यासात्। अतो विपर्ययेण सृष्टिज्ञानं प्रतिबद्धं तेन च सार्वज्ञ्यं न जायतेऽस्मदादीनामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.27।।तर्हि त्वज्ज्ञाने तान् माया कथं मोहयति इत्यत आह इच्छेति। सर्गे सृष्टावुत्पत्त्यनन्तरम् इच्छा स्वेष्टवस्तुषु द्वेषस्तद्विपरीतवस्तुषु ताभ्यां सम्यक् प्रकारेणोत्थितो यो द्वन्द्वमोहः सुखदुःखरूपस्तेन हे भारत भक्तवंशज सर्वभूतानि सम्मोहं यान्ति प्राप्नुवन्ति।

Chapter 7 (Part 17)

भारतेति सम्बोधनेन भरतवत् कस्यचिदेव भक्तस्य न मोहो भवतीति व्यञ्जितम्। अत्रायं भावः मत्क्रीडार्थं सेवार्थं वा ये सृष्टास्तैर्मत्संयोगवियोगसुखदुःखविचार एव कर्तव्यः न तु स्वस्वविचारकाणां भगवत्कार्यानुपयुक्तत्वान्माया मोहयतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.27।।तदेवं मायाविषयत्वेन जीवानां परमेश्वराज्ञानमुक्तम् तस्यैवाज्ञानस्य दृढत्वे कारणमाह इच्छाद्वेषसमुत्थेनेति। सृज्यत इति सर्गः सर्गे स्थूलदेहोत्पत्तौ सत्यां तदनुकूल इच्छा तत्प्रतिकूले च द्वेषः ताभ्यां समुत्थः समुद्भूतो यः शीतोष्णसुखदुःखादिद्वन्द्वनिमित्तो मोहो विवेकभ्रंशः तेन सर्वभूतानि संमोहं च अहमेव सुखी दुःखी चेति गाढतरमभिनिवेशं प्राप्नुवन्ति अतस्तानि मज्ज्ञानाभावान्न मां जानन्तीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.27।।किञ्चायं मोहो नेदानीन्तनः किन्तु सृष्ट्यर्थः प्राक्तन एवेत्याह इच्छेति। इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे व्यवस्थितौ ईशकृतौ (प्राकृतौ) रागद्वेषौ तयोः पापहेतुभूतयोः समुत्पत्तिर्येन तथाभूतेन द्वन्द्वनिमित्तेन मोहेन हेतुना सर्वभूतानि क्षरपदवाच्यानि संसृतानि सर्गे एव सम्मोहं जन्ममरणपर्यावर्त्ते कारणभूतं भगवत्स्वरूपाज्ञानभयं प्राप्नुवन्ति गुणप्रवाहमध्ये पतिता भवन्तीत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.27।।आपका तत्त्व जाननेमें ऐसा कौन प्रतिबन्धक है जिससे मोहित हुए सभी उत्पत्तिशील प्राणी आपको नहीं जान पाते यह जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं इच्छा और द्वेष इन दोनोंसे जो उत्पन्न होता है उसका नाम इच्छाद्वेषसमुत्थ है उससे ( प्राणी मोहित होते हैं। ) वह कौन है ऐसी विशेष जिज्ञासा होनेपर यह कहते हैं द्वन्द्वोंके निमित्तसे होनेवाला जो मोह है उस द्वन्द्वमोहसे ( सब मोहित होते हैं )। शीत और उष्णकी भाँति परस्परविरुद्ध ( स्वभाववाले ) और सुखदुःख तथा उनके कारणोंमें रहनेवाले वे इच्छा और द्वेष ही यथासमय सब भूतप्राणियोंसे सम्बन्धयुक्त होकर द्वन्द्व नामसे कहे जाते हैं। सो ये इच्छा और द्वेष जब इस प्रकार सुखदुःख और उनके कारणकी प्राप्ति होनेपर प्रकट होते हैं तब वे सब भूतोंकी बुद्धिको अपने वशमें करके परमार्थतत्त्वविषयक ज्ञानकी उत्पत्तिका प्रतिबन्ध करनेवाले मोहको उत्पन्न करते हैं। जिसका चित्त इच्छाद्वेषरूप दोषोंके वशमें फँस रहा है उसको बाहरी विषयोंके भी यथार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त नहीं होता फिर उन दोनोंसे जिसकी बुद्धि आच्छादित हो रही है ऐसे मूढ़ पुरुषको अनेकों प्रतिबन्धोंवाले अन्तरात्माके सम्बन्धमें ज्ञान नहीं होता इसमें तो कहना ही क्या है इसलिये हे भारत अर्थात् भरतवंशमें उत्पन्न अर्जुन उस इच्छाद्वेषजन्य द्वन्द्वनिमित्तक मोहके द्वारा मोहित हुए समस्त प्राणी हे परंतप जन्मकालमें उत्पन्न होते ही मूढ़भावमें फँस जाते हैं। अभिप्राय यह है कि उत्पत्तिशील समस्त प्राणी मोहके वशीभूत हुए ही उत्पन्न होते हैं। ऐसा होनेके कारण द्वन्द्वमोहसे जिनका ज्ञान प्रतिबद्ध हो गया है वे मोहित हुए समस्त प्राणी अपने आत्मारूप मुझ ( परमात्मा ) को नहीं जानते और इसीलिये वे आत्मभावसे मुझे नहीं भजते।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.27।। व्याख्या  इच्छाद्वेषसमुत्थेन ৷৷. सर्गे यान्ति परंतप इच्छा और द्वेषसे द्वन्द्वमोह पैदा होता है जिससे मोहित होकर प्राणी भगवान्से बिलकुल विमुख हो जाते हैं और विमुख होनेसे बारबार संसारमें जन्म लेते हैं।मनुष्यको संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्में लगनेकी आवश्यकता है। भगवान्में न लगनेमें बड़ी बाधा क्या है यह मनुष्यशरीर विवेकप्रधान है अतः मनुष्यकी प्रवृत्ति और निवृत्ति पशुपक्षियोंकी तरह न होकर अपने विवेकके अनुसार होनी चाहिये। परन्तु मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व न देकर राग और द्वेषको लेकर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है जिससे उसका पतन होता है।मनुष्यकी दो मनोवृत्तियाँ हैं एक तरफ लगाना और एक तरफसे हटाना। मनुष्यको परमात्मामें तो अपनी वृत्ति लगानी है और संसारसे अपनी वृत्ति हटानी है अर्थात् परमात्मासे तो प्रेम करना है और संसारसे वैराग्य करना है। परन्तु इन दोनों वृत्तियोंको जब मनुष्य केवल संसारमें ही लगा देता है तब वही प्रेम और वैराग्य क्रमशः राग और द्वेषका रूप धारण कर लेते हैं जिससे मनुष्य संसारमें उलझ जाता है और भगवान्से सर्वथा विमुख हो जाता है। फिर भगवान्की तरफ चलनेका अवसर ही नहीं मिलता। कभीकभी वह सत्संगकी बातें भी सुनता है शास्त्र भी पढ़ता है अच्छी बातोंपर विचार भी करता है मनमें अच्छी बातें पैदा हो जाती हैं तो उनको ठीक भी समझता है। फिर भी उसके मनमें रागके कारण यह बात गहरी बैठी रहती है कि मुझे तो सांसारिक अनुकूलताको प्राप्त करना है और प्रतिकूलताको हटाना है यह मेरा खास काम है क्योंकि इसके बिना मेरा जीवननिर्वाह नहीं होगा। इस प्रकार वह हृदयमें दृढ़तासे रागद्वेषको पकड़े रखता है जिससे सुनने पढ़ने और विचार करनेपर भी उसकी वृत्ति रागद्वेषरूप द्वन्द्वको नहीं छोड़ती। इसीसे वह परमात्माकी तरफ चल नहीं सकता।द्वन्द्वोंमें भी अगर उसका राग मुख्यरूपसे एक ही विषयमें हो जाय तो भी ठीक है। जैसे भक्त बिल्वमंगलकी वृत्ति चिन्तामणि नामक वेश्यामें लग गयी तो उनकी वृत्ति संसारसे तो हट ही गयी। जब वेश्याने यह ताड़ना की ऐसे हाड़मांसके शरीरमें तू आकृष्ट हो गया अगर भगवान्में इतना आकृष्ट हो जाता तो तू निहाल हो जाता तब उनकी वृत्ति वेश्यासे हटकर भगवान्में लग गयी और उनका उद्धार हो गया। इसी तरहसे गोपियोंका भगवान्में राग हो गया तो वह राग भी कल्याण करनेवाला हो गया। शिशुपालका भगवान्के साथ वैर (द्वेष) रहा तो वैरपूर्वक भगवान्का चिन्तन करनेसे भी उसका कल्याण हो गया। कंसको भगवान्से भय हुआ तो भयवृत्तिसे भगवान्का चिन्तन करनेसे उसका भी कल्याण हो गया। हाँ यह बात जरूर है कि वैर और भयसे भगवान्का चिन्तन करनसे शिशुपाल और कंस भक्तिके आनन्दको नहीं ले सके। तात्पर्य यह है कि किसी भी तरहसे भगवान्की तरफ आकर्षण हो जाय तो मनुष्यका उद्धार हो जाता है। परन्तु संसारमें रागद्वेष कामक्रोध ठीकबेठीक अनुकूलप्रतिकूल आदि द्वन्द्व रहनेसे मूढ़ता दृढ़ होती है और मनुष्यका पतन हो जाता है।दूसरी रीतिसे यों समझें कि संसारका सम्बन्ध द्वन्द्वसे दृढ़ होता है। जब कामनाको लेकर मनोवृत्तिका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है तब सांसारिक अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर रागद्वेष हो जाते हैं अर्थात् एक ही पदार्थ कभी ठीक लगता है कभी बेठीक लगता है कभी उसमें राग होता है कभी द्वेष होता है जिनसे संसारका सम्बन्ध दृढ़ हो जाता है। इसलिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें निर्द्वन्द्वः (2। 45) पदसे द्वन्द्वरहित होनेकी आज्ञा दी है। निर्द्वन्द्व पुरुष सुखपूर्वक मुक्त होता है निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते (5। 3)। सुखदुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होकर भक्तजन अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् (15। 5)। भगवान्ने द्वन्द्वको मनुष्यका खास शत्रु बताया है (3। 34)। जो द्वन्द्वमोहसे रहित होते हैं वे दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं (7। 28) इत्यादि रूपसे गीतामें द्वन्द्वरहित होनेकी बात बहुत बार आयी है।जन्ममरणमें जानेका कारण क्या है शास्त्रोंकी दृष्टिसे तो जन्ममरणका कारण अज्ञान है परन्तु सन्तवाणीको देखा जाय तो जन्ममरणका खास कारण रागके कारण प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग है। फलेच्छापूर्वक शास्त्रविहित कर्म करनेसे और प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् भगवदाज्ञाविरुद्ध कर्म करनेसे सत्असत् योनियोंकी प्राप्ति होती है अर्थात् देवताओँकी योनि चौरासी लाख योनि और नरक प्राप्त होते हैं।प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करनेसे सम्मोह अर्थात् जन्ममरण मिट जाता है। उसका सदुपयोग कैसे करें हमारेको जो अवस्था परिस्थिति मिली है उसका दुरुपयोग न करनेका निर्णय किया जाय कि हम दुरुपयोग नहीं करेंगे अर्थात् शास्त्र और लोकमर्यादाके विरुद्ध काम नहीं करेंगे। इस प्रकार रागरहित होकर दुरुपयोग न करनेका निर्णय होनेपर सदुपयोग अपनेआप होने लगेगा अर्थात् शास्त्र और लोकमर्यादाके अनुकूल काम होने लगेगा। जब सदुपयोग होने लगेगा तो उसका हमें अभिमान नहीं होगा। कारण कि हमने तो दुरुपयोग न करनेका विचार किया है सदुपयोग करनेका विचार तो हमने किया ही नहीं फिर करनेका अभिमान कैसे इससे तो कर्तृत्वअभिमानका त्याग हो जायगा। जब हमने सदुपयोग किया ही नहीं तो उसका फल भी हम कैसे चाहेंगे क्योंकि सदुपयोग तो हुआ है किया नहीं। अतः इससे फलेच्छाका त्याग हो जायगा। कर्तृत्वअभिमान और फलेच्छाका होनेसे अर्थात् बन्धनका अभाव होनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध है।प्रायः साधकोंमें यह बात गहराईसे बैठी हुई है कि साधनभजन जपध्यान आदि करनेका विभाग अलग है और सांसारिक कामधंधा करनेका विभाग अलग है। इन दो विभागोंके कारण साधक भजनध्यान आदिको तो बढ़ावा देते हैं पर सांसारिक कामधंधा करते हुए रागद्वेष कामक्रोध आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते प्रत्युत ऐसी दृढ़ भावना बना लेते हैं कि कामधंधा करते हुए तो रागद्वेष होते ही हैं ये मिटनेवाले थोड़े ही हैं। इस भावनासे बड़ा भारी अनर्थ यह होता है कि साधकके रागद्वेष बने रहते हैं जिससे उसके साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। वास्तवमें साधक चाहे पारमार्थिक कार्य करे चाहे सांसारिक कार्य करे उसके अन्तःकरणमें रागद्वेष नहीं रहने चाहिये।पारमार्थिक और सांसारिक क्रियाओंमें भेद होनेपर भी साधकके भावमें भेद नहीं होना चाहिये अर्थात् पारमार्थिक और सांसारिक दोनों क्रियाएँ करते समय साधकका भाव एक ही रहना चाहिये कि मैं साधक हूँ और मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है। इस प्रकार क्रियाभेद तो रहेगा ही और रहना भी चाहिये पर भावभेद नहीं रहेगा। भावभेद न रहनेसे अर्थात् एक भगवत्प्राप्तिका ही भाव (उद्देश्य) रहनेसे पारमार्थिक और सांसारिक दोनों ही क्रियाएँ साधन बन जायँगी। सम्बन्ध  पूर्वश्लोकमें भगवान्ने द्वन्द्वमोहसे मोहित होनेवालोंकी बात बतायी अब आगेके श्लोकमें द्वन्द्वमोहसे रहित होनेवालोंकी बात कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.27।।ननु च कर्माण्येव क्रियमाणानि प्रलयकाले मोक्षं विदधते (S विदधति N प्रविदधति) । अन्यथा किमिति महाप्रलय उपजायते इत्याशङ्कायामारभते ( मारभ्यते N मिदमारभ्यते) ।इच्छेति। इच्छाद्वेषक्रोधमोहादिभिस्तावन्मोहात्मक एव स परं स्फीतीभावमुपनीयते येन प्रकृतिजठरान्तर्वर्ति समग्रमेव जगत् निजकार्यकरणमात्राक्षममेव प्रसुप्ततामवलम्बते आमोहं वासनानुभवात् प्रतिदिनं रात्रिसमये सौषुप्तवत्। न तु तावता विमुक्तरूपता मोहानुभुवसमाप्तौ पुनर्विचित्रव्यापारसंसारदर्शनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.27।।भगवत्तत्त्वविज्ञानप्रतिबन्धकं मूलाज्ञानातिरिक्तं प्रश्नद्वारेणोदाहरति केनेत्यादिना। पुनःशब्दात्प्रतिबन्धकान्तरविवक्षा गम्यते। अपरोक्षमवान्तरप्रतिबन्धकमिदमा गृह्यते। विशेषमाकाङ्क्षापूर्वकं निक्षिपति केनेति। विशेषापेक्षायामिति। द्वन्द्वशब्देन गृहीतयोरपीच्छाद्वेषयोर्ग्रहणं द्वन्द्वशब्दार्थोपलक्षणार्थमित्यभिप्रेत्याह तावेवेति। तयोरपर्यायमेकत्रानुपपत्तिं गृहीत्वा विशिनष्टि यथाकालमिति। नच तयोरनधिकरणं किंचिदपि भूतं संसारमण्डले संभवतीत्याह सर्वभूतैरिति। तथापि कथं तयोर्मोहहेतुत्वमित्याशङ्क्याह तत्रेति। तयोराश्रयः सप्तम्यर्थः। उक्तमेवार्थं कैमुतिकन्यायेन प्रपञ्चयति नहीति। पूर्वभागानुवादपूर्वकमुत्तरभागेन फलितमाह अत इति। प्रत्यगात्मन्यहंकारादिप्रतिबन्धप्रभावतो ज्ञानोत्पत्तेरसंभवोऽतःशब्दार्थः। कुलप्रसूत्यभिमानेन स्वरूपशक्त्या च युक्तस्यैव यथोक्तप्रतिबन्धप्रतिविधानसामर्थ्यमिति द्योतनार्थं भारत परंतपेति संबोधनद्वयम्। तत्त्वज्ञानप्रतिबन्धे प्रकृतभवान्तरकारणमुपसंहरति मोहेति। जायमानभूतानां मोहपरतन्त्रत्वे फलितमाह यत इति। भगवत्तत्त्ववेदनाभावे तन्निष्ठत्ववैधुर्यं फलतीत्याह अतएवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.27।।इच्छाद्वेषौ द्वन्द्वम् तज्जन्यो मोहो द्वन्द्वमोहः तेनेति कश्चित् शं. तदसदिति भावेनाह द्वन्द्वेति।अन्यथा इच्छाद्वेषसमुत्थेन मोहेनेत्येव स्यादिति भावः। व्याख्यानव्याख्येयभावश्चागतिका गतिः। द्वन्द्वमोहस्येच्छाद्वेषसमुत्थत्वं कथं इत्यत आह इच्छेति। किञ्चित्सुखादिकं हेयत्वादिनेति शेषः। ननुनाहं प्रकाशः 7।25 इति भगवतोदैवी ह्येषा 7।14 इति तदधीनायाः गुणमय्या मायायाश्च मोहकत्वमुक्तं तत्कथं भगवद्विषयसम्मोहस्येच्छाद्वेषसमुत्थो द्वन्द्वमोहः कारणमुच्यते इत्यत आह कारणान्तरमिति। इच्छाद्वेषसमुत्थद्वन्द्वमोहलक्षणमेतद्भगवद्विषयस्य सम्मोहस्यावान्तरकारणमुच्यत इत्यर्थः। कुत एतदित्यतः तत्सूचकं पदं पठति सर्ग इति। सर्गः क्रिया कथं तस्याधिकरणत्वं इत्यतो लक्षणामाश्रित्य व्याचष्टे सर्गेति। तदुत्तरकालं किं तन्न कारणं इत्यतः पुनर्लक्षणाश्रयणेनाह आरभ्येति। सर्गकालमिति सम्बन्धः। कथमनेनावान्तरकारणत्वं ज्ञायते इत्यतः सावधारणमेतदित्युक्तमेवेति। उक्तमुपपादयन्नाह शरीर इति। आदिपदेन द्वेषस्य द्वन्द्वानां च ग्रहणम्। अतः सर्गकालमारभ्यैवैतत्कारणमिति सिद्धम्। एतावता कथमवान्तरकारणत्वसिद्धिः इत्यत आह पूर्वं त्विति। सर्गात्पूर्वं त्विच्छादिना विना ज्ञानमस्त्येव भगवदिच्छाद्यधीनमत एतदवान्तरं कारणमिति सिद्धमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.27।।द्वन्द्वमोहेन सुखदुःखादिविषयमोहेन इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम्। कारणान्तरमेतत्। सर्गे सर्गकाले आरभ्यैव शरीरे हि सतीच्छादयः। पूर्वं त्वज्ञानमात्रम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.27।।तथाहि इच्छाद्वेषाभ्यां समुत्थेन शीतोष्णादिद्वन्द्वाख्येन मोहेन सर्वभूतानि सर्गे जन्मकाल एव संमोहं यान्ति। एतद् उक्तं भवति गुणमयेषु सुखदुःखादिद्वन्द्वेषु पूर्वपूर्वजन्मनि यद्विषयौ इच्छाद्वेषौ रागद्वैषौ अभ्यस्तौ तद्वासनया पुनरपि जन्मकाल एव तदेव द्वन्द्वाख्यम् इच्छाद्वेषविषयत्वेन समुपस्थितं भूतानां मोहनं भवति तेन मोहेन सर्वभूतानि संमोहं यान्ति तद्विषयेच्छाद्वेषस्वभावानि भवन्ति न मत्संश्लेषवियोगसुखदुःखस्वभावानि। ज्ञानी तु मत्संश्लेषवियोगैकसुखदुःखस्वभावः न तत्स्वभावं किमपि भूतं जायते इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.27।। इच्छाद्वेषसमुत्थेन इच्छा च द्वेषश्च इच्छाद्वेषौ ताभ्यां समुत्तिष्ठतीति इच्छाद्वेषसमुत्थः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन। केनेति विशेषापेक्षायामिदमाह द्वन्द्वमोहेन द्वन्द्वनिमित्तः मोहः द्वन्द्वमोहः तेन। तावेव इच्छाद्वेषौ शीतोष्णवत् परस्परविरुद्धौ सुखदुःखतद्धेतुविषयौ यथाकालं सर्वभूतैः संबध्यमानौ द्वन्द्वशब्देन अभिधीयेते। तत्र यदा इच्छाद्वेषौ सुखदुःखतद्धेतुसंप्राप्त्या लब्धात्मकौ भवतः तदा तौ सर्वभूतानां प्रज्ञायाः स्ववशापादनद्वारेण परमार्थात्मतत्त्वविषयज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकारणं मोहं जनयतः। न हि इच्छाद्वेषदोषवशीकृतचित्तस्य यथाभूतार्थविषयज्ञानमुत्पद्यते बहिरपि किमु वक्तव्यं ताभ्यामाविष्टबुद्धेः संमूढस्य प्रत्यगात्मनि बहुप्रतिबन्धे ज्ञानं नोत्पद्यत इति। अतः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत भरतान्वयज सर्वभूतानि संमोहितानि सन्ति संमोहं संमूढतां सर्गे जन्मनि उत्पत्तिकाले इत्येतत् यान्ति गच्छन्ति हे परंतप। मोहवशान्येव सर्वभूतानि जायमानानि जायन्ते इत्यभिप्रायः। यतः एवम् अतः तेन द्वन्द्वमोहेन प्रतिबद्धप्रज्ञानानि सर्वभूतानि संमोहितानि मामात्मभूतं न जानन्ति अत एव आत्मभावेन मां न भजन्ते।।के पुनः अनेन द्वन्द्वमोहेन निर्मुक्ताः सन्तः त्वां विदित्वा यथाशास्त्रमात्मभावेन भजन्ते इत्यपेक्षितमर्थं दर्शयितुम् उच्यते

