Books / Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana By Bhagavan Das Mittal (Duplicate) - Rupesh Takur Prasad Prakashana, Varanasi_text

1. Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana By Bhagavan Das Mittal (Duplicate) - Rupesh Takur Prasad Prakashana, Varanasi_text

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रुपेश

भृगु संहिता

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श्री:

भृगु संहिता

फलित सर्वाङ्ग दर्शन

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प्रत्येक कुण्डली का कारणों सहित फल विवेचन

सर्वदा कालीन फलित, भाग्य का नक्शा, प्रत्येक अच्छे बुरे समय की जानकारी और स्पष्ट ज्योतिष दर्शन के सहित

लेखक :

भगवानदास मित्तल

संशोधक एवं परिवर्द्धक :

डॉ. एस.के. झा 'सुमन' (ज्यौतिषशास्त्राचार्य)

प्रकाशक :

रूपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन

कचौड़ीगली, वाराणसी-221001

फोन : 2392471, 2392543

सन् २००९ ई.]

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प्रकाशक :

रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन

कचौड़ीगली, वाराणसी-२२१००१

दूरभाष : २३९२५४३, २३९२४७१

सर्वाधिकार: प्रकाशकाधीना:

परिवर्धित संस्करण

सन् २००९ ई.

मुद्रक :

भारत प्रेस,

कचौड़ीगली, वाराणसी-२२१००१

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१. पुस्तक परिचय ....................................................... ९

२. फलादेश देखने की विधि ............................................... १०

३. ज्योतिष ज्ञान की आवश्यक बातें ....................................... ११

४. बारह राशियों के नाम व स्वरूप ....................................... ११

५. ग्रहों का आपसी स्थान और दृष्टि सम्बन्ध ............................... १२

६. केन्द्र-त्रिकोण और अन्यान्य स्थान ....................................... १२

७. कुण्डली के १२ घरों के नाम ............................................... १३

८. ग्रहों की अवस्थायें और अंश ............................................... १४

९. बारह घरों के स्वामी ग्रहों के सम्बोधन ....................................... १५

१०. ग्रहों की आपसी शत्रुता मित्रता ............................................... १५

११. स्त्री-पुरुष में फल भेद ....................................................... १५

१२. नवग्रहों का क्रम से परिचय ............................................... १६

१३. सही कुण्डली बनाने की रीति ............................................... १८

१४. नवग्रहों का शक्ति-परिचय ............................................... १९

१५. ग्रहों का स्थानाधिपति स्वभाव ............................................... १९

१६. प्रश्न लग्न विचार ....................................................... २०

१७. मेष लग्न का फलादेश ....................................................... २२-७६

१८. मेष लग्न में विद्या-बुद्धि तथा सन्तान स्थानाधिपति सूर्य ............... ३२

१९. मेष लग्न में माता, भूमि तथा सुख स्थानपति चन्द्र ....................... ३६

२०. मेष लग्न में देह, स्थान पति मंगल ....................................... ४०

२१. मेष लग्न में भाई स्थान पति बुध ....................................... ४६

२२. मेष लग्न में भाग्य स्थान पति गुरु ....................................... ५०

२३. मेष लग्न में धन स्थान पति शुक्र ....................................... ५६

२४. मेष लग्न में पिता स्थान पति शनि ....................................... ६१

२५. मेष लग्न में कष्ट चिन्ता के अधिपति राहु ....................................... ६७

२६. मेष लग्न में कष्ट-कठिन कर्म के अधिपति केतु ....................................... ७१

२७. वृष लग्न का फलादेश ....................................................... ७७-१३०

२८. वृष लग्न में माता स्थान पति सूर्य ............................................... ८६

२९. वृष लग्न में भात्र-स्थान पति चन्द्र ............................................... ९०

३०. वृष लग्न स्त्री स्थान पति भौम ............................................... ९४

३१. वृष लग्न में सन्तान स्थान पति बुध ....................................... १००

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३२. वृष लग्न में आयु स्थान पति गुरु ....................................................... १०५

३३. वृष लग्न में देहस्थान पति शुक्र ....................................................... १११

३४. वृष लग्न में भाग्य स्थान पति शनि ....................................................... ११५

३५. वृष लग्न में कष्ट स्थानाधिपति राहु....................................................... १२१

३६. वृष लग्न में कठिन कर्माधिपति केतु ....................................................... १२५

३७. मिथुन लग्न का फलादेश ....................................................... १३१-१८४

३८. मिथुन लग्न में भ्रातृ स्थानपति सूर्य ....................................................... १८०

३९. मिथुन लग्न में धन स्थानपति चन्द्र....................................................... १८४

४०. मिथुन लग्न में आमद स्थानपति भौम ....................................................... १८९

४१. मिथुन लग्न में देह स्थानपति बुध ....................................................... १९५

४२. मिथुन लग्न में स्त्री स्थानपति गुरु ....................................................... १९९

४३. मिथुन लग्न में विद्या स्थानपति शुक्र ....................................................... २०५

४४. मिथुन लग्न में आयु स्थानपति शनि ....................................................... २०९

४५. मिथुन लग्न में कष्टाधिपति राहु ....................................................... २१५

४६. कठिन कर्माधिपति केतु ....................................................... २२०

४७. कर्क लग्न का फलादेश ....................................................... २२१-२७६

४८. कर्क लग्न में धन स्थानपति सूर्य ....................................................... २३०

४९. कर्क लग्न में देह स्थानपति चन्द्र ....................................................... २३४

५०. कर्क लग्न में विद्या स्थानपति भौम ....................................................... २३९

५१. कर्क लग्न में भ्रातृ स्थानपति बुध ....................................................... २४४

५२. कर्क लग्न में भाग्य स्थानपति गुरु ....................................................... २४८

५३. कर्क लग्न में लाभ स्थानपति शुक्र ....................................................... २५४

५४. कर्क लग्न में स्त्री स्थानपति शनि ....................................................... २५८

५५. कर्क लग्न में कष्ट स्थानाधिपति राहु ....................................................... २६४

५६. कर्क लग्न में कठिन कर्माधिपति केतु ....................................................... २६८

५७. सिंहलग्न का फलादेश ....................................................... २७३-३२५

५८. सिंह लग्न में देह स्थान पति सूर्य ....................................................... २८२

५९. सिंह लग्न में खर्च स्थानपति चन्द्र....................................................... २८६

६०. सिंह लग्न में मातृ स्थानपति भौम ....................................................... २९१

६१. सिंह लग्न में धन स्थानपति बुध ....................................................... २९५

६२. सिंह लग्न में विद्या स्थानपति गुरु ....................................................... ३००

६३. सिंह लग्न में पिता स्थानपति शुक्र ....................................................... ३०४

६४. सिंह लग्न में स्त्री स्थानपति शनि ....................................................... ३१०

६५. सिंह लग्न में कष्टाधिपति राहु ....................................................... ३१५

६६. सिंह लग्न में कठिन कर्माधिपति केतु ....................................................... ३१९

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१३७. पञ्चाङ्ग प्रकरण ............................................... ६४९

१३८. राशि प्रभेद प्रकरण ............................................... ६५५

१३९. ग्रह प्रभेद प्रकरण ............................................... ६७४

१४०. आधान प्रकरण ....................................................... ७१७

१४१. सूतिका प्रकरण ....................................................... ७२४

१४२. बालारिष्ट प्रकरण ....................................................... ७३०

१४३. चन्द्रादि-अरिष्ट भङ्ग प्रकरण ............................................... ७४०

१४४. चन्द्र-सूर्य कृत योग प्रकरण ............................................... ७४३

१४५. दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण ............................................... ७५०

१४६. सन्यास योग प्रकरण ....................................................... ७५४

१४७. नाभस योग प्रकरण ....................................................... ७७८

१४८. ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल ............................................... ७८३

१४९. ग्रह भाव योग प्रकरण ....................................................... ८१६

१५०. भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण ....................................................... ८२३

१५१. राजयोग प्रकरण ....................................................... ८३९

१५२. ग्रह रशिम प्रकरण ....................................................... ८४६

१५३. महापुरुष योग प्रकरण ....................................................... ८४८

१५४. विंशोत्तरी दशा प्रकरण ....................................................... ८५८

१५५. उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण ....................................................... ८८९

१५६. स्त्रीजातक प्रकरण ....................................................... ८९९

१५७. नष्ट जातक प्रकरण ....................................................... ९०७

१५८. गोचर ग्रह प्रकरण ....................................................... ९२३

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दो शब्द

बहुत हर्ष का विषय है कि यह भृगुसंहिता : फलित सर्वाङ्गदर्शन फलित सूत्र भाग के सहित अपने नवीन कलेवर के साथ अब आपके हाथ में है। चूँकि इस विशिष्ट और विशाल ग्रन्थ को सर्वाङ्ग-सम्मादित-सम्पादित करने का प्रयास बहुत लम्बे समय से चल रहा था, जिसमें अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती रहीं, जिसका समाधान यथासमय करना समय और श्रम के लिहाज से इतना आसान नहीं था। फिर भी आज प्रकाशक ठाकुर प्रसाद पुस्तक भण्डार के सम्यक् प्रोत्साहन से यह सफलता पूर्वक मूर्तिमान् हो सका। इसमें मैं आप सभी सन् पाठकों का ही हाथ समझता हूँ, जिन्होंने पत्रों, फोन आदि माध्यमों से प्रकाशक, महोदय तक उक्त परिष्कृत ग्रन्थ के प्रकाशन के लिए अपनी अपेक्षित आवश्यकताओं को सम्प्रेषित करते रहे।

मैं आश्वस्त हूँ कि प्रस्तुत नवीन कलेवर युक्त यह 'भृगुसंहिता : फलित सर्वाङ्ग दर्शन' ग्रन्थ आप अवश्य पसन्द करेंगे, क्योंकि इसमें पूर्व की तुलना में 'कुण्डली फल ज्ञान' करने की अनेक विधियों को समायोजित तो किया ही गया है, साथ-ही उस अनागत फलों की प्रतिशत निकालने की समझ भी आप अधिकृत कर सकेंगे। विशेष रूप से इस ग्रन्थ के वैशिष्ट्य ज्ञान ग्रन्थ के आरम्भ में 'पुस्तक–परिचय' शीर्षक से सम्भव हो सकेगा। अन्त में, बस इतना कहते हुए कि यह ग्रन्थ रत्न सभी स्तर के पाठकों के हित की रक्षा करने में पूर्णतया सक्षम है, विराम लेते हैं।

देवोत्थान एकादशी विक्रमाब्द–२०६६ ख्रीष्टीय सन् २००९ वाराणसी सुरकान्त झा 'सुमन'

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प्रिय पाठक वृन्द! इस ग्रन्थ के अन्दर, समस्त जन्म कुण्डलियों का फलादेश, पूर्णरूपेण विस्तार पूर्वक, कारणों सहित लिखा है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति की कुण्डली का प्रत्येक ग्रह भाग्य सम्बन्धित, किस-किस विषय का अधिकारी होकर, किस-किस स्थान में बैठकर, किस-किस स्थान को, किस-किस प्रकार की दृष्टियों से देख-देख कर, किस-किस प्रकार का फल जिन्दगी भर तक स्थाई रूप से प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, आकाश मार्ग में, सदैव परिभ्रमण करते रहने वाले ‘नवग्रहों’ की चाल के द्वारा हर एक लग्न वालों पर भाग्य के हर एक सम्बन्धों में जिन्दगी भर तक परिवर्तनशील फल कब-कब, क्या-क्या प्रदान करेगा अर्थात समस्त जीवन भर, कौन-कौन से वर्षो में एवं कौन-कौन से मासों में तथा कौन-कौन से दिनों में किस-किस ग्रहों के द्वारा क्या-क्या फल प्रदान होता रहेगा, इस प्रकरण में आदि से अन्त तक जीवन का पूर्ण रूपेण विस्तार पूर्वक फलादेश मिलेगा। अतः पाठक वृन्द! इस बात पर ध्यान देने की कृपा करें कि प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुण्डली में, नव ग्रह जिस-जिस स्थान पर, जैसा-जैसा स्वभाव का फल लेकर बैठे हैं, उनका फल समस्त जीवन के एक तरफ, सदैव चलता रहेगा और दूसरी तरफ आकाश में प्रत्येक राशि पर भ्रमण करते रहने से, जिस-जिस प्रकार का बदलता हुआ फल हर एक लग्न वालों पर नवग्रह करते रहते हैं, उसका फल चलता-बदलता रहेगा। इस प्रकार हर प्राणी के जीवन पर दोनों प्रकार से फल घटित होता रहेगा, अतः उपरोक्त समस्त विषय को महान् विस्तृत रूप से, भिन्न-भिन्न ज्योतिष के सरल और सत्य सिद्धान्तों के द्वारा निरूपित किया है, अतः इसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति, बड़े ज्योतिषी सीखे हुए ही, ज्योतिष के सम्पूर्ण आँकड़ों के द्वारा अपना-अपना फलादेश मालूम कर सकते हैं। प्रिय पाठक वृन्द! इसी ग्रन्थ के दूसरे प्रकरण में राशि, भाव और ग्रह से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराते हुए, उन तीनों के योग से प्रत्येक लग्न वालों को किस-किस प्रकार के शुभाशुभ फल प्राप्त हो सकते है? इसकी जानकारी भी पुरातन महर्षियों, आचार्यों के मतों का अवलोकन कर विस्तार और स्पष्टता से संश्लेषित किया गया है। साथ-ही ग्रहों की विविध अवस्थाओं को भी यहाँ बताया गया है, जिससे किस प्रकार ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा आदि के समय किस प्रकार का फल प्रदान करेंगे, इसकी जानकारी भी सहज भाव से उपलब्ध हो सके। इसके अतिरिक्त भी ज्योतिषशास्त्र से सम्बन्धित अनेक प्रकार के ऐसे विषयों को भी यहाँ स्थान दिया गया है, जिनकी जानकारी कर लेने के बाद आप अपना भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान तो और भी सरल व सहज भाव से करेंगे ही, साथ-ही आप एक अनुभवी ज्योतिष की तरह अपने परिजन और इष्ट-मित्रों की कुण्डली से फलादेश कर यशस्वी भी हो सकेंगे। अस्तु!!

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फलादेश देखने की विधि

(प्रत्येक लग्न वालों को)

१. मेष लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर कुण्डली नं०१०८ तक में फलादेश देखना चाहिये।

२. वृषभ लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली नं० २१६ तक में फलादेश देखना चाहिये।

३. मिथुनु लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ३२४ तक में फलादेश देखना चाहिये।

४. कर्क लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ४३२ तक में फलादेश देखना चाहिये।

५. सिंह लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ५४० तक में फलादेश देखना चाहिये।

६. कन्या लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ६४८ तक में फलादेश देखना चाहिये।

७. तुला लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ७५६ तक में फलादेश देखना चाहिये।

८. वृश्चिक लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ८६४ तक में फलादेश देखना चाहिये।

९. धन लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं०९६२ तक में फलादेश देखना चाहिये।

१०. मकर लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं०१०८० तक में फलादेश देखना चाहिये।

११. कुम्भ लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं०११८८ तक में फलादेश देखना चाहिये।

१२. मीन लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० १२९६ तक में फलादेश देखना चाहिये।

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१. जन्म कुण्डली के बारह घरों या स्थानों के अन्तर्गत, किस-किस स्थान से, क्या-क्या भाव या विषय देखा जाता है।

२. बारह राशियों के क्या-क्या नाम हैं और कौन-कौन राशि के, कौन-कौन ग्रह स्वामी होते हैं।

३. कौन-कौन-सी राशियों पर बैठने से, कौन-कौन ग्रह, उच्च एवं नीच माने जाते हैं।

४. कौन-कौन सी राशियों पर दृष्टियाँ डालने से, कौन-कौन ग्रह उच्च एवं नीच फल प्रदान करते हैं।

५. कौन-कौन ग्रह की, ( अपने बैठे हुए स्थान से, ) कौन-कौन स्थानों पर दृष्टियाँ पड़ती हैं।

६. कौन-कौन ग्रह का आपस में, किस-किस अन्य ग्रह से शत्रु एवं मित्र तथा सामान्य भाव वाला व्यवहार रहता है।

७. कौन-कौन ग्रह, किस-किस स्थान पर, बैठने से, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, उच्चक्षेत्री, नीचक्षेत्री तथा सामान्य क्षेत्री कहलाते हैं।

८. कुण्डली के अन्दर, कौन-कौन से स्थानों को, केन्द्र एवं त्रिकोण तथा सामान्य स्थान कहते हैं।

९. कौन-कौन ग्रह, किस-किस स्थान पर बैठने से अथवा किस-किस स्थान को देखने से, किस-किस प्रकार से अच्छा-बुरा फल क्योंकर करते हैं।

यद्यपि इन उपरोक्त समस्त बातों की जानकारी के लिये पुस्तक के अन्दर शुरू के पृष्ठों में ही यह सब वस्तुएँ दे दी गई हैं किन्तु इस पुस्तक की विशेषता यह है कि उपरोक्त तमाम बातों वर्गैरह को बिना सीखे ही, पुस्तक के अन्दर फलादेश मालूम करते समय इन समस्त विषयों की जानकारी स्वतः हो जाती है, क्योंकि हर एक फलादेश के अन्दर उपरोक्त ग्रहों के समस्त कारणों को युक्त करके, उदाहरणों सहित, दर्पण की तरह फलादेश लिखा गया है।

बारह राशियों के नाम और स्वरूप

(मेष) (वृषभ) (मिथुन) (कर्क) (सिंह) (कन्या)

१ २ ३ ४ ५ ६

(तुला) (वृश्चिक) (धनु) (मकर) (कुम्भ) (मीन)

७ ८ ९ १० ११ १२

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ग्रहों का आपसी स्थान और दृष्टि सम्बन्ध

यदि कोई ग्रह अपने बैठे हुए स्थान से, अपनी दृष्टि के द्वारा, किसी और स्थान को देख रहा है या उस स्थान पर बैठे हुए किसी ग्रह को देख रहा है, वह ग्रहों का दृष्टि सम्बन्ध कहलाता है और यदि अलग-अलग स्थानों में बैठे हुए कोई भी दो ग्रह, एक दूसरे को दोनों देख रहे हों तो वह ग्रहों का परस्पर दृष्टि और यदि कोई दो ग्रह आपस में, एक दूसरे के घर में बैठे हुए हों, तो, इन दोनों ग्रहों का स्थान सम्बन्ध कहलाता है, इसके अतिरिक्त विचारणीय बात यह है कि वह ग्रह आपस में मित्रभाव से सम्बन्ध कर रहे हैं अथवा उच्च भाव से या नीच भाव से या सामान्य भाव से सम्बन्ध कर रहे हैं।

अतः सम्बन्धों का सार फल यह है कि उन सम्बन्ध करने वाले ग्रहों के गुण स्वभाव कर्मों को, एक दूसरे के सहयोग से मिलकर उन घरों के फलादेशों की पूर्ति करते हैं, अर्थात् एक ग्रह में दूसरे ग्रह का स्वभाव सम्मिलित रहता है।

पाठकगण! इस बात का ध्यान रखें कि इस ग्रन्थ के अन्दर जहाँ ग्रहों के फलादेश दृष्टियों के सहित लिखे हैं। वहाँ पर यदि किसी ग्रह की दृष्टि के अन्दर कोई ग्रह भी उस स्थान पर बैठा हो तो उस ग्रह का दृष्टि सम्बन्ध मान लेना चाहिये और जहाँ पर स्थानाधिपतियों का फलादेश लिखा है, वहाँ पर यदि किसी ग्रह के स्थान में दूसरा कोई ग्रह बैठा है, और उसके स्थान में, वह ग्रह बैठा है तो उसे स्थान सम्बन्ध मान लेना चाहिये, क्योंकि इस पुस्तक के अन्दर हर एक फलादेश, ग्रहों की पूर्ण विवेचन युक्त स्थितियों के द्वारा लिखा हुआ है।

कौन-कौन स्थानों को केन्द्र या त्रिकोण या अन्यान्य स्थान कहते हैं

जन्म कुण्डली के अन्दर पहला स्थान, चौथा स्थान, सातवाँ स्थान, दसवाँ स्थान, इस चारों घरों को केन्द्र स्थान कहते हैं, अतः केन्द्र में बैठे हुए ग्रह, विशेष शक्ति युक्त होने की वजह से अधिक सफलता शक्ति प्रदान करते हैं। पाँचवाँ स्थान और नौवाँ स्थान, इन दोनों स्थानों को त्रिकोण स्थान कहते हैं, इन स्थानों में दैविक शक्ति की प्रधानता होने की वजह से, इन स्थानों पर बैठे हुए ग्रह भी, किसी-किसी मार्गों में, विशिष्ट सफलता शक्ति प्रदान करते हैं और लाभ स्थान, धन स्थान में बैठे हुए ग्रह, धन की वृद्धि का कार्य करते हैं, परन्तु लाभ में बैठा ग्रह प्रायः उत्तम फल का दाता होता है और तीसरे पराक्रम स्थान में बैठा हुआ ग्रह भी, पराक्रम शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त कराता है, इसलिये यह स्थान भी उत्तम है और छठें

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हैं, वह अपने स्थान से पहिले स्थान की स्थिति का भी ध्यान रखकर उलटा चलने के कारणों से एक-सी रफ्तार का फल प्रदान नहीं कर पाते हैं।

अतः इस प्रकार यह उपरोक्त द्वारा जानकारी की जा सकेगी कि कौन-कौन ग्रह किस-किस अवस्था आदि में हैं।

बारह घरों के स्वामी ग्रहों के नाम सम्बोधन

१. प्रथम स्थान के स्वामी द्वादशेश को, लनेेश कहते हैं।

२. दूसरे स्थान के स्वामी धनपति को, धनेश कहते हैं अथवा द्वितीयेश कहते हैं।

३. तीसरे स्थान के भ्रातृ स्थान पति को, तृतीयेश एवं पराक्रमेश कहते हैं।

४. चौथे स्थान के मातृ स्थानपति को, चतुर्थेश एवं सुखेश कहते हैं।

५. पाँचवें स्थान के संतान-स्थानपति को पंचमेश कहते हैं।

६. छठवें स्थान के शत्रुस्थानपतिको षष्ठेश कहते हैं।

७. सातवें स्थान के स्त्री स्थानपति को सप्तमेश कहते हैं।

८. आठवें स्थान के आयु-स्थानपति को, अष्टमेश कहते हैं।

९. नवें स्थान के भाग्य स्थानपति को, भाग्येश एवं धर्मेश तथा नवमेश कहते हैं।

१०. दशम स्थान के राज्य स्थानपति को, राज्येश एवं दशमेश कहते हैं।

११. ग्यारहवें स्थान के लाभ स्थानपति को, लाभेश कहते हैं।

१२. बारहवें स्थान के खर्च स्थानपति को, व्ययेश कहते हैं।

ग्रहों की आपस में मित्रता, शत्रुता तथा सामान्यता

सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, गुरु ये चारों ग्रह आपस में मित्र हैं।

बुध सभी के मित्र हैं।

शुक्र, शनि, राहु, केतु ये चारों ग्रह आपस में मित्र हैं।

उपरोक्त नवग्रहों में दो प्रकार के यूथ हैं, इसलिये ये चार-चार ग्रह अपने-अपने यूथ में, आपसी मित्रता मानते हैं और दोनों यूथ, एक दूसरे के सम्बन्ध में शत्रुता मानते हैं और बुध सभी ग्रहों के मित्र हैं। इसके अतिरिक्त शत्रुता मानने वाले ग्रहों में कहीं-कहीं सामान्यता आती है उस भाव का पुस्तक के अन्दर फलादेशों में, साफ-साफ स्पष्टीकरण कर दिया है।

स्त्री पुरुषों के फलित में भेद

प्रिय पाठक वृन्द! इस ग्रन्थ के अन्दर आदि से अन्त तक जो कुछ भी फलादेश लिखा है, वह यद्यपि पुरुष जाति को सम्बोधित करके लिखा गया है, किन्तु वास्तव में, यह फलादेश स्त्री, पुरुष, बालक सभी पर लागू होने वाला है, परन्तु एक बात का खास फर्क रहेगा, वह यह है कि पुरुषों

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देख रहा है, उन सम्बन्धों में, हृदय की शक्ति के योग से कार्य करता है।

शुक्र- महान् चतुराई का स्वामी है, इसलिए जन्मकुण्डली में जिन-जिन स्थानों का स्वामी है और जहाँ बैठा है, एवं जहाँ देखता है, वहाँ-वहाँ महान् चतुराई के योग से कार्य करता है।

शनि- महान् दृढ़ता शक्ति का अधिकारी है, इसलिए जन्म कुण्डली के अन्दर शनि, जिन-जिन स्थानों का स्वामी है और जहाँ बैठा है, तथा जिन-जिन स्थानों को देखता है, उन स्थानों में दृढ़ता शक्ति से काम करता है।

राहु- गुप्त युक्तिबल तथा कमी और कष्ट के अधिपति हैं, इसलिये जन्म कुण्डली के अन्दर जिस स्थान पर बैठते हैं वहाँ गुप्त युक्ति बल का प्रयोग तथा कमी और कष्ट का कार्य करते हैं।

केतु- गुप्त शक्तिबल, कठिन कर्म तथा कमी और भय के अधिपति हैं, इसलिये जन्मकुण्डली में जिस स्थान पर बैठते हैं, वहाँ कठिन कर्म शक्ति एवं कमी तथा भय की प्राप्ति का कार्य करते हैं और जन्म कुण्डली में या ग्रह गोचर में जिस किसी भी ग्रह के सामने केतु आ रहे हों, वह ग्रह भी भययुक्त हो जाता है।

नोट- उपरोक्त ग्रहों का, हर सम्बन्धों में विचार रखते हुए, विस्तृत फलादेश पुस्तक के अन्दर लिखा गया है।

गलत बनी हुई कुण्डलियों को सुधारने की सरल विधि- प्रिय पाठक वृन्द! प्रायः कुछ निम्नलिखित कारणों से, जन्म कुण्डलियाँ गलत बन जाया करती हैं, अर्थात् बच्चे के जन्म समय पर स्त्रियों की असावधानियाँ से और घड़ीयाँ की गड़बड़ी से तथा गर्भ में बाहर बालक के क्षणिक दर्शन पर जन्म मानना या पूर्णरूपेण बालक का पृथ्वी पर आने पर जन्म मानने से, अथवा लोकल टाइम और सूर्य टाइम के अन्तर फर्क से और पृथ्वी की ऊँचाई नींचाई के शहरों में, सूर्योदय के फर्क से, अतः उपरोक्त समस्त कारणों में से, किसी भी कारण के द्वारा, अक्सर कुण्डलियाँ गलत बन जाया करती हैं, इसलिए जनता को, सत्य कुण्डली, सरलता पूर्वक प्राप्त होने के दृष्टिकोण से, यह ठोस उपाय प्रस्तुत कर रहा हूँ कि जिसके द्वारा, घण्टे दो घण्टे तक का फर्क भी निश्चय रूप से शुद्ध हो जायेगा।

अतः जन्म कुण्डली जो पैदाइश के समय प्राप्त हो, उससे १ लग्न पहले की लेकर और १ लग्न बाद की लेकर तथा ग्रहों की स्थान स्थिति उसी अनुसार बनाकर, फिर पुस्तक के अन्दर लिखित फलादेशों के अनुसार

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भी न सके, इतना ऊँचा आदर्श बनाना तो बहुत दूर रहा इसलिये यह भी गलत है।

नवग्रहों का शक्ति परिचय

जो कोई भी ग्रह अपने क्षेत्र में बैठे हों या उच्च क्षेत्र में बैठे हों अथवा अपने क्षेत्र को या उच्च क्षेत्र को देख रहे हों, तो उन सभी स्थानों की वृद्धि करते हैं। अर्थात इसे निम्नांकित रूप से समझिये।

सूर्य- सिंह राशि या मेष राशि पर बैठा हो, या इन्हें देख रहा हो।

चन्द्रमा- कर्क राशि या वृष राशि पर बैठा हो, या इन्हें देख रहा हो।

मंगल- मेष, वृश्चिक राशि या मकर राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा हो।

बुध- मिथुन, कन्या राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा हो।

गुरु- धन, मीनराशि या कर्क राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा हो।

शुक्र- वृषभ, तुला राशि या मीन राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा हो।

शनि- मकर कुम्भ राशि या तुला राशि पर बैठा हो, या इन्हें देख रहा हो।

राहु- मिथुन राशि पर बैठा हो या धनु राशि को छोड़कर लग्न से तीसरे या छठें या ग्यारहवें स्थान पर कहीं भी बैठा हो।

केतु- धनु राशि पर बैठा हो या मिथुन राशि को छोड़कर लग्न से तीसरे-छठें-ग्यारहवें स्थान पर कहीं भी बैठा हो।

नोट- क्रूर या गरम ग्रहों का, लग्न से तीसरे-छठें-ग्यारहवें स्थान में बैठना शक्ति प्रदायक होता है।

अतः उपरोक्त, नवग्रह यदि उपरोक्त राशियों पर बैठे हों या इन्हें देखते हों तो उन स्थानों में शक्तिशाली कार्य करते हैं। इसलिये इस ग्रंथ के अन्दर उपरोक्त समस्त विषय को, फलादेशों के अन्दर पूर्ण रूपेण स्पष्टीकरण करके फलादेश लिखा गया। पाठको! इस ग्रन्थ में धनु राशि या धन राशि नौवीं राशि का बोधक है, परन्तु धन स्थान या घर या भाव कुण्डली के बारह खाने में से दूसरे खाने का बोधक है।

ग्रहों का स्थानाधिपति स्वभाव

ज्योतिष के फलादेश को जानने के लिये, यह एक बड़ा सरल और सत्य आँकड़ा है कि जन्म कुण्डली के अन्दर १२ स्थानों के अधिपति सातों ग्रहों का यह प्राकृतिक स्वभाव है कि किसी भी स्थान का स्वामी कोई ग्रह,

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इस ग्रन्थ के अन्दर से, कुण्डली नं० १ से लेकर नं० १२९६ तक में वह लग्न के जहाँ भी ग्रहों का फलादेश लिखा हो, उन फलादेशों से, उस व्यक्ति के प्रश्न का उत्तर मान लेना चाहिये और उसके प्रश्न सम्बन्धी भविष्य की जानकारी उसी प्रकार कर लेनी चाहिये। जिस प्रकार जन्मकुण्डलियों के भविष्य जानने के लिए, हर एक लग्न के प्रथम भाग में, नवग्रहों के द्वारा दैनिक, मासिक, वार्षिक तीनों प्रकार से भविष्य जानने की रीति लिखी हुई है।

किन्तु पाठक वृन्द! इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि, प्रश्न कर्ता ने जिस विषय का प्रश्न किया है, उस विषय का योग, उस व्यक्ति की जन्मकुण्डली में, किस प्रकार पड़ा हुआ है, अतः जन्मकुण्डली के अन्दर जैसा योग होगा, उसके अन्तर्गत विचार करके प्रश्न लग्न में आये हुए ग्रहों का फलादेश समझना चाहिये और यदि जन्मकुण्डली प्रश्न कर्ता के पास कतई नहीं हो तो केवल प्रश्न लग्न के ग्रहों से ही फलादेश, इस पुस्तक के आधार पर बता देना चाहिये।

इसके अतिरिक्त प्रश्न लग्न का ज्ञान अपेक्षित होने पर या तो पांचांगों में छपी सारणी के अनुसार वर्तमान समय की लग्न जान ले लेनी चाहिये या लग्न निकालने की रीति किसी से सीख लेनी चाहिये। अथवा अन्दाज से लग्न निकालना हो तो, पंचागों में प्रथम लग्न जिसमें सूर्य बैठा होता है वह लग्न सूर्योदय के समय अवश्य रहती है। उसके बाद करीबन ११ बजे तक दो लग्न उसके आगे वाली समाप्त हो जाती है, दोपहर १२ बजे पर सुबह वाली लग्न से चौथी लग्न अवश्य आ जाती है और उसके बाद सायंकाल ४ बजे तक करीबन छठवीं लग्न समाप्त हो जाती है और सूर्यास्त के समय, सुबह वाली लग्न से, सातवीं लग्न आ जाती है और इसके बाद रात्रि में ११ बजे तक करीबन नौवीं लग्न समाप्त होकर रात्रि के १२ बजे दसवीं लग्न रहती है इसके उपरान्त करीबन ५ बजे प्रातःकाल तक बारहों लग्न समाप्त हो जाती हैं।

इस प्रकार, पाठक उपरोक्त विषयों का अध्ययन कर लेने के पश्चात् क्रम से मेष आदि बारह लग्न की कुण्डलियों का फल ज्ञान कर सकेंगे। उसके बाद जिन विषयों का ज्ञान अथवा जिन शंकाओं का समाधान आपको अभी तक नहीं हुआ हो, उनका ज्ञान या समाधान आप इसी ग्रन्थ के अग्निम भाग का अध्ययन करके निश्चय ही कर सकेंगे तथा शेष आपके लिए पूर्ण दैवज्ञ बनने के मार्ग को खोलने में सफल है।

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६. जिस मास में सूर्य कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में सूर्य तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में सूर्य वृश्चिक राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में सूर्य धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में सूर्य मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १० के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में सूर्य कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में सूर्य मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२ के अनुसार मालूम करिये।

( ९ ) मेष लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल

आपकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचांग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा।

अतः जन्म कुंडली और पंचांग दोनों हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है।

१. जिस दिन चन्द्रमा मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १६ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १८ के अनुसार मालूम करिये।

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७. जिस दिन चन्द्रमा तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा सिंह वृश्चिक पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २० के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २१ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २३ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४ के अनुसार मालूम करिये।

( १ ) मेष लग्न वालों की समस्त जीवन के लिये जीवन के दोषों किटयों पर-भौमफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा।

अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है।

१. जिस मास में मंगल मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २६ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में मंगल मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २७ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २९ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३० के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३१ के अनुसार मालूम करिये।

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९. जिस मास में बुध धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में बुध मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में बुध कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में बुध मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४८ के अनुसार मालूम करिये।

( १ ) मेष लग्न वालों का समस्त जीवन के लिये।

जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल

आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता रहेगा।

अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है।

१. जिस वर्ष में गुरु मेष राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु वृषभ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५० के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु मिथुन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में गुरु कर्क राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में गुरु सिंह राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में गुरु कन्या राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५४ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु तुला राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५५ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में गुरु वृश्चिक राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५६ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु धनु राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५७ के अनुसार मालूम करिये।

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१०. जिस वर्ष में गुरु मकर राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५८ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में गुरु कुम्भ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु मीन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६० के अनुसार मालूम करिये।

( १ ) मेष लग्नवालों को समस्त जीवन के लिए। जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में जिस स्थान पर शुक्र बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा।

अतः जन्म कुण्डली और पंचाङ्ग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार से फल घटित होता रहता है।

१. जिस मास में शुक्र मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६१ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में शुक्र वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६२ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में शुक्र मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६३ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में शुक्र कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६४ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में शुक्र सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में शुक्र कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६६ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में शुक्र तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में शुक्र वृश्चिक राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में शुक्र धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में शुक्र मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७० के अनुसार मालूम करिये।

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११. जिस मास में शुक्र कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७२ के अनुसार मालूम करिये।

( ९ ) मेष लग्न वालों का समस्त जीवन के लिये।

आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाड़-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा।

अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है।

१. जिस वर्ष में शनि मेष राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में शनि वृषभ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में शनि मिथुन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में शनि कर्क राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७६ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में शनि सिंह राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७७ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में शनि कन्या राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७८ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में शनि तुला राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७९ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में शनि वृश्चिक राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८० के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में शनि धनु राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में शनि मकर राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८२ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में शनि कुम्भ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३ के अनुसार मालूम करिये।

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( १ ) मेष लग्न वालों का समस्त जीवन के लिये।

जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचांग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा।

अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है।

१. जिस वर्ष में केतु मेष राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु वृषभ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९८ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु मिथुन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु कर्क राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०० के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु सिंह राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०१ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु कन्या राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु तुला राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु वृश्चिक राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु धनु राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु मकर राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु कुम्भ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु मीन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०८ के अनुसार मालूम करिये।

नोट- इसी प्रकार हर एक लग्न वालों को कुण्डली के नम्बरों से प्रत्येक ग्रहों का फल समझ लेना चाहिये।

अब इसके आगे जन्म कालीन ग्रहों का फलादेश प्रारम्भ होता है-

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विद्या बुद्धि-संतान स्थिति सूर्य

मेष लग्न में सूर्य

यदि मेष का सूर्य-प्रथम केन्द्र देह के स्थान में, उच्च का होकर, मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो देह का कद प्रभावशाली रहेगा और बुद्धि में उत्तेजना शक्ति रहेगी तथा विद्या के स्थान में महानता प्राप्त होगी और वाणी में प्रभाव रहेगा तथा हृदय में बड़ा भारी स्वाभिमान होगा तथा संतान पक्ष में, उत्तम शक्ति रहेगी, किन्तु सूर्य, सातवीं नीच दृष्टि से, स्त्री एवं रोजगार के स्थान को देख रहा है,

नं. १

इसलिए स्त्री स्थान में क्लेश एवं कष्ट तथा सुन्दरता की कमी प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ तथा कुछ कमी प्रतीत होगी और गृहस्थी के सुख सम्बन्धों में एवं उसके संचालन में कुछ दिक्कतें रहेंगी।

मेष लग्न में २ सूर्य

यदि वृषभ का सूर्य- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में, शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, इसलिए संतान पक्ष में बाधा रहेगी और विद्या के ग्रहण करने में कुछ दिक्कतों के योग से शक्ति प्राप्त होगी, किन्तु बुद्धि योग द्वारा धन की वृद्धि का विशेष प्रयत्न किया जायेगा, परन्तु धन की संचित शक्ति के अन्दर कुछ तुटि रहेगी और सातवीं

नं. २

की वृश्चिक राशि में देख रहा है इसलिए आयु की वृद्धि रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ बुद्धि योग द्वारा प्राप्त होगा तथा जीवन की दिनचर्या में, बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और कुटुम्ब का कुछ प्रभाव रहेगा।

मेष लग्न में ३ सूर्य

मिथुन का सूर्य- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में, मित्र बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी शक्ति मिलेगी और तीसरे स्थान पर, गरम ग्रह बहुत शक्ति-शाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये पराक्रम-पुरुषार्थ की बहुत वृद्धि होगी तथा बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और दिमाग के अन्दर तथा वाणी के अन्दर तेजी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से, भाग्य एवं धर्म स्थान को, गुरु की धनु राशि में देख रहा

नं. ३

है, इसलिये बुद्धि योग की शक्ति के द्वारा, भाग्य की वृद्धि होगी और धर्म

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मेष लग्न का फलादेश

दूसरे स्थानों में मान प्राप्त करेगा।

मेष लग्न में ७ सूर्य

तुला का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है, इसलिये विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी तथा बुद्धि और विवेक की लघुता से कार्य करेगा और संतान पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा स्त्री के सुख स्थान में परेशानी अनुभव होगी और रोजगार के मार्ग में दिक्कतों से एवं दिमागी परिश्रम से कार्य सम्पादन करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को, मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है इसलिये देह के कद में कुछ लम्बाई प्राप्त होगी तथा हृदय में कुछ छिपा हुआ स्वाभिमान विशेष रहेगा और बुद्धि की युक्ति से मान एवं प्रभाव प्राप्त करेगा।

नं. ७

मेष लग्न में ८ सूर्य

यदि वृश्चिक राशि का सूर्य-आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में, मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो विद्या ग्रहण करने में दिक्कतें और कमजोरियाँ रहेंगी तथा संतान पक्ष में कष्ट अनुभव होगा और दिमाग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा आयु में शक्ति होगी और पुरातत्व सम्बन्ध में बुद्धि योग द्वारा प्रभाव और चमत्कार रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष की वृद्धि करने में, बड़ा प्रयत्नशील रहेगा, किन्तु फिर भी धन और कुटुम्ब की तरफ से कुछ असन्तोष युक्त शक्ति प्राप्त होगी।

नं. ८

मेष लग्न में ९ सूर्य

यदि धनु राशि का सूर्य- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो बड़ी प्रभावशालिनी विद्या प्राप्त करेगा तथा बुद्धि के अन्दर उच्चतम शक्ति पायेगा और धर्म शास्त्र का अच्छा ज्ञान पायेगा तथा बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की महान् वृद्धि करेगा और संतान पक्ष में उत्तम सहयोग प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ा प्रभाव और यश पायेगा तथा ईश्वर और न्याय पर विश्वास मानेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है,

नं. ९

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इसलिये भाई-बहिन का अच्छा योग बनेगा पराक्रम तथा पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर बुद्धि की योग्यता से बड़ी शक्ति और स्फूर्ति प्राप्त करेगा।

मेष लग्न में १० सूर्य यदि मकर राशि का सूर्य- दशम केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो, पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या के पक्ष में कुछ अड़चनों के द्वारा राजभाषा की योग्यता पायेगा और दिमाग एवं विचारों के अन्दर बड़ी भारी उत्तेजना क्रोध तथा अहंभाव रखेगा और संतान पक्ष के सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर सहयोग शक्ति प्राप्त होगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता का और भूमि का अच्छा योग पायेगा तथा राज और समाज व कारबार के मार्ग में बुद्धि योग से उन्नति प्राप्त करेगा।

नं. १०

यदिकुम्भ राशि का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर या गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है। इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष उन्नति करने के लिये बड़ा भारी परिश्रम करेगा और बुद्धि योग के द्वारा विशेष सफलता प्राप्त करेगा तथा आमदनी के मार्ग में बड़ा प्रभाव रहेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, स्वयं अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा और संतान शक्ति प्राप्त रहेगी तथा स्वार्थ सिद्धि के मार्ग में बड़ी दृढ़ता और तत्परता तथा वाणी की कटुता से कार्य में सफलता पायेगा।

मेष लग्न में ११ सूर्य

नं. ११

यदि मीन का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्च की विशेष संचालन शक्ति बुद्धि योग द्वारा करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा, किन्तु व्यय स्थान के दोष के कारण विद्या के पक्ष में कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ कमी और परेशानी तथा हानि के कारण प्राप्त करेगा तथा दिमाग के अन्दर कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को, बुध की

मेष लग्न में १२ सूर्य

नं. १२

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मेष लग्न का फलादेश

कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में सद्भावनाओं के द्वारा प्रभाव की शक्ति और निर्भयता प्राप्त करेगा।

माता, भूमि, सुखस्थानपति चन्द्र

मेष लग्न में १ चन्द्र

यदि मेष का चन्द्र- प्रथम केन्द्र, देह के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो माता का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा भूमि-मकानादि का सुख एवं घरेलू सुख प्राप्त करेगा और देह में सुन्दरता रहेगी तथा मन का स्वामी चन्द्रमा है, इसलिये मन की प्रसन्नता प्राप्त करने के साधन बनेंगे और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है इसलिये स्त्री पक्ष में सुख और सुन्दरता रहेगी तथा रोजगार के मार्ग में सुख पूर्वक मनोयोग द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी और गृहस्थ के सम्बन्धों में बड़ा मनोरंजन और मान प्राप्त करेगा।

नं. १३

मेष लग्न में २ चन्द्र

यदि वृषभ का चन्द्र- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति का बड़ा आनन्द प्राप्त करेगा और बड़ा धनवान एवं जायदाद वाला बनेगा। अतः धन स्थानपति चन्द्रमा होने के कारण धन-जन-कुटुम्बी की वृद्धि करने में ही प्रसन्नता मानेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन का भी कार्य करता है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और नीच दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व के स्थान को, मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति रहेगी और कभी-कभी आयु और पुरातत्व स्थानों में कुछ संकट उत्पन्न होंगे।

नं. १४

मेष लग्न में ३ चन्द्र

यदि मिथुन का चन्द्र- तीसरे पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान में मित्र बुध की मिथुन राशि पर बैठा है तो भाई-बहन का सुख प्राप्त करेगा तथा सुख पूर्वक पराक्रम की वृद्धि पायेगा और माता की शक्ति मिलेगी तथा मन का स्वामी चन्द्रमा होता है, इसलिये मनोबल की शक्ति से भूमि-मकानादि रहने का सुन्दर स्थान प्राप्त करेगा तथा मन में सदैव प्रसन्न रहने का प्रयत्न करेगा और

नं. १५

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सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को, गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म का पालन एवं मनन करेगा और मनोबल की उत्साह शक्ति के द्वारा सफलता और यश प्राप्त करके भाग्यवान् कहलायेगा।

मेष लग्न में ४ चन्द्र

यदि कर्क का चन्द्र- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो माता को महान् सुख प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की शक्ति का सुन्दर योग मिलेगा तथा घरेलू वातावरण में मन को प्रसन्न करने के महान् साधन मिलेंगे, क्योंकि मन का स्वामी चन्द्रमा है, इसलिये मन के द्वारा सदैव मनोरंजन का ढंग बनाता रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को, शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता का योग अनुभव करेगा तथा राज-सामाज और कारबार के मार्ग में कुछ नीरसता से काम करेगा।

नं. १६

मेष लग्न में ५ चन्द्र

यदि सिंह का चन्द्र-पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो संतान पक्ष में बड़ा सुख अनुभव करेगा तथा मन का स्वामी चन्द्रमा होने के कारण मनोबल की शक्ति के द्वारा विद्या के पक्ष में बहुत सफलता प्राप्त करेगा तथा माता और मकानादि का सुख योग रहेगा और पन तथा बुद्धि के अन्दर प्रसन्नता और विनोद रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ असन्तोष युक्त मार्ग के द्वारा सफलता शक्ति पायेगा और साम्भीर तथा शान्त बुद्धि योग के द्वारा संतोषी एवं बड़ा चतुर बुद्धिमान् बनेगा।

नं. १७

मेष लग्न में ६ चन्द्र

यदि कन्या का चन्द्र- छठें शत्रु एवं झंझट के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो माता के पक्ष में सुख शक्ति की बड़ी कमी रहेगी और भूमि-मकानादि एवं घरेलू वातावरण में अशान्ति का योग प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में कुछ शान्ति के प्रभाव से सुख अनुभव करेगा तथा मन स्थानपति चन्द्रमा होने के कारण से मनोयोग द्वारा बड़ी-बड़ी दिक्कतों और मुसीबतों को सरलता और नम्रता से पार करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से

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में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष के कारण धर्म में श्रद्धा रखते हुए भी धर्म का ठीक रूप से पालन नहीं हो सकेगा और इसी कारण से भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ त्रुटियुक्त विकास का साधन पायेगा।

मेष लग्न में ३ भौम

यदि मिथुन का मंगल-तीसरे, भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूरग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम शक्ति की महान वृद्धि करेगा तथा बड़ी जबर्दस्त हिम्मत वाला बनेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा, परन्तु आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ी शानदार और प्रभाव रहेगा,

नं. २७

चौथी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को, बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी हिम्मत और बहादुरी से काम करेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को, मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के लिये बड़ा प्रयत्न करेगा और धर्म के पालन में कुछ रुचि रखेगा तथा आठवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज से बड़ा भारी प्रभाव तथा मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और पिता स्थान की उन्नति करेगा।

मेष लग्न में ४ भौम

यदि कर्क का मंगल-चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान पर नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण से माता के सुख सम्बन्धों की हानि प्राप्त करेगा तथा भूमि और मकानादि एवं घरेलू सुखों की बड़ी भारी कमी रहेगी तथा देह की सुन्दरता में कमजोरी प्राप्त होगी और जीवन की दिनचर्या एवं आयु में कुछ अशान्ति के योग प्राप्त रहेंगे और पुरातत्व सुख लाभ की कमजोरी रहेगी तथा

नं. २८

चौथी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ क्लेश युक्त सम्बन्ध रहेगा तथा रोजगार के मार्ग में परेशानी के योग से शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये पिता से कुछ वैमनस्य रखते हुए भी पिता और राज-

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मेष लग्न का फलादेश

समाज में कुछ उन्नति करेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में उन्नति पाने के लिए भारी प्रयत्न करेगा।

मेष लग्न में ५ भौम

यदि सिंह का मंगल- पाँचवें त्रिकोण, विद्या एवं सन्तान स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा तथा विद्या में कुछ कठिनाइयाँ के योग से शक्ति प्राप्त करेगा और वाणी तथा बुद्धि के अन्दर बड़ी तेजी रखेगा तथा देह में स्वाभिमान रखेगा और चौथी दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त रहेगी तथा बुद्धि योग द्वारा पुरातत्व सम्बन्धित शक्ति का लाभ प्राप्त रहेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ा प्रभाव रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी के योग से उन्नति प्राप्त करेगा, किन्तु लाभ के मार्ग में सफलता मिलने पर भी कुछ असंतोष मानेंगा और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रूप से खूब होता रहेगा तथा बाहरी स्थानों से जीविका सम्बन्धित शक्ति का उत्तम योग प्राप्त करेगा।

नं. २९

मेष लग्न में ६ भौम

यदि कन्या का मंगल- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर गरम यह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव कायम रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी निर्भयता से काम करेगा और परिश्रम के योग से उन्नति और स्वाभिमान की बुद्धि प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के मार्ग में कुछ कठिनाइयाँ प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन करने में इच्छा रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब शानदार करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में अच्छा सम्बन्ध बनाकर लाभ प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में देह के स्थान को, स्वक्षेत्र के रूप से देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा प्रभाव और स्वाभिमान प्राप्त करेगा तथा

नं. ३०

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कठिन परिश्रम के योग से अपने व्यक्तित्व की बड़ी जागृति और नाम प्राप्त करेगा और अधिक स्वाभिमानी होने के कारण कुछ विरोधियों से टकराते रहना पड़ेगा, कितु विजयी रहेगा।

मेष लग्न में ७ भौम

यदि तुला का मंगल-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण स्त्री पक्ष में कुछ कष्ट युक्त सम्पर्क के साधन प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाइयों के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा तथा आयु की उत्तम शक्ति पायेगा और पुरातत्वशक्ति का सुन्दर सहयोग पायेगा और जीवन की दिनचर्या में शानदार रहेगी तथा चौथी उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए पिता से कुछ वैमनस्यता होते हुए भी पिता की उन्नति करेगा और कारबार में बड़ी सफलता पायेगा तथा राज्य-समाज के मार्ग में बड़ी भारी इज्जत पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा प्रभाव और गौरव प्राप्त करेगा तथा बड़ा भारी स्वाभिमान रखेगा और आठवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिए धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिए कठिन प्रयत्न करने पर भी थोड़ी सफलता मिलेगी।

नं. ३१

मेष लग्न में ८ भौम

यदि वृश्चिक का मंगल-आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो आयु की वृद्धि करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव और गौरव रहेगा; किन्तु देह का स्वामी होकर अष्टम स्थान में बैठा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कमी रहेगी तथा बुढ़ापे के चिह्न जल्दी प्रतीत होने लगेंगे और दूसरे स्थानों से सम्बन्ध बनेगा और चौथी शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को, शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ थोड़ी-सी सफलता शक्ति मिलती रहेगी और आमदनी की परेशानियों के योग से विशेष प्रयत्न करेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब वृद्धि के लिये स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब के मार्ग में सफलता मिलने पर भी कुछ असन्तोष रहेगा और

नं. ३२

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एवं बाहरी स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और बाहरी स्थानों में कुछ परेशानी प्रतीत होगी तथा रोग व झंझटों की परवाह नहीं करेगा।

मेष लग्न में ७ बुध

यदि तुला का बुध- सातवें केन्द्र एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पुरुषार्थ और परिश्रम की शक्ति से रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु स्थान पति होने के दोष के कारण से रोजगार और स्त्री के स्थान में कुछ झंझट युक्त कार्य से शक्ति प्राप्त रहेगी तथा बुध विवेकी ग्रह है, इसलिये विवेक शक्ति के योग से गृहस्थ में संचालन करेगा और

भाई-बहिन का कुछ सहयोग पायेगा और शत्रु पक्ष के मार्ग मे विवेक शक्ति के परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये रोगेश होने के कारण देह में कुछ परेशानियों के योग से मान और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा।

मेष लग्न में ८ बुध

यदि वृश्चिक का बुध- आठवें, मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में हानि एवं परेशानी रहेगी और पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर कमजोरी प्रतीत होगी तथा उत्साह और हिम्मत की कमी रहेगी और शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव होगी तथा

शत्रु स्थान पति होने के दोष के कारण से जीवन की दिनचर्या तथा आयु एवं उदर और पुरातत्व के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी होने के कारणों से परेशानी अनुभव होगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ी भारी दौड़-धूप करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ थोड़ी अशान्ति के द्वारा शक्ति पायेगा।

मेष लग्न में ९ बुध

यदि धनु राशि का बुध- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो परिश्रम के योग से भाग्य की वृद्धि करेगा, किन्तु

पाप स्थान पति होने के दोष के कारण से भाग्य के पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और धर्म के पालन में कुछ भ्रुटि, किन्तु शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में भाग्य की ताकत से सफलता प्राप्त करेगा और प्रभाव की वृद्धि रहेगी तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग से उन्नति

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का योग बनेगा और विवेकी बुध सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मिथुन राशि में भाई एवं पराक्रम स्थान को, स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के योग से पुरुषार्थ कर्म की सफलता और भाई-बहिन के संयोग का लाभ प्राप्त करेगा।

मेष लग्न में १० बुध

यदि मकर का बुध- दसवें केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शनि की मकर राशि पर बैठा है तो परिश्रम और पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा बहुत उन्नति करेगा और भाई-बहिन का कुछ योग पायेगा, किन्तु शत्रु स्थानपति होने के दोष के कारण से पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त सम्बन्ध प्राप्त करेगा और बुध स्वभाव से विवेकी ग्रह है, इसलिये विवेक शक्ति के योग से कारबार,

नं. ४६

राज-समाज के अन्दर मान-प्रतिष्ठा एवं सफलता पायेगा और शत्रु पक्ष में विजयें रहेगीं तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता और भूमि स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता एवं मकान जायजाद के घरेलू वातावरण में कुछ प्रभाव युक्त शक्ति प्राप्त करेगा।

मेष लग्न में ११ बुध

यदि कुम्भ का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो बुध स्वभाव से विवेकी ग्रह है, इसलिये परिश्रम की विवेक शक्ति के द्वारा आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता प्राप्त करेगा और भाई-बहिन का लाभ योग पायेगा तथा शत्रु पक्ष से फायदा उठावेगा किन्तु

शत्रुस्थानपति होने के दोष के कारण से लाभ के मार्ग में कुछ झंझट रहेगा तथा पराक्रम शक्ति की सफलता रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परिश्रम की शक्ति से विद्या में सफलता पायेगा और कुछ झंझटों के योग से संतान पक्ष में शक्ति और सहयोग मिलेगा।

नं. ४७

यदि मीन का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में नीच का होकर गुरु की मीन राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता प्रतीत होगी तथा भाई-बहिन के सुख में विशेष कमी रहेगी और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में

भृ.सं.-४

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मेष लग्न में १२ बुध

कमजोरी रहेगी और शत्रु स्थानपति होने के दोष से कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग द्वारा भी हानि और परेशानी के कारण प्राप्त होंगे और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को, स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है और बुध स्वभाव से विवेकी ग्रह है इसलिये विवेक शक्ति की युक्तियों के द्वारा शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त करेगा और गुप्त धैर्य से विजय प्राप्ति का ढंग पायेगा।

नं. ४८

भाग्य-धर्म-खर्च-बाहरी स्थानपति-गुरु

मेष लग्न में १ गुरु

यदि मेष का गुरु- प्रथम केन्द्र, देह के स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर बड़ा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा खर्चा खूब ठाट से चलता रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्पर्क से बड़ी भारी इज्जत और उन्नति प्राप्त करेगा तथा व्ययेश होने के दोष के कारण से देह के अन्दर कुछ गुप्त कमजोरी भी रहेगी और पाँचवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी योग्यता प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त होगी और

सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ परेशानी के योग से शक्ति प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ दौड़-धूप करने से सफलता प्राप्त होगी तथा नवमीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को, स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की महान वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म और सज्जनता का यथा साध्य पालन करेगा तथा यश प्राप्त करेगा देव गुरु वृहस्पति के लग्न में बैठने से लौकिक एवं पारलौकिक दोनों मार्गों में कुशलता प्राप्त करेगा।

यदि वृषभ का गुरु- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो बाहरी स्थानों के योग से भाग्य शक्ति के द्वारा धन प्राप्त करेगा और भाग्यवान धनवान समझा जायेगा, किन्तु व्ययेश होने के कारण से धन के कोष में कभी-कभी हानि और कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ शक्ति रहेगी तथा खर्चा खूब रहेगा, परन्तु खर्च को रोकने की चेष्टा बराबर होती रहेगी और धर्म के मुकाबले में धन का अधिक महत्व माना जायेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान

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मेष लग्न का फलादेश

मेष लग्न में ४ गुरु

दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी और पुरातत्व सम्बन्ध से लाभ रहेगा तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी और सातवीं नीच दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को, शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिये पिता के सुख में कमी रहेगी और राजसमाज के मार्ग में कुछ अरूचि और असंतोष रहेगा तथा कारबार की वृद्धि करने में कुछ रूकावटें पड़ेंगी और नवमीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक तायदाद में रहेगा तथा बाहरी स्थानों का महान् सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त होगा तथा अपने स्थान से ही आनन्द प्राप्त करने का योग प्राप्त करेगा।

नं. ५२

मेष लग्न में ५ गुरु

यदि सिंह का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि के अन्दर विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म का अच्छा अध्ययन करेगा तथा सन्तान पक्ष में शक्ति और उन्नति पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से विद्या एवं सन्तान पक्ष में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा तथा विद्या की शक्ति के द्वारा खर्च का संचालन उत्तम रूप से करेगा और बाहरी स्थानों का विशेष ज्ञान प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की महान् उन्नति करेगा तथा बड़ा भारी भाग्यवान् एवं बुद्धिमान माना जायेगा और धर्म का पालन करेगा एवं सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसता रहेगी और नवमीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को, मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा गौरव तथा सुन्दरता युक्त मान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और ईश्वर तथा न्याय के लिए हृदय में विशेष स्थान रखेगा तथा अपने व्यक्तित्व और स्वाभिमान का बड़ा ध्यान रखेगा।

नं. ५३

यदि कन्या का गुरु- छठें शत्रु स्थान एवं झंझट स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है, तो भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी झंझटें रहेंगी और धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं हो सकेगा, किन्तु फिर भी झगड़े-झंझटों के मार्ग से ही भाग्य की वृद्धि हो सकेगी तथा शत्रु पक्ष में भाग्य की शक्ति से

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मेष लग्न में ६ गुरु

ही सफलता पायेगा और झगड़े तथा पाप के मार्ग में कुछ न्याय धर्म का भी ध्यान रखेगा तथा पाँचर्वी नीच दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के पक्ष में भाग्य की कुछ कमजोरी रहेगी और उन्नति के मार्गों में तथा कारबार में कुछ दिक्कतें रहेंगी और राज-समाज के पक्ष में कुछ कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये

खर्चा अधिक होने पर भी खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ शक्ति प्राप्त रहेगी और नवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिए बड़ा भारी प्रयत्न करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ मतभेद युक्त सम्बन्ध का योग प्राप्त करेगा तथा भाग्येश के छठें में बैठने से कुछ दसरों को सहारा पाकर भाग्य की जागृति करेगा।

मेष लग्न में ७ गुरु

यदि तुला का गुरु- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष तथा भाग्येश होने के गुण के कारणों से स्त्री पक्ष में कुछ तुष्टि लिये हुए शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री के अन्दर कुछ प्रभाव एवं दानाई तथा भाग्यवानी मिलेगी और इसी प्रकार रोजगार के मार्ग में कुछ कमजोरी के साथ-साथ भाग्य की शक्ति से उन्नति प्राप्त

करगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सफलता पायेगा तथा गृहस्थ में खर्चा खूब रहेगा और पाँचर्वी शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा आमदनी के मार्ग में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को, मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता एवं प्रभाव पायेगा अर्थात् भाग्यवान् समझा जायेगा और हृदय में धर्म का भी ध्यान रखेगा तथा नवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को, बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में सफलता शक्ति और यश पायेगा।

यदि वृश्चिक का गुरु- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष से तथा मृत्यु स्थान में बैठने के दोष के कारण से भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी भारी दिक्कतें

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मेष लग्न का फलादेश और कमजोरियाँ रहेगी तथा धर्म की हानि रहेगी और सुयश के स्थान पर अपयश मिल सकेगा, किन्तु आयु की शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व का लाभ मिलेगा; क्योंकि भाग्येश होकर आयु स्थान पर बैठा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में भाग्यवानी रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों से विशेष सम्बन्ध रखेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये कुछ सफलता प्राप्त करेगा और नवमीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि के सम्बन्धों में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और घरेलू सुख के साधनों को विशेष रूप से पायेगा तथा आमोद-प्रमोद चाहेगा।

मेष लग्न में ९ गुरु यदि धन का गुरु- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाग्य की महान् शक्ति प्राप्त करके भाग्यशाली कहलायेगा और धर्म का पालन करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य और धर्म के अन्दर कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और भाग्य की शक्ति के द्वारा खर्च की संचालन शक्ति को, मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर बड़ी प्रतिभा और गौरव तथा मान प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को, बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पराक्रम से सफलता पायेगा और भाई-बहिन का योग प्राप्त करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाई-बहिन एवं पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी भी रहेगी और नवमीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी उत्तम शक्ति एवं सफलता प्राप्त करेगा और संतान पक्ष से उत्तम योग पायेगा और वाणी के अन्दर धर्म शास्त्र की चर्चा करेगा तथा सज्जनता और बुद्धिमत्ता का योग प्राप्त करेगा।

यदि मकर का गुरु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का

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मेष लग्न में २ शुक्र

का-सा कार्य भी करता है, इसलिये स्त्री के सुख सम्बन्धों में दिक्कतें रहेंगी और रोजगार के कार्य संचालन में सुचारू रूप की कमी रहेगी, किन्तु आचार्य चतुर शुक्र की योग्यता के कारण से रोजगार द्वारा धन की वृद्धि खूब प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को, सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है; इसलिये आयु एवं जीवन की दिनचर्या में रौनक और अमीरात का ढंग रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में चतुराई से सफलता और लाभ पायेगा।

नं. ६२

मेष लग्न में ३ शुक्र

यदि मिथुन का शुक्र- भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो परम चतुर आचार्य शुक्र ग्रह के कारण से पराक्रम और चतुराई के द्वारा धन की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का सुन्दर योग पायेगा तथा रोजगार के मार्ग से धन प्राप्त करेगा और स्त्री का उत्तम सहयोग पायेगा, किन्तु धन स्थान पति ग्रह कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता है, इसलिये भाई-बन्धु

और स्त्री के सुख सम्बन्ध में कुछ अड़चनें या कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को, सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये चतुराई के विशेष योग से भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का कुछ पालन करेगा और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा भाग्यवान समझा जायेगा।

नं. ६३

मेष लग्न में ४ शुक्र

यदि कर्क का शुक्र- चौथे केन्द्र, माता और भूमि स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो धन और कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा, किन्तु धन स्थान का स्वामी ग्रह कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता है, इसलिये माता के सुख में कुछ कमी रहेगी, किन्तु भूमि-मकानादि की शक्ति पायेगा और कुछ थोड़ी-सी त्रुटि के साथ स्त्री का सुख प्राप्त रहेगा और परम चतुर आचार्य शुक्र

की कृपा से रोजगार के मार्ग में बड़ी चतुराई के द्वारा धन पैदा करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी चतुराई के कर्म योग से

नं. ६४

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मेष लग्न का फलादेश

मेष लग्न में १० शुक्र और रोजगार में बड़ी तरक्की करेगा तथा स्वाभिमानिनी सुन्दर स्त्री पायेगा और मान-प्रतिष्ठा एवं वैभव तथा कुटुम्ब का सुन्दर आनन्द पायेगा और सातवीं दृष्टि से माता भूमि एवं सुख स्थान को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये घरेलू सुख के साधनों में शक्ति प्राप्त करेगा तथा माता और भूमि की शक्ति का अनुकूल सहयोग पायेगा तथा हर मार्ग में चतुराई से उन्नति करेगा।

नं. ७०

मेष लग्न में ११ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो परम चतुर आचार्य शुक्र के योग के कारण से यह व्यक्ति बड़ी भारी चतुराई के द्वारा धन की शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार से खूब धन संग्रह करेगा तथा सुन्दर स्त्री का लाभ पायेगा तथा कुटुम्ब से लाभ मिलेगा और धन की सुन्दर आमदनी योग के कारण से बड़ा धनवान् व इज्जतदार माना जायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि-विद्या के मार्ग में बड़ी चतुराई के द्वारा सफलता पायेगा और संतान पक्ष में सुन्दर योग पायेगा तथा गृहस्थ का भी उत्तम योग पायेगा।

नं. ७१

मेष लग्न में १२ शुक्र यदि मीन का शुक्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा परम चतुर आचार्य शुक्र के योग से बाहरी स्थानों में बड़ी भारी चतुराई के द्वारा धन और रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययस्थान के दोष के कारण अपने निजी स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा स्त्री पक्ष के मार्ग में कुछ कमजोरी या कमी रहेगी तथा धर्म का संग्रह और कुटुम्ब का सुख पूर्ण प्राप्त नहीं कर सकेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ कमजोरी और छिपाव तथा भेद की शक्ति से काम निकालेगा।

नं. ७२

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पिता-राज्य-लाभ स्थानपति-शनि

मेष लग्न में १ शनि

यदि मेष का शनि- प्रथम केन्द्र, देह के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर नीच का होकर बैठा है तो देह की सुन्दरता में कमी रहेगी और आमदनी के मार्ग में कमजोरी और कुछ परतन्त्रता का योग प्राप्त करेगा तथा अपने मान प्रतिष्ठा के अन्दर कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और राज समाज के पक्ष में कुछ परेशानी या कमी रहेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का कुछ योग पायेगा और पराक्रम स्थान में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी उन्नति करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर बड़ी भारी आसक्ति रखेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में पिता एवं राज्य स्थान को, स्वक्षेत्र में देख रहा है, किन्तु स्वयं नीच होकर बैठा है, इसलिए पिता का अल्प सुख पायेगा और कारबार-मान-प्रतिष्ठा आदि के सम्बन्धों में थोड़ी सफलता प्राप्त कर सकेगा।

नं. ७३

मेष लग्न में २ शनि

यदि वृषभ का शनि- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो कारबार राज समाज के सम्बन्धों से धन की प्राप्ति करेगा और पिता स्थान को शक्ति का पायेगा तथा धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने में विशेष सफलता पायेगा तथा मान-प्रतिष्ठा इज्जत-आबरू की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता है, इसलिये पिता के सुख सहयोग में कुछ कमी रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि के सुख-सम्बन्धों में कुछ परेशानी के योग से कार्य सम्पादन करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से जीवन आय और परातत्व स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिए जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति रहेगी और पुरातत्व का लाभ प्राप्त होगा तथा दसवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की आमदनी के

नं. ७४

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मेष लग्न का फलादेश

मार्ग में विशेष शक्ति पायेगा। धन जन की वृद्धि करने में संलग्न आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति पायेगा धन जनकी वृद्धि करने में संलग्न रहकर सफलता पायेगा और अमीरात के ढढ़ से जीवन व्यतीत करेगा।

मेष लग्न में ३ शनि

यदि मिथुन का शनि- तीसरे, भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा विशेष सफलता और लाभ प्राप्त करेगा और भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति का सहयोग पायेगा और राज-समाज के मार्ग में बहुत उन्नति प्राप्त करेगा तथा कारबार में वृद्धि पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान

नं. ७५

स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में कुछ नीरसता के मार्ग से शक्ति पायेगा तथा संतान पक्ष में कुछ वैमनस्यता के साथ लाभ प्राप्त करेगा और वाणी के अन्दर तेजी और हुकूमत रखेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के मार्ग में थोड़ी-सी कठिनाई के योग से सफलता पायेगा और धर्म के पालन का ध्यान रखेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत करेगा और खर्च तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा।

मेष लग्न में ४ शनि

यदि कर्क का शनि- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो माता के सुख सम्बन्धों में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि के सम्बन्ध में शक्ति प्राप्त रहेगी और घर बैठे आमदनी का योग प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख के साधनों

नं. ७६

की वृद्धि करने का विशेष ध्यान रखेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव और लाभ प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में फायदेमन्द रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता एवं कारबार की वृद्धि करेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा एवं सफलता प्राप्त करेगा और अपनी आबरू का बड़ा ख्याल रखेगा तथा दसवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु मंगल

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की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता की कमी और परेशानी रहेगी तथा अपने कारबार की वृद्धि करने के सम्बन्धित मार्ग के द्वारा देह में कुछ चिन्ता फिकर के योग से कार्य संचालन करता रहेगा तथा हृदय में कुछ मकजोरी अनुभव करेगा।

मेष लग्न में ५ शनि

यदि सिंह का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि के योग से कारबार की सफलता पायेगा तथा संतान पक्ष में कुछ मतभेद या कुछ नीरसता के योग से शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी और बुद्धि में बड़ी तेजी रहेगी और राज-समाज से कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा तीसरी उच्च दृष्टि से सी एवं रोजगार के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष महत्व प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में बड़ी उन्नति एवं सफलता शक्ति मिलेगी तथा गृहस्थ की वृद्धि करने का महान प्रयल चाल रखेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी कुंभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और संतान पक्ष के योग से आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान के सम्बन्ध से भी कुछ लाभ प्राप्त करेगा और हर प्रकार की उन्नति के लिये सदैव विचारमग्न रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का सुन्दर योग पायेगा और इज्जतदारी एवं आबरू से जीवन चलायेगा।

मेष लग्न में ६ शनि

यदि कन्या का शनि- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान से कुछ वैमनस्यता रहेगी और राज-समाज के मार्ग में कुछ परिश्रम के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा तथा छठें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में किसी भी प्रकार बड़ा भारी प्रभाव और परिश्रम का योग प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में विजयी रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में और दिनचर्या में कुछ कठिनाई प्रतीत होगी तथा पुरातत्व शक्ति के मार्ग में कुछ नीरसताई से फायदा पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ अधिकता होने

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मेष लग्न का फलादेश

के कारण से परेशानी अनुभव होगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगा तथा दशवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का उत्तम सम्बन्ध रखेगा और पराक्रम स्थान से बड़ी सफलता शक्ति मिलेगी तथा बड़ी हिम्मत और प्रभाव शक्ति से कार्य करेगा।

मेष लग्न में ७ शनि

यदि तुला का शनि- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता और उन्नति प्राप्त करेगा तथा स्त्री स्थान में विशेष महत्वपूर्ण शक्ति पायेगा और पिता स्थान की शक्ति का बड़ा भारी सहयोग मिलेगा तथा राजसमाज से फायदा उठायेगा और मान प्रतिष्ठा युक्त मार्ग से आमदनी खूब प्राप्त करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के योग से उन्नति प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन कुछ अरुचि के साथ करेगा तथा यश की कमी रहेगी और सातवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी होगी और हृदय में कुछ अशान्ति रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए माता और भूमि के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटियुक्त शक्ति प्राप्त रहेगी और घरेलू सुखों में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा।

नं. ७९

मेष लग्न में ८ शनि

यदि वृश्चिक का शनि- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में अपने क्षेत्र से कमजोरी पाकर दूसरे स्थान के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का फायदा उठायेगा तथा अष्टम शनि के बैठने से आयु में उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, किन्तु मृत्यु स्थान में बैठने के दोष के कारण से पिता स्थान की शक्ति का अल्प लाभ पायेगा और राज-समाज में थोड़ा मान प्राप्त करेगा तथा उन्नति पाने के लिये कठिन प्रयत्न करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के मार्ग में विशेष

नं. ८०

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परिश्रम करके सफलता पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की सफलता में कुछ त्रुटि रहेगी और संतान पक्ष में कुछ नीरसतायुक्त मार्ग से शक्ति पायेगा तथा बुद्धि में क्रोध और वाणी में तेजी रहेगी और अपने मान-सम्मान का गुप्त रूप से बड़ा ख्याल रखेगा।

मेष लग्न में ९ शनि

यदि धन का शनि- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्मे स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो गुरु के स्थान पर बैठकर शनि कुछ विशेष फल देता है, इसलिये भाग्य की विशेष उन्नति करेगा, किन्तु प्रथम रूप में भाग्य की कुछ कमजोरी दिखायेगा और धर्म का कुछ आडम्बर रूप से पालन करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति का लाभ पायेगा और राजसमाज के मार्ग में भी सफलता पायेगा और तीसरी दृष्टि से लाभ स्थान

नं. ८१

को स्वयं अपनी कुंभ राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये आमोद-प्रमोद के मार्ग में भाग्य की शक्ति से बहुत सफलता पायेगा और किसी उत्तम कर्म से लाभोन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहन से लाभ युक्त रहेगा और पुरुषार्थ कर्म की सफलता का लाभ प्राप्त करेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में अपनी इज्जतदारों की शक्ति से बड़ा भारी प्रभाव पायेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से लाभ युक्त रहेगा तथा रोग, दोष, पाप के ऊपर सदैव अपना अधिकार रखकर सावधान और सचे्ट रहेगा तथा मान प्राप्त करेगा।

मेष लग्न में १० शनि

यदि मकर का शनि- दसम केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता स्थान में महान् शक्ति पायेगा और कारबार में बड़ी भारी सफलता और लाभोन्नति करेगा तथा राज-समाज के मार्ग में बड़ी भारी इज्ज्त एवं मान-प्रतिष्ठा और लाभ प्राप्त करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान

नं. ८२

को गुरु की मीन राशि में देख रहा है; इसलिये खर्चा बहुत अधिक रहेगा। अतः खर्च के मार्ग में एवं बाहरी सम्बन्धों में कुछ अरुचिकर रूप में कार्य संचालन रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को देख रहा है, इसलिये माता के

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मेष लग्न का फलादेश

सुख में नीरसत्ता रहेगी और भूमि-मकानादि एवं घेरलू सुख-सम्बन्धों से कुछ त्रुटियुक्त वातावरण के द्वारा साधन शक्ति प्राप्त रहेगी और दसवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष महत्व और शोभा पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में बड़ी भारी उन्नति और लाभ प्राप्त करेगा और गृहस्थ के भोग-विलास का उत्तम साधन पाकर भाग्यवान् कहलायेगा।

मेष लग्न में ११ शनि

यदि कुम्भ का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी उन्नति एवं सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और पिता स्थान का अच्छा लाभ पायेगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध से धन लाभ के उत्तम साधन पायेगा तथा कारबार में बड़ी उन्नति करेगा एवं आमदनी के मार्ग से बड़ी भारी इज्जत और नाम प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा तीसरी

नं. ८३

नीच दृष्टि से देह के स्थान को, शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में तथा स्वास्थ्य एवं शान्ति में कमी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की उन्नति में कुछ लापरवाही करेगा और सन्तान पक्ष से कुछ नीरसता युक्त लाभ सम्बन्ध रखेगा तथा बोल चाल के अन्दर स्वार्थ का विशेष ध्यान रखेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी रहेगी तथा पुरातत्व का कुछ लाभ पायेगा।

मेष लग्न में १२ शनि

यदि मीन का शनि- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक तायदाद में करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष सम्बन्ध स्थापित करेगा तथा पिता स्थान में हानि प्राप्त करेगा और राज-समाज कारबार के पक्ष में नुकसान एवं परेशानी के कारण पायेगा तथा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से आमदनी का योग पायेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख

नं. ८४

रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा तथा कुछ सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्थान में कुछ प्रभाव

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मेष लग्न में ६ राहु

यदि कन्या का राहु- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ी भारी सफलता प्राप्त करेगा और विवेकी ग्रह बुध की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये अनेकों प्रकार के झगड़े-झंझटों एवं मुसीबतों के मार्ग में गुप्त विवेक की गहराई युक्ति के योग से बड़ी भारी प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा, इसलिये कठिन से कठिन परिस्थिति में भी बड़ी भारी धैर्य से और साहस से काम लेकर अपना कार्य पूरा करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी परेशानियों से अधिक चिन्तित होना पड़ेगा परन्तु नवीन शक्ति का बल पाकर विजयी होगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी।

नं. ९०

मेष लग्न में ७ राहु

यदि तुला का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में, मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ दिक्कतें और चिन्तायें रहेंगी और परम चतुर दैत्य-आचार्यों की राशि पर मित्र भाव में बैठा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी चतुराई एवं गुप्त युक्ति के योगों से सफलता प्राप्त भी करेगा और इसी प्रकार गृहस्थ के मार्ग में भी बड़ी भारी चतुराई एवं गुप्त युक्ति के योगों से सफलता प्राप्त करेगा और इसी प्रकार गृहस्थ के मार्ग में भी बड़ी भारी चतुराई से कार्य सिद्ध करेगा और स्त्री तथा रोजगार के मार्गों में कुछ विशेष लाभ गुप्त युक्ति के बल से प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण गृहस्थ के संचालन में कठिनाइयाँ रहेंगी, किन्तु कुछ कमी के साथ-साथ कार्य संचालन होता रहेगा।

नं. ९१

मेष लग्न में ८ राहु

यदि वृश्चिक का राहु- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो जीवन यापन करने में बड़ी-बड़ी चिन्ताओं से टकराना पड़ेगा और जीवन में मृत्यु तुल्य कष्टों से भी कई बार सामना करना पड़ेगा तथा पुरातत्व शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा और पेट के अन्दर कुछ बीमारी या रोग की शिकायत रहेगी तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये

नं. ९२

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मेष लग्न में ११ राहु

नं. ९५

बल से करता रहेगा और कभी-कभी विशेष लाभ की प्राप्ति भी करता रहेगा और कठिन कठोर ग्रह शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये आमदनी की शक्ति पाने के लिये भारी कठिन कर्म करेगा, फिर भी राहु के स्वाभाविक गुण के कारणों से आमदनी के मार्ग में कमी और असंतोष के कारण प्राप्त होते रहेंगे और अधिक स्वार्थी बनेगा। यदि मीन का राहु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्चे के मार्ग से महान् परेशानी अनुभव करेगा और बाहरी स्थानों में कष्ट का योग पायेगा तथा देव गुरुं वृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये खर्च की शक्ति को पाने के लिये आदर्श युक्ति के द्वारा ही बाहरी स्थानों में सम्बन्ध स्थापित करेगा तथा विशेष योग्यता के द्वारा शानदार खर्चा करेगा। फिर भी कभी-कभी खर्च के मार्ग में महान् संकट का योग पायेगा। किन्तु बार-बार शक्ति प्राप्त होती रहेगी और अन्दरूनी कुछ परेशानी एवं कमी के होते हुए भी प्रकट में शानदार से खर्च करेगा।

मेष लग्न में १२ राहु

नं. ९६

कष्ट कठिन कर्म गुप्तशक्ति के अधिपति केतु

मेष लग्न में १ केतु

नं. ९७

यदि मेष का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो देह में कष्ट और परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी देह में कोई आघात शक्ति पायेगा और देह की सुन्दरता एवं सुडौलताई में कमी रहेगी तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर उग्र ग्रह केतु बैठा है, इसलिये अपना मान और व्यक्तित्व बढ़ाने के लिये बड़ा कठिन परिश्रम करेगा तथा कभी-कभी अवसर पड़ने पर हठयोग से काम करेगा और अपने अन्दर गुप्त शक्ति एवं गुप्त हिम्मत के द्वारा महान् कार्य करके कोई सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, जिसके द्वारा आन्तरिक शक्ति का विशेष अनुभव करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण कोई प्रकट कमी का योग प्राप्त करेगा।

यदि वृषभ का केतु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शुक्र की

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७२

मेष लग्न का फलादेश

मेष लग्न में २ केतु

राशि पर बैठा है तो धन के कोष स्थान में कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में परेशानी एवं मतभेद और झंझट रहेगी, किन्तु परम चतुर दैत्य गुरु शुक्राचार्य की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये महान् चतुराई और गुप्त शक्ति का विशेष प्रयोग करेगा तथा चतुराई पूर्ण कठिन कर्मे के द्वारा धन की प्राप्ति के साधन पायेगा और धन प्राप्त होने पर भी धन की संग्रह शक्ति के अभाव के कारण धन की तरफ से कुछ चिन्तित रहेगा, किन्तु धन की अन्दरूनी कमजोरी के मुकाबले में प्रकट रूप में इज्जत-आबरू धनवानों की-सी रहेगी।

नं. ९८

मेष लग्न में ३ केतु

यदि मिथुन का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष में विशेष हानि करेगा और पुरुषार्थ शक्त्ति को कमजोर करेगा तथा कभी-कभी हिम्मत शक्त्ति के अन्दर गुप्त कमी के कारण से डर महसूस करेगा, किन्तु विवेकी बुध की राशि पर बैठा है इसलिये गुप्त विवेक की गुप्त शक्ति के द्वारा अपना कार्य पूरा करेगा और तीसरे स्थान पर कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये विशेष परिश्रम करने का प्रयत्न करेगा, किन्तु नीच होने के कारण से कुछ परतन्त्रतायुक्त मार्ग से शक्ति प्राप्त करेगा और कुछ अनाधिकार रूप से शक्ति का प्रयोग करके हिम्मत प्राप्त करेगा।

नं. ९९

मेष लग्न में ४ केतु

यदि कर्क का केतु- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि स्थान पर मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो माता के सुख सम्बन्धों में महान् संकट प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का कष्ट प्राप्त करेगा और घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की कमी और अशान्ति का योग प्राप्त होगा तथा अपने जन्म भूमि के स्थान परिवर्तन करना पड़ेगा किन्तु मन की गति के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर केतु बैठा है इसलिये मानसिक क्लेश विशेष रहने पर भी मन को आन्तरिक शक्त्ति के द्वारा कुछ सुख का अनुभव करेगा और रहने के स्थान में भी परिवर्तन होता रहेगा तथा बहुत प्रकार की कठिनाईयों को प्राप्त करने के बाद सुख प्राप्त करेगा।

नं. १००

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मेष लग्न में ५ केतु

यदि सिंह का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है, तो विद्या स्थान में विद्या ग्रहण करने के सम्बन्ध में बड़ी परेशानियाँ एवं कष्ट अनुभव करेगा और दिमाग के अन्दर कुछ कमजोरी तथा फिकर मन्दी रहेगी तथा विद्या को प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करने पर भी कुछ प्रगट में झुंठी रहेगी और संतान पक्ष में सुख की प्राप्ति के लिये कठिन कर्म तथा विशेष उपचार करने पर भी पूरा सुख प्राप्त नहीं होगा और प्रबल तेजस्वी सूर्य की राशि पर गरम ग्रह केतु बैठा है, इसलिये वाणी के अन्दर नर्माई की कमी होने से बोलचाल में उग्रता रहेगी।

नं. १०१

मेष लग्न में ६ केतु

यदि कन्या का केतु- छठें शत्रु एवं झंझट स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और छठें स्थान पर कूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये शत्रु पक्ष में सदैव विजय प्राप्त करेगा और विवेकी ग्रह बुध की राशि पर बैठा है, कन्या पर बैठा हुआ केतु स्वक्षेत्री के समान माना जाता है। इन दोनों कारणों से बड़ी विवेक शक्ति एवं बड़ी बहादुरी के योग युक्त कारणों से सदैव अपने प्रभाव की जागृति रखेगा तथा बड़ी-बड़ी मुसीबतों एवं झगड़े-झंझटों में सफलता पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण ननसाल पक्ष में कुछ हानि रहेगी और अपने अन्दर गुप्त रूप से कुछ कमजोरी अनुभव करेगा।

नं. १०२

मेष लग्न में ७ केतु

यदि तुला का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के संचालन मार्ग में दिक्कतें रहेंगी और रोजगार की लाईन में बड़ी कठिनाईयों से कठिन कर्म के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और दैत्य आचार्य परम चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये रोजगार और गृहस्थ के मार्ग में बड़ी भारी चतुराई और गुप्त शक्ति के योग से सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण रोजगार के मार्ग में

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मेष लग्न का फलादेश

परिवर्तन करेगा एवं रोजगार और स्त्री स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और दैत्य आचार्य परम चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये रोजगार और गृहस्थ के मार्ग में बड़ी भारी चतुराई और गुप्त शक्ति के योग से सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण रोजगार के मार्ग में परिवर्तन करेगा एवं रोजगार और स्त्री स्थान में शक्ति प्राप्त करने पर भी कुछ त्रुटि अनुभव करेगा।

यदि वृश्चिक का केतु- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में बहुत बार मृत्यु तुल्य संकट प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति की हानि प्राप्त होगी एवं आठवें स्थान का सम्बन्ध पेट के निचले हिस्से से भी होता है, इसलिये पेट के निचले हिस्से में किसी प्रकार की बीमारी या शिकायत रहेगी और जीवन-यापन करने के सम्बन्ध में चिन्ता और कष्ट अनुभव होगा, किन्तु गरम ग्रह क्षत्रिय शक्ति से जीवन में सान्त्वना और शक्ति प्राप्त करेगा, परन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण जीवन की दिनचर्या में कोई खास कमी अनुभव करेगा।

मेष लग्न में ८ केतु

नं. १०४

स्वभाव मंगल की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये गुप्त धैर्य की महान शक्ति से जीवन में सान्त्वना और शक्ति प्राप्त करेगा, परन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण जीवन की दिनचर्या में कोई खास कमी अनुभव करेगा।

मेष लग्न में ९ केतु

नं. १०५

हृदय में मजबूती और साहस रखते हुए उन्नति प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण भाग्य में कई बार बहुत परिवर्तन और परेशानियों से भी टकराना पड़ेगा और भाग्य में कभी-कभी कुछ त्रुटि भी प्रतीत होती रहेगी।

यदि मकर का केतु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में हानि करेगा और राज समाज में परेशानी के कारण प्राप्त रहेंगे तथा कारबार के संचालन मार्ग में कष्ट और

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मेष लग्न में १० केतु नं. १०६ मेष लग्न में ११ केतु नं. १०७ मेष लग्न में १२ केतु नं. १०८

कठिनाईयों से काम करेगा और कारबार में परिवर्तन प्राप्त करने पड़ेंगे तथा कठोर ग्रह शनि की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये अपनी इज्जत-आबरू, कारबार, मान प्रतिष्ठा इत्यादि की उन्नति करने के लिये महान् कठिन कर्म एवं गुप्त शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण अपनी स्थिति और मान प्रतिष्ठा तथा कारबार के अन्दर कुछ कमी महसूस करेगा।

यदि कुम्भ का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा लाभ के सम्बन्ध में अधिक से अधिक मुनाफा खाने की योजना बनायेगा तथा कठोर ग्रह शनि की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये लाभ की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन कर्म करके गुप्त शक्ति के योग द्वारा विशेष सफलता पायेगा, परन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में परिवर्तन करने पड़ेंगे और किसी भी परिस्थिति में रहकर लाभ की कुछ कमी अनुभव करेगा और कष्ट-साध्य कर्म की शक्ति से उन्नति प्राप्त करेगा।

यदि मीन का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में बहुत परेशानी अनुभव करेगा और खर्च की शक्ति को प्राप्त करने के लिये कठिन कर्म करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कष्ट एवं झंझट प्राप्त होगा परन्तु देव गुरु बृहस्पति की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये बड़े आदर्श मार्ग के द्वारा महान् परिश्रम करके खर्च का संचालन का योग प्राप्त करेगा और इसी प्रकार बड़ी योग्यता पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण खर्च की लाईन में और बाहरी सम्बन्धों में परिवर्तन करेगा, फिर भी खर्च के मार्ग में कुछ कमी और असंतोष का योग पायेगा।

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मेष लग्न का फलादेश

  • मेष लग्न समाप्त *

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वृषभ लग्न का फलादेश प्रारम्भ

नवग्रहों द्वारा भाग्य फल

( कुण्डली नं० २१६ तक में देखिये )

प्रिय पाठक गण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्यरूप में जानने के लिए यह अनुभव सिद्ध विषय आप के सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल सम्पस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० १०९ से लेकर कुण्डली नं० २१६ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे

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मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता-फिरता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए।

अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा।

नोट- जन्म कुंडली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है।

जन्म कुंडली के अन्दर किसी ग्रह के साथ कोई ग्रह बैठा होगा या जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में ग्रह की दृष्टियाँ बतलाई हैं, उन-उन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा।

( २ ) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल

आपकी जन्म कुंडली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुंडली नं० १०९ से १२० तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये।

२. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. १०९ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में सूर्य, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ११० के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. १११ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ११२ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ११३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ११४ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ११५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश

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कुण्डली नं. ११६ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ११७ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ११८ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ११९ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. १२० के अनुसार मालूम करिये।

( २ ) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका

फलादेश कुण्डली नं १२१ से १३२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२१ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२२ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२३ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२४ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२५ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. १२६ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२७ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२८ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १२९ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. १३० के अनुसार मालूम करिये।

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१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १३१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १३२ के अनुसार मालूम करिये।

( २ ) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-भौमफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. १३३ से १४४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३३ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३४ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३५ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३६ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३८ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४० के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४२ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४४ के अनुसार मालूम करिये।

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५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७२ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७४ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७६ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७७ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७८ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७९ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७८० के अनुसार मालूम करिये।

( २ ) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल

आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. १९१ से १९२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये।

२. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८१ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८२ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८३ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८४ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८५ के अनुसार मालूम करिये।

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नं. २०० के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०२ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०४ के अनुसार मालूम करिये।

( २ ) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २०५ से २१६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतु से देखिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०६ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०८ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१० के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २११ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१२ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१३के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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कुण्डली नं. २१४ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१६ के अनुसार मालूम करिये।

माता, भूमि, घरेलू सुखसथानपति- सूर्य

वृषभ लग्न में १ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि का कुछ सुख और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण के सम्बन्ध में कुछ त्रुटियुक्त सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा तेजस्वी सूर्य के लग्न में बैठने से देह के अन्दर प्रभाव रहेगा, किन्तु देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुख शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ सुख युक्त वातावरण के द्वारा सफलता और प्रभाव की शक्ति पायेगा।

नं. १०९

वृषभ लग्न में २ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में सुख शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का सुख पायेगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, इसलिये माता के सुख में कुछ कमी रहेगी और घरेलू सुख सम्बन्धों में त्रुटियुक्त मार्ग से शक्ति मिलेगी और भूमि मकानादि के सुख सम्बन्ध में जायदाद की शक्ति होते हुए भी जायदाद का उपभोग सुन्दरता युक्त रूप से प्राप्त नहीं होगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की सुख शक्ति मिलेगी और पुरातत्व शक्ति से सुख प्राप्त होगा तथा जीवन की दिनचर्या में सुख और प्रभाव रहेगा।

नं. ११०

यदि कर्क का सूर्य- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो माता की शक्ति का प्रभाव पायेगा और भूमि मकानादि घरेलू सुख की शक्ति रहेगी एवं तीसरे स्थान पर गरम ग्रह विशेष

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वृषभ लग्न में ६ सूर्य यदि तुला का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा जन्म भूमि से वियोग रहेगा और मकानादि भूमि की कमी रहेगी तथा घरेलू सुख के साधनों में विशेष कमी रहेगी और झंझट युक्त मार्ग के द्वारा सुख प्राप्त कर सकेगा तथा शत्रु पक्ष से कुछ अशान्ति रहेगी, किन्तु गरम ग्रह होने के कारण से सूर्य के नीच होने पर भी कुछ प्रभाव कायम रखेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से खर्ची एवं बाहरी स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थान का उत्तम सुखदायक सम्बन्ध पायेगा तथा विशेष खर्च के द्वारा सुख के साधन पायेगा।

वृषभ लग्न में ७ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में सुख और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा माता का सुन्दर सहयोग पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में प्रभाव युक्त सुख शक्ति पायेगा और स्त्री गृहस्थ के रहन-सहन में भूमि मकानादि का अच्छा सहयोग पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कमी रहेगी और गृहस्थ के अन्दर की सुख सामग्रियों में तृप्ति प्रतीत होती रहेगी तथा गृहस्थी संचालन के कार्य कारणों से देह को आराम कम मिलेगा, इसलिये हृदय में कुछ अशान्ति रहेगी।

वृषभ लग्न में ८ सूर्य यदि धन का सूर्य- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में हानि करेगा तथा मातृ-भूमि से वियोग रहेगा अर्थात् जन्म स्थान और भूमि मकानादि के सुख में बड़ी कमी रहेगी और घरेलू सुख शान्ति के मार्ग में बड़ा असन्तोष रहेगा, किन्तु सुखेश सूर्य अष्टम स्थान में बैठा है, इसलिये आयु का सुख रहेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने का प्रयत्न चालू रहेगा और

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कुटुम्ब के स्थान में सुख सम्बन्ध प्राप्त रहेगा तथा धन प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में ९ सूर्य यदि मकर का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो माता के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि का योग भाग्य से प्राप्त होगा तथा घरेलू वातावरण में कुछ सुख प्राप्त रहेगा और भाग्य के अन्दर प्रभाव शक्ति रहेगी तथा धर्म का पालन भी रहेगा, किन्तु शत्रु राशि पर होने के कारण से भाग्य की खूबसूरती में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई-बहिन का सुख सम्बन्ध प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में सुख पूर्वक भाग्य की शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में ९ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो पिता के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और कुछ कठिनाई के द्वारा राज-समाज में मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और कारबार में शक्ति एवं सफलता पायेगा, किन्तु शत्रु राशि पर सूर्य के होने से प्रभाव की शक्ति जितनी अधिक रहेगी उतनी सफलता शक्ति का आनन्द प्राप्त न हो सकेगा, परन्तु सातवीं दृष्टि से चौथे सुख भवन की स्वयं अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भूमि मकानादि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा मातृ पक्ष में एवं घरेलू सुख के साधनों में प्रभाव और आनन्द का योग मिलेगा और सुख पूर्वक उन्नति के लिये प्रयत्न करेगा।

वृषभ लग्न में ११ सूर्य यदि मीन का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में कूर या गरम ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा और भूमि मकान इत्यादि का लाभ रहेगा तथा माता के सम्बन्ध से सुख लाभ पायेगा तथा घरेलू वातावरण से सुख के अच्छे साधन प्राप्त करेगा ओर सुखेश होकर सूर्य लाभ स्थान में बैठा है, इसलिये सुख पूर्वक

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वृषभ लग्न का फलादेश

आमदनी का कोई विशेष योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष से सुख और प्रभाव पायेगा तथा विद्या-बुद्धि के अन्दर शान्ति युक्त प्रभाव शक्ति से सफलता पायेगा।

वृषभ लग्न में १२ सूर्य

यदि मेष का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्च बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों में विशेष सुखदायक सम्बन्ध पायेगा। किन्तु अपने स्थान में घरेलू सुख के साधनों में कुछ कमी रहेगी और माता के पक्ष में भी कुछ कमी का योग बनेगा तथा भूमि मकानादि के सम्बन्ध में भी कुछ हानि प्राप्त होगी, क्योंकि खर्च के स्थान में गरम ग्रह का फल प्रायः हानिकारक होता है, इसलिये अपने जन्म स्थान में कमी रहेगी और दूसरे स्थान में प्रभाव खूब रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष मे कुछ पेचीदी शक्ति के योग से कार्य सम्पन्न करेगा।

नं. १२०

भाई, पराक्रम, मनस्थानपति-चन्द्र

वृषभ लग्न में १ चन्द्र

यदि वृषभ का चन्द्र प्रथम केन्द्र देह के स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो मन के अन्दर महान शक्ति पायेगा तथा देह में सुन्दर शक्ति रहेगी तथा भाई बहिन का विशेष योग पायेगा। भाई और पराक्रम स्थान से बड़ी सफलता और हिम्मत शक्ति पायेगा तथा देह के अन्दर प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में परेशानी और कुछ त्रुटि अनुभव करेगा तथा रोजगार के पक्ष में कुछ अरुचि युक्त मार्ग के द्वारा कार्य संचालन करेगा और रोजगार से एवं गृहस्थ के सम्बन्ध से कुछ लगाव अनुभव करेगा।

यदि मिथुन का चन्द्र- द्वितीय धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पराक्रम शक्ति और मनोबल के योग से धन का संग्रह प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में शक्ति पायेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, इसलिये भाई-बहन के सुख सम्बन्ध में

नं. १२१

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वृषभ लग्न में ११ चन्द्र

पुरुषार्थ कर्म करके आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता और प्रसन्नता प्राप्त करेगा तथा बाहुबल की पुरुषार्थ शक्ति के बल पर बड़ी भारी हिम्मत रहेगी और लाभ स्थान में उन्नति करने के लिये सदैव मानसिक विचार चलते रहेंगे तथा लाभ मार्ग में शोभा युक्त रहेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये मनोबल की शक्ति से विद्या बुद्धि वाणी के अन्दर शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में सुन्दर शक्ति प्राप्त रहेगा।

वृषभ लग्न में १२ चन्द्र

यदि मेष का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में बड़ी कमी और मतभेद रहेगा और बाहुबल की पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर बड़ी कमजोरी रहेगी, किन्तु मनोबल की पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा बड़ा भारी खर्च करता रहेगा तथा मनोबल के योग द्वारा बाहरी स्थानों में बड़ी सुन्दर शक्ति और अच्छे सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा अपने स्थान में हानि और कमजोरी पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मनोबल के योग द्वारा पुरुषार्थ कर्म से शत्रु स्थान में अपना कार्य निकालेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में मनोयोग की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में १ मंगल

यदि वृषभ का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह के कर्म योग से खर्च की संचालन शक्ति पायेगा और बाहरी स्थानों में अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा रोजगार की वजह से दूसरे स्थानों में आना जाना रहेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण से देह में कमजोरी और रक्त विकार एवं धातु क्षीणता का योग प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये उपरोक्त दोष के कारण ही माता के सुख में कमी प्राप्त

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९६ वृषभ लग्न का फलादेश चौथी दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए शत्रु स्थान में प्रभाव की जाग्रति रहेगी, क्योंकि गरम ग्रह की दृष्टि शत्रु नाशक होती है और सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि रहेगी तथा धर्म का पालन होता रहेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान में शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए पिता स्थान में उपरोक्त दोषों के कारण पिता से लाभ की हानि करेगा तथा राज समाज में कुछ परेशानी रहेगी और कारबार के मार्ग में हानि प्राप्त होगी तथा मान प्रतिष्ठा एवं उन्नति के मार्ग में रूकावटों के द्वारा कार्य संचालन होता रहेगा। वृषभ लग्न में ४ मंगल

यदि सिंह का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो मंगल को व्ययेश होने के दोष के कारण से माता के स्थान में हानि प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि एवं मातृ-भूमि इत्यादि सम्बन्धों में परेशानी और कमी के कारण प्राप्त होंगे तथा घरेलू सुख शान्ति के अन्दर कुछ कमी का योग प्राप्त रहेगा और चौथी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में शक्ति रहेगी और रोजगार में भी उन्नति करेगा

किन्तु बाहरी स्थानों के योग से उन्नति मिलेगी और फिर भी व्ययेश होने के दोष से कुछ परेशानी रहेगी और खर्च गृहस्थी में विशेष रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में हानि या कमी प्राप्त होगी और राज समाज के मार्ग में कुछ परेशानी एवं नीरसता रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा, किन्तु बाहरी स्थानों के योग से देर-अबेर में लाभ प्राप्ति द्वारा उन्नति का योग बनेगा। वृषभ लग्न में ५ मंगल

यदि कन्या का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो मंगल को व्ययेश होने के दोष के कारण से सन्तान पक्ष में कमजोरी रहेगी और बुद्धि के अन्दर कुछ फिकर चिन्ता का योग बनेगा तथा रोजगार के मार्ग में बुद्धि योग द्वारा कार्य संचालन करेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण ही स्त्री पक्ष में कुछ असन्तोष युक्त शक्ति प्राप्त रहेगी तथा चौथी

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मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन की दिनचर्या में चिन्ता कारक योग बनता रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि का योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के योग से आमदनी के मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि के रूप में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का बड़ा भारी सम्बन्ध प्राप्त करेगा और खर्च के योग से रोजगार में शक्ति प्राप्त रहेगा। वृषभ लग्न में ६ मंगल

यदि तुला का मंगल- छठें शत्रु स्थान में एवं झंझट स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्च के स्थान में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थान के सम्बंध में कुछ झंझट युक्त वातावरण रहेगा तथा व्ययेश होने के दोष के कारण से एवं शत्रु स्थान में बैठने के दोष के कारण से स्त्री पक्ष में कुछ अशान्ति रहेगी और रोजगार के मार्ग में हानि एवं परेशानी रहेगी किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्ति प्रदायक होता है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा और चौथी उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म

स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म के स्थान में कुछ विशेष रुचि रहेगी एवं विशेष खर्च भी करेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों से सम्बन्ध भी रहेगा और आठवीं दृष्टि से देह स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कमजोरी और परेशानी के कारण प्राप्त होंगे क्योंकि मंगल को व्ययेश होने का दोष है, इसलिये देह में रक्त विकार एवं वीर्य दोष का रोग उत्पन्न करेगा।

वृषभ लग्न में ७ मंगल

यदि वृंश्चक का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो स्त्री स्थान में और रोजगार के स्थान में शक्ति प्राप्त रहेगी किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण स्त्री पक्ष में एवं रोजगार के पक्ष में कुछ हानि एवं कुछ परेशानी रहेगी किन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सफलता मिलेगी और खर्चा विशेष चालू रहेगा और चौथी शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा

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वृषभ लग्न का फलादेश

है, इसलिये पिता स्थान में कुछ मतभेद और कुछ हानि का योग मिलेगा और राज-समाज के मार्ग में उन्नति के लिये कुछ कठिनाइयाँ प्राप्त होंगी तथा कारबार में कुछ दिक्कतें रहेंगी और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष के कारण से देह में कुछ कमजोरी तथा कुछ रक्त विकार रहेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये उपरोक्त दोष के कारण ही धन के कोष स्थान में कमजोरी और हानि प्राप्त होगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ हानि एवं परेशानी रहेगी।

वृषभ लग्न में ८ मंगल

यदि धन का मंगल- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो मंगल को व्ययेश होने का दोष एवं अष्टम में बैठने का दोष होने के कारण से स्त्री स्थान में बड़ा संकट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में भी बड़ी कठिनाइयाँ रहेंगी तथा दूसरे स्थान में रोजगार का सयोग बनेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि रहेगी और आठवें स्थान से उदर का सम्बन्ध भी रहता है, इसलिये पेट के अन्दर कुछ शिकायत रहेगी तथा कुछ मूत्रेन्द्रिय में विकार प्राप्त होगा और चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये विदेश योग के द्वारा धन का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कमी रहेगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ परेशानी रहेगी तथा आठवीं नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान में हानि प्राप्त होगी और दैहिक पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर कमजोरी रहेगी तथा अपने गृहस्थ जीवन में परेशानी अनुभव करेगा।

नं. १४०

वृषभ लग्न में ९ मंगल

यदि मकर का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है, तो स्त्री पक्ष में कुछ भाग्यवानी प्राप्त करेगा और भाग्य की शक्ति से रोजगार के मार्ग में उन्नति पायेगा तथा गृहस्थ के अन्दर धर्म का पालन करेगा और भाग्यवान समझा जायेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य में कुछ कमी अनुभव करेगा और चौथी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्च बहुत अधिक करेगा तथा भाग्य की ताकत

नं. १४१

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स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा रोजगार के मार्ग में बुद्धि योग एवं धन की शक्ति से उन्नति एवं सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में २ बुध यदि मिथुन का बुध- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो धन के कोश में बड़ी सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब की महानता रहेगी और बड़ी इज्जत प्राप्त रहेगी तथा विद्या स्थान में शक्ति मिलेगी और विद्या बुद्धि के योग से धन की वृद्धि प्राप्त होगी, किन्तु धन स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं

नं. १४६ पुरातत्व स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आयु पक्ष में उन्नति प्राप्त करेगा तथा जीवन में शानदार प्राप्त रहेगी।

वृषभ लग्न में ३ बुध यदि कर्क का बुध- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि की उत्तम शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा धन की प्राप्ति करेगा तथा कुटुम्ब शक्ति का सुन्दर योग बनेगा और भाई-बहन के योग का लाभ प्राप्त होगा तथा विवेकी बुध के पराक्रम स्थान पर बैठने से विवेकी शक्ति के द्वारा

नं. १४७ भाग्य एवं धर्म स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि प्राप्त होगी और भाग्यवान् सफल और पुरुषार्थी समझा जायेगा तथा धर्म का पालन करेगा और सज्जनता युक्त मार्ग से कार्योन्नति करता रहेगा।

वृषभ लग्न में ४ बुध यदि सिंह का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो माता की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और भूमि और मकान आदि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा विवेकी बुध पृथ्वी स्थान पर बैठा है, इसलिये विवेक की गम्भीर बुद्धि योग से विद्या की सफलता

नं. १४८ संग्रह करेगा तथा संतान और कुटुम्ब का सुख

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वृषभ लग्न में ७ बुध

नं. १५१

तथा बुद्धिमती स्त्री मिलेगी और धन तथा कुटुम्ब का सुन्दर योग पायेगा और गृहस्थ संचालन के मार्ग में बुद्धि योग से आनन्द प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और मान सम्मान प्राप्त करेगा बुद्धि विवेक और धन की शक्ति से इज्जत बढेगी और लौकिक कार्यों में बड़ा कार्य कुशल और प्रेमी स्वभाव होगा।

वृषभ लग्न में ८ बुध

नं. १५२

यदि धन का बुध- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष में कष्ट प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी तथा धन की संग्रह शक्ति का बड़ा प्रभाव रहेगा और कुटुम्ब सुख में बड़ी कमी रहेगी, किन्तु विवेकी बुध के अष्टम में बेठन से विवेक शक्ति के द्वारा पुरातत्व सम्बन्ध में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और आयु के पक्ष में शक्ति प्राप्त रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये भारी प्रयत्न करता रहेगा। अतः कठिनाई के मार्ग से धन की प्राप्ति रहेगी और कुटुम्ब की थोड़ी शक्ति का योग प्राप्त होगा।

वृषभ लग्न में ९ बुध

नं. १५३

यदि मकर का बुध- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य और बुद्धि के योग से धन की प्राप्ति का उत्तम योग बनेगा तथा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और विवेकी बुध, भाग्य का योग पाकर विद्या स्थान में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में उत्तम शक्ति प्राप्त रहेगी तथा कुटुम्ब का आनन्द प्राप्त रहेगा और धर्म के मार्ग से पालन और मनन रखेगा तथा न्यायोक्त मार्ग से उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान से लाभ युक्त सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम शक्ति के अन्तर बुद्धि और धन के योग से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

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शत्रु स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये विवेकी बुध की विवेक शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष में अपना कार्य सफल करने का मार्ग बनाएगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में धन और बुद्धि के योग से कामयाबी पायेगा।

आयु, पुरातत्व, लाभस्थानपति-गुरु

वृषभ लग्न में १२ शुक्र यदि वृषभ का गुरु- प्रथम केन्द्र में देह के स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु का लाभ प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध से मान और लाभ प्राप्त करेगा तथा देह के परिश्रम से लाभ की वृद्धि करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से पंचम संतान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये अशुभेश होने के दोष से तथा लाभेश की सुन्दरता से संतान पक्ष में कुछ लाभ और कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि के स्थान से योग्यता और अनुभव की शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री और रोजगार के स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार और स्त्री के पक्ष में कुछ कमी के साथ लाभ प्राप्त करेगा और नवमीं नीच दृष्टि से शनि की मकर राशि में भाग्य और धर्म स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ कमी या हानि प्राप्त करेगा। यश में कमी प्राप्त होगी और देह के पक्ष में कुछ परेशानी के साथ-साथ मान प्राप्त करेगा और लाभ की उन्नति करने के लिये सदैव परिश्रम करता रहेगा तथा प्रभाव युक्त रहेगा।

नं. १५७

वृषभ लग्न में २ गुरु यदि मिथुन का गुरु- धन भवन में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में—अष्टमेश होने के कारण कुछ हानि करेगा और लाभेश होने के कारण वृद्धि करेगा और पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में इसी कारण से कुछ विघ्नयुक्त शक्ति प्राप्त रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी धनु राशि में आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये आयु

नं. १५८

के ढंग से व्यतीत करेगा और पाँचवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में छठें शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिए शत्रु स्थान में दानाई के ढंग से प्रभाव रखेगा तथा नवमीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में पिता

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वृषभ लग्न का फलादेश

स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्धों में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज-समाज के पक्ष में कुछ अरुचिकर रूप से सफलता और मान प्राप्त करेगा और इज्जतदार माना जायेगा तथा अपने कारबार की उन्नति करने के मार्ग में बड़ा परिश्रम करेगा तथा कुछ कठिनाईयों के योग से धन की वृद्धि करेगा।

वृषभ लग्न में ३ गुरु

यदि कर्क का गुरु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर उच्च राशि में चन्द्र के घर में बैठा है तो पराक्रम शक्ति से महान हिम्मत प्राप्त करेगा और भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और नवम दृष्टि से मीन राशि में स्वयं अपने लाभ स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये धन के विशेष लाभ की आमदनी के रूप में प्राप्त करेगा तथा बड़ी प्रभाव शक्ति रखेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में रोजगार तथा स्त्री भवन को देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में तथा रोजगार पक्ष में कुछ कठिनाई के मार्ग से प्रभाव शक्ति और लाभ की उन्नति प्राप्त करेगा और आयु की वृद्धि और पुरातत्व का लाभ तथा जीवन में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से शनि की मकर राशि में भाग्य और धर्म के नवम स्थान को देख रहा है इसलिये भाग्य में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ अरुचि युक्त भावनायें रखेगा और दिनचर्या में बड़ी भारी सुस्ती प्राप्त करेगा।

नं. १५९

वृषभ लग्न में ४ गुरु

यदि सिंह का गुरु- चौथे केन्द्र माता के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के कारण माता के सुख में कुछ कमी करेगा, लाभेश होने के कारण आमदनी और सुख आदि के साधन प्राप्त रहेंगे और मकान जायदाद की पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से स्वयं अपने अष्टम आयु एवं पुरातत्व स्थान को धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा तथा जीवन का समय प्रभाव युक्त रूप से सुख पूर्वक व्यतीत करेगा। किन्तु घर के अंदरूनी सुखों में कुछ विघ्न बाधायें भी प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा और राज-समाज में मान प्रतिष्ठा, कारबार के पक्ष में कुछ कमी का योग रहेगा और नवमी मित्र दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च

नं. १६०

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स्थान को देख रहा है इसलिये खर्चा खूब रहेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध लाभ युक्त रहेगा तथा आमदनी से अधिक खर्च करने का ढंग रहेगा।

वृषभ लग्न में ५ गुरु

नं. १६१

यदि कन्या का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो विद्या एवं संतान पक्ष में प्रभाव शक्ति पायेगा तथा वाणी के अन्दर बड़ी योग्यता रहेगी, किन्तु अष्टमेश होने के दोष से सन्तान पक्ष में कुछ बाधायें प्राप्त करेगा, किन्तु लाभेश होने से संतान पक्ष में लाभ रहेगा और इन्हीं कारणों से विद्या स्थान में कुछ दिक्कतों के सहित लाभ शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरातत्व का लाभ बुद्धि संयोग से करेगा

तथा पंचम नीच दृष्टि से शत्रु शनि की मकर राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है इसलिये भाग्य में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और धर्म के पालन में कुछ हानि करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वीय अपने त्रिकोण लाभ स्थान को मीन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग से आमदनी अच्छी प्राप्त करेगा और नववीं सामान्य शत्रु दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये जीविका और लाभ के पक्ष से देह में कुछ परिश्रम और प्रभाव का योग प्राप्त करेगा और बातचीत के अन्दर भलमनसाहत के रूप में स्वार्थ सिद्धि का सदैव ध्यान रखेगा तथा आयु की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन में धन की वृद्धि करने में लगा रहेगा।

वृषभ लग्न में ६ गुरु

नं. १६२

यदि तुला का गुरु- छठें शत्रु स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में दानाई से काम निकालेगा, किन्तु लाभेश अष्टमेश होकर शत्रु घर में बैठने से लाभ के सम्बन्धों में कुछ कमी तथा परिश्रम और परतन्त्रता का योग प्राप्त करेगा तथा जीवन के समय में और आयु के पक्ष में कुछ परेशानी तथा कुछ घिराव-सा प्रतीत होगा और पुरातत्व लाभ की कुछ कमी रहेगी तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा और कारबार, राज्य-सम्मान के पक्ष में कुछ प्रभाव की कमी प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से मंगल की मेष राशि में बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध कुछ परेशानी से युक्त लाभप्रद रहेगा

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और परिश्रम करना पड़ेगा तथा नवमीं मित्र दृष्टि से धन भवन को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये अधिक प्रयत्न और परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कठिनाईयों के योग से कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ लाभ शक्ति का योग प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में ७ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- सातवें केन्द्र में ही एवं रोजगार के स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो आयु और पुरातत्व के सम्बन्ध में आयु और पुरातत्व के सम्बन्ध में लाभ प्राप्त करेगा और स्त्री स्थान में अष्टमेश होने से कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और लाभेश होने से लाभ करेगा और रोजगार के पक्ष में कुछ परिश्रम के योग से प्रभाव शक्ति प्रदान करेगा और पाँचवीं दृष्टि से स्वयं अपने लाभ स्थान को मीन राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये दैनिक कार्य रोजगार के मार्ग से बँधी हुई अच्छी आमदनी के रूप में अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं सामान्य शत्रु की दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि से देह को देख रहा है, इसलिये देह में आमदनी के मार्ग से कुछ थकान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा नवमीं उच्च दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में तीसरे स्थान को देख रहा है इसलिये पराक्रम की विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और भाई बहिन की शक्ति भी प्राप्त रहेगी और धन लाभ के मार्ग में बड़ी तत्परता और स्वार्थ शक्ति से सज्जनता दिखाकर लाभ करेगा।

नं. १६३

वृषभ लग्न में ८ गुरु यदि धन राशि का गुरु- अष्टम आयु स्थान में स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा, किन्तु लाभेश के अष्टम में बैठने से आमदनी के मार्ग में कठिनाई और परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च एवं बाहरी स्थान को देख रहा है। इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन एवं कुटुम्ब स्थान को देख रहा है, इसलिये परिश्रम शक्ति के योग से धन जन की वृद्धि करेगा और नवमीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये सुख प्राप्ति के साधनों की वृद्धि करने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और माता के सुख में अष्टमेश होने के

नं. १६८

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पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ परिश्रम के योग से लाभ प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ प्रभाव शक्ति प्राप्त रहेगी। वृषभ लग्न में ११ गुरु यदि मीन का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में मजबूती प्राप्त करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के नाते कुछ परिश्रम या कुछ कठिनाई रहेगी और आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का अच्छा लाभ रहेगा और पाँचवीं उच्च दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में पराक्रम एवं भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये पराक्रम का विशेष लाभ प्राप्त करेगा तथा भाई-बहिन की विशेष शक्ति रहेगी नं. १६७ और सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की कन्या राशि में विद्या एवं संतान स्थान को देख रहा है, इसलिये कुछ दिक्कत के साथ-साथ संतान पक्ष में लाभ का योग प्राप्त करेगा और बुद्धि विद्या में योग्यता शक्ति प्राप्त करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में सप्तम भवन रोजगार और स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार से खूब लाभ करेगा तथा स्त्री स्थान में कुछ कठिनाई के सहित शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री स्थान में प्रभाव युक्त रहेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव और मस्ती प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में १२ गुरु यदि मेष का गुरु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करेगा। नवाँ दृष्टि से स्वयं अपने आयु स्थान को धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये व्यय स्थान के दोष के कारण कभी-कभी जीवन पर संकट प्राप्त होंगे, किन्तु फिर भी आयु की शक्ति मिलेगी और पुरातत्व का कुछ कमजोरी से लाभ मिलेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के योग से सुख प्राप्ति के साधनों में वृद्धि करेगा और सातवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में छठें शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखने के लिये बड़ी दानाई से काम लेगा और खर्च की अधिकता के कारणों से कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा अष्टमेश के बारहवें स्थान पर बैठने से बाहरी स्थानों के सुन्दर सम्बन्ध के कारणों से आमदनी की अच्छी शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु खर्चा सदैव अधिक तायदाद में रहेगा।

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देह, शत्रु, रोगस्थानपति-शुक्र

वृषभ लग्न में १ शुक्र

यदि वृषभ का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह में कुछ सुन्दरता, प्रभाव और आत्मबल की शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ रोग कुछ परिश्रम और कुछ शत्रु पक्ष में झंझट इत्यादि प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु पक्ष का स्वामी लग्न में स्वक्षेत्री बैठा है, इसलिये शत्रु पक्ष में विजय प्राप्त करेगा और देह की चतुराई और शक्ति से बड़ी भारी हिम्मत रखेगा और सातवीं सामान्य मित्र की दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री भवन को देख रहा है, इसलिये स्त्री भवन में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और दैनिक परिश्रम की शक्ति और चतुराई के योग से रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और लौकिक भोगादि के सम्बन्धों में तथा मान और प्रभाव की वृद्धि के स्थान में विशेष ध्यान रखेगा और आत्मबल की विशेष शक्ति से सफलतायें मिलेंगी।

नं. १६९

वृषभ लग्न में २ शुक्र

यदि मिथुन का शुक्र- धन भवन में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम से धन की वृद्धि करने में विशेष प्रयत्न करता रहेगा और यथा सम्भव धन और जन की वृद्धि करेगा और विशेष चतुराईयों के योग से इज्जत और मान प्राप्त करेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये देह के सुख में परेशानी- सी रहेगी तथा सातवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से गुरु की धनु राशि में अष्टम आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व के स्थान में भी कुछ नीरसता से सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में चतुराई के योग से लाभ प्राप्त करेगा।

नं. १७०

यदि कर्क का शुक्र- तीसरे पराक्रम स्थान पर सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह की शक्ति के द्वारा महान् परिश्रम करके सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में चतुराई और हिम्मत के द्वारा विजय प्राप्त करेगा और षष्ठेश होने के कारण भाई-बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शनि की मकर राशि में नवम भाग्य एवं धर्म स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करेगा

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वृषभ लग्न का फलादेश

वृषभ लग्न में ३ शुक्र और धर्म पालन में श्रद्धा रखेगा तथा पराक्रम और चतुराई के योग से यश और सफलता प्राप्त करेगा और देहाधीश, षष्टें स्थान का स्वामी होकर पराक्रम स्थान पर बैठा है, इसलिये परिश्रम की अधिकता के कारण कभी-कभी थकान अनुभव करेगा, किन्तु जबर्दस्त हिम्मत रखेगा।

नं. १७१

वृषभ लग्न में ४ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- चौथे केन्द्र स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो षष्ठेश होने के नाते माता के सुख में कमी और वैमनस्यता उत्पन्न करेगा और मातृ भूमि के स्थान से कुछ अलग करेगा और रहन-सहन मकान इत्यादि सुख के साधनों में कुछ अरुचिकर शक्ति प्रदान करेगा क्योंकि षष्ट तथा देह का स्वामी सुख भवन में बैठा है, इसलिये कुछ कमियाँ और झंझटों के सहित सुख के साधन अवश्य प्राप्त होंगे और शत्रु पक्ष में कुछ शान्ति और चतुराई से काम निकालेगा

नं. १७२ तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में दशम पिता भवन और राज्य समाज स्थान को देख रहा है. इसलिये पिता पक्ष से शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज-कारबार आदि के स्थान में मान और सफलता प्राप्त करेगा तथा शान्ति प्रिय बनेगा।

वृषभ लग्न में ५ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- त्रिकोण पंचम स्थान में नीच राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा तथा विद्या में कुछ अपूर्ण रहेगा और बुद्धि की गुप्त चतुराई और बुद्धि के कठिन परिश्रम से शत्रु पक्ष में सफलता پا सकेगा और गुरु की मीन राशि में लाभ स्थान को सातवीं उच्च दृष्टि से देख रहा है, इसलिये दिमाग की कठिन सूझ और युक्तियों से, देह के परिश्रम से धन का लाभ अधिक करने में सफलता प्राप्त करेगा और आमदनी की वृद्धि करने में विशेष प्रयत्नशील रहेगा तथा बृद्धि में कुछ थकान और कुछ परेशानी अनुभव करेगा और देह की सुन्दरता में कुछ कमी और कुछ रोग प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों की तरफ से दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी तथा वाणी की युक्ति से लाभ पायेगा।

नं. १७३

यदि तुला का शुक्र- शत्रु स्थान में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो शत्रु पक्ष

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वृषभ लग्न में ६ शुक्र

में बड़ा प्रभाव रखेगा तथा देह की शक्ति और युक्ति तथा मजबूत चतुराई के योग से शत्रु पर विजय प्राप्त करेगा और देह के अन्दर सुन्दरता की कुछ कमी तथा कुछ रोग और कुछ परतन्त्रता प्राप्त करेगा और मामा के पक्ष में कुछ मजबूती पायेगा तथा सातवीं सामान्य मित्र दृष्टि से मंगल की राशि में बारहवें बाहरी स्थान तथा खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा और देहाधीश के छठें स्थान में बैठने से अधिक परिश्रम तथा परेशानी अनुभव करेगा और शत्रु पक्ष से कुछ झंझट बाजी का योग चलता रहने से प्रभाव की वृद्धि का योग बनता रहेगा तथा स्वाभिमानी बनेगा।

नं. १७४

वृषभ लग्न में ७ शुक्र

यदि वृश्चिक का शुक्र- केन्द्र में सातवें स्थान पर सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो षष्ठेश होने के कारण स्त्री स्थान में कुछ परेशानी कुछ रोग वैमनस्य तथा आत्मशक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ दैहिक परिश्रम तथा कुछ दिक्कतों से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और इन्द्रिय भोगादिक पक्ष में विशेष रुचि के साथ युक्ति और चतुराईयों से तथा कठिनाइयों से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने देह स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार तथा स्त्री पक्ष के संबंध से देह में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा देह में कुछ नामवरी भी प्राप्त करेगा और लौकिक कार्यों में बड़ी दक्षता रखेगा।

नं. १७५

वृषभ लग्न में ८ शुक्र

यदि धनु राशि का शुक्र- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के पक्ष में कुछ रोगादिक कष्ट प्राप्त करेगा और देह की सुन्दरता में और सुङौलताई में कुछ कमी प्राप्त करेगा और दूसरे स्थानों में रहेगा तथा देह के लिये आराम और शान्ति कम मिलेगी और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ कठिनाई और गूढ़ चतुराई के योग से सफलता मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को देख रहा है, इसलिये कठिन परिश्रम के योग से धन की वृद्धि करने में तत्पर रहेगा और शत्रु पक्ष से कुछ कष्ट या झंझट प्राप्त

नं. १७६

भ.सं.-८.

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१९४

वृषभ लग्न का फलादेश

करेगा तथा षष्ठेश के अष्टम स्थान में बैठने से मामा के पक्ष में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा प्रभाव की कमी रहेगी और उदर के अन्दर कुछ बीमारी रहेगी।

वृषभ लग्न में ९ शुक्र

यदि मकर का शुक्र- त्रिकोण नवम भाग्य और धर्म स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो दैहिक परिश्रम के योग से भाग्यशाली बनेगा और शत्रु पक्ष में भाग्य शक्ति से ही सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ कठिनाई लिये हुए धर्म मार्ग का पालन करेगा,

नं. १७७

किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के नाते धर्म की कुछ थोड़ी-सी हानि करेगा और लग्नेश होने के नाते धर्म की वृद्धि करेगा तथा शत्रु पक्ष में धर्म और न्याय से काम लेगा तथा देह में कुछ सुन्दरता और कुछ रोग या दिक्कत प्राप्त करेगा तथा सातवीं सामान्य मित्र दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में तीसरे भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन और पराक्रम की शक्ति में कुछ अरुचि के साथ सफलता प्राप्त करेगा और अनेकों प्रकार के झगड़े झंझटों में कुदरती तौर से विजय प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में १० शुक्र

यदि कुंभ का शुक्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो राज समाज में मान प्राप्त करेगा, कारबार में परिश्रम के योग से उन्नति करेगा और शत्रु स्थान पति होने से पिता के स्थान में कुछ वैमनस्य युक्त शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु पक्ष में प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और देह में तथा अपने कारबार में कुछ अहंकार रखेगा तथा बड़ी भारी चतुराई

नं. १७८

के योग से उन्नति के मार्ग में सफलता प्राप्त करता रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है इसलिये अपनी उन्नति के कार्य कारणों से सुख प्राप्ति की परवाह नहीं करेगा और माता से तथा जन्म भूमि से कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ झगड़े के मार्ग से उन्नति का सुन्दर योग पायेगा।

यदि मीन का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान पर उच्च राशि में बैठा है तो देह के परिश्रम से धन की लाभ शक्ति विशेष प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में महान् प्रयत्न और चतुराईयों से काम करता रहेगा तथा देह में

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राशि में विद्या एवं संतान घर को देख रहा है, इसलिये सन्तान शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और वाणी के द्वारा महान् योग्यता का परिचय देगा तथा दसवीं नीच दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कमजोरी प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में लापरवाही करेगा और प्रभावशाली तथा भाग्यवान् समझा जायेगा।

वृषभ लग्न में ४ शनि

यदि सिंह का शनि- चौथे केन्द्र माता और भूमि के स्थान पर शत्रु सूर्य की राशि में बैठा है तो माता के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और मकानादि सुख प्राप्ति के स्थानों में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने दसवें पिता स्थान में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त शक्ति से पिता स्थान में सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु धर्मेश होने के कारण कारबार तथा व्यवहार में ईमानदारी वरतेंगा, परन्तु धर्म पालन के स्थान में कुछ कमजोरी इसलिये रहेगी कि अपने धर्म स्थान को नहीं देख रहा है, किन्तु फिर भी भाग्यवान् और सज्जनता की शक्ति प्राप्त करेगी और तीसरी उच्च दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रहेगा और मामा के पक्ष में शक्ति मिलेगी और दसवीं मित्र दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में मान और प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और बड़ा इज्जतदार समझा जायेगा।

नं. १८४

वृषभ लग्न में ५ शनि

यदि कन्या का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो संतान पक्ष में उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में चमत्कार पायेगा तथा धर्म को खूब समझने वाला बनेगा और बुद्धि योग से भाग्य की श्रेष्ठ उत्त्रति प्राप्त करेगा और पिता तथा कारबार के पक्ष में विशेष रुचि के साथ काम करेगा और वाणी के द्वारा बड़ी नपी तुली बातें कहकर जनता में प्रभाव पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में कुछ असंतोष युक्त सफलता मिलेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से गुरु की मीन राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये आमदनी के योग में कुछ असंतोष रहेगा

नं. १८५

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सज्जनता युक्त्त व्यवहार के द्वारा गृहस्थ का संचालन रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता शोभा और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ नीरसता प्राप्त रहेगी तथा भूमि मकानादि के सुख में कुछ द्रुष्टि अनुभय होगी, किन्तु शोभा रहेगी।

वृषभ लग्न में ८ शनि

यदि धनु राशि का शनि- अष्टम आयु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो कुछ अड़चनों के साथ-साथ आयु की वृद्धी प्राप्त करेगा, क्योंकि भाग्येश और राज्येश ग्रह जहाँ बैठता है वहाँ ही वृद्धी करता है। भाग्य स्थान में तथा पिता स्थान में कमी एवं हानि प्राप्त करेगा और धर्म का पालन नहीं कर सकेगा। तीसरी द्रुष्टि से स्वयं अपने दसम स्थान कुम्भ राशि को देख रहा है, इसलिये पिता और मान सम्मान के पक्ष में कुछ कमी के साथ सफलता प्राप्त करेगा तथा भाग्योन्नति के लिये महान् कष्ट साध्य कार्य करेगा और सातवीं मित्र द्रुष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन की एवं जन की वृद्धी करने में लगा रहेगा

नं. १८८

वृषभ लग्न में ९ शनि

यदि मकर का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाग्य की महान् वृद्धी करेगा और मजबूत कर्म के मुकाबले में भाग्य और भगवान् को बड़ा मानेगा तथा पिता स्थान की शक्ति का गहरा आनन्द प्राप्त करेगा और राज-समाज, कारबार के मार्ग में न्याय और ईमानदारी से काम करेगा और इसी कारण से मान तथा सुयश प्राप्त करेगा और तीसरी

नं. १८९

देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से अच्छा साधन का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु द्रुष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में कुछ

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१२० वृषभ लग्न का फलादेश

अरुचिकर सहाय्यता प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की बहुत सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु पुरुषार्थ से उन्नति करने के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से कार्य करेगा और दसवीं उच्च दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य शक्ति के बल से शत्रु पक्ष में महान प्रभाव प्राप्त करेगा और माता के स्थान में वृद्धि पायेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में बहुत सफलता प्राप्त करेगा और परिश्रम के योग से बहुत उन्नति करेगा।

वृषभ लग्न में १० शनि

यदि कुम्भ का शनि- दसवें केन्द्र में पिता स्थान पर स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता स्थान की महान शक्ति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज, कारबार के स्थान में भाग्य शक्ति के बल से भारी इज्जत और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा उत्तम कर्मेष्ठी बनेगा और धर्म-कर्म का यथार्थ पालन करेगा तथा तीसरी नीच दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में किसी कारण से कमजोरी या परेशानी प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ बुराई या कमी पायेगा

नं. १९०

और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं सुख भवन को देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में और घरेलू सुख सम्बन्धों में कुछ-कुछ असन्तोष मानेंगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री तथा रोजगार के स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ भाग्यवानी एवं कुछ नीरसता प्राप्त करेगा और दैनिक रोजगार के मार्ग में कुछ अकलसाहट समझा जायेगा तथा लौकिक उन्नति करने के लिये बड़ी भारी चेष्टा और भारी प्रयत्न करके बड़ी भारी उन्नति करेगा तथा बड़े-बड़े कारबार और बड़े-बड़े व्यापार आदि में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा बड़ा भाग्यवान समझा जायेगा।

वृषभ लग्न में ११ शनि

यदि मीन का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में कुछ कठिन कार्यों के द्वारा विशेष सफलता प्राप्त करेगा और पिता पक्ष से भी लाभ की साधन शक्ति कुछ नीरसता से प्राप्त करेगा तथा ग्यारहवें स्थान पर कूर ग्रह विशेष फलदाता होता है, इसलिये भाग्य की शक्ति से किसी कार्य द्वारा विशेष लाभ प्राप्ति के साधन प्राप्त करेगा और धन की शक्ति को बढ़ाने के लिये महान कार्य करेगा

नं. १९१

मित्र दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देह स्थान को देख रहा है, इसलिये

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आमदनी के मार्ग से देह में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से, बुध की कन्या राशि में सन्तान पक्ष को देख रहा है, इसलिये सन्तान की शक्ति का सुन्दर सहयोग मिलेगा और बुद्धि विद्या के स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ कठिनाई अनुभव करेगा और पुरातत्व को कुछ दिक्कत से लाभ पायेगा।

वृषभ लग्न में १२ शनि

यदि मेष का शनि- बारहवें स्थान पर नीच राशि में बैठा है तो पिता स्थान की हानि प्राप्त करेगा, क्योंकि शनि का स्थान बल और राशि बल दोनों ही निषेध तथा कमजोर हो गये हैं, इसलिये राज-समाज, कारबार, मान-प्रतिष्ठा सभी में कमजोरी करेगा तथा खर्च में भी परेशानी रखेगा और भाग्य में भी दुर्बलता प्राप्त करेगा, किन्तु भाग्य के स्वामी शनि की भाग्य स्थान पर स्वक्षेत्र में दसवीं दृष्टि पड़ रही है, इसलिये भाग्य में कुछ शक्ति भी मिलेगी,

किन्तु यश की कमी रहेगी और धर्म का पालन कमजोर रहेगा और भाग्य की वृद्धि के लिये दूसरे स्थानों का कष्ट साध्य संपर्क स्थापित करना पड़ेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन स्थान को देख रहा है, इसलिये धन और जन की कुछ सफलता प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और भाग्योन्नति के लिये कुछ अनुचित और गुप्त कार्य भी करना पड़ेगा तथा झगड़ों-झंझटों में मार्ग से फायदा और प्रभाव प्राप्त करेगा,

किन्तु राज्येश- भाग्येश के नीच हो जाने से भाग्य के अन्दर बड़ा असंतोष रहेगा।

कष्ट, असत्य, गुप्तयुक्ति के अधिपति- राहु

वृषभ लग्न में १ राहु

यदि वृषभ का राहु- केन्द्र में देह के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य के अन्दर कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और देह में कुछ कष्ट तथा कुछ चिंता फिकर का योग प्राप्त करेगा तथा गुप्त चतुराई के बल से बड़ा मान प्राप्त करेगा और सत्य-असत्य की परवाह न करके अधिक स्वार्थ सिद्धि का ध्यान रखेगा तथा जीवन में कभी-कभी कोई मूर्च्छा या चोट प्राप्त करेगा तथा देह में किसी

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क्योंकि महान् तेजस्वी सूर्य की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी भारी हिम्मत शक्ति के द्वारा बाद में कुछ सुख के साधनों को प्राप्त कर सकेगा और सुख प्राप्ति के मार्ग में गुप्त युक्तियों से धैर्य के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में ५ राहु

यदि कन्या का राहु-त्रिकोण में पंचम स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी चतुराई से काम लेगा और दिमाग की शक्ति के अन्दर बड़ी गहरी और दूर की सूझ का योग प्राप्त करेगा तथा विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु कभी-कभी दिमाग के अन्दर कुछ कमी और परेशानी के योग प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करने पर भी संतान का सहयोग प्राप्त करेगा और कन्या पर बैठा हुआ राहु स्वक्षेत्र के समान है, इसलिये बोलचाल के कार्यों में सत्य का पालन नहीं कर सकेगा तथा गुप्त विचारों के योग से काम लेता रहेगा तथा अधिक बोलने की आदत प्राप्त करेगा तथा कुछ नशा करना चाहेगा।

नं. १९७

वृषभ लग्न में ६ राहु

यदि तुला का राहु-छठें शत्रु के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो शत्रु स्थान में विजय प्राप्त करेगा, क्योंकि छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाते हैं, इसलिये गुप्त युक्तियों के बल से शत्रु पक्ष में तथा अनेक प्रकार की विघ्न बाधाओं के पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा महान् चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये गुप्त विचारों की महान् शक्ति और युक्तियों से प्रभाव युक्त बुद्धि प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष के कारणों से कभी-कभी कुछ थोड़ी-सी अशांति के योग भी प्राप्त करेगा, किन्तु धैर्य और हिम्मत की शक्ति से सदैव सहारा प्राप्त करता रहेगा और माता के सुख में कुछ कमी करेगा।

नं. १९८

वृषभ लग्न में ७ राहु

यदि वृश्चिक का राहु-केन्द्र में स्त्री स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो स्त्री पक्ष में कष्ट और कमी का योग प्राप्त करेगा और स्त्री स्थान के सुख सम्बन्धों की पूर्ति करने के लिये बहुत प्रकार की कठिनाइयों से तथा युक्तियों से काम निकालेगा तथा भोगादिक पक्ष में कुछ अनुचित लाभ भी प्राप्त करेगा तथा कुछ इन्द्रिय विचार का कष्ट भी प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में

नं. १९९

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स्थान की शक्ति को कुछ कठिनाईयों से सफल बनाएगा और गुप्त विचारों से उन्नति के मार्ग को सदैव सोचता रहेगा और आन्तरिक इज्जत के मुकाबले में जाहिरदारी श्रेष्ठ रहेगी।

वृषभ लग्न में ११ राहु

यदि मीन का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त रहेंगी, किन्तु ग्यारहवें स्थान में कुंडली ग्रह अधिक शक्तिशाली फलदाता होता है, इसलिये आमदनी या धन प्राप्त के स्थान में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और धन के लाभ सम्बन्धों में नियत दायरे से अधिक प्राप्त करने के लिये बहुत अधिक युक्ति और परिश्रम करेगा और लाभ के मार्ग में न्याय के स्थान पर स्वार्थ सिद्धि का विशेष ध्यान रखेगा और कभी आमदनी के मार्ग में कठिन संकट का सामना करना पड़ेगा, किन्तु आखिर में सफलता शक्ति को अवश्य प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में १२ राहु

यदि मेष का राहु- बारहवें स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और खर्च संचालन शक्ति प्राप्त करने में कुछ युक्ति और परेशानी से काम लेगा तथा कभी-कभी खर्च के सम्बन्धों में विशेष रूझावट या दिक्कत पड़ने पर भी चतुराई से और युक्तियों से काम निकाल लेगा, किन्तु फिर भी खर्च के मार्ग में कुछ असंतोष महसूस करेगा, किन्तु दिखाई खर्च में कुछ प्रभाव रहेगा, परन्तु गरम ग्रह मंगल की राशि पर गरम ग्रह राहु बैठा है, इसलिये कठिन परिश्रम के द्वारा खर्च के मार्ग की शक्ति को सफल करेगा।

कष्ट, कठिन परिश्रम, गुप्तशक्ति वेक् अधिपति-केतु

वृषभ लग्न में १ केतु

यदि वृषभ का केतु- केन्द्र में देह के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो देह के स्थान में कभी चोट या घाव का निशान मिलेगा तथा देह की सुन्दरता में कुछ कषि रहेगी और कुछ गुप्त चिन्ता का योग प्राप्त रहेगा तथा साथ ही साथ गुप्त हिम्मत भी खूब रहेगी और इसी कारण से जिद्द बाजी या हठयोग से काम करेगा और शुक्र के घर में केतु है, इसलिये गुप्त चतुराई से सफलता

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१२६ वृषभ लग्न का फलादेश प्राप्त करेगा तथा देह की शक्ति और तेजी के कारणों पर प्रभाव डालेगा, किन्तु अकेला देह में बैठा होगा और दूसरे किसी भी ग्रह की इस पर दृष्टि भी नहीं होगी तो केतु के मस्तक न होने के कारण से अपने मंतव्य को ठीक तौर से समझा नहीं सकेगा। वृषभ लग्न में २ केतु यदि मिथुन का केतु- धन स्थान में नीच राशि पर बैठा है तो धन और जन के स्थान में महान् संकट का समय उपस्थित करेगा और धन की चिन्ता से कभी-कभी गम्भीर स्थिति के कारण इज्जत का बचाना मुश्किल हो जायेगा और धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करने के लिए महान् कष्ट साध्य कर्म करना पड़ेगा तथा बड़ी दौड़ धूप करनी पड़ेगी और कुछ गुप्त रूप से शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा तथा धन जन के मार्ग में न्याय के मुकाबले स्वार्थ सिद्धि का विशेष ध्यान रखेगा, किन्तु फिर भी धन-जन का पूरा सुख प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा।

वृषभ लग्न में ३ केतु यदि कर्क का केतु- तीसरे भाई के स्थान पर मुख्य शत्रु चन्द्र की राशि में बैठा है तो भाई बहिन के सम्बन्ध में कुछ हानि और कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा भाई-बहिन के सुख में विशेष कमी प्राप्त करेगा और पराक्रम सम्बन्धित कार्यों में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और अपनी बाहुबल की शक्ति में अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा, किन्तु तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह विशेष शक्तिशाली कार्य करने को द्वितक है, इसलिये अन्दरूनी कमजोरी के परवाह न करते हुए महान् धैर्य और हिम्मत की शक्ति से हठ योग के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा। परन्तु मन के अधिकारी चन्द्रमा की राशि पर केतु बैठा है; इसलिये अपने मन के अन्दर कुछ चिन्तित रहेगा।

वृषभ लग्न में ४ केतु यदि सिंह का केतु- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो माता के सुख सम्बन्धों में भारी कमी प्राप्त करेगा और जन्म स्थान से कुछ विछोह प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख के साधनों में कमी और कष्ट का योग अनुभव करेगा तथा रहने के निवास स्थान मकान जायदाद के मामलों में असंतोष रहेगा, महान् तेजस्वी सूर्य की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये सुख प्राप्ति के साधनों को प्राप्त करने के लिये महान् कठिनतम

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युक्ति एवं शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा और सुख प्राप्ति के स्थान में गुप्त धैर्य की शक्ति से तथा सहयोग से काम करेगा।

वृषभ लग्न में ५ केतु

यदि कन्या का केतु- त्रिकोण में संतान स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो संतान पक्ष में कुछ कमी या कष्ट अनुभव करेगा और विद्या प्राप्त करने के समय बड़ी कठिनाईयों का योग अनुभव करेगा और बुद्धि तथा विद्या विकास में कुछ कमी प्राप्त करेगा किन्तु विवेकी बुध के घर में स्वक्षेत्र के समान बैठा है, इसलिये विवेक की अन्दरूनी शक्ति से बड़े साहस के योग से सफलता प्राप्त करेगा। किन्तु फिर भी केतु के मस्तक नहीं अन्दरूनी कमजोरी अनुभव करेगा तथा प्रकट में शक्ति प्रदर्शित करेगा, किन्तु फिर भी गुप्त धैर्य से काम करेगा।

वृषभ लग्न में ६ केतु

यदि तुला का केतु- छठें शत्रु स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो छठे स्थान में विशेष प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा और चतुराई के सहित महान् हिम्मत और गुप्त धैर्य के बल से अनेक प्रकार की विघ्न बाधाओं पर विजय प्राप्त करेगा और प्रभाव की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा तथा कभी-कभी कुछ हिम्मत हारने की बात का योग प्राप्त होने पर भी जाहिर में बड़े साहस से ही काम करेगा। क्योंकि परम चतुर ग्रह आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी से बड़ी दिक्कतों को गहरी चतुराई से पार करेगा।

वृषभ लग्न में ७ केतु

यदि वृश्चिक का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो स्त्री के पक्ष में हानि और कष्ट प्राप्त करेगा तथा प्रमेह या मूत्राशय में कुछ बीमारी प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ा संघर्ष और संकट का योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार की पूर्ति करने के लिये बड़ा कठिन परिश्रम और गुप्त धैर्य की शक्ति से काम करेगा तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये कठिन परिश्रम करेगा तथा गृहस्थ और राजेगार के मार्ग में कभी-कभी महान् विफलता प्राप्त करेगा,

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किन्तु अन्त में कुछ कमी के साथ गृहस्थ का पालन करेगा और आन्तरिक दुःख का अनुभव करेगा तथा कठिनाईयों से कुछ शक्ति प्राप्त करेगा।

वृषभ लग्न में ८ केतु

यदि धन का केतु- आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में उच्च का होकर गुरु की राशि में बैठा है तो आयु स्थान की वृद्धि का योग प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति में कोई विशेष महत्व प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में विशेष मस्ती का योग पायेगा और बड़ी लापरवाही से तथा बहादुरी तरीके से रहन-सहन रखेगा और जीवन निर्वाह करने के मार्ग में बड़ा भारी कठिन परिश्रम करेगा और कभी-कभी बहुत धन प्राप्त करेगा

नं. २१२

तथा जीवन में किसी अल्प संकट का सामना प्राप्त करेगा तथा अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा, किन्तु गुप्त धैर्य की महान् शक्ति से कोई विशेष लाभ का संयोग मुफ्त का-सा प्राप्त करेगा और देवगुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये शानदार तरीके से रहेगा।

वृषभ लग्न में ९ केतु

यदि मकर का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य के स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो भाग्य स्थान में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और कुछ कठिन परिश्रम के योग से भाग्य की उन्नति प्राप्त करेगा और भाग्य तथा धर्म के मार्ग में श्रद्धा की कमी प्राप्त रहेगी तथा कुछ परिश्रम करेगा किन्तु धर्म का बाहरी रूप जितना अच्छा होगा उतना अन्दरूनी मजबूत नहीं होगा और इसी प्रकार भाग्य के स्थान में प्रत्यक्ष के मुकाबले में अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा और भाग्य की वृद्धि के लिये बड़ी मजबूत हिम्मत शक्ति से काम करेगा, किन्तु स्थिर और कठोर ग्रह शनि की राशि पर कठोर ग्रह केतु बैठा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि के लिये महान् कठिन साधन करेगा।

नं. २१३

वृषभ लग्न में १० केतु

यदि कुम्भ का केतु- दशम केन्द्र में पिता एवं राज्य स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो पिता के सुख सम्बन्धों में कुछ बाधा उत्पन्न करेगा और राज-समाज के मान-सम्मान के स्थान में जाहिर में प्रभाव अच्छा रखेगा और अन्दरूनी कुछ कमजोरी महसूस करेगा तथा स्वार्थ पूर्ति के लिये हठ योग से भी सफलता प्राप्त करेगा और कठोर ग्रह शनि की राशि पर कठिन ग्रह केतु बैठा है, इसलिये

नं. २१४

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उन्नति प्राप्त करने के लिये घोर कर्म करेगा। वृषभ लग्न में ११ केतु यदि मीन का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो आमदनी के मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा। किन्तु ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह अधिक बलशाली हो जाता है, इसलिये आमदनी और धन का लाभ करने के लिये विशेष परिश्रम करेगा। किन्तु फिर भी कुछ अन्दरूनी असंतोष प्राप्त रहेगा और स्वार्थ सिद्ध करने के लिये कुछ कड़ाई से काम निकालेगा और कभी-कभी आमदनी के स्थान में कोई महान्

नं. २१५ संकट का सामना प्राप्त करने के बाद में सफलता मिलेगी और देवगुरु वृहस्पति की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में आदर्शवादिता से सफलता प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में १२ केतु यदि मेष का केतु- बारहवें खर्च के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो खर्च के मार्ग में बड़ी-बड़ी कठिनाईयों का योग प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और खर्च की संचालन शक्ति को प्राप्त करने के मार्ग में बड़ा भारी परिश्रम और गुप्त धैर्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा,

किन्तु खर्च के मार्ग में कुछ कमी और कुछ कष्ट अनुभव करने से असंतोष रहेगा, किन्तु महान् दृढ़ता और हठ योग, जिद्द बाजी से काम निकलेगा और गर्म ग्रह मंगल की राशि पर कठिन ग्रह केतु बैठा है, इसलिये कुछ अशांति युक्त कठिन कर्म की शक्ति से खर्च की शक्ति को प्राप्त करता रहेगा।

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१३०

वृषभ लग्न का फलादेश

  • वृषभ लग्न समाप्तम् *

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मिथुन लग्न प्रारम्भ

मिथुन लग्न का फलादेश प्रारम्भ

नवग्रहों द्वारा भाग्य फल

(कुण्डली नं० ३२४ तक में देखिए )

प्रिय पाठकगण ! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आप के सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है।

अर्थात् जन्म कुण्डली

के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० १९७

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१०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२४ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२५ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२६ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२७ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२८ के अनुसार मालूम करिये।

(३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. २२९ से २४० तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २२९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३० के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३१ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३२ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २३३ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

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कुण्डली नं. २३८ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३९ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २४० के अनुसार मालूम करिये।

(३) मिथुन लग्नवालेों के समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. २४१ से २५२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४२ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४४ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४५ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४६ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४७ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४८ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४९ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५० के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५१ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५२ के अनुसार मालूम करिये।

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७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९३ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९८ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९९ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०० के अनुसार मालूम करिये।

( ३ ) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल

आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ३०१ से ३१२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०२ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०४ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०५ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०६ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली

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नं. ३०७ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०८ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०९ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१० के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३११ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१२ के अनुसार मालूम करिये।

(३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं ३१३ से ३२४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१३ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१४ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१५ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१६ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१७ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१८ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२० के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२१ के अनुसार मालूम करिये।

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१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२२ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२४ के अनुसार मालूम करिये।

भाई बहन, पराक्रम ( प्रभाव ) स्थानपति सूर्य

मिथुन लग्न में १ सूर्य

यदि मिथुन का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के तेजस्वी कर्म शक्ति के योग से मान प्राप्त करेगा और अपने को हमेशा ऊँचा रखने का कार्य करेगा और भाई बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और अपनी देह के पुरुषार्थ कर्म से महान् प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत रखने वाला साहसी बनेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री के अन्दर प्रभाव और पुरुषार्थी शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के भोगादिक पक्ष में पुरुषार्थ शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में पुरुषार्थ कर्म के योग से सफलता प्राप्त करेगा और इसी सफलता के कारण प्रभाव शक्ति प्राप्त रहेगी और देह के अन्दर बड़ी हिम्मत और स्फूर्ति तथा क्रोध, प्रभाव आदि शक्ति भी प्राप्त रहेगी।

नं. २१७

मिथुन लग्न में २ सूर्य

यदि कुर्क का सूर्य- धन भवन में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो धन का कोष स्थान बन्धन का स्थान माना जाता है, इसलिये भाई बहन के सुख सम्बन्धों में कमी करेगा और पुरुषार्थ कर्म के योग से धन की वृद्धि करेगा और तेजस्वी कर्म शक्ति के योग से धन की वृद्धि और कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त करेगा। धन की वृद्धि करने के कारणों से देह के पुरुषार्थ में कुछ कमजोरी प्राप्त रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति अनुभव करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ कुछ अरुचिकर एवं असंतोषकर रूप में प्राप्त करेगा और धन की वृद्धि करने के कारणों से प्रभाव और हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. २१८

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मिथुन लग्न में ३ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- पराक्रम स्थान पर स्वयं अपने घर में स्वक्षेत्री बैठा है तो पराक्रम की महान् प्रभाव रखेगा तथा भाई की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और अपने पुरुषार्थ से महान् भरोसा और हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ असन्तोष का योग बनेगा और धर्म के मार्ग में कुछ मतभेद समझने की वजह से अपने अलग ढंग से ही काम लेगा और बहादुर स्वभाव होने के कारण से भाग्य की कुछ कमजोरी समझते रहने पर भी परवाह नहीं करेगा, परन्तु महान् तेजस्वी सूर्य का तीसरे स्थान पर स्वक्षेत्री होने के कारण से कठिन कार्य की पूर्ति करने में तत्पर रहेगा।

मिथुन लग्न में ४ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- चौथे केन्द्र में माता के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो तेजस्वी पराक्रम शक्ति के द्वारा घरेलू सुख के साधनों में महानता प्राप्त करेगा और भाई-बहिन का सुख और मान प्राप्त करेगा और माता के स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा रहने सहने के स्थान में सुख शक्ति और प्रभाव पायेगा तथा मकान भूमि आदि की शक्ति प्राप्त करेगा और पराक्रम की सफलता से सुख प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से पराक्रम शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा और राज समाज में मान और प्रभाव पायेगा तथा कारबार की सफलता शक्ति का प्रभाव प्राप्त करेगा और सुख पूर्वक परिश्रम करके उन्नति करेगा।

मिथुन लग्न में ५ सूर्य यदि तुला का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण में सन्तान एवं विद्या स्थान पर नीच राशि में बैठा है तो सन्तान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा और विद्या में कमजोरी पायेगा तथा हिम्मत और बाहुबल की पराक्रम-शक्ति में कमजोरी अनुभव करेगा और बोल-चाल में कुछ छिपाव शक्ति से काम लेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से मंगल की मेष राशि में लाभ के स्थान को देख रहा है, इसलिये बुद्धि

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१४२मिथुन लग्न का फलादेशऔर बाहुबल की शक्ति से धन का विशेष लाभ करेगा और धन का लाभ अधिक करने के मार्ग में झूठ और छिपाव की शक्ति से काम करना पड़ेगा, क्योंकि बुद्धि स्थान पर सूर्य नीच राशि में बैठकर लाभ स्थान को उच्च भावना से देख रहा है, इसलिए लाभ के मुकाबले में शब्द शक्ति के सत्य असत्य की परवाह नहीं करेगा तथा लाभ के मार्ग में प्रभाव प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ६ सूर्ययदि वृश्चिक का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में पराक्रम की शक्ति के द्वारा महान् प्रभाव प्राप्त करेगा, क्योंकि छठे घर में गरम ग्रह विशेष महत्व दायक कार्य करते हैं, इसलिए विपक्षियों के सामने सदैव विजय प्राप्त करेगा और भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और पराक्रम शक्ति से कोई परिश्रमी प्रभाव का कार्य करेगा और शत्रु दृष्टि से शुक्र को वृषभ राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ असन्तोष रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता मानेगा, परन्तु खर्च के मार्ग में शक्ति प्राप्त करने के लिये कठिन परिश्रम करेगा और प्रभाव शक्ति से भी काम करेगा। मिथुन लग्न में ७ सूर्ययदि धनु का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो तेजस्वी कर्म शक्ति के द्वारा गृहस्थ में महानता प्राप्त करेगा और स्त्री के स्थान में प्रभाव और शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में प्रभावशाली परिश्रम के द्वारा सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा और भाई बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिए परिश्रम की सफलता से देह में प्रभाव प्राप्त करेगा और गृहस्थ के दैनिक कार्य के मार्गों में बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम लेगा तथा स्त्री के अन्दर कुछ तेजी और गर्मी का स्वभाव प्राप्त करेगा तथा भोगादिक पक्ष में शक्ति पायेगा। यदि मकर का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में हानि या कमी प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में असफलता और कमजोरी प्राप्त करेगा तथा कठिन परिश्रम करने के कारणों से जीवन में अशांति अनुभव करेगा और अपने

नं. २२२

नं. २२३

बैठा है तो भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में हानि या कमी प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में असफलता और कमजोरी प्राप्त करेगा तथा कठिन परिश्रम करने के कारणों से जीवन में अशांति अनुभव करेगा और अपने

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मिथुन लग्न में ८ सूर्य

नं. २२४

बाहुबल के कार्यों में निराशाओं के कारणों से कभी-कभी अधिक हिम्मत हार जायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध की कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और चन्द्रमा की कर्क राशि में धन भवन को सातवीं मित्र दृष्टि से देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिए थकान पाने वाले परिश्रम के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब में कुछ शक्ति और जीवन में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा, किन्तु कुछ उत्साह हीन रहेगा।

यदि कुम्भ का सूर्यन- नवम त्रिकोण में भाग्य स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो भाई बहन का कुछ असुचिकर संयोग प्राप्त करेगा और अपने बाहुबल के कठिन कार्य से भाग्य मे कुछ वृद्धि प्राप्त करेगा तथा कुछ भेद भावना रखते हुए धर्म का पालन करेगा और सातवीं स्विक्षेत्री दृष्टि से स्वयं अपनी सिंह राशि में पराक्रम स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ अरुचिकर सहयोग शक्ति से पराक्रम स्थान की सफलता प्राप्त करेगा और महान् हिम्मत शक्ति से उत्साह पूर्वक भाग्य की वृद्धि के कार्य में लाभ पाता रहेगा और भाई के संयोग से किसी प्रकार की सहायता प्राप्त करेगा और पराक्रम तथा भाग्य के संयोग से कुछ प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ तेजस्वी कर्म के द्वारा उन्नति पर पहुँचेगा।

मिथुन लग्न में ९ सूर्य

नं. २२५

यदि मीन का सूर्य- दसुम केन्द्र में पिता स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो पराक्रम शक्ति के द्वारा पिता स्थान की वृद्धि करेगा और पिता की शक्ति से सुन्दर संयोग प्राप्त करेगा और राजसमाज के मार्ग में मान प्राप्त करेगा तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा भाई-बहिन की प्रभाव शक्ति का योग अनुकूल रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की कन्या राशि में चौथे सुख भवन को देख रहा है, इसलिये सुख के साधनों की पराक्रम और प्रभाव शक्ति से वृद्धि करेगा और माता के स्थान में अनुकूल शक्ति प्राप्त करेगा और बाहुबल से लौकिक उन्नति के श्रेष्ठ साधन और सम्मान प्राप्त करेगा।

मिथुन लग्न में ११ सूर्य

नं. २२६

यदि मेष का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च राशि पर बैठा है तो

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मिथुन लग्न में ११ सूर्य पराक्रम शक्ति के संयog से धन का विशेष लाभ और उत्तम आमदनी प्राप्त करेगा तथा भाई बहिन की शक्ति का विशेष लाभ प्राप्त करेगा और आमदनी तथा लाभ के योग से बाहुबल की शक्ति में विशेष उन्नति और विशेष उत्साह प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में संतान घर को देख रहा है, इसलिए संतान पक्ष की सुख शक्ति में कमी और बाधायें प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमजोरी या कुछ रुकावटें प्राप्त करेगा और लाभ की दृष्टिकोण से बोलचाल के अन्दर कुछ रूखापन से काम निकालेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा।

मिथुन लग्न में १२ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य बारहवें खर्च के स्थान पर शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है तो भाई बहिन के सुख सम्बन्धों में हानि प्राप्त करेगा और खर्चे की अधिकता के कारणों से हिम्मत और पराक्रम शक्ति में कमजोरी प्राप्त करेगा और बाहरी दूसरे स्थान में परिश्रम के योग से कुछ सफलता प्राप्त करेगा और खर्च अधिक करने के वेग को रोक नहीं सकेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव और मिठास की शक्ति से काम करेगा, किन्तु अपने अन्दर की कमजोरी को छिपा कर जाहिर में हिम्मत शक्ति से तथा परिश्रम से सफलता पायेगा और पराक्रम स्थान पति सूर्य खर्च स्थान में बैठा है, इसलिए अपने अन्दर उत्साह की कमी का अनुभव करेगा।

धन, जन, बंधन तथा मनस्थानपति चंद्र यदि मिथुन का चंद्र प्रथम केन्द्र में तन स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो देह के अन्दर धनवान प्रतीत होने के सुन्दर लक्षण प्राप्त करेगा और देह के कार्य से धन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा धन प्राप्ति के सम्बन्ध में तन मन की सुन्दर शक्ति का प्रयोग करेगा, किन्तु देह के कार्य क्रम में कुछ अधिक घिराव-सा रहेगा और कुटुम्ब शक्ति का योग सुन्दर प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है,

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इसलिये स्त्री के पक्ष में सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग से धन प्राप्त करेगा तथा इज्जतदार व धनवान् समझा जायेगा तथा लौकिक और गृहस्थिक सफलता के लिये विशेष प्रयत्न करेगा।

मिथुन लग्न में २ चन्द्र- यदि कर्क का चन्द्र- दूसरे धन के स्थान में स्वक्षेत्री होकर अपने स्थान में ही बैठा है तो धन की संचि‌त शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का अच्छा सहयोग प्राप्त करेगा तथा धन की वृद्धि करने के लिये मन की सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में धन के कारणों से कुछ परेशानी अनुभव करेगा और सदैव धनो‌न्नति के चिन्तन में ही अपने मन को लगाये रख कर उन्नति प्राप्त करेगा और पुरातन्व का कुछ नीरसता युक्त लाभ प्राप्त करेगा क्योंकि धनेश कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, फिर भी धन जन के कारणों से इज्जतदार समझा जायेगा!

