1. Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana By Bhagavan Das Mittal (Duplicate) - Rupesh Takur Prasad Prakashana, Varanasi_text
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श्रीः भृगु संहिता फलित सर्वाङ्ग दर्शन 219
प्रत्येक कुण्डली का कारणों सहित फल विवेचन
सर्वदा कालीन फलित, भाग्य का नक्शा, प्रत्येक अच्छे बुरे समय की जानकारी और स्पष्ट ज्योतिष दर्शन के सहित
लेखक : भगवानदास मित्तल
संशोधक एवं परिवर्द्धक : डॉ. एस.के. झा 'सुमन' (ज्यौतिषशास्त्राचार्य)
प्रकाशक : रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन कचौड़ीगली, वाराणसी-221001 फोन : 2392471, 2392543
सन् २००९ ई.]
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प्रकाशक : रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन कचौड़ीगली, वाराणसी-२२१००१ दूरभाष : २३९२५४३, २३९२४७१
सर्वेऽधिकारा: प्रकाशकाधीनाः परिवर्धित संस्करण सन् २००९ ई.
मुद्रक : भारत प्रेस, कचौड़ीगली, वाराणसी-२२१००१
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भृगु संहिता : फलित सर्वांग दर्शन विषय सूची विषय दो शब्द- पृष्ठ
१. पुस्तक परिचय .९ २. फलादेश देखने की विधि १० ३. ज्योतिष ज्ञान की आवश्यक बातें .. ११ ४. बारह राशियों के नाम व स्वरूप ५. ग्रहों का आपसी स्थान और दृष्टि सम्बन्ध ११ १२ ६. केन्द्र-त्रिकोण और अन्यान्य स्थान १२ ७. कुण्डली के १२ घरों के नाम १३ ८. ग्रहों की अवस्थायें और अंश १४ ९. बारह घरों के स्वामी ग्रहों के सम्बोधन १५ १०. ग्रहों की आपसी शत्रुता मित्रता ११. स्त्री-पुरुषों में फल भेद १५ .. १५ १२. नवग्रहों का क्रम से परिचय १६ १३. सही कुण्डली बनाने की रीति १८ १४. नवग्रहों का शक्ति-परिचय १९ १५. ग्रहों का स्थानाधिपति स्वभाव १९ १६. प्रश्न लग्न विचार २० १७. मेष लग्न का फलादेश २२-७६ १८. मेष लग्न में विद्या-बुद्धि तथा सन्तान स्थानाधिपति सूर्य १९. मेष लग्न में माता, भूमि तथा सुख स्थानपति चन्द्र .. ३२ ३६ २०. मेष लग्न में देह, स्थान पति मंगल ४० २१. मेष लग्न में भाई स्थान पति बुध .. ४६ २२. मेष लग्न में भाग्य स्थान पति गुरु .. ५० २३. मेष लग्न में धन स्थान पति शुक्र. ५६ २४. मेष लग्न में पिता स्थान पति शनि .. ६१ २५. मेष लग्न में कष्ट चिन्ता के अधिपति राहु ६७ २६. मेष लग्न में कष्ट-कठिन कर्म के अधिपति केतु ७१ २७. वृष लग्न का फलादेश .. ७७-१३० २८. वृष लग्न में माता स्थान पति सूर्य ८६ २९. वृष लग्न में भातृ-स्थान पति चन्द्र. ९० ३०. वृष लग्न स्त्री स्थान पति भौम. ३१. वृष लग्न में सन्तान स्थान पति बुध .. ९४ १००
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विषय पृष्ठ ३२. वृष लग्न में आयु स्थान पति गुरु १०५ ३३. वष लग्न में देहस्थान पति शुक्र १११ ३४. वृष लग्न में भाग्य स्थान पति शनि ११५ ३५. वृष लग्न में कष्ट स्थानाधिपति राहु .. १२१ ३६. वृष लग्न में कठिन कर्माधिपति केतु १२५ ३७. मिथुन लग्न का फलादेश १३१-१८४ ३८. मिथुन लग्न में भ्रातृ स्थानपति सूर्य १४० ३९. मिथुन लग्न में धन स्थानपति चन्द्र १४४ ४०. मिथुन लग्न में आमद स्थानपति भौम १४९ ४१. मिथुन लग्न में देह स्थानपति बुध १५५ ४२. मिथुन लग्न में स्त्री स्थानपति गुरु १५९ ४३. मिथुन लग्न में विद्या स्थानपति शुक्र १६५ ४४. मिथुन लग्न में आयु स्थानपति शनि १६९ ४५. मिथुन लग्न में कष्टाधिपति राहु ४६. कठिन कर्माधिपति केतु 共 共 共 共 共 共 共 १७५ १८० ४७. कर्क लग्न का फलादेश ४८. कर्क लग्न में धन स्थानपति सूर्य १८५-२३६
४९. कर्क लग्न में देह स्थानपति चन्द्र. १९४
५०. कर्क लग्न में विद्या स्थानपति भौम १९८
५१. कर्क लग्न में भ्रातृ स्थानपति बुध २०२
५२. कर्क लग्न में भाग्य स्थानपति गुरु २०८
५३. कर्क लग्न में लाभ स्थानपति शुक्र २१२
५४. कर्क लग्न में स्त्री स्थानपति शनि. २१८
५५. कर्क लग्न में कष्ट स्थानाधिपाति राहु २२२
५६. कर्क लग्न में कठिन कर्माधिपति केतु २२८
५७. सिंहलग्न का फलादेश २३२
५८. सिंह लग्न में देह स्थान पति सूर्य २३७-२८५
५९. सिंह लग्न में खर्च स्थानपति चन्द्र २४६
६०. सिंह लग्न में मातृ स्थानपति भौम २५०
६१. सिंह लग्न में धन स्थानपति बुध २५३
६२. सिंह लग्न में विद्या स्थानपति गुरु २५९
६३. सिंह लग्न में पिता स्थानपति शुक्र २६२
६४. सिंह लग्न में स्त्री स्थानपति शनि २६८
६५. सिंह लग्न में कष्टाधिपति राहु २७२
६६. सिंह लग्न में कठिन कर्माधिपति केतु 표 용 표 용 용 共 共 용 오 프 프 부 共 其 २७७ २८१
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विषय पृष्ठ ६७. कन्या लग्न का फलादेश ६८. कन्या लग्न में खर्च स्थान पति सूर्य २८६-३३६ २९५ ६९. कन्या लग्न में लाभ स्थानपति चन्द्र. २९८ ७०. कन्या लग्न में आयु स्थानपति भौम ७१. कन्या लग्न में देह स्थानपति बुध ३०२
७२. कन्या लग्न में मातृ स्थानपति गुरु ३०८ ३१२ ७३. कन्या लग्न में भाग्य स्थानपति शुक्र ७४. कन्या लग्न में शत्रु स्थानपति शनि ३१८ 共 共 共 共 共 具 ३२२ ७५. कन्या लग्न में कष्टाधिपति राहु ३२७ ७६. कन्या लग्न में कठिनकर्माधिपति केतु ३३१ ७७. तुला लग्न का फलादेश ३३७-३८७ ७८. तुला लग्न में लाभ स्थानपति सूर्य ३४६ ७९. तुला लग्न में पितृ स्थानपति चन्द्र ३४९ ८०. तुला लग्न में धन स्थानपति भौम ३५४ ८१. तुला लग्न में भाग्य स्थानपति बुध ३५९ ८२. तुला लग्न में भ्रातृ स्थानपति गुरु ३६३ ८३. तुला लग्न में देह स्थानपति शुक्र ३६९ ८४. तुला लग्न में सन्तान स्थानपति शनि ३७३ ८५. तुला लग्न में कष्टाधिपति राहु ३७९ ८६. तुला लग्न में कठिनकर्माधिपति केतु ३८३ ८७. वृश्चिक लग्न का फलादेश ३८८-४३९ ८८. वृश्चिक लग्न में राज्य स्थानपति सूर्य ३९६ ८९. वृश्चिक लग्न में भाग्य स्थानपति चन्द्र ४०० ९०. वृश्चिक लग्न में देह स्थानपति भौम ४०५ ९१. वृश्चिक लग्न में लाभ स्थानपति बुध ४१० ९२. वृश्चिक लग्न में धन स्थानपति गुरु ४१५ ९३. वृश्चिक लग्न में स्त्री स्थानपति शुक्र ४२० ९४. वृश्चिक लग्न में भ्रातृ स्थानपति शनि ४२५ ९५. वृश्चिक लग्न में कष्टाधिकारी राहु ४३१ ९६. वृश्चिक लग्न में कठिन कर्माधिपति केतु ४३५ ९७. धनु लग्न का फलादेश ४४० -४९१ ९८. धनु लग्न में भाग्य स्थानपति सूर्य ४४९ ९९. धनु लग्न में आयु स्थानपति चन्द्र. ४५३ १००. धनु लग्न में सन्तान स्थानपति भौम ४५७ १०१. धनु लग्न में स्त्री स्थानपति बुध ४६३
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विषय पृष्ठ
१०२. धनु लग्न में सुख स्थानपति गुरु. ४६७ १०३. धनु लग्न में धन लाभ स्थानपति शुक्र ४७३ १०४. धनु लग्न में धनस्थानपति शनि ४७७ १०५. धनु लग्न में कष्टाधिकारी राहु ४८३ १०६. धनु लग्न में कठिन कर्माधिकारी केतु ४८७ १०७. मकर लग्न का फलादेश ४९२-५४२ १०८. मकर लग्न में आयु स्थान पति सूर्य ५०१ १०९. मकर लग्न में स्त्री स्थानपति चन्द्र ५०५ ११०. मकर लग्न में मातृ स्थानपति भौम ५०९ १११. मकर लग्न में भाग्य स्थानपति बुध ५१४ ११२. मकर लग्न में भ्रातृ स्थानपति गुरु ५१९ ११३. मकर लग्न में विद्या स्थानपति शुक्र ५२४ ११४. मकर लग्न में धनस्थानपति शनि ५२९ ११५. मकर लग्न में कष्टाधिकारी राहु ५३४ ११६. मकर लग्न में कठिन कर्माधिकारी केतु ५३८ ११७. कुम्भ लग्न का फलादेश. ५४३-५९५ ११८. कुम्भ लग्न में स्त्री स्थानपति सूर्य ५५२ ११९. कुम्भ लग्न में शत्रु स्थानपति चन्द्र ५५६ १२०. कुम्भ लग्न में पिता स्थानपति भौम ५६० १२१. कुम्भ लग्न में विद्या स्थानपति बुध ५६६ १२२. कुम्भ लग्न में लाभ स्थानपति गुरु. ५७० १२३. कुम्भ लग्न में भाग्य स्थानपति शुक्र ५७५ १२४. कुम्भ लग्न में देहस्थानपति शनि ५८० १२५. कुम्भ लग्न में कष्टाधिपति राहु १२६. कुम्भ लग्न में कठिन कर्माधिकारी केतु ५८६
१२७. मीन लग्न का फलादेश ५९०
१२८. मीन लग्न में शत्रुस्थानपति सूर्य ५९६-६४८
१२९. मीन लग्न में विद्यास्थानपति चन्द्र ६०५
१३०. मीन लग्न में धनस्थानपति भौम ६०९
१३१. मीन लग्न में मातृस्थानपति बुध ६१३
१३२. मीन लग्न में देहस्थानपति गुरु ६१८
१३३. मीन लग्न में भ्रातृस्थानपति शुक्र ६२२
१३४. मीन लग्न में लाभस्थानपति शनि ६२८
१३५. मीन लग्न में कष्टाधिपति राहु ६३३
१३६. मीन लग्न में कठिनकर्माधिकारी केतु ६३९ 4 용 용 共 共 共 共 上 ६४३
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१३७. पञ्चाङ्ग प्रकरण ६४९
१३८. राशि प्रभेद प्रकरण ६५५
१३९. ग्रह प्रभेद प्रकरण ६७४
१४०. आधान प्रकरण ७१७
१४१. सूतिका प्रकरण ७२४
१४२. बालारिष्ट प्रकरण ७३० १४३. चन्द्रादि-अरिष्ट भङ्ग प्रकरण ७४० 4 १४४. चन्द्र-सूर्य कृत् योग प्रकरण ७४३
१४५. दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण ७५०
१४६. सन्यास योग प्रकरण ७७५
१४७. नाभस योग प्रकरण ७७८
१४८. ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल ७८३
१४९. ग्रह भाव योग प्रकरण ८१६ १५०. भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण ८२३
१५१. राजयोग प्रकरण ८३१
१५२. ग्रह रश्मि प्रकरण ८४६
१५३. महापुरुष योग प्रकरण ८४८
१५४. विंशोत्तरी दशा प्रकरण ८५४
१५५. उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण ८८९
१५६. स्त्रीजातक प्रकरण ८९९
१५७. नष्ट जातक प्रकरण ९०२
१५८. गोचर ग्रह प्रकरण ९२३
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दो शब्द बहुत हर्ष का विषय है कि यह भृगुसंहिता : फलित सर्वाङ्गदर्शन फलित सूत्र भाग के सहित अपने नवीन कलेवर के साथ अब आपके हाथ में है। चूँकि इस विशिष्ट और विलक्षण ग्रन्थ को सम्बर्द्धित-सम्पादित करने का प्रयास बहुत लम्बे समय से चल रहा था, जिसमें अनेक प्रकार की कठिनाईयाँ आती रहीं, जिसका समाधान यथा समय करना समय और श्रम के लिहाज से इतना आसान नहीं था। फिर भी आज प्रकाशक ठाकुर प्रसाद पुस्तक भण्डार के सम्यक् प्रोत्साहन से यह सफलता पूर्वक मूर्तिमान् हो सका। इसमें मैं आप सभी सत् पाठकों का ही हाथ समझता हूँ, जिन्होंने पत्रों, फोनों आदि माध्यमों से प्रकाशक, महोदय तक उक्त परिष्कृत ग्रन्थ के प्रकाशन के लिए अपनी अपेक्षित आवश्यकताओं को सम्प्रेषित करते रहे। मैं आश्वस्त हूँ कि प्रस्तुत नवीन कलेवर युक्त यह 'भृगुसंहिता : फलित सर्वांग दर्शन' ग्रन्थ आप अवश्य पसन्द करेंगे, क्योंकि इसमें पूर्व की तुलना में 'कुण्डली फल ज्ञान' करने की अनेक विधियों को समायोजित तो किया ही गया है, साथ-ही उस अवत फलों की प्रतिशत निकालने की समझ भी आप अधिगत कर सकेंगे। विशेष रूप से इस ग्रन्थ के वैशिष्ट्य का ज्ञान ग्रन्थ के आरम्भ में 'पुस्तक-परिचय' शीर्षक से सम्भव हो सकेगा। अन्त में, बस इतना कहते हुए कि यह ग्रन्थ रत्न सभी स्तर के पाठकों के हित की रक्षा करने में पूर्णतया सक्षम है, विराम लेते हैं।
देवोत्थान एकादशी विक्रमाब्द-२०६६ ख्रीष्टीय सन् २००९ सुरकान्त झा 'सुमन' वाराणसी
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भृगु संहिता ९
भृगु संहिता श्रीः
फलित सर्वांग दर्शन पुस्तक परिचय प्रिय पाठक वृन्द! इस ग्रन्थ के अन्दर, समस्त जन्म कुण्डलियों का फलादेश, पूर्णरूपेण विस्तार पूर्वक, कारणों सहित लिखा है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति की कुण्डली का प्रत्येक ग्रह भाग्य सम्बन्धित, किस-किस विषय का अधिकारी होकर, किस- किस स्थान में बैठकर, किस-किस स्थान को, किस-किस प्रकार की दृष्टियों से देख- देख कर, किस-किस प्रकार का फल जिन्दगी भर तक स्थाई रूप से प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, आकाश मार्ग में, सदैव परिभ्रमण करते रहने वाले नवग्रहों की चाल के द्वारा हर एक लग्न वालों पर भाग्य के हर एक सम्बन्धों में जिन्दगी भर तक परिवर्तनशील फल कब-कब, क्या-क्या प्रदान करेगा अर्थात् समस्त जीवन भर, कौन-कौन से वर्षों में एवं कौन-कौन से मासों में तथा कौन-कौन से दिनों में किस-किस ग्रहों के द्वारा क्या-क्या फल प्रदान होता रहेगा, इस प्रकरण में आदि से अन्त तक जीवन का पूर्ण रूपेण विस्तार पूर्वक फलादेश मिलेगा। अतः पाठक वृन्द! इस बात पर ध्यान देने की कृपा करें कि प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुण्डली में, नव ग्रह जिस-जिस स्थान पर, जैसा-जैसा स्वभाव का फल लेकर बैठे हैं, उनका फल समस्त जीवन के एक तरफ, सदैव चलता रहेगा और दूसरी तरफ आकाश में प्रत्येक राशि पर भ्रमण करते रहने से, जिस-जिस प्रकार का बदलता हुआ फल हर एक लग्न वालों पर नवग्रह करते रहते हैं, उसका फल चलता-बदलता रहेगा। इस प्रकार हर प्राणी के जीवन पर दोनों प्रकार से फल घटित होता रहेगा, अतः उपरोक्त समस्त विषय को महान् विस्तृत रूप से, भिन्न-भिन्न ज्योतिष के सरल और सत्य सिद्धान्तों के द्वारा निरूषित किया है, अतः इसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति, बगैर ज्योतिष सीखे हुए ही, ज्योतिष के सम्पूर्ण आँकड़ों के द्वारा अपना- अपना फलादेश मालूम कर सकते हैं। प्रिय पाठक वृन्द! इसी ग्रन्थ के दूसरे प्रकरण में राशि, भाव और ग्रह से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराते हुए, उन तीनों के योग से प्रत्येक लग्न वालों को किस-किस प्रकार के शुभाशुभ फल प्राप्त हो सकते है? इसकी जानकारी भी पुरातन महर्षियों, आचार्यों के मतों का अवलोकन कर विस्तार और स्पष्टता से संनियोजित किया गया है। साथ-ही ग्रहों की विविध अवस्थाओं को भी यहाँ बतलाया गया है, जिससे किस प्रकार ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा आदि के समय किस प्रकार का फल प्रदान करेंगे, इसकी जानकारी भी सहज भाव से उपलब्ध हो सके। इसके अतिरिक्त भी ज्यौतिषशास्त्र से सम्बन्धित अनेक प्रकार के ऐसे विषयों को भी यहाँ स्थान दिया गया है, जिनकी जानकारी कर लेने के बाद आप अपना भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान तो और भी सरल व सहज भाव से करेंगे ही, साथ-ही आप एक अनुभवी दैवज्ञ की तरह अपने परिजन और इष्ट-मित्रों की कुण्डली से फलादेश कर यशस्वी भी हो सकेंगे। अस्तु !! -सम्पादक
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१० फलादेश देखने की विधि (प्रत्येक लग्न वालों को) १. मेष लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर कुण्डली नं०१०८ तक में फलादेश देखना चाहिये। २. वृषभ लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० २१६ तक में फलादेश देखना चाहिये। ३. मिथनु लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ३२४ तक में फलादेश देखना
४. कर्क लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी चाहिये।
कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ४३२ तक में फलादेश देखना
५. सिंह लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी चाहिये।
कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ५४० तक में फलादेश देखना
६. कन्या लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी चाहिये।
कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ६४८ तक में फलादेश देखना
७. तुला लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी चाहिये।
कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ७५६ तक में फलादेश देखना चाहिये। ८. वृश्चिक लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० ८६४ तक में फलादेश देखना चाहिये। ९. धन लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं०९६२ तक में फलादेश देखना चाहिये। १०. मकर लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं०१०८० तक में फलादेश देखना चाहिये। ११. कुम्भ लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं०११८८ तक में फलादेश देखना चाहिये। १२. मीन लग्न वालों को, प्रथम की एक बड़ी कुण्डली से लेकर-दूसरी बड़ी कुण्डली तक के अन्दर, कुण्डली नं० १२९६ तक में फलादेश देखना चाहिये। ***
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भृगु संहिता ११ ज्योतिष ज्ञान प्राप्त करने के लिये आवश्यक बातें १. जन्म कुण्डली के बारह घरों या स्थानों के अन्तर्गत, किस-किस स्थान से, क्या-क्या भाव या विषय देखा जाता है। २. बारह राशियों के क्या-क्या नाम हैं और कौन-कौन राशि के, कौन-कौन ग्रह स्वामी होते हैं। ३. कौन-कौन-सी राशियों पर बैठने से, कौन-कौन ग्रह, उच्च एवं नीच माने जाते हैं। ४. कौन-कौन सी राशियों पर दृष्टियाँ डालने से, कौन-कौन ग्रह उच्च एवं नीच फल प्रदान करते हैं। ५. कौन-कौन ग्रह की, (अपने बैठे हुए स्थान से,) कौन-कौन स्थामों पर दृष्टियाँ पड़ती हैं। ६. कौन-कौन ग्रह का आपस में, किस-किस अन्य ग्रह से शत्रु एवं मित्र तथा सामान्य भाव वाला व्यवहार रहता है। ७. कौन-कौन ग्रह, किस-किस स्थान पर, बैठने से, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, उच्चक्षेत्री, नीचक्षेत्री तथा सामान्य क्षेत्री कहलाते हैं। ८. कुण्डली के अन्दर, कौन-कौन से स्थानों को, केन्द्र एवं त्रिकोण तथा सामान्य स्थान कहते हैं। ९. कौन-कौन ग्रह, किस-किस स्थान पर बैठने से अथवा किस- किस स्थान को देखने से, किस-किस प्रकार से अच्छा-बुरा फल क्योंकर करते हैं। यद्यपि इन उपरोक्त समस्त बातों की जानकारी के लिये पुस्तक के अन्दर शूरु के पृष्ठों में ही यह सब वस्तुयें दे दी गई हैं किन्तु इस पुस्तक की विशेषता यह है कि उपरोक्त तमाम बातों वगैरह को विना सीखे ही, पुस्तक के अन्दर फलादेश मालूम करते समय इन समस्त विषयों की जानकारी स्वतः हो जाती है, क्योंकि हर एक फलादेश के अन्दर उपरोक्त ग्रहों के समस्त कारणों को युक्त करके, उदाहरणों सहित, दर्पण की तरह फलादेश लिखा गया है। बारह राशियों के नाम और स्वरूप (मेष ) (मिथुन) (कर्क) (सिंह) (कन्या) १ (वृषभ) २ ३ ४ ५ ६ (तुला) (वृश्चिक) (धनु) (मकर) (कुम्भ) (मीन) ७ ८ ९ १० ११ १२
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१२ ज्योतिष ज्ञान की आवश्यक बातें ग्रहों का आपसी स्थान और दृष्टि सम्बन्ध यदि कोई ग्रह अपने बैठे हुए स्थान से, अपनी दृष्टि के द्वारा, किसी और स्थान को देख रहा है या उस स्थान पर बैठे हुए किसी ग्रह को देख रहा है, वह ग्रहों का दृष्टि सम्बन्ध कहलाता है और यदि अलग-अलग स्थानों में बैठे हुए कोई भी दो ग्रह, एक दूसरे को दोनों देख रहे हों तो वह ग्रहों का परस्पर दृष्टि और यदि कोई दो ग्रह आपस में, एक दूसरे के घर में बैठे हुए हों, तो, इन दोनों ग्रहों का स्थान सम्बन्ध कहलाता है, इसके अतिरिक्त विचारणीय बात यह है कि वह ग्रह आपस में मित्रभाव से सम्बन्ध कर रहे हैं अथवा उच्च भाव से या नीच भाव से या सामान्य भाव से सम्बन्ध कर रहे हैं। अतः सम्बन्धों का सार फल यह है कि उन सम्बन्ध करने वाले ग्रहों के गुण स्वभाव कर्मों को, एक दूसरे के सहयोग से मिलकर उन घरों के फलादेशों की पूर्ति करते हैं, अर्थात् एक ग्रह में दूसरे ग्रह का स्वभाव सम्मिलित रहता है। पाठकगण! इस बात का ध्यान रखें कि इस ग्रन्थ के अन्दर जहाँ ग्रहों के फलादेश दृष्टियों के सहित लिखे हैं। वहाँ पर यदि किसी ग्रह की दृष्टि के अन्दर कोई ग्रह भी उस स्थान पर बैठा हो तो उस ग्रह का दृष्टि सम्बन्ध मान लेना चाहिये और जहाँ पर स्थानाधिपतियों का फलादेश लिखा है, वहाँ पर यदि किसी ग्रह के स्थान में दूसरा कोई ग्रह बैठा है, और उसके स्थान में, वह ग्रह बैठा है तो उसे स्थान सम्बन्ध मान लेना चाहिये, क्योंकि इस पुस्तक के अन्दर हर एक फलादेश, ग्रहों की पूर्ण विवेचन युक्त स्थितियों के द्वारा लिखा हुआ है। कौन-कौन स्थानों को केन्द्र या त्रिकोण या अन्यान्य स्थान कहते हैं जन्म कुण्डली के अन्दर पहिला स्थान, चौथा स्थान, सातवाँ स्थान, दसवाँ स्थान, इस चारों घरों को केन्द्र स्थान कहते हैं, अतः केन्द्र में बैठे हुए ग्रह, विशेष शक्ति युक्त होने की वजह से अधिक सफलता शक्ति प्रदान करते हैं। पाँचवाँ स्थान और नौवाँ स्थान, इन दोनों स्थानों को त्रिकोण स्थान कहते हैं, इन स्थानों में दैविक शक्ति की प्रधानता होने की वजह से, इन स्थानों पर बैठे हुए ग्रह भी, किसी-किसी मार्गों में, विलक्षण सफलता शक्ति प्रदान करते हैं और लाभ स्थान, धन स्थान में बैठे हुए ग्रह, धन की वृद्धि का कार्य करते हैं, परन्तु लाभ में बैठा ग्रह प्रायः उत्तम फल का दाता होता है और तीसरे पराक्रम स्थान में बैठा हुआ ग्रह भी, पराक्रम शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त कराता है, इसलिये यह स्थान भी उत्तम है और छठें
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भृगु संहिता १३ स्थान, आठवें स्थान, बारहवें स्थान, इन तीनों स्थानों में बैठे हुए ग्रह परेशानी उत्पन्न करते हैं, क्योंकि छठाँ घर शत्रु का है, आठवाँ घर मृत्यु का है और बारहवाँ घर खर्च का है, इसलिये इन तीनों स्थान के स्वामी ग्रह भी परेशानी के हेतु बनते हैं। किन्तु उपरोक्त समस्त स्थानों का फल, अपनी- अपनी ग्रह स्थिति के भेद और राशिभेद के कारणों से, सैकड़ों अच्छे बुरे रूपों में परिवर्तित होता रहता है। इसका पूरा स्पष्टीकरण इस पुस्तक के अन्दर, भिन्न-भिन्न स्थानों में एवं भिन्न-भिन्न राशियों में ग्रहों का फल, जो विस्तार पूर्वक लिखा है, उसी के अन्दर मालूम हो सकेगा। कौन-कौन राशियों के, कौन-कौन ग्रह स्वामी होते हैं- मेष और वृश्चिक-इन दोनों राशियों के स्वामी-मङ्गल हैं। १ ८
२ वृष और तुला- इन दोनों राशियों के स्वामी-शुक्र हैं। ७ जन्म कुण्डली में बारह घरों के नाम और स्वरूप
दूसरा घर धन- बारहवाँ घर खर्च
कुटुम्ब बन्धन पहिला बाहरी सम्बन्ध घर-तन तीसरा घर-भाई ग्यारहवाँ घर बहिन पराक्रम आमदनी लाभ
चौथा घर दसवाँ घर माता-भूमि सुख पिता-राज्य व्यापार
पाँचवा घर-विद्या नवाँ घर
संतान सातवाँ घर- भाग्य, धर्म
छठाँ घर स्त्री रोजार शत्रु रोग आठवाँ घर मृत्यु-आयु पुरातत्व
मिथुन और कन्या- इन दोनों राशियों के स्वामी बुध है। ३ ६ कर्क- इस राशि के स्वामी चन्द्रमा है। ४ सिंह- इस राशि के स्वामी सूर्य है।
धन और मीन- इन दोनों राशियों के स्वामी-गुरु हैं। ५
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१४ ज्योतिष ज्ञान की आवश्यक बातें
९ १२ मकर और कुम्भ-इन दोनों राशियों के स्वामी-शनि हैं। १० ११ कौन-कौन ग्रह की, कौन-कौन से स्थानों पर दृष्टियाँ पड़ती है- सूर्य- अपने बैठे हुए स्थान से सातवें, स्थानको देखता है। चन्द्रमा- अपने बैठे हुए स्थान से सातवें, स्थान को देखता है। मंगल- अपने बैठे हुए स्थान से सातवें, चौथे, आठवें तीनों स्थानों को देखता है। बुध- अपने बैठे हुए स्थान से सातवें, स्थान को देखता है। गुरु- अपने बैठे हुए स्थान से सातवें, पाँचवें, नववें तीनों स्थानों को देखता है। शुक्र- अपने बैठे हुए स्थान से सातवें, स्थान को देखता है। शनि- अपने बैठे हुए स्थान से सातवें, तीसरे और दसवें तीनों स्थानों को देखता है। ग्रहों की अवस्था, अंश, उदय-अस्त एवं वक्री-मार्गी से सम्बन्धित ज्ञान हर एक ग्रह स्थित राशि के अन्दर कुल ३० अंश होते हैं, अतः जो कोई ग्रह १० अंश से लेकर २२ अंश तक पर बैठा है तो, उसे युवा अवस्था में माना जायेगा और ३ अंश से लेकर ९ अंश तक किशोर अवस्था में माना जायेगा और २३ अंश से लेकर २८ अंश तक वृद्ध अवस्था में माना जायेगा और २९ अंश से ऊपर तथा २ अंश के भीतर वाले ग्रहों को मृतक अवस्था में माना जायेगा। इसके अतिरिक्त, जो कोई ग्रह, सूर्य के नजदीक बिलकुल बराबर अंशों पर साथ होगा वह ग्रह पूर्ण अस्त माना जायेगा और जो कोई ग्रह सूर्य के आठ अंश की दूरी पर होगा वह अधूरा अस्त माना जायेगा और जो कोई ग्रह, सूर्य से १५ अंश की दूरी पर है वह पूर्ण उदित माना जायेगा। अतः उपरोक्त सम्बन्धों में यह स्पष्टीकरण है कि जो कोई ग्रह, युवाः अवस्था वाले हैं और उदित हैं वह ग्रह अपनी शक्ति के अनुसार पूर्णरूपेण फल प्रदान करते हैं और जो कोई ग्रह, किशोरावस्था एवं वृद्धावस्था वाले ग्रह हैं वह कुछ कमजोरी के सहित अपना फल प्रदान करते हैं, और अधूरे अस्तवाले ग्रह भी कुछ कमजोरी से युक्त फल प्रदान करते है और जो कोई ग्रह, मृतक अंश होते हैं या पूर्ण अस्त होते हैं, वह ग्रह प्रायः बहुत सूक्ष्म और शून्य रूप से फल प्रदान करते हैं और जो कोई ग्रह मार्गी होते हैं, वह सीधे रूप से अपने स्थानानुसार फल प्रदान करते हैं और जो कोई ग्रह वक्री होते
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भृगु संहिता १५ हैं, वह अपने स्थान से पहिले स्थान की स्थिति का भी ध्यान रखकर उलटा चलने के कारणों से एक-सी रफ्तार का फल प्रदान नहीं कर पाते हैं। अतः इस प्रकार यह उपरोक्त द्वारा जानकारी की जा सकेगी कि कौन-कौन ग्रह किस-किस अवस्था आदि में हैं। बारह घरों के स्वामी ग्रहों के नाम स्म्बोधन १. प्रथम स्थान के स्वामी देहाधीश को, लग्नेश कहते हैं। २. दूसरे स्थान के स्वामी धनपति को, धनेश कहते हैं अथवा द्वितीयेश कहते हैं। ३. तीसरे स्थान के भ्रातृ स्थान पति को, तृतीयेश एवं पराक्रमेश कहते
४. चौथे स्थान के मातृ स्थानपति को, चतुर्थेश एवं सुखेश कहते हैं। हैं।
५. पाँचवें स्थान के संतान-स्थानपति को पंचमेश कहते हैं। ६. छठवें स्थान के शत्रुस्थानपतिको षष्ठेश कहते हैं। ७. सातवें स्थान के स्त्री स्थानपति को सप्तमेश कहते हैं। ८. आठवें स्थान के आयु-स्थानपति को, अष्टमेश कहते हैं। ९. नवें स्थान के भाग्य स्थानपति को, भाग्येश एवं धर्मेश तथा नवमेश कहते हैं। १०. दशम स्थान के राज्य स्थानपति को, राज्येश एवं दशमेश कहते हैं। ११. ग्यारहवें स्थान के लाभ स्थानपति को, लाभेश कहते हैं। १२. बारहवें स्थान के खर्च स्थानपति को, व्ययेश कहते हैं। ग्रहों की आपस में मित्रता, शत्रुता तथा सामान्यता सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, गुरु ये चारों ग्रह आपस में मित्र हैं। बुध सभी के मित्र हैं। शुक्र, शनि, राहु, केतु ये चारों ग्रह आपस में मित्र हैं। उपरोक्त नवग्रहों में दो प्रकार के यूथ हैं, इसलिये ये चार-चार ग्रह अपने-अपने यूथ में, आपसी मित्रता मानते हैं और दोनों यूथ, एक दूसरे के सम्बन्ध में शत्रुता मानते हैं और बुध सभी ग्रहों के मित्र हैं। इसके अतिरिक्त शत्रुता मानने वाले ग्रहों में कहीं-कहीं सामान्यता आती है उस भाव का पुस्तक के अन्दर फलादेशों में, साफ-साफ स्पष्टीकरण कर दिया है। स्त्री पुरुषों के फलित में भेद प्रिय पाठक वृन्द! इस ग्रन्थ के अन्दर आदि से अन्त तक जो कुछ भी फलादेश लिखा है, वह यद्यपि पुरुष जाति को सम्बोधित करके लिखा गया है, किन्तु वास्तव में, यह फलादेश स्त्री, पुरुष, बालक सभी पर लागू होने वाला है, परन्तु एक बात का खास फर्क रहेगा, वह यह है कि पुरुषों
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६६ ज्योतिष ज्ञान की आवश्यक बातें की जन्मकुण्डली में, लग्न से, सातवें स्थान का वर्णन करते समय, जिस जगह पर स्त्री से सम्बन्धित सुख-दुःख का फलादेश लिखा है, उस जगह पर यदि स्त्री की कुण्डली का फलादेश देखना हो तो, उसे पति से सम्बन्धित दुःख-सुख मान लेना चाहिये। इसके अतिरिक्त बात यह है कि, भाग्य के हर एक सम्बन्धों में, जहाँ अच्छे बुरे समय की और जिन्दगी के भोगों की जानकारी करनी हो तो स्त्री और पुरुष, दोनों की जन्मकुण्डली के ग्रहों से, भाग्य की और भविष्य की जानकारी करना परम आवश्यक है, क्योंकि स्त्री पुरुषों का भाग्य मिलकर साथ चलता है। इसके अतिरिक्त परिवार में जो लड़के बच्चे पैदा होते हैं, उनकी कुण्डली में, माता-पिता से सम्बन्धित जैसे भी अच्छे बुरे ग्रह बैठे होते हैं, उनका फलादेश भी माता-पिता पर लागू रहता है, और घर में कन्या का जन्म हो जाये तो जबतक लड़की की शादी नहीं हो जायेगी, तबतक उसके ग्रहों का असर भी, माता-पिता पर लागू रहता है, इसलिये सर्वप्रथम, पुरुष की कुण्डली के ग्रहों का असर-दूसरे स्त्री के ग्रहों का असर, तीसरे पुत्रों के ग्रहों का असर चौथे पुत्री के ग्रहों का असर भी सामूहिक रूप से प्राप्त होता रहता है। नवग्रहों का क्रम से परिचय सूर्य- प्रकाश और प्रभाव का सम्बन्धी ग्रह है, इसलिये जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान का स्वामी है और जहाँ बैठा होगा और जहाँ देख रहा होगा वहाँ से प्रकाश और प्रभाव प्राप्त करेगा। चन्द्रमा- मन की शक्ति का सम्बन्धी ग्रह है, इसलिए जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान का स्वामी है और जहाँ बैठा है और जहाँ देखता है वहाँ-वहाँ पर मनोयोग का कार्य करता है। मंगल- खून और शक्ति का सम्बन्धी ग्रह है, इसलिये जन्म कुण्डली में मंगल जिस-जिस स्थान का स्वामी है और जहाँ बैठा है तथा देखता है, वहाँ-वहाँ पर वह अपनी शक्ति और तेजी का कार्य करता है। बुध- विवेक शक्ति का स्वामी है, इसलिये जन्मकुण्डली में, जिस-जिस स्थान का स्वामी है और जहाँ कहीं बैठा है तथा जिस-जिस स्थानों को देखता है, उन सभी में, विवेक शक्ति के सहित कार्य करता है। गुरु- हृदय की शक्ति का स्वामी है, इसलिये जन्मकुण्डली में गुरु, जिस-जिस स्थान का स्वामी है और जहाँ बैठा है एवं जहाँ-जहाँ
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भृगु संहिता १७ देख रहा है, उन सम्बन्धों में, हृदय की शक्ति के योग से कार्य करता है। शुक्र- महान् चतुराई का स्वामी है, इसलिए जन्मकुण्डली में जिन-जिन स्थानों का स्वामी है और जहाँ बैठा है, एवं जहाँ देखता है, वहाँ-
शनि- वहाँ महान् चतुराई के योग से कार्य करता है। महान् दृढ़ता शक्ति का अधिकारी है, इसलिये जन्म कुण्डली के अन्दर शनि, जिन-जिन स्थानों का स्वामी है और जहाँ बैठा है, तथा जिन-जिन स्थानों को देखता है, उन स्थानों में दृढ़ता शक्ति से काम करता है। राहु- गुप्त युक्तिबल तथा कमी और कष्ट के अधिपति हैं, इसलिये जन्म कुण्डली के अन्दर जिस स्थान पर बैठते हैं वहाँ गुप्त युक्ति
केतु- बल का प्रयोग तथा कमी और कष्ट का कार्य करते हैं। गुप्त शक्तिबल, कठिन कर्म तथा कमी और भय के अधिपति हैं, इसलिये जन्मकुण्डली में जिस स्थान पर बैठते हैं, वहाँ कठिन कर्म शक्ति एवं कमी तथा भय की प्राप्ति का कार्य करते हैं और जन्म कुण्डली में या ग्रह गोचर में जिस किसी भी ग्रह
नोट- के सामने केतु आ रहे हों, वह ग्रह भी भययुक्त हो जाता है। उपरोक्त ग्रहों का, हर सम्बन्धों में विचार रखते हुए, विस्तृत फलादेश पुस्तक के अन्दर लिखा गया है। गलत बनी हुई कुण्डलियों को सुधारने की सरल विधि- प्रिय पाठक वृन्द! प्रायः कुछ निम्नलिखित कारणों से, जन्म कुण्डलियाँ गलत बन जाया करती हैं, अर्थात् बच्चे के जन्म समय पर स्त्रियों की असावधानता से और घड़ियों की गड़बडी से तथा गर्भ से बाहर बालक के क्षणिक दर्शन पर जन्म मानना या पूर्णरूपेण बालक का पृथ्वी पर आने पर जन्म मानने से, अथवा लोकल टाइम और सूर्य टाइम के अन्तर फर्क से और पृथ्वी की ऊँचाई नीचाई के शहरों में, सूर्योदय के फर्क से, अतः उपरोक्त समस्त कारणों में से, किसी भी कारण के द्वारा, अक्सर कुण्डलियाँ गलत बन जाया करती हैं, इसलिए जनता को, सत्य कुण्डली, सरलता पूर्वक प्राप्त होने के दृष्टिकोण से, यह ठोस उपाय प्रस्तुत कर रहा हूँ कि जिसके द्वारा, घण्टे दो घण्टे तक का फर्क भी निश्चय रूप से शुद्ध हो जायेगा। अतः जन्म कुण्डली जो पैदाइश के समय प्राप्त हो, उससे १ लग्न पहिले की लेकर और १ लग्न बाद की लेकर तथा ग्रहों की स्थान स्थिति उसी अनुसार बनाकर, फिर पुस्तक के अन्दर लिखित फलादेशों के अनुसार
भ सं-२
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१८ ज्योतिष ज्ञान की आवश्यक बातें
तीनों कुण्डलियों से जीवन को मिलाकर देख लें, अतः जिस कुण्डली से मनुष्य का जीवन चरित्र सही मिल जाय, उस कुण्डली को सही मान लेनी चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार हमको, श्री लोकमान्य तिलक की जन्म कुण्डली प्रथम बार मिथुन लग्न की प्राप्त हुई थी, किन्तु उस कुण्डली के ग्रहों से उनकी जीवनी का मिलान सही साबित नहीं हुआ तब हमने उनकी लग्न को बदलकर उपरोक्त रूप से देखा तो कर्क लग्न सही साबित रही, तदुपरान्त अन्य पुस्तकों में भी प्राप्त श्री लोकमान्य तिलक की जन्म कुण्डली, कर्क लग्न की ही लिखी प्राप्त हुई, इसलिये इस प्रकरण में हम इस पृष्ठ में, तीनों कुण्डलियाँ बनाकर रख रहे हैं ताकि जनता इस अचूक आँकड़े से सरलता पूर्वक लाभ उठा सके। (कुण्डली सही बनाने का तरीका) श्री लोकमान्यतिलक की तीन कुण्डनियाँ सही जन्मकुण्डली, कर्कलग्न [.स. ३ २ जन्म ता० २३ जुलाई सन् १८५८ सुबह ५ शू. श १ इन कुण्डलियों में, कर्क लग्न कीकुण्डली
के ग. च. आदर्शवादिता, धार्मिकता तथा राजनैतिक एवं ७ ९ सामाजिक कार्य कुशलता और प्रभाव, नाम मं. ११ १० ख्याति, मान सम्मान प्रतिष्ठा इत्यादि से शुद्ध ८ मानी गई है। मिथुन लग्न सिंह लग्न उपरोक्त कुण्डली से १ घण्टे उपरोक्त कुण्डली से १ बाद की कुण्डली घण्टे बाद की कुण्डली
५ श बू.सू. ६ x0 m ५ b/.श. के ७ ब.सू. म
१
९ ११ २ १० १२ १ ८ ग रा.
११ सं. १० च.रा.बु.
मिथुन लग्न- इस कुण्डली में धनोपार्जन की उन्नति से इज्जत बढ़ाने का योग मुख्य है इसलिये यह ऐसे आदर्श व्यक्ति के लिये गलत है। सिंह लग्न- इस कुण्डली में तो चारों केन्द्र और दोनों त्रिकोण ग्रहों से शून्य हैं जिससे कि कोई महानता नहीं बने बल्कि दुनियाँ में कोई जान
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भृगु संहिता १९ भी न सके, इतना ऊँचा आदर्श बनाना तो बहुत दूर रहा इसलिये यह भी गलत है। नवग्रहों का शक्ति परिचय जो कोई भी ग्रह अपने क्षेत्र में बैठे हों या उच्च क्षेत्र में बैठे हों अथवा अपने क्षेत्र को या उच्च क्षेत्र को देख रहे हों, तो उन सभी स्थानों की वृद्धि करते हैं। अर्थात् इसे निम्नांकित रूप से समझिये। सूर्य- सिंह राशि या मेष राशि पर बैठा हो, या इन्हें देख रहा हो। चन्द्रमा- कर्क राशि या वृष राशि पर बैठा हो, या इन्हें देख रहा हो। मंगल- मेष, वृश्चिक राशि या मकर राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा हो। बुध- मिथुन, कन्या राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा हो। गुरु- धन, मीनराशि या कर्क राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा हो। शुक्र- हो। वृषभ, तुला राशि या मीन राशि पर बैठा हो या इन्हें देख रहा
शनि- मकर कुम्भ राशि या तुला राशि पर बैठा हो, या इन्हें देख रहा हो। राहु- मिथुन राशि पर बैठा हो या धनु राशि को छोड़कर लग्न से तीसरे या छठें या ग्यारहवें स्थान पर कहीं भी बैठा हो। केतु- धनु राशि पर बैठा हो या मिथुन राशि को छोड़कर लग्न से तीसरे-छठें-ग्यारहवें स्थान पर कहीं भी बैठा हो। नोट- क्रूर या गरम ग्रहों का, लग्न से तीसरे-छठें-ग्यारहवें स्थान में बैठना शक्ति प्रदायक होता है। अतः उपरोक्त, नवग्रह यदि उपरोक्त राशियों पर बैठे हों या इन्हें देखते हों तो उन स्थानों में शक्तिशाली कार्य करते हैं। इसलिये इस ग्रंथ के अन्दर उपरोक्त समस्त विषया को, फलादेशों के अन्दर पूर्ण रूपेण स्पष्टीकरण करके फलादेश लिखा गया। पाठको! इस ग्रन्थ में धनु राशि या धन राशि नौवीं राशि का बोधक है, परन्तु धन स्थान या घर या भाव कुण्डली के बारह खानों में से दूसरे खाने का बोधक है। ग्रहों का स्थानाधिपति स्वभाव ज्योतिष के फलादेश को जानने के लिये, यह एक बड़ा सरल और सत्य आँकड़ा है कि जन्म कुण्डली के अन्दर १२ स्थानों के अधिपति सातों ग्रहों का यह प्राकृतिक स्वभाव है कि किसी भी स्थान का स्वामी कोई ग्रह,
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२० ज्वोतिष ज्ञान की आवश्यक बातें जिस-किसी भी स्थान पर बैठेगा, तो उस स्थान में, अपने स्थान की शक्ति के योग से, सफलता या असफलता प्राप्त करेगा। अर्थात् भाग्य का स्वामी ग्रह यदि भाग्य स्थान पर ही बैठा है, तो भाग्य स्वयमेव कुदरती तौर से जागृत रहेगा और भाग्य का स्वामी कोई ग्रह यदि राज्य स्थान पर बैठा है तो पिता, राज्य व्यापार आदि के योग से भाग्य की जागृति होगी और भाग्य का स्वामी यदि लाभ स्थान पर बैठा है तो आमदनी के उत्तम मार्ग से भाग्य की जागृति होगी, और भाग्य का स्वामी यदि प्रथम देह के स्थान पर बैठा है तो देह के योग से भाग्य की उन्नति प्राप्त होगी और भाग्य का स्वामी यदि धन भवन में बैठा है तो भाग्य की शक्ति एवं उन्नति, धन-जन के योग से बनेगी और भाग्य का स्वामी यदि पराक्रम स्थान में बैठा है तो पराक्रम और भाई के योग से भाग्य की उन्नति होगी और भाग्य का स्वामी यदि चौथे स्थान पर बैठा है तो माता और भूमि के योग से भाग्य की जागृति होगी और भाग्य का स्वामी यदि पंचम स्थान पर बैठा है तो विद्या और संतान के योग से भाग्य की जागृति होगी और भाग्य का स्वामी यदि छठें स्थान पर बैठा है तो परतन्त्रता या परेशानियों के योग से भाग्य की जागृति होगी और भाग्य का स्वामी यदि, सातवें स्थान पर बैठा है तो रोजगार एवं स्त्री सम्बन्ध से भाग्य की जागृति होगी और भाग्य का स्वामी यदि आठवें मृत्यु स्थान पर बैठा है तो मुसीबतों और पुरातत्व के लाभ से भाग्य की जागृति होगी। इसी प्रकार किसी भी स्थान का स्वामी कोई ग्रह, जिस स्थान पर बैठा होगा, उसी स्थान के द्वारा उस अपने स्थान की शक्ति प्राप्त करता है। इसलिए उपरोक्त १२ घरों के स्वामी समस्त ग्रहों का वर्णन, हर एक स्थान और हर एक राशियों में भिन्न-भिन्न रूप से खुलासा उदाहरणों सहित इस ग्रन्थ के अन्दर विस्तार पूर्वक लिखा है, इसके अतिरिक्त जन्मकुण्डली के अन्दर लग्न से छठे, आठवें, बारहवें तीनों स्थानों का सम्बन्ध या इनके स्थान पतियों का सम्बन्ध हर जगह कष्टप्रद सिद्ध होता है और अच्छे स्थानों का एवं स्थानपतियों का सम्बन्ध हमेशा उन्नतिदायक एवं सुखद सिद्ध होता है। प्रश्न लग्न विचार प्रिय पाठक वृन्द! यदि कभी किसी व्यक्ति के प्रश्न का उत्तर देना हो तो, प्रश्न करने वाले व्यक्ति के, प्रश्न करते ही घड़ी का टाइम देख लेना चाहिए और उस टाइम के अन्दर कौन सी लग्न वर्तमान है, उस लग्न को नवग्रहों सहित कागज पर लिख लेनी चाहिये। फिर उन नवग्रहों का फलादेश
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भृगु संहिता २१ इस ग्रन्थ के अन्दर से, कुण्डली नं० १ से लेकर नं० १२९६ तक में वह लग्न के जहाँ भी ग्रहों का फलादेश लिखा हो, उन फलादेशों से, उस व्यक्ति के प्रश्न का उत्तर मान लेना चाहिये और उसके प्रश्न सम्बन्धी भविष्य की जानकारी उसी प्रकार कर लेनी चाहिये। जिस प्रकार जन्मकुण्डलियों के भविष्य जानने के लिए, हर एक लग्न के प्रथम भाग में, नवग्रहों के द्वारा दैनिक, मासिक, वार्षिक तीनों प्रकार से भविष्य जानने की रीति लिखी हुई है। किन्तु पाठक वृन्द! इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि, प्रश्न कर्ता ने जिस विषय का प्रश्न किया है, उस विषय का योग, उस व्यक्ति की जन्मकुण्डली में, किस प्रकार पड़ा हुआ है, अतः जन्मकुण्डली के अन्दर जैसा योग होगा, उसके अन्तर्गत विचार करके प्रश्न लग्न में आये हुए ग्रहों का फलादेश समझना चाहिये और यदि जन्मकुण्डली प्रश्न कर्ता के पास कतई नहीं हो तो केवल प्रश्न लग्न के ग्रहों से ही फलादेश, इस पुस्तक के आधार पर बता देना चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रश्न लग्न का ज्ञान अपेक्षित होने पर या तो पांचांगों में छपी सारिणी के अनुसार वर्तमान समय की लग्न जान ले लेनी चाहिये या लग्न निकालने की रीति किसी से सीख लेनी चाहिये। अथवा अन्दाज से लग्न निकालना हो तो, पंचागों में प्रथम लग्न जिसमें सूर्य बैठा होता है वह लग्न सूर्योदय के समय अवश्य रहती है। उसके बाद करीबन ११ बजे तक दो लग्न उसके आगे वाली समाप्त हो जाती है, दोपहर १२ बजे पर सुबह वाली लग्न से चौथी लग्न अवश्य आ जाती है और उसके बाद सायंकाल ५ बजे तक करीबन छठवीं लग्न समाप्त हो जाती है और सूर्यास्त के समय, सुबह वाली लग्न से, सातवीं लग्न आ जाती है और इसके बाद रात्रि में ११ बजे तक करीबन नौवीं लग्न समाप्त होकर रात्रि के १२ बजे दसवीं लग्न रहती है इसके उपरान्त करीबन ५ बजे प्रातःकाल तक बारहों लग्न समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार, पाठक उपरोक्त विषयों का अध्ययन कर लेने के पश्चात् क्रम से मेष आदि बारह लग्न की कुण्डलियों का फल ज्ञान कर सकेंगे। उसके बाद जिन विषयों का ज्ञान अथवा जिन शंकाओं का समाधान आपको फलित सूत्र अबतक नहीं हुआ हो, उनका ज्ञान या समाधान आप इसी ग्रन्थ के अग्रिम भाग का अध्ययन करके निश्चय ही कर सकेंगे तथा शेष आपके लिए पूर्ण दैवज्ञ बनने के मार्ग को खोलने में सफल है। *** k ***
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२२ मेष लग्न का फलादेश
मेष लग्न प्रारम्भ मेष लग्न का फलादेश प्रारम्भ
२ १२ १
३ ११
४ १०
५ ९
७ ६ ८
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० १०८ तक में देखिये) प्रिय पाठक गण! ज्योतिष के गम्भीर विषय २ १२ को, अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये, ३ १ ११ यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे ४ १० हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर, नवग्रहों का ५ ७ दो प्रकारों से असर होता रहता है, अर्थात् जन्म के ८ समय, जन्म कुण्डली के अन्दर नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा स्वभाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरंफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग वश गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर, भिन्न-भिन्न रूप से, अच्छा बुरा असर, जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिये, प्रथम तो अपनी जन्मकुण्डली के बैठे
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भृगु संहिता २३ हुए नवग्रहों का फलादेश इस पुस्तक के अन्दर कुण्डली नं० १ से लेकर कुण्डली नं० १०८ तक के अन्दर, जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो-जो ग्रह, जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता रहता है उसका फलादेश, प्रथम के नवग्रहों वाले पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिये। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से, आपको समस्त जीवन का नक्शा और भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखाई देता रहेगा। नोट- जन्मकुण्डली के अन्दर बैठे हुए नवग्रहों में, जो कोई भी ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है, या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है, तो इन तीनों सूरतों में ग्रह कमजोर होने के कारणों से, अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाते हैं। जन्मकुण्डली के अन्दर किसी ग्रह के साथ कोई ग्रह बैठा होगा या जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में ग्रहों की दृष्टियाँ बतलाई हैं, उन-उन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो, उस ग्रह पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (१) मेष लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्मकुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचांग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्मकुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार के फल घटित होता रहता है। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५ के अनुसार मालूम करिये।
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२४ मेष लग्न का फलादेश r
६. जिस मास में सूर्य कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य वृश्चिक राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२ के अनुसार मालूम करिये। (१) मेष लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है। १. जिस दिन चन्द्रमा मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १८ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता २५ ७. जिस दिन चन्द्रमा तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा सिंह वृश्चिक पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४ के अनुसार मालूम करिये। (१) मेष लग्न वालों की समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-भौमफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है। १. जिस मास में मंगल मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २९ के अनुसार मालूम करिये। 1 ६. जिस मास में मंगल कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३१ के अनुसार मालूम करिये।
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२६ मेष लग्न का फलादेश ८. जिस मास में मंगल वृश्चिक राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६ के अनुसार मालूम करिये। (१) मेष लग्न वालों की समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है। १. जिस मास में बुध मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४२ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध वृश्चिक राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता २७ ९. जिस मास में बुध धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४८ के अनुसार मालूम करिये। (१) मेष लग्न वालों का समस्त जीवन के लिये। जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है। १. जिस वर्ष में गुरु मेष राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु वृषभ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५० के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु मिथुन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु कर्क राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु सिंह राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश
६. कुण्डली नं. ५३ के अनुसार मालूम करिये। जिस वर्ष में गुरु कन्या राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु तुला राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु वृश्चिक राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु धनु राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५७ के अनुसार मालूम करिये।
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२८ मेष लग्न का फलादेश १०. जिस वर्ष में गुरु मकर राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु कुम्भ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु मीन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६० के अनुसार मालूम करिये। (१) मेष लग्नवालों को समस्त जीवन के लिए। जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में जिस स्थान पर शुक्र बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार से फल घटित होता रहता है। १. जिस मास में शुक्र मेष राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र वृषभ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र मिथुन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र कर्क राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र सिंह राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र कन्या राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र तुला राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र वृश्चिक राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र धनु राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र मकर राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७० के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता २९ ११. जिस मास में शुक्र कुम्भ राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र मीन राशि पर हो तो उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७२ के अनुसार मालूम करिये। (१) मेष लग्न वालों का समस्त जीवन के लिये। जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है। १. जिस वर्ष में शनि मेष राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि वृषभ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि मिथुन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश 1 कुण्डली नं. ७५ के अनुसार मालूम करिये। जिस वर्ष में शनि कर्क राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि सिंह राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि कन्या राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि तुला राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि वृश्चिक राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में शनि धनु राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि मकर राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि कुम्भ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३ के अनुसार मालूम करिये।
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३० मेष लग्न का फलादेश १२. जिस वर्ष में शनि मीन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४ के अनुसार मालूम करिये। (१) मेष लग्न वालों का समस्त जीवन के लिये। जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है। १. जिस वर्ष में राहु मेष राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु वृषभ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु मिथुन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु कर्क राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु सिंह राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु कन्या राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु तुला राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु वृश्चिक राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु धनु राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु मकर राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु कुम्भ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु मीन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता ३१ (१) मेष लग्न वालों का समस्त जीवन के लिये। जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश इस पुस्तक के अन्दर लेखानुसार आपके समस्त जीवन भर जीवन के एक तरफ सदैव चलता रहेगा और जीवन के दूसरी तरफ नीचे लिखे अनुसार फलादेश पंचाङ्ग-गोचर द्वारा चलता बदलता रहेगा। अतः जन्म कुण्डली और पंचांग दोनों से हमेशा देखते रहिये, क्योंकि जीवन पर दोनों प्रकार का फल घटित होता रहता है। १. जिस वर्ष में केतु मेष राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु वृषभ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु मिथुन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु कर्क राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु सिंह राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु कन्या राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु तुला राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु वृश्चिक राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु धनु राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु मकर राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु कुम्भ राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु मीन राशि पर हो तो उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०८ के अनुसार मालूम करिये। नोट- इसी प्रकार हर एक लग्न वालों को कुण्डली के नम्बरों से प्रत्येक ग्रहों का फल समझ लेना चाहिये। अब इसके आगे जन्म कालीन ग्रहों का फलादेश प्रारम्भ होता है-
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३२ मेष लग्न का फलादेश विद्या बुद्धि-संतान स्थानपति सूर्य मेष लग्न में सूर्य यदि मेष का सूर्य-प्रथम केन्द्र देह के स्थान में, उच्च का होकर, मित्र मंगल की राशि पर बैठा २ १२ ३ १ सू. ११ है तो देह का कद प्रभावशाली रहेगा और बुद्धि में उत्तेजना शक्ति रहेगी तथा विद्या के स्थान में महानता ४ १० प्राप्त होगी और वाणी में प्रभाव रहेगा तथा हृदय ५ ७ ९ में बड़ा भारी स्वाभिमान होगा तथा संतान पक्ष में, ६ उत्तम शक्ति रहेगी, किन्तु सूर्य, सातवीं नीच दृष्टि V
नं. १ से, स्त्री एवं रोजगार के स्थान को देख रहा है, इसलिए स्त्री स्थान में क्लेश एवं कष्ट तथा सुन्दरता की कमी प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ तथा कुछ कमी प्रतीत होगी और गृहस्थी के सुख सम्बन्धों में एवं उसके संचालन में कुछ दिक्कतें रहेंगी। मेष लग्न में २ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में, शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन २ सू. १२ का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, ३ ११ इसलिए संतान पक्ष में बाधा रहेगी और विद्या के ४ १० ग्रहण करने में कुछ दिक्कतों के योग से शक्ति प्राप्त होगी, किन्तु बुद्धि योग द्वारा धन की वृद्धि ५ ७ ९ का विशेष प्रयत्न किया जायेगा, परन्तु धन की ६ संचित शक्ति के अन्दर कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं V
नं.२ मित्र दृष्टि से, आयु एवं पुरातत्व स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है इसलिये आयु की वृद्धि रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ बुद्धि योग द्वारा प्राप्त होगा तथा जीवन की दिनचर्या में, बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और कुटुम्ब का कुछ प्रभाव रहेगा। मेष लग्न में ३ सूर्य मिथुन का सूर्य- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में, मित्र बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये विद्या २ १२ बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी शक्ति मिलेगी और ३ सू. १ ११ तीसरे स्थान पर, गरम ग्रह बहुत शक्ति-शाली ४ १० फल का दाता हो जाता है, इसलिये पंराक्रम- पुरुषार्थ की बहुत वृद्धि होगी तथा बड़ा भारी ५ ७ ९ प्रभाव रहेगा और दिमाग के अन्दर तथा वाणी के ६ ८ अन्दर तेजी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से, भाग्य नं. ३ एवं धर्म स्थान को, गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग की शक्ति के द्वारा, भाग्य की वृद्धि होगी और धर्म
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भृगु संहिता ३३ का मनन एवं पालन होता रहेगा तथा ईश्वर और धर्म में निष्ठा रहेगी। मेष लग्न में ४ सूर्य कर्क का सूर्य- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान पर, मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है, २ १२ इसलिए सुखपूर्वंक विद्या प्राप्त होगा तथा संतान ३ १ ११ पक्ष की तरफ से सुख रहेगा और बुद्धि के अन्दर १० तेजी रहते हुए भी शान्ति धारण करेगा तथा बुद्धि x की योग्यता से भूमि और मकानादि की शक्ति का ५ ७ ९ प्रभाव प्राप्त करेगा और माता की सुख शक्ति ६ ८ रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से, पिता एवं राज्य नं. ४ स्थान को, शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए पिता के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज्य के मार्ग में कुछ नीरसता रहेगी तथा कुछ मान और प्रभाव प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ५ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर, स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री २ १२ होकर बैठा है तो, विद्या की महान् शक्ति प्राप्त ३ ११ करेगा तथा वाणी और बुद्धि की महान् तेजी के ४ १० कारण, बड़ा भारी प्रभाव रखेगा तथा संतान पक्ष के अन्दर बड़ा शक्तिशाली पुत्र प्राप्त होगा और ५ सू ७ ९ अपनी बुद्धि की योग्यता के सम्मुख दूसरों की ६ ८ बुद्धि को छोटा समझेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से नं. ५ लाभ स्थान को, शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष प्रयत्न करने पर लाभ (प्राप्त) की तरफ से कुछ असंतोष रहेगा, किन्तु लाभ के मार्ग में कुछ कटु भाषण से कार्य सम्पादन करेगा। मेष लग्न में ६ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- छठें, शत्रु एवं झगड़े- झंझट के स्थान पर, मित्र बुध की राशि पर बैठा है २ १२ तो विद्या ग्रहण करने में कुछ दिक्कतें रहेंगी, किन्तु ३ १ ११ विद्या और बुद्धि के द्वारा बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त ४ १० करेगा और संतान पक्ष के अन्दर कुछ परेशानी रहेगी, किन्तु छठें स्थान पर गरम ग्रह बड़ा ५ ७ ९ शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिए शत्रु ६ सू. ८ पक्ष में बड़ा भारी सफलता शक्ति और प्रभाव नं. ६ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से, खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिए खर्चा खूब करेगा और बुद्धि योग द्वारा बाहरी स्थानों में सफलता शक्ति पायेगा और
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३४ मेष लग्न का फलादेश दूसरे स्थानों में मान प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ७ सूर्य तुला का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि में २ १२ बैठा है, इसलिये विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी ३ १ ११ तथा बुद्धि और विवेक की लघुता से कार्य करेगा ४ १० और संतान पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा स्त्री के सुख स्थान में परेशानी अनुभव होगी और रोजगार ५ ७ सू. ९ के मार्ग में दिक्कतों से एवं दिमागी परिश्रम से ६ ८ कार्य सम्पादन करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से नं. ७ देह के स्थान को, मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है इसलिये देह के कद में कुछ लम्बाई प्राप्त होगी तथा हृदय में कुछ छिपा हुआ स्वाभिमान विशेष रहेगा और बुद्धि की युक्ति से मान एवं प्रभाव प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ८ सूर्य यदि वृश्चिक राशि का सूर्य-आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में, मित्र मंगल की राशि पर २ १२ ३ १ ११ बैठा है तो विद्या ग्रहण करने में दिक्कतें और कमजोरियाँ रहेंगी तथा संतान पक्ष में कष्ट अनुभव ४ १० होगा और दिमाग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा आयु में ५ ७ ९ शक्ति होगी और पुरातत्व सम्बन्ध में बुद्धि योग ६ ८ सू. द्वारा प्रभाव और चमत्कार रहेगा तथा सातवीं नं. ८ शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष की वृद्धि करने में, बड़ा प्रयत्नशील रहेगा, किन्तु फिर भी धन और कुटुम्ब की तरफ से कुछ असन्तोष युक्त शक्ति प्राप्त होगी। मेष लग्न में ९ सूर्य यदि धनु राशि का सूर्य- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो २ १२ बड़ी प्रभावशालिनी विद्या प्राप्त करेगा तथा बुद्धि ३ ११ के अन्दर उच्चतम शक्ति पायेगा और धर्म शास्त्र ४ १० का अच्छा ज्ञान पायेगा तथा बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की महान् वृद्धि करेगा और संतान पक्ष में ५ ७ ९ उत्तम सहयोग प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा ६ सू. ८ बड़ा प्रभाव और यश पायेगा तथा ईश्वर और नं. ९ न्याय पर विश्वास मानेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है,
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भृगु संहिता ३५ इसलिये भाई-बहिन का अच्छा योग बनेगा पराक्रम तथा पुरुषार्थं शक्ति के अन्दर बुद्धि की योग्यता से बड़ी शक्ति और स्फूर्ति प्राप्त करेगा। मेष लग्न में १० सूर्य यदि मकर राशि का सूर्य- दशम केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है २ १२ तो, पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति ३ १ ११ प्राप्त करेगा तथा विद्या के पक्ष में कुछ अड़चनों ४ सू. के द्वारा राजभाषा की योग्यता पायेगा और दिमाग एवं विचारों के अन्दर बड़ी भारी उत्तेजना क्रोध ५ ७ ९ ६ ८ तथा अहंभाव रखेगा और संतान पक्ष के सम्बन्ध
नं. १० में कुछ अरूचिकर सहयोग शक्ति प्राप्त होगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता का और भूमि का अच्छा योग पायेगा तथा राज और समाज व कारबार के मार्ग में बुद्धि योग से उन्नति प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ११ सूर्य यदि कुम्भ राशि का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान
२ १२ में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें ११ स्थान पर क्रूर या गरम ग्रह शक्तिशाली फल का ३ सू. दाता होता है। इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष ४ १० उन्नति करने के लिये बड़ा भारी परिश्रम करेगा और बुद्धि योग के द्वारा विशेष सफलता प्राप्त 4 ७ करेगा तथा आमदनी के मार्ग में बड़ा प्रभाव रहेगा ६ ८ और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, नं. ११ स्वयं अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा और संतान शक्ति प्राप्त रहेगी तथा स्वार्थ सिद्धि के मार्ग में बड़ी दृढ़ता और तत्परता तथा वाणी की कटुता से कार्य में सफलता पायेगा। मेष लग्न में १२ सूर्य यदि मीन का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्च २ १२सू की विशेष संचालन शक्ति बुद्धि योग द्वारा करेगा ३ ११ NV और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा, १० किन्तु व्यय स्थान के दोष के कारण विद्या के पक्ष में कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ 4 ७ ९ कमी और परेशानी तथा हानि के कारण प्राप्त ६ ८ करेगा तथा दिमाग के अन्दर कुछ परेशानी रहेगी नं. १२ और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को, बुध की
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३६ मेष लग्न का फलादेश कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में सद्भावनाओं के द्वारा प्रभाव की शक्ति और निर्भयता प्राप्त करेगा। माता, भूमि, सुखस्थानपति चन्द्र मेष लग्न में १ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- प्रथम केन्द्र, देह के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो माता का २ १२ सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा भूमि-मकानादि ३ १ चं. ११ का सुख एवं घरेलू सुख प्राप्त करेगा और देह में ४ १० सुन्दरता रहेगी तथा मन का स्वामी चन्द्रमा है, इसलिये मन की प्रसन्नता प्राप्त करने के साधन ५ ७ ९ बनेंगे और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के ६ ८ स्थान को, सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में नं. १३ देख रहा है इसलिये स्त्री पक्ष में सुख और सुन्दरता रहेगी तथा रोजगार के मार्ग में सुख पूर्वक मनोयोग द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी और गृहस्थ के सम्बन्धों में बड़ा मनोरंजन और मान प्राप्त करेगा। मेष लग्न में २ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की २ चं १२ राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति का बड़ा ३ १ ११ आनन्द प्राप्त करेगा और बड़ा धनवान् एवं जायदाद ४ वाला बनेगा। अतः धन स्थान पति चन्द्रमा होने के कारण धन-जन-कुटुम्बी की वृद्धि करने में ही ५ ७ ९ प्रसन्नता मानेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन ६ ८
नं. १४ का भी कार्य करता है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और नीच दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व के स्थान को, मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिए जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति रहेगी और कभी-कभी आयु और पुरातत्व स्थानों में कुछ संकट उत्पन्न होंगे। मेष लग्न में ३ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- तीसरे पराक्रम एवं
२ १२ भाई-बहिन के स्थान में मित्र बुध की मिथुन राशि ३ चं १ पर बैठा है तो भाई-बहन का सुख प्राप्त करेगा ११ तथा सुख पूर्वक पराक्रम की वृद्धि पायेगा और १० माता की शक्ति मिलेगी तथा मन का स्वामी चन्द्रमा ७ होता है, इसलिये मनोबल की शक्ति से भूमि- ९ मकानादि रहने का सुन्दर स्थान प्राप्त करेगा तथा w ८
नं. १५ मन में सदैव प्रसन्न रहने का प्रयत्न करेगा और
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भृगु संहिता ३७ सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को, गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म का पालन एवं मनन करेगा और मनोबल की उत्साह शक्ति के द्वारा सफलता और यश प्राप्त करके भाग्यवान् कहलायेगा। मेष लग्न में ४ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- चौथे केन्द्र, माता एवं
२ १२ भूमि के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री ३ १ ११ बैठा है तो माता का महान् सुख प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की शक्ति का सुन्दर योग मिलेगा ४ चं १० तथा घरेलू वातावरण में मन को प्रसन्न करने के ५ ७ महान् साधन मिलेंगे, क्योंकि मन का स्वामी चन्द्रमा ६ ८ है, इसलिये मन के द्वारा सदैव मनोरंजन का ढंग बनाता रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को, शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान नं. १६ में कुछ वैमनस्यता का योग अनुभव करेगा तथा राज-समाज और कारबार के मार्ग में कुछ नीरसता से काम करेगा। मेष लग्न में ५ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र-पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो २ १- संतान पक्ष में बड़ा सुख अनुभव करेगा तथा मन ३ १ ११ का स्वामी चन्द्रमा होने के कारण मनोबल की शक्ति ४ १० के द्वारा विद्या के पक्ष में बहुत सफलता प्राप्त करेगा ५ चं ७ ९ तथा माता और मकानादि का सुख योग रहेगा और ६ ८ मन तथा बुद्धि के अन्दर प्रसन्नता और विनोद रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ असन्तोष नं. १७
युक्त मार्ग के द्वारा सफलता शक्ति पायेगा और गम्भीर तथा शान्त बुद्धि योग के द्वारा संतोषी एवं बड़ा चतुर बुद्धिमान् बनेगा। मेष लग्न में ६ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- छठें शत्रु एवं झंझट के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो माता २ १२ के पक्ष में सुख शक्ति की बड़ी कमी रहेगी और १ ११ भूमि-मकानादि एवं घरेलू वातावरण में अशान्ति ४ १० का योग प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में कुछ शान्ति के प्रभाव से सुख अनुभव करेगा तथा मन स्थानपति ५ ७ ९ चन्द्रमा होने के कारण से मनोयोग द्वारा बड़ी- ६च. ८ बड़ी दिक्कतों और मुसीबतों को सरलता और नं. १८ नम्रता से पार करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से
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३८ मेष लग्न का फलादेश खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों में मनोबल के योग से सुख प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ७ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि २ १२ पर बैठा है तो स्त्री के स्थान में बड़ा सुख और ३ १ ११ सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा माता का सहयोग मिलेगां ४ १० और भूमि मकानादि की सुन्दर उपभोग्यता प्राप्त ५ होगी तथा रोजगार के मार्ग में शानदार सफलता ७ चं ९ शक्ति मिलेगी, किन्तु चन्द्रमा मन की गति का ६ ८
नं. १९ स्वामी है, इसलिये मनोयोग के बल से गृहस्थ के हर सम्बन्धों में सुख शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को, मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और सुख प्राप्त रहेगा तथा मनोरंजन का सदैव ध्यान रखेगा और मान सम्मान प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ८ चन्द्र यदि वृश्चिक राशि का चन्द्र- आठवें, मृत्यु स्थान पर मंगल की राशि में नीच का होकर बैठा है तो २ १२ माता के सुख सम्बन्धों को नष्ट करेगा और भूमि- ३ १ ११ मकानादि की हानि रहेगी तथा जन्म भूमि से विछोह ४ १० रहेगा और घरेलू सुख-शान्ति की भारी कमी रहेगी तथा आयु और जीवन की दिनचर्या में परेशानी ५ ७ ९ एवं कमजोरी रहेगी तथा पुरातत्व सम्बन्धित शक्ति ६ ८ चं. की भी कुछ हानि रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से नं. २० धन एवं कुटुम्ब स्थान को, शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है; इसलिए धन की शक्ति का सुख योग बनेगा और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये एवं धन की वृद्धि के लिये मनोबल की विशेष शक्ति का उपयोग करेगा। मेष लग्न में ९ चन्द्र यदि धनु राशि का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य
२ १२ एवं धर्म स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ३ माता का सदैव सहयोग प्राप्त करेगा और भूमि १ ११ भवनादि की उत्तम शक्ति प्राप्त रहेगी तथा भाग्य की ४ १० महानता से बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और ५ ७ मन की गति का स्वामी चन्द्रमा होने के कारण से ६ ८ मनोयोग से धर्म में विशेष रूचि रखेगा और मन के नं. २१ द्वारा सुख पूर्वक भाग्य की उन्नति के साधन प्राप्त
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भृगु संहिता ३९ करेगा तथा मगन मन रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई-बहन और पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा तथा मनोबल की शक्ति से पराक्रम में सफलता पायेगा। मेष लग्न में १० चन्द्र यदि मकर का चन्द्र-दशम केन्द्र, पिता एवं राजस्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो २ १२ पिता के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता से युक्त सुख ३ ११ शक्ति प्राप्त करेगा और मनोयोग की शक्ति से ४ १० च. कारबार में सफलता पायेगा और राजसमाज में मान प्राप्त करेगा तथा सुख पूर्वक उन्नति के साधन ५ ७ ९ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि ६ ८ स्थान को, स्वयं अपनी कर्क राशि में स्वक्षेत्र को नं. २२ देख रहा है, इसलिये माता की उत्तम शक्ति प्राप्त रहेगी तथा भूमि मकानादि का सुग्दर योग मिलेगा और घरेलू वातावरण में मान युक्त सुख के साधनों की प्राप्ति रहेगी तथा उन्नति करने में मन रहेगा। मेष लग्न में ११ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा तो आमदनी के मार्ग २ १२ में मनोयोग की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा, 3 १ वं. क्योंकि मन की गति का स्वमी चन्द्रमा है इसलिये ४ मन के द्वारा आमदनी की वृद्धि करने में ही १० प्रयत्नशील रहेगा, किन्तु सुख पूर्वक आमदनी का ५ ७ ९ योग प्राप्त करने के दृष्टिकोण से कुछ थोड़ा सा ६ ८ असंतोष अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. २३ विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है इसलिये मनोयोग की शक्ति से विद्या बुद्धि में उन्नति प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में सुख के साधन बनेंगे तथा वाणी से कुछ विनोद करेगा। मेष लग्न में १२ चन्द्र मीन का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है, इसलिए खर्चा २ १२चं सुख पूर्वक शानदारी से चलेगा और बाहरी स्थानों ३ १ ११ में सुन्दर सम्बन्ध पैदा करेगा और माता के सुख ४ सम्बन्धों में कमी का योग प्राप्त करेगा तथा भूमि १० मकानादि की कुछ कमजोरी रहेगी और घरेलू ५ ७ ९ वातावरण से या जन्म भूमि से अलहदगी का ६ ८ योग बनेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान नं. २४ को, बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में मनोयोग से शान्ति पूर्वक काम निकालेगा और झगड़े-झंझटों
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४० मेष लग्न का फलादेश के मार्ग में बड़ी सन्तोष बुद्धि से सफलता प्राप्त करेगा। देह, आयु, मृत्यु, पुरातत्वस्थानपति-मंगल मेष लग्न में १ भौम यदि मेष का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान
१२ में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह में २ १ मं. शक्तियुक्त रहेगा तथा आत्मबल उठा हुआ रहेगा, ३ ११ किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण देह में कुछ ४ १० परेशानी रहेगी तथा हृदय में बड़ा भारी स्वाभिमान रहेगा और चौथी नीच दृष्टि से माता एवं भूमि ५ ७ ९ स्थान को, मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख ६ ८
नं. २५ रहा है इसलिये माता के सुख सम्बन्धों की हानि प्राप्त करेगा तथा भूमि-मकानादि एवं मातृ स्थान के सुखों की कमी रहेगी और घरेलू वातावरण में कुछ अशान्ति प्रतीत होगी तथा सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष के कारण से स्त्री स्थान में कुछ कष्ट एवं क्लेश रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और आठवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ा प्रभाव और शान-गुमान रहेगा और पुरातत्व शक्ति का
मेष लग्न में २ भौम शान-गुमान रहेगा और पुरातत्व शक्ति का शानदार लाभ प्राप्त रहेगा। २मं. १२ यदि वृषभ का मंगल- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब ३ १ ११ स्थान में बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण से धन की संग्रह शक्ति में कमी रहेगी और कुटुम्ब ४ १० के स्थान में कुछ परेशानी रहेगी तथा देह का ५ स्वामी धन भवन में बैठा है, इसलिए धन की ७ ९ ६ वृद्धि करने के लिए कुछ कठिनाईयाँ सहन करके नं. २६ इज्जत प्राप्त करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के मार्ग में कुछ परेशानियों से शक्ति प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में कुछ कष्ट और कुछ सहयोग पायेगा और बुद्धि एवं वणी में तेजी रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि रहेगी और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या का ढंग अमीरों जैसा रहेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को, गुरु की धनु राशि
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भृगु संहिता ४१ में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष के कारण धर्म में श्रद्धा रखते हुए भी धर्म का ठीक रूप से पालन नहीं हो सकेगा और इसी कारण से भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ त्रुटियुक्त विकास का साधन पायेगा। मेष लग्न में ३ भौम यदि मिथुन का मंगल-तीसरे, भाई एवं पराक्रम १२ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो तीसरे २ ३ मं स्थान पर क्रूरग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता १ ११ है, इसलिए पराक्रम शक्ति की महान् वृद्धि करेगा ४ १० तथा बड़ी जबरदस्त हिम्मत वाला बनेगा, किन्तु
५ अष्टमेष होने के दोष के कारण से भाई-बहिन के ७ ६ सुख सम्बन्धों में कुछ परेशानी का योग प्राप्त ८
नं. २७ करेगा, परन्तु आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ी शानदारी और प्रभाव रहेगा, चौथी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को, बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी हिम्मत और बहादुरी से काम करेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को, मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के लिये बड़ा प्रयत्न करेगा और धर्म के पालन में कुछ रूचि रखेगा तथा आठवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये राज- समाज से बड़ा भारी प्रभाव तथा मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और पिता स्थान की उन्नति करेगा। मेष लग्न में ४ भौम यदि कर्क का मंगल-चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान पर नीच का होकर मित्र चन्द्रमा २ १२ की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के ३ ११ कारण से माता के सुख सम्बन्धों की हानि प्राप्त ४ मं. करेगा तथा भूमि और मकानादि एवं घरेलू सुखों १० की बड़ी भारी कमी रहेगी तथा देह की सुन्दरता में ५ ७ ९ कमजोरी प्राप्त होगी और जीवन की दिनचर्या ६ ८ एवं आयु में कुछ अशान्ति के योग प्राप्त रहेंगे नं. २८ और पुरातत्व सुख लाभ की कमजोरी रहेगी तथा चौथी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ क्लेश युक्त सम्बन्ध रहेगा तथा रोजगार के मार्ग में परेशानी के योग से शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये पिता से कुछ वैमनस्य रखते हुए भी पिता और राज-
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४२ मेष लग्न का फलादेश समाज में कुछ उन्नति करेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में उन्नति पाने के लिए भारी प्रयत्न करेगा। मेष लग्न में ५ भौम यदि सिंह का मंगल- पाँचवें त्रिकोण, विद्या एवं सन्तान स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा २ १२ है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण संतान पक्ष ३ ११ में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा तथा विद्या में कुछ ४ १० कठिनाईयों के योग से शक्ति प्राप्त करेगा और वाणी तथा बुद्धि के अन्दर बड़ी तेजी रखेगा तथा ५ मं ७ ९ देह में स्वाभिमान रखेगा और चौथी दृष्टि से आयु ६ ८ एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि नं. २९ में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त रहेगी तथा बुद्धि योग द्वारा पुरातत्व सम्बन्धित शक्ति का लाभ प्राप्त रहेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ा प्रभाव रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी के योग से उन्नति प्राप्त करेगा, किन्तु लाभ के मार्ग में सफलता मिलने पर भी कुछ असंतोष मानेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रूप से खूब होता रहेगा तथा बाहरी स्थानों से जीविका सम्बन्धित शक्ति का उत्तम योग प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ६ भौम यदि कन्या का मंगल- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर २ १२ गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, ३ ११ इसलिए शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव कायम ४ रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी निर्भयता १० से काम करेगा और परिश्रम के योग से उन्नति ५ ७ ९ और स्वाभिमान की बुद्धि प्राप्त करेगा तथा चौथी ६ मं. ८ मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु नं. ३० राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन करने में इच्छा रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब शानदार करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में अच्छा सम्बन्ध बनाकर लाभ प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में देह के स्थान को, स्वक्षेत्र के रूप से देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा प्रभाव और स्वाभिमान प्राप्त करेगा तथा
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भृगु संहिता ४३ कठिन परिश्रम के योग से अपने व्यक्तित्व की बड़ी जागृति और नाम प्राप्त करेगा और अधिक स्वाभिमानी होने के कारण कुछ विरोधियों से टकराते रहना पड़ेगा, किन्तु विजयी रहेगा। मेष लग्न में ७ भौम यदि तुला का मंगल-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला २ १२ राशि में बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण ३ १ ११ से स्त्री पक्ष में कुछ कष्ट युक्त सम्पर्क के साधन ४ १० प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा तथा आयु ५ ७ मं, ९ की उत्तम शक्ति पायेगा और पुरातत्वशक्ति का ६ ८ सुन्दर सहयोग पायेगा और जीवन की दिनचर्या नं. ३१ में शानदारी रहेगी तथा चौथी उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए पिता से कुछ वैमनस्यता होते हुए भी पिता की उन्नति करेगा और कारबार में बड़ी सफलता पायेगा तथा राज-समाज के मार्ग में बड़ी भारी इज्जत पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा प्रभाव और गौरव प्राप्त करेगा तथा बड़ा भारी स्वाभिमान रखेगा और आठवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिए धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिए कठिन प्रयत्न करने पर भी थोड़ी सफलता मिलेगी। मेष लग्न में ८ भौम यदि वृश्चिक का मंगल- आठवें आयु मृत्यु
१२ एवं पुरातत्व स्थान में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो २ आयु की वृद्धि करेगा तथा पुरातत्त्व शक्ति का 3 १ ११ लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव ४ १० और गौरव रहेगा; किन्तु देह का स्वामी होकर अष्टम स्थान में बैठा है, इसलिये देह की सुन्दरता ५ ७ ९ में कमी रहेगी तथा बुढ़ापे के चिह्न जल्दी प्रतीत ६ ८ मं. होने लगेंगे और दूसरे स्थानों से सम्बन्ध बनेगा नं. ३२ और चौथी शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को, शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ थोड़ी-सी परेशानियों के योग से सफलता शक्ति मिलती रहेगी और आमदनी की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब के मार्ग में सफलता मिलने पर भी कुछ असन्तोष रहेगा और
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४४ मेष लग्न का फलादेश आठवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को, बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, किन्तु अष्टमेष होने के दोष के कारण से भाई-बहिन के सुख में कमी रहेगी और पराक्रम की सफलता के लिये सदैव प्रयत्नशील रहेगा। मेष लग्न में ९ भौम यदि धनु राशि का मंगल- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में बैठा है तो देह और जीवन २ १२ के लिये भाग्य की शक्ति का अच्छा सहयोग ३ १ ११ पायेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से ४ १० भाग्य के अन्दर कुछ कमी अनुभव करेगा और धर्म के पालन में रूचि होते हुए भी धर्म का ठीक ५ ७ तौर से पालन नहीं हो सकेगा तथा आयु की वृद्धि ६ 1.0 पायेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा नं. ३३ और चौथी मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, गुरु की मीन राशि में देख रहा है; इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों से विशेष सम्बन्ध रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को, बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, अष्टमेश होने के दोष के कारण से भाई बहन के सम्बन्ध में उत्तम रूचि होते हुए भी कुछ कमी रहेगी और पराक्रम की विशेष सफलता प्राप्त करेगा और आठवीं नीच दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को, मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये डबल दोष होने से अर्थात् नीच दृष्टि है और अष्टमेश है, इसलिये माता के सुख में और घरेलू मकानादि के सुख सम्बन्धों में बड़ी कमी रहेगी। मेष लग्न में १० भौम यदि मकर का मंगल-दशम केन्द्र, पिता एवं २ १२ राज्य स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो पिता से कुछ वैमनस्यता रखते हुए ३ १ ११ भी पिता के स्थान की उन्नति करेगा और कारबार ४ १० मं. की वृद्धि रहेगी तथा राज-समाज के अन्दर बड़ा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा आयु की विशेष 4 ७ ९ शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व शक्ति का विशेष ६ ८ अधिकार पायेगा और चौथी दृष्टि से देह के स्थान नं. ३४ को, स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा हृदय में बड़ा अहंकार एवं स्वाभिमान रहेगा तथा कुछ ख्याति प्राप्ति और अपने व्यक्तित्व की उन्नति के लिये बड़ा भारी उद्योग करता रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से उन्नति के मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी और सातवीं नीच दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को, मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि के सुखों में कुछ घरेलू अशान्ति-सी रहेगी और
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भृगु संहिता ४५ आठवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि में बड़ी तेजी और हुकुमत रखेगा तथा संतान पक्ष में कुछ शक्ति मिलेगी और कुछ कष्ट रहेगा। मेष लग्न में ११ भौम यदि कुम्भ का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें २ १२ १ स्थान पर गरम ग्रह की राशि में, गरम ग्रह बैठा 3 मं. होने से विशेष शक्तिशाली माना जाता है, इसलिये ४ १० आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के कारण, आमदनी ५ ७ ९ का वृद्धि करने के मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ रहेगी, ६ ८ किन्तु अधिक मुनाफा खाने के मार्ग में संलग्न नं. ३५ रहेगा और आयु का लाभ रहेगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध से अच्छा लाभ रहेगा और चौथी दृष्टि से, धन एवं कुटुम्ब के स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिए अष्टमेश होने के कारण से धन और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ असंतोष रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान पक्ष में कुछ शक्ति एवं कुछ त्रुटि रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से अनुसंधान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है; इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा तथा बड़ा साहसी बनेगा। मेष लग्न में १२ भौम यदि मीन का मंगल- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्चा २ १२मं. बहुत अधिक करेगा और देह में कमजोरी पायेगा ३ १ ११ तथा बाहरी दूसरे स्थानों में अधिकांश भ्रमण करेगा ४ और देह की सुन्दरता में कमी रहेगी तथा पुरातत्व १० शक्ति की कुछ हानि रहेगी, किन्तु बाहरी दूसरे ५ ७ ९ स्थानों में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और चौथी ६ ८ मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को, बुध की नं. ३६ मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष के कारणों से भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ परेशानी-सी रहेगी और पराक्रम की सफलता के लिये विशेष परिश्रम करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को, बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ी हिम्मत और प्रभाव शक्ति से काम करेगा, तथा आठवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष के कारण से स्त्री स्थान में कुछ खास परेशानी करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाईयों से
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४६ मेष लग्न का फलादेश सफलता शक्ति पायेगा तथा कुछ मूत्र विकार पायेगा। भाई, पराक्रम, शत्रु, झंझटस्थानपति-बुध मेष लग्न में १ बुध यदि मेष का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो बहुत पराक्रम २ १२ पुरुषार्थ के योग से काम करेगा, किन्तु षष्ठेश होने ३ १ बु. ११ के दोष के कारण से देह में कुछ रोग एवं कुछ ४ १० परेशानी रहेगी और इसी कारण से भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति प्राप्त रहेगी ५ ७ ९ और बुध विवेक शक्ति का दाता है, इसलिये देह ६ ८ में विवेक शक्ति की योग्यता के द्वारा प्रभाव और नं. ३७ मान प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजयी रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम एवं पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा रोजगार में सफलता पायेगा और कुछ झंझट युक्त मार्ग से स्त्री पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा। मेष लग्न में २ बुध यदि वृषभ का बुध-दूसरे-धन एवं कुटुम्ब २ बु. १२ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पुरुषार्थ ३ एवं परिश्रम के योग से धन की वृद्धि के योग १ ११ प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु स्थानपति होने के दोष के ४ १० कारण से धन के मार्ग में कभी-कभी कुछ नुकसान होता रहेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का- ५ ७ ९ सा कार्य भी करता है, इसलिये भाई-बहिन के ६ ८ सम्बन्धों में कमी रहेगी और शत्रु पक्ष के मार्ग में नं. ३८ धन की शक्ति के द्वारा प्रभाव रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ झंझटों से आयु के मार्ग में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ कुछ विवेक शक्ति के द्वारा प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ३ बुध यदि मिथुन का बुध-तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर-स्वयं पराक्रम एवं हिम्मत शक्ति की २ १२ महानता प्राप्त करेगा और शत्रु स्थान पति होने के ३ब १ ११ दोष कारण से भाई-बहिन की शक्ति होते हुये भी ४ १० अन्दरूनी कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु ५ ७ ९ राशि में देख रहा है, इसलिये पराक्रम शक्ति के ६ ८ द्वारा भाग्य की वृद्धि करने का महान् प्रयास करता नं. ३९ रहेगा और धर्म के पालन में कुछ त्रुटि युक्त कार्य
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भृगु संहिता ४७ सम्पादन करेगा और बुध विवेक का स्वामी है, इसलिये विवेक शक्ति के परिश्रम से सफलता पायेगा। मेष लग्न में ४ बुध यदि कर्क का बुध- चौथे केन्द्र एवं भूमि के
१२ स्थान पर मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है तो शत्रु २ ३ १ ११ स्थान पति होने के दोष के कारण से माता के सुखों में कुछ त्रुटि और झंझट प्राप्त करेगा तथा ४ बु. १० भूमि और मकानादि की भी कुछ त्रुटि युक्त सुख ५ ७ शक्ति मिलेगी तथा शत्रु पक्ष के मार्ग में कुछ अशान्ति ६ सी रहते हुये भी प्रभाव रहेगा और भाई-बहिन के नं. ४० सम्बन्ध में कुछ थोड़ा-सा झंझट युक्त वातावरण के द्वारा सुख प्राप्त रहेगा और अपने स्थान से ही पराक्रम एवं परिश्रम की सफलता पायेगा और सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को, मित्र शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बुध विवेकी ग्रह है इस कारण विवेक शक्ति के परिश्रम योग से पिता, व्यापार और राज समाज में सफलता पायेगा। मेष लग्न में ५ बुध यदि सिंह का बुध- पाँचवें त्रिकोण, विद्या एवं संतान स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है २ १२
३ 2 ११ तो शत्रु स्थानपति होने के दोष के कारण से विद्या एवं संतान पक्ष की सुख शक्ति प्राप्त करने में कुछ ४ परेशानी रहेगी, किन्तु बुध विवेकी ग्रह है तथा ५ ९ विद्या स्थान पर बैठा है, इसलिये परिश्रम शक्ति के ब ७
८ योग से विद्या बुद्धि की विशेष सफलता प्राप्त ६ करेगा और वाणी के अन्दर बड़ी चतुराई रहेगी और भाई-बहिन के पक्ष में कुछ त्रुटि युक्त मार्ग से प्रेम सम्बन्ध रखेगा और नं. ४१
सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के योग से आमदनी के मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा और दिमाग की शक्ति के कारण से शत्रु पक्ष में सफलता और प्रभाव पायेगा। मेष लग्न में ६ बुध यदि कन्या का बुध- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर उच्च का बैठा है २ १२ तो शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव और विजय ३ १ ११ प्राप्त करेगा, किन्तु बुध विवेकी ग्रह है, इसलिये ४ विवेक शक्ति के पुरुषार्थ से बड़े-बड़े प्रभावशाली १० कर्म करेगा, परन्तु शत्रु स्थानपति होने के दोष के ५ ७ ९ कारण से भाई-बहिन के पक्ष में कुछ विरोध रहेगा ६ बु. ८ और पराक्रम शक्ति के अन्दर कुछ थोड़ी-सी नं. ४२ परतन्त्रता रहेगी और सातवीं नीच दृष्टि से खर्च
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४८ मेष लग्न का फलादेश एवं बाहरी स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और बाहरी स्थानों में कुछ परेशानी प्रतीत होगी तथा रोग व झंझटों की परवाह नहीं करेगा। मेष लग्न में ७ बुध यदि तुला का बुध- सातवें केन्द्र एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो २ १२ ३ १ ११ पुरुषार्थ और परिश्रम की शक्ति से रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु स्थान पति ४ १० होने के दोष के कारण से रोजगार और स्त्री के ५ ७ बु. ९ स्थान में कुछ झंझट युक्त कार्य से शक्ति प्राप्त ६ रहेगी तथा बुध विवेकी ग्रह है, इसलिये विवेक V
भाई-बहिन का कुछ सहयोग पायेगा और शत्रु पक्ष के मार्ग मे विवेक नं. ४३ शक्ति के योग से गृहस्थ में संचालन करेगा और
शक्ति के परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये रोगेश होने के कारण देह में कुछ परेशानी के योग से मान और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ८ बुध यदि वृश्चिक का बुध- आठवें, मृत्यु एवं पुरातत्व २ १२ स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई- ३ ११ बहिन के सुख सम्बन्धों में हानि एवं परेशानी रहेगी और पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर कमजोरी प्रतीत होगी ४ १० तथा उत्साह और हिम्मत की कमी रहेगी और शत्रु ५ ७ ९ पक्ष के सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव होगी तथा ६ ८ बु. शत्रु स्थान पति होने के दोष के कारण से जीवन की नं. ४४ दिनचर्या तथा आयु एवं उदर और पुरातत्व के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी होने के कारणों से परेशानी अनुभव होगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ी भारी दौड़-धूप करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ थोड़ी अशान्ति के द्वारा शक्ति पायेगा। मेष लग्न में ९ बुध यदि धनु राशि का बुध- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो २ १२ ३ १ ११ परिश्रम के योग से भाग्य की वृद्धि करेगा, किन्तु शत्रु स्थान पति होने के दोष के कारण से भाग्य के ४ १० पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और धर्म के ५ ९ ७ बु. पालन में कुछ त्रुटि, किन्तु शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में ६ ८ भाग्य की ताकत से सफलता प्राप्त करेगा और प्रभाव नं. ४५ की वृद्धि रहेगी तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग से उन्नति
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भृगु संहिता ४९ का योग बनेगा और विवेकी बुध सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मिथुन राशि में भाई एवं पराक्रम स्थान को, स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के योग से पुरुषार्थ कर्म की सफलता और भाई-बहिन के संयोग का लाभ प्राप्त करेगा। मेष लग्न में १० बुध यदि मकर का बुध- दसवें केन्द्र, पिता एवं
१२ राज्य स्थान में मित्र शनि की मकर राशि पर बैठा २ ३ १ ११ है तो परिश्रम और पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा बहुत उन्नति करेगा और भाई-बहिन का कुछ योग ४ १० बु. पायेगा, किन्तु शत्रु स्थानपति होने के दोष के ५ ७ ९ कारण से पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त ६ ८ सम्बन्ध प्राप्त करेगा और बुध स्वभाव से विवेकी नं. ४६ ग्रह है, इसलिये विवेक शक्ति के योग से कारबार, राज-समाज के अन्दर मान-प्रतिष्ठा एवं सफलता पायेगा और शत्रु पक्ष में विजयी रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता और भूमि स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता एवं मकान जायदाद के घरेलू वातावरण में कुछ प्रभाव युक्त शक्ति प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ११ बुध यदि कुम्भ का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में
२ १२ मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो बुध स्वभाव से
३ १ ११ विवेकी ग्रह है, इसलिये परिश्रम की विवेक शक्ति बु. के द्वारा आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता ४ १० प्राप्त करेगा और भाई-बहिन का लाभ योग पायेगा ५ ७ ९ तथा शत्रु पक्ष से फायदा उठावेगा किन्तु ६ शत्रुस्थानपति होने के दोष के कारण से लाभ के V नं. ४७ मार्ग में कुछ झंझट रहेगा तथा पराक्रम शक्ति की सफलता रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परिश्रम की शक्ति से विद्या में सफलता पायेगा और कुछ झंझटों के योग से संतान पक्ष में शक्ति और सहयोग मिलेगा। यदि मीन का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में नीच का होकर गुरु की मीन राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता प्रतीत होगी तथा भाई- बहिन के सुख में विशेष कमी रहेगी और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में भृ.सं .- ४
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५० मेष लग्न का फलादेश मेष लग्न में १२ बुध कमजोरी रद़ेगी और शत्रु स्थानपति होने के दोष से कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग द्वारा भी हानि २ १२बु. ३ और परेशानी के कारण प्राप्त होंगे और सातवीं १ ११ उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को, स्वयं अपनी कन्या ४ १० राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है और बुध स्वभाव ०~ 4 से विवेकी ग्रह है इसलिये विवेक शक्ति की ७ युक्तियों के द्वारा शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त करेगा ६ ८ और गुप्त धैर्य से विजय प्राप्ति का ढंग पायेगा। भाग्य-धर्म-खर्च-बाहरी स्थानपति-गुरु नं. ४८
मेष लग्न में १ गुरु यदि मेष का गुरु- प्रथम केन्द्र, देह के स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो देह के २ १२ ३ १ गु. ११ अन्दर बड़ा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा खर्चा खूब ठाट से चलता रहेगा और बाहरी स्थानों ४ १० के सम्पर्क से बड़ी भारी इज्जत और उन्नति प्राप्त करेगा तथा व्ययेश होने के दोष के कारण से देह ५ ७ ९ के अन्दर कुछ गुप्त कमजोरी भी रहेगी और पाँचवीं ६ ८ मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को, सूर्य की नं. ४९ सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी योग्यता प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त होगी और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ परेशानी के योग से शक्ति प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ दौड़-धूप करने से सफलता प्राप्त होगी तथा नवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को, स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की महान् वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म और सज्जनता का यथा साध्य पालन करेगा तथा यश प्राप्त करेगा देव गुरु वृहस्पति के लग्न में बैठने से लौकिक एवं पारलौकिक दोनों मार्गों में कुशलता प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का गुरु- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो बाहरी स्थानों के योग से भाग्य शक्ति के द्वारा धन प्राप्त करेगा और भाग्यवान् धनवान् समझा जायेगा, किन्तु व्ययेश होने के कारण से धन के कोष में कभी-कभी हानि और कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ शक्ति रहेगी तथा खर्चा खूब रहेगा, परन्तु खर्च को रोकने की चेष्टा बराबर होती रहेगी और धर्म के मुकाबले में धन का अधिक महत्व माना जायेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान
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भृगु संहिता ५१ मेष लग्न में २ गुरु को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रुपक्ष में दानाई के योग से कार्य की सिद्धि २ गु. १२ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व ३ १ ११ स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, ४ ६० इसलिये आयु में शक्ति रहेगी तथा पुरातत्व का कुछ लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ 4 ७ ९ अमीरात का ढंग रहेगा नवीं नीच दृष्टि से पिता एवं ६ ८ राजस्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख नं. ५० रहा है, इसलिये पिता के पक्ष में कमी और परेशानी रहेगी तथा राजसमाज के मार्ग में दिक्कतें प्राप्त होंगी और कारबार की उन्नति प्राप्त करने के लिये बड़ी कठिनाईयों के मार्ग से लाभ करेगा। मेष लग्न में ३ गुरु यदि मिथुन का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो २ १२ ३गु. ११ पराक्रम स्थान में शक्ति पायेगा और भाई-बहिन का योग प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष ४ १० के कारण से भाई एवं पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी और खर्च की सुन्दर शक्ति प्राप्त ५ ७ ९ करेगा तथा बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध रहेगा ६ ८ और पाँचवीं दृष्टि से स्त्री एवं राजेगार के स्थान नं. ५१ को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में कुछ कमजोरी के योग से सफलता प्राप्त करेगा और स्त्री स्थान में कुछ त्रुटि युक्त रूप से शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करेगा तथा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म का भी कुछ पालन करेगा तथा नवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के योग द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण से तथा भाग्येश होने के गुण से भाग्य गृहस्थ, लाभ, रोजगार, पुरुषार्थ,
होगा। भाई-बहिन इत्यादि सभी मार्गों में उतार, चढ़ाव-सुख-दुख का योग प्राप्त
यदि कर्क का गुरु- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान पर उच्च का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि में बैठा है तो माता की महान् शक्ति पायेगा और भूमि मकानादि की शोभा और गौरव प्राप्त करेगा तथा अपने स्थान में बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म का पालन भी करेगा तथा भाग्य की शक्ति से घरेलू सुखों के महान् साधन प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र
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५२ मेष लग्न का फलादेश मेष लग्न में ४ गुरु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिए आयु में २ १२ शक्ति मिलेगी और पुरातत्व सम्बन्ध से लाभ रहेगा ३ १ ११ तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी और ४ गु. १० सातवीं नीच दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को, शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिये ५ ७ ९ पिता के सुख में कमी रहेगी और राजसमाज के ६ ८ मार्ग में कुछ अरूचि और असंतोष रहेगा तथा नं. ५२ कारबार की वृद्धि करने में कुछ रूकावटें पड़ेंगी और नवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक तायदाद में रहेगा तथा बाहरी स्थानों का महान् सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त होगा तथा अपने स्थान से ही आनन्द प्राप्त करने का योग प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ५ गुरु यदि सिंह का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा २ १२ है तो विद्या बुद्धि के अन्दर विशेष शक्ति प्राप्त 3 १ ११ करेगा और धर्म का अच्छा अध्ययन करेगा तथा ४ १० सन्तान पक्ष में शक्ति और उन्नति पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से विद्या एवं सन्तान ५ गु ७ ९ पक्ष में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा तथा विद्या की ८ शक्ति के द्वारा खर्च का संचालन उत्तम रूप से नं. ५३ करेगा और बाहरी स्थानों का विशेष ज्ञान प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की महान् उन्नति करेगा तथा बड़ा भारी भाग्यवान् एवं बुद्धिमान् माना जायेगा और धर्म का पालन करेगा एवं सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसता रहेगी और नवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को, मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा गौरव तथा सुन्दरता युक्त मान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और ईश्वर तथा न्याय के लिए हृदय में विशेष स्थान रखेगा तथा अपने व्यक्तित्व और स्वाभिमान का बड़ा ध्यान रखेगा। यदि कन्या का गुरु- छठें शत्रु स्थान एवं झंझट स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है, तो भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी झंझटें रहेंगी और धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं हो सकेगा, किन्तु फिर भी झगड़े-झंझटों के मार्ग से ही भाग्य की वृद्धि हो सकेगी तथा शत्रु पक्ष में भाग्य की शक्ति से
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भृगु संहिता ५३ मेष लग्न में ६ गुरु ही सफलता पायेगा और झगड़े तथा पाप के मार्ग १२ में कुछ न्याय धर्म का भी ध्यान रखेगा तथा पाँचवीं २ नीच दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शनि ३ १ ११ की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के ४ १० पक्ष में भाग्य की कुछ कमजोरी रहेगी और उन्नति के मार्गों में तथा कारबार में कुछ दिक्कतें रहेंगी 4 ७ ९ और राज-समाज के पक्ष में कुछ कमी रहेगी और ६ गु ८ सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, स्वयं नं. ५४ अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक होने पर भी खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ शक्ति प्राप्त रहेगी और नवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को, सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिए बड़ा भारी प्रयत्न करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ मतभेद युक्त सम्बन्ध का योग प्राप्त करेगा तथा भाग्येश के छठें में बैठने से कुछ दूसरों को सहारा पाकर भाग्य की जागृति करेगा। मेष लग्न में ७ गुरु यदि तुला का गुरु- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि २ १२ पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष तथा भाग्येश ३ १ ११ होने के गुण के कारणों से स्त्री पक्ष में कुछ त्रुटि ४ १० लिये हुए शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री के अन्दर कुछ प्रभाव एवं दानाई तथा भाग्यवानी मिलेगी ५ ७ गु. ९ और इसी प्रकार रोजगार के मार्ग में कुछ कमजोरी ८ के साथ-साथ भाग्य की शक्ति से उन्नति प्राप्त नं. ५५ करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सफलता पायेगा तथा गृहस्थ में खर्चा खूब रहेगा और पाँचवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा आमदनी के मार्ग में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को, मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता एवं प्रभाव पायेगा अर्थात् भाग्यवान् समझा जायेगा और हृदय में धर्म का भी ध्यान रखेगा तथा नवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को, बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में सफलता शक्ति और यश पायेगा। यदि वृश्चिक का गुरु- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष से तथा मृत्यु स्थान में बैठने के दोष के कारण से भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी भारी दिक्कतें
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५४ मेष लग्न का फलादेश मेष लग्न में ८ गुरु और कमजोरियाँ रहेगी तथा धर्म की हानि रहेगी और सुयश के स्थान पर अपयश मिल सकेगा, २ १२ किन्तु आयु की शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व का ३ १ ११ लाभ मिलेगा; क्योंकि भाग्येश होकर आयु स्थान ४ १० पर बैठा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में भाग्यवानी रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से खर्च एवं 4 ७ ९ बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र ६ ८ गु. को देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और नं. ५६ बाहरी स्थानों से विशेष सम्बन्ध रखेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये कुछ सफलता प्राप्त करेगा और नवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि के सम्बन्धों में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और घरेलू सुख के साधनों को विशेष रूप से पायेगा तथा आमोद-प्रमोद चाहेगा। मेष लग्न में ९ गुरु यदि धन का गुरु- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा २ १२ ३ ११ है तो भाग्य की महान् शक्ति प्राप्त करके भाग्यशाली कहलायेगा और धर्म का पालन करेगा, ४ १० किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य और धर्म के अन्दर कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और ५ ९ ७ ग भाग्य की शक्ति के द्वारा खर्च की संचालन शक्ति ६ ८ प्राप्त करेगा और बाहरी स्थान का सुन्दर सम्बन्ध नं. ५७ पायेगा तथा पाचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को, मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर बड़ी प्रतिभा और गौरव तथा मान प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को, बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पराक्रम से सफलता पायेगा और भाई-बहिन का योग प्राप्त करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाई-बहिन एवं पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी भी रहेगी और नवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी उत्तम शक्ति एवं सफलता प्राप्त करेगा और संतान पक्ष से उत्तम योग पायेगा और वाणी के अन्दर धर्म शास्त्र की चर्चा करेगा तथा सज्जनता और बुद्धिमत्ता का योग प्राप्त करेगा। यदि मकर का गुरु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का
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भृगु संहिता ५५ मेष लग्न में १० गुरु होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष और नीच होने के दोष के कारण से २ १२ पिता स्थान में हानि पायेगा और राज-समाज के ३ १ ११ पक्ष में नीरसता रहेगी तथा कारबार की उन्नति के ४ १० गु. मार्ग में बड़ी भारी कठिनाईयाँ रहेंगी तथा धर्म- कर्म का साधारण पालन कर सकेगा और खर्च ५ ७ ९ की कमजोरी रहेगी तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध ६ ८ भी अल्प रूप में रहेगा और भाग्य की तरफ से नं. ५८ बड़ी दुर्बलता अनुभव करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब का थोड़ा लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से माता, भूमि, सुख भवन को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए माता भूमि आदि की शक्ति का सुख पायेगा और अन्दरूनी तरीके से सुख शान्ति प्राप्त करने का महान् साधन पायेगा और नवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रुपक्ष में भाग्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और झगड़े- झंझटों के मार्ग में भाग्य और भगवान् की (धर्म) शक्ति से कार्य सफल बनाने का प्रयत्न करेगा। मेष लग्न में ११ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य की २ १२ शक्ति से धन का लाभ प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश ३ गु. होने के दोष के कारण से आमदनी के पक्ष में ४ १० कुछ कमी अनुभव होगी तथा खर्चा भी अच्छे ढंग से चलेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से ५ ७ ९ लाभ रहेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और ६ ८ धर्म का कुछ पालन करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि नं. ५९ से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ त्रुटियुक्त शक्ति मिलेगी और पराक्रम स्थान से कुछ सफलता प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के अन्दर शक्ति प्राप्त रहेगी और संतान पक्ष में सहयोग प्राप्त रहेगा तथा वाणी की योग्यता से प्रभाव और सज्जनता का रोग प्राप्त करेगा और नवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु, शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के योग से रोजगार में सफलता पायेगा और स्त्री एवं गृहस्थ के मार्ग में कुछ नीरसता से शक्ति प्राप्त करेगा।
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५६ मेष लग्न का फलादेश
मेष लग्न में १२ गुरु यदि मीन का गुरु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर २ १२गु बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक तायदाद में रहेगा m १ ११ और भाग्य की शक्ति से बाहरी दूसरे स्थानों से ४ १० सफलता प्राप्त रहेगी, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य की उन्नति का योग बिलम्ब ५ ९ से प्राप्त होगा तथा धर्म के यथार्थ पालन में कुछ ६ ८ कमजोरी रहेगी और सुयश तथा बरक्कत की नं. ६० कमी रहेगी और पाँचवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए खर्च की विशेष शक्ति के द्वारा घरेलू वातावरण में एवं भूमि आदि के सम्बन्ध में चमत्कार रखेगा और माता का सुख पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष के मार्ग में भाग्य की शक्ति से दानाई के द्वारा कार्य सम्पादन करेगा तथा झगड़े- झंझटों के पक्ष में प्रभाव प्राप्त करेगा और नवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व सम्बन्ध में सफलता पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से उपरोक्त मार्गों के लाभ में कुछ त्रुटि रहेगी। धन, कुटुम्ब, स्त्री रोजगारस्थानपति-शुक्र मेष लग्न में १ शुक्र यदि मेष का शुक्र-प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो देह २ १२ के स्थान पर परम चतुर आचार्य के बैठने के ३ १ श्. ११ कारण से देह में बड़ी भारी सुन्दरता प्राप्त करेगा ४ और बड़ी भारी चतुराई के योग से धन और कुटुम्ब १० की शक्ति का आनन्द वैभव प्राप्त करेगा, किन्तु ५ ७ ९ धन का स्वामी कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता .
६ ८ है, इसलिये देह में कुछ घिराव-सा अथवा कुछ नं. ६१ परेशानी-सी भी रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी तुला राशि में स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार की महान् शक्ति को अपनी आदर्श योग्यता से उत्तम रूप में प्राप्त करेगा, किन्तु धनेश होने के कारण से स्त्री, विवाह एवं रोजगार के संचालन में कुछ दिक्कतें प्राप्त रहेंगी। यदि वृषभ का शुक्र- धन भवन एवं कुटुम्ब स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति का उत्तम योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का सुन्दर सौभाग्य प्राप्त करेगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन
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भृगु संहिता ५७
मेष लग्न में २ शुक्र का-सा कार्य भी करता है, इसलिये स्त्री के सुख सम्बन्धों में दिक्कतें रहेंगी और रोजगार के कार्य २ शु. १२ ११ संचालन में सुचारू रूप की कमी रहेगी, किन्तु ३ १ आचार्य चतुर शुक्र की योग्यता के कारण से ४ १० रोजगार द्वारा धन की वृद्धि खूब प्राप्त करेगा
५ ७ ९ और सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को, सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा ur
और अमीरात का ढंग रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में चतुराई से सफलता नं. ६२ है; इसलिए आयु एवं जीवन की दिनचर्या में रौनक
मेष लग्न में ३ शुक्र और लाभ पायेगा। यदि मिथुन का शुक्र- भाई एवं पराक्रम स्थान २ १२ में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो परम चतुर ३श. १ ११ आचार्य शुक्र ग्रह के कारण से पराक्रम और चतुराई के द्वारा धन की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और ४ १० कुटुम्ब का सुन्दर योग पायेगा तथा रोजगार के ५ ७ ९ मार्ग से धन प्राप्त करेगा और स्त्री का उत्तम सहयोग ८ पायेगा, किन्तु धन स्थान पति ग्रह कुछ बन्धन नं. ६३ का-सा कार्य भी करता है, इसलिये भाई-बहिन और स्त्री के सुख सम्बन्ध में कुछ अड़चनें या कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को, सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये चतुराई के विशेष योग से भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का कुछ पालन करेगा और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा भाग्यवान् समझा जायेगा। मेष लग्न में ४ शुक्र यदि कर्क का शुक्र- चौथे केन्द्र, माता और भूमि स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर २ १२ बैठा है तो धन और कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा, ३ १ ११ किन्तु धन स्थान का स्वामी ग्रह कुछ बन्धन का- ४ शु. १० सा कार्य भी करता है, इसलिये माता के सुख में कुछ कमी रहेगी, किन्तु भूमि-मकानादि की शक्ति ५ ७ ९ पायेगा और कुछ थोड़ी-सी त्रुटि के साथ स्त्री का ८ सुख प्राप्त रहेगा और परम चतुर आचार्य शुक्र नं. ६४ की कृपा से रोजगार के मार्ग में बड़ी चतुराई के द्वारा धन पैदा करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी चतुराई के कर्म योग से
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५८ मेष लग्न का फलादेश राज-समाज में इज्जत और उन्नति पायेगा तथा पिता से धन लाभ करेगा और कारबार के मार्ग में सफलता पायेगा। मेष लग्न में ५ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण, विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है २ १२ तो परम चतुर आचार्य शुक्र के कारण से विद्या ३ ११ स्थान में बड़ी शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा ४ १० तथा बुद्धि योग के द्वारा राजेगार की शक्ति से धन प्राप्त करेगा, किन्तु धन स्थान का स्वामी ५शु. ७ ९ कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, इसलिये संतान ६ ८ पक्ष में कुछ मतभेद के सहित शक्ति मिलेगी और नं. ६५ सातवें मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को, शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि की योग्यता से धन की आमदनी का सुन्दर योग प्राप्त करेगा तथा बुद्धि और वाणी तथा विचारों के द्वारा धन की बुद्धि और भोग प्राप्ति का विशेष ध्यान रखेगा। मेष लग्न में ६ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में नीच का होकर-मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन २ १२ की संचित शक्ति का अभाव रहेगा और स्त्री की ३ १ तरफ से कुछ परेशानी रहेगी तथा धन कुटुम्ब ४ १० सुख की करफ से कमजोरी रहेगी और रोजगार के मार्ग में कुछ झंझट एवं परतंत्रता का योग ५ ७ ९ रहेगा और शत्रु पक्ष में कुछ बेकार के-से कार्यों ६ शु. ८ में भी धन का दुरुपयोग होता रहेगा और सातवीं नं. ६६ उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष सम्बन्ध शक्ति पायेगा तथा परम चतुर आचार्य शुक्र ग्रह के योग से बड़ी-बड़ी कठिनाईयों द्वारा युक्ति बल से कार्य सिद्ध करेगा। मेष लग्न में ७ शुक्र यदि तुला का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री २ १२ बैठा है तो रोजगार के मार्ग से बहुत धन पैदा 3 १ ११ करेगा तथा स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दर शक्ति प्राप्त ४ करेगा और कुटुम्ब का बड़ा आनन्द पायेगा तथा १० परम चतुर दैत्य-आचार्य शुक्र के बलवान् होने ५ ७ शु. ९ से रोजगार और गृहस्थ के पक्ष में बड़ी भारी चतुराई के योग से विशेष सफलता शक्ति पायेगा, W
नं.६७ किन्तु धन स्थान का स्वामी कुछ बन्धन का-सा
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भृगु संहिता ५९ कार्य भी करता है, इसलिये रोजगार व स्त्री पक्ष में कुछ दिक्कत रहेगी और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और मान तथा बड़ी इज्जत प्राप्त करेगा तथा बड़ा योग्य कार्य कुशल समझा जायेगा। मेष लग्न में ८ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- आठवें मृत्यु एवं
२ १२ पुरातत्व स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि ३ १ ११ पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाईयों के ४ १० द्वारा कार्य सम्पादन करेगा तथा धन की संचित ५ ७ ९ शक्ति का अभाव या कमी अनुभव करेगा और ६ ८ शु. कुटुम्ब के सुख में कमी रहेगी, किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र के योग से पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और आयु में शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या का ढंग नं. ६८
शानदार रहेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन प्रयत्न सदैव करता रहेगा और कठिन परिश्रम
मेष लग्न में ९ शुक्र एवं चतुराई के योग से इज्जत प्राप्त करेगा। यदि धन का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि पर २ १२ १ ११ बैठा है तो बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा और परम चतुर आचार्य शुक्र की कृपा से उत्तम मार्ग ४ १० के रोजगार द्वारा विशेष चतुराई के योग से धन ५ ७ ९ शु. और भाग्य की उन्नति प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ
६ ८ और स्त्री का सुन्दर योग पाकर यश कमायेगा नं. ६९ तथा धन और कुटुम्ब का पालन धार्मिक रूप से करेगा तथा भाग्य और धर्म की शक्ति से उन्नति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का कुछ अच्छा योग पायेगा और पुरुषार्थ की सफलता शक्ति चतुराई के योग से प्राप्त करेगा और मान पायेगा। यदि मकर का शुक्र- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो परम चतुर ग्रह आचार्य शुक्र देव की कृपा से कारबार राज-समाज के सम्बन्धों द्वारा चतुराई से खूब धन पैदा करेगा
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६० मेष लग्न का फलादेश मेष लग्न में १० शुक्र और रोजगार में बड़ी तरक्की करेगा तथा
2 १२ स्वाभिमानिनी सुन्दर स्त्री पायेगा और मान-प्रतिष्ठा
११ एवं वैभव तथा कुटुम्ब का सुन्दर आनन्द पायेगा 3 १ और सातवीं दृष्टि से माता भूमि एवं सुख स्थान ४ १० शु को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख
५ ७ ९ रहा है, इसलिये घरेलू सुख के साधनों में शक्ति ६ ८ प्राप्त करेगा तथा माता और भूमि की शक्ति का
नं. ७० अनुकूल सहयोग पायेगा तथा हर मार्ग में चतुराई से उन्नति करेगा। मेष लग्न में ११ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में
२ १२ मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो परम चतुर ३ १ ११ आचार्य शुक्र के योग के कारण से यह व्यक्ति शु. बड़ी भारी चतुराई के द्वारा धन की शक्ति प्राप्त ४ १० करेगा और रोजगार से खूब धन संग्रह करेगा ५ ७ ९ तथा सुन्दर स्त्री का लाभ पायेगा तथा कुटुम्ब से ६ ८ लाभ मिलेगा और धन की सुन्दर आमदनी योग नं. ७१ के कारण से बड़ा धनवान् व इज्जतदार माना जायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि-विद्या के मार्ग में बड़ी चतुराई के द्वारा सफलता पायेगा और संतान पक्ष में सुन्दर योग पायेगा तथा गृहस्थ का भी उत्तम योग पायेगा। मेष लग्न में १२ शुक्र यदि मीन का शुक्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी
२ १२शु. स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की ३ राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा १ ११ तथा परम चतुर आचार्य शुक्र के योग से बाहरी ४ १० स्थानों में बड़ी भारी चतुराई के द्वारा धन और ५ ७ ९ रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययस्थान के दोष के कारण अपने निजी स्थान में हानि ६ ८ प्राप्त करेगा तथा स्त्री पक्ष के मार्ग में कुछ कमजोरी या कमी रहेगी तथा धर्म का संग्रह और कुटुम्ब का सुख पूर्ण प्राप्त नहीं कर नं. ७२
सकेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ कमजोरी और छिपाव तथा भेद की शक्ति से काम निकालेगा।
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भृगु संहिता ६१ पिता-राज्य-लाभ स्थानपति-शनि मेष लग्न में १ शनि यदि मेष का शनि- प्रथम केन्द्र, देह के स्थान
१२ में शत्रु मंगल की राशि पर नीच का होकर बैठा है २ ३ १ श. ११ तो देह की सुन्दरता में कमी रहेगी और आमदनी के मार्ग में कमजोरी और कुछ परतन्त्रता का योग ४ १० प्राप्त करेगा तथा अपने मान प्रतिष्ठा के अन्दर कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और राज समाज 4 ७ ९ के पक्ष में कुछ परेशानी या कमी रहेगी और तीसरी ६ ८ मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की नं. ७३ मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का कुछ योग पायेगा और पराक्रम स्थान में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी उन्नति करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर बड़ी भारी आसक्ति रखेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में पिता एवं राज्य स्थान को, स्वक्षेत्र में देख रहा है, किन्तु स्वयं नीच होकर बैठा है, इसलिए पिता का अल्प सुख पायेगा और कारबार-मान-प्रतिष्ठा आदि के सम्बन्धों में थोड़ी सफलता प्राप्त कर सकेगा। मेष लग्न में २ शनि यदि वृषभ का शनि- दूसरे, धन एवं कुटुम्ब २ श. १२ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो कारबार ३ राज समाज के सम्बन्धों से धन की प्राप्ति करेगा . ११ OV और पिता स्थान की शक्ति को पायेगा तथा धन ४ १० और कुटुम्ब की वृद्धि करने में विशेष सफलता ५ ७ ९ पायेगा तथा मान-प्रतिष्ठा इज्जत-आबरू की शक्ति ६ ८ प्राप्त करेगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन नं. ७४ का-सा कार्य भी करता है, इसलिये पिता के सुख सहयोग में कुछ कमी रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि के सुख-सम्बन्धों में कुछ परेशानी के योग से कार्य सम्पादन करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से जीवन आयु और पुरातत्व स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिए जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति रहेगी और पुरातत्व का लाभ प्राप्त होगा तथा दसवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की आमदनी के
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६२ मेष लग्न का फलादेश मार्ग में विशेष शक्ति पायेगा। धन जन की वृद्धि करने में संलग्न आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति पायेगा धन जनकी वृद्धि करने में संलग्न रहकर सफलता पायेगा और अमीरात के ढङ्ग से जीवन व्यतीत करेगा। मेष लग्न में ३ शनि यदि मिथुन का शनि-तीसरे, भाई एवं पराक्रम
२ १२ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो तीसरे
३श. १ ११ स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा विशेष ४ १० सफलता और लाभ प्राप्त करेगा और भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति ५ ७ ९ का सहयोग पायेगा और राज-समाज के मार्ग में ६ ८ बहुत उन्नति प्राप्त करेगा तथा कारबार में वृद्धि नं. ७५ पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में कुछ नीरसता के मार्ग से शक्ति पायेगा तथा संतान पक्ष में कुछ वैमनस्यता के साथ लाभ प्राप्त करेगा और वाणी के अन्दर तेजी और हुकूमत रखेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के मार्ग में थोड़ी-सी कठिनाई के योग से सफलता पायेगा और धर्म के पालन का ध्यान रखेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत करेगा और खर्च तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ४ शनि यदि कर्क का शनि- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा २ १२ है तो माता के सुख सम्बन्धों में कुछ नीरसता ३ १ ११ युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि के ४ श. सम्बन्ध में शक्ति प्राप्त रहेगी और घर बैठे आमदनी १० का योग प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख के साधनों ५ ७ ९ की वृद्धि करने का विशेष ध्यान रखेगा और तीसरी ६ मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की कन्या राशि नं. ७६ में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव और लाभ प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में फायदेमन्द रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता एवं कारबार की वृद्धि करेगा तथा राज- समाज में मान-प्रतिष्ठा एवं सफलता प्राप्त करेगा और अपनी आबरू का बड़ा ख्याल रखेगा तथा दसवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु मंगल
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भृगु संहिता ६३ की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता की कमी और परेशानी रहेगी तथा अपने कारबार की वृद्धि करने के सम्बन्धित मार्ग के द्वारा देह में कुछ चिन्ता फिकर के योग से कार्य संचालन करता रहेगा तथा हृदय में कुछ मकजोरी अनुभव करेगा। मेष लग्न में ५ शनि यदि सिंह का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है २ १२ तो विद्या बुद्धि के योग से कारबार की सफलता ३ १ ११ पायेगा तथा संतान पक्ष में कुछ मतभेद या कुछ ४ १० नीरसता के योग से शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी और बुद्धि में बड़ी तेजी रहेगी और राज-समाज ५श. ७ ९ से कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा तीसरी उच्च दृष्टि ६ ८ से सी एवं रोजगार के स्थान को मित्र शुक्र की नं.७ तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष महत्व प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में बड़ी उन्नति एवं सफलता शक्ति मिलेगी तथा गृहस्थ की वृद्धि करने का महान् प्रयत्न चालू रखेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और संतान पक्ष के योग से आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान के सम्बन्ध से भी कुछ लाभ प्राप्त करेगा और हर प्रकार की उन्नति के लिये सदैव विचारमग्न रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का सुन्दर योग पायेगा और इज्जतदारी एवं आबरू से जीवन चलायेगा। मेष लग्न में ६ शनि यदि कन्या का शनि-छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान से कुछ २ १२ वैमनस्यता रहेगी और राज-समाज के मार्ग में ३ ११ कुछ परिश्रम के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा तथा ४ १० छठें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में किसी ५ ७ ९ भी प्रकार बड़ा भारी प्रभाव और परिश्रम का ६ श. ८ योग प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में विजयी रहेगा नं. ७८ और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में और दिनचर्या में कुछ कठिनाई प्रतीत होगी तथा पुरातत्व शक्ति के मार्ग में कुछ नीरसताई से फायदा पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ अधिकता होने
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६४ मेष लग्न का फलादेश के कारण से परेशानी अनुभव होगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगा तथा दशवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का उत्तम सम्बन्ध रखेगा और पराक्रम स्थान से बड़ी सफलता शक्ति मिलेगी तथा बड़ी हिम्मत और प्रभाव शक्ति से कार्य करेगा। मेष लग्न में ७ शनि यदि तुला का शनि- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र २ १२ की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में बड़ी ३ १ ११ भारी सफलता और उन्नति प्राप्त करेगा तथा स्त्री ४ १० स्थान में विशेष महत्वदायक शक्ति पायेगा और पिता स्थान की शक्ति का बड़ा भारी सहयोग ५ ७ श. ९ मिलेगा तथा राजसमाज से फायदा उठायेगा और ६ ८ मान प्रतिष्ठा युक्त मार्ग से आमदनी खूब प्राप्त नं. ७९ करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के योग से उन्नति प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन कुछ अरूचि के साथ करेगा तथा यश की कमी रहेगी और सातवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और हृदय में कुछ अशान्ति रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए माता और भूमि के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटियुक्त शक्ति प्राप्त रहेगी और घरेलू सुखों में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा। मेष लग्न में ८ शनि यदि वृश्चिक का शनि- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है २ १२ तो आमदनी के मार्ग में अपने क्षेत्र से कमजोरी ३ १ ११ पाकर दूसरे स्थान के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त करेगा ४ १० और पुरातत्व शक्ति का फायदा उठायेगा तथा अष्टम शनि के बैठने से आयु में उत्तम शक्ति प्राप्त ५ ७ ९ करेगा और तीसरी दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान ६ ८ श. को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख नं. ८० रहा है, किन्तु मृत्यु स्थान में बैठने के दोष के कारण से पिता स्थान की शक्ति का अल्प लाभ पायेगा और राज-समाज में थोड़ा मान प्राप्त करेगा तथा उन्नति पाने के लिये कठिन प्रयत्न करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के मार्ग में विशेष
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भृगु संहिता ६५ परिश्रम करके सफलता पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की सफलता में कुछ त्रुटि रहेगी और संतान पक्ष में कुछ नीरसतायुक्त मार्ग से शक्ति पायेगा तथा बुद्धि में क्रोध और वाणी में तेजी रहेगी और अपने मान- सम्मान का गुप्त रूप से बड़ा ख्याल रखेगा। मेष लग्न में ९ शनि यदि धन का शनि- नवम त्रिकोण, भाग्य १२ एवं धर्म स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो २ गुरु के स्थान पर बैठकर शनि कुछ विशेष फल ३ १ ११ देता है, इसलिये भाग्य की विशेष उन्नति करेगा, ४ १० किन्तु प्रथम रूप में भाग्य की कुछ कमजोरी 马 兴 业 血
५ ९ दिखायेगा और धर्म का कुछ आडम्बर रूप से ७ श पालन करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति का ६ ८ लाभ पायेगा और राजसमाज के मार्ग में भी नं. ८१ सफलता पायेगा और तीसरी दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में भाग्य की शक्ति से बहुत सफलता पायेगा और किसी उत्तम कर्म से लाभोन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहन से लाभ युक्त रहेगा और पुरुषार्थ कर्म की सफलता का लाभ प्राप्त करेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में अपनी इज्जतदारी की शक्ति से बड़ा भारी प्रभाव पायेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से लाभ युक्त रहेगा तथा रोग, दोष, पाप के ऊपर सदैव अपना अधिकार रखकर सावधान और सचेष्ट रहेगा तथा मान प्राप्त करेगा। मेष लग्न में १० शनि यदि मकर का शनि- दसम केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा २ १२ है तो पिता स्थान में महान् शक्ति पायेगा और 3 १ ११ कारबार में बड़ी भारी सफलता और लाभोन्नति ४ १० श. करेगा तथा राज-समाज के मार्ग में बड़ी भारी इज्जत एवं मान-प्रतिष्ठा और लाभ प्राप्त करेगा ५ ७ ९ तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान ६ ८ को गुरु की मीन राशि में देख रहा है; इसलिये नं. ८२ खर्चा बहुत अधिक रहेगा। अतः खर्च के मार्ग में एवं बाहरी सम्बन्धों में कुछ अरूचिकर रूप में कार्य संचालन रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को देख रहा है, इसलिये माता के भृ.सं .- ५
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६६ मेष लग्न का फलादेश सुख में नीरसता रहेगी और भूमि-मकानादि एवं घरेलू सुख-सम्बन्धों से कुछ त्रुटियुक्त वातावरण के द्वारा साधन शक्ति प्राप्त रहेगी और दसवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष महत्व और शोभा पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में बड़ी भारी उन्नति और लाभ प्राप्त करेगा और गृहस्थ के भोग-विलास का उत्तम साधन पाकर भाग्यवान् कहलायेगा। मेष लग्न में ११ शनि यदि कुम्भ का शनि-ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी २ १२ के मार्ग में बड़ी भारी उन्नति एवं सफलता शक्ति ३ १ ११ श. प्राप्त करेगा और पिता स्थान का अच्छा लाभ ४ पायेगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध से धन लाभ १० के उत्तम साधन पायेगा तथा कारबार में बड़ी ५ ७ ९ उन्नति करेगा एवं आमदनी के मार्ग से बड़ी भारी ६ ८ इज्जत और नाम प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा तीसरी नं. ८३ नीच दृष्टि से देह के स्थान को, शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में तथा स्वास्थ्य एवं शान्ति में कमी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की उन्नति में कुछ लापरवाही करेगा और सन्तान पक्ष से कुछ नीरसता युक्त लाभ सम्बन्ध रखेगा तथा बोल चाल के अन्दर स्वार्थ का विशेष ध्यान रखेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी रहेगी तथा पुरातत्व का कुछ लाभ पायेगा। मेष लग्न में १२ शनि यदि मीन का शनि- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्चा २ १२श 3 १ ११ बहुत अधिक तायदाद में करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष सम्बन्ध स्थापित करेगा तथा पिता स्थान ४ १० में हानि प्राप्त करेगा और राज-समाज कारबार के पक्ष में नुकसान एवं परेशानी के कारण पायेगा ५ ७ ९ तथा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से आमदनी का ६ ८ योग पायेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से धन एवं नं. ८४ कुटुम्ब स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा तथा कुछ सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए स्थान में कुछ प्रभाव ज्त
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भृगु संहिता ६७ करेगा और कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग से सफलता पायेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के पक्ष में भारी प्रयत्न करने पर शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म का कुछ पालन करेगा तथा देर-अबेर के योग से एवं परेशानियों के बाद अपनी इज्जत-आबरू बना पायेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति राहु मेष लग्न में १ राहु यदि मेष का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो देह की २ १२ सुन्दरता में कमी रहेगी और देह के स्वास्थ्य में ३ १ रा. ११ कुछ परेशानी रहेगी तथा हृदय में चिन्ता के कारण बनते रहेंगे और अपने व्यक्तित्व की उन्नति पाने १० के लिये बड़ी भारी गुप्त युक्ति से काम करेगा 4 ७ ९ तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये ६ अपने आत्मसम्मान तथा देह सम्मान को प्राप्त नं. ८५ करने के सम्बन्ध में अपने युक्ति बल को बड़े हठधर्मी के रूप में इस्तेमाल करेगा और झूठ तथा छिपाव शक्ति से भी फायदा उठावेगा और बड़ी-बड़ी कठिन परिस्थितियों से गुजरता हुआ गुप्त हिम्मत एवं गुप्त बुद्धि योग के बल से आगे बढ़ता जायेगा। मेष लग्न में २ राहु यदि वृषभ का राहु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन के २ रा. १२ स्थान में चिन्ता एवं कष्ट के कारण प्राप्त करेगा ३ 2 ११ और कुटुम्ब में क्लेश तथा कमी का योग पायेगा, ४ किन्तु परम चतुर दैत्य आचार्य शुक्र की राशि पर १० बैठा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के सम्बन्ध ५ ७ ९ में महान् गहरी गुप्त युक्तियों के बल से धन की ६ ८ उन्नति करने का साधन प्राप्त करेगा और अनेकों नं. ८६ बार धन-जन की हानियाँ प्राप्त करने पर भी गुप्त युक्ति बल के योग से अपने होने वाले नुकसान क्षेत्र की पूर्ति भी करता रहेगा तथा प्रकट रूप में धनवान् इज्जतदार माना जायेगा और विशेष धन प्राप्त करने के लिये विशेष साधन शक्ति का उपयोग करेगा। यदि मिथुन का राहु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में उच्च का होकर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्ति शाली फल का दाता होता है, इसमें भी यह उच्च का होने से बहुत बलवान् हो गया है, इसलिये यह व्यक्ति पराक्रम शक्ति के द्वारा महान् उन्नति करेगा और भाई-बहिन की
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६८ मेष लग्न का फलादेश मेष लग्न में ३ राहु शक्ति होने पर भी भाई-बहिन की परवाह नहीं करेगा तथा जबरदस्त हिम्मत शक्ति के द्वारा काम २ १२ करेगा। विवेकी ग्रह बुध की राशि पर बैठा है, ३रा. १ ११ इसलिये गुप्त विवेक की महान् युक्ति बल से ४ १० सफलता प्राप्त करता रहेगा, किन्तु फिर भी राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी ५ ७ ९ आन्तरिक हिम्मत शक्ति में बड़ी कमजोरी अनुभव ६ ८ करने पर भी प्रकट रूप में अपनी हिम्मत को नहीं नं. ८७ छोड़ेगा। मेष लग्न में ४ राहु यदि कर्क का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर २ १२ बैठा है तो माता के स्थान में विशेष हानि प्राप्त ३ १ ११ करेगा और मातृभूमि तथा मकानादि के सुखों में ४ रा. १० कमी और परिवर्तन के योग पायेगा तथा घरेलू ५ वातावरण में सुख शान्ति का स्थाई योग प्राप्त नहीं ७ ९ हो सकने के कारणों से दुःख अनुभव करेगा तथा ६ ८
नं. ८८ मन की गति के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये घरेलू मामलों में मानसिक अशान्ति होने पर भी गुप्त मनोयोग की शक्ति से सुख-शान्ति की सफलता प्राप्त करने में सदैव प्रयत्न शील रहेगा, इसलिये दुःख-सुख का अनुभव करता रहेगा, किन्तु मेष लग्न में ५ राहु कभी-कभी घर के अन्दरूनी मामलों में विशेष अशान्ति भी प्राप्त करेगा। २ १२ यदि सिंह का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या ३ १ ११ एवं संतान स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर ४ बैठा है तो विद्या ग्रहण करने के मार्ग में बड़ी १० कठिनाई प्राप्त रहेगी, किन्तु तेजस्वी सूर्य की राशि ५ रा ७ ९ पर बैठा है, इसलिये प्रभाव शक्ति और गुप्त युक्ति ६ ८ के बल से विद्या स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा नं. ८९ और अपनी विद्या की अन्दरूनी कमजोरी को वाणी की प्रकट चतुराई द्वारा बुद्धिमानी से बदल कर सफाई के रूप में दिखाता रहेगा और सन्तान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा, किन्तु बहुत-सी युक्तियों के साधन करने के बाद सन्तान पक्ष में कुछ शक्ति पा सकेगा तथा दिमाग के अन्दर चिन्ता और परेशानियों के कारण प्राप्त रहेंगे, किन्तु गुप्त बुद्धि योग के बल से कार्य सिद्ध करता रहेगा।
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भृगु संहिता ६९
मेष लग्न में ६ राहु यदि कन्या का राहु-छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर २ १२ ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, ३ ११ इसलिये शत्रु स्थान में बड़ी भारी सफलता प्राप्त ४ १० करेगा और विवेकी ग्रह बुध की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये अनेकों प्रकार के झगड़े-झंझटों ५ ७ ९ एवं मुसीबतों के मार्ग में गुप्त विवेक की गहरी ६ रा. ८ युक्ति के योग से बड़ी भारी प्रभाव शक्ति प्राप्त नं. ९० करेगा, इसलिये कठिन से कठिन परिस्थिति में भी बड़ी भारी धैर्य से और साहस से काम लेकर अपना कार्य पूरा करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी परेशानियों से अधिक चिन्तित होना पड़ेगा परन्तु नवीन शक्ति का बल पाकर विजयी होगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी। मेष लग्न में ७ राहु यदि तुला का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में, मित्र शुक्र की राशि पर बैठा २ १२ है तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा रोजगार ३ १ ११ के मार्ग में कुछ दिक्कतें और चिन्तायें रहेंगी और ४ १० परम चतुर दैत्य-आचार्य की राशि पर मित्र भाव में बैठा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी ५ ७ रा. ९ चतुराई एवं गुप्त युक्ति के योगों से सफलता प्राप्त द ८ भी करेगा और इसी प्रकार गृहस्थ के मार्ग में भी नं. ९१ बड़ी भारी चतुराई एवं गुप्त युक्ति के योगों से सफलता प्राप्त करेगा और इसी प्रकार गृहस्थ के मार्ग में भी बड़ी भारी चतुराई से कार्य सिद्ध करेगा और स्त्री तथा रोजगार के मार्गों में कुछ विशेष लाभ गुप्त युक्ति के बल से प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण गृहस्थ के संचालन में कठिनाईयाँ रहेंगी, किन्तु कुछ कमी के साथ-साथ कार्य संचालन होता रहेगा। मेष लग्न में ८ राहु यदि वृश्चिक का राहु- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है २ ३ ११ तो जीवन यापन करने में बड़ी-बड़ी चिन्ताओं से १ टकराना पड़ेगा और जीवन में मृत्यु तुल्य कष्टों से ४ १० भी कई बार सामना करना पड़ेगा तथा पुरातत्व
५ ७ ९ शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा और पेट के
६ ८ रा. अन्दर कुछ बीमारी या रोग की शिकायत रहेगी नं. ९२ तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये
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७० मेष लग्न का फलादेश जीवन शक्ति प्राप्त करने के लिये महान् कठिन कार्य करेगा और जीवन को सहायक होने वाली किसी गुप्त शक्ति का लाभ भी प्राप्त करेगा, किन्तु जीवन में कुछ खास कमी महसूस करने के कारणों से कुछ अशान्तप्रद वातावरण में रहकर उन्नति की चेष्टा करेगा। मेष लग्न में ९ राहु यदि धन का राहु- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं १२ धर्म स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि २ ३ १ २१ पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में बड़ा कष्ट अनुभव करेगा और भाग्योन्नति के मार्ग में बड़ी-बड़ी ४ १० दिक्कतें रहेगी और धर्म के पालन में अश्रद्धा ५ ७ रा रहेगी तथा धर्म की हानि भी प्राप्त होगी तथा देव ६ गुरु वृहस्पति की राशि पर नीच का होकर बैठा V नं. ९३ है, इसलिये किसी अच्छे कार्य में भी लघुता युक्त रूप से भाग्य का संचालन रहेगा तथा कुछ परतन्त्रता एवं परेशानी रहेगी और सुयश के स्थान में कमी तथा अपयश की प्राप्ति रहेगी और भाग्य के स्थान में कभी-कभी घोर अन्धकार दिखाई देने के कारणों से महान् निराशा का अनुभव करेगा और अन्त में बहुत-सी मुश्किलों के बाद भाग्य में कुछ मेष लग्न में १० राहु शक्ति पायेगा। यदि मकर का राहु- दसम केन्द्र, पिता एवं २ १२ राज्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ३ १ ११ पिता स्थान में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और राज ४ १० रा. समाज के सम्बन्ध में कुछ परेशानी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के क्षेत्र में बड़ी दिक्कतें रहेंगी ५ ७ और मान प्रतिष्ठा आदि के मार्ग में कभी-कभी ६
नं. ९४ महान् कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा तथा महान् कठोर ग्रह शनि की राशि पर बैठा है तो मान उन्नति एवं पदोन्नति को प्राप्त करने के लिये महान् कठिन कार्य के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और वित्त से ज्यादे उन्नति पाने के लिये प्रयत्न करता रहेगा और सफलता भी प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण कुछ कमी युक्त रहेगा। यदि कुम्भ का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में क्रूर ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा और अपने निश्चित वित्त के दायरे से भी अधिक मुनाफा खाने का विशेष प्रयत्न युक्ति
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भृगु संहिता ७१ मेष लग्न में ११ राहु बल से करता रहेगा और कभी-कभी विशेष लाभ की प्राप्ति भी करता रहेगा और कठिन कठोर ग्रह २ १२ ३ १ ११ शनि की राशि पर बैठा है, इसलिए आमदनी की रा. शक्ति पाने के लिये भारी कठिन कर्म करेगा, ४ १० फिर भी राहु के स्वाभाविक गुण के कारणों से
५ ९ आमदनी के मार्ग में कमी और असंतोष के कारण ७ प्राप्त होते रहेंगे और अधिक स्वार्थी बनेगा। ६ ८
नं. ९५ यदि मीन का राहु- बारहवें खर्च एवं बाहरी
मेष लग्न में १२ राहु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्चे के मार्ग से महान् परेशानी अनुभव करेगा और बाहरी २ १२रा स्थानों में कष्ट का योग पायेगा तथा देव गुरु ३ १ ११ वृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिए खर्च की शक्ति को पाने के लिये आदर्श युक्ति के द्वारा ही ४ १० बाहरी स्थानों में सम्बन्ध स्थापित करेगा तथा विशेष
५ ७ ९ योग्यता के द्वारा शानदार खर्चा करेगा। फिर भी
६ ८ कभी-कभी खर्च के मार्ग में महान् संकट का
नं. ९६ योग पायेगा। किन्तु बार-बार शक्ति प्राप्त होती रहेगी और अन्दरूनी कुछ परेशानी एवं कमी के होते हुए भी प्रकट में शानदारी से खर्च रहेगा। कष्ट कठिन कर्म गुप्तशक्ति के अधिपति केतु मेष लग्न में १ केतु यदि मेष का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो देह में कष्ट २ १२ और परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा कभी- ३ १ क. ११ कभी देह में कोई आघात शक्ति पायेगा और देह
४ १० की सुन्दरता एवं सुडौलताई में कमी र्हेगी तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर उग्र ग्रह केतु बैठा है, ५ ९ इसलिये अपना मान और व्यक्तित्व बढ़ाने के लिये ६ बड़ा कठिन परिश्रम करेगा तथा कभी-कभी नं. ९७ अवसर पड़ने पर हठयोग से काम करेगा और अपने अन्दर गुप्त शक्ति एवं गुप्त हिम्मत के द्वारा महान् कार्य करके कोई सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, जिसके द्वारा आन्तरिक शक्ति का विशेष अनुभव करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण कोई प्रकट कमी का योग प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का केतु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शुक्र की
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७२ मेष लग्न का फलादेश मेष लग्न में २ केतु राशि पर बैठा है तो धन के कोष स्थान में कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान २ के १२ में परेशानी एवं मतभेद और झंझट रहेगी, किन्तु ३ ११ परम चतुर दैत्य गुरु शुक्राचार्य की राशि पर केतु ४ बैठा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये १० महान् चतुराई और गुप्त शक्ति का विशेष प्रयोग ५ ७ ९ करेगा तथा चतुराई पूर्ण कठिन कर्म के द्वारा धन ६ की प्राप्ति के साधन पायेगा और धन प्राप्त होने नं. ९८ पर भी धन की संग्रह शक्ति के अभाव के कारण धन की तरफ से कुछ चिन्तित रहेगा, किन्तु धन की अन्दरूनी कमजोरी के मुकाबले में प्रकट रूप में इज्जत-आबरू धनवानों की-सी रहेगी। मेष लग्न में ३ केतु यदि मिथुन का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर २ १२ बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष में विशेष हानि ३के १ ११ करेगा और पुरुषार्थ शक्ति को कमजोर करेगा ४ १० तथा कभी-कभी हिम्मत शक्ति के अन्दर गुप्त कमी के कारण से डर महसूस करेगा, किन्तु विवेकी ५ ७ ९ बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये गुप्त विवेक ६ ८
नं. ९९ की गुप्त शक्ति के द्वारा अपना कार्य पूरा करेगा और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये विशेष परिश्रम करने का प्रयत्न करेगा, किन्तु नीच होने के कारण से कुछ परतन्त्रतायुक्त मार्ग से शक्ति प्राप्त करेगा और कुछ अनाधिकार रूप से शक्ति का प्रयोग करके हिम्मत प्राप्त करेगा। मेष लग्न में ४ केतु यदि कर्क का केतु- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि स्थान पर मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर २ १२ ३ ११ बैठा है तो माता के सुख सम्बन्धों में महान् संकट १ प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का कष्ट प्राप्त ४ के. १० करेगा और घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की कमी और अशान्ति का योग प्राप्त होगा तथा ५ ७ ९ अपने जन्म भूमि के स्थान परिवर्तन करना पड़ेगा V ६
नं. १०० किन्तु मन की गति के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर केतु बैठा है इसलिये मानसिक क्लेश विशेष रहने पर भी मन की आन्तरिक शक्ति के द्वारा कुछ सुख का अनुभव करेगा और रहने के स्थान में भी परिवर्तन होता गहेगा तथा बहुत प्रकार की कठिनाईयों को प्राप्त करने के बाद सुख प्राप्त करेगा।
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भृगु संहिता ७३ मेष लग्न में ५ केतु यदि सिंह का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर २ १२ बैठा है, तो विद्या स्थान में विद्या ग्रहण करने के ३ १ ११ सम्बन्ध में बड़ी परेशानियाँ एवं कष्ट अनुभव करेगा ४ १० और दिमाग के अन्दर कुछ कमजोरी तथा फिकर मन्दी रहेगी तथा विद्या को प्राप्त करने के लिए ५ के ७ ९ कठिन परिश्रम करने पर भी कुछ प्रगट में त्रुटि ६ ८ रहेगी और संतान पक्ष में सुख की प्राप्ति के लिये नं. १०१ कठिन कर्म तथा विशेष उपचार करने पर भी पूरा सुख प्राप्त नहीं होगा और प्रबल तेजस्वी सूर्य की राशि पर गरम ग्रह केतु
उग्रता रहेगी। बैठा है, इसलिये वाणी के अन्दर नरमाई की कमी होने से बोलचाल में
मेष लग्न में ६ केतु यदि कन्या का केतु- छठें शत्रु एवं झंझट स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो शत्रु २ ३ ११ स्थान में बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता ४ १० होता है, इसलिये शत्रु पक्ष में सदैव विजय प्राप्त करेगा और विवेकी ग्रह बुध की राशि पर बैठा है, ५ ७ ९ कन्या पर बैठा हुआ केतु स्वक्षेत्री के समान माना ६ के ८
नं. १०२ जाता है। इन दोनों कारणों से बड़ी विवेक शक्ति एवं बड़ी बहादुरी के योग युक्त कारणों से सदैव अपने प्रभाव की जागृति रखेगा तथा बड़ी-बड़ी मुसीबतों एवं झगड़े- झंझटों में सफलता पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण ननसाल पक्ष में कुछ हानि रहेगी और अपने अन्दर गुप्त रूप से कुछ कमजोरी अनुभव करेगा। मेष लग्न में ७ केतु यदि तुला का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा २ १२ है तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ ३ १ ११ के संचालन मार्ग में दिक्कतें रहेंगी और रोजगार ४ की लाईन में बड़ी कठिनाईयों से कठिन कर्म के १० द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और दैत्य आचार्य परम ५ ७ के चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये रोजगार ६ ८ और गृहस्थ के मार्ग में बड़ी भारी चतुराई और नं. १०३ गुप्त शक्ति के योग से सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण रोजगार के मार्ग में
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७४ मेष लग्न का फलादेश परिवर्तन करेगा एवं रोजगार और स्त्री स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और दैत्य आचार्य परम चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये रोजगार और गृहस्थ के मार्ग में बड़ी भारी चतुराई और गुप्त शक्ति के योग से सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण रोजगार के मार्ग में परिवर्तन करेगा एवं रोजगार और स्त्री स्थान में शक्ति प्राप्त करने पर भी कुछ त्रुटि अनुभव करेगा। मेष लग्न में ८ केतु यदि वृश्चिक का केतु- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है २ १२ तो आयु स्थान में बहुत बार मृत्यु तुल्य संकट ३ ११ प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति की हानि प्राप्त ४ होगी एवं आठवें स्थान का सम्बन्ध पेट के निचले १० हिस्से से भी होता है, इसलिये पेट के निचले ५ ७ ९ हिस्से में किसी प्रकार की बीमारी या शिकायत ६ ८ क. रहेगी और जीवन-यापन करने के सम्बन्ध में चिन्ता नं. १०४ और कष्ट अनुभव होगा, किन्तु गरम ग्रह क्षत्रिय स्वभाव मंगल की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये गुप्त धैर्य की महान् शक्ति से जीवन में सान्त्वना और शक्ति प्राप्त करेगा, परन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण जीवन की दिनचर्या में कोई खास कमी अनुभव करेगा। मेष लग्न में ९ केतु यदि धन का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में उच्च का होकर बैठा है तो भाग्य के २ १२ अन्दर महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा भाग्य की ३ १ ११ उन्नति करने के लिए महान् कठिन कार्य करेगा ४ और धर्म के क्षेत्र में बहुत शक्ति संग्रह करेगा और कठिन कर्म की सफलता के परिणाम में बड़ा ५ ७ भारी भाग्यशाली समझा जायेगा तथा देव गुरु द ८ नं. १०५ वृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये दिव्य गुणों के मार्ग का अनुसरण करते हुए एवं आन्तरिक हृदय में मजबूती और साहस रखते हुए उन्नति प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण भाग्य में कई बार बहुत परिवर्तन और परेशानियों
रहेगी। से भी टकराना पड़ेगा और भाग्य में कभी-कभी कुछ त्रुटि भी प्रतीत होती
यदि मकर का केतु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में हानि करेगा और राज समाज में परेशानी के कारण प्राप्त रहेंगे तथा कारबार के संचालन मार्ग में कष्ट और
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भृगु संहिता ७५ मेष लग्न में १० केतु कठिनाईयों से काम करेगा और कारबार में परिवर्तन प्राप्त करने पड़ेंगे तथा कठोर ग्रह शनि की राशि २ १२ ३ ११ पर केतु बैठा है, इसलिये अपनी इज्जत-आबरू, १ कारबार, मान प्रतिष्ठा इत्यादि की उन्नति करने के 8 १० के लिये महान् कठिन कर्म एवं गुप्त शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक ५ ७ ९ ६ गुणों के कारण अपनी स्थिति और मान प्रतिष्ठा ८
नं. १०६ तथा कारबार के अन्दर कुछ कमी महसूस करेगा।
मेष लग्न में ११ केतु यदि कुम्भ का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान २ १२ पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, ३ १ के इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति प्राप्त ४ करेगा तथा लाभ के सम्बन्ध में अधिक से अधिक १० मुनाफा खाने की योजना बनायेगा तथा कठोर ५ ७ ९ ग्रह शनि की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये ६ ८ लाभ की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन कर्म नं. १०७ करके गुप्त शक्ति के योग द्वारा विशेष सफलता पायेगा, परन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में परिवर्तन करने पड़ेंगे और किसी भी परिस्थिति में रहकर लाभ की कुछ कमी अनुभव करेगा और कष्ट-साध्य कर्म की शक्ति से उन्नति प्राप्त करेगा। मेष लग्न में १२ केतु यदि मीन का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी
१२के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो खर्च के २ मार्ग में बहुत परेशानी अनुभव करेगा और खर्च ny १ ११ की शक्ति को प्राप्त करने के लिये कठिन कर्म ४ १० करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कष्ट एवं झंझट प्राप्त होगा परन्तु देव गुरु वृहस्पति की ५ ७ ९ राशि पर केतु बैठा है, इसलिये बड़े आदर्श मार्ग ६ ८ के द्वारा महान् परिश्रम करके खर्च का संचालन नं. १०८ का योग प्राप्त करेगा और इसी प्रकार बड़ी योग्यता और कठिनाईयों के द्वारा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध की शक्ति का लाभ पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण खर्च की लाईन में और बाहरी सम्बन्धों में परिवर्तन करेगा, फिर भी खर्च के मार्ग में कुछ कमी और असंतोष का योग पायेगा।
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७६ मेष लग्न का फलादेश
- मेष लग्न समाप्त *
२ १२ १
३ ११
४ १०
५ ९
६ ८
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भृगु संहिता ७
- वृषभ लग्न प्रारम्भ *
३ १ २
X १२
4 ११
६ १०
८ ७ ९
वृषभ लग्न का फलादेश प्रारम्भ नवग्रहों द्वारा भाग्य फल
३ १ (कुण्डली नं० २१६ तक में देखिये) ४ २ १२ प्रिय पाठक गण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्यरूप में जानने के लिए ११ यह अनुभव सिद्ध विषय आप के सम्मुख रख रहे ६ ८ १० हैं।
७ ९ प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० १०९ से लेकर कुण्डली नं० २१६ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे
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७८ वृषभ लग्न का फलादेश मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता-बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर किसी ग्रह के साथ कोई ग्रह बैठा होगा या जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में ग्रह की दृष्टियाँ बतलाई हैं, उन-उन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उरूका फलादेश कुण्डली नं० १०९ से १२० तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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भृगु संहिता ७९ कुण्डली नं. ११६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२० के अनुसार मालूम करिये। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२१ से १३२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १३० के अनुसार मालूम करिये।
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८० वृषभ लग्न का फलादेश १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १३१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १३२ के अनुसार मालूम करिये। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-भौमफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १३३ से १४४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १३८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश
९. कुण्डली नं. १३९ के अनुसार मालूम करिये। जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४४ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता ८१ (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १४५ से १५६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १४९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५० के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १५६ के अनुसार मालूम करिये। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १५७ से १६८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। भृ.सं .- ६
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८२ वृषभ लग्न का फलादेश २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १५७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १५८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १५९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १६८ के अनुसार मालूम करिये। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १६९ से १८० तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १६९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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भृगु संहिता ८३ कुण्डली नं. १७१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १८० के अनुसार मालूम करिये। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १८१ से १९२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८५ के अनुसार मालूम करिये।
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८४ वृषभ लग्न का फलादेश ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १८९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९२ के अनुसार मालूम करिये। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १९३ से २०४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १९९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली
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भृगु संहिता ८५ नं. २०० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०४ के अनुसार मालूम करिये। (२) वृषभ लग्न वालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २०५ से २१६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २०९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१० के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २११ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१३के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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८६ वृषभ लग्न का फलादेश कुण्डली नं. २१४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २१६ के अनुसार मालूम करिये। माता, भूमि, घरेलू सुखस्थानपति-सूर्य वृषभ लग्न में १ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के पक्ष ३ १ ४ २ सू. १२ में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि का कुछ सुख और प्रभाव प्राप्त ५ ११ करेगा तथा घरेलू वातावरण के सम्बन्ध में कुछ त्रुटियुक्त सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा तेजस्वी ८ १० सूर्य के लग्न में बैठने से देह के अन्दर प्रभाव ७ ९ रहेगा, किन्तु देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी नं. १०९ और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुख शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ सुख युक्त वातावरण के द्वारा सफलता और प्रभाव की शक्ति पायेगा। वृषभ लग्न में २ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- दूसरे धन स्थान एवं ३ सू. १ कुटुम्ब स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो ४ २ १२ धन के कोष में सुख शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का सुख पायेगा, किन्तु धन ५ ११ का स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, ६ ८ १० इसलिये माता के सुख में कुछ कमी रहेगी और ७ ९ घरेलू सुख सम्बन्धों में त्रुटियुक्त मार्ग से शक्ति नं. ११० मिलेगी और भूमि मकानादि के सुख सम्बन्ध में जायदाद की शक्ति होते हुए भी जायदाद का उपभोग सुन्दरता युक्त रूप से प्राप्त नहीं होगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की सुख शक्ति मिलेगी और पुरातत्व शक्ति से सुख प्राप्त होगा तथा जीवन की दिनचर्या में सुख और प्रभाव रहेगा। यदि कर्क का सूर्य- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो माता की शक्ति का प्रभाव पायेगा और भूमि मकानादि घरेलू सुख की शक्ति रहेगी एवं तीसरे स्थान पर गरम ग्रह विशेष
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भृगु संहिता ८७ वृषभ लग्न में ३ सूर्य शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा बड़ी सफलता और सुख शक्ति ३ १ १२ प्राप्त रहेगी तथा भाई बहिन का सुख और प्रभाव स्. २ पायेगा तथा परिश्रम शक्ति से प्रभाव की वृद्धि ५ ११ होगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म
६ स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, ८ १० इसलिये भाग्य के सम्बन्ध में उन्नति करने के लिये ७ ९ बहुत कुछ कठिन प्रयत्न करेगा और धर्म के पालन नं. १११ स्थान के कुछ-कुछ नीरसता युक्त मार्ग से धर्म का वृषभ लग्न में ४ सूर्य पालन करेगा तथा पुरुषार्थ में भरोसा रखेगा। यदि सिंह का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं ३ १ भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री ४ २ १२ बैठा है तो माता की महान् शक्ति पायेगा तथा ५ सू. ११ भूमि मकानादि की सुख शक्ति का प्रभावशाली योग प्राप्त करेगा और घरेलू वातावरण के अन्दर ६ ८ १० सुख शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त करेगा, किन्तु ७ ९ तेजस्वी सूर्य की विशेषता के कारण दिखावे में नं. ११२ विशेष प्रभाव रहेगा, किन्तु वास्तविक शान्ति की कुछ कमी प्रतीत होगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं राज-समाज में कुछ असन्तोष युक्त शक्ति के द्वारा सुख प्राप्त करेगा और व्यापार के पक्ष में कठिन मार्ग के द्वारा सफलता पायेगा और मान-प्रतिष्ठा, इज्जत-आबरू वृषभ लग्न में ५ सूर्य पायेगा। यदि कन्या का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या ३ १ एवं संतान स्थान में मित्र बुध की कन्या राशि पर ४ २ १२ बैठा है तो विद्या स्थान में सुख पूर्वक शक्ति और 4 ११ ज्ञान प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष में सुख और प्रभाव प्राप्त रहेगा और बुद्धि के अन्दर पृथ्वी सू. ८ १० तत्व का अधिकारी सूर्य के बैठने से बुद्धि के ७ ९ अन्दर बड़ी गम्भीरता और विशाल शक्ति प्राप्त नं. ११३ होगी तथा वाणी में दूरदर्शिता और प्रभाव रहेगा और बुद्धि योग के द्वारा घरेलू सुख का विशेष आनन्द प्राप्त होगा तथा भूमि और माता का सहयोग पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये सुख पूर्वक बुद्धि योग के द्वारा आमदनी के मार्ग में अच्छी सफलता पायेगा।
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८८ वृषभ लग्न का फलादेश वृषभ लग्न में ६ सूर्य यदि तुला का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता ३ १ १२ के स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा जन्म भूमि से ४ २ वियोग रहेगा और मकानादि भूमि की कमी रहेगी ५ ११ तथा घरेलू सुख के साधनों में विशेष कमी रहेगी ६ और झंझट युक्त मार्ग के द्वारा सुख प्राप्त कर ८ १० सकेगा तथा शत्रु पक्ष से कुछ अशान्ति रहेगी, ७सू. ९ किन्तु गरम ग्रह होने के कारण से सूर्य के नीच नं. ११४ होने पर भी कुछ प्रभाव कायम रखेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थान का उत्तम सुखदायक सम्बन्ध पायेगा तथा विशेष खर्च के द्वारा सुख के साधन पायेगा। वृषभ लग्न में ७ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं ३ १ रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा २ १२ है तो स्त्री स्थान में सुख और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा माता का सुन्दर सहयोग पायेगा ५ ११ तथा रोजगार के मार्ग में प्रभाव युक्त सुख शक्ति ६ ८ सू. १० पायेगा और स्त्री गृहस्थ के रहन-सहन में भूमि ७ ९ मकानादि का अच्छा सहयोग पायेगा तथा सातवीं नं. ११५ शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कमी रहेगी और गृहस्थ के अन्दर की सुख सामग्रियों में त्रुटि प्रतीत होती रहेगी तथा गृहस्थी संचालन के कार्य कारणों से देह को आराम कम मिलेगा, इसलिये हृदय में कुछ अशान्ति रहेगी। वृषभ लग्न में ८ सूर्य यदि धन का सूर्य- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है ३ १ तो माता के स्थान में हानि करेगा तथा मातृ-भूमि ४ २ १२ से वियोग रहेगा अर्थात् जन्म स्थान और भूमि ११ मकानादि के सुख में बड़ी कमी रहेगी और घरेलू ६ सुख शान्ति के मार्ग में बड़ा असन्तोष रहेगा, ८ १० ७ ९ सू. किन्तु सुखेश सूर्य अष्टम स्थान में बैठा है, इसलिये आयु का सुख रहेगा और जीवन की दिनचर्या में नं. ११६ प्रभाव रहेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने का प्रयत्न चालू रहेगा और
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भृगु संहिता ८९ कुटुम्ब के स्थान में सुख सम्बन्ध प्राप्त रहेगा तथा धन प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ९ सूर्य यदि मकर का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है ३ १ २ १२ तो माता के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के ४ द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि का ५ ११ योग भाग्य से पायेगा तथा घरेलू वातावरण में ६ १० कुछ सुख प्राप्त रहेगा और भाग्य के अन्दर प्रभाव ८ सू. शक्ति रहेगी तथा धर्म का पालन भी रहेगा, किन्तु ७ ९ शत्रु राशि पर होने के कारण से भाग्य की खूबसूरती नं. ११७ में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई- बहिन का सुख सम्बन्ध प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में सुख पूर्वक भाग्य की शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में १० सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ३ १ पिता के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के ४ २ १२ द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और कुछ कठिनाई के ५ ११ सू. द्वारा राज-समाज में मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा ६ और कारबार में शक्ति एवं सफलता पायेगा, किन्तु ८ १० शत्रु राशि पर सूर्य के होने से प्रभाव की शक्त्ति ७ ९ जितनी अधिक रहेगी उतनी सफलता शक्ति का नं. ११८ आनन्द प्राप्त न हो सकेगा, परन्तु सातवीं दृष्टि से चौथे सुख भवन को स्वयं अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भूमि मकानादि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा मातृ पक्ष में एवं घरेलू सुख के साधनों मे प्रभाव और आनन्द का योग मिलेगा और सुख पूर्वक उन्नति के लिये प्रयत्न करेगा। वृषभ लग्न में ११ सूर्य यदि मीन का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान ३ ४ २ १२ में क्रूर या गरम ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का सू. दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष ५ ११ सफलता शक्ति पायेगा और भूमि मकान इत्यादि ६ का लाभ रहेगा तथा माता के सम्बन्ध से सुख ८ १० लाभ पायेगा तथा घरेलू वातावरण से सुख के ७ ९ अच्छे साधन प्राप्त करेगा ओर सुखेश होकर सूर्य नं. ११९ लाभ स्थान में बैठा है, इसलिये सुख पूर्वक
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९० वृषभ लग्न का फलादेश आमदनी का कोई विशेष योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष से सुख और प्रभाव पायेगा तथा विद्या-बुद्धि के अन्दर शान्ति युक्त प्रभाव शक्ति से सफलता पायेगा। वृषभ लग्न में १२ सूर्य यदि मेष का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर 3 १ सू. बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी ४ २ १२ स्थानों में विशेष सुखदायक सम्बन्ध पायेगा। किन्तु ५ ११ अपने स्थान में घरेलू सुख के साधनों में कुछ ६ कमी रहेगी और माता के पक्ष में भी कुछ कमी ८ १०
७ ९ का योग बनेगा तथा भूमि मकानादि के सम्बन्ध
नं. १२० में भी कुछ हानि प्राप्त होगी, क्योंकि खर्च के स्थान में गरम ग्रह का फल प्रायः हानिकारक होता है, इसलिये अपने जन्म स्थान में कमी रहेगी और दूसरे स्थान में प्रभाव खूब रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष मे कुछ पेचीदी शक्ति के योग से कार्य सम्पन्न करेगा। भाई, पराक्रम, मनस्थानपति-चन्द्र वृषभ लग्न में १ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर ३ १ बैठा है तो मन के अन्दर महान् शक्ति पायेगा तथा ४ २ च. १२ देह में सुन्दर शक्ति रहेगी तथा भाई बहिन का विशेष ५ ११ योग पायेगा। भाई और पराक्रम स्थान से बड़ी ६ ८ १० सफलता और हिम्मत शक्ति पायेगा तथा देह के ७ ९ अन्दर प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा सातवीं नं. १२१ नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में परेशानी और कुछ त्रुटि अनुभव करेगा तथा रोजगार के पक्ष में कुछ अरुचि युक्त मार्ग के द्वारा कार्य संचालन करेगा और रोजगार से एवं गृहस्थ के सम्बन्ध से कुछ लघुता अनुभव करेगा। यदि मिथुन का चन्द्र- द्वितीय धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पराक्रम शक्ति और मनोबल के योग से धन का संग्रह प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में शक्ति पायेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, इसलिये भाई-बहन के सुख सम्बन्ध में
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वृषभ लग्न में २ चन्द्र कमी रहेगी और देह के पुरुषार्थ स्थान की शक्ति में कुछ कमजोरी रहेगी, किन्तु सातवीं मित्र दृष्टि ३ च. १
२ १२ से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनराशि ४ में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि रहेगी और ५ ११ मनोबल की शक्ति के द्वारा पुरातत्व का लाभ ६ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ी ८ १० रौनक एवं अमीरात का ढंग प्राप्त करेगा तथा धन ७ ९ वृद्धि की योजना में लगा रहेगा। नं. १२२ यदि कर्क का चन्द्र- तीसरे स्थान पर स्वयं वृषभ लग्न में ३ चन्द्र अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति का सुन्दर योग पायेगा तथा मनोबल ३ ४ १ के योग से पुरुषार्थ शक्ति में बड़ी सफलता पायेगा च. २ १२ एवं मन में बड़ा मगन और सुदृढ़ हिम्मत युक्त ५ ११ रहेगा और सहायक व सहयोगियों की उत्तम शक्ति ६ प्राप्त रहेगी, इसलिये मनोयोग और पुरुषार्थ शक्ति ८ १० के द्वारा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा सातवीं ७ ९ शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शनि की नं. १२३ मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के लिये कठिन प्रयत्न करना पड़ेगा एवं भाग्य के स्थान में कुछ असंतोष रहेगा तथा धर्म के पालन में कुछ नीरसता युक्त शक्ति रहेगी। वृषभ लग्न में ४ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है 3 १
४ २ १२ तो माता की शक्ति का बड़ा सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और भाई की शक्ति का भी सुख प्राप्त च. ११ रहेगा तथा सुख पूर्वक पराक्रम स्थान में शक्ति ६ बल प्राप्त करेगा और मनोबल की शक्ति योग के ८ १० द्वारा घरेलू सुख के उत्तम साधन पायेगा और ७ ९ भूमि मकान इत्यादि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा नं. १२४ सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज-समाज तथा कारबार के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से शक्ति पायेगा और मनोबल के परिश्रम से राज-समाज, कारबार के पक्ष में वृद्धि शक्ति से पायेगा। यदि कन्या का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो मनोबल की पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा विद्या स्थान में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा तथा वाणी और शब्दों के अन्दर बड़ी
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९२ वृषभ लग्न का फलादेश वृषभ लग्न में ५ चन्द्र शक्ति रहेगी और बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी हिम्मत के कार्य करता रहेगा और संतान पक्ष में सुन्दर 3 १ १२ शक्ति प्राप्त रहेगी और छोटे भाई बहिन का अच्छा ४ २ सम्बन्ध रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ ५ ११ स्थान को देवगुरु वृहस्पति की मीन राशि में रख ६ रहा है, इसलिये बुद्धि बल और मनोबल के योग च ८ १० से आमदनी के मार्ग में बड़ी उत्तम सफलता शक्ति ७ ९ प्राप्त करेगा तथा लाभ की वृद्धि के लिये सदैव नं. १२५ मनन करता रहेगा। वृषभ लग्न में ६ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- छठें शत्रु एवं झंझट स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है ३ १ तो भाई बहन के पक्ष में कुछ मन मुटाव रहेगा ४ २ १२ और मनोबल की पुरुषार्थ शक्ति के योग से शत्रु ५ ११ स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पराक्रमेश के ६ छठें स्थान पर बैठने से कुछ परतन्त्रता युक्त रहकर ८ १० कार्य करेगा और मन के अन्दर हिम्मत शक्ति के ७च. ९
नं. १२६ रहते हुए भी कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा कुछ झंझट युक्त मार्ग से पुरुषार्थ शक्ति का विकास पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बातरी स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों में मनोयोग से शक्ति प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ७ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल ३ १ की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में हानि और ४ २ १२ मानसिक कष्ट अनुभव करेगा तथा भाई बहन के ११ सुख सम्बन्ध में कमजोरी रहेगी और देह की पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर दुर्बलता एवं आलस्य प्राप्त होगा ८ च. १० और रोजगार के मार्ग में कमजोरी तथा मानसिक ७ ९
नं. १२७ परेशनी रहेगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता रहेगी और मान-सम्मान एवं प्रभाव प्राप्त रहेगा और हृदय के अन्दर शक्ति प्राप्त रहेगी। यदि धन का चन्द्र- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्त्व स्थान में मित्र गुरु की धनु राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष में हानि एवं मानसिक परेशानी रहेगी और पराक्रम स्थान में पुरुषार्थ शक्ति की कुछ कमजोरी
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भृगु संहिता ९३ वृषभ लग्न में ८ चन्द्र रहेगी तथा हिम्मत के कमजोर होने के साधन बनते रहेंगे। आयु स्थान में शक्ति प्राप्त रहेगी और ३ १ पुरातत्व सम्बन्ध में कोई सहायक शक्ति होने के ४ २ १२ कारण मन को गुप्त शक्ति प्राप्त रहेगी और सातवीं ५ ११ मित्र दृष्टि से धन भवन को बुध की मिथुन राशि ६ में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये ८ १० मानसिक पुरुषार्थ बहुत करता रहेगा और धन ७ ९च.