───────────────────

【 Verse 7.28 】

▸ Sanskrit Sloka: येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् | ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: ||

▸ Transliteration: yeṣāṃ tvantagataṃ pāpaṃ janānāṃ puṇyakarmaṇām | te dvandvamohanirmuktā bhajante māṃ dṛḍhavratāḥ ||

▸ Glossary: yeṣāṃ: whose; tu : but; antagataṃ: completely eradicated; pāpaṃ: sin; janānāṃ: of the persons; puṇya: pious; karmaṇāṃ: previous activities; te: they; dvandva: duality; moha: delusion; nirmuktāḥ: free from; bhajante worship; māṃ: Me; dṛḍhavratāḥ: with determination.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.28 Persons who have acted virtuously, whose sinful actions are completely eradicated and who are freed from the duality of reality and unreality, engage themselves in My worship with firm resolve.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.28।।परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्योंके पाप नष्ट गये हैं वे द्वन्द्वमोहसे रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.28।। परन्तु जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है वे द्वन्द्वमोह से निर्मुक्त और दृढ़वती पुरुष मुझे भजते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.28 येषाम् of whom? तु but? अन्तगतम् is at the end? पापम् sin? जनानाम् of men? पुण्यकर्मणाम् of men of virtuous deeds? ते they? द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः freed from the delusion of the pairs of opposites? भजन्ते worship? माम् Me? दृढव्रताः men steadfast in vows.Commentary By the performance of good deeds the heart is slowly purified Sattva increases Rajas and Tamas are gradually thinned out. The mind becomes serene and calm. The little selfarrogating personality slowly dies. You grow in spirituality. The divine flame becomes brighter and brighter. You become impersonal.Sin To forget ones identity with the Supreme Soul is the greatest sin. To see difference is sin. To take the body as the Self? to believe that this world is real is sin. Selfishness is sin. Egoism is sin. Ignorance is sin.Steadfast in vows The man steadfast in vows entertains a firm resolve I must realise the Self now I will not budge an inch from my seat till I attain Selfrealisation. He has the firm conviction that Brahman is the only Reality. This world is unreal. It is like a mirage. I can attain immortality and eternal bliss if I realise the Self only. There is not an iota of happiness in the sensual objects. Therefore the Lord says? Those persons of pure deeds worship Me steadfast in vows.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.28. But those men of virtuous deeds, whose sin has come to an end-they, being free from the delusion of pairs [of opposites], worship Me with firm resolve.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.28 But those who act righteously, in whom sin has been destroyed, who are free from the infatuation of the conflicting emotions, they worship Me with firm resolution.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.28 But the doers of good deeds, whose sins have come to an end, are freed from the delusion of the pairs of opposites. They worship Me, steadfast in their vows.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.28 On the other hand, those persons who are of virtuous deeds, whose sin has come to an end, they, being free from the delusion of dulaity and firm in their convictions, adore Me.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.28 But those men of virtuous deeds whose sins have come to an end, and who are freed from the delusion of the pairs of opposites, worship Me, steadfast in their vows.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.28 See Comment under 7.30

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.28 However, there are some whose sins, accruing from beginningless time, which cause desire or hatred to the pairs of opposites and annual the tendency towards Me, have come to an end, i.e., have become weakened, through the accumulation of good actions in numerous births, They resort to Me, devoid of delusion produced by the Gunas, and worship Me alone in proportion to the excellence of their Karmas previously described. In order to attain deliverance form old age and death and for aciring the supreme consummation of reaching Me, they remain steadfast in their vows.