नं. २३०

मिथुन लग्न में ३ चन्द्र- यदि सिंह का चन्द्र- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान में कुछ बन्धन युक्त सुन्दरता प्राप्त करेगा और मनोयोग के पुरुषार्थ से धन संचय करने के मार्ग में सदैव लगा रहेगा, इसलिये परिश्रम की सफलता से इज्जत और प्रसन्नता प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के स्थान में कुछ नीरसता अनुभव करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ अरुचि रखेगा तथा धर्म के मुकाबले में धन का महत्व अधिक समझेगा और कीमती पुरुषार्थ कर्म के द्वारा धन की शक्ति एवं बड़ी प्रतिष्ठा और प्रभाव पायेगा।

नं. २३१

मिथुन लग्न में ४ चन्द्र- यदि कन्या का चन्द्र- चौथे केन्द्र में माता के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो धनेश कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ रुकावट डालेगा किन्तु माता के स्थान में धन का आनन्द प्राप्त करेगा और मकान जायदाद की शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब तथा घरेलू सुख प्राप्त होगा और घरेलू सुख में कुछ सुन्दरता और कुछ बन्धन प्रतीत होगा और

नं. २३२

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मिथुन लग्न में ७ चन्द्र नं. २३५ मिथुन लग्न में ८ चन्द्र

आनन्द प्राप्त करेगा और भोगादिक पक्ष में अधिक रुचि रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में देह स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और इज्जत प्राप्त करेगा तथा धन की वृद्धि करने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहेगा और शोभा युक्त कार्य करेगा। यदि मकर का चन्द्र- आठवें मृत्यु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में भारी कमी अनुभव करेगा और कुटुम्ब में अशांति के कारण प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का कुछ नीरसता युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और आयु स्थान में तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ शक्ति एवं कुछ परेशानी और इज्जत प्राप्त करेगा तथा मानसिक अशांति प्राप्त रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्वयं कर्क राशि में धन भवन में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये मनोयोग के कठिन मार्ग से धन की पूर्ति के साधन प्राप्त करेगा और कुटुम्ब

की कुछ अधूरी नीरसता युक्त शक्ति के साधन प्राप्त करेगा, किन्तु धन और कुटुम्ब की उन्नति करने के लिये सदैव भारी परिश्रम करता रहेगा। मिथुन लग्न में ९ चन्द्र

यदि कुम्भ का चन्द्र- नवम त्रिकोण में भाग्य स्थान पर शत्रु शनि की राशि में बैठा है तो भाग्य के स्थान में कुछ नीरसतायुक्त मार्ग से धन की वृद्धि का योग प्राप्त करेगा और भाग्यवान् माना जायेगा तथा धन की वृद्धि के लिये धर्म का पालन करेगा अर्थात् स्वार्थ युक्त धर्म का पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सुन्दर योग प्राप्त करेगा और पराक्रम की सुन्दर शक्ति से धन की प्राप्ति करेगा और मनोयोग से उत्तम मार्ग का अनुसरण करते हुए भाग्य और भगवान् पर भरोसा करेगा, इसलिये मान और इज्जत तथा यश प्राप्त करेगा और धन की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा जन शक्ति के द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान में बड़ी हिम्मत शक्ति प्राप्त रहेगी। यदि मीन का चन्द्र- दशम केन्द्र में पिता स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान से धन का सुन्दर लाभ योग प्राप्त करेगा और

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आमद, शत्रु, रोग तथा परिश्रम, लाभस्थानपति-मंगल

मिथुन लग्न में १ मंगल यदि मिथुन का मंगल- प्रथम केन्द्र में देह स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर कुछ गरम रोग प्राप्त करेगा और देह के परिश्रम से धन का लाभ प्राप्त करेगा तथा लाभ के सम्बन्ध में कुछ झंझट-झगड़े का-सा योग प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में देह के द्वारा विजय और प्रभाव पायेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से माता के स्थान को देख रहा है, इसलिये माता तथा सुख सम्बन्धों के पक्ष में कुछ झंझट और लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में भी कुछ झगड़ा तथा कुछ रोग प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम के योग से लाभ प्राप्त करेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा जीवन में प्रभाव रखेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और लाभ सम्बन्ध के मार्ग में हेकड़ी और तेजी से कार्य लेगा और क्रोधी स्वभाव का बनेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से खूब लाभ प्राप्त करेगा तथा आमदनी की वृद्धि करने के लिए बड़ी भारी दौड़-धूप एवं परिश्रम करेगा।

नं. २४१

मिथुन लग्न में २ मंगल यदि कर्क का मंगल- धन भवन में नीच राशि का मित्र चन्द्र के स्थान पर बैठा है तो धन कोष में हानि और संकट प्राप्त करेगा तथा परिश्रम और कपट के योग से धन संचय करने में लगा रहेगा और कुटुम्ब की हानि प्राप्त करेगा और विपक्षी शत्रुओं के झगड़े-झंझटों से भी धन की हानि का योग बनेगा तथा जूआ-सट्टा आदि कार्यों से धन का नुकसान होगा और चौथी सामान्य मित्र की दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में संतान स्थान को देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ क्लेशयुक्त शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या वृद्धि के स्थान में कुछ हठयोग और छिपाव शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु में वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में

नं. २४२

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मिथुन लग्न का फलादेश

को देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और यश की कमी रहेगी तथा धर्म के स्थान में सच्ची श्रद्धा की अधिक कमी रहेगी और गुप्त युक्ति पर भरोसा रखेगा तथा धन की वृद्धि करने के लिये कठिन से कठिन कार्य को करने में तत्पर रहेगा।

मिथुन लग्न में ३ मंगल

यदि सिंह का मंगल- भाई पराक्रम तीसरे स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो भाई बहिन के पक्ष में कुछ झंझट युक्त शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा और परिश्रम का स्वामी गरम ग्रह पराक्रम के स्थान पर बैठकर अपनी चौथी दृष्टि से स्वयं अपने शत्रु स्थान के क्षेत्र की वृश्चिक राशि को देख रहा है, इसलिये महान् परिश्रम करेगा और परिश्रम की शक्ति से शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव प्राप्त करेगा तथा मामा के पक्ष में शक्ति प्राप्त रहेगी और प्रभाव तथा परिश्रम की शक्ति से खूब लाभ प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय और लाभ दोनों चीजें प्राप्त करेगा और रोग पर तथा झगड़े-झंझटों पर बड़ी बहादुरी और हिम्मत से सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु शनि की कुम्भ राशि में सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य पर और धर्म पर कुछ नीरसता युक्त रूप में थोड़ा-सा भरोसा रखेगा और मित्र गुरु की मीन राशि में आठवीं दृष्टि से पिता के दसवें स्थान को देख रहा है, इसलिए पिता के पक्ष से तथा राज-समाज, कारबार के पक्ष से धन का लाभ तथा मान, प्रभाव और सफलता, वैभव आदि परिश्रम शक्ति के योग से प्राप्त करेगा, क्योंकि दसवें स्थान पर मंगल की दृष्टि बहुत श्रेष्ठ फल प्रदान करती है।

नं. २४३

मिथुन लग्न में ४ मंगल

यदि कन्या का मंगल- चौथे केन्द्र में माता स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो माता के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष से घर बैठे लाभ प्राप्त करेगा और घरेलू रहने सहने के सुख भवन में कुछ झंझट या परेशानी के साथ लाभ शक्ति प्राप्त करेगा और मकानादि से लाभ प्राप्त करेगा क्योंकि आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि को लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये अपने स्थान से ही आमदनी की शक्ति प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से मित्र गुरु की धनु राशि में रूष्ठ स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ गरम रोग और झंझट युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और सप्तम स्थान पर

नं. २४४

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रोगेश की दृष्टि है, इसलिये कभी-कभी मूत्रेन्द्रिय विकार प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में राज्य स्थान को देख रहा है, इसलिये राज-समाज, कारबार एवं पिता स्थान में कुछ परिश्रम के योग से लाभ और मान तथा प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा, क्योंकि दसवें स्थान पर मंगल की दृष्टि श्रेष्ठ फल दाता होती है और शत्रु स्थानपति मंगल की लाभ स्थान पर बलवान पूर्ण दृष्टि पड़ रही है, इसलिये झगड़े-झंझटों के मार्ग से खूब लाभ प्राप्त करेगा।

मिथुन लग्न में ५ मंगल यदि तुला का मंगल- पञ्चम त्रिकोण में सन्तान व विद्या के स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो सन्तान पक्ष में कुछ वैमनस्यता एवं कुछ रोग झंझट आदि मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कुछ कठिन परिश्रम के योग से लाभ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि को लाभ स्थान में देख रहा है, इसलिए परिश्रमी और कुछ छिपाव

नं. २४५ करेगा और चौथी उच्च दृष्टि से शत्रु शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये कुछ झंझट युक्त मार्ग से आयु की वृद्धि और शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा जीवन में प्रभाव रहेगा और आठवीं दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों में कुछ परिश्रम के

वृद्धि योग से लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और आठवें स्थान का सम्बन्ध कुछ गुदा और पेट का भी होता है, इसलिये कुछ उदर विकार प्राप्त करेगा, क्योंकि रोगेश मंगल की उस पर दृष्टि पड़ रही है तथा रोगेश पंचम में बैठा है, इसलिये बुद्धि के झंझट युक्त कर्म से धन का विशेष लाभ पायेगा।

मिथुन लग्न में ६ मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- छठें शत्रु स्थान में अपनी ही राशि का होकर स्वक्षेत्र में बैठा है तो शत्रु पक्ष में महान प्रभाव शक्ति रखेगा. और बड़े भारी परिश्रम के मार्ग से प्रभाव योग के द्वारा आमदनी और लाभ प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष से तथा रोग व झगड़े-झंझटों के मार्ग से भी लाभ

नं. २४६ योग प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से शत्रु शनि की कुम्भ राशि में भाग्यस्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य और धर्म के पक्ष में कुछ अरुचि

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मिथुन लग्न का फलादेश

प्रभाव लाभ और कुछ रोग झंझट आदि वस्तुयें प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से माता के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ झंझट युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा तथा परिश्रमी कार्यों से सुख के साधनों की वृद्धि करेगा और आठवीं दृष्टि से संतान स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए संतान पक्ष में कुछ वैमनस्यता रोग और लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में परिश्रम के योग से लाभ तथा सफलता प्राप्त करेगा, क्योंकि दसवें स्थान पर मंगल बलवान् फल करता है, इसलिये बड़े प्रभाव से आमदनी प्राप्त करेगा, किन्तु षष्ठेश होने के कारण मंगल कुछ परेशानियाँ करता है।

मिथुन लग्न में ११ मंगल

यदि मेष का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान पर स्वयं अपने क्षेत्र में बहुत अधिक बलवान् बैठा है, तो धन का लाभ खूब करेगा क्योंकि ग्यारहवें घर में गरम ग्रह बहुत शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये परिश्रम के योग से बड़ी मजबूत आमदनी का स्थाई रूप प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु स्थान का स्वामी होने के कारण कुछ परेशानियाँ करेगा और आठवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र शत्रु स्थान को वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव रखते हुए लाभु प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझट प्रपंच आदि के योग से अथवा रोगादि के योग से सम्बन्धित लाभ भी प्राप्त करेगा और मामा के पक्ष का लाभ प्राप्त रहेगा और चौथी दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन का संग्रह नहीं कर सकेगा और कुटुम्ब के सम्बन्ध में कुछ क्लेश प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से संतान पक्ष को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ परेशानी के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि विद्या में परिश्रम के योग से सफलता प्राप्त करेगा।

नं. २५१

मिथुन लग्न में १२ मंगल

यदि वृषभ का मंगल- बारहवें खर्च स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में बैठा है तो खर्च विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करेगा और परिश्रम, प्रपंच व झंझट आदि के योग से खर्च और आमदनी का संयोग प्राप्त रहेगा तथा चौथी दृष्टि से भाई पराक्रम भाव को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ झंझट युक्त रूप से लाभ रहेगा और लाभ प्राप्ति

नं. २५२

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के योग से परिश्रम तथा पुरुषार्थ खूब करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने शत्रु स्थान को वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ हानि लाभ के योग से प्रभाव रखेगा और मामा के पक्ष में कुछ हानि या कमजोरी प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से स्त्री स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ झंझट रोग और कुछ मतभेद से सहित लाभ प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़े परिश्रम और प्रपंच के योग से लाभ प्राप्त करेगा, क्योंकि मंगल शत्रु स्थान का स्वामी होने से दोषी है, इसलिये मूत्रेन्द्रिय के स्थान में कमी के साथ कुछ रोग प्राप्त करेगा, क्योंकि सातवाँ स्थान भोग प्राप्त करने का होता है।

माता, भूमि देह, सुख विवेकस्थानपति-बुध

मिथुन लग्न में १ बुध यदि मिथुन का बुध- प्रथम केन्द्र में देह के स्थान पर स्वयं अपने क्षेत्र में ही बैठा है तो देह के अन्दर सुडौल कद एवं सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा माता की महानता और घरेलू सुख के साधनों को उत्तम रूप में प्राप्त करेगा और मकानादि भूमि का सुन्दर योग प्राप्त करेगा तथा विवेक की उत्तम योग शक्ति स्वयमेव प्राप्त रहेगी, इसलिये देह सदैव मान-सम्मान प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में आत्मीयता और सुख का विशेष योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में देह की विशेष शक्ति के द्वारा उत्तम सुख और सफलता प्राप्त करेगा और सुख शान्ति का विशेष अनुयायी बनेगा।

नं. २५३

मिथुन लग्न में २ बुध यदि कर्क का बुध- धन भाव में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह की विवेक शक्ति से सुख पूर्वक धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये धन संग्रह करने के सम्बन्ध से देह के सुख साधनों में कुछ त्रुति प्राप्त रहेगी और इसीलिये माता के सुख सम्बन्ध में भी कमी प्राप्त रहेगी और मकान जायदाद की शक्ति से धन का योग प्राप्त रहेगा और कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को मित्र शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये जिन्दगी में महानता प्राप्त करेगा। आयु और जीवन में सुख प्राप्ति के साधन प्राप्त रहेंगे तथा पुरातत्व का लाभ पायेगा।

नं. २५४

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मिथुन लग्न का फलादेश

मिथुन लग्न में ८ बुध

कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व के सम्बन्ध में विवेक शक्ति के द्वारा सुख उठावेगा और आयु का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या को सुखद रूप से व्यतीत करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि विशेष प्रयत्न से करेगा तथा कुम्भ के स्थान में कुछ सुखमय सम्बन्ध प्राप्त करेगा। किन्तु अपने देह द्वारा कुछ कठिन परिश्रम के कार्यों के करने से सुख शान्ति में बाधा प्राप्त करेगा।

नं. २६०

मिथुन लग्न में ९ बुध

यदि कुम्भ का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो दैहिक कर्म की विवेक शक्ति के द्वारा भाग्य की सुन्दर उन्नति प्राप्त करेगा और धर्म का सुन्दर पालन करेगा और बड़ा भाग्यवान समझा जायेगा तथा मकान भूमि आदि की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और माता का सुन्दर पवित्र योग प्राप्त करेगा और भाग्य की शक्ति से महान सुख प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में भाई और पराक्रम स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में सुन्दर सफलता और यश प्राप्त करेगा। किन्तु पुरुषार्थ के मुकाबले में भाग्य और भगवान को बड़ा मानेगा, क्योंकि बुध बड़ा विवेकी ग्रह है, इसलिये लौकिक और पारलौकिक मार्गों में गहरी विवेक शक्ति से उन्नति और यश प्राप्त करेगा।

नं. २६१

मिथुन लग्न में १० बुध

यदि मीन का बुध- केन्द्र में दसवें पिता स्थान पर नीच राशि का गुरु क्षेत्र में बैठा है तो देह के कठिन कर्म से उन्नति करने के मार्ग में प्रयत्नशील रहकर मान और अपमान का योग प्राप्त करेगा तथा पिता का सुख बहुत थोड़ा प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र सुख भवन को कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए सुख प्राप्ति के साधनों में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा मकानादि रहने के स्थानों में वृद्धि की शक्ति पायेगा, माता के स्थान का विशेष ख्याल रखेगा तथा देहाधीश बुध नीच राशि में बैठा है इसलिये कुछ छिपे तौर से तथा कुछ अनधिकार रूप से भी उन्नति

नं. २६२

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मिथुन लग्न का फलादेश

शक्ति का उत्तम लाभ प्राप्त करेगा और राज और समाज के कामों में मान प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता और प्रभाव पायेगा और पाँचवीं सामान्य शत्रु की दृष्टि से संतान भवन को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति से सहायता प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में उत्त्रति, वाणी में कुशलता तथा योग्यता प्राप्त करेगा और नववीं शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को शनि की कुंभ राशि में देखता है, इसलिये भाग्य के स्थान में कुछ टूट अनुभव करेगा, किन्तु भाग्यवान माना जायेगा और धर्म के स्थान में कुछ अरुचिकर रूप से धर्म का पालन करेगा और बड़प्पन का रहन सहन रखकर इज्जत पायेगा।

मिथुन लग्न में २ गुरु

यदि कर्क का गुरु- धन भवन में उच्च का होकर मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है तो धन संग्रह शक्ति का बड़ा गौरव प्राप्त करेगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता है, इसलिये स्त्री पक्ष के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और कुटुम्ब की शक्ति को सुन्दर योग पायेगा तथा नवमीं दृष्टि में स्वयं अपने दसवें पिता स्थान मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की उत्त्रति प्राप्त करेगा और कारबार से धन की खूब वृद्धि करेगा तथा राज-समाज में मान, इज्जत और लाभ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में इज्जत और प्रभाव की शक्ति से विजय एवं सफलता प्राप्त करेगा और मामा के पक्ष में सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से अष्टम आय एवं पुरातत्व स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति अनुभव करेगा तथा पुरातत्व की कुछ कमी रहेगी।

नं. २६६

मिथुन लग्न में ३ गुरु

यदि सिंह का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति-प्रदान करेगा तथा पराक्रम की खूब वृद्धि और सफलता प्राप्त करेगा और बड़ी भारी हिम्मत वाला बनेगा और पाँचवीं दृष्टि से स्वयं अपनी राशि में स्त्री स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये अपने स्थान की वृद्धि करेगा अर्थात स्त्री की महान सुन्दर और सुयोग्य शक्ति प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर बड़ी भारी प्रभाव एवं जागृति रखेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त

नं. २६७

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करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिए रोजगार और पुरुषार्थ के योग से धन का लाभ खूब शानदार करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य में तर्क शक्ति से काम करेगा तथा भाग्य के मुकाबले में पुरुषार्थ और कर्म को बड़ा मानिगा।

मिथुन लग्न में ४ गुरु यदि कन्या का गुरु- चौथे केन्द्र में माता के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो माता की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और मकान आदि रहने के स्थान में सुन्दर शक्ति और प्रभाव रखेगा तथा सुख के अच्छे साधन प्राप्त रहेंगे और सातवीं दृष्टि से मीन राशि में स्वयं अपने क्षेत्र राज्य स्थान को देख रहा है, इसलिये राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की सहायता शक्ति पायेगा और पाँचवीं नीच दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन में बहुत प्रकार की असुविधा और अशांति अनुभव करेगा तथा पुरातत्व की हानि प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से खर्च स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च अधिक होने के कारणों से कुछ असुविधा प्रतीत होगी और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध कुछ नीरसता युक्त प्राप्त रहेगा। किन्तु फिर भी खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष सम्बन्ध रखेगा।

नं. २६८

मिथुन लग्न में ५ गुरु यदि तुला का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है तो सन्तान और विद्या के पक्ष में कुछ नीरसटाई से सहायक शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में प्रभाव तथा योग्यता प्राप्त करेगा और वाणी की कुशलता से कारबार तथा राज-समाज में मान और सफलता प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ त्रुटि युक्त सफलता प्राप्त करेगा और धर्म का कुछ मतभेद सहित पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन लाभ का विशेष ध्यान रखते हुए बुद्धि की कुशलता से लाभ खूब प्राप्त करेगा और नवीं मित्र दृष्टि से देह स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए देह में बड़ा भारी स्वाभिमान रखेगा तथा सुन्दरता और मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ा चतुर बुद्धिमान्

नं. २६९

भृ.सं.-११

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स्वाभिमान वृद्धि करने का सदैव ध्यान रखकर दैनिक कार्य करता रहेगा। मिथुन लग्न में ८ गुरु यदि मकर का गुरु-आठवें मृत्यु स्थान में नीच का होकर शत्रु शनि की मकर राशि में बैठा है तो स्त्री और पिता के स्थान में कष्ट अनुभव करेगा तथा रोजगार और कारबार के मार्ग में महान् कठिनाइयों से काम करेगा तथा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से और कुछ कष्ट तथा कुछ कपट के योग से गृहस्थ का कार्य संचालन करेगा तथा उदर और मूत्रेन्द्रिय में कुछ विकार पायेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से खर्च स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च की अधिकता के स्थान में कुछ नीरसता प्राप्त रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से धन भवन को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि का विशेष ध्यान और अधिक प्रयत्न करेगा और नवमीं दृष्टि से सुख भवन को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए सुख प्राप्ति के साधन और मकान आदि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान और प्रभाव की कमी प्राप्त करेगा तथा कुछ अनुचित मार्ग का अभ्यायी बनेगा।

नं. २७२

मिथुन लग्न में ९ गुरु यदि कुम्भ का गुरु-नवम त्रिकोण में भाग्य स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो कुछ अरुचिकर रूप से भाग्य की उन्नति प्राप्त करेगा और कर्म-धर्म के स्थान में कुछ नीरस मार्ग के द्वारा सफलता पायेगा तथा स्त्री और पिता स्थान के सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर रूप से भाग्य वृद्धि के साधन प्राप्त करेगा और रोजगार व्यापार तथा राज-समाज के मार्ग में कुछ थोड़ी-सी दिक्कतों के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में मान सम्मान सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहीन की शक्ति का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की सफलता पायेगा तथा नवमीं दृष्टि से संतान पक्ष को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सफलता मिलेगी और विद्या बुद्धि के स्थान में कार्य कुशलता और योग्यता बढ़ेगी।

नं. २७३

यदि मीन का गुरु- दसवें केन्द्र में पिता स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो पिता स्थान में महानता और प्रभाव पायेगा तथा

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मिथुन लग्न का फलादेश

मिथुन लग्न में १० गुरु

पिता स्थान की शक्ति से रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और राज समाज से मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा लौकिक कार्यों में बड़ी भारी कार्य कुशलता व सफलता पायेगा और पाँचवीं उच्च दृष्टि से धन भवन को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति का बड़ा उत्तम सुख प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की श्रेष्ठ शक्ति मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से सुख भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये माता और मकानादि का सुन्दर सुख प्राप्त करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा तथा भामा के पक्ष में सहायता और मान पायेगा और राज्य स्थान पर स्वक्षेत्र में बैठकर धन भवन को एवं शत्रु भवन को पूर्णतया से देखने के कारण से बड़ा धनवान् एवं प्रभावशाली वैभव युक्त भाग्यवान बनेगा।

मिथुन लग्न में ११ गुरु

यदि मेष का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो कारबार-व्यापार तथा पिता स्थान के सम्बन्ध से खूब लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में संतान घर को देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ी-सी नीरसताई से संतान के पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में अपने स्वक्षेत्र में नवमी दृष्टि से स्वयं अपनी धनु राशि में अपने स्वक्षेत्र स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान का विशेष लाभ और सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ा लाभ और विशेष आमदनी का योग प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से पराक्रम एवं भाई के स्थान को मित्र सूर्य की राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन का उत्तम सुख प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान की विशेष बुद्धि और शक्ति प्राप्त करेगा तथा बाहुबल के कार्यों से मान-सम्मान और सफलता तथा धन लाभ प्राप्त करेगा और राज्येश होकर लाभ स्थान में बैठने से बड़ी शान्ति के साथ आमदनी की विशेष सफलता प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का गुरु- बारहवें खर्च स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो खर्च की अधिकता के कारणों से कुछ परेशानी प्रतीत होगी और बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से कुछ मान और रोजगार की

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मिथुन लग्न में १२ गुरु शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री और पिता के सुख सम्बन्धों में कमजोरी प्राप्त होगी और रोजगार व्यापार के स्थान में कुछ हानि तथा कमजोरी अनुभव होगी तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से चौथे सुख भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये घरेलू सुख मकानादि रहने के स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा नववीं नीच दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और पुरातत्व शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा तथा उदर में कुछ विकार पायेगा तथा खर्चा अधिक रहने की मजबूरी बनी रहेगी तथा आयु के स्थान में कभी-कभी विशेष खतरा प्राप्त करेगा और अपने मान-सम्मान में कमजोरी अनुभव करेगा।

विद्या संतान-खर्चस्थानपति-शुक्र

यदि मिथुन का शुक्र- प्रथम केन्द्र स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष के कारण देह में दुर्बलता प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी चतुराई रखेगा तथा खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से तथा बुद्धि की योग्यता से बड़ा मान पायेगा और संतान पक्ष में कुछ कमजोरी के साथ सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं सामान्य शत्रु की दृष्टि से स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये कुछ मतभेद के साथ स्त्री में विशेष आसक्ति प्राप्त करेगा और भोगादिक में विशेष रूचि रखेगा तथा बुद्धि की दौड़-धूप से रोजगार के मार्ग में काम निकालेगा तथा अपने अन्दर बुद्धि में कमजोरी और भ्रम प्राप्त करेगा।

यदि कुर्क का शुक्र- धन स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो बाहरी स्थानों के सम्बन्ध और बुद्धि योग से बड़ी चतुराई के साथ धन के मार्ग में इज्जत प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति में कमजोरी प्राप्त करेगा और संतान पति का व्ययेश होकर बन्धन ( धन ) के स्थान पर बैठने से संतान सुख में विशेष कमी

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मिथुन लग्न में २ शुक्र उत्पन्न करेगा विद्या अच्छी ग्रहण करेगा और बातचीत के अन्दर छिपी स्वार्थ शक्ति से ही चतुराईयों के सहित काम करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से अष्टम आयु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए जीवन में शानदारी से काम निकालेगा और पुरातत्व का सामान्य हानि-लाभ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब में कुछ तुष्टि प्राप्त करेगा।

नं. २७८ यदि सिंह का शुक्र- भाई के स्थान पर शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष के कारण भाई बहिन के पक्ष में कुछ कमी प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ के अन्दर कुछ कमजोरी पायेगा तथा सन्तान और विद्या के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी होते हुए भी चतुराई की शक्ति और हिम्मत से बातचीत के द्वारा काम की सफलता और खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए बुद्धि और खर्च की शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और धर्म के पक्ष में विशेष दिलचस्पी रखेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा खर्च का संचालन करेगा।

नं. २७९ मिथुन लग्न में ३ शुक्र

नं. २८० यदि कन्या का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं सुख भवन में नीच राशि का होकर बैठा है और व्ययेश होने का दोष भी है, इसलिए मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में हानि प्राप्त करेगा तथा मकानादि रहने के स्थानों में सुख की कमी प्राप्त करेगा और सन्तान सुख की कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और खर्च के कारणों से कुछ सुख- शान्ति में बाधा प्राप्त करेगा, किन्तु सातवीं उच्च दृष्टि से राज्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये घरेलू अशान्ति को सहन करके भी उत्त्रति के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा गुप्त चतुराई से सफलता पायेगा तथा अन्दरूनी कमजोरी के होते हुए भी बाहर मान- प्रतिष्ठा पायेगा।

यदि तुला का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर अपनी ही राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो सन्तान और विद्या के पक्ष में व्ययेश होने के कारण उपरोक्त विषय में कुछ कमजोरी या कमी प्राप्त करेगा और बुद्धि और

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मिथुन लग्न में ५ शुक्र

वाणी की महान् चतुराई से खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान रखेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग से धन का खूब लाभ प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के कारण आमदनी को भी विशेष खर्च करता रहेगा तथा हेर फेर की और दूर की बातों पर विशेष बोलने वाला बनेगा। यदि वृश्चिक का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में

सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष में बाधा प्राप्त करेगा और विद्या ग्रहण करने में दिक्कतें प्राप्त करेगा तथा दिमाग में कुछ खर्च के कारणों से परेशानी रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने खर्च स्थान को वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परतन्त्रता या परेशानी के योग से खर्चा खूब करेगा और शत्रु स्थान में बुद्धि की चतुराई और खर्च की ताकत से काम निकालेगा तथा सन्तान और रोग एवं झंझट-झगड़े

नं. २८१

नं. २८२

आदि सम्बन्धों से खर्चा अधिक करेगा तथा गुप्त चतुराई के योग से मतलब निकालेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध कुछ साधारण प्रभावशाली रहेगा।

मिथुन लग्न में ७ शुक्र

यदि धन का शुक्र- सातवें केन्द्र में स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो बुद्धिमती और चतुर स्त्री प्राप्त करेगा और बुद्धि की चतुराई के योग से रोजगार चलायेगा, किन्तु व्ययेश होने के कारण रोजगार के मार्ग में कुछ हानि भी प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में कुछ कमी या क्लेश का रूप भी प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में खर्चा खूब रहेगा और सन्तान तथा विद्या का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं

मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी और मान प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों से कुछ रोजगार के मार्ग में सहायता सम्बन्ध प्राप्त करेगा। यदि मकर का शुक्र- आठवें मृत्यु स्थान पर मित्र शनि की मकर राशि में बैठा है तो सन्तान पक्ष में हानि और कष्ट प्राप्त करेगा और विद्या में

नं. २८३

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मिथुन लग्न का फलादेश

मिथुन लग्न में ८ शुक्र

कमजोरी रहेगी और खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी महसूस होगी और गूढ़ बुद्धि तथा पुरातत्व का ज्ञान प्राप्त करेगा और अपनी जीवनाधार शक्ति को होने के लिये सदैव महान् प्रयत्न करता और सोचता रहेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ प्रभाव रहेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य मित्र चन्द्र की कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा किन्तु व्ययेश होने के कारण धन की संग्रह शक्ति में कमी अनुभव करेगा।

नं. २८४

मिथुन लग्न में ९ शुक्र

यदि कुम्भ का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो विद्या और सन्तान का सुख प्राप्त करेगा तथा धर्म का ज्ञान और सज्जनता धारण करेगा तथा बुद्धि और विद्या के योग से बाहरी स्थानों के सम्पर्क के द्वारा भाग्य की वृद्धि के साधन प्राप्त करेगा और बड़ा भारी चतुराई के योग से मान और यश प्राप्त करेगा भाग्य की और बुद्धि की शक्ति से खर्च के उत्तम साधन पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के नाते भाग्य की कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से भाई के स्थान को शत्रु सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में वैमनस्यता प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ के मुकाबले में मेँ भाग्य को बड़ा मानिगा।

नं. २८५

मिथुन लग्न में १० शुक्र

यदि मीन का शुक्र- दसवें केन्द्र पिता स्थान में उच्च का होकर गुरु की राशि में बैठा है तो व्ययेश होने के कारण पिता की सम्पत्ति की विशेष खर्चा करेगा और बड़े कारबार में नुकसान उठाना पड़ेगा, किन्तु बाहरी स्थानों का विशेष सम्बन्ध मान युक्त रहेगा और सन्तान शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या भी ग्रहण करेगा और राज समाज में कुछ मान प्राप्त करेगा तथा खर्च अधिक रहेगा तथा बुद्धि के अहंभाव के कारण उन्नति और मान प्राप्ति के स्थान में बार-बार हानियाँ प्राप्त करेगा और चौथे सुख स्थान को नीच दृष्टि से देख रहा है, इसलिये सुख प्राप्ति के सम्बन्ध में तथा मातृ स्थान के सुख में कमी प्राप्त करेगा।

नं. २८६

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मिथुन लग्न में ११ शुक्र

यदि मेष का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य मित्र मंगल की राशि में बैठा है और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने सन्तान स्थान को तुला राशि में देख रहा है, तो सन्तान का लाभ प्राप्त करेगा तथा विद्या ग्रहण करेगा और वाणी के द्वारा तथा चतुराई के द्वारा खूब धन लाभ प्राप्त करेगा, विद्या बुद्धि तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से आमदनी में शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के कारण से विद्या तथा संतान के पक्ष में कुछ कमी या कमजोरी अनुभव करेगा और दिमाग में कुछ परेशानी या फिकर रहेगी तथा खर्चा खूब करेगा और लाभ प्राप्ति के स्थान सम्बन्ध में बड़ी चतुराई के साथ बहुत हेर फेर की बातें करके स्वार्थ सिद्धि में सफलता प्राप्त करेगा।

नं. २८७

मिथुन लग्न में १२ शुक्र

यदि वृषभ का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान पर स्वयं अपने घर में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्पर्क प्राप्त करेगा तथा विद्या और संतान पक्ष में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा विद्या और संतान का कुछ विलम्ब से योग प्राप्त करेगा और बुद्धि योग से बड़ी चतुराई के साथ खर्चे की शक्ति प्राप्त करेगा तथा बड़ी घुमाव-फिराव की बातें करने का स्वभाव पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिए शत्रु पक्ष में बड़ी चतुराई और नर्माई से बातें बनाकर कार्य की पूर्ति करेगा तथा बुद्धि में कुछ परेशानी अनुभव करेगा।

नं. २८८

आयु, मृत्यु, भाग्य, धर्मस्थानपति-शनि

मिथुन लग्न में १ शनि

यदि मिथुन का शनि- प्रथम केन्द्र में देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म का पालन करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के कारण देह के सुख और सुन्दरता में कुछ कमी प्राप्त करेगा और धर्म के यथार्थ पालन में कुछ जुटि रखेगा तथा भाग्य सम्बन्धी कुछ पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा, किन्तु भाग्य में भी कुछ

नं. २८९

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१७०

मिथुन लग्न का फलादेश

कमजोरी अनुभव करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहन के स्थान में कुछ वैमनस्यता पायेगा और पुरुषार्थ कर्म में कुछ नीरसता अनुभव करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के पक्ष में कुछ नीरसता अनुभव करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से पिता स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में वैमनस्यता करेगा। राज-समाज व उन्नति के मार्गों में कुछ कठिन कर्म के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा।

मिथुन लग्न में २ शनि

यदि कर्क का शनि- धन स्थान में शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से पुरातत्व धन का लाभ प्राप्त करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण धन की संचित शक्ति के अन्दर हानि के कारण उत्पन्न करेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ सुख-दुःख का सामन्जस्य योग पायेगा तथा तीसरी मित्र दृष्टि से चौथे सुख भवन को देख रहा है, इसलिये सुख और मकानादि के

नं. २९०

पक्ष में सुख की थोड़ी-सी कमी के साथ योग प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र आयु स्थान को मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और जीवन की दिनचर्या में भाग्यवानी का तरीका प्राप्त करेगा और दसवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कछ कमजोरी तथा कष्ट और लापरवाही का योग प्राप्त करेगा और धर्म पालन के स्थान में धन का विशेष महत्व मानेंगा, किन्तु भाग्य स्थानपति शनि के धन भवन में बैठने के कारण से धन की तरफ से बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा तथा स्वार्थ युक्त सज्जनता का पालन करेगा।

मिथुन लग्न में ३ शनि

यदि सिंह का शनि- तीसरे भाई के स्थान पर शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन से वैमनस्यता प्राप्त रहेगा और पराक्रम सम्बन्धी कार्यों में कुछ अरुचि के साथ मिहनत करके सफलता प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा आयु में वृद्धि प्राप्त रहेगी और तीसरी उच्च दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि और सन्तान पक्ष में उन्नति प्राप्त करेगा तथा

नं. २९१

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वाणी द्वारा विशेष बातें कहकर अपना मतलब सिद्ध करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र भाग्य को कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए भाग्य की वृद्धि करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा। किन्तु अष्टमेश होने के कारण भाग्य स्थान में कुछ परेशानी भी प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग का यथाशक्ति पालन करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त रहेगा और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से सफलता प्राप्त होती रहेगी।

मिथुन लग्न में ४ शनि यदि कन्या का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं सुख स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो माता के स्थान की शक्ति तो प्राप्त होगी किन्तु अष्टमेश होने के दोष से माता के सुख-सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और मकानादि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा मकान और आय का उत्तम सुख प्राप्त रहेगा और घर की रहन-सहन के अन्दर भाग्यवान् समझा जायेगा तथा धर्म का कुछ पालन करेगा और तीसरी दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कड़ाई के साथ प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ लाभ युक्त रहेगा।

नं. २९२

तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज-समाज के कार्यों में कुछ अरुचि के साथ कार्य करेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह से भाग्यवान् समझा जायेगा और देह के द्वारा कुछ धर्म-कर्म का भी कार्य करेगा और सुख प्राप्ति के साधनों का विशेष ध्यान रखेगा तथा भाग्योदय प्राप्त करने के लिये देह के द्वारा विशेष प्रयत्नशील रहेगा।

मिथुन लग्न में ८ शनि यदि तुला का शनि- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि में उन्नति पायेगा तथा आयु में वृद्धि प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा संतान पक्ष से भाग्य की वृद्धि पायेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान

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मिथुन लग्न का फलादेश

को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ कष्ट और शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाई के सहित कार्य में सफलता पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से धन भवन को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के सहित धन की पूर्ति करेगा। अतः प्रत्येक विषयों में अष्टमेश होने के कारण कष्ट करता है और नवमेश होने के कारण से उत्तम और सहोदयता प्रदान करता है, इसलिये कुटुंब के पक्ष में कुछ अल्प सुख प्राप्त करेगा और भाग्य तथा जीवन की उन्नति करने के लिये भारी प्रयत्न करेगा।

मिथुन लग्न में ६ शनि

यदि वृश्चिक का शनि- छठें शत्रु स्थान में शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में बैठा है तो झगड़े झंझटों के मार्ग से भाग्य की वृद्धि करेगा और शत्रु स्थान में प्रभाव और सफलता प्राप्त करेगा तथा तीसरी दृष्टि से स्वयं अपने आयु स्थान को मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा भाग्येश का छठें स्थान पर बैठने से भाग्योन्नति में कुछ दिक्कतें पैदा करेगा और धर्म का यथार्थ पालन नहीं कर सकेगा।

नं. २९४

सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चों खूब शानदार करेगा और बाहरी स्थान का सम्बन्ध उत्तम रहेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख में बाधा प्राप्त करेगा और पराक्रम की सफलता के लिये कठिन प्रयत्न करेगा तथा छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बैठा है और तीसरे स्थान को क्रूर ग्रह स्वयं देख रहा है, इसलिये परिश्रम खूब करेगा और महान हिम्मत शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और छठें स्थान पर क्रूर ग्रह के बलवान होने से प्रभाव शक्ति की महान वृद्धि करेगा।

मिथुन लग्न में ७ शनि

यदि धन का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने का दोष और नवमेश होने का गुण दोनों कारणों के योग से स्त्री स्थान में सुख और दुख का हेतु बनेगा तथा रोजगार के पक्ष में कुछ कष्ट युक्त मार्ग से सफलता प्राप्त करेगा और आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा मूत्र-इन्द्रिय में कभी कोई कष्ट प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी कुंभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के मार्ग द्वारा भाग्य वृद्धि के अच्छे साधन

नं. २९५

है, इसलिये स्त्री और रोजगार के मार्ग द्वारा भाग्य वृद्धि के अच्छे साधन

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१७४

मिथुन लग्न का फलादेश

मंगल की मेघ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरियाँ तथा परेशानियाँ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहन के प्रेम सुख सम्बन्धों में तृप्ति प्राप्त करेगा और भाग्य के सम्मुख पुरुषार्थ को थोड़ा कम महत्व देगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान के पक्ष से कुछ परेशानी होते हुये भी शत्रुओं का परवाह नहीं करेगा तथा दिक्कतों पर भाग्य शक्ति से विजय पायेगा।

मिथुन लग्न में १० शनि

यदि मीन का शनि- दशम केन्द्र पिता स्थान में शत्रु बृहस्पति की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान के सुख में कमी प्राप्त करेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में बहुत प्रकार की दौड़-धूप और रहो बदल के बाद सफलता प्राप्त होगी और आयु स्थान की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा तथा धर्म-कर्म का पालन करेगा। किन्तु प्रत्येक कार्यों में स्वार्थ सिद्धि का मुख्य ध्यान रखेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त होगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से सुख स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये सुख के साधन और मकानादि की शक्ति प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी के साथ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, अतः इस जगह शनि का अष्टमेश होने का दोष और नवमेश होने का गुण दोनों ही चीजें हर विषय पर लागू होती हैं।

नं. २१८

मिथुन लग्न में ११ शनि

यदि मेष का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो आमदनी के मार्ग में कमजोरी प्राप्त करेगा और भाग्य शक्ति के स्थान में कुछ कमी महसूस करेगा तथा धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा, बल्कि धन के लाभ सम्बन्ध में कभी कुछ अनुचित स्वार्थ सिद्ध करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष से देह में कुछ कष्ट या अशान्ति पायेगा तथा नवमेश होने के कारण देह में भाग्यवानी पैदा

नं. २१९

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करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये वाणी के अन्दर वाचाल शक्ति पायेगा और विद्या तथा संतान पक्ष में वृद्धि प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपने आयु स्थान को मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा तथा पुरातत्व का कुछ लाभ प्राप्त करेगा, किन्तु नीच का होने के कारण जीवन में बड़े-बड़े कष्ट एवं संकट पायेगा तथा आयु में खतरा प्राप्त करेगा।

मिथुन लग्न में १२ शनि

यदि वृषभ के शनि- बारहवें खेच स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति में कुछ हानि करेगा तथा दसवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र भाग्य स्थान को कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थान के योग से भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का दिखावटी पालन करेगा तथा भाग्य स्थान में अन्दरूनी कमजोरी महसूस करेगा और तीसरी

नं. ३००

शत्रु दृष्टि से धन भवन को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इस लिये धन स्थान के कोष में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में कुछ अशांति अनुभव करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ दिक्कतों के साथ विजय और प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण से और नवमेश होने के नाते श्रेष्ठता के कारण से भाग्य और खर्च के सम्बन्धों में कुछ दु:ख-सुख उत्पन्न करता रहेगा और इसी कारण कभी-कभी यश और अपयश की प्राप्ति करता रहेगा, किन्तु फिर भी भाग्यवान माना जायेगा।

कष्ट, असत्य, गुप्त युक्ति के अधिपति-राहु

मिथुन लग्न में १ राहु

यदि मिथुन का राहु- प्रथम केन्द्र में धन स्थान पर उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो विवेकी बुध की राशि पर बैठने से विवेक की महान-शक्ति के योग से बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और देह के स्थान में कद की लम्बाई तथा युक्ति की गहराई प्रदान करेगा और विशेष महत्वपूर्ण शक्ति और प्रभाव प्राप्त करने के लिये महान प्रयत्न तथा भारी दौड़-धूप करायेगा तथा अपने व्यक्तित्व के अन्दर कोई विशेषता अवश्य प्राप्त करेगा और अपनी युक्ति बल के अन्दर महान हिम्मत शक्ति रखेगा तथा

नं. ३०१

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मिथुन लग्न का फलादेश

उन्नति प्राप्त करने के लिये कोई कष्ट साध्य कर्म का योग प्राप्त करेगा और गुप्त रूप से बड़े-बड़े उद्योग करेगा तथा बड़ी भारी जवाब की लम्बी चौड़ी बातों से मान और स्वार्थ सिद्ध करेगा।

मिथुन लग्न में २ राहु

यदि कर्क का राहु- दूसरे धन भवन में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो धन के खजाने में भारी कमी और हानि करेगा तथा धन सम्पत्ति के कारणों से महान् संकट प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा और मन के अधिकारी चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये धन संग्रह करने के लिये महान् कष्ट साध्य कर्म को करेगा और मानसिक वेदनाओं तथा गुप्त युक्तियों के द्वारा धन की खोज में रहेगा और जन तथा धन की खोज में रहते हुए जन तथा धन दोनों ही मार्गों में कभी-कभी भारी संकटों का सामना करना पड़ेगा और बहुत सी दिक्कतों के बाद दर-अबुर में धन का सुख प्राप्त कर सकेगा।

नं. ३०२

मिथुन लग्न में ३ राहु

यदि सिंह का राहु- तीसरे भाई के स्थान पर परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन के सुख सम्बन्धों में भारी कमी या कष्ट के कारणों को प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में बड़ा कठिन और कष्ट साध्य कर्म करेगा तथा बड़ा भारी प्रभाव रखने के लिये बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम करेगा, क्योंकि तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाते हैं, इसलिये कभी-कभी हिम्मत और धर्म की शक्ति में भारी संकट प्राप्त करने पर भी धैर्य की शक्ति प्राप्त रहेगी और गुप्त युक्तियों के बल से प्रभाव शक्ति की वृद्धि करेगा तथा भाई-बहिन के साथ कभी-कभी कोई विशेष झगड़ा-झंझट भी प्राप्त करेगा, किन्तु बहादुर स्वभाव रहेगा।

नं. ३०३

मिथुन लग्न में ४ राहु

यदि कन्या का राहु- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर विवेकी बुध की मित्र राशि में बैठा है तो विवेक की महान् शक्ति के द्वारा सुख के साधन प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभावानुसार माता के सुख सम्बन्धों में कमी रहेगी और मकानादि रहने के स्थान में कुछ अशान्ति या किसी प्रकार कोई झगड़े-झंझट का योग प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख शान्ति के स्थान में कुछ कमी अनुभव करेगा

नं. ३०४

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और कुछ गुप्त युक्तियों के कारणों से सुख प्राप्ति के साधन प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी महान् अशांति के कारण और बहुत-सी दिक्कतों के बाद अन्त में सुख-शक्ति के साधन प्राप्त करेगा, क्योंकि बुध के घर में राहु उत्तम समझा जाता है, इसलिये किसी भी स्थिति में रहकर भी सुख प्राप्त करेगा।

मिथुन लग्न में ५ राहु

यदि तुला का राहु- पाँचवें त्रिकोण संतान स्थान में परम चतुर शुक्र की मित्र राशि पर बैठा है तो विद्या और संतान पक्ष की सफलता के लिये महान् युक्तियों से काम करेगा, किन्तु फिर भी संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और विद्या ग्रहण करते समय कुछ दिक्कतें प्राप्त होंगी, किन्तु बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी गुप्त चतुराई रहेगी तथा अत्य मिश्रित बातों के योग से काम निकलेगी, किन्तु बातचीत के अन्दर बड़ी भारी योग्यता प्रदर्शित करेगा और दिमाग के अन्दर कुछ परेशानी तथा कुछ चिंता बनी रहेगी तथा विद्या स्थान में कुछ कमी या कमजोरी प्राप्त रहेगी और संतान सुख की पूर्ति करने में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

नं. ३०५

मिथुन लग्न में ६ राहु

यदि वृश्चिक का राहु- छठें शत्रु स्थान में शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में बैठा है तो शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और शत्रु का दमन करेगा, किन्तु शत्रु पक्ष से कुछ कठिनाई अनुभव होगी और छठें स्थान पर कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु स्थान के सम्बन्ध में कठिन से कठिन मुसीबत आने पर भी धैर्य मजबूत रहेगा और अन्त में विजय प्राप्त होगी तथा रोग और झगड़े-झंझटों में बड़ी हिम्मत से काम निकालेगा तथा चतुराई और युक्तिबल से सदैव प्रभाव शक्ति कायम रखेगा और अधिकांश रूप में कभी भी अपनी कमज़ोरियों को जाहिर नहीं होने देगा और मामा के पक्ष में कुछ त्रुटि करेगा।

नं. ३०६

यदि धन का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ संचालन की चिंताओं से टकराता रहेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी

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मिथुन लग्न में ९ राहु

कठिनाई और हानियाँ प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी रोजगार और गृहस्थ के कार्यों में महान् संकट का सामना प्राप्त करेगा और मूत्र-इन्द्रिय के अन्दर कभी-कभी कोई विकार प्राप्त करेगा और गृहस्थ तथा रोजगार के पक्ष में कुछ कमी या गुप्त युक्ति और असत्य तथा कुछ अनुचित रूप से भी कार्य संपादन करेगा तथा कुछ परतंत्रता या परेशानी मानेगा।

नं. ३०७ मिथुन लग्न में ८ राहु

यदि मकर का राहु- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानियाँ अनुभव करेगा और आयु स्थान में कई बार संकट और निराशा प्राप्त करेगा तथा जीवन की सहायक होने वाली पुरातत्व की संचित शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा और राहु कठोर ग्रह की राशि पर बैठा है, इसलिये हठ योग की युक्ति से शक्ति प्राप्त करेगा और पेट के अन्दर निचले हिस्से में कभी कोई विकार प्राप्त करेगा तथा जीवन की शक्ति प्राप्त करने के लिये किसी पुरातत्व वस्तु को गुप्त योजनाओं तथा कुछ कष्ट साध्य कर्म के द्वारा प्राप्त करेगा और जीवन के रहन-सहन के अन्दर प्रकट रूप में और अन्दरूनी में फर्क रहेगा।

नं. ३०८ मिथुन लग्न में ९ राहु

यदि कुम्भ का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो भाग्य की उन्नति को प्राप्त करने के लिये बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी और भाग्य के स्थान में कभी-कभी भारी चिंताओं का सामना करना पड़ेगा तथा गुप्त योजनाओं के कष्टसाध्य कर्म के द्वारा सफल बनकर भाग्य का विकास प्राप्त करेगा और अनाधिकर कर्म द्वारा भाग्य में वृद्धि का मार्ग प्राप्त करेगा और सयश की कमी पायेगा तथा धर्म के क्षेत्र में धर्म का पालन ठीक रूप से नहीं कर सकेगा, किन्तु दिखावटी धर्म का पालन कर सकेगा और भाग्य के प्रकट रूप में और अन्दरूनी स्वरूप में अन्दर महसूस करेगा, किन्तु कठोर ग्रह शनि की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये कठिन कर्म की युक्ति से सफलता पायेगा।

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मिथुन लग्न में ९ केतु पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में कुछ परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा भाग्य की उन्नति के लिये कष्ट साध्य कठिन प्रयत्न करना पड़ेगा और फिर भी भाग्य में कुछ अन्दरूनी कमजोरी प्राप्त करेगा तथा मित्र की राशि पर बैठा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के लिये महान् कठिनाइयाँ प्राप्त होने पर भाग्य का विकास प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा अर्थात् धर्मानुकूल धर्म का यथार्थ पालन नहीं कर सकेगा और सुश्र की कमी प्राप्त करेगा और भाग्योन्नति के लिये गुप्त शक्ति का योग प्राप्त करेगा, किन्तु कठोर ग्रह की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये कठिन मार्ग की गुप्त शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा। नं. ३२१

मिथुन लग्न में १० केतु यदि मीन का केतु- दशम केन्द्र पिता स्थान में शत्रु देवगुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, तो आदर्शवाद की गुप्त युक्ति व शक्ति के द्वारा उन्नति का मार्ग बनायेगा, किन्तु पिता स्थान के सुख में कमी और कष्ट प्राप्त करेगा तथा व्यापारिक कार्य क्षेत्रों की उन्नति में बड़ी-बड़ी बाधायें प्राप्त करेगा तथा राज-समाज, मान-प्रतिष्ठा आदि के कार्यों के सम्बन्ध में कमजोरी तथा परेशानियाँ अनुभव करेगा और मान-प्रतिष्ठा की उन्नति के लिये बड़े कठिन साध्य कर्म को करेगा और कभी-कभी इज्जत-आबरू के स्थान में महान् संकट प्राप्त करेगा तथा राज-काज में झगड़ें पायेगा। आदर्श गुरु की राशि पर बैठा है, इसलिये उन्नति पाने के लिये उत्तम मार्ग में कठिन परिश्रम करके गुप्त शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा। नं. ३२२

मिथुन लग्न में ११ केतु यदि मेष का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन की आमदनी के मार्ग में कठिन परिश्रम करेगा और ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् होकर शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में अधिक लाभ और अधिक मनाफा प्राप्त करेगा और धन लाभ की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन प्रयत्न करेगा तथा लाभ के मार्ग में कभी-कभी कोई भारी संकट प्राप्त करेगा, किन्तु गुप्त धैर्य की मजबूत शक्ति से काम लेने के कारणों से अन्त में उत्तम सफलता प्राप्त करेगा। नं. ३२३

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कर्क लग्न प्रारम्भ

कर्क लग्न का फलादेश प्रारम्भ

नवग्रहों द्वारा भाग्य फल

(कुण्डली नं० ४३२ तक में देखिये)

प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय

को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये

यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे

हैं|

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो

प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म

कुण्डली के अन्दर–जन्म के समय नवग्रह जिस-

जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर

बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा

होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग–गोचर गति के

अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर

भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

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अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं0 ३२५ से लेकर कुण्डली नं0 ४३२ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिये।

अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखाई देता रहेगा।

नोट- जन्म कुंडली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है।

जन्म कुंडली के अन्दर किसी ग्रह के साथ कोई ग्रह बैठा होगा या जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में ग्रह की दृष्टियाँ बतलाई हैं, उन-उन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा।

(४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल

आपकी जन्म कुंडली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३२५ से ३३६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये।

४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ३२५ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ३२६ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ३२७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ३२८ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ३२९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ३३० के अनुसार मालूम करिये।

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१०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३२ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३६ के अनुसार मालूम करिये।

(४) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ३३७ से ३४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३३७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३३८ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३३९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३४० के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४२ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४३ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४४ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

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कुण्डली नं. ३४५ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ३४६ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ३४७ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ३४८ के अनुसार मालूम करिये।

(४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका

फलादेश कुण्डली नं ३४९ से ३६० तक में देखिये और सर्वदा कालीन

मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३४९ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५० के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५१ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५२ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५४ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५६ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५७ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५८ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ३५९ के अनुसार मालूम करिये।

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फलादेश कुण्डली नं ३७३ से ३८४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७३ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७४ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७५ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७६ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७७ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७८ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७९ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८० के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८१ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८२ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८३ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८४ के अनुसार मालूम करिये।

(४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३८५ से ३९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये।

४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८५ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश

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६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८८ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९० के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९२ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९६ के अनुसार मालूम करिये।

(४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल

आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ३९७ से ४०८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये।

४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३९७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३९८ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३९९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०० के अनुसार मालूम करिये।

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कुण्डली नं. ४१५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१६ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१७ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१८ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१९ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२० के अनुसार मालूम करिये।

(४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-केतुपल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ४२१ से ४३२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२१ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२२ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२४ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२६ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२७ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२८ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२९ के अनुसार मालूम करिये।

भृ.सं.-१३

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कर्क लग्न का फलादेश

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४३० के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४३१ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४३२ के अनुसार मालूम करिये।

धन, कुटुम्ब, तेजस्थानपति- सूर्य

कर्क लग्न में १ सूर्य

यदि कर्क का सूर्य- देह के स्थान पर प्रथम केन्द्र में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह के द्वारा धन की शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का योग पायेगा तथा देह में तेज और प्रभाव की शक्ति रखेगा, क्योंकि दूसरे व्यक्तियों की दृष्टि में धनवान् और इज्जतदार समझा जायेगा और धन स्थान का स्वामी ग्रह कुछ बन्धन का सा कार्य करता है, इसलिये धन कुटुम्ब के कारणों से देह में कुछ घिराव और परेशानी अनुभव करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ झंझट और नीरसता प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी युक्त धन लाभ प्राप्त करेगा।

नं. ३२५

कर्क लग्न में २ सूर्य

यदि सिंह का सूर्य- धन भवन में स्वयं अपनी राशि का मालिक होकर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन भवन में शक्ति प्राप्त करेगा और धन के कारणों से प्रभाव और प्रतिष्ठा पायेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त होगी, किन्तु गरम ग्रह होने के कारणों से धन-जन की स्थिति में कोमलता की कमी प्राप्त रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन-जन की रक्षा और वृद्धि करने के कारणों से जीवन की दिनचर्या में कुछ अशांति अनुभव करेगा और पुरातत्व शक्ति के लाभ स्थान में कुछ नीरसता मानेगा तथा प्रभाव की शक्ति से धन की वृद्धि के कारणों को उत्पन्न करता रहेगा।

नं. ३२६

यदि कन्या का सूर्य- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर 'बैठा है तो धनेश ग्रह बन्धन का स्वरूप होता है, इसलिये भाई बहन के सुख स्थान में कुछ कमी के साथ शक्ति रखेगा और पराक्रम स्थान की शक्ति से

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कर्क लग्न का फलादेश

और अमीरात के ढंग से सफलता विशेष प्राप्त होगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष से धन का लाभ प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि के योग द्वारा धन की वृद्धि के साधन प्राप्त करेगा।

यदि मिथुन का सूर्य- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन का खर्चा विशेष करेगा तथा धन की संग्रह शक्ति में कमजोरी प्राप्त रहेगी और कुटुम्ब स्थान में सुख शक्ति का अभाव रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन की वृद्धि एवं धन प्राप्ति के साधन उत्तम रहेंगे और खर्च के स्थान में प्रभाव और अमीरात का ढंग रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में धन की

खर्च शक्ति के कारणों से अच्छा प्रभाव रखेगा और इसी हेतु रोगादिक झगड़े-झझटों के स्थान में सफलता प्राप्त करेगा तथा खर्च शक्ति के महत्ता के सम्मुख धन संग्रह की परवाह नहीं करेगा।

देह, आत्मा, मनस्थानपति-चन्द्र

कर्क लग्न में १ चन्द्र

यदि कर्क का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वयं अपनी ही राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो देह में सुन्दरता, सुडौलता प्राप्त होगी तथा मनोबल और आत्म बल की सुन्दर शक्ति प्राप्त रहेगी और कीर्ति तथा ख्याति प्राप्त करेगा तथा अपने अन्दर बहुत उत्तम उच्च कोटि की भावना उन्नति करने के लिये रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिये स्त्री स्थान में कुछ नीरसता अनुभव

करते हुए भी स्त्री भोगादिक पदार्थों की प्राप्ति करेगा और रोजगार के मार्ग में आत्मबल व मनोबल से सफलता पायेगा और लौकिक कार्यों में बड़ी दक्षता और सावधानी से यश प्राप्त करेगा।

यदि सिंह का चन्द्र- धन स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह की ओर मन की शक्ति से धन की वृद्धि करता रहेगा और कुटुम्ब की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का भी कार्य करता है, इसलिये धन के कारणों से देह में कुछ घिराव और परेशानी-सी रहेगी और धन की संग्रह शक्ति का आनन्द प्राप्त करेगा और

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कर्क लग्न में २ चन्द्र इज्जतदार एवं भाग्यवान् समझा जायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु के स्थान में कुछ संशयात्मक रूप से आयु की वृद्धि करेगा और कुछ नीरसता युक्त मार्ग से पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या शानदार तरीके से व्यतीत करेगा। यदि कन्या का चन्द्र- भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और तन मन से पराक्रम और प्रभाव की वृद्धि करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम करेगा और तनमन में बड़ा उमंग और उत्साह की शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक पुरुषार्थ के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का ध्यान और पालन करेगा और भरपूर पुरुषार्थ करने पर भी ईश्वर की शक्ति और सामर्थ्य में विश्वास रखेगा तथा देह के अन्दर शक्ति और सुन्दरता प्राप्त करेगा और मनोबल, देहबल के मिश्रित योग के द्वारा सज्जनता युक्त कर्म करने से सफलता प्राप्त करेगा। नं. ३३८

कर्क लग्न में ३ चन्द्र नं. ३३९

कर्क लग्न में ४ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता का और मातृ स्थान का सुख प्राप्त करेगा और देह को सुख पूर्वक आनन्द युक्त रखेगा और हँसने-हँसाने तथा मनोविनोद का स्वभाव प्राप्त करेगा और मकान-जायदाद पर अधिकार रखेगा तथा देह में सुन्दरता और मन में कोमलता प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से राज-स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये तन और मन की शक्ति से पिता स्थान की उन्नति करेगा तथा कारबार में सफलता पायेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा घरेलू और व्यापारिक कार्यों को सुख पूर्वक संचालित करने का ही प्रयत्न करेगा। यदि वृश्चिक का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण में मित्र मंगल की राशि पर नीच का होकर बैठा है तो विद्या की कमी प्राप्त करेगा और संतान पक्ष का

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कर्क लग्न में ५ चन्द्र कष्ट प्राप्त करेगा तथा देह में दुर्बलता या कमजोरी पड़यगा तथा मन और बुद्धि में सत्य का अभाव एवं संकुचित विचार रहेगा तथा लाभ स्थान को उच्च दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह और बुद्धि की युक्त बल से विशेष लाभ प्राप्त करेगा तथा धन लाभ की वृद्धि करने के लिये अनेक प्रकार की योजनाओं द्वारा मानसिक तथा शारीरिक शक्ति का विशेष प्रयोग करेगा और छिपाव की बातों से सदैव अपने स्वार्थ की सिद्धि करने में तत्पर रहेगा तथा मानसिक अशांति रहेगी।

नं. ३४१ यदि धन का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर कुछ रोग या परेशानी तथा दुर्बलता प्राप्त करेगा और कुछ झगड़े-झंझट आदि मार्ग में रहकर कार्य करेगा तथा किसी प्रकार से कुछ परतन्त्रता का योग अनुभव करेगा और शारीरिक तथा मानसिक शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष में बड़ी नरमाई के साथ प्रभाव की जागृति रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को बुध की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों में मनोयोग की शक्ति से मान प्राप्त करेगा तथा कुछ परेशानी के कार्यों में आत्मबल और गौरव से सफलता प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में ७ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- सातवें स्त्री स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा सुन्दर अधिकार प्राप्त करेगा तथा स्त्री भोगादिक कार्यों में मन की विशेष रुचि रहेगी और रोजगार के मार्ग में देह और मन की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु गृहस्थ और रोजगार के कार्य संचालन में कुछ कठिनाई अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपने क्षेत्र कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा लौकिल कार्यों की सफलता को प्राप्त करने के लिये अपनी शारीरिक तथा मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का प्रयोग करके हृदय में आनन्द अनुभव करेगा।

यदि कुम्भ का चन्द्र- आठवें मृत्यु स्थान में शनि की राशि पर बैठा है

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कर्क लग्न में ८ चन्द्र

तो देह की सुन्दरता में कमी प्राप्त करेगा तथा जीवन निर्वाह करने के कार्यों से परेशानी अनुभव करेगा और विदेश आदि के कठिन मार्ग का किसी प्रकार से अनुसरण करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का कुछ निरसताई से लाभ प्राप्त करेगा और आयु में कुछ शक्ति पायेगा जीवन की दिनचर्या में कुछ रौनक पायेगा और सातवीं दृष्टि से धन स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये तन और मन की कठीन साधना के द्वारा धन-जन की वृद्धि करेगा और गूढ शक्ति की खोज में लगा रहेगा।

नं. ३४४

धन-जन की वृद्धि करेगा और गूढ शक्ति की खोज में लगा रहेगा।

कर्क लग्न में ९ चन्द्र

यदि मीन का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो देह और मन की सुन्दर शक्ति के द्वारा भाग्य की महान् उत्तति करेगा और धर्म का सुन्दर पालन करेगा तथा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और देह के द्वारा सतोगुणी कर्म करते रहने से दैवी शक्ति की सफलता प्राप्त करेगा और ईश्वर में भारी भरोसा रखेगा तथा सुयश प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में

नं. ३४५

देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा मनोबल और देहबल के द्वारा पुरुषार्थ कर्म की सफलता प्राप्त करेगा और मन के अन्दर मगन रहने के साधन प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में १० चन्द्र

यदि मेष का चन्द्र- दशम केन्द्र पिता स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की सुन्दर वृद्धि करेगा तथा शारीरिक और मानसिक शक्ति के द्वारा कारबार की वृद्धि करेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और किसी प्रकार की सुन्दर पद या बड़प्पन प्राप्त करके आनन्द का अनुभव करेगा और देह के अन्दर सुन्दर प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से सुख स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये सुख स्थान की वृद्धि करेगा और मकानादि स्थानों में सुन्दरता और सुख प्राप्त करेगा।

नं. ३४६

यदि वृषभ का चन्द्र- एकादश लाभ स्थान में उच्च का होकर सामान्य

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कर्क लग्न का फलादेश

कर्क लग्न में ११ चन्द्र

यदि मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो शारीरिक और मानसिक शक्ति के द्वारा धन लाभ की विशेष उन्नति करेगा तथा देह में सुन्दरता एवं सुडौलता प्राप्त करेगा तथा आमदनी में वृद्धि करने के लिये सदैव बड़ा भारी प्रयत्न शील रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि से संतान स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष के सूक्ष्म सम्बन्धों मे कुछ कमी का योग प्राप्त करेगा और विद्या की शक्ति के अन्दर कुछ त्रुटि अनुभव करेगा तथा धन लाभ के कार्य कारणों में स्वार्थ सिद्धि के लिये कुछ कटु शब्दों का प्रयोग भी करेगा।

नं. ३४७

कर्क लग्न में १२ चन्द्र

यदि मिथुन का चन्द्र- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के सुख सम्बन्धों में कुछ कमजोरी रहेगी और खर्चा विशेष रहेगा तथा तन और मन की शक्ति से बाहरी स्थानों में सफलता प्राप्त करेगा तथा खर्च की विशेषताओं में ही प्रसन्नता का अनुभव करेगा किन्तु खर्च संचालन के कार्य कारणों से देह में कमजोरी या दुबलापन प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रुस्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये तन-मन और खर्च के कारणों से शत्रु स्थान में शांति युक्त वातावरण से प्रभाव रखेगा और फिर भी मन के अन्दर कुछ अशांति अनुभव करेगा।

नं. ३४८

विद्या, संतान, पिता, राज-समाजपति-मंगल

कर्क लग्न में १ मंगल

यदि कर्क का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर नीच का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह के स्वास्थ्य और सुन्दरता में कमी प्राप्त करेगा तथा विद्या कुछ अपूर्ण रहेगी और संतान पक्ष के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा पिता के प्रेम स्थान में कुछ नीरसता रहेगी और कार्य-व्यापार, उन्नति के मार्ग में अधूरा विकास होगा तथा राज-समाज के सम्बन्धों में मान-प्रतिष्ठा आदि की कुछ कमजोरी रहेगी तथा उन्नति को प्राप्त करने के लिये देह के परिश्रम और फिकरमंदी से काम करना पड़ेगा तथा चौथी दृष्टि से सुख भवन को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख

नं. ३४९

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रहा है, इसलिये कुछ मकानादि मात्र स्थान की शक्ति का सुख प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता के सहित वृद्धि और शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में विशेष प्रयत्न करके सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ कठिनाईयों के द्वारा प्रभाव शक्ति और कुछ पुरातत्व का लाभ रहेगा। कर्क लग्न में २ मंगल

यदि सिंह का मंगल- धन स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो ऊँचे कारबार के योग से धन की वृद्धि करेगा और राज-समाज से धन का लाभ और मान, प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और बुद्धि योग के कर्म से उन्नति का मार्ग बनायेगा तथा चौथी दृष्टि से संतान स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु धन का स्थान बन्धन

नं. ३५०

का-सा कार्य भी करता है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा, किन्तु बुद्धि से धन की वृद्धि करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी के योग से प्रभाव पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और उत्तम कर्म के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का पालन करेगा।

कर्क लग्न में ३ मंगल

यदि कन्या का मंगल- तीसरे पराक्रम स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पराक्रम और बाहुबल की शक्ति से महान् उन्नति प्राप्त करेगा और भाई या बहिन की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या और संतान शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरे स्थान पर गरम ग्रह बलवान् हो जाता है, फिर भी विशेषता यह है कि बुद्धि और राज्य का स्वामी है, इसलिये आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी

मेष राशि में राज्य स्थान को स्वक्षेत्र दृष्टि से देख रहा है, अतः बुद्धि योग द्वारा राज-समाज के उत्तम प्रभावशाली कर्म को करके बड़ी भारी शक्ति और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की ऊँची शक्ति प्राप्त करेगा और राजनीतिक क्षेत्र के कार्यों में बड़ी दक्षता और हिम्मत शक्ति से उत्साह पूर्वक कार्य करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से शत्रु

नं. ३५१

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स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और कर्म की बलवान् शक्ति के द्वारा शत्रु स्थान में विजय और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धिबल के कर्म से भाग्यशाली बनेगा और धर्म तथा यश की प्राप्ति करेगा और नीच राशि को छोड़कर राज्य स्थान पर मंगल का बैठना या देखना उन्नति दायक स्वयमेव होता है।

कर्क लग्न में ४ मंगल

यदि तुला का मंगल- चौथे केन्द्र मातृ स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो बुद्धि विद्या और सन्तान शक्ति का सुख प्राप्त करेगा तथा मातृ स्थान का सुख पायेगा और सातवें स्त्री स्थान को चौथी उच्च दृष्टि से शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के मार्ग में उन्नति प्राप्त करेगा तथा लौकिक एवं गृहस्थिक कार्यों में कुछ नीरसता अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से राज्य स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्रीय दृष्टि से देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा शान्ति, राज-समाज में वृद्धि, उन्नति और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान का नाम ऊँचा करेगा और कारबार में सफलता प्राप्त करेगा तथा भूमि और मकानादि का प्रभाव पायेगा और आठवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के योग से धन का लाभ खूब प्राप्त करेगा और अपने स्थान से ही अनेकों प्रकार के लाभ और सफलतायें प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में ५ मंगल

यदि वृश्चिक को मंगल- पंचम त्रिकोण सन्तान स्थान पर स्वयं अपने स्थान में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो विद्या और सन्तान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा राजभाषा की ज्ञान शक्ति के द्वारा मान और प्रभाव की वृद्धि करेगा तथा बुद्धि योग से ही कारबार चलायेगा और पिता की शक्ति का सहारा प्राप्त करेगा तथा वाणी की शक्ति से राज-समाज में सफलता और उन्नति पायेगा तथा चौथी दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ थकान पाने वाले बौद्धिक कर्मों के द्वारा शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कुछ नीरसता लिये हुये पुरातत्व का और आयु का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये

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सफलता प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से माता के सुख स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में कुछ नीरसता के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा मकानादि का लाभ पायेगा।

कर्क लग्न में १० मंगल

यदि मेष का मंगल- दसम केन्द्र पिता के स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो पिता स्थान की श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज में बहुत मान प्राप्त करेगा तथा बड़े कारबार को करने में सफलता प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में संतान और विद्या स्थान को स्वक्षेत्री दृष्टि से देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि विद्या के योग से ऊँचा पद और बड़ा कारबार करेगा तथा राज-भाषा और राजनैतिक ज्ञान को वाणी की योग्यता के द्वारा कार्य रूप में परिणत करने से प्रभाव और सफलता प्राप्त करेगा तथा बुद्धि के अन्दर तेजी, हुकूमत और कानून-कायदे को धारण करके व्यवहार करेगा और चौथी नीच दृष्टि से देह के स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता की कमी और कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से सुख भवन और मातृ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ३५८

कर्क लग्न में ११ मंगल

यदि वृषभ का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बहुत शक्ति शाली फल का दाता होता है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा और बड़े कारबार के मार्ग द्वारा धन लाभ खूब करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से संतान और विद्या के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि के कर्म योग से आमदनी और लाभ की वृद्धि करेगा तथा वाणी की योग्यता से मान और प्रभाव तथा राज-समाज की सफलता प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से धन स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन

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कर्क लग्न में २ बुध

पराक्रम शक्ति और खर्च की शक्ति तथा विवेक द्वारा धन संग्रह करने का विशेष प्रयत्न करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण धन संग्रह नहीं हो सकेगा, परन्तु इज्जत बनी रहेगी और धन का स्थान बन्धन का कार्य भी करता है, इसलिये भाई-बहिन के सुख में बहुत कमी करेगा और खर्चे को रोकने की चेष्टा करने पर भी धन का खर्च अधिक होता रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में आयु-स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का कुछ अधूरा लाभ प्राप्त करेगा।

नं. ३६२

कर्क लग्न में ३ बुध

यदि कन्या का बुध- तीसरे भाई-बहिन के स्थान पर उच्च का होकर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो पराक्रम की विशेष वृद्धि करेगा और भाई बहन को शक्ति प्राप्त करगा तथा खर्चा खूब करेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण भाई बहन के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा और देह की पराक्रम शक्ति के अन्दर कुछ अन्दरूनी कमजोरी अनुभव करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाग्य-स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म सम्बन्ध में कुछ लापरवाही रखेगा तथा पुरुषार्थ के मुकाबले में भाग्य की शक्ति को कुछ कमजोर समझेगा तथा यश की कुछ कमी प्राप्त करेगा।

नं. ३६३

कर्क लग्न में ४ बुध

यदि तुला का बुध- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो भाई बहिन का सुख प्राप्त करेगा तथा खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध सुख घर बैठे प्राप्त करेगा तथा सुख पूर्वक पराक्रम शक्ति से खर्च का संचालन करेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण से माता के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा मकान जायदाद रहने के स्थानों में कुछ टूटि युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कमजोरी के साथ-साथ पिता स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज, कारबार के सम्बन्धों में कुछ थोड़ी सफलता प्राप्त करेगा।

नं. ३६४

भृ.सं.-१४

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राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परिश्रम और खर्च की शक्ति से देह में प्रभाव और कुशलता प्राप्त करेगा, किन्तु देह में कुछ शक्ति और कुछ दुर्बलता, दोनों का अनुभव करेगा।

कर्क लग्न में ८ बुध यदि कुम्भ का बुध- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कमी या कष्ट का योग प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर कमजोरी तथा हिम्मत और उत्साह के अन्दर त्रुटि एवं आलस्यता प्राप्त करेगा और खर्च की संचालन शक्ति में कमजोरी या कमी पायेगा तथा कठिन परिश्रम और विवेक के योग से बाहरी स्थानों का

नं. ३६८ सम्बन्ध तथा खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन तथा आयु स्थान में कुछ शक्ति और कुछ कमजोरी का अनुभव करेगा और पुरातत्व के लाभ सम्बन्ध में भी कुछ विशिष्ट शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ पुरातत्व शक्ति से सम्बन्धित कार्य के द्वारा धन का लाभ कुछ त्रुटियुक्त करेगा, क्योंकि उपरोक्त सभी कार्यों में व्ययेश होने के दोष से कमजोरी करता है।

कर्क लग्न में ९ बुध यदि मीन का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर नीच का होकर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो भाई-बहिन का अपूर्ण सुख प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति का कुछ अधूरा लाभ प्राप्त करेगा और भाग्य तथा धर्म एवं ईश्वर के सम्बन्धों में बहुत थोड़ा विश्वास और थोड़ा धर्म का पालन कर सकेगा तथा बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध में सामान्य लाभ प्राप्त करेगा और

नं. ३६९ भाग्य की शक्ति से सामान्य खर्चें का योग प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य के मुकाबले में पुरुषार्थ का विशेष महत्व मानेंगा और व्ययेश होने से भाग्योन्नति के मार्ग में रुकावटें पायेगा।

यदि मेष का बुध- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष से पिता स्थान की सफलता शक्ति में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा राज समाज के सम्बन्धों में कुछ कमी लिये हुए

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कर्क लग्न में १० बुध

नं. ३७०

सफलता शक्ति बाहुबल के परिश्रम तथा विवेक के द्वारा प्राप्त करेगा और भाई-बहन की शक्ति का कुछ योग प्राप्त करेगा तथा खर्च अधिक करने से उन्नति में बाधा गेगी और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध सुन्दर व प्रभाव युक्त रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से सुख भवन को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम और खर्चे की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा।

यदि वृषभ का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पुरुषार्थ शक्ति से विवेक के द्वारा अच्छा लाभ प्राप्त करेगा तथा खर्चा खूब करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष से आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी, किन्तु बाहरी सम्बन्धों से खूब लाभ रहेगा और खर्चे के बल से आमदनी में वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से संतान स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या के पक्ष में कुछ कमी लिये हुए शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा वाणी में विवेक शक्ति से लाभ प्राप्त होगा।

कर्क लग्न में ११ बुध

नं. ३७१

कर्क लग्न में १२ बुध

यदि मिथुन का बुध- बारहवें खर्च स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी दूसरे स्थानों में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और भाई बहन के सुख में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर भी कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और विवेक रूपी पुरुषार्थ से खर्च की मजबूत संचालन शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये शांति, पुरुषार्थ और खर्च की शक्ति से शत्रु स्थान में कुछ सफलता और विवेक तथा खर्च के बल से बहुत-सी दिक्कतों पर काबू रखेगा तथा अपने अन्दर कुछ कमी या कमजोरी अनुभव करेगा, क्योंकि पुरुषार्थ का स्वामी व्ययेश हो गया है।

नं. ३७२

भाग्य, धर्म, शत्रुस्थान पति-गुरु

यदि कर्क का गुरु- देह के स्थान पर प्रथम केन्द्र लग्न में उच्च का

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कर्क लग्न में १ गुरु

नं. ३७३

होकर मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है तो देह में महान प्रभाव और सुन्दरता प्राप्त करेगा और नवम दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की महान उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म का पालन करेगा तथा भाग्य की शक्ति से सफलता और सुयश प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से संतान स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये संतान शक्ति का सुख प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि में कला कौशल और योग्यता प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ी सज्जनता का व्यवहार करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कमी या कष्ट प्राप्त करेगा और शत्रुस्थानपति होने से शत्रु पक्ष में विजय और प्रभाव रखेगा, किन्तु देह और भाग्य संतान इत्यादि मार्गों में कुछ दिक्कतें प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में २ गुरु

नं. ३७४

यदि सिंह का गुरु- धन स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाग्य और परिश्रम की शक्ति से खूब धन पैदा करेगा तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा तथा स्वार्थ युक्त धर्म का पालन करेगा और धन की शक्ति से इज्जत और मान प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में धन की शक्ति से भारी सफलता, विजय और लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पुरातत्व का लाभ और जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और नवमी दृष्टि से राज्य स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और कुछ परिश्रम के द्वारा पिता स्थान में व कारबार के सम्बन्ध में उन्नति और धन का लाभ प्राप्त करेगा तथा ननसाल पक्ष से कुछ फायदा पायेगा। यदि कन्या का गुरु- भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ तथा परिश्रम के योग से महान कार्यों के द्वारा उन्नति और यश प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कमी और क्लेश का योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी तथा कमजोरी अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से

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२१४

कर्क लग्न का फलादेश

कर्क लग्न में ३ गुरु

नं. ३७५

एक मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेगी।

कर्क लग्न में ४ गुरु

नं. ३७६

स्वयं अपनी मीन राशि, भाग्य स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये भाग्य की महान् वृद्धि करेगा तथा धर्म का पालन करेगा और शत्रु स्थान में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा तथा नवमीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और पुरुषार्थ के द्वारा कुछ थोड़ी-सी दिक्कतों से आमदनी के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा तथा हिम्मतदार एवं विजयी बनेगा, किन्तु शत्रु स्थान का स्वामी होने से हर एक मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेगी।

यदि तुला का गुरु- चौथे केन्द्र मातृ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में बैठा है तो माता के पक्ष में तथा मातृ भूमि के सम्बन्ध में कुछ निरसता के साथ सुख और सफलता प्राप्त करेगा और मकानादि होने के स्थान में कुछ तृटि लिये हुये अच्छी शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों में कुछ शान्तिप्रद वातावरण के द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और पाँचवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ निरसता के सहित जीवन की दिनचर्या में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से राज स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में परिश्रम और भाग्य की शक्ति से उन्नति और मान प्राप्त करेगा तथा कारबार व पिता के स्थान में शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा और नवम दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा परिश्रम और भाग्य की शक्ति से बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध में सफलता प्राप्त करेगा और यथा शक्ति धर्म का पालन करेगा।

यदि वृश्चिक का गुरु- पंचम त्रिकोण संतान स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से संतान पक्ष में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और थोड़े से परिश्रम के योग से भाग्य के द्वारा विद्या अध्ययन में श्रेष्ठ सफलता प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि की शक्ति से शत्रु पक्ष में सफलता और यश प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और संतान के योग से भाग्य की महान् वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म शास्त्र का ज्ञान और धर्म का पालन करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु

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शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के साथ लाभ की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा नवमीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बड़ी भारी सुन्दरता और प्रभाव और सुयश की शक्ति प्राप्त करेगा तथा हृदय में उत्तम ज्ञान धारण करेगा, किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के कारण बुद्धि, संतान, भाग्य, देह, धर्म इत्यादि सभी मार्गों में कुछ-कुछ परेशानी का योग मिश्रित रहेगा। यदि धन का गुरु- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और शत्रु पक्ष में भाग्य की शक्ति से बड़ी सफलता और सुयश प्राप्त करेगा।

किन्तु भाग्यपति गुरु छठें घर में बैठा है, इसलिये भाग्य की उन्नति में बड़ी-बड़ी दिक्कतें और विलम्ब का योग प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से राज्य स्थान को एवं पिता स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में बड़ी सफलता उन्नति और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा नवमीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन-जन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा, किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के नाते उपरोक्त सभी सम्बन्धों में कुछ दिक्कतें पैदा करेगा अर्थात् भाग्य के हर एक सम्बन्धों में कुछ झगड़े-झंझटों का योग प्राप्त करता रहेगा, किन्तु प्रभाव की वृद्धि हमेशा चलती रहेगी।

यदि मकर का गुरु- सातवीं स्त्री स्थान पर नीच का होकर शत्रु शनि की राशि में बैठा है तो स्त्री स्थान में कुछ कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ दिक्कतें प्राप्त करेगा तथा शत्रु-पक्ष और भाग्य के सम्बन्ध में कमजोरी अनुभव करेगा और पाँचवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये दैनिक परिश्रम के योग से धन लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से

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कर्क लग्न में १० गुरु

बैठा है तो पिता स्थान में उन्नति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज, कारबार के स्थान में मान-प्रतिष्ठा और सफलता प्राप्त करेगा और लौकिक धर्म-कर्म का पालन बड़ी योग्यता से करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और कर्म की शक्ति से धन-जन की वृद्धि करेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के साथ सुख की प्राप्ति खूब करेगा और नवमीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट तथा परिश्रम के योग से पदोन्नति और भाग्योन्नति करेगा तथा छठें स्थान का स्वामी होने के कारण उन्नति के मार्गों में कुछ दिक्कतें सहन करेगा और भाग्यशाली समझा जायेगा।

यदि वृषभ का गुरु- ग्यारहवें लाभ-स्थान में कर्क लग्न में

सामान्य शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है तो भाग्य की शक्ति और परिश्रम के योग से आमदनी एवं लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष से भी लाभ प्राप्त करेगा और धर्म का पालन करेगा तथा आमदनी के मार्ग में पाप-पुण्य का ध्यान रखेगा और पाँचवीं दृष्टि से भाई-बहिन के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ा-सा मन-मुटाव के साथ भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और पराक्रम शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से सन्तान और विद्या स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और नवमीं नीच दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के पक्ष में कमजोरी और कष्ट का अनुभव करेगा तथा बड़प्पन के मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा।

यदि मिथुन का गुरु- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा। भाग्य और परिश्रम के योग से बाहरी सम्बन्धों की सफलता और खर्च संचालन की शक्ति प्राप्त रहेगी; किन्तु भाग्य में कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा, परन्तु छठें घर का स्वामी होकर धर्मेश खर्च स्थान में बैठा है, इसलिये किसी रोग सम्बन्धी गरीबों की सहायता में किसी प्रकार से खर्च करेगा

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कर्क लग्न का फलादेश

कर्क लग्न में १२ गुरु

और पाँचवीं दृष्टि से सुखभवन को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परिश्रम और भाग्य की शक्ति से सुख के साधनों में सहायता प्राप्त करेगा और मातृ स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी धन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ खर्च और भाग्य की सहायता से सफलता प्राप्त करेगा और नवमीं दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में एवं आयु स्थान में कुछ नीरसता के साथ सफलता प्राप्त करेगा और कुछ पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा।

धनलाभ, माता, भूमि-स्थानपति-शुक्र

कर्क लग्न में १ शुक्र

यदि कर्क का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है तो देह की चतुराई के योग से बड़ा सुख और लाभ प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता प्राप्त करेगा और मातृ स्थान का सुख प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख और रहने के स्थानों में सुख प्राप्ति के साधनों पर सुन्दर अधिकार रखेगा तथा आमदनी और चतुराई के योग से आनन्द का अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि में स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री-पक्ष में सुख और सफलता प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग से खूब लाभ प्राप्त करेगा और भोगादिक के पक्ष में विशेष रुचि और सफलता प्राप्त करेगा और लग्न में शुक्र के बैठने से अनेक प्रकार की सफलता और मान प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में २ शुक्र

यदि सिंह का शुक्र- धन स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो कुछ थोड़े से असंतोष के साथ धन की शक्ति स्र सुख प्राप्त करे। और कुछ वैमनस्यता के साथ कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा और कभी-कभी धन लाभ अच्छा पायेगा और धनवान्, इज्जतदार समझा जायेगा तथा कुछ मकानादि का सुख प्राप्त करेगा और मातृ स्थान के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा, क्योंकि धन स्थान कुछ बन्धन का रूप होता है, इसके अतिरिक्त

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करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या की अपनी स्थिति का संचालन करेगा अर्थात् अपनी स्थिति के अन्दर ही सुख के साधनों की प्राप्ति करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन भवन को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिए धन को संग्रह करने की परवाह नहीं करेगा और कुटुम्ब सुख की थोड़ी शक्ति का योग प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में ९ शुक्र

यदि मीन का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की राशि में उच्च का होकर बैठा है तो भाग्य की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और भाग्य की शक्ति से विशेष लाभ प्राप्त करेगा और मात्र स्थान का तथा मकानादि का श्रेष्ठ सुख प्राप्त करेगा और घरेलू सुख प्राप्ति के उत्तम साधन भाग्य की शक्ति से ही प्राप्त करेगा और धर्म का पालन सुखपूर्वक आनन्द के साथ करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख साधनों में कमी या कमजोरी प्राप्त करेगा और भाग्य शक्ति की तुलना में पुरुषार्थ शक्ति को छोटा समझेगा, इसलिये भाग्य की शक्ति में अधिक भरोसा और सुख का अनुभव करेगा।

नं. ३९३

कर्क लग्न में १० शुक्र

यदि मेष का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में बड़ा सुख और लाभ प्राप्त करेगा तथा राजसमाज में बड़ा भारी मान और सुख प्राप्त करेगा और कारबार के मार्ग में बड़ी भारी सुख और सफलता पायेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी तुला राशि में मात्र तथा सुख भवन को स्वक्षेत्री दृष्टि से देख रहा है, इसलिये माता का गौरव और लाभ प्राप्त करेगा तथा घरेलू मकानादि का सुन्दर लाभ तथा सुख प्राप्त करेगा और बड़ी गम्भीर चतुराईयों के योग से बड़ी भारी उन्नति प्राप्त करेगा तथा सुन्दरता और सजावट पसंद करेगा।

नं. ३९४

यदि वृषभ का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और सुख प्राप्ति के उत्तम साधन पायेगा मातृ-स्थान का सुन्दर लाभ प्राप्त

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अष्टमेश के दोष से स्त्री व गृहस्थ में कुछ परेशानी भी रहेगी और इसी प्रकार कुछ परेशानी के योग से रोजगार के मार्ग में सफलता रहेगी और भोगादिक वस्तुओं की विशेष लालसा रहेगी तथा दसवीं नीच दृष्टि से पिता स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ कमी और परेशानी प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध में और कारबार के सम्बन्ध में कुछ मान प्रतिष्ठा और सफलता की कमी प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में २ शनि

यदि सिंह का शनि-धन द्वितीय भाव स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन संग्रह के कोष में हानि प्राप्त करेगा और कुटुम्ब में भी हानि या परेशानी प्राप्त करेगा और शनि के अष्टमेश होने का दोष तथा धन भवन में बन्धन होने का दोष है, अतः दोनों दोष होने के कारणों से स्त्री स्थान का सुख कंटक युक्त अपूर्ण रहेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से सुख भवन को तथा भूमि स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है,

नं ३१८

इसलिये सुख प्राप्ति के महान् साधन प्राप्त करेगा और भूमि की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और अमीरात का जीवन व्यतीत करेगा और दसवीं दृष्टि से लाभ-स्थान को मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की आमदनी बहुत उत्तम रहेगी और सप्तमेश, अष्टमेश होने के दोष के कारण से रोजगार के मार्ग में परिश्रम के योग से धन पैदा करेगा, किन्तु धन और कुटुम्ब के अभाव का योग रहेगा।

कर्क लग्न में ३ शनि

यदि कन्या का शनि-भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन के स्थान में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और पराक्रम तथा पुरुषार्थ की वृद्धि करेगा, क्योंकि तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये परिश्रम के योग से रोजगार की वृद्धि करेगा, स्त्री और पुरातत्व शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा तीसरी दृष्टि से सन्तान स्थान को शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख

नं ३१९

रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा वाणी में कुछ क्रोध रखेगा और विद्या स्थान में कुछ परेशानी पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये

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कर्क लग्न में ६ शनि

यदि धनु राशि का शनि- छठें शत्रु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद और प्रभाव प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम के द्वारा परेशानी को दूर करनेवाले प्रभावशाली कार्य करेगा और तीसरी दृष्टि से आयु स्थान को स्वेच अपनी कुंभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ दिक्कतों के साथ पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान में बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी दूसरे स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से पराक्रम तथा हिम्मत की वृद्धि करेगा और भाई के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा। छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान हो जाता है, इसलिये प्रभाव युक्त जीवन रहेगा किन्तु अष्टमेश होने के कारण से कुछ दिक्कतें भी पैदा करेगा है।

नं. ४०२

कर्क लग्न में ७ शनि

यदि मकर का शनि- सातवें केन्द्र स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो गृहस्थ के अन्दर किसी एक मार्ग में विशेष चमत्कार और रोजगार मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा और आयु तथा स्त्री-स्थान में भी शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के कारण स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाइयाँ प्राप्त करेगा और भोगादिक सुखों की विशेष इच्छा रखेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये गृहस्थ के सम्बन्धों से भाग्य में त्रुटि अनुभव करेगा और धर्म की श्रद्धा में कुछ कमी पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये सुन्दरता और स्वास्थ्य में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा दसवीं उच्च दृष्टि से चौथे सुख भवन को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान में तथा घरेलू सुख साधनों में तथा मकानादि के सम्बन्धों में शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ४०३

यदि कुम्भ का शनि- आठवें स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व की शक्ति पायेगा और सप्तमेश के अष्टम में बैठने के नाते स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में निजी स्थान के अन्दर परेशानी प्राप्त करेगा और दूसरे बाहरी स्थानों के अन्दर रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी नीच

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कर्क लग्न का फलादेश दृष्टि से पिता स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में एवं कारबार में कमजोरी या परेशानी प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति में कमी प्राप्त करेगा तथा कुटुंब में कुछ क्लेश या कमी पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से संतान स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में और दिमाग में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा।

कर्क लग्न में ९ शनि यदि मीन का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य- स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा स्त्री व रोजगार की शक्ति पायेगा और गृहस्थ तथा जीवन की तरफ से भाग्य में कुछ दु:ख सुख की अनुभवे करेगा और पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा तीसरी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में भाग्य के सहयोग से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन के स्थान में कुछ झूंटे अनुभव करेगा और पराक्रम की उन्नति करेगा तथा दसवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ अड़चनों के साथ शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े झंझटों के मार्ग में हिम्मत से काम लेगा तथा धर्म और भाग्य के सम्बन्धों में दिखावटी उन्नति तथा अन्दरूनी कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा, किन्तु प्रकट में बड़ा भारी भाग्यवान समझा जायेगा।

कर्क लग्न में १० शनि यदि मेष का शनि- दसवें केन्द्र पिता स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो पिता स्थान के सुख में कंटक प्राप्त करेगा तथा राज-समाज, कारबार के सम्बन्धों में एवं उन्नति के मार्ग में दिक्कतें और परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या और आयु स्थान में दिक्कतें प्राप्त करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा

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है, इसलिये खर्च अधिक होने के कारण खर्च में कुछ प्रयत्नशील रहेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से सुख भवन को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मकान, जायदाद व घरेलू सुख के साधन प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में स्त्री एवं रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा तथा भोगादिक मार्ग में प्रयत्नशील रहेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण स्त्री तथा कारबार के पक्षों में कुछ कमजोरी लिये विकटताओं के साथ कार्य संचालन करेगा तथा गुप्तनीति से भी कार्य-क्रम करता रहेगा।

कर्क लग्न में ११ शनि

यदि वृषभ का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो अच्छी आमदनी प्राप्त करता हुआ स्त्री का लाभ प्राप्त करेगा, किन्तु कू्र ग्रह का लाभ स्थान में बैठना श्रेष्ठ होता है और अष्टम स्थानपति होना कुछ कष्ट दायक होता है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में लाभ भी रहेगा और कुछ कष्ट एवं कुछ प्रपंच भी रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी एवं कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट अनुभव करेगा और विद्या में कुछ कमी पायेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कुम्भ राशि में आयु स्थान को स्वक्षेत्री दृष्टि से देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और पूरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा।

नं. ४०७

कर्क लग्न में १२ शनि

यदि मिथुन का शनि- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा तथा स्त्री स्थान में हानि और बाहरी स्थानों में सफलता प्राप्त करेगा तथा आयु के सम्बन्ध में कभी-कभी चिन्तायें होती रहेंगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये नगद धन की तरफ से चिन्तायें रहेंगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ परेशानियाँ रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ झंझट और प्रभाव रहेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की तरफ से कुछ चिन्तायें रहेंगी और धर्म के पालन में कुछ

नं. ४०८

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२२८

कर्क लग्न का फलादेश

प्रपंच रहेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी होते हुये भी खर्चे की शोभा रहेगी और खर्च की अधिकता के कारणों से जीवन में शानदार और आमोद-प्रमोद रहेगा।

कष्ट, चिन्ता, गुप्त युक्ति के अधिपति-राहु

यदि कर्क का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान

कर्क लग्न में १ राहु

में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में सुन्दरता की कमी करेगा और किसी प्रकार की चिन्ता हृदय में बनी रहेगी और कभी-कभी बड़ी भारी मुसीबतों का सामना करने की स्थिति प्राप्त करेगा और गुप्त रूप से कोई पेचीदा युक्ति के द्वारा मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा अपने अन्दर किसी प्रकार से खास किस्म की कमी अनुभव करेगा और अपनी उन्नति के लिये विशेष प्रयत्नशील रहेगा और अपने स्वास्थ्य सम्बन्ध की कोई चिन्ता का योग प्राप्त करेगा।

नं. ४०९

कर्क लग्न में २ राहु

यदि सिंह का राहु- धन द्वितीय भाव स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन स्थान में हानियाँ और परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा धन के सम्बन्ध में कभी-कभी महान् संकट का समय प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के सुख सम्बन्धों में हानि और कमी प्राप्त करेगा तथा धन की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन कार्य करने में उद्यत रहेगा और कोई गुप्त पेचीदा कर्म को बड़ी भारी हिम्मत के साथ कार्य रूप में परिणित करके धन की वृद्धि करने का साधन प्राप्त करेगा तथा इज्जत-आबरू की रक्षा और वृद्धि के लिये चिन्ता युक्त रहेगा तथा मुफ्त का-साथ धन भी कभी-कभी प्राप्त करेगा।

नं. ४१०

कर्क लग्न में ३ राहु

यदि कन्या का राहु- तीसरे पराक्रम और भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो तीसरे स्थान पर कूर ग्रह बलवान् हो जाता है और कन्या पर बैठा हुआ राहु स्वक्षेत्र के समान हो जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति की बहुत वृद्धि करेगा तथा महान् हिम्मत शक्ति से काम लेगा और प्रभाव की शक्ति रखेगा और भाई-बहिन के स्थान में कुछ झंझट प्राप्त करेगा तथा अपने कार्य

नं. ४११

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की सिद्धि करने के लिये गुप्त शक्ति के पराक्रम योग से बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और अदरूनी तौर से अपने अदर प्रभाव शक्ति को कायम रखने के लिये भारी प्रयतशील रहेगा और कभी-कभी अपने अदर अदरूनी तौर की कमजोरी अनुभव करेगा।

यदि तुला का राहु- चौथे केन्द्र माता के स्थान कर्क लग्न में ४ राहु पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में कुछ परेशानी और भातृस्थान के सुख सम्बन्धों में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा घरेलू रहन-सहन और घर के अदरूनी वातावरण में कुछ अशांति का अनुभव करेगा तथा मकानादि भूमि की कमी प्राप्त करेगा और सुख शांति के साधनों को प्राप्त करने के लिये बड़ी भारी गुप्त युक्तियों और चतुराईयों से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु कभी-कभी विशेष अशांति के कारणों से बड़ा दुःख अनुभव करेगा और बहुत समय के बाद शांति से कारणों को प्राप्त करेगा।

नं. ४१२

यदि वृश्चिक का राहु- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो सन्तान स्थान में कष्ट अनुभव करेगा और विद्या ग्रहण करने में परेशानी प्राप्त करेगा तथा दिमाग के अदर चिन्तायें अनुभव करेगा तथा छिपाव शक्ति और जिद्दबाजी से काम लेगा और बुद्धि के अदर कुछ कमजोरी महसूस करते हुए भी प्रकट में बड़ी भारी बचाव की बातें कहकर तथा बुद्धिमत्ता दिखाकर कार्य करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ विलम्ब और दिक्कतों के बाद शक्ति प्राप्त करेगा और राज्येश मंगल की राशि पर बैठा होने से कानूनी तरीके की बातें करेगा।

कर्क लग्न में ५ राहु नं. ४१३

यदि धनु का राहु- शत्रु-स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में कुछ परेशानी अनुभव करेगा, क्योंकि छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये छिपी हुई तरकीबों से और भेद नीत से शत्रु को दमन करेगा और ननसाल पक्ष में हानि या कमजोरी पायेगा तथा झगड़े-झंझटों में कुछ परेशानियों से मार्ग प्राप्त करेगा तथा गुप्त युक्ति और गुप्त शक्ति का भरोसा रखेगा तथा पाप-पुण्य की परवाह नहीं करेगा।

कर्क लग्न में ६ राहु नं. ४१४

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कर्क लग्न का फलादेश

यदि मकर का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में परेशानी प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी चिन्ताओं के साथ कार्य संचालन करेगा तथा स्त्री और रोजगार की सफलता के लिये गुप्त युक्ति और कुटिलताइयों से काम निकालेगा तथा स्त्री और रोजगार के मार्ग से विशेष सफलता पाने के लिये कोई विशेष तरकीब निकालेगा। कभी इन्द्रिय विकार प्राप्त करेगा। वैसे जाहिरा की सफलता के मुकाबले में अन्दरूनी कुछ कमी के कारणों से दुःख अनुभव करेगा तथा कभी-कभी गृहस्थ के सम्बन्धों में महान् कष्ट का योग प्राप्त करेगा और अन्त में शक्ति पायेगा।

कर्क लग्न में ७ राहु

नं. ४१५

कर्क लग्न में ८ राहु

यदि कुम्भ का राहु- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो आयु के स्थान में कभी-कभी कोई विशेष चिंता प्राप्त करेगा तथा जीवन में बड़ी कड़ी चिंतायें प्राप्त करेगा और उदर के अन्दर किसी प्रकार की दिक्कत का योग प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध की कुछ चिंता एवं हानि प्राप्त करेगा और जीवन निर्वाह करने के सम्बन्ध में कुछ फिकर मंडी रहेगी और जीवन (जिन्दगी) के लिये विशेष मजबूती पहुँचाने के लिये कोई गुप्त युक्ति के बल से कार्य करेगा और जीवन में बहुत सी दिक्कतों के बाद कोई शक्ति प्राप्त करेगा और अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा।

नं. ४१६

कर्क लग्न में ९ राहु

यदि मीन का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो भाग्य के सम्बन्ध में चिंता प्राप्त करेगा और धर्म का पालन दिखावटी करेगा, किन्तु अन्दरूनी तौर से धर्म के स्थान में हानि प्राप्त करेगा और भाग्य की उन्नति के लिये महान् कठिन युक्तियों से कार्य करेगा और भाग्य में कभी-कभी महान् भीषण संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा, किन्तु मुशीबतों के बाद भाग्य की उन्नति का मार्ग प्राप्त करेगा और फिर भी गुप्त युक्ति से सफलता पाने पर भी भाग्य के सम्बन्ध में कुछ फिकर बनी रहेगी और कुछ मुफ्त का-सा भाग्य से लाभ भी प्राप्त करेगा।

नं. ४१७

यदि मेष का राहु- दसवें केन्द्र पिता स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर

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कर्क लग्न में १० राहु

बैठा है तो पिता स्थान में हानि तथा सुख की कमी प्राप्त करेगा और राजसमाज मान-प्रतिष्ठा आदि के मार्गों में कुछ कमजोरी या कष्ट प्राप्त करेगा और किसी बड़ी उन्नति, कारबार के सम्बन्धों में परेशानी से सफलता प्राप्त करेगा तथा बार-बार दिक्कतों से टकराते रहने के कारणों से निराशायें प्राप्त करेगा और कुछ गुप्त युक्तियों के वैदिक कर्म से मान-प्रतिष्ठा की रक्षा करेगा और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये बड़ी बहादुरी तथा हिम्मत से कार्य करेगा।

नं. ४१८

कर्क लग्न में ११ राहु

यदि वृषभ का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की वृष राशि पर बैठा है तो बड़ी गहरी चतुराई के योग से धन का लाभ खूब करेगा। यद्यपि राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी, तथापि ग्यारहवें स्थान पर कूर ग्रह बलवान हो जाता है, इसलिये लाभ और मुनाफा की वृद्धि करेगा और कुछ मुफ्त का-सा लाभ प्राप्त करने की विशेष चेष्टा करके सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु कभी-कभी लाभ में किसी गहरे संकट का सामना करने की स्थिति प्राप्त करेगा और अधिक लाभ की खुशी होने पर भी लाभ के मार्ग में अन्दरूनी कुछ कमी अनुभव करेगा।

नं. ४१९

कर्क लग्न में १२ राहु

यदि मिथुन का राहु- बारहवें खर्च के स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्च बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष युक्ति बल के द्वारा विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों में बड़ा भारी मान और प्रभाव प्राप्त करेगा और खर्चा बढ़ाने में तथा बाहरी सम्बन्धों में सदैव बहुत गहरी-गहरी योजनायें बनायेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण खर्च की अधिकता और बाहरी सम्बन्धों के कार्यों में गुप्त रूप से कुछ कमी अनुभव करेगा, किन्तु उपरोक्त कार्यों में अपनी कुछ गुप्त कमजोरी की कमी प्रकट नहीं होने देगा तथा बड़ी भारी बुद्धिमत्ता की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा।

नं. ४२०

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कष्ट, कठिन-कर्म, गुप्त शक्ति के अधिपति-केतु

कर्क लग्न में १ केतु यदि कर्क का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर परम शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर कोई खास चोट या घाव का योग प्राप्त करेगा और देह की सुन्दरता और सुडौलता में कमी प्राप्त करेगा तथा किसी प्रकार से कोई रोग या चिन्ता का योग प्राप्त करता रहेगा और कभी चेचक की बीमारी भी रहेगी तथा मन के अधिकारी चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये कुछ गुप्त मानसिक क्लेश के कारण देह में कभी-कभी कोई मृत्यु तुल्य संकट का योग प्राप्त करेगा तथा अपनी प्रसिद्धता और प्रभाव के लिये कोई कठिन प्रयत्न गुप्त शक्ति के योग से करेगा।

नं. ४२१

कर्क लग्न में २ केतु यदि सिंह का केतु- दूसरे धन स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में विशेष हानि और संकट प्राप्त करेगा तथा धन के अभाव से बड़ी भारी दिक्कतों का सामना करने की स्थिति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में बड़ी कमी और क्लेश प्राप्त करेगा। धन द्वारा कार्य संचालन करने के लिये दूसरों से उधार भी लेना पड़ेगा, किन्तु फिर भी धन की व्यवस्था को सुचारू रूप में न कर सकने के कारण कठिन प्रयत्न और दौड़-धूप करने परेशानी से ईज्जत-आबरू प्राप्त करेगा और धन प्राप्ति के लिये कभी जोखिम उठा कर काम करेगा और धन की शक्ति का विशेष प्रभाव दिखाने की कोशिश करेगा।

नं. ४२२

कर्क लग्न में ३ केतु यदि कन्या का केतु- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाई के स्थान में परेशानी प्राप्त करेगा, किन्तु तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान हो जाता है, इसलिये हिम्मत और पराक्रम शक्ति की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा गुप्त विवेक शक्ति के सम्बन्ध में महान परिश्रम करके विशेष सफलता प्राप्त करेगा और नरमाई तथा शील का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा तथा जाहिरा में विशेष हिम्मत शक्ति का प्रदर्शन करने पर भी अन्दरूनी तौर से कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और प्रभाव युक्त रहेगा।

नं. ४२३

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कर्क लग्न में १० केतु

पर बैठा है तो पिता स्थान में हानि एवं कष्ट प्राप्त करेगा और राज समाज के सम्बन्धों में कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा कारबार की उन्नति के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा और कभी-कभी मान-प्रतिष्ठा स्थान में भारी संकट प्राप्त करेगा तथा गुप्त हिम्मत शक्ति के द्वारा अपनी इज्जत-आबरू को ऊँचा उठाने का प्रयत्न करेगा और कठिन कर्म की शक्ति का भरोसा रखेगा।

नं. ४३०

कर्क लग्न में ११ केतु

यदि वृषभ का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में खूब सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, क्योंकि ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये अधिक मुनाफा खाने के लिये भारी परिश्रम करेगा और शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी चतुराई और गुप्त शक्ति के द्वारा आमदनी के स्थान में वृद्धि प्राप्त करेगा, किन्तु अपने स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में परेशानी के योग कभी-कभी प्राप्त करेगा और स्वार्थ युक्त रहेगा।

नं. ४३१

कर्क लग्न में १२ केतु

यदि मिथुन का केतु- बारहवें खर्च स्थान में नीच राशि का होकर मित्र बुध की मिथुन राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में महान् संकट उपस्थित करेगा और बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्धों में कष्ट एवं परेशानी प्राप्त करेगा तथा खर्च की संचालन शक्ति को प्राप्त करने के लिये महान् कष्ट साध्य परिश्रम करेगा। किन्तु फिर भी खर्च की पूर्ति सुचारू रूप में संतोषजनक नहीं कर सकेगा तथा खर्च के मार्ग में कुछ गुप्त शक्ति के बल से काम निकालेगा। किन्तु कभी-कभी खर्च के स्थान में आन्तरिक विशेष दुःख अनुभव करेगा।

नं. ४३२

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७३६

कर्क लग्न का फलादेश

॥ कर्क लग्न समाप्त ॥

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सिंह लग्न का फलादेश प्रारम्भ

(कुण्डली नं० ५४० तक में देखिये)

प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ४३३ से लेकर कुण्डली नं० ५४० तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो, उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले

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कुण्डली नं. ४४२ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४३ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४४ के अनुसार मालूम करिये।

(५) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ४४५ से ४५६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४५ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४६ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४७ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४८ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५० के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५१ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५२ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५४ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५५ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५६ के अनुसार मालूम करिये।

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५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६९ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७०के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७१ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७२ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७३ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७४ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७५ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७६ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७७ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७८ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४८० के अनुसार मालूम करिये।

(५) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल

आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४८१ से ४९२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८१ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८२ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली

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८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८८ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८९ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९० के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९२ के अनुसार मालूम करिये।

( ५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ४९३ से ५०४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये।

५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९४ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९५ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९६ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९७ के अनुसार मालूम करिये।

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१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९८ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९९ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०० के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०१ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०२ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०३ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०४ के अनुसार मालूम करिये।

(५) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल

आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं ५०५ से ५१६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये।

५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०५ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०६ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०७ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०८ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१० के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५११ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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कुण्डली नं. ५१२ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१४ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१५ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१६ के अनुसार मालूम करिये।

(५) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल

आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ५१७ से ५२८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१७ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१८ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१९ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२० के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२१ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२२ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२३ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२४ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२५ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२६ के अनुसार मालूम करिये।

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३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२७ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२८ के अनुसार मालूम करिये।

( ५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५२९ से ५४० तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२९ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३० के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३१ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३२ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३३ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३४ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३५ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३६ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३७ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३८ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५४० के अनुसार मालूम करिये।

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सिंह लग्न में ७ सूर्य बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति का सम्बन्ध प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में कठिन परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा। स्त्री तथा गृहस्थ के संचालन में नीरसता का अनुभव करेगा, किन्तु फिर भी गृहस्थिक मार्ग के भोगादिक पक्ष में आत्मीयता रखेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी सिंह राशि में देह स्थान को स्वक्षेत्र रूप में देख रहा है, इसलिये देह में शक्ति और स्वाभिमान रखेगा तथा गृहस्थ धर्म के संचालन मार्ग से कुछ ऊँचा नाम करने की कोशिश करेगा।

नं. ४३९

सिंह लग्न में ८ सूर्य यदि मीन का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा बाहरी दूसरे स्थान का सम्बन्ध प्राप्त करेगा और जीवन निर्वाह की शक्ति को तथा कुछ पुरातत्व सम्बन्ध को स्वयं अपनी दैहिक शक्ति के योग से प्राप्त करेगा और अपने जीवन की दिनचर्या में प्रभाव प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ा प्रयत्न करेगा और धन-जन के मार्ग में कुछ सफलता प्राप्त करेगा तथा क्रोधी बनेगा।

नं. ४४०

सिंह लग्न में ९ सूर्य यदि मेष का सूर्य- भाग्य स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की बड़ी शक्ति प्राप्त करेगा और देह में बड़ी भारी प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा धर्म और ईश्वर में विश्वास करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा तथा देह में स्थूलता प्राप्त करेगा। सातवीं नीच दृष्टि से भाई के स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सम्बन्ध असंतोष रूप में प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में लापरवाही करेगा तथा पुरुषार्थ की तुलना में भाग्य को बड़ा मानेगा और कभी-कभी किसी छोटे कार्य को करेगा।

नं. ४४१

यदि वृषभ का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता स्थान में शत्रु शुक्र की वृष राशि

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सिंह लग्न में ४ चन्द्र

यदि वृश्चिक का चन्द्र- चौथे मातृ स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो माता के सुख स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि की शक्ति में कष्ट एवं कमी के कारण प्रदान करेगा तथा घर के अन्दर खर्च की कमी के कारणों से परेशानी का अनुभव करेगा और मानसिक अशान्ति का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से राज्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में मनोयोग की शक्ति से मान प्राप्त करेगा और पितास्थान के सम्बन्ध में ऊँची भावना रखेगा।

नं. ४४८

सिंह लग्न में ५ चन्द्र

यदि धनु का चन्द्र- पाँचवें संतान स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष के कारणों से सन्तान पक्ष में बाधा प्राप्त करेगा तथा विद्या में कमजोरी पायेगा और दिमाग के अन्दर खर्च के कारणों से परेशानी अनुभव करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से मनोयोग के द्वारा खर्च का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभस्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च और बुद्धि के संयोग से लाभ की सूrat पैदा करेगा तथा आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा।

नं. ४४९

सिंह लग्न में ६ चन्द्र

यदि मकर का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो कुछ परतन्त्रता या परेशानियों के योग से मनोबल के द्वारा खर्च की संचालन शक्ति प्राप्त करेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण शत्रु पक्ष में या झगड़े झंझट में या रोगादि कार्यों में भी असन्तोषप्रद रूप से नाजायज खर्च करना पड़ेगा, इसलिये किसी भी परेशानियों के कारण मन को दुःख अनुभव होगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कर्क राशि में खर्च स्थान को स्वक्षेत्र के रूप में देख रहा है, इसलिये खर्च की कुछ परेशानी होते हुए भी खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों का कुछ परिश्रम युक्त सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में मनोयोग की नरम शक्ति और खर्च के द्वारा कार्य चलायेगा।

नं. ४५०

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प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में भाग्य स्थान को स्वक्षेत्र के रूप में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के सरल योग से भाग्य की उत्तम शक्ति और वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म कार्य का पालन करेगा और यश की प्राप्ति होगी और आठवीं दृष्टि से राज्य-स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा व्यापारिक क्षेत्र में और पिता स्थान में उन्नति और सुख प्राप्त करेगा।

सिंह लग्न में ४ मंगल

यदि वृश्चिक का मंगल- चौथे माता के स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो माता की शक्ति प्राप्त करेगा और मकानादि भूमि का सुख प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण के अन्दर भाग्य बल शक्ति से सुख के महान साधन प्राप्त करेगा और चौथी शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मर्ग के द्वार स्त्री स्थान में सुख और सफलता प्राप्त करेगा तथा कुछ

नं. ४६०

अरूचिकर रूप से रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से पिता स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता और सुख प्राप्त करेगा और भाग्यलवान् समझा जायेगा।

सिंह लग्न में ४ मंगल

यदि धन का मंगल- पाँचवें स्थान में मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो संतान पक्ष से सुख और सफलता प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में सुख और सफलता के साथ-साथ यश प्राप्त करेगा और माता तथा मातृ स्थान का सहयोग और अनुराग मानेगा तथा धर्म और न्याय की बात को कहना और समझना पसंद करेगा और चौथी दृष्टि से आयु स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त करेगा और

नं. ४६१

जीवन की दिनचर्या में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य शक्ति के द्वारा लाभ प्राप्ति के अच्छे साधन प्राप्त करेगा और आठवीं नीच दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा

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सिंह लग्न में ८ मंगल

घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की कमी और कष्ट प्राप्त करेगा तथा आयु और पुरातत्व शक्ति का सुख लाभ प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की प्राप्ति में सफलता पायेगा तथा आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में भाई-बहिन के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में सुख प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की शक्ति प्राप्त करेगा और यश तथा बरकत में विशेष कमी प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में उमंग प्राप्त करेगा।

नं. ४६४

सिंह लग्न में ९ मंगल

यदि मेष का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो भाग्य की महान शक्ति प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन करेगा और चौथी नीच दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों में परेशानी के योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग से भाई-बहिन की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। आठवीं दृष्टि से माता के स्थान को एवं सुख स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता के स्थान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा मकानादि रहने के सुख सम्बन्धों में उन्नति प्राप्त करेगा और सुख के अच्छे साधन प्राप्त करेगा।

नं. ४६५

सिंह लग्न में १० मंगल

यदि वृषभ का मंगल- दशम केन्द्र राज्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो भाग्य शक्ति के बल से राज-समाज में विशेष सफलता और मान प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान में और कारबार के सम्बन्धों में उन्नति प्राप्त करेगा तथा धर्म-कर्म का पालन करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और भाग्यवानी

नं. ४६६

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२५८ सिंह लग्न का फलादेश

के लक्षण प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये मातृ सुख और घरेलू सुख प्राप्त करेगा तथा मकानादि भूमि की शक्ति प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से संतान और विद्या के स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या के स्थान में भाग्य की शक्ति से सफलता और सुख प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ी सज्जनताई की बातें करेगा।

सिंह लग्न में ११ मंगल

यदि मिथुन का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की मिथुन राशि पर बैठा है तो भाग्य की शाक्ति से सुख पूर्वक धन लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा लाभ स्थान में कूर ग्रह प्रबल हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और भूमि और मकानादि एवं माता के पक्ष से लाभ प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से धन भवन को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह के साधन प्राप्त करेगा और कुटुंब की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान स्थान को एवं विद्या स्थान को देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या के पक्ष में सुख सफलता प्राप्त करेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में भाग्य शक्ति द्वारा बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और रोगादि झगड़े-झंझटों में बड़ी भारी हिम्मत से सफलता प्राप्त करेगा तथा ननसाल पक्ष से सुख प्राप्त करेगा।

नं. ४६७

सिंह लग्न में १२ मंगल

यदि कर्क का मंगल- बारहवें खर्च स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में परेशानी प्राप्त करेगा और भाग्य की तरफ से कष्ट अनुभव करेगा और मातृ स्थान की तरफ से सुख सम्बन्धों में भारी कमी का योग प्राप्त करेगा, बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति से सफलतां प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों में हिम्मत से काम

नं. ४६८

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निकालेगा और आठवीं दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के योग से स्त्री तथा रोजगार का लाभ और सुख प्राप्त करेगा और धर्म की परवाह नहीं करेगा।

धन, कुटुम्ब, आमदस्थानपति-बुध

सिंह लग्न में १ बुध

यदि सिंह का बुध-देह के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा देह और विवेक शक्ति के योग से धन की अच्छी आमदनी प्राप्त करेगा तथा धन की संग्रह शक्ति का साधन पायेगा और धनवान् तथा इज्जतदार समझा जायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की शक्ति से स्त्री व गृहस्थ का लाभ प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता और उन्नति प्राप्त करेगा और देह में सुन्दरता एवं मार्ग की शक्ति पायेगा तथा धन प्राप्ति का मुख्य दृष्टिकोण रखेगा।

नं. ४६९

सिंह लग्न में २ बुध

यदि कन्या का बुध- द्वितीय धन भवन में उच्च का होकर स्वयं अपने क्षेत्र में बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति का उत्तम कोष प्राप्त करेगा और धन की शक्ति से धन की वृद्धि करने के और धन लाभ प्राप्त करेगा तथा धनवान् इज्जतदार समझा जायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से अष्टम आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में कई बार कष्ट एवं चिन्ताओं के कारण प्राप्त करना तथा पुरातत्व शक्ति की कमजोरी पायेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी पायेगा तथा उदर में विकार प्राप्त करेगा।

नं. ४७०

सिंह लग्न में ३ बुध

यदि तुला का बुध- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाई बन्धु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा धन की सफलता प्राप्त करेगा और विवेक बल से आमदनी के मार्ग में तथा उन्नति के मार्ग में उन्नति करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति प्राप्त करेगा तथा धन के द्वारा धर्म का पालन करेगा और पुरुषार्थ

नं. ४७१

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२६०

सिंह लग्न का फलादेश

कर्म के योग से यश प्राप्त करेगा और कुटुम्ब शक्ति का सहयोग अच्छा प्राप्त करेगा और धन कमाने के मार्ग में बड़ी हिम्मत से काम करेगा।

सिंह लग्न में ४ बुध

यदि वृश्चिक का बुध- चौथे मातृ स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है, तो धन संग्रह का सुन्दर सुख प्राप्त करेगा और माता की शक्ति का विशेष लाभ प्राप्त करेगा तथा मकान जायजाद की शक्ति का लाभ पायेगा और सुख प्राप्ति के अच्छे साधन पायेगा तथा घर बैठे ही आमदनी का सुख प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति से लाभ और उन्नति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज और कारबार के पक्ष में सफलता और मान प्राप्त करेगा।

नं. ४७२

सिंह लग्न में ५ बुध

यदि धनु का बुध- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि के स्थान में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा विवेक की शक्ति से धन की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और सन्तान शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मिथुन राशि में लाभ स्थान को स्वक्षेत्र के रूप में देख रहा है, इसलिये बुद्धि, कला और धन की शक्ति के योग से आमदनी की विशेष वृद्धि करेगा तथा वाणी के द्वारा सज्जनता युक्त रूप से स्वार्थ सिद्धि की बातें करेगा।

नं. ४७३

सिंह लग्न में ६ बुध

यदि मकर का बुध- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है, तो धन की संग्रह शक्ति में बड़ी कमी प्राप्त करेगा तथा कुछ परतन्त्रता युक्त मार्ग से आमदनी प्राप्त करेगा और शत्रु स्थान में एवं कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ धन की हानि पायेगा तथा शत्रु पक्ष में कुछ पैसे की ताकत एवं नर्माई की ताकत से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा।

नं. ४७४

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सिंह लग्न का फलादेश

सिंह लग्न में १० बुध

नं. ४७८

राज-समाज में मान और सफलता प्राप्त करेगा तथा विवेक शक्ति से बड़े कारबार के मार्ग में धन की वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से सुरुध स्थान एवं मातृ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन के योग से मातृ स्थान एवं सुरुध साधनों में सफलता और सुख प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का सुख सम्बन्ध पायेगा।

सिंह लग्न में ११ बुध

नं. ४७९

यदि मिथुन का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो विवेक शक्ति के योग से धन का लाभ स्वयमेव प्राप्त करेगा तथा आमदनी के मार्ग में सुन्दर शक्ति एवं प्रभाव प्राप्त करेगा और धन की शक्ति का सुख लाभ के रूप में प्राप्त करेगा तथा धन के द्वारा आमदनी का मार्ग पायेगा और कुटुम्ब शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान पक्ष को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के योग से सफलता पायेगा तथा संतान पक्ष में लाभ प्राप्त करेगा।

सिंह लग्न में १२ बुध

नं. ४८०

यदि कर्क का बुध- बारहवें खर्च स्थान में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो धन का खर्चा विशेष करेगा और धन की कमजोरी प्राप्त करेगा और धन की संग्रह न कर सकने के कारणों से दुःख अनुभव करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से धन का लाभ विवेक द्वारा प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान की शक्ति में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में धन की शक्ति से एवं विवेक शक्ति से काम निकलेगा और झगड़े-झंझटों में भी विवेक और खर्च की शक्ति से काम करेगा।

विद्या, सन्तान, आयुस्थानपति-गुरु

यदि सिंह का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र सूर्य की सिंह राशि में बैठा है तो देह में प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा सुन्दर आयु प्राप्त करेगा और अष्टमेश होने के दोष से कुछ कठिनाईयाँ और कुछ फिकरमंदी, बुद्धि और सन्तान पक्ष में रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से स्वयं

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सिंह लग्न में १ गुरु

अपनी धनु राशि में सन्तान पक्ष को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और वाणी की योग्यता के द्वारा मान प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ अरुचि के साथ सम्बन्ध प्राप्त करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है इसलिये बुद्धि योग द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का ज्ञान प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा बड़प्पन के ढंग से रहन-सहन रखेगा।

नं. ४८८१

नं. ४८८२

यदि कन्या का गुरु-धन भवन में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो बुद्धि योग द्वारा धन की वृद्धि का साधन प्राप्त करेगा तथा धन का स्थान बन्धन का स्थान माना जाता है, इसलिये सन्तान पक्ष में परेशानी अनुभव करेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति में बाधा प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा ननसाल पक्ष में हानि पायेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा अमीरात के ढंग से रहन-सहन रखेगा और नवमी दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में राज्य स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ मतभेद प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के कार्यों में कुछ अरुचि के साथ सम्पर्क रखेगा और वृद्धि के लिये प्रयत्नशील रहेगा।

यदि तुला का गुरु- तीसरे भाई के स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में बैठा है तो भाई-बहिन के सम्बन्धों में कुछ मतभेद और कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा पराक्रम स्थान में बुद्धि विद्या के योग द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ परेशानी के साथ संतान शक्ति प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ वैमनस्यता

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२६४ सिंह लग्न का फलोदेश युक्त सम्बन्ध रखेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी-सी अनुभव करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के मार्ग में बुद्धि के योग से सफलता प्राप्त करेगा और धर्म को समझेगा तथा नवमांश मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के द्वारा आमदनी की शक्ति प्राप्त करेगा और हिम्मत शक्ति से काम करेगा। यदि वृ्षिक का गुरु- चौथे केन्द्र मातृ स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश के दोष के कारण मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में कमी और कष्ट का कुछ योग प्राप्त करेगा तथा मातृ पक्ष का कुछ सुख प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष का कुछ सुख प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा।

नं. ४८३ सिंह लग्न में ३ गुरु

नं. ४८४ दिनचर्या में गौरव प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में साधारण विचारों से सम्पर्क रखेगा और नवमांश उच्च दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा एवं दूसरे स्थानों से जीवन का विशेष आनन्द प्राप्त होगा।

सिंह लग्न में ४ गुरु

यदि धन का गुरु- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो सन्तान शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि में शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष से सन्तान और विद्या के स्थान में कुछ कमी और कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा वाणी की शक्ति के अन्दर सभ्यता की कुछ कमी प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा और पुरातत्व शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि ग्राप्त करेगा और कुछ

सिंह लग्न में ५ गुरु

नं. ४८५

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धर्म का भी ध्यान रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग और पुरातत्व शक्ति के द्वारा लाभ के साधन प्राप्त करेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा और अपने विचारों द्वारा देह में सुख और दुःख का अनुभव करेगा।

सिंह लग्न में ६ गुरु

यदि मकर का गुरु- छठें शत्रु स्थान में नीच को होकर शनि की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष से कष्ट अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा और आयु के सम्बन्ध में बहुत बार झंझट प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व की हानि पायेगा और जीवन की दिनचर्या में परेशानी अनुभव करेगा तथा शत्रु पक्ष में चिंता फिकर पायेगा और पाँचवीं दृष्टि से पिता स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष में कुछ वैमनस्ययुक्त सम्बन्ध रखेगा तथा राज्य-संबंध के कार्यों में कुछ थोड़ी दिनचर्या रखेगा और मान, उन्नति का प्रयत्न करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च विशेष करेगा और दूसरे स्थानों का अच्छा सम्बन्ध बनायेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से धन स्थान को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये प्रयत्लशील रहेगा और कुटुम्ब का कुछ योग प्राप्त करेगा।

नं. ४८६

सिंह लग्न में ७ गुरु

यदि कुम्भ का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो अश्वमेध होने के दोष के कारणों से स्त्री स्थान में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा तथा स्त्री से कुछ वैमनस्यता रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा विद्या और सन्तान के पक्ष में साधारण शक्ति प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व का कुछ लाभ पायेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और पुरातत्व के योग से आमदनी प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग से देह में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा तथा

नं. ४८७

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२६६ सिंह लग्न का फलादेश पुरुषार्थ शक्ति के मार्ग में विशेष प्रयत्नशील रहकर उन्नति की चेष्टा करेगा। सिंह लग्न में ८ गुरु यदि मीन का गुरु- आठवें आयु स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु में वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक और प्रभाव लायेगा और संतान पक्ष से कष्ट प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा और वाणी के अन्दर मिठास की कमी और भेदनोति के द्वारा काम करेगा तथा पाँचवीं उच्च दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में खर्च भवन को देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा तथा बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्पर्क बनायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि काने का प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से माता के सुख स्थान को मित्र मंगल की राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि लिये हुये सहायता शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ४८८ सिंह लग्न में ९ गुरु यदि मेष का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है, तो बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म शास्त्र तथा पुरातत्व का ज्ञान प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बुद्धि योग द्वारा मान प्राप्त करेगा तथा बड़े जचाव की बातें करेगा और सातवीं दृष्टि से भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई के स्थान में कुछ अरुचिकर रूप से सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा पराक्रम की वृद्धि करेगा और नवमी दृष्टि से स्वयं अपनी धनु राशि संतान स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये संतान की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान की शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण विद्या, संतान, भाग्य सभी में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा।

नं. ४८९ यदि वृषभ का गुरु- दसम केन्द्र पिता स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण पिता स्थान में हानि और कुछ मतभेद प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि के योग से राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करेगा और

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सिंह लग्न में १० गुरु नं. ४९० शत्रु पक्ष से कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा झगड़े-झंझट आदि के सम्बन्धों से कुछ फिकरमन्दी पायेगा। सिंह लग्न में ११ गुरु नं. ४९१ अपनी धनु राशि में संतान एवं विद्या स्थान को देख रहा है, ओर संतान शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष से कुछ परेशानी करेगा और नवमांश शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुंभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्य और कुछ असन्तोष पायेगा तथा रोजगार में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १२ गुरु नं. ४९२

संतान शक्ति के द्वारा मान प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा धन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता सुख का सामान्य लाभ प्राप्त करेगा तथा नवमीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये

यदि मिथुन का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो बुद्धि योग के द्वारा आमदनी के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध का भी लाभ प्राप्त करेगा तथा आयु की शक्ति में वृद्धि पायेगा और पाँचवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ मतभेद रखेगा तथा पुरुषार्थ कर्म की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं

यदि कर्क का गुरु-बारहवें खर्च स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष अच्छा सम्पर्क प्राप्त करेगा और विद्या में कमी और बुद्धि में शक्ति प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में कुछ हानि और कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से माता के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सम्बन्ध में और भूमि मकानादि

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सिंह लग्न में ३ शुक्र प्राप्त करेगा और राज- समाज की सम्बन्धित शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा अपने बाहुबल के द्वारा कोई बड़े कारबार का संचालन कार्य करेगा और उन्नति के कार्यों में महान् चतुराई और हिम्मत से काम करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कम के द्वारा भाग्य की वृद्धि के साधन पैदा करेगा तथा धार्मिक कार्यों में भी परिश्रम से सुन्दर कर्म करेगा।

नं. ४९५

यदि वृश्चिक का शुक- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में कुछ थोड़े से मतभेद के साथ सुख शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा तथा मकान जायदाद की शक्ति पायेगा और भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा तथा रहने के स्थान में सुन्दरता और सुख प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से पिता स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सुख पूर्वक परिश्रम करके सफलता प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्धों में मान और सुख प्राप्त करेगा।

नं. ४९६

सिंह लग्न में ५ शुक्र यदि धनु का शुक्र- पांचवें त्रिकोण संतान के योग द्वारा विशेष लाभ के सहित आमदनी प्राप्त करेगा और राज-समाज सम्बन्धित कार्यों में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ा चतुर नीतिज्ञ बनेगा।

नं. ४९७

यदि मकर का शुक- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में बड़ी चतुराई की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा तथा भाई

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सिंह लग्न में ९ शुक्र

नं. ५०१

में प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में मान और सफलता तथा यश प्राप्त करेगा तथा चतुराई के सुन्दर सद्गुणी कर्म के द्वारा उन्नति पायेगा और सातवीं दृष्टि से पराक्रम और भाई के स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की सुन्दर राशि प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा सुन्दरता युक्त भाग्य की वृद्धि करेगा और बाहुबल के अन्दर विशेष शक्ति पायेगा।

सिंह लग्न में १० शुक्र

नं. ५०२

यदि वृषभ का शुक्र- दसवें केन्द्र पिता स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता स्थान की महान् शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज के मार्ग में बड़ा मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कारबार में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा भाई बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और सुन्दर चतुराई से परिश्रम कर्म के द्वारा विशेष उन्नति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से माता के स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और मकानादि की शक्ति का सुन्दर सुख लाभ प्राप्त करेगा।

सिंह लग्न में ११ शुक्र

नं. ५०३

यदि मिथुन का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान का लाभ प्राप्त करेगा और भाई बहिन की शक्ति का लाभ योग प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के कार्यों को चतुराई के द्वारा सफल बनाकर विशेष लाभ प्राप्त करेगा और राज-समाज सम्बन्धित मार्ग भी लाभप्रद रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में शक्ति और बुद्धि में बड़ी योग्यता प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष में सफलता शक्ति पायेगा और वाणी के द्वारा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा।

यदि कर्क का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत करेगा तथा पिता और भाई की हानि प्राप्त करेगा तथा अपने स्थानीय कार्यों में कमजोरी प्राप्त करेगा और कुछ

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२७२

सिंह लग्न का फलादेश

सिंह लग्न में १२ शुक्र

परतन्त्रता का-सा योग प्राप्त करेगा और देह की पुरुषार्थ शक्ति में कमजोरी पायेगा तथा बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध में सफलता प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के कार्यों में मान और प्रभाव की कमी प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी चतुराई की शक्ति से काम बनायेगा और झगड़े-झंझटों में हिम्मल शक्ति से कामयाबी पायेगा।

नं. ४०४

स्त्री, रोजगार, शत्रु स्थानपति-शनि

सिंह लग्न में १ शनि

यदि सिंह का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु सूर्य की सिंह राशि में बैठा है तो देह के स्थान में परेशानी तथा कुछ रोग और झंझट आदि के योग प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में कुछ प्रभाव रखेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से भाई के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा हिम्मत और पुरुषार्थ शक्ति में वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयં अपनी राशि में स्त्री

तथा रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, किन्तु शत्रु स्थान पति होने के कारण स्त्री के सुख और प्रेम की शक्ति में कुछ झंझट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम और कुछ परेशानी के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा तथा दशवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और कारबार में कुछ उन्नति एवं मान प्राप्त करेगा तथा कार्य कुशल बनेगा।

सिंह लग्न में २ शनि

नं. ४०५

यदि कन्या का शनि- धन स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन के संग्रह कोष के अन्दर वृद्धि और हानि के दोनों कारणों को प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में कुछ दुःख-सुख का योग पायेगा क्योंकि धन का स्थान बन्धन का रूप है, और छठा स्थान झंझट का रूप है, इसलिये स्त्री स्थान के सुख में अनेक बाधायें प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ दिक्कतों के साथ पैदा कमावेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से माता के

नं. ४०६

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सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और कारबार में सफलता पायेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग और चिन्ता फिकर प्राप्त करेगा तथा देह की सुन्दरता में कमी का योग प्राप्त करेगा।

सिंह लग्न में ५ शनि यदि धनु का शनि- पंचम त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो बुद्धि में कुछ फिकर रहेगी। सन्तान पक्ष में कुछ रोग या परेशानी का अनुभव करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमी प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से स्वयं अपनी कुंभ राशि में स्त्री तथा रोजगार स्थान को देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा रोजगार की शक्ति का संचालन करेगा और बुद्धिमती स्त्री प्राप्त करेगा। किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के दोष से स्त्री व गृहस्थ तथा रोजगार के मार्ग में कुछ चिंता फिकर का योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के परिश्रमी मार्ग से आमदनी की वृद्धि प्राप्त करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के द्वारा धन की वृद्धि करने का विशेष प्रयत्न करता रहेगा और कुटुम्ब का सामान्य सुख प्राप्त करेगा और भोगादिक की विशेष इच्छा रखेगा।

सिंह लग्न में ६ शनि यदि मकर का शनि- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो शत्रु स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा और ननसाल पक्ष की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री स्थान में कुछ मतभेद के सहित शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार व गृहस्थ के संचालन मार्ग में कुछ परेशानियाँ और प्रभाव तथा परिश्रम का योग प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ आशांति अनुभव करेगा और पुरातत्व का सामान्य लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करते हुए भी खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और भाई के स्थान को दसवीं उच्च दृष्टि से मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की अच्छी शक्ति

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प्राप्त करेगा और विशेष परिश्रम तथा हिम्मत शक्ति के योग से रोजगार की सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ७ शनि

यदि कुम्भ का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो स्त्री स्थान में कुछ विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में विशेषता युक्त कार्य करेगा। किन्तु शनि के शत्रु स्थान पर होने के कारण स्त्री पक्ष में कुछ झंझट और रोग भी प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम और परेशानी भी प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा तथा तीसरी नीच दृष्टि से भाग्य स्थान

नं. ५११ को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री व गृहस्थ के कारणों से भाग्य में कुछ कमजोरी या परेशानी रहेगी और धर्म के मार्ग में कुछ हानि रहेगी तथा यश की कमी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और शान्ति में कमी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और शान्ति में कमी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से माता के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और रहने के स्थान भूमि में कुछ अशांति रहेगी।

सिंह लग्न में ८ शनि

यदि मीन का शनि- आठवें मृत्यु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में विशेष अशान्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाईयों से कार्य करेगा और शत्रु पक्ष में कुछ दिक्कतें और परेशानी रहेगी और आयु स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा, क्योंकि अष्टम शनि आयु की वृद्धि का सूचक होता है और तीसरी मित्र दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता और

नं. ५१२ कारबार के स्थान में कुछ सहारा प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में कुछ कमी तथा संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और बुद्धि में कुछ फिकर रहेगी तथा पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ शक्ति पायेगा।

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सिंह लग्न में ९ शनि

यदि मेष का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की मेष राशि पर बैठा है, तो भाग्य स्थान में परेशानी प्राप्त रहेगी और धर्म में कमजोरी पायेगा तथा सुयश नहीं मिलेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाई के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और दसर्वी दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में भाग्य की शक्ति से प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ बुराई और कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा और सप्तमेश होने के कारण स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में कुछ भाग्य की दुर्बलता के साथ सहयोग शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ५१३

सिंह लग्न में १० शनि

यदि वृषभ का शनि- दसाम केन्द्र पिता स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो व्यापार के मार्ग में परिश्रम के द्वारा उन्नति और शक्ति प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान में कुछ मतभेद युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में कुछ मान पायेगा और शत्रु पक्ष में कार व्यापार के द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करते हुये भी खर्च में कुछ नीरसता रहेगी और रोजगार के लिये कुछ बाहरी स्थानों का सम्बन्ध पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और दसर्वी दृष्टि से स्वयं अपनी कुष्ठ राशि में स्त्री तथा रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये स्त्री व रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के कारण कुछ परेशानी भी रहेगी।

नं. ५१४

यदि मिथुन का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु स्थान से लाभ युक्त एवं प्रभाव युक्त रहेगा तथा स्त्री के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतों के साथ स्त्री सुख प्राप्त करेगा, क्योंकि छठें स्थान का स्वामी होने का दोष है और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम और परेशानी के योग से अच्छी सफलता और लाभ प्राप्त करेगा और अधिक नफा खाने का प्रयत्न करेगा

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सिंह लग्न में ११ शनि

तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी और देह में कुछ रोग प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और सन्तान पक्ष की सुख शक्ति में कुछ कमी प्राप्त होगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ चिन्ता फिकर का योग प्राप्त करेगा और पुरातत्व के लाभ में कुछ कमी प्राप्त करेगा।

नं. ५१५

सिंह लग्न में १२ शनि

यदि कर्क का शनि- बारहवें खर्च स्थान में शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थानों से रोजगार सम्बन्ध प्राप्त करेगा और रोजगार की लाइनों में नुकसान का योग प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त होगी और तीसरी मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और

नं. ५१६

सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ खर्च की शक्ति से शत्रु स्थान में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा और दसवीं नीच दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के पक्ष से भाग्य में कमी और कष्ट अनुभव करेगा तथा धर्म के स्थान में हानि प्राप्त करेगा और ईश्वर के विश्वास में और सुयश में कमी प्राप्त करेगा और कुछ रोगादिक झंझटों में खर्चा करना पड़ेगा।

कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्त के अधिपति- राहु

सिंह लग्न में १ राहु

यदि सिंह का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह की सुन्दरता में कमी करेगा और देह की सुख शक्ति में बाधा पैदा करेगा और किसी प्रकार की चिन्ता से युक्त रहेगा और देह के स्थान में कभी-कभी कोई गम्भीर कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा कुछ छिपाव शक्ति के कार्यों को हठयोग से पूर्ण करेगा और किसी विशेष पद पर या विशेष

नं. ५१७

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सिंह लग्न में २ केतु

यदि कन्या का केतु- दूसरे धन स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति के स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा और धन के कारणों से चिन्ता फिकर का योग मिलेगा और कुबुद्धि स्थान में कुछ अशान्ति का योग प्राप्त करेगा तथा धन की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा और गुप्त शक्ति के बल से इज्जत बढाने का प्रयत्न करेगा तथा धन के पक्ष में कभी-कभी कोई विशेष संकट का योग प्राप्त होगा तथा कभी-कभी कोई ऋण के रूप में भी धन प्राप्त करना पडेगा।

नं. ५३०

सिंह लग्न में ३ केतु

यदि तुला का केतु- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान में कष्ट और कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा, किन्तु तीसरे स्थान पर कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति की वृद्धि करेगा तथा पराक्रम और परिश्रम की गहन शक्ति पर विशेष भरोसा रखने के कारण बडी हिम्मत और निर्भयता प्राप्त करेगा तथा चतुराईयों के कार्यों को बाहुबल के द्वारा पूरा करके प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा लापरवाही और हठ धर्मों से कार्य करेगा।

नं. ५३१

सिंह लग्न में ४ केतु

यदि वृश्चिक का केतु- चौथे केन्द्र माता के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में कुछ परेशानी या कमी प्राप्त करेगा तथा मातृ स्थान में कुछ अलहदगी का योग प्राप्त करेगा और रहने के स्थान में तथा भूमि के कुछ सम्बन्धों में कुछ अशान्ति प्राप्त रहेगी अर्थात् घरेलू वातावरण में सुख की शक्ति को प्राप्त करने के लिये कठिन परिश्रम करेगा और गुप्त युक्ति के बल से सुख का अनुभव करेगा और कभी-कभी घरेलू वातावरण में गहरी अशान्ति का योग प्राप्त करेगा।

नं. ५३२

यदि धनु का केतु- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान पर

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सिंह लग्न में ५ केतु

नं. ५३३ उच्च का होकर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और कभी-कभी संतान पक्ष में कष्ट भी अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में शक्ति प्राप्त करने के लिये महान् परिश्रम करेगा और विद्या में सफलता शक्ति मिलेगी। किन्तु फिर भी बुद्धि विद्या के सम्बन्ध में कुछ कमी महसूस करेगा तथा हृदय में अन्दरूनी अपने को विशेष बुद्धिमान् समझेगा और वाणी की लावण्यता में कुछ कमी प्राप्त रहेगी। किन्तु तायदाद से अधिक बातों के द्वारा प्रभाव प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा।

सिंह लग्न में ६ केतु

नं. ५३४ यदि मकर का केतु- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में विशेष परिश्रम और विशेष प्रयत्न करेगा और झंझट तथा परेशानियों के मार्ग में अन्दरूनी तौर से बड़ी भारी शक्ति से काम करेगा, क्योंकि छठें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये बड़ी से बड़ी मुशीबतों में भी धैर्य से काम लेगा और बड़े भारी आन्तरिक साहस के साथ उन्नति की तरफ बढ़ते ही रहने का प्रयास करता रहेगा तथा ननसाल पक्ष में हानि रहेगी।

सिंह लग्न में ७ केतु

नं. ५३५ यदि कुम्भ का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री तथा रोजगार के स्थान में बैठा है तो स्त्री पक्ष के सुख सम्बन्धों में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त होंगे और रोजगार के मार्ग में कठिन परिश्रम करेगा तथा रोजगार के लिये बड़ी-बड़ी दिक्कतें प्राप्त करेगा और गृहस्थ पालन के स्थान में झंझटों का सामना पायेगा और कभी कोई मूत्रेन्द्रिय का विकार प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी गृहस्थ सम्बन्ध में गहरे संकटों का योग प्राप्त होने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति से काम लेगा और परिश्रम के योग से सफल होगा।

यदि मीन का केतु- आठवें आयु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा

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सिंह लग्न का फलादेश

सिंह लग्न में ८ केतु है तो जीवन काल में अनेक बार मृत्यु तुल्य संकटों का सामना करने की स्थिति प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली भूमि की हानि या कमी प्राप्त करेगा तथा उदर के निचले भाग में कोई विकार प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में चिन्ता फिकर प्राप्त रहेगी और जीवन को सहायक होने वाली किसी गुप्त शक्ति का संचय परिश्रम के योग द्वारा प्राप्त करेगा और जीवन काल में कभी-कभी विशेष चिन्ताओं का योग प्राप्त होने पर भी आन्तरिक धैर्य की महान् शक्ति के बल से मुक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ५३६

सिंह लग्न में ९ केतु यदि मेष का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य के सम्बन्धों में कुछ परेशानी और कष्ट प्राप्त करेगा तथा भाग्योदय के मार्ग में बड़ा कठिन परिश्रम करेगा और धर्म के स्थान में कमजोरी रहेगी तथा धर्म के पालन में कभी-कभी महान् असमर्थता होने से धर्म की हानि प्राप्त रहेगी और सुयश की कमी रहेगी तथा भाग्य के सम्बन्धों में कभी-कभी विशेष संकट का योग प्राप्त होने पर आन्तरिक धैर्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और अन्त में कुछ कमी लिये हुए भाग्य की मजबूती का योग प्राप्त करेगा।

नं. ५३७

सिंह लग्न में १० केतु यदि वृषभ का केतु- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पिता-स्थान में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्धों में मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिये कठिन प्रयत्न करेगा तथा कारबार की उन्नति के स्थान में कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा और कभी-कभी इज्जत-आबरू के स्थान में महान् संकट प्राप्त होने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति और चतुराइयों से कार्य की पूर्ति करेगा तथा बहुत समय तक परिश्रम और कठिनाईयाँ सहन करने पर उन्नति पायेगा।

नं. ५३८

यदि मिथुन का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें और कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा तथा धनोपार्जन की कमजोरी से दुःख का अनुभव

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कन्या लग्न का फलादेश प्रारम्भ

नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ६४८ तक में देखिये)

प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभवे सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिये प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ५४१ से लेकर कुण्डली नं० ६४८ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है, उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों

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वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत, भविष्य व वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। ( ६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल

आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५४१ से ५५२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४२ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४८ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश

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कुण्डली नं. ५५० के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ५५१ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ५५२ के अनुसार मालूम करिये।

( ६ ) कन्या लग्नवालों के समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका

फलादेश कुण्डली नं ५५३ से ५६४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन

चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५५३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ५५४ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५५५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५५६ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५५७ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५५८ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५५९ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५६० के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५६१ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५६२ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५६३ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश

कुण्डली नं. ५६४ के अनुसार मालूम करिये।

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( ६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल

आपकी जन्म कुंडली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुंडली नं० ५६५ से ५७६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५६५ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५६६ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५६७ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५६८ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५६९ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५७० के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५७१ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५७२ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५७३ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५७४ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५७५ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुंडली नं. ५७६ के अनुसार मालूम करिये।

( ६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल

आपकी जन्म कुंडली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुंडली नं० ५७७ से ५८८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।

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६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७८ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८० के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८२ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८६ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८८ के अनुसार मालूम करिये।

( ६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल

आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं ५८९ से ६०० तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५८९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९० के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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कुण्डली नं. ९९१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९२ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९३ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९४ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९५ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो. उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९६ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९७ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९८ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९९ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६०० के अनुसार मालूम करिये।

(६) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६०१ से ६१२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये।

६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०१ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश।

कुण्डली नं. ६०२ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०४ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०५ के अनुसार मालूम करिये।

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४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६३५ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६३६ के अनुसार मालूम करिये।

( ६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुंडली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुंडली नं. ६३७ से ६४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६३७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६३८ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६३९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४० के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४२ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४६ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुंडली नं. ६४८ के अनुसार मालूम करिये।

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खर्च तथा बाहरीस्थानपति-सूर्य कन्या लग्न में १ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक शानदार रहेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त होगा तथा व्ययेश होने के दोष के कारण से देह में दुर्बलता प्राप्त रहेगी और बाहरी स्थानों में आने जाने से प्रभाव बर्धन होगा और खर्च के कारण कुछ परेशानी अनुभव होगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के कारण स्त्री स्थान में कुछ कमजोरी या परेशानी मिलेगी और रोजगार के मार्ग की कुछ हानि तथा कुछ कमी रहेगी।

नं. ५४१

कन्या लग्न में २ सूर्य यदि तुला का सूर्य- धन स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र राशि पर बैठा है तो धन के कोश स्थान में भारी कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा, सूर्य को व्ययेश होने का दोष और नीच होने का दोष है अर्थात् प्रबल दोष है, इसलिये जन और धन की हानि प्राप्त होगी तथा धन की शक्ति के लिये बाहरी स्थान का कमजोर सम्बन्ध प्राप्त करेगा और खर्च करने के स्थान में कमजोरी और कष्ट प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से आयु स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में प्रभाव और पुरातत्व शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ५४२

कन्या लग्न में ३ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- तीसरे भाई के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पराक्रम की शक्ति से खर्च का सुन्दर संचालन करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध रखेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से भाई-बहन के सम्बन्धों में कमजोरी प्राप्त करेगी और दैहिक पुरुषार्थ के स्थान में कुछ कमजोरी महसूस करेगा तथा तीसरे स्थान पर गरम ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति के सम्बन्ध में तथा खर्च के सम्बन्ध में बड़ी भारी हिम्मत और प्रभाव शक्ति की प्राप्ति होगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य

नं. ५४३

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कन्या लग्न का फलादेश

के स्थान में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा।

कन्या लग्न में ४ सूर्य

यदि धनु का सूर्य- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो सुख पूर्वक अपने स्थान से ही खर्च का संचालन कार्य करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख और प्रभाव रखेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारणों से माता के सुख सम्बन्धों में कमी प्राप्त करेगा और घरेलू रहन-सहन तथा मकानादि के सम्बन्धों में सुख की कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता और कारबार तथा राज-समाज के सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी।