नं. १२८ तथा कुटुम्ब की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। यदि मकर का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य वृषभ लग्न में ९ चन्द्र एवं धर्म स्थान में शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के सुन्दर योग से भाग्य में ३ १ २ १२ कुछ शक्ति प्राप्त रहेगी और मनोबल के पुरुषार्थ ४ शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा ५ ११ मनोयोग से धर्म का पालन व मनन करेगा और भाग्य तथा भगवान् में श्रद्धा रखेगा। अतः इन्हीं ur ८ कारणों से भाग्यवान् और सज्जन सत् कर्मनिष्ठ ७ ९ माना जायेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वक्षेत्र में भाई नं. १२९ एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई और पुरुषार्थ कर्म की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा मनोबल के अन्दर स्फूर्ति शक्ति, हिम्मत और प्रसन्नता इत्यादि कारणों को प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में १० चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ३ १ पिता स्थान में कुछ मतभेद का योग प्राप्त करेगा ४ २ १२ तथा मनोयोग के कठिन परिश्रम से राजसमाज में ५ ११ च. मान प्राप्त करेगा और कारबार में उन्नति प्राप्त ६ करने के लिये मानसिक विचारों की शक्ति के ८ १० द्वारा बड़ा भारी प्रयत्न करता रहेगा तथा भाई- ७ ९ बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और सातवीं नं. १३० मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में सुख शक्ति पायेगा तथा भूमि मकानादि और घरेलू वातावरण में मनोबल के पुरुषार्थ से सुख व सफलता पायेगा। यदि मीन का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के लाभ का योग प्राप्त रहेगा तथा मनोबल के द्वारा
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९४ वृषभ लग्न का फलादेश वृषभ लग्न में ११ चन्द्र पुरुषार्थ कर्म करके आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता और प्रसन्नता प्राप्त करेगा तथा ३ १ २ बाहुबल की पुरुषार्थ शक्ति के बल पर बड़ी भारी हिम्मत रहेगी और लाभ स्थान में उन्नति करने के ५ ११ लिये सदैव मानसिक विचार चलते रहेंगे तथा ६ ८ १० लाभ मार्ग में शोभा युक्त रहेगा और सातवीं मित्र
७ दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की कन्या
नं. १३१ राशि में देख रहा है, इसलिये मनोबल की शक्ति से विद्या बुद्धि वाणी के अन्दर शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में सुन्दर शक्ति प्राप्त रहेगी। वृषभ लग्न में १२ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ३ १ च २ १२ भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में बड़ी कमी और ४ मतभेद रहेगा और बाहुबल की पुरुषार्थ शक्ति के ११ अन्दर बड़ी कमजोरी रहेगा, किन्तु मनोबल की ६ पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा बड़ा भारी खर्च करता ८ १० रहेगा तथा मनोबल के योग द्वारा बाहरी स्थानों में ७
नं. १३२ बड़ी सुन्दर शक्ति और अच्छे सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा अपने स्थान में हानि और कमजोरी पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मनोबल के योग द्वारा पुरुषार्थ कर्म से शत्रु स्थान में अपना कार्य निकालेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में मनोयोग की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा। स्त्री, रोजगार, खर्च, बाहरीस्थानपति-मंगल वृषभ लग्न में १ मंगल यदि वृषभ का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह 3 १ के कर्म योग से खर्च की संचालन शक्ति पायेगा ४ २ मं. १२ और बाहरी स्थानों में अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा ५ ११ तथा रोजगार की वजह से दूसरे स्थानों में आना ६ ८ १० जाना रहेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण से देह में कमजोरी और रक्त विकार एवं धातु क्षीणता ७ ९
नं. १३३ का योग प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिए उपरोक्त दोष के कारण ही माता के सुख में कमी प्राप्त
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भृगु संहिता ९५ करेगा और भूमि-मकानादि एवं घरेलू सुख सम्बन्ध में कमजोरी रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इस लिये रोजगार की उन्नति करेगा तथा स्त्री पक्ष में शक्ति मिलेगी; किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से स्त्री और रोजगार के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिए जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी रहेगी तथा आयु स्थान में कभी-कभी खतरा प्राप्त होता रहेगा और पुरातत्व सम्बन्धित शक्ति की कुछ हानि प्राप्त होगी। वृषभ लग्न में २ मंगल यदि मिथुन का मंगल- दूसरे धन एवं कुटुम्ब
३ म. स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा
२ १२ अधिक रहेगा और इसी कारण से धन के कोष में ४ कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब स्थान में परेशानी 4 ११ प्राप्त होगी तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का- ६ सा कार्य भी करता है, इसलिये स्त्री स्थान में बड़ी ८ १० कमी रहेगी और रोजगार तथा खर्च के मार्ग में ७ ९ कुछ दिक्कतें प्राप्त होंगी, किन्तु बाहरी स्थान का नं. १३४ सम्बन्ध कुछ अच्छा रहेगा और चौथी मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में व्ययेश होने के दोष के कारण से कुछ हानि करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमी रहेगी तथा बुद्धि और वाणी के द्वारा कुछ परेशानी प्रतीत होती रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में और आयु स्थान में कभी-कभी चिन्ताओं के कारण बनते रहेंगे और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि रहेगी और आठवीं उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि रहेगी तथा धर्म में श्रद्धा रहेगी इसलिये भाग्यवान् व सज्जन समझा जायेगा। वृषभ लग्न में ३ मंगल यदि कर्क का मंगल-तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि ३ १ ४ पर बैठा है तो भाई-बहन के स्थान में हानि प्राप्त मं २ १२ करेगा क्योंकि मंगल को नीच होने का दोष है ५ ११ तथा व्ययेश होने का दोष भी है, इसलिये विशेष ६ दोषी होने से स्त्री पक्ष में कष्ट प्राप्त करेगा तथा ८ १० रोजगार के मार्ग में हानि एवं परेशानी रहेगी और ७ ९ पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी तथा बाहरी नं. १३५ स्थानों का सम्बन्ध आलस्य रूप में रहेगा और
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९६ वृषभ लग्न का फलादेश चौथी दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए शत्रु स्थान में प्रभाव की जागृति रहेगी, क्योंकि गरम ग्रह की दृष्टि शत्रु नाशक होती है और सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि रहेगी तथा धर्म का पालन होता रहेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान में शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए पिता स्थान में उपरोक्त दोषों के कारण पिता से लाभ की हानि करेगा तथा राज समाज में कुछ परेशानी रहेगी और कारबार के मार्ग में हानि प्राप्त होगी तथा मान प्रतिष्ठा एवं उन्नति के मार्ग में रूकावटों के द्वारा कार्य संचालन होता रहेगा। वृषभ लग्न में ४ मंगल यदि सिंह का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है ३ १ २ तो मंगल को व्ययेश होने के दोष के कारण से ४ १२ माता के स्थान में हानि प्राप्त करेगा और भूमि ५ मं, ११ मकानादि एवं मातृ-भूमि इत्यादि सम्बन्धों में ६ परेशानी और कमी के कारण प्राप्त होंगे तथा ८ १० घरेलू सुख शान्ति के अन्दर कुछ कमी का योग ७ ९
नं. १३६ प्राप्त रहेगा और चौथी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में शक्ति रहेगी और रोजगार में भी उन्नति करेगा किन्तु बाहरी स्थानों के योग से उन्नति मिलेगी और फिर भी व्ययेश होने के दोष से कुछ परेशानी रहेगी और खर्चा गृहस्थी में विशेष रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में हानि या कमी प्राप्त होगी और राज समाज के मार्ग में कुछ परेशानी एवं नीरसता रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा, किन्तु बाहरी स्थानों के योग से देर-अबेर में लाभ प्राप्ति द्वारा उन्नति का योग बनेगा। वृषभ लग्न में ५ मंगल यदि कन्या का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा Ov ४ २ १२ है तो मंगल को व्ययेश होने के दोष के कारण से सन्तान पक्ष में कमजोरी रहेगी और बुद्धि के अन्दर ५ ११ कुछ फिकर चिन्ता का योग बनेगा तथा रोजगार मं ८ १० के मार्ग में बुद्धि योग द्वारा कार्य संचालन करेगा ७ ९ और व्ययेश होने के दोष के कारण ही स्त्री पक्ष में नं. १३७ कुछ असन्तोष युक्त शक्ति प्राप्त रहेगी तथा चौथी
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भृगु संहिता ९७ मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन की दिनचर्या में चिन्ता कारक योग बनता रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि का योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के योग से आमदनी के मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि के रूप में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का बड़ा भारी सम्बन्ध प्राप्त करेगा और खर्च के योग से रोजगार में शक्ति प्राप्त रहेगी। वृषभ लग्न में ६ मंगल यदि तुला का मंगल-छठें शत्रु स्थान में एवं ३ १ झंझट स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्च के स्थान में कुछ परेशानी रहेगी ४ २ १२ और बाहरी स्थान के सम्बन्ध में कुछ झंझट युक्त ५ ११ वातावरण रहेगा तथा व्ययेश होने के दोष के ६ ८ १० कारण से एवं शत्रु स्थान में बैठने के दोष के ७मं. ९ कारण से स्त्री पक्ष में कुछ अशान्ति रहेगी और
. १३८ रोजगार के मार्ग में हानि एवं परेशानी रहेगी किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्ति प्रदायक होता है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा और चौथी उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म के स्थान में कुछ विशेष रूचि रहेगी एवं विशेष खर्च भी करेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों से सम्बन्ध भी रहेगा और आठवीं दृष्टि से देह स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कमजोरी और परेशानी के कारण प्राप्त होंगे क्योंकि मंगल को व्ययेश होने का दोष है, इसलिये देह में रक्त विकार एवं वीर्य दोष का रोग उत्पन्न करेगा। वृषभ लग्न में ७ मंगल यदि वृकश्चिक का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में अपनी राशि पर स्वक्षेत्री ३ बैठा है तो स्त्री स्थान में और रोजगार के स्थान में ४ २ १२ शक्ति प्राप्त रहेगी किन्तु व्ययेश होने के दोष के ५ कारण स्त्री पक्ष में एवं रोजगार के पक्ष में कुछ ११ हानि एवं कुछ परेशानी रहेगी किन्तु बाहरी स्थानों w ८ मं. १० के सम्बन्ध से सफलता मिलेगी और खर्चा विशेष ७ ९ चालू रहेगा और चौथी शत्रु दृष्टि से पिता एवं नं. १३९ राज्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा भृ.सं .- ७
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९८ वृषभ लग्न का फलादेश है, इसलिये पिता स्थान में कुछ मतभेद और कुछ हानि का योग मिलेगा और राज-समाज के मार्ग में उन्नति के लिये कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी तथा कारबार में कुछ दिक्कतें रहेंगी और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष के कारण से देह में कुछ कमजोरी तथा कुछ रक्त विकार रहेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये उपरोक्त दोष के कारण ही धन के कोष स्थान में कमजोरी और हानि प्राप्त होगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ हानि एवं परेशानी रहेगी। वृषभ लग्न में ८ मंगल यदि धन का मंगल-आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो मंगल ३ १ ४ १२ को व्ययेश होने का दोष एवं अष्टम में बैठने का २ दोष होने के कारण से स्त्री स्थान में बड़ा संकट ५ ११ प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में भी बड़ी ६ कठिनाईयाँ रहेंगी तथा दूसरे स्थान में रोजगार का ८ १० ७ ९ मं. संयोग बनेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि रहेगी और आठवें स्थान से उदर का सम्बन्ध भी नं. १४० रहता है, इसलिये पेट के अन्दर कुछ शिकायत रहेगी तथा कुछ मूत्रेन्द्रिय में विकार प्राप्त होगा और चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये विदेश योग के द्वारा धन का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कमी रहेगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ परेशानी रहेगी तथा आठवीं नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान में हानि प्राप्त होगी और दैहिक पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर कमजोरी रहेगी तथा अपने गृहस्थ जीवन में परेशानी अनुभव करेगा। वृषभ लग्न में ९ मंगल यदि मकर का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य ३ १ स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर २ १२ बैठा है, तो स्त्री पक्ष में कुछ भाग्यवानी प्राप्त ४ करेगा और भाग्य की शक्ति से रोजगार के मार्ग 4 ११ में उन्नति पायेगा तथा गृहस्थ के अन्दर धर्म का ६ पालन करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा किन्तु ८ १०
७ ९ व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य में कुछ नं. १४१ कमी अनुभव करेगा और चौथी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को, स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा भाग्य की ताकत 4
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भृगु संहिता १९ से खर्च की संचालन शक्ति पायेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाई एवं पुरुषार्थ स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कमजोरी रहेगी और पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर कुछ दुर्बलता एवं हिम्मत की कमी रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष के कारण से माता और भूमि मकानादि के स्थान में कुछ हानि मिलेगी तथा घरेलू सुख में कुछ कमी रहेगी। वृषभ लग्न में १० मंगल यदि कुम्भ का मंगल-दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ३ १ ४ २ १२ व्ययेश होने के दोष से पिता स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा राज समाज कारबार की उन्नति के ५ ११ मं. मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और स्त्री पक्ष में ६ प्रभाव की अधिकता एवं कुछ कटुता प्राप्त होगी ८ १० और रोजगार को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से ७ ९
नं. १४२ ऊँचा उठाने का प्रयत्न विशेष करता रहेगा और खर्चा विशेष होने के कारणों से, इज्जत-आबरू बनाने में कुछ कठिनाईयाँ रहेंगी तथा चौथी दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष के कारण ही देह में कमजोरी और कुछ रक्त विकार रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये माता के और भूमि के पक्ष में सुख की कमी रहेगी और घरेलू सुख शान्ति में कुछ बाधायें प्राप्त होती रहेंगी और आठवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ क्रोध रहेगा और दशम स्थान पर मंगल का बैठना उत्तम होता है इसलिये मान प्रभाव रहेगा। वृषभ लग्न में ११ मंगल यदि मीन का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें ३ १ स्थान पर क्रूर ग्रह अथवा गरम स्वभाव का ग्रह ४ २ मं. विशेष उत्तम फल का दाता होता है, इसलिये ५ ११ आमदनी के मार्ग में बहुत लाभ प्राप्त करेगा ६ और स्त्री पक्ष से लाभ रहेगा तथा रोजगार के ८ १० मार्ग में बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से उन्नति प्राप्त ७ ९ करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से नं. १४३ स्त्री पक्ष में एवं आमदनी के पक्ष में कुछ असन्तोष रहेगा और चौथी मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को बुध की मिथुन
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१०० वृषभ लग्न का फलादेश राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कुछ हानि प्राप्त रहेगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ परेशानी रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए विद्या में कुछ i कमजोरी और संतान पक्ष में कुछ हानि और कष्ट प्राप्त होगा और आठवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, छठें स्थान पर गरम ग्रह की दृष्टि शुभ होती है, अतः शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त करेगा और खर्च एवं लाभ की शक्ति के द्वारा प्रभाव की जागृति रहेगी तथा बड़ा स्वार्थ युक्त व्यवहार रखेगा। वृषभ लग्न में १२ मंगल यदि मेष का मंगल- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में स्वयं अपनी मेष राशि पर स्वक्षेत्री होकर ३ १ मं ४ २ १२ बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक तायदाद में करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष शक्ति प्राप्त रहेगी, ५ ११ किन्तु स्त्री स्थानपति मंगल व्ययेश होकर स्वस्थान ६ में बैठ गया है, इसलिये विशेष दोषी होने के ८ १० कारण स्त्री स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा रोजगार ७ ९ में भी हानि का योग बनेगा और दूसरे स्थान में नं. १४४ रोजगार की शक्ति बनेगी और चौथी नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए भाई-बहन के स्थान में हानि प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ में कमजोरी रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुलाराशि में देख रहा है, अतः शत्रु स्थान पर गरम ग्रह की दृष्टि उत्तम होती है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में खर्च की ताकत से सफलता प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में कमजोरियों के होते हुए भी शक्ति प्राप्त करेगा। धनकोष, कुटुम्ब, विद्या, संतानस्थानपति-बुध वृषभ लग्न में १ बुध यदि वृषभ का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि ३ १ की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और दैहिक कर्म के ४ २ बु. १२ द्वारा धन और मान प्रतिष्ठा और सुन्दरता पायेगा ५ तथा संतान और कुटुम्ब की शक्ति का श्रेष्ठ योग ११ ६ प्राप्त होगा, इसके अतिरिक्त विवेकी बुध, बुद्धि ८ १० विद्या का स्वामी होकर देह पर मित्र भाव में बैठा ७ ९ है, इसलिये बुद्धि की लावण्यता का उत्तम आनन्द नं. १४५ और उन्नति प्राप्त होगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से
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भृगु संहिता १०१ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को, मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा रोजगार के मार्ग में बुद्धि योग एवं धन की शक्ति से उन्नति एवं सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में २ बुध यदि मिथुन का बुध- दूसरे धन एवं कुटुम्ब ३ बु. स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर १ बैठा है तो धन के कोष में बड़ी सुन्दर शक्ति प्राप्त ४ २ १२ करेगा तथा कुटुम्ब की महानता रहेगी और बड़ी 4 ११ इज्जत प्राप्त रहेगी तथा विद्या स्थान में शक्ति ६ मिलेगी और विद्या बुद्धि के योग से धन की वृद्धि ८ १० प्राप्त होगी, किन्तु धन स्थान कुछ बन्धन का-सा ७ ९ कार्य भी करता है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ नं. १४६ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिए आयु पक्ष में उन्नति प्राप्त करेगा तथा जीवन में शानदारी प्राप्त रहेगी। वृषभ लग्न में ३ बुध यदि कर्क का बुध- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि पर बैठा ३ १ ४ है तो विद्या बुद्धि की उत्तम शक्ति पायेगा और बु. २ १२ संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरुषार्थ ५ ११ शक्ति के द्वारा धन की प्राप्ति करेगा तथा कुटुम्ब ६ १० शक्ति का सुन्दर योग बनेगा और भाई-बहन के ८ योग का लाभ प्राप्त होगा तथा विवेकी बुध के ७ ९
नं. १४७ पराक्रम स्थान पर बैठने से विवेकी शक्ति के द्वारा बड़ी हिम्मत प्राप्त रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि प्राप्त होगी और भाग्यवान् सफल और पुरुषार्थी समझा जायेगा तथा धर्म का पालन करेगा और सज्जनता युक्त मार्ग से कार्योन्नति करता रहेगा। वृषभ लग्न में ४ बुध यदि सिंह का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं 3 १ भूमि के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है ४ २ १२ तो माता की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और ५ बु. भूमि और मकान आदि की शक्ति प्राप्त रहेगी ११ तथा विवेकी बुध पृथ्वी स्थान पर बैठा है, इसलिये ६ ८ १० विवेक की गम्भीर बुद्धि योग से विद्या की सफलता ७ ९ प्राप्त करेगा और बुद्धि विद्या के योग से धन का नं. १४८ संग्रह करेगा तथा संतान और कुटुम्ब का सुख
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१०२ वृषभ लग्न का फलादेश प्राप्त रहेगा और घरेलू सुख के साधनों में लावण्यता प्राप्त रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति का उत्तम लाभ पायेगा और राज समाज में मान प्राप्त करेगा तथा कारबार में बुद्धि योग से धनोन्नति प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ५ बुध यदि कन्या का बुध- पाँचवें त्रिकोण विद्या १ एवं सन्तान स्थान में स्वयं अपनी राशि में उच्च ४ २ १२ का होकर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो विवेकी बुध, बुद्धि स्थान में उच्च का होने से विशेष बलवान् ५ ११ हो गया है, इसलिए विद्या बुद्धि में विशेष शक्ति
बु. ८ १० प्राप्त रहेगी और वाणी के अन्दर बड़ी भारी योग्यता ७ ९ रहेगी तथा बुद्धि योग से धन की प्राप्ति करेगा
और सातवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख नं. १४९ और सन्तान एवं कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त होगी
रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी तथा कमी अनुभव करेगा अर्थात् आमदनी पर हमेशा त्रुटि प्रतीत होगी, इसलिये विद्या और सन्तान पक्ष के द्वारा धन की वृद्धि करने का मार्ग बनेगा तथा बुद्धि योग से इज्जत वृषभ लग्न में ६ बुध प्राप्त होगी। यदि तुला का बुध- छठें शत्रु स्थान में मित्र ३ १ १२ शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में बड़ी ४ २ कमी प्राप्त करेगा और कुटुम्ब में कमी तथा कुछ ५ ११ मतभेद रहेगा और सन्तान पक्ष में कष्ट प्राप्त रहेगा ६ ८ १० तथा विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी और शत्रु पक्ष
७ब्. ९ से कुछ अशान्ति रहेगी, किन्तु विवेकी बुध की नं. १५० विवेक शक्ति के योग से शत्रु पक्ष में एवं झगड़े- झंझटों के स्थान में कुछ सफलता प्राप्त करेगा और परिश्रम या कुछ परतन्त्रता के योग से धन की प्राप्ति करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन का लाभ प्राप्त करेगा और दूसरे स्थानों में इज्जत प्राप्त रहेगी। यदि वृश्चिक का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो विवेकी बुध के केन्द्र में बैठने से विवेक बुद्धि और विद्या के योग से रोजगार के मार्ग से धन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या की सफलता रहेगी और सन्तान पक्ष से लाभ और विनोद प्राप्त रहेगा
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भृगु संहिता १०३ वृषभ लग्न में ७ बुध तथा बुद्धिमती स्त्री मिलेगी और धन तथा कुटुम्ब
१ का सुन्दर योग पायेगा और गृहस्थ संचालन के 3 मार्ग में बुद्धि योग से आनन्द प्राप्त करेगा तथा ४ २ १२ सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की ५ ११ वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता ६ ८ बु. १० और मान सम्मान प्राप्त करेगा बुद्धि विवेक और धन की शक्ति से इज्जत बढ़ेगी और लौकिक ७ ९
नं. १५१ होगा। कार्यों में बड़ा कार्य कुशल और प्रेमी स्वभाव
वृषभ लग्न में ८ बुध यदि धन का बुध- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है ३ १ ४ २ १२ तो सन्तान पक्ष में कष्ट प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी तथा धन की संग्रह शक्ति ५ ११ का बड़ा प्रभाव रहेगा और कुटुम्ब सुख में बड़ी कमी रहेगी, किन्तु विवेकी बुध के अष्टम में बैठने ६ ८ १० से विवेक शक्ति के द्वारा पुरातत्व सम्बन्ध में बड़ी ७ ९बु. सफलता प्राप्त करेगा और आयु के पक्ष में शक्ति नं. १५२ प्राप्त रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये भारी प्रयत्न करता रहेगा। अतः कठिनाई के मार्ग से धन की प्राप्ति रहेगी और कुटुम्ब की थोड़ी शक्ति का योग प्राप्त होगा। वृषभ लग्न में ९ बुध यदि मकर का बुध- नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा 3 १ है तो भाग्य और बुद्धि के योग से धन की प्राप्ति ४ २ १२ का उत्तम योग बनेगा तथा बड़ा भाग्यशाली समझा 4 ११ जायेगा और विवेकी बुध, भाग्य का योग पाकर
६ विद्या स्थान में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और ८ १०
७ ९ बु. सन्तान पक्ष में उत्तम शक्ति प्राप्त रहेगी तथा कुटुम्ब का आनन्द प्राप्त रहेगा और धर्म के मार्ग से पालन नं. १५३ और मनन रखेगा तथा न्यायोक्त मार्ग से उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान से लाभ युक्त सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम शक्ति के अन्दर बुद्धि और धन के योग से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा।
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१०४ वृषभ लग्न का फलादेश वृषभ लग्न में १० बुध यदि कुम्भ का बुध- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ३ १ ४ २ १२ विवेकी बुध का विद्यास्थानपति होकर राज्य में बैठने से उत्तम रूप से विद्या ग्रहण करेगा और ५ ११ बु. राजभाषा में सफलता पायेगा तथा पिता स्थान ६ की शक्ति का सुन्दर लाभ प्राप्त करेगा और राज- ८ १० समाज में बड़ा मान पायेगा तथा बुद्धि योग द्वारा ७ ९
नं. १५४ उत्तम कर्म करके कारबार से धन की प्राप्ति करेगा और संतान पक्ष में बहुत सुन्दर सफलता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का वैभव अच्छा रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में लाभ शक्ति पायेगा और भूमि मकानादि का सुन्दर सहयोग प्राप्त होगा तथा घरेलू वातावरण में सुख प्राप्ति के अच्छे साधन प्राप्त होंगे। वृषभ लग्न में ११ बुध यदि मीन का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ३ 2 ४ २ १२ आमदनी के मार्ग में बड़ी कमजोरी और कठिनाईयों ब. के योग से लाभ की प्राप्ति करेगा तथा धन के ५ ११ कोष में कमजोरी रहेगी और कुटुम्ब का अल्प ६ लाभ रहेगा तथा विद्या और संतान पक्ष में भी ८ १० कुछ कमजोरी रहेगी तथा आमदनी और धन कुटुम्ब ७ ९
नं. १५५ की कमजोरियों के कारण से दिमाग के अन्दर परेशानी अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को उच्च दृष्टि से स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या में कमी होते हुए भी विवेकी बुध की उच्च दृष्टि के बल से विद्या में शक्ति मिलेगी और इसी आधार के बल से संतान पक्ष में कमी होते हुये भी संतान शक्ति रहेगी। वृषभ लग्न में १२ बुध यदि मेष का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो विद्या ३ १ बु. के पक्ष में कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में २ १२ X0 हानि प्राप्त करेगा तथा धन के कोष में भारी कमी ५ ११ और हानि प्राप्त होगी और कुटुम्ब के स्थान में अल्प योग रहेगा। किन्तु खर्चा बहुत अधिक w .. ८ १० तायदाद में रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध - ७ ९ में धन की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा बाहरी नं. १५६ स्थानों में इज्जत पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से
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भृगु संहिता १०५ शत्रु स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये विवेकी बुध की विवेक शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष में अपना कार्य सफल करने का मार्ग बनावेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में धन और बुद्धि के योग से कामयाबी पायेगा। आयु, पुरातत्व, लाभस्थानपति-गुरु वृषभ लग्न में १ गुरु यदि वृषभ का गुरु- प्रथम केन्द्र में देह के स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है ३ १ तो आयु का लाभ प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध ४ २ गु. १२ से मान और लाभ प्राप्त करेगा तथा देह के परिश्रम ५ ११ से लाभ की वृद्धि करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि ६ से पंचम संतान स्थान को बुध की कन्या राशि में १० V देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष से तथा ७ लाभेश की सुन्दरता से संतान पक्ष में कुछ लाभ नं. १५७ और कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि के स्थान से योग्यता और अनुभव की शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री और रोजगार के स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार और स्त्री के पक्ष में कुछ कमी के साथ लाभ प्राप्त करेगा और नवीं नीच दृष्टि से शनि की मकर राशि में भाग्य और धर्म स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ कमी या हानि प्राप्त करेगा। यश में कमी प्राप्त होगी और देह के पक्ष में कुछ परेशानी के साथ-साथ मान प्राप्त करेगा और लाभ की उन्नति करने के लिये सदैव परिश्रम करता रहेगा तथा प्रभाव युक्त रहेगा। वृषभ लग्न में २ गुरु यदि मिथुन का गुरु- धन भवन में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में-अष्टमेश ३ गु. १ होने के कारण कुछ हानि करेगा और लाभेश होने ४ २ १२ के कारण वृद्धि करेगा और पुरातत्व का लाभ ५ ११ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में इसी कारण से ६ कुछ विघ्नयुक्त शक्ति प्राप्त रहेगी और सातवीं ८ १० दृष्टि से स्वयं अपनी धनु राशि में आयु एवं पुरातत्व ७ ९ स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये आयु नं. १५८ की वृद्धि करेगा और जीवन के समय को अमीरात के ढंग. से व्यतीत करेगा और पाँचवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में छठें शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिए शत्रु स्थान में दानाई के ढंग से प्रभाव रखेगा तथा नवमी शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में पिता
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१०६ वृषभ लग्न का फलादेश स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्धों में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज-समाज के पक्ष में कुछ अरूचिकर रूप से सफलता और मान प्राप्त करेगा और इज्जतदार माना जायेगा तथा अपने कारबार की उन्नति करने के मार्ग में बड़ा परिश्रम करेगा तथा कुछ कठिनाईयों के योग से धन की वृद्धि करेगा। वृषभ लग्न में ३ गुरु यदि कर्क का गुरु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर उच्च राशि में चन्द्र के घर में बैठा है ३ १ गु. १२ तो पराक्रम शक्ति से महान् हिम्मत प्राप्त करेगा २ और भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और नवम ५ ११ दृष्टि से मीन राशि में स्वयं अपने लाभ स्थान को ६ स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये धन के विशेष ८ १० लाभ की आमदनी के रूप में प्राप्त करेगा तथा ९ बड़ी प्रभाद शक्ति रखेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि नं. १५९ से मंगल की वृश्चिक राशि में रोजगार तथा स्त्री भवन को देख रहा है, इसलिए स्त्री स्थान में तथा रोजगार पक्ष में कुछ कठिनाई के मार्ग से प्रभाव शक्ति और लाभ की उन्नति प्राप्त करेगा और आयु की वृद्धि और पुरातत्व का लाभ तथा जीवन में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से शनि की मकर राशि में भाग्य और धर्म के नवम स्थान को देख रहा है इसलिये भाग्य में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ अरूचि युक्त भावनायें रखेगा और दिनचर्या में बड़ी भारी सुस्ती प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ४ गुरु यदि सिंह का गुरु- चौथे केन्द्र माता के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने 3 १ के कारण माता के सुख में कुछ कमी करेगा, ४ २ १२ लाभेश होने के कारण आमदनी और सुख आदि ५ गु. ११ के साधन प्राप्त रहेंगे और मकान जायदाद की ६ १० पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं ८ दृष्टि से स्वयं अपने अष्टम आयु एवं पुरातत्व स्थान ७ ९ को धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की नं. १६० वृद्धि करेगा तथा जीवन का समय प्रभाव युक्त रूप से सुख पूर्वक व्यतीत करेगा। किन्तु घर के अन्दरूनी सुखों में कुछ विघ्न बाधायें भी प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा और राज-समाज में मान प्रतिष्ठा, कारबार के पक्ष में कुछ कमी का योग रहेगा और नवीं मित्र दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च
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भृगु संहिता १०७ स्थान को देख रहा है इसलिये खर्चा खूब रहेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध लाभ युक्त रहेगा तथा आमदनी से अधिक खर्च करने का ढंग रहेगा। वृषभ लग्न में ५ गुरु यदि कन्या का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है ३ १ ४ २ १२ तो विद्या एवं संतान पक्ष में प्रभाव शक्ति पायेगा तथा वाणी के अन्दर बड़ी योग्यता रहेगी, किन्तु ५ ११ अष्टमेश होने के दोष से सन्तान पक्ष में कुछ बाधायें
१० प्राप्त करेगा, किन्तु लाभेश होने से संतान पक्ष में ८ लाभ रहेगा और इन्हीं कारणों से विद्या स्थान में ७ ९ .१६१ कुछ दिक्कतों के सहित लाभ शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरातत्व का लाभ बुद्धि संयोग से करेगा तथा पंचम नीच दृष्टि से शत्रु शनि की मकर राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है इसलिये भाग्य में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और धर्म के पालन में कुछ हानि करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र लाभ स्थान को मीन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग से आमदनी अच्छी प्राप्त करेगा और नवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये जीविका और लाभ के पक्ष से देह में कुछ परिश्रम और प्रभाव का योग प्राप्त करेगा और बातचीत के अन्दर भलमनसाहत के रूप में स्वार्थ सिद्धि का सदैव ध्यान रखेगा तथा आयु की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन में धन की वृद्धि करने में लगा रहेगा। वृषभ लग्न में ६ गुरु यदि तुला का गुरु- छठें शत्रु स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में ३ १ दानाई से काम निकालेगा, किन्तु लाभेश अष्टमेश ४ २ १२ होकर शत्रु घर में बैठने से लाभ के सम्बन्धों में ११ कुछ कमी तथा परिश्रम और परतन्त्रता का योग ६ प्राप्त करेगा तथा जीवन के समय में और आयु ८ १० के पक्ष में कुछ परेशानी तथा कुछ घिराव-सा ९ प्रतीत होगा और पुरातत्व लाभ की कुछ कमी नं. १६२ रहेगी तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा और कारबार, राज-सम्मान के पक्ष में कुछ प्रभाव की कमी के सहित लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से मंगल की मेष राशि में बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध कुछ परेशानी से युक्त लाभप्रद रहेगा
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१०८ वृषभ लग्न का फलादेश और परिश्रम करना पड़ेगा तथा नवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये अधिक प्रयत्न और परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कठिनाईयों के योग से कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ लाभ शक्ति का योग प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ७ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर मित्र मंगल की राशि में 3 १ ४ २ १२ बैठा है तो आयु और पुरातत्व के सम्बन्ध में आयु और पुरातत्व के सम्बन्ध में लाभ प्राप्त करेगा ५ ११ और स्त्री स्थान में अष्टमेश होने से कुछ कष्ट प्राप्त ६ करेगा और लाभेश होने से लाभ करेगा और ८ गु. १० रोजगार के पक्ष में कुछ परिश्रम के योग से प्रभाव ७ ९ नं. १६३ शक्ति प्रदान करेगा और पाँचवीं दृष्टि से स्वयं अपने लाभ स्थान को मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये दैनिक कार्य रोजगार के मार्ग से बँधी हुई अच्छी आमदनी के रूप में अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं सामान्य शत्रु की दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि से देह को देख रहा है, इसलिये देह में आमदनी के मार्ग से कुछ थकान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा नवीं उच्च दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में तीसरे स्थान को देख रहा है इसलिये पराक्रम की विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और भाई बहिन की शक्ति भी प्राप्त रहेगी और धन लाभ के मार्ग में बड़ी तत्परता और स्वार्थ शक्ति से सज्जनता दिखाकर लाभ करेगा। वृषभ लग्न में ८ गुरु यदि धन राशि का गुरु- अष्टम आयु स्थान में स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा ३ १ और पुरातत्व का लाभ पायेगा, किन्तु लाभेश के ४ २ १२ अष्टम में बैठने से आमदनी के मार्ग में कठिनाई ५ ११ और परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च एवं w ८ १० २गु बाहरी स्थान को देख रहा है। इसलिये खर्च खूब ७ करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त नं. १६४ करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन एवं कुटुम्ब स्थान को देख रहा है, इसलिए परिश्रम शक्ति के योग से धन जन की वृद्धि करेगा और नवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये सुख प्राप्ति के साधनों की वृद्धि करने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और माता के सुख में अष्टमेश होने के
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भृगु संहिता १०९ नाते कुछ त्रुटि करेगा तथा आमदनी के मार्ग में कुछ असंतुष्ट रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के नाते जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रखेगा और धन की आमदनी बढ़ाने के लिए दूसरे स्थानों का सम्बन्ध बनाकर बड़ा भारी प्रयत्न करेगा। वृषभ लग्न में ९ गुरु यदि मकर का गुरु- नवम त्रिकोण धर्म एवं १ भाग्य स्थान में शत्रु शनि की नीच राशि पर बैठा ३ है तो पुरातत्व शक्ति के सम्बन्ध से भाग्य में कमजोरी ४ २ १२ प्राप्त करेगा और धर्म पालन में अश्रद्धा रखेगा ५ ११ तथा आमदनी की कमी से दुःख अनुभव प्राप्त ६ ८ १० करेगा और जीवन तथा आयु के स्थान में कुछ गु. नीरसता प्राप्त करेगा और पाँचवी सामान्य शत्रु ७ ९
नं. १६५ दृष्टि से वृषभ राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी करेगा तथा परिश्रम के योग से कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में पराक्रम एवं भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये पराक्रम की वृद्धि करेगा और भाई बहिन की सहयोग शक्ति प्राप्त रहेगी तथा बड़ी हिम्मत से काम करेगा और नवीं मित्र दृष्टि से बुध की कन्या राशि में पंचम स्थान को देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ कमी के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कुछ पुरातत्व बुद्धि के योग से वृद्धि प्राप्त करेगा। परन्तु भाग्य में नीच ग्रह के बैठने से सुयश और बरक्कत की कमी प्राप्त होगी। वृषभ लग्न में १० गुरु यदि कुम्भ का गुरु- केन्द्र में दसम स्थान पर शत्रु शनि की कुम्भ राशि में बैठा है तो अष्टमेश ३ १ होने के नाते पिता स्थान में कुछ कष्ट और कमी ४ २ १२ प्राप्त करेगा और राज समाज कारबार के स्थान ५ ११ गु. में कुछ असंतोष युक्त सफलता मिलेगी और पाँचवीं ६ मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन भवन ८ १० को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने का ९ विशेष प्रयत्न करेगा और कुटुम्ब का कुछ सहंयोग नं. १६६ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये कुछ असंतोष के सहित मातृ सुख और मकानादि की शक्ति पायेगा और नवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में छठें स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी के सहित प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और मान व उन्नति के लिये अधिक परिश्रम युक्त कर्म करेगा और आयु की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा
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११० वृषभ लग्न का फलादेश पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ परिश्रम के योग से लाभ प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ प्रभाव शक्ति प्राप्त रहेगी। वृषभ लग्न में ११ गुरु यदि मीन का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में मजबूती ३ १ ४ २ १२ प्राप्त करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के नाते कुछ गु. परिश्रम या कुछ कठिनाई रहेगी और आयु की ५ ११ वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्त्व शक्ति का अच्छा ६ लाभ रहेगा और पाँचवीं उच्च दृष्टि से चन्द्र की ८ १० कर्क राशि में पराक्रम एवं भाई के स्थान को देख ७ ९ रहा है, इसलिये पराक्रम का विशेष लाभ प्राप्त नं. १६७ करेगा तथा भाई-बहिन की विशेष शक्ति रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की कन्या राशि में विद्या एवं संतान स्थान को देख रहा है, इसलिये कुछ दिक्कत के साथ-साथ संतान पक्ष में लाभ का योग प्राप्त करेगा और बुद्धि विद्या में योग्यता शक्ति प्राप्त करेगा और नवीं मित्र दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में सप्तम भवन रोजगार और स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार से खूब लाभ करेगा तथा स्त्री स्थान में कुछ कठिनाई के सहित शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री स्थान में प्रभाव युक्त रहेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव और मस्ती प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में १२ गुरु यदि मेष का गुरु- बारहवें खर्च एवं बाहरी ३ १ गु. स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के संबंध ४ २ १२ से लाभ प्राप्त करेगा। नवीं दृष्टि से स्वयं अपने ५ ११ आयु स्थान को धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा ६ है, इसलिये व्यय स्थान के दोष के कारण कभी- ८ १० कभी जीवन पर संकट प्राप्त होंगे, किन्तु फिर भी ७ ९
नं. १६८ आयु की शक्ति मिलेगी और पुरातत्व का कुछ कमजोरी से लाभ मिलेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के योग से सुख प्राप्ति के साधनों में वृद्धि करेगा और सातवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में छठें शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखने के लिये बड़ी दानाई से काम लेगा और खर्च की अधिकता के कारणों से कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा अष्टमेश के बारहवें स्थान पर बैठने से बाहरी स्थानों के सुन्दर सम्बन्ध के कारणों से आमदनी की अच्छी शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु खर्चा सदैव अधिक तायदाद में रहेगा।
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भृगु संहिता १११ देह, शत्रु, रोगस्थानपति-शुक्र वृषभ लग्न में १ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र-प्रथम केन्द्र देह के स्थान ३ १ पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह में कुछ सुन्दरता, प्रभाव ४ २ शु. १२ और आत्मबल की शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ रोग कुछ परिश्रम और कुछ शत्रु पक्ष में झंझट ५ ११ इत्यादि प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु पक्ष का स्वामी ६ ८ १० लग्न में स्वक्षेत्री बैठा है, इसलिये शत्रु पक्ष में ७ ९ विजय प्राप्त करेगा और देह की चतुराई और शक्ति से बड़ी भारी हिम्मत रखेगा और सातवीं सामान्य मित्र की दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री भवन को देख रहा नं. १६९
है, इसलिये स्त्री भवन में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और दैहिक परिश्रम की शक्ति और चतुराई के योग से रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और लौकिक भोगादि के सम्बन्धों में तथा मान और प्रभाव की वृद्धि के स्थान में विशेष ध्यान रखेगा और आत्मबल की विशेष शक्ति से सफलतायें मिलेंगी। वृषभ लग्न में २ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- धन भवन में मित्र बुध ३ शु. १ की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम से धन की ४ २ १२ वृद्धि करने में विशेष प्रयत्न करता रहेगा और यथा सम्भव धन और जन की वृद्धि करेगा और ५ ११ विशेष चतुराईयों के योग से इज्जत और मान ६ ८ १० प्राप्त करेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन का ७ ९ कार्य करता है, इसलिये देह के सुख में परेशानी- नं. १७० सी रहेगी तथा सातवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से गुरु की धनु राशि में अष्टम आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व के स्थान में भी कुछ नीरसता से सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में चतुराई के योग से लाभ प्राप्त करेगा। यदि कर्क का शुक्र- तीसरे पराक्रम स्थान पर सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह की शक्ति के द्वारा महान् परिश्रम करके सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में चतुराई और हिम्मत के द्वारा विजय प्राप्त करेगा और षष्ठेश होने के कारण भाई-बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शनि की मकर राशि में नवम भाग्य एवं धर्म स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करेगा
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११२ वृषभ लग्न का फलादेश वृषभ लग्न में ३ शुक्र और धर्म पालन में श्रद्धा रखेगा तथा पराक्रम और चतुराई के योग से यश और सफलता प्राप्त ३ १
शु. २ १२ करेगा और देहाधीश, शत्रु छठें स्थान का स्वामी होकर पराक्रम स्थान पर बैठा है, इसलिये परिश्रम ५ ११ की अधिकता के कारण कभी-कभी थकान अनुभव करेगा, किन्तु जबर्दस्त हिम्मत शक्ति ८ १० रखेगा। ७ ९
नं. १७१ यदि सिंह का शुक्र- चौथे केन्द्र स्थान में शत्रु
वृषभ लग्न में ४ शुक्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो षष्ठेश होने के नाते माता के सुख में कमी और वैमनस्यता उत्पन्न 3 १ करेगा और मातृ भूमि के स्थान से कुछ अलग ४ २ करेगा और रहन-सहन मकान इत्यादि सुख के ५ शु. ११ साधनों में कुछ अरुचिकर शक्ति प्रदान करेगा क्योंकि षष्ठ तथा देह का स्वामी सुख भवन में ६ ८ १० बैठा है, इसलिये कुछ कमी और झंझटों के सहित ७ सुख के साधन अवश्य प्राप्त होंगे और शत्रु पक्ष नं. १७२ में कुछ शान्ति और चतुराई से काम निकालेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में दशम पिता भवन और राज्य समाज स्थान को देख रहा है। इसलिये पिता पक्ष से शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज-कारबार आदि के स्थान में मान और सफलता प्राप्त करेगा तथा शान्ति प्रिय बनेगा। वृषभ लग्न में ५ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- त्रिकोण पंचम स्थान में नीच राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट 3 १ ४ २ १२ अनुभव करेगा तथा विद्या में कुछ अपूर्ण रहेगा और बुद्धि की गुप्त चतुराई और बुद्धि के कठिन ५ ११ परिश्रम से शत्रु पक्ष में सफलता पा सकेगा और गुरु की मीन राशि में लाभ स्थान को सातवीं शु ८ १० उच्च दृष्टि से देख रहा है, इसलिये दिमाग की ७ ९ कठिन सूझ और युक्तियों से, देह के परिश्रम से नं. १७३ धन का लाभ अधिक करने में सफलता प्राप्त करेगा और आमदनी की वृद्धि करने में विशेष प्रयत्नशील रहेगा तथा बुद्धि में कुछ थकान और कुछ परेशानी अनुभव करेगा और देह की सुन्दरता में कुछ कमी और कुछ रोग प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों की तरफ से दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी तथा वाणी की युक्ति से लाभ पायेगा। यदि तुला का शुक्र-शत्रु स्थान में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो शत्रु पक्ष
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भृगु संहिता ११३ वृषभ लग्न में ६ शुक्र में बड़ा प्रभाव रखेगा तथा देह की शक्ति और युक्ति तथा मजबूत चतुराई के योग से शत्रु पर ३ १ २ विजय प्राप्त करेगा और देह के अन्दर सुन्दरता ४ १२ की कुछ कमी तथा कुछ रोग और कुछ परतन्त्रता ५ ११ प्राप्त करेगा और मामा के पक्ष में कुछ मजबूती ६ पायेगा तथा सातवीं सामान्य मित्र दृष्टि से मंगल ८ १० की मेष राशि में बारहवें बाहरी स्थान तथा खर्च ७शू ९ स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा नं. १७४ और बाहरी स्थानों में कुछ अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा और देहाधीश के छठें स्थान में बैठने से अधिक परिश्रम तथा परेशानी अनुभव करेगा और शत्रु पक्ष से कुछ झंझट बाजी का योग चलता रहने से प्रभाव की वृद्धि का योग बनता रहेगा तथा स्वाभिमानी बनेगा। वृषभ लग्न में ७ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- केन्द्र में सातवें स्थान पर सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो १ षष्ठेश होने के कारण स्त्री स्थान में कुछ परेशानी ४ २ १२ कुछ रोग वैमनस्य तथा आत्मशक्ति प्राप्त करेगा ५ ११ और रोजगार के मार्ग में कुछ दैहिक परिश्रम तथा ६ कुछ दिक्कतों से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा ८ शु १० और इन्द्रिय भोगादिक पक्ष में विशेष रूचि के ९
नं. १७५ साथ युक्ति और चतुराईयों से तथा कठिनाईयों से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने देह स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार तथा स्त्री पक्ष के संबंध से देह में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा देह में कुछ नामवरी भी प्राप्त करेगा और लौकिक कार्यों में बड़ी दक्षता रखेगा। वृषभ लग्न में ८ शुक्र यदि धनु राशि का शुक्र- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर ३ १ बैठा है तो देह के पक्ष में कुछ रोगादिक कष्ट प्राप्त ४ २ १२ करेगा और देह की सुन्दरता में और सुडौलताई में ५ ११ कुछ कमी प्राप्त करेगा और दूसरे स्थानों में रह ६ १० सकेगा तथा देह के लिये आराम और शान्ति कम ८ ९शु. मिलेगी और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा ७ पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ कठिनाई और गूढ़ चतुराई नं. १७६ के योग से सफलता मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को देख रहा है, इसलिये कठिन परिश्रम के योग से धन की वृद्धि करने में तत्पर रहेगा और शत्रु पक्ष से कुछ कष्ट या झंझट प्राप्त भ.सं. -८.
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११४ वृषभ लग्न का फलादेश करेगा तथा षष्ठेश के अष्टम स्थान में बैठने से मामा के पक्ष में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा प्रभाव की कमी रहेगी और उदर के अन्दर कुछ बीमारी रहेगी। वृषभ लग्न में ९ शुक्र यदि मकर का शुक्र- त्रिकोण नवम भाग्य ३ १ और धर्म स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है ४ २ १२ तो दैहिक परिश्रम के योग से भाग्यशाली बनेगा और शत्रु पक्ष में भाग्य शक्ति से ही सफलता और ५ ११ प्रभाव प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ ६ ८ १० शु. कठिनाई लिये हुए धर्म मार्ग का पालन करेगा, ७ ९ किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के नाते धर्म की नं. १७७ कुछ थोड़ी-सी हानि करेगा और लग्नेश होने के नाते धर्म की वृद्धि करेगा तथा शत्रु पक्ष में धर्म और न्याय से काम लेगा तथा देह में कुछ सुन्दरता और कुछ रोग या दिक्कत प्राप्त करेगा तथा सातवीं सामान्य मित्र दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में तीसरे भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन और पराक्रम की शक्ति में कुछ अरूचि के साथ सफलता प्राप्त करेगा और अनेकों प्रकार के झगड़े झंझटों में कुदरती तौर से विजय प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में १० शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- दसम केन्द्र पिता एवं
१ राज्य स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ३ राज समाज में मान प्राप्त करेगा, कारबार में परिश्रम ४ २ १२ के योग से उन्नति करेगा और शत्रु स्थान पति ५ ११ शु. होने से पिता के स्थान में कुछ वैमनस्य युक्त ६ ८ १० शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु पक्ष में प्रभाव ७ शक्ति प्राप्त करेगा और देह में तथा अपने कारबार O
के योग से उन्नति के मार्ग में सफलता प्राप्त करता रहेगा और सातवीं शत्रु नूं. १७८ में कुछ अहंकार रखेगा तथा बड़ी भारी चतुराई
दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है इसलिये अपनी उन्नति के कार्य कारणों से सुख प्राप्ति की परवाह नहीं करेगा और माता से तथा जन्म भूमि से कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ झगड़े के मार्ग से उन्नति का सुन्दर योग पायेगा। यदि मीन का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान पर उच्च राशि में बैठा है तो देह के परिश्रम से धन की लाभ शक्ति विशेष प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में महान् प्रयत्न और चतुराईयों से काम करता रहेगा तथा देह में
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भृगु संहिता ११५ वृषभ लग्न में ११ शुक्र सुन्दरता और कुछ रोग प्राप्त करेगा तथा शत्रु स्थान से लाभ युक्त रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि ३ १ ४ २ १२ से बुध की कन्या राशि में संतान घर को देख रहा श. है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ कमी प्राप्त करेगा ५ ११ और विद्या ग्रहण करने के समय बड़ी लापरवाही ६ के कारणों से कुछ झूठ बोलकर सफलता के ८ १० लिये काम लेना पड़ेगा और बातचीत के अन्दर ७ ९
नं. १७९ हेर-फेर से काम करेगा और प्रभाव की शक्ति से
वृषभ लग्न में १२ शुक्र अच्छा लाभ प्राप्त करेगा। यदि मेष का शुक्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी ३ १शु. स्थान में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है ४ २ १२ तो देह में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और परिश्रम तथा बाहरी स्थानों के संयोग से खर्च की अच्छी ५ ११ शक्ति प्राप्त करेगा और विशेष खर्च करेगा तथा ६ ८ १० सातवीं दृष्टि से तुला राशि में स्वयं अपने क्षेत्र शत्रु ७ ९ स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ दिखावटी हिम्मत शक्ति से प्रभाव रखेगा और शत्रु, झगड़े, झंझटों से कुछ हानि और कमजोरी प्राप्त करेगा और मामा के नं, १८०
पक्ष में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों में आने जाने का संयोग विशेष रूप से प्राप्त करेगा तथा देह में कुछ रोग प्राप्त करेगा और महान् चतुर ग्रह होने के कारण खर्च और प्रभाव के मार्ग में महान् चतुराई के योग से शक्ति प्राप्त करेगा। भाग्य, राज्य, पितास्थानपति-शनि वृषभ लग्न में १ शनि यदि वृषभ का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो देह में सुन्दरता ३ १ प्राप्त करेगा और प्रभाव रखेगा तथा देह के ४ २ श. १२ अवलोकन में भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म ५ ११ को खूब समझने पर भी कर्म क्षेत्र का विशेष ६ पालन करेगा; क्योंकि दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी ८ १० कुम्भ राशि में राज्य स्थान को देख रहा है इसलिये ७
नं. १८१ राज-समाज में मान प्रतिष्ठा की उन्नति तथा कारबार की उन्नति खूब करेगा और पिता स्थान की शक्ति प्राप्त करेगा और देह में स्वाभिमान प्राप्त करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में भाई स्थान को देख रहा है, इसलिये बहिन भाई के
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११६ वृषभ लग्न का फलादेश पक्ष में कुछ नीरसता रखेगा, किन्तु क्रूर ग्रह की तीसरे स्थान पर शक्ति बढ़ जाती है, इसलिये पराक्रम खूब करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाई भी अनुभव करेगा, किन्तु उन्नति की वृद्धि करेगा और राज्येश शनि, राज स्थान को देख रहा है, इसलिये दैहिक कार्यों में बड़ी भारी सफलता मिलेगी। वृषभ लग्न में २ शनि यदि मिथुन का शनि- धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य और ३ श. १ ४ २ १२ कर्म की शक्ति से धन की वृद्धि करेगा और पिता स्थान का सुख कुछ कम मिलेगा, क्योंकि धन ५ ११ का स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है किन्तु ६ राज समाज में बहुत सफलता और धन की वृद्धि ८ १० प्राप्त करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से गुरु की मीन ७ ९ राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये नं. १८२ आमदनी विशेष प्राप्त करेगा, क्योंकि ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह की शक्ति बलवान् हो जाती है और दृष्टि भी पड़ रही है, अतः आमदनी के मार्ग से भी धन संचय करेगा और कुटुम्ब की शक्ति में सफलता पायेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये माता के तथा मातृ स्थान के सुख में कमी प्राप्त करेगा और धन जन की उन्नति को ही सर्वस्व समझेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से गुरु की धनु राशि में आयु एवं पुरातत्व स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या और आयु इत्यादि सम्बन्धों में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा, किन्तु कुछ पुरातत्व स्थान में शक्ति पायेगा और धर्म के मुकाबले में धन की वृद्धि करने में ही तत्पर रहेगा। वृषभ लग्न में ३ शनि यदि कर्क का शनि- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान पर शत्रु चन्द्र की राशि में बैठा है तो कुछ ३ ४ १२ वैमनस्यता युक्त भाई बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा श २ और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् होता है, ५ ११ इसलिये उन्नति की सफलता प्राप्त करने के लिये ६ विशेष पुरुषार्थ करेगा और पिता स्थान की कुछ ८ १० नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और अपने कारबार ७ ९
नं. १८३ के सम्बन्ध से भारी हिम्मत और सफलता प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य की विशेष वृद्धि करेगा और धर्म का पालन करेगा तथा तीसरी मित्र दृष्टि से बुध की कन्या
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भृगु संहिता ११७ राशि में विद्या एवं संतान घर को देख रहा है, इसलिये सन्तान शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और वाणी के द्वारा महान् योग्यता का परिचय देगा तथा दसवीं नीच दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कमजोरी प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में लापरवाही करेगा और प्रभावशाली तथा भाग्यवान् समझा जायेगा। वृषभ लग्न में ४ शनि यदि सिंह का शनि- चौथे केन्द्र माता और भूमि के स्थान पर शत्रु सूर्य की राशि में बैठा है ३ १. तो माता के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति ४ २ १२ प्राप्त करेगा और मकानादि सुख प्राप्ति के स्थानों ५ श ११ में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और ६ सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने दसवें पिता स्थान में ८ १० स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता ७ ९ युक्त शक्ति से पिता स्थान में सफलता प्राप्त करेगा, नं. १८४ किन्तु धर्मेश होने के कारण कारबार तथा व्यवहार में ईमानदारी वरतेगा, परन्तु धर्म पालन के स्थान में कुछ कमजोरी इसलिये रहेगी कि अपने धर्म स्थान को नहीं देख रहा है, किन्तु फिर भी भाग्यवान् और सज्जनता की शक्ति प्राप्त करेगी और तीसरी उच्च दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिए शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रहेगा और मामा के पक्ष में शक्ति मिलेगी और दशवीं मित्र दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में मान और प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और बड़ा इज्जतदार समझा जायेगा। वृषभ लग्न में ५ शनि यदि कन्या का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है ३ १ ४ २ १२ तो संतान पक्ष में उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में चमत्कार पायेगा तथा धर्म को 4 ११ खूब समझने वाला बनेगा और बुद्धि योग से ६ भाग्य की श्रेष्ठ उन्नति प्राप्त करेगा और पिता तथा श ८ १० कारबार के पक्ष में विशेष रूचि के साथ काम ७ ९ करेगा और वाणी के द्वारा बड़ी नपी तुली बातें नं. १८५ कहकर जनता में प्रभाव पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में कुछ असंतोष युक्त सफलता मिलेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से गुरु की मीन राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये आमदनी के योग में कुछ असंतोष रहेगा
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११८ वृषभ लग्न का फलादेश और दसवीं मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन और जन की शक्ति प्राप्त करेगा बुद्धि तथा वाणी के योग से बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा धनवान् और भाग्यवान समझा जायेगा। अतः मान और इज्जत प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ६ शनि यदि तुला का शनि- छठें शत्रु स्थान पर उच्च राशि में बैठा है तो शत्रु पक्ष में बहुत भारी प्रभाव 3 १ ४ २ १२ रखेगा और कारबार राज-समाज के पक्ष में प्रभाव और सफलता प्राप्त करेगा तथा भाग्योन्नति के ५ ११ मार्ग में महान् प्रयत्न करते रहकर उन्नति और ६ १० प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म का दिखावा ८ ९ अधिक करेगा तथा पिता स्थान से कुछ वैमनस्यता श.
नं. १८६ युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से गुरु की मीन राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन की दिनचर्या में उन्नति के कार्य कारणों से कुछ फिकर मंदी रहेगी और कुछ परिश्रम के योग से पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से मंगल की मेष राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी प्राप्त रहेगी और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध कुछ अरूचिकर बनेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि' से चन्द्र की कर्क राशि में तीसरे भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में कुछ असंतोष प्राप्त करेगा और पराक्रम की अधिकता के कारणों से कुछ परेशानी भी अनुभव करेगा, किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये भाग्य और कर्म की शक्ति से प्रभाव की उन्नति करने का भारी प्रयत्न रखेगा। वृषभ लग्न में ७ शनि यदि वृश्चिक का शनि- सातवें स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ३ १ रोजगार के मार्ग में उन्नति प्राप्त करेगा तथा स्त्री ४ २ १२ स्थान में भाग्यवती स्त्री पायेगा, परन्तु शत्रु राशि ५ ११ पर होने के कारण रोजगार एवं गृहस्थ के संचालन में कुछ कठिनाइयाँ प्रतीत होंगी तथा पिता स्थान ८ श १० की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और राज-समाज ७ ९ में मान प्राप्त करेगा तथा उन्नति प्राप्त करेगा तथा नं. १८७ उन्नति प्राप्त करने के लिये नित्य प्रयत्नशील रहेगा और तीसरी दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा, इसलिये भाग्य की बलवान् शक्ति प्राप्त करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा तथा यथाशक्ति धर्म का पालन करेगा और
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भृगु संहिता ११९ सज्जनता युक्त व्यवहार के द्वारा गृहस्थ का संचालन रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता शोभा और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ नीरसता प्राप्त रहेगी तथा भूमि मकानादि के सुख में कुछ त्रुटि अनुभव होगी, किन्तु शोभा रहेगी। वृषभ लग्न में ८ शनि यदि धनु राशि का शनि- अष्टम आयु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो कुछ अड़चनों ३ के साथ-साथ आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा, क्योंकि ४ २ १२ भाग्येश और राज्येश ग्रह जहाँ बैठता है वहाँ ही ५ वृद्धि करता है। भाग्य स्थान में तथा पिता स्थान ६ में कमी एवं हानि प्राप्त करेगा और धर्म का पालन ८ १० नहीं कर सकेगा। तीसरी दृष्टि से स्वयं अपने दसम ७ ९श. स्थान कुम्भ राशि को देख रहा है, इसलिये पिता नं. १८८ और मान सम्मान के पक्ष में कुछ कमी के साथ सफलता प्राप्त करेगा तथा भाग्योन्नति के लिये महान् कष्ट साध्य कार्य करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिए धन की एवं जन की वृद्धि करने में लगा रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से बुध की कन्या राशि में सन्तान पक्ष को देख रहा है, इसलिए विद्या एवं सन्तान पक्ष में भाग्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु धर्मेश राज्येश के अष्टम में होने से उन्नति और यश प्राप्ति के मार्ग में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और अष्टम स्थान का शनि आयु की वृद्धि का योग बनाता है। वृषभ लग्न में ९ शनि यदि मकर का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो 3 भाग्य की महान् वृद्धि करेगा और मजबूत कर्म ४ २ १२ के मुकाबले में भाग्य और भगवान् को बड़ा मानेगा ५ ११ तथा पिता स्थान की शक्ति का गहरा आनन्द
६ प्राप्त करेगा और राज-समाज, कारबार के मार्ग ८ १८ श. में न्याय और ईमानदारी से काम करेगा और इसी ७ कारण से मान तथा सुयश प्राप्त करेगा और तीसरी नं. १८९ शत्रु दृष्टि से गुरु की मीन राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से अच्छा साधन का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में कुछ
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१२० वृषभ लग्न का फलादेश अरुचिकर सहायता प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की बहुत सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु पुरुषार्थ से उन्नति करने के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से कार्य करेगा और दसवीं उच्च दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य शक्ति के बल से शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव प्राप्त करेगा और मामा के स्थान में वृद्धि पायेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में बहुत सफलता प्राप्त करेगा और परिश्रम के योग से बहुत उन्नति करेगा। वृषभ लग्न में १० शनि यदि कुम्भ का शनि- दसम केन्द्र में पिता स्थान पर स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता स्थान की ३ १ ४ २ १२ महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज, कारबार के स्थान में भाग्य शक्ति के बल से भारी ११ श. इज्जत और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा उत्तम कर्मेष्ठी 5 बनेगा और धर्म-कर्म का यथार्थ पालन करेगा ८ १० तथा तीसरी नीच दृष्टि से मंगल की मेष राशि में ७ ९ खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के नं. १९० मार्ग में किसी कारण से कमजोरी या परेशानी प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ बुराई या कमी पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं सुख भवन को देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में और घरेलू सुख सम्बन्धों में कुछ-कुछ असन्तोष मानेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से मंगल की वृश्चिक राशि में स्त्री तथा रोजगार के स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ भाग्यवानी एवं कुछ नीरसता प्राप्त करेगा और दैनिक रोजगार के मार्ग में कुछ अकलसाहट समझा करेगा और ऊँचा भाग्यवान् समझा जायेगा तथा लौकिक उन्नति करने के लिए बड़ी भारी चेष्टा और भारी प्रयत्न करके बड़ी भारी उन्नति करेगा तथा बड़े-बड़े कारबार और बड़े-बड़े व्यापार आदि में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा। वृषभ लग्न में ११ शनि यदि मीन का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो आमदनी के ३ १ ४ १२ मार्ग में कुछ कठिन कार्यों के द्वारा विशेष सफलता श. प्राप्त करेगा और पिता पक्ष से भी लाभ की साधन ५ ११ शक्ति कुछ नीरसता से प्राप्त करेगा तथा ग्यारहवें ६ स्थान पर क्रूर ग्रह विशेष फलदाता होता है, इसलिये ८ १० भाग्य की शक्ति से किसी कार्य द्वारा विशेष लाभ ७ ९ प्राप्ति के साधन प्राप्त करेगा और धन की शक्ति नं. १९१ को बढ़ाने के लिए महान् कार्य करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देह स्थान को देख रहा है, इसलिये
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भृगु संहिता १२१ आमदनी के मार्ग से देह में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से, बुध की कन्या राशि में सन्तान पक्ष को देख रहा है, इसलिये सन्तान की शक्ति का सुन्दर सहयोग मिलेगा और बुद्धि विद्या के स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ कठिनाई अनुभव करेगा और पुरातत्व का कुछ दिक्कत से लाभ पायेगा। वृषभ लग्न में १२ शनि यदि मेष का शनि- बारहवें स्थान पर नीच राशि में बैठा है तो पिता स्थान की हानि प्राप्त ३ १श. ४ २ १२ करेगा, क्योंकि शनि का स्थान बल और राशि बल दोनों ही निषेध तथा कमजोर हो गये हैं, ५ १ १ इसलिये राज-समाज, कारबार, मान-प्रतिष्ठा सभी ६ में कमजोरी करेगा तथा खर्च में भी परेशानी रखेगा ८ १० और भाग्य में भी दुर्बलता प्राप्त करेगा, किन्तु ७ ९ भाग्य के स्वामी शनि की भाग्य स्थान पर स्वक्षेत्र नं. १९२ में दसवीं दृष्टि पड़ रही है, इसलिये भाग्य में कुछ शक्ति भी मिलेगी, किन्तु यश की कमी रहेगी और धर्म का पालन कमजोर रहेगा और भाग्य की वृद्धि के लिये दूसरे स्थानों का कष्ट साध्य संपर्क स्थापित करना पड़ेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में धन स्थान को देख रहा है, इसलिये धन और जन की कुछ सफलता प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और भाग्योन्नति के लिये कुछ अनुचित और गुप्त कार्य भी करना पड़ेगा तथा झगड़े-झंझटों में मार्ग से फायदा और प्रभाव प्राप्त करेगा, किन्तु राज्येश-भाग्येश के नीच हो जाने से भाग्य के अन्दर बड़ा असंतोष रहेगा। कष्ट, असत्य, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु वृषभ लग्न में १ राहु यदि वृषभ का राहु- केन्द्र में देह के स्थान
३ १ पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो देह की ४ २ रा. १२ सुन्दरता एवं स्वास्थ्य के अन्दर कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और देह में कुछ कष्ट तथा कुछ चिंता ५ ११ फिकर का योग प्राप्त करेगा तथा गुप्त चतुराई के बल से बड़ा मान प्राप्त करेगा और सत्य- w ८ १० असत्य की परवाह न करके अधिक स्वार्थ सिद्धि ९
नं. १९३ का ध्यान रखेगा तथा जीवन में कभी-कभी कोई मूर्छा या चोट प्राप्त करेगा तथा देह में किसी
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१२२ वृषभ लग्न का फलादेश प्रकार की कोई कमी महसूस करेगा और बहुत-सी दिक्कतों को सहने के बाद कुछ शक्ति और हिम्मत प्राप्त करेगा तथा शरीर का सामान्य कद रहेगा तथा अपने व्यक्तित्व की उन्नति करने के लिए बड़ी भारी युक्ति से काम करेगा। वृषभ लग्न में २ राहु यदि मिथुन का राहु- धन स्थान में उच्च राशि पर बैठा है तो बड़ी भारी चतुराई और युक्तियों ३ रा. १२ से धन की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धन के कोष में ४ २ कभी-कभी कुछ परेशानी का योग भी प्राप्त करेगा ५ ११ और धन के सम्बन्ध में प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और विवेकी बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये 4r ८ १० धन की वृद्धि करने के सम्बन्धों में कोई विशेष ७ ९ पोल अथवा मुफ्त का साधन प्राप्त कर लेने की नं. १९४ विवेक शक्ति से योजनायें बनाता रहेगा और कुछ कुटुम्ब के स्थान में वृद्धि और शक्ति रहेगी, किन्तु कोई संघर्ष भी प्राप्त करता रहेगा और धन की वृद्धि करने के लिए कठिन से कठिन कार्य को करने के लिए तत्पर रहेगा। वृषभ लग्न में ३ राहु यदि कर्क का राहु- तीसरे स्थान पर मुख्य शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो भाई के पक्ष में ३ १ ४ रा. २ १२ हानि या कष्ट के कारण उत्पन्न करेगा और पराक्रम शक्ति के स्थान में कभी महान् संकट अनुभव ५ ११ करेगा, किन्तु तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्ति ६ प्रदान करता है, इसलिये पराक्रम की वृद्धि करने ८ १० के लिए महान् हिम्मत से काम करेगा और कुछ ७ ९ परेशानियों से टकराने के बाद शक्ति प्राप्त करेगा नं. १९५ तथा हिम्मत पर काफी भरोसा रहेगा, किन्तु चन्द्रमा मन का स्वामी है और चन्द्रमा की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये फिर भी मन के अन्दर अपनी शक्ति पर कोई गुप्त कमजोरी अनुभव करेगा और जाहिर में प्रभाव रहेगा। वृषभ लग्न में ४ राहु यदि सिंह का राहु- केन्द्र में चौथे सुख स्थान ३ १ पर परम शत्रु सूर्य की राशि में बैठा है तो माता के ४ २ १२ स्थान में हानि या कष्ट का योग प्राप्त करेगा और ५ रा. सुख प्राप्ति के सम्बन्धों में बड़े-बड़े विघ्न और ११ अशांति के कारण प्राप्त करेगा तथा जन्म भूमि से ε ८ १० अलहदगी का योग प्राप्त करेगा और मकानादि रहने ७ ९ के स्थान में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और बहुत- नं. १९६ बहुत प्रकार के झंझट और दुखों को सहता रहेगा,
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भृगु संहिता १२३ क्योंकि महान् तेजस्वी सूर्य की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी भारी हिम्मत शक्ति के द्वारा बाद में कुछ सुख के साधनों को प्राप्त कर सकेगा और सुख प्राप्ति के मार्ग में गुप्त युक्तियों से धैर्य के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ५ राहु यदि कन्या का राहु-त्रिकोण में पंचम स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो बुद्धि के ३ १ अन्दर बड़ी भारी चतुराई से काम लेगा और दिमाग ४ २ १२ की शक्ति के अन्दर बड़ी गहरी और दूर की सूझ ५ ११ का योग प्राप्त करेगा तथा विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु कभी-कभी दिमाग के अन्दर कुछ रा ८ १० कमी और परेशानी के योग प्राप्त करेगा और ७ ९ संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करने पर भी संतान नं. १९७ का सहयोग प्राप्त करेगा और कन्या पर बैठा हुआ राहु स्वक्षेत्र के समान है, इसलिये बोलचाल के कार्यों में सत्य का पालन नहीं कर सकेगा तथा गुप्त विचारों के योग से काम लेता रहेगा तथा अधिक बोलने की आदत प्राप्त करेगा तथा कुछ नशा करना चाहेगा। वृषभ लग्न में ६ राहु यदि तुला का राहु- छठें शत्रु के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो शत्रु स्थान में 3 १ विजय प्राप्त करेगा, क्योंकि छठें स्थान पर क्रूर २ १२ ग्रह बलवान् हो जाते हैं, इसलिये गुप्त युक्तियों ५ ११ के बल से शत्रु पक्ष में तथा अनेक प्रकार की विघ्न बाधाओं के पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा ६ ८ १० तथा महान् चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर राहु ७रा. ९ बैठा है, इसलिये गुप्त विचारों की महान् शक्ति नं. १९८ और युक्तियों से प्रभाव युक्त बुद्धि प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष के कारणों से कभी-कभी कुछ थोड़ी-सी अशांति के योग भी प्राप्त करेगा, किन्तु धैर्य और हिम्मत की शक्ति से सदैव सहारा प्राप्त करता रहेगा और मामा के सुख में कुछ कमी करेगा। वृषभ लग्न में ७ राहु यदि वृश्चिक का राहु- केन्द्र में स्त्री स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो स्त्री पक्ष में कष्ट 3 १
४ २ १२ और कमी का योग प्राप्त करेगा और स्त्री स्थान के सुख सम्बन्धों की पूर्ति करने के लिये बहुत ५ ११ प्रकार की कठिनाईयों से तथा युक्तियों से काम ६ १० निकालेगा तथा भोगादिक पक्ष में कुछ अनुचित ८ रा. लाभ भी प्राप्त करेगा तथा कुछ इन्द्रिय विचार ७
नं. १९९ का कष्ट भी प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में
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१२४ वृषभ लग्न का फलादेश कुछ कष्ट और हानियों के योग प्राप्त करेगा तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये रोजगार की सफलता के लिये कठिनाईयों से तथा गुप्त युक्तियों से काम निकालेगा तथा बड़ा भारी परिश्रम करेगा। वृषभ लग्न में ८ राहु यदि धनु राशि का राहु- आयु के स्थान पर नीच राशि में बैठा है तो जीवन और आयु के पक्ष ३ १ में महान् संकटों का योग प्राप्त करेगा और ४ २ १२ दिनचर्या के अन्दर कुछ परेशानियों का सम्बन्ध ५ ११ प्राप्त करेगा तथा देवगुरु वृहस्पति की राशि पर ६ बैठा है, इसलिये बड़ी योग्यता और सज्जनता से ८ १० ७ ९रा. जीवन यापन करने के लिये कठिनाईयों से काम लेता रहेगा तथा पुरातत्व शक्ति में हानि प्राप्त नं. २०० करेगा और जीवन व्यतीत करने के सम्बन्धों में गुप्त और गहरी युक्तियों से तथा विदेश आदि के योग से काम चलाता रहेगा तथा गुप्त चिन्ता और कमी का योग प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ९ राहु यदि मकर का राहु- त्रिकोण में भाग्यस्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो भाग्य के 3 १ पक्ष में कुछ कमजोरी और दिखावे की विशेषता ४ २ १२ का योग प्राप्त करेगा, तदनुसार ही भाग्य की ५ ११ अन्दरूनी कुछ कमजोरी और दिखावे की शक्ति ६ प्राप्त करेगा तथा धर्म के स्थान में स्वार्थ सिद्धि ८ १० रा. का अधिक ध्यान रखेगा और भाग्य की वृद्धि ७ ९
नं. २०१ करने के लिये बड़ी भारी युक्ति से और धैर्य से काम लेता रहेगा। तथा भाग्य के पक्ष में कभी सुख और कभी दुःख का अनुभव करेगा तथा कठोर ग्रह शनि की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये भाग्योन्नति प्राप्त करने के लिये कठिन साधन करेगा। वृषभ लग्न में १० राहु यदि कुम्भ का राहु- दसम केन्द्र में पिता स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो पिता ३ १ ४ २ १२ के सम्बन्धों में कुछ परेशानी प्रदान करेगा और राज समाज, कारबार उन्नति के मार्ग में कुछ ५ ११ रा. दिक्कतें पैदा करेगा, क्योंकि कठोर ग्रह शनि की ६ राशि पर बैठा है, इसलिये कठिन कर्म के द्वारा ८ १० बड़ी युक्तियों से सफलता और मान प्राप्त करेगा ७ ९ तथा कारबार के मार्ग में कभी-कभी कुछ विशेष नं. २०२ संकट प्राप्त करने के बाद संतोष शक्ति मिलेगी और मान तथा इज्जत के स्थान में कुछ कमी महसूस करेगा और पिता
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भृगु संहिता १२५ स्थान की शक्ति को कुछ कठिनाईयों से सफल बनावेगा और गुप्त विचारों से उन्नति के मार्ग को सदैव सोचता रहेगा और आन्तरिक इज्जत के मुकाबले में जाहिरदारी श्रेष्ठ रहेगी। वृषभ लग्न में ११ राहु यदि मीन का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में
१ शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग ३ में कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त रहेंगी, किन्तु ग्यारहवें स्थान ४ २ १२ रा. में क्रूर ग्रह अधिक शक्तिशाली फलदाता होता है, ५ ११ इसलिये आमदनी या धन प्राप्त के स्थान में विशेष ६ सफलता प्राप्त करेगा और धन के लाभ सम्बन्धों में ८ १० नियत दायरे से अधिक प्राप्ति करने के लिये बहुत ७ ९
नं. २०३ अधिक युक्ति और परिश्रम करेगा और लाभ के मार्ग में न्याय के स्थान पर स्वार्थ सिद्धि का विशेष ध्यान रखेगा और कभी आमदनी के मार्ग में कठिन संकट का सामना करना पड़ेगा, किन्तु आखिर में सफलता शक्ति को अवश्य प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में १२ राहु यदि मेष का राहु-बारहवें स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में कुछ कष्ट ३ १ रा. १२ प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में ४ २ कुछ परेशानी अनुभव करेगा और खर्च संचालन ५ ११ शक्ति प्राप्त करने में कुछ युक्ति और परेशानी से ६ काम लेगा तथा कभी-कभी खर्च के सम्बन्धों में ८ १० विशेष रूकावट या दिक्कत पड़ने पर भी चतुराई ७ ९ से और युक्तियों से काम निकाल लेगा, किन्तु नं. २०४ फिर भी खर्च के मार्ग में कुछ असंतोष महसूस करेगा, किन्तु दिखावटी खर्च में कुछ प्रभाव रखेगा, परन्तु गरम ग्रह मंगल की राशि पर गरम ग्रह राहु बैठा है, इसलिये कठिन परिश्रम के द्वारा खर्च के मार्ग की शक्ति को सफल करेगा। कष्ट, कठिन परिश्रम, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु वृषभ लग्न में १ केतु यदि वृषभ का केतु- केन्द्र में देह के स्थान पर
१ मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो देह के स्थान में 3
४ २ के. १२ कभी चोट या घाव का निशान मिलेगा तथा देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और कुछ गुप्त ५ ११ चिन्ता का योग प्राप्त रहेगा तथा साथ ही साथ ६ ८ १० गुप्त हिम्मत भी खूब रहेगी और इसी कारण से जिद्द बाजी या हठयोग से काम करेगा और शुक्र ७ ९
नं. २०५ के घर में केतु है, इसलिये गुप्त चतुराई से सफलता
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१२६ वृषभ लग्न का फलादेश प्राप्त करेगा तथा देह की शक्ति और तेजी के कारणों पर प्रभाव डालेगा, किन्तु अकेला देह में बैठा होगा और दूसरे किसी भी ग्रह की इस पर दृष्टि भी नहीं होगी तो केतु के मस्तक न होने के कारण से अपने मंतव्य को ठीक तौर से समझा नहीं सकेगा। वृषभ लग्न में २ केतु यदि मिथुन का केतु- धन स्थान में नीच राशि ३ के १ पर बैठा है तो धन और जन के स्थान में महान् संकट ४ २ १२ का समय उपस्थित करेगा और धन की चिन्ता से कभी-कभी गम्भीर स्थिति के कारण इज्जत का बचाना ५ ११ मुश्किल हो जायेगा और धन की संग्रह शक्ति प्राप्त ६ ८ १० करने के लिए महान् कष्ट साध्य कर्म करना पड़ेगा ७ ९ तथा बड़ी दौड़ धूप करनी पड़ेगी और कुछ गुप्त रूप से शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा तथा धन जन के मार्ग में न्याय के मुकाबले स्वार्थ सिद्धि का विशेष ध्यान रखेगा, किन्तु नं. २०६
फिर भी धन-जन का पूरा सुख प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा। वृषभ लग्न में ३ केतु यदि कर्क का केतु- तीसरे भाई के स्थान पर मुख्य शत्रु चन्द्र की राशि में बैठा है तो भाई बहिन ३ १ के सम्बन्ध में कुछ हानि और कष्ट का योग प्राप्त के २ १२ करेगा तथा भाई-बहिन के सुख में विशेष कमी ५ ११ प्राप्त करेगा और पराक्रम सम्बन्धित कार्यों में ६ कुछ परेशानी अनुभव करेगा और अपनी बाहुबल ८ १० की शक्ति में अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा, ७ ९
नं. २०७ किन्तु तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह विशेष शक्तिशाली कार्य करने का द्योतक है, इसलिये अन्दरूनी कमजोरी के परवाह न करते हुए महान् धैर्य और हिम्मत की शक्ति से हठ योग के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा। परन्तु मन के अधिकारी चन्द्रमा की राशि पर केतु बैठा है; इसलिये अपने मन के अन्दर कुछ चिन्तित रहेगा। वृषभ लग्न में ४ केतु यदि सिंह का केतु- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो माता ३ १ १२ के सुख सम्बन्धों में भारी कमी प्राप्त करेगा और ४ २ जन्म स्थान से कुछ विछोह प्राप्त करेगा तथा घरेलू ५ के ११ सुख के साधनों में कमी और कष्ट का योग अनुभव ६ करेगा तथा रहने के निवास स्थान मकान जायदात ८ १० के मामलों में असंतोष रहेगा, महान् तेजस्वी सूर्य ७ की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये सुख प्राप्ति के नं. २०८ साधनों को प्राप्त करने के लिये महान् कठिनतम
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भृगु संहिता १२७ युक्ति एवं शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा और सुख प्राप्ति के स्थान में गुप्त धैर्य की शक्ति से तथा सहयोग से काम करेगा। वृषभ लग्न में ५ केतु यदि कन्या का केतु-त्रिकोण में संतान स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो संतान पक्ष में ३ १ १२ कुछ कमी या कष्ट अनुभव करेगा और विद्या ४ २ प्राप्त करने के समय बड़ी कठिनाईयों का योग ५ ११ अनुभव करेगा और बुद्धि तथा विद्या विकास में
के १० कुछ कमी प्राप्त करेगा किन्तु विवेकी बुध के घर ८ में स्वक्षेत्र के समान बैठा है, इसलिये विवेक की ७ ९
नं. २०९ अन्दरूनी शक्ति से बड़े साहस के योग से सफलता प्राप्त करेगा। किन्तु फिर भी केतु के मस्तक नहीं है, इसलिये अपने मन्तव्य को वाणी के द्वारा पूर्ण जाहिर करने में कुछ अन्दरूनी कमजोरी अनुभव करेगा तथा प्रकट में शक्ति प्रदर्शित करेगा, किन्तु फिर भी गुप्त धैर्य से काम करेगा। वृषभ लग्न में ६ केतु यदि तुला का केतु- छठें शत्रु स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो छठें स्थान में विशेष ३ १
४ २ १२ प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा और चतुराई के सहित महान् हिम्मत और गुप्त धैर्य के बल से ५ ११ अनेक प्रकार की विघ्न बाधाओं पर विजय प्राप्त ६ १० करेगा और प्रभाव की वृद्धि करने के लिये महान् ८ कठिन परिश्रम करेगा तथा कभी-कभी कुछ हिम्मत ७क. हारने की बात का योग प्राप्त होने पर भी जाहिर नं. २१० में बड़े साहस से ही काम करेगा। क्योंकि परम चतुर ग्रह आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी से बड़ी दिक्कतों को गहरी चतुराई से पार करेगा। वृषभ लग्न में ७ केतु यदि वृश्चिक का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो स्त्री m के पक्ष में हानि और कष्ट प्राप्त करेगा तथा प्रमेह ४ २ १२ या मूत्राशय में कुछ बीमारी प्राप्त करेगा और ५ ११ रोजगार के मार्ग में बड़ा संघर्ष और संकट का योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार की पूर्ति करने के ६ ८ के. १० लिये बड़ा कठिन परिश्रम और गुप्त धैर्य की शक्ति ९ से काम करेगा तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर नं. २११ केतु बैठा है, इसलिये कठिन परिश्रम करेगा तथा गृहस्थ और राजेगार के मार्ग में कभी-कभी महान् विफलता प्राप्त करेगा,
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१२८ वृषभ लग्न का फलादेश किन्तु अन्त में कुछ कमी के साथ गृहस्थ का पालन करेगा और आन्तरिक दुःख का अनुभव करेगा तथा कठिनाईयों से कुछ शक्ति प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में ८ केतु यदि धन का केतु-आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में उच्च का होकर गुरु की राशि में बैठा है ३ १ ४ २ १२ तो आयु स्थान की वृद्धि का योग प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति में कोई विशेष महत्व प्राप्त ५ ११ करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में विशेष मस्ती ६ का योग पायेगा और बड़ी लापरवाही से तथा ८ १०
७ ९क. बहादुरी तरीके से रहन-सहन रखेगा और जीवन
नं. २१२ निर्वाह करने के मार्ग में बड़ा भारी कठिन परिश्रम करेगा और कभी-कभी बहुत धन प्राप्त करेगा तथा जीवन में किसी अल्प संकट का सामना प्राप्त करेगा तथा अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा, किन्तु गुप्त धैर्य की महान् शक्ति से कोई विशेष लाभ का संयोग मुफ्त का-सा प्राप्त करेगा और देवगुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये शानदारी से रहेगा। वृषभ लग्न में ९ केतु यदि मकर का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य के स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो भाग्य ३ १ स्थान में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और कुछ ४ २ १२ कठिन परिश्रम के योग से भाग्य की उन्नति प्राप्त ५ ११ करेगा और भाग्य तथा धर्म के मार्ग में श्रद्धा की ६ कमी प्राप्त रहेगी तथा कुछ परिश्रम करेगा किन्तु ८ के धर्म का बाहरी रूप जितना अच्छा होगा उतना ७ ९ अन्दरूनी मजबूत नहीं होगा और इसी प्रकार भाग्य नं. २१३ के स्थान में प्रत्यक्ष के मुकाबले में अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा और भाग्य की वृद्धि के लिये बड़ी मजबूत हिम्मत शक्ति से काम करेगा, किन्तु स्थिर और कठोर ग्रह शनि की राशि पर कठोर ग्रह केतु बैठा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि के लिये महान् कठिन साधन करेगा। वृषभ लग्न में १० केतु यदि कुम्भ का केतु- दसम केन्द्र में पिता एवं ३ १ राज्य स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो ४ २ १२ पिता के सुख सम्बन्धों में कुछ बाधा उत्पन्न करेगा और राज-समाज के मान-सम्मान के स्थान में जाहिर ५ ११ के में प्रभाव अच्छा रखेगा और अन्दरूनी कुछ कमजोरी ६ ८ १० महसूस करेगा तथा स्वार्थ पूर्ति के लिये हठ योग ७ ९ से भी सफलता प्राप्त करेगा और कठोर ग्रह शनि नं. २१४ की राशि पर कठिन ग्रह केतु बैठा है, इसलिये
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भृगु संहिता १२९ उन्नति प्राप्त करने के लिये घोर कर्म करेगा। वृषभ लग्न में ११ केतु यदि मीन का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो आमदनी के मार्ग 3 १ में कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा। किन्तु गयारहवें ४ २ के स्थान पर क्रूर ग्रह अधिक बलशाली हो जाता है, ५ ११ इसलिये आमदनी और धन का लाभ करने के ६ लिये विशेष परिश्रम करेगा। किन्तु फिर भी कुछ ८ १० अन्दरूनी असंतोष प्राप्त रहेगा और स्वार्थ सिद्ध ७ ९ करने के लिये कुछ कड़ाई से काम निकालेगा नं. २१५ और कभी-कभी आमदनी के स्थान में कोई महान् संकट का सामना प्राप्त करने के बाद में सफलता मिलेगी और देवगुरु वृहस्पति की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में आदर्शवादिता से सफलता प्राप्त करेगा। वृषभ लग्न में १२ केतु यदि मेष का केतु- बारहवें खर्च के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो खर्च के ३ १ के मार्ग में बड़ी-बड़ी कठिनाईयों का योग प्राप्त करेगा ४ २ १२ और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी ५ ११ अनुभव करेगा और खर्च की संचालन शक्ति को प्राप्त करने के मार्ग में बड़ा भारी परिश्रम और uT ८ १० गुप्त धैर्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा, ७ ९ किन्तु खर्च के मार्ग में कुछ कमी और कुछ कष्ट नं. २१६ अनुभव करने से असंतोष रहेगा, किन्तु महान् दृढ़ता और हठ योग, जिद्द बाजी से काम निकलेगा और गरम ग्रह मंगल की राशि पर कठिन ग्रह केतु बैठा है, इसलिये कुछ अशांति युक्त कठिन कर्म की शक्ति से खर्च की शक्ति को प्राप्त करता रहेगा।
भृ.सं .- ९
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१३० वृषभ लग्न का फलादेश
- वृषभ लग्न समाप्तम् *
३ १ २
४ १२
५ ११
६ १०
८. ७ ९
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भृगु संहिता १३१
- मिथुन लग्न प्रारम्भ *
४ ३ २
4 १
६ १२
७ ११ ९ ८ १०
मिथुन लग्न का फलादेश प्रारम्भ नवग्रहों द्वारा भाग्य फल २ (कुण्डली नं० ३२४ तक में देखिए) AM S प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को १२ अति सरल और सत्ग रूप में जानने के लिये यह
११ अनुभव सिद्ध विषय आप के सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो ८ प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस-जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० २९७
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१३२ मिथुन लग्न का फलादेश से लेकर कुण्डली नं० ३२४ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो, उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता-बदलता है, उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत-भविष्य-वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर किसी ग्रह के साथ कोई ग्रह बैठा होगा या जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में ग्रह की दृष्टियाँ बतलाई हैं, उन-उन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २१७ से २२८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ३. जिस मास में सूर्य, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २१७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २१८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २१९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२३ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता १३३ १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश 1 कुण्डली नं. २२४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २२८ के अनुसार मालूम करिये। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २२९ से २४० तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २२९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३२ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २३३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश
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१३४ मिथुन लग्न का फलादेश कुण्डली नं. २३८ के अनुसार मालूप करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २३९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. २४० के अनुसार मालूम करिये। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २४१ से २५२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २४९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५२ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता १३५ (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २५३ से २६४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २५९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २६० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २६१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २६२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २६३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २६४ के अनुसार मालूम करिये। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २६५ से २७६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये।
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१३६ मिथुन लग्न का फलादेश ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २६५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २६६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २६७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २६८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २६९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २७० के अनुसार मालूम करिये। जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २७१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २७२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २७३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २७४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २७५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २७६ के अनुसार मालूम करिये। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २७७ से २८८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २७७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २७८ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता १३७
५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २७९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. २८८ के अनुसार मालूम करिये। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० २८९ से ३०० तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २८९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९२ के अनुसार मालूम करिये।
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१३८ मिथुन लग्न का फलादेश ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. २९९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०० के अनुसार मालूम करिये। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३०१ से ३१२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली
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भृगु संहिता १३९ नं. ३०७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३०९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३११ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१२ के अनुसार मालूम करिये। (३) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३१३ से ३२४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३१९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२१ के अनुसार मालूम करिये।
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१४० मिथुन लग्न का फलादेश १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३२४ के अनुसार मालूम करिये। भाई बहन, पराक्रम (प्रभाव) स्थानपति सूर्य मिथुन लग्न में १ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के तेजस्वी ४ २ 4 ३ सू. कर्म शक्ति के योग से मान प्राप्त करेगा और १ अपने को हमेशा ऊँचा रखने का कार्य करेगा ६ १२ और भाई बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और अपनी देह के पुरुषार्थ कर्म से महान् प्रभाव प्राप्त करेगा ७ ९ ११ तथा बड़ी भारी हिम्मत रखने वाला साहसी बनेगा ८ १० और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की धनु राशि में स्त्री नं. २१७ स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री के अन्दर प्रभाव और पुरुषार्थ शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के भोगादिक पक्ष में पुरुषार्थ शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में पुरुषार्थ कर्म के योग से सफलता प्राप्त करेगा और इसी सफलता के कारण प्रभाव शक्ति प्राप्त रहेगी और देह के अन्दर बड़ी हिम्मत और स्फूर्ति तथा क्रोध, प्रभाव इत्यादि शक्ति भी प्राप्त रहेगी। मिथुन लग्न में २ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- धन भवन में मित्र चन्द्र
२ की राशि पर बैठा है तो धन का कोष स्थान ४ सू. ५ ३ बन्धन का स्थान माना जाता है, इसलिये भाई १ बहन के सुख सम्बन्धों में कमी करेगा और पुरुषार्थ ६ १२ कर्म के योग से धन की वृद्धि करेगा और तेजस्वी कर्म शक्ति के योग से धन की वृद्धि और कुटुम्ब ७ ९ ११ की शक्ति प्राप्त करेगा। धन की वृद्धि करने के ८ १० कारणों से देह के पुरुषार्थ में कुछ कमजोरी प्राप्त नं. २१८ रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति अनुभव करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ कुछ अरुचिकर एवं असंतोषकर रूप में प्राप्त करेगा और धन की वृद्धि करने के कारणों से प्रभाव और हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा।
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भृगु संहिता १४१ मिथुन लग्न में ३ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- पराक्रम स्थान पर स्वयं अपने घर में स्वक्षेत्री बैठा है तो पराक्रम की महान् ४ २ ,सू. ३ प्रभाव रखेगा तथा भाई की शक्ति का योग प्राप्त १ करेगा और अपने पुरुषार्थ से महान् भरोसा और ६ १२ हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि ७ ९ ११ से शनि की कुम्भ राशि में भाग्य स्थान को देख ८ १० रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ असन्तोष का योग नं. २१९ बनेगा और धर्म के मार्ग में कुछ मतभेद समझने की वजह से अपने अलग ढंग से ही काम लेगा और बहादुर स्वभाव होने के कारण से भाग्य की कुछ कमजोरी समझते रहने पर भी परवाह नहीं करेगा, परन्तु महान् तेजस्वी सूर्य का तीसरे स्थान पर स्वक्षेत्री होने के कारण से कठिन कार्य की पूर्ति करने में तत्पर रहेगा। मिथुन लग्न में ४ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- चौथे केन्द्र में माता के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो तेजस्वी ४ २ 4 ३ पराक्रम शक्ति के द्वारा घरेलू सुख के साधनों में महानता प्राप्त करेगा और भाई-बहिन का सुख ६ सू १२ और मान प्राप्त करेगा और माता के स्थान में ७ ९ ११ शक्ति प्राप्त करेगा तथा रहने सहने के स्थान में ८ १० सुख शक्ति और प्रभाव पायेगा तथा मकान भूमि नं. २२० आदि की शक्ति प्राप्त करेगा और पराक्रम की सफलता से सुख प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से पराक्रम शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा और राज समाज में मान और प्रभाव पायेगा तथा कारबार की सफलता शक्ति का प्रभाव प्राप्त करेगा और सुख पूर्वक परिश्रम करके उन्नति करेगा। मिथुन लग्न में ५ सूर्य यदि तुला का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण में सन्तान २ एवं विद्या स्थान पर नीच राशि में बैठा है तो 4 ३ सन्तान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा और विद्या में कमजोरी पायेगा तथा हिम्मत और बाहुबल की १२ पराक्रम-शक्ति में कमजोरी अनुभव करेगा और ७सू. ९ ११ बोल-चाल में कुछ छिपाव शक्ति से काम लेगा ८ १० और सातवीं उच्च दृष्टि से मंगल की मेष राशि में नं. २२१ लाभ के स्थान को देख रहा है, इसलिये बुद्धि
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१४२ मिथुन लग्न का फलादेश और बाहुबल की शक्ति से धन का विशेष लाभ करेगा और धन का लाभ अधिक करने के मार्ग में झूठ और छिपाव की शक्ति से काम करना पड़ेगा, क्योंकि बुद्धि स्थान पर सूर्य नीच राशि में बैठकर लाभ स्थान को उच्च भावना से देख रहा है, इसलिए लाभ के मुकाबले में शब्द शक्ति के सत्य असत्य की परवाह नहीं करेगा तथा लाभ के मार्ग में प्रभाव प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ६ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में पराक्रम ४ २ ५ ३ की शक्ति के द्वारा महान् प्रभाव प्राप्त करेगा, क्योंकि छठे घर में गरम ग्रह विशेष महत्व दायक ६ १२ कार्य करते हैं, इसलिये विपक्षियों के सामने सदैव ७ ९ ११ विजय प्राप्त करेगा और भाई-बहिन के सुख ८ सू. १० सम्बन्धों में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और पराक्रम शक्ति से कोई परिश्रमी प्रभाव का कार्य करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में खर्च स्थान को देख नं. २२२
रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ असन्तोष रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता मानेगा, परन्तु खर्च के मार्ग में शक्ति प्राप्त करने के लिये कठिन परिश्रम करेगा और प्रभाव शक्ति से भी काम करेगा। मिथुन लग्न में ७ सूर्य यदि धनु का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो तेजस्वी कर्म ४ २ 4 ३ १ शक्ति के द्वारा गृहस्थ में महानता प्राप्त करेगा और स्त्री के स्थान में प्रभाव और शक्ति प्राप्त १२ करेगा तथा रोजगार के मार्ग में प्रभावशाली परिश्रम ७ ९ सू. ११ के द्वारा सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा और ८ १० भाई बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं नं. २२३ मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिए परिश्रम की सफलता से देह में प्रभाव प्राप्त करेगा और गृहस्थ के दैनिक कार्य के मार्गों में बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम लेगा तथा स्त्री के अन्दर कुछ तेजी और गर्मी का स्वभाव प्राप्त करेगा तथा भोगादिक पक्ष में शक्ति पायेगा। यदि मकर का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में हानि या कमी प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में असफलता और कमजोरी प्राप्त करेगा तथा कठिन परिश्रम करने के कारणों से जीवन में अशांति अनुभव करेगा और अपने
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भृगु रांहिता १४३ मिथुन लग्न में ८ सूर्य बाहुबल के कार्यों में निराशाओं के कारणों से कभी-कभी अधिक हिम्मत हार जायेगा और ४ २ 4 ३ पुरातत्व सम्बन्ध की कुछ नीरसता युक्त शक्ति १ प्राप्त करेगा और चन्द्रमा की कर्क राशि में धन ६ १२ भवन को सातवीं मित्र दृष्टि से देख रहा है, इसलिये
७ ९ ११ धन की वृद्धि करने के लिए थकान पाने वाले परिश्रम के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा ८ १०सू. नं. २२४ कुटुम्ब में कुछ शक्ति और जीवन में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा, किन्तु कुछ उत्सास हीन रहेगा। मिथुन लग्न में ९ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- नवम त्रिकोण में भाग्य स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो भाई ४ २ बहन का कुछ अरुचिकर संयोग प्राप्त करेगा और ५ ३ १ अपने बाहुबल के कठिन कार्य से भाग्य मे कुछ ६ १२ वृद्धि प्राप्त करेगा तथा कुछ भेद भावना रखते हुए धर्म का पालन करेगा और सातवीं स्वक्षेत्री ७ ९ दृष्टि से स्वयं अपनी सिंह राशि में पराक्रम स्थान ८ १० सू को देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ अरुचिकर नं. २२५ सहयोग शक्ति से पराक्रम स्थान की सफलता प्राप्त करेगा और महान् हिम्मत शक्ति से उत्साह पूर्वक भाग्य की वृद्धि के कार्य में लाभ पाता रहेगा और भाई के संयोग से किसी प्रकार की सहायता प्राप्त करेगा और पराक्रम तथा भाग्य के संयोग से कुछ प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ तेजस्वी कर्म के द्वारा उन्नति पर पहुँचेगा। मिथुन लग्न में १० सूर्य यदि मीन का सूर्य- दसम केन्द्र में पिता स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो पराक्रम ४ २ शक्ति के द्वारा पिता स्थान की वृद्धि करेगा और ५ ३ १ पिता की शक्ति से सुन्दर संयोग प्राप्त करेगा और ६ १२ सू. राजसमाज के मार्ग में मान प्राप्त करेगा तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में सफलता और प्रभाव ७ ९ ११ प्राप्त करेगा तथा भाई-बहिन की प्रभाव शक्ति ८ १० का योग अनुकूल रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. २२६ बुध की कन्या राशि में चौथे सुख भवन को देख रहा है, इसलिए सुख के साधनों की पराक्रम और प्रभाव शक्ति से वृद्धि करेगा और माता के स्थान में अनुकूल शक्ति प्राप्त करेगा और बाहुबल से लौकिक उन्नति के श्रेष्ठ साधन और सम्मान प्राप्त करेगा। यदि मेष का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च राशि पर बैठा है तो
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१४४ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में ११ सूर्य पराक्रम शक्ति के संयोग से धन का विशेष लाभ और उत्तम आमदनी प्राप्त करेगा तथा भाई-बहिन X २ 4 ३ १ सू. की शक्ति का विशेष लाभ प्राप्त करेगा और आमदनी तथा लाभ के योग से बाहुबल की शक्ति ६ १२ में विशेष उन्नति और विशेष उत्साह प्राप्त करेगा ७ ९ ११ और सातवीं नीच दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में १० संतान घर को देख रहा है, इसलिए संतान पक्ष ८
नं. २२७ की सुख शक्ति में कमी और बाधायें प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमजोरी या कुछ रुकावटें प्राप्त करेगा और लाभ की दृष्टिकोण से बोलचाल के अन्दर कुछ रूखेपन से काम निकालेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में १२ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- बारहवें खर्च के स्थान
२ सू पर शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है तो भाई बहिन ४ के सुख सम्बन्धों में हानि प्राप्त करेगा और खर्चे ५ ३ १ की अधिकता के कारणों से हिम्मत और पराक्रम ६ १२ शक्ति में कमजोरी प्राप्त करेगा और बाहरी दूसरे स्थान में परिश्रम के योग से कुछ सफलता प्राप्त ७ ९ ११ करेगा और खर्चा अधिक करने के वेग को रोक १० V नहीं सकेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से मंगल की नं. २२८ वृश्चिक राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव और मिठास की शक्ति से काम करेगा, किन्तु अपने अन्दर की कमजोरी को छिपा कर जाहिर में हिम्मत शक्ति से तथा परिश्रम से सफलता पायेगा और पराक्रम स्थान पति सूर्य खर्च स्थान में बैठा है, इसलिए अपने अन्दर उत्साह की कमी का अनुभव करेगा। धन, जन, बंधन तथा मनस्थानपति-चंद्र
मिथुन लग्न में १ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- प्रथम केन्द्र में तन स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो देह के अन्दर है २ धनवान प्रतीत होने के सुन्दर लक्षण प्राप्त करेगा ५ ३ चं. १ और देह के कार्य से धन की शक्ति प्राप्त करेगा
१२ तथा धन प्राप्ति के सम्बन्ध में तन मन की सुन्दर शक्ति का प्रयोग करेगा, किन्तु देह के कार्य क्रम ७ ९ ११ में कुछ अधिक घिराव-सा रहेगा और कुटुम्ब शक्ति ८ १० का योग सुन्दर प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि नं. २२९ से गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है,
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भृगु संहिता १४५ इसलिये स्त्री के पक्ष में सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग से धन प्राप्त करेगा तथा इज्जतदार व धनवान् समझा जायेगा तथा लौकिक और गृहस्थिक सफलता के लिये विशेष प्रयत्न करेगा। मिथुन लग्न में २ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- दूसरे धन के स्थान में स्वक्षेत्री होकर अपने स्थान में ही बैठा है तो धन ४ चं २ ५ ३ की संचित शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त करेगा १ और कुटुम्ब का अच्छा सहयोग प्राप्त करेगा तथा ६ १२ धन की वृद्धि करने के लिये मन की संपूर्ण शक्ति का प्रयोग करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि ७ ९ ११ की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, ८ १० इसलिये जीवन की दिनचर्या में धन के कारणों नं. २३० से कुछ परेशानी अनुभव करेगा और सदैव धनोन्नति के चिन्तन में ही अपने मन को लगाये रख कर उन्नति प्राप्त करेगा और पुरातत्व का कुछ नीरसता युक्त लाभ प्राप्त करेगा क्योंकि धनेश कुछ बन्धन का-सा कार्य करता है, फिर भी धन जन के कारणों से इज्जतदार समझा जायेगा। मिथुन लग्न में ३ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- तीसरे भाई के स्थान
४ २ पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो भाई-बहिन ५चं 3 १ के स्थान में कुछ बन्धन युक्त सुन्दरता प्राप्त करेगा और मनोयोग के पुरुषार्थ से धन संचय करने के ६ १२ मार्ग में सदैव लगा रहेगा, इसलिये परिश्रम की ७ ९ ११ सफलता से इज्जत और प्रसन्नता प्राप्त करेगा और ८ १० सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में भाग्य नं. २३१ स्थान को देख रहा है, इसलिए भाग्य की उन्नति के स्थान में कुछ नीरसता अनुभव करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ अरूचि रखेगा तथा धर्म के मुकाबले में धन का महत्व अधिक समझेगा और कीमती पुरुषार्थ कर्म के द्वारा धन की शक्ति एवं बड़ी प्रतिष्ठा और प्रभाव पायेगा। मिथुन लग्न में ४ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- चौथे केन्द्र में माता के
२ स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो धनेश ४ ५ ३ कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ रुकावट डालेगा किन्तु माता ६ चं. १२ के स्थान में धन का आनंद प्राप्त करेगा और ७ ९ ११ मकान जायदाद की शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब ८ १० तथा घरेलू सुख प्राप्त होगा और घरेलू सुख में नं. २३२ कुछ सुन्दरता और कुछ बन्धन प्रतीत होगा और भृ.सं .- १०
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१४६ मिथुन लग्न का फलादेश सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मित्र राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिए पिता स्थान से सुन्दर सहायक शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में मनोयोग से तथा धन की शक्ति से उन्नति का योग प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण में प्रभाव प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ५ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण में सन्तान स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है ४ २ ५ ३ तो धनेश कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये सन्तान स्थान के सुख सम्बन्धों में कुछ रुकावट ६ १२ करेगा और विद्या बुद्धि में सुन्दरता प्राप्त करेगा ७चं. ९ ११ और मन बुद्धि के योग से धन की शक्ति प्राप्त ८ १० करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से मंगल की मेष
की आमदनी और धन लाभ प्राप्त करने में विशेष रूचि के योग से सफलता नं. २३३ राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये धन
प्राप्त करेगा तथा बातचीत के अन्दर बड़े जवाव की बातों से लाभ प्राप्त करेगा और स्वार्थ युक्त बुद्धि से चतुराई के द्वारा इज्जत प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ६ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- छठे शत्रु स्थान में नीच राशि पर मंगल के घर में बैठा है तो कुछ ४ २ ५ ३ मनोयोग के कठिन परिश्रम से धन की प्राप्ति करेगा। धन और जन की हानि तथा संकट भी १२ प्राप्त करेगा और धन जन के अभाव के कारणों ७ ९ ११ से मानसिक परेशानी का अनुभव करेगा और ८च. १० शत्रु स्थान में विपक्षियों के द्वारा कुछ चिन्ता रहेगी तथा उनसे धन की हानि का योग प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में खर्च स्थान को देख रहा नं. २३४
है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक करेगा। इसी कारण धन संचय नहीं कर सकेगा और कुछ परतन्त्रता से धन प्राप्त करेगा तथा बाहरी स्थानों में शक्ति प्राप्त करेगा और धन के मार्ग में कुछ अपयश भी मिलता रहेगा। यदि धन का चन्द्र- सातवें केन्द्र में स्त्री स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो धन स्थान पति ग्रह कुछ बन्धन का कार्य भी करता है, इसलिये स्त्री पक्ष के सुख साधनों में कुछ दिक्कतें, रुकावट और सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा शादी के बाद धन की उन्नति पायेगा और रोजगार के मार्ग में मनोबल की शक्ति से खूब धन प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में कुटुम्ब का
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भृगु संहिता १४७ मिथुन लग्न में ७ चन्द्र आनन्द प्राप्त करेगा और भोगादिक पक्ष में अधिक रूचि रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की ४ २ मिथुन राशि में देह स्थान को देख रहा है, इसलिये ५ ३ १ देह में सुन्दरता और इज्जत प्राप्त करेगा तथा धन ६ १२ की वृद्धि करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेगा और शोभा युक्त कार्य करेगा। ७ ९ चं ११ यदि मकर का चन्द्र- आठवें मृत्यु स्थान में ८ १० शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में भारी कमी अनुभव करेगा और कुटुम्ब में अशांति मिथुन लग्न में ८ चन्द्र के कारण प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का कुछ नं. २३५
४ २ नीरसता युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और ५ ३ आयु स्थान में तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ
६ शक्ति एवं कुछ परेशानी और इज्जत प्राप्त करेगा १२ तथा मानसिक अशांति प्राप्त रहेगी और सातवीं ७ ९ ११ दृष्टि से स्वयं कर्क राशि में धन भवन में स्वक्षेत्र ८ १०चं. को देख रहा है, इसलिये मनोयोग के कठिन मार्ग नं. २३६ से धन की पूर्ति के साधन प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की कुछ अधूरी नीरसता युक्त शक्ति के साधन प्राप्त करेगा, किन्तु धन और कुटुम्ब की उन्नति करने के लिए सदैव भारी परिश्रम करता रहेगा। मिथुन लग्न में ९ चन्द्र यदि कुम्भ-का चन्द्र- नवम त्रिकोण में भाग्य स्थान पर शत्रु शनि की राशि में बैठा है तो भाग्य ४ २ के स्थान में कुछ नीरसतायुक्त मार्ग से धन की 4 ३ वृद्धि का योग प्राप्त करेगा और भाग्यवान् माना ६ १२ जायेगा तथा धन की वृद्धि के लिए धर्म का पालन करेगा अर्थात् स्वार्थ युक्त धर्म का पालन करेगा ७ ९ ११ चं. और सातवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में ८ १० भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई- नं. २३७ बहिन का सुन्दर योग प्राप्त करेगा और पराक्रम की सुन्दर शक्ति से धन की प्राप्ति करेगा और मनोयोग से उत्तम मार्ग का अनुसरण करते हुए भाग्य और भगवान् पर भरोसा करेगा, इसलिये मान और इज्जत तथा यश प्राप्त करेगा और धन की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा जन शक्ति के द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान में बड़ी हिम्मत शक्ति प्राप्त रहेगी। यदि मीन का चन्द्र- दशम केन्द्र में पिता स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान से धन का सुन्दर लाभ योग प्राप्त करेगा और
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१४८ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में १० चन्द्र कुटुम्ब की सुन्दर शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में बड़ी इज्जत प्राप्त करेगा ४ २ ५ ३ और धन की लागत लगाकर व्यापार कार्य में १ उन्नति करके धन की विशेष वृद्धि करेगा और १२ चं मनोयोग की शक्ति से अनेक प्रकार की सफलता और वैभव प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से ७ ९ ११ बुध की कन्या राशि में सुख स्थान को देख रहा ८ १०
नं. २३८ है, इसलिये माता के पक्ष में तथा घरेलू सुख प्राप्ति के साधनों में सफलता प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में और धन उन्नति के सम्बन्धों में कुछ घिराव-सा रहेगा क्योंकि धनेश कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता है। मिथुन लग्न में ११ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो मनोयोग की ४ २ शक्ति से धन का विशेष लाभ प्राप्त करेगा और 4 ३ १ चं. आमदनी के मार्ग में मन की महान् लवलीनता ६ १२ रहेगी तथा धन की शक्ति से धन की वृद्धि के कारण प्राप्त रहेंगे और कुटुम्ब का सुन्दर लाभ ७ ९ ११ रहेगा और मन को प्रसन्न करने के सम्बन्ध में ८ १० अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होंगे और सातवीं नं. २३९ सामान्य मित्र की दृष्टि से शुक्र की तुला राशि को सन्तान स्थान में देख रहा है, इसलिए संतान की कुंछ सहयोग शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि वाणी आदि के पक्ष में धन और मन की शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा इज्जतदार समझा जायेगा। मिथुन लग्न में १२ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- बारहवें खर्च स्थान में उच्च राशि पर बैठा है तो धन का बहुत अधिक ४ २चं खर्च करेगा और धन के कोष में कमी प्राप्त ५ ३ १ रहेगी और बाहरी स्थानों में धन प्राप्ति के सुन्दर ६ १२ साधन मिलेंगे और कुटुम्ब शक्ति कमजोर रहेगी और सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल ७ ९ ११ की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु ८ १० पक्ष में कुछ नरमाई से काम लेना पड़ेगा और नं. २४० मामा के पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी और रोगादिक झगड़े-झंझटों के सम्बन्ध में मन को कुछ अशांति रहेगी, इसलिये प्रभाव स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी और खर्च की बहुतायत को रोक नहीं सकेगा परन्तु बाहरी स्थानों में बड़ी भारी इज्जत और मान प्रतिष्ठा रहेगी।
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भृगु संहिता १४९ आमद, शत्रु, रोग तथा परिश्रम, लाभस्थानपति-मंगल मिथुन लग्न में १ मंगल यदि मिथुन का मंगल- प्रथम केन्द्र में देह स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के ४ २ ५ ३ मं. अन्दर कुछ गरम रोग प्राप्त करेगा और देह के १ परिश्रम से धन का लाभ प्राप्त करेगा तथा लाभ ६ १२ के सम्बन्ध में कुछ झंझट-झगड़े का-सा योग प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में देह के द्वारा विजय ७ ९ ११ और प्रभाव पायेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से माता १० के स्थान को देख रहा है, इसलिये माता तथा नं. २४१ सुख सम्बन्धों के पक्ष में कुछ झंझट और लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में भी कुछ झगड़ा तथा कुछ रोग प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम के योग से लाभ प्राप्त करेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा जीवन में प्रभाव रखेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और लाभ सम्बन्ध के मार्ग में हेकड़ी और तेजी से कार्य लेगा और क्रोधी स्वभाव का बनेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से खूब लाभ प्राप्त करेगा तथा आमदनी की वृद्धि करने के लिए बड़ी भारी दौड़-धूप एवं परिश्रम करेगा। मिथुन लग्न में २ मंगल यदि कर्क का मंगल- धन भवन में नीच राशि का मित्र चन्द्र के स्थान पर बैठा है तो धन ४ म २ के कोष में हानि और संकट प्राप्त करेगा तथा ५ ३ १ परिश्रम और कपट के योग से धन संचय करने ६ १२ में लगा रहेगा और कुटुम्ब की हानि प्राप्त करेगा और विपक्षी शत्रुओं के झगड़े-झंझटों से भी धन ७ ९ ११ की हानि का योग बनेगा तथा जूआ-सट्टा आदि ८ १० कार्यों से धन का नुकसान होगा और चौथी सामान्य नं. २४२ मित्र की दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में संतान स्थान को देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ क्लेशयुक्त शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या वृद्धि के स्थान में कुछ हठयोग और छिपाव शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु में वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में आग्वस्थान
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१५० मिथुन लग्न का फलादेश को देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और यश की कमी रहेगी तथा धर्म के स्थान में सच्ची श्रद्धा की अधिक कमी रहेगी और गुप्त युक्ति पर भरोसा रखेगा तथा धन की वृद्धि करने के लिये कठिन से कठिन कार्य को करने में तत्पर रहेगा। मिथुन लग्न में ३ मंगल यदि सिंह का मंगल- भाई पराक्रम तीसरे स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है नो भाई ४ २ ५म. बहिन के पक्ष में कुछ झंझट युक्त शक्ति से लाभ ३ प्राप्त करेगा और परिश्रम का स्वामी गरम ग्रह ६ १२ पराक्रम के स्थान पर बैठकर अपनी चौथी दृष्टि से स्वयं अपने शत्रु स्थान के क्षेत्र की वृश्चिक ७ ९ ११ राशि को देख रहा है, इसलिये महान् परिश्रम ८ १० करेगा और परिश्रम की शक्ति से शत्रु पक्ष में नं. २४३ महान् प्रभाव प्राप्त करेगा तथा मामा के पक्ष में शक्ति प्राप्त रहेगी और प्रभाव तथा परिश्रम की शक्ति से खूब लाभ प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय और लाभ दोनों चीजें प्राप्त करेगा और रोग पर तथा झगड़े-झंझटों पर बड़ी बहादुरी और हिम्मत से सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु शनि की कुम्भ राशि में सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य पर और धर्म पर कुछ नीरसता युक्त रूप में थोड़ा-सा भरोसा रखेगा और मित्र गुरु की मीन राशि में आठवीं दृष्टि से पिता के दसवें स्थान को देख रहा है, इसलिए पिता के पक्ष से तथा राज- समाज, कारबार के पक्ष से धन का लाभ तथा मान, प्रभाव और सफलता, वैभव आदि परिश्रम शक्ति के योग से प्राप्त करेगा, क्योंकि दसवें स्थान पर मंगल की दृष्टि बहुत श्रेष्ठ फल प्रदान करती है। मिथुन लग्न में ४ मंगल यदि कन्या का मंगल- चौथे केन्द्र में माता स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो माता ४ २ के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त मार्ग से लाभ ५ ३ प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष से घर बैठे लाभ प्राप्त ६ मं. १२ करेगा और घरेलू रहने सहने के सुख भवन में कुछ झंझट या परेशानी के साथ लाभ शक्ति ७ ११ प्राप्त करेगा और मकानादि से लाभ प्राप्त करेगा १० क्योंकि आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि नं. २४४ को लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये अपने स्थान से ही आमदनी की शक्ति प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से मित्र गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिए स्त्री पक्ष में कुछ गरम रोग और झंझट युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और सप्तम स्थान पर
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भृगु संहिता १५१ रोगेश की दृष्टि है, इसलिये कभी-कभी मूत्रेन्द्रिय विकार प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में राज्य स्थान को देख रहा है, इसलिये राज-समाज, कारबार एवं पिता स्थान में कुछ परिश्रम के योग से लाभ और मान तथा प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा, क्योंकि दसवें स्थान पर मंगल की दृष्टि श्रेष्ठ फल दाता होती है और शत्रु स्थानपति मंगल की लाभ स्थान पर बलवान पूर्ण दृष्टि पड़ रही है, इसलिये झगड़े-झंझटों के मार्ग से खूब लाभ प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ५ मंगल यदि तुला का मंगल- पंचम त्रिकोण में सन्तान व विद्या के स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की ४ २ राशि में बैठा है तो सन्तान पक्ष में कुछ वैमनस्यता 4 3 १ एवं कुछ रोग झंझट आदि मार्ग से लाभ प्राप्त ६ १२ करेगा और विद्या स्थान में कुछ कठिन परिश्रम के योग से लाभ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं ७म. ९ ११ दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि को लाभ स्थान में ८ १० देख रहा है, इसलिए परिश्रमी और कुछ छिपाव नं. २४५ की बुद्धि योग से खूब लाभ और आमदनी प्राप्त करेगा और चौथी उच्च दृष्टि से शत्रु शनि की मकर राशि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये कुछ झंझट युक्त मार्ग से आयु की वृद्धि और शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा जीवन में प्रभाव रहेगा और आठवीं दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिए खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों में कुछ परिश्रम के वृद्धि योग से लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और आठवें स्थान का सम्बन्ध कुछ गुदा और पेट का भी होता है, इसलिये कुछ उदर विकार प्राप्त करेगा, क्योंकि रोगेश मंगल की उस पर दृष्टि पड़ रही है तथा रोगेश पंचम में बैठा है, इसलिए बुद्धि के झंझट युक्त कर्म से धन का विशेष लाभ पायेगा। मिथुन लग्न में ६ मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- छठें गत्रु स्थान में अपनी ही राशि का होकर स्वक्षेत्र में बैठा है तो २ शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव शक्ति रखेगा और बड़े ५ ३ १ भारी परिश्रम के मार्ग से प्रभाव योग के द्वारा
१२ आमदनी और लाभ प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष से तथा रोग व झगड़े-झंझटों के मार्ग से भी लाभ ७ ९ ११ योग प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से शत्रु शनि ८ म. १० की कुम्भ राशि में भाग्यस्थान को देख रहा है, नं. २४६ इसलिए भाग्य और धर्म के पक्ष में कुछ अरूचि
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१५२ मिथुन लग्न का फलादेश और कमी का योग प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में खर्च स्थान को देख रहा है, इसलिये गर्न्गा खूब करेगा, किन्तु कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों से लाभ की शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से मित्र बुध की मिथुन राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ गरम रोग तथा कुछ परिश्रम झंझट आदि प्राप्त करेगा और प्रभाव की वृद्धि करने के सम्बन्धों में कुछ हठ योग के कारणों से आमदनी के मार्ग में नफा-नुकसान भी करेगा क्योंकि लाभेश मंगल गरम ग्रह है और खिलाफत के स्थान पर बलवान् होकर बैठा है, इसलिये परिश्रम और झंझट के मार्ग से ही धन और प्रभाव की वृद्धि करेगा। मिथुन लग्न में ७ मंगल यदि धनु का मंगल- सातवें केन्द्र में मित्र गुरु की राशि में स्त्री स्थान पर बैठा है तो कुछ झंझट ४ २ ५ युक्त मार्ग के द्वारा रोजगार की लाईन में विशेष ३ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में कुछ ६ १२ झंझट, रोग, मतभेद इत्यादि के सहित लाभ योग ७ ९ मं. ११ प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में परिश्रम की शक्ति से उन्नति प्राप्त करेगा और मूत्रेन्द्रिय में ८ १०
नं. २४७ कुछ विकार प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से मित्र गुरु की मीन राशि में पिता स्थान को देख रहा है, किन्तु मंगल को षष्ठेश होने का दोष है और लाभेश होने का गुण है, इसलिए पिता के स्थान में कुछ झंझट युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और राज समाज में मान पायेगा तथा कारबार उन्नति के स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से मित्र बुध की मिथुन राशि में देह के स्थान.को देख रहा है, इसलिये देह के परिश्रम से लाभ पायेगा किन्तु देह में कुछ रक्त या गरमी का विकार पायेगा और आठवीं नीच दृष्टि से कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन संग्रह की कमी के कारण से दुःख अनुभव करेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ क्लेश प्राप्त करेगा और कुछ गलत तरीके से धन की हानि करेगा। मिथुन लग्न में ८ मंगल यदि मकर का मंगल- आठवें आयु स्थान में २ उच्च का होकर शनि की मकर राशि में बैठा है तो ३ आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रखेगा और पुरातत्व स्थान में लाभ प्राप्त ६ १२ करेगा तथा उदर में कुछ विकार पायेगा और शत्रु ७ ९ ११ पक्ष से कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा सफलता ८ १०मं. प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से लाभ स्थान को नं, २४८ स्तयं अपनी मेष राशि में देख रहा है, इसलिये
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भृगु संहिता १५३ महान् परिश्रम के योग से धन का लाभ प्राप्त करेगा तथा लाभ के सम्बन्ध में विदेश का योग भी प्राप्त करेगा और जीवन निर्वाह के लिये बँधी-सी आमदनी प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से धन भवन को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए धन संग्रह की कमी प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब में कुछ क्लेश पायेगा, किन्तु जीवन की मस्ती के मुकाबले में धन जन की परवाह नहीं करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से पराक्रम स्थान को मित्र सूर्य की राशि में देख रहा है, इसलिये पराक्रम की वृद्धि करेगा, किन्तु भाई-बहिन के स्थान में कुछ झंझट या मतभेद के सहित लाभ पायेगा। मिथुन लग्न में ९ मंगल यदि कुम्भ का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर शत्रु शनि की कुम्भ राशि में बैठा है तो ४ २ ३ भाग्य स्थान में कुछ झंझट व परिश्रम के मार्ग से १ लाभ प्राप्त करेगा और लाभ प्राप्ति के मार्ग में ६ १२ भाग्य का कुछ असंतोषप्रद साधन रहेगा तथा धर्म का पालन स्वार्थ युक्त होकर अरूचिकर रूप ७ ९ मं से करेगा और शत्रु स्थान के सम्बन्ध में कुछ ८ १० नं. २४९ भाग्य की शक्ति का सहारा तथा कुछ कठिनाई से सफलता प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से खर्च स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध लाभप्रद रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से लाभ के स्थान को मित्र सूर्य की राशि में देख रहा है, इसलिये भाई- बहिन का योग प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान की वृद्धि करेगा तथा परिश्रम से सफलता रहेगी और आठवीं दृष्टि से सुख भवन को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये सुख प्राप्ति के तथा मकानादि के साधनों में कुछ परिश्रम के योग से सफलता प्राप्त करेगा और माता के सुख सम्बन्ध में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा, क्योंकि मंगल षष्ठेश होने के दोषी है। मिथुन लग्न में १० मंगल यदि मीन का मंगल- दसम केन्द्र में पिता स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो उत्तम ४ २ परिश्रम के योग से पिता स्थान में लाभ प्राप्त ५ ३ १ करेगा, किन्तु पिता स्थान के प्रेम सम्बन्ध में ६ १२ मं. कुछ मतभेद रहेगा। किन्तु दसम स्थान पर मंगल उत्तम फल का दाता बन जाता है, इसलिये ७ ९ ११ कारबार राज-समाज के सम्बन्धों में सफलता ८ १० और लाभ प्राप्त करेगा तथा शत्रु स्थान में बड़ा नं. २५० भारी प्रभाव रखेगा और चौथी दृष्टि से देह के स्थान की मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में मान
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१५४ मिथुन लग्न का फलादेश प्रभाव लाभ और कुछ रोग झंझट आदि वस्तुयें प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से माता के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ झंझट युक्त मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा तथा परिश्रमी कार्यों से सुख के साधनों की वृद्धि करेगा और आठवीं दृष्टि से संतान स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए संतान पक्ष में कुछ वैमनस्यता रोग और लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में परिश्रम के योग से लाभ तथा सफलता प्राप्त करेगा, क्योंकि दसवें स्थान पर मंगल बलवान् फल करता है, इसलिये बड़े प्रभाव से आमदनी प्राप्त करेगा, किन्तु षष्ठेश होने के कारण मंगल कुछ परेशानियाँ करता है। मिथुन लग्न में ११ मंगल यदि मेष का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान पर स्वयं अपने क्षेत्र में बहुत अधिक बलवान् ४ २ ५ बैठा है, तो धन का लाभ खूब करेगा क्योंकि ३ १ मं. ग्यारहवें घर में गरम ग्रह बहुत शक्तिशाली फल ६ १२ का दाता हो जाता है, इसलिए परिश्रम के योग ७ ९ ११ से बड़ी मजबूत आमदनी का स्थाई रूप प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु स्थान का स्वामी होने के १०
नं. २५१ कारण कुछ परेशानियाँ करेगा और आठवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र शत्रु स्थान को वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव रखते हुए लाभू प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझट प्रपंच आदि के योग से अथवा रोगादि के योग से सम्बन्धित लाभ भी प्राप्त करेगा और मामा के पक्ष का लाभ प्राप्त रहेगा और चौथी नीच दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन का संग्रह नहीं कर सकेगा और कुटुम्ब के सम्बन्ध में कुछ क्लेश प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से संतान पक्ष को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ परेशानी के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि विद्या में परिश्रम के योग से सफलता प्राप्त करेगा। निथुन लग्न में १२ मंगल यदि वृषभ का मंगल- बारहवें खर्च स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में बैठा है ४ २ मं. तो खर्च विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के ५ ३ १ सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करेगा और परिश्रम, प्रपंच ६ १२ व झंझट आदि के योग से खर्च और आमदनी का संयोग प्राप्त रहेगा तथा चौथी दृष्टि से भाई ७ ९ ११ पराक्रम भाव को मित्र सूर्य की सिंह राशि में ८ १० देख रहा है, इसलिए भाई-बहिन के पक्ष में कुछ नं. २५२ झंझट युक्त रूप से लाभ रहेगा और लाभ प्राप्ति
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भृगु संहिता १५५ के योग से परिश्रम तथा पुरुषार्थ खूब करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने शत्रु स्थान को वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिए शत्रु पक्ष में कुछ हानि लाभ के योग से प्रभाव रखेगा और मामा के पक्ष में कुछ हानि या कमजोरी प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से स्त्री स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ झंझट रोग और कुछ मतभेद से सहित लाभ प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़े परिश्रम और प्रपंच के योग से लाभ प्राप्त करेगा, क्योंकि मंगल शत्रु स्थान का स्वामी होने से दोषी है, इसलिये मूत्रेन्द्रिय के स्थान में कमी के साथ कुछ रोग प्राप्त करेगा, क्योंकि सातवाँ स्थान भोग प्राप्त करने का होता है। माता, भूमि देह, सुख विवेकस्थानपति-बुध मिथुन लग्न में १ बुध यदि मिथुन का बुध- प्रथम केन्द्र में देह के स्थान पर स्वयं अपने क्षेत्र में ही बैठा है तो देह के ४ २ अन्दर सुडौल कद एवं सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त ५ ३ बु. १ करेगा तथा माता की महानता और घरेलू सुख के ६ १२ साधनों को उत्तम रूप में प्राप्त करेगा और मकानादि भूमि का सुन्दर योग प्राप्त करेगा तथा विवेक की ७ ९ ११ उत्तम योग शक्ति स्वयमेव प्राप्त रहेगी, इसलिए ८ १० देह सदैव मान-सम्मान प्राप्त करेगा और सातवीं नं. २५३ दृष्टि से मित्र गुरु की धनु राशि में स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिए स्त्री स्थान में आत्मीयता और सुख का विशेष योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में देह की विशेष शक्ति के द्वारा उत्तम सुख और सफलता प्राप्त करेगा और सुख शान्ति का विशेष अनुयायी बनेगा। मिथुन लग्न में २ बुध यदि कर्क का बुध- धन भवन में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह की विवेक शक्ति से ४ बु २ सुख पूर्वक धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा। ३ 2 किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता ६ १२ है, इसलिए धन संग्रह करने के सम्बन्ध से देह के ७ सुख साधनों में कुछ त्रुटि प्राप्त रहेगी और इसीलिए ९ ११ माता के सुख सम्बन्ध में भी कमी प्राप्त रहेगी ८ नं. २५४ और मकान जायदाद की शक्ति से धन का योग प्राप्त रहेगा और कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा और सातदीं दृष्टि से आयु स्थान को मित्र शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये जिन्दगी में महानता प्राप्त करेगा। आयु और जीवन में सुख प्राप्ति के साधन प्राप्त रहेंगे तथा पुरातत्व का लाभ पायेगा।
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१५६ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में ३ बुध यदि सिंह का बुध- भाई और पराक्रम के स्थान पर मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई ४ २ ५बु. बहिन का सुख प्राप्त करेगा और सुख पूर्वक देह ३ १ के परिश्रम से उन्नति करेगा और माता के स्थान ६ १२ की अनुकूल शक्ति प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा सुख के साधन प्राप्त करेगा तथा शांति ७ ९ ११ युक्त बहादुरी और हिम्मत से काम लेगा तथा ८ १०
नं. २५५ मकानादि रहने के स्थान की शक्ति प्राप्त रहेगी EEEE और सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक पुरुषार्थ की विवेक शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का सुन्दर पालन करेगा तथा इसी कारण से मान और प्रभाव तथा यश प्राप्त करेगा और धैर्यवान् तथा सज्जन समझा जायेगा। मिथुन लग्न में ४ बुध यदि कन्या का बुध- चौथे केन्द्र सुख भवन में माता के स्थान पर स्वयं अपनी राशि के अन्दर X २ ५ ३ १ उच्च का होकर बैठा है तो सुख प्राप्ति के महान् साधन प्राप्त करेगा और माता के स्थान में महानता ६ बु. १२ प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का विशेष महत्व ७ ९ ११ दायक अधिकार प्राप्त करेगा और देह में सुडौलता- १० सुन्दरता का योग प्राप्त करेगा तथा घर के अन्दर ८
नं. २५६ विवेक शक्ति की महानता से विशेष प्रभाव और मनोविनोद का विशेष साधन प्राप्त करेगा, किन्तु सातवीं नीच दृष्टि से पिता स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में हानि या त्रुटि प्राप्त करेगा और राज-समाज, कारबार के स्थान में कमजोरी और मान, सम्मान में कमी पायेगा, क्योंकि घरेलू सुख की मस्ती के कारणों से उन्नति के मार्ग में लापरवाही करेगा। मिथुन लग्न में ५ बुध यदि तुला का बुध- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो सन्तान ४ २ स्थान में सुख एवं आत्मीयता के साधन प्राप्त ५ ३ १ करेगा तथा विद्या और विवेक की महान् शक्ति से ६ १२ सुख और आत्मविश्वास का आनन्द प्राप्त करेगा और वाणी के द्वारा बड़ी गम्भीर और बचाव की बबु. ९ ११ बातें कहेगा, इसलिये महान् चतुर और बड़ा योग्य ८ १० बुद्धिमान माना जायेगा और सातवीं दृष्टि से मित्र नं. २५७ मंगल की मेष राशि में लाभ स्थान को देख रहा
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भृगु संहिता १५७ है, इसलिये देह और बुद्धि के योग से लाभ खूब प्राप्त करेगा तथा अपने स्वाभिमान और धन लाभ का विशेष ध्यान रखेगा और माता की शक्ति का सुख बुद्धि योग द्वारा अनुभव करेगा तथा कुछ भूमि का सुख प्राप्त करेगा और गम्भीर एवं शान्तिप्रिय बनेगा। मिथुन लग्न में ६ बुध यदि वृश्चिक का बुध- छठें शत्रु स्थान पर २ मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो शांति पूर्वक ४ ५ ३ १ देह की विवेक शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष में काम निकालेगा तथा देह से परिश्रम खूब करेगा और ६ १२ कुछ परतन्त्रता का योग प्राप्त करेगा और माता ७ ९ ११ के स्थान से सम्बन्धित सुखों की बहुत कमी प्राप्त ८ बु. १० करेगा तथा रहने-सहने के स्थान में त्रुटि प्राप्त करेगा और देह में सुन्दरता की कमी तथा कुछ रोग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में खर्च नं. २५८
स्थान को देख रहा है, इसलिए खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में सुख का अनुभव करेगा तथा मामा के स्थान में भी कुछ सुख सहायता प्राप्त करेगा तथा कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग से सम्बन्धित रहकर परेशानी अनुभव करेगा। मिथुन लग्न में ७ बुध यदि धनु का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो स्त्री का उत्तम ४ २ 4 ३ १ सुख और सुन्दरता तथा महानता प्राप्त करेगा और स्त्री के अन्दर विशेष आत्मीयता का भाव रखेगा ६ १२ तथा माता के मान सम्मान में कुछ न्यूनता के ७ ११ भाव से सुन्दर काम निकालेगा और रोजगार के ८ १० मार्ग में दैहिक कर्म की चतुराई से सुख और नं. २५९ सफलता प्राप्त करेगा और रहने के स्थान मकान का सुन्दर सुख मिलेगा तथा भोग विलास का सुन्दर योग प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने देह स्थान को मिथुन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता तथा मान और चतुराई प्राप्त करेगा तथा अपने हृदय के अन्दर बड़ा भारी स्वाभिमान रखेगा तथा कुछ नाम प्राप्त करेगा। यदि मकर का बुध-आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की मकर राशि में बैठा है तो माता के सुख में कमी प्राप्त करेगा और देह के अन्दर सुन्दरता सुडौलताई की कमी प्राप्त करेगा और मातृ स्थान तथा जन्म भूमि के स्थान से दूर किसी दूसरे स्थान में निवास करेगा और मकानादि रहने के स्थान में
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१५८ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में ८ बुध कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व के सम्बन्ध में विवेक शक्ति के द्वारा सुख उठावेगा और आयु ४ २ ५ ३ का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या 2 को सुखद रूप से व्यतीत करेगा और सातवीं ६ १२ मित्र दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि विशेष प्रयत्न ७ ९ ११ से करेगा तथा कुटुम्ब के स्थान में कुछ सुखमय ८ १०बु. सम्बन्ध प्राप्त करेगा। किन्तु अपने देह द्वारा कुछ नं. २६० कठिन परिश्रम के कार्यों के करने से सुख शान्ति में बाधा प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ९ बुध यदि कुम्भ का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य २ स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो दैहिक ४ 4 कर्म की विवेक शक्ति के द्वारा भाग्य की सुन्दर १ उन्नति प्राप्त करेगा और धर्म का सुन्दर पालन ६ १२ करेगा और बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा तथा ७ मकान भूमि आदि की सुख शक्ति प्राप्त करेगा ९ ११
१० बु. और माता का सुन्दर पवित्र योग प्राप्त करेगा ८ और भाग्य की शक्ति से महान् सुख प्राप्त करेगा नं. २६१ और सातवीं मित्र दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में भाई और पराक्रम स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में सुन्दर सफलता और यश प्राप्त करेगा। किन्तु पुरुषार्थ के मुकाबले में भाग्य और भगवान् को बड़ा मानेगा, क्योंकि बुध बड़ा विवेकी ग्रह है, इसलिये लौकिक और पारलौकिक मार्गों में गहरी विवेक शक्ति से उन्नति और यश प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में १० बुध यदि मीन का बुध- केन्द्र में दसवें पिता स्थान पर नीच राशि का गुरु क्षेत्र में बैठा है तो देह के ४ २ कठिन कर्म से उन्नति करने के मार्ग में प्रयत्नशील ३ १ रहकर मान और अपमान का योग प्राप्त करेगा ६ १२ बु. तथा पिता का सुख बहुत थोड़ा प्राप्त करेगा और ७ ११ सातवीं उच्च दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र सुख भवन ९ को कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए सुख ८ १०
नं. २६२ प्राप्ति के साधनों में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा मकानादि रहने के स्थानों में वृद्धि की शक्ति पायेगा, माता के स्थान का विशेष ख्याल रखेगा तथा देहाधीश बुध नीच राशि में बैठा है इसलिये कुछ छिपे तौर से तथा कुछ अनधिकार रूप से भी उन्नति
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भृगु संहिता १५९ प्राप्त करने का प्रयत्नपूर्ण कार्य करेगा। मिथुन लग्न में ११ बुध यदि मेष का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो देह की विवेक २ शक्ति के योग से सुख पूर्वक खूब लाभ प्राप्त करेगा 4 ३ १ बु. तथा माता के स्थान का सुख प्राप्त करेगा और १२ मकान तथा जायदाद का लाभ प्राप्त करेगा और 3
९ ११ सातवीं मित्र दृष्टि से शुक्र की तुला राशि में संतान ७ स्थान को देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष से सुख ८ १० प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में सफलता पायेगा नं. २६३ और बुद्धि के अन्दर विवेक शक्ति के बल से मीठी, मोहित करने वाला शब्द शैली से सुख प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता पायेगा और अन्तरात्मा में धन लाभ की वृद्धि का विशेष ध्यान रखेगा। मिथुन लग्न में १२ बुध यदि वृषभ का बुध- बारहवें स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा ४ २ बु. और देह में दुर्बलता प्राप्त करेगा तथा माता के ५ ३ १ सुख सम्बन्धों में कमी प्राप्त करेगा और मकान ६ १२ आदि रहने के स्थान में कमी करेगा तथा जन्मभूमि से अलग दूसरे स्थानों में सुख के साधन प्राप्त ७ ९ ११ करेगा तथा बाहरी स्थानों में विशेष आने जाने ८ १० का सम्बन्ध रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु नं. २६४ स्थान को मंगल की मेष राषि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में शक्ति युक्त विवेक शक्ति से मतलब निकालेगा और सुख प्राप्ति के सम्बन्धों में विशेष खर्च करेगा तथा अन्दरूनी कुछ दुःख महसूस करेगा तथा खर्च की विशेष शक्ति के द्वारा अपना मान और प्रभाव कायम रखेगा। स्त्री, रोजगार, पिता, राज्यस्थानपति-गुरु मिथुन लग्न में १ गुरु यदि मिथुन का गुरु- केन्द्र में देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है, तो शरीर में प्रभाव ४ २ ५ ३ गु रहेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी स्त्री स्थान को धनु राशि में देख रहा है, इसलिए स्त्री स्थान में ६ १२ सुन्दरता, योग्यता, प्रतिभा और गौरव प्राप्त करेगा ७ ९ ११ तथा रोजगार के मार्ग में देह के सुन्दर सहयोग से
८ १० बड़ी उत्तम सफलता प्राप्त करेगा और अपने अन्दर
नं. २६५ बड़ा भारी स्वाभिमान रखेगा तथा पिता स्थान की
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१६० मिथुन लग्न का फलादेश शक्ति का उत्तम लाभ प्राप्त करेगा और राज और समाज के कामों में मान प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता और प्रभाव पायेगा और पाँचवीं सामान्य शत्रु की दृष्टि से संतान भवन को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति से सहायता प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में उन्नति, वाणी में कुशलता तथा योग्यता प्राप्त करेगा और नवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देखता है, इसलिये भाग्य के स्थान में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा, किन्तु भाग्यवान् माना जायेगा और धर्म के स्थान में कुछ अरूचिकर रूप से धर्म का पालन करेगा और बड़प्पन का रहन सहन रखकर इज्जत पायेगा। मिथुन लग्न में २ गुरु यदि कर्क का गुरु- धन भवन में उच्च का होकर मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है तो धन संग्रह ४ गु. २ 4 शक्ति का बड़ा गौरव प्राप्त करेगा, किन्तु धन का ३ १ स्थान कुछ बन्धन का-सा कार्य भी करता है, ६ २ इसलिये स्त्री पक्ष के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर योग पायेगा ७ ९ ११ तथा नवमी दृष्टि में स्वयं अपने दसवें पिता स्थान ८ १० मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये नं. २६६ पिता स्थान की उन्नति प्राप्त करेगा और कारबार से धन की खूब वृद्धि करेगा तथा राज-समाज में मान, इज्जत और लाभ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में इज्जत और प्रभाव की शक्ति से विजय एवं सफलता प्राप्त करेगा और मामा के पक्ष में सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से अष्टम आयु एवं पुरातत्व स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ अशान्ति अनुभव करेगा तथा पुरातत्व की कुछ कमी रहेगी। मिथुन लग्न में ३ गुरु यदि सिंह का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान पर मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो ४ २ भाई-बहिन की शक्ति-प्रदान करेगा तथा पराक्रम ३ १ की खूब वृद्धि और सफलता प्राप्त करेगा और ६ १२ बड़ी भारी हिम्मत वाला बनेगा और पाँचवीं दृष्टि से स्वयं अपनी राशि में स्त्री स्थान को स्वक्षेत्र में ७ ९ ११ देख रहा है, इसलिए अपने स्थान की वृद्धि करेगा ८ १० अर्थात् स्त्री की महान् सुन्दर और सुयोग्य शक्ति नं. २६७ प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर बड़ी भारी प्रभाव एवं जागृति रखेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त
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भृगु संहिता १६१ करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिए रोजगार और पुरुषार्थ के योग से धन का लाभ खूब शानदार करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य में तर्क शक्ति से काम करेगा तथा भाग्य के मुकाबले में पुरुषार्थ और कर्म को बड़ा मानेगा। मिथुन लग्न में ४ गुरु यदि कन्या का गुरु- चौथे केन्द्र में माता के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो माता ४ २ की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और मकान आदि ५ ३ १ रहने के स्थान में सुन्दर शक्ति और प्रभाव रखेगा ६ गु २२ तथा सुख के अच्छे साधन प्राप्त रहेंगे और सातवीं
९ ११ दृष्टि से मीन राशि में स्वयं अपने क्षेत्र राज्य स्थान ७ को देख रहा है, इसलिये राज-समाज में मान ८ १०
नं. २६८ प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की सहायता शक्ति पायेगा और पाँचवीं नीच दृष्टि से शनि की मकर शनि में आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन में बहुत्त प्रकार की असुविधा और अशांति अनुभव करेगा तथा पुरातत्व की हानि प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से खर्च स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च अधिक होने के कारणों से कुछ असुविधा प्रतीत होगी और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध कुछ नीरसता युक्त प्राप्त रहेगा। किन्तु फिर भी खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों में विशेष सम्बन्ध रखेगा। मिथुन लग्न में ५ गुरु यदि तुला का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि ४ २ में बैठा है तो सन्तान और स्त्री के पक्ष में कुछ ३ १ नीरसताई से सहायक शक्ति प्राप्त करेगा और ६ १२ विद्या स्थान में प्रभाव तथा योग्यता प्राप्त करेगा और वाणी की कुशलता से कारबार तथा राज- ७ग. ९ ११ समाज में मान और सफलता प्राप्त करेगा तथा ८ १० पाँचवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ त्रुटि युक्त सफलता प्राप्त करेगा और धर्म का कुछ मतभेद सहित पालन. नं. २६९
करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन लाभ का विशेष ध्यान रखते हुए बुद्धि की कुशलता से लाभ खूब प्राप्त करेगा और नवीं मित्र दृष्टि से देह स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए देह में बड़ा भारी स्वाभिमान रखेगा तथा सुन्दरता और मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ा चतुर बुद्धिमान् भृ. सं .- ११
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१६२ मिथुन लग्न का फलादेश दूरदर्शी बनेगा तथा अपनी विशेष उन्नति के लिए बड़ा भारी प्रयत्न करता रहेगा तथा वाणी में शक्ति प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ६ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- छठें शत्रु स्थान में मंगल की राशि में बैठा है तो स्त्री स्थान में कुछ विरोध ४ २ भावना या कुछ मतभेद और रोग के सहित स्त्री 4 ३ १ का अच्छा सहयोग प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान ६ १२ में भी कुछ विरोध या वैमनस्यता के सहित शक्ति प्राप्त करेगा और शत्रु स्थान में अपने कर्मबल के ७ ९ ११ प्रभाव से विजय प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से ८ गु. १० अपने क्षेत्र राज्य स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि नं. २७० को देख रहा है, इसलिए परिश्रम के योग से प्रभावशाली कर्म के द्वारा उन्नति करेगा और राज-समाज में सम्मान प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है इसलिये कुछ नीरसता के योग से खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में मान और रोजगार का लाभ उठावेगा और नवीं 'उच्च दृष्टि से चन्द्र की कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिए परिश्रमी रोजगार के मार्ग से धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त करेगा और भलमनसाहत के प्रभावशाली कर्म में खूब परिश्रम करेगा तथा परिश्रम और प्रभाव के योग से बड़ी उन्नति करेगा तथा झगड़े- झंझट युक्त परेशानी के कर्म से बड़ी सफलता प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ७ गुरु यदि धन का गुरु- सातवें केन्द्र में स्त्री स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो ४ २ स्त्री स्थान में बड़ा भारी प्रभाव सुन्दरता और गौरव ५ ३ प्राप्त करेगा और गृहस्थ में बड़ा वैभव प्राप्त करेगा ६ १२ तथा रोजगार के मार्ग में महानता पायेगा और पिता एवं राज्य स्थान के सम्बन्ध से रोजगार के ७ ९ गु. ११ पक्ष में सफलता और सहायता प्राप्त करेगा तथा ८ १० पाँचवीं मित्र दृष्टि से मंगल की मेष राशि में लाभ नं. २७१ स्थान को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि प्राप्त करने का बड़ा भारी ध्यान रखेगा और रोजगार व्यापार के मार्ग से धन का खूब लाभ मान सहित प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और मान प्राप्त करेगा तथा नवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति और सहायता प्राप्त करेगा और पराक्रम के कार्यों में बड़ी भारी प्रवीणता रखेगा और अपने
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भृगु संहिता १६३ स्वाभिमान वृद्धि करने का सदैव ध्यान रखकर दैनिक कार्य करता रहेगा। मिथुन लग्न में ८ गुरु यदि मकर का गुरु- आठवें मृत्यु स्थान में नीच का होकर शत्रु शनि की मकर राशि में बैठा ४ २ ५ ३ है तो स्त्री और पिता के स्थान में कष्ट अनुभव करेगा तथा रोजगार और कारबार के मार्ग में ६ १२ महान् कठिनाईयों से काम करेगा तथा दूसरे स्थानों ७ ९ ११ के सम्बन्ध से और कुछ कष्ट तथा कुछ कपट के १०गु. योग से गृहस्थ का कार्य संचालन करेगा तथा ८
नं. २७२ उदर और मूत्रेन्द्रिय में कुछ विकार पायेगा तथा 出 北 丹 화
पाँचवीं दृष्टि से खर्च स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च की अधिकता के स्थान में कुछ नीरसता प्राप्त रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से धन भवन को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि का विशेष ध्यान और अधिक प्रयत्न करेगा और नवीं दृष्टि से सुख भवन को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए सुख प्राप्ति के साधन और मकान आदि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान और प्रभाव की कमी प्राप्त करेगा तथा कुछ अनुचित मार्ग का अभ्यायी बनेगा। मिथुन लग्न में ९ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- नवम त्रिकोण में भाग्य स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो कुछ X २ अरुचिकर रूप से भाग्य की उन्नति प्राप्त करेगा ५ ३ और कर्म-धर्म के स्थान में कुछ नीरस मार्ग के - ६ १२ द्वारा सफलता पायेगा तथा स्त्री और पिता स्थान के सम्बन्ध में कुछ अरूचिकर रूप से भाग्य वृद्धि ७ ९ गु. के साधन प्राप्त करेगा और रोजगार व्यापार तथा ८ १० राज-समाज के मार्ग में कुछ थोड़ी-सी दिक्कतों नं. २७३ के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में मान सम्मान सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई- बहिन की शक्ति का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की सफलता पायेगा तथा नवमी दृष्टि से संतान पक्ष को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सफलता मिलेगी और विद्या बुद्धि के स्थान में कार्य कुशलता और योग्यता बढ़ेगी। यदि मीन का गुरु- दसवें केन्द्र में पिता स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो पिता स्थान में महानता और प्रभाव पायेगा तथा
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१६४ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में १० गुरु पिता स्थान की शक्ति से रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और राज समाज से मान ४ २ और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा लौकिक कार्यों में ५ ३ १ बड़ी भारी कार्य कुशलता व सफलता पायेगा ६ १२ गु. और पाँचवीं उच्च दृष्टि से धन भवन को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह ७ ९ ११ शक्ति का बड़ा उत्तम सुख प्राप्त करेगा और कुटुम्ब ८ १० की श्रेष्ठ शक्ति मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. २७४ सुख भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये माता और मकानादि का सुन्दर सुख प्राप्त करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा तथा मामा के पक्ष में सहायता और मान पायेगा और राज्य स्थान पर स्वक्षेत्र में बैठकर धन भवन को एवं शत्रु भवन को पूर्णता से देखने के कारण से बड़ा धनवान् एवं प्रभावशाली वैभव युक्त भाग्यवान् बनेगा। मिथुन लग्न में ११ गुरु यदि मेष का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो कारबार- ४ २ ५ ३ १गु. व्यापार तथा पिता स्थान के सम्बन्ध से खूब लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु ६ १२ शुक्र की तुला राशि में संतान घर को देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ी-सी नीरसताई से संतान के ७ ९ ११ पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में १० V नं.२७५ उत्तम व्यवहारिक बुद्धि की योग्यता से सफलता प्राप्त करेगा तथा नवमी दृष्टि से स्वयं अपनी धनु राशि में अपने स्वक्षेत्र स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान का विशेष लाभ और सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ा लाभ और विशेष आमदनी का योग प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से पराक्रम एवं भाई के स्थान को मित्र सूर्य की राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन का उत्तम सुख प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान की विशेष बुद्धि और शक्ति प्राप्त करेगा तथा बाहुबल के कार्यों से मान-सम्मान और सफलता तथा धन लाभ प्राप्त करेगा और राज्येश होकर लाभ स्थान में बैठने से बड़ी शानदारी के साथ आमदनी की विशेष सफलता प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का गुरु-बारहवें खर्च स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो खर्च की अधिकता के कारणों से कुछ परेशानी प्रतीत होगी और बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से कुछ मान और रोजगार की
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भृगु संहिता १६५ मिथुन लग्न में १२ गुरु शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री और पिता के सुख सम्बन्धों में कमजोरी प्राप्त होगी और रोजगार ४ २ गु. व्यापार के स्थान में कुछ हानि तथा कमजोरी ५ ३ 2 अनुभव होगी तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से चौथे ६ १२ सुख भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा ७ ९ ११ है, इसलिये घरेलू सुख मकानादि रहने के स्थान ८ १० में शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. २७६ शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा नवीं नीच दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और पुरातत्व शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा तथा उदर में कुछ विकार पायेगा तथा खर्चा अधिक रहने की मजबूरी बनी रहेगी तथा आयु के स्थान में कभी-कभी विशेष खतरा प्राप्त करेगा और अपने मान-सम्मान में कमजोरी अनुभव करेगा। विद्या संतान-खर्चस्थानपति-शुक्र मिथुन लग्न में १ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- प्रथम केन्द्र स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के ४ २ ५ ३ शु. दोष के कारण देह में दुर्बलता प्राप्त करेगा तथा १ विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी चतुराई रखेगा ६ १२ तथा खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के
११ सम्बन्ध से तथा बुद्धि की योग्यता से बड़ा मान ७ ९ पायेगा और संतान पक्ष में कुछ कमजोरी के साथ ८ १०
नं.२७७ सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं सामान्य शत्रु की दृष्टि से स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये कुछ मतभेद के साथ स्त्री में विशेष आशक्ति प्राप्त करेगा और भोगादिक में विशेष रूचि रखेगा तथा बुद्धि की दौड़-धूप से रोजगार के मार्ग में काम निकालेगा तथा अपने अन्दर बुद्धि में कमजोरी और भ्रम प्राप्त करेगा। यदि कर्क का शुक्र-धन स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो बाहरी स्थानों के सम्बन्ध और बुद्धि योग से बड़ी चतुराई के साथ धन के मार्ग में इज्जत प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति में कमजोरी प्राप्त करेगा और सन्तान पति का व्ययेश होकर बन्धन (धन) के स्थान पर बैठने से सन्तान सुख में विशेष कमी
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१६६ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में २ शुक्र उत्पन्न करेगा विद्या अच्छी ग्रहण करेगा और बातचीत के अन्दर छिपी स्वार्थ शक्ति से ही ४ श २ चतुराईयों के सहित काम करेगा तथा सातवीं ५ ३ १ मित्र दृष्टि से अष्टम आयु स्थान को शनि की मकर ६ १२ राशि में देख रहा है, इसलिए जीवन में शानदारी से काम निकालेगा और पुरातत्व का सामान्य ७ ९ ११ हानि-लाभ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब में कुछ त्रुटि ८ १० प्राप्त करेगा। नं. २७८ यदि सिंह का शुक्र- भाई के स्थान पर शत्रु मिथुन लग्न में ३ शुक्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष ४ २ के कारण भाई बहिन के पक्ष में कुछ कमी प्राप्त ५श. ३ १ करेगा और पुरुषार्थ के अन्दर कुछ कमजोरी पायेगा तथा सन्तान और विद्या के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी ६ १२ होते हुए भी चतुराई की शक्ति और हिम्मत से ७ ९ ११ बातचीत के द्वारा काम की सफलता और खर्च
८ १० की शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से
नं. २७९ भाग्य स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए बुद्धि और खर्च की शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और धर्म के पक्ष में विशेष दिलचस्पी रखेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा खर्च का संचालन करेगा। मिथुन लग्न में ४ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं सुख भवन में नीच राशि का होकर बैठा है और X २ 4 व्ययेश होने का दोष भी है, इसलिये मातृ स्थान ३ १ के सुख सम्बन्धों में हानि प्राप्त करेगा तथा ६ शु. १२ मकानादि रहने के स्थानों में सुख की कमी प्राप्त करेगा और सन्तान सुख की कुछ कमजोरी अनुभव ७ ९ ११ करेगा और खर्च के कारणों से कुछ सुख-शान्ति ८ १० में बाधा प्राप्त करेगा, किन्तु सातवीं उच्च दृष्टि से नं. २८० राज्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये घरेलू अशान्ति को सहन करके भी उन्नति के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा गुप्त चतुराई से सफलता पायेगा तथा अन्दरूनी कमजोरी के होते हुए भी बाहर मान-प्रतिष्ठा पायेगा। यदि तुला का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर अपनी ही राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो सन्तान और विद्या के पक्ष में व्ययेश होने के कारण उपरोक्त विषय में कुछ कमजोरी या कमी प्राप्त करेगा और बुद्धि और
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मिथुन लग्न में ५ शुक्र वाणी की महान् चतुराई से खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष ४ २ ज्ञान रखेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को ५ ३ १ सामान्य मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, ६ १२ इसलिये बुद्धि योग से धन का खूब लाभ प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के कारण आमदनी ७श ९ ११ को भी विशेष खर्च करता रहेगा तथा हेर फेर की ८ १० और दूर की बातों पर विशेष बोलने वाला बनेगा। नं. २८१ यदि वृश्चिक का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में मिथुन लग्न में ६ शुक्र सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष में बाधा प्राप्त करेगा और विद्या ग्रहण करने ४ २ ५ ३ में दिक्कतें प्राप्त करेगा तथा दिमाग में कुछ खर्च १ के कारणों से परेशानी रहेगी और सातवीं दृष्टि से ६ १२ स्वयं अपने खर्च स्थान को वृषभ राशि में देख
७ ९ रहा है, इसलिये कुछ परतन्त्रता या परेशानी के
८ शु. १० योग से खर्चा खूब करेगा और शत्रु स्थान में
नं. २८२ बुद्धि की चतुराई और खर्च की ताकत से काम निकालेगा तथा सन्तान और रोग एवं झंझट-झगड़े आदि सम्बन्धों से खर्चा अधिक करेगा तथा गुप्त चतुराई के योग से मतलब निकालेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध कुछ साधारण प्रभावशाली रहेगा। मिथुन लग्न में ७ शुक्र यदि धन का शुक्र- सातवें केन्द्र में स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की राशि ४ २ पर बैठा है तो बुद्धिमती और चतुर स्त्री प्राप्त 4 ३ १ करेगा और बुद्धि की चतुराई के योग से रोजगार ६ १२ चलायेगा, किन्तु व्ययेश होने के कारण रोजगार के मार्ग में कुछ हानि भी प्राप्त करेगा और स्त्री ७ ९ शु. ११ पक्ष में कुछ कमी या क्लेश का रूप भी प्राप्त ८ करेगा तथा गृहस्थ में खर्चा खूब रहेगा और सन्तान नं. २८३ तथा विद्या का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी और मान प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों से कुछ रोजगार के मार्ग में सहायता सम्बन्ध प्राप्त करेगा। यदि मकर का शुक्र-आठवें मृत्यु स्थान पर मित्र शनि की मकर राशि में बैठा है तो सन्तान पक्ष में हानि और कष्ट प्राप्त करेगा और विद्या में
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१६८ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में ८ शुक्र कमजोरी रहेगी और खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी महसूस होगी और गूढ़ बुद्धि तथा पुरातत्व का ४ २ ५ ज्ञान प्राप्त करेगा और अपनी जीवनाधार शक्ति ३ १ को होने के लिये सदैव महान् प्रयत्न करता और ६ १२ सोचता रहेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ ७ ९ ११ प्रभाव रहेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य मित्र चन्द्र की कर्क राशि में धन भवन को देख रहा है, ८ १०शु. इसलिये धन वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा नं. २८४ में कमी अनुभव करेगा। किन्तु व्ययेश होने के कारण धन की संग्रह शक्ति
मिथुन लग्न में ९ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य
४ २ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो विद्या ५ और सन्तान का सुख प्राप्त करेगा तथा धर्म का ३ १ ज्ञान और सज्जनता धारण करेगा तथा बुद्धि और ६ १२ विद्या के योग से बाहरी स्थानों के सम्पर्क के द्वारा भाग्य की वृद्धि के साधन प्राप्त करेगा और बड़ा ७ ९ ११
१० शु भारी चतुराई के योग से मान और यश प्राप्त ८ करेगा भाग्य की और बुद्धि की शक्ति से खर्च के नं. २८५ उत्तम साधन पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के नाते भाग्य की कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से भाई के स्थान को शत्रु सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में वैमनस्यता प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ के मुकाबले में भाग्य को बड़ा मानेगा। मिथुन लग्न में १० शुक्र यदि मीन का शुक्र- दसवें केन्द्र पिता स्थान में उच्च का होकर गुरु की राशि में बैठा है तो ४ २ व्ययेश होने के कारण पिता की सम्पत्ति की विशेष ५ ३ खर्चा करेगा और बड़े कारबार में नुकसान उठाना ६ १२ शु. पड़ेगा, किन्तु बाहरी स्थानों का विशेष सम्बन्ध मान युक्त रहेगा और सन्तान शक्ति प्राप्त करेगा ७ ९ ११ तथा विद्या भी ग्रहण करेगा और राज समाज में १० V
नं. २८६ कुछ मान प्राप्त करेगा तथा खर्चा अधिक रहेगा तथा बुद्धि के अहंभाव के कारण उन्नति और मान प्राप्ति के स्थान में बार-बार हानियाँ प्राप्त करेगा और चौथे सुख स्थान को नीच दृष्टि से देख रहा है, इसलिये सुख प्राप्ति के सम्बन्ध में तथा मातृ स्थान के सुख में कमी प्राप्त करेगा।
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मिथुन लग्न में ११ शुक्र यदि मेष का शुक्र-ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य मित्र मंगल की राशि में बैठा है और ४ २ ३ १शु. सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने सन्तान स्थान को ५ तुला राशि में देख रहा है, तो सन्तान का लाभ ६ १२ प्राप्त करेगा तथा विद्या ग्रहण करेगा और वाणी के द्वारा तथा चतुराई के द्वारा खूब धन लाभ ७ ९ ११ प्राप्त करेगा, विद्या बुद्धि तथा बाहरी स्थानों के ८ १० सम्बन्ध से आमदनी में शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु नं. २८७ व्ययेश होने के कारण से विद्या तथा संतान के पक्ष में कुछ कमी या कमजोरी अनुभव करेगा और दिमाग में कुछ परेशानी या फिकर रहेगी तथा खर्चा खूब करेगा और लाभ प्राप्ति के स्थान सम्बन्ध में बड़ी चतुराई के साथ बहुत हेर फेर की बातें करके स्वार्थ सिद्धि में सफलता प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में १२ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान पर
२ शु. स्वयं अपने घर में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो खर्चा ४ ५ ३ विशेष करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्पर्क १ प्राप्त करेगा तथा विद्या और संतान पक्ष में कुछ ६ १२ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा विद्या और संतान का ७ ९ ११ कुछ विलम्ब से योग प्राप्त करेगा और बुद्धि योग १० से बड़ी चतुराई के साथ खर्चे की शक्ति प्राप्त V
नं. २८८ करेगा तथा बड़ी घुमाव-फिराव की बातें करने का स्वभाव पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी चतुराई और नरमाई से बातें बनाकर कार्य की पूर्ति करेगा तथा बुद्धि में कुछ परेशानी अनुभव करेगा। आयु, मृत्यु, भाग्य, धर्मस्थानपति-शनि मिथुन लग्न में १ शनि यदि मिथुन का शनि- प्रथम केन्द्र में देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो आयु २ ५ ३ श. १ की वृद्धि प्राप्त करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म का पालन करेगा, किन्तु अष्टमेश ६ १२ होने के कारण देह के सुख और सुन्दरता में कुछ ७ ९ ११ कमी प्राप्त करेगा और धर्म के यथार्थ पालन में कुछ त्रुटि रखेगा तथा भाग्य सम्बन्धी कुछ पुरातत्व ८ १०
नं. २८९ शक्ति का लाभ पायेगा, किन्तु भाग्य में भी कुछ
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१७० मिथुन लग्न का फलादेश कमजोरी अनुभव करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहन के स्थान में कुछ वैमनस्यता पायेगा और पुरुषार्थ कर्म में कुछ नीरसता अनुभव करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के पक्ष में कुछ नीरसता अनुभव करेगा तथा दशवीं शत्रु दृष्टि से पिता स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में वैमनस्यता करेगा। राज-समाज व उन्नति के मार्गों में कुछ कठिन कर्म के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में २ शनि यदि कर्क का शनि- धन स्थान में शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से पुरातत्व ४ श २ धन का लाभ प्राप्त करेगा। किन्तु अष्टमेश होने 4 ३ के दोष के कारण धन की संचित शक्ति के अन्दर ६ १२ हानि के कारण उत्पन्न करेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ सुख-दुख का सामान्य योग पायेगा ७ ९ ११ तथा तीसरी मित्र दृष्टि से चौथे सुख भवन को ८ १० देख रहा है, इसलिये सुख और मकानादि के नं. २९० स्थान का कुछ सहारा प्राप्त करेगा और माता के पक्ष में सुख की थोड़ी-सी कमी के साथ योग प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र आयु स्थान को मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और जीवन की दिनचर्या में भाग्यवानी का तरीका प्राप्त करेगा और दसवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी तथा कष्ट और लापरवाही का योग प्राप्त करेगा और धर्म पालन के स्थान में धन का विशेष महत्व मानेगा, किन्तु भाग्य स्थानपति शनि के धन भवन में बैठने के कारण से धन की तरफ से बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा तथा स्वार्थ युक्त सज्जनता का पालन करेगा। मिथुन लग्न में ३ शनि यदि सिंह का शनि- तीसरे भाई के स्थान पर शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन से ४ २ वैमनस्यता प्राप्त रहेगा और पराक्रम सम्बन्धी कार्यों ५श. ३ में कुछ अरूचि के साथ मिहनत करके सफलता ६ १२ प्राप्त करेगा और पुरातत्त्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा आयु में वृद्धि प्राप्त रहेगी और तीसरी ७ ९ ११ उच्च दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को मित्र ८ १० शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या नं. २९१ बुद्धि और सन्तान पक्ष में उन्नति प्राप्त करेगा तथा
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भृगु संहिता १७१ वाणी द्वारा विशेष बातें कहकर अपना मतलब सिद्ध करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र भाग्य को कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए भाग्य की वृद्धि करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा। किन्तु अष्टमेश होने के कारण भाग्य स्थान में कुछ परेशानी भी प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग का यथाशक्ति पालन करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से खर्च सथान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब रहेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त रहेगा और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से सफलता प्राप्त होती रहेगी। मिथुन लग्न में ४ शनि यदि कन्या का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं सुख स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो ४ २ ५ माता के स्थान की शक्ति तो प्राप्त होगी किन्तु ३ १ अष्टमेश होने के दोष से माता के सुख-सम्बन्धों ६ श. १२ में कुछ कमी रहेगी और मकानादि की शक्ति प्राप्त
७ ९ ११ रहेगी तथा मकाना और आयु का उत्तम सुख प्राप्त रहेगा और घर की रहन-सहन के अन्दर ८ १०
नं. २९२ भाग्यवान् समझा जायेगा तथा धर्म का कुछ पालन करेगा और तीसरी दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कड़ाई के साथ प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ लाभ युक्त रहेगा। तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज-समाज के कार्यों में कुछ अरूचि के साथ कार्य करेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये देह से भाग्यवान् समझा जायेगा और देह के द्वारा कुछ धर्म-कर्म का भी कार्य करेगा और सुख प्राप्ति के साधनों का विशेष ध्यान रखेगा तथा भाग्योन्नति प्राप्त करने के लिये देह के द्वारा विशेष प्रयत्नशील रहेगा। मिथुन लग्न में ५ शनि यदि तुला का शनि- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की ४ २ राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त ५ 3 १ करेगा और विद्या बुद्धि में उन्नति पायेगा तथा आयु में वृद्धि प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा संतान ur १२ पक्ष से भाग्य की वृद्धि पायेगा तथा सातेवीं नीच ७श ९ ११ दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की मेष राशि में ८ १० देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी नं. २९३ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान
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१७२ मिथुन लग्न का फलादेश को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ कष्ट और शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाई के सहित कार्य में सफलता पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से धन भवन को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के सहित धन की पूर्ति करेगा। अतः प्रत्येक विषयों में अष्टमेश होने के कारण कष्ट करता है और नवमेश होने के कारण से उन्नति और सहायता प्रदान करता है, इसलिये कुटुम्ब के पक्ष में कुछ अल्प सुख प्राप्त करेगा और भाग्य तथा जीवन की उन्नति करने के लिये भारी प्रयत्न करेगा। मिथुन लग्न में ६ शनि यदि वृश्चिक का शनि- छठें शत्रु स्थान में शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में बैठा है तो झगड़े झंझटों ४ २ के मार्ग से भाग्य की वृद्धि करेगा और शत्रु स्थान ५ ३ १ में प्रभाव और सफलता प्राप्त करेगा तथा तीसरी ६ १२ दृष्टि से स्वयं अपने आयु स्थान को मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और ७ ९ ११ पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा भाग्येश ८ श. १० का छठें स्थान पर बैठने से भाग्योन्नति में कुछ नं. २९४ दिक्कतें पैदा करेगा और धर्म का यथार्थ पालन नहीं कर सकेगा। सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब शानदार करेगा और बाहरी स्थान का सम्बन्ध उत्तम रहेगा और दशवीं शत्रु दृष्टि से भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख में बाधा प्राप्त करेगा और पराक्रम की सफलता के लिये कठिन प्रयत्न करेगा तथा छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बैठा है और तीसरे स्थान को क्रूर ग्रह स्वयं देख रहा है, इसलिये परिश्रम खूब करेगा और महान् हिम्मत शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और छठें स्थान पर क्रूर ग्रह के बलवान् होने से प्रभाव शक्ति की महान् वृद्धि करेगा। मिथुन लग्न में ७ शनि यदि धन का शनि-सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में २ शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने का ४ दोष और नवमेश होने का गुण दोनों कारणों के ५ ३ OV योग से स्त्री स्थान में सुख और दुख का हेतु ६ १२ बनेगा तथा रोजगार के पक्ष में कुछ कष्ट युक्त मार्ग से सफलता प्राप्त करेगा और आयु की वृद्धि ७ ९ श. ११ प्राप्त करेगा तथा मूत्र-इन्द्रिय में कभी कोई कष्ट ८ १०
नं. २९५ प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के मार्ग द्वारा भाग्य वृद्धि के अच्छे साधन
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भृगु संहिता १७३ प्राप्त करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा और गृहस्थ धर्म का पालन करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुध की मिथुन राशि में देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ फिकर सहित सज्जनता और प्रभाव शक्ति पायेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से चौथे माता के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान के सुख में कुछ त्रुटि युक्त सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा मकानादि रहने के स्थान में कुछ नीरसता सहित सुखद शक्ति प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर कुछ दिक्कतें सहने के बाद उन्नति का योग प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ८ शनि यदि मकर का शनि- आठवें आयु स्थान में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त ४ २ करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और ५ ३ १ भाग्य में दुर्बलता अनुभव करेगा तथा विदेश द्वारा ६ १२ कठिनाई के योग से भाग्य की शक्ति प्राप्त करेगा और सुयश की कमी पायेगा तथा धर्म का ठीक ७ ९ ११ पालन नहीं कर सकेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से ८ १०श. पिता स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, नं. २९६ इसलिये पिता स्थान में कुछ कष्ट या कमी अनुभव करेगा और राज-समाज, व्यापार आदि कार्यों में कुछ कठिनाईयों से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन स्थान को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह के स्थान में त्रुटि अनुभव करेगा और दसवीं उच्च दृष्टि से संतान स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान पक्ष में कुछ दिक्कत के साथ वृद्धि प्राप्त करेगा तथा वाणी की शक्ति के द्वारा उन्नति तथा भाग्य वृद्धि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में भाग्यवानी के तरीके से गुजारा करेगा इसलिये भाग्यवान् समझा जायेगा। मिथुन लग्न में ९ शनि यदि कुम्भ का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर ४ २ बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष से भाग्य में कुछ ५ ३ अन्दरूनी त्रुटि पाते हुये प्रकट में अच्छा भाग्यवान् ६ १२ समझा जायेगा और धर्म का पालन करेगा एवं कुछ यश प्राप्त करेगा तथा कुछ पुरातत्व शक्ति ७ ९ ११
१० श का अच्छा लाभ पायेगा और आयु की वृद्धि प्राप्त ८ करेगा और दिनचर्या को बड़ी शानदारी से अमीरात के ढंग पर व्यतीत करेगा और कुदरती तौर से दैवी सहायतायें प्राप्त करेगा तथा तीसरी नीच दृष्टि से लाभ स्थान को नं. २९७
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१७४ मिथुन लग्न का फलादेश मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरियाँ तथा परेशानियाँ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहन के प्रेम सुख सम्बन्धों में त्रुटि प्राप्त करेगा और भाग्य के सम्मुख पुरुषार्थ को थोड़ा कम महत्व देगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान के पक्ष से कुछ परेशानी होते हुये भी शत्रुओं की परवाह नहीं करेगा तथा दिक्कतों पर भाग्य शक्ति से विजय पायेगा। मिथुन लग्न में १० शनि यदि मीन का शनि- दसम केन्द्र पिता स्थान में शत्रु वृहस्पति की राशि पर बैठा है तो पिता ४ २ ५ ३ स्थान के सुख में कमी प्राप्त करेगा और कारबार १ की उन्नति के मार्ग में बहुत प्रकार की दौड़-धूप ६ १२ श. और रद्दो बदल के बाद सफलता प्राप्त होगी और
११ आयु स्थान की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा राज- ९ समाज में मान पायेगा और भाग्यवान् समझा ८ १० जायेगा तथा धर्म-कर्म का पालन करेगा। किन्तु नं. २९८ प्रत्येक कार्यों में स्वार्थ सिद्धि का मुख्य ध्यान रखेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त होगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से सुख स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये सुख के साधन और मकानादि की शक्ति प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी के साथ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, अतः इस जगह शनि का अष्टमेश होने का दोष और नवमेश होने का गुण दोनों ही चीजें हर विषय पर लागू होती हैं। मिथुन लग्न में ११ शनि यदि मेष का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो ४ २ ५ ३ १श. आमदनी के मार्ग में कमजोरी प्राप्त करेगा और भाग्य शक्ति के स्थान में कुछ कमी महसूस करेगा ६ १२ तथा धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा, बल्कि धन के लाभ सम्बन्ध में कभी कुछ अनुचित ७ ९ ११ स्वार्थ सिद्ध करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से देह के ८ १०
नं. २९९ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष से देह में कुछ कष्ट या अशान्ति पायेगा तथा नवमेश होने के कारण देह में भाग्यवानी पैदा
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भृगु संहिता १७५ करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये वाणी के अन्दर वाचाल शक्ति पायेगा और विद्या तथा संतान पक्ष में वृद्धि प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपने आयु स्थान को मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा तथा पुरातत्व का कुछ लाभ प्राप्त करेगा, किन्तु नीच का होने के कारण जीवन में बड़े-बड़े कष्ट एवं संकट पायेगा तथा आयु में खतरा प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में १२ शनि यदि वृषभ का शनि- बारहवें खर्च स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक ४ २ श करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध प्राप्त ५ ३ करेगा तथा पुरातत्व शक्ति में कुछ हानि करेगा ६ १२ तथा दसवीं दृष्टि से स्वयं अपने क्षेत्र भाग्य स्थान
११ को कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी ७ ९ १० स्थान के योग से भाग्य की वृद्धि करेगा और ८
नं. ३०० धर्म का दिखावटी पालन करेगा तथा भाग्य स्थान में अन्दरूनी कमजोरी महसूस करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से धन भवन को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इस लिये धन स्थान के कोष में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में कुछ अशांति अनुभव करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ दिक्कतों के साथ विजय और प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण से और नवमेश होने के नाते श्रेष्ठता के कारण से भाग्य और खर्च के सम्बन्धों में कुछ दुःख-सुख उत्पन्न करता रहेगा और इसी कारण कभी-कभी यश और अपयश की प्राप्ति करता रहेगा, किन्तु फिर भी भाग्यवान् माना जायेगा। कष्ट, असत्य, गुप्त युक्ति के अधिपति-राहु मिथुन लग्न में १ राहु यदि मिथुन का राहु- प्रथम केन्द्र में धन स्थान पर उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है ४ २ ३ रा. तो विवेकी बुध की राशि पर बैठने से विवेक की ५ १ महान्-शक्ति के योग से बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा ६ १२ और देह के स्थान में कद की लम्बाई तथा युक्ति की गहराई प्रदान करेगा और विशेष महत्वपूर्ण ७ ९ ११ शक्ति और प्रभाव प्राप्त करने के लिये महान् ८ १० प्रयत्न तथा भारी दौड़-धूप करायेगा तथा अपने नं. ३०१ व्यक्तित्व के अन्दर कोई विशेषता अवश्य प्राप्त करेगा और अपनी युक्ति बल के अन्दर महांन् हिम्मत शक्ति रखेगा तथा
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१७६ मिथुन लग्न का फलादेश उन्नति प्राप्त करने के लिये कोई कष्ट साध्य कर्म का योग प्राप्त करेगा और गुप्त रूप से बड़े-बड़े उद्यम करेगा तथा बड़ी भारी जवाब की लम्बी चौड़ी बातों से मान और स्वार्थ सिद्ध करेगा। मिथुन लग्न में २ राहु यदि कर्क का राहु-दूसरे धन भवन में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो धन के खजाने ४ रा. २ में भारी कमी और हानि करेगा तथा धन सम्पत्ति ५ ३ १ के कारणों से महान् संकट प्राप्त करेगा और कुटुम्ब ६ १२ स्थान में कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा और मन के अधिकारी चन्द्रमा की राशि पर बैठा ७ ९ ११ है, इसलिये धन संग्रह करने के लिये महान् कष्ट ८ १० साध्य कर्म को करेगा और मानसिक वेदनाओं नं. ३०२ तथा गुप्त युक्तियों के द्वारा धन की खोज में रहेगा और जन तथा धन की खोज में रहते हुए जन तथा धन दोनों ही मार्गों में कभी-कभी भारी संकटों का सामना करना पड़ेगा और बहुत सी दिक्कतों के बाद देर-अबेर में धन का सुख प्राप्त कर सकेगा। मिथुन लग्न में ३ राहु यदि सिंह का राहु- तीसरे भाई के स्थान पर परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन ४ २ ५रा. के सुख सम्बन्धों में भारी कमी या कष्ट के कारणों ३ १ को प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में ६ १२ बड़ा कठिन और कष्ट साध्य कर्म करेगा तथा बड़ा भारी प्रभाव रखने के लिये बड़ी भारी हिम्मत ७ ९ ११ शक्ति से काम करेगा, क्योंकि तीसरे स्थान पर ८ १० क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये कभी- नं. ३०३ कभी हिम्मत और धर्म की शक्ति में भारी संकट प्राप्त करने पर भी धैर्य की शक्ति प्राप्त रहेगी और गुप्त युक्तियों के बल से प्रभाव शक्ति की वृद्धि करेगा तथा भाई-बहिन के साथ कभी-कभी कोई विशेष झगड़ा-झंझट भी प्राप्त करेगा, किन्तु बहादुर स्वभाव रहेगा। मिथुन लग्न में ४ राहु यदि कन्या का राहु- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर विवेकी बुध की मित्र राशि में बैठा है तो ४ २ ५ ३ १ विवेक की महान् शक्ति के द्वारा सुख के साधन प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभावानुसार माता ६ रा. १२ के सुख सम्बन्धों में कमी रहेगी और मकानादि ७ ९ ११ रहने के स्थान में कुछ अशान्ति या किसी प्रकार ८ १० कोई झगड़े-झंझट का योग प्राप्त करेगा तथा घरेलू नं. ३०४ सुख शान्ति के स्थान में कुछ कमी अनुभव करेगा
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भृगु संहिता १७७ और कुछ गुप्त युक्तियों के कारणों से सुख प्राप्ति के साधन प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी महान् अशांति के कारण और बहुत-सी दिक्कतों के बाद अन्त में सुख-शक्ति के साधन प्राप्त करेगा, क्योंकि बुध के घर में राहु उत्तम समझा जाता है, इसलिये किसी भी स्थिति में रहकर भी सुख प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ५ राहु यदि तुला का राहु- पाँचवें त्रिकोण संतान
४ २ स्थान में परम चतुर शुक्र की मित्र राशि पर ५ ३ बैठा है तो विद्या और संतान पक्ष की सफलता १ के लिये महान् युक्तियों से काम करेगा, किन्तु ६ १२ फिर भी संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा ७रा. ९ ११ और विद्या ग्रहण करते समय कुछ दिक्कतें ८ १० प्राप्त होंगी, किन्तु बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी गुप्त चतुराई रहेगी तथा असत्य मिश्रित बातों के योग से काम निकालेगा, किन्तु बातचीत के अन्दर बड़ी भारी नं. ३०५
योग्यता प्रदर्शित करेगा और दिमाग के अन्दर कुछ परेशानी तथा कुछ चिंता बनी रहेगी तथा विद्या स्थान में कुछ कमी या कमजोरी प्राप्त रहेगी और संतान सुख की पूर्ति करने में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। मिथुन लग्न में ६ राहु यदि वृश्चिक का राहु- छठें शत्रु स्थान में शत्रु
२ मंगल की वृश्चिक राशि में बैठा है तो शत्रु पक्ष में ४ ५ ३ १ बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और शत्रु का दमन करेगा, किन्तु शत्रु पक्ष से कुछ कठिनाई अनुभव होगी ६ १२ और छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, ७ ९ ११ इसलिये शत्रु स्थान के सम्बन्ध में कठिन से कठिन ८ रा. १० मुसीबत आने पर भी धैर्य मजबूत रहेगा और अन्त में विजय प्राप्त होगी तथा रोग और झगड़े- झंझटों में बड़ी हिम्मत से काम निकालेगा तथा चतुराई और युक्तिबल से नं. ३०६ सदैव प्रभाव शक्ति कायम रखेगा और अधिकांश रूप में कभी भी अपनी कमजोरियों को जाहिर नहीं होने देगा और मामा के पक्ष में कुछ त्रुटि करेगा। यदि धन का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ संचालन की चिंताओं से टकराता रहेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी भृ.सं .- १२
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१७८ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में ७ राहु कठिनाई और हानियाँ प्राप्त करेगा तथा कभी- कभी रोजगार और गृहस्थ के कार्यों में महान् संकट ४ २ ५ ३ का सामना प्राप्त करेगा और मूत्र-इन्द्रिय के अन्दर १ कभी-कभी कोई विकार प्राप्त करेगा और गृहस्थ ६ १२ तथा रोजगार के पक्ष में कुछ कमी या गुप्त युक्ति ९ रा. ११ और असत्य तथा कुछ अनुचित रूप से भी कार्य ८ १० संपादन करेगा तथा कुछ परतंत्रता या परेशानी नं. ३०७ मानेगा। मिथुन लग्न में ८ राहु यदि मकर का राहु- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो जीवन की ४ २ 4 ३ दिनचर्या में कुछ परेशानियाँ अनुभव करेगा और आयु स्थान में कई बार संकट और निराशा प्राप्त ६ १२ करेगा तथा जीवन की सहायक होने वाली पुरातत्व ७ ९ ११ की संचित शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा और ८ १०रा. राहु कठोर ग्रह की राशि पर बैठा है, इसलिये हठ
अन्दर निचले हिस्से में कभी कोई विकार प्राप्त करेगा तथा जीवन की नं. ३०८ योग की युक्ति से शक्ति प्राप्त करेगा और पेट के
शक्ति प्राप्त करने के लिये किसी पुरातत्व वस्तु को गुप्त योजनाओं तथा कुछ कष्ट साध्य कर्म के द्वारा प्राप्त करेगा और जीवन के रहन-सहन के अन्दर प्रकट रूप में और अन्दरूनी में फर्क रहेगा। मिथुन लग्न में ९ राहु यदि कुम्भ का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य २ स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो भाग्य ४ ५ ३ १ की उन्नति को प्राप्त करने के लिये बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी और भाग्य के स्थान में कभी-कभी ६ १२ भारी चिंताओं का सामना करना पड़ेगा तथा गुप्त ७ ९ रा. योजनाओं के कष्टसाध्य कर्म के द्वारा सफल बनकर ८ १० भाग्य का विकास प्राप्त करेगा और अनाधिकार नं. ३०९ कर्म द्वारा भाग्य में वृद्धि का मार्ग प्राप्त करेगा और सुयश की कमी पायेगा तथा धर्म के क्षेत्र में धर्म का पालन ठीक रूप से नहीं कर सकेगा, किन्तु दिखावटी धर्म का पालन कर सकेगा और भाग्य के प्रकट रूप में और अन्दरूनी स्वरूप में अन्दर महसूस करेगा, किन्तु कठोर ग्रह शनि की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये कठिन कर्म की युक्ति से सफलता पायेगा।
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भृगु संहिता १७९
मिथुन लग्न में १० राहु यदि मीन का राहु- दसम केन्द्र में पिता स्थान पर शत्रु की राशि में बैठा है तो पिता के सुख के ४ २ सम्बन्धों में कष्ट प्राप्त करेगा और मान प्राप्ति ५ ३ १ तथा उन्नति के कार्य व्यापार क्षेत्र में कठिनाईयाँ ६ १२ रा. प्राप्त होंगी तथा सुन्दर गुप्तयुक्तियों के द्वारा ७ ९ ११ कष्टसाध्य कर्म को करके उन्नति का मार्ग स्थापित ८ १० करेगा और राज-समाज के सम्बन्धों में कुछ सुन्दर नं. ३१० सम्बन्ध की कनी और दुख का अनुभव करेगा तथा राज-समाज व व्यापार, मान-प्रतिष्ठा इत्यादि सम्बन्धों में कभी-कभी भारी संकट का सामना प्राप्त करेगा, किन्तु सहारा और शक्ति प्राप्त करेगा तथा इज्जत-आबरू, प्रभाव, मान आदि में प्रकट और अंदरूनी स्थिति में फर्क रहेगा, किन्तु देव गुरु वृहस्पति की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये आदर्शवाद की युक्ति से उन्नति का मार्ग बनावेगा। मिथुन लग्न में ११ राहु यदि मेष का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आमदनी के ४ २ मार्ग में कुछ कष्ट साध्य कर्म को बड़ी भारी गुप्त ५ ३ १ रा. युक्तियों से सफल बनायेगा, किन्तु ग्यारहवें स्थान ६ १२ पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये वित्त से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिये कठिन से कठिन ७ ९ ११ कार्य को करके अधिक लाभ प्राप्त करेगा और ८ १० कभी-कभी लाभ के स्थान में भारी संकट का नं. ३११ सामना प्राप्त करना पड़ेगा, किन्तु अन्त में लाभ की योजनाओं में मजबूत सफालता प्राप्त करेगा और लाभ के स्थान में थोड़ा नफा-थोड़ी आमदनी पर सन्तोष नहीं रहेगा, इसलिये आमदनी की वृद्धि करने के हेतु सदैव गम्भीर योजनाओं में तत्पर बना रहेगा। मिथुन लग्न में १२ राहु यदि वृषभ का राहु- बारहवें खर्च स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा के मार्ग ४ २ रा. में कभी-कभी बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा। ५ ३ १ किन्तु महान् चतुर शुक्र के घर में बैठा है, इसलिये ६ १२ गुप्त योजनाओं की बड़ी भारी चतुराईयों के द्वारा सफल बनकर खर्च की संचालन शक्ति को प्राप्त ७ ९ ११ करेगा। और इसी प्रकार गुप्त चतुराईयों के योग ८ १० से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कष्ट साध्य कर्प के नं. ३१२ द्वारा कार्य सम्पादन करेगा और खर्च के स्थान
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१८० मिथुन लग्न का फलादेश पर प्रकट रूप में जितना प्रभाव होगा, उसकी तुलना में अन्दरूनी कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और खर्च की व्यवस्था सुचारू रूप में संचालित करने में सदैव प्रयत्नशील रहेगा। कष्ट, कठिन परिश्रम, गुप्त शक्ति के अधिपति-केतु मिथुन लग्न में १ केतु यदि मिथुन का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान ४ २ में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है ५ ३ के. १ तो देह की सुन्दरता में कमी प्राप्त करेगा तथा देह की कुछ परतन्त्रता होगी और कष्ट साध्य कर्म ६ १२ को करेगा और हृदय में गुप्त चिंताओं से प्रायः ७ ९ ११ चिंतित रहेगा और कभी-कभी महान् संकट का ८ १० सामना प्राप्त करेगा अथवा कभी-कभी देह में नं. ३१३ कोई चोट या बीमारी का योग प्राप्त करेगा तथा देह के द्वारा कुछ अनुचित और गुप्त कर्म को करेगा एवं गुप्त धैर्य की शक्ति से हृदय में बल प्राप्त करेगा तथा स्वार्थ की पूर्ति करने के लिये अपने अन्दर स्वाभिमान में कुछ कमी प्राप्त करेगा, किन्तु विवेकी बुध की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये विवेक के द्वारा स्वार्थ सिद्ध करेगा। मिथुन लग्न में २ केतु यदि कर्क का केतु- धन स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, तो धन स्थान में ४ के २ बड़ी भारी चिन्ता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब में ५ ३ क्लेश या हानि प्राप्त करेगा और धन की संग्रह ६ १२ शक्ति के अभाव से कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी धन स्थान में गहरा संकट और ७ ९ ११ हानि प्राप्त करेगा तथा बहुत सी दिक्कतों और ८ १०
नं. ३१४ मुसीबतों के बाद धन का सहारा प्राप्त करेगा तथा मन अधिकारी चन्द्रमा की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये धन और कुटुम्ब के कारणों से मानसिक क्लेश का योग अनुभव करता रहेगा किन्तु गुप्त धैर्य की शक्ति से धन के सम्बन्ध में काम करेगा। यदि सिंह का केतु- तीसरे स्थान पर परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई के स्थान में कष्ट अनुभव करेगा तथा भाई-बहिन के सुख में भारी कमी का योग प्राप्त करेगा तथा तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये पराक्रम शक्ति और हिम्मत का बड़ा भारी योग
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भृगु संहिता १८१ मिथुन लग्न में ३ केतु प्राप्त करेगा, किन्तु शत्रु राशि पर होने से बाहुबल के कार्यों में कुछ परेशानी अनुभव होगी और ४ २ अपने पराक्रम द्वारा किये हुये कार्यों की सफलता ५ के ३ १ में निराशा का अनुमान होगा, किन्तु परेशानियों ६ १२ का परिणाम विजय और प्रभाव सूचक बनेगा। केतु महान् तेजस्वी सूर्य की राशि पर बैठा है, ७ ९ ११ इसलिये जबर्दस्त हेकड़ी और हिम्मत से काम ८ १० करेगा। नं. ३१५ यदि कन्या का केतु- चौथे केन्द्र माता के मिथुन लग्न में ४ केतु स्थान पर विवेकी बुध की मित्र राशि पर बैठा है तो घरेलू वातावरण का सुख प्राप्त करने के लिये ४ २ ५ गुप्त चतुराई से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु भूमि, ३ १ मकानादि और माता के सुख में कुछ कमी प्राप्त ६ के १२ करेगा तथा घरेलू सुख शान्ति के वातावरण में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा और भूमि मकानादि ७ ९ ११ रहने के स्थानों में सुख के साधनों की कुछ कमी ८ १० रहेगी, किन्तु कन्या पर बैठा हुआ केतु स्वक्षेत्री के नं. ३१६ समान माना जाता है, इसलिये उपरोक्त सभी विषयों की कमी को किसी न किसी प्रकार पूरी कर लेगा और गुप्त धैर्य की शक्ति के द्वारा सुख प्राप्त करने के साधनों में सफलता प्राप्त करेगा और सुख प्राप्ति के लिये प्रयत्न करेगा। मिथुन लग्न में ५ केतु यदि तुला का केतु- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा ४ २ ३ है तो संतान पक्ष में कुछ कष्ट अनुभव करेगा और ५ १ विद्या ग्रहण करने के समय में कठिनाइयाँ प्राप्त ६ १२ करेगा तथा बुद्धि की गुप्त धैर्य शक्ति से विद्या
७के स्थान की पूर्ति करेगा, किन्तु अपने अन्दर बुद्धि ९ ११ विद्या की कुछ कमी अनुभव करने के कारणों से ८ १०
नं. ३१७ अन्दरूनी कुछ दुःख मानता रहेगा, क्योंकि चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बातों की शब्द शैली में दृढ़ता और चतुराई से काम निकालेगा और संतान पक्ष में बहुत सी कठिनाईयों के बाद कुछ शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु फिर भी संतान पक्ष में कुछ कमी का योग अनुभव करता रहेगा। यदि वृश्चिक का केतु- छठें शत्रु स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में बड़ी दमन शक्ति से काम लेगा और शत्रु पक्ष पर प्रभाव
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१८२ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में ६ केतु और विजय प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय पाने के लिये बड़ी कठिन और गुप्त शक्ति से ४ २ काम लेगा, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ दिक्कतें ५ ३ १ रहेंगी। कार्य के पक्ष में कुछ सहयोग की कमी ६ १२ प्राप्त करेगा तथा छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये कुछ झंझटों और झगड़ों में ७ ९ ११ ही प्रभाव की मजबूती प्राप्त करेगा और अपने ८ क. १० अन्दर कुछ कमजोरी महसूस करते हुये भी अपनी नं. ३१८ कमजोरी की कमी जाहिर नहीं होने देगा और बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम लेने वाला बनेगा। मिथुन लग्न में ७ केतु यदि धन का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो ४ ५ ३ स्त्री स्थान में कुछ कठिनाईयों के योग से बहुत १ प्रकार की विशेषतायें प्राप्त होंगी और बहुत प्रकार w १२ से इन्द्रिय भोगादिक सुखों की प्राप्ति होगी तथा ७ रोजगार के मार्ग में बड़ी-बड़ी तब्दीलियों के सहित ९ के. ११ १० बहुत ऊँचा कार्य करेगा और रोजगार की उन्नति ८
नं. ३१९ के लिये महान् कठिन परिश्रम तथा दौड़-धूप करेगा और थोड़े बहुत रोजगार की सफलताओं से तृप्ति नहीं मानेगा अर्थात् उन्नति के लिये अन्धाधुन्ध कोशिश में लगा रहेगा, इसलिये गृहस्थ की हर प्रकार से उन्नति करने के लिये बड़े-बड़े कष्ट साध्य कर्म को करने में तत्पर रहेगा। मिथुन लग्न में ८ केतु यदि मकर का केतु-आठवें-मृत्यु स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो जीवन-यापन ४ २ ५ ३ १ करने के मार्ग में अनेक प्रकार की चिंतायें प्राप्त होंगी और आयु के स्थान में कई बार संकट प्राप्त ६ १२ होंगे तथा पुरातत्व सम्बन्धी धरोहर शक्ति की कुछ ७ ९ ११ हानि प्राप्त करेगा और पेट के अन्दर निचले हिस्से ८ १०क. में कई प्रकार की कुछ शिकायत या परेशानी
नं. ३२० रहेगी, किन्तु मित्र की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये किसी भी परेशानी के अन्दर रहते हुए गुप्त धैर्य की शक्ति से समय व्यतीत करेगा और जीवन की दिनचर्या में अन्दरूनी तौर से कुछ कमी अनुभव करेगा और प्रत्यक्ष रूप में शक्ति और प्रभाव कायम रहेगा तथा कुछ गरमाई रखेगा। यदि कुम्भ का केतु-नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र शनि की राशि 1
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भृगु संहिता १८३ मिथुन लग्न में ९ केतु पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में कुछ परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा भाग्य की उन्नति के लिये कष्ट ४ २ साध्य कठिन प्रयत्न करना पड़ेगा और फिर भी ५ ३ १ भाग्य में कुछ अन्दरूनी कमजोरी प्राप्त करेगा ६ १२ तथा मित्र की राशि पर बैठा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के लिये महान् कठिनाईयाँ प्राप्त होने ७ ९ पर भाग्य का विकास प्राप्त करेगा और धर्म के १० के मार्ग में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा अर्थात् धर्मानुकुल नं. ३२१ धर्म का यथार्थ पालन नहीं कर सकेगा और सुयश की कमी प्राप्त करेगा और भाग्योन्नति के लिये गुप्त शक्ति का योग प्राप्त करेगा, किन्तु कठोर ग्रह की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये कठिन मार्ग की गुप्त शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में १० केतु यदि मीन का केतु- दसम केन्द्र पिता स्थान में शत्रु देवगुरु वृहस्पति की राशि पर बैठा है, तो ४ २ आदर्शवाद की गुप्त युक्ति व शक्ति के द्वारा उन्नति ५ ३ १ का मार्ग बनायेगा, किन्तु पिता स्थान के सुख में ६ १२ के. कमी और कष्ट प्राप्त करेगा तथा व्यापारिक कार्य क्षेत्रों की उन्नति में बड़ी-बड़ी बाधायें प्राप्त करेगा ७ ९ ११ तथा राज-समाज, मान-प्रतिष्ठा आदि के कार्यों ८ १० के सम्बन्ध में कमजोरी तथा परेशानियाँ अनुभव नं. ३२२ करेगा और मान-प्रतिष्ठा की उन्नति के लिये बड़े कठिन साध्य कर्म को करेगा और कभी-कभी इज्जत-आबरू के स्थान में महान् संकट प्राप्त करेगा तथा राज-काज में झंझट पायेगा। आदर्श गुरु की राशि पर बैठा है, इसंलिये उन्नति पाने के लिये उत्तम मार्ग में कठिन परिश्रम करके गुप्त शक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा। मिथुन लग्न में ११ केतु यदि मेष का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन की आमदनी ४ २ के मार्ग में कठिन परिश्रम करेगा और ग्यारहवें ५ ३ १ के स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् होकर शक्तिशाली ६ १२ कार्य करता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में अधिक लाभ और अधिक मुनाफा प्राप्त करेगा और धन ७ ९ ११ लाभ की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन प्रयत्न ८ १० करेगा तथा लाभ के मार्ग में कभी-कभी कोई नं. ३२३ भारी संकट प्राप्त करेगा, किन्तु गुप्त धैर्य की मजबूत शक्ति से काम लेने के कारणों से अन्त में उत्तम सफलता प्राप्त
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१८४ मिथुन लग्न का फलादेश मिथुन लग्न में १२ केतु करेगा फिर भी आमदनी लाभ के सम्बन्धों में २के. कुछ त्रुटि, कुछ असंतोष अनुभव करेगा और लाभ ४ की वृद्धि के लिये सदैव प्रयत्नशील रहेगा। ५ ३ १ यदि वृषभ का केतु- बारहवें खर्च स्थान में ६ १२ मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में हमेशा कुछ न कुछ परेशानी अनुभव करेगा खर्च ७ ९ ११ की अधिकता के कारणों से कभी-कभी कोई १० भारी संकट का अवसर प्राप्त करेगा और बाहरी नं. ३२४ स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा खर्च की संचालन शक्ति को सुचारु रूप में प्राप्त करने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा और गुप्त धैर्य की शक्ति से खर्च के मार्ग को ठीक रखेगा किन्तु परम चतुर शुक्र की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये गुप्त शक्ति की चतुराईयों द्वारा सफल बनकर खर्च का संचालन कार्य पूरा करेगा। * मिथुन लग्न समाप्त *
४ ३ २
५ १
६ १२
७ ११ ९ ८ १०
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भृगु संहिता १८५ कर्क लग्न प्रारम्भ
4 ३ ४
६ २
७
१२
१० ९ ११
कर्क लग्न का फलादेश प्रारम्भ नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ४३२ तक में देखिये) प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय ५ ३ को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये ६ ४ २ यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। ७ प्रत्येक मनुष्ध के जीवन पर नवग्रहों का दो ८ १० १२ प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म ९ ११ कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है।
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१८६ कर्क लग्न का फलादेश अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ३२५ से लेकर कुण्डली नं० ४३२ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर किसी ग्रह के साथ कोई ग्रह बैठा होगा या जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में ग्रह की दृष्टियाँ बतलाई हैं, उन-उन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३२५ से ३३६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३२५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३२६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३२७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३२८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३२९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३० के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता १८७ १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३३६ के अनुसार मालूम करिये। (४) मिथुन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३३७ से ३४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३३७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३३८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३३९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३४० के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश
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१८८ कर्क लग्न का फलादेश कुण्डली नं. ३४५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ३४८ के अनुसार मालूम करिये। (४ ) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३४९ से ३६० तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३४९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३५९ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता १८९ ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६० के अनुसार मालूम करिये। (४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३६१ से ३७२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३६९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३७० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३७१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३७२ के अनुसार मालूम करिये। (४ ) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका
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१९० कर्क लग्न का फलादेश फलादेश कुण्डली नं० ३७३ से ३८४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३७९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३८४ के अनुसार मालूम करिये। (४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३८५ से ३९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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भृगु संहिता १९१ कुण्डली नं. ३८६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३८९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ३९६ के अनुसार मालूम करिये। (४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ३९७ से ४०८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३९७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३९८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ३९९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०० के अनुसार मालूम करिये।
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१९२ कर्क लग्न का फलादेश ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिप्त वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०८ के अनुसार मालूम करिये। (४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४०९ से ४२० तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४०९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
७. कुण्डली नं. ४११ के अनुसार मालूम करिये। जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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भृगु संहिता १९३ कुण्डली नं. ४१५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४१९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२० के अनुसार मालूम करिये। (४) कर्क लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४२१ से ४३२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४२९ के अनुसार मालूम करिये। भृ.सं .- १३
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१९४ कर्क लग्न का फलादेश १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४३० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४३१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४३२ के अनुसार मालूम करिये। धन, कुटुम्ब, तेजस्थानपति-सूर्य कर्क लग्न में १ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- देह के स्थान पर प्रथम केन्द्र में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह के ५ ३ 5 सू. द्वारा धन की शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का ६ २ योग पायेगा तथा देह में तेज और प्रभाव की ७ १ शक्ति रखेगा, क्योंकि दूसरे व्यक्तियों की दृष्टि में धनवान् और इज्जतदार समझा जायेगा और धन ८ १० १२ स्थान का स्वामी ग्रह कुछ बन्धन का सा कार्य ९ ११ करता है, इसलिये धन कुटुम्ब के कारणों से देह नं. ३२५ में कुछ घिराव और परेशानी अनुभव करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ झंझट और नीरसता प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी युक्त धन लाभ प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में २ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- धन भवन में स्वयं अपनी ५ सू. राशि का मालिक होकर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन ३ भवन में शक्ति प्राप्त करेगा और धन के कारणों ६ ४ २ से प्रभाव और प्रतिष्ठा पायेगा तथा कुटुम्ब की ७ १ शक्ति प्राप्त होगी, किन्तु गरम ग्रह होने के कारणों से धन-जन की स्थिति में कोमलता की कमी ८ १० १२ प्राप्त रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान ११ को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ३२६ धन-जन की रक्षा और वृद्धि करने के कारणों से जीवन की दिनचर्या में कुछ अशांति अनुभव करेगा और पुरातत्व शक्ति के लाभ स्थान में कुछ नीरसता मानेगा तथा प्रभाव की शक्ति से धन की वृद्धि के कारणों को उत्पन्न करता रहेगा। यदि कन्या का सूर्य- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धनेश ग्रह बन्धन का स्वरूप होता है, इसलिये भाई बहन के सुख स्थान में कुछ कमी के साथ शक्ति रखेगा और पराक्रम स्थान की शक्ति से
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भृगु संहिता १९५ कर्क लग्न में ३ सूर्य धन प्राप्त करेगा तथा धन के कारणों से प्रभाव की वृद्धि पायेगा, क्योंकि तीसरे स्थान पर गरम ५ ३ ग्रह शक्ति शाली कार्य करता है, इसलिये धन के छ सू. ४ २ कारणों से बड़ी भारी हिम्मत शक्ति और प्रभाव ७ १ और मान प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, ८ १० १२ इसलिये धन और पराक्रम के करणों से भाग्य ९ ११ की वृद्धि करेगा और धर्म का पालन करेगा तथा नं. ३२७ भाग्य स्थान में प्रभाव और यश प्राप्त करेगा तथा भाग्य और पुरुषार्थ दोनों की मान्यता रखेगा। कर्क लग्न में ४ सूर्य यदि तुला का सूर्य- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है ५ ३ तो धन संग्रह शक्ति के अभाव से दुख अनुभव ६ ४ २ करेगा अर्थात् धन कोष त्रुटि युक्त रहेगा और ७ सू. १ माता के सुख सम्बन्ध में कमी और वियोग प्राप्त करेगा तथा कौटुम्बिक सुख की कमी प्राप्त करेगा ८ १० १२ तथा रहने के स्थान में सुख की कमी प्राप्त करेगा ९ ११ और सातवीं उच्च दृष्टि से राजस्थान को मित्र मंगल नं. ३२८ की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये पिता और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा कारबार की वृद्धि करेगा तथा प्रतिष्ठा और उन्नति प्राप्त करने के लिये धन और सुख शान्ति की परवाह नहीं करेगा। कर्क लग्न में ५ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो धन ५ ३ स्थानपति होने से कुछ बन्धन का कार्य करता है, ६ ४ २ इसलिये सन्तान पक्ष के सुख में कुछ बाधा उपस्थित ७ करेगा और कोई प्रभावशाली सन्तान प्राप्त होगी
८सू. तथा विद्या स्थान में बड़ी भारी शक्ति प्राप्त करेगा १० १२ तथा वाणी के अन्दर बड़ा भारी प्रभाव रखेगा ११ नं. ३२९ और स्वभाव में गर्मी रहेगी तथा धन के कोष की वृद्धि का विशेष ध्यान रहेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ की शक्ति प्राप्त करते हुए भी लाभ की अधिक परवाह नहीं करेगा तथा वजनदार कीमती बातें कहने और सोचने की शक्ति रखेगा। यदि धनु का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो धन के कारण से शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और धन की
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१९६ कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में ६ सूर्य संग्रह शक्ति में कुछ कमजोरी पायेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति में प्रभाव और वैमनस्य दोनों ही प्राप्त ५ ३ ४ २ करेगा तथा छठें स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली ६ कार्य करता है, इसलिये कुछ झगड़े-झंझट युक्त ७ १ परिश्रमी और प्रभावशाली मार्ग से धन की शक्ति प्राप्त करेगा और शत्रु तथा रोग पर काबू रखेगा ८ १० १२
९सू. ११ और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को बुध की
नं. ३३० मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा धन का खर्चा करने में गौरव अनुभव करेगा, इसलिये धनकोष का संग्रह करने की परवाह नहीं रखेगा। कर्क लग्न में ७ सूर्य यदि मकर का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो ५ ३ धनस्थानपति (द्वितीयेशग्रह) बन्धन का सा कार्य ६ ४ २ भी करता है, इसलिये स्त्री स्थान के सुख में कमी ७ १ और क्लेश का रूप प्राप्त करेगा तथा स्त्री से
१२ वैमनस्यता पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ ८ १० सू. परेशानियों के योग से धन की शक्ति प्राप्त करेगा ९ ११
नं. ३३१ और कुटुम्ब सुख के दृष्टिकोण से गृहस्थ में कुछ झंझट प्राप्त करेगा और मूत्र-इन्द्रिय के अन्दर कभी कोई बीमारी या परेशानी का योग अनुभव करेगा तथा भोगादिक सुखों को प्राप्त करने के लिये धन की शक्ति का प्रयोग करने पर भी कुछ नीरसता रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और इज्जत प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ८ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह ५ ३ शक्ति का अभाव प्राप्त करेगा और कुटुम्ब सुख ६ ४ २ के स्थान में क्लेश और कमी पायेगा तथा जीवन ७ १ की दिनचर्या में कुछ बन्धन या घिराव-सा प्रतीत रहेगा और आयु स्थान में कभी-कभी विशेष संकट ८ १० १२ प्राप्त करेगा तथा जीवन में कुछ अमीरात का ढंग ९ ११ सू. प्राप्त रहेगा, किन्तु द्वितीयेश होने के दोष के कारण नं. ३३२ से जीवन के वास्तविक आनन्द में कमी रखेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ कुछ नीरसता युक्त रूप में अच्छा प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से अपने धन स्थान को स्वक्षेत्रीय भाव से देख रहा है,
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भृगु संहिता १९७ इसलिये धन और जन की शक्ति का कुछ सहारा प्राप्त करेगा तथा उदर के अन्दर कोई बीमारी या परेशानी का योग प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ९ सूर्य यदि मीन का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाग्य ५ ३ ४ २ की शक्ति से धन का कोष प्राप्त करेगा और ६ कुटुम्ब सुख प्राप्त करेगा तथा बड़ा भारी प्रभाव ७ १ शाली व भाग्यवान् समझा जायेगा और धन की
८ १० २ शक्ति से धर्म का पालन अच्छा करेगा और उत्तम
९ ११ प्रभाव युक्त मार्ग के द्वारा धन की शक्ति उपलब्ध
नं. ३३३ करता रहेगा और इज्जत, मान, प्रभाव तथा यश प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा और पराक्रम शक्ति से धन लाभ और सफलता प्राप्त करेगा। इसलिये बड़ी हिम्मत शक्ति रखेगा और स्वार्थ तथा 业 奖 出 站