Sri Krsna enumerates what special things are to be known and what ought to be attained by these three classes of votaries of God:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.28 Yesam jananam, those persons; tu, on the other hand; punya-karmanam, who are of virtuous deeds, in whom exist virtuous deeds that are the cause of purification of the mind; whose papam, sin; antagatam, has come to an end, is almost eradicated, attenuated; te, they; dvandva-moha-nirmuktah, being free from the delusion of duality as described; and drdhavratah, firm in their convictions-those who [Here Ast. adds, 'sarva-parityaga-vratena, through the vow of relinishing everything'.-Tr.] have the firm knowledge that the supreme Reality is such alone and not otherwise are called drdhavratah-; bhajante, adore; mam, Me, the supreme Self. Why do they worship? This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.28।। जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है इस कथन को सम्यक् प्रकार से समझना आवश्यक है। पाप मनुष्य का स्वभाव नहीं हैं वेदान्त के अनुसार वह मनुष्य द्वारा किये गये गलत निर्णय अर्थात् विपरीत ज्ञान का परिणाम है जिसने आत्मचैतन्य को आच्छादित सा कर दिया है। पाप का मुख्य कारण है बाह्य स्थूल जगत् के निम्न स्तरीय विषयोपभोग के लिए हमारे मन की तृष्णा और स्पृहा। पापी पुरुष वह है जिसका अत्यधिक समय और ध्यान केवल अपने देहसुख के लिए ही व्यक्त होता है। ऐसे पुरुष में देह स्वामी और आत्मा उसकी दासी बन जाती है। बहिर्मुखी प्रवृत्ति वैषयिक सुखों की कामना मन में उठने वाली प्रत्येक निम्न कोटि की भावना का सन्तुष्टीकरण यह है पापी पुरुष की जीवन पद्धति।इस प्रकार का कामुक पाशविक जीवन अन्तकरण में वैसी ही वासनाएं उत्पन्न करता है। वासना के अनुसार ही विचार होते हैं। विचारानुसार कर्म और ये कर्म फिर वासना को ही दृढ़ करते हैं।मनुष्य की शान्ति और सन्तुष्टि को विनष्ट करने वाली वासनाविचारकर्म की श्रृंखला को तोड़ने के लिए मनुष्य को पुण्यकर्म का नया जीवन प्रारम्भ करने का उपदेश दिया जाता है। पुण्यकर्म पाप का विरोधी होने से उसके अन्तर्गत वे सब विचार भावनाएं तथा कर्म आते हैं जो ईश्वर को समर्पित होते हैं अर्थात् जिनका लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होता है। मैं देह हूँ के स्थान पर मैं आत्मा हूँ इस ज्ञान को दृढ़ करके कर्म करने पर वे अपना संस्कार उत्पन्न नहीं करेंगे। कुछ कालावधि में इन पुण्यसंस्कारों के दृढ़ होने पर पाप वासनाएं नष्ट हो जायेंगी।ऐसा पापयुक्त पुरुष सुख दुखादि रूप सभी प्रकार के द्वन्द्वमोह से निर्मुक्त हो जाता है। तब उसमें यह योग्यता आती है कि वह एकाग्रचित तथा दृढ़वती अर्थात् दृढ़ निश्चयी होकर आत्मा का ध्यान कर सके।साधन सम्पन्न साधक किस प्रयोजन से आत्मा का ध्यान करते हैं उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.28।।के पुनस्त्वां विदित्वा यथाशास्त्र मात्मभावेन भजन्त इत्यपेक्षायामाह। येषां तु पुनर्जनानां पुण्यकर्मणां पुण्यं कर्म पापक्षयद्वारा सत्त्वशुद्धिकरं येषां ते पुण्यकर्माणस्तेषां पापमन्तं समाप्तिं गतं प्राप्तम् ते यथोक्तद्वन्द्वमोहेन विनिर्मुक्ता वर्जिता अतएव दृढव्रताः एवमेवात्मतत्त्वं नान्यथेत्येवं सर्वपरित्यागेन निश्चितविज्ञाना मां परमात्मानं भजन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.28।।यदि सर्वभूतानि संमोहं यान्ति कथं तर्हिचतुर्विधा भजन्ते मामित्युक्तम्। सत्यम्। सुकृतातिशयेन तेषां क्षीणपापत्वादित्याह येषां त्वितरलोकविलक्षणानां जनानां सफलजन्मनां पुण्यकर्मणामनेकजन्मसु पुण्याचरणशीलानां तैस्तैः पुण्यैः कर्मभिर्ज्ञानप्रतिबन्धकं पापमन्तगतमन्तमवसानं प्राप्तं ते पापाभावेन तन्निमित्तेन द्वन्द्वमोहेन रागद्वेषादिनिबन्धनविपर्यासेन स्वत एव निर्मुक्ताः पुनरावृत्त्ययोग्यत्वेन त्यक्ताः दृढव्रता अचाल्यसंकल्पाः सर्वथा भगवानेव भजनीयः स चैवंरुप एवेति प्रमाणजनिताप्रामाण्यशङ्काशून्यविज्ञानाः सन्तो मां परमात्मानं भजन्तेऽनन्यशरणाः सन्तः सेवन्ते। एतादृशा एव चतुर्विधा भजन्ते मामित्यत्र सुकृतिशब्देनोक्ताः। अतः सर्वभूतानि संमोहं यान्तीत्युत्सर्गः। तेषां मध्ये ये सुकृतिनस्ते संमोहशून्या मां भजन्त इत्यपवाद इति न विरोधः। अयमेवोत्सर्गः प्रागपि प्रतिपादितस्त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरित्यत्र। तस्मात्सत्त्वशोधकपुण्यकर्मसंचयाय सर्वदा यतनीयमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.28।।केषां तर्हि सार्वज्ञ्यं भवतीत्याशङ्क्याह येषां त्विति द्वाभ्याम्। येषां पुनर्जनानां पुण्यकर्मणां पापं अन्तगतं अन्तं नाशं प्राप्तं।द्वितीया श्रिता इति समासः। ते द्वन्द्वमोह उक्तलक्षणस्तेन निर्मुक्ताः सन्तः प्रथमं दृढव्रताः शमदमादिदार्ढ्य भाजो भूत्वा मां भजन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.28।।ननु ये मोहयुक्तास्तन्मध्ये तत्सङ्गिन एव केचन पूर्वमभजन्तः पश्चात् त्वद्भजनप्रवृत्ताः कथं भवन्ति इत्यत आह येषामिति। येषां दुर्लभानां भाग्यवतां पुण्यकर्मणां मद्दर्शनादिना पुण्याचरणशीलानां महत्सु विनयादियुक्तानाम्। तु पुनः जनादिक्लेशयुक्तानां पापं मत्स्वरूपज्ञानप्रतिबन्धकं अन्तभावं गतं प्राप्तं नष्टमिति यावत्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः स्वसुखदुःखादिमोहनिर्मुक्ताः दृढव्रताः द़ृढसङ्कल्पाः मदेकनिष्ठाः मां भजन्ते। अत्रायं भावः पूर्वजन्मकृतं यत्किञ्चित् पुण्यकर्म तेन जन्मान्तरे प्रवृद्धमाने वाऽनेकजन्मनि वयसः परिपाके पुण्योपचितमरणभयेन तन्निवृत्त्यर्थं मद्भजनप्रवृत्ता भवन्ति। अतएवजन्मान्तरसहस्रेषु तपोज्ञानसमाधिभिः। नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रजायते पां.गी.40 इति भागवतैरुक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.28।।कुतस्तर्हि केचन त्वां भजन्तो दृश्यन्ते तत्राह येषामिति। येषां तु पुण्याचरणशीलानां सर्वं प्रतिबन्धकं पापमन्तगतं नष्टं ते द्वन्द्वनिमित्तेन मोहेन निर्मुक्ताः दृढव्रता एकान्तिनः सन्तो मां भजन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.28।।येषां त्विति। सुकृतिनां जनानां पापमात्रं नष्टं पापरूपं प्रतिबन्धकं वा ते मां दृढव्रताः सन्तो भजन्ते। मां भजन्तो दृश्यन्त इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.28।।तो फिर इस द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए ऐसे कौनसे मनुष्य हैं जो आपको शास्त्रोक्त प्रकारसे आत्मभावसे भजते हैं इस अपेक्षित अर्थको दिखानेके लिये कहते हैं जिन पुण्यकर्मा पुरुषोंके पापोंका लगभग अन्त हो गया होता है अर्थात् जिनके कर्म पवित्र यानी अन्तःकरणकी शुद्धिके कारण होते हैं वे पुण्यकर्मा हैं ऐसे उपर्युक्त द्वन्द्वमोहसे मुक्त हुए वे दृढ़व्रती पुरुष मुझ परमात्माको भजते हैं। परमार्थतत्त्व ठीक इसी प्रकार है दूसरी प्रकार नहीं ऐसे निश्चित विज्ञानवाले पुरुष दृढ़व्रती कहे जाते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.28।। व्याख्या  येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् द्वन्द्वमोहसे मोहित मनुष्य तो भजन नहीं करते और जो द्वन्द्वमोहसे मोहित नहीं हैं वे भजन करते हैं तो भजन न करनेवालोंकी अपेक्षा भजन करनेवालोंकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ तु पद आया है।जिन मनुष्योंने अपनेको तो भगवत्प्राप्ति ही करनी है इस उद्देश्यको पहचान लिया है अर्थात् जिनको उद्देश्यकी यह स्मृति आ गयी है कि यह मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये नहीं है प्रत्युत भगवान्की कृपासे केवल उनकी प्राप्तिके लिये ही मिला है ऐसा जिनका दृढ़ निश्चय हो गया है वे मनुष्य ही पुण्यकर्मा हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपने एक निश्चयसे जो शुद्धि होती है पवित्रता आती है वह यज्ञ दान तप आदि क्रियाओंसे नहीं आती। कारण कि हमें तो एक भगवान्की तरफ ही चलना है यह निश्चय स्वयंमें होता हैऔर यज्ञ दान आदि क्रियाएँ बाहरसे होती हैं।अन्तगतं पापम् कहनेका भाव यह है कि जब यह निश्चय हो गया कि मेरेको तो केवल भगवान्की तरफ ही चलना है तो इस निश्चयसे भगवान्की सम्मुखता होनेसे विमुखता चली गयी जिससे पापोंकी जड़ ही कट गयी क्योंकि भगवान्से विमुखता ही पापोंका खास कारण है। सन्तोंने कहा है कि डेढ़ ही पाप है और डेढ़ ही पुण्य है। भगवान्से विमुख होना पूरा पाप है और दुर्गुणदुराचारोंमें लगना आधा पाप है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख होना पूरा पुण्य है और सद्गुणसदाचारोंमें लगना आधा पुण्य है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य भगवान्के सर्वथा शरण हो जाता है तब उसके पापोंका अन्त हो जाता है।दूसरा भाव यह है कि जिनका लक्ष्य केवल भगवान् हैं वे पुण्यकर्मा हैं क्योंकि भगवान्का लक्ष्य होनेपर सब पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान्का लक्ष्य होनेपर पुराने किसी संस्कारसे पाप हो भी जायगा तो भी वह रहेगा नहीं क्योंकि हृदयमें विराजमान भगवान् उस पापको नष्ट कर देते हैं विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः (श्रीमद्भा0 11। 5। 42)।तीसरा भाव यह है कि मनुष्य सच्चे हृदयसे यह दृढ़ निश्चय कर ले कि अब आगे मैं कभी पाप नहीं करूँगा तो उसके पाप नहीं रहते।ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः पुण्यकर्मा लोग द्वन्द्वरूप मोहसे रहित होकर और दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं। द्वन्द्व कई तरहका होता जैसे 1 भगवान्में लगें या संसारमें लगें क्योंकि परलोकके लिये भगवान्का भजन आवश्यक है और इहलोकके लिये संसारका काम आवश्यक है।2 वैष्णव शैव शाक्त गाणपत और सौर इन सम्प्रदायोंमेंसे किस सम्प्रदायमें चलें और किस सम्प्रदायमें न चलें3 परमात्माके स्वरूपके विषयमें द्वैत अद्वैत विशिष्टाद्वैत शुद्धाद्वैत अचिन्त्यभेदाभेद आदि कई तरहके सिद्धान्त हैं। इनमेंसे किस सिद्धान्तको स्वीकार करें और किस सिद्धान्तको स्वीकार न करें4 परमात्माकी प्राप्तिके भक्तियोग ज्ञानयोग कर्मयोग ध्यानयोग हठयोग लययोग मन्त्रयोग आदि कई मार्ग हैं। उनमेंसे किस मार्गपर चलें और किस मार्गपर न चलें5 संसारमें होनेवाले अनुकूलप्रतिकूल हर्षशोक ठीकबेठीक सुखदुःख रागद्वेष आदि सभी द्वन्द्व हैं।उपर्युक्त सभी पारमार्थिक और सांसारिक द्वन्द्वरूप मोहसे मुक्त हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं।मनुष्यका एक ही पारमार्थिक उद्देश्य हो जाय तो पारमार्थिक और सांसारिक सभी द्वन्द्व मिट जाते हैं। पारमार्थिक उद्देश्यवाले साधक अपनीअपनी रुचि योग्यता और श्रद्धाविश्वासके अनुसार अपनेअपने इष्टको सगुण मानें साकार मानें निर्गुण मानें निराकार मानें द्विभुज मानें चतुर्भुज मानें अथवा सहस्रभुज आदि कैसे ही मानें पर संसारकी विमुखतामें और परमात्माकी सम्मुखतामें वे सभी एक हैं। उपासनाकी पद्धतियाँ भिन्नभिन्न होनेपर भी लक्ष्य सबका एक होनेसे कोई भी पद्धति छोटीबड़ी नहीं है। जिस साधकका जिस पद्धतिमें श्रद्धाविश्वास होता है उसके लिये वही पद्धति श्रेष्ठ है और उसको उसी पद्धतिका ही अनुसरणकरना चाहिये। परन्तु दूसरोंकी पद्धति या निष्ठकी निन्दा करना उसको दो नम्बरका मानना दोष है। जबतक यह साधनविषयक द्वन्द्व रहता है और साधकमें अपने पक्षका आग्रह और दूसरोंका निरादर रहता है तबतक साधकको भगवान्के समग्ररूपका अनुभव नहीं होता। इसलिये आदर तो सब पद्धतियों और निष्ठाओंका करे पर अनुसरण अपनी पद्धति और निष्ठाका ही करे तो इससे साधनविषयक द्वन्द्व मिट जाता है।मनुष्यमात्रकी यह प्रकृति होती है ऐसा एक स्वभाव होता है कि जब वह पारमार्थिक बातें सुनता है तब वह यह समझता है कि साधन करके अपना कल्याण करना है क्योंकि मनुष्यजन्मकी सफलता इसीमें है। परन्तु जब वह व्यवहारमें आता है तब वह ऐसा सोचता है कि साधनभजन से क्या होगा सांसारिक काम तो करना पड़ेगा क्योंकि संसारमें बैठे हैं चीजवस्तुकी आवश्यकता पड़ती है उसके बिना काम कैसे चलेगा अतः संसारका काम मुख्य रहेगा ही और भजनस्मरणका नित्यनियम तो समयपर कर लेना है क्योंकि सांसारिक कामकी जितनी आवश्यकता है उतनी भजनस्मरण नित्यनियमकी नहीं। ऐसी धारणा रखकर भगवान्में लगे हुए मनुष्य बहुत हैं।भगवान्की तरह चलनेवालोंमें भी जिन्होंने एक निश्चय कर लिया है कि मेरेको तो अपना कल्याण करना है सांसारिक लाभहानि कुछ भी हो जाय इसकी कोई परवाह नहीं। कारण कि सांसारिक जितनी भी सिद्धि है वह आँख मीचते ही कुछ नहीं है सम्मीलने नयनयोर्नहि किञ्चिदस्ति और इन सांसारिक वस्तुओंको प्राप्त करनेसे कितने दिनतक हमारा काम चलेगा ऐसा विचार करके जो एक भगवान्की तरफ ही लग जाते हैं और सांसारिक आदरनिरादर आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते ऐसे मनुष्य ही द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए हैं।दृढ़व्रताः कहनेका तात्पर्य है कि हमें तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है हमारा और कोई लक्ष्य है ही नहीं। वह परमात्मा द्वैत है कि अद्वैत है शुद्धाद्वैत है कि विशिष्टाद्वैत है सगुण है कि निर्गुण है द्विभुज है कि चतुर्भुज है इससे हमें कोई मतलब नहीं है (टिप्पणी प0 440)। वह हमारे लिये कैसी भी परिस्थिति भेजे हमें कहीं भी रखे और कैसे भी रखे इससे भी हमें कोई मतलब नहीं है। बस हमें तो केवल परमात्माकी तरफ चलना है ऐसे निश्चयसे वे दृढ़व्रती हो जाते हैं।परमात्माकी तरफ चलनेवालोंके सामने तीन बातें आती हैं परमात्मा कैसे हैं जीव कैसा है और जगत् कैसा है तो उनके हृदयमें इनका सीधा उत्तर यह होता है कि परमात्मा हैं। वे कहाँ रहते हैं क्या करते हैं आदिसे हमें कोई मतलब नहीं हमें तो परमात्मासे मतलब है। जीव क्या है उसका कैसा स्वरूप है वह कहाँ रहता है इससे हमें कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही पर्याप्त है कि मैं हूँ। जगत् कैसा है ठीक है कि बेठीक है हमें इससे कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही समझना पर्याप्त है कि जगत् त्याज्य है और हमें इसका त्याग करना है। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माकी तरफ चलना है संसारको छोड़ना है और हमें चलना है अर्थात् हमें संसारसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख होना है यही सम्पूर्ण दर्शनोंका सार है और यही दृढ़व्रती होना है। दृढ़व्रती होनेसे उनके द्वन्द्व नष्ट हो जाते हैं क्योंकि एक निश्चय न होनेसे ही द्वन्द्व रहते हैं।दूसरा भाव है कि उनको न तो निर्गुणका ज्ञान है और न उनको सगुणके दर्शन हुए हैं किन्तु उनकी मान्यतामें संसार निरन्तर नष्ट हो रहा है निरन्तर अभावमें जा रहा है और सब देश काल वस्तु व्यक्ति आदिमें भावरूपसे एक परमात्मा ही हैं ऐसा मानकर वे दृढ़व्रती होकर भजन करते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री पतिके परायण रहती है ऐसे ही भगवान्के परायण रहना ही उनका भजन है।विशेष बातशास्त्रोंमें सन्तवाणीमें और गीतामें भी यह बात आती है कि पापी मनुष्य भगवान्में प्रायः नहीं लग पाते पर यह एक स्वाभाविक सामान्य नियम है। वास्तवमें कितने ही पाप क्यों न हों वे भगवान्से विमुख कर ही नहीं सकते क्योंकि जीव साक्षात् भगवान्का अंश है अतः उसकी शुद्धि पापोंसे आच्छादित भले ही हो जाय पर मिट नहीं सकती। इसलिये दुराचारी भी दुराचार छोड़कर भगवान्के भजनमें लग जाय तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा (भक्त) हो जाता है क्षिप्रं भवति धर्मात्मा (टिप्पणी प0 441) (गीता 9। 31)। अतः मनुष्यको कभी भी ऐसा नहीं मानना चाहिये कि पुराने पापोंके कारण मेरेसे भजन नहीं हो रहा है क्योंकि पुराने पाप केवल प्रतिकूल परिस्थितिरूप फल देनेके लिये होते हैं भजनमें बाधा देनेके लिये नहीं। प्रतिकूल परिस्थिति देकर वे पाप नष्ट हो जाते हैं। अगर ऐसा मान लिया जाय कि पापोंके कारण ही भजन नहीं होता तो अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् (गीता 9। 30) दुराचारीसेदुराचारी पुरुष अनन्यभावसे मेरा भजन करता है यह कहना बन नहीं सकता। पापोंके कारण अगर भजनध्यानमें बाधा लग जाय तो बड़ी मुश्किल हो जायगी क्योंकि बिना पापके कोई प्राणी है ही नहीं। पापपुण्यसे ही मनुष्यशरीर मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि पुराने पाप भजनमें बाधक नहीं हो सकते। इसलिये जो दृढ़व्रती पुरुष भगवान्के शरण होकर वर्तमानमें भगवान्के भजनमें लग जाते हैं उनके पुराने पापोंका अन्त हो जाता है। मनुष्यशरीर भजन करनेके लिये ही मिला है अतः जो परिस्थितियाँ शरीरतक रहनेवाली हैं वे भजनमें बाधा पहुँचायें ऐसा कभी सम्भव ही नहीं है।सकाम पुण्यकर्मोंकी मुख्यता होनेसे जीव स्वर्गमें जाते हैं और पापकर्मोंकी मुख्यता होनेसे नरकोंमें जाते हैं। परन्तु भगवान् विशेष कृपा करके पापों और पुण्योंका पूरा फलभोग न होनेपर भी अर्थात् चौरासी लाख योनियोंके बीचमें ही जीवको मनुष्यशरीर दे देते हैं। मनुष्यशरीरमें भगवद्भजनका अवसर विशेषतासे प्राप्त होता है। अतः मनुष्यशरीर प्राप्त होनेपर भगवत्प्राप्तिकी तरफसे कभी निराश नहीं होना चाहिये क्योंकि भगवत्प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिलता है।यह मनुष्यशरीर भोगयोनि नहीं है। इसको सामान्यतः कर्मयोनि कहते हैं। परन्तु संतोंकी वाणी और सिद्धान्तोंके अनुसार मनुष्यशरीर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही है। इसमें पुराने पुण्योंके अनुसार जो अनुकूल परिस्थिति आती है और पुराने पापोंके अनुसार जो प्रतिकूल परिस्थिति आती है ये दोनों ही केवल साधनसामग्री हैं। इन दोनोंमेंसे अनुकूल परिस्थिति आनेपर दुनियाकी सेवा करना और प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करना यह साधकका काम है। ऐसा करनेसे ये दोनों ही परिस्थितियाँ साधनसामग्री हो जायँगी। इनमें भी देखा जाय तो अनुकूल परिस्थितिमें पुराने पुण्योंका नाश होता है और वर्तमानमें भोगोंमें फँसनेकी सम्भावना भी रहती है। परन्तु प्रतिकूल परिस्थितिमें पुराने पापोंका नाश होता है और वर्तमानमें अधिक सजगता सावधानी रहती है जिससे साधन सुगमतासे बनता है। इस दृष्टिसे संतजन सांसारिक प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते आये हैं। सम्बन्ध  सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने साधकके लिये तीन बातें कही थीं मय्यासक्तमनाः मेरेमें प्रेम करके और मदाश्रयः मेरा आश्रय लेकर योगं युञ्जन् योगका अनुष्ठान करता है वह मेरे समग्ररूपको जान जाता है। उन्हीं तीन बातोंका उपसंहार अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.28 7.30।।येषामित्यादि युक्तचेतस इत्यन्तम्। ये तु विनष्टतामसाः पुण्यापुण्यपरिक्षयक्षेमीकृतात्मानः ते विपाटितमहामोहवितानाः सर्वमेव भगवद्रश्मिखचितं जरामरणमयतमिस्रस्रुतं ब्रह्म विदन्ति आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकाधियाज्ञिकानि च ममैव रूपान्तराणि। प्रयाणकाले च नित्यं भगवद् भावितान्तःकरणत्वात् मां जानन्ति यतो येषां जन्म पूर्वमेव भगवत्तत्त्वं ते अन्तकाले परमेश्वरं संस्मरेयुः। किं जन्मासेवनया इति ये मन्यन्ते तेषां तूष्णींभाव एव शोभनः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.28।।यदि सर्वाणि भूतानि जन्मप्रतिपद्यमानानि संमूढानि सन्ति भगवत्तत्त्वपरिज्ञानशून्यानि भगवद्भजनपराङ्मुखानि तर्हि शास्त्रानुरोधेन भगवद्भजनमुच्यमानमधिकार्यभावादनर्थकमापद्येतेति शङ्कते के पुनरिति। अनेकेषु जन्मसु सुकृतवशादपाकृतदुरितानां द्वन्द्वप्रयुक्तमोहविरहिणां ब्रह्मचर्यादिनियमवतां भगवद्भजनाधिकारित्वान्न शास्त्रविरोधोऽस्तीति परिहरति उच्यत इति। तुशब्दद्योत्यमर्थमाह पुनरिति। उक्तार्थमात्रसिद्ध्यर्थं समाप्तप्रायमित्युक्तम्। प्रकृतोपयोगं पुण्यस्य कर्मणो दर्शयितुं विशिनष्टि सत्त्वेति। उभयविधशुद्धेर्द्वन्द्वनिमित्तमोहनिवृत्तिफलमाह ते द्वन्द्वेति। मोहनिवृत्तेर्भगवन्निष्ठापर्यन्तत्वमाह भजन्त इति। तेषां नानापरिग्रहवतां भगवद्भजनप्रतिहतिमाशङ्क्याह दृढेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.28।।चतुर्विधाः 7।16 इत्यनेन गतार्थमुत्तरं वाक्यमित्यत आह विपरीताश्चेति। त्वत्प्रपत्तेर्मायाकरणाकारणत्वात् स्वदोषाद्वा त्वां न प्रपद्यन्त इत्यत्र कथं निर्णयः इत्यतस्तदुक्तम्। सर्वभूतानि सम्मोहं यान्ति चेत् लुप्तो मुक्तिमार्ग इत्याशङ्क्याऽत्र द्वन्द्वमोहरहिताश्च केचित्सन्तीत्याहेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.28।।विपरीताश्च केचित्सन्तीत्याह येषामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.28।।येषां तु अनेकजन्मार्जितेन उत्कृष्टपुण्यसंचयेन गुणमयं द्वन्द्वेच्छाद्वेषहेतुभूतं मदौन्मुख्यविरोधि च अनादिकालप्रवृत्तं पापम् अन्तगतं क्षीणम् ते पूर्वोक्तेन सुकृततारतम्येन मां शरणम् अनुप्रपद्य गुणमयान्मोहाद् विनिर्मुक्ताः जरामरणमोक्षाय प्रकृतिवियुक्तात्मस्वरूपदर्शनाय महते च ऐश्वर्याय मत्प्राप्त्ये च दृढव्रताः दृढसंकल्पा माम् एव भजन्ते।तत्र तेषां त्रयाणां भगवन्तं भजमानानां ज्ञातव्यविशेषान् उपादेयांश्च प्रस्तौति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.28।। येषां तु पुनः अन्तगतं समाप्तप्रायं क्षीणं पापं जनानां पुण्यकर्मणां पुण्यं कर्म येषां सत्त्वशुद्धिकारणं विद्यते ते पुण्यकर्माणः तेषां पुण्यकर्मणाम् ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः यथोक्तेन द्वन्द्वमोहेन निर्मुक्ताः भजन्ते मां परमात्मानं दृढव्रताः। एवमेव परमार्थतत्त्वं नान्यथा इत्येवं सर्वपरित्यागव्रतेन निश्चितविज्ञानाः दृढव्रताः उच्यन्ते।।ते किमर्थं भजन्ते इत्युच्यते