नं. ५८४

कन्या लग्न में ५ सूर्य

यदि मकर का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर शत्रु शनि की राशि में बैठा है तो बुद्धि योग के परिश्रम द्वारा खर्च का संचालन करेगा और बाहरी स्थानों का सामान्य सम्बन्ध प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारणों से सन्तान पक्ष की हानि करेगा और विद्या स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा और खर्च के कारणों से दिमाग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ सम्बन्ध में कुछ टूटे लिये हुए शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा बातचीत के अन्दर कुछ हेर-फेर से काम करेगा।

नं. ५८५

कन्या लग्न में ६ सूर्य

यदि कुम्भ का सूर्य- छठें स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो परिश्रम के योग से खर्च का संचालन कार्य करेगा और बाहरी स्थानों का कुछ सामान्यतम सम्बन्ध बनाएगा और व्ययेश होने के दोष के कारणों से शत्रु पक्ष में कुछ खर्च और झंझटों से परेशानी प्राप्त करेगा। किन्तु छठे स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में और झंझटों के सम्बन्ध में बड़ी हिम्मत शक्ति से तथा प्रभाव शक्ति से काम करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयम अपनी सिंह राशि में खर्च भवन को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये कुछ मजबूरियों की वजह से भी खर्चा अधिक करेगा।

नं. ५८६

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कन्या लग्न में १ चन्द्र में बैठा है तो देह के द्वारा धन का लाभ प्राप्त करेगा और मनोयोग की सुन्दर शक्ति से आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा तथा मन में प्रसन्नता और देह में सुन्दरता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में रोजगार एवं स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और स्त्री स्थान में सुन्दरता एवं लाभ प्राप्त करेगा तथा मनोबल की शक्ति से गृहस्थ का विशेष आनन्द प्राप्त करेगा और कुछ मान एवं प्रभाव तथा ख्याति प्राप्त करेगा।

कन्या लग्न में २ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- धन स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो धन की शक्ति से आमदनी की शक्ति प्राप्त करेगा और मनोबल की योगशक्ति से धनोपार्जन में सफलता मिलेगी तथा धन की आमदनी से धन की संग्रह शक्ति में सफलता प्राप्त करेगा और इज्जतदार व धनवान् समझा जायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव एवं रौनक प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का लाभ पायेगा।

कन्या लग्न में ३ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- तीसरे भाई-बहिन के स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन की तरफ से कमी या कष्ट का योग प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी प्राप्त रहेगी तथा धनोपार्जन के सम्बन्ध में कुछ परतंत्रता या परेशानी अनुभव करेगा और पुरुषार्थ शक्ति में कमजोरी रहेगी तथा मानसिक चिन्ता का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कठिन पुरुषार्थ के योग से भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा और धर्म का विशेष ध्यान रखेगा।

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कन्या लग्न में ४ चन्द्र पर बैठा है तो सुख पूर्वक अपने स्थान से ही आमदनी प्राप्त करेगा तथा मातृ सुख का सुन्दर लाभ प्राप्त करेगा और मकान जायदाद का सुख लाभ पायेगा तथा मन की प्रसन्नता के लिये विशेष साधन प्राप्त करेगा और अपनी योग से महान् सुख का अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये मनोयोग की शक्ति से कारबार एवं पिता स्थान में लाभोन्नति पायेगा तथा राज समाज में मान प्रतिष्ठा एवं प्रभाव पायेगा।

नं. ५५६

कन्या लग्न में ५ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो बुद्धि-विद्या के योग से धन लाभ प्राप्त करेगा तथा मनोयोग की शक्ति से विद्या स्थान में बड़ी सफलता पायेगा और मन तथा वाणी के संयोग से आमदनी के स्थान में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष के लाभ का मन में आनन्द मानेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने लाभ स्थान कर्क राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन लाभ की उन्नति एवं वृद्धि करने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहेगा तथा विचारों की और दिमाग की शक्ति को लाभ के लिये लगाता रहेगा।

नं. ५५७

कन्या लग्न में ६ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो झंझट और परेशानी के मार्ग से आमदनी का योग प्राप्त करेगा तथा लाभ के सम्बन्ध में कुछ परतंत्रता या बन्धन सा महसूस करेगा तथा आमदनी और शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में कुछ मन को अशान्ति रहेगी। किन्तु नर्माई के योग से शत्रु पक्ष में सफलता और लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा कुछ रोगादिक सम्बन्ध में थोड़ा ज्ञान रहेगा।

नं. ५५८

यदि मीन का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र गुरु

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कन्या लग्न में ७ चन्द्र

की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग से धन लाभ प्राप्त करेगा तथा मनोबल के दैनिक कर्म से आमदनी के स्थान में सुन्दर सफलता प्राप्त होगी और सुन्दर स्त्री का लाभ पायेगा तथा गृहस्थ के भोगादिक पदार्थों में मन को प्रसन्न करने के उत्तम साधन प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और प्रसन्नता के कारण प्राप्त रहेंगे तथा लाभ प्राप्ति का विशेष ध्यान रखेगा।

नं. ५५९

कन्या लग्न में ८ चन्द्र

यदि मेष का चन्द्र- आठवें आयु एवं मृत्यु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में कष्ट और कमी प्राप्त करेगा तथा दूसरे स्थानों के योग से आमदनी के मार्ग बनावेगा और आयु के स्थान में लाभ प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति एवं जीवन को सहायक होने वाली वस्तु का लाभ पायेगा तथा रहन-सहन में सुन्दरता प्राप्त करेगा और सातवीं सामान्य मित्र दृष्टि से धन स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह करने का विशेष ध्यान रखेगा और कुटुम्ब का कुछ लाभ पायेगा।

नं. ५६०

कन्या लग्न में ९ चन्द्र

यदि वृषभ का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन लाभ का विशेष साधन पायेगा और धर्म का विशेष पालन एवं ध्यान रखेगा तथा दैवी सहायक शक्ति का योग पायेगा तथा मन में मगन रहेगा और बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा और कभी-कभी उम्मीद से भी बहुत अधिक मुफ्त का-साथ धन लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से पराक्रम भवन को तथा भाई-बहीन के स्थान को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ करने की परवाह नहीं करेगा तथा भाई-बहिन के स्थान में कुछ नीरसता मानेगा।

नं. ५६१

यदि मिथुन का चन्द्र- दसम केन्द्र राज्य एवं पिता स्थान पर मित्र बुध

की राशि में बैठा है तो पिता स्थान से लाभ प्राप्त करेगा तथा कारबार में

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कन्या लग्न में १० चन्द्र मनोयोग की शक्ति से सुन्दर लाभ पायेगा और राज-समाज के मार्ग में लाभ तथा मान प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में इज्जत और प्रभाव की शक्ति से सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की धनु राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष से लाभ प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि रहने के स्थान का सुख लाभ प्राप्त करेगा तथा मन में बड़प्पन की खुशी पायेगा। यदि कर्क का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में

नं. ५६२ कन्या लग्न में १९ चन्द्र स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा और मनोयोग की स्थिर शक्ति के द्वारा खूब धन लाभ मिलेगा तथा मन में बड़ा भारी आनन्द अनुभव करेगा और स्वयमेव होने वाले लाभ का मार्ग प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में कुछ वैमनस्यता अनुभव करेगा और विद्या स्थान में कुछ नीरसता के सहित

नं. ५६३ लाभ प्राप्त करेगा और बातचीत की चतुराई से लाभ पायेगा। कन्या लग्न में १२ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- बारहवें खर्च स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो बाहरी स्थानों के योग से धन लाभ पायेगा तथा खर्च की शक्ति और मनोबल के योग से आमदनी का मार्ग स्थापित करेगा और आमदनी का धन पूरा-पूरा खर्च कर देगा तथा बाहरी स्थान में सुन्दर सम्बन्ध पायेगा। किन्तु लाभ के सम्बन्ध में मन को कुछ अशांति

नं. ५६४ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में मनोयोग की शीतल शक्ति से तथा खर्च की शक्ति से सफलता पायेगा और रोगादिक झंझटों में कुछ खर्च करेगा। भाई, पराक्रम, आयु तथा पुरातत्वस्थानपति- मंगल यदि कन्या का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति पायेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति का सुन्दर उपयोग करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारणों से देह में कुछ

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में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति में गौरव प्राप्त करेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का योग प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ ॠटि अनुभव करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च विशेष करेगा और बाहरी स्थानों की शक्ति का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा और दिनचर्या और रहन-सहन में प्रभाव शक्ति एवं शानदारी रखेगा। कन्या लग्न में ६ मंगल

यदि कुम्भ का मंगल- छठें शत्रु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु स्थान में विशेष प्रभाव रखेगा और भाई-बहिन के पक्ष में कुछ विरोध या वैमनस्य प्राप्त करेगा तथा अधिक पुरुषार्थ और अधिक परिश्रम करेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ घिराव या परतंत्रता और प्रभाव की शक्ति रखेगा तथा आयु की शक्ति का योग अच्छा रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ

शक्ति पायेगा और चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष होने के कारण से भाग्य में कुछ कमी अनुभव करेगा तथा धर्म में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों का कुछ कम सम्बन्ध रहेगा तथा आठवीं दृष्टि देह स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष कारण से देह में कुछ परेशानी और कुछ रक्त विकार का योग पायेगा तथा शत्रु पक्ष में एवं रोगादिक झगड़े-झंझटों के विषय में प्रभाव एवं विजय पाने के लिये कुछ कठिनाईयाँ सहन करेगा। कन्या लग्न में ७ मंगल

यदि मीन का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के कारण से स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ा कठिन परिश्रम करेगा तथा आयु की शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व और चौथी मित्र दृष्टि से पिता स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है,

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३०६ कन्या लग्न का फलादेश इसलिये पिता स्थान में कुछ परेशानी पायेगा तथा राज-समाज, कारबार की उन्नति एवं मान प्राप्त करने के लिये बहुत पुरुषार्थ करेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ गरम विकार तथा कुछ परेशानी और हिम्मत शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति एवं कुटुम्ब स्थान में कुछ कमजोरी पायेगा।

कन्या लग्न में ८ मंगल यदि मेष का मंगल- आठवें मृत्यु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान में सुख सम्बन्ध की कमी पायेगा और पुरुषार्थ की कुछ कमजोरी रहेगी तथा आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली शक्ति प्राप्त रहेगी और चौथी नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी पायेगा और

नं. ५७२ जीवन की दिनचर्या की मस्ती के कारणों से आमदनी में कुछ लापरवाही रहेगी और सातवीं दृष्टि से धन भवन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति में कुछ कमजोरी पायेगा और कुटुम्ब में कुछ अशांति रहेगी और आठवीं स्वक्षेत्र दृष्टि से भाई के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन और पराक्रम स्थान की कुछ सामान्य शक्ति प्राप्त करेगा तथा गुप्त हिम्मत खूब रहेगी।

कन्या लग्न में ९ मंगल यदि वृषभ का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा भाग्य से पुरातत्व की शक्ति का लाभ पायेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से भाग्य स्थान में कुछ परेशानी पायेगा और धर्म के स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी तथा चौथी दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च

नं. ५७३ पायेगा तथा सातवीं स्वक्षेत्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाइयों के साथ-साथ भाई बहन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में

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सफलता पायेगा तथा आठवीं मित्र दृष्टि से माता व सुख स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश दोष के कारण माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी प्राप्त करेगा और मकानादि एवं रहने के स्थानों में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा, किन्तु जीवन की दिनचर्या का ढंग भाग्यवानी के रूप में रहेगा।

कन्या लग्न में १० मंगल

नं. ५७४

यदि मिथुन का मंगल- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व की कुछ सहायक शक्ति पायेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारणों से पिता के स्थान में कुछ कष्ट पायेगा और कारबार एवं राज-समाज के कार्यों में उन्नति के स्थानों में कुछ परेशानियाँ पायेगा और कारबार एवं राज-समाज के कार्यों में उन्नति के स्थानों में कुछ परेशानियाँ पायेगा किन्तु मान एवं प्रभाव प्राप्त करेगा। क्योंकि दसम स्थान पर मंगल शक्ति प्रदायक कार्य करता है और भाई-बहिन के सुख-सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त वातावरण रहेगा और चौथी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ विकार प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त रहेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि विद्या के स्थान में खूब उन्नति करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ त्रुटि युक्त विशेष शक्ति पायेगा तथा हुकूमत और हेकड़ी से बाते करेगा।

कन्या लग्न में ११ मंगल

नं. ५७५

यदि कर्क का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो आमदनी के स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा आयु के पक्ष में कुछ न्यूनता एवं दिनचर्या में कुछ सादगी पायेगा तथा पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी और चौथी दृष्टि से धन भवन को सामान्प्य शनि शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष के कारण धन भवन में कुछ कमी करेगा तथा कुटुम्ब के स्थान में कुछ क्लेश पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि विद्या के पक्ष

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कन्या लग्न में ८ बुध

नं. ५८४

तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये गुप्त एवं गूढ विवेक की शक्ति से कार्य करेगा तथा जीवन निर्वाह करने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा तथा कुटुम्ब को बहुत चाहेगा।

कन्या लग्न में ९ बुध

नं. ५८५

यदि वृषभ का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह में बड़ी सुन्दरता एवं भाग्यवानी प्राप्त करेगा और पिता स्थान की शक्ति का बड़ा उत्तम लाभ पायेगा तथा विवेक शक्ति के उत्तम प्रशंसनीय कार्य के द्वारा कारबार और भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म कर्म का सुन्दर पालन करेगा तथा ईश्वर में विश्वास करेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा कुदरती तौर से उन्नति के मूल कारण करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति मिलेगी तथा पराक्रम की सफलता प्राप्त करेगा।

कन्या लग्न में १० बुध

नं. ५८६

यदि मिथुन का बुध- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का स्वयं संचालन करेगा और राज-समाज, कारबार आदि के सम्बन्धों में बड़ी सफलता और मान प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता और प्रभाव की शक्ति पायेगा और बड़े स्वाभिमान एवं विवेक शक्ति के द्वारा बड़ी उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता स्थान की शक्ति पायेगा तथा भूमि स्थान का सुख प्राप्त करेगा और घरेलू वातावरण में अमीरात का ढंग एवं कार्य कुशलता

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कन्या लग्न का फलादेश

कन्या लग्न में ११ बुध

यदि कर्क का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान से लाभ प्राप्त करने तथा दैहिक कर्म और विवेक शक्ति के योग से सुन्दर लाभ पायेगा और राज समाज, कारबार से सम्बन्धित आमदनी का योग मिलेगा और देह में सुन्दरता रहेगी तथा आमदनी के मार्ग में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में सुन्दर शक्ति पायेगा तथा विद्या के स्थान में वृद्धि करेगा और वाणी की शक्ति से उन्नति करेगा।

नं. ५८७

कन्या लग्न में १२ बुध

यदि सिंह का बुध- बारहवें खर्च स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा तथा पिता स्थान में कमजोरी विदेश यात्राओं का योग पायेगा तथा कारबार, राज-समाज के सम्बन्धों में हानि रहेगी और बाहरी स्थानों के योग से सफलता एवं मान प्राप्त करेगा किन्तु उन्नति के लिये बड़ी दौड़-धूप करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति और दैहिक कर्म के शांत योग से शत्रु पथ में कामयाबी पायेगा।

नं. ५८८

माता, भूमि, स्त्री तथा रोजगारस्थानपति-गुरु

कन्या लग्न में १ गुरु

यदि कन्या का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह में सुन्दरता एवं सुडौलता प्राप्त करेगा और माता की सुख शक्ति पायेगा तथा भूमि मकानादि का आनन्द रहेगा और पाँचवीं नीच दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कमजोरी पायेगा और विद्या स्थान में कुछ परेशानी रहेगी तथा बुद्धि के अन्दर कुछ छिपाव शक्ति से काम करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मीन राशि में स्त्री तथा रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये स्त्री सुख उत्तम प्राप्त करेगा और रोजगार में

नं. ५८९

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उत्नति एवं मान प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उत्नति के स्थान में कुछ न्यूनता युक्त बुद्धि के साधन मिलेंगे तथा धर्म पालन की आन्तरिक यथार्थता में कुछ कमी रहेगी। किन्तु भाग्यवान् सज्जन और कार्य कुशल समझा जायेगा।

यदि तुला का गुरु- दूसरे स्थान धन भवन में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में बैठा है तो धन की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब में प्रभाव रहेगा तथा धन का स्थान बन्धन का स्थान होता है, इसलिये माता एवं स्त्री पक्ष के सुख सम्बन्धों में कमी और रूकावटें प्राप्त रहेंगी तथा रोजगार के मार्ग से धन वृद्धि पायेगा और मकानादि के जरिये लाभ पायेगा तथा पाँचवीं

नं. ५१० शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में दानाई के योग से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का सुख मिलेगा और नवमी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से सुख प्राप्त करेगा तथा कार्य व्यापार में उत्नति रहेगी और राज-समाज में मान एवं प्रभाव पायेगा तथा धन प्राप्त करने की क्रिया को विशेष रूप से प्रयोग में लायेगा।

कन्या लग्न में ३ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन एवं पराक्रम शक्ति की सफलता पायेगा और मातृ स्थान की एवं भूमि मकान की शक्ति प्राप्त रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र

नं. ५११ को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति के योग से रोजगार की विशेष वृद्धि करेगा और स्त्री स्थान में सुख शक्ति एवं सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के कार्यों में विशेष रुचि एवं शक्ति का योग करेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उत्नति के सम्बन्ध में कुछ असंतोष युक्त मार्ग से सफलता पायेगा और धर्म का

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कन्या लग्न का फलादेश

पालन करेगा तथा नवमी उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये अपने दैनिक कार्य क्रम के योग से आमदनी के मार्ग में विशेष लाभ प्राप्त करेगा और लाभ का विशेष ध्यान रखेगा।

कन्या लग्न में ४ गुरु

नं. ५९२

यदि धन का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो माता की सुन्दर शक्ति एवं मकानादि का सुख प्राप्त करेगा और स्त्री व गृहस्थ का अच्छा उत्तम सुख पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में घर बैठे सफलता शक्ति मिलेगी और अपने घर के अन्दर बड़ा प्रभाव एवं महत्व प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु को सुख शक्ति पायेगा तथा जीवन को सहायक होने वाले पुरातत्व का लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से राज्य स्थान एवं पिता स्थान का बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में सुख शक्ति मिलेगी और राज-समाज कारबार के पक्ष में उन्नति एवं मान प्रभाव मिलेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा।

कन्या लग्न में ५ गुरु

नं. ५९३

यदि मकर का गुरु- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान पर नीच का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कुछ कष्ट अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में कुछ कमजोरी पायेगा और गृहस्थ के सुख सम्बन्धों में दुःख का अनुभव प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कमजोरी पायेगा व मातृ स्थान के पक्ष में कमी रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ वृद्धि मिलेगी और धर्म में कुछ रूचि रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी की वृद्धि करने के लिये भारी प्रयत्न करेगा तथा दिमाग की परेशानी के योग से लाभ वृद्धि रहेगी और नवमी मित्र दृष्टि में देह के स्थान की बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में मान और कार्य कुशलता की शक्ति प्राप्त करेगा

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कन्या लग्न में ८ गुरु है तो स्त्री स्थान में दुःख का कारण प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाइयाँ प्राप्त रहेंगी और मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में विशेष कमी रहेगी अर्थात् गृहस्थ के मार्ग में बड़ी दिक्कतों से कामयाबी प्राप्त करेगा तथा दूसरे स्थान के सम्बन्ध से गृहस्थ, स्त्री तथा रोजगार में सुख का साधन पायेगा और पाँचवाँ मित्र दृष्टि से खर्च के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध रहेगा और सातवीं दृष्टि से धन भवन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब में कुछ वैमनस्यता पायेगा और नवमी दृष्टि से सुख भवन एवं मातृ स्थान को स्वयं अपनी धन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ देर और दिक्कतों से घेरलू सुख के साधन एवं मकानादि का सुख पायेगा।

कन्या लग्न में ९ गुरु यदि वृषभ का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो कुछ अरुचिकर मार्ग के द्वारा भाग्य की वृद्धि के साधन पायेगा और स्त्री गृहस्थ की सुख शक्ति में कुछ न्यूनतायुक्त मार्ग से कामयाबी पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ भाग्य के भरोसे एवं सज्जनता के कारणों से फायदा प्राप्त करेगा और मकानादि रहने के स्थान की कुछ शक्ति मिलेगी तथा माता का कुछ सहारा मिलेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुख और सम्मान का योग पायेगा तथा भोगादिक सुखों की विशेष इच्छा रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की कुछ सुख पूर्वक कार्य करने की शक्ति पायेगा और नवमी नोंच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष के सुख में कमी और विद्या में कुछ कमजोरी पायेगा और दिमाग की सूझ शक्ति के अन्दर कुछ गुप्त योजनाओं से कार्य करेगा तथा कुछ धर्म का पालन करेगा।

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कन्या लग्न में १० गुरु

नं. ५९८

यदि मिथुन का गुरु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में सुख सफलता पायेगा तथा कार्य व्यापार में उन्नति करेगा और राज-समाज में मान एवं प्रभाव पायेगा तथा सुन्दर एवं प्रभावशालिनी स्त्री मिलेगी और सुख पूर्वक रोजगार में सफलता पायेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से धन भवन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और सातवीं स्वक्षेत्र दृष्टि से माता के सुख भवन को स्वयं अपनी धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता का सुख मिलेगा और मकानादि भूमि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख के उत्तम्भ साधन पायेगा और नवमीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ निर्बलता के योग से शान्ति भाव के द्वारा कार्य सिद्ध करेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ सुख प्राप्त करेगा।

कन्या लग्न में ११ गुरु

नं. ५९९

यदि कर्क का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और मातृ स्थान की शक्ति का लाभ पायेगा तथा भूमि मकानादि का उत्तम लाभ पायेगा और धन लाभ के मार्ग से महान सुख का अनुभव करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान के द्वारा सुख और सफलता पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमी पायेगा तथा दिमाग में कुछ घरेलू पक्ष से चिन्ता रहेगी और नवमीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये सुयोग्य स्त्री प्राप्त करेगा तथा रोजगार में खूब सफलता पायेगा और भोगादिक की उत्तम शक्ति पायेगा।

यदि सिंह का गुरु- बारहवें खर्च स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो खर्च बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों के योग से एवं खर्च के योग से सुख प्राप्त करेगा। किन्तु अपने मातृ स्थान के सुख में कमी पायेगा

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उत्तम होने के नाते आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा चतुर व धनवान् बनेगा। कन्या लग्न में ३ शुक्र यदि वृ्षिक का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान पर सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्येश शुभ फल का दाता होता है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति में बड़ी स्फूर्ति पायेगा तथा पराक्रम के द्वारा धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब का योग पायेगा एवं बड़ा चतुर, पुरुषार्थी बनेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य के स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये अपने बाहुबल की शक्ति के योग से भाग्य की महान् वृद्धि करेगा एवं बड़ा भाग्यवान्, चतुर समझा जायेगा और शक्ति धर्म का भी पालन करेगा और बड़ा हिम्मतवर बनेगा।

नं. ६०३

कन्या लग्न में ४ शुक्र यदि धनु का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि पर बैठा है तो भाग्य स्थानपति श्रेष्ठ फल का दाता होता है, इसलिये माता स्थान का बड़ा सुख प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा सुख प्राप्ति के साधन भाग्य बल से उत्तम रूप में पायेगा तथा धन और कुटुम्ब की शक्ति सुखपूर्वक चतुराई से प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति का लाभ पायेगा और राज-समाज मान में और लाभ मिलेगा तथा कारबार में उन्नति पायेगा और धर्म-कर्म का पालन करेगा।

नं. ६०४

कन्या लग्न में ५ शुक्र यदि मकर का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या में स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य स्थान पति जहाँ भी बैठता है, वहाँ उत्तम फल करता है, इसलिये संतान शक्ति से लाभ रहेगा और विद्या स्थान में सफलता मिलेगी तथा बुद्धि योग के द्वारा धन और भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म का पालन एवं मनन तथा ज्ञान प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है,

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३२० कन्या लग्न का फलादेश इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा तथा सज्जनता युक्त वाणी की महान् चतुराई से उन्नति के अन्दर साधन प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ६ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य की कमजोरी पायेगा और धन संग्रह की तरफ से कमी और दुःख का कारण पायेगा तथा कुटुम्ब से कुछ मतभेद रहेगा और धर्म में कुछ अरुचि रहेगी। किन्तु शत्रु स्थान में भाग्य की शक्ति एवं धन की शक्ति से चतुराई के द्वारा सफलता पायेगा तथा रोगादिक झगड़े-झंझटों के मार्ग से तथा परिश्रम के योग से भाग्य की वृद्धि के साधन पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च अधिक करने से कुछ दुःख अनुभव होगा। किन्तु बाहरी स्थानों का कुछ अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा।

नं. ६०६

कन्या लग्न में ७ शुक्र यदि मीन का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो रोजगार के स्थान में बहुत चतुराई से सफलता प्राप्त करेगा और बहुत धन कमायेगा तथा बड़ी चतुर सुन्दरी स्त्री प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में धर्म का पालन करेगा और बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा तथा कुटुम्ब का गृहस्थी में आनन्द पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता में कुछ कमी पायेगा और धन तथा रोजगार की वृद्धि करने के लिये देह के सुख की परवाह नहीं करेगा।

नं. ६०७

कन्या लग्न में ८ शुक्र यदि मेष का शुक्र- आठवें मृत्यु स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की बड़ी कमजोरी पायेगा तथा धन की संग्रह शक्ति में परेशानी का योग प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ क्लेश रहेगा तथा धर्म पालन स्थान में केवल स्वार्थ धर्म का पालन करेगा तथा सुयश की कमी रहेगी और आयु स्थान में वृद्धि पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति से धन लाभ पायेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी तुला राशि धन

नं. ६०८

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भृगु संहिता

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भवन में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये महान् कठिनाईयों के योग से धन की प्राप्ति के साधन पायेगा और गुप्त चतुराई के बल से उन्नति के साधन प्राप्त करेगा।

कन्या लग्न में ९ शुक्र

यदि वृषभ का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो बड़ा भाग्यशाली बनेगा और धर्म का पालन करेगा तथा भाग्य और धर्म की शक्ति से धन की खूब प्राप्ति करेगा तथा धन की शक्ति का सदुपयोग करने के कारणों से यश की प्राप्ति रहेगी और बड़ी चतुराई के योग से ईश्वर में विशेष निष्ठा रखेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की शक्ति से विशेष सफलता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर आनन्द पायेगा तथा सु मार्ग से धन की प्राप्ति रहेगी।

नं. ६०९

कन्या लग्न में १० शुक्र

यदि मिथुन का शुक्र- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से पिता स्थान की विशेष उन्नति पायेगा तथा राज्य, व्यापार, मान व प्रतिष्ठा आदि की अच्छी सफलता पायेगा तथा चतुराई के उत्तम कर्म योग से धन की वृद्धि प्राप्त होगी और कुटुम्ब का सुख मिलेगा और बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ मतभेद के स्थान माता के सुख स्थान की शक्ति पायेगा तथा मकानादि भूमि का सुख करेगा।

नं. ६१०

कन्या लग्न में ११ शुक्र

यदि कर्क का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन का विशेष लाभ पायेगा और कुटुम्ब का आनन्द प्राप्त करेगा तथा बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा और धन का ध्यान रखेगा, इसलिये आमदनी के मार्ग में न्याय की शक्ति से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से संतान एवं विद्या के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान का लाभ

नं. ६११

पृ.सं.-२१

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कन्या लग्न का फलादेश

प्राप्त करेगा और विद्या की योग्यता में उत्क्रति पायेगा तथा वाणी एवं बुद्धि की विशेष चतुराई से यश और लाभ का सुन्दर योग पायेगा।

कन्या लग्न में १२ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन का विशेष खर्चा करेगा और भाग्य की कमजोरी के कारणों से दु:ख का अनुभव और उत्क्रति में बाधा प्राप्त करेगा और धन की संग्रह शक्ति नहीं कर सकेगा तथा कुटुम्ब की हानि पायेगा तथा धर्म का पालन नहीं कर सकेगा और बाहरी दूसरे स्थानों में भाग्य की शक्ति का एवं धन की हानि का योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्यबल से और धन-बल की शक्ति से शत्रु पक्ष में सफलता पायेगा तथा झगड़े झंझटों से लाभ पायेगा।

नं. ६१२

विद्या, संतान, शत्रु तथा रोगस्थानपात-शनि

कन्या लग्न में १ शनि यदि कन्या का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि की परिश्रम युक्त शक्ति से प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा संतान शक्ति प्राप्त होने पर भी कुछ संतान से वैमनस्यता पायेगा और देह में कुछ रोग एवं कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहीन के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और पराक्रम के स्थान में अधिक परिश्रम के योग से सफलता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में परिश्रम शक्ति से कार्य करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ कठिनाई से शक्ति मिलेगी और राज-समाज व व्यवहार में यश से मान पायेगा।

नं. ६१३

यदि तुला का शनि- दूसरे स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर उच्च का होकर बैठा है, तो बुद्धि और परिश्रम के योग से विशेष धन कमायेगा तथा कुटुम्ब के स्थान में कुछ वृद्धि एवं कुछ झंझट प्राप्त करेगा और विद्या ग्रहण करेगा तथा संतान पक्ष में परेशानी पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई बहिन

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कन्या लग्न में २ शनि

माता एवं भूमि स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान में कुछ वैमनस्यता पायेगा और मकानादि के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ अशांति पायेगा तथा आयु की कुछ कमी तथा पुरातत्व शक्ति की कुछ कमजोरी पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के स्थान में कुछ दिक्कत प्राप्त करेगा अर्थात छठें स्थान का गृह स्वामी हर एक सम्बन्धों में दिक्कतें और परिश्रम एवं युक्तियों से ही कार्य करता है किन्तु शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा।

नं. ६१४

कन्या लग्न में ३ शनि

यदि वृश्चिक का शनि- तीसरे भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है, तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये पराक्रम और हिम्मत शक्ति की वृद्धि करेगा और शत्रु पक्ष में प्रभाव एवं विजय पायेगा और शत्रु स्थानपति होने के दोष के कारणों से भाई-बहिन के स्थान में झंझट एवं परेशानी पायेगा तथा तीसरी दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये मामूली कुछ दिक्कत लिये हुए संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या एवं वाणी की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य की उन्नति करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा।

नं. ६१५

कन्या लग्न में ४ शनि

यदि धन का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो माता के सुख सम्बन्धों में कमी एवं झंझट का कारण प्राप्त करेगा तथा मकानादि भूमि के सुखों में कुछ कमी पायेगा और घर के अन्दर सन्तान पक्ष के सुख में कुछ झंझट या फिकर रहेगी तथा विद्या का सुख रहेगा और तीसरी दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा घर बैठे शत्रु पक्ष में

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कन्या लग्न का फलादेश

प्रभाव की शक्ति कायम रखेगा और झंगड़े-झंझटों के योग से सुख-दुःख का सदैव अनुभव करेगा और ननसाल पक्ष की कुछ सुख शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से दसम राज्य एवं पिता स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और परिश्रम के योग से पिता एवं मान सम्मान आदि में शक्ति पायेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग पायेगा तथा परिश्रम और प्रभाव की शक्ति से मान पायेगा।

कन्या लग्न में ५ शनि

यदि मकर का शनि- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री पर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति पायेगा तथा विद्या ग्रहण करेगा। किन्तु छठें स्थान पति का दोष होने के कारण संतान पक्ष में कुछ कष्ट एवं झंझट प्राप्त करेगा तथा विद्या के पक्ष में कुछ दिक्कतों और रुकावटों से सफलता रहेगी तथा बुद्धि एवं वाणी के अन्दर गुप्त युक्ति का बल रहेगा और इसी गुप्त बल बुद्धि के प्रभाव से शत्रु पक्ष में सफलता पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ दिमागी परिश्रम रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के परिश्रम से लाभ की प्राप्ति करेगा और दसवीं उच्च दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब की शक्ति पायेगा।

नं. ६१७

कन्या लग्न में ६ शनि

यदि कुम्भ का शनि- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु पक्ष में बुद्धि की शक्ति से विजय प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में परेशानी पायेगा तथां विद्या ग्रहण करने में कुछ दिक्कतें रहेंगी। किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये विद्या के पक्ष से प्रभाव कायम रखेगा और तीसरी नीच दृष्टि से आमय स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में बहुत बार जान के खतरे आयेंगे तथा कुछ झंझटों के कारण अशांति का अनुभव होता रहेगा तथा पुरातत्व सहायक शक्ति की हानि रहेगी और उदर में कुछ विकार

नं. ६१८

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पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी तथा बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध में नीरसता रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से पराक्रम एवं भाई के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन से कुछ परेशानी का सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम के स्थान में बुद्धि योग के परिश्रम से दौड़-धूप में सफलता एवं हिम्मत योग्य शक्ति प्राप्त करेगा।

कन्या लग्न में ७ शनि

यदि मीन का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु गुरु की मीन राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ी परेशानी अनुभव करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बुद्धि योग से बड़ा परिश्रम करेगा तथा कुछ मूत्रेन्द्रिय में विकार पायेगा और विद्या की शक्ति से गृहस्थ का संचालन करेगा तथा संतान पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और बुद्धि की पेचीदगी युक्तियों से शत्रु पक्ष में सफलता पायेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से भाग्य

स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म का ध्यान रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग और कुछ परेशानी के साथ-साथ प्रभाव पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि तथा सुख स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कमी पायेगा और मकानालंद भूमि तथा रहने के स्थान में कुछ अशांति अनुभव करेगा।

कन्या लग्न में ८ शनि

यदि मेष का शनि- आठवें आयु स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा तो जीवन में महान् अशांति अनुभव करेगा तथा आयु स्थान में कई बार खतरे आयेंगे और सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति की हानि रहेगी तथा संतान पक्ष में कष्ट अनुभव होगा और विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी एवं शत्रु पक्ष से अशांति रहेगी

और तीसरी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं राज्य पक्ष में कुछ झंझट युक्त संपर्क रहेगा तथा कारबार में कुछ बुद्धि योग से शक्ति पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से धन स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन जन की वृद्धि के लिये

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कन्या लग्न में ११ शनि बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये बुद्धि के परिश्रमी मार्ग से आमदनी की खूब वृद्धि करेगा और शत्रु पक्ष एवं झगड़े-झंझट आदि से लाभ युक्त रहेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग एवं परिश्रम का योग प्राप्त करेगा तथा बड़ी होशियारी से स्वार्थ सिद्ध करने में सदैव तत्पर रहेगा और

नं. ६२३

एवं विद्या स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु शत्रु स्थान पति होने के दोष के कारण से संतान और विद्या के सुख में कुछ त्रुटि एवं झंझट रहेगी और दसवीं नीच दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन में बड़ा संघर्ष प्राप्त करेगा तथा सहायक होने वाली पराशक्ति में कुछ हानि पायेगा।

कन्या लग्न में १२ शनि

यदि सिंह का शनि- बारहवें खर्च स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो कुछ नीरसता के सहित खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा विद्या एवं संतान पक्ष में हानि तथा कमजोरी प्राप्त करेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से धन भवन को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है,

नं. ६२४

इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिये भारी प्रयत्न करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और खर्च की शक्ति से शत्रु पक्ष में एवं रोगादिक झंझटों में प्रभाव پا सकेगा, किन्तु परेशानी-सी रहेगी और दसवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के संयोग से बुद्धि बल के द्वारा भाग्य की कुछ वृद्धि करेगा तथा धर्म के पक्ष में कुछ सुन्दर रूचि रखेगा तथा अधिक खर्च करने में अपनी शान समझता रहेगा।

कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु

यदि कन्या का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो कन्या पर बैठा हुआ राहु स्वक्षेत्र के समान माना जाता है,

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३२८

कन्या लग्न का फलादेश

कन्या लग्न में १ राहु इसलिये देह में गुप्त युक्तिबल की विशेष शक्ति पायेगा तथा बड़ा स्वाभिमानी होगा और कुछ शरीर में दिक्कतें एवं कुछ परेशानी का योग पायेगा तथा मान प्राप्त करेगा तथा दिमाग की गहरी सूझ शक्ति के बल से प्रभाव कायम रखेगा एवं विशेष उन्नति पाने के लिये कठिन प्रयत्न करेगा और कभी-कभी गहरी चिन्ता पाने का भी धैर्य की महान् शक्ति से काम लेगा और देह में आन्तरिक रूप से कुछ कमी महसूस करेगा और उन्नति भी करेगा।

नं. ६२५

कन्या लग्न में २ राहु यदि तुला का राहु- धन स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन की तरफ से चिन्ता प्राप्त रहेगी और कुटुम्ब के स्थान में कुछ झंझट या परेशानी प्राप्त रहेगी तथा धन संग्रह के अभाव से कुछ गुप्त वेदना, तेज़ी तथा कभी-कभी धन में हानि प्राप्त करेगा और धन की वृद्धि करने के लिये महान् प्रयत्न करेगा एवं राहु चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये विशेष चतुराई के गूढ़ मार्ग से कठिन कर्म के द्वारा धन की शक्ति पायेगा और प्रकट में धनवान् समझा जायेगा तथा कभी-कभी धन के पक्ष में मुफ्त की-सी सफलता शक्ति से विशेष लाभ पा जायेगा।

नं. ६२६

कन्या लग्न में ३ राहु यदि वृश्चिक का राहु- भाई-बहिन और पुरुषार्थ के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये पराक्रम, प्रभाव और हिम्मत की विशेष वृद्धि करेगा तथा चतुराई की शक्ति से बड़े-बड़े कठिन कार्यों को भी पूरा करने में सदैव तत्परता से काम करेगा। किन्तु भाई-बहिन के पक्ष में परेशानी एवं कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी पराक्रम स्थान के कार्यों में विशेष संकट प्राप्त होने पर भी आन्तरिक धैर्य की शक्ति को नहीं छोड़ेगा और साहस से सफलता प्राप्त करेगा और सदैव अपनी जीत एवं कार्य सिद्धि के लिये प्रयत्नशील रहेगा तथा शील संतोष की परवाह नहीं करेगा।

नं. ६२७

यदि धन का राहु- चौथे केन्द्र माता, भूमि एवं सुख के स्थान पर नीच का होकर शत्रु गुरु की धनु राशि पर बैठा है तो माता के सुख की महान् हानि करेगा तथा मकानादि रहने के स्थानों की कमी करेगा तथा घरेलू

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कन्या लग्न में ४ राहुसुख शांति में विशेष बाधायें प्राप्त करेगा और घर के अन्दर कभी-कभी घोर संकट एवं दुःख के कारण प्राप्त होंगे और मातृ स्थान एवं मातृ भूमि से सम्बन्ध विच्छेद रहेगा तथा बहुत प्रकार से सुख सम्बन्धों में संकोर्णता रहेगी और किसी प्रकार प्राप्त योजनाओं के द्वारा गुप्त रूप से सुख के साधन प्राप्त होंगे और निजी स्थान में शान्ति का विशेष अभाव रहेगा।

नं. ६२८

कन्या लग्न में ५ राहु यदि मकर का राहु- पंचम त्रिकोण सन्तान एवं विद्या के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो विद्या की शक्ति प्राप्त करने में कुछ अड़चनें रहेगी। किन्तु विद्या प्राप्त करेगा तथा दिमाग के अन्दर गुप्त युक्तियों का विशेष संग्रह होने के कारण बुद्धि में कुछ परेशानी रहेगी और सन्तान पक्ष में कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और बुद्धि-विद्या की आन्तरिक कमी के रहते हुए भी प्रकट में बातों की चतुराई और सफाई से काम करता रहेगा तथा बोल चाल में स्वार्थ सिद्धि के कारण सत्य-असत्य की परवाह नहीं करेगा तथा कभी-कभी दिमाग के अन्दर गहरी चिन्ता के कारण भी प्राप्त करेगा।

नं. ६२९

कन्या लग्न में ६ राहु यदि कुम्भ का राहु- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव कायम करेगा और झगड़े झंझटों के मार्ग में बड़ी गुप्त युक्ति के बल से विजय और सफलता पायेगा तथा कभी-कभी शत्रु एवं रोगादिक पक्ष की दिक्कतों में महान् संकट आने पर भी गुप्त सूझ और गुप्त हिम्मत की शक्ति के कारण प्रत्यक्ष में अपनी कमजोरी जाहिर नहीं होने देगा किन्तु अपने अन्दर कुछ कमजोरी का अनुमान करेगा। और अपना प्रभाव जमाने के लिये कठिन से कठिन कार्य को भी करने में तत्पर रहेगा।

नं. ६३०

यदि मीन का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाइयाँ एवं परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी गृहस्थी

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कन्या लग्न में १० राहु से मान और प्रभाव पायेगा तथा गुप्त युक्ति की विशेष कला के द्वारा कारबार में खूब सफलता प्राप्त करेगा और राज-समाज और कारबार के स्थान में कभी-कभी विशेष संकट का योग प्राप्त करेगा। किन्तु विशेष धैर्य एवं चतुराई के बल से पुनः अच्छे रास्ते पर आ जायेगा और कारबार एवं मान-प्रतिष्ठा की विशेष उन्नति प्राप्त करने के लिये महान् कठिन प्रयत्न भी करेगा। यदि कर्क का राह- ग्यारहवें लाभ स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में वृद्धि तो अवश्य करेगा, किन्तु शत्रु राशि पर होने से लाभ के मार्ग में विशेष दिक्कतें रहेंगी तथा कभी-कभी लाभ के सम्बन्ध में विशेष चिन्ता या विशेष धोखा खाने का योग भी बनेगा, क्योंकि आमदनी के मार्ग में कभी-कभी विशेष लाभ प्राप्ति के लिये कुछ अधिक कठिन परिश्रम और अधिक प्रयत्न भी करेगा तथा आमदनी के स्थान में कुछ त्रुटि एवं असंतोष रहेगा और कभी-कभी मुफ्त का-सा अचानक लाभ भी प्राप्त होगा।

नं. ६३४

कन्या लग्न में ११ राहु

नं. ६३५

करेगा तथा आमदनी के स्थान में कुछ त्रुटि एवं असंतोष रहेगा और कभी-कभी मुफ्त का-सा अचानक लाभ भी प्राप्त होगा। कन्या लग्न में १२ राहु यदि सिंह का राह- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में बहुत परेशानी प्राप्त करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में दुःख का अनुभव करेगा और खर्च संचालन की शक्ति को प्राप्त करने के लिये भारी कठिन प्रयत्न करेगा और कभी-कभी खर्च के मार्ग में भारी संकटों का सामना करने की स्थिति पायेगा, किन्तु फिर भी गुप्त युक्ति और गुप्त हिम्मत की शक्ति से खर्च का संचालन करता रहेगा और कभी-कभी कोई मुफ्त का-सा धन खर्च संचालन के लिये प्राप्त करेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु यदि कन्या का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में कुछ कष्ट एवं चिन्ताओं का योग प्राप्त करेगा

नं. ६३६

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कन्या लग्न का फलादेश

कन्या लग्न में १ केतु

तथा देह में कभी-कभी कोई चोट एवं घाव प्राप्त होंगे और देह की सुन्दरता में कुछ कमी तथा परिश्रम का योग पायेगा तथा अपने अन्दर गुप्त शक्ति एवं गुप्त हिम्मत का योग प्राप्त करेगा और कभी-कभी कोई गहरे संकट का अवसर प्राप्त होने पर भी गुप्त सहायक शक्ति के बल से रक्षा पायेगा और देह के अन्दर कुछ कमजोरी के होते हुये भी बड़ी हेकड़ी और हठ रखेगा तथा कुछ कमी लिये हुये मान और प्रभाव प्राप्त करेगा

नं. ६३७

अर्थात् नरम ग्रह के स्थान में गरम ग्रह बैठा है, इसलिये नरमाई और गर्माई से काम करेगा।

कन्या लग्न में २ केतु

यदि तुला का केतु- दूसरे धन स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन के कोष स्थान में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब के सम्बन्ध में क्लेश और दुःख के कारण पायेगा और कभी-कभी धन के सम्बन्ध में अचानक विशेष हानि के कारणों से विशेष चिन्ता रहेगी। किन्तु आचार्य शुक्र के घर में बैठा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये विशेष चतुराई के कार्यों में परिश्रम शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा और कभी-कभी मुफ्त का धन भी प्राप्त करेगा। किन्तु धन के किसी भी कार्य और कारणों के सम्बन्ध से कुछ परेशानियों का योग अवश्य पाता रहेगा और अधिक धन की प्राप्ति के लिये अधिक प्रयत्न करेगा।

नं. ६३८

कन्या लग्न में ३ केतु

यदि वृश्चिक का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान में कष्ट एवं परेशानी के कारण प्राप्त करेगा तथा तीसरे स्थान पर कूर ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये अपने पराक्रम एवं हिम्मत शक्ति की बहुत वृद्धि करेगा और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये अपना प्रभाव जमाने के लिये महान् कठिन परिश्रम एवं कठिन कर्म करेगा और बाहुबल के अन्दर शक्ति पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण कभी-कभी स्वयं अपनी हिम्मत के अन्दर गुप्त रूप से महान् कमजोरी अनुभव करेगा, किन्तु प्रकट रूप में कभी-कभी हिम्मत हार कर भी हार मानने को तैयार नहीं होगा।

नं. ६३९

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बड़ी भारी बहादुरी से काम करेगा।

कन्या लग्न में ७ केतु यदि मीन का केतु- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाईयाँ मिलेंगी, किन्तु आचार्य गुरु की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़े बूर्जुगों के ढंग से कठिन परिश्रम के द्वारा रोजगार में कुछ सफलता पायेगा। स्त्री गृहस्थ के पक्ष में बड़े संकटों और दिक्कतों की प्राप्ति कर लेने के बाद कुछ सहूलियत पायेगा तथा कभी-कभी कई प्रकार से मूत्र-इन्द्रिय विकार का योग प्राप्त होगा और गृहस्थ जीवन को अनेकों प्रकार की गुप्त युक्ति एवं गुप्त शक्ति के प्रयोगों से सफल बनाने पर भी अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा।

कन्या लग्न में ८ केतु यदि मेष का केतु- आठवें आयु स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में अनेकों बार प्राण संकट का योग बनेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति की कमी एवं हानि रहेगी और उदर के अन्दर कई प्रकार की दिक्कत या बीमारी पायेगा तथा गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये जीवन में प्रभाव पाने के लिए महान् कठिन परिश्रम करेगा और जो कुछ भी शक्ति प्राप्त होगी उसमें भी कुछ कमी और जीवन की दिनचर्या में अधिक तेजी एवं क्रोध और संघर्ष रहेगा तथा जीवन में कभी-कभी जीवन निर्वाह करने के लिये महान् चिन्ता का योग बनेगा।

कन्या लग्न में ९ केतु यदि वृषभ का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में बड़े-बड़े संकट एवं दिक्कतें प्राप्त होंगी और धर्म के मार्ग में कमजोरी रहेगी तथा कुछ कमी लिये हुए युक्तिपूर्ण धर्म का पालन करेगा और आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के लिये चतुराई के सहारे परिश्रम से शक्ति पायेगा, किन्तु कभी-कभी केतु के स्वाभाविक दोष के कारण भाग्य के स्थान में किसी प्रकार गहरी चिन्ता का योग प्राप्त करेगा किन्तु गुप्त

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शक्ति और चतुराई के कारणों से हर एक दिक्कतों से बचाव पाता रहेगा, किन्तु भाग्य के अन्दर किसी कारण से कुछ कमजोरी महसूस करेगा। कन्या लग्न में १० केतु यदि मिथुन का केतु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में हानि एवं कष्ट प्राप्त करेगा और राज-समाज के स्थान में मान और प्रभाव की कमजोरी सम्भव होगी और कारबार एवं उन्नति के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें एवं झंझटें और अवनति के कारण प्राप्त होंगे तथा राज पक्ष से कभी कोई झगड़ा और परेशानी प्राप्त करेगा और उन्नति प्राप्त करने के मार्ग में कभी

नं. ६४६ कोई महान् संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा तथा नरम ग्रह के स्थान पर नीच का होकर केतु बैठा है, इसलिये कभी-कभी कोई मान हानि पाने का कार्य एवं ढंग बनेगा और दबकर काम करेगा।

कन्या लग्न में ११ केतु यदि कर्क का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में परम शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में उन्नति एवं वृद्धि तो करेगा, किन्तु लाभ करने के कारणों में मानसिक परेशानियाँ प्राप्त रहेंगी और कभी-कभी कोई विशेष झंझट या नुकसान भी आमदनी के मार्ग में हो सकेगा और केतु के स्वाभाविक दोष के कारण आमदनी के स्थान में कमी का अनुभव करने के

नं. ६४७ कारणों से दु:ख का भान होता रहेगा, किन्तु कभी-कभी कोई मुफ्त का-सा धन लाभ होता रहेगा और आमदनी की वृद्धि करने के लिये मनोयोग से कठिन परिश्रम करेगा।

कन्या लग्न में १२ केतु यदि सिंह का केतु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो खर्च के स्थान में बड़ी चिन्ता और परेशानी का योग पायेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में दु:ख एवं अरुचि अनुभव करेगा तथा खर्च की संचालन शक्ति को पाने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा और गरम ग्रह की शत्रु राशि पर

नं. ६४८ कभी महान् संकट का सामना करने पायेगा इसलिये

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कुण्डली नं. ६५८ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५९ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६६० के अनुसार मालूम करिये।

(७) तुला लग्नवाला को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६६१ से ६७२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६६१ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६२ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६३ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६४ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६५ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६६ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६७ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६८ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६७० के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६७१ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६७२ के अनुसार मालूम करिये।

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(७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६७३ से ६८४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७३ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७८ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७९ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८० के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८२ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८४ के अनुसार मालूम करिये।

(७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल

आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं ६८५ से ६९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।

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३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ७२९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ७३० के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ७३१ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ७३२ के अनुसार मालूम करिये।

(७) तुला लग्नवालों को समस्यत जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल

आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७३३ से ७४४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३३ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३८ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३९ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४० के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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कुण्डली नं. ७४२ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४४ के अनुसार मालूम करिये।

(७) तुला लग्नवालों के समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं ७४५ से ७५६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४५ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४६ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४७ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४८ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४९ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५० के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५१ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५२ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५३ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५४ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५५ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५६ के अनुसार मालूम करिये।

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आमदनी के मार्ग में भाग्यवान् समझा जायेगा।

तुला लग्न में ४ सूर्य - यदि मकर का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो आमदनी पक्ष के कुछ नीरसता युक्त सुख की प्राप्ति करेगा तथा माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और भूमि मकानादिक की शान्ति का कुछ अधूरा सुख प्राप्त करेगा तथा आमदनी के मार्ग में कुछ सुख पूर्वक प्राप्ति करने की विशेष चेष्टा होते हुए भी कुछ अशांत युक्त थोड़ा-सा वातावरण रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से राज्य एवं पिता, कारबार तथा मान के स्थान को एवं पिता स्थान में मान और सफलता पायेगा।

नं. ६५२

तथा मान के स्थान को एवं पिता स्थान में मान और सफलता पायेगा।

तुला लग्न में ५ सूर्य - यदि कुम्भ का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो बुद्धि योग से लाभ पायेगा तथा संतान पक्ष का नीरसता युक्त लाभ मिलेगा तथा विद्या के ग्रहण करने में कुछ कठिनाइयों से सफलता मिलेगी और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये बोलचाल एवं बातचीत के अन्दर मिठास की कमी और स्वास्थ्य की विशेषता रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी सिंह राशि में लाभ स्थान स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के कठिन कर्म से आमदनी की अच्छी शक्ति पायेगा; किन्तु दिमाग में कुछ खिन्नता रहेगी।

नं. ६५३

लाभ स्थान स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के कठिन कर्म से आमदनी की अच्छी शक्ति पायेगा; किन्तु दिमाग में कुछ खिन्नता रहेगी।

तुला लग्न में ६ सूर्य - यदि मीन का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतों के योग से लाभ प्राप्त करेगा तथा प्रभाव शक्ति से बहुत फायदा पायेगा और शत्रु स्थान में एवं झगड़े-झंझटों के मार्ग में लाभ और विजय प्राप्त करेगा, किन्तु लाभ के लिये परिश्रम करना पड़ेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों में लाभ की सूत्रें पायेगा और बड़ी बहादुरी एवं हिम्मत शक्ति के द्वारा आमदनी को प्राप्त करता रहेगा तथा रोगादिक पक्ष में लाभ युक्त रहेगा।

नं. ६५४

सम्बन्धों में लाभ की सूत्रें पायेगा और बड़ी बहादुरी एवं हिम्मत शक्ति के द्वारा आमदनी को प्राप्त करता रहेगा तथा रोगादिक पक्ष में लाभ युक्त रहेगा।

यदि मेष का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा भारी

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तुला लग्न में ७ सूर्य

प्रभाव एवं सुन्दरता पायेगा और स्त्री तथा ससुरल पक्ष से लाभ पायेगा तथा रोजगार के स्थान में बड़ी भारी आमदनी का योग पायेगा और दैनिक कार्यक्रम के द्वारा कभी-कभी बहुत अधिक लाभ पायेगा और गृहस्थ के अन्दर विशेष शक्ति एवं विशेष योग और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और सुडौलताई में कमजोरी सम्भव होगी और देह में कुछ चिंता एवं फिकर प्राप्त करेगा।

नं. ६५५

तुला लग्न में ८ सूर्य

यदि वृषभ का सूर्य- आठवें आयु एवं पुरातत्व के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में परेशानी प्राप्त करेगा तथा दूसरे स्थान के सम्बन्ध से कठोर परिश्रम के द्वारा लाभ पायेगा और कुछ नीरसता युक्त मार्ग से पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा आयु स्थान में कुछ प्रभाव की शक्ति पायेगा एवं उदर के अन्दर कुछ गर्मी की शिकायत पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन भवन व कुटुम्ब स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने का विशेष प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में प्रभाव एवं लाभ की शक्ति रखेगा और दिनचर्या में आमदनी के लिये बड़ा ख्याल रखेगा।

नं. ६५६

तुला लग्न में ९ सूर्य

यदि मिथुन का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन का उत्तम लाभ पायेगा और धर्म का पालन करेगा तथा ईश्वर में बड़ा विश्वास रखेगा तथा भाग्य के स्थान में बड़ा प्रभाव पायेगा और न्यायोक्त लाभ को कुदरती तौर से पाने का योग रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का लाभ पायेगा तथा पराक्रम शक्ति का विशेष लाभ पायेगा अर्थात बाहुबल की शक्ति में प्रभाव और लाभ पायेगा। अतः भाग्य और पुरुषार्थ दोनों में भरोसा रखकर कार्य करता रहेगा।

नं. ६५७

यदि कर्क का सूर्य- दसम राज्य स्थान एवं पिता स्थान में मित्र चन्द्रमा

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तुला लग्न में १० सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में बड़ा लाभ प्राप्त करेगा और कारबार में उन्नति पायेगा तथा राज-समाज के स्थान में आमदनी एवं लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के सुख स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के कारणों में घबराहट सुख शांति में कुछ बाधा प्राप्त करेगा और माता के स्थान में कुछ नीरसता पायेगा और भूमि के सुख में कुछ कमी रहेगी तथा मान प्रतिष्ठा उत्तम रहेगी।

यदि सिंह का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता एवं शक्ति पायेगा तथा स्वयं प्रभाव की शक्ति से आमदनी का मार्ग बनेगा। ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये लाभ के स्थान में विशेष प्रभाव रहेगा और सातवीं दृष्टि से संतान एवं विद्यास्थान को शत्रु शनि की कुंभ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ असंतोष एवं कुछ नीरसता प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि के अन्दर कुछ अरुचि करेगा तथा वाणी में तेजी रहेगी।

यदि कन्या का सूर्य- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक तायदाद में करेगा और बाहरी स्थानों के योग से प्रभाव के द्वारा आमदनी का मार्ग बनाएगा और बाहरी स्थानों में बड़ी सरलता शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु आमदनी के सम्पूर्ण लाभ को सदैव खर्च करने में तत्पर रहेगा तथा थोड़ा मुनाफा खाने का संयोग पाएगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव युक्त मैत्री सम्बन्ध रखेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में प्रभाव की शक्ति से लाभ युक्त रहेगा।

पिता, कारबार, राज-समाजस्थानपति- चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर शोभा सुन्दरता एवं सौम्य प्रभाव की

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तुला लग्न में १ चन्द्र

शक्ति पायेगा तथा राज–समाज आदि ऊँचे स्थानों में मान पायेगा तथा पिता स्थान की शोभा ऊँची करेगा और मनोयोग के कर्मबल से कारबार में वृद्धि पायेगा क्योंकि चन्द्रमा मन का स्वामी होता है, इसलिये राजनीति एवं सामाजिक ज्ञान का उत्तम योग पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुन्दरता एवं मान तथा प्रभाव पायेगा और रोजगार के पक्ष में मनोयोग के कर्मबल से बहुत सफलता एवं उन्नति पायेगा तथा सुन्दर भोग प्राप्त करेगा।

नं. ६६१

तुला लग्न में २ चन्द्र

यदि वृश्चिक का चन्द्र– धन भवन में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में कमजोरी पायेगा और राज–समाज के सम्बन्ध में मान सम्मान की कमी पायेगा तथा धन की संग्रह शक्ति में कमजोरी के कारण से धन एवं कुटुम्ब के स्थान में दुःख और क्लेश का योग पायेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में कमजोरी और बाधायें प्राप्त करेगा। किन्तु मनोयोग के गुप्त कर्म से एवं कुछ परतंत्रता युक्त कर्म से धन की वृद्धि का साधन बनावेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व के स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि और जीवन की सहायक होने वाले पुरातत्व का लाभ पायेगा।

नं. ६६२

तुला लग्न में ३ चन्द्र

यदि धनु का चन्द्र– तीसरे भाई के स्थान एवं पराक्रम स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई–बहिन के स्थान में शोभा पायेगा और पराक्रम स्थान में बड़ी सफलता शक्ति पायेगा और राज–समाज में बड़ा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में मनोयोग के कर्म’ बल से एवं पुरातत्व शक्ति से उन्नति का योग पायेगा और पिता स्थान की सहारा शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये मनोयोग के पुरुषार्थ कर्म से भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म कर्म के पालन का ध्यान रखेगा और मन का स्वामी

नं. ६६३

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३५२ तुला लग्न का फलादेश

तुला लग्न में ७ चन्द्र बनायेगा क्योंकि चन्द्रमा मनका स्वामी होता है।

यदि मेष का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो चन्द्रमा मन का अधिकारी होने के कारण मनोबल के सुन्दर कर्म योग से रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दरता एवं प्रभाव और उन्नति के कारण प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की तरफ से भी सुख रहेगा तथा राज-समाज के पक्ष में मान रहेगा और कारबार की तरफ से उन्नति का योग पायेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्ध में गौरव प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता, प्रभाव ओर मान पायेगा।

नं. ६६६७

तुला लग्न में ८ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व के स्थान पर उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में शक्ति पायेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में मस्ती का आनन्द पायेगा तथा पिता स्थान में हानि एवं कमी पायेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में दिक्कतें एवं रुकावटें पायेगा तथा राज समाज में साधारण मान पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से धन भवन को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये कारबार की उन्नति के मार्ग में धन की हानि एवं कमजोरी पायेगा तथा कुटुम्ब की कमजोरी पायेगा।

नं. ६६६८

तुला लग्न में ९ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की सुन्दर शक्ति पायेगा तथा धर्म कर्म का पालन मनोयोग से सुन्दर रूप में करेगा और पिता सीन कीशक्ति का फायदा उठावेगा तथा मन का अधिकारी चन्द्रमा है, इसलिये कारबार की उन्नति के मार्ग में मनोयोग के सुन्दर सतोगुणी कर्म के द्वारा भाग्योदय पायेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में मान सम्मान एवं यश प्राप्त करेगा

और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रमस्थान को गुरु की धनु राशि में

नं. ६६६९

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देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति का योग पायेगा तथा पराक्रम स्थान में सफलता पायेगा।

तुला लग्न में १० चन्द्र

यदि कर्क का चन्द्र- दशम केन्द्र पिता-स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता-स्थान में बड़ी सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और चन्द्रमा मन की शक्ति का स्वामी है, इसलिये मनोबल के सुन्दर कर्म योग से कारबार में उन्नति करेगा तथा राज समाज में मान प्रतिष्ठा पायेगा और मन के अन्दर विशेष स्वाभिमान रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि का सुख कुछ त्रुटि युक्त पायेगा तथा घरेलू वातावरण के अन्दर कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सुख प्राप्ति के साधन पायेगा तथा बड़ी नीतिज्ञता से काम करेगा।

नं. ६७०

तुला लग्न में ११ चन्द्र

यदि सिंह का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान का लाभ पायेगा तथा चन्द्रमा मन की शक्ति का अधिकारी होता है, इसलिये मनोयोग के सुन्दर कर्म से उत्तम लाभ प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध का लाभ पायेगा तथा मान प्रतिष्ठा पायेगा और मन की शक्ति से आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से सन्तान स्थान को देख रहा है, अतः सन्तान पक्ष के स्थान में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सफलता पायेगा तथा विद्या में शक्ति की पूर्ति करेगा तथा लाभ का विशेष ध्यान रखेगा।

नं. ६७१

तुला लग्न में १२ चन्द्र

यदि कन्या का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा तथा पिता स्थान की कमजोरी पायेगा और कारबार के स्थान में हानि पायेगा तथा राज समाज के सम्बन्ध में मान प्रतिष्ठा की कमजोरी पायेगा और चन्द्रमा मन की शक्ति का अधिकारी है इसलिये मनोयोग की शक्ति से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में उन्नति एवं सफलता पायेगा तथा खर्च संचालन की उत्तम शक्ति पायेगा और सातवीं

नं. ६७२

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३५६

तुला लग्न में ५ मंगल

तुला लग्न का फलादेश करेगा और कुटुम्ब से कुछ वैमनस्य पायेगा तथा चौथी दृष्टि से आयु एवं पुरोत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन के मार्ग में कुछ दिक्कतों के साथ-साथ पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार से खूब आमदनी करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन की प्राप्ति में सफलता पायेगा तथा स्वार्थ सिद्धि के लिये कुछ कटु शब्द का प्रयोग भी करेगा।

नं. ६७७

तुला लग्न में ६ मंगल

यदि मीन का मंगल- छठें शत्रु स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा और धन की संग्रह शक्ति में कमी रहेगी तथा स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद या झंझट रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम एवं दिक्कतों से सफलता मिलेगी तथा कुटुम्ब एवं गृहस्थ से कुछ परेशानी रहेगी और चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान को भाग्य एवं धर्म वृद्धि करेगा तथा धर्म के मार्ग में स्वार्थ युक्त पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थानों से अच्छा सम्बन्ध बनावेगा और आठवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता एवं देह के सुख में कुछ कमी पायेगा और देह में कुछ गर्म विकार पायेगा तथा झगड़े झंझटों के मार्ग से फायदा करेगा।

नं. ६७८

यदि मेष का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में विशेष शक्ति पायेगा किन्तु धन स्थानपति ग्रह कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ घिराव या इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ घिराव या कुछ दिक्कत सी रहेगी तथा भोगादिक की अच्छी शक्ति पायेगा और चौथी नीच दृष्टि से पिता स्थान को एवं राज-समाज, कारबार के स्थान को मित्र

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तुला लग्न में ७ मंगल

चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ हानि पायेगा तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ कमजोरी या परतंत्रता पायेगा और राज-समाज के अन्दर प्रभाव की कुछ कमी रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से देख के स्थान का सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ गरम विकार पायेगा और आठवीं दृष्टि से धन स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की शक्ति पायेगा।

नं. ६७९

तुला लग्न में ८ मंगल

यदि वृषभ का मंगल- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में संकट पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में परेशानी पायेगा और दूसरे स्थान से सम्बन्धित रोजगार के मार्ग में परेशानी पायेगा और दूसरे स्थान से सम्बन्धित रोजगार चलावेगा और पुरातत्व शक्ति का सहयोग पायेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्ध में चिन्ता रहेगी और चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी की शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में धन स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये धन की कुछ शक्ति परिश्रम से और पुरातत्व से पायेगा ओर कुटुम्ब का थोड़ा सा सहयोग प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की कुछ शक्ति पायेगा तथा पराक्रम स्थान से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ६८०

तुला लग्न में ९ मंगल

यदि मिथुन का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन की वृद्धि पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में भाग्य से अच्छा सहयोग मिलेगा ओर भाग्यवती स्त्री पायेगा तथा शादी के बाद भाग्य की उन्नति होगी और धर्म के योग से धन की वृद्धि पायेगा और गृहस्थ धर्म का उत्तम पालन करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों में फायदे का योग रहा है,

नं. ६८१

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पायेगा और सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भई का कुछ अच्छा योग पायेगा तथा पराक्रम स्थान में सफलता पायेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान की वृद्धि करेगा और भूमि-मकानादि की सुख शक्ति पायेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्धित सुखों की वृद्धि करेगा तथा लौकिक पारलौकिक दोनों का ध्यान रखेगा।

तुला लग्न में १० मंगल

यदि कर्क का मंगल- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में हानि करेगा तथा राज समाज में मान प्रतिष्ठा की कमी पायेगा और कारबार के मार्ग में पूरी उन्नति नहीं कर सकेगा तथा कुछ परतंत्रता युक्त कर्म से कार्य करेगा और धन एवं रोजगार की कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब में कुछ अशांति रहेगी और स्त्री पक्ष

नं. ६८२

प्राप्त रहेंगे तथा चौथी मित्र दृष्टि से देह के सीन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देहल में कुछ कमजोरी ओर कुछ मान प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान एवं भूमि स्थान की शक्ति पायेगा ओर आठवीं शत्रु दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ वैमनस्य प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि की शक्ति से स्वार्थ पूर्ण और नीरसता युक्त बातें करेगा।

तुला लग्न में ११ मंगल

यदि सिंह का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग से बहुत धन लाभ पायेगा और स्त्री स्थान का विशेष लाभ पायेगा क्योंकि ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बहुत शक्तिशाली हो जाता है और चौथी दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र ,देख रहा है,

नं. ६८३

इसलिये धन संग्रह की शक्ति पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ वैमनस्य या नीरसता पायेगा और शब्द शैली में स्वयं युक्त बातें करेगा और आठवीं

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मित्र दृष्टि से शत्रुस्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव और लाभ पायेगा तथा झगड़े-झंझटों से फायदा उठावेगा।

तुला लग्न में १२ मंगल

यदि कन्या का मंगल- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध पायेगा और धन एवं कुटुम्ब की हानि पायेगा तथा रोजगार व स्त्री स्थान में हानि एवं कमजोरी प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ सुख में बाधा पायेगा और चौथी मित्र दृष्टि से भाई एवं पुरुषार्थ के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति पायेगा तथा पुरुषार्थ के स्थान में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये व्यवहाारिक एवं धन की शक्ति से शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा और आठवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कमजोरी लिए हुए शक्ति पायेगा और रोजगार के पक्ष में दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ६८४

भाग्य, धर्म, खर्च, बाहरी स्थानपति-बुध

तुला लग्न में १ बुध

यदि तुला का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उत्तम शक्ति पायेगा तथा शानदार खर्च करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भाग्य को उन्नति का योग प्राप्त करेगा किन्तु व्ययेश होने के कारण देह में कुछ दुर्बलता पायेगा तथा भाग्य के स्थान में कुछ कमी महसूस करेगा और कुछ कमी लिये हुए धर्म का सुन्दर पालन करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में भाग्य एवं बाहरी स्थान से विवेक की शक्ति के द्वारा सफलता पायेगा और स्त्री स्थान से सुन्दर सहयोग पायेगा।

नं. ६८५

यदि वृश्चिक का बुध- दूसरे धन स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य एवं बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन की वृद्धि करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष कारणों से धन के दोष में कुछ कमजोरी रहेगी और

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तुला लग्न में २ बुध

कुटुम्ब स्थान में कुछ कमी के साथ उत्तम सम्बन्ध पायेगा तथा खर्चा खूब करेगा और धर्म के पालन में कुछ स्वार्थ का अधिक ध्यान रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की दिनचर्या में कुछ शक्ति एवं भाग्यवानी पायेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा धनवान व इज्जतदार माना जायेगा।

नं. ६८६

तुला लग्न में ३ बुध

यदि धन का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई-बहीन की शक्ति पायेगा और पराक्रम की सफलता पायेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भाग्योन्नति के मार्ग में कुछ कमजोरी पायेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को अपनी मिथुन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि पायेगा और धर्म का पालन करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा यश प्राप्त करेगा और भाग्य तथा पुरुषार्थ की शक्ति से खर्चा खूब करेगा तथा धर्म और ईश्वर के सम्बन्ध में विवेक शक्ति के अन्दर कुछ कमी लिये हुये कुछ विशेष धर्म का पालन करेगा।

नं. ६८७

तुला लग्न में ४ बुध

यदि मकर का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान की सुख शक्ति पायेगा और भूमि मकानादि की शक्ति पायेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारणों से घेरलू सुख शान्ति में कमी रहेगी और भूमि के सुख में भी कुछ कमजोरी रहेगी तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से घर बैठे भाग्य की वृद्धि के साधन विवेक शक्ति से पायेगा और खर्चा खूब आनन्द पूर्वक करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा राज्य समाज में मान प्राप्त करेगा।

नं. ६८८

यदि कुम्भ का बुध- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और

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तुला लग्न का फलादेश

और धर्म के पक्ष में हानि पायेगा और खर्च के मार्ग में कमी एवं कुछ परेशानी पायेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतों के साथ सफलता शक्ति पायेगा और आयु स्थान में कुछ शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को मंगल की दृष्टि राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाइयों के मार्ग से धन की वृद्धि के कारण पायेगा तथा यश की कमी रहेगी।

नं. ६९२

तुला लग्न में ९ बुध

यदि मिथुन का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाग्य की वृद्धि एवं शक्ति पायेगा और धर्म के मार्ग में श्रद्धा रखेगा तथा बहरी स्थानों के सम्बन्ध से विवेक की सुनदरता शक्ति द्वारा भाग्य को उन्नति का मार्ग पायेगा और भाग्य की शक्ति से खर्चा खूब करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से भाग्य के अन्दर कुछ कमजोरी अनुभव करेगा तथा धर्म का पालन ठीक तौर से पूरा नहीं कर सकेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति रहेगी तथा पुरुषार्थ स्थान में कुछ कमजोरी के साथ सफलता मिलेगी।

नं. ६९३

तुला लग्न में १० बुध

यदि कर्क का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में भाग्य शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और राज-समाज में मान रहेगा तथा कारबार के मार्ग में बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में खर्चा खूब करेगा और सफलता मिलेगी किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से पिता के लाभ स्थान में कुछ कमी रहेगी और कारबार की उन्नति एवं राज-समाज के पक्ष में भी कुछ कमजोरी रहेगी तथा धर्म-कर्म का थोड़ा पालन ठीक से रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शनि की मकर राशि में माता एवं भूमि स्थान को देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान और भूमि की कुछ शक्ति पायेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा।

नं. ६९४

यदि सिंह का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति और बाहरी स्थान के सम्बन्ध से आमदनी के

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३६६

तुला लग्न का फलादेश

रहेगा और पराक्रम शक्ति का प्रयोग बुद्धि और युक्ति के द्वारा किया जायेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के योग से भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का यथा शक्ति पालन करेगा और यश प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और नवमीं दृष्टि से देह में सम्मान और प्रभाव की शक्ति पायेगा और छठें स्थान पति होने के दोष से स्वास्थ्य एवं संतान में कुछ त्रुटि रहेगी।

तुला लग्न में ६ गुरु

यदि मीन का गुरु- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु स्थान में आदर्श मार्ग से महान् प्रभाव की शक्ति पायेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से पुरुषार्थ में सफलता शक्ति पायेगा तथा छठें स्थान का स्वामी होने के दोष कारणों से भाई-बहिन के सम्बन्धों में कुछ वैमनस्यता प्राप्त होगी तथा पुरुषार्थ कर्म में कुछ परतन्त्रता युक्त प्रभाव की शक्ति पायेगा और

नं. ७०२

पाँचवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के स्थान की उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और कारबार में वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और पुरुषार्थ कर्म के योग से बाहरी स्थानों में सफलता शक्ति पायेगा और नवमीं मित्र दृष्टि से धन एवं कटम्भ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम की विशेष शक्ति पायेगा और इज्जतदार माना जायेगा।

तुला लग्न में ७ गुरु

यदि मेष का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा रोजगार में उन्नति करेगा किन्तु शत्रु स्थान पति होने के दोष के कारण से स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ अधिक परिश्रम करना पड़ेगा तथा भाई-बहिन

नं. ७०३

दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशी में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ

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कर्म के योग से धन लाभ की शक्ति पायेगा तथा आवश्यकताओं की पूर्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पराक्रम स्थान की वृद्धि करेगा तथा भाई बहिन की सुख शक्ति में कुछ कमी लिये हुये सहयोग पायेगा।

तुला लग्न में ८ गुरु

यदि वृष का गुरु- आठवें आयु एवं मृत्यु तथा पुरातत्व स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में बैठा है तो भाई बहिन की सुख शक्ति में कमी पायेगा और पराक्रम स्थान के सम्बन्ध में कमजोरी पायेगा तथा शत्रु पक्ष के सम्बन्ध से जीवन में कुछ परेशानी सी रहेगी और छठे रोग स्थान का स्वामी होने के कारण उदर के नीचे कुछ शिकायत रहेगी पाँचवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को एवं बाहरी स्थानों को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम के योग से खर्च स्थान का संचालन करेगा तथा बाहरी स्थानों में शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन, परिवार द्वितीय घर में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के साधन बढायेगा तथा कुटुम्ब से कुछ सहयोग पायेगा तथा नवमी नीच दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कमी एवं क्लेश प्राप्त करेगा और भूमि, मकानादि के सुख में एवं मातृ स्थान के सम्बन्धों में विशेष कमी रहेगी और कुछ परतंत्रता का अनुभव करेगा।

तुला लग्न में ९ गुरु

यदि मिथुन का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो परिश्रम के योग से भाग्य की वृद्धि और यश पायेगा तथा शत्रु पक्ष और झगड़े-झंझटों के योग से भाग्य में कुछ परेशानी रहेगी तथा धर्म के पालन स्थान में कुछ वृद्धि एवं कमजोरी पायेगा और पाँचवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी को लिये हुये प्रभाव की शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पराक्रम की विशेष सफलता शक्ति, भाग्य और परिश्रम के योग से पायेगा तथा भाई-बहिन

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है, इसलिये स्त्री पक्ष में शक्ति तथा रोजगार के मार्ग में सफलता शक्ति मिलेगी, किन्तु छठे स्थान का स्वामी होने के दोष के कारण से भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ मतभेद रहेगा और आमदनी के मार्ग में विशेष दौड़-धूप करनी पड़ेगी।

तुला लग्न में १२ गुरु

यदि कन्या का गुरु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत करेगा तथा बाहरी स्थानों में शक्ति प्राप्त करेगा और भाई-बहिन के पक्ष में कमजोरी होगी तथा पुरुषार्थ शक्ति में कमजोरी रहेगी और कुछ परतन्त्रता का-सा योग पायेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से माता के सुख स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख-सम्बन्धों में कमी एवं कष्ट प्राप्त करेगा और मकानादि रहने के सुख स्थान में कुछ अशान्ति रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपने मीन राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के योग से तभया कुछ दव्बू नीति से एवं छिपी नीति से शत्रु पक्ष में मतलब सिद्ध करेगा तथा प्रभाव की कमजोरी रहेगी और नवीं दृष्टि से आयु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या एवं आयु में कुछ झंझटों के साथ शक्ति मिलेगी और पुरातत्व का कुछ लाभ पायेगा तथा छठे स्थान का स्वामी होने के दोष-कारण से खर्च के मार्ग में, बाहरी सम्बन्धों में तथा भाई-बहिन आदि के पक्षों में कुछ परेशानी और झंझट-सी रहेगी।

नं. ७०८

देह, आयु, पुरातत्वस्थानपात-शुक्र

तुला लग्न में १ शुक्र

यदि तुला का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो देह में आत्मबल की शक्ति तथा आयु की सुन्दर शक्ति मिलेगी और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का आदर्श लाभ पायेगा तथा देह के अन्दर प्रभाव और मान की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से देह में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री के पक्ष में खूब आत्मीयता रखते हुए भी कुछ स्त्री के सुख में कमी पायेगा और रोजगार के पक्ष में विशेष

नं. ७०९

भ.सं.-२४

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३७०

तुला लग्न का फलादेश

दिलचस्पी के साथ कार्य करने से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

तुला लग्न में २ शुक्र

यदि वृश्चिक का शुक्र- दूसरे धन और कुटुम्ब स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है

तो धन की शक्ति को प्राप्त करने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति मिलेगी किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से धन की संग्रह शक्ति में कमी पायेगा और कुटुम्ब के सुख-संबन्धों में कुछ अशान्ति रहेगी, किन्तु धन-जन की उन्नति करने का ही मुख्य लक्ष्य रहेगा और सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी वृषभ

राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या का रहन-सहन अमीरात के ढंग से व्यतीत होगा तथा बड़ी चतुराई के योग से इज्जत होगी।

नं. ७१०

तुला लग्न में ३ शुक्र

यदि धन का शुक्र- तीसरे भाई बहिन और पराक्रम स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान में कुछ वैमनस्यता होगी और पुरुषार्थ शक्ति के स्थान में आत्मबल के योग और परिश्रम के द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और आयु को शक्ति प्राप्त होगी तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति

का लाभ चतुराई के द्वारा प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य और धर्म स्थान को बध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक परिश्रम के योग से भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म स्थान की वृद्धि करने के लिए भी प्रयत्नशील रहेगा तथा देह की हिम्मत शक्ति के बल एवं चतुराई के योग से जीवन की दिनचर्या को प्रभावयुक्त व्यतीत करेगा।

नं. ७११

तुला लग्न में ४ शुक्र

यदि मकर का शुक्र- चौथे केन्द्र माता और भूमि के स्थान पर मित्र धनि की राशि में बैठा है

तो मातृ स्थान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा देह को आराम के साधन पायेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष-कारण से माता के सुख और प्रेम की कमी रहेगी तथा रहने के स्थान में भूमि का सुख होगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का सुख रहेगा और सातवीं दृष्टि से राज्य

नं. ७१२

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एवं पिता स्थान को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं कारबार की वृद्धि करने के लिये चतुराई के योग से प्रयत्नशील रहेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ५ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो आत्मबल की शक्ति और चतुराई के योग से विद्या स्थान में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और वाक्चातुरी के द्वारा प्रभाव और मान प्राप्त होगा तथा संतान शक्ति पायेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से संतान पक्ष के सुख में कुछ त्रुटि अनुभव होगी और आयु का उत्तम योग मिलेगा तथा कुछ पुरातत्त्व शक्ति का फायदा पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ के स्थान में कुछ अरुचिकर रूप से लाभ की शक्ति मिलेगी और बुद्धिमान् बनेगा। तुला लग्न में ६ शुक्र

नं. ७१३

यदि मीन का शुक्र- छठे शत्रु स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में विशेष प्रभाव रखेगा और बड़ी-बड़ी दिक्कतों पर हमेशा हिम्मत शक्ति के द्वारा विजय प्राप्त करेगा तथा कुछ परतंत्रता युक्त जीवन व्यतीत करेगा और आयु की शक्ति का थोड़ा लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या में शानदाररी रहेगी तथा देह में कुछ रोग और झंझट थोड़ा-सा पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों में कुछ दिक्कतें होंगी। तुला लग्न में ७ शुक्र

नं. ७१४

यदि मेष का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण से स्त्री के पक्ष में कुछ दिक्कत पाते हुए आत्मीयता और शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में देह के परिश्रम के योग से सफलता प्राप्त करेगा और आयु की सुन्दर शक्ति मिलेगी तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा गृहस्थ जीवन में विकास तथा सातवीं

नं. ७१५

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के योग से विशेष प्रयत्न करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं सुख भवन का शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता का सुख और घरेलू सुख प्राप्त करेगा।

तुला लग्न में ११ शुक्र

यदि सिंह का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम और चतुराई के योग से आमदनी के मार्ग से सफलता और अनेक प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति प्राप्त करेगा तथा आयु की शक्ति पायेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या में लाभ का आनन्द मानेंगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या

नं. ७१९

देख रहा है, इसलिये विद्या के स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ थोड़ी-सी अदिचन के साथ उत्साह शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा प्रभाव शक्ति पायेगा।

तुला लग्न में १२ शुक्र

यदि कन्या का शुक्र- बारहवें खच एवं बाहरी स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्च के स्थान में विशेष परेशानी अनुभव करेगा और बाहरी स्थान में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा आयु के सम्बन्ध में कमी और कष्ट के कारण बनेंगे तथा देह के पक्ष में कमजोरी एवं दुर्बलता रहेगी और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व

नं. ७२०

शक्ति को हानि प्राप्त होगी तथा हृदय में कुछ अशान्ति रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में विशेष प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट आदि मार्गों में बड़ी भारी हिम्मत और विशेष चतुराईयों से काम निकालेगा।

माता, भूमि, सुख, विद्या, सन्तानस्थानपति-शनि

यदि तुला का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह में स्थूलता एवं प्रभाव पायेगा और मातृ स्थान की सुख शक्ति को उत्तम रूप से प्राप्त करेगा और भूमि, मकानादि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा सन्तान पक्ष से सुख शक्ति मिलेगी और विद्या का उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सम्बन्ध

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तुला लग्न में १ शनि

में कुछ वैमनस्यता पायेगा तथा पराक्रम स्थान में कुछ अधिक परिश्रम करने से सफलता शक्ति मिलेगी और सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद रहने के कारण थोड़ा–सा कष्ट का अनुभव होगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ेगी तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख में कुछ नीरसता रहेगी और राज–समाज में कुछ मान रहेगा तथा कारबार में शक्ति मिलेगी।

नं. ७२१

तुला लग्न में २ शनि

यदि वृश्चिक का शनि–दूसरे धन स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन के सुख–सम्बन्धों में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सफलता प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के सुख में कुछ मतभेद रहेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये सन्तान पक्ष के सुख में कुछ कमी रहेगी और विद्या की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु धन वृद्धि करने में ही सुख का अनुभव करेगा तथा तीसरी दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की सहायता शक्ति एवं भूमि की शक्ति का सुख प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आठवें आयु स्थान एवं पुरातत्त्व स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्त्व शक्ति का लाभ जीवन के सहायता के रूप में प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा आमदनी की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा और आमदनी की वृद्धि करने के लिये कठिन मार्ग से भी लाभ की सूर्तें बुद्धि योग द्वारा स्थापित करेगा।

नं. ७२२

यदि धन का शनि–तीसरे भाई–बहिन एवं पराक्रम स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति की विशेष सफलता पायेगा और कुछ वैमनस्यता युक्त रूप से भाई–बहिन की शक्ति मिलेगी तथा मातृ स्थान की शक्ति प्राप्त होगी और परिश्रम के योग से प्रभाव और सुख तथा हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से विद्या एवं सन्तान पक्ष को स्वयं अपनी कुम्भ

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३७६ तुला लग्न का फलादेश और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियों से कार्य संचालित होगा तथा गृहस्थ भोगादिक पक्ष में कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से सफलता मिलेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि में धन भवन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कुछ त्रुटियाँ युक्त सुख का अनुभव करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ मतभेद रहेगा, किन्तु बुद्धि में आनन्द मानेगा। तुला लग्न में ६ शनि यदि मीन का शनि- छठे शत्रु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो माता के सुख-सम्बन्धों में कमी और वैमनस्यता का योग पायेगा तथा मकानादि रहने के स्थान में कुछ झंझट का योग होगा और संतान पक्ष के सुख-सम्बन्धों में दिक्कत और परेशानी पायेगा और विद्या के स्थान में कुछ कमी और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा छठे स्थान पर पूरे ग्रह बलवान् हो जाते हैं, इसलिये शत्रु स्थान में बुद्धि योग से विजय एवं प्रभाव प्राप्त करेगा तथा दिमाग के अन्दर कुछ शांति की कमी पायेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से आयु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व की कुछ सुख-शक्ति मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा तथा बाहरी स्थान का सुख-सम्बन्ध होगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता पायेगा। किन्तु पुरुषार्थ एवं हिम्मत की वृद्धि करेगा।

नं. ७२६

तुला लग्न में ७ शनि यदि मेष का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री गृहस्थ के सुख-साधनों में कमी एवं परेशानी प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परतन्त्रता एवं अशांति के कारण बनेंगे तथा विद्या में कुछ कमजोरी रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परतन्त्रता एवं अशांति के कारण बनेंगे तथा विद्या में कुछ कमजोरी रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा तीसरी मित्र दृष्टि से, भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है,

नं. ७२७

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तुला लग्न का फलादेश

देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसता से सफलता शक्ति मिलेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ मतभेद होगा और विशेष परिश्रम के द्वारा पुरुषार्थ शक्ति की सफलता पायेगा और दसर्वीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ वैमनस्यता एवं अरुचिकर रूप से प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा दिक्कतों पर विजय तथा बुद्धि का योग एवं दैवयोग से भाग्योन्नति के साधन प्रयोेगा तथा धन और भाग्य की शक्ति के द्वारा आनन्द का विशेष अनुभव करेगा।

तुला लग्न में १० शनि यदि कर्क का शनि- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में कुछ नीरसता युक्त शक्ति मिलेगी तथा राज-समाज में कुछ मान और प्रभाव प्राप्त होगा और कारबार में कुछ दिक्कतों के साथ सफलता शक्ति के साथ विद्या ग्रहण करेगा तथा संतान पक्ष में उत्तम शक्ति पाने पर भी कुछ मतभेद रहेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थानों को बुध की कन्या राशि में देख रहा है,

नं. ७३०

इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख मिलेगा और सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि, स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है इसलिये माता की शक्ति प्राप्त होगी और भूमि, मकानादि रहने के स्थान की शक्ति अच्छी मिलेगी और प्रभाव युक्त मार्ग से सुख के साधन मिलेंगे तथा दसर्वीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ मतभेद के कारण परेशानियों को अनुभव होगा और रोजगार के मार्ग में कुछ दिक्कतों से टकरा-टकरा कर कार्य चलेगा तथा गृहस्थ-भोगादिक सुखों को कुछ कमी रहेगी तथा बुद्धि में तेजी होगी।

तुला लग्न में ११ शनि यदि सिंह का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा हो तो क्रूर ग्रह लाभ स्थान में बैठने से अधिक लाभ करने की शक्ति देता है, किन्तु शत्रु राशि पर होने से बुद्धि योग द्वारा आमदनी के मार्ग में कुछ कठिनाई लिये हुए विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और माता के सुख को न्यूनता के साथ लाभ करेगा तथा भूमि-मकानादि का लाभ होगा और तीसरी उच्च दृष्टि से देह के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में

नं. ७३१

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देख रहा है, इसलिये देह में स्थूलता एवं प्रभाव की शक्ति प्राप्त होगी और सातवीं दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या, बुद्धि की शक्ति पायेगा और दिमाग में कुछ गर्मी तथा चिन्ता-फिकर एवं विशेष स्वार्थपरता होगी और संतान पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त रहेगी और दसवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त होगी तथा पुरातत्व की शक्ति की लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या तथा देह में कुछ मस्ती तथा सुख एवं लापरवाही रहेगी।

तुला लग्न में १२ शनि यदि कन्या का शनि- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख का योग प्राप्त करेगा, किन्तु संतान पक्ष के सम्बन्ध में हानि एवं कमी रहेगी तथा विद्या के स्थान में कमजोरी और मातृ स्थान के सुख-सम्बन्धों में कमी प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि की कमजोरी रहेगी तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से धन भवन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में भी कुछ कमजोरी पायेगा तथा कुटुम्ब स्थान में कुछ मतभेद रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ नीरसता के साथ शक्ति और प्रभाव होगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ वृद्धि करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ रुचि रखेगा तथा बुद्धि एवं वाणी के अन्दर भ्रम और कुछ परेशानी मानेगी।

कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु तुला लग्न में १ राहु यदि तुला का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो देह में कुछ परेशानी के कारण शरीर में कुछ कमी या कमजोरी रहेगी और अपने व्यक्तित्व की उन्नति के लिये महान् गुप्त युक्तियों का एवं चतुराईयों का प्रयोग होगा तथा दिखावटी प्रभाव अधिक पायेगा और अन्दरूनी गहरी उन्नति करने के लिये विशेष झंझट युक्त मार्ग से कठिन कर्म के द्वारा प्रयत्न करेगा तथा उन्नति के मार्ग में कभी-कभी महान् संकट का सामना करना पड़ेगा। किन्तु फिर भी अपनी स्थिति के मुकाबले में

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के कारण प्राप्त होंगे और अन्त में गुप्त शक्ति के बल पर संकट से मुक्ति मिलेगी तथा सुख प्राप्ति के साधन मिलेंगे।

तुला लग्न में ५ राहु

यदि कुम्भ का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट उत्पन्न करेगा और विद्या के ग्रहण करने में परेशानी के कारण प्राप्त होंगे तथा विद्या के अन्दरूनी हिस्से में कुछ कमी और कमजोरी रहेगी तथा बाहरी हिस्से में विद्या की शक्ति का अच्छा प्रदर्शन रहेगा और दिमाग शक्ति के अन्दर कुछ परेशानी एवं कुछ युक्तियों का योग मिलेगा तथा अपनी बात को सिद्ध करने के लिए सत्य-असत्य की परवाह नहीं की जायेगी, बल्कि शनि के घर में बैठा है, इसलिये अपने प्रत्येक शब्दों को दृढ़ता के रूप में इस्तेमाल करेगा तथा विचारों में कुछ चिन्ता रहेगी।

नं. ७३८

तुला लग्न में ६ राहु

यदि मीन का राहु- छठें शत्रु स्थान में एवं रोग, झगड़े-झंझट के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में कुछ झंझट रहेगी, किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव कायम करेगा और बड़ी-बड़ी दिक्कतों एवं झंझटों पर विजय पायेगा तथा अपनी हिम्मत-शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी महसूस करते हुए भी प्रकट में बड़ी भारी हिम्मत और बहादुरी से काम लेगा तथा गुरु की शक्ति पर बैठा है, इसलिये आदर्श युक्ति के गुप्त बल से सज्जनता युक्त मार्ग के द्वारा विपक्षियों में सफलता और प्रभाव प्राप्त होगा और रोजगार आदि मार्ग में सफलता और ननिहाल पक्ष में कुछ कमी रहेगी।

नं. ७३९

तुला लग्न में ७ राहु

यदि मेष का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में कठिन संकट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी दिक्कतों और परेशानियों से कार्य करेगा तथा स्त्री गृहस्थ के अन्दर कभी-कभी गम्भीर चिन्ता प्राप्त होगी, किन्तु गुप्त युक्ति और धैर्य के कारण गम्भीर परिस्थिति पर काबू पा सकेगा और बहुत-सी दिक्कतों के बाद स्त्री स्थान में कुछ शक्ति पायेगा तथा रोजगार

नं. ७४०

Page 386

३८२

तुला लग्न का फलादेश

के पक्ष में कभी-कभी महान् संकट पाने पर भी हिम्मत और युक्ति से कामा लेगा, क्योंकि गरम ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये विशेष परिश्रम और विशेष युक्तिबल तथा संघर्षों के योग से सफलता पायेगा।

तुला लग्न में ८ राहु

यदि वृषभ का राहु- आठवें आयु एवं पुरातत्त्व स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो जीवन के अन्दर आयु स्थान में बड़े-बड़े महान् संकट प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी जीवन समाप्ति का-सा योग बन जायेगा। किन्तु आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, अतः जीवन रक्षा बराबर युक्ति बल से होती रहेगी और आयु स्थान में शक्ति बनेगी तथा उदर में कुछ शिकायत रहेगी और पुरातत्त्व स्थान में हानि प्राप्त होगी किन्तु

नं. ७४१

किसी दूसरे मार्ग से जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ गम्भीर योजनाओं द्वारा प्राप्त होगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ चिन्ता और परेशानियों का योग प्राप्त रहने पर भी कुछ प्रभाव युक्त रहेगा।

तुला लग्न में ९ राहु

यदि मिथुन का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो उच्च युक्तियों के बल से भाग्य की विशेष वृद्धि प्राप्त करेगा और बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा तथा बड़ी-बड़ी लम्बी योजनाओं के द्वारा भाग्य की वृद्धि के लिये सदैव महान् प्रयत्लशील रहेगा और धर्म के सम्बन्ध में

नं. ७४२

बड़ी भारी छान-बीन करके किसी खास तरीके पर धर्म का पालन करेगा और कभी-कभी भाग्योन्नति के मार्ग में विशेष बाधायें मिलेंगी। किन्तु विवेकी बुध के घर में मित्र भाव से बैठा है, इसलिये विवेक की महान् शक्ति और चतुराई से सदैव सफलता को पायेगा।

तुला लग्न में १० राहु

यदि कर्क का राहु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान के सुख में कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध में कमी और कुछ परेशानियाँ होंगी और कभी-कभी कारबार एवं उन्नति के मार्गों में बड़ी-बड़ी दिक्कतें और झंझट प्राप्त होंगे तथा मन को शक्ति

नं. ७४३

के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर शत्रु भाव में बैठा है, इसलिये मान-प्रतिष्ठा कारबार के मार्ग में मन

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३८४ तुला लग्न का फलादेश करेगा तथा मान-प्रतिष्ठा पायेगा और गुप्त युक्ति के बल से बड़ी गहरी योजना बनाकर सफलता प्राप्ति तथा देह में कुछ अन्दरूनी कमी के कारण महसूस करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति के गुप्त बल से विजयी बनेगा। तुला लग्न में २ केतु यदि वृश्चिक का केतु- दूसरे धन स्थान में एवं कुुटुम्ब स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में बड़ी कमी रहेगी और कुटुम्ब के सम्बन्ध में बड़ा क्लेश होगा तथा धन के सम्बन्ध में कभी-कभी महान् संकट का सामना करेगा और धर्म के लिए कठिन कर्म का प्रयोग और कुछ गुप्त शक्ति के द्वारा भी धन की प्राप्ति करेगा, क्योंकि मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये धन और कुटुम्ब के सम्बन्ध से सदैव ही कुछ न कुछ परेशानियाँ प्राप्त होती रहेंगी। किन्तु धन की पूर्ति करने के लिये कष्ट-साध्य कर्म को बड़ी भारी हिम्मत के साथ करता रहेगा और कुछ गुप्त रूप से धन का शक्ति पाने पर भी धन के सम्बन्ध में अन्दरूनी दुःख का अनुभव प्राप्त होगा।

नं. ७४६

तुला लग्न में ३ केतु यदि धन का केतु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर उच्च का होकर बैठा है तो पराक्रम स्थान की महान् वृद्धि करेगा और बहिन भाइयों को विशेष शक्ति मिलेगी और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह विशेष शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये कठिन से कठिन कार्यों को बड़ी जबरदस्त मुस्तैदी के साथ पूरा करेगा और कभी हिम्मत नहीं हारेगा तथा महान् कठिन कर्म की पूर्ति के द्वारा बड़ी भारी प्रभावशक्ति पायेगा और सदैव दौड़-धूप में लगा रहेगा। किन्तु केतु के स्वाभाविक दोष के कारण कभी-कभी भाई के स्थान में कोई परेशानी का योग होगा तथा कभी कोई गुप्त पराक्रम शक्ति के अन्दर कमजोरी पाने से कुछ कष्ट अनुभव करेगा।

नं. ७४७

तुला लग्न में ४ केतु यदि मकर का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में कमी और कष्ट के कारण तथा मकानादि भूमि की कमी प्राप्त करेगा और घरेलू सुख-सम्बन्धों में झगड़े और परेशानी होगी तथा गरम ग्रह शनि की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये कभी-कभी घरेलू वातावरण में महान् अशांति के कारण प्राप्त करेगा किन्तु गुप्त शक्ति

नं. ७४८

Page 389

और कठिन कर्म के द्वारा सुख प्राप्ति के साधन प्राप्त होगा, फिर भी कुछ न कुछ मकान आदि सुख के सम्बन्धों में कमी प्राप्त रहेगी तथा गहरे सुख की खोज में रहेगा।

तुला लग्न में ५ केतु

यदि कुम्भ का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कुछ कष्ट और संकट के योग प्राप्त होंगे तथा विद्या ग्रहण करने में कुछ कठिनाइयाँ और परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा बुद्धि और शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये कठिन कर्म के द्वारा विद्या की शक्ति का संग्रह करेगा और बहुत सी अति कठिनाइयों के बाद संतान पक्ष में शक्ति पायेगा। किन्तु फिर कभी-कभी संतान पक्ष में गहरे संकट का सामना करना होगा।

नं. ७४९

तुला लग्न में ६ केतु

यदि मीन का केतु- छठें शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु के स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम लेगा तथा वेद गुरु बृहस्पति के घर में बैठा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी योग्यता और दृढ़ता तथा निर्भयता से काम लेगा। उत्तम रूप के साथ शत्रु पक्ष में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, छठें स्थान पर कूर ग्रह बलवान हो जाता है, इसलिये कभी-कभी शत्रु स्थान में महान संकट प्राप्त करेगा और परेशानियों पर काबू पाने के लिये गुप्त शक्ति के कठिन कर्म का प्रयोग करेगा तथा ननिहाल पक्ष में कमजोरी पायेगा।

नं. ७५०

तुला लग्न में ७ केतु

यदि मेष का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में विशेष कष्ट अनुभव करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी दिक्कतें प्राप्त होंगी और गरम ग्रह की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये कभी-कभी गृहस्थ के स्थान में महान संकट का योग प्राप्त करेगा, किन्तु गृहस्थ एवं रोजगार के पक्ष में सफलता पाने के लिये गुप्त शक्ति के कठिन कर्म का प्रयोग दृढ़ता के साथ करेगा और बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम लेगा तथा कभी कुछ इन्द्रिय विकार प्राप्त

नं. ७५१

बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम लेगा तथा कभी कुछ इन्द्रिय विकार प्राप्त

भृ.सं.-२५

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३८६

तुला लग्न का फलादेश

करेगा और बड़ी परेशानियों के बाद गृहस्थ-शक्ति को प्राप्त करेगा।

तुला लग्न में ८ केतु

यदि वृषभ का केतु- आठवें आयु स्थान एवं

पुरातत्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है

तो आयु स्थान में कई बार महान् संकट प्राप्त

करेगा तथा पुरातत्व स्थान में जीवन की सहायक

होने वाली शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा तथा

जीवन की दिनचर्या में कुछ गुप्त चिन्ताओं का

योग पायेगा और आचार्य शुक्र की राशि पर केतु

बैठा है, इसलिये महान् चतुराई के योग से कठिन

कर्म के द्वारा जीवन की सहायक शक्ति प्राप्त

करेगा और कुछ गुप्त शक्ति के बल से हृदय में साहस मिलेगा किन्तु अपने

जीवन की दिनचर्या में किसी प्रकार की खास कमी महसूस करेगा और

उदर में कुछ विकार होगा।

तुला लग्न में ९ केतु

नं. ७५२

यदि मिथुन का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य

स्थान एवं धर्म स्थान में नीच का होकर मित्र बुध

की राशि पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में महान्

कष्ट पायेगा तथा धर्म के स्थान में हानि प्राप्त

करेगा और भाग्य की उन्नति के लिये बड़ी-बड़ी

परेशानियाँ पायेगा तथा कभी-कभी भाग्य के

स्थान में घोर संकट का योग पायेगा, किन्तु विवेकी

बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये भाग्य की रक्षा

एवं उन्नति के लिये महान् कठिन कर्म के द्वारा

माग बना सकेगा और कुछ अनुचित मार्ग के द्वारा भी स्वार्थ की सिद्धि

पाने का प्रयत्न करेगा तथा कभी कोई अपयश पायेगा तथा बरकत की

कुछ कमी रहेगी और ईश्वर में श्रद्धा एवं विश्वास की कमी होगी।

नं. ७५३

तुला लग्न में १० केतु

यदि कर्क का केतु- दसवें केन्द्र पिता स्थान

एवं राज्य स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि

पर बैठा है तो पिता स्थान के सम्बन्ध में कमी

और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा राज-समाज

में कुछ परेशानी और मान की कमी होगी और

कारोबार की उन्नति के मार्ग में बार-बार दिक्कतें

और झंझटें प्राप्त होंगी तथा राज-काज, व्यापार

आदि सम्बन्धों में कभी-कभी भयानक संकट

का योग प्राप्त होगा और बड़ी-बड़ी दिक्कतें सहने

के बाद एवं बहुत उतार-चढ़ाव के बाद कठिन परिश्रम की गुप्त शक्ति के

नं. ७५४

Page 391

द्वारा सफलता का मार्ग पायेगा।

तुला लग्न में ११ केतु

नं. ७५५

यदि सिंह का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो लाभ के स्थान में कुछ झंझट और परेशानी के कारण पायेगा, किन्तु ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये आमदनी के स्थान में विशेष शक्ति मिलेगी अर्थात् आमदनी की वृद्धि करने के लिए गुप्त शक्ति के कठिन परिश्रम से लाभ के स्थान में विशेष संकट का सामना करना पड़ेगा, परन्तु अन्त में सफलता मिलेगी और सूर्य की राशि पर होने से आमदनी के मार्ग में फायदे से अधिक मुनाफा खाने का भारी प्रयत्न करेगा और प्रभाव रखेगा।

तुला लग्न में १२ केतु

नं. ७५६

यदि कन्या का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में परम मित्र बुध की राशि पर बैठा है, तो खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों में विशेष शक्ति पायेगा और विवेकी बुध की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये खर्च की शक्ति को सुचारू रूप में चलाने के लिए बड़ी विवेक शक्ति से काम लेगा और खर्च की शक्ति में वृद्धि और सफलता पाने के लिए गुप्त रूप की शक्ति से कठिन परिश्रम के द्वारा काम करेगा फिर भी कभी-कभी खर्ची के मार्ग में महान् संकट का योग पायेगा तथा बाहरी स्थानों में परेशानी के योग प्राप्त करेगा, किन्तु अन्त में शक्ति प्राप्त होगी।

।। तुला लग्न समाप्त ।।

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वृश्चिक लग्न का फलादेश प्रारम्भ

नवग्रहों द्वारा भाग्य फल

(कुण्डली नं० ८६४ तक में देखिये)

प्रिय पाठकगण- ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है।

अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है

और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिये प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० '८६४' से लेकर कुण्डली नं० ८६४ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये

और दूसरे पंचांग के अन्तर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ

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६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६८ के अनुसार मालूम करिये।

(८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७६९ से ७८० तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७६९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७० के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७२ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७६ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७८ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८० के अनुसार मालूम करिये।

(८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ७८१ से ७९२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८२ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८३ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८४ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८५ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८६ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८७ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८८ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८९ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९० के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९१ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९२ के अनुसार मालूम करिये।

(८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल

आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ७९३ से ८०४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।

८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश

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कुण्डली नं ७९३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ७९४ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ७९५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ७९६ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ७९७ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ७९८ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ७९९ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ८०० के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ८०१ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ८०२ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ८०३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश

कुण्डली नं. ८०४ के अनुसार मालूम करिये।

(८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल

आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका

फलादेश कुण्डली नं. ८०५ से ८१६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन

गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

कुण्डली नं. ८०५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली

नं. ८०६ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

कुण्डली नं. ८०७ के अनुसार मालूम करिये।

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११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८०८ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८०९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१० के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८११ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१२ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१३ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१४ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१५ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१६ के अनुसार मालूम करिये।

(८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. ८१७ से ८२८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये।

८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८१७ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८१८ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८१९ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२० के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२१ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश

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कुण्डली नं. ८५१ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५२ के अनुसार मालूम करिये।

(८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८५३ से ८६४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५४ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५६ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५७ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५८ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५९ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६० के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६१ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६२ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६४ के अनुसार मालूम करिये।

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वृश्चिक लग्न में १० सूर्य

राज-समाज में मान एवं शक्तिप्राप्त करेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा तथा मान-प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की वृद्धि करने के लिये उग्र कर्म करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं मकानादि के सुख भवन को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सम्बन्ध में वैमनस्यता अथवा नीरसता पायेगा और भूमि मकानादि के स्थान में एवं सुख सम्बन्धों में कुछ कमी प्रतीत होगी।

नं. ७६६

वृश्चिक लग्न में ११ सूर्य

यदि कन्या का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान के सम्बन्ध से विशेष लाभ पायेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में प्रभाव कर्म के द्वारा लाभ की उत्तम शक्ति पायेगा और कारबार के मार्ग में विशेष लाभ करेगा और मान-प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा विद्या के अन्दर शक्ति और प्रभाव पायेगा तथा विद्या एवं वाणी के द्वारा मान-प्रतिष्ठा पायेगा तथा हुकूमत और तेजी का स्वभाव पायेगा।

नं. ७६७

वृश्चिक लग्न में १२ सूर्य

यदि तुला का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर नीच का होकर बैठा है तो खर्च के स्थान में बड़ी दिक्कतें पायेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में बड़ी कमजोरी रहेगी और पिता स्थान की तरफ से कष्ट और कमजोरी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के लिये बड़ी परेशानियाँ प्राप्त करेगा एवं राज-समाज के सम्बन्ध में प्रभाव की कमी और कभी-कभी मानहानि के कारण पायेगा तथा कुछ परतन्त्रता युक्त कर्म करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु के स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में शक्ति से काम करेगा।

नं. ७६८

भाग्य, धर्म, मनस्थानपति-चन्द्र

यदि वृश्चिक का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी पायेगा

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

वृश्चिक लग्न में ७ चन्द्र

विशाल् शक्ति के द्वारा रोजगार में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री के पक्ष में सुन्दरता एवं भाग्यवानी मिलेगी तथा गृहस्थ सुख के अन्दर मन को बड़ा आनन्द रहेगा तथा स्वार्थ युक्त धर्म का पालन बनेगा और सातवीं नीव दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी होगी और आत्मशान्ति के साधन कमजोर रहेंगे और भाग्य तथा धर्म में आन्तरिक दृष्टि से कुछ कमी अनुभव रखेगा।

नं. ७७५

वृश्चिक लग्न में ८ चन्द्र

यदि मिथुन का चन्द्र-आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी कमजोरी एवं परेशानियाँ रहेंगी और धर्म का यथार्थ पालन नहीं हो सकेगा और सुखश की कमी रहेगी किन्तु आयु की वृद्धि होगी और जीवन की सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ पायेगा। किन्तु मन को कुछ शान्ति रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये मनोबल की शक्ति से भाग्य और पुरातत्व के सहयोग से धन की शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी तब कुटुम्ब का सहयोग मिलेगा।

नं. ७७६

वृश्चिक लग्न में ९ चन्द्र

यदि कर्क का चन्द्र-त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाग्य की महान् सुंदर शक्ति प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन करेगा और मनोबल की सतोगुणी शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि और यश की प्राप्ति करेगा तथा ईश्वर में विशेष श्रद्धा शक्ति रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की सुन्दर शक्ति प्राप्त करने पर भी भाई-बहिन की तरफ से कुछ नारसता रहेगी और पराक्रम स्थान के सम्बन्ध में मनोबल और धर्म बल की सुन्दरता युक्त मार्ग से बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी।

नं. ७७७

यदि सिंह का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र सूर्य की

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वृश्चिक लग्न में १० चन्द्र सिंह राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में विशेष सफलता शक्ति पायेगा और राज-समाज में बड़ा मान और प्रभाव पायेगा तथा भाग्य और मनोबल की शक्ति से कारबार के मार्ग में विशेष उन्नत पायेगा तथा धर्म कर्म का उत्तम पालन करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ नीरसता अनुभव करेगा और भूमि मकानादि के स्थान में कुछ कमी मिले हुए सुख के साधन पावेगा तथा यश मिलेगा|

नं. ७७८

वृश्चिक लग्न में ११ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य और मनोबल की शक्ति से धन लाभ की आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगी और धर्म का लाभ पायेगा तथा भाग्य की सफलता के मार्ग से मन को महान् प्रसन्नता रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुद्धि, विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में बड़ा सुन्दर लाभ प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा बुद्धि और वाणी के अन्दर मनोबल की शक्ति के द्वारा यश और लाभ पायेगा|

नं. ७७९

वृश्चिक लग्न में १२ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- बारहवें खर्चे एवं बाहरी स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति के द्वारा खर्चा बहुत करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में मनोयोग के द्वारा बहुत सफलता पायेगा और स्थानीय मार्ग में भाग्य की बड़ी कमजोरी अनुभव करेगा तथा धम के पालन में कमजोरी प्राप्त रहेगी और भाग्योन्नति के मार्ग में बड़ी देर और दूर के योग से शक्ति प्राप्त होगी और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझटों के स्थान को मंगल मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में एवं दिक्कतों के मार्ग में भाग्य और मनोबल की शान्त शक्ति से काम निकालेगा|

नं. ७८०

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देख रहा है, इसलिये भाग्य और धर्म की कुछ हानि या कमजोरी पायेगा तथा यश की कमी रहेगी तथा ईश्वर पर भरोसा थोड़ा रहेगा।

वृश्चिक लग्न में ३ मंगल

यदि मकर का मंगल- तीसरे पराक्रम एवं भाई बहिन के स्थान पर उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो पराक्रम स्थान में विशेष शक्ति पायेगा तथा भाई-बहिन की विशेषता के अन्दर कुछ मतभेद पायेगा और देह के द्वारा विशेष पुरुषार्थ कर्म करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति रखेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण देह में कुछ शिकायत रहेगी और चौथी दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और विपक्षियों में विजय प्राप्त करेगा तथा झंझट युक्त मार्ग के द्वारा बड़ी सफलता पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य पर भरोसा न रखकर पुरुषार्थ पर भरोसा अधिक रहेगा और धर्म के मार्ग का ठीक अनुसरण नहीं करेगा तथा आठवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की उन्नति करेगा और राज-समाज में मान पायेगा तथा कारबार के मार्ग में खूब उन्नति करेगा।

नं. ७८३

वृश्चिक लग्न में ४ मंगल

यदि कुम्भ का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो माता के सुख और प्रेम की कमी प्राप्त करेगा तथा भूमि-मकानादि के सुख में कुछ नीरसता प्रतीत होगी और देह के अन्दर कुछ रोग या कुछ परेशानी रहेगी तथा शत्रु पक्ष के कारणों से सुख-शान्ति में कुछ बाधा रहेगी और अपने स्थान में ही रहना पसंद होगा और चौथी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद युक्त शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम के द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और मूत्रेन्द्रिय में कुछ विकार का योग पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता-स्थान की उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और कारबार की उन्नति करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या

नं. ७८४

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शक्ति मिलेगी और परिश्रम की शक्ति के द्वारा आत्मबल की जागृति रहेगी। वृश्चिक लग्न में ७ मंगल यदि वृषभ का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति पायेगा तथा कुछ मतभेद रहेगा और गृहस्थ के संचालन में कुछ परेशानी रहेगी तथा छठें स्थान के दोष के कारण मूत्र-इन्द्रिय के स्थान में कुछ विकार का योग कभी पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम और कुछ परेशानी के साथ-साथ शक्ति पायेगा और चौथी मित्र दृष्टि

नं. ७८७ से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और कारबार के मार्ग में शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ प्रभाव तथा अपने व्यक्तित्व की व्यवहारिक कुशलता से शत्रु पक्ष में विजय पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि का तथा कुटुम्ब की वृद्धि का विशेष प्रयत्न करेगा।

वृश्चिक लग्न में ८ मंगल यदि मिथुन का मंगल- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के सुख और सुन्दरता में कमी पायेगा तथा छठें स्थान के दोष के कारण आयु एवं जीवन की दिनचर्या में कुछ-कुछ परेशानी या चिन्ता पायेगा और पुरातत्व की अनकूल शक्ति

नं. ७८८ को कुछ कठिनाइयों से प्राप्त करेगा तथा उदर में कुछ विकार पायेगा और शत्रु पक्ष के सम्बन्ध से कुछ परेशानी अनुभव करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है इसलिये देह के कठिन परिश्रम से आमदनी के मार्ग में शक्ति पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये विशेष परिश्रम करेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से भाई और पराक्रम के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख

रहा है, इसलिये देह के कठिन पुरुषार्थ से पराक्रम की महान शक्ति पायेगा तथा भाई-बहिन के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति और वृद्धि प्राप्त करेगा और बड़ी हिम्मत रखेगा। यदि कर्क का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में नीच का

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

वृश्चिक लग्न में ९ मंगल होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, तो भाग्य के स्थान में कमजोरी अनुभव करेगा और धर्म के पालन में कमजोरी रहेगी तथा षष्ठेश होने के दोष कारण से शत्रु पक्ष एवं झगड़े-झंझट तथा दिक्कतों के योग से भाग्योन्नति के मार्ग में रूकावटें पड़ती रहेंगी और देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य के पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा चन्द्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों में सम्पर्क शक्ति रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह के परिश्रम के योग से पुरुषार्थ कार्य की उन्नति करेगा तथा भाई-बहिन की शक्ति का विकास पायेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में कुछ वैमनस्यता पायेगा और मकानादि के सुख में कुछ कमी रहेगी।

नं. ७८९

वृश्चिक लग्न में १० मंगल

यदि सिंह का मंगल- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो षष्ठेश होने के दोष के कारण से पिता स्थान में कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज में मान एवं प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में कुछ परिश्रम और कुछ दिक्कतों के योग से उन्नति और सफलता पायेगा और दशम स्थान पर मंगल शक्ति प्रदायक माना जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में विजय और सफलता पायेगा ओर चौथी दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा भारी प्रभाव शक्ति पायेगा, किन्तु कुछ रोग या झंझट भी पायेगा तथा तथा बड़ा स्वाभिमानी बनेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के और मातृ भूमि के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध पायेगा तथा आठवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक परिश्रम की शक्ति से विद्या एवं वाणी के अन्दर सफलता और प्रभाव पायेगा तथा सन्तान पक्ष में कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ७९०

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वृश्चिक लग्न में ११ मंगल

यदि कन्या का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम से और प्रभाव शक्ति से खूब लाभ पायेगा तथा शत्रु पक्ष में झगड़े-झंझट का स्वामी होने के कारण देह की कुछ परेशानी तथा कुछ रोग या अधिक प्रयत्लशील रहना पड़ेगा और चौथी दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाइयों के द्वारा विद्या की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ दिक्कतों के साथ उत्तम शक्ति तथा वाणी और बुद्धि के द्वारा प्रभाव शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में विजय लाभ पायेगा तथा बड़ा प्रभाव रखेगा और ननसाल पक्ष से लाभ का योग होगा तथा स्वाभिमानी बनेगा।

नं. ७९१

वृश्चिक लग्न में १२ मंगल

यदि तुला का मंगल- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में बड़ी कमजोरी तथा कुछ रोग होगा और खर्च अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों में मान प्राप्त करेगा और अपने स्थान में कुछ खिन्नता पायेगा तथा चौथी उच्च दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में कुछ शक्ति रहेगी तथा पराक्रम स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ प्रभाव रहेगा और झगड़े-झंझट के मार्ग में कुछ हिम्मत शक्ति से काम करेगा ओर आठवीं दृष्टि से स्त्री तथा रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति पायेगा तथा कभी मूत्र रोग का विकार और गृहस्थी में झंझट पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाइयों के द्वारा काम संचालित रहेगा।

नं. ७९२

आमद, आयु, पुरातत्वस्थानपति-बुध

यदि वृश्चिक का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम और विवेक शक्ति के द्वारा धन का सुन्दर

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

वृश्चिक लग्न में १ बुध

लाभ पायेगा और आयु की शक्ति का उत्तम योग मिलेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति को लाभ होगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण से देह में कुछ परेशानी पायेगा किन्तु प्रभाव युक्त रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ विवेक और परिश्रम के योग से रोजगार में सफलता मिलेगी तथा स्त्री स्थान में कुछ कठिनाई के सहित सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा।

नं. ७९३

वृश्चिक लग्न में २ बुध

यदि धनु राशि का बुध- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है, तो आमदनी के सुन्दर योग से धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब शक्ति पायेगा तथा विवेक शक्ति के द्वारा धन और कुटुम्ब का लाभ होगा और आठवें स्थान का स्वामी होने के दोष के कारण से धन और कुटुम्ब की सुख-शक्ति में कुछ कमी और कुछ बाधा प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि होगी तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या अमीरात ढंग से चलायेगा।

नं. ७९४

वृश्चिक लग्न में ३ बुध

यदि मकर का बुध- तीसरे पराक्रम एवं भाई बहिन के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन की शक्ति का लाभ करेगा तथा विवेक शक्ति और पुरुषार्थ के योग से आमदनी का सुन्दर लाभ होगा किन्तु अष्टमेश होने के कारण से भाई बहिन की सुख शक्ति के लाभ में कुछ कमी और कुछ दिक्कत रहेगी तथा पुरुषार्थ कर्म की सफलता के मार्ग में कुछ कठिन परिश्रम करना पड़ेगा और आयु के स्थान में सुन्दर शक्ति का लाभ मिलेगा तथा पुरातत्व सम्बन्धी लाभ का योग विवेक रुपी पुरुषार्थ के बल से प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य और धर्म के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के बल से भाग्य और धर्म का लाभ होगा।

नं. ७९५

यदि कुम्भ का बुध- चौथ केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शनि

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

यदि वृषभ का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण कुछ थोड़ी सी परेशानी के साथ स्त्री स्थान में लाभ शक्ति पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ विवेक शक्ति के द्वारा तथा कुछ कठिनाईयों के द्वारा सुन्दर लाभ की योग प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति के संयोग से लाभ का साधन मिलेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक की शक्ति के द्वारा देह में मान प्राप्ति तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी।

वृश्चिक लग्न में ७ बुध

नं. ७९९

वृश्चिक लग्न में ८ बुध

यदि मिथुन का बुध- आठवें आयु एवं मृत्यु स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु स्थान में वृद्धि एवं शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की सहायक होने वाले पुरातत्व शक्ति का लाभ होगा और अष्टमेश होने के कारण लाभ स्थान में कुछ परेशानी तथा कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा परिश्रम के योग से आमदनी और जीवन की दिनचर्या में शानदार पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के योग द्वारा धन की वृद्धि के कारण प्राप्त करेगा और कुछ कठिनाई के योग से कुटुम्ब का लाभ होगा।

नं. ८००

वृश्चिक लग्न में ९ बुध

यदि कर्क का बुध- नवम् त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य और विवेक की शक्ति से आमदनी का योग होगा तथा पुरातत्व शक्ति के लाभ योग के कारण भाग्यवान् माना जायेगा और आयु की उत्तम शक्ति मिलेगी। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण भाग्य में कुछ परेशानी पायेगा और धर्म के स्थान में कुछ स्वार्थ युक्त शक्ति का पालन करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कमी मिले हुए लाभ योग होगा और विवेक शक्ति के लाभ योग द्वारा पुरुषार्थ की सफलता शक्ति पायेगा।

नं. ८०१

यदि सिंह का बुध- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में मित्र सूर्य की

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वृश्चिक लग्न में १० बुध

राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के कारण से पिता के स्थान में कुछ कष्ट युक्त मार्ग के द्वारा लाभ की शक्ति प्रदान करता है, इसी प्रकार कुछ कठिनाइयों के द्वारा राज-समाज में लाभ और मान प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में विवेक शक्ति के कठिन कर्म से उत्कति और पुरातत्व एवं आयु की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा तथा इज्जत-आबरू के जरिये से धन का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि के सुख भवन को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के साथ माता और भूमि का लाभ होगा।

नं. ८०२

वृश्चिक लग्न में ११ बुध

यदि कन्या का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में विवेक शक्ति के सम्बन्ध से पुरातत्व मार्ग के द्वारा महान उत्तम लाभ की सफलता शक्ति पायेगा और आयु का उत्तम लाभ होगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ा उमंग पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान पक्ष को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में कुछ कमी पायेगा और सन्तान पक्ष में कुछ कमी और कुछ कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा अष्टमेश होने के कारण से एवं अधिक स्वार्थ सिद्धि करने के कारण से बुद्धि एवं वाणी से कुछ रूखा बताव करेगा।

नं. ८०३

वृश्चिक लग्न में १२ बुध

यदि तुला का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो बहुत अधिक खर्च करेगा तथा पुरातत्व शक्ति की हानि पायेगा और आमदनी के मार्ग में कमजोरी पायेगा। किन्तु पुरातत्व से सम्बन्धित विवेक शक्ति के द्वारा बाहरी स्थानों में सफलता मिलेगी और खर्च का संचालन कार्य भी बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से करेगा और आयु के सम्बन्ध में कभी-कभी चिंताओं का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नरमाई और विवेक शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष से काम निकालेगा

नं. ८०४

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

तथा भ्रमणकारी जीवन होने की वजह से कुछ अशान्ति-सी रहेगी।

धन, संतान तथा विद्यास्थानपति-गुरु

वृश्चिक लग्न में ९ गुरु

यदि वृश्चिक का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के

स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो देह

में इज्जत और मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और

धन-जन की शक्ति का गौरव पायेगा। तथा

द्वितीयेश होने के कारण कुछ देह में घिराव-सा

रहेगा और पाँचवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान

को स्वयं अपनी राशि मीन में स्वक्षेत्र को देख

रहा है, इसलिये विद्या के स्थान में महान् गौरव

और सफलता शक्ति पायेगा तथा सन्तान पक्ष में

बहुत उत्तम शक्ति और सफलता पायेगा तथा विद्या, बुद्धि एवं देह के

संयोग से धन की शक्ति का सुख प्राप्त होगा और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं

रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है,

इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद युक्त सहयोग सफलता शक्ति मिलेगी

और नवमी उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क

राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के स्थान में विशेष उन्नति करेगा और

यश प्राप्त होगा तथा धर्म का विशेष पालन करेगा और ईश्वर में विशेष

निष्ठा रहेगी तथा भाग्यवान् माना जायेगा।

वृश्चिक लग्न में २ गुरु

यदि धन का गुरु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब के

स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो

धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का

संयोग प्राप्त करेगा तथा विद्या की विशेष शक्ति

का संग्रह करेगा। किन्तु द्वितीयेश होने के दोष के

कारण से सन्तान पक्ष के सुख-सम्बन्धों में कमी

पायेगा और बुद्धि के अन्दर स्वार्थ-सिद्धि का

विशेष ध्यान रखेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से

शत्रु एवं झंझट स्थान को मंगल की मेष राशि में

देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में एवं झंझटों के स्थान में बड़ी दानाई और

बुद्धि योग के द्वारा सफलता मिलेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं

पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए आयु की

शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व स्थान के मार्ग में सफलता पायेगा और

नवमी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा

है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का लाभ के साथ राज-समाज में’मान

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वृश्चिक लग्न में ७ गुरु

शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री में प्रभाव पायेगा और रोजगार के मार्ग में बुद्धि योग की शक्ति में धन की शक्ति पायेगा तथा बड़ी योग्यता के द्वारा गृहस्थ का संचालन कार्य करेगा और विद्या एवं सन्तान पक्ष की शक्ति प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से धन की आमदनी के लाभ स्थान की बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और दैनिक कार्य क्रम के योग से अच्छा लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह

नं. ८११ के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता, प्रभाव और इज्जत पायेगा तथा बोलचाल के अन्दर सज्जनता और दानाई से काम करेगा और नवੀਂ नीच दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान की शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान में कुछ परेशानी का योग पायेगा और पराक्रम स्थान में कमजोरी रहेगी तथा हिम्मत में कमी अनुभव होगी।

वृश्चिक लग्न में ८ गुरु

यदि मिथुन का गुरु- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष में संकट रहेगा तथा विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी और धन के संग्रह करने के मार्ग में बड़ी कठिनाई होगी तथा कुटुम्ब की शक्ति में कमजोरी रहेगी एवं धन-सन्तान के पक्ष से बुद्धि में फिकर रहेगी और पुरातत्व धन की शक्ति का लाभ पायेगा और आयु के स्थान में शक्ति मिलेगी तथा जीवन

नं. ८१२ की दिनचर्या में कुछ रौनक रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों में अच्छा सम्बन्ध रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की शक्ति का सामान्यतम सहयोग प्राप्त होगा और नववीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के सुख भवन को

शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ वैमनस्यता युक्त रूप से माता का एवं भूमि का सुख प्राप्त करेगा तथा बुद्धि की योग्यता से सुख के साधन पायेगा।

यदि कर्क का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य की महान् उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में विशेष ज्ञान और विशेष शक्ति पायेगा

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

४१९

वृश्चिक लग्न में ९ गुरु

तथा भाग्य की शक्ति के द्वारा धन की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का सुन्दर योग पायेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह को बड़ा मान प्राप्त होगा और बुद्धि योग की शक्ति से बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहीन की सुख-शक्ति में कमी रहेगी और

नं. ८१३

पराक्रम स्थान में कमजोरी रहेगी और भाग्य के मुकाबले में पुरुषार्थ की शक्ति न्यूनीत रहेगी तथा नवमी दृष्टि से विद्या एवं सन्तान को स्वयं अपनी मीन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की महानता पायेगा और सन्तान पक्ष की विशेष उत्तम शक्ति पायेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ी कीमती बातें कहकर सुयश प्राप्त करेगा।

वृश्चिक लग्न में १० गुरु

यदि सिंह का गुरु- दशम केन्द्र पिता एवं राज-स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान के द्वारा धन की शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त होगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध में बड़ी इज्जत, प्रभाव और मान प्राप्त करेगा और बुद्धि योग के द्वारा कारबार में भारी सफलता और उन्नति प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष में बड़ी सफलता और सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा विद्या स्थान में विशेष शक्ति और मान प्राप्त होगा और

नं. ८१४

पाँचवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्रत्र को देख रहा है, इसलिये धन की विशेष उन्नति करेगा तथा कुटुम्ब का सुन्दर सहयोग प्राप्त होगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है इसलिये माता के और भूमि के सुख-सम्बन्धों में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा सफलता शक्ति पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और बुद्धिबल की उत्तम कर्म शक्ति के द्वारा अनेक प्रकार के संकट से सुरक्षा प्राप्त करेगा।

यदि कन्या का गुरु- प्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा हो तो आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति मिलेगी और कभी-कभी विशेष धन का लाभ होगा तथा कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर योग मिलेगा और बड़ी इज्जत प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से भाई-

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वृश्चिक लग्न में ४ शुक्र

नं. ८२०

यदि कुम्भ का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो सुखपूर्वक घर बैठे खर्च चलेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख मिलेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से माता के सुख एवं कमी रहेगी और भूमि के सुख में कमी रहेगी और स्त्री पक्ष के संबंध में कुछ त्रुटियुक्त सुख के साधन पायेगा और रोजगार के मार्ग में तथा बाहरी स्थानों में चतुराई के संबंध से सुख मिलेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के स्थान के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज व कारबार में कुछ दिक्कतों के साथ कामयाबी रहेगी।

वृश्चिक लग्न में ५ शुक्र

नं. ८२१

यदि मीन का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर उच्च का होकर बैठा है तो बुद्धि विद्या के अन्दर कोई विशेष कला पायेगा तथा संतान पक्ष में शक्ति रहेगी। किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण विद्या एवं संतान पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा अधिक बोलने की शक्ति और चतुराई की बातों से बहुत काम निकालेगा तथा स्त्री पक्ष में प्रभाव रहेगा और बाहरी स्थानों के संबंध से रोजगार के मार्ग में सफलता शक्ति पायेगा और खर्चा विशेष करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से लाभ के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कमी और कुछ परेशानी रहेगी।

वृश्चिक लग्न में ६ शुक्र

नं. ८२२

यदि मेष का शुक्र- छठें शत्रु और झंझट के स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कुछ झंझट तथा परेशानी पायेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी, क्योंकि शुक्र व्ययेश होने से भी दोषी है और छठें बैठने से भी दोषी है, इसलिये गृहस्थ के संचालन और खर्चे के मार्ग में दिक्कतें रहेंगी तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी रहेगी किन्तु बाहरी सम्बन्ध से एवं दैनिक कर्म की चतुराई से शत्रु पक्ष में शान्ति से काम निकालेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च अधिक करना

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

पड़ेगा और बाहरी स्थानों में कुछ परिश्रम मार्ग के द्वारा सम्बन्ध बनाएगा।

वृश्चिक लग्न में ७ शुक्र

यदि वृषभ का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो स्त्री एवं रोजगार के स्थान में बड़ी सुन्दर शक्ति पायेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में कुछ कमजोरी भी रहेगी, परन्तु बाहरी स्थानों के सुन्दर सम्बन्ध से गृहस्थ संचालन के मार्ग में चतुराई के योग से खर्च की सुन्दर शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी पायेगा। किन्तु गृहस्थ की शक्ति के कारण कुछ प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा व्यवहारिक कार्य, दौड़-धूप में चतुर बनेगा।

नं. ८२३

वृश्चिक लग्न में ८ शुक्र

यदि मिथुन का शुक्र- आठवें मृत्यु स्थान में एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा संकट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के पक्ष में बड़ी कठिनाइयाँ मिलेगी। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से परिश्रम एवं परेशानी के द्वारा रोजगार का कार्य गूढ़ चतुराईयों से पूरा करेगा और खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी एवं कमजोरी रहेगी और गृहस्थ के सुख संचालन मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और सातवीं दृष्टि से

धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति के मार्ग में बड़ी कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब के मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा चतुराई से इज्जत बनाएगा ओर आयु स्थान में कुछ दिक्कत रहेगी।

नं.८२४

वृश्चिक लग्न में ९ शुक्र

यदि कर्क का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य में कुछ कमजोरी पायेगा तथा धर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और स्त्री गृहस्थ के सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त रहकर भाग्य की शक्ति से उत्तम योग प्राप्त करेगा तथा धर्म के मार्ग में स्वार्थयुक्त रहकर चतुराई और खर्च के मार्ग से धर्म का पालन करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध

नं. ८२५

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

से रोजगार में शक्ति मिलेगी और सातवीं दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये व्यवहारिक चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में एवं झंझटों में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

भाई, पराक्रम, माता तथा भूमि स्थानपति-शनि

वृश्चिक लग्न में १ शनि

यदि वृश्चिक का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता के सुख सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त रहेगी और भूमि तथा घरेलू सुख के मार्ग में कुछ शक्ति मिलेगी और देह के अन्दर स्वभाव में कुछ शान्तियुक्त तेजी का योग रहेगा तथा तीसरी दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहेन के सम्बन्ध में शक्ति प्राप्त रहेगी तथा पुरुषार्थ शक्ति ही सफलता मिलेगी और बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री तथा रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुख शक्ति प्राप्त रहेगी तथा रोजगार के पक्ष में अच्छी सुख-सफलता मिलेगी और दसवीं शत्रुदृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में वैमनस्यता पायेगा तथा राज-समाज में कुछ प्रभाव की कमी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ कठिनाइयों के द्वारा सफलता-शक्ति प्राप्त करेगा।

वृश्चिक लग्न में २ शनि

यदि धनु राशि का शनि- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो कुछ थोड़ी सी नीरसटाई के साथ धन की शक्ति और कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धनकारक होता है, इसलिये भाई-बहेन के सुख-सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी तथा पराक्रम की शक्ति से धन की वृद्धि करने में लगा रहेगा और धन के संग्रह करने में भी सुख का अनुभव करेगा तथा तीसरी दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भूमि की शक्ति पायेगा तथा कुछ माता की शक्ति का लाभ पायेगा।

किन्तु मातृ स्थान के प्रेम सम्बन्ध में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं

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पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति का सुख मिलेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से आमद तथा लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति पायेगा तथा सुखपूर्वक धन के लाभ का आनन्द प्राप्त करेगा, परन्तु घेरेलू सुख की वास्तविक यथार्थता में कमी का योग मिलेगा।

वृश्चिक लग्न में ३ शनि नं. ८३१ यदि मकर का शनि- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष की सुख-शक्ति प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान में बड़ी सफलता-शक्ति और हिम्मत-शक्ति प्राप्त रहने के कारण से बड़ा सुख और उत्साह रहेगा तथा माता की शक्ति का आनन्द मिलेगा और भूमि मकानादि के सुख की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में

देख रहा है इसलिये कुछ दिक्कतों के साथ विद्या की शक्ति का सुख संग्रह पायेगा और संतान-पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त रूप से सुख-शक्ति मिलेगी तथा बातचीत की शक्ति विशेष रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये थोड़ी-सी नीरसता के साथ भाग्य-शक्ति का सुख प्राप्त होगा और धर्म के स्थान में कुछ मतभेद के साथ पालन करेगा तथा दसवीं उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत करेगा और दूसरे स्थानों में सफलता पायेगा।

वृश्चिक लग्न में ४ शनि यदि कुम्भ का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो माता के पक्ष को विशेष शक्तित मिलेगी तथा भूमि और मकानादि की सुन्दर शक्ति का आनन्द रहेगा और घरेलू सुख प्राप्ति के मजबूत साधन मिलेंगे तथा भाई-बहिन की शक्ति का सुन्दर सुख रहेगा और सुखपूर्वक पराक्रम-शक्ति का प्रयोग करेगा तथा तीसरी नीच दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में

देख रहा है; इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ अशान्ति के कारण बनेंगे तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ नरमाई या कठिनाई के योग से काम निकलेगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता

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को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन से विरोध रूप होते हुए भी कुछ शक्ति रहेगी और पराक्रम में कुछ शक्ति रहेगी और पराक्रम में कुछ कमजोरी होते हुए भी हिम्मत से सफलता मिलेगी। वृश्चिक लग्न में ७ शनि

यदि वृषभ का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष से सुख और शक्ति पायेगा तथा सुखपूर्वक पराक्रम शक्ति के द्वारा रोजगार के मार्ग में सफलता एवं सुख प्राप्त करेगा और भाई-बहिन की शक्ति का योग रहेगा और गृहस्थ में आनन्द अनुभव करेगा तथा तीसरी शत्रुदृष्टि से

भाग्य एवं धर्मस्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये धर्म व भाग्य के स्थान में कुछ थोड़ी-सी नीरसता का अनुभव करते हुए भी भाग्य और धर्म के विकास का साधन बनाता रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता की कुछ कमी रहेगी और देह से परिश्रम अधिक लिया जायेगा और दसवीं दृष्टि से

माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति मिलेगी और घरेलू सुख के उत्तम साधन मिलेंगे तथा भकान भूमि की सुख-शक्ति मिलेगी और दैनिक कार्य के मार्गों में आमोद-प्रमोद का सदैव ख्याल रखेगा। वृश्चिक लग्न में ८ शनि

यदि मिथुन का शनि- आठवें मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष में हानि या कमी पायेगा और माता के सुख में बहुत कमी रहेगी तथा भूमि के सुख-सम्बन्धों में परेशानी और पराक्रम स्थान की शक्ति में कमजोरी रहेगी तथा आयु के स्थान में शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ

पायेगा और तीसरी शत्रुदृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्ध में वैमनस्यता प्राप्त करेगा ओर राज-समाज के कार्यों में कुछ नीरसता रहेगी तथा कारबार के मार्ग में उन्नति के लिये कुछ आलस्य मानेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की

धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह-शक्ति में कुछ कमी रहेगी तथा कुटुम्ब में कुछ वैमनस्यता रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

में कुछ कमी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ नीरसता का योग प्राप्त करेगा तथा दिनचर्या में कुछ शानदारी रहेगी।

वृश्चिक लग्न में ९ शनि यदि कर्क का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो कुछ नीरसतायुक्त मार्ग के द्वारा भाग्य की वृद्धि पायेगा तथा धर्म का पालन करेगा और माता की शक्ति का सुख प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का सुख मिलेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से आमदनी के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ और भाग्य की शक्ति से धन का खूब लाभ पायेगा और आमदनी

के मार्ग में सुखपूर्वक सफलता पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पराक्रम स्थान की उत्तम सफलता शक्ति पायेगा और भाई-बहिन की शक्ति का सुन्दर सम्बन्ध पायेगा और दसवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी के सहित शक्ति पायेगा और झगड़े-झंझटों के पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी तथा भाग्यवान् समझा जायेगा।

वृश्चिक लग्न में १० शनि यदि सिंह का शनि- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में कुछ नीरसता के योग से शक्ति और सुख प्राप्त करेगा तथा राज समाज के सम्बन्ध में कुछ परिश्रम के योग से मान प्राप्त करेगा और कारबार के स्थान में शक्ति मिलेगी और उन्नत्ति करेगा तथा भाई-बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति और सुख प्राप्त करेगा और पराक्रम

से सफलता-शक्ति मिलेगी तथा तीसरी उच्च दृष्टि से खर्चस्थान एवं बाहरी स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों में सफलता-शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कुम्भ राशि में माता एवं भूमि स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति में कुछ मतभेद रखते हुए सुख प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की शक्ति पायेगा तथा घरेलू सुख के साधन रहेंगे और दसवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुखपूर्वक शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में सुखपूर्वक शक्ति

नं. ८३७

नं. ८३८

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प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर सुखसम्बन्धी साधनों को पायेगा।

वृश्चिक लग्न में ११ शनि यदि कन्या का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के स्थान में विशेष सुख-शक्ति एवं उन्नति पायेगा, क्योंकि ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति से सुखपूर्वक लाभ की शक्ति प्राप्त रहेंगा और भाई-बहिन की शक्ति का सुख लाभ पायेगा और माता के पक्ष से लाभ की शक्ति पायेगा

तथा भूमि-मकानादि की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ के मार्ग के द्वारा देह में कुछ आराम की कमी रहेगी तथा सुन्दरता में कुछ न्यूनता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ दिक्कत के साथ विद्या की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में कुछ थोड़ी-सी निरसता के योग से सुख-शक्ति मिलेगी तथा दसवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की सुख-शक्ति पायेगा और पुरातत्व में शक्ति के योग से सुख मिलेगा।

वृश्चिक लग्न में १२ शनि यदि तुला का शनि- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों में विशेष प्रभाव शक्ति और सुख मिलेगा और भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ हानि या परेशानी-सी पायेगा तथा माता के सुख सम्बन्धों में तथा मातृस्थान के सम्बन्ध में कमजोरी पायेगा

और तीसरी शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कमी रहेगी तथा कुटुम्ब स्थान में कुछ नीरसता प्रतीत होगी और सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी के कारण प्राप्त करेगा तथा कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग में दिक्कतें रहेंगी और दसवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु के पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में सुख-शक्ति रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक और प्रभाव रहेगा और विशेष खर्च के संयोग से सुख का अच्छा साधन पायेगा।

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४३४

भृगु संहिता

पड़ेगा तथा बड़ी भारी निराशाओं से सामना करना पड़ेगा और ईश्वर के भरोसे में बारम्बार कमी और शंका रहेगी बाद में कुछ सहारा रहेगा। वृश्चिक लग्न में १० राहु यदि सिंह का राहु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में परेशानी तथा चिन्ता के कारण प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ कष्ट एवं निराशा प्राप्त करेगा तथा मान-उन्नति एवं पदोन्नति के मार्ग में रुकावटें तथा कमी पायेगा और कारबार की उन्नति के लिये विशेष चिन्ता एवं परेशानियों के द्वारा कार्य करेगा और राज्य-समाज, इज्जत-आबरू के सम्बन्ध में कभी-कभी महान्

नं. ८५०

संकट का सामना पायेगा तथा सूर्य के स्थान पर राहु बैठा है, इसलिये हेकड़ी और चतुराई के द्वारा उन्नति एवं प्रभाव की वृद्धि के प्रयत्न करेगा। वृश्चिक लग्न में ११ राहु यदि कन्या का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो लाभ स्थान में कूर ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष लाभ पायेगा तथा गुप्त युक्ति एवं विवेक शक्ति के द्वारा अधिक नफा खाने के लिये विशेष प्रयत्ल करेगा तथा आमदनी के स्थान में कभी-कभी कष्ट एवं चिंताओं का योग प्राप्त करेगा तथा अधिक लाभ प्राप्ति के लिये अनधिकार लाभ की शक्ति

भी प्राप्त करेगा तथा अधिक स्वार्थ सिद्धि का सदैव ध्यान रखेगा फिर भी आमदनी के अन्दर कमी और असन्तोष के कारण प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी मुफ्त का-सा धन प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में १२ राहु यदि तुला का राहु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक होने के कारण अथवा खर्च के किसी भी कारण से परेशानी प्राप्त करेगा तथा चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये चतुराई तथा गुप्त युक्ति बल की शक्ति से खर्च के संचालन

नं. ८५२

मिलेगी किन्तु कभी-कभी खर्च के मार्ग में भारी संकट का सामना करना

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पड़ेगा फिर भी खर्च के मार्ग में कुछ कमी के साथ शक्ति मिलेगी और कभी-कभी मुफ्त का-सा खर्च-संचालन मार्ग भी मिलेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति का अधिपति-केतु वृश्चिक लग्न में १ केतु यदि वृश्चिक का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में कई बार गहरे संकट और आघात प्राप्त होंगे तथा देह में सुन्दरता की कमी रहेगी क्योंकि गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये स्वभाव में गर्मी रहेगी तथा देह के द्वारा कठिन कर्म एवं विशेष परिश्रम करना पड़ेगा और दिमाग की शक्ति के सम्बन्ध में इसलिये कमजोरी मानेगा क्योंकि केतु के धड़ पर शिर नहीं है, और देह में कभी कोई माता का यानी चेचक की बीमारी भी पायेगा तथा अधिक दौड़-धूप करने के कारण से थकान एवं परेशानी अनुभव करेगा।

नं. ८५३

वृश्चिक लग्न में २ केतु यदि धनु राशि का केतु- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो धन के स्थान में कभी-कभी मुफ्त का-सा विशेष धन प्राप्त करेगा और धन की विशेष शक्ति पाने के लिये बड़ा भारी परिश्रम एवं विशेष दौड़-धूप करेगा और कुटुम्ब के स्थान में बड़ा भारी आडम्बर पायेगा और नकद धन की स्थिति के अन्दर प्रकट रूप में बड़ा भारी दिखावा रहेगा। किन्तु अन्दरूनी कुछ कमी रहेगी और केतु के स्वाभाविक गुण के कारण से धन के पक्ष में कभी-कभी बड़ी हानि पायेगा तथा इसी कारण कुटुम्ब सुख में कुछ कमी रहेगी और इज्जत-आबरू के अन्दर बड़ी शक्ति प्राप्त करने का सदैव भारी प्रयत्न करेगा।

नं. ८५४

वृश्चिक लग्न में ३ केतु यदि मकर का केतु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो तीसरे स्थान पर कूर ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये बड़ी भारी पुरुषार्थ शक्ति से काम करने और उद्योग करने का प्रयत्न करेगा तथा बड़ी भारी मित्र हिम्मत शक्ति रखेगा तथा भाई बहिन के पक्ष में कष्ट एवं परेशानी के कारण पायेगा तथा केतु का स्वाभाविक गुण खराब होने के कारण परिश्रम की शक्ति और दौड़-धूप के मार्ग में अन्दरूनी कुछ कमजोरी और परेशानी प्राप्त करेगा तथा जाहिर में बड़ी

नं. ८५५

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भारी हेकड़ी के काम लेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बहादुरी की सफलता-शक्ति मिलेगी। किन्तु अपनी अन्दरूनी पुरुषार्थ-शक्ति के अन्दर कुछ गुप्त शक्ति का भरोसा तथा कुछ कमजोरी मानेगा।

वृश्चिक लग्न में ४ केतु यदि कुम्भ का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो माता के स्थान में परेशानी एवं कुछ कष्ट के कारण पायेगा और घरेलू सुख-शान्ति के अन्दर बड़ी भारी कमी एवं झंझट प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की कमी एवं कुछ परेशानी रहेगी तथा कभी-कभी महान् अशांति के कारण प्राप्त होंगे।

किन्तु सुख-शान्ति पाने के लिये महान् कठिन कर्म एवं विशेष परिश्रम करेगा और गुप्त शक्ति के द्वारा धैर्य और सुख का अनुभव करेगा तथा मकानादि का स्थानान्तर पाकर भी सुख-संचय करने में कुछ त्रुटि मानेगा।

नं. ८५६

वृश्चिक लग्न में ५ केतु यदि मीन का केतु- पांचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में विद्या ग्रहण करते समय बड़ी दिक्कतें पायेगा तथा दिमाग के अन्दर परेशानी और गुप्त चिंता का योग प्राप्त करेगा तथा बातचीत के अन्दर शब्दशैली की शोभा में कमी रहेगी तथा कभी-कभी सन्तान पक्ष में महान् संकट का योग प्राप्त करेगा और बुद्धि के अन्दर गुप्त शक्ति का योग पायेगा तथा विचारों में बड़ी भारी जिदम्बाजी तथा दृढ़ता शक्ति से काम लेगा, इसलिये बुद्धि की प्रयोग शक्ति में शील और सत्य की कमजोरी रहेगी तथा क्रोध रहेगा।

नं. ८५७

वृश्चिक लग्न में ६ केतु यदि मेष का केतु- छठे शत्रु मंगल की मेष राशि में बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये बड़ी बहादुरी के साथ शत्रु पक्ष में विजय प्राप्त करेगा तथा बड़ी से बड़ी दिक्कतों और मुसीबतों में भारी गुप्त शक्ति और धैर्य से काम करेगा और प्रभाव शक्ति का विकास करने के लिये बड़ी भारी कठिन परिश्रम

नं. ८५८

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

तथा विशेष दौड़-धूप करेगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी पायेगा तथा कभी-कभी शत्रु पक्ष में अन्दरूनी कमजोरी अनुभव करेगा।

वृश्चिक लग्न में ७ केतु यदि वृषभ का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा कष्ट सहन करेगा और गृहस्थ में संचालन मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें एवं परेशानियाँ पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में बड़ी कठिनाईयाँ मिलेंगी, कठिन कर्म के द्वारा कार्य-संचालन करेगा और चतुर शुक्र के स्थान पर बैठा है, इसलिये चतुराई और हठयोग की शक्ति से सफलता पायेगा तथा कभी कोई मूत्र इन्द्रिय में विकार पायेगा एवं गृहस्थ के अन्दर कोई खास कमी अनुभव करेगा तथा कभी-भी गृहस्थ एवं रोजगार के मार्ग में महान् संकट का सामना पायेगा।

नं. ८५९

वृश्चिक लग्न में ८ केतु यदि मिथुन का केतु- आठवें आयु स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि और कष्ट के कारण पायेगा तथा जीवन में अनेकों बार मृत्युतुल्य महान् संकट के योग प्राप्त करेगा और दिनचर्या में बड़ी परेशानियाँ अनुभव करेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति की हानि पायेगा और मुद्रा के अन्दर या पेट में कोई बीमारी के कारण कष्ट पायेगा तथा अनेक प्रकार की चिंताओं से टकराना पड़ेगा और जीवन-निर्वाह करने के लिए महान् कठिन परिश्रमी कर्म के द्वारा काम करेगा तथा अतिगुप्त शक्ति का भरोसा तथा हिम्मत रखेगा।

नं. ८६०

वृश्चिक लग्न में ९ केतु एवं धर्म स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य स्थान में महान् संकट प्राप्त करेगा तथा धर्म के मार्ग में बड़ी हानि और कमजोरी करेगा और भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी-बड़ी कठिनाईयाँ और परेशानियाँ पायेगा क्योंकि मन स्थानपति चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये मानसिक चिंतायें अधिक रहेंगी और कभी-कभी भाग्य के सम्बन्ध में घोर संकट या योग प्राप्त करेगा तथा भाग्य की उन्नति के लिये बड़े कठिन कर्म की साधना करेगा।

नं. ८६१

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तदुपरान्त बड़ी दिक्कत और देर के बाद भाग्य स्थान में कुछ सान्त्वना पायेगा।

वृश्चिक लग्न में १० केतु यदि सिंह का केतु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में बड़ा भारी कष्ट प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के मार्ग में मान और प्रभाव की हानि एवं परेशानी रहेगी और कारबार की उन्नति के स्थान में बड़ी भारी दिक्कतें रहेंगी। किन्तु गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये उन्नति के लिये महान् कठिन और उग्र कर्म की उपासना करेगा तथा कभी-कभी राज-समाज या कारबार के मार्ग में बड़ा भारी संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा और कठिनाई तथा गुप्त शक्ति के बल से अन्त में कुछ सुधार पायेगा।

नं. ८६२

वृश्चिक लग्न में ११ केतु यदि कन्या का केतु- मित्र बुध की राशि पर लाभ स्थान में बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बहुत शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा . तथा धन लाभ की वृद्धि करने में महान् शक्ति का प्रयोग करेगा तथा बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये विवेक और कठिन कर्म की शक्ति से मुफ्त का-सा लाभ भी प्राप्त करेगा और धन की आमदनी के मार्ग में कभी-कभी संकट पायेगा तथा लाभोन्नति के स्थान में विशेष स्वार्थ सिद्धि का सदैव ध्यान रखेगा तथा फिर भी लाभ के मार्ग में अन्दरूनी कुछ करमी अनुभव करेगा और हिम्मत से काम लेगा।

नं. ८६३

वृश्चिक लग्न में १२ केतु यदि तुला का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक रहेगा तथा खर्च के मार्ग में कुछ चिंता-फिकर का योग पायेगा किन्तु केतु चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी चतुराई और परिश्रम के योग से खर्च की शक्ति का संचालन प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी रहेगी। किन्तु चतुराई और कठिन परिश्रम के योग से बाहरी स्थानों में सफलता

नं. ८६४

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वृश्चिक लग्न का फलादेश

शक्ति पायेगा तथा खर्च के संचालन में कुछ अन्दरूनी कमी अनुभव करेगा तथा खर्च में हिम्मत शक्ति से काम लेगा।

।।वृश्चिक लग्न समाप्त।।

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धन लग्न का फलादेश प्रारम्भ

नवग्रहों द्वारा भाग्य फल

(कुण्डली नं० ९७२ तक में देखिये)

प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभाव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है।

अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है

और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है!