परस्वार्थ दोनों का ठीक पालन करेगा। कर्क लग्न में १० सूर्य यदि मेष का सूर्य- दसम केन्द्र राज-स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है ५ ३ तो कारबार राजसमाज से खूब धन प्राप्त करेगा ६ ४ २ और पिता स्थान की इज्जत बढ़ायेगा तथा ७ १ सू. प्रभावशाली कार्य के द्वारा मान, प्रतिष्ठा और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा धनवान्, इज्जतदार ८ १० १२ समझा जायेगा और किसी भी संस्था आदि में ९ ११ अच्छा पद प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से नं. ३३४ माता स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कमी प्राप्त करेगा तथा मातृ-स्थान में और रहने के स्थान में कुछ त्रुटि या कमी पायेगा और घरेलू सुख शान्ति के अन्दर कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा ऊँचा कर्मेष्ठी बनेगा। कर्क लग्न में ११ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- एकादश लाभ स्थान में ५ ३ शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में ४ गरम ग्रह अधिक शक्तिशाली कार्य करता है, w सू इसलिये धन का लाभ तो अधिक करेगा, किन्तु ७ १ शत्रु राशि पर होने से लाभ प्राप्ति के मार्ग में कुछ १० १२ नीरसता प्रतीत होगी और कुटुम्ब सुख में प्रेम कम ११ रहेगा तथा धन की शक्ति से आमदनी की वृद्धि नं. ३३५ अच्छी रहेगी और लाभ प्राप्ति के मार्ग में प्रभाव
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१९८ कर्क लग्न का फलादेश और अमीरात के ढंग से सफलता विशेष प्राप्त होगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष से धन का लाभ प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि के योग द्वारा धन की वृद्धि के साधन प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में १२ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- बारहवें खर्च स्थान में ५ ३ सू मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन का खर्चा ६ ४ विशेष करेगा तथा धन की संग्रह शक्ति में कमजोरी २ प्राप्त रहेगी और कुटुम्ब स्थान में सुख शक्ति का ७ १ अभाव रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से ८ १० १२ धन की वृद्धि एवं धन प्राप्ति के साधन उत्तम ९ ११ रहेंगे और खर्च के स्थान में प्रभाव और अमीरात नं. ३३६ का ढंग रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में धन की खर्च शक्ति के कारणों से अच्छा प्रभाव रखेगा और इसी हेतु रोगादिक झगड़े-झंझटों के स्थान में सफलता प्राप्त करेगा तथा खर्च शक्ति के महत्ता के सम्मुख धन संग्रह की परवाह नहीं करेगा। देह, आत्मा, मनस्थानपति-चन्द्र कर्क लग्न में १ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वयं अपनी ही राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा 4 ३ है तो देह में सुन्दरता, सुडौलता प्राप्त होगी तथा ६ ४ चं. २ मनोबल और आत्म बल की सुन्दर शक्ति प्राप्त ७ १ रहेगी और कीर्ति तथा ख्याति प्राप्त करेगा तथा
८ १२ अपने अन्दर बहुत उत्तम उच्च कोटि की भावना १० उन्नति करने के लिये रखेगा और सातवीं शत्रु ९ ११ दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख नं. ३३७ रहा है इसलिये स्त्री स्थान में कुछ नीरसता अनुभव करते हुए भी स्त्री भोगादिक पदार्थों की प्राप्ति करेगा और रोजगार के मार्ग में आत्मबल व मनोबल से सफलता पायेगा और लौकिक कार्यों में बड़ी दक्षता और सावधानी से यश प्राप्त करेगा। यदि सिंह का चन्द्र- धन स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह की और मन की शक्ति से धन की वृद्धि करता रहेगा और कुटुम्ब की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का भी कार्य करता है, इसलिये धन के कारणों से देह में कुछ घिराव और परेशानी-सी रहेगी और धन की संग्रह शक्ति का आनन्द प्राप्त करेगा और
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भृगु संहिता १९९ कर्क लग्न में २ चन्द्र इज्जतदार एवं भाग्यवान् समझा जायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शनि की ५ चं ३ कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु के ६ ४ २ स्थान में कुछ संशयात्मक रूप से आयु की ७ १ वृद्धि करेगा और कुछ नीरसता युक्त मार्ग से पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की ८ १० १२ दिनचर्या शानदार तरीके से व्यतीत करेगा। ९ ११ यदि कन्या का चन्द्र- भाई के स्थान पर मित्र नं. ३३८ बुध की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन की कर्क लग्न में ३ चन्द्र सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और तन मन से पराक्रम और प्रभाव की वृद्धि करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत ५ ३ शक्ति से काम करेगा और तनमन में बड़ा उमंग ६ च. ४ २ और उत्साह की शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं ७ १ मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक पुरुषार्थ के द्वारा ८ १० १२ भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का ध्यान और ११ पालन करेगा और भरपूर पुरुषार्थ करने पर भी नं. ३३९ ईश्वर की शक्ति और सामर्थ्य में विश्वास रखेगा तथा देह के अन्दर शक्ति और सुन्दरता प्राप्त करेगा और मनोबल, देहबल के मिश्रित योग के द्वारा सज्जनता युक्त कर्म करने से सफलता प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ४ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है ५ ३ तो माता का और मातृ स्थान का सुख प्राप्त करेगा ६ ४ २ और देह को सुख पूर्वक आनन्द युक्त रखेगा और ७ च. १ हँसने-हँसाने तथा मनोविनोद का स्वभाव प्राप्त करेगा और मकान-जायदाद पर अधिकार रखेगा ८ १० १२ तथा देह में सुन्दरता और मन में कोमलता प्राप्त ९ ११ करेगा तथा सातवीं दृष्टि से राजस्थान को मित्र नं. ३४० मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये तन और मन की शक्ति से पिता स्थान की उन्नति करेगा तथा कारबार में सफलता पायेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा घरेलू और व्यापारिक कार्यों को सुख पूर्वक संचालित करने का ही प्रयत्न करेगा। यदि वृश्चिक का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण में मित्र मंगल की राशि पर नीच का होकर बैठा है तो विद्या की कमी प्राप्त करेगा और संतान पक्ष का
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२०० कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में ५ चन्द्र कष्ट प्राप्त करेगा तथा देह में दुर्बलता या कमजोरी पायेगा तथा मन और बुद्धि में सत्य का अभाव ५ ३ एवं संकुचित विचार रहेगा तथा लाभ स्थान को ६ ४ २ उच्च दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, ७ १ इसलिये देह और बुद्धि की युक्त बल से विशेष ८चं लाभ प्राप्त करेगा तथा धन लाभ की वृद्धि करने १० १२ के लिये अनेक प्रकार की योजनाओं द्वारा मानसिक ९ ११
नं. ३४१ तथा शारीरिक शक्ति का विशेष प्रयोग करेगा और छिपाव की बातों से सदैव अपने स्वार्थ की सिद्धि करने में तत्पर रहेगा तथा मानसिक अशांति रहेगी। कर्क लग्न में ६ चन्द्र यदि धन का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर कुछ रोग या ५ ३ परेशानी तथा दुर्बलता प्राप्त करेगा और कुछ ६ ४ २ झगड़े-झंझट आदि मार्ग में रहकर कार्य करेगा ७ १ तथा किसी प्रकार से कुछ परतन्त्रता का योग १२ अनुभव करेगा और शारीरिक तथा मानसिक शक्ति ८ १० ९च. ११ के द्वारा शत्रु पक्ष में बड़ी नरमाई के साथ प्रभाव
नं. ३४२ की जागृति रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को बुध की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों में मनोयोग की शक्ति से मान प्राप्त करेगा तथा कुछ परेशानी के कार्यों में आत्मबल और गौरव से सफलता प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ७ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में 4 ३ कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा सुन्दर अधिकार ६ ४ २ प्राप्त करेगा तथा स्त्री भोगादिक कार्यों में मन की ७ १ विशेष रूचि रहेगी और रोजगार के मार्ग में देह और मन की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा, ८ १० च १२ किन्तु गृहस्थ और रोजगार के कार्य संचालन में ११ कुछ कठिनाई अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से नं. ३४३ देह के स्थान को स्वयं अपने क्षेत्र कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा लौकिल · कार्यों की सफलता को प्राप्त करने के लिये अपनी शारीरिक तथा मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का प्रयोग करके हृदय में आनन्द अनुभव करेगा। यदि कुम्भ का चन्द्र- आठवें मृत्यु स्थान में शनि की राशि पर बैठा है
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भृगु संहिता २०१ कर्क लग्न में ८ चन्द्र तो देह की सुन्दरता में कमी प्राप्त करेगा तथा जीवन निर्वाह करने के कार्यों से परेशानी अनुभव ५ ३ करेगा और विदेश आदि के कठिन मार्ग का किसी ६ ४ २ प्रकार से अनुसरण करेगा तथा पुरातत्व शक्ति ७ १ का कुछ निरसताई से लाभ प्राप्त करेगा और
१२ आयु में कुछ शक्ति पायेगा जीवन की दिनचर्या ८ १० में कुछ रौनक पायेगा और सातवीं दृष्टि से धन ११चं. नं. ३४४ स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये तन और मन की कठिन साधना के द्वारा धन-जन की वृद्धि करेगा और गूढ़ शक्ति की खोज में लगा रहेगा। कर्क लग्न में ९ चन्द्र यदि मीन का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो देह ५ ३ और मन की सुन्दर शक्ति के द्वारा भाग्य की महान् ६ ४ २ उन्नति करेगा और धर्म का सुन्दर पालन करेगा ७ १ तथा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और देह के द्वारा सतोगुणी कर्म करते रहने से दैवी शक्ति ८ १० १२ च. की सफलता प्राप्त करेगा और ईश्वर में भारी भरोसा ९ ११ रखेगा तथा सुयश प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र नं. ३४५ दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा मनोबल और देहबल के द्वारा पुरुषार्थ कर्म की सफलता प्राप्त करेगा और मन के अन्दर मगन रहने के साधन प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में १० चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान ५ ३ की सुन्दर वृद्धि करेगा तथा शारीरिक और मानसिक ६ ४ २ शक्ति के द्वारा कारबार की वृद्धि करेगा तथा ७ १ चं. राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और किसी प्रकार की सुन्दर पद या बड़प्पन प्राप्त करके ८ १० १२ आनन्द का अनुभव करेगा और देह के अन्दर ९ ११ नं. ३४६ सुन्दर प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से सुख स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये सुख स्थान की वृद्धि करेगा और मातृ स्थान में सुन्दर प्रेम रखेगा तथा रहने के मकानादि स्थानों में सुन्दरता और सुख प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का चन्द्र- एकादश लाभ स्थान में उच्च का होकर सामान्य
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२०२ कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में ११ चन्द्र मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो शारीरिक और मानसिक शक्ति के द्वारा धन लाभ की विशेष ५ ३ ६ ४ २चं. उन्नति करेगा तथा देह में सुन्दरता एवं सुडौलता प्राप्त करेगा तथा आमदनी में वृद्धि करने के लिये ७ १ सदैव बड़ा भारी प्रयत्न शील रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि से संतान स्थान को मंगल की वृश्चिक ८ १० १२ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष के सुक्ष ११ सम्बन्धों मे कुछ कमी का योग प्राप्त करेगा और नं. ३४७ विद्या की शक्ति के अन्दर कुछ त्रुटि अनुभव करेगा तथा धन लाभ के कार्य कारणों में स्वार्थ सिद्धि के लिये कुछ कटु शब्दों का प्रयोग भी करेगा। कर्क लग्न में १२ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के सुख 4 ३चं सम्बन्धों में कुछ कमजोरी रहेगी और खर्चा विशेष ६ ४ २ रहेगा तथा तन और मन की शक्ति से बाहरी स्थानों ७ १ में सफलता प्राप्त करेगा तथा खर्च की विशेषताओं
१० १२ में ही प्रसन्नता का अनुभव करेगा किन्तु खर्च ८ ९ ११ संचालन के कार्य कारणों से देह में कमजोरी या
नं. ३४८ दुबलापन प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रुस्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये तन-मन और खर्च के कारणों से शत्रु स्थान में शांति युक्त वातावरण से प्रभाव रखेगा और फिर भी मन के अन्दर कुछ अशांति अनुभव करेगा। विद्या, संतान, पिता, राजस्थानपति-मंगल कर्क लग्न में १ मंगल यदि कर्क का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के ३ स्थान पर नीच का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर ५ ४ मं, २ बैठा है तो देह के स्वास्थ्य और सुन्दरता में कमी ६ प्राप्त करेगा तथा विद्या कुछ अपूर्ण रहेगी और ७ १ संतान पक्ष के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा पिता के प्रेम स्थान में कुछ नीरसता रहेगी ८ १० १२ ९ ११ और कार्य-व्यापार, उन्नति के मार्ग में अधूरा विकास
नं. ३४९ होगा तथा राज-समाज के सम्बन्धों में मान-प्रतिष्ठा आदि की कुछ कमजोरी रहेगी तथा उन्नति को प्राप्त करने के लिये देह के परिश्रम और फिकरमंदी से काम करना पड़ेगा तथा चौथी दृष्टि से सुख भवन को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख
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भृगु संहिता २०३ रहा है, इसलिये कुछ मकानादि मातृ स्थान की शक्ति का सुख प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता के सहित वृद्धि और शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में विशेष प्रयत्न करके सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ कठिनाईयों के द्वारा प्रभाव शक्ति और कुछ पुरातत्व का लाभ रहेगा। कर्क लग्न में २ मंगल यदि सिंह का मंगल- धन स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो ऊँचे कारबार के योग से ५ मं ३ धन की वृद्धि करेगा और राज-समाज से धन का ६ ४ २ लाभ और मान, प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा पिता ७ १ स्थान की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और बुद्धि
८ १२ योग के कर्म से उन्नति का मार्ग बनायेगा तथा १० चौथी दृष्टि से संतान स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक ९ ११ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या नं. ३५० की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु धन का स्थान बन्धन का-सा कार्य भी करता है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा, किन्तु बुद्धि से धन की वृद्धि करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी के योग से प्रभाव पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में भाग्य स्थान को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और उत्तम कर्म के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का पालन करेगा। कर्क लग्न में ३ मंगल यदि कन्या का मंगल- तीसरे पराक्रम स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पराक्रम और ५ ३ बाहुबल की शक्ति से महान् उन्नति प्राप्त करेगा ४ २ और भाई या बहिन की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा ७ १ तथा विद्या और संतान शक्ति प्राप्त करेगा और
१२ तीसरे स्थान पर गरम ग्रह बलवान् हो जाता है, १० फिर भी विशेषता यह है कि बुद्धि और राज्य का ९ ११ स्वामी है, इसलिये आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी नं. ३५१ मेष राशि में राज्य स्थान को स्वक्षेत्र दृष्टि से देख रहा है, अतः बुद्धि योग द्वारा राज-समाज के उत्तम प्रभावशाली कर्म को करके बड़ी भारी शक्ति और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की ऊँची शक्ति प्राप्त करेगा और राजनैतिक क्षेत्र के कार्यों में बड़ी दक्षता और हिम्मत शक्ति से उत्साह पूर्वक कार्य करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से शत्रु
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२०४ कर्क लग्न का फलादेश स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और कर्म की बलवान् शक्ति के द्वारा शत्रु स्थान में विजय और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धिबल के कर्म से भाग्यशाली बनेगा और धर्म तथा यश की प्राप्ति करेगा और नीच राशि को छोड़कर राज्य स्थान पर मंगल का बैठना या देखना उन्नति दायक स्वयमेव होता है। कर्क लग्न में ४ मंगल यदि तुला का मंगल- चौथे केन्द्र मातृ स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ५ ३ बुद्धि विद्या और संतान शक्ति का सुख प्राप्त ६ ४ २ करेगा तथा मातृ स्थान का सुख पायेगा और ७ मं, १ सातवें स्त्री स्थान को चौथी उच्च दृष्टि से शनि १२ की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और ८ १० रोजगार के मार्ग में उन्नति प्राप्त करेगा तथा लौकिक ९ ११ एवं गृहस्थिक कार्यों में कुछ नीरसता अनुभव नं. ३५२ करेगा और सातवीं दृष्टि से राज्य स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्रीय दृष्टि से देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा शान्ति, राज-समाज में वृद्धि, उन्नति और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान का नाम ऊँचा करेगा और कारबार में सफलता प्राप्त करेगा तथा भूमि और मकानादि का प्रभाव पायेगा और आठवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के योग से धन का लाभ खूब प्राप्त करेगा और अपने स्थान से ही अनेकों प्रकार के लाभ और सफलतायें प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ५ नंगल यदि वृश्चिक का मंगल- पंचम त्रिकोण संतान स्थान पर स्वयं अपने स्थान में स्वक्षेत्री होकर ५ ३ बैठा है तो विद्या और सन्तान की शक्ति प्राप्त ६ ४ २ करेगा तथा राज्यभाषा की ज्ञान शक्ति के द्वारा ७ १ मान और प्रभाव की वृद्धि करेगा तथा बुद्धि योग से ही कारबार चलायेगा और पिता की शक्ति का ८ मं १० १२ सहारा प्राप्त करेगा तथा वाणी की शक्ति से राज- ९ ११ समाज में सफलता और उन्नति पायेगा तथा चौथी दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ थकान पाने वाले नं. ३५३
बौद्धिक कर्मों के द्वारा शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कुछ नीरसता लिये हुये पुरातत्व का और आयु का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये
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भृगु संहिता २०५ लाभ की वृद्धि करने के लिये दिमाग की शक्ति का विशेष प्रयत्न करना पड़ेगा और आठवीं दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है इसलिये खर्चा अधिक रहेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में बुद्धि योग द्वारा खर्च की सफलता और मान प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ६ मंगल यदि धनु का मंगल- छठें शत्रु स्थान पर मित्र गुरु की धनु राशि पर बैठा है तो पिता और सन्तान ३ पक्ष के सुख सम्बन्धों में कुछ अरूचि या वैमनस्यता ६ ४ २ प्राप्त करेगा, किन्तु छठें स्थान पर गरम ग्रह ७ १ शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये विद्या ग्रहण करेगा और विद्या बुद्धि के कर्म योग से परिश्रम ८ १० १२ के द्वारा शत्रु स्थान में विजय प्राप्त करेगा और ९म. ११ कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा राज-समाज में नं. ३५४ मान और सफलता प्राप्त करेगा और वाणी की शक्ति से प्रभाव की जागृति रखेगा तथा चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के कर्म से भाग्य की उन्नति प्राप्त करेगा तथा धर्म के पालन में रुचि रखेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध ठीक रखेगा तथा आठवीं नीच दृष्टि से देह स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और सुडौलताई में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा देह में कुछ थकान पाने वाले बुद्धि योग के कर्म से सफलता प्राप्त करेगा, इसलिये अपने दैहिक सुख शान्ति और देह के सम्मान के मार्ग में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा। कर्क लग्न में ७ मंगल यदि मकर का मंगल-सातवें केन्द्र स्त्री स्थान पर उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि में बैठा है ५ ३ तो कई स्त्रियों का संयोग प्राप्त करेगा और स्त्री ६ ४ २ स्थान में सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा किन्तु ७ १ स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद भी रहेगा और रोजगार के मार्ग में विशेष सफलता और मान प्राप्त करेगा ८ १० मं. १२ तथा विद्या और संतान शक्ति प्राप्त करेगा और ९ ११ चौथी दृष्टि से राज्य स्थान को स्वयं अपनी मेष नं. ३५५ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है; इसलिये कारबार में खूब उन्नति करेगा तथा राज-समाज में प्रभाव और इज्जत पायेगा तथा पिता की शक्ति का नाम और महत्त्व ऊँचा करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में
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२०६ कर्क लग्न का फलादेश कुछ कमजोरी और सुन्दरता की कुछ कमी रहेगी तथा गृहस्थ और कारबार की उन्नति करने के कारणों से देह में कुछ परेशानी-सी रहेगी और आठवीं दृष्टि से धन स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और रोजगार की शक्ति से धन का संग्रह करेगा तथा वाणी में विशेष प्रभाव रखेगा। कर्क लग्न में ८ मंगल यदि कुम्भ का मंगल-आठवें मृत्यु स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो पिता और पुत्र ५ ३ के सुख सम्बन्धों में कमी और कष्ट का योग ६ ४ २ प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में कमजोरी अनुभव ७ १ करेगा और राज-समाज के अन्दर मान और प्रभाव
१२ की कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा बड़े कारबार की ८ १० हानि प्राप्त करेगा और दूसरे स्थानों के सम्बन्धों ९ ११मं. नं. ३५६ में कुछ सफलता प्राप्त करेगा, चौथी दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रमी मार्ग से बराबर लाभ प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति से सम्बन्धित भी लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से धन स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के परिश्रमी मार्ग के द्वारा धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब का कुछ अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से पराक्रम स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या और आयु स्थान में कुछ नीरसता के योग से शक्ति प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ९ मंगल यदि मीन का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो उत्तम 5 ३ श्रेष्ठ विद्या प्राप्त करेगा तथा संतान का उत्तम ६ ४ २ सुख प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की महानता ७ १ प्राप्त करेगा और बुद्धि के उत्तम धर्म के द्वारा भाग्य की श्रेष्ठ उन्नति और यश प्राप्त करेगा तथा ८ १२ १० म. धर्म-कर्म का ज्ञान और पालन करेगा और उत्तम ९ ११
नं. ३५७ न्याय की बातों के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से भाई के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन का उत्तम सहयोग प्राप्त करेगा और पराक्रम शक्ति से
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भृगु संहिता २०७ सफलता प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से माता के सुख स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में कुछ नीरसताई के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा मकानादि का लाभ पायेगा। कर्क लग्न में १० मंगल यदि मेष का मंगल- दसम केन्द्र पिता के स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा ५ ३ है तो पिता स्थान की श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करेगा और ६ ४ २ राज-समाज में बहुत मान प्राप्त करेगा तथा बड़े १ मं. कारबार को करने में सफलता प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में संतान ८ १० १२ और विद्या स्थान को स्वक्षेत्री दृष्टि से देख रहा है, ९ ११ इसलिये विद्या और संतान की विशेष शक्ति प्राप्त नं. ३५८ करेगा और बुद्धि विद्या के योग से ऊँचा पद और बड़ा कारबार करेगा तथा राज-भाषा और राजनैतिक ज्ञान को वाणी की योग्यतां के द्वारा कार्य रूप में परिणित करने से प्रभाव और सफलता प्राप्त करेगा तथा बुद्धि के अन्दर तेजी, हुकूमत और कानून-कायदे को धारण करके व्यवहार करेगा और चौथी नीच दृष्टि से देह के स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता में कुछ कमी और कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से सुख भवन और मातृ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ११ मंगल यदि वृषभ का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है 4 ३ तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बहुत शक्ति शाली ६ ४ २मं. फल का दाता होता है, इसलिये धन की वृद्धि ७ 2 करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा और बड़े कारबार के मार्ग द्वारा धन लाभ खूब करेगा तथ ८ १० १२ पिता स्थान की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और ९ ११ सातवीं दृष्टि से संतान और विद्या के स्थान को नं. ३५९ स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि के कर्म योग से आमदनी और लाभ की वृद्धि करेगा तथा वाणी की योग्यता से मान और प्रभाव तथा राज-समाज की सफलता प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से धन स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन
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२०८ कर्क लग्न का फलादेश और कुटुम्ब की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि की महानता से शत्रु स्थान में विजय और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में १२ मंगल यदि मिथुन का मंगल- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता और ५ ३म पुत्र की हानि या कष्ट का योग प्राप्त करेगा और ६ ४ २ विद्या तथा संतान पक्ष के सुख में विशेष कमी ७ १ अनुभव करेगा और खर्चा अधिक करेगा तथा कारबार की उन्नति में बड़ी बाधायें प्राप्त करेगा ८ १० १२ और राज-समाज के अन्दर मान-प्रतिष्ठा की ९ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से भाई- नं. ३६० बहिन पराक्रम के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पराक्रम से सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में प्रभाव रखेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार की विशेष उन्नति करेगा तथा स्त्री स्थान में विशेषता और प्रभाव प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में बुद्धि योग के कर्म से सफलता और मान प्राप्त करेगा तथा खर्च के मार्ग से उन्नति के साधन पायेगा तथा बुद्धि में कुछ भ्रम और परेशानी अनुभव करेगा। भाई, पराक्रम, खर्च, विवेकस्थानपति-बुध कर्क लग्न में १ बुध यदि कर्क का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो प्रभाव और 4 ३ ६ ४ बु. पराक्रम की जागृति विवेक शक्ति के द्वारा करेगा २ तथा भाई बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और खर्चा ७ खूब करेगा, किन्तु व्ययेश होने के कारण देह में कुछ कमजोरी तथा भाई-बहिन के सुख में कुछ ८ १० १२ कमी प्राप्त करेगा। परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्धों ९ ११ में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. ३६१ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक पुरुषार्थ और खर्च की शक्ति से स्त्री और रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष से कुछ कमजोरियाँ भी प्राप्त करेगा। यदि सिंह का बुध- धन स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो
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भृगु संहिता २०९
कर्क लग्न में २ बुध पराक्रम शक्ति और खर्च की शक्ति तथा विवेक द्वारा धन संग्रह करने का विशेष प्रयत्न करेगा, ५ ब. ३ किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण धन संग्रह ६ ४ २ नहीं हो सकेगा, परन्तु इज्जत बनी रहेगी और धन ७ १ का स्थान बन्धन का कार्य भी करता है, इसलिये
८ १० १२ भाई-बहिन के सुख में बहुत कमी करेगा और खर्चे को रोकने की चेष्टा करने पर भी धन का ११ खर्च अधिक होता रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. ३६२ शनि की कुम्भ राशि में आयु-स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का कुछ अधूरा लाभ प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ३ बुध यदि कन्या का बुध- तीसरे भाई-बहिन के स्थान पर उच्च का होकर स्वयं अपनी राशि में .4 ३ स्वक्षेत्री बैठा है तो पराक्रम की विशेष वृद्धि करेगा ६बु. ४ २ और भाई बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा खर्चा ७ १ खूब करेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण भाई बहन के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा और ८ १० १२ देह की पराक्रम शक्ति के अन्दर कुछ अन्दरूनी ९ ११
नं. ३६३ कमजोरी अनुभव करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाग्य-स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म सम्बन्ध में कुछ लापरवाही रखेगा तथा पुरुषार्थ के मुकाबले में भाग्य की शक्ति को कुछ कमजोर समझेगा तथा यश की कुछ कमी प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ४ बुध यदि तुला का बुध- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो भाई बहिन ५ ३ का सुख प्राप्त करेगा तथा खर्चा खूब करेगा ६ ४ २ और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध सुख घर बैठे प्राप्त ७ ब. १ करेगा तथा सुख पूर्वक पराक्रम शक्ति से खर्च का संचालन करेगा और व्ययेश होने के दोष के ८ १० १२ कारण से माता के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा ९ ११ तथा मकान जायदाद रहने के स्थानों में कुछ त्रुटि नं. ३६४ युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कमजोरी के साथ-साथ पिता स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज, कारबार के सम्बन्धों में कुछ थोड़ी सफलता प्राप्त करेगा। भृ.सं. -१४
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२१० कर्क लग्न का फलादेश
कर्क लग्न में ५ बुध यदि वृश्चिक का बुध- पाँचवें त्रिकोण संतान स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो 4 ३ व्ययेश होने के दोष के कारण संतान की कुछ ६ ४ २ त्रुटि युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा बहन-भाई का ७ १ सामान्य सुख प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि के अन्दर कुछ कमी लिये हुए शक्ति प्राप्त करेगा, ८बु. १० १२ किन्तु विवेक और वाणी की शक्ति से खर्च की ९ ११ सफलता प्राप्त करेगा तथा बुद्धि के अन्दर कुछ नं. ३६५ कमजोरी अनुभव करते हुए भी बुद्धि द्वारा बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि बल के द्वारा लाभ प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों में बुद्धि बल से सफलता प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ६ बुध यदि धनु का बुध- छठें शत्रु स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के सुख ५ ३ सम्बन्धों में कमी और विरोध या वैमनस्यता प्राप्त ६ ४ २ करेगा और कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ ७ के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी तथा कुछ परतंत्रता १२ का योग पायेगा और शत्रु स्थान में व्ययेश के ८ १० दोष के कारणों से कुछ कमजोरी तथा पराक्रमेश ९ बु. ११ नं. ३६६ होने के नाते कुछ शक्ति से काम करेगा, किन्तु नरम और विवेकी ग्रह होने के कारण प्रकट रूप में शान्ति से ही शत्रु पक्ष में अपना मतलब सिद्ध करेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा कम करने पर भी अधिक होगा और बाहरी स्थानों का सामान्य सम्बन्ध बनेगा। कर्क लग्न में ७ बुध यदि मकर का बुध- सातवें केन्द्र, स्त्री व रोजगार के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा ५ ३ है तो पराक्रम की शक्ति से रोजगार में सफलता ६ ४ २ और गृहस्थ का आनन्द प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश ७ १ होने के दोष से रोजगार और स्त्री स्थान का सुख १२ तथा सफलता-शक्ति के अन्दर कमजोरी अनुभव ८ १० बु. करेगा और गृहस्थी के अन्दर खर्चा खूब करेगा ९ ११
नं. ३६७ तथा रोजगार और गृहस्थी के अन्दर बाहरी स्थानों के संपर्क से विवेक शक्ति और परिश्रम के द्वारा उन्नति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह स्थान को चन्द्र की कर्क
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भृगु संहिता २११ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परिश्रम और खर्च की शक्ति से देह में प्रभाव और कुशलता प्राप्त करेगा, किन्तु देह में कुछ शक्ति और कुछ दुर्बलता, दोनों का अनुभव करेगा। कर्क लग्न में ८ बुध यदि कुम्भ का बुध-आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के ५ ३ २ सुख सम्बन्धों में कमी या कष्ट का योग प्राप्त ६ ४ करेगा और पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर कमजोरी ७ तथा हिम्मत और उत्साह के अन्दर त्रुटि एवं ८ १० १२ आलस्यता प्राप्त करेगा और खर्च की संचालन ९ ११बु. शक्ति में कमजोरी या कमी पायेगा तथा कठिन नं. ३६८ परिश्रम और विवेक के योग से बाहरी स्थानों का सम्बन्ध तथा खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन तथा आयु स्थान में कुछ शक्ति और कुछ कमजोरी का अनुभव करेगा और पुरातत्व के लाभ सम्बन्ध में भी कुछ त्रुटियुक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ पुरातत्व 1 शक्ति से सम्बन्धित कार्य के द्वारा धन का लाभ कुछ त्रुटियुक्त करेगा, क्योंकि उपरोक्त सभी कार्यों में व्ययेश होने के दोष से कमजोरी करता है। कर्क लग्न में ९ बुध यदि मीन का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य 4 ३ स्थान पर नीच का होकर मित्र गुरु की राशि में ६ ४ २ बैठा है तो भाई-बहिन का अपूर्ण सुख प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति का कुछ अधूरा लाभ ७ १ प्राप्त करेगा और भाग्य तथा धर्म एवं ईश्वर के ८ १२ १० सम्बन्धों में बहुत थोड़ा विश्वास और थोड़ा धर्म ९ ११ का पालन कर सकेगा तथा बाहरी दूसरे स्थानों नं. ३६९ के सम्बन्ध में सामान्य लाभ प्राप्त करेगा और भाग्य की शक्ति से सामान्य खर्चे का योग प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य के मुकाबले में पुरुषार्थ का विशेष महत्व मानेगा और व्ययेश होने से भाग्योन्नति के मार्ग में रुकावटें पायेगा। यदि मेष का बुध- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष से पिता स्थान की सफलता शक्ति में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा राज समाज के सम्बन्धों में कुछ कमी लिये हुए
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२१२ कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में १० बुध सफलता शक्ति बाहुबल के परिश्रम तथा विवेक के द्वारा प्राप्त करेगा और भाई-बहन की शक्ति ५ ३ का कुछ योग प्राप्त करेगा तथा खर्च अधिक ६ ४ २ करने से उन्नति में बाधा रहेगी और बाहरी स्थानों ७ १ बु. का सम्बन्ध सुन्दर व प्रभाव युक्त रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से सुख भवन को मित्र शुक्र की तुला १० १२ राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम और खर्चे ९ ११ की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा। नं. ३७० कर्क लग्न में ११ बुध यदि वृषभ का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पुरुषार्थ शक्ति ५ ३ से विवेक के द्वारा अच्छा लाभ प्राप्त करेगा तथा ६ ४ २बु. खर्चा खूब करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष से आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी, किन्तु ७ १ बाहरी सम्बन्धों से खूब लाभ रहेगा और खर्चे के ८ १० १२ बल से आमदनी में वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं ९ ११ दृष्टि से संतान स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक नं. ३७१ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या के पक्ष में कुछ कमी लिये हुए शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा वाणी में विवेक शक्ति से लाभ प्राप्त होगा। कर्क लग्न में १२ बुध यदि मिथुन का बुध- बारहवें खर्च स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो ५ ३ बु. खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी दूसरे स्थानों ६ ४ २ में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और भाई बहन के ७ १ सुख में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति 尘 半 业 业 出
१० १२ के अन्दर भी कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और ८ विवेक रूपी पुरुषार्थ से खर्च की मजबूत संचालन ९ ११ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु नं. ३७२ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये शांति, पुरुषार्थ और खर्च की शक्ति से शत्रु स्थान में कुछ सफलता और विवेक तथा खर्च के बल से बहुत-सी दिक्कतों पर काबू रखेगा तथा अपने अन्दर कुछ कमी या कमजोरी अनुभव करेगा, क्योंकि पुरुषार्थ का स्वामी व्ययेश हो गया है। भाग्य, धर्म, शत्रुस्थान पति-गुरु यदि कर्क का गुरु- देह के स्थान पर प्रथम केन्द्र लग्न में उच्च का
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भृगु संहिता २१३ कर्क लग्न में १ गुरु होकर मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है तो देह में महान् प्रभाव और सुन्दरता प्राप्त करेगा और नवम ५ ३ दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में ६ ४ गु. २ स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की महान् ७ १ उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म का पालन करेगा तथा भाग्य की शक्ति से सफलता और ८ १० १२ सुयश प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से संतान ९ ११ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, नं. ३७३ इसलिये संतान शक्ति का सुख प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि में कला कौशल और योग्यता प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ी सज्जनता का व्यवहार करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कमी या कष्ट प्राप्त करेगा और शत्रुस्थान पति होने से शत्रु पक्ष में विजय और प्रभाव रखेगा, किन्तु देह और भाग्य संतान इत्यादि मार्गों में कुछ दिक्कतें प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में २ गुरु यदि सिंह का गुरु- धन स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाग्य और परिश्रम की ५गु. ३ शक्ति से खूब धन पैदा करेगा तथा कुटुम्ब का ६ ४ २ सुख प्राप्त करेगा तथा स्वार्थ युक्त धर्म का पालन ७ १ करेगा और धन की शक्ति से इज्जत और मान प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को ८ १० १२ स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, ११ इसलिये शत्रु स्थान में धन की शक्ति से भारी नं. ३७४ सफलता, विजय और लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये पुरातत्व का लाभ और जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और नवमी दृष्टि से राज्य स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और कुछ परिश्रम के द्वारा पिता स्थान में व कारबार के सम्बन्ध में उन्नति और धन का लाभ प्राप्त करेगा तथा ननसाल पक्ष से कुछ फायदा पायेगा। यदि कन्या का गुरु- भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और पुरूषार्थ तथा परिश्रम के योग से महान् कार्यों के द्वारा उन्नति और यश प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कमी और क्लेश का योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी तथा कमजोरी अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से
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२१४ कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में ३ गुरु स्वयं अपनी मीन राशि, भाग्य स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये भाग्य की महान् वृद्धि ५ ३ करेगा तथा धर्म का पालन करेगा और शत्रु स्थान ६ गु. ४ २ में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा तथा नवीं दृष्टि से ७ १ लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और पुरुषार्थ के ८ १० १२ द्वारा कुछ थोड़ी-सी दिक्कतों से आमदनी के मार्ग ११ में सफलता प्राप्त करेगा तथा हिम्मतदार एवं विजयी नं. ३७५ बनेगा, किन्तु शत्रु स्थान का स्वामी होने से हर एक मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेगी। कर्क लग्न में ४ गुरु यदि तुला का गुरु- चौथे केन्द्र मातृ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में बैठा है तो 4 ३ माता के पक्ष में तथा मातृ भूमि के सम्बन्ध में ६ ४ २ कुछ नीरसता के साथ सुख और सफलता प्राप्त ७ गु. १ करेगा और मकानादि होने के स्थान में कुछ त्रुटि लिये हुये अच्छी शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े- ८ १० १२ झंझटों में कुछ शान्तिप्रद वातावरण के द्वारा ११ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और पाँचवीं शत्रु नं. ३७६ दृष्टि से आयु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए कुछ निरसता के सहित जीवन की दिनचर्या में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्त्व का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से राज स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में परिश्रम और भाग्य की शक्ति से उन्नति और मान प्राप्त करेगा तथा कारबार व पिता के स्थान में शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा और नवम दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा परिश्रम और भाग्य की शक्ति से बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध में सफलता प्राप्त करेगा और यथा शक्ति धर्म का पालन करेगा। यदि वृश्चिक का गुरु- पंचम त्रिकोण संतान स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से संतान पक्ष में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और थोड़े से परिश्रम के योग से भाग्य के द्वारा विद्या अध्ययन में श्रेष्ठ सफलता प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि की शक्ति से शत्रु पक्ष में सफलता और यश प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और संतान के योग से भाग्य की महान् वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म शास्त्र का ज्ञान और धर्म का पालन करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु
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भृगु संहिता २१५
कर्क लग्न में ५ गुरु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के साथ लाभ की वृद्धि प्राप्त करेगा ५ ३ तथा नवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को मित्र ६ ४ २ चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह ७ में बड़ी भारी सुन्दरता और प्रभाव और सुयश की
१२ शक्ति प्राप्त करेगा तथा हृदय में उत्तम ज्ञान धारण ८गु. १० करेगा, किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के कारण
नं. ३७७ बुद्धि, संतान, भाग्य, देह, धर्म इत्यादि सभी मार्गों में कुछ-कुछ परेशानी का योग मिश्रित रहेगा। कर्क लग्न में ६ गुरु यदि धन का गुरु- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो शत्रु ५ ३ स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और शत्रु पक्ष ६ ४ २ में भाग्य की शक्ति से बड़ी सफलता और सुयश प्राप्त करेगा। किन्तु भाग्य पति गुरु छठें घर में बैठा है, इसलिये भाग्य की उन्नति में बड़ी-बड़ी ८ १० १२ ९गु. दिक्कतें और विलम्ब का योग प्राप्त करेगा और ११ पाँचवीं मित्र दृष्टि से राज्य स्थान को एवं पिता नं. ३७८ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में बड़ी सफलता उन्नति और मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा नवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन-जन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा, किन्तु छठें स्थान का रगणी होने के नाते उपरोक्त सभी सम्बन्धों में कुछ दिक्कतें पैदा करेगा अर्थात् भाग्य के हर एक सम्बन्धों में कुछ झगड़े-झंझटों का योग प्राप्त करता रहेगा, किन्तु प्रभाव की वृद्धि हमेशा चलती रहेगी। कर्क लग्न में ७ गुरु यदि मकर का गुरु- सातवीं स्त्री स्थान पर नीच का होकर शत्रु शनि की राशि में बैठा है तो 4 mY स्त्री स्थान में कुछ कमी और कष्ट का योग प्राप्त ६ २ करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ दिक्कतें ७ १ प्राप्त करेगा तथा शत्रु-पक्ष और भाग्य के सम्बन्ध में कमजोरी अनुभव करेगा और पाँचवीं दृष्टि से ८ १० गु. १२ लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि ९ ११ में देख रहा है, इसलिये दैनिक परिश्रम के योग से नं. ३७९ धन लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से
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२१६. कर्क लग्न का फलादेश देह के स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा नवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और पराक्रम से सफलता और उत्साह पायेगा तथा छठें स्थान का पति होने से हर एक सम्बन्धों में कुछ-कुछ परेशानी करेगा। कर्क लग्न में ८ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- आठवें मृत्यु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य की ५ ३ महान् दुर्बलता प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष की ६ ४ २ तरफ से जीवन में कुछ अशांति अनुभव करेगा ७ १ और आयु स्थान में कुछ असंतोष के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति की कुछ सफलता ८ १० १२ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से खर्च स्थान को ९ ११गु. नं. ३८० मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सफलता प्राप्त करेगा अर्थात् दूसरे स्थानों में कुछ दिक्कतों के साथ भाग्य की वृद्धि पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन-स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के साधन प्राप्त करेगा और नवीं दृष्टि से माता के सुख स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के साथ मातृ स्थान के सुखों को प्राप्त करेगा और धर्म पालन की कमजोरी पायेगा। कर्क लग्न में ९ गुरु यदि मीन का गुरु- त्रिकोण भाग्य स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो ५ ३ भाग्य की श्रेष्ठ उन्नति प्राप्त करेगा तथा धर्म का ६ ४ २ पालन करेगा किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के ७ १ नाते भाग्य और धर्म की उन्नति में कुछ त्रुटि प्राप्त १२ करेगा; किन्तु भाग्य की शक्ति से विजय और १० प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं उच्च दृष्टि से देह ९ ११ के स्थान को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, नं. ३८१ इसलिये देह में प्रभाव और सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान पक्ष को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये उत्तम विद्या प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष की शक्ति प्राप्त करेगा तथा बुद्धि और सज्जनता के योग से यश प्राप्त करेगा। यदि मेष का गुरु- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र मंगल की राशि पर
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भृगु संहिता २१७ कर्क लग्न में १० गुरु बैठा है तो पिता स्थान में उन्नति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज, कारबार के स्थान में मान-प्रतिष्ठा 4 ३ और सफलता प्राप्त करेगा और लौकिक धर्म- ६ ४ २ कर्म का पालन बड़ी योग्यता से करेगा तथा पाँचवीं ७ १ गु. मित्र दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और कर्म की शक्ति १० १२ से धन-जन की वृद्धि करेगा और सातवीं दृष्टि से ९ ११ सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में सुख भवन नं. ३८२ को देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के साथ सुख की प्राप्ति खूब करेगा और नवमी दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट तथा परिश्रम के योग से पदोन्नति और भाग्योन्नति करेगा तथा छठें स्थान का स्वामी होने के कारण उन्नति के मार्गों में कुछ दिक्कतें सहन करेगा और भाग्यशाली समझा जायेगा। कर्क लग्न में ११ गुरु यदि वृषभ का गुरु- ग्यारहवें लाभ-स्थान में
३ सामान्य शत्रु शुक्र की राशि में बैठा है तो भाग्य ५ की शक्ति और परिश्रम के योग से आमदनी एवं ४ २गु. w लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष से भी ७ १ लाभ प्राप्त करेगा और धर्म का पालन करेगा
८ १० १२ तथा आमदनी के मार्ग में पाप-पुण्य का ध्यान रखेगा और पाँचवीं दृष्टि से भाई-बहिन के स्थान ९ ११ नं. ३८३ को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ा-सा मन-मुटाव के साथ भाई- बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और पराक्रम शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से सन्तान और विद्या स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और नवमी नीच दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के पक्ष में कमजोरी और कष्ट का अनुभव करेगा तथा बड़प्पन के मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा। यदि मिथुन का गुरु- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा। भाग्य और परिश्रम के योग से बाहरी सम्बन्धों की सफलता और खर्च संचालन की शक्ति प्राप्त रहेगी; किन्तु भाग्य में कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा, परन्तु छठें घर का स्वामी होकर धर्मेश खर्च स्थान में बैठा है, इसलिये किसी रोग सम्बन्धी गरीबों की सहायता में किसी प्रकार से खर्च करेगा
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२१८ कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में १२ गुरु और पाँचवीं दृष्टि से सुखभवन को शत्रु शुक्र की ३ गु. तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परिश्रम ५ और भाग्य की शक्ति से सुख के साधनों में सहायता ६ ४ २ प्राप्त करेगा और मातृ स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त ७ १ करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये ८ १० १२ ११ शत्रु पक्ष में कुछ खर्च और भाग्य की सहायता से
नं.३८४ सफलता प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में एवं आयु स्थान में कुछ नीरसता के साथ सफलता प्राप्त करेगा और कुछ पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा। धनलाभ, माता, भूमि-स्थानपति-शुक्र कर्क लग्न में १ शुक्र यदि कर्क का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि में बैठा है तो देह 4 ३ ६ ४ शु. की चतुराई के योग से बड़ा सुख और लाभ प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता प्राप्त करेगा और मातृ ७ १ स्थान का सुख प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख और
८ रहने के स्थानों में सुख प्राप्ति के साधनों पर सुन्दर १० १२ अधिकार रखेगा तथा आमदनी और चतुराई के ९ ११ नं.३८५ योग से आनन्द का अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि में स्त्री स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री-पक्ष में सुख और सफलता प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग से खूब लाभ प्राप्त करेगा और भोगादिक के पक्ष में विशेष रूचि और सफलता प्राप्त करेगा और लग्न में शुक्र के बैठने से अनेक प्रकार की सफलता और मान प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में २ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- धन स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो कुछ थोड़े से असंतोष के ५शु ३ साथ धन की शक्ति का सुख प्राप्त करे.।. जार ६ ४ २ कुछ वैमनस्यता के साथ कुटुम्ब का सुख प्राप्त ७ १ करेगा और कभी-कभी धन लाभ अच्छा पायेगा और धनवान, इज्जतदार समझा जायेगा तथा कुछ ८ १० १२ मकानादि का सुख प्राप्त करेगा और मातृ स्थान ९ ११ के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा, क्योंकि धन नं. ३८६ स्थान कुछ बन्धन का रूप होता है, इसके अतिरिक्त
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भृगु संहिता २१९ सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा तथा जीवन की दिनचर्या को अमीरात और सुखी करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ और सुख प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ३ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- तीसरे भाई के स्थान पर नीच का होकर मित्र बुध की राशि में बैठा है ५ ३ तो भाई-बहिन के स्थान में सुख की प्राप्ति करेगा ६ शू, ४ २ और पुरुषार्थ शक्ति के स्थान में लाभ और आमदनी ७ के कारणों से कमजोरी प्राप्त करेगा तथा मातृ स्थान के सुख में कमी अनुभव करेगा और सातवीं ८ १० १२ उच्च दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु गुरु ९ ११ की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की नं. ३८७ वृद्धि पायेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म का विशेष ध्यान करेगा। किन्तु अपने अन्दर की कमजोरी को चतुराईयों के द्वारा छिपाकर रखेगा और अन्दरूनी कमजोर हिम्मत रखेगा। कर्क लग्न में ४ शुक्र यदि तुला का शुक्र- चौथे केन्द्र माता के
4 ३ स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो माता के पक्ष से महान् सुख लाभ प्राप्त ६ ४ २ करेगा और भूमि का बड़ा सुन्दर लाभ प्राप्त करेगा 9 शु तथा बड़ी चतुराई के साथ सुख और आनन्द की
८ १२ महानता प्राप्त करेगा और सुख पूर्वक आमदनी १० ११ का गम्भीर लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से
नं. ३८८ राज्य स्थान को सामान्य मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज के सम्बन्धों में सुख पूर्वक मान-प्रतिष्ठा और लाभ प्राप्त करेगा तथा बड़ी चतुराई के योग से कारबार के अन्दर अच्छा लाभ प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ५ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- पंचम त्रिकोण सन्तान स्थान में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है ५ ३ तो सन्तान पक्ष में विशेष लाभ और सुख प्राप्त ६ ४ २ करेगा तथा विद्या स्थान में बड़ी सफलता, सुख १ और धन लाभ प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा वाणी के अन्दर बड़ी भारी चतुराई तथा कोमलता के ८शु १० १२ योग से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि ९ ११ से लाभ स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि के नं. ३८९ स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा धन लाभ की विशेष योग्यता शक्ति प्राप्त करेगा तथा मातृ स्थान का
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२२० कर्क लग्न का फलादेश प्रेम और सुख प्राप्त करेगा तथा मकानादि रहने की सुख शक्ति प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ६ शुक्र यदि धन का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शांति युक्त चतुराईयों ५ ३ के द्वारा शत्रु पक्ष में सफलता मिलेगी और मातृ ६ ४ २ स्थान के सुख सम्बन्धों में कमजोरी और कुछ ७ १ अशांति का योग प्राप्त करेगा और मकान-जायदाद के सुख और आराम में कुछ कमी प्राप्त करेगा ८ १० १२ तथा आमदनी के मार्ग में कुछ परिश्रम कुछ परेशानी ९शु. ११
नं. ३९० या कुछ परतंत्रता का योग अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में सुख और लाभ प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझट व परेशानी के कार्यों में सुख का और लाभ का योग प्राप्त करेगा तथा ननसाल पक्ष से सुख प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ७ शुक्र यदि मकर का शुक्र-सातवें स्त्री स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में ५ ३ बहुत सुख और लाभ प्राप्त करेगा तथा रोजगार ४ २ के मार्ग में बड़ी चतुराई के योग से धनलाभ और ७ सफलता प्राप्त करेगा और घरेलू व मातृ स्थान ८ १० शु. १२ का तथा रहने के मकानादि का सुख प्राप्त करेगा और गृहस्थ भोगादिक सुखों में विशेष रूचि और ९ ११
नं. ३९१ आनन्द का योग अनुभव करेगा तथा सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और सुख और चतुराई प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ और धन लाभ की ओर से यश और नाम प्राप्त करेगा अर्थात् लौकिक कार्यों में बड़ी कुशलता एवं योग्यता से गृहस्थ का संचालन करने में गम्भीर सुख मानेगा। कर्क लग्न में ८ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- आठवें मृत्यु स्थान में ५ ३ मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो माता के सुख ६ ४ २ सम्बन्धों में कमी और दुःख का योग प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में व मातृ स्थान में कमी ७ होने के कारण दूसरे स्थान में सफलता पायेगा, ८ १० १२ किन्तु घरेलू सुख शांति के अभाव से तथा कुछ ९ ११शु. कठिनाईयों के योग से धन लाभ का मार्ग स्थापित नं. ३९२ करेगा और आयु के प्रसङ्ग में सुख सफलता प्राप्त
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भृगु संहिता २२१ करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या की अपनी स्थिति का संचालन करेगा अर्थात् अपनी स्थिति के अन्दर ही सुख के साधनों की प्राप्ति करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन भवन को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन को संग्रह करने की परवाह नहीं करेगा और कुटुम्ब सुख की थोड़ी शक्ति का योग प्राप्त
कर्क लग्न में ९ शुक्र करेगा। यदि मीन का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य 4 ३ स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की राशि में उच्च का ६ ४ २ होकर बैठा है तो भाग्य की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और भाग्य की शक्ति से विशेष लाभ प्राप्त ७ १ करेगा और मातृ स्थान का तथा मकानादि का ८ १२ १० शु. श्रेष्ठ सुख प्राप्त करेगा और घरेलू सुख प्राप्ति के ९ ११ उत्तम साधन भाग्य की शक्ति से ही प्राप्त करेगा नं. ३९३ और धर्म का पालन सुखपूर्वक आनन्द के साथ करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख साधनों में कमी या कमजोरी प्राप्त करेगा और भाग्य शक्ति की तुलना में पुरुषार्थ शक्ति को छोटा समझेगा, इसलिये भाग्य की शक्ति में अधिक भरोसा और सुख का अनुभव कर्क लग्न में १० शुक्र करेगा। यदि मेष का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान ५ ३ में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ६ ४ २ पिता स्थान में बड़ा सुख और लाभ प्राप्त करेगा ७ १ शु. तथा राजसमाज में बड़ा भारी मान और सुख
८ १० १२ प्राप्त करेगा और कारबार के मार्ग में बड़ी भारी
९ ११ सुख और सफलता पायेगा और सातवीं दृष्टि से
नं. ३९४ स्वयं अपनी तुला राशि में मातृ तथा सुख भवन को स्वक्षेत्री दृष्टि से देख रहा है, इसलिये माता का गौरव और लाभ प्राप्त करेगा तथा घरेलू मकानादि का सुन्दर लाभ तथा सुख प्राप्त करेगा और बड़ी गम्भीर चतुराईयों के योग से बड़ी भारी उन्नति प्राप्त करेगा तथा सुन्दरता और सजावट पसन्द करेगा। यदि वृषभ का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और सुख प्राप्ति के उत्तम साधन पायेगा मातृ-स्थान का सुन्दर लाभ प्राप्त
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२२२ कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में ११ शुक्र करेगा और सुख पूर्वक बड़ी चतुराई के साथ धन का लाभ प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि का 4 ३ X ६ २शु. लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या और संतान स्थान को सामान्य मित्र मंगल की वृश्चिक ७ १ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या में सफलता और उन्नति प्राप्त करेगा तथा वाणी से बड़ी चतुराई ८ १० १२ और सज्जनता युक्त बातों के द्वारा लाभ प्राप्त ९ ११ करेगा और संतान पक्ष से सुख और लाभ प्राप्त नं. ३९५ करेगा।
कर्क लग्न में १२ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष ५ ३श्. करेगा तथा खर्च के मार्ग से बड़ा सुख प्राप्त ६ ४ २ करेगा और आमदनी के मार्ग में बड़ी कमजोरी
७ १ प्राप्त करेगा। किन्तु बाहरी दूसरे स्थानों में बड़ी सफलता और सुख प्राप्त करेगा तथा माता के ८ १० १२ सुख में कमी प्राप्त करेगा और मातृ-स्थान से ९ ११
नं. ३९६ सम्बन्धों में कुछ वियोग या अलहदगी प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि के सुख की कमजोरी प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में शीलता और चतुराई से कार्य सिद्ध करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ अरूचि से कार्य करेगा तथा खर्च के मार्ग से प्रभाव प्राप्त करेगा। स्त्री, रोजगार, आयु, मृत्युस्थानपति-शनि कर्क लग्न में १ शनि यदि कर्क का शनि-प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह के ५ ३
६ ४ श. २ अन्दर सुन्दरता की कुछ कमी रहेगी तथा देह में कुछ परेशानी के कारण भी प्राप्त रहेंगे और आयु ७ १ की शक्ति का गौरव रहेगा तथा तीसरी मित्र दृष्टि
८ १० १२ से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति तो प्राप्त ९ ११
नं. ३९७ रहेगी, किन्तु मृत्यु स्थानपति होने के दोष के कारणों से भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी रहेगी और पुरुषार्थ खूब करना पड़ेगा और सातवीं दृष्टि से स्त्री स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये स्त्री की शक्ति रहेगी, किन्तु
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भृगु संहिता २२३ अष्टमेष के दोष से स्त्री व गृहस्थ में कुछ परेशानी भी रहेगी और इसी प्रकार कुछ परेशानी के योग से रोजगार के मार्ग में सफलता रहेगी और भोगादिक वस्तुओं की विशेष लालसा रहेगी तथा दसवीं नीच दृष्टि से पिता स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ कमी और परेशानी प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध में और कारबार के सम्बन्ध में कुछ मान प्रतिष्ठा और सफलता की कमी प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में २ शनि यदि सिंह का शनि-धन द्वितीय भाव स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन संग्रह के ५श ३ कोष में हानि प्राप्त करेगा और कुटुम्ब में भी ६ ४ २ हानि या परेशानी प्राप्त करेगा और शनि के अष्टमेश ७ १ होने का दोष तथा धन भवन में बन्धन होने का दोष है, अतः दोनों दोष होने के कारणों से स्त्री ८ १० १२ स्थान का सुख कंटक युक्त अपूर्ण रहेगा और ९ ११ तीसरी उच्च दृष्टि से सुख भवन को तथा भूमि नं. ३९८ स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये सुख प्राप्ति के महान् साधन प्राप्त करेगा और भमि की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और अमीरात का जीवन व्यतीत करेगा और दसवीं दृष्टि से लाभ-स्थान को मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की आमदनी बहुत उत्तम रहेगी और सप्तमेश, अष्टमेश होने के दोष के कारण से रोजगार के मार्ग में परिश्रम के योग से धन पैदा करेगा, किन्तु धन और कुटुम्ब के अभाव का योग रहेगा। कर्क लग्न में ३ शनि यदि कन्या का शनि- भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष ५ ३ के कारण भाई-बहिन के स्थान में कुछ परेशानी ४ २ प्राप्त करेगा और पराक्रम तथा पुरुषार्थ की वृद्धि ७ १ करेगा, क्योंकि तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये परिश्रम के योग से रोजगार ८ १० १२ की वृद्धि करेगा, स्त्री और पुरातत्व शक्ति का ९ ११ सहयोग प्राप्त करेगा तथा तीसरी दृष्टि से सन्तान नं. ३९९ स्थान को शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा वाणी में कुछ क्रोध रखेगा और विद्या स्थान में कुछ परेशानी पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, डसलिये
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२२४ कर्क लग्न का फलादेश भाग्य में कुछ परेशानी पायेगा तथा धर्म के मार्ग में कुछ अरूचि रखेगा और दसवीं दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थान के सम्बन्ध में शक्ति प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ४ शनि यदि तुला शनि- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है ५ ३ तो घरेलू सुख के साधनों की वृद्धि तथा मकान ६ ४ २ प्राप्त करेगा, स्त्री तथा गृहस्थ की महान् शक्ति ७ श. १ प्राप्त करेगा और आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा
८ १२ तथा माता के स्थान में अष्टमेश होने के दोष के १० कारण से कुछ परेशानी के साथ सफलता प्राप्त ९ ११ करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से गुरु की धनु राशि नं. ४०० में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये कुछ अड़चनों के साथ शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से पिता स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में तथा राज-समाज और कारबार के स्थान में दिक्कतें और परेशनी प्राप्त करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ देह में परेशानी प्राप्त करेगा तथा घरेलूं सुख के साधनों के मुकाबले में उन्नति के कार्यों में आलस्य अनुभव करेगा। कर्क लग्न में ५ शनि यदि वृश्चिक का शनि- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान में शत्रु मंगल की राशि में बैठा है ५ ३ तो अष्टमेश होने के दोष के कारण से सन्तान पक्ष ६ ४ २ से कष्ट और चिन्ता का योग प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और ७ आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा तीसरी ८श १० १२ दृष्टि से स्त्री स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में ९ ११ स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धिमती स्त्री
कष्ट भी प्राप्त करेगा और बुद्धि योग के द्वारा रोजगार में वृद्धि करेगा तथा नं. ४०१ का सुख प्राप्त करेगा। किन्तु स्त्री पक्ष में कुछ
भोगादिक काम वासना की विशेष इच्छा रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में आमदनी खूब करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से धन भवन को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कमजोरी प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और धन जन के कारणों से हमेशा कुछ चिन्तित रहेगा, किन्तु उन्नति के लिये प्रयत्नशील रहेगा।
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भृगु संहिता २२५ कर्क लग्न में ६ शनि यदि धनु राशि का शनि- छठें शत्रु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में ५ ३ प्रभाव प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद ६ ४ २ और प्रभाव प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में ७ १ कुछ परिश्रम के द्वारा परेशानी को दूर करनेवाले प्रभावशाली कार्य करेगा और तीसरी दृष्टि से आयु १२ १० स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को ९श. ११ देख रहा है, इसलिये कुछ दिक्कतों के साथ पुरातत्व नं. ४०२ का लाभ प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान में बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी दूसरे स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से पराक्रम तथा हिम्मत की वृद्धि करेगा और भाई के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा। छठें 1 स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये प्रभाव युक्त जीवन रहेगा किन्तु अष्टमेश होने के कारण से कुछ दिक्कतें भी पैदा करेगा है। कर्क लग्न में ७ शनि यदि मकर का शनि-सातवें केन्द्र स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो गृहस्थ 4 ३ के अन्दर किसी एक मार्ग में विशेष चमत्कार ६ ४ २ और रोजगार मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा और ७ १ आयु तथा स्त्री-स्थान में भी शक्ति प्राप्त करेगा,
८ १० श. १२ किन्तु अष्टमेश होने के कारण स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा और ९ ११ भोगादिक सुखों की विशेष इच्छा रखेगा तथा नं. ४०३ तीसरी शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये गृहस्थ के सम्बन्धों से भाग्य में त्रुटि अनुभव करेगा और धर्म की श्रद्धा में कुछ कमी पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये सुन्दरता और स्वास्थ्य में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा दसवीं उच्च दृष्टि से चौथे सुख भवन को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान में तथा घरेलू सुख साधनों में तथा मकानादि के सम्बन्धों में शक्ति प्राप्त करेगा। यदि कुम्भ का शनि-आठवें स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व की शक्ति पायेगा और सप्तमेश के अष्टम में बैठने के नाते स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में निजी स्थान के अन्दर परेशानी प्राप्त करेगा और दूसरे बाहरी स्थानों के अन्दर रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी नीच भृ.सं .- १५
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२२६ कर्क लग्न का फलादेश कर्क लग्न में ८ शनि दृष्टि से पिता स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा ५ ३ तथा राज-समाज में एवं कारबार में कमजोरी या ६ ४ २ परेशानी प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन ७ १ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति में कमी प्राप्त करेगा तथा ८ १० १२ कुटुम्ब में कुछ क्लेश या कमी पायेगा और दसवीं ११श. शत्रु दृष्टि से संतान स्थान को मंगल की वृश्चिक नं. ४०४ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में और दिमाग में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ९ शनि यदि मीन का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य- स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो आयु ५ ३ की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा स्त्री व रोजगार की ६ ४ २ शक्ति पायेगा और गृहस्थ तथा जीवन की तरफ से भाग्य में कुछ दुःख सुख का अनुभव करेगा ७ १
१२ और पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ प्राप्त करेगा ८ १० श. तथा तीसरी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को शुक्र की ९ ११ वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के नं. ४०५ मार्ग में भाग्य के सहयोग से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन के स्थान में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा और पराक्रम की उन्नति करेगा तथा दसवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ अड़चनों के साथ शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े झंझटों के मार्ग में हिम्मत से काम लेगा तथा धर्म और भाग्य के सम्बन्धों में दिखावटी उन्नति तथा अन्दरूनी कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा, किन्तु प्रकट में बड़ा भारी भाग्यवान् समझा जायेगा। कर्क लग्न में १० शनि यदि मेष का शनि- दसम केन्द्र पिता स्थान
५ ३ में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है ६ ४ २ तो पिता स्थान के सुख में कंटक प्राप्त करेगा तथा राज-समाज, कारबार के सम्बन्धों में एवं ७ १ श. उन्नति के मार्ग में दिक्कतें और परेशानियाँ प्राप्त ८ १० १२ करेगा तथा जीवन की दिनचर्या और आयु स्थान ९ ११ में दिक्कतें प्राप्त करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से नं. ४०६ खर्च स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा
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भृगु संहिता २२७ है, इसलिये खर्च अधिक होने के कारण खर्च में कुछ प्रयत्नशील रहेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से सुख भवन को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये मकान, जायदाद व घरेलू सुख के साधन प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में स्त्री एवं रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा तथा भोगादिक मार्ग में प्रयत्नशील रहेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण तथा नीच होने के दोष के कारण स्त्री तथा कारबार के पक्षों में कुछ कमजोरी लिये दिक्कतों के साथ कार्य संचालन करेगा तथा गुप्तनीति से भी कार्य-क्रम करता रहेगा। कर्क लग्न में ११ शनि यदि वृषभ का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो अच्छी आमदनी ५ ३
६ ४ २श. प्राप्त करता हुआ स्त्री का लाभ प्राप्त करेगा, किन्तु क्रूर ग्रह का लाभ स्थान में बैठना श्रेष्ठ होता ७ १ है और अष्टम स्थानपति होना कुछ कष्ट दायक
८ १० १२ होता है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में लाभ भी रहेगा और कुछ कष्ट एवं कुछ प्रपंच भी ११ रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को नं. ४०७ चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी एवं कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट अनुभव करेगा और विद्या में कुछ कमी पायेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कुम्भ राशि में आयु स्थान को स्वक्षेत्री दृष्टि से देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में १२ शनि यदि मिथुन का शनि- बारहवें खर्च स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक ५ ३श करेगा तथा स्त्री स्थान में हानि और बाहरी स्थानों ६ ४ २ में सफलता प्राप्त करेगा तथा आयु के सम्बन्ध में ७ कभी-कभी चिन्तायें होती रहेंगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से धन स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख ८ १० १२ रहा है, इसलिये नगद धन की तरफ से चिन्तायें ९ ११ रहेंगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ परेशानियाँ रहेगी नं. ४०८- तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ झंझट और प्रभाव रहेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की तरफ से कुछ चिंतायें रहेंगी और धर्म के पालन में कुछ
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२२८ कर्क लग्न का फलादेश प्रपंच रहेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी होते हुये भी खर्चे की शोभा रहेगी और खर्च की अधिकता के कारणों से जीवन में शानदारी और आमोद-प्रमोद रहेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्त युक्ति के अधिपति-राहु कर्क लग्न में १ राहु यदि कर्क का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो देह ५ ३ के स्थान में सुन्दरता की कमी करेगा और किसी ६ ४ रा. २ प्रकार की चिन्ता हृदय में बनी रहेगी और कभी- ७ १ कभी बड़ी भारी मुसीबतों का सामना करने की स्थिति प्राप्त करेगा और गुप्त रूप से कोई पेचीदा ८ १० १२ युक्ति के द्वारा मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा ९ ११ अपने अन्दर किसी प्रकार से खास किस्म की नं. ४०९ कमी अनुभव करेगा और अपनी उन्नति के लिये विशेष प्रयत्नशील रहेगा और अपने स्वास्थ्य सम्बन्ध की कोई चिन्ता का योग प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में २ राहु यदि सिंह का राहु- धन द्वितीय भाव स्थान
५रा. ३ में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन स्थान में हानियाँ और परेशानियाँ प्राप्त करेगा ६ ४ २ तथा धन के सम्बन्ध में कभी-कभी महान् संकट ७ १ का समय प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के सुख सम्बन्धों ८ में हानि और कमी प्राप्त करेगा तथा धन की १० १२ ९ ११ वृद्धि करने के लिये महान् कठिन कार्य करने में
नं. ४१० उद्यत रहेगा और कोई गुप्त पेचीदा कर्म को बड़ी भारी हिम्मत के साथ कार्य रूप में परिणित करके धन की वृद्धि करने का साधन प्राप्त करेगा तथा इज्जत-आबरू की रक्षा और वृद्धि के लिये चिन्ता युक्त रहेगा तथा मुफ्त का-सा धन भी कभी- कभी प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ३ राहु यदि कन्या का राहु- तीसरे पराक्रम और भाई ५ ३ के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो ६ रा. २ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है और कन्या पर बैठा हुआ राहु स्वक्षेत्र के समान हो ७ १ जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति की बहुत वृद्धि ८ १० १२ करेगा तथा महान् हिम्मत शक्ति से काम लेगा ११ और प्रभाव की शक्ति रखेगा और भाई-बहिन के नं. ४११ स्थान में कुछ झंझट प्राप्त करेगा तथा अपने कार्य
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भृगु संहिता २२९ की सिद्धि करने के लिये गुप्त शक्ति के पराक्रम योग से बड़ी सफलता प्राप्त करेगा और अन्दरूनी तौर से अपने अन्दर प्रभाव शक्ति को कायम रखने के लिये भारी प्रयत्नशील रहेगा और कभी-कभी अपने अन्दर अन्दरूनी तौर की कमजोरी अनुभव करेगा। कर्क लग्न में ४ राहु यदि तुला का राहु- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता के ५ ३ स्थान में कुछ परेशानी और भातृस्थान के सुख ६ ४ २ सम्बन्धों में कमजोरी प्राप्त करेगा तथा घरेलू रहन- ७ रा. १ सहन और घर के अन्दरूनी वातावरण में कुछ अशांति का अनुभव करेगा तथा मकानादि भूमि ८ १० १२ की कमी प्राप्त करेगा और सुख शांति के साधनों ९ ११ को प्राप्त करने के लिये बड़ी भारी गुप्त युक्तियों नं. ४१२ और चतुराईयों से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु कभी-कभी विशेष अशांति के कारणों से बड़ा दुःख अनुभव करेगा और बहुत समय के बाद शांति से कारणों को प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ५ राहु यदि वृश्चिक का राहु- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ५ ३ सन्तान स्थान में कष्ट अनुभव करेगा और विद्या ६ ४ २ ग्रहण करने में परेशानी प्राप्त करेगा तथा दिमाग ७ के अन्दर चिंतायें अनुभव करेगा तथा छिपाव शक्ति और जिद्दबाजी से काम लेगा और बुद्धि के ८रा. १० १२ अन्दर कुछ कमजोरी महसूस करते हुए भी प्रकट ९ ११
नं. ४१३ में बड़ी भारी बचाव की बातें कहकर तथा बुद्धिमत्ता दिखाकर कार्य करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ विलम्ब और दिक्कतों के बाद शक्ति प्राप्त करेगा और राज्येश मंगल की राशि पर बैठा होने से कानूनी तरीके की बातें करेगा। कर्क लग्न में ६ राहु यदि धनु का राहु- शत्रु-स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान ५ ३ में कुछ परेशानी अनुभव करेगा, क्योंकि छठें स्थान ६ ४ २ पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये छिपी ७ १ हुई तरकीबों से और भेद नीति से शत्रु का दमन करेगा और ननसाल पक्ष में हानि या कमजोरी पायेगा ८ १० १२ तथा झगड़े-झंझटों में कुछ परेशानियों से मार्ग प्राप्त ९रा. ११ करेगा तथा गुप्त युक्ति और गुप्त शक्ति का भरोसा नं. ४१४ रखेगा तथा पाप-पुण्य की परवाह नहीं करेगा।
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२३० कर्क लग्न का फलादेश
कर्क लग्न में ७ राहु यदि मकर का राहु-सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में ५ ३ परेशानी प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में ६ ४ २ बड़ी चिन्ताओं के साथ कार्य संचालन करेगा ७ १ तथा स्त्री और रोजगार की सफलता के लिये गुप्त युक्ति और कठिनाईयों से काम निकालेगा ८ १०रा. १२ तथा स्त्री और रोजगार के मार्ग से विशेष सफलता ११ पाने के लिये कोई विशेष तरकीब निकालेगा। नं. ४१५ कभी इन्द्रिय विकार प्राप्त करेगा। वैसे जाहिरा की सफलता के मुकाबले में अन्दरूनी कुछ कमी के कारणों से दुःख अनुभव करेगा तथा कभी-कभी गृहस्थ के सम्बन्धों में महान् कष्ट का योग प्राप्त करेगा और अन्त में शक्ति पायेगा। कर्क लग्न में ८ राहु यदि कुम्भ का राहु- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो आयु के स्थान ५ ३ में कभी-कभी कोई विशेष चिंता प्राप्त करेगा ४ w २ तथा जीवन में बड़ी कड़ी चिंतायें प्राप्त करेगा और ७ १ उदर के अन्दर किसी प्रकार की दिक्कत का योग
८ १० १२ प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध की कुछ चिंता एवं हानि प्राप्त करेगा और जीवन निर्वाह करने के ९ ११रा. नं. ४१६ सम्बन्ध में कुछ फिकर मंदी रहेगी और जीवन (जिन्दगी) के लिये विशेष मजबूती पहुँचाने के लिये कोई गुप्त युक्ति के बल से कार्य करेगा और जीवन में बहुत सी दिक्कतों के बाद कोई शक्ति प्राप्त करेगा और अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा। कर्क लग्न में ९ राहु यदि मीन का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो भाग्य के ५ ३ सम्बन्ध में चिंता प्राप्त करेगा और धर्म का पालन ६ ४ २ दिखावटी करेगा, किन्तु अन्दरूनी तौर से धर्म के ७ स्थान में हानि प्राप्त करेगा और भाग्य की उन्नति के लिये महान् कठिन युक्तियों से कार्य करेगा ८ १२ १० रा. और भाग्य में कभी-कभी महान् भीषण संकट ९ ११
नं. ४१७ का सामना करने की स्थिति पायेगा, किन्तु मुशीबतों के बाद भाग्य की उन्नति का मार्ग प्राप्त करेगा और फिर भी गुप्त युक्ति से सफलता पाने पर भी भाग्य के सम्बन्ध में कुछ फिकर बनी रहेगी और कुछ मुफ्त का-सा भाग्य से लाभ भी प्राप्त करेगा। यदि मेष का राहु- दसम केन्द्र पिता स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर
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भृगु संहिता २३१ कर्क लग्न में १० राहु बैठा है तो पिता स्थान में हानि तथा सुख की कमी प्राप्त करेगा और राजसमाज मान-प्रतिष्ठा ५ ३ आदि के मार्गों में कुछ कमजोरी या कष्ट प्राप्त ४ २ 3 करेगा और किसी बड़ी उन्नति, कारबार के सम्बन्धों ७ १ रा. में परेशानी से सफलता प्राप्त करेगा तथा बार-
८ बार दिक्कतों से टकराते रहने के कारणों से १० १२
९ ११ निराशायें प्राप्त करेगा और कुछ गुप्त युक्तियों के वैदिक कर्म से मान-प्रतिष्ठा की रक्षा करेगा और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये बड़ी बहादुरी तथा हिम्मत नं. ४१८
से कार्य करेगा। कर्क लग्न में ११ राहु यदि वृषभ का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में
३ मित्र शुक्र की वृष राशि पर बैठा है तो बड़ी गहरी ५ ४ २रा. चतुराई के योग से धन का लाभ खूब करेगा। यद्यपि राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी ७ १ के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी, तथापि ग्यारहवें ८ १० १२ स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान हो जाता है, इसलिये ९ ११ लाभ और मुनाफा की वृद्धि करेगा और कुछ मुफ्त का-सा लाभ प्राप्त करने की विशेष चेष्टा करके सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु कभी-कभी लाभ में किसी गहरे संकट नं. ४१९
का सामना करने की स्थिति प्राप्त करेगा और अधिक लाभ की खुशी होने पर भी लाभ के मार्ग में अन्दरूनी कुछ कमी अनुभव करेगा। कर्क लग्न में १२ राहु यदि मिथुन का राहु- बारहवें खर्च के स्थान
५ में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा ३रा. ६ है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी ४ २ स्थानों के सम्बन्ध में विशेष युक्ति बल के द्वारा ७ १ विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों में ८ बड़ा भारी मान और प्रभाव प्राप्त करेगा और १० १२ ९ ११ खर्चा बढ़ाने में तथा बाहरी सम्बन्धों में सदैव
के स्वाभाविक गुणों के कारण खर्च की अधिकता और बाहरी सम्बन्धों नं. ४२० बहुत गहरी-गहरी योजनायें बनायेगा, किन्तु राहु
के कार्यों में गुप्त रूप से कुछ कमी अनुभव करेगा, किन्तु उपरोक्त कार्यों में अपनी कुछ गुप्त कमजोरी की कमी प्रकट नहीं होने देगा तथा बड़ी भारी बुद्धिमत्ता की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा।
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२३२ कर्क लग्न का फलादेश कष्ट, कठिन-कर्म, गुप्त शक्ति के अधिपति-केतु कर्क लग्न में १ केतु यदि कर्क का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर परम शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो देह के ५ ३ अन्दर कोई खास चोट या घाव का योग प्राप्त ! ४ के. २ करेगा और देह की सुन्दरता और सुडौलता में ७ १ कमी प्राप्त करेगा तथा किसी प्रकार से कोई रोग या चिन्ता का योग प्राप्त करता रहेगा और कभी ८ १० १२ चेचक की बीमारी भी रहेगी तथा मन के अधिकारी ११ चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये कुछ गुप्त नं. ४२१ मानसिक क्लेश के कारण देह में कभी-कभी कोई मृत्यु तुल्य संकट का योग प्राप्त करेगा तथा अपनी प्रसिद्धता और प्रभाव के लिये कोई कठिन प्रयत्न गुप्त शक्ति के योग से करेगा। कर्क लग्न में २ केतु यदि सिंह का केतु- दूसरे धन स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में ५ के ३ विशेष हानि और संकट प्राप्त करेगा तथा धन के ६ ४ २ अभाव से बड़ी भारी दिक्कतों का सामना करने ७ १ की स्थिति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में बड़ी कमी और क्लेश प्राप्त करेगा। धन द्वारा ८ १० १२ कार्य संचालन करने के लिये दूसरों से उधार भी २१ लेना पड़ेगा, किन्तु फिर भी धन की व्यवस्था को नं. ४२२ सुचारू रूप में न कर सकने के कारण कठिन प्रयत्न और दौड़-धूप करने परेशानी से इज्जत-आबरू प्राप्त करेगा और धन प्राप्ति के लिये कभी जोखिम उठा कर काम करेगा और धन की शक्ति का विशेष प्रभाव दिखाने की कोशिश करेगा। कर्क लग्न में ३ केतु यदि कन्या का केतु- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाई के ५ ३ स्थान में परेशानी प्राप्त करेगा, किन्तु तीसरे स्थान ६र क ४ २ पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये हिम्मत ७ १ और पराक्रम शक्ति की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा
८ १२ गुप्त विवेक शक्ति के सम्बन्ध में महान् परिश्रम १० करके विशेष सफलता प्राप्त करेगा और नरमाई ९ ११ तथा शील का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा नं. ४२३ तथा जाहिरा में विशेष हिम्मत शक्ति का प्रदर्शन करने पर भी अन्दरूनी तौर से कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और प्रभाव युक्त रहेगा।
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भृगु संहिता २३३
कर्क लग्न में ४ केतु यदि तुला का केतु- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता ५ ३ के सुख सम्बन्धों में कमी और परेशानी करेगा ६ ४ २ तथा मकानादि रहने के स्थानों में परिवर्तन और ७ के १ दिक्कतें प्राप्त करेगा एवं मातृ-भूमि या मातृ- स्थान से अलहदा दूसरे स्थान में रहेगा और घर के ८ १० १२ अन्दरूनी सुखों को प्राप्त करने के लिये बड़ी ९ ११
नं. ४२४ चतुराई के साथ महान् कठिन परिश्रम करेगा तथा कभी-कभी घरेलू वातावरण के अन्दर घोर संकट प्राप्त करेगा और बाद में धीरे-धीरे सुख के साधन प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ५ केतु यदि वृश्चिक का केतु- पाँचवें त्रिकोण संतान
३ एवं विद्या स्थान में शत्रु मंगल राशि पर बैठा है तो 4 संतान पक्ष में कष्ट एवं कुछ परेशानी प्राप्त करेगा ६ ४ २ और विद्यास्थान में कुछ कमी और कुछ दिक्कतें ७ प्राप्त करेगा तथा बुद्धि के अन्दर और वाणी के ८के. अन्दर तेजी और छिपाव की शक्ति रखेगा तथा १० १२
९ ११ दिमाग के अन्दर परेशानी या कुछ चिन्ता महसूस
का अनुभव करते हुये ये भी जाहिर में बड़ी मजबूती से बातें करके योग्यता नं. ४२५ करेगा और अपनी बुद्धिविद्या के अन्दर कुछ कमी
प्रदर्शित करेगा और शील संतोष का पालन करने में असमर्थता प्राप्त करेगा। कर्क लग्न में ६ केतु यदि धनु राशि का केतु- छठें शत्रु-स्थान में
५ ३ उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो
४ २ शत्रु पक्ष में महान् सफलता प्राप्त करेगा तथा बड़ी से बड़ी मुसीबतों के अन्दर महान् धैर्य की १ गुप्त शक्ति से काम करेगा और महान् उन्नति पर ८ १२ पहुँचने के लिए महान् कठिन कार्य की सिद्धि ९के ११ महान् परिश्रम के द्वारा प्राप्त करेगा और अपने नं. ४२६ अन्दर बड़ी भारी हिम्मत और बहादुरी का योग प्राप्त करेगा और रोग इत्यादि के भय से मुक्त रहेगा और शील तथा दया का पालन नहीं कर सकेगा। यदि मकर का केतु-सातवें केन्द्र स्त्री-स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में हानि तथा कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के माने
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२३४ कर्क लग्न का फलादेश
कर्क लग्न में ७ केतु में बड़ी परेशानी अनुभव करेगा तथा रोजगार की सफलता प्राप्त करने में महान् कठिन परिश्रम करेगा 4 ३
६ ४ २ और कभी कोई मूत्रेन्द्रिय का विकार प्राप्त करेगा तथा स्त्री भोगादिक पक्ष में विशेष भोग प्राप्ति ७ १ की इच्छा शक्ति रखेगा और गृहस्थ के कार्यों को ८ १०के. १२ संचालन एवं पालन करने में बड़ी दिक्कतों का ९ ११ और कठिनाईयों का योग प्राप्त करेगा और रोजगार नं. ४२७ के पक्ष में गुप्त धैर्य की महान् जिद्दबाजी से काम करेगा। कर्क लग्न में ८ केतु यदि कुम्भ का केतु- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो जीवन की ५ ३
६ ४ २ दिनचर्या में बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा और आयु के स्थान में कई बार मृत्यु तुल्य संकट प्राप्त ७ १ करेगा तथा पुरातत्व शक्ति की कुछ हानि प्राप्त ८ १० १२ करेगा तथा पेट के अन्दर निचले हिस्से में कोई ९ ११के. बीमारी या शिकायत प्राप्त करेगा और जीवन नं. ४२८ निर्वाह के सम्बन्ध में कभी-कभी भारी चिन्ता का योग प्राप्त करेगा तथा अपनी वित्त-शक्ति में कमजोरी अनुभव करेगा, किन्तु किसी स्थिर सहायक शक्ति को प्राप्त करने के लिये महान् कठिन परिश्रम, किसी गूढ़तम कार्य में करेगा। कर्क लग्न में ९ केतु यदि मीन का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य ५ ३ स्थान पर शत्रु गुरु की मीन राशि पर बैठा है तो ६ ४ २ भाग्य के स्थान में बहुत प्रकार की चिन्ताओं का योग प्राप्त करेगा तथा धर्म के पालन में कुछ ७ १ कमजोरी पायेगा और भाग्य की वृद्धि करने के ८ १० के लिये बड़ी योग्यता के द्वारा महान् कठिन परिश्रम ९ ११ करेगा और धीरे-धीरे भाग्य की सफलता पायेगा, नं. ४२९ किन्तु कभी-कभी भाग्य के स्थान में भीषण संघर्ष का योग प्राप्त करेगा और गुप्त धैर्य की शक्ति से काम करेगा तथा ईश्वर के विश्वास में आन्तरिक कुछ कमजोरी अनुभव करेगा। यदि मेष का केतु- दसम केन्द्र पिता स्थान में शत्रु मंगल की राशि
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भृगु संहिता २३५ कर्क लग्न में १० केतु पर बैठा है तो पिता स्थान में हानि एवं कष्ट प्राप्त करेगा और राज समाज के सम्बन्धों में कुछ 4 ३ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा कारबार की ६ ४ २ उन्नति के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा ७ १ क. और कभी-कभी मान-प्रतिष्ठा स्थान में भारी ८ १० १२ संकट प्राप्त करेगा तथा गुप्त हिम्मत शक्ति के ९ ११ द्वारा अपनी इज्जत- आबरू को ऊँचा उठाने का नं. ४३० प्रयत्न करेगा और कठिन कर्म की शक्ति का भरोसा रखेगा। कर्क लग्न में ११ केतु यदि वृषभ का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आमदनी के ५ ३ ४ मार्ग में खूब सफलता शक्ति प्राप्त करेगा, क्योंकि ६ रके. ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, : 19 १ इसलिये अधिक मुनाफा खाने के लिये भारी ८ १० १२ परिश्रम करेगा और शुक्र की राशि पर बैठा है, ९ ११ इसलिये बड़ी चतुराई और गुप्त शक्ति के द्वारा नं. ४३१ आमदनी के स्थान में वृद्धि प्राप्त करेगा, किन्तु अपने स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में परेशानी के योग कभी-कभी प्राप्त करेगा और स्वार्थ युक्त रहेगा। कर्क लग्न में १२ केतु यदि मिथुन का केतु- बारहवें खर्च स्थान में नीच राशि का होकर मित्र बुध की मिथुन राशि ५ ३ के ६ ४ २ पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में महान् संकट उपस्थित करेगा और बाहरी दूसरे स्थानों के ७ सम्बन्धों में कष्ट एवं परेशानी प्राप्त करेगा तथा ८ १० १२ खर्च की संचालन शक्ति को प्राप्त करने के ९ ११ लिये महान् कष्ट साध्य परिश्रम करेगा। किन्तु नं. ४३२ फिर भी खर्च की पूर्ति सुचारू रूप में संतोषजनक नहीं कर सकेगा तथा खर्च के मार्ग में कुछ गुप्त शक्ति के बल से काम निकालेगा। किन्तु कभी-कभी खर्च के स्थान में आन्तरिक विशेष दुःख अनुभव करेगा।
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२३६ कर्क लग्न का फलादेश
।। कर्क लग्न समाप्त ॥
५ ३ ४
६ २
७ १
८ १२
१० ९ ११
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भृगु संहिता २३७ सिंह लग्न का फलादेश प्रारम्भ
६ X ५
७ ३
८ २
९ १
११ १० १२
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ५४० तक में देखिये) प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ४३३ से लेकर कुण्डली नं० ५४० तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो, उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन- जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फादेश प्रथम के नवग्रहों वाले
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२३८ सिंह लग्न का फलादेश नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४३३ से ४४४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४३९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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भृगु संहिता २३९ कुण्डली नं. ४४२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४४ के अनुसार मालूम करिये। (५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४४५ से ४५६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४४७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४४९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ४५६ के अनुसार मालूम करिये।
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२४० सिंह लग्न का फलादेश (५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४५७ से ४६८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४५७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४५८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४५९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६८ के अनुसार मालूम करिये। (५) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४६९ से ४८० तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।
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भृगु संहिता २४१ ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४६९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७०के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४७९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४८० के अनुसार मालूम करिये। (५) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४८१ से ४९२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८२ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली भृ. सं .- १६
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२४२ सिंह लग्न का फलादेश नं. ४८३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४८९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९० के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ४९२ के अनुसार मालूम करिये। (५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ४९३ से ५०४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९७ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता २४३ १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ४९९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०३ के अनुसार मालूम करिये। जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५०४ के अनुसार मालूम करिये। (५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५०५ से ५१६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५०९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५११ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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२४४ सिंह लग्न का फलादेश कुण्डली नं. ५१२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१६ के अनुसार मालूम करिये। (५ ) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५१७ से ५२८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५१९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२६ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता २४५ ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२८ के अनुसार मालूम करिये। (५) सिंह लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५२९ से ५४० तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५२९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५३९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५४० के अनुसार मालूम करिये।
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२४६ सिंह लग्न का फलादेश देह, आत्मबल (तेज) के स्वामी-सूर्य सिंह लग्न में १ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो ६ ४ देह में शक्ति और स्वाभिमान प्राप्त करेगा तथा ५ सू. ३ आत्मबल की विशेष शक्ति के कारण बड़ी भारी ८ हिम्मत प्राप्त करेगा और देह के प्रथम जीवन २ ९ काल में सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा और ११ १ देह में बड़ा कद प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु १० १२ दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में नं. ४३३ देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा गृहस्थ के संचालन कार्यों में कुछ अरुचि युक्त लापरवाही से कार्य करेगा और तेजी रखेगा। सिंह लग्न में २ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- दूसरे धन स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन की वृद्धि करने ६ सू. ४ में विशेष संलग्नता पूर्वक कार्य करेगा और धन ५ ३ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा धन स्थान बन्धन ८ का-सा कार्य करता है, इसलिये देह में कुछ परेशानी २ या घिराव-सा महसूस करेगा तथा कुटुम्ब में कुछ ९ ११ १ प्रभाव रहेगा, सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को १० १२ गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु नं. ४३४ की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव शक्ति पायेगा और कुछ पुरातत्व शक्ति की खोज एवं लाभ प्राप्त करेगा तथा इज्जतदार समझा जायेगा। सिंह लग्न में ३ सूर्य यदि तुला का सूर्य- तीसरे भाई के स्थान पर नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो ४ भाई के स्थान में कमी और वैमनस्य एवं दुःख ५ ३ का योग प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और कुछ परतंत्रता युक्त V २ कर्म करेगा तथा तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह ११ १ शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये अपने अन्दर १० १२ कमजोरी होते हुए भी बड़ी हिम्मत से कार्य करेगा नं. ४३५ किन्तु कभी-कभी किसी विशेष परेशानी का योग प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और भगवान् पर भरोसा करेगा तथा
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भृगु संहिता २४७ धर्म का पालन करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा। सिंह लग्न में ४ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य-चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ६ ४ माता की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और सुख का ७ ५ ३ साधन प्राप्त करेगा और देह को आनन्द युक्त एवं ८ सू. प्रभाव युक्त रखेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, ९ ११ १ इसलिये पिता स्थान के सम्बन्धों में वैमनस्यता १० १२ या मतभेद रखेगा तथा राजसमाज के स्थान में नं. ४३६ कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा और किसी बड़े कारबार को ऊँचा उठाने का सामान्य प्रयत्न करता रहेगा। सिंह लग्न में ५ सूर्य यदि धनु का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण संतान स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो संतान ६ ४ ५ शक्ति प्राप्त करेगा तथा उत्तम विद्या प्राप्त करेगा ७ ३ और बुद्धि के अन्दर दूरदर्शिता और आत्मज्ञान ८ २ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा देह और बुद्धि योग
सू. ११ के द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा। किन्तु दिमाग के अन्दर तेजी रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ १० १२
नं. ४३७ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा खूब लाभ प्राप्त करेगा तथा आत्मिक बल के द्वारा आमदनी के मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा अहंभाव रखेगा। सिंह लग्न में ६ सूर्य यदि मकर का सूर्य- छठें शत्रु स्थान पर शनि की मकर राशि पर बैठा है तो देह के पक्ष में कुछ ६ ४ परेशानी तथा कुछ परतंत्रता एवं कुछ रोग प्राप्त ७ ५ ३ करेगा तथा सुन्दरता में कुछ कमी प्राप्त करेगा। ८ २ किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, ९ ११ इसलिये शत्रुओं की और दिक्कतों की परवाह १ नहीं करेगा तथा हिम्मत शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष १० सू. १२
नं. ४३८ में विजय प्राप्त करेगा और अपने को कुछ घिराव के अन्दर समझते हुए भी प्रभाव शक्ति से काम लेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा। यदि कुम्भ का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर
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२४८ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में ७ सूर्य बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति का सम्बन्ध प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में ६ ४ ५ ३ कठिन परिश्रम से सफलता प्राप्त करेगा। स्त्री तथा गृहस्थ के संचालन में नीरसता का अनुभव ८ २ करेगा, किन्तु फिर भी गृहस्थिक मार्ग के भोगादिक ९ ११ सू. १ पक्ष में आत्मीयता रखेगा और सातवीं दृष्टि से १० १२ स्वयं अपनी सिंह राशि में देह स्थान को स्वक्षेत्र नं. ४३९ रूप में देख रहा है, इसलिये देह में शक्ति और स्वाभिमान रखेगा तथा गृहस्थ धर्म के संचालन मार्ग से कुछ ऊँचा नाम करने की कोशिश करेगा। सिंह लग्न में ८ सूर्य यदि मीन का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में us ४ ५ ३ कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा बाहरी ७ दूसरे स्थान का सम्बन्ध प्राप्त करेगा और जीवन ८ २ निर्वाह की शक्ति को तथा कुछ पुरातत्व सम्बन्ध ९ ११ १ को स्वयं अपनी दैहिक शक्ति के योग से प्राप्त १० १२सू. करेगा और अपने जीवन की दिनचर्या में प्रभाव नं. ४४० प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ा प्रयत्न करेगा और धन-जन के मार्ग में कुछ सफलता प्राप्त करेगा तथा क्रोधी बनेगा। सिंह लग्न में ९ सूर्य यदि मेष का सूर्य- भाग्य स्थान में उच्च का ६ होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य ४ ७ ५ ३ की बड़ी शक्ति प्राप्त करेगा और देह में बड़ी भारी प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा धर्म और ८ २ ईश्वर में विश्वास करेगा और भाग्यवान् समझा ९ ११ १ सू- जायेगा तथा देह में स्थूलता प्राप्त करेगा। सातवीं १० १२ नीच दृष्टि से भाई के स्थान को शत्रु शुक्र की नं. ४४१ तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सम्बन्ध असंतोष रूप में प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में लापरवाही करेगा तथा पुरुषार्थ की तुलना में भाग्य को बड़ा मानेगा और कभी- कभी किसी छोटे कार्य को करेगा। यदि वृषभ का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता स्थान में शत्रु शुक्र की वृष राशि
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भृगु संहिता २४९ सिंह लग्न में १० सूर्य पर बैठा है तो पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति को प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में ६ ४ मान और प्रभाव प्राप्त करेगा। किन्तु उन्नति के ७ ५ ३ मार्गों में कुछ नीरसता का अनुभव करेगा, परन्तु ८ २ सू. उन्नति के मार्ग में हमेशा प्रयत्नशील रहेगा और ९ ११ देह में प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं १ १० १२ मित्र दृष्टि से मातृ-स्थान को मंगल की वृश्चिक
नं. ४४२ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में सुन्दर रूचि रखेगा और सुख के साधनों को प्राप्त करने के लिये विशेष कार्य करेगा। सिंह लग्न में ११ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- ग्यारहवें लाभ-स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह की ६ ४ शक्ति के द्वारा विशेष लाभ प्राप्त करेगा और देह ७ ५ ३ सू. में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा क्रूर ग्रह यानी ८ २ गरम ग्रह ग्यारहवें स्थान पर बलवान् हो जाता ९ १६ है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता १ १० १२ प्राप्त करेगा और सदैव हर कार्यों में अपने निजी
नं. ४४३ लाभ और स्वार्थ का विशेष ध्यान रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये संतान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या ग्रहण करेगा और हमेशा स्वार्थ युक्त बातें करेगा तथा वाणी में कुछ गर्मी रखेगा। सिंह लग्न में १२ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- बारहवें खर्च स्थान में
६ ४सू. मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष
५ करेगा तथा देह में कमजोरी और दुबलापन प्राप्त ७ ३ करेगा तथा बाहरी स्थानों में भ्रमण करेगा तथा ८ २ हृदय में अशांति अनुभव करेगा और दूसरे स्थानों ९ ११ १ में शक्ति और स्वाभिमान प्राप्त करेगा तथा खर्च १० १२ के मार्ग में प्रभाव रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा खर्च की शक्ति से एवं देह की नं. ४४४
शक्ति से अनेक प्रकार की दिक्कतों पर विजय प्राप्त करेगा।
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२५० सिंह लग्न का फलादेश खर्च (मन) बाहरी स्थानों के स्वामी-चन्द्र सिंह लग्न में १ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने ६ ४ के दोष के कारण देह में दुबलापन प्राप्त करेगा। ७ ५ च. ३ बाहरी स्थानों का भ्रमणकारी सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त ८ २ करेगा और मन में व हृदय में खर्च के कारणों से ९ ११ कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा सातवीं शत्रु १ दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में १० १२ देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में भी कुछ परेशानी नं. ४४५ अनुभव करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ नुकसान और चिन्ता का योग प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में मनोबल की शक्ति से सफलता पायेगा। सिंह लग्न में २ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र-दूसरे धन स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष ६ चं. ४ के कारण धन भवन में कुछ हानि करेगा और ७ ५ ३ दिखावटी अमीरी का ढंग बनावेगा तथा कुटुम्ब ८ २ स्थान में कुछ कमी पैदा करेगा तथा बाहरी स्थानों ९ के सम्बन्ध में मनोयोग की शक्ति से लाभ प्राप्त ११ १ करेगा और धन के स्थान में मनोयोग की चिंता १० १२ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आठवें नं. ४४६ आयु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च की शानदारी से जीवन में कुछ रौनक और कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ३ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- तीसरे भाई के स्थान पर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा ६ ४ खूब करेगा तथा व्ययेश होने के दोष के कारण ७च ५ ३ से भाई बहिन के स्थान में कुछ हानि प्राप्त करेगा २ तथा पुरुषार्थ शक्ति में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा V
९ और बाहरी दूसरे स्थानों की शक्ति से मनोयोग ११ १ द्वारा सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि १० १२ से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख नं. ४४७ रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और धर्म के पालन में कमी पायेगा, किन्तु भाग्य और धर्म स्थान में कुछ खर्च के योग से थोड़ी-सी सुन्दरता प्राप्त करेगा।
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भृगु संहिता २५१
सिंह लग्न में ४ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- चौथे मातृ स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है ६ ४ तो माता के सुख स्थान में हानि प्राप्त करेगा तथा ७ ५ ३ भूमि मकानादि की शक्ति में कष्ट एवं कमी के ८ चं २ कारण प्रदान करेगा तथा घर के अन्दर खर्च की कमी के कारणों से परेशानी का अनुभव करेगा ९ ११ १ और मानसिक अशांति का योग प्राप्त करेगा तथा १० १२ सातवीं उच्च दृष्टि से राज्य स्थान को शुक्र की नं. ४४८ वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में मनोयोग की शक्ति से मान प्राप्त करेगा और पितास्थान के सम्बन्ध में ऊँची भावना रखेगा। सिंह लग्न में ५ चन्द्र यदि धनु का चन्द्र- पाँचवें संतान स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के ६ ४ दोष के कारणों से सन्तान पक्ष में बाधा प्राप्त ७ ५ ३ करेगा तथा विद्या में कमजोरी पायेगा और दिमाग ८ २ के अन्दर खर्च के कारणों से परेशानी अनुभव करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से मनोयोग चं ११ १ के द्वारा खर्च का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा १० १२ सातवीं मित्र दृष्टि से लाभस्थान को बुध की मिथुन नं. ४४९ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च और बुद्धि के संयोग से लाभ की सूरत पैदा करेगा तथा आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा। सिंह लग्न में ६ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो कुछ परतन्त्रता या ६ ४ परेशानियों के योग से मनोबल के द्वारा खर्च की ७ ३ संचालन शक्ति प्राप्त करेगा और व्ययेश होने के ८ दोष के कारण शत्रु पक्ष में या झगड़े झंझट में या २ ९ रोगादि कार्यों में भी असन्तोषप्रद रूप से नाजायज ११ १ खर्च करना पड़ेगा, इसलिये किसी भी परेशानियों १०च. १२ के कारण मन को दुःख अनुभव होगा और सातवीं नं. ४५० दृष्टि से स्वयं अपनी कर्क राशि में खर्च स्थान को स्वक्षेत्र के रूप में देख रहा है, इसलिये खर्च की कुछ परेशानी होते हुए भी खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों का कुछ परिश्रम युक्त सम्बन्ध प्राप्त -
करेगा तथा शत्रु पक्ष में मनोयोग की नरम शक्ति और खर्च के द्वारा कार्य चलायेगा।
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२५२ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में ७ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने ६ ४ के दोष के कारण स्त्री स्थान में हानि प्राप्त करेगा ७ 4 ३ तथा रोजगार में नुकसान प्राप्त करेगा और मनोयोग ८ २ के द्वारा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से रोजगार के ९ मार्ग में खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा तथा गृहस्थी ११ च. १ के संचालन मार्ग में कुछ मानसिक कमजोरी १० १२ नं. ४५१ अनुभव करेगा तथा इन्द्रिय भोगादि सुखों में कुछ कमी अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा कुछ खर्च की फिकर रहेगी। सिंह लग्न में ८ चन्द्र यदि मीन का चन्द्र- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो खर्च के मार्ग में ६ ४
७ ५ कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा व्ययेश होने के m दोष के कारण आयु स्थान में कभी-कभी ८ २ परेशानियाँ या फिकर प्राप्त करेगा और उदर के ९ ११ अन्दर कोई शिकायत रहेगी तथा मनोयोग के १ बल से बाहरी स्थानों का सम्बन्ध प्राप्त करेगा १० १२च. नं. ४५२ और सातवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन स्थान में कुछ नुकसान प्राप्त करेगा और मनोयोग से पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ९ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो ६ ४ भाग्य की शक्ति के द्वारा मनोबल के योग से ७ m खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने ८ २ के दोष के कारणों से भाग्य स्थान में कुछ कमजोरी ९ ११ १चं प्राप्त करेगा तथा धर्म के मार्ग में कुछ खर्च करेगा किन्तु धर्म पालन में त्रुटि प्राप्त करेगा और सातवीं १० १२
नं. ४५३ दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में भाई के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सम्बन्धों में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा तथा मन के अन्दर कुछ कमजोरी और कुछ प्रसन्नता दोनों प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता स्थान में उच्च का होकर
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भृगु संहिता २५३ सिंह लग्न में १० चन्द्र सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पिता की सम्पत्ति को विशेष खर्च करेगा और विशेष ४ खर्चा करने के कारणों से उन्नति के मार्ग में हानि ७ ५ ३ प्राप्त करेगा तथा बाहरी स्थानों का ऊँचा सम्बन्ध ८ २ च. मनोयोग के द्वारा प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से सुख भवन को मित्र मंगल की वृश्चिक ९ ११ १ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के कारणों से १० १२ सुख शान्ति में बड़ी अशांति प्राप्त करेगा और नं. ४५४ माता के स्थान में कमी प्राप्त करेगा तथा मकान- जायदाद की कमजोरी प्राप्त करेगा तथा मन के अन्दर स्वाभिमान रखेगा। सिंह लग्न में ११ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- ग्यारहवें स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो बाहरी स्थानों के ६ ४ सम्बन्ध से मनोयोग के द्वारा लाभ प्राप्त करेगा ७ ५ चं तथा व्ययेश होने के दोष के कारण आमदनी के ८ मार्ग में कमजोरी अनुभव करेगा तथा खर्चे के
९ कार्य कारणों से आमदनी का मार्ग बनायेगा और ११ १ सातवीं मित्र दृष्टि से संतान स्थान को गुरु की धनु 北 半 半 山
१० १२ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ
पायेगा तथा खर्चें के इन्तजामी मार्ग में कुछ फिकर मंदी से काम चलायेगा। नं. ४५५ हानि प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमजोरी
सिंह लग्न में १२ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- बारहवें खर्च स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो खर्चा ६ ४ चं विशेष करेगा तथा बाहरी स्थानों का विशेष सुन्दर ७ ५ ३ सम्बन्ध मनोयोग के द्वारा प्राप्त करेगा और विशेष खर्च करने में ही मन की प्रसन्नता प्राप्त करेगा V २ ९ तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की ११ १ मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में १० १२ शान्तियुक्त मनोबल की शक्ति से काम करेगा नं. ४५६ तथा खर्च की शक्ति से शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त करेगा और कुछ रोगादिक झगड़े-झंझटों के मामले में खर्चा अधिक करेगा। भाग्य, धर्म, माता, भूमिस्थानपति-मंगल यदि सिंह का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा तथा धर्म का पालन करेगा तथा ईश्वर और भाग्य पर भरोसा करेगा और देह में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में माता स्थान को स्वक्षेत्र के
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२५४ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में १ मंगल भाव से देख रहा है, इसलिये माता की श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का सुख प्राप्त ६ ४
७ ५ मं. करेगा और देह के लिये सुख और भाग्य की ३ सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से ८ स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा २ है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता के साथ ९ ११ १ सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में १० १२ कुछ अरूचिकर रूप में सफलता प्राप्त करेगा नं. ४५७ और आठवीं दृष्टि से आयुस्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली किसी पुरातत्व शक्ति की सुख सफलता प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में २ मंगल यदि कन्या का मंगल- धन स्थान में मित्र
६मं. बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से ४ धन का सुख प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का अच्छा ७ ५ ३ सहयोग प्राप्त करेगा तथा धन का स्थान बंधन ८ २ का भी कार्य करता है, इसलिये माता के और मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में कमी प्राप्त करेगा ९ ११ १ ओर चौथी दृष्टि से संतान स्थान को मित्र गुरु की १० १२ धनु राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में नं. ४५८ सुख प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि के स्थान में सफलता शक्ति भाग्य द्वारा प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और पुरातत्व में सफलता प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में भाग्य स्थान को स्वक्षेत्र रूप में देख रहा है, इसलिये बड़ा भाग्यशाली बनेगा और धन के द्वारा भाग्य और धर्म का आनन्द प्राप्त करेगा तथा इज्जतदार व्यक्तियों में आपका नाम रहेगा तथा स्वार्थ युक्त धर्म का पालन करेगा। सिंह लग्न में ३ मंगल यदि तुला का मंगल- तीसरे भाई के स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो ६ ४ भाई-बहिन के पक्ष में हिम्मत और सुख शक्ति ७मं ५ ३ प्राप्त करेगा तथा माता के स्थान की शक्ति प्राप्त ८ करेगा और सुख पूर्वक अपने पराक्रम पुरुषार्थ २ के कार्यों में सफलता प्राप्त करेगा और चौथी ९ ११ १ उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान के शनि की मकर राशि १० १२ में देख रहा है, इसलिये भाग्य और पुरुषार्थ के नं. ४५९ द्वारा शत्रु पक्ष में सफलता और सुख एवं प्रभाव
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भृगु संहिता २५५ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में भाग्य स्थान को स्वक्षेत्र के रूप में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के सरल योग से भाग्य की उत्तम शक्ति और वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म कार्य का पालन करेगा और यश की प्राप्ति होगी और आठवीं दृष्टि से राज्य-स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में मान प्राप्त करेगा तथा व्यापारिक क्षेत्र में और पिता स्थान में उन्नति और सुख प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ४ मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- चौथे माता के स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो माता ६ ४ की शक्ति प्राप्त करेगा और मकानादि भूमि का ७ ५ ३ सुख प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण के अन्दर ८ मं. २ भाग्य बल शक्ति से सुख के महान् साधन प्राप्त ९ ११ करेगा और चौथी शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु १ १२ शनि की कुम्भ रारश में देख रहा है, इसलिये १० 1 कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा स्त्री स्थान में नं. ४६० सुख और सफलता प्राप्त करेगा तथा कुछ अरूचिकर रूप से रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से पिता स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता और सुख प्राप्त करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा। सिंह लग्न में ५ मंगल यदि धनु का मंगल- पाँचवें स्थान में मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो संतान पक्ष से सुख ६ ४ और सफलता प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में ७ ५ ३ सुख और सफलता के साथ-साथ यश प्राप्त करेगा और माता तथा मातृ स्थान का सहयोग और अनुराग V २ मानेगा तथा धर्म और न्याय की बात को कहना मं ११ १ और समझना पसंद करेगा और चौथी दृष्टि से १० १२ नं. ४६१ आयु स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य शक्ति के द्वारा लाभ प्राप्ति के अच्छे साधन प्राप्त करेगा और आठवीं नीच दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा
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२५६ सिंह लग्न का फलादेश है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कमजोरी रहेगी और धार्मिक कार्यों में खर्च की रुकावटें या खर्च की मजबूरियाँ रहेंगी। सिंह लग्न में ६ मंगल यदि मकर का मंगल- शत्रु स्थान में उच्च का होकर शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु ६ ४ स्थान में महान् प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा और ७ ५ ३ शत्रु पक्ष में भाग्य की शक्ति से सफलता और V २ सुख का योग प्राप्त करेगा तथा रोगादिक झगड़े- ९ झंझटों में बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम करेगा ११ १ १०म. १२ तथा चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ नं. ४६२ परिश्रम और प्रभाव तथा कुछ झंझटों के मार्ग के द्वारा भाग्य की अच्छी वृद्धि प्राप्त करेगा और कुछ परेशानियों से मुक्त करने के मार्ग में धार्मिक कार्य करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ कमी और कुछ परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और सुख तथा सुन्दरता प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ७ मंगल यदि कुम्भ का मंगल- सातवें स्त्री स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो कुछ नीरसता ६ ४ युक्त मार्ग से या कुछ कठिनाईयों के योग से स्त्री ७ ५ ३ का सुख सौभाग्य प्राप्त करेगा तथा रोजगार के ८ २ मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से ९ ११ मं. पिता स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़े से मतभेद के १० १२ योग से पिता स्थान की शक्ति का सुख प्राप्त नं. ४६३ करेगा तथा राज, समाज में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कारबार में सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और सुख सौभाग्य की शक्ति पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में धर्म कर्म का पालन करेगा। यदि मीन का मंगल- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाग्य की कमजोरी और माता के सुख में कमी एवं कष्ट प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा और मकानादि के अन्दर
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भृगु संहिता २५७ सिंह लग्न में ८ मंगल घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की कमी और कष्ट प्राप्त करेगा तथा आयु और पुरातत्व शक्ति ६ ४ का सुख लाभ प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि ७ ५ ३ से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख ८ २ रहा है, इसलिये लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और ९ सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या ११ १ राणि में देख रहा है, इसलिये धन की प्राप्ति में १० १२म. नं. ४६४ सफलता पायेगा तथा आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में भाई-बहिन के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में सुख प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की शक्ति प्राप्त करेगा और यश तथा बरक्कत में विशेष कमी प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में उमंग प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ९ मंगल यदि मेष का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा ६ ४ ५ है तो भाग्य की महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा ७ ३ धर्म का पालन करेगा और चौथी नीच दृष्टि से ८ २ खर्च स्धान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा ९ ११ १ मं. है, इसलिये खर्च के मार्ग में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों १० १२
नं. ४६५ में परेशानी के योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग से भाई-बहिन की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म की सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। आठवीं दृष्टि से माता के स्थान को एवं सुख स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता के स्थान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा मकानादि रहने के सुख सम्बन्धों में उन्नति प्राप्त करेगा और सुख के अच्छे साधन प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १० मंगल यदि वृषभ का मंगल-दसम केन्द्र राज्य स्थान ६ ४ में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है ७ ५ ३ तो भाग्य शक्ति के बल से राज-समाज में विशेष सफलता और मान प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान ८ २ मं. में और कारबार के सम्बन्धों में उन्नति प्राप्त करेगा ९ ११ १ तथा धर्म-कर्म का पालन करेगा और चौथी मित्र १० १२ दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में नं. ४६६ देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और भाग्यवानी घृ.सं .- १७
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२५८ सिंह लग्न का फलादेश के लक्षण प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये मातृ सुख और घरेलू सुख प्राप्त करेगा तथा मकानादि भूमि की शक्ति प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से संतान और विद्या के स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या के स्थान में भाग्य की शक्ति से सफलता और सुख प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ी सज्जनताई की बातें करेगा। सिंह लग्न में ११ मंगल यदि मिथुन का मंगल-ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की मिथुन राशि पर बैठा है तो भाग्य ६ ४
७ ५ की शाक्ति से सुख पूर्वक धन लाभ की शक्ति ३ प्राप्त करेगा तथा लाभ स्थान में क्रूर ग्रह प्रबल २ हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष V
९ सफलता प्राप्त करेगा और भूमि और मकानादि ११ १ एवं माता के पक्ष से लाभ प्राप्त करेगा तथा १० १२ चौथी दृष्टि से धन भवन को मित्र बुध की कन्या नं. ४६७ राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह के साधन प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान स्थान को एवं विद्या स्थान को देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या के पक्ष में सुख सफलता प्राप्त करेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में भाग्य शक्ति द्वारा बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और रोगादि झगड़े- झंझटों में बड़ी भारी हिम्मत से सफलता प्राप्त करेगा तथा ननसाल पक्ष से सुख प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १२ मंगल यदि कर्क का मंगल- बारहवें खर्च स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है ६ ४ मं तो खर्च के मार्ग में परेशानी प्राप्त करेगा और ७ 3 भाग्य की तरफ से कष्ट अनुभव करेगा और मातृ ८ स्थान की तरफ से सुख सम्बन्धों में भारी कमी २ ९ का योग प्राप्त करेगा, बाहरी स्थानों के सम्बन्ध ११ १ में कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा और चौथी दृष्टि से १० १२ भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला नं. ४६८ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों में हिम्मत से काम
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भृगु संहिता २५९ निकालेगा और आठवीं दृष्टि से स्त्री स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के योग से स्त्री तथा रोजगार का लाभ और सुख प्राप्त करेगा और धर्म की परवाह नहीं करेगा। धन, कुटुम्ब, आमदस्थानपति-बुध सिंह लग्न में १ बुध यदि सिंह का बुध-देह के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में प्रभाव ६ ४ और मान प्राप्त करेगा तथा देह और विवेक शक्ति ७ ५ बु. ३ के योग से धन की अच्छी आमदनी प्राप्त करेगा ८ २ तथा धन की संग्रह शक्ति का साधन पायेगा और ९ धनवान् तथा इज्जतदार समझा जायेगा और सातवीं ११ १ मित्र दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि १० १२ में देख रहा है, इसलिये धन की शक्ति से स्त्री व नं. ४६९ गृहस्थ का लाभ प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता और उन्नति प्राप्त करेगा और देह में सुन्दरता एवं भोग की शक्ति पायेगा तथा धन प्राप्ति का मुख्य दृष्टि कोण रखेगा। सिंह लग्न में २ बुध यदि कन्या का बुध- द्वितीय धन भवन में उच्च का होकर स्वयं अपने क्षेत्र में बैठा है तो धन दब्. ४ की संग्रह शक्ति का उत्तम कोष प्राप्त करेगा और ७ ५ ३ धन की शक्ति से धन की वृद्धि करने के और धन ८ २ लाभ प्राप्त करेगा तथा धनवान् इज्जतदार समझा ९ जायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से अष्टम आयु ११ १ स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में १० १२ कई बार कष्ट एवं चिन्ताओं के कारण प्राप्त करेगा नं. ४७० तथा पुरातत्व शक्ति की कमजोरी पायेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी पायेगा तथा उदर में विकार प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ३ बुध यदि तुला का बुध- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाई बडिन की ४ शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा ३ धन की सफलता प्राप्त करेगा और विवेक बल ८ २ से आमदनी के मार्ग में तथा उन्नति के मार्ग में ९ उन्नति करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य ११ १ स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा १० १२ है, इसलिये भाग्य की उन्नति प्राप्त करेगा तथा नं. ४७१ धन के द्वारा धर्म का पालन करेगा और पुरुषार्थ
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२६० सिंह लग्न का फलादेश कर्म के योग से यश प्राप्त करेगा और कुटुम्ब शक्ति का सहयोग अच्छा प्राप्त करेगा और धन कमाने के मार्ग में बड़ी हिम्मत से काम करेगा। सिंह लग्न में ४ बुध यदि वृश्चिक का बुध- चौथे मातृ स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है, तो धन संग्रह का us ४ सुन्दर सुख प्राप्त करेगा और माता की शक्ति का ७ ५ ३ विशेष लाभ प्राप्त करेगा तथा मकान जायदाद ८ बु. २ की शक्ति का लाभ पायेगा और सुख प्राप्ति के ९ अच्छे साधन पायेगा तथा घर बैठे ही आमदनी ११ १ का सुख प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से १० १२ पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा नं. ४७२ है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति से लाभ और उन्नति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज और कारबार के पक्ष में सफलता और मान प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ५ बुध यदि धनु का बुध- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो विद्या ६ ४ बुद्धि के स्थान में बड़ी सफलता प्राप्त करेगा ७ ५ ३ और बुद्धि तथा विवेक की शक्ति से धन की ८ २ विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और सन्तान शक्ति से ९ लाभ प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान से लाभ बु. ११ १ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी १० १२ मिथुन राशि में लाभ स्थान को स्वक्षेत्र के रूप में नं. ४७३ देख रहा है, इसलिये बुद्धि, कला और धन की शक्ति के योग से आमदनी की विशेष वृद्धि करेगा तथा वाणी के द्वारा सज्जनता युक्त रूप से स्वार्थ सिद्धि की बातें करेगा। सिंह लग्न में ६ बुध यदि मकर का बुध- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है, तो धन की संग्रह ६ ४ शक्ति में बड़ी कमी प्राप्त करेगा तथा कुछ परतन्त्रता ७ ५ युक्त मार्ग से आमदनी प्राप्त करेगा और शत्रु स्थान ८ २ में एवं कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ धन ९ की हानि पायेगा तथा शत्रु पक्ष में कुछ पैसे की १ ताकत एवं नरमाई की ताकत से काम करेगा और १०बु. १२ सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की नं. ४७४ कर्क राशि में देख रहा, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा और कुटुम्ब स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगः।
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भृगु संहिता २६१ सिंह लग्न में ७ बुध यदि कुम्भ का बुध- सातवें स्त्री स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में ६ ४ विशेष लाभ और सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा रोजगार ७ ५ ३ के मार्ग में धन की आमदनी तथा धन की संग्रह ८ २ शक्ति का योग प्राप्त करेगा और गृहस्थ यथा ९ ११ बु. रोजगार के पक्ष में इज्जत तथा कुटुम्ब की शक्ति १ १० १२ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के
नं. ४७५ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और मान प्राप्त करेगा तथा विवेक शक्ति के द्वारा धनोपार्जन का विशेष ध्यान रखेगा और उसमें बड़ी कुशलता प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ८ बुध यदि मीन का बुध-आठवें मृत्यु स्थान में नीच का होकर गुरु की राशि पर बैठा है तो धन की ६ ४ आमदनी और धन की संग्रह शक्ति के मार्ग में ७ ५ ३ बड़ी परेशानी और चिन्ता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब ८ २ स्थान के सम्बन्ध में क्लेश और कमी का योग ९ पायेगा तथा आयु स्थान में कभी-कभी भारी ११ १ संकट प्राप्त करेगा और पुरातत्व लाभ एवं जीवन १० १२बु. की दिनचर्या में कुछ कमी पायेगा तथा उदर में नं. ४७६ कुछ विकार प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से धन भवन को स्वयं अपनी कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की कमी रहते हुये भी कार्यों की पूर्ति का योग प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ९ बुध यदि मेष का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र मंगल की मेष राशि पर बैठा है तो भाग्य ६ ४ की और धर्म की शक्ति से धन की प्राप्ति करेगा ७ ५ ३ और बड़ा भारी भाग्यवान् समझा जायेगा तथा ८ २ धर्म का पालन करेगा और ईमानदारी से धन का ९ ११ १बु. उपार्जन एवं संग्रह करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति १० १२ का सुन्दर योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र
नं. ४७ दृष्टि से भाई के स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म की सफलता एवं वृद्धि प्राप्त करेगा तथा सज्जनता और यश प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का बुध- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की उन्नति करेगा तथा पिता का लाभ पायेगा और
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२६२ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में १० बुध राज-समाज में मान और सफलता प्राप्त करेगा तथा विवेक शक्ति से बड़े कारबार के मार्ग में धन ६ ४ की वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से ७ ५ ३ सुख स्थान एवं मात स्थान को मंगल की वृश्चिक ८ २ बु. राशि में देख रहा है, इसलिये धन के योग से मातृ ९ स्थान एवं सुख के साधनों में सफलता और सुख ११ १ प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का सुख सम्बन्ध १० १२ पायेगा। नं. ४७८ यदि मिथुन का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में सिंह लग्न में ११ बुध स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो विवेक शक्ति के योग से धन का लाभ स्वयमेव प्राप्त ६ ४ करेगा तथा आमदनी के मार्ग में सुन्दर शक्ति एवं ७ ५ प्रभाव प्राप्त करेगा और धन की शक्ति का सुख ८ २ लाभ के रूप में प्राप्त करेगा तथा धन के द्वारा ९ आमदनी का मार्ग पायेगा और कुटुम्ब शक्ति का ११ १ लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या १० १२ एवं संतान पक्ष को गुरु की धनु राशि में देख रहा नं. ४७९ है, इसलिये विद्या बुद्धि के योग से सफलता पायेगा तथा संतान पक्ष में लाभ प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १२ बुध यदि कर्क का बुध- बारहवें खर्च स्थान में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो धन का खर्चा ६ ४ ब. ३ विशेष करेगा और धन की कमजोरी प्राप्त करेगा ७ ५ और धन की संग्रह न कर सकने के कारणों से ८ २ दुःख अनुभव करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों ९ ११ से धन का लाभ विवेक द्वारा प्राप्त करेगा तथा १ १० १२ कुटुम्ब स्थान की शक्ति में कमजोरी प्राप्त करेगा
नं. ४८० तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में धन की शक्ति से एवं विवेक शक्ति से काम निकालेगा और झगड़े-झंझटों में भी विवेक और खर्च की शक्ति से काम करेगा। विद्या, सन्तान, आयुस्थानपति-गुरु यदि सिंह का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र सूर्य की सिंह राशि में बैठा है तो देह में प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा सुन्दर आयु प्राप्त करेगा और अष्टमेश होने के दोष से कुछ कठिनाईयाँ और कुछ फिकरमंदी, बुद्धि और सन्तान पक्ष में रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से स्वयं
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भृगु संहिता २६३ सिंह लग्न में १ गुरु अपनी धनु राशि में सन्तान पक्ष को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त ६ ४
७ ५ गु. ३ करेगा तथा विद्या स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और वाणी की योग्यता के द्वारा मान प्राप्त ८ २ करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को ९ ११ १ शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये १० १२ स्त्री पक्ष में कुछ अरूचि के साथ सम्बन्ध प्राप्त
मंगल की मेष राशि में देख रहा है इसलिये बुद्धि योग द्वारा भाग्य की नं. ४८१ करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को
वृद्धि करेगा तथा धर्म का ज्ञान प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा बड़प्पन के ढंग से रहन-सहन रखेगा। सिंह लग्न में २ गुरु यदि कन्या का गुरु-धन भवन में मित्र बुध ६ गु. ४ की राशि पर बैठा है तो बुद्धि योग द्वारा धन की ७ ५ ३ वृद्धि के साधन प्राप्त करेगा तथा धन का स्थान बन्धन का स्थान माना जाता है, इसलिये सन्तान ८ २ पक्ष में परेशानी अनुभव करेगा और अष्टमेश ९ ११ १ होने के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति में १० १२ बाधा प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से नं. ४८२ शत्रु स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा ननसाल पक्ष में हानि पायेगा और सातवीं दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा अमीरात के ढंग से रहन-सहन रखेगा और नवमी दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में राज्य स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ मतभेद प्राप्त करेगा तथा राज- समाज के कार्यों में कुछ अरूचि के साथ सम्पर्क रखेगा और वृद्धि के लिये प्रयत्नशील रहेगा। यदि तुला का गुरु- तीसरे भाई के स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में बैठा है तो भाई-बहिन के सम्बन्धों में कुछ मतभेद और कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा पराक्रम स्थान में बुद्धि विद्या के योग द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुछ परेशानी के साथ संतान शक्ति प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ वैमनस्यता
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२६४ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में ३ गुरु युक्त सम्बन्ध रखेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी-सी अनुभव करेगा तथा सातवीं मित्र ६ ४ ५ दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में ३ देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के मार्ग में ८ २ बुद्धि के योग से सफलता प्राप्त करेगा और धर्म ९ को समझेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान ११ १ को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये १० १२ बुद्धि के द्वारा आमदनी की शक्ति प्राप्त करेगा नं. ४८३ और हिम्मत शक्ति से काम करेगा। सिंह लग्न में ४ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- चौथे केन्द्र मातृ स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश के ६ ४ दोष के कारण मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में ७ ५ ३ कमी और कष्ट का कुछ योग प्राप्त करेगा तथा ८ गु. २ मातृ पक्ष का कुछ सुख प्राप्त करेगा तथा सन्तान ११ पक्ष का कुछ सुख प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं दृष्टि १ से आयु स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में १० १२ नं. ४८४ स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा। जीवन की दिनचर्या में गौरव प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में पिता स्थान को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में साधारण विचारों से सम्पर्क रखेगा और नवीं उच्च दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा एवं दूसरे स्थानों से जीवन का विशेष आनन्द प्राप्त होगा। सिंह लग्न में ५ गुरु यदि धन का गुरु- पाँचवें त्रिकोण सन्तान स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो ४ सन्तान शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि में ७ ५ ३ शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष से ८ २ सन्तान और विद्या के स्थान में कुछ कमी और ९ कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा वाणी की शक्ति गु. ११ १ के अन्दर सभ्यता की कुछ कमी प्राप्त करेगा १० १२ और पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल नं. ४८५ की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा और पुरातत्व शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा और कुछ
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भृगु संहिता २६५ धर्म का भी ध्यान रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग और पुरातत्व शक्ति के द्वारा लाभ के साधन प्राप्त करेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा और अपने विचारों द्वारा देह में सुख और दुःख का अनुभव करेगा। सिंह लग्न में ६ गुरु यदि मकर का गुरु- छठें शत्रु स्थान में नीच का होकर शनि की राशि पर बैठा है तो संतान ६ ४ पक्ष से कष्ट अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में ७ ५ ३ कमजोरी प्राप्त करेगा और आयु के सम्बन्ध में ८ २ बहुत बार झंझट प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व की ९ ११ हानि पायेगा और जीवन की दिनचर्या में परेशानी १ १० गु. १२ अनुभव करेगा तथा शत्रु पक्ष में चिंता फिकर पायेगा और पाँचवीं दृष्टि से पिता स्थान को सामान्य नं. ४८६ शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष में कुछ वैमनस्य युक्त सम्बन्ध रखेगा तथा राज-समाज के कार्यों में कुछ थोड़ी दिनचर्या रखेगा और मान, उन्नति का प्रयत्न करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और दूसरे स्थानों का अच्छा सम्बन्ध बनायेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से धन स्थान को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये प्रयत्नशील रहेगा और कुटुम्ब का कुछ योग प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ७ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने ६ ४ के दोष के कारणों से स्त्री स्थान में कुछ कष्ट ७ ३ प्राप्त करेगा तथा स्त्री से कुछ वैमनस्यता रहेगा ८ २ और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव ९ ११ गु. करेगा तथा विद्या और संतान के पक्ष में साधारण १ शक्ति प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति पायेगा १० १२ नं. ४८७ तथा पुरातत्व का कुछ लाभ पायेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और पुरातत्व के योग से आमदनी प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग से देह में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा तथा
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२६६ सिंह लग्न का फलादेश पुरुषार्थ शक्ति के मार्ग में विशेष प्रयत्नशील रहकर उन्नति की चेष्टा करेगा। सिंह लग्न में ८ गुरु यदि मीन का गुरु- आठवें आयु स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु में ६ ४ ७ 4 वृद्धि प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ 3 प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक ८ २ और प्रभाव लायेगां और संतान पक्ष से कष्ट प्राप्त ९ करेगा तथा विद्या स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा ११ १ तथा वाणी के अन्दर मिठास की कमी और भेदनीति १० १२गु. के द्वारा काम करेगा तथा पाँचवीं उच्च दृष्टि से नं. ४८८ चन्द्र की कर्क राशि में खर्च भवन को देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा तथा बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्पर्क बनायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि काने का प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से माता के सुख स्थान को मित्र मंगल की राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि लिये हुये सहायता शक्ति प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ९ गुरु यदि मेष का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है, तो बुद्धि योग ur ४ के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म शास्त्र ७ ५ ३ तथा पुरातत्व का ज्ञान प्राप्त करेगा और आयु की ८ २ शक्ति प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह ९ के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, ११ १गु. इसलिये देह में बुद्धि योग द्वारा मान प्राप्त करेगा १० १२ तथा बड़े जचाव की बातें करेगा और सातवीं नं. ४८९ दृष्टि से भाई के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई के स्थान में कुछ अरुचिकर रूप से सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा पराक्रम की वृद्धि करेगा और नवमी दृष्टि से स्वयं अपनी धनु राशि संतान स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये संतान की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान की शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण विद्या, संतान, भाग्य सभी में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा। यदि वृषभ का गुरु- दसम केन्द्र पिता स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण पिता स्थान में हानि और कुछ मतभेद प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि के योग से राज- समाज में मान प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करेगा और
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सिंह लग्न में १० गुरु संतान शक्ति के द्वारा मान प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में ६ ४ देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा धन की ५ ३ शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का ८ २ गु. सामान्य सुख प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में ९ ११ १ देख रहा है, इसलिये मातृ सुख का सामान्य लाभ १० १२ प्राप्त करेगा तथा नवमी नीच दृष्टि से शत्रु स्थान नं. ४९० को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष से कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा झगड़े-झंझट आदि के सम्बन्धों से कुछ फिकरमन्दी पायेगा। सिंह लग्न में ११ गुरु यदि मिथुन का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो बुद्धि योग के ६ ४ द्वारा आमदनी के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा ७ ५ और पुरातत्व सम्बन्ध का भी लाभ प्राप्त करेगा ८ २ तथा आयु की शक्ति में वृद्धि पायेगा और पाँचवीं ९ ११ दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में भाई १ के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के १० २
नं. ४९१ पक्ष में कुछ मतभेद रखेगा तथा पुरुषार्थ कर्म की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी धनु राशि में संतान एवं विद्या स्थान को देख रहा है, इसलिये विद्या ओर संतान शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष से कुछ परेशानी करेगा और नवमी शत्रु दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्य और कुछ असन्तोष पायेगा तथा रोजगार में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १२ गुरु यदि कर्क का गुरु-बारहवें खर्च स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो ६ ४ गु. खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों के ७ ५ ३ सम्बन्ध में विशेष अच्छा सम्पर्क प्राप्त करेगा और ८ विद्या में कमी और बुद्धि में शक्ति प्राप्त करेगा २ ९ तथा संतान पक्ष में कुछ हानि और कुछ शक्ति ११ १ प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से माता के १० १२ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, नं. ४९२ इसलिये माता के सम्बन्ध में और भूमि मकानादि के सम्बन्ध में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान
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२६८ सिंह लग्न का फलादेश को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा नवमी दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का कुछ लाभ और हानि प्राप्त करेगा और अष्टमेश के दोष के कारणों से जीवन के सम्बन्धों में अनेक प्रकार के कुछ चिन्ता-फिकर या दिक्कतों का अनुभव करेगा। पिता, राज्य, भाई, पराक्रमस्थानपति-शुक्र सिंह लग्न में १ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के ६ स्थान पर शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह ४ ७ ५ शु. ३ में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सुन्दरता एवं सजावट का ध्यान रखेगा और भाई बहिन ८ २ तथा पिता की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु भाई ९ ११ और पिता से कुछ मतभेद रहेगा तथा उन्नति १ १० १२ प्राप्त करने के लिये बहुत-बहुत प्रकार के कर्म, नं. ४९३ चतुराई और परिश्रम करता रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में महान् शक्ति और इज्जत प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और लौकिक गृहस्थिक कार्यों के सम्बन्ध में सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा भोगादिक आनन्द प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में २ शुक्र. यदि कन्या का शुक्र- धन भवन में नीच का ६शु ४ होकर बुध की कन्या राशि में बैठा है तो धन ७ ५ ३ संग्रह की शक्ति में कमजोरी प्राप्त करेगा और पिता एवं भाई बहन के सुख सम्बन्धों में कमी का ८ २ योग प्राप्त करेगा तथा कारबार और पुरुषार्थ कर्म ९ ११ १ एवं राज-समाज इत्यादि मार्गों में कमजोरी रहेगी १० १२ और सातवीं उच्च दृष्टि से आयु स्थान को गुरु की नं. ४९४ मीन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव एवं शानदारी रखेगा और गुजर-बसर करने का साधन अच्छा प्राप्त करेगा। यदि तुला का शुक्र- तीसरे भाई के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा पिता की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा महान् शक्ति
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भृगु संहिता २६९ सिंह लग्न में ३ शुक्र प्राप्त करेगा और राज- समाज की सम्बन्धित शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा अपने बाहुबल ६ ४ के द्वारा कोई बड़े कारबार का संचालन कार्य ७श ५ ३ करेगा और उन्नति के कार्यों में महान् चतुराई ८ २ और हिम्मत से काम करेगा तथा सातवीं दृष्टि से ९ भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की राशि में ११ १ देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के द्वारा १० १२
नं. ४९५ भाग्य की वृद्धि के साधन पैदा करेगा तथा धार्मिक कार्यों में भी परिश्रम से सुन्दर कर्म करेगा। सिंह लग्न में ४ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा ६ ४ है तो माता के स्थान में कुछ थोड़े से मतभेद के ७ ५ ३ साथ सुख शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा ८ शु. २ तथा मकान जायदाद की शक्ति पायेगा और
९ भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा तथा रहने के ११ १ स्थान में सुन्दरता और सुख प्राप्त करेगा तथा १० १२
नं. ४९६ सातवीं दृष्टि से पिता स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सुख पूर्वक परिश्रम करके सफलता प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्धों में मान और सुख प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ५ शुक्र यदि धनु का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण संतान स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि पर बैठा ६ ४ है तो संतान शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा ७ ५ विद्या के स्थान में शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा ८ २ और वाणी की योग्यता और चतुराई से बड़ा मान ९ और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा भाई-बहन और ११ १ पिता स्थान का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा और १० १२ सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की नं. ४९७ मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये उत्तम कर्म के योग द्वारा विशेष लाभ के सहित आमदनी प्राप्त करेगा और राज- समाज सम्बन्धित कार्यों में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ा चतुर नीतिज्ञ बनेगा। यदि मकर का शुक्र-छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में बड़ी चतुराई की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा तथा भाई
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२७० सिंह लग्न का फलादेश
सिंह लग्न में ६ शुक्र और पिता स्थान में कुछ मतभेद रखेगा तथा कुछ परतन्त्रता युक्त मार्ग से उन्नति का स्थान प्राप्त ६ ४ करेगा और बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा ७ ५ ३ और राज-समाज के परिश्रमी मार्गों द्वारा मान ८ २ और प्रभाव पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च ९ स्थान को सामान्य मित्र चन्द्र की कर्क राशि में ११ १ देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी १०शु. १२ स्थानों का अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा और पेचीदी नं. ४९८ युक्तियों से शक्ति बल में वृद्धि पायेगा। सिंह लग्न में ७ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र-सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में ६ ४ विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग ७ ५ ३ में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और भाई-बहिन ८ २ तथा पिता के सम्बन्धों में सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा ९ ११ शु. तथा लौकिक व गृहस्थिक कार्यों में बड़ी कुशलता १ और चतुराई के द्वारा सफलता और मान प्राप्त १० १२ नं. ४९९ करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और जबाब की शक्ति प्राप्त करेगा तथा हिम्मत हुकूमत और न्याय से काम करेगा और पुरुषार्थ कर्म से उन्नति पायेगा। सिंह लग्न में ८ शुक्र यदि मीन का शुक्र- आठवें मृत्यु स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर ६ ४ बैठा है तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व ७ ५ ३ का लाभ पायेगा और पिता तथा भाई बहिन की ८ २ शक्ति का कुछ त्रुटि युक्त सम्बन्ध प्राप्त करेगा ९ और कुछ गूढ़कर्म की वृद्धि करने में सफलता ११ १ १० १२शु. पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में शानदारी रखेगा
नं. ५०० और राज समजा की कुछ सम्बन्ध शक्ति प्राप्त करेगा सातवीं नीच दृष्टि से धन भवन को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन के संग्रह करने में कुछ कमजोरी पायेगा और कुदुम्ब के सहयोग में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा। यदि मेष का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की महान् शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म-कर्म का पालन करेगा तथा पिता स्थान की शक्ति लाभ भाग्य द्वारा सुन्दर रूप
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भृगु संहिता २७१ सिंह लग्न में ९ शुक्र में प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में मान और सफलता तथा यश प्राप्त करेगा तथा ६ ४
७ ५ ३ चतुराई के सुन्दर सद्गुणी कर्म के द्वारा उन्नति पायेगा और सातवीं दृष्टि से पराक्रम और भाई के ८ २ स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को ९ ११ १शु. देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की सुन्दर राशि १० १२ प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा सुन्दरता नं. ५०१ युक्त भाग्य की वृद्धि करेगा और बाहुबल के
सिंह लग्न में १० शुक्र अन्दर विशेष शक्ति पायेगा। यदि वृषभ का शुक्र- दसम केन्द्र पिता स्थान ६ ४ पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता ७ ५ ३ स्थान की महान् शक्ति प्राप्त करेगा और राज- समाज के मार्ग में बड़ा मान और प्रभाव प्राप्त ८ २ शु. करेगा तथा कारबार में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा ९ ११ १ तथा भाई बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा १० १२ और सुन्दर चतुराई से परिश्रम कर्म के द्वारा विशेष नं. ५०२ उन्नति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से माता के स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और मकानादि की शक्ति का सुन्दर सुख लाभ प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ११ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के ६ ४ मार्ग में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान का ७ 4 शु लाभ प्राप्त करेगा और भाई बहिन की शक्ति का ८ २ लाभ योग प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के ९ कार्यों को चतुराई के द्वारा सफल बनाकर विशेष ११ १ लाभ प्राप्त करेगा और राज-समाज सम्बन्धित १० १२ मार्ग भी लाभप्रद रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या नं. ५०३ एवं सन्तान स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसिलये विद्या स्थान में शक्ति और बुद्धि में बड़ी योग्यता प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष में सफलता शक्ति पायेगा और वाणी के द्वारा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा। यदि कर्क का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत करेगा तथा पिता और भाई की हानि प्राप्त करेगा तथा अपने स्थानीय कार्यों में कमजोरी प्राप्त करेगा और कुछ
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२७२ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में १२ शुक्र परतन्त्रता का-सा योग प्राप्त करेगा और देह की पुरुषार्थ शक्ति में कमजोरी पायेगा तथा बाहरी ६ ४ श् ७ ५ दूसरे स्थानों के सम्बन्ध में सफलता प्राप्त करेगा ३ तथा राज-समाज के कार्यों में मान और प्रभाव ८ की कमी प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से २ ९ ११ शत्रु स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा १ है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी चतुराई की शक्ति से १० १२ नं. ५०४ काम बनायेगा और झगड़े-झंझटों में हिम्मल शक्ति से कामयाबी पायेगा। स्त्री, रोजगार, शत्रु स्थानपति-शनि सिंह लग्न में १ शनि यदि सिंह का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु सूर्य की सिंह राशि में बैठा है तो देह के ६ ४ स्थान में परेशानी तथा कुछ रोग और झंझट आदि ७ ५ श. ३ के योग प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में कुछ प्रभाव ८ २ रखेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से भाई के स्थान ९ ११ को मित्र शुक्र की तुला राशिं में देख रहा है, १ १० १२ इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा
नं. ५०५ हिम्मत और पुरुषार्थ शक्ति में वृद्धि प्राप्त, करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी राशि में स्त्री तथा रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, किन्तु शत्रु स्थान पति होने के कारण स्त्री के सुख और प्रेम की शक्ति में कुछ झंझट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम और कुछ परेशानी के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा तथा दशवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और कारबार में कुछ उन्नति एवं मान प्राप्त करेगा तथा कार्य कुशल बनेगा। सिंह लग्न में २ शनि यदि कन्या का शनि-धन स्थान में मित्र बुध ६श. की राशि पर बैठा है तो धन के संग्रह कोष के ४
७ ५ अन्दर वृद्धि और हानि के दोनों कारणों को प्राप्त m करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में कुछ दुःख-सुख का २ योग पायेगा क्योंकि धन का स्थान बन्धन का V
९ रूप है, और छठा स्थान झंझट का रूप है, इसलिये ११ १ १० १२ स्त्री स्थान के सुख में अनेक बाधायें प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ दिक्कतों के साथ नं. ५०६ पैदा कमावेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से माता के
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भृगु संहिता २७३ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा और घरेलू मकानादि के सुख सम्बन्धों में कुछ विघ्न बाधायें प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ अशान्ति अनुभव करेगा और पुरातत्व में कुछ नीरसता पायेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में वृद्धि और शक्ति पायेगा। सिंह लग्न में ३ शनि यदि तुला का शनि-तीसरे भाई के स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ६ ४ परिश्रम और पुरुषार्थ शक्ति के मार्ग में बड़ी ७श ५ ३ सफलता प्राप्त करेगा और भाई-बहिन की शक्ति ८ २ का संयोग प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष के सम्बन्धों में बड़ी भारी हिम्मत और दौड़ धूप की शक्ति से ९ ११ विजय प्राप्त करेगा और स्त्री स्थान में बड़ा प्रभाव १० १२ और कुछ झंझट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के नं. ५०७ मार्ग में बड़ी मिहनत के द्वारा उन्नति करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या में कुछ झंझट युक्त शक्ति पायेगा तथा संतान पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि में भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार तथा कुछ झंझटों के कारणों से भाग्य स्थान में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा धर्म के कार्य के कारणों में कमी और हानि प्राप्त करेगा और सुयश की कमी पायेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करते हुये भी खर्चा के मार्ग में परेशानी प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ४ शनि यदि वृश्चिक का शनि- चौथे केन्द्र माता और भूमि के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है ६ ४ तो माता के सुख और प्रेम में कुछ झंझट प्राप्त ७ ५ ३ करेगा तथा सुख शान्ति और मकानादि के सम्बन्धों ८ श. २ में कुछ परेशानी और प्रभाव भी प्राप्त करेगा तथा स्त्री गृहस्थ और रोजगार के स्थान में कुछ सुख ११ १ और कुछ झंझट-फिकर प्राप्त करेगा, क्योंकि १० १२ छठें घर का स्वामी परेशानी का दाता होता है और तीसरी दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये अपने घर के क्षेत्र से ही शान्तिपूर्वक नं. ५०८
शत्रु स्थान में प्रभाव रखेगा और दिक्कतों पर सफलता प्राप्त करेगा तथा . सं. - १८
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२७४ सिंह लग्न का फलादेश सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और कारबार में सफलता पायेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग और चिन्ता फिकर प्राप्त करेगा तथा देह की सुन्दरता में कमी का योग प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ५ शनि यदि धनु का शनि- पंचम त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो ६ ४ ५ बुद्धि में कुछ फिकर रहेगी। सन्तान पक्ष में कुछ ७ रोग या परेशानी का अनुभव करेगा और विद्या w
८ २ स्थान में कुछ कमी प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि ९ से स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्त्री तथा रोजगार श ११ १ स्थान को देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा १० १२ नं. ५०९ रोजगार की शक्ति का संचालन करेगा और बुद्धिमती स्त्री प्राप्त करेगा। किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के दोष से स्त्री व गृहस्थ तथा रोजगार के मार्ग में कुछ चिंता फिकर का योग प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के परिश्रमी मार्ग से आमदनी की वृद्धि प्राप्त करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के द्वारा धन की वृद्धि करने का विशेष प्रयत्न करता रहेगा और कुटुम्ब का सामान्य सुख प्राप्त करेगा और भोगादिक की विशेष इच्छा रखेगा। सिंह लग्न में ६ शनि यदि मकर का शनि-छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो शत्रु ६ ४ स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा और ननसाल पक्ष ५ ३ की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री स्थान में ८ २ कुछ मतभेद के सहित शक्ति प्राप्त करेगा तथा ९ ११ रोजगार व गृहस्थ के संचालन मार्ग में कुछ १ परेशानियाँ और प्रभाव तथा परिश्रम का योग १०श. १२ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु स्थान नं. ५१० को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ अशांति अनुभव करेगा और पुरातत्व का सामान्य लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करते हुए भी खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और भाई के स्थान को दसवीं उच्च दृष्टि से मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की अच्छी शक्ति
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भृगु संहिता २७५ प्राप्त करेगा और विशेष परिश्रम तथा हिम्मत शक्ति के योग से रोजगार की सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ७ शनि यदि कुम्भ का शनि-सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो स्त्री ६ ४ स्थान में कुछ विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और ७ ५ ३ रोजगार के मार्ग में विशेषता युक्त कार्य करेगा। ८ २ किन्तु शनि के शत्रु स्थान पति होने के कारण स्त्री ९ ११ श. पक्ष में कुछ झंझट और रोग भी प्राप्त करेगा तथा १ रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम और परेशानी १० १२ नं. ५११ भी प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा तथा तीसरी नीच दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री व गृहस्थ के कारणों से भाग्य में कुछ कमजोरी या परेशानी रहेगी और धर्म के मार्ग में कुछ हानि रहेगी तथा यश की कमी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और शान्ति में कमी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और शान्ति में कमी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से माता के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और रहने के स्थान भूमि में कुछ अशांति रहेगी। सिंह लग्न में ८ शनि यदि मीन का शनि- आठवें मृत्यु स्थान में ६ शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में ४ विशेष अशान्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के ७ ५ ३ मार्ग में बड़ी कठिनाईयों से कार्य करेगा और शत्रु ८ २ पक्ष में कुछ दिक्कतें और परेशानी रहेगी और ९ ११ आयु स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा, क्योंकि १ १० १२श. अष्टम शनि आयु की वृद्धि का सूचक होता है
नं. ५१२ और तीसरी मित्र दृष्टि से पिता स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पिता और कारबार के स्थान में कुछ सहारा प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में कुछ कमी तथा संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और बुद्धि में कुछ फिकर रहेगी तथा पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ शक्ति पायेगा।
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२७६ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में ९ शनि यदि मेष का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की मेष राशि पर ६ ४ बैठा है, तो भाग्य स्थान में परेशानी प्राप्त रहेगी ७ ५ ३ और धर्म में कमजोरी पायेगा तथा सुयश नहीं ८ २ मिलेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को ९ ११ १श. बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये १० १२ आमदनी की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाई के स्थान को मित्र शुक्र की नं. ५१३ तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में भाग्य की शक्ति से प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ बुराई और कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा और सप्तमेश होने के कारण स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में कुछ भाग्य की दुर्बलता के साथ सहयोग शक्ति प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १० शनि यदि वृषभ का शनि- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो व्यापार के ६ ४ मार्ग में परिश्रम के द्वारा उन्नति और शक्ति प्राप्त ५ ३ करेगा तथा पिता स्थान में कुछ मतभेद युक्त शक्ति ८ २ श. प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में कुछ मान पायेगा ९ और शत्रु पक्ष में कार व्यापार के द्वारा प्रभाव ११ १ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान १० १२ नं. ५१४ को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करते हुये भी खर्च में कुछ नीरसता रहेगी और रोजगार के लिये कुछ बाहरी स्थानों का सम्बन्ध पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में कुछ वैमनस्यता प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्त्री तथा रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये स्त्री व रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु छठें स्थान का स्वामी होने के कारण कुछ परेशानी भी रहेगी। यदि मिथुन का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और शत्रु स्थान से लाभ युक्त एवं प्रभाव युक्त रहेगा तथा स्त्री के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतों के साथ स्त्री सुख प्राप्त करेगा, क्योंकि छठें स्थान का स्वामी होने का दोष है और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम और परेशानी के योग से अच्छी सफलता और लाभ प्राप्त करेगा और अधिक नफा खाने का प्रयत्न करेगा
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भृगु संहिता २७७ सिंह लग्न में ११ शनि तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता ६ ४
७ ५ ३ में कुछ कमी और देह में कुछ रोग प्राप्त करेगा श. और सातवीं शत्रु दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान ८ २ को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये ९ विद्या और सन्तान पक्ष की सुख शक्ति में कुछ ११ १ १२ कमी प्राप्त होगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु १०
नं. ५१५ स्थान को शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ चिन्ता फिकर का योग प्राप्त करेगा और पुरातत्व के लाभ में कुछ कमी प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १२ शनि यदि कर्क का शनि- बारहवें खर्च स्थान में ६ ४ श शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक ७ 4 ३ करेगा और बाहरी स्थानों से रोजगार सम्बन्ध प्राप्त करेगा और रोजगार की लाईन में नुकसान का ८ २ योग प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी ९ ११ १ प्राप्त होगी और तीसरी मित्र दृष्टि से धन स्थान १० १२ को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ५१६ धन की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ खर्च की शक्ति से शत्रु स्थान में कुछ प्रभाव प्राप्त करेगा और दसवीं नीच दृष्टि से भाग्य स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के पक्ष से भाग्य में कमी और कष्ट अनुभव करेगा तथा धर्म के स्थान में हानि प्राप्त करेगा और ईश्वर के विश्वास में और सुयश में कमी प्राप्त करेगा और कुछ रोगादिक झंझटों में खर्चा करना पड़ेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्त के अधिपति-राहु सिंह लग्न में १ राहु यदि सिंह का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान ६ पर मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह ४ ७ ५ रा. की सुन्दरता में कमी करेगा और देह की सुख ३ शक्ति में बाधा पैदा करेगा और किसी प्रकार की ८ २ चिन्ता से युक्त रहेगा और देह के स्थान में कभी- ९ ११ कभी कोई गम्भीर कष्ट का योग प्राप्त करेगा १ तथा कुछ छिपाव शक्ति के कार्यों को हठयोग से १० १२ पूर्ण करेगा और किसी विशेष पद पर या विशेष नं. ५१७
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२७८ सिंह लग्न का फलादेश महत्व पर पहुँचने के लिये कोई गहरी और कष्ट युक्त चाल से कार्य करेगा और परेशानी के अन्दर हिम्मत से काम लेकर सफलता की ओर चलता रहेगा। सिंह लग्न में २ राहु यदि कन्या का राहु-दूसरे धन स्थान में परम ६ रा. मित्र बुध की राशि पर स्वक्षेत्रवत् बैठा है तो धन ४ ५ ३ की वृद्धि करने के लिये महान् गम्भीर युक्ति पूर्ण ७ कर्म से कार्य में सफलता पायेगा और नगद धन ८ २ की संग्रह शक्ति में अभाव होने के कारण कष्ट का ११ कुछ योग प्राप्त करेगा और कभी-कभी धन की १ १० १२ शक्ति में कोई गहरा संकट प्राप्त करेगा और कुटुम्ब नं. ५१८ स्थान में कुछ क्लेश या कमी का योग प्राप्त करेगा तथा धन के कोष में कुछ परेशानी के कारण या ऋण का योग प्राप्त करेगा और कभी-कभी किसी कारण वश मुफ्त का-सा धन भी प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ३ राहु यदि तुला का राहु- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन के ६ ४ ५ स्थान में कुछ क्लेश का योग प्राप्त करेगा और ७रा ३ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह प्रबल हो जाता है, इसलिये ८ २ पुरुषार्थ की वृद्धि करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत ९ शक्ति से काम करेगा और कभी-कभी जीवन में ११ १ हिम्मत टूटने के विशेष योग अन्दरूनी प्राप्त होंगे, १० १२
नं. ५१९ किन्तु प्रकट में धैर्य रहेगा और गुप्त युक्ति से और गुप्त शक्ति और चतुराईयों के बल से विशेष कार्य कर सकेगा और स्वार्थ सिद्धि के लिये विशेष दृढ़ता से और तत्परता से काम लेगा। सिंह लग्न में ४ राहु यदि वृश्चिक का राहु- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ६ ४
७ ५ ३ माता के स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा और चरेलू सुख शांति में बाधा मिलेगी तथा भूमि मकानादि ८ रा. २ के स्थान में कुछ अशांति अनुभव होगी और मातृ ९ ११ भूमि से अलग स्थान में रहने का योग भी बनेगा १ १२ और घरेलू वातावरण के अन्दर कभी-कभी महान् १०
नं. ५२० संकट का सामना करना पड़ेगा, किन्तु भाग्य शक्ति और हिम्मत शक्ति के द्वारा सुख के साधन प्राप्त होते रहेंगे, किन्तु फिर भी सुख प्राप्ति के लिये गुप्त युक्ति बल के द्वारा
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भृगु संहिता २७९ काम करता रहेगा। सिंह लग्न में ५ राहु यदि धन का राहु- पाँचवें त्रिकोण संतान और विद्या के स्थान से नीच का होकर शत्रु गुरु ६ ४ की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट प्राप्त ७ 4 ३ करेगा और विद्या के स्थान में कमी रहेगी तथा ८ २ बोलचाल के अन्दर सभ्यता और योग्यता की ९ रा ११ १ कमजोरी पायेगा तथा विद्या बुद्धि की योग्यता १० १२ में अन्दरूनी कमजोरी अनुभव करने के कारणों से परेशानी अनुभव करेगा और अन्दरूनी तौर से सत्य का पालन नहीं कर सकेगा अर्थात् छिपाव शक्ति से काम नं. ५२१
निकालेगा और विचारों के अन्दर कभी-कभी विशेष घबड़ाहट या विशेष चिंता प्राप्त करेगा और गुप्त धैर्य से काम निकालेगा। सिंह लग्न में ६ राहु यदि मकर का राहु-छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान में क्रूर ६ ४
७ 4 ३ ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु स्थान में विशेष प्रभाव रखेगा और गुप्त युक्तिबल के ८ २ द्वारा शत्रु पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा ९ ११ १ कभी-कभी किसी शत्रु पक्ष से या किसी झंझट १०रा. १२ के कारणों से परेशानी अनुभव करेगा। किन्तु प्रत्यक्ष में बड़ी हिम्मत शक्ति से काम लेगा और ननसाल पक्ष में कुछ हानि पायेगा और कभी-कभी किसी झगड़े-झंझटों नं. ५२२
के मार्ग के मुफ्त की-सी बहादुरी का योग प्राप्त करेगा और कठिन परिस्थिति में रहकर भी गुप्त धैर्य की महान् शक्ति के द्वारा पार होता रहेगा। सिंह लग्न में ७ राहु यदि कुम्भ का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में ६ ४ ७ ५ ३ कष्ट अनुभव करेगा और स्त्री पक्ष के सुख की वृद्धि करने के लिये गुप्त युक्तियों से विशेष कार्य ८ २ करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी-बड़ी पेचीदी ९ ११ रा. १ और परिश्रम की युक्तियों से रोजगार का कार्य १० १२ संचालन करेगा और रोजगार तथा गृहस्थिक मार्गों में कभी-कभी महान् वेदना और भारी संकट का सामना पायेगा, फिर भी किसी प्रकार की दिक्कतों के बाद गृहस्थ का नं. ५२३
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२८० सिंह लग्न का फलादेश संचालन कर सकेगा। सिंह लग्न में ८ राहु यदि मीन का राहु- आठवें आयु स्थान में ६ ४ शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो जीवन के अन्दर ७ ५ ३ मृत्यु तुल्य कई बार संकट प्राप्त करेगा और उदर के अन्दर निचले हिस्से में कुछ शिकायत प्राप्त V २ करेगा तथा दिनचर्या में कुछ परेशानी और चिन्ता ९ ११ १ अनुभव करेगा और पुरातत्व की कुछ हानि प्राप्त १० १२रा. करेगा और जीवन निर्वाह करने के सम्बन्ध में नं. ५२४ कुछ अधिक दौड़ धूप और दिक्कतों का योग प्राप्त रहेगा, किन्तु किसी विशेष गूढ़ युक्ति के बल से कुछ सहारा प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ९ राहु यदि मेष का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान ६ ४ में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य के ७ ५ ३ सम्बन्ध में अनेक प्रकार की चिंतायें प्राप्त करेगा और भाग्योन्नति के मार्ग में बहुत बार रुकावटें ८ २ और झंझटों के योग प्राप्त करेगा तथा धर्म पालन ९ ११ १ रा. के स्थान में हानि करेगा और ईश्वर की निष्ठा में १० १२ कुछ कमजोरी रहेगी तथा भाग्य की वृद्धि करने नं. ५२५ के लिये बड़े कठिन प्रयत्न से और पेचीदी युक्तियों से कार्य करेगा, किन्तु बहुत-सी कठिनाईयों के बाद भाग्य की शक्ति में सहारा प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १० राहु यदि वृषभ का राहु- दसम केन्द्र राज्य स्थान ६ में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो राज-समाज ४ ७ ५ ३ के सम्बन्ध में कुछ झंझट या परेशानी प्राप्त करेगा और पिता स्थान के सुख में कमी तथा कष्ट मिलेगा V २ रा. और कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें ११ १ और रुकावटें प्राप्त होंगी। किन्तु शुक्र की राशि १० १२ पर होने के कारण विशेष गहरी युक्तियों के योग नं. ५२६ से कारबार की उन्नति करेगा और कठिनाईयों के कर्म योग से मान प्राप्त करेगा तथा गुप्त कर्म के बल का भरोसा रखेगा। यदि मिथुन का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो क्रूर ग्रह लाभ स्थान में विशेष शक्तिशाली
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भृगु संहिता २८१ सिंह लग्न में ११ राहु हो जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और आवश्यकाता ६ ४ ५ ३ से अधिक मुनाफा खायेगा तथा कभी-कभी रा. मुफ्त का-सा विशेष धन लाभ पायेगा और V २ आमदनी के मार्ग में विशेष युक्ति बल की ११ २ महान् शक्ति से कार्य करेगा। किन्तु कभी कोई १० १२ आमदनी के मार्ग में विशेष संकट या परेशानी नं. ५२७ का योग भी प्राप्त करेगा।
सिंह लग्न में १२ राहु यदि कर्क का राहु- बारहवें खर्च स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो खर्च ६ ४ रा. संचालन के विषय में विशेष चिन्ता और परेशानी ७ 4 ३ के योग प्राप्त करेगा तथा खर्च के मार्ग में ८ २ कभी-कभी महान् संकट प्राप्त होने के कारण ९ ११ १ शोचनीय दशा की स्थिति प्राप्त करेगा और १० १२ बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में हानि प्राप्त करेगा और खर्च संचालन के मार्ग की पूर्ति करने के लिये मनोयोग के कष्ट साध्य कर्म के द्वारा एवं गुप्त युक्ति के बल के द्वारा नं. ५२८
सफलता पायेगा तथा मन स्थान पति चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये खर्च के मार्ग में मन की शक्ति से बल प्राप्त करेगा। कष्ट, कठिन कर्म, गुप्त शक्ति के अधिपति-केतु सिंह लग्न में १ केतु यदि सिंह का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है ६ ४ ५ क. ३ तो देह के स्थान में कुछ कष्ट और चिन्ता का ७ योग प्राप्त करेगा तथा सुन्दरता एवं सुडौलताई ८ २ में कमजोरी पायेगा तथा देह में कभी कोई ९ ११ १ विशेष सांघातिक चोट या घाव का योग प्राप्त १० १२ करेगा तथा संलग्नता पूर्वक परिश्रम कर कार्य नं. ५२९ करेगा और हृदय में कुछ चिन्ता के होते हुये भी अन्दरूनी गुप्त धैर्य की शक्ति से काम करेगा और अपने अन्दर कुछ कमी या कमजोरी के होते हुये भी बड़ी हिम्मत के साथ काम करेगा।
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२८२ सिंह लग्न का फलादेश
सिंह लग्न में २ केतु यदि कन्या का केतु-दूसरे धन स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति ६ के ४
७ ५ ३ के स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा और धन के कारणों से चिन्ता फिकर का योग मिलेगा और ८ २ कुटुम्ब स्थान में कुछ अशांति का योग प्राप्त करेगा ९ ११ १ तथा धन की वृद्धि करने के लिये महान् कठिन १० १२ परिश्रम करेगा और गुप्त शक्ति के बल से इज्जत नं. ५३० बढ़ाने का प्रयत्न करेगा तथा धन के पक्ष में कभी- कभी कोई विशेष संकट का योग प्राप्त होगा तथा कभी-कभी कोई ऋण के रूप में भी धन प्राप्त करना पड़ेगा। सिंह लग्न में ३ केतु यदि तुला का केतु- तीसरे भाई के स्थान पर ६ ४ मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाई-बहिन के ७क ५ ३ स्थान में कष्ट और कुछ परेशानी का योग प्राप्त
८ करेगा, किन्तु तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् २ हो जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति की वृद्धि ११ १ करेगा तथा पराक्रम और परिश्रम की गहन शक्ति १० १२ पर विशेष भरोसा रखने के कारण बड़ी हिम्मत न. ५३१ और निर्भयता प्राप्त करेगा तथा चतुराईयों के कार्यों को बाहुबल के द्वारा पूरा करके प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा तथा लापरवाही और हठ धर्मी से कार्य करेगा। सिंह लग्न में ४ केतु यदि वृश्चिक का केतु- चौथे केन्द्र माता के ६ ४ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता ७ ५ ३ के स्थान में कुछ परेशानी या कमी प्राप्त करेगा
८ क तथा मातृ स्थान में कुछ अलहदगी का योग प्राप्त २ करेगा और रहने के स्थान में तथा भूमि के कुछ ९ ११ १ सम्बन्धों में कुछ अशांति प्राप्त रहेगी अर्थात् घरेलू १० १२ वातावरण में सुख की शक्ति को प्राप्त करने के नं. ५३२ लिये कठिन परिश्रम करेगा और गुप्त युक्ति के बल से सुख का अनुभव करेगा और कभी-कभी घरेलू वातावरण में गहरी अशांति का योग प्राप्त करेगा। यदि धनु का केतु- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान पर
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सिंह लग्न में ५ केतु उच्च का होकर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और कभी-कभी संतान पक्ष में कष्ट ६ ४ ५ भी अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में शक्ति ७ ३ प्राप्त करने के लिये महान् परिश्रम करेगा और ८ २ विद्या में सफलता शक्ति मिलेगी। किन्तु फिर भी ९ के ११ १ बुद्धि विद्या के सम्बन्ध में कुछ कमी महसूस करेगा १० १२ तथा हृदय में अन्दरूनी अपने को विशेष बुद्धिमान् नं. ५३३ समझेगा और वाणी की लावण्यता में कुछ कमी प्राप्त रहेगी। किन्तु तायदाद से अधिक बातों के द्वारा प्रभाव प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा। सिंह लग्न में ६ केतु यदि मकर का केतु- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में ६ ४
७ ५ ३ प्रभाव प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में विशेष परिश्रम और विशेष प्रयत्न करेगा और झंझट ८ २ तथा परेशानियों के मार्ग में अन्दरूनी तौर से ९ ११ १ बड़ी भारी शक्ति से काम करेगा, क्योंकि छठें १०के. १२ स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, नं. ५३४ इसलिये बड़ी से बड़ी मुशीबतों में भी धैर्य से काम लेगा और बड़े भारी आन्तरिक साहस के साथ उन्नति की तरफ बढ़ते ही रहने का प्रयास करता रहेगा तथा ननसाल पक्ष में हानि रहेगी। सिंह लग्न में ७ केतु यदि कुम्भ का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री तथा रोजगार के स्थान में बैठा है तो स्त्री पक्ष के सुख ६ ४ सम्बन्धों में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त होंगे ७ ५ ३ और रोजगार के मार्ग में कठिन परिश्रम करेगा ८ २ तथा रोजगार के लिये बड़ी-बड़ी दिक्कतें प्राप्त ९ ११ के करेगा और गृहस्थ पालन के स्थान में झंझटों १ १० १२ का सामना पायेगा और कभी कोई मूत्रेन्द्रिय का नं. ५३५ विकार प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी गृहस्थ सम्बन्ध में गहरे संकटों का योग प्राप्त होने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति से काम लेगा और परिश्रम के योग से सफल होगा। यदि मीन का केतु- आठवें आयु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा
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२८४ सिंह लग्न का फलादेश सिंह लग्न में ८ केतु है तो जीवन काल में अनेक बार मृत्यु तुल्य संकटों का सामना करने की स्थिति प्राप्त करेगा और ६ ४ ७ ५ ३ पुरातत्व सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली भूमि की हानि या कमी प्राप्त करेगा तथा उदर के ८ २ नीचले भाग में कोई विकार प्राप्त करेगा तथा ९ ११ जीवन की दिनचर्या में चिन्ता फिकर प्राप्त रहेगी १ १० १२क. और जीवन को सहायक होने वाली किसी गुप्त नं. ५३६ शक्ति का संचय परिश्रम के योग द्वारा प्राप्त करेगा और जीवन काल में कभी-कभी विशेष चिन्ताओं का योग प्राप्त होने पर भी आन्तरिक धैर्य की महान् शक्ति के बल से मुक्ति प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में ९ केतु यदि मेष का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य के ६ ४ सम्बन्धों में कुछ परेशानी और कष्ट प्राप्त करेगा ७ ५ ३ तथा भाग्योदय के मार्ग में बड़ा कठिन परिश्रम ८ २ करेगा और धर्म के स्थान में कमजोरी रहेगी तथा ९ ११ धर्म के पालन में कभी-कभी महान् असमर्थता १के. होने से धर्म की हानि प्राप्त रहेगी और सुयश की १० १२ कमी रहेगी तथा भाग्य के सम्बन्धों में कभी- नं. ५३७ कभी विशेष संकट का योग प्राप्त होने पर आन्तरिक धैर्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और अन्त में कुछ कमी लिये हुए भाग्य की मजबूती का योग प्राप्त करेगा। सिंह लग्न में १० केतु यदि वृषभ का केतु- दसम केन्द्र पिता स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पिता-स्थान ६ ४ ५ में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्धों में मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिये कठिन ८ २ के. प्रयत्न करेगा तथा कारबार की उन्नति के स्थान ९ में कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा और कभी-कभी ११ १ इज्जत-आबरू के स्थान में महान् संकट प्राप्त १० १२ नं. ५३८ होने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति और चतुराईयों से कार्य की पूर्ति करेगा तथा बहुत समय तक परिश्रम और कठिनाईयाँ सहन करने पर उन्नति पायेगा। यदि मिथुन का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें और कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा तथा धनोपार्जन की कमजोरी से दुःख का अनुभव
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सिंह लग्न में ११ केतु करेगा और आमदनी के मार्ग में कुछ निम्न प्रकार के मार्ग से काम चलावेगा और कभी-कभी द्रव्य ६ ४ के अभाव से घोर संकट प्राप्त होने पर भी गुप्त ७ ५ धैर्य की शक्ति से काम करेगा और किसी न किसी ८ २ प्रकार अपना मतलब सिद्ध कर लेगा, क्योंकि ग्यारहवें स्थान में क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है। ९ ११ १ अतः लाभ के मार्ग में उचित-अनुचित की परवाह १० १२ नहीं करेगा। नं. ५३९ यदि कर्क का केतु- बारहवें खर्च के स्थान सिंह लग्न में १२ केतु में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में बहुत परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा ६ ४ के खर्च के कारणों से कष्ट और कमी तथा मानसिक ७ ५ ३ चिन्ता का योग प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों ८ २ के सम्बन्ध में दिक्कतों और हानियों के योग ९ ११ प्राप्त करेगा और खर्च के संचालन में बड़ा परिश्रम १ १० १२ करेगा तथा कठिनाईयों के द्वारा कार्य करते रहने
नं. ५४० पर भी कभी-कभी खर्च के मार्ग में विशेष संकट प्राप्त करेगा, किन्तु आन्तरिक धैर्य की गुप्त शक्ति के बल से सदैव कार्य निकालता रहेगा। * सिंह लग्न समाप्त *
६ ४ ५
७ ३
८ २
९ १
११
१० १२
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२८६ कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न का फलादेश प्रारम्भ
9 ५ ६ ८ ४
९ ३
१० २ १२ ११ १
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ६४८ तक में देखिये) प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं, उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ५४१ से लेकर कुण्डली नं० ६४८ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन- जिन राशियों पर चलता बदलता है, उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों
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भृगु संहिता २८७ वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत, भविष्य व वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५४१ से ५५२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५४९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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२८८ कन्या लग्न का फलादेश कुण्डली नं. ५५० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५५१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५५२ के अनुसार मालूम करिये। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५५३ से ५६४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५५३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५५४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५५५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५५६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५५७ के अनुसारं मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५५८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५५९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५६० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५६१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५६२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५६३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ५६४ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता २८९ (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५६५ से ५७६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५६५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५६६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५६७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५६८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५६९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७६ के अनुसार मालूम करिये। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५७७ से ५८८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये। भृ. सं .- १९
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२९० कन्या लग्न का फलादेश ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५७९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ५८८ के अनुसार मालूम करिये। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ५८९ से ६०० तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५८९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९० के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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भृगु संहिता २९१ कुण्डली नं. ५९१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो. उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ५९९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६०० के अनुसार मालूम करिये। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६०१ से ६१२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश। कुण्डली नं. ६०२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०५ के अनुसार मालूम करिये।
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२९२ कन्या लग्न का फलादेश ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६०९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६१० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६११ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६१२ के अनुसार मालूम करिये। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६१३ से ६२४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६१३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६१४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६१५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६१६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६१७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६१८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६१९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली
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भृगु संहिता २९३ नं. ६२० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२४ के अनुसार मालूम करिये। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६२५ से ६३६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६२९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३४ के अनुसार मालूम करिये।
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२९४ कन्या लग्न का फलादेश ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३६ के अनुसार मालूम करिये। (६ ) कन्या लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६३७ से ६४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६३९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६४८ के अनुसार मालूम करिये।
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भृगु संहिता २९५ खर्च तथा बाहरीस्थानपति-सूर्य कन्या लग्न में १ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा अधिक ७ ५ ४ शानदार रहेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध ८ ६ सू प्राप्त होगा तथा व्ययेश होने के दोष के कारण से ९ ३ देह में दुर्बलता प्राप्त रहेगी और बाहरी स्थानों में आने जाने से प्रभाव बर्धन होगा और खर्च के १० १२ २ कारण कुछ परेशानी अनुभव होगी तथा सातवीं १ मित्र दृष्टि से स्त्री स्थान को गुरु की मीन राशि में नं. ५४१ देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के कारण स्त्री स्थान में कुछ कमजोरी या परेशानी मिलेगी और रोजगार के मार्ग की कुछ हानि तथा कुछ कमी रहेगी। कन्या लग्न में २ सूर्य यदि तुला का सूर्य- धन स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र राशि पर बैठा है तो धन के कोष ७सू. ५ स्थान में भारी कमी और कष्ट के कारण प्राप्त ८ ४ wr करेगा, सूर्य को व्ययेश होने का दोष और नीच ९ ३ होने का दोष है अर्थात् प्रबल दोष है, इसलिये जन और धन की हानि प्राप्त होगी तथा धन की १० १२ २ ११ शक्ति के लिये बाहरी स्थान का कमजोर सम्बन्ध १
नं. ५४२ प्राप्त करेगा और खर्च करने के स्थान में कमजोरी और कष्ट प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से आयु स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में प्रभाव और पुरातत्व शक्ति प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ३ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- तीसरे भाई के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पराक्रम की ७ ५ शक्ति से खर्च का सुन्दर संचालन करेगा और ८सू. ६ ४ बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध रखेगा। किन्तु ९ ३ व्ययेश होने के दोष कारण से भाई-बहन के संबन्धों में कमजोरी प्राप्त करेगी और दैहिक पुरुषार्थ के १० १२ २ स्थान में कुछ कमजोरी महसूस करेगा तथा तीसरे ११ १ स्थान पर गरम ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति के सम्बन्ध में तथा खर्च के सम्बन्ध में बड़ी भारी हिम्मत और प्रभाव शक्ति की प्राप्ति होगी और सातवीं शत्रु नं. ५४३
दृष्टि से भाग्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य
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२९६ कन्या लग्न का फलादेश के स्थान में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा। कन्या लग्न में ४ सूर्य यदि धनु का सूर्य- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो सुख पूर्वक ७ ५ अपने स्थान से ही खर्च का संचालन कार्य करेगा ८ E ४ और बाहरी स्थानों के संबन्ध से सुख और प्रभाव ९ सू. ३ रखेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारणों से माता के सुख सम्बन्धों में कमी प्राप्त करेगा और १० १२ २ घरेलू रहन-सहन तथा मकानादि के सम्बन्धों में ११ १ सुख की कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. ५४४ पिता स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता और कारबार तथा राज-समाज के सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी। कन्या लग्न में ५ सूर्य यदि मकर का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण संतान स्थान पर शत्रु शनि की राशि में बैठा है तो बुद्धि ७ ५ योग के परिश्रम द्वारा खर्च का संचालन करेगा ८ ६ ४ और बाहरी स्थानों का सामान्य सम्बन्ध प्राप्त ९ ३ करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारणों से १० सन्तान पक्ष की हानि करेगा और विद्या स्थान में १२ २ कमजोरी प्राप्त करेगा और खर्च के कारणों से ११ १
नं. ५४५ दिमाग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ सम्बन्ध में कुछ त्रुटि लिये हुए शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि तथा बातचीत के अन्दर कुछ हेर-फेर से काम करेगा। कन्या लग्न में ६ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- छठें स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो परिश्रम के योग से खर्च ७ ५ का संचालन कार्य करेगा और बाहरी स्थानों का ८ ६ ४ कुछ सामान्यतम सम्बन्ध बनावेगा और व्ययेश ९ ३ होने के दोष के कारणों से शत्रु पक्ष में कुछ खर्च और झंझटों से परेशानी प्राप्त करेगा। किन्तु छठें १० १२ २ स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये ११ सू. १ शत्रु पक्ष में और झंझटों के सम्बन्ध में बड़ी हिम्मत नं. ५४६ शक्ति से तथा प्रभाव शक्ति से काम करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी सिंह राशि में खर्च भवन को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये कुछ मजबूरियों की वजह से भी खर्चा अधिक करेगा।
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भृगु संहिता २९७ कन्या लग्न में ७ सूर्य यदि मीन का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग ७ ५ से खर्च का संचालन कार्य करेगा और बाहरी ८ ६ ४ स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध बनावेगा। किन्तु व्ययेश ९ ३ होने के दोष कारणों से स्त्री स्थान में कुछ कमी तथा कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और रोजगार के १० १२ सू. २ कुछ हानि तथा कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और ११ १ गृहस्थ भोगादिक सुखों में कुछ त्रुटि रहेगी और नं.५४७ सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी प्राप्त रहेगी और खर्च के कारणों से कुछ फिकर और चंचलता एवं क्रोध प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ८ सूर्य यदि मेष का सूर्य- आठवें आयु स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है ७ ५ तो खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों का ८ ६ ४ विशेष सम्बन्ध स्थापित करेगा और व्ययेश होने ९ ३ का दोष तथा उच्च होने की शक्ति; इन दोनों कारणों के योग से जीवन में कुछ परेशानी और १० १२ २ कुछ प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा प्रभाव की १ सू. वृद्धि के लिये खर्चा अधिक स्वयमेव होगा और नं. ५४८ पुरातत्व की कुछ शक्ति पायेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से धन को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन की विशेष हानि करेगा और कुटुम्ब में कमी व अशांति प्राप्त करेगा और धन की तरफ से चिंता फिकर प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ९ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य ७ ५ की शक्ति के द्वारा खर्च का संचालन करेगा और ८ ४ बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा ९ ३ व्ययेश होने के दोष के कारण भाग्य स्थान में कमजोरी एवं परेशानी प्राप्त करेगा और धर्म के १० १२ २ स्थान में कुछ हानि तथा कुछ कमी प्राप्त करेगा ११ सू. १ और ईश्वर के विश्वास में संदेह और भ्रम रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी नं. ५४९
रहेगी और पराक्रम के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी रहेगी, किन्तु खर्च का प्रभाव रहेगा।
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२९८ कन्या लग्न का फलादेश
कन्या लग्न में १० सूर्य यदि मिथुन का सूर्य-दसम केन्द्र स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो प्रभाव शक्ति के ७ ५ द्वारा खर्च का संचालन कार्य करेगा तथा बाहरी ८ ४ स्थानों का सुन्दर प्रभाव युक्त सम्बन्ध प्राप्त करेगा, ९ ३ सू. किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारणों से पिता स्थान में हानि या कमी पायेगा और राज-समाज १० १२ २ तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ कमजोरी ११ १ रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से मातृ स्थान एवं सुख नं. ५५० भवन को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सम्बन्ध में तथा घरेलू सुख सम्बन्धों में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ११ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र चन्द्र की कर्क राशि पर बैठा है तो आमदनी ५ के मार्ग से खर्च का संचालन कार्य करेगा और ८ ६ सू. बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करेगा। ९ ३ किन्तु व्ययेश होने के दोष से लाभ के मार्ग में
१० १२ २ कुछ कमी प्रतीत होगी, परन्तु गरम ग्रह लाभ स्थान में शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये ११ १
नं. ५५१ खर्च के योग से आमदनी में वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ कष्ट पायेगा और विद्या बुद्धि में कुछ कमजोरी और फिकर प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में १२ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- बारहवें खर्च स्थान में
७ ५ सू. स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो खर्चा विशेष करेगा तथा खर्च के मार्ग में प्रभाव ८ ४ ur शक्ति पायेगा और बाहरी स्थानों का मजबूत ९ ३ सम्बन्ध और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ राशि १० १२ २ में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ नाजायज ११ १
नं. ५५२ खर्च करना पड़ेगा अर्थात् झगड़े-झंझट, रोगादिक पक्ष में कुछ खर्च करना पड़ेगा, किन्तु शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा, क्योंकि छठे स्थान पर गरम ग्रह की दृष्टि अच्छा फल देती है, इसलिये मुसीबतों में साहस रखेगा। मन एवं लाभस्थानपति-चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि
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भृगु संहिता २९९ कन्या लग्न में १ चन्द्र में बैठा है तो देह के द्वारा धन का लाभ प्राप्त करेगा और मनोयोग की सुन्दर शक्ति से आमदनी ७ के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा तथा मन में ८ ६ चं ४ प्रसन्नता और देह में सुन्दरता पायेगा और सातवीं ९ ३ मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में रोजगार एवं स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये रोजगार के १० १२ २
११ १ मार्ग में अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और स्त्री स्थान
नं. ५५३ में सुन्दरता एवं लाभ प्राप्त करेगा तथा मनोबल की शक्ति से गृहस्थ का विशेष आनन्द प्राप्त करेगा और कुछ मान एवं प्रभाव तथा ख्याति प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में २ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- धन स्थान में सामान्य
७चं, ५ मित्र शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो धन की
८ ६ ४ और जन की ताकत से आमदनी की शक्ति प्राप्त करेगा और मनोबल की योगशक्ति से धनोपार्जन ९ ३ में सफलता मिलेगी तथा धन की आमदनी से १० १२ २ धन की संग्रह शक्ति में सफलता प्राप्त करेगा ११ और इज्जतदार व धनवान् समझा जायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन नं. ५५४
की दिनचर्या में प्रभाव एवं रौनक प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का लाभ पायेगा। कन्या लग्न में ३ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- तीसरे भाई-बहिन के स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर ७ ५ ८ चं ६ ४ बैठा है तो भाई-बहिन की तरफ से कमी या कष्ट का योग प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में ९ ३ कुछ कमजोरी प्राप्त रहेगी तथा धनोपार्जन के १० १२ २ सम्बन्ध में कुछ परतंत्रता या परेशानी अनुभव १ करेगा और पुरुषार्थ शक्ति में कमजोरी रहेगी तथा मानसिक चिन्ता का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख नं. ५५५
रहा है, इसलिये कठिन पुरुषार्थ के योग से भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा और धर्म का विशेष ध्यान रखेगा। यदि धनु का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता के स्थान में मित्र गुरु की राशि
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३०० कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में ४ चन्द्र पर बैठा है तो सुख पूर्वक अपने स्थान से ही आमदनी प्राप्त करेगा तथा मातृ सुख का सुन्दर ७ ५ लाभ प्राप्त करेगा और मकान जायदाद का ८ ४ सुख लाभ पायेगा तथा मन की प्रसन्नता के ९ चं, ३ लिये विशेष साधन प्राप्त करेगा और आमदनी १० १२ २ के योग से महान् सुख का अनुभव करेगा और ११ १ सातवीं मित्र दृष्टि से पिता स्थान को मित्र बुध नं. ५५६ की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये मनोयोग की शक्ति से कारबार एवं पिता स्थान में लाभोन्नति पायेगा तथा राज समाज में मान प्रतिष्ठा एवं प्रभाव पायेगा। कन्या लग्न में ५ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण संतान ७ ५ एवं विद्या के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर ८ ६ ४ बैठा है तो बुद्धि-विद्या के योग से धन लाभ प्राप्त करेगा तथा मनोयोग की शक्ति से विद्या स्थान में ९ ३ बड़ी सफलता पायेगा और मन तथा वाणी के १० च १२ २ संयोग से आमदनी के स्थान में वृद्धि प्राप्त करेगा ११ १ तथा संतान पक्ष के लाभ का मन में आनन्द मानेगा नं. ५५७ और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपने लाभ स्थान कर्क राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन लाभ की उन्नति एवं वृद्धि करने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहेगा तथा विचारों की और दिमाग की शक्ति को लाभ के लिये लगाता रहेगा। कन्या लग्न में ६ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में शत्रु ७ ५ शनि की राशि पर बैठा है तो झंझट और परेशानी ६ ४ के मार्ग से आमदनी का योग प्राप्त करेगा तथा लाभ के सम्बन्ध में कुछ परतंत्रता या बन्धन सा ९ ३ महसूस करेगा तथा आमदनी और शत्रु पक्ष के १० १२ २ सम्बन्ध में कुछ मन को अशान्ति रहेगी। किन्तु ११च. १ नरमाई के योग से शत्रु पक्ष में सफलता और
को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और नं. ५५८ लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान
बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा कुछ रोगादिक सम्बन्ध में थोड़ा ज्ञान रहेगा। यदि मीन का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र गुरु
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भृगु संहिता ३०१ कन्या लग्न में ७ चन्द्र की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग से धन लाभ प्राप्त करेगा तथा मनोबल के दैनिक कर्म ७ ५ से आमदनी के स्थान में सुन्दर सफलता प्राप्त ८ ६ होगी और सुन्दर स्त्री का लाभ पायेगा तथा गृहस्थ ९ ३ के भोगादिक पदार्थों में मन को प्रसन्न करने के उत्तम साधन प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से देह १० १२ चं २ के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, ११ १ इसलिये देह में सुन्दरता और प्रसन्नता के कारण नं. ५५९ प्राप्त रहेंगे तथा लाभ प्राप्ति का विशेष ध्यान रखेगा। कन्या लग्न में ८ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- आठवें आयु एवं मृत्यु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ७ ५ आमदनी के मार्ग में कष्ट और कमी प्राप्त करेगा ८ ६ ४ तथा दूसरे स्थानों के योग से आमदनी के मार्ग ९ बनावेगा और आयु के स्थान में लाभ प्राप्त करेगा ३ तथा पुरातत्व शक्ति एवं जीवन को सहायक होने १० १२ २ वाली वस्तु का लाभ पायेगा तथा रहन-सहन में ११ १ चं. सुन्दरता प्राप्त करेगा और सातवीं सामान्य मित्र नं. ५६० दृष्टि से धन स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह करने का विशेष ध्यान रखेगा और कुटुम्ब का कुछ लाभ पायेगा। कन्या लग्न में ९ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु शुक्र की ७ ५ राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन लाभ ८ का विशेष साधन पायेगा और धर्म का विशेष ९ ३ पालन एवं ध्यान रखेगा तथा दैवी सहायक शक्ति का योग पायेगा तथा मन में मगन रहेगा और १० १२ २ बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा और कभी-कभी ११ चं. १ उम्मीद से भी बहुत अधिक मुफ्त का-सा धन नं. ५६१ लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से पराक्रम भवन को तथा भाई-बहिन के स्थान को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ करने की परवाह नहीं करेगा तथा भाई-बहिन के स्थान में कुछ नीरसता मानेगा। यदि मिथुन का चन्द्र- दसम केन्द्र राज्य एवं पिता स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो पिता स्थान से लाभ प्राप्त करेगा तथा कारबार में
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३०२ कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में १० चन्द्र मनोयोग की शक्ति से सुन्दर लाभ पायेगा और राज-समाज के मार्ग में लाभ तथा मान प्राप्त ७ ५ करेगा और आमदनी के मार्ग में इज्जत और प्रभाव ६ ४ की शक्ति से सफलता पायेगा और सातवीं मित्र ९ ३ चं. दृष्टि से गुरु की धनु राशि में सुख भवन को देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष से लाभ प्राप्त करेगा १० १२ २ तथा भूमि मकानादि रहने के स्थान का सुख लाभ ११ १ प्राप्त करेगा तथा मन में बड़प्पन की खुशी पायेगा। नं. ५६२ यदि कर्क का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में कन्या लग्न में ११ चन्द्र स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा और ७ ५ मनोयोग की स्थिर शक्ति के द्वारा खूब धन लाभ ८ चं। मिलेगा तथा मन में बड़ा भारी आनन्द अनुभव ९ ३ करेगा और स्वयमेव होने वाले लाभ का मार्ग प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से सन्तान एवं १० १२ २ विद्या स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा १ है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ वैमनस्यता अनुभव नं. ५६३ करेगा और विद्या स्थान में कुछ नीरसता के सहित लाभ प्राप्त करेगा और बातचीत की चतुराई से लाभ पायेगा। कन्या लग्न में १२ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- बारहवें खर्च स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो बाहरी स्थानों ७ ५ चं के योग से धन लाभ पायेगा तथा खर्च की शक्ति ८ ६ ४ और मनोबल के योग से आमदनी का मार्ग स्थापित ९ ३ करेगा और आमदनी का धन पूरा-पूरा खर्च कर देगा तथा बाहरी स्थान में सुन्दर सम्बन्ध पायेगा। १० १२ २ किन्तु लाभ के सम्बन्ध में मन को कुछ अशांति ११ १ पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ नं. ५६४ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में मनोयोग की शीतल शक्ति से तथा खर्च की शक्ति से सफलता पायेगा और रोगादिक झंझटों में कुछ खर्च करेगा। भाई, पराक्रम, आयु तथा पुरातत्वस्थानपति-मंगल यदि कन्या का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति पायेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति का सुन्दर उपयोग करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारणों से देह में कुछ
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भृगु संहिता ३०३ कन्या लग्न में १ मंगल परेशानी तथा सुन्दरता में कुछ कमी पायेगा और भाई-बहिन के सुख में कुछ दिक्कतें रहेंगी और ७ ५ चौथे मित्र दृष्टि से मातृ स्थान तथा सुख भवन को ८ ६ मं. ४ गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश ३ होने के कारण माता के सुख सम्बन्धों में कमी और कष्ट का योग पैदा करेगा तथा घरेलू सुख १० १२ २ और मकानादि भूमि की शक्ति में भी कमी के ११ १ कारण पैदा करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री नं. ५६५ एवं रोजगार के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के योग से परिश्रम के द्वारा सफलता पायेगा तथा आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में आयु स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में २ मंगल यदि तुला का मंगल- धन स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के ७मं. ५ दोष के कारण से धन स्थान की संग्रह शक्ति में ८ ६ ४ हानि प्राप्त करेगा तथा भाई-बहिन एवं कुटुम्ब ९ ३ के सुखों में कमी एवं अशान्ति पायेगा और धन की संग्रह शक्ति के लिये कठिन पुरुषार्थ करेगा १० १२ २ तथा चौथी उच्च दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान ११ को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, नं. ५६६ इसलिये विद्या बुद्धि की विशेष उन्नति के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और सन्तान पक्ष के सम्बन्ध में कुछ कष्ट युक्त वातावरण के अन्दर भी कुछ रौनक और उन्नति पायेगा और अधिक वाचाल शक्ति पायेगा तथा सातवीं स्वक्षेत्र दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या को अमीरी ढंग से व्यतीत करेगा और आठवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि के लिये प्रयत्न करते रहने पर भी भाग्य स्थान में कुछ असंतोष पायेगा और धर्म पालन में कुछ कमजोरी रहेगी। यदि वृश्चिक का मंगल- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है, तो पराक्रम स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त होने पर भी अष्टमेश होने के दोष के कारण से भाई के सुख में कुछ संकट पायेगा और आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व सम्बन्धित शक्ति का भरोसा रखेगा और चौथी दृष्टि से
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३०४ कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में ३ मंगल शनि की कुम्भ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये बाहुबल की हिम्मत शक्ति के द्वारा ७ ५ शत्रु स्थान में प्रभाव रखेगा और सातवीं दृष्टि से ८मं ६ ४ सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में भाग्य स्थान ९ ३ को देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें प्राप्त करेगा और धर्म का १२ २ पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा तथा आठवीं ११ १ मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की नं. ५६७ मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख में कुछ कमी करेगा तथा राज-समाज एवं कारबार के स्थान में उन्नति के लिये विशेष प्रयत्न करने पर भी सफलता की कमी पायेगा। कन्या लग्न में ४ मंगल यदि धनु का मंगल- चौथे केन्द्र माता के स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो आयु ७ ५ स्थान में सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व ८ ६ ४ का लाभ पायेगा और भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों ९ मं. ३ में कुछ कमी या त्रुटि पायेगा और अष्टमेश के दोष के कारण माता के सुख स्थान में कमी प्राप्त १० १२ २ करेगा तथा भूमि मकानादि के स्थान में कुछ त्रुटि ११ १
नं. ५६८ अनुभव करेगा और चौथी दृष्टि से स्त्री स्थान एवं रोजगार स्थान को मित्र गुरु की राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोजगार के पक्ष में कुछ कष्ट युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ कष्ट पायेगा तथा राज-समाज, कारबार के स्थान में उन्नति के लिये कुछ कठिन परिश्रम करेगा और आठवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में परेशानी अनुभव करेगा। कन्या लग्न में ५ मंगल यदि मकर का मंगल- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की ७ ५ राशि पर बैठा है तो विद्या बुद्धि एवं शक्ति प्राप्त ८ ४ करेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण से 3
९ ३ संतान पक्ष में कुछ कष्ट एवं शक्ति और प्रभाव १० पायेगा और भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कमी मं १२ २ युक्त सम्बन्ध रहेगा और वाणी के द्वारा पुरुषार्थ ११ १ शक्ति का विशेष परिचय देगा और चौथी स्वक्षेत्र नं. ५६९ की दृष्टि से आयु स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि
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भृगु संहिता ३०५ में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति में गौरव प्राप्त करेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का योग प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च विशेष करेगा और बाहरी स्थानों की शक्ति का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा और दिनचर्या और रहन-सहन में प्रभाव शक्ति एवं शानदारी रखेगा। कन्या लग्न में ६ मंगल यदि कुम्भ का मंगल-छठें शत्रु स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर क्रूर ७ ५ ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु स्थान में ८ ६ ४ विशेष प्रभाव रखेगा और भाई-बहिन के पक्ष में ९ ३ कुछ विरोध या वैमनस्य प्राप्त करेगा तथा अधिक पुरुषार्थ और अधिक परिश्रम करेगा और जीवन १० १२ २ की दिनचर्या में कुछ घिराव या परतंत्रता और ११ मं. १ प्रभाव की शक्ति रखेगा तथा आयु की शक्ति का नं. ५७० योग अच्छा रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ शक्ति पायेगा और चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष होने के कारण से भाग्य में कुछ कमी अनुभव करेगा तथा धर्म में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों का कुछ कम सम्बन्ध रहेगा तथा आठवीं दृष्टि देह स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष कारण से देह में कुछ परेशानी और कुछ रक्त विकार का योग पायेगा तथा शत्रु पक्ष में एवं रोगादिक झगड़े-झंझटों के विषय में प्रभाव एवं विजय पाने के लिये कुछ कठिनाईयाँ सहन करेगा। कन्या लग्न में ७ मंगल यदि मीन का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने 9 4 के कारण से स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा और ८ ६ ४ रोजगार के मार्ग में बड़ा कठिन परिश्रम करेगा ९ ३ तथा आयु की शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति की कुछ सहायता पायेगा तथा भाई-बहिन १० १२ मं. २ की शक्ति एवं सुख सम्बन्धों में कुछ अनुकूलता ११ १ एवं कुछ प्रतिकूलता पायेगा तथा गृहस्थ संचालन नं. ५७१ के लिये पराक्रम शक्ति का विशेष उपयोग करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से पिता स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, भृ. सं .- २०