───────────────────

【 Verse 7.29 】

▸ Sanskrit Sloka: जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये | ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ||

▸ Transliteration: jarāmaraṇa mokṣāya māmāśritya yatanti ye | te brahma tadviduḥ kṛtsnam adhyātmaṃ karma cākhilam ||

▸ Glossary: jarā: old age; maraṇa: death; mokṣāya: for the purpose of liberation; māṃ: unto Me; āśritya: taking shelter of; yatanti: endeavor; ye: all those; te: such persons; brahma: Brahman; tat: actually that; viduḥ: they know; kṛtsnaṃ: everything; adhyātmaṃ: transcendental; karma: activities; ca: and; akhilaṃ: entirely

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.29 Persons who are striving for liberation from the cycle of birth, old age and death, take refuge in Me. They are actually Brahman because they comprehend everything about activities that transcend these.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.29।।(टिप्पणी प0 442) जरा और मरणसे मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं वे उस ब्रह्मको सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.29।। जो मेरे शरणागत होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं वे पुरुष उस ब्रह्म को सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.29 जरामरणमोक्षाय for liberation from old age and death? माम् Me? आश्रित्य having taken refuge in? यतन्ति strive? ये who? ते they? ब्रह्म Brahman? तत् that? विदुः know? कृत्स्नम् the whole? अध्यात्मम् knowledge of the Self? कर्म action? च and? अखिलम् whole.Commentary They attain to the full knowledge of the Self or perfect knowledge of Brahman. They attain to the Bhuma or the Highest or the Unconditioned. All their doubts are totally destroyed. They fully realise now? All is Vaasudeva. All indeed is Brahman. There is no such thing as diversity.They are not rorn here and have thus conered old age and death. They are liberated here and now.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.29. Those, who, relying on Me, strive to achieve freedom from old age and death-they realise all to be the Brahman and realise all the actions governing the Self.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.29 Those who make Me their refuge, who strive for liberation from decay and Death, they realise the Supreme Spirit, which is their own real Self, and in which all action finds its consummation.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.29 Those who take refuge in Me and strive for deliverance from old age and death, know brahman (or the self) all about the nature of that self, and the entire Karma (or activities leading to rirth).

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.29 Those who strive by resorting to Me for becoming free from old age and death, they know that Brahman, everything about the individual Self, and all about actions. [They know Brahman as being all the individual entities and all actions. This verse prescribes meditation on the alified Brahman for aspirants of the middle class. Verses beginning with the 14the speak about the reaization of the unalified Brahman by aspirants of the highest class.]

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.29 Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realise in full ï1thatï1 Brahman, the whole knowledge of the Self and all action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.29 See Comment under 7.30

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.29 Those who take refuge in Me and strive for deliverance from old age and death, i.e., for the vision of the real nature of the self as distinct from the Prakrti, they know brahman (the pure individual self). They also know all about the individual self, and the whole of Karma. [This attainment is known as Kaivalya, which means the aloofness of the self in absorption in Its own bliss.]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.29 Ye, those who; yatanti, strive; asritya, by resorting; mam, to Me, the supreme God, by having their minds absorbed in Me; jara-marana-moksaya, for becoming free from old age and death; te, they; viduh, know; tat, that; brahma,

Chapter 7 (Part 18)