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ८६५ से लेकर कुण्डली नं० ९७२ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये

और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ

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(९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८८९ से ९०० तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८८९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस पास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९० के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९१ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९२ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९४ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९५ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९६ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९७ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९८ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९९ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०० के अनुसार मालूम करिये।

(९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल

आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९०१ से ९१२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।

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९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०१ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०२ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०३ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०५ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०६ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०७ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०८ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०९ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९१० के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९११ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९१२ के अनुसार मालूम करिये।

( ९ ) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफ़ल

आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९९३ से १२४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१४ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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कुण्डली नं. ९९५ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९६ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९७ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९८ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२० के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि गर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२१ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२२ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२३ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२४ के अनुसार मालूम करिये।

(९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुकफल

आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं ९२५ से ९३६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये।

९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२५ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२६ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२८ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश

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२. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुणडली नं. ९३० के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुणडली नं. ९३१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुणडली नं. ९३२ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुणडली नं. ९३३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुणडली नं. ९३४ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुणडली नं. ९३५ अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुणडली नं. ९३६ के अनुसार मालूम करिये।

(९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनफल

आपकी जन्म कुणडली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुणडली नं० ९३७ से ९४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ९३७ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ९३८ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ९३९ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ९४० के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ९४१ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ९४२ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुणडली नं. ९४३ के अनुसार मालूम करिये।

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४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४४ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४५ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४६ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४७ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४८ के अनुसार मालूम करिये।

(९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल

आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९४९ से ९६० तक में देखिये और सदैव कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५० के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५१ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५२ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५४ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५५ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५६ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५७ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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कुण्डली नं. ९५८ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५९ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६० के अनुसार मालूम करिये।

( ९ ) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९६१ से ९७२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६१ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६२ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६३ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६४ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६५ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६६ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६७ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६८ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६९ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७० के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७१ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७२ के अनुसार मालूम करिये।

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धनु लग्न का फलादेश

भाग्य, धर्म तथा प्रभावस्थानपति- सूर्य

धन लग्न में १ सूर्य

यदि धनु राशि का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा तथा देह के अन्दर प्रभाव और जचाव की शक्ति रखेगा अर्थात् भाग्यशाली दिखाई पड़ेगा और धर्म का पालन एवं धर्म की जानकारी करेगा और ईश्वर में आदर्श श्रद्धा का रूप प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए स्त्री पक्ष में सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा भाग्यशालिनी स्त्री मिलेगी और भाग्य की शक्ति से रोजगार के मार्ग में सफलता शक्ति मिलेगी तथा गृहस्थ के अन्दर प्रभाव और धर्म तथा सुख रहेगा।

नं. ८६५

यदि मकर का सूर्य- दुसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कुछ थोड़ी सी नीरसताई के मार्ग से अच्छी सफलता एवं प्रभाव प्राप्त करेगा और भाग्यवान् धनवान् समझा जायेगा तथा भाग्य की शक्ति से धन की उन्नति होगी और धर्म का पालन स्वार्थ सिद्ध के लिये करेगा तथा कुटुम्ब के स्थान मे कुछ थोड़ी-सी मतभेद की शक्ति से उन्नति पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा भाग्य की शक्ति से जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा।

नं. ८६६

धन लग्न में ३ सूर्य

यदि कुम्भ का सूर्य- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर गरम ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता बनता है, इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा बड़ी भारी सफलता पायेगा और भाई बहिन के स्थान में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के साथ विशेष शक्ति पायेगा तथा भाग्य की शक्ति से बाहुबल के कार्यों में बड़ी सफलता एवं प्रभाव मिलेगा और धर्म की शक्ति का एवं ईश्वर की शक्ति का भरोसा रखेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य के स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा भाग्य की विशेष उन्नत्ति करेगा।

नं. ८६७

पृ.सं.-२९

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धनु लग्न का फलादेश

... को देख रहा है, इसलिये भाग्य और खर्च की शक्ति में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ थोड़ी सी दिक्कतों के बाद सफलता शक्ति पायेगा तथा बाहरी स्थानें में उत्तम सम्बन्ध पायेगा।

पुरातत्व आयु, मृत्यु, प्रभावस्थानपति- चन्द्र

धन लग्न में १ चन्द्र

यदि धन का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो आयु के सम्बन्ध में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ मनोयोग द्वारा पायेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण देह में कुछ परेशानी पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में रोनक रहेगी और मन के अन्दर बड़े उतार-चढ़ाव और दुख-सुख के भाव आते रहेंगे तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ परेशानी और कुछ शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाई के द्वारा मनोयोग में सफलता पायेगा।

नं. ८७७

धन लग्न में २ चन्द्र

यदि मकर का चन्द्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण धन के कोष स्थान में संग्रह शक्ति का अभाव रहेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कमजोरी तथा कुछ अशान्ति के कारण प्राप्त होंगे। किन्तु मनोयोग की पुरातत्व सम्बन्धित शक्ति के द्वारा धन की प्राप्ति के साधन मिलते रहेंगे और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कर्क राशि में आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का सुन्दर लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा तथा मन को कुछ घिराव-सा रहेगा।

नं. ८७८

धन लग्न में ३ चन्द्र

यदि कुम्भ का चन्द्र- तीसरे भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व सम्बन्धी मनोयोग की शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन की शक्ति एवं सुख सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और पराक्रम स्थान में कुछ परिश्रम करना पड़ेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को

नं. ८७९

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सूर्य की सिंह गशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के कारण जीवन में रौनक और भाग्य एवं धर्म स्थान में कुछ परेशानी या कुछ कमी अनुभव करेगा।

धन लग्न में ४ चन्द्र

यदि मीन का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो आयु की उत्तम शक्ति मिलेगी तथा मनोयोग के बल से पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी तथा मातृभूमि के स्थान से कुछ वियोग मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ परेशानी अनुभव होगी तथा राज-समाज एवं कारबार के स्थान में कुछ थोड़ी दिक्कतें प्रतीत होंगी।

धन लग्न में ५ चन्द्र

यदि मेष का चन्द्र- पांचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है, तो आयु स्थान में शक्ति प्राप्त रहेगी तथा मनोयोग के बल से पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ मनोरंजन रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त होगा और विद्या स्थान में कुछ त्रुटि मिलेगी तथा दिमाग के अन्दर कुछ फिकर रहेगी और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ के सम्बन्ध में कुछ परेशानी तथा मनोयोग का बल प्रयोग करना पड़ेगा।

धन लग्न में ६ चन्द्र

यदि वृषभ का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु में कुछ शक्ति मिलेगी और कुछ मनोयोग के विशेष परिश्रम से पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा शत्रु स्थान में प्रभाव रखेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ दिक्कतों के साथ आनन्द मानेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण शत्रु पक्ष एवं झगड़े झंझटों के मार्ग से कुछ मानसिक परेशानी अनुभव करेगा ओर सातवीं नीच दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र मंगत की वृश्चिक राशि में देख

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धनु लग्न का फलादेश रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थान के सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर मार्ग प्रतीत होगा। धन लग्न में ७ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में शक्ति मिलेगी तथा मनोयोग के दैनिक कर्म से पुरातत्व जीवनाधार शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ मनोरंजन रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु को धनु राशि में देख रहा है, इसलिए देह की सुन्दरता या स्वास्थ्य में कुछ परिश्रम या परेशानी के कारणों से देह में कुछ थकान अनुभव करेगा।

नं. ८८३

धन लग्न में ८ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- आठवें आयु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु की वृद्धि पायेगा तथा जीवनाधार पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ी शानदार एवं रौनक रहेगी तथा पुरातत्व सम्बन्ध में मन को विशेष ज्ञान रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से मन को कुछ शान्ति सी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन के लाभ स्थान में कुछ चिंता रहेगी और कुटुम्ब के स्थान में कुछ मानसिक परेशानी रहेगी तथा जीवन निर्वाह के सम्बन्ध में विचार युक्त रहेगा।

नं. ८८४

धन लग्न में ९ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- नवम स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है, तो आयु स्थान मे वृद्धि मिलेगी तथा जीवनाधार पुरातत्व शक्ति का लाभ भाग्य के द्वारा सुन्दर रूप में प्राप्त होगा तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ी शानदार रहेगी और अष्टमेश होने के दोष के कारण से भाग्य स्थान में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और यश की कुछ कमी रहेगी तथा धर्म के यथार्थ पालन में कुछ कमी रहेगी ओर सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन

नं. ८८५

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धनु लग्न का फलादेश

में मन को बड़ी आशान्ति रहेगी किन्तु सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त होगा और मनोयोग की शक्ति से गूढ़ ज्ञान के द्वारा बड़े-बड़े झगड़े-झंझटों में कामयाबी प्राप्त करेगा।

विद्या, सन्तान, खर्च, बाहरीस्थानपति-मंगल

धन लग्न में १ मंगल

यदि धनु का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो खर्च की संचालन शक्ति देह और बुद्धि योग के द्वारा करेगा तथा बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध पायेगा और विद्या की शक्ति रहेगी एवं सन्तान शक्ति मिलेगी, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से देह के स्वास्थ्य और सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी तथा विद्या बुद्धि के सम्बन्ध में कुछ कमी और कुछ फिक्र रहेगी तथा विचारधारा अधिक घूमकर यथार्थता की ओर आयगा करेगी, किन्तु बुद्धि के अन्दर अहंभाव अधिक रहेगा और सन्तान पक्ष में कुछ कमी अनुभव होगी तथा चौथी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये मातृभूमि और माता के सुख में कमी प्राप्त करेगा तथा घरेलू-मकानादि के सुख में कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में कुछ कमी लिये हुये शक्ति मिलेगी और आठवीं नीच दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन और आयु में कुछ अशान्ति रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति की कुछ कमजोरी रहेगी।

धन लग्न में २ मंगल

यदि मकर का मंगल- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो बाहरी सम्बन्धों के योग से और बुद्धियोग के द्वारा धन संचय करने का विशेष प्रयत्न करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से धन संग्रह नहीं हो सकेगा बल्कि खर्चा अधिक रहेगा और कुटुम्ब के स्थान में बहुत-बहुत प्रकार से उतार-चढ़ाव, दुःख-सुख रहेगा तथा चौथी दृष्टि से विद्या एवं सन्तान पक्ष को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति पायेगा तथा

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धनु लग्न का फलादेश

बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी के कार्य चलेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के पक्ष में कुछ कमी रहेगी और राजसमाज कारबार के मार्ग में कुछ त्रुटि रहेगी और आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बुद्धि योग के द्वारा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्ति की सफलता शक्ति पायेगा और आमदनी के लिये अधिक प्रयत्न करेगा।

धन लग्न में ५ मंगल

यदि मेष का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो विद्या स्थान में शक्ति पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से विद्या ग्रहण करने में कुछ परेशानी रहेगी और इसी कारण से संतान पक्ष में कुछ परेशानियों के बाद शक्ति मिलेगी तथा दिमाग के विचारों में बड़ी चंचलता रहेगी तथा चौथी नीच दृष्टि से आयु स्थान एवं पुरातत्व स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु एवं जीवन की दिनचर्या में बड़ी परेशानी रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति की हानि या कमजोरी रहेगी और उदर में विकार रहेगा

नं. ८९३

और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ बुद्धि योग द्वारा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सफलता शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये खर्च खुला करेगा और बाहरी स्थानों की संबंध शक्ति को बुद्धियोग के द्वारा विशेष रूप से प्राप्त करेगा किन्तु खर्च के कारणों से बुद्धि में कुछ परेशानी का योग चलता रहेगा।

धन लग्न में ६ मंगल

यदि वृषभ का मंगल- छठें शत्रु स्थान में एवं झगड़े-झंझट के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में बड़ी परेशानी रहेगी और विद्या के स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी; क्योंकि मंगल का व्ययेश होने का दोष है तथा छठें बैठने का दोष है, किन्तु छठें स्थान पर कूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रखेगा और झगड़े झंझटों में खर्च की शक्ति से एवं हठयोग से

नं. ८९४

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धन लग्न में १० मंगल

इसलिये देह में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कुछ कमी रहेगी और भूमि मकानादि के पक्ष में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा और आठवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि की अच्छी योग्यता रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कुछ शक्ति मिलेगी, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से विद्या और सन्तान पक्ष के सुख में कुछ कमी रहेगी।

नं. ८९८

धन लग्न में ११ मंगल

यदि तुला का मंगल- लाभ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी अच्छी सफलता शक्ति पायेगा और खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से तथा बुद्धि योग से लाभ की वृद्धि पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण लाभ के मार्ग में कुछ कमी रहेगी तथा चौथी उच्च दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिए विशेष प्रयत्न करेगा तथा अधिक लाभ करेगा और कुटुम्ब स्थान में कुछ शक्ति पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की अच्छी शक्ति रहेगी तथा सन्तान पक्ष से लाभ रहेगा और आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव पायेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में सफलता शक्ति होगी।

नं. ८९९

धन लग्न में १२ मंगल

यदि वृश्चिक का मंगल- बारहवें खर्च स्थान में एवं बाहरी स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों में बुद्धियोग के द्वारा बड़ी सफलता रहेगी किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से सन्तान पक्ष में हानि प्राप्त होगी और विद्या में कमजोरी रहेगी तथा दिमाग के अन्दर बड़ी लम्बी चौड़ी सूझ आने के कारणों से दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी तथा चौथी शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान

नं. ९००

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घनु लग्न का फलादेश

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को शनि का कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन से वैमनस्यता रहेगी तथा पुरुषार्थ खूब करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में शक्ति रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में संकट प्राप्त करेगा और रोजगार में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा बुद्धि और बाहरी सम्बन्धों से रोजगार में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा।

स्त्री, रोजगार, पिता, राज्यस्थानपति-बुध

धन लग्न में १ बुध

यदि धन का बुध- केन्द्र देह के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह में शोभा और सम्मान प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की उत्तम शक्ति प्राप्त रहेगी और राज-समाज एवं कारबार के द्वारा उन्नति रहेगी तथा देह और विवेक की उत्तम कर्म शक्ति से लौकिक सफलता विशेष रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ९०१

ऊँची ससुराल मिलेगी और रोजगार के मार्ग में बड़े ऊँचे ढंग से अपनी दैहिक शक्ति के द्वारा बड़ी भारी सफलता पायेगा और गृहस्थ के अन्दर विशेष शक्ति प्राप्त होने के कारण हृदय में बड़ा उल्लास और उमंग रहेगा।

धन लग्न में २ बुध

यदि मकर का बुध- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो रोजगार व्यापार केम के द्वारा धन की महान् शक्ति पायेगा और कुटुम्ब की विशेष शक्ति प्राप्त रहेगी; किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य भी करता है, इसलिए स्त्री के सुख में बड़ी कमी रहेगी और पिता के व्यक्तित्व के बजाय पिता की शक्ति का लाभ अच्छा रहेगा तथा राज समाज के

नं. ९०२

पक्ष में मान और इज्जत रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है; इसलिये आयु के स्थान में शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व विभाग में लाभ व सफलता रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी तथा विवेक कर्म के द्वारा उन्नति करेगा।

यदि कुम्भ का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शनि की

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भृगु संहिता

शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा।

धन लग्न में ९ बुध

यदि सिंह का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है तो बड़ा भाग्यवान् बनेगा और धर्म का पालन करेगा तथा रोजगार व्यापार के पक्ष में भाग्य की शक्ति से बड़ी भारी सफलता मिलेगी तथा स्त्री और पिता के पक्ष से सुन्दर सहयोग प्राप्त होगा और राज-समाज तथा लौकिक व्यवहार के पक्ष में उत्तम विवेक की शक्ति से मान-प्रतिष्ठा मिलेगी और गृहस्थ के आनन्द में वैभव रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में अच्छा सम्बन्ध रहेगा तथा पुरुषार्थ कर्म से कारबार के अन्दर सफलता प्राप्त करेगा।

नं. ९०९

धन लग्न में १० बुध

यदि कन्या का बुध- दसवें केन्द्र पिता एवं राज स्थान में स्वयं अपनी राशि पर उच्च का होकर बैठा है तो पिता की महान् शक्ति रहेगी और राज समाज के पक्ष में बड़ा भारी मान प्राप्त होगा तथा रोजगार-व्यापार के मार्ग में दैनिक कर्म की कुशलता और विवेक शक्ति के द्वारा बड़ी भारी सफलता शक्ति मिलेगी और स्त्री स्थान की सुन्दर शक्ति मिलेगी तथा प्रभाव शक्ति रहेगी एवं गृहस्थ में बड़ा भारी वैभव रहेगा और सातवीं

नं. ९१०

नीच दृष्टि से चौथे माता और भूमि स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्ध में कमी रहेगी और जन्मभूमि तथा मकानाति के सम्बन्धों में कुछ कमी एवं कुछ परेशानी रहेगी।

धन लग्न में ११ बुध

यदि तुला का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो रोजगार व्यापार मार्ग से बड़ा भारी लाभ पायेगा तथा पिता स्थान की शक्ति में सफलता रहेगी तथा स्त्री स्थान के सुख सम्बन्ध में उत्तम योग लाभ रहेगा और राज-समाज के मार्ग में लाभ और मान रहेगा तथा लौकिक कार्यों की बड़ी योग्यता शक्ति प्राप्त करेगा और विवेक शक्ति के द्वारा खूब अपनी अपनो पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान

नं. ९११

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धनु लग्न का फलादेश

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धन लग्न में ४ गुरु

मकानादि का उत्तम सुख प्राप्त रहेगा और देह के लिए बड़ा सुख और सुन्दरता पायेगा तथा हास-विलास के अच्छे साधन रहेंगे और पाँचवी उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा जीवन निर्वाह के लिये पुरातत्व शक्ति का विशेष लाभ प्राप्त होगा तथा दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में भी सुख शक्ति मिलेगी और राज-समाज के मार्ग में मान-प्रतिष्ठा रहेगी तथा कारबार में सफलता रहेगी और नवमी मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये सुखपूर्वक खर्च का सुन्दर संचालन रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख और शक्ति का मार्ग प्राप्त करेगा।

नं. ९१६

धन लग्न में ५ गुरु

यदि मेष का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान से सुख शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में बड़ा सुख और आत्मीयता का योग मिलेगा तथा बुद्धि और वाणी के अन्दर बड़ी योग्यता रहेगी तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि पायेगा तथा यश मिलेगा और धर्म का ध्यान एवं पालन करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में सफलता शक्ति होते हुए भी कुछ असन्तोष रहेगा तथा लाभ की वृद्धि के मार्ग में कुछ नीरसता प्राप्त रहेगी और नवमी दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता एवं प्रभाव और सुढौलता प्राप्त करेगा तथा आत्मबल और ख्याति मिलेगी तथा दैहिक कर्म और बुद्धि योग के द्वारा भाग्यवान् एवं बुद्धिमान् माना जायेगा और अपने हृदय के अन्दर बड़ा भारी स्वाभिमान एवं सिद्धान्त शक्ति रखेगा।

नं. ९१९

यदि वृषभ का गुरु- छठें शत्रु स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो देह के सुख और सुन्दरता तथा स्वास्थ्य में कुछ कमी रहेगी और कुछ परतन्त्रता का सा योग रहेगा तथा माता के सुख सम्बन्धों में बड़ी कमी रहेगी तथा शत्रु एवं झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ परेशानी

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धन लग्न में ६ गुरु

और दानाई के योग से कार्य की सफलता प्राप्त करेगा और पाँचवाँ मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के पक्ष में सुख शक्ति रहेगी तथा राज-समाज में मान प्राप्त होगा और कारबार में शक्ति रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि के खर्च एवं बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध पायेगा और नवमीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब का सुन्दर सम्बन्ध पायेगा

नं. ९१८ दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब का सुन्दर सम्बन्ध पायेगा और नवमीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन की तरफ से कुछ परेशानी हृदय में अनुभव करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में बड़ा असन्तोष मानेगा तथा कुछ झंझट युक्त रहेगा।

धन लग्न में ७ गुरु

नं. ९१९ यदि मिथुन को गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दरता और प्रभाव एवं सुख प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता और आनन्द मानेगा तथा माता का सुख होगा और भूमि-मकानादि रहने पर सुन्दर स्थान प्राप्त होगा और लौकिक दैनिक कार्यों का बड़ी योग्यता के साथ पालन करके हृदय में प्रसन्नता अनुभव करेगा और पाँचवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आपदनी के मार्ग में कुछ असन्तोष युक्त सुख शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता व सरलता और स्वाभिमान रखेगा तथा नवमीं शत्रु दृष्टि से भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहन के स्थान में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध पायेगा और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा उन्नति करने के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से कार्य सम्पादन करेगा!

यदि कर्क का गुरु- आठवीं आयु मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो देह में कुछ परेशानी तथा हिम्मत रहेगी और जीवन की दिनचर्या में कुछ शक्ति रहेगी और आयु की शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और देह की सुन्दरता एवं सुडौलताई में कुछ कमी रहेगी तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा

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भृगु संहिता

के पक्ष में कुछ असंतोष रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति रहेगी और भूमि-मकानादि का प्रभाव रहेगा तथा घरेलू वातावरण में सुख सौभाग्य प्राप्त होगा और नवमी दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी योग्यता और दानाई से काम निकालेगा। किन्तु कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग में अरुचि रहने के कारण थोड़ी-सी दिक्कत अनुभव होगी, किन्तु विपक्षियों में प्रभाव रहेगा और रोगादिक मार्ग में सफलता रहेगी।

धन लग्न में ११ गुरु

यदि तुला का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो कुछ थोड़ी-सी नीरसता के साथ देह के योग से आमदनी का सुख लाभ प्राप्त करेगा और माता का लाभ पायेगा तथा भूमि-मकानादि का सुख रहेगा और धन लाभ को वृद्ध करने के लिये बड़ा प्रयत्लशील रहेगा तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में कुछ नीरसता का योग प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में सुख शक्ति पायेगा और विद्या स्थान में बड़ी सफलता रहेगी। बुद्धि और वाणी के द्वारा बड़ी योग्यता प्रदर्शित करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोगजगार के पक्ष में सुख और आत्मीयता प्राप्त करेगा।

नं. ९२३

कुछ नीरसता का योग प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में सुख शक्ति पायेगा और विद्या स्थान में बड़ी सफलता रहेगी। बुद्धि और वाणी के द्वारा बड़ी योग्यता प्रदर्शित करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोगजगार के पक्ष में सुख और आत्मीयता प्राप्त करेगा।

धन लग्न में १२ गुरु

यदि वृश्चिक का गुरु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्च विशेष करेगा और बाहरी स्थानों में सुख सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा देह के पक्ष में कमजोरी रहेगी और बाहरी स्थानों में भ्रमण करना पड़ेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ कमी के सहित माता का सुख सम्बन्ध पायेगा तथा भूमि-मकानादि की कुछ थोड़ी शक्ति रहेगी और खर्च के योग से सुख प्राप्ति का साधन पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ

नं. ९२४

की कुछ थोड़ी शक्ति रहेगी और खर्च के योग से सुख प्राप्ति का साधन पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ

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धनु लग्न का फलादेश

राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी दानाई के साथ शत्रु पक्ष में काम निकालेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ शान्ति से शक्ति पायेगा और नवमी उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का विशेष लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ी रौनक एवं प्रभाव रहेगा।

धनलाभ, शत्रु, दिक्कतस्थानपति-शुक्र

यदि धनु राशि का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम और विशेष चतुराई के योग से आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा छठें स्थान का स्वामी होने के कारण देह में कुछ रोग और प्रभाव तथा कुछ परेशानी पायेगा। किन्तु शत्रु पक्ष में विजयी रहेगा और झगड़े झंझटों के मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ थोड़े से मतभेद के सहित लाभ पायेगा और रोजगार के मार्ग में थोड़े से परिश्रम के योग से बड़ी योग्यता और चतुराई के द्वारा बड़ा लाभ एवं सफलता शक्ति और मान पायेगा।

धन लग्न में १ शुक्र

१० ८ ७ ११ ९ शु. ६ १२ ३ २ ४ ५ १

नं. ९२५

धन लग्न में २ शुक्र

१० शु. ८ ७ ११ ९ ६ १२ ३ २ ४ ५ १

नं. ९२६

यदि मकर का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग से धन की संग्रह शक्ति का विशेष लाभ पायेगा और छठें स्थान का स्वामी होने के दोष के कारण से धन के मार्ग में कुछ परेशानी भी रहेगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ मतभेद रहेगा तथा शत्रु पक्ष एवं झगड़े-झंझटों के सम्बन्ध में फायदेमन्द तथा प्रभाव युक्त रहेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में आयु एवं पुरातत्व स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा और जीवन की दिनचर्या में आमोद-प्रमोद की ढंग रहेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और इज्जत-आबरू पायेगा तथा धन का संग्रह करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा।

यदि कुम्भ का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शनि की

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धनु लग्न का फलादेश

४७५

धन लग्न में ६ शुक्र

नं. ९३०

मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्ची अधिक करना पड़ेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर मार्ग से अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा।

यदि वृषभ का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से लाभ की शक्ति पायेगा तथा आमदनी के पक्ष में कुछ परतंत्रता और परिश्रम के योग से सफलता शक्ति पायेगा तथा धन के लाभी सम्बन्ध में कुछ कमी एवं असंतोष पायेगा और ननसाल पक्ष से कुछ लाभ का सम्बन्ध पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु

धन लग्न में ७ शुक्र

नं. ९३१

मूत्रेन्द्रिय का विकार होगा और सातवीं दृष्टि से द्रह के स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभावी रहेगा। किन्तु आमदनी के मार्ग में कुछ परिश्रम और कुछ दिक्कतें अनुभव होंगे।

यदि मिथुन का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की मिथुन राशि पर बैठा है तो कुछ परिश्रम और विशेष चतुराई के योग से रोजगार के मार्ग में धन का सुन्दर लाभ योग एवं सफलता शक्ति पायेगा और शत्रु पक्ष में प्रभाव युक्त रहेगा तथा छठें स्थानपति होने के दोष के कारण से स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद युक्त लाभ की सुन्दर शक्ति पायेगा और कभी कुछ स्त्री को रोग रहेगा तथा कभी स्वयं को कोई

धन लग्न में ८ शुक्र

नं. ९३२

के सम्बन्ध से कुछ दिक्कतें अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटम्ब स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन की

यदि कर्क का शुक्र- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में शक्ति पायेगा और पुरातत्व स्थान का लाभ योग प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा दूसरे स्थान के सम्बन्ध से लाभ का साधन चतुराई और परिश्रम के द्वारा प्राप्त करेगा, किन्तु

छठें स्थान का स्वामी होने के कारण से जीवन की दिनचर्या में कुछ झगड़े-झंझट और शत्रु पक्ष

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वृद्धि करने के लिये महान् प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब की कुछ शक्ति का सहयोग पायेगा।

धनु लग्न में ९ शुक्र

यदि सिंह का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो कुछ असंतोष के कारणों सहित भाग्य की शक्ति और परिश्रम के योग से आमदनी का साधन मार्ग प्राप्त करेगा और धर्म के पक्ष में कुछ थोड़ी श्रद्धा का लाभ पायेगा तथा शत्रु पक्ष में भाग्य की शक्ति और चतुराई से लाभ प्राप्त होगा, किन्तु छठे स्थानपति होने के कारण भाग्य के पक्ष में कुछ दिक्कतें अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुंभ राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति की वृद्धि एवं सफलता पायेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा।

नं. ९३३

धन लग्न में १० शुक्र

यदि कन्या का शुक्र- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता पक्ष में एवं आमदनी के पक्ष में परेशानी का योग पायेगा और राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा की बड़ी कमी रहेगी और कारबार की उन्नति के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और शत्रु पक्ष के कारण से लाभोत्पति में रुकावटें एवं कुछ कमी रहेगी तथा गुप्त शत्रुओं के कारण से अपना काम चलावेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में कुछ दिक्कत के साथ अच्छी योग्यता पायेगा तथा संतान पक्ष का कुछ कर्मी के साथ लाभ पायेगा और बड़ा चतुर बनेगा।

नं. ९३४

धन लग्न में ११ शुक्र

यदि तुला का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में सफलता शक्ति पायेगा और शत्रु पक्ष के मार्ग में बड़ा प्रभाव और लाभ पायेगा तथा झगड़े-झंझट आदि के पक्ष में बड़ी गहरी चतुराई के योग से सफलता शक्ति मिलेगी। किन्तु छठे स्थान पतिः होने के कारण से आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतें भी रहेंगी और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष

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धन लग्न में २ शनि

नं. ९३८

यदि कुम्भ का शनि- तीसरे पराक्रम स्थान एवं भाई के स्थान पर स्वंय अपनी कुम्भ राशि में बैठा है तो पराक्रम स्थान की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ के द्वारा खूब धन पायेगा और कुटुम्ब की शक्ति रहेगी। किन्तु धनेश कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये भाई-बहन की शक्ति होते हुए भी कुछ कमी रहेगी और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये पुरुषार्थ और हिम्मत स्थान पर बड़ा भारी भरोसा रखेगा और तीसरी नीच दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा और विद्या में कुछ कमी रहेगी राशि में और धर्म और भाग्य स्थान सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और यश की कुछ कमजोरी रहेगी तथा धर्म पर श्रद्धा की कमजोरी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च की अधिकता के मार्ग में कुछ परेशानी होगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगी।

धन लग्न में ३ शनि

नं. ९३९

यदि मीन का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो माता के सुख सम्बन्ध में कमी रहेगी और भूमि

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धन लग्न में ६ शनि

फायदा उठावेगा तथा धन के पक्ष में प्रभाव रखते हुए भी अन्दरूनी कमजोरी रहेगी और कुटुम्ब तथा भाई-बहिन के पक्ष में कुछ विरोध का-सा रूप रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ फिकर रहेगी तथा आयु में शक्ति बनेगी और पुरातत्व स्थान से कुछ शक्ति मिलने पर भी पुरातत्व शक्ति में कुछ कमी प्रतीत होगी और उदर में कुछ शिकायत रहेगी

नं. ९४२

और सातवीं दृष्टि से शत्रु की राशि वृश्चिक में खर्च और बाहरी स्थान को देख रहा है। अतः खर्च करने की शक्ति के अभाव के कारण दुःखी रहेगा तथा दसवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त होते हुए भी भाई-बहिन के सम्पर्क में कुछ वैमनस्यता एवं अलहदगी का योग पायेगा और अपने पुरुषार्थ पर बड़ा भारी भरासा रखते हुए जबरदस्त हिम्मत और बहादुरी के साथ काम करेगा।

धन लग्न में ७ शनि

यदि मिथुन का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग से काफी धन पैदा करेगा और स्त्री स्थान में शक्ति पायेगा, किन्तु धन स्थानपति के दोष होने के कारण स्त्री के सुख में कुछ थोड़ी कमी रहेगी तथा कुटुम्ब की शक्ति रहेगी और भाई-बहिन के पक्ष से अच्छा सहयोग बनेगा और पुरुषार्थ की शक्ति के द्वारा काफी सफलता प्राप्त करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से

नं. ९४३

भाग्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य स्थान में कुछ नीरसता प्रतीत होगी तथा धर्म के मार्ग में कुछ अरुचि रहेगी, क्योंकि भाग्य और धर्म के मुकाबले में पुरुषार्थ और लौकिक सफलता का महत्व अधिक रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बुध परेशानी पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से चौथे माता एवं भूमि स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा भूमि-भवनादि की शक्ति में कुछ परिवर्तन होगा और कठिनाई से उन्नति करेगा।

यदि कर्क का शनि- आठवें मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो पुरातत्व शक्ति का लाभ करेगा तथा आठवें

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धनु लग्न का फलादेश

धन लग्न में ८ शनि

स्थान पर शनि आयु का वृद्धि कारक माना जाता है, इसलिए आयु की वृद्धि करेगा, किन्तु जीवन की दिनचर्या में फिकरमंदी रहेगी और भाई-बहिन के सुख में कमजोरी रहेगी तथा सञ्जित धन शक्ति का अभाव रहेगा और कठिनाई के मार्ग से धन की प्राप्ति होगी तथा पुरुषार्थ शक्ति के मार्ग में होगी तथा पुरुषार्थ शक्ति के मार्ग में कमजोरी प्रतीत होगी और कभी-कभी हिम्मत टूट जायेगी तथा तीसरी मित्र दृष्टि से पिता एवं

नं. ९८४

राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सहारा मिलेगा और राज-समाज में कुछ मान रहेगा तथा कारबार के पक्ष में कुछ शक्ति रहेगी और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की साधारण शक्ति प्राप्त रहेंगे और दसवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सम्मान पक्ष को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और सम्मान पक्ष में सुखों में कमजोरी रहेगी।

यदि सिंह का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है तो कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा भाग्य की उन्नति कर पायेगा तथा धर्म के स्थान में कुछ अरुचियुक्त भाव से धर्म का पालन कर

धन लग्न में ९ शनि

नं. ९८५

सकेगा और धन की संग्रह शक्ति का साधारण योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का थोड़ा सुख प्राप्त करेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से लाभी स्थान की मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष नफा और सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी मुफ्त का सा धन लाभ प्राप्त होगा और सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त रहेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति की सफलता मिलेगी और हिम्मत शक्ति से कार्य करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और झगड़े-झंझट आदि के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति और लाभ प्राप्त करेगा।

यदि कन्या का शनि- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान से बड़ी सफलता शक्ति पायेगा और

पृ.सं.-३१

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धन लग्न में १० शनि

कारबार से धन की उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा और लाभ पायेगा तथा भाई-बहिन की शक्ति का गौरव प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा सुन्दर उन्नति का मार्ग बनेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति का अच्छा सहयोग रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च की अधिकता के मार्ग में कुछ कटुता एवं कुछ असन्तोष रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्ध में कुछ कमी रहेगी और भूमि के स्थान में कुछ नीरसता के साथ शक्ति रहेगी तथा दसवें मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष मे सफलता शक्ति मिलेगी और रोजगार के मार्ग में पुरुषार्थ के द्वारा धन का लाभ श्रेष्ठ रहेगा।

नं. ९४६

धन लग्न में ११ शनि

यदि तुला का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें घर में कूड़ ग्रह जबरदस्त शक्ति का द्योतक होता है, इसलिये धन की आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा और कभी-कभी मुफ्त का-सा बहुत धन लाभ प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति का उत्तम सहयोग पायेगा और भाई-बहिन की सम्पर्क शक्ति का लाभ पायेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा बड़ा लाभ प्राप्त करेगा

नं. ९४७

और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी और सुन्दरता की कुछ कमी रहेगी तथा सातवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ कष्ट रहेगा और विद्या स्थान में कुछ कमी रहेगी तथा बोल-चाल में कुछ रूखापन रहेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी रहेगी तथा पुरातत्व का लाभ रहेगा।

यदि वृश्चिक का शनि- ग्यारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा और धन तथा कुटुम्ब की कुछ हानि पायेगा और भाई-बहिन की शक्ति का कुछ कष्ट और कषणी प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति में कुछ कमजोरी रहेगी और बाहरी

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धन लग्न में १२ शनि

नं. ९४८

स्थानों के सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर मार्ग के द्वारा शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की थोड़ी सी शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट व आमदनी के पक्षों में लाभ युक्त रहेगा और कुछ छिपी शक्ति से काम करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के स्थान में कुछ असन्तोष युक्त मार्ग से सफलता पायेगा तथा धर्म का थोड़ा-सा पालन करेगा।

कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु

धन लग्न में १ राहु

नं. ९४९

यदि धनु राशि का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह की सुन्दरता में बड़ी कमी रहेगी और देह में कुछ कष्ट और चिन्ता का योग प्राप्त करेगा तथा गुप्त युक्ति के बल से उन्नति पर पहुँचने का विशेष प्रयत्न करेगा, किन्तु उन्नति के मार्ग एवं मान प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में कमी रहेगी और देह में कभी-कभी महान्‌ संकट का योग पायेगा

किन्तु राहु देव गुरु वृहस्पतिजी के घर में बैठा है, इसलिये अन्दरूनी छिपाव एवं अनुचित योजना की शक्ति का प्रयोग प्रकट में बड़े राजनैतिक ढंग के कार्य रूप में परिणित करेगा और अपनी परिस्थिति के अन्दर एक बड़ी कमी होने के कारण गुप्त दुःख का अनुभव करेगा।

धन लग्न में २ राहु

नं. ९५०

यदि मकर का राहु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कमी और कष्ट के कारण पायेगा तथा कुटुम्ब के सम्बन्ध में कुछ चिन्ता रहेगी, क्योंकि स्थिर हठी ग्रह शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये धन की शक्ति पाने के लिये बड़ा भारी युक्ति बल का प्रयोग करेगा तथा धन और कुटुम्ब के मार्ग में कभी-कभी महान संकट का योग मिलेगा, किन्तु बार-बार गहरे प्रयत्न की शक्ति से धन के सुधार का मार्ग प्राप्त करेगा एवं धन की

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पूर्ति करने के लिए कभी-कभी धन का कर्ज लेकर कार्य संचालन करेगा।

धन लग्न में ३ राहु

यदि कुम्भ का राहु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शनि शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये पराक्रम स्थान के मार्ग से बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और जबर्दस्त हिम्मत शक्ति से काम लेगा और स्थिर ग्रह शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये अपनी उन्नति करने के लिये गहरी युक्ति बल के प्रयोग से सदैव प्रयत्नशील रहेगा।

किन्तु भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा। कभी-कभी पुरुषार्थ कर्म की सफलता के मार्ग में घोर संकट प्राप्त होने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति से काम निकालेगा।

नं. ९५१

धन लग्न में ४ राहु

यदि मीन का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो माता के सुख में भारी कमी रहेगी और भूमि-मकानादि की हानि या कमी प्राप्त करेगा तथा घरेलू रहन-सहन के सुख सम्बन्धों में कुछ अशान्ति का योग पायेगा।

किन्तु देवगुरु वृहस्पति के स्थान में राहु बैठा है, इसलिये घरेलू सुख के साधनों को बड़ी योग्यता एवं गुप्त युक्ति के बल से प्राप्त करेगा और कभी-कभी घरेलू वातावरण में घोर संकट का सामना करने की स्थिति उत्पन्न होने पर भी गुप्त बुद्धिमत्ता के द्वारा कार्य सम्पन्न करेगा और जन्म स्थान से वियोग पायेगा तथा कुछ मुफ्त का-सा सुख भी मिलेगा।

नं. ९५२

धन लग्न में ५ राहु

यदि मेष का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट प्राप्त होगा और संतान पक्ष के सम्बन्ध से कुछ न कुछ चिंताये बनती रहेंगी तथा विद्या ग्रहण करने के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें उत्पन्न होंगी;

किन्तु गरम ग्रह मंगल की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये हिम्मत शक्ति के द्वारा किसी न किसी प्रकार विद्या ग्रहण करेगा, किन्तु विद्या में कुछ कमी रहेगी और बोलचाल के अन्दर कुछ रुखापन और कुछ छिपाव रहेगा तथा गुप्त युक्ति के बल से अपने सिद्धांत की पूर्ति करेगा।

किन्तु दिमाग के अन्दर

नं. ९५३

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धनु लग्न का फलादेश

कभी-कभी बेहद परेशानी अनुभव करेगा।

धन लग्न में ६ राहु यदि वृषभ का राहु- छठें शत्रु स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर राहु बैठा है इसलिये अति गम्भीर गहरी युक्तियों के द्वारा सदैव विजयी रहेगा तथा अनेक प्रकार के विघ्न बाधाओं को चतुराई से ही दमन करेगा और अपने को हमेशा निडर मानेगा। किन्तु मामा के पक्ष में कुछ खराबी करेगा और राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी शत्रु पक्ष में बेहद परेशानी का योग पायेगा। किन्तु अपनी अन्दरूनी कमजोरी को छिपाये रखने से प्रभाव कायम करेगा।

नं. ९५४

धन लग्न में ७ राहु यदि मिथुन का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर बैठा है तो स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति पायेगा और सम्भवतः कुछ अधिक स्त्रियों से शादी या सम्बन्ध पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में विशेष उन्नति करेगा और बहुत प्रकार के मार्गों से रोजगार की वृद्धि के साधन बनायेगा तथा विवेकी बुध की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये महान् चतुराई के साधनों से सफलता शक्ति पायेगा और राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण ग्रहस्थ और रोजगार के मार्ग में कभी-कभी भारी अशान्ति का योग बनेगा किन्तु उच्च का होने के नाते उन मुसीबतों से जल्दी ही छुटकारा मिलेगा और रास्ता साफ हो जायेगा।

नं. ९५५

धन लग्न में ८ राहु यदि कर्क का राहु- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो आयु के स्थान में कई बार संकट प्राप्त करेगा तथा परातत्व शक्ति की हानि रहेगी और जीवन की दिनचर्या में बड़ी चिन्तायें प्राप्त करेगा तथा उदर के अन्दर कोई बीमारी रहेगी और कभी-कभी जीवन की समाप्ति का सा महान् संकट बनेगा इसलिये जीवन की रक्षा और जीवन के निर्वाह के लिये फिकरमंदी का योग चलेगा तथा गुप्त युक्ति और अनेक प्रकार के साधनों से जीवन की दिनचर्या का संचालन कार्य करेगा तथा

नं. ९५६

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जीवन झंझट युक्त रहेगा। यदि सिंह का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में परमशत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में महान् संकट प्राप्त करेगा तथा भाग्योदयति के लिये बड़ी-बड़ी दिक्कतें सहनी पड़ेंगी और धर्म के पक्ष में हानि और कमी रहेगी तथा ईश्वर की भक्ति और निष्ठा में कमजोरी रहेगी और सुयश का अभाव रहेगा तथा सूर्य की राशि पर होने से भाग्य की उत्तति के मार्ग में भारी प्रयत्न करेगा और विशेष मुक्तिबल से काम लेगा।

नं. ९५७ किन्तु कभी-कभी भाग्य के पक्ष में घोर संकट को पाने पर भी हिम्मत और प्रताप शक्ति से काम करेगा। धनु लग्न में १० राहु यदि कन्या का राहु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में कुछ परेशानी या कमी रहेगी और राज-समाज में कुछ झंझट युक्त वातावरण से काम चलेगा तथा कारबार मान-प्रतिष्ठा आदि के मार्ग में कभी महान् संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा, किन्तु विवेकी बुध की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये गुप्त और गहरी युक्ति के बल से अपनी स्थिति और कारबार की उन्नति करेगा; फिर भी कुछ कमी और कमजोरी रहेगी और बहुत सी दिक्कतों के मार्ग के बाद इज्जत-आबरू को बना सकेगा तथा अधिक उन्नति और ऊँचे पद पर पहुँचने के लिये सदैव चिन्ता युक्त रहेगा।

नं. ९५८ धन लग्न में ११ राहु यदि तुला का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थानपर कूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा और अधिक से अधिक मुनाफा खाने की चेष्टा करेगा। किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में महान् चतुराई की गुप्त युक्तियों के द्वारा रास्ता इस्तेमाल करके आमदनी की वृद्धि प्राप्त करेगा, किन्तु राहु क स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में कठिनाईयाँ और परेशानियाँ भी प्राप्त रहेंगी। कभी-कभी लाभ के मार्ग

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धनु लग्न का फलादेश

में कठिन समस्या बनने पर भी धैर्य से काम लेगा। यदि वृश्चिक का राहु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मड़ल की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में कुछ चिन्ता फिकर रहेगी और कुछ झंझट एवं परेशानियों के द्वारा खर्च का संचलन कार्य रहेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ कष्ट अनुभव होगा, गरम ग्रह मंगल की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये बड़ी कड़ाई और मेहनत तथा हिम्मत और गुप्त युक्तियों के बल से खर्च के मार्ग को पूरा करेगा तथा इसी प्रकार बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कार्य बनावेगा। किन्तु खर्च के मार्ग में कभी-कभी भारी संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा तथा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से कभी नुकसान रहेगा, किन्तु धैर्य और गुप्त साहस से काम निकालेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु

नं. ९६०

धन लग्न में १ केतु

यदि धनु राशि का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के आकार में वृद्धि और शक्ति प्राप्त करेगा तथा अपने अन्दर बड़ी बहादुरी और हिम्मत रखेगा तथा हठधर्मी और जिद्बाजी से काम करेगा किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण देह में कुछ चिन्ता एवं कुछ कष्ट का योग पायेगा तथा देह की सुन्‍दरता और स्वास्थ्य से सम्बन्ध में कुछ कमी रहेगी तथा अपने व्यक्तित्व और मान-प्रतिष्ठा की उन्नति के लिये महान् कठिन परिश्रम और विशेष साधन उपस्थित करेगा तथा कठिन से कठिन कार्य को पूरा करने के लिये सदैव उद्यत रहेगा; किन्तु फिर भी अपने अन्दर कुछ कमी के कारण से दुःख अनुभव करेगा।

नं. ९६१

धन लग्न में २ केतु

यदि मकर का केतु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो धन के पक्ष में कुछ संकट एवं कमी का योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब के अन्दर कमी और क्लेश का रूप पायेगा और धन की उन्नति करने के लिये बड़्‌चा कठिन कर्म करेगा तथा शनि की राशि पर बैठा है इसलिये धन की प्राप्ति के मार्ग में बड़ा भारी पाश्च्रिम करते हुए सदैव प्रयत्लशील रहेगा और मेहनत

नं. ९६२

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४९०

भृगु संहिता

की हानि प्राप्त होगी तथा उदर के अन्दर कई प्रकार की बीमारी का योग भी रहेगा और चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये मन के अन्दर मृत्यु तुल्य दुःख का अनुभव करेगा और जीवन को चलाने के लिए कुछ गुप्त शक्ति और कठिन कर्म का प्रयोग करेगा।

धन लग्न में ९ केतु यदि सिंह का केतु- नवम त्रिकोण भाव एवं धर्म स्थान में परम सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में महान् संकटों का योग प्राप्त करेगा तथा भाग्य की वृद्धि करने के लिये बड़े-बड़े कठिन कर्म और गुप्त शक्तियों का प्रयोग करेगा और फिर भी भाग्य की स्थिति के अन्दर बड़ी भारी कमी एवं कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में बड़ी-बड़ी रुकावटें पड़ेंगी तथा सुयश की कमी रहेगी और दैव संयोग के द्वारा असफलताओं के कारण प्राप्त होते रहेंगे और ईश्वर के विश्वास में तथा बरकत्त के स्थान में बड़ी कमजोरी रहेगी।

नं. ९६९

धन लग्न में १० केतु यदि कन्या का केतु- दसम केन्द्र पिता स्थान में एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में कुछ कमी और परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा कारबार और राज-समाज के पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा मान प्रतिष्ठा के अन्दर कुछ कमजोरी के सहित मार्ग बनेगा और केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी मान प्रतिष्ठा एवं कारबार के अन्दर गहरा अशांति के कारण पाने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति एवं हिम्मत से और कठिन परिश्रम के योग से पुनः अपनी जीवनो शक्ति को प्राप्त करेगा।

नं. ९७०

धन लग्न में ११ केतु यदि तुला का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर कूर ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा और अधिक से अधिक नफा खाने का विशेष प्रयत्न एवं विशेष परिश्रम करेगा और केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में कभी-कभी विशेष परेशानी का योग प्राप्त करेगा। किन्तु गुप्त शक्ति और

नं. ९७१

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धनु लग्न का फलादेश

कठिन परिश्रम के योग से सफलता शक्ति पायेगा तथा लाभ प्राप्ति में वृद्धि होते हुए भी लाभ के स्थान में कुछ त्रुटि महसूस होती रहेगी।

यदि वृश्चिक का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी धन लग्न में १२ केतु स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्च

के मार्ग में बड़ी परेशानी रहेगी और खर्च की संचालन शक्ति पाने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतें एवं कठिनाइयाँ रहेंगी तथा गरम ग्रह मंगल

की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये खर्च की शक्ति को सफल करने के लिये गुप्त शक्ति और महान हिम्मत से काम लेगा।

किन्तु खर्च के स्थान में कभी-कभी महान संघर्ष के योग बनते रहेंगे और कुछ त्रुटि युक्त मार्ग से खर्च का संचालन चलता रहेगा।

॥ धन लग्न समाप्त ॥

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कुण्डली नं. ९८२ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९८३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९८४ के अनुसार मालूम करिये।

( १० ) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है उसका फलादेश कुण्डली नं० ९८५ से ९९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८६ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८७ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८८ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८९ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९० के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९१ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९२ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९९४ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९६ के अनुसार मालूम करिये।

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नं. १०२३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२६ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२८ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३० के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३२ के अनुसार मालूम करिये।

(१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०३३ से १०४४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये।

१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३३ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३४ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३५ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३६ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३७ के अनुसार मालूम करिये।

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६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १५३ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५४ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५५ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५६ के अनुसार मालूम करिये।

(१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल

आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं १०५७ से १०६८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

१०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५७ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५८ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५९ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६० के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६१ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६२ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६३ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६४ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६५ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६६ के अनुसार मालूम करिये।

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८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६७ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशे पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६८ के अनुसार मालूम करिये।

(१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं १०६९ से १०८० तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६९ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७० के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७२ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७३ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७४ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७५ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७६ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७८ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०८० के अनुसार मालूम करिये।

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मकर लग्न का फलादेश

आयु, मृत्यु, पुरातत्वस्थानपति- सूर्य

मकर लग्न में १ सूर्य

यदि मकर का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य के अन्दर कुछ कमजोरी रहेगी और देह में कभी-कभी विशेष संकट की योग भी बनेगा। किन्तु आयु स्थान की वृद्धि रहेगी और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर रूप से शक्तिक रहेगी तथा देह में प्रभाव और तेज़ी रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोज़गार के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोज़गार के पक्ष में अष्टमेश के दोष युक्त दृष्टि के कारण कुछ परेशानी एवं कुछ कठिनाइयाँ रहेंगी।

नं. ९७३

मकर लग्न में २ सूर्य

यदि कुम्भ का सूर्य- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है, तो अष्टमेश होने के दोष के कारण धन की शक्ति को संचित नहीं कर सकेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ परेशानी एवं नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा और धन के मार्ग में कभी-कभी विशेष चिन्ता का योग बनेगा और कुटुम्ब से संघर्ष करता रहेगा।

नं. ९७४

सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त होगी तथा पुरातत्व शक्ति का अच्छा लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव और अमरत्व को ढंग रहेगा और जीवन की शानदार के लिए धन की परबाह नहीं करेगा।

मकर लग्न में ३ सूर्य

यदि मीन का सूर्य- तीसरे पराक्रम स्थान एवं भाई के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान में गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा जीवन की शक्ति में बड़ी हिम्मत और जोश रहेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन के पक्ष में कुछ परेशानी तथा कुछ कमी रहेगी और

नं. ९७५

सातवीं मित्र दृष्टि से भावय एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख

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मकर लग्न का फलादेश

गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा तथा बाहरी स्थान में कुछ अरुचि रहेगी।

यदि कर्क का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं मकर लग्न में ७ सूर्य रोजगार के स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण स्त्री स्थान में संकट एवं परेशानी रहेगी और रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाइयों से संचालन कार्य करेगा तथा कभी-कभी रोजगार में बड़ी हानि रहेगी और आयु स्थान में शनि शक्ति प्राप्त होगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव और प्रमोद रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कष्ट रहेगा और देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी तथा अधिक परिश्रम करना पड़ेगा।

नं. ९७९

मकर लग्न में ८ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- आठवें आयु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु स्थान में शक्ति प्राप्त रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली विशेष शक्ति प्राप्त होगी तथा निर्भयता युक्त समय व्यतीत करेगा तथा रहन-सहन के अन्दर तेज और स्वाभिमान रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह के स्थान में परेशानी के कारण प्राप्त होंगे और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ झंझट और निरसता का योग पायेगा।

नं. ९८०

यदि कन्या का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या का भाग्यवानी और प्रभाव के द्वारा व्यतीत करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण भाग्य स्थान की उन्नति के मार्ग में रुकावट प्राप्त करेगा तथा सूर्यश की कमी रहेगी और धर्म पालन की हानि और कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है

नं. ९८१

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मकर लग्न का फलादेश

से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा और बाहर का अच्छा सम्बन्ध रहेगा।

यदि कर्क का चन्द्र- सातवें स्त्री एवं रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो मनोयोग की महान शक्ति के द्वारा रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री के सुख और सौन्दर्य में महानता प्राप्त होगी तथा गृहस्थ के अन्दर मनोरञ्जन का सुन्दर साधन रहेगा तथा लौकिक भोगादिक पक्ष के अन्दर विशेष अभिरुचि रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये गृहस्थ और रोजगार के पक्ष से देह के सम्बन्ध की कुछ अरुचि युक्त मार्ग से मान और गौरव प्राप्त होगा।

नं. ९९१

देख रहा है, इसलिये गृहस्थ और रोजगार के पक्ष से देह के सम्बन्ध की कुछ अरुचि युक्त मार्ग से मान और गौरव प्राप्त होगा।

मकर लग्न में ८ चन्द्र

यदि सिंह का चन्द्र- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्वस्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाइयाँ युक्त कर्म के द्वारा कार्य सफल कर सकेगा तथा गृहस्थ सुख की कमी के कारण मानसिक अशान्ति रहेगी और पुरातत्व सम्बन्ध में सहायता शक्ति मिलेगी तथा आयु में तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान

को शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिए कुछ दिक्कतों के साथ धन की वृद्धि करने का प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब से कुछ अच्छा सम्पर्क रहेगा।

नं. ९९२

मकर लग्न में ९ चन्द्र

यदि कन्या का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री के पक्ष में भाग्यवानी और सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा मनोयोग की उत्तम शक्ति के द्वारा रोजगार के मार्ग में बड़ी सुन्दर सफलता प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ और रोजगार के द्वारा बड़ा भाग्यवान समझा जायेगा और लौकिक तथा पार-लौकिक दोनों ही विषयों में सुन्दर रुचि रखेगा

तथा यश और धर्म को प्राप्त करेगा तथा व्यवहारिक मार्ग में न्याय को पसंद करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में भाई और पराक्रम स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का योग

नं. ९९३

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पायेगा तथा मनोयोग के द्वारा पुरुषार्थ की सफलता पाएगा। मकर लग्न में १० चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और राज-समाज के अन्दर बड़ी मान प्रतिष्ठा पायेगा तथा मनोबल की उत्तम शक्ति के द्वारा रोजगार का मार्ग ऊँचे स्तर पर ले जाकर सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा सुन्दर और स्वाभिमान वाली स्त्री पाएगा और गृहस्थ के सम्बन्ध में आमोद-प्रमोद रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में और मकानादि भूमि के सम्बन्ध में सुख और मनोज्ञ पायेगा।

नं. ९९४

मकर लग्न में ११ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और स्त्री पक्ष के सम्बन्ध में सुख की कमी अनुभव होगी तथा रोजगार के साथ मनोयोग के द्वारा लाभ होता रहेगा और गृहस्थ के सम्बन्ध से कुछ मानसिक परेशानियाँ रहेंगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि की शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में बुद्धि और उल्लास प्राप्त करेगा।

नं. ९९५

मकर लग्न में १२ चन्द्र यदि धनु राशि का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से मनोयोग की कर्म शक्ति से सफलता पाएगा और स्त्री पक्ष के सुख सम्बन्ध में हानि और कमजोरी रहेगी तथा स्थानीय रोजगार के मार्ग में बड़ी परेशानियाँ और नुकसान रहेगा और गृहस्थ सुख के अन्दर मन को अशान्ति के कारण मिलेंगे और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी नरमाई से काम निकालेगा और मनोयोग की शक्ति से कुछ अभाव रहेगा।

नं. ९९६

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मकर लग्न का फलादेश

यदि वृषभ का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो विद्या की शक्ति का सुख लाभ पायेगा और बुद्धि एवं वाणी के द्वारा स्वार्थ की पूर्ति सुख पूर्वक करेगा। संतान पक्ष में सुख शक्ति और लाभ प्राप्त करेगा तथा माता का लाभ मिलेगा और भूमि मकानादि का लाभ व सुख रहेगा चौथी

मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिए आयु के पक्ष में सुख शक्ति रहेगी और पुरातत्व स्थान की शक्ति का लाभ रहेगा तथा जीवन की दिनचर्या में आनन्द रहेगा और सातवीं दृष्टि से आमदनी के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आमदनी की शक्ति का मजबूत लाभ बुद्धि योग द्वारा प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में सुख और लाभ प्राप्त करेगा।

नं. १००१

मकर लग्न में ७ मंगल

यदि मिथुन का मंगल- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर गरम ग्रह शक्ति शाली फल का दाता होता है, इसलिये शत्रु स्थान में विशेष प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट आदि मार्गों में सफलता और सुख सम्बन्धों में कमी पायेगा और जन्मभूमि के मकानादि स्थान पक्ष में सुख की कमी रहेगी और आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतों के योग से सफलता और प्रभाव पायेगा तथा चौथी भित्र

दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का कुछ पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिए खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थान के सम्बन्ध में सुख लाभ रहेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह में विशेष प्रभाव पायेगा तथा सुन्दरता युक्ति सुडौल कद रहेगा। देह का सुख और लाभ प्राप्त रहेगा।

यदि कर्क का मंगल- सातवें केन्द्र स्री एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, तो स्री स्थान में घरेलू सुख शांति की बड़ी भारी कमी रहेगी तथा रोजगार के पक्ष में आमदनी की

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मकर लग्न का फलादेश

मकर लग्न में ९ मंगल सफलता एवं यश मिलेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की सुख शक्ति का लाभ रहेगा और पराक्रम स्थान की सफलता शक्ति से लाभ और सुख मिलेगा तथा उल्लास और हिम्मत शक्ति पर भरोसा रहेगा तथा आठवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति का विशेष सुख और लाभ भाग्य से प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की उत्तम शक्ति का लाभ पायेगा तथा घरेलू वातावरण में रहन-सहन और आमोद-प्रमोद के ढंग स्वतः भाग्य की शक्ति से प्राप्त करेगा।

नं. ९००५

मकर लग्न में १० मंगल यदि तुला का मंगल- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो दसम स्थान पर मंगल का बैठना अधिक श्रेष्ठ माना जाता है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का विशेष लाभ पायेगा और राज-समाज के अन्दर मान-प्रतिष्ठा और आमदनी का उत्तम मार्ग प्राप्त करेगा तथा कारबार के पक्ष में बड़ी शानदार से उन्नति और लाभ पायेगा और चौथी उच्च दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शनि की

नं. ९००६

मकर राशि में देख रहा है, इसलिए देह में विशेष प्रभाव एवं मान तथा सुख के साधन पायेगा तथा देह के कद में वृद्धि रहेगी तथा समाज में अपना व्यक्तित्व-बड़प्पन रखेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में माता एवं भूमि के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये माता की सुख शक्ति का गौरव पायेगा और भूमि-मकानादि की प्रतिभा शक्ति का आनन्द रहेगा और आठवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में शक्ति और लाभ रहेगा तथा विद्या स्थान में वृद्धि तथा शक्ति एवं सुख और लाभ पायेगा तथा दिमाग के अन्दर हुकुमत का प्रभाव रहेगा।

यदि वृश्चिक का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी से सम्बन्ध में बड़ी भारी शक्ति का मार्ग प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की शक्ति का लाभ और सुख विशेष पायेगा तथा माता की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा लाभ प्राप्ति के

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मकर लग्न का फलादेश

मकर लग्न में १ बुध

शक्ति के योग से प्रभाव पायेगा तथा अनेक प्रकार झंझट और परेशानियों से बचाव पाने के लिए भाग्य का सुन्दर सहयोग स्वतः रहेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारणों से देह में कुछ रोग रहेगा तथा भाग्योन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेंगी और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में शक्ति रहेगी।

नं. १००९

मकर लग्न में २ बुध

यदि कुम्भ का बुध- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की कुम्भ राशि पर बैठा है तो भाग्य और परिश्रम के योग से विशेष शक्ति के द्वारा धन की खूब वृद्धि करेगा तथा कुटुम्ब की योगशक्ति का फायदा उठावेगा और धनवान एवं भाग्यवान समझा जायेगा और इज्जत तथा मान प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में स्वार्थ युक्ति से सफलता प्राप्त करेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से कभी-कभी धन और भाग्य में कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और दिनचर्या में प्रभाव रहेगा।

नं. १०१०

मकर लग्न में ३ बुध

यदि मीन का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन के पक्ष में सुख की कमी रहेगी और पुरुषार्थ स्थान में बल बुद्धि की कुछ कमजोरी रहेगी तथा शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में कुछ-कुछ कमजोरी रहेगी। कुछ कमजोरी युक्त वातावरण के द्वारा भाग्य की शक्ति से सहारा प्राप्त करेगा और कुछ झगड़े-झंझटों के पक्ष से परेशानी एवं कुछ दिक्कतें रहेंगी और सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ और विवेक शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का यथाशक्ति पालन करने की चेष्टा रखेगा तथा कुछ भगव

नं. १०११

यदि मेष का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो माता की शक्ति का सौभाग्य प्राप्त करेगा तथा

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मकर लग्न में ४ बुध

भूमि-मकानादि की सुख शाक्ति प्राप्त रहेगी और भाग्य की शक्ति और विवेक के द्वारा अनेक प्रकार के सुख प्राप्त करेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण घरेलू वातावरण और सुख शान्ति के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतें एवं रुकावटें मिलेंगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति का लाभ पायेगा तथा राजसमाज में मान पायेगा और शत्रु पक्ष में भाग्य से सफलता पायेगा।

नं. १०१२

मकर लग्न में ५ बुध

यदि वृषभ का बुध- पांचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में विवेक शक्ति और परिश्रम तथा भाग्य के योग से बहुत भारी सफलता प्राप्त करेगा और कुछ थोड़ी-सी परेशानी के साथ सन्तान पक्ष में उत्तम शक्ति पायेगा तथा बुद्धि विद्या के योग से भाग्य की उत्क्रति करेगा तथा कुछ चतुराई के साथ धर्म का पालन करेगा तथा शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में उत्तम विवेक शक्ति के द्वारा सफलता

नं. १०१३

और यश पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और विवेक शक्ति के द्वारा आमदनी की अच्छी सफलता रहेगी।

मकर लग्न में ६ बुध

यदि मिथुन का बुध- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु स्थान में भाग्य की शक्ति से एवं विवेक शक्ति से बड़ी सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु भाग्य की उत्क्रति के मार्ग में बड़ी दिक्कतें एवं कुछ झगड़े-झंझटें रहेंगी ओर धर्म के मार्ग में कुछ गड़बड़ी रहेगी। किन्तु कुछ रोगादिक झंझटों के मार्ग में दया, धर्म व परमार्थ रहेगा और प्रभाव की वृृद्धि करने के सम्बन्ध

नं. १०१४

में भाग्य की कुछ लाभ-हानि का योग बनेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्यानों में अच्छा सम्बन्ध बनेगा।

यदि कर्क का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र

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मकर लग्न का फलादेश

चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति एवं विवेक युक्त परिश्रम के द्वारा रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री पक्ष में कुछ थोड़ी-सी झंझट और भाग्य की वृद्धि के कारण सुन्दरता पायेगा और धर्म का सामान्यतम पालन करेगा तथा शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में कुछ दैनिक कार्य की कुशलता और भाग्य की शक्ति से सफलता पायेगा और षष्ठेश होने के कारण कुछ दिक्कतों के योग से भाग्य वृद्धि के साधन पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए देह में मान और प्रभाव तथा कुछ रोग पायेगा।

मकर लग्न में ७ बुध

नं. १०१५

यदि सिंह की बुध- आठवीं आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो आयु की वृद्धि रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें रहेंगी और सुयश की विशेष कमी प्राप्त रहेगी और षष्ठेश होने के दोष के कारण शत्रु पक्ष की तरफ से या कुछ रोग की तरफ से जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति रहेगी एवं कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग से भाग्य स्थान में थोड़ी परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुंब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और कुछ झंझटों के योग से धन की वृद्धि रहेगी तथा कुटुम्ब स्थान में शक्ति मिलेगी तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा।

मकर लग्न में ८ बुध

नं. १०१६

यदि कन्या का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री एवं उच्च का होकर बैठा है तो भाग्य की महान उन्नति करेगा तथा बाहरी धर्म के दिखावे का विशेष पालन करेगा और विवेक शक्ति की पेचिदी चाल से उत्तम रूप के द्वारा भाग्य की सफलता और शत्रु पर विजय प्राप्त करेगा तथा वह बड़ा भारी भाग्यवान समझा जायेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से लाभ पायेगा सातवीं नीच दृष्टि के द्वारा भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख में विरोध या कमी पायेगा और भागय शक्ति

मकर लग्न में ९ बुध

नं. १०१७

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५१८

भृगु संहिता

के मुकाबले में पुरुषार्थ के महत्व को छोटा समझेगा तथा पराक्रम में कुछ दुर्बलता रहेगी।

मकर लग्न में १० बुध

यदि तुला का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर पिता स्थान की शक्ति पर बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का अच्छा फायदा उठावेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा एवं उन्नति का प्रभाव योग प्राप्त करेगा और भाग्य तथा परिश्रम की शक्ति से कारबार में बड़ी सफलता मिलेगी और बड़ा भाग्यवान् माना जायेगा तथा शत्रु पक्ष के मार्ग में भाग्य और विवेक शक्ति के ऊँचे कर्मबल से स्वतः सफलता प्राप्त रहेगी और सातवें मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि की शक्ति का लाभ पायेगा तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से उन्नति के मार्गों में कुछ दिक्कतें रहेंगी।

नं. १०१८

मकर लग्न में ११ बुध

यदि वृश्चिक का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष के मार्ग में भाग्य के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा और कुछ परिश्रम तथा विवेक शक्ति एवं भाग्य के योग से आमदनी के अन्दर उत्तम शक्ति का योग लाभ प्राप्त करेगा और लाभ के मार्ग से बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा तथा धर्म के मार्ग में कुछ स्वार्थयुक्त धर्म का पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के अन्दर विवेक शक्ति के द्वारा बड़ी सफलता पायेगा और सन्तान पक्ष में सफलता मिलेगी, किन्तु षष्ठेश होने के कारण कुछ परेशानी रहेगी।

नं. १०१९

मकर लग्न में १२ बुध

यदि धन का बुध- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्च प्रभाव युक्त अच्छा रहेगा तथा बाहरी स्थानों में परिश्रमी विवेक की शक्ति और भाग्यबल से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु भाग्य की उन्नति के मार्ग में परेशानियाँ और कमजोरी रहेगी तथा देर-अबेर और दिक्कतों के साथ भाग्य की शक्ति को प्राप्त करेगा तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से

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कुछ दानाई और नम्र रीति से काम करेगा तथा नवमी दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ कमजोरी पायेगा, राज–समाज में कुछ मान पायेगा तथा कारबार में कुछ शक्ति रहेगी।

मकर लग्न में ३ गुरु यदि मीन का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाई-बहन की शक्ति एवं पुरुषार्थ शक्ति उत्तम रूप से प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम रूप से सम्बन्ध पायेगा और पाँचर्वी उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दरता युक्त शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ उतार-चढ़ाव रहेगा और धर्म का थोड़ा पालन करेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से आमद के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ की शक्ति अच्छी रहेगी।

नं. १०२३

मकर लग्न में ४ गुरु यदि मेष का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष के कारण से माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रखेगा और भूमि-मकानादि की शक्ति में कुछ कमजोरी रहेगी तथा भाई-बहन के सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति रहेगी और पराक्रम शक्ति का कुछ सुख रहेगा और पाँचर्वी मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में कुछ शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व शक्ति में कुछ उन्नति और अवनति के कारण प्राप्त रहेंगे और सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति रहेगी और राज–समाज में कुछ शक्ति रहेगी और नवमी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक चलता रहेगा और बाहरी स्थानों की शक्ति का लाभ घर बैठे सुख पूर्वक प्राप्त होता रहेगा।

यदि वृषभ का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में शक्ति मिलेगी,

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मकर लग्न का फलादेश

किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारणों से विद्या में कुछ कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ हानि लाभ का मिश्रित योग प्राप्त करेगा तथा बुद्धि योग द्वारा खर्च की शक्ति का संचालन करेगा तथा बाहरी स्थान-सम्बन्धों का अच्छा ज्ञान रहेगा और भाई-बहिन की साधारण शक्ति रहेगी तथा पुरुषार्थ कर्म की सफलता को बुद्धि योग द्वारा पायेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है,

इसलिये भाग्य की कुछ वृद्धि रहेगा तथा धर्म का थोड़ा पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा आमदनी की वृद्धि करेगा और नवमी नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य के अन्दर कमी एवं कुछ परेशानी के कारण प्राप्त करेगा।

नं. १०२५

यदि मिथुन का गुरु- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पराक्रम और खर्च की शक्ति से शत्रु पक्ष में प्रभाव रख सकेगा और भाई-बहिन के पक्ष में कुछ विरोध एवं कुछ कमी के कारण पायेगा तथा पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी या कुछ परतन्त्रता का योग बनेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ थोड़ी शक्ति और हिम्मत पायेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान की सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है,

इसलिये पिता स्थान में कुछ शक्ति और हानि प्राप्त रहेगी तथा राज-समाज में कुछ कमी और कुछ मान पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों की कुछ सम्बन्ध शक्ति पायेगा और नवमी शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की और कुटुम्ब की वृद्धि करने का बड़ा प्रयत्न करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से धन और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कमी और कुछ पायेगा।

नं. १०२६

यदि कर्क का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर उच्च का होकर बैठा है तो स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति और सुन्दरता पायेगा और रोजगार के मार्ग में अच्छी सफलता शक्ति रहेगी,

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मकर लग्न का फलादेश

पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का कुछ सहारा प्राप्त करेगा और पराक्रम की सफलता शक्ति पायेगा अर्थात् पराक्रम के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा और कुछ भाग्यवान् समझा जायेगा तथा नवमी सामान्य शत्रु दृष्टि से विद्या तथा सन्तान स्थान को शुभ की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या तथा बुद्धि एवं सन्तान पक्ष से कुछ भाग्योदय का साधन प्राप्त करेगा और सज्जनता धारण करेगा।

नं. १०२९

और सज्जनता धारण करेगा।

मकर लग्न में १० गुरु

यदि तुला का गुरु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष कारण से पिता पक्ष में कुछ कमी रहेगी और कारबार में कुछ असफलता मिलेगी तथा राज-समाज के मार्ग में थोड़ा मान प्राप्त रहेगा और भाई-बहिन की कुछ शक्ति मिलेगी तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा कुछ शक्ति और कुछ प्रभाव पायेगा और खर्च का कार्य बड़ी शानदारी से करेगा।

तथा बाहरी स्थानों से अच्छा सम्बन्ध पायेगा और पाँचवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में वृद्धि का प्रयत्न करने पर भी कुछ कमी और असंतोष प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में भी कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कुछ त्रुटियुक्त शक्ति पायेगा और भूमि और मकानादि के पक्ष में खर्च की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा और नवमीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी दानाई के रूप से शत्रु पक्ष में प्रभाव पायेगा।

नं. १०३०

यदि वृश्चिक का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में प्राप्त सभी ग्रह लाभदायक होते हैं, इसलिये आमदनी के मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से स्थानीय आमदनी में कुछ त्रुटि रहेगी और बाहरी सम्बन्धों से उत्तम लाभ की योग प्राप्त करेगा तथा खर्चा भी शानदार रहेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में को देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के कारण थोड़ी त्रुटि सहित भाई-बहिन की शक्ति पायेगा और पुरुषार्थ कर्म की सफलता शक्ति पायेगा तथा

मकर लग्न में ९ गुरु

मकर लग्न में १० गुरु

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मकर लग्न में ४ शुक्र

नं. १०३६

पिता एवं राज्य-स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है; इसलिये पिता की शक्ति का सुख प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और विद्या की शक्ति और चतुराई के कर्म से उन्नति करेगा और संतान पक्ष की सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण में सुख और वैभव पायेगा और नीति एवं शान्ति युक्त योग्यता की बातों से प्रभाव पायेगा। यदि वृषभ का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो विद्या की महान शक्ति प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में महानता पायेगा तथा बुद्धि और वाणी की शक्ति एवं चतुराई के योग से उन्नति और मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और पिता की शक्ति का योग लाभ पायेगा तथा राज समाज में मान पायेगा और हुकूमत या कानून की दृष्टि से बातें करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के कर्म योग से आमदनी की शक्ति का सुन्दर लाभ पायेगा तथा उन्नति के लिये बड़ा विचार युक्त रहेगा।

मकर लग्न में ५ शुक्र

नं. १०३७

मकर लग्न में ६ शुक्र

नं. १०३८

यदि मिथुन का शुक्र- छठे शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता के पक्ष से कुछ मतभेद युक्त शक्ति रहेगी तथा संतान पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी तथा विद्या की शक्ति में कुछ कमी रहेगी और उन्नति प्राप्त करने के लिए बड़ी भारी पेचीदी चतुराईयों के योग से तथा परिश्रम से काम रखेगा और राज-समाज में मान सम्मान की कुछ कमी रहेगी तथा गहरी चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में प्रभाव कायम रखेगा तथा दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध सामान्य तथा ठीक रहेगा। यदि कर्क का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दरता, योग्यता और शक्ति पायेगा तथा रोजगार-व्यापार के मार्ग में बुद्धि की महान चतुराई

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मकर लग्न का फलादेश

और बड़ी भारी कार्य कुशलता क योग से विशेष सफलता प्राप्त करेगा और पिता स्थान की शक्ति का सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा विद्या की योग्यत्ता शक्ति से गृहस्थ का उत्तम आनन्द पायेगा और संतान पक्ष में सहायक सुख शक्ति पायेगा तथा संतती मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है; इसलिये देह में सुन्दरता और ज्ञान पायेगा तथा राज-समाज के पक्ष से इज्जत और उन्नति एवं गौरव पायेगा।

मकर लग्न में ७ शुक्र

नं. १०३९

मकर लग्न में ८ शुक्र

नं. १०४०

यदि सिंक का शुक्र- मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का कष्टप्रद योग पायेगा और संतान पक्ष से भी दुःख अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान की कुछ कमजोरी रहेगी और राज-समाज में मान प्रतिष्ठा की कमी होगी तथा कारबार के लिये विदेश का योग रहेगा और आयु के पक्ष में शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा तथा गूढ़ युक्तियों के बल और परिश्रम से उन्नति का मार्ग बनायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की कुछ वृद्धि कर सकेगा और कुटुम्ब की शक्ति का योग प्राप्त करेगा।

मकर लग्न में ९ शुक्र

नं. १०४१

यदि कन्या का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी तथा धर्म का पालन ठीक रूप से नहीं हो सकेगा और पिता की तरफ से अधूरा सुख रहेगा तथा विद्या के पक्ष में थोड़ी कमी के साथ चतुराई द्वारा सफलता रहेगी और संतान पक्ष में कुछ दुःख-सुख के योग से शक्ति मिलेगी तथा राज-समाज में सामान्य रूप से ज्ञान प्राप्त होगा और कारबार के पक्ष में कुछ कमजोरी के साथ सहारा मिलेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की विशेष शक्ति रहेगी और पुरुषार्थ कर्म एवं हिम्मत की शक्ति से सफलता पायेगा।

यदि तुला का शुक्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी

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मकर लग्न में ३ शनि

यदि मीन का शनि- तीसरे पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष में कुछ परेशानी और शक्ति रहेगी और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये देह और बाहुबल की शक्ति में वृद्धि रहेगी तथा हिम्मत के द्वारा बहुत कार्य करेगा और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा धन की शक्ति पायेगा और कुटुम्ब की शक्ति रहेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान की शक्ति मिलेगी और विद्या स्थान में बहुत उन्नति एवं सफलता पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्मस्थान को सुख की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म के पालन का ध्यान रखेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत करेगा तथा खर्चे के मार्ग में एवं बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी के समय शक्ति पायेगा और बाहर के स्थानों में कुछ हानि-लाभ का बोझ प्राप्त करेगा।

नं. १०४७

मकर लग्न में ४ शनि

यदि मेष का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता के पक्ष में कुछ त्रुटि रहेगी और भूमि-मकानादि के कुछ सम्बन्धों में कुछ कमी अनुभव होगी तथा देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य में कुछ न्यूनता रहेगी और सम्पत्ति की कुछ कमी के कारण से परेशानी होगी तथा कुटुम्ब के सुख में कुछ कमी रहेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा और झगड़े-झंझटों में लाभ रहेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की मान प्रतिष्ठा रहेगी तथा दसवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ सुन्दरता रहेगी तथा आत्मबल के योग पायेगा और धन के पक्ष में शक्ति संग्रह करने का बड़ा भारी ध्यान रखेगा।

नं. १०४८

यदि वृषभ का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में बड़ी शक्ति रहेगी और बुद्धि तथा वाणी के द्वारा बड़ी कीमती बातें कहेगा तथा सन्तान पक्ष में विशेष

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मकर लग्न का फलादेश

मकर लग्न में ५ शनि

शक्ति पायेगा और देह के अन्दर सुन्दरता और योग्यता को प्राप्त करेगा तथा स्वाभिमानी विचारवान् तथा स्थाई युक्त रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान जो चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता युक्त भावना होते हुए भी विशेष आकर्षित रहेगा और राजगार के मार्ग में कुछ त्रुटियुक्त शक्ति रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से आमद के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के पक्ष में कुछ परेशानी का अनुभव करके लाभ पायेगा और दसवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए बुद्धियोग द्वारा धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब एवं सन्तान पक्ष से लाभयुक्त रहेगा तथा धन-जन की उन्नति के कारण से मान प्रभाव और इज्जत पायेगा।

नं. १०४९

मकर लग्न में ६ शनि

यदि मिशुन का शनि- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के पक्ष में कुछ स्वास्थ्य और सुन्दरता की थोड़ी कमी रहेगी और धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी रहेगी और कुटुम्ब की शक्ति में कुछ विरोध रहेगा तथा देह से कुछ परिश्रम करना पड़ेगा किन्तु छठे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये देह के कार्य से प्रभाव की शक्ति और इज्जत प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय और सफलता पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में कुछ नीरसता रहेगी और पुरातत्व का थोड़ा लाभ रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के पक्ष में कुछ थोड़ी सी परेशानी से अधिक खर्च होगा तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध रखेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता या कुछ कमी रहेगी और पुरुषार्थ के पक्ष में विशेष उद्योगी बनेगा।

नं. १०५०

यदि कर्क का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो कुछ मतभेद के सहित स्त्री पक्ष में आत्मीयता एवं शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में कुछ परिश्रम के सहित उन्नति पायेगा और धन पैदा करेगा तथा कुटुम्ब के सम्बन्ध में कुछ शक्ति

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मकर लग्न में ७ शनि मिलेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा और धर्म का कुछ ध्यान रखेगा तथा सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और स्वाभिमान प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्ध से तथा रोजगार के पक्ष से मान-सम्मान और प्रभाव इत्यादि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा दसवीं नीच दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों की हानि और कमी रहेगी तथा भूमि मकानादि की शक्ति में बड़ी कमजोरी रहेगी और मातृ-भूमि में कुछ अशान्ति रहेगी।

नं. १०५१

मकर लग्न में ८ शनि यदि सिंह का शनि- आठवें मृत्यु एवं आयु स्थान में तथा पुरातत्व स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में बड़ी परेशानी रहेगी ओर सुन्दरता तथा स्वास्थ्य में कमजोरी रहेगी और जन-धन के सम्बन्धों से भी परेशानी बनेगी। किन्तु आठवें स्थान पर शनि आयु की वृद्धि का द्योतक है, इसलिये आयु में शक्ति प्राप्त होगी और पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ मिलेगा तथा तीसरी उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष में शक्ति मिलेगी तथा राज-सम्मान में कुछ मान प्राप्त करेगा और उन्नति पाने के लिये विशेष कर्म करेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन और कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की शक्ति का कुछ सहयोग पायेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिए विद्या एवं सन्तान पक्ष में शक्ति रहेगी और बुद्धि में तेज़ी रहेगी।

यदि कन्या का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उत्तम शक्ति मिलेगी और भाग्य की शक्ति एवं देह के कर्म से धन की विशेष शक्ति प्राप्ति होगी तथा देह में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर योग पायेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ी-सी परेशानी से आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति मिलेगी तथा

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मकर लग्न का फलादेश

५३३

मकर लग्न में ९ शनि

नं. १०५३

अधिक नफा खायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बन्धु के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम स्थान में शक्ति तथा हिम्मत रखेगा और भाग्य तथा पुरुषार्थ दोनों को ही बड़ा मानेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में धन और जन की शक्ति से प्रभाव और लाभ पायेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी सावधानी के साथ सफलता प्राप्त करेगा।

मकर लग्न में १० शनि

नं. १०५४

यदि तुला का शनि- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह में सुन्दरता एवं प्रभाव की विशेष शक्ति पायेगा और राज-समाज के अन्दर उत्तम कर्म के द्वारा बड़ा मान-सम्मान प्राप्त करेगा और धन की उत्तम शक्ति पायेगा तथा कुटुम्ब का विशेष योग प्राप्त करेगा और किसी बड़े कारबार के द्वारा उन्नति का योग बनेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से माता एवं भूमि और भूमि के सुख सम्बन्धों में कमी रहेगी और घरेलू वातावरण में कुछ अशान्ति रहेगी तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष के सुख में कुछ कमी युक्त सहयोग रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ थोड़ी परेशानी के द्वारा शक्ति रहेगी।

मकर लग्न में ११ शनि

नं. १०५५

यदि वृश्चिक का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर कू्र ग्रह तथा गरम ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा तथा बहुत धन प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की सहायता प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से देह स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और आत्मबल पायेगा और नाम तथा इज्जत प्राप्त करेगा तथा धन संचय का सदैव ध्यान रखेगा

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मकर लग्न का फलादेश

और बड़ा सावधान रहेगा।

यदि कुम्भ का राहु-दूसरे धन भवन में एक कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो धन के स्थान में कुछ चिन्तायें प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कष्ट और कमी रहेगी तथा गुप्त युक्ति के बल से धन की वृद्धि का कारण बनता रहेगा किन्तु मजबूत स्थिर ग्रह की राशि पर बैठा है, इसलिये आन्तरिक धैर्य की शक्ति तथा मजबूत विचारों से धन की प्राप्ति करेगा और कभी-कभी धन के मार्ग में कर्जा लेकर भी काम करेगा और धन के पक्ष में प्रकट रूप से इज्जत प्राप्त करेगा किन्तु आन्तरिक रूप में धन की तरफ से कुछ कष्ट रहेगा और अन्त में धन की तरफ से मजबूती पायेगा।

नं. १०५८

मकर लग्न में ३ राहु

यदि मीन का राहु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये पराक्रम स्थान की शक्ति में वृद्धि करेगा तथा बड़ी जबरदस्त हिम्मत की शक्ति से काम करेगा। किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कष्ट और चिन्ता के कारण प्राप्त करेगा तथा आचार्य देवगुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये गहरी और गुप्त युक्तियों के बड़े आदेश मार्ग से उठकर शक्ति सञ्चित करेगा तथा प्रभाव पायेगा। किन्तु अन्दरूनी तौर से हिम्मत शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी मानेगा और प्रकट में विजयी रहेगी।

नं. १०५९

मकर लग्न में ४ राहु

यदि मेष का राहु- चाथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में बड़ी परेशानी एवं कष्ट का कारण प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि की शक्ति में सुख की कमी रहेगी और घरेलू वातावरण के अन्दर कभी-कभी अशान्ति के कारण प्राप्त होते रहेंगे एवं मातृ भूमि के स्थान से प्राप्त अलहदा रहने के योग पायेगा और गुप्त युक्तियों के मार्ग से अन्त में बड़ी मजबूती के साथ सुख के साधन प्राप्त करेगा और हिम्मत रखेगा।

नं. १०६०

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मकर लग्न में ५ राहु यदि वृषभ का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा तथा विद्या ग्रहण करने के सम्बन्ध में कुछ परेशानी रहेगी किन्तु महान् चतुर ग्रह आचार्य शुक्र की राशि बैठा है, इसलिए विद्या बुद्धि के अन्दर चतुराई के विशेष कारण रहेंगे और गुप्त युक्तियों की गहराई के द्वारा बातें करके दिमागी शक्ति का प्रभाव रखेगा विशेष परेशानी के कारण पायेगा और अन्त में सन्तान पक्ष और विद्या के पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. १०६१

मकर लग्न में ६ राहु यदि मिथुन का राहु- छठे शत्रु स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैंठा है तो शत्रु स्थान में बड़ा जबरदस्त प्रभाव रखेगा और बड़ी से बड़ी दिक्कतों एवं झंझटों के मार्ग में बड़ी दिलेरी के साथ कामयाबी प्राप्त करेगा, क्योंकि छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये गुप्त युक्ति के गहरे बल से बड़ी भारी विजय और ऊँची सफलता प्राप्त करेगा और बड़ा भारी कूटनीतिज्ञ व बहादुर बनेगा तथा रोगादिक बीमारियों के पक्ष में प्रायः मुक्त रहेगा और परम विवेकी बुध की राशि पर बैठा है, इसलिए हमेशा गहरे विवेक की शक्ति से काम लेगा।

नं. १०६२

मकर लग्न में ७ राहु यदि कर्क का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में महान् कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में विशेष कठिनाईयाँ रहेंगी तथा गृहस्थ के संचालन मार्ग में चिन्ताओं से टकराना पड़ेगा तथा कभी मूत्रेन्द्रिय की बीमारी का योग बनेगा और चन्द्रमा मन का स्वामी है, इसलिये रोजगार और स्त्री के पक्ष में मनोयोग को गुप्त युक्तियों के बल से अपने कार्य को सफलता बनायेगा, किन्तु कुछ मानसिक दुःख रहेगा।

नं. १०६३

यदि सिंह का राहु- आठवें आयु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो आयु के सम्बन्ध में बड़ी-बड़ी जबरदस्त चिन्ताओं से टकराना पड़ेगा तथा कभी-कभी जीवन रक्षा के लाले पड़

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मकर लग्न का फलादेश

मकर लग्न में २ केतु राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कमजोरी रहेगी तथा धन के पक्ष से कष्ट के कारण प्राप्त होंगे और धन की शक्ति पाने के लिए बड़ा कठिन कर्म करेगा और गुप्त शक्ति का प्रयोग करने से सफलता पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण, धन के पक्ष से कभी-कभी महान् संकट का गुप्त अनुभव करेगा, किन्तु स्थिर ग्रह शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी हिम्मत शक्ति से धन के पक्ष की पूर्ति करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कभी कमी और कष्ट के कारण प्राप्त होते रहेंगे, किन्तु सदैव महान् साहस से शक्ति पायेगा।

नं. १०७०

यदि मीन का केतु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह का बैठना विशेष शक्ति का सूचक होता है, इसलिये महान् कठिन परिश्रम और गुप्त युक्ति के बल से पुरुषार्थ स्थान को वृद्धि एवं शक्ति प्राप्त करेगा और जबरदस्त हिम्मत से काम करके विजय पायेगा; किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण भाई-बहिन के स्थान में हानि और परेशानी के कारण प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी भाई-बहिन के पक्ष से या हिम्मत शक्ति के पक्ष से विशेष कष्ट या निराशा का योग गुप्त रूप से अनुभव करेगा प्रकट में धैर्य रहेगा।

नं. १०७१

यदि मेष का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में कष्ट और कमी के कारण प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि से सुख-सम्बन्धों में कमी और परेशानियों के योग प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण में कुछ अशान्ति रहेगी और भूमि से या जन्म स्थान से अलहदगी का योग प्राप्त रहेगा और गरम ग्रह मंगल की राशि पर गरम ग्रह केतु बैठा है, इसलिये सुख के साधनों को पाने के लिये कठिन कर्म करेगा तथा गुप्त शक्ति के बल से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण स्थान परिवर्तन करना पड़ेगा।

नं. १०७२

यदि वृषभ का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष में कष्ट का योग पायेगा तथा

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मकर लग्न का फलादेश

मकर लग्न में ८ केतु

यदि केतु अष्टम स्थान अर्थात आयु के स्थान में महान संकट का योग प्राप्त करेगा अर्थात जीवन की रक्षा पाने के लिये अनेकों बार दुर्घटनायें प्राप्त होंगी और जीवन निर्वाह करने के लिये भी जीविका के मार्ग में बड़े कष्ट या परेशानियाँ बनेंगी और पुरातत्व की संचित शक्ति की हानि या अभाव रहेगा और उदर या पेट के निचले हिस्से में कुछ बीमारी रहेगी, किन्तु शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है, इसलिये गुप्त में चिन्ता और प्रकट में प्रभाव गुप्त शक्ति और कठिन परिश्रम से काम करेगा।

नं. १०७६

मकर लग्न में ९ केतु

यदि कन्या का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर स्वक्षेत्र के समान बैठा है तो केतु के स्वाभाविक गुण के कारण भाग्य स्थान में परेशानियाँ रहेंगी किन्तु कन्या का राहु या केतु बलवान होता है इसलिये भाग्य के प्रकट रूप में शक्ति और सुन्दरता रहेगी तथा धर्म के पालन करने का ढंग रहेगा, किन्तु फिर भी कभी भाग्य के स्थान में विशेष संकट का योग प्राप्त करेगा, परन्तु विवेकी बुध के कठिन कर्म के द्वारा और गुप्त शक्ति के बल से सफलता शक्ति पायेगा और प्रकट में यश मिलेगा।

नं. १०७७

मकर लग्न में १० केतु

यदि तुला का केतु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में कष्ट और कमी के कारण प्राप्त होंगे तथा राज-समाज के पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी और कार्य-व्यापार की उन्नति के मार्ग में बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी तथा कभी-कभी इज्जत-आबरू की रक्षा करने के लिये बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये उन्नति प्राप्त करने के लिये तथा मान पाने के लिये बड़ी भारी गुप्त चतुराई की शक्ति के द्वारा कठिन परिश्रम करके सफलता पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण उन्नति के मार्ग में बड़े-बड़े परिवर्तन करने पड़ेंगे।

नं. १०७८

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मकर लग्न में ११ केतु

यदि वृश्चिक का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आमदनी के स्थान में कूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और अधिक से अधिक लाभ पाने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर गरम ग्रह केतु बैठा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कठिन परिश्रम और गुप्त शक्ति के योग से काम लेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण आमदनी के मार्ग में कभी-कभी चिन्ता और कष्ट के साधन पायेगा, किन्तु बहुत शीघ्र सफलता शक्ति को प्राप्त करेगा, परन्तु गुप्त रूप से कुछ कमी अनुभव करेगा।

नं. १०७९

मकर लग्न में १२ केतु

यदि धन का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्च बहुत अधिक तादाद में करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष शक्ति पायेगा तथा खर्च की बहुतायत के प्रवाह को रोक नहीं सकेगा; बल्कि खर्च अधिक मात्रा में चालू रखने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा और गुप्त शक्ति के महान् प्रयोग से खर्च संचालन करने की महान् शक्ति प्राप्त करेगा और केतु के स्वाभाविक गुण के कारण खर्च के मार्ग में अथवा बाहरी सम्बन्धों के मार्ग में कोई विशेष परेशानी की योग प्राप्त करेगा; किन्तु विशेष सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी।

नं. १०८०

|| मकर लग्न समाप्त ||

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कुम्भ लग्न का फलादेश प्रारम्भ

नवग्रहों द्वारा भाग्य फल

(कुण्डली नं० ११८८ तक में देखिये)

प्रिय पाठकगण- ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारो करने के लिये प्रथेम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० १०८१ से लेकर कुण्डली नं० ११८८ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले

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कुण्डली नं. १०९० के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०९१ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०९२ के अनुसार मालूम करिये।

(११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०९३ से ११०४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये।

११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९३ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९४ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९५ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९६ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९७ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९८ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९९ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ११०० के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११०१ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ११०२ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ११०३ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ११०४ के अनुसार मालूम करिये।

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११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११७ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११८ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११९ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२० के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२१ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२२ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२३ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२४ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२५ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२६ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२७ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२८ के अनुसार मालूम करिये।

(११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुपफल

आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नंब ११२९ से ११४० तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११२९ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३० के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३१ के अनुसार मालूम करिये।

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२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३२ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३३ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३४ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३५ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३६ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३७ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३८ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३९ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९४० के अनुसार मालूम करिये।

( ११ ) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल

आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १९४१ से १९५२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९४१ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९४२ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९४३ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९४४ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९४५ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश

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७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६१ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६२ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६३ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६४ के अनुसार मालूम करिये।

( ११ ) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल

आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं १९६५ से १९७६तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु के फल निम्न प्रकार से देखिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६५ के अनुसार मालूम करिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६६ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६७ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६८ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६९ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९७० के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९७१ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९७२ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९७३ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९७४ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली

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कुम्भ लग्न का फलादेश

और सातर्वी नीच दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के अन्दर कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और धर्म के पक्ष में कुछ लापरवाही रहेगी और सुयश एवं वरक्कत की कुछ कमी रहेगी।

कुम्भ लग्न में ४ सूर्य

यदि वृषभ का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के सुख स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष का सुख प्राप्त रहेगा और भूमि तथा माता की सहयोग शक्ति मिलेगी। किन्तु माता और स्त्री के पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता का अनुभव रहेगा और रोजगार के मार्ग में थोड़ी परेशानी के साथ-साथ सुख और सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से सफलता शक्ति मिलेगी और राज-समाज के पक्ष में मान-प्रतिष्ठा और प्रभाव रहेगा तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में दैनिक कर्म के योग से लाभ पायेगा।

नं. १०८४

कुम्भ लग्न में ५ सूर्य

यदि मिथुन का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में शक्ति रहेगी और वाणी के अन्दर कुशलता और प्रभाव की शक्ति रहेगी तथा संतान पक्ष में अनुकूल शक्ति का योग प्राप्त करेगा और बुद्धिमती स्त्री का संयog एवं प्रभाव प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बुद्धि विद्या की शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार और बुद्धि के योग से आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी और लाभ प्राप्ति के पक्ष से प्रभाव प्राप्त रहेगा।

नं. १०८५

कुम्भ लग्न में ६ सूर्य

यदि कर्क का सूर्य- छठे शत्रु स्थान में मित्र चन्द्र की कर्क राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से विकास का साधन पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में कुछ परेशानी के योग से सफलता और प्रभाव शक्ति मिलेगी तथा स्त्री के सम्बन्ध में कुछ मतभेद और प्रभाव शक्ति रहेगी तथा प्रभाव के मार्ग से ही रोजगार और गृहस्थ का संचालन करेगा

नं. १०८६

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और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों के पक्ष में कुछ दिक्कतों के योग से प्रभाव और सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

कुम्भ लग्न में ७ सूर्य

यदि सिंह का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में स्वयං अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति मिलेगी और गृहस्थ के संचालन विभाग के अन्दर बड़ा भारी प्रभाव रहेगा तथा ससुराल पक्ष में विशेष शक्ति रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और स्त्री पक्ष के मार्ग में कुछ मतभेद होने के कारण परेशानी का योग अनुभव रहेगा, किन्तु गृहस्थ जीवन और रोजगार के पक्ष से प्रभाव युक्त रहेगा।

नं. १०८७

कुम्भ लग्न में ८ सूर्य

यदि कन्या का सूर्य- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कष्ट एवं परेशानी के कारण प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी-बड़ी कठिनाई और दिक्कतों के योग से कार्य करेगा तथा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से रोजगार की संचालन शक्ति पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा आयु के पक्ष में सुन्दर सहयोग मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के लिए कठिन परिश्रम से धन की वृद्धि करेगा तथा कुटुम्ब का सहयोग मिलेगा।

नं. १०८८

कुम्भ लग्न में ९ सूर्य

यदि तुला का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में नीच का होकर रवि शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो भाग्य के पक्ष में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा स्त्री के सम्बन्ध में कुछ परेशानी रहेगी और रोजगार के मार्ग में बड़ी कमजोरी के साथ कार्य संचालन करेगा और धर्म के पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा कुछ न्याय विरुद्ध रूप से स्वार्थ सिद्ध करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को

नं. १०८९

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कुम्भ लग्न का फलादेश

मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की उन्नति करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति के द्वारा सफलता शक्ति का योग प्राप्त करेगा।

कुम्भ लग्न में १० सूर्य

यदि वृश्चिक का सूर्य- दशम केन्द्र पिता एवं

राजस्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में महान उन्नति और प्रभाव प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति एवं सुन्दरता तथा बड़प्पन प्राप्त करेगा और पिता के सम्बन्ध में सहायता शक्ति रहेगी तथा राज-समाज में मान प्रतिष्ठा बनेगी और प्रभाव शक्ति के द्वारा कारबार की उन्नति करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से माता

नं. १०९०

एवं भूमि के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये गृहस्थ के सम्बन्ध में मातृ सुख के अन्दर कुछ नीरसता रहेगी और भूमि के सुख में कुछ कमी रहेगी।

कुम्भ लग्न में ११ सूर्य

यदि धनु राशि का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता-शक्ति प्राप्त करेगा और ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह विशेष लाभकारी होता है; इसलिये आमदनी के पक्ष में विशेष लाभ पायेगा और अधिक मुनाफा करेगा। स्त्री पक्ष में बहुत लाभ रहेगा और स्त्री के अन्दर सुन्दरता और प्रभाव की शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र बुध की मिथुन

नं. १०९१

राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि में विकास और प्रभाव पायेगा तथा संतान पक्ष में सहायक शक्ति प्राप्त करेगा।

कुम्भ लग्न में १२ सूर्य

यदि मकर का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करना पड़ेगा तथा खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी-सी रहेगी तथा स्त्री के सुख सम्बन्धों में बड़ी भारी कमी और परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में रोजगार की शक्ति मिलेगी

नं. १०९२

किन्तु स्थानीय रोजगार के मार्ग में बड़ी हानि एवं परेशानी रहेगी और गृहस्थ के मार्ग में बड़ी कठिनाई का योग मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु

स्थान को चन्द्रमा की वक्री राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव

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कुम्भ लग्न का फलादेश

है, इसलिये भाग्योन्नति के मार्ग में कुछ झंझटयुक्त कर्म से काम करेगा और धर्म के पक्ष में कुछ कठिन मार्ग का अनुसरण करेगा तथा प्रभाव की वृद्धि प्राप्त करेगा।

कुम्भ लग्न में ४ चन्द्र

यदि वृषभ का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में घर बंट प्रभव को शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े-

नं. १०९६

स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी एवं क्लेश का योग पायेगा और राज-समाज तथा कारबार पक्ष में कुछ झंझट रहेगी।

कुम्भ लग्न में ५ चन्द्र

यदि मिथुन का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो बुद्धि और मनोयोग के द्वारा शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से विद्या ग्रहण करने में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और संतान

नं. १०९७

झंझट युक्त मार्ग के द्वारा आमदनी की वृद्धि करेगा तथा अधिक लाभ पाने के लिये कुछ मनोयोग की पेचीदी तरकीबों से भी सफलता प्रायेगा।

कुम्भ लग्न में ६ चन्द्र

यदि कर्क का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान एवं झंझट स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो मनोयोग की महान शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव एवं विजय प्राप्त करेगा

नं. १०९८

और झगड़े झंझटों के मार्ग में महान धैर्य की शक्ति से काम लेगा तथा नगनल पक्ष में शक्ति रहेगी, किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से मन के अन्दर हमेशा कुछ झगड़े तलक परेशानी की बातें रहेंगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से बाहरी स्थान

Page 562

५५८ भृगु संहिता

को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के संचालन में कुछ दिक्कतों के योग से शक्ति रहेगी और बाहरी स्थानों में कुछ झंझट रहेगी।

कुम्भ लग्न में ७ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा

है तो गृहस्थ एवं रोजगार की व्यावहारिक दिनचर्या के कारण शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से स्त्री पक्ष में कुछ रोग तथा

कुछ झंझट एवं वैमनस्यता युक्त वातावरण के द्वारा शक्ति प्राप्त रहेगी और रोजगार के मार्ग में कुछ मनोयोग की परिश्रम शक्ति के द्वारा तथा

कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा सफलता पायेगा नं. १९०९९ और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा

है, इसलिये देह में कुछ रोग तथा कुछ फिकर और दौड़ धूप का योग रहेगा तथा मन में शक्ति रहेगी।

कुम्भ लग्न में ८ चन्द्र

यदि कन्या का चन्द्र- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्त्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष के मार्ग में बड़ी परेशानी अनुभव करेगा और

प्रभाव के मार्ग में अन्तरूनी कमजोरी रहेगी तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से जीवन की दिनचर्या में मानसिक चिन्ता फिकर रहेगी और आयु के

स्थान में परेशानियाँ प्रीत होंगी तथा पेट के अन्दर कोई बीमारी या शिकायत रहेगी तथा ननसाल पक्ष नं. ११००० कमजोर रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं

कुटुम्ब स्थान को मीन राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन के कठिन परिश्रम से मनोयोग द्वारा धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये बड़ा प्रयत्न करता रहेगा।

कुम्भ लग्न में ९ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य

एवं धर्म स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति और मनोयोग के कारण से शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा

झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ उन्नति पायेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से भाग्य की

उन्नति के मार्ग में कुछ परेशानियाँ या कुछ दिक्कतें रहेंगी और धर्म के पक्ष में कुछ रुकावटें एवं कमजोरी रहेगी और सुयश की कमी रहेगी तथा

सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख नं. १९०१९ रहा है।

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कुम्भ लगन का फलादेश

रहा है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में कुछ झंझट रहेगी और पराक्रम स्थान में मनोयोग की शक्ति से उत्साह प्राप्त करेगा।

कुम्भ लगन में १० चन्द्र

यदि वृश्चिक का चन्द्र- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष की तरफ से मानसिक चिन्तायें और दिक्कतें रहेंगी तथा प्रभाव के पक्ष में कमजोरी रहेगी और षष्ठेश होने के दोष के कारण से पिता के पक्ष में कुछ कमी और वैमनस्यता तथा अशान्ति के कारण प्राप्त होंगे और राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा की कुछ कमजोरी रहेगी तथा उन्नति मार्ग एवं कारबार में रूकावटें और झंझटें रहेंगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि-भवन तथा सुख वातावरण में मनोयोग से सुख प्राप्त करेगा।

नं. ११०२

कुम्भ लगन में ११ चन्द्र

यदि धन का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा और शत्रु एवं झगड़े-झंझटों के मार्ग से लाभ युक्त रहेगा तथा मनोयोग की परिश्रमी शक्ति के द्वारा आमदनी में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और षष्ठेश होने के दोष के कारण से आमदनी के पक्ष में कुछ दौड़ धूप या मानसिक परिश्रम अधिक करना पड़ेगा तथा लाभ की शक्ति में कुछ थोड़ी असन्तोष पानेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये मनोयोग के द्वारा विद्या स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में कुछ फिकरमंदी रहेगी।

नं. ११०३

कुम्भ लगन में १२ चन्द्र

यदि मकर का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष की तरफ से हानि एवं कुछ मानसिक परेशानी रहेगी और प्रभाव की कुछ कमी रहेगी तथा षष्ठेश होने के दोष कारण से खर्च के मार्ग में कुछ दिक्कतें और झंझट रहेंगी तथा मानसिक परिश्रम से खर्च की शक्ति मिलेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और अनेक प्रकार के झंझटों से मन को कष्ट और अशान्ति रहेगी

नं. ११०४

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कुम्भ लग्न का फलादेश

जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा और आठवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, राज्येश ग्रह का भाग्य को देखना उत्तम होता है इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा और धर्म-कर्म का पालन करेगा और बरकत प्राप्त होगी।

कुम्भ लग्न में ३ मंगल

यदि मेष का मंगल- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त रहेगी और पराक्रम स्थान में महान शक्ति मिलेगी तथा मंगल का दशम स्थान पर अधिकार पाना महत्व दायक होता है, इसलिये यह आठवीं दृष्टि से राज्य एवं पिता स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, अतः पिता स्थान की शक्ति का बहुत उन्नति एवं लाभ प्राप्त करेगा और राज-समाज के अन्दर प्रभाव और मान व प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में उन्नति, पुरुषार्थ तथा कर्म की शक्ति से बहुत सफलता पायेगा और चौथी नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ झंझट रहेगी तथा ननसाल पक्ष में कुछ हानि रहेगी और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म-कर्म का पालन करेगा और बड़ा जबरदस्त हिम्मत और कर्म की शक्ति से भाग्यवान बनेगा।

नं. ११०७

कुम्भ लग्न में ४ मंगल

यदि वृषभ का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो कुछ झुटि के सहित माता और भूमि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा भाई बहिन का सुख योग रहेगा और पराक्रम शक्ति से सुख प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण मकानादि में प्रभाव शक्ति रखेगा और चौथी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है इसलिये स्त्रीपक्ष में शक्ति प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में पराक्रम शक्ति के द्वारा सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में राज्य एवं पिता स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति से सुख प्राप्त रेगा कारबार की उन्नति करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कारबार एवं पराक्रम शक्ति के द्वारा आमदनी

नं. ११०८

भृ.सं.-३६

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कुम्भ लग्न का फलादेश

की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी रखते हुए देह में प्रभाव की शक्ति रहेगी और स्वभाव में तेज़ी रहेगी।

कुम्भ लग्न में ७ मंगल

यदि सिंह का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में पुरुषार्थ के उत्तम कर्म के द्वारा बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और भाई-बहिन की शक्ति का सहयोग पायेगा तथा स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति और उन्नति रहेगी और चौथी दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को

स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सहयोग अच्छा रहेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में मान प्रतिष्ठा एवं उन्नति प्राप्त रहेगी तथा कारबार में सफलता और प्रभाव प्राप्त होगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह

की सुन्दरता में कुछ कमी के साथ-साथ प्रभाव और मान प्राप्त होगा और आठवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये व्याहारिक दैनिक कर्म क्षेत्र के द्वारा धर्म की शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सहयोग पायेगा।

कुम्भ लग्न में ८ मंगल

यदि कन्या का मंगल- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में हानि एवं कमी पायेगा और राज-समाज में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा उन्नति के मार्गों में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और मान

प्रतिष्ठा की कुछ कमजोरी रहेगी और भाई-बहिन के स्थान एवं पुरुषार्थ में कुछ कमजोरी रहेगी और दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की

धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करता रहेगा

और कुटुम्ब की शक्ति का सहारा पायेगा तथा आठवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति की वृद्धि करेगा। किन्तु अष्टम में बैठने के दोष

कारण से भाई-बहिन और पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर अधूरा शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा।

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कुम्भ लग्न का फलादेश

प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में अच्छी शक्ति मिलेगी और दसम स्थान पर तो मंगल स्वयमेव ही उत्तम होता है, किन्तु स्वक्षेत्री मंगल का दशम स्थान पर बैठना राजयोग कारक होता है।

कुम्भ लग्न में ११ मंगल

यदि धनु राशि का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह का बैठना अधिक श्रेष्ठ होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और पिता स्थान की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा राज-समाज से लाभ ओर मान पायेगा और उत्तम कारबार एवं पुरुषार्थ कर्म के द्वारा धनलाभ की विशेष शक्ति और अधिक नफा खायेगा और भाई-बहिन की शक्ति

का लाभ प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है; इसलिये धन की संग्रह शक्ति के लिये विशेष प्रयत्न करके सफलता प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान की शक्ति से लाभ पायेगा तथा आठवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है; इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ झंझट रहेगी और ननसाल पक्ष में कमजोरी रहेगी।

कुम्भ लग्न में १२ मंगल

यदि मकर का मंगल- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है, तो खर्च बहुत अधिक तायदाद में करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष शक्ति का सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा पिता के सम्बन्धों में कुछ हानि रहेगी और राज-समाज तथा स्थानीय सम्बन्ध कुछ कमजोर रहेगा और कारबार के पक्ष में अपने

स्थान में हानि तथा दूसरे स्थानों में सफलता पायेगा और चौथी दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है; इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा

है; इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ झंझट रहेगी और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी तथा आठवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है; इसलिये रोजगार के मार्ग बड़ी सफलता शक्ति के द्वारा गृहस्थ के अन्दर शक्ति का संचार रखेगा।

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कुम्भ लग्न का फलादेशकुछ कठिनाईयों के साथ-साथ भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का ध्यान रखेगा तथा बुद्धि के अन्दर विवेक शक्ति की विशेषता के कारण अनेकों कार्यों की पूर्ति तथा पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का बुध- चौथे माता एवं भूमि के कुम्भ लग्न में ४ बुधस्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु की सुख शक्ति और पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा। विद्या बुद्धि की अच्छी योग्यता पायेगा और सन्तान पक्ष में कुछ सुख शक्ति मिलेगी, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से माता के सुख में कुछ कमी रहेगी और भूमि मकानादि के सम्बन्धों में कुछ परेशानी के साथ सुख मिलेगा और सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्ध में कुछ फिकर या परेशानी से काम चलेगा और राजसमाज कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ कठिनाई और विशेष शक्ति के मान और सफलता पायेगा।

नं. १९२०

कुम्भ लग्न में ५ बुधयदि मिथुन का बुध- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो विद्या स्थान में पुरातत्व सम्बन्धित मार्ग की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और बुध के अन्दर विवेक शक्ति की प्रधानता होने के कारण बुद्धि और वाणी के द्वारा प्रभाव शक्ति पायेगा और सन्तान पक्ष में शक्ति मिलेगी, किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से सन्तान पक्ष में कुछ कमी एवं कुछ कष्ट प्राप्त होगा और विद्या बुद्धि के अन्दर कुछ त्रुटि रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि की विवेक शक्ति के द्वारा आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. १९२१

कुम्भ लग्न में ६ बुधयदि कर्क का बुध- छठे शत्रु स्थान एवं झंझट विद्या को ग्रहण करने में बड़ी परेशानियाँ और कमजोरी रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कष्ट और दिक्कतें रहेंगी और जीवन की दिनचर्या में एवं आयु के संबंध में बहुत-सी दिक्कतें रहेंगी और पुरातत्व सम्बन्ध की शक्ति प्राप्त करने में बड़ी कमजोरी रहेगी तथा शत्रु पक्ष की तरफ से कुछ अशांति

नं. १९२२

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४७०

भृगु संहिता

करने के पक्ष में कुछ दिमाग में परेशानी रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ नरमाई और विवेक की शक्ति से सफलता पायेगा तथा अनेकों झंझटों से बचेगा।

धन, कुटुम्ब तथा आमद स्थानपति-गुरु

कुम्भ लग्न में १ गुरु

यदि कुम्भ का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो देह के द्वारा धन और लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा मान और प्रभाव मिलेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सहयोग रहेगा तथा धनवानों में इज्जत रहेगी और बुजुर्गों के ढंग से धन की शक्ति पायेगा तथा धन की प्राप्ति का बड़ा भारी ख्याल और बड़ा भारी प्रयत्न चालू रखेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के मार्ग में बड़ी शक्ति प्राप्त रहेगी तथा सन्तान पक्ष से लाभ प्राप्त करेगा और वाणी के द्वारा सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दर सफलता प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में धनोत्पत्ति के सम्बन्ध में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा नवमी दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति पायेगा तथा धर्म का पालन धन से करेगा।

नं. ११२९

कुम्भ लग्न में २ गुरु

यदि मीन का गुरु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा तथा आमदनी की मोटी शक्ति पायेगा और कुटुम्ब के अन्दर विशेष शक्ति प्राप्त रहेगी तथा धनवान् इज्जतदार समझा जायेगा और धन को जोड़ने के लिये भारी प्रयत्न करेगा तथा पाँचवीं उच्च दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क की राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष से लाभ और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा झंझट और परिश्रम से फायदा उठायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व धन का लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा और नवमी

नं. ११३०

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कुम्भ लग्न का फलादेश

मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से धन की शक्ति प्राप्त रहेगा और राज-समाज में इज्जत और लाभ पायेगा तथा कारबार के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति और उन्नति करेगा।

कुम्भ लग्न में ३ गुरु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पराक्रम स्थान के द्वारा धनलाभ की विशेष शक्ति प्राप्त रहेगी और भाई-बहिन से भी लाभ युक्त सम्बन्ध रहेगा तथा अपने बाहुबल के द्वारा बड़ा भारी कीमती कार्य करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर लाभ प्राप्त करेग तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दरता एवं लाभ योग रहेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति और धन प्राप्त करेगा तथा ससुराल से फायदे उठायेगा और गृहस्थ में अमीरों का ढंग रहेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ी-सी रुकावटों के योग से भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा और धर्म की विशेष छानबीन करेगा तथा नवमी दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ११३१

कुम्भ लग्न में ४ गुरु

यदि वृषभ का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में सामानय शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो भूमि और मकानादि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा धनेश कुछ बन्धन का कार्य भी करता है, इसलिये माता के सुख सम्बन्ध में कुछ त्रुटि करेगा। किन्तु मातृ स्थान की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा अपने स्थान से ही धन की आमदनी का मार्ग सुख पूर्वक प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में वृद्धि पायेगा और पुरातत्व धन का लाभ प्राप्त करेगा और अमीरों के ढंग से जीवन व्यतीत करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि से देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति का लाभ पायेगा और राज-समाज एवं कारबार के पक्ष में उन्नति और सफलता तथा मान प्राप्त करेगा और नवमी नीच दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु शनि की

नं. ११३२

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कुम्भ लग्न का फलादेश

कुटुम्ब स्थान में कुछ शक्ति रहेगी तथा धनवान् समझा जायेगा।

यदि सिंह का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं कुम्भ लग्न में ७ गुरु रोजगार के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में महान् सफलता शक्ति तथा धन और सौन्दर्य प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बहुत धन प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में बड़ा भारी प्रभाव और इज्जत रहेगी तथा धन और कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर सहयोग पायेगा और पाँचवीं दृष्टि से आमदनी के मार्ग को स्वयं अपनी धनु राशि में देख रहा है; इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और कीमती रोजगार करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है; इसलिये देह में मान-सम्मान और प्रभाव रहेगा; किन्तु सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और धनवान् समझा जायेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का लाभ पायेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के मार्ग से बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और उन्नति करेगा तथा धन कमाने के मार्ग में बड़ी भारी हिम्मत शक्ति और योग्यता से काम करेगा।

नं. ११३५

कुम्भ लग्न में ८ गुरु

यदि कन्या का गुरु- आठवें आयु एवं पुरातत्त्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान के मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्त्व धन शक्ति का लाभ पायेगा; किन्तु अष्टम स्थान पर बैठने के दोष के कारण संचित धन की शक्ति में हानि प्राप्त रहेगी तथा कुटुम्ब के स्थान में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त होंगे और आमदनी के मार्ग में दूसरे स्थान का सम्बन्ध और कठिनाइयाँ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से खर्च और बाहरी स्थान को शनि की मकर राशि में शत्रु भाव से देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में तथा बाहरी स्थान के सम्बन्धों में कमी और कष्ट का कारण प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मीन राशि में धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये महान् प्रयत्न करेगा और कुटुम्ब का कुछ सहयोग पायेगा और नवमी दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्नेह में कुछ त्रुटि रहेगी और भूमि मकानादि की कुछ शक्ति प्राप्त रहेगी तथा कुछ घरेलू सुख शक्ति मिलेगी।

नं. ११३६

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कुम्भ लग्न में १ शुक्र

भूमि मकानादि की उत्तम शक्ति पायेगा और माता का उत्तम् आदर्श योग प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन बड़ी चतुराई और योग्यता के साथ करेगा और भाग्य की आदर्श शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ी-सी नीरसता के साथ स्त्री पक्ष में सुख और भाग्यवानी प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में थोड़ी-सी कठिनाई के द्वारा बहुत सफलता पायेगा तथा बड़ी भारी उत्तम चतुराई के द्वारा लोक और परलोक दोनों की अनुकूल शक्ति पायेगा।

नं. ११४१

कुम्भ लग्न में २ शुक्र

यदि मीन का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो धन संग्रह की महान शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का बड़ा वैभव प्राप्त होगा तथा भूमि मकानादि की शक्ति का लाभ पायेगा और भाग्य की शक्ति से धन की विशेष सुख सफलता पायेगा और धन से धर्म का पालन करेगा तथा बड़ा भारी भाग्यशाली समझा जायेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, इसलिये माता के सुख और प्रेम में कुछ त्रुटि युक्त विशेष शक्ति पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और पुरातत्त्व के स्थान में कुछ कमी या कुछ परेशानी रहेगी तथा दिनचर्या में कुछ फिकर रहेगी।

नं. ११४२

कुम्भ लग्न में ३ शुक्र

यदि मेष का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान से सुख सौभाग्य प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा बड़ी भारी सफलता और सुख प्राप्त करेगा तथा माता की शक्ति से सुख मिलेगा और भूमि और मकानादि की सुख शक्ति पायेगा और घरेलू सुख के साधनों को अपनी हिम्मत और चतुराई के द्वारा प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की

नं. ११४३

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कुम्भ लग्न का फलादेश

बड़ी भारी उन्नति करेगा और धर्म का पालन करेगा एवं यश प्राप्त होगा तथा ईश्वर में पूर्ण निष्ठा रखेगा और उत्तम मार्ग का अनुयायी बनेगा तथा पुरुषार्थ कर्म की सफलता शक्ति के द्वारा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और उत्साह युक्त रहेगा।

कुम्भ लग्न में ४ शुक्र

यदि वृषभ का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो माता के सुख की महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा भूमि और मकानादि की श्रेष्ठ सुख शक्ति पायेगा तथा घरेलू सुख की प्राप्ति के उत्तम साधन पायेगा तथा घर के अन्दर श्रेष्ठ धर्म का पालन करेगा और बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और घर बैठे भाग्योदय के साधन प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का फायदा और सुख स्वतः प्राप्त होगा तथा राज-समाज के मार्ग में बड़ी इज्जत और उन्नति रहेगी तथा भाग्य की शक्ति और सुन्दर चतुराई के योग से कारोबार के स्थान में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ११४४

सामान्य शत्रु मंगल की शक्ति का फायदा और सुख स्वतः प्राप्त होगा तथा राज-समाज के मार्ग में बड़ी इज्जत और उन्नति रहेगी तथा भाग्य की शक्ति और सुन्दर चतुराई के योग से कारोबार के स्थान में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

कुम्भ लग्न में ५ शुक्र

यदि मिथुन का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि की महान् सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष से बड़ा सुन्दर सौभाग्य प्राप्त करेगा तथा बुद्धि योग द्वारा उत्तम धर्म का पालन करेगा और भगवान् पर बड़ा भारी भरोसा रखेगा और बुद्धि योग के उत्तम कर्म के द्वारा भाग्य की उन्नति करेगा तथा बहुत गहरी चतुराई से सुयश प्राप्त करेगा तथा माता और भूमि मकानादि की शक्ति पायेगा तथा बुद्धि के अन्दर सत्य, संतोष, शान्ति और सुख की प्राप्ति करेगा तथा सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये सतोगुणी चतुराई के मार्ग से धन लाभ करेगा और भाग्य तथा भगवान् के भरोसे पर अनेक प्रकार के उत्तम पदार्थों के लाभ और सफलता शक्ति पायेगा।

नं. ११४५

मकानादि की शक्ति पायेगा तथा बुद्धि के अन्दर सत्य, संतोष, शान्ति और सुख की प्राप्ति करेगा तथा सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये सतोगुणी चतुराई के मार्ग से धन लाभ करेगा और भाग्य तथा भगवान् के भरोसे पर अनेक प्रकार के उत्तम पदार्थों के लाभ और सफलता शक्ति पायेगा।

यदि कर्क का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति और चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग से भाग्य की वृद्धि पायेगा। माता के सुख सम्बन्धों में कमी और झंझट पायेगा और भूमि

प्र.सं.-३७

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कुम्भ लग्न में ६ शुक्र

नं. ११४६ मकानादि की शक्ति में एवं मातृभूमि के स्थान सम्बन्धों में कमी रहेगी तथा भाग्य के पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और धर्म के यथार्थ पालन में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए भाग्य की शक्ति से खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ सफलता प्राप्त करेगा और चतुराई तथा नरमाई से प्रभाव पायेंगे।

कुम्भ लग्न में ७ शुक्र

नं. ११४७ यदि सिंह का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के साथ सुख और सफलता प्राप्त करेगा तथा रोजगार के पक्ष में कुछ थोड़ा परिश्रम के योग से उन्नति और सुख प्राप्त करेगा तथा माता का सहयोग पायेगा और भूमि और मकानादि के रहने के स्थान में सुख और सुन्दरता रहेगी तथा गृहस्थ के अन्दर बड़ा सुन्दर आमोद-प्रमोद का ढंग रहेगा तथा धर्म का पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर सुन्दरता और सुख-सौभाग्य प्राप्त करेगा और बड़ा सौभाग्यवान् समझा जायेगा और सज्जनता युक्त कर्म के मार्ग से यश प्राप्त करेगा तथा बड़ी कार्यकुशलता पायेगा।

कुम्भ लग्न में ८ शुक्र

नं. ११४८ यदि कन्या का शुक्र- आठवें आय मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य के सम्बन्ध में महान् कमजोरी प्राप्त करेगा तथा धर्म के पक्ष में कुछ अनुचित और कमजोर मार्ग का अनुसरण करेगा तथा माता के सुख में बड़ी भारी कमी रहेगी और भूमि मकानादि के सुख सम्बन्धों में कुछ अशान्ति रहेगी एवं दूसरे स्थान का योग प्राप्त करेगा और आयु तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ शान्ति की वृत्ति रहेगी और पुरातत्व की कुछ कमी रहेगी और सातवीं उच्चदृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा और धन प्राप्त करेगा।

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सफलता पायेगा तथा वाणी में विशेष चतुरता रहेगी। कुम्भ लग्न में १२ शुक्र यदि मकर का शुक्र- बारहवें खर्चे एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष सुख और सफलता शक्ति पायेगा तथा अन्दरूनी तौर से भाग्य के पक्ष में बड़ी कमजोरी मानेगा और धर्म के मार्ग में उसकी पालन करने में कमजोरी रहेगी और सुयश प्राप्ति की कमी रहेगी तथा माता के सुख में कमी और वियोग पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य नं. ११५२ मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की शक्ति और चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में सफलता पायेगा तथा झंझटों से कुछ सुख मिलेगा। देह, खर्च तथा बाहरीस्थानपति-शनि कुम्भ लग्न में १ शनि यदि कुम्भ का शनि- प्रथम केन्द्र, देह के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह स्थान में सुन्दरता एवं सुदौलता पायेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से देह में कुछ कमजोरी रहेगी अथवा कभी-कभी शरीर का संकट प्राप्त होगा और बाहरी स्थानों की स्वतः शक्ति प्राप्त रहेगी तथा आदर मान और ख्याति प्राप्त करेगा और खर्चा शानदार तरीके से चलायेगा और तीसरी नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शत्रु

नं. ११५३ मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बन्धु के स्थान में कुछ परेशानी रहेगी और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी तथा उत्साह और हिम्मत की जगह कुछ लापरवाही तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता अनुभव होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी सी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है; इसलिये पिता के कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज कारबार में कुछ कठिनाई से काम करेगा। यदि मीन का शनि- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो धन की शक्ति प्राप्त करने के लिये महान कठिनकर्म करेगा और कुछ धन-जन की शक्ति पायेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से धन एवं कुटुम्ब स्थान में कमजोरी रहेगी और खर्च को रोकने की चेष्टा करने पर भी खर्चा मजबूरन अधिक हो जायेगा तथा धन का स्थान

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कुम्भ लग्न का फलादेश

कुम्भ लग्न में २ शनि कुछ बन्धन का काम करता है, इसलिये देह के सुख और सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में इज्जत रहेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि का सहयोग प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश के दोष कारण से घरेलू सुख के साधनों में कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसटाई के योग से काम करेगा। किन्तु अधिक मुनाफा और अधिक लाभ को पाने की प्रबल इच्छा रखेगा।

नं. ११५४

कुम्भ लग्न में २ शनि यदि मेष का शनि- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष में कष्ट और कमी के कारण पायेगा तथा पराक्रम शक्ति में कुछ कमजोरी रहेगी और व्ययेश होने से तथा नीच होने से देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कमी रहेगी तथा खर्च और बाहरी सम्बन्ध्यों में कुछ परेशानी करेगा। किन्तु दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्च और बाहरी स्थान के सम्बन्धों में शक्ति प्राप्त करेगा तथा तीसरे स्थान पर कूर ग्रह का बैठना भी शक्ति प्रदायक होता है और तीसरी मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि तथा सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने से कुछ त्रुटि रखेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति पैदा करेगा और बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म के पालन का ध्यान रखेगा और कूर ग्रह का नीच होकर पराक्रम में बैठने से येन-केन प्रकारेण अपनी उन्नति करने में तत्पर रहेगा।

नं. ११५५

यदि वृषभ का शनि- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता और भूमि के स्थान पर अपूर्ण अधिकार प्राप्त करेगा क्योंकि शनि व्ययेश होने के कारण दोषी है, इसलिये अपने स्थान में सुख पूर्वक रहने पर भी घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की कुछ

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कुम्भ लग्न में ४ शनि

कमी रहेगी और घर बैठे खर्च की संचालन शक्ति प्राप्त रहेगी और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध सुखदाता बनेगा। तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से चन्द्रमा की कर्क राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये अपने दैनिक प्रभाव और बाहरी सम्बन्धों के कारण से शत्रु स्थान में प्रभाव और सावधानता प्राप्त करेगा और झंझट तथा परेशानियों से बचाव पा सकेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता से कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज कारबार के मार्ग में कुछ कठिनाई से कामयाबी प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कुंभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और नाम की प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष से देह में कुछ कमजोरी व फिकर रहेगी तथा घर बैठे मान्यता प्राप्त करेगी।

नं. ११५६

पिता से कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज कारबार के मार्ग में कुछ कठिनाई से कामयाबी प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कुभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और नाम की प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष से देह में कुछ कमजोरी व फिकर रहेगी तथा घर बैठे मान्यता प्राप्त करेगी।

कुम्भ लग्न में ५ शनि

यदि मिथुन का शनि- पाँचवें त्रिकोण, विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा तथा बुद्धि योग द्वारा खर्च की संचालन शक्ति प्राप्त करेगा, तथा संतान पक्ष में कुछ शक्ति रहेगी और बुद्धि योग द्वारा बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध एवं मान प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से विद्या में कुछ कमी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ हानि प्राप्त होगी और दिमाग के अन्दर कुछ आत्मबल और कुछ परेशानी पायेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आपदनी के मार्ग में कुछ नीरसटाई से सफलता पायेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्नशील और चिन्तित रहेगा।

नं. ११५७

आत्मबल और कुछ परेशानी पायेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आपदनी के मार्ग में कुछ नीरसटाई से सफलता पायेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्नशील और चिन्तित रहेगा।

यदि कर्क का शनि- छठे शत्रु स्थान में एवं झंझट स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो देह के द्वारा अधिक परिश्रम करके प्रभाव की विशेष वृद्धि करेगा तथा बाहरी स्थानों में सम्बन्ध प्राप्त करके प्रभावशाली तथा परतंत्रतायुक्त कर्म करेगा और व्ययेश होने के दोष कारण से देह में कुछ सुन्दरता की कमी और कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा खर्च के मार्ग

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कुम्भ लग्न का फलादेश

कुम्भ लग्न में ६ शनि में कुछ दिक्कतें रहेंगी और शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा छठे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान हो जाता है, इसलिये अपने अन्दर की कमजोरी को जाहिर न करके बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में कुछ शक्ति पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति मिलेगी और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों से अच्छा सम्बन्ध रहेगा और दसवीं नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कमी और कष्ट रहेगा तथा पुरुषार्थी कर्म की शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी रहेगी।

नं. ११५८

कुम्भ लग्न में ७ शनि यदि सिंह का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कुछ नीरसता एवं परेशानियों से युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाइयों से सफलता शक्ति पायेगा, क्योंकि व्ययेश होने का दोष है, इसलिये कुछ नुकसान और परेशानियों के योग से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध द्वारा शक्ति पा सकेगा और खर्चा अधिक करना पड़ेगा तथा तीसरी उच्च दृष्टि से भाग्य स्थान को एवं धर्म स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उत्क्रति प्राप्त करने से भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म के मार्ग में विशेष श्रद्धा रखेगा तथा ईश्वर में भरोसा रखेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता एवं प्रसिद्धता का योग पायेगा। किन्तु व्ययेश दोष के कारण से देह में कुछ परेशानी रहेगी तथा दसवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है इसलिये माता और भूमि कुछ शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से माता और भूमि के सम्बन्धों में कुछ त्रुटि रहेगी और घरेलू सुखों में भी कुछ कमी रहेगी।

नं. ११५९

यदि कन्या का शनि- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के सम्बन्ध में बड़ी परेशानी प्राप्त करेगा

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कुम्भ लग्न में ८ शनि

और खर्च के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ झंझटों से शक्ति पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि लाभ दोनों की शक्ति पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि लाभ दोनों की शक्ति पायेगा क्योंकि व्ययेश होने के दोष कारण से और अष्टम बैठने के दोष कारण से डबल दोष बन गया है, इसलिये प्रायः उपरोक्त मार्गों में परेशानी के कारण प्राप्त करता है, किन्तु आठवें स्थान पर शनि के बैठने से आयु में वृद्धि प्राप्त होती है, इसलिये आयु पर संकट आने पर भी जीवन की रक्षा होती रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता पायेगा और राजसमाज कारबार की उन्नति में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब के मार्ग में कुछ चिंतित रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और सन्तान पक्ष में शक्ति पायेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से विद्या और सन्तान पक्ष में कुछ क्षति रहेगी।

नं. ११६०

कुम्भ लग्न में ९ शनि

यदि तुला की शनि- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह में सुन्दरता और सुडौलता प्राप्त करेगा और बड़ा भाग्यशाली बनेगा तथा ईश्वर और धर्म को मानने एवं पालन करने वाला बनेगा और खूब खर्चा करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में भाग्य की शक्ति से विशेष सफलता प्राप्त करेगा; किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य और धर्म के मार्ग में कभी-कभी हानि तथा परेशानी के कारण भी प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतों से सफलता शक्ति पायेगा तथा कुछ मुफ्त सा लाभ भी पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाई व पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के सुख में बड़ी क्षति और परेशानी पायेगा और देह के पुरुषार्थ में कुछ कमजोरी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से चन्द्रमा की कर्क राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में प्रभाव रखने के लिये विशेष शक्ति का प्रयोग करेगा; किन्तु कुछ शत्रु पक्ष

नं. ११६१

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कुम्भ लग्न का फलादेश

एवं झंझटों के मार्ग में कुछ कठिनाइयों से सफलता शक्ति पायेगा, किन्तु स्वयं उच्च होने से भावायवत् समझा जायेगा।

कुम्भ लग्न में १० शनि

यदि वृश्चिक का शनि- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो राज-समाज में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा देह में गौरव और स्वाभिमान रखेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से पिता स्थान में कुछ हानि या कमी रहेगी और कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें प्राप्त होंगी तथा राज-समाज में भी कुछ परेशानी बनेगी और तीसरी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में

नं. ११६२

स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष शानदार रहेगा और बाहरी स्थानों से विशेष महत्त्व दायक सम्बन्ध बनेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कमी के साथ माता और भूमि का सुख पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ कमी और नीरसता का योग पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और गृहस्थ के सञ्चालन कार्यों में कुछ कठिनाइयाँ से शक्ति प्राप्त करेगा।

कुम्भ लग्न में ११ शनि

यदि धन का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बहुत शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन लाभ की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा आमदनी की वृद्धि करने में बड़ी भारी तत्परता से काम करता रहेगा और खर्चे की शक्ति से आमदनी में

नं. ११६३

वृद्धि प्राप्त करेगा तथा तीसरी दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और नाम प्राप्त करेगा तथा उन्नति करने में सदैव तत्पर रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष कारण से कुछ कुटिलि युक्त विद्या और सन्तान पक्ष की शक्ति प्राप्त करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति रहेगी और पुरातत्व शक्ति के मार्ग में सफलता पायेगा और जीवन

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कुम्भ लग्न का फलादेश

मिलेगा और कभी-कभी धन का अचानक नुकसान प्राप्त करेगा किन्तु देवगुरु बृहस्पति के स्थान में होने से बुद्धि के आदर्श गुप्त सूझ के कारणों से मान युक्त मार्ग से धन की प्राप्ति करेगा और बड़ा धनवान् समझा जायेगा; परन्तु अनेकों बार धन की हानियाँ प्राप्त करने के बाद धन की वृद्धि करने के लिये बड़े कष्ट साध्य मार्ग एवं कर्ज के द्वारा तथा महान् हिम्मत शक्ति एवं गुप्त चिन्त्ताओं से सफलता प्राप्त करेगा।

नं. ११६६

कुम्भ लग्न में ३ राहु

यदि मेष का राहु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा महान् सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और बड़ी जबरदस्त हिम्मत शक्ति से काम करेगा, क्योंकि गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये प्रभाव की महानता रखने के लिये बड़ा भारी कष्ट साध्य प्रयास करेगा। किन्तु भाई बहिन के पक्ष में संकट या विरोध के साधन प्राप्त करेगा। राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण अन्दरूनी तौर से अपनी हिम्मत शक्ति के अन्दर बहुत बार कमजोरियाँ अनुभव करेगा और अपनी गुप्त कमजोरी पर चिन्ता मानते हुए भी प्रकट में विजयी रहेगा।

नं. ११६७

कुम्भ लग्न में ४ राहु

यदि वृषभ का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के सुख सम्बन्धों में कष्ट और कष्ट के कारण प्रदान करेगा तथा भूमि के सुख में कमी रहेगी और घरेलू वातावरण में कुछ अशान्ति के कारण प्राप्त होते रहेंगे; किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये कभी-कभी विशेष अशान्ति का योग प्राप्त होने पर भी गहरी चतुराई के योग से सुख के साधनों को प्राप्त कर ही लेगा तथा बहुत से घरेलू संघर्षों को पार करने के बाद अन्त में सुख के साधनों को मजबूती से पा सकेगा। किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण घरेलू सुखों के मार्ग में कुछ कमी और कुछ अशान्ति का योग किसी अंशों में अवश्य रहेगा।

नं. ११६८

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कुम्भ लग्न में ५ राहु यदि मिथुन का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा बड़ा बोलने वाला होगा एवं वाणी और दिमाग की विशेष कला एवं योग्यता रखेगा और गुप्त युक्तियों के द्वारा बड़ा भारी काम करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण संतान पक्ष में कुछ कष्ट एवं कुछ कमी प्राप्त करने पर संतान शक्ति पायेगा और विद्या स्थान में अंदरूनी कुछ कमजोरी रहेगी तथा विवेकी बुध की राशि पर उच्च का होकर राहु बैठा है, इसलिये विद्या बुद्धि तथा संतान पक्ष के मार्ग में विवेक जाहिर करता रहेगा। कुम्भ लग्न में ६ राहु यदि कर्क का राहु- छठे शत्रु स्थान में चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रखेगा तथा छठे स्थान पर कूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल प्रदान करता है, इसलिये झगड़े-झंझटों और विपक्षियों के मुकाबले में गुप्त युक्तियों के बल से विजय प्राप्त करेगा तथा राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण शत्रु पक्ष में कुछ अन्दरूनी तौर से परेशानी अनुभव करेगा। किन्तु प्रकट रूप में बड़े भारी धैर्य और हिम्मत शक्ति से काम करके सफलता प्राप्त करेगा तथा ननसाल पक्ष में हानि पायेगा और मनोयोग के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये अनेक प्रकार की कठिनाइयों को दमन करने के मार्ग में मनोयोग की गुप्त सूझ के द्वारा सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ७ राहु यदि सिंह का राहु- सातवें स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा कष्ट और कमी के कारण प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के संचालन मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाइयाँ और कुछ परेशानियाँ रहेंगी तथा मूत्र इन्द्रिय में कुछ विकार प्राप्त करेगा और तेजस्वी सूर्य की राशि पर बैठा है, इसलिये रोजगार के पक्ष में कठिन कठिनाइयाँ प्राप्त करके भी प्रभाव शक्ति पायेगा और बड़ी-बड़ी निराशाओं से टकरा-टकरा करके उन्नति का

नं. १९६९

नं. ११७०

नं. ११७१

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कुम्भ लग्न का फलादेश

मार्ग प्राप्त करेगा तथा गुप्त युक्तियों तथा महान् धैर्य की शक्ति से गृहस्थ में शक्ति प्राप्त करेगा।

कुम्भ लग्न में ८ राहु

यदि कन्या का राहु- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि पायेगा तथा आयु के सम्बन्ध में अनेकों बार चिन्तायें प्राप्त होंगी तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और अष्टम स्थान का सम्बन्ध उदर से भी होता है, इसलिये पेट के निचले हिस्से में कुछ परेशानी रहेगी। किन्तु विवेकी बुध की मित्र राशि पर स्वक्षेत्र के समान बैठा है, इसलिये आयु में शक्ति देगा और पुरातत्व का कुछ लाभ करेगा तथा गुप्त विवेक की गहरी सूझ शक्ति के द्वारा जीवन का ढंग प्रभावशाली रूप में व्यतीत करेगा और अन्त में उन्नति रहेगी।

कुम्भ लग्न में ९ राहु

यदि तुला का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण भाग्य में कुछ परेशानी रहेगी तथा धर्म के स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी और भाग्य की उन्नति के मार्ग में अनेकों बार अड़चनें पड़ती रहेंगी। किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र की मित्र राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी जबरदस्त गहरी युक्ति और गुप्त चतुराई के द्वारा भाग्य की अच्छी उन्नति करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा। फिर भी किसी प्रकार से भाग्य के अन्दरूनी हिस्से में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा। किन्तु भाग्य की उन्नति के लिये कठिन प्रयत्न करता रहेगा।

कुम्भ लग्न में १० राहु

यदि वृश्चिक का राहु- दशवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में बड़ा कष्ट एवं झंझट प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के मार्ग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और कारबार की उन्नति के रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ रहेंगी। किन्तु गर्म ग्रह मंगल की राशि पर गर्म ग्रह बैठा है, इसलिये उन्नति प्राप्त करने के लिये बड़ा कठिन और कठोर प्रयत्न करेगा तथा अनेकों संघर्ष प्राप्त करने के बाद उन्नति का

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मार्ग प्राप्त करेगा और कभी-कभी इज्जत-आबरू की रक्षा करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा, किन्तु गुप्त शक्ति से सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ११ राहु यदि धन का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी कमजोरी और कठिनाईयाँ रहेंगी तथा ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, किन्तु यह नीच का होने के कारण कुछ अधिक लाभ की उन्नति न करके थोड़ा लाभ प्राप्त करेगा तथा देवगुरु बृहस्पति के धन में बैठा है, इसलिये कुछ न्यूनता युक्त मान- सम्मान के मार्ग से आमदनी की शक्ति प्राप्त रहेगी; नं. ११७५ किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में बड़ी चिन्ता युक्त प्रणाली से तथा कुछ गुप्त युक्तियों के बल से सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में १२ राहु यदि मकर का राहु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ चिन्ताओं से टकराना पड़ेगा तथा राहु के स्वाभाविक गुणों के कारणों से खर्च के लिये कभी-कभी विशेष चिन्तित होना पड़ेगा, किन्तु दृढ़ ग्रह शनि की मित्र राशि पर होने के कारणों से खर्च की शक्ति को पाने के लिये कठोर प्रयत्न करेगा और प्रकट रूप में बड़ा खर्चीला बनेगा किन्तु अन्दरूनी तौर से खर्च के मार्ग में कुछ कमी का अनुभव करेगा और गुप्त युक्ति के बल से खर्चें की शक्ति तथा बाहरी स्थान की शक्ति पायेगा।

कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु कुम्भ लग्न में १ केतु यदि कुम्भ का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो कठोर ग्रह की राशि पर कठोर ग्रह बैठा है, इसलिये बड़े स्वभाव के द्वारा कार्य करेगा तथा व्यक्तित्व की उन्नति पाने के लिये महान् कठिन कर्म करेगा और कभी-कभी देह में कोई चोट या घाव प्राप्त करेगा तथा देह की सुन्दरता और सुडौलता में कुछ कमी रहेगी, किन्तु अपने अन्दर की कुछ

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कुम्भ लग्न का फलादेश

कमी के होते हुए भी प्रकट में बड़ी हिम्मत और गुप्त शक्ति के द्वारा उन्नति की तरफ बढ़ता रहेगा और कोई महान् संकट आने पर भी धैर्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा तथा किसी विशेष कार्य के द्वारा प्रभाव की स्थिर शक्ति प्राप्त करके मान और गौरव पायेगा।

कुम्भ लग्न में २ केतु

यदि मीन का केतु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो धन के कोश में बड़ी भारी कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में क्लेश और झंझट रहेगा तथा धन पूर्ति करने के लिये महान् कठिन कर्म करेगा, किन्तु देवगुरु बृहस्पति की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये आदर्श वादिता के मार्ग से धन की प्राप्ति का साधन रहेगा और

नं. ११७८

कभी-कभी कर्ज के द्वारा बड़ी समझदारी से धन के क्षेत्र की पूर्ति करके कार्य संपादन करेगा, किन्तु जीवन में कभी-कभी धन के पक्ष से महान् संकट का योग बनने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति से सफलता का मार्ग प्राप्त करेगा तथा धन की शक्ति को, सुचारू रूप में प्राप्त करने के लिये सदैव भारी प्रयत्न करता रहेगा।

कुम्भ लग्न में ३ केतु

यदि मेष का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम स्थान से महान् सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और बड़ी जबरदस्त हिम्मत शक्ति से उद्योग करता रहेगा तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये

नं. ११७९

उन्नति का मार्ग पकड़े रहेगा और गुप्त शक्ति के बल से प्रभाव रखेगा तथा केतु के स्वाभाविक गुण के कारण भाई-बहिन के पक्ष में कष्ट और हानि का योग पायेगा तथा कभी-कभी आन्तरिक रूप से हिम्मत शक्ति बिल्कुल टूट जाने पर भी प्रकट में हिम्मत नहीं हारेगा और अन्त में पुनः शक्ति सम्पन्नता प्राप्त करेगा।

यदि वृषभ का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण माता के स्थान में कुछ हानि या परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा मातृभूमि और मकानादि

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कुछ तृटि अनुभव करेगा।

कुम्भ लग्न में १० केतु

यदि वृश्चिक का केतु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्यस्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा तथा समाज में परेशानियों के कारण पायेगा और कारबार के मार्ग में बड़ा कठिन परिश्रम करेगा और गरम ग्रह मंगल की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये उन्नति और मान की वृद्धि करने के लिये गुप्त शक्ति के बल से महान् कठिन प्रयत्न करेगा तथा उन्नति के मार्ग में अनेकों बार विफलतायें प्राप्त करने पर भी अन्त में शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु अपनी आन्तरिक स्थिति के दायरे में कुछ ऐसी कमजोरी पायेगा; जिसके कारण कुछ गुप्त दुःख का अनुभव करेगा परन्तु उत्साह पूर्वक उन्नति के मार्ग में लगा रहेगा।

नं. ११८६

कुम्भ लग्न में ११ केतु

यदि धन का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी शक्ति प्राप्त करेगा और ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये बड़ा भारी नफा खाने का कार्य करेगा तथा कभी-कभी मुफ्त का-सा धन लाभ भी पाता रहेगा और देवगुरु बृहस्पति के घर में उच्च का होकर बैठा है, इसलिये आशीर्वाद की उच्चतम प्रणाली से बहुत अधिक धन पैदा करेगा तथा आमदनी के मार्ग में अधिक से अधिक उन्नति करने का सदैव भारी प्रयत्न करता रहेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी।

नं. ११८७

कुम्भ लग्न में १२ केतु

यदि मकर का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा तथा खर्चे के मार्ग में कुछ कष्ट अनुभव करेगा और खर्ची की शक्ति को पाने के लिये गुप्त शक्ति के बल का प्रयोग भी करेगा तथा कठोर गरम ग्रह शनि की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये बाहरी सम्बन्धों में शक्ति पाने के लिये तथा खर्च संचालन की शक्ति के लिये महान् कठिन परिश्रम का कर्म करेगा और अनेकों बार निराशाओं से टकरा-टकरा करके भी अन्त में खर्च की, और बाहरी सम्बन्धों

नं. ११८८

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कुम्भ लग्न का फलादेश

की शक्ति को प्राप्त करेगा और विशेष प्रयत्न करते रहने पर भी इस मार्ग में अन्दरूनी कुछ कमजोरी महसूस करेगा।

|| कुम्भ लग्न समाप्त ||

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मीन लग्न का फलादेश प्रारम्भ

(कुण्डली नं० १२९६ तक में देखिये)

प्रिय पाठकगण ! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।

अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० १९८९ से लेकर कुण्डली नं० १२९६ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-

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(१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल

आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२१३ से १२२४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये।

१२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१६ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१८ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२० के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२२ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२३ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२४ के अनुसार मालूम करिये।

(१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल

आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२२५ से १२३६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।

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१२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२५ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२६ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२७ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२८ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२९ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३० के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३१ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३२ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३४ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३६ के अनुसार मालूम करिये।

( १२ ) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल

आपकी जन्म कुंडली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुंडली नं० १२३७ से १२४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

१२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२३७ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२३८ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५५ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५६ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५७ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५८ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५९ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२६० के अनुसार मालूम करिये।

(१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये

जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल

आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. १२६१ से १२७२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये।

१२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६१ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६२ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६३ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६४ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६५ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६६ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६७ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६८ के अनुसार मालूम करिये।

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८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६९ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७० के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७१ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७२ के अनुसार मालूम करिये।

(१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल

आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं १२७३ से १२८४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये।

१२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७३ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७४ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७५ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७६ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७७ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७८ के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७९ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८० के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८१ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८२ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश

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कुण्डली नं. १२८३ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८४ के अनुसार मालूम करिये।

( १२ ) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल

आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं. १२८५ से १२९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये।

१२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८५ के अनुसार मालूम करिये।

१. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८६ के अनुसार मालूम करिये।

२. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८७ के अनुसार मालूम करिये।

३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८८ के अनुसार मालूम करिये।

४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८९ के अनुसार मालूम करिये।

५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९० के अनुसार मालूम करिये।

६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९१ के अनुसार मालूम करिये।

७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९२ के अनुसार मालूम करिये।

८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९३ के अनुसार मालूम करिये।

९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९४ के अनुसार मालूम करिये।

१०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९५ के अनुसार मालूम करिये।

११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९६ के अनुसार मालूम करिये।

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मीन लग्न का फलादेश

शत्रु, प्रभाव तथा परिश्रमस्थानपति-सूर्य

मीन लग्न में १ सूर्य

यदि मीन का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह में प्रभाव की शक्ति पायेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय प्राप्त करेगा और षष्ठेश होने के दोष के कारण से देह में कुछ रक्तविकार और कुछ रोग प्राप्त करेगा तथा प्रभाव की वृद्धि करने के लिये अधिक दौड़ धूप और परिश्रम करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ झंझटों से

युक्त प्रभाव की शक्ति पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ अधिक परिश्रम की शक्ति से सफलता पायेगा तथा गृहस्थ में कुछ परेशानी रहेगी।

मीन लग्न में २ सूर्य

यदि मेष का सूर्य- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो प्रभावशाली परिश्रम के योग से धन की वृद्धि के कारण प्राप्त करेगा और धन की संग्रह शक्ति के द्वारा प्रभाव की वृद्धि होगी तथा कुटुम्ब के स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और विशेष प्रयत्नशील रहने के कारण इज्जत बढेगी और

सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु शुक्र की तुला राशि में आयु एवं पुरातत्व स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन को दिनचर्या और आयु के पक्ष में कुछ थोड़ी शनि रहेगी और पुरातत्व शक्ति के लाभ में कुछ कमजोरी रहेगी।

मीन लग्न में ३ सूर्य

यदि वृषभ का सूर्य- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा, किन्तु तीसरे स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये महान् पराक्रम शक्ति प्राप्त करेगा और महान् परिश्रम के योग से महान् प्रभाव प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय पायेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से पुरुषार्थ

शक्ति में एवं श्रात्रु शक्ति में कुछ परेशानी प्राप्त होगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम और प्रभाव के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा, धर्म की नहीं।

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मीन लग्न में ४ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो घर बैठे सुख पूर्वक प्रभाव की वृद्धि प्राप्त करेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से माता के प्रेम सम्बन्ध में कमी रहेगा और घरेलू सुख शान्ति के अन्दर कुछ परेशानी के कारण प्राप्त होंगे तथा भूमि और भकानादि तथा रहने के स्थान में कुछ झंझटयुक्त वातावरण रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं राज समाज के सम्बन्ध में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कारबार एवं मान प्रतिष्ठा की उन्नति के लिये विशेष प्रयत्न करेगा।

मीन लग्न में ५ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो बुद्धि और वाणी में प्रभाव की शक्ति रहेगी तथा शत्रु पक्ष में बुद्धि योग द्वारा विजय पायेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से संतान पक्ष में झंझट एवं कुछ बाधा प्राप्त होगी और विद्या के ग्रहण करने में कुछ असुविधायें रहेंगी तथा दिमाग के अन्दर कुछ क्रोध और परेशानियाँ रहेंगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतें प्रतीत होंगी; किन्तु अधिक लाभ प्राप्त करने के लिये बुद्धि के द्वारा अधिक परिश्रम से सफलता पायेगा।

मीन लग्न में ६ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- छठें स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु स्थान में महान प्रभाव और विजय प्राप्त करेगा तथा प्रभाव की वृद्धि करने के लिये उग्र परिश्रम करेगा और अपने पक्ष को प्रबल रखने के लिये सदैव तत्पर रहेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में निर्भयता पूर्वक कार्य करेगा और रोगादिक पक्ष में बहुत कम घिराव पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुंभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चे के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों में कुछ दिक्कतें रहेंगी और प्रभाव की रक्षा के कारण अधिक खर्च करने से कुछ अशान्ति प्रतीत होगी।

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मीन लग्न का फलादेश

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मीन लग्न में ७ सूर्य

यदि कन्या का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो षष्ठेश होने के दोष के कारण स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त प्रभावशक्ति पायेगा तथा स्त्री पक्ष में कुछ झंझट रहेंगे और रोजगार के मार्ग में प्रभावशाली परिश्रम के योग से सफलता पायेगा, किन्तु रोजगार के लिये कुछ दौड़-धूप तथा कुछ परेशानियों के कार्य संचालन करना पड़ेगा और रोजगार तथा गृहस्थ की व्यावहारिक प्रणाली के प्रभाव से शत्रु पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी के योग से प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. ११९५

मीन लग्न में ८ सूर्य

यदि तुला का सूर्य- आठवें आयु उदर एवं पुरातत्व के स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु के स्थान में बड़ा संघर्ष तथा निराशायें प्राप्त होंगी और पुरातत्व शक्ति के सम्बन्ध में हानि और कमजोरी रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में शत्रु पक्ष के द्वारा बड़ी परेशानियाँ प्रतीत होंगी तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से उदर में या उदर के नीचे के तरफ कोई रोग रहेगा तथा ननसाल पक्ष में कमजोरी रहेगी और सातवीं उच्चं दृष्टि से धन एवं कुटुंब स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन के कठिन परिश्रम के द्वारा धन और कुटुम्ब की वृद्धि का विशेष प्रयत्न करेगा।

नं. ११९६

मीन लग्न में ९ सूर्य

यदि वृश्चिक का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से शत्रु स्थान में विजय एवं सफलता प्राप्त करेगा और स्वतः प्रभाव की शक्ति प्राप्त रहेगी, किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण भाग्य की उन्नति में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा कुछ परिश्रमी प्रभावशाली कर्म से भाग्य की वृद्धि होगी और धर्म के यथार्थ पालन में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई के पक्ष में कुछ विरोध रहेगा, पराक्रम स्थान में कुछ परिश्रम और कुछ झंझटों के द्वारा

नं. ११९७

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प्रभाव और हिम्पत की वृद्धि तथा शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में १० सूर्य यदि धन का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा प्रभावशाली परिश्रम के योग से कारबार में तथा राज-समाज में उन्नति करेगा; किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता पायेगा और कारबार, मान, प्रतिष्ठा आदि के मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम और प्रभाव के योग से घरेलू वातावरण में कुछ शक्ति पायेगा और भूमि तथा माता के स्थान में कुछ झंझट युक्त प्रभाव रहेगा।

नं. ११९८

मीन लग्न में ११ सूर्य यदि मकर का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कठिन परिश्रम के द्वारा विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में विजय लाभ प्राप्त करेगा तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से लाभ के मार्ग में कुछ परेशानियाँ प्रतीत होंगी, किन्तु अधिक मुनाफा खाने का प्रयत्न करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान पक्ष में कुछ कठिनाई से सफलता प्राप्त करेगा।

नं. ११९९

मीन लग्न में १२ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष के मार्ग में कुछ परेशानी-सी रहेगी और षष्ठेश होने के दोष कारण से खर्च के संचालन में कुछ कठिनाइयाँ मिलेंगी और बाहरी स्थानों में कुछ दिक्कतों का सामना रहेगा तथा कुछ नीरसता के योग से अधिक खर्च हो जायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्च के योग से शत्रु पक्ष के प्रभाव प्राप्त करेगा और प्रभाव की वृद्धि के लिये कठिनाइयाँ सहेन करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी प्रभाव की जागृति होगी तथा कमजोर

नं. १२००

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स्थिति के अन्दर भी क्रोध और अहंकार छिपा रहेगा।

विद्या, संतान तथा मनसथानपति-चन्द्र

मीन लग्न में १ चन्द्र- यदि मीन का चन्द्रमा- प्रथम केन्द्र देह के

स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो विद्या

का आदर्श ज्ञान प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में

उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और देह में सुन्दरता एवं

कोमलता पायेगा तथा वृद्धि और मनोयोग की

शक्ति से सुन्दर सम्मान एवं कीर्ति व ख्याति पायेगा

तथा मन के अन्दर आत्मिक शान्ति प्राप्त रहेगी

तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के

स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है,

इसलिये स्त्री स्थान में सुन्दरता पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में वृद्धि तथा

मन की शक्ति से उत्तमति एवं सुन्दरता सफलता प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में २ चन्द्र- यदि मेष का चन्द्र- धन एवं कुटुम्ब स्थान में

मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो मन और बुद्धि

के योग से धन की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा

विद्या का अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब

की सुन्दर शक्ति मिलेगी तथा धन का स्थान कुछ

बन्धन का-भी कार्य करता है, इसलिये संतान

पक्ष में भी कुछ परेशानी रहेगी, किन्तु विद्या और

संतान पक्ष से इज्जत भी प्राप्त करेगा और सातवीं

दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य मित्र

शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी तथा

मनोयोग के बल से पुरातत्व शक्ति का योग लाभ पायेगा तथा जीवन की

दिनचर्या में प्रसन्नता प्राप्त रहेगी।

मीन लग्न में ३ चन्द्र- यदि वृषभ का चन्द्र- भाई एवं पराक्रम स्थान

में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की राशि

पर बैठा है तो भाई-बहीन की शक्ति प्राप्त करेगा

तथा मनोबल का पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा विद्या

की विशेष सफलता पायेगा और संतान पक्ष की

शक्ति का बल प्राप्त करेगा तथा मन और बुद्धि

के योग से बड़ी प्रसन्नता एवं हिम्मत शक्ति प्राप्त

करेगा और बातचीत के अन्दर बड़ी तेजी एवं स्फूर्ति

रहेगी तथा सातवीं नीच दृष्टि में भाग्य एवं धर्म

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मीन लग्न का फलादेश

होगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करने से कुछ दुःख प्रतीत होगा तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति पायेगा।

मीन लग्न में ७ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में बैठा है तो बुद्धि और मनोयोग की सुन्दर शक्ति से रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता पायेगा और गृहस्थ के अन्दर मनोरंजन एवं प्रसन्नता के सुन्दर साधन प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में सहयोग मिलेगा और विद्या स्थान की शक्ति के द्वारा उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह

नं. १२०७ के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और योग्यता प्राप्त करेगा तथा मान-सम्मान की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा लौकिक एवं गृहस्थी के कार्यो की प्रवीनता और कुशलता मिलेगी।

मीन लग्न में ८ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो विद्या को प्राप्त करने में बड़ी परेशानी और कमजोरी रहेगी तथा संतान पक्ष में कष्ट अनुभव होगा और मन तथा बुद्धि में अशान्ति रहेगी, किन्तु

पुरातत्व संबंध में मन की शक्ति से उन्नति एवं लाभ रहेगा तथा आयु में शक्ति मिलेगी और जीवन की दिनचर्या में शानदारी तथा प्रभाव रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को

नं. १२०८ मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये मन और बुद्धि के योग से धन को वृद्धि करने के बहुत साधन बनायेगा और कुटुम्ब के पक्ष में विशेष दिलचस्पी रखेगा।

मीन लग्न में ९ चन्द्र यदि वृ्षिक का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में कुछ कमजोरी मिलेगी तथा संतान पक्ष के सुख में कमी एवं कुछ परेशानी रहेगी और बुद्धि तथा मन की

कमजोरी के कारण भाग्य की उन्नति के मार्ग में रुकावटें रहेंगी और धर्म का यथार्थ पालन नहीं कर सकेगा और मार्ग के पक्ष से मन में चिन्तित रहना पड़ेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाई एवं