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३०६ कन्या लग्न का फलादेश इसलिये पिता स्थान में कुछ परेशानी पायेगा तथा राज-समाज, कारबार की उन्नति एवं मान प्राप्त करने के लिये बहुत पुरुषार्थ करेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ गरम विकार तथा कुछ परेशानी और हिम्मत शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति एवं कुटुम्ब स्थान में कुछ कमजोरी पायेगा। कन्या लग्न में ८ मंगल यदि मेष का मंगल- आठवें मृत्यु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो भाई- ७ ५ बहिन के स्थान में सुख सम्बन्ध की कमी पायेगा ८ और पुरुषार्थ की कुछ कमजोरी रहेगी तथा आयु ९ ३ स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली शक्ति प्राप्त १० १२ २ रहेगी और चौथी नीच दृष्टि से लाभ स्थान को ११ १ मं. मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ५७२ आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी पायेगा और जीवन की दिनचर्या की मस्ती के कारणों से आमदनी में कुछ लापरवाही रहेगी और सातवीं दृष्टि से धन भवन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति में कुछ कमजोरी पायेगा और कुटुम्ब में कुछ अशांति रहेगी और आठवीं स्वक्षेत्र दृष्टि से भाई के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन और पराक्रम स्थान की कुछ सामान्य शक्ति प्राप्त करेगा तथा गुप्त हिम्मत खूब रहेगी। कन्या लग्न में ९ मंगल यदि वृषभ का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है ७ ५ तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा भाग्य से ८ ४ पुरातत्व की शक्ति का लाभ पायेगा। किन्तु अष्टमेश ९ ३ होने के दोष के कारण से भाग्य स्थान में कुछ परेशानी पायेगा और धर्म के स्थान में कुछ कमजोरी १० १२ २ मं. रहेगी तथा चौथी दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र ११ १ सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा नं. ५७३ विशेष करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध पायेगा तथा सातवीं स्वक्षेत्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाईयों के साथ- साथ भाई बहन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में
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भृगु संहिता ३०७ सफलता पायेगा तथा आठवीं मित्र दृष्टि से माता व सुख स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश दोष के कारण माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी प्राप्त करेगा और मकानादि एवं रहने के स्थानों में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा, किन्तु जीवन की दिनचर्या का ढंग भाग्यवानी के रूप में रहेगा। कन्या लग्न में १० मंगल यदि मिथुन का मंगल- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है ७ ५ तो आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व की ८ ६ ४ कुछ सहायक शक्ति पायेगा, किन्तु अष्टमेश होने ९ ३ मं. के दोष के कारणों से पिता के स्थान में कुछ कष्ट पायेगा और कारबार एवं राज-समाज के १० १२ २ कार्यों में उन्नति के स्थानों में कुछ परेशानियाँ ११ १ पायेगा और कारबार एवं राज-समाज के कार्यों नं. ५७४ में उन्नति के स्थानों में कुछ परेशानियाँ पायेगा किन्तु मान एवं प्रभाव प्राप्त करेगा। क्योंकि दसम स्थान पर मंगल शक्ति प्रदायक कार्य करता है और भाई-बहिन के सुख-सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त वातावरण रहेगा और चौथी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ विकार प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त रहेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि विद्या के स्थान में खूब उन्नति करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ त्रुटि युक्त विशेष शक्ति पायेगा तथा हुकूमत और हेकड़ी से बातें करेगा। कन्या लग्न में ११ मंगल यदि कर्क का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा ७ ५ है तो आमदनी के स्थान में कमजोरी प्राप्त करेगा ८ ६ तथा आयु के पक्ष में कुछ न्यूनता एवं दिनचर्या ९ ३ में कुछ सादगी पायेगा तथा पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी और चौथी दृष्टि से धन १० १२ २ भवन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में ११ १ देख रहा है, इसलिये अष्टमेश के दोष के कारण धन भवन में कुछ कमी करेगा तथा कुटुम्ब के स्थान में कुछ क्लेश पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से सन्तान एवं विद्या नं. ५७५
स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि विद्या के पक्ष
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३०८ कन्या लग्न का फलादेश में तेजी रखेगा तथा सन्तान पक्ष में कुछ कष्टयुक्त मार्ग के द्वारा शक्ति पायेगा और अधिक बोलेगा तथा आठवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु पक्ष में प्रभाव और विजय प्राप्त करेगा तथा बड़ी बहादुरी और हिम्मत से झगड़े-झंझटों में सफलता पायेगा। कन्या लग्न में १२ मंगल यदि सिंह का मंगल- बारहवें खर्च स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो पुरातत्व शक्ति ७ ५ मं के सम्बन्ध में खर्चा अधिक करने के कारण ८ ६ ४ कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और आयु स्थान में ९ ३ कभी-कभी संकट पायेगा तथा बाहरी स्थानों की सम्बन्ध शक्ति को काम में लावेगा और चौथी १० १२ २ स्वक्षेत्र दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान ११ १ को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, नं. ५७६ इसलिये भाई-बहिन का सामान्य योग पायेगा और पुरुषार्थ शक्ति में कुछ न्यूनतम बल प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ दिक्कत युक्त मार्ग से प्रभाव कायम रखेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के दोष के कारण से स्त्री पक्ष में कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में कठिनाईयों के परिश्रम योग के द्वारा कार्य करेगा तथा पेट और इन्द्रियों के अन्दर कुछ विकार का योग पायेगा तथा खर्च की अधिकता को न रोक सकने के कारण कुछ परेशानी पायेगा। देह, पिता तथा राज्यस्थानपति-बुध कन्या लग्न में १ बुध यदि कन्या का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो देह के कद में विशालता ७ ५ एवं सुन्दरता पायेगा और पिता स्थान के सम्बन्ध ८ ६ बु. ४ में बड़प्पन पायेगा। राज-समाज में मान और प्रभाव ९ ३ प्राप्त करेगा तथा कार्य-व्यापार में उन्नति करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के १० १२ २ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये ११ १ अपने व्यक्तित्व के सम्मुख स्त्री पक्ष में बहुत कमी नं.५७७ अनुभव करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कमजोरी पायेगा और गृहस्थ भोगादिक के सुखों में कुछ त्रुटि रहेगी और अपने विशेष स्वाभिमान के कारण रोजगार के मार्ग में पूरी तौर से दिलचस्पी नहीं लेगा।
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कन्या लग्न में २ बुध यदि तुला का बुध- धन स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो विवेक शक्ति द्वारा महान् ७ब् ५ व्यापार कर्म से धन की वृद्धि उत्तम रूप में प्राप्त ८ ६ ४ करेगा और पिता से भी धन की शक्ति का योग ९ ३ पायेगा तथा कुटुम्ब का वैभव प्राप्त करेगा और राज-समाज से मान तथा लाभ प्राप्त रहेगा तथा १० १२ २ धन-जन की वृद्धि के लिये दैहिक सुख शक्ति में ११ १ बाधा पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान नं. ५७८ को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा और धन की वृद्धि करने में अपनी संपूर्ण शक्ति का प्रयोग करेगा। कन्या लग्न में ३ बुध यदि वृश्चिक का बुध- तीसरे भाई के स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन ७ ५ की सुख और शक्ति प्राप्त करेगा और अपने पराक्रम ८बु. ६ ४ स्थान में बड़ी सुन्दर सफलता शक्ति पायेगा तथा ९ पिता के स्थान की शक्ति से सहायता मिलेगी m और कारबार, राज-समाज के सम्बन्ध में प्रभाव, १० १२ २ उन्नति तथा मान प्राप्त करेगा और देह में सुन्दरता ११ १
है, इसलिए अपने दैहिक कर्म की विवेक शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि नं. ५७९ एवं सुडौलता रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा
करेगा और धर्म-कर्म की शक्ति में सफलता पायेगा तथा यश मिलेगा। BEFE कन्या लग्न में ४ बुध यदि धनु का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ७ ५ माता की सुन्दर शक्ति मिलेगी। मकानादि, भूमि ८ ६ ४ एवं रहने के स्थान आदि की शक्ति प्राप्त करेगा ९ बु. 3 और देह में सुन्दरता एवं सुख प्राप्ति के साधन पायेगा तथा शान्ति युक्त कोमल वातावरण में १० १२ २ रहना पसंद करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी ११ १ मिथुन राशि में पिता एवं राज्य स्थान को स्वक्षेत्र नं. ५८० में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति से सुख मिलेगा और राज-समाज में मान एवं प्रभाव, शील-शान्ति द्वारा मिलेगा और कारबार के मार्ग में गम्भीर विवेक के योग से सफलता प्राप्त करेगा तथा अपने स्थान में सुन्दर स्वाभिमान रखेगा।
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३१० कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में ५ बुध यदि मकर का बुध- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा ७ ५ है तो संतान शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान ८ ६ ४ में दैहिक कर्म और विवेक शक्ति के योग से सुन्दर ९ ३ सफलता प्राप्त करेगा तथा बुद्धि एवं वाणी के १० योग से बड़े प्रशंसनीय कार्य करेगा और सातवीं बू. १२ २ मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की कर्क ११ १ राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज के नं. ५८१ सुन्दर व्यवहारिक ज्ञान की शक्ति से अच्छी आमदनी प्राप्त करेगा और कारबार की बड़ी योग्यता एवं कुशलता प्राप्त करने के कारणों से मान और प्रभाव की शक्ति रखेगा तथा स्वाभिमान रखने वाला एवं सुन्दरता युक्त रहेगा। कन्या लग्न में ६ बुध यदि कुम्भ का बुध- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो देह के सम्बन्ध में ७ ५ परेशानी एवं कुछ रोग और सुन्दरता की कमी ८ ६ ४ पायेगा तथा कुछ परतंत्रता युक्त मार्ग से कर्म ९ ३ करेगा और पिता, राज-समाज, व्यापार, मान प्रतिष्ठा इत्यादि सम्बन्ध में कुछ कमजोरी रहेगी १० १२ २ और शत्रु पक्ष में कुछ विवेक की नरम-गरम शक्ति ११बु. १ से काम निकालेगा तथा ननसाल पक्ष में कुछ नं. ५८२ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा तथा बाहरी स्थानों का सुन्दर संबंध प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ७ बुध यदि मीन का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री तथा रोजगार के स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की ७ ५ राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कुछ कमी तथा ८ ६ ४ स्त्री के सम्मुख अपने व्यक्तित्व में कुछ त्रुटि एवं ९ ३ कुछ दबाव अनुभव करेगा और रोजगार के पक्ष १० १२ बु २ में कुछ अधिक परिश्रम करेगा एवं कुछ न्यूनतम मार्ग का अनुसरण करेगा तथा पिता स्थान के ११ १
नं. ५८३ सुख सम्बन्ध में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और राज- समाज, कारबार के सम्बन्ध में सामान्य शक्ति पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के मार्ग से देह का मान एवं बड़प्पन प्राप्त करेगा यथा देह की सुन्दरता में कुछ त्रुटि युक्त रहेगी।
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कन्या लग्न में ८ बुध यदि मेष का बुध- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो देह के सुख ७ ५ सम्बन्धों में तथा सुन्दरता में कमी प्राप्त करेगा ८ ६ ४ और पिता की शक्ति का अल्प सुख प्राप्त करेगा ९ ३ तथा राज-समाज, कारबार के सम्बन्धों में परेशानी अनुभव करेगा और विदेश आदि दूसरे स्थानों में १० १२ २ रहकर कार्य संचालन करेगा और आयु की शक्ति ११ १बु. प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व का लाभ प्राप्त होगा नं. ५८४ और सातवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये गुप्त एवं गूढ़ विवेक की शक्ति से कार्य करेगा तथा जीवन निर्वाह करने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा तथा कुटुम्ब को बहुत चाहेगा। कन्या लग्न में ९ बुध यदि वृषभ का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह में ७ ५ बड़ी सुन्दरता एवं भाग्यवानी प्राप्त करेगा और ८ ६ ४ पिता स्थान की शक्ति का बड़ा उत्तम लाभ पायेगा ९ ३ तथा विवेक शक्ति के उत्तम प्रशंसनीय कार्य के द्वारा कारबार और भाग्य की वृद्धि करेगा और १० १२ धर्म कर्म का सुन्दर पालन करेगा तथा ईश्वर में ११ बु. १ विश्वास करेगा और राज-समाज में मान प्राप्त नं. ५८५ करेगा तथा कुदरती तौर से उन्नति के मूल कारण प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति मिलेगी तथा पराक्रम की सफलता प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में १० बुध यदि मिथुन का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में ७ 4 बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का स्वयं संचालन ८ ६ ४ करेगा और राज-समाज, कारबार आदि के सम्बन्धों ९ ३ बु. में बड़ी सफलता और मान प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता और प्रभाव की शक्ति पायेगा और १० १२ २ बड़े स्वाभिमान एवं विवेक शक्ति के द्वारा बड़ी ११ १ उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं नं. ५८६ भूमि स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता स्थान की शक्ति पायेगा तथा भूमि स्थान का सुख प्राप्त करेगा और घरेलू वातावरण में अमीरात का ढंग एवं कार्य कुशलता
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३१२ कन्या लग्न का फलादेश पायेगा। कन्या लग्न में ११ बुध यदि कर्क का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान से ७ ५ ८ लाभ प्राप्त करने तथा दैहिक कर्म और विवेक ६ शक्ति के योग से सुन्दर लाभ पायेगा और राज ९ ३ 'समाज, कारबार से सम्बन्धित आमदनी का योग मिलेगा और देह में सुन्दरता रहेगी तथा आमदनी १० १२ २ ११ के मार्ग में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा १
नं. ५८७ सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में सुन्दर शक्ति पायेगा तथा विद्या के स्थान में वृद्धि करेगा और वाणी की शक्ति से उन्नति करेगा। कन्या लग्न में १२ बुध यदि सिंह का बुध- बारहवें खर्च स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो खर्चा विशेष ७ ५ बु. करेगा तथा पिता स्थान में कमजोरी विदेश यात्राओं ८ ६ ४ का योग पायेगा तथा कारबार, राज-समाज के ९ ३ सम्बन्धों में हानि रहेगी और बाहरी स्थानों के योग से सफलता एवं मान प्राप्त करेगा किन्तु १० १२ २ उन्नति के लिये बड़ी दौड़-धूप करेगा और सातवीं ११ १ मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ राशि नं. ५८८ में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति और दैहिक कर्म के शांत योग से शत्रु पक्ष में कामयाबी पायेगा। माता, भूमि, स्त्री तथा रोजगारस्थानपति-गुरु कन्या लग्न में १ गुरु यदि कन्या का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह में ७ ५ सुन्दरता एवं सुडौलता प्राप्त करेगा और माता की ८ ६ गु ४ सुख शक्ति पायेगा तथा भूमि मकानादि का आनन्द ९ ३ रहेगा और पाँचवीं नीच दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा १० १२ २ है, इसलिये संतान पक्ष में कमजोरी पायेगा और ११ १ विद्या स्थान में कुछ परेशानी रहेगी तथा बुद्धि के नं. ५८९ अन्दर कुछ छिपाव शक्ति से काम करेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मीन राशि में स्त्री तथा रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये स्त्री सुख उत्तम प्राप्त करेगा और रोजगार में
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भृगु संहिता ३१३ उन्नति एवं मान प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के स्थान में कुछ न्यूनता युक्त बुद्धि के साधन मिलेंगे तथा धर्म पालन की आन्तरिक यथार्थता में कुछ कमी रहेगी। किन्तु भाग्यवान् सज्जन और कार्य कुशल समझा जायेगा। कन्या लग्न में २ गुरु यदि तुला का गुरु- दूसरे स्थान धग भवन में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में बैठा है ७ग् ५ ८ ४ तो धन की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब ur में प्रभाव रहेगा तथा धन का स्थान बन्धन का ९ ३ स्थान होता है, इसलिये माता एवं स्त्री पक्ष के १० १२ २ सुख सम्बन्धों में कमी और रूकावटें प्राप्त रहेंगी ११ तथा रोजगार के मार्ग से धन वृद्धि पायेगा और मकानादि के जरिये लाभ पायेगा तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से शनि की कुम्भ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये नं. ५९०
शत्रु पक्ष में दानाई के योग से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का सुख मिलेगा और नवमी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से सुख प्राप्त करेगा तथा कार्य व्यापार में उन्नति रहेगी और राज-समाज में मान एवं प्रभाव पायेगा तथा धन प्राप्त करने की क्रिया को विशेष रूप से प्रयोग में लायेगा। कन्या लग्न में ३ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ७ ५ ८गु. ६ ४ भाई-बहिन एवं पराक्रम शक्ति की सफलता पायेगा और मातृ स्थान की एवं भूमि मकान की शक्ति ९ ३ प्राप्त रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार १० १२ २ के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र ११ १ को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति के योग
में सुख शक्ति एवं सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के कार्यों में विशेष नं. ५९१ से रोजगार की विशेष वृद्धि करेगा और स्त्री स्थान
रूचि एवं शक्ति का योग करेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के सम्बन्ध में कुछ असंतोष युक्त मार्ग से सफलता पायेगा और धर्म का
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३१४ कन्या लग्न का फलादेश पालन करेगा तथा नवमी उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये अपने दैनिक कार्य क्रम के योग से आमदनी के मार्ग में विशेष लाभ प्राप्त करेगा और लाभ का विशेष ध्यान रखेगा। कन्या लग्न में ४ गुरु यदि धनु का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि ७ ५ के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है ८ ६ तो माता की सुन्दर शक्ति एवं मकानादि का सुख ९ गु. प्राप्त करेगा और स्त्री व गृहस्थ का अच्छा उत्तम ३ सुख पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में घर बैठे १० १२ २ सफलता शक्ति मिलेगी और अपने घर के अन्दर ११ १ बड़ा प्रभाव एवं महत्व प्राप्त करेगा और पाँचवीं नं. ५९२ मित्र दृष्टि से आयु स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की सुख शक्ति पायेगा तथा जीवन को सहायक होने वाले पुरातत्व का लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से राज्य स्थान एवं पिता स्थान का बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में सुख शक्ति मिलेगी और राज-समाज कारबार के पक्ष में उन्नति एवं मान प्रभाव मिलेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ५ गुरु यदि मकर का गुरु- पाँचवें त्रिकोण संतान ७ ५ एवं विद्या स्थान पर नीच का होकर शत्रु शनि की ८ ६ ४ राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कुछ कष्ट अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान में कुछ कमजोरी पायेगा ९ ३ और गृहस्थ के सुख सम्बन्धों में दुःख का अनुभव १० गु. १२ २ प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कमजोरी ११ १ पायेगा व मातृ स्थान के पक्ष में कमी रहेगी और नं. ५९३ पाँचवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ वृद्धि मिलेगी और धर्म में कुछ रूचि रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी की वृद्धि करने के लिये भारी प्रयत्न करेगा तथा दिमाग की परेशानी के योग से लाभ वृद्धि रहेगी और नवमी मित्र दृष्टि में देह के स्थान की बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में मान और कार्य कुशलता की शक्ति प्राप्त करेगा
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भृगु संहिता ३१५ तथा गृहस्थ के दैनिक कार्यों में व्यस्त चित्त रहेगा। कन्या लग्न में ६ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- छठें शत्रु स्थान में शत्रु शनि की कुम्भ राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में ७ ५ बड़ी नम्रता एवं बुजुर्गी के योग से काम निकालेगा ८ ४ और स्त्री के सुख सम्बन्धों में बड़ा झंझट एवं ९ ३ परेशानी पायेगा और मातृ स्थान के सुख में बड़ी १० १२ २ कमी रहेगी तथा मकानादि रहने के स्थान व भूमि ११गु. १ सम्बन्ध की तरफ से सुख की कमजोरी रहेगी नं. ५९४ तथा रोजगार के संचालन मार्ग में परिश्रम और कठिनाईयाँ प्राप्त रहेंगी और पाँचवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए पिता पक्ष से कुछ सहारा प्राप्त होगा राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ मान प्राप्त होगा और कारबार की वृद्धि का विशेष प्रयत्न करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में सुन्दर सहयोग पायेगा तथा नवमी दृष्टि से धर्म भवन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है इसलिये धन की संग्रह शक्ति पाने के लिये विशेष परिश्रम करेगा तथा कुटुम्ब सुख का योग प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ७ गुरु यदि मीन का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं
७ ५ रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री ८ ६ ४ बैठा है तो बहुत सुन्दर सुखदाता स्त्री प्राप्त करेगा तथा रोजगार के पक्ष में सुख पूर्वक वृद्धि एवं ९ ३ शक्ति प्राप्त रहेगी और मातृ स्थान का सुख मिलेगा १० १२ गु. २ और गृहस्थ के अन्दर बड़ा गौरव पायेगा तथा ११ पाँचवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की
उत्तम वृद्धि पायेगा और सुख पूर्वक अपने स्थान में ही लाभ प्राप्त करता नं. ५९५ कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी की
रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में मान और सुख का आनन्द प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का सुख पायेगा तथा पराक्रम की शक्ति से सुख सफलता प्राप्त करेगा। यदि मेष का गुरु- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा
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३१६ कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में ८ गुरु है तो स्त्री स्थान में दुख का कारण प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त ७ ५ रहेंगी और मातृ स्थान के सुख सम्बन्धों में विशेष ८ ६ ४ कमी रहेगी अर्थात् गृहस्थ के मार्ग में बड़ी दिक्कतों ९ ३ से कामयाबी प्राप्त करेगा तथा दूसरे स्थान के २ सम्बन्ध से गृहस्थ, स्त्री तथा रोजगार में सुख का १० १२ ११ १ गु. साधन पायेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से खर्च के नं. ५९६ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध रहेगा और सातवीं दृष्टि से धन भवन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब में कुछ वैमनस्यता पायेगा और नवमी दृष्टि से सुख भवन एवं मातृ स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ देर और दिक्कतों से घरेलू सुख के साधन एवं मकानादि का सुख पायेगा। कन्या लग्न में ९ गुरु यदि वृषभ का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है ७ ५ ४ तो कुछ अरुचिकर मार्ग के द्वारा भाग्य की वृद्धि ८ w के साधन पायेगा और स्त्री गृहस्थ की सुख शक्ति ९ ३ में कुछ न्यूनतायुक्त मार्ग से कामयावी पायेगा १० १२ तथा रोजगार के मार्ग में कुछ भाग्य के भरोसे एवं गू ११ १ सज्जनता के कारणों से फायदा प्राप्त करेगा और नं. ५९७ मकानादि रहने के स्थान की कुछ शक्ति मिलेगी तथा माता का कुछ सहारा मिलेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुख और सम्मान का योग पायेगा तथा भोगादिक सुखों की विशेष इच्छा रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की कुछ सुख पूर्वक कार्य करने की शक्ति पायेगा और नवमी नीच दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष के सुख में कमी और विद्या में कुछ कमजोरी पायेगा और दिमाग की सूझ शक्ति के अन्दर कुछ गुप्त योजनाओं से कार्य करेगा तथा कुछ धर्म का पालन करेगा।
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कन्या लग्न में १० गुरु यदि मिथुन का गुरु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो ७ ५ पिता स्थान में सुख सफलता पायेगा तथा कार्य ८ ६ ४ व्यापार में उन्नति करेगा और राज-समाज में मान ९ ३ गु. एवं प्रभाव पायेगा तथा सुन्दर एवं प्रभावशालिनी स्त्री मिलेगी और सुख पूर्वक रोजगार में सफलता १० १२ २ ११ १ पायेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से धन भवन को सामान्य
नं. ५९८ शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और सातवीं स्वक्षेत्र दृष्टि से माता के सुख भवन को स्वयं अपनी धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता का सुख मिलेगा और मकानादि भूमि की शक्ति प्राप्त करेगा तथा घरेलू सुख के उत्तम साधन पायेगा और नवमी शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ नीरसताई के योग से शान्त भाव के द्वारा कार्य सिद्ध करेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ सुख प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ११ गुरु यदि कर्क का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो ७ ५ आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और मातृ स्थान की शक्ति का लाभ पायेगा तथा ९ ३ भूमि मकानादि का उत्तम लाभ पायेगा और धन लाभ के मार्ग से महान् सुख का अनुभव करेगा १० १२ २ तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाई बहिन एवं पराक्रम ११ १ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, नं. ५९९ इसलिये भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान के द्वारा सुख और सफलता पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमी पायेगा तथा दिमाग में कुछ घरेलू पक्ष से चिन्ता रहेगी और नवमी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये सुयोग्य स्त्री प्राप्त करेगा तथा रोजगार में खूब सफलता पायेगा और भोगादिक की उत्तम शक्ति पायेगा। यदि सिंह का गुरु- बारहवें खर्च स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों के योग से एवं खर्च के योग से सुख प्राप्त करेगा। किन्तु अपने मातृ स्थान के सुख में कमी पायेगा
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३१८ कन्या लग्न का फलादेश
कन्या लग्न में १२ गुरु और स्त्री गृहस्थ का बहुत कमजोर सुख मिलेगा अर्थात् गृहस्थ सुख में कुछ हानि रहेगी और पाँचवीं ७ ५ गु दृष्टि से मातृ व सुख भवन को स्वयं अपनी धनु ८ ६ ४ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये मातृ ९ ३ स्थान के सुख की कुछ थोड़ी शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ १० १२ २ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ ११ १ नीरसता युक्त मार्ग से नरमाई के साथ काम नं. ६०० निकालेगा और नवमीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की सुख शक्ति पायेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ सुख का अनुभव करेगा। भाग्य, धर्म, धन तथा कुटुम्बस्थानपति-शुक्र कन्या लग्न में १ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है ७ ५ तो देह में कुछ कमजोरी रहेगी और भाग्य तथा ८ ६ शु ४ धन कुटुम्ब की तरफ से कमजोरी प्राप्त करेगा ९ ३ तथा धर्म पालन के संबंध में कमजोरी रहेगी और भाग्य तथा धन की वृद्धि करने के लिये धर्म की १० १२ २ परवाह नहीं करेगा तथा धन की प्राप्ति के लिये ११ १ कुछ सेवा के रूप में कार्य करेगा और सातवीं नं. ६०१ उच्च दृष्टि से स्त्री तथा रोजगार के स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री में सुन्दरता एवं भाग्यवानी रहेगी तथा रोजगार के पक्ष में विशेष उन्नति करेगा और गृहस्थ भोगादिक शक्ति को विशेष रूप में पाने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा। कन्या लग्न में २ शुक्र यदि तुला का शुक्र- धन एवं कुटुम्ब स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो धन ७शु. ५ संग्रह शक्ति का सुन्दर योग पायेगा और कुटुम्ब ८ ४ का गौरव पायेगा तथा भाग्यशाली समझा जायेगा ९ ३ और धर्म का पालन कुछ धन के योग से करेगा तथा भाग्य की शक्ति से धन की वृद्धि का हेतु १० १२ २ प्राप्त करेगा और इज्जत पायेगा तथा सातवीं दृष्टि ११ १ से आयु स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष नं. ६०२ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्येश की दृष्टि
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भृगु संहिता ३१९ उत्तम होने के नाते आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा चतुर व धनवान् बनेगा। कन्या लग्न में ३ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान पर सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है ७ ५ तो भाग्येश शुभ फल का दाता होता है, इसलिये ८श. ६ ४ भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पराक्रम ९ ३ शक्ति में बड़ी स्फूर्त्ति पायेगा तथा पराक्रम के द्वारा धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब का योग १० १२ २ पायेगा एवं बड़ा चतुर, पुरुषार्थी बनेगा और सातवीं ११ १ दृष्टि से भाग्य के स्थान को स्वयं अपनी वृषभ नं. ६०३ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये अपने बाहुबल की शक्ति के योग से भाग्य की महान् वृद्धि करेगा एवं बड़ा भाग्यवान्, चतुर समझा जायेगा और शक्ति धर्म का भी पालन करेगा और बड़ा हिम्मतवर बनेगा। कन्या लग्न में ४ शुक्र यदि धनु का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि ७ ५ पर बैठा है तो भाग्य स्थानपति श्रेष्ठ फल का दाता ८ ६ ४ होता है, इसलिये माता स्थान का बड़ा सुख प्राप्त ९ शु. ३ करेगा और भूमि मकानादि की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा सुख प्राप्ति के साधन भाग्य बल से १० १२ २ उत्तम रूप में पायेगा तथा धन और कुटुम्ब की ११ १
नं. ६०४ शक्ति सुखपूर्वक चतुराई से प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति का लाभ पायेगा और राज-समाज मान में और लाभ मिलेगा तथा कारबार में उन्नति पायेगा और धर्म-कर्म का पालन करेगा। कन्या लग्न में ५ शुक्र यदि मकर का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या में स्थान पर मित्र शनि की राशि पर ७ ५ बैठा है तो भाग्य स्थान पति जहाँ भी बैठता है, ८ ६ ४ वहाँ उत्तम फल करता है, इसलिये संतान शक्ति ९ ३ से लाभ रहेगा और विद्या स्थान में सफलता मिलेगी १० तथा बुद्धि योग के द्वारा धन और भाग्य की उन्नति शु. १२ २ करेगा तथा धर्म का पालन एवं मनन तथा ज्ञान ११ १ प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को नं. ६०५ सामान्य मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है,
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३२० कन्या लग्न का फलादेश इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा तथा सज्जनता युक्त वाणी की महान् चतुराई से उन्नति के अन्दर साधन प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ६ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य की कमजोरी ७ ५ पायेगा और धन संग्रह की तरफ से कमी और ८ ६ ४ दुःख का कारण पायेगा तथा कुटुम्ब से कुछ ९ ३ मतभेद रहेगा और धर्म में कुछ अरुचि रहेगी। किन्तु शत्रु स्थान में भाग्य की शक्ति एवं धन की १० १२ २ शक्ति से चतुराई के द्वारा सफलता पायेगा तथा ११शु. १ रोगादिक झगड़े-झंझटों के मार्ग से तथा परिश्रम नं. ६०६ के योग से भाग्य की वृद्धि के साधन पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करने से कुछ दुःख अनुभव होगा। किन्तु बाहरी स्थानों का कुछ अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ७ शुक्र यदि मीन का शुक्र-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु ७ ५ गुरु की राशि पर बैठा है तो रोजगार के स्थान में ८ बहुत चतुराई से सफलता प्राप्त करेगा और बहुत ९ ३ धन कमायेगा तथा बड़ी चतुर सुन्दरी स्त्री प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में धर्म का पालन करेगा और १० १२ शु. २ ११ १ बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा तथा कुटुम्ब का गृहस्थी में आनन्द पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि नं. ६०७ से देह के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता में कुछ कमी पायेगा और धन तथा रोजगार की वृद्धि करने के लिये देह के सुख की परवाह नहीं करेगा। कन्या लग्न में ८ शुक्र यदि मेष का शुक्र- आठवें मृत्यु स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य ७ ५ की बड़ी कमजोरी पायेगा तथा धन की संग्रह ८ ४ शक्ति में परेशानी का योग प्राप्त करेगा और कुटुम्ब ९ ३ के पक्ष में कुछ क्लेश रहेगा तथा धर्म पालन स्थान में केवल स्वार्थ धर्म का पालन करेगा तथा १० १२ २ सुयश की कमी रहेगी और आयु स्थान में वृद्धि ११ १शु. पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति से धन लाभ पायेगा नं. ६०८ और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी तुला राशि धन
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भृगु संहिता ३२१ भवन में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये महान् कठिनाईयों के योग से धन की प्राप्ति के साधन पायेगा और गुप्त चतुराई के बल से उन्नति के साधन प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ९ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर ७ ५ स्वक्षेत्री बैठा है तो बड़ा भाग्यशाली बनेगा और ८ ६ ४ धर्म का पालन करेगा तथा भाग्य और धर्म की ९ ३ शक्ति से धन की खूब प्राप्ति करेगा तथा धन की
१० १२ २ शक्ति का सदुपयोग करने के कारणों से यश की शु प्राप्ति रहेगी और बड़ी चतुराई के योग से ईश्वर में ११ विशेष निष्ठा रखेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं नं. ६०९ पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की शक्ति से विशेष सफलता प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर आनन्द पायेगा तथा सुमार्ग से धन की प्राप्ति रहेगी। कन्या लग्न में १० शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो ७ ५ भाग्य की शक्ति से पिता स्थान की विशेष उन्नति ८ ६ ४ पायेगा तथा राज्य, व्यापार, मान व प्रतिष्ठा आदि *९ ३ शु. की अच्छी सफलता पायेगा तथा चतुराई के उत्तम कर्म योग से धन की वृद्धि प्राप्त होगी और कुटुम्ब १० १२ २ का सुख मिलेगा और बड़ा भाग्यशाली समझा ११ १ जायेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान नं. ६१० को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ मतभेद के स्थान माता के सुख स्थान की शक्ति पायेगा तथा मकानादि भूमि का सुख करेगा। कन्या लग्न में ११ शुक्र यदि कर्क का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य ७ ५ की शक्ति से धन का विशेष लाभ पायेगा और ८ ६ शु. कुटुम्ब का आनन्द प्राप्त करेगा तथा बड़ा ९ ३ भाग्यवान्, समझा जायेगा और धन का ध्यान रखेगा, इसलिये आमदनी के मार्ग में न्याय की १० १२. २ शक्ति से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से ११ १ संतान एवं विद्या के स्थान को शुनि की मकर नं. ६११ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान का लाभ मृ. सं .- २१
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३२२ कन्या लग्न का फलादेश प्राप्त करेगा और विद्या की योग्यता में उन्नति पायेगा तथा वाणी एवं बुद्धि की विशेष चतुराई से यश और लाभ का सुन्दर योग पायेगा। कन्या लग्न में १२ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो धन का विशेष ७ ५शु. खर्चा करेगा और भाग्य की कमजोरी के कारणों ६ ४ से दुःख का अनुभव और उन्नति में बाधा प्राप्त ९ ३ करेगा और धन की संग्रह शक्ति नहीं कर सकेगा तथा कुटुम्ब की हानि पायेगा तथा धर्म का पालन १० १२ २ नहीं कर सकेगा और बाहरी दूसरे स्थानों में भाग्य ११ १ की शक्ति का एवं धन की हानि का योग प्राप्त नं. ६१२ करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्यबल से और धन-बल की शक्ति से शत्रु पक्ष में सफलता पायेगा तथा झगड़े झंझटों से लाभ पायेगा। विद्या, संतान, शत्रु तथा रोगस्थानपति-शनि कन्या लग्न में १ शनि यदि कन्या का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठ है तो विद्या बुद्धि ५ की परिश्रम युक्त शक्ति से प्रभाव और मान प्राप्त ८ ६ श. करेगा तथा संतान शक्ति प्राप्त होने पर भी कुछ ३ संतान से वैमनस्यता पायेगा और देह में कुछ रोग एवं कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में १० १२ २ विजय पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई बहिन ११ एवं पराक्रम स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में नं. ६१३ देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि प्राप्त करेगा और पराक्रम के स्थान में अधिक परिश्रम के योग से सफलता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में परिश्रम शक्ति से कार्य करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ कठिनाई से शक्ति मिलेगी और राज-समाज व व्यवहार में युक्ति से मान पायेगा। यदि तुला का शनि- दूसरे स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर उच्च का होकर बैठा है, तो बुद्धि और परिश्रम के योग से विशेष धन कमायेगा तथा कुदुम्ब के स्थान में कुछ वृद्धि एवं कुछ झंझट प्राप्त करेगा और विद्या ग्रहण करेगा तथा संतान पक्ष में परेशानी पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से
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भृगु संहिता ३२३ कन्या लग्न में २ शनि माता एवं भूमि स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान में कुछ वैमनस्यता ७श. ५ पायेगा और मकानादि के सुख में कुछ कमी प्राप्त ६ ४ करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से आयु स्थान को ९ ३ शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ अशांति पायेगा तथा आयु की १० १२ २ कुछ कमी तथा पुरातत्त्व शक्ति की कुछ कमजोरी ११ १ पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को नं. ६१४ चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के स्थान में कुछ दिक्कत प्राप्त करेगा अर्थात् छठें स्थान का गृह स्वामी हर एक सम्बन्धों में दिक्कतें और परिश्रम एवं युक्तियों से ही कार्य करता है किन्तु शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा। कन्या लग्न में ३ शनि यदि वृश्चिक का शीन- तीसरे भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा ७ ५ है, तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता ८श ६ ४ है, इसलिये पराक्रम और हिम्मत शक्ति की वृद्धि ९ 3 करेगा और शत्रु पक्ष में प्रभाव एवं विजय पायेगा और शत्रु स्थानपति होने के दोष के कारणों से १० १२ २ भाई-बहिन के स्थान में झंझट एवं परेशानी पायेगा ११ १
नं. ६१५ तथा तीसरी दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये मामूली कुछ दिक्कत लिये हुए संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या एवं वाणी की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य की उन्नति करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ४ शनि यदि धन का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो ५ माता के सुख सम्बन्धों में कमी एवं झंझट का ८ ६ ४ कारण प्राप्त करेगा तथा मकानादि भूमि के सुखों ९ श. में कुछ कमी पायेगा और घर के अन्दर सन्तान ३ पक्ष के सुख में कुछ झंझट या फिकर रहेगी तथा १० १२ २ विद्या का सुख रहेगा और तीसरी दृष्टि से शत्ु ११ १ स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, नं. ६१६ इसलिये बुद्धि योग द्वारा घर बैठे शत्रु पक्ष में
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३२४ कन्या लग्न का फलादेश प्रभाव की शक्ति कायम रखेगा और झंगड़े-झंझटों के योग से सुख-दुःख का सदैव अनुभव करेगा और ननसाल पक्ष की कुछ सुख शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से दसम राज्य एवं पिता स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और परिश्रम के योग से पिता एवं मान सम्मान आदि में शक्ति पायेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग पायेगा तथा परिश्रम और प्रभाव की शक्ति से मान पायेगा। कन्या लग्न में ५ शनि यदि मकर का शनि- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र ७ ५ पर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति पायेगा तथा ८ ६ ४ विद्या ग्रहण करेगा। किन्तु छठें स्थान पति का ९ ३ दोष होने के कारण संतान पक्ष में कुछ कष्ट एवं १० झंझट प्राप्त करेगा तथा विद्या के पक्ष में कुछ श १२ २ दिक्कतों और रुकावटों से सफलता रहेगी तथा ११ १
नं. ६१७ बुद्धि एवं वाणी के अन्दर गुप्त युक्ति का बल रहेगा और इसी गुप्त बल बुद्धि के प्रभाव से शत्रु पक्ष में सफलता पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ दिमागी परिश्रम रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के परिश्रम से लाभ की प्राप्ति करेगा और दसवीं उच्च दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब की शक्ति पायेगा। कन्या लग्न में ६ शनि यदि कुम्भ का शनि-छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु पक्ष में ७ ५ बुद्धि की शक्ति से विजय प्राप्त करेगा और संतान ६ V पक्ष में परेशानी पायेगा तथां विद्या ग्रहण करने में ३ कुछ दिक्कतें रहेंगी। किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये विद्या के पक्ष से १० १२ २ प्रभाव कायम रखेगा और तीसरी नीच दृष्टि से ११श. १ आय्रु स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में बहुत बार जान के खतरे आयेंगे तथा कुछ झंझटों के कारण अशांति का अनुभव होता रहेगा नं. ६१८
तथा पुरातत्व सहायक शक्ति की हानि रहेगी और उदर में कुछ विकार
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भृगु संहिता ३२५ पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी तथा बाहरी दूसरे स्थानों के सम्बन्ध में नीरसता रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से पराक्रम एवं भाई के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाई- बहिन से कुछ परेशानी का सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम के स्थान में बुद्धि यांग के परिश्रम से दौड़-धूप में सफलता एवं हिम्मत योग्य शक्ति प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ७ शनि यदि मीन का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु गुरु की मीन राशि पर ७ ५ बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ी परेशानी अनुभव ८ ६ करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बुद्धि योग से ९ ३ बड़ा परिश्रम करेगा तथा कुछ मूत्रेन्द्रिय में विकार पायेगा और विद्या की शक्ति से गृहस्थ का संचालन १० १२ श. २ करेगा तथा संतान पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी ११ १ और बुद्धि की पेचीदी युक्तियों से शत्रु पक्ष में नं. ६१९ सफलता पायेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म का ध्यान रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग और कुछ परेशानी के साथ-साथ प्रभाव पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि तथा सुख स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कमी पायेगा और मकानादि भूमि तथा रहने के स्थान में कुछ अशांति अनुभव करेगा। कन्या लग्न में ८ शनि यदि मेष का शनि- आठवें आयु स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा तो ७ ५ जीवन में महान् अशांति अनुभव करेगा तथा आयु ८ ६ ४ स्थान में कई बार खतरे आयेंगे और सहायक ३ होने वाली पुरातत्व शक्ति की हानि रहेगी तथा संतान पक्ष में कष्ट अनुभव होगा और विद्या स्थान १० १२ २ में कमजोरी रहेगी एवं शत्रु पक्ष से अशान्ति रहेगी ११ १श. और तीसरी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं राज्य पक्ष में कुछ झंझट युक्त संपर्क रहेगा तथा कारबार में कुछ नं.६२०
बुद्धि योग से शक्ति पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से धन स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये धन जन की वृद्धि के लिये
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३२६ कन्या लग्न का फलादेश महान् प्रयत्न करेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में सन्तान एवं विद्या स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या बुद्धि की कुछ कमजोर शक्ति पायेगा और गुप्त चतुर बनेगा। कन्या लग्न में ९ शनि यदि वृषभ का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो बुद्धि ५ योग के परिश्रम मार्ग से भाग्य की शक्ति प्राप्त ८ ६ ४ करेगा तथा संतान पक्ष में सफलता पायेगा और ९ ३ विद्या प्राप्त करेगा तथा शत्रु स्थानपति होने के
१० १२ २ दोष के कारण भाग्य में और धर्म सम्बन्ध में कुछ
११ श. कमजोरी पायेगा और बड़ा नीतिज्ञ चतुर १ बोलनेवाला बनेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से चन्द्रमा नं. ६२१ की कर्क राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये लाभ के लिये विशेष प्रयत्न करेगा और सातवीं स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पराक्रम शक्ति की वृद्धि के लिये अधिक प्रयत्न एवं परिश्रम करेगा और भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता पायेगा और दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में शत्रु स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये भाग्य और बुद्धि की शक्ति से शत्रु स्थान में विजय पायेगा और प्रभाव की वृद्धि करेगा तथा झगड़े- झंझटों के मार्ग से उन्नति पायेगा। कन्या लग्न में १० शनि यदि मिथुन का शनि- दसम केन्द्र पिता स्थान एवं राज्य स्थान में बैठा है तो छठें स्थान का पति ७ ५ होने के दोष के कारण से पिता के सुख में कुछ ८ ४ झंझट पायेगा और बुद्धि योग के परिश्रमी मार्ग 3
९ से राजसमाज में प्रभाव शक्ति पायेगा एवं कारबार ३ श. में उन्नति करेगा और विद्या की शक्ति पायेगा १० १२ २ तथा संतान पक्ष से उन्नति के साधन पायेगा और ११ १ तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ नीरसता प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ अरूचि रखेगा तथा नं. ६२२ सातवीं शत्रु दृष्टि से चौथे मातृ स्थान को एवं भूमि स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भूमि और माता के सम्बन्ध में सुख शांति की कमी पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री के सुख में भी कुछ कमी पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कठिन परिश्रम से उन्नति करेगा। यदि कर्क का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
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भृगु संहिता ३२७ कन्या लग्न में ११ शनि बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये बुद्धि के परिश्रमी मार्ग से ७ ५ आमदनी की खूब वृद्धि करेगा और शत्रु पक्ष एवं ८ ६ श. झगड़े-झंझट आदि से लाभ युक्त रहेगा और तीसरी ९ ३ मित्र दृष्टि से देह के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग एवं १० १२ २ परिश्रम का योग प्राप्त करेगा तथा बड़ी होशियारी ११ १ से स्वार्थ सिद्ध करने में सदैव तत्पर रहेगा और नं. ६२३ सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में संतान एवं विद्या स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये संतान और विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु शत्रु स्थान पति होने के दोष के कारण से संतान और विद्या के सुख में कुछ त्रुटि एवं झंझट रहेगी और दसवीं नीच दृष्टि से आयु स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन में बड़ा संघर्ष प्राप्त करेगा तथा सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति में कुछ हानि पायेगा। कन्या लग्न में १२ शनि यदि सिंह का शनि- बारहवें खर्च स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो कुछ नीरसता ७ ५श. के सहित खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों ८ ६ ४ के सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा ९ ३ विद्या एवं संतान पक्ष में हानि तथा कमजोरी प्राप्त करेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से धन भवन १० १२ २ को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, ११ १ इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के नं. ६२४ लिये भारी प्रयत्न करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि और खर्च की शक्ति से शत्रु पक्ष में एवं रोगादिक झंझटों में प्रभाव पा सकेगा, किन्तु परेशानी-सी रहेगी और दसवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के संयोग से बुद्धि बल के द्वारा भाग्य की कुछ वृद्धि करेगा तथा धर्म के पक्ष में कुछ सुन्दर रूचि रखेगा तथा अधिक खर्च करने में अपनी शान समझता रहेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु यदि कन्या का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो कन्या पर बैठा हुआ राहु स्वक्षेत्र के समान माना जाता है,
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३२८ कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में १ राहु इसलिये देह में गुप्त युक्तिबल की विशेष शक्ति पायेगा तथा बड़ा स्वाभिमानी होगा और कुछ शरीर ५ में दिक्कतें एवं कुछ परेशानी का योग पायेगा ८ ६ रा. ४ तथा मान प्राप्त करेगा तथा दिमाग की गहरी सूझ ९ ३ शक्ति के बल से प्रभाव कायम रखेगा एवं विशेष उन्नति पाने के लिये कठिन प्रयत्न करेगा और कभी- १० १२ २ कभी गहरी चिन्ता पाने का भी धैर्य की महान् ११ १ शक्ति से काम लेगा और देह में आन्तरिक रूप से नं. ६२५ कुछ कमी महसूस करेगा और उन्नति भी करेगा। कन्या लग्न में २ राहु यदि तुला का राहु- धन स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन की तरफ से चिन्ता ७रा. ५ प्राप्त रहेगी और कुटुम्ब के स्थान में कुछ झंझट ८ ६ ४ या परेशानी प्राप्त रहेगी तथा धन संग्रह के अभाव ३ से कुछ गुप्त वेदना, तेजी तथा कभी-कभी धन में हानि प्राप्त करेगा और धन की वृद्धि करने के १० १२ २ लिये महान् प्रयत्न करेगा एवं राहु चतुर आचार्य १ शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये विशेष त्रतुराई
पायेगा और प्रकट में धनवान् समझा जायेगा तथा कभी-कभी धन के पक्ष नं. ६२६ के गूढ़ मार्ग से कठिन कर्म के द्वारा धन की शक्ति
में मुफ्त की-सी सफलता शक्ति से विशेष लाभ पा जायेगा। कन्या लग्न में ३ राहु यदि वृश्चिक का राहु- भाई-बहिन और पुरुषार्थ के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ७ ५ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, टरा ६ ४ इसलिये पराक्रम, प्रभाव और हिम्मत की विशेष ९ वृद्धि करेगा तथा चतुराई की शक्ति से बड़े-बड़े ३ कठिन कार्यों को भी पूरा करने में सदैव तत्परता १० १२ २ से काम करेगा। किन्तु भाई-बहिन के पक्ष में ११ १ परेशानी एवं कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा नं. ६२७ तथा कभी-कभी पराक्रम स्थान के कार्यों में विशेष संकट प्राप्त होने पर भी आन्तरिक धैर्य की शक्ति को नहीं छोड़ेगा और साहस से सफलता प्राप्त करेगा और सदैव अपनी जीत एवं कार्य सिद्धि के लिये प्रयत्नशील रहेगा तथा शील संतोष की परवाह नहीं करेगा। यदि धन का राहु- चौथे केन्द्र माता, भूमि एवं सुख के स्थान पर नीच का होकर शत्रु गुरु की धनु राशि पर बैठा है तो माता के सुख की महान् हानि करेगा तथा मकानादि रहने के स्थानों की कमी करेगा तथा घरेलू
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भृगु संहिता ३२९ कन्या लग्न में ४ राहु सुख शांति में विशेष बाधायें प्राप्त करेगा और घर के अन्दर कभी-कभी घोर संकट एवं दुःख ७ ५ के कारण प्राप्त होंगे और मातृ स्थान एवं मातृ ८ ६ ४ भूमि से सम्बन्ध विच्छेद रहेगा तथा बहुत प्रकार ९ रा. ३ से सुख सम्बन्धों में संकीर्णता रहेगी और किसी प्रकार गुप्त योजनाओं के द्वारा गुप्त रूप से सुख १० १२ २ के साधन प्राप्त होंगे और निजी स्थान में शान्ति ११ १ का विशेष अभाव रहेगा। नं. ६२८ यदि मकर का राहु- पंचम त्रिकोण संतान कन्या लग्न में ५ राहु एवं विद्या के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो विद्या की शक्ति प्राप्त करने में कुछ ७ ५ अड़चनें रहेगी। किन्तु विद्या प्राप्त करेगा तथा ८ ४ दिमाग के अन्दर गुप्त युक्तियों का विशेष संग्रह ३ होने के कारण बुद्धि में कुछ परेशानी रहेगी और संतान पक्ष में कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और १० रा. १२ २ बुद्धि-विद्या की आन्तरिक कमी के रहते हुये भी ११ १ प्रकट में बातों की चतुराई और सफाई से काम नं. ६२९ करता रहेगा तथा बोल चाल में स्वार्थ सिद्धि के कारण सत्य-असत्य की परवाह नहीं करेगा तथा कभी-कभी दिमाग के अन्दर गहरी चिन्ता के कारण भी प्राप्त करेगा। 半 半 出 典
कन्या लग्न में ६ राहु यदि कुम्भ का राहु- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर क्रूर ७ ५ ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में E ४ V बड़ा प्रभाव कायम करेगा और झगड़े झंझटों के ९ ३ मार्ग में बड़ी गुप्त युक्ति के बल से विजय और सफलता पायेगा तथा कभी-कभी शत्रु एवं १० १२ २ रोगादिक पक्ष की दिक्कतों में महान् संकट ११रा. १ आने पर भी गुप्त सूझ और गुप्त हिम्मत की नं. ६३० शक्ति के कारण प्रत्यक्ष में अपनी कमजोरी जाहिर नहीं होने देगा किन्तु अपने अन्दर कुछ कमजोरी का अनुमान करेगा। और अपना प्रभाव जमाने के लिये कठिन से कठिन कार्य को भी करने में तत्पर रहेगा। यदि मीन का राहु-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी कठिनाईयाँ एवं परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी गृहस्थी
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३३० कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में ७ राहु एवं रोजगार के मार्ग में महान् संकट प्राप्त करेगा। किन्तु गुप्त चतुराईयों के योग से तथा आन्तरिक ५ धैर्य की शक्ति से परिस्थिति को पुनः संभाल कर ८ ६ ४ चलेगा और कभी कोई मूत्रेन्द्रिय में विकार का ९ ३ योग बनेगा तथा स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में हृदय के अन्दर कुछ दुःख और कमी का अनुभव १० १२ रा. २ करता रहेगा और स्त्री स्थान तथा रोजगार के ११ १ सम्बन्ध में अधिक उन्नति करने के लिये कठिन नं. ६३१ प्रयत्न करेगा। कन्या लग्न में ८ राहु यदि मेष का राहु-आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु मंगल की मेष राशि पर बैठा है तो ७ ५ आयु के सम्बन्ध में कई बार महान् संकट प्राप्त ८ ४ करेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व ९ ३ शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा और उदर के अन्दर नीचे की तरफ कुछ बीमारी या शिकायत १८ १२ २ पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में चिन्ता एवं ११ १ रा. परेशानियों के कारण प्राप्त होंगे तथा जीवन निर्वाह नं. ६३२ की शक्ति को मजबूत बनाने के लिये स्थाई लाभ प्राप्त करने की ख्याल से बड़ा भारी कठिन प्रयत्न करेगा। किन्तु इतने पर भी अपनी दिनचर्या के मार्ग में कुछ कमी और झंझट का गुप्त योग अनुभव करेगा। कन्या लग्न में ९ राहु यदि वृषभ का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर ७ ५ बैठा है तो भाग्य के स्थान में कुछ चिन्तायें प्राप्त ८ ६ ४ करेगा तथा धर्म के यथार्थ पालन में कुछ कमजोरी ९ ३ रहेगी और भाग्य की उन्नति के लिये महान् कष्ट साध्य प्रयत्न करेगा तथा भाग्य के बाहरी हिस्से १० १२ २ में जितनी उन्नति पायेगा उसकी तुलना में अन्दरूनी ११ १ रा. तौर से भाग्य में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा नं. ६३३ और भाग्य स्थान में कभी-कभी भारी संकट प्राप्त करेगा किन्तु गुप्त युक्ति एवं चतुराई और धैर्य की शक्ति से पुनः भाग्य में जागृति पायेगा और कुछ अधिकार रूप से भी भाग्य की उन्नति पायेगा। यदि मिथुन का राहु-दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर उच्च का होकर बैठा है तो पिता स्थान में कुछ संघर्ष के साथ- साथ विशेष उन्नति प्राप्त करेगा और राजसमाज के स्थान में बड़ी चतुराई
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कन्या लग्न में १० राहु से मान और प्रभाव पायेगा तथा गुप्त युक्ति की विशेष कला के द्वारा कारबार में खूब सफलता ७ ५ प्राप्त करेगा और राज-समाज और कारबार के ८ ६ ४ स्थान में कभी-कभी विशेष संकट का योग प्राप्त
९ ३ रा. करेगा। किन्तु विशेष धैर्य एवं चतुराई के बल से पुनः अच्छे रास्ते पर आ जायेगा और कारबार १० १२ २ एवं मान-प्रतिष्ठा की विशेष उन्नति प्राप्त करने के ११ १ लिये महान् कठिन प्रयत्न भी करेगा। नं. ६३४ यदि कर्क का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में कन्या लग्न में ११ राहु परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये ७ ५ ६ ४ आमदनी के मार्ग में वृद्धि तो अवश्य करेगा, V रा. किन्तु शत्रु राशि पर होने से लाभ के मार्ग में ९ ३ विशेष दिक्कतें रहेंगी तथा कभी-कभी लाभ के सम्बन्ध में विशेष चिन्ता या विशेष धोखा खाने १० १२ २ का योग भी बनेगा, क्योंकि आमदनी के मार्ग में ११ १ कभी-कभी विशेष लाभ प्राप्ति के लिये कुछ नं. ६३५ अधिक कठिन परिश्रम और अधिक प्रयत्न भी करेगा तथा आमदनी के स्थान में कुछ त्रुटि एवं असंतोष रहेगा और कभी- कभी मुफ्त का-सा अचानक लाभ भी प्राप्त होगा। कन्या लग्न में १२ राहु यदि सिंह का राहु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा ७ ५ रा. है तो खर्च के मार्ग में बहुत परेशानी प्राप्त करेगा ८ ६ ४ तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में दुःख का अनुभव
९ करेगा और खर्च संचालन की शक्ति को प्राप्त ३ करने के लिये भारी कठिन प्रयत्न करेगा और १० १२ २ कभी-कभी खर्च के मार्ग में भारी संकटों का ११ १ सामना करने की स्थिति पायेगा, किन्तु फिर भी नं. ६३६ गुप्त युक्ति और गुप्त हिम्मत की शक्ति से खर्च का संचालन करता रहेगा और कभी-कभी कोई मुफ्त का-सा धन खर्च संचालन के लिये प्राप्त करेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु यदि कन्या का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में कुछ कष्ट एवं चिन्ताओं का योग प्राप्त करेगा
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३३२ कन्या लग्न का फलादेश कन्या लग्न में १ केतु तथा देह में कभी-कभी कोई चोट एवं घाव प्राप्त होंगे और देह की सुन्दरता में कुछ कमी तथा ७ ५ परिश्रम का योग पायेगा तथा अपने अन्दर गुप्त ८ ६ के ४ शक्ति एवं गुप्त हिम्मत का योग प्राप्त करेगा और ९ ३ कभी-कभी कोई गहरे संकट का अवसर प्राप्त होने पर भी गुप्त सहायक शक्ति के बल से रक्षा १० १२ २ पायेगा और देह के अन्दर कुछ कमजोरी के होते ११ १ हुये भी बड़ी हेकड़ी और हठ रखेगा तथा कुछ नं. ६३७ कमी लिये हुये मान और प्रभाव प्राप्त करेगा अर्थात् नरम ग्रह के स्थान में गरम ग्रह बैठा है, इसलिये नरमाई और गरमाई से काम करेगा। कन्या लग्न में २ केतु यदि तुला का केतु- दूसरे धन स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो धन के कोष स्थान में ७ के ५ कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब ८ ६ ४ के सम्बन्ध में क्लेश और त्रुटि के कारण पायेगा ९ ३ और कभी-कभी धन के सम्बन्ध में अचानक विशेष हानि के कारणों से विशेष चिन्ता रहेगी। किन्तु १० १२ २ आचार्य शुक्र के घर में बैठा है, इसलिये धन की ११ १
नं. ६३८ वृद्धि करने के लिये विशेष चतुराई के कार्यों में परिश्रम शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा और कभी-कभी मुफ्त का धन भी प्राप्त करेगा। किन्तु धन के किसी भी कार्य और कारणों के सम्बन्ध से कुछ परेशानी का योग अवश्य पाता रहेगा और अधिक धन की प्राप्ति के लिये अधिक प्रयत्न करेगा। कन्या लग्न में ३ केतु यदि वृश्चिक का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ७ ५ भाई-बहिन के स्थान में कष्ट एवं परेशानी के ८क ४ कारण प्राप्त करेगा तथा तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह ९ ३ शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये अपने पराक्रम एवं हिम्मत शक्ति की बहुत वृद्धि करेगा और १० १२ २ गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये १
नं. ६३९ अपना प्रभाव जमाने के लिये महान् कठिन परिश्रम एवं कठिन कर्म करेगा और बाहुबल के अन्दर शक्ति पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण कभी-कभी स्वयं अपनी हिम्मत के अन्दर गुप्त रूप से महान् कमजोरी अनुभव करेगा, किन्तु प्रकट रूप में कभी-कभी हिम्मत हार कर भी हार मानने को तैयार नहीं होगा।
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कन्या लग्न में ४ केतु यदि धनु का केतु- चौथे केन्द्र माता और भूमि तथा सुख स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु ७ की राशि पर बैठा है तो माता के सुख में कुछ ८ ६ ४ आडम्बर युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि ९ के. ३ मकानादि की शक्ति पांयेगा तथा आचार्य गुरु के स्थान में उच्च का होकर बैठा है, इसलिये बड़े १० १२ २ बुजुर्गी के ढंग से हेकड़ी और शानदारी से घरेलू ११ १ सुखों की महान शक्ति पाने के लिये महान् कठिन नं. ६४० परिश्रम एवं कठिन प्रयत्न करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण कभी-कभी घरेलू सुख और सम्बन्धों में विशेष संकट प्राप्त करेगा और अन्त में सुख प्राप्ति के साधनों में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा। कन्या लग्न में ५ केतु यदि मकर का केतु- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है ७ ५ तो संतान पक्ष में परेशानी एवं चिन्ता का योग ८ ६ प्राप्त करेगा तथा विद्या स्थान में पढ़ाई के समय x
९ ३ में कुछ गुप्त चिन्तायें महसूस करेगा, किन्तु विद्या २० को ग्रहण करने के लिये महान् परिश्रम एवं क १२ २ कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा और कभी-कभी केतु ११ १
नं. ६४१ के स्वाभाविक दोष के कारण दिमाग के अन्दर महान् चिन्ता का योग पायेगा और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये बोलचाल एवं बातचित के अन्दर बड़ी कड़ाई से काम करेगा और अपने अन्दर कुछ बुद्धि विद्या की योग्यता में कमजोरी महसूस करेगा। कन्या लग्न में ६ केतु यदि कुम्भ का केतु- छठें शत्रु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान में क्रूर ७ ५ ग्रह बहुत बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष ८ ६ में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझट
३ आदि के स्थानों में बड़ी गुप्त हिम्मत शक्ति के बल से और बड़ी हेकड़ी एवं निर्भयता से काम १० १३ २ करेगा और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा ११क. १ है, इसलिये दूसरों के सामने प्रभाव कायम रखने के लिये महान कठिन परिश्रम करेगा, किन्तु स्वाभाविक दोष के कारण अपने प्रभाव के अन्दर कुछ गुप्त कमजोरी नं.६४२
अनुभव करेगा और ननसाल पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और कभी-कभी
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३३४ कन्या लग्न का फलादेश बड़ी भारी बहादुरी से काम करेगा। कन्या लग्न में ७ केतु यदि मीन का केतु- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है ७ ५ तो स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा रोजगार ८ ४ W के मार्ग में बड़ी कठिनाईयाँ मिलेंगी, किन्तु आचार्य ९ ३ गुरु की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़े बुजुर्गी के ढंग से कठिन परिश्रम के द्वारा रोजगार में कुछ १० १२ के २ सफलता पायेगा। स्त्री गृहस्थ के पक्ष में बड़े संकटों ११
नं. ६४३ और दिक्कतों की प्राप्ति कर लेने के बाद कुछ सहूलियत पायेगा तथा कभी-कभी कई प्रकार से मूत्र-इन्द्रिय विकार का योग प्राप्त होगा और गृहस्थ जीवन को अनेकों प्रकार की गुप्त युक्ति एवं गुप्त शक्ति के प्रयोगों से सफल बनाने पर भी अन्दरूनी कुछ कमी महसूस करेगा। कन्या लग्न में ८ केतु यदि मेष का केतु- आठवें आयु स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में ७ ५ अनेकों बार प्राण संकट का योग बनेगा और ८ ४ जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति की ९ ३ कमी एवं हानि रहेगी और उदर के अन्दर कई प्रकार की दिक्कत या बीमारी पायेगा तथा गरम १० १२ २ ११ १ के. ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये जीवन में प्रभाव पाने के लिए महान् कठिन परिश्रम करेगा नं. ६४४ और जो कुछ भी शक्ति प्राप्त होगी उसमें भी कुछ कमी और जीवन की दिनचर्या में अधिक तेजी एवं क्रोध और संघर्ष रहेगा तथा जीवन में कभी-कभी जीवन निर्वाह करने के लिये महान् चिन्ता का योग बनेगा। कन्या लग्न में ९ केतु यदि वृषभ का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है ७ ५ तो भाग्य के स्थान में बड़े-बड़े संकट एवं दिक्कतें ८ ६ प्राप्त होंगी और धर्म के मार्ग में कमजोरी रहेगी ९ ३ तथा कुछ कमी लिये हुए युक्तिपूर्ण धर्म का पालन १० १२ २ करेगा और आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है,
११ के इसलिये भाग्य की वृद्धि करने के लिये चतुराई १ के सहारे परिश्रम से शक्ति पायेगा, किन्तु कभी- नं. ६४५ कभी केतु के स्वाभाविक दोष के कारण भाग्य के स्थान में किसी प्रकार गहरी चिन्ता का योग प्राप्त करेगा किन्तु गुप्त
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भृगु संहिता ३३५ शक्ति और चतुराई के कारणों से हर एक दिक्कतों से बचाव पाता रहेगा, किन्तु भाग्य के अन्दर किसी कारण से कुछ कमजोरी महसूस करेगा। कन्या लग्न में १० केतु यदि मिथुन का केतु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि ७ ५ पर बैठा है तो पिता स्थान में हानि एवं कष्ट प्राप्त ६ ४ करेगा और राज-समाज के स्थान में मान और ९ ३ के. प्रभाव की कमजोरी सम्भव होगी और कारबार एवं उन्नति के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें एवं १० १२ २ झंझटें और अवनति के कारण प्राप्त होंगे तथा ११ १ राज पक्ष से कभी कोई झगड़ा और परेशानी प्राप्त नं. ६४६ करेगा और उन्नति प्राप्त करने के मार्ग में कभी कोई महान् संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा तथा नरम ग्रह के स्थान पर नीच का होकर केतु बैठा है, इसलिये कभी-कभी कोई मान हानि पाने का कार्य एवं ढंग बनेगा और दबकर काम करेगा। कन्या लग्न में ११ केतु यदि कर्क का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में परम शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें ७ ५ स्थान में क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये x016 ८ ६ आमदनी के मार्ग में उन्नति एवं वृद्धि तो करेगा, ९ ३ किन्तु लाभ करने के कारणों में मानसिक परेशानियाँ प्राप्त रहेंगी और कभी-कभी कोई विशेष १० १२ २ झंझट या नुकसान भी आमदनी के मार्ग में हो ११ १ सकेगा और केतु के स्वाभाविक दोष के कारण नं. ६४७ आमदनी के स्थान में कमी का अनुभव करने के कारणों से दुःख का भान होता रहेगा, किन्तु कभी-कभी कोई मुफ्त का- सा धन लाभ होता रहेगा और आमदनी की वृद्धि करने के लिये मनोयोग से कठिन परिश्रम करेगा। कन्या लग्न में १२ केतु यदि सिंह का केतु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा ७ ५ के है तो खर्च के स्थान में बड़ी चिन्ता और परेशानी ८ ६ ४ का योग पायेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में ९ दुःख एवं अरूचि अनुभव करेगा तथा खर्च की ३ संचालन शक्ति को पाने के लिये महान् कठिन १० १२ २ परिश्रम करेगा और गरम ग्रह की शत्रु राशि पर ११ १ गरम ग्रह बैठा है, इसलिये खर्च के स्थान में कभी- नं. ६४८ कभी महान् संकट का सामना करने पायेगा इपपलिये
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३३६ कन्या लग्न का फलादेश कभी-कभी बड़े संकीर्ण रूप से खर्च का संचालन करेगा और कभी- कभी अधिक मात्रा में खर्च करने के कारण भी दुःख का योग बनेगा, किन्तु गुप्त हिम्मत शक्ति से खर्च का कार्य करता रहेगा। ।।कन्या लग्न समाप्त।।
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भृगु संहिता ३३७ तुला लग्न का फलादेश प्रारम्भ
८ ६ ७ ९ ५
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१२ १ २
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ७५६ तक में देखिये) प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ६४९ से लेकर कुण्डली नं० ७५६ तक के अन्दर जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन- जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों मृ.सं .- २२
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३३८ तुला लग्न का फलादेश वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६४९ से ६६० तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश. कुण्डली नं. ६४९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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भृगु संहिता ३३९ कुण्डली नं. ६५८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६५९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६६० के अनुसार मालूम करिये। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६६१ से ६७२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६६१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६६९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६७० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६७१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ६७२ के अनुसार मालूम करिये।
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३४० तुला लग्न का फलादेश (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६७३ से ६८४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस भास का फलादेश कुण्डली नं. ६७४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६७९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८० के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश
४. कुण्डली नं. ६८१ के अनुसार मालूम करिये। जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८४ के अनुसार मालूम करिये। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६८५ से ६९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।
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भृगु संहिता ३४१ ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६८९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ६९६ के अनुसार मालूम करिये। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ६९७ से ७०८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६९७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ६९८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली
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३४२ तुला लग्न का फलादेश नं. ६९९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७०८ के अनुसार मालूम करिये। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७०९ से ७२० तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७०९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७११ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१३ के अनुसार मालूम करिवे।
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भृगु संहिता .३४३ १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७१९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस भास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७२० के अनुसार मालूम करिये। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७२१ से ७३२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में शनि, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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३४४ तुला लग्न का फलादेश कुण्डली नं. ७२८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७२९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३२ के अनुसार मालूम करिये। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७३३ से ७४४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७३९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४० के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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भृगु संहिता ३४५ कुण्डली नं. ७४२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४४ के अनुसार मालूम करिये। (७) तुला लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७४५ से ७५६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७४९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ७५६ के अनुसार मालूम करिये। - .
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३४६ तुला लग्न का फलादेश आमदनी एवं प्रभावस्थानपति-सूर्य तुला लग्न में १ सूर्य यदि तुला का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है ८ ६ ९ तो देह में कमजोरी और सुन्दरता की कमी प्राप्त ७ 4 करेगा तथा आमदनी के मार्ग में कमी और कमजोरी १० मिलेगी तथा धन लाभ के सम्बन्ध में कुछ दबकर ११ या परतंत्रता से आमदनी की शक्ति पायेगा और १ ३ तेजी की कमी रहेगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से १२ २ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र मंगल की नं. ६४९ राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के पक्ष में उन्नति करेगा तथा स्त्री स्थान में विशेष लाभ एवं सुन्दरता पायेगा और गृहस्थ-भोगादिक की अच्छी शीक्त मिलेगी। तुला लग्न में २ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- धन स्थान में मित्र ६ मंगल की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग ८ सू. से विशेष धन प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति ९ 4 पायेगा तथा धन और धन के संग्रह करने का १० ४ विशेष प्रयोग करेगा तथा धन और कुटुम्ब में ११ प्रभाव पायेगा और प्रभाव युक्त मार्ग से एवं धन १ ३ की शक्ति से आमदनी का मार्ग स्थापित करेगा १२ २ और सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को शुक्र की नं. ६५० वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कारणों से जीवन की दिनचर्या में कुछ थोड़ी सी परेशानी एवं प्रभाव पायेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ कुछ नीरसता से प्राप्त होगा। तुला लग्न में ३ सूर्य यदि धनु का सूर्य- तीसरे भाई और पराक्रम के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ६ ९स. ७ पराक्रम की शक्ति से धन का लाभ एवं आमदनी प्राप्त करेगा और भाई-बहिन की शक्ति का लाभ १० ४ प्राप्त करेगा तथा तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह ११ शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये लाभ के मार्ग में १ ३ विशेष सफलता मिलेगी और पुरुषार्थ तथा प्रभाव १२ २ नं. ६५१ की महान् वृद्धि पायेगा एवं अपने बाहुबल की शक्ति का विशेष भरोसा करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की खूब वृद्धि होगी तथा धर्म के पक्ष में प्रकाश रखेगा और
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भृगु संहिता ३४७ आमदनी के मार्ग में भाग्यवान् समझा जायेगा। तुला लग्न में ४ सूर्य यदि मकर का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ८ ६ ९ आमदनी पक्ष के कुछ नीरसता युक्त सुख की प्राप्ति ७ ५ करेगा तथा माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी ० सू. ४ रहेगी और भूमि मकानादिक की शक्ति का कुछ
११ अधूरा सुख प्राप्त करेगा तथा आमदनी के मार्ग में १ ३ १२ कुछ सुख पूर्वक प्राप्ति करने की विशेष चेष्टा होते २
नं. ६५२ हुए भी कुछ अशांत युक्त थोड़ा-सा वातावरण रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से राज्य एवं पिता, कारबार तथा मान के स्थान को एवं पिता स्थान में मान और सफलता पायेगा। तुला लग्न में ५ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- पाचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर ६ ९ बैठा है तो बुद्धि योग से लाभ पायेगा तथा संतान ५ पक्ष का नीरसता युक्त लाभ मिलेगा तथा विद्या १० ४ के ग्रहण करने में कुछ कठिनाईयों से सफलता ११ मिलेगी और गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा सू. १ ३ है, इसलिये बोलचाल एवं बातचीत के अन्दर १२ २ मिठास की कमी और स्वार्थ की विशेषता रहेगी नं. ६५३ तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी सिंह राशि में लाभ स्थान स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के कठिन कर्म से आमदनी की अच्छी शक्ति पायेगा; किन्तु दिमाग में कुछ खिन्नता रहेगी। तुला लग्न में ६ सूर्य यदि मीन का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में ८ ६ कुछ दिक्कतों के योग से लाभ प्राप्त करेगा तथा ७ 4 प्रभाव शक्ति से बहुत फायदा पायेगा और शत्रु ४ स्थान में एवं झगड़े-झंझटों के मार्ग में लाभ और
११ विजय प्राप्त करेगा, किन्तु लाभ के लिये परिश्रम ३ /१२सू. करना पड़ेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च के २ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, नं. ६५४ इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों में लाभ की सूरतें पायेगा और बड़ी बहादुरी एवं हिम्मत शक्ति के द्वारा आमदनी को प्राप्त करता रहेगा तथा रोगादिक पक्ष में लाभ युक्त रहेगा। यदि मेष का सूर्य- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा भारी
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३४८ तुला लग्न का फलादेश तुला लग्न में ७ सूर्य प्रभाव एवं सुन्दरता पायेगा और स्त्री तथा ससुराल पक्ष से लाभ पायेगा तथा रोजगार के स्थान में ८ ६ बड़ी भारी आमदनी का योग पायेगा और दैनिक ९ ७ ५ कार्यक्रम के द्वारा कभी-कभी बहुत अधिक लाभ १० ४ पायेगा और गृहस्थ के अन्दर विशेष शक्ति एवं विशेष योग और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं ११ १ सू. ३ नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शुक्र की तुला १२ २ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता नं. ६५५ और सुडौलताई में कमजोरी सम्भव होगी और देह में कुछ चिंता एवं फिकर प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ८ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- आठवें आयु एवं पुरातत्व के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो ८ ६ आमदनी के मार्ग में परेशानी प्राप्त करेगा तथा ७ ५ दूसरे स्थान के सम्बन्ध से कठिन परिश्रम के द्वारा १० ४ लाभ पायेगा और कुछ नीरसता युक्त मार्ग से ११ पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा आयु स्थान ३ में कुछ प्रभाव की शक्ति पायेगा एवं उदर के १२ २ सू. नं. ६५६ अन्दर कुछ गरमी की शिकायत पायेगा और सातवी मित्र दृष्टि से धन भवन व कुटुम्ब स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने का विशेष प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में प्रभाव एवं लाभ की शक्ति रखेगा और दिनचर्या में आमदनी के लिये बड़ा ख्याल रखेगा। तुला लग्न में ९ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर ८ ६ बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन का उत्तम लाभ ९ ७ 4 पायेगा और धर्म का पालन करेगा तथा ईश्वर में १० बड़ा विश्वास रखेगा तथा भाग्य के स्थान में बड़ा ४ प्रभाव पायेगा और न्यायोक्त लाभ को कुदरती ११ १ तौर से पाने का योग रखेगा तथा सातवीं मित्र १२ सू. २ दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनु नं. ६५७ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का लाभ पायेगा तथा पराक्रम शक्ति का विशेष लाभ पायेगा अर्थात् बाहुबल की शक्ति में प्रभाव और लाभ पायेगा। अतः भाग्य और पुरुषार्थ दोनों में भरोसा रखकर कार्य करता रहेगा। यदि कर्क का सूर्य- दसम राज्य स्थान एवं पिता स्थान में मित्र चन्द्रमा
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भृगु संहिता ३४९ तुला लग्न में १० सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में बड़ा लाभ प्राप्त करेगा और कारबार में उन्नति पायेगा तथा ८ ६ राज-समाज के स्थान में आमदनी एवं लाभ प्राप्त ९ ७ 4 करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के १० ४ सू. सुख स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के कार्य कारणों से घरेलू ११ १ ३ सुख शांति में कुछ बाधा प्राप्त करेगा और माता १२ २
नं. ६५८ के स्थान में कुछ नीरसता पायेगा और भूमि के सुख में कुछ कमी रहेगी तथा मान प्रतिष्ठा उत्तम रहेगी। तुला लग्न में ११ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी ८ ६ के मार्ग में विशेष सफलता एवं शक्ति पायेगा ९ ५ सू- तथा स्वयं प्रभाव की शक्ति से आमदनी का मार्ग १० ४ बनेगा। ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये लाभ के स्थान में विशेष ११ १ ३ प्रभाव रहेगा और सातवीं दृष्टि से संतान एवं १२ २ विद्यास्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख नं. ६५९ रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ असंतोष एवं ! कुछ नीरसता प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि के अन्दर कुछ अरुचिकर ार्ग से शक्ति पायेगा तथा वाणी में तेजी रहेगी। तुला लग्न में १२ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो ८ ६ सू. ९ खर्चा बहुत अधिक तायदाद में करेगा और बाहरी ५ स्थानों के योग से प्रभाव के द्वारा आमदनी का १० ४ मार्ग बनावेगा और बाहरी स्थानों में बड़ी सरलता
११ शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु आमदनी के सम्पूर्ण लाभ १ ३ को सदैव खर्च करने में तत्पर रहेगा तथा थोड़ा १२ मुनाफा खाने का संयोग पाएगा और सातवीं मित्र
रहा है, इसलिए शत्रु पक्ष में प्रभाव युक्त मैत्री संबन्ध रखेगा और झगड़े- नं. ६६० दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख
झंझटों के मार्ग में प्रभाव की शक्ति से लाभ युक्त रहेगा। पिता, कारबार, राज-समाजस्थानपति-चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर शोभा सुन्दरता एवं सौम्य प्रभाव की
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३५० तुला लग्न का फलादेश तुला लग्न में १ चन्द्र शक्ति पायेगा तथा राज-समाज आदि ऊँचे स्थानों में मान पायेगा तथा पिता स्थान की शोभा ऊँची ८ ६ करेगा और मनोयोग के कर्मबल से कारबार में ९ ७ चं ५ वृद्धि पायेगा क्योंकि वन्द्रमा मन का स्वामी होता १० ४ है, इसलिये राजनीति एवं सामाजिक ज्ञान का उत्तम योग पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री ११ १ ३ एवं रोजगार के स्थान को मंगल की मेष राशि में १२ २ देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुन्दरता एवं नं. ६६१ मान तथा प्रभाव पायेगा और रोजगार के पक्ष में मनोयोग के कर्मबल से बहुत सफलता एवं उन्नति पायेगा तथा सुन्दर भोग प्राप्त करेगा। तुला लग्न में २ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- धन भवन में नीच का ८चं ६ होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान में कमजोरी पायेगा और राज-समाज के ९ ७ ५ सम्बन्ध में मान सम्मान की कमी पायेगा तथा १० ४ धन की संग्रह शक्ति में कमजोरी के कारण से ११ धन एवं कुटुम्ब के स्थान में दुःख और क्लेश का १ ३ योग पायेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में १२ २ नं. ६६२ कमजोरी और बाधायें प्राप्त करेगा। किन्तु मनोयोग के गुप्त कर्म से एवं कुछ परतंत्रता युक्त कर्म से धन की वृद्धि का साधन बनावेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व के स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि और जीवन को सहायक होने वाले पुरातत्व का लाभ पायेगा। तुला लग्न में ३ चन्द्र यदि धनु का चन्द्र- तीसरे भाई के स्थान एवं ६ पराक्रम स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ८ भाई-बहिन के स्थान में शोभा पायेगा और पराक्रम ९ चं ७ ५ स्थान में बड़ी सफलता शक्ति पायेगा और राज- १० ४ समाज में बड़ा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में मनोयोग के कर्म बल से एवं ११ १ ३ पुरातत्व शक्ति से उन्नति का योग पायेगा और पिता १२ २ नं. ६६३ स्थान की सहारा शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये मनोयोग के पुरुषार्थ कर्म से भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म कर्म के पालन का ध्यान रखेगा और मन का स्वामी
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भृगु संहिता ३५१ चन्द्रमा पुरुषार्थ स्थान में बैठा है, इसलिये बड़ी भारी हिम्मत से कार्य करेगा। तुला लग्न में ४ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है ८ ६ तो कुछ नीरसता युक्त मार्ग से माता की शक्ति ९ ७ 4 एवं सुख प्राप्त करेगा तथा मकानादि भूमि के १० चं ४ स्थानों में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति एवं प्रभाव पायेगा और मनोयोग का स्वामी चन्द्रमा है, इसलिये ११ १ ३ मनोबल की कर्म शक्ति से सुख प्राप्ति के साधनों १२ २ को प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से पिता एवं नं. ६६४ राज्य स्थान को स्वयं अपनी कर्क राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और कारबार के मार्ग में मनोबल के योग से उन्नति एवं सुख प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ५ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर ६ बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति पायेगा तथा मनोबल ७ 4 की शक्ति से विद्या में सफलता प्राप्त करेगा और १० ४ बुद्धि एवं वाणी की शक्ति से तथा मनोयोग से ११ कारबार की उन्नति एवं राज-समाज में मान एवं च १ ३ १२ प्रभाव प्राप्त करेगा और मन का स्वामी चन्द्रमा २ है, इसलिये मन एवं बुद्धि के अन्दर लौकिक नं. ६६५ सफलता के लिये विशेष विचार युक्त रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी एवं लाभ की वृद्धि प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ६ चन्द्र यदि मीन का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की तरफ ८ ६ से कुछ असंतोष एवं वैमनस्य रहेगा तथा कारबार ५ के मार्ग में मनोयोग के परिश्रमी कर्म के द्वारा १० ४ कार्य संचालन करेगा किन्तु उन्नति के स्थान में
११ कुछ बाधायें एवं रुकावटें मिलेंगी और राज समाज ३ के सम्बन्ध में मान एवं प्रभाव की कुछ कमी १२च. २ रहेगी तथा शत्रु स्थान में मनोबल की विशेष चतुराई नं. ६६६ से शान्ति के द्वारा कार्य करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों में मनोयोग के कर्म से अच्छा संपर्क
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३५२ तुला लग्न का फलादेश बनायेगा क्योंकि चन्द्रमा मनका स्वामी होता है। तुला लग्न में ७ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर ८ ६ बैठा है तो चन्द्रमा मन का अधिकारी होने के ९ ५ कारण मनोबल के सुन्दर कर्म योग से रोजगार १० ४ के मार्ग में बड़ी भारी सफलता प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दरता एवं प्रभाव और उन्नति ११ १ च ३ के कारण प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की तरफ १२ २ से भी सुख रहेगा तथा राज-समाज के पक्ष में नं. ६६७ मान रहेगा और कारबार की तरफ से उन्नति का योग पायेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्ध में गौरव प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता, प्रभाव ओर मान पायेगा। तुला लग्न में ८ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व के स्थान पर उच्च का होकर सामान्य ८ मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु स्थान में ९ ५ शक्ति पायेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली १० ४ पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में मस्ती का आनन्द पायेगा तथा पिता ११ १ ३ स्थान में हानि एवं कमी पायेगा और कारबार की १२ २ च. उन्नति के मार्ग में दिक्कतें एवं रुकावटें पायेगा नं. ६६८ तथा राज समाज में साधारण मान पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से धन भवन को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये कारबार की उन्नति के मार्ग में धन की हानि एवं कमजोरी पायेगा तथा कुटुम्ब की कमजोरी पायेगा। तुला लग्न में ९ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है ६ तो भाग्य की सुन्दर शक्ति पायेगा तथा धर्म कर्म 9 ५ का पालन मनोयोग से सुन्दर रूप में करेगा और १० पिता सीन कीशक्ति का फायदा उठावेगा तथा ४ मन का अधिकारी चन्द्रमा है, इसलिये कारबार ११ १ ३ की उन्नति के मार्ग में मनोयोग के सुन्दर सतोगुणी १२ २ चं
के सम्बन्ध में मान सम्मान एवं यश प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रूमस्थान को गुरु की धनु राशि में नं. ६६९ कर्म के द्वारा भाग्योन्नति पायेगा और राज-समाज
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भृगु संहिता ३५३ देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति का योग पायेगा तथा पराक्रम स्थान में सफलता पायेगा। तुला लग्न में १० चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता-स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो पिता- ६ V स्थान में बड़ी सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और चन्द्रमा ९ ७ ५ मन की शक्ति का स्वामी है, इसलिये मनोबल के १० ४ चं. सुन्दर कर्म योग से कारबार में उन्नति करेगा तथा राज समाज में मान प्रतिष्ठा पायेगा और मन के ११ १ ३ अन्दर विशेष स्वाभिमान रहेगा तथा सातवीं शत्रु १२ २ दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की नं. ६७० मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि का सुख कुछ त्रुटि युक्त पायेगा तथा घरेलू वातावरण के अन्दर कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सुख प्राप्ति के साधन पायेगा तथा बड़ी नीतिज्ञता से काम करेगा। तुला लग्न में ११ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान ८ ६ का लाभ पायेगा तथा चन्द्रमा मन की शक्ति का ९ ७ ५ चं. अधिकारी होता है, इसलिये मनोयोग के सुन्दर १० ४ कर्म से उत्तम लाभ प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध का लाभ पायेगा तथा मान प्रतिष्ठा ११ १ ३ पायेगा और मन की शक्ति से आमदनी के मार्ग में १२ २ विशेष सफलता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से नं. ६७१ सन्तान स्थान को देख रहा है, अतः संतान पक्ष के स्थान में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सफलता पायेगा तथा विद्या में शक्ति पायेगा और बोलचाल की वाणी के अन्दर बड़ी चतुराई से अपने स्वार्थ की पूर्ति करेगा तथा लाभ का विशेष ध्यान रखेगा। तुला लग्न में १२ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा ८ ; चं विशेष करेगा तथा पिता स्थान की कमजोरी पायेगा ९ ७ ५ और कारबार के स्थान में हानि पायेगा तथा राज १० ४ समाज के सम्बन्ध में मान प्रतिष्ठा की कमजोरी पायेगा और चन्द्रमा मन की शक्ति का अधिकारी ११ १ ३ है इसलिये मनोयोग की शक्ति से बाहरी स्थानों १२ २ के सम्बन्ध में उन्नति एवं सफलता पायेगा तथा नं. ६७२ खर्च संचालन की उत्तम शक्ति पायेगा और सातवीं भृ. सं .- २३
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३५४ तुला लग्न का फलादेश मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये मनोबल की कर्म शक्ति से शत्रु स्थान में सफलता प्राप्त करेगा और झगड़े- झंझटों के मार्ग में शांति युक्त चतुराई से काम निकालेगा। धन, कुटुम्ब, स्त्री, रोजगार स्थानपति-मंगल तुला लग्न में १ मंगल यदि तुला का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है ८ ६ तो देह के कर्म से धन की प्राप्ति करेगा तथा ९ ७ मं 4 कुटुम्ब का योग पायेगा तथा देह में कुछ गरमी १० ४ का स्वभाव पायेगा और गृहस्थ में इज्जत प्राप्त करेगा और चौथी उच्च दृष्टि से माता माता एवं ११ १ ३ भूमि के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में १२ २ देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में एवं घरेलू नं.६७३ सुख और मकानादि के सम्बन्ध में विशेष शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये स्त्री की महानता पायेगा और रोजगार में उन्नति एवं इज्जत पायेगा तथा भोगादिक की उत्तम शक्ति मिलेगी और आठवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये पुरातत्व की सामान्य शक्ति पायेगा और आशु एवं जीवन के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से शक्ति पायेगा तथा उदर में कुछ शिकायत रहेगी। तुला लग्न में २ मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- दूसरे धन स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो ८ मं. ६ धन की शक्ति में रोजगार के मार्ग से वृद्धि करेगा ७ ५ और धन का स्थान बन्धन का कार्य भी करता है, १० ४ इसलिये स्त्री पक्ष में संकट एवं घिराव सा पायेगा और कुटुम्ब की शक्ति रहेगी किन्तु गृहस्थ सुख ११ १ ३ में कमी रहेगी और चौथी शत्रु दृष्टि से संतान १२ २ स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा नं.६७४ है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ बाधा एवं शक्ति पायेगा और विद्या बुद्धि के मार्ग में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में आयु एवं पुरातत्व को देख रहा है, इसलिये आयु तथा पुरातत्व की कुछ शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि पायेगा तथा स्वार्थ धर्म का पालन करेगा।
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भृगु संहिता ३५५ तुला लग्न में ३ मंगल यदि धन का मंगल- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो तीसरे ८ ६ २ मं स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये ७ ५ पराक्रम स्थान में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त १० ४ करेगा और भाई बहिन की शक्ति पायेगा तथा
११ स्त्री पक्ष की सुन्दर शक्ति पायेगा और अपने पुरुषार्थ १ ३ से धन कमावेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से शत्रु १२ २ स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, नं. ६७५ इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा और दिक्कतों पर विजय पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म का पालन एवं ध्यान रखेगा और आठवीं नीच दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता का कष्ट प्राप्त करेगा और राज-समाज, उन्नति के मार्ग में रुकावटें एवं दिक्कतें रहेगी तथा कुछ परतंत्रता रहेगी। तुला लग्न में ४ मंगल यदि मकर का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की ८ ६ मकर राशि पर बैठा है तो घरेलू सुख की महान् ९ ७ ५ शक्ति पायेगा और माता की एवं भूमि की विशेषता १० मं. ४ पायेगा और धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा तथा चौथी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को ११ १ ३ स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, १२ २ इसलिये स्त्री की सुख शक्ति प्राप्त करेगा और नं. ६७६ रोजगार के मार्ग में विशेष वृद्धि एवं सुख पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि पिता एवं राजसमाज के स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख में कमी और राज-समाज में कुछ कमजोरी पायेगा और कारबारकी उन्नति में कुछ दिक्कतें पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा और अपने स्थान में मगन रहेगा। यदि कुम्भ का मंगल- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो धन स्थान पति कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये संतान पक्ष के सुख में कुछ दिक्कतें पायेगा और विद्या स्थान में कुछ दिक्कत के साथ शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री पक्ष के सुख में कुछ त्रुटि अनुभव करेगा तथा बुद्धि सम्बन्धित रोजगार के मार्ग से धन प्राप्त
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३५६ तुला लग्न का फलादेश तुला लग्न में ५ मंगल करेगा और कुटुम्ब से कुछ वैमनस्य पायेगा तथा चौथी दृष्टि से आयु एवं पुरोतत्व स्थान को सामान्य ८ ६ शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये ७ ५ जीवन के मार्ग में कुछ दिक्कतों के साथ-साथ १० ४ पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और सातवीं मित्र ११ दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख मं १ ३ रहा है, इसलिये रोजगार से खूब आमदनी करेगा १२ २ और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान नं.६७७ को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन की प्राप्ति में
करेगा। सफलता पायेगा तथा स्वार्थ सिद्धि के लिये कुछ कटु शब्द का प्रयोग भी
तुला लग्न में ६ मंगल यदि मीन का मंगल- छठें शत्रु स्थान में मित्र ६ गुरु की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर क्रूर V ९ ग्रह बड़ा शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये शत्रु ७ स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा और धन की संग्रह १० ४ शक्ति में कमी रहेगी तथा स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद या झंझट रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ ११ १ ३ परिश्रम एवं दिक्कतों पे सफलता मिलेगी तथा १२म. २ कुटुम्ब एवं गृहस्थ से कुछ परेशानी रहेगी औ नं.६७८ चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान को भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ वृद्धि करेगा तथा धर्म के मार्ग में स्वार्थ युक्त पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देखर रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थानों से अच्छा सम्बन्ध बनावेगा और आठवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता एवं देह के सुख में कुछ कमी पायेगा और देह में कुछ गरम विकार पायेगा तथा झगड़े झंझटों के मार्ग से फायदा करेगा। यदि मेष का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में विशेष शक्ति पायेगा किन्तु धन स्थानपति ग्रह कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ घिराव या इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ घिराव या कुछ दिक्कत सी रहेगी तथा भोगादिक की अच्छी शक्ति पायेगा और चौथी नीच दृष्टि से पिता स्थान को एवं राज-समाज, कारबार के स्थान को मित्र
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भृगु संहिता ३५७ तुला लग्न में ७ मंगल चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ हानि पायेगा तथा कारबार की उन्नति ८ ६ के मार्ग में कुछ कमजोरी या परतंत्रता पायेगा ९ ७ ५ और राज-समाज के अन्दर प्रभाव की कुछ कमी १० ४ रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से देह के स्थान का सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये ११ १ मं. ३ देह में कुछ गरम विकार पायेगा और आठवीं दृष्टि १२ २ से धन स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में नं. ६७९ स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की शक्ति पायेगा। तुला लग्न में ८ मंगल यदि वृषभ का मंगल-आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान पर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है ८ ६ तो स्त्री स्थान में संकट पायेगा तथा रोजगार के ९ ७ ५ मार्ग में परेशानी पायेगा और दूसरे स्थान से १० ४ सम्बन्धित रोजगार के मार्ग में परेशानी पायेगा और दूसरे स्थान से सम्बन्धित रोजगार चलावेगा ११ १ ३ २मं. और पुरातत्व शक्ति का सहयोग पायेगा तथा गृहस्थ १२ के सम्बन्ध में चिन्ता रहेगी और चौथी मित्र दृष्टि नं. ६८० से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी की शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में धन स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये धन की कुछ शक्ति परिश्रम से और पुरातत्व से पायेगा ओर कुटुम्ब का थोड़ा सा सहयोग प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की कुछ शक्ति पायेगा तथा पराक्रम स्थान से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ९ मंगल यदि मिथुन का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर ८ ६ बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन की वृद्धि ९ ७ ५ पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में भाग्य से अच्छा १० ४ सहयोग मिलेगा ओर भाग्यवती स्त्री पायेगा तथा
११ शादी के बाद भाग्य की उन्नति होगी और धर्म के ३ योग से धन की वृद्धि पायेगा और गृहस्थ धर्म का १२ २ मं. उत्तम पालन करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से खर्च नं. ६८१ एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों में फायदे का योग
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३५८ तुला लग्न का फलादेश पायेगा और सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई का कुछ अच्छा योग पायेगा तथा पराक्रम स्थान में सफलता पायेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान की वृद्धि करेगा और भूमि-मकानादि की सुख शक्ति पायेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्धित सुखों की वृद्धि करेगा तथा लौकिक पारलौकिक दोनों का ध्यान रखेगा। तुला लग्न में १० मंगल यदि कर्क का मंगल- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर चन्द्रमा की राशि ६ V पर बैठा है तो पिता स्थान में हानि करेगा तथा ९ ७ ५ राज समाज में मान प्रतिष्ठा की कमी पायेगा १० ४ मं. और कारबार के मार्ग में पूरी उन्नति नहीं कर ११ सकेगा तथा कुछ परतंत्रता युक्त कर्म से कार्य १ ३ करेगा और धन एवं रोजगार की कमजोरी रहेगी १२ २ नं. ६८२ तथा कुटुम्ब में कुछ अशांति रहेगी और स्त्री पक्ष में भी कुछ क्लेश एवं कुछ कमी के कारण प्राप्त रहेंगे तथा चौथी मित्र दृष्टि से देह के सीन को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलियेल देहल में कुछ कमजोरी ओर कुछ मान प्राप्त करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान एवं भूमि स्थान की शकित पायेगा ओर आठवीं शत्रु दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ वैमनस्य प्राप्त करेगा और विद्या बुद्धि की शक्ति से स्वार्थ पूर्ण और नीरसता युक्त बातें करेगा। तुला लग्न में ११ मंगल यदि सिंह का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो रोजगार के ८ ६ ९ मार्ग से बहुत धन लाभ पायेगा और स्त्री स्थान ७ ५ मं. का विशेष लाभ पायेगा क्योंकि ग्यारहवें स्थान १० ४ पर क्रूर ग्रह बहुत शक्तिशाली हो जाता है और चौथी दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं ११ १ ३ अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र,देख रहा है, १२ २ इसलिये धन संग्रह की शक्ति पायेगा तथा सातवीं नं. ६८३ शत्रु दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ वैमनस्य या नीरसता पायेगा और शब्द शैली में स्वयं युक्त बातें करेगा और आठवीं
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भृगु संहिता ३५९ मित्र दृष्टि से शत्रुस्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव और लाभ पायेगा तथा झगड़े-झंझटों से फायदा उठावेगा। तुला लग्न में १२ मंगल यदि कन्या का मंगल-बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र अुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा ८ ६ मं. अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध ९ ७ 4 पायेगा और धन एवं कुटुम्ब की हानि पायेगा १० ४ तथा रोजगार व स्त्री स्थान में हानि एवं कमजोरी प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ सुख में बाधा पायेगा ११ १ ३ और चौथी मित्र दृष्टि से भाई एवं पुरुषार्थ के १२ २ स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की नं. ६८४ शक्ति पायेगा तथा पुरुषार्थ के स्थान में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये व्यवहारिक एवं धन की शक्ति से शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा और आठवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कमजोरी लिए हुए शक्ति पायेगा और रोजगार के पक्ष में दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त करेगा। भाग्य, धर्म, खर्च, बाहरी स्थानपति-बुध तुला लग्न में १ बुध यदि तुला का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र शुक्र की रााशि पर बैठा है तो भाग्य की ८ ६ उत्तम शक्ति पायेगा तथा शानदार खर्च करेगा ७ बु. ५ और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भाग्य की उन्नति १० ४ का योग प्राप्त करेगा किन्तु व्ययेश होने के कारण से देह में कुछ दुर्बलता पायेगा तथा भाग्य के ११ १ ३ स्थान में कुछ कमी महसूस करेगा और कुछ कमी १२ २ लिये हुए धर्म का सुन्दर पालन करेगा तथा सातवीं नं. ६८५ मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के मार्ग में भाग्य एवं बाहरी स्थान से विवेक की शकित के द्वारा सफलता पायेगा और स्त्री स्थान से सुन्दर सहयोग पायेगा। यदि वृश्चिक का बुध- दूसरे धन स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य एवं बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन की वृद्धि करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष कारणों से धन के दोष में कुछ कमजोरी रहेगी और
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३६० तुला लग्न का फलादेश तुला लग्न में २ बुध कुटुम्ब स्थान में कुछ कमी के साथ उत्तम सम्बन्ध पायेगा तथा खर्चा खूब करेगा और धर्म के पालन ८बु. ६ में कुछ स्वार्थ का अधिक ध्यान रखेगा और सातवीं ९ ७ ५ मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को शुक्र १० ४ की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की दिनचर्या में कुछ शक्ति एवं भाग्यवानी पायेगा ११ १ ३ और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति १२ २ का लाभ पायेगा तथा धनवान् व इज्जतदार माना नं. ६८६ जायेगा। तुला लग्न में ३ बुध यदि धन का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाई- ८ ६ बहिन की शक्ति पायेगा और पराक्रम की सफलता ९बु. ७ ५ पायेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भाग्योन्नति १० ४ के मार्ग मं कुछ कमजोरी पायेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी ११ १ ३ मिथुन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये १२ २ भाग्य की वृद्धि पायेगा और धर्म का पालन करेगा नं. ६८७ तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा यश प्राप्त करेगा और भाग्य तथा पुरुषार्थ की शक्ति से खर्चा खूब करेगा तथा धर्म और ईश्वर के सम्बन्ध में विवेक शक्ति के अन्दर कुछ कमी लिये हुये कुछ विशेष धर्म का पालन करेगा। तुला लग्न में ४ बुध यदि मकर का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं ६ भूमि के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है ९ तो माता के स्थान की सुख शक्ति पायेगा और ५ भूमि मकानादि की शक्ति पायेगा। किन्तु व्ययेश १० ब. ४ होने के दोष कारणों से घरेलू सुख शान्ति में कमी ११ रहेगी और भूमि के सुख में भी कुछ कमजोरी ३ रहेगी तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से घर बैठे १२ २
नं. ६८८ भाग्य की वृद्धि के साधन विवेक शक्ति से पायेगा और खर्चा खूब आनन्द पूर्वक करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा राज- समाज में मान प्राप्त करेगा। यदि कुम्भ का बुध- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और
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भृगु संहिता ३६१ तुला लग्न में ५ बुध विद्या बुद्धि एवं विवेक की अच्छी शक्ति पायेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण संतान पक्ष ८ ६ में कुछ त्रुटि रहेगी और विद्या स्थान में कुछ कमी ९ ७ ५ रहेगी तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से बुद्धि १० ४ योग द्वारा भाग्य की वृद्धि पायेगा और बड़ी ११ बुद्धिमत्ता से खर्चा खूब करेगा तथा धर्म का ज्ञान बु. १ ३ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान १२ २ को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ६८९ और भाग्यवान् माना जायेगा। बुद्धि योग द्वारा धन लाभ की आमदनी खूब करेगा
तुला लग्न में ६ बुध यदि मीन का बुध- छठें शत्रु स्थान में नीच का होकर गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान ८ ६ में परेशानी पायेगा और खर्च के संचालन में ९ ७ 4 दिक्कतों के मार्ग से काम करेगा तथा भाग्य के १० ४ पक्ष में बड़ी कमजोरी पायेगा और धर्म का पालन ठीक नहीं कर सकेगा तथा कुछ कठिनाईयों के ११ १ ३ द्वारा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से भाग्य की शक्ति १२बु २ का साधन पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च नं. ६९० के स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये कमी के होते हुए भी खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध पायेगा और खर्चे में मार्ग में नीरसता रहेगी। तुला लग्न में ७ बुध यदि मेष का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर ८ ६ बैठा है तो भाग्य की शक्ति और बाहरी स्थानों के ९ ७ ५ योग से रोजगार में सफलता पायेगा तथा भाग्य १० का सुन्दर योग पायेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष ४ कारण से स्त्री तथा रोजगार के मार्ग में कुछ कमी ११ १ बु. ३ महसूस करेगा और गृहस्थ के स्थान में खर्च की १२ २ सुन्दर शक्ति पायेगा और धर्म का कुछ पालन नं. ६९१ : करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है इसलिये देह के मान पायेगा और गृहस्थ के सम्बन्ध से भाग्यवान् समझा जायेगा तथा विवेक शक्ति से यश और मान प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का बुध- आठवें आयु, मृत्यु तथा एवं पुरातत्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में बड़ी कमजोरी पायेगा
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३६२ तुला लग्न का फलादेश तुला लग्न में ८-बुध और धर्म के पक्ष में हानि पायेगा और खर्च के मार्ग में कमी एवं कुछ परेशानी पायेगा और बाहरी ८ ६ स्थानों के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतों के साथ ९ ५ सफलता शक्ति पायेगा और आयु स्थान में कुछ १० ४ शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन भवन को ११ १ ३ मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये १२ २बु. कुछ कठिनाईयों के मार्ग से धन की वृद्धि के नं. ६९२ कारण पायेगा तथा यश की कमी रहेगी। तुला लग्न में ९ बुध यदि मिथुन का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री ६ बैठा है तो भाग्य की वृद्धि एवं शक्ति पायेगा और ९ ७ धर्म के मार्ग में श्रद्धा रखेगा तथा बहरी स्थानों के १० ४ सम्बन्ध से विवेक की सुन्दरता शक्ति द्वारा भाग्य की उन्नति का मार्ग पायेगा और भाग्य की शक्ति ११ १ से खर्चा खूब करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष १२ २ कारण से भाग्य के अन्दर कुछ कमजोरी अनुभव नं. ६९३ करेगा तथा धर्म का पालन ठीक तौर से पूरा नहीं कर सकेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति रहेगी तथा पुरुषार्थ स्थान में कुछ कमजोरी के साथ सफलता मिलेगी। तुला लग्न में १० बुध यदि कर्क का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र चन्द्र की राशि पर बैठा है तो ८ ६ पिता के स्थान में भाग्य शक्ति से सफलता प्राप्त ९ ७ ५ करेगा और राज-समाज में मान रहेगा तथा कारबार १० ४ बु. के मार्ग में बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में खर्चा खूब करेगा और सफलता मिलेगी किन्तु व्ययेश होने ११ १ ३ के दोष कारण से पिता के लाभ स्थान में कुछ २ २ कमी रहेगी और कारबार की उन्नति एवं राज- नं. ६९४ समाज के पक्ष में भी कुछ कमजोरी रहेगी तथा धर्म-कर्म का थोड़ा पालन ठीक से रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शनि की मकर राशि में माता एवं भूमि स्थान को देख रहा है, इसलिये मातृ स्थान और भूमि की कुछ शक्ति पायेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा। यदि सिंह का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति और बाहरी स्थान के सम्बन्ध से आमदनी के
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भृगु संहिता ३६३ तुला लग्न में ११ बुध मार्ग में अच्छी सफलता मिलेगी तथा भाग्यवान् माना जायेगा तथा धर्म का पालन भी करेगा और ८ ६ ९ ७ ५बु. व्ययेश होने के दोष के कारण लाभ स्थान में कुछ कमजोरी के भी कारण प्रतीत होंगे और १० ४ सातवीं दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को मित्र ११ १ ३ शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये
१२ २ संतान पक्ष में कुछ शक्ति पायेगा और विद्या में
नं. ६९५ सफलता पायेगा क्योंकि बुध विवेक शक्ति का दाता है, इसलिये बुद्धि विवेक और वाणी की योग्यता से भाग्य में उन्नति के कारण पायेगा। तुला लग्न में १२ बुध यदि कन्या का बुध- बारहवें खर्च स्थान
६ बु एवं बाहरी स्थान में स्वयं अपनी राशि में उच्च ८ ७ का होकर स्वक्षेत्र में बैठा है तो बाहरी स्थानों के 4 सम्बन्ध से भाग्य की उन्नति पायेगा और खर्चा १० ४ विशेष करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष के ११ १ ३ कारणों से भाग्य की उन्नति के मार्ग में दिक्कतें १२ २ एवं कुछ कमजोरी अनुभव होगी तथा देर से
भाग्यवान् समझा जायेगा तथा खर्च के मार्ग से धर्म का पालन करेगा और नं. ६९६ सफलता मिलेगी और बाहरी स्थानों में विशेष
सातवीं नीच दृष्टि में शत्रु स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ अशान्ति एवं कुछ अनुचित रूप से कार्य निकाला जायेगा पर कुछ दिक्कतें रहेंगी।
i भाई, पराक्रम, शत्रु, दिक्कतस्थानपति-गुरु तुला लग्न में १ गुरु यदि तुला का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान
८ ६ पर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह ९ ७ गु. ५ में प्रभाव एवं पुरुषार्थ की शक्ति पायेगा तथा कुछ रोग और झंझट आदि परिश्रम का योग पायेगा १० X और पुरुषार्थ के द्वारा मान पायेगा तथा भाई- ११ १ ३ बहिन का योग कुछ नीरसता युक्त मार्ग से पायेगा १२ २ और शत्रु पक्ष में आदर्श मार्ग से एवं हिम्मत शक्ति नं. ६९७ से प्रभाव पायेगा और पाँचवीं शत्रु दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान
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३६४ तुला लग्न का फलादेश पक्ष मे कुछ वैमनस्यता पायेगा और विद्या बुद्धि में शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि एवं वाणी के द्वारा उत्थान पाने के लिये विशेष परिश्रम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री तथा रोजगार के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार में शक्ति पायेगा तथा स्त्री स्थान में सहयोग का अच्छा सम्बन्ध पायेगा और नवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा और धर्म के मार्ग में जानकारी एवं पालन करके यश प्राप्त करेगा। तुला लग्न में २ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ८गु. ६ पुरुषार्थ की शक्ति से धन की वृद्धि का योग ९ ७ ५ प्राप्त करेगा और धन का स्थान बन्धन का कार्य १० ४ भी करता है, इसलिये भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कमी पायेगा और पाँचवीं दृष्टि से शत्रु स्थान ११ १ ३ को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख १२ २ रहा है, इसलिये धन की शक्ति और हिम्मत शक्ति नं. ६९८ से शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और परिश्रम एवं कुछ झंझटों के योग से धन की शक्ति पायेगा तथा कुटुम्ब स्थान में प्रभाव शक्ति पायेगा और धन की वृद्धि करने के लिये निरंतर परिश्रम एवं उद्योग में लगा रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में कुछ नीरसता से युक्त शक्ति पायेगा और पुरातत्व की कुछ शक्ति पायेगा तथा नवीं उच्च दृष्टि से राज्य स्थान एवं पिता स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति पायेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और कारबार में बड़ी उन्नति करेगा तथा आदर्श परिश्रम के मार्ग से हृदय बल की शक्ति से बड़ा प्रभाव और इज्जत पायेगा। तुला लग्न में ३ गुरु यदि धन का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम ८ ६ स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है ९गु. ७ ५ तो पराक्रम और पुरुषार्थ की महान् सीलता शक्ति मिलेगी तथा शत्रु स्थानपति होने के कारण से १० ४ भाई बहिन की शक्ति में कुछ झंझट रहेगा। किन्तु ११ १ ३ शत्रु पक्ष में विजय और प्रभाव प्राप्त करेगा और १२ २ झगड़े-झंझट, परिश्रम आदि दिक्कतों के मार्ग नं. ६९९ से शक्ति और हिम्मत पायेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की
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भृगु संहिता ३६५ मेष राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के योग से रोजगार एवं स्त्री स्थान से सफलता और प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म से भाग्य की वृद्धि पायेगा और धर्म का यथा साध्य पालन करेगा और नवमी मित्र दृष्टि में लाभ स्थान को सूर्य भी सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ के द्वारा धन की आमदनी प्राप्त करेगा तथा
युक्त रहेगा। अपनी प्रत्येक आवश्यकतओं की पूर्ति के साधन प्राप्त करेगा और प्रभाव
तुला लग्न में ४ गुरु यदि मकर का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर नीच का होकर शत्रु शनि की ८ ६ ९ ७ राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में सुख शान्ति ५ की कमी और कष्ट का अनुभव करेगा तथा भूमि १० गु. ४ मकानादि के सुख में कुछ कमी पायेगा और भाई ११ १ ३ बहिन के सुख में भी कमी रहेगी और शत्रु पक्ष में १२ २ झगड़े झंझटों के सम्बन्ध से सुख शान्ति में बाधा रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिए जीवन नं. ७००
की दिनचर्या में प्रभाव की शक्ति पायेगा और पुरातत्व स्थान का कुछ लाभ पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से राज्य स्थान एवं पिता स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये राज-समाज में विशेष मान एवं प्रभाव पायेगा तथा पिता स्थान की शक्ति पायेगा और कारबार मान प्रतिष्ठा आदि के मार्ग में खूब सफलता प्राप्त करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा।
तुला लग्न में ५ गुरु यदि कुम्भ का गुरु-पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर शत्रु राशि की राशि पर बैठा ८ ६ है तो संतान पक्ष में कुछ दिक्कतें एवं कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति मिलेगी और विद्या स्थान 10
१० में कुछ कठिन परिश्रम के योग से सफलता एवं ४ ११ प्रभाव पायेगा तथा वाणी की शक्ति के द्वारा शत्रु गु १ ३ स्थान में प्रभाव और विजय मिलेगा, किन्तु दिमाग १२ २ के अन्दर कुछ झंझटों से परेशानी का अनुभव नं. ७०१ होगा तथा भाई-बहिन के पक्ष में कुछ मतभेद
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३६६ तुला लग्न का फलादेश रहेगा और पराक्रम शक्ति का प्रयोग बुद्धि और युक्ति के द्वारा किया जायेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के योग से भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का यथा शक्ति पालन करेगा और यश प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धन लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा और नवमीं दृष्टि से देह में सम्मान और प्रभाव की शक्ति पायेगा और छठें स्थान पति होने के दोष से स्वास्थ्य एवं संतान में कुछ त्रुटि रहेगी। तुला लग्न में ६ गुरु यदि मीन का गुरु- छठें शत्रु स्थान में स्वयं ८ ६ अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु स्थान में ९ ७ ५ आदर्श मार्ग से महान् प्रभाव की शक्ति पायेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से पुरुषार्थ में सफलता १० ४ शक्ति पायेगा तथा छठें स्थान का स्वामी होने के ११ १ ३ दोष कारणों से भाई-बहिन के सम्बन्धों में कुछ १२गु. २ वैमनस्यता प्राप्त होगी तथा पुरुषार्थ कर्म में कुछ परतन्त्रता युक्त प्रभाव की शक्ति पायेगा और पाँचवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में नं. ७०२
देख रहा है, इसलिये पिता के स्थान की उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्त करेगा और कारबार में वृद्धि प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और पुरुषार्थ कर्म के योग से बाहरी स्थानों में सफलता शक्ति पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम की विशेष शक्ति पायेगा और इज्जतदार माना जायेगा। तुला लग्न में ७ गुरु यदि मेष का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार ८ ६ के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ९ ७ स्त्री स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ ५ शक्ति के द्वारा रोजगार में उन्नति करेगा किन्तु शत्रु १० ४ स्थान पति होने के दोष के कारण से स्त्री पक्ष में ११ १ गु. ३ कुछ मतभेद रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ १२ २ अधिक परिश्रम करना पड़ेगा तथा भाई-बहिन के पक्ष में कुछ दिक्कत रहेगी और पाँचवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राश में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ नं. ७०३
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भृगु संहिता कर्म के योग से धन लाभ की शक्ति पायेगा तथा आवश्यकताओं की पूर्ति ३६७
पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और नवमी दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पराक्रम स्थान की वृद्धि करेगा तथा भाई बहिन की सुख शक्ति में कुछ कमी लिये हुये सहयोग पायेगा। तुला लग्न में ८ गुरु यदि वृष का गुरु- आठवें आयु एवं मृत्यु ६ तथा पुरातत्व स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की ८ वृषभ राशि में बैठा है तो भाई बहिन की सुख ९ शक्ति में कमी पायेगा और पराक्रम स्थान के १० ४ सम्बन्ध में कमजोरी पायेगा तथा शत्रु पक्ष के
११ सम्बन्ध से जीवन में कुछ परेशानी सी रहेगी और १ ३ छठे रोग स्थान का स्वामी होने के कारण उदर के १२ २गु. नीचे कुछ शिकायत रहेगी पाँचवीं मित्र दृष्टि से नं. ७०४ खर्च स्थान को एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए परिश्रम के योग से खर्च स्थान का संचालन करेगा तथा बाहरी स्थानों में शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन, परिवार द्वितीय घर में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के साधन बढ़ायेगा तथा कुटुम्ब से कुछ सहयोग पायेगा तथा नवमी नीच दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कमी एवं क्लेश प्राप्त करेगा और भूमि, मकानादि के सुख में एवं मातृ स्थान के सम्बन्धों में विशेष कमी रहेगी और कुछ परतंत्रता का अनुभव करेगा। तुला लग्न में ९ गुरु यदि मिथुन का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है ८ ६ तो परिश्रम के योग से भाग्य की वृद्धि और यश ९ ७ ५ पायेगा तथा शत्रु पक्ष और झगड़े-झंझटों के योग १० ४ से भाग्य में कुछ परेशानी रहेगी तथा धर्म के .-- पालन स्थान में कुछ वृद्धि एवं कमजोरी पायेगा ११ १ ३ गु और पाँचवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य १२ २ शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ७०५ देह में कुछ परेशानी को लिये हुए प्रभाव की शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पराक्रम की विशेष सफलता शक्ति, भाग्य और परिश्रम के योग से पायेगा तथा भाई-बहिन
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३६८ तुला लग्न का फलादेश की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा और नवीं शत्रु दृष्टि से विद्या, बृद्धि उवं सन्तान स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा विद्या के स्थान में परश्रिम के योग से शक्ति प्राप्त करेगा और वाणी एवं बुद्धि के द्वारा प्रभाव की शक्ति और बड़ी योग्यता पायेगा। तुला लग्न में १० गुरु यदि कर्क का गरु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में उच्च का होकर चन्द्रमा की राशि ६ V पर बैठा है तो पिता के स्थान में वृद्धि, तथा राज- ९ ७ ५ समाज में मान और इज्जत मिलेगी और कारबार १० ४ गु. के मार्ग में उन्नति एवं सफलता पायेगा और भाई- बहिन का योग, तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से धन ११ १ ३ एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में १२ २ देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब को शक्ति का गौरव पायेगा तथा तथा सातवीं नीच दृष्टि से सुख भवन, मातृ स्थान की शनि की मकर नं. ७०६
राशि में देख रहा है, इसलिये मातृस्थान के सुख में कमी प्राप्त होगी और मकानादि रहने के स्थानों में कुछ त्रुटि रहेगी तथा नवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में विजय और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा झगड़े-झंझट आदि के मार्गों से तथा स्वयं परिश्रम और दौड़धूप के योग से उन्नति के कारण मान वृद्धि तथा छठे स्थान का स्वामी होने के दोष से भाई-बहिन और पिता के सम्बन्ध में कुछ मतभेद रहेगा। तुला लग्न में ११ गुरु यदि सिंह का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र सूर्य की राशि में बैठा है तो परिश्रम के योग ८ ६ से आमदनी के मार्ग में गौरव प्राप्त करेगा और ९ ७ ५ गु. शत्रु पक्ष की तरफ से लाभ युक्त एवं प्रभाव युक्त १० रहेगा और झगड़े-झंझट युक्त मार्गों से लाभ होगा ४ तथा पाँचवीं दृष्टि से पराक्रम एवं भाई-बहिन के ११ १ ३ स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को १२ २ देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का नं. ७०७ लाभ और पराक्रम स्थान की शक्ति के द्वारा विशेष सफलता पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान की शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और सन्तान पक्ष में कुछ नीरसता रहेगी, किन्तु बुद्धि के स्थान में शक्ति और युक्ति पायेगा और नवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा
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भृगु संहिता ३६९ है, इसलिये स्त्री पक्ष में शक्ति तथा रोजगार के मार्ग में सफलता शक्ति मिलेगी, किन्तु छठे स्थान का स्वमी होने के दोष के कारण से भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ मतभेद रहेगा और आमदनी के मार्ग में विशेष दौड़-धूप करनी पड़ेगी। तुला लग्न में १२ गुरु यदि कन्या का गुरु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो ६ गु V खर्चा बहुत करेगा तथा बाहरी स्थानों में शक्ति ९ ७ ५ प्राप्त करेगा और भाई-बहिन के पक्ष में कमजोरी १० ४ होगी तथा पुरुषार्थ शक्ति में कमजोरी रहेगी और ११ कुछ परतन्त्रता का-सा योग पायेगा तथा पाँचवीं १ ३ नीच दृष्टि से माता के सुख स्थान को शनि की १२ २ मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख- नं. ७०८ सम्बन्धों में कमी एवं कष्ट प्राप्त करेगा और मकानादि रहने के सुख स्थान में कुछ अशांति रहेगी तथा सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बाहरी स्थानों के योग से तभा कुछ दब्बू नीति से एवं छिपी नीति से शत्रु पक्ष में मतलब सिद्ध करेगा तथा प्रभाव की कमजोरी रहेगी और नवीं दृष्टि से आयु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या एवं आयु में कुछ झंझटों के साथ शक्ति मिलेगी और पुरातत्व का कुछ लाभ पायेगा तथा छठे स्थान का स्वामी होने के दोष-कारण से खर्च के मार्ग में, बाहरी सम्बन्धों में तथा भाई-बहिन आदि के पक्षों में कुछ परेशानी और झंझट-सी रहेगी। देह, आयु, पुरातत्त्वस्थानपति-शुक्र तुला लग्न में १ शुक्र यदि तुला का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो देह में ६ V ९ ७ श. आत्मबल की शक्ति तथा आयु की सुन्दर शक्ति 4 मिलेगी और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व १० ४ शक्ति का आदर्श लाभ पायेगा तथा देह के अन्दर प्रभाव और मान की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा। ११ १ ३ किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से देह में १२ २ कुछ परेशानी अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से नं. ७०९ सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में रोजगार तथा स्त्री स्थान को देख रहा है, इसलिये स्त्री के पक्ष में खूब आत्मीयता रखते हुए भी कुछ स्त्री के सुख में कमी पायेगा और रोजगार के पक्ष में विशेष
भृ. सं .- २४
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३७० तुला लग्न का फलादेश दिलचस्पी के साथ कार्य करने से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। तुला लग्न में २ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- दूसरे धन और कुटुम्ब स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है ८शु ६ ९ तो धन की शक्ति को प्राप्त करने के लिये विशेष ७ 4 प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति मिलेगी किन्तु १० ४ अष्टमेश होने के दोष के कारण से धन की संग्रह शक्ति में कमी पायेगा और कुटुम्ब के सुख-सम्बन्धों ११ १ ३ में कुछ अशान्ति रहेगी, किन्तु धन-जन की उन्नति १२ करने का ही मुख्य लक्ष्य रहेगा और सातवीं दृष्टि नं. ७१० से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या का रहन-सहन अमीरात के ढंग से व्यतीत होगा तथा बड़ी चतुराई के योग से इज्जत होगी। तुला लग्न में ३ शुक्र यदि धन का शुक्र- तीसरे भाई बहिन और पराक्रम स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर ८ ६ बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान में कुछ वैमनस्यता ९शु. ७ ५ होगी और पुरुषार्थ शक्ति के स्थान में आत्मबल १० ४ के योग और परिश्रम के द्वारा सफलता शीक्त
११ प्राप्त करेगा और आयु को शक्ति प्राप्त होगी तथा १ ३ जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति १२ २ का लाभ चतुराई के द्वारा प्राप्त करेगा और सातवीं नं. ७११ मित्र दृष्टि से भाग्य और धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक परिश्रम के योग से भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा धर्म स्थान की वृद्धि करने के लिए भी प्रयत्नशील रहेगा तथा देह की हिम्मत शक्ति के बल एवं चतुराई के योग से जीवन की दिनचर्या को प्रभावयुक्त व्यतीत करेगा। तुला लग्न में ४ शुक्र यदि मकर का शुद्र- चौथे केन्द्र माता और ६ भूमि के स्थान पर मित्र धनि की राशि में बैठा है V ७ ५ तो मातृ स्थान की शक्ति प्राप्त करेगा तथा देह को आराम के साधन पायेगा, किन्तु अष्टमेश होने १० शु. के दोष-कारण से माता के सुख और प्रेम की 半 9 业 心 ११ १ ३ कमी रहेगी तथा रहने के स्थान में भूमि का सुख १२ २ होगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व नं. ७१२ शक्ति का सुख रहेगा और सातवीं दृष्टि से राज्य
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भृगु संहिता ३७१ एवं पिता स्थान को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं कारबार की वृद्धि करने के लिये चतुराई के योग से प्रयत्नशील रहेगा और राज-समाज में मान प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ५ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या
८ ६ एवं संतान स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो आत्मबल की शक्ति और चतुराई के योग से ९ ७ ५ विद्या स्थान में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और १० ४ वाक्चातुरी के द्वारा प्रभाव और मान प्राप्त होगा ११ १ ३ तथा संतान शक्ति पायेगा किन्तु अष्टमेश होने के शु. दोष कारण से संतान पक्ष के सुख में कुछ त्रुटि १२ २
नं. ७१३ अनुभव होगी और आयु का उत्तम योग मिलेगा तथा कुछ पुरातत्त्व शक्ति का फायदा पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ के स्थान में कुछ अरूचिकर रूप से लाभ की शक्ति मिलेगी और बुद्धिमान् बनेगा। तुला लग्न में ६ शुक्र यदि मीन का शुक्र- छठे शत्रु स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है ८ ६ ९ तो शत्रु स्थान में विशेष प्रभाव रखेगा और बड़ी- ७ 4 बड़ी दिक्कतों पर हमेशा हिम्मत शक्ति के द्वारा १० ४ विजय प्राप्त करेगा तथा कुछ परतंत्रता युक्त जीवन व्यतीत करेगा और आयु की शक्ति का थोड़ा ११ १ ३ लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या में शानदारी १२शु. २ रहेगी तथा देह में कुछ रोग और झंझट थोड़ा-सा नं. ७१४ पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों में कुछ दिक्कतें होंगी। तुला लग्न में ७ शुक्र यदि मेष का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि ८ ६ पर बैठा है तो अष्टमेश होन के दोष के कारण से ९ ७ ५ स्त्री के पक्ष में कुछ दिक्कत पाते हुए आत्मीयता १० और शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में ४ देह के परिश्रम के योग से सफलता प्राप्त करेगा ११ १ शु. ३ और आयु की सुन्दर शक्ति मिलेगी तथा जीवन १२ २ को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ नं. ७१५ पायेगा तथा गृहस्थ जीवन में विकास तथा सातवीं
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३७२ तुला लग्न का फलादेश दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिए देह में सुन्दरता और आत्मशक्ति तथा प्रभाव पायेगा। तुला लग्न में ८ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- अष्टम आयु मृत्यु एवं पुरातत्त्व स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री ८ ६ बैठा है तो आयु के स्थान में शनि एवं वृद्धि प्राप्त ५ करेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व १० ४ शक्ति का लाभ पायेगा, किन्तु देहाधीश के अष्टम स्थान में बैठने के दोष के कारण शरीर की सुन्दरता ११ १ ३ ओर स्वास्थ्य में कमी प्राप्त होगी और बुढ़ापे के १२ २ शु. चिन्ह जल्दी दीखने लगेंगे और जीवन की दिनचर्या
से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख नं. ७१६ में शानदारी तथा प्रभाव रहेगा और सातवीं दृष्टि
रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये चतुराई युक्त कठिन कर्म करेगा और कुटुम्ब में कुछ वैमनस्यता होगी। तुला लग्न में ९ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है ८ ६ तो भाग्य शक्ति का आनन्द मिलेगा तथा धर्म ९ ७ ५ ओर ईश्वर में विश्वास रखेगा; किन्तु अष्टमेश होने १० ४ के दोष के कारण के अन्दर कुछ कमजोरी, और ११ जीवन की दिनचर्या को भाग्य के भरोसे पर रख १ ३ कर हृदय में लापरवाही रखेगा और आयु की १२ २ शु.
नं. ७१७ शक्ति पायेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ पायेगा और देह में कुछ शील तथा कुछ सुन्दरता पायेगा और सातवीं दृष्टि से भाई-बहिन एवं पुरुषार्थ स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के कुछ मतभेद पायेगा और पराक्रम स्थान में शक्ति पायेगा। तुला लग्न में १० शुक्र यदि कर्क का शुक्र- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर ८ ६ बैठा है तो देह में प्रभाव और मान की शक्ति ९ ७ ५ पायेगा और आयु की उत्तम शक्ति रहेगी किन्तु १० ४ शु. अष्टमेश होने के दोष कारण से पिता के सुख में कुछ कमी रहेगी और राज समाज में मान मिलेगा ११ १ ३ तथा व्यापार कार्य के स्थान में कुछ कठिनाईयों १२ २ के साथ-साथ शक्ति प्राप्त करेगा और उन्नति प्राप्त नं. ७१८ करने के लिये दैहिक परिश्रम के द्वारा चतुराईयों
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भृगु संहिता ३७३ के योग से विशेष प्रयत्न करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं सुख भवन का शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये माता का सुख और घरेलू सुख प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ११ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम ८ ६ और चतुराई के योग से आमदनी के मार्ग से ९ ७ ५शु. सफलता और अनेक प्रकार की आवश्यकताओं १० ४ की पूर्ति प्राप्त करेगा तथा आयु की शक्ति पायेगा और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति ११ १ ३ का लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या में लाभ १२ २ का आनन्द मानेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या नं. ७१९ एवं सन्तान स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में कुछ थोड़ी-सी अड़चन के साथ उत्साह शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा प्रभाव शक्ति पायेगा। तुला लग्न में १२ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- बारहवें खच एवं बाहरी स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर ८ ६ शु बैठा है तो खर्च के स्थान में विशेष परेशानी अनुभव ९ ५ करेगा और बाहरी स्थान में कुछ दिक्कतें रहेंगी १० ४ तथा आयु के सम्बन्ध में कमी और कष्ट के कारण ११ बनेंगे तथा देह के पक्ष में कमजोरी एवं दुर्बलता ३ रहेगी और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व १२ २ शक्ति को हानि प्राप्त होगी तथा हृदय में कुछ नं. ७२० अशान्ति रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में विशेष प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट आदि मार्गों में बड़ी भारी हिम्मत और विशेष चतुराईयों से काम निकालेगा। माता, भूमि, सुख, विद्या, संतानस्थानपति-शनि यदि तुला का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह में स्थूलता एवं प्रभाव पायेगा और मातृ स्थान की सुख शक्ति को उत्तम रूप से प्राप्त करेगा और भूमि, मकानादि की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा संतान पक्ष से सुख शक्ति मिलेगी और विद्या का उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सम्बन्ध
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३७४ तुला लग्न का फलादेश तुला लग्न में १ शनि में कुछ वैमनस्यता पायेगा तथा पराक्रम स्थान में कुछ अधिक परिश्रम करने से सफलता शक्ति ८ ६ मिलेगी और सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार ९ ७ श. ५ के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, १० ४ इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद रहने के कारण थोड़ा-सा कष्ट का अनुभव होगा और रोजगार के ११ १ ३ मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ सहन करनी पड़ेगी तथा १२ २ दसवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को नं. ७२१ चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख में कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज में कुछ मान रहेगा तथा कारबार में शक्ति मिलेगी। तुला लग्न में २ शनि यदि वृश्चिक का शनि- दूसरे धन स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन के सुख- ८श. ६ सम्बन्धों में कुछ नीरसता युक्त मार्ग से सफलता ९ ७ ५ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के सुख में कुछ मतभेद १० ४ रहेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य २१ करता है, इसलिये संतान पक्ष के सुख में कुछ १ ३ कमी रहेगी और विद्या की कुछ शक्ति प्राप्त करेगा, १२ २ नं. ७२२ किन्तु धन वृद्धि करने में ही सुख का अनुभव करेगा तथा तीसरी दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की सहायता शक्ति एवं भूमि की शक्ति का सुख प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आठवें आयु स्थान एवं पुरातत्त्व स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्त्व शक्ति का लाभ जीवन के सहायता के रूप में प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा आमदनी की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा और आमदनी की वृद्धि करने के लिये कठिन मार्ग से भी लाभ की सूरतें बुद्धि योग द्वारा स्थापित करेगा। यदि धन का शनि- तीसरे भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति की विशेष सफलता पायेगा और कुछ वैमनस्यता युक्त रूप से भाई-बहिन की शक्ति मिलेगी तथा मातृ स्थान की शक्ति प्राप्त होगी और परिश्रम के योग से प्रभाव और सुख तथा हिम्मत शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से विद्या एवं संतान पक्ष को स्वयं अपनी कुम्भ
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भृगु संहिता ३७५ तुला लग्न में ३ शनि राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या की विशेष शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में शक्ति ६ V और सुख मिलने पर भी कुछ मतभेद रहेगा तथा ९श ७ ५ वाणी में उत्तेजना रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से १० ४ भाग्य स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा ११ १ ३ तथा धर्म में रूचि रखेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से १२ २ खर्च एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में नं. ७२३ देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ४ शनि यदि मकर का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं
६ भूमि के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री ८ बैठा है तो माता की सुख-शक्ति प्राप्त करेगा और ५ मकानादि भूमि के स्थान की उत्तम शक्ति और १० श ४ सुख प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष से सुख प्राप्त
११ करेगा और विद्या को सुखपूर्वक ग्रहण करेगा १ ३ तथा तीसरी दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन १२ २ राशि में शत्रु भाव से देख रहा है, इसलिये शत्रु नं. ७२४ स्थान में विशेष प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में विशेष नीरसता का भाव रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता स्थान एवं राजस्थान को चन्द्रमा की कर्क-राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ मतभेद युक्त सुख शक्ति पायेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्ति और कारबार की वृद्धि के लिये शान्ति से काम करेगा और दसवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता, सुडौलता और आनन्द प्राप्त करेगा तथा बुद्धियोग द्वारा देह में मान और प्रभाव का सुख भोगेगा। तुला लग्न में ५ शनि यदि कुम्भ का शनि- पाँचवें त्रिकोण संतान एवं विद्या के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री ८ ६ बैठा है तो संतान पक्ष में शक्ति पायेगा तथा विद्या- ९ ७ ५ बुद्धि से सुख शक्ति प्राप्त करेगा और मातृ स्थान १० का एवं भूमि स्थान का सुख मिलेगा तथा वाणी ४ -L- ११ के द्वारा गम्भीर प्रभावशाली बातें करेगा और तीसरी श. १ ३ नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मंगल १२ २ की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में नं. ७२५ कुछ मतभेद एवं कुछ कष्ट के कारण प्राप्त होंगे
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३७६ तुला लग्न का फलादेश और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियों से कार्य संचालित होगा तथा गृहस्थ भोगादिक पक्ष में कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से सफलता मिलेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि में धन भवन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कुछ त्रुटि युक्त सुख का अनुभव करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ मतभेद रहेगा, किन्तु बुद्धि में आनन्द मानेगा। तुला लग्न में ६ शनि यदि मीन का शनि- छठे शत्रु स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो माता के सुख-सम्बन्धों ८ ६ में कमी और वैमनस्यता का योग पायेगा तथा ९ ७ ५ मकानादि रहने के स्थान में कुछ झंझट का योग १० होगा और संतान पक्ष के सुख-संबंधों में दिक्कत ४ और परेशानी पायेगा और विद्या के स्थान में कुछ ११ १ ३ कमी और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा छठे स्थान पर १२श २ क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये शत्रु स्थान नं. ७२६ में बुद्धि योग से विजय एवं प्रभाव प्राप्त करेगा तथा दिमाग के अन्दर कुछ शांति की कमी पायेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से आयु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्त्व की कुछ सुख-शक्ति मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान को एवं बाहरी स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा तथा बाहरी स्थान का सुख-सम्बन्ध होगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता पायेगा। किन्तु पुरुषार्थ एवं हिम्मत की वृद्धि करेगा। तुला लग्न में ७ शनि यदि मेष का शनि-सातवें केन्द्र स्त्री स्थान एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर शत्रु ८ ६ ९ मंगल की राशि पर बैठा है तो स्त्री गृहस्थ के ७ ५ सुख-साधनों में कमी एवं परेशानी प्राप्त होगी १० ४ और रोजगार के मार्ग में कुछ परतन्त्रता एवं अशांति के कारण बनेंगे तथा विद्या में कुछ कमजोरी ११ १ श. ३ रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त १२ २ होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परतन्त्रता एवं नं. ७२७ अशांति के कारण बनेंगे तथा विद्या में कुछ कमजोरी रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा तीसरी मित्र दृष्टि से, भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है,
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भृगु संहिता ३७७ इसलिये बुद्धि योग द्वारा भाग्य की वृद्धि तथा धर्म के मार्ग में रुचि रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए देह का लम्बा कद एवं कुछ आराम और मान के साधन प्राप्त होंगे और दसवीं दृष्टि से माता, भूमि एवं सुख भवन को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि के द्वारा किये गये कठिन परिश्रम के रोजगार से घरेलू सुख के साधन मिलेंगे तथा मातृ स्थान का कुछ शक्ति पायेगा किन्तु गृहस्थ के सुख सम्बन्धों में कमी के कारणों से दिमाग में कुछ फिकर रहेगी। तुला लग्न में ८ शनि यदि वृषभ का शनि- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्त्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है L ६ तो माता के सुख में कमी होगी तथा भूमि की ९ ७ ५ थोड़ी-सी पैतृक शक्ति और जीवन को सहायक १० ४ होने वाली कुछ पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा आठवें स्थान पर शनि दीर्घायु करता है, ११ १ ३ इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा विद्या और १२ २ श. नं. ७२८ सन्तान पक्ष में कुछ कमी एवं कष्ट होगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि मो देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता होगी और राज-समाज में कुछ कमी का सम्बन्ध और उन्नति के मार्ग में कुछ नीरसता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष स्थान में कुछ कमी रहेगी तथा कुटुम्ब के पक्ष में कुछ नीरसता का योग पायेगा और दसवीं दृष्टि से सन्तान एवं विद्या स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या एवं सन्तान पक्ष में कुछ थोड़ी सुख- शक्ति मिलेगी और मृत्यु स्थान में बैठा है, इसलिये दिमाग मे कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा बुद्धि में कुछ छिपाव की शक्ति से काम लेगा। तुला लग्न में ९ शनि यदि मिथुन का शनि- नवमत्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है BE 51 ८ ६ तो बुद्धि योग द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा ९ ७ ५ धर्म में रुचि रखेगा और उत्तम रूप से विद्या ग्रहण १० करेगा तथा संतान शक्ति का उत्तम सुख प्राप्त ४ करेगा और मातृ स्थान की शक्ति का सुख प्राप्त ११ १ ३ श करेगा तथा मकानादि भूमि का आनन्द पायेगा १२ २ और भाग्यवान् माना जायेगा तथा तीसरी शत्रु नं. ७२९ दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु सूर्य की सिंह राशि में
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३७८ तुला लग्न का फलादेश देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसता से सफलता शक्ति मिलेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ मतभेद होगा और विशेष परिश्रम के द्वारा पुरुषार्थ शक्ति की सफलता पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ वैमनस्यता एवं अरुचिकर रूप से प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा तथा दिक्कतों पर विजय तथा बुद्धि का योग एवं दैवयोग से भाग्योन्नति के साधन पायेगा तथा यश और भाग्य की शक्ति के द्वारा आनन्द का विशेष अनुभव करेगा। तुला लग्न में १० शनि यदि कर्क का शनि- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु चन्द्र की राशि पर बैठा है तो ८ ६ पिता स्थान में कुछ नीरसता युक्त शक्ति मिलेगी ९ ७ ५ तथा राज-समाज में कुछ मान और प्रभाव प्राप्त १० ४ श. होगा और कारबार में कुछ दिक्कतों के साथ सफलता शक्ति के साथ विद्या ग्रहण करेगा तथा ११ ३ संतान पक्ष में उत्तम शक्ति पाने पर भी कुछ मतभेद १२ २ रहेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी नं. ७३० स्थानों को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख मिलेगा और सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि, स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है इसलिये माता की शक्ति प्राप्त होगी और भूमि, मकानादि रहने के स्थान की शक्ति अच्छी मिलेगी और प्रभाव युक्त मार्ग से सुख के साधन मिलेंगे तथा दसवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ मतभेद के कारण परेशानी का अनुभव होगा और रोजगार के मार्ग में कुछ दिक्कतों से टकरा-टकरा कर कार्य चलेगा तथा गृहस्थ-भोगादिक सुखों को कुछ कमी रहेगी तथा बुद्धि में तेजी होगी। तुला लग्न में ११ शनि यदि सिंह का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा हो तो क्रूर ग्रह लाभ ८ ६ स्थान में बैठने से अधिक लाभ करने की शक्ति ९ ७ ५ श. देता है, किन्तु शत्रु राशि पर होने से बुद्धि योग १० ४ द्वारा आमदनी के मार्ग में कुछ कठिनाई लिये हुए विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और माता के ११ १ ३ सुख को न्यूनता के साथ लाभ करेगा तथा भूमि- १२ २ मकानादि का लाभ होगा और तीसरी उच्च दृष्टि नं. ७३१ से देह के स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में
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भृगु संहिता ३७९ देख रहा है, इसलिये देह में स्थूलता एवं प्रभाव की शक्ति प्राप्त होगी और सातवीं दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या, बुद्धि की शक्ति पायेगा और दिमाग में कुछ गर्मी तथा चिंता-फिकर एवं विशेष स्वार्थपरता होगी और संतान पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त रहेगी और दसवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त होगी तथा पुरातत्व की शक्ति का लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या तथा देह में कुछ मस्ती तथा सुख एवं लापरवाही रहेगी। तुला लग्न में १२ शनि यदि कन्या का शनि-बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्चा ८ ६ श ९ विशेष करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से ७ ५ सुख का योग प्राप्त करेगा, किन्तु संतान पक्ष के, १० ४ सम्बन्ध में हानि एवं कमी रहेगी तथा विद्या के स्थान में कमजोरी और मातृ स्थान के सुख-सम्बन्धों ११ १ ३ में कमी प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि की १२ २ कमजोरी रहेगी तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से धन भवन नं. ७३२ एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में भी कुछ कमजोरी पायेगा तथा कुटुम्ब स्थान में कुछ मतभेद रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ नीरसता के साथ शक्ति और प्रभाव होगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ वृद्धि करेगा और धर्म के मार्ग में कुछ रुचि रखेगा तथा बुद्धि एवं वाणी के अन्दर भ्रम और कुछ परेशानी मानेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु तुला लग्न में १ राहु यदि तुला का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र शुक्र की राशि में बैठा है तो देह में कुछ ६ परेशानी के कारण शरीर में कुछ कमी या कमजोरी ९ ७ रा. ५ रहेगी और अपने व्यक्तित्व की उन्नति के लिये १० ४ महान् गुप्त युक्तियों का एवं चतुराईयों का प्रयोग होगा तथा दिखावटी प्रभाव अधिक पायेगा और ११ १ ३ अन्दरूनी गहरी उन्नति करने के लिये विशेष झंझट १२ २ युक्त मार्ग से कठिन कर्म के द्वारा प्रयत्न करेगा नं. ७३४ तथा उन्नति के मार्ग में कभी-कभी महान् संकट का सामना करना पड़ेगा। किन्तु फिर भी अपनी स्थिति के मुकाबले में
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३८० तुला लग्न का फलादेश उन्नति अवश्य प्राप्त करेगा, कयोंकि आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये गहरी सूझ की शक्ति से और कठिनाईयों से सफलता मिलेगी। तुला लग्न में २ राहु यदि वृश्चिक का राहु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन ८रा. ६ ९ की संग्रह शक्ति का अभाव पाने के कारण कष्ट ७ ५ अनुभव करेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ १० ४ क्लेश एवं कमी प्राप्त होगी तथा मंगल की राशि पर होने से धन वृद्धि के लिये कठिन प्रयत्न करेगा ११ १ ३ और कभी-कभी धन के मार्ग में भीषण कठिनाई १२ २ या संकट का योग आयेगा, किन्तु धन की वृद्धि नं. ७३५ के लिये गुप्त युक्ति का कष्टसाध्य प्रयोग सदैव चलता रहेगा तथा कभी कोई मुफ्त की-सी धनु राशि भी प्राप्त होगी और धन की संग्रह शक्ति के लिये कोई नवीन और गम्भीर योजनाओं के द्वारा सफलता का मार्ग बनेगा। तुला लग्न में ३ राहु यदि धन का राहु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर नीच का होकर बैठा है तो भाई- ८ ६ ९ रा. बहिन के सम्बन्ध में परेशानी एवं कष्ट के कारण ७ 4 होंगे और पराक्रम स्थान की कमजोरी प्राप्त करेगा १० ४ तथा अपने पुरुषार्थ कर्म के कार्यों में कुछ परतंत्रता ११ का योग प्राप्त करेगा और गुप्त हिम्मत शक्ति के ३ बल पर कार्य होगा तथा प्रकट रूप में हिम्मत १२ २ शक्ति के अन्दर कमजोरी के साथ अपनी पुरुषार्थ नं. ७३६ शक्ति की वृद्धि करने के लिये कभी-कभी कुछ अनुचित मार्ग का भी अनुसरण करेगा तथा कभी-कभी महान् संकट का सामना पाने पर बड़ा भय प्रतीत होगा, किन्तु गुप्त युक्ति और आन्तरिक धैर्य की शक्ति से सफलता पा जायेगा, क्योंकि तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बली हो जाता है। तुला लग्न में ४ राहु यदि मकर का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं ८ ६ भूमि के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है ९ ७ ५ तो माता के सुख-सम्बन्धों में कमी और कष्ट के १० रा कारण प्राप्त करेगा तथा भूमि, मकानादि की ४ शक्ति में सुख की कुछ कमी रहेगी और घरेलू सुख ११ १ ३ के साधनों में कुछ कमी रहेगी किन्तु शनि की राशि १२ २ पर होने से युक्तिबल से और दृढ़ता के बल से सुख नं. ७३७ के साधनों को प्राप्त करेगा परन्तु कभी महान् अशान्ति
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भृगु संहिता के कारण प्राप्त होंगे और अन्त में गुप्त शक्ति के बल पर संकट से मुक्ति ३८१
मिलेगी तथा सुख प्राप्ति के साधन मिलेंगे। तुला लग्न में ५ राहु यदि कुम्भ का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा ८ ६ है तो संतान पक्ष में कष्ट उत्पन्न करेगा और विद्या ९ ७ ५ के ग्रहण करने में परेशानी के कारण प्राप्त होंगे १० ४ तथा विद्या के अन्दरूनी हिस्से में कुछ कमी और ११ कमजोरी रहेगी तथा बाहरी हिस्से में विद्या की रा. १ ३ शक्ति का अच्छा प्रदर्शन रहेगा और दिमाग शक्ति १२ २ के अन्दर कुछ परेशानी एवं कुछ युक्तियों का नं. ७३८ योग मिलेगा तथा अपनी बात को सिद्ध करने के लिए सत्य-असत्य की परवाह नहीं की जायेगी, बल्कि शनि के घर में बैठा है, इसलिये अपने प्रत्येक शब्दों को दृढ़ता के रूप में इस्तेमाल करेगा तथा विचारों में कुछ चिन्ता रहेगी। तुला लग्न में ६ राहु यदि मीन का राहु- छठें शत्रु स्थान में एवं
६ रोग, झगड़े-झंझट के स्थान में शत्रु गुरु की राशि V ९ पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में कुछ झंझट रहेगी, ७ 4 किन्तु छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, १० ४ इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव कायम ११ ३ करेगा और बड़ी-बड़ी दिक्कतों एवं झंझटों पर १ १२रा. विजय पायेगा तथा अपनी हिम्मत-शक्ति के अन्दर २
नं. ७३९ कुछ कमजोरी महसूस करते हुए भी प्रकट में बड़ी भारी हिम्मत ओर बहादुरी से काम लेगा तथा गुरु की शक्ति पर बैठा है, इसलिये आदर्श युक्ति के गुप्त बल से सज्जनता युक्त मार्ग के द्वारा विपक्षियों मे सफलता और प्रभाव प्राप्त होगा और रोजगर आदि मार्ग में सफलता और ननिहाल पक्ष में कुछ कमी रहेगी। तुला लग्न में ७ राहु यदि मेष का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर ८ ६ बैठा है तो स्त्री पक्ष में कठिन संकट प्राप्त करेगा ९ ७ 4 और रोजगार के मार्ग में बड़ी दिक्कतों और
१० परेशानियों से कार्य करेगा तथा स्त्री गृहस्थ के ४ अन्दर कभी-कभी गम्भीर चिंता प्राप्त होगी, किन्तु ११ १ रा. ३ गुप्त युक्ति और धैर्य के कारण गम्भीर परिस्थिति १२ २ पर काबू पा सकेगा और बहुत-सी दिक्कतों के नं. ७४० बाद स्त्री स्थान में कुछ शक्ति पायेगा तथा रोजगार
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३८२ तुला लग्न का फलादेश के पक्ष में कभी-कभी महान् संकट पाने पर भी हिम्मत और युक्ति से कमा लेगा, क्योंकि गरम ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये विशेष परिश्रम और विशेष युक्तिबल तथा संघर्षों के योग से सफलता पायेगा। तुला लग्न में ८ राहु यदि वृषभ का राहु- आठवें आयु एवं पुरातत्त्व ६ स्थान पर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो V ९ जीवन के अन्दर आयु स्थान में बड़े-बड़े महान् ७ ५ संकट प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी जीवन समाप्ति १० ४ का-सा योग बन जायेगा। किन्तु आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, अतः जीवन रक्षा बराबर ११ १ ३ युक्ति बल से होती रहेगी और आयु स्थान में १२ २ रा. शक्ति बनेगी तथा उदर में कुछ शिकायत रहेगी नं. ७४१ और पुरातत्त्व स्थान में हानि प्राप्त होगी किन्तु किसी दूसरे मार्ग से जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ गम्भीर योजनाओं द्वारा प्राप्त होगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ चिन्ता और परेशानियों का योग प्राप्त रहने पर भी कुछ प्रभाव युक्त रहेगा। तुला लग्न में ९ राहु यदि मिथुन का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य ८ ६ स्थान एवं धर्म स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध ९ ७ ५ की राशि पर बैठा है तो उच्च युक्तियों के बल से भाग्य की विशेष वृद्धि प्राप्त करेगा और बड़ा १० ४ भाग्यवान् समझा जायेगा तथा बड़ी-बड़ी लम्बी ११ १ ३ योजनाओं के द्वारा भाग्य की वृद्धि के लिये सदैव रा. महान् प्रयत्नशील रहेगा और धर्म के सम्बन्ध में १२ २ बड़ी भारी छान-बीन करके किसी खास तरीके नं. ७४२ पर धर्म का पालन करेगा और कभी-कभी भाग्योन्नति के मार्ग में विशेष बाधायें मिलेंगी। किन्तु विवेकी बुध के घर में मित्र भाव से बैठा है, इसलिये विवेक की महान् शक्ति और चतुराई से सदैव सफलता को पायेगा। तुला लग्न में १० राहु यदि कर्क का राहु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर ६ बैठा है तो पिता स्थान के सुख में कमी और कष्ट ९ ७ का योग प्राप्त करेगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध १० ४ रा. में कमी और कुछ परेशानियाँ होंगी और कभी- कभी कारबार एवं उन्नति के मार्गों में बड़ी-बड़ी ११ १ ३ दिक्कतें और झंझट प्राप्त होंगे तथा मन को शक्ति १२ २ के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर शत्रु भाव में बैठा नं. ७४३ है, इसलिये मान-प्रतिष्ठा कारबार के मार्ग में मन
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भृगु संहिता ३८३ को अशांति रहेगी और उन्नति के स्थान में रुकावटों और परेशानियों का भ्रम बना रहेगा तथा बड़ी दिक्कतों के बाद उन्नति होगी। तुला लग्न में ११ राहु यदि सिंह का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में
६ परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी कठिनाईयों का योग प्राप्त होगा ९ ५ रा. किन्तु ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो १० ४ जाता है, इसलिये दिक्कतों का मार्ग होते हुये भी आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति मिलेगी तथा ११ m १ बड़ी युक्तियों से सफलता पायेगा और सूर्य की १२ २ राशि पर होने से लाभ प्राप्ति के स्थान में हठधर्मी नं. ७४४ से काम लेगा और अधिक से अधिक मुनाफा खाने का प्रयत्न करेगा। किन्तु कभी-कभी आमदनी के स्थान में कोई महान् संकट का योग प्राप्त करेगा तथा बाद में शक्ति प्राप्त होगी। तुला लग्न में १२ राहु यदि कन्या का राहु- बारहवें खर्च स्थान में एवं बाहरी स्थान में परम मित्र बुध की राशि पर ८ ६ रा. बैठा है तो खर्चा अधिक करेगा और खर्च के ९ ५ कारणों को कुछ परेशानियों के योग से संचालित १० ४ करेगा तथा खर्च के मार्ग में कभी-कभी कोई महान् संकट का योग बनेगा और बाहरी स्थानों ११ १ ३ के सम्बन्ध में कुछ परेशानियों के संयोग से अच्छा १२ २ सम्बन्ध बनाएगा, क्योंकि विवेकी बुध की राशि नं. ७४५ पर कूटनीतिज्ञ राहु मित्र भाव में बैठा है, इसलिये खर्च के सम्बन्ध में बड़ी भारी विवेक शक्ति से और युक्तिबल से सफलता पायेगा और इसी प्रकार बाहरी सम्बन्धों में भी विवेक और युक्ति बल से बड़ी कामयाबी रहेगी। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु तुला लग्न में १ केतु यदि तुला का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान ६ में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान ९ ७ क. में परेशानियाँ और कष्ट के योग पायेगा तथा 4 कभी-कभी महान् संकट के प्राप्त होने पर भी १० ४ गुप्त धैर्य की शक्ति से काम निकालेगा और परम ११ १ ३ चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर मित्र भाव में १२ २ बैठा है, इसलिए देह के कठिन कर्म के योग से
नं. ७४५ महान् चतुराईयों के द्वारा अपने व्यक्तित्व की उन्नति
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३८४ तुला लग्न का फलादेश करेगा तथा मान-प्रतिष्ठा पायेगा और गुप्त युक्ति के बल से बड़ी गहरी योजना बनाकर सफलता प्राप्ति तथा देह में कुछ अन्दरूनी कमी के कारण महसूस करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति के गुप्त बल से विजयी बनेगा। तुला लग्न में २ केतु यदि वृश्चिक का केतु- दूसरे धन स्थान में एवं ८के ६ कुटुम्ब स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है ९ तो धन के कोष में बड़ी कमी रहेगी और कुटुम्ब ७ ५ के सम्बन्ध में बड़ा क्लेश होगा तथा धन के सम्बन्ध १० ४ में कभी-कभी महान् संकट का सामना करेगा ११ और धर्म के लिए कठिन कर्म का प्रयोग और १ ३ १२ कुछ गुप्त शक्ति के द्वारा भी धन की प्राप्ति करेगा, २ क्योंकि मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये धन नं. ७४६ और कुटुम्ब के सम्बन्ध से सदैव ही कुछ न कुछ परेशानियाँ प्राप्त होती रहेंगी। किन्तु धन की पूर्ति करने के लिये कष्ट-साध्य कर्म को बड़ी भारी हिम्मत के साथ करता रहेगा और कुछ गुप्त रूप से धन का शक्ति पाने पर भी धन के सम्बन्ध में अन्दरूनी दुःख का अनुभव प्राप्त होगा। तुला लग्न में ३ केतु यदि धन का केतु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर उच्च का होकर बैठा है तो पराक्रम ८ ६ ९के स्थान की महान् वृद्धि करेगा और बहिन भाइयों ७ ५ को विशेष शक्ति मिलेगी और तीसरे स्थान पर १० ४ क्रूर ग्रह विशेष शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये ११ कठिन से कठिन कार्यों को बड़ी जबरदस्त मुस्तैदी १ ३ के साथ पूरा करेगा और कभी हिम्मत नहीं हारेगा १२ २ तथा महान् कठिन कर्म की पूर्ति के द्वारा बड़ी नं. ७४७ भारी प्रभावशक्ति पायेगा और सदैव दौड़-धूप में लगा रहेगा। किन्तु केतु के स्वाभाविक दोष के कारण कभी-कभी भाई के स्थान में कोई परेशानी का योग होगा तथा कभी कोई गुप्त पराक्रम शक्ति के अन्दर कमजोरी पाने से कुछ कष्ट अनुभव करेगा। तुला लग्न में ४ केतु यदि मकर का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं ६ भूमि के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा है ९ ५ तो माता के स्थान में कमी और कष्ट के कारण तथा मकानादि भूमि की कमी प्राप्त करेगा और १० के ४ घरेलू सुख-सम्बन्धों में झंझट और परेशानी होगी ११ १ ३ तथा गरम ग्रह शनि की राशि पर केतु बैठा है, १२ २ इसलिये कभी-कभी घरेलू वातावरण में महान् नं. ७४८ अशांति के कारण प्राप्त करेगा किन्तु गुप्त शक्ति
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भृगु संहिता ३८५ और कठिन कर्म के द्वारा सुख प्राप्ति के साधन प्राप्त होगा, फिर भी कुछ न कुछ मकान आदि सुख के सम्बन्धों में कमी प्राप्त रहेगी तथा गहरे सुख की खोज में रहेगा। तुला लग्न में ५ केतु यदि कुम्भ का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा ६ है तो संतान पक्ष में कुछ कष्ट और संकट के योग ९ ७ 4 प्राप्त होंगे तथा विद्या ग्रहण करने में कुछ १० ४ कठिनाईयाँ और परेशानियाँ प्राप्त करेगा तथा बुद्धि - ११ के अन्दर कुछ अन्दरूनी कमजोरी महसूस होगी के १ ३ और शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये कठिन १२ २ कर्म के द्वारा विद्या की शक्ति का संग्रह करेगा नं. ७४९ और बहुत सी अति कठिनाईयों के बाद संतान पक्ष में शक्ति पायेगा। किन्तु फिर कभी-कभी संतान पक्ष में गहरे संकट का सामना करना होगा। तुला लग्न में ६ केतु यदि मीन का केतु- छठें शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु के स्थान में बड़ा प्रभाव रखेगा ८ ६ और झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी भारी हिम्मत ९ ७ ५ शक्ति से काम लेगा तथा वेद गुरु बृहस्पति के घर १० ४ में बैठा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी योग्यता ११ और दृढ़ता तथा निर्भयता से काम लेगा। उत्तम ३ १२के रूप के साथ शत्रु पक्ष में सफलता शक्ति प्राप्त २ करेगा, छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता नं. ७५० है, इसलिए कभी-कभी शत्रु स्थान में महान् संकट प्राप्त करेगा और परेशानियों पर काबू पाने के लिये गुप्त शक्ति के कठिन कर्म का प्रयोग करेगा तथा ननिहाल पक्ष में कमजोरी पायेगा। तुला लग्न में ७ केतु यदि मेष का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा ८ ६ है तो स्त्री पक्ष में विशेष कष्ट अनुभव करेगा तथा ९ ७ ५ रोजगार के मार्ग में बड़ी दिक्कतें प्राप्त होंगी और १० ४ गरम ग्रह की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये कभी-कभी गृहस्थ के स्थान में महान् संकट का ११ १ के ३ योग प्राप्त करेगा, किन्तु गृहस्थ एवं रोजगार के १२ २ पक्ष में सफलता पाने के लिये गुप्त शक्ति के नं. ७५१ कठिन कर्म का प्रयोग दृढ़ता के साथ करेगा और बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम लेगा तथा कभी कुछ इन्द्रिय विकार प्राप्त भृ.सं. - २५
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३८६ तुला लग्न का फलादेश करेगा और बड़ी परेशानियों के बाद गृहस्थ-शक्ति को प्राप्त करेगा। तुला लग्न में ८ केतु यदि वृषभ का केतु- आठवें आयु स्थान एवं ८ ६ पुरातत्त्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है ९ तो आयु स्थान में कई बार महान् संकट प्राप्त ७ ५ करेगा तथा पुरातत्त्व स्थान में जीवन की सहायक १० ४ होने वाली शक्ति की कुछ हानि प्राप्त करेगा तथा ११ जीवन की दिनचर्या में कुछ गुप्त चिन्ताओं का १ ३ योग पायेगा और आचार्य शुक्र की राशि पर केतु १२ २ के. बैठा है, इसलिये महान् चतुराई के योग से कठिन नं. ७५२ कर्म के द्वारा जीवन की सहायक शक्ति प्राप्त करेगा और कुछ गुप्त शक्ति के बल से हृदय में साहस मिलेगा किन्तु अपने जीवन की दिनचर्या में किसी प्रकार की खास कमी महसूस करेगा और उदर में कुछ विकार होगा। तुला लग्न में ९ केतु यदि मिथुन का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में नीच का होकर मित्र बुध V ९ की राशि पर बैठा है तो भाग्य के स्थान में महान् ७ ५ कष्ट पायेगा तथा धर्म के स्थान में हानि प्राप्त १० ४ करेगा और भाग्य की उन्नति के लिये बड़ी-बड़ी ११ परेशानियाँ पायेगा तथा कभी-कभी भाग्य के १ ३ के स्थान में घोर संकट का योग पायेगा, किन्तु विवेकी १२ 1 २
नं. ७५३ बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये भाग्य की रक्षा एवं उन्नति के लिये महान् कठिन कर्म के द्वारा माग बना सकेगा और कुछ अनुचित मार्ग के द्वारा भी स्वार्थ की सिद्धि पाने का प्रयत्न करेगा तथा कभी कोई अपयश पायेगा तथा बरक्कत की कुछ कमी रहेगी और ईश्वर में श्रद्धा एवं विश्वास की कमी होगी। तुला लग्न में १० केतु यदि कर्क का केतु- दसवें केन्द्र पिता स्थान एवं राज्य स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि ८ ६ पर बैठा है तो पिता स्थान के सम्बन्ध में कमी ९ ७ ५ और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा राज-समाज १० ४ के. में कुछ परेशानी और मान की कमी होगी और कारोबार की उन्नति के मार्ग में बार-बार दिक्कतें ११ १ ३ और झंझटें प्राप्त होंगी तथा राज-काज, व्यापार १२ २ आदि सम्बन्धों में कभी-कभी भयानक संकट नं. ७५४ का योग प्राप्त होगा और बड़ी-बड़ी दिक्कतें सहने के बाद एवं बहुत उतार-चढ़ाव के बाद कठिन परिश्रम की गुप्त शक्ति के
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भृगु संहिता ३८७ - द्वारा सफलता का मार्ग पायेगा। तुला लग्न में ११ केतु यदि सिंह का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में ८ ६ परम शत्रु सूर्यं की राशि पर बैठा है तो लाभ के ९ ७ के स्थान में कुछ झंझट और परेशानी के कारण पायेगा, किन्तु ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह १० ४ शक्तिशाली कार्य करता है, इसलिये आमदनी के ११ स्थान में विशेष शक्ति मिलेगी अर्थात् आमदनी १ ३
१२ की वृद्धि करने के लिए गुप्त शक्ति के कठिन २
नं. ७५५ परिश्रम से लाभ के स्थान में विशेष संकट का सामना करना पड़ेगा, परन्तु अन्त में सफलता मिलेगी और सूर्य की राशि पर होने से आमदनी के मार्ग में फायदे से अधिक मुनाफा खाने का भारी प्रयत्न करेगा और प्रभाव रखेगा। तुला लग्न में १२ केतु यदि कन्या का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में परम मित्र बुध की राशि पर बैठा है, तो ८ छ के खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों में विशेष ९ ७ ५ शक्ति पायेगा और विवेकी बुध की राशि पर १० ४ केतु बैठा है, इसलिये खर्च की शक्ति को सुचारू रूप में चलाने के लिए बड़ी विवेक शक्ति से ११ १ ३ काम लेगा और खर्च की शक्ति में वृद्धि और १२ २ सफलता पाने के लिए गुप्त रूप की शक्ति से नं. ७५६ कठिन परिश्रम के द्वारा काम करेगा फिर भी कभी-कभी खर्च के मार्ग में महान् संकट का योग पायेगा तथा बाहरी स्थानों में परेशानी के योग प्राप्त करेगा, किन्तु अन्त में शक्ति प्राप्त होगी। ।। तुला लग्न समाप्त ।। +
८ ६ ७ ९ ५
१० ४
११ ३
१२ १ २
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३८८ भृगु संहिता वृश्चिक लग्न का फलादेश प्रारम्भ
९ ७ ८ १० ६
११ ५
१२ ४
१ २ ३
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ८६४ तक में देखिये) प्रिय पाठकगण- ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डती नं० ७५७ से लेकर कुण्डली नं० ८६४ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ
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वृश्चिक लग्न का फलादेश पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। ३८९
अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७५७ से ७६८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७५७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७५८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७५९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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३९० भृगु संहिता
६. कुण्डली नं. ७६६ के अनुसार मालूम करिये। जिस मास में सूर्य, कन्चा राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७६८ के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७६९ से ७८० तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७६९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ७७९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८० के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ३९१ जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७८१ से ७९२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७८९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९२ के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ७९३ से ८०४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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३९२ भृगु संहिता कुण्डली नं. ७९३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ७९९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८०० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८०१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८०२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८०३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८०४ के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८०५ से ८१६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८०५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८०६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८०७ के अनुसार मालूम करिये।
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश ३९३
कुण्डली नं. ८०८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८०९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८११ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८१६ के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८१७ से ८२८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८१७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८१८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८१९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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३९४ भृगु संहिता कुण्डली नं. ८२२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८२८ के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८२९ से ८४० तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८२९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३६ के अनुसार मालूम करिये।
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ३९५ ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८३९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४० के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८४१ से ८५२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८४८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
५. कुण्डली नं. ८४९ के अनुसार मालूम करिये। जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली .- नं. ८५० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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३९६ भृगु संहिता कुण्डली नं. ८५१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५२ के अनुसार मालूम करिये। (८) वृश्चिक लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८५३ से ८६४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८५९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६० के अनुसार मालूम करिये। 1 ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ८६४ के अनुसार मालूम करिये।
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ३९७
पिता, राज्य, प्रभावस्थानपति-सूर्य वृश्चिक लग्न में १ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ९ ७ पिता की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और कारबार १० ८ सू. ६ के मार्ग में प्रभाव और सफलता पायेगा तथा देह ११ में गौरव और प्रभाव तथा गुस्सा एवं स्वाभिमान विशेष रखेगा एवं सुन्दर सुसज्जित रूप से वस्त्र १२ २ ४ इत्यादि पहिनेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री १ ३ तथा रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि नं. ७५७ में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ प्रभाव और मतभेद रखेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ नीरसता या वैमनस्य के योग से सफलता शक्ति पायेगा और हुकूमत तथा हेकड़ी से काम लेगा। वृश्चिक लग्न में २ सूर्य यदि धनु का सूर्य- दूसरे धन एवं फुटुम्ब स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो पैतृक ९ सू. ७ मार्ग एवं कारबार के द्वारा धन की शक्ति प्राप्त १० ८ ६ करेगा तथा कुटुम्ब का प्रभाव पायेगा और राज- ११ ५ समाज से मान और लाभ प्राप्त करेगा एवं धन-
१२ जन की शक्ति का गौरव रहेगा। किन्तु धन का २ ४ स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये १ ३ पिता से सुख-सम्बन्धों में कुछ कमी पायेगा और नं. ७५८ सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये पुरातत्त्व सम्बन्ध में जीवन की सहायक होने वाली कुछ शक्ति पायेगा तथा आयु स्थान में तथा जीवन की दिनचर्या में शक्ति और प्रभाव मिलेगा। वृश्चिक लग्न में ३ सूर्य यदि मकर का सूर्य- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो 20 ९ ७ भाई-बहिन के सम्बन्ध में नीरसता युक्त मार्ग से ८ 3 शक्ति और पिता स्थान की तरफ से मतभेद पायेगा ११ ५ और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता
१२ है, इसलिये कारबार के सम्बन्ध में पराक्रम स्थान २ ४ के द्वारा खूब सफलता पायेगा और राज-समाज १ ३ के स्थान में मान और प्रभाव पायेगा तथा सातवीं नं. ७५९ दृष्टि से धर्म एवं भाग्य स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का
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३९८ भृगु संहिता पालन करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म की सफलता से यश मिलेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति रहेगी। वृश्चिक लग्न में ४ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है ७ तो माता के स्थान में कुछ मतभेद पायेगा तथा १० ८ ६ भूमि मकानादि की शक्ति में कुछ नीरसता युक्त ११ सू. ५ मार्ग से प्रभाव पायेगा तथा घरेलू सुख-सम्बन्धों में कुछ खरखरा रहते हुए भी शक्ति रहेगी और १२ २ ४ सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं १ ३ नं. ७६० अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सहयोग मिलेगा और राज-समाज के सम्बन्धों में मान और प्रभाव की प्राप्ति रहेगी और कारबार के स्थान में अपने घर से ही उन्नति के मार्ग प्राप्त करेगा तथा शक्ति युक्त रहेगा। वृश्चिक लग्न में ५ सूर्य यदि मीन का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण सन्तान एवं विद्या के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा ९ ७ है, तो विद्या स्थान में विशेष शक्ति एवं प्रभाव १० ८ w प्राप्त करेगा तथा राजनीतिक ज्ञान की शक्ति से ११ मान और उन्नति पायेगा तथा संतान पक्ष में विशेष १२ २ महत्त्व प्राप्त होगा तथा पिता की शक्ति पायेगा स. ४ और बुद्धि योग द्वारा कारबार की वृद्धि होगी १ ३ नं. ७६१ तथा दिमाग के अन्दर हुकूमत और क्रोध रखेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये धन लाभ की वृद्धि के उत्तम साधन प्राप्त करेगा और आमदनी के मार्ग में बुद्धि के बल से सफलता पायेगा। वृश्चिक लग्न में ६ सूर्य यदि मेष का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो शत्रु ९ ७ पक्ष के अन्दर महान् प्रभाव की शक्ति और विजय १० ६ प्राप्त करेगा तथा पिता के स्थान में प्रभाव और ११ ५ मतभेद रहेगा तथा राज-समाज में बड़ा प्रभाव और मान पायेगा तथा कारबार के मार्ग में महान् १२ २ ४ परिश्रम एवं प्रभावशाली कर्म के द्वारा विशेष उन्नति १ सू. ३ करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु शुक्र की नं. ७६२ तुला राशि में खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ में कुछ नीरसता और दिक्कतें प्राप्त रहेंगी।
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ३९९ वृश्चिक लग्न में ७ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा ९ ७ है तो स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता युक्त प्रभाव की १० ८ ६ शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ ११ ५ कठिनाईयों के योग से उन्नति करेगा तथा पिता स्थान की कुछ सहायक शक्ति प्राप्त होगी और १२ २ सू. ४ राज-समाज से सम्बन्धित कार्यों में कुछ मान और १ ३ प्रभाव पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के नं. ७६३ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और गौरव प्राप्त करेगा तथा कुछ शोभा युक्त वस्त्र पहिनेगा तथा कारबार की उन्नति करने के लिये विशेष प्रयत्न करता रहेगा। वृश्चिक लग्न में ८ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता के सम्बन्ध ९ ७ में हानि और परेशानी का योग पायेगा और राज- १० ८ ६ समाज के सम्बन्ध में कमजोरी रहेगी तथा कारबार ११ ५ की उन्नति के मार्ग में विशेष कठिनाईयाँ मिलेंगी
१२ और आयु स्थान में शक्ति मिलेगी तथा जीवन की २ ४ दिनचर्या में प्रभाव रहेगा और पुरातत्त्व सम्बन्ध १ ३ सू. की शक्ति का लाभ रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि नं. ७६४ से धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कठिन परिश्रम के द्वारा धन की वृद्धि के कारण उत्पन्न करेगा और कुटुम्ब में कुछ प्रभाव होगा। तथा कुछ दूसरे स्थान का सम्पर्क पायेगा। वृश्चिक लग्न में ९ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा ९ ७ है तो भाग्य की शक्ति के अन्दर विशेष प्रभाव १० ६ पायेगा तथा धर्म का पालन करेगा तथा कारबार ११ की उन्नति के मार्ग में भाग्य की शक्ति के बल पर उन्नति पायेगा और उत्तम आदर्श कर्म के द्वारा १२ २ ४सू. सफलता और यश प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु १ ३ दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की नं. ७६५ मकर राशि में देख रहा है, इसलिए भाई-बहिन के पक्ष में मतभेद रखेगा और पराक्रम शक्ति के स्थान में कुछ नीरसता के साथ शक्ति और प्रभाव पायेगा। यदि सिंह का सूर्य- दसम केन्द्र पिता स्थान में एवं राज्य स्थान में स्वं अपनी राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का प्रभाव पायेगा तथा
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४०० भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में १० सूर्य राज-समाज में मान एवंद शक्ति प्राप्त करेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में विशेष सफलता ९ ७ शक्ति पायेगा तथा मान-प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की १० ८ ६ वृद्धि करने के लिये उग्र कर्म करेगा और सातवीं ११ ५ सू. शत्रु दृष्टि से माता एवं मकानादि के सुख भवन को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये १२ २ ४ माता के सम्बन्ध में वैमनस्यता अथवा नीरसता १ ३ पायेगा और भूमि मकानादि के स्थान में एवं नं. ७६६ वृश्चिक लग्न में ११ सूर्य सुख सम्बन्धों में कुछ कमी प्रतीत होगी। यदि कन्या का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान के ९ ७
१० ८ ६ सू. सम्बन्ध से विशेष लाभ पायेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में प्रभाव कर्म के द्वारा लाभ की ११ ५ उत्तम शक्ति पायेगा और कारबार के मार्ग में १२ विशेष लाभ करेगा और मान-प्रतिष्ठा एवं प्रभाव २ ४ की शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से संतान १ ३
नं. ७६७ एवं विद्या स्थान को गुरु की भीन राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में शक्ति और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा विद्या के अन्दर शक्ति और प्रभाव पायेगा तथा विद्या एवं वाणी के द्वारा मान-प्रतिष्ठा पायेगा तथा हुकूमत और तेजी का स्वभाव पायेगा। वृश्चिक लग्न में १२ सूर्य यदि तुला का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी
७सू. स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर नीच का होकर ९ बैठा है तो खर्च के स्थान में बड़ी दिक्कतें पायेगा १० E६ तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में बड़ी कमजोरी ٨
११ ५ रहेगी और पिता स्थान की तरफ से कष्ट और कमजोरी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के लिये १२ २ ४ बड़ी परेशानियाँ प्राप्त करेगा एवं राज-समाज के १ ३ सम्बन्ध में प्रभाव की कमी और कभी-कभी नं. ७६८ मानहानि के कारण पायेगा तथा कुछ परतन्त्रता युक्त कर्म करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु के स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में शक्ति से काम करेगा। भाग्य, धर्म, मनस्थानपति-चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी पायेगा
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४०१ वृश्चिक लग्न में १ चन्द्र तथा धर्म पालन के लिये श्रद्धा में कुछ कमी रहेगी और देह में कुछ कमजोरी रहेगी तथा सुयश ९ ७ की कुछ कमी रहेगी और भाग्योन्नति के मार्ग में १० ८ चं. ६ कुछ रुकावटें पाने की वजह से मन में अशान्ति ११ ५ अनुभव करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में १२ २ ४ देख रहा है, इसलिये मनोबल और भाग्यबल के १ ३ द्वारा रोजगार में सफलता शक्ति पायेगा तथा स्त्री नं. ७६९ स्थान में सुन्दरता प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में २ चन्द्र यदि धन का चन्द्र-दूसरे धन स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो मन और भाग्य की ९चं. ७ शक्ति से धन की शक्ति का उत्तम आनन्द पायेगा १० ८ ६ तथा कुटुम्ब का सुन्दर योग प्राप्त करेगा और धन ११ ५ का स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा और १२ २ ४ भाग्य में चमत्कार रहते हुए भी भाग्य में कुछ १ ३ घिराव-सा रहेगा और धन की संग्रह शक्ति के नं. ७७० योग से यश और मान मिलेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में शक्ति मिलेगी और जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ भाग्य द्वारा मिलेगा। वृश्चिक लग्न में ३ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- तीसरे पराक्रम एवं भाई- बहिन के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है ९ ७ तो मनोयोग के बल से तथा भाग्यबल से पराक्रम चं ८ ६ स्थान में सफलता शक्ति पायेगा और भाई-बहिन ११ 4 के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा मन के अन्दर बड़ी हिम्मत रखेगा और सातवीं १२ २ ४ दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी ३ कर्क राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये नं. ७७१ भाग्य की उन्नति पायेगा और भाग्यवान् समझा जावेगा तथा धर्म का यथा शक्ति पालन करेगा और यश प्राप्त करेगा तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा, किन्तु शत्रु राशि पर होने से मन के अन्दर भाग्य के सम्बन्ध में कुछ कमी अनुभव करेगा। यदि कुम्भ का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है, तो माता के पक्ष में सुन्दर शक्ति पायेगा और भूमि का भृ.सं .- २६
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४०२ भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में ४ चन्द्र सुख प्राप्त रहेगा तथा मनोयोग के बल से और भाग्यबल से सुख के साधन पायेगा। किन्तु शत्रु ९ ७ राशि पर होने से मन में कुछ नीरसता के साधन १० ८ ६ अनुभव करेगा और धर्म का कुछ पालन करेगा ११ चं. ५ तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये १२ २ ४ पिता की शक्ति का सुख मिलेगा और राज-समाज १ ३ में मान और प्रभाव रहेगा तथा कारबार की उन्नति नं. ७७२ के प्रसङ्ग में मनोबल की कर्म शक्ति से अपने स्थान में सफलता पायेगा। वृश्चिक लग्न में ५ चन्द्र यदि मीन का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा ७ है तो विद्या स्थान में मनोबल और भाग्यबल के १० ६ V द्वारा महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष ११ में चमत्कारिक सुन्दर सफलता पायेगा तथा १२ बुद्धि के अन्दर धर्म का विशेष ज्ञान रहेगा तथा चं २ ४ वाणी के द्वारा शील युक्त सज्जनता का सुन्दर १ ३ बर्ताव रखेगा तथा भाग्योन्नति के सुन्दर साधन नं. ७७३ बुद्धि के द्वारा प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और बुद्धि के योग से आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता पायेगा तथा यश मिलेगा। वृश्चिक लग्न में ६ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- छठे शत्रु स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो धर्म और भाग्योन्नति ९ ७ के मार्ग में दिक्कतें एवं रुकावटें तथा झंझट- १० ८ ६ झगड़े आदि का योग पायेगा और शत्रु पक्ष से ११ ५ मन में कुछ अशांति अनुभव करेगा, किन्तु मनोबल और भाग्यबल की शक्ति से ही शत्रु पक्ष में शांति १२ २ ४ नीति के द्वारा सफलता पा सकेगा और सातवीं १ च. ३ दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में खर्च नं. ७७४ एवं बाहरी स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में तथा बाहरी सम्बन्ध में मनोबल और भाग्यबल से सफलता पायेगा। यदि वृषभ का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो भाग्य और मन की
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४०३ वृश्चिक लग्न में ७ चन्द्र विशाल शक्ति के द्वारा रोजगार में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री के पक्ष में सुन्दरता ९ ७ एवं भाग्यवानी मिलेगी तथा गृहस्थ सुख के अन्दर १० ८ मन को बड़ा आनन्द रहेगा तथा स्वार्थ युक्त धर्म ११ ५ का पालन बनेगा और सातवीं नीव दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, १२ २ चं. ४ इसलिये देह में कुछ कमजोरी होगी और १ ३ आत्मशान्ति के साधन कमजोर रहेंगे और भाग्य नं. ७७५ तथा धर्म में आन्तरिक दृष्टि से कुछ कमी अनुभव रखेगा। वृश्चिक लग्न में ८ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य ९ ७ की उन्नति के मार्ग में बड़ी कमजोरी एवं परेशानियाँ १० ८ ६ रहेंगी और धर्म का यथार्थ पालन नहीं हो सकेगा ११ ५ और सुयश की कमी रहेगी किन्तु आयु की वृद्धि होगी और जीवन की सहायक होने वाली पुरातत्त्व १२ २ ४ शक्ति का लाभ पायेगा। किन्तु मन को कुछ शान्ति १ ३ चं. रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब नं. ७७६ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये मनोबल की शक्ति से भाग्य और पुरातत्व के सहयोग से धन की शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी तब कुटुम्ब का सहयोग मिलेगा। वृश्चिक लग्न में ९ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो ९ ७ भाग्य की महान् सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा १० ८ धर्म का पालन करेगा और मनोबल की सतोगुणी ११ शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि और यश की
१२ प्राप्ति करेगा तथा ईश्वर में विशेष श्रद्धा शक्ति २ ४चं रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई-बहिन एवं १ ३ पराक्रम स्थान को शनि की मकर राशि में देख नं. ७७७ रहा है, इसलिये भाई-बहिन की सुन्दर शक्ति प्राप्त करने पर भी भाई-बहिन की तरफ से कुछ नीरसता रहेगी और पराक्रम स्थान के सम्बन्ध में मनोबल और धर्म बल की सुन्दरता युक्त मार्ग से बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी। यदि सिंह का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र सूर्य की
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४०४ भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में १० चन्द्र सिंह राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में. विशेष सफलता शक्ति पायेगा और राज-समाज ९ ७ में बड़ा मान और प्रभाव पायेगा तथा भाग्य १० ८ ६ और मनोबल की शक्ति से कारबार के मार्ग में ११ ५ चं. विशेष उन्नत पायेगा तथा धर्म कर्म का उत्तम १२ २ ४ पालन करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं १ ३ भूमि के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख नं. ७७८ रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ नीरसता अनुभव करेगा और भूमि मकानादि के स्थान में कुछ कमी मिले हुए सुख के साधन पावेग तथा यश मिलेगा। वृश्चिक लग्न में ११ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान ९ ७ में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य और १० ८ ६ चं मनोबल की शक्ति से धन लाभ की आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा ११ ५ और धर्म का लाभ पायेगा तथा भाग्य की १२ २ ४ सफलता के मार्ग से मन को महान् प्रसन्नता १ ३ रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से बुद्धि, विद्या नं. ७७९ एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में बड़ा सुन्दर लाभ प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा बुद्धि और वाणी के अन्दर मनोबल की शक्ति के द्वारा यश और लाभ पायेगा। वृश्चिक लग्न में १२ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी ९ ७चं. स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है १० ८ तो भाग्य की शक्ति के द्वारा खर्चा बहुत करेगा w
११ तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में मनोयोग के ५ द्वारा बहुत सफलता पायेगा और स्थानीय मार्ग १२ २ ४ में भाग्य की बड़ी कमजोरी अनुभव करेगा तथा १ ३ धम के पालन में कमजोरी प्राप्त रहेगी और नं. ७८० भाग्योन्नति के मार्ग में बड़ी देर और दूर के योग से शक्ति प्राप्त होगी और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट के स्थान को मंगल मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में एवं दिक्कतों के मार्ग में भाग्य और मनोबल की शान्त शक्ति से काम निकालेगा।
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४०५
देह, शत्रु तथा झंझटस्थानपति-मंगल वृश्चिक लग्न में १ मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर ९ ७ बैठा है तो देह में बड़ी शक्ति और प्रभाव रखेगा १० ८ मं. ६ तथा शत्रु स्थान में सफलता शक्ति पायेगा तथा ११ ५ दिक्कतों और झंझटों पर विजय पायेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारणों से देह में कुछ १२ २ ४ परेशानी एवं परिणाम का योग पाकर व्यक्तित्व १ ३ का विकास करेगा और देह में कुछ रोग पायेगा नं. ७८१ और चौथी शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता पिता के स्थान में कुछ वैमनस्यता पायेगा और मातृ भूमि के सुख सम्बन्धों में कमी पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ परिश्रम की शक्ति से रोजगार में शक्ति पायेगा और कुछ नीरसता युक्त मार्ग से स्त्री पक्ष में शक्ति पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति पायेगा और पुरातत्व में कुछ झंझट से शक्ति पायेगा। वृश्चिक लग्न में २ मंगल यदि धनु का मंगल- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो धन ९मं. ७ की वृद्धि करने के लिये विशेष परिश्रम करेगा १० ८ ६ तथा कुटुम्ब के स्थान में कुछ झंझट युक्त रूप से ११ शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का काम करता है और छठें घर का स्वामी १२ २ ४ परेशानी का कार्य करता है, इसलिये दोनों दोषों १ ३ के कारण देह के पक्ष में सुख शांति की कमी नं. ७८२ तथा स्वास्थ्य में कुछ प्रभाव की शक्ति तथा इज्जत पायेगा और चौथी दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिए कुछ परेशानी के योग से संतान पक्ष में शक्ति पायेगा और परिश्रम के मार्ग विद्या स्थान में शक्ति पायेगा तथा वाणी के अन्दर विशेष शक्ति रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम के योग से पुरातत्व का कुछ लाभ पायेगा और आयु में कुछ शक्ति पायेगा और आठवीं नीच दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में
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४०६ भृगु संहिता देख रहा है, इसलिये भाग्य और धर्म की कुछ हानि या कमजोरी पायेगा तथा यश की कमी रहेगी तथा ईश्वर पर भरोसा थोड़ा रहेगा। वृश्चिक लग्न में ३ मंगल यदि मकर का मंगल- तीसरे पराक्रम एवं भाई बहिन के स्थान पर उच्च का होकर शत्रु १० ९ ७ शनि की राशि पर बैठा है तो पराक्रम स्थान में मं ८ विशेष शक्ति पायेगा तथा भाई-बहिन की विशेषता ११ ५ के अन्दर कुछ मतभेद पायेगा और देह के द्वारा विशेष पुरुषार्थ कर्म करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत १२ २ ४ शक्ति रखेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण १ ३ से देह में कुछ शिकायत रहेगी और चौथी दृष्टि से नं. ७८३ शत्रु स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और विपक्षियों में विजय प्राप्त करेगा तथा झंझट युक्त मार्ग के द्वारा बड़ी सफलता पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य पर भरोंसा न रखकर पुरुषार्थ पर भरोसा अधिक रहेगा और धर्म के मार्ग का ठीक अनुसरण नहीं करेगा तथा आठवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की उन्नति करेगा और राज-समाज में मान पायेगा तथा कारबार के मार्ग में खूब उन्नति करेगा। वृश्चिक लग्न में ४ मंगल यदि कुम्भ का मंगल-चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है ७ १० तो माता के सुख और प्रेम की कमी प्राप्त करेगा ८ तथा भूमि-मकानादि के सुख में कुछ नीरसता ११ मं. ५ प्रतीत होगी और देह के अन्दर कुछ रोग या कुछ १२ परेशानी रहेगी तथा शत्रु पक्ष के कारणों से सुख- २ ४ १ ३ शान्ति में कुछ बाधा रहेगी और अपने स्थान में नं. ७८४ ही रहना पसंद होगा और चौथी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद युक्त शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम के द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और मूत्रेन्द्रिय में कुछ विकार का योग पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता-स्थान की उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और कारबार की उन्नति करगा और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४०७ राशि में देख रहा है, इसलिये धन लाभ और आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा अपने स्थान से प्रभाव युक्त रहेगा। वृश्चिक लग्न में ५ मंगल यदि मीन का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा ९ ७ है तो विद्या स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा १० ६ बुद्धि एवं वाणी के द्वारा प्रभाव शक्ति एवं हठ ११ ५ धर्म रखेगा और षष्ठेश होने के दोष के कारण से १२ संतान पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा मं २ शत्रु पक्ष में सदैव विजय पाने के लिये सोचेगा, १ ३ इसलिये दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी और चौथी नं. ७८५ मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव और कुछ चिन्ता शक्ति पायेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक परिश्रम और बुद्धि की शक्ति से आमदनी के मार्ग में सफलता शक्ति पायेगा तथा आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान को देख रहा है, इसलिये खर्च की अधिकता से कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थान में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा सफलता शक्ति पायेगा। वृश्चिक लग्न में ६ मंगल यदि मेष का मंगल- छठें शत्रु स्थान में एवं झंझट के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री ९ ७ बैठा है तो शत्रु स्थान में विशेष प्रभाव शक्ति १० ८ ६ कायम करेगा तथा विजय पायेगा, क्योंकि छठें ११ ५ स्थान पर क्रूर ग्रह बहुत बलवान् हो जाता है, १२ इसलिये बड़े से बड़े झंझटों और परेशानियों के २ ४ १ म. अन्दर बड़ी बहादुरी के साथ सफलता शक्ति ३ नं. ७८६ पायेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से देह में कुछ रोग और कुछ परेशानी या परतंत्रता- सी प्राप्त करेगा तथा चौथी नीच दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और धर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी पायेगा तथा यश की कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के साथ खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों में सम्बन्ध बनावेगा और आठवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और नाम की कुछ
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४०८ भृगु संहिता शक्ति मिलेगी और परिश्रम की शक्ति के द्वारा आत्मबल की जागृति रहेगी। वृश्चिक लग्न में ७ मंगल यदि वृषभ का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि ७ पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता युक्त १० ८ ६ शक्ति पायेगा तथा कुछ मतभेद रहेगा और गृहस्थ ११ 4 के संचालन में कुछ परेशानी रहेगी तथा छठें १२ २ मं. स्थान के दोष के कारण मूत्र-इन्द्रिय के स्थान में ४ कुछ विकार का योग कभी पायेगा और रोजगार १ ३ के मार्ग में कुछ परिश्रम और कुछ परेशानी के नं. ७८७ साथ-साथ शक्ति पायेगा और चौथी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान पायेगा और कारबार के मार्ग में शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ प्रभाव तथा अपने व्यक्तित्व की व्यवहारिक कुशलता से शत्रु पक्ष में विजय पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से धन स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है,, इसलिये धन की वृद्धि का तथा कुटुम्ब की वृद्धि का विशेष प्रयत्न करेगा। वृश्चिक लग्न में ८ मंगल यदि मिथुन का मंगल- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है ९ ७ तो देह के सुख और सुन्दरता में कमी पायेगा १० ८ ६ तथा छठें स्थान के दोष के कारण आयु एवं ११ ५ जीवन की दिनचर्या में कुछ-कुछ परेशानी या चिन्ता पायेगा और पुरातत्व की अनुकूल शक्ति १२ २ ४ ३ मं. को कुछ कठिनाईयों से प्राप्त करेगा तथा उदर में १ नं. ७८८ कुछ विकार पायेगा और शत्रु पक्ष के सम्बन्ध से कुछ परेशानी अनुभव करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है इसलिये देह के कठिन परिश्रम से आमदनी के मार्ग में शक्ति पाचेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये विशेष परिश्रम करेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से भाई और पराक्रम के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह के कठिन पुरुषार्थ से पराक्रम की महान् शक्ति पायेगा तथा भाई-बहिन के स्थान में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति और वृद्धि प्राप्त करेगा और बड़ी हिम्मत रखेगा। यदि कर्क का मंगल-नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में नीच का
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४०९ वृश्चिक लग्न में ९ मंगल होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, तो भाग्य के स्थान में कमजोरी अनुभव करेगा और ९ ७ धर्ष के पालन में कमजोरी रहेगी तथा षष्ठेश होने १० ८ ६ के दोष कारण से शत्रु पक्ष एवं झगड़े-झंझट ११ तथा दिक्कतों के योग से भाग्योन्नति के मार्ग में रूकावटें पड़ती रहेंगी और देह की सुन्दरता एवं १२ २ ४मं स्वास्थ्य के पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा चौथी १ ३ दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु नं. ७८९ शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों में सम्पर्क शक्ति रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह के परिश्रम के योग से पुरुषार्थ कार्य की उन्नति करेगा तथा भाई-बहिन की शक्ति का विकास पायेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में कुछ वैमनस्यता पायेगा और मकानादि के सुख में कुछ कमी रहेगी। वृश्चिक लग्न में १० मंगल यदि सिंह का मंगल- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो ७ षष्ठेश होने के दोष के कारण से पिता स्थान में ८ ६ कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त ११ ५ मं. करेगा और राज-समाज में मान एवं प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में कुछ परिश्रम १२ २ ४ और कुछ दिक्कतों के योग से उन्नति और १ ३ सफलता पायेगा और दसम स्थान पर मंगल नं. ७९० शक्ति प्रदायक माना जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में विजय और सफलता पायेगा ओर चौथी दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा भारी प्रभाव शक्ति पायेगा, किन्तु कुछ रोग या झंझट भी पायेगा तथा तथा बड़ा स्वाभिमानी बनेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के और मातृ भूमि के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध पायेगा तथा आठवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये दैहिक परिश्रम की शक्ति से विद्या एवं वाणी के अन्दर सफलता और प्रभाव पायेगा तथा संतान पक्ष में कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा।
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४१० भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में ११ मंगल यदि कन्या का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम ९ ७ से और प्रभाव शक्ति से खूब लाभ पायेगा तथा १० ८ ६ मं शत्रु पक्ष में झगड़े-झंझट का स्वामी होने के कारण ११ ५ देह की कुछ परेशानी तथा कुछ रोग या अधिक प्रयत्नशील रहना पड़ेगा और चौथी दृष्टि से धन १२ २ ४ एवं कुटुम्ब स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में १ ३ देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करेगा तथा नं. ७९१ कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाईयों के द्वारा विद्या की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ दिक्कतों के साथ उत्तम शक्ति तथा वाणी और बुद्धि के द्वारा प्रभाव शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में विजय लाभ पायेगा तथा बड़ा प्रभाव रखेगा और ननसाल पक्ष से लाभ का योग होगा तथा स्वाभिमानी बनेगा। वृश्चिक लग्न में १२ मंगल यदि तुला का मंगल- बारहवें खर्च स्थान ७मं. एवं बाहरी स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा ९ है तो देह के स्थान में बड़ी कमजोरी तथा कुछ १० रोग होगा और खर्चा अधिक करेगा तथा बाहरी ११ ५ स्थानों में मान प्राप्त करेगा और अपने स्थान में कुछ खिन्नता पायेगा तथा चौथी उच्च दृष्टि से १२ २ ४ भाई एवं पराक्रम स्थान को शत्रु शनि की मकर १ ३ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष नं. ७९२ में कुछ शक्ति रहेगी तथा पराक्रम स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ प्रभाव रहेगा और झगड़े-झंझट के मार्ग में कुछ हिम्मत शक्ति से काम करेगा ओर आठवीं दृष्टि से स्त्री तथा रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति पायेगा तथा कभी मूत्र रोग का विकार और गृहस्थी में झंझट पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के द्वारा कार्य संचालित रखेगा। आमद, आयु, पुरातत्त्वस्थानपति-बुध यदि वृश्चिक का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो देह के परिश्रम और विवेक शक्ति के द्वारा धन का सुन्दर
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वृश्चिक लग्न में १ बुध लाभ पायेगा और आयु की शक्ति का उत्तम योग मिलेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली ९ ७ पुरातत्त्व शक्ति को लाभ होगा और अष्टमेश होने १० ८ बु. ६ के दोष के कारण से देह में कुछ परेशानी पायेगा ११ ५ किन्तु प्रभाव युक्त रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ १२ २ ४ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ विवेक और १ ३ परिश्रम के योग से रोजगार में सफलता मिलेगी नं. ७९३ तथा स्त्री स्थान में कुछ कठिनाई के सहित सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में २ बुध यदि धनु राशि का बुध- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है, ९बु. ७ तो आमदनी के सुन्दर योग से धन की संग्रह १० ८ ६ शक्ति प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब शक्ति पायेगा तथा ११ ५ विवेक शक्ति के द्वारा धन और कुटुम्ब का लाभ होगा और आठवें स्थान का स्वामी होने के दोष १२ २ ४ के कारण से धन और कुटुम्ब की सुख-शक्ति में १ ३ कुछ कमी और कुछ बाधा प्राप्त करेगा तथा सातवीं नं. ७९४ दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि होगी तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या अमीरात ढंग से चलायेगा। वृश्चिक लग्न में ३ बुध यदि मकर का बुध- तीसरे पराक्रम एवं भाई बहिन के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा ९ ७ है तो भाई बहिन की शक्ति का लाभ करेगा तथा बु ८ ६ विवेक शक्ति और पुरुषार्थ के योग से आमदनी ११ ५ का सुन्दर लाभ होगा किन्तु अष्टमेश होने के कारण से भाई बहिन की सुख शक्ति के लाभ में कुछ १२ २ ४ कमी और कुछ दिक्कत रहेगी तथा पुरुषार्थ कर्म १ ३ की सफलता के मार्ग में कुछ कठिन परिश्रम करना नं. ७९५ पड़ेगा और आयु के स्थान में सुन्दर शक्ति का लाभ मिलेगा तथा पुरातत्त्व सम्बन्धी लाभ का योग विवेक रूपी पुरुषार्थ के बल से प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य और धर्म के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के बल से भाग्य और धर्म का लाभ होगा। यदि कुम्भ का बुध-चौथ केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शनि
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४१२ भृगु संहिता । वृश्चिक लग्न में ४ बुध की राशि पर बैठा है तो माता को शक्ति का लाभ करेगा और कुछ पुरातन भूमि का लाभ होगा ९ ७ तथा अपने स्थान में ही कुछ विवेक शक्ति के १० ८ ६ कठिन कर्म से आमदनी का सुन्दर लाभ होगा, ११ बु. ५ किन्तु अष्टमेश होने के दोष-कारण से माता के सुख-सम्बन्धों में तथा भूमि के पक्ष में कुछ कमी १२ २ ४ प्राप्त करेगा और आयु की शक्ति का सुख लाभ १ ३ होगा और पुरातत्त्व शक्ति के लाभ का सुख प्राप्त नं. ७९६ करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के साथ पिता एवं राज-समाज का लाभ पायेगा। वृश्चिक लग्न में ५ बुध यदि मीन का बुध- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की ९ ७ राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष में बड़ा कष्ट एवं १० V ६ कमी पायेगा और विद्या ग्रहण करने में कठिनाईयाँ ११ ५ रहेंगी तथा बुद्धि एवं वाणी की शक्ति में कुछ १२ कमजोरी लिये हुए विवेक शक्ति के द्वारा आमदनी बु, २ ४ का लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या तथा १ ३ आयु स्थान में कुछ चिंतित रहकर समय व्यतीत नं. ७९७ करेगा और पुरातत्व शक्ति का थोड़ा लाभ पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में वित्त से ज्यादा लाभ प्राप्ति का साधन बनायेगा। वृश्चिक लग्न में ६ बुध यदि मेष का बुध- छठे शत्रु एवं झंझट स्थान पर मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो कुछ ७ परिश्रम एवं परेशानी के योग से आमदनी का ८ ३ मार्ग प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में कुछ विवेक ११ ५ शक्ति के योग से लाभ होगा तथा आयु और १२ जीवन की दिनचर्या में कुछ दिक्कतें पायेगा और २ ४ १ बु. पुरातत्व सम्बन्धी लाभ की कुछ हानि होगी तथा ३ लाभ के मार्ग में कुछ कमी के कारणों के दुःख नं. ७९८ अनुभव करेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में लाभ का योग प्राप्त करेगा तथा नरमाई के योग से प्रभाव पायेगा।
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वृश्चिक लग्न में ७ बुध यदि वृषभ का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा ९ ७ है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण कुछ थोड़ी १० ८ ६ सी परेशानी के साथ स्त्री स्थान में लाभ शक्ति ११ 4 पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ विवेक शक्ति के द्वारा तथा कुछ कठिनाईयों के द्वारा सुन्दर लाभ १२ २ बु. ४ का योग प्राप्त करेगा और पुरातत्व शक्ति के संयोग १ ३ से लाभ का साधन मिलेगा तथा सातवीं मित्र नं. ७९९ दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक की शक्ति के द्वारा देह में मान प्राप्ति तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी। वृश्चिक लग्न में ८ बुध यदि मिथुन का बुध- आठवें आयु एवं मृत्यु स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो ७ आयु स्थान में वृद्धि एवं शक्ति प्राप्त करेगा तथा १० ८ 3 जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का ११ ५ लाभ होगा और अष्टमेश होने के कारण लाभ
१२ स्थान में कुछ परेशानी तथा कुछ कमी प्राप्त करेगा २ ४ तथा परिश्रम के योग से आमदनी और जीवन की १ ३ बु. दिनचर्या में शानदारी पायेगा और सातवीं मित्र नं. ८०० दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के योग द्वारा धन की वृद्धि के कारण प्राप्त करेगा और कुछ कठिनाई के योग से कुटुम्ब का लाभ होगा। वृश्चिक लग्न में ९ बुध यदि कर्क का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा ९ ७ है तो भाग्य और विवेक की शक्ति से आमदनी १० w V का योग होगा तथा पुरातत्व शक्ति के लाभ योग ११ ५ के कारण भाग्यवान् माना जायेगा और आयु की १२ २ हबु. उत्तम शक्ति मिलेगी। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण भाग्य में कुछ परेशानी पायेगा और १ ३ धर्म के स्थान में कुछ स्वार्थ युक्त शक्ति का पालन नं. ८०१ करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कमी मिले हुए लाभ योग होगा और विवेक शक्ति के लाभ योग द्वारा पुरुषार्थ की सफलता शक्ति पायेगा। यदि सिंह का बुध- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में मित्र सूर्य की
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४१४ भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में १० बुध राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के कारण से पिता के स्थान में कुछ कष्ट युक्त मार्ग के द्वारा ९ ७ लाभ की शक्ति प्रदान करता है, इसी प्रकार कुछ १० ८ ६ कठिनाइयों के द्वारा राज-समाज में लाभ और ११ ५ बु. मान प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में विवेक शक्ति के कठिन कर्म से उन्नति और पुरातत्व एवं १२ २ ४ आयु की उत्तम शक्ति पायेगा तथा इज्जत-आबरू १ ३ के जरिये से धन का लाभ प्राप्त करेगा और नं. ८०२ सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि के सुख भवन को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाई के साथ माता और भूमि का लाभ होगा। वृश्चिक लग्न में ११ बुध यदि कन्या का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री ९ ७ बैठा है तो आमदनी के मार्ग में विवेक शक्ति के १० ८ ६बु. सम्बन्ध से पुरातत्व माग्र के द्वारा महान् उत्तम ११ ५ लाभ की सफलता शक्ति पायेगा और आयु का उत्तम लाभ होगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध की विशेष १२ २ ४ शक्ति प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में १ ३ नं. ८०३ बड़ा उमंग पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान पक्ष को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में कुछ कमी पायेगा और सन्तान पक्ष में कुछ कमी और कुछ कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा अष्टमेश होने के कारण से एवं अधिक स्वार्थ सिद्धि करने के कारण से बुद्धि एवं वाणी से कुछ रूखा बर्ताव करेगा। वृश्चिक लग्न में १२ बुध यदि तुला का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो बहुत ९ ७बु अधिक खर्च करेगा तथा पुरातत्व शक्ति की हानि १० ६ पायेगा और आमदनी के मार्ग में कमजोरी पायेगा। ११ ५ किन्तु पुरातत्व से सम्बन्धित विवेक शक्ति के द्वारा बाहरी स्थानों में सफलता मिलेगी और खर्च १२ २ ४ का संचालन कार्य भी बाहरी स्थानों के सम्बन्ध १ ३ से करेगा और आयु के सम्बन्ध में कभी-कभी नं. ८०४ चिंताओं का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नरमाई और विवेक शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष से काम निकालेगा
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४१५ तथा भ्रमणकारी जीवन होने की वजह से कुछ अशान्ति-सी रहेगी। धन, संतान तथा विद्यास्थानपति-गुरु वृश्चिक लग्न में १ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है तो देह ९ ७ में इज्जत और मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और १० ८ गु. ६ धन-जन की शक्ति का गौरव पायेगा। तथा ११ द्वितीयेश होने के कारण कुछ देह में घिराव-सा रहेगा और पाँचवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान १२ २ ४ को स्वयं अपनी राशि मीन में स्वक्षेत्र को देख १ ३ रहा है, इसलिये विद्या के स्थान में महान् गौरव नं. ८०५ और सफलता शक्ति पायेगा तथा सन्तान पक्ष में बहुत उत्तम शक्ति और सफलता पायेगा तथा विद्या, बुद्धि एवं देह के संयोग से धन की शक्ति का सुख प्राप्त होगा और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद युक्त सहयोग सफलता शक्ति मिलेगी और नवमी उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के स्थान में विशेष उन्नति करेगा और यश प्राप्त होगा तथा धर्म का विशेष पालन करेगा और ईश्वर में विशेष निष्ठा रहेगी तथा भाग्यवान् माना जायेगा। वृश्चिक लग्न में २ गुरु यदि धन का गुरु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो ९गु. ७ धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का १० V ६ संयोग प्राप्त करेगा तथा विद्या की विशेष शक्ति ११ ५ का संग्रह करेगा। किन्तु द्वितीयेश होने के दोष के कारण से सन्तान पक्ष के सुख-सम्बन्धों में कमी १२ २ ४ पायेगा और बुद्धि के अन्दर स्वार्थ-सिद्धि का १ ३ विशेष ध्यान रखेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से नं. ८०६ शत्रु एवं झंझट स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में एवं झंझटों के स्थान में बड़ी दानाई और बुद्धि योग के द्वारा सफलता मिलेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्त्व स्थान के मार्ग में सफलता पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का लाभ के साथ राज-समाज में मान
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४१६ भृगु संहिता एवं प्रभाव होगा तथा कारबार के मार्ग में बुद्धि और धन की शक्ति से उन्नति प्राप्त करेगा तथा बड़ा बुद्धिमान् बनेगा। वृश्चिक लग्न में ३ गुरु यदि मकर का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में नीच का होकर शत्रु शनि की मकर राशि १० ९ ७ पर बैठा है तो भाई-बहिन के स्थान में परेशानी ग ८ ६ प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ स्थान में कमजोरी रहेगी ११ ५ और विद्या के पक्ष में कमी रहेगी तथा धन और कुटुम्ब की तरफ से कुछ कमी और कुछ परेशानी १२ २ ४ पायेगा तथा बुद्धि की तरफ से कुछ अनुचित १ ३ शक्ति का प्रयोग करेगा और पाँचवीं दृष्टि से स्त्री नं. ८०७ एवं रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ वैमनस्यता युक्त रूप से अच्छी शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परिश्रम के योग से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उत्तम शक्ति का लाभ और धर्म का पालन श्रेष्ठ रूप में करेगा और नवमी दृष्टि से लाभ के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग और परिश्रम के द्वारा धन का खूब लाभ आमदनी के रूप में प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में ४ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु शनि कुम्भ राशि पर बैठा है ९ ७ तो माता के पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त शक्ति से १० ८ सफलता और कुछ भूमि मकानादि की शक्ति ११ गु. ५ पायेगा तथा कुछ विद्या की शक्ति रहेगी और १२ सन्तान पक्ष में कुछ मतभेद युक्त सुख-शक्ति और २ ४ धन तथा कुटुम्ब के पक्ष में कुछ सुख-शक्ति मिलेगी १ ३ नं. ८०८ तथा पाँचवीं मित्र-दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति रहेगी और पुरातत्त्व के सम्बन्ध में सफलता शक्ति मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से लाभ पायेगा और राज-समाज में इज्जत तथा मान मिलेगा और कारबार के मार्ग में धन का लाभ होगा और नवमी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा तथा बाहरी स्थानों में कुछ थोड़ी सी नीरसता के साथ धन का लाभ होगा।
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४१७
वृश्चिक लग्न में ५ गुरु यदि मीन का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री ९ ७ बैठा है तो विद्या स्थान में विशेष शक्ति पायेगा १० ६ तथा विद्या बुद्धि के योग से धन की प्राप्ति करेगा ११ ५ और कुटुम्ब में शक्ति पायेगा, किन्तु द्वितीयेश १२ होने के कारण से कुछ दिक्कतों के साथ सन्तान ४ गु. २ पक्ष में कीमती शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी की १ ३ ताकत से विशेष लाभ पायेगा और पाँचवीं उच्च नं. ८०९ दृष्टि से भाग्य के स्थान को मित्र चन्द्रमा की राशि कर्क में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति विशेष रूप से प्राप्त करेगा और धर्म का विशेष ज्ञान होगा तथा बुद्धि योग से यश मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में सफलता शक्ति मिलेगी और नवमी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बड़ा प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता और इज्जत मिलेगी और विद्या, सन्तान, धन, इज्जत, मान इत्यादि कार्यों की प्राप्ति के कारण से बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा। वृश्चिक लग्न में ६ गुरु यदि मेष का गुरु- छठे शत्रु एवं झंझट स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो सन्तान पक्ष ७ में झंझट और परेशानी रहेगी तथा विद्या स्थान में १० ८ ६ कमजोरी रहेगी और बुद्धि की तेजी से शत्रु पक्ष ११ ५ में दानाई से काम निकालेगा और धन-जन एवं