Brahman, which is the Supreme; they know krtsnam, everything; about adhyatmam, the individual Self, that indwelling intity; ca, and; they know akhiliam, all; about karma, actions.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.29।। चित्तशुद्धि तथा ध्यानसाधना का प्रयोजन है जरा और मरण से मुक्ति पाना। आधुनिक काल में भी मनुष्य ऐसे उपायों को खोजने का प्रयत्न कर रहा है जिसके द्वारा जरा और मरण से मुक्ति मिल सके। उसकी अमृत्व की कल्पना यह है कि इस भौतिक देह का अस्तित्व सदा बना रहे परन्तु अध्यात्म शास्त्र में इसे अमृतत्त्व नहीं कहा है और न देह के नित्य अस्तित्व को जीवन का लक्ष्य बताया है।प्राणिमात्र के लिए जन्म वृद्धि व्याधि क्षय और मरण ये विकार अवश्यंभावी हैं। ये सभी विकार या परिवर्तन मनुष्य को असह्य पीड़ा दायक होते हैं। इनके अभाव में मनुष्य का जीवन अखण्ड आनन्दमय होता है। ध्यानाभ्यास में साधक का प्रयत्न इन परिवर्तनशील उपाधियों के साथ हुए तादात्म्य से ऊपर उठकर कालत्रयातीत मुक्त आत्मस्वरूप में स्थिति प्राप्त करने का होता है।योग्यता सम्पन्न साधक आत्मा का ध्यान करके अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात्कार करता है कि यह आत्मा मैं हूँ। यह आत्मा ही वह परम सत्य है जो समस्त ब्रह्माण्ड का अधिष्ठान है जिसे वेदान्त में ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। आत्मसाक्षात्कार का अर्थ ही ब्रह्मस्वरूप बनना है क्योंकि व्यक्ति की आत्मा ही भूतमात्र की आत्मा है। सत्य के इस अद्वैत को यहाँ इस प्रकार सूचित किया गया है कि जो साधक मुझ आत्मस्वरूप पर ध्यान करते हैं वे ब्रह्म को जानते हैं।ज्ञानी पुरुष के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह न केवल सर्वव्यापी आत्मा का ज्ञाता है बल्कि स्वयं की सम्पूर्ण अध्यात्म अर्थात् मनोवैज्ञानिक शक्तियों का भी ज्ञाता है तथा वह सभी कर्मों में कुशल होता है। इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि आत्मानुभवी पुरुष जगत् व्यवहार में अकुशल और मूढ़ नहीं होता। अनुभवी पुरुषों का मत है कि केवल वही पुरुष वास्तविक अर्थ में जगत् की सेवा कर सकता है जिसे लोगों के मनोविज्ञान का पूर्ण ज्ञान है तथा अपने मन पर पूर्ण संयम है। सत्य का गीत गाने के लिए ऐसा पूर्णत्व प्राप्त व्यक्ति ही योग्यतम माध्यम है और ऐसे व्यक्ति का सुसंगठित और समस्त कार्यों में कुशल होना आवश्यक है।ज्ञानी पुरुषों के विषय में ही आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.29।।किमर्थ भजन्तीत्यत आह जरामरणमोक्षाय मां परमेश्वरं सगुणमाश्रित्य ये पापहिताः पुण्यकर्माणो द्वन्द्वमोहविनिर्मुक्ताः दृढव्रताः सन्तो यतन्ति यतन्ते ते यत्परं ब्रह्म तद्विदुः। तथा कृत्स्त्रमध्यात्मं प्रत्यगात्मविषयं वस्तु कर्म च वक्ष्यमाणम्। यत्तु कर्म च तदुभयवेदनसाधनं गुरुपसदश्रवणमननाद्यखिलं निरवशेषं फलाव्यभिचारीति केचित्। तन्न।भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः इति मूलतद्भाष्यस्य यागदानहोमात्मकं वैदिकं कर्मेत्यादिस्वोक्तेश्च विरोधस्य स्पष्टत्वादखिलं प्रपञ्चं ब्रह्मानन्यं सर्वं विदुः। तथा चैवंज्ञानिनो जरामरणादिलक्षणात्संसारान्मुच्यन्त इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.29।।अथेदानीमर्जुनस्य प्रश्नमुत्थापयितुं सूत्रभूतौ श्लोकावुच्येते। अनयोरेव वृत्तिस्थानीय उत्तरोऽध्यायो भविष्यति ये संसारदुःखान्निर्विण्णा जरामरणमोक्षाय जरामरणादिविविधदुःसंहसंसारदुःखनिरासाय तदेकहेतुं मां सगुणं भगवन्तमाश्रित्येतरसर्ववैमुख्येन शरणं गत्वा यतन्ति यतन्ते मदर्पितानि फलाभिसन्धिशून्यानि विहितानि कर्माणि कुर्वन्ति ते क्रमेण शुद्धान्तःकरणाः सन्तस्तज्जगत्कारणं मायाधिष्ठानं शुद्धं परं ब्रह्म निर्गुणं तत्पदलक्ष्यं मां विदुः। तथात्मानं शरीरमधिकृत्य प्रकाशमानं कृत्स्नमुपाध्यपरिच्छिन्नं त्वंपदलक्ष्यं विदुः। कर्म च तदुभयवेदनसाधनं गुरूपसदनश्रवणमननाद्यखिलं निरवशेषं फलाव्यभिचारि विदुर्जानन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.29।।ततश्च जरामरणयोः प्रवाहादात्मनो मोक्षाय मामाश्रित्य मयि समाहितचेतसो भूत्वा ये यतन्ति यतन्ते ज्ञानलाभाय वेदान्तश्रवणादौ ते तत् सर्ववेदान्तप्रसिद्धं कृत्स्नं ब्रह्म विदुः। विराडाद्युपासका ह्यकृत्स्नब्रह्मविदः।सूत्रकारणयोर्निष्कलस्य चाज्ञानात् श्रीगोपालबालोपासकास्तु तत्पदलक्ष्यकृत्स्नब्रह्मविदोऽतस्तेऽध्यात्मादिकं कात्स्न्र्येन जानन्ति। सर्वविदो भवन्तीत्यर्थः। अनेनयज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते इत्येकविज्ञानात्सर्वविज्ञानप्रतिज्ञा या पूर्वं कृता तस्या उपसंहारो दर्शितः। अध्यात्मं आत्मनि शरीरे स्थितं प्रत्यगात्मविषयं वस्तु शुद्धं त्वंपदार्थमित्यर्थः। कर्म च तत्त्वंपदार्थज्ञानयोः साधनं श्रवणादिकं सर्वं विदुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.29।।एवं भजनप्रवृत्ता मां जानन्तीत्याह जरामरणेति। जरामरणयोः भगवद्भजनप्रतिबन्धकभगवद्विस्मरणरूपयोर्मोक्षाय निवारणार्थं मामाश्रित्य अनन्यैकचित्तेन ये यतन्ति भजनार्थं यत्नं कुर्वन्ति भजन्ति वा ते तत् परं ब्रह्म पुरुषोत्तमात्मकं विदुः जानन्ति। कृत्स्नं पूर्णमध्यात्मं भजनौपयिकं साधनरूपं विदुः। च पुनः कर्म सेवारूपं तत्साधनात्मकमखिलं भावादियुक्तं जानन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.29।।एवं च मां भजन्तस्ते सर्वं विज्ञेयं विज्ञाय कृतार्था भवन्तीत्याह जरामरणेति। जरामरणयोर्निरासार्थं मामाश्रित्य ये प्रयतन्ते ते तत्परं ब्रह्म विदुः कृत्स्नमध्यात्मं च विदुः येन तत्प्राप्तव्यं तं देहादिव्यतिरिक्तं शुद्धमात्मानं च जानन्तीत्यर्थः। तत्साधनभूतमखिलं सरहस्यं कर्मं च जानन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.29।।एवं पूर्वोक्तेषु चतुर्षु भजमानेषु ज्ञानिभक्तानामुत्कर्ष उक्तः आर्त्तार्थार्थिनस्तु भगवतः सकाशात्फलं प्राप्य पश्चान्मुमुक्षवो भूत्वा जिज्ञासवो भवन्ति तेषां ज्ञानिनां च फलं वदंस्तत्साधनीभूतज्ञानविशेषोपादेयानर्जुनस्य तज्जिज्ञासोत्पादनार्थं भगवान्प्रस्तौति द्वाभ्यां जरामरणमोक्षायेति। जरामरणतो मोक्षो हि ब्रह्मात्मज्ञान एवेति तदर्थं मुमुक्षवो मामाश्रित्य प्रपद्य यतन्ति यतयो ये आत्मतत्त्वजिज्ञासवस्ते ब्रह्म परमं तदक्षरं विदुरध्यात्मं आत्माधिगतं स्वभावं च विदुरखिलं कर्म च।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.29।।वे किसलिये भजते हैं सो कहते हैं जो पुरुष जरा और मृत्युसे छूटनेके लिये मुझ परमेश्वरका आश्रय लेकर अर्थात् मुझमें चित्तको समाहित करके प्रयत्न करते हैं वे जो परब्रह्म है उसको जानते हैं एवं समस्त अध्यात्म अर्थात् अन्तरात्मविषयकवस्तुको और अखिल समस्त कर्मको भी जानते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.29।। व्याख्या    जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये   यहाँ जरा (वृद्धावस्था) और मरणसे मुक्ति पानेका तात्पर्य यह नहीं है कि ब्रह्म अध्यात्म और कर्मका ज्ञान होनेपर वृद्धावस्था नहीं होगी शरीरकी मृत्यु नहीं होगी। इसका तात्पर्य यह है कि बोध होनेके बाद शरीरमें आनेवाली वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही पर ये दोनों अवस्थाएँ उसको दुःखी नहीं कर सकेंगी। जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमेंभूतप्रकृतिमोक्षम् कहनेका तात्पर्य भूत और प्रकृति अर्थात् कार्य और कारणसे सम्बन्धविच्छेद होनेमें है ऐसे ही यहाँ जरामरणमोक्षाय कहनेका तात्पर्य जरा मृत्यु आदि शरीरके विकारोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेमें है।जैसे कोई युवा पुरुष है तो उसकी अभी न वृद्धावस्था है और न मृत्यु है अतः वह जरामरणसे अभी मुक्त है। परन्तु वास्तवमें वह जरामरणसे मुक्त नहीं है क्योंकि जरामरणके कारण शरीरके साथ जबतक सम्बन्ध है तबतक जरामरणसे रहित होते हुए भी वह इनसे मुक्त नहीं है। परन्तु जो जीवन्मुक्त महापुरुष हैं उनके शरीरमें जरा और मरण होनेपर भी वे इनसे मुक्त हैं। अतः जरामरणसे मुक्त होनेका तात्पर्य है जिसमें जरा और मरण होते हैं ऐसे प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होना। जब मनुष्य शरीरके साथ तादात्म्य (मैं यही हूँ) मान लेता है तब शरीरके वृद्ध होनेपर मैं वृद्ध हो गया और शरीरके मरनेको लेकर मैं मर जाऊँगा ऐसा मानता है। यह मान्यता शरीर मैं हूँ और शरीर मेरा है इसीपर टिकी हुई है। इसलिये तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आया है जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् अर्थात् जन्म मृत्यु जरा और व्याधिमें दुःखरूप दोषोंको देखना इसका तात्पर्य है कि शरीरके साथ मैं और मेरापन का सम्बन्ध न रहे। जब मनुष्य मैं और मेरापन से मुक्त हो जायगा तब वह जरा मरण आदिसे भी मुक्त हो जायगा क्योंकि शरीरके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही वास्तवमें जन्मका कारण है कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। वास्तवमें इसका शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं है तभी सम्बन्ध मिटता है। मिटता वही है जो वास्तवमें नहीं होता।यहाँ मामाश्रित्य यतन्ति ये पदोंमें आश्रय लेना और यत्न करना इन दो बातोंको कहनेका तात्पर्य है कि मनुष्य अगर स्वयं यत्न करता है तो अभिमान आता है कि मैंने ऐसा कर लिया जिससे ऐसा हो गया और अगर स्वयं यत्न न करके भगवान्के आश्रयसे सब कुछ हो जायगा ऐसा मानता है तो वह आलस्य और प्रमादमें तथा संग्रह और भोगमें लग जाता है। इसलिये यहाँ दो बातें बतायीं कि शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार स्वयं तत्परतासे उद्योग करे और उस उद्योगके होनेमें तथा उद्योगकी सफलतामें कारण भगवान्को माने।जो नित्यनिरन्तर वियुक्त हो रहा है ऐसे शरीरसंसारको मनुष्य प्राप्त और स्थायी मान लेता है। जबतक वह शरीर और संसारको स्थायी मानकर उसे महत्ता देता रहता है तबतक साधन करनेपर भी उसको भगवत्प्राप्ति नहीं होती। अगर वह शरीरसंसारको स्थायी न माने और उसको महत्त्व न दे तो भगवत्प्राप्तिमें देरी नहीं लगेगी। अतः इन दोनों बाधाओँको अर्थात् शरीरसंसारकी स्वतन्त्र सत्ताको और महत्ताको विचारपूर्वक हटाना ही यत्न करना है। परन्तु जो भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं वे श्रेष्ठ हैं। उनका तो यही भाव रहता है कि उस प्रभुकी कृपासे ही साधनभजन हो रहा है। भगवान्की कृपाका आश्रय लेनेसे और अपने बलका अभिमान न करनेसे वे भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं।जो भगवान्का आश्रय न लेकर अपना कल्याण चाहते हुए उद्योग करते हैं उनको अपनेअपने साधनके अनुसार भगवत्स्वरूपका बोध तो हो जाता है पर भगवान्के समग्ररूपका बोध उनको नहीं होता। जैसे कोई प्राणायाम आदिके द्वारा योगका अभ्यास करता है तो उसको अणिमा महिमा आदि सिद्धियाँ मिलती हैं और उनसे ऊँचा उठनेपर परमात्माके निराकारस्वरूपका बोध होता है अथवा अपने स्वरूपमें स्थिति होती है। ऐसे ही बौद्ध जैन आदि सम्प्रदायोंमें चलनेवाले जितने मनुष्य हैं जो कि ईश्वरको नहीं मानते वे भी अपनेअपने सम्प्रदायके सिद्धान्तोंके अनुसार साधन करके असत्जडरूप संसारसे सम्बन्धविच्छेद करके मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो संसारसे विमुख होकर भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं उनको भगवान्के समग्ररूपका बोध होकर भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है यह विलक्षणता बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ मामाश्रित्य यतन्ति ये कहा है।ते ब्रह्म तत् (विदुः) इस तरहसे यत्न (साधन) करनेपर वे मेरे स्वरूपको (टिप्पणी प0 443) अर्थात् जो निर्गुणनिराकार है जो मनबुद्धिइन्द्रियों आदिका विषय नहीं है जो सामने नहीं है शास्त्र जिसका परोक्षरूपसे वर्णन करते हैं उस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको जान जाते हैं।ब्रह्म के साथ तत् शब्द देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः सभी तत् शब्दसे कहे जानेवाले जिस परमात्माको परोक्षरूपसे ही देखते हैं ऐसे परमात्माका भी वे साक्षात् अपरोक्षरूपसे अनुभव कर लेते हैं।उस परमात्माकी सत्ता प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। कारण कि वह परमात्मा किसी देशमें न हो किसी समयमें न हो किसी वस्तुमें न हो और किसी व्यक्तिमें न हो ऐसा नहीं है प्रत्युत वह सब देशमें है सब समयमें है सब वस्तुओँमें है और सब व्यक्तियोंमें है। ऐसा होनेपर भी वह अप्राप्त क्यों दीखता है जो पहले नहीं था बादमें नहीं रहेगा अभी मौजूद रहते हुए भी प्रतिक्षण वियुक्त हो रहा है अभावमें जा रहा है ऐसे शरीरसंसारकी सत्ता और महत्ता स्वीकार कर ली इसीसे नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्व अप्राप्त दीख रहा है।कृत्स्नमध्यात्मम् (विदुः) वे सम्पूर्ण अध्यात्मको जान जाते हैं अर्थात् सम्पूर्ण जीव तत्त्वसे क्या हैं इस बातको वे जान जाते हैं। पंद्रहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें कहा है कि जीवके द्वारा एक शरीरको छो़ड़कर दूसरे शरीरको प्राप्त करनेको विमूढ़ पुरुष नहीं जानते और ज्ञानचक्षुवाले जानते हैं। इसको जाननेका तात्पर्य यह नहीं है कि जीव कितने हैं वे क्याक्या करते हैं और उनकी क्याक्या गति हो रही है इसको जान जाते हैं प्रत्युत आत्मा शरीरसे अलग है इसको तत्त्वसे जान जाते हैं अर्थात् अनुभव कर लेते हैं।भगवान्के आश्रयसे साधकका जब क्रियाओं और पदार्थोंमें सम्बन्धविच्छेद हो जाता है तब वह अध्यात्मतत्त्वको अपने स्वरूपको जान जाता है। केवल अपने स्वरूपको ही नहीं प्रत्युत तीनों लोकों और चौदह भुवनोंमें जितने भी स्थावरजङ्ग प्राणी हैं उन सबका स्वरूप शुद्ध है निर्मल है प्रकृतिसे असम्बन्ध है। अनन्त जन्मोंतक अनन्त क्रियाओं और शरीरोंके साथ एकता करनेपर भी उनकी कभी एकता हो ही नहीं सकती और अनन्त जन्मोंतक अपने स्वरूपका बोध न होनेपर भी वे अपने स्वरूपसे कभी अलग हो ही नहीं सकते ऐसा जानना सम्पूर्ण अध्यात्मतत्त्वको जानना है।कर्म चाखिलं विदुः वे सम्पूर्ण कर्मोंके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् सृष्टिकी रचना क्यों होती है कैसे होती है और भगवान् कैसे करते हैं इसको भी वे जान जाते हैं।जैसे भगवान्ने चारों वर्णोंकी रचना की। उस रचनामें जीवोंके जो गुण और कर्म हैं अर्थात् उनके जैसे भाव हैं और उन्होंने जैसे कर्म किये हैं उनके अनुसार ही शरीरोंकी रचना की गयी है। उन वर्णोंमें जन्म होनेमें स्वयं भगवान्की तरफसे कोई सम्बन्ध नहीं है इसलिये भगवान्में कर्तृत्व नहीं है और फलेच्छा भी नहीं है (गीता 4। 13 14)। तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिकी रचना करते हुए भी भगवान् कर्तृत्व और फलासक्तिसे सर्वथा निर्लिप्त रहते हैं। ऐसे ही मनुष्यमात्रको देश काल परिस्थितिके अनुरूप जो भी कर्तव्यकर्म प्राप्त हो जाय उसे कर्तृत्व और फलासक्तिसे रहित होकर करनेसे वह कर्म मनुष्यको बाँधनेवाला नहीं होता अर्थात् वह कर्म फलजनक नहीं बनता। तात्पर्य है कि कर्मोंके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं है इस तरह उनके साथ निर्लिप्तताका अनुभव करना ही अखिल कर्मको जानना है।जो अनन्यभावसे केवल भगवान्का आश्रय लेता है उसका प्राकृत क्रियाओँ और पदार्थोंका आश्रय छूट जाता है। इससे उसको यह बीत ठीक तरहसे समझमें आ जाती है कि ये सब क्रियाएँ और पदार्थ परिवर्तनशील और नाशवान् हैं अर्थात् क्रियाओँका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा पदार्थोंकी भी उत्पत्ति और विनाश संयोग और वियोग होता है। ब्रह्मलोकतककी कोई भी क्रिया और पदार्थ नित्य रहनेवाला नहीं है। अतः कर्मोंके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है यह भी अखिल कर्मको जानना है।तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का आश्रय लेकर चलनेवाले ब्रह्म अध्यात्म और कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् भगवान्ने जैसे कहा है कि यह सम्पूर्ण संसार मेरेमें ही ओतप्रोत है (7। 7) और सब कुछ वासुदेव ही है (7। 19) ऐसे ही वे भगवान्के समग्ररूपको जान जाते हैं कि ब्रह्म अध्यात्म और कर्म ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं भगवान्के सिवाय इनमें दूसरी कोई सत्ता नहीं है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.28 7.30।।येषामित्यादि युक्तचेतस इत्यन्तम्। ये तु विनष्टतामसाः पुण्यापुण्यपरिक्षयक्षेमीकृतात्मानः ते विपाटितमहामोहवितानाः सर्वमेव भगवद्रश्मिखचितं जरामरणमयतमिस्रस्रुतं ब्रह्म विदन्ति आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकाधियाज्ञिकानि च ममैव रूपान्तराणि। प्रयाणकाले च नित्यं भगवद् भावितान्तःकरणत्वात् मां जानन्ति यतो येषां जन्म पूर्वमेव भगवत्तत्त्वं ते अन्तकाले परमेश्वरं संस्मरेयुः। किं जन्मासेवनया इति ये मन्यन्ते तेषां तूष्णींभाव एव शोभनः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.29।।यथोक्तानामधिकारिणां भगवद्भजनफलं प्रश्नद्वारा दर्शयति ते किमर्थमिति। जरामरणादिलक्षणो यो बन्धस्तद्विश्लेषार्थं भगवद्भजनमित्यर्थः। संप्रति सगुणस्य सप्रपञ्चस्य मध्यमानुग्रहार्थं ध्येयत्वमाह मामाश्रित्येति। जरादिसंसारनिवृत्त्यर्थं निर्गुणं निष्प्रपञ्चं मामुत्तमाधिकारिणो जानन्तीत्युक्तंमामेव ये प्रपद्यन्ते इत्यादावित्याह जरेति। मध्यमाधिकारिणः प्रत्याह मामेति। परमेश्वराश्रयणं नाम विषयविमुखत्वेन भगवदेकनिष्ठत्वमित्याह मत्समाहितेति। प्रयतनं भगवन्निष्ठासिद्ध्यर्थं बहिरङ्गाणां यज्ञादीनामन्तरङ्गाणां च श्रवणादीनामनुष्ठानम्। प्रागुक्तं जगदुपादानं परं ब्रह्म। कथं ब्रह्म विदुरित्यपेक्षायां समस्ताध्यात्मवस्तुत्वेन सकलकर्मत्वेन च तद्विदुरित्याह कृत्स्नमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.29।।मां भजन्ते 7।18 इत्युक्तानुवादेन फलमुच्यते। तत्रजरामरणमोक्षाय इत्यनुक्तस्यानुवादासम्भवादप्राप्तत्वेन विध्यर्थं मद्भजनं च जरामरणमोक्षोद्देशेन कार्यमित्येवं प्रतीतिनिरासार्थमाह जरेति। लक्षणया स्वर्गादिकामनिवृत्तिरर्थोऽस्येति तथोक्तम्। मोक्षविषयासक्तिरन्यसक्तेः प्रशस्तेतितत्स्तुत्यर्थं वा सर्वथा न विधिः। कुतः इत्यत आह मुमुक्षोरिति। इतरस्यामुमुक्षोर्भक्तस्य। न हि प्रशस्ते सत्यप्रशस्तं नियन्तुं युक्तमिति भावः। इति चेतरस्तुतेरिति सम्बन्धः। प्रकारभेदात्पृथगुक्तिः। इतश्च न मोक्षकामविधिरित्याह देवानामिति। सत्त्व एवैकमनसः शुद्धसात्त्विकस्य पुंसो देवानामिन्द्रियाणां गुणलिङ्गानां गन्धाद्युपलब्धिलक्षणगुणानुमेयानाम् तथा वचनादिक्रियानुमेयानां च आनुश्राविककर्मणां वैदिकानुष्ठान कारणानाम्। या भगवत्यनिमित्ता फलोद्देशरहिता केवलं स्वाभाविकी निरवधिकस्नेहरूपस्वभावनिर्वृत्ता वृत्तिः सा भक्तिः सा च सकामभक्त्या जातायाः सिद्धेर्मुक्तेरपिगरीयसी। या सा कामनाभावेऽपि कोशं लिङ्गशरीरं स्वभावादेव जरयत्यनलवदित्यनिमित्तत्वस्य भक्तिलक्षणत्वेनोक्तत्वाच्चेत्यर्थः। न हि लक्षणवैकल्यं विधेयमिति भावः। आह च स्पष्टमेतदन्यत्र। देवार्थाः देवप्रतिपत्त्यर्थाः। प्रतिपन्ना देवा नारायणज्ञानार्थाः। मोक्षार्थे ज्ञातव्यः। नान्यार्थः परः पुरुषार्थः। मध्यमभक्तानां चित्तवृत्तिः। एकान्तानां नियतानामुत्तमभक्तानां न कस्यचिदर्थे स एव परमपुरुषार्थः। ननुमामेव ये प्रपद्यन्ते 7।14 इत्युक्तत्वात्ते ब्रह्म तद्विदुः इति पुनरुक्तमित्यत आह त एवेति। अन्योपायनिवृत्त्यर्थमेतदित्यर्थः। स्यादेवं व्याख्यानम् यदि भगवद्भजनेनं विना ज्ञानस्यान्योपायाभावः प्रमितः स्यात्। स एव कुतः इत्यत आह यमिति। भक्तमेव च वृणुत इति च प्रसिद्धम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.29।।जरामरणमोक्षाय इत्यन्यकामव्यावृत्त्यर्थं मोक्षे सक्तिस्तुत्यर्थ वा न विधिःमुमुक्षोरमुमुक्षुस्तु वरो ह्येकान्तभक्तिभाक् इति इतरस्तुतेर्नारदीये। नात्यन्तिकमिति च।देवानां गुणलिङ्गानामानुश्राविककर्मणाम्। सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या। अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा 3।25।3233 इति लक्षणाच्च भागवते। आह चसर्वे वेदास्तु देवार्था देवा नारायणार्थकाः। नारायणस्तु मोक्षार्थो मोक्षो नान्यार्थ इष्यते। एवं मध्यमभक्तानामेकान्तानां न कस्यचित्। अर्थे नारायणो देवः सर्वमन्यत्तदर्थकम् इति गीताकल्पे। त एव च विदुः। यमेवैष वृणुते कठो.2।22मुंडो.2।3 इति श्रुतेः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.29।।जरामरणमोक्षाय प्रकृतिवियुक्तात्मस्वरूपदर्शनाय माम् आश्रित्य ये यतन्ते ते तद् ब्रह्म विदुः अध्यात्मं च कृत्स्नं विदुः कर्म च अखिलं विदुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.29।। जरामरणमोक्षाय जरामरणयोः मोक्षार्थं मां परमेश्वरम् आश्रित्य मत्समाहितचित्ताः सन्तः यतन्ति प्रयतन्ते ये ते यत् ब्रह्म परं तत् विदुः कृत्स्नं समस्तम् अध्यात्मं प्रत्यगात्मविषयं वस्तु तत् विदुः कर्म च अखिलं समस्तं विदुः।।