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भृगु संहिता

पराक्रम स्थान को उच्च दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति मिलेगी तथा पुरुषार्थ शक्ति पर बड़ा भारी भरोसा और हिम्मत शक्ति प्राप्त रहेगा।

मीन लग्न में १० चन्द्र

यदि धनु राशि का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता, राज-समाज तथा कार-बार के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो मनोयोग की शक्ति से विद्या स्थान में बहुत सफलता प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष की उत्तम शक्ति मिलेगी और पिता की शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त करेगा तथा मनोयोग और बुद्धिबल के द्वारा कार-बार में बड़ी उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा और इज्जत रहेगी और कानून कायदे का माननेवाला

नं. १२१०

स्वाभिमानी बनेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के द्वारा घरेलू सुख और भूमि मकानादि की शक्ति को सहयोग तथा माता को सुख प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ११ चन्द्र

यदि मकर का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो मनोयोग के कुछ कठिन मार्ग से विद्या की सफलता प्राप्त करेगा तथा संतान शक्ति प्राप्त रहेगी और बुद्धि तथा मनोबल की योग शक्ति से धनलाभ की आमदनी खूब प्राप्त रकegगा और आमदनी की वृद्धि करने का सदैव चिन्तन एवं मनन करता रहेगा, किन्तु शत्रु राशि पर होने के कारण मन के अंदर आमदनी एवं सन्तान पक्ष से कुछ असन्तोष रहेगा

नं. १२११

और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को स्वयां अपनी कर्क राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि और सन्तान पक्ष के सम्बन्धों में सदैव उन्नति का ध्यान रखेगा तथा स्वार्थयुक्त बातें कहेगा।

मीन लग्न में १२ चन्द्र

यदि कुम्भ का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी और सन्तान पक्ष में हानि एवं कष्ट प्राप्त रहेगा तथा दिमाग में अशान्ति रहेगी और मनोयोग तथा बुद्धिबल के द्वारा खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों की सम्बन्ध शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु शत्रु राशि पर होने से खर्च के मार्ग में तथा बाहरी स्थानों में कुछ मानसिक परेशानी अनुभव

नं. १२१२

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मीन लग्न का फलादेश

करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और वाणी की नरम शक्ति से शत्रुपक्ष में काम निकालेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में मनोयोग के द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा।

धन, कुुटुम्ब, भाग्य, धर्मस्थानपति-मंगल

मीन लग्न में ९ मंगल

यदि मीन का मंगल- प्रथम केन्द्र देह स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के योग से धन की शक्ति और इज्जत प्राप्त करेगा तथा कुुटुम्ब का सुन्दर योग मिलेगा और भाग्य की उन्नति करेगा तथा बड़ा भाग्यवान्‌ समझा जायेगा और यथासामर्थ्य धर्म का पालन करेगा तथा देह से मान-सम्मान प्राप्त करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान से शक्ति पायेगा तथा भूमि और मकानादि एवं रहने के स्थानों में सुख सौभाग्य प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में भाग्यवानी प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में भाग्य की शक्ति से धन की प्राप्ति करेगा तथा भाग्य के बल से ही गृहस्थ के अन्दर उन्नति के साधन पायेगा और आठवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पुरातत्व सम्बन्ध में कोई विशेष शक्ति पायेगा और आयु स्थान में वृद्धि का योग प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ कठिनाई के साथ अमीरात का ढंग पायेगा।

नं. १२१३

मीन लग्न में २ मंगल

यदि मेष का मंगल- दूसरे धन एवं कुुटुम्ब स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन का संग्रह शक्ति का सौभाग्य प्राप्त करेगा और कुुटुम्ब की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा बड़ा धनवान्‌ माना जायेगा और चौथी नीच दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त रहेगा तथा बुद्धि के अन्दर कुछ परेशानी एवं चिन्ता के कारण रहेंगे और अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये वाणी के द्वारा कुछ कटु शब्दों का प्रयोग करेगा तथा सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुराशक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या

नं. १२१४

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मीन लग्न का फलादेश

दृष्टि से लाभ के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिये घर बैठे भाग्य की शक्ति से आमदनी का विशेष लाभ प्राप्त करेगा और अनेकों प्रकार के लाभ का संयोग सुलभता पूर्वक प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ५ मंगल

यदि कर्क का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट और विद्या के पक्ष में कमजोरी रहेगी और धन तथा कुटुम्ब की तरफ से चिन्ता और परेशानी के कारण रहेंगे तथा बुद्धि और विचारों के अन्दर भाग्य की दुर्बलता का ध्यान रहेगा और धर्म के पक्ष में श्रद्धा की कमजोरी रहेगी और चौथी दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान

नं. १२१७

को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में एवं आयु पक्ष में प्रभाव रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ शक्ति प्राप्त रहेगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में वृद्धि एवं शक्ति पायेगा अर्थात् आमदनी की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्लशील रहेगा और

आठवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्ची अधिक होने के कारण खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ६ मंगल

यदि सिंह का मंगल- छठे शत्रु स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में भाग्य की शक्ति से बड़ी भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और छठे स्थान में गर्म ग्रह शक्तिशाली फल का द्योतक होता है, इसलिये नगद धन की कुछ कमी होते

हुये भी धन का काम शानदार ढंग से चलता रहेगा और कुटुम्ब का थोड़ा प्रभाव रहेगा तथा परिश्रम और झंझट युक्त मार्ग के द्वारा धन की वृद्धि करेगा तथा चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान एवं धर्म

नं. १२१८

स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाइयों के योग से भाग्य की वृद्धि एवं उन्नति करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और धम्प्र का थोड़ा पालन करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है,

इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ नीरसता रहेगी तथा बाहरी स्थानों में कुछ अरुचि रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि

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भृगु संहिता

में देख रहा है, इसलिये देह में मान-सम्मान और इज्जत प्राप्त करेगा तथा झगड़े-झंझट और परेशानियों के मार्ग में बड़ी निर्भयता से काम करेगा।

मीन लग्न में ७ मंगल यदि कन्या का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा

है तो भाग्यशाली स्त्री का संयोग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग से धन की वृद्धि तथा रोजगार की विशेष सफलता शक्ति पायेगा और

गृहस्थ के अन्दर धर्म पालन का भी ध्यान रखेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान

को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति मिलेगी और राज-समाज में मान

नं. १२१९

और शक्ति पायेगा तथा कारबार के मार्ग में बड़ी उन्नति करेगा तथा लौकिक सफलतायें प्राप्त करने में बड़ी भारी कोशिश और कुदरती सहायताओं का

योग पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि

में देख रहा है, इसलिये देह में गौरव और मान प्रतिष्ठा एवं भाग्यवानी का योग प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं

अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये रोजगार और भाग्य की शक्ति के द्वारा धन की विशेष वृद्धि करेगा और कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ८ मंगल यदि तुला का मंगल- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र को राशि पर

बैठा है तो भाग्य की तरफ से कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म का पालन सुचारू रूप से नहीं

कर सकेगा तथा सुयश की कमी रहेगी और भाग्येश होने के कारण आयु की वृद्धि रहेगी तथा पुरातत्व सम्पत्ति का लाभ प्राप्त करेगा और चौथी उच्च

नं. १२२०

दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि

में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलताशक्ति पायेगा और अधिक नफा खाने का प्रयत्न करता रहेगा तथा

सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन का संग्रह करने के लिये विशेष परिश्रम सदैव

करते रहकर धन की कुछ शक्ति पायेगा और कुटुम्ब की शक्ति की भी कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शत्रु

शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहीन के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध पायेगा तथा पराक्रम स्थान में परिश्रम के द्वारा

सफलता शक्ति पायेगा।

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मीन लग्न का फलादेश

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मीन लग्न में ९ मंगल

नं. १२२१

यदि वृश्चिक का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाग्य की महान् शक्ति प्राप्त करेगा और बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा तथा दैव के संयोग से धन और यश की प्राप्ति होगी अर्थात् भाग्य की शक्ति से धन की उन्नति पायेगा और कुटुम्ब का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा चौथी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ नीरसता युक्त रूप से खर्च का संचालन रहेगा और बाहरी स्थानों में कुछ अरुचिकर रूप से सम्बन्ध रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये थोड़ी सी नीरसता के साथ भाई बहिन का योग पायेगा और पराक्रम स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता एवं भूमि मकानादि की सुख शक्ति का योग पायेगा।

मीन लग्न में १० मंगल

नं. १२२२

यदि धन का मंगल- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाग्येश जहाँ बैठता है वहाँ उन्नति करता है, इसलिये पिता स्थान की बड़ी उन्नति करेगा तथा राज-समाज में बड़ा भारी प्रभाव और मान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में बड़ी तरक्की प्राप्त होगी तथा भाग्य की शक्ति और दैव संयोग के द्वारा अनेकों प्रकार से धन और मान की वृद्धि तथा कुटुम्ब का उत्तम सहयोग प्राप्त होगा और धर्म कर्म का पालन करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और गौरव पायेगा तथा स्वाभिमान और इज्जत का बड़ा ध्यान रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से सुख एवं माता और भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि तथा घरेलू सुख प्राप्त करेगा और आठवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या में कुछ कमजोरी तथा संतान पक्ष में कुछ कमजोर और कष्ट के कारण पायेगा तथा दिमाग में कुछ परेशानी तथा शब्दों में कुछ नीरसता रहेगी।

यदि मकर का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह विशेष लाभदायक

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मीन लग्न में ११ मंगल

होता है इस पर भी यह उच्च का बैठा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी जबरदस्त शक्ति पायेगा और अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त करने में भाग्य शक्ति का विशेष सहयोग प्राप्त करेगा तथा बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म का भी कुछ पालन करेगा तथा चौथी दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब को विशेष शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में कुछ कमी रहेगी और सन्तान पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में भाग्य की शक्ति से बड़ी सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत रहेगी।

नं. १२२३

यदि कुम्भ का मंगल- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की कुम्भ राशि में बैठा है तो खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों में शक्ति प्राप्त करेगा और धन की संग्रह शक्ति में बड़ी भारी कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब के स्थान में हानि रहेगी और भाग्य के स्थान में उन्नति प्राप्त करने के लिये बड़ी भारी परेशानी एवं अधिक दौड़-धूप करनी पड़ेगी और धर्म तथा सुयश की कमी रहेगी।

मीन लग्न में १२ मंगल

नं. १२२४

पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई के पक्ष में कुछ वैमनस्यतायुक्त रूप से शक्ति प्राप्त करेगा और पराक्रम की वृद्धि शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव पायेगा तथा बड़ी हिम्मत शक्ति के द्वारा कार्य करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है इसलिये भाग्य की शक्ति और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से रोजगार के पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा स्त्री और गृहस्थ से भाग्यवानी पायेगा तथा खर्च के योग से उन्नति करेगा।

स्त्री, रोजगार, माता, भूमिस्थानपति-बुध

यदि मीन का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देख की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य में कुछ कमी रहेगी और स्त्री तथा गृहस्थ के एवं मकानादि के सुख सम्बन्धों में तथा

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मीन लग्न का फलादेश

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माता के सुखों में कुछ कमी रहेगी तथा देह के अन्दर स्वाभिमान तथा गौरव और प्रभाव की कुछ कमी के कारण आन्तरिक थोड़ा सा दुःख अनुभव होगा और सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह के परिश्रम के द्वारा रोजगार की वृद्धि करेगा और स्त्री पक्ष में विशेष मान्यता और प्रभाव मानेगा।

नं. १२२५

मीन लग्न में १ बुध

यदि मेष का बुध- धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग से विवेक के द्वारा सुख पूर्वक धन की वृद्धि का योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का सुख पायेगा। भूमि और मकानादि की शक्ति का लाभ प्राप्त होगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, इसलिये माता और स्त्री के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी, किन्तु गृहस्थ के पक्ष में कुछ इज्जत रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को, शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में आमोद प्रमोद रहेगा।

नं. १२२६

मीन लग्न में २ बुध

यदि वृषभ का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पराक्रम स्थान से विशेष सफलता शक्ति पायेगा और भाई बहिन के पक्ष से सुन्दर सुख प्राप्त होगा तथा माता एवं स्त्री की सुख शक्ति प्राप्त रहेगा। भूमि और मकानादि का सुन्दर योग रहेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा रोजगार के पक्ष में बड़ी सफलता शक्ति मिलेगी तथा घरेलू वातावरण में बड़ी हिम्मत शक्ति रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म के पालन का प्रयत्न रखेगा तथा गृहस्थ में यश प्राप्त करेगा।

नं. १२२७

मीन लग्न में ३ बुध

यदि मिथुन का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो माता का विशेष सुख मिलेगा तथा भूमि मकानादि की उत्तम सुख शक्ति प्राप्त होगी और स्त्री पक्ष से बड़ा सुन्दर सुख मिलेगा तथा गृहस्थ में बड़ा आनन्द रहेगा और घर बैठे विवेक

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मीन लग्न का फलादेश

मीन लग्न में ७ बुध

नं. १२३१

और जचाव रहेगा और रहने के स्थान भूमि मकानादि का सुख अच्छा मिलेगा तथा माता का सुन्दर सहयोग पायेगा और रोजगार के मार्ग में गम्भीर विवेक शक्ति के द्वारा घर बैठे विशेष सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को मित्र गुरु की मनी राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कमजोरी रहेगी तथा गृहस्थ संचालन की विशेषताओं के कारण से देह के स्वास्थ्य में लापरवाही रहेगी।

यदि तुला का बुध- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है

तो स्त्री के सुख में विशेष कमी रहेगी और माता की सुख सहायता में बड़ा घाटा रहेगा तथा गृहस्थ के संचालन मार्ग में बड़ी परेशानी रहेगी और रोजगार की सफलता के लिये दूसरे स्थानों का सहयोग सम्बन्ध बनावेगा किन्तु पुरातत्व सम्बन्ध में विवेक शक्ति से लाभ उठावेगा तथा आयु और दिनचर्या में प्रभाव एवं सुख शक्ति रहेगी और

मीन लग्न में ८ बुध

नं. १२३२

सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल को मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये बड़ा प्रयत्नशील रहेगा और धन एवं कुटुम्ब की शक्ति का कुछ शेग प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ९ बुध

नं. १२३३

यदि वृश्चिक का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है

तो माता का सुन्दर सहयोग एवं सुख पायेगा और स्त्री के अन्दर सुन्दरता, सुशीलता और भाग्यवानी प्राप्त करेगा तथा भूमि और रहने के स्थान की सुन्दरता शक्ति पायेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्ध में धर्म का पालन करेगा और भाग्य की शक्ति से सुख सम्पृद्धि प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में सफलता पूर्वक धन शक्ति पायेगा तथा सातवीं

मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहन को सुख प्राप्त करेगा तथा घर बैठे पुरुषार्थ की शक्ति से सफलता मिलेगी तथा हिम्मत और यश प्राप्त करेगा।

यदि धनु राशि का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता के सम्बन्ध से सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा

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मीन लग्न में १० बुध

राज-समाज में मान और उन्नति रहेगी और कारबार रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति पायेगा तथा स्त्री स्थान में बड़ा प्रभाव प्राप्त करेगा और गृहस्थ के हर एक मार्ग में विवेक शक्ति के द्वारा बड़ी उन्नति पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता की बड़ी उत्तम शक्ति पायेगा और भूमि का सुख पायेगा और भूमि मकानादि की शोभा का गौरव प्राप्त करेगा तथा वैभव युक्त रहेगा।

नं. १२३४

मीन लग्न में ११ बुध

यदि मकर का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो माता एवं स्त्री पक्ष से बड़ा भारी सुख लाभ प्राप्त करेगा तथा रोजगार व्यापार के मार्ग से विवेक शक्ति के द्वारा बड़ी भारी आमदनी पैदा करेगा और गृहस्थ सम्बन्ध में उत्तम लाभ रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या में बड़ी भारी सफलता करेगा तथा विवेक की शक्ति का स्वामी बुध जब बुद्धि स्थान को देख रहा है तो बुद्धि और वाणी से यश पायेगा।

नं. १२३५

मीन लग्न में १२ बुध

यदि कुम्भ का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो माता के सुख में बड़ी हानि रहेगी और स्त्री पक्ष में सुख सम्बन्धों की बड़ी कमजोरी रहेगी तथा मकानादि भूमि आदि को परेशानी मिलेगी अर्थात्‌ घरेलू वातावरण में अशान्ति का सा योग रहेगा तथा रोजगार के लिये दूसरे बाहरी स्थानों के सम्पर्क से कामयाबी पायेगा; किन्तु निजी स्थानों में हानि रहेगी तथा विवेक शक्ति के योग से खर्चा खूब होगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शान्ति युक्त दैनिक व्यवहारिक कुशलता के योग से शत्रु स्थान में कामयाबी पायेगा तथा धैर्य से काम करेगा।

नं. १२३६

राज्य, पिता तथा देहस्थानपति-गुरु

यदि मीन का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह के अन्दर बड़ा भारी प्रभाव और सुन्दरता पायेगा और पिता की शक्ति का उत्तम योग प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान

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मीन लग्न में ३ गुरु

भरोसा रखेगा और राज समाज में प्रभाव का योग प्राप्त करेगा तथा पिता एवं भाई बहिन के सम्बन्ध में कुछ थोड़ा सा मतभेद युक्त शक्ति पायेगा तथा कारबार के पक्ष में महानता और हिम्मत शक्ति से द्वारा उन्नति करेगा तथा पाँचर्वी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम कर्म के द्वारा रोजगार के मार्ग में बड़ी उन्नति करेगा और स्त्री स्थान में आत्मशक्ति तथा प्रभाव का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के द्वारा भाग्य की बड़ी भारी उन्नति करेगा और धर्म कर्म का पालन करेगा तथा नवमी नीच दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी पायेगा।

नं. १२३९

मीन लग्न में ४ गुरु

यदि मिथुन का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो माता की विशेष शक्ति का योग प्राप्त करेगा और भूमि और मकानादि की उत्तम शक्ति मिलेगी तथा अपने स्थान में सुख पूर्वक मानयुक्त रहेगा और देह में सुन्दरता एवं प्रभाव रहेगा तथा घरेलू वातावरण में सुख प्राप्ति के उत्तम साधन प्राप्त होंगे और पाँचर्वी दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी और पुरातत्व सम्बन्ध में कोई लाभ शक्ति का सहयोग पायेगा और सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति से उन्नति पायेगा तथा राज समाज में मान प्रतिष्ठा रहेगी और कारबार से सुख शक्ति पायेगा और नवमी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा, किन्तु खर्चे के मार्ग में कुछ असुविधा युक्त वातावरण रहेगा और बाहरी स्थानों में कुछ नीरसतायुक्त मार्ग से विशेष सम्बन्ध रखेगा।

नं. १२४०

यदि कर्क का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर उच्च का होकर बैठा है तो विद्या स्थान में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा प्रभावशाली बोलने वाला बनेगा और संतान पक्ष में विशेष उत्तम शक्ति पायेगा तथा पिता स्थान की शक्ति

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मीन लग्न का फलादेश

पायेगा और राज समाज में इज्जत और मान प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में उन्नति पाने के लिये विशेष प्रयत्नशील रहेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म का पालन एवं ध्यान रखेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी पायेगा तथा आमदनी के लिये कुछ लापरवाही करेगा और नवमी दृष्टि से देह के स्था को स्वयं अपनी मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर सुन्दरता और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करेगा और हृदय में स्वाभिमान एवं गौरव पायेगा तथा नाम प्रसिद्धता और इज्जत प्राप्त करेगा।

नं. १२४१

मीन लग्न में ५ गुरु

मीन लग्न में ६ गुरु

यदि सिंह का गुरु- छठे स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और कुछ परतंत्रता युक्त एवं कुछ रोग युक्त रहेगा तथा कुछ परिश्रम की अधिकता के कारण शान्ति कम मिलेगी। किन्तु शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और अपने दैहिक परिश्रम के योग से उन्नति प्राप्त करने के लिये सदैव तत्परता से काम करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के योग से खर्च करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ अरुचिकर रूप से सम्बन्ध रखेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहो है, इसलिये धन की वृद्धि करेगा तथा कुटुम्ब की कुछ उत्तम शक्ति पायेगा और विशेष परिश्रम के योग से मान प्रतिष्ठा और इज्जत प्राप्त करेगा।

नं. १२४२

यदि कन्या का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ी सुन्दरता एवं प्रभाव और मानयुक्त आत्मीयता का योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के पक्ष में महान शक्ति प्राप्त करेगा तथा पिता की शक्ति का उत्तम सहयोग पायेगा और राज-समाज में मान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा कारबार की उन्नति के लिये

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मीन लग्न में ७ गुरु

विशेष प्रयत्न करेगा और पाँचवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी और मुनाफा का हिस्सा कमजोर रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और सुडौलता प्राप्त करेगा तथा अच्छा स्वास्थ्य रहेगा और देह में मान प्रतिष्ठा प्रभाव और ख्याति तथा स्वाभिमान प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से भाई एवं पुरुषार्थ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग से भाई बहिन की शक्ति का अच्छा सहयोग पायेगा और पुरुषार्थ कर्म के पक्ष में कुछ अधिक परिश्रम करके सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. १२४३

मीन लग्न में ८ गुरु

यदि तुला का गुरु- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की तरफ से परेशानी रहेगी और राज-समाज के सम्बन्ध में मान प्रतिष्ठा की कमी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के लिये बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी और देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य में बड़ी कमजोरी रहेगी तथा दूसरे स्थान का सहवास पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और आयु स्थान में वृद्धि रहेगी तथा पाँचर्वी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक होने के कारण कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से अरुचिकर मार्ग से शक्ति सम्पर्क स्थापित करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन की कुछ वृद्धि करेगा और कुटुम्ब का कुछ सुन्दर सहयोग पायेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता का और भूमि का कुछ सुन्दर सम्पर्क पायेगा तथा रहने के स्थान में कुछ सुख शक्ति प्राप्त करेगा।

यदि वृश्चिक का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र मंगल की वृश्चिक राशि पर बैठा है तो भाग्य की महान शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म कर्म का पालन करेगा तथा ईश्वर में निष्ठा और भक्ति पायेगा और राज-समाज के अन्दर मान प्रतिष्ठा एवं प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति का सुन्दर सहयोग पायेगा तथा कारबार के मार्ग में भाग्यबल से सफलता

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मीन लग्न का फलादेश

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मीन लग्न में ९ गुरु

प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये देह में महान् सुन्दरता एवं प्रभाव की शक्ति पायेगा और स्वाभिमान तथा आत्माभिमान रखेगा और सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहन के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त भाव से अच्छा सम्बन्ध रखेगा और पराक्रम की सफलता शक्ति पायेगा तथा नवमी उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की महान उत्तम शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में बहुत उन्नति रहेगी तथा वाणी में कलात्मक शक्ति रहेगी।

नं. १२४५

मीन लग्न में १० गुरु

यदि धनु राशि का गुरु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी धनु राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता स्थान की महान उन्नति करेगा तथा राज समाज में बड़ा भारी प्रभाव और मान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा बड़ा ऊँचा आदर्शवाला कारबार करके सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और देह के अन्दर सुन्दरता एवं प्रभाव की शक्ति रखेगा तथा स्वाभिमानी बनेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी शानदार के साथ धनु की उन्नति करेगा और कुटुम्ब का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा बड़ा भारी इज्जतदार समझा जायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता की सुख शक्ति पायेगा और भूमि, मकानादि के सुख सम्बन्ध का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और रहने के स्थान में सजावट का ध्यान रखेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव और विजय शक्ति पायेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी भारी धैर्य की शक्ति से सफलता पायेगा तथा बड़ी भारी बहादुरी एवं हिम्मत शक्ति रखेगा और हुकुमत रखेगा।

नं. १२४६

यदि मकर का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी कमी रहेगी तथा देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कमजोरी रहेगी तथा पिता स्थान के लाभ सम्बन्धों में दिक्कतें रहेंगी और राज-समाज के पक्ष में मान प्रतिष्ठा की

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मीन लग्न में ११ गुरु

कमी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में बड़ी रुकावटें रहेंगी और देह के परिश्रम से थोड़ा लाभ प्राप्त होगा और पाँचवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभराशि में देख रहा है इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के योग से अच्छा सम्बन्ध

नं. १२४७

है, इसलिये विद्या बुद्धि में अच्छी शक्ति पायेगा तथा संतान पक्ष में कोई विशेष उन्नति का योग पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के पक्ष में सुन्दरता और शक्ति प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में १२ गुरु

यदि कुम्भ का गुरु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की कुम्भ राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष करने के कारणों से परेशानी रहेगी और देह के पक्ष में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता

नं. १२४८

की कमी रहेगी और पिता के सुख में कमी एवं कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और राज-समाज के पक्ष में मान सम्मान की कमी रहेगी और कारबार के मार्ग में हानि एवं उन्नत्ति में रुकावटें प्राप्त करेगा

तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि को सुख शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी दानाई से काम निकालेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में धैर्य से काम करेगा तथा नवमी दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है,

इसलिये आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध में कोई सहायता शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव प्राप्त करेगा।

भाई, पराक्रम, आयु, पुरातत्वस्थानपति-शुक्र यदि मान के शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह में सुन्दर सुडौलता एवं विशालता प्राप्त करेगा तथा उत्तम आयु पायेगा और भाई बहिन की विशेष

शक्ति रहेगी तथा पराक्रम स्थान में शक्ति और हिम्मत की विशेषता रहेगी

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मीन लग्न का फलादेश

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मीन लग्न में १ शुक्र तथा पुरातत्व स्थान में उत्तम शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में मस्ती और आनन्द पायेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री के सुख में कमी एवं कुछ कष्ट का योग पायेगा और रोजगार के मार्ग में कई प्रकारों से कभी-कभी कमजोरियाँ प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में कुछ असंतोष मानेंगा।

नं. १२४९

मीन लग्न में २ शुक्र यदि मेष का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो पुरुषार्थ की शक्ति के द्वारा धन कमाने का विशेष प्रयत्न करेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति पूर्ण नहीं कर सकेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का सा कार्य भी करता है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में कुछ सुख की कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्री को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ बड़ी चतुराई और पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त करेगा तथा अमीरात के ढंग से दिनचर्या व्यतीत करेगा।

नं. १२५०

मीन लग्न में ३ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो भाई की शक्ति पायेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण भाई बहिन के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी या कुछ परेशानी रहेगी और पराक्रम स्थान की सफलता शक्ति पायेगा और आयु स्थान में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व की शक्ति का विशेष बल पायेगा और अपने बाहुबल के कार्यों से बड़ी हिम्मत तथा भरोसा प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति में कुछ थोड़ी सी दिक्कतों के योग से शक्ति पायेगा और धर्म के मार्ग में कुछ त्रुटियुक्त वातावरण से धर्म का पालन करेगा।

नं. १२५१

यदि मिथुन का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण माता के सुख...

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मीन लग्न का फलादेश

करेगा और बाहरी स्थानों का कुछ सम्बन्ध पायेगा।

मीन लग्न में ७ शुक्र

यदि कन्या का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की कन्या राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष एवं नीच होने के दोष के कारण स्त्री के स्थान में एवं रोजगार के स्थान में परेशानियों के कारण प्राप्त करते हुए कुछ त्रुटि युक्त मार्ग से गृहस्थ का संचालन कर सकेगा और भाई-बहिन के पक्ष से कमी और कुछ क्लेश रहेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और आयु तथा जीवन की दिनचर्या तथा पुरातत्व की तरफ से कुछ असंतोष प्रतीत होगा

नं. १२५५

और सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर कुछ विशालता प्राप्त करेगा।

यदि तुला का शुक्र- आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु स्थान में एवं पुरातत्व स्थान में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा किन्तु मृत्यु स्थान के दोष के कारण से भाई-बहिन के पक्ष से बड़ा असंतोष रहेगा और पराक्रम जीवन में कुछ मस्ती और वेफिकरी का भी योग प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ी शक्ति और चतुराई का प्रयोग करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से धन और कुटुम्ब की सफलता के स्थान में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ८ शुक्र

नं. १२५६

यदि वृश्चिक का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आयु की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का फायदा भाग्यबल से प्राप्त करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से भाग्य की उन्नति में कुछ परेशानी रहेगी और धर्म का पालन ठीक तौर पर नहीं कर सकेगा तथा सुयश की कमी रहेगी और जीवन की दिनचर्या में मस्ती और आनन्द अनुभव करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी वृश्चभ राशि में स्वक्षेत्र को

नं. १२५७

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मीन लग्न का फलादेश

मीन लग्न का फलादेश मार्ग में तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ परेशानी के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी और चतुराई के योग से तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा प्रभाव पायेगा तथा झंझटों को बुरा समझेगा।

आमद, खर्च तथा बाहरी स्थानपति-शनि

यदि मीन का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष के कारण देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कुछ परेशानी अनुभव करेगा, किन्तु देह के द्वारा खर्चा और आमदनी की खास संचाल शक्ति पायेगा और बाहरी स्थानों में सम्बन्ध की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है इसलिये लाभेश होने का गुण और व्ययेश होने का दोष इन दोनों कारणों से भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान के सम्बन्धों में हानि लाभ दुःख सुख दोनों की प्राप्ति करेगा तथा हिम्मत शक्ति से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ दुःख सुख प्राप्त रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ हानि लाभ दोनों का योग प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष में कुछ दैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ परेशानी से प्रभाव रहेगा।

नं. १२६१

यदि मेष का शनि- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति में हानि और कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब का सुख बहुत थोड़ा प्राप्त होगा और व्ययेश होने के दोष के कारण धन का बेजां तौर से खर्च होता रहेगा तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध भी हानिकारक सिद्ध होगा

नं. १२६२

और तीसरी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश-लाभेश होने के दोष-गुण के कारण माता और भूमि के सुख सम्बन्धों में दुःख सुख एवं हानि लाभ का योग पायेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व

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स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरुषत्व की लाभोन्नति प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में मस्ती रखेगा तथा दसवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्रा को देख रहा है, इसलिये आमदनी की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और धन की आमदनी का विशेष योग मिलेगा किन्तु धन के जोड़ने के पक्ष में सदैव कमजोर रहेगा।

मीन लग्न में ३ शनि

यदि वृषभ का शनि- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो लाभेश होने के गुण और व्ययेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन के पक्ष से कुछ सुख-दुःख एवं लाभ-हानि का योग पायेगा और पराक्रम शक्तिः के द्वारा आमदनी एवं खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा तथा तीसरे स्थान पर गुरु ग्रह बलवान होता है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के द्वारा विशेष सफलता प्राप्त करेगा और बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष कारण से संतान पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी और विद्या स्थान में कुछ कमी रह जायेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रह. है, इसलिये भाग्य ओर धर्म के अन्दरूनी मार्ग में कुछ कमी रहेगी और दसवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी कुर्म राशि में स्वक्षेत्रा को देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों से लाभ की शक्ति पायेगा।

नं. १२६३

मीन लग्न में ४ शनि

यदि मिथुन का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो लाभेश होने के गुण और व्ययेश होने के दोष के कारण माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी और कुछ हानि से युक्त लाभ शक्ति प्राप्त करेगा और मातृ भूमि एवं मकानादि की कुछ हानि एवं विवादों में कुछ बाद भूमि को कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण के अन्दर सुख शान्ति में कुछ बाधा रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी के संयोग से प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ हानि लाभ पायेगा और

नं. १२६४

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मीन लग्न में ६ शनि

पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त होगा तथा जीवन में उमंग और प्रभाव रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों से अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा किन्तु छठे बेथन के कारण आमदनी और खर्चों में जितना बाहरी प्रभाव रहेगा उतना अन्दरूनी आनन्द नहीं रहेगा और दशवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मित्र के साथ सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम शक्ति में सफलता और हिम्मत रहेगी।

शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के सुख में कुछ कमी के साथ सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम शक्ति में सफलता और हिम्मत रहेगी।

मीन लग्न में ७ शनि

यदि कन्या का शनि- सातवें स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो लाभेश होने के गुण और व्ययेश होने के कारण स्त्री स्थान में कुछ हानि और परेशानी पाने के बाद कुछ शक्ति पायेगा तथा इसी प्रकार रोजगार के मार्ग में कुछ हानि लाभ का योग प्राप्त करेगा तथा खर्चा अधिक रहने के कारणों से गृहस्थ में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ दुःख-सुख का योग पायेगा और धर्म का थोड़ा लाभ पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिए देह में कुछ कमजोरी तथा कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और दशवें मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है। इसलिये माता के सुख में कुछ हानि लाभ का योग पायेगा और भूमि मकानादि के सुख प्राप्ति में कुछ कमी के साथ सफलता पायेगा।

यदि तुला का शनि- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु की विशेष वृद्धि करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा तथा बाहरी दूसरे स्थान के योग से ही आमदनी का मजबूत योग बनेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से और अष्टम में बैठने के दोष कारण से आदमनी के मार्ग में कुछ परेशानी और अधिक दौड़धूप का योग प्राप्त रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से पिता

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मीन लग्न का फलादेश

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मीन लग्न में ८ शनि

नं. १२६८

एवं राज्य स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ साधारण सम्पर्क रहेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु मंगल का मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति का अभाव रहने के कारणों से कुछ परेशानी बनेगी और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कष्ट और कमी के कारण प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष कारण से संतान पक्ष में कुछ हानि ओर कमी के कारण बनेंगे तथा विद्यास्थान में कुछ कमजोरी रहेगी और दिमाग के अन्दर खर्च एवं लाभ की वजह से कुछ चिन्ता रहेगी।

मीन लग्न में ९ शनि

नं. १२६९

यदि वृश्चिक का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से खर्च का संचालन कर सकेगा और बाहरी स्थानों का लाभ युक्त सम्बन्ध प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण भाग्य की उन्नति में कुछ बाधायें प्राप्त होती रहेंगी और धर्म के पालन में कुछ स्वार्थ युक्त धर्म का पालन करेगा और तीसरी दृष्टि से स्वयं अपने लाभ स्थान को मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की शक्ति से आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और धर्म स्थान के योग से भी लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहन के पक्ष में कुछ कमजोरी से सम्बन्ध पायेगा और पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाइयों के योग से शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और झंझट युक्त मार्ग से कुछ लाभ पायेगा।

यदि धन का शनि- दशम केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष कारण से कारबार की उन्नति के मार्ग में बड़ी दिक्कतें ओर राज-समाज के पक्ष में कुछ कमजोरी युक्त लाभ का ढंग रहेगा किन्तु प्रभावयुक्त मार्ग के द्वारा आमदनी का योग प्राप्त -

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मीन लग्न में १० शनि करेगा और तीसरी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब शानदार करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ और प्रभाव की शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी युक्त लाभ रहेगा और भूमि मकानादि के सम्बन्ध में कुछ थोड़ा सुख प्राप्त रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के कारण स्त्री पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और रोजगार के पक्ष में कुछ हानियों के योग से लाभ प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ११ शनि यदि मकर का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्रा बैठा है तो आमदनी के स्थान पर क्रूर ग्रह का बैठना विशेष शक्ति का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से तथा खर्च की शक्ति से बहुत धन पैदा करेगा और खर्चा भी खूब करेगा तथा व्ययेश होने के दोष के कारण से आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता की कमी रहेगी और धन के आवागमन के मार्ग से देह को विशेष दौड़-धूप और चिंतिंत रहने का कष्ट प्राप्त होगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की सफलता के मार्ग में कुछ परेशानी एवं कुछ कमजोरी रहेगी और सन्तान पक्ष के सम्बन्ध में व्ययेश दोष के कारण कुछ हानि और कुछ चिन्ता रहेगी तथा वाणी के अन्दर कुछ नीरसता और कुछ स्वार्थ परायणता का विशेष ढंग रहेगा, इसलिये धनोपार्जन का मुख्य ध्यान रहेगा।

तथा दसवीं उच्च और मित्र दृष्टि से अष्टम भाव, पुरातत्त्व स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है। अतः अष्टम स्थान आयु का कारक तो है ही, शनि भी आयु कारक ग्रह है, इसलिए आयु अच्छी रहेगी, पुरातत्त्व का लाभ भी प्राप्त होगा। देशान्तर भ्रमण का अवसर प्राप्त होगा।

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मीन लग्न का फलादेश

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यदि कुम्भ का शनि- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो खर्च का संचालन विशेष रूप से करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष लाभदायक सम्बन्ध प्राप्त करेगा, किन्तु निजी स्थान में आमदनी की तरफ से कुछ परेशानी रहेगी क्योंकि लाभेश को व्ययेश होने का दोष है और व्यय स्थान में ही बैठ गया है।

यह तीसरी नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये नगद धन की संग्रह शक्ति का बड़ा भारी अभाव रहेगा और कुटुम्ब की तरफ से हानि रहेगी अर्थात् धन और कुटुम्ब की तरफ से चिन्ता के कारण प्राप्त होंगे तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ थोड़ी-सी परेशानी के योग से कार्य बनेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष के कारण भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ बाधायें रहेंगी और लाभेश होने के कारण कुछ भाग्य में शक्ति भी मिलेगी और धर्म की कुछ कमजोरी रहेगी और यश थोड़ा मिलेगा।

कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के आधिपति-राहु

यदि मीन का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु गुरु राशि में बैठा है तो देह की सुख शान्ति और सुन्दरता में कमी करेगा और देवगुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये मान प्राप्त करने का विशेष साधन तथा उपाय करेगा और कठिनाई के योग से मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा अपने व्यक्तित्व की उन्नति के लिये बड़ी गुप्त और गहरी युक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा किन्तु अपने अन्दर खास तौर से कुछ कमी अनुभव करेगा तथा अन्धकार वातावरण पर भी कायापलट पाने में सफल हो सकेगा और कभी-कभी गहरे संकट का सामना प्राप्त करेगा, किन्तु अपनी उन्नति के मार्ग में बार-बार प्रयत्नशील होकर सफल बनेगा।

यदि मेष का राहु- दूसरे धन भवन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति के अभाव के कारण बड़ा भारी कष्ट अनुभव करेगा और कुटुम्ब के स्थान में कमी और कष्ट के कारण कष्ट अनुभव करेगा

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मीन लग्न में ८ राहु

यदि तुला का राहु- आठवें आयु एवं मृत्यु तथा पुरातत्व स्थान में मित्र शुक्र को राशि पर बैठा है तो जीवन और आयु के सम्बन्ध में अनेकों बार चिन्ता और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि और कमी का योग पायेगा और आठवें स्थान से उदर का भी सम्बन्ध है, इसलिये पेट के अन्दर कुछ परेशानी या कुछ बीमारी का योग रहेगा और कभी-कभी जीवन निर्वाह तथा जीवन संचालन के मार्ग में विशेष चिन्ताओं का योग प्राप्त करेगा, किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी भारी गम्भीर चतुराई के योग से जीवन निर्वाह की शक्ति पायेगा और इसी चतुराई के बल से कुछ मुफ्त का सा पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और प्रकट रूप में शानदार जीवन रहेगा।

नं. १२८०

मीन लग्न में ९ राहु

यदि वृश्चिक का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्मस्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में बड़ी चिन्तायें रहेंगी और भाग्य की उत्क्रति के मार्ग में हमेशा कुछ न कुछ दिक्कतों और परेशानियों से टकराना पड़ेगा तथा धर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और सुयश प्राप्ति का कुछ अभाव रहेगा। परन्तु गरम ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी हिम्मत शक्ति और गुप्त युक्ति के कठिन प्रयत्न से भाग्य की वृद्धि पायेगा और कठिन प्रयत्न के परिणाम स्वरूप कभी-कभी भाग्य में मुफ्त का-सा लाभ पायेगा और राहु के स्वाभाविक गुण के कारण कभी-कभी भाग्य के स्थान में महान् कष्ट का अनुभव करेगा, किन्तु भाग्य की उत्क्रति के लिये बराबर प्रयत्नशील रहकर शक्ति प्राप्त करेगा।

नं. १२८१

मीन लग्न में १० राहु

यदि धन का राहु- दमस केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में महान् कष्ट का योग पायेगा और राज-समाज में बड़ी भारी झंझट और परेशानी के कारण प्राप्त करेगा तथा उत्क्रति प्राप्त करने के मार्ग में अनेकों बार हानियाँ मिलेंगी और मान-सम्मान, प्रभाव आदि के पक्ष में कुछ कमी और लघुता प्राप्त होगी, किन्तु देवगुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये कमजोरी के अन्दर

नं. १२८२

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मीन लग्न का फलादेश

भी आदर्शवाद का दिखावा रखकर गुप्त युक्तियों के बल से अपना कार्य सम्पादन करेगा और बड़े-बड़े संघर्षों के मार्ग से अपनी इज्जत-आबरू बना सकेगा और अति गम्भीर युक्तियों के योग से अपने कारबार का मार्ग बनाकर चलेगा।

मीन लग्न में ११ राहु

यदि मकर का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल को देता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष लाभ प्राप्त करेगा और अपने वित्त से अधिक नफा खाने का योग प्राप्त करेगा और राहु के स्वाभाविक गुण के कारण कभी-कभी धनोपार्जन के लिये बड़ा कष्ट अनुभव करेगा, किन्तु गरम ग्रह मित्र शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये धन प्राप्ति के मार्ग में बड़ी भारी गुप्त युक्ति के बल से और धैर्य की महान शक्ति से विशेष सफलता प्राप्त करेगा और कभी-कभी मुफ्त को-सी धन भी प्राप्त करेगा और आमदनी की अधिक से अधिक वृद्धि करने के लिये बड़ी गहरी सूझ शक्ति से सदैव काम करता रहेगा।

नं. १२८३

मीन लग्न में १२ राहु

यदि कुम्भ का राहु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्च की संचालन शक्ति को पाने के लिये बड़ी कठिनाइयों का योग प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्पर्क में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा स्थिर ग्रह शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये खर्च के मार्ग को सुचारू बनाने के लिये गहरी युक्ति की सूझ शक्ति के द्वारा महान प्रयत्न करता रहेगा, परन्तु राहु के स्वाभाविक गुण के कारणों से खर्च के मार्ग में एवं बाहरी सम्बन्धों में कभी-कभी बड़ी भारी परेशानी एवं कमी और कष्ट के कारणों को सहन करेगा, किन्तु मित्र राशि पर होने के कारण कुछ संघर्षों के द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त करता रहेगा।

नं. १२८४

गुप्तपरिश्रमशक्ति, कमी, कष्ट के अधिपति-केतु

यदि मीन का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के सम्बन्ध में बड़ी चिन्तायें रहेंगी और कभी-कभी कोई सांगातिक चोट एवं मृत्यु तुल्य कष्ट का योग प्राप्त होगा और देह की

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मीन लग्न का फलादेश

मीन लग्न में ४ केतु दुःख अनुभव करेगा तथा घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की बड़ी कमजोरी रहेगी तथा घरेलू सुख शान्ति पाने के लिये कुछ निम्न श्रेणी के मार्ग से कार्य पूर्ति करेगा, क्योंकि विवेकी ग्रह बुध की मित्र राशि पर बैठा है, इसलिये गुप्त विवेक की अति गूढ़ शक्ति के द्वारा सुख प्राप्त के साधनों को कठिन परिश्रम के योग से प्राप्त कर सकेगा, फिर भी कभी-कभी घोर क्लेश का योग प्राप्त करेगा और गुप्त धैर्य से सुख मानेगा। यदि कर्क का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो विद्या ग्रहण करने के मार्ग में बड़ी जबरदस्त परेशानी का योग पायेगा और संतान पक्ष में बड़ा भारी कष्ट और कमी का योग प्राप्त करेगा तथा दिमाग के अन्दर बड़ी चिन्ताओं का गुप्त अनुभव करेगा तथा मन के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये विद्या बुद्धि एवं संतान पक्ष के कारणों से मन में फिकर और अशान्ति के विचारों को प्राप्त करेगा परन्तु मनोयोग की गुप्त परिश्रम शक्ति के द्वारा ही विद्या एवं संतान पक्ष की पूर्ति के कुछ साधन प्राप्त करेगा और केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी विचारों में किंकर्तव्य विमूढ़ता का योग पायेगा और कभी-कभी मजबूती पायेगा।

मीन लग्न में ५ केतु

यदि सिंह का केतु- छठे शत्रु स्थान में एवं परिश्रम और झंझट के स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर कूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये शत्रु का दमन करने के लिये और शत्रु पर विजय पाने के लिये गुप्त शक्ति के महान् परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा और बड़े-बड़े झगड़े-झंझटों में कामयाबी पायेगा तथा अपनी प्रभाव की वृद्धि करने के लिये बड़ी तत्परता और कठोरता के योग से सदैव कार्य करेगा। किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण शत्रु पक्ष में कभी-कभी अन्दरूनी बड़ी परेशानी अनुभव करेगा किन्तु। सूर्य की तेजस्वी राशि पर बैठा है, इसलिये कठिन से कठिन परिस्थिति में भी बहादुरी से विजय प्राप्त करेगा।

मीन लग्न में ६ केतु

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मीन लग्न का फलादेश

और धर्म की उन्नति का भी गुप्त ध्यान रखेगा; फिर भी धर्म, भाग्य और यश की कुछ कमी रहेगी।

यदि धनु राशि का केतु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्यस्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में और कारबार में बहुत उन्नति करेगा तथा राज-समाज के पक्ष में बड़ा प्रभाव रखेगा किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण पिता स्थान में कुछ संघर्ष प्राप्त करने के लिये महान् कठिन प्रयत्न और कठोर परिश्रम करेगा तथा देव गुरु बृहस्पति की राशि पर उच्च का बैठा है, इसलिये आदर्शवाद के मार्ग द्वारा उन्नति की महान् शक्ति प्राप्त करने के लिये सदैव गुप्त रूप से भारी दौड़ धूप करता रहेगा और कभी-कभी विशेष परेशानी का योग प्राप्त होने पर भी अपनी उन्नति करने के मार्ग में विशेष बहादुरी का काम करेगा।

मीन लग्न में १० केतु

नं. १२९४

यदि मकर का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि को राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और क्रूर ग्रह की राशि पर क्रूर ग्रह बैठा है, इसलिये अधिक लाभ पाने के लिये गुप्त परिश्रम की कठोर शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और सदैव पूर्वक स्वार्थ सिद्धि करने में लगा रहेगा,

किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण, आमदनी के मार्ग में कभी-कभी महान् कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा फिर भी आमदनी में कुछ कमी का योग अनुभव करने के कारण से आमदनी की वृद्धि करने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा।

मीन लग्न में ११ केतु

नं. १२९५

यदि कुम्भ का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में कुछ कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव करेगा, किन्तु गर्म ग्रह की राशि पर गर्म ग्रह बैठा है, इसलिये खर्च की संचालन शक्ति प्राप्त करने के लिये गुप्त परिश्रम शक्ति के योग से दौड़-धूप करके सफलता पायेगा और

मीन लग्न में १२ केतु

नं. १२९६

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भृगुसंहिता फल दर्पण

भृगुसंहिता : फलित सर्वाड्‌ग दर्शन

(फलित सूत्र भाग)

६४९

पञ्‍झाड प्रकरण

इसके पूर्व अपनी-अपनी जन्मकुण्‍डली और गोचर ग्रह स्थिति के अनुसार सार्वकालिक और दैनिक फल जानने की पद्धति को बताया गया है, यहाँ अब डा. सुरकान्त उन फलों को बतलाने में प्रयुक्त साधनों जैसे नक्षत्र, राशि, भाव, ग्रह आदि की जानकारी देने के लिए क्रम से उन विषयों का अलग-अलग विवेचन पञ्‍झाड वर्णन से करते है;- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण इनकी ही पञ्‍झाड संज्ञा है। उनमें से पहले तिथि को यहाँ कहा जा रहा है।

मासनक्षत्रप्रवृत्तविशेषण

पूर्वोक्त चैत्रादि बारह मासों का नाम, उनकी पूर्णिमा तिथि को उदित नक्षत्र वश सिद्ध होती है। जैसे चैत्र-चित्रा नक्षत्र से, वैशाख-विशाखा नक्षत्र से, ज्येष्ठ-ज्येष्ठा, आषाढ-पूर्वाषाढ, श्रावण-श्रवण, भाद्रपद-पूर्वाभाद्रपद, आश्विन-अश्विनी, कार्तिक-कृतिका, मार्गशीर्ष-मृगशिरा, पौष-पुष्य, माघ-मघा, फाल्गुन-पूर्वाफाल्गुनी, इन्हीं नक्षत्रों को मास नक्षत्र कहा जाता है। अब मास नक्षत्र से दैनिक नक्षत्र तक गिनकर जितनी नक्षत्र संख्या हो, उतनी तिथि की संख्या भी क्रम से जाननी चाहिए।

तिथि कथन

१. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४. चतुर्थी, ५. पञ्चमी, ६. षष्ठी, ७. सप्तमी, ८. अष्टमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी, १५. पञ्‍ञदशी-ये तिथियाँ शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों के क्रम से कुल तीस तिथि चान्द्रमास में होते हैं। वहाँ पञ्‍ञदशी तिथि से शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि और कृष्ण पक्ष में अमावस्या तिथि का बोध करना चाहिए।

पूर्णिमा-अमावास्या की संज्ञाएँ

जिस पूर्णिमा में चन्द्रकला अपूर्ण हो या चतुर्दशी युक्ता पूर्णिमा को 'अनुमति' और जिस पूर्णिमा में चन्द्रकला पूर्ण हो, उस पूर्णिमा को 'राका' कहा जाता है। उसी प्रकार, जिस अमावास्या में चन्द्रकला दृश्य हो या चतुर्दशी युक्ता अमावास्या हो, तो उस अमावास्या को 'सिनीवालि' और

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६५०

पञ्चाङ्ग प्रकरण

जिस अमावास्या में, चन्द्रकला का पूर्णत: अभाव हो; उस अमावास्या को 'कुहू' कहा जाता है।

शुभाशुभ तिथि कथन

प्रतिपदा सिद्धि देने वाली, द्वितीया कार्य साधन करने वाली, तृतीया आरोग्यदायिनी, चतुर्थी हानि देने वाली, पञ्चमी शुभ, षष्ठी अशुभ, सप्तमी शुभ, अष्टमी व्याधि नाश करने वाली, नवमी मृत्यु देने वाली, दशमी द्रव्य देने वाली, एकादशी शुभ देने वाली, द्वादशी सब प्रकार से सिद्धि देने वाली, त्रयोदशी सर्व सिद्ध करने वाली, चर्तुदशी उग्रता प्रदान करने वाली, पूर्णिमा पुष्टि करने वाली, अमावास्या अशुभ तिथि है।

तिथियों के अपर नाम

प्रतिपदा आदि तिथियों के नाम क्रमश: वृद्धिदा, सुमझ्ला, सबला, खला, श्रीमति, कीर्ति, मित्रपदा, बलवती, उग्रा, धमिर्णी, नन्दा, यशवती, जयकरी, क्रूरा, सौम्या, दर्श आदि मुनियों ने बताया है।

तिथि स्वामी

प्रतिपदा के तिथियों के स्वामी क्रमश: अग्नि, ब्रह्मा, गौरी, गणेश, सर्प, स्कन्द, सूर्य, शिव, यम, विश्वेदेव, हरि, मदन, शिव और चन्द्र हैं। अमावास्या का स्वामी पितर कहा गया है।

तिथि स्वामी प्रयोजन

तिथि स्वामियों के ज्ञान का व्यवहार में बहुत ही प्रयोजन रहता है। किसी देवता की प्रतिष्ठा में उसकी अपनी तिथि का प्रयोजन होता है।

दीक्षा ग्रहण में इष्टदेव की तिथि का प्रयोजन होता है। पवित्रार्पण और दमनारोप में भी इसका प्रयोजन कहा गया है। ग्रहशान्ति में भी ग्रह की अधिदेवता आदि की तिथियों का प्रयोजन होता है। अपने दैनिक कार्य के सिद्धि के लिए भी उसका प्रयोजन होता है। जैसा गर्ग आदि महर्षियों ने कहा है, वैसा बुद्धिमानों द्वारा उसे उस तिथि को ग्रहण करना चाहिए।

तिथि संज्ञा

नन्दा १-६-११ तिथियों की संज्ञा है। भद्रा २-७-१२ तिथियों की, जया ३-८-१३ तिथियों की, रिक्ता ४-९-१४ तिथियों की और पूर्णा ५-१०-१५ तिथियों की संज्ञा कही गई है। शुक्लपक्ष में प्रतिपदा से पञ्चमी तक अशुभ, षष्ठी से दशमी तक मध्यम और एकादशी से पूर्णिमा तिथि तक उत्तम तथा कृष्ण पक्ष में उक्त के

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विपरीत अर्थात् १ से ५ उत्तम, ९-१० मध्यम और ११-१५ अधम कहा गया है।

वारों के नाम

सात वारों के नाम इस प्रकार जाने-रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार व शनिवार।

वार का आरम्भ

अग्र लिखित वार विहित कर्म की सिद्धि के लिए लड़्खा में सूर्योदय काल से ही वार ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि लड़्खा में सूर्योदय के समय में ही सृष्टा ने सृष्टि का सृजन किया था। सम्प्रति व्यवहार में ‘उदयादुदयं यावद्’ के अनुसर अपने सूर्योदय से ही लोग वार ( सावन दिन ) को व्यवहार में लाते हैं, जो सिद्धान्तः उचित नहीं। विद्वानों को विचार करना चाहिए।

रविवार के कर्म

राज्याभिषेक, उत्सव, यात्रा, राजसेवा, गाय-बैल का क्रय-विक्रय, हवन करना, मन्त्रोपदेश करना, औषध तथा शस्त्र निर्माण करना, सोना, ताँबा, ऊन, चर्म, काष्ठ ( लकड़ी ) कर्म, युद्ध और क्रय-विक्रय इत्यादि कर्म रविवार को करने चाहिए।

सोमवार के कर्म

शङ्ख, मोती, मोती, चाँदी, ईख, भोजन, स्त्री संगर्ग, वृक्ष, कृषि, जलादिकर्म, अलङ्कार, गाना, यज्ञकर्म, दूध-दही मथना, सींग पढ़ाना, पुष्प, वस्र कार्य सोमवार को करने चाहिए।

भौमवार के कर्म

भेद, अनृत, चोरी, विष, अग्नि, शस्त्र, वध, वन्ध्या, घात, संग्राम, कपट व दम्भादि कर्म, सेना का पड़ाव, खान, धातु, सुवर्ण मूंगा, रत्नादि कर्म मङ्गल को प्रशस्त हैं।

बुधवार के कर्म

चातुर्य, पुण्य, अध्ययन, कला, शिल्पशास्त्र, सेवा, लिखना, चित्र काछना, धातुक्रिया, सोने के जड़ाऊ अलङ्कार युक्ति, सन्धि ( समझौता ), व्यायाम और वाद करना, ये कर्म बुधवार को करने चाहिए।

गुरुवार के कर्म

धर्म करना, नवग्रहादि पूजा, यज्ञ, विद्याभ्यास, माङ्गलिक कर्म, स्वर्ण

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कार्य, वस्त्र, गृह बनाना, यात्रा, रथ, अश्व, औषधि, विभूषण आदि कृत्य गुरुवार को करना चाहिए।

शुक्रवार के कर्म

स्त्री प्रसङ्ग, गायन, शय्या, मणि, रत्न, गन्ध, वस्त्र, उत्सव, अलङ्कार, वाणिज्य, भूमि, दूकान, गौ, द्रव्य तथा खेती आदि कार्य शुक्रवार को प्रशस्त है।

शनिवार के कर्म

लोहा, पत्थर, सीसा, जस्ता, शस्त्र, दास, दुष्टकर्म, झूठ बोलना, चोरी, विष, अर्क निकालना, गृह प्रवेश, हाथी बाँधना, दीक्षा ग्रहण करना और स्थिर कर्म शनिवार को करने चाहिए।

वारों के देवता अधिदेवता

शिव, पार्वती, स्कन्द, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र और काल ये सात क्रम से सूर्यादि वारों के देवता जानना चाहिए। अग्नि, जल, भूमि, हरि, इन्द्र, इन्द्राणी और ब्रह्मा ये सात सूर्यादि वारों के अधिदेवता मुनियों ने कहा है।॥१०१॥

शुभाशुभ वार

चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र ये शुभवार शुभकर्म में प्रशस्त हैं और सूर्य, मङ्गल और शनि अशुभ वार सदा अशुभ, कूर कर्म के लिए हैं।

वार की स्थिरादि संज्ञा

सूर्य स्थिर, चन्द्र चर, मङ्गल उग्र, बुध सम, गुरु लघु, शुक्र मृदु और शनि तीक्ष्ण कहे गये हैं।

नक्षत्र ज्ञान प्रकार

चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से गत मास संख्या को दो से गुणाकर वर्तमान तिथि संख्या को जोड़ना चाहिए। योग फल में से एक घटाकर शेषांक को २७ से भाग देने पर शेष संख्या तुल्य वर्तमान तिथि में नक्षत्र होता है। कृष्ण पक्ष में २ और शुक्ल पक्ष में १ घटाकर २७ से भाग देने पर उपरोक्त क्रिया सही होगी।

जैसे-श्री शुभ मस्तु २०५१ वैशाख शुक्ल एकादशी को कौन-सा नक्षत्र सूर्योदय काल में है, इसे जानने के लिए गत मास = १ × २ = २ + ११ वर्तमान तिथि = १३ – १ शुक्ल पक्ष होने से = १२ ÷ २७; लब्धि = ० और शेष = १२, अतः शेष तुल्य बारहवीं अश्विनादि नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी सिद्ध हुआ।

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१. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी, ५. मृगाशिरा, ६. आर्द्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्य, ९. आश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वाफाल्गुनी, १२. उत्तराफाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाती, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढ़ा, २१. उत्तराषाढ़ा, २२. अभिजित्, २३. श्रवण, २४. धनिष्ठा, २५. शतभिषा, २६. पूर्वभाद्रपद, २७. उत्तराभाद्रपद, २८. रेवती।

विशेष- नक्षत्र चक्र में २७ नक्षत्र के साथ अभिजित् नक्षत्र को सम्मिलित कर देने से नक्षत्र संख्या २८ भी माने गए हैं। इस अभिजित् नक्षत्र का समावेश दो नक्षत्र उत्तराषाढ़ा का अन्तिम चरण १५ घड़ी और श्रवण के भोग का आदि पञ्चदशांश भाग ४ घड़ी अर्थात् १९ घड़ी भोग के अन्तर्गत किया गया है।

नक्षत्रों के स्वामी

अश्विनी नक्षत्र का स्वामी अश्विनी कुमार, भरणी का यम, कृत्तिका का अग्निदेव, रोहिणी का ब्रह्मा, मृगशिरा का चन्द्र, आर्द्रा का शिव, पुनर्वसु का अदिति, पुष्य का गुरु, आश्लेषा का सर्प, मघा का पितर, पूर्वाफाल्गुनी का भग, उत्तराफाल्गुनी का अर्यमा, हस्त का सूर्य, चित्रा का त्वष्टा, स्वाती का वायु, विशाखा का इन्द्राग्नि, अनुराधा का मित्र, ज्येष्ठा का इन्द्र, मूल का राक्षस, पूर्वाषाढ़ा का जल, उत्तराषाढ़ा का विश्वेदेव, अभिजित् का विधि, श्रवण का विष्णु, धनिष्ठा का वसु, शतभिषा का वरुण, पूर्वाभाद्रपदा का अजैकपाद, उत्तराभाद्रपदा का अहिर्बुध्न्य, रेवती की पूषा ( सूर्य ) स्वामी कहे गए हैं।

योग परिज्ञान

सूर्य और चन्द्र की दैनिक गति का योगफल, जब ८०० कला होता है, तो एक योग होता है। इस तरह के २७ प्रसिद्ध योग हैं, वे विष्कम्भ आदि नाम से जाने जाते हैं।

२७ योगों के नाम

१. विष्कम्भ, २. प्रीति, ३. आयुष्मान, ४. सौभाग्य, ५. शोभन, ६. अतिगण्ड, ७. सुकर्मा, ८. धृति, ९. शूल, १०. गण्ड, ११. वृद्धि, १२. ध्रुव, १३. व्याघात, १४. हर्षण, १५. वज्र, १६. सिद्धि, १७. व्यतीपात, १८. वरीयान, १९. परिघ, २०. शिव, २१. सिद्ध, २२. साध्य, २३. शुभ, २४. शुक्ल, २५. ब्रह्म, २६. ऐन्द्र और २७. वैधृति-ये सत्ताईस योग अपने-अपने नाम तुल्य शुभाशुभ फल करते हैं, अर्थात् अपने नाम के अर्थ जैसा ही फल करते हैं।

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विष्टि, ये सात चर करण हैं; ऐसा महर्षियों ने कहा है। कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के उत्तरार्ध में शकुनि, अमावास्या के पूर्वार्ध में चतुष्पद, उत्तरार्ध में नाग और शुक्लपक्ष प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किंस्तुघ्न नामक करण स्थित रहते हैं। ये चार स्थिर करण कहे जाते हैं।

करणों के स्वामी

बवादि चर करणों के स्वामी क्रम से इन्द्र, बह्मा, मित्र, अर्यमा, भूमि, श्री, और यम हैं। शकुनि आदि चार स्थिर करणों के स्वामी कल्पि, वृष, सर्प और वायु कहे गये हैं।

राशि प्रभेद प्रकरण

प्रलय काल में जब सम्पूर्ण जगत् अन्धकार में व्याप्त था और पृथ्वी जल से प्लावित थी, उस समय अचानक अपने प्रकाश से समस्त संसार को प्रकाशित करते हुए भगवान् सूर्य का उदय हुआ।

सूर्योदय से संसार की रचना हुई और ग्रहों के भ्रमणचक्र पर परिभ्रमण से उसे राशि चक्र के बारह विभाग विधित्र रूप से समय के आधार पर प्रस्तुत हुए।

अर्थात् नक्षत्रों के आधार पर राशियों के १२ भेद दृष्टिपथ पर आये। अभिप्राय यह है कि २७ नक्षत्र उनमें २७ × ४ = १०८ चरण तथा १०८/१२ = ९ चरण की राशि होती है। इसी प्रकार मेषादि १२ राशियाँ क्रम से कल्पित की गई हैं।

बारह राशियाँ— मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन ये क्रम से १२ राशियों के नाम हैं।

बारह राशियों के स्वरूप- कुम्भ राशि का रूप घट को धारण किए हुए पुरुष है।

मिथुन राशि स्त्री पुरुष का जोड़ा है, जो कि वीणा और गदा धारण किए हुए हैं।

मीन राशि का रूप युग्म मछली मिली हुई है।

धनु राशि का स्वरूप धनुष लिए कमर के ऊपर मनुष्य और कमर के नीचे घोड़ा के सदृश है।

मकर राशि हिरन के समान मुख वाला है।

कन्याराशि हाथ में दीपक लिए हुए नौका पर बैठी हुई कन्या है।

तुला राशि का रूप हाथ में तराजू लिए हुए है। शेष राशियों का स्वरूप नाम सदृश है।

काल पुरुष के अङ्ग- बारह राशियों को कालपुरुष का अङ्ग बताया

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मकर - मृगास्य, नक्र।

कुम्भ - घट, तोयधर।

मीन - अन्य, मत्स्य, पृथुरोम, झष।

राशि के पर्याय- राशि, ऋक्ष, क्षेत्र, भ, भवन ये राशि शब्द के पर्याय ( समानार्थक ) नाम पूर्व ऋषियों ने कहे हैं।

नक्षत्र से राशि परिज्ञान

चूचेचोलाजश्विनी प्रोक्ता लीलूलेलो भरण्यथ। आईऊए कृत्तिकास्यादोवावीवू तु रोहिणी॥

बेवोका की मृगाशिर: कुढाङछा तथार्द्रका। केकोहाही पुनर्वसूहेहोडा तु पुष्यभम॥

डीडूडेडो तु आश्लेषा मामीमू मघा स्मृता। मोटाटीडू पूर्वाफल्गु टेटोपाप्युत्तरा तथ॥

पूषाणठाहस्ततारा पेपोरारी तु चित्रका। हेरोते स्मृता स्वाती तूतूते विशाखिका॥

नानीनूने डनुराधक्ष ज्येष्ठा नोयायियू स्मृता। येयो भाभी मूलतारा पूर्वाषाढा बुधाफदा॥

भेभोजाज्युत्तरााषाढा जूजेजोखाझभिजिद्रवेत। खीखूखेखो श्रवणभं गागीगूरे धनिष्ठिका॥

गोसासीसू शतभिषकूसेसोदादी तु पूर्वभाक। दूथाझाझ यथा झेयो देदोचाची तु रेवती॥

अश्विनी-चू, चे, चो, ला; भरणी-ली, लू, ले, लो; कृत्तिका-अ, इ, ऊ, ए; रोहिणी-ओ, वा, वी, वू।

मृगशिरा-वे, वो, का, की; आर्द्रा-कू, घ, ङ, छ; पुनर्वसु-के, को, हा, ही; पुष्य-डू, हे, हो, डा;

आश्लेषा-डी, डू, डे, डो; मघा-मा, मी, मू, मे; पूर्वाफाल्गुनी-मो, टा, टी, टू; उत्तराफाल्गुनी-टे, टो, पा, पी;

हस्त-पू, ष, ण, ठ; चित्रा-पे, पो, रा, रो;

स्वाती-रू, रे, रो, ता; विशाखा-ती, तू, ते, तो;

अनुराधा-ना, नी, नू, ने; ज्येष्ठा-नो, या, यी, यूं;

मूल-ये, यो, भा, भी; पूर्वाषाढा-भू, धा, फा, ढा;

उत्तराषाढा-भे, भो, जा, जी; अभिजित-जू, जे, जो, ख; श्रवण-खी, खू, खे, खो; धनिष्ठा-गा, गी, गू, गे;

शतभिषा-गो, सा, सी, सू; पूर्वभाद्रपद-से, सो, दा, दी;

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उत्तराभाद्रपद- दू, थ, झ, ञ;रेवती- दे, दो, चा, ची नक्षत्र के प्रत्येक चरण का एक-एक अक्षर होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र के चार-चार चरण होते हैं। कुल बारह राशियाँ होती हैं। एक राशि में नौ-नौ चरण होते हैं। अतः पृथ्वी के चारों ओर नक्षत्रों के कुल २७ × ४ = १०८ चरण है।

न प्रोक्ता ड ज णा वर्णा तामादौ सन्ति ते नहि । चेद् भवन्ति तदा झेया गजडासते यथाक्रमम् ॥ स्वर चक्र में 'ड ज ण' ये वर्ण नहीं कहे गये हैं, क्योंकि ये तीनों वर्ण नाम के आदि में नहीं पाये जाते हैं। अगर किसी नाम आदि में हो तो वहां डकार के जगह गकार, जकार के स्थान में जकार तथा णकार के स्थान में डकार समझना चाहिए। यह स्वर विचार में कहे हैं। किन्तु इसका अर्थ कितने अनभिज्ञ उल्टा समझ कर शतपद चक्रानुसार नामकरण में लगाते हैं, वह माने योग्य नहीं है।

नाम के आदि अक्षर से नक्षत्र का ज्ञान यत्रामाद्याक्षरं यस्मिन् नक्षत्रस्य पदे भवेत् । तदेव तस्य नक्षत्रं विज्ञेयं गण कोत्तमैः ॥ जातक के नाम का प्रथम अक्षर जिस नक्षत्र के चारों चरण में से एक हो वह उस जातक का नक्षत्र होगा।

यदि नामिनि भवेद्द्वर्णः संयुक्ताक्षरलक्षणः । ग्राह्यस्तदादिमो वर्ण इत्युक्तं ब्रह्मयामले ॥ यदि नाम संयुक्त अक्षर द्वारा प्रारंभ होता है, तब उसका प्रथम वर्ण लेना चाहिए। उदाहरणार्थ 'श्रीकान्त' नाम में संयुक्त अक्षर 'श्र' है। जिसका प्रथम वर्ण 'श' कार है। अतः शतभिषा नक्षत्र होगा।

अनुक्तत्वादृकारस्य रेफो ग्राह्यो विचक्षणैः । ऋद्धिनाथस्य नक्षत्रं यथा चित्राख्यमेव ॥ शतपद चक्र में 'ऋ' कार नहीं है, अतः 'ऋ' कार के बदले 'र' अक्षर स्वीकार करना होगा। उदाहरणार्थ 'ऋद्धिनाथ' नाम में प्रथम अक्षर 'ऋ' कार है तब उसके स्थान पर 'र' अक्षर ग्रहण करके देखे तो चित्रा नक्षत्र होता है।

अ आ, इ ई, उ ऊ, ए ऐ, ओ औ, द्वो द्रौ मिथः समो । व वौ, शसौ तथैवात्र झेयौ दैवविदां सदा ॥ शतपद चक्र में अ तथा आ, इ और ई, उ और ऊ, ए और ऐ, ओ एवं औ दोनों को एक समान समझा जाता है तथा ब और व, श और स यह दो-दो अक्षर समान समझने चाहिए।

एक नक्षत्र जन्म विचार- यदि जातक का जन्म नक्षत्र ही माता, पिता

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क्रम नक्षत्र पाद-गताक्षर नक्षत्र योनि गण युष्टा नाड़ी राशि स्वामी

१. चु.चे.चो.ला. अश्विनी अश्व देव पूर्व आद्य मेष मं.

२. ली.लू.ले.लो. भरणी गज मनुष्य पूर्व मध्य मेष मं.

३. आ.इ.उ.ए. कृत्तिका मेष राक्षस पूर्व अन्त्य मेष1 वृ.३ मं.१शु३

४. ओ.वा.वि.वु. रोहिणी सर्प मनुष्य पूर्व अन्त्य वृषभ शु.

५. वे.वो.का.की. मृगशीर्ष सर्प देव पूर्व मध्य वृ.२ मि.२ शु.२ बु.२

६. कु.घ.ङ.छ. आर्द्रा धान मनुष्य मध्य आद्य मिथुन बु.

७. के.को.हा.ही. पुनर्वसु मार्जार देव मध्य आद्य मि.३ क.९ बु.३ चं.९

८. हु.हे.हो.डा. पुष्य मेष देव मध्य मध्य कर्क चन्द्र

९. डे.डू.डे.डो. आश्लेषा मार्जार राक्षस मध्य अन्त्य कर्क चन्द्र

१०. मा.मी.मू.मे. मघा मुषक राक्षस मध्य अन्त्य सिंह सूर्य

११. मो.टा.टी.टु. पू.फा. मुषक मनुष्य मध्य मध्य सिंह सूर्य

१२. टे.टो.पा.पी. उ.फा. गौ मनुष्य मध्य आद्य सि.१ कन्या३ सू.१ बु.३

१३. पू.ष.ण.ठ. हस्त महिषी देव मध्य आद्य कन्या बु.

१४. पे.पो.रा.री. चित्रा व्याघ्र राक्षस मध्य मध्य क.२ तु.२ बु.२ शु.२

१५. रु.रे.रो.ता. स्वाति महिषी देव मध्य अन्त्य तुला शुक्र

१६. ती.तू.ते.तो. विशाखा व्याघ्र राक्षस मध्य अन्त्य तु.३ वृ.९ शु.३ मं.९

१७. ता.ती.तू.ते. अनुराधा मृग देव मध्य मध्य वृश्चिक मंगल

१८. नो.या.यी.यु. ज्येष्ठा मृग राक्षस अन्त्य आद्य वृश्चिक मंगल

१९. ये.यो.भा.भी. मूल धान राक्षस अन्त्य आद्य धनु गुरु

२०. भू.धा.फा.ढा. पू.षा. कपि मनुष्य अन्त्य मध्य धनु गुरु

२१. भे.भा.जा.जी. उ.षा. नकुल मनुष्य अन्त्य अन्त्य ध.१ मकर३ गु.१ शा.३

२२. जु.जे.जो.खा. अभिजित् नकुल मनुष्य अन्त्य अन्त्य मकर शनि

२३. खी.खू.खे.खो. श्रवण कपि देव अन्त्य अन्त्य मकर शनि

२४. गा.गी.गू.गे. धनिष्ठा सिंह राक्षस अन्त्य मध्य म.२ कुं.२ शनि

२५. गो.सा.सी.सु. शतभिषा अश्व राक्षस अन्त्य आद्य कुम्भ शनि

२६. से.सो.दा.दि. पू.भा. सिंह मनुष्य अन्त्य आद्य कु.३ मो.९ शा.३ गु.९

२७. दु.थ.झ.ञ. उ.भा. गौ मनुष्य अन्त्य मध्य मीन गुरु

२८. दे.दो.चा.ची. रेवती गज देव पूर्व अन्त्य मीन गुरु

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भृगु संहिता फल दर्पण

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नागा राशि के वर्णादि सहित राशि-वर्गतालिका

जातक जिस अकारादि अक्षर का नाम होता है उसका स्वाभाविक वर्ण उसके अक्षर के वर्गस्वामी ग्रह होगा॥

उस पर उसे अपने वर्ग के नाम वर्ग का, मित्र वर्ग का और अपने से तीसरा वर्ग का इत्यादि समझना चाहिये। जैसे— गरुड वर्ग का सर्प मित्र होता है और सिह सम है। जैसे— गरुड का ज्ञान मित्र है। — गरुड का मित्र ज्ञान है।

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या भाई-बहन का भी जन्म नक्षत्र हो तो वह अशुभ होता है। ऐसी अवस्था में शास्त्रों में एक का विनाश लिखा है। हमारा अनुभव है कि ऐसी स्थिति में थोड़ी कमजोर ग्रह स्थिति वाला अपेक्षाकृत पिछड़ा रहता है, लेकिन दोनों ही वास्तव में सम्पूर्ण शुभ फलों का भोग नहीं कर पाते। इसकी शान्ति करनी चाहिए। एतदर्थ शुभ दिन में नक्षत्र के अधिपति देवता का पूजन धातु की मूर्ति बनवा कर करें। उस मूर्ति को पहले लाल कपड़े में लपेट कर ऊपर से वस्त्र रखकर कलश पर स्थापित करें। ग्रहादि पूजनोपरान्त पंचवारुणी होमोत्तर नक्षत्र देवता के मन्त्र की १०५ आहुतियाँ दें। पश्चात् कलशाम्बु से सब का अभिषेक करें। यह एक नक्षत्र जन्म विचार सर्वदा करना चाहिए। यदि कृष्णपक्ष में जन्म हो, तो तारा विचार करना आवश्यक है। जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मैत्र, अतिमैत्र ये ताराएँ प्रसिद्ध हैं। माता-पिता या भाई-बहन का जन्म नक्षत्र समान होने पर जन्म तारा का फल कह चुके हैं। अग्रज या माता-पिता के नक्षत्र से गणना करके जिस तारा में जातक का जन्म नक्षत्र পড়े तदनुसार फल गर्गाचार्य के मत से बताया जा रहा है।

दूसरी तारा में कल्याण करने वाला, तीसरी तारा में नित्य कलह करने वाला, चौथी क्षेमतारा में सरल स्वभाव व शुभ, पाँचवीं में शत्रुता, षष्ट तारा में सहायक, सप्तम तारा में अनिष्टकारक, अष्टम तारा में मित्र व नवम तारा में परमप्रिय होते हैं। सामान्यतः ताराएँ नाम तुल्य फल देने वाली होती हैं। अतः तीसरी, पाँचवीं, सातवीं ये अनिष्टकारक व शेष शुभ होती हैं। ध्यान रहे कि शुक्लपक्ष नारद का मत है कि- कृष्णपक्षे बली तारा शुक्लपक्षे बली शशी।

गण्डादि विचार-मूल, ज्येष्ठा, श्लेषा, रेवती, अश्विनी मघा ये ६ नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्र कहलाते हैं। इनमें उत्पन्न जातक को विविध प्रकार के अरिष्ट दोष व्याप्त होते हैं। अतः सत्ताईसवें दिन उसी नक्षत्र के पुनः आने पर शास्त्रोक्त शान्ति विधान करके बालक का मुख देखना चाहिए। इनमें भी मूल, ज्येष्ठा, व श्लेष ये तीन विशेषतया गण्डकारक होते हैं। अश्विनी, रेवती व मघा ये उपगण्ड नक्षत्र हैं। ज्योतिष तत्व नामक ग्रन्थ में बताया गया है कि अश्विनी, मघा व मूल की शुरू की पाँच घड़ियाँ व मूल, ज्येष्ठा, श्लेषा की अन्तिम पाँच घड़ियाँ 'गण्ड' कहलाती हैं। लेकिन सामान्यतः सारे नक्षत्र को ही गण्ड माना जाता है।

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पिता की मृत्यु एक वर्ष के अन्दर व माता की तीन वर्ष के अन्दर, एवं स्वयं की तुरन्त मृत्यु सम्भावित होती है। अतः अविलम्ब विधि-विधानपूर्वक शान्ति करानी चाहिए।

गण्डान्त का अपवाद- वशिष्ठ का मत है कि यदि रात्रि में मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो अथवा दिन में द्वितीय चरण में जन्म हो तो बालक कमशः पिता व माता का नाशक नहीं होता।

गर्गाचार्य का मत है कि रविवार को हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, रेवती, ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्म हो तो त्रिविध गण्डान्त का दोष नहीं होता।

यदि चन्द्रमा बलवान् हो तो नक्षत्र व तिथि गण्डान्त एवं गुरु बली हो तो लग्न गण्डान्त दोष नहीं होता।

अभिजित् मुहूर्त स्थानीय समयानुसार ११.३६ बजे से १२.२४ बजे तक होता है। वशिष्ठ के मत से अभिजिन्मुहूर्त में जन्म होने पर समस्त गण्डान्त दोष शान्त हो जाता है।

हमारे विचार से यदि सामर्थ्य हो तो सर्वत्र गण्डमूल या गण्डान्तादि की शान्ति अवश्य करानी चाहिए।

शान्ति काल व्यवस्था- सामान्यतया जिस नक्षत्र में जन्म हो, वही नक्षत्र जब २७ दिन बाद लौटकर आए तो उसी नक्षत्र में शान्ति करानी चाहिए, यह मत बहुत प्रचलित है।

लेकिन उक्त समय का अतिक्रमण होने पर या अत्यावश्यकता में इस प्रकार शान्ति काल का निश्चय करें।

१. सूतकान्त समय में या बारहवें दिन।

२. आठवें वर्ष में।

३. जब कभी भी शुभ समय में अपना जन्म नक्षत्र हो।

४. अत्यावश्यकता में किसी शुभ दिन व मुहूर्तों।

मूलवास विचार- यदि जन्मलग्न, व जन्ममास के अनुसार मूल का वास भूमि पर ही रहे तो विशेष कष्ट होता है।

स्वर्ग या पाताल में वास आने पर साधारण अशुभ होता है।

मूलवास चक्र

जन्ममासचैत्र, श्रावण, कार्तिक, पौषभूमि, आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन, माघस्वर्ग, वैशाख, ज्येष्ठ मार्गशीर्ष फाल्गुनपाताल

जन्मलग्न३।६।९।१२१।४।७।१०१४।७।१०।०२।५।८।११

कृष्ण चतुर्दशी जन्म- कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के मान को ६ बराबर भागों में बाँट लेना चाहिए। जिस षष्ठांश में जन्म हो तदानुसार जन्म फल जानें।

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षष्ठांश | फल | षष्ठांश | फल १ | शुभ | २ | पितृनाश ३ | मातृनाश | ४ | मातुलनाश ४ | वंशनाश | ६ | आत्मनाश या धनहानि

अमावस्या जन्म फल ज्ञान- अमावस्या के भी सम्पूर्ण मान के ६ समान भाग करके देखें। तदनुसार फल जानें। प्रथम षष्ठांश-धननाश द्वितीय षष्ठांश-मातृनाश तृतीय षष्ठांश-पितृनाश चतुर्थ षष्ठांश-मातुलनाश पंचम षष्ठांश-आत्मनाश षष्ठ षष्ठांश-आत्मनाश या धनहानि

इसी प्रकार व्यतिपात, परिघ, वैधृति, विष्कम्भ, शूल योग में उत्पन्न जातक को भी गण्ड दोष लगता है।

कार्तिक मास में तुलागत सूर्य में जन्म होने से भी शरीर, धन व सन्तान की हानि सुनिश्चित होती है।

इसके अतिरिक्त, ग्रहण, संक्रान्ति, उत्पात दिनादि में या मुहूर्त खण्डोक्त अशुभ वेलाओं में जन्म होने पर भी प्रबल अरिष्ट होता है।

इनकी शान्ति के लिए, अभिषेक, जल, होमादि, रुद्रार्चन, तिलपात्र का दान करवाना श्रेयस्कर होता है।

इस शान्तिकार्य को यथाशीघ्र करवाना चाहिए। अधिक समय व्यतीत होने पर शान्तिकर्म की मात्रा स्वबुद्धि विवेक से द्विगुणित, चतुर्गुणित या अष्टगुणित करनी चाहिए।

मण्डल या चक्रार्थ स्वामी- यदि कोई ग्रह बारह राशियों पर भ्रमण कर लेता है तो उस ग्रह का १ भ्रमण कहा जाता है उसे सिद्धान्तग्रन्थों में भचक्र भी कहा गया है; उस चक्र भ्रमण के आधे सिंह से क्रमश: ६ राशियों के स्वामी अर्थात् सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर का स्वामी सूर्य एवं कर्क से विलोम ६ राशियों का अधिपति चन्द्रमा होता है।

इसके अतिरिक्त पञ्चताराग्रह (मं०, बृ०, बृ०, शु०, श० ) कर्क, सिंह को छोड़ कर अन्य राशियों के स्वामी होते हैं।

चक्रार्थ स्वामी के आधार पर फल ज्ञान- जन्माङ्ग में सूर्य के चक्रार्थ में समस्त ग्रहों के होने से जातक शौर्य गुण सम्पन्न तेजस्वी और अत्यन्त साहसी होता है।

चन्द्र के चक्रार्थ में ग्रह होने पर जातक मृदु, सरल स्वभाव और भाग्यवान् होता है।

१२ राशियों के स्वामी एवं नवांशाधिपति- मङ्डल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा,

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६६८ राशि प्रभेद प्रकरण सूर्य, बुध, शुक्र, मङ्गल, गुरु, शनि, और गुरु ये मेषादि राशियों के स्वामी हैं। इन मेषादि राशियों में क्रम से मेष, मकर, तुला और कर्क से आरम्भ करके नवमांश होते हैं। मेष का नवांश मेष से, वृष का मकर से, मिथुन का तुला से, कर्क का कर्क से इसी को तीन आवृत्ति इस प्रकार करने पर मेषादि बारह राशियों के नवांशपति हो जाते हैं। स्पष्टार्थ चक्र मेत्रृमिंकसिकतुवृघमकुमीराशिनाम ११०७४१११०७४११०७४१ प्रथम नवांश १ राशि में ३० अंश होता है। उसमें ९ का भाग देने पर ३ अंश २० कला का १ नवांश होता है। जैसे- ९)३०(३अंश २७ ३×२० = १८० (२० कला १८ x

भवनाधिप के बिना फलादेश नहीं होता--विज्ञ गणक को जातक शास्त्र में वर्णित फलादेश का भावाधिपति के आधार पर ही विचार करना चाहिए; क्योंकि भावाधिपतियों के बिना इस जातक शास्त्र में एक पद भी चलना संभव नहीं है। वर्गोत्तम नवांश तथा द्वादशांश का वर्णन--चर राशियों में अर्थात् मेष, कर्क, तुला, और मकर राशियों में प्रथम नवांश वर्गोत्तम नवांश होता है। स्थिर अर्थात् वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशियों में मध्य अर्थात् पांचम (५वां) नवांश वर्गोत्तम होता है एवं द्विस्वभाव राशियों अर्थात् मिथुन, कन्या, धनु और मीन में अन्तिम नवांश वर्गोत्तम होता है। अभिप्राय यह है कि मेष में मेष का, वृष में वृष का, मिथुन में मिथुन का और इसी प्रकार आगे सभी राशियों का नवांश, वर्गोत्तम कहलाता है। यदि जन्म लग्न में वर्गोत्तम नवांश हो तो जातक कुल में प्रधान होता है। द्वादशांश--प्रत्येक राशि में अपनी राशि से प्रारम्भ होता है। राशि में ३० अंश होता है। इसमें १२ का भाग देने पर ३०/१२ = २/३१ द्रेष्काण एवं होरा स्वामी--द्रेष्काण चक्र में प्रथम द्रेष्काण उसी राशि का होता है। द्वितीय द्रेष्काण उससे पांचम राशि का और तृतीय द्रेष्काण नवमराशी

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का होता है। एक राशि के तृतीय भाग को द्रेष्काण कहते हैं। अर्थात् १२ राशि में ३० अंश इसका तृतीयांश १० अंश तक पहला, ११ से २० अंश तक दूसरा तथा २१ से ३० तक तीसरा द्रेष्काण होता है। होरा विचार-विषम अर्थात् ९, ३, ५, ७, ९, ११ में प्रथम होरा सूर्य की और द्वितीय होरा चन्द्र की होती है और सम अर्थात् २, ४, ६, ८, १०, एवं १२ राशियों में प्रथम होरा चन्द्र की तथा द्वितीय होरा सूर्य की होती है। १५, १५ अंश की होरा कही गई है। एक राशि में दो होराएँ होती हैं।

त्रिशांश के स्वामी- विषम राशियों ९, ३, ५, ७, ९, ११ में ५, ५, ८, ७, ५, अंश तक क्रम से ९ अंश से ५ अंश तक मङ्गल, ६ से १० तक शनि, ११ से १८ अंश तक गुरु, १९ से २५ अंश तक बुध तथा २६ से ३० अंश तक शुक्र त्रिशांश के स्वामी होते हैं। इसी प्रकार सम राशियों में १ से ५ अंश तक शुक्र, ६ से १२ तक बुध, १३ से २० तक गुरु, २१ से २५ तक शनि, २६ से ३० तक मङ्गल त्रिशांश के स्वामी होते हैं।

सप्तमांश के स्वामी- मेष राशि का प्रथम सप्तमांश मेष का, द्वितीय वृष का, तृतीय मिथुन का, इसी प्रकार अन्य राशियों का समझना चाहिए। वृष में वृश्चिक से, मिथुन में मिथुन से, कर्क में मकर से, सिंह में सिंह से, कन्या में मीन से, तुला में तुला से, वृश्चिक में वृष से, धनु में धनु से, मकर में कर्क से, कुम्भ में कुम्भ से, मीन में कन्या से शुरू होकर सप्तम राशि तक सप्तमांश होता है। उक्त राशियों के सप्तमांश उनके स्वामी भी होते हैं।

अभिप्राय यह है कि विषमराशियों में अपनी राशि से ही सप्तमांश होता है तथा समराशियों अपनी राशि से जो सप्तम राशि हो उससे प्रारंभ होता है। राशियों में वर्गभेद संख्या का ज्ञान- एक राशि में ३० अंश, १ अंश में ६० कला होती है। इसी प्रकार एक राशि में १८०० कला होती है। अपनी अपनी राशि से इन्हीं १८०० कलाओं के परिवर्तन से १ राशि में षडवर्ग बनाने हों तो ६ भेद होते हैं। इस प्रकार १२ × ६ = ७२ भेद होते हैं। इसी प्रकार सप्तवर्ग में कुल संख्या १२ × ६ = ७२ होगी। ७२ में चूड़ अर्थात १२ जोड़ने पर ७२ + १२ = ८४ होगा।

यहाँ पर चूड़ का अर्थ अन्तिम है। पद का अर्थ स्थान है। अतः राशियों की संख्या १२ ही है इसलिये राशियों की अन्तिम संख्या १२ ही है। वर्गभेद का आनयन- किसी भाव या किसी ग्रह में इच्छित वर्ग जानना हो तो स्पष्ट भाव या स्पष्ट राश्यादि ग्रह की कला बनाकर, इसको अभीष्ट जो

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वर्ग है उसकी संख्या से गुणा करके गुणनफल में १८०० का भाग देने पर लब्धि अभीष्ट वर्ग राशि होती है। इसके गुण दोषों का वर्णन आगे किया जाएगा। जिस ग्रन्थ से साधित ग्रह परीक्षा करने में सिद्ध हो, उसी के द्वारा ग्रह स्पष्ट करके वर्गों का आनयन करना चाहिए।

उदाहरणार्थ राशि यदि लग्न ४।१८।४५।१८ हो, इसमें सप्तमांश जानना है, तो पूर्वोक्त चक्र से सिंह राशि में सप्तमांश का चतुर्थ खण्ड है, तथा सिंह में सिंह से ही सप्तमांश आरम्भ होता है अतः सिंह से चतुर्थ वृश्चिकराशि का सप्तमांश हुआ। जिसका स्वामी मंगल ग्रह हुआ।

४८ + १४ = ६२ ६० = ३७२० १५ = ३७३५ ७

१८०० ) २६१४५ ( इस प्रकार सप्तमांश एवं नवमांश, दोनों प्रकार से तुल्य ही सिद्ध होता है। परन्तु होरा, द्रेष्काण और त्रिशांश में भेद पड़ता है। क्योंकि उपरोक्त रीति से होरा, आदि सभी वर्ग मेषादि द्वादश राशियों के होते हैं।

परन्तु होरा सभी राशियों के न मानकर केवल रवि और चन्द्रमा की ही बहुत से आचार्य मानते हैं। तथा द्रेष्काण केवल स्व, पंचम और नवम राशि के ही, एवं त्रिशांश मंगलादि ५ ग्रहों के ही मानते हैं। इस प्रक्रिया से सातों वर्गों की सिद्धि नहीं होती है। पाठकगण क्रिया करके देख लें।

राशियों के कूरादि संज्ञा- ऊपर दिए गए राशियों की कूरादि संज्ञा स्पष्ट है। इन राशियों की संज्ञा जानकर ज्योतिष्विद फलादेश किया करते हैं। जैसे-मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ राशियों की संज्ञा कूर है। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन राशियों की अकूर (शुभ) संज्ञा है।

जैसे कूर राशियों में जातक कूर स्वभाव वाला, अकूर (शुभ) राशि में जन्म लेने वाले का स्वभाव सरल तथा मधुर होता है।

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पुरुष राशि में पैदा हुआ प्राणी तेजस्वी और स्त्री राशि में पैदा हुआ सौम्य स्वभाव का होता है। चर राशि में चंचल प्रकृति, स्थिर में स्थिर प्रकृति वाला तथा द्विस्वभाव में मिली जुली प्रकृति का होता है कर्क, मीन, वृश्चिक राशियों की अन्तिम भाग गण्डान्त संज्ञा से सुप्रसिद्ध है।

गण्डान्त में उत्पन्न बालक फल ज्ञान- गण्डान्त में जन्म लेने वाला प्राय: जीवित नहीं रह पाता। यदि जीवित रहे तो माता को क्लेशप्रद या कुल का नाशक होता है। साथ ही वह जातक हाथी घोड़ों से युत राजा के समान सुख भोग करता है।

राशियों की दिशा और फल ज्ञान- पूर्वादि क्रम से ३ आवृत्ति राशियों की दिशा होती है। दिशा क्रम से मात्रादि का भी विचार करना चाहिए। इसके विषय में अन्य ग्रन्थों में निर्देश सुस्पष्ट हैं।

दिशा के ज्ञान से ही खोई हुई वस्तु का ज्ञान तथा सूतिका गृह के द्वारादि भी बताते हैं।

पूर्वादि दिशाओं में क्रम से, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में नीचे बताए गये क्रम से राशियाँ बली होती हैं।

पूर्व दिशा में द्विपद अर्थात् नरराशियाँ (कन्या, मिथुन, कुम्भ, तुला, धनु का पूर्वार्ध) राशियाँ, दक्षिण दिशा में चतुष्पद अर्थात् पशु (धनु का परार्ध, सिंह, वृष, मकर का पूर्वार्ध और मेष) बली होती है। पश्चिम में वृश्चिक और उत्तर में जलचर ( मकर का परार्ध, मीन और कर्क ) बली होती हैं।

इनमें रात्रि में चतुष्पद, दिन में द्विपद, सन्ध्या में मकर, वृश्चिक, कर्क और मीन बली होती हैं।

मिथुन, कर्क, मकर, मेष, वृष, धनु इनकी रात्रि संज्ञा, सिंह, तुला, वृश्चिक, कुम्भ, मीन, कन्या इनकी दिन संज्ञा, मिथुन के सहित जो ६ राशियाँ है उनमें मिथुन को छोड़कर कर्क, मकर, मेष, वृष और धनु ये ५ राशियाँ पृष्ठोदय कहाती है।

इसी प्रकार मीन को छोड़कर मिथुन के साथ ५ राशियाँ सिंह, तुला, कन्या, वृश्चिक, और कुम्भ शीर्षोदय संज्ञक है।

मीनराशि उभयोदय संज्ञक है जिन राशियों का उदय पृष्ठ से होता है वे पृष्ठोदय, जिनका सिर से उदय होता है वे शीर्षोदय राशियाँ हैं।

मीनराशि का उदय मुख और पूँछ दोनों तरफ से होता है, इसलिये इसकी उभयोदय संज्ञा कही है।

जातक पारिजात में-

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शीर्षोदयगतः खेटः पाकादौ फलदो भवेत्। पृष्ठोदयस्थः पाकान्ते सदा चोभयराशिगः॥ (२ अ० ८६ श्लो०)

जो राशि अपने स्वामी से या मित्र से दृष्ट युत हो एवं बुध बृहस्पति से युत दृष्ट हो और अन्य ग्रहों से दृष्ट युत न हो तो वह राशि बलवान् होती है।

लग्नादि १२ भावों के नाम- १. तनु, २. धन, ३. सहज, ४. बान्धव, ५. पुत्र, ६. अरि ( शत्रु ) वण, ७. स्त्री, ८. विनाश ( मृत्यु ), ९. पुण्य, १०. कर्म, ११. आय तथा १२. व्यय

ये लग्नादि द्वादश भावों के नाम हैं। अपर नाम- १. शक्ति, २. धन, ३. पौरुष, ४. गृह ( भूमि ), ५. प्रतिभा, ६. वण, ७. काम, ८. देह, विवर अर्थात् छिद्र ९. गुरु, १०. मान, ११. भव एवं १२. वय-ये द्वादश भावों के नामान्तर हैं।

पुनः नामान्तर- ४, ८, की चतुरस्त्र संज्ञा; ९ की तप संज्ञा; १, ४, ७, १० की चतुष्टय कण्टक, केन्द्र संज्ञा होती है।

पुनः चतुर्थ दशम के नामान्तर- चतुर्थ भाव का सुख जल, पातल बन्धु, हिबुक नाम है। दशम का कर्म, आज्ञा, मेषरण और आप्तन नाम है।

पुनः नवम, पञ्चम, सप्तम के अपर नाम- ९, ५ को त्रिकोण कहते हैं। पञ्चम को धी ( बुद्धि ) सप्तम को यून, जाया, अस्तमय और जामित्र कहते हैं।

६, ३, १२, २ के नामान्तर- ६, ३, १२, २ के नामान्तर षड्‌कोण, तृतीय को दुःशिक्ष्य द्वादश को रिफ्फ, द्वितीय को कुटुम्ब कहते हैं।

पणफर आपोक्लिम संज्ञा- केन्द्र से आगे के भाव २, ५, ८, ११ ये पणफर उसके आगे ३, ६, ९, १२ आपोक्लिम कहलाते हैं। केन्द्र में जो ग्रह रहता है वह जातक की बाल्यावस्था में फल देता है जो पणफर में रहता है वह यौवनावस्था में और जो आपोक्लिम में रहता है वह वृद्धावस्था में फल देता है।

उपचय और अनुपचय- ६, १०, ११, ३ ये चार भाव उपचय और १, २, ३, ४, ५, ७, ८, ९, १२ ये आठों भाव अनुपचय नामक हैं।

ग्रहों के मूल त्रिकोणराशि- सिंह, वृष, मेष, कन्या, धनु, तुला और कुम्भ ये क्रम से सूर्यादि ग्रहों के मूलत्रिकोण हैं। मेष, वृष, मकर, कन्या, कर्क, मीन और तुला ये क्रम से १०, ३, २८, १५, ५, २०, अंशों से सूर्यादि ग्रहो के उच्च स्थान हैं।

इनमें जो अंश कहे गये है उतने उतने अंश पर परमोच्च समझना चाहिए। तथा अपने अपने उच्चसे सप्तम राशि नीच स्थान होते हैं। एवं उच्च काित अंशों में परम नीच समझ़नी चाहिए।

राशियों के हस्व, मध्य दिर्घोदय संज्ञा- मीन, वृष, मेष, कुम्भ ये हस्वोदय, तथा मिथुन, धनु, कर्क, मकर ये समोदय ( मध्योदय ) और वृश्चिक, कन्या, सिंह, तुला ये दीर्घ ( दीर्घोदय ) है।

इन में जो राशि लग्न में हो उसी राशि के समान हस्व, सम या दीर्घ

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जातक का मस्तकादि शरीर समझना चाहिए तथा लग्न में जो ग्रह हो उस ग्रह के समान भी जातक का शरीर समझना चाहिए। राशियों का प्लव- यहाँ राशियों के स्वामी की जो दिशा कही गई है वह उन राशियों की प्लव दिशा कहलाती है ऐसा यवनों ने कहा है। जैसे-मेष का स्वामी मङ्गल है, मङ्गल की दक्षिण दिशा हैं, अतः दक्षिण मेष का प्लव हुआ। प्लव का अर्थ नत ( निम्न भूतल ) है। अतः जिस राशि में लग्न या चन्द्रमा हो उसकी प्लव दिशा में राजा यात्रा करे तो अति शीघ्र शत्रु को जीत लेता है इससे राजा का जप का पराजय का विचार होता है।

राशियों के वर्ण तथा प्रयोजन- १. लाल २. श्वेत, ३. शुकसदृश हरित, ४ पाटल (लाल, उजला, मिला हुआ ), ५. धूम्र, ६. पाण्डु वर्ण, ७. अनेक वर्ण, ८ कृष्ण वर्ण, ९. सुवर्ण सदृश, १० पिङ्गल, ११ चित्र और बभ्रु (भूरा रंग ) क्रम से ये मेषादि राशियों के वर्ण है। इसका प्रयोजन यह है कि जनसामलिक लग्न राशि के वर्ण सदृश जातक का वर्ण होता है।

जन्मलग्न के स्वामी को उसी वर्ण की प्रतिमा बना कर पूजन करने से रोगादि समस्त शत्रुओं का उसी प्रकार नाश होता है, जैसे इन्द्र की सेना द्वारा राक्षसों का नाश होता है।

कालपुरुष के आत्मादि विभाग- कालपुरुष का सूर्य आत्मा, चन्द्रमा मन, मङ्गल बल, बुद्ध वाणी, गुरु ज्ञान, शुक्र सुख, राहु मद और शनि उस कालपुरुष का दुख है।

जन्म समय में आत्मादि कारक ग्रह बली हो तो आत्मादि बली, और दुर्बल हो तो दुर्बल समझना चाहिए। किन्तु शनि का फल विपरीत कहना चाहिए। क्योंकि दु:खकारक होने के कारण शनि जितना दुर्बल हो उतना ही अच्छा है।

लग्न राशि के आश्रित जितने विकल्प है, उनका जिस प्रकार उदय होता रहता है, उसी प्रकार काल पुरुष के ७; ७, ८ आदि संख्यक अवयव उत्पन्न होते रहते हैं। अर्थात् प्रथम द्रेष्काण में जन्म होने से मूर्धादि ७ अवयव, द्वितीय द्रेष्काण में ग्रीवादि ७ अवयव, और तृतीय द्रेष्काण में वस्ति आदि ८ अवयव होते हैं।

लग्नद्रेष्काणवश अवयव ज्ञान- तात्कालिक लग्न से पीछे की ६ राशि जो उदित (क्षितिज से ऊपर ) रहती है वे काल या जातक के वाम अङ्ग, तथा अनुदित अर्थात् क्षितिज से नीचे लग्न से आगे की ६ राशियाँ दक्षिण अङ्ग समझना चाहिए। वाम अङ्ग निर्बल तथा दक्षिण अङ्ग सबल होता है।

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शुक्ल एकादशी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण बली और षष्ठी से अमावस्या तक बलहीन होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी के अर्द्धभाग से शुक्लपक्ष की अष्टमी के अर्द्ध भाग तक क्षीण रहता है। सूर्यादि ग्रहों के अन्य नाम परिचय- सूर्य के नाम-हेलि, भानु। चन्द्र का शशी, मृडल के नाम-कर, इंक, भमिसुत, आर, रक्त और वक्र हैं। बुध के नाम-हेम्न, विद्, ज़ और बोधन है। गुरु के नाम-ईड्य, इज्य, अड्डिरा, जीव शुक्र के आस्फुजित, सित, भृगु। शनि के मन्द, कोण, यम, कृष्ण नाम है। इसके और भी पर्यायवाची नाम ग्रन्थान्तर से समझना चाहिए। अन्य ग्रन्थों में विशेषतः सर्वार्थचिन्तामणि में सूर्यादि ग्रहों के पर्याय दिए गए है। जैसे-सूर्य, हेलि, भानु, दीप्तरश्मि, चण्डांशु, भास्कर, अहस्कर, तपन, दिनकृत, भानुमान, पूषा, अरुण और अर्थ नाम है। चन्द्रमा का शीत रशिम, अब्ज, सोम, शीतांशु, ग्लौ, मृगांक, क्लेश, शीतयुतिः, उदुपति, इन्दु ये चन्द्र के नाम हैं। मंगल के आर वक्र, क्रूरदृक, आवनेय, क्रूज, भौम, क्रूर, लोहिताङ्‌, पाणी, क्षितिज, रुघिर, अंगारक, क्रूर नेत्र नाम है। बुध का हेम्न, विद्, ज़ बोधन, इन्द्रपुत्र, सौम्य चन्द्रपुत्र, चान्द्र तारा ये नाम हैं। गुरु का ईड्य, इज्य, अड्डिरा और जीव है। शुक्र का आस्फुजित, सित, भृगु नाम प्रख्यात है। शनि का मन्द, कोण, यम और कृष्ण ये नाम हैं। इसके अतिरिक्त भी ग्रहों का नाम ग्रन्थान्तर से जानना चाहिए। सूर्यादि ग्रहों के वर्ण और अधिदेवता- ताम्रवर्ण, श्वेत, लाल, हरा, पीत, अनेक रङ‌ और काल से सूर्यादि ग्रहों के क्रम से वर्ण हैं अग्नि, जल, कार्तिकेय विष्णु, इन्द्, इन्द्राणी और ब्रह्मा क्रम से सूर्यादि ग्रहों के अधिदेवता होते हैं। सूर्यादि नव ग्रहों की पूजा तत्द्‌ ग्रह के मन्त्र द्वारा करके उस ग्रह की दिशा में यात्रा करे तो शत्रु को जीतकर सुवर्ण, रत्न हस्ती आदि वाहन का लाभ होता है।

ग्रहों के पुरुष-स्त्री नपुंसक तथा विप्रादि एवं तत्वों के अधिपति- चन्द्रमाः शुक्र स्त्रियों के, बुध शनि नपुंसकों के, गुरु राव मडल पुरुषों के अधिपति हैं। शुक्र गुरु ब्राह्मणों के, सूर्य मडल क्षत्रियों के, चन्द्रमा वैश्यों के, शनि संकर जातियों के, बुध शूद्रों के अधिपति हैं। अग्नि, भूमि, आकाश, जल और वायु ५ तत्वों के पञ्चताराग्रह (मंगल,

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बु०, बृ०, शु० और श० ) अधिपति हैं। अर्थात् अग्नि तत्व का मङ्गल, भूमि का बुध, आकाश का गुरु, जल का शुक्र, वायु तत्व का शनि स्वामी हैं। ग्रहों के रस तथा स्थान- कटु, लवण तिक्त, मिश्र, मधुर, खट्टा और कषाय ( कसैला ) ये क्रमश: सूर्यादि ग्रहों के रस हैं। अर्थात् सूर्य का कटु, चन्द्र का क्षार ( नमकीन ) बुध का मिश्रित गुरु का मधुर, शुक्र का खट्टा और शनि का कसैला रस है। देवालय, जलाशय, अग्निशाला, कीडास्थान, भण्डार, शयनागार और कतवारखाना इन स्थानों के क्रम से सूर्यादि ग्रहो के स्थान कहे गए हैं। भुवनदीपक में सूर्यादि ग्रहों के रस निरूपण निम्न प्रकार से किया गया है-

कुजाकौ कटकौ जीवो मधुरस्तुवरो बुधः। क्षाराम्लौ चन्द्र भृगुजौ तीक्ष्णौसर्पाक नन्दनौ।। अर्थात् मङ्गल और सूर्य कटु प्रिय होते हैं वृहस्पति मधुर, बुध कषाय, चन्द्र का क्षार, ( नमकीन ) शुक्र अम्ल ( खट्टा ) राहु तथा शनि तीक्ष्ण ( तीता ) रस प्रिय होते हैं। इन ग्रहों के भोज्य रसों के आधार पर प्रश्न कालाङ्कचक्र के द्वारा प्रश्नकर्ता की भोज्य अभिरुचि बताई जाती है। भोजन में पड़े रसों की प्रधानता होती है। आठ ग्रहों में षड् रसों का वर्गीकरण करते हैं। आचार्य पद्मप्रभसूरी ने राहु केतु एवं मङ्गल तथा सूर्य की सामान्य अभिरुचि को बताया है।

रस के विषय में ताजिक नीलकण्ठा का मत पृथक है। उन्होंने ७ रसों को माना है- जैसे सूर्य कटु, चन्द्र नमकीन, मङ्गल तिक्त, बुध मिश्रित, गुरु मधुर, शुक्र अम्ल तथा शनि कषाय। इनकी कल्पना में राहु ग्रह को स्थान नहीं मिल सका है। सूर्यादि ग्रहों के वस्र व धातु- सूर्य का मोटा, चन्द्र का अहत ( नवीन ) मङ्गल का जला हुआ, बुध का भीगा हुआ, ( गीला ) गुरु का न पुराना न नया मध्यम स्तर का, शुक्र का मजबूत, शनि का अत्यन्त पुराना वस्र है।

तन्त्र, मणि, सुवर्णा, मिश्रित दृढ़ रूप, मोती और लोहा ये सूर्यादि ग्रहों के क्रम से धातु हैं। काल एवं ऋतुओं के स्वामी- अयन, मुहूर्त, अहोरात्र ऋतु, मास, पक्ष और वर्ष के अधिपति क्रमश: सूर्यादि ग्रह हैं। एवं शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा शरद, और हेमन्त इन ६ ऋतुओं के

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कफ पित्त वात प्रकृति, प्रसन्न, मध्यम स्वरूप, कार्यों में निपुण, गोलाकृति, शिरा ( नस ) से व्याप्त, वेष और वचनों से सबका अनुकरण करने वाला और हरित रङ्ग वस्त्र वाला बुध है। बृहस्पति का स्वरूप एवं गुण- थोड़े पीत नेत्र व कर्ण सिंह के समान गम्भीर शब्द, स्थिर सतोगुणी ( सत्व- गुण से युक्त ), तपे हुए सोने के समान शरीर वर्ण, मोटी व ऊँची छाती, थोड़ा धर्म में तत्पर, नम्रता में चतुर, स्थिर उत्कृष्ट दृष्टि, क्षमावान्, पीला वस्त्र, कफ प्रकृति, चर्बी में बल वाला गुरु हैं। शुक्र का स्वरूप तथा गुण- मन को हर लेने वाला स्वरूप, बड़े-बड़े हाथ, विशाल छाती व सुख, वीर्याधिक्य, चेष्टावान, काले घुँघराले पतले लम्बे बाल, दूर्वा के समान श्यामल वर्ण, कामी, वात और कफप्रकृति रजोगुणी, केलि कुशल, बुद्धिमान्, विशाल नेत्र एवं मोटे कन्धों वाला शुक्र है। शनि का स्वरूप एवं गुण- कपिल, गहरे नेत्र, दुबला-पतला लम्बा शरीर, नसों से युक्त, आलसी, कृष्ण वर्ण, वातप्रकृति, चुगली करने वाला, स्नायु ( खाल ) में शक्ति रखने वाला, निर्दयी, मूर्ख, मोटे नाखून और दाँतों वाला, अत्यन्त गन्दा वेश, चेष्टाहीन अपवित्र, तामस प्रकृति, भयावह, क्रोधी, वृद्ध ( बूढ़ा ) एवं काले वस्न धारण करने वाले शनि का स्वरूप है।

ग्रहों के वर्ण सन्दर्भ में आचार्यों में मतभेद हैं। वाराहमिहिर ने सूर्य को 'रक्त श्यामो भास्कर:' कहा है। अर्थात् हल्का लाल, परन्तु भटोत्पल ने टीका में रक्त श्याम के लिए पारलपुष्प वर्ण कहा है। जो मरकत सड़ृत है। श्वेतरक्तस्तु पाटल: के अनुसार 'उजला और लालवर्ण का मिश्रण पाटल कहलाता है। पराशर भी सूर्य को रक्तश्याम वर्ण मानते हैं- 'रक्तश्यामो दिवाधीश:'

वस्तुतः सूर्य का रंग प्रत्येक ऋतु में बदलता है जिसका संहिताओं में उल्लेख मिलता है। चन्द्रमा को सभी आचार्यों ने गौर माना है। जातक पारिजात ( वैद्यनाथ ) तथा बृहज्जातक ने मङ्गल को रक्तगौर वर्ण ( पाटल ) माना है। शेष आचार्यों ने इसे रक्त वर्ण माना है। गुरु को प्रायश: लोग पीत वर्ण मानते हैं। परन्तु पराशर और वाराहमिहिर मत से गुरु गौर वर्ण है। शुक्र को नील कण्ठ तथा भुवनदीपककार श्वेत वर्ण मानते हैं जबकि पराशर वाराहमिहिर तथा वैद्यनाथ ने इसे श्याम माना है। शनि को नील कण्ठ ने नील वर्ण कहा है।

सूर्यादि ग्रहों के नैसर्गिक मित्र, शत्रु एवं सम ग्रह- सूर्य के गुरु, मंगल और चन्द्र मित्र हैं। चन्द्रमा के सूर्य, बुध, मंगल के सूर्य, चन्द्र, गुरु, बुध के सूर्य

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ग्रह प्रभेद प्रकरण

अब प्रत्येक ग्रह की दृष्टि ज्ञानार्थ चक्र दिये जाते है, जिससे हमें यह सहजता से ही ज्ञात हो सकेगा कि ग्रह, जिस किसी स्थान में भी स्थित हो तो वह वहाँ से कहाँ-कहाँ कैसी दृष्टि से देखता है-

सूर्य दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-१

कुण्डली के चक्र में जहाँ सूर्य स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व दशवें भाव को एक पाद दृष्टि से; पाँचवे व नवें भाव को आधी दृष्टि से; चौथे और आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा सातवें भाव को सम्पूर्ण दृष्टि से देखता है।

चन्द्र दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-२

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कुण्डली चक्र में बुध, जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व दशवें भाव को एक पाद दृष्टि से; पाँचवें व नवें भाव को आधी दृष्टि से; चौथे व आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।

गुरु दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-५

कुण्डली चक्र में गुरु जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे और दशवें भाव को पाद दृष्टि से, चौथे और आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा पाँचवें, नवें और सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।

शुक्र दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-६

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ग्रह प्रभेद प्रकरण

राहु-केतु की दृष्टि विचार

भृगुसंहिता पद्धति के अनुसार राहु व केतु की दृष्टि का विचार इस प्रकार करना चाहिए-

राहु या केतु; कुण्डली चक्र में, जिस किसी भाव में स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व छठे भाव को एक पाद दृष्टि से; दूसरे व दशवें भाव को आधी दृष्टि से तथा पाँचवें, नवें, सातवें और बारहवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। शेष चक्र से स्पष्ट है।

केतु दृष्टिस्थान ज्ञानार्थ चक्र-९

सूचना- पाठक ध्यान दें, किसी भी कुण्डली में राहु से सातवें स्थान में ही केतु स्थित रहता है। अतः उसकी दृष्टि स्थान भी सात स्थान का अन्तर हो जाता है। इसे समझने हेतु आगे स्थित केतु दृष्टि स्थान चक्र का अवलोकन करें।

अंश से ग्रहावस्था विचार-

कुण्डली में स्पष्ट ग्रह दिये रहते हैं, उससे ग्रहों के अंश का ज्ञान कर इस प्रकार उनकी अवस्था का ज्ञान करना चाहिए-

३ से ९ अंश में तक स्थित ग्रह किशोरावस्था का माना जाता है।

१० से २२ अंश में तक स्थित ग्रह युवावस्था का माना जाता है।

२३ से २८ अंश में तक स्थित ग्रह वृद्धावस्था का माना जाता है।

२९ से ३ अंश में तक स्थित ग्रह मृतकावस्था का माना जाता है।

इस प्रकार से किशोर और वृद्ध अवस्था में स्थित ग्रह कुछ कम अपना

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कौन ग्रह किस अवस्था में है उसे जानने की विधि यह है कि- जिस ग्रह की अवस्था निकालनी होती है, वह ग्रह जन्म समय में किस नक्षत्र में था, इसको जन्म के समय के पञ्चाङ्ग द्वारा निकालना चाहिए। जैसे उदाहरणार्थ किसी कुण्डली में यदि मंगल की अवस्था जाननी हो तो पहले यह देखना होगा कि जन्म समय में मंगल किस नक्षत्र में था। कुण्डली के मंगल का स्पष्ट ५।११।१२।४५ है अर्थात् मेष से ५०वां नवमांश, या अश्विनी से ४०वां चरण, अर्थात् दसवां नक्षत्र, मघा में जन्म के समय मंगल था। इस नक्षत्र संख्या को ग्रह संख्या से गुणा करना होता है। यहाँ सूर्य की ९, चन्द्रमा की २, मंगल की ३, बुध की ४, बृहस्पति की ५, शुक्र की ६, शनि की ७, राहु की ८, केतु की ९, ग्रह संख्या मानी जाती है। इस कारण मंगल की संख्या ३ को नक्षत्र संख्या १० से गुणा करना होगा और इस गुणन फल को उस ग्रह के अंश अर्थात् मंगल के अंश १२ (११ अंश १५ कला है अर्थात् बारहवां अंश ) से गुणा करना होगा, और इन तीनों के गुणनफल में जातक के इष्ट द्विपद १०।१५।४५ पल है। इस कारण ११ को जोड़ना होगा। पुनः उसमें जन्म नक्षत्र की संख्या उत्तरभाद्र है, इस कारण २६ जोड़ना होगा और पुनः उसमें जातक की लग्न संख्या धनु लग्न है इस कारण ९ जोड़ना होगा। उपर्युक्त गुणा और जोड़ के बाद फल आयेगा अर्थात् (१०×३×१२)+११+२६+९=४०६ को १२ से भाग देना होगा। भाग देकर जो शेष आयेगा वही अवस्था का अङ्क होगा। उदाहरण में ४०६ को १२ से भाग देने से १० शेष रहता है। इसलिये १०वीं अवस्था मंगल की हुई। अर्थात् मंगल की वृथ्य लिप्सा अवस्था हुई।

इसी रीति से अवस्था निकाला जाता है। एक शेष रहने से शयन अवस्था, २ शेष रहने से उपवेशन ३ शेष रहने से नेत्रपाणि अवस्था इत्यादि-इत्यादि जानना चाहिए।

सुगमता से स्मरण रखने के लिये अवस्था निकालने के नियम को निम्न-लिखित रीति से कहा जा सकता है (ग्रह नक्षत्र × ग्रह संख्या × ग्रह अंश + इष्ट + जन्म नक्षत्र + लग्न ) ÷ १२ जो शेष रहेगा वही अवस्था संख्या होगी। शेष शून्य होने पर १२ शेष माना जाता है और अंश में यदि किसी अंश के बाद कला भी हो तो उस अंश में एक जोड़ देना पड़ता है। जैसे उदाहरण कुण्डली में मंगल, सिंह राशि के ११ अंश २५ कला पर है। इसका मतलब यह होता है कि बारहवें अंश में मंगल है। इसलिये ऐसे स्थान में अंशमान बारह होगा न कि ग्यारह?

पुनः यदि मंगल, सिंह के ग्यारहवें अंश और शून्य कला विकल्प पर होता तो अंश मान ग्यारह लिखा जाता है।

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ग्रह प्रभेद प्रकरण

इसी प्रकार उदाहरणार्थ कुण्डली का इष्ट दण्ड१०१५८ पला है। इष्ट मान १० नहीं लेकर १९ लिया गया। इसी रीति से सब ग्रहों की शयनादि अवस्था निकाली जाती है।

ग्रहों की अवस्थाओं को स्थिर करने के बाद एक विधि शास्त्रकारों ने और लिखा है।

मुनियों का कथन है कि यदि कोई ग्रह 'दृष्टि' में हो तो उस ग्रह का फल स्वल्प, यदि ग्रह 'चेष्ट' में हो तो बहुत और यदि 'विचेष्टा' का हो तो कुछ भी फल नहीं देता है।

अब इस स्थान में यह लिखा जाता है कि ग्रह, 'दृष्टि'; 'चेष्टा' और 'विचेष्टा' कब होता है।

( २ ) ऊपर लिखा जा चुका है १ शेष रहने से शयन और २ शेष रहने से उपवेशन इत्यादि अवस्थाएं होती हैं। अवस्था का जो शेष अंक आये उस अंक को उसी अंक से गुणा करके उस वर्ग फल में, 'स्वरांक' जोड़ना होता है।

स्वरांक जोड़ने के बाद जो फल आये उसके १२ से भाग देने के अनन्तर जो शेष रहे उसमें जिस ग्रह की अवस्था निकाली गयी है उस ग्रह का क्षेपकांक जोड़ना पड़ता है और उस अन्तिम फल को तीन से भाग देने पर यदि शेष १ रहे तो ग्रह 'दृष्टि', २ रहे तो 'चेष्टा' तथा शून्य रहे तो विचेष्टा कहलाता है।

ऊपर 'स्वरांक' और क्षेपकांक शब्दों के प्रयोग हुए हैं। उनका विवरण इस स्थान पर किया जाता है।

यह सभी जानते हैं कि हर एक मनुष्य किसी न किसी नाम से प्रसिद्ध रहता है। चाहे वह किसी जाति को हो। ऐसे नाम को साधारण भाषा में 'पुकार' नाम कहते हैं। उर्दू में 'मौसमा' कहते हैं। 'पुकार' नाम उसे कहते हैं जिस नाम से सोते हुए पुरुष को पुकारा जाय और वह व्यक्ति यह समझ कर कि पुकारने वाला उस व्यक्ति को सम्बोधित कर रहा है, जाग उठे।

इस स्थान में यदि किसी व्यक्ति के मन में यह प्रशन उठे कि पुकारननाम से ज्योतिष के गणित का क्यों और कैसा सम्बन्ध हो सकता है?, तो इस बात पर इस प्रकार विचार करना होगा कि प्रति व्यक्ति को अपने नाम से कुछ ऐसा घनिष्ट सम्बन्ध, मनस, वाचा, कर्मणा द्वारा हो जाता है कि यदि वह अपने नाम का किसी दूसरे व्यक्ति को देता है तो तदक्षण उसके मन में उस दूसरे व्यक्ति के साथ क्षणिक प्रेम तो अवश्य उत्पन्न हो जाता है।

उत्तरी भारत में ऐसे व्यक्ति को 'मीता' कहते हैं। 'मीता' मित्रता का अपभ्रंश है। प्रति व्यक्ति को अपने नाम से कुछ घनिष्ट सम्बन्ध हो जाता है। अन्य लोगों को सुनते ही उसके स्वरूप, गुण, और अवगुणादि का

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भृगु संहिता फल दर्पण

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स्मरण हो जाता है। किसी नाम के साथ अपशब्द के प्रयोग करते ही उस व्यक्ति को, जिसका वह नाम है और उसके इष्ट मित्रों को अतिकष्ट हो जाता है। अस्तु यह अवश्य ठीक है कि प्रति मनुष्य को अपने-अपने नाम से एक घनिष्ट सम्बन्ध हो जाता है। प्रतीत होता है कि इन्हीं सब कारणों से ऋषियों ने मनुष्य के नाम के प्रथम अक्षर का बल अंक में बतलाया है। जैसे यदि किसी के नाम का प्रथम अक्षर 'अ' हो ( मात्रा चाहे कुछ भी हो ) उसका स्वरांक १ होगा यदि प्रथम अक्षर 'इ' हो तो उसका स्वरांक २ होगा, 'उ' होने से ३, 'ए' होने से ४, 'ओ' होने से ५, 'क' होने से १, 'ख' होने से २ इत्यादि। इसका पूर्ण विवरण नीचे के चक्र में बतलाया जाता है, इसी को स्वरांक कहते हैं।

स्वरांकज्ञानार्थ चक्र

१ | २ | ३ | ४ | ५

अ | इ | उ | ए | ओ

क | ख | ग | घ | च

छ | ज | झ | ट | ठ

ड | ढ | त | थ | द

ध | न | प | फ | ब

भ | म | य | र | ल

व | श | ष | स | ह

स्मरण रहे कि नाम का प्रथम अक्षर होना चाहिए, न कि उपाधियों का बाबू, श्रीमान्, सैय्यद, मोहम्मद, मिस्टर या मिसेज इत्यादि उपाधि जो नाम के पहले लगाये जाते हैं, उसे छोड़कर शुद्ध नाम का प्रथामाक्षर लेना उचित है। जैसे उदाहरणार्थ कुण्डली का प्रथमाक्षर 'द' है। इस कारण इस जातक का स्वरांक ५ हुआ। क्षेपकांक सूर्य का ५, चन्द्र का २, मंगल का २, बुध का ३, बृहस्पति का ५, शुक्र का ३, शनि का ३, राहु का ४ और केतु का ४ है। इस ग्रह क्षेपकांक की उत्पत्ति क्यों हुई? कैसे हुई? अर्थात् अमुक ग्रह का अमुक क्षेपकांक क्यों माना गया इसका पता नहीं इसे लिखने तक चला है।

क्षेपकांकज्ञानार्थ चक्र

सूर्य | चन्द्र | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनि | राहु | केतु

५ | २ | २ | ३ | ५ | ३ | ३ | ४ | ४

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उदाहरणार्थ कुण्डली के मंगल की दृष्टि, चेष्टा और विचेष्टा का विचार इस प्रकार किया जायगा। अवस्था विचार में दस शेष रहा था। दस को दस से गुणा करने से, वर्गफल सौ हुआ और नाम का प्रथम अक्षर 'द' होने से उसमें स्वरांक पाँच जोड़ा और १२ से भाग दिया तो शेष ९ रहा और उस ९ में मंगल के क्षेपकांक २ को जोड़ा तो ११ हुआ। ११ को तीन से भाग दिया तो शेष २ रहा। इस कारण दो शेष रहने से मंगल की चेष्टा फल हुआ अर्थात् 'नृत्यलिप्सा' अवस्था का होकर 'चेष्टा' पद में है। अर्थात् नृत्यलिप्सा अवस्था का जो फल है उसका विकाश 'चेष्टा' होने के कारण पूर्ण रीति से होगा।

सूर्य का द्वादश अवस्था फल ज्ञान

( ९ ) शयन अवस्था में सूर्य हो तो जातक मन्दाग्नि रोग अर्थात् क्षुधा की कमी और पाचनादि शक्ति में गड़बड़ी से बहुधा दुःखी होता है। पित्त की विशेषता होती है, गुदा में व्रण आदि रोग होते हैं। हृदय शूल का रोग होता है और उसकी जंघा तथा पैर स्थूल होते हैं।

( २ ) उपवेशन अवस्था में सूर्य हो तो ऐसा सूर्य जातक को दरिद्र बनाता है। ऐसा जातक पराये का भार ढोने वाला, कलह उपस्थित करने वाला, विद्या को जानने वाला, चित्त का कठोर और निर्दयी होता है तथा उसकी सम्पत्ति नष्ट होती है।

( ३ ) नेत्रपाणि अवस्था में सूर्य हो तो जातक आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है और धनवान्, बलवान्, सुखी, राजा की कृपा से अभिमान युक्त, विवेक शील तथा परोपकारी होता है। यदि ऐसा सूर्य अर्थात् नेत्रापाणि अवस्था वाला सूर्य, नवम, पञ्चम अथवा दशम स्थान में हो तो शुभ फल होता है। अर्थात् इन भावों के शुभ फल की पुष्टि होती है।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में सूर्य हो तो जातक चित्त का उदार, धन सम्पन्न, सभा में चतुराई से बात करने वाला, पुण्यवान्, बलवान् और सुन्दर होता है।

यदि सूर्य पञ्चम, सप्तम, दशम अथवा द्वादश स्थान में बैठा हो तो स्त्री तथा पुत्र की हानि होती है।

( ५ ) गमनेच्छा अवस्था में सूर्य हो तो जातक निरुद्यमी, परदेश में रहने वाला, दुःखों को भोगने वाला, बुद्धिहीन, गुस्से से भरा हुआ और भय से आतुर रहता है तथा धनहीन भी होता है।

( ६ ) गमनावस्था में सूर्य हो तो जातक परस्त्रीगामी, निरन्तर सफर की इच्छा रहने वाला होता है।

( ७ ) सभा अवस्था में सूर्य हो तो जातक परोपकार में तत्पर, धन

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रत्नादि से सम्पन्न, बहुगणी, पृथ्वी और मकान आदि का मालिक, बलवान्, उत्तम वस्त्रादि से भूषित और कृपाशील होता है। उसके बहुत से मित्र होते हैं और प्रतिदिन उसके साथ प्रेम करते हैं।

( ८ ) आगम अवस्था में सूर्य हो तो जातक शत्रुओं से कम्पित, कुटिलबुद्धि, चंचल, धर्म कर्म से रहित, शरीर का दुबला, मदमस्त और आत्मश्लाघी होता है।

( ९ ) भोजन अवस्था में सूर्य हो तो जातक परस्त्रीगमन के कारण धन और बल का सर्वदा नाश करता है और उसका खाना--पीना व्यर्थ हो जाता है। गठिया और वात आदि रोग से पीड़ित होता है अर्थात् शरीर के जोड़ों में वेदना होती है।

शिर में रोग होता है, बुद्धि का कुमार्गी, अनिष्ट वार्ताओं में रुचि रखने वाला और असत्यवादी होता है। यदि सूर्य नवमस्थ हो तो उसके पुण्यकार्य में अनेक बाधायें पड़ती हैं।

( १० ) नृत्यलिप्सा अवस्था में सूर्य हो तो जातक स्वयं विद्वान् और विद्वानों से घिरा रहता है। काव्य विद्या को जानने वाला, वाचाल, राजा से आदर पाने वाला और पृथ्वी में पूजित होता है।

( ११ ) कौतुक अवस्था में सूर्य हो तो जातक सर्वदा आनन्द युक्त ज्ञानीवान्, यज्ञ करने वाला, राजद्वार में रहने वाला, उत्तम काव्य करने वाला और अपने शत्रुओं पर सदा प्रबल रहता है। यदि ऐसा सूर्य छठे स्थान में हो तो वैरियों पर अवश्य सर्वदा विजय पाता है।

यदि सातवाँ या आठवाँ भाव में हो तो स्त्री पुत्र की हानि और लिंग में रोग होता है।

( १२ ) निद्रा अवस्था में सूर्य रहे तो जातक का नेत्र लाल रंग का होता है और नींद से चोर रहता है। ऐसा जातक विदेश में निवास करता है और इसकी स्त्री को क्षय रोग होता है और इसका धन बारम्बार नष्ट होता है।

चन्द्रमा का द्वादश अवस्था फल ज्ञान

चन्द्रमा के विषय में एक नियम यह है कि शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा अर्थात् ज्योतिर्मय चन्द्रमा सर्वदा शुभ फल और कृष्णपक्ष का चन्द्रमा अर्थात् क्षीण चन्द्रमा अशुभ फल देने वाली होती है।

( ९ ) शयन अवस्था में चन्द्र हो तो जातक मानी होता है तथा किसी व्यसनादि में स्वयं अपने धन का नाश करता है, परन्तु कामी होता है। ऐसे जातक के शरीर में शीत की प्रधानता रहती है।

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( २ ) उपवेश अवस्था में चन्द्र हो तो जातक रोग से पीड़ित, स्वभाव का कठोर, परधनहारी, परधनाशक्ता और धनहीन होता है।

( ३ ) नेत्रपाणि अवस्था में चन्द्र हो तो जातक राजरोगी अर्थात् बड़े रोग से पीड़ित, सर्वदा कुमार्ग में तत्पर, बड़ा धूर्त और वाचाल होता है।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में चन्द्र हो तो जातक निर्मल गुण सम्पन्न, वाहन अर्थात् हाथी, घोड़े आदि से सुशोभित, नवीन गृहों का स्वामी, भूमि आदि से भूषित और तीर्थयात्रा परायण होता है। तथा स्त्री से सुखी रहता है।

( ५ ) कृष्णपक्ष का अर्थात् ( क्षीण ) चन्द्र गमनेच्छा अवस्था का हो, तो जातक सर्वदा नेत्ररोग से पीड़ित और कूरस्वभाव का होता है। यदि चन्द्रमा शुक्ल पक्ष का हो तो जातक भयातुर होता है।

( ६ ) गमनावस्था में चन्द्र हो तो जातक मानी, दुःखी, असन्तोषी और बुद्धिहीन, गुप्तरीति से पाप करने में तत्पर रहता है तथा उसके पैरों में रोग होते हैं।

( ७ ) सभा अवस्था में यदि पूर्ण चन्द्रमा हो तो जातक मनुष्य मात्र में एकमात्र चतुर, बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं का माननीय, युवती स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, गुणग्राही और प्रेमकला में कुशल होता है।

( ८ ) आगम अवस्था में चन्द्र हो तो जातक वाचाल और धार्मिक होता है। यदि चन्द्रम कृष्णपक्ष का हो तो जातक रोगी, हठी, और अतिदुष्ट स्वभाव का होता है।

ऐसे जातक बहुधा दो स्त्रियाँ होती हैं।

( ९ ) पूर्ण कला का होकर चन्द्र भोजन अवस्था में हो तो जातक माननीय और वाहनादि तथा मनुष्यों से सुख पाने वाला होता है। ऐसे जातक को स्त्री सुख होता है और कन्याएँ उत्पन्न होती हैं।

यदि चन्द्रम कृष्णपक्ष का हो तो अनिष्ट फल होता है।

( १० ) नृत्यलिप्सा अवस्था में बली चन्द्र हो तो जातक गायन विद्या को जानने वाला, श्रृंगारादि नवरसों का ज्ञाता और बलवान् होता है। परन्तु कृष्णपक्ष का चन्द्रम होने से पापनिरत होता है।

( ११ ) कौतुक अवस्था में चन्द्र हो तो जातक राजा अथवा राजा के समान धनी, कामकला कुशल और वारांगनाओं के साथ रत, क्रोधी में चतुर होता है।

( १२ ) यदि शुक्लपक्ष का चन्द्रम निद्रा अवस्था में हो और उसके साथ बृहस्पति भी हो तो जातक बड़े महत्वपद को प्राप्त करता है। परन्तु यदि कृष्णपक्ष का चन्द्रम निद्रावस्था में हो तो ऐसे जातक के

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संचित धन का विनाश होता है और वह सर्वदा अवगुणों का खान होता है और शोक तथा दरिद्रता से ग्रस्त रहता है।

( ९ ) यदि शयन अवस्था में मंगल हो तो जातक के शरीर में कण्डु (खुजली), दद्रु (दिनाय) आदि रोग, सप्तम स्थान में हो तो जातक की स्त्री की हानि और पञ्चम स्थान में हो तो पुत्र की हानि होती है।

यदि षष्ठ स्थान में शत्रु ग्रहों से दृष्ट हो तो कामदेव-जन्य विकार की तत्परता से जातक का हाथ टूट जाता है।

यदि ऐसा मंगल, शनि और राहु दोनों से युक्त हो तो जातक निरन्तर रोगी और शिरोवेदना से पीड़ित रहता है।

( २ ) उपवेशन अवस्था में मंगल हो तो जातक धन सम्पन्न होता है। परन्तु झूठा, पापकर्म निरत, स्वधर्म से हीन और सदा चतुर तथा वाचाल होता है।

( ३ ) नेत्रपाणि अवस्था का होकर मंगल लग्न में हो तो जातक सर्वदा दरिद्र रहता है। पर अन्य भावों में रहने से नगर ग्रामादि का स्वामी होता है।

लग्न स्थित मंगल का विशेष फल यह होता है कि ऐसे जातक को गृहस्थाश्रम के सुख का अभाव, कामदेव जन्य विकार की तत्परता से अंग-भंग, सर्पभय, जलभय और अग्नि भय होता है। जातक दांत की पीड़ा एवं व्रणादि से पीड़ित रहता है।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में मंगल हो तो जातक के गुणों का प्रकाश होता है। ऐसा जातक परदेश में निवास करता है और राजद्वार में उसकी मान मर्यादा बढ़ती रहती है।

यदि ऐसा मंगल पञ्चम भाव में हो तो पुत्र का नाश होता है और यदि उसके साथ राहु भी हो तो ऐसे जातक का वृक्षादि से पतन होता है।

यदि ऐसा मंगल सप्तम भाव में हो तो स्त्री की हानि होती है। स्मरण रहे कि प्रकाश अवस्था का मंगल यदि पापयुक्त अथवा पाप ग्रहों से घिरा हो तो ऐसा जातक बहुत बड़ा दुष्कर्मी होता है।

शास्त्रकारों ने कहा है कि ऐसा जातक के पाप की ध्वजा उड़ती है।

( ५ ) गमनेच्छा अवस्था में मंगल हो तो जातक निरन्तर यात्रा निरत अर्थात् सफर करने वाला होता है।

ऐसे जातक को स्त्री कलह करने वाली होती है और जातक प्राण, दाह तथा खुजली आदि चर्म रोग से पीड़ित रहता है एवं शत्रु द्वारा उसके धन की हानि होती है।

( ६ ) गमनावस्था में मंगल हो तो जातक अनेक गुण सम्पन्न, तीक्ष्ण

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ग्रह प्रभेद प्रकरण

खड्गधारी, हाथी आदि सवारियों से युक्त, मणियों की माला पहनने वाला, शत्रुओं का विजेता और आत्मीय जनों को सुखकारी होता है।

( ७ ) यदि उच्चस्थ मंगल सभा अवस्था में हो तो जातक युद्ध विद्या विशारद, धर्मात्मा और धनी, पञ्चम अथवा नवम स्थान में हो तो मूर्ख, बारहवें स्थान में हो तो स्त्री-पुत्र-मित्रादि से रहित तथा इन स्थानों के अतिरिक्त यदि अन्य स्थान में हो तो राजसभा का पण्डित, दानी, मानी एवं बहुधनी होता है।

( ८ ) आगमन अवस्था में मंगल हो तो जातक धर्म कर्म रहित, कायर और कुसंगी होता है और ऐसे जातक के कान के समीप किसी शूल रोग से पीड़ित होती है।

( ९ ) भोजन अवस्था में मंगल बली हो तो जातक मिष्टान्न प्रिय, नीचकर्म करने वाला और मान हीन होता है।

( १० ) नृत्यलिप्सा अवस्था में मंगल हो तो जातक को राजा से बहुत धन की प्राप्ति होती है और उस के गृह विशाल, सुन्दर और धन-धान्यादि से पूर्ण रहते हैं।

( ११ ) कौतुक अवस्था में मंगल हो तो जातक कौतुक प्रिय और मित्र-पुत्रादि से युक्त होता है। यदि मंगल उच्च हो तो जातक राजदरबार का पण्डित, बहुत गुणज्ञ और पण्डितों से सम्मानित होता है।

( १२ ) निद्रा अवस्था में मंगल हो तो जातक क्रोधी, बुद्धिहीन, धनहीन, धर्महीन, रोगी और धूर्त होता है।

बुध का द्वादश अवस्था फल जान

( १ ) शयन अवस्था में बुध हो तो जातक के नेत्र कर्जनी के सदृश लाल होते हैं। वह लंगड़ा, भूख से सर्वदा आतुर रहता है। यदि ऐसा बुध अन्य कोई भावगत हो तो जातक लोभी और धूर्त होता है।

( २ ) उपवेशन अवस्था में बुध हो तो जातक सर्वगुण सम्पन्न होता है। यदि वैसा बुध उच्च अथवा मित्रराशिगत हो तो जातक धन से सुखी और पापयुक्त या दुष्ट हो तो दरिद्र होता है।

( ३ ) नेत्रपांग अवस्था में बुध हो तो जातक विद्या-विवेकहीन, असन्तोषी और दम्भी होता है। तथा वह किसी की भलाई नहीं करता है। यदि वैसा बुध पञ्चमभाव गत हो तो पुत्र और स्त्री के सुख से वंचित रहता है; परन्तु ऐसे जातक को कन्या का सुख होता है।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में बुध हो तो जातक दयावान, दाता, पुण्यक कार्य को करने वाला, विवेकी, उद्दट विद्वान् और दुष्टों के घमण्ड को तोड़ने

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( ५ ) गमनेच्छा अवस्था ।

( ६ ) गमनावस्था में बुध हो तो जातक सर्वदा चल फिर करने वाला, लक्ष्मी से पूर्ण गृह वाला और सब प्रकार से शोभा युक्त होता है। ऐसे जातक को राजा से विस्तृत भूमि मिलती है।

( ७ ) सभा अवस्था में बुध हो तो जातक कुबेर के समान धनी, हाकिमो इत्यादि के पद पर नियुक्त अथवा मंत्री होता है। ऐसे जातक को पुण्य की वृद्धि उत्तरोत्तर होती है और विष्णु भगवान एवं शंकर भगवान के चरणों का प्रेमी होता है। ऐसे जातक को साक्ष्त शक्तिकी मुक्ति होती है; परन्तु यदि ऐसा बुध सप्तम अथवा पञ्चम भाव गत हो तो कन्यायें बहुत और पुत्र थोड़े होते हैं।

( ८ ) आगम अवस्था में बुध हो तो जातक को कार्य में सफलता नीच जनों कीसेवा से होती है और ऐसे जातक को दो पुत्र तथा शुभ लक्षणों से भरी हुई एवं सम्मान (प्रतिष्ठा) देने वाली एक कन्या होती है।

( ९ ) भोजन अवस्था में बुध हो तो जातक के धन की हानि, विवाद और झगड़ा इत्यादि से होती है। स्त्री और धन के सुख से वंचित रहता है, राजा से भयभीत और चंचल बुद्धि वाला होता है।

( १० ) नृत्यालिप्सा अवस्था में बुध हो तो जातक मानी, इज्जत वाला, मित्र, पुत्र और वाहनादि से सुखी, धन सम्पन्न, प्रतापी और सभा में चतुर होता है। परन्तु यदि पापराशि गत हो तो जातक व्यसनी और वाराङ्गनाओं से रतिक्रीडा करने वाला होता है।

( ११ ) कौतुक अवस्था में बुध हो और लग्न में बैठा हो तो ऐसा जातक गान-विद्या में प्रशंसा योग्य होता है। यदि ऐसा बुध सप्तम अथवा अष्टम स्थान में हो तो वाराङ्गनाओं से प्रीति करने वाला और नवम स्थान में हो तो आगम पुण्य कार्य में तत्पर रहता हुआ अन्त उसकी सद्गति होती है।

( १२ ) निद्रा अवस्था में बुध हो तो शारीरिक तथा मानसिक व्यथा से पीड़ित और निद्रासुख से भी वंचित तथा सन्ताप में निमग्न रहता है। भ्राताओं से उसे विकलता रहती है, उसके धन और मान का नाश होता है और अपने मनुष्यों से कलह तथा झगड़ा होता रहता है।

बृहस्पति का द्वादश अवस्था फल ज्ञान

( ९ ) शयन अवस्था में बृहस्पति हो तो बलवान् होने पर भी जातक

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ग्रह प्रभेद प्रकरण

का स्वर अच्छा नहीं होता है जातक गौरवर्ण का होता है। उसकी ठुडडी लम्बी होती है तथा निरन्तर उसे शत्रुओं का भय रहता है।

( २ ) उपवेशन अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक वाचाल, घमण्डी और राजा तथा शत्रुओं से सर्वदा सन्तप्त रहता है। ऐसे जातक के मुख, हाथ, जंघा तथा पैर में व्रणादि दोष हुआ करता है।

( ३ ) नेत्रपाणि अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक गौराङ्ग परन्तु शोभा रहित, अतिकामी तथा विजातियों से प्रेम करने वाला होता है एवं उसे नाच गान से अधिक प्रेम होता है।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में बृहस्पति हो और उच्चस्थ हो तो जातक कुबेर के ऐसा धनाढ्य, श्रीकृष्ण भगवान के ऐसा वन-उपवन में विहार करने वाला, भक्ति द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने वाला, सर्वगुण सम्पन्न, सुखी और तेजस्वी होता है।

( ५ ) गमनेच्छा अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक साहसी, मित्र, पुत्र आदि से सम्पन्न, धन से सुशोभित, वेदों को जानने वाला और पण्डित होता है।

( ६ ) गमनावस्था में बृहस्पति हो तो जातक को लक्ष्मी सर्वदा सुशोभित रखती हैं। उसकी स्त्री सुशीला होती है तथा उसके अधीन बहुत से मनुष्य रहते हैं।

( ७ ) सभा अवस्था में बृहस्पति रहे तो जातक शास्त्रों तथा अनेक विद्याओं को जानने वाला और धनी होता है।

ऐसे जातक को हाथी, घोड़े, रथ इत्यादि का पूर्ण सुख होता है। उसका घर मणि-माणिक्य इत्यादि से भरा रहता है।

( ८ ) आगम अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक को हाथी, घोड़े, पालकी इत्यादि वाहन और सेवक, पुत्र, मित्र तथा स्त्री का सुख होता है।

वह विद्वान्, राजा के तुल्य धनी, काव्य का प्रेमी, अति बुद्धिमान् और सर्व हितैषी होता है।

( ९ ) भोजन अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक को भोजन में उत्तम पदार्थ मिलते हैं और घोड़ा, हाथी, रथ इत्यादि का सुख होता है।

चिरकाल तक लक्ष्मी उसके घर में निवास करती हैं।

यदि वैसा बृहस्पति लग्न में हो तो जातक धुनधर अर्थात् अस्त्रविद्या में प्रवीण में प्रवीण होता है।

परन्तु यदि वैसा बृहस्पति पञ्चम अथवा नवम भाव में हो तो जातक निर्धन, पुत्र रहित तथा पापी होता है।

( १० ) नृत्यलिप्सा अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक राजा से सम्मानित, धर्मपरायन, धनवान, तन्त्रशास्त्री अथवा तर्कशास्त्र और व्याकरण शास्त्र को

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जानने वाला अर्थात् पण्डित होता है। वह विद्वानों से घिरा रहता है। ऐसे जातक की ऊहापोह अर्थात् समयानुसार सूझ ( हाजिर जवाबी ) अच्छी होती है। ( ११ ) कौतुक अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक खेल तमाशा करने वाला, सर्वदा धन सम्पन्न, कृपालु, सुखी, नीतिमान्, बलवान् और राजद्वार का पण्डित होता है। ऐसा जातक अपने कुल रूपी कमल का सूर्य होता है। अर्थात् जातक के कुल की ख्याति, उन्नति इत्यादि, जातक द्वारा होती है और उस के पुत्र नष्ट स्वभाव के होते हैं। ( १२ ) निद्रा अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक दरिद्रता से पीड़ित अपने कार्यों में मूर्खता दिखलाने वाला होता है। उसके गृह में पुण्य का अभाव होता है।

शुक्र का द्वादश अवस्था फल ज्ञान ( १ ) शयन अवस्था में शुक्र हो तो जातक बलवान् होते हुए भी क्रोधी तथा दुराचार्गी होता है। ऐसा जातक धनहीन, व्यसनी और वेश्याओं के साथ सड़्ति करने वाला होता है। ( २ ) उपवेशन अवस्था में शुक्र हो तो जातक मणि-माणिक्य और स्वर्ण के आभूषणों से सर्वदा अलंकृत रहता है। उसकी मानोन्नति होती है। वह शत्रुओं पर विजय पाता है और राजा से अनुग्रहीत रहता है। ( ३ ) नेत्रपाणि अवस्था में होकर लग्नगत शुक्र हो अथवा सप्तम एवं दशम भावगत हो तो जातक दुराचार्गी और नेत्ररोगी होता है। उसे कामदेव की वृद्धि और धन का क्षय अवश्य होता है; परन्तु यदि अन्य भावगत हो तो वह विशाल भवनाधिपति होता है।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में शुक्र हो और यदि स्वगृही उच्च अथवा मित्र राशिगत हो तो जातक, काव्य विद्या और श्रृङ्गारादि कलाओं में निपुण तथा गायन विद्या का ज्ञाता होता है। उसका ऐश्वर्य राज तुल्य होता है और उन्मत्त हाथी की लीला एवं क्रोड़ा आदि में उसे बहुत प्रेम होता है। ( ५ ) गमनेच्छा अवस्था में शुक्र हो तो जातक की माता की मृत्यु शीघ्र होती है और शत्रुओं के भय से ऐसा जातक भी स्वपक्षीय लोगों के पक्ष में रहता है और कभी शत्रु पक्ष में मिल जाता है। ( ६ ) गमनावस्था में शुक्र हो तो जातक बुद्धिमान्, तीर्थयात्रा करने

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(७) सभा अवस्था में शुक्र हो तो जातक तेजस्वी, गुणी, शत्रुविजयी, कुबेरतुल्य धनी और हाथी, घोड़ा आदि सवारी पर गमन करने वाला तथा श्रेष्ठ मनुष्य होता है। वह राजसभा में अपने तेज और बल से बिना विशेष परिश्रम के मर्यादा प्राप्त करता है।

(८) आगम अवस्था में शुक्र हो तो जातक धनागम से वञ्चित अर्थात् दरिद्र होता है। शत्रुओं से हानि होती है। पुत्र तथा स्वजनों का नाश होता है।

(९) भोजन अवस्था में शुक्र हो तो जातक सर्वदा भूख से आतुर, शत्रुओं के भय से दुःखी, रोग से पीड़ित और विद्वानों से मण्डित होता है। अपनी स्त्री के प्रताप से धनावान् और उसे स्त्री सुख होता है।

(१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में शुक्र हो तो जातक काव्य विद्या का उत्तम ज्ञाता होता है। गान-विद्या में निपुण और मृदंग आदि बाजा के बजाने में योग्य होता है। ऐसे जातक की बुद्धि मनोहर होती है और सर्वदा धन की वृद्धि होती रहती है।

(११) कौतुक अवस्था में शुक्र हो तो जातक इन्द्रवत् ऐश्वर्यवान्, रमणीय, विद्या को जानने वाला और सभाओं में मर्यादा पाने वाला होता है। संसार में उसे बड़प्पन मिलता है और लक्ष्मी सदा उसके गृह को सुशोभित करती रहती हैं।

(१२) निद्रा अवस्था में शुक्र हो तो जातक सदा सारी पृथ्वी में भ्रमण करने वाला, अतिवाचाल, वीर, सर्वदा अन्य लोगों का सेवक और दूसरों की बुराई करने वाला होता है।

शनि का द्वादश अवस्था फल ज्ञान शनि जन्मकाल में जिस अदस्था का होकर जिस किसी भाव में स्थित हो उस अवस्था के नाम सदृश्य शुभाशुभ फल विशेषतः देता है।

(१) शयन अवस्था में शनि हो तो जातक भूख प्यास से सर्वदा व्याकुल, छोटी आयु में रोगी और पीछे जाकर बड़ा भाग्यवान् होता है।

(२) उपवेशन अवस्था में शनि हो तो जातक बली और शत्रुओं से पीड़ित रहता है। उसके धन की हानि होती है। राजा से बारम्बार दण्ड पाता है। दाद (दिनाय) आदि चर्म रोग से अवश्य ही दुःखी रहता है और बड़ा अभिमानी होता है।

(३) नेत्रपाणि अवस्था में शनि हो तो राजा ऐसे जातक पर प्रेमपूर्वक प्रसन्नता रखता है। अनेक कला कौशल का जानने वाला होता है।

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वाणी उसकी निर्मल होती है और दूसरे की सम्पत्ति से शोभित होता है। उसका घर सुन्दर और पराये धन से सम्पन्न रहता है। ( ४ ) प्रकाशन अवस्था में शनि हो तो जातक की कान्ति सुन्दर होती है। वह गुणवान्, सबुबुद्धिमान्, विनोदशील, दयावान् और ग्रामों का अधिपति तथा धनी होता है। ईश्वर के चरणों में उसकी भक्ति रहती है।

( ५ ) गमनेच्छा अवस्था में शनि हो तो जातक महाधनी, पुण्य करने वाला, शत्रु जिवर्यो, शत्रु से भूमि हरण करने में सफल और पुत्रैश्वति से आनन्दित रहता है तथा राजदरबार को चतुरों का शिरोमणि बनकर सुशोभित करता है।

( ६ ) गमनावस्था में शनि हो तो जातक पुत्र तथा स्त्री सुख से हीन, पृथ्वी में पर्यटन करने वाला और मानसिक दुःख के कारणएकान्त स्थान का वास करने वाला होता है। उसके पैरों में रोग होता है।

( ७ ) सभा अवस्था में शनि हो तो जातक रत्नादि की मालाओं से सुशोभित, तेजस्वी और नीतिमान् होता है।

( ८ ) आगम अवस्था में शनि हो तो जातक की चाल अति मन्द होती है और किसी से याचना करने में असमर्थ तथा बारम्बार रोग से पीड़ित होता है।

( ९ ) भोजन अवस्था में शनि हो तो जातक को षट्‌रस भोजन प्राप्त होता है। वह मोह तथा अज्ञान से संतप्त रहता है। उसके नेत्रों की ज्योति मन्द होती है।

( १० ) नृत्यलिप्सा अवस्था में शनि हो तो जातक धैर्यवान्, रणकुशल, राजदरबार में आदरणीय, धनी और धर्मात्मा भी होता है।

( ११ ) कौतुक अवस्था में शनि हो तो ऐसा जातक काव्य शास्त्र को जानने वाला अर्थात् काव्य-रस का प्रेमी, धनी और सुखी होता है। उसकी स्त्री सुन्दर होती है।

( १२ ) निद्रा अवस्था में शनि हो तो जातक धनी, गुणी, पराक्रमी, प्रचण्ड, शत्रुविजयी और स्त्री प्रसंग-विधि में कुशल होता है।

राहु का द्वादश अवस्था फल विचार

( १ ) शयन अवस्था में राहु हो तो जातक रोगी तथा दुःखी रहता है। पुनः यदि ऐसा राहु मेष, वृष, मिथुन, कन्या, तुला और वृश्चिक राशिगत हो तो जातक के पास धन एवं अन्न का समूह रहता है।

यदि द्वितीय, एकादश अथवा द्वादश भाव में हो तो जातक निर्धन रहता है।

यदि द्वितीय, एकादश अथवा द्वादश भाव में हो तो जातक निर्धन रहता हुआ संसार में भ्रमण करता है।

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ऐसा भी वर्णन मिलता है कि राहु के उच्च, स्वग्रही, मित्रग्रही, स्वनवमांश, मित्रनवांश, शुक्र या मंगल के क्षेत्र में हो तो पूर्ण फल मिलता है।

( २ ) उपवेशन अवस्था में राहु हो तो जातक राज्यसभा में बैठने वाला और माननीय होता है। परन्तु उसे धनसुख नहीं होता और दाद रोग से सन्तप्त रहता है।

( ३ ) नेत्रपाणि अवस्था में राहु हो तो जातक के धन का क्षय होता है। वह नेत्र रोगी और उसे शत्रु, चोर तथा सर्पादि से भय होता है।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में राहु हो तो जातक के उत्तम यश तथा धन एवं सद्गुणों की वृद्धि होती है। विद्या तथा चतुराई के कारण राज्यदरबार में उत्तम पद प्राप्त होता है। उसकी यशरूपी लता की बहुत वृद्धि होती है और परदेश में विशेष उन्नति होती है तथा जातक मेघ सदृश रूपवान् होता है।

( ५ ) गमनेच्छा अवस्था में राहु हो तो जातक विद्वान्, धनवान्, उदार, मनुष्यों में श्रेष्ठ और राजपूज्य होता है। ऐसे जातक के ( अपनी ) सन्तान की संख्या अच्छी होती है।

( ६ ) गमनावस्था में राहु हो तो जातक क्रोधी, कृपण, कुटीिल, बुद्धिहीन और धनरहित तथा कामासक्त भी होता है।

( ७ ) सभा अवस्था में राहु हो तो जातक बहुगुण सम्पन्न, धनी एवं विद्वान् परन्तु कृपण होता है।

( ८ ) आगम अवस्था में राहु हो तो जातक शत्रुभय से पीड़ित, बन्धुबान्धवों से कलह करने वाला और मूर्ख होता है। उसके धन की हानि होती है और उसका शरीर कृश होता है।

( ९ ) भोजन अवस्था में राहु हो तो जातक स्त्री-पुत्र के सुख से वर्जित, आलसी, मन्द बुद्धि वाला और इतना दरिद्र होता है कि भोजन में भी सन्देह होता है।

( १० ) नृत्यलिप्सा अवस्था में राहु हो तो जातक के धन और धर्म का क्षय होता है। शत्रुओं से भयभीत, कठिन रोगों से ग्रसित और नेत्र रोगी होता है।

( ११ ) कौतुक अवस्था में राहु हो तो जातक परधनहारी, परस्त्रीगामी और गृहरहित होता है।

( १२ ) निद्रा अवस्था में राहु हो तो जातक धनी, गुणी, धैर्यवान् और स्त्री पुत्रादि से सुखी होता है।