१२ कुटुम्ब की तरफ से कुछ झंझट प्राप्त होगा तथा २ ४ पाँचवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को १ गु. ३ सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता- नं. ८१० स्थान की उन्नति करेगा और राज-समाज में मान तथा प्रभाव होगा और कारबार की उन्नति करेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थान के सम्बन्धों में प्रभाव रखेगा और नवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि के परिश्रम-मार्ग के द्वारा धन की वृद्धि के लिये सदैव प्रयत्न किया करेगा, अतः धन मिलता रहेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ वैमनस्यता रखते हुए भी कुछ शक्ति-सम्बन्ध रहेगा। यदि वृषभ का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद के सहित सुन्दर भृ. सं .- २७
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४१८ भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में ७ गुरु शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री में प्रभाव पायेगा और रोजगार के मार्ग में बुद्धि योग की शक्ति में ९ ७ धन की शक्ति पायेगा तथा बड़ी योग्यता के द्वारा १० ८ ६ गृहस्थ का संचालन कार्य करेगा और विद्या एवं ११ ५ सन्तान पक्ष की शक्ति प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से धन की आमदनी के लाभ स्थान की १२ २ गु. ४ बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये १ ३ बुद्धि और दैनिक कार्यक्रम के योग से अच्छा नं. ८११ लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता, प्रभाव और इज्जत पायेगा तथा बोलचाल के अन्दर सज्जनता और दानाई से काम करेगा और नवीं नीच दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान की शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान में कुछ परेशानी का योग पायेगा और पराक्रम स्थान में कमजोरी रहेगी तथा हिम्मत में कमी अनुभव होगी। वृश्चिक लग्न में ८ गुरु यदि मिथुन का गुरु- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो सन्तान ९ ७ पक्ष में संकट रहेगा तथा विद्या स्थान में कमजोरी १० ८ ६ रहेगी और धन के संग्रह करने के मार्ग में बड़ी ११ ५ कठिनाई होगी तथा कुटुम्ब की शक्ति में कमजोरी रहेगी एवं धन-सन्तान के पक्ष से बुद्धि में फिकर १२ २ ४ रहेगी और पुरातत्व धन की शक्ति का लाभ पायेगा १ ३ गु. और आयु के स्थान में शक्ति मिलेगी तथा जीवन नं. ८१२ की दिनचर्या में कुछ रौनक रहेगी और पाँचवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों में अच्छा सम्बन्ध रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की शक्ति का सामान्यतम सहयोग प्राप्त होगा और नवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि के सुख भवन को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ वैमनस्यता युक्त रूप से माता का एवं भूमि का सुख प्राप्त करेगा तथा बुद्धि की योग्यता से सुख के साधन पायेगा। यदि कर्क का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में उच्च का · होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य की महान् उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और धर्म के मार्ग में विशेष ज्ञान और विशेष शक्ति पायेगा
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४१९
वृश्चिक लग्न में ९ गुरु तथा भाग्य की शक्ति के द्वारा धन की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का सुन्दर योग ९ ७ पायेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान १० ८ ६ को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये ११ ५ देह को बड़ा मान प्राप्त होगा और बुद्धि योग की शक्ति से बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और सातवीं १२ २ ४गु. नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शत्रु १ ३ शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ८१३ भाई-बहिन की सुख-शक्ति में कमी रहेगी और पराक्रम स्थान में कमजोरी रहेगी और भाग्य के मुकाबले में पुरुषार्थ की शक्ति न्यून रहेगी तथा नवमी दृष्टि से विद्या एवं सन्तान को स्वयं अपनी मीन राशि में देख रहा है, इसलिए विद्या की महानता पायेगा और सन्तान पक्ष की विशेष उत्तम शक्ति पायेगा तथा वाणी के द्वारा बड़ी कीमती बातें कहकर सुयश प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में १० गुरु यदि सिंह का गुरु- दशम केन्द्र पिता एवं राज-स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो ९ ७ पिता स्थान के द्वारा धन की शक्ति का सुन्दर १० ८ ६ योग प्राप्त होगा तथा राज-समाज के सम्बन्ध में ११ ५ गु. बड़ी इज्जत, प्रभाव और मान प्राप्त करेगा और बुद्धि योग के द्वारा कारबार में भारी सफलता १२ २ ४ और उन्नति प्राप्त करेगा तथा सन्तान पक्ष में बड़ी ३ सफलता और सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा विद्या नं. ८१४ स्थान में विशेष शक्ति और मान प्राप्त होगा और पाँचवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की विशेष उन्नति करेगा तथा कुटुम्ब का सुन्दर सहयोग प्राप्त होगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है इसलिये माता के और भूमि के सुख-सम्बन्धों में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा सफलता शक्ति पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और बुद्धिबल की उत्तम कर्म शक्ति के द्वारा अनेक प्रकार के संकट से सुरक्षा प्राप्त करेगा। यदि कन्या का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा हो तो आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति मिलेगी और कभी- कभी विशेष धन का लाभ होगा तथा कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर योग मिलेगा और बड़ी इज्जत प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से भाई-
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४२० भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में ११ गुरु बहिन एवं पराक्रम स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के सुख- ९ ७ सम्बन्धों में कमी अनुभव करेगा तथा पराक्रम १० ८ ६गु. स्थान में कमजोरी पायेगा और हिम्मत शक्ति के ११ 4 अन्दर कुछ आलस्य रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को स्वयं अपनी मीन १२ २ ४ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या १ ३ स्थान की शक्ति का उत्तम लाभ पायेगा और नं. ८१५ सन्तान पक्ष के योग से विशेष उन्नति रहेगी तथा बुद्धि और वाणी की योग्यता से बड़ा लाभ पायेगा और नवमी दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त मार्ग से लाभ होगा और रोजगार में सफलता प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में १२ गुरु यदि तुला का गुरु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है। ९ ७गु. अतः बहुत अधिक खर्च करेगा तथा धन के संग्रह १० ८ ६ स्थान में कमी और दुःख का अनुभव करेगा तथा ११ ५ कुटुम्ब स्थान के सम्बन्ध में कमजोरी रहेगी और सन्तान पक्ष की तरफ से कष्ट का योग प्राप्त १२ २ ४ करेगा तथा विद्या स्थान में कमजोरी रहेगी और १ ३ बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में बुद्धि योग द्वारा धन नं. ८१६ का लाभ होगा तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये माता और मातृ भूमि के सम्बन्ध में नीरसता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में एवं झंझटों में कुछ दानाई से काम निकालेगा और प्रभाव पायेगा तथा नवमी दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति का अच्छा योग बनेगा और जीवन की सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति का लाभ होगा तथा जीवन में शान और बुद्धि में अशान्ति रहेगी। स्त्री, रोजगार, खर्च, बाहरीस्थानपति-शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो देह में कुछ कमजोरी और कुछ रौनक पायेगा तथा खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध होगा तथा घूमने-
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४२१ वृश्चिक लग्न में १ शुक्र फिरने के कार्यों में बड़ी योग्यता, कुशलता और चतुराई से काम करेगा और सातवीं दृष्टि से स्त्री ९ ७ एवं रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी वृषभ राशि १० ८ शु. ६ में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बाहरी सम्बन्धों ११ ५ के योग से बड़ी चतुराई के साथ रोजगार की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष के सम्बन्ध १२ २ ४ में कुछ सुन्दर शक्ति मिलेगी। किन्तु व्ययेश होने १ ३ के दोष से स्त्री व रोजगार के मार्ग में कुछ कमी नं. ८१७ अनुभव होगी। वृश्चिक लग्न में २ शुक्र यदि धन का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो ९शु. ७ व्ययेश होने के दोष के कारण से धन के कोष १० ८ ६ स्थान में कमजोरी रहेगी और कुटुम्ब की सुख ११ ५ शक्ति में भी कमी रहेगी और स्त्री पक्ष का स्वामी धन के बन्धन स्थान में बैठा है, इसलिये स्त्री पक्ष १२ २ ४ में विशेष असन्तोष रहेगा और रोजगार के मार्ग में १ ३ बाहरी स्थानों के योग से धन का लाभ पायेगा नं. ८१८ किन्तु खर्चे को शक्ति अधिक रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान को एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में कुछ रौनक रहेगी और पुरातत्व स्थान में कुछ शक्ति और कुछ कमजोरी मिलेगी किन्तु बड़ी चतुराई के साथ धनवानों में नाम रखेगा। वृश्चिक लग्न में ३ शुक्र यदि मकर का शुक्र- तीसरे भाई-बहन एवं पराक्रम के स्थान पर मित्र शनि की राशि पर बैठा १० ९ ७ है तो व्ययेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन शु ८ ६ के स्थान में कुछ कमी पायेगा तथा पुरुषार्थ में ११ ५ कुछ कमजोरी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से रोजगार की शक्ति पायेगा तथा खर्चा खूब १२ २ ४ करेगा और स्त्री के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी लिये १ ३
नं. ८१९ हुए शक्ति पायेगा तथा बड़ी चतुराई के द्वारा गृहस्थ के स्थान में खर्च की शक्ति से आमोद-प्रमोद करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य और धर्म के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के कारण भाग्य में कुछ कमजोरी लिये हुए कुछ शक्ति पायेगा और धर्म के मार्ग में खर्च की शक्ति से काम लेगा किन्तु यथार्थ धर्म का पालन नहीं करेगा।
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४२२ भृगु संहिता वृश्चिक लग्न में ४ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है ९ ७ तो सुखपूर्वक घर बैठे खर्च चलेगा और बाहरी १० ८ ६ स्थानों के सम्बन्ध से सुख मिलेगा किन्तु व्ययेश ११ शु. 4 होने के दोष के कारण से माता के सुख एवं कमी रहेगी और भूमि के सुख में कमी रहेगी और स्त्री १२ २ ४ पक्ष के संबंध में कुछ त्रुटियुक्त सुख के साधन १ ३ पायेगा और रोजगार के मार्ग में तथा बाहरी स्थानों नं. ८२० में चतुराई के संबंध से सुख मिलेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के स्थान के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज व कारबार में कुछ दिक्कतों के साथ कामयाबी रहेगी। वृश्चिक लग्न में ५ शुक्र यदि मीन का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि ९ ७ पर उच्च का होकर बैठा है तो बुद्धि विद्या के १० ६ अन्दर कोई विशेष कला पायेगा तथा संतान पक्ष ११ ५ में शक्ति रहेगी। किन्तु व्ययेश होने के दोष के १२ कारण विद्या एवं संतान पक्ष में कुछ कमी रहेगी श २ ४ तथा अधिक बोलने की शक्ति और चतुराई की १ ३
नं. ८२१ बातों से बहुत काम निकालेगा तथा स्त्री पक्ष में प्रभाव रहेगा और बाहरी स्थानों के संबंध से रोजगार 共 些 业 樂
के मार्ग में सफलता शक्ति पायेगा और खर्चा विशेष करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से लाभ के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कमी और कुछ परेशानी रहेगी। वृश्चिक लग्न में ६ शुक्र यदि मेष का शुक्र- छठें शत्रु और झंझट के स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है ७ तो स्त्री स्थान में कुछ झंझट तथा परेशानी पायेगा १० ८ ६ और रोजगार के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी, ११ ५ क्योंकि शुक्र व्ययेश होने से भी दोषी है और छठें बैठने से भी दोषी है, इसलिये गृहस्थ के संचालन १२ २ ४ और खर्चे के मार्ग में दिक्कतें रहेंगी तथा बाहरी १ शु. ३ स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी रहेगी किन्तु नं. ८२२ बाहरी सम्बन्ध से एवं दैनिक कर्म की चतुराई से शत्रु पक्ष में शान्ति से काम निकालेगा और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च अधिक करना
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४२३ पड़ेगा और बाहरी स्थानों में कुछ परिश्रम माग्र के द्वारा सम्बन्ध बनावेगा। वृश्चिक लग्न में ७ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र ९ ७ में बैठा है तो स्त्री एवं रोजगार के स्थान में बड़ी १० ६ सुन्दर शक्ति पायेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के ११ ५ कारण स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में कुछ कमजोरी भी रहेगी, परन्तु बाहरी स्थानों के सुन्दर सम्बन्ध १२ २ शु. ४ से गृहस्थ संचालन के मार्ग में चतुराई के योग से १ ३ खर्च की सुन्दर शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से नं. ८२३ देह के स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में दंख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी पायेगा। किन्तु गृहस्थ की शक्ति के कारण कुछ प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा व्यवहारिक कार्य, दौड़-धूप में चतुर बनेगा। वृश्चिक लन में ८ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- आठवें मृत्यु स्थान में एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा ९ ७ है तो स्त्री स्थान में बड़ा संकट प्राप्त करेगा तथा १० ६ रोजगार के पक्ष में बड़ी कठिनाईयाँ मिलेगी। बाहरी ११ ५ स्थानों के सम्बन्ध से परिश्रम एवं परेशानी के द्वारा रोजगार का कार्य गूढ़ चतुराईयों से पूरा १२ २ ४ करेगा और खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी एवं १ ३ शु. कमजोरी रहेगी और गृहस्थ के सुख संचालन नं.८२४ मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और सातवीं दृष्टि से धन एवं वुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये वययेश होने के दोष के कारण धन की संग्रह शक्ति के मार्ग में बड़ी कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब के मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा चतुराई से इज्जत बनावेगा ओर आयु स्थान में कुछ दिक्कत रहेगी। वृश्चिक तग्न में ९ शुक्र यदि कर्क का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क ७ राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष के कारण १० ६ V से भाग्य में कुछ कमजोरी पायेगा तथा धर्म के '१ ५ मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और स्त्री गृहस्थ के सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त रहकर भाग्य की शक्ति १२ २ ४शु. से उत्तम योग प्राप्त करेगा तथा धर्म के मार्ग में १ ३ स्वार्थयुक्त रहकर चतुराई और खर्च के मार्ग से नं. ८२५ धर्म का पालन करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध
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४२४ भृगु संहिता का लाभ कुदरती तौर से भाग्य शक्ति द्वारा प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से चतुराई से कुछ सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये भाई एवं पराक्रम स्थान में कुछ कमी प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में १० शुक्र यदि सिंह का शुक्र- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो ९ ७ व्ययेश होने के दोष के कारण पिता स्थान में १० ८ ६ कुछ हानि या कमी पायेगा ओर राज-समाज के ११ ५ शु. सम्बन्ध में कुछ चतुराई और बाहरी स्थानों के सहयोग से कुछ शक्ति पायेगा और कारबार की १२ २ ४ उन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें पायेगा और स्त्री १ ३ गृहस्थ के सुखों में कुछ कमजोरी ओर विशेष नं. ८२६ खर्च की योजना से काम करेगा तथा गेजगार के पक्ष में कुछ चतुराई के योग से मान पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलियं माता का बड़ा सहयोग मिलेगा और भूमि का कुछ सुख पायेगा। वृश्चिक लग्न में ११ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में ७ नीच का होकर मित्र बुध की राशि प: बैठा है तो १० ८ ६शु. व्ययेश होने से तथा नीच होने से डवल दोष के कारण आमदनी के स्थान में कमजोरीकरेगा तथा ११ ५ खर्चे की भी कमी रहेगी और स्त्री पक्षके सम्बन्ध १२ २ ४ में सुख शान्ति की कमी रहेगी ओर ऐोजगार के १ ३ मार्ग में बाहरी स्थानों के योग से तथा चतुराई से नं. ८२७ आमदनी की थोड़ी लाभ शक्ति पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि में शक्ति प्राप्त करेगा तथा संतन पक्ष में कुछ कमी के साथ विशेष शक्ति पायेगा। वृश्चिक लग्न में १२ शुक्र यदि तुला का शुक्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी ९ ७श स्थान में स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैग है तो १० E खर्चा बहुत अधिक तायदाद में करेगा और बाहरी ८ स्थानों के सम्बन्ध में विशेष शक्ति पायेगा तथा ११ ५ व्ययेश होने के दोष के कारण से स्त्री पक्ष मेंहानि १२ २ ४ प्राप्त करेगा और दूर व देर के योग से स्त्री का १ ३ साधन पायेगा तथा स्थानीय रोजगार में परेशनी नं. ८२८ रहेगी और बाहर के सम्बन्ध तथा चतुराई के यंग
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४२५ से रोजगार में शक्ति मिलेगी और सातवीं दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये व्यवहारिक चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में एवं झंझटों में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। भाई, पराक्रम, माता तथा भूमि स्थानपति-शनि वृश्चिक लग्न में १ शनि यदि वृश्चिक का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता ९ ७ के सुख सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त १० ८ श. ६ रहेगी और भूमि तथा घरेलू सुख के मार्ग मे कुछ ११ ५ शक्ति मिलेगी और देह के अन्दर स्वभाव में कुछ
१२ शान्तियुक्त तेजी का योग रहेगा तथा तीसरी दृष्टि २ ४ से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मकर १ ३ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई- नं. ८२९ बहन के सम्बन्ध में शक्ति प्राप्त रहेगी तथा पुरुषार्थ शक्ति की सफलता मिलेगी और बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री तथा रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुख शक्ति प्राप्त रहेगी तथा रोजगार के पक्ष में अच्छी सुख-सफलता मिलेगी और दसवीं शत्रुदृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में वैमनस्यता पायेगा तथा राज-समाज में कुछ प्रभाव की कमी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ कठिनाईयों के द्वारा सफलता-शक्ति प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में २ शनि यदि धनु राशि का शनि- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो कुछ ९श थोड़ी सी नीरसताई के साथ धन की शक्ति और १० ८ ६ कुटुम्ब का सुख प्राप्त करेगा किन्तु धन का स्थान ११ ५ कुछ बन्धनकारक होता है, इसलिये भाई-बहन के सुख-सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी तथा पराक्रम १२ २ ४ की शक्ति से धन की वृद्धि करने में लगा रहेगा १ ३ और धन के संग्रह करने में भी सुख का अनुभव नं. ८३० करेगा तथा तीसरी दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिए भूमि की शक्ति पायेगा तथा कुछ माता की शक्ति का लाभ पायेगा। किन्तु मातृ स्थान के प्रेम सम्बन्ध में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं
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४२६ भृगु संहिता पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति का सुख मिलेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से आमद तथा लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति पायेगा तथा सुखपूर्वक धन के लाभ का आनन्द प्राप्त करेगा, परन्तु घरेलू सुख की वास्तविक यथार्थता में कमी का योग मिलेगा। वृश्चिक लग्न में ३ शनि यदि मकर का शनि-तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्री १० ७ बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष की सुख-शक्ति श ८ ६ प्राप्त करेगा तथा पराक्रम स्थान में बड़ी सफलता- ११ ५ शक्ति और हिम्मत-शक्ति प्राप्त रहने के कारण से बड़ा सुख और उत्साह रहेगा तथा माता की शक्ति १२ २ ४ का आनन्द मिलेगा और भूमि मकानादि के सुख १ ३ की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से नं. ८३१ विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है इसलिये कुछ दिक्कतों के साथ विद्या की शक्ति का सुख संग्रह पायेगा और संतान-पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त रूप से सुख-शक्ति मिलेगी तथा बातचीत की शक्ति विशेष रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये थोड़ी-सी नीरसता के साथ भाग्य-शक्ति का सुख प्राप्त होगा और धर्म के स्थान में कुछ मतभेद के साथ पालन करेगा तथा दसवीं उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए खर्चा बहुत करेगा और दूसरे स्थानों में सफलता पायेगा। वृश्चिक लग्न में ४ शनि यदि कुम्भ का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री ९ ७ बैठा है तो माता के पक्ष को विशेष शकित मिलेगी १० ८ तथा भूमि और मकानादि की सुन्दर शक्ति का ११ श. ५ आनन्द रहेगा और घरेलू सुख प्राप्ति के मजबूत १२ साधन मिलेंगे तथा भाई-बहिन की शक्ति का २ ४ सुन्दर सुख रहेगा और सुखपूर्वक पराक्रम-शक्ति १ ३
नं. ८३२ का प्रयोग करेगा तथा तीसरी नीच दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है; इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ अशान्ति के कारण बनेंगे तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ नरमाई या कठिनाई के योग से काम निकालेगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४२७ एवं राज्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के स्थान में कुछ मतभेद रहेगा और राज-समाज के सम्बन्धों में कुछ नीरसताई रहेगी तथा कारबार की उन्नति के लिये लापरवाही रखेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी तथा देह से बहुत परिश्रम करने का प्रयत्न करेगा। वृश्चिक लग्न में ५ शनि यदि मीन का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है ९ तो कुछ अरुचिकर मार्ग के द्वारा विद्या की शक्ति १० ८ ६ पायेगा और विशेष वाचाल शक्ति रखेगा और ११ ५ भाई-बहिन तथा माता के पक्ष में कुछ वैमनस्यता २ युक्त सम्पर्क पायेगा और मकानादि भूमि का थोड़ा श २ ४ सुख मिलेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति का प्रयोग १ ३ बुद्धियोग द्वारा करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से नं. ८३३ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष से सुख शक्ति मिलेगी तथा रोजगार के मार्ग में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में सफलता पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष स्थान की वृद्धि करने का विशेष प्रयत्न करते रहने पर भी धन की शक्ति का साधारण सुख मिलेगा और कुटुम्ब से कुछ वैमनस्यता रहेगी। वृश्चिक लग्न में ६ शनि यदि मेष का शनि- छठे शत्रु स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की मेष राशि पर बैठा है तो ७ माता के सम्बन्ध में सुख-शक्ति की महान् कमी १० ८ ६ पायेगा तथा मातृ-भूमि मकानादि की कमी एवं ११ ५ कष्ट रहेगा और भाई-बहिन के पक्ष में शत्रुता एवं परेशानी का योग रहेगा तथा सुख-शक्ति को पाने १२ २ ४ के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा तथा शत्रु १ श. ३ पक्ष में कुछ गुप्त शक्ति के बल से हिम्मत और नं. ८३४ सहारा प्राप्त करेगा तथा कुछ दूसरे का सहारा पाकर चलेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी और पुरातत्व का लाभ पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से खर्च स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में शक्ति मिलेगी और दसवीं दृष्टि से भाई-बहिन के स्थान
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४२८ भृगु संहिता को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन से विरोध रूप होते हुए भी कुछ शक्ति रहेगी और पराक्रम में कुछ शक्ति रहेगी और पराक्रम में कुछ कमजोरी होते हुए भी हिम्मत से सफलता मिलेगी। वृश्चिक लग्न में ७ शनि यदि वृषभ का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा ९ ७ है तो स्त्री पक्ष से सुख और शक्ति पायेगा तथा १० ८ ६ सुखपूर्वक पराक्रम शक्ति के द्वारा रोजगार के ११ ५ मार्ग में सफलता एवं सुख प्राप्त करेगा और भाई- बहिन की शक्ति का योग रहेगा और गृहस्थ में १२ २ श. ४ आनन्द अनुभव करेगा तथा तीसरी शत्रुदृष्टि से १ ३ भाग्य एवं धर्मस्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में नं. ८३५ देख रहा है, इसलिये धर्म व भाग्य के स्थान में कुछ थोड़ी-सी नीरसता का अनुभव करते हुए भी भाग्य और धर्म के विकास का साधन बनाता रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता की कुछ कमी रहेगी और देह से परिश्रम अधिक लिया जायेगा और दसवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति मिलेगी और घरेलू सुख के उत्तम साधन मिलेंगे तथा मकान भूमि की सुख-शक्ति मिलेगी और दैनिक कार्य के मार्गों में आमोद-प्रमोद का सदैव ख्याल रखेगा। वृश्चिक लग्न में ८ शनि यदि मिथुन का शनि-आठवें मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की रीश पर बैठा है ९ ७ तो भाई-बहिन के पक्ष में हानि या कमी पायेगा १० ८ ६ और माता के सुख में बहुत कमी रहेगी तथा भूमि ११ ५ के सुख-सम्बन्धों में परेशानी और पराक्रम स्थान की शक्ति में कमजोरी रहेगी तथा आयु के स्थान १२ २ ४ में शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ १ ३ श. पायेगा और तीसरी शत्रुदृष्टि से पिता एवं राज्य- नं. ८३६ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्ध में वैमनस्यता प्राप्त करेगा ओर राज-समाज के कार्यों में कुछ नीरसता रहेगी तथा कारबार के मार्ग में उन्नति के लिये कुछ आलस्य मानेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह-शक्ति में कुछ कमी रहेगी तथा कुटुम्ब में कुछ वैमनस्यता रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४२९ में कुछ कमी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ नीरसता का योग प्राप्त करेगा तथा दिनचर्या में कुछ शानदारी रहेगी। वृश्चिक लग्न में ९ शनि यदि कर्क का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है ७ तो कुछ नीरसतायुक्त मार्ग के द्वारा भाग्य की १० ६ वृद्धि पायेगा तथा धर्म का पालन करेगा और ११ ५ माता की शक्ति का सुख प्राप्त करेगा तथा भूमि मकानादि का सुख मिलेगा और तीसरी मित्र दृष्टि १२ २ ४श. से आमदनी के स्थान को बुध की कन्या राशि में १ ३ देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ और भाग्य की नं. ८३७ शक्ति से धन का खूब लाभ पायेगा और आमदनी के मार्ग में सुखपूर्वक सफलता पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पराक्रम स्थान की उत्तम सफलता शक्ति पायेगा और भाई-बहिन की शक्ति का सुन्दर सम्बन्ध पायेगा और दसवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी के सहित शक्ति पायेगा और झगड़े-झंझटों के पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी तथा भाग्यवान् समझा जायेगा। वृश्चिक लग्न में १० शनि यदि सिंह का शनि- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो ९ ७ पिता स्थान में कुछ नीरसता के योग से शक्ति १० ८ ६ और सुख प्राप्त करेगा तथा राज समाज के सम्बन्ध ११ ५ श. में कुछ परिश्रम के योग से मान प्राप्त करेगा और कारबार के स्थान में शक्ति मिलेगी और उन्नत्ति १२ २ ४ करेगा तथा भाई-बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता १ ३ युक्त शक्ति और सुख प्राप्त करेगा और पराक्रम
दृष्टि से खर्चस्थान एवं बाहरी स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख नं. ८३८ से सफ़लत्ता-शक्ति मिलेगी तथा तीसरी उच्च
रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों में सफलता-शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कुम्भ राशि में माता एवं भूमि स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति में कुछ मतभेद रखते हुए सुख प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की शक्ति पायेगा तथा घरेलू सुख के साधन रहेंगे और दसवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिए स्त्री स्थान में सुखपूर्वक शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में सुखपूर्वक शक्ति
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४३० भृगु संहिता प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर सुखसम्बन्धी साधनों को पायेगा। वृश्चिक लग्न में ११ शनि यदि कन्या का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आमदनी के ९ ७ स्थान में विशेष सुख-शक्ति एवं उन्नति पायेगा, १० ८ ६श. क्योंकि ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली ११ ५ फल का दाता बन जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति से सुखपूर्वक लाभ की शक्ति प्राप्त रहेगी १२ २ ४ और भाई-बहिन की शक्ति का सुख लाभ पायेगा १ ३ और माता के पक्ष से लाभ की शीक्त पायेगा नं. ८३९ तथा भूमि-मकानादि की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ के मार्ग के द्वारा देह में कुछ आराम की कमी रहेगी तथा सुन्दरता में कुछ न्यूनता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ दिक्कत के साथ विद्या की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में कुछ थोड़ी-सी निरसता के योग से सुख-शक्ति मिलेगी तथा दशवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए आयु की सुख-शक्ति पायेगा और पुरातत्त्व में शक्ति के योग से सुख मिलेगा। वृश्चिक लग्न में १२ शनि यदि तुला का शनि- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर ९ ७श. बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी १० ८ ६ स्थानों में विशेष प्रभाव शक्ति और सुख मिलेगा ११ ५ और भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ हानि या परेशानी-सी पायेगा तथा माता के सुख सम्बन्धों १२ २ ४ में तथा मातृस्थान के सम्बन्ध में कमजोरी पायेगा १ ३ और तीसरी शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान नं. ८४० को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में कमी रहेगी तथा कुटुम्ब स्थान में कुछ नीरसता प्रतीत होगी और सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी के कारण प्राप्त करेगा तथा कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग में दिक्कतें रहेंगी और दसवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये आयु के पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में सुख- शक्ति रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक और प्रभाव रहेगा और विशेष खर्च के संयोग से सुख का अच्छा साधन पायेगा।
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४३१
कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु वृश्चिक लग्न में १ राहु यदि वृश्चिक का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है तो देह ९ ७ के सम्बन्ध में चिन्ता और कष्ट के साधन पायेगा १० ८ रा. ६ तथा देह के अन्दर कोई कमी अनुभव करेगा तथा
११ ५ बड़ी कठिन और गुप्त युक्ति के बल से मान और प्रभाव पायेगा तथा गहरी उन्नति करने के लिये १२ २ ४ महान् कठिन कर्म की साधना करेगा तथा मंगल १ ३ की राशि में राहु बैठा है, इसलिये स्वभाव में बड़ी
का योग बनाता रहेगा किन्तु कभी-कभी देह में मृत्यु तुल्य संकट का नं. ८४१ तेजी रहेगी और गुप्त रूप से अधिक सर्वार्थसिद्धि
सामना भी करना पड़ता रहेगा तथा सुन्दरता में कमी का योग प्राप्त करेगा; किन्तु अन्दरूनी तौर से देह में कोई छिपी शक्ति का संयोग पायेगा। वृश्चिक लग्न में २ राहु यदि धनु राशि का राहु- धन और कुटुम्ब के स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर ९रा. ७ बैठा है, तो धन के कोष स्थान में बड़ी भारी कमी १० ८ ६ रहेगी, धन के सम्बन्ध में कभी-कभी महान् हानि ११ ५ और महान् संकट के योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब के पक्ष में बड़ी भारी चिंता और परेशानी के योग १२ २ ४ प्राप्त करेगा। गुरु की राशि पर नीच का होकर १ ३ बैठा है, इसलिये धन की शक्ति पाने के लिए नं. ८४२ महान् कठिन कष्टसाध्य कर्म को बड़ी गुप्त युक्ति और योग्यता के द्वारा साधकर सफल बनेगा। किन्तु फिर भी जीवन में धन की चिंता से मुक्ति नहीं मिलेगी तथा धन की पूर्ति के लिये कभी-कभी धन का कर्जा भी लेना पड़ेगा तथा धन की न्यून शक्ति का पालन करेगा। वृश्चिक लग्न में ३ राहु यदि मकर का राहु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो तीसरे ९ ७ १० स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये रा. ८ पराक्रम शक्ति की महान् वृद्धि करेगा और बड़ी ११ ५ भारी हिम्मत शक्ति से काम लेगा तथा गुप्त युक्ति के कर्म बल से महान् धैर्य के द्वारा बड़े-बड़े काम १२ २ ४ करेगा। किन्तु कभी-कभी अचानक हिम्मत हारने १ ३ का योग बनेगा, परन्तु प्रकट में धैर्य नहीं टूटेगा और भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ चिन्ता, फिकर का योग किसी भी रूप में प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ के द्वारा उन्नति करने नं. ८४३
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४३२ भृगु संहिता के मार्ग में असाधारण हिम्मत शक्ति से काम लेगा, फिर भी अपने अन्दर शक्ति सामर्थ्य की कुछ कमी अनुभव करेगा। वृश्चिक लग्न में ४ राहु यदि कुम्भ का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है ९ ७ तो माता के स्थान में बड़ा संकट एवं माता के १० ६ V सुख की कमी प्राप्त करेगा और भूमि स्थान के ११ रा. 4 सुख-सम्बन्धों में भी कमी और झंझट पायेगा तथा घरेलू वातावरण में कभी-कभी घोर अशांति १२ २ ४ के कारण प्राप्त करेगा। शनि की राशि पर राहु १ ३ बैठा है, अतः बड़ी भारी गुप्त युक्ति के बल से नं. ८४४ घरेलू सुख के साधनों को प्राप्त करेगा और अशांति के वातावरण में बड़ी युक्ति के द्वारा बचाव के अनेक साधन बनायेगा तथा सुखी रहने के लिये कठिन परिश्रम तथा कुछ दूसरों का सहारा प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में ५ राहु यदि मीन का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है ७ तो संतान पक्ष में बड़ा भारी संकट प्राप्त करेगा १० ६ V और विद्या को ग्रहण करने में बड़ी-बड़ी दिक्कतें ११ रहेंगी। किन्तु फिर भी गुरु की राशि पर राहु बैठा १२ है, इसलिये गुप्त युक्ति और योग्यता के बल से रा २ ४ विद्या स्थान की पूर्ति करेगा तथा छिपाव शक्ति १ ३ के द्वारा बोलचाल के अन्दर बड़ी भारी अक्लमंदी नं. ८४५ जाहिर करेगा और संतान पक्ष में बड़ी-बड़ी दिक्कतों से टकराने के बाद कुछ शक्ति पायेगा और दिमाग के अन्दर कुछ अशान्ति और परेशानी-सी रहेगी और बड़ी-बड़ी गहरी युक्तियों के द्वारा बड़ी-बड़ी लम्बी योजनाएँ बनायेगा। वृश्चिक लग्न में ६ राहु यदि मेष का राहु-छठे शत्रु स्थान एवं झंझट स्थान में शत्रु मंगल की मेष राशि पर बैठा है, तो ९ ७० १० छठे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली हो जाता ८ ६ है। अतः शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा ११ ५ और बड़ी से बड़ी मुसीबतों के अन्दर बड़ी से १२ २ बड़ी मुसीबतों के अन्दर बड़ी भारी युक्ति और ४ १ रा. हिम्मत शक्ति से काम निकालेगा और गुप्त हिम्मत ३ शक्ति से बड़ी विजय पायेगा किन्तु फिर भी कभी- नं. ८४६ कभी राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी प्राप्त होगी बल्कि कभी-कभी शत्रु पक्ष में कठिन
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४३३ समस्याओं से टकराना पड़ेगा किन्तु झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी धैर्यता की शक्ति से कामयाबी प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में ७ राहु यदि वृषभ का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा ९ ७ है तो स्त्री स्थान में हानि एवं परेशानी पायेगा तथा १० ८ ६ रोजगार के स्थान में बड़ी दिक्कतें रहेंगी मगर ११ ५ चतुर शुक्र की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये बड़ी-बड़ी चतुराई और युक्तियों के बल से स्त्री १२ २ रा. ४ और गृहस्थ की संचालन शक्ति पायेगा तथा बड़ी १ ३ गहरी युक्तियों के बल से रोजगार में शक्ति प्राप्त नं. ८४७ करेगा, किन्तु कभी-कभी स्त्री स्थान में एवं गृहस्थ के पक्ष में घोर संकट पायेगा तथा इसी प्रकार रोजगार के मार्ग में कभी- कभी भारी चिन्ता का योग पायेगा और रोजगार तथा गृहस्थ के सम्बन्ध में अन्दरूनी कुछ कमी के साथ चलेगा। वृश्चिक लग्न में ८ राहु यदि मिथुन का राहु- आठवें आयु स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो ९ ७ आयु स्थान की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्त्व १० ८ ६ शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या ११ ५ में बड़ी उमंग करेगा तथा बड़े जवाब और शानदारी के तौर से रहेगा। किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों १२ २ ४ के कारण जीवन के अन्दर अन्दरूनी कुछ कमी १ ३ रा. महसूस करेगा तथा कभी-कभी आयु के स्थान नं. ८४८ में अचानक कोई खतरा या निराशा का योग पायेगा और इसी प्रकार कभी-कभी पुरातत्त्व विभाग में कोई हानि का योग पायेगा और कभी-कभी कोई उदर के अन्दर शिकायत का योग पायेगा तथा आसपास के स्थान में प्रसिद्धता पायेगा। वृश्चिक लग्न में ९ राहु यदि कर्क का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा ९ ७ है तो भाग्य के स्थान में महान् संकट का योग १० ८ ६ प्राप्त करेगा तथा भाग्य की उन्नति के लिये बड़ी- ११ 4 बड़ी टक्करें खाने के बाद कुछ रास्ता पायेगा
१२ और धर्म के मार्ग में हानि एवं कुछ अश्रद्धा रहेगी २ ठरा. तथा धर्म का पालन ठीक तौर से नहीं कर सकेगा १ ३ और मानसिक चिंतायें प्राप्त होंगी तथा भाग्योन्नति नं. ८४२ के लिये कुछ न्याय के विपरीत मार्ग भी बनाना भृ.सं .- २८
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४३४ भृगु संहिता पड़ेगा तथा बड़ी भारी निराशाओं से सामना करना पड़ेगा और ईश्वर के भरोसे में बारम्बार कमी और शंका रहेगी बाद में कुछ सहारा रहेगा। वृश्चिक लग्न में १० राहु यदि सिंह का राहु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा ९ ७ है तो पिता के स्थान में परेशानी तथा चिन्ता के १० ८ ६ कारण प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में ११ ५ रा. कुछ कष्ट एवं निराशा प्राप्त करेगा तथा मान-उन्नति एवं पदोन्नति के मार्ग में रुकावटें तथा कमी पायेगा १२ २ ४ और कारबार की उन्नति के लिये विशेष चिन्ता एवं १ ३ परेशानियों के द्वारा कार्य करेगा और राज्य-समाज, नं. ८५० इज्जत-आबरू के सम्बन्ध में कभी-कभी महान् संकट का सामना पायेगा तथा सूर्य के स्थान पर राहु बैठा है, इसलिये हेकड़ी और चतुराई के द्वारा उन्नति एवं प्रभाव की वृद्धि के प्रयत्न करेगा। वृश्चिक लग्न में ११ राहु यदि कन्या का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो लाभ स्थान में ९ ७ १० क्रूर ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता बन ६ रा. जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष ११ 4 लाभ पायेगा तथा गुप्त युक्ति एवं विवेक शक्ति
१२ के द्वारा अधिक नफा खाने के लिये विशेष प्रयल २ ४ करेगा तथा आमदनी के स्थान में कभी-कभी १ ३
नं. ८५१ कष्ट एवं चिंताओं का योग प्राप्त करेगा तथा अधिक लाभ प्राप्ति के लिये अनधिकार लाभ की शक्ति भी प्राप्त करेगा तथा अधिक स्वार्थ सिद्धि का सदैव ध्यान रखेगा फिर भी आमदनी के अन्दर कमी और असन्तोष के कारण प्राप्त करेगा तथा कभी- कभी मुफ्त का-सा धन प्राप्त करेगा। वृश्चिक लग्न में १२ राहु यदि तुला का राहु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा ९ ७रा अधिक होने के कारण से अथवा खर्च के किसी १० ८ ६ भी कारण से परेशानी प्राप्त करेगा तथा चतुर ११ ५ शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये चतुराई तथा
१२ २ गुप्त युक्ति बल की शक्ति से खर्च के संचालन ४ मार्ग में शक्ति पायेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध १ ३ में परेशानी के कारण बनेंगे, किन्तु युक्ति बल के नं. ८५२ द्वारा बाहरी सम्बन्धों में कठिनाई के मार्ग में सफलता मिलेगी किन्तु कभी-कभी खर्च के मार्ग में भारी संकट का सामना करना
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४३५ पड़ेगा फिर भी खर्च के मार्ग में कुछ कमी के साथ शक्ति मिलेगी और कभी-कभी मुफ्त का-सा खर्च-संचालन मार्ग भी मिलेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति का अधिपति-केतु वृश्चिक लग्न में १ केतु यदि वृश्चिक का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो देह ९ ७ के स्थान में कई बार गहरे संकट और आघात १० ८ के. ६ प्राप्त होंगे तधा देह में सुन्दरता की कमी रहेगी ११ ५ क्योंकि गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये स्वभाव में गरमी रहेगी तथा देह के द्वारा १२ २ ४ कठिन कर्म एवं विशेष परिश्रम करना पड़ेगा और १ ३ दिमाग की शक्ति के सम्बन्ध में इसलिये कमजोरी मानेगा क्योंकि केतु के धड़ पर शिर नहीं है, और देह में कभी कोई माता का यानी चेचक की बीमारी भी पायेगा तथा नं. ८५३
अधिक दौड़-धूप करने के कारण से थकान एवं परेशानी अनुभव करेगा। वृश्चिक लग्न में २ केतु यदि धनु राशि का केतु- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की ९ के ७ राशि पर बैठा है तो धन के स्थान में कभी-कभी १० V ६ मुफ्त का-सा विशेष धन प्राप्त करेगा और धन ११ ५ की विशेष शक्ति पाने के लिये बड़ा भारी परिश्रम एवं विशेष दौड़-धूप करेगा और कुटुम्ब के स्थान १२ २ ४ में बड़ा भारी आडम्बर पायेगा और नकद धन की १ ३ स्थिति के अन्दर प्रकट रूप में बड़ा भारी दिखावा
के स्वाभाविक गुण के कारण से धन के पक्ष में कभी-कभी बड़ी हानि नं. ८५४ रहेगा। किन्तु अन्दरूनी कुछ कमी रहेगी और केतु
पायेगा तथा इसी कारण कुटुम्ब सुख में कुछ कमी रहेगी और इज्जत- आबरू के अन्दर बड़ी शक्ति प्राप्त करने का सदैव भारी प्रयत्न करेगा। वृश्चिक लग्न में ३ केतु यदि मकर का केतु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है तो 2० ७ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली हो जाता है, के ८ ६ इसलिये बड़ी भारी पुरुषार्थ शक्ति से काम करने ११ ५ और उद्योग करने का प्रयत्न करेगा तथा बड़ी भारी मित्र हिम्मत शक्ति रखेगा तथा भाई बहिन १२ २ ४ के पक्ष में कष्ट एवं परेशानी के कारण पायेगा ३ तथा केतु का स्वाभाविक गुण खराब होने के कारण परिश्रम की शक्ति और दौड़-धूप के मार्ग में अन्दरूनी कुछ कमजोरी और परेशानी प्राप्त करेगा तथा जाहिर में बड़ी नं. ८५५
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४३६ भृगु संहिता भारी हेकड़ी के काम लेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बहादुरी की सफलता-शक्ति मिलेगी। किन्तु अपनी अन्दरूनी पुरुषार्थ-शक्ति के अन्दर कुछ गुप्त शक्ति का भरोसा तथा कुछ कमजोरी मानेगा। वृश्चिक लग्न में ४ केतु यदि कुम्भ का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर मित्र शनि की राशि में बैठा है ९ ७ तो माता के स्थान में परेशानी एवं कुछ कष्ट के १० ८ ६ कारण पायेगा और घरेलू सुख-शान्ति के अन्दर ११ के. ५ बड़ी भारी कमी एवं झंझट प्राप्त करेगा और भूमि- मकानादि की कमी एवं कुछ परेशानी रहेगी तथा १२ २ ४ कभी-कभी महान् अशांति के कारण प्राप्त होंगे। १ m किन्तु सुख-शान्ति पाने के लिये महान् कठिन नं. ८५६ कर्म एवं विशेष परिश्रम करेगा और गुप्त शक्ति एवं हिम्मत के द्वारा धैर्य और सुख का अनुभव करेगा तथा मकानादि का स्थानान्तर पाकर भी सुख-संचय करने में कुछ त्रुटि मानेगा। वृश्चिक लग्न में ५ केतु यदि मीन का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या : एवं संतान स्थान पर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है ९ ७ तो संतान पक्ष में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा और १० ८ ६ विद्या स्थान में विद्या ग्रहण करते समय बड़ी ११ ५ दिक्कतें पायेगा तथा दिमाग के अन्दर परेशानी १२ और गुप्त चिंता का योग प्राप्त करेगा तथा बातचीत के २ ४ के अन्दर श्ब्दशैली की शोभा में कमी रहेगी तथा १ ३ कभी-कभी सन्तान पक्ष में महान् संकट का योग नं. ८५७ प्राप्त करेगा और बुद्धि के अन्दर गुप्त शक्ति का योग पायेगा तथा विचारों में बड़ी भारी जिद्दबाजी तथा दृढ़ता शक्ति से काम लेगा, इसलिये बुद्धि की प्रयोग शक्ति में शील और सत्य की कमजोरी रहेगी तथा क्रोध रहेगा। वृश्चिक लग्न में ६ केतु यदि मेष का केतु- छठे शत्रु मंगल की मेष राशि में बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर ग्रह ९ ७ शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में १० ६ बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और गरम ग्रह की राशि ११ पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये बड़ी बहादुरी के साथ शत्रु पक्ष में विजय प्राप्त करेगा तथा बड़ी से १२ २ ४ बड़ी दिक्कतों और मुसीबतों में भारी गुप्त शक्ति १ के ३ और धैर्य से काम करेगा और प्रभाव शक्ति का नं. ८५८ विकास करने के लिये बड़ी भारी कठिन परिश्रम
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४३७ तथा विशेष दौड़-धूप करेगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी पायेगा तथा कभी-कभी शत्रु पक्ष में अन्दरूनी कमजोरी अनुभव करेगा। वृश्चिक लग्न में ७ केतु यदि वृषभ का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र शुक्र की वृषभ राशि ९ ७ पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ा कष्ट सहन करेगा १० ८ ६ और गृहस्थ में संचालन मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें ११ ५ एवं परेशानियाँ पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में बड़ी कठिनाईयाँ मिलेंगी, कठिन कर्म के द्वारा १२ २ क. ४ कार्य-संचालन करेगा और चतुर शुक्र के स्थान १ ३ पर बैठा है, इसलिये चतुराई और हठयोग की नं. ८५९ शक्ति से सफलता पायेगा तथा कभी कोई मूत्र इन्द्रिय में विकार पायेगा एवं गृहस्थ के अन्दर कोई खास कमी अनुभव करेगा तथा कभी-भी गृहस्थ एवं रोजगार के मार्ग में महान् संकट का सामना पायेगा। किन्तु गुप्त धैर्य की शक्ति से मंजिल पूरी करता रहेगा। वृश्चिक लग्न में ८ केतु यदि मिथुन का केतु- आठवें आयु स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि और कष्ट के ७ कारण पायेगा तथा जीवन में अनेकों बार मृत्यु १० ६ तुल्य महान् संकट के योग प्राप्त करेगा और ११ ५ दिनचर्या में बड़ी परेशानियाँ अनुभव करेगा तथा जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्त्व शक्ति १२ २ ४ की हानि पायेगा और गुदा के अन्दर या पेट में १ ३ के. कोई बीमारी के कारण कष्ट पायेगा तथा अनेक नं. ८६० प्रकार की चिंताओं से टकराना पड़ेगा और जीवन- निर्वाह करने के लिए महान् कठिन परिश्रमी कर्म के द्वारा काम करेगा तथा अतिगुप्त शक्ति का भरोसा तथा हिम्मत रखेगा। वृश्चिक लग्न में ९ केतु यदि कर्क का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि पर ९ ७ बैठा है तो भाग्य स्थान में महान् संकट प्राप्त १० ८ ६ करेगा तथा धर्म के मार्ग में बड़ी हानि और कमजोरी ११ ५ करेगा और भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी- बड़ी कठिनाईयाँ और परेशानियाँ पायेगा क्योंकि १२ २ ४ के मन स्थानपति चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये १ ३ मानसिक चिंतायें अधिक रहेंगी और कभी-कभी नं. ८६१ भाग्य के सम्बन्ध में घोर संकट या योग प्राप्त करेगा तथा भाग्य की उन्नति के लिये बड़े कठिन कर्म की साधना करेगा।
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४३८ भृगु संहिता तदुपरान्त बड़ी दिक्कत और देर के बाद भाग्य स्थान में कुछ सान्त्वना पायेगा। वृश्चिक लग्न में १० केतु यदि सिंह का केतु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा ९ ७ है तो पिता के स्थान में बड़ा भारी कष्ट प्राप्त १० ८ ६ करेगा तथा राज-समाज के मार्ग में मान और ११ ५ के. प्रभाव की हानि एवं परेशानी रहेगी और कारबार की उन्नति के स्थान में बड़ी भारी दिक्कतें रहेंगी। १२ २ ४ किन्तु गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, १ ३ इसलिये उन्नति के लिये महान् कठिन और उग्र नं. ८६२ कर्म की उपासना करेगा तथा कभी-कभी राज- समाज या कारबार के मार्ग में बड़ा भारी संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा और कठिनाई तथा गुप्त शक्ति के बल से अन्त में कुछ सुधार पायेगा। वृश्चिक लग्न में ११ केतु यदि कन्या का केतु- मित्र बुध की राशि पर लाभ स्थान में बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ७ ग्रह बहुत शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये १० ८ ६के. आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा ११ ५ तथा धन लाभ की वृद्धि करने में महान् शक्ति का प्रयोग करेगा तथा बुध की राशि पर बैठा है, १२ २ ४ इसलिये विवेक और कठिन कर्म की शक्ति से १ ३ मुफ्त का-सा लाभ भी प्राप्त करेगा और धन की नं. ८६३ आमदनी के मार्ग में कभी-कभी संकट पायेगा तथा लाभोन्नति के स्थान में विशेष स्वार्थ सिद्धि का सदैव ध्यान रखेगा तथा फिर भी लाभ के मार्ग में अन्दरूनी कुछ कमी अनुभव करेगा और हिम्मत से काम लेगा। वृश्चिक लग्न में १२ केतु यदि तुला का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो खर्चा ९ ७क. अधिक रहेगा तथा खर्च के मार्ग में कुछ चिंता- १० ८ फिकर का योग पायेगा किन्तु केतु चतुर शुक्र ११ ५ की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी चतुराई और परिश्रम के योग से खर्च की शक्ति का संचालन १२ २ ४ प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में १ ३ कुछ परेशानी रहेगी। किन्तु चतुराई और कठिन नं. ८६४ परिश्रम के योग से बाहरी स्थानों में सफलता
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वृश्चिक लग्न का फलादेश ४३९ शक्ति पायेगा तथा खर्च के संचालन में कुछ अन्दरूनी कमी अनुभव करेगा तथा खर्च में हिम्मत शक्ति से काम लेगा। ।।वृश्चिक लग्न समाप्त।
९ ७ ८ १० ६
११ ५
१२ ४
२ १ ३
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४४० भृगु संहिता धन लग्न का फलादेश प्रारम्भ
१० ८ ९ ११ ७
१२ ६
१ ५
३ २ ४
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ९७२ तक में देखिये) प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ८६५ से लेकर कुण्डली नं० ९७२ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ
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धनु लग्न का फलादेश ४४१ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत, भविष्य एवं वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८६५ से ८७६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८६५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८६६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८६७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८६८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८६९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८७० के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८७१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८७२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८७३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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४४२ भृगु संहिता कुण्डली नं. ८७४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८७५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८७६ के अनुसार मालूम करिये। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८७७ से ८८८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८७७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८७८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८७९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८८७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ८८८ के अनुसार मालूम करिये।
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धनु लग्न का फलादेश ४४३ (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ८८९ से ९०० तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८८९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९२ के अनुसार मालूम करिये। : १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश - कुण्डली नं. ८९६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ८९९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०० के अनुसार मालूम करिये। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९०१ से ९१२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।
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४४४ भृगु संहिता ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फ़लादेश कुण्डली नं. ९०५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९०९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९१० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९११ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९१२ के अनुसार मालूम करिये। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९१३ से ९२४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१४ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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धनु लग्न का फलादेश ४४५ कुण्डली नं. ९१५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९१९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२२ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९२४ के अनुसार मालूम करिये। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९२५ से ९३६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२६ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९२८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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४४६ भृगु संहिता कुण्डली नं. ९२९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९३० के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९३१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९३२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९३३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९३४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९३५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९३६ के अनुसार मालूम करिये। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९३७ से ९४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९३७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९३८ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९३९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४१ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४३ के अनुसार मालूम करिये।
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धनु लग्न का फलादेश ४४७ ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४८ के अनुसार मालूम करिये। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९४९ से ९६० तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९४९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५० के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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४४८ भृगु संहिता कुण्डली नं. ९५८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९५९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६० के अनुसार मालूम करिये। (९) धनु लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९६१ से ९७२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६२ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९६९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ९७२ के अनुसार मालूम करिये।
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धनु लग्न का फलादेश ४४९
भाग्य, धर्म तथा प्रभावस्थानपति-सूर्य धन लग्न में १ सूर्य यदि धनु राशि का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो भाग्य १० ८ ११ ९ सू. ७ की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा तथा देह के अन्दर प्रभाव और जचाव की शक्ति रखेगा अर्थात् १२ ६ भाग्यशाली दिखलाई पड़ेगा और धर्म का पालन एवं धर्म की जानकारी करेगा और ईश्वर में आदर्श १ ३ 4 श्रद्धा का रूप प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से २ ४ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन नं. ८६५ राशि में देख रहा है, इसलिए स्त्री पक्ष में सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा भाग्यशालिनी स्त्री मिलेगी और भाग्य की शक्ति से रोजगार के मार्ग में सफलता शक्ति मिलेगी तथा गृहस्थ के अन्दर प्रभाव और धर्म तथा सुख रहेगा। धन लग्न में २ सूर्य यदि मकर का सूर्य- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो १०सू. ११ धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कुछ थोड़ी सी ९ ७ नीरसताई के मार्ग से अच्छी सफलता एवं प्रभाव १२ प्राप्त करेगा और भाग्यवान् धनवान् समझा जायेगा 3 तथा भाग्य की शक्ति से धन की उन्नति होगी और १ ३ ५ धर्म का पालन स्वार्थ सिद्धि के लिये करेगा तथा २ ४ कुटुम्ब के स्थान मे कुछ थोड़ी-सी मतभेद की नं. ८६६ शक्ति से उन्नति पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त करेगा तथा भाग्य की शक्ति से जीवन को सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा। धन लग्न में ३ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य-तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान पर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ११ १० ८ तीसरे स्थान पर गरम ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का सू. ७ दाता बनता है, इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा १२ ६ बड़ी भारी सफलता पायेगा और भाई बहिन के स्थान में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के साथ विशेष १ ३ ५ शक्ति पायेगा तथा भाग्य की शक्ति से बाहुबल के २ ४ कार्यों में बड़ी सफलता एवं प्रभाव मिलेगा और नं. ८६७ धर्म की शक्ति का एवं ईश्वर की शक्ति का भरोसा रखेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य के स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा भाग्य की विशेष उन्नति करेगा मृ. सं. - २९
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४५० भृगु संहित। और धर्म का पालन करेगा तथा हिम्मत शक्ति से यश प्राप्त करेगा। धन लग्न में ४ सूर्य यदि मीन का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं १० ८ भूमि के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है ११ तो माता के स्थान में बड़ा भारी प्रभाव तथा ७ सफलता और सुख मिलेगा तथा भूमि-मकानादि १२ सू. ६ की शक्ति प्राप्त होगी और घरेलू वातावरण के १ ३ ५ अन्दर भाग्य की शक्ति से बड़ा आनन्द और प्रभाव २ ४ रहेगा और यथा शक्ति धर्म के पालन का आचरण
नं. ८६८ रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से सफलता शक्ति पायेगा तथा राज-समाज में मान एवं प्रभाव रहेगा और कारबार के मार्ग में भाग्य की शक्ति से उन्नति के कारण मिलेंगे तथा धर्म के सुन्दर मार्ग का अनुसरण करते रहने के कारण यश प्राप्त होते रहेंगे। धन लग्न में ५ सूर्य यदि मेष का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल ८ ११ की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष की विशेष ९ ७ शक्ति और सफलता मिलेगी और विद्या स्थान में १२ ६ विशेष उन्नति करेगा तथा बुद्धि और वाणी की १ सू. शक्ति में बड़ा प्रभाव और चमत्कार पायेगा तथा ३ ५ धर्म और ईश्वर के सम्बन्ध में बड़ा ज्ञान प्राप्त २ ४
नं. ८६९ करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी प्राप्त रहेगी और लाभोन्नति के मार्ग में कुछ सज्जनता की शक्ति का दुरुपयोग करना पड़ेगा तथा बुद्धि और वाणी की प्रखरता एवं तेजी के कारणों से लाभ के मार्ग में हानि के कारण बनेंगे। धन लग्न में ६ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में शुक्र की राशि पर बैठा है, तो छठें स्थान पर गरम ग्रह १० ८ शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये ११ ७ शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव स्थापित रखेगा १२ ६ तथा बड़े-बड़े झगड़े-झंझटों के मार्ग में भाग्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और झगड़े- ३ ५ झंझटों के मार्ग एवं दिक्कतों के मार्ग से ही भाग्य २ सू. ४ का विकास पायेगा। किन्तु प्रकट रूप से भाग्य नं. ८७० के स्थान में कुछ कमी अनुभव करेगा तथा धर्म
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धनु लग्न का फलादेश ४५१ का पालन करने में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च संचालन करने के मार्ग में भाग्य की सहायता रहेगी और बाहरी स्थानों में सफलता मिलेगी। धन लग्न में ७ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १० ८ ११ ७ है तो भाग्य की शक्ति से रोजगार के मार्ग में बड़ी ९ भारी सफलता शक्ति पायेगा और स्त्री के पक्ष में १२ ६ बड़ा प्रभाव और भाग्य की उत्तम शक्ति पायेगा १ ३ सू. 4 तथा गृहस्थ धर्म के अन्दर सुन्दर आनन्द रहेगा २ और ईश्वर तथा भाग्य की शक्ति का भरोसा मानेगा
नं. ८७१ तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर प्रभव की शक्ति रहेगी और भागयवान् समझा जायेगा तथा धर्म और सज्जनता के पालन का ध्यान रखेगा तथा सूर्य गरम स्वभाव का है, इसलिए स्त्री के स्वभाव में तेजी रहेगी। धन लग्न में ८ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- आठवें मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा १० ८ है तो भाग्य के सम्बन्ध में बड़ी भारी परेशानियाँ ११ ९ ७ रहेंगी और भाग्योन्नति के लिये बहुत-सी निराशाओं १२ से टकराने के बाद दूसरे स्थान का सहारा लेकर देर-अबेर में शक्ति पायेगा। किन्तु भाग्येश होने के १ ३ ५ नाते आयु की वृद्धि करेगा तथा जीवन की सहायक २ ४ होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और नं. ८७२ जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा सातवीं शत्रु की दृष्टि से धन भवन को देख रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कुछ कमी अनुभव करेगा और कुटुम्ब के मार्ग में कुछ नीरसता पायेगा। धन लग्न में ९ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर १० ८ बैठा है तो भाग्य की महान् उन्नति करेगा तथा ११ ९ ७ भाग्य में बड़ा भारी प्रभाव और यश प्राप्त करेगा १२ और धर्म का ऊँची भावना से पालन करेगा तथा ईश्वर में निष्ठा रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से पराक्रम १ ३ ५ सू- एवं भाई-बहिन के स्थान को शनि की कुम्भ २ ४ राशि में देख रहा है, इसलिये पराक्रम स्थान की नं. ८७३ वृद्धि के मार्ग में कुछ नीरसता पायेगा तथा भाई-
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४५२ भृगु संहिता बहन के सम्बन्ध में कुछ मतभेद प्राप्त करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा तथा भाग्य के मुकाबले पुरुषार्थ स्थान की मान्यता कम करेगा। धन लग्न में १० सूर्य यदि कन्या का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता एवं १० ८ राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो ११ ७ पिता स्थान में बहुत उन्नति पायेगा तथा राज- समाज के मार्ग में बड़ा मान और प्रभाव प्राप्त १२ ६ सू करेगा तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में भाग्य की शक्ति से बड़ी सफलता पायेगा तथा १ ३ ५ २ ४ प्रभावशाली कर्म करेगा और बड़ा भाग्यवान्
नं. ८७४ समझाजायेगा और धर्म-कर्म का सुन्दर पालन करेगा तथा सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की मीन राशि में माता एवं भूमि के स्थान को देख रहा है, इसलिये भाग्य की शक्ति से माता का सुख सौभाग्य पायेगा और भूमि के स्थान में सुख और सफलता शक्ति पायेगा तथा प्रतिष्ठा युक्त रहेगा। धन लग्न में ११ सूर्य यदि तुला का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो १० ८ ११ यद्यपि नीच होने से कमजोर है तथापि ग्यारहवें ९ ७सू स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता १२ बन जाता है, इसलिये भाग्य की शक्ति से लाभ तो सदैव होता रहेगा। किन्तु लाभ के मार्ग में कुछ १ ३ ५ कठिनाई एवं कुछ कमी अनुभव होगी और सातवीं २ ४ उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र नं. ८७५ मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में शक्ति मिलेगी तथा संतान पक्ष में सफलता रहेगी और बुद्धि एवं वाणी के अन्दर धर्म का उत्तम ज्ञान तथा सज्जनता की बोलचाल रहेगी। किन्तु धर्म के पालन में कुछ कमजोरी रहेगी। धन लग्न में १२ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा १० टसू है तो खर्चा अधिक करेगा और भाग्योन्नति के ११ ९ ७ मार्ग में कुछ कमजोरियाँ पायेगा तथा बाहरी स्थानों १२ ६ के संयोग से भाग्य की वृद्धि कुछ देरी से प्राप्त करेगा और धर्म के पालन में कुछ कमजोरी रहेगी १ ३ ५ किन्तु धर्म के मार्ग में खर्चा अवश्य होगा और २ ४ यश प्राप्ति में कुछ कमजोरी रहेगी तथा सातवीं नं. ८६५ शत्रु दृष्टि से शुक्र की वृषभ राशि में शत्रु स्थान
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धनु लग्न का फलादेश ४५३ ... को देख रहा है, इसलिये भाग्य और खर्च की शक्ति में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ थोड़ी सी दिक्कतों के बाद सफलता शक्ति पायेगा तथा बाहरी स्थानें में उत्तम सम्बन्ध पायेगा। पुरातत्त्व आयु, मृत्यु, प्रभावस्थानपति-चन्द्र धन लग्न में १ चन्द्र यदि धन का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो आयु के १० ८ सम्बन्ध में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति ११ ९ चं ७ का लाभ मनोयोग द्वारा पायेगा और अष्टमेश होने १२ ६ के दोष के कारण देह में कुछ परेशानी पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी और मन १ ३ ५ के अन्दर बड़े उतार-चढ़ाव और दुख-सुख के २ ४ भाव आते रहेंगे तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में कुछ परेशानी और कुछ शक्ति पायेगा तथा नुं. ८७७
रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाई के द्वारा मनोयोग से सफलता पायेगा। धन लग्न में २ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश १०चं. ८ होने के दोष के कारण धन के कोष स्थान में ११ 19 संग्रह शक्ति का अभाव रहेगा और कुटुम्ब के पक्ष १२ ६ में कुछ कमजोरी तथा कुछ अशान्ति के कारण प्राप्त होंगे। किन्तु मनोयोग की पुरातत्व सम्बन्धित १ ३ ५ शक्ति के द्वारा धन की प्राप्ति के साधन मिलते २ ४ रहेंगे और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी कर्क राशि
रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व शक्ति का सुन्दर नं. ८७८ में आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वक्षेत्र में देख
लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा तथा मन को कुछ घिराव-सा रहेगा। धन लग्न में ३ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- तीसरे भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है ११ १० तो आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व चं ९ ७ सम्बन्धी मनोयोग की शक्ति का लाभ पायेगा १२ ६ और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण भाई-बहिन की १ ३ ५ शक्ति एवं सुख सम्बन्ध में कुछ परेशानी अनुभव २ ४ करेगा और पराक्रम स्थान में कुछ परिश्रम करना नं. ८७९ पड़ेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य स्थान को
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४५४ भृगु संहिता सूर्य की सिंह गशि में देख रहा है, इसलिये अष्टमेश होने के कारण जीवन में रौनक और भाग्य एवं धर्म स्थान में कुछ परेशानी या कुछ कमी अनुभव करेगा। धन लग्न में ४ चन्द्र यदि मीन का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं १० ८ भूमि के स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है ११ ९ ७ तो आयु की उत्तम शक्ति मिलेगी तथा मनोयोग के बल से पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और १२ चं. ६ जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी, किन्तु अष्टमेश १ ३ ५ होने के दोष के कारण से माता के सुख सम्बन्धों २ ४ में कुछ कमी रहेगी तथा मातृभूमि के स्थान से
नं. ८८० कुछ वियोग मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ परेशानी अनुभव होगी तथा राज- समाज एवं कारबार के स्थान में कुछ थोड़ी दिक्कतें प्रतीत होंगी। धन लग्न में ५ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र मंगल की राशि पर १० ८ बैठा है, तो आयु स्थान में शक्ति प्राप्त रहेगी तथा ११ ९ ७ मनोयोग के बल से पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा १२ ६ और जीवन की दिनचर्या में कुछ मनोरंजन रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से सन्तान १ चं. ३ ५ पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त होगा और विद्या स्थान में २ ४
नं. ८८१ कुछ त्रुटि मिलेगी तथा दिमाग के अन्दर कुछ फिकर रहेगी और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ के सम्बन्ध, में कुछ परेशानी तथा मनोयोग का बल प्रयोग करना पड़ेगा। धन लग्न में ६ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है १० ८ तो आयु में कुछ शक्ति मिलेगी और कुछ मनोयोग ११ ९ ७ के विशेष परिश्रम से पुरातत्व शक्ति का लाभ १२ पायेगा तथा शत्रु स्थान में प्रभाव रखेगा और जीवन की दिनचर्या में कुछ दिक्कतों के साथ १ 3 ५ आनन्द मानेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के २चं. ४ कारण शत्रु पक्ष एवं झगड़े झंझटों के मार्ग से नं. ८८२ कुछ मानसिक परेशानी अनुभव करेगा ओर सातवीं नीच दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख
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धनु लग्न का फलादेश ४५५ रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थान के सम्बन्ध में कुछ अरूचिकर मार्ग प्रतीत होगा। धन लग्न में ७ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १० ८ है तो आयु स्थान में शक्ति मिलेगी तथा मनोयोग ११ ७ के दैनिक कर्म से पुरातत्व जीवनाधार शक्ति प्राप्त
१२ ६ करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ मनोरंजन रहेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से १ ३ चं. ५ स्त्री स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार के २ ४ मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा सातवीं नं. ८८३ मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु को धनु राशि में देख रहा है, इसलिए देह की सुन्दरता या स्वास्थ्य में कुछ परिश्रम या परेशानी के कारणों से देह में कुछ थकान अनुभव करेगा। धन लग्न में ८ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- आठवें आयु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु १० ८ ११ की वृद्धि पायेगा तथा जीवनाधार पुरातत्व शक्ति ९ का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में १२ ६ बड़ी शानदारी एवं रौनक रहेगी तथा पुरातत्व सम्बन्ध में मन को विशेष ज्ञान रहेगा, किन्तु अष्टमेश १ ३ ५ होने के दोष के कारण से मन को कुछ शान्ति सी २ ४ चं. रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब नं. ८८४ स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष स्थान में कुछ चिंता रहेगी और कुटुम्ब के स्थान में कुछ मानसिक परेशानी रहेगी तथा जीवन निर्वाह के सम्बन्ध में विचार युक्त रहेगा। धन लग्न में ९ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- नवम स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है, तो आयु स्थान मे वृद्धि १० ८ मिलेगी तथा जीवनाधार पुरातत्व शक्ति का लाभ ११ ७ भाग्य के द्वारा सुन्दर रूप में प्राप्त होगा तथा १२ ६ जीवन की दिनचर्या में बड़ी शानदारी रहेगी और अष्टमेश होने के दोष के कारण से भाग्य स्थान में १ ३ चं. कुछ परेशानी अनुभव करेगा और यश की कुछ २ ४ कमी रहेगी तथा धर्म के यथार्थ पालन में कुछ नं. ८८५ कमी रहेगी ओर सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन
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,४५६ भृगु संहिता के पक्ष में कुछ मतभेद रहेगा तथा मनोयोग के परिश्रम से कुछ शक्ति पायेगा तथा पुरुषार्थ के स्थान में कुछ नीरसता पायेगा। धन लग्न में १० चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो १० ८ आयु के पक्ष में शक्ति प्राप्त होगी तथा जीवन की ११ ९ ७ दिनचर्या में प्रभाव एवं रौनक रहेगी और मनोयोग १२ ६ चं. के द्वारा पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से पिता के सुख १ ३ ५ में कुछ कमी रहेगी तथा राज-समाज के सम्बन्धों २ ४ मे कुछ दिक्कतें रहेंगी और कारबार की उन्नति के नं. ८८६ मार्ग में कुछ बाधायें प्राप्त होंगी और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि रहेगी और भूमि मकानादि के सुख में कुछ नीरसता प्रतीत होगी। धन लग्न में ११ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु १० ११ के पक्ष में सुन्दर लाभ रहेगा और पुरातत्व शक्ति ९ ७चं. का लाभ मनोयोग से प्राप्त करेगा तथा जीवन १२ ६ की दिनचर्या में प्रसन्नता रहेगी और लाभ स्थान में प्रायः सभी ग्रह उत्तम फल देते हैं, इसलिये धन १ ३ ५ लाभ होता रहेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष के २ ४ कारण से आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव नं. ८८७ होगी और सातवीं मित्र दृष्टि से संतान एवं विद्या स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी और विद्या स्थान में कुछ कमी एवं कुछ परेशानी रहेगी तथा दिमाग के अन्दर कुछ उधेड़बुन तथा कुछ फिकर रहेगी। धन लग्न में १२ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर १० ८चं. बैठा है तो आयु स्थान में कमी और परेशानी ११ ७ रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति की हानि रहेगी और १२ जीवन की दिनचर्या में मन के लिये बड़ी परेशानी अनुभव होगी तथा अष्टमेश होने के दोष के कारण १ ३ ५ तथा नीच होने के कारण खर्च के मार्ग में बड़ी २ ४ परेशानी अनुभव होगी ओर बाहरी स्थानों का नं. ८८८ सम्बन्ध कष्ाद सिद्ध होगा तथा जीवन की दिनचर्या
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धनु लग्न का फलादेश ४५७ में मन को बड़ी अशान्ति रहेगी किन्तु सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त होगा और मनोयोग की शक्ति से गूढ़ ज्ञान के द्वारा बड़े-बड़े झगड़े-झंझटों में कामयाबी प्राप्त करेगा। विद्या, संतान, खर्च, बाहरीस्थानपति-मंगल धन लग्न में १ मंगल यदि धन का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर मित्र गुरु की राशि में बैठा है तो खर्च की १० ८ संचालन शक्ति देह और बुद्धि योग के द्वारा करेगा ११ ९ मं. ७ तथा बाहरी स्थानों का उत्तम सम्बन्ध पायेगा और १२ ६ विद्या की शक्ति रहेगी एवं सन्तान शक्ति मिलेगी, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से देह के १ ३ ५ स्वास्थ्य और सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी तथा २ ४ विद्या बुद्धि के सम्बन्ध में कुछ कमी और कुछ नं. ८८९ फिकर रहेगी तथा विचारधारा अधिक घूमकर यथार्थता की ओर आया करेगी, किन्तु बुद्धि के अन्दर अहंभाव अधिक रहेगा और सन्तान पक्ष में कुछ कमी अनुभव होगी तथा चौथी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये मातृभूमि और माता के सुख में कमी प्राप्त करेगा तथा घरेलू-मकानादि के सुख में कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में कुछ कमी लिये हुये शक्ति मिलेगी और आठवीं नीच दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन और आयु में कुछ अशान्ति रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति की कुछ कमजोरी रहेगी। धन लग्न में २ मंगल यदि मकर का मंगल- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की मकर १०मं. ८ ११ राशि पर बैठा है तो बाहरी सम्बन्धों के योग से ९ ७ और बुद्धियोग के द्वारा धन संचय करने का विशेष १२ ६ प्रयत्न करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से धन संग्रह नहीं हो सकेगा बल्कि खर्चा अधिक १ ३ 4 रहेगा और कुटुम्ब के स्थान में बहुत-बहुत प्रकार २ ४ से उतार-चढ़ाव, दुःख-सुख रहेगा तथा चौथी नं. ८९० दृष्टि से विद्या एवं सन्तान पक्ष को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति पायेगा तथा
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४५८ भृगु संहिता धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये सन्तान पक्ष में कुछ बाधा रहेगी और सातवीं नीच दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और जीवन में कुछ अशान्ति रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति की कुछ कमजोरी रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि पाने के लिये अनेकों प्रयत्न करेगा, किन्तु सफलता कम मिलेगी और धर्म के मार्ग में ज्ञान ध्यान होते हुए भी यथार्थतः धर्म पालन की कुछ कमी रहेगी। धन लग्न में ३ मंगल यदि कुम्भ का मंगल- तीसरे भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो १० ८ ११ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली बन जाता है, मं ९ ७ इसलिये पराक्रम शक्ति का विकास एवं सफलता १२ दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से प्राप्त करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाई-बहिन की शक्ति में १ ३ ५ कमी पायेगा और पुरुषार्थ कर्म में कभी-कभी २ ४ हिम्मत शक्ति की कमी और कभी वृद्धि पायेगा नं. ८९१ तथा खर्चा खूब करेगा और विद्या स्थान में कुछ कमी रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति मिलेगी और दिमाग के अन्दर तेजी रहेगी तथा चौथी दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में पड़ा प्रभाव पायेगा और झगड़े-झंझटों में सफलता मिलेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये धर्म और भाग्य के स्थान में कुछ उन्नति एवं कमी तथा कुछ अवनति पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता राज-समाज व कारबार में कुछ उतार-चढ़ाव के योग पायेगा। धन लग्न में ४ मंगल यदि मीन का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है १० ८ तो खर्च का कार्य सुख पूर्वक बुद्धि योग द्वारा ११ ७ चलेगा और बाहरी स्थानों से कुछ अच्छा सम्बन्ध १२ मं. ६ रहेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से माता के सुख में बड़ी हानि रहेगी और भूमि १ ३ ५ मकानादि के सुखों में भारी कमी रहेगी तथा सन्तान २ ४
नं. ८९२ पक्ष के सुखों में कुछ कमी के साथ पूर्ति होगी तथा विद्या स्थान के सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्ति शक्ति प्राप्त रहेगी और चौथी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को
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धनु लग्न का फलादेश ४५९ बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी के कार्य चलेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के पक्ष में कुछ कमी रहेगी और राजसमाज कारबार के मार्ग में कुछ त्रुटि रहेगी और आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में लाभ स्थान को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बुद्धि योग के द्वारा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्ति की सफलता शक्ति पायेगा और आमदनी के लिये अधिक प्रयत्न करेगा। धन लग्न में ५ मंगल यदि मेष का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १० ८ बैठा है तो विद्या स्थान में शक्ति पायेगा, किन्तु ११ ९ ७ व्ययेश होने के दोष के कारण से विद्या ग्रहण १२ करने में कुछ परेशानी रहेगी और इसी कारण से संतान पक्ष में कुछ परेशानियों के बाद शक्ति १ मं. ३ ५ मिलेगी तथा दिमाग के विचारों में बड़ी चंचलता २ ४ रहेगी तथा चौथी नीच दृष्टि से आयु स्थान एवं नं. ८९३ पुरातत्व स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु एवं जीवन की दिनचर्या में बड़ी परेशानी रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति की हानि या कमजोरी रहेगी और उदर में विकार रहेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ बुद्धि योग द्वारा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सफलता शक्ति पायेगा और आठवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों की संबंध शक्ति को बुद्धियोग के द्वारा विशेष रूप से प्राप्त करेगा किन्तु खर्च के कारणों से बुद्धि में कुछ परेशानी का योग चलता रहेगा। धन लग्न में ६ मंगल यदि वृषभ का मंगल- छठें शत्रु स्थान में एवं झगड़े-झंझट के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की १० ८ वृषभ राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में बड़ी ११ ७ परेशानी रहेगी और विद्या के स्थान में कुछ कमजोरी १२ ६ रहेगी; क्योंकि मंगल को व्ययेश होने का दोष है तथा छठें बैठने का दोष है, किन्तु छठें स्थान पर १ ३ 4 क्रूर ग्रह बलवान् हो जाता है, इसलिये बुद्धि योग २मं. ४ द्वारा शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रखेगा और झगड़े नं. ८९४ झंझटों में खर्च की शक्ति से एवं हठयोग से
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४६० भृगु संहिता सफलता शक्ति पायेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य स्थान में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा धर्म के पालन में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा और खर्च में कुछ परेशानी रहेगी तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतें रहेंगी और आठवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कुछ कमजोरी रहेगी तथा खर्च के कारणों से कुछ परेशानी अनुभव होगी और दिमाग के अन्दर परेशानी का वातावरण रहेगा। धन लग्न में ७ मंगल यदि मिथुन का मंगल-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १० ८ ११ है तो बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध रहेगा ९ ७ किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से स्त्री १२ ६ स्थान में कष्ट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें एवं हानियाँ प्राप्त करेगा १ ३ मं. ५ और बुद्धियोग द्वारा दैनिक कर्म से खर्चा प्राप्त २ ४ करेगा तथा विद्या स्थान में कुछ कमी लिये हुए नं. ८९५ शक्ति प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में कुछ परेशानियों के साथ सहयोग मिलेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के पक्ष में कुछ कमी प्राप्त होगी और राज-समाज के स्थान में बुद्धि योग द्वारा दौड़-धूप से एवं बाहरी सम्बन्धों से कुछ सफलता शक्ति और कुछ मान पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिए देह मे कुछ कमजोरी रहेगी और आठवीं उच्च दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिये धन के पक्ष में कुछ उन्नति करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में कुछ शक्ति रहेगी। धन लग्न में ८ मंगल यदि कर्क का मंगल-आठवें मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा १० ८ की राशि पर बैठा है तो आयु के पक्ष में कमजोरी ११ ७ रहेगी और पुरातत्व शक्ति की हानि प्राप्त करेगा १२ ६ तथा जीवन की दिनचर्या में परेशानी अनुभव करेगा तथा व्ययेश होने का दोष और अष्टम में व १ ३ ५ नीच होने से त्रिदोष होने के कारण सन्तान पक्ष २ ४ मं. में महान् संकट प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में नं. ८९६ बड़ी कमजोरी रहेगी तथा खर्च की कमी के कारण
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धनु लग्न का फलादेश ४६१ से दिमाग में परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में अशान्ति रहेगी और उदर के अन्दर कुछ बीमारी रहेगी तथा चौथी दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के कठिन परिश्रम से कुछ आमदनी पायेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन की शक्ति को पाने के लिए महान् प्रयत्न करेगा और कुटुम्ब की कुछ शक्ति पायेगा तथा आठवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है। इसलिये भाई-बहन के स्थान में कुछ विरोध पायेगा तथा अधिक परिश्रम करेगा। धन लग्न में ९ मंगल यदि सिंह का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र सूर्य की सिंह राशि पर बैठा १० ८ है तो बुद्धि विद्या की शक्ति पायेगा किन्तु व्ययेश ११ ९ ७ होने के दोष के कारण से विद्या बुद्धि की शोभा १२ ६ में कमी रहेगी तथा सन्तान पक्ष में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति पायेगा और दिमाग के अन्दर धर्म और १ ३ ५ मं. भाग्य की व्याख्या की ठीक तौर से पूर्णरूपेण २ ४ नहीं समझ सकने के कारण कभी-कभी उचित नं. ८९७ अनुचित बातें सोचेगा और कहेगा तथा भाग्य के अन्दर कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और बुद्धिमान् समझा जायेगा तथा चौथी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा किन्तु भाग्य और बुद्धि से खर्च की शक्ति पायेगा तथा बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में त्रुटि और विरोध भावना पायेगा तथा नीरसता युक्त मार्ग से पुरुषार्थ कम करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति पायेगा तथा कुछ कमी लिये हुए भूमि मकानादि की शक्ति और सुख पायेगा। यदि कन्या का मंगल- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की कन्या राशि पर बैठा है तो खर्चा शानदार करेगा और बाहरी स्थानों का सुन्दर प्रभावशाली सम्बन्ध बुद्धियोग द्वारा प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से पिता स्थान में हानि पायेगा तथा कारबार में कुछ नुकसान रहेगा तथा किसी बड़ी जगह में बुद्धियोग द्वारा कार्य करेगा और मान पायेगा और राज-समाज के अन्दर कुछ थोड़ा प्रभाव पायेगा तथा चौथी दृष्टि से देह के स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है,
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४६२ भृगु संहिता धन लग्न में १० मंगल इसलिये देह में कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को गुरु की मीन १० ८ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में ११ ९ ७ कुछ कमी रहेगी और भूमि मकानादि के पक्ष में १२ ६ मं. कुछ त्रुटि अनुभव करेगा और आठवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को स्वयं अपनी मेष १ ३ ५ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या २ ४ बुद्धि की अच्छी योग्यता रहेगी तथा सन्तान पक्ष नं. ८९८ में कुछ शक्ति मिलेगी, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से विद्या और संतान पक्ष के सुख में कुछ कमी रहेगी। धन लग्न में ११ मंगल यदि तुला का मंगल- लाभ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें १० ८ ११ ९ ७मं स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी अच्छी १२ ६ सफलता शक्ति पायेगा और खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से तथा बुद्धि योग १ ३ ५ से लाभ की वृद्धि पायेगा, किन्तु व्ययेश होने के २ ४ दोष के कारण लाभ के मार्ग में कुछ कमी रहेगी नं. ८९९ तथा चौथी उच्च दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिए विशेष प्रयत्न करेगा तथा अधिक लाभ करेगा और कुटुम्ब स्थान में कुछ शक्ति पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की अच्छी शक्ति रहेगी तथा सन्तान पक्ष से लाभ रहेगा और आठवीं दृष्टि से सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव पायेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में सफलता शक्ति रहेगी। धन लग्न में १२ मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- बारहवें खर्च स्थान
१० ८मं. में एवं बाहरी स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री ११ बैठा है तो खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों ९ ७ में बुद्धियोग के द्वारा बड़ी सफलता रहेगी किन्तु १२ ६ व्ययेश होने के दोष के कारण से संतान पक्ष में
१ ३ ५ हानि प्राप्त होगी और विद्या में कमजोरी रहेगी तथा दिमाग के अन्दर बड़ी लम्बी चौड़ी सूझ २ ४ आने के कारणों से दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी नं. ९०० तथा चौथी शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान
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धनु लग्न का फलादेश ४६३ को शनि का कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन से वैमनस्यता रहेगी तथा पुरुषार्थ खूब करेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में शक्ति रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में संकट प्राप्त करेगा और रोजगार में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा बुद्धि और बाहरी सम्बन्धों से रोजगार में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा। स्त्री, रोजगार, पिता, राज्यस्थानपति-बुध धन लग्न में १ बुध यदि धन का बुध- केन्द्र देह के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह में शोभा १० ८ ११ ९ बु. और सम्मान प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान की ७ उत्तम शक्ति प्राप्त रहेगी और राज-समाज एवं १२ ६ कारबार के द्वारा उन्नति रहेगी तथा देह और विवेक की उत्तम कर्म शक्ति से लौकिक सफलता विशेष १ ३ ५ रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के २ ४ स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में देख रहा नं. ९०१ है, इसलिये स्त्री स्थान में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा। ऊँची ससुराल मिलेगी और रोजगार के मार्ग में बड़े ऊँचे ढंग से अपनी दैहिक शक्ति के द्वारा बड़ी भारी सफलता पायेगा और गृहस्थ के अन्दर विशेष शक्ति प्राप्त होने के कारण हृदय में बड़ा उल्लास और उमंग रहेगा। धन लग्न में २ बुध यदि मकर का बुध- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है १०ब्. ८ तो रोजगार व्यापार कर्म के द्वारा धन की महान् ११ शक्ति पायेगा और कुटुम्ब की विशेष शक्ति प्राप्त १२ ६ रहेगी; किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का कार्य भी करता है, इसलिए स्त्री के सुख में बड़ी कमी १ ३ 4 रहेगी और पिता के व्यक्तित्व के बजाय पिता की २ ४ शक्ति का लाभ अच्छा रहेगा तथा राज समाज के नं. ९०२ पक्ष में मान और इज्जत रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है; इसलिए आयु के स्थान में शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व विभाग में लाभ व सफलता रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी तथा विवेक कर्म के द्वारा उन्नति करेगा। यदि कुम्भ का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शनि की
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४६४ भृगु संहिता धन लग्न में ३ बुध राशि पर बैठा है तो पुरुषार्थ कर्म की शक्ति द्वारा कारबार के मार्ग में बड़ी भारी सम्मति करेगा १० ८ ११ तथा भाई-बहिन व पिता की शक्ति का सहारा बु. ७ पायेगा और स्त्री पक्ष के सम्बन्ध में सुन्दर शक्ति १२ ६ प्राप्त करेगा तथा राज समाज के दैनिक सम्बन्धों में सुन्दर सम्पर्क तथा मान और प्रभाव प्राप्त रहेगा १ ३ ५ तथा गृहस्थ और लौकिक कार्य में विवेक शक्ति २ ४ से सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से नं. ९०३ भाग्य एवं कर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिए भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा और धर्म-कर्म का पालन करेगा तथा कार्य कुशलता के मार्ग में यश पायेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति रखेगा। धन लग्न में ४ बुध यदि मीन का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की राशि १० ८ पर बैठा है तो माता के सुख सम्बन्ध में कमी ११ ९ ७ रहेगी तथा भूमि-मकानादि की कुछ कमजोरी १२ बु. ६ रहेगी और स्त्री गृहस्थ के सुख में कुछ त्रुटि युक्त वातावरण रहेगा तथा रहने के मकानादि भूमि स्थान १ ३ ५ का परिवर्तन मिलेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से २ पिता, व्यापार, राज्य स्थान को स्वयं अपनी कन्या नं. ९०४ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है और स्वयं नीच होकर बैठा है, इसलिये पिता पक्ष में कुछ कमी होते हुये भी उन्नति करेगा तथा राज-समाज और कारबार के स्थान में कुछ कमी के सहित शक्ति पायेगा। धन लग्न में ५ बुध यदि मेष का बुध- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र मंगल की मेष राशि पर १० ८ ११ बैठा है तो विद्या स्थान में विवेक शक्ति के द्वारा ९ ७ बड़ी भारी सफलता और यश तथा मान प्राप्त १२ ६ करेगा तथा बुद्धि योग के द्वारा रोजगार व्यापार का १ बु. ३ ५ उत्तम संचालन करेगा और स्त्री, गृहस्थ तथा ततान २ पक्ष की सुन्दर सुख शक्ति पायेगा और राज-समाज ४ के अन्दर मान तथा प्रभाव मिलेगा और सातवीं नं. ९०५ मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये दैनिक कर्म शक्ति के उत्तम बुद्धि योग द्वारा विशेष लाभ का योग पायेगा और बातचीत के अन्दर बड़ी भारी चतुराई रहेगी। यदि वृषभ का बुध- छठें शत्रु स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है
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धनु लग्न का फलादेश ४६५
धन लग्न में ६ बुध तो पिता पक्ष में सुख की कमी रहेगी और रोजगार कारबार के मार्ग में बड़ा परिश्रम एवं कुछ परतंत्रता १० ८ का योग पायेगा तथा स्त्री एवं गृहस्थ के संचालन ११ ७ मार्ग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और शत्रु पक्ष एवं १२ ६ झगड़े-झंझटों के मार्ग में विवेक शक्ति के कुशल कर्म के द्वारा सफलता पायेगा तथा राज-समाज १ ३ ५ के सम्बन्धों में कुछ नीरसता रहेगी और मामा २बु. ४ नाना के पक्ष में शक्ति रहेगी तथा सातवीं मित्र नं. ९०६ दृष्टि और बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध अच्छा रहोगा। धन लग्न में ७ बुध यदि मिथुन का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १० ८ बैठा है तो स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दर सौभाग्य शक्ति ११ ९ ७ पायेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता १२ ६ विवेक कर्म के द्वारा प्राप्त करेगा तथा पिता स्थान
३ बु. की शक्ति का सुन्दर सहयोग मिलेगा और राज- १ ५ समाज के सम्पर्क में मान और इज्जत रहेगी तथा २ ४ गृहस्थ के अन्दर बड़ा वैभव रहेगा तथा लौकिक नं. ९०७ कार्यों में बड़ी योग्यता और यश पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बड़ी शोभा और सम्मान प्राप्त रहेगा और अपनी इज्जत आबरू की सुचारू रूप से संचालन करने का पूरा ख्याल रखेगा तथा सुन्दर योग पायेगा। धन लग्न में ८ बुध यदि कर्क का बुध- आठवें मृत्यु स्थान एवं
१० ८ पुरातत्व स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा ११ ७ है तो स्त्री स्थान में बड़ी परेशानी रहेगी तथा पिता ९ के सम्बन्ध में कष्ट एवं सुख की कमी रहेगी और १२ ६ रोजगार व्यापार के मार्ग में बड़ा नुकसान और १ परेशानी मिलेगी। किन्तु दूसरे स्थान के योग से ३ ५ २ कठिनाईयों के द्वारा रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा ४ बु. नं. ९०८ और पुरातत्व का लाभ पायेगा तथा आयु स्थान में शक्ति मिलेगी और जीवन की दिनचर्या में गूढ़ विवेक की शक्ति से रौनक पायेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में बड़ी कमजोरी पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मित्र मृ. सं .- ३०
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४६६ भृगु संहिता शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्न करेगा। धन लग्न में ९ बुध यदि सिंह का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है १० ८ ११ तो बड़ा भाग्यवान् बनेगा और धर्म का पालन ७ करेगा तथा रोजगार व्यापार के पक्ष में भाग्य की १२ शक्ति से बड़ी भारी सफलता मिलेगी तथा स्त्री w और पिता के पक्ष से सुन्दर सहयोग प्राप्त होगा १ ३ ५ बु. और राज-समाज तथा लौकिक व्यवहार के पक्ष २ में उत्तम विवेक की शक्ति से मान-प्रतिष्ठा मिलेगी नं. ९०९ और गृहस्थ के आनन्द में वैभव रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में अच्छा सम्बन्ध रहेगा तथा पुरुषार्थ कर्म से कारबार के अन्दर सफलता प्राप्त करेगा। धन लग्न में १० बुध यदि कन्या का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज स्थान में स्वयं अपनी राशि पर उच्च का १० ८ होकर बैठा है तो पिता की महान् शक्ति रहेगी ११ ९ ७ और राज समाज के पक्ष में बड़ा भारी मान प्राप्त १२ ६ बु. होगा तथा रोजगार-व्यापार के मार्ग में दैनिक कर्म की कुशलता और विवेक शीक्त के द्वारा १ ३ ५ बड़ी भारी सफलता शक्ति मिलेगी और स्त्री स्थान २ ४
नं. ९१० की सुन्दर शक्ति मिलेगी तथा प्रभाव शक्ति रहेगी एवं गृहस्थ में बड़ा भारी वैभव रहेगा और सातवीं नीच दृष्टि से चौथे माता और भूमि स्थान को मित्र गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्ध में कमी रहेगी और जन्मभूमि तथा मकानादि के सम्बन्धों में कुछ कमी एवं कुछ परेशानी रहेगी। धन लग्न में ११ बुध यदि तुला का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो रोजगार व्यापार १० ८ मार्ग से बड़ा भारी लाभ पायेगा तथा पिता स्थान ११ ९ ७बु. की शक्ति में सफलता रहेगी तथा स्त्री स्थान के १२ ६ सुख सम्बन्ध में उत्तम योग लाभ रहेगा और राज- समाज के मार्ग में लाभ और मान रहेगा तथा १ ३ ५ लौकिक कार्यों की बड़ी योग्यता शक्ति प्राप्त २ ४ करेगा और विवेक शक्ति के द्वारा खूब आपनी नं. ९११ पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान
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धनु लग्न का फलादेश ४६७ स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि में शक्ति प्राप्त करेगा और संतान पक्ष के सम्बन्धों में सफलता रहेगी था उत्तम विवेक रहेगा। धन लग्न में १२ बुध यदि वृश्चिक का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो १० ८बु. खर्चा अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों का अच्छा ७ सम्बन्ध पाकर रोजगार चलावेगा। किन्तु अपने १२ ६ निजी स्थान में रोजगार व्यापार में हानि रहेगी तथा स्त्री और पिता के सम्बन्धों में सुख का विशेष १ ३ ५ घाटा रहेगा और राज-समाज के पक्ष में सुन्दर २ ४ सम्बन्ध की बड़ी कमजोरी रहेगी तथा घरेलू नं. ९१२ वातावरण में इज्जत-आबरू बनाने के लिये परेशानियाँ रहेंगी और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये विवेक शक्ति के दैनिक कार्यक्रम के द्वारा शत्रु एवं झगड़े-झंझटों में सफलता पायेगा। देह, माता, भूमि, सुखस्थानपति-गुरु धन लग्न में १ गुरु यदि धनु राशि का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री होकर १० ८ बैठा है तो देह में विशेष सुख प्राप्त करेगा और ११ ९ गु. ७ माता का सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा भूमि- १२ ६ मकानादि की शक्ति और सुख रहेगा तथा देह में मान सम्मान और सुन्दरता पायेगा तथा हँसने- १ ३ ५ हँसाने वाला सुख मिजाज रहेगा और पाँचवीं दृष्टि २ ४
नं. ९१३ से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर बड़ी योग्यता पायेगा और संतान पक्ष में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी और बोलचाल के अन्दर मिठास तथा बड़प्पन रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के पक्ष में सुख और आत्मसंतोष पायेगा तथा नवमी दृष्टि से भाग्य और धर्म स्थान को मित्र सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति का सुन्दर योग पायेगा और धर्म का पालन एवं मनन हृदय से करेगा तथा सुख संतोष और सज्जनता के मार्ग से यश प्राप्त करेगा तथा भाग्यशाली माना जायेगा। यदि मकर का गुरु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में नीच का होकर शत्रु
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४६८ भृगु संहिता धन लग्न में २ गुरु शनि की राशि पर बैठा है तो धन के कोष में कमी के कारण अथवा धन के नुकसान होने के कारण १०गु. ८ हृदय में बड़ी अशान्ति अनुभव करेगा और कुटुम्ब ११ ९ ७ के पक्ष से कुछ परेशानी पायेगा तथा देह स्वास्थ्य १२ और सुन्दरता के अन्दर कुछ कमजोरी रहेगी तथा ur माता एवं भूमि पक्ष से कुछ दुःख का अनुभव १ ३ ५ होगा और पाँचवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य २ ४ शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ९१४ शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ दानाई से काम निकालेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व की लाभ शक्ति मिलेगी ओर जीवन की दिनचर्या शानदार रहेगी और नवमी दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से शक्ति लाभ रहेगा तथा राज-समाज में मान प्राप्त होगा और कारबार के मार्ग में उन्नति करेगा तथा मान उन्नति एवं पद उन्नति के लिए विशेष प्रयत्न करेगा। धन लग्न में ३ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- तीसरे भाई बहिन एवं पुरुषार्थ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है १० ८ ११ तो भाई-बहिन के स्थान में कुछ मतभेद के सहित ९ ७ शक्ति रहेगी और पुरुषार्थ कर्म की उन्नति के मार्ग ६ में कुछ निरसता रहेगी तथा देह में बल स्फूर्ति होते हुए भी कुछ आलस्य रहेगा और माता के १ ३ ५ सुख में कुछ नीरसता युक्त शक्ति रहेगी तथा भूमि- २ ४ मकानादि का सामान्य सुख रहेगा और पाँचवीं नं. ९१५ मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुख और सुन्दरता पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में सफलता मिलेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का पालन ध्यान में रखेगा तथा यश मिलेगा और नवमी दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसता से कुंछ सफलता शक्ति पायेगा और अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति के सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति प्राप्त करेगा। यदि मीन का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो माता की महान् सुख शक्ति पायेगा तथा भूमि-
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धनु लग्न का फलादेश ४६९ धन लग्न में ४ गुरु मकानादि का उत्तम सुख प्राप्त रहेगा और देह के लिए बड़ा सुख और सुन्दरता पायेगा तथा हास- १० ८ विलास के अच्छे साधन रहेंगे और पाँचवी उच्च ११ ९ ७ दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मित्र चन्द्रमा १२ गु. ६ की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा जीवन निर्वाह के लिये पुरातत्व १ ३ ५ शक्ति का विशेष लाभ प्राप्त होगा तथा दिनचर्या २ ४ में बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि नं. ९१६ से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में भी सुख शक्ति मिलेगी और राज- समाज के मार्ग में मान-प्रतिष्ठा रहेगी तथा कारबार में सफलता रहेगी और नवमी मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये सुखपूर्वक खर्च का सुन्दर संचालन रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख और शक्ति का मार्ग प्राप्त करेगा। धन लग्न में ५ गुरु यदि मेष का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है १० ८ तो विद्या स्थान से सुख शक्ति पायेगा और संतान ११ ७ पक्ष में बड़ा सुख और आत्मीयता का योग मिलेगा १२ तथा बुद्धि और वाणी के अन्दर बड़ी योग्यता w
१ गु. रहेगी तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म ३ ५ स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, २ ४
नं. ९१७ इसलिये भाग्य की वृद्धि पायेगा तथा यश मिलेगा और धर्म का ध्यान एवं पालन करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में सफलता शक्ति होते हुए भी कुछ असन्तोष रहेगा तथा लाभ की वृद्धि के मार्ग में कुछ नीरसता प्राप्त रहेगी और नवमी दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता एवं प्रभाद और सुडौलता प्राप्त करेगा तथा आत्मबल और ख्याति मिलेगी तथा दैहिक कर्म और बुद्धि योग के द्वारा भाग्यवान् एवं बुद्धिमान् माना जायेगा और अपने हृदय के अन्दर बड़ा भारी स्वाभिमान एवं सिद्धान्त शक्ति रखेगा। यदि वृषभ का गुरु- छठें शत्रु स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो देह के सुख और सुन्दरता तथा स्वास्थ्य में कुछ कमी रहेगी और कुछ परतन्त्रता का सा योग रहेगा तथा माता के सुख सम्बन्धों में बड़ी कमी रहेगी तथा शत्रु एवं झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ परेशानी
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४७० भृगु संहिता धन लग्न में ६ गुरु और दानाई के योग से कार्य की सफलता प्राप्त करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य १० ८ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, ११ ९ ७ इसलिये पिता के पक्ष में सुख शक्ति रहेगी तथा १२ ६ राज-समाज में मान प्राप्त होगा और कारबार में शक्ति रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि के खर्च एवं १ ३ बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख २गु. ४ रहा है इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी नं. ९१८ स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध पायेगा और नवमी नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब का सुन्दर सम्बन्ध पायेगा और नवमीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन की तरफ से कुछ परेशानी हृदय में अनुभव करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में बड़ा असन्तोष मानेगा तथा कुछ झंझट युक्त रहेगा। धन लग्न में ७ गुरु यदि मिथुन का गुरु- सातवें कन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १० ८ ११ है तो स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दरता और प्रभाव एवं ७ सुख प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी १२ ६ सफलता और आनन्द मानेगा तथा माता का सुख होगा और भूमि-मकानादि रहने पर सुन्दर स्थान १ ३ गु. ५ २ प्राप्त होगा और लौकिक दैनिक कार्यो का बड़ी ४
नं. ९१९ योग्यता के साथ पालन करके हृदय में प्रसन्नता अनुभव करेगा और पाँचवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ असंतोष युक्त सुख शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता व सरलता और स्वाभिमान रखेगा तथा नवमी शत्रु दृष्टि से भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के स्थान में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध पायेगा और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा उन्नति करने के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से कार्य सम्पादन करेगा। यदि कर्क का गुरु- आठवीं आयु मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो देह में कुछ परेशानी तथा हिम्मत रहेगी और जीवन की दिनचर्या में कुछ शक्ति रहेगी और आयु की शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और देह की सुन्दरता एवं सुडौलताई में कुछ कमी रहेगी तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा
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धनु लग्न का फलादेश ४७१
धन लग्न में ८ गुरु खूब करेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा सम्बन्ध पायेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब १० ८ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा ११ ७ है, इसलिये धन के पक्ष में कुछ कमजोरी तथा १२ ६ कुटुम्ब के स्थान में कुछ क्लेश रहेगा और नवमी दृष्टि से चौथे माता एवं भूमि के स्थान को स्वयं १ ३ ५ अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये २ ४ गु. माता के सुख सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति नं. ९२० रहेगी और भूमि मकानादि की कुछ शक्ति रहेगी तथा घरेलू सुख सम्बन्धों में कुछ दिक्कतों से शक्ति मिलेगी। धन लग्न में ९ गुरु यदि सिंह का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है १० ८ तो भाग्य की महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा धर्म ११ 2 ७ का पालन और अध्ययन करेगा तथा माता की १२ शक्ति मिलेगी और मकानादि भूमि का सुख प्रापत रहेगा तथा देह के द्वारा यश मिलेगा और पाँचवीं १ ३ ५गु. दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में २ ४ स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता नं.९२१ पायेगा और नाम तथा कीर्ति रहेगी और सतोगुण के द्वारा विकास और उन्नति के साधन पायेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष से सुख शक्ति पायेगा और विद्या स्थान में दृद्धि की शक्ति औ. सफलता रहेगी तथा वाणी में प्रभाव रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पुरुषार्थ स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई- बहिन के पक्ष में कुछ नीरसताई के साथ सुख-सम्बन्ध रहेगा और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से कार्य संचालन करेगा। धन लग्न में १० गुरु यदि कन्या का गुरु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो १० ८ पिता स्थान से बड़ी सुख शक्ति प्राप्त रहेगी और ११ ७ राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा मिलेगी तथा कारबार १२ ६ गु. के मार्ग में बड़ी सफलता और यश प्राप्त करेगा तथा देह में सुन्दरता और स्वाभिमान रहेगा और १ ३ 4 पाँचवीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को २ शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये नं. ९२२ धन के कोष स्थान में कमजोरी रहेगी और कुटुम्ब
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४७२ भृगु संहिता के पक्ष में कुछ असंतोष रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की शक्ति रहेगी और भूमि-मकानादि का प्रभाव रहेगा तथा घरेलू वातावरण में सुख सौभाग्य प्राप्त होगा और नवमी दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी योग्यता और दानाई से काम निकालेगा। किन्तु कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग में अरुचि रहने के कारण थोड़ी-सी दिक्कत अनुभव होगी, किन्तु विपक्षियों में प्रभाव रहेगा और रोगादिक मार्ग में सफलता रहेगी। धन लग्न में ११ गुरु यदि तुला का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो कुछ १० ८ थोड़ी-सी नीरसताई के साथ देह के योग से ११ ९ ७गु. आमदनी का सुख लाभ प्राप्त करेगा और माता १२ ६ का लाभ पायेगा तथा भूमि-मकानादि का सुख रहेगा और धन लाभ की वृद्धि करने के लिये १ ३ ५ २ बड़ा प्रयत्नशील रहेगा तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से ४ भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि नं. ९२३ में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में कुछ नीरसता का योग प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ अरुचिकर रूप से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में सुख शक्ति पायेगा और विद्या स्थान में बड़ी सफलता रहेगी। बुद्धि और वाणी के द्वारा बड़ी योग्यता प्रदर्शित करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोगजगार के पक्ष में सुख और आत्मीयता प्राप्त करेगा। धन लग्न में १२ गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा १० ८गु. है तो खर्चा विशेष करेगा और बाहरी स्थानों में ११ ९ ७ सुख सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा देह के पक्ष में १२ ६ कमजोरी रहेगी और बाहरी स्थानों में भ्रमण करना पड़ेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से माता एवं भूमि के १ ३ ५ स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को २ ४ देख रहा है, इसलिये कुछ कमी के सहित माता नं. ९२४ का सुख सम्बन्ध पायेगा तथा भूमि-मकानादि की कुछ थोड़ी शक्ति रहेगी और खर्च के योग से सुख प्राप्ति का साधन पायेगा और सातवीं पृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ
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धनु लग्न का फलादेश ४७३ राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी दानाई के साथ शत्रु पक्ष में काम निकालेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ शान्ति से शक्ति पायेगा और नवमी उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का विशेष लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में बड़ी रौनक एवं प्रभाव रहेगा। धनलाभ, शत्रु, दिक्कतस्थानपति-शुक्र धन लग्न में १ शुक्र यदि धनु राशि का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो १० ८ देह के परिश्रम और विशेष चतुराई के योग से ११ ९ शु. ७ आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त १२ करेगा तथा छठें स्थान का स्वामी होने के कारण देह में कुछ रोग और प्रभाव तथा कुछ परेशानी १ ३ ५ पायेगा। किन्तु शत्रु पक्ष में विजयी रहेगा और २ ४ झगड़े झंझटों के मार्ग से लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ थोड़े से नं. ९२५
मतभेद के सहित लाभ पायेगा और रोजगार के मार्ग में थोड़े से परिश्रम के योग से बड़ी योग्यता और चतुराई के द्वारा बड़ा लाभ एवं सफलता शक्ति और मान पायेगा। धन लग्न में २ शुक्र यदि मकर का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो आमदनी १०शु ८ के मार्ग से धन की संग्रह शक्ति का विशेष लाभ ११ ७ पायेगा और छठें स्थान का स्वामी होने के दोष के १२ ६ कारण से धन के मार्ग में कुछ परेशानी भी रहेगी और कुटुम्ब स्थान में कुछ मतभेद रहेगा तथा शत्रु १ ३ ५ पक्ष एवं झगड़े-झंझटों के सम्बन्ध में फायदेमन्द २ ४
नं. ९२६ तथा प्रभाव युक्त रहेगा और सातवीं दृष्टि से सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में आयु एवं पुरातत्व - स्थान को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा और जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और इज्जत-आबरू पायेगा तथा धन का संग्रह करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा। यदि कुम्भ का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शनि की
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४७४ भृगु संहिता धन लग्न में ३ शुक्र राशि पर बैठा है तो अपने परिश्रम और पुरुषार्थ के बल से बड़ी चतुराईयों के द्वारा अच्छी आमदनी ११ १० ८ का मार्ग पायेगा और शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव श. ९ ७ रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में विजयी १२ ६ और लाभ युक्त रहेगा और छठें स्थान पति होने के दोष के कारण से भाई-बहिन के पक्ष में कुछ १ ३ ५ मतभेद युक्त सम्बन्ध रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि २ ४ से भाग्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख नं. ९२७ रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा धर्म के स्थान में कुछ अरूचिकर सम्बन्ध रहेगा तथा भाग्य के मुकाबले में पुरुषार्थ और युक्तिबल को विशेष अपनावेगा। धन लग्न में ४ शुक्र यदि मीन का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु १० ११ गुरु की राशि पर बैठा है तो अपने स्थान से ही ७ आमदनी का श्रेष्ठ मार्ग और सुलभ साधन पायेगा १२ शु. ६ और भूमि-मकानादि की विशेष शक्ति रहेगी तथा माता का लाभ पायेगा और शत्रु पक्ष तथा झगड़े- १ ३ ५ झंझटों के मार्ग से सरलतापूर्वक लाभ पायेगा २ ४ तथा सातवीं नीच दृष्टि से पिता एव राज्य स्थान नं. ९२८ को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पितास्थान में हानि या परेशानी रहेगी और राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी रहेगी तथा मान प्रतिष्ठा कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें प्राप्त होंगी। धन लग्न में ५ शुक्र यदि मेष का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि १० ११ पर बैठा है तो विद्या स्थान में शनि पायेगा तथा ७ बुद्धि एवं वाणी के अन्दर बड़ी चतुराई और कला १२ ६ शक्ति का लाभ पायेगा और छठें स्थानपति होने १ शु. के दोष के कारण से संतान पक्ष में कुछ दिक्कत ३ 4 के साथ लाभ शक्ति रहेगी और शत्रु पक्ष के अन्दर ४ बुद्धि योग द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा झगड़े- नं. ९२९ झंझट और परिश्रम से फायदा पायेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी तुला राशि में लाभ स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये बुद्धि-विद्या एवं संतान पक्ष के सम्बन्धों द्वारा आमदनी का मजबूत साधन पायेगा।
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धनु लग्न का फलादेश ४94
धन लग्न में ६ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्र में बैठा है तो शत्रु स्थान १० ८ में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझटों ११ के मार्ग से लाभ की शक्ति पायेगा तथा आमदनी १२ ६ के पक्ष में कुछ परतंत्रता और परिश्रम के योग से सफलता शक्ति पायेगा तथा धन के लाभ सम्बन्ध १ ३ ५ में कुछ कमी एवं असंतोष पायेगा और ननसाल २शु. ४ पक्ष से कुछ लाभ का सम्बन्ध पायेगा तथा सातवीं नं. ९३० दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करना पड़ेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर मार्ग से अच्छा सम्बन्ध प्राप्त करेगा। धन लग्न में ७ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की मिथुन राशि पर १० ८ बैठा है तो कुछ परिश्रम और विशेष चतुराई के ११ ७ योग से रोजगार के मार्ग में धन का सुन्दर लाभ १२ योग एवं सफलता शक्ति पायेगा और शत्रु पक्ष में प्रभाव युक्त रहेगा तथा छठें स्थानपति होने के १ ३ शु. ५ दोष के कारण से स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद युक्त २ ४
नं. ९३१ लाभ की सुन्दर शक्ति पायेगा और कभी कुछ स्त्री को रोग रहेगा तथा कभी स्वयं को कोई मूत्रेन्द्रिय का विकार होगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव रहेगा। किन्तु आमदनी के मार्ग में कुछ परिश्रम और कुछ दिक्कतें अनुभव होंगे। धन लग्न में ८ शुक्र यदि कर्क का शुक्र- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि १० ८ पर बैठा है तो आयु स्थान में शीक्त पायेगा और ११ ९ पुरातत्व स्थान का लाभ योग प्राप्त करेगा और १२ आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी अनुभव करेगा तथा दूसरे स्थान के सम्बन्ध से लाभ का साधन १ ३ ५ चतुराई और परिश्रम के द्वारा प्राप्त करेगा, किन्तु २ ४ शु. छठें स्थान का स्वामी होने के कारण से जीवन नं. ९३२ की दिनचर्या में कुछ झगड़े-झंझट और शत्रु पक्ष के सम्बन्ध से कुछ दिक्कतें अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृषष्टि से धन एवं कटम्ब स्था ब स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये धन की
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४७६. भृगु संहिता वृद्धि करने के लिये महान् प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब की कुछ शक्ति का सहयोग पायेगा। धन लग्न में ९ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में शंत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है १० ८ तो कुछ असंतोष के कारणों सहित भाग्य की १-१ ९ शक्ति और परिश्रम के योग से आमदनी का साधन १२ ६ मार्ग प्राप्त करेगा और धर्म के पक्ष में कुछ थोड़ी १ श्रद्धा का लाभ पायेगा तथा शत्रु पक्ष में भाग्य ३ ५शु. की शक्ति और चतुराई से लाभ प्राप्त होगा, किन्तु २ ४ छठे स्थानपति होने के कारण भाग्य के पक्ष में नं. ९३३ कुछ दिक्कतें अनुभव करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ शक्ति सम्बन्ध रहेगा और परिश्रम के मार्ग से पुरुषार्थ शक्ति की वृद्धि एवं सफलता पायेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा। धन लग्न में १० शुक्र यदि कन्या का शुक्र- दसम केन्द्र पिता एवं १० ८ राज्य स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की राशि ११ ७ पर बैठा है तो पिता पक्ष में एवं आमदनी के पक्ष में परेशानी का योग पायेगा और राज-समाज में १२ ६ शु. मान-प्रतिष्ठा की बड़ी कमी रहेगी और कारबार १ ३ ५ की उन्नति के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और २ शत्रु पक्ष के कारण से लाभोन्नति में रुकावटें एवं ४
नं. ९३४ कुछ कमी रहेगी तथा गुप्त चतुराई के कारण से अपना काम चलावेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में कुछ दिक्कत के साथ अच्छी योग्यता पायेगा तथा संतान पक्ष का कुछ कमी के साथ लाभ पायेगा और बड़ा चतुर बनेगा। धन लग्न में ११ शुक्र यदि तुला का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी १० ८ के मार्ग में सफलता शक्ति पायेगा और शत्रु पक्ष ११ ९ ७शु के मार्ग में बड़ा प्रभाव और लाभ पायेगा तथा १२ ६ झगड़े-झंझट आदि के पक्ष में बड़ी गहरी चतुराई के योग से सफलता शीक्त मिलेगी। किन्तु छठे १ ३ ५ स्थान पति होने के कारण से आमदनी के मार्ग में २ ४ कुछ दिक्कते भी रहेंगी और सातवीं दृष्टि से विद्या नं. ९३५ एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष
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धनु लग्न का फलादेश ४७७ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में कुछ दिक्कत के साथ अच्छी योग्यता पायेगा तथा संतान पक्ष का कुछ कमी के साथ लाभ पायेगा और बड़ा चतुर बनेगा। धन लग्न में १२ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि १० ८शु पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करना पड़ेगा ११ ९ तथा बाहरी स्थानों से आदमनी का योग प्राप्त १२ ६ करेगा और निजी स्थान में आमदनी की कुछ कमजोरी रहेगी तथा झगड़े-झंझट आदि मार्गों से १ ३ ५ कुछ परेशानी रहेगी और गुप्त चतुराई के योग से २ ४ एवं परिश्रम से लाभ पायेगा और सातवीं दृष्टि से नं. ९३६ शत्रु स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ खर्चे की शक्ति और युक्ति से अपना मतलब हल करेगा तथा सामान्य प्रभाव पायेगा और खर्च के स्थान में अधिक वृद्धि करने से अपना प्रभाव अनुभव करेगा। धन, कुटुम्ब, भाई, पराक्रमस्थानपति-शनि धन लग्न में १ शनि यदि धनु राशि का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो दैहिक १० ८ कर्म की कुछ अरूचिकर शक्ति से धन की प्राप्ति ११ ९ श. ७ करेगा और कुटुम्ब के सम्बन्ध में कुछ मतभेद १२ ६ युक्त शक्ति पायेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, इसलिये धन और १ ३ ५ कुटुम्ब के पक्ष में कुछ घिराव सा रहेगा तथा २ ४ धनवानों और इज्जतदारों में नाम रहेगा और देह की सुन्दरता में तथा स्वास्थ्य में थोड़ी सी कमी रहेगी और तीसरी दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मकर नं. ९३७
राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा पुरुषार्थ कर्म करने में सर्वथा तत्पर रहेगा और बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में शक्ति रहेगी और रोजगार के मार्ग से धन प्राप्त करेगा तथा दसवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से शक्ति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। यदि मकर का शनि- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में स्वयं अपनी
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४७८ भृगु संहिता धन लग्न में २ शनि राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का वैभव रहेगा तथा १०श ८ ११ धन का स्थान बन्धन का सा काम करता है, ९ ७ इसलिये भाई-बहिन के सुख सम्बन्ध में कमी १२ रहेगी और पुरुषार्थ के द्वारा बहुत धन प्राप्त करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से चौथे माता के स्थान ३ ५ और भूमि स्थान को गुरु की मीन राशि में देख २ ४ रहा है, इसलिये माता के स्थान में कुछ नीरसता नं. ९३८ पायेगा और भूमि मकानादि के पक्ष में कुछ सुख की कमी रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में कुछ शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व स्थान में लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा तथा दसवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी और धन लाभ के पक्ष में विशेष सफलता शक्ति मिलेगी अर्थात् कभी-कभी मुफ्त का-सा धन प्राप्त करेगा और धन वृद्धि करने के मार्ग में अपनी विशेष पुरुषार्थ की शक्ति का प्रयोग करेगा। धन लग्न में ३ शनि यदि कुम्भ का शनि- तीसरे पराक्रम स्थान एवं भाई के स्थान पर स्वयं अपनी कुम्भ राशि में १० ८ ११ बैठा है तो पराक्रम स्थान की विशेष शक्ति प्राप्त श ७ करेगा तथा पुरुषार्थ के द्वारा खूब धन पायेगा १२ और कुटुम्ब की शक्ति रहेगी। किन्तु धनेश कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये भाई-बहन १ ३ ५ की शक्ति होते हुए भी कुछ कमी रहेगी और तीसरे २ ४ स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली हो जाता है, नं. ९३९ इसलिये पुरुषार्थ और हिम्मत स्थान पर बड़ा भारी भरोसा रखेगा और तीसरी नीच दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कष्ट अनुभव करेगा और विद्या में कुछ कमी रहेगी राशि में और धर्म और भाग्य स्थान सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह और में देख रहा है, इसलिये भाग्य और यश की कुछ कमजोरी रहेगी तथा धर्म पर श्रद्धा की कमजोरी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च की अधिकता के मार्ग में कुछ परेशानी होगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगी। यदि मीन का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर शत्रु गुरु की राशि में बैठा है तो माता के सुख संबन्ध में कमी रहेगी और भूमि
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धनु लग्न का फलादेश ४७९ धन लग्न में ४ शनि मकानादि की शक्ति प्राप्त रहेगी, किन्तु रहने के स्थान में कुछ नीरसता का योग प्रतीत होगा तथा १० ८ भाई-बहिन कुटुम्ब इत्यादि की सुख शक्ति के ११ ७ अन्दर कुछ फीकापन रहेगा और धन की शक्ति से १२ श. ६ धनवान् समझा जायेगा तथा तीसरी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा १ ३ ५ है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रखेगा और २ ४ झगड़े-झंझटों के मार्ग में लाभ युक्त रहेगा और नं. ९४० ननसाल पक्ष से कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के पक्ष से उन्नति एवं शक्ति पायेगा और राज-समाज के स्थान में मान प्रतिष्ठा पायेगा और कारबार का वृद्धि करने का प्रयत्न करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इस लिये देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कुछ कमजोरी रहेगी तथा धन स्थान पति ग्रह कुछ बन्धन का भी कार्य करता है, इसलिये दैहिक सुख और घरेलू सुख में कुछ बाधायें रहेंगी। धन लग्न में ५ शनि यदि मेष का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल १० ८ की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट अनुभव ११ ७ करेगा और विद्या ग्रहण करने के सम्बन्ध में D
१२ ६ कमजोरी रहेगी तथा बोलचाल बातचीत के अन्दर कुछ रूखापन और छिपाव रहेगा तथा कुटुम्ब के १श. ३ ५ पक्ष में कुछ चिंता रहेगी तथा तीसरी मित्र दृष्टि से २ ४ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन नं. ९४१ राशि में देख रहा है इसलिए रोजगार में शक्ति रहेगी और स्त्री स्थान में सफलता मिलेगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति रहेगी और लाभ के स्थान में अधिक धन प्राप्त करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करता रहेगा और दसवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये विशेष चिन्तित रहकर पेचीदी युक्ति से काम लेकर कुछ शक्ति पायेगा। यदि वृषभ का शनि- छठें शत्रु स्थान में शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट के मार्ग से
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४८० भृगु संहिता धन लग्न में ६ शनि फायदा उठावेगा तथा धन के पक्ष में प्रभाव रखते हुए भी अन्दरूनी कमजोरी रहेगी और कुटुम्ब १० ८ ११ तथा भाई-बहिन के पक्ष में कुछ विरोध का-सा ९ ७ रूप रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु एवं १२ ६ पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन में कुछ फिकर रहेगी तथा १ ३ ५ आयु में शक्ति बनेगी और पुरातत्व स्थान से कुछ २श. ४ शक्ति मिलने पर भी पुरातत्व शक्ति में कुछ कमी नं. ९४२ प्रतीत होगी और उदर में कुछ शिकायत रहेगी और सातवीं दृष्टि से शत्रु की राशि वृश्चिक में खर्च ओर बाहरी स्थान को देख रहा है। अतः खर्च करने की शक्ति के अभाव के कारण दुःखी रहेगा तथा दसवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त होते हुए भी भाई-बहिन के सम्पर्क में कुछ वैमनस्यता एवं अलहदगी का योग पायेगा और अपने पुरुषार्थ पर बड़ा भारी भरोसा रखते हुए जबरदस्त हिम्मत और बहादुरी के साथ काम करेगा। धन लग्न में ७ शनि यदि मिथुन का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १० ८ है तो रोजगार के मार्ग से काफी धन पैदा करेगा ११ ७ और स्त्री स्थान में शक्ति पायेगा, किन्तु धन १२ ६ स्थानपति के दोष होने के कारण स्त्री के सुख में कुछ थोड़ी कमी रहेगी तथा कुटुम्ब की शक्ति १ ३ श. ५ रहेगी और भाई-बहिन के पक्ष से अच्छा सहयोग २ ४ बनेगा और पुरुषार्थ की शक्ति के द्वारा काफी नं. ९४३ सफलता प्राप्त करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से भाग्य स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य स्थान में कुछ नीरसता प्रतीत होगी तथा धर्म के मार्ग में कुछ अरुचि रहेगी, क्योंकि भाग्य और धर्म के मुकाबले में पुरुषार्थ और लौकिक सफलता का महत्व अधिक रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह में बुध परेशानी पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से चौथे माता एवं भूमि स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिए माता के सुख में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा भूमि-मकानादि की शक्ति में कुछ परिवर्तन होगा और कठिनाई से उन्नति करेगा। यदि कर्क का शनि-आठवें मृत्यु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो पुरातत्व शक्ति का लाभ करेगा तथा आठवें
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धनु लग्न का फलादेश ४८१
धन लग्न में ८ शनि स्थान पर शनि आयु का वृद्धि कारक माना जाता है, इसलिए आयु की वृद्धि करेगा, किन्तु जीवन १० ८ की दिनचर्या में फिकरमन्दी रहेगी और भाई- ११ ९ बहिन के सुख में कमजोरी रहेगी तथा सञ्चित १२ ६ धन शक्ति का अभाव रहेगा और कठिनाई के मार्ग से धन की प्राप्ति होगी तथा पुरुषार्थ शक्ति १ ३ ५ के मार्ग में होगी तथा पुरुषार्थ शक्ति के मार्ग में २ ४ श. कमजोरी प्रतीत होगी और कभी-कभी हिम्मत नं. ९४४ टूट जायेगी तथा तीसरी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सहारा मिलेगा और राज-समाज में कुछ मान रहेगा तथा कारबार के पक्ष में कुछ शक्ति रहेगी और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की साधारण शक्ति प्राप्त रहेगी और दसवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान पक्ष को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और सन्तान पक्ष में सुखों में कमजोरी रहेगी। धन लग्न में ९ शनि यदि सिंह का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह राशि १० ८ ११ पर बैठा है तो कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा ९ ७ भाग्य की उन्नति कर पायेगा तथा धर्म के स्थान १२ ६ में कुछ अरुचियुक्त भाव से धर्म का पालन कर सकेगा और धन की संग्रह शक्ति का साधारण १ ३ ५श. योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का थोड़ा सुख २ ४
नं. ९४५ प्राप्त करेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से लाभ स्थान की मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए आमदनी के मार्ग में विशेष नफा और सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी मुफ्त का सा धन लाभ प्राप्त होगा और सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त रहेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति की सफलता मिलेगी और हिम्मत शक्ति से कार्य करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट आदि के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति और लाभ प्राप्त करेगा। यदि कन्या का शनि- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान से बड़ी सफलता शक्ति पायेगा और मृ. सं .- ३१
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४८२ भृगु संहिता धन लग्न में १० शनि कारबार से धन की उन्नति करेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा और लाभ पायेगा तथा भाई-बहिन १० ८ ११ की शक्ति का गौरव प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ ९ ७ कर्म के द्वारा सुन्दर उन्नति का मार्ग बनेगा तथा १२ ६ श. कुटुम्ब की शक्ति का अच्छा सहयोग रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान १ ३ ५ को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये २ ४ खर्च की अधिकता के मार्ग में कुछ कटुता एवं नं. ९४६ कुछ असन्तोष रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्ध में कुछ कमी रहेगी और भूमि के स्थान में कुछ नीरसता के साथ शक्ति रहेगी तथा दसवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष मे सफलता शक्ति मिलेगी और रोजगार के मार्ग में पुरुषार्थ के द्वारा धन का लाभ श्रेष्ठ रहेगा। धन लग्न में ११ शनि यदि तुला का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो १० ८ ग्यारहवें घर में क्रूर ग्रह जबरदस्त शक्ति का द्योतक ११ ९ ७श होता है, इसलिये धन की आमदनी के मार्ग में. १२ ६ विशेष सफलता शक्ति पायेगा और कभी-कभी मुफ्त का-सा बहुत धन लाभ प्राप्त करेगा तथा १ ३ 4 कुटुम्ब की शक्ति का उत्तम सहयोग पायेगा और २ ४ भाई-बहिन की सम्पर्क शक्ति का लाभ पायेगा नं. ९४७ तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा बड़ा लाभ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी और सुन्दरता की कुछ कमी रहेगी तथा सातवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ कष्ट रहेगा और विद्या स्थान में कुछ कमी रहेगी तथा बोल-चाल में कुछ रूखापन रहेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये आयु तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी रहेगी तथा पुरातत्व का लाभ रहेगा। यदि वृश्चिक का शनि- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत अधिक करेगा और धन तथा कुटुम्ब की कुछ हानि पायेगा और भाई-बहिन की शक्ति का कुछ कष्ट और कमी प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति में कुछ कमजोरी रहेगी और बाहरी
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धनु लग्न का फलादेश ४८३ धन लग्न में १२ शनि स्थानों के सम्बन्ध में कुछ अरुचिकर मार्ग के द्वारा शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा और तीसरी १० ८श. दृष्टि से धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं ११ ९ ७ अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, १२ ६ इसलिये धन और कुटुम्ब की थोड़ी सी शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को १ ३ ५ शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु २ ४ पक्ष में प्रभाव रखेगा और झगड़े-झंझट व आमदनी नं. ९४८ के पक्षों में लाभ युक्त रहेगा और कुछ छिपी शक्ति से काम करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के स्थान में कुछ असन्तोष युक्त मार्ग से सफलता पायेगा तथा धर्म का थोड़ा-सा पालन करेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु धन लग्न में १ राहु यदि धनु राशि का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर १० ८ बैठा है तो देह की सुन्दरता में बड़ी कमी रहेगी ११ ९ रा. ७ और देह में कुछ कष्ट और चिन्ता का योग प्राप्त १२ ६ करेगा तथा गुप्त युक्ति के बल से उन्नति पर पहुँचने का विशेष प्रयत्न करेगा, किन्तु उन्नति के मार्ग १ ३ 4 एवं मान प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में कमी रहेगी और ४ देह में कभी-कभी महान् सङ्कट का योग पायेगा किन्तु राहु देव गुरु वृहस्पतिजी के घर में बैठा है, इसलिये अन्दरूनी छिपाव एवं अनुचित योजना की शक्ति का प्रयोग प्रकट नं. ९४९
में बड़े सज्जनता के ढङ्ग के कार्य रूप में परिणित करेगा और अपनी परिस्थिति के अन्दर एक बड़ी कमी होने के कारण गुप्त दुःख का अनुभव करेगा। धन लग्न में २ राहु यदि मकर का राहु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो धन १०रा. ८ ११ की संग्रह शक्ति के अन्दर कमी और कष्ट के ९ ७ कारण पायेगा तथा कुटुम्ब के सम्ब्रन्ध में कुछ १२ ६ चिन्ता रहेगी, क्योंकि स्थिर हठी ग्रह शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये धन की शक्ति पाने के १ ३ ५ लिये बड़ा भारी युक्ति बल का प्रयोग करेगा २ ४ तथा धन और कुटुम्ब के मार्ग में कभी-कभी नं. ९५० महान संकट का योग मिलेगा, किन्तु बार-बार गहरे प्रयत्न की शक्ति से धन के सुधार का मार्ग प्राप्त करेगा एवं धन की
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४८४ भृगु संहिता पूर्ति करने के लिए कभी-कभी धन का कर्ज लेकर कार्य संचालन करेगा। धन लग्न में ३ राहु यदि कुम्भ का राहु-तीसरे पराक्रम एवं भाई १२ १० के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली कार्य करता रा ७ है, इसलिये पराक्रम स्थान के मार्ग से बड़ी भारी १२ ६ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और जबर्दस्त हिम्मत १ ३ ५ शक्ति से काम लेगा और स्थिर ग्रह शनि की राशि २ ४ पर बैठा है, इसलिये अपनी उन्नति करने के लिये गहरी युक्ति बल के प्रयोग से सदैव प्रयत्नशील रहेगा। किन्तु भाई-बहिन के सुख सम्बन्धों में कमी और कष्ट के कारण नं. ९५१
प्राप्त करेगा। कभी-कभी पुरुषार्थ कर्म की सफलता के मार्ग में घोर संकट प्राप्त होने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति से काम निकालेगा। धन लग्न में ४ राहु यदि मीन का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो १० ८ माता के सुख में भारी कमी रहेगी और भूमि- ११ ९ ७ मकानादि की हानि या कमी प्राप्त करेगा तथा १२ रा. ६ घरेलू रहन-सहन के सुख सम्बन्धों में कुछ अशान्ति का योग पायेगा। किन्तु देवगुरु वृहस्पति के स्थान १ ३ ५ में राहु बैठा है, इसलिये घरेलू सुख के साधनों को २ ४ बड़ी योग्यता एवं गुप्त युक्ति के बल से प्राप्त नं. ९५२ करेगा और कभी-कभी घरेलू वातावरण में घोर संकट का सामना करने की स्थिति उत्पन्न होने पर भी गुप्त बुद्धिमत्ता के द्वारा कार्य सम्पन्न करेगा और जन्म स्थान से वियोग पायेगा तथा कुछ मुफ्त का-सा सुख भी मिलेगा। धन लग्न में ५ राहु यदि मेष का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान पर शत्रु मंगल की राशि में बैठा है १० ८ तो संतान पक्ष में कष्ट प्राप्त होगा और संतान पक्ष ११ ९ ७ के सम्बन्ध से कुछ न कुछ चिंताये बनती रहेंगी १२ ६ तथा विद्या ग्रहण करने के मार्ग में बड़ी-बड़ी दिक्कतें उत्पन्न होंगी; किन्तु गरम ग्रह मंगल की १ रा. ३ 4 राशि पर राहु बैठा है, इसलिए हिम्मत शक्ति के २ ४ द्वारा किसी न किसी प्रकार विद्या ग्रहण करेगा, नं.९५३ किन्तु विद्या में कुछ कमी रहेगी और बोलचाल और बातचीत के अन्दर कुछ रुखापन और कुछ छिपाव रहेगा तथा गुप्त युक्ति के बल से अपने सिद्धांत की पूर्ति करेगा। किन्तु दिमाग के अन्दर
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धनु लग्न का फलादेश ४८५ कभी-कभी बेहद परेशानी अनुभव करेगा। धन लग्न में ६ गहु यदि वृषभ का राहु- छठें शत्रु स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर १० ८ ११ ९ ७ ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा १२ ६ और परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर राहु बैठा है इसलिये अति गम्भीर गहरी युक्तियों के १ ३ ५ २रा. द्वारा सदैव विजयी रहेगा तथा अनेक प्रकार के ४
नं.९५४ विघ्न बाधाओं को चतुराई से ही दमन करेगा और अपने को हमेशा निडर मानेगा। किन्तु मामा के पक्ष में कुछ खराबी करेगा और राह्ु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी शत्रु पक्ष में बेहद परेशानी का योग पायेगा। किन्तु अपनी अन्दरूनी कमजोरी को छिपाये रखने से प्रभाव कायम करेगा। धन लग्न में ७ राहु यदि मिथुन का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर बैठा है तो १० ८ ११ स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति पायेगा और सम्भवतः ७ कुछ अधिक स्त्रियों से शादी या सम्बन्ध पायेगा १२ ६ तथा रोजगार के मार्ग में विशेष उन्नति करेगा और
१ ५ बहुत प्रकार के मार्गों से रोजगार की वृद्धि के ३ रा. साधन बनायेगा तथा विवेकी बुध की राशि पर २ ४
नं. ९५५ राहु बैठा है, इसलिये महान् चतुराई के साधनों से सफलता शक्ति पायेगा और राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण गृहस्थ और रोजगार के मार्ग में कभी-कभी भारी अशांति का योग बनेगा किन्तु उच्च का होने के नाते उन मुसीबतों से जल्दी ही छुटकारा मिलेगा और रास्ता साफ हो जायंगा। धन लग्न में ८ राहु यदि कर्क का राहु-आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व १० ८ स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है ११ ७ तो आयु के स्थान में कई बार संकट प्राप्त करेगा तथा परातत्व शक्ति की हानि रहेगी और जीवन १२ ६ की चिनचर्या में बड़ी चिन्तायें प्राप्त करेगा तथा १ ३ ५ उदर के अन्दर कोई बीमारी रहेगी और कभी- २ ४ रा. कभी जीवन की समाप्ति का सा महान् संकट
निर्वाह के लिये फिकरमंदी का योग चलेगा तथा गुप्त युक्ति और अनेक नं. ९५६ बनेगा इसलिये जीवन की रक्षा और जीवन के
प्रकार के साधनों से जीवन की दिनचर्या का संचालन कार्य करेगा तथा
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४८६ भृगु संहिता जीवन झंझट युक्त रहेगा। धन लग्न में ९ राहु यदि सिंह का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में परमशत्रु सूर्य की राशि पर बैठा १० ८ है तो भाग्य के स्थान में महान् संकट प्राप्त करेगा ११ ७ तथा भाग्योन्नति के लिये बड़ी-बड़ी दिक्कतें सहनी १२ ६ पड़ेंगी और धर्म के पक्ष में हानि और कमी रहेगी तथा ईश्वर की भक्ति और निष्ठा में कमजोरी रहेगी १ ३ ५रा. और सुयश का अभाव रहेगा तथा सूर्य की राशि २ ४ पर होने से भाग्य की उन्नति के मार्ग में भारी नं. ९५७ प्रयत्न करेगा और विशेष मुक्तिबल से काम लेगा। किन्तु कभी-कभी भाग्य के पक्ष में घोर संकट को पाने पर भी हिम्मत और प्रताप शक्ति से काम करेगा। धन लग्न में १० राहु यदि कन्या का राहु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो १० ८ पिता स्थान में कुछ परेशानी या कमी रहेगी और ११ ७ राज-समाज में कुछ झंझट युक्त वातावरण से १२ ६ रा. काम चलेगा तथा कारबार मान-प्रतिष्ठा आदि के मार्ग में कभी महान् संकट का सामना करने की १ ३ ५ स्थिति पायेगा, किन्तु विवेकी बुध की राशि पर २ ४ राहु बैठा है, इसलिये गुप्त और गहरी युक्ति के नं. ९५८ बल से अपनी स्थिति और कारबार की उन्नति करेगा; फिर भी कुछ कमी और कमजोरी रहेगी और बहुत सी दिक्कतों के 即 光 出 9 半 华
मार्ग के बाद इज्जत-आबरू को बना सकेगा तथा अधिक उन्नति और ऊँचे पद पर पहुँचने के लिए सदैव चिन्ता युक्त रहेगा। धन लग्न में ११ राहु यदि तुला का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थानपर १० ८ क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, ११ ७रा इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता १२ ६ शक्ति पायेगा और अधिक से अधिक मुनाफा खाने की चेष्टा करेगा। किन्तु परम चतुर आचार्य १ ३ ५ शुक्र की राशि पर राहु बैठा है, इसलिये आमदनी २ ४ के मार्ग में महान् चतुराई की गुप्त युक्तियों के नं. ९५९ द्वारा रास्ता इस्तेमाल करके आदमनी की वृद्धि प्राप्त करेगा, किन्तु राहु क स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में कठिनाईयाँ और परेशानियाँ भी प्राप्त रहेंगी। कभी-कभी लाभ के मार्ग
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धनु लग्न का फलादेश ४८७ में कठिन समस्या बनने पर भी धैर्य से काम लेगा। धन लग्न में १२ राहु यदि वृश्चिक का राहु- बारहवें खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान में मङ्गल की राशि पर बैठा है तो १० ८रा. खर्च के मार्ग में कुछ चिन्ता फिकर रहेगी और ११ ७ कुछ झंझट एवं परेशानियों के द्वारा खर्च का १२ ६ सञ्चालन कार्य रहेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ कष्ट अनुभव होगा, गरम ग्रह मंगल की १ ३ ५ राशि पर राहु बैठा है, इसलिये बड़ी कड़ाई और २ ४ मेहनत तथा हिम्मत और गुप्त युक्तियों के बल से खर्च के मार्ग को पूरा करेगा तथा इसी प्रकार बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कार्य बनावेगा। किन्तु खर्च के मार्ग में कभी- नं. ९६०
कभी भारी संकट का सामना करने की स्थिति पायेगा तथा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से कभी नुकसान रहेगा, किन्तु धैर्य और गुप्त साहस से काम निकालेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु धन लग्न में १ केतु यदि धनु राशि का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर १० ८ बैठा है तो देह के आकार में वृद्धि और शक्ति ११ ९ के. ७ प्राप्त करेगा तथा अपने अन्दर बड़ी बहादुरी और १२ ६ हिम्मत रखेगा तथा हठधर्मी और जिद्दबाजी से काम करेगा किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के १ ३ ५ कारण देह में कुछ चिंता एवं कुछ कष्ट का योग २ ४
नं. ९६१ पायेगा तथा देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य से सम्बन्ध में कुछ कमी रहेगी तथा अपने व्यक्तित्व और मान-प्रतिष्ठा की उन्नति के लिये महान् कठिन परिश्रम और विशेष साधन उपस्थित करेगा तथा कठिन से कठिन कार्य को पूरा करने के लिए सदैव उद्यत रहेगा; किन्तु फिर भी अपने अन्दर कुछ कमी के कारण से दुःख अनुभव करेगा। धन लग्न में २ केतु यदि मकर का केतु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब १० के ८ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो धन के ११ ७ पक्ष में कुछ संकट एवं कमी का योग प्राप्त करेगा
१२ तथा कुटुम्ब के अन्दर कमी और क्लेश का रूप ६ पायेगा और धन की उन्नति करने के लिये बड़ा ३ ५ कठिन कर्म करेगा तथा शनि की राशि पर बैठा है २ ४ इसलिये धन की प्राप्ति के मार्ग में बड़ा भारी नं. ९६२ पश्रिम करते हुए सदैव प्रयत्नशील रहेगा और मेहनत
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४८८ भृगु संहिता की परवाह नहीं करेगा, किन्तु फिर भी कभी-कभी धन के स्थान में घोर संकट का सामना पायेगा परन्तु पुनः हिम्मत शक्ति और परिश्रम के योग से उन्नति के पथ पर चलेगा और कभी-कभी धन के लिए कर्ज भी करना पड़ेगा। धन लग्न में ३ केतु यदि कुम्भ का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो १० ८ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बहुत शक्तिशाली फल के ७ का दाता बन जाता है, इसलिये पराक्रम स्थान १२ ६ की शक्ति के द्वारा महान् कठिन परिश्रम कर उन्नति प्राप्त करेगा तथा अपने बाहुबल की शक्ति पर १ ३ 4 बड़ा भारी भरोसा करेगा और भाई-बहिन के स्थान २ ४ में कुछ कष्ट एवं कुछ कमी पायेगा तथा केतु के नं. ९६३ स्वाभाविक दोष के कारण कभी-कभी हिम्मत शक्ति के अन्दर अन्दरूनी और से कमी या कमजोरी अनुभव करेगा। किन्तु प्रकट रूप में कभी-कभी हिम्मत नहीं हारेगा, इसलिये कठिन से कठिन समय पर विपक्षियों के सम्मुख जबरदस्त धैर्य की गुप्त शक्ति से काम लेकर सफलता प्राप्त करेगा। धन लग्न में ४ केतु यदि मीन का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो १० ८ ११ माता के सुख सम्बन्ध में जबरदस्त हानि और कमी ९ प्राप्त करेगा तथा मातृ भूमि एवं जन्म स्थान स्थान १२ के. ६ से वियोग पायेगा तथा मकानादि भूमि के सम्बन्ध में तथा घरेलू वातावरण में सुखों की कमी रहेगी १ ३ ५ और देवगुरु वृहस्पति के घर में केतु बैठा है, इसलिये २ ४ गुप्त धैर्य और संतोष के द्वारा सुख का साधन बनावेगा नं. ९६४ तथा सुख प्राप्ति के साधनों के लिये बड़ा भारी प्रयत्न और गुप्त रूप से परिश्रम करके सफलता शक्ति पायेगा। किन्तु कभी- कभी घरेलू सुख शान्ति के अन्दर विशेष संकट प्राप्त करेगा। धन लग्न में ५ केतु यदि मेष का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा ८ ११ 9 है तो संतान पक्ष में महान् संकट का योग प्राप्त करेगा तथा विद्या ग्रहण करने के मार्ग में बड़ी- १२ ६ बड़ी दिक्कतें रहेंगी तथा बड़े भारी कठिन परिश्रम १क. ३ ५ और कठिनाईयों के योग से थोड़ी विद्या प्राप्त हो २ ४ सकेगी। विद्या की कुछ कमी और संतान पक्ष के नं. ९६५ कारणों से दुःख का अनुभव होता रहेगा तथा
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धनु लग्न का फलादेश ४८९ दिमाग के अन्दर कुछ चिन्ता फिकर-सी रहेगी और बोलचाल में कुछ नीरसता एवं क्रोध रहेगा, किन्तु गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये अपने मन्तव्य और गुप्त युक्ति के सम्मुख किसी दूसरे व्यक्ति की बात को ग्रहण नहीं करेगा। धन लग्न में ६ केतु यदि वृषभ का केतु- छठे शत्रु स्थान में मित्र
१० ८ शुक्र की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में क्रूर ११ ७ ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का द्योतक होता है, इसलिये शत्रुपक्ष में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा और १२ बड़े-बड़े झगड़े-झंझटों के मार्ग में विजय प्राप्त १ ३ ५ करेगा तथा परम चतुर आचार्य शुक्रदेव की राशि २के. ४ पर बैठा है, इसलिये प्रत्येक कठिनाईयों के सम्मुख
से काम करके सफलता शक्ति पायेगा तथा केतु के स्वाभाविक गुणों के नं. ९६६ बड़ी भारी चतुर और गुप्त शक्ति तथा जिद्दबाजी
कारण कभी-कभी शत्रु पक्ष में महान् संकट का योग पाने पर भी प्रकट में बड़ी बहादुरी से काम निकालेगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमी रहेगी। धन लग्न में ७ केतु यदि मिथुन का केतु- सातवें केन्द्र, स्त्री एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की १० ८ ११ ९ ७ राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में विशेष हानि या परेशानी प्राप्त होगी तथा रोजगार के मार्ग में बड़ी- १२ बड़ी दिक्कतें रहेंगी और कठिन कर्म तथा १ ३ के ५ परेशानियों से रोजगार का संचालन कर सकेगा २ ४ तथा कभी-कभी रोजगार एवं गृहस्थ के अन्दर
धैर्य की शक्ति से काम निकालेगा और बार-बार गृहस्थ के सम्बन्धों से नं. ९६७ महान् संकट का योग प्राप्त होगा। किन्तु प्राप्त
दुःख का अनुभव करता रहेगा। किन्तु कुछ गुप्त युक्ति की शक्ति से काम धन लग्न में ८ केतु निकालेगा तथा गृहस्थ सुख की कमी को कुछ
१० ८ मजबूरियों के कारण पूरा नहीं कर सकेगा। ११ ९ ७ यदि कर्क का केतु-आठवें आयु एवं मृत्यु तथा पुरातत्व स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की १२ ६ राशि पर बैठा है तो आयु के सम्बन्ध में बड़े-बड़े १ ३ ५ महान् संकटों का सामना करने की स्थिति प्राप्त २ ४ के. करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में बहुत प्रकार नं. ९६८ की परेशानियाँ रहेंगी और पुरातत्व सम्बन्धी शक्ति
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४९० भृगु संहिता की हानि प्राप्त होगी तथा उदर के अन्दर कई प्रकार की बीमारी का योग भी रहेगा और चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये मन के अन्दर मृत्यु तुल्य दुःख का अनुभव करेगा और जीवन को चलाने के लिए कुछ गुप्त शक्ति और कठिन कर्म का प्रयोग करेगा। धन लग्न में ९ केतु यदि सिंह का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य ८ एवं धर्म स्थान में परम सूर्य की राशि पर बैठा है १० ११ ९ ७ तो भाग्य के स्थान में महान् संकटों का योग प्राप्त करेगा तथा भाग्य की वृद्धि करने के लिये १२ ६ बड़े-बड़े कठिन कर्म और गुप्त शक्तियों का प्रयोग १ ३ ५ के करेगा और फिर भी भाग्य की स्थिति के अन्दर २ बड़ी भारी कमी एवं कमजोरी प्राप्त करेगा और ४
नं. ९६९ धर्म के मार्ग में बड़ी-बड़ी रुकावटें पड़ेंगी तथा सुयश की कमी रहेगी और दैव संयोग के द्वारा असफलताओं के कारण प्राप्त होते रहेंगे और ईश्वर के विश्वास में तथा बरक्कत के स्थान में बड़ी कमजोरी रहेगी। 共 学 少 业
धन लग्न में १० केतु यदि कन्या का केतु- दसम केन्द्र पिता स्थान में एवं राज्य स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १० ८ है तो पिता स्थान में कुछ कमी और परेशानी का ११ ७ योग प्राप्त करेगा तथा कारबार और राज-समाज १२ ६ के. के पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा मान प्रतिष्ठा के अन्दर कुछ कमजोरी के सहित मार्ग बनेगा १ ३ ५ और केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी- २ ४ कभी मान प्रतिष्ठा एवं कारबार के अन्दर घोर नं. ९७० अशांति के कारण पाने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति एवं हिम्मत से और कठिन परिश्रम के योग से पुनः अपनी जीवनी शक्ति को प्राप्त करेगा। धन लग्न में ११ केतु यदि तुला का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में १० ८ मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान ११ ९ ७के पर क्रूर ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष १२ ६ सफलता शक्ति पायेगा और अधिक से अधिक १ नफा खाने का विशेष प्रयत्न एवं विशेष परिश्रम m ५ करेगा और केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण २ ४
नं. ९७१ आमदनी के मार्ग में कभी-कभी विशेष परेशानी का योग प्राप्त करेगा। किन्तु गुप्त शक्ति और
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धनु लग्न का फलादेश ४९१ कठिन परिश्रम के योग से सफलता शक्ति पायेगा तथा लाभ प्राप्ति में वृद्धि होते हुए भी लाभ के स्थान में कुछ त्रुटि महसूस होती रहेगी। धन लग्न में १२ केतु यदि वृश्चिक का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो खर्च १० ८के. के मार्ग में बड़ी परेशानी रहेगी और खर्च की ११ संचालन शक्ति पाने के लिये महान् कठिन परिश्रम
१२ करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतें एवं कठिनाईयाँ रहेंगी तथा गरम ग्रह मंगल १ ३ ५ की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये खर्च की २ ४ शक्ति को सफल करने के लिये गुप्त शक्ति और महान् हिम्मत से काम लेगा। किन्तु खर्च के स्थान में कभी-कभी महान् संघर्ष के योग बनते रहेंगे और कुछ त्रुटि युक्त मार्ग से नं. ९७२
खर्च का सञ्चालन चलता रहेगा। ।। धन लग्न समाप्त ।।
१० ९ ११ ७
१२ ६
१ ५
३
२ ४
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४९२ भृगु संहिता मकर लग्न का फलादेश प्रारम्भ
११ १० ९
१२ ८
१ ७
२ ६
४ ३ ५
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० १०८० तक में देखिये) प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ९७३ से लेकर कुण्डली नं० १०८० तक के अन्दर जो-जो ग्रह, जहाँ-जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन- जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले
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मकर लग्न का फलादेश ४९३ नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९७३ से ९८४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९७३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १७५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९७६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९७७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९७८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९७९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९८० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश
७. कुण्डली नं. ९८१ के अनुसार मालूम करिये। जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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४९४ भृगु संहिता कुण्डली नं. ९८२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९८३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९८४ के अनुसार मालूम करिये। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है उसका फलादेश कुण्डली नं० ९८५ से ९९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९८९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९९४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ९९६ के अनुसार मालूम करिये।
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मकर लग्न का फलादेश ४९५ (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ९९७ से १००८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९९७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९९८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ९९९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००८ के अनुसार मालूम करिये। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १००९ से १०२० तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।
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४९६ भृगु संहिता १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १००९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०११ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०१९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, ध्नु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०२० के अनुसार मालूम करिये। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०२१ से १०३२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२२ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली
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मकर लग्न का फलादेश ४९७ नं. १०२३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०२९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३० के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०३२ के अनुसार मालूम करिये। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०३३ से १०४४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३४ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३७ के अनुसार मालूम करिये।
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४९८ भृगु संहिता ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०३९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०४० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०४१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०४२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०४३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०४४ के अनुसार मालूम करिये। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०४५ से १०५६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०४५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०४६ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०४७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०४८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०४९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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मकर लग्न का फलादेश ४९९ कुण्डली नं. १०५२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १५३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५६ के अनुसार मालूम करिये। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०५७ से १०६८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५८ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०५९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली : नं. १०६६ के अनुसार मालूम करिये।
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५०० भृगु संहिता ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६८ के अनुसार मालूम करिये। (१०) मकर लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०६९ से १०८० तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०६९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७० के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०७९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १०८० के अनुसार मालूम करिये।
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मकर लग्न का फलादेश ५०१
आयु, मृत्यु, पुरातत्वस्थानपति-सूर्य मकर लग्न में १ सूर्य यदि मकर का सूयं- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने ११ ९ के दोष के कारण से देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य १२ १० सू. ८ के अन्दर कुछ कमजोरी रहेगी और देह में कभी-
१ ७ कभी विशेष संकट का योग भी बनेगा। किन्तु आयु स्थान की वृद्धि रहेगी और पुरातत्व सम्बन्ध २ ४ ६ में कुछ अरुचिकर रूप से शक्ति रहेगी तथा देह में ३ ५ प्रभाव और तेजी रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से नं. ९७३ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के पक्ष में अष्टमेश के दोष युक्त दृष्टि के कारण कुछ परेशानी एवं कुछ कठिनाईयाँ रहेंगी। मकर लग्न में २ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है, तो अष्टमेश ११ सू. ९ होने के दोष के कारण धन की शक्ति को संचित १२ १० ८ नहीं कर सकेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ १ ७ परेशानी एवं नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा और धन के मार्ग में कभी-कभी विशेष चिन्ता का २ ४ ६ योग बनेगा और कुटुम्ब से संघर्ष करता रहेगा। ३ सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान नं. ९७४ को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि प्राप्त होगी तथा पुरातत्व शक्ति का अच्छा लाभ होगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव और अमीरात का ढंग रहेगा और जीवन की शानदारी के लिए धन की परबाह नहीं करेगा। मकर लग्न में ३ सूर्य यदि मीन का सूर्य- तीसरे पराक्रम स्थान एवं
१२ ११ भाई के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ९ तीसरे स्थान में गरम ग्रह शक्ति शाली फल का सू. १० ८ दाता बन जाता है, इसलिये आयु की शक्ति प्राप्त १ ७ रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा तथा
२ जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा जीवन. ४ ६ की शक्ति में बड़ी हिम्मत और जोश रहेगा किन्तु ३ ५ नं.९७५ अष्टमेश होने के दोष के कारण से भाई-बहिन के पक्ष में कुछ परेशानी तथा कुछ कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख
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५०२ भृगु संहिता रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ कमी नजर आयेगी और धर्म के मार्ग में वास्तविक रूप से कुछ कमजोरी रहेगी। मकर लग्न में ४ सूर्य यदि मेष का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं ११ भूमि के स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की ९ १२ राशि पर बैठा है तो आयु की विशेष सुख शक्ति १० ८ रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ा आनन्द १ सू. ७ और प्रभाव रहेगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध की सञ्ञित शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि २ ४ ६ की शक्ति रहेगी तथा घरेलू वातावरण एवं माता ३ ५ के सम्बन्ध में प्रभाव युक्त रहेगा और सातवीं नं. ९७६ नीच दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए पिता के सुख में बड़ी कमी रहेगी और राज-समाज के अन्दर मान-प्रतिष्ठा की कमी रहेगी तथा उन्नति के मार्ग में रुकावटे रहेंगे। मकर लग्न में ५ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या ११ ९ एवं संतान स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा १२ १० ८ है, तो आयु स्थान में कुछ शक्ति रहेगी तथा पुरातत्व सम्बन्ध का ज्ञान और लाभ रहेगा तथा जीवन की १ ७ दिनचर्या में कुछ नीरसता का अनुभव होगा, किन्तु २सू. ४ ६ अष्टमेश होने के दोष के कारणों से संतान पक्ष में ३ 4 कष्ट प्राप्त होगा तथा विद्या के सम्बन्ध में कुछ नं.९७७ परेशानियाँ रहेंगी और बुद्धि के अन्दर कुछ क्रोध और कुछ चिन्ता रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ा प्रयत्न और परिश्रम करेगा। मकर लग्न में ६ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- छठे शत्रु स्थान पर मित्र बुध की राशि में बैठा है तो छठें स्थान पर ११ ९ १२ गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो जाता है, १० ८ इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रखेगा तथा १ आयु स्थान में कुछ शक्ति रहेगी और पुरातत्व सम्बन्ध की कुछ शक्ति मिलेगी और झगड़े-झंझट २ ४ ६ आदि मार्गों में कुछ-कुछ परिश्रम के योग से ३ सू. 4 सफलता प्राप्त करेगा तथा अष्टमेश होने के दोष नं. ९७८ के कारण से मामा के पक्ष में तथा शत्रु पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को
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मकर लग्न का फलादेश ५०३ गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा तथा बाहरी स्थान में कुछ अरुचि रहेगी। मकर लग्न में ७ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर ११ ९ बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण स्त्री १२ १० ८ स्थान में संकट एवं परेशानी रहेगी और रोजगार १ ७ के मार्ग में बड़ी कठिनाईयों से संचालन कार्य करेगा तथा कभी-कभी रोजगार में बड़ी हानि २ ४ सू. ६ रहेगी और आयु स्थान में शक्ति प्राप्त होगी तथा ३ ५ पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और जीवन की नं. ९७९ दिनचर्या में प्रभाव और प्रमोद रहेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कष्ट रहेगा और देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी तथा अधिक परिश्रम करना पड़ेगा। मकर लग्न में ८ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- आठवें आयु स्थान में
११ स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आयु ९ १२ ८ स्थान में शक्ति प्राप्त रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में बड़ा भारी प्रभाव रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध १ ७ में जीवन को सहायक होने वाली विशेष शक्ति प्राप्त होगी तथा निर्भयता युक्त समय व्यतीत करेगा २ ४ ६ ३ ५ सू. तथा रहन-सहन के अन्दर तेजी और स्वाभिमान रखेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से कुम्भ राशि में नं. ९८० देख रहा है, इसलिये धन संग्रह के स्थान में परेशानी के कारण प्राप्त होंगे और कुदुम्ब के पक्ष में कुछ झंझट और नीरसता का योग पायेगा। मकर लग्न में ९ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है ११ ९ १२ तो आयु की वृद्धि प्राप्त करेगा तथा जीवन को १० ८ सहायक होने वाली पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त १ ७ करेगा तथा जीवन की दिनचर्या का भाग्यवानी और प्रभाव के द्वारा व्यतीत करेगा। किन्तु अष्टमेश २ ४ ६ सू. होने के दोष के कारण भाग्य स्थान की उन्नति के ३ ५ मार्ग में रुकावट प्राप्त करेगा तथा सुयश की कमी नं. ९८१ रहेगी और धर्म पालन की हानि और कमी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में
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५०४ भृगु संहिता देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी तथा पुरुषार्थ में कुछ लापरवाही करेगा। मकर लग्न में १० सूर्य यदि तुला का सूर्य- दसम केन्द्र पिता एवं ११ राज्य स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की राशि ९ १२ पर बैठा है तो पिता के सुख सम्बन्ध में महान् कष्ट १० ८ प्राप्त करेगा; क्योंकि सूर्य नीच भी है और अष्टमेश १ भी है, इसलिये विशेष दोषी होने के कारण प्रत्येक उन्नति के मार्ग में बाधा और रुकावट प्राप्त होंगी २ ४ ६ तथा राज-समाज से सम्बन्ध में मान-प्रतिष्ठा की ३ ५ कमी रहेगी और आयु की तरफ से भी कुछ कमजोरी नं. ९८२ रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता एवं भूमि के सम्बन्धों में कुछ शक्ति रहेगी और सुख मिलेगा। मकर लग्न में ११ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान ११ ९ में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें १२ .सू. स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो १० जाता है, इसलिये आयु की विशेष शक्ति रहेगी १ ७ तथा पुरातत्व सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली शक्ति का लाभ रहेगा और आमदनी के २ ४ ६ मार्ग में सफलता और प्रभाव मिलेगा तथा अष्टमेश ३ ५
नं. ९८३ होने के दोष के कारण से आमदनी के मार्ग में कुछ कठिनाईयाँ तथा परिश्रम रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में कष्ट रहेगा और विद्या स्थान में कुछ कठिनाई प्राप्त होगी तथा विभाग में कुछ तेजी रहेगी। मकर लग्न में १२ सूर्य यदि धनु का सूर्य- बारहवें खर्चे एवं बाहरी ९ सू. स्थान में मित्र गुरु की धनु राशि पर बैठा है तो ११ आयु के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी रहेगी तथा १२ १० ८ जीवन की दिनचर्या में प्रभाव की कुछ कमी रहेगी १ ७ और पुरातत्व शक्ति के लाभ में कुछ हानि रहेगी तथा अष्टमेश होने के दोष के कारण खर्च के २ ४ ६ मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी। बाहरी स्थान के ३ ५ मार्ग में कुछ असफलता या दिक्कतें रहेगी और नं. ९८४ उदर में कुछ नीचे के तरफ विकार रहेगा और 共 共 共 出 सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है,
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मकर लग्न का फलादेश ५०५ इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ दिक्कतों के साथ प्रभाव शक्ति रहेगी तथा अनेकों झंझटें स्वयमेव कटती रहेंगी। स्त्री, रोजगार, मनस्थानपति-चन्द्र मकर लग्न में १ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो देह से ११ ९
१२ १० चं. ८ कुछ सुन्दरता एवं कोमलता पायेगा और देह में कुछ सजावट एवं मनोरञ्जन का ध्यान रहेगा तथा १ ७ मान और कुछ ख्याति प्राप्त करेगा तथा लौकिक उन्नति और कार्य कुशलता का बड़ा ध्यान रखेगा २ ४ ६ तथ सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को ३ 4 स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, नं. ९८५ इसलिए स्त्री पक्ष में सुन्दरता एवं योग्यता तथा स्वाभिमान पायेगा और रोजगार के मार्ग में तन और मन की शक्ति के द्वारा बड़ी भारी सफलता शक्ति मिलेगी तथा गृहस्थ के पक्ष में आनन्दित रहेगा तथा प्रभाव शक्ति रहेगी। मकर लग्न में २ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की रशि पर बैठा है तो रोजगार ११ चं ९ के मार्ग से धन की वृद्धि रहेगी और कुटुम्ब के १२ १० ८ अन्दर शक्ति रहेगी। किन्तु धन का स्थान कुछ
१ ७ बन्धन का सा कार्य करता है, इसलिये स्त्री के सुख सम्बन्ध में मन के लिये बड़ी परेशानी रहेगी २ ४ ६ और मनोयोग की शक्ति से धनोन्नति के कारण ३ ५ पैदा करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आयु स्थान नं. ९८६ को एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और दिनचर्या में अमीरात का ढङ्ग रहेगा। मकर लग्न में ३ चन्द्र यदि मीन का चन्द्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो मनोयोग १२ ११ ९ के द्वारा पराक्रम शक्ति से रोजगार के मार्ग में चं १० बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और स्त्री पक्ष में १ 19 सुन्दर शक्ति पायेगा तथा भाई बहिन की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा और गृहस्थ के पक्ष से २ ४ ६ मन को बड़ी प्रसन्नता रहेगी तथा सातवीं मित्र ३ ५ नं. ९८७ दृष्टि से भाग्य एवं धर्मस्थान को बुध की कन्या
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५०६ भृगु संहिता राशि में देख रहा है, इसलिए भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा धर्म में रुचि रखेगा तथा उत्साहित मनोयोग के द्वारा यश प्राप्त करेगा। मकर लग्न में ४ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं ११ भूमि के स्थान पर मित्र मंगल की राशि में बैठा है ९ १२ तो स्त्री पक्ष की तरफ से बहुत सुख और सुन्दरता १० ८ प्राप्त रहेगी तथा मनोयोग से रोजगार की बड़ी १ चं. ७ सुन्दर सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि के रहन-सहन का सुन्दर सुख रहेगा २ ४ ६ तथा माता का उत्तम आनन्द और सुख मिलेगा ३ ५
नं. ९८८ और घरेलू वातावरण में मनोरंजन का सुन्दर साधन रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पितास्थान में सुन्दर सहायता मिलेगी और राज-समाज, कारबार में मान प्रतिष्ठा और सुख रहेगा। मकर लग्न में ५ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण, विद्या
११ एवं संतान स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र ९ १२ शुक्र की राशि पर बैठा है तो स्त्री और संतान पक्ष १० ८ में सुन्दर शक्ति पायेगा तथा मन और बुद्धि के १ ७ योग से रोजगार का कार्य बड़ी योग्यता से करेगा तथा लौकिक भोगादिक पक्ष के सम्बन्ध में बड़ी २चं ४ ६ भारी दिलचस्पी रखेगा और विद्या बुद्धि एवं ३ ५ बातचीत के अन्दर हाजिर जबाबी का दिमाग नं. ९८९ पायेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी कमजोरी अनुभव करेगा अतः लाभ के पक्ष से मन को कुछ असुविधा रहेगी। मकर लग्न में ६ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में मानसिक ११ ९ विरोध रहेगा एवं मन को कुछ असुविधा ऑर १२ १० ८ अशांति अनुभव होगी तथा रोजगार के मार्ग में १ ७ बड़ी दिक्कतें रहेंगी अर्थात् मानसिक मनोययोग के परिश्रस और कुछ परेशानियों के संयोग से २ ४ ६ रोजगार का संचालन करेगा तथा दैनिक व्यवहार ३ च. ५ और मनोयोग की कुशलता से शत्रु पक्ष में नरमाई नं. ९९० से अपना कार्य पूरा करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि
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मकर लग्न का फलादेश ५०७ से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा और बाहर का अच्छा सम्बन्ध रहेगा। मकर लग्न में ७ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- सातवें स्त्री एवं रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है ११ तो मनोयोग की महान् शक्ति के द्वारा रोजगार के १२ १० ८ मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा
१ ७ और स्त्री के सुख और सौन्दर्य में महानता प्राप्त होगी तथा गृहस्थ के अन्दर मनोरञ्जन का सुन्दर २ ४ चं ६ साधन रहेगा तथा लौकिक भोगादिक पक्ष के ३ ५ अन्दर विशेष अभिरूचि रहेगी और सातवीं शत्रु नं. ९९१ दृष्टि से देह के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये गृहस्थ और रोजगार के पक्ष से देह के सम्बन्ध की कुछ अरूचि युक्त मार्ग से मान और गौरव प्राप्त होगा। मकर लग्न में ८ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्वस्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो ११ ९ स्त्री स्थान में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा और रोजगार १२ १० ८ के मार्ग में बड़ी कठिनाईयाँ युक्त कर्म के द्वारा १ ७ कार्य सफल कर सकेगा तथा गृहस्थ सुख की कमी के कारण मानसिक अशान्ति रहेगी और २ ४ ६ पुरातत्व सम्बन्ध में सहायता शक्ति मिलेगी तथा ३ ५ चं. आयु में तथा जीवन की दिनचर्या में रौनक रहेगी नं. ९९२ और सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है इसलिए कुछ दिक्कतों के साथ धन की वृद्धि करने का प्रयत्न करेगा तथा कुटुम्ब से कुछ अच्छा सम्पर्क रहेगा। मकर लग्न में ९ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है ११ ९ तो स्त्री के पक्ष में भाग्यवानी और सुन्दरता प्राप्त १२ १० ८ करेगा तथा मनोयोग की उत्तम शक्ति के द्वारा
१ रोजगार के मार्ग में बड़ी सुन्दर सफलता प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ और रोजगार के द्वारा बड़ा २ ४ ६ च भाग्यवान् समझा जायेगा और लौकिक तथा पार- ३ ५ लौकिक दोनों ही विषयों में सुन्दर रुचि रखेगा नं. ९९३ तथा यश और धर्म को प्राप्त करेगा तथा व्यवहारिक मार्ग में न्याय को पसंद करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से गुरु की मीन राशि में भाई और पराक्रम स्थान को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन का योग
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५०८ भृगु संहिता. पायेगा तथा मनोयोग के द्वारा पुरुषार्थ की सफलता पाएगा। मकर लग्न में १० चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- दसवें केन्द्र पिता एवं ११ राज्य स्थान में सामान्य मित्र 'शुक्र की राशि पर ९ बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति का सुन्दर सहयोग १२ १० ८ प्राप्त करेगा और राज-समाज के अन्दर बड़ी मान १ ७ चं. प्रतिष्ठा पायेगा तथा मनोबल की उत्तम शक्ति के द्वारा रोजगार का मार्ग ऊँचे स्तर पर ले जाकर २ ४ ६ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा सुन्दर और ३ ५ स्वाभिमान वाली स्त्री पायेगा और गृहस्थ के नं. ९९४ सम्बन्ध में आमोद-प्रमोद रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता और भूमि के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में और मकानादि भूमि के सम्बन्ध में सुख और मनोञ्जन पायेगा। मकर लग्न में ११ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान ११ में नीच का होकर मित्र मंगल की राशि पर बैठा ९ १२ ८ चं. है तो आमदनी के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी १० और स्त्री पक्ष के सम्बन्ध में सुख की कमी अनुभव १ ७ होगी तथा रोजगार के साथ मनोयोग के द्वारा लाभ होता रहेगा और गृहस्थ के सम्बन्ध से कुछ २ ४ ६ मानसिक परेशानियाँ रहेंगी तथा सातवीं उच्च ३ ५ नं. ९९५ दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि की शक्ति पायेगा और सन्तान पक्ष में बुद्धि और उल्लास प्राप्त करेगा। मकर लग्न में १२ चन्द्र यदि धनु राशि का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं ११ बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ९च. १२ खर्चा बहुत करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध १० ८ से मनोयोग की कर्म शक्ति से सफलता पायेगा १ ७ और स्त्री पक्ष के सुख सम्बन्ध में हानि और कमजोरी रहेगी तथा स्थानीय रोजगार के मार्ग में बड़ी २ ४ ६ परेशानियाँ और नुकसान रहेगा और गृहस्थ सुख ३ ५ नं. ९९६ के अन्दर मन को अशान्ति के कारण मिलेंगे और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए शत्रु पक्ष में तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी नरमाई से काम निकालेगा और मनोयोग की शक्ति से कुछ अभाव रहेगा।
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मकर लग्न का फलादेश ५०९ माता, भूमि तथा आमद स्थानपति-मंगल मकर लग्न में १ मंगल यदि मकर का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर ११ ९ बैठा है तो देह के अन्दर सुन्दर और सुड़ौल कद १२ १० मं. ८ प्राप्त करेगा तथा सुख पूर्वक विशेष लाभ की १ ७ शक्ति देह के द्वारा प्राप्त होगी और देह में बड़ा प्रभाव रहेगा तथा चौथी दृष्टि से माता एवं भूमि २ ४ ६ स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को ३ ५ देख रहा है, इसलिये माता का उत्तम सुख प्राप्त नं. ९९७ करेगा और भूमि और मकानादि की शक्ति का विशेष लाभ पायेगा तथा घरेलू रहन-सहन के अन्दर सुख प्राप्ति के ऊँचे साधन पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिए स्त्री के सुख-सम्बन्ध में कुछ कमी रहेगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी तथा आठवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में सुख शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा अपने अनेक प्रकार के लाभ और स्वार्थ सिद्धि के लिये तत्परता से काम करेगा। मकर लग्न में २ मंगल यदि कुम्भ का मंगल- दूसरे धन स्थान एवं
११ मं कुटुम्ब स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ९ १२ कुछ थोड़े से अरुचिकर मार्ग के द्वारा धन का १० अच्छा लाभ पायेगा तथा कुटुम्ब के सम्बन्ध में १ ७ कुछ नीरसता के साथ सुख मिलेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का भी कार्य करता है, इसलिये २ ४ ६ माता के सुख संबंध में कमी रहेगी और भूमि ३ ५ नं. ९९८ और मकानादि की शक्ति से लाभ रहेगा और धन की वृद्धि करने के कारणों से घरेलू सुख शान्ति में विशेष कमी रहेगी और चौथी दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में बुद्धि पायेगा और संतान पक्ष में सुख शक्ति मिलेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य स्थान में वृद्धि पायेगा और धर्म का पालन करेगा, किन्तु
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५१० भृगु संहिता अपने आर्थिक लाभ का विशेष ध्यान रखेगा। मकर लग्न में ३ मंगल यदि मीन का मंगल- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान पर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ११ ९ १२ तीसरे स्थान पर गरम ग्रह शक्ति शाली फल का मं १० ८ दाता होता है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति की वृद्धि ७ रहेगी और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति पायेगा तथा पराक्रम २ ४ ६ के द्वारा ही घरेलू वातावरण तथा भूमि मकानादि ३ ५ का सुख प्राप्त करेगा और माता तथा भाई-बहिन नं. ९९९ की शक्ति का लाभ रहेगा और चौथी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में लाभ और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि पायेगा तथा धर्म का पालन करेगा और यश प्राप्त करेगा और आठवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ क्षणिक अरूचि के साथ पिता की शक्ति का लाभ पायेगा और राज-समाज कारबार के पक्ष में मान और उन्नति रहेगी। मकर लग्न में ४ मंगल यदि मेष का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री ११ ९ बैठा है तो माता की महान् शक्ति का लाभ मिलेगा १२ १० ८ और भूमि मकानादि की शक्ति से बहुत लाभ १ मं. ७ और सुख प्राप्त रहेगा तथा आमदनी के मार्ग की शक्ति का लाभ घर बैठे मिलेगा और चौथी नीच २ ४ ६ दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र चन्द्रमा ३ ५ की कर्क राशि में देख रहा है। इसलिए स्त्री पक्ष में नं. १००० कष्ट प्राप्त करेगा तथा स्त्री के सुख सम्बन्धों में बड़ी कमी रहेगी और रोजगार के मार्ग में लाभ और सुख की कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिए पिता की शक्ति का लाभ पायेगा और राज- समाज में मान प्राप्त करेगा तथा बड़े स्थान के कार्य में सफलता पायेगा और आठवीं दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में लाभ स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति का लाभ पायेगा अर्थात् बँधी हुई मजबूत आमदनी का योग बड़ी सुगमता पूर्वक प्राप्त करता रहेगा।
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मकर लग्न का फलादेश ५११
मकर लग्न में ५ मंगल यदि वृषभ का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर ११ ९ बैठा है तो विद्या की शक्ति का सुख लाभ पायेगा १२ १० ८ और बुद्धि एवं वाणी के द्वारा स्वार्थ की पूर्ति सुख १ ७ पूर्वक करेगा। संतान पक्ष में सुख शक्ति और लाभ प्राप्त करेगा तथा माता का लाभ मिलेगा २मं. ४ ६ और भूमि मकानादि का लाभ व सुख रहेगा चौथी ३ ५ मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को सूर्य की नं. १००१ सिंह राशि में देख रहा है, इसलिए आयु के पक्ष में सुख शक्ति रहेगी और पुरातत्व स्थान की शक्ति का लाभ रहेगा तथा जीवन की दिनचर्या में आनन्द रहेगा और सातवीं दृष्टि से आमदनी के स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आमदनी की शक्ति का मजबूत लाभ बुद्धि योग द्वारा प्राप्त करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से खर्च स्थान एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में सुख और लाभ प्राप्त करेगा। मकर लग्न में ७ मंगल यदि मिथुन का मंगल- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर ११ ९ १२ गरम ग्रह शक्ति शाली फल का दाता होता है, १० ८ इसलिये शत्रु स्थान में विशेष प्रभाव रखेगा और १ ७ झगड़े-झंझट आदि मार्गों में सफलता और सुख सम्बन्धों में कमी पायेगा और जन्मभूमि के २ ४ मं. ६ मकानादि स्थान पक्ष में सुख की कमी रहेगी और ३ ५ आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतों के योग से नं. १००३ सफलता और प्रभाव पायेगा तथा चौथी भिन्न दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिए भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का कुछ पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिए खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थान के सम्बन्ध में सुख लाभ रहेगा और आठवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह में विशेष प्रभाव पायेगा तथा सुन्दरता युक्ति सुडौल कद रहेगा। देह का सुख और लाभ प्राप्त रहेगा। यदि कर्क का मंगल-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, तो स्त्री स्थान में घरेलू सुख शान्ति की बड़ी भारी कमी रहेगी तथा रोजगार के पक्ष में आमदनी की
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५१२ भृगु संहिता मकर लग्न में ६ मंगल कमजोरी रहेगी और माता के सुख सम्बन्ध में कमी रहेगी तथा भूमि मकानादि के सुख की ११ ९ कमजोरी रहेगी तथा चौथी दृष्टि से पिता एवं १२ १० ८ राज्य स्थान को सामान्य शत्रु की तुला राशि में ७ देख रहा है, इसलिए पिता-स्थान से लाभ और सुख प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान प्रतिष्ठा २ ४ ६ पायेगा तथा बड़े कारबार के मार्ग में सफलता ३ मं. 4 रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को नं. १००२ शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए देह में प्रभाव और गौरव प्राप्त रहेगा तथा देह की वृद्धि और सुख प्राप्ति का विशेष ध्यान रखेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए धन की संग्रह शक्ति के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त शक्ति रहेगी कुटुम्ब का सुख रहेगा। मकर लग्न में ८ मंगल यदि सिंह का मंगल-आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है ११ ९ तो माता के सुख सम्बन्ध में बड़ी भारी कमी १२ १० ८ रहेगी तथा भूमि एवं मकानादि के सम्बन्ध में १ ७ कुछ हानि रहेगी और आमदनी के पक्ष में कुछ परेशानी तथा आयु स्थान में सुख शक्ति रहेगी २ ४ ६ और पुरातत्व सम्बन्ध की शक्ति का लाभ पायेगा ३ ५ मं. तथा चौथी दृष्टि से आमदनी के स्थान को स्वयं नं. १००४ अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये परिश्रम और कठिनाई के योग से मजबूत आमदनी का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए धन संग्रह शक्ति के सुख में कुछ कमी के साथ सुखी रहेगा और कुटुम्ब का सामान्य सुख रहेगा तथा आठवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का सुख योग रहेगा तथा पराक्रम शक्ति में वृद्धि और हिम्मत रहेगी तथा घरेलू सुख थोड़ा रहेगा। यदि कन्या का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति से आमदनी का उत्तम मार्ग प्राप्त करेगा और धर्म का पालन करेगा तथा धन का लाभ न्याय से करेगा और भाग्यवान् समझा जायेगा और चौथी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को मित्र गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में लाभ और सुख मिलेगा और कुदरती तौर से
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मकर लग्न का फलादेश ५१३ मकर लग्न में ९ मंगल सफलता एवं यश मिलेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि ११ में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की सुख १२ १० ८ शक्ति का लाभ रहेगा और पराक्रम स्थान की १ ७ सफलता शक्ति से लाभ और सुख मिलेगा तथा उल्लास और हिम्मत शक्ति पर भरोसा रहेगा तथा २ ४ ६ मं आठवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं ३ ५ अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये नं. १००५ माता की शक्ति का विशेष सुख और लाभ भाग्य से प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की उत्तम शक्ति का लाभ पायेगा तथा घरेलू वातावरण में रहन-सहन और अमोद-प्रमोद के ढंग स्वतः भाग्य की शक्ति से प्राप्त करेगा। मकर लग्न में १० मंगल यदि तुला का मंगल- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर ११ ९ बैठा है तो दसम स्थान पर मंगल का बैठना अधिक १२ १० ८ श्रेष्ठ माना जाता है, इसलिये पिता स्थान की १ ७ मं. शक्ति का विशेष लाभ पायेगा और राज-समाज के अन्दर मान-प्रतिष्ठा और आमदनी का उत्तम २ ४ ६ मार्ग प्राप्त करेगा तथा कारबार के पक्ष में बड़ी ३ ५ शानदारी से उन्नति और लाभ पायेगा और चौथी नं. १००६ उच्च दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए देह में विशेष प्रभाव एवं मान तथा सुख के साधन पायेगा तथा देह के कद में वृद्धि रहेगी तथा समाज में अपना व्यक्तित्व-बड़प्पन रखेगा और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मेष राशि में माता एवं भूमि के स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये माता की सुख शक्ति का गौरव पायेगा और भूमि-मकानादि की प्रतिभा शक्ति का आनन्द रहेगा और आठवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में शक्ति और लाभ रहेगा तथा विद्या स्थान में वृद्धि तथा शक्ति एवं सुख और लाभ पायेगा तथा दिमाग के अन्दर हुकुमत का प्रभाव रहेगा। यदि वृश्चिक का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री होकर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में गरम ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये आमदनी से सम्बन्ध में बड़ी भारी शक्ति का मार्ग प्राप्त करेगा और भूमि-मकानादि की शक्ति का लाभ और सुख विशेष पायेगा तथा माता की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा लाभ प्राप्ति के
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५१४ भृगु संहिता मकर लग्न में ११ मंगल स्थान मे बंधी हुई आमदनी का जरिया सुख पूर्वक रहेगा और चौथी दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान ११ ९ की शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, १२ १० ८ मं इसलिये धन की संग्रह शक्ति के सुख सम्बन्ध में १ ७ थोड़ा-सा असंतोष रहेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के साथ सुख सम्बन्ध २ ४ ६ रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान ३ ५ को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख नं. १००७ रहा है, इसलिये विद्या में शक्ति प्राप्त रहेगी और संतान पक्ष में सुख और लाभ पायेगा तथा आठवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रहेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से लाभ और सुख पायेगा। निर्भय रहेगा। मकर लग्न में १२ मंगल यदि धनु राशि का मंगल- बारहवें खर्च एवं
११ बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ९ मं. माता के सुख सम्बन्धों में हानि और कमी पायेगा १२ १० ८ तथा भूमि-मकानादि की शक्ति में दुर्बलता रहेगी १ ७ और मातृभूमि से विछोह रहेगा तथा घरेलू सुख के साधनों की कमी रहेगी और स्थानीय लाभ २ ४ w प्राप्ति के मार्ग में कमजोरी रहेगी तथा खर्चा ३ ५ अधिक तायदाद में रहेगा। किन्तु बाहरी स्थानों नं. १००८ के सम्बन्ध में आमदनी और सुख प्राप्ति के अच्छे साधन रहेंगे और खर्च का मार्ग कभी रूक नहीं सकेगा और चौथी मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई- बहिन का लाभ रहेगा और पराक्रम स्थान के द्वारा सफलता शक्ति पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी दानाई से प्रभाव रखेगा और झगड़ा-झंझटों की परवाह नहीं करेगा और आठवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में हानि या सुख की कमी के कारण पायेगा और रोजगार में कुछ परेशानी रहेगी। भाग्य, धर्म, शत्रु, विवेकस्थानपति बुध यदि मकर का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उत्तम शक्ति मिलेगी तथा देह को मान-सम्मान प्राप्त रहेगा और धर्म का पालन करेगा और शत्रु पक्ष के मार्ग में विवेक
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मकर लग्न का फलादेश ५१५ मकर लग्न में १ बुध शक्ति के योग से प्रभाव पायेगा तथा अनेक प्रकार झंझट और परेशानियों से बचाव पाने के लिए ११ ९
१२ भाग्य का सुन्दर सहयोग स्वतः रहेगा। किन्तु षष्ठेश १० बु. ८ होने के दोष के कारणों से देह में कुछ रोग रहेगा १ ७ तथा भाग्योन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेंगी २ ४ ६ और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को ३ ५ सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, नं. १००९ इसलिये स्त्री एवं रोजगार के मार्ग में शक्ति रहेगी। मकर लग्न में २ बुध यदि कुम्भ का बुध- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की कुम्भ राशि पर बैठा है तो ११बु. ९ भाग्य और परिश्रम के योग से विशेष शक्ति के १२ १० ८ द्वारा धन की खूब वृद्धि करेगा तथा कुटुम्ब की १ ७ योगशक्ति का फायदा उठावेगा और धनवान एवं भाग्यवान् समझा जायेगा और इज्जत तथा मान २ ४ ६ प्रााप्त करेगा और धर्म के मार्ग में स्वार्थ युक्ति से ३ ५ सफलता प्राप्त करेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष नं. १०१० के कारण से कभी-कभी धन और भाग्य में कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा और दिनचर्या में प्रभाव रहेगा। मकर लग्न में ३ बुध यदि मीन का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम
११ स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की राशि पर १२ ९ बैठा है तो भाई बहिन के पक्ष में सुख की कमी ब् १० ८ रहेगी और पुरुषार्थ स्थान में बल बुद्धि की कुछ १ ७ कमजोरी रहेगी तथा शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में कुछ-
२ कुछ कमजोरी रहेगी। कुछ कमजोरी युक्त वातावरण ४ ६ के द्वारा भाग्य की शक्ति से सहारा प्राप्त करेगा ३ ५
भाग्य स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, नं. १०११ और कुछ झगड़े-झंझटों के पक्ष से परेशानी एवं कुछ दिक्कतें रहेंगी और सातवीं उच्च दृष्टि से
इसलिये पुरुषार्थ और विवेक शक्ति के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा तथा धर्म का यथाशक्ति पालन करने की चेष्टा रखेगा तथा कुछ भग्यवान समझा जायेगा। यदि मेष का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो माता की शक्ति का सौभाग्य प्राप्त करेगा तथा
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५१६ भृगु संहिता मकर लग्न में ४ बुध भूमि-मकानादि की सुख शाक्ति प्राप्त रहेगी और भाग्य की शक्ति और विवेक के द्वारा अनेक प्रकार ११ ९ के सुख प्राप्त करेगा। किन्तु षष्ठेश होने के दोष १२ १० ८ के कारण घरेलू वातावरण और सुख शान्ति के १ बु. ७ सम्बन्ध में कुछ दिक्कतें एवं रुकावटें मिलेंगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान २ ४ ६ को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये ३ ५ पिता की शक्ति का लाभ पायेगा तथा राजसमाज नं. १०१२ में मान पायेगा और शुत्र पक्ष में भाग्य से सफलता पायेगा। मकर लग्न में ५ बुध यदि वृषभ का बुध- पांचवे त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा ११ ९ है तो विद्या स्थान में विवेक शक्ति और परिश्रम १२ १० ८ तथा भाग्य के योग से बहुत भारी सफलता प्राप्त
१ ७ करेगा और कुछ थोड़ी-सी परेशानी के साथ संतान पक्ष में उत्तम शक्ति पायेगा तथा बुद्धि विद्या के २बु. ४ ६ योग से भाग्य की उन्नति करेगा तथा कुछ चतुराई ३ ५ के साथ धर्म का पालन करेगा तथा शत्रु पक्ष के नं. १०१३ सम्बन्ध में उत्तम विवेक शक्ति के द्वारा सफलता और यश पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और विवेक शक्ति के द्वारा आमदनी की अच्छी सफलता रहेगी। मकर लग्न में ६ बुध यदि मिथनु का बुध- छठें शत्रु स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु स्थान में ११ ९ १२ भाग्य की शक्ति से एवं विवेक शक्ति से बड़ी १० ८ सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु भाग्य की उन्नति के १ ७ मार्ग में बड़ी दिक्कतें एवं कुछ झगड़े-झंझटें रहेंगी ओर धर्म के मार्ग में कुछ गड़बड़ी रहेगी। किन्तु २ ४ ६ ३ बु. कुछ रोगादिक झंझटों के मार्ग में दया, धर्म व ५
नं. १०१४ परमार्थ रहेगा और प्रभाव की वृद्धि करने के सम्बन्ध में भाग्य की कुछ लाभ-हानि का योग बनेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों में अच्छा सम्बन्ध बनेगा। यदि कर्क का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र
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मकर लग्न का फलादेश ५१७
मकर लग्न में ७ बुध चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति एवं विवेक युक्त परिश्रम के द्वारा रोजगार के मार्ग ११ ९ में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा स्त्री १२ १० ८ पक्ष में कुछ थोड़ी-सी झंझट और भाग्य की वृद्धि १ ७ के कारण सुन्दरता पायेगा और धर्म का सामान्यतम पालन करेगा तथा शत्रु पक्ष के सम्बन्ध में कुछ २ ४ बु. ६ दैनिक कार्य की कुशलता और भाग्य की शक्ति ३ ५ से सफलता पायेगा और षष्ठेश होने के कारण नं. १०१५ कुछ दिक्कतों के योग से भाग्य वृद्धि के साधन पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिए देह में मान और प्रभाव तथा कुछ रोग पायेगा। मकर लग्न में ८ बुध यदि सिंह की बुध-आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो आयु ११ ९ की वृद्धि रहेगी तथा पुरातत्व शक्ति का लाभ १२ १० ८ रहेगा और भाग्य की उन्नति के मार्ग में बड़ी-बड़ी १ ७ दिक्कतें रहेंगी और सुयश की विशेष कमी प्राप्त रहेगी और षष्ठेश होने के दोष के कारण शत्रु पक्ष २ ४ ६ की तरफ से या कुछ रोग की तरफ से जीवन की ३ ५ बु. नं. १०१६ दिनचर्या में कुछ अशांति रहेगी एवं कुछ झगड़े- झंझट़ों के मार्ग से भाग्य स्थान में थोड़ी परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और कुछ झंझटों के योग से धन की वृद्धि रहेगी तथा कुटुम्ब स्थान में शक्ति मिलेगी तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा। मकर लग्न में ९ बुध यदि कन्या का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य
११ स्थान एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर ९ १२ स्वक्षेत्री एवं उच्च का होकर बैठा है तो भाग्य की १० ८ महान् उन्नति करेगा तथा बाहरी धर्म के दिखावे १ ७ का विशेष पालन करेगा और विवेक शक्ति की
२ पेचिदी चाल से उत्तम रूप के द्वारा भाग्य की ४ दबु. सफलता और शत्रु पर विजय प्राप्त करेगा तथा ३ 4 नं. १०१७ बड़ा भारी भाग्यवान् समझा जायेगा और झगड़े- झंझटों के मार्ग से लाभ पायेगा सातवीं नीच दृष्टि के द्वारा भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के सुख में विरोध या कमी पायेगा और भागय शक्ति
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५१८ भृगु संहिता के मुकाबले में पुरुषार्थ के महत्व को छोटा समझेगा तथा पराक्रम में कुछ दुर्बलता रहेगी। मकर लग्न में १० बुध यदि तुला का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर पिता स्थान ११ ९ की शक्ति पर बैठा है तो पिता स्थान की शक्ति १२ १० ८ का अच्छा फायदा उठावेगा तथा राज-समाज में १ ७ बु. मान-प्रतिष्ठा एवं उन्नति का प्रभाव योग प्राप्त करेगा और भाग्य तथा परिश्रम की शक्ति से कारबार में २ ४ ६ बड़ी सफलता मिलेगी और बड़ा भाग्यवान् माना ३ ५ जायेगा तथा शत्रु पक्ष के मार्ग में भाग्य और नं. १०१८ विवेक शक्ति के ऊँचे कर्मबल से स्वतः सफलता प्राप्त रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि की शक्ति का लाभ पायेगा तथा वष्ठेश होने के दोष के कारण से उन्नति के मार्गों में कुछ दिक्कतें रहेंगी। मकर लग्न में ११ बुध यदि वृश्चिक का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में ११ ९ मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष के
१२ ८बु. मार्ग में भाग्य के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा और कुछ परिश्रम तथा विकेक शक्ति एवं भाग्य के १ ७ योग से आमदनी के अन्दर उत्तम शक्ति का योग
२ ४ ६ लाभ प्राप्त करेगा और लाभ के मार्ग से बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा तथा धर्म के मार्ग में ३ ५ नं. १०१९ कुछ स्वार्थयुक्त धर्म का पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या के अन्दर विवेक शक्ति के द्वारा बड़ी सफलता पायेगा और सन्तान पक्ष में सफलता मिलेगी, किन्तु षष्ठेश
मकर लग्न में १२ बुध होने के कारण कुछ परेशानी रहेगी। यदि धन का बुध- बारहवें खर्च स्थान एवं ११ ९बु. बाहरी स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो १२ १० ८ खर्चा प्रभाव युक्त अच्छा रहेगा तथा बाहरी स्थानों में परिश्रमी विवेक की शक्ति और भाग्यबल से १ ७ सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु भाग्य की उन्नति के २ ४ ६ मार्ग में परेशानियाँ और कमजोरी रहेगी तथा देर- अबेर और दिक्कतों के साथ भाग्य की शक्ति को ३ ५
नं. १०२० प्राप्त करेगा तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से
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मकर लग्न का फलादेश ५१९ बरक्कत और यश की कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मिथुन राशि में शत्रु स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानियों के द्वारा भाग्यबल की शक्ति से मतलब निकालेगा। भाई, पराक्रम, खर्च, बाहरीस्थानपति-गुरु मकर लग्न में १ गुरु यदि मकर का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है ११ ९ तो देह में कमजोरी रहेगी तथा खर्च की तरफ से १२ १० गु. ८ कुछ परेशानी अनुभव होगी और बाहरी स्थानों १ ७ की तरफ से सम्बन्ध कमजोर रहेंगे तथा भाई- बहिन के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी और कष्ट के २ ४ ६ कारण मिलेंगे तथा पुरुषार्थ और हिम्मत शक्ति ३ ५ के अन्दर कमजोरी का ढंग बनता रहेगा और नं. १०२१ सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दरता और शक्ति प्राप्त रहेगी तथा रोजगार के मार्ग में परिश्रम से अच्छी उन्नति और प्रभाव प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में कुछ कमजोरी के साथ-साथ शक्ति प्राप्त करेगा और संतान पक्ष में कुछ दुख रहेगा और नवमी दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और धर्म के मार्ग में कुछ उतार चढ़ाव चलता रहेगा। मकर लग्न में २ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- द्वितीय धनऔर कुटुम्ब २१गु. के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ९ १२ व्ययेश होने के दोष के कारण से धन के कोष १० ८ स्थान में कमजोरी और हानि के कारण पैदा करेगा, किन्तु धन की वृद्धि करने क लिए पुरुषार्थ और 2 ७
२ बाहरी स्थानों के योग से विशेष प्रयत्नशील रहेगा ४ ६ और खर्च के मार्ग में बड़ी रोक थाम करने पर भी ३ ५ नं. १०२२ खर्चा अधिक रहेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी तथा भाई-बहिन के पक्ष में सुख सम्बन्ध की कमी रहेगी तथा पुरुषार्थ शक्ति में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु एवं पुरातत्व संबंध में कुछ शक्ति रहेगी और पाँचवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिए शत्रु पक्ष में
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५२० भृगु संहिता कुछ दानाई और नरम रीति से काम करेगा तथा नवमी दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ कमजोरी पायेगा, राज-समाज में कुछ मान पायेगा तथा कारबार में कुछ शक्ति रहेगी। मकर लग्न में ३ गुरु यदि मीन का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम
१२ ११ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो ९ भाई-बहन की शक्ति एवं पुरुषार्थ शक्ति उत्तम गु १० ८ रूप से प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तम १ ७ रूप से सम्बन्ध पायेगा और पाँचवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र चन्द्र की कर्क २ ४ ६ राशि में देख रहा है इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दरता ३ ५ नं. १०२३ युक्त शक्ति पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ उतार-चढ़ाव रहेगा और धर्म का थोड़ा पालन करेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से आमद के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये लाभ की शक्ति अच्छी रहेगी। मकर लग्न में ४ गुरु यदि मेष का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ११ ९ १२ व्ययेश होने के दोष के कारण से माता के सुख १० ८ सम्बन्धों में कुछ कमी रखेगा और भूमि-मकानादि १ गु. ७ की शक्ति में कुछ कमजोरी रहेगी तथा भाई- बहिन के सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति रहेगी २ ४ ६ और पराक्रम शक्ति का कुछ सुख रहेगा और ३ ५ पाँचवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को नं. १०२४ सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में कुछ शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व शक्ति में कुछ उन्नति और अवनति के कारण प्राप्त रहेंगे और सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति रहेगी और राज-समाज में कुछ शक्ति रहेगी और नवमी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक चलता रहेगा और बाहरी स्थानों की शक्ति का लाभ घर बैठे सुख पूर्वक प्राप्त होता रहेगा। यदि वृषभ का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में शक्ति मिलेगी,
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मकर लग्न का फलादेश ५२१
मकर लग्न में ५ गुरु किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारणों से विद्या में कुछ कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में कुछ हानि ११ ९ लाभ का मिश्रित योग प्राप्त करेगा तथा बुद्धि १२ १० योग द्वारा खर्च की शक्ति का संचालन करेगा
१ ७ तथा बाहरी स्थान-सम्बन्धों का अच्छा ज्ञान रहेगा और भाई-बहिन की साधारण शक्ति रहेगी तथा २गु. ४ ६ पुरुषार्थ कर्म की सफलता को बुद्धि योग द्वारा ३ 4 पायेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म नं. १०२५ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ वृद्धि रहेगा तथा धर्म का थोड़ा पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा आमदनी की वृद्धि करेगा और नवमी नीच दृष्टि से देह के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य के अन्दर कमी एवं कुछ परेशानी के कारण प्राप्त करेगा। मकर लग्न में ६ गुरु यदि मिथुन का गुरु- छठें शत्रु स्थान में मित्र
११ ९ बुध की राशि पर बैठा है तो पराक्रम और खर्च
१२ की शक्ति से शत्रु पक्ष में प्रभाव रख सकेगा और १० ८ भाई-बहिन के पक्ष में कुछ विरोध एवं कुछ कमी १ ७ के कारण पायेगा तथा पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी या कुछ परतन्त्रता का योग बनेगा और २ ४ ६ झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ थोड़ी शक्ति और ३ गु. ५ हिम्मत पायेगा तथा पाँचवीं दृष्टि से पिता एवं नं. १०२६ राज्य-स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ शक्ति और हानि प्राप्त रहेगी तथा राज-समाज में कुछ कमी और कुछ मान पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों की कुछ सम्बन्ध शक्ति पायेगा और नवमी शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की और कुटुम्ब की वृद्धि करने का बड़ा प्रयत्न करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से धन और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कमी और कष्ट पायेगा। यदि कर्क का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर उच्च का होकर बैठा है तो स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति और सुन्दरता पायेगा और रोजगार के मार्ग में अच्छी सफलता शक्ति रहेगी,
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५२२ भृगु संहिता मकर लग्न में ७ गुरु किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से स्त्री तथा राजेगार के पक्ष में कुछ हानि या कुछ त्रुटि भी ११ ९ रहेगी और खर्च का विशेष संचालन गृहस्थ में १२ १० ८ रहेगा और बाहरी स्थानों का अच्छा संपर्क रहेगा १ ७ तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी २ ४ गु. ६ के मार्ग में अच्छा लाभ पायेगा और सातवीं नीच ३ ५ दृष्टि से देह स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में नं. १०२७ देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य के अन्दर कुछ त्रुटि रहेगी और हृदय में कुछ परेशानी अनुभव रहेगी तथा नवीं दृष्टि से पराक्रम एवं भाई के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति रहेगी और पराक्रम स्थान से विशेष सफलता और सहयोग तथा हिम्मत प्राप्त होगी। मकर लग्न में ८ गुरु यदि सिंह का गुरु- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व ११ ९ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई- १२ बहन के पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी और पुरातत्व १० ८ सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली शक्ति १ ७ की कुछ हानि व लाभ पायेगा तथा खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी। किन्तु पाँचवीं दृष्टिः से २ ४ ६ ३ ५ गु. खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी धनु रृंशि नं. १०२८ में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा परिश्रम के योग से सदैव चलता रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ शक्ति मिलेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कमी और नीरसता रहेगी तथा नवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कुछ त्रुटियुक्त सुख मिलेगा और भूमि-मकानादि के सम्बन्ध में कुछ हानि व लाभ का योग मिलेगा। यदि कन्या का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो खर्च संचालन की शक्ति में भाग्य का सहारा रहेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से भाग्य की उन्नति में कुछ कमी रहेगी और धर्म के पालन में भी कुछ कमजोरी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध का कुछ सहारा स्वतः प्राप्त होता रहेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी तथा सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और आत्मा में कुछ आशान्ति रहेगी और सातवीं दृष्टि से
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मकर लग्न का फलादेश ५२३
मकर लग्न में ९ गुरु पराक्रम एवं भाई-बहिन के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन ११ ९ का कुछ सहारा प्राप्त करेगा और पराक्रम की १२ १० ८ सफलता शक्ति पायेगा अर्थात् पराक्रम के द्वारा
१ ७ भाग्य की वृद्धि करेगा और कुछ भाग्यवान् समझा जायेगा तथा नवमी सामान्य शत्रु दृष्टि से विद्या २ ४ ६ गु. तथा सन्तान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में ३ ५ देख रहा है, इसलिये विद्या तथा बुद्धि एवं सन्तान नं. १०२९ पक्ष से कुछ भाग्योन्नति का साधन प्राप्त करेगा और सज्जनता धारण करेगा। मकर लग्न में १० गुरु यदि तुला का गुरु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि ११ ९ पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष कारण से पिता १२ १० ८ पक्ष में कुछ कमी रहेगी और कारबार में कुछ १ ७ गु. असफलता मिलेगी तथा राज-समाज के मार्ग में थोड़ा मान प्राप्त रहेगा और भाई-बहिन की कुछ २ ४ ६ शक्ति मिलेगी तथा पुरुषार्थ कर्म के द्वारा कुछ ३ ५ नं. १०३० शक्ति और कुछ प्रभाव पायेगा और खर्च का कार्य बड़ी शानदारी से करेगा तथा बाहरी स्थानों से अच्छा सम्बन्ध पायेगा और पाँचवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन के कोष में वृद्धि का प्रयत्न करने पर भी कुछ कमी और असंतोष प्राप्त करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में भी कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कुछ त्रुटियुक्त शक्ति पायेगा और भूमि और मकानादि के पक्ष में खर्च की शक्ति से सुख प्राप्त करेगा और नवमीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी दानाई के रूप से शत्रु पक्ष में प्रभाव पायेगा। यदि वृश्चिक का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान में प्राप्त सभी ग्रह लाभदायक होते हैं, इसलिये आमदनी के मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से स्थानीय आमदनी में कुछ त्रुटि रहेगी और बाहरी सम्बन्धों से उत्तम लाभ का योग प्राप्त करेगा तथा खर्चा भी शानदार रहेगा और पाँचवी मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में 1 को देख रहा है, इसलिए व्ययेश होने के कारण थोड़ा त्रुटि सहित भाई- बहिन की शक्ति पायेगा और पुरुषार्थ कर्म की सफलता शक्ति पायेगा तथा
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५२४ भृगु संहिता मकर लग्न में ११ गुरु खर्च के योग से उन्नति करेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र ११ ९ की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान १२ १० ८गु. पक्ष में कुछ असन्तोष युक्त शक्ति पायेगा और १ ७ विद्या, बुद्धि व वाणी के अन्दर कुछ त्रुटियुक्त शक्ति और प्रभाव रहेगा तथा नवमी उच्च दृष्टि से २ ४ ६ स्त्री एवं रोजगार के स्थान को मित्र चन्द्रमा की ३ 4 कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये बाहरी सम्बन्ध नं. १०३१ कें योग से रोजगार में विशेष शक्ति और स्त्री में प्रभाव पायेगा। मकर लग्न में १२ गुरु यदि धनु का गुरु- बारहवें खर्च एवं बाहरी ११ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो ९गु. १२ खर्चा बहुत करेगा तथा बाहरी स्थानों में अपनी १० ८ पुरुषार्थ की सफलता शक्ति में बड़ी त्रुटि रहेगी १ ७ और पुरुषार्थ शक्ति में कुछ कमजोरी और असफलता रहेगी तथा कभी-कभी हिम्मत टूटती २ ४ ६ रहेगी और पाँचवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के ३ 4 नं. १०३२ स्थान को मंगल की राशि में देख रहा है, इसलिये माता का थोड़ा सुख प्राप्त करेगा और भूमि- मकानादि की शक्ति का कुछ त्रुटि युक्त सुख सम्बन्ध प्राप्त करेगा और खर्च की ताकत से सुख पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी युक्ति से काम निकालेगा और प्रभाव रखेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु के और जीवन के दिनचर्या में खर्च की शक्ति के कारण प्रभाव कायम रखेगा। विद्या, संतान, पिता, राज्यस्थानपति-शुक्र मकर लग्न में १ शुक्र यदि मकर का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान ११ ९ में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो देह के १२ १० शु. ८ सम्बन्ध में सुन्दरता और मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और पिता स्थान की शक्ति का सुन्दर सहयोंग १ ७ पायेगा तथा राज समाज में इज्जत और उन्नति २ ६ रहेगी तथा कारबार के मार्ग में चतुराई और बुद्धि ४ ३ के योग से सफलता मिलेगी तथा विद्या को उत्तम ५ नं. १०३३ रूप से ग्रहण करेगा और सन्तान पक्ष की सुन्दर
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मकर लग्न का फलादेश ५२५ शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुन्दरता और योग्यता की शक्ति पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में बुद्धि की विशेष शक्ति के द्वारा उत्तम सफलता मिलेगी तथा बड़ा कार्य कुशल बनेगा। मकर लग्न में २ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शशि की राशि पर बैठा है तो नगद ११शु ९ धन की विशेष संग्रह शक्ति रहेगी और कुटुम्ब की १२ १० ८ शक्ति का विशेष गौरव पायेगा तथा पिता की १ ७ शक्ति से बहुत उन्नति होगी और राज-समाज और इज्जत मान प्राप्त करेगा तथा बुद्धि विद्या की २ ४ ६ कीमती शक्ति प्राप्त होगी; इसलिये बुद्धि योग के ३ ५ व्यापार कर्म से विशेष सफलता और धन प्राप्त नं. १०३४ करेगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का भी कार्य करता है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ दिक्कत रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु तथा दिनचर्या में कुछ नीरसता रहेगी और पुरातत्त्व का थोड़ा-सा लाभ मिलेगा। मकर लग्न में ३ शुक्र यदि मीन का शुक्र- तीसरे भाई और पराक्रम स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की ११ ९ १२ राशि पर बैठा है तो पराक्रम स्थान में विशेष शक्ति शु. ८ प्राप्त करेगा तथा विद्या और संतान पक्ष की १ ७ महत्वदायक शक्ति पायेगा और पिता-स्थान की शक्ति का खूबी के साथ संचालन करेगा तथा २ ४ ६ राज-समाज में प्रभाव और मान पायेगा तथा बड़े ३ 4 काम को पूरा करने की विशेष हिम्मत शक्ति रखेगा नं. १०३५ तथा भाई-बहिन के सम्बन्ध में कुछ नीरसतायुक्त शक्ति का योग प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाग्य तथा धर्म स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि भें देख रहा है, इसलिये भाग्य की कुछ कमजोरी पायेगा और धर्म के पालन में भी कुछ कमजोरी रहेगी तथा वरक्कत और यश की प्राप्ति में कमी रहेगी। यदि मेष का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो माता की शक्ति का लाभ पायेगा और भूमि-मकानादि की सुख शक्ति एवं लाभ प्राप्त रहेगा और सुख पूर्वक बुद्धि योग की चतुराई से आमदनी की शक्ति पायेगा और सातवीं दृष्टि से
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५२६ भृगु संहिता मकर लग्न में ४ शुक्र पिता एवं राज्य-स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है; इसलिये पिता की ११ ९ १२ शक्ति का सुख प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में १० ८ मान पायेगा और विद्या की शक्ति और चतुराई के १ शु. ७ कर्म से उन्नति करेगा और संतान पक्ष की सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण में सुख २ ४ ६ और वैभव पायेगा और नीति एवं शान्ति युक्त ३ 4 योग्यता की बातों से प्रभाव पायेगा। नं. १०३६ यदि वृषभ का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या मकर लग्न में ५ शुक्र एवं संतान स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो विद्या की महान् शक्ति प्राप्त करेगा ११ ९ और संतान पक्ष में महानता पायेगा तथा बुद्धि १२ १० ८ और वाणी की शक्ति एवं चतुराई के योग से १ ७ उन्नति और मान तथा प्रभाव प्राप्त करेगा और पिता की शक्ति का योग लाभ पायेगा तथा राज २शु. ४ ६ समाज में मान पायेगा और हुकूमत या कानून की ३ ५ नं. १०३७ दृष्टि से बातें करेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के कर्म योग से आमदनी की शक्ति का सुन्दर लाभ पायेगा तथा उन्नति के लिये बड़ा विचार युक्त रहेगा। मकर लग्न में ६ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- छठे शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो पिता के पक्ष से कुछ ११ ९ ८ मतभेद युक्त शक्ति रहेगी तथा संतान पक्ष में कुछ १२ परेशानी रहेगी तथा विद्या की शक्ति में कुछ कमी १ ७ रहेगी और उन्नति प्राप्त करने के लिए बड़ी भारी पेचीदी चतुराईयों के योग से तथा परिश्रम से २ ४ ६. काम रकेगा और राज-समाज में मान सम्मान की ३ शु. 4 नं. १०३८ कुछ कमी रहेगी तथा गहरी चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में प्रभाव कायम रखेगा तथा दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी और सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध सामान्य तथा ठीक रहेगा। यदि कर्क का शुक्र-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में बड़ी सुन्दरता, योग्यता और शक्ति पायेगा तथा रोजगार-व्यापार के मार्ग में बुद्धि की महान् चतुराई
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मकर लग्न का फलादेश ५२७
मकर लग्न में ७ शुक्र और बड़ी भारी कार्य कुशलता क योग से विशेष सफलता प्राप्त करेगा और पिता स्थान की शक्ति ११ ९ का सुन्दर सहयोग मिलेगा तथा विद्या की योग्यता १२ १० ८ शक्ति से गृहस्थ का उत्तम आनन्द पायेगा और
१ ७ संतान पक्ष में सहायक सुख शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शनि की २ ४ शू. ६ मकर राशि में देख रहा है; इसलिये देह में सन्दरता ३ ५ और ज्ञान पायेगा तथा राज-समाज के पक्ष से नं. १०३९ इज्जत और उन्नति एवं गौरव पायेगा। मकर लग्न में ८ शुक्र यदि सिंक का शुक्र- मृत्यु एवं पुरातत्त्व स्थान
११ में सूर्य की राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की ९ शक्ति का कष्टप्रद योग पायेगा और संतान पक्ष से १२ १० ८ भी दुःख अनुभव करेगा तथा विद्या स्थान की १ ७ कुछ कमजोरी रहेगी और राज-समाज में मान प्रतिष्ठा की कमी होगी तथा कारबार के लिये २ ४ ६ विदेश का योग रहेगा और आयु के पक्ष में शक्ति ३ ५ शु.