───────────────────

【 Verse 7.30 】

▸ Sanskrit Sloka: साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु: | प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस: ||

▸ Transliteration: sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥ | prayāṇakāle ’pi ca māṃ te vidur yuktacetasaḥ ||

▸ Glossary: sādhibhūta: the governing principle of the material manifestation; adhidaivaṃ: underlying all the demigods; māṃ: Me; sādhiyajñaṃ: sustaining all sacrifices; ca: and; ye: those; viduḥ: know; prayāṇa: of death; kāle: at the time; api: even; ca: and; māṃ: Me; te : they; viduḥ: know; yukta cetasaḥ: with steadfast minds.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 7.30 Those who know Me as the Supreme Lord, as the governing principle of the material manifestation, who know Me as the one underlying all the demigods and as the one sustaining all sacrifices, can with steadfast mind, understand and know Me, even at the time of death.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।7.30।।जो मनुष्य अधिभूत अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं वे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।7.30।। जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं वे युक्तचित्त वाले पुरुष अन्तकाल में भी मुझे जानते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 7.30 साधिभूताधिदैवम् with the Adhibhuta and the Adhidaiva together? माम् Me? साधियज्ञम् with the Adhiyajna? च and? ये who? विदुः know? प्रयाणकाले at the time of death? अपि even? च and? माम् Me? ते they? विदुः know? युक्तचेतसः steadfast in mind.Commentary They who are steadfast in mind? who have taken refuge in Me? who know Me as the knowledge of elements in the physical plane? as the knowledge of the gods in the celestial or mental plane? as the knowledge of the sacrifice in the realm of sacrifice? are not affected by death. They do not lose their memory. They continue to keep up the consciousness of Me even at the time of their departure from this world. Those who worship Me along with these three know Me even at the time of death. (Cf.VIII.25)(This chapter is known by the names Vijnana Yoga and Jnana Yoga also.)Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the Science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the seventh discourse entitledThe Yoga of Wisdom and Realisation. ,

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 7.30. Those who realise Me as one [identical] with what governs the beings, deities and with what governs the sacrifices-they, even at the moment of their journey, experience Me, with their mastering the Yoga.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 7.30 Those who see Me in the life of the world, in the universal sacrifice, and as pure Divinity, keeping their minds steady, they live in Me, even in the crucial hour of death."

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 7.30 And those who know Me with the Adhibhuta, Adhidaiva and the Adhiyajna, they too, with their minds fixed in meditation, know Me even at the hour of death.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 7.30 Those who know me as existing in the physical and the divine planes, and also in the context of the sacrifice, they of concentrated minds know Me even at the time of death.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 7.30 Those who know Me with the Adhibhuta (pertaining to the elements), Adhidaiva (pertaining to the gods) and the Adhiyajna (pertaining to the sacrifice) know Me even at the time of death, steadfast in mind.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 7.30 Yesam etc. upto yukta-cetasah. Those, in whom the darkness (ignorance) has totally vanished, and the Self is well secured due to the decaying of the good and bad effects of actions-they break off the canopy of their [castle of the] mighty delusion and realise everything as the Brahman studded (purified) with the rays of the Bhagavat, emerging out of the darkness of old age and death; and realise 'what governs the Self, the beings, the deities and the sacrifices are all My own different aspects'. They also experience Me at the time of their journey, on account of their having internal organ permanently immersed in the thought of the Bhagavat. For, those who remember the Bhagavat even earlier, since their birth-they at the last momnet would very well remember the Absolute Lord. [Hence] it is good to simply keep silent with regard to those who opine 'What is the use of worshiping since [the time of] birth ?'

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 7.30 Here, other alified persons distinct from those already mentioned (i.e., those who desire Kaivalya) are to be understood, because of the mention again of the term 'those' (ye). Even though the declaration - those seekers of fortune who know Me as being connected with the higher material entities' (Adhibhuta) and 'with that which is higher to divinities' (Adhidaiva) i.e., the self in Its lordship - resmles a repetition, it is really an injunction on account of the meaning not being known otherwise. The statement of knowing Me as being connected with the sacrifice is also enjoined as an injunction for all the three types of differently alified aspirants (those who aspire for Kaivalya, wealth and liberation) without any difference, because of the nature of the subject matter, that being sacrificial. None of the three types of aspirants can give up the performance of the great sacrifices and other rituals in the form of periodical and occasional rituals. They know Me at the hour of death in a way corresponding with their objectivies.