यदि नवां या सातवां भाव में राहु हो तो जातक किसी पुण्य क्षेत्र में निवास करता है।

केतु का द्वादश अवस्था फल ज्ञान

( ९ ) शयन अवस्था में मेष, वृष, मिथुन अथवा कन्या राशिगत केतु

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हो तो ऐसे जातक के धन की वृद्धि होती है; परन्तु अन्य राशिगत होने से रोग की वृद्धि होती है।

( २ ) उपवेशन अवस्था में केतु हो तो जातक को शत्रु, चोर, राजा तथा सर्प से भय होता है और उसे चर्म रोग अर्थात दाद इत्यादि का भय होता है।

( ३ ) नेत्रपाणि अवस्था में केतु हो तो जातक को दुष्ट जन्त अर्थात सर्पादि, शत्रु और राजा से भय होता है। जातक नेत्र रोगी और चंचल होता है। उसके धन नष्ट होते हैं।

( ४ ) प्रकाशन अवस्था में केतु हो तो जातक को विदेश में सुख प्राप्त होता है। राजा से मान प्राप्त करता है। यश तथा धन की वृद्धि होती है।

( ५ ) गमनेच्छा अवस्था में केतु हो तो जातक धनी, पुत्रवान और विद्वान होता है तथा राजा से उसे मान प्राप्त होता है।

( ६ ) गमनावस्था में केतु हो तो जातक कामी, दुष्ट, निर्धन, धर्म-कर्म रहित, क्रोधी तथा द्रुग होता है।

( ७ ) सभा अवस्था में केतु हो तो जातक धूर्त, वाचाल, गर्वित, लोभी और कृपण होता है।

( ८ ) आगम अवस्था में केतु हो तो जातक बन्धुवर्ग तथा शत्रुओं से विवाद करने वाला, रोगी और बड़ा भारी पापी होता है।

( ९ ) भोजन अवस्था में केतु हो तो जातक भूख से पीड़ित, रोगी, दरिद्र तथा भ्रमणशील होता है।

( १० ) नृत्यलिप्सा अवस्था में केतु हो तो जातक के नेत्रों की दृष्टि स्थिर नहीं रहती है और वह सर्वदा रोगी तथा दुःखी होता है।

धूर्त तथा अनर्थ कार्यों में लिप्त रहता है; परन्तु किसी से हारता नहीं है

( ११ ) कौतुक अवस्था में केतु हो तो जातक खेल तमाशे में लिप्त तथा नटिन स्त्रियों में आसक्त, दुष्टाचारी और दरिद्र होता है। तथा स्थान भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर मारता फिरता है।

( १२ ) निद्रा अवस्था में केतु हो तो जातक अन्न, धन से पूरित रहता हुआ गुणों की चर्चा में लीन रहकर सुख से दिन व्यतीत करता है।

निद्रावस्या का विशेष फल ज्ञान- निद्रावस्था में यदि कोई पापग्रह सप्तम स्थान में हो तो जातक की स्त्री का नाश होता है।

परन्तु यदि शुभग्रह की उस पर दृष्टि पड़ती हो अथवा शुभग्रह उसके साथ हो तो स्त्री कष्ट भोग कर जीवित रह जाती है।

यदि कभी छठे अथवा सातवें स्थान में कोई भी निद्रावस्था का ग्रह हो, परन्तु यदि वह शत्रु ग्रह से दृष्ट हो तो ऐसे जातक की स्त्री उचित रक्षा होने पर

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मत से इस के दश भेद हैं| पराशर, गुणाकर और सारावली में ९ प्रकार बतलाया है| 'जातक पारिजात' भावकुतूहल' और दक्षिण भारत के कई विद्वानों ने १० ही बतलाया है| उसका नाम इस प्रकार है- ( १ ) दीप्त, ( २ ) स्वस्थ, ( ३ ) प्रमुदित, ( ४ ) शान्त, ( ५ ) शक्त, ( ६ ) प्रपीड़ित, ( ७ ) दीन, ( ८ ) खल, ( ९ ) विकल और ( १० ) भीत|

( १ ) दीप्त-जब ग्रह उच्च होते हैं तब उनका नाम दीप्त होता है| किसी किसी के मत से मूलत्रिकोणस्थ ग्रह भी दीप्त कहलाता है|

ऐसे दीप्त ग्रह की महादशा में जातक राजा के जैसा धनवान्, यशस्वी, दानी, विद्या-विनोद सम्पन्न, शत्रुओं को पराजय करने वाला, बुद्धिमान् और शत्रु विजयी होता है|

वाहन सुख और कन्या सन्तान की उत्पत्ति होती है तथा राजा, सम्बन्धी एवं मित्र वर्गों से पुरस्कृत होता है|

( २ ) स्वस्थ-वह कहलाता है जो ग्रह स्वगृही होता है| किसी मत से अतिमित्रगृही ग्रह स्वस्थ अवस्था का होता है|

स्वस्थ ग्रह की महादशा में जातक आचार, धर्म, पुराणादि, श्रवण, सर्वसुख सम्पन्न, शरीर स्वस्थ और धन लाभ का सुख पाता है|

वह राजा से सम्मानित होता है और विद्या, यश तथा आनन्द प्राप्त करता है|

उसे स्त्री तथा सन्तान का सुख होता है| वह उदार, कीर्तिमान् एवं विनाशक होता है|

( ३ ) प्रमुदित-( दूषित ) उस ग्रह को कहते हैं जो मित्रगृही होता है| प्रमुदित ग्रह की महादशा में राजप्रीति, सुख और विभूतियों की वृद्धि होती है|

अच्छे-अच्छे वस्त्र और सुगन्धादि के लाभ होते हैं| सन्तान, सम्पत्ति, वाहन, भूषणादि तथा पृथ्वी का लाभ होता है|

गीत-नृत्य और पुराणादि श्रवण तथा उच्च पद सम्भव होता है| वह मित्र पुत्रादि, सुख सम्पन्न और धार्मिक होता है|

( ४ ) शान्त-इस अवस्था का वह ग्रह कहलाता है, जो शुभ वर्ग तथा वर्गोत्तम का होता है|

शान्त ग्रह की महादशा में आरोग्यता, आनन्द, सन्तान, भूसम्पत्ति, वाहनविद्या विनोद और बहु द्रव्य आदि की प्राप्ति होती है|

राजा से सम्मानित होता है अथवा सचिव होता है| अच्छी शिक्षायें मिलती हैं|

कुटुम्बों को सहायता देता और सुखमय जीवन व्यतीत करता है|

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ऐसा जातक परोपकारी और धार्मिक होता है। ( ५ ) शक्त-शक्त उसे कहते हैं तो वक्री हो 'गूणाकर' में रशिमवितान भृक्त्वा' लिखा है, 'सारावली' में 'स्फुट किरणजालश्र' लिखा है। शक्त ग्रह की महादशा में पुरुषार्थ की उत्तति, सम्पत्ति और स्वजन सम्बन्धी आनन्द प्राप्त होता है। विद्या विनय तय्यरती, धर्मानुष्ठान से सिद्धि और दानादि की चेष्टा होती है। जातक सजीला जवान, सुन्दर, विख्यात और कीर्तिमान होता है। स्परण रहे कि ऐसा शुभग्रह यदि वक्री होता है तो शुभ फल देता है, परन्तु पापग्रह के वक्री होने से विपरीत फल होते हैं।

( ६ ) प्रपीड़ित-प्रपीड़ित तथा पीड़ित ( दुःखित ) ग्रह वह कहलाता है जो शत्रु गृही, पापराशिगत, ग्रहयुद्ध में हारा हुआ या राशि के अंतिम नवांश मे रहता है। पीड़ित ग्रह की महादशा में मित्रों से असन्तोष, कुटुम्बों से विवाद, परिवार में अशान्ति, फौजदारी मुकद्दमे से दुःख, राजदण्ड से निकाला, या परदेश में मारा फिरने वाला और चोर-डाकुओं से भय होता है। अथवा किसी छोटे भाई को मृत्यु होती है।

( ७ ) दीन-( भीत ) ग्रह वह कहलाता है जो नीच, शत्रु ग्रह या पाप नवमांश का हो। दीन ग्रह की महादशा में चित्त की अशान्ति, परभलापन अर्थात् मन को भ्रान्ति, रोग, जाति, कुल से पतन, बन्धुजनों से विरोध, हीन वृत्ति से जीविका, मलिनता, प्रवास और नाना प्रकार से शोक-दुःखाइ होते हैं।

( ८ ) खल-खल ग्रह वह कहलाता है जो शत्रु वर्गी या पापवर्गी हो। खलग्रह की महादशा में माता पिता और स्त्री पुत्र से मनोमालिन्य अथवा वियोग तथा अकस्मात् धन एवं पृथ्वी का नाश, जाति वर्गों से लाञ्छना, रोग, कारागार और नाना प्रकार के सन्ताप होते हैं।

( ९ ) विकल-लुप्त ग्रह वह कहलाता है जो सूर्य से अस्त रहता है। विकल ग्रह की महादशा में चित्त भ्रान्ति, उन्माद, माता-पिता से वियोग, पुत्र द्वारा हानि तथा स्त्री, सन्तान और मित्रादिकों की मानहानी होती है। अथवा किसी मित्र की मृत्यु होती है। दुश्मनों से पीड़ित और स्त्रीमरण शोक से संतप्त रहता है।

( १० ) भीत-यह ग्रह अतिचारी होता है। ( पञ्जाङ्क को देखने से बोध होगा कि कई कारणों से कभी-कभी ग्रह बहुत ही शीघ्रगामी हो जाता है, उसी को अतिचार कहते हैं )।

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भृगु संहिता फल दर्पण

भौतग्रह की महादशा में राजा, अग्नि, चोर और शत्रु से भय होता है। नाना प्रकार के दुःख, मनहानी और रोग से जातक दुःखी रहता है।

लज्जिताद्यवस्था विचार

इसमें छः प्रकार की अवस्थायें होती हैं।

( १ ) जब कोई ग्रह पंचमभाव में हो और उसके साथ राहु, केतु, सूर्य, शनि अथवा मंगल हो तो वह लज्जितावस्था में होता है।

( २ ) उच्चस्थ ग्रह या मूलत्रिकोणस्थ ग्रह की गर्वितावस्था होती है।

( ३ ) शत्रुग्रही, शनियुक्त शत्रुग्रहयुक्त अथवा शत्रुग्रद्दृष्ट ग्रह क्षुधितावस्था में होता है।

( ४ ) यदि कोई ग्रह जलराशिगत हो और उस पर शत्रुग्रह की दृष्टि भी हो, पर शुभ ग्रह से दृष्ट न हो तो उस ग्रह की तृषितावस्था होती है।

( ५ ) यदि कोई मित्रग्रही हो, मित्रग्रह से युक्त भी हो अथवा बृहस्पति से युक्त हो अथवा मित्रग्रह से दृष्ट हो तो उसकी मुदितावस्था होती है।

( ६ ) अस्तग्रह जब पाप अथवा शत्रुग्रह से दृष्ट हो तो उसकी क्षोभितावस्था होती है।

जिस किसी भी भाव में क्षुधित अथवा शोभित ग्रह पड़ता है उस भाव के फलों को नष्ट करता है और उससे जातक दुःखी होता है।

यदि उसके साथ मुदितावस्था का ग्रह भी हो तो मिश्रित फल होता है। पर यदि मुदित ग्रह बलहीन हो तो हानि विशेष रूप से और यदि बलवान् हो तो उत्तम फल होता है।

यदि दशमस्थान में लज्जित, तृषित, क्षुधित या शोभित ग्रह बैठा हो तो जातक अनेक प्रकार का दुःख भोगता है।

पंचमभाव में लज्जित ग्रह के रहने से जातक के सन्तान की मृत्यु होती है और एक ही सन्तान रह जाता है।

इसी प्रकार यदि क्षोभित या तृषित ग्रह सप्तम स्थान में बैठा हो तो जातक की स्त्री की मृत्यु होती है।

यह अवस्था अद्भुत सागर नामक ग्रन्थ से उद्धृत किया गया है। इन अवस्थाओं के अलग-अलग फल का पता नहीं चलता।

ऊपर लिखा गया है कि दशमस्थान में यदि लज्जित ग्रह हों तो जातक दुःख का भाजन होता है।

लज्जितावस्था में पंचम भावगत ग्रह होता है। इसी कारण लज्जित का दशमे स्थान में होना असम्भव है।

प्रतीत होता है कि मूल में छापे की भूल है।

वचन इस प्रकार है–

'कर्मस्थाने स्थिता यस्य लज्जितस्तृषितस्तथा । क्षुधितः क्षोभितो वाऽपि स नरो दुःख भाजनः ।।'

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शुद्धाद्यावस्था विचार- इसमें २७ प्रकार की अवस्था होती है। उनके नाम इस प्रकार से कहे गये हैं- ( १ ) शुद्ध, ( २ ) वस्त्रधारण, ( ३ ) पुण्‍ड्रधारण, ( ४ ) जय, ( ५ ) शिवपूजा, ( ६ ) अवसान, ( ७ ) विष्णुपूजा ( ८ ) विप्रपूजा, ( ९ ) नमस्कार, ( १० ) प्रदक्षिणा, ( ११ ) व्यासदेव, ( १२ ) अतिथिपूजा, ( १३ ) भोजन, ( १४ ) विद्या-परिश्रम, ( १५ ) क्रोध, ( १६ ) ताम्बूल, ( १७ ) नृपाल पस्त्यम, ( १८ ) गमन, ( १९ ) जलपान, ( २० ) आलस्य, ( २१ ) शयन, ( २२ ) अमृतपान, ( २३ ) अलंकार, ( २४ ) स्त्रीआलापनम्, ( २५ ) सम्भोग, ( २६ ) निद्रा और ( २७ ) रत्नपरीक्षा।

शास्त्रकारों का मत है कि सभी ग्रह इन सत्ताईस अवस्थाओं में से किसी न किसी एक अवस्था के होते हैं और प्रत्येक को अपनी अवस्था के अनुसार फल दायित्व होता है।

इस अवस्था के जानने की दो विधि हैं। मेष से लग्न पर्यन्त, जो संख्या आये उस संख्या को जिस ग्रह की अवस्था निकालना है, उस ग्रह की राशि स्थित संख्‍या से गुणा कर दे और जो गुणन फल आये, उसको सत्ताईस से भाग दे। जो शेष रहे उसको उस ग्रह की महादशा की संख्या से गुणा कर उसको फिर सत्ताईस से भाग दे; जो शेष रहे वही उस ग्रह की अवस्था होगी।

यदि एक शेष रहे तो शुद्ध अवस्था, दो रहे तो वस्त्रधारण अवस्था, इत्यादि -इत्यादि प्रकार जानना चाहिए। यदि २७ से भाग न हो सके तो जो अंक है वही रह जायगा और यदि सत्ताईस से भाग देने पर शून्‍य बच जाय तो शेष २७ मानना होगा।

उदाहरण कुंडली के मंगल की अवस्था कि निकालना हो तो उनकी विधि यह होगी। लग्न धनु राशि है। मेष से गिनने से धनु की संख्या ९ होती है। मंगल सिंह में है। मेष से मंगल तक गिनने से ५ होती है। अर्थात् इस प्रकार मानिये कि धनु नवम राशि और सिंह पञ्चम राशि है। अब ९ को ५ से गुणा किया तो फल ४५ आया। ४५ को २७ से भाग दिया तो शेष १८ रहा। १८ को मंगल की महादशा मान, अर्थात् ७ से गुणा किया तो फल १२६ आया। उसको पुनः २७ से भाग दिया तो शेष १८ बचा और अठारहवीं गमन अवस्था है, इसलिये मंगल गमन अवस्था का हुआ।

शुद्धाद्यावस्थाओं का फल ज्ञान- यदि पथम अवस्था हो तो उत्तत्ति, दूसरी अवस्था शुभ, तृतीय अवस्था में सब तरह से रक्षा, चतुर्थ अवस्था में आनन्‍द, पञ्चम में शत्रुओं पर विजय, षष्ठ में साधारण फल, सप्तम में विजय, अष्टम में कार्य में तत्परता, नवम में आनन्‍दमय जीवन, दशम में कठिनाईयाँ, ग्यारह में अशुभ, बारहवें में अति आनन्‍द, तेरहवें में कार्य में तत्परता, चौदह में उन्नत्ति,

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सत्रहवें में धार्मिक प्रतिष्ठित सुशील और नियमशील होता है। अठारहवें में विद्वान् धनी और उच्च श्री का फौजी जीवन व्यतीत करने वाला होता है। उन्नीसवें में मधुरभाषी परन्तु आसक्ती और चित्त का धोखेबाज होता है। बीसवें में शिक्षित परन्तु सुस्‍त प्रकृति का तथा चिन्ता शून्य अर्थात् बेपरवाह होता है। इक्कीसवें में रोगी परिवार पर कठोरता से व्यवहार करने वाला और कामी होता है। बाईसवें में असावधान, मित्रों का अपकार करने वाला, स्वजनों से घृणा करने वाला और अपने नाश का कारण होता है। तेईसवें में स्वास्थ्य अच्छी होती है। सन्तान अच्छे होते हैं। स्त्री मिलती है। भोजन उत्तम मिलता है और कुटुम्बों से मर्यादा पाता है। चौबीसवें में स्वभाव का सुशील, उन्नति शील और कार्य में फलीभूत होता है। पच्चीसवें में मित्र और बन्धुओं से परित्यक्त और दुःखी होता है। तथा कार्य में निष्फलता होती है। छब्बीसवें में मद्य-प्रिय, किसी पुराने रोग से ग्रसित और राजकोप से पीड़ित होता है। सत्ताईसवें में शोक ग्रसित बदला लेने का इच्छुक, नीच कक्षा के स्त्रियों में रत, धूर्त और बुरे विचारों वाला होता है। अष्टाचत्वारिंश अवस्था विचार- इस अवस्था का गणित इस प्रकार किया जाता है कि-

लग्न संख्या को ग्रह स्थित भाव संख्या से गुणा करके सत्ताइस से भाग दिया जाता है। यदि सत्ताईस से भाग न पड़ सके तो गुणनफल जो अवेगा उसी को लेना होगा। अब इस अंक को ग्रहदशा से गुणा करना होगा और उसको अड़तालीस से भाग देने पर जो शेष रहे वही अवस्था की संख्या होगी। इस स्थान में यदि शून्य शेष रहे तो संख्या ४८ मानी जायगी। उदाहरणार्थ कुण्डली में धनु लग्न से लग्न की संख्या ९ हुई। यदि मंगल की अवस्था जाननी हो तो मंगल के नवम स्थान में रहने के कारण मंगल की संख्या ९ हुई। ९ को ९ से गुणा करने से ८१ हुआ। ८१ को २७ से भाग देने से शेष शून्य रहा, इस कारण शेष शून्य रहने से शेष २७ माना जायगा। मंगल का महादशा मान ७ वर्ष है। इस कारण २७ को ७ से गुणा करने से गुणनफल १८९ हुआ। १८९ को ४८ से भाग देने से शेष ४५ रहा।

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अत: मंगल की ४५वीं अवस्था हुई और आगे प्रति अवस्था का जो फल दिया जा रहा है तदनुसार मंगल की महादशा में फल होगा। एकादि शेष के अनुसार ४८ अवस्थाओं का फल इस प्रकार जानना चाहिए-

यदि १ शेष हो तो जातक का धनोपार्जन अच्छा होता है और विद्या अध्ययन में अभिरुचि होती है।

यदि २ शेष हो तो जातक का बहुत ही बुरा फल होता है। स्री-सन्तानादि दुःखित रहते हैं। तथा जातक को राजदण्ड का भय रहता है।

यदि ३ शेष हो तो उस ग्रह के प्रथम और तृतीय तृतीयांश में साधारण फल होता है। परन्तु मध्य तृतीयांश में बहुत ही अशुभ फल होता है।

यदि ४ शेष हो तो शुभ फल होता है। गुरुजनों से भेंट मुलाकात होती है। परन्तु यदि वह ग्रह पाप हो और द्वादशस्थ हो तो जातक को बहु प्रकार से व्यय होता है।

यदि ५ शेष हो तो उसका फल बुरा होता है। जातक स्वयं और उसके परिवार के लोग दुःखी होते हैं। और जातक देशाटन करता है।

यदि ६ शेष हो तो उत्तम भोजन की प्राप्ति और सुखी भोजन होता है।

यदि ७ शेष हो तो अशुभ फल होता है। जातक क्रोधातुर, असहिष्णु, चिन्तित और दुःखी रहता है। उसका व्यय अधिक होता है। वह ऋण ग्रस्त रहता है।

यदि ८ शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है। नवीन वस्तुओं की प्राप्ति होती है और रुद्राक्ष की माला धारण करता है।

यदि ९ शेष हो तो मन्त्र शास्त्र में अभिरुचि ऊँहती है। गणित, ज्योतिष तथा विज्ञान विद्या के सीखने का अवसर होता है।

यदि १० शेष हो तो जातक सांसारिक दृष्टि से सुखी, परन्तु मानसिक व्यथा से दुःखित रहता है।

यदि ११ शेष हो तो भी अशुभ फल होता है। ऐसा जातक रासायनिक विद्या तथा मिमियागिरी के पीछे द्रव्य व्यय करता है। मानसिक रोग से दुःखित रहता है और धूर्त्त होता है।

यदि १२ शेष हो तो अतिशुभ फल होता है।

यदि १३ शेष हो तो बहुत अशुभ फल नहीं होता है अध्ययन में रुचि होती है।

यदि १४ शेष हो तो बहुत अशुभ फल होता है। जीवन का मध्य भाग दुःखी होता है।

यदि १५ शेष हो तो बहुत अशुभ फल होता है। अनेक प्रकार की

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ग्रह प्रभेद प्रकरण

कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।

यदि १६ शेष हो तो अति उत्तम फल होता है।

यदि १७ शेष हो तो अत्युत्तम फल होता है।

यदि १८ शेष हो तो बहुत बुरा फल नहीं होता है, परन्तु समय समय पर दुःखी अवश्य होता है।

यदि १९ शेष हो तो जातक रोगी और मित्रों से त्याज्य होता है।

यदि २० शेष हो तो जातक रोग से पीड़ित रहता है और मित्रों से त्याज्य होता है।

यदि २१ शेष हो तो फल अशुभ होता है। आय से व्यय अधिक हो जाता है और ऋणी रहता है।

यदि २२ शेष हो तो कार्य में सफलता प्राप्त होती है और जीवन सुखी होता है।

यदि २३ शेष हो तो पश्चिम दिशा की यात्रा करता है और जीवन में उसे अच्छा धन प्राप्त होता है।

यदि २४ शेष हो तो ग्राम, गृह एवं सम्पत्ति का नाश होता है।

यदि २५ शेष हो तो किञ्चितमात्र शुभ, विशेषतः अशुभ ही फल होता है।

यदि २६ शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है। और जातक उदार होता है।

यदि २७ शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है।

यदि २८ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल प्राप्त होता है और व्यय की मात्रा बहुत बढ़ जाती है।

यदि २९ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ, गुरुजनों की प्राति अश्रद्धा उत्पन्न होती है।

यदि ३० शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है।

यदि ३१ शेष हो तो अशुभ, नीच, कामरत तथा जातक को कठिनाईयाँ झेलनी पड़ती हैं।

यदि ३२ शेष हो तो अशुभ एवं रोगी होता है।

यदि ३३ शेष हो तो अति शुभ फल होता है।

यदि ३४ शेष हो तो आरम्भ में बड़ा उत्तम परन्तु शेष में व्यय की मात्रा बढ़ जाती है।

यदि ३५ शेष हो तो फल बुरा होता है और जातक धोखेबाज होता है।

यदि ३६ शेष हो तो उत्तम फल, व्यापार में उसकी रुचि होती है। जीवन के अन्तिम भाग में क्षति होती है।

यदि ३७ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल होता है। कारागार निवास

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का योग होता है। यदि ३८ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल होतां है। मुकद्दमाबाजी, रोग और ऋण परिणाम होता है। यदि ३९ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल प्राप्त होता है। यदि ४० शेष हो तो आय कम, व्यय अधिक और कठिनाईयों को झेलना पड़ता है।

यदि ४१ शेष हो तो अशुभ फल, शारीरिक व्यथा और शत्रुओं से दुःख प्राप्त होता है। यदि ४२ शेष हो तो राजदण्ड से पीड़ित और बहुत अशुभ फल होता है।

यदि ४३ शेष हो तो कुशलपूर्वक तीर्थ यात्रा और उत्तम भोजन प्राप्त होता है। यदि ४४ शेष हो तो परदेश यात्रा एवं परदेश में व्यवहार उत्त्रति होती है।

यदि ४५ शेष हो तो अति उत्तम फल प्राप्त होता है। विद्योन्नति एवं धार्मिक भावों का आगमन होता है। यदि ४६ शेष हो तो अति उत्तम फल प्राप्त होता है। व्यवहार में उन्नति और अच्छी नौकरी आदि मिलती है।

यदि ४७ शेष हो तो अशुभ फल प्राप्त होता है और जननेन्द्रिय में रोग होता है। यदि ४८ शेष हो तो सुखमय जीवन व्यतीत करता है।

उच्च राशि में ग्रह फल ज्ञान- यदि उच्च में विलोम ( वक्रगति ) हो तो फल नहीं होता है, ऐसे अन्य आचार्यों का मत है तथा काल की अत्यधिकता होने के कारण अपने उच्च राशि में अतिवक्र होने पर भी उसी प्रकार कलाभाव समझना चाहिए।

एक ही राशि में वक्रगति होकर फिर मार्ग गति हो जाय तो ग्रह वक्री, यदि एक राशि में वक्रगति होकर पिछली राशि में चला जाय तो ग्रह अतिवक्री कहलाता है।

जब ग्रह वक्र होता है तो १ राशि में अधिक काल लगता ( कुछ अंशों को दोबारा भोग करना पड़ता ) है। उच्चादि बल में श्रेष्ठ मध्य, अल्पबल का कथन- ग्रह अपने उच्च में श्रेष्ठ ( उत्तम ) बलो, मूल त्रिकोण में मध्यबलो, राशि में मध्यबलो, मित्र ग्रह के द्वारा दृष्ट मित्र की राशि में हो तो अल्पबली होता है।

चन्द्र बल में श्रेष्ठाविकथन- यवनाचार्यों का कथन है कि शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से दशमी तक चन्द्रमा मध्य बली, द्वितिय दशक ( शुक्ल

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फल पूर्ण शत्रु राशि में पूर्ण अशुभ फल से कुछ कम, उच्च में शून्य, मित्र राशि में ३/४, अपनी राशि में, आधा और मूलत्रिकोण में एक चरण १/४ अशुभ फल होता है।

शुभफल का अभाव और अशुभ फल पूर्ण– जिन ग्रहों के योग से उत्पात हो जो सूर्य के साथ अस्त हो कान्ति हीन हो नीच राशि वा शत्रु के घर में हो तथा जो युद्ध में पराजित हो इन परिस्थितियों ग्रह का शुभ फल नष्ट होता है और पाप ( अशुभ ) फल निरन्तर बढ़ता है।

उच्च एवं मूलत्रिकोण बल से युक्त ग्रह फल ज्ञान– ग्रह उच्च बल से युक्त हो तो जातक को अत्यधिक सम्पत्ति प्राप्त कराता है। मूल त्रिकोण बल से युक्त ग्रह राजा तथा राजा से समान व्यक्ति का मन्त्री अथवा सेनापति बनाता है।

स्वराशि, मित्रराशि तथा स्वहोरा बल से युक्त ग्रह फल ज्ञान– अपनी राशि स्वराशि, मित्रराशि तथा स्वहोरा बल से युक्त ग्रह हो तो जातक प्रसन्नचित्त, धन-धान्य और लक्ष्मी से परिपूर्ण होता है।

मित्र राशि बल से युक्त ग्रह हो तो कीर्तिमान, तेजस्वी, अत्यन्त सुखी, स्थिर लक्ष्मी और राजा से धन प्राप्त करने वाला होता है।

स्वहोरा बल से युक्त ग्रह पराक्रमी बनाता है।

स्वद्रेष्काण और स्वनवांश से युक्त ग्रह फल ज्ञान– अपने द्रेष्काण बल से स्वद्रेष्काण और स्वनवांश से युक्त ग्रह फल ज्ञान– अपने नवांशगत बल से युक्त ग्रह हो तो जातक सुप्रसिद्ध होता है।

सप्तमांश एवं द्वादशांश बल से युत ग्रह फल ज्ञान– सप्तमांश बल से युत ग्रह साहसी धनी कीर्तिमान् बनाता है। द्वादशांश बल से युत ग्रह कर्मठ परोपकारी बनाता है।

त्रिंशांश बल से युत एवं शुभग्रह से दृष्ट ग्रह फल ज्ञान– त्रिंशांश बल से युत ग्रह जातक को विकसित पूर्ण सुखी एवं गुणवान् बना देता है। शुभ ग्रह से दृष्ट ग्रह पुरुष को धनी, प्रख्यात, सुन्दर भाग्यवान, लोक- मान्य, सुन्दर देहधारी, अच्छे सुख से युत करता है।

पुरुष-स्त्री राशि बल से युत ग्रह फल ज्ञान– पुरुष अथवा स्त्री राशि बल से युत ग्रह जातक को लोक में पूजित, कलाओं में कुशलता, चित्त में प्रसन्नता, शरीर में आरोग्यता, परलोक से भय आदि प्रदान करता है।

स्थानबल से युत ग्रह फल ज्ञान–स्थानबल से युत ग्रह जातक को स्थिर व मित्रसुखी, भाग्यवान्, धैर्यवान, स्थिर, चित्त एवं स्वातन्त्र कर्ता मनुष्य होता है।

दिगबल से युत ग्रह फल ज्ञान– दिशाबल से युत ग्रह पुरुष को अपनी दिशा में ले जाता है और वहाँ ले जाकर वस्त्र, भूषण वाहन सुख से युक्त

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अयनबल से युत ग्रह फल ज्ञान- अयनबल से युत् ग्रह जातक को अपनी दिशा में अनेक प्रकार से धन लाभ कराता है। चेष्टाबल से युत ग्रह जातक को, कभी राज्य, कभी पूजा, कहीं द्रव्य ( लक्ष्मी ), कहीं यश, ऐसा अनेक प्रकार का फल देता है।

शुभ पाप एवं वक्र ग्रहों का फल ज्ञान- शुभग्रह वक्‍रगति हो तो वह महाबली होकर राज्यप्रद होता है। पापग्रह वक्र हो तो दुःखप्रद और व्यर्थ भ्रमण कराने वाला होता है।

निष्कंटक राज्यप्रद ग्रह फल ज्ञान- यदि ग्रह निर्मल हो या चन्द्रमा के सान्निध्य में हो अथवा युद्ध में विजयी हो तो वह ग्रह सम्पूर्ण शुभ फल और शत्रुओं से न जीतने वाले राज्य को प्रदान करता है।

दिन रातिबल से युत ग्रह फल ज्ञान- रात्रि दिन सम्पबन्धी बल से युक्त ग्रह हो तो भूमि, गज आदि के लाभ तथा पराक्रम की वृद्धि से शत्रु को पराजित कर राज्यलक्ष्मी को उपलब्ध कराता है।

वर्षेशादि ग्रह फल ज्ञान- वर्षेश, मासेश, वारेश, और होरेश ये अपनी दशा में क्रम से सुख, धन, कीर्ति की त्रिगुणोत्तर वृद्धि करते हैं। अर्थात् वर्षेश से द्विगुण मासेश, मासेश से द्विगुण वारेश एवं वारेश से द्विगुण होरेश शुभ फल देते हैं।

पक्षबल से युत ग्रह फल ज्ञान- पक्षबल युत ग्रह हो तो शत्रुओं का नाश, रत्न, वस्त्र वाहन आदि सम्पत्ति स्त्री, सुवर्ण, भूमि का लाभ और स्वच्छ यश प्राप्त होता है।

समस्त बल से युत ग्रह फल ज्ञान- जो ग्रह पूर्वोक्त सब बलों से युक्त, निर्मल किरणों से सुशोभित हो वह जातक को इच्छा से भी अधिक राज्य और सुख देता है।

बलवान् शुभ ग्रहों का फल ज्ञान- जन्म समय में सब शुभ ग्रह बली हो तो जातक सदाचार सत्य, शौच से युक्त, सुन्दर, तेजस्वी, कार्यकुशल, ब्राह्मण और देवता का भक्त, सान्ध भाल्य वस्त्र विभूषण से सुसम्पन्न होता है।

बलवान् पाप ग्रहों का फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सभी पाप ग्रह सबल हो तो जातक लोभी, कुकर्मी, स्वार्थी, साधु जनों का द्वेषी, कलहकर्ता, तामसी, क्रूर, हिंसक, मलीन, कृतघ्न, चुगलखोर और कुरूप होता है।

स्वमित्रादि राशिगत ग्रहों की दशाओं के नाम- जो ग्रह स्वगृह या मित्र राशि में हो उसकी बालानाम दशा, अपने मूलत्रिकोणस्थ ग्रह की कुमारी दशा, उच्चस्थ ग्रह की युवती नामक, शत्रुग्रहगत ग्रह की वृद्धा और नीचस्थ ग्रह की मरण नामक दशा होती है।

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बालादि दशाओं का फल ज्ञान– बाल दशा में सुखी, कुमारी में सुशील, युवती में राजा, वृद्धदशा में रोगभय और ऋण की वृद्धि तथा मरण दशा में मरण या व्यर्थ व्यय होता है। विषम एवं सम राशिगत ग्रह फल ज्ञान– जन्म काल में ग्रह पुरुष ( विषम ) राशि में हो और सबल भी हो तो जातक धीर और संग्रामप्रिय ( योद्धा ) होता है। यदि विषम राशि में ही निर्बल हो तो कठोर खुल और मूर्ख होता है। यदि ग्रह स्त्री ( सम ) राशि में हो तो मृदु स्वभाव, संग्राम से भीत, जल पुष्प वस्त्रों में प्रेम करने वाला, सुभग, नीरोग स्वजन पोषक होता है। परस्पर कारक ग्रह– यदि अपने-अपने गृह, मूलत्रिकोण या उच्च में स्थित होकर ग्रह केन्द्र में हो तो परस्पर कारक होते हैं। इस प्रकार लग्न से ही केन्द्र स्थान में कारक होते हैं। उदाहरण–कर्क लग्न में चन्द्रमा, गुरु; तुला में शनि और मेष में रवि मङ्गल सहित हो तो ये परस्पर कारक ( राजयोगकारक ) होते हैं। बहुतों का मत है कि कहीं भी स्वोच्चादि गत परस्पर केन्द्र में हो तो कारक होते हैं, परन्तु लग्न से ही केन्द्र में वास्तव कारक होते हैं यह विष्णुगुप्त

का मत है। अन्य कारक ग्रह कथन– ग्रह किसी भी भाव में उच्चस्थ या मित्रराशि में अथवा स्वनवांश में स्थित रहने पर कारक होता है एवं दशम भाव में सूर्य मेष राशि में होने पर विशेष कारक होता है ऐसा चाणक्य का मत है। स्वोच्चादि से भिन्न राशि में ग्रह लग्न चतुर्थ दशम में स्थित हो तो भी कारक होते हैं। किसी आचार्य के मत में एकादश भाव में स्थित ग्रह भी कारक होता है। परन्तु यह श्रेष्ठ मुनियों का मत नहीं है। कारक ग्रह फल एवं समस्त योगों में कारक की प्रधानता– जिस जातक के जन्म समय में ऊपर कहे हुए योगकारक ग्रह हों वह नीच कुल में उत्पन्न होकर भी प्रधान होता है। सब योगों में भेद कारक भेद ही प्रबल होता है, इसलिए कारक भेद से ही फलादेश करना चाहिए, ऐसा हरि नामक आचार्य का कथन है। वारेशादि कथन– सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि ये दिन ( वार ) आदि ( होरा, मास, वर्ष ) के अधिपति होते हैं। आषाढ़ आदि मास में और आषाढ़ादि वर्ष में प्रथम वारेश जो होता है वहाँ मासेश और वर्षेश होता है। सिद्धान्त ज्योतिष के अनुसार ग्रहों का कक्षाक्रम बताया गया है। सबसे ऊपर शनि की कक्षा है। उसके नीचे गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और

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बुध के विषय- वेदादि शास्त्र, लेख शिल्प, वैद्यक, निपुणता, कवित्व, दुतत्व, हास्य, पक्षी, मिथुन ( स्त्री पुरुष की जोड़ी ), ख्याति, वनस्पति, सोना का अधिप बुध है।

बृहस्पति के विषय- शुभकार्य; धर्म, पौष्टिक, महत्व, शिक्षा, नियुक्ति, नगर, राष्ट्र, सुवर्ण, शख्या, सवारी, आसन, अन्न, गृह और पुत्र का स्वामी गुरु है।

शुक्र के विषय- वज्र ( हीरा ) मणि, रत्न, भूषण, विवाह, सुगन्ध, मित्र, माल्य, स्त्री, गोबर, निदान, विद्या, सुरत और चाँदी का अधिपति ( कारक ) शुक्र है।

शनि के विषय- राँगा, सीसा, कृष्णबालु, कुथान्य (बजरा आदि), मृतबन्धु, मूर्ख, नौकर, नीच स्त्री, विक्रम वस्तु, दास, दीन और दीक्षा का अधिपति शनि है।

ग्रहों के देश-- सूर्य का कलिङ्ग देश है, चन्द्रमा का यवन, शुक्र का समतल, बृहस्पति का सिन्धु, बुध का मगध, शनि का सौराष्ट्र, मङ्गल का उज्जयिनी और राहु केतु का द्रविड़ देश है।

आधान प्रकरण

राशि आदि ( होरा, द्रेष्काणादि वर्ग ) के फलों का विभाजन जन्मकाल के बिना कैसे समझा जा सकता है, इसलिए समस्त जीवों के कारणभूत आधान या निष्ठेक या गर्भाधान विषय को आगे प्रस्तुत करते हैं।

गर्भाधानयोग्य रजोदर्शन-- स्त्री की जन्म राशि से चन्द्रमा जब अनुपचय राशि में अर्थात् राशि से १/२/४/५/७/८/९/१२ इन स्थानों में हो और गोचर में स्थित मङ्गल की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि हो तो प्रति मास स्त्री को मासिक धर्म होता है। ऐसा बहुत आचार्यों का कथन है तथा सर्वार्थचिन्तामणि आदि ग्रन्थ से भी इस तथ्य की पुष्टि की गई है।

रजो दर्शन में कारण- स्त्रियों को प्रत्येक मास में योनि से तीन दिन तक रक्त स्ताव होता है। उसी को रजोदर्शन कहते हैं। उस रजो दर्शन का कारण मङ्गल और चन्द्रमा हैं।

क्योंकि जलमय चन्द्रमा और अग्निमय मङ्गल के शास्त्रकारों ने माना है। इसलिए जल से रजधिर और अग्नि से पित्त की उत्पत्ति होती है।

जब पित्त के द्वारा रजधिर ( खून ) में हलचल होती है तो स्त्रियों को मासिक धर्म होता है।

गर्भाधान में अक्षम रजोदर्शन- इस प्रकार जो प्रत्येक मास स्त्रियों को मासिक धर्म होता है; उस ही विद्वानों ने गर्भ का कारण स्वीकार किया है।

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का जन्म कहना चाहिए। यह चतुर्थ योग है। यदि विषम राशिस्थ बुध और समराशिस्थ चन्द्रमा को मंगल देखता हो तो नपुंसक का जन्म कहना चाहिए। यह पंचम योग है। यदि विषम राशि में या विषम राशि के नवांश में लग्न चन्द्र का और बुध हों तो और उन पर शुक्र शनि की दृष्टि हो तो भी नपुंसक का जन्म कहना चाहिए। यह षष्टम योग है।

यमल योग विचार- लग्न और चन्द्रमा समराशि में हो उस पर बली ग्रह की दृष्टि हो तो गर्भ में मिथुन ( यमल ) समझना चाहिए। चन्द्रमा, शुक्र समराशि में हो और गुरु, शुक्र, बुध, लग्न ये विषम राशि में बली या द्विस्वभाव में हो तो भी यमल स्त्री पुरुष समझना चाहिए।

गर्भ में तीन बालकों का योग- आधान काल में या जन्म काल में यदि द्विस्वभाव राशि के नवमांश में ग्रह या लग्न हो और मिथुन राशि के नवांश में स्थित बुध लग्न और ग्रहों को देखता हो तो गर्भ में एक कन्या और दो पुत्र कहना चाहिए।

यदि कन्या राशि के नवांश में स्थित बुध पूर्वोक्त स्थिति में विद्यमान ग्रह और लग्न को देखें तो गर्भ में २ कन्या १ पुत्र कहना चाहिए। यदि मिथुन या धनु राशि के नवांश में ग्रह और लग्न हों तथा मिथुन राशि के नवांश में स्थित बुध लग्न और ग्रहों को देखता हो तो गर्भ में तीन बालक ( पुरुष ) कहना चाहिए।

यदि कन्या या मीन राशि के नवांश में लग्न व ग्रह हों और कन्या राशि के नवांश में स्थित बुध देखता हो तो गर्भ में ३ कन्याओं को समझना चाहिए। अर्थात् तीन कन्याओं का जन्म होता है।

माता-पिता-मौसी-चाचा आदि कारक ग्रह विचार- दिन में गर्भाधान हो तो शुक्र माता और रवि पिता, तथा रात्रि में चन्द्र माता और शनि पिता होता है। इसके विपरीत अर्थात् दिन में चन्द्र मौसी, शनि चाचा तथा रात्रि में शुक्र मौसी और रवि पितृव्य ( चाचा ) ग्रह होता है।

इन कारक ग्रहों का प्रयोजन- पिता और पितृव्य ग्रह यदि लग्न से विषम राशि में हो तो क्रम से पिता और पितृव्य का सुखकारक होता है। एवं भातृ और मौसी संज्ञक ग्रह यदि सम राशि में हो तो माता और मौसी का सुख कारक होता है।

प्रत्येक मास में गर्भ की स्थिति विचार- गर्भाधान से ७ मास में क्रम से १ कलल ( शुक्र शोणित मिश्रण ) २ पिण्ड, ३ शाखा ( अवयव ), ४ अस्थि, ५ त्वचा, ६ रोम और, ७ चेतन्य होते हैं। अष्टम मास में प्यास, भूख, ९वें में उद्वेग और १०वें मास में पूर्ण पक्व

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फल के समान बाहर निकल आता है।

गर्भ के दस मासों का स्वामी-- इन १० मासों के स्वामी क्रम से १ शुक्र, २ मङ्गल, ३ गुरु, ४ रवि, ५ चन्द्र, ६ शनि, ७ बुध, ८ लग्नेश, ९ चन्द्र, १० सूर्य होते हैं। इन मासों के शुभाशुभत्व से गर्भ के शुभाशुभत्व समझना चाहिए।

गर्भपात योग- यदि गर्भाधान समय में जो ग्रह विद्यमान/रक्षित/उदित उदयात से हत या पाप ग्रह से पराजित हो तो उस ग्रह के मास में गर्भपतन होता है अथवा लग्न राशि गर्भपतन का कारण होता है।

अथवा आधान कालिक लग्न में शनि मङ्गल हो अथवा शनि मङ्गल की राशि ( १०/११/१/८ ) में चन्द्रमा हो अथवा शनि मङ्गल से दृष्ट चन्द्रमा हो तो गर्भ का पतन होता है।

गर्भपुष्टि ज्ञान– आधान काल में या प्रश्नकाल में होरा 'होरेतिलग्नं' अर्थात् लग्न में शुभ ग्रह हो या चन्द्र शुभग्रह से युत हो अथवा लग्न या चन्द्र से १, ५, ९, २, १०, ८ भावों में शुभग्रह हो अथवा ३, ११ भाव में पापग्रह हो अथवा लग्न या चन्द्र पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो प्रसव काल तक गर्भ सुखी अर्थात् सुरक्षित रहता है।

गर्भ सहित गर्भवती मरण विचार– प्रश्नकाल या आधान काल में सूर्य या चन्द्रमात यदि दो पाप ग्रह के मध्य में हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो गर्भ सहित स्त्री का मरण होता है।

लग्न और सप्तम में पाप ग्रह हो उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो अथवा लग्न में शनि तथा क्षीण चन्द्र हो उन पर मङ्गल की दृष्टि हो तो गर्भवती का मरण होता है।

रवि या क्षीण चन्द्रमाद्वादश भाव में और मङ्गल चतुर्थ भाव में हो अथवा दो पाप ग्रहों के बीच शुक्र हो तो इन योगो में भी गर्भवती का मरण होता है।

चन्द्रमा से या लग्न से चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तो गर्भ नष्ट हो तो माता के साथ ही गर्भ नष्ट होता है।

चतुर्थ भाव में मङ्गल १२ में रवि और चन्द्रमा क्षीण हो अथवा मङ्गल लग्न में हो और १२, २ में पाप ग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तब भी मरण होता है।

सप्तम में रवि लग्न में मङ्गल हो तो शास्त्र से संगर्भ स्त्री का मरण होता है।

गर्भ वृद्धि योग– गर्भाधानकालिक लग्न पर बलवान बुध, गुरु, शुक्र और रवि की दृष्टि हो तो गर्भ पुष्ट होता है अर्थात् गर्भ का पतन नहीं होता।

एवं प्रत्येक मास में मासेश्व के बल के अनुसार मासेश्वर के स्वभाव

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और गुणों से युक्त होता है। तीसरे मास में गर्भिणी स्त्री को दोहद ( अनेक प्रकार के वस्तु खाने पीने की इच्छा ) होती है। वह मास स्वामी ( मासेश ) के स्वभाव और लग्न, योगादि से भी समझना चाहिए। गर्भ समय से प्रसव मास का ज्ञान- यदि आधान काल में चरराशि में सूर्य हो तो १०वें मास में, स्थिर राशि में हो तो ११वें मास में और द्विस्वभाव में हो तो १२वें मास में प्रसव होता है। मतान्तर से कहते हैं कि चर राशि का चन्द्र हो तो १०वें में; स्थिर का हो तो ११वें में; द्विस्वभाव का हो तो १२वें मास में प्रसव होता है। अन्य प्रकार से प्रसव ज्ञान विचार- गर्भ से प्रसव का ज्ञान गर्भाधान कालिक लग्न के होरादि षड्वर्ग से करना चाहिए। आधान राशि से दशवीं जन्म राशि होती है ऐसा मत किसी किसी आचार्य का है। बादरायणाचार्य का मत है कि आधान लग्न से सप्तम जन्म लग्न अथवा आधान राशि से सप्तम जन्म राशि होती है। इसलिये इन कथनों में एकत्वाभाव होने के कारण आगे अब सर्वसम्मत मत को कहते हैं। सर्वसम्मत से जन्म राशि ज्ञान- गर्भाधान काल में जिस राशि के द्वादशांश में चन्द्रमा हो उससे उतने संख्यक राशि में चन्द्रमा के जाने पर संभव ( १० आदि ) मास में प्रसव कहना चाहिए। तीन वर्ष के बाद एवं बारह वर्ष के बाद प्रसव योग- आधानकालिक लग्न में शनि की नवांश हो और लग्न से नवम स्थान में शनि हो तो गर्भाधान काल से ३ वर्ष में प्रसव होता है। एवं लग्न चन्द्र का नवांश हो और लग्न से सप्तम भाव में चन्द्रमा हो तो बारहवें वर्ष में प्रसव होता है। प्रसव काल का ज्ञान- गर्भाधान कालिक दिनसंज्ञक या रात्रिसंज्ञक लग्न हो तो राशि के जितने अंश उदित हुए हों उतना ही दिन या रात्रि व्यतीत होने पर प्रसव कहना चाहिए। जैसे ३० अंश में दिनमान, या रात्रिमान हो, तो लग्न के गतांश में क्या? इस प्रकार त्रैराशिक से दिन या रात्रि गत इष्टघटी का ज्ञान होता है। बृहद् पाराशरादि होराशास्त्र के प्रतिष्ठित ग्रन्थों में भी इस विषय को प्रतिपादित किया गया है। प्रसवकालिक लग्नादि का ज्ञान- पूर्व कथन से दिन रात्रि ज्ञान करके जन्म के समय में होरादि षड्वर्ग में स्थित लग्न का ज्ञान युक्ति से कहना

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चाहिये।

इस प्रकार उदय ( लग्न ) समुदाय ( षडवर्गादि ) से दिन ( वासर ) पक्ष मुहूर्त मास संज्ञक राशि में प्रसव होता है।

इस प्रकाराधान समय में प्रथम प्रसव समय का निश्वय करके ज्योतिषी को जातकोक्त फलादेश का विचार करना चाहिये।

नेत्रहीन योग- यदि आधान में सिंह लग्न रवि और चन्द्रमा हो उन पर शनि मङ्गल की दृष्टि हो तो गर्भस्थ शिशु जन्म काल से ही अन्धा होता है।

उन्हीं ( रवि, चन्द्र ) को यदि मङ्गल और बुध देखते हों तो नेत्र में फूला होता है।

और भी नयन विनाशक योग कहा जा रहा है-

यदि द्वादश भाव में क्षीण चन्द्रमा हो तो वामनेत्र और यदि सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र नाश होता है।

यदि उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो यन्त्र से नेत्र रक्षा होती है अर्थात निर्बल दृष्टि होती है।

जातक-पारिजात में कुछ भिन्न नेत्रहीन योगों के लक्षण मिलते हैं-

इनका कहना है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा दोनों १२वें भाव में हो तो दोनों आँखों का अन्धा होता है।

यदि केवल सूर्य हो तो दाहिनी और केवल चन्द्रमा हो तो बाँयी आँख अन्धी होती है।

मूक योग- पाप ग्रह राशि सन्धि में हो, वृषस्थ ( उच्चस्थ ) चन्द्रमा पर मङ्गल शनि और रवि की दृष्टि हो तो अधिक दिन के बाद बोलने की शक्ति होती है।

अर्थात वह बालक कुछ दिनों के बाद बोलता है।

जातकालंकार में कहा गया है कि यदि पञ्चमेश बृहस्पति बारहवें, छठे या आठवें स्थान में हो तो जातक वाणी से हीन होता है।

जड़ एवं सदन्त योग- यदि समस्त पाप ग्रह राशिसन्धि में हो व चन्द्रमा शुभ ग्रहों की दृष्टि से हीन हो तो जातक जड़ ( मूर्ख ) होता है।

यदि शनि, मङ्गल बुध के नवमांश में हो तो गर्भस्थ बालक सदन्त ( दाँत के सहित ) जन्म लेता है।

अधिकाड् योग- लग्न से ९/५ में बुध हो और शेष सब ग्रह निर्बल हो तो २ मुख, ४ हाथ, ८ पैर वाली जातिक होती है।

वामन एवं कुब्ज योग- मकर के अन्तिम नवांश में लग्न हो और उस पर रवि, चन्द्र, शनि की दृष्टि हो तो गर्भस्थ बालक वामन ( बौना ) होता है।

यदि कर्क लग्न में चन्द्रमा हो उसे मङ्गल और शनि देखते हो तो

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सूतिका प्रकरण

हो तो तीन बरामदे वाला घर में जन्म होता है।

सूतिका गृह के स्वरूप ज्ञान- जन्म काल में यदि शुक्र बली हो तो नवीन और चित्रयुत गृह में, गुरु बली हो तो दृढ़ ( मजबूत ), मड़ल बली हो तो जला हुआ, रवि बली हो तो अधिक कष्ट से युक्त, चन्द्र बलवान् हो तो नवीन गृह में और शनि बलवान् हो तो प्राचीन सूतिका गृह में जन्म होता है।

सूतिका गृह के घर व समीप के घर का विचार- केन्द्र में जो ग्रह बलवान् हो तो उस ग्रह की दिशा में द्वार कहना चाहिए अर्थात इससे सिद्ध होता है कि केन्द्र में ग्रह नहीं हो तो सबसे जो ग्रह बली हो उस दिशा में या लग्न राशि की दिशा में द्वार समझना चाहिए।

एवं गृहद्वार ग्रह के जिस दिशा में जो ग्रह हो सूतिका गृह से उस दिशा में उसी ग्रह के गृह समान प्रतिबेश्म ( अन्य घर ) कहना चाहिए।

रवि का देवालय, चन्द्र का जलाशय, मड़ल का अग्निशाला, गुरु का कोश- गृह, शुक्र का विहारस्थान, शनि का कतवार खाना और बुध का शयनागार स्थान है। जो ग्रह सबसे बली हो उस सूतिका का स्थान समझना चाहिए।

सूतिका की शय्या का विचार- जिस प्रकार ग्रह में मेषादि राशि की स्थिति कही गई है उसी प्रकार शय्या ( खटिया ) में भी समझना।

जिस स्थान में जो ग्रह हो उस स्थान में उस ग्रह के वस्त्र से निर्मित शय्या पर गलीचा, उल्लोंच आदि आस्तरण कहना चाहिए।

सिरहाने से पौथान पर्यन्त न्यारा करना तथा ग्रह के सदृशचिन्ह का विचार करना।

जहाँ द्विस्वभाव राशि हो वहाँ खटिया में न तत्व (नीचे को दबा हुआ) समझना चाहिए।

खटिये के लग्न से ३, ६, ९, १२ भावों को चारों पाँव और शेष राशि शय्या के अन्य अड़ समझना चाहिए।

सूतिका का भूमि शयन एवं उपसूतिका ज्ञान- यदि जन्मकाल में चन्द्रमा अपने नीच में होकर चतुर्थ या लग्न में हो तो भूमि में सूतिका का निवास समझना चाहिए।

चन्द्रमा से लग्न तक जितने ग्रह हो उतनी उपसूतिका सहायक संख्या होती है।

लग्न से आगे सप्तम भाव पर्यन्त जितने ग्रह हो उतनी उप-सूतिका भीतर और सप्तम से आगे लग्न पर्यन्त ग्रह हो उतनी बाहर में उपसूतिकाएँ जानना चाहिए।

उनमें भी जितने शुभ ग्रह हो उतनी सुलक्षणा, सुरूपा, सौभाग्यवती

भूरशयुक्ता स्त्री, तथा जितने पाप ग्रह हो उतनी कुरुपा, दुर्भगा और मलिना

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स्त्री समझना चाहिए| मिश्र ग्रह बलवान् हो तो मध्यम रूप गुण वाली समझना चाहिए| इस प्रकार का विचार ग्रह बल के अनुसार करना चाहिए| दीपक की वर्त्ति व तेल का ज्ञान- पूर्वोक्त विधि से सूतिका के ग्रह में १२ विभागस्थ राशियों में जिस भाग में सूर्य हो उस स्थान पर दीप समझना चाहिए|

यदि चर राशि हो तो दीप को चल तथा स्थिर राशि हो तो स्थिर जानना चाहिए| लग्न के जितने अंश उदित हो चुके हों उतने ही भाग वत्ती का भी जला हुआ कहना चाहिए| चन्द्रमा जिस प्रकार पूर्ण या क्षीण हो उसी प्रकार दीप तेल भी पूर्ण या न्यून जानना चाहिए|

अधिक दीप का ज्ञान-- यदि जन्म काल में बलवान् सूर्य भौम से दृष्ट हो तो प्रसव काल में आधिक दीप समझना चाहिए| तथा अन्य ग्रह निर्बल हों तो प्रसव में तृण जलाकर प्रकाश होता है|

प्रसव के समय अन्थकार विचार- यदि जन्म काल में चन्द्रमा शनि के नवांश में या जलचर राशि के नवांश में हो या शनि से युत् चतुर्थ भाव में अथवा शनि से दृष्ट चन्द्र हो तो अन्थकार में जन्म होता है इसमें सन्देह नहीं|

पिता की अनुपस्थिति में जन्म योग- यदि चन्द्रमा लग्न को नहीं देखता हो तो पिता के परोक्ष में जन्म कहना| यदि १० वें भाव से आगे होकर सूर्य चर राशि में हो तो परदेशस्थ पिता के परोक्ष में जन्म समझना चाहिए|

दिन में रवि और रात्रि में शनि यदि मङ्गल से दृष्ट हो तो पिता के परोक्ष में जन्म होता है| यदि उक्त रवि या शनिश्वर राशि में मङ्गल युत दृष्ट हो तो पिता को परदेश में मृत समझना चाहिये|

सूर्य से ५, ९, ७ भाव पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो पिता को जेल में समझना चाहिए| यहाँ भी चर राशि हो तो परदेश में, स्थिर हो तो स्वदेश में, द्विस्वभाव हो तो मार्ग में समझना चाहिए|

अन्य ग्रन्थों में जैसे लघु जातक एवं लग्न जातक में भी ऐसा ही कहा गया है| लग्न जातक में इसी मत को स्वीकार करते हुए कहा गया हैं-

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बालारिष्ट प्रकरण

पिता का मरण समझना चाहिए।

यदि शुभ पाप दोनों से युत हो तो क्लेश कारक तथा यदि शुभ ग्रह से सूर्य चन्द्रमा दृष्ट हो तो पिता-माता को शुभ होता है।

माता पिता का सुख योग- यदि जन्म के समय पञ्चम भाव में परिपूर्ण चन्द्रमा गुरु या शुक्र से युत हो और बुध से दृष्ट हो तो माता के लिए अत्यन्त शुभफल देता है।

इसी प्रकार सूर्य अपनी राशि में या स्वोच्च राशि में शुक्र गुरु से युत पंचम भाव में बुध से दृष्ट हो तो पिता को सुख देने वाला होता है।

बालारिष्ट प्रकरण

आयु ज्ञान के अभाव में जातकोक्त समस्त फल निष्फल होता है। इसलिए आयु ज्ञान के लिए सर्वप्रथम बालारिष्ट को कहते हैं।

पुरुष-स्त्री ग्रहों के बल का ज्ञान- यदि जातक का जन्म शुक्लपक्ष और दिन में हो तो विषम राशियों में पुरुष ग्रह बलवान् होते हैं।

इसी प्रकार कृष्णपक्ष रात्रि में जन्म होने पर सम राशियों में स्त्री ग्रह बली होते हैं।

तीन प्रकार के अरिष्ट- नियत, अनियत और योगज तीन प्रकार के अरिष्ट शास्त्रकारों ने बतलाया है, उनमें सर्वप्रथम योगज अरिष्ट को कहा जा रहा है। शेष दोनों ( नियत और अनियत ) को आगे कहेंगे।

तृतीय वर्ष में अरिष्ट योग- जन्मकालावधि में यदि मंगल की राशि ( मेष वृश्चिक ) में अष्टमभाव में गुरु हो तो जातक की मृत्यु तृतीय वर्ष में होती है।

द्वितीय वर्ष में अरिष्ट योग- शनि यदि वक्री होकर मङ्गल की राशि में स्थित हो तथा चन्द्र ८, ६ या केन्द्र में स्थित हो उस पर बलवान मङ्गल की दृष्टि हो तो उत्पन्न जातक मात्र दो वर्ष तक जीवित रहता है।

नवम वर्ष के बाद अरिष्ट योग- यदि जन्म समय में सूर्य चन्द्रमा के साथ शनि हो तो नवम वर्ष के अनन्तर जातक की मृत्यु होती है। यह वाक्य ब्रह्मशौण्ड का है।

एक मास में अरिष्ट योग- यदि जन्म काल में मङ्गल, रवि, शनि मङ्गल की राशि अर्थात् १, ८ में हो तो जातक यमराज से रक्षित होने पर भी १ मास में अवश्य मर जाता है।

एक वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जन्मकाल में शुक्र की राशि २, ७ में अष्टमस्थ अर्थात् अष्टम भाव में २, ७ राशियाँ हों और एक भी पापग्रह से दृष्ट हो तो जातक १ वर्ष में मृत्यु को प्राप्त होता है। चाहे उसने अमृत का पान भी किया हो तो भी मृत्यु को प्राप्त होता है।

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हो तथा गुरु से दृष्ट हो तो जातक का नवें वर्ष में मरण होता है।

मातृ अरिष्ट योग- यदि जातक की पत्री में किसी भी भाव में चन्द्रमा, मङ्गल, सूर्य, शनि इन तीनों से दृष्ट हो तो माता का शीघ्र निधन होता है।

यदि चन्द्रमा शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो माता का निधन नहीं होता है।

पितृ अरिष्ट योग- जिस जातक का दिन में जन्म हो और सूर्य, मङ्गल, शनि ग्रह से देखे जाते हों, अथवा पाप ग्रह युत हो तो निश्वय पिता का मरण होता है।

यदि जन्म के समय में सूर्य, मङ्गल और शनि युत हो तथा बुध, गुरु, शुक्र से युत न हो तो जातक के पिता या पितामह का मरण होता है।

पिता के अरिष्ट का योग- यदि जातक का जन्म दिन में हो और सूर्य दो पापग्रहों के बीच में हो, अथवा सूर्य पापग्रह से युक्त हो तो अवश्य पिता का मरण होता है।

यदि जन्म काल में सूर्य की राशि से अष्टम राशि में शनि और मङ्गल शुभग्रह से न देखे जाते हो तो पिता का शीघ्र मरण होता है।

यदि जन्मपत्रिका में चरराशि में सूर्य, पापग्रह से युत हो तो अल्पायु में पिता की मृत्यु विष, शस्त्र या जल से ( पानी में डूबने से ) होती है।

माता के साथ निधन योग- यदि चन्द्रमा से अष्टम राशि में या नवम में या सप्तम में समस्त पाप ग्रह हो या एक भी हो तो माता सहित जातक का मरण होता है।

जन्म के समय पिता का स्थान- यदि जातक का जन्म दिन में हो और चरराशि में सूर्य, मङ्गल से दृष्ट हो तो जन्म के समय पिता को परदेश कहना चाहिए।

यदि जातक का जन्म रात्रि में हो और चरराशिगत शनि को सूर्य देखता हो तो इस योग में भी जातक का पिता परदेश में रहता है ऐसा फलादेश करना चाहिए।

इस विषय में लग्न जातक में कहा गया है कि- pितुर्जात: परोक्षेऽस्य लग्नमिन्दावपश्यति। विदेशस्थस्य चरभे मध्याद् भ्रष्टे दिवाकरे।।

अर्थात् जन्म लग्न को यदि चन्द्रमा नहीं देखता हो तो पिता का परोक्ष में बालक का जन्म कहना चाहिए और सूर्य मध्यमभ्रष्ट अर्थात् नवें ग्यारहवें और बारहवें स्थान में चरराशि का हो तो उत्पन्न जातक का पिता विदेश में समझना चाहिए।

पिता का निघन योग- यदि जातक का जन्म रात्रि में हो और चरराशि में शनि, मङ्गल से युत हो तो पिता का मरण परदेश में होता है। इसमें संदेह

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एवं चन्द्रमा यदि शनि, सूर्य से युत हो तो नाना प्रकार के रोग से नेत्र में विकार उत्पन्न करता है। नेत्रहीन योग का वर्णन जातकालङ्कार तथा जातक पारिजात में भी दिया गया है। छात्रों को ध्यान से पढ़कर धिन्तन करना चाहिए। कर्ण रोग का ज्ञान- जन्मकुण्डली में पापाक्रान्त चन्द्रमा यदि ११, ३-१९ में हो तो जातक को कर्ण रोग होता है। यदि पापग्रह की दृष्टि भी हो तो जन्म के समय में ही कर्ण रोग होता है। यदि नवम और पञ्चम भाव दोनों में पापग्रह हों तो और पाप ग्रह से दृष्ट भी हो तो जन्म समय में ही कर्ण रोग होता है। नवम में पापग्रह हो तो दाहिने कान में और पञ्चम में हो तो वाम कर्ण में रोग होता है।

यदि ९, ५ में शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह से दृष्ट भी हो तो शुभ फल कहना चाहिए। बृहज्जातक में नवम में वाम कर्ण में और पञ्चम में दक्षिण कर्ण में रोग माना गया है। अतः 'सुतभे दक्षिणकर्ण, वामं नवमे ग्रहो हन्यांत' इस प्रकार निर्विरोध पाठ होना उचित है। इसका अर्थ है कि पञ्चम में ग्रह हो तो दाहिने और नवम में हो तो वाम कान में रोगादि कहना चाहिए। चन्द्र राशि से कर्ण रोग का ज्ञान- यदि जन्म के अतिरिक्त जो व्यक्ति जिस राशि के चन्द्रमा में रोग प्राप्त करता है उसे ही उस रोग का लग्न समझ कर रोग का विचार करना चाहिए और जन्म कालिक चन्द्रमा से भी विचार करना चाहिए।

इस प्रकार योग कारक ग्रहों से दक्षिण वाम भाग में शुभग्रह चिन्ह करते हैं। यदि वे पापग्रह से दृष्ट हो तो शरीर के उस अङ्ग को विरुद्ध करते हैं। इन तीनों अर्थात् जन्म, लग्न, जन्मराशि रोगोत्पति काल को ज्ञान कर के शुभाशुभ फल कहना चाहिए। तीन दिन जीवन योग- जिस जातक की पत्री में मीन राशि के सूर्य और चन्द्रमा तृतीय भाव में हो तो जन्म से ही व्याधि प्राप्त करके ३ दिन में उसका जीवन समाप्त हो जाता है अर्थात् ३ दिन में उस जातक की मृत्यु हो जाती है। चन्द्रादित्यौ तृतीयस्थौ मीनक्षेत्रं न चास्य तु। व्याधिं तत्र विजानीयात् त्रिरात्रे तस्य जीवितम्॥

एक दिन का जीवन योग- यदि चन्द्रमा दशम स्थान में हो और चन्द्रमा से तृतीय नक्षत्र में सूर्य पापग्रहों से युत हो या अकेला ही हो तो जातक का जीवन १ दिन का होता है अर्थात् १ दिन के बाद मृत्यु हो जाती है।

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शरीर में कष्ट होकर मरण होता है। इसमें सन्देह नहीं है। यदि जन्म काल में भौम हो और शुक्र केन्द्र में हो तो पुनः भौम लग्नगत राशि में आता है। तब बालक ( जातक ) का मरण होता है। शीघ्र निधन योग- यदि जन्म समय गुरु त्रिकोण में हो और लग्न स्वामी लग्न में हो तथा गुरु या जन्म लग्न से केन्द्र में भौम हो तो शीघ्र मरण होता है।

१०८ वर्ष की आयु का योग- यदि जन्म के समय अष्टमभाव या लग्न में कोई भी पापग्रह न हो तथा किसी भी केन्द्र राशि ( १/४/७/१० ) में गुरु हो तो जातक १०८ वर्ष जीता है। यदि केन्द्र त्रिकोण अथवा अष्टम भाव पापग्रह से रहित हो तथा गुरु, शुक्र केन्द्र में हो तो जातक १०८ वर्ष जीता है।

१२० वर्ष की आयु का योग- यदि लग्न में शुक्र हो और किसी भी केन्द्र में गुरु हो तथा अष्टम भाव में पापग्रह न हों तो १२० वर्ष जातक जीता है। यदि कर्क लग्न में गुरु शुक्र हो या गुरु चन्द्रमा से युत कर्क लग्न में हो तथा अष्टम में पापग्रह न हो तो भी उपयुक्त फल होता है।

देवतुल्य आयु योग- यदि केन्द्र, त्रिकोण व अष्टम भाव में पापग्रह न हो तो जातक की देवतुल्य आयु नि:संदेह कहनी चाहिए। गतायु योग- यदि ८/७/१२/१/९/५ इन भावों में क्षीण चन्द्रमा बली पापग्रह से युत हो तथा शुभग्रहों से अदृष्ट हो तो जातक की आयु समाप्त कहना चाहिये अर्थात् जीवन नहीं होता है।

अनुक्तकाल योगों में निधन समय का विचार- जिन योगों में मरण का समय नहीं लिखा है उनमें योग करने वाले ग्रहों में से जो बली ग्रह हो उसकी राशि में जब चन्द्रमा का संचार हो तब अरिष्ट कहनी चाहिए। अथवा चन्द्रमा पुनः अपनी राशि में या लग्न में आये और पापग्रहों से दृष्ट हो तो जातक का मरण होता है। यह विचार एक वर्ष के भीतर होता है।

पाँचवें वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जन्म के समय में सूर्य चन्द्र भौम, गुरु एक राशि में हो या भौम, गुरु, शनि, चन्द्र एक राशि में हो अथवा सूर्य शनि भौम चन्द्रमा एक राशि में हों तो पाँच वर्ष गें जातक का मरण होता है।

ग्यारहवें वर्ष में अरिष्ट योग- यदि सूर्य से युत बुध ( पाठान्तर से सूर्य चन्द्र से युत बुध ) पापग्रहों से दृष्ट हो तो देवता से रक्षित भी जातक का ११वें वर्ष में मरण होता है।

सात वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जातक की कुण्डली में लग्न में सूर्य, शनि या भौम हो तथा सप्तम भाव में शुक्र की राशि ( २/७ ) में क्षीण चन्द्रमा गुरु से अदृष्ट हो तो सात वर्ष में जातक का मरण कहना चाहिए।

चतुर्थ वर्ष में अरिष्ट योग- यदि क्षीण चन्द्रमा केन्द्र में सूर्य से युत हो

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तथा भौम या शनि से दृष्ट अथवा युत हो तो ४ वर्ष में जातक का मरण होता है। यहाँ ( इस योग में ) गणित करने की आवश्यकता नहीं होती है।

तीन वर्ष में अरिष्ट योग- यदि कुण्डली में लग्नेश से अष्टम स्थान में अत्यन्त कुश ( क्षीण ) चन्द्रमा हो और समस्त पाप ग्रहों से दृष्ट और शुभ ग्रहों से अदृष्ट हो तो तीन वर्ष में जातक का मरण होता है।

नौ वर्ष में अरिष्ट योग- यदि पापग्रह लग्नेश होकर चन्द्रमा के नवमांश में चन्द्रराशि से बारहवें स्थान में हो व पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक का ९ वर्ष में मरण होता है।

पाँच वर्ष में अरिष्ट योग- यदि पाप ग्रह लग्नेश होकर चन्द्रमा के नवमांश में चन्द्र राशि से बारहवें स्थान में हो अथवा पापग्रहों से दृष्ट राशि से बारहवें स्थान में हो अथवा पापग्रहों से दृष्ट हो तो जातक का ५ वर्ष में मरण होता है।

बारह वर्ष में अरिष्ट योग- यदि राहु सप्तम भाव में सूर्य व चन्द्रमा से दृष्ट हो एवं शुभ ग्रह से अदृष्ट हो तो १२ वर्ष में जातक का मरण होता है।

सात वर्ष में अरिष्ट योग- यदि कुम्भ वा सिंह वृश्चिक लग्न में राहु पापग्रहों से दृष्ट हो तो निश्चित ही ७ वर्ष में जातक की मृत्यु हो जाती है।

दुर्मुहूर्त में अरिष्ट योग- यदि जातक के जन्म के समय से में प्रथम केतु का उदय हो, पीछे उल्कादि व वायु का निर्धात ( आँधी ) हो एवं रौद्र व सर्प मुहूर्त में जन्म हो तो भी जातक का मरण होता है।

अल्प समय में अरिष्ट योग- यदि क्षीण चन्द्रमा पापग्रहों से युत हो और राहु से दृष्ट हो तो बिना कारण अल्प समय में जातक का निधन होता है।

प्रत्येक राशि में चन्द्रकृत अरिष्ट योग- यदि जन्म कालीन चन्द्रमा कुम्भराशि के २१वें अंश में हो, या सिंह के ५वें अंश में हो या वृष के नवम अंश में हो तो मरण करता है।

वृश्चिक राशि के ३९वें अंश में, मेष के अष्टम अंशा में, कर्क राशि के २२वें अंश में चन्द्रमा हो तो निधन कारक होता है।

कन्या राशि के प्रथमांश में, धनु के १८ वें अंश में चन्द्रमा हो तो मरण कारक योग होता है।

कथित अंशों में निधन समय का विचार- जन्मकालीन समय में चन्द्रमा जिस राशि में जितने अंशों में मरण कारक कहा गया है उतने ही वर्षों में यमराज द्वारा रक्षित होने पर भी उसे जातक का निधन होता है।

यहाँ जिन अरिष्टों का वर्णन किया गया है। उन अरिष्टों में सब का निधन नहीं होता, किन्तु अरिष्ट भङ्ग योग होने पर इन योगों में भी जातक का जीवन होता है।

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प्रत्येक राशि में जिन जिन अंशो में चन्द्रकृत अरिष्ट कहा है; वहाँ अनुपात द्वारा समय का ज्ञान करके ही अरिष्ट कहना चाहिये। क्योंकि चन्द्रमा अंश कलादि से युत होता है। यथा-मेष के अष्टम अंश में चन्द्रमा अरिष्टकारक होता है। कुण्डली में यदि ०/७/१०/२ चन्द्रमा है तो मेष के अष्टम अंश में होने से अष्टम वर्ष में अरिष्ट कारक हुआ। अष्टम वर्ष में कब मरण होगा यह अनुपात द्वारा जानकर फलादेश कहना चाहिये।

गुरुवश निधन वर्ष का विचार- इस प्रकार प्रयत्न से जातक के राशि स्थान अथवा केन्द्र स्थान का विचार करके अरिष्ट कहना चाहिये। गुरु जातक का जीवन है इसलिये बृहस्पति की स्थितिवश मृत्यु का विचार करना चाहिये। यथा-यदि गुरु ३।४।५।७।९।१०।११।१ भाव में हो तो क्रम से ५।१०।४६।२१।१०० ( अन्यत्र से ३० ) ४९।६९।१९ ( अन्यत्र से ४० ) वर्ष तक जातक का जीवन होता है।

चन्द्रादि-अरिष्ट भङ्ग प्रकरण जो अरिष्ट योग कहे गये हैं उनका भङ्ग ( विकलता ) जिन योगों से होता है उन अरिष्ट भङ्ग योगों को आगे कहते हैं, क्योंकि जातक शास्त्र में ये प्रधान हैं। उनमें भी सर्वप्रथम चन्द्रकृतारिष्टभङ्ग योगों को कहते हैं, इसके बाद शेष योगों को कहा जाइगै, जैसा कि ब्रह्मादि शास्त्रकारों ने कहा है।

चन्द्रमा पूर्ण बिम्ब हो उस पर सब ग्रहों की दृष्टि हो तो अरिष्टियोग को नाश कर देता है, जैसे कानून से विरुद्ध चलने वालों को राजा नाश कर देता है। तथा पूर्ण चन्द्रमा अपने मित्र के नवांश में हो और शुक्र से दृष्ट हो तो अरिष्टभङ्गकारक होता है, जैसे वात रोग हरणकारक में वस्ति क्रिया श्रेष्ठ अर्थात् प्रधान मानी गई है।

कालान्तर से अरिष्टभङ्ग योग ज्ञान- यदि चन्द्रमा अपने परमोच्च ( वृषभ में ३ अंश पर ) हो और शुक्र से दृष्ट हो तो वह उसी प्रकार अरिष्टों का नाश कर देता है जैसे कफ और पित्त के दोष को विरेचन ( जुलाब ) और वमन ( उल्टी ) नष्ट कर देता है। शुभ ग्रहों के वर्ग ( गृह होरादि ) में क्षीण चन्द्रमा भी यदि शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो अरिष्ट का उसी प्रकार नाश कर देता है जैसे जाईफल के छिलके

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का काढ़ा महातिसार व्याधि को नाश कर देता है। पत्री में चन्द्रमा से ७, ८, ६ में पाप ग्रह से रहित शुभ ग्रह मात्र हो तो अरिष्ट का नाश कर देता है, जैसे उन्माद रोग को कल्याण घृत नाश कर देता है वैसे ही अरिष्ट को नाश कर देता है।

यदि चन्द्र शुभ फल प्रदानकर्ता शुभ ग्रहों से युत हो और शुभ ग्रह के दृष्टिकोण में हो तो उसी प्रकार अरिष्टों को नाश करता है जैसे लवण युक्त घृत नेत्र रोग को समाप्त कर देता है।

पत्रिका में पूर्णबिम्ब चन्द्रमा यदि शुभ ग्रह के द्वादशांश में हो तो अरिष्ट को नष्ट कर देता है।

जैसे तक्र ( माठा ) गुद रोग ( बवासीर आदि ) को नष्ट कर देता है। तथा चन्द्रमा यदि शुभ ग्रह की राशि में लग्नेश से दृष्ट हो तो उस पर अन्य ( पाप ) की दृष्टि नहीं हो तो अरिष्ट को नष्ट कर देता है जैसे कुलवधू ( कुलाङ्गना ) अन्य पुरुष से सड़कर कुल को नष्ट कर देती है।

यदि चन्द्रमा पाप ग्रह की राशि या उसके वर्ग में हो और राशिपति से दृष्ट हो तो जातक की रक्षा ही करता है, जैसे कृपण अपने धन की रक्षा करता है।

यदि जन्म राशीश बली हो तथा शुभग्रह मित्र से दृष्ट हो तो जैसे भीरू ( डरपोक ) संग्राम में जाकर भी किसी को नहीं मारता है, उसी प्रकार चन्द्रमा भी अरिष्टकारक नहीं होता है।

जन्म राशिपति लरन में हो उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो अरिष्ट का नाश होता है।

जैसे उष्णा ( कर्षा पिप्पली ) और बिदल ( बाँस के छिलका ) को जलाकर बनाया हुआ आँजन ( काजर ) शुल्क ( धवलता ) को नष्ट कर देता है।

अर्थात् जिस प्रकार आंख की फूली समाप्त कर देता है उसी प्रकार अरिष्ट भी नष्ट हो जाते हैं।

सम्पूर्ण ( पूर्ण बिम्ब ) चन्द्रमा यदि अपने उच्च, अपनी राशि, मित्र के षड्वर्ग, या अपने षड्वर्ग में हो उस पर केवल शुभ ग्रह की दृष्टि हो, अपने शत्रु और पाप ग्रह से युत दृष्ट नहीं हो तो कठिन अरिष्ट को नष्ट करता है।

जैसे रवि दस्तर ( कठिन ) प्रालेय ( पाला ) को नष्ट कर देता है।

चन्द्रमा में १२वें स्थान में बुध, शुक्र, और ११वें में पाप ग्रह तथा १० वें बृहस्पति हो तो अरिष्ट नष्ट होता है, जैसे मुनि पुष्य ( अगस्त्य ) के रस बने हुये नस्य ( सुंघनी ) से चौथैया ( चौथे दिन आने वाला ज्वर ) रोग नष्ट होता है।

लग्नेश से ६, ३, १०, ११, ४ में चन्द्रमा हो और उस पर शुभ ग्रह की

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७४२ चन्द्रादि-आरिष्ट भञ्ज प्रकरण दृष्टि हो तो सब अरिष्ट का नाश होता है जैसे राजा की सेना के पीछे चलने वालों को पूर्ण सुरक्षा बनी रहती है। एक ही जन्म राशिपति पूर्ण बलनी हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वह जातक के चन्द्रकृत अरिष्ट का उसी प्रकार नाश कर देता है जैसे वन में उत्पत्त बाघ हरिणों का नाश कर देता है। यदि शुक्ल पक्ष हो और रात्रि में जन्म हो या कृष्णपक्ष में दिन में जन्म हो तो ६, ८ भाव में स्थित चन्द्रमा शुभाशुभ ग्रहों से दृष्ट होने पर भी यत्न से विपत्ति में रक्षा करता है। जिस प्रकार पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है अर्थात् उसे मारता नहीं है। इसी तरह अरिष्टभञ्ज का विचार वाराहमिहिर ने लग्नजातक में अरिष्टभञ्जाध्याय के नवें अध्याय के श्लोक १६ में किया है, आगे सामान्यारिष्ट भञ्जयोग कहा जा रहा है- बृहस्पति की स्थिति से अरिष्टभञ्ज योग- यदि देदीप्यमान किरणों से युक्त अति बलो बृहस्पति लग्न में हो तो वह पूर्व में कहे हुये सब अरिष्ट योगों को ठीक उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे भक्तिपूर्वक विष्णु के चरण में एक बार किया हुआ प्रणाम भी अत्यन्त दुष्टर पापों को नष्ट कर देता है। अन्य अरिष्टभञ्ज योग- जन्म समय में समस्त शुभ ग्रह पूर्ण बलवान् और सब पाप ग्रह निर्बल हो तथा शुभ ग्रह की राशि लग्न हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वह जातक सब अरिष्टों से रहित हो जाता है। जैसे सूर्यादि ग्रहों की पूजा करने वाला सभी पापों से मुक्त हो जाता है। पुनः प्रकारान्तर- यदि पाप ग्रह सब शुभ ग्रह के वर्ग में हो और शुभ वर्ग स्थित शुभ ग्रहों से देखा जाता हो तो जैसे विरक्ता स्त्री अपने पति का नाश करती है उसी प्रकार अरिष्ट को नष्ट कर देता है। राहु से अरिष्टभञ्ज योग- यदि जन्मकाल में लग्न से ३,६,११ भाव में राहु शुभ ग्रहों द्वारा दृष्ट हो तो सभी अरिष्टों को उसी तरह नष्ट कर देता है, जैसे वायु, रूई के ढेर को नष्ट कर देती है। जन्मकाल में सभी ग्रह शीर्षोदय राशि में बलवान हो तो जिस प्रकार अग्नि घृत को नष्ट कर देती है वैसे ही जातक का सभी अरिष्ट नष्ट हो जाता है। जन्म काल में शुभ ग्रह यदि पाप ग्रह को पराजित कर शुभग्रहों से देखे जाते हों तथा शुभ वर्ण में हो तो अवश्य ही समस्त अरिष्टों का नाशक होता है तो सभी अरिष्टों को नष्ट कर देता है जैसे प्रबल वायु वृक्षों को उखाड़ फेंकता है। ... यदि अरिष्टकारक ग्रह किसी ग्रह से घिरा हुआ ( युत ) पापग्रह से दृष्ट

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हो तो भी सभी अरिष्टों का नाश होता है। जैसे सूर्य ग्रहण में कुरुक्षेत्रादि में स्नान करने पर पाप नष्ट हो जाते हैं।

जन्म काल में सुखस्पर्श मन्द पवन सहित आकाश में मनोहर मेघ हो तथा ग्रह समूह भी प्रबल निर्मल बिम्ब वाले हो तो क्षणभर में अरिष्ट शान्त हो जाते है, जैसे जल की धारा रजकण अर्थात् धूलिसमुदाय को शान्त कर देती है।

अगस्त्य नाम का तारा तथा मरीची आदि सप्तर्षियों के उदय काल में यदि जातक का जन्म हो तो सभी अरिष्ट नष्ट हो जाता है। जैसे सूर्योदय होते ही समस्त अन्धकार नष्ट हो जाता है।

मेष, वृष या कर्क लग्न में राहु हो तो समस्त कष्ट से जातक की रक्षा करता है। जैसे राजा प्रस्थान हो कर अपराधी की रक्षा करता है।

राहु केतु से अतिरिक्त यदि अपने अपने द्रेष्काण में हो तो ग्रह जनित समस्त अरिष्टों को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे अन्यकार को सूर्य किरण नष्ट कर देता है।

यदि जन्म समय में अधिक ग्रह शुभ फलद हो तथापि अरिष्ट नष्ट हो जाता है। जैसे सूर्य से त्रिकोण (९/५) में चन्द्रमा रहने पर राजा की यात्रा में विघ्न को हटा देती है।

केन्द्रस्थ गुरु-शुक्र से अरिष्टभद्र योग- यदि गुरु और शुक्र केन्द्र में हो तो राशिकृत और चन्द्रकृत सब अरिष्टों को शीघ्र नष्ट कर देता है और जातक १०० वर्ष तक जीता है।

अमितायु योग- जन्म पत्रिका में गुरु और पूर्ण चन्द्रमा यदि कर्क राशि में होकर ४, १० या लग्न में हो तथा शनि, बुध, तुला राशि में हो और सभी ग्रह ११, ६ भाव में होतो अमित (१२० से भी अधिक ) आयु होती है।

जातक शास्त्र में विंशोत्तरी तथा अष्टोत्तरी दशाओं की चर्चा की गई है जिसका मान १२० या १०८ है अतः इससे भी अधिक आयु का योग होता है।

सभी प्राचीन आचार्यों द्वारा बताए गए अरिष्ट भद्र योग मैंने कहा है जिन योगों को जानकर ज्योतिषी गण राजाओं के प्रिय पात्र होते हैं।

चन्द्र-सूर्य कृत योग प्रकरण

चन्द्रकृत् सुनफा, अनफा, दुरुघरा योग- जन्माड़ में चन्द्र से सूर्य को छोड़कर अन्यग्रह यदि चन्द्रमा से द्वितीय में हों तो सुनफा, १२वें में हों तो अनफा, और दोनों अर्थात् २, १२ में हों तो दुरुघरा योग होते हैं।

मानसागरी में इन योगों के लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं- 'रविवर्ज्ज द्वादशगैर्नफा चन्द्राद् द्वितीयगैः सुनफा।'

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शुभगेस्थितैदुरुधरा केमद्रुम स्थितौ योडन्य:।।

अर्थात् चन्द्रमा से द्वादश भाव में सूर्य को छोड़कर कोई भी ग्रह हो तो अनफा द्वितीय भाव में सूर्यरहित कोई ग्रह हो तो सुनफा तथा चन्द्रमा से दोनों तरफ अर्थात् द्वितीय द्वादश दोनों भावों में सूर्यरहित ग्रह हो तो दुरुधरा योग होता है।

उससे भिन्न स्थिति में अर्थात् चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में कोई भी ग्रह न हो तो केमद्रुम नामक योग होता है।

केमद्रुम योग- जन्म कुण्डली में यदि चन्द्रमा समस्त ग्रहों से अदृष्ट हो अर्थात् चन्द्र को कोई भी ग्रह न देखते हों तथा चन्द्र से २, १२ स्थान में कोई ग्रह न हो और चन्द्रमा से १, ४, ७, १० में कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम नामक योग होता है।

यदि चन्द्रमा पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तथापि केमद्रुम योग होता है। यह योग अनेक प्रकार का कष्ट देने वाला होता है।

प्रस्तार विधि से सुनफादि योग भेद संख्या का ज्ञान- प्रस्तार विधि से सुनफा योग के ३१ भेद और अनफा के ३१ भेद होते हैं। दुरुधरा योग के ६० × ३ = १८० भेद बताए गए हैं।

उसकी चर्चा बृहज्जातकादि ग्रन्थों में विस्तार से बताया गयाा.है।

बृहज्जातकोक्त विधि निम्नलिखित है- सुनफायोगफल ज्ञान- सुनफा योग में उत्पन्न जातक लक्ष्मीवान् अपने भुजबल से धनोपार्जन करने वाला अत्यन्त धार्मिक, शास्त्र के रहस्य को जानने वाला यशस्वी, शान्त, सुखी, राजा या मन्त्री और परम बुद्धिमान् होता है।

मानसागरी में भी कहा गया हैं- भौमादीनां फलं यत् स्याज्ज्ञात्वा तविकल्पं बुध:। प्रज्ञाय प्रवदेत्सम्यक् सुनफादि वृतं फलम्।।

अर्थात् भौमादि ५ ग्रहों का फल पञ्चमहापुरुषयोग में बताया गया है इन फलों को भली भाँती जानकर एवं सुनकर सुनफा आदि योगों का फल विद्वान् ज्योतिषी को कहना चाहिए!

अनफा योग फल ज्ञान- अनफा योग में उत्पन्न बालक वक्ता प्रभावशाली, धनी, नीरोग, सुशील, अन्नपान, पुष्प, वस्त्र और स्त्री आदि सुखों का भोग करने वाला, प्रख्यात, गुणी, सुखी प्रसन्नचित्त रहने वाला और सुन्दर शरीर वाला और रूपवान् होता है।

अनफा योग का फल मानसार ने निम्नलिखित प्रकार से किया हैं- चौर स्वामी दृप्त: स्ववशीमानी रणोत्सट:सेर्य:। क्रोधात्सम्पत्त्साध्य: सुतनुर्नम: कुजेदुनफायां च।।

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अर्थात् भौम कृत अनफा योग में चोरों का सरदार, तेजस्वी, आत्मसंयमी, स्वाभिमानी, युद्ध का अभिलाषी, ईर्ष्यालु, क्रोध से सम्पत्ति अर्जित करने वाला; शरीर से सुन्दर तथा विनम्र होता है। इसी प्रकार बुध, गुरु, शुक्र, शनि से अनफा योगों का फल मानसागरी के अनुसार अधोलिखित प्रकार समझने चाहिए-

गन्धर्वो लेखपटु: कवि: प्रवक्ता नृपात्सत्कार:। रसधिर: सुभगोऽपि बुधे प्रसिद्धकर्मा अनफायां हि॥ गम्भीर सन्मेधा चायुतेा बुध्दिमान नृपाप्तयशा:। अनफायां त्रिदशसुरो सङ्घात: सत्कारिर्भवति॥ युवतीनामतिसुभग: प्रणयी क्षितिपस्य गोपति: कान्त:। कनकस्रीदृढद्रश पु माननफायां भार्गवे भवति॥ विस्तीर्णश्रुज: सुभगो गृहीतवाक्यश्रुतषडसमृद्ध:। दुर्विनितामाणभोक्ता गुणसहित: पुत्रवान रविजे॥ इस प्रकार भौमादि पञ्चतारा ग्रहों से अनफा का फल स्पष्ट है।

दुरुधरायोग फल ज्ञान– दुरुथरा योग में उत्पन्न जातक वाणी, बुद्धि, पराक्रम और गुणों से पृथ्वी पर प्रख्यात, दानी, परिवार के लोगों के पोषण में कष्ट आदि के भोग का भागी सद्व्यवहार और कार्यों में अग्रगण्य होता है। इस प्रकार दुरुधरा योग और केमद्रुम योग का फल मानसार ने इस प्रकार दिया है-

उत्पन्नभोगसुखमुब्धनवहनालाघ: त्यागान्वितोदुरुधाराप्रभव: सुभृृत्य:। केमद्रुमे मलिन दुखितनीचिनी:स्वाः प्रेष्याश्र तत्र नृपतेरपि वंशजाताः॥ अर्थात् दुरुधरा योग में उत्पन्न जातक समस्त सुखों का उपभोग करने वाला होता है।

वह जातक धन एवं वाहन से युक्त, त्यागी प्रकृति वाला तथा अच्छे सेवकों से युक्त होता है। इसी प्रकार केमद्रुम में उत्पन्न व्यक्ति मलिन आचरण वाला, सदा दुखी, नीच, निर्धन तथा सेवा कार्य करने वाला होता है। वह चाहे राजकुल में ही क्यों न उत्पन्न हुआ हो।

जो जातक केमद्रुम योग में उत्पन्न राजवंश में भी स्त्री अत्र, पान (दुग्धादि) ग्रह, वस्त्र, मित्रों से रहित, दारिद्रय, दु:ख, रोग, और दीनता के विकार से युक्त, मजदूरी करके जीवन वाला, दुष्ट सङ्ग से युक्त दुराचारी होता है।

सुनफादि योगों का केन्द्र में प्राधान्य -केन्द्रादि (१, ४, ७, १०) में ग्रहों के द्वारा जो अनफादि योग कहे गए हैं वे मुख्य हैं।

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घोड़ा आदि ) से युक्त सुन्दर पराक्रमी राजा से सम्मानित धैर्यवान और सभी कार्यों में कुशल होता है। सुनफा योग कारक शनि फल ज्ञा-१- जन्म कुंडली में यदि सुनफा योग शनि के कारण बन रहा हो तो जातक चतुर, बुद्धिमान, ग्राम तथा नगर के मनुष्यों द्वारा पूजित, धनी, कार्यों में संलग्न और धैर्य धारण करने वाला होता है। अनफा योगकारक भौमफल ज्ञान- जन्म पत्रिका में यदि अनफा योगकारक मङ्गल हो तो जातक चोरों का स्वामी, नीड़र, स्वतन्त्र अभिमानी, युद्धप्रिय, क्रोधी, श्रेष्ठ और सेवापरायण, प्रशंसनीय सुन्दर शरीर वाला और लाभकर्ता और प्रगल्भ होता है। आचार्य वारहमिहिर ने सुनफा, अनफा, दुरुधरा योगों का अलग- अलग ग्रह के आधार पर एक ही फल कहा है। कहने का अभिप्राय यह है कि पञ्चतारा ग्रहों के सुनफा योग में जो फल कहे गए हैं वही अनफादि में भी हैं। यहाँ पर पृथक्-पृथक् वर्णन प्रस्तुत किया गया है।

अनफा योग कारक बुध फल ज्ञान- पत्रिका में अनफा योग कारक बुध हो तो जातक गान्धर्व ( गान, नृत्य ) विद्या और लेख लिखने में चतुर, कवि भाषण में निपुण राजा से आदर और सत्कार पाने वाला सुन्दर शरीर वाला और प्रसिद्ध कार्यकर्त्ता होता है। अनफा योग कारक गुरु फल ज्ञान- पत्रिका में यदि अनफा योग में गुरु हो तो उत्पन्न जातक गम्भीर प्रकृति का, बलवान, मेधावी, शुभकार्यों में संलग्न, बुद्धिमान राजा निःयश प्राप्त करने वाला और उत्तम कवि होता है। अनफा योग कारक शुक्र फल ज्ञान- पत्रिका में यदि अनफा योगकारक शुक्र हो तो जातक स्त्रियों का प्रिय, उप्र राजा, गायों का स्वामी, भोगी, रूपवान् प्रसिद्ध, सुवर्ण सम्पत्ति वाला और उग्र होता है। अनफा योग कारक शनि फल ज्ञान- जन्म पत्रिका में यदि अनफा योग करने वाला शनि हो तो विशाल हाथ वाला, नेता वचन को पालन करने वाला, चतुष्पद सम्पत्ति वाला, दुशरित्रा स्त्री का पति या भक्त, एवं गुणवान होता हैं।

दुरुधरा योग कारक भौम-बुध फल ज्ञान- जन्म काल में यदि मङ्गल बुध से दुरुधरा योग हो तो जातक खेती करने वाला, अतिधनवान कार्यों में कुशल, लोभी, बुद्ध और कुलटा स्त्री में आसक्त, कुल में श्रेष्ठ होता है। दुरुधरा योग कारक भौम-गुरु फल ज्ञान- जन्म काल में यदि मङ्गल गुरु से योग हो तो कर्मों में विख्यात, धनी, बहुतों से बैर रखने वाला हष्ट, कुलरक्षक और धन सञ्चय करने वाला होता है। दुरुधरा योग कारक भौम-शनि फल ज्ञान- जातक की जन्म कुंडली में

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आचार्य पराशर ने अड़तीसवें अध्याय के तीसरे श्लोक में इसके विपरीत फल कहा है।

वाशी योग कर्ता गुरु व शुक्र फल ज्ञान- जन्म कुंडली में यदि वाशी योग में गुरु हो तो धैर्यबल और बुद्धि से युक्त तथा वचन को पालन करने वाला होता है।

शुक्र हो तो शूर, लोक में विख्यात, गुणवान और यशस्वी होता है।

वाशी योग कर्ता बुध व भौम फल ज्ञान- बुध हो तो प्रियवचन वक्ता सुन्दर और दूसरे की आज्ञा मानने वाला होता है। मङ्गल हो तो संग्राम में विनयी, अपने भाग्य से जीने वाला होता है।

वाशी योग कर्ता शनि फल ज्ञान- योग कारक शनि हो तो व्यापारी, दृष्ट स्वभाव, परधन हरण करने वाला, गुरु जनों का द्वेषी तथा निर्ज्ज होता है।

फलादेश में विशेष कथन- इस प्रकार रवि तथा योगकारक ग्रहों के बल तथा शुभाशुभ राशि नवांश को ठीक से देखकर इन योगों का फल कहना चाहिए।

उभयचारी योग फल ज्ञान- जन्म काल में उभयचारी योग में उत्पन्न पुरुष समस्त भार (कार्यभार) को सहन करने वाला, कल्याण से युक्त, समान शरीर वाला, स्थिर, विशाल बल, अधिक उच्च नहीं, संतोषी, विद्वान सुन्दर, बहुत नौकर वाला, बन्धुजनों का पालक, राजा के तुल्य, उत्साही, दृष्ट-पुष्ट और सुख भोग करने वाला होता है।

दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

यवनादि प्राचीनाचार्यों ने दिग्रह योग के फल जो कहे हैं, उनको यहाँ अहङ्कार मुक्तभाव से विशेष रूप से आगे कहने जा रहे हैं-

नोट :- यहाँ नीचे लिखे योग ज्ञान के लिए दिए गए कुंडलियों के किसी भी भाव में दो, तीन, चार, पाँच, छः या सात ग्रह एक साथ स्थित होने से उस कुंडलियों के साथ संलग्न ग्रह योग का फल समझना चाहिए न कि किसी भाव या घर में स्थित होने का।

उदाहरणार्थ यहाँ आपको समझने मात्र के लिए लग्न भाव में ग्रह योग प्रदर्शित किया गया है।

सूर्य चन्द्रमा योग फल ज्ञान

जन्माङ्ग में रवि और चन्द्रमा एक स्थान में हों तो जातक स्त्री का वश विनय रहित कूट (सुवर्णादि धातुओं को मिश्रणपरिवर्तन क्रिया)

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

स्त्री एवं पुत्रादि से रहित, अपने कुल के गुणों से प्रसिद्ध और हीनशील होता है।

चन्द्र भौम योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में चन्द्र मङ्गल का योग हो तो वह व्यक्ति शूर, रूप में विजयी, शत्रु से पीड़ित, मिट्टी, चर्म और धातुओं के वस्तु बनाने वाला, कूट ( धातु पर रंग चढ़ाने की क्रिया ) को जानने वाला होता है।

चन्द्र बुध योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में चन्द्र बुध का योग हो तो जातक काव्य करने में निपुण, धनवान स्त्री का प्रिय, सुरुपवान, हँसमुख, धर्मात्मा और विशेष गुण वाला होता है।

चन्द्र गुरु योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में चन्द्र गुरु का योग हो तो पुरुष स्थिर मैत्री वाला, विनययुक्त, बन्धुओं का आदर करने वाला धनवान, सुशील और देव ब्राह्मणों का हित चिन्तक होता है।

चन्द्र शुक्र योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में चन्द्र शुक्र का योग हो तो वह व्यक्ति माला सुगन्ध वस्त्रादि से युत कार्य प्रणाली को जानने वाला, अपने कुल का प्रिय, आलसी, क्रय विक्रय में कुशल होता है।

चन्द्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में चन्द्र शनि का योग हो तो जातक वृद्धा स्त्री में आसक्त, हाथी एवं घोड़े आदि का सम्पालक, शीलहीन, दूसरे का अनुकरण करने

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भृगु संहिता फल दर्पण

वाला, निर्धन और विवादादि(झगड़ा) में हारने वाला होता है।

भौम बुध योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में मड़ल बुध का योग हो तो स्त्रीजनों में तुच्छ ( अपमानित ), अल्प धन वाला, सोना और लोहा का कार्य करने वाला, कुलटा स्त्री और दुश्वरित्रा विधवा को रखने वाला और औषधि बनाने में निपुण होता है।

भौम गुरु योग फल ज्ञान-

यदि जातक की कुण्डली में मड़ल गुरु का योग हो तो वह पुरुष शिल्प, वेद, शास्त्रों का ज्ञाता, मेधावी, बोलने में चतुर, बुद्धिमान तथा शस्त्र चलाने वालों में प्रधान ( श्रेष्ठ ) होता है।

भौम शुक्र योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में मड़ल शुक्र का योग हो तो लोकमें पूज्य, समाज में मुख्य, गणितज्ञ, परस्त्री में आसक्त, धूर्त, जुआ, मिथ्या तथा शठता में रत और विदू ( परस्त्रीरत ) होता है।

भौम शनि योग फल ज्ञान-

यदि जातक की कुण्डली में मड़ल शनि का योग हो तो वह धातु क्रिया, इन्द्रजाल विद्या में कुशल, वञ्चक, चोर विद्या में निपुण, धर्महीन शस्त्र और विष से आहत और कलह प्रिय होता है ।

बुध गुरु योग फल ज्ञान-

कुण्डली में बुध गुरु का योग हो तो नृत्य कला को जानने वाला, पण्डित शान और वाद्य में

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

निपुण, बुद्धिमान और सुखी होता है।

बुध शुक्र योग फल ज्ञान–

यदि कुण्डली में बुध शुक्र का योग हो तो

अति धनवान, नीतिज्ञ, विविधशिल्प कला का ज्ञाता,

वेद जानने वाला, प्रियवक्ता, शीतज्ञ, हास्य और

सुगन्ध मालादि में रुचि रखने वाला होता है।

बुध शनि योग फल ज्ञान–

यदि कुण्डली में बुध शनि का योग हो तो

जातक ऋण से युत, घमण्डी, प्रपञ्ची, कवि, घूमने

वाला, कार्य में चतुर और प्रियभाषी होता है।

गुरु शुक्र योग फल ज्ञान–

यदि कुण्डली में गुरु शुक्र का योग हो तो

जातक विद्या, वाद से जिविका वाला सप्रमाण

विशेष धर्म में रहने वाला, श्रेष्ठ स्त्री वाला तथा

बुद्धिमान होता है।

गुरु शनि योग फल ज्ञान–

यदि कुण्डली में गुरु शनि का योग हो तो

धनवान, नगराध्यक्ष, यशस्वी, श्रेणी, सभा ग्राम और

संस्था का प्रधान होता है।

शुक्र शनि योग फल ज्ञान–

यदि कुण्डली में शुक्र शनि का योग हो तो

लकड़ी चीर्ने में चतुर चौर कर्म, चित्ररचना, पत्थर

आदि से शिल्प क्रिया को करने में निपुण, योद्धा,

भ्रमणशील, और पशुओं को पालन करने वाला

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होता है। इस प्रकार यहाँ दो ग्रहों के योग से फल का वर्णन किया गया है। इनमें ग्रह परस्पर वर्ग में हो तो अधिक विकल्प से फल में न्यूनाधिकता भी होती है। आगे त्रिग्रहों के योग का फल कहते हैं।

सूर्य चन्द्र मंगल योग फल ज्ञान- जन्म कुण्डली में यदि सूर्य, चन्द्र मङ्गल का योग हो तो जातक लज्जारहित, पापी, यन्त्र बनाने वाला, शत्रु को जीतने वाला, सब कार्यों में दक्ष होता है।

सूर्य चन्द्र बुध योग फल ज्ञान- यदि रवि चन्द्र बुध का योग हो अर्थात् एक राशि में तो जातक तेजस्वी, पूर्ण बुद्धिमान शस्त्रकला में निपुण, सभा व पान ( मदिरादि ) में लीन, राजा का कार्य करने वाला और धैर्यवान् होता है।

सूर्य चन्द्र गुरु योग फल ज्ञान- जन्म कुण्डली में यदि सूरज, चन्दमा, गुरु एक राशि में हों तो जातक क्रोधी मायाचार में चतुर, सेवा कर्म में निपुण, विदेश गमन में लीन अर्थात् परदेश में रहने वाला, अत्यन्त बुद्धिमान और चञ्चल होता है।

सूर्य चन्द्र शुक्र योग फल ज्ञान- जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र और शुक्र एक राशि में हों तो जातक दूसरे के द्रव्य हरण करने पर चतुर, परस्त्री आसक्त रहने वाला और शास्त्र में चतुर होता है।

चतुर, परस्त्री आसक्त रहने वाला और शास्त्र में चतुर होता है।

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

सूर्य चन्द्र शनि योग फल ज्ञान-

जन्म कुण्डली में यदि सूर्य, चन्द्रमा, शनि एक राशि में हों तो जातक काम शास्त्र में चतुर, मूर्ख, पराधीन और दरिद्र होता है।

सूर्य मंगल बुध योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि सूर्य, मङ्गल और बुध ये तीनों ग्रह यदि एक ही राशि में बैठे हो तो जातक प्रसिद्ध, कुश्ती लड़ने वाला, साहसी, निष्ठुर, निर्लज्ज और धन पुत्र स्त्री से रहित होता है।

सूर्य मंगल गुरु योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि सूर्य मङ्गल गुरु की युति हो तो जातक बोलने में चतुर, बड़ा धनवान्, सलाहकार, सत्यवादी और स्वभाव से उदार होता है।

सूर्य भौम शुक्र योग फल ज्ञान-

जिस जातक के जन्म काल में यदि सूर्य, मङ्गल, शुक्र एक राशि में हों तो वह जातक नेत्ररोगी, अच्छे कुल में उत्पन्न, भाग्यशाली, कठोर वचन बोलने वाला और सम्पतिशाली होता है।

सूर्य भौम शनि योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि सूर्य, मङ्गल, शनि एक राशि में हों तो जातक अड़ियल, धनहीन, रोगी, स्वजन रहित, और अत्यन्त मूर्ख होता है।

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सूर्य बुध गुरु योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि सूर्य, बुध, गुरु की युति हो तो जातक नेत्र रोगी, सम्पत्ति-शाली, मूर्ख, शास्त्रादि शिल्पविद्या एवं काव्यादि कार्य करने में लीन और सुन्दर लेखक होता है।

सूर्य बुध शुक्र योग फल ज्ञान-

जन्म पत्रिका में यदि सूर्य, बुध शुक्र एक राशि में हों तो जातक अत्यन्त दुखी, वाचाल, घुपने में प्रवृत्ति वाला, एवं स्त्री के लिए दुखी होता है।

सूर्य बुध शनि योग फल ज्ञान-

जन्म काल में सूर्य, बुध, शनि युति हो तो जातक नपुंसक की तरह आचरण करने वाला, द्वेष, सबसे पराजित, बन्धु बान्धवों से त्यागा हुआ होता है।

सूर्य गुरु शुक्र योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि सूर्य, गुरु तथा शुक्र एक ही राशि में स्थित हों तो इस प्रकार का जातक कमजोर नेत्रों वाला, वीर, पण्डित, निर्धन, राजा का मन्त्री तथा दूसरे के कार्य में लीन रहने वाला होता है।

सूर्य गुरु शनि योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि सूर्य गुरु शनि एक राशि में हों तो जातक असमान शरीर वाला पूजनीय, अपने लोगों से अनाहत, सुन्दर स्त्री पुत्र तथा मित्र वाला राजा का प्रिय तथा निर्भय होता है।

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

सूर्य शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

जन्मकाल में यदि सूर्य, शुक्र तथा शनि एक राशि में स्थित हों तो वह जातक शत्रु के भय से दुखी, सम्मान, कला एवं काव्य से रहित, दूषित आचरण वाला और कोढ़ी होता है।

चन्द्र भौम बुध योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि चन्दमा, भौम, बुध एक राशि में हों तो पाप करने वाला, दुष्ट आचरण में लीन, जीवन पर्यन्त मित्र व अपने बन्धुओं से रहित होता है।

चन्द्र भौम गुरु योग फल ज्ञान-

जन्म काल में यदि चन्द्र, भौम, गुरु एक राशि में हों तो जातक नम्र देह ( पाठान्तर से घावों से युत ) स्त्री लोलुप, चोर, सुन्दर, स्त्रियों का प्रिय व महाक्रोधी होता है।

चन्द्र भौम शुक्र योग फल ज्ञान-

जन्म कुण्डली में यदि चन्दमा, भौम एवं शुक्र एक राशि में हों तो जातक दुःशीला अर्थात शील ( नम्रता ) रहित, पुत्र व पति, घूमने की रुचि वाला और ठण्ड से डरने वाला होता है।

चन्द्र भौम शनि योग फल ज्ञान-

यदि जातक की कुण्डली में चन्द्र, भौम तथा शनि एक ही राशि में स्थित हों तो वह जातक बाल्यावस्था में मातृ सुख से रहित, क्षुद्र स्वभाव, विषम बुद्धि व लोक ( संसार ) द्वेषी होती है।

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भृगु संहिता फल दर्पण

भौम गुरु शनि योग फल ज्ञान–

जन्म कुण्डली में यदि मङ्गल, गुरु, शनि एक राशि में हों तो जातक राजा से संमत, भग्न देह, दृष्ट आचरण करने वाला, मित्रों से निन्दनीय एवं घृणा से रहित होता है।

भौम शुक्र शनि योग फल ज्ञान–

यदि जन्माङ्क में मङ्गल, शुक्र, शनि एक राशि में हों तो जातक चरित्रहीन स्त्री का पुत्र और पति ( अर्थात् चरित्रहीन स्त्री का पति भी ), सुख-साधनों से रहित और परदेशवासी होता है।

बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान–

जन्म कुण्डली में यदि बुध, गुरु, शुक्र एक साथ हों तो जातक सुन्दर शरीर वाला, शत्रुहीन, राजा, भाग्यवान्, यशस्वी, और सत्यवक्ता होता है।

बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान–

जन्म कुण्डली में यदि बुध, गुरु, शनि एक राशि में हों तो जातक धन ऐश्वर्य युक्त, पण्डित, बहुत सुखभोगी, अपने स्त्री से प्रेम करने वाला, धैर्ययुत और भाग्यवान् होता है।

बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान–

जन्म कुण्डली में बुध, शुक्र, शनि एक साथ हों तो वाचाल, धूर्त, मिथ्यावादी, परस्त्रीगामी, कलाकार और स्वदेश प्रिय होता है।

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सूर्य चन्द्र भौम शुक्र योग फल ज्ञान- यदि सूर्य, चन्द्र, भौम, शुक्र एक साथ हों तो जातक श्रेष्ठ उचित वाणी व व्यवहार वाला, ( पाठान्तर से उग्र अर्थात् तीक्ष्ण, जठराग्नि वाला ) सुखभोगी, चतुर, धन संग्रहकर्ता, विद्या पुत्र व स्त्री से युक्त होता है।

सूर्य चन्द्र भौम शनि योग फल ज्ञान- यदि सूर्य, चन्द्र, भौम, शनि एक साथ हों तो जातक न्यूनाधिक शरीर वाला, वामन ( लघु ), धन हीन, भिक्षाशी और सर्वं विदित मूर्ख होता है।

सूर्य चन्द्र बुध गुरु योग फल ज्ञान- यदि सूर्य, बुध, गुरु, चन्द्रमा एक साथ हों तो जातक सुवर्ण ( सोना ) का कार्य करने वाला ( सुनार ), बड़े नेत्र वाला कला का ज्ञाता, बड़ा धनवान, धैर्यधारी, ( पाठान्तर से वीर ) व रोगहीन, देहधारी, ( पाठान्तर से गम्भीर ) होता है।

सूर्य चन्द्र बुध शुक्र योग फल ज्ञान- यदि सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र एक साथ हों तो जातक व्यग्र, सुन्दर भाग्य वाला, प्रवक्ता, छोटे कद वाला, पाठान्तर से नेत्र रोगी व पीत नेत्र वाला व राजा का प्यारा होता है।

सूर्य चन्द्र बुध शनि योग फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्र, बुध, शनि एक साथ हों तो जातक माता पिता से हीन, धन सुख से रहित, घूमने वाला, भिक्षाशी व असत्य भाषी होता है।

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

सूर्य चन्द्र गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शुक्र एक साथ हों तो जातक जल हिरन व जड़ूल का स्वामी, सुख भागी ( पाठान्तर से राजा से सम्मानित ) व कुशल होता है।

सूर्य चन्द्र गुरु शनि योग फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि एक साथ हों तो जातक लाल नेत्र वाला, क्रोध दृष्टि वाला, उग्र, अधिक पुत्र धन से युक्त और श्रेष्ठ स्त्रियों का प्रिय पात्र होता है।

सूर्य चन्द्र शुक्र शनि योग फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि एक साथ हों तो जातक स्त्री के समान आचरण करने वाला अर्थात् जनखा, अति चलने वाला, अत्यन्त दुर्बल देहधारी व सब जगह भयभीत होता है।

सूर्य भौम बुध गुरु योग फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सूर्य, भौम, बुध, गुरु एक साथ हों तो जातक वीर, सूत बनाने वाला वा चक्की चलाने वाला और ( ग्रन्थान्तर से साइकिल वगैरह पर चलने वाला ) स्त्री व धन से रहित, दुःखी अथवा घूमने वाला होता है।

सूर्य भौम बुध शुक्र योग फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सूर्य, भौम, बुध, शुक्र एक साथ हों तो जातक दूसरों की स्त्री में लीन, चोर, असमान शरीर धारी, दुर्जन व दुर्बल होता है।

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

चन्द्र बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान-

यदि चन्द्र, बुध, गुरु, शनि एक साथ हों तो जातक धर्मात्मा यशस्वी श्रेष्ठ, तेजस्वी, बन्धुओं का प्रिय, बुद्धिमान, राजमान्य और श्रेष्ठ कवि होता है।

चन्द्र बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्क में चन्द्र, बुध, शनि एक राशि में हों तो परस्त्रीगामी, दुःशीला स्त्री का पति, विपत्ति से युक्त बन्धु वाला, पण्डित तथा संसार का द्वेषी होता है।

चन्द्र गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

जन्माङ्क में चन्द्र, गुरु, शुक्र, शनि के योग होने से जातक मातृविहीन, सौभाग्य-शाली, चर्मरोगी, दु:खी, भ्रमणशील, बहुत बोलने वाला और सत्य में रत होता है।

भौम बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्क में मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र का योग हो तो स्त्री से कलह करने वाला, धनी, लोकमान्य, सुशील एवं नीरोग शरीर वाला होता है।

भौम बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान-

यदि मङ्गल, बुध, गुरु, शनि का योग हो तो जातक पण्डित, वक्ता, धनहीन, सत्य और शौच से बोलने वाला, कष्ट सहनशील और बुद्धिमान होता है।

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

सूर्य चन्द्र भौम बुध शनि योग फल ज्ञान-यदि कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, शनि एक भवन में हो तो जातक थोड़ी आयु वाला कारागार में वृद्ध, दीन, समस्त सुख से हीन एवं स्त्री पुत्र धन से रहित होता है।

सूर्य चन्द्र भौम गुरु शुक्र योग फल ज्ञान-यदि जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, गुरु, शुक्र एक भवन में हो तो जातक जन्म से अन्थ, अत्यन्त दुःखी, माता-पिता से सदा संत्यक्क अर्थात माता पिता के सुख का अभाव तथा गान ( संगीत ) में अभिरुचि रखने वाला होता है।

सूर्य चन्द्र भौम गुरु शनि योग फल ज्ञान-यदि जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, गुरु, शनि एक भवन में हों तो जातक युद्ध में निपुण, सामर्थ्यवान, दूसरों के धन का हरण करने वाला, अन्य लोगों को कष्टदायी अथवा चुगलखोर एवं दुष्ट स्वभाव का होता है।

सूर्य चन्द्र भौम शुक्र शनि योग फल ज्ञान-यदि कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, शुक्र तथा शनि एक ही भवन में हों तो जातक सम्मान धन, वैभव से रहित, दुष्ट आचरण कर्ता व दूसरों के स्त्री में लीन होता है।

सूर्य चन्द्र बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान-यदि जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र एक भवन में हो तो जातक मशीनरी का ज्ञाता, अधिक धनी, राजा का मन्त्री, न्यायाधीश, विख्यात और अच्छे यश वाला होता है।

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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण

चन्द्र मंगल बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- जन्माङ्ग में चन्द्र, मङ्गल, बुध, शुक्र, शनि के योग होने पर जातक मृत्यु, बन्धन और रोग से पीड़ित लोक में मान्य और रोग से व्यथित, विद्वान्, निर्धन और विकल शरीर वाला होता है।

सूर्य मंगल बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- जन्माङ्ग में रवि, मङ्गल, बुध, शुक्र एवं शनि के योग से जातक रोग और शत्रु से पीड़ित, स्थानहीन, दुःख से युक्त, सदा क्षोभ रहित होकर भ्रमण करने वाला होता है।

चन्द्र भौम गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञाने- जन्माङ्ग में चन्द्र, मङ्गल, गुरु, शुक्र, शनि के योग से जातक नपुंसक, नीच आचरण वाला, दुर्भाग्य युक्त, विकल और धनहीन होता है।

सूर्य भौम गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- जन्माङ्ग में सूर्य, मङ्गल, गुरु, शुक्र, शनि के योग से जातक जलयन्त्र, धातु, पारा आदि रसायन निर्माण क्रिया में निपुण और इन्हीं कार्यों को प्रसिद्ध कार्य मानने वाला होता है।

सूर्य बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- जन्माङ्ग में रवि, बुध, गुरु, शुक्र, शनि के योग से जातक बहुत शास्त्र जानने में निपुण, मित्र और गुरुजनों का प्रिय, धर्मात्मा और दयालु होता है।

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चन्द्र भौम बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान-

जन्माढ़ में चन्द्र, मढ़ल, बुध, गुरु, शुक्र के योग से जातक सज्जन, नीरोगी शरीर, विद्या, धन और सुख से सम्पन्न, बन्धुओं का हित और बहुत मित्र वाला होता है।

चन्द्र भौम बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान-

जन्माढ़ में चन्द्र, मढ़ल, बुध, गुरु, शनि के योग से जातक आँख का रोगी, दरिद्र, परान्नभोगी, दीन और अपने बन्धु वर्गों को लज्जित करने वाला होता है।

चन्द्र भौम बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि कुण्डली में चन्द्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि एक भाव में हों तो जातक अधिक शत्रु व मित्रों से युक्त, परोपकारी, विपरीत स्वभाव वाला एवं अधिक अहंकारी होता है।

चन्द्र बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक राज्य सचिव या राजा के समान, समुदाय का स्वामी एवं सर्वमान्य होता है।

भौम बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि एक ही भवन में हों तो जातक सुन्दर मन चित्त वाला, उन्मादी, राजा का प्रिय पात्र, शोक से रहित, निद्रालु एवं निर्धन होता है।

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अब आगे छः ग्रहों के योग का फल प्रस्तुत किया जा रहा है-

एक राशि में सूर्य चन्द्र भौम बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र एक स्थान में हों तो जातक विद्या वित्त धर्म में लीन कुश, देहधारी अधिक भाषी (बहुभाषी) एवं विशिष्ट बुद्धिमान् होता है।

सूर्य चन्द्र भौम बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शनि एक स्थान में हों तो जातक दानी, परोपकारी, अभिशाप स्वभाव वाली, सन्त एवं गुणों, निजेन स्थान में रमण करने वाला होता है।

सूर्य चन्द्र भौम बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि एक स्थान में हों तो जातक चोर, परस्त्रीगामी, कोढ़ी, अपने मनुष्यों से निरादर पाने वाला, मूर्ख, स्थान से च्युत एवं पुत्रहीन होता है।

सूर्य चन्द्र भौम गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि सूर्य, चन्द्र, भौम, गुरु, शुक्र, शनि एक स्थान में हों तो जातक दुष्ट, दूसरों के कार्य में लीन वा करने वाला, क्षय रोगी (टी.वी. का रोगी), श्वास व खाँसी से पीड़ित देहधारी और भाई बन्धुओं में निन्दित होता है।

सूर्य चन्द्र बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक राजा का मन्त्री, सौभाग्यवान्, क्षमा से युक्त, शोक से पीड़ित एवं स्त्री और धन से रहित होता है।

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सूर्य मंगल बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक तीर्थ में सदा रमण करने वाला, धन व पुत्र से हीन, वन या पर्वत का सेवन करने वाला होता है।

चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्ग में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक सदा पवित्र, प्रतापी, अधिक स्त्रियों में लीन, राजा का प्यारा, राज्य मन्त्री, धन, पुत्र व सौभाग्य से युत होता है।

कन्दल के मत से पाँच या छः ग्रहों के योग फल ज्ञान-

यदि जन्माङ्ग में पाँच या छः ग्रहों का योग हो तो जातक विशेष कर दरिद्र, दुःखी और मूर्ख होता है। जिस प्रकार ग्रहों की युति होने पर फल कथन किया है, उसी प्रकार परस्पर दृष्टि होने पर भी कन्दलाचार्यों के मत में फल होता है।

सन्यास योग प्रकरण

सन्यास योगों का वर्णन- यदि जन्म के समय चार या चार से अधिक ग्रह एक स्थान में हों तो कितने पुरुषों ने तपस ( प्रव्राजक = सन्यासी आदि ) योग के भेद विस्तार पूर्वक कहे हैं। उन योगों में तपस्वियों का जन्म होता है। उन सब योगों को यहाँ कहा जा रहा है।

तपस्वी योग- यदि जन्माङ्ग में सूर्य, चन्द्र, बुध, भौम अथवा सूर्य, मङ्गल, शनि, बुध, शुक्र एक राशि में हों तो जातक तपस्वी होता है।

प्रव्राजक योग- यदि मङ्गल, चन्द्र, सूर्य, बुध, गुरु, रवि, चन्द्र, शनि, बुध या सूत्र्य, चन्द्र मङ्गल, शनि एक राशि में हों तो जातक सन्यासी होता है।

अन्य तपस्वी योग- यदि रवि, गुरु, शनि, बुध अथवा मङ्गल, रवि, बुध, गुरु एक स्थान में हों तो तपस्वी का जन्म होता है।

यदि शुक्र, रवि, मङ्गल, शनि, चन्द्र, गुरु, शनि सबल होकर एक साथ हों तो तपस्वी का जन्म होता है।

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नामस योग प्रकरण

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यूप-शर-शक्ति-दण्ड योग का ज्ञान- किसी भी जातक के पत्रिका में लग्न से चतुर्थ पर्यन्त सभी ग्रह हों तो यूपयोग होता है। चतुर्थ से सप्तम पर्यन्त सब ग्रह हों तो शरयोग होता है तथा सप्तम से दशम पर्यन्त सब ग्रह हों तो शक्ति योग और दशम से लग्न तक सभी ग्रह हों तो दण्डयोग होता है। ये योग सत्याचार्योक्त हैं।

अर्धचन्द्र व गदा योग लक्षण- केन्द्र से त्रिकोण स्थान से आरम्भ करके ७ स्थान में लगातार ग्रह हों तो अर्धचन्द्र नामक योग होता है तथा समीपस्थ दो केन्द्र में सब ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है।

यहाँ अर्धचन्द्र योग ८ प्रकार का होता है। (१) द्वितीय से अष्टम पर्यन्त, (२) तृतीय से नवम पर्यन्त, (३) पञ्चम से एकादश पर्यन्त, (४) षष्ठ से द्वादश पर्यन्त, (५) अष्टम से द्वितीय तक, (६) नवम से तृतीय, (७) एकादश से पञ्चम, (८) द्वादश से षष्ठ पर्यन्त ये आठ भेद कहे गए हैं। गदा योग ४ प्रकार का होता है। (१) लग्न से चतुर्थ तक सभी ग्रह, (२) चतुर्थ से सप्तम तक सभी ग्रह, (३) सप्तम से दशम तक सभी ग्रह, (४) दशम से लग्न पर्यन्त सभी ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है।

वज्र व यव योग का- यदि लग्न और सप्तम में केवल सब शुभ ग्रह हो, अथवा चतुर्थ दशम में केवल सब पाप हो तो दोनों स्थिति से वज्र योग होता है। इससे विपरीत ( अर्थात् लग्न सप्तम में सब शुभ ग्रह ) हो तो दोनों स्थिति में यव योग होता है।

पूर्व ( प्रथम ) लग्न में सब शुभग्रह हों तो पूर्व वयस में तथा पश्च्चिम ( सप्तम ) लग्न में शुभ ग्रह हो तो पश्च्चिम ( अन्त्य ) वयस में शुभ फल को देता है।

यदि दोनों में शुभ ग्रह हो तो दोनों वयस में शुभ फल देता है। अतः उसका नाम वज्र रखा गया क्योंकि वज्र के दोनों ( मूल और अग्र ) भाग में शक्ति रहती है।

शकट, विहग, हल व शृङ्गाटक योग- यदि जन्मकुण्डली में लग्न और सप्तम में सभी ग्रह हों तो शकट योग, चतुर्थ दशम में सभी ग्रह हों तो विहग योग होता है। लग्न से त्रिकोण त्रिकोण ( १/५/९ ) में सब ग्रह हो तो हल और लग्न से त्रिकोण में सब ग्रह हो तो शृङ्गाटक होता है।

चक्र व समुद्र योग- जन्मकुण्डली में लग्न से आरम्भ कर १ राशि अन्तर करके ६ स्थानों में अर्थात् १, ३, ५, ७, ९, ११ में सब ग्रह हों तो चक्र योग तथा द्वितीय भाव से आरम्भ कर एक अन्तर करके ६ भावों में सब ग्रह हों अर्थात् २, ४, ६, ८, १०, १२ में सभी ग्रह हों तो समुद्र योग होता है, इस प्रकार ये २० आकृति योग यहाँ कहा है। अब आगे वृद्ध गर्गाचार्य का मत का आश्रय लेकर योगों को कहा जा रहा है-

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दूत, मैथुन से जीविका करने वाला, ढीठ, कलहप्रिय होता है। गदा योग फल ज्ञान- गदा योग में उत्पन्न जातक मान और धन चाहने वाला, यज्ञकर्ता, शास्त्र और सङ्गीत में निपुण, धन सुवर्ण रत्नादि सम्पत्ति से युक्त पुरुष होता है।

श्रृङ्गाटक योग फल ज्ञान- श्रृङ्गाटक योग में जातक कलहप्रिय, रणप्रिय, साहसी, सखी, राजा का प्रिय, सौभाग्यवान, रूपवान, धनाढ्य और स्त्री द्वेषी होता है।

हल योग फल ज्ञान- हल योग में उत्पन्न जातक बहुत खाने वाला, दरिद्र, खेती करने वाला, उद्विग्न, बन्धु और मित्र से त्यक्त, प्रेष्य (भृत्य) होता है।

चक्र योग फल ज्ञान- चक्र नामक योग में उत्पन्न मनुष्य समस्त राजाओं से वन्दित चरण वाला भूपेन्द्र होता है।

समुद्र योग फल ज्ञान- समुद्र योग में उत्पन्न व्यक्ति बहुत धन, रत्न, भोगों का प्रिय, स्थिरचित्त, सत्त्वगुण सम्पन्न राजा होता है।

यूप योग फल ज्ञान- यूपयोग में उत्पन्न जातक अपनी रक्षा में तत्पर, दानी, धन सुख से सम्पन्न, व्रत नियम और सत्य का पालक तथा विशिष्ट पुरुष होता है।

शर योग फल ज्ञान- शरयोग में उत्पन्न मनुष्य जातक शस्त्र बनाने, डाकुओं को पकड़ने, शिकार खेलने, धन में विहार करने में उन्मादयुत (पागल सदृश अर्थात् तल्लीन) होता है तथा हिंसक और नीच कर्म करने वाला होता है।

शक्ति योग फल ज्ञान- शक्ति योग में उत्पन्न जातक धनहीन विकल, दुःखी, आलसी, अल्पायु, संग्रामप्रिय, स्थिर और सुभग (रूपवान्) होता है।

दण्ड योग फल ज्ञान- दण्डयोग में उत्पन्न व्यक्ति स्त्री एवं पुत्र से हीन, निर्धन, सब लोगों से तिरस्कृत, अपने परिजन से बाहर, दुःखी और नीच होता है।

माला योग फल ज्ञान- माला योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति नित्य सुखी, वाहन, वस्त्र, धनभोग से युक्त, रूपवान् और पत्नी वाला होता है।

सर्प योग फल- सर्प योग में उत्पन्न जातक कुटिल, कूर, निर्धन, दुःख से पीड़ित, दीन, दूसरों के घर में खाकर जीने वाला होता है।

रज्जु योग फल- रज्जुयोग में जन्म लेने वाला मनुष्य भ्रमणशील, रूपवान्, परदेश से धन लाभ करने वाला, क्रूर तथा दुष्ट स्वभाव वाला होता है।

मुसल योग फल- मुसल योग में उत्पन्न जातक मान, धन, ज्ञान से युक्त, कार्य से आसक्त, राजा का प्रिय, विख्यात, स्थिरचित्त और वीर होता है।

नल योग फल- नल योग में न्यूनाधिक अङ्गों वाला, धन संग्रकारी,

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल

बलहीन, दुःखी, और मलिन शरीर वाला होता है। गुरु की दृष्टि हो तो बहुत धनी, दानी, राजमन्त्री, न्यायाधीश, और श्रेष्ठ पुरुष होता है। शुक्र की दृष्टि हो तो नीच स्त्री का पति, बहुत्त शत्रु और अल्प बन्धु वाला, दीन और कोढ़ी होता है। शनि की दृष्टि हो तो कष्ट युक्त शरीर, कार्य में उन्माद वाली, बुद्धिहीन और मूर्ख होता है।

वृष राशि पर स्थित सूर्य फल- सूर्य वृष राशि में स्थित हो तो जातक मुख और नेत्र रोग से पीड़ित, क्लेश सहन करने वाला, योग्य, व्यवहार पटु, मतिमान, वन्ध्या स्त्री का द्वेषी, भोजन, माला, गन्ध, वस्र से पूर्ण, गीत, वाद्य, नृत्य जानने वाला तथा जल से भय करने वाला होता है।

वृष एवं तुला में स्थित सूर्य पर ग्रहों की दृष्टि- वृष या तुला में स्थित सूर्य पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक वेश्यागामी, प्रियभाषी, बहुत क्रियों का पोषक तथा जल से जीविका करने वाला होता है। मंगल की दृष्टि हो तो वीर, संग्राम प्रिय, तेजस्वी, साहस से धन और यश पाने वाला और विकल होता है। बुध की दृष्टि हो तो चित्र, लेख काव्य, गाना आदि में निपुण और सुन्दर होता है।

गुरु की दृष्टि हो तो बहुत शत्रु और मित्रों वाला राजमन्त्री, सुन्दर नेत्र वाला, कान्तिमान तुष्ट राजा होता है। शुक्र की दृष्टि हो तो राजा या राजमन्त्री, स्त्री, धन और भोग से युक्त, बुद्धिमान और भीरु होता है। शनि की दृष्टि हो तो नीच, आलसी, दरिद्र, वृद्धा स्त्री से प्रेम करने वाला, कूर स्वभाव और रोगों से पीड़ित होता है।

मिथुन राशि में स्थित सूर्य फल- जन्मकाल में मिथुन में सूर्य हो तो जातक मेधावी, प्रिय वचन, वात्सल्य गुणों से युत, सदाचारी, विज्ञान और शास्त्र में निपुण, बहुत धनी, उदार हृदय, निपुण, ज्योतिष का जानकार, मध्यमरूप, दो माता वाला, सुन्दर और विनययुक्त होता है।

बुध राशिस्थ सूर्य पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में मिथुन या कन्या में स्थित सूर्य पर यदि चन्द्रमा की दृष्टि हो तो शत्रु और बन्धुओं से कष्ट, विदेशयात्रा से पीड़ित और बहुत विलाप करने वाला होता है। मंगल की दृष्टि हो तो शत्रु से भय, कलहप्रिय, रण में अपयश आदि से दुःखी, विख्यात, बन्धुयुक्त, शत्रुहीन और नेत्र रोगी होता है। गुरु की दृष्टि से बहुत शास्त्रों का ज्ञाता, राजदूत, विदेशगामी, उग्र, उन्मादी होता है।

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवेश फल

शुक्र की दृष्टि हो तो जातक कुष्ठादि दुष्ट रोग से पीड़ित, निर्दय एवं निर्लज्ज होता है।

यदि शनि की दृष्टि हो तो स्वकार्यनाशक, नपुंसक और दूसरों को कष्ट देने वाला होता है।

कन्या राशिस्थ सूर्य फल- यदि जन्म पत्रिका में कन्या राशि में सूर्य हो तो स्त्री समान देह वाला, लज्जायुक्त, लेखक दुबले, प्रियभाषी, मेधावी, अल्पबली, विद्वान्, देव और पितादि गुरुजनों की सेवा करने वाला, पैर दबाने आदि कार्यों में चतुर, वेद, गाने, बजाने में निपुण, कोमल और दीनवचन बोलने वाला होता है।

तुला राशिस्थ सूर्य फल- जन्माक्ष में यदि तुल में सूर्य हो तो भद्र (पराजय) क्षय (हाने) और व्यय (खर्च) से पीड़ित, विदेश और मार्ग में रहने वाला, दुष्ट, नीच, प्रीतिहीन, सुवर्ण लोहादि से जीविका करने वाला, द्वेषी, दूसरों का काम करने वला, परस्त्रीगामी, मलिन, राजा से तिरस्कृत एवं ढीठ होता है।

वृश्चिक राशिस्थ सूर्य फल- जन्म कुण्डली में वृश्चिक राशि में सूर्य हो तो जातक लड़ाई झगड़े में रोकने पर भी नहीं रुकने वाला, वैदिक धर्म में तत्पर, मिथ्याभाषी, मूरख, स्त्रीहीन या रुष्टा स्त्री वाला, खल, दुःशीला स्त्री की आज्ञा में रहने वाला, क्रोधी, दुष्ट आचरण वाला, लोभी, कलहप्रिय, मिथ्याभाषी, शस्त्र, अग्नि या विष से पीड़ित और माता पिता का शत्रु होता है।

धनुराशिस्थ सूर्य फल- जन्माक्ष में धनु राशि में सूर्य हो तो धन युक्त, राजप्रिय, पण्डित, देवब्राह्मण का भक्त, शस्त्र अस्त्र और हाथी की शिक्षा में निपुण, व्यपहारयोग्यक्त, सज्जनों में आदृत, शान्त, धनवान, विशाल मोटा और सुन्दर शरीर वाला, बन्धुओं का हित करने वाला और बलवान होता है।

गुरु राशिस्थ ग्रहदृष्ट सूर्य फल- यदि जन्माक्ष में धनु या मीन राशिस्थ सूर्य पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक वाक्य बुद्ध, वैभव, पुत्र से युक्त, राजतुल्य, शोकहीन, सुन्दर शरीर वाला होता है।

मंगल की दृष्टि से संग्राम में विजय प्राप्त करने वाला, स्पष्टवक्ता, धन सुख से संयुक्त और धातुओं का ज्ञाता और लोकप्रिय होता है।

गुरु की दृष्टि से राजा का सम्बन्धी वा राजा, हाथी, घोड़ा, धन से सम्पन्न और विद्वान होता है।

शुक्र की दृष्टि से दिव्य स्त्री, गन्धादि भोग से युक्त शान्त होता है।

शनि की दृष्टि से अपवित्र, परान्न भोजी, नीचसेवी और पशुपालक होता है।

मकर राशिस्थ सूर्य फल- जन्मकुण्डली में मकर राशि में सूर्य हो तो जातक लोभी, दुःशीला स्त्री और कुकर्म में रत, तृष्णा करने वाला, बहुत

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कार्य में लीन, डरपोक, बन्धुहीन, चञ्चल प्रकृति वाला, भ्रमणशील, अल्प बली तथा आत्मीयजनों के विक्षोभ से सर्वनाश करने वाला होता है। शनि राशिस्थ ग्रह दृष्ट सूर्य फल- जन्माङ्ग में मकर या कुम्भरस्थित सूर्य पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो माया में निपुण, चञ्चल बुद्धि, स्त्री के संग से धन सुख नष्ट करने वाला होता है। मंगल की दृष्टि हो तो रोग और शत्रु से नायुसक सदृश स्वभाव वाला, दूसरे का धन चुराने वाला और सारहीन देहधारी होता है। गुरु की दृष्टि से पुण्य कार्य करने वाला, बुद्धिमान्, सबका आश्रय, सुविख्यात, यश और मनस्वी होता है। शुक्र की दृष्टि से शंख, मूँगा और मणि का व्यापारी, वेश्या और स्त्री द्वारा धन लाभकारी और सुखी होता है। शनि की दृष्टि से शत्रु को जीतने वाला, राजा के सम्मान से बर्धित आश्वासन वाला होता है। कुम्भ राशिस्थ सूर्य फल- जन्माङ्ग में कुम्भ राशि में सूर्य हो तो हृदय रोगी, बहुत बल और जन्तु वाला, सज्जनों से निन्दित, अति क्रोधी, परस्त्रीगामी, कार्यों में निपुण दुःखी, अल्पधन वाला, धूर्त, चंचल मैत्री वाला, मलिन, चुगला, अनुचित प्रलाप करने वाला अर्थात् असत् वक्ता होता है। मीन राशिस्थ सूर्य फल- जन्माङ्ग में मीन राशि में सूर्य हो तो बहुत मित्र वाला, स्त्री के प्रेम से सुखी, पण्डित, शत्रुओं को जीतने वाला, जन और यश से जय पाने वाला, अच्छे पुत्र और नौकरों से सुखी, जल के व्यापार से धनी, प्रिय और मिथ्या बोलने वाला, गुप्त रोगी और बहुत सहोदर वाला होता है।

चन्द्र का राशि व दृष्टिवश फल

मेष राशि में स्थित चन्द्र फल- यदि जन्मकाल में मेष राशि में चन्द्रम हो तो जातक सुवर्ण समान गौर देह, स्थिर धनी, सहोदरहीन, साहसी, मान और कल्याण युत, कामी, दुर्बल घुटने वाला, खराब नख, थोड़े केश वाला, चञ्चल, मान को ही धन समझने वाला, कमल सदृश हाथ पैर वाला, अधिक पुत्र और परिजन वाला, गोल नेत्र वाला, स्नेह पूर्ण, जल से भीत, व्रण से अड़ित मस्तक और स्त्री से पराजित होता है। मेष राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में यदि मेष राशिस्थ चन्द्र पर रवि की दृष्टि से क्रोधी राजा किन्तु विनम्रजनों के प्रति अति मृदु, धीर, संग्रामप्रिय होता है। मङ्गल की दृष्टि से दाँत और आँख के रोग से पीड़ित, विष, अग्नि, शस्त्र से विकृत देह, जिलाधीश और मूत्रकृच्छू रोग युक्त होता है।

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल

बुध की दृष्टि से अनेक विद्या का आचार्य, सत्यवक्ता, मनस्वी, सुकवि और यशस्वी होता है।

गुरु की दृष्टि से बहुत नौकर और धन से युक्त, राजमन्त्री वा सेनापति होता है।

शुक्र की दृष्टि से सौभाग्य, पुत्र और धन से युक्त, सुन्दरी स्त्री और भूषण सहित और भागशाली अर्थात् असत् वक्ता पुरुष होता है।

शनि की दृष्टि से द्वेषी, दुखी, दरिद्र, मलिन और मिथ्याभाषी होता है।

वृष राशि में चन्द्र फल- जन्मकाल में वृष में चन्द्रमा हो तो जातक विशाल वक्षस्थल, महादानी, सघन और घुँघराले बाल वाला, कामी, यशस्वी, मनोहर कन्या सन्तान वाला, बैल सदृश नेत्र वाला, हंस सदृश सदसदविवेकी, मध्य और अन्तवयस में सुख भागी, स्थूल कटि, पैर कन्धा, घुटना मुख और जाँघ वाला, पाँजर मुख, पीठ और कन्धे पर चिह्न वाला, सुन्दर गति ( चाल ) वाला और क्षमावान होता है।

वृष राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में वृष स्थित चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि हो तो खेती आदि अनेक कार्य करने वाला, नौकर और चतुष्पद से लाभ करने वाला, धनाढ्य और प्रयोग जानने वाला होता है।

मङ्गल की दृष्टि से अति कामी, परस्त्री के कारण पत्नी मित्रजनों से हीन, क्रियों का मन हरण करने वाला और माता का अशुभ होता है।

बुध की दृष्टि से पण्डित, वक्ता, प्रसन्न, सबका हित, उत्कृष्ट गुणों से युक्त होता है।

गुरु की दृष्टि से स्थिर पुत्र, स्त्री, मित्र वाला, माता-पिता का भक्त, परम निपुण, धर्मात्मा और प्रविख्यात होता है।

शुक्र की दृष्टि से भूषण, सवारी, गृह, शय्या, आसन, सुगन्ध वस्त्र माला का उपभोग करने वाला होता है।

शनि की दृष्टि हो तो धनहीन, माता और क्रियों का अनिष्टकारक, पुत्र-बन्धु, मित्र से युक्त होता है।

वृषस्थ चन्द्र के पूर्वार्ध व पार्ध फल- जन्मकाल में वृष राशि के पूर्वार्ध में चन्द्रमा हो तो जातक मातृहीन तथा उत्तरार्ध में हो तो पितृहीन पितृवियोग सूचक होता है।

मिथुन राशिस्थ चन्द्र फल- जन्म के समय मिथुन राशि में चन्द्रमा हो तो जातक ऊँची नाक वाला, कृष्णनेत्र, सुरत विधि और कला काव्य को जानने वाला, सुख भोग करने वाला, हाथ में मत्स्यरेखा वाला, विषय सुख में लीन, बुद्धिमान्, नरों से युक्त, सुन्दर, सौभाग्यवान्, हास्यप्रिय, मृदुभाषी, स्त्री के वश, लम्बा शरीर, नपुंसकों से मैत्री करने वाला और दो माताओं से पालित होता है।

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मिथुन राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में मिथुन राशि स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्य की दृष्टि हो तो बुद्धि रूप धन वाला, प्रसिद्ध, रूपवान्, धर्मात्मा, दुखी और अल्प धन वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि से, वीर, पण्डित, सुख, वाहन, ऐश्वर्य और रूप से युक्त होता है। बुध की दृष्टि से धनोपार्जन में निपुण, सदा विजयी, धीर अखण्डित आज्ञा वाला राजा होता है। गुरु की दृष्टि से शास्त्रविद्या का आचार्य, प्रसिद्ध, सत्यवक्ता, अति रूपवान्, मान्य, वाचाल होता है। शुक्र की दृष्टि हो तो सुन्दर स्त्री, माला एवं वस्त्रों वाला, श्रेष्ठ वाहन, भूषण, रत्नों का भोग करने वाला होता है। शनि की दृष्टि से बन्धु स्त्री और धन से रहित लोगों का द्वेषी होता है।

कर्क राशिस्थ चन्द्र- जन्मकाल में यदि कर्क राशि में स्थित चन्द्रमा हो तो जातक सौभाग्य, धैर्य, गृह, मित्र, पर्यटन, ज्योतिष विद्या का ज्ञान रखने वाला, शील से युक्त, कामी, कृतज्ञ, राजमन्त्री, सत्यवादी, परदेशवासी, उन्मादयुक्त, अधिक केश वाला, जल और पुष्प का प्रेमी, हास और वृद्धि युत, मकान, बगीचा वापी आदि बनाने में तत्पर और स्थूल कण्ठ वाला होता है।

कर्क राशिस्थ ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में कर्कस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से जातक राजा का छोटा कर्मचारी निर्धन, पत्रवाहक अथवा दुर्ग का रक्षक होता है। कर्क राशि पर चन्द्रमा मंगल से दृष्ट हो तो व्यक्ति वीर हतदेह, माता के लिये अनर्थकारी होता है। कर्क राशि पर चन्द्रमा बुध से दृष्ट हो तो वह व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला, नीतिज्ञ, धन-स्त्री व पुत्र से युत, राजमन्त्री, और सुखी होता है। यदि कर्क राशि पर चन्द्रमा गुरु से दृष्ट हो तो जातक राजकीय गुणों से युत राजा, सुखी, सुन्दर स्त्री का पति, नीति और पराक्रम से युत होता है। कर्क राशि में स्थित चन्द्र शुक्र से दृष्ट हो तो जातक धन सुवर्ण, वस्त्र स्त्री रत्नों का पात्र और वेश्या स्त्री का नायक और सुन्दर होता है। कर्कस्थ चन्द्रमा शनि से दृष्ट हो तो जातक भ्रमणशील सुख से रहित, दुरिद्र, माता को कष्ट देने वाला, असत् वक्ता, पापी और दुष्ट होता है।

सिंह राशिस्थ चन्द्र- जन्मकाल में सिंह राशि में चन्द्रमा हो तो वह व्यक्ति मोटी हड्डी वाला, अल्प रोम स्थूल मुख और गर्दन छोटी और पिङ्गल वर्ण आँख, स्त्री से द्वेष करने वाला, भूख, प्यास, उदर और दाँत के रोग से पीड़ित, मांसभक्षी, दाता, तीखे स्वभाव, अल्प पुत्र, वन और पर्वत में

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७९० ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल प्रेम करने वाला, माता का भक्त, विशाल वक्षस्थल, पराक्रमी, कार्य में तत्पर और सर्वत्र गहन दृष्टि वाला होता है। सिंह राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- यदि जन्मकाल में सिंह राशि पर चन्द्र सूर्य से दृष्ट हो तो जातक राजा से शत्रुता, करने वाला, पुत्रहीन राजा, उत्तम गुणों से युत महान् वीर, उच्चशब्द वाला, घोर पाप में लीन तथा प्रख्यात होता है। यदि सिंह राशिस्थ चन्द्र, बुध से दृष्ट हो तो जातक स्त्री के वश में, स्त्रीप्रिय, स्त्री से बली, युवतियों का सेवक धन भोग युक्त पुरुष होता है। यदि सिंहस्थ चन्द्र गुरु से दृष्ट हो तो जातक विख्यात कुलोत्पन्न, ज्ञानी, गुणों से युत राजा के तुल्य होता है। यदि सिंहस्थ चन्द्र पर शुक्र दृष्टि हो तो स्त्रीधन से युक्त रोगी, स्त्री का नौकर, रति क्रिया का ज्ञाता और पण्डित होता है। यदि सिंहस्थ चन्द्र, शनि से दृष्ट हो तो जातक खेती करने वाला, धनरहित झूठ बोलने वाला, दुर्गरक्षक, स्त्री सुख से हीन, शूद्र होता है। कन्या राशिस्थ चन्द्र- जन्म समय कन्या राशि में चन्द्रमा हो तो जातक स्त्री में आसक्त, दीर्घबाहु, सुन्दर मुख, दाँत, आँख और कान वाला, विद्वान्, वेदशास्त्राध्यापक, प्रियवक्ता, सत्य और शौच से युक्त, धीर, प्राणियों में दया रखने वाला, परदेश में रत, क्षमा और सौभाग्य वाला, अधिक कन्या और थोड़े पुत्र वाला होता है।

कन्या राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्म समय में कन्या राशिस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से राजा का कोषाध्यक्ष, विख्यात, वचन का पालन और उत्तम कार्य करने वाला तथा क्रोधहीन होता है। मङ्गल की दृष्टि हो तो शिल्प कला में निपुण, विख्यात, धनी, शिक्षित, धीर, माता का अहित करने वाला होता है। बुध की दृष्टि से ज्योतिष और काव्य का ज्ञाता, विवाद और युद्ध में विजयी, और अति निपुण होता है। गुरु की दृष्टि से बन्धुजनों से युक्त, सुखी, राजकर्मचारी, वचन का पालक, धनी होता है। शुक्र की दृष्टि से बहुत स्त्री, अनेक प्रकार के भूषण, भोग और धन से युक्त, और नित्य भाग्योदय से युक्त होता है। शनि की दृष्टि हो तो स्मरण शक्ति रहित, दरिद्र, सुखहीन, मातृहीन, स्त्री के भाग्य से धनी होता है। तुला राशिस्थ चन्द्र- जन्मकाल में तुला राशि में चन्द्रमा हो तो ऊँची नाक वाला, विशाल नेत्र, कृश शरीर, बहुत स्त्री और बहुत बैल वाला, गाय और भूमि से धन बल प्राप्त करने वाला, वृष समान अण्डकोश वाला,

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पराक्रमी, कार्य कुशल, देव ब्राह्मण का भक्त, बहुत ऐश्वर्य से युक्त, स्त्री का वश, अन्न संग्रह करने वाला और बन्धुओं का उपकार करने वाला होता है। तुला राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में तुला राशिस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से जातक निर्धन, रोगी, भ्रमणशील, अपमानित, भोगहीन, पुत्रहीन और निर्बल होता है।

मंगल की दृष्टि से तीक्ष्ण स्वभाव वाला, चोर, उग्र, परस्त्रीगामी, सुगन्धभोगी, बुद्धिमान और नेत्र रोग से युक्त होता है। बुध की दृष्टि से कलाओं में निपुण, अति धनवान, प्रियवक्ता, विद्वान, देश में विख्यात होता है। गुरु की दृष्टि से सर्वत्र पूज्य रत्न आदि के क्रय विक्रय में निपुण होता है।

शुक्र की दृष्टि हो तो सुन्दर, नीरोग, सौभाग्यवान, पुष्ट शरीर वाला, धनी, पण्डित, अनेक उपायों को जानने वाला होता है। शनि की दृष्टि से धनी, प्रियभाषी, वाहन से चलने वाला, विषय का प्रेमी, सुखहीन और माता का हित करने वाला होता है।

वृश्चिक राशिस्थ चन्द्र फल- जन्मकाल में वृश्चिक में चन्द्रमा हो तो जातक लोभी, गोलजङ्घा, कठोर देह वाला, नास्तिक, कूर, चोर, बाल्यावस्था में रोगी, दाढ़ी और नाखून में आघात, सुन्दर नेत्र, सम्पत्तिवान, कार्यों में उद्यत और परस्त्रीगामी, बन्धुहीन, उन्मत्त, प्रतापी, राजा द्वारा नष्टधन धन, लम्बा पेट और स्थूल मस्तक से युत होता है।

वृश्चिक राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में वृश्चिक राशि पर विद्यमान होने पर चन्द्र पर रवि की दृष्टि से दृष्ट हो तो लोगों का द्वेषी, विद्वान, भ्रमणशील, धनवान किन्तु सुख से हीन पुरुष होता है। मंगल की दृष्टि से अति धैर्यवान, राजतुल्य, ऐश्वर्ययुक्त, शूर, रण में विजयी, अधिक भोजन करने वाला होता है।

बुध की दृष्टि से चतुरता से रहित, कटुभाषी, यमल ( जुड़वा ) सन्तान वाला, योग्य, नकली वस्तु बनाने वाला और संगीत विद्या का ज्ञाता होता है। गुरु की दृष्टि से कार्य में तत्पर, लोगों का द्वेषी, धन, सवारी भोग से युक्त, स्त्री द्वारा नष्ट बल होता है।

शनि की दृष्टि से अधम सन्तान वाला, कृपण, रोगी, निर्धन, मिथ्याभाषी, अधम अर्थात् नीच कार्यकर्त्ता होता है।

धनु राशिस्थ चन्द्र फल- जन्म समय धनु राशि में चन्द्रमा हो तो जातक कुबड़ा, गोलनेत्र, ऊँची छाती, मोटी कटि और मोटे बाहु वाला, वक्ता, लम्बे कन्धे और कण्ठ वाला, जल के किनारे निवास करने वाला, शिल्पज्ञ, गूढ़ विषय का ज्ञाता, शूर, प्रसन्न, मजबूत हड्डी वाला, बहुत बली, मोटा गर्दन, ओठ और नाक वाला, बन्धु का प्रेमी, कृतज्ञ, प्रगल्भ और मिले हुए पैर

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल

धनु राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकालावधि धनु राशिस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से राजा, धनी, वीर, विख्यात, अद्वितीय सुखी और उत्तम सवारी वाला होता है।

मङ्गल की दृष्टि से सेना अध्यक्ष, धनाढ्य, सुन्दर, प्रविख्यात, पराक्रमी और उत्तम नौकर वाला होता है।

बुध की दृष्टि से बहुत नौकर वाला, मजबूत त्वचा वाला, ज्योतिष, शिल्प आदि में चतुर, और नृत्यविद्या का अध्यक्ष होता है।

गुरु की दृष्टि से सुन्दर शरीर, राज मन्त्री, धन, कर्म और सुख से सम्पन्न होता है।

शुक्र की दृष्टि से सुखी, सुन्दर, सौभाग्यवान, पुत्रवान, धनी, कामी, उत्तम मित्र और सुन्दर स्त्री वाला होता है।

शनि की दृष्टि से प्रिय और सत्यवक्ता, बहुत विषय का वेत्ता, सरल स्वभाव और राजपुरुष होता है।

मकर राशिस्थ चन्द्र फल- जन्मकाल के समय मकर में चन्द्र हो तो जातक गीतज्ञ, ठण्डा से डरने वाला, स्थूल मस्तक वाला, सत्य और धर्म का सेवक उत्तम, विख्यात, अल्प क्रोध, कामी, निर्दय, निर्लज्ज, सुन्दर नेत्र, कृष देह, गुरु-पत्नीगामी, सुकवि, गोल जङ्घा वाला, अल्पोत्साही, उत्साही, अत्यन्त लोभी, लम्बे कण्ठ और कान वाला होता है।

कुम्भ राशिस्थ चन्द्र फल- यदि जन्म के समय मकरस्थ चन्द्रमा सूर्य से दृष्ट हो तो वह जातक धनहीन दु:खी, भ्रमण करने वाला, पर उपकाररत, मलिन और चित्रकारी करने वाला होता है।

यदि मकर राशि में विद्यमान चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो तो वह व्यक्ति अत्यन्त धनी और उदार भाग्यशाली, धनी, वाहन सुख सम्पन्न और प्रतापी होता है।

यदि मकरस्थ चन्द्रमा पर बुध की दृष्टि हो तो व्यक्ति मूर्ख, विदेश में रहने वाला, विधुर अस्थिर, उग्र, सुख में आसक्त, और निर्धन होता है।

यदि मकरस्थ चन्द्र गुरु से देखा जाता हो तो जातक राजा, अत्यन्त वीर, राजकीय गुण सम्पन्न, बहु स्त्री पुत्र और मित्रों वाला होता है।

यदि मकरस्थ चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो तो जातक श्रेष्ठ, परस्त्री, धन अलंकार, वाहन-माला से युत, क्रोधी और पुत्रहीन होता है।

यदि मकरस्थ चन्द्र पर शनि की दृष्टि हो तो जातक आलसी, मलीन, धनी, कर्ण दोष से पीड़ित परस्त्री में लीन, झूठ बोलने वाला होता है।

कुम्भराशिस्थ चन्द्र फल- यदि जन्म काल में कुम्भ राशि में चन्द्रमा हो तो ऊँची नाक सुश्क देह, मोटा हाथ पैर वाला, शराबी सुन्दर, द्रोही, धर्म से

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रहित, दूसरे के पुत्र उत्पन्न कर्त्ता, विशाल मस्तक, बुरेनेत्र वाला, मूर्ख, आलसी विशालमुख वाला, शिल्पज्ञ, दुष्ट स्वभाव वाला, दुःखी और दरिद्र होता है।