नं. १०४० मिलेगी तथा पुरातत्त्व शक्ति का लाभ रहेगा तथा गूढ़ युक्तियों के बल और परिश्रम से उन्नति का मार्ग बनायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन की कुछ वृद्धि कर सकेगा और कुटुम्ब की शक्ति का योग प्राप्त करेगा। मकर लग्न में ९ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में नीच का होकर मित्र बुध ११ ९ १२ की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उन्नति के मार्ग १० ८ में कुछ कमजोरी रहेगी तथा धर्म का पालन ठीक १ ७ रूप से नहीं हो सकेगा और पिता की तरफ से अधूरा सुख रहेगा तथा विद्या के पक्ष में थोड़ी २ ४ ६शु. कमी के साथ चतुराई द्वारा सफलता रहेगी और ३ ५ संतान पक्ष में कुछ दुःख-सुख के योग से शक्ति नं. १०४१ मिलेगी तथा राज-समाज में सामान्य रूप से ज्ञान प्राप्त होगा और कारबार के पक्ष में कुछ कमजोरी के साथ सहारा मिलेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की विशेष शक्ति रहेगी और पुरुषार्थ कर्म एवं हिम्मत की शक्ति से सफलता पायेगा। यदि तुला का शुक्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी
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५२८ भृगु संहिता मकर लग्न में १० शुक्र राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो राज-समाज में बड़ा भारी प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा बुद्धि ११ ९ और चतुराई से उन्नति के विशेष कारण मिलेंगे १२ १० ८ और राजकीय विद्या की उत्तम शक्ति मिलेगी तथा १ ७ शु वाणी के द्वारा न्याय और हुकूमत्त की बातें करेगा तथा पिता स्थान की महत्वदायक शक्ति मिलेगी २ ४ ६ और संतान पक्ष में बड़ा भारी गौरव रहेगा तथा ३ ५ सातवीं दृष्टि में माता एवं भूमि स्थान को देख रहा नं. १०४२ है, इसलिये माता की शक्ति मिलेगी तथा भूमि मकानादि की शक्ति का सुख रहेगा और घरेलू वातावरण में बड़ा आनन्द और वैभव प्राप्त होगा। मकर लग्न में ११ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान
११ में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ९ ८शु आमदनी के स्थान में विशेष शक्ति का लाभ पायेगा १२ तथा महान् चतुराई के उत्तम कर्म में बड़ी सफलता १ ७ मिलेगी और राज-समाज में मान और लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान २ ४ ६ को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख ३ ५ नं. १०४३ रहा है, इसलिये विद्या की विशेष शक्ति रहेगी तथा बुद्धि योग के द्वारा बहुत धन पैदा करेगा और संतान पक्ष में उत्तम शक्ति का लाभ रहेगा तथा वाणी की योग्यता के द्वारा बड़ा आदर और मान तथा हुकूमत एवं प्रभाव और लाभ की शक्ति रहेगी। मकर लग्न में १२ शुक्र यदि धनु राशि का शुक्र- बारहवें खर्च सामान्य ११ ९श. शत्रु गुरु की धनु राशि पर बैठा है तो खर्चा बहुत १२ १० अधिक लरेगा और बाहरी स्थानों से उत्तम सम्बन्ध ८ पायेगा। किन्तु व्यय स्थान में बैठने के दोष के १ ७ कारण से पिता के पक्ष में हानि व कमी रहेगी तथा संतान पक्ष में कष्ट और परेशानी के कारण २ ४ ६ पायेगा और विद्या स्धान में बड़ी कमजोरी रहेगी ३
नं. १०४४ तथा दिमाग में परेशानी रहेगी और राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा की कमी रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी चतुराई के योग से काम निकालेगा और उन्नति के मार्ग में विलम्ब से सफलता मिलेगी।
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मकर लग्न का फलादेश ५२९ धन, कुटुम्ब, देहस्थानपति-शनि मकर लग्न में १ शनि यदि मकर का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह में ११ ९ सुन्दरता और इज्जत प्राप्त करेगा तथा धन और १२ १० श. ८ जन का सुन्दर योग पायेगा और कुटुम्ब का सहारा १ ७ मिलेगा तथा देह में स्वाभिमान प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान २ ४ ६ को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये ३ ५ भाई-बहिन के पक्ष में कुछ नीरसता पायेगा और नं. १०४५ पराक्रम स्थान में कुछ शक्ति पायेगा तथा हिम्मत से काम करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता युक्त रूप से शक्ति मिलेगी और रोजगार के मार्ग में उन्नति करने के लिए बराबर ध्यान रखेगा तथा दसवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में शक्ति से उन्नति पायेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा रहेगी और कारबार के मार्ग में उन्नति करेगा तथा धन संग्रह करेगा और धनवान् माना जायेगा। मकर लग्न में २ शनि यदि कुम्भ का शनि- दूसरे धन एवं कुटुम्ब
११श स्थान में अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन ९ १२ की संग्रह शक्ति का स्थिर योग प्राप्त करेगा और १० ८ कुटुम्ब की शक्ति का लाभ पायेगा तथा धन का १ ७ स्थान कुछ बन्धन का कार्य करता है, इसलिये २ देह के सुख सम्बन्ध और शान्ति में कमी रहेगी ४ ६ तथा तीसरी नीच दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान ३ 4 नं. १०४६ को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख में कमी और कुछ परेशानी के कारण पायेगा तथा भूमि और मकानादि के सुख सम्बन्ध में कमजोरी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये पुरातत्व शक्ति में कुछ नीरसता रहेगी और आयु तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानी-सी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ कठिनाई के योग से विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और धन की वृद्धि करने के लिए महान् साधना करेगा और बड़ी इज्जत. पायेगा तथा स्वार्थ युक्त रहेगा। भृ. सं .- ३४
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५३० भृगु संहिता मकर लग्न में ३ शनि यदि मीन का शनि- तीसरे पराक्रम एवं भाई- बहिन के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है ११ १२ तो भाई-बहिन के पक्ष में कुछ परेशानी और शक्ति श. ८ रहेगी और तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली १ ७ फल का दाता हो जाता है, इसलिये देह और बाहुबल की शक्ति में वृद्धि रहेगी तथा हिम्मत के २ ४ ६ द्वारा बहुत कार्य करेगा और प्रभाव प्राप्त करेगा ३ ५ नं. १०४७ तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा धन की शक्ति पायेगा और कुटुम्ब की शक्ति रहेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान की शक्ति मिलेगी और विद्या स्थान में बहुत उन्नति एवं सफलता पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्मस्थान को सुख की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म के पालन का ध्यान रखेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत करेगा तथा खर्च के मार्ग में एवं बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ परेशानी के समय शक्ति पायेगा और बाहर के स्थानों में कुछ हानि-लाभ का बोझ प्राप्त करेगा। मकर लग्न में ४ शनि यदि मेष का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं ११ भूमि के स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की ९ १२ ८ राशि पर बैठा है तो माता के पक्ष में कुछ त्रुटि १० रहेगी और भूमि-मकानादि के कुछ सम्बन्धों में १ श. ७ कुछ कमी अनुभव होगी तथा देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य में कुछ न्यूनता रहेगी और सम्पत्ति २ ४ ६ की कुछ कमी के कारण से परेशानी होगी तथा ३ ५ नं. १०४८ कुटुम्ब के सुख में कुछ कमी रहेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा और झगड़े-झंझटों में लाभ रहेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की मान प्रतिष्ठा रहेगी तथा दसवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में कुछ सुन्दरता रहेगी तथा आत्मबल के योग पायेगा और धन के पक्ष में शक्ति संग्रह करने का बड़ा भारी ध्यान रखेगा। यदि वृषभ का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में बड़ी शक्ति रहेगी और बुद्धि तथा वाणी के द्वारा बड़ी कीमती बातें कहेगा तथा संतान पक्ष में विशेष
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मकर लग्न में ५ शनि शक्ति पायेगा और देह के अन्दर सुन्दरता और योग्यता को प्राप्त करेगा तथा स्वाभिमानी ११ ९ विचारवान् तथा स्थाई युक्त रहेगा और तीसरी १२ १० ८ शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान जो चन्द्रमा ७ की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में OV कुछ नीरसता युक्त भावना होते हुए भी विशेष २श ४ ६ आशक्ति रहेगी और रोजगार के मार्ग में कुछ ३ 4 त्रुटियुक्त शक्ति रहेगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से नं. १०४९ आमद के स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के पक्ष में कुछ परेशानी का अनुभव करके लाभ पायेगा और दसवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिए बुद्धियोग द्वारा धन की वृद्धि करेगा और कुटुम्ब एवं सन्तान पक्ष से लाभयुक्त रहेगा तथा धन-जन की उन्नति के कारण से मान प्रभाव और इज्जत पायेगा। मकर लग्न में ६ शनि यदि मिथुन का शनि- छठें शत्रु स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के पक्ष में कुछ ११ स्वास्थ्य और सुन्दरता की थोड़ी कमी रहेगी और १२ १० ८ धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी १ रहेगी और कुटुम्ब की शक्ति में कुछ विरोध रहेगा तथा देह से कुछ परिश्रम करना पड़ेगा किन्तु छठे २ ४ ६ ३ श. स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो ५ जाता है, इसलिये देह के कार्य से प्रभाव की नं. १०५० शक्ति और इज्जत प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय और सफलता पायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से आयु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में कुछ नीरसता रहेगी और पुरातत्व का थोड़ा लाभ रहेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के पक्ष में कुछ थोड़ी सी परेशानी से अधिक खर्च होगा तथा बाहरी स्थानों का सम्बन्ध रखेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में कुछ वैमनस्यता या कुछ कमी रहेगी और पुरुषार्थ के पक्ष में विशेष उद्यमी बनेगा। यदि कर्क का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो कुछ मतभेद के सहित स्त्री पक्ष में आत्मीयता एवं शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के पक्ष में कुछ परिश्रम के सहित उन्नति पायेगा और धन पैदा करेगा तथा कुटुम्ब के सम्बन्ध में कुछ शक्ति
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५३२ भृगु संहिता मकर लग्न में ७ शनि मिलेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, ११ ९ १२ इसलिए भाग्य की उन्नति करेगा और धर्म का १० कुछ ध्यान रखेगा तथा सातवीं दृष्टि से देह के १ ७ स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और स्वाभिमान २ ४ श. ६ प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्ध से तथा रोजगार ३ ५ के पक्ष से मन-सम्मान और प्रभाव इत्यादि की नं. १०५१ शक्ति प्राप्त करेगा तथा दसवीं नीच दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों की हानि और कमी रहेगी तथा भूमि मकानादि की शक्ति में बड़ी कमजोरी रहेगी और मातृ-भूमि में कुछ अशान्ति रहेगी। मकर लग्न में ८ शनि यदि सिंह का शनि- आठवें मृत्यु एवं आयु ११ स्थान में तथा पुरातत्व स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह ९ १२ १० ८ राशि पर बैठा है तो देह के स्थान में बड़ी परेशानी रहेगी ओर सुन्दरता तथा स्वास्थ्य में कमजोरी १ ७ रहेगी और जन-धन के सम्बन्धों से भी परेशानी २ ६ बनेगी। किन्तु आठवें स्थान पर शनि आयु की ४ ३ ५ श. वृद्धि का द्योतक है, इसलिये आयु में शक्ति प्राप्त नं. १०५२ होगी और पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ मिलेगा तथा तीसरी उच्च दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष में शक्ति मिलेगी तथा राज-समाज में कुछ मान प्राप्त करेगा और उन्नति पाने के लिये विशेष कर्म करेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन और कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की शक्ति का कुछ सहयोग पायेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिए विद्या एवं सन्तान पक्ष में शक्ति रहेगी और बुद्धि में तेजी रहेगी। यदि कन्या का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो भाग्य की उत्तम शक्ति मिलेगी और भाग्य की शक्ति एवं देह के कर्म से धन की विशेष शक्ति प्राप्ति होगी तथा देह में प्रभाव और मान प्राप्त करेगा तथा धर्म का पालन करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सुन्दर योग पायेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ी-सी परेशानी से आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति मिलेगी तथा
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मकर लग्न का फलादेश ५३३
मकर लग्न में ९ शनि अधिक नफा खायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को गुरु की मीन राशि में ११ ९ देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ १२ १० ८ नीरसतायुक्त सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम स्थान में
१ ७ शक्ति तथा हिम्मत रखेगा और भाग्य तथा पुरुषार्थ दोनों को ही बड़ा मानेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से २ ४ ६ श. शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि देख रहा है, ३ ५ इसलिये शत्रु पक्ष में धन और जन की शक्ति से नं. १०५३ प्रभाव और लाभ पायेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी सावधानी के साथ सफलता प्राप्त करेगा। मकर लग्न में १० शनि यदि तुला का शनि- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की ११ राशि पर बैठा है तो देह में सुन्दरता एवं प्रभाव की १२ १० ८ विशेष शक्ति पायेगा और राज-समाज के अन्दर १ ७ श. उत्तम कर्म के द्वारा बड़ा मान-सम्मान प्राप्त करेगा और धन की उत्तम शक्ति पायेगा तथा कुटुम्ब का २ ४ ६ विशेष योग प्राप्त करेगा और किसी बड़े कारबार ३ ५ के द्वारा उन्नति का योग बनेगा तथा सातवीं नीच नं. १०५४ दृष्टि से माता एवं भूमि और भूमि के सुख सम्बन्धों में कमी रहेगी और घरेलू वातावरण में कुछ अशान्ति रहेगी तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष के सुख में कुछ कमी युक्त सहयोग रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ थोड़ी परेशानी के द्वारा शक्ति रहेगी। यदि वृश्चिक का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर मकर लग्न में ११ शनि बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह तथा गरम ग्रह विशेष शक्तिशाली फल का दाता होता है, ११ ९ इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता १२ १० ८श शक्ति पायेगा तथा बहुत धन प्राप्त करेगा और १ 19 कुटुम्ब का सहयोग प्राप्त करेगा और तीसरी दृष्टि से देह स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र २ ४ ६ को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और ३ ५ आत्मबल पायेगा और नाम तथा इज्जत प्राप्त नं. १०५५ करेगा तथा धन संचय का सदैव ध्यान रखेगा
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५३४ भृगु संहिता और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये संतान शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा और विद्या स्थान में बड़ी कीमती शक्ति प्राप्त करेगा तथा बातचीत के अन्दर बड़ी योग्यता के द्वारा स्वार्थ की सिद्धि करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये आयु के स्थान में कुछ फिकर रहेगी और जीवन की दिनचर्या में कुछ दौड़धूप करेगा तथा पुरातत्व शक्ति के लाभ का योग कुछ नीरसता से पायेगा। मकर लग्न में १२ शनि यदि धनु राशि का शनि-बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो ११ ९श. १२ धन का खर्चा विशेष करेगा और देह में दुर्बलता १० ८ रहेगी और बाहरी स्थनों में विशेष भ्रमण करेगा १ ७ तथा बाहरी स्थानों में विशेष शक्ति पायेगा और कुटुम्ब की तथा धन की कमजोरी रहेगी। किन्तु २ ४ ६ तीसरी दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं ३ ५ नं. १०५६ अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन को प्राप्त करने के लिये विशेष रूप से सदैव प्रयत्नशील रहेगा और कुटुम्ब की थोड़ी शक्ति रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ लाभप्रद रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म के पालन में भी कुछ ध्यान रखेगा तथा अपने व्यक्तित्व के अन्दर खर्च करने की सबसे प्रमुख शक्ति रखेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु मकर लग्न में १ राहु यदि मकर का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो देह के स्वास्थ्य ११ ९ और सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और कुछ गुप्त १२ १० रा. ८ चिन्ताओं का योग प्राप्त करेगा तथा देह में कभी- १ ७ कभी कोई विशेष बीमारी या चोट वगैरह का खास संकट पायेगा और गुप्त युक्ति के बल द्वारा २ ४ ६ प्रभाव और मान की शक्ति प्राप्त होगी तथा ३ ५ हृदयबल की शक्ति के द्वारा बड़ी गहरी उन्नति का नं. १०५७ मार्ग खोजेगा और प्रयत्न करता रहेगा सो दिक्कतों से टकरा-टकरा कर अन्त में अपनी गहरी मजबूती के ढंग स्थापित करेगा
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और बड़ा सावधान रहेगा। मकर लग्न में २ राहु यदि कुम्भ का राहु-दूसरे धन भवन में एक
११रा ९ कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो धन के स्थान में कुछ चिन्तायें प्राप्त करेगा १२ १० ८ और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ कष्ट और कमी रहेगी १ ७ तथा गुप्त युक्ति के बल से धन की वृद्धि का कारण बनता रहेगा किन्तु मजबूत स्थिर ग्रह की २ ४ ६ राशि पर बैठा है, इसलिये आन्तरिक धैर्य की ३
नं. १०५८ शक्ति तथा मजबूत विचारों से धन की प्राप्ति करेगा और कभी-कभी धन के मार्ग में कर्जा लेकर भी काम करेगा और धन के पक्ष में प्रकट रूप से इज्जत प्राप्त करेगा किन्तु आन्तरिक रूप में धन की तरफ से कुछ कष्ट रहेगा और अन्त में धन की तरफ से मजबूती पायेगा। मकर लग्न में ३ राहु यदि मीन का राहु- तीसरे भाई एवं पराक्रम
११ स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो तीसरे १२ ८ स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली कार्य करता है, रा १० इसलिये पराक्रम स्थान की शक्ति में वृद्धि करेगा १ ७ तथा बड़ी जबरदस्त हिम्मत की शक्ति से काम
२ करेगा। किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण ४ ६ भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कष्ट और चिन्ता के ३ ५
नं. १०५९ कारण प्राप्त करेगा तथा आचार्य देवगुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये गहरी और गुप्त युक्तियों को बड़े आदर्श मार्ग से उठाकर शक्ति संचित करेगा तथा प्रभाव पायेगा। किन्तु अन्दरूनी तौर से हिम्मत शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी मानेगा और प्रकट में विजयी रहेगा। मकर लग्न में ४ राहु यदि मेष का राहु- चाथे केन्द्र माता एवं भूमि
११ के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो गरम ९ १२ ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये माता १० ८ के सुख सम्बन्धों में बड़ी परेशानी एवं कष्ट का १ रा. कारण प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि की शक्ति
२ में सुख की कमी रहेगी और घरेलू वातावरण के ४ ६ अन्दर कभी-कभी अशान्ति के कारण प्राप्त होते m ५ नं. १०६० रहेंगे एवं मातृ भूमि के स्थान से प्राप्त अलहदा रहने के योग पायेगा और गुप्त युक्तियों के मार्ग से अन्त में बड़ी मजबूती के साथ सुख के साधन प्राप्त करेगा और हिम्मत रखेगा।
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५३६ भृगु संहिता मकर लग्न में ५ राहु यदि वृषभ का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा ११ ९ है तो सन्तान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा तथा १२ १० ८ विद्या ग्रहण करने के सम्बन्ध में कुछ परेशानी १ रहेगी किन्तु महान् चतुर ग्रह आचार्य शुक्र की राशि बैठा है, इसलिए विद्या बुद्धि के अन्दर चतुराई २रा. ४ ६ के विशेष कारण रहेंगे और गुप्त युक्तियों की ३ 4 गहराई के द्वारा बातें करके दिमागी शक्ति का नं. १०६१ प्रभाव रखेगा विशेष परेशानी के कारण पायेगा और अन्त में सन्तान पक्ष और विद्या के पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा। मकर लग्न में ६ राहु यदि मिथुन का राहु- छठे शत्रु स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की राशि पर बैंठा है तो शत्रु ११ ९ स्थान में बड़ा जबरदस्त प्रभाव रखेगा और बड़ी १२ १० ८ से बड़ी दिक्कतों एवं झंझटों के मार्ग में बड़ी १ ७ दिलेरी के साथ कामयाबी प्राप्त करेगा, क्योंकि छठें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का २ ४ ६ दाता बन जाता है, इसलिये गुप्त युक्ति के गहरे ३ रा. ५ बल से बड़ी भारी विजय और ऊँची सफलता नं. १०६२ प्राप्त करेगा और बड़ा भारी कूटनीतिज्ञ व बहादुर बनेगा तथा रोगादिक बीमारियों के पक्ष में प्रायः मुक्त रहेगा और परम विवेकी बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये हमेशा गहरे विवेक की शक्ति से काम लेगा। मकर लग्न में ७ राहु यदि कर्क का राहु-सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि ११ ९ पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में महान् कष्ट प्राप्त करेगा १२ १० ८ और रोजगार के पक्ष में विशेष कठिनाईयाँ रहेंगी १ ७ तथा गृहस्थ के संचालन मार्ग में चिन्ताओं से टकराना पड़ेगा तथा कभी मूत्रेन्द्रिय की बीमारी २ ४ रा. ६ का योग बनेगा और चन्द्रमा मन का स्वामी है, ३ ५ इसलिये रोजगार और स्त्री के पक्ष में मनोयोग नं. १०६३ की गुप्त युक्तियों के बल से अपने कार्य की सफलता बनायेगा, किन्तु कुछ मानसिक दुःख रहेगा। यदि सिंह का राहु- आठवें आयु स्थान एवं पुरातत्व स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो आयु के सम्बन्ध में बड़ी-बड़ी जबरदस्त चिन्ताओं से टकराना पड़ेगा तथा कभी-कभी जीवन रक्षा के लाले पड़
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मकर लग्न का फलादेश ५३७
मकर लग्न में ८ राहु जायेंगे और पुरातत्व शक्ति की हानि प्राप्त होगी तथा अष्टम स्थान से उदर और गुदा का भी सम्बन्ध ११ ९ रहता है, इसलिये उदर या गुदा में कोई बीमारी १२ १० ८ या परेशानी रहेगी तथा जीवन के निर्वाह के सम्बन्ध १ ७ में फिकर और कष्ट का अनुभव होगा, गुप्त युक्तियों के बल से समय का संचालन होता रहेगा, किन्तु २ ४ ६ दिनचर्या में प्रकट रूप में कुछ प्रभाव रहेगा क्योंकि ३ ५ रा.
नं. १०६४ सूर्य की राशि पर बैठा है।
मकर लग्न में ९ राहु यदि कन्या का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में मित्र बुध राशि पर स्वक्षेत्र के समान ११ ९ बैठा है तो राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण १० भाग्य स्थान में चिन्तायें प्राप्त होंगी और बड़े V १२ कठिन एवं कष्ट साध्य मार्ग से भाग्य की उन्नति १ ७ प्राप्त होगी और विवेकी बुध की राशि पर बैठा २ ४ दरा. है, इसलिये गुप्त विवेक की गहरी शक्ति के द्वारा ३ ५ भाग्य का विकास प्राप्त करेगा, फिर भी कभी- नं. १०६५ कभी भाग्य के सम्बन्ध में विशेष परेशानियों से टकराना पड़ेगा और धर्म के पालन में प्रकट रूप से शक्ति रहेगी और अन्दरूनी कुछ कमजोरी रहेगी तथा भाग्य के अन्दर भी कुछ कमी अनुभव होगी। मकर लग्न में १० राहु यदि तुला का राहु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो ११ पिता के स्थान में कुछ चिन्तायें प्राप्त करेगा तथा १२ १० ८ राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ परेशानियों के १ ७ रा. द्वारा मान प्राप्त करेगा और कारबार की उन्नति के मार्ग में बड़ी-बड़ी कठिनाईयों का योग बनेगा २ ४ ६ किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा ३ ५
नं. १०६६ है, इसलिये बड़ी गुप्त चतुराइयों के योग से विकास के साधन प्राप्त करेगा और कभी-कभी राज- समाज एवं कारबार के पक्ष में बड़ा संकट पायेगा, किन्तु फिर युक्ति के बल से पुनः सुधार पायेगा और सम्पन्न रहेगा। यदि वृश्चिक का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह शुभ फल का संधाता हो जाता है और
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५३८ भृगु संहिता मकर लग्न में ११ राहु गरम ग्रह के बैठने से यह विशेषता रहेगी कि आमदनी के मार्ग में साहस के साथ बहुत भारी ११ ९ १२ प्रयत्न करके लाभ की अधिक वृद्धि पायेगा और १० ८ रा. अधिक नफा खायेगा तथा कुछ गुप्त युक्ति के १ ७ बल से भी विशेष लाभ प्राप्त करेगा किन्तु राहु के स्वाभाविक गुण के कारण आमदनी के मार्ग २ ४ ६ में कुछ परेशानी एवं कष्ट का योग प्राप्त करेगा ३ 4
नं. १०६७ कभी-कभी लाभ के मार्ग विशेष दुःख-सुख प्राप्त होगा। मकर लग्न में १२ राहु यदि धनु राशि का राहु- बारहवें खर्च स्थान.
११ एवं बाहरी स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की ९रा. १२ धनु राशि पर बैठा है तो खर्च के मार्ग में बड़ी १० ८ परेशानी और कमजोरी रहेगी तथा बाहरी स्थानों १ ७ के सम्बन्ध में कुछ दिक्कतें और कष्ट के कारण पैदा होंगे तथा खर्च के संचालन कार्य क्षेत्र में २ ४ ६ अति गुप्त युक्ति के द्वारा शक्ति प्राप्त करेगा और ३ 4 नं. १०६८ कभी-कभी खर्च के स्थान में भयंकर चिन्ता का योग पैदा होगा; किन्तु देवगुरु वृहस्पति की राशि पर नीच का बैठा है, इसलिये खर्च की शक्ति को पाने के लिये जो लघु कर्म और कठिन प्रयास करना होगा उसका प्रकट रूप उतना बुरा प्रतीत नहीं होगा अर्थात् दिखावा कुछ ठीक रहेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु मकर लग्न में १ केतु यदि मकर का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो देह की ११ सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और स्वास्थ्य के सम्बन्ध १२ १० के. ८ में कुछ कमजोरी या परेशानी रहेगी तथा कभी- १ ७ कभी देह के ऊपर महान् संकट या भयंकर चोट का योग प्राप्त करेगा तथा अपने शरीर के अन्दर २ ४ ६ कुछ खास कमी का अनुभव होने के कारण कष्ट ३ ५ मानेगा; किन्तु गरम और जिद्दी शनि की राशि पर नं. १०६९ बैठा है; इसलिये बड़ी भारी तेजी रखेगा और जबरदस्त जिद्दबाजी का स्वभाव पायेगा और अपने व्यक्तित्व को ऊँचा करने के लिये एवं मान पाने के लिये किसी गुप्त शक्ति के बल का प्रयोग करेगा। यदि कुम्भ का केतु- द्वितीय धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र शनि की
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मकर लग्न का फलादेश ५३९
मकर लग्न में २ केतु राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति के अन्दर कमजोरी रहेगी तथा धन के पक्ष से कष्ट के कारण ११ के प्राप्त होंगे और धन की शक्ति पाने के लिए बड़ा १२ १० ८ कठिन कर्म करेगा और गुप्त शक्ति का प्रयोग करने से सफलता पायेगा, किन्तु केतु के १ ७ स्वाभाविक गुण के कारण, धन के पक्ष से कभी- २ ४ ६ कभी महान् संकट का गुप्त अनुभव करेगा, किन्तु ३ ५ स्थिर ग्रह शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये नं. १०७० बड़ी हिम्मत शक्ति से धन के पक्ष की पूर्ति करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कभी कमी और कष्ट के कारण प्राप्त होते रहेंगे, किन्तु सदैव महान् साहस से शक्ति पायेगा। यदि मीन का केतु- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में शत्रु गुरु की मकर लग्न में ३ केतु राशि पर बैठा है तो तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह का बैठना विशेष शक्ति का सूचक होता है, इसलिये ११ ९ १२ महान् कठिन परिश्रम और गुप्त युक्ति के बल से के १० ८ पुरुषार्थ स्थान को वृद्धि एवं शक्ति प्राप्त करेगा १ ७ और जबरदस्त हिम्मत से काम करके विजय पायेगा; किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण २ ४ ६ भाई-बहिन के स्थान में हानि और परेशानी के ३ ५ कारण प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी भाई-बहिन नं. १०७१ के पक्ष से या हिम्मत शक्ति के पक्ष से विशेष कष्ट या निराशा का योग गुप्त रूप से अनुभव करेगा प्रकट में धैर्य रहेगा। यदि मेष का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में शत्रु मंगल मकर लग्न में ४ केतु की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में कष्ट और कमी के कारण प्राप्त करेगा तथा भूमि ११ ९ १२ मकानादि से सुख-सम्बन्धों में कमी और परेशानियों १० के योग प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण में १ के. ७ कुछ अशान्ति रहेगी और भूमि से या जन्म स्थान
२ से अलहदगी का योग प्राप्त रहेगा और गरम ग्रह ४ ६ मंगल की राशि पर गरम ग्रह केतु बैठा है, इसलिये ३ ५ नं. १०७२ सुख के साधनों को पाने के लिये कठिन कर्म करेगा तथा गुप्त शीक्त के बल से सफलता प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण स्थान परिवर्तन करना पडेगा। यदि वृषभ का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कष्ट का योग पायेगा तथा
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५४० भृगु संहिता मकर लग्न में ५ केतु संतान पक्ष में कुछ कमी एवं कुछ परेशानी रहेगी तथा विद्या ग्रहण करने में कुछ परेशानियाँ रहेंगी ११ ९ और विद्या के पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा दिमाग १२ १० ८ और बुद्धि के अन्दर कुछ चिन्ता फिकर का गुप्त १ योग प्राप्त करेगा तथा विद्या बुद्धि की उन्नति करने के लिये कठिन परिश्रम और गुप्त शक्ति के २के ४ द्वारा सफलता प्राप्त करेगा और चतुर ग्रह आचार्य ३ ५ नं. १०७३ शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बुद्धि के
प्रकट में कुछ रूखापन रहेगा। अन्दर अन्दरूनी शक्ति और चतुराई रहेगी और
मकर लग्न में ६ केतु यदि मिथुन का केतु- छठे शत्रु स्थान में मित्र ११ बुध की राशि पर नीच का होकर बैठा है तो शत्रु १२ पक्ष के सम्बन्ध में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और १० छठें स्थान पर क्रूर ग्रह प्रभावशाली कर्म करता १ है, इसलिये शत्रु स्थान में गुप्त शक्ति के बल से प्रभाव पायेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय प्राप्त करने २ ४ ६ ३ क. के लिये कठिन कर्म तथा दौड़-धूप करेगा, किन्तु ५ नं. १०७४ विवेकी बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये विवेक शक्ति के गुप्त बल से झगड़े-झंझटों में कामयाबी पायेगा और केतु के स्वाभाविक गुण के कारण ननसाल पक्ष में हानि प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष से कभी-कभी महान् संकट का योग प्राप्त करने पर भी गुप्त धैर्य से काम करेगा। मकर लग्न में ७ केतु यदि कर्क का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं ११ रोजगार के स्थान में मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि १२ ८ पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में महान् संकट प्राप्त करेगा-और स्त्री गृहस्थ के कार्य में अनेकों बार १ ७ दिक्कतों से टकरा-टकराकर चलना पड़ेगा और रोजगार के स्थान में कष्ट, परेशानियाँ प्राप्त होंगी २ ४ के. ६ तथा केतु के स्वाभाविक गुण के कारण रोजगार ३ ५ नं. १०७५ के मार्ग में अनेकों प्रकार के परिवर्तन करने पड़ेंगे तथा रोजगार और गृहस्थ के संचालन विभाग में उन्नति पाने के लिये बड़ा कठिन परिश्रम और गुप्त युक्ति के बल से काम निकालेगा और बहुत सी परेशानियों के बाद तथा कुछ देर-अबेर से और कुछ कमी के योग से सफलता शक्ति पायेगा। यदि सिंह का केतु- आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में परमशत्रु सूर्य
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मकर लग्न में ८ केतु की राशि पर बैठा है तो आयु के स्थान में महान् संकट का योग प्राप्त करेगा अर्थात् जीवन की ११ रक्षा पाने के लिये अनेकों बार दुश्चिन्तायें प्राप्त १२ १० ८ होंगी और जीवन निर्वाह करने के लिये भी जीविका
१ ७ के मार्ग में बड़े कष्ट या परेशानियाँ बनेंगी और पुरातत्व की संचित शक्ति की हानि या अभाव २ ४ ६ रहेगा और उदर या पेट के निचले हिस्से में कुछ ३ ५ क. बीमारी रहेगी, किन्तु शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा नं. १०७६ है, इसलिये गुप्त में चिन्ता और प्रकट में प्रभाव रहेगा और जीवन की दिनचर्या को सुचारू रूप से व्यतीत करने के लिये गुप्त शक्ति और कठिन परिश्रम से काम करेगा। मकर लग्न में ९ केतु यदि कन्या का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र बुध की राशि पर ११ ९ स्वक्षेत्र के समान बैठा है तो केतु के स्वाभाविक १२ १० ८ गुण के कारण भाग्य स्थान में परेशानियाँ रहेंगी १ ७ किन्तु कन्या का राहु या केतु बलवान् होता है इसलिये भाग्य के प्रकट रूप में शक्ति और सुन्दरता २ ४ ६ के रहेगी तथा धर्म के पालन करने का ढंग रहेगा, ३ ५ किन्तु फिर भी कभी भाग्य के स्थान में विशेष नं. १०७७ संकट का योग प्राप्त करेगा, परन्तु विवेकी बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करने के लिये विवेक शक्ति के कठिन कर्म के द्वारा और गुप्त शक्ति के बल से सफलता शक्ति पायेगा और प्रकट में यश मिलेगा। मकर लग्न में १० केतु यदि तुला का केतु- दसम केन्द्र पिता एवं
११ राज्य स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो १२ पिता स्थान में कष्ट और कमी के कारण प्राप्त १० ८ होंगे तथा राज-समाज के पक्ष में कुछ दिक्कतें १ ७ के रहेंगी और कार्य-व्यापार की उन्नति के मार्ग में
२ बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी तथा कभी-कभी ४ ६ इज्जत-आबरू की रक्षा करने के लिये बड़ी ३ ५ नं. १०७८ मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये उन्नति प्राप्त करने के लिये तथा मान पाने के लिये बड़ी भारी गुप्त चतुराई की शक्ति के द्वारा कठिन परिश्रम करके सफलता पायेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक -
गुण के कारण उन्नति के मार्ग में बड़े-बड़े परिवर्तन करने पड़ेंगे।
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५४२ भृगु संहिता मकर लग्न में ११ केतु यदि वृश्चिक का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो आमदनी के ११ स्थान में क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता १२ १० ८के होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता १ ७ प्राप्त करेगा और अधिक से अधिक लाभ पाने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा तथा गरम ग्रह मंगल २ ४ ६ की राशि पर गरम ग्रह केतु बैठा है, इसलिये ३ ५ आमदनी के मार्ग में कठिन परिश्रम और गुप्त नं. १०७९ शक्ति के योग से काम लेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण आमदनी के मार्ग में कभी-कभी चिन्ता और कष्ट के साधन पायेगा, किन्तु बहुत शीघ्र सफलता शक्ति को प्राप्त करेगा, परन्तु गुप्त रूप से कुछ कमी अनुभव करेगा। मकर लग्न में १२ केतु यदि धन का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर ११ ९के. १२ बैठा है तो खर्च बहुत अधिक तायदाद में करेगा १० ८ और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में विशेष शक्ति १ ७ पायेगा तथा खर्च की बहुतायत के प्रवाह को रोक नहीं सकेगा; बल्कि खर्च अधिक मात्रा में २ ४ ६ चालू रखने के लिये महान् कठिन परिश्रम करेगा ३ ५
नं. १०८० और गुप्त शक्ति के महान् प्रयोग से खर्च संचालन 1 करने की महान् शक्ति प्राप्त करेगा और केतु के स्वाभाविक गुण के कारण खर्च के मार्ग में अथवा बाहरी सम्बन्धों के मार्ग में कोई विशेष परेशानी का योग प्राप्त करेगा; किन्तु विशेष सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी। । मकर लग्न समाप्त।।
११ १०
१२ ८
१ ७
२ ६
४ ३ ५
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५४३ कुम्भ लग्न का फलादेश प्रारम्भ
१२ ११ १०
१ ९
२ ८
३ ७
५ ४ ६
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० ११८८ तक में देखिये) प्रिय पाठकगण- ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० १०८१ से लेकर कुण्डली नं० ११८८ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन- जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले
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५४४ भृगु संहिता नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत, भविष्य एवं वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०८१ से १०९२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश
६. कुण्डली नं. १०८७ के अनुसार मालूम करिये। जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०८९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५४५ कुण्डली नं. १०९० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०९१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १०९२ के अनुसार मालूम करिये। (११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १०९३ से ११०४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १०९९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ११०० के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११०१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ११०२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. ११०३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश - भृ.सं .- ३५ 1 कुण्डली नं. ११०४ के अनुसार मालूम करिये।
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५४६ भृगु संहिता (११ ) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ११०५ से १११६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११०५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११०६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११०७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११०८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११०९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११११ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११२ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११६ के अनुसार मालूम करिये। (११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १११७ से ११२८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५४७ ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १९१७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में बुध, भीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १११९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२० के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११२८ के अनुसार मालूम करिये। (११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ११२९ से ११४० तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११२९ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३० के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३१ के अनुसार मालूम करिये।
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५४८ भृगु संहिता २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३२ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश। कुण्डली नं. ११३३ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३४ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३५ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३६ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३७ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३८ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११३९ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११४० के अनुसार मालूम करिये। (११ ) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ११४१ से ११५२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४१ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४२ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४३ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४४ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४५ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५४९ कुण्डली नं. ११४६ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४७ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४८ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११४९ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११५० के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११५१ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११५२ के अनुसार मालूम करिये। (११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ११५३ से ११६४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११५३ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११५४ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११५५ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११५६ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११५७ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११५८ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११५९ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६० के अनुसार मालूम करिये।
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५५० भृगु संहिता ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६१ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६२ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६३ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६४ के अनुसार मालूम करिये। (११ ) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ११६५ से ११७६तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६५ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६६ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६७ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६८ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११६९ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७० के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७१ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७२ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७३ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७४ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५५१ नं. ११७५ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७६ के अनुसार मालूम करिये। (११) कुम्भ लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ११७७ से ११८८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७७ के अनुसार मालूम करिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७८ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११७९ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८० के अनुसार मालूम करिये। - ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८१ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८२ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८३ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८४ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८५ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८६ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८७ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. ११८८ के अनुसार मालूम करिये।
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५५२ भृगु संहिता स्त्री, रोजगार, प्रभावस्थानपति-सूर्य कुम्भ लग्न में १ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो देह की १२ १० सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और स्वास्थ्य के सम्बन्ध १ ११ सू. ९ में भी कुछ कमजोरी रहेगी। किन्तु देह में प्रभाव २ ८ की शक्ति रहेगी और स्वभाव में तेजी रहेगी तथा गरम ग्रह की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये ३ ५ ७ दैनिक कार्य क्रम के अन्दर बड़ी भारी दौड़-धूप ४ ६ करता रहेगा और सातवीं दृष्टि से स्त्री एवं दैनिक नं. १०८१ रोजगार के स्थान को स्वयं अपनी सिंह राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा रोजगार के पक्ष में दैहिक कर्म के द्वारा विशेष सफलता शक्ति पायेगा और गृहस्थ की दिनचर्या में बड़ा प्रभाव प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में २ सूर्य यदि मीन का सूर्य- दूसरे धन एवं कुटुम्ब १२सू. १० स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग से धन की वृद्धि के साधन प्राप्त रहेंगे १ ११ ९ और धन के स्थान में प्रभाव की शक्ति मिलेगी २ ८ और कुटुम्ब के पक्ष में बड़ा सहारा एवं शक्ति ३ प्राप्त रहेगी। किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन ७ का-सा कार्य भी करता है, इसलिये स्त्री पक्ष में ४ ६ नं. १०८२ प्रभाव प्राप्त होने पर भी स्त्री के सुख सम्बन्धों में कोई खास कमी नहीं रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की शक्ति का सहारा मिलेगा और जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध में शक्ति और प्रभाव प्राप्त रहेगा। कुम्भ लग्न में ३ सूर्य यदि मेष का सूर्य- तीसरे भाई एवं पराक्रम १२ स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर १० १ सू. बैठा है तो तीसरे स्थान पर गरम ग्रह उच्च का हो ११ ९ जाने से महान् शक्तिशाली फल का दाता होता है, २ ८ इसलिये महान् पुरुषार्थ की शक्ति से काम करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति ३ ५ ७ प्राप्त करेगा तथा स्त्री स्थान में बड़ी सुन्दरता रहेगी ४ ६
नं. १०८३ और भाई-बहिन की प्रभाव शक्ति रहेगी तथा महान् हिम्मत, शक्ति के द्वारा उन्नति प्राप्त करेगा
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५५३ और सातवीं नीच दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य के अन्दर कुछ कमजोरी अनुभव करेगा और धर्म के पक्ष में कुछ लापरवाही रहेगी और सुयश एवं वरक्कत की कुछ कमी रहेगी। कुम्भ लग्न में ४ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के सुख स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर १२ १० बैठा है तो स्त्री पक्ष का सुख प्राप्त रहेगा और १ ११ ९ भूमि तथा माता की सहयोग शक्ति मिलेगी। किन्तु २ सू. ८ माता और स्त्री के पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता का अनुभव रहेगा और रोजगार के मार्ग में थोड़ी ३ ५ ७ परेशानी के साथ-साथ सुख और सफलता शक्ति ४ ६ प्राप्त रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं नं. १०८४ राज्य-स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से सफलता शक्ति मिलेगी और राज-समाज के पक्ष में मान-प्रतिष्ठा और प्रभाव रहेगा तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में दैनिक कर्म के योग से लाभ पायेगा। कुम्भ लग्न में ५ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १२ १० तो विद्या स्थान में शक्ति रहेगी और वाणी के १ ११ ९ अन्दर कुशलता और प्रभाव की शक्ति रहेगी तथा २ ८ संतान पक्ष में अनुकूल शक्ति का योग प्राप्त करेगा
३ सू. और बुद्धिमती स्त्री का संयोग एवं प्रभाव प्राप्त ५ ७ करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बुद्धि विद्या की ४ ६
नं. १०८५ शक्ति के योग से सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार और बुद्धि के योग से आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त रहेगी और लाभ प्राप्ति के पक्ष से प्रभाव प्राप्त रहेगा। कुम्भ लग्न में ६ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- छठें शत्रु स्थान में मित्र १२ १० चन्द्र की कर्क राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में १ ११ बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों ९ के मार्ग से विकास का साधन पायेगा तथा रोजगार २ ८ के पक्ष में कुछ परेशानी के योग से सफलता और ३ ५ ७ प्रभाव शक्ति मिलेगी तथा स्त्री के सम्बन्ध में कुछ ४ सू. ६ मतभेद और प्रभाव शक्ति रहेगी तथा प्रभाव के नं. १०८६ मार्ग से ही रोजगार और गृहस्थ का संचालन करेगा
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५५४ भृगु संहिता और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों के पक्ष में कुछ दिक्कतों के योग से प्रभाव और सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ७ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं १२ रोजगार के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १० बैठा है तो स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति और प्रभाव १ ११ ९ प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी २ सफलता शक्ति मिलेगी और गृहस्थ के संचालन V
५ सू विभाग के अन्दर बड़ा भारी प्रभाव रहेगा तथा ३ ७ ससुराल पक्ष में विशेष शक्ति रहेगी तथा सातवीं ४ ६
नं. १०८७ शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और स्त्री पक्ष के मार्ग में कुछ मतभेद होने के कारण परेशानी का योग अनुभव रहेगा, किन्तु गृहस्थ जीवन और रोजगार के पक्ष से प्रभाव युक्त रहेगा। कुम्भ लग्न में ८ सूर्य यदि कन्या का सूर्य-आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व १२ स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री १०
१ ९ स्थान में कष्ट एवं परेशानी के कारण प्राप्त करेगा ११ और रोजगार के मार्ग में बड़ी-बड़ी कठिनाई और २ ८ दिक्कतों के योग से कार्य करेगा तथा दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से रोजगार की संचालन शक्ति पायेगा ३ ५ ७ और पुरातत्व सम्बन्ध में शक्ति और प्रभाव प्राप्त ४ ६ सू. नं. १०८८ करेगा तथा आयु के पक्ष में सुन्दर सहयोग मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार के लिए कठिन परिश्रम से धन की वृद्धि करेगा तथा कुटुम्ब का सहयोग मिलेगा। कुम्भ लग्न में ९ सूर्य यदि तुला का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य १२ १० स्थान एवं धर्म स्थान में नीच का होकर रवि शुक्र
१ ११ की तुला राशि पर बैठा है तो भाग्य के पक्ष में ९ कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा स्त्री के सम्बन्ध २ ८ में कुछ परेशानी रहेगी और रोजगार के मार्ग में बड़ी कमजोरी के साथ कार्य संचालन करेगा ३ ५ ७ सू. और धर्म के पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा कुछ ६
नं. १०८९ न्याय विरूद्ध रूप से स्वार्थ सिद्ध करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५५५ मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा और पुरुषार्थ की उन्नति करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत शक्ति के द्वारा सफलता शक्ति का योग प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में १० सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- दशम केन्द्र पिता एवं राजस्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो १२ १० रोजगार के मार्ग में महान् उन्नति और प्रभाव प्राप्त १ ११ ९ करेगा और स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति एवं सुन्दरता
२ ८ सू. तथा बड़प्पन प्राप्त करेगा और पिता के सम्बन्ध में सहायता शक्ति रहेगी तथा राज-समाज में मान ३ ५ ७ प्रतिष्ठा बनेगी और प्रभाव शक्ति के द्वारा कारबार ४ ६ की उन्नति करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से माता नं. १०९० एवं भूमि के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये गृहस्थ के सम्बन्ध में मातृ सुख के अन्दर कुछ नीरसता रहेगी और भूमि के सुख में कुछ कमी रहेगी। कुम्भ लग्न में ११ सूर्य यदि धनु राशि का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान
१२ १० में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो रोजगार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता-शक्ति प्राप्त करेगा १ ११ ९सू और ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह विशेष लाभकारी २ ८ होता है; इसलिये आमदनी के पक्ष में विशेष लाभ पायेगा और अधिक मुनाफा करेगा। स्त्री पक्ष में ३ ५ ७ बहुत लाभ रहेगा और स्त्री के अन्दर सुन्दरता और ४ ६ नं. १०९१ प्रभाव की शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि में विकास और प्रभाव पायेगा तथा संतान पक्ष में सहायक शक्ति प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में १२ सूर्य यदि मकर का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी
१२ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो खर्चा १०सू. अधिक करना पड़ेगा तथा खर्च के मार्ग में कुछ १ ११ ९ परेशानी-सी रहेगी तथा स्त्री के सुख सम्बन्धों में २ बड़ी भारी कमी और परेशानी रहेगी और बाहरी
३ स्थानों के सम्बन्ध में रोजगार की शक्ति मिलेगी ५ ७ किन्तु स्थानीय रोजगार के मार्ग में बड़ी हानि एवं ६ नं. १०९२ परेशानी रहेगी और गृहस्थ के मार्ग में बड़ी कठिनाई का योग मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव
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५५६ भृगु संहिता रहेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में कुछ सफलता का योग प्राप्त होगा। शत्रु, झंझट, मनःस्थानपति-चन्द्र कुम्भ लग्न में १ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष के १२ १० सम्बन्ध में प्रभाव शक्ति रखेगा तथा मनोयोग के १ ११ चं. ९ द्वारा अनेकों प्रकार की झंझटों पर विजय प्राप्त २ ८ करेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारणों से देह में कुछ रोग रहेगा तथा शत्रु पक्ष एवं कुछ ३ ५ ७ अन्य विघ्न बाधाओं के कारण कुछ परेशानी का ४ ६ भय और शक्ति का अनुभव होगा तथा सातवीं नं. १०९३ मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ मतभेद रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी या फिकर रहेगी। कुम्भ लग्न में २ चन्द्र यदि मीन का चन्द्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब १२चं १० स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो मनोयोग १ ११ के परिश्रम से धनोपार्जन करेगा तथा धन और ९ कुटुम्ब की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्नशील रहेगा २ V और कुछ झगड़े-झंझटों के मार्ग से धन की ३ ५ ७ सफलता का योग प्राप्त करेगा; किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से धन स्थान के सम्बन्ध में ४ ६ नं. १०९४ कुछ हानि या परेशानी का योग प्राप्त रहेगा और कुटुम्ब के स्थान में कुछ झंझट एवं कुछ वैमनस्य रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में एवं पुरातत्व में कुछ झंझटयुक्त वातावरण प्राप्त रहेगा। कुम्भ लग्न में ३ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम १२ १० स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो मन १ चं की पराक्रम शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष में विजय ११ ९ प्राप्त करेगा और मन के अन्दर बड़ा उत्साह रहेगा, २ ८ किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से भाई- बहिन के पक्ष में कुछ झंझट या वैमनस्यता रहेगा ३ ५ ७ और पुरुषार्थ एवं उन्नति के मार्ग में कुछ दिक्कतें ४ ६ रहेंगी और सातवीं दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की नं. १०९५ तुला राशि में भाग्य एवं धर्म स्थान को देख रहा
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५५७ है, इसलिये भाग्योन्नति के मार्ग में कुछ झंझटयुक्त कर्म से काम करेगा और धर्म के पक्ष में कुछ कठिन मार्ग का अनुसरण करेगा तथा प्रभाव की वृद्धि प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ४ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र १२ १० शुक्र की वृषभ राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में १ ११ ९ घर बैठे प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा और झगड़े- २ चं. ८ झंझटों के मार्ग से सुख के साधन पायेगा तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से माता के सुख ३ ५ ७ सम्बन्धों में कुछ दिक्कतें रहेगी; किन्तु उच्च का ४ ६ होने के कारण माता और भूमि के पक्ष में प्रभाव नं. १०९६ रहेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी एवं क्लेश का योग पायेगा और राज-समाज तथा कारबार पक्ष में कुछ झंझट रहेगी। कुम्भ लग्न में ५ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १२ १० तो बुद्धि और मनोयोग के द्वारा शत्रु पक्ष में प्रभाव १ ११ ९ रखेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से विद्या २ ८ ग्रहण करने में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और संतान
३चं पक्ष में कुछ झंझट एवं रोग और चिन्ता फिकर ५ ७ मिलेगी तथा विचारों के अन्दर मानंसिक परेशानी ४ ६ रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को नं. १०९७ गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा आमदनी की वृद्धि करेगा तथा अधिक लाभ पाने के लिये कुछ मनोयोग की पेचीदी तरकीबों से भी सफलेता पायेगा। कुम्भ लग्न में ६ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- छठें शत्रु स्थान एवं झंझट स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १२ १० बैठा है तो मनोयोग की महान् शक्ति के द्वारा शत्रु १ ११ ९ पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव एवं विजय प्राप्त करेगा २ ८ और झगड़े झंझटों के मार्ग में महान् धैर्य की शक्ति से काम लेगा तथा ननसाल पक्ष में शक्ति ३ ५ ७ रहेगी, किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से मन ४ चं. ६ के अन्दर हमेशा कुछ झगड़े तलब परेशानी की नं. १०९८ बातें रहेंगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से बाहरी स्थान
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५५८ भृगु संहिता को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के संचालन में कुछ दिक्कतों के योग से शक्ति रहेगी और बाहरी स्थानों में कुछ झंझट रहेगी। कुम्भ लग्न में ७ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं १२ रोजगार के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा १० है तो गृहस्थ एवं रोजगार की व्यावहारिक दिनचर्या १ ११ ९ के कारण शत्रु पक्ष में प्रभाव रहेगा, किन्तु षष्ठेश २ ८ होने के दोष कारण से स्त्री पक्ष में कुछ रोग तथा कुछ झंझट एवं वैमनस्यता युक्त वातावरण के ३ ५ चं. ७ द्वारा शक्ति प्राप्त रहेगी और रोजगार के मार्ग में ४ ६ कुछ मनोयोग की परिश्रम शक्ति के द्वारा तथा नं. १०९९ कुछ झंझट युक्त मार्ग के द्वारा सफलता पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ रोग तथा कुछ फिकर और दौड़ धूप का योग रहेगा तथा मन में शक्ति रहेगी। कुम्भ लग्न में ८ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- आठवें मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो शत्रु १२ १० पक्ष के मार्ग में बड़ी परेशानी अनुभव करेगा और १ ११ ९ प्रभाव के मार्ग में अन्दरूनी कमजोरी रहेगी तथा २ ८ षष्ठेश होने के दोष के कारण से जीवन की दिनचर्या में मानसिक चिन्ता फिकर रहेगी और आयु के ३ ७ स्थान में परेशानियाँ प्रतीत होंगी तथा पेट के अन्दर ४ ६ च. कोई बीमारी या शिकायत रहेगी तथा ननसाल पक्ष नं. ११०० कमजोर रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मीन राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन के कठिन परिश्रम से मनोयोग द्वारा धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये बड़ा प्रयत्न करता रहेगा। कुम्भ लग्न में ९ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य १२ एवं धर्म स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर १० बैठा है तो भाग्य की शक्ति और मनोयोग के १ ११ ९ कारण से शत्रु पक्ष में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा २ ८ झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ उन्नति पायेगा। ३ किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से भाग्य की ५ ७चं. उन्नति के मार्गं में कुछ परेशानियाँ या कुछ दिक्कतें ४ ६ रहेंगी और धर्म के पक्ष में कुछ रुकावटें एवं नं. ११०१ कमजोरी रहेगी और सुयश की कमी रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५५९ रहा है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में कुछ झंझट रहेगी और पराक्रम स्थान में मनोयोग की शक्ति से उत्साह प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में १० चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की १२ १० राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष की तरफ से मानसिक १ ११ ९ चिन्तायें और दिक्कतें रहेंगी तथा प्रभाव के पक्ष २ ८ चं, में कमजोरी रहेगी और षष्ठेश होने के दोष के कारण से पिता के पक्ष में कुछ कमी और वैमनस्यता ३ ५ ७ तथा अशान्ति के कारण प्राप्त होंगे और राज- ४ ६ समाज में मान-प्रतिष्ठा की कुछ कमजोरी रहेगी नं. ११०२ तथा उन्नति मार्ग एवं कारबार में रूकावटें और झंझटें रहेंगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से माता एवं भूमि-भवन तथा सुख स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये घरेलू वातावरण में मनोयोग से सुख प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ११ चन्द्र यदि धन का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में १२ १० प्रभाव रहेगा और शत्रु एवं झगड़े-झंझटों के मार्ग १ ११ ९ चं. से लाभ युक्त रहेगा तथा मनोयोग की परिश्रमी २ शक्ति के द्वारा आमदनी में बड़ी सफलता प्राप्त V करेगा और षष्ठेश होने के दोष के कारण से आमदनी ३ ५ ७ के पक्ष में कुछ दौड़ धूप या मानसिक परिश्रम ४ ६
नं. ११०३ अधिक करना पड़ेगा तथा लाभ की शक्ति में कुछ थोड़ा असन्तोष मानेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये मनोयोग के द्वारा विद्या स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में कुछ फिकरमंदी रहेगी। कुम्भ लग्न में १२ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु १२ १० चं. पक्ष की तरफ से हानि एवं कुछ मानसिक परेशानी १ ११ ९ रहेगी और प्रभाव की कुछ कमी रहेगी तथा षष्ठेश २ ८ होने के दोष कारण से खर्च के मार्ग में कुछ दिक्कतें और झंझट रहेंगी तथा मानसिक परिश्रम ३ ५ ७ से खर्च की शक्ति मिलेगी और बाहरी स्थानों के ४ सम्बन्ध में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और अनेक प्रकार नं. ११०४ के झंझटों से मन को कष्ट और अशान्ति रहेगी
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५६० भृगु संहिता तथा सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी कर्क राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये मनोयोग की नरम शक्ति से शत्रु पक्ष में प्रभाव और कामयाबी प्राप्त करेगा। पिता, राज्य, भाई, पराक्रमस्थानपति-मंगल कुम्भ लग्न में १ मंगल यदि कुम्भ का मंगल- प्रथम केन्द्र देह के १२ स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो कुछ १० थोड़ी-सी नीरसता के योग से पिता की उत्तम १ ११ मं. ९ शक्ति प्राप्त करेगा और राज-समाज में कुछ उत्तम २ ८ परिश्रम से सफलता शक्ति और मान-प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कारबार की उन्नति करेगा और भाई- ३ ५ ७ बहिन की शक्ति का अच्छा सहयोग प्राप्त करेगा ४ ६ तथा पराक्रम स्थान में सफलता शक्ति और उत्साह नं. ११०५ प्राप्त करेगा और अपने व्यक्तित्व एवं उन्नति के लिये सदैव ही प्रयत्नशील रहेगा तथा चौथी दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के साथ शक्ति प्राप्त रहेगी और भूमि मकानादि का अच्छा सहयोग रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष एवं रोजगार के पक्ष में शक्ति और मान प्राप्त होगा तथा आठवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति रहेगी और पुरातत्व का लाभ प्राप्त होगा। कुम्भ लग्न में २ मंगल यदि मीन का मंगल- दूसरे धन एवं कुटुम्ब १२मं. स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो उत्तम १० पराक्रम शक्ति के द्वारा धन की वृद्धि करेगा और १ ११ ९ उज्जत मिलेगी तथा राज समाज में मान प्राप्त २ ८ होगा, किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का सा कार्य करता है इसलिये भाई बहिन और पिता के ३ 4 ७ सुख सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और कुटुम्ब की ४ शक्ति मिलेगी और चौथी मित्र दृष्टि से विद्या एवं नं. ११०६ सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के अन्दर.राज-समाज की ज्ञान शक्ति और सन्तान पक्ष में सहयोग की शक्ति मिलेगी और वाणी में तेजी रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुंध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु एवं पुरातत्व सम्बन्ध में शक्ति मिलेगी तथाा
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५६१ जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा और आठवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, राज्येश ग्रह का भाग्य को देखना उत्तम होता है इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा और धर्म- कर्म का पालन करेगा और बरक्कत प्राप्त होगी। कुम्भ लग्न में ३ मंगल यदि मेष का मंगल-तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो १२ १० भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त रहेगी और पराक्रम १ मं. ११ ९ स्थान में महान् शक्ति मिलेगी तथा मंगल का २ ८ दसम स्थान पर अधिकार पाना महत्व दायक होता है, इसलिये यह आठवीं दृष्टि से राज्य एवं पिता ३ ५ ७ स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र ४ ६ को देख रहा है, अतः पिता स्थान की शक्ति का नं. ११०७ लाभ प्राप्त करेगा और राज-समाज के अन्दर बहुत उन्नति एवं प्रभाव और मान व प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में उन्नति, पुरुषार्थ तथा कर्म की शक्ति से बहुत सफलता पायेगा और चौथी नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ झंझट रहेगी तथा ननसाल पक्ष में कुछ हानि रहेगी और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म-कर्म का पालन करेगा और बड़ा जबरदस्त हिम्मत और कर्म की शक्ति से भाग्यवान् बनेगा। कुम्भ लग्न में ४ मंगल यदि वृषभ का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर १२ १० बैठा है तो कुछ त्रुटि के सहित माता और भूमि १ ११ ९ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा भाई बहिन का सुख २ मं. ८ योग रहेगा और पराक्रम शक्ति से सुख प्राप्त करेगा तथा घरेलू वातावरण मकानादि में प्रभाव शक्ति ३ ५ ७ रखेगा और चौथी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार ४ के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है नं. ११०८ इसलिये स्त्रीपक्ष में शक्ति प्राप्त होगी और रोजगार के मार्ग में पराक्रम शक्ति के द्वारा सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में राज्य एवं पिता स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति से सुख प्राप्त रेगा कारबार की उन्नति करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये कारबार एवं पराक्रम शक्ति के द्वारा आमदनी भृ. सं .- ३६
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५६२ भृगु संहिता की वृद्धि करेगा और अधिक नफा खायेगा। यह मंगल तीसरे दसवें का स्वामी होकर, दसवें और ग्यारहवें स्थान को देखने से विशेष महत्वदायक फल का दाता बन गया है। कुम्भ लग्न में ५ मंगल यदि मिथुन का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या १२ एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १० तो विद्या स्थान में राज-भाषा की शक्ति का उत्तम १ ११ ९ ज्ञान प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में शक्ति मिलेगी २ ८ तथा बुद्धि और वाणी में तेजी रहेगी और भाई ३मं. बहिन में बड़प्पन पायेगा तथा पिता की शक्ति 4 ७ का सहयोग प्राप्त करेगा एवं बुद्धि योग के द्वारा- ४ ६ समाज में मान और प्रभाव पायेगा तथा कारबार नं. ११०९ का सुचारू रूप से संचालन करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु पक्ष में शक्ति रहेगी और पुरातत्व शक्ति से फायदा उठायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धियोग के पुरुषार्थ कर्म से आमदनी के मार्ग में अच्छी सफलता प्राप्त करेगा। आठवीं उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का उत्तमोत्तम सम्बन्ध प्राप्त करेगा तथा कायदे- कानून से बातें करेगा। कुम्भ लग्न में ६ मंगल यदि कर्क का मंगल- छठें शत्रु एवं झंझट स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा की राशि १२ ६० पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में कुछ झंझटों एवं कुछ १ ११ ९ दिक्कतों से सफलता प्राप्त करेगा, क्योंकि छठें २ ८ स्थान पर गरम ग्रह तेज पड़ जाता है और भाई- बहिन पिता के पक्ष में कुछ वैमनस्यता युक्त सम्बन्ध ३ ५ ७ की शक्ति पायेगा और कुछ परतन्त्रतायुक्त कर्म ४ मं. ६ नं. १११० की शक्ति से पुरुषार्थ का विकास करेगा और राज-समाज के मार्ग में थोड़ा प्रभाव पायेगा और ननसाल पक्ष में कुछ कमी रहेगी तथा चौथी दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ कर्म के कठिन परिश्रम से भाग्य की उन्नति करेगा और कुछ धर्म का पालन करेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा और बाहरी स्थानों का विशेष सम्बन्ध रहेगा तथा आठवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५६३ की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी रखते हुए देह में प्रभाव की शक्ति रहेगी और स्वभाव में तेजी रहेगी। कुम्भ लग्न में ७ मंगल यदि सिंह का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा १२ १० है तो रोजगार के मार्ग में पुरुषार्थ के उत्तम कर्म १ ११ ९ के द्वारा बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा २ ८ और भाई-बहिन की शक्ति का सहयोग पायेगा तथा स्त्री पक्ष में विशेष शक्ति और उन्नति रहेगी ३ ५ मं. ७ और चौथी दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को ४ ६ स्वयं अपनी वृश्कि राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा नं. ११११ है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का सहयोग अच्छा रहेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में मान प्रतिष्ठा एवं उन्नति प्राप्त रहेगी तथा कारबार में सफलता और प्रभाव प्राप्त होगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ रीश में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी के साथ-साथ प्रभाव और मान प्राप्त होगा और आठवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये व्याहारिक दैनिक कर्म क्षेत्र के द्वारा धर्म की शीक्त प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सहयोग पायेगा। कुम्भ लग्न में ८ मंगल यदि कन्या का मंगल-आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १२ १० तो पिता स्थान में हानि एवं कमी पायेगा और १ ११ ९ राज-समाज में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा २ ८ उन्नति के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेगी और मान प्रतिष्ठा की कुछ कमजोरी रहेगी और भाई-बहिन ३ ५ ७ के स्थान एवं पुरुषार्थ में कुछ कमजोरी रहेगी ४ ६ मं. और दूसरे स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त करेगा नं. १११२ तथा चौथी मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करता रहेगा और कुटुम्ब की शीक्त का सहारा पायेगा तथा आठवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पुरुषार्थ शक्ति की वृद्धि करेगा। किन्तु अष्टम में बैठने के दोष कारण से भाई-बहिन और पुरुषार्थ शक्ति के अन्दर अधूरा शक्ति प्राप्त करेगा किन्तु पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा।
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५६४ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में ९ मंगल यदि तुला का मंगल- यदि तुला का मंगल नवम त्रिकोण, भाग्य एवं धर्म स्थान में सामान्य १२ १० शत्रु शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो भाग्य की १ ११ ९ विशेष उन्नति करेगा, क्योंकि भाग्य स्थानपति २ ८ कोई ग्रह राज्य में बैठा हो या राज्य स्थानपति कोई ग्रह भाग्य में बैठा हो तो विशेष उत्तम फल ३ ५ ७मं. का दाता होता है, इसलिये यह मंगल बड़ा ६ भाग्यशाली एवं धर्मात्मा बनायेगा और पिता की नं. १११३ शक्ति मिलेगी तथा राजसमाज से मान प्राप्त करेगा और कारबार के मार्ग में भाग्य शक्ति से उन्नति प्राप्त होगी तथा चौथी उच्च दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिये खर्चा बहुत अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों में विशेष शक्ति का सम्बन्ध प्राप्त होगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त होगी तथा पराक्रम स्थान में सफलता शक्ति मिलेगी तथा सतोगुणी कर्म के द्वारा हिम्मत शक्ति और यश मिलेगा तथा आठवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये उत्तम कर्म के द्वारा भूमि और घरेलू सुख के साधन मिलेंगे और माता की शक्ति का लाभ रहेगा तथा भाग्य और कर्म दोनों का अनुयायी बनेगा। कुम्भ लग्न में १० मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- दसम केन्द्र, पिता १२ एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १० बैठा है तो राज-समाज के अन्दर बड़ी भारी शक्ति १ ११ ९ और मान व प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा पिता की २ ८ मं. श्रेष्ठ शक्ति पायेगा और पुरुषार्थ कर्म की महानता से कारबार के पक्ष में बहुत उन्नति करेगा तथा ३ ५ ७ भाई-बहिन की शक्ति का योग पायेगा और अपनी ४ ६ हिम्मत शक्ति के द्वारा बड़ी भारी हुकूमत और नं. १११४ प्रभाव का ढंग बनायेगा और चौथी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह की सुन्दरता में कुछ कमी रखते हुए इज्जत और प्रभाव विशेष रहेगा और स्वाभिमानी बनेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है इसलिये माता के सुख में कुछ नीरसता युक्त शक्ति रहेगी और भूमि मकानादि का योग प्राप्त रहेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है; इसलिये विद्या स्थान में राज भाषा की शक्ति उत्तम रूप में
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५६५ प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में अच्छी शक्ति मिलेगी और दसम स्थान पर तो मंगल स्वयमेव ही उत्तम होता है, किन्तु स्वक्षेत्री मंगल का दशम स्थान पर बैठना राजयोग क़ारक होता है। कुम्भ लग्न में ११ मंगल यदि धनु राशि का मंगल- ग्यारहवें लाभ
१२ १० स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह का बैठना अधिक श्रेष्ठ होता ११ ९मं. है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता २ ८ शक्ति प्राप्त करेगा और पिता स्थान की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा राज-समाज से लाभ ३ ५ ७ और मान पायेगा और उत्तम कारबार एवं पुरुषार्थ ४ ६
नं. १११५ कर्म के द्वारा धनलाभ की विशेष शक्ति और अधिक नफा खायेगा और भाई-बहिन की शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है; इसलिये धन की संग्रह शक्ति के लिये विशेष प्रयत्न करके सफलता प्राप्त करेगा और कुटुम्ब की शक्ति का सहयोग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा और विद्या स्थान की शक्ति से लाभ पायेगा तथा आठवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है; इसलिये शत्रु पक्ष मे कुछ झंझट रहेगी और ननसाल पक्ष में कमजोरी रहेगी। कुम्भ लग्न में १२ मंगल यदि मकरं का मंगल- बारहवें खर्च एवं बाहरी १२ १०मं स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है, तो खर्चा बहुत अधिक तायदाद में करेगा १ ११ ९ और बाहरी स्थानों में विशेष शक्ति का सम्बन्ध २ ८ प्राप्त करेगा तथा पिता के सम्बन्धों में कुछ हानि रहेगी और राज-समाज तथा स्थानीय सम्बन्ध ३ ५ ७ कुछ कमजोर रहेगा और कारबार के पक्ष में अपने ४ ६ स्थान में हानि तथा दूसरे स्थानों में सफलता पायेगा नं. १११६ और चौथी दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है; इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का योग प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है; इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ झंझट रहेगी और ननसाल पक्ष में कुछ कमजोरी रहेगी तथा आठवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है; इसलिये रोजगार के मार्ग बड़ी सफलता शक्ति के द्वारा गृहस्थ के अन्दर शक्ति का संचार रखेगा।
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५६६ भृगु संहिता विद्या, सन्तान, आयु, पुरातत्वस्थानपति-बुध कुम्भ लग्न में १ बुध यदि कुम्भ का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान १२ १० में मित्र शनि की राशि पर बैठा है, तो आयु के पक्ष में शक्ति मिलेगी और पुरातत्व सम्बन्ध की १ ११ बु. ९ शक्ति का लाभ रहेगा और संतान पक्ष में सहयोग २ और मान मिलेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से देह के स्वास्थ्य और सुन्दरता और कुछ ३ ५ ७ कमी रहेगी तथा कुछ चिन्ता फिकर का योग ४ ६ प्राप्त रहेगा और पञ्चमेश होने की विशेषता के कारण विवेक शक्ति का गहन ज्ञान प्राप्त होगा और प्रभाव तथा मान मिलेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के नं. १११७
स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के मार्ग में कुछ कठिनाइयों के साथ-साथ विवेक शक्ति के द्वारा सहयोग का लाभ प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में २ बुध यदि मीन का बुध- दूसरे धन एवं कुटुम्ब १ २बु. १० स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की मीन राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी १ ११ ९ और संतान पक्ष में कुछ कष्ट अनुभव होगा तथा २ ८ नगद धन की संचित शक्ति का अभाव रहेगा और कुटुम्ब स्थान में कुछ कमी और विरोध रहेगा ३ ५ ७ तथा जीवन निर्वाह के सम्बन्ध में कुछ चिन्ता ४ ६ फिकर का योग प्राप्त होगा और सातवीं उच्च नं. १११८ दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी और पुरातत्व धन का अधूरा लाभ रहेगा और विद्या बुद्धि से सम्बन्धित पुरातत्व शक्ति का विवेक की हठयोगता से लाभ और मान प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ३ बुध यदि मेष का बुध- तीसरे पराक्रम एवं भाई १२ १० बहिन के स्थान में मित्र मंगल की मेष राशि पर १ बु. बैठा है तो विद्या बुद्धि की शक्ति का बल प्राप्त ११ ९ करेगा आयु और संतान पक्ष में शक्ति प्राप्त रहेगी २ ८ किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कष्ट का भी कारण मिलेगा तथा ३ ५ ७ संतान पक्ष में भी कुछ परेशानी रहेगी और पुरुषार्थ ४ ६ शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं नं. १११९ मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और विवेक की शक्ति के द्वारा
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कुम्भ लग्न का फलादेश 1
कुछ कठिनाईयों के साथ-साथ भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का ध्यान रखेगा तथा बुद्धि के अन्दर विवेक शक्ति की विशेषता के कारण अनेकों कार्यों की पूर्ति तथा पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ४ बुध यदि वृषभ का बुध- चौथे माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु १२ १० की सुख शक्ति और पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा। १ ११ विद्या बुद्धि का अच्छा योग पायेगा और संतान २ बु. ८ पक्ष में कुछ सुख शक्ति मिलेगी, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से माता के सुख में कुछ 3 ५ ७ कमी रहेगी और भूमि मकानादि के सम्बन्धों में ४ ६ कुछ परेशानी के साथ सुख मिलेगा और सातवीं नं. ११२० मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृक्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्ध में कुछ फिकर या परेशानी से काम चलेगा और राजसमाज कारबार की उन्नति के मार्ग में कुछ कठिनाई और विशेष शक्ति के मान और सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ५ बुध यदि मिथुन का बुध- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं सन्तान स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री :२ १० बैठा है तो विद्या स्थान में पुरातत्व सम्बन्धित मार्ग १ ११ की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और बुध के अन्दर २ विवेक शक्ति की प्रधानता होने के कारण बुद्धि V और वाणी के द्वारा प्रभाव शक्ति पायेगा और ३ ब् ५ ७ सन्तान पक्ष में शक्ति मिलेगी, किन्तु अष्टमेश होने ४ ६ के दोष कारण से सन्तान पक्ष में कुछ कमी एवं नं. ११२१ कुछ कष्ट प्राप्त होगा और विद्या बुद्धि के अन्दर कुछ त्रुटि रहेगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि की विवेक शक्ति के द्वारा आमदनी के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ६ बुध यदि कर्क का बुध- छठे शत्रु स्थान एवं झंझट १२ १८ स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो १ ११ विद्या को ग्रहण करने में बड़ी परेशानियाँ और कमजोरी रहेगी तथा संतान पक्ष में कष्ट और दिक्कतें २ ८ रहेंगी और जीवन की दिनचर्या में एवं आयु के ३ ५ ७ संबंध में बहुत-सी दिक्कतें रहेंगी और पुरातत्व ४ बु. ६ सम्बन्ध की शक्ति प्राप्त करने में बड़ी कमजोरी नं. ११२२ रहेगी तथा शत्रु पक्ष की तरफ से कुछ अशांति
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५६८ भृगु संहिता रहेगी। किन्तु विवेक की नरम और गुप्त शक्ति के द्वारा शत्रु और झंझटों पर विजय प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक रहेगा और बाहरी स्थानों में विवेक शक्ति के द्वारा सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ७ बुध यदि सिंह का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं १२ रोजगार के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा १० है तो विद्या बुद्धि की योग्यता प्राप्त करेगा तथा ११ ९ सन्तान पक्ष में शक्ति पायेगा तथा आयु और पुरातत्व २ ८ शक्ति का सुन्दर योग-भोग प्राप्त करेगा। किन्तु ५ बु. अष्टमेश होने के दोष के कारण से स्त्री और रोजगार ३ ७ के मार्ग में कुछ परेशानियों के द्वारा विवेक शक्ति ४ ६
नं. ११२३ के योग से सफलता प्राप्त करेगा और विद्या तथा संतान पक्ष में कुछ त्रुटि रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में भी कुछ परेशानी के योग से मान प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिरचर्या में रौनक और प्रभाव रहेगा। कुम्भ लग्न में ८ बुध यदि कन्या का बुध- आठवें आयु एवं पुरातत्त्व १२ १० स्थान में उच्च का होकर बैठा है तो आयु स्थान में १ ११ ९ विशेष शक्ति रहेगी तथा पुरातत्त्व सम्बन्ध में जीवन को सहायक होने वाली शक्ति प्राप्त करेग और २ ८ दिनचर्या में बड़ी रौनक और प्रभाव रहेगा, किन्तु ३ 4 ७ संतान पक्ष में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और विद्दा की ४ ६ बु. शक्ति में कुछ कमजोरी होते हुये भी विवेक गक्ति नं. ११२४ की महानता रहेगी तथा वाणी में प्रभाव हेगा और सातवीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटम्ब स्थान को मित्र गुरु की मीन नशि में देख रहा है, इसलिये धन संग्रह शक्ति में कमजोरी अनुभव होगी और कुटुम्ब के स्थान में कुछ क्लेश का या कमी का योग रहेगा। कुम्भ लग्न में ९ बुध यदि तुला का बुध- नवम त्रिकोण प्राप्य एवं १२ १० धर्म स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है ते १ ११ ९ संतान पक्ष में शक्ति मिलेगी और विद्या स्थान मे सुन्दर सफलता मिलेगी तथा आयु का सुन्दर योग २ प्राप्त रहेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ भाग्य से ३ ५ ७बु ही स्वतः प्राप्त होगा और विवेक शक्ति की महानता ४ से भाग्य की वृद्धि करेगा और धर्म का ज्ञान प्राप्त ur नं. ११२५ करेगा। किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से भाग्य
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५६९ की उन्नति में और धर्म के पालन में कुछ कमी रहेगी तथा सातवीं भित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई- बहिन और पराक्रम शक्ति के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि युक्त लाभ रहेगा। कुम्भ लग्न में १० बुध यदि वृश्चिक का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो १२ १० आयु की विशालता मिलेगी और पुरातत्व शक्ति १ ११ ९ का अच्छा लाभ विवेक कर्म के द्वारा प्राप्त करेगा २ ८ बु. और विद्या बुद्धि के कर्म योग से मान प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में शक्ति मिलेगी और अष्टमेश ३ ५ होने के दोष के कारण से पिता स्थान में कुछ ४ ६ परेशानी रहेगी तथा कारबार एवं राज-समाज के नं. ११२६ सम्बन्धों में कुछ बाधायें प्राप्त होंगी और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि के सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्त सुख मिलेगा तथा विवेक शक्ति से सम्मान प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ११ बुध यदि धनु राशि का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान
१२ में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो आयु के पक्ष १०
१ ११ ९बु. में शक्ति प्राप्त रहेगी और पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और पुरातत्व सम्बन्धित विवेक शक्ति २ ८ के योग से लाभ की शक्ति पायेगा और जीवन की दिनचर्या में आनन्द और प्रभाव रहेगा तथा ३ ५ ७ अष्टमेश होने के दोष के कारण से आमदनी के ४ ६
नं. ११२७ मार्ग में कुछ दिक्कतों के योग से अच्छी सफलता पायेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये थोड़ी-सी परेशानी के साथ संतान पक्ष और विद्या स्थान में शक्ति पायेगा तथा वाणी में स्वार्थ और प्रभाव रहेगा। कुम्भ लग्न में १२ बुध यदि मकर का बुध- बारहवें बाहरी एवं खर्च १२ १०बु स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्चा १ ११ बहुत अधिक करेगा तथा पुरातत्व शक्ति की हानि पायेगा और आयु के सम्बन्ध में चिन्तायें प्राप्त २ ८ होंगी तथा सन्तान पक्ष में हानि और परेशानी रहेगी ३ ५ ७ एवं विद्या के पक्ष में बड़ी कमजोरी रहेगी और ४ ६ बाहरी स्थान में बुद्धि एवं विवेक की शक्ति से नं. ११२८ कुछ सफलता प्राप्त करेगा। किन्तु जीवन यापन
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५७० भृगु संहिता करने के पक्ष में कुछ दिमाग में परेशानी रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ नरमाई और विवेक की शक्ति से सफलता पायेगा तथा अनेकों झंझटों से बचेगा। धन, कुटुम्ब तथा आमद स्थानपति-गुरु कुम्भ लग्न में १ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो देह के द्वारा १२ १० धन और लाभ की शक्ति प्राप्त करेगा तथा मान १ ११ गु. ९ और प्रभाव मिलेगा और कुटुम्ब की शक्ति का २ ८ सहयोग रहेगा तथा धनवानों में इज्जत रहेगी और बुजुर्गी के ढंग से धन की शक्ति पायेगा तथा धन ३ ५ ७ की प्राप्ति का बड़ा भारी ख्याल और बड़ा भारी ४ ६ प्रयत्न चालू रखेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से नं. ११२९ विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि के मार्ग में बड़ी शक्ति प्राप्त रहेगी तथा सन्तान पक्ष से लाभ प्राप्त करेगा और वाणी के द्वारा सफलता पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दर सफलता प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में धनोन्नति के सम्बन्ध में सफलता शक्ति प्राप्त करेगा तथा नवमी दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति पायेगा तथा धर्म का पालन धन से करेगा। कुम्भ लग्न में २ गुरु यदि मीन का गुरु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब १२गु. स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो १० धन की संग्रह शक्ति प्राप्त करेगा तथा आमदनी १ ११ की मोटी शक्ति पायेगा और कुटुम्ब के अन्दर २ ८ विशेष शक्ति प्राप्त रहेगी तथा धनवान् इज्जतदार ३ समझा जायेगा और धन को जोड़ने के लिये भारी ५ ७ प्रयत्न करेगा तथा पांचवीं उच्च दृष्टि से शत्रु एवं ४ ६ नं. ११३० झंझट स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क की राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष से लाभ और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा झंझट और परिश्रम से फायदा उठायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में शक्ति मिलेगी तथा पुरातत्व धन का लाभ रहेगा और जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा और नवमी
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५७१ मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान से धन की शक्ति प्राप्त रहेगा और राज-समाज में इज्जत और लाभ पायेगा तथा कारबार के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति और उन्नति करेगा। कुम्भ लग्न में ३ गुरु यदि मेष का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो १२ १० पराक्रम स्थान के द्वारा धनलाभ की विशेष शक्ति १गु ११ ९ प्राप्त रहेगी और भाई-बहिन से भी लाभ युक्त २ ८ सम्बन्ध रहेगा तथा अपने बाहुबल के द्वारा बड़ा भारी कीमती कार्य करेगा और कुटुम्ब की शक्ति ३ ५ ७ का सुन्दर लाभ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं मित्र w ४ दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की नं. ११३१ सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में सुन्दरता एवं लाभ योग रहेगा और रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति और धन प्राप्त करेगा तथा ससुराल से फायदा उठायेगा और गृहस्थ में अमीरों का ढंग रहेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ थोड़ी-सी रुकावटों के योग से भाग्य की वृद्धि प्राप्त करेगा और धर्म की विशेष छानबीन करेगा तथा नवमी दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ४ गुरु यदि वृषभ का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं
१२ भूमि के स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ १० राशि पर बैठा है तो भूमि और मकानादि की १ ११ शक्ति प्राप्त करेगा तथा धनेश कुछ बन्धन का २ गु. ८ कार्य भी करता है, इसलिये माता के सुख सम्बन्ध में कुछ त्रुटि करेगा। किन्तु मातृ स्थान की शक्ति ३ ५ 1 का लाभ प्राप्त करेगा तथा अपने स्थान से ही धन ६ की आमदनी का मार्ग सुख पूर्वक प्राप्त करेगा नं. ११३२ और पाँचवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में वृद्धि पायेगा और पुरातत्व धन का लाभ प्राप्त करेगा और अमीरों के ढंग से जीवन व्यतीत करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि से देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति का लाभ पायेगा और राज-समाज एवं कारबार के पक्ष में उन्नति और सफलता तथा मान प्राप्त करेगा और नवमी नीच दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु शनि की
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५७२ भृगु संहिता मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च में और बाहरी स्थानों में कुछ परेशानी रहेगी। कुम्भ लग्न में ५ गुरु यदि मिथुन का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या १२ एवं सन्तान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १० है तो विद्या स्थान में महान् शक्ति प्राप्त करेगा १ ११ ९ तथा बुद्धि विद्या व वाणी के द्वारा धन की और २ ८ कुटुम्ब की शक्ति पायेगा तथा सन्तान पक्ष में ३गु. कुछ द्वितीयेश होने के दोष के कारण से थोड़ी- ५ ७ सी परेशानी के साथ संतान पक्ष की विशेष ४ ६ नं. ११३३ लाभदायक शक्ति प्राप्त होगी और पाँचवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है; इसलिये थोड़ी-सी दिक्कत के साथ भाग्य स्थान की वृद्धि और शक्ति पायेगा तथा धन से धर्म का पालन करेगा तथा सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग के द्वारा खूब धनोपार्जन करेगा और नवमी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव शक्ति रहेगी और धनवान् एवं भाग्यवान् समझा जायेगा तथा बुद्धि और वाणी के अन्दर सज्जनता, योग्यता, स्वार्थ और परमार्थ सभी का पालन करेगा। कुम्भ लग्न में ६ गुरु यदि कर्क का गुरु- छठे शत्रु एवं झंझट स्थान में उच्च का होकर मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि १२ १० पर बैठा है तो कभी कोई मुफ्त की धन शक्ति १ ११ ९ मिलेगी और शत्रु पक्ष में धन शक्ति का बड़ा २ ८ प्रभाव रहेगा तथा ननसाल पक्ष में महानता रहेगी किन्तु छठें स्थान पर बैठने के दोष के कारण से ३ ५ ७ धन की प्राप्ति के मार्ग में अर्थात् आमदनी के ४ गु. ६ नं. ११३४ लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा तथा संचित धन को खराब करेगा और कुटुम्ब के पक्ष में कुछ झंझट रहेगी तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति का लाभ मिलेगा और राज-समाज व कारबार के मार्ग से फायदा उठावेगा और सातवीं नीच दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान की शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में तथा बाहरी सम्बन्धों में परेशानी रहेगी और नवमी दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये परश्रिम और झंझटों के मार्ग से धन की प्राप्ति करेगा तथा
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५७३ कुटुम्ब स्थान में कुछ शक्ति रहेगी तथा धनवान् समझा जायेगा। कुम्भ लग्न में ७ गुरु यदि सिंह का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा १२ १० है तो स्त्री पक्ष में महान् सफलता शक्ति तथा धन १ ११ ९ और सौन्दर्य प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में २ ८ बहुत धन प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ में बड़ा भारी प्रभाव और इज्जत रहेगी तथा धन और कुटुम्ब ३ ५ गु. ७ की शक्ति का सुन्दर सहयोग पायेगा और पाँचवीं ४ ६ दृष्टि से आमदनी के मार्ग को स्वयं अपनी धनु नं. ११३५ राशि में देख रहा है; इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और कीमती रोजगार करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है; इसलिये देह में मान-सम्मान और प्रभाव रहेगा; किन्तु सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और धनवान् समझा जायेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का लाभ पायेगा तथा पुरुषार्थ कर्म के मार्ग से बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और उन्नति करेगा तथा धन कमाने के मार्ग में बड़ी भारी हिम्मत शक्ति और योग्यता से काम करेगा। कुम्भ लग्न में ८ गुरु यदि कन्या का गुरु- आठवें आयु एवं पुरातत्त्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो आयु १२ १० स्थान के मार्ग में शक्ति प्राप्त करेगा और पुरातत्त्व १ ११ ९ धन शक्ति का लाभ पायेगा; किन्तु अष्टम स्थान २ ८ पर बैठने के दोष के कारण से संचित धन की शक्ति में हानि प्राप्त रहेगी तथा कुटुम्ब के स्थान ३ ५ ७ में कमी और कष्ट के कारण प्राप्त होंगे और ४ ६ गु. आमदनी के मार्ग में दूसरे स्थान का सम्बन्ध और नं. ११३६ कठिनाईयाँ प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं नीच दृष्टि से खर्च और बाहरी स्थान को शनि की मकर राशि में शत्रु भाव से देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में तथा बाहरी स्थान के सम्बन्धों में कमी और कष्ट का कारण प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मीन राशि में धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वक्षेत्र में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये महान् प्रयत्न करेगा और कुटुम्ब का कुछ सहयोग पायेगा और नवमी दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्नेह में कुछ त्रुटि रहेगी और भूमि मकानादि की कुछ शक्ति प्राप्त रहेगी तथा कुछ घरेलू सुख शक्ति मिलेगी।
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५७४ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में ९ गुरु यदि तुला का गुरु- नवम त्रिकोण, भाग्यं एवं धर्म स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर १२ १० बैठा है तो भाग्य की शक्ति से धन की विशेष ११ ९ प्राप्ति करेगा तथा बड़ा भाग्यवान् एवं धनवान् २ समझा जायेगा और कुटुम्ब की उत्तम शक्ति मिलेगी V तथा न्याय के मार्ग से धनोपार्जन करेगा और धर्म ३ 4 ७ गु. की गहरी छानबीन करके धर्म का पालन करेगा ४ ६ और पांचवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को शनि नं. ११३७ का कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और भाग्यवानी के लक्षण प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन की शक्ति का लाभ पायेगा और पुरुषार्थ कर्म की शक्ति से बहुत धनोपार्जन का लाभ पायेगा तथा हिम्मत शक्ति प्राप्त रहेगी और नवमी मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की शक्ति का अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और सन्तान पक्ष में शक्ति मिलेगी तथा बुद्धि और वाणी से लाभ प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में १० गुरु यदि वृश्चिक का गुरु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो १२ १० पिता स्थान से महान् शक्ति पायेगा तथा राज- १ ११ समाज में बड़ी लाभ और मान प्राप्त करेगा और २ ८ गु. कारोबार व्यापार के मार्ग में बड़ी भारी सफलता और धनोन्नति करेगा और बड़ी भारी शानदारी के ३ ५ ७ मार्ग से आमदनी का योग प्राप्त करेगा तथा पाँचवीं ४ ६ दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी नं. ११३८ मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की शक्ति से कारोबार के द्वारा धन की महान् वृद्धि करेगा और कुटुम्ब की विशेष शक्ति पायेगा और सातवीं सामान्य शत्रु दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भूमि की शक्ति से लाभ प्राप्त करेगा और माता की शक्ति का लाभ व सहयोग प्राप्त रहेगा और सुख के साधन मिलेंगे तथा नवमी उच्च दृष्टि से शत्रु एवं झंझट स्थान को मित्र चन्द्रमा के कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव रखेगा और झंझटयुक्त मार्ग से बहुत सफलता प्राप्त करेगा तथा उन्नति के लिये विशेष परिश्रम करेगा। यदि धन का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी के मार्ग में स्वतन्त्र एवं आदर्श शक्ति के द्वारा
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५७५ कुम्भ लग्न में ११ गुरु विशेष सफलता प्राप्त करेगा और अपने क्षेत्र में ही आमदनी का सुन्दर मार्ग पायेगा तथा कभी- १२ १० कभी लाभ के रूप में विशेष धन सम्पत्ति प्राप्त १ ११ ९गु. करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति का लाभ प्राप्त २ करेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, ३ 4 ७ इसलिये भाई-बहन की शक्ति का लाभ पायेगा ४ ६ और पुरुषार्थ कर्म की शक्ति और सफलता से नं. ११३९ कीमती लाभ पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या में विशेष शक्ति पायेगा और सन्तान पक्ष में सफलता और लाभ पायेगा, तथा नवमी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के मार्ग में बड़ी सुन्दर सफलता प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में १२ गुरु यदि मकर का गुरु- बारहवें ख़र्च एवं बाहरी स्थान में नीच का होकर शत्रु शनि की राशि पर १२ १० गु. बैठा है तो खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी ११ ९ तथा आमदनी के पक्ष में कमजोरी रहेगी और २ ८ बाहरी स्थानों में कुछ दिक्कतें बनेंगी और संचित धन की शक्ति का कुछ अभाव रहेगा और कुटुम्ब ३ ५ ७ के पक्ष में कुछ अशान्ति रहेगी तथा धन लाभ के ४ ६ मार्ग में कुछ थोड़ा मुनाफा मिलेगा और पाँचवीं नं. ११४० दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि के सुख सम्बन्धों में कुछ त्रुटि से युक्त शक्ति प्राप्त करेगा तथा रहने के स्थान पर कुछ सुख मिलेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है इसलिये शत्रु स्थान में प्रभाव शक्ति पायेगा और झंझट से धन लाभ प्राप्त करेगा और नवमी मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी और पुरातत्व धन शक्ति का लाभ पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में अमीरात का ढंग रहेगा। भाग्य, धर्म, माता तथा भूमि स्थानपति-शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो देह के अन्दर सुन्दरता और सुख सौभाग्य प्राप्त करेगा तथा
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५७६ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में १ शुक्र भूमि मकानादि की उत्तम शक्ति पायेगा और माता का उत्तम आदर्श योग प्राप्त करेगा तथा धर्म का १२ १० पालन बड़ी चतुराई और योग्यता के साथ करेगा १ ११ शु. ९ और भाग्य की आदर्श शक्ति प्राप्त करेगा तथा २ ८ सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ ३ ५ ७ थोड़ी-सी नीरसता के साथ स्त्री पक्ष में सुख और ur भाग्यवानी प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में नं. ११४१ थोड़ी-सी कठिनाई के द्वारा बहुत सफलता पायेगा तथा बड़ी भारी उत्तम चतुराई के द्वारा लोक और परलोक दोनों की अनुकूल शक्ति पायेगा। कुम्भ लग्न में २ शुक्र यदि मीन का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की १२शु. १० राशि पर बैठा है तो धन संग्रह की महान शक्ति १ ११ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का बड़ा वैभव प्राप्त २ ८ होगा तथा भूमि मकानादि की शक्ति का लाभ पायेगा और भाग्य की शक्ति से धन की विशेष ३ ५ ७ सुख सफलता पायेगा और धन से धर्म का ४ ६ नं. ११४२ पालन करेगा तथा बड़ा भारी भाग्यशाली समझा जायेगा और धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, इसलिये माता के सुख और प्रेम में कुछ त्रुटि युक्त विशेष शक्ति पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से आयु एवं पुरातत्त्व स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और पुरातत्त्व के स्थान में कुछ कमी या कुछ परेशानी रहेगी तथा दिनचर्या में कुछ फिकर रहेगी। कुम्भ लग्न में ३ शुक्र यदि मेष का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है १२ १० तो भाई-बहिन के स्थान से सुख सौभाग्य प्राप्त १ शु ११ ९ करेगा तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा बड़ी भारी २ ८ सफलता और सुख प्राप्त करेगा तथा माता की शक्ति से सुख मिलेगा और भूमि और मकानादि ३ ५ ७ की सुख शक्ति पायेगा और घरेलू सुख के साधनों ४ ६ नं. ११४३ को अपनी हिम्मत और चतुराई के द्वारा प्राप्त करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिए भाग्य की
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५७७ बड़ी भारी उन्नति करेगा और धर्म का पालन करेगा एवं यश प्राप्त होगा तथा ईश्वर में पूर्ण निष्ठा रखेगा और उत्तम मार्ग का अनुयायी बनेगा तथा पुरुषार्थ कर्म की सफलता शक्ति के द्वारा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और उत्साह युक्त रहेगा। कुम्भ लग्न में ४ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १२ १० बैठा है तो माता के सुख की महान् शक्ति प्राप्त १ ११ करेगा तथा भूमि और मकानादि की श्रेष्ठ सुख २ शु. शक्ति पायेगा तथा घरेलू सुख की प्राप्ति के उत्तम V साधन पायेगा तथा घर के अन्दर श्रेष्ठ धर्म का ३ ७ पालन करेगा और बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा ४ ६ और घर बैठे भाग्योन्नति के साधन प्राप्त करेगा नं. ११४४ तथा सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान की शक्ति का फायदा और सुख स्वतः प्राप्त होगा तथा राज-समाज के मार्ग में बड़ी इज्जत और उन्नति रहेगी तथा भाग्य की शक्ति और सुन्दर चतुराई के योग से कारोबार के स्थान में बड़ी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ५ शुक्र यदि मिथुन का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १२ १० तो विद्या बुद्धि की महान् सफलता शक्ति प्राप्त १ ११ ९ करेगा तथा संतान पक्ष से बड़ा सुन्दर सौभाग्य २ ८ प्राप्त करेगा तथा बुद्धि योग द्वारा उत्तम धर्म का पालन करेगा और भगवान् पर बड़ा भारी भरोसा ३शु. ५ ७ रखेगा और बुद्धि योग के उत्तम कर्म के द्वारा ४ ६ भाग्य की उन्नति करेगा तथा बहुत गहरी चतुराई नं. ११४५ से सुयश प्राप्त करेगा तथा माता और भूमि मकानादि की शक्ति पायेगा तथा बुद्धि के अन्दर सत्य, संतोष, शान्ति और सुख की प्राप्ति करेगा तथा सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये सतोगुणी चतुराई के मार्ग से धन लाभ करेगा और भाग्य तथा भगवान् के भरोसे पर अनेक प्रकार के उत्तम पदार्थों के लाभ और सफलता शक्ति पायेगा। यदि कर्क का शुक्र- छठें शत्रु स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो भाग्य की शक्ति और चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग से भाग्य की वृद्धि पायेगा। माता के सुख सम्बन्धों में कमी और झंझट पायेगा और भूमि भृ. सं .- ३७
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५७८ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में ६ शुक्र मकानादि की शक्ति में एवं मातृभूमि के स्थान सम्बन्धों में कमी रहेगी तथा भाग्य के पक्ष में १२ १० कुछ परेशानी रहेगी और धर्म के यथार्थ पालन में १ ११ ९ कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से २ खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की मकर राशि में V देख रहा है, इसलिए भाग्य की शक्ति से खर्चा ३ 4 ७ खूब करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ सफलता ४ शु. ६ प्राप्त करेगा और चतुराई तथा नरमाई से प्रभाव नं. ११४६ पायेंगा। कुम्भ लग्न में ७ शुक्र यदि सिंह का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह राशि पर १२ १० बैठा है तो स्त्री पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के १ ११ ९ साथ सुख और सफलता प्रांप्त करेगा तथा रोजगार २ ८ के पक्ष में कुछ थोड़ा परिश्रम के योग से उन्नति और सुख प्राप्त करेगा तथा माता का सहयोग ३ ५ शु. ७ पायेगा और भूमि और मकानादि के रहने के स्थान ४ ६ में सुख और सुन्दरता रहेगी तथा गृहस्थ के अन्दर नं. ११४७ बड़ा सुन्दर आमोद-प्रमोद का ढंग रहेगा तथा धर्म का पालन करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर सुन्दरता और सुख- सौभाग्य प्राप्त करेगा और बड़ा सौभाग्यवान् समझा जायेगा और सज्जनता युक्त कर्म के मार्ग से यश प्राप्त करेगा तथा बड़ी कार्यकुशलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ८ शुक्र यदि कन्या का शुक्र-आठवें आयु मृत्यु एवं १२ पुरातत्व स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की १० राशि पर बैठा है तो भाग्य के सम्बन्ध में महान् १ ११ ९ कमजोरी प्राप्त करेगा तथा धर्म के पक्ष में कुछ २ ८ अनुचित और कमजोर मार्ग का अनुसरण करेगा तथा माता के सुख में बड़ी भारी कमी रहेगी और ३ ५ ७ भूमि मकानादि के सुख सम्बन्धों में कुछ अशान्ति ४ ६ शु. रहेगी एवं दूसरे स्थान का योग प्राप्त करेगा और नं. ११४८ आयु तथा जीवन की दीनचर्या में कुछ शान्ति की त्रुटि रहेगी और पुरातत्व की कुछ कमी रहेगी और सातवीं उच्चदृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि के लिये बड़ा भारी प्रयत्न करेगा और धन प्राप्त करेगा।
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कुम्भ लग्न में ९ शुक्र यदि तुला का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो १२ १० भाग्थ की महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा धर्म का १ ११ ९ उत्तम पालन करेगा और माता की श्रेष्ठ शक्ति
२ ८ मिलेगी तथा भूमि मकानादि के सम्बन्धों में भाग्य की शक्ति से बड़ी सफलता और सुख प्राप्त करेगा ३ 4 ७शु और दैवी गुणों की चतुराई के योग से बड़ा सुयश ४ ६ पायेगा और घरेलू वातावरण के अन्दर खान- नं. ११४९ पान-आनन्द इत्यादि का उत्तम सुख साधन प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की शक्ति से भाई-बहिन का सुख प्राप्त करेगा और पराक्रम स्थान की सफलता का योग स्वतः सरलता से प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में १० शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- दशम पिता एवं राज्य
१२ १० स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो भाग्य की प्रबल शक्ति के द्वारा पिता के स्थान ११ ९ में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में २ ८ शु बड़ी भारी मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा और कारबार के मार्ग में बड़ी भारी उन्नति और सफलता ३ 4 ७ करेगा और उत्तम चतुराई के कर्म से सुयश प्राप्त ४ ६
नं. ११५० करेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये माता की महान् शक्ति पायेगा और भूमि और मकानादि की उत्तम शोभा पायेगा तथा घरेलू वातावरण में राजसी सुख भोगेगा। कुम्भ लग्न में ११ शुक्र यदि धनु राशि का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो १२ १० भाग्य की उत्तम शक्ति के द्वारा आमदनी के मार्ग १ ११ ९शु में बड़ी भारी सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और २ ८ सुखपूर्वक धन लाभ का आनन्द प्राप्त होगा और आमदनी के मार्ग में न्याय और चतुराई के कारणों ३ ५ ७ से यश प्राप्त करेगा और धर्म का पालन करेगा ४ ६ तथा माता का सुख लाभ पायेगा और भूमि नं. ११५१ मकानादि की लाभ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये संतान पक्ष में सुख सौभाग्य पायेगा और विद्या स्थान में बड़ी
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५८० भृगु संहिता सफलता पायेगा तथा वाणी में विशेष चतुरता रहेगी। कुम्भ लग्न में १२ शुक्र यदि मकर का शुक्र-बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो भाग्य १२ १०शु. की शक्ति से खर्चा विशेष करेगा और बाहरी १ ११ ९ स्थानों में विशेष सुख और सफलता शक्ति पायेगा २ तथा अन्दरूनी तौर से भाग्य के पक्ष में बड़ी कमजोरी मानेगा और धर्म के मार्ग में उसका पालन ३ 4 ७ करने में कमजोरी रहेगी और सुयश प्राप्ति की ४ ६ कमी रहेगी तथा माता के सुख में कमी और वियोग नं. ११५२ पायेगा और सातवीं दृष्टि से शत्रु स्थान को सामान्य मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की शक्ति और चतुराई के योग से शत्रु पक्ष में सफलता पायेगा तथा झंझटों से कुछ सुख मिलेगा। देह, खर्च तथा बाहरीस्थानपति-शनि EPE कुम्भ लग्न में १ शनि यदि कुम्भ का शनि- प्रथम केन्द्र, देह के १२ १० स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह स्थान में सुन्दरता एवं सुडौलता पायेगा। किन्तु १ ११ श. ९ व्ययेश होने के दोष कारण से देह में कुछ कमजोरी २ ८ रहेगी अथवा कभी-कभी शरीर का संकट प्राप्त होगा और बाहरी स्थानों की स्वतः शक्ति प्राप्त ३ ५ ७ रहेगी तथा आदर मान और ख्याति प्राप्त करेगा ४ ६ और खर्चा शानदार तरीके से चलायेगा और तीसरी नं. ११५३ नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के स्थान में कुछ परेशानी रहेगी और पुरुषार्थ कर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी तथा उत्साह और हिम्मत की जगह कुछ लापरवाही तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ नीरसता अनुभव होगी और रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानी सी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है; इसलिये पिता के कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज कारबार में कुछ कठिनाई से काम करेगा। यदि मीन का शनि- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो धन की शक्ति प्राप्त करने के लिये महान् कठिनकर्म करेगा और कुछ धन-जन की शक्ति पायेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से धन एवं कुटुम्ब स्थान में कमजोरी रहेगी और खर्च को रोजने की चेष्टा करने पर भी खर्चा मजबूरन अधिक हो जायेगा तथा धन का स्थान
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५८१ कुम्भ लग्न में २ शनि कुछ बन्धन का काम करता है, इसलिये देह के सुख और सुन्दरता में कुछ कमी रहेगी और बाहरी १२श १० स्थानों के सम्बन्ध में इज्जत रहेगी और तीसरी ११ मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शुक्र २ ८ की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि का सहयोग प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश ३ ५ ७ के दोष कारण से घरेलू सुख के साधनों में कुछ ४ ६ त्रुटि रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पुरातत्व स्थान नं. ११५४ को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और पुरातत्व शक्ति का कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसताई के योग से काम करेगा। किन्तु अधिक मुनाफा और अधिक लाभ को पाने की प्रबल इच्छा रखेगा। कुम्भ लग्न में ३ शनि यदि मेष का शनि- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर १२ १० बैठा है तो भाई-बहिन के पक्ष में कष्ट और कमी १श ११ ९ के कारण पायेगा तथा पराक्रम शक्ति में कुछ २ ८ कमजोरी रहेगी और व्ययेश होने से तथा नीच होने से देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कमी ३ ५ ७ रहेगी तथा खर्च और बाहरी सम्बन्धों में कुछ ४ ६ नं. ११५५ परेशानी करेगा। किन्तु दसवीं दृष्टि से स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्च और बाहरी स्थान के सम्बन्धों में शक्ति प्राप्त करेगा तथा तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह का बैठना भी शक्ति प्रदायक होता है और तीसरी मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि तथा सन्तान पक्ष में शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने से कुछ त्रुटि रखेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति पैदा करेगा और बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म के पालन का ध्यान रखेगा और क्रूर ग्रह का नीच होकर पराक्रम में बैठने से येन-केन प्रकारेण अपनी उन्नति करने में तल्लीन रहेगा। यदि वृषभ का शनि- चौथे केन्द्र, माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो माता और भूमि के स्थान पर अपूर्ण अधिकार प्राप्त करेगा क्योंकि शनि व्ययेश होने के कारण दोषी है, इसलिये अपने स्थान में सुख पूर्वक रहने पर भी घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की कुछ
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५८२ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में ४ शनि कमी रहेगी और घर बैठे खर्च की संचालन शक्ति प्राप्त रहेगी और बाहरी स्थानों का सम्बन्ध सुखदाता १२ १० बनेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से चन्द्रमा की कर्क १ ११ ९ राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये अपने २ श. ८ दैहिक प्रभाव और बाहरी सम्बन्धों के कारण से शत्रु स्थान में प्रभाव और सावधानता प्राप्त करेगा ३ ५ ७ और झंझट तथा परेशानियों से बचाव पा सकेगा ४ ६ और सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्यस्थान को नं. ११५६ मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता से कुछ नीरसता रहेगी और राज-समाज कारबार के मार्ग में कुछ कठिनाई से कामयाबी प्राप्त करेगा और दसवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कुभ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और नाम की प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष से देह में कुछ कमजोरी व फिकर रहेगी तथा घर बैठे मान्यता प्राप्त करेगी। कुम्भ लग्न में ५ शनि यदि मिथुन का शनि- पाँचवें त्रिकोण, विद्या एवं संतान स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १२ १० तो विद्या की शक्ति प्राप्त करेगा तथा बुद्धि योग १ ११ ९ द्वारा खर्च की संचालन शक्ति प्राप्त करेगा, तथा २ ८ संतान पक्ष में कुछ शक्ति रहेगी और बुद्धि योग द्वारा बाहरी स्थानों का सुन्दर सम्बन्ध एवं मान ३श ५ ७ प्राप्त करेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण ४ ६ से विद्या में कुछ कमी रहेगी और संतान पक्ष में नं. ११५७ कुछ हानि प्राप्त होगी और दिमाग के अन्दर कुछ आत्मबल और कुछ परेशानी पायेगा और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसताई से सफलता पायेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री और रोजगार के पक्ष में कुछ परेशानी अनुभव करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब की वृद्धि करने के लिये बड़ा भारी प्रयत्नशील और चिन्तित रहेगा। यदि कर्क का शनि- छठे शत्रु स्थान में एवं झंझट स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो देह के द्वारा अधिक परिश्रम करके प्रभाव की विशेष वृद्धि करेगा तथा बाहरी स्थानों में सम्बन्ध प्राप्त करके प्रभावशाली तथा परतंत्रतायुक्त कर्म करेगा और व्ययेश होने के दोष कारण से देह में कुछ सुन्दरता की कमी और कुछ परेशानी प्राप्त करेगा तथा खर्च के मार्ग
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५८३ कुम्भ लग्न में ६ शनि में कुछ दिक्कतें रहेंगी और शत्रु पक्ष में प्रभाव रखेगा तथा छठे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान हो १२ १० जाता है, इसलिये अपने अन्दर की कमजोरी को १ ११ ९ जाहिर न करके बड़ी भारी हिम्मत शक्ति से काम २ करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, ३ ७ इसलिये आयु में कुछ शक्ति पायेगा और पुरातत्व ४ श. ६ सम्बन्ध में कुछ त्रुटि युक्त शक्ति मिलेगी और नं. ११५८ जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक करेगा तथा बाहरी स्थानों से अच्छा सम्बन्ध रहेगा और दसवीं नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ कमी और कष्ट रहेगा तथा पुरुषार्थ कर्म की शक्ति के अन्दर कुछ कमजोरी रहेगी। कुम्भ लग्न में ७ शनि यदि सिंह का शनि- सातवें केन्द्र स्त्री एवं
१२ १० रोजगार के स्थान में शत्रु सूर्य की सिंह राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में कुछ नीरसता एवं परेशानियों १ ११ से युक्त शक्ति प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग २ ८ में कुछ कठिनाईयों से सफलता शक्ति पायेगा, क्योंकि व्ययेश होने का दोष है, इसलिये कुछ ३ ५ श. ७ नुकसान और परेशानियों के योग से बाहरी स्थानों ४ ६ नं. ११५९ के सम्बन्ध द्वारा शक्ति पा सकेगा और खर्चा अधिक करना पड़ेगा तथा तीसरी उच्च दृष्टि से भाग्य स्थान को एवं धर्म स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति प्राप्त करने से भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म के मार्ग में विशेष श्रद्धा रखेगा तथा ईश्वर में भरोसा रखेगा और सातवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता एवं प्रसिद्धता का योग पायेगा। किन्तु व्ययेश दोष के कारण से देह में कुछ परेशानी रहेगी तथा दसवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है इसलिये माता और भूमि की कुछ शक्त्ति प्राप्त करेगा किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से माता और भूमि के सम्बन्धों में कुछ त्रुटि रहेगी और घरेलू सुखों में भी कुछ कमी रहेगी। यदि कन्या का शनि- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो देह के सम्बन्ध में बड़ी परेशानी प्राप्त करेगा
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५८४ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में ८ शनि और खर्च के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ झंझटों से शक्ति १२ १० पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि लाभ १ ११ ९ दोनों की शक्ति पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में २ ८ कुछ हानि लाभ दोनों की शक्ति पायेगा क्योंकि व्ययेश होने के दोष कारण से और अष्टम बैठने ३ ५ ७ के दोष कारण से डबल दोष बन गया है, इसलिये ४ ६ श. प्रायः उपरोक्त मार्गों में परेशानी के कारण प्राप्त नं. ११६० करता है, किन्तु आठवें स्थान पर शनि के बैठने से आयु में वृद्धि प्राप्त होती है, इसलिये आयु पर संकट आने पर भी जीवन की रक्षा होती रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ वैमनस्यता पायेगा और राजसमाज कारबार की उन्नति में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब के मार्ग में कुछ चिंतित रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान पक्ष में शक्ति पायेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष कारण से विद्या और संतान पक्ष में कुछ त्रुटि रहेगी। कुम्भ लग्न में ९ शनि यदि तुला की शनि- नवम त्रिकोण भाग्य १२ १० एवं धर्म स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो देह में सुन्दरता और सुडौलता ११ ९ प्राप्त करेगा और बड़ा भाग्यशाली बनेगा तथा २ ८ ईश्वर और धर्म को मानने एवं पालन करने वाला ३ बनेगा और खूब खर्चा करेगा तथा बाहरी स्थानों ५ ७श के सम्बन्ध में भाग्य की शक्ति से विशेष सफलता ४ ६ नं. ११६१ प्राप्त करेगा; किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से भाग्य और धर्म के मार्ग में कभी-कभी हानि तथा परेशानी के कारण भी प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतों से सफलता शक्ति पायेगा तथा कुछ मुफ्त सा लाभ भी पायेगा और सातवीं नीच दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के सुख में बड़ी त्रुटि और परेशानी पायेगा और देह के पुरुषार्थ में कुछ कमजोरी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से चन्द्रमा की कर्क राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में प्रभाव रखने के लिये विशेष शक्ति का प्रयोग करेगा; किन्तु कुछ शत्रु पक्ष
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५८५ एवं झंझटों के मार्ग में कुछ कठिनाइयों से सफलता शक्ति पायेगा, किन्तु स्वयं उच्च होने से भाग्यवान् समझा जायेगा। कुम्भ लग्न में १० शनि यदि वृश्चिक का शनि- दशम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो १२ १० राज-समाज में मान और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा १ ११ ९ देह में गौरव और स्वाभिमान रखेगा, किन्तु व्ययेश २ ८ श. होने के दोष कारण से पिता स्थान में कुछ हानि या कमी रहेगी और कारबार की उन्नति के मार्ग ३ ५ ७ में कुछ दिक्कतें प्राप्त होंगी तथा राज-समाज में ४ ६
नं. ११६२ भी कुछ परेशानी बनेगी और तीसरी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष शानदार रहेगा और बाहरी स्थानों से विशेष महत्व दायक सम्बन्ध बनेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कमी के साथ माता और भूमि का सुख पायेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ कमी और नीरसता का योग पायेगा तथा रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और गृहस्थ के सञ्चालन कार्यों में कुछ कठिनाईयों से शक्ति प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ११ शनि यदि धन का शनि- ग्यारहवें लाभ स्थान में
१२ शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान १० पर क्रूर ग्रह बहुत शक्तिशाली हो जाता है, इसलिये १ ११ ९श. आमदनी के मार्ग में बड़ी भारी सफलता शक्ति २ ८ प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन लाभ की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा आमदनी ३ ५ ७ की वृद्धि करने में बड़ी भारी तत्परता से काम ४ ६ करता रहेगा और खर्चे की शक्ति से आमदनी में नं. ११६३ वृद्धि प्राप्त करेगा तथा तीसरी दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और नाम प्राप्त करेगा तथा उन्नति करने में सदैव तत्पर रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष कारण से कुछ त्रुटि युक्त विद्या और सन्तान पक्ष की शक्ति प्राप्त करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति रहेगी और पुरातत्व शक्ति के मार्ग में सफलता पायेगा और जीवन
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५८६ भृगु संहिता की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा। कुम्भ लग्न में १२ शनि यदि मकर का शनि- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो १२ १०श. खर्चा बहुत अधिक करेगा और बाहरी स्थानों में १ ११ ९ विशेष शक्ति प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के २ ८ दोष कारण से देह में कमजोरी रहेगी तथा बाहरी स्थानों में खासतौर से आना जाना रहेगा और ३ ५ ७ अपने मुख्य स्थान में कुछ कमी अनुभव करेगा ४ ६ तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान नं. ११६४ को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष कारण से धन एवं कुटुम्ब स्थान की वृद्धि करने के लिये विशेष चिन्तित रहेगा और धन संग्रह में कुछ कमजोरी रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से चन्द्रमा की कर्क राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु स्थान में कुछ थोड़ी सी परेशानी के योग से प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा और दसवीं उच्च दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की विशेष वृद्धि करेगा और धर्म का पालन करेगा तथा व्ययेश होने के कारण कभी-कभी भाग्य में चिन्ता रहेगी; किन्तु लग्नेश होने के कारण बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के अधिपति-राहु कुम्भ लग्न में १ राहु यदि कुम्भ का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान १२ में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो देह के स्थान १० में कोई चोट वगैरह लगेगी एवं देह की सुन्दरता १ ११ रा. ९ में कुछ कमी रहेगी तथा स्वास्थ्य में कुछ कमजोरी २ ८ रहेगी और कुछ गुप्त चिन्ता रहेगी, किन्तु मित्र की राशि पर दृढ़ ग्रह के स्थान में राहु बैठा है, ३ ५ ७ इसलिये अपने व्यक्तित्व की उन्नति के लिये महान् ४ ६ नं. ११६५ प्रयत्न करेगा और दृढ़ता की शक्ति से उन्नति करेगा तथा असाधारण प्रयास के मार्ग में भी सफलता प्राप्त करेगा किन्तु कभी-कभी दिक्कतों और परेशानियों से टकराता रहेगा; परन्तु दिमाग की पेचीदा गम्भीर चाल के द्वारा मान और प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा। यदि मीन का राहु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो धन कोष में कमी करेगा और धन के अभाव से कभी-कभी बड़ा कष्ट अनुभव करेगा तथा कुटुम्ब की शक्ति से बहुत थोड़ा सुख
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कुम्भ लग्न का फलादेश
कुम्भ लग्न में २ राहु मिलेगा और कभी-कभी धन का अचानक नुकसान प्राप्त करेगा किन्तु देवगुरु बृहस्पति के स्थान में १२रा १० होने से बुद्धि के आदर्श गुप्त सूझ के कारणों से १ ११ मान युक्त मार्ग से धन की प्राप्ति करेगा और बड़ा २ ८ धनवान् समझा जायेगा; परन्तु अनेकों बार धन की हानियाँ प्राप्त करने के बाद धन की बृद्धि ३ ५ ७ करने के लिये बड़े कष्ट साध्य मार्ग एवं कर्ज के ४ ६ द्वारा तथा महान् हिम्मत शक्ति एवं गुप्त चिन्ताओं नं. ११६६ से सफलता प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ३ राहु यदि मेष का राहु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो तीसरे १२ १० स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता हो १ रा. ११ ९ जाता है, इसलिये पराक्रम शक्ति के द्वारा महान् २ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और बड़ी जबरदस्त V हिम्मत शक्ति से काम करेगा, क्योंकि गरम ग्रह ३ ५ ७ की राशि पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये प्रभाव ४ ६ की महानता रखने के लिये बड़ा भारी कष्ट साध्य नं. ११६७ प्रयत्न करेगा। किन्तु भाई बहिन के पक्ष में संकट या विरोध के साधन प्राप्त करेगा। राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण अन्दरूनी तौर से अपनी हिम्मत शक्ति के अन्दर बहुत बार कमजोरियाँ अनुभव करेगा और अपनी गुप्त कमजोरी पर चिन्ता मानते हुए भी प्रकट में विजयी रहेगा। कुम्भ लग्न में ४ राहु यदि वृषभ का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है १२ १० तो माता के सुख सम्बन्धों में कण्टक और कष्ट १ ११ ९ के कारण प्रदान करेगा तथा भूमि के सुख में २ रा. कमी रहेगी और घरेलू वातावरण में कुछ अशान्ति V के कारण प्राप्त होते रहेंगे; किन्तु परम चतुर आचार्य ३ ५ ७ शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये कभी-कभी ४ ६ विशेष अशान्ति का योग प्राप्त होने पर भी गहरी नं. ११६८ चतुराई के योग से सुख के साधनों को प्राप्त कर ही लेगा तथा बहुत से घरेलू संघर्षों को पार करने के बाद अन्त में सुख के साधनों को मजबूती से पा सकेगा। किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण घरेलू सुखों के मार्ग में कुछ कमी और कुछ अशान्ति का योग किसी अंशों में अवश्य रहेगा।
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५८८ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में ५ राहु यदि मिथुन का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की १२ १० राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में विशेष शक्ति १ ११ ९ प्राप्त करेगा तथा बड़ा बोलने वाला होगा एवं २ ८ वाणी और दिमाग की विशेष कला एवं योग्यता रखेगा और गुप्त युक्तियों के द्वारा बड़ा भारी काम ३रा. ५ ७ करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण ४ ६ संतान पक्ष में कुछ कष्ट एवं कुछ कमी प्राप्त नं. ११६९ करने पर संतान शक्ति पायेगा और विद्या स्थान में अंदरूनी कुछ कमजोरी रहेगी तथा विवेकी बुध की राशि पर उच्च का होकर राहु बैठा है, इसलिये विद्या बुद्धि तथा संतान पक्ष के मार्ग में विवेक शक्ति के योग से बड़ी सफलता प्राप्त करेगा तथा बातचीत में प्रभाव जाहिर करता रहेगा। कुम्भ लग्न में ६ राहु यदि कर्क का राहु-छठे शत्रु स्थान में चन्द्रमा १२ की राशि पर बैठा है तो शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव १० १ रखेगा तथा छठे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली ११ ९ फल प्रदान करता है, इसलिये झगड़े-झंझटों और २ ८ विपक्षियों के मुकाबले में गुप्त युक्तियों के बल ३ ७ से विजय प्राप्त करेगा तथा राहु के स्वाभाविक ५ गुणों के कारण शत्रु पक्ष में कुछ अन्दरूनी तौर से ४ रा. ६
नं. ११७० परेशानी अनुभव करेगा। किन्तु प्रकट रूप में बड़े भारी धैर्य और हिम्मत शक्ति से काम करके सफलता प्राप्त करेगा तथा ननसाल पक्ष में हानि पायेगा और मनोयोग के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये अनेक प्रकार की कठिनाईयों को दमन करने के मार्ग में मनोयोग की गुप्त सूझ के द्वारा सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ७ राहु यदि सिंह का राहु-सातवें स्त्री एवं रोजगार १२ १० के स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो स्त्री १ स्थान में बड़ा कष्ट और कमी के कारण प्राप्त ११ ९ करेगा तथा गृहस्थ के संचालन मार्ग में बड़ी २ ८ दिक्कतें रहेंगी और रोजगार के मार्ग में बड़ी ३ ५ रा. ७ कठिनाईयाँ और कुछ परेशानियाँ रहेंगी तथा मूत्र इन्द्रिय में कुछ विकार प्राप्त करेगा और तेजस्वी ४ ६ नं. ११७१ सूर्य की राशि पर बैठा है, इसलिये रोजगार के पक्ष में कठिन कठिनाईयाँ प्राप्त करके भी प्रभाव शक्ति पायेगा और बड़ी-बड़ी निराशाओं से टकरा-टकरा करके उन्नति का
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५८९ मार्ग प्राप्त करेगा तथा गुप्त युक्तियों तथा महान् धैर्य की शक्ति से गृहस्थ में शक्ति प्राप्त करेगा। कुम्भ लग्न में ८ राहु यदि कन्या का राहु- आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १२ १० तो पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि पायेगा तथा १ ११ ९ आयु के सम्बन्ध में अनेकों बार चिन्तायें प्राप्त २ ८ होंगी तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ परेशानियाँ रहेंगी और अष्टम स्थान का सम्बन्ध उदर से भी ३ ५ ७ होता है, इसलिये पेट के निचले हिस्से में कुछ ४ द रा. परेशानी रहेगी। किन्तु विवेकी बुध की मित्र राशि नं. ११७२ पर स्वक्षेत्र के समान बैठा है, इसलिये आयु में शक्ति देगा और पुरातत्व का कुछ लाभ करेगा तथा गुप्त विवेक की गहरी सूझ शक्ति के द्वारा जीवन का ढंग प्रभावशाली रूप में व्यतीत करेगा और अन्त में उन्नति रहेगी। कुम्भ लग्न में ९ राहु यदि तुला का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य
१२ १० स्थान एवं धर्म स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण १ ११ ९ भाग्य में कुछ परेशानी रहेगी तथा धर्म के स्थान २ ८ में कुछ कमजोरी रहेगी और भाग्य की उन्नति के मार्ग में अनेकों बार अड़चनें पड़ती रहेगी। किन्तु ३ ५ ७रा. परम चतुर आचार्य शुक्र की मित्र राशि पर बैठा ४ ६
नं. ११७३ है, इसलिये बड़ी जबरदस्त गहरी युक्ति और गुप्त चतुराई के द्वारा भाग्य की अच्छी उन्नति करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा। फिर भी किसी प्रकार से भाग्य के अन्दरूनी हिस्से में कुछ कमजोरी अनुभव करेगा। किन्तु भाग्य की उन्नति के लिये कठिन प्रयत्न करता रहेगा। कुम्भ लग्न में १० राहु यदि वृश्चिक का राहु- दसवें केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो १२ पिता के स्थान में बड़ा कष्ट एवं झंभट प्राप्त करेगा ११ ९ तथा राज-समाज के मार्ग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी २ ८ रा. और कारबार की उन्नति के रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाईयाँ रहेंगी। किन्तु गरम ग्रह मंगल की राशि ३ ५ ७ पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये उन्नति प्राप्त करने ४ ६ के लिये बड़ा कठिन और कठोर प्रयत्न करेगा नं. ११७४ तथा अनेकों संघर्ष प्राप्त करने के बाद उन्नति का
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५९० भृगु संहिता मार्ग प्राप्त करेगा और कभी-कभी इज्जत-आबरू की रक्षा करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा, किन्तु गुप्त शक्ति से सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ११ राहु यदि धन का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में १२ नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो १० आमदनी के मार्ग में बड़ी कमजोरी और कठिनाईयाँ १ ११ ९रा. रहेंगी तथा ग्यारहवें स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा २ ८ शक्तिशाली फल का दाता होता है, किन्तु यह नीच का होने के कारण कुछ अधिक लाभ की उन्नति न ३ ५ ७ करके थोड़ा लाभ प्राप्त करेगा तथा देवगुरु बृहस्पति ४ ६
नं. ११७५ के धन में बैठा है, इसलिये कुछ न्यूनता युक्त मान- सम्मान के मार्ग से आमदनी की शक्ति प्राप्त रहेगी; किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में बड़ी चिन्ता युक्त प्रणाली से तथा कुछ गुप्त युक्तियों के बल से सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में १२ राहु यदि मकर का राहु- बारहवें खर्च स्थान एवं १२ बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो १० रा. खर्च के मार्ग में बड़ी दिक्कतें रहेंगी और बाहरी १ ११ ९ स्थानों के सम्बन्ध में कुछ चिन्ताओं से टकराना २ ८ पड़ेगा तथा राहु के स्वाभाविक गुणों के कारणों से खर्च के लिये कभी-कभी विशेष चिन्तित होना ३ ५ ७ पड़ेगा, किन्तु दृढ़ ग्रह शनि की मित्र राशि पर होने ४ ६
नं. ११७६ के कारणों से खर्च की शक्ति को पाने के लिये कठोर प्रयत्न करेगा और प्रकट रूप में बड़ा खर्चीला बनेगा किन्तु अन्दरूनी तौर से खर्च के मार्ग में कुछ कमी का अनुभव करेगा और गुप्त युक्ति के बल से खर्चे की शक्ति तथा बाहरी स्थान की शक्ति पायेगा। कष्ट, कठिनकर्म, गुप्तशक्ति के अधिपति-केतु कुम्भ लग्न में १ केतु यदि कुम्भ का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान १२ में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो कठोर ग्रह १० १ की राशि पर कठोर ग्रह बैठा है, इसलिये बड़े ११ के स्वभाव के द्वारा कार्य करेगा तथा व्यक्तित्व की २ ८ उन्नति पाने के लिये महान् कठिन कर्म करेगा ३ और कभी-कभी देह में कोई चोट या घाव प्राप्त ५ ७ करेगा तथा देह की सुन्दरता और सुडौलता में ४ ६
नं. ११७७ कुछ कमी रहेगी, किन्तु अपने अन्दर की कुछ
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५९१ कमी के होते हुए भी प्रकट में बड़ी हिम्मत और गुप्त शक्ति के द्वारा उन्नति की तरफ बढ़ता रहेगा और कोई महान् संकट आने पर भी धैर्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा तथा किसी विशेष कार्य के द्वारा प्रभाव की स्थिर शक्ति प्राप्त करके मान और गौरव पायेगा। कुम्भ लग्न में २ केतु यदि मीन का केतु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब १२के १० स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो धन के
१ ११ कोष में बड़ी भारी कमी और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब स्थान में क्लेश और २ ८ झंझट रहेगा तथा धन पूर्ति करने के लिये महान् ३ ५ ७ कठिन कर्म करेगा, किन्तु देवगुरु बृहस्पति की ४ ६ राशि पर केतु बैठा है, इसलिये आदर्श वादिता के मार्ग से धन की प्राप्ति का साधन रहेगा और कभी-कभी कर्ज के द्वारा बड़ी समझदारी से धन के क्षेत्र की पूर्ति करके नं. ११७८
कार्य संपादन करेगा, किन्तु जीवन में कभी-कभी धन के पक्ष से महान् संकट का योग बनने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति से सफलता का मार्ग प्राप्त करेगा तथा धन की शक्ति को, सुचारू रूप में प्राप्त करने के लिये सदैव भारी प्रयत्न करता रहेगा। कुम्भ लग्न में ३ केतु यदि मेष का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम
१२ १० के स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो १ के ११ ९ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम स्थान से महान् २ V सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और बड़ी जबरदस्त ३ ५ ७ हिम्मत शक्ति से उद्योग करता रहेगा तथा गरम ६ ग्रह मंगल की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये कठिन से कठिन कष्ट साध्य कर्म को करके भी उन्नति का मार्ग पकड़े रहेगा और गुप्त शक्ति के बल से प्रभाव रखेगा तथा नं. ११७९
केतु के स्वाभाविक गुण के कारण भाई-बहिन के पक्ष में कष्ट और हानि का योग पायेगा तथा कभी-कभी आन्तरिक रूप से हिम्मत शक्ति बिल्कुल टूट जाने पर भी प्रकट में हिम्मत नहीं हारेगा और अन्त में पुनः शक्ति सम्पन्नता प्राप्त करेगा। यदि वृषभ का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण माता के स्थान में कुछ हानि या परेशानी का योग प्राप्त करेगा तथा मातृभूमि और मकानादि
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५९२ भृगु संहिता कुम्भ लग्न में ४ केतु के सुखों में कमी रहेगी और घरेलू वातावरण में १२ १० कुछ अशान्ति का योग प्राप्त रहेगा, किन्तु परम १ ११ ९ चतुर आचार्य शुक्रदेव की मित्र राशि पर बैठा है, इसलिये घरेलू वातावरण के सुखों की प्राप्ति के २ के. ८ मार्ग में बड़ी भारी चतुराई की गुप्त शक्ति के द्वारा ३ ५ ७ सफलता पायेगा तथा भूमि मकानादि के सुखों की वृद्धि के लिये बड़ा कठिन परिश्रम करेगा ४ ६
नं. ११८० और सुख के साधनों में कुछ त्रुटि युक्त प्रभाव रहेगा। कुम्भ लग्न में ५ केतु यदि मिथुन का केतु- पञ्चम त्रिकोण विद्या १२ एवं संतान स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की १० राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में बड़ी भारी १ ११ ९ कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी और विद्या ग्रहण करने के २ लिये महान् कठिन परिश्रम करने पर भी विद्या के V क्षेत्र में कमजोरी रहेगी तथा संतान पक्ष में महान् ३के ५ ७ संकट प्राप्त होगा और संतान सुख प्राप्त करने के ४ लिये बड़े कष्ट साध्य कर्म के गुप्त प्रयोग करेगा, नं. ११८१ किन्तु विवेकी बुध की राशि पर केतु बैठा है और बुध अष्टमेश होने से दोषी हो गया है, इसलिये संतान पक्ष में कुछ त्रुटियुक्त ही वातावरण रहेगा और बुद्धि तथा वाणी के द्वारा सत्य और शील की विशेष कमी रहेगी तथा दिमाग में अशान्ति रहेगी। कुम्भ लग्न में ६ केतु यदि कर्क का केतु- छठे शत्रु स्थान में एवं झंझट स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है १२ १० तो केतु के स्वाभाविक गुण के कारण, शत्रु पक्ष १ ११ ९ से कुछ अशान्ति करेगा तथा ननसाल पक्ष में २ ८ कमी और कष्ट का योग बनावेगा, किन्तु छठे स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता ३ ५ ७ होता है, इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव ४ के. ६
नं. ११८२ रखेगा और मनोयोग के स्वामी चन्द्रमा की राशि पर बैठा है इसलिये मनोयोग की गुप्त शक्ति के द्वारा शत्रु पक्ष में विजय प्राप्त करेगा और बड़े भारी कठिन परिश्रम के द्वारा, प्रभाव की वृद्धि करने में सदैव तत्पर और कटिबद्ध रहेगा, किन्तु कभी-कभी शत्रु पक्ष से विशेष भय अनुभव होने पर भी प्रकट में हिम्मत नहीं हारेगा तथा गुप्त धैर्य की शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा। यदि सिंह का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में शत्रु
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५९३ कुम्भ लग्न में ७ केतु सूर्य की राशि पर बैठा है तो स्त्री पक्ष में महान् संकट प्राप्त करेगा तथा रोजगार के मार्ग में बड़ा १२ १० कष्ट साध्य कठिन कर्म के द्वारा काम करेगा और १ ११ कई बार रोजगार की महान् विफलताओं को प्राप्त २ ८ करने से रोजगार के मार्ग में परिवर्तन प्राप्त करेगा और गृहस्थ के संचालन क्षेत्र में बड़ी दिक्कतों ३ ५ के. ७ और कठिनाईयों से कार्य करेगा तथा गरम ग्रह ४ ६ सूर्य की राशि पर केतु बैठा है, इसलिये मूत्रेन्द्रिय नं. ११८३ में कुछ विकार रहेगा तथा स्त्री के स्वभाव में बड़ी तेजी रहेगी और स्त्री तथा रोजगार के पक्ष में घोर संकटों का योग पाने के बाद पुनः शक्ति प्राप्त होगी, किन्तु शक्ति मिलने पर भी कुछ असंतोष रहेगा। कुम्भ लग्न में ८ केतु यदि कन्या का केतु- आठवें आयु मृत्यु एवं
१२ १० पुरातत्व स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो बुध की कन्या राशि पर राहु या केतु स्वक्षेत्र १ ११ ९ के समान बलवान् माने जाते है।, इसलिये आयु २ ८ की वृद्धि करेगा किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण आयु स्थान पर मृत्यु तुल्य संकट अनेकों ३ ७ बार प्राप्त करेगा और जीवन के निर्वाह के सम्बन्धों ४ छ क. में चिन्तायें अनुभव करेगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध नं. ११८४ में अनेकों बार हानियों के योग पायेगा तथा पुरातत्व का सामान्य लाभ प्राप्त रहेगा और विवेकी बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये जीवन की निर्वाहक शक्ति को पाने के लिये गुप्त विवेक की शक्ति से कठिन कर्म के द्वारा सफलता पायेगा। कुम्भ लग्न में ९ केतु यदि तुला का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है १२ १० तो भाग्य के स्थान में कुछ चिन्तायें प्राप्त करेगा १ ११ ९ और भाग्योन्नति के मार्ग में महान् कठिन कर्म २ ८ और गुप्त शक्ति के योग से सफलतायें प्राप्त करेगा, किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्रदेव की राशि पर ३ ५ ७के मित्र रूप में बैठा है, इसलिये बड़ी भारी चतुराई ४ ६ और कठिन परिश्रम के योग से सफलता शक्ति नं. ११८५ प्राप्त करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण भाग्य और धर्म के पक्ष में कुछ गुप्त कमजोरियाँ रहेंगी और कभी- कभी भाग्य स्थान में घोर निराशाओं का सामना करने की स्थिति पाने पर भी गुप्त धैर्य की शक्ति से सफलतायें पायेगा तथा भाग्य स्थान में फिर भी भृ. सं. -३८
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५९४ भृगु संहिता कुछ त्रुटि अनुभव करेगा। कुम्भ लग्न में १० केतु यदि वृश्चिक का केतु- दशम केन्द्र पिता एवं राज्यस्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो १२ १० पिता स्थान में बड़ा कष्ट प्राप्त करेगा तथा राज- १ ११ ९ समाज में परेशानियों के कारण पायेगा और २ ८ के. कारबार के मार्ग में बड़ा कठिन परिश्रम करेगा और गरम ग्रह मंगल की राशि पर केतु बैठा है, ३ ५ ७ इसलिये उन्नति और मान की वृद्धि करने के लिये ४ गुप्त शक्ति के बल से महान् कठिन प्रयत्न करेगा नं. ११८६ तथा उन्नति के मार्ग में अनेकों बार विफलतायें प्राप्त करने पर भी अन्त में शक्ति प्राप्त करेगा, किन्तु अपनी आन्तरिक स्थिति के दायरे में कुछ ऐसी कमजोरी पायेगा; जिसके कारण कुछ गुप्त' दुःख का अनुभव करेगा परन्तु उत्साह पूर्वक उन्नति के मार्ग में लगा रहेगा। कुम्भ लग्न में ११ केतु यदि धन का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में १२ १० बड़ी भारी शक्ति प्राप्त करेगा और ग्यारहवें स्थान १ ११ ९के. पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता २ ८ है, इसलिये बड़ा भारी नफा खाने का कार्य करेगा तथा कभी-कभी मुफ्त का-सा धन लाभ भी ३ ५ ७ पाता रहेगा और देवगुरु बृहस्पति के घर में उच्च ४ ६ का होकर बैठा है, इसलिये आशीर्वाद की उच्चतम नं. ११८७ प्रणाली से बहुत अधिक धन पैदा करेगा तथा आमदनी के मार्ग में अधिक से अधिक उन्नति करने का सदैव भारी प्रयत्न करता रहेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी। कुम्भ लग्न में १२ केतु यदि मकर का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्चा १२ १० क अधिक करेगा तथा खर्चे के मार्ग में कुछ कष्ट १ ११ ९ अनुभव करेगा और खर्च की शक्ति को पाने के २ ८ लिये गुप्त शक्ति के बल का प्रयोग भी करेगा तथा कठोर गरम ग्रह शनि की राशि पर केतु बैठा ३ ५ ७ है, इसलिये बाहरी सम्बन्धों में शक्ति पाने के लिये ४ ६ तथा खर्च संचालन की शक्ति के लिये महान् कठिन परिश्रम का कर्म करेगा और अनेकों बार निराशाओं से टकरा-टकरा करके भी अन्त में खर्च की और बाहरी सम्बन्धों नं. ११८८
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कुम्भ लग्न का फलादेश ५९५ की शक्ति को प्राप्त करेगा और विशेष प्रयत्न करते रहने पर भी इस मार्ग में अन्दरूनी कुछ कमजोरी महसूस करेगा।
१२ ११ १०
१ ९
२ ८
३ ७
५ ४ ६
।। कुम्भ लग्न समाप्त ।।
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५९६ भृगु संहिता मीन लग्न का फलादेश प्रारम्भ
१ १२ ११
२ १०
३ ९
४ ८
५ ७
नवग्रहों द्वारा भाग्य फल (कुण्डली नं० १२९६ तक में देखिये) प्रिय पाठकगण! ज्योतिष के गम्भीर विषय को अति सरल और सत्य रूप में जानने के लिये यह अनुभव सिद्ध विषय आपके सम्मुख रख रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का दो प्रकारों से असर होता रहता है। अर्थात् जन्म कुण्डली के अन्दर-जन्म के समय नवग्रह जिस- जिस स्थान पर जैसा-जैसा अच्छा बुरा भाव लेकर बैठे होते हैं उनका फल समस्त जीवन भर, जीवन के एक तरफ हमेशा होता रहता है और दूसरी तरफ नवग्रहों द्वारा हमेशा पंचांग-गोचर गति के अनुसार राशि परिवर्तन करते रहने के कारणों से हर एक लग्न वालों पर भिन्न-भिन्न रूप से अच्छा बुरा असर जीवन के दूसरी तरफ होता रहता है। अतः इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन और भाग्य की पूरी-पूरी जानकारी करने के लिए प्रथम तो अपनी जन्म कुण्डली नं० ११८९ से लेकर कुण्डली नं० १२९६ तक के अन्दर जो-जो ग्रह जहाँ बैठा हो उससे मालूम कर लेना चाहिये और दूसरे पंचांग के अन्दर जो ग्रह जिन-
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मीन लग्न का फलादेश ५९७ जिन राशियों पर चलता बदलता है उसका फलादेश प्रथम के नवग्रहों वाले नौ पृष्ठों से मालूम करते रहना चाहिए। अतः दोनों प्रकारों से फलादेश मालूम करते रहने से आपको समस्त जीवन का नक्शा तथा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान आपके सामने सदैव दिखलाई देता रहेगा। नोट- जन्म कुण्डली के अन्दर बैठे हुए नव ग्रहों में से जो कोई ग्रह २७ अंश से ऊपर होता है या ३ अंश के भीतर होता है या सूर्य से अस्त होता है तो इन तीनों कारणों से ग्रह कमजोर होने की वजह से अपनी भरपूर शक्ति के अनुसार पूरा फल प्रदान नहीं कर पाता है। जन्म कुण्डली के अन्दर जहाँ-जहाँ जिन-जिन स्थानों में यदि कोई ग्रह बैठा होगा तो उस पर भी उसका असर फल लागू समझा जायेगा। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-सूर्यफल आपकी जन्म कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० ११८९ से १२०० तक में देखिये और सर्वदा कालीन सूर्य का फल निम्न प्रकार से देखिये। १२. जिस मास में सूर्य, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११८९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में सूर्य, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में सूर्य, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९२ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में सूर्य, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में सूर्य, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में सूर्य, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में सूर्य, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में सूर्य, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९७ के अनुसार मालूम करिये।
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५९८ भृगु संहिता ९. जिस मास में सूर्य, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में सूर्य, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. ११९९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में सूर्य, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२०० के अनुसार मालूम करिये। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर -चन्द्रफल आपकी जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस स्थान पर बैठा है उसका फलादेश कुण्डली नं० १२०१ से १२१२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन चन्द्रमा का फल निम्न प्रकार से देखिये। १२. जिस दिन चन्द्रमा, मीन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०१ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस दिन चन्द्रमा, मेष राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस दिन चन्द्रमा, वृषभ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस दिन चन्द्रमा, मिथुन राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस दिन चन्द्रमा, कर्क राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस दिन चन्द्रमा, सिंह राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस दिन चन्द्रमा, कन्या राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस दिन चन्द्रमा, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२०८ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस दिन चन्द्रमा, वृश्चिक राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२०९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस दिन चन्द्रमा, धनु राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२१० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस दिन चन्द्रमा, मकर राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२११ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस दिन चन्द्रमा, कुम्भ राशि पर हो, उस दिन का फलादेश कुण्डली नं. १२१२ के अनुसार मालूम करिये।
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मीन लग्न का फलादेश ५९९ (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-मंगलफल आपकी जन्म कुण्डली में मंगल जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२१३ से १२२४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन मंगल का फल निम्न प्रकार से देखिये। १२. जिस मास में मंगल, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में मंगल, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में मंगल, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में मंगल, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में मंगल, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में मंगल, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में मंगल, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२१९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में मंगल, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२० के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में मंगल, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में मंगल, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२२ के अनुंसार मालूम करिये। १०. जिस मास में मंगल, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में मंगल, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२४ के अनुसार मालूम करिये। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-बुधफल आपकी जन्म कुण्डली में बुध जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२२५ से १२३६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन बुध का फल निम्न प्रकार से देखिये।
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६०० भृगु संहिता १२. जिस मास में बुध, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में बुध, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में बुध, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में बुध, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस मास में बुध, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२२९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में बुध, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में बुध, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में बुध, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में बुध, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में बुध, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में बुध, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में बुध, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२३६ के अनुसार भालूम करिये। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-गुरुफल आपकी जन्म कुण्डली में गुरु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२३७ से १२४८ तक में देखिये और सर्वदा कालीन गुरु का फल निम्न प्रकार से देखिये। १२. जिस वर्ष में गुरु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२३७ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में गुरु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२३८ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में गुरु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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मीन लग्न का फलादेश ६०१ कुण्डली नं. १२३९ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में गुरु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४० के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में गुरु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४१ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में गुरु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४२ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में गुरु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४३ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में गुरु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४४ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में गुरु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४५ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में गुरु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४६ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में गुरु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४७ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में गुरु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२४८ के अनुसार मालूम करिये। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शुक्रफल आपकी जन्म कुण्डली में शुक्र जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२४९ से १२६० तक में देखिये और सर्वदा कालीन शुक्र का फल निम्न प्रकार से देखिये। १२. जिस मास में शुक्र, मीन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२४९ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस मास में शुक्र, मेष राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५० के अनुसार मालूम करिये। २. जिस मास में शुक्र, वृषभ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५१ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस मास में शुक्र, मिथुन राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५२ के अनुसार मालूम करिये। जिस मास में शुक्र, कर्क राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५३ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस मास में शुक्र, सिंह राशि पर हो, उस मास का फलादेश
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६०२ भृगु संहिता कुण्डली नं. १२५४ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस मास में शुक्र, कन्या राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५५ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस मास में शुक्र, तुला राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५६ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस मास में शुक्र, वृश्चिक राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५७ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस मास में शुक्र, धनु राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५८ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस मास में शुक्र, मकर राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२५९ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस मास में शुक्र, कुम्भ राशि पर हो, उस मास का फलादेश कुण्डली नं. १२६० के अनुसार मालूम करिये। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-शनिफल आपकी जन्म कुण्डली में शनि जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२६१ से १२७२ तक में देखिये और सर्वदा कालीन शनि का फल निम्न प्रकार से देखिये। १२. जिस वर्ष में शनि, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६१ के अनुसार मालृम करिये। १. जिस वर्ष में शनि, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६२ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में शनि, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६३ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में शनि, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६४ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में शनि, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६५ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में शनि, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६६ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में शनि, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६७ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में शनि, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६८ के अनुसार मालूम करिये।
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मीन लग्न का फलादेश ६०३ ८. जिस वर्ष में शनि, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२६९ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७० के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में शनि, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७१ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में शनि, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७२ के अनुसार मालूम करिये। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-राहुफल आपकी जन्म कुण्डली में राहु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२७३ से १२८४ तक में देखिये और सर्वदा कालीन राहु का फल निम्न प्रकार से देखिये। 1 १२. जिस वर्ष में राहु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७३ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में राहु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७४ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में राहु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७५ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में राहु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७६ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में राहु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७७ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में राहु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७८ के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में राहु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२७९ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में राहु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८० के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में राहु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८१ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में राहु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८२ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में राहु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश
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६०४ भृगु संहिता कुण्डली नं. १२८३ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में राहु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८४ के अनुसार मालूम करिये। (१२) मीन लग्नवालों को समस्त जीवन के लिये जीवन के दोनों किनारों पर-केतुफल आपकी जन्म कुण्डली में केतु जिस स्थान पर बैठा है तो उसका फलादेश कुण्डली नं० १२८५ से १२९६ तक में देखिये और सर्वदा कालीन केतु का फल निम्न प्रकार केतुसे देखिये। १२. जिस वर्ष में केतु, मीन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८५ के अनुसार मालूम करिये। १. जिस वर्ष में केतु, मेष राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८६ के अनुसार मालूम करिये। २. जिस वर्ष में केतु, वृषभ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८७ के अनुसार मालूम करिये। ३. जिस वर्ष में केतु, मिथुन राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८८ के अनुसार मालूम करिये। ४. जिस वर्ष में केतु, कर्क राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२८९ के अनुसार मालूम करिये। ५. जिस वर्ष में केतु, सिंह राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९० के अनुसार मालूम करिये। ६. जिस वर्ष में केतु, कन्या राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९१ के अनुसार मालूम करिये। ७. जिस वर्ष में केतु, तुला राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९२ के अनुसार मालूम करिये। ८. जिस वर्ष में केतु, वृश्चिक राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९३ के अनुसार मालूम करिये। ९. जिस वर्ष में केतु, धनु राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९४ के अनुसार मालूम करिये। १०. जिस वर्ष में केतु, मकर राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९५ के अनुसार मालूम करिये। ११. जिस वर्ष में केतु, कुम्भ राशि पर हो, उस वर्ष का फलादेश कुण्डली नं. १२९६ के अनुसार मालूम करिये।
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मीन लग्न का फलादेश ६०५
शत्रु, प्रभाव तथा परिश्रमस्थानपति-सूर्य मीन लग्न में १ सूर्य यदि मीन का सूर्य- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह में प्रभाव १ ११ की शक्ति पायेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय प्राप्त २ १२ सू. १० करेगा और षष्ठेश होने के दोष के कारण से देह में
३ ९ कुछ रक्तविकार और कुछ रोग प्राप्त करेगा तथा प्रभाव की वृद्धि करने के लिये अधिक दौड़ धूप ४ ६ ८ और परिश्रम करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री ५ ७ एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में नं. ११८९ देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ झंझटों से युक्त प्रभाव की शक्ति पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ अधिक परिश्रम की शक्ति से सफलता पायेगा तथा गृहस्थ में कुछ परेशानी रहेगी। मीन लग्न में २ सूर्य यदि मेष का सूर्य- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में उच्च का होकर मित्र मंगल की राशि पर १ सू. ११ बैठा है तो प्रभावशाली परिश्रम के योग से धन २ १२ १० की वृद्धि के कारण प्राप्त करेगा और धन की ३ ९ संग्रह शक्ति के द्वारा प्रभाव की वृद्धि होगी तथा कुटुम्ब के स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और विशेष ४ ६ ८ प्रयत्नशील रहने के कारण इज्जत बढ़ेगी और ५ ७ सातवीं नीच दृष्टि से शत्रु शुक्र की तुला राशि में नं. ११९० आयु एवं पुरातत्व स्थान को देख रहा है, इसलिये जीवन को दिनचर्या और आयु के पक्ष में कुछ थोड़ी शनी रहेगी और पुरातत्व शक्ति के लाभ में कुछ कमजोरी रहेगी। मीन लग्न में ३ सूर्य यदि वृषभ का सूर्य- तीसरे भाई एवं पराक्रम के स्थान में शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो १ ११ भाई बहिन के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता प्राप्त २सू. १२ १० करेगा, किन्तु तीसरे स्थान पर गरम ग्रह शक्तिशाली ३ ९ फल का दाता होता है, इसलिये महान् पराक्रम शक्ति प्राप्त करेगा और महान् परिश्रम के योग से ४ ६ ८ महान् प्रभाव प्राप्त करेगा तथा शत्रु पक्ष में विजय ५ ७ पायेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से पुरुषार्थ शक्ति में एवं भ्रातृ शक्ति में कुछ परेशानी प्राप्त होगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक नं. ११९१ राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम और प्रभाव के द्वारा भाग्य की वृद्धि करेगा, धर्म की नहीं।