Because of the term ca (too) in 'they too,' those who have been mentioned before as 'striving for release from old age and death' are also to be understood along with the others as knowing Me at the hour of death. By this, even the Jnanin knows Me as being connected with the sacrifice on account of the nature of the meaning of the subject treated (i.e., sacrifice). They also know Me even at the hour of death in a way corresponding with their objective. The purport is that, besides the others mentioned earlier like the knower of the Self, those others who are now described as knowing Him with Adhibhuta, Adhidaiva and Adhiyajna are to be included among those who will know Him at the time of death.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 7.30 Ye, those who; viduh, know; mam, Me; sa-adhi-bhuta-adhidaivam, as existing in the physical and the divine planes; ca, and also; sa-adhiyajnam, as existing in the context of the sacrifice; te, they; yukta-cetasah, of concentrated minds-those who have their minds absorbed in God; viduh, know; mam, Me; api ca, even; prayanakale, at the time of death. [For those who are devoted to God, there is not only the knowledge of Brahman as identified with all individuals and all actions (see previous verse), but also the knowledge of It as existing in all things on the physical, the divine and the sacrificial planes. Those who realize Brhaman as existing in the context of all the five, viz of the individual, of actions, of the physical,of the divine, and of the sacrifices-for them with such a realization there is no forgetting, loss of awareness, of Brahman even at the critical moment of death.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।7.30।। आत्मानुभवी पुरुष न केवल मन के स्वभाव (अध्यात्म) और कर्म ऋ़े स्वरूप को ही जानते हैं वरन् वे अधिभूत (पंच विषय रूप जगत्) अधिदैव (इन्द्रिय मन और बुद्धि की कार्य प्रणाली) और अधियज्ञ अर्थात् उन परिस्थितियों को भी जानते हैं जिनमें विषय ग्रहण रूप यज्ञ सम्पन्न होता है।ईश्वर के किसी रूप विशेष के भक्त के विषय में सम्भवत यह धारणा उचित हो सकती है कि भक्तजन अव्यावहारिक होते हैं और उनमें सांसारिक जीवन को सफलतापूर्वक जीने की कुशलता नहीं होती। एक सगुण उपासक अपने इष्ट देवता का ध्यान करने में ही इतना भावुक और व्यस्त हो जाता है कि उसमें संसार को समझने की न रुचि होती है और न क्षमता। परन्तु वेदान्त शास्त्र में आत्मज्ञानी पुरुष का जो चित्रण मिलता है उसके अनुसार वह पुरुष न केवल आत्मानुभव में दृढ़निष्ठ होता है वरन् वह सर्वत्र सदा एवं समस्त परिस्थितियों में अपने मन का स्वामी बना रहता है और ऐसी सार्मथ्य से सम्पन्न होता है जिसे सम्पूर्ण जगत् को स्वीकार करना पड़ता है।ऐसा स्वामित्व प्राप्त पुरुष ही जगत् को नेतृत्व प्रदान कर सकता है। सब प्रकार के असंयम एवं विपर्ययों से मुक्त वह ज्ञानी पुरुष अध्यात्म और अधिभूत को जानते हुए जगत् में ईश्वर के समान रहता है। सारांशत इस अध्याय की समाप्ति भगवान् की इस घोषणा के साथ होती है कि जो पुरुष मुझे जानता है वह सब कुछ जानता है। भगवान् श्रीकृष्ण के समान वह अपनी वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के भाग्य निर्माण में मार्गदर्शक बनता है।इस अध्याय के अन्तिम दो श्लोक उनमें प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों का पूर्णरूप से वर्णन नहीं करते हैं। ये सूत्ररूप श्लोक हैं जिनका विस्तृत विवेचन अगले अध्याय में किया गया है। दो अध्यायों को संबद्ध करने की पारम्परिक शास्त्रीय पद्धतियों में से यह एक पद्धति है।conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का ज्ञानविज्ञानयोग नामक सप्तम अध्याय समाप्त होता है।उपनिषदों में उपदिष्ट सिद्धांत महर्षि व्यास के समय केवल काव्यत्मक पूर्णत्व के काल्पनिक वर्णन के रूप में रह गये थे जिनका जीवन की वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं था। इस प्रकार अपनी संस्कृति के मूल वैभव एवं सार्मथ्य से विलग हुए हिन्दुओं की सांस्कृतिक चेतना में पुनर्जीवित करना आवश्यक था। यह कार्य उन्हें उनके दार्शनिक सिद्धांतों में सौन्दर्य एवं तेजस्विता को दर्शा कर सम्पन्न किया जा सकता था। इस अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने निश्चयात्मक रूप से यह सिद्ध किया है तथा इस पर बल दिया है कि वेदान्त प्रतिपादित पूर्णत्व कोई कल्पना नहीं वरन् वह साधक की वास्तविक उपलब्धि बन सकती है जिसे जीवन में सफलतापूर्वक जी कर वह अप्ानी पीढ़ी का कल्याण कर सकता है। अत इस अध्याय का ज्ञानविज्ञानयोग शीर्षक अत्यन्त उपयुक्त है। केवल ज्ञान विशेष उपयोगी नहीं होता। ज्ञान का पूर्णत्व उसके यथार्थ अनुभव में है। ज्ञान का उपदेश तो दिया जा सकता है परन्तु अनुभव (विज्ञान) नहीं। धर्म तत्त्व ज्ञान का उपदेश देता है और उसके साथ ही उन उपायों का भी निर्देशन करता है जिनके द्वारा वह ज्ञान साधक का अपना विज्ञान बन सके और जीवन के साथ एकरूप हो जाय। इस प्रकार धर्म का प्रयोजन ऐसे अनुभवी पुरुषों का निर्माण करना है जो जीवन के परम पुरुषार्थ को प्राप्त करके धर्म को सत्योचित प्रमाणित कर सकें और अपनी पीढ़ियों को आनन्दाभिभूत करके कृतार्थ करने में सक्षम हों।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।7.30।।ननु मरणकाले तेषां त्वद्विस्मरणस्य संभवात्कथं संसारान्मोक्ष इत्याशङ्क्याह सेति। अधिभूतं चाधिदैवं चाधिभूताधिदैवमिति समाहारद्वन्द्वस्तेन सहवर्तत इति तम् अधियज्ञेन सह वर्तत इति तं च मां ये विदुः प्रयाणकाले मरणकालेऽपि च मां ते युक्तचेतसो विदुरतस्तेषां मोक्षप्राप्तौ न कोऽपि संदेह इति। साधिभूतादिपदार्थस्तु मूलएव स्फुटीभविष्यति। तदनेन सप्तमाध्यानेनोक्तमाधिकारिणं प्रति ज्ञेयं निरुपयता तज्ज्ञानार्थ मध्यमाधिकारिणं प्रति तत्पदवाच्यं प्रतिपादयता तत्पदवाच्यं तल्लक्ष्यं च प्रदर्शितम्।श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां सप्तमोध्यायः।।7।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।7.30।।नचैवंभूतानां मद्भक्तानां मृत्युकालेऽपि विवशकरणतया मद्विस्मरणं शङ्कनीयम् यतः साधिभूताधिदैवमधिभूताधिदैवाभ्यां सहितं तथा साधियज्ञं चाधियज्ञेन च सहितं मां ये विदुश्चिन्तयन्ति ते युक्तचेतसः सर्वदा मयि समाहितचेतसः सन्तस्तत्संस्कारपाटवात्प्रयाणकाले प्राणोत्क्रमणकाले करणग्रामस्यात्यन्तन्यग्रतायामपि चकारादयत्नेनैव मत्कृपया मां सर्वात्मानं विदुर्जानन्ति तेषां मृतिकालेऽपि मदाकारैव चित्तवृत्तिः पूर्वोपचितसंस्कारपाटवाद्भवति। तथाच ते मद्भक्तियोगात्कृतार्था एवेति भावः। अधिभूताधिदैवाधियज्ञशब्दानुत्तरेऽध्यायेऽर्जुनप्रश्नपूर्वकं व्याख्यास्यति भगवानिति सर्वमनाविलम्। तदत्रोत्तमाधिकारिणं प्रति ज्ञेयं मध्यमाधिकारिणं प्रति च ध्येयं लक्षणया मुख्यया च वृत्त्या तत्पदप्रतिपाद्यं ब्रह्म निरूपितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।7.30।।एवं तत्पदार्थविवेकं सद्योमुक्तिहेतुं समाप्य तत्प्राप्त्युपायभूतान्युपासनानि क्रममुक्तिफलानि विस्तरेण वक्तुकामः संक्षेपेण सूत्रयति साधिभूतेति। अधिभूतं च अधिदैवं च ताभ्यां सहितं साधिभूताधिदैवम्। तथाऽधियज्ञेन सहितं साधियज्ञं च मां ये विदुरुपासते ते युक्तचेतसः। यतो नित्यं समाहितचित्तास्ततो मां प्रयाणकालेऽपि सर्वजनव्यामोहके विदुरेव। भावनादार्ढ्यान्मरणकालेऽपि तस्य ज्ञानस्य प्रमोषो न भवत्यतो भगवति नैरन्तर्येण दृढा भावना कर्तव्येति भावः। अधिभूतादिपदार्थं तु भगवानेव व्याख्यास्यतीति नोक्तवन्तो वयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।7.30।।एवं ज्ञानस्य फलमाह साधिभूताधिदेव मेति। साधिभूताधिदैवम् अधिभूतेन अधिकरणात्मकेन अधिदेवेन मूलरूपेण सह अधियज्ञेन अंशात्मककर्मरूपेण च सहितं ये मां विदुस्ते युक्तचेतसः युक्तं तन्निष्ठं चेतो येषां तादृशा भवन्ति मां प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। च पुनः प्रयाणकाले मरणसमयेऽपि भ्रमादिरहितास्ते मां विदुः जानन्ति मरणकाले स्वज्ञानोक्त्याअन्ते या मतिः सा गतिः [ ] इति वाक्योक्तरीत्या प्राप्नुवन्तीति व्यञ्जितम्।भक्तानामेव श्रीकृष्णज्ञानविज्ञानयोग्यता। अतोऽत्र ज्ञानविज्ञानयोगं हरिरुवाच हि।।7।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।7.30।। न चैवंभूतानां योगभ्रंशशङ्कापीत्याह साधिभूताधिदैवमिति। अधिभूतादिशब्दानामर्थं भगवानेवानन्तराध्याये व्याख्यास्यति। अधिभूतेनाधिदैवेन च सहाधियज्ञेन च सहितं ये मां भजन्ति ते युक्तचेतसः मय्यासक्तमनसः प्रयाणकालेऽपि मरणसमयेऽपि मां विदुर्जानन्ति नतु तदापि व्याकुलीभूय मां विस्मरन्ति। अतो मद्भक्तानां न योगभ्रंशशङ्केत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।7.30।।साधिभूतेति। अत्रये इति पुनर्निदेशात्पूर्वनिर्दिष्टेभ्योऽन्ये जिज्ञासव उक्ता इत्यवसीयते। ये च मां (साधिभूतं) साधिदैवं साधियज्ञमिति विशेषसहितं विदुरिति। किञ्च भगवत्तत्त्वजिज्ञासवः प्राणानां प्रयाणकालेऽपि ते च मां तथाभूतमात्मानं विदुः। किम्भूतास्ते युक्तचेतस इति योगसिद्धिरन्ते सूचिता।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।7.30।।( इसी प्रकार ) जो मनुष्य मुझ परमेश्वरको साधिभूताधिदैव अर्थात् अधिभूत और अधिदैवके सहित जानते हैं एवं साधियज्ञ अर्थात् अधियज्ञके सहित भी जानते हैं वे निरुद्धचित्त योगी लोग मरणकालमें भी मुझे यथावत् जानते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।7.30।। व्याख्या  साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः [पूर्वश्लोकमें निर्गुणनिराकारको जाननेका वर्णन करके अब सगुणसाकारको जाननेकी बात कहते हैं।]यहाँ अधिभूत नाम भौतिक स्थूल सृष्टिका है जिसमें तमोगुणकी प्रधानता है। जितनी भी भौतिक सृष्टि है उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसका क्षणमात्र भी स्थायित्व नहीं है। फिर भी यह भौतिक सृष्टि सत्य दीखती है अर्थात् इसमें सत्यता स्थिरता सुखरूपता श्रेष्ठता और आकर्षण दीखता है। यह सत्यता आदि सबकेसब वास्तवमें भगवान्के ही हैं क्षणभङ्गुर संसारके नहीं। तात्पर्य है कि जैसे बर्फकी सत्ता जलके बिना नहीं हो सकती ऐसे ही भौतिक स्थूल सृष्टि अर्थात् अधिभूतकी सत्ता भगवान्के बिना नहीं हो सकती। इस प्रकार तत्त्वसे यह संसार भगवत्स्वरूप ही है ऐसा जानना ही अधिभूतके सहित भगवान्को जानना है।अधिदैव नाम सृष्टिकी रचना करनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीका है जिनमें रजोगुणकी प्रधानता है। भगवान् ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट होते हैं अर्थात् तत्त्वसे ब्रह्माजी भगवत्स्वरूप ही हैं ऐसा जानना ही अधिदैवके सहित भगवान्को जानना है।अधियज्ञ नाम भगवान् विष्णुका है जो अन्तर्यामीरूपसे सबमें व्याप्त हैं और जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है। तत्त्वसे भगवान् ही अन्तर्यामीरूपसे सबमें परिपूर्ण हैं ऐसा जानना ही अधियज्ञके सहित भगवान्को जानना है।अधिभूत अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्को जाननेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्णके शरीरके किसी एक अंशमें विराट्रूप है (गीता 10। 42 11। 7) और उस विराट्रूपमें अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड) अधिदैव (ब्रह्माजी) और अधियज्ञ (विष्णु) आदि सभी हैं जैसा कि अर्जुनने कहा है हे देव मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको जिनकी नाभिसे कमल निकला है उन विष्णुको कमलपर विराजमान ब्रह्मको और शंकर आदिको देख रहा हूँ (गीता 11। 15)। अतः तत्त्वसे अधिभूत अधिदैव और अधियज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण ही समग्र भगवान् हैं।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः जो संसारके भोगों और संग्रहकी प्राप्तिअप्राप्तिमें समान रहनेवाले हैं तथा संसारसे सर्वथा उपरत होकर भगवान्में लगे हुए हैं वे पुरुष युक्तचेता हैं। ऐसे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मेरेको ही जानते हैं अर्थात् अन्तकालकी पीड़ा आदिमें भी वे मेरेमें ही अटलरूपसे स्थित रहते हैं। उनकी ऐसी दृढ़ स्थिति होती है कि वे स्थूल और सूक्ष्मशरीरमें कितनी ही हलचल होनेपर भी कभी किञ्चिन्मात्र भी विचलित नहीं होते।भगवान्के समग्ररूपसम्बन्धी विशेष बात(1)प्रकृति और प्रकृतिके कार्य क्रिया पदार्थ आदिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही सभी विकार पैदा होते हैं और उन क्रिया पदार्थ आदिकी प्रकटरूपसे सत्ता दीखने लग जाती है। परन्तु प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद करके भगवत्स्वरूपमें स्थित होनेसे उनकी स्वतन्त्र सत्ता उस भगवत्तत्त्वमें ही लीन हो जाती है। फिर उनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं दीखती।जैसे किसी व्यक्तिके विषयमें हमारी जो अच्छे और बुरेकी मान्यता है वह मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो वह व्यक्ति भगवान्का स्वरूप है अर्थात् उस व्यक्तिमें तत्त्वके सिवाय दूसरा कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व ही नहीं है। ऐसे ही संसारमें यह ठीक है यह बेठीक है इस प्रकार ठीकबेठीककी मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो संसार भगवान्का स्वरूप ही है। हाँ संसारमें जो वर्णआश्रमकी मर्यादा है ऐसा काम करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये यह जो विधिनिषेधकी मर्यादा है इसको महापुरुषोंने जीवोंके कल्याणार्थ व्यवहारके लिये मान्यता दी है।जब यह भौतिक सृष्टि नहीं थी तब भी भगवान् थे और इसके लीन होनेपर भी भगवान् रहेंगे इस तरहसे जब वास्तविक भगवत्तत्त्वका बोध हो जाता है तब भौतिक सृष्टिकी सत्ता भगवान्में ही लीन हो जाती है अर्थात् इस सृष्टिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न रहनेपर संसार मिट जाता है उसका अभाव हो जाता है प्रत्युत अन्तःकरणमें सत्यत्वेन जो संसारकी सत्ता और महत्ता बैठी हुई थी जो कि जीवके कल्याणमें बाधक थी वह नहीं रहती। जैसे सोनेके गहनोंकी अनेक तरहकी आकृति और अलगअलग उपयोग होनेपर भी उन सबमें एक ही सोना है ऐसे ही भगवद्भक्तके द्वारा अनेक तरहका यथायोग्य सांसारिक व्यवहार होनेपर भी उन सबमें एक ही भगवत्तत्त्व है ऐसी अटलबुद्धि रहती है। इस तत्त्वको समझनेके लिये ही उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें समग्ररूपका वर्णन हुआ है।(2)उपासनाकी दृष्टिसे भगवान्के प्रायः दो रूपोंका विशेष वर्णन आता है एक सगुण और एक निर्गुण। इनमें सगुणके दो भेद होते हैं एक सगुणसाकार और एक सगुणनिराकार। परन्तु निर्गुणके दो भेद नहीं होते निर्गुण निराकार ही होता है। हाँ निराकारके दो भेद होते हैं एक सगुणनिराकार और एक निर्गुणनिराकार।उपासना करनेवाले दो रुचिके होते हैं एक सगुणविषयक रुचिवाला होता है और एक निर्गुणविषयक रुचिवाला होता है। परन्तु इन दोनोंकी उपासना भगवान्के सगुणनिराकार रूपसे ही शुरू होती है जैसे परमात्मप्राप्तिके लिये कोई भी साधक चलता है तो वह पहले परमात्मा है इस प्रकार परमात्माकी सत्ताको मानता है और वे परमात्मा सबसे श्रेष्ठ हैं सबसे दयालु हैं उनसे बढ़कर कोई है नहीं ऐसे भाव उसके भीतर रहते हैं तो उपासना सगुणनिराकारसे ही शुरू हुई। इसका कारण यह है कि बुद्धि प्रकृतिका कार्य (सगुण) होनेसे निर्गुणको पकड़ नहीं सकती। इसलिये निर्गुणके उपासकका लक्ष्य तो निर्गुणनिराकार होता है पर बुद्धिसे वह सगुणनिराकारका ही चिन्तन करता है (टिप्पणी प0 445)।सगुणकी ही उपासना करनेवाले पहले सगुणसाकार मानकर उपासना करते हैं। परन्तु मनमें जबतक साकाररूप दृढ़ नहीं होता तबतक प्रभु हैं और वे मेरे सामने हैं ऐसी मान्यता मुख्य होती है। इस मान्यतामें सगुण भगवान्की अभिव्यक्ति जितनी अधिक होती है उतनी ही उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें जब वह सगुणसाकाररूपसे भगवान्के दर्शन भाषण स्पर्श और प्रसाद प्राप्त कर लेता है तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है।निर्गुणकी उपासना करनेवाले परमात्माको सम्पूर्ण संसारमें व्यापक समझते हुए चिन्तन करते हैं। उनकी वृत्ति जितनी ही सूक्ष्म होती चली जाती है उतनी ही उनकी उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें सांसारिक आसक्ति और गुणोंका सर्वथा त्याग होनेपर जब मैं तू आदि कुछ भी नहीं रहता केवल चिन्मयतत्त्व शेष रह जाता है तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है।इस प्रकार दोनोंकी अपनीअपनी उपासनाकी पूर्णता होनेपर दोनोंकी एकता हो जाती है अर्थत् दोनों एक हीतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं (टिप्पणी प0 446.1)। सगुणसाकारके उपासकोंको तो भगवत्कृपासे निर्गुणनिराकारका भी बोध हो जाता है मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।(मानस 3। 36। 5) निर्गुणनिराकारके उपासकमें यदि भक्तिके संस्कार हैं और भगवान्के दर्शनकी अभिलाषा है तो उसे भगवान्के दर्शन हो जाते हैं अथवा भगवान्को उससे कुछ काम लेना होता है तो भगवान् अपनी तरफसे भी दर्शन दे सकते हैं। जैसे निर्गुणनिराकारके उपासक मधुसूदनाचार्यजीको भगवान्ने अपनी तरफसे दर्शन दिये थे (टिप्पणी प0 446.2)।(3)वास्तवमें परमात्मा सगुणनिर्गुण साकारनिराकार सब कुछ हैं। सगुणनिर्गुण तो उनके विशेषण हैं नाम हैं। साधक परमात्माको गुणोंके सहित मानता है तो उसके लिये वे सगुण हैं और साधक उनको गुणोंसे रहित मानता है तो उसके लिये वे निर्गुण हैं। वास्तवमें परमात्मा सगुण तथा निर्गुण दोनों हैं और दोनोंसे परे भी हैं। परन्तु इस वास्तविकताका पता तभी लगता है जब बोध होता है।भगवान्के सौन्दर्य माधुर्य ऐश्वर्य औदार्य आदि जो दिव्य गुण हैं उन गुणोंके सहित सर्वत्र व्यापक परमात्माको सगुण कहते हैं। इस सगुणके दो भेद होते हैं (1) सगुणनिराकार जैसे आकाशका गुण शब्द है पर आकाशका कोई आकार (आकृति) नहीं है इसलिये आकाश सगुणनिराकार हुआ। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें परिपूर्णरूपसे व्यापक परमात्माका नाम सगुणनिराकार है।(2) सगुणसाकार वे ही सगुणनिराकार परमात्मा जब अपनी दिव्य प्रकृतिको अधिष्ठित करके अपनी योगमायासे लोगोंके सामने प्रकट हो जाते हैं उनकी इन्द्रियोंके विषय हो जाते हैं तब उन परमात्माको सगुणसाकार कहते हैं। सगुण तो वे थे ही आकृतियुक्त प्रकट हो जानेसे वे साकार कहलाते हैं।जब साधक परमात्माको दिव्य अलौकिक गुणोंसे भी रहित मानता है अर्थात् साधककी दृष्टि केवल निर्गुण परमात्माकी तरफ रहती है तब परमात्माका वह स्वरूप निर्गुणनिराकार कहा जाता है।गुणोंके भी दो भेद होते हैं (1) परमात्माके स्वरूपभूत सौन्दर्य माधुर्य ऐश्वर्य आदि दिव्य अलौकिक अप्राकृत गुण और (2) प्रकृतिके सत्त्व रज और तम गुण। परमात्मा चाहे सगुणनिराकार हों चाहे सगुणसाकार हों वे प्रकृतिके सत्त्व रज और तम तीनों गुणोंसे सर्वथा रहित हैं अतीत हैं। वे यद्यपि प्रकृतिके गुणोंको स्वीकार करके सृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और प्रलयकी लीला करते हैं फिर भी वे प्रकृतिके गुणोंसे सर्वथा रहित ही रहते हैं (गीता 7। 13)।जो परमात्मा गुणोंसे कभी नहीं बँधते जिनका गुणोंपर पूरा आधिपत्य होता है वे ही परमात्मा निर्गुण होते हैं। अगर परमात्मा गुणोंसे बँधे हुए और गुणोंके अधीन होंगे तो वे कभी निर्गुण नहीं हो सकते। निर्गुण तो वे ही हो सकते हैं जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं और जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं ऐसे परमात्मामें ही सम्पूर्ण गुण रह सकते हैं। इसलिये परमात्माको सगुणनिर्गुण साकारनिराकार आदि सब कुछ कह सकते हैं। ऐसे परमात्माका ही उन्तीसवेंतीसवें श्लोकोंमें समग्ररूपसे वर्णन किया गया है।अध्यायसम्बन्धी विशेष बातभगवान्ने इस अध्यायमें पहले परिवर्तनशीलको अपरा और अपरिवर्तनशीलको परा नामसे कहा (7। 4 5)। फिर इन दोनोंके संयोगसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी और अपनेको सम्पूर्ण संसारका प्रभव और प्रलय बताया अर्थात् संसारके आदिमें और अन्तमें केवल मैं ही रहता हूँ यह बताया (7। 6 7)। उसी प्रसङ्गमें भगवान्ने सत्रह विभूतियोंके रूपमें कारणरूपसे अपनी व्यापकता बतायी (7। 8 12)। फिर भगवान्ने कहा कि जो तीनों गुणोंसे मोहित है अर्थात् जिसने निरन्तर परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है वह गुणोंसे पर मेरेको नहीं जान सकता (7। 13)। यह गुणमयी माया तरनेमें बड़ी दुष्कर