कुम्भ राशिस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में कुम्भस्थ चन्द्रमा पर- रवि की दृष्टि हो तो जातक अतिमलिन, शूर, राजा के सदृश, धर्मात्मा और खेती करने वाला होता है।

मङ्गल की दृष्टि से सत्यवक्ता, मातापिता और धन से रहित, आलसी, विपरीत स्वभाव वाला, दूसरे के कार्य करने वाला होता है।

बुध की दृष्टि से भोजन विधि में निपुण, गीतज्ञ, स्त्रियों का प्रिय, थोड़े धन और थोड़े सुख वाला होता है।

गुरु की दृष्टि से गाँव, खेती, उपवन, उत्तम स्त्री का भोग करने वाला श्रेष्ठ पुरुष होता है।

कुम्भराशिस्थ चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि से नीच, पुत्र और मित्र से हीन, डरपोक, गुरुजनों से तिरस्कृत, पापी, दुष्ट स्त्री का पति और अल्पसुखी होता है।

शनि की दृष्टि से बड़े बड़े नख और रोमधारी मलिन, परस्त्रीगामी, शठ, अधर्मी, अचार ( वृक्षादि ) वस्तु से धनवान होता है।

मीन राशिस्थ चन्द्र फल- जन्मकालावधि यतिः मीन राशि में चन्द्रमा हो तो जातक शिल्प विद्या में कुशल, शत्रु को जीतने में निपुण, शास्त्रज्ञ, सुन्दर देह, गीतज्ञ, धर्मात्मा, बहुत स्त्री वाला, मृदुभाषी, राजा का सेवक, अल्पकोष ( खजाना ) वाला, विशाल मस्तक, धनवान, सुखी, स्त्री का वश, सुशील, समुद्रयात्रा करने वाला और दान देने वाला होता है।

मीन राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में मीनस्थ चन्द्रमा पर- रवि की दृष्टि हो तो जातक अत्यन्त कामी, सुखी, सेनापति, धनाढ्य, और प्रसन्न स्त्री वाला होता है।

मङ्गल की दृष्टि से लोक में अपमानित, सुखहीन, कुलटा का पुत्र, पापी, और वीर होता है।

बुध की दृष्टि से राजा, अति सुखी, श्रेष्ठ स्त्रियों से युत और वश में होता है।

गुरु की दृष्टि से मनोहर, मण्डलेशों में श्रेष्ठ, अत्यन्त धनी, सुकुमार और बहुत स्त्रियों से युत होता है।

शुक्र की दृष्टि से सुशील, रतिक्रिया में निपुण, नाचगान में रत, स्त्रियों के मन को हरने वाला होता है।

शनि की दृष्टि से जातक विकल, माता का शत्रु, कामी, पुत्र स्त्री और बुद्धि से हीन, अधम और कुरुपा स्त्री में आसक्त होता है।

कहे गए फलों का निर्णय- यदि जन्मराशि का स्वामी और राशि तथा

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल

चन्द्रमा ये तीनों बलवान् हों तो ऊपर कहे हुए सब फल पूर्णरूप से प्राप्त होते हैं|

अर्थात् उच्च नीचादि में स्थिति के अनुसार फल में न्यूनाधिक्य तारतम्य से विचार कर फलादेश करना चाहिये|

भौम राशि नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में चन्द्रमा मेष या वृश्चिक राशि के नवांश में स्थित हो तो और मंगल से दृष्ट हो तो जातक शत्रु जेताऔर उग्र होता है|

यदि शनि की दृष्टि हो तो मायावी और ठग होता है| यदि सूर्य से दृष्ट हो तो चोर, हिंसक, रक्षा करने वाला वीर होता है| यदि गुरु से दृष्ट हो तो राजा, विख्यात पण्डितों द्वारा पूज्य होता है| यदि शुक्र से दृष्ट हो तो राजा का मंत्री, धनाढ्य और स्त्री के श्रृंगार करने में लीन होता है| यदि बुध से दृष्ट हो तो वह जातक शौघ वक्ता और अस्थिर होता है|

शुक्र नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में शुक्र नवांश स्थित चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि से स्त्री, वस्त्र, अन्न, पान और धन से सुखी होता है| बुध की दृष्टि से वाद्य, नृत्य और संगीत जानने वाला होता है| गुरु की दृष्टि से सुकवि, नीति शास्त्रज्ञ और राजमन्त्री होता है| मङ्गल की दृष्टि से परस्त्रीगामी, कामी और बहुत नौकर वाला होता है| सूर्य की दृष्टि से परम मूर्ख, प्रियभाषी, सतत् खाने पीने को इच्छुक होता है| शनि की दृष्टि से वर्धकी ( लकड़ी चीरने वाला बढ़ई ) के गुणों से सम्पन्न होता है|

बुध नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- बुधनवांशस्थ चन्द्र पर बुध की दृष्टि से जातक शिल्पज्ञ और कवि होता है| शुक्र की दृष्टि से विशाल देह, संगीतज्ञ, वचनपारिक होता है| गुरु की दृष्टि से राजमन्त्री, गुणी प्रतिष्ठित और मनोहर होता है| मङ्गल की दृष्टि से चोर, विवादि, भयानक होता है| शनि की दृष्टि हो तो शास्त्रज्ञ, कवि, बुद्धिमान्, शिल्पज्ञ होता है| रवि की दृष्टि से संग्राम में विजेता और सुप्रख्यात होता है|

कर्क राशि नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- निज ( कर्क ) नवांशस्थ चन्द्रमा पर सूर्य की दृष्टि से कृश देह किन्तु नीरोग शरीर वाला होता है| मङ्गल की दृष्टि से दूसरों के धन लेने में चतुर, अति लोभी होता है| शनि की दृष्टि से कुकर्मी, वध बन्धन विवाद से दुखी होता है| शुक्र की दृष्टि से स्त्री का शत्रु, नग्नक समागम होता है| गुरु की दृष्टि से राजमन्त्री या राजा होता है| बुध की दृष्टि से पापासक्त, बहुत सोने वाला भ्रमणशील होता है|

सिंह राशि नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में सिंहनवांशस्थ चन्द्र पर सूर्य की दृष्टि से जातक क्रोधी, यशस्वी, धनी होता है| शनि की दृष्टि से पापी, निर्दय, हिंसक होता है| मङ्गल की दृष्टि से सुवर्ण से धनी, विख्यात, राजा से आदृत, प्रतापी होता है| गुरु की दृष्टि से सेनापति वा राजा

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल

परदेशगमन प्रिय, धर्मात्मा बुद्धिमान, पुत्र और मित्रों का शुभचिन्तक और अनेक कार्य में तत्पर रहता है।

कर्क राशि में स्थित भौम फल- जन्माझ में कर्क राशि में मङ्गल हो तो जातक दूसरी के घर में रहने वाला, रोग से पीड़ित, खेती से धनवान, बाल्यावस्था में उत्तम भोजन और वस्न चाहने वाला, सदा दूसरे का भोजन करने वाला, जलाशय से धनी, बार बार वेदना से पीड़ित, सरल स्वभाव वाला और दीन होता है।

सिंहस्थ भौम फल- जन्माझ में सिंह राशि में भौम हो तो असहनशील, प्रतापी, वीर, पराये धन और सन्तान को अपनाने वाला, जंगल में रहने वाला, गाय की सेवा और मांस खाने का प्रिय, प्रथम पत्नी से हीन, सर्प और मृग को मारने वाला, पुत्र और सुख से हीन, सदा कार्य में तत्पर रहता है।

कन्या राशिस्थ भौम फल- जन्माझ में कन्या राशि में मङ्गल हो तो साधुओं में पूज्य, अपतिधनी, सुन्दर स्त्री और सङ्गीत प्रिय, कोमल और पियवक्ता, बहुत खर्ची और थोड़े पराक्रम वाला, विद्वान तथा दृढ़ पार्श वाला, शत्रुओं से अधिक डरने वाला, श्रुति स्मृतिधर्म को मानने वाला, शिल्पज्ञ, स्वच्छ रहने,और चन्दन पाउडर लगाने में तत्पर होता है।

तुला राशिस्थ भौम फल- जन्माझ में तुला राशि में मङ्गल हो तो भ्रमणशील, दूषित व्यापार में आसक्त, वक्ता, सुन्दर, किसी अङ्ग से हीन, अल्प परिवार वाला, युद्धप्रिय, दूसरे के भाग्य से जीने वाला, स्त्री, गुरुजन और मित्रों का प्रिय, प्रथम स्त्री से रहित, मद्य विक्रेता के और वेश्या के सम्पर्क से उपार्जित धन को नाश करने वाला होता है।

वृश्चिक राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माझ में वृश्चिक में मङ्गल हो तो जातक व्यापारवार्ता में आसक्त, चोरों का स्वामी, कार्यों में कुशल, युद्धप्रिय, अत्यन्तपापी, अपराधी, शत्रुओं के प्रति धूर्त, द्रोह और हिंसा में कुबुद्धि वाला, चुगलखोर, भूमि का मालिक, पुत्रवान स्त्री का प्रिय तथा विष, अग्नि, शस्त्र व्रण से पीड़ित होता है।

धनु राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माझ में धनु राशि में मङ्गल हो तो बहुत आघात से दुर्बल देह वाला, कटु भाषी, शठ, पराधीन, रथ, गज पर और पैदल युद्ध करने वाला, रथ पर से शर चलाने वाला, बहुत परिश्रम से सुखी क्रोध से धन सुख को नष्ट करने वाला, गुरुजनों का अभक्त होता है।

मकर राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माझ में अपने उच्च ( मकर ) में मङ्गल हो तो धन्यवाद का पात्र, धन सञ्चय करने वाला, सुख भोग से युक्त, स्वस्थ, श्रेष्ठबुद्धि, विख्यात, राजा वा सेनापति, सुशीला स्त्री का पति, युद्ध में विजयी, अपने देश में रहने वाला, स्वतन्त्र, लोगों का रक्षक, सुशील और बहुत उपचारों में लीन होता है।

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शनि की दृष्टि से वृद्ध समान आकृति, निर्धन, परगृह निवासकर्त्ता तथा दुखी होता है।

गुरु राशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में गुरु राशिस्थ मङ्गल पर रवि की दृष्टि से लोक में पूज्य, सुन्दर, वन पर्वतदुर्ग में निवास करने वाला और धनी होता है।

धनेश की दृष्टि से विकल, कलहप्रिय, पण्डित, राज्य का विरोधी पुरुष होता है।

बुध की दृष्टि से मेधावी, कार्य कुशल, शिल्पज्ञ और विद्वान् होता है।

गुरु की दृष्टि से स्त्री और सुख से हीन, शत्रुओं से अजेय, धनी, व्यायाम (कसरत) करने वाला होता है।

शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों का प्रिय, चित्रज्ञ, आभूषण भागी, उदार, विषय सुखभोगी सुन्दर होता है।

शनि की दृष्टि से कुरूप शरीर, संग्रामप्रिय, पापी, भ्रमणशील, सुखहीन, परम धर्मरत होता है।

शनि राशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में शनि राशि (मकर कुम्भ) स्थित मंगल पर रवि की दृष्टि हो तो कृष्णवर्ण देह, शूर, बहुत स्त्री, पुत्र और धन से युक्त, अत्यन्त तेज स्वभाव वाला होता है।

शनि राशिस्थ मंगल पर चन्द्रमा की दृष्टि से चञ्चल, माता का शत्रु, आभूषणभागी, उदार, चल मैत्री वाला, धनवान होता है।

बुध की दृष्टि से मन्दगामी निर्धन, कार्यों में असफल, निर्बल, कपटी, अधर्मी होता है।

शनि राशिस्थ मंगल पर गुरु की दृष्टि से सुन्दर, राजा के गुणों से युक्त होता है।

शनि राशिस्थ मंगल पर शुक्र की दृष्टि से विविध भोग का भोगी, धनाढ्य, स्त्रियों का पोषक, कलहप्रिय होता है।

शनि की दृष्टि से राजा, बहुत धनी, स्त्री का द्रेष्क, बहुत प्रजा वाला, पण्डित किन्तु सुखहीन और युद्ध में पराक्रम दिखाने वाला होता है।

बुध का राशि व दृष्टिवश फल

मेष राशिस्थ बुध फल- जन्मकल में मेष में बुध हो तो ज्ञातक संग्रामप्रिय, विज्ञ, आचार्य, धूर्त, कुशदेह, गान और नाच में रत, मिथ्याभाषी, सुन्दरियों का प्रिय, लेखक, नकली वस्तु बनाने वाला, बहुत भोजनकर्ता, श्रम से उपार्जित धन को नष्ट करने वाला, कर्ज करने वाला और कारागार के दुःखभोगी, चञ्चल और स्थिर दोनों स्वभाव से युत हैं।

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वृष राशिस्थ बुध फल- जन्म के समय वृष में बुध हो तो जातक चतुर, ढीठ, दानी, विख्यात, वेद शास्त्र के अर्थ ज्ञाता, व्यायाम, वस्त्र, भूषण का प्रेमी, स्थिर, स्वभाव वाला उत्तम स्त्री, धन से युक्त, मधुर और कोमल वचन, वचनपालक, संगीत हस्य, और सौन्दर्य का प्रेमी होता है।

मिथुन राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में मिथुन राशिस्थ बुध हो तो उत्पन्न जातक सुन्दर वेषधारी, प्रियवक्ता, विख्यात, धनी, प्रवक्ता, मानी, सुखत्यागी, अल्परति वाला, दो स्त्रियों का पति, विवादी, वेद शास्त्र कला को जानने वाला, कवि, स्वतन्त्र, दानी, कर्मठ, बहुपुत्र और मित्रों वाला होता है।

कर्क राशि में स्थित बुध फल- जन्म के समय कर्क में बुध हो तो जातक, पण्डित, परदेशवासी, स्त्री, और सड़तीालत में आसक्त, चञ्चल, व्यर्थ बात करने वाला, अपने बन्धुओं का द्वेषी, स्त्री से शत्रुता कर धन को नष्ट करने वाला, दु:शील, बहुत कार्य में लीन, कवि, और अपने कुल की कीर्ति से प्रसिद्ध होता है।

सिंहस्थ बुध फल- जन्मकाल में सिंह राशि में बुध हो तो उत्पन्न जातक ज्ञान और कला से रहित, लोक में प्रख्यात असत्यभाषी, अल्प स्मरणशक्ति वाला, धनी, बलहीन, सहोदरों का द्वेषी, स्त्री सुखहीन, स्वतन्त्र, दुष्कर्मी, सेवक, सन्तानहीन, अपने कुल से विरुद्ध और दूसरों का मित्र होता है।

कन्या राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में कन्या में बुध हो तो धर्मात्मा, प्रवक्ता, चतुर, लेख और काव्य का ज्ञाता, विज्ञान और शिल्प विद्या में रत, स्त्रियों का प्रिय, अल्प बली, श्रेष्ठ साधुओं में पूज्य, मानी, विनय उपचार और विवाद में तल्लीन, अपने गुणों से प्रसिद्ध उदार और बलवान् होता है।

तुला राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में जन्म समय में बुध हो तो शिल्पज्ञ, विवादरत, वाक्पटु, धन को इच्छानुसार खर्च करने वाला, अनेक देशों में व्यापार करने वाला, विप्र, अतिथि, देव गुरु का भक्त, विहित उपचारों में निपुण, लोक का प्रिय, देश का भक्त, धूर्त, चञ्चल, शीघ्र ही क्रोध और शान्ति धारण करने वाला पुरुष होता है।

वृश्चिक राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में वृश्चिक में बुध हो तो श्रम, शोक और अनर्थ का भागी, द्वेषी, धर्म और लज्जा से रहित, मूर्ख, दु:स्वभाव, लोभी, दुष्ट स्त्री में आसक्त, कठोर दण्ड में रत, कविता, निन्द्य कार्य में लीन, ऋणी, अधम जनों में प्रेम, दूसरों की वस्तु को लेने वाला होता है।

धनु राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में धनु में बुध हो तो जातक विख्यात, उदार, श्रुति स्मृति और शास्त्र वेत्ता, शूर, सुशील, राजा का मन्त्री या पुरोहित, कुल में श्रेष्ठ, महाधनी, यज्ञ, अध्यापन में रत, मेधावी, वाक्पटु, व्रती, दानी, व्याकरणशास्त्र में चतुर होता है।

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मकर राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में मकर में बुध हो तो जातक अधम, मूर्ख, नपुंसक, दूसरों के कार्य में रत, कुल गुणों से हीन, अनेक दुःख से पीड़ित, सोने और घूमने वाला, चुगली करने वाला, असत्य वक्ता, बन्धुओं से त्यक्त, अव्यवस्थित, मलिन और डरपोक होता है।

कुम्भ राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में कुम्भस्थित बुध हो तो सद्बुद्धि और सत्कर्म से हीन, अनेक धर्म में प्रवृत्त, विहित कार्य को छोड़ने वाला, शत्रुओं से अपमानित, अशुचि, शीलहीन, मूर्ख, अतिदृष्ट स्त्री का द्वेषी, अभोगी, गूँगा, दरिद्र, भीरु, मलिन और दूसरे की आज्ञा में रहने वाला होता है।

मीन राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में मीन में बुध हो तो जातक सदाचारी, पवित्र, विदेशवासी, सन्तानहीन, दरिद्र, सती स्त्री का पति, निपुण, सज्जनों का प्रिय, अन्य धर्म को भी मानने वाला, सिलाई कार्य में निपुण, विज्ञान, वेदशास्त्र कला से रहित, पर धन लेने में उद्यत, तथापि धनहीन और मिलाजुला स्वभाव वाला होता है।

भौम राशिस्थ (मेष-वृश्चिक) बुध पर ग्रहों की दृष्टि- जन्म के समय कुजराशि ( मेष वृश्चिक ) स्थित बुध पर रवि की दृष्टि से जातक सत्यवक्ता सुखी, राजा का मान्य और क्षमाशील होता है।

भौम राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि से स्त्रियों का प्रिय, सेवा कार्य करने वाला, मलिन और शीलहीन होता है।

एवं मङ्गल की दृष्टि होने से मिथ्या और प्रिय वक्ता, कलहप्रिय, विद्वान्, धनी, राजा का प्रिय तथा शूर होता है।

एवं मेष गुरु की दृष्टि से सुखी, कोमल रोमयुक्त देह और सुन्दर केश वाला, अति धनवान, लोगों पर आज्ञा पालन करने वाला एवं पापी होता है।

शुक्र की दृष्टि होने से राजा का कार्य करने वाला, जन समूह या नगर का मुखिया, बोलने में चतुर, विश्वस्त और स्त्री सुख से युक्त होता है।

शनि की दृष्टि से सुख से रहित, उग्र, हिसक, कुटुम्बियों से रहित होता है।

शुक्रराशिस्थ (वृष-तुला) बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में शुक्र राशि ( वृष या तुला) में स्थित बुध पर रवि की दृष्टि होने से जातक दारिद्र दुख से पीड़ित, रोगी, दूसरों के कार्यों में रत होता है तथा लोक में निन्द्य होता है।

यदि शुक्र राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि होने से लोक में विश्वस्त, धनी, ईश्वरभक्त, नीरोग, स्थिर परिजन वाला, विख्यात, राजमन्त्री होता है।

मङ्गल की दृष्टि होने से रोग और शत्रु से पीड़ित, राजा से अपमानित होकर देश से बहिष्कृत होता है।

गुरु की दृष्टि से पण्डित, अपने वचन का पालन कर्त्ता, देश नगर या जनों का मुखिया और विख्यात होता है।

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल

एवं शुक्र की दृष्टि होने से सुन्दर, सुखी, वस्त्र एवं आभूषणों का भोगी तथा स्त्रियों का प्रिय होता है।

तथा शनि की दृष्टि होने से सुख से हीन, बन्धु शोक से पीड़ित, रोगी, अनेक विपत्ति वाला तथा मलिन पुरुष होता है।

स्वराशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- यदि जन्मकाल में स्वगृहे ( मिथुन या कन्या ) स्थित बुध पर रवि की दृष्टि से सत्या बोलने वाला, सुन्दर, राजा या राजा का प्रिय, सदाचारी, लोगों का प्रिय होता है।

मङ्गल की दृष्टि से भग्नदेहधारी, मलिन, प्रतिभाशाली, राजा का प्रिय नौकर होता है।

गुरु की दृष्टि से राजमन्त्री, श्रेष्ठ, सुरूप, उदार धन परिजन से युक्त, शूर होता है।

शुक्र की दृष्टि से पण्डित, राजसेवक या राजदूत, सन्धिपालक, दुष्ट स्त्री में आसक्त होता है।

शनि की दृष्टि से उदरतृष्णील, विनयी, कार्यसिद्धि करने वाले, धनवस्त्र सम्पन्न होता है।

कर्क राशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में कर्क गत बुध पर रवि की दृष्टि से जातक धोबी, माली, घर बनाने वाला या मणि कर्त्ता ( सोनार ) होता है।

कर्क राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि से स्त्री के कारण धन बल और सुख से हीन, असत्यभाषी, कूट ( नकली वस्तु ) बनोने वाला, चोर किन्तु प्रियवक्ता होता है।

एवं गुरु की दृष्टि से मेधावी लोकप्रिय, भाग्यवान, राजप्रिय, विद्या का पारङ्गत अर्थात् विद्वान् होता है।

इसी प्रकार कर्क राशिस्थ बुध, शुक्र से दृष्ट हो तो जातक कामदेव के समान सुन्दर प्रियवक्ता, गमनवादन में दक्ष, भाग्यवान् और सुन्दर होता है।

यदि कर्क राशिस्थ बुध, शनि से दृष्ट हो तो जातक आडम्बर में इच्छा रखने वाला, पाखण्डी, कारागार में रहने वाला, गुणहीन, भाई गुरुजनों का द्रोही होता है।

सिंह राशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मपत्री में सिंहस्थ बुध पर रवि की दृष्टि से जातक सेवा करने से योग्य ईष्याँवान, धनी, गुणी, हिंसक, क्षुद्र, चञ्चल स्वभाव और निर्लज्ज होता है।

यदि सिंह राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि से रूपवान्, चतुर, काव्य, कला और संगीत में पटु, धनी, सुशील होता है।

यदि सिंह राशिस्थ बुध पर मङ्गल की दृष्टि से नीच, दुखी क्षतदेह, चातुर्यहीन, लीला में सुन्दर और नपुंसक होता है।

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मेष राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में मेष में गुरु हो तो जातक विवादियों के गुण से युक्त, यत्न से रत्नादि लाभ करने वाला, पुत्र धन और बल से युक्त, प्रतिभा सम्पन्न, तेजस्वी, बहुत शत्रु वाला, बहुत व्यय करने वाला, क्षत शरीर, क्रोधी, उदग्रड नायक होता है।

वृष राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में वृष में गुरु हो तो विशाल शरीर, देव ब्राह्मण और गाय का भक्त, मनोहर रूप, स्वप्निलरत, कृषि और गाय से धनी, उत्तम वस्तुओं से युक्त, उचित भाषी, सबुबुद्धि, गुणी, नीतिज्ञ, विनयी और वैद्यक क्रिया में चतुर होता है।

मिथुन राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में मिथुन में गुरु हो तो धनी, सबुबुद्धि, वैज्ञानिक, सुन्दर आँख वाला, वक्ता, सरल, चतुर, धर्मशील, गुरुजन तथा बन्धुओं से आर्दित, मृदुलशब्द प्रयोक्ता, कार्य में आसक्त और श्रेष्ठ कवि होता है।

कर्क राशि में स्थित गुरु फल- जन्माड चक्र में कर्क में बृहस्पति हो तो पण्डित, रूपवान्, धर्मात्मा, सुशील, बली, यशस्वी, सुसम्पन्न और धन वाला, सत्यभाषी, स्थिर पुत्र वाला, लोक में मान्य, विख्यात राजा, सुकर्म करने वाला, मित्रों में आसक्त होता है।

सिंहस्थ गुरु फल- जन्माड में सिंहस्थ बृहस्पति में शत्रुओं से दृढ़ शत्रुता और मित्रों से स्नेह करने वाला, विद्वान्, धनी, शिष्ट परिजनों से युक्त, राजा या राजतुल्य, पुरुषार्थ करने वाला, सभा का लक्ष्य, शत्रु को जीतने वाला, दृढ़देह और वन पर्वत दुर्ग में निवास वाला होता है।

कन्या राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में कन्यास्थित गुरु हो तो बुद्धिमान, धर्मात्मा, कार्यकुशल, सुगन्ध वस्त्र से सहित, कार्य में दृढ़ संकल्प, शास्त्र और शिल्प से धनी, दानी, सुशील, चतुर और अनेक अक्षर (लिपि) को जानने वाला धनी होता है।

तुला राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में तुला राशि में गुरु हो तो जातक बुद्धिमान, बहुत पुत्र वाला, विदेश भ्रमण से अति धनी, भूषण प्रिय, विनीत, नट नर्तकों द्वारा धन संग्रह करने वाला, सुन्दर, शास्त्रज्ञ, अपने साथी व्यापारियों में श्रेष्ठ, देवता और अतिथि के सत्कार में लीन और पण्डित होता है।

वृश्चिक राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में वृश्चिक में गुरु हो तो जातक बहुत शास्त्रों में निपुण, राजा या ग्रन्थों का भाष्य करने वाला, चतुर, देव मन्दिर बनवाने वाला, बहुत स्त्री और पुत्र वाला, रोग से पीड़ित, बहुत परिश्रमी, अति क्रोधी, दम्भ युक्त कर्म करने वबला, निन्द्य आचरण करने वाला होता है।

धनु राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में धनु में गुरु हो तो व्रतोद्यापन,

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवेश फल

शुक्र राशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से अति मनोहर, महाधनी, आभूषण धारण करने वाला, दयालु, उत्तम शय्या और उत्तम वस्त्र वाला होता है। शुक्र राशिस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि से पण्डित बहुत धनी, गाँव और नगरवासियों में श्रेष्ठ, पलिन, कुरूप और स्त्रीहीन होता है।

बुध राशिस्थ (मिथुन-कन्या) गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में मिथुन या कन्यास्थित गुरु पर रवि की दृष्टि से श्रेष्ठ, गाँव का प्रमुख, परिवार स्त्री पुत्र धन से युक्त होता है।

बुध राशिस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से धनी, माता का भक्त, सुख, स्त्री पुत्र से युत और अनुपम सुन्दर होता है।

बुध राशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से सर्वत्र विजयी, विकृतदेह, धनी, लोक में मान्य होता है।

बुध राशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से ज्योतिषज्ञाता, बहुत स्त्री पुत्र वाला, अनेक रूप के वचन बोलने वाला, सूत्रकार होता है।

बुध राशिस्थ गुरु पर शुक्र की दृष्टि से देवमन्दिर आदि कृत्य करने वाला, वेश्यागामी, स्त्रियों के हृदय को चुराने वाला होता है।

बुध राशिस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि से, किसी जाति, या जनसमूह, या राष्ट्र, या ग्राम या नगर का प्रमुख सुन्दर शरीर वाला होता है।

कर्क राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्म चक्र में कर्कस्थ गुरु पर रवि की दृष्टि से जातक लोक में विख्यात, जनसमूह, पूर्व अवस्था में सुख धन स्त्री से हीन पश्चात् इन सबों के सुख से युक्त होता है।

कर्क राशिस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से अति सुन्दर, धन, सवारी, उत्तम स्त्रीपुत्र वाली राशि होती है।

कर्क राशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से बाल्यावस्था में ही विवाहित, सुवर्ण भूषण से युक्त, धनी, कलहप्रिय, पापहीन, लोक में विश्वस्त राजमन्त्री होता है।

कर्क राशिस्थ गुरु पर शुक्र से दृष्ट हो तो बहुधा स्त्री, बहुत धन और भूषण से युत, सुखी और सुन्दर होता है।

कर्क राशिस्थ गुरु पर शनि से दृष्ट हो तो गाँव, शहर या सेना का अध्यक्ष, वक्ता, धनवान और वृद्धावस्था में भोगो से युत होता है।

सिंह राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्म चक्र में सिंहस्थ वृहस्पति पर रवि की दृष्टि से सज्जनों का प्रिय, विख्यात, राजा, अतिधनी, सुशील होता है।

सिंहस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से सौभाग्यवान्, मलिन, स्त्री के भाग्य से धनवृद्धि वाला, जितेन्द्रिय होता है।

सिंहस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से साधु और गुरुओं का भक्त सुकृत्य

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करने वाला, श्रेष्ठ, चतुर, शुद्ध, वीर, और क्रूर होता है। सिंहस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से गृह निर्माण में निपुण, वैज्ञानिक, प्रियवक्ता, राजा का प्रधान मन्त्री और शास्त्रज्ञ होता है।

सिंहस्थ गुरु पर शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों का प्रिय, सुन्दर, राजा से आदृत, अधिक बलवान् होता है।

सिंहस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि से अधिक और प्रियवचनवक्ता, सुखहीन, चित्रकार, निष्ठुर और देवताओं के समान सुखी होता है।

गुरु राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में धनु वा मीनस्थ गुरु पर रवि की दृष्टि से जातक राजा का विरोधी, धन और बन्धुओं से त्यक्त होकर दुखी होता है।

स्वराशिस्थ गुरु पर चन्द्र की दृष्टि से सब सुखों से युक्त, स्त्रियों का प्रिय, मान धन ऐश्वर्य से गर्वित होता है।

स्वराशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से संग्राम में क्षतदेह, हिंसक, परोपकारिक, परिवारहीन होता है।

स्वराशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से राजा या राजमन्त्री, पुत्र धन सौभाग्यसुख से युक्त, सबका हित साधक होता है।

स्वराशिस्थ गुरु पर शुक्र की दृष्टि से सुखी, धनी, पण्डित, दोषहीन, दीर्घायु, सुन्दर, लक्ष्मीवान् पुरुष होता है।

स्वराशिस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि से मलिन, भीरु, लोक में निन्द्य, दीन सुखधर्मादि से हीन होता है।

शनि राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मचक्र में मकर या कुम्भस्थ गुरु पर रवि की दृष्टि से जातक विद्वान्, राजा, स्वभाव से हीन; धनी, भोगी और पराक्रमी होता है।

शनि राशिस्थ गुरु पर चन्द्रम की दृष्टि से पिता माता का भक्त, श्रेष्ठ, कुलीन, विद्वान्, धनी सुशील और धर्मात्मा होता है।

शनि राशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से वीर, राजा का सेनापति, बलवान्, सुन्दर, विख्यात, लोक में मान्य होता है।

शनि राशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से कामी, गुणियों में श्रेष्ठ, धन वाहन से युत, विख्यात, मित्रों से युत होता है।

शनि राशिस्थ गुरु पर शुक्र से दृष्ट हो तो जातक खाने योग्य अन्न का संग्रह कर्ता, उत्तम घर शय्या, आसन स्त्री, भूषण व वस्त्र से युक्त होता है।

यदि शनि राशिस्थ गुरु शनि से दृष्ट होती अद्वितीय विद्या और स्वभाव वाला, सर्वश्रेष्ठ, भूपाल परिजन, पशुओं से सम्पन्न तथा भोग विलास में लीन होता है।

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मकर राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में मकर में शुक्र हो तो खर्च भय से दुखी, दुर्बल देह, वृद्धा स्त्री में आसक्त, हृदयरोगी, धनलोभी, मिथ्याभाषी, धूर्त, चतुर, नपुंसक, चेष्टाहीन, दूसरे के कार्य में रत, मूर्ख और क्लेश सहन करने वाली होती है।

कुम्भ राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में कुम्भ में शुक्र हो तो उद्वेग रोग से दुखी, व्यर्थ कार्य में रत, परस्त्रीगामी, अधर्मी, गुरुजन और सन्तान का शत्रु, रत्नादि उपभोग तथा वस्त्राभूषणादि से हीन और मलिन होता है, इसमें संदेह नहीं है।

मीन राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में मीन में शुक्र हो तो जातक चतुर, उदार, दानी, गुणी, धनी, शत्रुजेता, लोक में ख्यात, श्रेष्ठ, विशेष कार्यकर्ता, राजा का प्रिय, वक्ता, बुद्धिमान् साधुजनों से धन और मान लाभ करने वाला, वचन पालक, कुलपूजक और ज्ञानी होता है।

भौम राशिस्थ (मेष-वृश्चिक) शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल के समय मेष या वृश्चिक स्थित शुक्र पर रवि की दृष्टि से स्त्री के कारण धन सुख से हीन, दुःख से पीड़ित किन्तु राजा और पण्डित होता है।

भौम राशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि से बन्धन भागी, कामी, दुष्टा स्त्री का पति होता है।

भौम राशिस्थ शुक्र पर मङ्गल की दृष्टि से धन सुख और मान से हीन, दूसरे का कार्यकर्ता, मलिन होता है।

भौम राशिस्थ शुक्र पर बुध की दृष्टि से मूर्ख, हीन, नीच, भाई से लड़ने वाला, विनयहीन, चोर, क्षुद्र, कूर होता है।

भौम राशिस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि से सुलोचन, उत्तम स्त्री वाला, सुन्दर और लम्बा शरीर, बहुत पुत्र वाला होता है।

भौम राशिस्थ शुक्र पर शनि की दृष्टि से जातक अत्यन्त मलिन, आलसी, भ्रमणशील, अपने स्वभाव के मनुष्य का नौकर और चोर होता है।

स्वराशिस्थ (वृष-तुला) शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में वृष या तुलास्थित शुक्र पर रवि की दृष्टि से सुन्दर स्त्री, धन सुख से युक्त, उत्तम पुरुष किन्तु स्त्री का वशीभूत होता है।

स्वराशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि से कुलीन माता का पुत्र, सुख धन मान और पुत्र से युक्त, श्रेष्ठ और मनोहर रूप होता है।

स्वराशिस्थ शुक्र पर मङ्गल की दृष्टि से दु:शीला स्त्री के कारण घर और धन का नाश करने वाला, कामी होता है।

स्वराशिस्थ शुक्र पर बुध की दृष्टि से मनोहर, मृदुल, सुन्दर, सुख,

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जातक व्यवहार, बोध ( ज्ञान ), अध्ययन, विद्या में निपुण, पुत्रों के गुणों से तथा अपने धर्म और सुशीलता से लोक में ख्यात, वृद्धावस्था में उत्कृष्ट सम्पत्ति का भोग, लोक में आदर, थोड़े बोलने वाला, बहुत नाम वाला तथा सरल होता है।

मकर राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में मकर में शनि हो तो परस्त्री तथा अन्य स्थान का अधिपति, वेदज्ञ, गुणी, शिल्पज्ञ, श्रेष्ठ, कुलपूज्य, दूसरों से आदृत, विख्यात, स्नान और अलंकार का प्रेमी, कार्य में चतुर, विदेश में रहने वाला, शूरता से सम्पन्न होता है।

कुम्भ राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में कुम्भ में शनि हो तो जातक अधिक असत्य बोलने वाला, मदिरा तथा स्त्री के व्यसन में अति आसक्त, धूर्त, ठग, मित्रों को धोखा देने वाला, अति क्रोधी, ज्ञान कथा से बहिर्मुख, परस्त्रीगामी, कठोरभाषी, बहुत कार्य को आरम्भ करने वाला होता है।

मीन राशिस्थ शनि फल- यदि जन्मकाल में मीन में शनि हो तो जातक यज्ञ तथा शिल्प विद्या का प्रेमी, अपने बन्धु और मित्रों में प्रधान, शान्त स्वभाव, धनी, नीतिज्ञ, रत्न की परीक्षा में प्रयत्न करने वाला, धर्म व्यवहार में तल्लीन, विनयी तथा गुणों से युक्त तथा वृद्ध सदृश विचारशील होता है।

भौम राशिस्थ (मेष-वृश्चिक) शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- प्रादुर्भाव काल में मेष या वृश्चिकस्थित भौमराशि स्थित शनि पर रवि की दृष्टि से जातक खेती करने वाला, अत्यन्त धनी, गाय, भैंस, घोड़े आदि चतुष्पदों से युक्त, भाग्यवान्, कार्यों में सतत्नद्ध होता है।

भौमराशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि से जातक चञ्चल, नीच स्वभाव, कुरूपा और कुशीला स्त्री में आसक्त, सुख और धन से हीन होता है।

भौमराशिस्थ शनि पर मङ्गल की दृष्टि से हिंसक, क्षुद्र, चोरों का मुखिया, स्त्री, मांस, मदिरा सेवन करने वाला होता है।

भौमराशिस्थ शनि पर बुध की दृष्टि से मिथ्यावादी, अधर्मी, बहुत खाने वाला, प्रसिद्ध चोर, सुख और धन से रहित होता है।

भौमराशिस्थ शनि पर गुरु की दृष्टि से सुखी, धनी, भाग्यवान्, राजा का प्रधान मन्त्री होता है।

भौमराशिस्थ शनि पर शुक्र की दृष्टि से जातक चञ्चल, कुरूप, परस्त्रीगामी, वेश्या का भक्त तथा सुख भोग से हीन होता है।

शुक्र राशिस्थ (वृष–तुला) शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में वृष या तुला राशिस्थ शनि पर सूर्य की दृष्टि हो तो जातक स्पष्ट वक्ता, निर्धन, विद्वान्, परान्नभोजी, कुशागात्र (दुर्बल ) होता है।

तुला वृष राशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो स्त्रियों के मदद से बली, राजमन्त्री सम्मानित, स्त्रियों का प्रिय, कुटुम्बों से युक्त होता है।

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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल

तुला वृष राशिस्थ शनि पर मङ्गल की दृष्टि से युद्ध क्रिया में कुशल होता हुआ भी युद्ध से हटने वाला, वक्ता, धन और जन से युक्त होता है।

शुक्र राशिस्थ शनि पर बुध की दृष्टि से हास्य प्रिय, नपुंसक समान, स्त्रियों का भक्त, नीच प्रकृति होता है।

शुक्र राशिस्थ शनि पर गुरु की दृष्टि से दूसरों के सुख से सुखी और दुखी, परोपकारी, लोगों को प्रिय, दाता, उद्यमी होता है।

शुक्र राशिस्थ शनि पर शुक्र की दृष्टि से मधुरा तथा स्त्रियों से सुखी, अनेक रत्नों वाला, महाबली, राजा का परम प्रिय होता है।

बुध राशिस्थ (मिथुन-कन्या) शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- प्रादुर्भाव काल में मिथुन या कन्या स्थित शनि पर रवि की दृष्टि हो तो सुखहीन, धनहीन, धमौत्मा, क्रोधरहित, क्लेश को सहने वाला और धैर्यवान् होता है।

चन्द्रमा की दृष्टि से राजा के तुल्य, कान्तिमान, स्त्रियों से धन और सत्कार पाने वाला, तथा स्त्रियों का कार्य कर्ता होता है।

मङ़ल की दृष्टि से विख्यात योद्धा, मुग्धबुद्धि, भारवाही और विकृत देह होता है।

बुध की दृष्टि से धनवान युद्ध में निपुण, नृत्य और गान में कुशल, शिल्प में परम निपुण होता है।

गुरु की दृष्टि से राजकुल में विश्वस्त, सब गुणों से युत, साधुओं का प्रिय, गुण से धनार्जन करने वाला होता है।

शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों के श्रृङ्गार बनाने में निपुण, योगशास्त्रज्ञ वा योगक्रिया का ज्ञाता और स्त्रियों का प्रेमी होता है।

कर्क राशिस्थ शनि पर ग्रहों की दृष्टि- प्रादुर्भाव काल में कर्क राशिस्थ शनि पर सूर्य की दृष्टि हो तो जातक बाल्यावस्था में पितृहीन, धन सुख और स्त्री से भी रहित, कुत्सित भोजन से प्रसन्न और पापकर्ता होता है।

कर्क राशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि से माता का अहित, धनी, सहोदरों से पिड़ित होता है।

कर्क राशि में शनि मङ़ल की दृष्टि से राजा को धन समर्पण करने वाला, विकल देह, परिवार सहित कलह कारक, कुबन्धु वाली स्त्री का पति होता है।

बुध की दृष्टि से निठुर, वाचाल, शत्रु को जानने वाला, दय्भो और उत्तम कार्य को करने वाला होता है।

गुरु की दृष्टि से खेती, घर, मित्र, पुत्र, धन, रत्न, स्त्री से युक्त होता है।

शुक्र की दृष्टि से उत्तम कुल में जन्म लेकर रूप और सुख से हीन होता है।

सिंह राशिस्थ शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- सिंह स्थित शनि पर सूर्य की

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वाला, तामसी, सुन्दर, भ्रमणशील, विख, अल्पधनवान, भाग्यवान होता है। स्वराशिस्थ शनि पर गुरु की दृष्टि से विख्यात गुण, राजा राजवंशी, दीर्घायु, नीरोग होता है। स्वराशिस्थ शनि पर शुक्र की दृष्टि से धनी, परस्त्रीगामी, सुन्दर, सुखी, उपस्थित पान का भोगी होता है।

ग्रह भाव योग प्रकरण जिससे समस्त जन्तुओं के शरीर, धन, भाई, माता, सन्तान, शत्रु, स्त्री इत्यादि पदार्थ के शुभाशुभ फल का ज्ञान करना सम्भव होता है। इसलिये अब आगे भाव और ग्रह से उत्पन्न फलों को विशेषरूप से वर्णन करते हैं।

लग्नस्थ सूर्य फल- जन्मकुण्डली में लग्न में सूर्य हो तो जातक थोड़े केश वाला, कार्य करने में आलसी, क्रोधी, उच्चाकृति, मानी, रुक्षदृष्टि, कठोर देह, शूर, क्षमाहीन, दया से रहित होता है। यदि लग्न में कर्क राशि हो तो मूली नेत्र वाला, मेष हो तो मेढ़ दृष्टि, सिंह लग्न हो तो रतौंधी वाला और यदि तुला लग्न हो तो दरिद्र और पुत्रहीन होता है।

द्वितीय भाव में स्थित सूर्य फल- यदि जन्मकुण्डली में द्वितीय भाव में सूर्य हो तो नौकर और पशुओं से युक्त, मुख का रोगी, ऐश्वर्य सुख से हीन, राजा या चोर से अपहृत धन वाला होता है।

तृतीय भाव में स्थित सूर्य फल- जन्म कुण्डली में तृतीय भाव में रवि हो तो पराक्रमी, बली, भाईयों रहित, लोक में मान्य, मनोहर और पण्डित तथा शत्रु को जीतने वाला होता है।

चतुर्थ भावस्थ सूर्य फल- यदि कुण्डली में चतुर्थभाव में सूर्य हो तो धन वाहन हीन, दु:खित हृदय, पैत्रक घर, धन का नाश करने वाला और दृष्ट राजा का सेवा करने वाला होता है।

पंचम भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मकुण्डली में जन्मलग्न से पंचम भाव में सूर्य हो तो सुख, पुत्र और मित्र से हीन, खेती करने वाला, पर्वतादि दुर्ग स्थान में रहने वाला, बुद्धिमान, धनहीन और अल्पायु होता है।

षष्ट भावस्थ सूर्य- जन्मकुण्डली में षष्ठभाव में रवि हो तो अधिक कामी, प्रबल जठराग्नि वाला, बली, धनवान, राजा या न्यायधीश होता है।

सप्तम भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मपत्री में सप्तम भाव में रवि हो तो कान्तिहीन, लोक में अनादृत, रोगी, बन्धनभागी, कुमार्गगामी और स्त्री से शत्रुता करने वाला होता है।

अष्टम भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मपत्री में अष्टमभावगत सूर्य हो तो आँख का रोगी, धन और सुख से हीन, अल्पायु, अपने हित जनों के वियोग

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अष्टम भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मकाल में अष्टम स्थान में चन्द्रमा हो तो बुद्धिमान, तेजस्वी रोग से कुश शरीर होता है। यदि क्षीण चन्द्रमा हो तो अल्पायु होता है।

नवम भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मकाल में नवम भाव में चन्द्र हो तो देवता और पितर का भक्त, सुख, बुद्धि और पुत्र से युक्त, स्त्रियों का मन हरने वाला प्रिय कार्यों में उद्योगी होता है।

दशम भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मकाल में दशम भाव में चन्द्रमा हो तो विषाद से युक्त, कार्यों में तत्पर होकर सम्पन्न करने वाला, धनी, पवित्र, बली, शूर और दानी होता है।

एकादश भावस्थ चन्द्र फल- जन्मकाल में एकादश भावगत चन्द्रमा हो तो धनी, अधिक पुत्र वाला, दीर्घायु, उत्तम मित्र और नौकर वाला, मनस्वी, तेजस्वी, शूर, कान्तिमान् होता है।

द्वादश भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मकाल में द्वादश भाव में चन्द्रमा हो तो द्वेषी, नीच, क्षुद्र, आँख का रोगी, आलसी, अशान्त, दूसरे से उत्पन्न और लोक में सदादुःखी होता है।

लग्नस्थ मंगल फल- जन्म पत्रिका में मङ्गल लग्न में हो तो जातक क्रूर, साहसी, मूढ़, अल्पायु, अभिमानी, शूर, क्षतदेह, सुन्दर रूप वाला और चञ्चल होता है।

द्वितीय भाव में स्थित मंगल फल- जन्मपत्री में द्वितीय भाव में मङ्गल हो तो निर्धन, कदन्रभोजी, विकृत मुख वाला, नीच लोगों का सङ्ढ करने वाला और विद्या से हीन होता है।

तृतीय भाव में स्थित मंगल फल- जन्मपत्री में तृतीय भावगत मङ्गल हो तो शूर, अजेय, भ्रातृहीन, हृष्ट, सभी गुणों का निधान और सुप्रसिद्ध होता है।

चतुर्थ भावस्थ मंगल फल- जन्मकाल में चतुर्भाव में भौम हो तो गृह, अन्न, वस्त्र और बन्धु से हीन, वाहनरहित, दुःखी, दूसरे के घर में रहने वाला होता है।

पंचम भाव में स्थित मंगल फल- जन्मकुण्डली में पञ्चम भावगत भौम हो तो सुख धन और पुत्र से हीन, चञ्चलबुद्धि, चुगुलखोर, दुष्ट, अशान्त और नीच होता है।

षष्ठ भावस्थ मंगल फल- जन्मकुण्डली में षष्ठभाव में मङ्गल हो तो अतिकामी, दीप्ततरागिन, सुन्दर और दीर्घदेह वाला बलवान, बन्धुओं में श्रेष्ठ अर्थात् मुखिया होता है।

सप्तम भाव में स्थित मंगल फल- जन्मकुण्डली में सप्तम भावगत भौम हो तो स्त्री का नाशक रोगी, कुमार्गगामी, दुःखी, पापी, सन्तार युत, निर्धन, निरस ( पतला ) शरीर वाला होता है।

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बुध हो तो विख्यात यश और बल वाला, दीर्घायु, कुलपोषक, राजा के तुल्य अथवा न्यायाधीश होता है। नवम भाव में स्थित बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में नवम भाव में बुध हो तो अतिधनी, विद्या से सम्पन्न, सदाचारी, वक्ता, कार्य में कुशल और धर्मात्मा होता है।

दशम भाव में स्थित बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में दशमभाव में बुध हो तो श्रेष्ठबुद्धि, सत्कर्मी, कार्य को सफल करने वाला धैर्यशाली, बली, विविध आभूषणों के सुख का भोगी होता है।

एकादश भावस्थ बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में एकादश स्थान में बुध हो तो धनी, आज्ञाकारी नौकर वाला, पण्डित, सुखी भोगी, दीर्घायु और प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला होता है।

द्वादश भाव में स्थित बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में द्वादशभाव में बुध हो तो वचन पालन करने वाला, आलसी, अपमानित, वक्ता, पण्डित, दीन और कठोर पुरुष होता है।

लग्नस्थ बृहस्पति फल- यदि जन्मकुण्डली में लग्न में गुरु हो तो जातक सुन्दर देह वाला, दीर्घायु विचारकर कार्य करने वाला, पण्डित, धैर्यवान् और श्रेष्ठ होता है।

द्वितीय भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में द्वितीय भाव में गुरु हो तो धनी, भोजनार्थी, वक्ता, सुन्दर, सुरूप, सुवचन, सुन्दर वस्त्र वाला और त्यागी होता है।

तृतीय भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में तृतीय भाव में बृहस्पति हो तो लोक में अत्याधिक दु:खी, कृपण, सहोदरों में लघु, मन्दाग्नि, स्त्री से पराजित और पाप कर्म करने वाला होता है।

चतुर्थ भावस्थ बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में चतुर्थ भाव में गुरु हो तो परिजन, भवन, वस्त्रवाहन, सुख, सुपति, भोग, धन से युक्त, श्रेष्ठ, शत्रु को जीतने वाला होता है।

पंचम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में पंचमभाव में गुरु हो तो पुत्र और मित्रों से सम्पन्न, पण्डित, धीर, स्थिर धन से युक्त और सदा सुखी होता है।

षष्ठ भावस्थ बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में षष्ठ भावगत गुरु हो तो दुषित जठराग्नि और पुंस्त्व वाला, अपमानित, दुर्बल, आलसी, स्त्री द्वारा पराजित, शत्रुजेताऔर विख्यात होता है।

सप्तम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मपत्रिका में सप्तमभाव में गुरु हो तो सुन्दर भाग्यवान्, सुन्दर स्त्री का पति, पिता से गुण में श्रेष्ठ, वक्ता, कवि, गाँव में मुख्य और सुविख्यात पण्डित होता है।

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अष्टम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुंडली में अष्टम भाव में गुरु हो तो अपमानित, दीर्घायु, नौकरी करने वाला, दीन और मलिना स्त्री का पति होता है।

नवम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुंडली में नवम स्थान में गुरु हो तो देव पितर का भक्त, विद्वान, सुन्दर, राजमन्त्री वा सेनापति और प्रधान होता है।

दशम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्म पत्रिका में दशम भाव में यदि गुरु हो तो जातक कार्य को सम्पन्न करने वाला, माननीय, सब उपाय और कुशलता से युक्त, सुख, धन, जन, वाहन और सुन्दर यश से युक्त होता है।

एकादश भावस्थ बृहस्पति फल- जन्म पत्रिका में एकादश भाव में गुरु हो तो अत्यधिक लाभ, अधिक वाहन, नौकर से युक्त, साधु, थोड़ी विद्या और अल्प पुत्र वाला होता है।

द्वादश भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्म पत्रिका में द्वादश भाव में गुरु हो तो आलसी, लोगों का द्वेषी, वाग्विहीन, अथवा भाग्यहीन तथा सेवा कार्य में निरत होता है।

लग्नस्थ शुक्र फल- जनपकुण्डली में लग्न में शुक्र हो तो सर्वाङ्गसुन्दर, सुखी, दीर्घायु, डरपोक स्त्रियों का प्रिय होता है।

द्वितीय भाव में स्थित शुक्र फल- जन्मकुंडली में द्वितीय भाव में शुक्र हो तो बहुत अन्न, पान, ऐश्वर्य, द्रव्य और उत्तम विलास तथा सुन्दर वचन बोलने वाला और अति धनी होता है।

तृतीय भाव में स्थित शुक्र फल- जन्मपत्री में तृतीय स्थान में शुक्र हो तो सुख धन से युक्त, स्त्री से पराजित, कृपण, अल्प उत्साह वाला, सौभाग्यवान और वस्त्रों से युत होता है।

चतुर्थ भावस्थ शुक्र फल- जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव में शुक्र हो तो बन्धु मित्र सुख वाहन अन्न वस्त्र गृह से युक्त सुन्दर उदार पुरुष होता है।

पंचम भाव में स्थित शुक्र फल- जन्म पत्रिका में पंचम भाव में शुक्र हो तो सुखी, पुत्रवान, मित्रयुत, विलासी, अतिधनी, सब वस्तु से परिपूर्ण, राजमन्त्री या न्यायाधीश होता है।

षष्ट भावस्थ शुक्र फल- जन्मकुंडली में षष्ट भाव में शुक्र हो तो जातक स्त्री का देषी, अधिक शत्रु वाला, ऐश्वर्य से हीन, अत्यन्त विह्वल और अधिक दुष्ट होता है।

सप्तम भाव में स्थित शुक्र फल- सप्तम भाव में शुक्र हो तो अत्यन्त रूपवती स्त्री के सुख और विभव से युक्त, अजातशत्रु और सौभाग्य सम्पन्न होता है।

अष्टम भाव में स्थित शुक्र फल- जन्मकुंडली में अष्टम स्थान में शुक्र हो

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तो दीर्घायु, अतुलसुख से युत, धनाढय, राजा के तुल्य प्रतिक्षण संतोष प्राप्त करने वाला होता है।

नवम भाव में स्थित शुक्र फल- यदि कुण्डली में नवम भाव में शुक्र हो तो पुष्ट, विशाल शरीर, धनवान, उदार, स्त्री सुख, मित्रों से युक्त, देव, अतिथि और गुरु की सेवा में तल्लीन होता है।

दशम भाव में स्थित शुक्र फल- जन्मकुण्डली में दशम भाव में शुक्र हो तो उत्थान (पौरुष) और विवाद से सुख, रति, मान, धन और कीर्ति उपार्जित करने वाला तथा अत्यधिक बुद्धिमान और विख्यात पुरुष होता है।

एकादश भावस्थ शुक्र फल- जन्मकुण्डली में एकादश भाव में शुक्र हो तो जातक अनुकूल नोकर वाला, अधिक लाभ करने वाला तथा समस्त दुःखों से रहित व्यक्ति होता है।

द्वादश भाव में स्थित शुक्र फल- जन्म पत्रिका में द्वादश भाव में शुक्र हो तो आलसी, सुखी, स्थूलदेह, नीच, शोधित (साफ) अन्न खाने वाला, शय्या के उपचार में चतुर, स्त्री से पराजित होता है।

लग्नस्थ शनि फल- जन्मकुण्डली में लग्न में स्वोच्च या स्वराशिस्थ शनि हो तो जातक राजा के तुल्य, देश या गाँव का अधिपति होता है, यदि अवशिष्ट राशियों में लग्नस्थ शनि लग्न में हो तो बाल्यावस्था में रोगाक्रान्त, दरिद्र, कार्यों के वश में दुष्टित तथा आलसी होता है।

द्वितीय भाव में स्थित शनि फल- द्वितीय भाव में शनि हो तो विकृत मुख वाला, धन का भोगी, जनहित, न्यायी, परदेश में जाकर धन वाहन आदि का भोग करने वाला होता है।

तृतीय भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में तृतीय भाव में शनि हो तो संस्कार से युत शरीर वाला, नीच, आलसी परिवार वाला, शूर, दाता और विशाल बुद्धि वाला होता है।

चतुर्थ भावस्थ शनि फल- जन्मकुण्डली में चतुर्थ भाव में शनि हो तो दुःखी हृदय, बन्धु, वाहन, धन, बुद्धि और सुख से हीन, बाल्यावस्था में रोगी, बड़े बड़े नख और रोम धारण करने वाला होता है।

पंचम भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में पंचम भाव में शनि हो तो सुख पुत्र मित्र बुद्धि हृदय से हीन, पागल और गरीब होता है।

षष्ठ भावस्थ शनि फल- जन्मपत्र में षष्ठ भाव में शनि हो तो कामी, सुन्दर, शूर, अधिक खाने वाला, कुटिल स्वभाव, बहुत शत्रुओं को जीतने वाला होता है।

सप्तम भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में सप्तम भाव में शनि हो तो सदा रोगी, स्त्रीनाशक, धनहीन, खराब वेश-भूषा वाला, पापी और नीच काम को करने वाला होता है।

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अष्टम भाव में स्थित शनि फल- जन्म पत्री में अष्टम भाव में शनि हो तो कुष्ठ या भगन्दर रोग से दुःखी, थोड़ी आयु वाला, किसी भी कार्य को नहीं करने वाला होता है।

नवम भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में नवम भाव में शनि हो तो धर्महीन, थोड़े धन वाला, सोदर और पुत्र से हीन, सुख रहित और दूसरों को दुःख देने वाला होता है।

दशम भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में दशम भाव में शनि हो तो धनी, पण्डित, शूर, राजमन्त्री, या न्यायाधीश, समुदाय तथा नगर और ग्राम का प्रधान होता है।

एकादश भावस्थ शनि फल- जन्मकुण्डली में एकादशभाव में शनि हो तो जातक दीर्घायु, सिस्थर धन वाला, शिल्पज्ञ, नीरोग, तथा धन मनुष्य सम्पत्ति से युत होता है।

द्वादश भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में द्वादश भाव में शनि हो तो अशान्त चित्त, पातित, बकवादी, कुटिल दृष्टि, निर्दयी, निर्लज्ज, बहुत खर्चीला और पीड़ित होता है।

भावों का शुभाशुभत्व विचार- लग्नादि भावों में शुभग्रह हो तो उस भाव की वृद्धि करते हैं तथा पाप ग्रह हो तो उस भाव के फल का नाश करते हैं। ६,८,१२ भावों में शुभ-अशुभ फल विपरीत होते हैं। अर्थात् त्रिक में स्थित शुभग्रह अशुभ फल और पाप ग्रह शुभ फल करता है। शुभग्रह से दृष्ट योग बलवान् होता है तथा उच्चस्थ ग्रहों से दृष्टयोग का फल विपरीत होता है।

भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण

सूर्य से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर रवि की दृष्टि हो तो जातक पराक्रमी, स्त्री पर रोष करने वाला, कृपण, पैतृक धन से युक्त तथा राजा के सेवक होता है।

चन्द्र से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर चन्द्रम की दृष्टि होने से स्त्री के वश में रहने वाला, सुन्दर, सरल स्वभाव वाला, बहुत धनवान, जलीय वस्तु के व्यापार से लाभ करने वाला होता है।

भौम से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर मङ्गल की दृष्टि से साहसी, युद्धप्रिय, क्रोधी, बन्धुओं से युत, धर्मात्मा और स्थूल लिङ्ग वाला होता है।

बुध से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर बुध की दृष्टि से शिल्प और कला से धनोपार्जन करने वाला, बुद्धिमान्, यशस्वी और मानी होता है।

गुरु से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर गुरु की दृष्टि से यज्ञ और व्रत में तत्पर, राजमान्य, यशस्वी, साधु, गुरु और अतिथि का भक्त होता है।

शुक्र से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर शुक्र की दृष्टि से वेश्या स्त्री का प्रिय, सामर्थ्यवान्, धन-धान्य सुख से सम्पन्न और सुन्दर स्वरूप होता है।

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शनि से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर शनि की दृष्टि से भार, मिर्गी रोग से पीड़ित, क्रोधी, वृद्धा स्त्री का पति, सुखहीन, मलिन और मूर्ख होता है।

लग्नस्थ अपनी राशि को देखने का फल- यदि जातक के जन्मपत्रिका में कोई भी ग्रह लग्नगत अपनी राशि को देखे तो वह जातक सब प्रकार के धन और सुख से सम्पन्न तथा विशेष करके राजा का प्रिय पात्र होता है।

पाप शुभे दृष्ट लग्न फल- लग्नगत अन्य राशि को यदि पापग्रह देखे तो अशुभफल और शुभग्रह देखे तो शुभफल होता है।

किसी भी ग्रह से अदृष्ट लग्न फल- यदि लग्न पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो केवल लग्न राशिस्थ जो स्वभाव होता है उसी स्वभाव का जातक होता है और वह जातक सब गुणों से हीन होता है।

दो आदि ग्रह से व एक शुभग्रह से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर यदि दो या अधिक ग्रहों की दृष्टि हो अथवा एक भी शुभग्रह की दृष्टि हो तो जातक धनी और सुखी होता है। परन्तु एक भी पापग्रह की दृष्टि शुभप्रद नहीं होती है।

समस्त ग्रहों से दृष्ट लग्न फल- यदि लग्न पर सब ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक राजा होता है। यदि सब ग्रह बली हों तो सब सुख सम्पन्न, नीरोग और दीर्घायु होता है।

लग्नस्थ तीन शुभ ग्रह व पाप ग्रहों का फल- यदि लग्न में तीन शुभग्रह हों तो शोकादि से हीन राजा होता है। यदि तीन पापग्रहमात्र हो तो रोग, शोक, भय से युक्त, बहुत खाने वाला, लोक में निन्दित होता है।

लग्न से ६, ७, ८ में पापग्रहों से अदृष्ट या अयुक्त, शुभ ग्रहों का फल- यदि लग्न से ६ ७ ८ भावों में शुभ ग्रह हो तो अधियोग होता है। इस योग में जातक राजमन्त्री, न्यायाधीश; या राजा तथा बहुत स्त्रियों का पति, दीर्घायु, नीरोग और निर्भय होता है।

लग्नस्थ ग्रह के फल में न्यूनाधिक फल- ग्रह अपने गृह, उच्च और शुभवर्ग में हो तो फल पुष्टरूप से होता है। यदि नीच या शत्रु ग्रह में हो तो फल देने में विफल होता है।

धनभाव में सूर्य शनि भौम फल- रवि, शनि तथा मङ्गल यदि ये धन भाव में हों या धन भाव को देखते हो तो धन नाशक होते हैं। उन पर क्षीण चन्द्रमा की दृष्टि हो तो विशेष कर धन नाश होता है।

धन भाव में रवि और मङ्गल हो तो जातक चर्मरोग से युक्त और निर्धन होता है। यदि केवल शनि धन भाव में हो उस पर बुध की दृष्टि हो तो जातक महाधनवान होता है।

द्वितीय भाव में सूर्य भी यदि शनि से दृष्ट हो तो जातक निर्धन होता है। यदि अन्य ग्रह से दृष्ट हो तो शुभ होता है। धन भाव में शुभ ग्रह हो तो अनेक प्रकार से जातक धनवान होता है।

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लाभ भाव सूry से दृष्ट व युक्त होने पर फल- जन्म पत्रिका में लग्न से एकादश भाव में रवि की दृष्टि या योग हो तो उस जातक को राजा से तथा युद्ध करके, या चोरों के द्वारा, वन और चतुष्पद के द्वारा धन लाभ होता है। चन्द्र से दृष्ट युक्त एकादश भाव फल- यदि चन्द्रमा की दृष्टि या योग हो तो स्त्री जन द्वारा, तथा हाथी के व्यापार से धन लाभ होता है, परन्तु चन्द्रमा क्षीण हो तो अल्प और पूर्ण हो तो पूर्ण धन समझना चाहिये। भौम से दृष्ट युत एकादश भाव फल-- जन्म पत्रिका में एकादश भाव यदि मङ्गल से दृष्ट या युक्त हो तो जातक को सोना, मूंगा, भूषण, माणिक्य के व्यापार, साहस और चलने फिरने तथा अग्नि और शस्त्र से धन लाभ होता है।

बुध से दृष्ट युत व आयस्थ बुध वर्ग फल-- यदि एकादश भाव में बुध के वर्ग का योग दृष्टि हो तो लेख, शिल्पकला, काव्य से धनलाभ, विशेष कर काँसा और पित्तलादि धातु से धनलाभ होता है। गुरु के वर्ग में गुरु से दृष्ट वा युत एकादश भाव फल- जन्म कुण्डली में एकादश भाव गुरु से दृष्ट युक्त हो तो जातक को शहिर के मुखिया या राजा की सहायता से या और विशेष पुण्य कार्यों से धन लाभ होता है। उसमें सोना और घोड़ा अधिक होता है। शुक्र के वर्ग में शुक्र से दृष्ट वा युत एकादश भाव फल- यदि शुक्र से दृष्टि युक्त हो तो वेश्याओं के द्वारा तथा यातायात से धन लाभ होता है। उसमें मोती और चाँदी अधिक समझना चाहिये। शनि के वर्ग में शनि से दृष्ट वा युत एकादश भाव फल- जन्म कुण्डली में एकादश भाव में शनि की दृष्टि या योग वा वर्ग हो तो नगर और ग्रामवासियों के सहयोग से स्थिर कार्यों से धन लाभ होता हैं। उस में लोहा, गधा, पहिष अधिक संख्या में होते हैं।

एकादश में शुभ-पाप मिश्रग्रह योग फल-- इस प्रकार उपर्युक्त योगों में एकादश में शुभग्रह की दृष्टि हो तो विशेषरूप से फल तथा पापग्रह की दृष्टि से न्यून और पाप शुभ दोनों की दृष्टि हो तो मध्यम मान से फल लाभ होता है। मित्र-स्वगृहादिस्थ ग्रहों का फल- यदि कुण्डली में जो ग्रह अपने मित्र के गृह या स्वगृह में हो वह आधा, जो अपने उच्च में हो वह पूर्ण, जो अस्त हो वह बहुत थोड़ा तथा जो ग्रह शत्रु राशि में हो वह चतुथांश फल देता है। ऊपर कहे हुए एकादश भाव में जो फल है वह जन्म काल से ही (कुल क्रम के अनुसार) समझना। परन्तु राजा या मण्डलेश्वर आदि के जन्म पत्र में एकादश भाव में ग्रहों के योग से अपरिमित लाभ होता है। ऐसा लोकाक्ष नामक आचार्य का कहना है। व्यय में सूर्य-चन्द्र-भौम और द्वादशस्थ गुरु चन्द्र शुक्र फल- यदि जन्म

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कुण्डली में लग्न से व्ययभाव में सूर्य या क्षीण चन्द्रमा हो तो जातक का धन राजा ले लेता है।

यदि द्वादश भाव में मड़ूल हो उस पर बुध की दृष्टि हो तो सब तरह से धन का नाश होता है।

यदि द्वादश भाव में गुरु, पूर्ण चन्द्र, और शुक्र हो तथा उन पर मड़ूल की दृष्टि नहीं हों तो धन की पुष्टि करते हैं।

इससे अतिरिक्त भावाध्याय के कथित योग के अनुसार भी व्यय भाव का फल समझना चाहिये।

विशेष फल का विचार- जन्म कुण्डली में यदि लग्न में बुध का द्रेष्काण हो उस पर केन्द्रस्थ चन्द्रमा की दृष्टि हो तो राजकुलोत्पन्न भी शिल्प कर्म कारक होता है।

प्रकारान्तर से विशेष फल का विचार- जन्म कुण्डली में यदि शुक्र अपने नीच राशि में शनि के नवांश में होकर द्वादश भाव में हो और सप्तम भाव स्थित रवि चन्द्रमाँ पर शनि की दृष्टि हो तो बड़े कुल में जन्म लेने पर जातक की माता दासी होती है।

पुनः प्रकारान्तर से विशेष फल का विचार- जन्म कुण्डली में यदि सूर्य से द्वितीय स्थान में शनि, दसवें स्थान में चन्द्रमा और सप्तम में में मड़ूल हो तो जातक सर्वदा विफल रहता है।

पुनः प्रकारान्तर से विशेष फल का विचार- यतिद दो पाप ग्रहों के बीच चन्द्रमा हो, तथा लग्न से सप्तम भाव में शनि हो तो जातक श्वास, क्षयादि, प्लीरोग (मुलायम स्थान के रोग) से पीड़ित होता है।

पुनः अन्य प्रकार से विशेष फल का विचार- जन्म कुण्डली में यदि सूर्य के नवमांश में चन्द्रमा और चन्द्रमा के नवमांश में सूर्य हो तो जातक कफ रोगी होता है। यदि रवि और चन्द्र दोनों एक ही राशि में तुल्य अंश में हो तो जातक दुर्बल होता है।

नेत्र विनाश योग- यदि ८, २, ६ तथा १२ इन स्थानों में क्रम से रवि, चन्द्र, मड़ूल और शनि हों तो इनमें जो बली हों उस ग्रह के दोष से जातक की आँख नष्ट हो जाती है।

कर्ण व दन्त नाश योग- यदि ९, ११, ३, ५ स्थानों में पापग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो कर्ण यातक होते हैं। और सप्तम स्थान में पापग्रह हो तो दाँत में कष्ट होता है।

उन्मादी योग- यदि कुण्डली में लग्न में शनि हो या ५, ९ तथा ७ स्थानों में मंगल हो अथवा क्षीण चन्द्रमाँ शनि के साथ द्वादश भाव में हो तो जातक उन्मादी अर्थात् पागल होता है।

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यह ज्योतिष विशेषकर राजोपयोगी शास्त्र है, क्योंकि विशेष कर लोग राजाओं के जन्म समय के अनुसार राजयोगों का ही विचार करते हैं, इसलिये यहाँ भी उन्हीं कुछ राजयोगों को प्रस्तुत करता हूँ।

राजकुलोत्पन्न राजयोग व निम्नकुलोत्पन्न राजयोग एवं धनवान् योग

यदि जन्म समय में ३ या ४ ग्रह यदि हो तो अपने उच्च या मूल त्रिकोण में बली हो तो राजवंश में उत्पन्न मनुष्य अवश्य राजा होता है।

तथा ५ या ६ ग्रह यांदे उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हो तो दरिद्र कुलोत्पन्न भी राजा होता है।

यदि २, या एक ग्रह उच्चस्थ हो तो धनवान होता है, परन्तु राजा नहीं होता है।

कूरकर्मा व सत्कृत राजयोग- यदि केवल पापग्रह उच्च में हो तो कूरकर्मा राजा होता है, ऐसा यवनाचार्य का मत है।

परन्तु पापग्रहों से राजयोग में उत्पन्न पुरुष राजा नहीं होता, किन्तु राजा के द्वारा सत्कृत होता है, अर्थात् मन्त्री आदि होता है।

नीचकुल में उत्पन्न होने वाले राजयोग- जिन योगों में दरिद्र कुलोत्पन्न भी राजा होता है।

उन राजयोगों को शास्त्रकारों के अनुसार यहाँ प्रस्तुत करते हैं।

नीच कुलोत्पन्न राजयोगों के बत्तीस प्रकार- यदि जन्म कुण्डली में रवि, मंगल, शनि और गुरु इनमें चारों अथवा ३ यदि उच्च में हो और उन्हीं में से कोई एक लग्न में हो तो १६ प्रकार के योग होते हैं इनमें नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है

यदि भौमादि दो में से उच्च में हो और एक लग्न में हो तथा चन्द्रमा अपने गृह ( कर्क ) में हो तब भी सोलह प्रकार के राजयोग होते हैं, ऐसा प्राचीन महर्षियों ने कहा है।

अधमवंशोत्पन्न का राजयोग- लग्न अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो तो तथा चन्द्र छोड़ कर अन्य ४, ५ या ६ ग्रहों से दृष्ट हो तो नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है।

अखिलभूमण्डल पालक योग- जन्म कुण्डली में जन्म समय मेष लग्न में चन्द्र, मङ्गल, गुरु हो तो जातक आसमुद्र पृथ्वी का पालक और समस्त शत्रु दल का संहारक राजा होता है।

अन्य राजयोग- बृहस्पति अपने उच्च में तथा मङ्गल मेष में होकर लग्न में हो अथवा मेष लग्न में ही मङ्गल और गुरु दोनों हो तो राजा होता है, उसके सामने कभी कोई शत्रु नहीं होता है, उसका मन्त्री भी अपने अनुकूल होता है।

विज्ञान कुशल राजयोग- एकादश भाव में चन्द्रमा, शुक्र, गुरु हो, मङ्गल मेष में शनि मकर में, कन्या में बुध यदि लग्न में हो तो निश्चय जातक विज्ञानी राजा होता है।

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सद्भूपाल राज्ययोग- पूर्ण चन्द्रमा यदि कर्क लग्न में तथा बुध सप्तम भाव में छठे में सूर्य, चौथे में शुक्र, दसवें में गुरु और ३ में शनि मंगल हो तो राजा होता है।

यदि कुण्डली में परिपूर्ण चन्द्रमा कर्क लग्न में हो तथा सप्तम भाव में बुध, छठवे भाव में सूर्य, चौथे में शुक्र, दशम में गुरु, शनि व भौम तृतीय भाव में हो तो जातक चन्द्रमा की किरणों के समान शुभ्र चामर तथा राजलक्ष्मी अधिक लक्ष्मी से युत राजयोग- वृष लग्न में पूर्ण चन्द्रमा हो, कुम्भ में शनि, सिंह में सूर्य, और वृश्चिक में गुरु हो तो अधिक सम्पत्ति और वाहन युक्त राजा होता है।

इन्द्र तुल्य राज्ययोग- यदि कुण्डली में मकर लग्न में शनि, चन्द्रमा मीन राशि में तथा कन्या राशि को छोड़कर बुध के घर में अर्थात् मिथुन में भौम, कन्या में बुध, धनु राशि में गुरु हो तो जातक इन्द्र के समान महिमा पाने वाला होता है।

शत्रु से अजेय राज्ययोग- यदि कुण्डली में मकर लग्न में मंगल और सप्तम भाष में पूर्ण चन्द्रमा हो तो शत्रुओं से अजेय तथा वेदार्थ का ज्ञाता होता है।

शत्रु को पराजित कर्त्ता राज्ययोग- यदि अपने उच्च में स्थित सूर्य चन्द्रमा के साथ लग्न में हो तो जातक परमसुन्दर राजा होता है।

जिसके स्मरण से शत्रुओं की स्त्री की शोकाग्नि नयन जल से सिक्त होने पर भी सर्वदा हृदय में प्रज्वलित ही होती है। अर्थात् वह जातक शत्रु को जीतने वाला होता है।

जन्म कुण्डली में तुला में शुक्र मेष में मंगल, कर्क में गुरु हो तो जातक समस्त देश में विख्यात यश वाला राजा होता है।

स्वभुजबल से पृथ्वीपति योग- जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण बली बृहस्पति कर्क लग्न में हो, सूर्य दशम भाव (मेष) में हो और वृष में चन्द्र, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो वह जातक अपने भुजबल से पृथ्वीपति होता है।

जन्म कुण्डली में धनु में चन्द्रमा सहित गुरु हो, मंगल मकर में तथा शुक्र अथवा बुध अपने उच्च में होकर लग्न गत हो तो जातक राजा होता है।

जन्म कुण्डली में धनु के पूर्वार्ध में सूर्य और चन्द्रमा हो, तथा बली (स्वोच्चगत) शनि लग्न में और मङ्गल भी स्वोच्च में हो तो जातक महाप्रतापी शत्रु को जीतने वाला राजा होता है शत्रु भय के कारण दूर से ही नमस्कार करते हैं।

अधिराजयोग- जन्म कुण्डली में यदि चन्द्रमा से षष्ट, सप्तम, अष्टम स्थानों में सब शुभ ग्रह उदित हो और उनपर पापग्रह की दृष्टि नहीं हो तो

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पत्रिका में सब ग्रह बली होकर अपने अपने उच्च में हो और अपने मित्र से दृष्ट हों, उस पर शुत्क्र की दृष्टि नहीं हो तो ऐसे राजा का जन्म होता है जिसकी सेना (हाथी घोड़े की सवारी) के चलने से पृथ्वी चलित हो जाती है। (अर्थात् वह प्रतापी राजा होता है)।

अखण्ड भूपतियोग- पत्रिका में यदि चन्द्रमापरमोच्च में हो उस पर शुत्र की दृष्टि हो और सब पापग्रह आपोक्लिम स्थान में हो तो जातक राजा होता है।

पत्रिका में यदि जन्म लग्नेश और जन्म राशीश दोनों केन्द्र में हों तथा शुभ ग्रह और मित्र से दृष्ट हों, पापग्रह से अदृष्ट, शत्रु से पराजित न हो तथा जन्म राशीश से नवम स्थान में चन्द्रमा लग्न में पड़ता हो तो भी समृद्धिशाली राजा होता है।

जन्म कुंडली में जिस ग्रह की उच्च राशि लग्न में हो वह ग्रह यदि अपने नवांश या मित्र अथवा उच्च के नवांश में केन्द्रगत शुभग्रह से दृष्ट हो तो जातक राजा होता है।

जन्म पत्रिका में बलवान् शनि मकर के उत्तरार्ध में, रवि सिंह में, शुक्र तुला में, मृड़ल मेष में, चन्द्रमा कर्क में तथा बुध कन्या में हो तो जातक चक्रवर्त्ती राजा होता है।

प्रकारान्तर से राजयोग- सब ग्रह बली होकर अपने अपने गृह में वर्गोत्तम नवांश में हो तो शत्रु को जीतने वाला राजा होता है।

लग्नेश केन्द्र में अपने मित्रों से दृष्ट हो तथा शुभ ग्रह लग्न में हो तो जातक राजा होता है।

यशस्वी व सम्पत्त शत्रुहन्ता राजयोग- जन्म पत्रिका में वृष लग्न में गुरु और चन्द्रमा हो, बली लग्नेश त्रिकोण में हो उस पर बलवान् रवि, शनि, मृड़ल की दृष्टि नहीं हो तो जातक शत्रु रहित यशस्वी राजा होता है।

जन्म पत्रिका में जन्म समय सब ग्रह यदि नीच और शत्रु राशि में नहीं हो अर्थात् अपनी राशि अपने नवांश या उच्च के नवांश में मित्रों से दृष्ट हो तथा चन्द्रमा पूर्ण बली हो तो जातक राजा होता है।

जन्म पत्रिका में वर्गोत्तम नवांगात अपने उच्च राशि (वृष) स्थित पूर्ण चन्द्रमा को जो शुभग्रह देखता है वह अपनीदशा में जातक को राजा बना देता है। यदि जन्म काल में कोई बलवान् पापग्रह केन्द्र में न हो तो यह राजा संसार में प्रसिद्ध होता है।

जन्म पत्रिका में यदि जन्म लग्नेश और जन्म राशीश बली होकर केन्द्र में हो और जलचर राशिगत चन्द्रमा त्रिकोण में हो तो जातक राजा होता है।

सार्वभौम राजयोग- जन्म पत्रिका में जन्म समय में सब ग्रह अपनी राशि में मित्र के नवांश या मित्र की राशि में अपने नवांश में हो तो जातक सार्वभौम

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अदृष्ट हो तो जातक राजा होता है। यशस्वी राज्ययोग- जन्म पत्रिका में पूर्ण चन्द्रमा अपने उच्च में हो और सब ग्रहों से दृष्ट हो तो हाथी, घोड़े और पदाति अनेकों सैन्य से युक्त परम यशस्वी राजा का जन्म होता है। जो समस्त पृथ्वी के भार से खिन्न शेष फणिराज के समान प्रजा का पालन करता है। अर्थात् चक्रवर्ती राजा होता है।

अधिक हाथी रखने वाला राजा-- जन्म पत्रिका में अति स्वच्छ बिम्ब चन्द्रम यदि सूर्य के नवमांश में हो और सब शुभ ग्रह केन्द्र में हो उनको पापग्रहों का योग न हो तो बहुत हाथी (उपलक्षण से उत्तम उत्तम सवारी) रखने वाला राजा होता है।

स्वकृति से दिशाओं का शुभ्रकर्ता राज्ययोग- यदि चन्द्र, बुध, मंगल ये नीच भिन्न स्थान में अपने अपने नवमांश में हों और १२, ३ भाव में हों तथा अस्त नहीं हो तथा चन्द्रमा सहित गुरु पञ्चम भाव में हो तो संसार में विख्यात कीर्ति राजा होता है।

शत्रुजेत राजयोग- जन्म पत्रिका में नीच और शत्रु के वर्ग से भिन्न स्थान में कोई भी ३ ग्रह अपने नवमांश में पूर्ण बलो हो उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो तथा पूर्ण निर्मल बिम्ब हो तो जातक शत्रु को जीतने वाला राजा होता है।

सार्वभौम राज्ययोग- कुण्डली में यदि वर्गोत्तम या स्व नवमांश स्थित चन्द्रमा को बलवान ग्रह देखता हो तथा लग्न में कोई पापग्रह नहीं हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला चक्रवर्ती राजा होता है।

अधिक हाथी वाला राज्ययोग- कुंडली में चन्द्रमा यदि जलचर राशि नवमांश में हो तथा शुभग्रह अपने वर्ग में होकर लग्न में हो तथाकेन्द्र में पापग्रह नहीं हो तो जातक बहुत हाथी आदि सवारी रखने वाला राजा होता है।

अपूर्व यशस्वी राज्ययोग- पत्रिका में यदिपूर्ण चन्द्र मा वर्गोत्तम नवमांश में हो तो जातक परम यशस्वी राजा होता है। जिसके हाथी, घोड़े के खुर के आघात के धूलियों से आच्छादित सूर्य भी प्रातः काल के चन्द्रमा सदृश (निष्ठ्रभ) हो जाते हैं।

जन्म समय में सब ग्रह योगकारक हो तो जातक चक्रवर्ती होता है। एक, या दो ग्रह योग कारक हो तो मण्डल (प्रान्त या जिला) का अधिपति होता है।

एक ग्रह भी अपने पञ्चमांश में स्थित हो तो जातक राजा होता है। यदि सब ग्रह बलो हो तो निश्वय चक्रवर्ती होता है।

यदि वृष राशिस्थ चन्द्रमा को जन्म समय में वृहस्पति देखता हो तो जातक समस्त पृथिवी का पालक होता है।

निषाद कुलोत्पन्न राज्ययोग- अपने उच्च, त्रिकोण या स्वराशि में स्थित होकर कोई भी ग्रह चन्द्रमा को देखता है तो नीच कुलोत्पन्न भी जातक राजा होता है।

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होता है।

महाराज योग- यदि चन्द्रमा अपनी राशि या ड्रेष्काण में हो तो जातक राजा होता है। यदि इसी योग में शुभ ग्रह पूर्ण बलो हो तो महाराजा होता है। जिसके जन्म समय में सूर्य अपने नवमांश में और चन्द्रमा अपनी राशि में हो तो जातक महाराजानी राजा होता है।

ग्रामीय राज्योग- जन्म कुण्डली में लग्न में शनि और सप्तम भाव में नवोदित बृहस्पति हो, उन पर शुक्र की दृष्टि हो तो गाँव में जन्म लेने वाला भी राजा ( मुखिया ) होता है।

जन्म कुण्डली में यदि बृहस्पति की राशि में स्थित शुक्र को बृहस्पति देखता हो और बुध स्वोच्च में जातक निश्य राजा होता है।

जन्म कुण्डली में यदि शुक्र रवि और चन्द्रमा तीनों एक भाव में केवल गुरु से दृष्ट हो तो जातक राजा होता है।

अधिक यशस्वी राजयोग- जन्म कुण्डली में शुक्र बुध मंगल तीनों लग्न में और चन्द्रमा से युत गुरु सप्तम भाव में हो उस पर शनि की दृष्टि हो तो महायशस्वी राजा होता है।

नीच कुलोत्पन्न राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण बली बृहस्पति मंगल के नवमांश में हो उस पर मंगल की दृष्टि हो तथा मेष स्थित सूर्य दशम भाव में हो तो नीच कुलोत्पन्न जातक भी राजा होता है।

जन्म कुण्डली में यदि शुक्र, चन्द्र, सूर्य ये तृतीय भाव में हो मंगल सप्तम में, गुरु नवम में और लग्न में वर्गोत्तम नवमांश हो तो नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है।

देवतुल्य राजयोग- कुण्डली में यदि जन्म समय में देदीप्यमान किरण बृहस्पति, बुध, शुक्र, या चन्द्रमा ये सब या एक भी बली होकर नवम भाव में हो और अपने मित्र से दृष्ट हो तो जातक देव तुल्य राजा होता है।

जन्म पत्रिका में नवम भाव में जिन ग्रहों का उच्च हो उससे युत या दृष्ट नवम भाव हो तथा दो अन्य ग्रह अपने उच्च में हो तो बहुत कुलुम्ब अर्थात सतति वाला राजा होता है।

नीच कुलोत्पन्न राजयोग- यदि कुण्डली में पञ्चम भाव में चन्द्रमा और बृहस्पति हो उन पर पञ्चमेश की दृष्टि हो और मीन में शुक्र हो तो नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है।

लक्ष्मीयुत राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में चन्द्रमा तृतीय या दशम भाव में हो और गुरु अपने उच्च में हो तो लक्ष्मी युक्त समस्त पृथिवी का राजा होता है।

प्रसिद्ध राजयोग- यदि कुण्डली में अपने उच्च का गुरु किसी केन्द्र में हो और शुक्र दशम भाव में हो तो जातक समस्त पृथिवी का सुप्रसिद्ध राजा होता है।

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ब्राह्मणकुलोत्पन्न का राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में पूर्ण चन्द्रमा कर्क में हो तथा बली बुध, गुरु, शुक्र, ये अपने नवमांश में होकर चतुर्थ भाव में हो उन पर सूर्य की दृष्टि हो तो द्विज कुलोत्पन्न मनुष्य राजा होता है।

गौपालक राज्ययोग- जन्म कुण्डली में अपने मूलत्रिकोणस्थिति सूर्य दशम भाव में हो, शुक्र, गुरु, चन्द्र ये अपने- अपने राशि स्थित होकर ३, ६, ११ वें स्थान में हो तो गायों का पालन करने वाला अर्थात् ग्वाला भी राजा होता है।

सकलनृप पालक राजयोग-- पत्रिका में अपने मित्र के नवमांशगत शुभग्रह सप्तमभाव में अपने मित्र से दृष्ट हो और मंगल अपने उच्च में हो तो समस्त भूमि का पालक राजा होता है।

जन्म पत्रिका में रवि चन्द्र, बुध, शुक्र ये अपने मित्र के नवमांश में दसवें स्थान में हो तथा ये अस्त और नीच में नही हों और शुक्र नवम भावं में हो तो जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला राजा होता है।

यशस्वी राजयोग- जन्म पत्रिका में अपने नवमांश में बली होकर नवम भाव में हो, लگن में शुभ वर्ग या शुभ ग्रह हो उस पर बुध की दृष्टि हो तो परम कीर्तिमान राजा होता है।

अन्यजात का राजयोग- जन्म पत्रिका में पूर्ण चन्द्रमा वृष में हो उसको तुलास्थित शुक्र देखता हो तथा बुध चतुर्थ भाव में हो तो अन्यकुलोत्पन्न भी राजा होता है।

क्तिस्तत राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि मंगल अपने उच्च में हो उस पर रवि चन्द्र और गुरु की दृष्टि हो तो नीच कुलोत्पन्न भी समस्त पृथिवी का रक्षक राजा होता है।

नीचकुलोत्पन्न राजयोग- उक्त राजयोगों में अभिजित् ( नक्षत्र या मुहूर्त ) में जन्म हो तो नीच कुलोत्पन्न भी परमबलशाली राजा होता है, इसमें सन्देह नहीं।

शत्रुजेता राजयोग- जन्म पत्रिका में कृत्तिका नक्षत्रस्थित चन्द्रमा यदि लग्न में हो तथा गण्डान्त, भद्रा, परिघ या व्यतिपात योग हो तो जातक शत्रुओं को नाश करने वाला होता है।

निराकुल राजयोग- जन्म पत्रिका में लग्न में बुध, सप्तम बृहस्पति कर्कराशिस्थ चन्द्रमा चतुर्थ भाव में और शुक्र दशमभाव में हो तो जातक शासक होता है।

चक्र व समुद्र राजयोग- यदि जन्म पत्रिका में एक राशि अन्तर करके ६ राशि में सब ग्रह हों तो चक्र योग होता है इसमें जन्म लेने वाला राजा होता है।

यदि इसी योग में एक शुभ ग्रह लग्न में हो तो सम्पूर्ण भूमण्डल का राजा होता है। उक्त योग में ही यदि दो ग्रह लग्न में हो तो समुद्र

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योग होता है, इसमें जातक राजा होता है। यदि सब शुभग्रह केन्द्र में हो तो भी जातक राजा होता है। जन्म कुण्डली में लग्न से निरन्तर ६ राशियों में सब ग्रह हो तो जातक राजा होता है। चार राशियों में सब ग्रह हो तो राजमन्त्री होता है।

अधिक सम्पत्तिवान राजयोग- यदि सब ग्रह ५, ४, ३, ९ भाव में हो तो धन पुत्र बन्धु और वाहनो से तथा बहुत नौकरों से युक्त राजा होता है ऐसा यवनादि आचार्यों का मत है।

नगर नामक राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि १०, ७, ४, ९ इन सब ग्रह हों तो नगर नामक योग होता है। इस योग में उत्पन्न मनुष्य पृथ्वीपति होता है।

प्रशान्त राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि सब ग्रह चतुर्थ, लग्न और सप्तम भाव में तथा मंगल, रवि एवं शनि ये तृतीय, षष्ठ और एकादश भाव में हों तो जातक न्यायप्रिय राजा होता है। यह राजयोग यवनाचार्यों ने कहा है।

कलश संज्ञित राजयोग-- जन्म कुण्डली में यदि सब शुभ ग्रह ११, ९ भाव में हो तथा सभी पापग्रह दशमभाव में हों तो कलश नामक राजयोग कहा गया है।

पूर्ण कुम्भ नामक राजयोग- जन्म कुण्डली में यति ३, ५, ११, भाव में ३ ग्रह, षष्ठाभाव में २ ग्रह और शेष २ ग्रह सप्तम भाव में हो तो यह कुम्भ नामक राज योग होता है।

इस प्रकार जन्म कुण्डली में ऊपर प्रायः नीच कुलोत्पन्न जातक के लिए भी अनेक प्रकार के राजयोग कहे हैं, इसके आगे केवल राजवंशियों के राजा होने वाला योग मुनियों द्वारा कहा गया है।

सर्व वन्दित राजयोग- जन्म कुण्डली में सिंह लग्न में सूर्य, मेष में चन्द्रमा, कुम्भ में शनि, मकर में मंगल हो तो जातक सबका वन्दनीय होता है।

स्थिर लक्ष्मीवान् राजयोग- जन्म कुण्डली में एक बलवान शुभग्रह लग्न में और अन्य शुभग्रह ९, १, २ भाव में तथा शेष ग्रह ३, ११, ६, १० भाव में हो तो जातक स्थिर लक्ष्मी वाला राजा होता है।

जिसकी विजय यात्रा में हाथियों का समूह अपने मद जल वर्षि से लोक में मेघ का भ्रम उत्पन्न कर देता है।

अति लक्ष्मीवान् राजयोग- जन्म काल में स्वराशिस्थ बृहस्पति चतुर्थ भाव में और पूर्ण चन्द्रमा नवें भाव में तथा शेष ग्रह १, ३ भाव में हो तो जातक बुद्धिमान, सब सम्पत्ति और वाहनों से युक्त राजा होता है।

चन्द्रांशतुल्य यशस्वी राजयोग- जन्म काल में अपने उच्च में स्थित चन्द्रमा यदि लग्न में हो, धन भाव में बृहस्पति हो, तुला में शुक्र, कन्या में बुध, मेष में मंगल तथा सिंह में सूर्य हो तो जातक अति यशस्वी राजा होता है।

स्वगुण प्रख्यात राजयोग- जन्म कुण्डली में चन्द्रमा और रवि दशम

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भाव में, लग्न में शनि, चतुर्थ में गुरु, शुक्र, बुध, मंगल, ये एकादश भाव में हो तो गुणों से सुप्रसिद्ध राजा होता है।

जन्म पत्रिका में मकर से भिन्न लग्न में बृहस्पति हो तो बहुत हाथी आदि वाहनों से युक्त राजा होता है।

यशस्वी राज्योग- जन्म पत्रिका में लग्न में मंगल दशम में शनि और रवि, ७ में गुरु, ९ में शुक्र, ११ वें में बुध और चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो इस योग में जन्म लेने वाला यशस्वी राजा होता है।

जन्म कुण्डली में क्षीण चन्द्रमा भी उच्चस्थ हो तो राजा का जन्म होता है। यदि पूर्ण चन्द्र उच्चस्थ हो तो कहना ही क्या है?

पराक्रम धन वाहन से युक्त राजयोग- पत्रिका में यदि पूर्ण चन्द्रमा लग्न से भिन्न केन्द्र में हो तो जातक धन, वाहन और पराक्रम से युक्त राजा होता है।

सर्पराज के तुल्य प्रतापी राजयोग- जन्म समय में यदि शुक्र को बृहस्पति देखता हो तो जातक बहुत वाहनों से युक्त प्रतापी राजा होता है।

राजराजेश्वर राजयोग- यदि जातक के जन्मपत्रिका में जन्म समय में बुध को गुरु देखता हो तो वह जातक राजाओं से वन्दनीय होता है।

शत्रुजित राजयोग- जन्म कुंडली में यदि लग्नेश स्वोच्चगत होकर चन्द्रमा को देखता हो तो धन, वाहनों अर्थात हाथी घोड़ा से युत से शत्रुओं को जितने वाला राजा होता है।

जन्म पत्रिका में चन्द्रमा स्वोच्चस्थ होकर बुध और शुक्र को देखता हो तो जातक यशस्वी, भाग्यवान शत्रुहन्ता राजा होता है।

लक्ष्मीपति राजयोग- जन्म कुण्डली में अपने अधिमित्र के नवमांशस्थ चन्द्रमा को यदि शुक्र देखता है तो सदा धन-धान्यसम्पन्न लक्ष्मी का पति राजा का जन्म होता है।

दिन में जन्म हो, चन्द्रमा स्वनवांश या अधिमित्र के नवांश में हो, उस पर गुरु की दृष्टि हो तो निश्चय ही राजा होता है।

ब्राह्मणकुलोत्पन्न राजयोग- पत्रिका में जन्मराशि का स्वामी बली होकर केन्द्र में हो तो ब्राह्मण कुलोत्पन्न भी राजा होता है। फिर राजकुलोत्पन्न की तो बात ही क्या?

अंग देशाधिप राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि सूर्य अपने अधिमित्र की राशि में हो, उसे पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक अंग देश का राजा धन, धर्म से युक्त होता है।

मगधाधिप राजयोग- जन्म पत्रिका में चन्द्रमा के साथ बुध अपने उच्च में हो तो जातक मगध देश का राजा होता है। जिसके हाथियों के मदगन्ध से सब दिशा सुगन्धित होती है।

शत्रुदमन राजयोग- जन्म पत्रिका में एक भी पूर्णिमा का चन्द्रमा यदि

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उन पर शुभग्रह की दृष्टि हो और रवि चन्द्र की दृष्टि नहीं हो तो शत्रु पक्ष को पराजित करने वाला राजा होता है। जन्म पत्रिका में जन्म समय में सुखद वायु बहती हो, आकाश निर्मल हो और सब ग्रहों में जातककालिक मैत्री हो गई हो, बृहस्पति लग्न में हो, शुक्र वृष में हो तो जातक पृथवीपति होता है।

कोतिमान् राजयोग- जन्म पत्रिका में चन्द्र बुध मंगल ये अपने नवमांशस्थ होकर १२, ३ भाव में हो और नीच राशि में वा अस्त नहीं हों, गुरु और चन्द्र पञ्चम भाव में हो तो परम यशस्वी राजा होता है।

पुष्कल नामक राजयोग एवं फल- जन्म पत्रिका में पूर्ण बली जन्मराशिपति और लग्नेश अधिमित्र की राशि में स्थित केन्द्र में होकर लग्न को देखता हो तो पुष्कलयोग होता है। पुष्कलयोग में जन्म लेने वाला शत्रुजेत यशस्वी राजा होता है।

उक्त राजयोगों में लग्नेश यदि राश्यादि में हो तो जातक राजाओं में श्रेष्ठ, राशि के मध्य में हो तो मण्डलाधिप, राशि के अन्त में हो जातक ग्राम का मालिक होता है।

शतयोजन भूमि का स्वामी- रेवती, पू. फा. उ. फा. मूल या पुष्य में स्थित सूर्य लग्न में हो तो जातक सौ योजन भूमि अथवा देश का राजा होता है। यदि कुण्डली में कृत्तिका स्वा. पुष्य या अश्विनी में स्थित शुक्र लग्नगत हो तो जातक राजाओं में श्रेष्ठ अथवा राजाओं का राजा होता है।

सार्वभौम राजयोग- यदि कुण्डली में लग्न के नवमांश का स्वामी अपने उच्च में होकर केन्द्र में हो तो जातक राजा होता है। जन्म राशीश या जन्म लग्नेश यदि केन्द्र में हो तो जातक धन सम्पन्न होता है।

अन्य सार्वभौम राजयोग- यदि कुण्डली में मीन में पूर्ण चन्द्रमा अपने मित्र से दृष्ट हो तो सार्वभौम ( चक्रवर्ती ) राजा होता है। जिसकी आज्ञा सब मानते हैं।

( कुण्डली में ) मंगल दशम स्थान में, चन्द्र, शुक्र नवम स्थान में, स्वोच्च ( मेष ) गत सूर्य एकादश भाव में बृहस्पति से युक्त हो तो जातक राजा होता है। जिसके सैनिकों ( हाथी, घोड़े ) के चलने से दिशों में फैली धूलियों से सूर्य के घोड़ों को पृथ्वी के सुगन्ध सुख प्राप्त होता है।

वर्धितश्री राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में चन्द्रमा के साथ शनि केन्द्र में हो तो जातक परजात होकर भी धन वाहनों से परिपूर्ण राजा होता है।

शत्रुजेत राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में शुक्र बृहस्पति बुध ये द्वितीय भाव में, चन्द्र रवि मंगल ये सप्तम भाव में हो तो जातक शत्रुहन्ता राजा होता है।

यदि जन्म कुण्डली में बलि रवि और चन्द्रमा कर्क में हो कोई एक अन्य ग्रह स्वच्छ राशिमें, अपने उच्च में हो, लग्न में गुरु, षष्ठभाव में मंगल

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वक्रतत्याग स्थान में साधित रशिम में अष्टमांश हीन कर देना। शत्रु के द्वादशांश में और नीच राशि में ग्रह हो जो षोडशांश हीन कर देना चाहिये। जो ग्रह अस्त हो उसकी रशिमसंख्या शून्य कर देना चाहिये। जो ग्रह अस्त हो उसकी रशिमसंख्या यथागत ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार रशिमसाधन आचार्यों ने कहा है।

ग्रहों की राशि योग संख्या से ( १–५ तक ) फल का विचार– इस प्रकार जन्म के समय ग्रहों के ९ से ५ तक रशिम होने से मनुष्य बहुत–सा दुःख वाला, कुलरहित, पराश्रित, दरिद्र और क्षुद्र कर्म करने वाला होता है।

६ से १० तक रशिम योग संख्या फल– ९ से ५ तक रशिम संख्या योग हो तो जातक दुखी, कुलहीन, परतन्त्र, दरिद्र, नीच होता है। ११ से १० तक रशिम योग हो तो मनुष्य मृतक ( पराज्ञा– रत ), विदेशनिरत, भाग्यहीन और मलिन होता है।

११–१५ तक फल– ११ से १५ तक रशिम संख्या योग हो तो क्रम से बहुत विद्वान्, सुजन, धर्मात्मा सुन्दर और अपने पिता के तुल्य होता है।

१६–२० तक फल– १६ से २० तक रशिम योग हो तो क्रम से कुल में श्रेष्ठ, धनवान, लोक में विख्यात, यशस्वी और स्वजन में आदरणीय होता है।

२१–३५ तक रशिम योग संख्या फल– २१ से २५ तक रशिम हो तो जातक क्रम से पूज्य, सौभाग्यवान्, धीर, विद्वान, और राजा होता है। २६ हो तो जातक सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला होता है। २७ हो तो राजा का आश्रित हो कर जीता है। २८ हो तो राजा से धन और सुख लाभ करने वाला होता है। ३१/३० हो तो राजमंत्री और राजगुरु होता है।

३१ रशिम में राजाओं का प्रिय श्रेष्ठ पुरुष, ३२ हो तो ५० गाँव का अधिप, ३३ हो तो सहस्रग्राम का अधिप, ३४ हो तो ३ सहस्र ग्राम का अधिप, ३५ हो तो बहुत धनवान, बलवान् और मण्डलेश्वर ( प्रान्तपति ), यशस्वी, सुरूप, लोगों का प्रिय होता है।

३६–३८ तक रशिम योग संख्या फल– ३६ रशिम हो तो लाखों ग्राम का अधिप होता है। ३७ या ३८ रशिम हो तो ३ लाख ग्राम का पालक होता है।

३९वीं रशिम योग संख्या फल– यदि ३९ रशिम हो तो वह जातक समस्त लोक को सुख देने वाला पृथ्वीपति राजा होता है।

४०वीं रशिम योग संख्या फल– जिसके जन्मसमय ग्रहों की रशिमसंख्या ४० हो वह अधिक भूमि का पालक होता है। जिसके भुजबल से निहत शत्रुओं की स्त्री के शोकार्त शब्दों से लोक में ख्याति होती है।

४१–४३ तक रशिम योग संख्या फल– जिसकी रशिम संख्या ४१ हो वह एक दिशा के समुद्र पर्यन्त पृथ्वीपति होता है। ४२ रशिम हो तो दिशा के

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में १०० अडंगुल, मन्त्र और अभिचार कर्म में निपुण, तौल में १००० तुला और मुख की लम्बाई के बराबर उसका कटिप्रदेश होता है। रuchak योगोत्पन्न जातक विन्ध्य और सह्य पर्वत स्थित नगरों का पालन करके ७० वर्ष की आयु में शस्त्र या अग्नि के आघात से मृत्यु प्राप्त कर स्वर्ग जाता है।

शशी योग- ज्योतिष गणनानुसार शशी योगोत्पन्न पुरुष छोटे छोटे दाँत और मुख वाला, शीघ्रगति, धूर्त, अति शूरवीर, प्रतापी, वन, पर्वत और नदी का प्रेमी, कुश कटी, लम्बा शरीर, लोक में प्रसिद्ध, सेनापति, सब कार्य में पटु कुछ ऊँचे दाँत वाला, धातुवादी, चञ्चल, कमल नेत्र, स्त्री में आसक्त, परधन का ग्रहणकर्ता, माता का भक्त, सुन्दर जड्भा, क्षीण कटी, अनेक बुद्धि, दूसरों के दोष को देखने वाला होता है। शशयोग में उत्पन्न जातक के हाथ में खटिया, शंख, चक्र, मृदङ्ग, माला, वीणा की रेखा होती है। इस योग में उत्पन्न जातक किसी एक प्रान्त का राजा होकर ७० वर्ष तक जीता है ऐसा ऋषियों ने कहा है।

हंस योग- जातक शास्त्रानुसार हंस योगोत्पन्न पुरुष रक्त वर्ण और उन्नत नाक, सुन्दर पैर, प्रसन्न वित्त, गौरदेह, पुष्टगाल, लालनख, हंससमान शब्द, कफात्मा, हाथ और पैर में शंख, कमल, अडकुश, रज्जू, मछली, खटिया, धनुष की रेखा, मधुर्वण नेत्र, गोलमस्तक, जलाशय का प्रेमी, स्त्रैण, कामातुर, तौल में १६०० तुला और लम्बाई में ९६ अडंगुल होता है। हंस योगोत्पन्न सुरसेन, गान्धार, गड्ढा यमुना के मध्यप्रदेश का पालक होकर ९०० वर्ष जीता है। अन्त में अर्थात् जीवन के अन्तिम काल में बनान्त में मृत्यु को प्राप्त होता है।

भद्र योग- भद्र योग में उत्पन्न पुरुष व्याघ्र समान मुख, गजगति गामी, पुष्ट जंघा और वक्षस्थल, दीर्घ और पुष्ट बाहु, चतुरस्र देह, कामी, कोमल और सूक्ष्म दाढ़ी के केश वाला, विद्वान्, कमल सदृश हाथ पैर वाला, बलवान् और योगी होता है। उसके हाथ और पैर में शंख, हाथी, गदा, पुष्प, शर, ध्वजा, चक्र, कमल, हल की रेखा से चिहित, अगरू, गजमद, प्रथम जल वृष्टि से उत्पन्न भूमि और पुष्प के सुगन्ध समान गन्धयुत शरीर और सुन्दर नाक वाला होता है।

अन्य फलों का विचार- शास्त्रतत्वज्ञ, धैर्यवान, सुन्दर भौंह, गजोपम, सुन्दर पेट, धर्मात्मा, सुन्दर कपाल वाला, धीर, स्थिरचित्त, कृष्ण और औंठिया केश से शोभित, सब कार्य में स्वतंत्र, परिवार का पालन करने वाला, मित्रों को धन देने वाला, तौल में २० तुला (१ भार) तुल्य, स्त्री आदि मुख्य मुख्य वस्तुओं से युक्त, सर्वदा सुखी होकर ८० वर्ष पर्यन्त मध्यदेश का राज्य करता है अर्थात् इस योग में उत्पन्न जातक की आयु ८०

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शत्रुजेता राज्योग– जिन मनुष्यों के स्वर ( शब्द ) सिंह, मृदंग ( वाद्य विशेष ) हाथी, रथ समुदाय भेरी, वृष वा मेघ के समान होते हैं वे जातक समस्त भूमि की रक्षा करने में समर्थ, शत्रुजेता राजा होते हैं।

विशेष राज्योग– जिस मनुष्य के जिह्वा ( जीभ ), त्वचा ( चर्म ), दाँत, नेत्र, नख, केश, चिकने व चमकदार हों तो वह राजा होता है। जिसका जिह्वादि शुष्क व स्वर भी शुष्क हो तो मनुष्य निर्धन होता है।

ऐसा जातक ग्रन्थों में कहा गया है। राजा का वर्ण– चिकना व तेज से युक्त शुद्ध वर्ण राजा का कहा है। इसके विपरीत अर्थात् रूक्ष व तेज हीन होने पर क्लेश दायक व सुत धन सुख का भोग मध्यम होता है।

समस्त पृथ्वी पालक राजा– मनुष्यों की आध्धी भूमी का भोग करने वाला राजाओं का भार रूप जन होता है। जिन राजाओं के पास आध्धी भूमि होती है, वे समस्त भूमि के पालक होते हैं।

पञ्चतारा से फल का विचार– भौम से बल–पराक्रम, बुध से गुरुता, गुरु से स्वर, शुक्र से स्नेह, शनि से वर्ण का विचार करना चाहिये, अर्थात् भौम बली हो तो पूर्ण बलवान् निर्बल हो तो लघु अल्प बलवान् इसी प्रकार से पूर्ण अल्प गुरुता का, गुरु से पूर्ण अल्प स्वर का, शुक्र और शनि से स्नेह और वर्ण का विचार करना चाहिये।

सतोगुणी के प्रधान लक्षण– सरल स्वभावी, दयालु, अधिक स्त्री और नौकर वाला, स्थिर स्वभाव, प्रिय सत्यभाषी, देवता और ब्राह्मणों का पूजक, सहनशील, ये सत्व गुण की प्रधानता होने पर मनुष्यों में विद्यमान रहते हैं।

रजोगुणी के प्रधान लक्षण– वीर, कला व काव्य का खजाना, सुन्दर बुद्धि, स्त्री भोग में आसक्त मन, चतुर, आडम्बरों ( बहुरुपिया ) हास्य अर्थात् हँसने में तत्पर, ढीठ, गानविद्या व अक्ष ( पासा फेंकने की ) विद्या का ज्ञाता, ये गुण रजोगुण की प्रधानता होने पर मनुष्यों में रहते हैं।

तमोगुणी के प्रधान लक्षण– मूर्ख, आलसी, ठग, क्रोधी, विवादो, चुगलखोर, भूख से पीड़ित, आचार से हीन अर्थात् दुराचारी, अपवित्र, नशे में चूर, लोभी, प्रमादी, ये बातें तमोगुण की प्रधानता से होती हैं।

तत्व विचार– जिसकी कुण्डली में गुरु बली हो तो वह आकाश स्वभाव, शुक्र बली हो तो जल तत्व की अधिकता, अर्थात् जल स्वभाव, शनि बली हो तो वायु स्वभाव, भौम बली हो तो अग्नि स्वभाव, बुध बली हो तो पृथ्वी स्वभाव, गुरु शुक्र से छाया स्वरूप, शनि से वायु, भौम से पित्त, बुध से कफ स्वरूप होता है। १, २ या अधिक बली हों तो मिश्र स्वभाव व स्वरूप होता है।

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८५२ महापुरुष योग प्रकरण

सुख का भोगी अर्थात् धर्मात्मा, धनी, सुखी और जनप्रिय होता है।

वात प्रकृति फल- जिसकी वायु प्रकृति होती है वह जातक शीत (ठंड) से दुःखी, अधिक बोलने वाला, शीघ्र गामी, कहीं भी रुकने वाला नहीं, वीर, ईर्ष्यालु, रोगी, भाग्यहीन, अन्यायी, दाँतों को चबाने वाला अर्थात् क्रोधी, अधिक मित्रता बुद्धि से रहित, सड़ती का ज्ञाता, दुर्बल, मित्रों की प्राप्ति में अधिक चतुर, रूप में आकाश में उड़ने वाले, धैर्यता से रहित, शुष्क मूँछ व बाल वाला, कृतघ्नी, फटे पैर हाथ वाला, क्रोधी, कान्ति से रहित, धननाशक और निबन्ध (मल मूत्र का अवरोध) रोग से विलाप करने वाला होता है।

पित्त प्रकृति फल- जिसकी पित्त प्रकृति होती है वह जातक दुर्गन्धी, थोड़ा सन्तापी, विशाल बुद्धि, जल्दी प्रसन्न होने वाला, मोटा, लाल नख व आँख, पैर और हाथ वाला, वृद्ध के तुल्य आकार वाला, जलन वाला, बुद्धिमान, संग्राम में निर्भीक, शीत प्रिय, दूसरों को पकड़ कर बोलने वाला, अधिकों से डर कर शरण में नहीं जाने वाला, नम्रता से युक्त मनुष्यों का प्रेमी होता है। तथा स्वप्न में सुवर्ण सूर्य, दीपक, दावाग्नि, पलाश पुष्प, मणि, कनईल पुष्प, लाल कमल, नपुंसक, खून के समूह व बिजली के समूहों को देखता है।

कफ प्रकृति फल- जिसकी कफ प्रकृति होती है वह जातक लक्ष्मीवान, गठित देह सन्धि, धैर्यवान, बलवान, चिकनी कान्ति वाला, सुन्दर देहधारी, ग्रहण कर्ता, सत्व गुणों वाला, मृदङ्ग व मेघ के शब्द से भी अधिक शब्द वाला, सहनशील, गौर वर्ण, लाल नेत्र प्रान्त वाला, मधुर रस का प्रेमी, शत्रु से शत्रुता करने वाला, कृपालु अर्थात् उपकार मानने वाला, क्लेश में प्रसन्न, समस्त मनुष्य व मित्र एवं गुरुजनों का पूजक होता है। वह सोता हुआ स्वप्न में समुद्र, नदी, तालाब, मोती का समुदाय, हंस, सफेद कमल, शंख, नक्षत्र, कुन्द, पुष्प, चन्द्रमा और तुषारपात अर्थात् पाला पतन को देखता है।

राजयोग में विशेष कथन- यदि कुण्डली में बली भूमि आदि ग्रह से राजयोग की सत्ता हो तथा सूर्य चन्द्रमा निर्बल हों तो राजयोग नहीं होता है, किन्तु राजयोग कारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा में धन पुत्रादि प्राप्ति होती है।

इसके पूर्व अनेक राजयोगों का वर्णन किया गया है। यहाँ पर यह कहना है कि उन राजयोगों के फल कैसे भोग हो जाते हैं, इसका वर्णन यहाँ ‘राजयोगभद्र निरूपण’ में किया जा रहा है।

राजयोगभद्र विचार- जन्म काल में मङ्गल, रवि, गुरु और शनि इनमें सभी या ३ या २ अपने नीचराशि में हो और इन्हीं में कोई एक लग्न में पड़े तथा वृश्चिक में चन्द्रमा हो तो राजयोग का भद्र हो जाता है।

अन्य राजयोगभद्र विचार- जन्म काल में यदि क्षीण चन्द्रमा चर राशि

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के अन्तिम नवांश में, स्थिर राशि के अष्टम, द्विस्वभाव राशि के प्रथम नवांश में हो उस पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो राजयोग भङ्ग हो जाता है।

पुनः राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में सब पापग्रह अपने नीच या शत्रु राशि में होकर केन्द्र में हो और सब शुभ ग्रह त्रिक अर्थात् १२, ६, ८वें स्थान में हो तो राजयोग भङ्ग होता है!

अन्य प्रकार से राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में यदि लग्न में वर्गोत्तम नवमांश न हो तथा किसी भी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो राजयोग भङ्ग हो जाता है और जातक दरिद्र होता है।

अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में कुष्ठ लग्न हो, ३ ग्रह नीच में, बृहस्पति अस्त और नीच में हो तथा एक भी ग्रह उच्च में नहीं हो, न शुभ ग्रह से युक्त ही हों तो सैकड़ों राजयोग भङ्ग हो जाता है।

अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में केन्द्र में या चन्द्रमा के साथ शुभ ग्रह नहीं हो तथा चार ग्रह अस्त, नीच या शत्रु राशि में हो तो राजयोग का भङ्ग होता है।

अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में सूर्य अपने नवमांश में हो, चन्द्रमा अस्त हो, पापग्रह से दृष्ट और शुभग्रह से अदृष्ट हो तो जातक कुछ दिन राज्यकर पश्चात् राज्यच्युत होकर दुखी होता है।

प्रकारान्तर से राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में चन्द्रमा लग्नेश को शत्रु दृष्टि से देखता हो, रवि मङ्गल शनि ये ३, ६, ९ स्थान में हो, शुभग्रह अस्त हो और केन्द्र में नहीं हो तो राजयोग भङ्ग हो जाता है!

अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में यदि पाँच ग्रह नीच में या अस्त हों तो बताए हुए राजयोग का भङ्ग हो जाता है!

अपशकुन से राजयोगभङ्ग विचार- जन्म समय में उल्कापात, निर्घात, व्यतीपात, या केतु का दर्शन हो तो राज योग भङ्ग हो जाता है।

अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म समय त्रिशङ्कुकुतारा का उदय, और लग्न में शनि तथा अन्य भी कोई उत्पात हो तो राजयोग का भङ्ग होता है।

अन्य भङ्ग विचार- यदि योगकारक ग्रहों में युद्ध की संभावना हो, वे ग्रह कान्तिहीन और क्षीणबल हो तो राजयोग के बाधक होते हैं।

अन्य भङ्ग विचार- क्षीण चन्द्रमा परम नीच ( वृश्चिक के १० अंश ) में हो तो साधारण राजयोग नष्ट हो जाता है।

प्रकारान्तर से राजयोगभङ्ग विचार- यदि सूर्य तुला राशि के दशवें अंश में हो तो जैसे लोभ से सब गुणों का नाश होता है ठीक उसी प्रकार सब राजयोगों का नाश हो जाता है।

और यदि जन्म के समय तुला राशि के दशवें अंश में सूर्य हो तो हजार राजयोगों का भी नाश हो जाता है।

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अन्य राजयोगभङ्ग विचार- यदि अन्य ग्रह अपने मूलत्रिकोण, उच्च या राशि में हो तो तथापि केवल एक रवि अपने नीच में हो तो योग विफल हो जाता है।

यदि मकर का गुरु लग्न में हो तो जैसे कामातुर निर्धन मनुष्य वेश्या के घर में दुखी होता है ठीक उसी प्रकार वह जातक दुखी होता है। यदि चन्द्रमा अपने घर का नहीं हो।

केमद्रुम योग में चन्द्र पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो राजयोग नष्ट हो जाता है और जातक दुराचारी होता है।

प्रकारान्तर से विचार- यदि तीन या अधिक ग्रह नीच में हों तो चक्रवर्ती राजा का पुत्र भी दरिद्र होता है।

यदि पाँच ग्रह अधिशत्रु या नीच राशि में हो और रवि या चन्द्र उच्च में नहीं हो तो राजयोग नष्ट हो जाता है।

अन्य राजयोगभङ्ग विचार- शुक्र यदि अपने नीच नवांश में हो तो राजयोग में उत्पन्न भी राज्यच्युत हो जाता है।

फल में विशेष- पूर्व जो राजयोग कहें हैं, और ये प्रबल राजयोग भङ्ग जो कहे गए हैं, इन दोनों के बलाबल विचार कर योग या भङ्ग कहना चाहिये।

राजयोग ज्ञान- जन्म कुण्डली में सूर्य कन्या में, मङ्गल और गुरु वृश्चिक में, चन्द्रमा मेष में हो इन पर अन्य ग्रहों की दृष्टि नहीं हो तो वह जातक राजा होता है। जिसकी युद्ध यात्रा में हाथी के पादधूलि से आकाश आच्छादित हो जाता है।

जन्मनक्षत्र से दशेश ज्ञान प्रकार- जन्म नक्षत्र की संख्या में से २ घटाकर शेष में ९ से भाग दें, एकादि शेष से सूर्यादि दशेश जानना चाहिए।

यथा ९ शेष से सूर्य, २ शेष से चन्द्र, ३शेष से मङ्गल, ४ शेष से राहु, ५ शेष से गुरु, ६ शेष से शनि, ७ शेष से बुध, ८ शेष से केतु ९ या ० शेष से शुक्र की दशा समझनी चाहिए।

ग्रहदशा वर्ष और भुक्त भोग्य वर्ष ज्ञान प्रकार- विंशोत्तरी दशा क्रम में सूर्य का दशा वर्ष = ६, चन्द्र = १० मङ्गल = ७, राहु = १८, गुरु = १६, शनि = १९, बुध = १७, केतु = ७ और शुक्र = २० वर्ष होता है।

अब जन्म नक्षत्र के भयात व भभोग की पूर्ववत् गणना कर भयात में जन्म नक्षत्र वश ज्ञात दशेश ग्रह की दशा वर्ष से गुणा कर भभोग से भाग देने पर जो लब्धि होती है, उसे दशा वर्ष और शेष में १२ से गुणा कर भभोग से भाग देने पर लब्धि मास तथा शेष में ऋण से ३०, ६०, ६० से गुणा और भभोग से भाग देने पर दिन, घटी व पल भी प्राॅप्त होते हैं। इस प्रकार प्राप्त

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वर्षादि ग्रह दशा भुक्तवर्षादि होती है। दशा वर्ष से घटाने पर भोग्य वर्षादि हो जाती है। जैसे-

पूर्व उदाहरण ( १५ ) में साधित पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का भयात = २१।०१ व भभोग = ६०१५३ हैं

इससे शुक्र दशा का भुक्तवर्षादि इस प्रकार साधन करना चाहिए-

भुक्तवर्षादि = भभोगपलात्मक × ग्रह दशा वर्ष

शुक्र भुक्तवर्षादि = १२६१ × २० शुक्र दशा

= ३६५३

= ६ वर्ष १० मास २५ दिन २४ घटि ३३ पल

अतः शुक्र भोग्यादि वर्ष = २० वर्ष - ६।१०।२५।२४।३३

= १३ । १ । १४ । ३५।२७

इस प्रकार भुक्त व भोग्य वर्षादि साधन कर विंशोत्तरी दशा चक्र और अन्तर्दशा चक्र का लेखन करना चाहिए।

विंशोत्तरी दशा में ग्रहों के नक्षत्र-क्रम-विंशोत्तरी दशा क्रम में कृत्तिकादि भरणी पर्यन्त २७ नक्षत्रों ( अभिजित् को छोड़कर ) को तीन आवृत्तियों में क्रम से सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु और शुक्र; इन ९ ग्रहों के कहे गए हैं।

दशा व अन्तर्दशा, उसके स्वामियों के नाम, उनके नक्षत्र और वर्षादि संख्या अगलिखित चक्र से स्पष्ट ज्ञात होगा।

सारणी द्वारा विंशोत्तरी दशा साधन- साधारण प्रयास से दशासाधन के लिये सारणी का उपयोग किया जाता है। इसके पहले गणित द्वारा दशा साधन दिखाया गया है। यहाँ सरलता से दशा साधन का क्रम दिखाया जायेगा। दशा साधन में स्पष्ट चन्द्र की आवश्यकता रहती है।

सारणी में ऊपर राशि तथा बांये तरफ अंश दिये हैं। अभीष्ट स्पष्टचन्द्र की राशि अंश के सम्मुख कोष्टक में लब्ध फल दशा का भुक्त वर्षादि होगा। जो दशा दो अंशों के भीतर समाप्त होती है।

अतः १३ अंश सम्बन्धि फल ६-६-२७ तथा उस दशा के समाप्ति के वर्ष ७ एक ही कोष्टक में दिये हैं। इसका ध्यान दशा साधन में रखना चाहिये।

इस दूसरी तालिका में कला-विकला सम्बन्ध दशा फल के लिये एक विस्तृत कला-विकला सारणी दी है। इसमें प्रति कला-विकला सघ्बन्धि फल अनायास प्राप्त हो जाता है।

इन सब फलों का योग दशा का भुक्तमान बन जाता है। इसे ग्रह दशा

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विंशोत्तरी दशा प्रकरण

वर्ष में घटाने से दशा का भोग्यमान प्राप्त होगा। उदाहरण-स्पष्ट चन्द्र ४।१७।५६।१९ पर से दशा साधन ऊपर लिखे नियमानुसार सारिणी द्वारा किया जाता है। जातक का जन्म भौम दशा में हुआ है।

व. मा. दि. घ. प.

५।६।१०।०।० राशि ४ अंश १७ सप्तम्धि फल

१६।२४।१।०।० कला ५६ सम्बन्धि फल

  • १।२४।० विकला ०९ सम्बन्धि फल

६।१०।१२।५।१० भौम भुक्त दशा वर्षादि। इसे शुक्र के दशा वर्ष सात में घटाने से भोग्य दशा वर्षादि ३।१९।८।५५।१९ प्राप्त हुए। इस प्रकार अन्य उदाहरणों का साधन करना चाहिये।

अन्तर्दशा ज्ञान प्रकार-अपनी प्राप्त दशा वर्ष को ३० से गुणा कर प्राप्त फल में जिस ग्रह की अन्तर्दशा लानी हो, उसकी दशा वर्ष से पुनः गुणा करके ३० से भाग देने से अन्तर्दशा वर्ष, मास, दिन आदि में प्राप्त होता है और प्रत्यन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा सारिणी देखनी चाहिए।

०००

सूर्य महादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल

सूर्य महादशा में सूर्यन्तर का फल-सूर्य उच्चराशि में या अपनी राशि में या केन्द्र ( १-४-७-१० ) में या लाभ अथवा त्रिकोण ( ५-९ ) में रहे तो वह अपनी दशा और अन्तर्दशा में धन-धान्य का लाभ कराता है, यदि नीचादि अशुभ राशि में स्थित हो तो अशुभ फल देता है।

सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी दशा अन्तर्दशा में अपमृत्यु ( मरणतुल्य कष्ट ) का भय होता है। अपमृत्यु दोष के निवारण हेतु मृत्युञ्जय का जप तथा सूर्य की पूजा आदि शान्ति क्रिया करानी चाहिए।

सूर्य महादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-चन्द्र यदि केन्द्र त्रिकोण ( १-४-७-१० ) में हो तो सूर्यदशा में चन्द्र की अन्तर्दशा आने पर विवाहादि उत्सव एवं धन-सम्मत्ति-गृह-भूमि-पशु-वाहन आदि की वृद्धि होती है।

चन्द्रमा यदि स्वोच्च, स्वराशि में हो तो स्त्रीसुख धन पुत्रादि का लाभ तथा राजा महाराजा की कृपा से अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है।

चन्द्रमा यदि क्षीण या पापग्रह से युक्त हो तो स्त्री पुत्रादि को पीड़ा-कार्यहानि-लोगो से विवाद-नौकर सेवक का नाश-राजा से विरोध तथा धन धान्यादि का भी नाश होता है। यदि ६, ८, १२ में चन्द्र रहे तो जलभय-मनोव्यथा-बन्धन-रोगभय-स्थानहानि-बन्धुओं से विवाद-कदन्नभोजन-

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चोर आदि से पीड़ा-राजा का कोप तथा मूत्र कृच्छ्रादि रोग से शरीर में कष्ट होता है।

दशाधिपति से ११, ९ तथा केन्द्रस्थान में शुभग्रह हो तो सूर्यदशा के चन्द्रान्तर में भोग-भाग्योदय-सन्तोष-स्त्री व पुत्र सुख की वृद्धि-राज्यलाभ-स्थलालाभ-विवाह्योपवीतादि उत्सव-वस्त्र-भूषण-वाहन का लाभ तथा पुत्र पौत्रादि का सुख होता है।

दशेश से ६, ८, १२ में चन्द्र हो अथवा बलहीन हो तो कदन्नभोजन तथा देशान्तरगमन होता है। मारकेश ( द्वितीयेश-सप्तमेश ) की अन्तर्दशा में अपमृत्युभय भी होता है। उसकी शान्ति के लिये श्वेता गौ एवं महिषी का दान करना चाहिए।

सूर्यमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-मङ्गल यदि स्वोच्च-स्वराशि-केन्द्र या त्रिकोण में हो तो सूर्यदशा में मङ्गल की अन्तर्दशा आने पर भूमिलाभ-कृषि से धन धान्य की वृद्धि-गृह क्षेत्रादि का लाभ व रक्तवस्त्र की प्राप्ति होती है। भौम लग्नेश से युक्त हो तो सौख्य-शत्रुनाश-मन दृढ़ता-राजसम्मान-कुटुम्बसुख तथा भाईयों की वृद्धि होती है।

दशेश से १२, ८ में भौम स्थित हो और पापग्रह से युत या दृष्ट होकर अधिकार तथा बल से हीन हो तो उसकी अन्तर्दशा में कुरबुद्धि-मानसिक रोग-कारागार-बन्धुनाश-भाईयों में विरोध और कार्यनाश होता है।

भौम यदि नीचराशि में हो या दुर्बल हो तो राजा के द्वारा धननाश तथा यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शारीरिक और मानसिक कष्ट होता है। वेदपाठ-जप-दान-वृषोत्सर्ग आदि शान्ति कार्य करने से आयु-आरोग्य की वृद्धि और कार्य में सिद्धि प्राप्त होती है।

सूर्यमहादशा में राहु अन्तर्दशाफल-सूर्य की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में रहे तो आरम्भ में २ मास तक धनहानि-चौर सर्प और व्रण का भय तथा स्त्री पुत्र को कष्ट होता है इसके बाद सुखलाभ होता है।

राहु यदि शुभग्रह से युत हो या शुभनवांश में स्थित हो तो आरोग्य-सन्तोष-राजा से सम्मान प्राप्ति और सुख होता है। लग्न से उपचय ( ३, ६, १०, ११ ) स्थान में यदि राहु योग कारक ग्रह से युत हो या दशेश से शुभस्थान में स्थित हो तो राजा से सम्मानप्राप्ति-भाग्यवृद्धि-यशलाभ-स्त्रीपुत्र का कुशल तथा पुत्र पौत्र जन्म आदि उत्सव से घर में कल्याण व शोभा होती है।

सूर्य से १२, ८ में स्थित होकर राहु यदि बलहीन हो तो बन्धन-स्थन्नाश-चोर व सर्प का भय तथा व्रण होता है। स्त्री पुत्र की उन्नति-पशु-घर-कृषि का नाश तथा गुल्म-क्षय-ातिसार आदि रोग से पीड़ा होती है।

राहु यदि २, ७ में स्थित हो या इन स्थान के अधिपतियों से युक्त हो

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तो उसकी अन्तर्दशा में अपमृत्यु तथा सर्प का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु दुर्गा का पूजन-जप तथा छाग-कृष्णागौ-महिषी आदि का दान करना चाहिए।

सूर्यमहादशा में गुरु अन्तर्दशा का फल-सूर्य महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो तथा गुरु लग्न से केन्द्र-त्रिकोण में या स्वोच्च-स्वगृह या मित्रग्रह या मित्रके वर्ग में स्थित हो तो स्त्रीप्राप्ति, राजा की कृपा, धन धान्य-पुत्रसुख-महाराज की कृपा से अभीष्ट कार्यसिद्धि एवं विप्रों से सम्मान् और वस्त्रादि का लाभ होता है।

यदि बृहस्पति भाग्येश और दशमेश हो तो राज्यलाभ-पालकी आदि वाहन का लाभ तथा स्थानप्राप्ति होती है। दशेश से शुभस्थान में गुरु रहे तो भाग्यवृद्धि-धार्मिकार्य-देवपूजा-गुरुभक्ति आदि पुण्यकार्य एवं मनोकामना सिद्ध होती हैं।

यदि दशापति से गुरु ६, ८ में हो या नीचस्थान में हो या पापग्रह से युत हो तो स्त्री-पुत्र को कष्ट-शरीर में पीड़ा-राजकोप-भय-इष्टकार्य की हानि-महाभय-पापकर्म से धननाश-शरीर में कष्ट तथा मानसिक व्यथा होती है। इसमें सुवर्ण दान, कपिला गौ का दान तथा इष्टदेव की पूजा करने से आरोग्य होता है।

सूर्यमहादशा में शन्यान्तर्दशा का फल-लग्न से केन्द्र त्रिकोण में शनि हो तो सूर्य की महादशा में शनि की अन्तर्दशा आने पर शत्रुनाश-पೂರ್ಣसुख-सवल्प अन्न व द्रव्य का लाभ और घर में विवाहादि शुभ कार्य होते हैं। शनि यदि स्वोच्च-स्वगृह या मित्रराशि में या मित्रग्रह से युक्त हो तो कल्याण-सम्पत्तिवृद्धि, राजा से सम्मान-कीर्ति तथा विविध प्रकार से वस्त्र व धन का लाभ होता है।

यदि शनि दशेश से ८, १२ में हो या पापग्रह से युत हो तो वात-शूल-ज्वर-अतिसार आदि रोग से पीड़ा-बन्धन-कार्यहानि-धननाश-कलह तथा स्वजनों से विग्रह होता है।

सूर्यमहादशा में शनि की अन्तर्दशा हो तो प्रारंभ में मित्रहानि, मध्य में शुभ तथा अन्त में क्लेश होता है। शनि नीचस्थ हो तो भी इसी प्रकार माता-पिता का वियोग तथा भ्रमण कार्य होता है। यदि शनि द्वितीयेश-सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु गौ-महिषी और छाग का दान तथा मृत्युञ्जय जप करना चाहिए।

सूर्यमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-सूर्य महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध यदि उच्च-स्वगृह या लग्न से केन्द्र त्रिकोण में हो तो राज्यलाभ-उत्साह-स्त्री-पुत्रादि का सुख-राजा की कृपा से वाहन वस्त्र आभूषण की प्राप्ति-पुण्यतीर्थ दर्शन व गौ आदि पशुधन का लाभ होता है।

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यदि बुध भाग्येश लाभेश से युक्त हो तो लाभ व वृद्धि कारक होता है। ९-५-१० स्थान में बुध हो तो लोक में सम्मान-सुकर्म व धर्म की वृद्धि-गुरु व देवता में भक्ति-धनधान्य की वृद्धि-विवाह तथा पुत्र जन्म होता है।

यदि उच्चराशि या त्रिकोणादि शुभस्थान बुध में हो तो विवाह-यज्ञ-दान-धर्मानुष्ठान-अपने नाम की कीर्ति या यश से दूसरा उपनाम-सुभोजन-वस्त्र-आभूषण की प्राप्ति सहित इन्द्र के समान वह मनुष्य सुखी होता है।

बुध यदि दशेश से ६, ८, १२वें स्थान में या नीचराशि में हो तो शरीरकष्ट-मन में सन्ताप तथा स्त्री पुत्र को कष्ट होता है। इसकी अन्तर्दशा के प्रारम्भ में कष्ट, मध्य में स्वल्प सुख तथा अन्त में राजभय और देशान्तरगमनागमन होता है।

बुध यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट व ज्वररोग होता है। इसकी शान्ति हेतु विष्णुसहस्रनाम का पाठ, अन्न तथा चाँदी की प्रतिमा का दान करना चाहिये।

सूर्यमहादशा में केतुन्तर्दशा का फल-सूर्य की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो तो शरीर में पीड़ा-मनोव्यथा-धनहानि-राजभय और बन्धुओं से कष्ट होता है। केतु यदि लग्नेश से युत हो तो प्रारम्भ में सुख-मध्य में कष्ट और अन्त में मृत्यु सम्बन्धि समाचार प्राप्त होता है।

दशेश से ८, १२ स्थान में पापग्रह हो तो कपोल या दाँत में रोग, मूत्रकृच्छ्ररोग-स्थाननाश-धननाश-मित्र की हानि-पिता का मरण-विदेश यात्रा तथा शत्रु से कष्ट होता है।

लग्न से उपचय स्थान ३, ६, १०, ११ में योगकारक ग्रह से युक्त अथवा शुभवर्ग से युक्त केतु हो तो शुभकर्म फलदायक-स्त्री-पुत्र सुख-सन्तोष-मित्रों की वृद्धि-वस्त्रादि का लाभ और सुयश की वृद्धि होती है।

केतु यदि २, ७ स्थान के स्वामी से युत हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु दुर्गाजी की आराधना तथा छागदान करना चाहिये।

सूर्यमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-केन्द्रत्रिकोणस्थित या स्वोच्च-स्वरर्ग-मित्रवर्ग-स्थित शुक्र हो तो सूर्य की महादशा में उसकी अन्तर्दशा आने पर इच्छानुसार स्त्रीसुख-सम्पत्ति-ग्रामान्तर गमन-विप्र और राजा का दर्शन-राज्यलाभ-उत्साह-वैभव-घर में शुभकृत्य-मिष्टान्न भोजन-मोती आदि रत्न-स्वर्ण-पशु-धन-धान्य-उत्साह और सुयश की वृद्धि तथा विविध वाहनों का लाभ होता है।

यदि शुक्र लग्न या दशापति से ६, ८, १२ में हो या निर्बल हो तो उसकी अन्तर्दशा में राजकोप-मन में सन्ताप और स्त्री-पुत्रादि को कष्ट होता है। इसकी अन्तर्दशारम्भ में मध्यमफल, दशामध्य में उत्तमफल और अन्त में अपयश-स्थाननाश-बन्धुओं में द्वेष तथा सुख की हानि होती है।

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८५० विंशोत्तरी दशा प्रकरण सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट एवं रोगभय होता है। षष्ठेश-अष्टमेश से युक्त शुक्र हो तो अपमृत्यु का भय होता है। दोषों की शान्ति हेतु मृत्युञ्जयजप-कपिला गौ का दान-महिषीदान तथा रुद्र का जप करना चाहिए। इस तरह करने पर शंकर जी की प्रसन्नता से सुख शान्ति की प्राप्ति होती है।

चन्द्रमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल चन्द्रमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-यदि स्वोच्च-स्वराशि-केन्द्र त्रिकोण स्थित चन्द्र हो, अथवा दशमेश-नवमेश से युक्त हो तो उसकी महादशा अन्तर्दशा में हाथी-घोड़ा-वस्त्रादि का लाभ-देव और गुरुओं में भक्ति-भगवद्भजन-राज्यलाभ-परमसुख-यश की वृद्धि और शरीर सुख होता है। चन्द्रमा यदि पूर्णबली हो तो सेनापतित्व आदि का अधिकार एवं सुख प्राप्त होता है।

चन्द्रमा यदि नीचराशि में हो, पापयुक्त हो, ६, ८, १२ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में धननाश-स्थानहानि-आलस्य-सन्ताप-राजा व मन्त्री से विरोध, माता को कष्ट-बन्धन व बन्धुओं का नाश होता है। चन्द्र यदि २, ७ स्थान का स्वामी हो या १२, ८ के स्वामी से युक्त हो तो शरीर में कष्ट व अपमृत्युभय होता है। उसके निवारण हेतु कपिला गौ और महिषी का दान करना चाहिये।

चन्द्रमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो तथा भौम केन्द्रत्रिकोण में हो तो भोग्यवृद्धि-राज्य से सम्मान-वस्त्राभूषण का लाभ-यत्न से कार्य में सिद्धि होती है इसमें संशय नहीं, गृह और कृषि में वृद्धि तथा व्यवहार में विजय होता है, यदि स्वोच्च-स्वराशि में हो तो कार्यलाभ व महत्सौख्य होता है।

भौम यदि ६, ८, १२ में हो या पापयुक्त हो अथवा दशापति से अशुभ (६, ८, १२) स्थान में शत्रु से दृष्ट हो तो शरीर में कष्ट-घर और कृषि में हानि, व्यवहार में हानि, सेवक और राजा से कलह, स्वजनों से बन्धुओं से वियोग तथा क्रोध की वृद्धि होती है। भौम यदि २, ९ का स्वामी हो ८ स्थान में हो या अष्टमेश हो तो अशुभ फल होता है, उसके दोषशमन हेतु ब्राह्मणों का सत्कार करना चाहिये।

चन्द्रमहादशा में राहुन्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में केन्द्र त्रिकोण में स्थित राहु की अन्तर्दशा हो तो प्रारम्भ में कुछ शुभ बाद में चोर सर्प और राजा का भय-पशुओं को कष्ट-बन्धु और मित्रों की हानि-मन्नाश और मनस्ताप होता है।

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शुक्र यदि नीचराशि में हो, अस्त हो, पापग्रह से युत दृष्ट हो तो भूमि-पुत्र-मित्र-स्त्री-पशु की हानि और राजा से विरोध होता है।

शुक्र यदि द्वितीय भाव में स्वोच्च या स्वराशि में हो तो निधि (गड़ा हुआ धन), भूमि व सुख का लाभ तथा पुत्रोत्पत्ति होती है। नवमेश या एकादशेश से युत शुक्र हो तो भाग्य की वृद्धि, राजा की कृपा से सुख और अभीष्ट कार्य सिद्धि, देव-ब्राह्मण में भक्ति तथा मोती, मूंगा आदि रत्नों का लाभ होता है।

दशेश से केन्द्र त्रिकोण में शुक्र हो तो गृह लाभ, कृषि की वृद्धि, धन का लाभ और सुख होता है।

दशापति से ६, ८, १२ में शुक्र हो या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो विदेशवास से दुःख, मृत्यु, और चोरभय होता है।

शुक्र यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी अन्तर्दशा में अपमृत्यु (महाकष्ट) का भय होता है। इस दोष की शान्ति के लिये रुद्रीप, कपिला गोदान तथा चाँदी का दान करने से शुक्र की कृपा से सुख और शान्ति की प्राप्ति होती है।

चन्द्रमहादशा में सूर्यन्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च, स्वराशि-केन्द्र या ५, ९, ११, २, ३ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में नष्टराज्य और धन की प्राप्ति, घर में कल्याण, मित्र और राजा की कृपा से ग्राम और भूमि का लाभ, पुत्रजन्म तथा घर में लक्ष्मी की कृपा होती है। अन्तर्दशा के अन्त में शरीर में आलस्य और ज्वर से कष्ट होता है।

दशेश से सूर्य यदि ८, १२ में हो या पापग्रह से युत हो तो राजा, चोर और सर्प से भय, ज्वर आदि रोग तथा विदेशगमन से कष्ट होता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी अन्तर्दशा में ज्वर से कष्ट होता है। इसके शान्त्यर्थ श्री शड्कर की पूजा करनी चाहिए।

भौममहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल

भौममहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-भौम की दशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम यदि लग्न से केन्द्र में या ५, ९, ११, ३, २ में हो, लग्नेश से युत हो, शुभग्रह से युत हो तो राजा की कृपा से धनलाभ, लक्ष्मी की कृपा, नष्टराज्य व धन का लाभ, पुत्रजन्म आदि उत्सव और गौ महिष आदि दुधारू पशुओं की वृद्धि होती है।

भौम यदि स्वोच्च, स्वराशि, स्ववांश में रहकर, बली हो तो गृह, भूमि, गौ, महिष आदि का लाभ तथा राजा की कृपा से अभीष्टसिद्धि होती है।

भौम यदि ८, १२ भाव में हो या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो मूत्रकृच्छू

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आदि रोग से कष्ट, व्रण, चौर, सर्प और राजा का भय तथा धन-धान्यादि का हास होता है।

भौम यदि द्वितीयेश- सप्तमेश हो तो देह में कष्ट और मन में व्यथा होती है।

दोषशान्त्यर्थ रुद्र का जप तथा वृषभ दान करने पर शंकर की कृपा से आरोग्य व सब सम्पत्ति का लाभ होता है।

भौममहादशा में राहन्तर्दशा का फल- भौम की दशा में राहु की अन्तर्दशा हो तथा राहु यदि अपने मूलत्रिकोण, स्वोच्चादि में हो या लग्न से केन्द्र में या ११, ५, ९ में हो और शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो उस समय में राजा से सम्मान, गृह, भूमि, आदि का लाभ, पुत्र स्त्री को सुख, व्यापार में अधिक लाभ, गढ़ा आदि तीर्थ में स्नान और विदेशगमन होता है।

राहु यदि लग्न से ८, १२ में या पापग्रह से युत दृष्ट रहे तो उसकी अन्तर्दशा में चौर, सर्प, व्रणरोग, पशुओं की हानि, वात, पित्त से रोग तथा बन्धन होता है।

द्वितीय स्थान में राहु हो तो धननाश, सप्तम भाव में हो तो अपमृत्यु का महाभय कहना चाहिये।

इसमें नाग की पूजा, ब्राह्मण भोजन, मृत्युंजय का जप करने से आयु तथा आरोग्य लाभ होता है।

भौममहादशा में जीवान्तर्दशा का फल- भौम की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो तथा गुरु यदि लग्न से त्रिकोण में या केन्द्र में या ११ या २ में हो, अपने उच्चनवांश या स्वांश में हो तो सुयश, राजसम्मान, धन-धान्यवृद्धि, गृह में कल्याण, सम्पत्ति तथा स्त्री-पुत्रादि को लाभ होता है।

दशापति 'भौम' से गुरु यदि त्रिकोण में या केन्द्र में या ११ में हो, नवमेश-दशमेश-चतुर्थेश या लग्नेश से युत हो, शुभ नवमांश आदि में स्थित हो तो उसकी अन्तर्दशा में गृह-भूमि की वृद्धि, कल्याण, सम्पत्ति, आरोग्य, सुयश, पशुओं का लाभ, व्यवसाय में वृद्धि, स्त्री पुत्र को सुख और राजा से आदर व धन का लाभ होता है।

गुरु यदि ६, ८, १२ में हो या नीचराशि में या अस्त हो, पापग्रह से युक्त हो, निर्बल हो तो चोर, सर्प, राजभय, पित्तरोग, प्रेतबाधा तथा नौकरों और सहोदरों का नाश होता है।

यदि गुरु द्वितीयेश हो तो अपमृत्युभय व ज्वरपीड़ा होती है।

दोषशान्त्यर्थ शिव सहस्रनाम का जप करना चाहिये।

भौममहादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल- भौम की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो तथा शनि यदि केन्द्र में त्रिकोण में या अपने मूलत्रिकोण, उच्च या स्वनवांश में हो, लग्नेश या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो राजा से आदर, यश की वृद्धि, धनधान्यवृद्धि, पुत्र पौत्रादि से सुख, गोधन की वृद्धि, विशेषकर शनिवार व शनि के मास ( माघ-फाल्गुन ) में पुत्रादि की वृद्धि होती है।

शनि यदि नीच या शत्रुराशि में या ८, १२ भाव में हो तो उसकी

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अन्तर्दशा में म्लेच्छा राजाओं से भय, धननाश, कारागार में बन्धन, रोगभय तथा कृषि आदि की हानि होती है। यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश हो और पापग्रह से युत हो तो महाभय, धननाश, राजा का कोप, मनोव्यथा, चोर, अग्नि, राजा से पीड़ा, सहोंदरों का नाश, कुटुंबों से द्वेष, पशुओं की हानि, मृत्युभय, पुत्र स्त्री को कष्ट तथा कारागारादि राजदण्ड होता है।

शनि यदि दशेश से केन्द्र में या ११, ५, ९ में रहे तो विदेशयात्रा, अपयश, जीवहिंसादि दुष्कर्म, भूमि आदि के विक्रय से हानि, स्थाननाश, मनोव्यथा, युद्ध में पराजय तथा मतक्रृच्छ्र रोग का भय होता है।

यदि दशेश से ८ या १२वाँ स्थान पापग्रह से युक्त हो तो उसकी अन्तर्दशा में मरण, राजा-चौर आदि से भय, वातरोग, शूलरोग और बन्धुओं तथा शत्रुओं से भय होता है। दोष शान्ति हेतु मृत्युञ्जय का जप करने पर शङ्कर की कृपा से सुखप्राप्त होता है।

भौममहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में बुध का अन्तर हो और बुध यदि लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो तो सत्सङ्ग, अजपा जप, दान-धर्म में रत, सुयश-नीति में प्रवृत्ति, मिष्टान्न भोजन, वाहन-वस्त्र-पशु आदि का लाभ, राजा के दरबार में अधिकार से सुख तथा कृषिकार्य में सफलता प्राप्त होती है।

बुध यदि नीचराशि में हो या अस्तङ्गत हो अथवा ६, ८, १२ स्थान में हो तो उसकी अन्तर्दशा में हृदयरोग, बन्धन, बन्धुनाश, स्त्री-पुत्र को कष्ट तथा धन व पशुओं का नाश होता है।

बुध यदि दशेश से युत हो तो शत्रुओं की वृद्धि, विदेशगमन, विविध रोग व राजा से विरोध तथा स्वजनों से कलह होता है।

बुध यदि दशेश से केन्द्र-त्रिकोण में हो या अपने उच्चराशि-स्वराशि में हो तो अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि, धन धान्य लाभ, राजा से सम्मान, राज्यलाभ, वस्त्र, आभूषण की प्राप्ति, अनेक वाद्य (मृदङ्ग आदि) में प्रेम, सेनापतित्व, शास्त्रपुराण की चर्चा, घर में स्त्री-पुत्र आदि का सुख और लक्ष्मी की कृपा होती है।

बुध यदि भौम से ६, ८, १२वें स्थान में हो या पापग्रह से युक्त हो तो उसकी अन्तर्दशा में माननाश, पापबुद्धि, कटुवाणी, चोर-अग्नि और राजा से भय, मार्ग में चोर डाकुओं का भय और अकस्मात् कलह होता है इसमें कोई सन्देह नहीं।

बुध यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी अन्तर्दशा में भयङ्कर रोग होता है। इसमें अश्वदान, विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से सब सम्पत्तियों की प्राप्ति तथा कष्टों का नाश होता है।

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दशेश से ६, ८, १२वें स्थान में सूर्य यदि पापग्रह से युत हो तो उसकी अन्तर्दशा में शरीरकष्ट, मनोसन्ताप, कार्यहानि, भय, मस्तिष्करोग, ज्वर, अतिसार आदि रोग होता है। यदि पूर्ण द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो सर्प, विष और ज्वर से भय तथा पुत्र को क्लेश होता है। यदि उससमय सूर्य की आराधना विधिपूर्वक की जाय तो निरोगता और धनलाभ होता है।

भौम्महादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि उच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में हो अथवा ९, ४, १०, १९ इन भावों के स्वामी से युत हो तो सुगन्ध, माल्य, वस्त्रादि का पूर्णलाभ, तालाब, गोशाला आदि का निर्माण, घर में विवाहादि उत्सवकार्य, स्त्री-पुत्र को सुख, माता-पिता से सुख, लक्ष्मी की कृपा, राजा की कृपा से अभीष्ट कार्यसिद्धि होती है। चन्द्रमा यदि पूर्ण हो तो पूर्णफल और क्षीण हो तो अल्पफल होता है।

चन्द्र यदि नीचराशि में या शत्रुराशि में अथवा या लग्न या दशापति से ६, ८ में हो तो मृत्यु, स्त्रीपुत्र को कष्ट, भूमि का नाश, पशु और धन की हानि तथा चौर व युद्धभय होता है। चन्द्र यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु, शरीर कष्ट तथा मन में सन्ताप होता है। दोषशान्त्यर्थ दुर्गाजी और लक्ष्मी जी का जप, गोदान और महिषदान करने पर आरोग्य और सुख होता है।

राहुमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल

राहुमहादशा में राहन्तर्दशा का फल-कर्क, वृश्चिक, कन्या और धनु राशि में राहु हो तो उसकी दशा में रजसम्बन्ध-वस्त्र वाहन भूपण की प्राप्ति, व्यापार में वृद्धि, चतुष्पद वाहन का लाभ, पश्चिम में यात्रा से वाहन वस्त्रादि का लाभ होता है। लग्न से ३, ६, १०, ११ में या योगकारक ग्रह के साथ अपने उच्चांश में या मित्रांश में राहु यदि शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो राहु की दशा और अन्तर्दशा में राज्यलाभ, उत्साह, राजा से प्रेम, स्त्री, पुत्र आदि से सुख तथा सम्पत्ति की वृद्धि होती है।

राहु यदि लग्न से ८, १२ में हो या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो चौरभय, ऋण से कष्ट, राजाधिकारि से द्वेष, इष्ट बन्धुओं का नाश तथा स्त्री-पुत्रादि को कष्ट होता है।

राहु यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो या इन दोनों (२,७) स्थान में हो तो रोग और कष्ट होता है। उस समय जप दानादि शान्ति करने से आरोग्यादि लाभ होता है।

राहुमहादशा में गुरुवार्तदशा का फल-राहु की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो तथा गुरु यदि स्वोच्च या स्वराशि या स्वांश या उच्चांश में या लग्न से

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केंद्र, त्रिकोण में हो तो स्थानलाभ, मानसिक स्थिरता, शत्रुनाश, सुख, राजा से प्रीति, शुक्लपक्ष के चन्द्र समान दिनोंदिन सम्पत्ति की वृद्धि, वाहन, गोधन का लाभ, नैत्रलय और पश्चिम दिशा की यात्रा, राजा का दर्शन, अभीष्ट कार्यसिद्धि, पुनः स्वदेश आगमन, ब्राह्मणों पर उपकार, तीर्थयात्रा, ग्राम का लाभ, देव-ब्राह्मण में भक्ति, पुत्र पौत्रादि से संतुष्टि और नित्य मिष्टान्न भोजन होता है।

गुरु यदि नीचराशि में या, अस्त में, या लग्न से ६, ८, १२ में या शत्रुराशि में या पापग्रह से युक्त दृष्ट हो तो उसकी अन्तर्दशा में धनहानि, कार्य में बाधा, मानहानि, स्त्रीपुत्र को कष्ट, हृदयरोग और राज अधिकार प्राप्त होता है।

दशेश से केंद्र में या कोण में या ११, २, ३ में गुरु हो या बली अवस्था में हो तो उसकी अन्तर्दशा में भूमिप्राप्ति, सुभोजन, पशु आदि का लाभ और दान-धर्मादि में प्रवृत्ति होती है। अन्तर्दशा के अन्तसमय में दो मास तक शरीरकष्ट तथा बड़े भाई व माता-पिता को कष्ट होता है।

दशेश से गुरु यदि ६, ८, १२वें स्थान में हो या पापग्रह से युत हो तो उसकी अन्तर्दशा में धनहानि तथा शरीर को कष्ट होता है। यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय होता है। शान्ति हेतु शंकर की सोने की प्रतिमा बनाकर पूजा करनी चाहिए इससे शिवजी की कृपा से आरोग्य सुख होता है।

राहुमहादशा में शन्यान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो और शनि यदि केंद्र में या त्रिकोण में या स्वोच्च में या स्वराशि में या मूलत्रिकोण में या ३, ११ भाव में हो तो उसकी अन्तर्दशा में राजा की सेवा से कृपा प्राप्ति, घर में विवाहादि उत्सव कार्य, पुण्य कर्म, तालाबनिमाण, शूद्र वर्ण के धनी व्यक्ति से पशु आदि का लाभ, पश्चिमदिशा की यात्रा से राजा द्वारा धनहानि, आलस्य से अल्पलाभ तथा पुनः स्वदेश में आगमन होता है।

शनि यदि नीचराशि में, शत्रुराशि या लग्न स्थान से ८, १२ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में नीचलोंगों से, शत्रु से और राजा से भय, स्त्री-पुत्र को कष्ट, अपने बन्धुओं में कलह, सन्ताप, दायादों से कलह, कार्य व्यापार में भी कलह तथा अचानक आभूषणलाभ भी होता है।

दशेश से ६, ८, १२ स्थान में या पापग्रह से युत शनि हो तो उसकी अन्तर्दशा में हृदय रोग, मानहानि, कलह, शत्रु भय, विदेशश्रमण, गुल्मरोग, कु भोजन तथा जातिवर्ग से दुःख और भय होता है। शनि यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु होती है। दोषशमनार्थ कृष्णा गौ का तथा महिष का दान करने से आरोग्य होता है।

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राहुमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध अपने उच्चराशि में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र स्थान में या पंचम में हो या बली हो तो उस अन्तर्दशा में राज्ययोग, घर में कल्याण, व्यापार में धनलाभ, उत्तम वahनसुख, विवाहादि उत्सव कार्य तथा पशुवृद्धि उत्तम रूप से होता है। बुध के मास तथा बुध के वार में सुख, राजा की कृपा से सुगन्ध-पुष्पशय्या-स्र्रीसुख, धने और यश की लाभ होता है। दशापति से बुध यदि केन्द्रस्थान में या १,३,९,१०स्थान में हो तो शरीर में आरोग्य, इष्ट कार्य की सिद्धि, पुराण इतिहास का श्रवण, विवाह, यज्ञ, दान आदि कार्य तथा धर्म व दया का उदय होता है। यदि बुध ६,८,१२स्थान में देव और ब्राह्मणों की निन्दा, भाग्यहानि, मिथ्याभाषण, दुर्बुद्धि, चौर, सर्प और राजा से कष्ट, आकारण कलह, गुरु पुत्रादि का नाश, स्त्री पुत्रादि को कष्ट, राजकोप और धननाश होता है। बुध यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है। दोषशान्त्यर्थ विष्णु सहस्रनाम का जप करना चाहिये।

राहुमहादशा में केतुवन्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो तो विदेशभ्रमण, राजभय, वातज्वर आदि रोग तथा पशुओं की हानि होती है। केतु यदि अष्टमेश से युक्त हो तो शरीर में पीड़ा व मनोव्यथा होती है तथा शुभग्रह से युक्त और दृष्ट हो तो सुख, धनलाभ, राजसम्मान, आभूषण लाभ एवं गृह में शुभकार्य होता है। यदि केतु का लग्नेश से सम्बन्ध हो तो इष्टकार्य सिद्धि और यदि लग्नेश से योग हो तो निश्चय ही धनलाभ होता है। यदि केन्द्र या त्रिकोण में केतु हो तो निश्चय ही पशुओं की वृद्धि होती है। केतु यदि लग्न से ८,१२ में बलहीन होकर रहे तो उसकी अन्तर्दशा में रोग चौर और सर्प का भय, व्रण से पीड़ा, माता-पिता का वियोग, बन्धुओं से द्वेष और मानसिकव्यथा होती है। यदि केतु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट होता है। दोष की शान्ति हेतु छागदान करना चाहिये।

राहुमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्र, त्रिकोण या ११ में हो और बली हो तो ब्राह्मणों के द्वारा धनलाभ,पशुओं की वृद्धि, पुत्रजन्मोत्सव, कल्याण, राजसम्मान तथा राज्यलाभ आदि उत्तमसुख होता है। शुक्र यदि अपने उच्च में या स्वराशि में या उच्चांश में या स्वांश में हो तो नवीन गृहनिर्माण, मिष्टात्र भोजन, पुत्र-पुत्री से सुख, मित्र का सङ्ग, सुभोजन, अन्नदानादि धार्मिक कार्य, राजा की कृपा से वाहन-वस्त्रादि का लाभ, व्यवसाय से विशेष लाभ विवाह, उपनयन आदि उत्सव कार्य होता है।

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यदि शुक्र लग्न से ६, ८, १२वें स्थान में या नीच में अथवा शत्रुराशि में हो, शनि मडल या राहु से युक्त हो तो उसकी अन्तर्दशा में रोग, कलह, पिता या पुत्र का वियोग, बन्धुओं को कष्ट, जाति वर्ग से कलह, स्वामी या अपनी ही मृत्यु, स्त्री-पुत्र को पीड़ा और शूल आदि रोग की सम्भावना होती है। शुक्र यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११, १० स्थानों में हो तो राजा से सुख, सुगन्ध शक्या गान आदि से सुख तथा छत्र चामर आदि अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है। यदि शुक्र दशेश से ६, ८, १२ में हो या पापग्रह से युत हो तो विप्र, सर्प, चोर और राजा से भय, मूत्रकृच्छ, प्रमेह, रधिरविकारादि रोग, कदन्न भोजन, शिर में कष्ट, कारावास तथा राजदण्ड से धननाश होता है। शुक्र यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो स्त्री-पुत्र को कष्ट तथा स्वयं को भी अपमृत्युुभय होता है। शान्ति हेतु श्री दुर्गा व श्री लक्ष्मी जी का जप-पाठ करना चाहिए, इससे सुख प्राप्ति होती है।

राहुमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल–राहु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ भाव में या उच्चांश में या स्वांश में शुभग्रह से दृष्ट युत रहे तो राजा से प्रेम, धन धान्य की वृद्धि, स्वल्प सम्मान, स्वल्पसुख, अल्पग्रामाधिपत्य एवं स्वल्पलाभ होता है। यदि सूर्य भाग्येश-लग्नेश अथवा कर्मेश से युत या दृष्ट हो तो राजाश्रय से सुयश, विदेशयात्रा, देश का आधिपत्य, हाथी, घोड़े, वस्त्र, आभूषण का लाभ, अभीष्ट सिद्धि तथा पुत्र को सुख होता है।

दशेश से १२, ८, ६ स्थान में या स्वनीचराशि में सूर्य हो तो ज्वर, अतिसाररोग, कलह, राजा से विग्रह, व्यर्थ भ्रमण, शत्रुुभय और राजा-चोर-अग्नि से पीड़ा होती है। सूर्य यदि दशेश से केन्द्र, त्रिकोण या ३, ११ भाव में रहे तो विदेश में राजा से सम्मान तथा सब प्रकार से कल्याण होता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो महारोग होता है। अशुभफल शान्त्यर्थ सूर्य की आराधना करनी चाहिये।

राहुमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल–राहु की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या मित्रकी राशि में शुभग्रह से युत हो तो राज्यलाभ, राजा से सम्मान, धनलाभ, आरोग्य, वस्त्राभूषणलाभ, मित्र, स्त्री, पुत्रादि से सुख, वाहन से सुख तथा गृह-भूमि की वृद्धि होती है। चन्द्र यदि पूर्णबली हो तो पूर्णफल और क्षीण हो तो कुछ न्यूनफल होता है। चन्द्रमा यदि दशापति से ५, ९ में या केन्द्र में या ११ में रहे तो घर में

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शिवसहस्रनाम या रूद्र का जप तथा गोदान करना चाहिए इससे अभीष्ट ( कार्य ) सिद्ध होता है। गुरुमहादशा में शन्यान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में शनि का अन्तर हो और शनि यदि स्वराशिें या स्वोच्च में या लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में बली होकर रहे तो उस समय में राज्यलाभ-वस्त्र-आभूषण, धनधान्य-स्री-वाहन-पशु तथा स्थान का लाभ, पुत्र मित्रादि से सुख, नील अश्व एवं नील वस्त्रादि का लाभ, पश्चिम दिशा की यात्रा तथा राजा का दर्शन एवं धन का लाभ होता है। यदि शनि लग्न से ६, ८, १२ में हो नीच अस्त या शत्रुराशि में स्थित हो तो धननाश, ज्वरपीड़ा, मनोव्यथा, स्री-पुत्र को वणादि से कष्ट, घर में अशुभकार्य, पशुओं और नौकरों की हानि तथा बल्युवर्ग से द्वेष होता है। यदि शनि दशेश से केन्द्र, त्रिकोण या ११, २ स्थान में हो तो भूमि-धन-पत्र-पश आदि का लाभ तथा नीच जाति से धनप्राप्ति होती है। यदि दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युक्त शनि हो तो धननाश, बन्धुओं से विरोध, उद्योग में बाधा, शरीर में कष्ट तथा कुटुम्बादि से भी भय होता है। यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो अपमृत्यु से भय होता है। शान्ति हेतु विष्णुसहस्रनाम का जप, कृष्णा गौ का दान तथा महिषदान करना चाहिए। इससे शनि की प्रसन्नता से निश्रय ही आरोग्य लाभ होता है। गुरुमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो, बुध यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में या दशापति से युत हो तो धनलाभ, शरीरसुख, राज्यलाभ, राजा की कृपा से अभीष्ट सिद्धि, वाहन-वस्त्र तथा पशु आदि का लाभ होता है। बुध यदि भौम से दृष्ट हो तो उसकी अन्तर्दशा में शत्रुवृद्धि, सुखनाश, कार्यव्यापार में हानि, ज्वर तथा अतिसारजन्य पीड़ा होती है। बुध यदि दशेश से त्रिकोण में या केन्द्र में या स्वोच्च में हो तो स्वदेश में ही धनलाभ, पिता-माता से सुख तथा राजा की कृपा से वाहनादि का विशेष सुख होता है। बुध यदि दशेश से ६, ८, १२ वें भाव में हो और पापग्रह से युक्त एवं शुभग्रह से अदृष्ट रहे तो धननाश, विदेशयात्रा, मार्ग में चौरभय, वण-दाह-नेत्रकष्ट और विदेश भ्रमण होता है। यदि बुध लग्न से ६, ८, १२ में हो और पापग्रह से युत हो तो आकारण कलह, क्रोध, पशुहानि, व्यापार में क्षति और अपमृत्युभय होता है। बुध यदि शुभग्रह से दृष्ट और पापग्रह से युत हो तो अन्तर्दशा के प्रारम्भ में स्त्रीसुख, धनलाभ, वाहन-वस्त्र आदि का लाभ होता है।

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के अन्त में धनहानि और शारीरिक कष्ट होता है। यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु सर्वसुखदायक, आयुवृद्धिकारक विष्णुसहस्त्रनाम का जप करना चाहिये।

गुरुमहादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में केतु का अन्तर हो और केतु यदि शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो अल्पसुख, अल्पधनलाभ, कदन्न परान्न या श्राद्धात्र का भोजन तथा कुकर्म से धनप्राप्ति होती है।

केतु यदि दशेश से ६, ८, १२वें स्थान में पापग्रह से युत हो तो राजा के कोप से धनहानि, बन्धन, रोग व बल का नाश, पिता और बन्धु से द्वेष तथा मानसिक पीड़ा होती है।

केतु यदि दशेश से ५, ९,४, १०वें स्थान में हो तो पालकी, हाथी-घोड़ा आदि सवारी का एवं वस्त्र का सुख, राजा की कृपा से इष्टकार्यसिद्धि, व्यवसाय में अधिक लाभ, पशुओं की वृद्धि तथा यवन राजा से धनवस्त्रादि का लाभ होता है।

यदि केतु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो कष्ट होता है। दोष शान्ति हेतु छागदान और विधिविधान से मृत्युञ्जय जप करना चाहिये।

गुरुमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में शुक्र की अन्तर की दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या अपनी राशि में शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो उस समय पालकी हाथी आदि सवारी का सुख, राजा की कृपा से धनलाभ व बहुत सुख, पूर्व दिशा की यात्रा से विशेष धनलाभ, गृह में कल्याण, माता-पिता से सुख, देवता व गुरु में भक्ति, अन्नदान तथा जलाशय, गोशाला निर्माण आदि धर्मकार्य होता है।

यदि शुक्र दशेश से या लग्न से ६, ८, १२ में रहे या अपने नीच में रहे तो कलह, बन्धुविरोध तथा स्त्री-पुत्र को कष्ट होता है। शनि यदि राहु से युक्त हो तो कलह, राजभय, स्त्री से द्वेष, श्वशुर से कलह, सोदरविदाद और धनहानि होती है।

शुक्र यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या द्वितीय में हो तो धनलाभ, स्त्री से सुख, राजदर्शन, वाहन, पुत्र और पशुओं की वृद्धि, गीत वाद्य सुख, विद्वान् से सङ्गति, मिष्टान्न भोजन तथा बन्धु पालन पोषण आदि का सुख होता है ।

शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो धनहानि, अपमृत्यु भय तथा स्त्री से कलह होता है। शान्ति हेतु श्वेत गो का दान व महिषदान करना चाहिए इससे शुक्र की प्रसन्नता द्वारा सुखलाभ होता है।

गुरुमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल–गुरु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो, सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या

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३, ११, २ में बलयुक्त रहे तो धनलाभ, राजसम्मान, वाहन, वस्त्र, पशु, भूषण, पुत्र आदि से सुख तथा राजा की मैत्री से सभी कार्य की सिद्धि होती है। लग्न स्थान से या दशेश से ६, ८, १२ में सूर्य हो तो उसकी अन्तर्दशा में शिरोव्यथा, ज्वर, सत्कर्म में आलस्य, पापकर्मवृद्धि, सभी से द्वेष, बन्धुयोग और अकारण कलह होता है।

सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो शरीर में पीड़ा होती है। शान्ति हेतु आदित्यहृदय का पाठ करने से श्रीसूर्य की कृपा से सब कष्टों का निवारण होता है।

गुरुमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या स्वोच्च में या स्वराशि में पूर्णबली हो और दशापति से शुभस्थान में हो तो उस समय राजा से सम्मान, ऐश्वर्य, स्त्री-पुत्रादि से सुख, पायस आदि सुभोजन, सत्कर्म से सुप्रश, पुत्र-पौत्रों की वृद्धि, राजा की कृपा से सर्वसुख और दान तथा धर्म में रुचि होती है।

चन्द्र यदि लग्न से या दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युत व निर्बल रहे तो धन और बन्धुवर्ग की हानि, विदेश-भ्रमण, राजा और चोर का भय, बान्धवों से कलह, मामा का वियोग तथा माता को क्लेश होता है। चन्द्र यदि द्वितीयेश या षष्ठेश हो तो देहकष्ट होता है। दोष के शान्त्यर्थ सप्तशतीदुर्गापाठ करना चाहिये।

गुरुमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या उच्च में या स्वनवांश में हो तो घर में विवाहादि उत्सव, ग्राम-भूमि का लाभ, जनसामर्थ्य की प्राप्ति और सर्वकार्य की सिद्धि होती है।

दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११, २ भाव में शुभग्रह से युत दृष्ट यदि मङ्गल हो तो धन-धान्यादि की वृद्धि, मिष्टान्न भोजन, राजा की प्रसन्नता, स्त्री-पुत्र से सुखप्राप्ति और पुण्य कार्य होता है।

दशेश से भौम यदि ८, १२ में या नीच में या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो धन और गृह का नाश तथा नेत्ररोग आदि अनेक दु:ख होते हैं। दशा के पूर्वार्ध में विशेष कष्ट होता है; परन्तु अन्त में सुख भी होता है। भौम यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट व मानसिक व्यथा होती है। शान्ति हेतु सर्व-सम्पत्तिप्रदायक वृषभ का दान करना चाहिये।

गुरुमहादशा में राहुान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि स्वोच्च, स्वराशि, मूलत्रिकोण या लग्न से केन्द्र त्रिकोण में केन्द्रस्वामी से या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो योगक्रिया में रुचि, प्रारम्भ में पाँच मास तक धन-धान्य की वृद्धि, देश या ग्राम का आधिपत्य, अन्यजातीय

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विंशोत्तरी दशा प्रकरण

प्राप्ति होती है।

शनिमहादशा में केतु अन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो, केतु स्वोच्च या स्वराशि या शुभराशि में अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हो, शुभग्रह से युत दृष्ट हो तब भी उसकी दशा में स्थाननाश, भय, दरिद्रता, कष्ट, विदेशयात्रा आदि अशुभ फल होते हैं। यदि केतु लग्नेश से सम्बन्ध हो तो दशारम्भ में सुख-धनलाभ-गङ्गादि तीर्थस्थान और देवदर्शन होता है।

यदि केतु दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ३, ११ भाव में रहे तो, सामर्थ्यता, धर्म में रुचि, राजा का दर्शन तथा सर्वसुख होता है।

यदि केतु दशेश या लग्न से ८, १२ में रहे तो अपमृत्युभय, कदन्न भोजन, शीतज्वर, अतिसार, व्रण, चौरभय तथा स्त्री-पुत्र का वियोग होता है।

यदि केतु लग्न से द्वितीय या सप्तम स्थान में रहे तो शरीरकष्ट होता है। शान्ति हेतु छागदान करने पर केतु की प्रसन्नता से सुख और शान्ति प्राप्त होती है।

शनिमहदशा में शुक्र अन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो, शुक्र यदि केन्द्र-त्रिकोण-स्वोच्च-स्वराशि में या ११ भाव में शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो स्त्री-पुत्र-धनलाभ-आरोग्य-गृह में कल्याण, राज्यलाभ, राजा की कृपा से सुख-सम्मान, विविध वस्त्र, आभूषण, वाहनादि अभीष्ट वस्तुओं का लाभ होता है। उस समय बृहस्पति अनुकूल रहे तो भाग्योदय व सम्पत्ति की वृद्धि होती है। शनिगोचर से अनुकूल रहे तो योगाभ्यास की सिद्धि होती है।

यदि शुक्र नीचराशि में हो या अस्त हो या ६, ८, १२ में हो तो स्त्रीकष्ट, स्थाननाश, मानसिक व्यथा और स्वजनों से कलह होता है।

यदि शुक्र दशेश से ९, ११ या केन्द्र में हो तो राजा की कृपा से अभीष्टसिद्धि, दान, धर्म, तीर्थयात्रा, शास्त्र में प्रवृत्ति, काव्यरचना, वेदान्तादि कथा श्रवण तथा स्त्री-पुत्रादि से सुखलाभ होता है।

यदि शुक्र दशेश से १२, ६, ८ में हो तो नेत्रकष्ट, ज्वर, आचरणहीनता, दत्तरोग, हृदय, गुह्यभाग में शूल, जल में डूबने और वृक्ष पर से गिरने का भय, राजपुरुष और सहोदर से कलह होता है।

यदि शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गासप्तशती का पाठ-गोदान-माहिषदान करने पर दुर्गा की प्रसन्नता से आरोग्य और सुख होता है।

शनिमहादशा में सूर्यन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य अपने उच्च में या गृह में या भाग्येश से युत हो या

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लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो स्वामी से सुख, गृह में कल्याण, पुत्रादि से सुख तथा वाहन, पशु आदि का लाभ होता है। यदि सूर्य लग्न से या दशेश से ८, १२ में हो तो हृदयरोग, मानहानि, स्थान-नाश, मानसिक व्यथा, बन्धुवियोग, उद्योग में अवरोध, ज्वर, ताप, व्याकुलता, भय, सम्बन्धियों का तथा प्रियवस्तु का नाश होता है। यदि सूर्य द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ सूर्य की पूजा करनी चाहिये। शनिमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्रमा स्वोच्च, स्वगृह या लग्न से केन्द्र-त्रिकोण या ११ में बलवान हो या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो राजा की कृपा से वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ, सुख-सौभाग्य की वृद्धि, नौकरों का पालन, मातृकुल-पितृकुल में सुख और पशुओं की वृद्धि एवं सुख होता है। यदि चन्द्रमा क्षीण हो या पापग्रह से युतदृष्ट हो, नीच-कूर ग्रह के नवांश या कूरग्रह की राशि में हो तो उसकी अन्तर्दशा में घोरकष्ट, राजकोप, धनहानि, मातृ-पितृ वियोग, सन्तानकष्ट, व्यापार में हानि, असमय भोजन और औषधसेवन होता है। दशारम्भ में धनलाभ और सुख होता है। यदि चन्द्र दशेश से केन्द्र में त्रिकोण में या ११ में हो तो वाहन, वस्त्र और बन्धुओं से सुख, पिता, माता, स्त्री, मित्र, स्वामी आदि से भी इष्ट सिद्धि और सर्वसुख होता है। यदि चन्द्र दशेश से १२, ८ में हो या निर्बल हो तो निद्रा, आलस्य, स्थाननाश, सुखनाश, शत्रुवृद्धि और बन्धुओं से द्वेष होता है। यदि चन्द्र द्वितीयेश या द्वादशेश हो तो शरीरकष्ट और आलस्य होता है। दोष शान्त्यर्थ तिल से हवन, गुड़, घी, दधिमिश्रित तण्डुल, गौ तथा महिष का दान करने से आयुवृद्धि होती है। शनिमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम स्वोच्च, स्वराशि में या दशेश से या लग्नेश से युत हो तो उस समय दशारम्भ से ही सुख, धनलाभ, राजसम्मान, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ, सेनापतित्व, कृषि, पशुओं की वृद्धि, नूतन गृहनिर्माण और भ्रातृवर्ग को सुख होता है। यदि भौम अपने नीच में हो अस्तंगत या लग्न से ८, १२ में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो उस समय धनहानि, चोर, सर्प, शस्त्र तथा गठिया रोग से भय, पिता और भाई को कष्ट, बन्धुवर्ग में कलह, पशुओं की हानि, कदन्न भोजन, विदेशगमन और अनावश्यक खर्च होता है। यदि भौम अष्टमेश-सप्तमेश या द्वितीयेश हो तो अपमृत्युभय, विविध

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कष्ट और पराभव होता है। दोष शान्ति हेतु होम और वृष का दान करना चाहिये।

शनिमहादशा में राहन्तर्दशा का फल—शनि की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि उच्चादि स्थानों में नहीं हो तो कलह, मानसिक व्यथा, शरीरकष्ट, सन्ताप, पुत्रों से द्वेष, रोगभय, अपव्यय, राजभय, स्वजनों से कलह, विदेशयात्रा तथा गृह और कृषि में हानि होती है।

यदि राहु लग्नेश या योगकारक ग्रह से युत हो या स्वोच्च में, स्वराशि में, लग्न या दशेश से केन्द्र में या, ११ भाव में हो तो अन्तर्दशारम्भ काल में सुख-धनलाभ-कृषि में वृद्धि-देव और ब्राह्मणों में भक्ति-तीर्थयात्रा-पशुओं की वृद्धि और घर में कल्याण होता है। दशा के मध्यकाल में राजा से भय और पुत्र-मित्रादि से विरोध होता है।

राहु यदि मेष-कन्या-कर्क-वृष-मीन-धनु या कन्या राशि में हो तो पूर्ण ऐश्वर्य की वृद्धि, राजाओं से मित्रता तथा दिव्य वस्त्रादि से सुख होता है।

राहु यदि द्वितीयेश या सप्तमेश से युत हो तो शरीरकष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ मृत्युंजय जप, छागदान तथा वृषदान करना चाहिये।

शनिमहादशा में गुरुवार्तदशा का फल—शनि की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो और गुरु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या लग्नेश से युत हो या स्वक्षेत्र या स्वोच्च में हो तो सभी कार्यों की सिद्धि, घर में कल्याण, राजा की कृपा से धन-वाहन-भूषण-वस्त्रलाभ-सम्मान की प्राप्ति-देव व गुरु में भक्ति-विद्वानों का सङ्ग और स्त्री-पुत्रादि से सुख होता है।

गुरु यदि लग्न से ६, ८, १२ स्थानों में हो, स्वनीच में हो या पापग्रह से युत हो तो सम्बन्धियों का नाश, धनहानि, राजकर्मचारियों से द्वेष, कार्य में क्षति, विदेश गमन और कुष्टादि रोग का भय होता है।

यदि गुरु दशेश से केन्द्र में या ५, ९, २, ११ स्थानों में रहे तो ऐश्वर्य, स्त्रीसुख, राजा द्वारा धनलाभ, भोजन-वस्त्रादि का सुख तथा दान-धर्म में प्रवृत्ति होती है। साथ ही वेद-वेदान्त का ज्ञान, यज्ञकर्म, अन्नदान आदि से देश में कीर्ति होती है।

यदि गुरु दशेश से ६, ८, १२ में हो या बलहीन हो तो बन्धुओं से द्वेष, मानसिक व्यथा-कलह-स्थान-त्याग-कुभोजन-कार्य में क्षति-राजदण्ड से धनहानि-बन्धन तथा पुत्र-स्त्री को कष्ट होता है।

यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट-मनसन्ताप और अपने परिजनों का नाश होता है। दोष शान्त्यर्थ शिवसहस्रनाम का जप और सुवर्णदान करना चाहिये।

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बुधमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल

बुधमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में बुध की ही अन्तर्दशा हो तथा बुध यदि स्वोच्चादि शुभस्थान में हो तो उस काल में मोती आदि रत्नों की प्राप्ति, ज्ञान-कर्म और सुख का विकास, विद्या-कीर्ति की वृद्धि, नवीन राजाओं से भेंट तथा धन-स्त्री-पुत्र, पिता-माता आदि से सुख प्राप्त होता है। बुध यदि अपने नीचादि स्थान में या ६, ८, १२ में हो, पापग्रह से युत हो तो धन और पशु का नाश, बन्धुओं से वैर, शूल आदि रोग तथा राजकार्य में व्यग्रता होती है। यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो स्त्रीकष्ट, सम्बन्धियों का मरण तथा वात व शूल रोग होता है। दोष शान्त्यर्थ विष्णुसहस्रनाम का जप करना चाहिए।

बुधमहादशा में केतु अन्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो और केतु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में हो अथवा शुभग्रह से या लग्नेश से या योगकारक ग्रह से युत दृष्ट हो तो अथवा दशेश से केन्द्र स्थान में या ११ में हो तो देहसुख, स्वल्पधन लाभ, बन्धुवर्ग से प्रेम, पशुओं की वृद्धि, उद्योग से धनलाभ, विद्या-कीर्ति-सम्मान, राजदर्शन और भोजन-वस्त्र आदि का सुख होता है। यदि केतु दशेश से ८-१२ में हो या पापग्रह से युत हो तो सवारी से पतन, पुत्र को कष्ट, चौर और राजा से भय, पापकर्म में प्रवृत्ति, विषैले जीवों से भय, नीचों से कलह, शोक-रोग आदि क्लेश और नीचों का सङ्घट होता है। यदि केतु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ छागदान करना चाहिए।

बुधमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्रस्थान में या ११, ५, ९ में हो तो धर्मकार्य में रुचि, मित्र और राजा के द्वारा कार्यसिद्धि, कृषि और सुख में वृद्धि होती है। शुक्र यदि दशेश से केन्द्रस्थान में या ५, ९, ११ में हो तो राज्य-धन-सम्पत्ति का लाभ, जलाशय खनन, दान-धर्म में तत्परता और व्यवसाय से धन-धान्य का विशेष लाभ होता है। यदि शुक्र दशेश से ६, ८, १२ में होकर निर्बल रहे तो हृदयरोग-मानहानि-ज्वर-अतिसार-बन्धुविग्रह-शरीरकष्ट और मनसन्ताप होता है। यदि शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गा मन्त्र का जप करने से सुख प्राप्त होता है।

बुधमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च-स्वराशि-केन्द्र-त्रिकोण या २, ११ में या उच्चांश या स्वनवांश में हो तो राजा की कृपा से भाग्योदय और मित्रों से सुख होता

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स्थानहानि होती है। दशा के मध्य में सुख-धनलाभ और दशान्त में राजभय व स्थाननाश होता है। यदि भौम द्वितीयेश या तृतीयेश हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ गोदान और मृत्युञ्जय जप करने पर शडूर की कृपा से सुख होता है। बुधमहादशा में राहु-अन्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में हो या षष्ठ-कष्ट-कन्या-वृप राशि में हो तो राजा से सम्मान, सुयश, धनलाभ-तीर्थ-देव का दर्शन, यज्ञ, सम्मान और वत्रलाभ होता है। दशा के प्रारंभ में कुछ कष्ट होता है; किन्तु दशान्त में सुख होता है। यदि राहु लग्न से ८, १२ में रहे तो उसकी अन्तर्दशा में धननाश, शरीर में कष्ट, वात-ज्वर और अजीर्ण रोग से क्लेश होता है। यदि राहु लग्नस्थान से ३, ६, १०, ११ में हो तो राजा से वार्ता, यदि शुभग्रह से युत हो तो नवीन राजा का दर्शन होता है। यदि राहु दशेश से ८, १२ में पापग्रह से युत हो तो राजकार्य में श्रम, स्थान की क्षति, भय, बन्धन, रोग, अपने और बन्धुओं को क्लेश, हृदयरोग, सम्माननाश और धनहानि होती है। यदि राहु द्वितीय या सप्तम भाव में हो तो अपमृत्यु-भय होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गा और लक्ष्मी का मन्त्रजप, कपिला गौ का दान और महिषदान करने पर जगदम्बा की कृपा से सुख प्राप्त होता है।

बुधमहादशा में गुरुन्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो और गुरु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११, २ भाव में या स्वोच्च में या स्वराशि में हो तो शरीरसुख-धनलाभ-राजा की कृपा-घर में विवाहादि उत्सव-मित्रान्न भोजन-पशुओं की वृद्धि-पुण्यादि श्रवण-देव-गुरु में भक्ति-दान-धर्म-यज्ञ में प्रवृत्ति और शडूर की आराधना होती है। यदि गुरु नीच राशि में हो, अस्त हो, लग्न से ६, ८, १२ में हो या शनि-भौम से दृष्ट युत हो तो स्वजनों और राजा से कलह, चोर आदि से कष्ट, मातृ-पितृ मरण, महानि, राजदण्ड, धनहानि, विष-सर्प और ज्वर से कष्ट तथा कृषि और भूमि की क्षति होती है। यदि गुरु दशेश से केन्द्र में या, त्रिकोण में या ११ में होकर बली रहे तो बन्धु-पुत्र से सुख, उत्साह, धन-गौ महिष्यादि और यश की वृद्धि तथा अन्न-दानादि का पुण्य प्राप्त होता है। दशेश से ६, ८, १२ में निर्बल गुरु हो तो सन्ताप, विकलता, रोगभय, स्त्री और बन्धु से द्वेष, राजकोप, अचानक कलह धनहानि और विप्र से भय होता है। यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश हो या २, ७ भाव में हो तो कष्ट होता

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है। दोष शान्त्यर्थ शिवसहस्रनाम का जप, गोदान तथा सुवर्णदान करने पर अरिष्टनाश होता है।

बुधमहादशा में शन्यान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो और शनि यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में हो तो घर में कल्याण, राज्यलाभ, उत्साहवृद्धि, पशुवृद्धि, स्थानलाभ, तार्थ-श्रेमेण व दर्शन होता है।

यदि शनि दशेश से ८, १२ में हो तो शत्रुभय, स्त्री-पुत्र को कष्ट, बुद्धिनाश, बन्धुनाश, कार्यहानि, मानसिक व्यथा, विदेशयात्रा और दुःस्वप्नदर्शन होता है।

शनि यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय कहना चाहिए। इसमें मृत्युञ्जयजप, कृष्णा गौ और महिष का दान करने पर आरोग्यलाभ होता है।

केतुमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल

केतुमहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में केतु की ही अन्तर्दशा हो और केतु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या लग्नेश से युत हो तथा भाग्येश या कर्मेश या चतुर्थेश का सम्बन्धी हो तो धन-पुत्र-स्त्री से सुख, राजसम्मान; मानसिक व्यथा, ग्राम व भूमि आदि का लाभ होता है।

यदि केतु अपनी नीचराशि में अस्तग्रह से युत हो या ८, १२ में हो तो हृदयरोग, मानहानि, धन-पशु का नाश, स्त्री-पुत्र को कष्ट तथा मनोचाञ्चल्य होता है।

केतु यदि द्वितीयेश या सप्तमेश से सम्बन्धित हो अथवा २, ७ स्थान में हो तो रोगभय-कष्ट तथा अपने बन्धुओं का वियोग होता है। दोष शान्त्यर्थ सप्तशती का पाठ, मृत्युञ्जयजप करने पर सुख की प्राप्ति होती है।

केतुमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र-त्रिकोण में या ११ में दशमेश से युत हो तो राजकृपा, सौभाग्य वृद्धि व वस्त्रादि का लाभ होता है।

यदि नवमेश से युत हो तो भाग्योदय, नष्ट राज्य का लाभ, वाहनादि सुख, सेवनान, देवदर्शन आदि पुण्य कार्य तथा राजा की कृपा से ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है।

शुक्र यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ३, ११ में हो तो आरोग्य सुख घर में कल्याण व भोजन-वस्त्र-वाहन आदि की प्राप्ति होती है।

यदि दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युत होकर शुक्र रहे तो अकारण कलह, धनहानि व पशुओं को पीड़ा होती है।

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सर्प व व्रण का भय, धननाश, पुत्र-स्त्री का वियोग तथा शरीरकष्ट होता है। दशा के प्रारम्भ में कुछ शुभफल होता है; परन्तु अन्त में निश्चय ही अशुभफल होता है।

यदि गुरु दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ३, ११ में या शुभग्रह से युत हो तो राजकृपा से विविध प्रकार के वस्त्र, आभषण का लाभ, विदेश गमन, बन्धुवर्ग का पालन तथा सुभोजन आदि का लाभ होता है। दशा के प्रारम्भ में कुछ शारीरिक कष्ट और अन्त में स्थान-हानि व कलह होता है।

यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो अपमृत्यु का भय होता है। दोष शान्त्यर्थ शिवसहस्त्रनाम का पाठ तथा मृत्युञ्जय जप करने पर सब कष्टों का नाश होता है।

केतुमहादशा में शन्यान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो तो पीड़ा, बन्धुकष्ट, मन सन्ताप, पशुओं की वृद्धि, राजकार्य से धन क्षय, स्थानभ्रष्टता, परदेश गमन तथा मार्ग में चोर का भय होता है। शनि यदि ८, १२ में हो तो आलस्य और धननाश होता है।

यदि शनि मीन से त्रिकोण ( कर्क-वृश्चिक ) में, तुला में, अपनी राशि में, लग्न से केन्द्र-त्रिकोण में ३, ११ में, शुभनवान्श में अथवा शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो सभी कार्य की सिद्धि, स्वामी से सुखलाभ, यात्रासुख, ग्रामसुख, सम्पत्ति की वृद्धि तथा अपने राजा का दर्शन होता है।

यदि शनि दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युत हो तो शरीरकष्ट, मन में सन्ताप, कार्य में बाधा, आलस्य, मानहानि तथा मातृ-पितृ का मरण होता है। यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु भय होता है। दोष शान्त्यर्थ तिल से होम, काली गाय का दान तथा महिषदान करने पर आरोग्य होता है।

केतुमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या स्वोच्च में या स्वराशि में हो तो राज्यलाभ, सुख, सत्सङ्ग, दानादि धार्मिक कार्य, भूमि-पुत्र व धन का लाभ, बिना प्रयास के ही धर्म और विवाहादि शुभकृत्य, गृह में कल्याण तथा वस्त्र-आभूषण की प्राप्ति होती है।

बुध यदि नवमेश या दशमेश के साथ हो तो भाग्योदय, विद्वानों के बुद्ध में सत्कथा द्वारा समय व्यतीत होता है।

बुध यदि ६, ८, १२ वें भाव में स्थित होकर शनि-भौम-राहु से युत दृष्ट हो तो अधिकरियों से वैर, पर गृहवास, वस्त्र, वाहन, पशु-धन आदि का नाश होता है। दशा के प्रारम्भ में कुछ शुभफल मध्य में विशेष सुख तथा अन्त में उपरोक्त अशुभफल अर्थात् स्त्री-पुत्रादि को कष्ट होता है।

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बुध यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ वें भाव में हो तो आरोग्यसुख, पुत्रसुख, ऐश्वर्यवृद्धि, भोजन-वस्त्र की प्राप्ति तथा व्यापार से अधिक लाभ होता है। बुध यदि दशेश से ६, ८, १२ वें भाव में स्थित होकर निर्बल रहे तो अन्तर्दशारम्भ में कष्ट मृती-पुत्र को पीड़ा व राज्यभय, मध्य में तीर्थयात्रा होती है। बुध यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ विष्णुसहस्त्रनाम का जप करने पर भगवान् की कृपा से सुख प्राप्त होता है।

शुक्रमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल

शुक्रमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ भाव में होकर बली हो तो विप्र द्वारा धन-पशु (गौ) आदि की प्राप्ति, घर में पुत्रोत्सव, कल्याण, राजसम्मान तथा पद लाभादि से अधिक सुख होता है।

यदि शुक्र स्वोच्च में या स्वराशि में या उच्चांश में या नवमांश में हो तो नूतन गृह का निर्माण, मिष्टान्न भोजन, स्त्री-पुत्र को सुख, मित्र का सङ्ग, अन्नदानादि धर्म कार्य, राजा की कृपा, वस्त्र, वाहन, आभूषण का लाभ, व्यापार में सिद्धि, पशुओं की वृद्धि और पश्चिमदिशा की यात्रा से वस्त्रादि का लाभ होता है।

यदि शुक्र लग्न से ३, ६, ११ में हो और शुभग्रह से युत दृष्ट हो या मित्र के नवांश में हो उच्चस्थ हो लाभेश या योगकारक ग्रह से युत हो तो राज्यलाभ, उत्साह, राजकृपा, गृह में कल्याण और स्त्री-पुत्र धन आदि की वृद्धि होती है।

यदि शुक्र ६, ८, १२ वें भाव में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो चोर वण आदि का भय, स्वजनों को कष्ट, राज्याधिकारियों से द्वेष, मित्र और बन्धुओं का नाश तथा स्त्री-पुत्र को कष्ट होता है।

यदि शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो मृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गापाठ और गोदान करना चाहिए।

शुक्रमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल- शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि अपने उच्च या नीच से अन्यत्र हो तो मनसन्ताप, राजकोप और बन्धुवर्ग से कलह होता है।

सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न अथवा शुक्र से केन्द्र-त्रिकोण में या २, ११ भाव में हो तो राज्य, धन, ऋणसुख, लाभ, स्वामी से सुखलाभ, मित्रों का समागम, माता-पिता और स्त्री से सुख, कीर्ति, सौभाग्य

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उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण

उच्चस्थ सूर्य व चन्द्र फल-

किसी भी जातक के जन्म काल में सूर्य उच्च राशि में स्थित हो तो जातक अत्यन्त उग्र स्वभाव, धनाढ्य और सर्वश्रेष्ठ होता है। यदि चन्द्रमा उच्चस्थ हो तो सुन्दर (सुखादु) भोजन करने वाला, सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से विभूषित होता है।

उच्चस्थ भौम व बुध फल-

यदि जन्मपत्री में मंगल उच्चस्थ हो तो जातक तेजस्वी, कुत्सित पुत्रों वाला दुःसाहसी, घमण्डी और घर से बाहर रहने वाला (प्रवासी) होता है। यदि बुध अपने उच्च राशि में हो तो वह व्यक्ति अत्यन्त बुद्धिमान, कुलाढ्य धनी, वाकू पटु होता है।

उच्चस्थ गुरु व शुक्र फल-

यदि जन्मकाल में गुरु उच्चस्थ हो तो वह जातक सुविख्यात, वैभव वाला, विद्वान, मान्य और चतुर (चालक) होता है। यदि शुक्र उच्चस्थ दहो तो वह जातक विलासी (भोगस्त) हास्यप्रिय, गायन और नृत्य में लीन होता है।

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उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण

वीर और दया रहित होता है। यदि बुध हो तो हास्यप्रिय और विजय श्री प्राप्त करने वाला होता है।

मूलत्रिकोणस्थ मंगल

मूलत्रिकोणस्थ बुध

मूलत्रिकोणस्थ गुरु व शुक्र फल-

यदि जन्म काल में गुरु अपने मूल त्रिकोण में हो तो जातक अच्छा कार्यकर्ता सर्वश्रेष्ठ नीतिज्ञ और सुखी होता है। यदि शुक्र हो तो गाँव, नगर का प्रधान धनाढ्य और भाग्यशाली होता है।

मूलत्रिकोणस्थ गुरु

मूलत्रिकोणस्थ शुक्र

मूलत्रिकोणस्थ शनि फल-

यदि जन्म काल में शनि मूल त्रिकोणस्थ हो तो वह व्यक्ति धन से धनवान कुल से युत और वीर होता है।

मूलत्रिकोणस्थ शनि

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भृगु संहिता फल दर्पण

स्वराशिस्थ सूर्य, चन्द्र व भौम फल-

यदि जन्म काल में सूर्य स्वराशिगत हो तो जातक बड़ा उग्र तथा श्रेष्ठ कार्य करने वाला होता है।

यदि चन्द्रमा स्वराशि में हो तो जातक धर्मात्मा, मनस्वी, रूपवान होता है।

यदि मंगल अपनी राशि अर्थात मेष/वृश्चिक में हो तो वह व्यक्ति धनी क्रोधी और स्थिर स्वभाव वाला होता है।

स्वराशिस्थ सूर्य

स्वराशिस्थ चन्द्र

स्वराशिस्थ मङ्गल

स्वराशिस्थ बुध व गुरु फल-

यदि जन्म काल में बुध स्वराशि (३, ६) में हो तो वह व्यक्ति सुन्दर वाणी वाला, पण्डित (विद्वान्) होता है।

यदि गुरु स्वराशि में हो तो वह व्यक्ति वेद शास्त्र का ज्ञाता, धनाढ्य, उच्च कामनाओं वाला होता है।

स्वराशिस्थ बुध

स्वराशिस्थ गुरु

स्वराशिस्थ शुक्र व शनि फल-

यदि जन्म काल में शुक्र स्वराशिगत हो तो जातक कृषक और

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उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण

धनादय होता है। यदि शनि स्वराशि में हो तो जातक सम्माननीय दु:ख रहित होता है।

स्वराशिस्थ शुक्र

स्वराशिस्थ शनि

मित्रगृहस्थ सूर्य व चन्द्र फल- यदि जन्म काल में सूर्य मित्र ग्रह हो तो स्थायी मित्रता करने वाला, धनदाता होता है।

यदि चन्द्रमा अपने मित्र गृह में हो तो जातक बहुत सुख और सम्मान प्राप्त करने वाला होता है।

मित्रगृहस्थ भौम व बुध फल- यदि जन्म काल में मंगल अपने मित्रग्रह में हो तो वह व्यक्ति धनरक्षक होता है। तथा यदि बुध मित्र ग्रह में हो तो जातक चतुर हँसने वाला और धनवान होता है।

मित्रगृहस्थ गुरु व शुक्र फल- यदि जन्म काल में यदि गुरु मित्र ग्रहों की राशि में हो तो वह जातक सत्पुरुषों द्वारा सम्मान पाने वाला और सुन्दर विशिष्ट कार्य करने वाला होता है।

मित्रगृहस्थ शनि फल- यदि जन्म काल में शनि मित्र गृह में बैठा हो तो जातक परान्न भोक्ता और नीच कार्यों में आसक्त होता है।

यदि उक्तकाल में सूर्य नीच राशि में हो तो जातक सेवक और अपने भाई-बन्धुओं से तिरस्कार पाने वाला होता है।

नीचस्थ सूर्य, चन्द्र व भौम फल- यदि चन्द्रमा नीचराशि अर्थात् वृश्चिक राशि में हो तो जातक स्वरूप पुण्य वाला, रोगग्रस्त और भाग्यहीन होता है।

यदि मंगल नीच राशि में हो तो जातक अनर्थकर्ता व्यसनी और नीच होता है।

नीच राशिस्थ सूर्य

नीच राशिस्थ चन्द्र

नीच राशिस्थ मङ्गल

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यदि जन्म काल में बुध अपनी नीच राशि में हो अर्थात् मीन राशि में बैठा हो तो वह जातक क्षुद्र तथा स्वजनों का शत्रु होता है। यदि गुरु नीचस्थ हो तो वह जातक मलिन, अपमानित और अत्यन्त दरिद्र होता है।

नीच राशिस्थ बुध

नीच राशिस्थ गुरु

यदि जन्म काल में शुक्र नीचस्थ हो अर्थात् कन्या राशि में बैठा हो तो जातक पराधीन, पत्नहीन विषम स्वभाव वाला होता है। यदि शनि नीचस्थ हो तो वह जातक विपत्तियों से परिब्याप्त निन्दित आचरण करने वाला और अर्थ से हीन होता है।

नीच राशिस्थ शुक्र

नीच राशिस्थ शनि

शत्रुराशिस्थ सूर्य व चन्द्र फल- यदि जन्म काल में सूर्य शत्रु गृह में हो तो वह जातक धनहीन कामासक्त होता है। यदि चन्द्रमा शत्रुगृह में हो तो वह जातक हृदय रोग से पीड़ित होता है।

शत्रुराशिस्थ भौम व बुध फल- जन्म काल में मंगल शत्रु गृह में हो तो वह जातक बन्धन (कारागार) शत्रुद्वारा आघात सहने वाला धनहीन, अशान्त और भाग्यहीन होता है।

यदि बुध शत्रुगृह में हो तो जातक अज्ञानी दुःखी और दरिद्र होता है।

शत्रुराशिस्थ गुरु व शुक्र व शनि फल- यदि जन्म काल में गुरु रिपुराशि में

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हो तो जातक नपुंसक, नीतिरहित, वधिर और अर्थहीन होता है। यदि शुक्र रिपुराशि में हो तो जातक नौकर खराब आचरण वाला, शोक संतप्त होता है। यदि शनि अपने शत्रु राशि में हो तो जातक कल्पुषित हृदय वाला, रोग दुख तथा शोक से सन्तप्त होता है।

उच्च नीचादि नवांश में फल का न्यूनाधिक्य- अपने उच्च राशि के नवांश में बैठा हुआ ग्रह पूर्ण फल प्रदान करता है तथा अपने नवांश में स्थित ग्रह स्वराशि तुल्य फल अर्थात् पूर्ण फल प्रदान करता है। अपने नीच अथवा शत्रु ग्रह के नवांश में विद्यमान ग्रह अशुभ फल देता है।

इसी प्रकार अपने मित्र ग्रह के राशि के नवांश में बैठा हुआ ग्रह मध्यम फल देता है।

उच्च दो तीन ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में दो ग्रह उच्चस्थ हो तो जातक धनाढ्य, यशस्वी होता है। यदि ३ ग्रह उच्चस्थ हो तो नगर का रक्षक, धनवान, सेनापति और यशस्वी होता है।

उच्चस्थ चार पाँच ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में चार ग्रह उच्चस्थ हो तो जन्म लेने वाला व्यक्ति धनाढ्य राजा से यश प्राप्त करने वाला राज धर्म से युक्त होता है।

यदि पाँच ग्रह उच्चस्थ हो तो वह अत्यन्त सुविख्यात, राजप्रिय अनेक प्रकार से धन को वृद्धि करने वाला होता है।

उच्चस्थ छः ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में छः ग्रह उच्च राशिगत हो तो वह जातक दान, मान और अनेक वाहनों से युक्त राजा होता है।

समस्त ग्रह उच्चस्थ होने से फल- यदि जन्म कुण्डली में सभी ग्रह उच्चराशि में बैठे हो तो जातक समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का पालन कर्त्ता चक्रवर्ती सम्राट होता है।

स्वमूलत्रिकोण राशिस्थ दो ग्रहों के फल- यदि जन्म काल में २ ग्रह स्वमूल त्रिकोण में स्थित हो तो जन्म लेने वाला व्यक्ति बहुत परिवार वाला, कुल की वृद्धि कर्त्ता, सर्वश्रेष्ठ और प्रख्यात यशस्वी होती है।

स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ तीन व चार ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में तीन अपने मूल त्रिकोण में हो तो जातक धनाढ्य समरुप ग्राम का प्रधान होता है।

यदि ४ ग्रह अपने मूल त्रिकोणस्थ हो तो वह व्यक्ति, राजपक्ष से सम्मानित और संसार का प्रिय होता है।

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स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ पाँच ग्रहों का फल– जन्म काल में पाँच अपने मूल त्रिकोण में हो तो जातक सेना ग्राम, नगर तथा राजा के खजाने का प्रधान रक्षक, बहुत परिवार वाला, बहुत सुखों से युत होता है।

स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ छः ग्रहों का फल– जन्म के समय ६ ग्रह अपने मूल त्रिकोणस्थ हो तो जातक विद्वान्, दानी, धनी गोपवंशोत्पन्न और निश्रय ही प्रशासक होता है।

समस्त ग्रह स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ फल– यदि जन्म काल में सभी ग्रह मूल त्रिकोण में हो तो जातक अर्थ, पत्नी और शक्तिसम्पन्न, विद्या-शास्त्र विशारद होता है।

स्वराशिस्थ दो व तीन ग्रहों का फल– जन्म काल के समय दो ग्रह स्वराशिस्थ हो तो वह व्यक्ति अपने कुल का श्रेष्ठ भाई बन्धुओं से आदर पाने वाला और श्लाघ्य होता है।

यदि तीन ग्रह स्वराशिस्थ हो तो कुल वृद्धि करने वाला, धनाढ्य पद प्रतिष्ठा से सम्मानित होता है।

स्वराशिस्थ चार व पाँच ग्रहों का फल– यदि जन्म काल में ४ ग्रह अपनी राशि में हो तो जातक विख्यात उच्च विचार वाला ग्राम नगर का प्रतिपालक होता है।

यदि पाँच ग्रह स्वराशिस्थ हो तो गाय, भूमि और त्रियों से युक्त राजा के समान होता है।

स्वराशिस्थ छः ग्रहों का फल– जन्म काल में ६ ग्रह स्वराशिस्थ हो तो वह जातक विख्यात यश वाला, कान्ति, अर्थ, स्वजन, अश्व सम्मान से युक्त राजकुलोत्पन्न सम्राट होता है।

यदि ७ ग्रह हो तो शत्रु पक्ष को पराजय करने वाला राजा होता है।

मित्रराशिस्थ दो, तीन व चार ग्रहों का फल– यदि जन्म कालावधि में दो ग्रह अपने मित्र राशि में हो तो वह व्यक्ति मित्र के आश्रय में रहने वाला और उत्तम चरित्र वाला होता है।

यदि तीन ग्रह अपने मित्र की राशि में हो तो वह व्यक्ति भाई-बन्धु और मित्रों का उपकारी और अपने गुणों से सुप्रसिद्ध होता है।

यदि चार ग्रह अपने मित्र गृह में हो तो देवद्विज की आराधना में तल्लीन धुरन्धर और सुप्रख्यात होता है।

स्वमित्रराशिस्थ पाँच, छः व सात ग्रहों का फल– यदि ५ ग्रह स्वमित्र गृह में हो तो वह व्यक्ति राजा का उपसेवक, राजा का कार्य करने वाला और धनाढ्य होता है।

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यदि छः ग्रह स्वमित्र राशि में बैठे हो तो जातक भोगी, वाहन धन से युत राजतुल्य होता है।

यदि सभी ग्रह स्वमित्र गृह में हो तो बहुत से वाहनों, नौकरों और साधन सम्पन्न सम्राट होता है।

स्वनीचराशिस्थ दो, तीन व चार ग्रहों का फल– यदि जन्म काल में दो ग्रह अपने नीच राशि में हो तो वह व्यक्ति चिन्ता से तथा आग्रह से युक्त होता है।

यदि तीन ग्रह नीचस्थ हो तो मूर्ख, अधार्मिक, धनहीन पर्यटन करने वाला भृत्य होता है।

यदि चार ग्रह नीचस्थ हो तो आलसी, चेष्टरहित, और नौकर होता है।

स्वनीचराशिस्थ पांच व छः ग्रहों का फल– यदि जन्म काल में ५ ग्रह नीचस्थ हो तो जातक गृह-पत्नी रहित सेवक होता है।

यदि ६ ग्रह नीचस्थ हो तो वह व्यक्ति धातिभिय से संतप्त; श्रम से दुःखी होता है।

स्वनीचराशिस्थ सात ग्रहों का फल– यदि जन्म काल में सात ग्रह नीचस्थ हो तो जातक भिखारी, उच्छिष्ट भोगी, नग्न रहने वाला, जीर्ण वस्त्र धारक धनहीन होता है।

स्वशत्रु राशिस्थ दो ग्रहों का फल– यदि जन्म काल में दो ग्रह अपने शत्रु गृह में हो तो जातक क्लेश से पीड़ित, नित्य कलह अथवा लड़ाई की इच्छा वाला तथा अपमान प्राप्त करने वाला होता है।

स्वशत्रु राशिस्थ तीन व चार ग्रहों का फल– यदि कालावधि यदि तीन ग्रह स्वशत्रुराशि में हो तो वह अनेक प्रकार के व्यय से तड़प, दुखभोगकर्ता तथा श्रमोत्पादक धन को नष्ट करने वाला होता है।

यदि जन्म काल की अवधि में ४ ग्रह शत्रुराशिगत हो तो वह जातक मित्र, पत्नी पुत्र, धन विनाश से संतप्त हृदय वाला होता है।

स्वशत्रु राशिस्थ पांच व छः ग्रहों का फल– यदि ५ ग्रह अपने शत्रु ग्रह के गृह में बैठे हो तो वह व्यक्ति व्यसन और अभिघात से पीड़ित होता है।

यदि ६ ग्रह स्वशत्रु राशिगत हो तो वह व्यक्ति रोगाक्रांत और अत्यन्त दुःखी होता है।

स्वशत्रु राशिस्थ सात ग्रहों का फल– यदि जन्म काल में ७ ग्रह स्वशत्रु गृह में विद्यमान हो तो जातक दुष्ट कुलोत्पन्न शक्या, वस्त्र तथा भोजन से रहित होता है।

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पुरुष के लिये जिन फलों को कहा गया है, वे स्त्री के जन्म कुण्डली में भी समझना चाहिये। यहाँ स्त्रियों के जन्म कुण्डली का विशेषफल को सविस्तार प्रस्तुत करते हैं।

भाव विशेषों से विशेष फल का ज्ञान- स्त्री की जन्म पत्री में अष्टम भाव से वैधव्य, लग्न से शरीर, सप्तम से पति सौख्य और पंचम भाव से सन्तान का विचार करना चाहिए।

पतिव्रता, सुशीला व रूपवती योग- किसी भी स्त्री की पत्री में लग्न और चन्द्रमा दोनों सम राशि में हो तो स्त्री सुशीला ( पतिव्रता ) और रूपवती होती है।

यदि लग्न चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो सब सद्गुणों और आभूषणों से सुशोभित होती है।

पुरुषाकृति योग- यदि लग्न चन्द्र विषम राशि में हो तो वह स्त्री पुरुष समान स्वभाव और आकृति वाली कुशीला और दु:ख भागिनी होती है।

यदि पापग्रह की दृष्टि या योग हो तो पापिनी और गुणहीना होती है।

बली त्रिशांश फल- स्त्री की कुण्डली में लग्न और चन्द्रमा में से जो बली हो वह यदि मंगल, शुक्र, बुध, गुरु या शनि के त्रिंशांश में हो तो क्रम से आगे कहे गये फल को जानना चाहिये।

भौम राशिस्थ त्रिंशांशों का फल- यदि स्त्री के पत्री में लग्न और चन्द्रमा मेष वृश्चिक अर्थात मंगल की राशि में हो या मंगल के त्रिशांश में हो तो वह कुमारी अवस्था में ही दूषिता होती है।

यदि भौमराशि में शुक्र के त्रिशांश में लग्न या चन्द्र हो तो गलत आचरण वाली तथा मंगल राशि में बुध के त्रिशांश में लग्न चन्द्र हो तो स्त्री माया चार करने वाली होती है।

बुध की राशि में त्रिशांशों का फल- यदि स्त्री की कुण्डली में इन दोनों में बलवान मंगल की राशि में, गुरु के त्रिशांश में हो तो वह स्त्री सुशीला होती है।

यदि मंगल के घर में शनि का त्रिंशांश हो तो स्त्री दासी होती है। यदि बलवान लग्नेश या चन्द्रमा बुध की राशि मिथुन, कन्या में मंगल के त्रिशांश में हो तो वह नारी कष्ट करने वाली होती है।

यदि शुक्र के त्रिशांश में हो तो अधिक काम की इच्छा करने वाली, बुध के त्रिशांश में गुणवती होती है।

शुक्र की राशि में त्रिशांशों का फल- यदि गुरु का त्रिंशांश हो तो सती अर्थात पतिव्रत धर्म को निर्वाह करने वाली, एवं बुध की राशि में बल्ली

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लग्नेश या चन्द्रमा शनि के त्रिंशांश में हो तो स्त्री नपुंसक ( क्लेश ) होती है। इसी प्रकार यदि बलवान् लग्नेश या चन्द्रमा शुक्र की राशि अर्थात वृष और तुला में मंगल के त्रिंशांश में हो तो स्त्री दुष्टा तथा शुक्र के त्रिंशांश में हो तो अत्यन्त गुणवती होती है। यदि बुध का त्रिंशांश हो तो सभी कलाओं में चतुर होती है।

कर्क व सिंह राशि में त्रिशांशों का फल- यदि गुरु का त्रिंशांश हो तो गुणों से युक्ता और राशि में लग्नेश और चन्द्रमा के होने पर यदि शनि का त्रिंशांश हो तो पतिधातिनी होती है।

यदि लग्नेश और चन्द्र दोनों मंगल के त्रिंशांश में हो तो अधिक बोलने वाली होती है तथा शुक्र के त्रिंशांश में हो तो पतिव्रता होती है। इसी प्रकार यदि बुध के त्रिंशांश में हो तो पुरुष की तरह इच्छा वाली तथा गुरु के त्रिंशांश में रानी और सिंह राशि में शनि का त्रिंशांश हो तो अपने कुल से पृथक् होती है तथा गुरु की राशि में बली लग्नाधीश या चन्द्रमा मंगल के त्रिंशांश में हो तो अधिक गुण वाली होती है।

इसी प्रकार शुक्र में गुरु व शनि की राशि में त्रिशांशों का फल- यदि बुध के त्रिंशांश में हो तो विज्ञान की जानकारी रखने वाली अर्थात् विज्ञानवत्ता, गुरु में गुण वाली, तथा शनि में अल्प काम सुख देने वाली होती है। इसी प्रकार यदि कोई स्त्री शनि राशि अर्थात् मकर कुम्भ में हो तो वह दासी होती है।

यदि शुक्र के त्रिंशांश में लग्नेश और चन्द हो तो बुद्धिमति, बुध में दुष्टा, गुरु में पतिव्रता तथा शनि में दुष्टों का सेवन करने वाली होती है। स्त्री-स्त्री संभोग ज्ञान- यदि कन्या की पत्री में शुक्र, शनि के नवमांश में हो और शनि, शुक्र के नवमांश में हो तथा दोनों की परस्पर दृष्टि हो तो वह कामातुर होकर दूसरी स्त्री के भग के ऊपर रबर का लिंडू बोध कर अपनी काम की अग्नि को शमन करती है।

सप्तम भाव का फल- सप्तम भाव में कोई ग्रह नहीं हो तो उस स्त्री का पति तुच्छ पुरुष होता है। सप्तमभाव पर शुभग्रह की दृष्टि नही हो तो पति बलहीन, सप्तम भाव में चर राशि हो तो पति बाहर रहने वाला, बुध, शनि हो तो नपुंसक होता है।

अन्य सप्तम भाव का फल- सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसे पति छोड़ देता है। मङ्गल हो तो बालविधवा, शनि हो तो कुमारी ही वृद्धा हो जाती है। सप्तम भाव में बलहीन पापग्रह हो उस पर पाप की दृष्टि हो तो पति से छोड़ दी जाती है। सबल पाप ग्रह हो तो विधवा होती है, शुभ और पाप दोनों हो

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तो पुनर्भू होती है।

परपुरुषासक्त योग- मङ्गल और शुक्र एक दूसरे नवमांश में चन्द्रमा हो तो पति की आज्ञा से परपुरुष गामिनी होती है।

माता के साथ कुलटा योग- शनि या मङ्गल की राशि में शुक्र के साथ चन्द्रमा यदि लग्न में हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो वह स्त्री माता सहित कुलटा होती है।

सरोग नीरोग भोग का ज्ञान- सप्तम भाव में मङ्गल का नवांश हो और चन्द्रमा से दृष्ट हो तो वह स्त्री रोग युक्त योनि वाली होती है। शुक्र का नवमांश हो तो सुन्दर भग वाली और पति की प्रिया होती है।

सप्तम भावस्थ शनि, भौम राशि व नवांश फल- यदि किसी भी स्त्री की पत्री में सप्तम भाव में शनि के घर में अर्थात् मकर, कुम्भ राशि अथवा नवमांश हो तो उस स्त्री का पति वृद्ध या मूर्ख होता है।

यदि मङ्गल की राशि अर्थात् मेष, वृश्चिक के नवांश में हो तो स्त्री का पति स्त्री के तरह आचरण करने वाला और क्रोधी होता है।

सप्तम भावस्थ शुक्र, बुध राशि व नवांश फल- यदि किसी भी स्त्री की पत्री में सप्तम में शुक्र की राशि अर्थात् वृष, तुला हो या नवांश हो तो उसका पति रूपवान् और भाग्यशाली होता है।

यदि उक्त सप्तम भाव में बुध के ग्रह (मिथुन कन्या) में या इनके नवांश में हो तो स्त्री का भर्त्ता अत्यन्त चतुर और वैज्ञानिक होता है।

सप्तम भावस्थ चन्द्र, गुरु राशि व नवांश फल- किसी भी स्त्री जातक के पत्री में सप्तम में चन्द्रमा की राशि कर्क या इसका हो नवांश हो तो स्त्री का पति काम से पीड़ित और सत्यन्त सरल स्वभाव वाला होता है।

यदि धनु, मीन अर्थात् गुरु के घर में या गुरु के नवांश में हो तो स्त्री का पति गुणवान् और अपने इन्द्रियों को वश में रखने वाला होता है।

सप्तम भावस्थ सूर्य राशि व नवांश फल- यदि किसी भी स्त्री के जन्म पत्री में सप्तम भाव में सूर्य राशि या सूर्य का नवांश हो तो उस स्त्री का पति अधिक परिश्रम करने वाला अत्यधिक तीक्ष्ण अर्थात् तीखा स्वभाव वाला होता है।

लग्नस्थ ग्रहों का फल- यदि किसी भी स्त्री के पत्री में लग्नस्थ शुक्र के साथ चन्द्रमा हो तो ईर्ष्या वाली और अपना ही सुख चाहने वाली होती है।

बुध सहित चन्द्रमा लग्न में हो तो वह स्त्री सुखी, कलाओं में निपुणा, गुणवती यदि बुध, शुक्र लग्नस्थ हो तो सुन्दरी, सौभाग्यवती, कलाओं में निपुण होती है। लग्न में शुभग्रह हो तो अन्न वस्त्र और दासियों से युक्त होती है।

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है, पापग्रह लग्न में हो तो दु:खभागिनी कुरूपा, कुशीला होती है। लग्नस्थ ग्रहों का फल- यदि स्त्री के जन्माक्ष में अष्टभाव में पापग्रह बैठे हो तो वह स्त्री विधवा होती है। अष्टमेश ग्रह जिस ग्रह के नवांश में हो उसी ग्रह की दशान्तर्दशा में आने पर वह स्त्री विधवा होती है। यदि पापग्रह अष्टमस्थ हो और शुभ ग्रह द्वितीयस्थ हो तो पति के पूर्व स्त्री की मरण होता है।

अल्पपुत्र योग-- यदि स्त्री के जन्म पत्रिका में पंचम भाव में शुभग्रह से युक्त चन्द्रमा कन्या या वृश्चिक अथवा वृष या सिंह में राशि में हो तो स्त्री थोड़े पुत्र वाली होती है। यदि शुभ ग्रह से दृष्ट चन्द्रमा हो तो भी अल्प पुत्र वाली होती है।

पुरुषाकृति योग- यदि स्त्री के पत्री में विषमराशि लग्न हो बुध, चन्द्र, शुक्र निर्बल हो, शनि मध्यबली और शेष ग्रह बलवान हो तो स्त्री पुरुषाकृति और पुरुष सदृश आचरण वाली विश्व में विख्याता होती है।

संन्यासिनी योग- यदि स्त्री के पत्री में सप्तमभाव में पापग्रह हो तथा नवम भाव में यदि कोई ग्रह हो तो सप्तमस्थ पापग्रहजनित प्रव्रज्या होती है अर्थात वह स्त्री संन्यासिनी होती है।

ब्रह्मवादिनी योग- यदि स्त्री के जन्मकाल में बली बुध, गुरु, शुक्र और चन्द्रमा समराशिगत लग्न में हो तो वह स्त्री बह्मवादिनी (वेद) और अनेक शास्त्र को जानने वाली होती है। इस प्रकार उपयुक्त योग स्त्री के जन्मकाल, विवाह और प्रश्नादिकाल में विचार करना चाहिये।

नष्टजातक प्रकरण जिसका जन्म या गर्भाधान काल अज्ञात हो उसके लिये प्रश्नकाल से आगे कहे हुए विकल्प द्वारा जन्म समय कल्पना करना चाहिये। सूतिका निरूपण के लग्न तथा ९ ग्रह इन दशों के लक्षण से जातक के स्वरूप और स्वभाव के जो चिह्न ( लक्षण ) कहे गये हैं, उन लक्षणों को देखकर तदनुसार जन्मकालिक लग्नादि का ज्ञान करना चाहिये।

मेष लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- मेष लग्न में जन्म लेने वाला जातक अत्यन्त क्रोधी, प्रवासप्रिय, लोभी, शरीर से दुर्बल, अल्पसुखी, ईर्ष्यालु, चञ्चल, पित्त, वात और अधर रोग से युक्त, कार्यकुशल एवं भीरू ( डरपोक ) होता है।

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वृृष लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- वृष लग्न में जन्म लेने वाला वीर, कष्ट सहने वाला, सुखी, शत्रुजेता, बाल्यावस्था से ही धन संग्राही, विस्तार और पुष्ट नासिका, कपोल और ओष्ठ वाला, कार्य में तत्पर, सुन्दर, माता पिता का भक्त, दानी, व्ययशील, भयानक, कफ और वात प्रकृत वाला, अधिक कन्या सन्तान वाला, अपने कुटुम्ब का अपमान करने वाला, धर्मविमुख, स्त्री प्रिय, चञ्चल, खाने पीने का शौकीन, विविध प्रकार के वस्न आभूषणों से युक्त होता है।

मिथुन लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- मिथुन लग्न में जातक भूषण वस्त्रादि में स्त्री में प्रेम रखने वाला, लोक में मान्य, प्रिय वचन बोलने वाला, दो माताओं वाला, शत्रुओं से भी प्रेम करने वाला, सुशील और शिल्प जानने वाला, वेद शास्त्रज्ञ, हस्यप्रिय, कवि, प्रसन्नचित्त, अलङ्कार प्रिय, गौरववान्, सत्यवक्ता, किसी की बात न सहने वाला, कुत्सित पुत्र वाला, कठोर चित्त, थोड़े भाई वाला, न्यूनीाधिक अङ्ग ( अङ्गहीन आदि ) वाला, विनीत और गोल नेत्रवाला, चण्ड ( सकोप ) आकार वाला, लोगों का वश्य, बड़े शत्रुओं को जीतने वाला, भूमि, रत्न, सुवर्ण और जलोत्पन्न धन का भागी होता है।

कर्क लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- कर्क लग्न में जातक डरपोक, अनेक स्थान में वास करने वाला, चञ्चल बुद्धि, मेधावी, अधिक भार ढोने वाला, गुप्तरोग से पीड़ित शत्रु को जीतने वाला, हृदय का कुटिल, कामी, ब्राह्मण और देवता का भक्त, दानी, धर्मात्मा, कफ प्रकृति, स्त्री सदृश शरीर वाला, गुणों से पूज्य, अपनी बहनों से छोटा, सहोदर भाई से रहित, अल्प पुत्र, कुत्सित परिवार वाला, परधन भागी, दृढ़ प्रतिज्ञ, परदेशी, धैर्यवान्, साहसी जल से धन लाभ करने वाला, स्त्री सुख भोग से संयुक्त होता है।

सिंह लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- सिंह लग्न में जातक मांसप्रिय, राजा से आदर और धन पाने वाला, धर्माविमुख, अपने कुटुम्बो के कार्य करने में अशक्त, सिंह के समान मुख वाला, स्थिर, गम्भीर, वली, ढीठ, मितभाषी, लोभी दूसरे का आघात करने वाला, सर्वदा भोजन की इच्छा वाला, वन और पर्वत पर विहार करने वाला, रोषवान्, दृढ़मैत्री वाला, असावधान, दुर्दर्श, शत्रु जेता, विख्यात पुत्र वाला, साधुओं का भक्त,

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कृषि आदि कर्म से धनी, व्यापारी, वेश्या, नदी आदि से प्रेम में तथा अपनी स्त्री के कारण एवं दाँत के रोग के हेतु बहुत खर्च करने वाला होता है। कन्या लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- कन्या लग्न में उत्पन्न जातक साधु, सङ्गीत, काव्य, चित्रकला में निपुण, प्रियभाषी, विनीत, दानी, कुमारियों के साथ विलास करने वाला, सत्सङ्गणी, दयालु, परधनभोगी, रोग से आक्रान्त, विदेश भ्रमणशील, स्त्रीस्वभाव, मृदुभाषी, धूर्त, भूमि को बढ़ाने (उपार्जन करने) वाला, सौभाग्यशाली, कामी, यशस्वी, धर्मात्मा, सुन्दर, मनोहर, गुरुजनों का भक्त, पापकर्मरत, सहोदरों से विरुद्ध, कन्या सन्तति वाला, बात कफ प्रकृति वाला, नीच और शत्रुओं से बात करने वाला होता है।

तुला लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- तुला लग्न में जन्म लेने वाला मनुष्य कुटिल देह, दुष्ट स्वभाव, चञ्चल, धन में हास और वृद्धि वाला, शरीर सुख से हीन, कफ, वात प्रकृति, कलहप्रिय, लम्बा मुख शरीर वाला, धर्मवान्, मतिमान्, दुःखी, मेधावी, शत्रु को जीतने वाला, सुन्दर नेत्र, अतिथि, विप्र और देव का भक्त, यज्ञकर्ता, गुरु भक्त, अनाथों का धर्मपिता (पालक), सत्य प्रिय, कोमल देह, गौरवर्ण, भाइयों का स्नेही, धनवान, पवित्र, किन्तु पापाचरण बन्धु वाला, दाता, निन्द्य व्यापार करने वाला तथा धर्म व्यापारी और अल्प बुद्धि वाला होता है।

वृश्चिक लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- वृश्चिक लग्न में उत्पन्न जातक मोटा, लम्बा चौड़ा शरीर, तेजस्वी, हृदय का कोमल, माता का भक्त, सङ्ग्रामप्रिय, दाता, गम्भीर, पिङ्गल नेत्र विस्तृत वक्षःस्थल संकीर्ण पेट, चिपटा नाक, साहसी, स्थिर, क्रोधी, विश्वासी, हास्यप्रिय, पित्तरोग से पीड़ित, परिवार से परिपूर्ण, गुरुजनों का द्रोही, परस्त्रीगामी, सुन्दर मुख, राजा का सेवक, शत्रु वाला, संयमी, धनी, सुन्दरी स्त्री वाला, धर्म प्रिय परन्तु कूर होता है।

धनु लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- धनु लग्न में उत्पन्न जातक मोटे दाँतों वाला, उच्च और विस्तृत ललाट, आश्रित जनों का पालक, धैर्य बल से युक्त, न्यायी, मलिन नाक और ओठ वाला, कुनख वाला, सलज्ज, अति स्थूल जङ्घा और उदर वाला, विज्ञानी, शास्त्रज्ञ, श्रेष्ठ बुद्धि, क्रोधी, बलियों के बीच रोष पूर्ण, कुल श्रेष्ठ, शत्रुजेत, रण में यशस्वी, कपटी, बन्धुओं के गुण को छिद्रान्वेषणकर्ता, चित्रकार, स्वकर्म तत्पर, परिजनों को सुख देने वाला, मनोहर, मुख और नेत्र का रोगी, राजा द्वारा अपहत धन वाला एवं धर्म में तत्पर रहने वाला होता है।

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मकर लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान– मकर लग्न में जन्म लेने वाला मनुष्य शरीर से दुर्बल, डरपोक, हरिण सदृश मुख वाला, वात रोगी, उच्च नाक वाला, अल्प बल, अनेक पुत्र वाला, रोगयुक्त शरीर, विस्तृत हाथ पैर वाला, आचार और गुणों से हीन, तृषा से पीड़ित, युवतियों का प्रिय, वन और पर्वत पर भ्रमण करने वाला, शस्त्र, वेद, शास्त्र, चित्र, सङ्गीत-वाद्य आदि का जानने वाला, अल्प बल, परिवार से युक्त, दुष्ट हृदय, बन्धुओं के प्रति कठोर, कुचरित्र, सुरूप एवं दुःशीला का पति, गुणज्ञ, धनी, धर्मात्मा, राजकार्यकर्ता, महादानी, सुखी और सौभाग्यवान् होता है।

कुम्भ लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान– कुम्भ लग्न में जन्म लेने वाला पुरुष नीच कर्म करने वाला, कुल में मुखिया, मूर्ख, कटी नाक वाला, क्रोधी, नीच, आलसी, कलहप्रिय, अप्रसन्न, कठोर, जूआ और नीच स्त्री से सङ्ग करने वाला, बन्धुओं का द्वेषी, क्षोभयुक्त, होश वृद्ध वाला, धनागम करने वाला, चुगलखोर, धूर्त, कृपण, बन्धुहीन, लोक से त्यक्त, दूसरों का अप्रिय, उत्कृष्ट सम्पत्ति वाला और गुरुजनों का भक्त होता है। सत्याचार्य के मतानुसार कुम्भ लग्न में जन्म सर्वथा प्रशस्त नहीं होता है। यवनाचार्य के मतानुसार किसी भी लग्न में कुम्भ राशि का वर्ग प्रशस्त नहीं माना जाता है। परन्तु चाणक्य ऋषि के मत में कुम्भ राशि के वर्ग में दोष नहीं माना जाता है।

मीन लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान– मीन लग्न में उत्पन्न जातक भाग्यवान्, स्पष्ट नाक वाला, अस्पष्ट नेत्र, विज्ञान और काव्य में निपुण, मानी, लोक में आदृत, कीर्तिमान्, खुले हुए ओठ और दाँत वाला, कुष्ठ रोगी, विस्तृत मुख, लोभी, सरल स्वभाव, विश्वासी, भेड़ बकरा आदि पालने वाला, पवित्र, आचारवान्, धैर्यवान्, कन्या सन्तान वाला, विनम्र, सद्बुद्धि, बलवान्, सङ्गीत और स्त्रीरति का ज्ञाता सुशील, उदार, भाई से धन पाने वाला, सुबन्धु वाला होता है। लग्न राशि या लग्नेश बलवान् हो तो ये फल पूर्ण होता है।

मेष लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल– मेष की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला व्यक्ति निरर्थक ही आख टढ करने वाला, क्रूर, धनवान्, कामाधिक, कुटिला स्त्री का पति, मोटा और लम्बाकद, क्रोधी और चोरों का सरदार होता है।

मेष की द्वितीय होरा में जन्म लेने वाला चोर, प्रमादी, गधा के समान पैर और अंगुली वाला, बड़े बड़े सुन्दर नेत्र वाला, चतुर, विस्तार और मोटा

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केश वाला, धूर्त, गोल नेत्र, सुन्दर त्वचा वाला और पैरों के अग्रभाग से हीन होता है।

वृश्चिक लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल– वृश्चिक की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला प्रान्त में लालिमा से युक्त और पिंगलवर्ण नेत्र वाला, साहसी, रागप्रचुर, दुष्ट प्रकृति, कृपणीय धनवान होता है।

द्वितीय होरा में लम्बा चौड़ा और पुष्ट शरीर वाला, राजसेवक, बहुत ऋण और बहुत मित्र तथा आँख में फूली वाला होता है।

धनु लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल– धनु की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला असम्पुटित मुख और विस्तृत छाती वाला, टेढ़ा नेत्र और गाल वाला, बाल्यावस्था में ही मातादि से त्यक्त और तपस्वी होता है।

द्वितीय होरा में जन्म लेने वाला कमल नेत्र, दीर्घबाहु, शास्त्रार्थवत्ता, सुन्दर, प्रियवक्ता, भाग्यवान् और यशस्वी होता है।

मकर लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल– मकर की प्रथम होरा में, श्यामवर्ण, हरिणदृश नेत्र, भाग्यवान्, स्त्री को वश में रखने वाला, सुन्दर, मूर्ख, धनवान्, मिष्टान्नभोजी, सत्कार्यरत, पतली और ऊँची नाक वाला होता है।

द्वितीय होरा में लाल नेत्र प्रान्त वाला, आलसी, लम्बा सफर करने वाला, मूर्ख, श्यामवर्ण, रोम से व्याप्त देह, तीव्र, बिना विचारे कठिन कार्य करने वाला होता है।

कुम्भ लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल– कुम्भ की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला स्त्री मित्रादि से युक्त, रसज्ञ, कोमल शरीर, अल्प पुत्र, सद्गुण, वीर, ताम्रवर्ण, तेजस्वी, भ्रमणशील होता है।

द्वितीय होरा में रक्त नेत्र, कुश देह, स्थिर, छोटा कद, आलसी, कपटी, विषाद युक्त, कृपण और धूर्त होता है।

मीन लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल– मीन की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला ऊँचाई में छोटा-पुष्ट और सुन्दर शरीर, विस्तृत ललाट, मुख और छाती वाला, स्त्री का प्रेमी, यशस्वी, कार्य कुशल और शूर होता है।

द्वितीय होरा में जन्म लेने वाला दाता, ऊँची नाक, कार्यों में कुशल, मेधावी और सुन्दर नेत्र वाला होता है।

होरा फल प्राप्ति का ज्ञान– सूर्य और चन्द्रमा में एक बलवान् हो और उसको होरा का स्वामी देखता हो अथवा होरापति केन्द्र में हो तो जातक को होरा का पूर्णफल प्राप्त होता है।

मेष लग्नस्थ प्रथम द्वितीय व तृतीय द्रेष्काण फल– मेष के प्रथम द्रेष्काण

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में उत्पन्न जातक दान करने वाला, दान लेने वाला, तेजस्वी, हास वृद्धि से युक्त, रण में वीर, कलहप्रिय, बन्धुओं को दण्ड देने वाला होता है। द्वितीय द्रेष्काण में स्त्री में आसक्त, भ्रमणशील, सुरत और संगीत प्रिय, मनस्वी, मित्र से धन पाने वाला, सुन्दर और स्त्री के धन का लोभी होता है। तृतीय द्रेष्काण में गुणी, दूसरों का दोषोद्घाटन करने वाला, चञ्चल, राजसेवक, अपने परिवार का प्रिय, धर्मात्मा, आदर का इच्छुक और मूर्ख होता है।

वृष राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- वृष के प्रथम द्रेष्काण में उत्पन्न जातक अभीष्ट भोजन-पान, स्त्री के वियोग से दुखी, वस्त्रादि के सहित, स्त्री के अनुकूल कार्य करने वाला होता है। द्वितीय द्रेष्काण में मनोहर रूप, स्त्री का प्रिय, मोटा ओठ, धनवान्, स्थिर और मनस्वी होता है। तृतीय द्रेष्काण में चतुर, अल्पभाग्यवान्, वीर, मलिन, धन का उपयोग कर बाद में पछताने वाला होता है।

मिथुन राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- मिथुन के प्रथम द्रेष्काण में जन्म लेने वाला जातक विशाल मस्तक, धनवान्, उन्नत, धूर्त, गुणी, विलासप्रिय, राजा से आदृत और वक्ता होता है। द्वितीय द्रेष्काण में जन्म लेने वाला छोटा मुख, मनोहर शरीर, अल्प केश, भाग्यवान्, कोमल चित्त, बहुत बड़ी बुद्धिमान्, प्रतापी और यशस्वी होता है।

तृतीय द्रेष्काण में स्त्री का द्वेषी होता है, विशाल मस्तक, शत्रु से युक्त, लम्बा शरीर, रूखे नख पैर और हाथ वाला, चल सम्पत्ति से युक्त तथा दृढ़ प्रतिज्ञ होता है।

कर्क राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- कर्क के प्रथम द्रेष्काण में जन्म लेने वाला देवता और विप्र का भक्त, चञ्चल, गौरवर्ण, परोपकारी, बुद्धिमान्, सुन्दरूप, सुन्दरी स्त्री वाला और भाग्यवान् होता है। द्वितीय द्रेष्काण में लोभी, मिष्टान्नप्रिय, अधिक शयन करने वाला, स्त्री का वश, अभिमानी, अधिक सोदर वाला, विलासी, चञ्चल और अनेक रोगों से युक्त होता है।

तृतीय द्रेष्काण में स्त्री प्रिय, धनी, परदेशी, मदिराप्रिय, सज्जन, वन और जल का प्रिय एवं सुन्दर नेत्र वाला होता है।

सिंह राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- सिंह के प्रथम द्रेष्काण में जन्म

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मेष राशिस्थ प्रथमा‌दि नवांशों का फल- जन्म काल में मेष के प्रथम नवांश में उत्पन्न पुरुष भेड़ सदृश मुख, छोटा नाक, छोटा भुज, कठोरशब्द, कुरूप, संकुचित आँख, हष्ट और मजबूत शरीर वाला होता है।

द्वितीय नवमांश में श्यामवर्ण, स्थूल कन्धा और बाहु, छोटा ललाट (मस्तक), सुन्दर कन्धा और बाहु का जोड़ वाला, तीक्ष्ण दृष्टि, लम्बा मुख और नाक, प्रियवक्ता, दुर्बल पैर वाला होता है।

तृतीय नवांश में लुप्तकेश, गौरवर्ण, शिथिलबाहु, सुन्दर नेत्र और नाक, बोलने में चतुर, दुर्बल पैर वाला होता है।

जन्म काल में मेष के चतुर्थ नवमांश में भ्रान्तदृष्टि, क्रोधी, छोटा नाक, भ्रमणशील, कठोर पैर और रोम वाला, सहोदर भाइयों से हीन, और दुर्बल होता है।

मध्य ( पञ्चम ) नवमांश में उग्र, हाथी के सदृश नेत्र, स्थूल नाक, भौंह और ललाट, मोटा शरीर, कठोर रोम और केश वाला होता है।

छठे नवांश में श्यामवर्ण, कोमल हृदय, हरिण समान नेत्र, लम्बा, दुर्बल पश्‍चात् भाग, कठोर पैर, शिथिल पेट और बाहु, नपुंसक, डरपोक और बहुत बोलने वाला होता है।

मेष के सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला श्यामवर्ण, चञ्चल, श्वेत नेत्र, कुलटा का पति, धूर्त, मोटा शरीर वाला होता है।

अष्टम नवांश में वानर सदृश मुख, प्रवक्ता, कठोर और पिङ्गल शरीर, गुप्तरोगी, हिंसक, मिथ्यावादी, मित्रों का प्रिय, उग्रस्वभाव होता है।

नवम नवांश में उत्पन्न जातक लम्बा, दुबला शरीर, भ्रमणशील, छोटा ललाट और कान, घोड़े के समान मुख, बहुत नाम वाला और कुटिल होता है।

वृष राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- वृष के प्रथम नवांश में उत्पन्न जातक मझोला कद, कृष्णवर्ण, प्रथम अवस्था में कुछ करने में अक्षम्, अन्त्यावस्था में नीचकर्म करने वाला, नीच, आचरण करने वाला और कुटिल दृष्टि वाला होता है।

द्वितीय नवांश में गंभीर दृष्टि, आलसी, नतमस्तक और मुख वाला, अल्पबुद्धि, उल्टा कार्य करने वाला, अधिक मिथ्या बोलने वाला होता है।

तृतीय नवांश में कोमलदेह, सुन्दर नाक, विशाल नेत्र, लम्बा कद, यज्ञादि कर्म में निरत, मजबूत ( पुष्ट ) पैर और हाथ वाला होता है।

चतुर्थ नवांश में जन्म लेने वाला छोटा कद, भ्रमणशील, क्रोधी, भेड़ के सदृश नेत्र वाला, पिङ्गल वर्ण, निर्धन, परधनहर्ता होता है।

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पञ्चम नवांश में शठ, उच्च नाक वाला, महावृक्ष सदृश आकार, घुंघराले केश वाला, विलासी, स्थूलभुज, कन्धा और कमर वाला तथा गौरवर्ण होता है।

षष्ठ नवांश में सुन्दर नेत्र वाला, स्थिर, सुन्दरकेश, कान्तिमान, प्रियवक्ता, प्रौढ़ हस्यप्रिय, कुशदेह, सब कार्यों में निपुण होता है।

सप्तम नवमांश में उत्पन्न जातक मृतवत्सा स्त्री का प्रेमी, कुछ लम्बा नाक और आँख वाला, दृढ़ देह, स्वजन द्वेषी, लम्बा पैर, सूक्ष्म केश वाला होता है।

अष्टम नवांश में बाघ के समान नेत्र, सुन्दर दाँत, अजेय, फटी हुई नाक वाला, थोड़े काम करने वाला, कुज्जित और कृष्णवर्ण केश, तीक्ष्ण नख तथा बहुत बोलने वाला होता है।

नवम नवमांश में उत्पन्न जातक लोक में मान्य, अल्प बल, भीरु, क्रोधी, सम और सुन्दर शरीर, धूर्त, धन संग्रह करने वाला, विख्यात, अर्धाभाग से दुर्बल और बाद में प्रलाप करने वाला होता है।

मिथुन राशिस्थ प्रथमाादि नवांशों का फल- मिथुन के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक भुज और कन्धे पर रोम वाला, सुन्दर कृष्णवर्ण नेत्र; उन्नत नाक, दुर्बा सदृश हरितवर्ण, कृश पैर और हाथ वाला होता है।

द्वितीय नवांश में घड़ा सदृश मस्तक वाला, अपवित्र कार्य कर्त्ता, हिंसक, बीच में चिपटी नाक वाला, बहुत बोलने वाला, बहुत चेष्टा वाला तथा विग्रह करने में मुख्य होता है।

तृतीय नवमांश में उत्पन्न जातक गौर वर्ण, लाल नेत्र, सुन्दर नाक, सम शरीर, मेेघावी, लम्बा मुख, काला भौंह बोलने में निपुण होता है।

चतुर्थ नवांश में उत्पन्न सुन्दर भौंह और मस्तक वाला, कामी, श्यामवर्ण, विशाल छाती, स्वच्छदन्त, प्रियभाषी, सुन्दर रोम वाला होता है।

पञ्चम नवांश में विशाल मुख, उन्नतनितम्ब, पुष्ट छाती, स्थूल मस्तक वाला, खल, मायावी, स्वच्छ और समदृष्टि वाला होता है।

षष्ठ नवांश में उत्पन्न जातक मध्यवर्ण नेत्र वाला, व्यर्थ बोलने वाला, विस्तृत ललाट, मेधावी कवि, सुन्दर देह, धूर्त, धनील, सुन्दर ओठ और दांत वाला तथा बलवान होता है।

सप्तम नवांश में उत्पन्न जातक लाल, और उच्च नेत्र, विशाल छाती, शिक्षा और चित्रकारी में चतुर, हास्य प्रिय होता है।

अष्टम नवांश में श्यामवर्ण, श्रेष्ठ, मनस्वी, सुन्दर, प्रियवक्ता, लम्बा शरीर, विशाल और कृष्णवर्ण नेत्र वाला, कला को जानने वाला होता है।

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नवम नवांश में गोल और कृष्ण नेत्र, सुन्दर देह, कार्यकासाधक, मेधावी, प्रेसी, विज्ञान और काव्य में निपुण होता है।

कर्क राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- कर्कराशि के प्रथम नवमांश में उत्पन्न होने वाला जातक स्वच्छ गौर वर्ण, सुन्दर केश, विशाल पेट, सुन्दर मुख, ऊँची आँख, कुश देह और भुज वाला होता है।

द्वितीय नवांश में रक्तगौर, संग्रामप्रिय, कला जानने वाला, बिडाल सदृश मुख और नेत्र वाला, दाता और दुर्बल जङ्घा वाला होता है।

तृतीय नवांश में गौर, सुन्दर नेत्र, वक्ता, स्त्रीसदृश कोमल देह, बुद्धिमान्, हल्का काम करने वाला, आलसी होता है।

चतुर्थ नवांश में उत्पन्न जातक श्यामवर्ण, नम्र भौंह, स्थूल और लम्बा कद, सुन्दर नाक और आँख वाला, धीर, हीन, अपने जाति का द्वेषी होता है।

पञ्चम नवांश में घण्टासदृश शब्दोच्चारण करने वाला, नतमुख, सम्मिलित भौंह, दीर्घ बाहु, सेवा में तत्पर, निन्द्य कार्य करने वाला, दुर्धर्ष, अल्पबुद्धि होता है।

षष्ठ नवांश में लम्बा विशाल देह, सुन्दर आँख, बड़ा प्रतापी, गौर वर्ण, सुन्दर नाम वाला, वक्ता और स्थूल दाँत वाला होता है।

सप्तम नवमांश में उत्पन्न जातक पृथक्-पृथक् केश और रोम वाला, विशाल देह, शिरा से व्याप्त जाँघ वाला, परभवनवासी, कौआ सदृश आकार वाला होता है।

अष्टम नवांश में घण्टाकृति मस्तक वाला, निन्द्य कार्यकर्ता, सुन्दर मुख, और भुज वाला, कछुए की समान गति, नतनासिका वाला कृष्णवर्ण होता है।

नवम नवांश में गौर, मछली सदृश नेत्र, श्रेष्ठ, कोमल पेट, विशाल छाती, लम्बी ओठ और दाढ़ी वाला, स्थूल जङ्घा और कृश घुटने वाला होता है।

सिंह राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- सिंह राशि के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक कृश उदर, प्रतापी, रक्तनासिका, विशाल मस्तक, उच्च और पुष्ट छाती वाला होता है।

द्वितीय नवांश में उत्पन्न जातक उन्नत और विशाल ललाट, चतुरस्र देह, विशाल नेत्र, लम्बा भुज, ऊँची छाती, स्थूल नाक वाला होता है।

तृतीय नवमांश में सोमयुक्त विशाल भुज, चकोर सदृश नेत्र वाला, चञ्चल, साधु, दाता, ऊँची नाक वाला, कोमल देह और गोल गला वाला

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वाला होता है। अष्टम नवांश में कोमल और गौरवर्ण देह, लम्बा कद, ऊँची आँख, उग्र, मारना, लम्बा और मोटा भुज, पिङ्गलवर्ण रोम वाला होता है। नवम नवांश में जन्म हो तो विख्यात, कोमल शरीर, सुन्दर रूप, विशाल नेत्र, अतुल बलशाली, चतुर, नटकन्धर और लेखादि में प्रवीन होता है।

तुला राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- तुला के प्रथम नवांश में उत्पन्न व्यक्ति गौरवर्ण, विशाल नेत्र, उन्नतिशील, लम्बा मुख, धन का संग्रह करने वाला, व्यापार में चतुर, लोक में विख्यात होता है। द्वितीय नवांश में तिरछा और गोल नेत्र, ऊँचे दाँत, टेढ़ी कमर, सुन्दर गला, विशाल हृदय, कुत्सित देह और मिली हुई भौंह वाला होता है। तृतीय नवांश में गौरवर्ण, घोड़े के समान मुख, सुन्दर दाँत, ऊँची आँख वाला, दुर्बल, यशस्वी, लम्बा केश और नाक, सुन्दर पलक वाला होता है।

चतुर्थ नवमांश में जन्म लेने वाला जातक दुर्बल भुज, डरपोक, उठे दाँत वाला, दुर्बल देह, चञ्चल नेत्र, छोटी नाक वाला, विषादयुक्त, श्यामवर्ण, शीलहीन होता है। पञ्चम नवांश में गम्भीर दृष्टि, स्थिर बुद्धि, मित्रों का प्रिय, गर्वरहित, रुक्केश, समनेत्र, सुन्दर नाक वाला होता है। षष्ठ नवांश में पुष्ट शरीर गौरवर्ण, विशाल नेत्र, सुन्दर नाक, स्वच्छ नख, नीतिज्ञ और शास्त्रज्ञ होता है।

सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला रक्तगौर, बुद्धिमान्, लम्बादेह और हाथ, विशाल मस्तक, लोभी, उग्रस्वभाव और मनस्वी होता है। अष्टम नवांश में जन्म लेने वाला ऊँचे कन्धा और गाल वाला, भोगी, कठोर देह, दीर्घ और कृष्णवर्ण भौंह वाला, शान्त निश्चिन्त कथा बोलने वाला, सुन्दर छाती और खण्डित मस्तक वाला होता है। नवम नवांश में जन्म लेने वाला सुन्दर नेत्र, प्रसन्नचित्त, गौरवर्ण, सुन्दर शरीर वाला, चतुर, कलाविज्ञ, सरल हृदयप्रिय, शुद्ध स्वभाव होता है।

वृश्चिक राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- वृश्चिक के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक हुस्व अर्थात् छोटाकर तथा उन्नत ओठ और नाक, सुन्दर ललाट, मजबूत शरीर वाला, गौर, मेंढ़क के समान पेट वाला और दलाल होता है। द्वितीय नवांश में उत्पन्न जातक गौरवर्ण, पुष्ट और विशाल हृदय, भुज,

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लाल नेत्र, शत्रु सेना को जीतने वाला, साहसी, अधिक केश वाला होता है। तृतीय नवांश में विद्वान्, पुष्ट कन्या और भुज, सुन्दर केश, स्पष्टवक्ता, कानीन ( कुमारी का पुत्र ), गौरवर्ण और सुन्दर ओठ वाला होता है। चतुर्थ नवमांश में जायमान पुरुष परस्त्री और विद्रोह में चित्त रखने वाला, लोगों को कार्य में प्रेरित करने वाला, धीर, दीर्घ देह, श्यामवर्ण, कृष्णवर्ण केश और आँख वाला, नृत्य में प्रौढ़, मोटे रोम और पुष्ट कन्या वाला होता है।

पञ्चम नवांश में, गम्भीर, लाल नेत्र, चिपटी नाक वाला, धीर, गर्वयुक्त, कठिन कार्य को करने वाला, मजबूत देह और यशस्वी होता है। षष्ठ नवांश में ढीठ, बुद्धिमान्, उच्च नाक, बलवान्, नीतिज्ञ, उग्र कार्य करने वाला, कार्यकुशल, थोड़े केश, सघन भौंह वाला होता है। सप्तम नवांश में उत्पन्न जातक खुला मुख, मजबूत देह, छोटे बड़े दाँत, नशाँ से युक्त शरीर वाला, सड़ूचित उदर, वक्र, दृष्टि, सुन्दर कान्ति वाला होता है।

वृश्चिक राशि का अष्टम नवांश में जन्म लेने वाला फटी नाक, कृष्णवर्ण, शीलहीन, मलिन वेष, उत्कट केश, बुद्धिहीन होता है। नवम नवांश में उत्पन्न जातक गौर वर्ण, मृग के समान सरल स्वभाव, शान्तचित्त, पिङ्गलदृष्टि, मजबूत और पुष्ट देह वाला होता है।

धनु राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- धनु राशि के प्रथम नवांश में जायमान व्यक्ति लम्बी नाक, विषम दृष्टि, स्पष्ट वक्ता, सुन्दर दाँत और रोम वाला, गौरवर्ण, दृढ़ अण्डकोश वाला और उग्र होता है। द्वितीय नवांश में उँचा मस्तक, स्थिरबुद्धि, दीर्घनेत्र, पुष्ट कटि भाग और जाँघ, विकृत नासिका, लम्बा कद और स्थूल दाढ़ी वाला होता है।

तृतीय नवांश में जन्म हो तो शिक्षा, शास्त्र का ज्ञाता, प्रौढ़, गम्भीर, नीतिज्ञ, स्त्री का प्यारा, मनस्वी, हस्यप्रिय और शिल्पशास्त्रज्ञ होता है। चतुर्थ नवांश में उत्पन्न जातक कार्यकुशल, मध्यवर्ण, गोल नेत्र, गौर देह, कछुए के सदृश पेट वाला, बुद्धिमान्, भ्रमणशील, सुन्दर केश, विशाल देह और सुन्दर रूप होता है।

पञ्चम नवांश में जन्म हो तो विस्तृत कर्ण, नेत्र और मुख वाला, सिंह सदृश शरीर, लम्बी भौंह, पुष्ट कन्या और बाहु, रोम रहित देह और स्थिर बुद्धि होता है। षष्ठ नवांश में सुन्दर कृष्णवर्ण विशाल नेत्र, विस्तृत ललाट, काव्यकर्ता, पुष्ट और विस्तृत मुख, असहाय और विद्वान् की बात में श्रद्धा रखने वाला

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होता है। सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला जातक श्यामवर्ण, सरल स्वभाव, वाणी का पालक, उच्च मस्तक वाला, सङ्ग्रहकर्ता, दीर्घ देह, विशाल नेत्र, तथा उदार होता है। अष्टम नवांश में जायमान पुरुष चिपटी हुई नाक, लम्बा मस्तक, लोगों से शत्रुता करने वाला, भ्रान्त दृष्टि, बहुत बोलने वाला, गुरुजनों का प्रियपात्र होता है। नवम नवांश में गौर वर्ण, घोड़े के समान मुख, विशाल और कृष्ण नेत्र, मितभाषी, सत्यवादी, विषादयुक्त, टेढ़े पैर जाँघ वाला होता है।

मकर राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- मकर के प्रथम नवांश में उत्पन्न जातक पतले दाँत, श्यामवर्ण, अल्प बोलने वाला, कठोर केश, विख्यात, सङ्गीत और हास्य का प्रिय, अस्थिर धन और दुर्बल देह वाला होता है। मकर के द्वितीय नवांश में आलसी, धूर्त, टेढ़ी नाक वाला, गीत प्रिय, विशाल देह, अधिक स्त्रियों का प्रेमी, बहुभाषी और चतुर होता है। मकर के तृतीय नवांश में सङ्गीत में निपुण, विख्यात, गौरवर्ण, स्वच्छ नेत्र, सुन्दर नाक, बहुत मित्र और बन्धुओं से प्रेम करने वाला, अभीष्ट कार्य को सिद्ध करने में तत्पर रहने वाला होता है।

चतुर्थ नवांश में जन्म लेने वाला जातक लाल और कृष्णवर्ण गोल नेत्र, विशाल भाल ( ललाट ) तथा दुर्बल देह, हाथ वाला, बिखरे हुए केश, पतले दाँत और अल्प बोलने वाला होता है। पञ्चम नवांश में उच्च कपाल, नासिका और मुख वाला, भाग्यहीन, युवती स्त्री में आसक्त, श्यामवर्ण, गोल जाँघ और भुज वाला, कार्य को आरम्भ कर सम्पन्न करने वाला होता है। षष्ट नवांश में जन्म लेने वाला कान्तिमान, सुन्दर रूप, कामी, सूक्ष्म और समान दाँत वाला, प्रियवक्ता, विशाल दाढ़ी और ललाट वाला होता है।

सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला जातक श्यामवर्ण, आलसी, सुन्दर बोलने वाला, घुँघुँराले केश, विशाल देह वाला, कठोर चित्त, तथा कोमल हाथ पैर वाला, बुद्धिमान्, सुशील होता है। अष्टम नवांश में उत्पन्न जातक गम्भीर दृष्टि, सुन्दर नाक, लाल मुख, छिन्न नह और केश, बेडौल शरीर, घड़ा सदृश ललाट वाला होता है। नवम नवांश में विशाल नेत्र और हृदय, मेधावी, सुन्दर मुख, गायन बादन में तत्पर, प्रिय दर्शन, बलवान तथा सज्जन, और नीतिज्ञ होता है। कुम्भ राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- कुम्भ के प्रथम नवमांश में,

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जन्म लेने वाला श्यामवर्ण, कोमल, कृष देह, स्थूल दाढ़ी, शास्त्र वेत्ता और काव्यज्ञ, कामी, प्रेमी, सुन्दररूप वाला होता है।

द्वितीय नवांश में कठोर त्वचा, नख, नेत्र और केश वाला, दुखियों का सहायक, सज्जन, लम्बा कद, विचित्र मस्तक वाला और मूर्ख होता है।

तृतीय नवांश में दृढ़ देह, स्त्रियों का प्रिय, सुन्दर कान्ति, शास्त्र का जानने और प्रवक्ता होता है।

कुम्भ के चतुर्थ नवांश में स्त्री का वश, गौर वर्ण, विस्तृत मुख, शत्रुनाशक, गम्भीर, धैर्यवान, बलवान, भोगी और प्रेमी होता है।

पञ्चम नवांश में स्पष्टार्थज्ञ, कलाकुशल, तीक्ष्ण, रोम युत पैर वाला, उग्र स्वभाव, सड़ूचित कपोल और कान वाला एवं कृष्णवर्ण होता है।

षष्ठ नवांश में बाघ समान मुख वाला, प्रौढ़, घुँघराले केश वाला, दृढ़ संकल्प रखने वाला, बाघ, हरिण और सर्प को मारने वाला और राजा का प्रिय पात्र होता है।

सप्तम नवमांश में उत्पन्न जातक बकरा के समान नेत्र मुख वाला, तीक्ष्ण स्वभाव, गाँव में प्रेम करने वाला, स्त्री का वश, पित्तरोगी, बल और धैर्य वाला होता है।

अष्टम नवांश में स्थिर बल, बुद्धि और प्रेम वाला, राजसैनिक या राजा, सुन्दर, स्थूल दाँत, विशाल नेत्र वाला होता है।

नवम नवांश में, श्यामवर्ण, श्याम दन्त, धन-स्त्री और पुत्र से सम्पन्न रहने वाला, प्रियवक्ता, विख्यात और कीर्तिमान् होता है।

मीन राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- मीन के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक रक्त गौर कान्ति, कोमल हृदय, स्त्री का प्रिय, चञ्चल चित्त, छोटा गला, और पतली कमर वाला होता है।

द्वितीय नवांश में जायमान पुरुष स्थूल और विस्तृत नाक वाला, कार्यकुशल, मांस का आहार करने वाला, सुन्दर देह, वन, पर्वत में भ्रमण करने वाला, स्थूल मस्तक वाला होता है।

तृतीय नवांश में गौरवर्ण, धूर्त, सुन्दर नेत्र, सुन्दर देह, धर्मात्मा, विद्वान, उदार, विनययुक्त और सुन्दर स्वरूप वाला होता है।

मीन के चतुर्थ नवांश में उत्पन्न जातक गुणी, दीनजनों का सहायक, वृद्धों का सेवक, कार्यकुशल, बली, नीतिज्ञ, उच्च नाक वाला होता है।

मीन के पञ्चम नवांश में उत्पन्न जातक लम्बा कद, श्यामवर्ण, प्रतापी, अशान्त चित्त, छोटी नाक, सुन्दर नेत्र वाला, हिंसक, सुन्दर दाँत वाला, असह्य और व्यर्थ बोलने वाला होता है।

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मीन के षष्ठ नवांश में जन्म लेने वाला दर्शनीय, प्रतापी, गुणी, कुलीन, छोटी नाक वाला, अभिमानी, टेढ़ा मुख, विख्यात और चतुर होता है।

सप्तम नवमांश में जन्म लेने वाला अभिमानी, अन्यधर्म में प्रेम करने वाला, श्रेष्ठ, राजमन्त्री, बली, विषादी, क्रूर, चञ्चल होता है।

अष्टम नवांश में उत्पन्न जातक लम्बा, बड़ा मस्तक, दुर्बल शरीर, आलसी, रूक्ष नेत्र और केश वाला, अल्प संतान वाला, धन सञ्चय में तत्पर, युद्ध में निपुण होता है।

नवम नवमांश में उत्पन्न जातक छोटा कद, सरल स्वभाव, धैर्यवान्, विस्तृत वक्ष, आँख और नाक वाला, कान्तिमान्, विशाल शरीर और सुन्दर बुद्धि वाला, गुणी तथा विख्यात होता है।

द्वादशांश फल का ज्ञान- इस प्रकरण पूर्व द्वादश राशियों के जो फल कहे गये हैं, तदनुसार ही प्रत्येक राशि में द्वादशांश के भी फल कहना चाहिये तथा शेष वर्गों ( त्रिशांशादि ) में भी सप्तमांश के समान विद्वानों को फल कहना चाहिये।

प्रश्न लग्न से जन्म के अयन का ज्ञान- प्रश्नकाल में लग्न १५ अंश के भीतर हो तो उत्तरायण, यदि १५ अंश से ऊपर हो तो दक्षिणायन में प्रश्नकर्ता का जन्म समझना चाहिये।

जिस व्यक्ति का जन्म काल ज्ञात न हो उसके जीवन भर के शुभाशुभ जानने के लिये प्रश्न के द्वारा जन्म-समय का आधार मानकर उस पर से जो तात्कालिक स्पष्ट ग्रह, लग्नादि भाव बना कर प्रश्न कुण्डली बनाकर फलादेश किया जाता है उसको 'नष्टजन्मपत्र' कहते हैं अर्थात् जिसका जन्म काल ज्ञात नहीं रहता है वह 'नष्ट जातक' कहलाता है।

ऋतु व मास का ज्ञान- प्रश्नकालिक लग्न में जो ग्रह हो उस ग्रह की ऋतु में जन्म कहना चाहिये। जैसे प्रश्न लग्न में सूर्य हो तो ग्रीष्म, चन्द्रमा हो तो वर्षा, भौम हो तो ग्रीष्म, बुध हो तो शरद, गुरु हो तो हेमन्त, शुक्र हो तो बसन्त और शनि हो तो शिशिर ऋतु कहना चाहिये। इसी प्रकार एक से अधिक ग्रहों के होने पर जो बलवान् हो उसकी ऋतु पूर्वोक्तानुसार कहना चाहिये। लग्न में ग्रह न हो तो लग्न के द्रेष्काण, राशिस्वामी यह की ऋतु समझना चाहिये।

तिथि और जन्म काल का ज्ञान- द्रेष्काण के गतांश से अनुपात द्वारा तिथि का ज्ञान करना चाहिये। कुछ आचार्य अनुपात द्वारा सूर्य के गतांश मानते हैं।

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५ अंश में ३० तिथि, या ३० सूर्यांश तो द्रेष्काण के गत, पूर्वार्ध या उत्तरार्ध के अंश में क्या? इस प्रकार त्रैराशिक को अनुपात कहते हैं। अर्थात् द्रेष्काण पूर्वार्ध या उत्तरार्ध के गतांश को ३० से गुणा कर गुणनफल में ५ के भाग देने से लब्धि गत तिथि या सूर्य के भुक्तांश होते हैं। शेष को ६० से गुना कर फिर ५ से भाग देकर ( अथवा शेष को १२ से गुणा कर देने से ) घट्यादि या सूर्य की भुक्त कलादि समझना चाहिए। इस घट्यादिच के द्वारा अथवा मुक्त कलादि से इष्ट घटी का ज्ञान कर लेना चाहिये।

जन्म संवत् का ज्ञान- प्रश्नकालिक लग्न के अंशादि को २ से गुणा कर ५ का भाग देकर जो राश्यादि फल प्राप्त होता है, वही जन्म कालिक मध्यम बृहस्पति होता है। उसके द्वारा वर्तमान ( प्रश्नकालिक ) पञ्चाङ्गस्थ गुरु से प्रश्नकर्ता के वयस के अनुसार जन्म कालिक संवत्सर समझना। बृहस्पति, एक एक राशि में एक एक संवत्सर भोग करता है। इसलिये १२, १२ वर्ष बाद फिर उसी राशि पर आता है। अतः अनुमान से १२, १२ वर्ष जोड़ कर जन्म संवत् स्थिर करना चाहिये।

प्रकारान्तर से जन्मिष्ट ज्ञान- पूर्वोक्त दिन संज्ञक अर्थात् क.तु. वृ.फु. मीन राशि प्रश्नलग्न हो तो रात्रि में और रात्रि संज्ञक अर्थात् में वृ.मि.क.ध.म. राशि हो तो दिन में जन्म कहना चाहिए एवं लग्न के भुक्तांशों से दिनगत या रात्रिगत इष्टघटी का ज्ञान करना चाहिए।

दिन में जन्म निश्चित हो तो दिनमान को, रात्रि में जन्म निश्चित हो तो रात्रिमान को लग्न के भुक्तांशादि से गुना कर ३० का भाग देने से दिन या रात्रि की गतघटी होती है। उस पर से स्पष्ट ग्रह लग्नादि साधन कर नष्ट जन्मपत्र बनाना चाहिए।

मतान्तर से जन्म राशि का ज्ञान- प्रश्न लग्न तथा उस से ५, ९ भाव में जो राशिबली हो वही प्रश्नकर्ता की जन्मराशि कहना चाहिए, अथवा प्रश्नकर्ता अपने मस्तक आदि जिस अङ्ग का स्पर्श करता हुआ प्रश्न करे उसी अङ्ग की मेषादि राशि को जन्मराशि कहना चाहिए। अथवा लग्न से प्रश्नकालिक चन्द्रमा जितने राश्यादि मान से आगे हो उतने ही आगे चन्द्रमा से जो राशि हो वही जन्मराशि समझना चाहिए। विशेष यह है कि किमीन लग्न प्रश्नकाल में हो तो मान ही जन्म राशि समझनी चाहिए।

जन्म लग्न का ज्ञान- प्रश्नकालिक लग्न में जो नवमांश हो उसी राशि को जन्म लग्न विद्वानों को समझना चाहिए। अथवा लग्न द्रेष्काण से जितने द्रेष्काण में सूर्य हो, फिर सूर्य से उतने ही द्रेष्काण सम्बन्धी राशि को जन्मलग्न समझना चाहिए, यह ज्योतिषशास्त्र का सिद्धान्त है।

प्रथम प्रकार का उदाहरण- प्रश्न लग्न ३।७।२०।१० राश्यादि। कर्क में

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तृतीय ( कन्या ) राशि का नवांश है अतः कन्या लग्न में जन्म निश्चित हुआ। लग्न भुक्तांश जानने के लिये तृतीय नवांश के भुक्तकला ४० को ३० से गुना कर २०० के भाग देकर लब्ध लग्न के भुक्तांश ६ हुए अतः जन्म लग्न राश्यादि ५।६।१०।१० हुआ।

द्वितीय प्रकार का उदाहरण-एक राशि में ३ द्रेष्काण होते हैं अतः लग्न को सूर्य में घटा कर शेष राश्यादि को ३ से गुना करने से द्रेष्काण संख्या होगी उसको प्रश्नकालिक सूर्य में जोड़कर जो राश्यादि हो वही जन्म लग्न समझना चाहिए। राशि १२ से अधिक हो तो १२ से शोषित कर लेना चाहिये।

प्रकारान्तर से जन्म लग्न का ज्ञान- यदि प्रश्नकालिक लग्न में ग्रह हो तो उस ग्रह के राश्यादि को कलात्मक बनावे, यदि लग्न में अनेक ग्रह हो तो उनमें जो बली हो उसको कलात्मक करके प्रश्नकालिक छाया ( अंशुलादि ) संख्या से गुना कर गुणनफल में १२ के भाग देकर जो शेष बचे उसी को जन्म लग्न समझना।

नक्षत्र ज्ञान- यदि प्रश्नकर्ता खड़ा होकर प्रश्न करे तो प्रश्न लग्न को, यदि बिछौने पर पड़ा हुआ प्रश्न करे तो, प्रश्नलग्न से चतुर्थ को, यदि बैठा हुआ प्रश्न करें तो सप्तम भाव को यदि चलता हुआ प्रश्न करे तो प्रश्नलग्न से १० वाँ राशि को जन्म लग्न समझना चाहिए। जिस प्रकार प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तदनुसार लग्नादि केन्द्र भाव को जन्म लग्न मानकर फलादेश करना चाहिये।

नक्षत्र ज्ञान- प्रश्नकर्ता नामकरण संस्कार द्वारा माता पिता ने जो नाम करण किया हो उस नाम की मात्राओं की संख्या को २ से गुना कर प्रश्नकालिक द्वादशांशूलशड्‌डू अर्थात् पलभा की छायाड्‌डुल संख्या जोड़ कर २७ से भाग देने से जो शेष बचे वह घनिष्ठा से नक्षत्र जानना चाहिये।

समस्त नष्ट जातक का विचार- सर्वप्रथम प्रश्न लग्न का कला पिण्ड बनाकर राशि के गुणकों से गुणा करना चाहिए।

यदि कोई प्रश्नकर्ता का लग्न वृष या सिंह हो तो तुला लग्न कला पिण्ड को १० से गुना करें, तथा मिथुन या वृश्चिक हो तो ८ से तुला और मकर लग्न हो तो १७ से, कन्या और मकर राशि का प्रश्न लग्न हो तो ५ से तथा शेष राशियों का लग्न होने पर अपनी अपनी राशि संख्या से अर्थात् कर्क राशि हो तो ४ से, धनुराशि हो तो ९ से कुम्भ राशि हो तो ११ से तथा मीनराशि हो तो १२ से गुणा करना चाहिए।

यदि प्रश्न काल के लग्न में कोई ग्रह हो तो राशि से गुणित पिण्ड को

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ग्रह के गुणक से गुणा करना चाहिए। ग्रहों के अर्थात सू०, च०, बु०, श० का ५ तथा मंगल का ८ गुरु का १० और शुक्र का ७ गुणक बताया गया है। इस प्रकार पिण्ड बनेगा। यदि वर्ष ऋतु, मास का ज्ञान अभीष्ट हो तो पुनः पिण्ड को १० से गुणा करना चाहिये।

पक्ष, तिथि का ज्ञान करना हो तो ७ से गुणा करना चाहिए। इसी प्रकार लग्न का नवांश या इष्टकाल ज्ञान हेतु ५ से गुणा कर अपने विकल्प से भाग देने पर शेष तुल्य वर्ष मासादि होता है।

विकल्प वर्ष के लिये १२०, ऋतु का ६, मास और पक्ष का २, तिथि का १५, नक्षत्र का २७, लग्न का १२, नवांश का ९ तथा दिन या रात्रि की जानकारी हेतु २ विकल्प होता है।

इस प्रकार असंभव में ९ को धनर्ण करके अभीष्ट की सिद्धि कर लेना चाहिए।

यवन, इन्द्र दर्शन आदि प्राचीनाचार्यों ने जो नष्ट जातक का वर्णन किया हैं, उन सब प्रकारों को मैंने इस प्रकरण में बताया। परन्तु सब प्रकार वास्तव स्पष्ट नहीं हैं।

इन में जो प्रकार श्रेष्ठ समझने में आवे उसको स्वतः (स्वयं अपने बुद्धि के अनुकूल ) ग्रहण करना चाहिये।

चन्द्र राशि से कालादि का ज्ञान– प्रश्नकालिक में चन्द्र राशि दिन बली हो तो रात्रिमान तथा रात्रिबली हो तो दिनमान का १/४ या १/३ या १/२ भाग समाप्त हुआ समझना चाहिए।

चन्द्रराशि का व्यतीतभाग के आधार पर चतुर्थशादि की जानकारी करके राशि के कला पिण्ड को पूर्वोक्त 'वृष सिंहा' इत्यादि गुणक से गुणा कर ७ से पुनः गुणाकर २७ से भाग देने पर शेषक्रम से अश्विन्यादि नक्षत्र समझना चाहिए।

यदि ९ घटाने से अभीष्ट सिद्धि हो तो मघा से शेष नक्षत्र ( जो २७ से भाग देने पर आया है ) तक गिनें।

यदि ९ जोड़ने पर अभीष्ट की सिद्धि हो तो मूल नक्षत्र शेष नक्षत्र तक गणना करना चाहिए।

इस प्रकार पिण्ड को ७ से भाजित करने पर जो शेष मिले उसे प्रश्न दिन के बार से गिन कर जन्मवार समझना चाहिए।

इस प्रकार नष्ट जातक का ज्ञान करके सूर्यादि ग्रहों का स्पाष्टिकरण करना चाहिए।

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इसके बाद महादशा आदि भुक्तभोग्यादि का ज्ञान करना उचित होगा। तथा विलोम क्रिया से लग्न से सूर्य का या इष्टकाल का ज्ञान करना चाहिए। जब तक काल ज्ञान न हो तब तक ९ जोड़कर अभीष्ट की सिद्धि करनी चाहिए।

गोचर ग्रह प्रकरण

फलादेश में गोचर अर्थात् जन्मराशि से विभिन्न स्थानों में ग्रहों का तात्कालिक भ्रमण बहुत महत्वपूर्ण है। जो दैवज्ञ दशाफल व होराफल पर पूर्णतया निर्भर रहते हैं तथा गोचर की उपेक्षा करते हैं, वे निश्चय ही बहुत चूक करते हैं। वशिष्ठ संहिता में ऐसा ही कहा गया है कि- ‘गोचरबलाभिज्ञास्तवति लोके यान्ति हास्यतां सुजनैः।’

इसके विपरीत दशान्तर्दशा के साथ गोचर फल का भी समन्वय करके फलादेश करने वाला ज्योतिषी सर्वत्र सम्मान पाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी जन्म लग्न से राशि की भी गोचर देखते हैं तथा वहाँ जन्मराशि सायन सूर्य की राशि मानी जाती है। हमने भी अनुभव में गोचर विचार को जन्म लग्न व जन्म चन्द्र से विशेष प्रभावी पाया है।

गोचर विषय विभाग- राजपक्ष के कार्यों में सूर्य का, युद्ध मुकदमा आदि में मंगल का, विद्याभ्यास में बुध का, विवाह व मंगल कार्यों में गुरु का, यात्रा में शुक्र का, तन्त्र-मन्त्र दीक्षा व सुख विचार में शनि का एवं सब कार्यों में चन्द्रमा का गोचर विशेषतया देखना चाहिए।

गोचर में अंग विधान- गोचर विचार में सिर व मुख प्रदेश का स्वामी, सूर्य, छाती व गले का चन्द्रमा, पीठ व पेट का स्वामी मंगल, हाथ, पाँव व नसों-नाड़ियों का बुध, कमर व जाँघ का गुरु, गुप्त स्थानों का शुक्र व घुटनों व पिण्डलियों का शनि स्वामी होता है।

इन ग्रहों का अशुभ गोचर उक्त अंगों में पीड़ा देता है। साथ ही यह पूर्वोक्त ग्रह प्रकरण में वर्णित ग्रहों की अवस्था, वर्ण, रस आदि का भी समन्वय गोचर में करके तत्तत् वस्तुओं का विचार करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त भी मंगल से रक्त का, शुक्र से वीर्य का, बुध से बुद्धि व चेतना का, गुरु से जीवन का, चन्द्रमा से मन का, सूर्य से स्नायु, सत्त्व, बल, सुख आदि का विचार एवं शनि से सब प्रकार के कष्टों का विचार करना चाहिए।

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ग्रह भोगकाल

मासं शुक्रबुधादित्या: सार्धमासं तु मङ्गल: । त्रयोदश गुरुश्रैव सपादद्विदिनं शशी ।। राहरष्टादशान्मासान् त्रिंशन मासान शनैश्वर: । राहुकेतुतुकत्सु राशिभोगा: प्रक्रीर्तिता: ।। सूर्य: पञ्चदिनं शशी त्रिघटिका भौमोष्टदिनं वै वासरं सप्ताहं हुशना बुधस्त्रयदिनं मासद्वयं वै गुरु: । षड्मासं रविःसत्थैव सततं स्वर्भानुमासद्वये केतोश्रैव तथा फलं परिमितं येयं ग्रहाणां फलम् ।। राशिप्रवेशे सूर्यारौ मध्ये शुक्रवृहस्पती । राहुशनैश्वर्य शनिशान्ते सौम्यश्रैव सदा शुभ: ।।

सूर्यादि नवग्रहों के द्वारा एक राशि को भोगने में जितना समय लगता है, उसे और उनके फलदान काल को कहा जा रहा है- सूर्य- एक राशि का एक माह में भोग करते हैं, उसमें प्रथम पाँच दिन फल देते हैं। चन्द्र- एक राशि को सवा दो दिन में भोग करते हैं, उसमें अन्त के ३ घटी फल देते हैं। मंगल- एक राशि को ४५ दिन में भोग करते हैं, उसमें प्रथम आठ दिन फल देते हैं। बुध- एक राशि को १ मास में भोग करते हैं, उसमें प्रत्येक दिन फल देते हैं। गुरु- एक राशि को १३ मास में भोग करते हैं, उसमें मध्य के दो मास में फल देते हैं। शुक्र- एक राशि को एक मास में भोग करते हैं, उसमें मध्य के सात दिन फल देते हैं। शनि- एक राशि को तीस माह में भोग करते हैं, उसमें अन्त के ६ मास फल देते हैं। राहु या केतु- एक राशि को १८ मास में भोग करते हैं, उसमें अन्त के दो मास फल देते हैं।

द्वादश भावों के नाम

तत्रादौ तनुधनसहज सुहृत्सुतरिपवश । जायामृत्युयुध्मकर्माड्यव्ययाख्यानी द्वादश भवनानि ।।

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जातक, प्रश्न या गोचर कुण्डली में १२ स्थान होते हैं, जिन्हें सिद्धान्त विद् महर्षियों ने द्वादश भाव कहा है ।

क्रमशः उनके नाम हैं-तनु, सहज, धन, सुहृत्त, सुत, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय ।

गोचर ग्रहों के द्वादश भाव स्थित फल

सूर्य: स्थानविनाशं भयं श्रियम्‌ मानहानिमथ दैन्यम्‌।

विजयं मार्ग पीडां सुकृतं हन्ति सिद्धिमायामथ हानिम्‌॥

चन्द्रे: तनं च धनं सौख्यं रोगं कार्यक्षतिं श्रियम्‌।

स्त्रियं मृत्युनं नृपभयं सुखमायव्ययं क्रमात्‌॥

भौमो: डरिभीतिं धननाशमर्य भयं तथाडर्थ क्षितिमर्थलाभम्‌।

धनात्ययं शत्रुभयं च पीडां शोकं धनं हानिमनुक्रमेण ।

बधस्तु बन्धं धनमन्यभीतिं धनं रुजं स्थानमथो च पीडाम्‌।

अर्थ रुजं सौरव्यमथात्म सौख्यमर्थक्षतिं जन्मगृहात्करोति ॥

गुरुभयं धनं क्लेशं धननाशं सुखं शुचम्‌।

मानं रोगं सुखं दैन्यं लाभं पीडां च जन्मभात्‌ ॥

कविः शत्रुनाशं धनं सौख्यमर्थ

सुतापतिं रिपोः साध्वसंशोकमर्थम्‌।

विद्याद्रव्यान्नलाभं विपत्तिं धनाप्तिं

तनोत्यात्मनो जन्मराशे: ॥

शनि: सर्वनाशं तथा वित्तनाशं धनं शत्रुवृद्धि सुतादे: प्रवृद्धिम्‌ ।

श्रियम्‌ दोषसन्धिं रिपुं द्रव्यनाशं तथा दौर्मनस्यं देशे द्रवहनर्थम्‌ ॥

राहुर्हानिं तथा नैःस्वं धनं वैरं शुचं श्रियम्‌ ।

कलिं वसुं च दुरितं वैरसौख्यं शुचं क्रमात्‌ ॥

केतुः क्रमा हर्ज वैरं सुखं भीतिं शुचं धनम्‌ ।

गतिं गदं दुष्टकृतं च शोकं कीर्ति च शत्रुताम्‌ ॥

प्राय: अर्थ स्पष्ट है। सुविधा के लिए चक्र का अवलोकन करना चाहिए ।

गोचर में अंग विभाग- गोचर विचार में सिर व मुखप्रदेश का स्वामी सूर्य, छाती व गले का चन्द्रमा, पीठ व पेट का स्वामी मंगल, हाथ पाँव व नसों-नाड़ियों का बुध, कमर व जाँघ का गुरु, गुप्त स्थानों का शुक्र व घुटनों व पिण्डलियों का शनि स्वामी होता है।

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नाम | रवि | चन्द्र | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु | केतु

तनु | नाश | अतिप्र. | शत्रुभय | वन्धन | भय | शत्रुनाश | सर्वनाश | हानि | रोग

धन | भय | धनप्रा. | धननाश | धनप्राप्ति | धनप्राप्ति | धनप्राप्ति | वित्तनाश | धनलाभ | वैर

सहज | धन | सुखप्राप्ति | धनप्राप्ति | भीति | दुःख | सौख्य | धनलाभ | धनप्राप्ति | सुख

सुत | दैन्य | रोग | अर्थप्राप्ति | रोग | सुख | पुनःप्राप्ति | सुतप्राप्ति | शोक | शोक

रिपु | विजय | लक्ष्मी | लाभ | स्थानलाभ | शोक | रिपुभय | धनप्राप्ति | लक्ष्मी | धनप्राप्ति

जाया | मार्गकष्ट | लक्ष्मी | खर्च | पीड़ा | मान | शोक | दोष | कलह | मार्गक्रम

मृत्यु | पीड़ा | मृत्यु | शत्रुभय | अर्थप्राप्ति | रोग | धनप्राप्ति | रिपु | धनलाभ | रोग

धर्म | पुण्‍डनाश | राजभय | पीड़ा | रोग | सुख | वसुलाभ | धननाश | पापकर्म | दुष्टकर्म

कर्म | सिद्धि | सुख | शोक | सौख्य | दैन्य | विपत्ति | शत्रुवृद्धि | वैर | शोक

आय | लाभ | आय | धनप्राप्ति | सौख्य | लाभ | धनप्राप्ति | धनप्राप्ति | सौख्य | कीर्ति

व्यय | हानि | खर्च | हानि | नाश | पीड़ा | धनप्राप्ति | धननाश | शोक | समुत्था

इन ग्रहों का अशुभ गोचर उक्त अंगों में पीड़ा देता है। साथ ही ग्रहों की अवस्था, वर्ण, रस आदि का भी समन्वय गोचर में करके तत्तत् वस्तुओं का विचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त भी मंगल से रक्त का, शुक्र से वीर्य का, बुध से बुद्धि व चेतना का, गुरु से जीवन का, चन्द्रमा से मन का, सूर्य से स्नायु, सत्व, बल, सुख आदि का विचार एवं शनि से सब प्रकार के कष्टों का विचार करना चाहिए।

शुभाशुभ गोचर का सामान्य विचार- (क) जन्मराशि (चन्द्रराशि) से ग्यारहवें स्थान में सभी ग्रहों का गोचर शुभ है। (ख) सूर्य जन्म राशि से ३,६,१०,११ में शुभ फलप्रद होता है। मंगल व शनि ३,६,११ स्थानों में चन्द्रमा १,३,६,७,१०,११ में, शुक्र १,२,३,४,५,८,९,११,१२ स्थानों में, गुरु २,५,७,९,११ स्थानों में, बुध २,४,६,८,१०,११ में शुभ फलप्रद होते हैं। स्वोच्च मूल त्रिकोण मित्र राशि में व उदित सभी ग्रह प्रायः शुभ व अन्य स्थित में अशुभ फल देते हैं। (ग) सामान्यतः क्रूर ग्रह ३,६,११ में व शुभ ग्रह अन्य स्थानों में फलप्रद होते हैं।

गोचर वेध

सूर्यो रसान्त्ये खयुगे उग्निनन्दे शिवाक्षयोर्भोंमपशनितमश्र । रसांकयोरलाभशरे गुणान्त्ये चन्द्रौडम्बराद्भौ गुणनन्दयोश्र ॥

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लाभाष्टमे चाद्यशरे रसान्त्ये नगद्वये जो द्विशरेsब्विरामे । रसांकयोगविधौ खनागे लाभव्यये देवगुरु: शराद्बौ ।।

द्व्यन्त्ये नवांशद्रिगुणे शिवाहौ शुक्र: कुनागे द्विनगेजगिनरूपे । वेदांबरे पञ्चनिधौ गजेशो नन्देशयोर्भानुरसे शिवाग्नौ ।।

क्रमाच्छुभो विद्र्र इति ग्रह: स्यात् पितु: सुतस्याज्ञ न वेधमाह: । दुष्टोऽपि खेटो विपरीतवेधाच्छुभो द्विकोणे शुभद: सितेऽब्ज: ।।

स्वजन्मराशेरिह वेधमाहुरनये ग्रहाधिष्ठितराशित: स: । हिमाद्रिविन्ध्यान्तर एव वेधो न सर्वदेशेष्वति काश्यपोक्ति: ।।

जन्म राशि से गोचर ग्रह का द्वादश भाव स्थिति वश शुभाशुभ फल ज्ञान कर अधोलिखित चक्र के अनुसार अन्य ग्रह से वेध का परीक्षण करना चाहिए ।

जैसे कि सूर्य जन्म राशि से षष्ट स्थान में हो, तो शुभ फल करता है, लेकिन वहीं से द्वादश स्थान में भी कोई ग्रह हो, तो वेधित होने के कारण सूर्य अशुभ फल ही देता है।

इसी प्रकार अन्य ग्रहों के लिए भी विचार करना चाहिए। विशेषता मात्र इतना ही है कि पिता और पुत्र का परस्पर वेध नहीं माना जाता है।

जैसे सूर्य का शनि से, चन्द्र का बुध से अथवा शनि का सूर्य से, बुध का चन्द्र से वेध नहीं होता।

इसी तरह यदि सूर्य द्वादश स्थान में हो और कोई ग्रह तृतीय स्थान में भी हो, तो इसे विपरीत वेध कहा गया है।

यह ग्रहों की शुभदा में वृद्धि ही करता है । इस वेध का विचार हिमाद्रि और विन्ध्याचल के मध्य में ही करना चाहिए, अन्यत्र नहीं, जैसा काश्यप महर्षि ने कहा है

गोचर ग्रह वेधचक्र

रवे: चन्द्रस्य बुधस्य

६ १० ३ ११ ६ ११ ३ १० ३ ११ १ ६ ७ २ ४ ६ ८ १० ११ शुभस्थान १२ ४ ९ ५ ९ ५ १२ ४ ९ ८ ५ १२ २ ५ ३ ९ १ ८ १२ वेध स्थान

गुरो: शु्क्रस्य

५ २ ९ ७ ११ १ २ ३ ४ ५ ८ ९ १२ ११ शुभ स्थान ७ १२ १० ३ १ ९ १ १० १ ५ ११ ६ ३ वेध स्थान

विपरीत (नाम) वेध विचार- सूर्य ३,६,१०,११ स्थानों में शुभ है, इन स्थानों के वेध भाव ९,१२,४,५ हैं। अतः जन्म राशि से इन स्थानों में जब सूर्य जाएगा तो अशुभ फल ही देगा।

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शुभ फल देने वाले स्थान विपरीत वेधस्थान कहे जाएंगे। उदाहरणार्थ जन्म राशि से १२वें स्थान में सूर्य अशुभ फल देगा, लेकिन १२वें का वेध स्थान छठा है। अतः छठे स्थान में ( सूर्य राशि से ) कोई ग्रह शनि को छोड़कर स्थित हो तो १२वें सूर्य का अशुभ फल नहीं होगा। इसी प्रकार जन्मराशि से चतुर्थ में गुरु अशुभ है तो गुरु राशि से पंचम ( चतुर्थ का विपरीत वेध स्थान ) में कोई ग्रह हो तो गुरु अशुभ फल नहीं दे सकेगा। जिन स्थानों का शुभ वेधस्थानों में ग्रहण नहीं हुआ है उनका फल सामान्य नियम से जानना चाहिए। जन्मतः क्रमवेधः स्यात् वामवेधो ग्रहालन्यात् ।

शनि का विशेष गोचर- सोढ़ेसाती विचार- जन्म चन्द्र राशि से १२।११ व १ स्थानों में शनि का गोचर साढ़े सात वर्षों का होने पर साढेसाती कही जाती है। यह गोचर प्रायः कष्टप्रद होता है। जिनकी कुण्डलियों में शनि बलवान्, शुभ भावों का स्वामी, ३।६।११ स्थानों में स्थित या शुभ दृष्ट, कारक ग्रहों से युक्त, राशि बली या नवांश बली हो तो उन्हें विशेष अशुभ फल नहीं होता। बल्कि कारक शनि की साढेसाती अपने योग कारकत्व से राज्ययोग करती है।

इसके विपरीत यदि शनि शत्रुक्षेत्री, शत्रु या पाप दृष्ट युक्त, उसके भावेश, अशुभ भावस्थ, नीच, अस्त आदि हो तो बहुत कष्ट देता है। परिवार में एक साथ कई सदस्यों को साढेसाती आना अधिक कष्टकारक होता है। यदि साढेसाती के साथ दशान्तर्दशा भी खराब हो तो अधिक अशुभ फल होता है। प्रायः अल्पायु लोग एक साढेसाती, मध्यायु लोग दो तथा दीर्घायु लोग तीन साढेसाती भोगते हैं।

साढेसाती के पाये (पाद विचार)– शनि जब राशि बदले उस दिन अपनी जन्मराशि से चन्द्रमा यदि १।६।११ भाव में हो तो सोने के पाये, २।५।९ में हो तो चाँदी के पाये, ३।१०।१० में ताँबे के पाये व ४।८।१२ भाव में लोहे के पाये से शनि का गोचर होता है। इसमें सुवर्णपाद में सब प्रकार का सुख, चाँदी के पाये में शुभ, ताम्रपाद में शुभाशुभ समान फल तथा लोहेपाद में बहुत अनिष्ट फल होता है। ढैय्या विचार (लघु कल्याण)– इसी प्रकार जन्मराशि से ४ या ८ राशियों में शनि रहने से ढाई वर्ष तक अशुभ फल देता है।

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इसमें भी पाये, उच्च, नीच आदि का विचार करके फलादेश करना चाहिए|

लग्नों की साढ़ेसाती विचार– मेष जन्मराशि या लग्न वालों की साढ़ेसाती का शनि द्वादश मीन में समक्षेत्री होने पर सम व द्वितीय वृषभ में मित्र क्षेत्री होने पर साधारण कष्टकारक, लेकिन मेष राशि में नीचस्थ शनि अपना अशुभ फल विशेष देगा|

अतः विभिन्न राशी वाले लोगों का साढ़ेसाती का निम्नोक्त समय अधिक कष्ट कारक होगा|

मेष–मध्य के ढाई वर्ष।

वृष–प्रथम के ढाई वर्ष।

मिथुन–अन्त के दो वर्ष।

कर्क–मध्य के ढाई वर्ष।

सिंह–प्रथम पाँच वर्ष।

कन्या–प्रथम ढाई वर्ष।

तुला–अन्त के ढाई वर्ष।

वृश्चिक–मध्य के ढाई वर्ष।

धनु–प्रथम ढाई वर्ष।

मकर–प्रथम ढाई वर्ष।

कुम्भ–अन्त के ढाई वर्ष।

मीन–अन्त के ढाई वर्ष।

परस्पर दोषहर्ता ग्रह- राहु के दोष को बुध, इन दोनों के दोष को शनि, इन तीनों के दोष को मंगल, इन चारों के दोष को शुक्र, इन पाँचों के दोष को गुरु, इन छहों के दोष को चन्द्रमा व सब के दोष को ( विशेषतया उत्तरायण में ) सूर्य दूर कर देता है|

दोषशामक ग्रह बली होना चाहिए|

आशय यह है कि किसी को शनि का गोचर अनिष्ट कारक है तो बलवान् मंगल या बलवान् चन्द्रमा या बलवान सूर्य जब तक शुभ गोचर रहेगा, तब तक शनि का अशुभ गोचर फल स्थगित रहेगा|

इसी प्रकार सब ग्रहों के विषय में समझना चाहिए|

दोष शान्ति के उपाय– ( ९ ) अनिष्ट कारक ग्रह के व्रत, मन्त्र का जप, हवन व सम्बन्धित जड़ी-बूटी के रस से स्नान करना सबसे अच्छा है|

तत्पश्चात् केवल दान, तत्पश्चात् केवल मन्त्र से तर्पण भर करना चाहिए|

उक्त तीनों कर्म साथ हो जाएं तो काफी हद तक अशुभ फल शान्त हो जाता है|

अशुभ ग्रह के वैदिक या तान्त्रिक मन्त्र की निश्चित संख्या का जप करना या कराना चाहिए|

( २ ) संक्षिप्त विधि अपनाना हो तो सूर्य की शान्ति के लिए प्रतिदिन रविवार या प्रतिदिन लगे हुए पान का, चन्द्रमा के लिए चन्दन का, मंगल के लिए भोजन का, शुक्र के लिए चावल या सफेद वस्त्र का, शनि के लिए तेल का, राहु व केतु के लिए प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व स्नान या काले तिल या नमक का दान करना चाहिए|

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( ३ ) सामान्यतः ईश्वराराधना, सत्कार्य, देव बाह्मण पूजन, यज्ञ करने से सभी ग्रह दोष शान्त होते हैं। अन्न व वस्त्र का दान, दक्षिणा सहित करने से भी ग्रहों का अरिष्ट दूर होता है।

दैनिक गोचर ज्ञान- ( ९ ) अपने जन्म नक्षत्र से दिन नक्षत्र तक गिन कर उस संख्या में ९ का भाग दें। शेष से निम्न दशा वाहन चक्र में दिया फल जानें।

दिन दशा वाहन चक्र

शेषांक

१ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९

वाहन

गर्दभ | अश्व | गज | महिष | शृगाल | सिंह | काक | मयूर | हंस

फल

कलह | यात्रा | लाभ | व्याधि | भय | विजय | चिन्ता | सम्पत्ति | जय

( २ ) जन्मनक्षत्र को चार से गुणा करके उसमें वार संख्या ( रविवार १, सोमवार २ ) व शुक्लपक्ष से प्रश्न दिन की उदय तिथि संख्या जोड़कर ९ का भाग दें।

यदि २,४,५,६ शेष बचें तो लाभ व सुख तथा अन्य संख्या शेष होने पर कष्ट तथा ० बचने पर महाकष्ट होता है।

शनि चक्र द्वारा गोचर विचार– इसमें पुरुषाकार शनि चक्र बनाकर फल देखा जाता है। जिस नक्षत्र में शनि चल रहा हो, उस नक्षत्र से पीछे की ओर गिनते हुए नक्षत्रों को स्थापित कर फल जानें।

शनि चक्र

अंग | दायाँ हाथ | दोनो पैर | बायाँ हाथ | पेट | सिर | नेत्र | गुदा

शनि नक्षत्र से उल्टे क्रम से नक्षत्र | ४ | ६ | ८ | ५ | ३ | ४ | १

फल | रोग | लाभ | यात्रा या बन्धन | दरिद्रता | लाभ | सौभाग्य | अल्पमृत्यु

उदाहरणार्थ शनि धनिष्ठा में है तथा आर्द्रा नक्षत्रोत्पन्न बालक का गोचर फल जानना है तो धनिष्ठा से उल्टे क्रम से गिनता तो आर्द्रा नक्षत्र १८वाँ है। यह पेट पर है, अतः दरिद्रता या बन्धन का द्योतक है। यह मानसागरी का मत है।

कुछ विद्वान् शनि चक्र में उल्टे क्रम से नक्षत्र न गिन कर शनि जिस नक्षत्र में हो, उससे सीधी गणना द्वारा, जहाँ जन्म नक्षत्र या नाम नक्षत्र पड़े, तदुनुसार फल कहते हैं। हमारे विचार से भी सीधी गणना द्वारा फल अधिक सटीक बैठता है।

अन्य शनि चक्र- जिस नक्षत्र में गोचर में शनि हो, वहाँ से सीधी गणना द्वारा निम्न प्रकार से नक्षत्र स्थापित कर, जहाँ नाम नक्षत्र ग्रा जन्म नक्षत्र पड़े,

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तदनुसार फल कहना चाहिए।

अंग | नक्षत्र संख्या | फल सिर | १ | रोग मुख | ३ | लाभ गुप्तांग | ४ | हानि नेत्र | २ | धन हृदय | ३ | सुखी बॉयाँ हाथ | ४ | बन्धन बायाँ पैर | ३ | पीड़ा दायाँ पैर | ३ | श्रेष्ठ यात्रा दायाँ हाथ | ४ | लाभ

उदाहरणार्थ शनि नक्षत्र धनिष्ठा से जन्म नक्षत्र आर्द्रा तक गिना तो उत्त्क नक्षत्र हृदय पर पड़ता है, अतः सुखी होगा।

शनि व बृहस्पति का गोचर जीवन में प्रायः सभी मुख्य अच्छे या बुरे परिवर्तनों को बताता है। अतः इनका विचार जन्मपत्र की दशा-अन्तर्दशा के अतिरिक्त भी करते रहना चाहिए।

दोनों का एक साथ अशुभ गोचर प्रायः नाशक होता है।

गुरु चक्र- बृहस्पति के गोचर नक्षत्र से जन्म नक्षत्र तक गिनकर निम्नांकित गुरु चक्र द्वारा फल जाने।

गुरु चक्र अंग | मस्तक | कन्थे | गला | छाती | पैर | हाथ | आँखे नक्षत्र | ४ | ४ | १ | ५ | ६ | ८ | २ फल | राज्योग | धन | ऐश्वर्य | सुख व प्राप्ति | पीड़ा | मृत्यु | राजसी सुख

जन्म के चन्द्र में वर्जित पञ्चकर्म

जन्मस्तर्क्षे शशाङ्के तु पञ्च कर्माणि वर्जयेत्। यात्रा युद्धं विवाहं च क्षौरं च गृहवेशनम् ।।

यात्रा करना, युद्ध में जाना, विवाह करना, क्षौर करना और गृह प्रवेश करना ये पाँच कर्म जन्म राशि में करना (जन्म के चन्द्र में करना ) वर्जित किया गया है।

चन्द्र तारा बल कथन

द्विपञ्चनवमे शुक्ले श्रेष्ठशशन्द्रो हि उच्यते । अष्टमे द्वादशे कृष्णो चतुर्थे श्रेष्ठ उच्यते । शुक्लपक्षे बलीचन्द्रः कृष्णो तारा बलीयसी ।।

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शुक्लपक्ष में जन्म राशि से २-५-९ स्थान स्थित चन्द्र शुभ और कृष्ण पक्ष में ४-८-१२ स्थान स्थित चन्द्र भी शुभ कहा गया है। शुक्ल पक्ष में चन्द्र का बल और कृष्ण पक्ष में तारा का बल श्रेष्ठ कहा गया है।

ग्रहों के शान्ति के उचित काल

खेचरा गोचरतोऽष्टवर्गादशा क्रमाद्वाच्यशुभा भवन्ति । दानादिना ते सुतरां प्रसन्नास्ते नाधुना दानविधिं प्रवक्ष्ये ॥

प्रत्येक ग्रह की शान्ति, तब करनी चाहिए, जब वह गोचर से, अष्टक वर्ग से अथवा दशा क्रम से अशुभ हो । उसके प्रसन्नता के लिए दानादि-शान्ति कार्य उचित है, अतः अब यहाँ दान आदि की विधि को कहा जा रहा है ।

वासरोत्थदोषशमनोपाय भानुस्थांबलदानेनापहरति नृणां वैकृतं वासरोत्थं । सोमः श्रीखण्डदानादनिवरसतुो भोजनात्पुष्पदानात्॥ सौम्यः शास्त्रस्य मन्त्रादुरुहरभजनाद्दार्गवः शुभवस्त्रा-तैलस्नानात्प्रभाते दिनकरतनयो ब्रह्माणत्या परे च ॥

सूर्य ताम्बुल दान से, चन्द्र चन्दन दान से, मंगल भोजन व पुष्पदान से, बुध शास्त्रोक्त मन्त्र-जप से, गुरु शिवाराधन और भोजन से, शुक्र श्वेत वस्त्र से और शनि प्राप्तः काल तैलस्नान और विप्र सम्पान से ये ग्रह अपने-अपने वारों के अशुभ फलों को दूर कर शुभफल के दाता हो जाते हैं ।

माणिक्य गोदूमसवत्सधेनु: कौसुम्भवासो गुडहेमताम्रं । आरक्तकं चन्दनमम्बुजं च वदन्ति दानं हि विरोचनाय ॥ सद्रंशपात्रस्थिततण्डुलांशं कर्पूरमुक्ताफलशुभ्रवस्त्रं । युगोपयुक्तं वृषभं च रौप्यं चन्द्राय दद्यात् घृतपूर्णकुम्भं ॥ प्रवालगोधूममसूरिकाश्र वृषोरणशापि गुडः सुवर्णं । आरक्तवस्त्रं करवीरपुष्पं ताम्रं च भौमाय वदन्ति दानं ॥ ऋषभं च नीलं कलधौतकांस्यं मुद्राज्यगौरुतम त सर्वपुष्पं । दासीस च दन्तं द्विद्रव्य नूनं वदन्ति दानं विधुनन्दनाय ॥ शर्करा च रजनी तुवरकं: पीतधान्यमपि पीतमम्बरं । पुष्परागलवणं सकाच्छानं प्रीतये सुरगुरोः प्रदीयते ॥ चित्रांबरं शुभ्रतुरङ्गं च धनुश्च वज्रं रजतं सुवर्णं । सतण्डुलानुत्तमगन्धयुक्तं वदन्ति दानं भृगुनन्दनाय ॥ माषाश्र तैलं विमलेन्द्रनीलं तिलाः कुलत्या महिषी च लोहम् । कृष्णा च धेनुः प्रवदन्ति नूनं तुष्टये च दानं रविनन्दनाय ॥

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गोमेदरत्नं च तुरड्र्ङमश्व सुनीलचैलामलकम्बलं च । तिलाक्ष तैलं खलु लोहमिश्रं स्वर्णभानुविदानमिदं वदन्ति ॥ वैदूर्यरत्नं सतिलं च तैलं सुकम्बलश्रापि मदो मृगस्य । शस्त्रं च केतोः परितोषहेतौश्छागस्य दानं कथितं मुनिन्द्रैः ॥ रवे: सप्तसहस्राणि चन्द्रस्यैकादशैव तु । भौमे दशसहस्राणि बुद्धे चाश्वतहकम् ॥ एकोन विंशतिरिज्जीवे शुक्र एकादशैव तु । त्रयोविंशतिमन्दे च राहोरष्टादशैव तु ॥ केतौ सप्तसहस्राणि जपसंख्या प्रकोर्तिता । पूर्वोदितं ग्रहाणां तु कोष्ठकेषु च दृष्टव्यम् ॥ अर्थ प्रायः स्पष्ट है । सुविधा के लिए दानवस्तु और जप संख्या सम्बन्धी चक्र अवलोकन करना चाहिए।

ग्रह पीड़ा शमनार्थ सामान्योपाय देवब्राह्मणवन्दनाद गुरुचः सम्पादनात्म्येहं साधनमपि भाषणाच्छुति रवश्रेयः कथाकारनात् । भावाज्जपादानतो होमादध्वरदर्शनाच्छुचिमनो कुर्वन्तीह कदाचिदेव पुरुषस्यैवं ग्रहाः पीडनम् ॥

ग्रह दान वस्तु और जप संख्या स्पष्टार्थ चक्र

नाम | रवि | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु | केतु माणिक | वेणुपात्र युक्ततन्दुल | मूँगा | कालावैल | शर्करा | चित्रवस्त्र | उड़द | गोमेद | वैदूर्य गेहूँ | कर्पूर | सोना | हल्दी | श्वेत अन्न | तेल | घोड़ा | रत्न गोवत्स | मोती | मसूर | कांस्यपात्र | घोड़ा | गाय | नीलमणि | नीलवस्त्र | तिल रक्तवस्त्र | श्वेतवस्त्र | ताम्बेल | मूँगा | पीत अन्न | वत्र | तिल | कम्बल | तिल | कम्बल दान- वस्तु | गुड़ | श्वेत बैल | गुड़ | घृत | पीत वत्र | रूपा | सोना | पुष्य रा. | सोना | कस्तूरी सोना | रूप्य | गरूड़त्म | पुष्य रा. | सोना | कस्तूरी ताँबा | रूपा | लाल वत्र | सर्वपुष्प | नमक | ताम्बूल | लोहा | लोहा | शस्त्र रक्तचन्द्र | घृत कुम्भ | केसरपुष्प | दासी | सोना | चन्दन | कृष्णगो | क. पू. | मेढ़ा कमल | ० | ० | हस्तिदान्त | ० | ० | ० | ० | ० जप संख्या | ७००० | ११००० | १०००० | ९००० | १९००० | ११००० | २३००० | १८००० | ७०००

देव और ब्राह्मण की प्रीति के लिए उनकी वन्दना करें और प्रतिदिन गुरु और सज्जनों के सदवचन तथा उत्तम-उत्तम कथा श्रवण करे। होम व यज्ञ के दर्शन करें, शुद्ध मन से जप दान करें। इस प्रकार जो ग्रहों के निमित्त ऐसे उपाय करेंगे, तो उसकी ग्रहपीड़ा

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निवृत्ति होगी और उसका शुभ फल प्राप्त होगा। मन्त्र से ग्रह-उपचार- मन्त्र से ग्रहों के दोषों व रोगों का निदान किया जाता है। यहाँ सूर्यादि नवग्रहों की उपासना, पूजा, ध्यान, दानादि द्वारा शान्ति तथा उनकी प्रसन्नता से समृद्धि का उपाय बताया गया है। इसमें प्रत्येक ग्रह की प्रसन्नता हेतु वैदिक, तांत्रिक, पौराणिक, नाम तथा जैन मन्त्रों का उल्लेख तथा उनकी जप-संख्या भी बतायी गयी है।

सूर्य- सूर्य के लिए निम्न मंत्र का जाप किया जाता है।

वैदिक मंत्र : ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यञ्च। हिरण्येन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्।।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ घृणिः सूर्यादित्योम। २. ॐ घृणिः सूर्य आदित्योम श्री। ३. ॐ हां हीं हौं सः सूर्याय नमः। ४. ॐ हीं हीं सूर्याय नमः।

नाम मंत्र- ॐ घृणि सूर्याय नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ जवाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिम् हि्वाक्रम्।।

जैन मंत्र : ॐ हीं क्लीं श्रीं श्रीं सूर्यग्रह अरिष्टनिवारक श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।

जप संख्या : ७०००

चन्द्रमा- चन्द्र हेतु इस मंत्र का जाप किया जाता है-

वैदिक मंत्र : ॐ इमं देवा असपत्नꣳ सुहवध्वꣳ महते क्षत्राय महते ज्येष्ठ्ठाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्ये पुत्रममुष्यै पुत्रममुष्ये विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकꣳ स राजा सोमोऽस्माकमम्बाहृणानां राजा।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः। २. ॐ श्रां श्रीं श्रौं चन्द्रमसे नमः। ३. ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नमः। नाम मंत्र : ॐ सों सोमाय नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोरदार्णवसंभवम्। नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुटभूषणम्।।

जैन मंत्र : ॐ हीं कौं श्रीं क्लीं चन्द्रारिष्टनिवारक श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।

जप संख्या : ११०००

मंगल- मंगल हेतु यह मंत्र जाप करना चाहिए-

वैदिक मंत्र : ॐ अङ्गिर्मूर्द्ददिवः ककुत्पतिः पृथिव्याअयम्। अपारेता यः सिजिन्वती।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ हां हंसः खं खः। २. ॐ हूं श्रीं मंगलाय नमः। ३. ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः। नाम मंत्र : ॐ अं अङ्गारकाय नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम्।।

जैन मंत्र : ॐ आं क्रौं हीं श्रीं क्लीं। भौमारिष्टनिवारक

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श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।

जप संख्या : १९०००- बुध- बुध हेतु निम्न मंत्र का जाप करें-

वैदिक मंत्र : ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्तेस । सुरेथामयज्ञ। अस्मिन्स्तथस्थेध्युत्तरस्मिन्न्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत।।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं श्रीं श्रीं बुधाय नमः। २. ॐ बाँ ब्रीं बौं सः बुधाय नमः। ३. ॐ स्त्रीं स्त्रीं बुधाय नमः। नाम मंत्र : ॐ बूं बुधाय नमः

पौराणिक मंत्र : ॐ प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् । सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ।।

जैन मंत्र : ॐ हीं कौं आं श्रीं बुधग्रहारिष्टनिवारक श्रीविमल अनंतधर्मशान्ति कुन्धअरहनमिवर्धमान अष्टजिनेन्द्रेभ्यो नमः शान्तिं कुरुत कुरुत स्वाहा।

जप संख्या : ८०००

गुरु- गुरु हेतु इन मंत्रों में से किसी का जाप करना चाहिए-

वैदिक मंत्र : ॐ बृहस्पते अतियदर्यो अर्हाद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद्दीदयच्छवसडृतप्रजात तदस्मासु द्रविण्ंधेहि चित्रम् ।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं क्रीं बृहस्पतये नमः। २. ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः। ३. ॐ श्रीं श्रीं गुरदे नमः। नाम मंत्र : ॐ बूं बृहस्पतये नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसन्निभम् । बुद्धिद्भूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ।।

जैन मंत्र : ॐ आं कौं हीं श्रीं क्लीं ऐं गुरु अरिष्ट निवारकऋषभअजित संभव अभिनंदनसुमति सुपारसशीतल श्रेयांसअष्टजिनेन्द्रेभ्यो नमः शान्तिं कुरुत कुरुत स्वाहा।

जप संख्या : १९०००-शुक्र- शुक्र हेतु प्रस्तुत मन्त्र का जाप उत्तम होता है-

वैदिक मंत्र : ॐ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपल्क्षत्रं पयः सोमं प्रजापतिः । ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधुः ।।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ हीं श्रीं शुक्राय नमः। २. ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः। ३. ॐ वत्रं मे देहि शुक्राय स्वाहा। नाम मंत्र : ॐ शुं शुक्राय नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ।

जैन मंत्र : ॐ हीं श्रीं क्लीं हीं शुक्र अरिष्टनिवारक श्रीपुष्पदन्तऽजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।

जप संख्या : ११०००- शनि- यह मन्त्र शनि की प्रसन्नता प्रदान करवाते हैं तथा उपकृत करते हैं- वैदिक मंत्र : ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शंयोरभिष्ट्रवन्तु नः ।।

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९३६ गोचर ग्रह प्रकरण

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्वराय नमः। २. ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः। ३. ॐ क्लीं क्लीं शनये नमः। नाम मंत्र : ॐ शं शनैश्वराय नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमग्रजम्‌ । छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्वरम्‌ ॥

जैन मंत्र : ॐ ह्रीं क्रौं हः श्री शनिग्रहारिष्टनिवारक श्रीमन्सुव्रतनाथजिनेन्द्र्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।

राहु- राहु के लिए निम्नलिखित मंत्र का जाप करें-

वैदिक मंत्र : ॐ कयानश्वित्र आभुवदूतीसदा वृधः सखा। कया-शचिस्ड्यावृता।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं ह्रीं राहवे नमः। २. ॐ ब्रां श्रीं ब्रौं राहवे नमः। ३. ॐ ह्रीं ह्रीं राहवे नमः। नाम मंत्र : ॐ रां राहवे नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ अर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम्‌ । सिंहकागर्भसंभूतं तं राहूं प्रणमाम्यहम्‌ ॥

जैन मंत्र : ॐ ह्रौं क्लीं ह्रौं राहुग्रहपीडानिवारकश्रीमान्‌मिनाथजिनेन्द्र्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।

जप संख्या : १८०००- केतु- केतु हेतु प्रस्तुत मंत्र का जाप उत्तम होता है-

वैदिक मंत्र : ॐ केतु कृणवत्केतवे पेशोमर्या अपेशसे समुषद्रजरायथा:।

तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ह्रीं केतवे नमः। २. ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः। ३. ॐ क्रीं क्रीं केतवे नमः। नाम मंत्र : ॐ कें केतवे नमः।

पौराणिक मंत्र : ॐ पलाशपुष्पसंकाशं ताराग्रहमस्तकम्‌ । रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्‌ ॥

जैन मंत्र : ॐ ह्रीं क्लीं ऐं केतुअरिष्टनिवारक-श्रीमल्लिनाथ पार्श्वनाथ-जिनेन्द्र्रभ्यां नमः शान्तिं कुरुत कुरुत स्वाहा। जप संख्या : १७०००

इस प्रकार योगों, दशा महादशा एवं गोचर के माध्यम से जीवन में आने वाले कष्टों का पूर्वानुमान कर, अनिष्टकारक ग्रहों की शांति के लिए उक्त मंत्रों का अनुष्ठान करे। 'मंत्र-शास्त्र' में इसको पुरश्चरण कहा जाता है।

॥ इस प्रकार डा. सुरकान्त 'सुमन' द्वारा भृगु संहिता : फलित सर्वाङ्‌ दर्शन ग्रन्थ में भृगु संहिता फलदर्पण भाग का लेखन सम्पादन कर्म सुसम्पन्न हुआ ॥

रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन कचौड़ीगली, वाराणसी-२२१००१

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प्रकाशक : रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन कचौड़ीगली, वाराणसी-१

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