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६०६ भृगु संहिता मीन लग्न में ४ सूर्य यदि मिथुन का सूर्य- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १ ११ तो घर बैठे सुख पूर्वक प्रभाव की वृद्धि प्राप्त २ १२ १० करेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से माता ३ सू. ९ के प्रेम सम्बन्ध में कमी रहेगा और घरेलू सुख शान्ति के अन्दर कुछ परेशानी के कारण प्राप्त होंगे ४ ६ तथा भूमि और मकानादि तथा रहने के स्थान में ५ ७ कुछ झंझटयुक्त वातावरण रहेगा और सातवीं मित्र नं. ११९२ दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं राज समाज के सम्बन्ध में प्रभाव प्राप्त करेगा तथा कारबार एवं मान प्रतिष्ठा की उन्नति के लिये विशेष प्रयत्न करेगा। मीन लग्न में ५ सूर्य यदि कर्क का सूर्य- पाँचवें त्रिकोण विद्या १ ११ एवं संतान स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर २ १२ १० बैठा है तो बुद्धि और वाणी में प्रभाव की शक्ति रहेगी तथा शत्रु पक्ष में बुद्धि योग द्वारा विजय -३ ९ पायेगा, किन्तु षष्ठेश होने के दोष कारण से संतान ४सू. ६ पक्ष में झंझट एवं कुछ बाधा प्राप्त होगी और ८ ५ ७ विद्या के ग्रहण करने में कुछ असुविधायें रहेंगी नं. ११९३ तथा दिमाग के अन्दर कुछ क्रोध और परेशानियाँ रहेंगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ दिक्कतें प्रतीत होंगी; किन्तु अधिक लाभ प्राप्त करने के लिये बुद्धि के द्वारा अधिक परिश्रम से सफलता पायेगा। मीन लग्न में ६ सूर्य यदि सिंह का सूर्य- छठें स्थान में स्वयं अपनी ११ राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो शत्रु स्थान में महान् १
२ प्रभाव और विजय प्राप्त करेगा तथा प्रभाव की १२ १० वृद्धि करने के लिये उग्र परिश्रम करेगा और अपने ३ ९ पक्ष को प्रबल रखने के लिये सदैव तत्पर रहेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में निर्भयता पूर्वक ४ ६ ८ ५सू ७ कार्य करेगा और रोगादिक पक्ष में बहुत कम
नं. ११९४ घिराव पायेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चे के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्धों में कुछ दिक्कतें रहेंगी और प्रभाव की रक्षा के कारण अधिक खर्च करने से कुछ अशान्ति प्रतीत होगी।
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मीन लग्न का फलादेश ६०७
मीन लग्न में ७ सूर्य यदि कन्या का सूर्य- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १ ११ है तो षष्ठेश होने के दोष के कारण स्त्री पक्ष में २ १२ १० कुछ वैमनस्यता युक्त प्रभावशक्ति पायेगा तथा
३ ९ स्त्री पक्ष में कुछ झंझट रहेगी और रोजगार के मार्ग में प्रभावशाली परिश्रम के योग से सफलता ४ ६ सू. ८ पायेगा, किन्तु रोजगार के लिये कुछ दौड़-धूप ५ ७ तथा कुछ परेशानियों के कार्य संचालन करना नं. ११९५ पड़ेगा और रोजगार तथा गृहस्थ की व्यावहारिक प्रणाली के प्रभाव से शत्रु पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ परेशानी के योग से प्रभाव शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ८ सूर्य यदि तुला का सूर्य- आठवें आयु उदर एवं पुरातत्व के स्थान में नीच का होकर शत्रु शुक्र की १ ११ राशि पर बैठा है तो आयु के स्थान में बड़ा संघर्ष २ १२ १० तथा निराशायें प्राप्त होंगी और पुरातत्व शक्ति के ९ सम्बन्ध में हानि और कमजोरी रहेगी तथा जीवन की दिनचर्या में शत्रु पक्ष के द्वारा बड़ी परेशानियाँ ६ ८ x0 प्रतीत होंगी तथा षष्ठेश होने के दोष के कारण से 4 ५ उदर में या उदर के नीचे के तरफ कोई रोग रहेगा नं. ११९६ तथा ननसाल पक्ष में कमजोरी रहेगी और सातवीं उच्च दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मित्र मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन के कठिन परिश्रम के द्वारा धन और कुटुम्ब की वृद्धि का विशेष प्रयत्न करेगा। मीन लग्न में ९ सूर्य यदि वृश्चिक का सूर्य- नवम त्रिकोण भाग्य
११ एवं धर्म स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है १ तो भाग्य की शक्ति से शत्रु स्थान में विजय एवं २ १२ १० सफलता प्राप्त करेगा और स्वतः प्रभाव की शक्ति ३ ९ प्राप्त रहेगी, किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण भाग्य की उन्नति में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा कुछ ४ ६ सू ५ परिश्रमी प्रभावशाली कर्म से भाग्य की वृद्धि ७ होगी और धर्म के यथार्थ पालन में कुछ कमजोरी नं. ११९७ रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई के पक्ष में कुछ विरोध रहेगा, पराक्रम स्थान में कुछ परिश्रम और कुछ झंझटों के द्वारा
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६०८ भृगु संहिता प्रभाव और हिम्मत की वृद्धि तथा शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में १० सूर्य यदि धन का सूर्य- दसवें केन्द्र पिता एवं ११ राज्य स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो १ शत्रु पक्ष में महान् प्रभाव की शक्ति प्राप्त करेगा २ १२ १० तथा प्रभावशाली परिश्रम के योग से कारबार में ३ ९ सू. तथा राज-समाज में उन्नति करेगा; किन्तु षष्ठेश होने के दोष के कारण से पिता स्थान में कुछ ४ ६ ८ वैमनस्यता पायेगा और कारबार, मान, प्रतिष्ठा ५ ७
नं. ११९८ आदि के मार्ग में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम और प्रभाव के योग से घरेलू वातावरण में कुछ शक्ति पायेगा और भूमि तथा माता के स्थान में कुछ झंझट युक्त प्रभाव रहेगा। मीन लग्न में ११ सूर्य यदि मकर का सूर्य- ग्यारहवें लाभ स्थान में
१ ११ शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें
१२ १० स्थान पर क्रूर ग्रह बड़ा शक्तिशाली फल का दाता २ स. होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कठिन ३ ९ परिश्रम के द्वारा विशेष सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और शत्रु पक्ष में विजय लाभ प्राप्त करेगा तथा ४ ६ ८ षष्ठेश होने के दोष के कारण से लाभ के मार्ग में ५ ७
नं. ११९९ कुछ परेशानियाँ प्रतीत होंगी, किन्तु अधिक मुनाफा खाने का प्रयत्न करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या और संतान पक्ष में कुछ कठिनाई से सफलता प्राप्त करेगा। मीन लग्न में १२ सूर्य यदि कुम्भ का सूर्य- बारहवें खर्च एवं बाहरी १ ११सू. स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो शत्रु २ पक्ष के मार्ग में कुछ परेशानी-सी रहेगी और षष्ठेश १२ १० होने के दोष कारण से खर्च के संचालन में कुछ ३ ९ कठिनाईयाँ मिलेंगी और बाहरी स्थानों में कुछ दिक्कतों का सामना रहेगा तथा कुछ नीरसता के ४ ६ ८ योग से अधिक खर्च हो जायेगा और सातवीं दृष्टि ५ ७
नं. १२०० से शत्रु स्थान को स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्च के योग से शत्रु पक्ष के प्रभाव प्राप्त करेगा और प्रभाव की वृद्धि के लिये कठिनाईयाँ सहन करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी प्रभाव की जागृति होगी तथा कमजोर
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मीन लग्न का फलादेश ६०९ स्थिति के अन्दर भी क्रोध और अहंकार छिपा रहेगा। विद्या, संतान तथा मनस्थानपति-चन्द्र मीन लग्न में १ चन्द्र यदि मीन का चन्द्रमा- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो विद्या १ ११ का आदर्श ज्ञान प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में २ १२ चं. १० उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा और देह में सुन्दरता एवं ३ ९ कोमलता पायेगा तथा वृद्धि और मनोयोग की शक्ति से सुन्दर सम्मान एवं कीर्ति व ख्याति पायेगा ४ ६ ८ तथा मन के अन्दर आत्मिक शान्ति प्राप्त रहेगी ५ ७ तथा सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के नं. १२०१ स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में सुन्दरता पायेगा तथा रोजगार के पक्ष में वृद्धि तथा मन की शक्ति से उन्नति एवं सुन्दरता सफलता प्राप्त करेगा। मीन लग्न में २ चन्द्र यदि मेष का चन्द्र- धन एवं कुटुम्ब स्थान में
१चं. ११ मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो मन और बुद्धि
२ के योग से धन की सुन्दर शक्ति प्राप्त करेगा तथा १२ १० विद्या का अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और कुटुम्ब ३ ९ की सुन्दर शक्ति मिलेगी तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का-भी कार्य करता है, इसलिये संतान ४ ६ ८ पक्ष में भी कुछ परेशानी रहेगी, किन्तु विद्या और ७
नं. १२०२ संतान पक्ष से इज्जत भी प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी तथा मनोयोग के बल से पुरातत्व शक्ति का योग लाभ पायेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रसन्नता प्राप्त रहेगी। मीन लग्न में ३ चन्द्र यदि वृषभ का चन्द्र- भाई एवं पराक्रम स्थान में उच्च का होकर सामान्य मित्र शुक्र की राशि १ ११ २चं पर बैठा है तो भाई-बहिन की शक्ति प्राप्त करेगा १२ १० तथा मनोबल का पुरुषार्थ शक्ति के द्वारा विद्या ३ ९ की विशेष सफलता पायेगा और संतान पक्ष की शक्ति का बल प्राप्त करेगा तथा मन और बुद्धि ४ ६ ८ के योग से बड़ी प्रसन्नता एवं हिम्मत शक्ति प्राप्त ५ ७ करेगा और बातचीत के अन्दर बड़ी तेजी एवं स्फूर्ति नं. १२०३ रहेगी तथा सातवीं नीच दृष्टि में भाग्य एवं धर्म
भृ. सं .- ३१
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६१० भृगु संहिता स्थान को मित्र मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि योग द्वारा भाग्य की उन्नति में रुकावटें पड़ेंगी और धर्म के पक्ष में मन की रुचि कमजोर रहेगी तथा सहनशीलता की कमी के कारण सुयश की भी कमी रहेगी। मीन लग्न में ४ चन्द्र यदि मिथुन का चन्द्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के सुख स्थान में मित्र बुध की राशि पर १ ११ बैठा है तो संतान पक्ष से सुख प्राप्त होगा तथा २ १२ १० माता के पक्ष में प्रसन्नता रहेगी और विद्या के द्वारा ३ चं. ९ सुख के अच्छे साधन बनेंगे तथा बुद्धि और वाणी के द्वारा मनोरंजन का व्यवहार रहेगा तथा भूमि- ४ ६ ८ मकानादिक रहने के स्थान में सुख प्राप्त होगा ५ ७ और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य व कारबार नं. १२०४ स्थान को गुरु की धनराशि में देख रहा है, इसलिये मनोयोग एवं बुद्धि के द्वारा कारबार में उन्नति करेगा तथा राजसमाज में मान प्राप्त होगा और पिता के अन्दर सहयोग का लाभ पायेगा और अनेकों प्रकार की उन्नति को सुखपूर्वक पायेगा। मीन लग्न में ५ चन्द्र यदि कर्क का चन्द्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १ ११ बैठा है तो मनोयोग की बलवान् शक्ति के द्वारा २ १२ १० विद्या की महानता प्राप्त करेगा तथा बोलचाल ३ ९ के अन्दर कोमलता युक्त विशेष वाक्यपटुता की शक्ति से काम करेगा और संतान पक्ष में सुन्दर ६ ८ शक्ति पायेगा तथा मन में मगन रहेगा और दिमाग ५ ७ के अन्दर स्थिरता रहेगी तथा विचारों में दूरदर्शिता नं. १२०५ एवं गम्भीरता रहेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कुछ नीरसता प्रतीत होते हुये भी आमदनी की वृद्धि के लिये मन और बुद्धि की शक्ति का विशेष प्रयोग करके सफलता पायेगा। मीन लग्न में ६ चन्द्र यदि सिंह का चन्द्र- छठें शत्रु एवं झंझट १ ११ स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो विद्या २ १२ १० ग्रहण करने में बड़ी दिक्कत रहेगी और मन तथा बुद्धि के अन्दर कुछ झगड़े झंझटों की तरफ से ३ बड़ी अशान्ति रहेगी और संतान पक्ष में कष्ट अनुभव ४ ६ ८ होगा तथा शत्रु पक्ष में मनोयोग एवं बुद्धि की ५ चं. ७ कोमल शक्ति के द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा नं. १२०६ विद्या की कमी के कारण कुछ दुःख अनुभव
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मीन लग्न का फलादेश ६११ होगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करने से कुछ दुःख प्रतीत होगा तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ नीरसता युक्त मार्ग के द्वारा शक्ति पायेगा। मीन लग्न में ७ चन्द्र यदि कन्या का चन्द्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं १ ११ रोजगार के स्थान में बैठा है तो बुद्धि और मनोयोग २ १२ १० की सुन्दर शक्ति से रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता पायेगा तथा स्त्री पक्ष में सुन्दरता एवं बुद्धिमत्ता ३ ९ पायेगा और गृहस्थ के अन्दर मनोरंजन एवं प्रसन्नता ४ ६ चं. ८ के सुन्दर साधन प्राप्त करेगा तथा संतान पक्ष में ५ सहयोग मिलेगा और विद्या स्थान की शक्ति के नं. १२०७ द्वारा उन्नति करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और योग्यता प्राप्त करेगा तथा मान-सम्मान की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा लौकिक एवं गृहस्थी के कार्यों की प्रवीणता और कुशलता मिलेगी। मीन लग्न में ८ चन्द्र यदि तुला का चन्द्र- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर ११ बैठा है तो विद्या को प्राप्त करने में बड़ी परेशानी २ १२ १० और कमजोरी रहेगी तथा संतान पक्ष में कष्ट अनुभव ३ ९ होगा और मन तथा बुद्धि में अशान्ति रहेगी, किन्तु पुरातत्व संबंध में मन की शक्ति से उन्नति एवं ४ ६ ८ लाभ रहेगा तथा आयु में शक्ति मिलेगी और जीवन 4 ७चं. की दिनचर्या में शानदारी तथा प्रभाव रहेगा और नं. १२०८ सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये मन और बुद्धि के योग से धन की वृद्धि करने के बहुत साधन बनायेगा और कुटुम्ब के पक्ष में विशेष दिलचस्पी रखेगा। मीन लग्न में ९ चन्द्र यदि वृश्चिक का चन्द्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में नीच का होकर मित्र मंगल की १ ११ राशि पर बैठा है तो विद्या स्थान में कुछ कमजोरी २ १२ १० मिलेगी तथा संतान पक्ष के सुख में कमी एवं ३ ९ कुछ परेशानी रहेगी और बुद्धि तथा मन की कमजोरी के कारण भाग्य की उन्नति के मार्ग में ४ ६ ८चं. रुकावटें रहेंगी और धर्म का यथार्थ पालन नहीं ५ ७ कर सकेगा और माग्य के पक्ष से मन में चिन्तित नं. १२०९ रहना पड़ेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से भाई एवं
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६१२ भृगु संहिता पराक्रम स्थान को उच्च दृष्टि से सामान्य मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन की शक्ति मिलेगी तथा पुरुषार्थ शक्ति पर बड़ा भारी भरोसा और हिम्मत शक्ति प्राप्त रहेगी। मीन लग्न में १० चन्द्र यदि धनु राशि का चन्द्र- दसम केन्द्र पिता, १ ११ राज-समाज तथा कार-बार के स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो मनोयोग की शक्ति से २ १२ १० विद्या स्थान में बहुत सफलता प्राप्त करेगा तथा ३ ९ चं. सन्तान पक्ष की उत्तम शक्ति मिलेगी और पिता की शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त करेगा तथा मनोयोग ४ ६ ८ और बुद्धिबल के द्वारा कार-बार में बड़ी उन्नति ५ ७
नं. १२१० करेगा तथा राज-समाज में मान-प्रतिष्ठा और इज्जत रहेगी और कानून कायदे का माननेवाला स्वाभिमानी बनेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि के द्वारा घरेलू सुख और भूमि मकानादि की शक्ति का सहयोग तथा माता का सुख प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ११ चन्द्र यदि मकर का चन्द्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में 1 शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो मनोयोग १ ११ २ १० के कुछ कठिन मार्ग से विद्या की सफलता प्राप्त १२ चं.। करेगा तथा संतान शक्ति प्राप्त रहेगी और बुद्धि ३ ९ तथा मनोबल की योग शक्ति से धनलाभ की आमदनी खूब प्राप्त रकेगा और आमदनी की वृद्धि ४ ६ ८ करने का सदैव चिन्तन एवं मनन करता रहेगा, ५ ७ किन्तु शत्रु राशि पर होने के कारण मन के अन्दर नं. १२११ आमदनी एवं सन्तान पक्ष से कुछ असन्तोष रहेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को स्वयं अपनी कर्क राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि और संतान पक्ष के सम्बन्धों में सदैव उन्नति का ध्यान रखेगा तथा स्वार्थयुक्त बातें कहेगा। मीन लग्न में १२ चन्द्र यदि कुम्भ का चन्द्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी १ ११ चं स्थान में शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो विद्या २ १२ १० स्थान में कमजोरी रहेगी और संतान पक्ष में हानि एवं कष्ट प्राप्त रहेगा तथा दिमाग में अशान्ति रहेगी ३ ९ और मनोयोग तथा बुद्धिबल के द्वारा खर्चा खूब ४ ८ करेगा और बाहरी स्थानों की सम्बन्ध शक्ति प्राप्त ५ ७ करेगा किन्तु शत्रु राशि पर होने से खर्च के मार्ग में नं. १२१२ तथा बाहरी स्थानों में कुछ मानसिक परेशानी अनुभव .⑈"
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मीन लग्न का फलादेश ६१३ करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये बुद्धि और वाणी की नरम शक्ति से शत्रुपक्ष में काम निकालेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में मनोयोग के द्वारा प्रभाव प्राप्त करेगा। धन, कुटुम्ब, भाग्य, धर्मस्थानपति-मंगल मीन लग्न में १ मंगल यदि मीन का मंगल- प्रथम केन्द्र देह स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के योग १ ११ से धन की शक्ति और इज्जत प्राप्त करेगा तथा २ १२ मं. १० कुटुम्ब का सुन्दर योग मिलेगा और भाग्य की ३ ९ उन्नति करेगा तथा बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा और यथासामर्थ्य धर्म का पालन करेगा तथा देह ४ ६ ८ से मान-सम्मान प्राप्त करेगा और चौथी मित्र दृष्टि ५ ७ से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन नं. १२१३ राशि में देख रहा है, इसलिये माता के स्थान से शक्ति पायेगा तथा भूमि और मकानादि एवं रहने के स्थानों में सुख सौभाग्य प्राप्त करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री स्थान में भाग्यवानी प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में भाग्य की शक्ति से धन की प्राप्ति करेगा तथा भाग्य के बल से ही गृहस्थ के अन्दर उन्नति के साधन पायेगा और आठवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये पुरातत्व सम्बन्ध में कोई विशेष शक्ति पायेगा और आयु स्थान में वृद्धि का योग प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में कुछ कठिनाई के साथ अमीरात का ढंग पायेगा। मीन लग्न में २ मंगल यदि मेष का मंगल- दूसरे धन एवं कुटुम्ब
१ मं. ११ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो धन का संग्रह शक्ति का सौभाग्य प्राप्त करेगा २ १२ १० और कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त रहेगी तथा बड़ा धनवान् ३ ९ माना जायेगा और चौथी नीच दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में ४ ६ ८ देख रहा है, इसलिये विद्या के पक्ष में कुछ कमजोरी 4 ७ रहेगी और संतान पक्ष में कुछ कष्ट प्राप्त रहेगा नं. १२१४ तथा बुद्धि के अन्दर कुछ परेशानी एवं चिन्ता के कारण रहेंगे और अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये वाणी के द्वारा कुछ कटु शब्दों का प्रयोग करेगा तथा सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुराशक्ति का लाभ पायेगा और जीवन की दिनचर्या
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६१४ भृगु संहिता में अमीरात की रहन-सहन पायेगा और आठवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये धन की शक्ति के द्वारा भाग्य की महान् उन्नति करेगा और बड़ा भारी भाग्यवान् समझा जायेगा तथा धर्म के पालन करने के मार्ग में कुछ स्वार्थ युक्त वातावरण के द्वारा धर्म के पालन का भी सदैव ध्यान रखेगा। मीन लग्न में ३ मंगल यदि वृषभ का मंगल- तीसरे पराक्रम एवं भाई के स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर ११ बैठा है तो तीसरे स्थान पर गरम ग्रह विशेष २मं. १२ १० शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम ३ स्थान की शक्ति के द्वारा विशेष सफलता एवं धन उन्नति प्राप्त करेगा तथा भाइ-बहिन की शक्ति ४ w ८ का उत्तम सहयोग प्राप्त करेगा और कुटुम्ब का ५ ७ सुन्दर सहयोग पायेगा और चौथी मित्र दृष्टि से नं. १२१५ शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य और पुरुषार्थं की शक्ति के द्वारा शत्रु स्थान में बड़ा प्रभाव प्राप्त करेगा तथा झगड़े झंझटों की कभी परवाह नहीं करेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये धन और पुरुषार्थ के द्वारा भाग्य की उन्नति पाकर भाग्यशाली कहलायेगा और धर्म के मार्ग में श्रद्धा भक्ति रखेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज-समाज व कारबार के स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता एवं कारबार के उन्नति करेगा और राज समाज में भाग्य की शक्ति से मान प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ४ मंगल यदि मिथुन का मंगल- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १ ११ तो धन कुटुम्ब का सुख सहयोग पायेगा तथा २ १२ १० भूमि और मकानादि सम्बन्धी भी धन की शक्ति ३ मं. ९ पायेगा तथा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म का पालन करेगा तथा चौथी मित्र दृष्टि से ४ ६ ८ स्त्री एवं रोजगार के स्थान की बुध की कन्या ५ ७ राशि में दो रहा है, इसलिये भाग्य और धन की नं. १२१६ शक्ति से रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता पायेगा और भाग्यवान् स्त्री का संयोग प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर अड़ी शोभा रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज-समाज को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में शक्ति पायेगा और राज- समाज में मान प्राप्त करेगा तथा कारबार में उन्नति रहेगी और आठवीं उच्च
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मीन लग्न का फलादेश ६१५ दृष्टि से लाभ के स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है इसलिये घर बैठे भाग्य की शक्ति से आमदनी का विशेष लाभ प्राप्त करेगा और अनेकों प्रकार के लाभ का संयोग सुलभता पूर्वक प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ५ मंगल यदि कर्क का मंगल- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में नीच का होकर मित्र चन्द्रमा १ ११ की राशि पर बैठा है तो संतान पक्ष में कमी और २ १२ १० कष्ट का योग पायेगा तथा विद्या के पक्ष में कमजोरी ३ ९ रहेगी और धन तथा कुटुम्ब की तरफ से चिन्ता और परेशानी के कारण रहेंगे तथा बुद्धि और ४ मं. ६ ८ विचारों के अन्दर भाग्य की दुर्बलता का ध्यान ५ ७
नं. १२१७ रहेगा और धर्म के पक्ष में श्रद्धा की कमजोरी रहेगी और चौथी दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये जीवन की दिनचर्या में एवं आयु पक्ष में प्रभाव रहेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ शक्ति प्राप्त रहेगी तथा सातवीं उच्च दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में वृद्धि एवं शक्ति पायेगा अर्थात् आमदनी की वृद्धि के लिये विशेष प्रयत्नशील रहेगा और आठवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक होने के कारण खर्च के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ नीरसता युक्त शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ६ मंगल यदि सिंह का मंगल- छठे शत्रु स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो शत्रु स्थान में भाग्य १ ११ की शक्ति से बड़ा भारी प्रभाव प्राप्त करेगा और २ १२ १० छठे स्थान में गरम ग्रह शक्तिशाली फल का द्योतक ३ ९ होता है, इसलिये नगद धन की कुछ कमी होते हुये भी धन का काम शानदारी से चलता रहेगा ४ ६ ८ और कुटुम्ब का थोड़ा प्रभाव रहेगा तथा परिश्रम ५ म. ७ और झंझट युक्त मार्ग के द्वारा धन की वृद्धि नं. १२१८ करेगा तथा चौथी दृष्टि से भाग्य स्थान एवं धर्म स्थान को स्वयं अपनी वृश्चिक राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाईयों के योग से भाग्य की वृद्धि एवं उन्नति करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और धम्र का थोड़ा पालन करेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शत्रु शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ नीरसता रहेगी तथा बाहरी स्थानों में कुछ अरुचि रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि
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६१६ भृगु संहिता में देख रहा है, इसलिये देह में मान-सम्मान और इज्जत प्राप्त करेगा तथा झगड़े-झंझट और परेशानियों के मार्ग में बड़ी निर्भयता से काम करेगा। मीन लग्न में ७ मंगल यदि कन्या का मंगल- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १ ११ है तो भाग्यशाली स्त्री का संयोग प्राप्त करेगा २ १२ १० तथा रोजगार के मार्ग से भाग्य की वृद्धि तथा ३ ९ रोजगार की विशेष सफलता शक्ति पायेगा और गृहस्थ के अन्दर धर्म पालन का भी ध्यान रखेगा ४ ६ मं. ८ तथा चौथी मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान ५ ७ को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये नं. १२१९ पिता की शक्ति मिलेगी और राज-समाज में मान और शक्ति पायेगा तथा कारबार के मार्ग में बड़ी उन्नति करेगा तथा लौकिक सफलतायें प्राप्त करने में बड़ी भारी कोशिश और कुदरती सहायताओं का योग पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में गौरव और मान प्रतिष्ठा एवं भाग्यवानी का योग प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये रोजगार और भाग्य की शक्ति के द्वारा धन की विशेष वृद्धि करेगा और कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ८ मंगल यदि तुला का मंगल- आठवें आयु मृत्यु एवं ११ पुरातत्व स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर १ बैठा है तो भाग्य की तरफ से कमजोरी प्राप्त २ १२ १० करेगा और धर्म का पालन सुचारू रूप से नहीं ३ ९ कर सकेगा तथा सुयश की कमी रहेगी और भाग्येश होने के कारण आयु की वृद्धि रहेगी तथा पुरातत्व ६ ८ सम्पत्ति का लाभ प्राप्त करेगा और चौथी उच्च ५ ७ मं. नं. १२२० दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष सफलताशक्ति पायेगा और अधिक नफा खाने का प्रयत्न करता रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इललिये धन का संग्रह करने के लिये विशेष परिश्रम सदैव करते रहकर धन की कुछ शक्ति पायेगा और कुटुम्ब की शक्ति का भी कुछ लाभ प्राप्त करेगा तथा आठवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध पायेगा तथा पराक्रम स्थान में परिश्रम के द्वारा सफलता शक्ति पायेगा।
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मीन लग्न में ९ मंगल यदि वृश्चिक का मंगल- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री १ ११ बैठा है तो भाग्य की महान् शक्ति प्राप्त करेगा २ २ १० और बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा तथा दैव ३ ९ के संयोग से धन और यश की प्राप्ति होगी अर्थात् भाग्य की शक्ति से धन की उन्नति पायेगा और ४ ६ ८मं. कुटुम्ब का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा चौथी 4 ७ शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की नं. १२२१ कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्च के मार्ग में कुछ नीरसता युक्त रूप से खर्च का संचालन रहेगा और बाहरी स्थानों में कुछ अरुचिकर रूप से सम्बन्ध रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये थोड़ी सी नीरसता के साथ भाई बहिन का योग पायेगा और पराक्रम स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा ओर आठवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता एवं भूमि मकानादि की सुख शक्ति का योग पायेगा। मीन लग्न में १० मंगल यदि धन का मंगल- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो १ ११ भाग्येश जहाँ बैठता है वहाँ उन्नति करता है, इसलिये २ १२ १० पिता स्थान की बड़ी उन्नति करेगा तथा राज- ३ ९ मं. समाज में बड़ा भारी प्रभुत्व और मान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में बड़ी तरक्की ४ ६ ८ प्राप्त होगी तथा भाग्य की शक्ति और दैव संयोग ५ ७ के द्वारा अनेकों प्रकार से धन और मान की वृद्धि नं. १२२२ तथा कुटुम्ब का उत्तम सहयोग प्राप्त होगा और धर्म कर्म का पालन करेगा और चौथी मित्र दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में प्रभाव और गौरव पायेगा तथा स्वाभिमान और इज्जत का बड़ा ध्यान रखेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से सुख एवं माता और भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि तथा घरेलू सुख प्राप्त करेगा और आठवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या में कुछ कमजोरी तथा संतान पक्ष में कुछ कमी और कष्ट के कारण पायेगा तथा दिमाग में कुछ परेशानी तथा शब्दों में कुछ नीरसता रहेगी। यदि मकर का मंगल- ग्यारहवें लाभ स्थान में उच्च का होकर शत्रु शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान पर गरम ग्रह विशेष लाभदायक
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६१८ भृगु संहिता मीन लग्न में ११ मंगल होता है इस पर भी यह उच्च का बैठा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में बड़ी जबरदस्त शक्ति पायेगा १ ११ और अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त करने में २ १२ १० मं. भाग्य शक्ति का विशेष सहयोग प्राप्त करेगा तथा ३ ९ बड़ा भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म का भी कुछ पालन करेगा तथा चौथी दृष्टि से धन एवं ६ ८ कुटुम्ब स्थान को स्वयं अपनी मेष राशि में स्वक्षेत्र ५ ७ को देख रहा है, इसलिये धन और कुटुम्ब को नं. १२२३ विशेष शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या स्थान में कुछ कमी रहेगी और सन्तान पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और आठवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में भाग्य की शक्ति से बड़ी सफलता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा बड़ी भारी हिम्मत रहेगी। मीन लग्न में १२ मंगल यदि कुम्भ का मंगल-बारहवें खर्च एवं बाहरी १ ११मं स्थान में शत्रु शनि की कुम्भ राशि में बैठा है तो खर्चा विशेष रहेगा और बाहरी स्थानों में शक्ति २ १२ १० प्राप्त करेगा और धन की संग्रह शक्ति में बड़ी ३ ९ भारी कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब के स्थान में हानि रहेगी और भाग्य के स्थान में उन्नति प्राप्त ४ ६ ८ करने के लिये बड़ी भारी परेशानी एवं अधिक ५ ७ दौड़-धूप करनी पड़ेगी और धर्म तथा सुयश की नं. १२२४ कमी रहेगी तथा चौथी दृष्टि से भाई-बहिन एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई के पक्ष में कुछ वैमनस्यतायुक्त रूप से शक्ति प्राप्त करेगा और पराक्रम की वृद्धि शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में प्रभाव पायेगा तथा बड़ी हिम्मत शक्ति के द्वारा कार्य करेगा और आठवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है इसलिये भाग्य की शक्ति और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से रोजगार के पक्ष में सफलता प्राप्त करेगा तथा स्त्री और गृहस्थ से भाग्यवानी पायेगा तथा खर्च के योग से उन्नति करेगा। स्त्री, रोजगार, माता, भूमिस्थानपति-बुध यदि मीन का बुध- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में नीच का होकर मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो देख की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य में कुछ कमी रहेगी और स्त्री तथा गृहस्थ के एवं मकानादि के सुख सम्बन्धों में तथा
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मीन लग्न में १ बुध माता के सुखों में कुछ कमी रहेगी तथा देह के अन्दर स्वाभिमान तथा गौरव और प्रभाव की कुछ १ ११ कमी के कारण आन्तरिक थोड़ा सा दुःख अनुभव २ १२ बु. १० होगा और सातवीं उच्च दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार ३ के स्थान को स्वयं अपनी कन्या राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह के परिश्रम के द्वारा ४ ६ ८ रोजगार की वृद्धि करेगा और स्त्री पक्ष में विशेष ५ ७ मान्यता और प्रभाव मानेगा। नं. ९२२५ यदि मेष का बुध- धन एवं कुटुम्ब स्थान में मीन लग्न में २ बुध मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो रोजगार के
११ मार्ग से विवेक के द्वारा सुख पूर्वक धन की वृद्धि १ बु. का योग प्राप्त करेगा तथा कुटुम्ब का सुख पायेगा। २ १२ १० भूमि और मकानादि की शक्ति का लाभ प्राप्त ३ होगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का-सा भी कार्य करता है, इसलिये माता और स्त्री के सुख ४ ६ ८ सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी, किन्तु गृहस्थ के ५ ७
नं. १२२६ पक्ष में कुछ इज्जत रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को, शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु और पुरातत्व का लाभ प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में आमोद प्रमोद रहेगा। मीन लग्न में ३ बुध यदि वृषभ का बुध- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो पराक्रम १ ११ स्थान से विशेष सफलता शक्ति पायेगा और भाई २बु १२ १० बहिन के पक्ष से सुन्दर सुख प्राप्त होगा तथा माता ३ एवं स्त्री की सुख शक्ति प्राप्त रहेगा। भूमि और मकानादि का सुन्दर योग रहेगा तथा पुरुषार्थ कर्म ४ ६ ८ के द्वारा रोजगार के पक्ष में बड़ी सफलता शक्ति ७ मिलेगी तथा घरेलू वातावरण में बड़ी हिम्म्त शक्ति नं. १२२७ रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा धर्म के पालन का प्रयास रखेगा तथा गृहस्थ में यश प्राप्त करेगा। यदि मिथुन का बुध- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो माता का विशेष सुख मिलेगा तथा भूमि मकानादि की उत्तम सुख शक्ति प्राप्त होगी और स्त्री पक्ष से बड़ा सुन्दर सुख मिलेगा तथा गृहस्थ में बड़ा आनन्द रहेगा और घर बैठे विवेक
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६२० भृगु संहिता मीन लग्न में ४ बुध शक्ति के बल से रोजगार की शक्ति प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान १ ११ को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये २ १२ १० पिता स्थान में सुख प्राप्त होगा और राज-समाज ३ बु. से मान प्रतिष्ठा एवं उन्नति का योग पायेगा तथा कारबार के मार्ग में उन्नति प्राप्त होगी, किन्तु बुध ४ ६ ८ विवेकी ग्रह है, इसलिये विवेक से सुख पायेगा। ५ ७ यदि कर्क का बुध- पाँचवें त्रिकोण विद्या नं. १२२८ मीन लग्न में ५ बुध एवं संतान स्थान में मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि पर बैठा है तो विवेकी ग्रह बुध के विद्या स्थान पर १ ११ बैठने से विशेष महत्ता और बढ़ गई। इसलिये २ १२ १० विद्या की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और बुद्धि के अन्दर बड़ी भारी योग्यता एवं गृहस्थ सम्बंधी ३ ९ कार्य कुशलता का ज्ञान पायेगा और वाणी के ४ बु. ६ ८ अन्दर बड़ा मिठास पायेगा और माता तथा स्त्री ५ ७ का सुख प्राप्त करेगा और मकान जायदाद का नं. १२२९ मान और सुख पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से आमदनी के स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये शान्ति पूर्वक बुद्धि के द्वारा धन की आमदनी का सुन्दर सुख योग प्राप्त करेगा और बड़ा विवेकी बनेगा। मीन लग्न में ६ बुध यदि सिंह का बुध-छठें शत्रु स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो स्त्री और माता के १ ११ पक्ष से सुख की कमी प्राप्त होगी और स्त्री एवं २ १२ १० माता से कुछ विरोध भावना रहेगी तथा गृहस्थ के ३ ९ सम्बन्ध में कुछ झंझट युक्त वातावरण से कार्य संचालन करेगा और भूमि मकानादि के सुख ४ ६ ८ सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और रोजगार के मार्ग ५ बु. ७ में कुछ विवेक युक्त परिश्रम की शक्ति से सफलता नं. १२३० पायेगा तथा शत्रु पक्ष में शान्ति पूर्वक काम निकालेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब करेगा और रोजगार के पक्ष से बाहरी वातावरण में अच्छा सम्बन्ध और सफलता पायेगा। यदि कन्या का बुध- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में उच्च का होकर स्वयं अपनी राशि में स्वक्षेत्री बैठा है तो स्त्री के पक्ष में महान् सुख और सुन्दरता प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर बड़ा भारी प्रभाव
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मीन लग्न का फलादेश ६२१
मीन लग्न में ७ बुध और जचाव रहेगा और रहने के स्थान भूमि मकानादि का सुख अच्छा मिलेगा तथा माता का १ ११ सुन्दर सहयोग पायेगा और रोजगार के मार्ग में २ १२ १० गम्भीर विवेक शक्ति के द्वारा घर बैठे विशेष
३ ९ सफलता प्राप्त करेगा और सातवीं नीच दृष्टि से देह के स्थान को मित्र गुरु की मनी राशि में देख ४ ६ बु. ८ रहा है, इसलिये देह में कमजोरी रहेगी तथा गृहस्थ ५ ७ संचालन की विशेषताओं के कारण से देह के नं. १२३१ स्वास्थ्य में लापरवाही रहेगी। मीन लग्न में ८ बुध यदि तुला का बुध- आठवें मृत्यु आयु एवं पुरातत्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है १ ११ १० तो स्त्री के सुख में विशेष कमी रहेगी और माता २ १२ की सुख सहायता में बड़ा घाटा रहेगा तथा गृहस्थ ३ ९ के संचालन मार्ग में बड़ी परेशानी रहेगी और रोजगार की सफलता के लिये दूसरे स्थानों का ४ ६ ८ सहयोग सम्बन्ध बनावेगा किन्तु पुरातत्व सम्बन्ध ५ ७ बु. में विवेक शक्ति से लाभ उठावेगा तथा आयु और नं. १२३२ दिनचर्या में प्रभाव एवं सुख शक्ति रहेगी और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल को मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि के लिये बड़ा प्रयत्नशील रहेगा और धन एवं कुटुम्ब की शक्ति का कुछ शेग प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ९ बुध यदि वृश्चिक का बुध- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है १ ११ तो माता का सुन्दर सहयोग एवं सुख पायेगा और २ १२ १० स्त्री के अन्दर सुन्दरता, सुशीलता और भाग्यवानी ३ ९ प्राप्त करेगा तथा भूमि और रहने के स्थान की सुन्दरता शक्ति पायेगा तथा गृहस्थ के सम्बन्ध में ४ ६ ८बु. धम्र का पालन करेगा और भाग्य की शक्ति से ५ ७ सुख समृद्धि प्राप्त करेगा और रोजगार के मार्ग में नं. १२३३ सफलता पूर्वक धन शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन का सुख प्राप्त करेगा तथा घर बैठे पुरुषार्थ की शक्ति से सफलता मिलेगी तथा हिम्मत और यश प्राप्त करेगा। यदि धनु राशि का बुध- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य-स्थान में मित्र गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता के सम्बन्ध से सुख शक्ति प्राप्त करेगा तथा
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६२२ भृगु संहिता मीन लग्न में १० बुध राज-समाज में मान और उन्नति रहेगी और कारबार रोजगार के मार्ग में बड़ी सफलता शक्ति पायेगा १ ११ तथा स्त्री स्थान में बड़ा प्रभाव प्राप्त करेगा और २ १२ १० गृहस्थ के हर एक मार्ग में विवेक शक्ति के द्वारा ३ ९ बु. बड़ी उन्नति पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को स्वयं अपनी मिथुन राशि में देख ४ ६ ८ रहा है, इसलिये माता की बड़ी उत्तम शक्ति पायेगा ५ ७ और भूमि का सुख पायेगा और भूमि मकानादि की नं. १२३४ मीन लग्न में ११ बुध शोभा का गौरव प्राप्त करेगा तथा वैभव युक्त रहेगा। यदि मकर का बुध- ग्यारहवें लाभ स्थान में १ २१ मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो माता एवं स्त्री २ १२ १० बू. पक्ष से बड़ा भारी सुख लाभ प्राप्त करेगा तथा रोजगार व्यापार के मार्ग से विवेक शक्ति के द्वारा ३ ९ बड़ी भारी आमदनी पैदा करेगा और गृहस्ध सम्बन्ध में उत्तम लाभ रहेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से ४ ६ ८ ५ ७ विद्या एवं सन्तान स्थान को चन्द्रमा की कर्क
नं. १२३५ राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या में बड़ी भारी सफलता करेगा तथा विवेक की शक्ति का स्वामी बुध जब बुद्धि स्थान को देख रहा है तो बुद्धि और वाणी से यश पायेगा। मीन लग्न में १२ बुध यदि कुम्भ का बुध- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो माता १ ११बु. के सुख में बड़ी हानि रहेगी और स्त्री पक्ष में सुख २ १२ १० सम्बन्धों की बड़ी कमजोरी रहेगी तथा मकानादि ३ ९ भूमि आदि को परेशानी मिलेगी अर्थात् घरेलू वातावरण में अशान्ति का सा योग रहेगा तथा ४ ६ ८ रोजगार के लिये दूसरे बाहरी स्थानों के सम्पर्क ५ ७ से कामयाबी पायेगा; किन्तु निजी स्थानों में हानि
रहेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख नं. १२३६ रहेगी तथा विवेक शक्ति के योग से खर्चा खूब
रहा है, इसलिये शान्ति युक्त दैनिक व्यावहारिक कुशलता के योग से शत्रु स्थान में कामयाबी पायेगा तथा धैर्य से काम करेगा। राज्य, पिता तथा देहस्थानपति-गुरु यदि मीन का गुरु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो देह के अन्दर बड़ा भारी प्रभाव और सुन्दरता पायेगा और पिता की शक्ति का उत्तम योग प्राप्त करेगा तथा राज-समाज में मान
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मीन लग्न में १ गुरु प्तिष्ठा प्राप्त करेगा और बड़े प्रभाव एवं गौरव के साथ कारबार करेगा तथा देहाधीश के स्वक्षेत्री १ ११ होने के कारण नाम एवं ख्याति प्राप्त होगी और २ १२ गु. १० पाँचवीं उच्च दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को ३ ९ मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये ऊँचे दर्जे की विद्या प्राप्त करेगा तथा वाणी और ४ ६ ८ बुद्धि के योग से यश प्राप्त करेगा तथा सन्तान ५ ७ पक्ष में विशेष शक्ति पायेगा और सातवीं मित्र नं. १२३७ दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये रोजगार में बड़ी सफलता शक्ति रहेगी और स्त्री पक्ष में सुन्दरता और प्रभाव प्राप्त करेगा तथा गृहस्थ के अन्दर .- मान तथा इज्जत रहेगी और नवमी मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की विशेष उन्नति प्राप्त करेगा और धर्म-कर्म का पालन करेगा तथा यश और बरक्कत पायेगा। मीन लग्न में २ गुरु यदि मेष का गुरु- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में मित्र मंगल की राशि पर बैठा है तो धन की १ गु. ११ संग्रह शक्ति का सुन्दर योग प्राप्त करेगा और २ १२ १० धनवान् और इज्जतदार समझा जायेगा तथा कुटुम्ब ३ ९ का महान् शक्ति का योग मिलेगा किन्तु धन का स्थान कुछ बन्धन का भी कार्य करता है, इसलिये ४ ६ ८ देह के स्वास्थ्य में कुछ परेशानी सी रहेगी और ५ ७ पाँचवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह नं. १२३८ राशि में देख रहा है, इसलिये अपने दैहिक कर्म के प्रभाव और धन की शक्ति से शत्रु स्थान में बड़ा प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े झंझटों के मार्ग में बड़े धैर्य से सफलता पायेगा तथा सातवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में कुछ शक्ति मिलेगी और पुरातत्व सम्बन्ध में कोई उन्नति एवं शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव रहेगा और नवमी दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं अपनी धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता की महान् शक्ति से उन्नति पायेगा और राज समाज से मान प्रतिष्ठा एवं इज्जत प्राप्त करेगा और कारबार की महानता के द्वारा धन की वृद्धि प्राप्त रहेगी। यदि वृषभ का गुरु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की राशि पर बैठा है तो पुरुषार्थ कर्म की शक्ति से उत्तम सफलता एवं मान सम्मान प्राप्त करेगा और अपने बाहुबल के कार्यों पर बड़ा भारी
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६२४ भृगु संहिता मीन लग्न में ३ गुरु भरोसा रखेगा और राज समाज में प्रभाव का योग प्राप्त करेगा तथा पिता एवं भाई बहिन के १ ११ २गु. सम्बन्ध में कुछ थोड़ा सा मतभेद युक्त शक्ति पायेगा १२ १० तथा कारबार के पक्ष में महानता और हिम्मत ३ ९ शक्ति से द्वारा उन्नति करेगा तथा पाँचवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की ४ ६ ८ कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये परिश्रम कर्म ५ ७ के द्वारा रोजगार के मार्ग में बड़ी उन्नति करेगा नं. १२३९ और स्त्री स्थान में आत्मशक्ति तथा प्रभाव का योग प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, डसलिये पुरुषार्थ कर्म के द्वारा भाग्य की बड़ी भारी उन्नति करेगा और धर्म कर्म का पालन करेगा तथा नवमी नीच दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी पायेगा। मीन लग्न में ४ गुरु यदि मिथुन का गुरु- चौथे केन्द्र माता एवं ११ भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है १ १२ १० तो माता की विशेष शक्ति का योग प्राप्त करेगा २ और भूमि और मकानादि की उत्तम शक्ति मिलेगी ३ गु. ९ तथा अपने स्थान में सुख पूर्वक मानयुक्त रहेगा और देह में सुन्दरता एवं प्रभाव रहेगा तथा घरेलू ४ ६ ८ ५ ७ वातावरण में सुख प्राप्ति के उत्तम साधन प्राप्त नं. १२४० होंगे और पाँचवीं दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति मिलेगी और पुरातत्व सम्बन्ध में कोई लाभ शक्ति का सहयोग पायेगा और सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता की शक्ति से उन्नति पायेगा तथा राज समाज में मान प्रतिष्ठा रहेगी और कारबार से सुख शक्ति पायेगा और नवमी शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा विशेष करेगा, किन्तु खर्चे के मार्ग में कुछ अरुचिकर वातावरण रहेगा और बाहरी स्थानों में कुछ नीरसतायुक्त मार्ग से विशेष सम्बन्ध रखेगा। यदि कर्क का गुरु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मित्र चन्द्रमा की राशि पर उच्च का होकर बैठा है तो विद्या स्थान में विशेष शक्ति प्राप्त करेगा तथा वाणी के द्वारा प्रभावशाली बोलने वाला बनेगा और संतान पक्ष में विशेष उत्तम शक्ति पायेगा तथा पिता स्थान की शक्ति
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मीन लग्न का फलादेश ६२५
मीन लग्न में ५ गुरु पायेगा और राज समाज में इज्जत और मान प्राप्त करेगा तथा कारबार के मार्ग में उन्नति पाने के १ ११ लिये विशेष प्रयत्नशील रहेगा और पाँचवीं मित्र २ १२ १० दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक ३ राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति करेगा तथा भाग्यवान् समझा जायेगा और धर्म 6 गु ६ ८ का पालन एवं ध्यान रखेगा तथा सातवीं नीच ५ ७ दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि नं. १२४१ में देख रहा है, इसलिये आमदनी के मार्ग में कमजोरी पायेगा तथा आमदनी के लिये कुछ लापरवाही करेगा और नवमी दृष्टि से देह के स्था को स्वयं अपनी मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर सुन्दरता और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करेगा और हृदय में स्वाभिमान एवं गौरव पायेगा तथा नाम प्रसिद्धता और इज्जत प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ६ गुरु यदि सिंह का गुरु- छठे स्थान में मित्र सूर्य की राशि पर बैठा है तो देह की सुन्दरता एवं १ ११ २ स्वास्थ्य में कुछ कमजोरी प्राप्त करेगा और कुछ १२ १० परतंत्रता युक्त एवं कुछ रोग युक्त रहेगा तथा कुछ ३ ९ परिश्रम की अधिकता के कारण शान्ति कम मिलेगी। किन्तु शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा ४ ६ ८ ५ गु. और पाँचवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को ७
नं. १२४२ स्वयं अपनी धनराशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में उन्नति करेगा तथा राज- समाज में मान प्राप्त करेगा और अपने दैहिक परिश्रम के योग से उन्नति प्राप्त करने के लिये सदैव तत्परता से काम करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता के योग से खर्च करेगा और बाहरी स्थानों में कुछ अरुचिकर रूप से सम्बन्ध रखेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहो है, इसलिये धन की वृद्धि करेगा तथा कुटुम्ब की कुछ उत्तम शक्ति पायेगा और विशेष परिश्रम के योग से मान प्रतिष्ठा और इज्जत प्राप्त करेगा। यदि कन्या का गुरु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो स्त्री स्थान में बड़ी सुन्दरता एवं प्रभाव और मानयुक्त आत्मीयता का योग प्राप्त करेगा तथा रोजगार के पक्ष में महान् शक्ति प्राप्त करेगा तथा पिता की शक्ति का उत्तम सहयोग पायेगा और राज-समाज में मान प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा कारबार की उन्नति के लिये भृ. सं. - ४०
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६२६ भृगु संहिता मीन लग्न में ७ गुरु विशेष प्रयत्न करेगा और पाँचवीं नीच दृष्टि से लाभ स्थान को शत्रु शनि की मकर राशि में देख ११ रहा है, इसलिये आमदनी और मुनाफा का हिस्सा २ १२ १० कमजोर रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से देह के स्थान ३ ९ को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये देह में सुन्दरता और सुडौलता प्राप्त ४ ६ गु. V करेगा तथा अच्छा स्वास्थ्य रहेगा और देह में मान ५ ७ प्रतिष्ठा प्रभाव और ख्याति तथा स्वाभिमान प्राप्त नं. १२४३ करेगा और नवमी दृष्टि से भाई एवं पुरुषार्थ स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ नीरसता युक्त मार्ग से भाई बहिन की शक्ति का अच्छा सहयोग पायेगा और पुरुषार्थ कर्म के पक्ष में कुछ अधिक परिश्रम करके सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ८ गुरु यदि तुला का गुरु- आठवें मृत्यु आयु एवं १ ११ पुरातत्व स्थान में सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि पर बैठा है तो पिता स्थान की तरफ से २ १२ १० परेशानी रहेगी और राज-समाज के सम्बन्ध में ३ मान प्रतिष्ठा की कमी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के लिये बड़ी कठिनाईयाँ प्राप्त होंगी और ४ ६ ८ देह की सुन्दरता एवं स्वास्थ्य में बड़ी कमजोरी ५ ७ गु रहेगी तथा दूसरे स्थान का सहवास पायेगा और पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ शक्ति प्राप्त करेगा और आयु स्थान में वृद्धि रहेगी तथा पाँचवीं शत्रु दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा अधिक होने के कारण कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से अरूचिकर मार्ग से शक्ति सम्पर्क स्थापित करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन की कुछ वृद्धि करेगा और कुटुम्ब का कुछ सुन्दर सहयोग पायेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता का और भूमि का कुछ सुन्दर सम्पर्क पायेगा तथा रहने के स्थान में कुछ सुख शक्ति प्राप्त करेगा। यदि वृश्चिक का गुरु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में मित्र मंगल की वृश्चिक राशि पर बैठा है तो भाग्य की महान् शक्ति का योग प्राप्त करेगा तथा बड़ा भाग्यशाली समझा जायेगा और धर्म कर्म का पालन करेगा तथा ईश्वर में निष्ठा और भक्ति पायेगा और राज-समाज के अन्दर मान प्रतिष्ठा एवं प्रभाव प्राप्त करेंगा तथा पिता स्थान की शक्ति का सुन्दर सहयोग पायेगा तथा कारबार के मार्ग में भाग्यबल से सफलता
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मीन लग्न का फलादेश ६२७
मीन लग्न में ९ गुरु प्राप्त करेगा और पाँचवीं दृष्टि से देह के स्थान को स्वयं अपनी मीन राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, १ ११ इसलिये देह में महान् सुन्दरता एवं प्रभाव की २ १२ १० शक्ति पायेगा और स्वाभिमान तथा आत्माभिमान
३ रखेगा और सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा ४ ६ जगु है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में कुछ नीरसतायुक्त ५ ७ भाव से अच्छा सम्बन्ध रखेगा और पराक्रम की नं. १२४५ सफलता शक्ति पायेगा तथा नवमी उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की महान् उत्तम शक्ति पायेगा और संतान पक्ष में बहुत उन्नति रहेगी तथा वाणी में कलात्मक शक्ति रहेगी। मीन लग्न में १० गुरु यदि धनु राशि का गुरु- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में स्वयं अपनी धनु राशि पर स्वक्षेत्री १ ११ बैठा है तो पिता स्थान की महान् उन्नति करेगा २ १२ १० तथा राज समाज में बड़ा भारी प्रभाव और मान ३ ९ गु. प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा तथा बड़ा ऊँचा आदर्शवाला कारबार करके सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और ४ ६ ८ देह के अन्दर सुन्दरता एवं प्रभुत्व की शक्ति रखेगा ५ ७ तथा स्वाभिमानी बनेगा और पाँचवीं मित्र दृष्टि से नं. १२४६ धन एवं कुटुम्ब स्थान को मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये बड़ी शानदारी के साथ धनु की उन्नति करेगा और कुटुम्ब का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा तथा बड़ा भारी इज्जतदार समझा जायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता की सुख शक्ति पायेगा और भूमि, मकानादि के सुख सम्बन्ध का सुन्दर सहयोग प्राप्त करेगा और रहने के स्थान में सजावट का ध्यान रखेगा तथा नवमी मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा भारी प्रभाव और विजय शक्ति पायेगा तथा झगड़े-झंझटों के मार्ग में बड़ी भारी धैर्य की शक्ति से सफलता पायेगा तथा बड़ी भारी बहादुरी एवं हिम्मत शक्ति रखेगा और हुकुमत रखेगा। यदि मकर का गुरु- ग्यारहवें लाभ स्थान में नीच का होकर शत्रु शनि की मकर राशि पर बैठा है तो आमदनी के मार्ग में बड़ी कमी रहेगी तथा देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कमजोरी रहेगी तथा पिता स्थान के लाभ सम्बन्धों में दिक्कतें रहेंगी और राज-समाज के पक्ष में मान प्रतिष्ठा की
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६२८ भृगु संहिता मीन लग्न में ११ गुरु कमी रहेगी तथा कारबार की उन्नति के मार्ग में बड़ी रुकावटें रहेंगी और देह के परिश्रम से थोड़ा १ ११ लाभ प्राप्त होगा और पाँचवीं दृष्टि से भाई एवं २ १२ ग. पराक्रम स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की वृषभराशि ३ ९ में देख रहा है इसलिये भाई-बहिन के पक्ष में कुछ थोड़ी-सी नीरसता के योग से अच्छा सम्बन्ध ४ ६ ८ बनायेगा और पुरुषार्थ कर्म के द्वारा शक्ति प्राप्त ५ ७ करेगा और सातवीं उच्च दृष्टि से विद्या एवं संतान नं. १२४७ स्थान को मित्र चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि में अच्छी शक्ति पायेगा तथा संतान पक्ष में कोई विशेष उन्नति का योग पायेगा और नवमी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री तथा रोज़गार के पक्ष में सुन्दरता और शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में १२ गुरु यदि कुम्भ का गुरु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में शत्रु शनि की कुम्भ राशि पर बैठा है तो १ ११गु. २ खर्चा विशेष करने के कारणों से परेशानी रहेगी १२ १० और देह के पक्ष में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता. ३ ९ की कमी रहेगी और पिता के सुख में कमी एवं कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और राज-समाज के ४ ६ V पक्ष में मान सम्मान की कमी रहेगी और कारबार ५ ७ के मार्ग में हानि एवं उन्नति में रुकावटें प्राप्त करेगा नं. १२४८ तथा पांचवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि की सुख शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ी दानाई से काम निकालेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग में धैर्य से काम करेगा तथा नवमी दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को सामान्य शत्रु शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु स्थान में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व सम्बन्ध में कोई सहायता शक्ति प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव प्राप्त करेगा। भाई, पराक्रम, आयु, पुरातत्वस्थानपति-शुक्र यदि मीन का शुक्र- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में उच्च का होकर सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह में सुन्दर सुडौलता एवं विशालता प्राप्त करेगा तथा उत्तम आयु पायेगा और भाई बहिन की विशेष शक्ति रहेगी तथा पराक्रम स्थान में शक्ति और हिम्मत की विशेषता रहेगी
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मीन लग्न का फलादेश ६२९
मीन लग्न में १ शुक्र तथा पुरातत्व स्थान में उत्तम शक्ति का लाभ प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में मस्ती और १ ११ आनन्द पायेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से स्त्री एवं २ १२ शु. १० रोजगार के स्थान को मित्र बुध की कन्या राशि में
३ ९ देख रहा है, इसलिये स्त्री के सुख में कमी एवं कुछ कष्ट का योग पायेगा और रोजगार के मार्ग ४ ६ ८ में कई प्रकारों से कभी-कभी कमजोरियाँ प्राप्त ५ ७ करेगा तथा गृहस्थ में कुछ असंतोष मानेगा। नं. १२४९ मीन लग्न में २ शुक्र यदि मेष का शुक्र- दूसरे धन एवं कुटुम्ब स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है
१ शु. ११ तो पुरुषार्थ की शक्ति के द्वारा धन कमाने का
२ विशेष प्रयत्न करेगा किन्तु अष्टमेश होने के दोष १२ १० के कारण धन की संग्रह शक्ति पूर्ण नहीं कर ३ ९ सकेगा तथा धन का स्थान कुछ बन्धन का सा
४ ६ ८ कार्य भी करता है, इसलिये भाई बहिन के पक्ष में ७ कुछ सुख की कमी रहेगी और सातवीं दृष्टि से
नं. १२५० आयु एवं पुरातत्व स्थान को स्वयं अपनी तुला राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि पायेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ बड़ी चतुराई और पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त करेगा तथा अमीरात के ढंग से दिनचर्या व्यतीत करेगा। मीन लग्न में ३ शुक्र यदि वृषभ का शुक्र- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो १ ११ भाइ की शक्ति पायेगा किन्तु अष्टमेश होने के २शु १२ १० दोष के कारण भाई बहिन के सुख सम्बन्धों में ३ ९ कुछ कमी या कुछ परेशानी रहेगी और पराक्रम स्थान की सफलता शक्ति पायेगा और आयु स्थान ४ ६ ८ में वृद्धि प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व की शक्ति का ५ ७ विशेष बल पायेगा और अपने बाहुबल के कार्यों नं. १२५१ से बड़ी हिम्मत तथा भरोसा प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य की उन्नति में कुछ थोड़ी सी दिक्कतों के योग से शक्ति पायेगा और धर्म के मार्ग में कुछ त्रुटियुक्ति वातावरण से धर्म का पालन करेगा। यदि मिथुन का शुक्र- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो अष्टमेश होने के दोष के कारण माता के सुख
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६३० भृगु संहिता मीन लग्न में ४ शुक्र सम्बन्धों में कुछ कमी रहेगी और घरेलू भूमि मकानादि की भी कुछ कमी रहेगी किन्तु आयु १ ११ की शक्ति प्राप्त होगी और पुरातत्व की शक्ति से २ १२ १० जीवन को सहायता और सुख मिलेगा और भाई- ३ शु. ९ बहिन का सहयोग पायेगा और पराक्रम की सफलता और चतुराई से सुख प्राप्त करेगा और ४ ६ ८ सातवीं दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को सामान्य ५ ७ शत्रु गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये नं. १२५२ पिता के सुख में कुछ कमी युक्त सम्बन्ध पायेगा और राज-समाज तथा कारबार के मार्ग में चतुराई और परिश्रम के योग से सफलता शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ५ शुक्र यदि कर्क का शुक्र- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में सामान्य मित्र चन्द्रमा की १ ११ कर्क राशि पर बैठा है तो बुद्धि स्थान पर चतुर २ १२ १० ग्रह शुक्र के बैठने से पुरातत्व सम्बन्धी विद्या की 3 ९ विशेष शक्ति प्राप्त होगी तथा वाणी में कलात्मक शैली रहेगी और आयु की शक्ति उत्तम रहेगी तथा ४ शु. ८ पुरुषार्थ की सफलता का योग बुद्धि द्वारा प्राप्त ५ ७
नं. १२५३ करेगा और भाई बहिन की शक्ति का योग अपने से छोटों में पायेगा और अष्टमेश होने के दोष के कारण से विद्या और संतान पक्ष में कुछ कमी प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से लाभ स्थान को शनि की मकर राशि में देख रहा है, इसलिये अपनी बल बुद्धि की योग्यता के द्वारा आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और अपने हर एक स्वार्थ की पूर्ति के लिये भारी प्रयत्न करेगा। मीन लग्न में ६ शुक्र यदि सिंह का शुक्र-छठें शत्रु स्थान एवं १ ११ परेशानी के स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो भाई बहिन के पक्ष में परेशानी और कष्ट का २ १२ १० योग रहेगा और अपने पुरुषार्थ कर्म के अन्दर ३ ९ कुछ परतन्त्रता का योग प्राप्त करेगा तथा आयु ४ ६ ८ और जीवन की दिनचर्या में अनेकों बार असंतोष ५शु. ७ प्राप्त होगा तथा पुरातत्व शक्ति की कुछ हानि नं. १२५४ ओर कमी रहेगी तथा अष्टमेश होने के दोष कारण से शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और चतुराई की शक्ति से अपना कार्य बना सकेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को शनि की कुम्भ राशि में देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब
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मीन लग्न का फलादेश ६३१ करेगा और बाहरी स्थानों का कुछ सम्बन्ध पायेगा। मीन लग्न में ७ शुक्र यदि कन्या का शुक्र- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में नीच का होकर मित्र बुध की १ ११ कन्या राशि पर बैठा है तो अष्टमेष होने के दोष २ १२ १० एवं नीच होने के दोष के कारण स्त्री के स्थान में ३ ९ एवं रोजगार के स्थान में परेशानियों के कारण प्राप्त करते हुए कुछ त्रुटि युक्त मार्ग से गृहस्थ का ४ ६ शु. ८ संचालन कर सकेगा और भाई-बहिन के पक्ष से ५ ७ कमी और कुछ क्लेश रहेगा तथा पुरुषार्थ कर्म नं. १२५५ के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और आयु तथा जीवन की दिनचर्या तथा पुरातत्व की तरफ से कुछ असंतोष प्रतीत होगा और सातवीं उच्च दृष्टि से देह के स्थान को सामान्य शत्रु गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह के अन्दर कुछ विशालता प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ८ शुक्र यदि तुला का शुक्र-आठवें आयु एवं पुरातत्व स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो १ ११ आयु स्थान में एवं पुरातत्व स्थान में विशेष शक्ति २ १२ १० प्राप्त करेगा तथा जीवन की दिनचर्या में प्रभाव ३ रहेगा किन्तु मृत्यु स्थान के दोष के कारण से भाई-बहिन के पक्ष से बड़ा असंतोष रहेगा और ४ ६ ८ पराक्रम जीवन में कुछ मस्ती और वेफिकरी का ५ ७ शु. नं. १२५६ भी योग प्राप्त करेगा और सातवीं दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को सामान्य शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये बड़ी शक्ति और चतुराई का प्रयोग करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष के कारण से धन और कुटुम्ब की सफलता के स्थान में कुछ परेशानी प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ९ शुक्र यदि वृश्चिक का शुक्र- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्म स्थान में सामान्य शत्रु मंगल की राशि १ ११ पर बैठा है तो आयु की उत्तम शक्ति प्राप्त करेगा २ १२ १० और पुरातत्व शक्ति का फायदा भाग्यबल से प्राप्त ३ करेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से भाग्य की उन्नति में कुछ परेशानी रहेगी और धर्म ४ ८शु. का पालन ठीक तौर पर नहीं कर राकेगा तथा ५ ७ सुयश की कमी रहेगी और जीवन की दिनचर्या नं. १२५७ में मस्ती और आनन्द अनुभव करेगा तथा सातवीं दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को स्वयं अपनी वृषभ राशि में स्वक्षेत्र को
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६३२ भृगु संहिता देख रहा है, इसलिये पराक्रम स्थान की विशेष शक्ति और सफलता प्राप्त करेगा किन्तु अष्टमेश होने के कारण भाई बहिन के पक्ष में कटु त्रुटि युक्त वातावरण से शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में १० शुक्र यदि धन का शुक्र- दसम केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में सामान्य शत्रु गुरु की राशि पर १ ११ बैठा है तो आयु की वृद्धि रहेगी तथा पुरातत्व २ १२ १० शक्ति का लाभ एवं प्रभाव रहेगा और पराक्रम ३ ९ शु. शक्ति की सरलता के योग से मान और इज्जत पायेगा, किन्तु अष्टमेश होने के दोष कारण से ४ ६ ८ पिता की सुख शक्ति में कमी रहेगी और भाई- ५ ७ बहिन के सम्बन्ध में कुछ त्रुटियुक्त प्रभाव पायेगा नं. १२५८ और राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता युक्त सम्पर्क शक्ति पायेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये माता और भूमि की सुख शक्ति को त्रुटियुक्त मार्ग से प्राप्त करेगा और गूढ़ चतुराई से उन्नति करेगा। मीन लग्न में ११ शुक्र यदि मकर का शुक्र- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो आयु की उत्तम १ ११ शक्ति पायेगा तथा पुरातत्व शक्ति का विशेष लाभ २ १२ १० श्. चतुराई और पराक्रम के द्वारा प्राप्त करेगा तथा ३ ९ पराक्रम शक्ति के द्वारा जीवन का अच्छा आनन्द पायेगा और अष्टमेश होने के दोष कारण से भाई ४ ६ ८ के लाभ में थोड़ी सी त्रुटियुक्त सफलता रहेगी ५ ७ और आमदनी के कार्य में विशेष परिश्रम शक्ति नं. १२५९ के द्वारा उन्नति पायेगा तथा अनेक प्रकारों से अपनी स्वार्थ सिद्धि करने का विशेष ध्यान रखेगा और सातवीं दृष्टि से विद्या, बुद्धि, वाणी और सन्तान स्थान में चन्द्र की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या बुद्धि वाणी एवं संतान पक्ष में शक्ति पाने के लिये बड़ा प्रयत्न करेगा। मीन लग्न में १२ शुक्र यदि कुम्भ का शुक्र- बारहवें खर्च एवं बाहरी १ ११शु. स्थान में मित्र शक्ति की राशि पर बैठा है तो भाई २ १२ १० बहिन के पक्ष में हानि और कमी प्राप्त करेगा तथा पुरुषार्थ शक्ति में कमजोरी रहेगी और पुरातत्व ३ ९ शक्ति की हानि पायेगा तथा आयु के सम्बन्ध में ४ ६ ८ कुछ कमजोरी रहेगी तथा कई बार मृत्यु तुल्य ५ ७ संकट प्राप्त होंगे और खर्चा बहुत अधिक करना नं. १२६० पड़ेगा तथा अष्टमेश होने के कारण से खर्च के
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मीन लग्न का फलादेश ६३३ मार्ग में तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ परेशानी के साथ शक्ति प्राप्त करेगा और सातवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी और चतुराई के योग से तथा पराक्रम शक्ति के द्वारा प्रभाव पायेगा तथा झंझटों को बुरा समझेगा। आमद, खर्च तथा बाहरी स्थानपति-शनि मीन लग्न में १ शनि यदि मीन का शनि- प्रथम केन्द्र देह के स्थान
१ ११ में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने २ १२ श. १० के दोष के कारण देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य में कुछ परेशानी अनुभव करेगा, किन्तु देह के ३ ९ द्वारा खर्चा और आमदनी की खास संचाल शक्ति ४ ६ ८ पायेगा और बाहरी स्थानों में सम्बन्ध की उत्तम ५ ७ शक्ति प्राप्त करेगा और तीसरी मित्र दृष्टि से भाई
देख रहा है इसलिये लाभेष होने का गुण और व्ययेश होने का दोष इन नं. १२६१ एवं पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में
दोनों कारणों से भाई बहिन एवं पराक्रम स्थान के सम्बन्धों में हानि लाभ दुःख सुख दोनों की प्राप्ति करेगा तथा हिम्मत शक्ति से काम करेगा और सातवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ दुःख सुख प्राप्त रहेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ हानि लाभ दोनों का योग प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता पक्ष में कुछ दैमनस्यता प्राप्त करेगा और राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ परेशानी से प्रभाव रहेगा। मीन लग्न में २ शनि यदि मेष का शनि- दूसरे धन एवं कुटुम्ब
१ श ११ स्थान में नीच का होकर शत्रु मंगल की राशि पर २ १२ १० बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति में हानि और कमजोरी रहेगी तथा कुटुम्ब का सुख बहुत थोड़ा ३ प्राप्त होगा और व्ययेश होने के दोष के कारण ४ ६ ८ धन का बेजां तौर से खर्च होता रहेगा तथा बाहरी ५ ७ स्थानों का सम्बन्ध भी हानिकारक सिद्ध होगा नं. १२६२ और तीसरी मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश-लाभेश होने के दोष-गुण के कारण माता और भूमि के सुख सम्बन्धों में दुःख सुख एवं हानि लाभ का योग पायेगा तथा सातवीं उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व
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६३४ भृगु संहिता स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु में शक्ति प्राप्त करेगा तथा पुरातत्व की लाभोन्नति प्राप्त करेगा और जीवन की दिनचर्या में मस्ती रखेगा तथा दसवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये आमदनी की विशेष शक्ति प्राप्त करेगा और धन की आमदनी का विशेष योग मिलेगा किन्तु धन के जोड़ने के पक्ष में सदैव कमजोर रहेगा। मीन लग्न में ३ शनि यदि वृषभ का शनि- तीसरे भाई एवं पराक्रम १ ११ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो लाभेश २श १२ होने के गुण और व्ययेश होने के दोष के कारण १० भाई-बहिन के पक्ष से कुछ सुख-दुःख एवं लाभ- 3 ९ हानि का योग पायेगा और पराक्रम शत्ति के द्वारा ४ ६ ८ आमदनी एवं खर्च की शक्ति प्राप्त करेगा तथा ५ ७ तीसरे स्थान पर क्रूर ग्रह बलवान् होता है, इसलिये नं. १२६३ पुरुषार्थ कर्म के द्वारा विशेष सफलता प्राप्त करेगा और बड़ी हिम्मत शक्ति से काम करेगा तथा तीसरी शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष कारण से संतान पक्ष में कुछ दिक्कतें रहेंगी और विद्या स्थान में कुछ कमी रह जायेगी और सातवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धम्र स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रह है, इसलिये भाग्य ओर धर्म के अन्दरूनी मार्ग में कुछ कमी रहेगी और दसवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्च खूब करेगा तथा बाहरी स्थानों से लाभ की शक्ति पायेगा। मीन लग्न में ४ शनि यदि मिथुन का शनि- चौथे केन्द्र माता एवं १ ११ भूमि के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है २ १२ १० तो लाभोश होने के गुण और व्ययेश होने के दोष के कारण माता के सुख सम्बन्धों में कुछ कमी ३ श. और कुछ हानि से युक्त लाभ शक्ति प्राप्त करेगा ४ ६ ८ और मातृ भूमि एवं मकानादि की कुछ हानि एवं ५ ७ वियोग पाने के बाद भूमि का कुछ लाभ प्राप्त
में कुछ बाधा रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह नं. १२६४ करेगा तथा घरेलू वातावरण के अन्दर सुख शान्ति
राशि में देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ परेशानी के संयोग से प्रभाव प्राप्त करेगा और झगड़े-झंझटों के मार्ग से कुछ हानि लाभ पायेगा और
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मीन लग्न का फलादेश ६३५ सातवीं शत्रु दृष्टि से पिता एवं राज्य-स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता के सम्बन्ध में कुछ वैमनस्यता युक्त लाभ खर्च का संयोग पायेगा और राज-समाज के मार्ग में कुछ नीरसता युक्त सम्बन्ध रहेगा और कारबार की उन्नति के पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और दसवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह के आराम में कुछ कमी तथा देह की सुन्दरता और स्वास्थ्य के संबन्ध में कुछ कमजोरी रहेगी तथा खर्च और आमदनी के सम्बन्ध से कुछ गुप्त चिन्ता और बाहरी स्थानों में सुख प्राप्त होगा। मीन लग्न में ५ शनि यदि कर्क का शनि- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर १ ११ बैठा है तो लाभेश होने के गुण एवं व्ययेश होने २ १२ १० के दोष के कारण संतान पक्ष में कुछ कष्ट और ३ ९ परेशानी के योग से थोड़ा लाभ प्राप्त करेगा तथा ४श. विद्या स्थान में कुछ कमजोरी के साथ-साथ कुछ ६ ८ ५ ७ शक्ति पायेगा और बुद्धि योग के द्वारा आमदनी नं. १२६५ और खर्च की शक्ति प्राप्त होगी तथा बाहरी स्थानों का लाभयुक्त सम्बन्ध पायेगा किन्तु दिमाग में कुछ परेशानी रहेगी और तीसरी मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये स्त्री पक्ष में कुछ दुःख-सुख का मिश्रित योग पायेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ हानि लाभ का मिश्रित योग होने के कारण उन्नति में सामान्यता रहेगी और सातवीं दृष्टि से लाभ स्थान को स्वयं अपनी मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये बुद्धि तथा बाहरी स्थानों के संयोग से बराबर आमदनी प्राप्त करेगा और दसवीं नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये धन को संग्रह शक्ति का प्रभाव रहेगा और कुटुम्ब में कुछ कष्ट और क्लेश रहेगा इसलिये धन और जन की तरफ से चिन्ता रहेगी। यदि सिंह का शनि-छठें शत्रु स्थान में शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो छठें स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, इसलिये शत्रु पक्ष में बड़ा प्रभाव रखेगा किन्तु आमदनी और खर्च के मार्ग में कुछ परतंत्रता एवं कुछ परिश्रम का योग प्राप्त करेगा और व्ययेश होने के दोष के कारण कुछ झगड़े-झंझटों में अथवा बीमारी आदि में भी बेकार खच करना पड़ेगा और तीसरी उच्च दृष्टि से आयु एवं पुरातत्व स्थान को मित्र शुक्र की तुला राशि में देख रहा है, इसलिये आयु की वृद्धि रहेगी और
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2 ६३६ भृगु संहिता मीन लग्न में ६ शनि पुरातत्व शक्ति का लाभ प्राप्त होगा तथा जीवन १ ११ में उमंग और प्रभाव रहेगा तथा सातवीं दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान को स्थान को स्वयं अपनी २ १२ १० कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये ३ ९ खर्चा खूब करेगा और बाहरी स्थानों से अच्छा ६ सम्बन्ध प्राप्त करेगा किन्तु छठें बैठने के कारण ४ ८ ५श. ७ आमदनी और खर्चा में जितना बाहरी प्रभाव रहेगा नं. १२६६ उतना अन्दरूनी आनन्द नहीं रहेगा और दशवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं पराक्रम स्थान को मित्र शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहिन के सुख में कुछ कमी के साथ सम्बन्ध रहेगा और पराक्रम शक्ति में सफलता और हिम्मत रहेगी। मीन लग्न में ७ शनि यदि कन्या का शनि-सातवें स्त्री एवं रोजगार ११ के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो १ २ १२ १० लाभेश होने के गुण और व्ययेश होने के कारण स्त्री स्थान में कुछ हानि और परेशानी पाने के ३ ९ बाद कुछ शक्ति पायेगा तथा इसी प्रकार रोजगार ४ ६ श. ८ के मार्ग में कुछ हानि लाभ का योग प्राप्त करेगा ५ ७ तथा खर्चा अधिक रहने के कारणों से गृहस्थ में कुछ परेशानी रहेगी और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को नं. १२६७
मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये भाग्य में कुछ दुःख-सुख का योग पायेगा और धर्म का थोड़ा लाभ पायेगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिए देह में कुछ कमजोरी तथा कुछ परेशानी प्राप्त करेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से माता एवं भूमि स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख रहा है। इसलिये माता के सुख में कुछ हानि लाभ का योग पायेगा और भूमि मकानादि के सुख प्राप्ति में कुछ कमी के साथ सफलता पायेगा। यदि तुला का शनि-आठवें आयु मृत्यु एवं पुरातत्व स्थान में उच्च का होकर मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो आयु की विशेष वृद्धि करेगा और पुरातत्व शक्ति का लाभ रहेगा तथा बाहरी दूसरे स्थान के योग से ही आमदनी का मजबूत योग बनेगा, किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण से और अष्टम में बैठने के दोष कारण से आदमनी के मार्ग में कुछ परेशानी और अधिक दौड़धूप का योग प्राप्त रहेगा और तीसरी शत्रु दृष्टि से पिता
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मीन लग्न का फलादेश ६३७ मीन लग्न में ८ शनि एवं राज्य स्थान को गुरु की धनु राशि में देख रहा है, इसलिये पिता स्थान में कुछ नीरसता रहेगी ११ और राज-समाज के सम्बन्ध में कुछ साधारण २ १२ १० सम्पर्क रहेगा तथा सातवीं नीच दृष्टि से धन एवं ३ ९ कुटुम्ब स्थान को शत्रु मंगल का मेष राशि में देख ६ ८ रहा है, इसलिये धन की संग्रह शक्ति का अभाव ४ ५ ७ श. रहने के कारणों से कुछ परेशानी बनेगी और कुटुम्ब नं. १२६८ के पक्ष में कुछ कष्ट और कमी के कारण प्राप्त करेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं संतान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष कारण से संतान पक्ष में कुछ हानि ओर कमी के कारण बनेंगे तथा विद्यास्थान में कुछ कमजोरी रहेगी और दिमाग के अन्दर खर्च एवं लाभ की वजह से कुछ चिन्ता रहेगी। मीन लग्न में ९ शनि यदि वृश्चिक का शनि- नवम त्रिकोण भाग्य
११ एवं धर्म स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है १ २ १२ तो भाग्य की शक्ति से खर्च का संचालन कर १० सकेगा और बाहरी स्थानों का लाभ युक्त सम्बन्ध ३ ९ प्राप्त करेगा। किन्तु व्ययेश होने के दोष के कारण ४ ६ ८श. भाग्य की उन्नति में कुछ बाधायें प्राप्त होती रहेंगी ५ ७ और धर्म के पालन में कुछ स्वार्थ युक्त धर्म का पालन करेगा और तीसरी दृष्टि से स्वयं अपने लाभ स्थान को मकर राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये भाग्य की नं. १२६९
शक्ति से आमदनी के मार्ग में विशेष सफलता प्राप्त करेगा और धर्म स्थान के योग से भी लाभ प्राप्त करेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से भाई एवं 7 पराक्रम स्थान को शुक्र की वृषभ राशि में देख रहा है, इसलिये भाई बहन के पक्ष में कुछ कमजोरी से सम्बन्ध पायेगा और पराक्रम स्थान में कुछ कमजोरी रहेगी तथा दसवीं शत्रु दृष्टि से शत्रु स्थान को सूर्य की सिंह राशि में देख रहा है, इसलिये कुछ कठिनाईयों के योग से शत्रु स्थान में प्रभाव प्राप्त करेगा और झंझट युक्त मार्ग से कुछ लाभ पायेगा। यदि धन का शनि- दशम केन्द्र, पिता एवं राज्य स्थान में शत्रु गुर की राशि पर बैठा है तो व्ययेश होने के दोष कारण से कारबार की उन्नति के मार्ग में बड़ी दिक्कतें ओर राज-समाज के पक्ष में कुछ कमजोरी युक्त लाभ का ढंग रहेगा किन्तु प्रभावयुक्त मार्ग के द्वारा आमदनी का योग प्राप्त
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६३८ भृगु संहिता मीन लग्न में १० शनि करेगा और तीसरी दृष्टि से खर्च एवं बाहरी स्थान १ ११ को स्वयं अपनी कुम्भ राशि में स्वक्षेत्र को देख रहा है, इसलिये खर्चा खूब शानदार करेगा और २ १२ १० बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ और प्रभाव की ३ ९ श. शक्ति पायेगा तथा सातवीं मित्र दृष्टि से माता एवं ६ ८ भूमि के स्थान को बुध की मिथुन राशि में देख ४ ५ ७ रहा है, इसलिये माता के सुख सम्बन्धों में कुछ नं. १२७० कमी युक्त लाभ रहेगा और भूमि मकानादि के सम्बन्ध में कुछ थोड़ा सुख प्राप्त रहेगा और दसवीं मित्र दृष्टि से स्त्री एवं रोजगार के स्थान को बुध की कन्या राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के कारण स्त्री पक्ष में कुछ परेशानी रहेगी और रोजगार के पक्ष में कुछ हानियों के योग से लाभ प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ११ शनि यदि मकर का शनि- गयारहवें लाभ स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो आमदनी ११ १० के स्थान पर क्रूर ग्रह का बैठना विशेष शक्ति का २ १२ श. दाता होता है, इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष ३ ९ सफलता प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध ४ से तथा खर्च की शक्ति से बहुत धन पैदा करेगा ६ ८ ५ ७ और खर्चा भी खूब करेगा तथा व्ययेश होने के नं. १२७१ दोष के कारण से आमदनी के मार्ग में कुछ परेशानी रहेगी और तीसरी शत्रु दृष्टि से देह के स्थान को गुरु की मीन राशि में देख रहा है, इसलिये देह में कुछ कमजोरी तथा सुन्दरता की कमी रहेगी और धन के आवागमन के मार्ग से देह को विशेष दौड़-धूप और चिंतिंत रहने का कष्ट प्राप्त होगा तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से विद्या एवं सन्तान स्थान को चन्द्रमा की कर्क राशि में देख रहा है, इसलिये विद्या की सफलता के मार्ग में कुछ परेशानी एवं कुछ कमजोरी रहेगी और सन्तान पक्ष के सम्बन्ध में व्ययेश दोष के कारण कुछ हानि और कुछ चिन्ता रहेगी तथा वाणी के अन्दर कुछ नीरसता और कुछ स्वार्थ परायणता का विशेष ढंग रहेगा, इसलिये धनोपार्जन का मुख्य ध्यान रहेगा। तथा दशवी उच्च और मित्र दृष्टि से अष्टम भाव, पुरातत्त्व स्थान को शुक्र की तुला राशि में देख रहा है। अतः अष्टम स्थान आयु का कारक तो है ही, शनि भी आयु कारक ग्रह है, इसलिए आयु अच्छी रहेगी, पुरातत्त्व का लाभ भी प्राप्त होगा। देशान्तर भ्रमण का अवसर प्राप्त होगा।
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मीन लग्न का फलादेश ६३९ मीन लग्न में १२ शनि यदि कुम्भ का शनि-बारहवें खर्च एवं बाहरी
११श स्थान में स्वयं अपनी राशि पर स्वक्षेत्री बैठा है तो १ खर्च का संचालन विशेष रूप से करेगा और २ १२ बाहरी स्थानों में विशेष लाभदायक सम्बन्ध प्राप्त ३ ९ करेगा, किन्तु निजी स्थान में आमदनी की तरफ से कुछ परेशानी रहेगी क्योंकि लाभेश को व्ययेश ४ ६ ८ ५ ७ होने का दोष है और व्यय स्थान में ही बैठ गया नं. १२७२ है। यह तीसरी नीच दृष्टि से धन एवं कुटुम्ब स्थान को शत्रु मंगल की मेष राशि में देख रहा है, इसलिये नगद धन की संग्रह शक्ति का बड़ा भारी अभाव रहेगा और कुटुम्ब की तरफ से हानि रहेगी अर्थात् धन और कुटुम्ब की तरफ से चिन्ता के कारण प्राप्त होंगे तथा सातवीं शत्रु दृष्टि से सूर्य की सिंह राशि में शत्रु स्थान को देख रहा है, इसलिये शत्रु पक्ष में कुछ थोड़ी-सी परेशानी के योग से कार्य बनेगा और दसवीं शत्रु दृष्टि से भाग्य एवं धर्म स्थान को मंगल की वृश्चिक राशि में देख रहा है, इसलिये व्ययेश होने के दोष के कारण भाग्य की उन्नति के मार्ग में कुछ बाधायें रहेंगी और लाभेश होने के कारण कुछ भाग्य में शक्ति भी मिलेगी और धर्म की कुछ कमजोरी रहेगी और यश थोड़ा मिलेगा। कष्ट, चिन्ता, गुप्तयुक्ति के आधिपति-राहु मीन लग्न में १ राहु यदि मीन का राहु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान पर शत्रु गुरु राशि में बैठा है तो देह की सुख ११ शान्ति और सुन्दरता में कमी करेगा और देवगुरु २ १२ रा. १० बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये मान प्राप्त ३ ९ करने का विशेष साधन तथा उपाय करेगा और कठिनाई के योग से मान और प्रभाव प्राप्त करेगा ४ ६ ८ ५ तथा अपने व्यक्तित्व की उन्नति के लिये बड़ी ७
नं. १२७३ गुप्त और गहरी युक्ति के द्वारा सफलता प्राप्त करेगा किन्तु अपने अन्दर खास तौर से कुछ कमी अनुभव करेगा तथा अनधिकार वातावरण पर भी कामयावी पाने में सफल हो सकेगा और कभी-कभी गहरे संकट का सामना प्राप्त करेगा, किन्तु अपनी उन्नति के मार्ग में बार-बार प्रयत्नशील होकर सफल बनेगा। यदि मेष का राहु-दूसरे धन भवन एवं कुटुम्ब स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है तो धन की संग्रह शक्ति के अभाव के कारण बड़ा भारी कष्ट अनुभव करेगा और कुटुम्ब के स्थान में कमी और कष्ट के कारण
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६४० भृगु संहिता मीन लग्न में २ राहु प्राप्त करेगा तथा गरम ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये धन की वृद्धि करने के लिये १ रा. ११ महान् कठिन गुप्त युक्ति के द्वारा सफलता शक्ति २ १२ १० पायेगा और अपने वित्त से भी अधिक कठिन ३ मार्ग में धन प्राप्ति का साधन पा सकेगा, किन्तु फिर भी राहु के प्राकृतिक स्वभाव के कारण ४ ६ ८ कभी-कभी धन की तरफ से महान् चिन्ता पा ५ ७ सकेगा परन्तु कठिनाईयों के मार्ग से धन की वृद्धि नं. १२७४ एवं शक्ति कुछ अपूर्ण रूप से प्राप्त कर ही लेगा। मीन लग्न में ३ राहु यदि वृषभ का राहु- तीसरे भाई एवं पराक्रम स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है तो तीसरे १ ११ स्थान पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता २रा. १२ १० होता है, इसलिये पराक्रम स्थान में बड़ी शक्ति ३ ९ प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुण के कारण भाई बहिन के पक्ष में कुछ कमी और कष्ट ४ ६ ८ के कारण प्राप्त करेगा तथा कभी-कभी अपने ५ ७ अन्दर गुप्त रूप से कुछ कमजोरी अनुभव करेगा,
अपने पुरुषार्थ की वृद्धि करने के लिये बड़ी भारी चतुराई और गुप्त युक्ति नं. १२७५ किन्तु परम चतुर शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये
•के द्वारा पराक्रम और प्रीज्ञाव की सफलता प्राप्त करेगा तथा प्रकट रूप में कभी भी हिम्मत हारने को तैयार नहीं होगा और अपना कार्य सिद्ध करने में सदैव तत्पर रहेगा। मीन लग्न में ४ राहु यदि मिथुन का राहु- चौथे केन्द्र माता एवं ११ भूमि के स्थान में उच्च का होकर मित्र बुध की १ २ राशि पर बैठा है तो भूमि-मकानादि की सुख १२ १० शक्ति पायेगा तथा माता के स्थान में विशेष प्रभाव ३ रा. ९ प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुण के कारण माता के पक्ष में एवं भूमि के पक्ष में कुछ ४ ६ ८ कमी का योग अनुभव करेगा और घरेलू वातावरण ५ ७
नं. १२७६ में कुछ गुप्त युक्ति बल के द्वारा सुख के साधनों की विशेष वृद्धि करेगा, किन्तु फिर भी कभी- कभी गुप्त अशान्ति का योग प्राप्त करेगा, परन्तु उच्च का होने के कारण कुछ सुख के साधनों को मुफ्त के से रूप में विशेष प्राप्त करेगा सुख प्राप्ति के मार्ग में दिखावटी आडम्बर बहुत कैचा रहेगा। यदि कर्क का राहु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में मुख्य
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मीन लग्न का फलादेश ६४१
मीन लग्न में ५ राहु शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है तो विद्या ग्रहण करने के माग्र में परेशानी रहेगी और संतान पक्ष १ ११ में कष्ट अनुभव करेगा तथा दिमाग के अन्दर चिन्ता २ १२ १० रहेगी और बोलचाल की वाणी के अन्दर कुछ ३ ९ रूखापन रहेगा क्योंकि मुख्य शत्रु चन्द्रमा की राशि पर बैठा है, इसलिये मन के द्वारा संतान पक्ष ४रा. ६ ८ और बुद्धि योग के अन्दर कभी-कभी महान् संकट ५ ७ का योग प्राप्त करेगा और गुप्त युक्ति एवं विचारों नं.१२७७ के योग से संतान पक्ष में शक्ति पाने का विशेष प्रयत्न करेगा और सत्य असत्य की परवाह न करते हुए अपने मन को प्रसन्न रखने की चेष्टा करेगा। मीन लग्न में ६ राहु यदि सिंह का राहु- छठे शत्रु स्थान में परम शत्रु सूर्य की राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर १ ११ क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता बन जाता है, २ १२ १० इसलिये शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखेगा ३ ९ और शत्रुपक्ष को परास्त करने के लिये गुप्त युक्ति E E PE के बल से विशेष सफलता प्राप्त करेगा किन्तु ४ ६ ८ राहु के स्वाभाविक गुण के कारण शत्रु स्थान से ५ रा. ७ कुछ परेशानी का योग भी प्राप्त करेगा किन्तु नं. १२७८ महा तेजस्वी सूर्य की राशि पर बैठा है इसलिये शत्रु पक्ष में विजय पाने के लिये महान् शक्ति और महान् युक्ति का प्रयोग करेगा तथा ननसाल पक्ष में कुछ हानि प्राप्त करेगा और प्रत्येक अवस्थाओं में अपने प्रभाव को जागृति रखने का पूरा प्रबन्ध रखेगा। मीन लग्न में ७ राहु यदि कन्या का राहु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १ ११ है तो स्त्री स्थान में कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और २ १२ १० रोजगार के मार्ग में कुछ परेशानियाँ रहेंगी, किन्तु ३ ९ विवेकी बुध की कन्या राशि पर राहु स्वक्षेत्री के समान माना जाता है इसलिये गुप्त विवेक की ६ रा. ८ महान् शक्ति के द्वारा रोजगार के मार्ग में कुछ ५. ७ कठिनाईयों के योग से विशेष शक्ति प्राप्त करेगा नं. १२७९ और स्त्री तथा गृहस्थ के अन्दर कुछ कमी के योग से उन्नति का मार्ग प्राप्त करेगा, किन्तु राहु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी गृहस्थ के अन्दर महान् संकट का योग पायेगा, परन्तु राहु बलवान् है, इसलिये पुनः पुनः उन्नति पायेगा। भृ. सं. -४१
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६४२ भृगु संहिता मीन लग्न में ८ राहु यदि तुला का राहु- आठवें आयु एवं मृत्यु तथा पुरातत्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर १ ११ बैठा है तो जीवन और आयु के सम्बन्ध में अनेकों २ १२ १० बार चिन्ता और कष्ट के कारण प्राप्त करेगा और ३ ९ पुरातत्व सम्बन्ध में कुछ हानि और कमी का योग पायेगा और आठवें स्थान से उदर का भी सम्बन्ध ४ ६ ८ है, इसलिये पेट के अन्दर कुछ परेशानी या कुछ ५ ७ रा. बीमारी का योग रहेगा और कभी-कभी जीवन नं. १२८० निर्वाह तथा जीवन संचालन के मार्ग मं विशेष चिन्ताओं का योग प्राप्त करेगा, किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी भारी गम्भीर चतुराई के योग से जीवन निर्वाह की शक्ति पायेगा और इसी चतुराई के बल से कुछ मुफ्त का सा पुरातत्व शक्ति का लाभ पायेगा और प्रकट रूप में शानदार जीवन रहेगा। मीन लग्न में ९ राहु यदि वृश्चिक का राहु- नवम त्रिकोण भाग्य एवं धर्मस्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है १ ११ तो भाग्य के स्थान में बड़ी चिन्तायें रहेंगी और २ १२ १० भाग्य की उन्नति के मार्ग में हमेशा कुछ न कुछ ३ ९ दिक्कतों और परेशानियों से टकराना पड़ेगा तथा धर्म के मार्ग में कुछ कमजोरी रहेगी और सुयश ४ ६ ८रा. प्राप्ति का कुछ अभाव रहेगा। परन्तु गरम ग्रह ५ ७ मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये बड़ी हिम्मत नं. १२८१ शक्ति और गुप्त युक्ति के कठिन प्रयत्न से भाग्य की वृद्धि पायेगा और कठिन प्रयत्न के परिणाम स्वरूप कभी-कभी भाग्य में मुफ्त का-सा लाभ पायेगा और राहु के स्वाभाविक गुण के कारण कभी-कभी भाग्य के स्थान में महान् कष्ट का अनुभव करेगा, किन्तु भाग्य की उन्नति के लिये बराबर प्रयत्नशील रहकर शक्ति प्राप्त करेगा। मीन लग्न में १० राहु यदि धन का राहु- दमस केन्द्र पिता एवं राज्य स्थान में नीच का होकर शत्रु गुरु की राशि १ ११ पर बैठा है तो पिता स्थान में महान् कष्ट का योग २ १२ १० पायेगा और राज-समाज में बड़ी भारी झंझट और ३ ९ रा. परेशानी के कारण प्राप्त करेगा तथा उन्नति प्राप्त करने के मार्ग में अनेकों बार हानियाँ मिलेंगी ४ ६ ८ और मान-सम्मान, प्रभाव आदि के पक्ष में कुछ ५ ७ कमी और लघुता प्राप्त होगी, किन्तु देवगुरु वृहस्पति नं. १२८२ की राशि पर बैठा है, इसलिये कमजोरी के अन्दर
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मीन लग्न का फलादेश ६४३ भी आदर्शवाद का दिखावा रखकर गुप्त युक्तियों के बल से अपना कार्य सम्पादन करेगा और बड़े-बड़े संघर्षों के मार्ग से अपनी इज्जत-आबरू बना सकेगा और अति गम्भीर युक्तियों के योग से अपने कारबार का मार्ग बनाकर चलेगा। मीन लग्न में ११ राहु यदि मकर का राहु- ग्यारहवें लाभ स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान १ ११ १० पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, २ १२ रा. इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष लाभ प्राप्त ३ ९ करेगा और अपने वित्त से अधिक नफा खाने का योग प्राप्त करेगा और राहु के स्वाभाविक गुण ४ ६ ८ ५ ७ के कारण कभी-कभी धनोपार्जन के लिये बड़ा
नं. १२८३ कष्ट अनुभव करेगा, किन्तु गरम ग्रह मित्र शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये धन प्राप्ति के मार्ग में बड़ी भारी गुप्त युक्ति के बल से और धैर्य की महान् शक्ति से विशेष सफलता प्राप्त करेगा और कभी-कभी मुफ्त का-सा धन भी प्राप्त करेगा और आदमनी की अधिक से अधिक वृद्धि करने के लिये बड़ी गहरी सूझ झक्ति से सदैव काम करता रहेगा। मीन लग्न में १२ राहु यदि कुम्भ का राहु- बारहवें खर्च एवं बाहरी स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्च १ ११रा. १२ १० की संचालन शक्ति को पाने के लिये बड़ी २ कठिनाईयों का योग प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों ३ के सम्पर्क में कुछ दिक्कतें रहेंगी तथा स्थिर ग्रह ४ ६ शनि की राशि पर बैठा है, इसलिये खर्च के मार्ग V ५ को सुचारू बनाने के लिये गहरी युक्ति की सूझ नं. १२८४ शक्ति के द्वारा महान् प्रयत्न करता रहेगा, परन्तु राहु के स्वाभाविक गुण के कारणों से खर्च के मार्ग में एवं बाहरी सम्बन्धों में कभी-कभी बड़ी भारी परेशानी एवं कमी और कष्ट के कारणों को सहन करेगा, किन्तु मित्र राशि पर होने के कारण कुछ संघर्षों के द्वारा सफलता शक्ति प्राप्त करता रहेगा। गुप्तपरिश्रमशक्ति, कमी, कष्ट के अधिपति-केतु यदि मीन का केतु- प्रथम केन्द्र देह के स्थान में शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो देह के सम्बन्ध में बड़ी चिन्तायें रहेंगी और कभी-कभी कोई सांघातिक चोट एवं मृत्यु तुल्य कष्ट का योग प्राप्त होगा और देह की
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६४४ भृगु संहिता मीन लग्न में १ केतु सुन्दरता में भी स्वास्थ्य में कुछ कमी रहेगी, किन्तु देव गुरु बृहस्पति की राशि पर बैठा है, इसलिये १ ११ आदर्शवाद की गुप्त शक्ति के द्वारा अपने व्यक्तित्व २ १२ के. १० की उन्नति करेगा और कठिन परिश्रम के यौग से ३ मान एवं प्रभाव प्राप्त करेगा और अपने अन्दर कुछ कमी एवं कुछ कमजोरी को पाते हुए भी प्रकट में ४ ६ ८ बड़ी हिम्मत शक्ति से कार्य संचालन के योग से ५ ७ जीवन-यापन करता रहेगा। नं. १२८५ यदि मेष का केतु- दूसरे धन स्थान एवं कुटुम्ब मीन लग्न में २ केतु स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है, तो धन १ के ११ की संग्रह शक्ति के अन्दर बड़ी कमी रहेगी और २ १२ १० कुटुम्ब के अन्दर क्लेश रहेगा तथा धन और कुटुम्ब के योग से बड़ा कष्ट अनुभव करेगा, किन्तु क्षत्री ३ ९ ग्रह मंगल की राशि पर बैठा है, इसलिये धन की ४ ८ वृद्धि करने के लिये गुप्त शक्ति के कठिन परिश्रम ५ ७ से दृढ़ता पूर्वक कार्य करता रहेगा परन्तु धन-जन की कठिन पररिस्थति के कारणों से कभी-कभी कठिन वेदना का योग पायेगा और कभी कुछ मुफ्त का-सा धन भी प्राप्त नूं. १२८६
करेगा और अन्दरूनी धन की कमजोरी रहते हुए भी जाहिर में कुछ इज्जत प्राप्त करेगा और दूसरों की दृष्टि में कुछ धनवान् कुटुम्बवान् समझा जायेगा। मीन लग्न में ३ केतु यदि वृषभ का केतु- तीसरे भाई एवं पराक्रम १ ११ स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा है, तो तीसरे २के १२ १० स्थान पर क्रूर ग्रह शक्ति शाली फल का दाता होता है, इसलिये पराक्रम स्थान की बड़ी भारी ३ ९ सफलता शक्ति प्राप्त करेगा और परम चतुर आचार्य शुक्र की राशि पर बैठा है, इसलिये गुप्त ४ ६ ८ चतुराई की शक्ति के बल से बड़ी उन्नति पायेगा ५ ७ और इसी कारण बड़ी भारी हिम्मत प्राप्त करेगा नं. १२८७ किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण भाई- बहिन के पक्ष में परेशानी और कुछ कष्ट प्राप्त करेगा और इसी वजह से कभी-कभी अपने अन्दर कमजोरी अनुभव करेगा परन्तु प्रकट में दूसरों के सम्मुख चतुराइयों के द्वारा बड़ी जबरदस्त हिम्मत शक्ति से काम करेगा और बाहुबल में बहादुरी और स्वतन्त्रता पाने के लिये सदैव प्रयत्न करता रहेगा। यदि मिथुन का केतु- चौथे केन्द्र माता एवं भूमि के स्थान पर नीच का होकर मित्र बुध की राशि पर बैठा है तो माता के स्थान में बड़ी जबरदस्त कमी एवं कष्ट प्राप्त करेगा और भूमि मकानादि रहन, सहन के पक्ष में कुछ
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मीन लग्न का फलादेश ६४५ मीन लग्न में ४ केतु दुःख अनुभव करेगा तथा घरेलू वातावरण में सुख शान्ति की बड़ी कमजोरी रहेगी तथा घरेलू १ ११ सुख शान्ति पाने के लिये कुछ निम्न श्रेणी के २ १२ १० मार्ग से कार्य पूर्ति करेगा, क्योंकि विवेकी ग्रह ३ के. बुध की मित्र राशि पर बैठा है, इसलिये गुप्त विवेक की अति गूढ़ शक्ति के द्वारा सुख प्राप्ति ४ ६ ८ के साधनों को कठिन परिश्रम के योग से प्राप्त ५ ७ कर सकेगा, फिर भी कभी-कभी घोर क्लेश का नं. १२८८ योग प्राप्त करेगा और गुप्त धैर्य से सुख मानेगा। मीन लग्न में ५ केतु यदि कर्क का केतु- पाँचवें त्रिकोण विद्या एवं संतान स्थान में परम शत्रु चन्द्रमा की राशि १ ११ पर बैठा है तो विद्या ग्रहण करने के मार्ग में बड़ी २ १२ १० जबरदस्त परेशानी का योग पायेगा और संतान पक्ष में बड़ा भारी कष्ट और कमी का योग प्राप्त ३ ९ करेगा तथा दिमाग के अन्दर बड़ी चिन्ताओं का ४के ६ ८ गुप्त अनुभव करेगा तथा मन के स्वामी चन्द्रमा ५ ७ की राशि पर बैठा है, इसलिये विद्या बुद्धि एवं संतान पक्ष के कारणों से मन में फिकर और अशान्ति के विचारों को प्राप्त करेगा परन्तु मनोयोग की गुप्त परिश्रम शक्ति के द्वारा ही नं. १२८९
विद्या एवं संतान पक्ष की पूर्ति के कुछ साधन प्राप्त करेगा और केतु के स्वाभाविक गुणों के कारण कभी-कभी विचारों में किंकर्तव्य विमूढ़ता का योग पायेगा और कभी-कभी मजबूती पायेगा। मीन लग्न में ६ केतु यदि सिंह का केतु- छठे शत्रु स्थान में एवं परिश्रम और झंझट के स्थान में मुख्य शत्रु सूर्य १ ११ की राशि पर बैठा है तो छठे स्थान पर क्रूर ग्रह २ १२ १० बड़ा शक्तिशाली फल का दाता होता है, इसलिये ३ ९ शत्रु का दमन करने के लिये और शत्रु पर विजय पाने के लिये गुप्त शक्ति के महान् परिश्रम से ४ ६ ८ सफलता प्राप्त करेगा और बड़े-बड़े झगड़े-झंझटों ५ के ७ में कामयाबी पायेगा तथा अपनी प्रभाव की वृद्धि करने के लिये बड़ी तत्परता और कट्टरता के योग से सदैव कार्य करेगा। किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण शत्रु पक्ष नं. १२९०
में कभी-कभी अन्दरूनी बड़ी परेशानी अनुभव करेगा किन्तु। सूर्य की तेजस्वी राशि पर बैठा है, इसलिये कठिन से कठिन परिस्थिति में भी बहादुरी से विजय प्राप्त करेगा।
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६४६ भृगु संहिता मीन लग्न में ७ केतु यदि कन्या का केतु- सातवें केन्द्र स्त्री एवं रोजगार के स्थान में मित्र बुध की राशि पर बैठा १ ११ है तो कन्या राशि पर बैठा राहु या केतु स्वक्षेत्र के २ १२ १० समान होता है, इसलिये स्त्री एवं रोजगार के पक्ष ३ ९ में शक्ति तो प्रदान करेगा किन्तु केतु स्वाभाविक गुणों के कारण स्त्री पक्ष में कुछ अशान्ति का ४ ६ के. ८ योग प्रदान करेगा और रोजगार के मार्ग में कुछ ५ ७ कष्ट और कठिनाईयाँ भी प्राप्त होंगी तथा रोजगार नं. १२९१ की उन्नति करने के लिये गुप्त परिश्रम की महान् शक्ति से कार्य करेगा तथा विवेकी बुध की राशि पर बैठा है, इसलिये गहरी विवेक की शक्ति से गृहस्थ का आनन्द प्राप्त करेगा फिर भी स्त्री और गृहस्थ के सम्बन्ध में कभी-कभी घोर कष्ट का अनुभव करेगा। - मीन लग्न में ८ केतु यदि तुला का केतु- आठवें आयु मृत्यु एवं १ ११ पुरातत्व स्थान में मित्र शुक्र की राशि पर बैठा तो आयु के स्थान में कई बार मृत्यु तुल्य संकट प्राप्त २ १२ १० होंगे और पुरातत्व शक्ति की हानि एवं कमजोरी ३ ९ बनेगी किन्तु परम चतुर आचार्य शुक्र की मित्र राशि पर बैठा है, इसलिये जीवन की रक्षा के ४ ६ ८ लिये बड़े-बड़े उत्तम उपाय और साधन की ५ ७ के. नं. १२९२ अनुकूलता के योग से आयु में शक्ति प्राप्त होगी और पुरातत्व सम्बन्ध में कोई गुप्त परिश्रम की शक्ति और चतुगई के योग से जीवन निर्वाह के मजबूत साधन मिलेंगे, परन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण निर्वाह करने के मार्ग में कभी-कभी गहरी चिन्ता और कष्ट का योग प्राप्त करके पुनः उत्तम मार्ग प्राप्त करेगा। मीन लग्न में ९ केतु यदि वृश्चिक का केतु- नवम त्रिकोण भाग्य १ ११ एवं धर्म स्थान में शत्रु मंगल की राशि पर बैठा है २ १२ तो भाग्य के स्थान में परेशानी एवं कष्ट अनुभव १० करेगा और धर्म के मार्ग में कमजोरी रहेगी, परन्तु ३ ९ गरम ग्रह मंगल की राशि पर कठिन ग्रह केतु बैठा है, इसलिये भाग्य की उन्नति के लिये कठिन ४ ६ टके और गुप्त परिश्रम की शक्ति के द्वारा सफलता ५ ७
नं. १२९३ का मार्ग प्राप्त करेगा केतु के स्वाभाविक गुण के कारण भाग्योन्नति के स्थान में कभी-कभी घोर संकट एवं भारी निराशायें प्राप्त करने पर भी गुप्त हिम्मत शक्ति के द्वारा उन्नति का योग प्राप्त करेगा तथा भाग्योन्नति करने में सदैव तत्पर रहेगा
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मीन लग्न का फलादेश ६४७ और धर्म की उन्नति का भी गुप्त ध्यान रखेगा; फिर भी धर्म, भाग्य और यश की कुछ कमी रहेगी। मीन लग्न में १० केतु यदि धनु राशि का केतु- दसवें केन्द्र पिता
१ ११ एवं राज्यस्थान में उच्च का होकर शत्रु गुरु की राशि पर बैठा है तो पिता के स्थान में और कारबार २ १२ १० में बहुत उन्नति करेगा तथा राज-समाज के पक्ष में ३ ९ के. बड़ा प्रभाव रखेगा किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण पिता स्थान में कुछ संघर्ष प्राप्त ४ ६ ८ ७ करेगा और राज-समाज की उन्नति और मान प्राप्त ५ करने के लिये महान् कठिन प्रयत्न और कठोर नं. १२९४ परिश्रम करेगा तथा देव गुरु बृहस्पति की राशि पर उच्च का बैठा है, इसलिये आदर्शवाद के मार्ग द्वारा उन्नति की महान् शक्ति प्राप्त करने के लिये सदैव गुप्त रूप से भारी दौड़ धूप करता रहेगा और कभी-कभी विशेष परेशानी का योग प्राप्त होने पर भी अपनी उन्नति करने के मार्ग में विशेष बहादुरी के काम करेगा। मीन लग्न में ११ केतु यदि मकर का केतु- ग्यारहवें लाभ स्थान में
११ मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो ग्यारहवें स्थान १ २ १२ १० पर क्रूर ग्रह शक्तिशाली फल का दाता होता है, के. इसलिये आमदनी के मार्ग में विशेष शक्ति प्राप्त ३ करेगा और क्रूर ग्रह की राशि पर क्रूर ग्रह बैठा है, इसलिये अधिक लाभ पाने के लिये गुप्त परिश्रम ४ ६ ८ ५ की कठोर शक्ति से सफलता प्राप्त करेगा और ७
नं. १२९५ दृढ़ता पूर्वक स्वार्थ सिद्धि करने में लगा रहेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण, आमदनी के मार्ग में कभी-कभी महान् कष्ट का योग प्राप्त करेगा तथा फिर भी आमदनी में कुछ कमी का योग अनुभव करने के कारण से आमदनी की वृद्धि करने के लिये विशेष प्रयत्न करेगा। मीन लग्न में १२ केतु यदि कुम्भ का केतु- बारहवें खर्च एवं बाहरी १ ११ क. स्थान में मित्र शनि की राशि पर बैठा है तो खर्च २ १२ के मार्ग में कुछ कमी और कष्ट का योग प्राप्त करेगा और बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ ३ ९ परेशानी अनुभव करेगा, किन्तु गरम ग्रह की राशि ४ ६ ८ पर गरम ग्रह बैठा है, इसलिये खर्च की संचालन ५ ७ शक्ति प्राप्त करने के लिये गुप्त परिश्रम शक्ति के नं. १२९६ योग से दौड़-धूप करके सफलता पायेगा और
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६४८ भृगु संहिता खर्च एवं बाहरी सम्बन्धों के मार्ग में बड़ी हिम्मत और दृढ़ता से कार्य करेगा, किन्तु केतु के स्वाभाविक गुण के कारण खर्च के मार्ग में कभी- कभी घोर संकट का योग प्राप्त होने पर भी बड़ी बहादुरी के साथ परिश्रम करके पुनः खर्च करने की शक्ति में वृद्धि प्राप्त करेगा।
१ १२ ११
२ १०
३ ९
४ ८
५ ६ ७
।। मीन लग्न समाप्त।।
।। इस प्रकार डा. सुरकान्त झा 'सुमन' द्वारा भृगु संहिता फलित सर्वांग दर्शन ग्रन्थ में फलित भाग का संशोधन कर्म सुसम्पन्न हुआ।।
श्री ठाकुर प्रसाद पुस्तक भण्डार कचौड़ीगली, वाराणसी दूरभाष : २३९२५४३, २३९२४७१
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भृगु संहिता फल दर्पण ६४९ भृगुसंहिता : फलित सर्वाङ्ग दर्शन (फलित सूत्र भाग)
पञ्चाङ्ग प्रकरण इसके पूर्व अपनी-अपनी जन्मकुण्डली और गोचर ग्रह स्थिति के अनुसार सार्वकालिक और दैनिक फल जानने की पद्धति को बतलाया गया है, यहाँ अब डा. सुरकान्त उन फलों को बतलाने में प्रयुक्त साधनों जैसे नक्षत्र, राशि, भाव, ग्रह आदि की जानकारी देने के लिए क्रम से उन विषयों का अलग-अलग विवेचन पञ्चाङ्ग वर्णन से करते है ;- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण इनकी ही पञ्चाङ्ग संज्ञा है। उनमें से पहले तिथि को यहाँ कहा जा रहा है। मासनक्षत्रवशतिथिज्ञान पूर्वोक्त चैत्रादि बारह मासों का नाम, उनकी पूर्णिमा तिथि को उदित नक्षत्र वश सिद्ध होती है। जैसे चैत्र-चित्रा नक्षत्र से, वैशाख-विशाखा नक्षत्र से, ज्येष्ठ-ज्येष्ठा, आषाढ़-पूर्वाषाढ़, श्रावण-श्रवण, भाद्रपद-पूर्वाभाद्रपद, आश्विन-अश्विनी, कार्तिक-कृत्तिका, मार्गशीर्ष-मृगशिरा, पौष-पुष्य, माघ- मघा, फाल्गुन-पूर्वाफाल्गुनी, इन्हीं नक्षत्रों को मास नक्षत्र कहा जाता है। अब मास नक्षत्र से दैनिक नक्षत्र तक गिनकर जितनी नक्षत्र संख्या हो, उतनी तिथि की संख्या भी क्रम से जाननी चाहिए। तिथि कथन १. प्रतिपदा, २. द्वितीया, ३. तृतीया, ४. चतुर्थी, ५. पञ्चमी, ६. षष्ठी, ७. सप्तमी, ८. अष्टमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, १३. त्रयोदशी, १४. चर्तुदशी, १५. पञ्चदशी-ये तिथियाँ शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों के क्रम से कुल तीस तिथि चान्द्रमास में होते हैं। वहाँ पञ्चदशी तिथि से शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि और कृष्ण पक्ष में अमावस्या तिथि का बोध करना चाहिए। पूर्णिमा-अमावास्या की संज्ञाऐं जिस पूर्णिमा में चन्द्रकला अपूर्ण हो या चतुर्दशी युक्ता पूर्णिमा को 'अनुमति' और जिस पूर्णिमा में चन्द्रकला पूर्ण हो, उस पूर्णिमा को 'राका' कहा जाता है। उसी प्रकार, जिस अमावास्या में चन्द्रकला दृश्य हो या चतुर्दशी युक्ता अमावास्या हो, तो उस अमावास्या को 'सिनीवाली' और
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६५० पञ्चाङ्ग प्रकरण जिस अमावास्या में, चन्द्रकला का पूर्णतः अभाव हो; उस अमावास्या को 'कुहू' कहा जाता है। शुभाशुभ तिथि कथन प्रतिपदा सिद्धि देने वाली, द्वितीया कार्य साधन करने वाली, तृतीया आरोग्यदायिनी, चतुर्थी हानि देने वाली, पञ्चमी शुभ, षष्ठी अशुभ, सप्तमी, शुभ, अष्टमी व्याधि नाश करने वाली, नवमी मृत्यु देने वाली, दशमी द्रव्य देने वाली, एकादशी शुभ देने वाली, द्वादशी सब प्रकार से सिद्धि देने वाली, त्रयोदशी सर्व सिद्ध करने वाली, चर्तुदशी उग्रता प्रदान करने वाली, पूर्णिमा पुष्टि करने वाली, अमावास्या अशुभ तिथि है। तिथियों के अपर नाम प्रतिपदा आदि तिथियों के नाम क्रमशः वृद्धि, सुमङ्गला, सबला, खला, श्रीमति, कीर्ति, मित्रपदा, बलवती, उग्रा, धर्म्मिणी, नन्दा, यशवती, जयकरी, क्रूरा, सौम्या, दर्श आदि मुनियों ने बताया है। तिथि स्वामी प्रतिपदा के तिथियों के स्वामी क्रमशः अग्नि, ब्रह्मा, गौरी, गणेश, सर्प, स्कन्द, सूर्य, शिव, यम, विश्वेदेव, हरि, मदन, शिव और चन्द्र हैं। अमावास्या का स्वामी पितर कहा गया है। तिथि स्वामी प्रयोजन तिथि स्वामियों के ज्ञान का व्यवहार में बहुत ही प्रयोजन रहता है। किसी देवता की प्रतिष्ठा में उसकी अपनी तिथि का प्रयोजन होता है। दीक्षा ग्रहण में इष्टदेव की तिथि का प्रयोजन होता है। पवित्रार्पण और दमनारोप में भी इसका प्रयोजन कहा गया है। ग्रहशान्ति में भी ग्रह की अधिदेवता आदि की तिथियों का प्रयोजन होता है। अपने दैनिक कार्य के सिद्धि के लिए भी उसका प्रयोजन होता है। जैसा गर्ग आदि महर्षियों ने कहा है, वैसा बुद्धिमानों द्वारा उसे उस तिथि को ग्रहण करना चाहिए। तिथि संज्ञा नन्दा १-६-११ तिथियों की संज्ञा है। भद्रा २-७-१२ तिथियों की, जया ३-८-१३ तिथियों की, रिक्ता ४-९-१४ तिथियों की और पूर्णा ५- १०-१५ तिथियों की संज्ञा कही गई है। शुक्लपक्ष में प्रतिपदा से पञ्चमी तक अशुभ, षष्ठी से दशमी तक मध्यम और एकादशी से पूर्णिमा तिथि तक उत्तम तथा कृष्ण पक्ष में उक्त के
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भृगु संहिता फलू दर्पण ६५१ विपरीत अर्थात् १ से ५ उत्तम, ९-१० मध्यम और ११-१५ अधम कहा गया है। वारों के नाम सात वारों के नाम इस प्रकार जाने-रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार व शनिवार। वार का आरम्भ अग्र लिखित वार विहित कर्म की सिद्धि के लिए लङ्गा में सूर्योदय काल से ही वार ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि लङ्का में सूर्योदय के समय में ही सृष्टा ने सृष्टि का सृजन किया था। सम्प्रति व्यवहार में 'उदयादुदयं यावद्' के अनुसर अपने सूर्योदय से ही लोग वार (सावन दिन) को व्यवहार में लाते हैं, जो सिद्धान्तः उचित नहीं। विद्वानों को विचार करना चाहिए। रविवार के कर्म राज्याभिषेक, उत्सव, यात्रा, राजसेवा, गाय-बैल का क्रम-विक्रय, हवन करना, मन्त्रोपदेश करना, औषध तथा शस्त्र निर्माण करना, सोना, ताँबा, ऊन, चर्म, काष्ठ (लकड़ी) कर्म, युद्ध और खरीदना-बेचना इत्यादि कर्म रविवार को करने चाहिए। सोमवार के कर्म श्ध, मूँगा, मोती, चाँदी, ईख, भोजन, स्त्री संसर्ग, वृक्ष, कृषि, जलादिकर्म, अलङ्कार, गाना, यज्ञकर्म, दूध-दही मथना, सींग पढ़ाना, पुष्प, वस्त्र कार्य सोमवार को करने चाहिए। भौमवार के कर्म भेद, अनृत, चोरी, विष, अग्नि, शस्त्र, वध, वन्ध्या, घात, संग्राम, कपट व दम्भादि कर्म, सेना का पड़ाव, खान, धातु, सुवर्ण मूँगा, रत्नादि कर्म मङ्गल को प्रशस्त हैं। बुधवार के कर्म चातुर्य, पुण्य, अध्ययन, कला, शिल्पशास्त्र, सेवा, लिखना, चित्र काढ़ना, धातुक्रिया, सोने के जड़ाऊ अलङ्कार युक्ति, सन्धि (समझौता), व्यायाम और वाद करना, ये कर्म बुधवार को करने चाहिए। गुरुवार के कर्म धर्म करना, नवग्रहादि पूजा, यज्ञ, विद्याभ्यास, माङ्गलिक कर्म, स्वर्ण
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1 ६ं५२ पञ्चाङ्ग प्रकरण कार्य, वस्त्र, गृह बनाना, यात्रा, रथ, अश्व, औषधि, विभूषण आदि कृत्य गुरुवार को करना चाहिए। शुक्रवार के कर्म स्त्री प्रसङ्ग, गायन, शय्या, मणि, रत्न, गन्ध, वस्त्र, उत्सव, अलङ्कार, वाणिज्य, भूमि, दूकान, गौ, द्रव्य तथा खेती आदि कार्य शुक्रवार को प्रशस्त है। शनिवार के कर्म लोहा, पत्थर, सीसा, जस्ता, शस्त्र, दास, दुष्टकर्म, झूठ बोलना, चोरी, विष, अर्क निकालना, गृह प्रवेश, हाथी बाँधना, दीक्षा ग्रहण करना और स्थिर कर्म शनिवार को करने चाहिए। 1 वारों के देवता अधिदेवता शिव, पार्वती, षडानन, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र और काल ये सात क्रम से सूर्यादि वारों के देवता जानना चाहिए। अग्नि, जल, भूमि, हरि, इन्द्र, इन्द्राणी और ब्रह्मा ये सात सूर्यादि वारों के अधिदेवता मुनियों ने कहा है।।१०॥ शुभाशुभ वार चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र ये शुभवार शुभकर्म में प्रशस्त हैं और सूर्य, मङ्गल और शनि अशुभ वार सदा अशुभ, क्रूर कर्म के लिए हैं। वार की स्थिरादि संज्ञा सूर्य स्थिर, चन्द्र चर, मङ्गल उग्र, बुध सम, गुरु लघु, शुक्र मृदु और शनि तीक्ष्ण कहे गये हैं। नक्षत्र ज्ञान प्रकार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से गतमास संख्या को दो से गुणाकर वर्तमान तिथि संख्या को जोड़ना चाहिए। योग फल में से एक घटाकर शेषांक को २७ से भाग देने पर शेष संख्या तुल्य वर्तमान तिथि में नक्षत्र होता है। कृष्ण पक्ष में २ और शुक्ल पक्ष में १ घटाकर २७ से भाग देने पर उपरोक्त क्रिया सही होगा। जैसे-श्री शुभ सम्वत् २०६१ वैशाख शुक्ल एकादशी को कौन-सा नक्षत्र सूर्योदय काल में है, इसे जानने के लिए गत मास = १ x २ = २+ ११ वर्तमान तिथि = १३-१ शुक्ल पक्ष होने से = १२ : २७; लब्धि =० सिद्ध हुआ। और शेष = १२, अतः शेष तुल्य बारहवीं अश्विनादि नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी
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भृगु संहिता फल दर्पण ६५३ नक्षत्र नाम १. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी, ५. मृगशिरा, ६. आर्द्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्य, ९. श्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वाफाल्गुनी, १२. उत्तराफाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाती, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढ़, २१. उत्तराषाढ़, २२. अभिजित्, २३. श्रवण, २४. धनिष्ठा, २५. शतभिषा, २६. पूर्वाभाद्रपद, २७. उत्तराभाद्रपद, २८. रेवती। विशेष- नक्षत्र चक्र में २७ नक्षत्र के साथ अभिजित् नक्षत्र को सम्मिलित कर देने से नक्षत्र संख्या २८ भी माने गए हैं। इस अभिजित् नक्षत्र का समावेश दो नक्षत्र उत्तराषाढ़ा का अन्तिम चरण १५ घड़ी और श्रवण के भोग का आदि पञ्चदशांश भाग ४ घड़ी अर्थात् १९ घड़ी भोग के अन्तर्गत किया गया है। नक्षत्रों के स्वामी अश्विनी नक्षत्र का स्वामी अश्विनी कुमार, भरणी का यम, कृत्तिका का अग्निदेव, रोहिणी का ब्रह्मा, मृगशिरा का चन्द्र, आर्द्रा का शिव, पुनर्वसु का अदिति, पुष्य का गुरु, श्लेषा का सर्प, मघा का पितर, पूर्वाफाल्गुनी का भग, उत्तराफाल्गुनी का अर्यमा, हस्त का सूर्य, चित्रा का त्वष्टा, स्वाती का वायु, विशाखा का इन्द्राग्नि, अनुराधा का मित्र, ज्येष्ठा का इन्द्र, मूल का राक्षस, पूर्वाषाढ़ा का जल, उत्तराषाढ़ा का विश्वेदेव, अभिजित् का विधि, 1 श्रवण का विष्णु, धनिष्ठा का वसु, शतभिषा का वरुण, पूर्वाभाद्रपदा का
कहे गए हैं। अजैकपाद, उत्तराभाद्रपदा का अहिर्बुध्न्य, रेवती की पूषा (सूर्य) स्वामी
योग परिज्ञान सूर्य और चन्द्र की दैनिक गति का योगफल, जब ८०० कला होता है, तो एक योग होता है। इस तरह के २७ प्रसद्धि योग हैं, वे विष्कम्भ आदि नाम से जाने जाते हैं। २७ योगों के नाम १. विष्कम्भ, २. प्रीति, ३. आयुष्मान्, ४. सौभग्य, ५. शोभन, ६. अतिगण्ड, ७. सुकर्मा, ८. धृति, ९. शूल, १०. गण्ड, ११. वृद्धि, १२. ध्रुव, १३. व्याघात, १४. हर्षण, १५. वज्र, १६. सिद्धि, १७. व्यतीपात्, १८. वरीयान्, १९. परिध, २०. शिव, २१. सिद्ध, २२. साध्य, २३. शुभ, २४. शुक्ल, २५. ब्रह्म, २६. ऐन्द्र और २७. वैधृति-ये सत्ताईस योग अपने-अपने नाम तुल्य शुभाशुभ फल करते हैं, अर्थात् अपने नाम के अर्थ जैसा ही फल
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६५४ पञ्चाङ्ग प्रकरण करते हैं। वर्तमान योग जानने का प्रथम प्रकार पुष्य से सूर्य नक्षत्र तक और श्रवण से वर्तमान नक्षत्र तक गिन कर, जितनी-जितनी संख्या हो, दोनों के योगफल में २७ से भाग देने पर जितनी नक्षत्र संख्या शेष हो, उस संख्या तुल्य वर्तमान योग का नाम होता है। जैसे-श्री शुभ सम्वत् २०६१, वैशाख शुक्ल पूर्णिमा में भरणी का सूर्य और वर्तमान नक्षत्र स्वाती है। उस दिन के योग का नाम क्या होगा? अतः उपरोक्तानुसार पुष्य से भरणी (सूर्य नक्षत्र) तक २२ संख्या हुई और श्रवण से स्वाती (वर्तमान दैनिक नक्षत्र) तक २१ संख्या हुई, दोनों का योगफल ४३ में २७ का भाग देने से शेष = १६ नक्षत्र तुल्य सोलहवाँ सिद्धि नाम योग ज्ञात हुआ। वर्तमान योग जानने का द्वितीय प्रकार जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो और जिस नक्षत्र में चन्द्र स्थित हो, उन दोनों नक्षत्रों की संख्या के योगफल से एक कम वर्तमान योग की संख्या होगी। जैसे उपरोक्त उदाहरण से-सूर्य नक्षत्र भरणी २+ चन्द्र नक्षत्र स्वाती १५ = १७ अतः १७-१ =१६वाँ सिद्धि नाम वर्तमान योग हुआ। करण परिभाषा तिथि का अर्द्धभाग तुल्य करण जानना चाहिए, अर्थात् एक तिथि में दो करण होते हैं और उस करण की संख्या ११ होती है, वहाँ पर सात चर करण और चार स्थिर करण जानना चाहिए। वर्तमान करण ज्ञान प्रकार शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से गत तिथि संख्या को २ से गुणा कर एक जोड़ना चाहिए। योगफल में ७ से भाग देने पर शेष तुल्य करण की संख्या होगी। जैसे-सम्वत् २०६१ वैशाख शुक्ल पूर्णिमा में करण जानना है, तो गततिथि संख्या १४ x २ = २८+१ = २९ :७= लब्धि ४, शेष १ हुआ। अतः पूर्णिमा के उत्तरार्द्ध में बव नामक करण हुआ, जिसकी संख्या शेष तुल्य १ है। करण के नाम परिज्ञान १. बव, २. बालव, ३. कौलव, ४. तैत्तिल, ५. गर, ६. वणिज्, ७.
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भृगु संहिता फल दर्पण ६५५ विष्ट, ये सात चर करण हैं; ऐसा महर्षियों ने कहा है। कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के उत्तरार्द्ध में शकुनि, अमावास्या के पूर्वार्द्ध में चतुष्पद, उत्तरार्द्ध में नाग और शुक्लपक्ष प्रतिपदा के पूर्वार्द्ध में किंस्तुघ्न नामक करण स्थित रहते हैं। ये चार स्थिर करण कहे जाते हैं। करणों के स्वामी बवादि चर करणों के स्वामी क्रम से इन्द्र, ब्रह्मा, मित्र, अर्यमा, भूमि, श्री, और यम हैं। शकुनि आदि चार स्थिर करणों के स्वामी कलि, वृष, सर्प और वायु कहे गये हैं। राशि प्रभेद प्रकरण प्रलय काल में जब सम्पूर्ण जगत् अन्धकार में व्याप्त था और पृथ्वी जल से प्लावित थी, उस समय अचानक अपने प्रकाश से समस्त संसार को प्रकाशित करते हुए भगवान् सूर्य का उदय हुआ। सूर्योदय से संसार की रचना हुई और ग्रहों के भ्रमणचक्र पर परिभ्रमण से उस राशि चक्र के बारह विभाग विचित्र रूप से समय के आधार पर प्रस्तुत हुए। अर्थात् नक्षत्रों के आधार पर राशियों के १२ भेद दृष्टिपथ पर आये। अभिप्राय यह है कि २७ नक्षत्र उनमें २७ x ४ = १०८ चरण तथा १०८/ १२ = ९ चरण की राशि होती है। इसी प्रकार मेषादि १२ राशियाँ क्रम से कल्पित की गई हैं। बारह राशियाँ-मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन ये क्रम से १२ राशियों के नाम हैं।
पुरुष है। बारह राशियों के स्वरूप- कुम्भ राशि का रूप घट को धारण किए हुए
किए हुए है। मिथुन राशि स्त्री पुरुष का जोड़ा है, जो कि वीणा और गदा धारण
मीन राशि का रूप युग्म मछली मिली हुई है। धनु राशि का स्वरूप धनुष लिए कमर के ऊपर मनुष्य और कमर के नीचे घोड़ा के सदृश है। मकर राशि हिरन के समान मुख वाला है। कन्याराशि हाथ में दीपक लिए हुए नौका पर बैठी हुई कन्या है। तुला राशि का रूप हाथ में तराजू लिए हुए है। शेष राशियों का स्वरूप नाम सदृश है। काल पुरुष के अङ्ग- बारह राशियों को कालपुरुष का अङ्ग बताया
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६५६ राशि प्रभेद प्रकरण गया है जो इस प्रकार है- मेष राशि काल पुरुष का मस्तक, वृष मुख, मिथुन हाथ, कर्क हृदय, सिंह पेट, कन्या कमर, तुला नाभि से उपस्थ (लिङ्ग) पर्यन्त, वृश्चिक उपस्थ, धनु जाँघ, मकर ठेहुना, कुम्भ ठेहुना से नीचे का भाग और मीन पैर है।
निम्न लिखित हैं- बृहज्जातक में काल पुरुष के अङ्गों का वर्णन किया गया है। जो
अर्थात् जन्मसमय में नराकृति कालचक्र बनाकर उसके मस्तक में मेष, मुख में वृष, छाती में मिथुन, हृदय में कर्क, पेट में सिंह, कटि में कन्या, नाभि के नीचे तुला, लिङ्ग में वृश्चिक, उरु में धनु, जङ्गा में मकर, ठेहुनी के नीचे भाग में कुम्भ और पैर में मीन समझना चाहिए। अङ्गों के प्रयोजन- जीवों के जन्म काल में पूर्वोक्त अङ्गों का विचार इस प्रकार करना चाहिए, जो अवयव शुभ राशि से या शुभग्रह से युत या दृष्ट हों तो जातक का वह अंग पुष्ट होगा। पापग्रह से पीड़ित या दृष्ट हो तो उस अङ्ग को दुर्बल, कमजोर, पीड़ायुक्त समझना चाहिए। बारह राशियों के नामान्तर 4 राशियाँ नामान्तर राशियाँ नामान्तर १- मेष क्रिय ७- तुला जूक :२- वृष ताबुरु ८- वृश्चिक कौर्पिक ३ - मिथुन जुतुम ९- धनु तौक्ष ४- कर्क कुलीर १० - मकर आकोकेर ५ - सिंह लेय ११ - कुम्भ हृदयरोग ६ - कन्या पाथोन ये बारह राशियों के अन्य नाम हैं। इस ग्रन्थ के अतिरिक्त जातक १२ - मीन अन्त्य
पारिजात आदि अन्य नामों में मेषादि राशियों के निम्न पर्यायवाची नाम बताये गये हैं- मेष -अज, विश्व, क्रिय, तुम्बुर, आद्य। वृष -उक्ष, गो, तावुर, गोकुल। मिथुन - द्वन्द्व, नृयुग्म, जुतुम, यम, युग, तृतीय। कर्क - कुलीर, कर्काटक, कर्कट। सिंह -कण्ठीरव, मृगेन्द्र, लेय कन्या - पाथोन, रमणी, तरणी, तौली, वणिक, जूक, घट। वृश्चिक -अलि, अष्टम, कौर्पि, कीट। धनु -चाप, शरासन।
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भृगु संहिता फल दर्पण ६५७ मकर - मृगास्य, नक्र। कुम्भ - घट, तोयधर। मीन - अन्त्य, मत्स्य, पृथुरोम, झष। राशि के पर्याय-राशि, ऋक्ष, क्षेत्र, भ, भवन ये राशि शब्द के पर्याय समानार्थक) नाम पूर्व ऋषियों ने कहे हैं। नक्षत्र से राशि परिज्ञान चूचेचोलाऽश्चिनी प्रोक्ता लीलूलेलो भरण्यथ। आईऊए कृत्तिकास्यादोवावीवू तु रोहिणी।। वेवोकाकी मृगशिर: कुघाडाछा तथार्द्रका। केकोहाही पुनर्वसुर्हूहेहोडा तु पुष्यभम्।। डीडूडेडो तु आश्लेषा मामीमूमे मघा स्मृता। मोटाटीटू पूर्वाफल्गु टेटोपाप्युत्तरं तथा।। पूषाणठाहस्ततारा पेपोरारी तु चित्रका। रुरेरोता स्मृता स्वाती तीतूतेतो विशाखिका।। -६ नानीनूनेऽनुराधर्क्षं ज्येष्ठा नोयायियू स्मृता। येयो भाभी मूलतारा पूर्वाषाढा भुधाफढा।। भेभोजाज्युत्तराषाढा जूजेजोखाऽभिजिद्भवेत्। खीखूखेखो श्रवणभं गागीगूगे धनिष्ठिका।। गोसासीसू शतिभिषक्सेसोदादी तु पूर्वभाक्। दूथाझाञ यथा ज्ञेयो देदोचाची तु रेवती।। अश्विनी-चू, चे, चो, ला; भरणी-ली, लू, ले, लो; कृतिका-अ, ई, ऊ, ए;रोहिणी-जो, वा, वि, वू. मृगशिरा-वे, वो, का, की;आर्द्रा-कू, घ, ङ, छ; पुनर्वसु-के, को, हा, ही; पुष्य-हू, हे, हो, डा; आश्लेषा-डी, डू, डे, डो;मघा-मा, मी, मू, मे; पूर्वाफाल्गुनी-मो, टा, टी, टू;उत्तराफाल्गुनी-टे, टो, पा, पी; हस्त-पू, ष, ण, ठ;चित्रा-पे, पो, रा, री: स्वाती-रू, रे, रो, ता;विशाखा-ती, तू, ते, तो; अनुराधा-ना, नी, नू, ने.ज्येष्ठा-नो, या, यी, यू; मूल-ये, यो, भा, भी;पूर्वाषाढ़ा-भू, धा, फा, ढा; उत्तराषाढ़ा-भे, भो, जा, जी;अभिजित-जू, जे, जो, ख; श्रवण-खी, खू, खे, खो;धनिष्ठा-गा, गी, गू, गे; शतभिषा-गो, सा, सी, सू;पूर्वाभाद्रप्रद-से, सो, दा, दी;
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६५८ राशि प्रभेद प्रकरण उत्तराभाद्रपद-दू, थ, झ, ञ;रेवती-दे, दो, चा, ची नक्षत्र के प्रत्येक चरण का एक-एक अक्षर होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र के चार-चार चरण होते हैं। कुल बारह राशियाँ होती हैं। एक राशि में नौ-नौ चरण होते हैं। अतः पृथ्वी के चारों ओर नक्षत्रों के कुल २७ x ४= १०८ चरण है। न प्रोक्ता ङ ञ णा वर्णा तामादौ सन्ति ते नहि। चेद् भवन्ति तदा ज्ञेया गजडास्ते यथाक्रमम्।। स्विर चक्र में 'ङ ज ण' ये वर्ण नहीं कहे गये हैं, क्योंकि ये तीनों वर्ण नाम के आदि में नहीं पाये जाते हैं। अगर किसी नाम आदि में हो तो वहाँ डकार के जगह गकार, जकार के स्थान में जकार तथा णकार के स्थान में डकार समझना चाहिए। यह स्वर विचार में कहे हैं। किन्तु इसका अर्थ कितने योग्य नहीं है। अनभिज्ञ उल्टा समझ कर शतपद चक्रानुसार नामकरण में लगाते हैं, वह मानने
नाम के आदि अक्षर से नक्षत्र का ज्ञान यन्नामाद्यक्षरं यस्य नक्षत्रस्य पदे भवेत्। तदेव तस्य नक्षत्रं विज्ञेयं गण कोत्तमैः ॥ जातक के नाम का प्रथम अक्षर जिस नक्षत्र के चारों चरण में से एक हो वह उस जातक का नक्षत्र होगा। यदि नाम्नि भवेद्वर्णः संयुक्ताक्षरलक्षणः । ग्राह्यस्तदादिमो वर्ण इत्युक्तं ब्रह्मयामले ।। यदि नाम संयुक्त अक्षर द्वारा प्रारम्भ होता है, तब उसका प्रथम वर्ण लेना चाहिए। उदाहरणार्थ 'श्रीकान्त नाम में संयुक्त अक्षर 'श्र' है। जिसका प्रथम वर्ण 'श' कार है। अतः शतभिषा नक्षत्र होगा। अनुत्कत्वादृकारस्य रेफो ग्राह्यो विचक्षणैः ! ऋद्धिनाथस्य नक्षत्रं यथा चित्राख्यमेव।। शतपद चक्र में 'ऋ' कार नहीं है, अतः 'ऋ' कार के बदले 'र' अक्षर स्वीकार करना होगा। उदाहरणार्थ 'ऋद्धिनाथ' नाम में प्रथम अक्षर 'ऋ' कार है तब उसके स्थान पर 'र' अक्षर ग्रहण करके देखे तो चित्रा नक्षत्र होता है। अआ, इ ई, उ ऊ, ए ऐ, ओ औ, द्वो द्वौ मिथ समो। ब वौ, शसौ तथैवात्र ज्ञेयौ दैवविदां सदा।। शतपद चक्र में अ तथा आ, इ और ई, उ और ऊ, ए और ऐ, ओ एवं औ दोनों को एक समान समझा जाता है तथा ब और व, श और स यह दो- दो अक्षर समान समझने चाहिए। एक नक्षत्र जन्म विचार- यदि जातक का जन्म नक्षत्र ही माता, पिता
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भृगु संहिता फल दर्पण ६५९
नक्षत्र योनि गणादि बोधक तालिका
नक्षत्र पाद- स्वामी कम योनि युञ्जा नाडी राशि गताक्षर नक्षत्र गण
१. चु.चे.चो.ला. अश्विनी अश्व देव पूर्व आद्य मेष मं
२. ली.लू.ले.लो भरणी गज मनुष्य पूर्व मध्य मेष मं.
३. आ.इ.उ.ए. कृत्तिका मेष राक्षस पूर्व अन्त्य मेष१ वृ.३ मं.१शु३
४. ओ.वा.वि.वु. रोहिणी सर्प मनुष्य पूर्व अन्त्य वृषभ शु.
५. वे.वो.का.की. मृगशीर्ष सर्प देव पूर्व मध्य वृ.२ मि.२ शु.२ बु.२
६. कु.घ.ङ.छ. आर्द्रा श्वान मनुष्य मध्य आद्य मिथुन बु.
७. के.को.हा.ही. पुनर्वसु मार्जार देव मध्य आद्य मि.३ क.१ बु.३ चं.१
८. हु.हे. हो.डा. पुष्य मेष देव मध्य मध्य कर्क चन्द्र
९. डी.डू.डे.डो. आश्लेषा मार्जार राक्षस मध्य अन्त्य कर्क चन्द्र
१०. मा.मी.मु.मे. मघा मूषक राक्षस मध्य अन्त्य सिंह सूर्य
११. मो.टा.टी.टु. पू.फा. मूषक मनुष्य मध्य मध्य सिंह सूर्य
१२. टे.टो.पा.पी. उ.फा. गौ मनुष्य मध्य आद्य सि.१ कन्या३ सू.१ बु.३
१३. पू.ष.ण.ठ. हस्त महिषी देव मध्य आद्य कन्या बु.
१४. पे.पो. रा.री. चित्रा व्याघ्र राक्षस मध्य मध्य क.२ तु.२ बु.२ शु.२
१५. रु.रे.रो.ता. स्वाती महिषी देव मध्य अन्त्य तुला शुक्र
१६. ती.तू.ते.तो. विशाखा व्याघ्र राक्षस मध्य अन्त्य तु.३ वृ.१ शु.३ मं. १
१७. ना.नी. नू.ने. अनुराधा मृग देव मध्य मध्य वृश्चिक मंगल
१८. नो.या.यी.यु. ज्येष्ठा मृग राक्षस अन्त्य आद्य वृश्चिक मंगल
१९. ये.यो.भा.भी. मूल श्वान राक्षस अन्त्य आद्य धनु गुरु
Ro भू.धा. फ. ढ़ा. पू.षा. कपि मनुष्य अन्त्य मध्य धनु गुरु
२१. भे.भो.जा.जी. उ.षा. नकुल मनुष्य अन्त्य अन्त्य ध.१ मकर३ गु.१ श.३
R२. जू.जे.जो.खा. अभिजित् नकुल मनुष्य अन्त्य अन्त्य
२३. खी.खू.खे.खो श्रवण कपि देव अन्त्य अन्त्य मकर शनि
२४. गा.गी.गू.गे. धनिष्ठा सिंह राक्षस अन्त्य मध्य म.२ कुं.२ शनि
२५. गो.सा.सी.सू. शतभिषा अश्व राक्षस अन्त्य आद्य कुम्भ शनि
२६. से.सो.दा.दि. पू.भा. सिंह मनुष्य अन्त्य आद्य कु.३ मी.१ श.३ गु.१
२७. दु.थ.झ.ञ. उ.भा. गौ मनुष्य अन्त्य मध्य मीन गुरु
२८. दे.दो.चा.ची. रेवती गज देव पूर्व अन्त्य मीन गुरु
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द्वादश राशियों के वर्णादि सहित मासादिघाततालिका
राशि मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु मकर कुम्भ मीन
वर्ण क्षत्रिय वैश्य शृद्र विप्र क्षत्रिय वैश्य शुद्र विप्र क्षत्रिय वैश्य शूद्र विप्र
जलचर काट मानव चतु.
वश्य चतु. चतु. मानव चतु. मानव मानव
कीट सरी. मनुष्य जलचर
चतु. जल गशि प्रभेद प्रकरण
तत्त्व अग्नि भूमि वायु जल अग्नि भूमि वायु जल अग्नि भूमि वायु जल
मास कार्तिक मार्ग आषाढ़ पौष ज्येष्ठ भाद्रपद माघ आश्विन श्रावण वेशाख चैत्र फाल्गुन
तिथि १-६-११ ५-१०-१५ २-७-१२ २-७-१२ ३-८-१३ ५-१०-१५/४-९-१४ १-६-११ ३-८-१३ ४-९-१४ ३-८-१३ ५-१०-१५
वार रवि शनि सोम बुध शनि शनि गुरु शुक्र शुक्र भौम गुरु शुक्र
नक्षत्र मघा हस्त स्वाति अनुराधा मूल श्रवण शतभिषा रेवती भरणी रोहिणी आर्द्रा आश्लेषा
योग विष्कुम्भ सुकर्मा परिघ व्याघात धृति शुभ शुक्ल व्यति. वज्र वैधृति गण्ड वज्र
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द्वादश राशियों के वर्णादि सहित मासादिघाततालिका
करण बव शकुनी चतुष्पाद नाग बव कौलव तैत्तिल गर तैत्तिल शकुनी वणिज् विष्टि
प्रहर १ ४ ३ १ १ १ ४ १ १ ४ ३ ४
पु.घा.चं. १ ५ ९ २ ६ १० ३ ७ ४ ८ ११ १२
स्त्री.घ.चं. १ ८ ७ ९ ४ ३ ६ २ १० ११ ५ १२ भृगु संहिता फल दर्पण
संज्ञा चर स्थिर द्विस्व. चर स्थिर द्विस्व. चर स्थिर द्विस्व चर स्थिर द्विस्व.
पु.स्त्री पुं. स्त्री पुं. स्त्री पुं स्त्री पुं स्त्री पुं स्त्री पुं स्त्री
क्र. वर्गाक्षर वर्ग वर्गस्वामी वर्ग विचार-जन्म नक्षत्रपादगत अक्षर जिस अकारादि
१. अ, आ, इ, ई, उ,ऊ,ऋ अ वर्ग गरुड
ए, ऐ, ओ, औ, अं अ: अष्टवर्ग में पड़े, उस पर से उसका स्वामी जानना चाहिये। जैसे
२. क, ख, ग, घ, ङ क वर्ग मार्जार वर्गअक्षर पर जन्म नाम है, तो वर्गस्वामी गरुड होगा। कवर्ग अक्षर
३. च, छ, ज, छ, ञ च वर्ग सिंह पर नाम रहने से उसका स्वामी मार्जार होगा। इसी प्रकार अन्यत्र भी
४. ट, ठ, ड, ढ, ण ट वर्ग श्वान समझना चाहिये। अपने नाम के वर्ग से पञ्चम वर्ग का वैर होता है।
५. त, थ त, ध, न त वर्ग सर्प जैसे-गरुड सर्प का, मार्जार मूषक का इत्यादि और अपने से तीसरा
६. प, फ, ब, भ, म प वर्ग मूषक सम होता है। जैसे-गरुड का सिंह सम है तथा चतुर्थ मित्र होता
७. य, र, ल, व य वर्ग मृग है। जैसे-गरुड का मित्र श्वान है।
८. श, ष, स ह श वर्ग मेष ६६१
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६६२ राशि प्रभेद प्रकरण या भाई-बहन का भी जन्म नक्षत्र हो तो वह अशुभ होता है। ऐसी अवस्था में शास्त्रों में एक का विनाश लिखा है। हमारा अनुभव है कि ऐसी स्थिति में थोड़ी कमजोर ग्रह स्थिति वाला अपेक्षाकृत पिछड़ा रहता है, लेकिन दोनों ही वास्तव में सम्पूर्ण शुभ फलों का भोग नहीं कर पाते। इसकी शान्ति करनी चाहिए। एतदर्थ शुभ दिन में नक्षत्र के अधिपति देवता का पूजन धातु की मूर्ति बनवा कर करें। उस मूर्ति को पहले लाल कपड़े में लपेट कर ऊपर से वस्त्र रखकर कलश पर स्थापित करें। ग्रहादि पूजनोपरान्त पंचवारुणी होमानन्तर नक्षत्र देवता के मन्त्र की १०५ आहुतियाँ दें। पश्चात् कलशाम्बु से सब का अभिषेक करें। यह एक नक्षत्र जन्म विचार सर्वदा करना चाहिए। यदि कृष्णपक्ष में जन्म हो, तो तारा विचार करना आवश्यक है। जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मैत्र, अतिमैत्र ये ताराएँ प्रसिद्ध हैं। माता-पिता या भाई-बहन का जन्म नक्षत्र समान होने पर जन्म तारा का फल कह चुके हैं। अग्रज या माता-पिता के नक्षत्र से गणना करके जिस तारा में जातक का जन्म नक्षत्र पड़े तदनुसार फल गर्गाचार्य के मत से बताया जा रहा है। दूसरी तारा में कल्याण करने वाला, तीसरी तारा में नित्य कलह करने वाला, चौथी क्षेमतारा में सरल स्वभाव व शुभ, पाँचवीं में शत्रुता, षष्ठ तारा में सहायक, सप्तम तारा में अनिष्ठकारक, अष्टम तारा में मित्र व नवम तारा में परमप्रिय होते हैं। सामान्यतः ताराएँ नाम तुल्य फल देने वाली होती हैं। अतः तीसरी, पाँचवीं, सातवीं ये अनिष्टकारक व शेष शुभ होती हैं। ध्यान रहे कि शुक्लपक्ष में इसका विचार निरर्थक माना गया है। नारद का मत है कि- कृष्णपक्षे बली तारा शुक्लपक्षे बली शशी। गण्डादि विचार- मूल, ज्येष्ठा, श्लेषा, रेवती, अश्विनी मघा ये ६ नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्र कहलाते हैं। इनमें उत्पन्न जातक को विविध प्रकार के अरिष्ठ दोष व्याप्त होते हैं। अतः सत्ताईसवें दिन उसी नक्षत्र के पुनः आने पर शास्त्रोक्त शान्ति विधान करके बालक का मुख देखना चाहिए। इनमें भी मूल, ज्येष्ठा, व श्लेष ये तीन विशेषतया गण्डकारक होते हैं। अश्विनी, रेवती व मघा ये उपगण्ड नक्षत्र हैं। ज्योतिष तत्त्व नामक ग्रन्थ में बताया गया है कि अश्विनी, मघा व मूल की शुरु की पाँच घड़ियाँ व मूल, ज्येष्ठा, श्लेषा की अन्तिम पाँच घड़ियाँ 'गण्ड' कहलाती हैं। लेकिन सामान्यतः सारे नक्षत्र को ही गण्ड माना जाता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ६६३ मूल व ज्येष्ठा का दिन में, श्लेषा व मघा का रात्रि में एवं अश्विनी व रेवती का दोनों सन्ध्या कालों में विशेष कुप्रभाव होता है। सामान्यतया अश्विनी का प्रथम चरण, मघा के पहले दो चरण व रेवती का अन्तिम चरण अनिष्टकारक होता है। शेष चरणों में जन्म हो तो 'विशेष गण्डदोष' नहीं माना जाना चाहिए। तीन प्रधान गण्ड नक्षत्रों का पृथक् विचार यहाँ किया जा रहा है। मूल विचार- सामान्यतया समस्त मूल नक्षत्र को ही अरिष्टकारक माना गया है। लेकिन जयार्णव नामक ग्रन्थ में मूल विचार विशेष पद्धति से बताया गया है। विद्वान् लोगों में इसका विचार प्रचलित तथा मान्यता प्राप्त है। मूल चक्र को वहाँ वृक्षाकार या पुरुषाकार मानकर दो प्रकार से मूल नक्षत्र के सम्पूर्ण भोग मान (भभोग) का विभाजन इस प्रकार किया गया है- मूल में ७, तने में ८, त्वचा में १०, शाखा में ११, पत्तों में १२, पुष्प में ५, फल में ४, चोटी में ३ घड़ियाँ स्थापित करें। जिस वृक्ष-भाग की घड़ियों में जन्म हो तदनुसार क्रमशः मूलनाश, वंशनाश, मातृकष्ट, सर्वनाश, राज्यप्राप्ति, मंत्रिपद प्राप्ति, धनागम व अल्पायु यह फल कहना चाहिए। मूलचक्र (वृक्षाकार) वृक्षांग मूल तना त्वचा शाखा पत्र पुष्प फल शिखा घड़िया ७ ८ १० ११ १२ ५ ४ ३
फल मूलनाश वंशनाश मातृकष्ट मामानाश राज्यलाभ मंत्रिपद धन अल्पायु
पुरुषाकार मूल चक्र में मस्तक में ५, मुख में ७, कन्धों में ४, भुजा में ८, गले में ३, हृदय में ९, नाभि में २, गुप्तांगों में १०, घुटनों में ६ व पैरों में ६ घड़ियाँ स्थापित करें। तदनुसार क्रमशः राज्यलाभ, पितृकष्ट, बलशालिता, सामर्थ्य, दानी, मंत्रित्व, बली, कामी व मृत्यु फल होता है।
मूलचक्र (पुरुषाकार) अंग सिर मुख कन्धा भुजा हाथ हृदय नाभि गुप्तांग घुटना पैर
घड़ियाँ ५ ७ ४ ८ ३ ९ २ १० ६ ६
फल राज्य पितृकष्ट बलवत्ता सामर्थ्य दानी राज्य बली कामी बुद्धि- मृत्यु मंत्री मान
यदि कन्या जन्म हो तो अलग प्रकार से घटिका विभाजन होता है। सिर में ४, मुख में ६, कण्ठ में ५, हृदय में ५, भुजा में ५, हाथ में ८, गुह्य अंग में ९, जांघ में ४, घुटने में ४, चरणों में १० घड़ियाँ देखें।
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६६४ राशि प्रभेद प्रकरण तदनुसार सिर में जन्म हो, तो पशुनाश, मुख में धननाश, कण्ठ मे धनागम, हृदय में कुटिलता, भुजा में धन, हाथ में दया, गुप्तांग में कामसुख जांघों में माता को कष्ट, घुटनों में बड़े भाई को कष्ट व पैरों में विधवा होती है। चरणानुसार मूल के प्रथम चरण में पितृनाश, दूसरे में मातृनाश, तीसरे मे धननाश और चौथा चरण सुफलदायक होता है। श्लेषा विचार-श्लेषा नक्षत्र में पुत्र व कन्या के जन्म में कोई भेद नहीं होता। यह विभाग सर्वत्र समान रहता है। श्लेषा वृष में क्रमशः फल, पुष्प, पत्र, शाखा, त्वचा, लता व स्कन्ध में क्रमशः १०।५।९।७।१३।१२।४ घड़ियाँ रखें। तदनुसार क्रमशः धन, धन, राजभय, हानि, मातृनाश, पितृहानि व आत्महानि फल कहना चाहिए। वृक्षाकार श्लेषा चक्र
अंग फल पुष्प पत्र शाखा त्वचा लता स्कन्ध घटिका १० ५ ९ ७ १३ १३ ४ फल श्री श्री राजभय हानि मातृनाश पितृहानि आत्महानि ..
मूलवत् श्लेषा चक्र पुरुषाकार भी बताया गया है। इसमें सिर, मुख, नेत्र, ग्रीवा, स्कन्, हाथ, हृदय, नाभि, गुप्तांग, पैर में क्रमशः५।७।२।४।४।८। : १०।६।७।७ घड़ियों के विभाग मानकर क्रमशः आगे बतायी चक्रोक्त रीति से फलादेश किया जाता है। पुरुषाकार श्लेषा चक्र अंग सिर मुख नेत्र ग्रीवा स्कन्ध हाथ हृदय नाभि गुप्तांग पेर घटिका ५ ७ २ ४ ४ ८ १० ६ ७ ७ फल सुपुत्र पितृ मातृ लंपट गुरु बली आत्म- भ्रम तपस्वी धन हानि हानि भक्ति घाती नाश
ज्येष्ठा विचार- ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने से बड़े भाई को, दूसरे चरण में छोटे भाई को, तीसरे चरण में माता को व चौथे चरण में स्वयं को विशेष कष्ट होता है। चौथे चरण में भी अन्तिम घड़ियाँ विशेष हानिकारक व भयप्रदा होती हैं। सम्पूर्ण ज्येष्ठा नक्षत्र को ६-६ घड़ियों के समान दस भागों में बाँट लेना चाहिए। यह नक्षत्र प्रथम ६ घड़ियों के जन्म में नानी का, दूसरे भाग में नाना का, तीसरे में मामा का, चौथे में माता का, पाँचवें में स्वयं का, छठे में वंश के अन्य व्यक्ति का, सातवें में मातृ व पितृ कुल का, आठवें में बड़े भाई
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भृगु संहिता फल दर्पण ६६५ का, नवें में ससुर का और दसवें भाग में सब कुटुम्ब का नाश करने वाला होता है। अभुक्त मूल विचार- ज्येष्ठा नक्षत्र में अन्त की चार घड़ियाँ व मूल की प्रथम चार घड़ियाँ मिलाकर आठ घड़ियाँ या लगभग एक प्रहर का समय अभुक्त मूल कहलाता है। कश्यप, वशिष्ठ, नारद आदि ने अभुक्त मूल का समय मान एक प्रहर अर्थात् ३ घंटे अर्थात् ७।३० घड़ी माना है, लेकिन स्थूल व्यवहार में चार- चार घड़ी का पक्ष प्रचलित है। यही मुख्य पक्ष भी है। वैसे कुछ लोग इससे भी कम घड़ी समय की अभुक्त संज्ञा मानते हैं। लेकिन चार घड़ी वाला पक्ष अनेक मुनियों द्वारा समर्थित है। अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक महान् अनिष्ठकारी बताया गया है। अतः आठ वर्ष तक पिता मुँह न देखें। नवें वर्ष में विधिवत् शान्ति करके मुख देखे अथवा, बालक का परित्याग कर दे, ऐसा शास्त्र वचन है। लेकिन हम इसे आजकल अमानवीय मानते हैं तथा असम्भव भी। अतः शान्ति ही मुख्य पक्ष है। विधिवत् सविस्तार मूलशान्ति एवं महामृत्युञ्जय जप, गोदान, स्वर्णदान व वस्त्रदान करके सूतकान्त में पिता सुमुहूर्त्त में मुख देखें। त्रिविध गण्डान्त विचार-रेवती के अन्त की दो घड़ियाँ व अश्विनी के आरम्भ की दो घड़ियाँ, इसीप्रकार श्लेषा के अन्त की दो घड़ी व मघा की प्रथम दो घड़ी एवं ज्येष्ठा के अन्त की दो घड़ी व मूल के आदिकी दो घड़ियाँ 'नक्षत्र गण्डान्त' कहलाती हैं। यह काल नक्षत्र-सन्धि के साथ-साथ राशि-
गया है। सन्धि का भी होता है। अतः यात्रा, विवाह व जन्म में महान् अनिष्टकारी कहा
पूर्ण तिथियों ५।१०।१५ की अन्तिम एक घड़ी व इनसे अगली नन्दा तिथियों के आदि की एक घड़ी कुल दो घड़ी या ४८ मिनट का समय 'तिथ गण्डान्त' कहलाता है। इसी प्रकार कर्क लग्न की अन्तिम आधी घड़ी व सिंह के प्रारम्भ की आधी घड़ी, वृश्चिक के अन्त की व धनु के शुरू की आधी-आधी घड़ी एवं मीन के अन्त की व मेष के प्रारम्भ की आधी-आधी घड़ी 'लग्न गण्डान्त' कहलाती हैं। आधी घड़ी का मान १२ मिनट होता है। यही तीन प्रकार का गण्डान्त काल कहलाता है। इस गण्डान्त काल में विवाह, उपनयन, यात्रा, जन्मादि निषिद्ध व अनिष्टकारी होते हैं। दिन में गण्डान्त में जन्म हो तो पिता की, रात्रि में जन्म हो तो माता की व सन्ध्या समय गण्डान्त काल में जन्म हो तो स्वयं जातक की मृत्यु हो जाती है। !
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६६६ राशि प्रभेद प्रकरण पिता की मृत्यु एक वर्ष के अन्दर व माता की तीन वर्ष के अन्दर, एवं स्वयं की तुरन्त मृत्यु सम्भावित होती है। अतः अविलम्ब विधि-विधानपूर्वक शान्ति करानी चाहिए। गण्डान्त का अपवाद- वशिष्ठ का मत है कि यदि रात्रि में मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो अथवा दिन में द्वितीय चरण में जन्म हो तो बालक क्रमशः पिता व माता का नाशक नहीं होता। गर्गाचार्य का मत है कि रविवार को अश्विनी, बुध या रविवार को हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, रेवती, ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्म हो तो त्रिविध गण्डान्त का दोष नहीं होता। यदि चन्द्रमा बलवान् हो तो नक्षत्र व तिथि गण्डान्त एवं गुरु बली हो तो लग्न गण्डान्त दोष नहीं होता। अभिजित् मुहूर्त स्थानीय समयानुसार ११.३६ बजे से १२.२४ बजे तक होता है। वशिष्ठ के मत से अभिजिन्मुहूर्त में जन्म होने पर समस्त गण्डान्त दोष शान्त हो जाता है। हमारे विचार से यदि सामर्थ्य हो तो सर्वत्र गण्डमूल या गण्डान्तादि की शान्ति अवश्य करानी चाहिए। शान्ति काल व्यवस्था-सामान्यतया जिस नक्षत्र में जन्म हो, वही नक्षत्र जब २७ दिन बाद लौटकर आए तो उसी नक्षत्र में शान्ति करानी चाहिए, यह मत बहुत प्रचलित है। लेकिन उक्त समय का अतिक्रमण होने पर या अत्यावश्यकता में इस प्रकार शान्ति काल का निश्चय करें। १. सूतकान्त समय में या बारहवें दिन। २. आठवें वर्ष में। ३. जब कभी भी शुभ समय में अपना जन्म नक्षत्र हो। ४. अत्यावश्यकता में किसी शुभ दिन व मुहूर्त में। मूलवास विचार- यदि जन्मलग्न, व जन्ममास के अनुसार मूल का वास भूमि पर ही रहे तो विशेष कष्ट होता है। स्वर्ग या पाताल में वास आने पर साधारण अशुभ होता है। मूलवास चक्र भूमि स्वर्ग पाताल जन्ममास चैत्र, श्रावण, आषाढ़, भाद्रपद, वैशाख, ज्येष्ठ कार्तिक, पौष आश्विन, माघ मार्गशीर्ष फाल्गुन जन्मलग्न ३।६।९।१२ १।४/७/१० २।५/८/११ कृष्ण चतुर्दशी जन्म- कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के मान को ६ बराबर भागों में बाँट लेना चाहिए। जिस षष्ठांश में जन्म हो तदनुसार जन्म फल जानें।
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भृगु संहिता फल दर्पण ६६७
षष्ठांश फल षष्ठांश फल
१ शुभ २ पितृनाश ३ मातृनाश ४ मातुलनाश ५ वंशनाश ६ आत्मनाश या धनहानि अमावस्या जन्म फल ज्ञान- अमावस्या के भी सम्पूर्ण मान के ६ समान भाग करके देखें। तदनुसार फल जानें। प्रथम षष्ठांश-धननाश द्वितीय षष्ठांश-मातृनाश तृतीय षष्ठांश-पितृनाश चतुर्थ षष्ठांश-मातुलनाश पंचम षष्ठांश-आत्मनाश षष्ठ षष्ठांश-आत्मनाश या धनहानि इसी प्रकार व्यतिपात, परिघ, वैधृति, विष्कम्भ, शूल योग में उत्पन्न जातक को भी गण्ड दोष लगता है। कार्तिक मास में तुलागत सूर्य में जन्म होने से भी शरीर, धन व सन्तान की हानि सुनिश्चित होती है। इसके अतिरिक्त, ग्रहण, संकान्ति, उत्पात दिनादि में या मुहूर्त खण्डोक्त अशुभ वेलाओं में जन्म होने पर भी प्रबल अरिष्ट होता है। इनकी शान्ति के लिए, अभिषेक, जल, होमादि, रुद्रार्चन, तिलपात्र का दान करवाना श्रेयस्कर होता है। इस शान्तिकार्य को यथाशीघ्र करवाना चाहिए। अधिक समय व्यतीत होने पर शान्तिकर्म की मात्रा स्वबुद्धि विवेक से द्विगुणत, चतुर्गुणित या अष्टगुणित करनी चाहिए। मण्डल या चक्रार्ध स्वामी- यदि कोई ग्रह बारह राशियों पर भ्रमण कर लेता है तो उस ग्रह का १ भ्रमण कहा जाता है उसे सिद्धान्तग्रन्थों में भचक्र भी कहा गया है; उस चक्र भ्रमण के आधे सिंह से क्रमशः ६ राशियों के स्वामी अर्थात् सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर का स्वामी सूर्य एवं कर्क से विलोम ६ राशियों का अधिपति चन्द्रमा होता है। इसके अतिरिक्त पञ्चताराग्रह (मं०, बु०, बृ०, शु०, श०) कर्क, सिंह को छोड़ कर अन्य राशियों के स्वामी होते हैं। चक्रार्ध स्वामी के आधार पर फल ज्ञान-जन्माङ्ग में सूर्य के चक्रार्ध में समस्त ग्रहों के होने से जातक शौर्य गुण सम्पन्न तेजस्वी और अत्यन्त साहसी होता है।
भाग्यवान् होता है। चन्द्र के चक्रार्ध में ग्रह होने पर जातक मृदु, सरल स्वभाव और
१२ राशियों के स्वामी एवं नवांशाधिपति- मङ्गल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा,
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६६८ राशि प्रभेद प्रकरण सूर्य, बुध, शुक्र, मङ्गल, गुरु, शनि, और गुरु ये मेषादि राशियों के स्वामी हैं। इन मेषादि राशियों में क्रम से मेष, मकर, तुला और कर्क से आरम्भ करके नवमांश होते हैं। मेष का नवांश मेष से, वृष का मकर से, मिथुन का तुला से, कर्क का कर्क से इसी को तीन आवृत्ति इस प्रकार करने पर मेषादि बारह राशियों के नवांशपति हो जाते हैं। स्पष्टार्थ चक्र मे वृ मि क सिक तु वृ म कु मी ११० ७ ४ १ १० ' राशिनाम ४ १ १० ७ ४ प्रथमनवांश १ राशि में ३० अंश होता है। उसमें ९ का भाग देने पर ३ अंश २० कला का १ नवांश होता है। जैसे- ९) ३० ( ३ अंश २७ ३ x ६० = १८० (२० कला १८ x x भवनाधिप के बिना फलादेश नहीं होता-विज्ञ गणक को जातक शास्त्र में वर्णित फलादेश का भावाधिपति के आधार पर ही विचार करना चाहिए; क्योंकि भावाधिपतियों के बिना इस जातक शास्त्र में एक पद भी चलना संभव नहीं है। वर्गोत्तम नवांश तथा द्वादशांश का वर्णन- चर राशियों में अर्थात् मेष, कर्क, तुला, और मकर राशियों में प्रथम नवांश वर्गोत्तम नवांश होता है। स्थिर अर्थात् वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशियों में मध्य अर्थात् पञ्चम (५वाँ) नवांश वर्गोत्तम होता है। एवं द्विस्वभाव राशियों अर्थात् मिथुन, कन्या, धनु और मीन में अन्तिम नवांश वर्गोत्तम होता है। अभिप्राय गह है कि मेष में मेष का, वृष में वृष का, मिथुन में मिथुन का और इसी प्रकार आगे सभी राशियों का नवांश, वर्गोत्तम कहलाता है। यदि जन्म लग्न में वर्गोत्तम नवांश हो तो जातक कुल में प्रधान होता है। द्वादशांश-प्रत्येक राशि में अपनी राशि से प्रारम्भ होता है। राशि में ३० अंश होता है। इसमें १२ का भाग देने पर ३०/१२=२/३। द्रेष्काण एवं होरा स्वामी-द्रेष्काण चक्र में प्रथम द्रेष्काण उसी राशि का होता है। द्वितीय द्रेष्काण उससे पञ्चम राशि का और तृतीय द्रेष्काण नवमराशि
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भृगु संहिता फल दर्पण ६६९ का होता है। एक राशि के तृतीय भाग को द्रेष्काण कहते हैं। अर्थात् १२ राशि में ३० अंश इसका तृतीयांश १० अंश तक पहला, ११ से २० अंश तक दूसरा तथा २१ से ३० तक तीसरा द्रेष्काण होता है। होरा विचार-विषम अर्थात् १, ३, ५, ७, ९, ११ में प्रथम होरा सूर्य की और द्वितीय होरा चन्द्र की होती है और सम अर्थात् २, ४, ६,८, १०, एवं १२ राशियों में प्रथम होरा चन्द्र की तथा द्वितीय होरा सूर्य की होती है। १५, १५ अंश की होरा कही गई है। एक राशि में दो होराएँ होती हैं। त्रिशांश के स्वामी- विषम राशियों १, ३, ५, ७, ९, ११ में ५,५,८, ७,५, अंश तक क्रम से १ अंश से ५ अंश तक मङ्गल, ६ से १० तक शनि, ११ से १८ अंश तक गुरु, १९ से २५ अंश तक बुध तथा २६ से ३० अंश तक शुक्र त्रिशांश के स्वामी होते हैं। इसी प्रकार सम राशियों में १ से ५ अंश तक शुक्र, ६ से १२ तक बुध, १३ से २० तक गुरु, २१ से २५ तक शनि, २६ से ३० तक मङ्गल त्रिशांश के स्वामी होते है। सप्तमांश के स्वामी-मेष राशि का प्रथम सप्तमांश मेष का, द्वितीय वृष का, तृतीय मिथुन का, इसी प्रकार अन्य राशियों का समझना चाहिए। वृष में वृश्चिक से, मिथुन में मिथुन से, कर्क में मकर से, सिंह में सिंह से, कन्या में मीन से, तुला में तुला से, वृश्चिक में वृष से, धनु में धनु से, मकर में कर्क से, कुम्भ में कुम्भ से, मीन में कन्या से शुरु होकर सप्तम राशि तक सप्तमांश होता है। उक्त राशियों के सप्तमांश उनके स्वामी भी होते हैं। अभिप्राय यह है कि विषमराशियों में अपनी राशि से ही सप्तमांश होता है तथा समराशियों अपनी राशि से जो सप्तम राशि हो उससे प्रारंभ होता है। राशियों में वर्गभेद संख्या का ज्ञान- एक राशि में ३० अंश, १ अंश में ६० कला होती है। इसी प्रकार एक राशि में १८०० कला होती है। अपनी अपनी राशि से इन्हीं १८०० कलाओं के परिवर्तन से १ राशि में षडवर्ग बनाने हों तो ६ भेद होते हैं। इस प्रकार १२ x ६ = ७२ भेद होते हैं। इसी प्रकार सप्तवर्ग में कुल संख्या १२ x ६ = ७२ होगी। ७२ में चूड अर्थात् १२ जोड़ने पर ७२ + १२ = ८४ होगा। यहाँ पर चूड का अर्थ अन्तिम है। पद का अर्थ स्थान है। अतः राशियों की संख्या १२ ही है इसलिये राशियों की अन्तिम संख्या १२ ही है। वर्गभेद का आनयन-किसी भाव या किसी ग्रह में इच्छित वर्ग जानना हो तो स्पष्ट भाव या स्पष्ट राश्यादि ग्रह की कला बनाकर, इसको अभीष्ट जो
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६७० राशि प्रभेद प्रकरण वर्ग है उसकी संख्या से गुणा करके गुणनफल में १८०० का भाग देने पर लब्धि अभीष्ट वर्ग राशि होती है। इसके गुण दोषों का वर्णन आगे किया जाएगा। जिस ग्रन्थ से साधित ग्रह परीक्षा करने में सिद्ध हो, उसी के द्वारा ग्रह स्पष्ट करके वर्गों का आनयन करना चाहिए। उदाहरणार्थ राश्यादि लग्न ४।१४।१५।१० हो, इसमें सप्तमांश जानना है, तो पूर्वोक्त चक्र से सिंह राशि में सप्तमांश का चतुर्थ खण्ड है, तथा सिंह में सिंह से ही सप्तमांश आरम्भ होता है अतः सिंह से चतुर्थ वृश्चिकराशि का सप्तमांश हुआ। जिसका स्वामी मंगल ग्रह हुआ। ४८ + १४ ६२ ६० ३७२० १५ ३७३५ ७ १८००) २६१४५ ( इस प्रकार सप्तमांश एवं नवमांश, दोनों प्रकार से तुल्य ही सिद्ध होता है। परञ्च होरा, द्रेष्काण और त्रिशांश में भेद पड़ता है। के होते हैं। क्योंकि उपरोक्त रीति से होरा, आदि सभी वर्ग मेषादि द्वादश राशियों परञ्च होरा सभी राशियों के न मानकर केवल रवि और चन्द्रमा की ही बहुत से आचार्य मानते हैं। तथा द्रेष्काण केवल स्व, पञ्चम और नवम राशि के ही, एवं त्रिंशांश मंगलादि ५ ग्रहों के ही मानते हैं। करके देख लें। इस प्रक्रिया से सातों वर्गों की सिद्धि नहीं होती है। पाठकगण क्रिया राशियों के क्रूरादि संज्ञा- ऊपर दिए गए राशियों की कूरादि संज्ञा स्पष्ट है। इन राशियों की संज्ञा जानकर ज्योतिर्विद फलादेश किया करते हैं। जैसे-मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ राशियों की संज्ञा क्रूर है। संज्ञा है। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन राशियों की अक्रूर (शुभ) जैसे क्रूर राशियों में जातक क्रूर स्वभाव वाला, अक्रूर (शुभ) राशि में जन्म लेने वाले का स्वभाव सरल तथा मधुर होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ६७१ पुरुष राशि में पैदा हुआ प्राणी तेजस्वी और स्त्री राशि में पैदा हुआ सौम्य स्वभाव का होता है। चर राशि में चञ्चल प्रकृति, स्थिर में स्थिर प्रकृति वाला तथा द्विस्वभाव में मिली जुली प्रकृति का होता है कर्क, मीन, वृश्चिक राशियों की अन्तिम भाग गन्डान्त संज्ञा से सुप्रसिद्ध है। गण्डान्त में उत्पन्न बालक फल ज्ञान- गण्डान्त में जन्म लेने वाला प्रायः जीवित नहीं रह पाता। यदि जीवित रहे तो माता को क्लेशप्रद या कुल का नाशक होता है। साथ ही वह जातक हाथी घोड़ों से युत राजा के समान सुख भोग करता है। राशियों की दिशा और फल ज्ञान- पूर्वादि क्रम से ३ आवृत्ति राशियों की दिशा होती है। दिशा क्रम से मात्रादि का भी विचार करना चाहिए। इसके विषय में अन्य ग्रन्थों में निर्देश सुस्पष्ट हैं- दिशा के ज्ञान से ही खोई हुई वस्तु का ज्ञान तथा सूतिका गृह के द्वारादि भी बताते हैं। पूर्वादि दिशाओं में क्रम से, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में नीचे बताए गये क्रम से राशियाँ बली होती हैं। पूर्व दिशा में द्विपद अर्थात् नरराशियाँ (कन्या, मिथुन, कुम्भ, तुला, धनु का पूर्वार्द्ध) राशियाँ, दक्षिण दिशा में चतुष्पद अर्थात् पशु (धनु का परार्ध, सिंह, वृष, मकर का पूर्वार्द्ध और मेष) बली होती है। पश्चिम में वृश्चिक और उत्तर में जलचर (मकर का परार्ध, मीन और कर्क) बली होती हैं। इनमें रात्रि में चतुष्पद, दिन में द्विपद, सन्ध्या में मकर, वृश्चिक, कर्क और मीन बली होती हैं। मिथुन, कर्क, मकर, मेष, वृष, धनु इनकी रात्रि संज्ञा, सिंह, तुला, वृश्चिक, कुम्भ, मीन, कन्या इनकी दिन संज्ञा, मिथुन के सहित जो ६ राशियाँ है उनमें मिथुन को छोड़कर कर्क, मकर, मेष, वृष और धनु ये ५ राशियाँ पृष्ठोदय कहाती है। इसी प्रकार मीन को छोड़कर मिथुन के साथ ५ राशियाँ सिंह, तुला, कन्या, वृश्चिक, और कुम्भ शीर्षोदय संज्ञक है। मीनराशि उभयोदय संज्ञक है जिन राशियों का उदय पृष्ठ से होता है वे पृष्ठोदय, जिनका सिर से उदय होता है वे शीर्षोदय राशियाँ हैं। मीनराशि का उदय मुख और पूँछ दोनों तरफ से होता है, इसलिये इसकी उभयोदय संज्ञा कही है। जातक पारिजात में-
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६७२ राशि प्रभेद प्रकरण शीर्षोदयगतः खेटः पाकादौ फलदो भवेत्। पृष्ठोदयस्थः पाकान्ते सदा चोभयराशिगः॥ (२ अ० ८६ श्लो०) जो राशि अपने स्वामी से या मित्र से दृष्ट युत हो एवं बुध बृहस्पति से युत दृष्ट हो और अन्य ग्रहों से दृष्ट युत न हो तो वह राशि बलवान् होती है। लग्नादि १२ भावों के नाम- १. तनु, २. धन, ३. सहज, ४. बान्धव, ५. पुत्र, ६. अरि (शत्रु) व्रण, ७. स्त्री, ८. विनाश (मृत्यु), ९. पुण्य, १०. कर्म, ११. आय तथा १२. व्ययेंये लग्नादि द्वादश भावों के नाम हैं। अपर नाम- १. शक्ति, २. धन, ३. पौरुष, ४. गृह (भूमि), ५. प्रतिभा, ६. व्रण, ७. काम, ८. देह, विवर अर्थात् छिद्र ९. गुरु, १०. मान, ११. भव एवं १२. व्यय-ये द्वादश भावों के नामान्तर हैं। पुनः नामान्तर- ४,८, की चतुरस्त्र संज्ञा; ९ की तप संज्ञा; १, ४, ७, १० की चतुष्टय कण्टक, केन्द्र संज्ञा होती है। पुनः चतुर्थ दशम के नामान्तर- चतुर्थ भाव का सुख जल, पातल बन्धु, हिबुक नाम हैं। दशम का कर्म, आज्ञा मेषूरण और गगन नाम है। पुनः नवम, पञ्चम, सप्तम के अपर नाम-९, ५ को त्रिकोण कहते हैं। पञ्चम को धी (बुद्धि) सप्तम को द्यून, जाया, अस्तमय और जामित्र कहते हैं। ६, ३, १२, २ के नामान्तर- ६, ३, १२, २ के नामान्तर षष्ठभाव को षट्कोण, तृतीय को दुश्चिक्य द्वादश को रिष्फ, द्वितीय को कुटुम्ब कहते हैं। पणफर आपोक्लिम संज्ञा- केन्द्र से आगे के भाव २, ५, ८, ११ ये पणफर उसके आगे ३, ६, ९, १२ आपोक्लिम कहलाते हैं। केन्द्र में जो ग्रह रहता है वह जातक की बाल्यावस्था में फल देता है जो पणफर में रहता है वह यौवनावस्था में और जो आपोक्लिम में रहता है वह वृद्धावस्था में फल देता है। उपचय और अनुपचय- ६, १०, ११, ३ ये चार भाव उपचय और १, २, ३, ४, ५, ७, ८, ९, १२ ये आठों भाव अनुपचय नामक हैं। ग्रहों के मूल त्रिकोणराशि- सिंह, वृष, मेष, कन्या, धनु, तुला और कुम्भ ये क्रम से सूर्यादि ग्रहों के मूलत्रिकोण हैं। मेष, वृष, मकर, कन्या, कर्क, मीन और तुला ये क्रम से १०, ३, २८, १५, ५, २०, अंशों से सूर्यादि ग्रहो के उच्च स्थान हैं। इनमें जो अंश कहे गये है उतने उतने अंश पर परमोच्च समझना चाहिए। तथा अपने अपने उच्चसे सप्तम राशि नीच स्थान होते हैं। एवं उच्च कथित अंशों में परम नीच समझना चाहिए। राशियों के ह्रस्व, मध्य दीर्घोदय संज्ञा-मीन, वृष, मेष, कुम्भ ये ह्रस्वोदय, तथा मिथुन, धनु, कर्क, मकर ये समोदय (मध्योदय) और वृश्चिक, कन्या, सिंह, तुला ये दीर्घ (दीर्घोदय) है। इन में जो राशि लग्न में हो उसी राशि के समान ह्रस्व, सम या दीर्घ
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भृगु संहिता फल दर्पण ६७३ जातक का मस्तकादि शरीर समझना चाहिए तथा लग्न में जो ग्रह हो उस ग्रह के समान भी जातक का शरीर समझना चाहिए। राशियों का प्लव- यहाँ राशियों के स्वामी की जो दिशा कही गई है वह उन राशियों की प्लव दिशा कहलाती है ऐसा यवनों ने कहा है। जैसे-मेष का स्वामी मङ्गल है, मङ्गल की दक्षिण दिशा हैं, अतः दक्षिण मेष का प्लव हुआ। प्लव का अर्थ नत (निम्न भूतल) है। अतः जिस राशि में लग्न या चन्द्रमा हो उसकी प्लव दिशा में राजा यात्रा करे तो अति शीघ्र शत्रु को जीत लेता है इससे राजा का जप का पराजय का विचार होता है। राशियों के वर्ण तथा प्रयोजन- १. लाल २. श्वेत, ३. शुकसदृश हरित, ४ पाटल (लाल, उजला, मिला हुआ), ५. धूम्र, ६. पाण्डु वर्ण, ७. अनेक वर्ण, ८ कृष्ण वर्ण, ९. सुवर्ण सदृश, १० पिङ्गल, ११ चित्र और बभ्रु (भूरा रंग) क्रम से ये मेषादि राशियों के वर्ण है। इसका प्रयोजन यह है कि जन्मकालिक लग्न राशि के वर्ण सदृश जातक का वर्ण होता है। जन्मलग्न के स्वामी को उसी वर्ण की प्रतिमा बना कर पूजन करने से रोगादि समस्त शत्रुओं का उसी प्रकार नाश होता है, जैसे इन्द्र की सेना द्वारा राक्षसों का नाश होता है। कालपुरुष के आत्मादि विभाग- कालपुरुष का सूर्य आत्मा, चन्द्रमा मन, मङ्गल बल, बुद्ध वाणी, गुरु ज्ञान, शुक्र सुख, राहु मद और शनि उस कालपुरुष का दुख है। जन्म समय में आत्मादि कारक ग्रह बली हो तो आत्मादि बली, और दुर्बल हो तो दुर्बल समझना चाहिए। किन्तु शनि का फल विपरीत कहना चाहिए। क्योंकि दुःखकारक होने के कारण शनि जितना दुर्बल हो उतना ही अच्छा है। लग्न राशि के आश्रित जितने विकल्प है, उनका जिस प्रकार उदय होता रहता है, उसी प्रकार काल पुरुष के ७;७, ८ आदि संख्यक अवयव उत्पन्न होते रहते हैं। अर्थात् प्रथम द्रेष्काण में जन्म होने से मूर्धादि ७ अवयव, द्वितीय द्रेष्कारण में ग्रीवादि ७ अवयव, और तृतीय द्रेष्काण में वस्ति आदि ८ अवयव होते हैं। लग्नद्रेष्काणवश अवयव ज्ञान- तात्कालिक लग्न से पीछे की ६ राशि जो उदित (क्षितिज से ऊपर) रहती है वे काल या जातक के वाम अङ्ग, तथा अनुदित अर्थात् क्षितिज से नीचे लग्न से आगे की ६ राशियाँ दक्षिण अङ्ग समझना चाहिए। वाम अङ्ग निर्बल तथा दक्षिण अङ्ग सबल होता है।
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६७४ ग्रह प्रभेद प्रकरण उसी अङ्ग विभाग को कहते हैं- यदि लग्न में प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न १ मस्तक, २, १२ नेत्र, ३, ११ कान, ४, १० नाक, ५, ९ गाल, ६ ठुड्डी और सप्तम भाव मुख होता है। यदि द्वितीय द्रेष्काण लग्न में हो तो लग्न १ ग्रीवा (कण्ठ), २,१२ कन्धा, ३, ११ दोनों भुज, ४, १० पँजरी, ५, ९ हृदय (छाती), ६,८ पेट और ७ सप्तम भाव नाभि होती है। यदि तृतीय द्रेष्काण लग्न में हो तो लग्न १. वस्ति (पेडू), २, १२ लिङ्ग और गुद मार्ग, ३, ११ दोनों अण्डकोश, ४, १० जाँघ, ५,९ घुटने के नीचे का हिस्सा और सप्तम भाव पैर होता है। इस तरह का लग्न के द्रेष्काणवश ३ प्रकार अङ्ग विभाग कहे गये हैं लग्न के आधार पर दोनों तरफ कल्पना करके उक्त अवयवों का शुभाशुभ कर विचार करना चाहिए। अङ्गज्ञान का प्रयोजन-जिस अवयवस्थित भाव में पाप ग्रह हो उस अङ्ग में घाव वा चोट, जिसमें शुभ ग्रह हो तो उसमें तिल मसा आदि चिन्ह समझना चाहिए। यदि ग्रह (शुभ वा पाप) अपनी राशि वा अपने नवांश में हो तो उक्त चिन्ह जन्म के समय में ही समझना। यदि स्वराशि वा स्वनवांश में ग्रह न हो तो अपनी अपनी दशा आने पर घाव आदि चिन्ह करते हैं।
ग्रह प्रभेद प्रकरण ग्रहों के राजत्वादि अधिकार और प्रयोजन- सूर्यादि ग्रहो में सूर्य और चन्द्रमा राजा। बुध युवराज। मङ्गल सेनापति। गुरु, शुक्र मन्त्री। शनि भृत्य। बनाता है। इस तरह जन्म समय जो ग्रह सबल हो वह जातक को अपने सदृश ही यदि अधिक ग्रह बलवान् हो तो जातक में सभी प्रकार के गुण होते हैं। कौन सा ग्रह किस दिशा का स्वामी- सूर्य, शुक्र, मङ्गल, राहु, शनि, चन्द्र, बुध और गुरु ये क्रम से पूर्वादि आठों दिशाओं के स्वामी हैं। अर्थात् पूर्व का सूर्य, अग्निकोण का शुक्र, दक्षिण का मंगल, नैऋत्य का राहू, पश्चिम का शनि, वायव्य का चन्द्रमा, उत्तर का बुध और ईशान का स्वामी गुरु होता है। ग्रहों के शुभ एवं पाप संज्ञा- गुरु, बुध, और शुक्र ये शुभ ग्रह हैं। बुध यदि पाप ग्रह के साथ हो तो वह भी पाप ग्रह ही समझा जाता है और चन्द्रमा क्षीण हो तो पाप, अर्थात् पूर्ण हो तो शुभ होता है। ध्येय है कि चन्द्रमा शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मध्यबली,
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भृगु संहिता फल दर्पण ६७५ शुक्ल एकादशी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण बली और षष्ठी से अमावस्या तक बलहीन होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी के अर्द्धभाग से शुक्लपक्ष की अष्टमी के अर्द्ध भाग तक क्षीण रहता है। सूर्यादि ग्रहों के अन्य नाम परिचय- सूर्य के नाम-हेलि, भानु। चन्द्र का शशी, मङ्गल के नाम-क्रूर, दृक, भूमिसुत, आर, रक्त और वक्र हैं। बुध के नाम-हेम्न, विद्, ज्ञ और बोधन है। गुरु के नाम-ईड्य, इज्य, अङ्गिरा, जीव शुक्र के आस्फुजित, सित, भृगु। शनि के मन्द, कोण, यम, कृष्ण नाम है। इसके और भी पर्यायवाची नाम ग्रन्थान्तर से समझना चाहिए। अन्य ग्रन्थों में विशेषतः सर्वार्थचिन्तामणि में सूर्यादि ग्रहों के पर्याय दिए गए है। जैसे-सूर्य, हेलि, भानु, दीप्तरश्मि, चण्डाशु, भास्कर, अहस्कर, तपन, दिनकृत, भानुमान, पूषा, अरुण और अर्थ नाम है। चन्द्रमा का शीत रश्मि, अब्ज, सोम, शीतांशु, ग्लौ, मृगांक, क्लेश, शीतयुति, उडुपति, इन्दु ये चन्द्र के नाम है। मंगल के आर वक्र, क्रूरदृक, आवनेय, कुज, भौम, क्रूर, लोहिताङ्ग, पाणी, क्षितिज, रुधिर, अंगारक, क्रूर नेत्र नाम है। बुध का हेम्न, विद्, ज्ञ बोधन, इन्द्रपुत्र, सौम्य चन्द्रपुत्र, चान्द्रि तारा ये नाम हैं। गुरु का ईड्य, इज्य, अङ्गिरा और जीव है। शुक्र का आस्फुजित, सित, भृगु नाम प्रख्यात है। शनि का मन्द, कोण, यम और कृष्ण ये नाम है। इसके अतिरिक्त भी ग्रहों का नाम ग्रन्थान्तर से जानना चाहिए। सूर्यादि ग्रहों के वर्ण और अधिदेवता-ताम्रवर्ण, श्वेत, लाल, हरा, पीत, अनेक रङ्ग और काला सूर्यादि ग्रहों के क्रम से वर्ण हैं अग्नि, जल, कार्त्तिकेय विष्णु, इन्द, इन्द्राणी और ब्रह्मा क्रम से सूर्यादि ग्रहों के अधिदेवता होते हैं। सूर्यादि नव ग्रहों की पूजा तत्तद् ग्रह के मन्त्र द्वारा करके उस ग्रह की
लाभ होता है। दिशा में यात्रा करे तो शत्रु को जीतकर सुवर्ण, रत्न हस्ती आदि वाहन का
ग्रहों के पुरुष-स्त्री नपुंसक तथा विप्रादि एवं तत्त्वों के अधिपति- चन्द्रमा, शुक्र स्त्रियों के, बुध शनि नपुंसकों के, गुरु रवि मङ्गल पुरुषों के अधिपति है। शुक्र गुरु ब्राह्मणों के, सूर्य मङ्गल क्षत्रियों के, चन्द्रमा वैश्यों के, शनि संकर जातियों के, बुध शूद्रों के अधिपति हैं। अग्नि, भूमि, आकाश, जल और वायु ५ तत्त्वों के पञ्चताराग्रह (मं०,
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६७६ ग्रह प्रभेद प्रकरण बु०,बृ०,शु० और श०) अधिपति हैं। अर्थात् अग्नि तत्व का मङ्गल, भूमि का बुध, आकाश का गुरु, जल का शुक्र, वायु तत्व का शनि स्वामी है। ग्रहों के रस तथा स्थान- कटु, लवण तिक्त, मिश्र, मधुर, खट्टा और कषाय (कसैला) ये क्रमशः सूर्यादि ग्रहों के रस हैं। अर्थात् सूर्य का कड़वा, चन्द्र का क्षार भौम का तीता बुध का मिश्रित गुरु का मधुर, शुक्र का खट्टा और शनि का कसैला रस है। देवालय, जलाशय, अग्निशाला, क्रीडास्थान, भण्डार, शयनागार और कतवारखाना इन स्थानों के क्रम से सूर्यादि ग्रहो के स्थान कहे गए हैं। भुवनदीपक में सूर्यादि ग्रहों के रस निरूपण निम्न प्रकार से किया गया है- कुजार्कौं कटकौ जीवो मधुरस्तुवरो बुधः। क्षाराम्लौ चन्द्र भृगुजौ तीक्ष्णौसर्पार्क नन्दनौ।। अर्थात् मङ्गल और सूर्य कटु प्रिय होते हैं वृहस्पति मधुर, बुध कषाय, चन्द्र का क्षार, (नमकीन) शुक्र अम्ल (खट्टा) राहु तथा शनि तीक्ष्ण (तीता) रस प्रिय होते हैं। इन ग्रहों के भोज्य रसों के आधार पर प्रश्न कालाङ्गचक्र के द्वारा प्रश्नकर्त्ता की भोज्य अभिरुचि बताई जाती है। भोजन में पड़े रसों की प्रधानता होती है। आठ ग्रहों में षड् रसों का वर्गीकरण करते हैं। आचार्य पद्मप्रभुसूरि ने राहु केतु एवं मङ्गल तथा सूर्य की सामान्य अभिरुचि को बताया है। रस के विषय में ताजिक नीलकण्ठी का मत पृथक है। उन्होंने ७ रसों को माना है- जैसे सूर्य कटु, चन्द्र नमकीन, मङ्गल तिक्त, बुध मिश्रित, गुरु मधुर, शुक्र अम्ल तथा शनि कषाय। इनकी कल्पना में राहु ग्रह को स्थान नहीं मिल सका है। सूर्यादि ग्रहों के वस्त्र व धातु- सूर्य का मोटा, चन्द्र का अहत (नवीन) मङ्गल का जला हुआ, बुध का भीगा हुआ, (गीला) गुरु का न पुराना न नया मध्यम स्तर का, शुक्र का मजबूत, शनि का अत्यन्त पुराना वस्त्र है।
के क्रम से धातु हैं। ताम्र, मणि, सुवर्ण, मिश्रित द्रव्य रूप, मोती और लोहा ये सूर्यादि ग्रहों
काल एवं ऋतुओं के स्वामी-अयन, मुहूर्त्त, अहोरात्र ऋतु, मास, पक्ष और वर्ष के अधिपति क्रमशः सूर्यादि ग्रह हैं। एवं शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा शरद, और हेमन्त इन ६ ऋतुओं के
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भृगु संहिता फल दर्पण ६७७ स्वामी क्रम से शनि, शुक्र, मङ्गल, चन्द्रमा, बुध और गुरु अधिपति है। यहाँ सूर्य ग्रीष्म ऋतु का स्वामी भी होता है। कालाधिपति प्रयोजन-शत्रुओं से विजय; गर्भ अथवा कार्यों के प्रश्न में प्रश्नलग्न के स्वामी का जो काल पूर्व में वर्णित हैं उस समय में कार्य सिद्धि होता है। ऐसा कालशास्त्रज्ञ को कहना चाहिए। समय कहने के समय भुक्तांश से अनुपात द्वारा अर्थात् (उक्तकाल x भुक्तांश) इस अनुपात से समय का ज्ञान करके ही ज्योतिषियों को फलादेश करना३ चाहिए। वेदों के अधिपति और लोकस्वामी ग्रह-ऋग्वेद का गुरु, यजुर्वेद का शुक्र सामवेद का मङ्गल और अथर्ववेद का स्वामी बुध है। गुरु स्वर्ग का; चन्द्रमा शुक्र पितृलोक, रविमङ्गल और मर्त्यलोकवासियों के स्वामी; बुध तथा शनि होते हैं। सूर्य का स्वरूप एवं गुण- थोड़ा घुँघुँराले बाल वाला, चतुर बुद्धि वाला, सुन्दर स्वरूप, गम्भीर स्वर, अत्यन्त ऊँचा नहीं (मध्यम ऊँचाई), मधुसदृश, पिङ्गल दृष्टि, शूर, प्रतापी, स्थिर, लाल और श्याम वर्ण का शरीर, छिपे हुए पैर, पित्तस्वभाव, हड्डियों में ताकत (बल); बड़ा, गम्भीर चौखूँटा, विशाल किरण, केसर के रङ्ग सदृश वस्त्र वाला सूर्य का स्वरूप है। इस प्रकार बृहज्जातक में वाराहमिहिराचार्य भी सूर्य चन्द्र के स्वरूप को बताते हुए कहते हैं- 'मधुपिङ्गलदृक्चतुरस्रतनुः पित्तप्रकृतिस्सविताल्पकचः। तनुवृत्ततनुर्बहुवातकफ: प्राज्ञश्च शशी मृदुवाक् शुभदृक्।।' अर्थात् शहद के समान पीला नेत्र, चतुरस्त्र देह, पित्त प्रकृति और थोड़े बाल बाला सूर्य का स्वरूप है। चन्द्रमा का स्वरूप एवं गुण- दर्शनीय, सुन्दर नेत्र, मधुरभाषी, गौर, कृशशरीर, युवावस्था, उन्नत छोटेकाले घुँघुँराले केश वाला सदसद्विवेकी, मृदु सत्त्वगुणी, मनोहर, बात और कफ प्रकृति, मित्रों से प्रेम रखने वाला, शोणित में बल वाला दयावान, वृद्ध स्त्री से प्रेम करने वाला, चञ्चल अति सुन्दर मूर्त्ति और स्वच्छ वस्त्र धारण करने वाला चन्द्रमा है। मङ्गल का स्वरूप एवं गुण- छोटा कद, पिङ्गल नेत्र, मजबूत देह, प्रज्वलित अग्नि सदृश कान्ति वाला, चञ्चल, मज्जा में बल वाला, लालवर्ण, कार्यों में चतुर, शूर; सिद्धान्त वचन कहने वाला, हिंसक, घुँघुँराले केश वाला, घातकर्म, (शत्रुओं को मारने) निपुण रक्त गौर वर्ण मङ्गल है। बुध का स्वरूप तथा गुण- रक्त और विशाल नेत्र वाला, मधुरभाषी, दूर्वा सदृश; श्यामवर्ण, त्वचा में बल वाला, रजोगुणी, स्पष्टवक्ता, स्वच्छ,
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६७८ ग्रह प्रभेद प्रकरण कफ पित्त वात प्रकृति, प्रसन्न, मध्यम स्वरूप, कार्यों में निपुण, गोलाकृति, शिरा (नस) से व्याप्त, वेष और वचनों से सबका अनुकरण करने वाला और हरित रङ्ग वस्त्र वाला बुध है। बृहस्पति का स्वरूप एवं गुण- थोड़े पीत नेत्र व कर्ण सिंह के समान गम्भीर शब्द, स्थिर सतोगुणी (सत्व-गुण से युक्त), तपे हुए सोने के समान शरीर वर्ण, मोटी व ऊँची छाती, थोड़ा धर्म में तत्पर, नम्रता में चतुर, स्थिर उत्कृष्ट दृष्टि, क्षमावान्, पीला वस्त्र, कफ प्रकृति, चर्बी में बल वाला गुरु हैं। शुक्र का स्वरूग तथा गुण- मन को हर लेने वाला स्वरूप, बड़े-बड़े हाथ, विशाल छाती व मुख, वीर्याधिक्य, चेष्टावान, काले घुँघुँराले पतले लम्बे बाल, दूर्वा के समान श्यामल वर्ण, कामी, वात और कफप्रकृति रजोगुणी, केलिकुशल, बुद्धिमान्, विशाल नेत्र एवं मोटे कन्धों वाला शुक्र है। शनि का स्वरूप एवं गुण- कपिल, गहरे नेत्र, दुबला-पतला लग्बा शरीर, नसों से युक्त, आलसी, कृष्ण वर्ण, वातप्रकृति, चुगली करने वाला, स्नायु (खाल) में शक्ति रखने वाला, निर्दयी, मूर्ख, मोटे नाखून और दाँतों वाला, अत्यन्त गन्दा वेश, चेष्टाहीन अपवित्र, तामस प्रकृति, भयावह, क्रोधी, वृद्ध (बूढ़ा) एवं काले वस्त्र धारण करने वाले शनि का स्वरूप है। ग्रहों के वर्ण सन्दर्भ में आचार्यों में मतभेद हैं। वाराहमिहिर ने सूर्य को 'रक्त श्यामो भास्करः' कहा है। अर्थात् हल्का लाल, परन्तु भटोत्पल ने टीका में रक्त श्याम के लिए पारलपुष्प वर्ण कहा है। जो सर्वथा सङ्गत है। श्वेतरक्तस्तु पाटल: के अनुसार उजला और लालवर्ण का मिश्रण पाटल कहलाता है। पराशर भी सूर्य को रक्तश्याम वर्ण मानते हैं- 'रक्तश्यामो दिवाधीशः' वस्तुतः सूर्य का रं प्रत्येक ऋतु में बदलता है जिसका संहिताओं में उल्लेख मिलता है। चन्द्रमा को सभी आचार्यों ने गौर माना है। जातक पारिजात (वैद्यनाथ) तथा बृहज्जातक ने मङ्गल को रक्तगौर वर्ण (पाटल) माना है। शेष आचार्यों ने इसे रक्त वर्ण माना है। गुरु को प्रायश: लोग पीप्त वर्ण मानते हैं। परन्तु पराशर और वाराहमिहिर मत से गुरु गौर वर्ण है। शुक्र को नील कण्ठ तथा भुवनदीपककार श्वेत वर्ण मानते हैं जबकि पराशर वाराहमिहिर तथा वैद्यनाथ ने इसे श्याम माना है। शनि को नील कण्ठ ने नील वर्ण कहा है। सूर्यादि ग्रहों के नैसर्गिक मित्र, शत्रु एवं सम ग्रह-सूर्य के गुरु, मंगल और चन्द्र मित्र हैं। चन्द्रमा के सूर्य, बुध, मंगल के सूर्य, चन्द्र, गुरु, बुध के सूर्य
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बुध मित्र हैं। शुक्र, गुरु के चन्द्रमा सूर्य और मंगल, शुक्र के शनि बुध तथा शनि के शुक्र
सूर्य के शुक्र तथा शनि शत्रु हैं। चन्द्रमा का कोई भी ग्रह शत्रु नहीं है। मंगल का बुध, बुध का चन्द्रमा, गुरु के शुक्र, बुध एवं शुक्र के सूर्य, चन्द्र तथा शनि के सूर्य चन्द्र तथा मंगल शत्रु ग्रह हैं। इस प्रकार मित्र शत्रु से शेष ग्रह सम होते हैं। मित्रामित्रज्ञानार्थ चक्र
र. चं. मं. बु बृ. शु. श ग्रहा:
मं० बृ० सू० र. चं. सू. र.चं. श. शु. मित्राणि
चं० बु० बृ. शु. मं. बु. बु.
बृ० मं.बृ.शु शु. श. श. बृ.
श मं.बृ. श मं.बृ. समा:
शु.श. बु. च. शु. चं. सू.च.