Chapter 7 (Part 19)

है। जो मेरे शरण हो जाते हैं वे इस मायाको तर जाते हैं (7। 14) परन्तु जो मेरेसे विमुख होकर निषिद्ध आचरणोंमें लग जाते हैं वे दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते (7। 15)। अब यहाँ चौदहवें श्लोकके बाद ही सोलहवाँ श्लोक कह देते तो बहुत ठीक बैठता अर्थात् चौदहवें श्लोकमें शरण होनेकी बात कही तो अब शरण होनेवाले चार तरहके होते हैं ऐसा बतानेसे श्रृङ्खला बहुत ठीक बैठती। परन्तु पंद्रहवाँ श्लोक बीचमें आ जानेसे प्रकरण ठीक नहीं बैठता। अतः यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध अर्थात् बाधा डालनेवाला मालूम देता है। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध नहीं है क्योंकि यह श्लोक न आनेसे पापी मेरे शरण नहीं होते यह कहना बाकी रह जाता। इसलिये पंद्रहवें श्लोकमें दुष्कृति (पापी) मेरे शरण होते ही नहीं यह बात बता दी और सोलहवें श्लोकमें शरण होनेवालोंके चार प्रकार बता दिये।अब जो शरण होते हैं उनके भी दो प्रकार हैं एक तो भगवान्को भगवान् समझकर अर्थात् भगवान्की महत्ता समझकर भगवान्के शरण होते हैं ( 7। 16 19) और दूसरे भगवान्को साधारण मनुष्य मानकर देवताओंको सबसे बड़ा मानते हैं इसलिये भगवान्का आश्रय न लेकर कामनापूर्तिके लिये देवताओंके शरण हो जाते हैं (7। 20 23)।देवताओँके शरणमें होनेमें भी दो हेतु होते हैं कामनाओँका बढ़ जाना और भगवान्की महत्ताको न जानना। इनमेंसे पहले हेतुका वर्णन तो बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक कर दिया और दूसरे हेतुका वर्णन चौबीसवें श्लोकमें कर दिया। जो भगवान्को साधारण मनुष्य मानते हैं उनके सामने भगवान् प्रकट नहीं होते यह बात पचीसवें श्लोकमें बता दी।अब ऐसा असर पड़ता है कि भगवान् भी मायासे ढके होंगे। अतः भगवान् कहते हैं कि मेरा ज्ञान ढका हुआ नहीं है (7। 26)। मेरेको न जाननेमें रागद्वेष ही मुख्य कारण हैं (7। 27)। जो इस द्वन्द्वरूप मोहसे रहित होते हैं वे दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं (7। 28)। जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं वे मेरे समग्ररूपको जान जाते हैं और अन्तमें मेरेको ही प्राप्त होते हैं (7। 29 30)।इस अध्यायपर आदिसे अन्ततक विचार करके देखें तो भगवान्के विमुख और सम्मुख होनेका ही इसमें वर्णन है। तात्पर्य है कि जडताकी तरफ वृत्ति रखनेसे मनुष्य बारबार जन्मतेमरते रहते हैं। अगर वे जडतासे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं तो वे सगुणनिराकार निर्गुणनिराकार और सगुणसाकार ऐसे भगवान्के समग्ररूपको जानकर अन्तमें भगवान्को ही प्राप्त हो जाते हैं।इस प्रकारँ़ तत् सत् इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ज्ञानविज्ञानयोग नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।7।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।7.28 7.30।।येषामित्यादि युक्तचेतस इत्यन्तम्। ये तु विनष्टतामसाः पुण्यापुण्यपरिक्षयक्षेमीकृतात्मानः ते विपाटितमहामोहवितानाः सर्वमेव भगवद्रश्मिखचितं जरामरणमयतमिस्रस्रुतं ब्रह्म विदन्ति आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकाधियाज्ञिकानि च ममैव रूपान्तराणि। प्रयाणकाले च नित्यं भगवद् भावितान्तःकरणत्वात् मां जानन्ति यतो येषां जन्म पूर्वमेव भगवत्तत्त्वं ते अन्तकाले परमेश्वरं संस्मरेयुः। किं जन्मासेवनया इति ये मन्यन्ते तेषां तूष्णींभाव एव शोभनः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।7.30।।न केवलं भगवन्निष्ठानां सर्वाध्यात्मिककर्मात्मकब्रह्मवित्त्वमेव किंत्वधिभूतादिसहितं तद्वेदित्वमपि सिध्यतीत्याह साधिभूतेति। अध्यात्मं कर्माधिभूतमधिदैवमधियज्ञश्चेति पञ्चकमेतद्ब्रह्म ये विदुस्तेषां यथोक्तज्ञानवतां समाहितचेतसामापदवस्थायामपि भगवत्तत्त्वज्ञानमप्रतिहतं तिष्ठतीत्याह प्रयाणेति।अपिचेति निपाताभ्यां तस्यामवस्थायां करणग्रामस्य व्यग्रतया ज्ञानासंभवेऽपि मयि समाहितचित्तानामुक्तज्ञानवतां भगवत्तत्त्वज्ञानमयत्नलभ्यमिति द्योत्यते। तदनेन सप्तमेनोत्तममधिकारिणं प्रति ज्ञेयं निरूपयता तदर्थमेव सर्वात्मकत्वादिकमुपदिशता प्रकृतिद्वयद्वारेण सर्वकारणत्वादिति च वदता तत्पदवाच्यं तल्लक्ष्यं चोपक्षिप्तम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दज्ञान0 सप्तमोऽध्यायः।।7।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।7.30।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।7.30।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।7.30।।अत्र य इति पुनर्निर्देशात् पूर्वनिर्दिष्टेभ्यः अन्ये अधिकारिणो ज्ञायन्ते।साधिभूतं साधिदैवं माम् ऐश्वर्यार्थिनो ये विदुः इत्येतद् अनुवादस्वरूपम् अपि अप्राप्तार्थत्वात् तद्विधायकम् एव।तथा साधियज्ञम् इत्यपि त्रयाणाम् अधिकारिणाम् अविशेषेण विधीयते अर्थस्वाभाव्यात् त्रयाणां हि नित्यनैमित्तिकरूपमहायज्ञाद्यनुष्ठानम् अवर्जनीयम्।ते च प्रयाणकालेऽपि स्वाप्राप्यानुगुणं मां विदुः।ते च इति चकारात् पूर्वे जरामरणमोक्षाय यतमानाश्च प्रयाणकालेऽपि विदुः इति समुच्चीयन्ते। अनेन ज्ञानिनः अपि अर्थस्वाभाव्यात् साधियज्ञं मां विदुः प्रयाणकाले अपि स्वप्राप्यानुगुणं मां विदुः इति उक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।7.30।। साधिभूताधिदैवम् अधिभूतं च अधिदैवं च अधिभूताधिदैवम् सह अधिभूताधिदैवेन वर्तते इति साधिभूताधिदैवं च मां ये विदुः साधियज्ञं च सह अधियज्ञेन साधियज्ञं ये विदुः प्रयाणकाले अपि च मरणकाले अपि च मां ते विदुः युक्तचेतसः समाहितचित्ता इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येसप्तमोऽध्यायः।।