0 बु. र. मं. शत्रव:
सूर्यादि ग्रहों के तात्कालिक मित्र एवं शत्रु-जन्मकाल में जो ग्रह जिसराशि में हो उस स्थान राशि से १२, ४, २, १०, ११, ३ स्थानों में ग्रह रहे तो उसका तात्कालिक मित्र होता है। तथा ५,७,८, १, ५, ९ स्थानों में शत्रु होता है। पञ्चधा मैत्री विचार (१) नैसर्गिक मित्र और तात्कालिक मित्र हो तो अधिमित्र। -> (२) नैसर्गिक सम तात्कालिक मित्र हो तो मित्र। (३) नैसर्गिक शत्रु तात्कालिक मित्र हो तो सम। (४) नैसर्गिक सम तात्कालिक शत्रु हो तो शत्रु। (५) नैसर्गिक शत्रु तात्कालिक शत्रु हो तो अधिशत्रु होता है। इस तरह दोनों प्रकार के विवेक से जन्मकाल में वास्तव मित्रता और शत्रुता समझनी चाहिए। ग्रहों की साधारण दृष्टि- ग्रह जिस स्थान में रहता है वहाँ से ३, १० स्थान को १ चरण से, ५/९ को २ चरण से ४, ८ को ३ चरण से और ७ (सप्तम) को ४ चारों चरण से देखता है और तदनुसार (चरण के तुल्य) ही फल देता है। ग्रहों की विशेष पूर्ण दृष्टि- शनि ३, १०, को गुरु ५, ९ को, मङ्गल ४,
ही देखते हैं। ८ को पूर्ण दृष्टि से देखता है, तथा सप्तम को सभी (सातों) ग्रह पूर्ण दृष्टि से
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६८० ग्रह प्रभेद प्रकरण अब प्रत्येक ग्रह की दृष्टि ज्ञानार्थ चक्र दिये जाते है, जिससे हमें यह सहजता से ही ज्ञात हो सकेगा कि ग्रह, जिस किसी स्थान में भी स्थित हो तो वह वहाँ से कहाँ-कहाँ कैसी दृष्टि से देखता है- सूर्य दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-१
द्वितीयभाव प्रथम भाव द्वादश भाव सूर्य तृतीय भाव एक पाद दृष्टि एकादश भाव
चतुर्थ भाव पाद दृष्टि तीन पाद दृष्टि दशम भाव
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि आधी दृष्टि सप्तम भाव नवम भाव आधी दृष्टि
षष्ठ भाव तीन पाद दृष्टि अ्टम भाव
कुण्डली के चक्र में जहाँ सूर्य स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व दशवें भाव को एक पाद दृष्टि से; पाँचवे व नवें भाव को आधी दृष्टि से; चौथे और आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा सातवें भाव को सम्पूर्ण दृष्टि से देखता है। चन्द्र दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-२
द्वितीयभाव प्रथम भाव द्वादश भाव चन्द्र तृतीय भाव एक पाद दृष्टि* एकादश भाव
चतुर्थ भाव तीन पाद दृष्टि एक पाद दृष्टि दशम भाव
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि नवम भाव आधी दृष्टि सप्तम भाव आधी दृष्टि
षष्ठ भाव तीन पाद दृष्टि अष्टम भाव
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भृगु संहिता फल दर्पण ६८१ इसी प्रकार कुण्डली चक्र में चन्द्र जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व दशवे भाव में एक पाद दृष्टि से; पाँचवें व नवें भाव को आधी दृष्टि से; चौथे व आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा सातवें भाव को सम्पूर्ण दृष्टि से देखता है। मंगल दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-३
द्वितीयभाव प्रथम भाव द्वादश भाव मङल तृतीय भाव एक पाद दृष्टि एकादश भाव
चतुर्थ भाव एक पाद दृष्टि सम्पूर्ण दृष्टि दशम भाव
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि नवम भाव आधी दृष्टि सप्तम भाव आधी दृष्टि
षष्ठ भाव तीन पाद दृष्टि पूर्ण दृष्टि
कुण्डली चक्र में मङ्गल, जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व दशवे भाव को एक पाद दृष्टि से; पाँचवे व नवें भाव को आधी दृष्टि से तथा चौथे, आठवें और सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से ही देखता है। बुध दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-४
द्वितीयभाव प्रथम भाव द्वादश भाव बध तृतीय भाव एक पाद दृष्टि एकादश भाव
चतुर्थ भाव एक पाद दृष्टि तीन पाद दृष्टि दशम भाव 4
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि नवम भाव आधी दृष्टि* सप्तम भाव आधी दृष्टि
षष्ठ भाव तीन पाद दृष्टि अष्टम भाव
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६८२ ग्रह प्रभेद प्रकरण कुण्डली चक्र में बुध, जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व दशवें भाव को एक पाद दृष्टि से; पाँचवें व नवें भाव को आधी दृष्टि से; चौथे व आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। गुरु दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-५
द्वितीयभाव प्रथम भाव द्वादश भाव गुरु तृतीय भाव एक पाद दृष्टि* एकादश भाव
चतुर्थ भाव एक पाद दृष्टि तीन पाद दृष्टि दशम भाव
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि नवम भाव पूर्ण दृष्टि सप्तम भाव पूर्ण दृष्टि
षष्ठ भाव तीन पाद दृष्टि अष्टम भाव
कुण्डली चक्र में गुरु जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे और दशवें भाव को पाद दृष्टि से, चौथे और आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा पाचवें, नवें और सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। शुक्र दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-६
द्वितीयभाव प्रथम भाव द्वादश भाव शुक्र तृतीय भाव एक पाद दृष्टि एकादश भाव
चतुर्थ भाव तीन पाद दृष्टि एक पाद दृष्टि दशम भाव
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि आधी दृष्टि' सप्तम भाव नवम भाव आधी दृष्टि
षष्ठ भाव तीन पाद दृष्टि अष्टम भाव
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भृगु संहिता फल दर्पण ६८३ कुण्डली चक्र में शुक्र, जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व दशवें भाव को एकपाद दृष्टि से; पाँचवें व नवें भाव को आधी दृष्टि से; चौथे व आठवें भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। शनि दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-७
द्वितीयभाव प्रथम भाव शनि द्वादश भाव
तृतीय भाव पूर्ण दृष्टि एकादश भाव
चतुर्थ भाव दशग भाव तीन पाद दृष्टि पूर्ण दृष्टि
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि नवम भाव आधी दृष्टि* सप्तम भाव आधी दृष्टि
षह भाव तीन पाद दृष्टि अष्टम भाव
कुण्डली चक्र में शनि, जहाँ भी स्थित हो, वहाँ से वह पाँचवें व नवें भाव को आधी दृष्टि से, चौथे व आठवे भाव को तीन पाद दृष्टि से तथा तीसरे, दशवे और सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। राहु दृष्टि स्थान ज्ञानार्थ चक्र-८
द्वितीयभाव आधी दृष्टि प्रथम भाव द्वादश भाव राहु * पूर्ण दृष्टि तृतीय भाव एक पाद दृष्टि एकादश भाव
चतुर्थ भाव दशम भाव आधी दृष्टि
पञ्चम भाव पूर्ण दृष्टि नवम भाव
पूर्ण दृष्टि सप्तम भाव पूर्ण दृष्टि
षष्ठ भाव एक पाद दृष्टि अष्टम भाव
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६८४ ग्रह प्रभेद प्रकरण राहु-केतु की दृष्टि विचार भृगुसंहिता पद्धति के अनुसार राहु व केतु की दृष्टि का विचार इस प्रकार करना चाहिए- राहु या केतु; कुण्डली चक्र में, जिंस किसी भाव में स्थित हो, वहाँ से वह तीसरे व छठे भाव को एक पाद दृष्टि से; दूसरे व दशवें भाव को आधी दृष्टि से तथा पाँचवें, नवें, सातवें और बारहवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। शेष चक्र से स्पष्ट है। केतु दृष्टिस्थान ज्ञानार्थ चक्र-९
द्वितीयभाव द्वादश भाव
प्रथम भाव पाद दृष्टि तृतीय भाव पूर्ण दृष्टि पूर्ण दृष्टिं एकादश भाव पूर्ण दृष्टि
चतुर्थ भाव दशम भाव आधी दृष्टि
पञ्चम भाव नवम भाव
षष्ठ भाव केतु एक पाद दृष्टि
पूर्ण दृष्टि सप्तम भाव आधी दृष्टि अष्टम भाव
सूचना- पाठक ध्यान दें, किसी भी कुण्डली में राहु से सातवें स्थान में ही केतु स्थित रहता है। अतः उसकी दृष्टि स्थान भी सात स्थान का अन्तर
करें। हो जाता है। इसे समझने हेतु आगे स्थित केतु दृष्टि स्थान चक्र का अवलोकन
अंश से ग्रहावस्था विचार- कुण्डली में स्पष्ट ग्रह दिये रहते हैं, उससे ग्रहों के अंश का ज्ञान कर इस प्रकार उनकी अवस्था का ज्ञान करना चाहिए- ३ से ९ अंश में तक स्थित ग्रह किशोरावस्था का माना जाता है। १० से २२ अंश में तक स्थित ग्रह युवावस्था का माना जाता है। २३ से २८ अंश में तक स्थित ग्रह वृद्धावस्था का माना जाता है। २९ से २ अंश में तक स्थित ग्रह मृतकावस्था का माना जाता है। इस प्रकार से किशोर और वृद्ध अवस्था में स्थित ग्रह कुछ कम अपना
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भृगु संहिता फल दर्पण ६८५ प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। युवावस्था का ग्रह अपना पूर्ण प्रभाव और मृतक अवस्था का ग्रह 1
अपना न्यूनतम प्रभाव ही प्रदर्शित करते हैं। यहाँ कहने में तात्पर्य है कि ग्रह अपने अवस्था के अनुरूप ही जातक को शुभाशुभ प्रभाव रूप फल प्रदान करते हैं। ग्रहों के इस अवस्था का विचार सामान्य फलादेश और विशेष अर्थात् दशा गोचर आदि के समय के फलादेश में करना ही चाहिए। ग्रहों के चार प्रकार के बल-ग्रहों के शुभाशुभ बल का निर्णय दिग्बल, स्थानबल, काल बल और चेष्टा बल से होते हैं जिसका मैं (ग्रन्थकार) वर्णन करता हूँ। इन चारों बलों से हीन ग्रह निर्बल होता है। दिग्बल एवं स्थानबल- गुरु और बुध जन्म लग्न में, रवि, मङ्गल दशम भाव में, शनि सप्तम भाव में और चन्द्र, शुक्र चतुर्थ भाव में बली होते हैं। यह दिग्बल है क्योंकि लग्न पूर्व, दशम दक्षिण, सप्तम पश्चिम और चतुर्थ भाव उत्तर दिशा में होते हैं। अब स्थानबल को कहते हैं-गह अपने उच्च और मूल त्रिकोण, अपने गृह, मित्र के गृह अपने नवांश में स्थित हो और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो बली होता है। चन्द्रमा शुक्र समराशि में और अन्य ग्रह विषम राशि में बली होते हैं। यह स्थानबल कहलाता है आचार्यों के स्थान बल कहा है। कालबल एवं चेष्टाबल-गुरु, रवि शुक्र दिन में बुध सर्वदा, शनि, चन्द्र, मङ्गल रात्रि में बली होते हैं। होरा में होरापति, मास में मासपति, दिन में दिनपति और वर्ष में वर्षपति बली होते हैं। शुभग्रह शुक्ल पक्ष में और पाप ग्रह कृष्ण पक्ष में बली होते हैं। जो ग्रह युद्ध में जयी हों जो वक्रगति हों, जिनके किरण देदीप्यमान हों, जो वक्र गति हों, वे बली होते हैं, रवि और चन्द्रमा उत्तर अयन (मकर से मिथुन तक) में बली होते हैं। यह सत्याचार्य के मत से चेष्टाबल हैं। ग्रहों का आयनबल-उत्तर अयन में प्राप्त शुक्र, मङ्गल, गुरु, रवि तथा दक्षिणायन में जाने पर चन्द्र, शनि बली होते हैं। बुध अपने वर्ग में हो तो दोनों अयन में बली होता है। ग्रहों का द्रेष्काणबल-पुरुष ग्रह (रवि, मंगल एवं गुरु) किसी भी राशि के प्रथम द्रेष्काण में अर्थात् १० अंश के भीतर, स्त्री ग्रह (चन्द्र, शुक्र) तृतीय द्रेष्काण में अर्थात् २० अंश से ऊपर तथा ३० अंश के भीतर एवं नपुंसक ग्रह (बुध, शनि) मध्य (द्वितीय) द्रेष्काण में १० अंश से २० अंश के भीतर बली होते हैं ऐसा यवनाचार्य का मत है। ग्रहों के दिन, रात्रि एवं त्रिभागबल- चन्द्रमा रात्रि के प्रथम त्रिभाग में,
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1 ६८६ ग्रह प्रभेद प्रकरण शुक्र मध्य त्रिभाग अर्थात् द्वितीय द्रेष्काण में १० अंश से २० अंश के भीतर तथा मङ्गल रात्रि के अन्तिम अंश में बली होता है। एवं बुध दिन के प्रथम द्रेष्काण में, रवि और गुरु सर्वदा (अहोरात्र) बली होते हैं। नैसर्गिकबल-शनि, मङ्गल, बुध, गुरु क्रम से उत्तरोत्तर बली होते हैं। यह नैसर्गिक (स्वाभाविक) बल हैं। जब अन्य बलों में समता हो तो जिसका नैसर्गिक बल अधिक हो तो बलवान् होता है। ग्रहों के सात प्रकार के बल- दिक् स्थान चेष्टादि सात प्रकार के ग्रहों के बल कहे गए हैं। अपने कथित प्रकार से यदि बल प्राप्त हो तो ग्रह बली होता है। यदि कुछ भी बल प्राप्त न हो सके तो किसी भी ग्रह का शून्य बल होता है। अल्प बल में अर्थात् थोड़े बल में अल्प बली समझना चाहिए। ग्रहों की शुभाशुभ अफलता- पाप ग्रह से पीड़ित, शत्रु से पराजित, नीच राशिस्थ अथवा नीचांशस्थ दुष्ट चेष्टा वाला, ६,८, १२, में अल्प बली अथवा रुक्ष ग्रह, बलहीन ग्रह, शुभाशुभ फल से रहित होता है। ग्रहों की अवस्था विचार- ज्योतिष शास्त्र में अनेकानेक प्रकार की अवस्थाओं का लेख पाया जाता है। उनमें से कतिपय उपयोगी और लागू अवस्थाओं का इस पुस्तक में उल्लेख किया जाता है। किन्ही-किन्ही स्थानों में अवस्था जानने की विधि में भी एक ऋषि से दूसरे ऋषि ने कुछ विभिन्नता की है। अवस्था द्वारा जो फल होता है उसका विकास जातक के जीवन मात्र में होता है। परन्तु ग्रह की दशा-अन्तरदशा काल में ग्रह की अवस्था फल का विशेष विकास होता है। किसी दो व्यक्ति का एक ही समय एवं एक ही लग्न में यदि जन्म हो तो दोनों के फलाफल में अन्तर का कारण अवस्था ही होता है। शयनादि अवस्था विचार- महर्षि पराशर ने एक प्रकार की 'अवस्था' का फलाफल अपनी प्रसिद्ध पुस्तक बृहत्पाराशर होराशास्त्र में लिखा है। इस अवस्था का लेख 'शयनादि' द्वादश अवस्था के नाम से अन्य कई ग्रन्थों में भी पाया जाता है। उस अवस्था के नाम हैं- (१) शयन। (२) उपवेशन, (३ ) नेत्रपाणि, (४ ) प्रकाशन, (५ ) गमनेच्छा, (६) गमन, (७) सभा, (८) आगम, (९ ) भोजन, (१० ) नृत्यलिप्सा, (११) कौतुक और (१२) निद्रा है। 'बृहत्पाराशरहोराशास्त्र' में पाँचवें एवं छठे का नाम 'गमनागमन' या आठवें का 'आगम' लिखा है और यही 'भाव कुतूहल' में भी है। परन्तु 'होरारत्न' में 'गमनेच्छा च गमनं' और आठवें को 'आगम' लिखा है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ६८७ कौन ग्रह किस अवस्था में है उसे जानने की विधि यह है कि- जिस ग्रह की अवस्था निकालनी होती है, वह ग्रह जन्म समय में किस नक्षत्र में था, इसको जन्म के समय के पञ्चाङ्ग द्वारा निकालना चाहिए। जैसे उदाहरणार्थ किसी कुण्डली में यदि मंगल की अवस्था जाननी हो तो पहले यह देखना होगा कि जन्म समय में मंगल किस नक्षत्र में था। कुण्डली के मंगल का स्पष्ट ४।११।२५ है अर्थात् मेष से ४०वां नवमांश, या अश्विनी से ४०वां चरण, अर्थात् दसवां नक्षत्र, मघा में जन्म के समय मंगल था। इस नक्षत्र संख्या को ग्रह संख्या से गुणा करना होता है। यहाँ सूर्य की १, चन्द्रमा की २, मंगल की ३, बुध की ४, बृहस्पति की ५, शुक्र की ६, शनि की ७, राहु की ८, केतु की ९, ग्रह संख्या मानी जाती है। इस कारण मंगल की संख्या ३ को नक्षत्र संख्या १० से गुणा करना होगा और इस गुणन फल को स ग्रह के अंश अर्थात् मंगल के अंश १२ (११ अंश १५ कला है अर्थात् बारहवां अंश) से गुणा करना होगा, और इन तीनों के गुणनफल में जातक के इष्ट दण्ड १०।५८ पल है। इस कारण ११ को जोड़ना होगा। पुनः उसमें जन्म नक्षत्र की संख्या उत्तरभाद्र है, इस कारण २६ जोड़ना होगा और पुनः उसमें जातक की लग्न संख्या धनु लग्न है इस कारण ९ जोड़ना होगा। उपर्युक्त गुणा और जोड़ के बाद फल आयेगा अर्थात् (१० x ३x १२) + ११ + २६ + ९= ४०६ को १२ से भाग देना होगा। भाग देकर जो शेष आयेगा वही अवस्था का अङ्ग होगा। उदाहरण में ४०६ को १२ से भाग देने से १० शेष रहता है। इसलिये १०वीं अवस्था मंगल की हुई। अर्थात् मंगल की नृत्य लिप्सा अवस्था हुई। इसी रीति से अवस्था निकाला जाता है। एक शेष रहने से शयन अवस्था, २ शेष रहने से उपवेशन ३ शेष रहने से नेत्रपाणि अवस्था इत्यादि- इत्यादि जानना चाहिए। सुगमता से स्मरण रखने के लिये अवस्था निकालने के नियम को निम्न-लिखित रीति से कहा जा सकता है (ग्रह नक्षत्र x ग्रह संख्या x ग्रह अंश + इष्ट + जन्म नक्षत्र + लग्न) : १२ जो शेष रहेगा वही अवस्था संख्या होगी। शेष शून्य होने पर १२ शेष माना जाता है और अंश में यदि किसी अंश के बाद कला भी हो तो उस अंश में एक जोड़ देना पड़ता है। जैसे उदाहरण कुण्डली में मंगल, सिंह राशि के ११ अंश २५ कला पर है। इसका मतलब यह होता है कि बारहवें अंश में मंगल है। इसलिये ऐसे स्थान में अंशमान बारह होगा न कि ग्यारह? पुनः यदि मंगल, सिंह के ग्यारहवें अंश और शून्य कला विकलादि पर होता तो अंश मान ग्यारह लिखा जाता है।
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६८८ ग्रह प्रभेद प्रकरण इसी प्रकार उदाहरणार्थ कुण्डली का इष्ट दण्ड१०।५८ पला है। इष्ट मान १० नहीं लेकर ११ लिया गया। इसी रीति से सब ग्रहों की शयनादि अवस्था निकाली जाती है। ग्रहों की अवस्थाओं को स्थिर करने के बाद एक विधि शास्त्रकारों ने और लिखा है। मुनियों का कथन है कि यदि कोई ग्रह 'दृष्टि' में हो तो उस ग्रह का फल स्वल्प, यदि ग्रह 'चेष्टा' में हो तो बहुत और यदि 'विचेष्टा' का हो तो कुछ भी फल नहीं देता है। अब इस स्थान में यह लिखा जाता है कि ग्रह, 'दृष्टि'; 'चेष्टा' और 'विचेष्टा' कब होता है। (२) ऊपर लिखा जा चुका है १ शेष रहने से शयन और २ शेष रहने से उपवेशन इत्यादि अवस्थाएं होती हैं। अवस्था का जो शेष अंक आये उस अंक को उसी अंक से गुणा करके उस वर्ग फल में, 'स्वरांक' जोड़ना होता है। स्वरांक जोड़ने के बाद जो फल आये उसको १२ से भाग देने के अनन्तर जो शेष रहे उसमें जिस ग्रह की अवस्था निकाली गयी है उस ग्रह का क्षेपकांक जोड़ना पड़ता है और उस अन्तिम फल को तीन से भाग देने पर यदि शेष १ रहे तो ग्रह 'दृष्टि', २ रहे तो 'चेष्टा' तथा शून्य रहे तो विचेष्टा कहलाता है। ऊपर 'स्वरांक' और क्षेपकांक शब्दों के प्रयोग हुए हैं। उनका विवरण इस स्थान पर किया जाता है। यह सभी जानते है कि हर एक मनुष्य किसी न किसी नाम से प्रसिद्ध रहता है। चाहे वह किसी जाति का हो। ऐसे नाम को साधारण भाषा में 'पुकार' नाम कहते हैं। उर्दू में 'मौसमा' फहते हैं। 'पुकार' नाम उसे कहते हैं जिस नाम से सोते हुए पुरुष को पुकारा जाय और वह व्यक्ति यह समझ कर कि पुकारने वाला उस व्यक्ति को सम्बोधित कर रहा है, जाग उठे। इस स्थान में यदि किसी व्यक्ति के मन में यह प्रश्न उठे कि पुकारनाम से ज्योतिष के गणित का क्यों और कैसा सम्बन्ध हो सकता है?, तो इस बात पर इस प्रकार विचार करना होगा कि प्रति व्यक्ति को अपने नाम से कुछ ऐसा घनिष्ट सम्बन्ध, मनस, वाचा, कर्मणा द्वारा हो जाता है कि यदि वह अपने नाम का किसी दूसरे व्यक्ति को देखता है तो तत्क्षण उसके मन में उस दूसरे व्यक्ति के साथ क्षणिक प्रेम तो अवश्य उत्पन्न हो जाता है। उत्तरी भारत में ऐसे व्यक्ति को 'मीता' कहते हैं। 'मीता' मित्रता का अपभ्रंश है। प्रति व्यक्ति को अपने नाम से कुछ घनिष्ट सम्बन्ध हो जाता है। अन्य लोगों को सूनते ही उसके स्वरूप, गुण, और अवगुणादि का
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भृगु संहिता फल दर्पण ६८९ स्मरण हो जाता है। किसी नाम के साथ अपशब्द के प्रायेग करते ही उस व्यक्ति को, जिसका वह नाम है और उसके इष्ट मित्रों को अतिकष्ट हो जाता है। अस्तु यह अवश्य ठीक है कि प्रति मनुष्य को अपने-अपने नाम से एक घनिष्ट सम्बन्ध हो जाता है। प्रतीत होता है कि इन्हीं सब कारणों से ऋषियों ने मनुष्य के नाम के प्रथम अक्षर का बल अंक में बतलाया है। जैसे यदि किसी के नाम का प्रथम अक्षर 'अ' हो (मात्रा चाहे कुछ भी हो) उसका स्वरांक १ होगा यदि प्रथम अक्षर 'इ' हो तो उसका स्वरांक २ होगा, 'उ' होने से ३, 'ए' होने से ४, 'ओ' होने से ५, 'क' होने से १, 'ख' होने से २ इत्यादि इत्यादि। इसका पूर्ण विवरण नीचे के चक्र में बतलाया जाता है, इसी को स्वरांक कहते हैं। स्वरांकज्ञानार्थ चक्र
१ २ ३ ४ ५ 110 अ इ उ ए ओ
क ख ग घ च
छ ज झ ट 여
ड ढ त थ द
ध न प फ ब
भ म य र ल
व श ष स ह स्मरण रहे कि नाम का प्रथम अक्षर होना चाहिए, न कि उपाधियों का बाबू, श्रीमान्, सैय्यद, मोहम्मद, मिस्टर या मिसेज इत्यादि उपाधि जो नाम के पहले लगाये जाते हैं, उसे छोड़कर शुद्ध नाम का प्रथमाक्षर लेना उचित है। जैसे उदाहरणार्थ कुण्डली का प्रथमाक्षर 'द' है। इस कारण इस जातक का स्वरांक ५ हुआ। क्षेपकांक सूर्य का ५, चन्द्र का २, मंगल का २, बुध का ३, बृहस्पति का ५, शुक्र का ३, शनि का ३, राहु का ४ और केतु का ४ है। इस ग्रह क्षेपकांक की उत्पत्ति क्यों हुई? कैसे हुई? अर्थात् अमुक ग्रह का अमुक क्षेपकांक क्यों माना गया इसका पता नहीं इसे लिखने तक चला है। क्षेपकांकज्ञानार्थ चक्र सूर्य चन्द्र मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि राहु केतु
५ २ २ ३ ५ ३ ३ ४ ४
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६९० ग्रह प्रभेद प्रकरण उदाहरणार्थ कुण्डली के मंगल की दृष्टि, चेष्टा और विचेष्टा का विचार इस प्रकार किया जायगा। अवस्था विचार में दस शेष रहा था। दस को दस से गुणा करने से, वर्गफल सौ हुआ और नाम का प्रथम अक्षर 'द' होने से उसमें स्वरांक पाँच जोड़ा और १२ से भाग दिया तो शेष ९ रहा और उस ९ में मंगल के क्षेपकांक २ को जोड़ा तो ११ हुआ। ११ को तीन से भाग दिया तो शेष २ रहा। इस कारण दो शेष रहने से मंगल की चेष्टा फल हुआ अर्थात् 'नृत्यलिप्सा' अवस्था का होकर 'चेष्टा' पद में है। अर्थात् नृत्यलिप्सा अवस्था का जो फल है उसका विकास 'चेष्टा' होने के कारण पूर्ण रीति से होगा। सूर्य का द्वादश अवस्था फल ज्ञान (१ ) शयन अवस्था में सूर्य हो तो जातक मन्दाग्नि रोग अर्थात् क्षुधा की कमी और पाचनादि शक्ति में गड़बड़ी से बहुधा दुःखी होता है। पित्त की विशेषता होती है, गुदा में व्रण आदि रोग होते हैं। हृदय शूल का रोग होता है और उसकी जंघा तथा पैर स्थूल होते हैं। (२) उपवेशन अवस्था में सूर्य हो तो ऐसा सूर्य जातक को दरिद्र बनाता है। ऐसा जातक पराये का भार ढोने वाला, कलह उपस्थित करने वाला, विद्या को जानने वाला, चित्त का कठोर और निर्दयी होता है तथा उसकी सम्पत्ति नष्ट होती है। (३) नेत्रपाणि अवस्था में सूर्य हो तो जातक आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है और धनवान्, बलवान्, सुखी, राजा की कृपा से अभिमान युक्त, विवेक शील तथा परोपकारी होता है। यदि ऐसा सूर्य अर्थात् नेत्रापाणि अवस्था वाला सूर्य, नवम, पञ्चम अथवा दशम स्थान में हो तो शुभ फल होता है। अर्थात् इन भावों के शुभ फल की पुष्टि होती है। (४) प्रकाशन अवस्था में सूर्य हो तो जातक चित्त का उदार, धन सम्पन्न, सभा में चतुराई से बात करने वाला, पुण्यवान्, बलवान् और सुन्दर होता है। यदि सूर्य पञ्च, सप्तम, दशम अथवा द्वादश स्थान में बैठा हो तो स्त्री तथा पुत्र की हानि होती है। (५) गमनेच्छा अवस्था में सूर्य हो तो जातक निरुद्यमी, परदेश में रहने वाला, दुःखों को भोगने वाला, बुद्धिहीन, गुस्सा से भरा हुआ और भय से आतुर रहता है तथा धनहीन भी होता है। (६) गमनावस्था में सूर्य हो तो जातक परस्त्रीगामी, निरन्तर सफर की इच्छा रहने वाला होता है। (७) सभा अवस्था में सूर्य हो तो जातक परोपकार में तत्पर, धन
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भृगु संहिता. फल दर्पण ६९१ रत्नादि से सम्पन्न, बहुगणी, पृथ्वी और मकान आदि का मालिक, बलवान्, उत्तम वस्त्रादि से भूषित और कृपाशील होता है। उसके बहुत से मित्र होते हैं और प्रतिदिन उसके साथ प्रेम करते हैं। (८) आगम अवस्था में सूर्य हो तो जातक शत्रुओं से कम्पित, कुटिला- बुद्धि, चंचल, धर्म कर्म से रहित, शरीर का दुबला, मदमस्त और आत्मश्लाघी होता है। (९) भोजन अवस्था में सूर्य हो तो जातक परस्त्रीगमन के कारण धन और बल का सर्वदा नाश करता है और उसका खाना-पीना व्यर्थ हो जाता है। गठिया और वात आदि रोग से पीड़ित होता है अर्थात् शरीर के जोड़ों में वेदना होती है। शिर में रोग होता है, बुद्धि का कुमार्गी, अनिष्ट वार्ताओं में रुचि रखने वाला और असत्यवादी होता है। यदि सूर्य नवमस्थ हो तो उसके पुण्यकार्य में अनेक बाधायें पड़ती हैं। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में सूर्य हो तो जातक स्वयं विद्वान् और विद्वानों से घिरा रहता है। काव्य विद्या को जानने वाला, वाचाल, राजा से आदर पाने वाला और पृथ्वी में पूजित होता है। (११ ) कौतुक अवस्था में सूर्य हो तो जातक सर्वदा आनन्द युक्त ज्ञानवान्, यज्ञ करने वाला, राजद्वार में रहने वाला, उत्तम काव्य करने वाला और अपने शत्रुओं पर सदा प्रबल रहता है। यदि ऐसा सूर्य छठे स्थान में हो तो वैरियों पर अवश्य सर्वदा विजय पाता है। यदि सातवाँ या आठवाँ भाव में हो तो स्त्री पुत्र की हानि और लिंग में रोग होता है। (१२ ) निद्रा अवस्था में सूर्य रहे तो जातक का नेत्र लाल रंग का होता है और नींद से चूर रहता है। ऐसा जातक विदेश में निवास करता है और इसकी स्त्री को क्षय रोग होता है और इसका धन बारम्बार नष्ट होता है। चन्द्रमा का द्वादश अवस्था फल ज्ञान चन्द्रमा के विषय में एक नियम यह है कि शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा अर्थात् ज्योतिर्मय चन्द्रमा सर्वदा शुभ फल और कृष्णपक्ष का चन्द्रमा अर्थात् क्षीण चन्द्रमा अशुभ फल देने वाला होता है। (१ ) शयन अवस्था में चन्द्र हो तो जातक मानी होता है तथा किसी व्यसनादि में स्वयं अपने धन का नाश करता है, परन्तु कामी होता है। ऐसे जातक के शरीर में शीत की प्रधानता रहती है।
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६९२ ग्रह प्रभेद प्रकरण (२) उपवेश अवस्था में चन्द्र हो तो जातक रोग से पीड़ित, स्वभाव का कठोर, परधनहारी, परधनाशक्ता और धनहीन होता है। (३) नेत्रपाणि अवस्था में चन्द्र हो तो जातक राजरोगी अर्थात् बड़े रोग से पीड़ित, सर्वदा कुमार्ग में तत्पर, बड़ा धूर्त और वाचाल होता है। (४) प्रकाशन अवस्था में चन्द्र हो तो जातक निर्मल गुण सम्पन्न, वाहन अर्थात् हाथी, घोड़े आदि से सुशोभित, नवीन गृहों का स्वामी, भूषणादि से भूषित और तीर्थयात्रा परायण होता है। तथा स्त्री से सुखी रहता है। (५ ) कृष्णपक्ष का अर्थात् (क्षीण) चन्द्र गमनेच्छा अवस्था का हो, तो जातक सर्वदा नेत्ररोग से पीड़ित और क्रूरस्वभाव का होता है। यदि चन्द्रमा शुक्ल पक्ष का हो तो जातक भयातुर होता है। (६) गमनावस्था में चन्द्र हो तो जातक मानी, दुःखी, असन्तोषी और बुद्धिहीन, गुप्तरीति से पाप करने में तत्पर रहता है तथा उसके पैरों में रोग होते हैं। (७) सभा अवस्था में यदि पूर्ण चन्द्रमा हो तो जातक मनुष्य मात्र में एकमात्र चतुर, बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं का माननीय, युवती स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, गुणग्राही और प्रेमकला में कुशल होता है।
होता है। (८) आगम अवस्था में चन्द्र हो तो जातक वाचाल और धार्मिक
स्वभाव का होता है। यदि चन्द्रमा कृष्णपक्ष का हो तो जातक रोगी, हठी, और अतिदुष्ट
ऐसे जातक बहुधा दो स्त्रियाँ होती हैं। (९) पूर्ण कला का होकर चन्द्र भोजन अवस्था में हो तो जातक माननीय और वाहनादि तथा मनुष्यों से सुख पाने वाला होता है। ऐसे जातक को स्त्री सुख होता है और कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। यदि चन्द्रमा कृष्णपक्ष का हो तो अनिष्ट फल होता है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में बली चन्द्र हो तो जातक गायन विद्या को जानने वाला, शृंगारादि नवरसों का ज्ञाता और बलवान् होता है। परन्तु कृष्णपक्ष का चन्द्रमा होने से पापनिरत होता है। (११ ) कौतुक अवस्था में चन्द्र हो तो जातक राजा अथवा राजा के समान धनी, कामकला कुशल और वाराङ्गनाओं के साथ रत, क्रीड़ा में चतुर होता है। (१२) यदि शुक्लपक्ष का चन्द्रमा निद्रा अवस्था में हो और उसके साथ बृहस्पति भी हो तो जातक बड़े महत्वपद को प्राप्त करता है। परन्तु यदि कृष्णपक्ष का चन्द्रमा निद्रावस्था में हो तो ऐसे जातक के
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भृगु संहिता फल दर्पण ६९३ संचित धन का विनाश होता है और वह सर्वदा अवगुणों का खान होता है और शोक तथा दरिद्रता से ग्रस्त रहता है। मंगल का द्वादश अवस्था विचार (१) यदि शयन अवस्था में मंगल हो तो जातक के शरीर में कण्डु (खुजली), दद्ठ (दिनाय) आदि रोग, सप्तम स्थान में हो तो जातक की स्त्री की हानि और पञ्चम स्थान में हो तो पुत्र की हानि होती है। यदि षष्ठ स्थान में शत्रु ग्रहों से दृष्टि हो तो कामदेव-जन्य विकार की तत्परता से जातक का हाथ टूट जाता है। यदि ऐसा मंगल, शनि और राहु दोनों से युक्त हो तो जातक निरन्तर रोगी और शिरोवेदना से पीड़ित रहता है। (२) उपवेशन अवस्था में मंगल हो तो जातक धन सम्पन्न होता है। परन्तु झूठा, पापकर्म निरत, स्वधर्म से हीन और सदा चतुर तथा वाचाल होता है। (३) नेत्रपाणि अवस्था का होकर मंगल लग्न में हो तो जातक सर्वदा दरिद्र रहता है। पर अन्य भावों में रहने से नगर ग्रामादि का स्वामी होता है। लग्न स्थित मंगल का विशेष फल यह होता है कि ऐसे जातक को गृहस्थाश्रम के सुख का अभाव, कामदेव जन्य विकार की तत्परता से अंग- भंग, सर्पभय, जलभय और अग्नि भय होता है। जातक दांत की पीड़ा एवं व्रणादि से पीड़ित रहता है। (४) प्रकाशन अवस्था में मंगल हो तो जातक के गुणों का प्रकाश होता है। ऐसा जातक परदेश में निवास करता है और राजद्वार में उसकी मान मर्यादा बढ़ती रहती है। यदि ऐसा मंगल पञ्चम भाव में हो तो पुत्र का नाश होता है और यदि उसके साथ राहु भी हो तो ऐसे जातक का वृक्षादि से पतन होता है। यदि ऐसा मंगल सप्तम भाव में हो तो स्त्री की हानि होती है। स्मरण रहे कि प्रकाश अवस्था का मंगल यदि पापयुक्त अथवा पाप ग्रहों से घिरा हो तो ऐसा जातक बहुत बड़ा दुष्कर्मी होता है। शास्त्रकारों ने कहा है कि ऐसा जातक के पाप की ध्वजा उड़ती है। (५) गमनेच्छा अवस्था में मंगल हो तो जातक निरन्तर यात्रा निरत अर्थात् सफर करने वाला होता है। ऐसे जातक की स्त्री कलह करने वाली होती है और जातक व्रण, दाद तथा खुजली आदि चर्म रोग से पीड़ित रहता है एवं शत्रु द्वारा उसके धन की हानि होती है। (६) गमनावस्था में मंगल हो तो जातक अनेक गुण सम्पन्न, तीक्ष्ण
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६९४ ग्रह प्रभेद प्रकरण खङ्गधारी, हाथी आदि सवारियों से युक्त, मणियों की माला पहनने वाला, शत्रुओं का विजेता और आत्मीय जनों को सुखकारी होता है। (७) यदि उच्चस्थ मंगल सभा अवस्था में हो तो जातक युद्ध विद्या विशादर, धर्मात्मा और धनी, पञ्चम अथवा नवम स्थान में हो तो मूर्ख, बारहवें स्थान में हो तो स्त्री-पुत्र-मित्रादि से रहित तथा इन स्थानों के अतिरिक्त यदि अन्य स्थान में हो तो राजसभा का पण्डित, दानी, मानी एवं बहुधनी होता है। (८) आगमन अवस्था में मंगल हो तो जातक धर्म कर्म रहित, कायर और कुसंगी होता है और ऐसे जातक के कान के समीप किसी शूल रोग से पीड़ा होती है। (९) भोजन अवस्था में मंगल बली हो तो जातक मिष्टान्न प्रिय, नीचकर्म करने वाला और मान हीन होता है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में मंगल हो तो जातक को राजा से बहुत धन की प्राप्ति होती है और उस के गृह विशाल, सुन्दर और धन-धान्यादि से पूर्ण रहते हैं। (११ ) कौतुक अवस्था में मंगल हो तो जातक कौतुक प्रिय और मित्र-पुत्रादि से युक्त होता है। यदि मंगल उच्च हो तो जातक राजदरबार का पण्डित, बहुत गुणज्ञ और पण्डितों से सम्मानित होता है। (१२ ) निद्रा अवस्था में मंगल हो तो जातक क्रोधी, बुद्धिहीन, धनहीन, धर्महीन, रोगी और धूर्त होता है। बुध का द्वादश अवस्था फल ज्ञान (१ ) शयन अवस्था में बुध हो तो जातक के नेत्र कर्जनी के सृदश लाल होते हैं। वह लंगड़ा, भूख से सर्वदा आतुर रहता है। यदि ऐसा बुध अन्य कोई भावगत हो तो जातक लोभी और धूर्त होता है। (२) उपवेशन अवस्था में बुध हो तो जातक सर्वगुण सम्पन्न होता है। यदि वैसा बुध उच्च अथवा मित्रराशिगत हो तो जातक धन से सुखी और पापयुक्त या दृष्ट हो तो दरिद्र होता है। (३) नेत्रपाणि अवस्था में बुध हो तो जातक विद्या-विवेकहीन, असन्तोषी और दम्भी होता है। तथा वह किसी की भलाई नहीं करता है। यदि वैसा बुध पञ्चमभाव गत हो तो पुत्र और स्त्री के सुख से वंचित रहता है; परन्तु ऐसे जातक को कन्या का सुख होता है। (४) प्रकाशन अवस्था में बुध हो तो जातक दयावान्, दाता, पुण्यकार्य को करने वाला, विवेकी, उद्भट विद्वान् और दुष्टों के घमण्ड को तोड़ने
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भृगु संहिता फल दर्पण ६९५ वाला होता है। (५) गमनेच्छा अवस्था। (६) गमनावस्था में बुध हो तो जातक सर्वदा चल फिर करने वाला, लक्ष्मी से पूर्ण गृह वाला और सब प्रकार से शोभा युक्त होता है। ऐसे जातक को राजा से विस्तृत भूमि मिलती है। (७) सभा अवस्था में बुध हो तो जातक कुबेर के समान धनी, हाकिमी इत्यादि के पद पर नियुक्त अथवा मंत्री होता है। ऐसे जातक को पुण्य की वृद्धि उत्तरोत्तर होती है और विष्णु भगवान् एवं शंकर भगवान के चरणों का प्रेमी होता है। ऐसे जातक को साक्षत् सात्त्विकी मुक्ति होती है; परन्तु यदि ऐसा बुध सप्तम अथवा पञ्चम भाव गत हो तो कन्यायें बहुत और पुत्र थोड़े होते हैं। (८) आगम अवस्था में बुध हो तो जातक को कार्य में सफलता नीच जनों कीसेवा से होती है और ऐसे जातक को दो पुत्र तथा शुभ लक्षणों से भरी हुई एवं सम्मान (प्रतिष्ठा) देने वाली एक कन्या होती है। (९) भोजन अवस्था में बुध हो तो जातक के धन की हानि, विवाद और झगड़ा इत्यादि से होती है। सत्री और धन के सुख से वंचित रहता है, राजा से भयभीत और चंचल बुद्धि वाला होता है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में बुध हो तो जातक मानी, इज्जत वाला, मित्र, पुत्र और वाहनादि से सुखी, धन सम्पन्न, प्रतापी और सभा में चतुर होता है। परन्तु यदि पापराशि गत हो तो जातक व्यसनी और वाराङ्गनाओं से रतिक्रीड़ा करने वाला होता है। (११ ) कौतुक अवस्था में बुध हो और लग्न में बैठा हो तो ऐसा जातक गान-विद्या में प्रशंसा योग्य होता है। यदि ऐसा बुध सप्तम अथवा अष्टम स्थान में हो तो वाराङ्गनाओं से प्रीति करने वाला और नवम स्थान में हो तो आगम पुण्य कार्य में तत्पर रहता हुआ अन्त उसकी सद्गति होती है। (१२ ) निद्रा अवस्था में बुध हो तो शारीरिक तथा मानसिक व्यथा से पीड़ित और निद्रासुख से भी वंचित तथा सन्ताप में निमग्न रहता है। भ्राताओं से उसे विकलता रहती है, उसके धन और मान का नाश होता है और अपने मनुष्यों से कलह तथा झगड़ा होता रहता है। बृहस्पति का द्वादश अवस्था फल ज्ञान (१ ) शयन अवस्था में बृहस्पति हो तो बलवान् होने पर भी जातक
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६९६ ग्रह प्रभेद प्रकरण का स्वर अच्छा नहीं होता है जातक गौरवर्ण का होता है। उसकी ठुड्डी लम्बी होती है तथा निरन्तर उसे शत्रुओं का भय रहता है। (२) उपवेशन अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक वाचाल, घमण्डी और राजा तथा शत्रुओं से सर्वदा सन्तप्त रहता है। ऐसे जातक के मुख, हाथ, जंघा तथा पैर में व्रणादि दोष हुआ करता है। (३) नेत्रपाणि अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक गौराङ्ग परन्तु रोगी होता है। धन और शोभा से रहित, अतिकामी तथा विजातियों से प्रेम करने वाला होता है एवं उसे नाच गान से अधिक प्रेम होता है। (४) प्रकाशन अवस्था में बृहस्पति हो और उच्चस्थ हो तो जातक कुबेर के ऐसा धनाढ्य, श्रीकृष्ण भगवान के ऐसा वन-उपवन में विहार करने वाला, भक्ति द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने वाला, सर्वगुण सम्पन्न, सुखी और तेजस्वी होता है। (५) गमनेच्छा अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक साहसी, मित्र, पुत्र आदि से सम्पन्न, धन से सुशोभित, वेदों को जानने वाला और पण्डित होता है। (६) गमनावस्था में बृहस्पति हो तो जातक को लक्ष्मी सर्वदा सुशोभित रखती हैं। उसकी स्त्री सुशीला होती है तथा उसके अधीन बहुत से मनुष्य रहते हैं। (७) सभा अवस्था में बृहस्पति रहे तो जातक शास्त्रों तथा अनेक विद्याओं को जानने वाला और धनी होता है। ऐसे जातक को हाथी, घोड़े, रथ इत्यादि का पूर्ण सुख होता है। उसका घर मणि-माणिक्य इत्यादि से भरा रहता है। (८) आगम अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक को हाथी, घोड़े, पालकी इत्यादि वाहन और सेवक, पुत्र, मित्र तथा स्त्री का सुख होता है। सर्व हितैषी होता है। वह विद्वान्, राजा के तुल्य धनी, काव्य का प्रेमी, अति बुद्धिमान् और (९) भोजन अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक को भोजन में उत्तम पदार्थ मिलते हैं और घोड़ा, हाथी, रथ इत्यादि का सुख होता है। चिरकाल तक लक्ष्मी उसके घर में निवास करती हैं। यदि वैसा बृहस्पति लग्न में हो तो जातक धुनर्धर अर्थात् अस्त्रविद्या में प्रवीण में प्रवीण होता है। परन्तु यदि वैसा बृहस्पति पञ्चम अथवा नवम भाव में हो तो जातक निर्धन, पुत्र रहित तथा पापी होता है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक राजा से सम्तानित, धर्मपरायण, धनवान्, तन्त्रशास्त्री अथवा तर्कशास्त्र और व्याकरण शास्त्र को
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भृगु संहिता फल दर्पण ६९७ जानने वाला अर्थात् पण्डित होता है। वह विद्वानों से घिरा रहता है। ऐसे जातक की ऊहापोह अर्थात् समयानुसार सूझ (हाजिर जवाबी) अच्छी होती हे। (११) कौतुक अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक खेल तमाशा करने वाला, सर्वदा धन सम्पन्न, कृपालु, सुखी, नीतिमान्, बलवान् और राजद्वार का पण्डित होता है। ऐसा जातक अपने कुल रूपी कमल का सूर्य होता है। अर्थात् जातक के कुल की ख्याति, उन्नति इत्यादि, जातक द्वारा होती है और उस के पुत्र नम्र स्वभाव के होते हैं। (१२ ) निद्रा अवस्था में बृहस्पति हो तो जातक दरिद्रता से पीड़ित अपने कार्यों में मूर्खता दिखलाने वाला होता है। उसके गृह में पुण्य का अभाव होता है। शुक्र का द्वादश अवस्था फल ज्ञान (१) शयन अवस्था में शुक्र हो तो जातक बलवान् होते हुए भी क्रोधी तथा दन्तरोगी होता है।
वाला होता है। ऐसा जातक धनहीन, व्यसनी और वेश्याओं के साथ सङ्गति करने
(२) उपवेशन अवस्था में शुक्र हो तो जातक मणि-माणिक्य और स्वर्ण के आभूषणों से सर्वदा अलंकृत रहता है। उसकी मानोन्नति होती है। वह शत्रुओं पर विजय पाता है और राजा से अनुगृहीत रहता है। (३ ) नेत्रपाणि अवस्था में होकर लग्नगत शुक्र हो अथवा सप्तम एवं दशम भावगत हो तो जातक दन्तरोगी और नेत्ररोगी होता है। उसे कामदेव की वृद्धि और धन का क्षय अवश्य होता है; परन्तु यदि अन्य भावगत हो तो वह विशाल भवनाधिपति होता है। (४) प्रकाशन अवस्था में शुक्र हो और यदि स्वगृही उच्च अथवा मित्र राशिगत हो तो जातक, काव्य विद्या और शृङ्गारादि कलाओं में निपुण तथा गायन विद्या का ज्ञाता होता है। उसका ऐश्वर्य राज तुल्य होता है और उन्मत्त हाथी की लीला एवं क्रीड़ा आदि में उसे बहुत प्रेम होता है। (५) गमनेच्छा अवस्था में शुक्र हो तो जातक की माता की मृत्यु शीघ्र होती है और शत्रुओं के भय से ऐसा जातक भी स्वपक्षीय लोगों के पक्ष में रहता है और कभी शत्रु पक्ष में मिल जाता है। (६) गमनावस्था में शुक्र हो तो जातक बहुधनी, तीर्थयात्रा करने
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६९८ ग्रह प्रभेद प्रकरण वाला और उद्यमशील होता है; परन्तु उसके पैरों में रोग भी होते हैं। (७) सभा अवस्था में शुक्र हो तो जातक तेजस्वी, गुणी, शत्रुविजयी, कुबेरतुल्य धनी और हाथी, घोड़ा आदि सवारी पर गमन करने वाला तथा श्रेष्ठ मनुष्य होता है। वह राजसभा में अपने तेज और बल से बिना विशेष परिश्रम के मर्यादा प्राप्त करता है। (८) आगम अवस्था में शुक्र हो तो जातक धनागम से वञ्चित अर्थात् दरिद्र होता है। शत्रुओं से हानि होती है। पुत्र तथा स्वजनों का नाश होता है। (९) भोजन अवस्था में शुक्र हो तो जातक सर्वदा भूख से आतुर, शत्रुओं के भय से दुःखी, रोग से पीड़ित और विद्वानों से मण्डित होता है। अपनी स्त्री के प्राताप से धनावान् और उसे स्त्री सुख होता है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में शुक्र हो तो जातक काव्य विद्या का उत्तम ज्ञाता होता है। गान-विद्या में निपुण और मृदंग आदि बाजा के बजाने में योग्य होता है। ऐसे जातक की बुद्धि मनोहर होती है और सर्वदा धन की वृद्धि होती रहती है। (११ ) कौतुक अवस्था में शुक्र हो तो जातक इन्द्रवत् ऐश्वर्यवान्, रमणीय, विद्या को जानने वाला और सभाओं में मर्यादा पाने वाला होता है। संसार में उसे बड़प्पन मिलता है और लक्ष्मी सदा उसके गृह को सुशोभित करती रहती हैं। (१२ ) निद्रा अवस्था में शुक्र हो तो जातक सदा सारी पृथ्वी में भ्रमण करने वाला, अतिवाचाल, वीर, सर्वदा अन्य लोगों का सेवक और दूसरों की बुराई करने वाला होता है। शनि का द्वादश अवस्था फल ज्ञान शनि जन्मकाल में जिस अदस्था का होकर जिस किसी भाव में स्थित हो उस अवस्था के नाम सदृश्य शुभाशुभ फल विशषतः देता है। (१) शयन अवस्था में शनि हो तो जातक भूख प्यास से सर्वदा व्याकुल, छोटी आयु में रोगी और पीछे जाकर बड़ा भाग्यवान् होता है। (२) उपवेशन अवस्था में शनि हो तो जातक बली और शत्रुओं से पीड़ित रहता है। उसके धन की हानि होती है। राजा से बारम्बार दण्ड पाता है। दाद (दिनाय) आदि चर्म रोग से अवश्य ही दुःखी रहता है और बड़ा अभिमानी होता है। (३) नेत्रपाणि अवस्था में शनि हो तो राजा ऐसे जातक पर प्रेमपूर्वक प्रसन्नता रखता है। अनके कला कौशल का जानने वाला होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ६९९ वाणी उसकी निर्मल होती है और दूसरे की सम्पत्ति से शोभित होता है। उसका घर सुन्दर और पराये धन से सम्पन्न रहता है। (४) प्रकाशन अवस्था में शनि हो तो जातक की कान्ति सुन्दर होती है। वह गुणवान्, सुबुद्धिमान्, विनोदशील, दयावान् और ग्रामों का अधिपति तथा धनी होता है। ईश्वर के चरणों में उसकी भक्ति रहती है। (५) गमनेच्छा अवस्था में शनि हो तो जातक महाधनी, पुण्य करने वाला, शत्रु जिवयी, शत्रु से भूमि हरण करने में सफल और पुत्रोन्नति से आनन्दित रहता है तथा राजदरबार को चतुरों का शिरोमणि बनकर सुशोभित करता है। (६) गमनावस्था में शनि हो तो जातक पुत्र तथा स्त्री सुख से हीन, पृथ्वी में पर्यटन करने वाला और मानिसक दुःख के कारणएकान्त स्थान का वास करने वाला होता है। उसके पैरों में रोग होता है। (७) सभा अवस्था में शनि हो तो जातक रत्नादि की मालाओं से सुशोभित, तेजस्वी और नीतिमान् होता है। (८) आगम अवस्था में शनि हो तो जातक की चाल अति मन्द होती है और किसी से याचना करने में असमर्थ तथा बारम्बार रोग से पीड़ित होता है। (९) भोजन अवस्था में शनि हो तो जातक को षट्स भोजन प्राप्त होता है। वह मोह तथा अज्ञान से संतप्त रहता है। उसके नेत्रों की ज्योति मन्द होती है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में शनि हो तो जातक धैर्यवान्, रणकुशल, राजदरबार में आदरणीय, धनी और धर्मात्मा भी होता है। (११ ) कौतुक अवस्था में शनि हो तो ऐसा जातक काव्य शास्त्र को जानने वाला अर्थात् काव्य-रस का प्रेमी, धनी और सुखी होता है। उसकी स्त्री सुन्दर होती है। (१२ ) निद्रा अवस्था में शनि हो तो जातक धनी, गुणी, पराक्रमी, प्रचण्ड, शत्रुविजयी और स्त्री प्रसंग-विधि में कुशल होता है। राहु का द्वादश अवस्था फल विचार (१ ) शयन अवस्था में राहु हो तो जातक रोगी तथा दुःखी रहता है। पुनः यदि ऐसा राहु मेष, वृष, मिथुन, कन्या, तुला और वृश्चिक राशिगत हो तो जातक के पास धन एवं अन्न का समूह रहता है। यदि द्वितीय, एकादश अथवा द्वादश भाव में हो तो जातक निर्धन रहता है। यदि द्वितीय, एकादश अथवा द्वादश भाव में हो तो जातक निर्धन रहता हुआ संसार में भ्रमण करता है।
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७०० ग्रह प्रभेद प्रकरण ऐसा भी वर्णन मिलता है कि राहु के उच्च, स्वगृही, मित्रगृही, स्वनवमांश, मित्रनवांश, शुक्र या मंगल के क्षेत्र में हो तो पूर्ण फल मिलता है। (२) उपवेशन अवस्था में राहु हो तो जातक राजसभा में बैठने वाला और माननीय होता है। परन्तु उसे धनसुख नहीं होता और दाद रोग से सन्तप्त रहता है। (३) नेत्रपाणि अवस्था में राहु हो तो जातक के धन का क्षय होता है। वह नेत्र रोगी और उसे शत्रु, चोर तथा सर्पादि से भय होता है। (४) प्रकाशन अवस्था में राहु हो तो जातक के उत्तम यश तथा धन एवं सद्गुणों की वृद्धि होती है। विद्या तथा चतुराई के कारण राजदरबर में उत्तम पद प्राप्त होता है। उसकी यशरूपी लता की बहुत वृद्धि होती है और परदेश में विशेष उन्नति होती है तथा जातक मेघ सदृश रूपवान् होता है। (५) गमनेच्छा अवस्था में राहु हो तो जातक विद्वान्, धनवान्, उदार, मनुष्यों में श्रेष्ठ और राजपूज्य होता है। ऐसे जातक के (अपनी) सन्तान की संख्या अच्छी होती है। (६) गमनावस्था में राहु हो तो जातक क्रोधी, कृपण, कुटिल, बुद्धिहीन ' और धनरहित तथा कामासक्त भी होता है। (७) सभा अवस्था में राहु हो तो जातक बहुगुण सम्पन्न, धनी एवं विद्वान् परन्तु कृपण होता है। (८) आगम अवस्था में राहु हो तो जातक शत्रुभय से पीड़ित, बन्धु- बान्धवों से कलह करने वाला और मूर्ख होता है। उसके धन की हानि होती है और उसका शरीर कृश होता है। (९) भोजन अवस्था में राहु हो तो जातक स्त्री-पुत्र के सुख से वर्जित, आलसी, मन्द बुद्धि वाला और इतना दरिद्र होता है कि भोजन में भी सन्देह होता है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में राहु हो तो जातक के धन और धर्म का क्षय होता है। शत्रुओं से भयभीत, कठिन रोगों से ग्रसित और नेत्र रोगी होता है। (११) कौतुक अवस्था में राहु हो तो जातक परधनहारी, परस्त्रीगामी और गृहरहित होता है। (१२ ) निद्रा अवस्था में राहु हो तो जातक धनी, गुणी, धैर्यवान् और स्त्री पुत्रादि से सुखी होता है। यदि नवां या सातवां भाव में राहु हो तो जातक किसी पुण्य क्षेत्र में निवास करता है। केतु का द्वादश अवस्था फल ज्ञान (१ ) शयन अवस्था में मेष, वृष, मिथुन अथवा कन्या राशिगत केतु
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भृगु संहिता फल दर्पण ७०१ हो तो ऐसे जातक के धन की वृद्धि होती है; परन्तु अन्य राशिगत होने से रोग की वृद्धि होती है। (२) उपवेशन अवस्था में केतु हो तो जातक को शत्रु, चोर, राजा तथा सर्प से भय होता है और उसे चर्म रोग अर्थात् दाद इत्यादि का भय होता है। (३) नेत्रपाणि अवस्था में केतु हो तो जातक को दुष्ट जन्तु अर्थात् सर्पादि, शत्रु और राजा से भय होता है। जातक नेत्र रोगी और चंचल होता है। उसके धन नष्ट होते हैं। (४) प्रकाशन अवस्था में केतु हो तो जातक को विदेश में सुख प्राप्त होता है। राजा से मान प्राप्त करता है। यश तथा धन की वृद्धि होती है। (५) गमनेच्छा अवस्था में केतु हो तो जातक धनी, पुत्रवान् और विद्वान् होता है तथा राजा से उसे मान प्राप्त होता है। (६) गमनावस्था में केतु हो तो जातक कामी, दुष्ट, निर्धन, धर्म-कर्म रहित, क्रोधी तथा ठग होता है। (७) सभा अवस्था में केतु हो तो जातक धूर्त, वाचाल, गर्वित, लोभी और कृपण होता है। (८) आगम अवस्था में केतु हो तो जातक बन्धुवर्ग तथा शत्रुओं से विवाद करने वाला, रोगी और बड़ा भारी पापी होता है। (९) भोजन अवस्था में केतु हो तो जातक भूख से पीड़ित, रोगी, दरिद्र तथा भ्रमणशील होता है। (१०) नृत्यलिप्सा अवस्था में केतु हो तो जातक के नेत्रों की दृष्टि स्थिर नहीं रहती है और वह सर्वदा रोगी तथा दुःखी होता है। धूर्त तथा अनर्थ कार्यो में लिप्त रहता है; परन्तु किसी से हारता नहीं है (११ ) कौतुक अवस्था में केतु हो तो जातक खेल तमाशे में लिप्त तथा नटिन स्त्रियों में आसक्त, दुष्टाचारी और दरिद्र होता है। तथा स्थान भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर मारा फिरता है। (१२ ) निद्रा अवस्था में केतु हो तो जातक अन्न, धन से पूरित रहता हुआ गुणों की चर्चा में लीन रहकर सुख से दिन व्यतीत करता है। निद्रावस्था का विशेष फल ज्ञान- निद्रावस्था में यदि कोई पापग्रह सप्तम स्थान में हो तो जातक की स्त्री का नाश होता है। परन्तु यदि शुभग्रह की उस पर दृष्टि पड़ती हो अथवा शुभग्रह उसके साथ हो तो स्त्री कष्ट भोग कर जीवित रह जाती है। यदि कभी छठे अथवा सातवें स्थान में कोई भी निद्रावस्था का ग्रह हो, परन्तु यदि वह शत्रु ग्रह से दृष्ट हो तो ऐसे जातक की स्त्री उचित रक्षा होने पर
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७०२ ग्रह प्रभेद प्रकरण भी नहीं जीवित रहती। उपर्युक्त योग होते हुए यदि शुभग्रह की दृष्टि हो अथवा शुभग्रह से युक्त हो तो वैसे जातक का एक स्त्री के मरने के बाद दूसरा विवाह होता है। यदि शुभग्रह और पापग्रह दोनों से दृष्ट अथवा युत हो तो जातक की स्त्री कष्ट से ही जीती है। पुनः यदि कोई निद्रावस्था का ग्रह पञ्चमभाव में उच्च अथवा स्वगृही होकर बैठा हो और वह पापग्रह से दृष्ट अथवा युक्त हो तो जातक के सन्तान का नाश होता है। यदि उस ग्रह पर शुभग्रह की भी दृष्टि हो तो ऐसे जातक के एक पुत्र की मृत्यु अवश्य होती है। पुनः एक साधारण नियम यह है कि पञ्चम स्थान में शुभग्रह रहने से प्रायः शुभफल होता है। परन्तु यदि वह ग्रह शयनावस्था या निद्रावस्था में हो तो सन्तान के लिये अशुभ होता है। इसी प्रकार पापग्रह यदि शयन या निद्रा अवस्था में पुत्रभात में बैठा हो तो सन्तान के लिये किसी अंश में अच्छा ही होता है। इस प्रकार विचार से प्रतीत होता है कि पापग्रह उन अवस्थाओं में रहने के कारण निर्बल हो जाते हैं। अतएव अनिष्ट करने में उनको निर्बलता हो जाती है। इस कारण अवस्था विचार अति आवश्यक है। यदि किसी जातक की कुण्डली में मंगल, शनि और राडु अष्टम स्थान में बैठा हो और इन तीन ग्रहों में से कोई भी निद्रा अवस्था में हो तो शस्त्र द्वारा जातक की अपमृत्यु होती है। इसी प्रकार अष्टम स्थान में कोई शुभ ग्रह भी यदि निद्रावस्था में हो और उस पर किसी पापग्रह अथवा शत्रुग्रह की दृष्टि पड़ती हो तो ऐसे जातक की मृत्यु संग्राम में होती है। इसी प्रकार लिखा है कि यदि कोई ग्रह पापयुक्त, अष्टम स्थान में निद्रावस्था का अथवा शयनावस्था का हो तो ऐसे जातक की मृत्यु शत्रु द्वारा होती है। पुनः यदि वह शुभग्रहों से दृष्टि या युक्त हो अथवा स्वगृही ग्रह से युक्त हो तो ऐसा जातक भगवान् के पद में निमग्न रहता हुआ सायुज्य पद को पाता है। दीप्ताद्यवस्थानुसार फल ज्ञान-अवस्था का विचार अनेक प्रकार का है। नीचे लिखी हुई अवस्था बहुतेरे ग्रन्थों में पायी जाती है। परन्तु दुःख से लिखना पड़ता है कि इसमें भी नाम में मतान्तर पाया जाता है। और किसी
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भृगु संहिता फल दर्पण ७०३ मत से इस के दश भेद हैं। पराशर, गुणाकर और सारावली में ९ प्रकार बतलाया है। "जातक पारिजात' भावकुतूहल' और दक्षिण भारत के कई विद्वानों ने १० ही बतलाया है। उसका नाम इस प्रकार है- (१ ) दीप्त, (२) स्वस्थ, (३) प्रसुदित, (४) शान्त, (५) शक्त, ( ६ ) प्रपीड़ित, (७) दीन, (८) खल, (९ ) विकल और ( १० ) भीत। (१) दीप्त-जब ग्रह उच्च होते हैं तब उनका नाम दीप्त होता है। किसी किसी के मत से मूलत्रिकोणस्थ ग्रह भी दीप्त कहलाता है। ऐसे दीप्त ग्रह की महादशा में जातक राजा के जैसा धनवान्, यशस्वी, दानी, विद्या-विनोद सम्पन्न, शत्रुओं को पराजय करने वाला, बुद्धिमान् और शत्रु विजयी होता है। वाहन सुख और कन्या सन्तान की उत्पत्ति होती है तथा राजा, सम्बन्धी एवं मित्र वर्गों से पुरस्कृत होता है। (२) स्वस्थ-वह कहलाता है जो ग्रह स्वगृही होता है। किसी मत से अतिमित्रगृही ग्रह स्वस्थ अवस्था का होता है। स्वस्थ ग्रह की महादशा में जातक आचार, धर्म, पुराणादि, श्रवण, सर्वसुख सम्पन्न, शरीर स्वस्थ और धन लाभ का सुख पाता है। वह राजा से सम्मानित होता है और विद्या, यश तथा आनन्द प्राप्त करता है।
विनाशक होता है। उसे स्त्री तथा सन्तान का सुख होता है। वह उदार, कीर्तिमान् एवं 1 (३) प्रमुदित- (दूषित) उस ग्रह को कहते हैं जो मित्रगृही होता है।
वृद्धि होती है। प्रमुदित ग्रह की महादशा में राजप्रीति, सुख और विभूतियों की अच्छे-अच्छे वस्त्र और सुगन्धादि के लाभ होते हैं। सन्तान, सम्पत्ति, वाहन, भूषणादि तथा पृथ्वी का लाभ होता है। गीत-नृत्य और पुराणादि श्रवण तथा उच्च पद सम्भव होता है। वह मित्र पुत्रादि, सुख सम्पन्न और धार्मिक होता है।
वर्गोत्तम का होता है। (४) शान्त-इस अवस्था का वह ग्रह कहलाता है, जो शुभ वर्ग तथा
शान्त ग्रह की महादशा में आरोग्यता, आनन्द, सन्तान, भूसम्पत्ति, वाहनविद्या विनोद और बहु द्रव्य आदि की प्राप्ति होती है। राजा से सम्मानित होता है अथव सचिव होता है। अच्छी शिक्षायें मिलती हैं। कुटुम्बों को सहायता देता और सुखमय जीवन व्यतीत करता है।
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७०४ ग्रह प्रभेद प्रकरण ऐसा जातक परोपकारी और धार्मिक होता है। (५) शक्त-शक्त उसे कहते हैं तो वक्री हो 'गूणाकर' में रश्मिवितान भृत्त्वा' लिखा है, 'सारावली' में 'स्फुट किरणजालश्च' लिखा है। शक्त ग्रह की महादशा में पुरूषार्थ की उन्नति, सम्पत्ति और स्वजन सम्बन्धी आनन्द प्राप्त होता है।
होती है। विद्या विनय तत्परता, धर्मानुष्ठान से सिद्धि और दानादि की चेष्टा
जातक सजीला जवान्, सुन्दर, विख्यात और कीर्तिमान होता है। स्मरण रहे कि ऐसा शुभग्रह यदि वक्री होता है तो शुभ फल देता है, परन्तु पापग्रह के वक्री होने से विपरीत फल होते हैं। (६ ) प्रपीड़ित-प्रपीड़ित तथा पीड़ित (दुःखित) ग्रह वह कहलाता है जो शत्रु गृही, पापराशिगत, ग्रहयुद्ध में हारा हुआ या राशि के अंतिम नवांश मे रहता है। पीड़ित ग्रह की महादशा में मित्रों से असन्तोष, कुटुम्बों से विवाद, परिवार में अशान्ति, फौजदारी मुकद्दमें से दुःख, राजदण्ड से निकाला, या परदेश में मारा फिरने वाला और चोर-डाकुओं से भय होता है। अथवा किसी छोटे भाई को मृत्यु होती है।
नवमांश का हो। (७) दीन-(भीत) ग्रह वह कहलाता है जो नीच, शत्रु ग्रह या पाप
दीन ग्रह की महादशा में चित्त की अशान्ति, पगलापन अर्थात् मन को भ्रान्ति, रोग, जाति, कुल से पतन, बंधुजनों से विरोध, हीन वृत्ति से जीविका, मलिनता, प्रवास और नाना प्रकार से शोक-दुःखादि होते हैं। (८) खल-खल ग्रह वह कहलाता है जो शत्रु वर्गी या पापवर्गी हो। खलग्रह की महादशा में माता पिता और स्त्री पुत्र से मनोमालिन्य अथवा वियोग तथा अकस्मात् धन एवं पृथ्वी का नाश, जाति वर्गों से लाञ्छना, रोग, कारागार और नाना प्रकार के सन्ताप होते हैं। (९) विकल-लुप्त ग्रह वह कहलाता है जो सूर्य से अस्त रहता है। विकल ग्रह की महादशा में चित्त भ्रान्ति, उन्माद, माता-पिता से वियोग, पुत्र द्वारा हानि तथा स्त्री, सन्तान और मित्रादिकों की मानहानी होती है। अथवा किसी मित्र की मृत्यु होती है। दुश्मनों से पीड़ित और स्त्रीमरण शोक से संतप्त रहता है। (१०) भीत-यह ग्रह अतिचारी होता है। (पञ्चाङ्ग को देखने से बोध होगा कि कई कारणों से कभी-कभी ग्रह बहुत ही शीघ्रगामी हो जाता है, उसी को अतिचार कहते हैं)।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७०५ भीतग्रह की महादशा में राजा, अग्नि, चोर और शत्रु से भय होता है। नाना प्रकार के दुःख, मानहानि और रोग से जातक दुःखी रहता है। लज्जिताद्यवस्था विचार इसमें छः प्रकार की अवस्थायें होती हैं। (१) जब कोई ग्रह पंचमभाव में हो और उसके साथ राहु, केतु, सूर्य, शनि अथवा मंगल हो तो वह लज्जितावस्था में होता है। (२) उच्चस्थ ग्रह या मूलत्रिकोणस्थ ग्रह की गर्वितावस्था होती है। (३) शत्रुगृही, शनियुक्त शत्रुग्रहयुक्त अथवा शत्रुग्रहदृष्ट ग्रह क्षुधितावस्था में होता है। (४) यदि कोई ग्रह जलराशिगत हो और उस पर शत्रुग्रह की दृष्टि भी हो, पर शुभ ग्रह से दृष्ट न हो तो उस ग्रह की तृषितावस्था होती है। (५) यदि कोई मित्रगृही हो, मित्रग्रह से युक्त भी हो अथवा बृहस्पति से युक्त हो अथव मित्रग्रह से दृष्ट हो तो उसकी मुदितावस्था होती है। (६) अस्तग्रह जब पाप अथवा शत्रुग्रह से दृष्ट हो तो उसकी क्षोभितावस्था होती है। जिस किसी भाव में क्षुधित अथवा शोभित ग्रह पड़ता है उस भाव के फलों को नष्ट करता है और उससे जातक दुःखी होता है। यदि उसके साथ मुदितावस्था का ग्रह भी हो तो मिश्रित फल होता है। पर यदि मुदित ग्रह बलहीन हो तो हानि विशेष रूप से और यदि बलवान् हो तो उत्तम फल होता है। यदि दशमस्थान में लज्जित, तृषित, क्षुधित या शोभित ग्रह बैठा हो तो जातक अनेक प्रकार का दुःख भोगता है। पंचमभाव में लज्जित ग्रह के रहने से जातक के सन्तान की मृत्यु होती है और एक ही सन्तान रह जाता है। इसी प्रकार यदि क्षोभित या तृषित ग्रह सप्तम स्थान में बैठा हो तो जातक की स्त्री की मृत्यु होती है। यह अवस्था अद्भुत सागर नामक ग्रन्थ से उद्धत किया गया है। इन अवस्थाओं के अलग-अलग फल का पता नहीं चलता। ऊपर लिखा गया है कि दशमस्थान में यदि लज्जित ग्रह हों तो जातक दुःख का भाजन होता है। लज्जितावस्था में पंचम भावगत ग्रह होता है। इसी कारण लज्जित का दशम स्थान में होना असम्भव है। प्रतीत होता है कि मूल में छापे की भूल है। वचन इस प्रकार है- 'कर्मस्थाने स्थिता यस्य लज्जितस्तृषितस्तथा। क्षुधितः क्षोभितो वाऽपि स नरो दुःख भाजनः ।।' भू.सं-४५
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७०६ ग्रह प्रभेद प्रकरण शुद्धाद्यवस्था विचार- इसमें २७ प्रकार की अवस्था होती है। उनके नाम इस प्रकार से कहे गये हैं-(१) शुद्ध, ( २ ) वस्त्रधारण, ( ३ ) पुण्ड्धारण, (४) जय, (५) शिवपूजा, (६) अवसान, (७) विष्णुपूजा (८) विप्रपूजा, (९) नमस्कार, (१० ) प्रदक्षिणा, (११) व्यासदेव, (१२ ) अतिथिपूजा, (१३) भोजन, (१४ ) विद्या-परिश्रम, (१५ ) क्रोध, (१६ ) ताम्बूल, (१७) नृपाल पस्यम्, (१८) गमन, (१९ ) जलपान, (२० ) आलस्य, (२१ ) शयन, (२२ ) अमृतपान, (२३) अलंकार, (२४ ) स्त्रीआलापनम्, (२५) सम्भोग, (२६ ) निद्रा और (२७) रत्नपरीक्षा। शास्त्रकारों का मत है कि सभी ग्रह इन सत्ताईस अवस्थाओं में से किसी न किसी एक अवस्था के होते हैं और प्रतिग्रह को अपनी अवस्था के अनुसार फल दायित्त्व होता है। इस अवस्था के जानने की दो विधि हैं। मेष से लग्न पर्यन्त, जो संख्या आये उस संख्या को जिस ग्रह की अवस्था निकालना है, उस ग्रह की राशि स्थित संख्या से गुणा कर दे और जो गुणन फल आये, उसको सत्ताइस से भाग दे। जो शेष रहे उसको उस ग्रह की महादशा की संख्या से गुणा कर उसको फिर सत्ताईस से भाग दे; जो शेष रहे वही उस ग्रह की अवस्था होगी। यदि एक शेष रहे तो शुद्ध अवस्था, दो रहे तो वस्त्रधारण अवस्था, इत्यादि-इत्यादि प्रकार जानना चाहिए। यदि २७ से भाग न हो सके तो जो अंक है वही रह जायगा और यदि सत्ताईस से भाग देने पर शून्य बच जाय तो शेष २७ मानना होगा। उदाहरण कुण्डली के मंगल की अवस्था यदि निकालना हो तो उसकी विधि यह होगी। लग्न धनु राशि है। मेष से गिनने से धनु की संख्या ९ होती है। मंगल सिंह में है। मेष से मंगल तक गिनने से ५ होती है। अर्थात् इस प्रकार मानिये कि धनु नवम राशि और सिंह पञ्चम राशि है। अब ९ को ५ से गुणा किया तो फल ४५ आया। ४५ को २७ से भाग दिया तो शेष १८ रहा। १८ को मंगल की महादशा मान, अर्थात् ७ से गुणा किया तो फल १२६ आया। उसको पुनः २७ से भाग दिया तो शेष १८ बचा और अठारहवां गमन अवस्था है, इसलिये मंगल गमन अवस्था का हुआ। शुद्धाद्यवस्थाओं का फल ज्ञान-यदि प्रथम अवस्था हो तो उन्नति, दूसरी अवस्था शुभ, तृतीय अवस्था में सब तरह से रक्षा, चतुर्थ अवस्था में आनन्द, पञ्चम में शत्रुओं पर विजय, षष्ठ में साधारण फल, सप्तम में विजय, अष्टम में कार्य में तत्परता, नवम में आनन्दमय जीवन, दशम में कठिनाईयाँ, ग्यारह में अशुभ, बारहवें में अति आनन्द, तेरहवें में कार्य में तत्परता, चौदह में उन्नति,
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भृगु संहिता फल दर्पण ७०७ पन्द्रहवें में दुःख, सोलहवें में प्रतिष्ठा तथा कीर्ति, सत्रहवें में सफलता, अठारहवें में शुभ और अशुभ मिश्रित फल, उन्नीएवें में आनन्द, बीसवें में भय, इक्कीसवें में दरिद्रता, बाइसवें में सन्तोष, तेइसवें में वस्त्र प्राप्ति, चौबीसवें में आनन्द, पचीसवें में मानसिक दुःख, छब्बीसवें में रोग और सत्ताईसवें में द्रव्य प्राप्ति होती है। शुद्धाद्यवस्था का विस्तृत विचार- प्रथम अवस्था में ग्रह के रहने पर जातक की उन्नति, परिवार-सुख, सुपुत्र सुख, सत्कार और कार्य में सफलता होती है। दूसरी अवस्था से धन, मणि-माणिक, प्रभाव, वस्त्र और उत्तम भोजनादि की प्राप्ति होती है। तीसरा अवस्था में परदेश में उन्नति, ख्याति तथा सम्मान प्राप्त होता है और जातक परिश्रमी होता है। चौथे में पृथ्वी से लाभ एवं उत्तम वाहनादि का सुख होता है और जातक प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। पाँचवें में राजभय, धन का क्षय, तथा लाञ्छनाओं का भागी होता है और जातक को पृथ्वी से प्रेम होता है। छठे में धन की वृद्धि और ख्याति होती है तथा उपद्रवियों के मध्य में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। सप्तम में विद्वान् परन्तु दुःखी और पित्त विकारी होता है। अष्टम में पृथ्वी से लाभ और धन की प्राप्ति होती है। जातक के कुटुम्ब धनी होते हैं और शत्रुओं का क्षय होता है। नवम में उत्तम वाहनादि प्राप्ति होते हैं और जातक मधुर भाषी परन्तु दिखावटी होता है। दशम में शूलादि रोग से पीड़ा, पित्त जनित रोग का भय फौजदारी के मुकद्दमों की परेशानी होती है। ग्यारहवें में जातक को पारिवारिक सुख तथा जीवन उन्नतिशील होता है। वह राजनैतिक अधिकार प्राप्त करता है। बारहवें में गड़े हुए धन की प्राप्ति और तन्त्र विद्या में प्रेम होता है अथवा वह जादूगिरी को जानने वाला तथा दम्भी भी होता है।
होता है। तेरहवें में धर्म्म विरोधी, वर्णाश्रम धर्म से च्युत, रोगी तथा धोखे बाज
चौदहवें में कुत्सित भोजन करने वाला और घृणित स्वभाव का होता है। पन्द्रहवें में मनुष्य से घृणा करने वाला और दम्भी होता है। सोलहवें में विद्वान्, धनी और यशस्वी तथा उच्चपदाधिकारी भी होता है।
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७०८ ग्रह प्रभेद प्रकरग सत्रहवें में धार्मिक प्रतिष्ठित सुशील और नियमशील होता है। अठारहवें में विद्वान् धनी और उच्च श्रेी का फौजी जीवन व्यतीत करने वाला होता है। उन्नीसवें में मधुरभाषी परन्तु आसकती और चित्त का धोखेबाज होता है। बीसवें में शिक्षित परन्तु सुस्त प्रकृति का तथा चिन्ता शून्य अर्थात् बेपरवाह होता है। इक्कीसवें में रोगी परिवार पर कठोरता से व्यवहार करने वाला और कामी होता है। बाईसवें में असावधान, मित्रों का अपकार करने वाला, स्वजनों से घृणा करने वाला और अपने नाश का कारण होता है। तेइसवें में स्वास्थ्य अच्छी होती है। सन्तान अच्छे होते हैं। स्त्री मिलती है। भोजन उत्तम मिलता है और कुटुम्बों से मर्यादा पाता है। चौबीसवें में स्वभाव का सुशील, उन्नति शील और कार्य में फलीभूत होता है। पच्चीसवें में मित्र और बन्धुओं से परित्यक्त और दुःखी होता है। तथा कार्य में निष्फलता होती है। 1
पीड़ित होता है। छब्बीसवें में मद्य-प्रिय, किसी पुराने रोग से ग्रसित और राजकोप से
सत्ताईसवें में शोक ग्रसित बदला लेने का इच्छुक, नीच कक्षा के • स्त्रियों में रत, धूर्त्त और बुरे विचारों वाला होता है। अष्टाचत्वारिंश अवस्था विचार- इस अवस्था का गणित इस प्रकार किया जाता है कि- लग्न संख्या को ग्रह स्थित भाव संख्या से गुणा करके सत्ताइस से भाग दिया जाता है। यदि सत्ताईस से भाग न पड़ सके तो गुणनफल जो अवेगा उसी को लेना होगा। अब इस अंक को ग्रहदशा से गुणा करना होगा और उसको अड़तालीस से भाग देने पर जो शेष रहे वही अवस्था की संख्या होगी। इस स्थान में यदि शून्य शेष रहे तो संख्या ४८ मानी जायगी। उदाहरणार्थ कुण्डली में धनु लग्न से लग्न की संख्या ९ हुई। यदि मंगल की अवस्था जाननी हो तो मंगल के नवम स्थान में रहने के कारण मंगल की संख्या ९ हुई। ९ को ९ से गुणा करने से ८१ हुआ। ८१ को २७ से भाग देने से शेष शून्य रहा, इस कारण शेष शून्य रहने से शेष २७ माना जायगा। मंगल का महादशा मान ७ वर्ष है। इस कारण २७ को ७ से गुणा करने से गुजनफल १८९ हुआ। १८९ को ४८ से भाग देने से शेष ४५ रहा।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७०९ अतः मंगल की ४५वीं अवस्था हुई और आगे प्रति अवस्था का जो फल दिया जा रहा है तदनुसार मंगल की महादशा में फल होगा। एकादि शेष के अनुसार ४८ अवस्थओं का फल इस प्रकार जानना चाहिए- यदि १ शेष हो तो जातक का धनोपार्जन अच्छा होता है और विद्या अध्ययन में अभिरुचि होती है। यदि २ शेष हो तो जातक का बहुत ही बुरा फल होता है। स्त्री- सन्तानादि दुःखित रहते हैं। तथा जातक को राजदण्ड का भय रहता है। यदि ३ शेष हो तो उस ग्रह के प्रथम और तृतीय तृतीयांश में साधारण फल होता है। परन्तु मध्य तृतीयांश में बहुत ही अशुभ फल होता है। यदि ४ शेष हो तो शुभ फल होता है। गुरुजनों से भेंट मुलाकात होती है। परन्तु यदि वह ग्रह पाप हो और द्वादशस्थ हो तो जातक को बहु प्रकार से व्यय होता है। यदि ५ शेष हो तो उसका फल बुरा होता है। जातक स्वंय और उसके परिवार के लोग दुःखी होते हैं। और जातक देशाटन करता है। यदि ६ शेष हो तो उत्तम भोजन की प्राप्ति और सुखी भोजन होता है। यदि ७ शेष हो तो अशुभ फल होता है। जातक क्रोधातुर, असहिष्णु, चिन्तित और दुःखी रहता है। उसका व्य अधिक होता है। वह ऋण ग्रस्त रहता है। यदि ८ शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है। नवीन वस्तुओं की प्राप्ति होती है और रुद्राक्ष की माला धारण करता है। यदि ९ शेष हो तो मन्त्र शास्त्र में अभिरुचि रहती है। गणित, ज्योतिष तथा विज्ञान विद्या के सीखने का अवसर होता है। यदि १० शेष हो तो जातक सांसारिक दृष्टि से सुखी, परन्तु मानसिक व्यथा से दुःखित रहता है। यदि ११ शेष हो तो भी अशुभ फल होता है। ऐसा जातक रासायनिक विद्या तथा मिमियागिरी के पीछें द्रव्य व्यय करता है। मानसिक रोग से दुःखित रहता है और धूर्त्त होता है। यदि १२ शेष हो तो अतिशुभ फल होता है।
रुचि होती है। यदि १३ शेष हो तो बहुत अशुभ फल नहीं होता है अध्ययन में
दुःखी होता है। यदि १४ शेष हो तो बहुत अशुभ फल होता है। जीवन का मध्य भाग
यदि १५ शेष हो तो बहुत अशुभ फल होता है। अनेक प्रकार की
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७१० ग्रह प्रभेद प्रकरण कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। यदि १६ शेष हो तो अति उत्तम फल होता है। यदि १७) शेष हो तो अत्युत्तम फल होता है। यदि १८ शेष हो तो बहुत बुरा फल नहीं होता है, परन्तु समय समय पर दुःखी अवश्य होता है। यदि १९ शेष हो तो जातक रोगी और मित्रों से त्याज्य होता है। यदि २० शेष हो तो जातक रोग से पीड़ित रहता है और मित्रों से त्याज्य होता है। यदि २१ शेष हो तो फल अशुभ होता है। आय से व्यय अधिक हो जाता है और ऋणी रहता है। यदि २२ शेष हो तो कार्य में सफलता प्राप्त होती है और जीवन सुखी होता है। यदि २३ शेष हो तो पश्चित दिशा की यात्रा करता है और जीवन में उसे अच्छा धन प्राप्त होता है। यदि २४ शेष हो तो ग्राम, गृह एवं सम्पत्ति का नाश होता है। यदि २५ शेष हो तो किञ्चन्मात्र शुभ, विशेषतः अशुभ ही फल होता है।
होता है। यदि २६ शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है। और जातक उदार
यदि २७ शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है। यदि २८ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल प्राप्त होता है और व्यय की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। यदि २९ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ, गुरुजनों की प्राति अश्रद्धा उत्पन्न होती है। यदि ३० शेष हो तो शुभ फल प्राप्त होता है।
झेलनी पड़ती हैं। यदि ३१ शेष हो तो अशुभ, नीच, कामरत तथा जातक को कठिनाईयाँ
यदि ३२ शेष हो तो अशुभ एवं रोगी होता है। यदि ३३ शेष हो तो अति शुभ फल होता है। यदि ३४ शेष हो तो आरम्भ में बड़ा उत्तम परन्तु शेष में व्यय की मात्रा बढ़ जाती है। यदि ३५ शेष हो तो फल बुरा होता है और जातक धोखेबाज होता है। यदि ३६ शेष हो तो उत्तम फल, व्यापार में उसकी रुचि होती है। जीवन के अन्तिम भाग में क्षति होती है। यदि ३७ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल होता है। कारागार निवास
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भृगु संहिता फल दर्पण ७११ का योग होता है। यदि ३८ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल होता है। मुकद्दमाबाजी, रोग और ऋण परिणाम होता है। यदि ३९ शेष हो तो अत्यधिक अशुभ फल प्राप्त होता है। यदि ४० शेष हो तो आय कम, व्यय अधिक और कठिनाईयों को झेलना पड़ता है। यदि ४१ शेष हो तो अशुभ फल, शारीरिक व्यथा और शत्रुओं से दुःख प्राप्त होता है। यदि ४२ शेष हो तो राजदण्ड से पीड़ित और बहुत अशुभ फल होता है। यदि ४३ शेष हो तो कुशलपूर्वक तीर्थ यात्रा और उत्तम भोजन प्राप्त होता है। यदि ४४ शेष हो तो परदेश यात्रा एवं परदेश में व्यवहार उन्नति होती है। यदि ४५ शेष हो तो अति उत्तम फल प्राप्त होता है। विद्योन्नति एवं धार्मिक भावों का आगमन होता है। यदि ४६ शेष हो तो अति उत्तम फल प्राप्त होता है। व्यवहार में उन्नति और अच्छी नौकरी आदि मिलती है।
होता है। यदि ४७ शेष हो तो अशुभ फल प्राप्त होता है और जननेन्द्रिय में रोग
यदि ४८ शेष हो तो सुखमय जीवन व्यतीत करता है। उच्च राशि में ग्रह फल ज्ञान- यदि उच्च में विलोम (वक्रगति) हो तो फल नहीं होता है, ऐसे अन्य आचार्यों का मत है तथा काल की अत्यधिकता होने के कारण अपने उच्च राशि में अतिवक्र होने पर भी उसी प्रकार कलाभाव समझना चाहिए। एक ही राशि में वक्रगति होकर फिर मार्ग गति हो जाय तो ग्रह वक्री, यदि एक राशि में वक्रगति होकर पिछली राशि में चला जाय तो ग्रह अतिवक्री कहलाता है। जब ग्रह वक्र होता है तो १ राशि में अधिक काल लगता (कुछ अंशों को दोबारा भोग करना पड़ता) है। उच्चादि बल में श्रेष्ठ मध्य, अल्पबल का कथन- ग्रह अपने उच्च में श्रेष्ठ (उत्तम) बली, मूल त्रिकोण तथा राशि में मध्यबली, मित्र ग्रह के द्वारा दृष्ट मित्र की राशि में हो तो अल्पबली होता है। चन्द्र बल में श्रेष्ठादि कथन- यवनाचार्यों का कथन है कि शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से दशमी तक चन्द्रमा मध्य बली, द्वितीय दशक (शुक्ल
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७१२ ग्रह प्रभेद प्रकरण एकादशी से कृष्णपक्ष की पञ्चमीतिथि पर्यन्त में श्रेष्ठ बल, और तृतीय दशक (कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि से अमावस्या पर्यन्त) में न्यून बल होता है। जन्म समय में देदीप्यमान किरण, प्रसन्नमण्डल, पूर्ण चन्द्रमा हो तो उस मनुष्य को राजा बना देता है, तथा उसकी सेना को कोई कहीं रोक नहीं सकता। आयु मध्य में सुख योग- जिस व्यक्ति के जन्मकाल में चन्द्रमा जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी लग्नेश भी हो या गुरु केन्द्र में। ग्रह के राशि भेद फल का कथन- राशि या राशीश के बल से राशि भेद फल अर्थात् बल भेद का ज्ञान कर यदि एकसा दोनों का फल हो तो एक को ग्रहण करना चाहिए। ग्रह के फल भेद का निर्णय- लग्न (राशि) व ग्रह के बल में समता हो तो नैसर्गिक बल के द्वारा जो बली हो उसके आधार पर फलादेश करना चाहिए। ऐसा कुछ आचार्यों का कथन है। परन्तु चूणामणि आचार्य का मत है कि लग्नेश के बल समान ग्रह ही बली होता है अर्थात् लग्नाधीश ही बलवान् होता है। राशियों में उच्च मूलत्रिकोण एवं स्वगृह के अंश- सूर्य की सिंह राशि मूल त्रिकोण व स्वगृह भी है तो सूर्य में मूल त्रिकोण का फल देगा व अपने घर का (उत्तर) सिंह राशि में सूर्य १ अंश से २० अंश तक मूल त्रिकोण का फल तथा २१ से ३० अंश तक स्वगृह का फल देता है। चन्द्रमा ३ अंश तक उच्च का, ४ से ३० अंश तक का मूल त्रिकोण का; भौम मेष में १२ अंश तक मूल त्रिकोण और १३ से ३० तक अपने घर का फल देता है। कन्या राशि में बुध एक से १५ अंश तक उच्च का तथा १६ अंश से२० तक मूल त्रिकोण का; २१ से ३० तक अपने घर का; धनुराशि में गुरु १ से १० अंश तक मूलत्रिकोण, ११ से ३० तक स्वभवन का, शुक्र तुला में १ से ५ अंश तक मूल त्रिकोण का; ६ से ३० तक स्वभवन का फल देता है। शनि कुम्भराशि में उसी प्रकार फल देता है जिस प्रकार सिंह में सूर्य फल देता है। अर्थात् १ से २० अंश तक मूल त्रिकोण और २१ से ३० तक अपने घर का फल देता है। उच्च नीचादि राशिस्थित शुभ ग्रहों के शुभ फल में न्यूनाधिक्य-यदि उच्च राशि में दो ग्रह हों तो शुभ फल पूर्णतः देते हैं। नीच राशि में शुभ फल का अभाव समझना चाहिए। शत्रुराशि में अल्प शुभ फल होता है तथा मित्र की राशि में चतुर्थांश, अपने घर में आधा और मूल त्रिकोण राशि में ३ चरण अर्थात् ३/४ शुभ फल होता है। पापग्रहों के अशुभ फल में न्यूनाधिकता- नीच राशि में ग्रह होने पर अशुभ
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भृगु संहिता फल दर्पण ७१३ फल पूर्ण शत्रु राशि में पूर्ण अशुभ फल से कुछ कम, उच्च में शून्य, मित्र राशि में ३ चरण, ३/४; अपनी राशि में, आधा और मूलत्रिकोण में एक चरण १/४ अशुभ फल होता है। शुभफल का अभाव और अशुभ फल पूर्ण-जिन ग्रहों के योग से उत्पात हो जो सूर्य के साथ अस्त हो कान्ति हीन हो नीच राशि वा शत्रु के घर में हो तथा जो युद्ध में पराजित हो इन परिस्थितियों ग्रह का शुभ फल नष्ट होता है और पाप (अशुभ) फल निरन्तर बढ़ता है। उच्च एवं मूलत्रिकोण बल से युक्त ग्रह फल ज्ञान-ग्रह उच्च बल से युक्त हो तो जातक को अत्यधिक सम्पत्ति प्राप्त कराता है। मूल त्रिकोण बल से युक्त ग्रह राजा तथा राजा से समान व्यक्ति का मन्त्री अथवा सेनापति बनाता है। स्वराशि, मित्रराशि तथा स्वहोरा बल से युक्त ग्रह फल ज्ञान- अपनी राशि बल से युक्त ग्रह हो तो जातक प्रसन्नचित्त, धन-धान्य और लक्ष्मी से परिपूर्ण होता है। मित्र राशि बल से युक्त ग्रह हो तो कीर्तिमान, तेजस्वी, अत्यन्त सुखी, स्थिर लक्ष्मी और राजा से धन प्राप्त करने वाला होता है। स्वहोरा बल से युक्त ग्रह पराक्रमी बनाता है। स्वद्रेष्काण और स्वनवांश से युक्त ग्रह फल ज्ञान- अपने द्रेष्काण बल से युक्त ग्रह हो तो गुणवान् अपने नवांशगत बल से युक्त ग्रह हो तो जातक सुप्रसिद्ध होता है। सप्तमांश एवं द्वादशांश बल से युत ग्रह फल ज्ञान- सप्तमांश बल से युत ग्रह साहसी धनी कीर्तिमान् बनाता है। द्वादशांश बल से युत ग्रह कर्मठ परोपकारी बनाता है। त्रिंशांश बल से युत एवं शुभग्रह से दृष्ट ग्रह फल ज्ञान- त्रिशांश बल से युत ग्रह जातक को विकसित पूर्ण सुखी एवं गुणवान् बना देता है। शुभ ग्रह से दुष्ट ग्रह पुरुष को धनी, प्रख्यात, सुन्दर भाग्यवान्, लोक- मान्य, सुन्दर देहधारी, अच्छे सुख से युत करता है। पुरुष-स्त्री राशि बल से युत ग्रह फल ज्ञान- पुरुष अथवा स्त्री राशि बल से युत ग्रह जातक को लोक में पूजित, कलाओं में कुशलता, चित्त में प्रसन्नता, शरीर में आरोग्यता, परलोक से भय आदि प्रदान करता है। स्थानबल से युत ग्रह फल ज्ञान-स्थानबल से युत ग्रह जातक को स्थिर व मित्रसुखी, भाग्यवान्, धैर्यवान्, स्थिर, चित्त एवं स्वतन्त्र कर्ता मनुष्य होता है। दिग्बल से युत ग्रह फल ज्ञान- दिशाबल से युत ग्रह पुरुष को अपनी दिशा में ले जाता है और वहाँ ले जाकर वस्त्र, भूषण वाहन सुख से युक्त
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७१४ ग्रह प्रभेद प्रकरण करता है। अयनबल से युत ग्रह फल ज्ञान- अयनबल से युत् ग्रह जातक को अपनी दिशा में अनेक प्रकार से धन लाभ कराता है। चेष्टाबल से युत ग्रह जातक को, कभी राज्य, कभी पूजा, कहीं द्रव्य (लक्ष्मी), कहीं यश, ऐसा अनेक प्रकार का फल देता है। शुभ पाप एवं वक्र ग्रहों का फल ज्ञान- शुभग्रह वक्रगति हो तो वह महाबली होकर राज्यप्रद होता है। पापग्रह वक्र हो तो दुःखप्रद और व्यर्थ भ्रमण कराने वाला होता है। निष्कंटक राज्यप्रद ग्रह फल ज्ञान- यदि ग्रह निर्मल हो या चन्द्रमा के सान्निध्य में हो अथवा युद्ध में विजयी हो तो वह ग्रह सम्पूर्ण शुभ फल और शत्रुओं से न जीतने वाले राज्य को प्रदान करता है। दिन रात्रिबल से युत ग्रह फल ज्ञान- रात्रि दिन सम्बन्धी बल से युक्त ग्रह हो तो भूमि, गज आदि के लाभ तथा पराक्रम की वृद्धि से शत्रु को पराजित कर राज्यलक्ष्मी को उपलब्ध करता है। वर्षेशादि ग्रह फल ज्ञान- वर्षेश, मासेश, वारेश, और होरेश ये अपनी दशा में क्रम से सुख, धन, कीर्ति की द्विगुणोत्तर वृद्धि करते हैं। अर्थात् वर्षेश से द्विगुण मासेश, मासेश से द्विगुण वारेश एवं वारेश से द्विगुण होरेश शुभ फल देते हैं। पक्षबल से युत ग्रह फल ज्ञान- पक्षबल युत ग्रह हो तो शत्रुओं का नाश, रत्न, वस्त्र वाहन आदि सम्पत्ति स्त्री, सुवर्ण, भूमि का लाभ और स्वच्छ यश प्राप्त होता है। समस्त बल से युत ग्रह फल ज्ञान- जो ग्रह पूर्वोक्त सब बलों से युक्त, निर्मल किरणों से सुशोभित हो वह जातक को इच्छा से भी अधिक राज्य और सुख देता है। बलवान् शुभ ग्रहों का फल ज्ञान-जन्म समय में सब शुभ ग्रह बली हो तो जातक सदाचार सत्य, शौच से युक्त, सुन्दर, तेजस्वी, कार्यकुशल, ब्राह्मण और देवता का भक्त, गन्ध भाल्य वस्त्र विभूषण से सुसम्पन्न होता है। बलवान् पाप ग्रहों का फल ज्ञान- जन्म काल में यदि सभी पाप ग्रह सबल हो तो जातक लोभी, कुकर्मी, स्वार्थी, साधु जनों का द्वेषी, कलहकर्त्ता, तामसी, क्रूर, हिंसक, मलिन, कृतघ्न, चुगलखोर और कुरूप होता है। स्वमित्रादि राशिगत ग्रहों की दशाओं के नाम- जो ग्रह स्वगृह या मित्र राशि में हो उसकी बालानाम दशा, अपने मूलत्रिकोणस्थ ग्रह की कुमारी दशा, उच्चस्थ ग्रह की युवती नामक, शत्रुगृहगत ग्रह की वृद्धा और नीचस्थ ग्रह की मरण नामक दशा होती है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७१५ बालादि दशाओं का फल ज्ञान-बाल दशा में सुखी, कुमारी में सुशील, युवती में राजा, वृद्धदशा में रोगभय और ऋण की बृद्धि तथा मरण दशा में मरण या व्यर्थ व्यय होता है। विषम एवं सम राशिगत ग्रह फल ज्ञान-जन्म काल में ग्रह पुरुष (विषम) राशि में हो और सबल भी हो तो जातक धीर और संग्रामप्रिय (योद्धा) होता है। यदि विषम राशि में ही निर्बल हो तो कठोर खल और मूर्ख होता है। यदि ग्रह स्त्री (सम) राशि में हो तो मृदु स्वभाव, संग्राम से भीत, जल पुष्प वस्त्रों में प्रेम करने वाला, सुभग, नीरोग स्वजन पोषक होता है। परस्पर कारक ग्रह- यदि अपने-अपने गृह, मूलत्रिकोण या उच्च में स्थित होकर ग्रह केन्द्र में हो तो परस्पर कारक होते हैं। इस प्रकार लग्न से ही केन्द्र स्थान में कारक होते हैं। उदाहरण-कर्क लग्न में चन्द्रमा, गुरु; तुला में शनि और मेष में रवि मङ्गल सहित हो तो ये परस्पर कारक (राजयोगकारक) होते हैं। बहुतों का मत है कि कहीं भी स्वोच्चादि गत परस्पर केन्द्र में हो तो कारक होते हैं, परञ्च लग्न से ही केन्द्र में वास्तव कारक होते हैं यह विष्णुगुप्त का मत है। अन्य कारक ग्रह कथन- ग्रह किसी भी भाव में उच्चस्थ या मित्रराशि में अथवा स्वनवांश में स्थित रहने पर कारक होता है एवं दशम भाव में सूर्य मेष राशि में होने पर विशेष कारक होता है ऐसा चाणक्य का मत है। स्वोच्चादि से भिन्न राशि में ग्रह लग्न चतुर्थ दशम में स्थित हो तो भी कारक होते हैं। किसी आचार्य के मत में एकादश भाव में स्थित ग्रह भी कारक होता है। परन्तु यह श्रेष्ठ मुनियों का मत नहीं है। कारक ग्रह फल एवं समस्त योगों में कारक की प्रधानता-जिस जातक के जन्म समय में ऊपर कहे हुए योगकारक ग्रह हों वह नीच कुल में उत्पन्न होकर भी प्रधान होता है। सब योगों में भेद कारक भेद ही प्रबल होता है, इसलिए कारक भेद से ही फलादेश करना चाहिए, ऐसा हरि नामक आचार्य का कथन है। वारेशादि कथन- सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि ये दिन (वार) आदि (होरा, मास, वर्ष) के अधिपति होते हैं। आश्विन आदि मास में और आश्विनादि वर्ष में प्रथम वारेश जो होता है वही मासेश और वर्षेश होता है। सिद्धान्त ज्योतिष के अनुसार ग्रहों का कक्षाक्रम बताया गया है। सबसे ऊपर शनि की कक्षा है। उसके नीचे गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और
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७१६ ग्रह प्रभेद प्रकरण चन्द्र की शनि से चतुर्थ सूर्य, सूर्य से चतुर्थ चन्द्रमा, चन्द्र से चतुर्थ मंगल इत्यादि सात वार (दिन) होते हैं। ये ही ७ वार वर्षेश, मासेश, वारेश और होरेश होते हैं। वर्षारम्भ में जो सूर्यादि वार हो वही वर्षेश मासारम्भ में जो वार हो मासेश एवं प्रथम होरा में जो वार हो वही होरेश होते हैं। प्रथम वर्षेश एवं होरेश से द्वितीयादि तथा मास मध्य में वारेश का निर्णय-प्रथम वर्षेश दिन से चतुर्थ ग्रह (सूर्य चन्द्रादिवास क्रम से) द्वितीय वर्षेश का ज्ञान भी होता है। एक अहोरात्र में २४ घण्टे होते हैं। १ घण्टा = १ होरा = ५/२ घटी। इसलिए ६० घटी = १ अहोरात्र। इन २४ होरा स्वामियों का ज्ञान प्रथम होरा स्वामी से छठे छठे ग्रह (वार) क्रम से होता है। प्रथम से षष्ठ द्वितीय द्वितीय से षष्ठ तृतीय, इस प्रकार आगे भी जानना चहिए। ३० सूर्यादि (सावन) दिन का १ मास होता है। इसलिए जिस मास के मध्य में वारेश का ज्ञान करना हो वहाँ तक चैत्र शुक्लादि से गतमास संख्या को तीस गुणा करके गत दिन संख्या जोड़कर
होता है। ७ का भाग देने पर जो शेष हो, वह सूर्यादि क्रम से दिन का स्वामी (वारेश)
एवं गत दिनादि से वर्षेश का ज्ञान करना चाहिए। सौर एवं चान्द्रमास का कथन- तीस अंश का १ सौर मास होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चान्द्रमास ३० तिथि का होता है। मेष के सूर्य में जो चान्द्र मास होता है उसकी चैत्र संज्ञा होती है, वृष में वैशाख इस प्रकार आगे भी जानना चाहिए। भावोक्त कर्म करने का समय-जिस भाव का जो ग्रह अधिपति हो उस भाव के कर्म उसी (भावेश) ग्रह की राशि में उस भावेश के लग्न से उपचय स्थान स्थित होने पर उसी राशि के लग्न में, उसी ग्रह के दिन, होरा, वर्ष या मास में प्रशस्त होते हैं।
कार्यसिद्धि होती है। परञ्च वर्षेश, मासेश, दिनेश और होरेश के काल में चरण वृद्धि से
सूर्य के विषय-सर्प, ऊन, पर्वत, सोना, शस्त्र, विष, अग्नि, औषध, राजा, म्लेच्छ समुद्र, तार (मोती) बन, काष्ठ और मन्त्र का अधिपति सूर्य है। चन्द्र के विषय-कवि, पुष्प, भोज्य, मणि, चाँदी, शंख, लवण, जल, शर, वस्त्र, भूषण, स्त्री, धृत, तिल, तेल और निद्राका अधिपति चन्द्रमा है। भौम के विषय- रक्तोत्पल (लाल कमल), ताम्बा, सोना, रुधिर पारा, मैनशिलादि (पत्थर) धातु, पृथ्वी, राजा, पवन, मूर्छा, पित्त और चोर का अधिपति मङ्गल होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७१७ बुध के विषय- वेदादि शास्त्र, लेख शिल्प, वैद्यक, निपुणता, कवित्व, द्रुतत्व, हास्य, पक्षी, मिथुन (स्त्री पुरुष की जोड़ी), ख्याति, वनस्पति, सोना का अधिप बुध है। बृहस्पति के विषय- शुभकार्य; धर्म, पौष्टिक, महत्त्व, शिक्षा, नियुक्ति, नगर, राष्ट्र, सुवर्ण, शय्या, सवारी, आसन, अन्न, गृह और पुत्र का स्वामी गुरु है। शुक्र के विषय-वज्र (हीरा) मणि, रत्न, भूषण, विवाह, सुगन्ध, मित्र, माल्य, स्त्री, गोबर, निदान, बिद्या, सुरत और चाँदी का अधिपति (कारक) शुक्र है। शनि के विषय- राँगा, सीसा, कृष्णबालु, कुधान्य (बजरा आदि), मृतबन्धु, मूर्ख, नौकर, नीच स्त्री, विक्रम वस्तु, दास, दीन और दीक्षा का अधिपति शनि है। ग्रहों के देश- सूर्य का कलिङ्ग देश है, चन्द्रमा का यवन, शुक्र का समतल, बृहस्पति का सिन्धु, बुध का मगध, शनि का सौराष्ट्र, मङ्गल का उज्जयिनी और राहु केतु का द्रविड़ देश है।
आधान प्रकरण राशि आदि (होरा, द्रेष्काणादि वर्ग) के फलों का विभाजन जन्मकाल के बिना कैसे समझा जा सकता है, इसलिए समस्त जीवों के कारणभूत आधान या निषेक या गर्भाधान विषय को आगे प्रस्तुत करते हैं। गर्भाधानयोग्य रजोदर्शन-स्त्री की जन्म राशि से चन्द्रमा जब अनुपचय राशि में अर्थात् राशि से १/२/४/५/७/८/९/१२ इन स्थानों में हो और गोचर में स्थित मङ्गल की चन्द्रमा पर पूर्ण दृष्टि हो तो प्रति मास स्त्री को मासिक धर्म होता है। ऐसा बहुत आचार्यों का कथन है तथा सर्वार्थचिन्तामणि आदि ग्रन्थ से भी इस तथ्य की पुष्टि की गई है। रजो दर्शन में कारण-स्त्रियों को प्रत्येक मास में योनि से तीन दिन तक रक्त स्राव होता है। उसी को रजोदर्शन कहते हैं। उस रजो दर्शन का कारण मङ्गल और चन्द्रमा हैं। क्योंकि जलमय चन्द्रमा और अग्निमय मङ्गल के शास्त्रकारों ने माना है। इसलिए जल से रुधिर और अग्नि से पित्त की उत्पत्ति होती है। जब पित्त के द्वारा रुधिर (खून) में हलचल होती है तो स्त्रियों को मासिक धर्म होता है। गर्भाधान में अक्षम रजोदर्शन- इस प्रकार जो प्रत्येक मास स्त्रियों को मासिक धर्म होता है; उस ही विद्वानों ने गर्भ का कारण स्वीकार किया है।
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७१८ आधान प्रकरण यदि स्त्री की शशि से ३/६/१०/११ वें चन्द्रमा हो तो वह मासिक धर्म निष्फल होता है अर्थात् गर्भधारण की क्षमता उस रजोदर्शन में नहीं होती है। स्त्री पुरुष संयोग कथन- पुरुष की राशि से उपचय (३/६/१०/११) राशि में चन्द्रमा हो और उस पर गुरु की या अपने मित्र ग्रह की विशेष कर शुक्र की दृष्टि रहने पर यदि स्त्री पुरुष संयोग होता है तो गर्भ धारण होगा। तीन दिन तक रजोदर्शन गर्भ धारण करने में समर्थ नहीं होता है तथा धर्मशास्त्र में त्याज्य भी है। 'भर्तु: स्पृश्या चतुर्थेडह्नि' चतुर्थ दिन भी निषेक के योग्य नहीं होता। कहा गया है-'नाद्याश्चतस्रोऽजो निषेकयोग्या'। इसलिये ५वें दिन से १६वें दिन तक ही निषेक का समय माना गया है। इसी से पुरुष स्त्री की राशि से चन्द्रमा को पूर्वोक्त रीति से जानकर उक्त काल में निषेक करने पर सन्तान अवश्य होती है; किन्तु 'न वन्ध्याबृद्धातुराल्पव- यसामपि चैतदिष्टम'। अन्य पुरुष संयोग कथन- यदि उपचय राशि में चन्द्रमा रजोदर्शन के समय मङ्गल से दृष्ट हो तो धूर्त पुरुष से स्त्री का संयोग, सूर्य से दृष्ट हो तो राजपुरुष से तथा शनि से दृष्ट हो तो नौकर से स्त्री का संयोग होता है। इस प्रकार एक एक पाप ग्रह से दृष्ट हो और अन्य (शुभग्रह) से अदृष्ट होने पर पूर्वोक्त फल समझना चाहिए। यदि भौमादि सब पापग्रहों की दृष्टि चन्द्रमा पर हो तो वह स्त्री घर का परित्याग करके वेश्या हो जाती है। संभोग प्रकार का विचार- गर्भाधान कालिक लग्न से अथवा प्रश्नकालिक लग्न से सप्तमभाव स्थित द्विपदादि अर्थात् द्विपद राशि अथवा चतुष्पद राशि जिस रीति से संभोग करता है अभिप्राय यह है कि यदि सप्तम में द्विपद राशि हो तो द्विपद की तरह चतुष्पद हो तो चतुष्पद की तरह स्त्री पुरुष के संभोग को कहना चाहिए। यदि सप्तमभाव पर पाप ग्रह की दृष्टि या उससे युति हो तो क्रोध व लड़ाई के साथ, यदि शुभ ग्रह से युत दृष्ट सप्तमभाव हो तो कामशास्त्र की रीति से शान्ति पूर्वक हास-विलासादि से युत, यदि शुभ पाप दोनों की दृष्टि या युति हो तो शुक्र (वीर्य) शोणित (रज) संयुक्त गर्भावास (बच्चेदानी) में कर्मानुकूल विषय वृत्ति पतित होती है। गर्भ सम्भव योग- गर्भाधान के समय यदि रवि, शुक्र समराश्यंश में बली होकर पुरुष के उपचय राशि में हो, अथवा मङ्गल, चन्द्रमा बली होकर स्त्री के उपचय राशि में हो तो गर्भ सम्भव कहना चाहिए। यदि शुक्र, रवि, मङ्गल चन्द्र अपने नवांश में होकर उपचय स्थान में
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भृगु संहिता फल दर्पण ७१९ हो या गुरु (१/५/९) भाव में बली होकर हो तो भी गर्भ सम्भव कहना चाहिए। गर्भस्थिति का स्वरूप- गर्भाधान समय में स्त्री पुरुष का जिस प्रकार का मनोभाव, जिस प्रकार की अभिलाषा, कफ पित्तादि जिस प्रकार के दोष से युत हो उसी प्रकार के गुण दोष से युक्त गर्भ में पलने वाला बालक होता है। गर्भ में पुत्रादि का ज्ञान-लग्न, चन्द्र, गुरु, रवि ये विषमराशि और विषम नवांश में बली होकर हो तो पुरुष का जन्म, यदि समराशि, सम नवांश में हो तो स्त्री (कन्या) का जन्म समझना चाहिए। यदि बलवान् गुरु, रवि विषम राशि में हो तो पुरुष का, यदि शुक्र, चन्द्र, मंङ्गल समराशि में हो तो कन्या जन्म कहना चाहिए। गर्भ में यमल योग- यदि रवि, गुरु मिथुन या धनु में बुध से दृष्ट हो तो पुरुष का, तथा शुक्र, चन्द्र, मङ्गल यदि कन्या या मीन में हो तो दो कन्या का जन्म कहना चाहिए। विविध ग्रन्थों में यमल योग का वर्णन मिलता है। सर्वार्थचिन्तामणि नामक ग्रन्थ में यमल योग का लक्षण निम्नलिखित श्लोक में बताया गया है- निषेकलग्नेशतृतीयनाथौ लग्नस्थितौ चेद्ययमलोद्भवः स्यात्। तृतीयनाथेन युतो निषेकलग्नेश्वरस्तत्सहजे तथैव।। अर्थात् गर्भाधान के समय मातृ स्थानेश और लग्नेश का योग हो तो यमल का जन्म होता है। लग्नेश भातृ स्थान में हो या उच्च स्थान में हो तो यमल योग अर्थात् दो सन्तान की उत्पत्ति होती है। पुत्र जन्म योग- लग्न को छोड़कर अन्य विषम स्थान में शनि हो तो पुत्र जन्मकारक होता है। इस प्रकार आधानकाल में ग्रह के बलानुसार पुत्र या कन्या का जन्म कहना चाहिए। नपुंसक जन्म योग कथन-प्रश्न कालिक या गर्भाधान कालिक कुण्डली में यदि बलवान् विषम राशि में सूर्य चन्द्रमा परस्पर दृष्ट हों अर्थात् सूर्य चन्द्र को देखता हो और चन्द्र सूर्य को देखता हो तो नपुंसक का जन्म कहना चाहिए यह प्रथम योग है। यदि विषम राशिगत बली शनि और बुध परस्पर दृष्ट हो तो नपुंसक का जन्म कहना चाहिए। यह द्वितीय योग है। यदि विषम राशिगत मंगल समराशि में सूर्य को देखता हो तो नपुंसक का जन्म कहना चाहिए। यह तृतीय योग है। यदि समराशिगत मंगल विषमराशिस्थ लग्न और चन्द्र हो तो नपुंसक
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७२० आधान प्रकरण का जन्म कहना चाहिए। यह चतुर्थ योग है। यदि विषम राशिस्थ बुध और समराशिस्थ चन्द्रमा को मंगल देखता हो तो नपुंसक का जन्म कहना चाहिए। यह पंचम योग है। यदि विषम राशि में या विषम राशि के नवांश में लग्न चन्द्र का और बुध हों तो और उन पर शुक्र शनि की दृष्टि हो तो भी नपुंसक का जन्म कहना चाहिए। यह छठा योग है। यमल योग विचार-लग्न और चन्द्रमा समराशि में हो उस पर बली ग्रह की दृष्टि हो तो गर्भ में मिथुन (यमल) समझना चाहिए। चन्द्रमा, शुक्र समराशि में हो और गुरु, शुक्र, बुध, लग्न ये विषम राशि में बली या द्विस्वभाव में हो तो भी यमल स्त्री पुरुष समझना चाहिए। गर्भ में तीन बालकों का योग-आधान काल में या जन्म काल में यदि द्विस्वभाव राशि के नवमांश में ग्रह या लग्न हो और मिथुन राशि के नवांश में स्थित बुध लग्न और ग्रहों को देखता हो तो गर्भ में एक कन्या और दो पुत्र कहना चाहिए। यदि कन्या राशि के नवांश में स्थित बुध पूर्वोक्त स्थिति में विद्यमान ग्रह और लग्न को देखें तो गर्भ में २ कन्या १ पुत्र कहना चाहिए। यदि मिथुन या धनु राशि के नवांश में ग्रह और लग्न हों तथा मिथुन राशि के नवांश में स्थित बुध लग्न और ग्रहों को देखता हो तो गर्भ में तीन बालक (पुरुष) कहना चाहिए। यदि कन्या या मीन राशि के नवांश में लग्न व ग्रह हों और कन्या राशि के नवांश में स्थित बुध देखता हो तो गर्भ में ३ कन्याओं को समझना चाहिए। अर्थात् तीन कन्याओं का जन्म होता है। माता-पिता-मौसी-चाचा आदि कारक ग्रह विचार-दिन में गर्भाधान हो तो शुक्र माता और रवि पिता, तथा रात्रि में चन्द्र माता और शनि पिता होता है। इसके विपरीत अर्थात् दिन में चन्द्र मौसी, शनि चाचा तथा रात्रि में शुक्र मौसी और रवि पितृव्य (चाचा) ग्रह होता है। इन कारक ग्रहों का प्रयोजन- पितृ और पितृव्य ग्रह यदि लग्न से विषम राशि में हो तो क्रम से पिता और पितृव्य का सुखकारक होता है। एवं भातृ और मौसी संज्ञक ग्रह यदि सम राशि में हो तो माता और मौसी का सुख कारक होता है। प्रत्येक मास में गर्भ की स्थिति विचार- गर्भाधान से ७ मास में क्रम से १ कलल (शुक्र शोणित मिश्रण) २ पिण्ड, ३ शाखा (अवयव), ४ अस्थि, ५ त्वचा, ६ रोम और, ७ चेतन्य होते हैं। अष्टम मास में प्यास, भूख, ९वें में उद्वेग और १०वें मास में पूर्ण पके
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भृगु संहिता फल दर्पण ७२१ फल के समान बाहर निकल आता है। गर्भ के दस मासों का स्वामी- इन १० मासों के स्वामी क्रम से १ शुक्र, २ मंङ्गल, ३ गुरु, ४ रवि, ५ चन्द्र, ६ शनि, ७ बुध, ८ लग्नेश, ९ चन्द्र, १० सूर्य होते हैं। इन मासों के शुभाशुभत्व से गर्भ के शुभाशुभत्व समझना चाहिए। गर्भपात योग-यदि गर्भाधान समय में जो ग्रह दिव्यान्तरिक्षादि उत्पात से हत या पाप ग्रह से पराजित हो तो उस ग्रह के मास में गर्भपतन होता है अथवा लग्न राशि गर्भपतन का कारण होता है। अथवा आधान कालिक लग्न में शनि मङ्गल हो अथवा शनि मङ्गल की राशि (१०/११/१/८) में चन्द्रमा हो अथवा शनि मङ्गल से दृष्ट चन्द्रमा हो तो गर्भ का पतन होता है। गर्भपुष्टि ज्ञान-आधान काल में या प्रश्नकाल में होरा ''होरेतिलग्न" अर्थात् लग्न में शुभ ग्रह हो या चन्द्र शुभग्रह से युत हो अथवा लग्न या चन्द्र से ९,५,७,२,१०,४ भावों में शुभग्रह हो अथवा ३,११ भाव में पापग्रह हों अथवा लग्न या चन्द्र पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो प्रसव काल तक गर्भ सुखी अर्थात् सुरक्षित रहता है। गर्भ सहित गर्भवती मरण विचार- प्रश्नकाल या आधान काल में सूर्य या चन्द्रमा यदि दो पाप ग्रह के मध्य में हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो गर्भ सहित स्त्री का मरण होता है। लग्न और सप्तम में पाप ग्रह हो उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो अथवा लग्न में शनि तथा क्षीण चन्द्र हो उन पर मङ्गल की दृष्टि हो तो गर्भवती का मरण होता है। रवि या क्षीण चन्द्रमा द्वादश भाव में और मङ्गल चतुर्थ भाव में हो अथवा दो पाप ग्रहों के बीच शुक्र हो तो इन योगो में भी गर्भवती का मरण होता है। चन्द्रमा से या लग्न से चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तो गर्भ नष्ट हो तो माता के साथ ही गर्भ नष्ट होता है। चतुर्थ भाव में मङ्गल १२ में रवि और चन्द्रमा क्षीण हो अथवा मङ्गल लग्न में हो और १२, २ में पाप ग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तब भी मरण होता है। सप्तम में रवि लग्न में मङ्गल हो तो शस्त्र से सगर्भ स्त्री का मरण होता है। गर्भ वृद्धि योग- गर्भाधानकालिक लग्न पर बलवान बुध, गुरु, शुक्र और रवि की दृष्टि हो तो गर्भ पुष्ट होता है अर्थात् गर्भ का पतन नहीं होता। एवं प्रत्येक मास में मासेश्वर के बल के अनुसार मासेश्वर के स्वभाव भ.सं .- ४६
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७२२ आधान प्रकरण और गुणों से युक्त होता है। तीसरे मास में गर्भिणी स्त्री को दोहद (अनेक प्रकार के वस्तु खाने पीने की इच्छा) होती है। वह मास स्वामी (मासेश) के स्वभाव और लग्न, योगादि से भी समझना चाहिए। गर्भ समय से प्रसत मास का ज्ञान- यदि आधान काल में चरराशि में सूर्य हो तो १० मास में, स्थिर राशि में हो तो ११वें मास में और द्विस्वभाव में हो तो १२वें मास में प्रसव होता है। मतान्तर से कहते हैं कि चर राशि का चन्द्र हो तो १०वें में; स्थिर का हो तो ११वें में; द्विस्वभाव का हो तो १२वें मास में प्रसव होता है। अन्य प्रकार से प्रसव ज्ञान विचार- गर्भ से प्रसव का ज्ञान गर्भाधान कालिक लग्न के होरादि षड्वर्ग से करना चाहिए। आधान राशि से दशवीं जन्म राशि होती है ऐसा मत किसी किसी आचार्य का है। बादरायणाचार्य का मत है कि आधान लग्न से सप्तम जन्म लग्न अथवा आधान राशि से सप्तम जन्म राशि होती है। इसलिये इन कथनों में एकत्वाभाव होने के कारण आगे अब सर्वसम्मत मत को कहते हैं। सर्वसम्मत से जन्म राशि ज्ञान- गर्भाधान काल में जिस राशि के द्वादशांश में चन्द्रमा हो उससे उतने संख्यक राशि में चन्द्रमा के जाने पर संभव (१० आदि) मास में प्रसव कहना चाहिए। तीन वर्ष के बाद एवं बारह वर्ष के बाद प्रसव योग-आधानकालिक लग्न में शनि का नवांश हो और लग्न से ७वें स्थान में शनि हो तो गर्भाधान काल से ३ वर्ष में प्रसव होता है। एवं लग्न चन्द्र का नवांश हो और लग्न से सप्तम भाव में चन्द्रमा हो तो बारहवें वर्ष में प्रसव होता है। प्रसव काल का ज्ञान- गर्भाधान कालिक दिनसंज्ञक या रात्रिसंज्ञक लग्न हो तो राशि के जितने अंश उदित हुए हों उतना ही दिन या रात्रि व्यतीत होने पर प्रसव कहना चाहिए। जैसे ३० अंश में दिनमान, या रात्रिमान हो, तो लग्न के गतांश में क्या? इस प्रकार त्रैराशिक से दिन या रात्रि गत इष्टघटी का ज्ञान होता है।
किया गया है। बृहद् पाराशरादि होराशास्त्र के प्रतिष्ठित ग्रन्थों में भी इस विषय को प्रतिपादित प्रसवकालिक लग्नादि का ज्ञान- पूर्व कथन से दिन रात्रि ज्ञान करके जन्म के समय में होरादि षड्वर्ग में स्थित लग्न का ज्ञान युक्ति से कहना
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भृगु संहिता फल दर्पण ७२३ चाहिये। इस प्रकार उदय (लग्न) समुदाय (षड्वर्गादि) से दिन (वासर) पक्ष मुहूर्त मास संज्ञक राशि में प्रसव होता है। इस प्रकार आधान समय में प्रथम प्रसव समय का निश्चय करके ज्योतिषी को जातकोक्त फलादेश का विचार करना चाहिए। नेत्रहीन योग- यदि आधान में सिंह लग्न रवि और चन्द्रमा हो उन पर शनि मङ्गल की दृष्टि हो तो गर्भस्थ शिशु जन्म काल से ही अन्धा होता है। उन्हीं (रवि, चन्द्र) को यदि मङ्गल और बुध देखते हों तो नेत्र में फूला होता है। और भी नयन विनाशक योग कहा जा रहा है- यदि द्वादश भाव में क्षीण चन्द्रमा हो तो वामनेत्र और यदि सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र नाश होता है।
निर्बल दृष्टि होती है। यदि उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो यन्त्र से नेत्र रक्षा होती है अर्थात्
जातक-पारिजात में कुछ भिन्न नेत्रहीन योगों के लक्षण मिलते हैं- इनका कहना है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा दोनों १२वें भाव में हो तो दोनों आँखों का अन्धा होता है। यदि केवल सूर्य हो तो दाहिनी और केवल चन्द्रमा हो तो बाँयी आँख अन्धी होती है। मूक योग- पाप ग्रह राशि सन्धि में हो, वृषस्थ (उच्चस्थ) चन्द्रमा पर
होती है। मङ्गल शनि और रवि की दृष्टि हो तो अधिक दिन के बाद बोलने की शक्ति
अर्थात् वह बालक कुछ दिनों के बाद बोलता है। जातकालंकार में कहा गया है कि यदि पञ्चमेश बृहस्पति बारहवें, छठे या आठवें स्थान में हो तो जातक वाणी से हीन होता है। जड एवं सदन्त योग-यदि समस्त पाप ग्रह राशिसन्धि में हो व चन्द्रमा शुभ ग्रहों की दृष्टि से हीन हो तो जातक जड़ (मूर्ख) होता है। यदि शनि, मङ्गल बुध के नवमांश में हो तो गर्भस्थ बालक सदन्त (दाँत के सहित) जन्म लेता है। अधिकाङ्ग योग-लग्न से ९/५ में बुध हो और शेष सब ग्रह निर्बल हो तो २ मुख, ४ हाथ, ४ पैर वाला जातक होता है। वामन एवं कुब्ज योग- मकर के अन्तिम नवांश में लग्न हो और उस पर रवि, चन्द्र, शनि की दृष्टि हो तो गर्भस्थ बालक वामन (बौना) होता है। यदि कर्क लग्न में चन्द्रमा हो उसे मङ्गल और शनि देखते हो तो
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७२४ मूतिका प्रकरण गर्भस्थ बालक कुबड़ा होता है। पङ्गु योग- मीन लग्न हो उस पर मङ्गल, शनि और चन्द्र की दृष्टि हो तो गर्भस्थ बालक पङ्गु होता है। ऊपर कहे हुए योगों में शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो यत्न करते रहने से दोष की निवृत्ति समझना चाहिये। बिना शिर, पैर, हाथ के जन्म योग- आधान काल में पंचम भावस्थ द्रेष्काण मंगल से युत हो और शनि, चन्द्र, सूर्य से दृष्ट हो तो गर्भ में स्थित बालक को हाथ से रहित कहना चाहिए। यदि नवम भावस्थ द्रेष्काण मंगल से युत या उक्त ग्रहों से दृष्ट हो तो बिना पैर का अर्थात् पङ्ग का जन्म होगा। यदि लग्नस्थ द्रेष्काण मंगल से युत या उक्त ग्रहों से दृष्ट हो तो बिना मस्तक का गर्भस्थ बालक को कहना चाहिए। इस आधानाध्याय में जो योग कहे गये हैं उनमें जो युक्त हो वे जन्म लग्न से भी समझना चाहिये तथा जो आघान में नहीं कहे गये हैं तथा आगे जन्म या सूतिका में कहे गये हैं उनको भी आधान लग्न से विचार करना उचित ही जानना चाहिए।
सूतिका प्रकरण मैंने लग्न काल के निर्णयार्थ आधान काल को कहा है, अब उसको जानकर जन्म या सूतिका का निरूपण करते हैं। लग्नादि से जन्मयोग का ज्ञान- जन्मकाल के समय लग्न में शीर्षोदय राशि हो तो मस्तक से, पृष्ठोदय राशि हो तो पैर और उभयोदय राशि हो तो हाथ से प्रसव (जन्म) होता है। लग्न पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो सुख पूर्वक, अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो कष्ट के साथ जन्म समझना चाहिए। प्रसव स्थान का विचार- लग्न में जो नवमांश हो उस राशि के सदृश स्थान में प्रसव होता है अर्थात् बालक का जन्म होता है। यदि द्विस्वभाव नवांश हो तो मार्ग में तथा स्थिरनवांश हो तो अपने
चाहिए। स्थान में अर्थात् सिद्ध हुआ कि चर नवांश हो तो परदेश में जन्म समझना
लग्न में अपना नवांश हो तो अपने घर में अन्य नवांश हो तो अन्यत्र जन्म समझना चाहिए। पितृसंज्ञक आदि ग्रह के बल से वन में जम्म होता है। अर्थात् पितृ संज्ञक सूर्य शनि ग्रह बली हो तो पिता के घर में, मातृसंज्ञक
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भृगु संहिता फल दर्पण ७२५ ग्रह बली हो तो माता के घर में जम्म कहना चाहिए। सभी शुभ ग्रह नीच राशि में हो तो प्राकार अर्थात् घर के बाहर चहारदीवारी, वृक्ष के नीचे नदी तट में जन्म कहना चाहिये। यदि सभी ग्रह एक स्थान में होकर यदि लग्न और चन्द्रमा को न देखे तो महावन (निर्जन स्थान) में जन्म होता है। जल चर राशि लग्न हो उसको जलचर राशिस्थ पूर्ण चन्द्र देखता हो और चतुर्थ लग्न या दशमभाव में हो तो जल में प्रसव होता है। लग्न में शुभग्रह हो और पूर्ण चन्द्र स्वराशि या जलचर राशि में हो अथवा शुभ ग्रह चतुर्थ भाव में हो या लग्न और चन्द्रमा जलचर राशि में हो तो जल में प्रसव समझना चाहिए। वृश्चिक या कर्क लग्न में शनि हो उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो अवट (गड्ढे) में प्रसव होता है। ऐसा यवन और मणित्थ आचार्यों की सम्मति है। जलचर राशि लग्नगत शनि को बुध देखता हो तो क्रीडास्थान में, रवि देखता हो तो देवालय में, चन्द्रमा देखता हो तो ऊसर भूमि में प्रसव होता है।
चाहिए। वन चर राशि लग्न हो तो पर्वत, वन, दुर्ग, स्थान में जन्म कहना
एवं द्विपद राशि लग्न में शनि को मङ्गल देखता हो तो शिल्पशाला में, रवि देखता हो तो गोशाला में, राजभवन या देवालय में जन्म हो। और शुक्र चन्द्रमा देखते हों तो रम्यस्थान में और गुरु देखता हो तो अग्निहोत्र स्थान में जन्म होता है। सूतिकागृह विचार- जन्मकाल में यदि कर्कराशि गत गुरु दशम भाव में हो तो २, ३ या ४ मनिल के मकान में जन्म होता है। शुभग्रह यदि शनि के नवांश में ४, १० वें भाव में हो तो असाल (वरामदा रहित) घर में प्रसव कहना चाहिए। सूतिका गृह में शयन स्थान ज्ञान- यदि जातक के जन्मकाल में मेष, वृष लग्न हो तो घर के पूर्वभाग में, मिथुन लग्न में अग्निकोण में कर्क, सिंह, लग्न में दक्षिण में, कन्या लग्न में नैर्ऋ्ण्य कोण में, तुला वृश्चिक में, पश्चिम और धनु में वायव्य कोण में, मकर कुम्भ में उत्तर, मीन में ईशानकोण में सूतिका का शयन स्थान होता है। प्रसव गृह में बरामदे का ज्ञान- इस प्रकार दिशाओं में स्थित राशि चक्र में जिस दिशा के केन्द्र में ग्रह स्थित हो तो शाला (ओसारा घर का मुख) समझना चाहिए। यदि मकर राशि सबल हो तो बिना ओसारा वाला घर और धनु सबल
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७२६ सूतिका प्रकरण हो तो तीन बरामदे वाला घर में जन्म होता है। सूतिका गृह के स्वरूप ज्ञान- जन्म काल में यदि शुक्र बली हो तो नवीन और चित्रयुत गृह में, गुरु बली हो तो दृढ (मजबूत), मङ्गल बली हो तो जला हुआ, रवि बली हो तो अधिक कष्ट से युक्त, चन्द्र बलवान् हो तो नवीन गृह में और शनि बलवान् हो तो प्राचीन सूतिका गृह में जन्म होता है। सूतिका गृह के घर व समीप के घर का विचार-केन्द्र में जो ग्रह बलवान् हो तो उस ग्रह की दिशा में द्वार कहना चाहिए अर्थात् इससे सिद्ध होता है कि केन्द्र में ग्रह नहीं हो तो सबसे जो ग्रह बली हो उस दिशा में या लग्न राशि की दिशा में द्वार समझना चाहिए। एवं गृहद्वार ग्रह के जिस दिशा में जो ग्रह हो सूतिका गृह से उस दिशा में उसी ग्रह के गृह समान प्रतिवेश्म (अन्य घर) कहना चाहिए। रवि का देवालय, चन्द्र का जलाशय, मङ्गल का अग्निशाला, गुरु का कोश- गृह, शुक्र का विहारस्थान, शनि का कतवार खाना और बुध का शयनागार स्थान है। जो ग्रह सबसे बली हो उस सूतिका का स्थान समझना चाहिए। सूतिका की शय्या का विचार- जिस प्रकार गृह में मेषादि राशि की स्थिति कही गई है उसी प्रकार शय्या (खटिया) में भी समझना। जिस स्थान में जो ग्रह हो उस स्थान में उस ग्रह के वस्त्र से निर्मित शय्या पर गलीचा, उल्लोंच आदि आस्तरण कहना चाहिए। सिरहाने से पौथान पर्यन्त न्यारा करना तथा ग्रह के सदृशचिन्ह का विचार करना। जहाँ द्विस्वभाव राशि हो वहाँ खटिया में न तत्व (नीचे को दबा हुआ) समझना चाहिए। खटिये के लग्न से ३,६,९, १२ भावों को चारों पाँव और शेष राशि शय्या के अन्य अङ्ग समझना चाहिए। सूतिका का भूमि शयन एवं उपसूतिका ज्ञान- यदि जन्मकाल में चन्द्रमा अपने नीच में होकर चतुर्थ या लग्न में हो तो भूमि में सूतिका का निवास समझना चाहिए। चन्द्रमा से लग्न तक जितने ग्रह हो उतनी उपसूतिका सहायक संख्या होती है। लग्न से आगे सप्तम भाव पर्यन्त जितने ग्रह हो उतनी उप-सूतिका भीतर और सप्तम से आगे लग्न पर्यन्त ग्रह हो उतनी बाहर में उपसूतिकाएँ जानना चाहिए। उनमें भी जितने शुभ ग्रह हो उतनी सुलक्षणा, सुरूपा, सौभाग्यवती भूषणयक्ता स्त्री, तथा जितने पाप ग्रह हो उतनी कुरुपा, दुर्भगा और मलिना
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स्त्री समझना चाहिए। मिश्र ग्रह बलवान् हो तो मध्यम रूप गुण वाली समझना चाहिए। इस प्रकार का विचार ग्रह बल के अनुसार करना चाहिए। दीपक की वर्त्ति व तेल का ज्ञान- पूर्वोक्त विधि से सूतिका गृह में १२ विभागस्थ राशियों में जिस भाग में सूर्य हो उस स्थान पर दीप समझना चाहिए। यदि चर राशि हो तो दीप को चल तथा स्थिर राशि हो तो स्थिर जानना चाहिए। लग्न के जितने अंश उदित हो चुके हों उतने ही भाग वत्ती का भी जला हुआ कहना चाहिए। चन्द्रमा जिस प्रकार पूर्ण या क्षीण हो उसी प्रकार दीप तेल भी पूर्ण या न्यून जानना चाहिए। अधिक दीप का ज्ञान- यदि जन्म काल में बलवान् सूर्य भौम से दृष्ट हो तो प्रसव काल में अधिक दीप समझना चाहिए। तथा अन्य ग्रह निर्बल हों तो प्रसव में तृण जलाकर प्रकाश होता है। प्रसव के समय अन्धकार विचार- यदि जन्म काल में चन्द्रमा शनि के नवांश में या जलचर राशि के नवांश में हो या शनि से युत् चतुर्थ भाव में अथवा शनि से दृष्ट चन्द्र हो तो अन्धकार में जन्म होता है। इसमें सन्देह नहीं। पिता की अनुपस्थिति में जन्म योग- यदि चन्द्रमा लग्न को नहीं देखता हो तो पिता के परोक्ष में जन्म कहना। यदि १० वें भाव से आगे होकर सूर्य चर राशि में हो तो परदेशस्थ पिता के परोक्ष में जन्म समझना चाहिए। दिन में रवि और रात्रि में शनि यदि मङ्गल से दृष्ट हो तो पिता के परोक्ष में जन्म होता है। यदि उक्त रवि या शनिश्चर राशि में मङ्गल युत दृष्ट हो तो पिता को परदेश में मृत समझना चाहिये। सूर्य से ५, ९, ७ भाव पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो पिता को जेल में समझना चाहिए। यहाँ भी चर राशि हो तो परदेश में, स्थिर हो तो स्वदेश में, द्विस्वभाव हो तो मार्ग में समझना चाहिए। अन्य ग्रन्थों में जैसे लघु जातक एवं लग्न जातक में भी ऐसा ही कहा गया है। लग्न जातक में इसी मत को स्वीकार करते हुए कहा गया हैं-
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७२८ सूतिका प्रकरण पितुर्जातः परोक्षेऽस्थ लग्मभिन्दावपश्यति। विदेशस्थस्य चरभे मध्याद् भ्रष्टे दिवाकरे।। अर्थात् लग्न को चन्द्रमा नहीं देखता हो तो पिता के परोक्ष में बालक का जन्म कहना चाहिए। और सूर्य मध्यभ्रष्ट अर्थात् नवें आठवें, ग्यारहवें और बारहवें स्थान में चरराशि (मेष कर्क तुला और मकर) का हो तो उत्पन्न शिशु का पिता विदेश में समझना चाहिए। कष्ट में प्रसव एवं माता के सुख का विचार- जन्मकाल के समय यदि ७,९, ५ भावों में पाप ग्रह हो तो कष्ट युक्त प्रसव और यदि १०, ४ भाव में शुभ ग्रह हों तो सुख से प्रसव और अधिक सम्पत्ति प्राप्त होती है। परजात जन्म योग- यदि लग्न और चन्द्रमा को गुरु नहीं देखता हो अथवा चन्द्र सहित सूर्य को या पाप युक्त रवि और चन्द्रमा को गुरु नहीं देखता हो तो परजात अर्थात् दूसरे से उत्पन्न नवजात को समझना चाहिए। यदि गुरु, चन्द्र, रवि तीनों नीच राशि में हो तथा शनि लग्न में हो और लग्न, चन्द्रमा, शुक्र, इन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हों तो भी परजात (अन्य से उत्पन्न) नवजात को समझना चाहिए। प्रसव समय में मातृकष्ट का विचार- जन्मकाल के समय चन्द्र सहित पापग्रह चौथे, दशवें भाव में हो तो जातक की माता को क्लेश होता है।
होता है। चन्द्रमा से सप्तम स्थान में पापग्रहों पर मङ्गल की दृष्टि हो तो मरण
चन्द्रमा से दशम स्थान में पापयुत रवि हो तो माता का मरण होता है तथा शुक्र से ५वें और ९वें स्थान में शनि सहित रवि हो उस पर मङ्गल की दृष्टि हो तो भी माता का मरण समझना चाहिए। रात्रि में जन्म हो चन्द्रमा से ५/९ स्थान में शनि यदि पापग्रह से दृष्ट हो अथवा दिन में जन्म हो शुक्र से ५/९ स्थान में मंङ्गल, पाप से दृष्ट हो तो माता का मरण होता है। माता से त्यक्त योग-मङ्गल और शनि त्रिकोण (५,९) में और चन्द्रमा सप्तम भाव में हो तो जातक को माता परित्याग कर देती है। यदि गुरु की दृष्टि हो तो त्यक्त होकर भी सुखी और चिरंजीवी होता है। लग्न में चन्द्रमा और सप्तम में मङ्गल यदि पाप ग्रह से दृष्ट हो, अथवा लग्न से १०,११ भाव में मङ्गल, शनि हो तो त्यक्त बालक का मरण होता है। यदि इन योगों में बलवान् शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो जिस प्रकार के पितृ
जाता है। मातृ संज्ञादि शुभ ग्रह हो उस प्रकार के पुरुष या स्त्री के हाथ वह जातक
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भृगु संहिता फल दर्पण ७२९ यदि शुभ और पाप दोनों की दृष्टि हो तो दूसरे के हाथ जाने पर वह बालक मृत्यु को प्राप्त होता है। शनि और मङ्गल एक अंश में हो तो माता से त्यक्त होता है। अथवा लग्न से सप्तम में मङ्गल हो, उसको शनि देखता हो तो निश्चय माता से त्यक्त होता है। जिस शुभ ग्रह की दृष्टि हो उस शुभ ग्रह के गुण त्यक्त जातक में होते हैं। रवि बलवान् हो तो पिता के सदृश, तथा चन्द्रमा बलवान् हो तो माता सदृश स्वभाव और गुण से युत होता है। नालवेष्टित जन्म योग- जातक के जन्मकाल में सिंह, मेष या वृष लग्न हो, उसमें मङ्गल या शनि हो तो लग्न के नवांश राशि जिस गात्र का हो उस गात्र में नाल से वेष्टित बालक का जन्म कहना चाहिए। सर्पवेष्टित जन्म योग- लग्न में मङ्गल या शनि का द्रेष्काण हो उसमें पाप ग्रह व चन्द्रमा हो और २, ११ में शुभ ग्रह हो तो सर्प से वेष्टित बालक का जन्म होता है। यमल जन्म योग-जातक के जन्म काल में यदि सूर्य चतुष्पद राशि में हो और अन्य सभी ग्रह बलवान होकर द्विस्वभाव में हों तो एक ही नाल से वेष्टित दो बालकों (यमल) का जन्म होता है। जातक के शरीर एवं वर्ण का ज्ञान- जन्म कालिक प्रबल ग्रह के समान अथवा लग्न नवांश पति या नवांश राशि सदृश जातक का शरीर होता है। तथा चन्द्रमा जिस नवांश में होकर उसके या उसके स्वामी के समान जातक का वर्ण समझना चाहिए। यदि बहुत ग्रह प्रबल हो तो उन सबके समान मिश्रित देह और वर्ण समझना चाहिए। अथवा कुल, जाति देश या व्यक्ति विशेष गुण देख कर जातक के गुण और वर्ण समझना चाहिए। जातक की प्रकृति का विचार-जिस ग्रह के त्रिशांश में सूर्य हो उस ग्रह
कहा है। के तुल्य सत्व गुण, रजोगुण या तमोगुण जातक में होता है। ऐसा मुनियों ने जन्म समय में ग्रहों की मित्रता, शत्रुता, बल, नीच, उच्च, स्थिति और ग्रह के स्वभाव को जानकर अन्य विषय का भी ज्ञान करना चाहिए। जातक के पिता एवं माता का निधन योग- यदि जन्म काल में क्षीण चन्द्रमा पापग्रह से युत हो अथवा पापग्रह से देखा जाता हो तो माता का मरण होता है। इसी प्रकार यदि सूर्य निर्बल सपाप हो और पापग्रहों से दृष्ट हो तो
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७३० बालारिष्ट प्रकरण पिता का मरण समझना चाहिए। यदि शुभ पाप दोनों से युत हो तो क्लेश कारक तथा यदि शुभ ग्रह से सूर्य चन्द्रमा दृष्ट हो तो पिता-माता को शुभ होता है। माता पिता का सुख योग- यदि जन्म के समय पञ्चम भाव में परिपूर्ण चन्द्रमा गुरु या शुक्र से युत हो और बुध से दृष्ट हो तो माता के लिए अत्यन्त शुभफल देता है। इसी प्रकार सूर्य अपनी राशि में या स्वोच्च राशि में शुक्र गुरु से युत पंचम भाव में बुध से दृष्ट हो तो पिता को सुख देने वाला होता है।
बालारिष्ट प्रकरण आयु ज्ञान के अभाव में जातकोक्त समस्त फल निष्फल होता है। इसलिए आयु ज्ञान के लिए सर्वप्रथम बालारिष्ट को कहते हैं। पुरुष-स्त्री ग्रहों के बल का ज्ञान- यदि जातक का जन्म शुक्लपक्ष और दिन में हो तो विषम राशि में पुरुष ग्रह बलवान् होते हैं।
होते हैं। इसी प्रकार कृष्णपक्ष रात्रि में जन्म होने पर सम राशि में स्त्री ग्रह बली
तीन प्रकार के अरिष्ट- नियत, अनियत और योगज तीन प्रकार के अरिष्ट शास्त्रकारों ने बतलाया है, उनमें सर्वप्रथम योगज अरिष्ट को कहा जा रहा है। शेष दोनों (नियत और अनियत) को आगे कहेंगे। तृतीय वर्ष में अरिष्ट योग-जन्मकालावधि में यदि मंगल की राशि (मेष वृश्चिक) में अष्टमभाव में गुरु हो तो जातक की मृत्यु तृतीय वर्ष में होती है। द्वितीय वर्ष में अरिष्ट योग- शनि यदि वक्री होकर मङ्गल की राशि में स्थित हो तथा चन्द्र ८, ६ या केन्द्र में स्थित हो उस पर बलवान मङ्गल की दृष्टि हो तो उत्पन्न जातक मात्र दो वर्ष तक जीवित रहता है। नवम वर्ष के बाद अरिष्ट योग- यदि जन्म समय में सूर्य चन्द्रमा के साथ शनि हो तो नवम वर्ष के अनन्तर जातक की मृत्यु होती है। यह वाक्य ब्रह्मशौण्ड का है। एक मास में अरिष्ट योग- यदि जन्म काल में मङ्गल, रवि, शनि मङ्गल की राशि अर्थात् १,८ में हो तो जातक यमराज से रक्षित होने पर भी १ मास में अवश्य मर जाता है। एक वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जन्मकाल में शुक्र की राशि २,७ में अष्टमस्थ अर्थात् अष्टम भाव में २,७ राशियाँ हों और एक भी पापग्रह से दृष्ट हो तो जातक १ वर्ष में मृत्यु को प्राप्त होता है। चाहे उसने अमृत का पान भी किया हो तो भी मृत्यु को प्राप्त होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७३१ छठवें वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जन्म के काल में शुक्र, सिंह या कर्क राशि में स्थित हो कर बारहवें, षष्ठ या अष्टम भाव में शुभग्रहों से दृष्ट हो तो छठे वर्ष में मरण होता है। इसमें आश्चर्य की क्या बात है। चौथे वर्ष में अरिष्ट योग- यदि लग्न से ६, ८, १२ भाव में कर्क राशिस्थ बुध, चन्द्रमा से दृष्ट हो तो ४ वर्ष में जातक की मृत्यु हो जाती है। यवनादि आचार्यों ने जिन उत्कृष्ट फल वाले राजयोगों का वर्णन किया है उन योगों में कुलीनों की उत्पत्ति होती है किन्तु अरिष्ट का भी भय रहता है। दो मास में अरिष्ट योग- केतु का उदय जिस नक्षत्र में हुआ हो, यदि उसी नक्षत्र में किसी का जन्म हो तो जातक २ माह में मरण होता है। शीघ्र अरिष्ट योग- यदि मङ्गल की राशि १, ८ या शनि की राशि १०,
संदेह नहीं। ११ में दशमस्थ सूर्य बली पापग्रहों से दृष्ट हो तो शीघ्र मरण होता है, इसमें जन्माधिपति के द्वारा शारीरिक पीड़ा का ज्ञान-यदि राशीश पापग्रह हो, या पापग्रह से दृष्ट या युत हो तो शरीर कष्ट देता है। यदि शुभग्रह की दृष्टि हो तो अधिक पीड़ा नहीं देता। सात वर्ष में अरिष्ट का ज्ञान- यदि लग्न में निगड, सर्प, पक्षी, पाशधर संज्ञक द्रेष्काण पापग्रह से युत हों तो जातक का निधन हो जात है। यदि द्रेष्काणेश की दृष्टि न हो तो सप्तम, वर्ष में जातक का निधन हो जाता है। दश या सोलह वर्ष में अरिष्ट का विचार- यदि जन्म काल में राहु १, ४, ७,१० भाव में पापग्रह से दृष्ट हो तो कुछ आचार्यों के मत से १० वर्ष में और कुछ आचार्यों के मत से १६ वर्ष में मरण होता है। शीघ्र मरण विचार-यदि सूर्योदय काल में जन्म हो और पापग्रह ५,९,
मरण होता है। १, ४, ७, १० में हो तथा शुभग्रह ६,८, १२ भाव में हो तो जातक का शीघ्र स्वल्पकाल में मरण योग- यदि नवांश पति राशिपति, लग्नपति ये तीनों अस्त हों तो जातक की अल्पकाल में मृत्यु हो जाता है। अन्य अरिष्ट योग- यदि रिपु भाव में लग्नेश हो तो छठे भाव में स्थित राशि तुल्य वर्ष में, तथा द्रेष्काणेश हो तो राशितुल्य मास में लग्ननवांश पति यदि शत्रु भाव में हो तो राशि तुल्य दिन में मरण होता है। यदि पापग्रह से दृष्ट शनि लग्न में हो तो १६ दिन में तथा पापयुत शनि होने पर १ मास में, इसी प्रकार यदि पापग्रह से दृष्ट या युत शनि हो तो एक वर्ष में मरण कारक होता है। यदि जन्म काल में क्षीण चन्द्रमा कर्क, वृष, मेष राशि को छोड़ कर
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७३२ बालारिष्ट प्रकरण पापग्रह से दृष्ट लग्न में हो तो जातक का स्वर्गगमन होता है। एक, चार, आठ वर्ष में अरिष्ट योग- यदि चन्द्रमा लग्न से छठे या आठवें भाव में पापग्रह से दृष्ट हो तो शीघ्र ही १ वर्ष के मध्य में मृत्यु हो जाता है। यदि शुभग्रह से दृष्ट चन्द्र हो तो अष्टम वर्ष में निधन हो जाता है। यदि शुभ पाप दोनों से दृष्ट हो तो ४ वर्ष में मरण होता है। ग्रहों की अल्पाधिक दृष्टिवशात् अनुपात द्वारा मरण काल का निश्चय करना चाहिए। एक, छः, आठ वर्ष में अरिष्ट योग- यदि शुभ ग्रह षष्टाष्टम भाव में वक्रगति वाले पाप ग्रह से दृष्ट तथा शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो १ मास में निधन होता है। यदि १२, २,८, ६वें भाव में पाप ग्रह शुभ ग्रह से न देखे जाते हों तो ६ या ८ मास में मरण हो जाता है। अन्य अरिष्ट योग- यदि जन्म काल में लग्न स्वामी या राशिपति ६,८, १२ भाव में अस्त हो कर स्थित हो तो राशितुल्य वर्ष में मरण होता है। यदि लग्नेश पापग्रह से पराजित हो कर सप्तम भाव में शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो १ मास में मरण होता है। यदि लग्नेश पापग्रह से पराजित हो कर सप्तम भाव में शुभ ग्रह से न देखा जात हो तो १ मास में मरण होता है। इसी प्रकार यदि राशिपति या चन्द्रमा सप्तम में पाप ग्रह से पराजित होकर शुभग्रह से न देखे जाते हो तो भी १ मास में जातक की मृत्यु हो जाती है। नवम वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जन्म काल में चन्द्रमा, मङ्गल या सूर्य से युत या शुभग्रह से न देखे जाते हो या मिथुन अथवा कन्या राशि में स्थित हो तो जातक का नवम वर्ष में मरण होता है। इसमें सन्देह नहीं है। चतुर्थ मास में अरिष्ट का विचार-यदि लग्नेश अष्टम में समस्त पापग्रहों से दृष्ट हो तो ४ मास में निधन करता है। ऐसा मुनिजनों का कथन है। अन्य अरिष्ट योग- जन्माधिपति सूर्य शनि से युक्त होकर अष्टम में शुक्र से देखा जाता हो तो राशि तुल्य वर्ष में जातक की मृत्यु हो जाती है। यदि १२,८, ६,९ स्थानों में चन्द्र पाप ग्रहों से युत और शुभ ग्रहों का अभाव हो तो जातक का निश्चय ही निधन हो जाता है। ऐसा सभी आचार्यों का मत है। प्रकारान्तर से अरिष्ट योग- यदि राशि चक्र के पूर्वभाग में पापग्रह या पश्चिम भाग में शुभ ग्रह हो और वृश्चिक लग्न में जन्म हो तो वज्रमुष्टि योग में जातक का निधन होता है। यदि लग्न में क्षीण चन्द्रमा हो और समस्त पापग्रह केन्द्र (१, ४, ७, १०) या अष्टम भाव में हो तो मरण अवश्य होता है। यह यवनाचार्य का मत है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७३३ अन्य अरिष्ट योग- यदि सन्ध्या काल में जन्म हो या पापग्रह राशि के अन्तभाग में हो और लग्न में चन्द्र की होरा हो एवं चारों केन्द्र में पापग्रह या चन्द्रमा हो तो मरण होता है। यदि चन्द्र दो पापग्रहों में स्थित होकर ७,४, ८ भाव में हो तो देवता से रक्षित होने पर भी जातक का निश्चय मरण होता है। अन्य अरिष्ट योग- यदि दो पापग्रहों के बीच में चन्द्रमा लग्न या सप्तम अष्टम भाव में बलहीन शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो निश्चय जातक का निधन होता है। यदि सप्तम अष्टम भाव में पापग्रह से दृष्ट पाप ग्रह हो तो माता के साथ जातक का मरण होता है। यदि उक्त योग पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो सत्याचार्य के के कथनानुसार मात्र कष्ट होता है। माता के साथ अरिष्ट का विचार- यदि जन्म काल के समय चन्द्रग्रहण हो और चन्द्रमा पापग्रह के साथ लग्न में या मङ्गल, अष्टम भवन में हो तो माता के सहित जातक का मरण होता है। यदि सूर्य ग्रहण काल में जन्म हो या पापग्रह से युत सूर्य लग्न में हो और अष्टम भवन में भौम हो तो भी माता के सहित जातक का निधन शस्त्र से अर्थात् आपरेशनादि से होता है। शीघ्र निधन अरिष्ट योग- यदि क्षीण चन्द्रमा जातक के लग्न में विराजमान हो, एवं पापग्रह १,४, ७, ८, १० में शुभ ग्रह से न देखे जाते हों तो शीघ्र ही मृत्यु होती है। ऐसा सत्याचार्य का मत है। शीघ्र अरिष्ट योग- यदि जन्मकाल में सप्तम भाव में सूर्य या लग्न में शनि और मङ्गल हो तो शीघ्र ही निधन होता है। अथवा अष्टम भाव में शनि या मङ्गल हो और लग्न में सूर्य हो तो शीघ्र मरण या चन्द्र मङ्गल या शनि से युत एवं पापग्रह दृष्ट हो तो शीघ्र निधन होता है। यदि लग्न, अष्टम, सप्तम भवन में कोई पाप ग्रह हो तथा क्षीण चन्द्रमा द्वादशस्थ हो तो और केन्द्र में कोई भी शुभ ग्रह न हो तो भी शीघ्र ही मृत्यु होती है। शीघ्र अरिष्ट का ज्ञान- यदि जन्म समय में १, १२, ९,८ में चन्द्र, सूर्य, शनि, मङ्गल, क्रमेण युत हो या गुरु से अदृष्ट हो अर्थात् गुरु न देखता हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है। यदि लग्न में चन्द्रमा या सूर्य हो और बलवान् पापग्रह पञ्चम, नवम, अष्टम भवन में शुभ ग्रहों की दृष्टि या युति से रहित हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है। यह यवनाचार्यों का मत है। नवम वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जन्म समय में शुक्र, सूर्य, शनि से युत
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७३४ बालारिष्ट प्रकरण हो तथा गुरु से दृष्ट हो तो जातक का नवें वर्ष में मरण होता है। मातृ अरिष्ट योग- यदि जातक की पत्री में किसी भी भाव में चन्द्रमा, मङ्गल, सूर्य, शनि इन तीनों से दृष्ट हो तो माता का शीघ्र निधन होता है। यदि चन्द्रमा शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो माता का निधन नहीं होता है। पितृ अरिष्ट योग- जिस जातक का दिन में जन्म हो और सूर्य, मङ्गल, शनि ग्रह से देखे जाते हों, अथवा पाप ग्रह युत हो तो निश्चय पिता का मरण होता है। यदि जन्म के समय में सूर्य, मङ्गल और शनि युत हो तथा बुध, गुरु, शुक्र से युत न हो तो जातक के पिता या पितामह का मरण होता है। पिता के अरिष्ट का योग- यदि जातक का जन्म दिन में हो और सूर्य दो पापग्रहों के बीच में हो, अथवा सूर्य पापग्रह से युक्त हो तो अवश्य पिता का मरण होता है। यदि जन्म काल में सूर्य की राशि से अष्टम राशि में शनि और मङ्गल शुभग्रह से न देखे जाते हो तो पिता का शीघ्र मरण होता है। यदि जन्मपत्रिका में चरराशि में सूर्य, पापग्रह से युत हो तो अल्पायु में पिता की मृत्यु विष, शस्त्र या जल से ( पानी में डूबने से) होती है। माता के साथ निधन योग-यदि चन्द्रमा से अष्टम राशि में या नवम में या सप्तम में समस्त पाप ग्रह हो या एक भी हो तो माता सहित जातक का मरण होता है। जन्म के समय पिता का स्थान- यदि जातक का जन्म दिन में हो और चरराशि में सूर्य, मङ्गल से दृष्ट हो तो जन्म के समय पिता को परदेश कहना चाहिए। यदि जातक का जन्म रात्रि में हो और चरराशिगत शनि को सूर्य देखता हो तो इस योग में भी जातक का पिता परदेश में रहता है ऐसा फलादेश करना चाहिए। इस विषय में लग्न जातक में कहा गया है कि- पितुर्जातः परोक्षेऽस्य लग्नमिन्दावपश्यति। विदेशस्थस्य चरभे मध्याद् भ्रष्टे दिवाकरे।। अर्थात् जन्म लग्न को यदि चन्द्रमा नहीं देखता हो तो पिता का परोक्ष में बालक का जन्म कहना चाहिए और सूर्य मध्यमभ्रष्ट अर्थात् नवें ग्यारहवें और बारहवें स्थान में चरराशि का हो तो उत्पन्न जातक का पिता विदेश में समझना चाहिए। पिता का निधन योग-यदि जातक का जन्म रात्रि में हो और चरराशि में शनि, मङ्गल से युत हो तो पिता का मरण परदेश में होता है। इसमें संदेह
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नहीं। यदि जन्माङ्ग में जिस किसी भी राशि में सूर्य, शनि व मङ्गल से युत हो तो जन्म से पूर्व ही पिता का निधन कहना चाहिए। माता के साथ निधन योग- यदि जन्मकाल में पापग्रह प्रथम, अष्टम, सप्तम, षष्ठ, द्वादश भवन में हो तो निःसंदेह माता के साथ जातक का निधन होता है। माता एवं जातक में एक के निधन का ज्ञान-यदि जन्म पत्रिका में ६,८, भवन में सब पापग्रह हो तो माता जीवित रहती है और बालक का निधन हो जाता है। यदि लग्न अष्टम, सप्तम में पापग्रह हो तो बालक जीवित रहता है और उसकी माता का निधन हो जाता है। नेत्र हानि योग-मङ्गल या शनि १२वें भाव में हों तो नेत्र नाशक होते हैं, शनि दक्षिण नेत्र को और मङ्गल वामनेत्र को नष्ट करता है। रवि और चन्द्रमा दोनों साथ ही १२वें भाव में बैठे हों अथवा ६,८ में पापग्रह हो तो जातक नेत्रहीन होता है। अथवा इन दोनों में एक भी द्वादश भाव में हो तो नेत्र नाशक होता है, उनमें रवि दक्षिण नेत्र और चन्द्रमा वाम नेत्र को नष्ट करता है।
होता है। यदि राहु लग्न में हो और सप्तम स्थान में सूर्य हो तो जातक नेत्रहीन पुनः नेत्र हानि योग- यदि द्वितीय भाव में चन्द्र या बारहवें में सूर्य हो तथा अष्टम या षष्ठ भाव में पापग्रह हों तो जातक नेत्रहीन होता है। यदि षष्ठ भाव में चन्द्र या अष्टम भाव में सूर्य, शनि द्वादश में या मङ्गल द्वितीय भवन में हो तो इस योग में भी जातक नेत्रहीन होता है। यदि चन्द्रमा मङ्गल या शनि से युत होकर षष्ठ भाव मेंया अष्टम भाव में हों तो पित्त या कफ के त्रिकार से जातक का नेत्र नष्ट हो जाता है। यदि अष्टम में स्थिति हो तो दक्षिण नेत्र षष्ठ में स्थित चन्द्रमा हो तो वाम नेत्र नष्ट होता है।
होती है। यदि शुभग्रह से दृष्ट हो तो जन्म समय में नहीं; कालान्तर में नेत्र हीनता शनि के साथ चन्द्रमा यदि ८, १२ में पापग्रह से दृष्ट हो तो वात विकार से नेत्र नष्ट होता
1 उनमें अष्टमस्थ दाहिने और द्वादशस्थ वाम नेत्र का नाश करता है। यदि शुभग्रहों से दृष्ट हो तो तत्काल नहीं कालान्तर में नेत्र नष्ट होता है।
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७३६ बालारिष्ट प्रकरण : एवं चन्द्रमा यदि शनि, सूर्य से युत हो तो नाना प्रकार के रोग से नेत्र में विकार उत्पन्न करता है। नेत्रहीन योग का वर्णन जातकालङ्कार तथा जातक पारिजात में भी दिया गया है। छात्रों को ध्यान से पढ़कर चिन्तन करना चाहिए। कर्ण रोग का ज्ञान-जन्मकुण्डली में पापाक्रान्स चन्द्रमा यदि ११,३- १ में हो तो जातक को कर्ण रोग होता है। यदि पापग्रह की दृष्टि भी हो तो जन्म के समय में ही कर्ण रोग होता है। यदि नवम और पञ्चम भाव दोनों में पापग्रह हों तो और पाप ग्रह से दृष्ट भी हो तो जन्म समय में ही कर्ण रोग होता है। नवम में पापग्रह हो तो दाहिने कान में और पञ्चम में हो तो वाम कर्ण में रोग होता है। यदि ९, ५ में शुभ ग्रह की राशि या शुभ ग्रह से दृष्ट भी हो तो शुभ फल कहना चाहिए। बृहज्जातक में नवम में वाम कर्ण में और पञ्चम में दक्षिण कर्ण में रोग माना गया है। अतः 'सुतभे दक्षिणकर्ण, वामं नवमे ग्रहो हन्यात' इस प्रकार निर्विरोध पाठ होना उचित है। इसका अर्थ है कि पञ्चम में ग्रह हो तो दाहिने और नवम में हो तो वाम कान में रोगादि कहना चाहिए। चन्द्र राशि से कर्ण रोग का ज्ञान- यदि जन्म के अतिरिक्त जो व्यक्ति जिस राशि के चन्द्रमा में रोग प्राप्त करता है उसे ही उस रोग का लग्न समझ कर रोग का विचार करना चाहिए और जन्म कालिक चन्द्रमा से भी विचार करना चाहिए। इस प्रकार योग कारक ग्रहों से दक्षिण वाम भाग में शुभग्रह चिन्ह करते हैं। यदि वे पापग्रह से दृष्ट हो तो शरीर के उस अङ्ग को विरुद्ध करते हैं। इन तीनों अर्थात् जन्म, लग्न, जन्मराशि रोगोत्पति काल को ज्ञान कर के शुभाशुभ फल कहना चाहिए। तीन दिन जीवन योग-जिस जातक की पत्री में मीन राशि के सूर्य और चन्द्रमा तृतीय भाव में हो तो जन्म से ही व्याधि प्राप्त करके ३ दिन में उसका जीवन सामप्त हो जाता है अर्थात् ३ दिन में उस जातक की मृत्यु हो जाती है। चन्द्रादित्यौ तृतीयस्थौ मीनक्षेत्रं स यस्य तु। व्याधिं तत्र विजानीयात् त्रिरात्रं तस्य जीवितम्।। एक दिन का जीवन योग- यदि चन्द्रमा दशम स्थान में हो और चन्द्रमा से तृतीय नक्षत्र में सूर्य पापग्रहों से युत हो या अकेला ही हो तो जातक का जीवन १ दिन का होता है अर्थात् १ दिन के बाद मृत्यु हो जाती है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७३७ सात दिन का जीवन योग- जिस जातक के चन्द्रमा से सप्तम भाव में मङ्गल, सूर्य दोनों हो तो वह जातक सात दिन तक जीवित रहता है। रोगारम्भ से अरिष्ट का विचार- यदि जन्म के समय ४, ८ भाव में पापग्रह हों और वे पापग्रह १२, २ में हो तो उस समय में यदि जातक रोगी होता है तो वह १० दिन जीवित रहता है। यदि रोगारम्भ के समय पञ्चम सूर्य और नवम चन्द्रमा ही हो तो १२ दिन तक जीवित रहता है। पुनः रोगारम्भ से अरिष्ट-रोगारम्भ काल में यदि त्रिकोण के चन्द्रमा हो अर्थात् ९, ५ में चन्द्र हो, और ४, ८ में सूर्य विद्यमान हो तो वह जातक दुर्व्याधि से युक्त होकर ३ दिन में निधन को प्राप्त हो जाता है। यदि लग्न से चतुर्थ भवन में चन्द्रमा हो तथा षष्ठ भाव में सूर्य हो तो वह जातक १८ दिन रोग से युक्त होकर निधन को प्राप्त करता है। यदि चन्द्रमा से ९, ५ में सूर्य हो तो वह जातक रोगारम्भ से २० दिन जीवित रहता है। अर्थात् २० दिन के बाद मृत्यु को प्राप्त करता है। यदि रोग कालिक लग्न से अष्टम भाव में सूर्य, शनि और मङ्गल से दृष्ट हो तो उस व्यक्ति का जीवन न होकर मरण होता है। पुनः जन्माङ्ग से अरिष्ट योग-यदि १, ४, ७, १० में मङ्गल हो, और गुरु केन्द्र में न हो तो मरे हुए बालक का जन्म होता है। यदि जन्म काल सूर्य लग्न में हो तथा गुरु केन्द्र से अन्य स्थान में हो तो जन्म के साथ मरण होता है। अथवा अष्टम में कोई पापग्रह हो और गुरु केन्द्र से भिन्न स्थान में हो तो भी जन्म के साथ ही मरण होता है। यदि लग्न या केन्द्र में चन्द्रमा हो और अष्टम में कोई पापग्रह हो तो जन्म के साथ मरण होता है। यदि जन्म कालीन लग्नस्थ द्रेष्काण से सप्तम राशि में पापग्रह हो और लग्न में चन्द्रमा हो तो शीघ्र मरण होता है। एक मास वा सात दिन का आयु योग- जिस जातक के जन्म काल के समय अष्टम भाव में अधिक ग्रह हो तो उसकी आयु एक मास या सात दिन की होती है। मृत जातक योग- यदि लग्न में शनि हो या अष्टम में भौम हो और गुरु केन्द्र (१/४/७/१०) से अन्य भाव में हो तो मृत बालक का जन्म होता है। त्रिकोण गत पापग्रह से अरिष्ट योग- जन्म के समय लग्न में जो द्रेष्काण वर्तमान हो अर्थात् जिस राशि का द्रेष्काण हो यदि वह राशि त्रिकोण (५/ ९) में पाप ग्रह से युक्त हो तो आगे कथित ग्रह अपने समान फल देता है। यथा-यदि शनि हो तो व्याधि, भौम हो तो मरण, सूर्य हो तो रोग से भृ.सं .- ४७
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७३८ बालारिष्ट प्रकरण शरीर में कष्ट होकर मरण होता है। इसमें सन्देह नहीं है। यदि जन्म काल में भौम हो और शुक्र केन्द्र में हो तो पुनः भौम लग्नगत राशि में आता है। तब बालक (जातक) का मरण होता है। शीघ्र निधन योग- यदि जन्म समय गुरु त्रिकोण में हो और लग्न स्वामी लग्न में हो तथा गुरु या जन्म लग्न से केन्द्र में भौम हो तो शीघ्र मरण होता है। -= १०८ वर्ष की आयु का योग- यदि जन्म के समय अष्टमभाव या लग्न में कोई भी पापग्रह न हो तथा किसी भी केन्द्र राशि (१/४/७/१०) में गुरु हो तो जातक १०८ वर्ष जीता है। यदि केन्द्र त्रिकोण अथवा अष्टम भाव पापग्रह से रहित हो तथा गुरु, शुक्र केन्द्र में हो तो जातक १०८ वर्ष जीता है। १२० वर्ष की आयु का योग- यदि लग्न में शुक्र हो और किसी भी केन्द्र में गुरु हो तथा अष्टम भाव में पापग्रह न हों तो १२० वर्ष जातक जीता है। यदि कर्क लग्न में गुरु शुक्र हो या गुरु चन्द्रमा से युत कर्क लग्न में हो तथा अष्टम में पापग्रह न हों तो भी उपयुक्त फल होता है। देवतुल्य आयु योग- यदि केन्द्र, त्रिकोण व अष्टम भाव में पापग्रह न हो तो जातक की देवतुल्य आयु निःसंदेह कहनी चाहिये। गतायु योग- यदि ८/७/१२/१/९/५ इन भावों में क्षीण चन्द्रमा बली पापग्रह से युत हो तथा शुभग्रहों से अदृष्ट हो तो जातक की आयु समाप्त कहना चाहिये अर्थात् जीवन नहींहोता है। अनुक्तकाल योगों में निधन समय का विचार- जिन योगों में मरण का समय नहीं लिखा है उनमें योग करने वाले ग्रहों में से जो बली ग्रह हो उसकी राशि में जब चन्द्रमा का संचार हो तब अरिष्ट कहना चाहिए। अथवा चन्द्रमा पुनः अपनी राशि में या लग्न में आये और पापग्रहों से दृष्ट हो तो जातक का मरण होता है। यह विचार एक वर्ष के भीतर होता है। पाँचवें वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जन्म के समय में सूर्य चन्द्र भौम, गुरु एक राशि में हो या भौम, गुरु, शनि, चन्द्र एक राशि में हो अथवा सूर्य शनि भौम चन्द्रमा एक राशि में हों तो पाँच वर्ष गें जातक का मरण होता है। ग्यारहवें वर्ष में अरिष्ट योग- यदि सूर्य से युत बुध (पाठान्तर से सूर्य चन्द्र से युत बुध) पापग्रहों से दृष्ट हो तो देवता से रक्षित भी जातक का ११वें वर्ष में मरण होता है। सात वर्ष में अरिष्ट योग- यदि जातक की कुण्डली में लग्न में सूर्य, शनि या भौम हो तथा सप्तम भाव में शुक्र की राशि (२/७) में क्षीण चन्द्रमा गुरु से अदृष्ट हो तो सात वर्ष में जातक का मरण कहना चाहिए। चतुर्थ वर्ष में अरिष्ट योग- यदि क्षीण चन्द्रमा केन्द्र में सूर्य से युत हो
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भृगु संहिता फल दर्पण ७३९ तथा भौम या शनि से दृष्ट अथवा युत हो तो ४ वर्ष में जातक का मरण होता है। यहाँ (इस योग में) गणित करने की आवश्यकता नहीं होती है। तीन वर्ष में अरिष्ट योग- यदि कुण्डली में लग्नेश से अष्टम स्थान में अत्यन्त कृश (क्षीण) चन्द्रमा हो और समस्त पाप ग्रहों से दृष्ट और शुभ ग्रहों से अदृष्ट हो तो तीन वर्ष में जातक का मरण होता है। नौ वर्ष में अरिष्ट योग- यदि पापग्रह लग्नेश होकर चन्द्रमा के नवमांश में चन्द्रराशि से बारहवें स्थान में हो व पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक का ९ वर्ष में मरण होता है। पाँच वर्ष में अरिष्ट योग- यदि पाप ग्रह लग्नेश होकर चन्द्रमा के नवमांश में चन्द्र राशि से बारहवें स्थान में हो या पापग्रहों से दृष्ट राशि से बारहवें स्थान में हो अथवा पापग्रहों से दृष्ट हो तो जातक का ५ वर्ष में मरण होता है। बारह वर्ष में अरिष्ट योग- यदि राहु सप्तम भाव में सूर्य व चन्द्रमा से दृष्ट हो एवं शुभ ग्रह से अदृष्ट हो तो १२ वर्ष में जातक का मरण होता है। सात वर्ष में अरिष्ट योग- यदि कुम्भ वा सिंह वृश्चिक लग्न में राहु पापग्रहों से दृष्ट हो तो निश्चित ही ७ वर्ष में जातक की मृत्यु हो जाती है। दुर्मुहूर्त में अरिष्ट योग- यदि जातक के जन्म के समय से में प्रथम केतु का उदय हो, पीछे उल्कादि व वायु का निर्धात (आँधी) हो एवं रौद्र व सार्प मुहूर्त में जन्म हो तो भी जातक का मरण होता है। अल्प समय में अरिष्ट योग- यदि क्षीण चन्द्रमा पापग्रहों से युत हो और राहु से दृष्ट हो तो बिना कारण अल्प समय में जातक का निधन होता है। प्रत्येक राशि में चन्द्रकृत अरिष्ट योग- यदि जन्म कालीन चन्द्रमा कुम्भराशि के २१वें अंश में हो, या सिंह के ५वें अंश में हो या वृष के नवें अंश में हो तो मरण करता है। वृश्चिक राशि के २३वें अंश में, मेष के अष्टम अंश में, कर्क राशि के २२वें अंश में चन्द्रमा हो तो निधन कारक होता है। कन्या राशि के प्रथमांश में, धनु के १८ वें अंश में चन्द्रमा हो तो मरण कारक योग होता है। कथित अंशों में निधन समय का विचार-जन्मकालीन समय में चन्द्रमा जिस राशि में जितने अंशों में मरण कारक कहा गया है उतने ही वर्षों में यमराज द्वारा रक्षित होने पर भी उस जातक का निधन होता है। यहाँ जिन अरिष्टों का वर्णन किया गया है। उन अरिष्टों में सब का निधन नहीं होता, किन्तु अरिष्ट भङ्ग योग होने पर इन योगों में भी जातक का जीवन होता है।
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७४० चन्द्रादि-अरिष्ट भङ्ग प्रकरण प्रत्येक राशि में जिन जिन अंशो में चन्द्रकृत अरिष्ट कहा है; वहाँ अनुपात द्वारा समय का ज्ञान करके ही अरिष्ट कहना चाहिये। क्योंकि चन्द्रमा अंश कलादि से युत होता है। यथा-मेष के अष्टम अंश में चन्द्रमा अरिष्टकारक होता है। कुण्डली में यदि ०/७/१०/२ चन्द्रमा है तो मेष के अष्टम अंश में होने से अष्टम वर्ष में अरिष्ट कारक हुआ। अष्टम वर्ष में कब मरण होगा यह अनुपात द्वारा जानकर फलादेश कहना चाहिये। गुरुवश निधन वर्ष का विचार- इस प्रकार प्रयत्न से जातक के राशि स्थान अथवा केन्द्र स्थान का विचार करके अरिष्ट कहना चाहिये। गुरु जातक का जीवन है इसलिये बृहस्पति की स्थितिवश मृत्यु का विचार करना चाहिये। यथा-यदि गुरु ३।४।५।७।९।१०।११।१ भाव में हो तो क्रम से ५। १०। ४६ २१।१०० ( अन्यत्र से ३०) ४०। ६०। ३० (अन्यत्र से ५०) वर्ष तक जातक का जीवन होता है।
चन्द्रादि-अरिष्ट भङ्ग प्रकरण जो अरिष्ट योग कहे गये हैं उनका भङ्ग (विकलता) जिन योगों से होता है उन अरिष्ट भङ्ग योगों को आगे कहते हैं, क्योंकि जातक शास्त्र में ये प्रधान हैं। उनमें भी सर्वप्रथम चन्द्रकृतारिष्टभङ्ग योगों को कहते हैं, इसके बाद शेष योगों को कहा जायगा, जैसा कि ब्रह्मादि शास्त्रकारों ने कहा है। चन्द्रमा पूर्ण बिम्ब हो उस पर सब ग्रहों की दृष्टि हो तो अरिष्टयोग को नाश कर देता है, जैसे कानून से विरुद्ध चलने वालों को राजा नाश कर देता है। तथा पूर्ण चन्द्रमा अपने मित्र के नवांश में हो और शुक्र से दृष्ट हो तो अरिष्टभङ्गकारक होता है, जैसे वात रोग हरणकारक में वस्ति क्रिया श्रेष्ठ अर्थात् प्रधान मानी गई है। कालान्तर से अरिष्टभङ्ग योग ज्ञान- यदि चन्द्रमा अपने परमोच्च (वृष में ३ अंश पर) हो और शुक्र से दृष्ट हो तो वह उसी प्रकार अरिष्टों का नाश कर देता है जैसे कफ और पित्त के दोष को विरेक (जुलाब) और वमन (उल्टी) नष्ट कर देता है। शुभ ग्रहों के वर्ग (गृह होरादि) में क्षीण चन्द्रमा भी यदि शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो अरिष्ट का उसी प्रकार नाश कर देता है जैसे जाईफल के छिलके
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भृगु संहिता फल दर्पण ७४१ का काढ़ा महातिसार व्याधि को नाश कर देता है। पत्री में चन्द्रमा से ७,८, ६ में पाप ग्रह से रहित शुभ ग्रह मात्र हो तो अरिष्ट का नाश कर देता है, जैसे उन्माद रोग को कल्याण घृत नाश कर देता है वैसे ही अरिष्ट को नाश कर देता है। यदि चन्द्र शुभ फल प्रदानकर्ता शुभ ग्रहों से युत हो और शुभ ग्रह के द्रेष्काण में हो तो उसी प्रकार अरिष्टों का नाश करता है जैसे लवण युत घृत नेत्र रोग को समाप्त कर देता है। पत्रिका में पूर्णबिम्ब चन्द्रमा यदि शुभ ग्रह के द्वादशांश में हो तो अरिष्ट को नष्ट कर देता है। जैसे तक्र (माठा) गुद रोग (बवासीर आदि) को नष्ट कर देता है। तथा चन्द्रमा यदि शुभ ग्रह की राशि में लग्नेश से दृष्ट हो तो उस पर अन्य (पाप) की दृष्टि नहीं हो तो अरिष्ट को नष्ट कर देता है जैसे कुलवधू (कुलाङ्गना) अन्य पुरुष से सङ्ग करके कुल को नष्ट कर देती है। यदि चन्द्रमा पाप ग्रह की राशि या उसके वर्ग में हो और राशिपति से, दृष्ट हो तो जातक की रक्षा ही करता है, जैसे कृपण अपने धन की रक्षा करता है। यदि जन्म राशीश बली हो तथा शुभग्रह मित्र से दृष्ट हो तो जैसे भीरु (डरपोक) संग्राम में जाकर भी किसी को नहीं मारता है, उसी प्रकार चन्द्रमा भी अरिष्टकारक नहीं होता है। जन्म राशिपति लग्न में हो उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो अरिष्ट का नाश होता है। जैसे उष्णा (कृष्ण पिप्पली) और बिदल (बाँस के छिलका) को
देता है। जलाकर बनाया हुआ आँजन (काजर) शुल्क (धवलता) को नष्ट कर
अर्थात् जिस प्रकार आंख की फूली समाप्त कर देता है उसी प्रकार अरिष्ट भी नष्ट हो जाते हैं। सम्पूर्ण (पूर्ण बिम्ब) चन्द्रमा यदि अपने उच्च, अपनी राशि, मित्र के षड्वर्ग, या अपने षड्वर्ग में हो उस पर केवल शुभ ग्रह की दृष्टि हो, अपने शत्रु और पाप ग्रह से युत दृष्ट नहीं हो तो कठिन अरिष्ट को नष्ट करता है। जैसे रवि दुस्तर (कठिन) प्रालेय (पाला) को नष्ट कर देता है। चन्द्रमा में १२वें स्थान में बुध, शुक्र, और ११वें में पाप ग्रह तथा १० वें बृहस्पति हो तो अरिष्ट नष्ट होता है, जैसे मुनि पुष्प (अगस्त्य) के रस बने हुये नस्य (सुंघनी) से चौथैया (चौथे दिन आने वाला ज्वर) रोग नष्ट होता है। लग्नेश से ६, ३, १०, ११, ४ में चन्द्रमा हो और उस पर शुभ ग्रह की
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७४२ चन्द्रादि-अरिष्ट भङ्ग प्रकरण दृष्टि हो तो सब अरिष्ट का नाश होता है जैसे राजा की सेना के पीछे चलने वालों को पूर्ण सुरक्षा बनी रहती है। एक ही जन्म राशिपति पूर्ण बली हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वह जातक के चन्द्रकृत अरिष्ट का उसी प्रकार नाश कर देता है जैसे वन में उन्मत्त बाघ हरिणों का नाश कर देता है। यदि शुक्ल पक्ष हो और रात्रि में जन्म हो या कृष्णपक्ष में दिन में जन्म हो तो ६,८ भाव में स्थित चन्द्रमा शुभाशुभ ग्रहों से दृष्ट होने पर भी यत्न से विपत्ति में रक्षा करता है। जिस प्रकार पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है अर्थात् उसे मारता नहीं है। इसी तरह अरिष्टभङ्ग का विचार वाराहमिहिर ने लघुजातक में अरिष्टभङ्गाध्याय के नवें अध्याय के श्लोक १६ में किया है, आगे सामान्यारिष्ट भङ्गयोग कहा जा रहा है- बृहस्पति की स्थिति से अरिष्टभङ्ग योग- यदि देदीप्यमान किरणों से युक्त अति बली बृहस्पति लग्न में हो तो वह पूर्व में कहे हुये सब अरिष्ट योगों को ठीक उसी प्रकार नष्ट कर देता है। जैसे भक्तिपूर्वक विष्णु के चरण में एक बार किया हुआ प्रणाम भी अत्यन्त दुस्तर पापों को नष्ट कर देता है। अन्य अरिष्टभङ्ग योग- जन्म समय में समस्त शुभ ग्रह पूर्ण बलवान् और सब पाप ग्रह निर्बल हो तथा शुभ ग्रह की राशि लग्न हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वह जातक सब अरिष्टों से रहित हो जाता है। जैसे सूर्यादि ग्रहों की पूजा करने वाला सभी पापों से मुक्त हो जाता है। पुनः प्रकारान्तर- यदि पाप ग्रह सब शुभ ग्रह के वर्ग में हो और शुभ वर्ग स्थित शुभ ग्रहों से देखा जाता हो तो जैसे विरक्ता स्त्री अपने पति का नाश करती है उसी प्रकार अरिष्ट को नष्ट कर देता है। राहु से अरिष्टभङ्ग योग- यदि जन्मकाल में लग्न से ३,६,११ भाव में राहु शुभ ग्रहों द्वारा दृष्ट हो तो सभी अरिष्टों को उसी तरह नष्ट कर देता है, जैसे वायु, रुई के ढेर को नष्ट कर देती है। जन्मकाल में सभी ग्रह शीर्षोदय राशि में बलवान हो तो जिस प्रकार अग्नि घृत को नष्ट कर देती है वैसे ही जातक का सभी अरिष्ट नष्ट हो जाता है। जन्म काल में शुभ ग्रह यदि पाप ग्रह को पराजित कर शुभग्रहों से देखे जाते हों तथा शुभ वर्ण में हो तो अवश्य ही समस्त अरिष्टों का नाशक होता है तो सभी अरिष्टों को नष्ट कर देता है जैसे प्रबल वायु वृक्षों को उखाड़ फेंकता है। यदि अरिष्टकारक ग्रह किसी ग्रह से घिरा हुआ (युत) पापग्रह से दृष्ट
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भृगु संहिता फल दर्पण ७४३ हो तो भी सभी अरिष्टों का नाश होता है। जैसे सूर्य ग्रहण में कुरुक्षेत्रादि में स्नान करने पर पाप नष्ट हो जाते हैं। जन्म काल में सुखस्पर्श मन्द पवन सहित आकाश में मनोहर मेघ हो तथा ग्रह समूह भी प्रबल निर्मल बिम्ब वाले हो तो क्षणभर में अरिष्ट शान्त हो जाते है, जैसे जल की धारा रजकण अर्थात् धूलिसमुदाय को शान्त कर देती है। अगस्त्य नाम का तारा तथा मरीच्यादि सप्तर्षियों के उदय काल में यदि जातक का जन्म हो तो सभी अरिष्ट नष्ट हो जाता है। जैसे सूर्योदय होते ही समस्त अन्धकार नष्ट हो जाता है। मेष, वृष या कर्क लग्न में राहु हो तो समस्त कष्ट से जातक की रक्षा करता है। जैसे राजा प्रसन्न हो कर अपराधी की रक्षा करता है। राहु केतु से अतिरिक्त यदि अपने अपने द्रेष्काण में हो तो ग्रह जनित समस्त अरिष्टों को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे अन्धकार को सूर्य किरण नष्ट कर देता है। यदि जन्म समय में अधिक ग्रह शुभ फलद हो तथापि अरिष्ट नष्ट हो जाता है। जैसे सूर्य से त्रिकोण (९/५) में चन्द्रमा रहने पर राजा की यात्रा विघ्न को हटा देती है। केन्द्रस्थ गुरु-शुक्र से अरिष्टभङ्ग योग-यदि गुरु और शुक्र केन्द्र में हो तो राशिकृत और चन्द्रकृत सब अरिष्टों को शीघ्र नष्ट कर देता है और जातक १०० वर्ष तक जीता है। अमितायु योग- जन्म पत्रिका में गुरु और पूर्ण चन्द्रमा यदि कर्क राशि में होकर ४, १० या लग्न में हो तथा शनि, बुध, तुला राशि में हो और सभी ग्रह ११, ६ भाव में हो तो अमित (१२० से भी अधिक) आयु होती है। जातक शास्त्र में विंशोत्तरी तथा अष्टोत्तरी दशाओं की चर्चा की गई है। जिसका मान १२० या १०८ है अतः इससे भी अधिक आयु का योग होता है। सभी प्राचीन आचार्यों द्वारा बताए गए अरिष्ट भङ्ग योग मैंने कहा है जिन योगों को जानकर ज्योतिषी गण राजाओं के प्रिय पात्र होते हैं।
चन्द्र-सूर्य कृत् योग प्रकरण चन्द्रकृत् सुनफा, अनफा, दुरुधरा योग- जन्माङ्ग में चन्द्र से सूर्य को छोड़कर अन्यग्रह यदि चन्द्रमा से द्वितीय में हों तो सुनफा, १२वें में हों तो अनफा, और दोनों अर्थात् २, १२ में हों तो दुरुधरा योग होते हैं। मानसागरी में इन योगों के लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं- 'रविवर्ज्ज द्वादशगैरनफा चन्द्राद् द्वितीयगैः सुनफा।
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७४४ चन्द्र-सूर्य कृत् योग प्रकरण शुभगैस्थितैर्दुरुधरा केमद्रुम स्थितौ योऽन्यः।।' अर्थात् चन्द्रमा से द्वादश भाव में सूर्य को छोड़कर कोई भी ग्रह हो तो अनफा द्वितीय भाव में सूर्यरहित कोई ग्रह हो तो सुनफा तथा चन्द्रमा से दोनों तरफ अर्थात् द्वितीय द्वादश दोनों भावों में सूर्यरहित ग्रह हो तो दुरुधरा योग होता है। उससे भिन्न स्थिति में अर्थात् चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में कोई भी ग्रह न हो तो केमद्रुम नामक योग होता है। केमद्रुम योग- जन्म कुण्डली में यदि चन्द्रमा समस्त ग्रहों से अदृष्ट हो अर्थात् चन्द्र को कोई भी ग्रह न देखते हों तथा चन्द्र से २, १२ स्थान में कोई ग्रह न हो और चन्द्रमा से १, ४, ७, १० में कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम नामक योग होता है। यदि चन्द्रमा पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तथापि केमद्ठम योग होता है। यह योग अनेक प्रकार का कष्ट देने वाला होता है। प्रस्तार विधि से सुनफादि योग भेद संख्या का ज्ञान- प्रस्तार विधि से सुनफा योग के ३१ भेद और अनफा के ३१ भेद होते हैं। दुरुधरा योग के ६० x ३ = १८० भेद बताए गए हैं। उसकी चर्चा बृहज्जातकादि ग्रन्थों में विस्तार से बताया गया. है। बृहज्जातकोक्त विधि निम्नलिखित है- सुनफायोगफल ज्ञान- सुनफा योग में उत्पन्न जातक लक्ष्मीवान् अपने भुजबल से धनोपार्जन करने वाला अत्यन्त धार्मिक, शास्त्र के रहस्य को जानने वाला यशस्वी, शान्त, सुखी, राजा या मन्त्री और परम बुद्धिमान् होता है। मानसागरी में भी कहा गया हैं- भौमादीनां फलं यत् स्याज्ज्ञात्वा त्वविकलं बुधः। प्रज्ञाय प्रवदेत्सम्यक् सुनफादि वृतं फलम्।। अर्थात् भौमादि ५ ग्रहों का फल पञ्चमहापुरुषयोग में बताया गया है। इन फलों को भली भाँती जानकर एवं सुनकर सुनफा आदि योगों का फल विद्वान् ज्योतिषी को कहना चाहिए। अनफा योग फल ज्ञान-अनफा योग में उत्पन्न बालक वक्ता प्रभावशाली, धनी, नीरोग, सुशील, अन्नपान, पुष्प, वस्त्र और स्त्री आदि सुखों का भोग करने वाला, प्रख्यात, गुणी, सुखी प्रसन्नचित्त रहने वाला और सुन्दर शरीर वाला और रूपवान् होता है। अनफा योग का फल मानसार ने निम्नलिखित प्रकार से किया हैं- चौर स्वामी दृप्तः स्ववशीमानी रणोत्कटःसेर्ष्यः। क्रोधात्सम्पत्साध्यः सुतनुर्नमः कुजेदुनफायां च।।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७४५ अर्थात् भौम कृत अनफा योग में चोरों का सरदार, तेजस्वी, आत्मसंयमी, स्वाभिमानी, युद्ध का अभिलाषी, ईर्ष्यालु, क्रोध से सम्पत्ति अर्जित करने वाला; शरीर से सुन्दर तथा विनम्र होता है। इसी प्रकार बुध, गुरु, शुक्र, शनि से अनफा योगों का फल मानसागरी के अनुसार अधोलिखित प्रकार समझने चाहिए- गन्धर्वो लेख्यपटुः कविः प्रवक्ता नृपाप्तसत्कारः। रुधिरः सुभगोऽपि बुधे प्रसिद्धकर्माअनफायां हि।। गम्भीर सन्मेधा चायुयुतो बुद्धिमान नृपाप्तयशाः। अनफायां त्रिदशसुरौ सञ्जातः सत्कविर्भवति।। युवतीनामतिसुभग: प्रणयी क्षितिपस्य गोपतिः कान्तः। कनकसमृद्धश्च पुमाननफायां भार्गवे भवति।। विस्तीर्णभुजः सुभगो गृहीतवाक्यश्चतुष्पदसमृद्धः। दुर्वनितागणभोक्ता गुणसहित: पुत्रवान् रविजे।। इस प्रकार भौमादि पञ्चतारा ग्रहों से अनफा का फल सुस्पष्ट है। दुरुधरायोग फल ज्ञान- दुरुधरा योग में उत्पन्न जातक वाणी, बुद्धि, पराक्रम और गुणों से पृथ्वी पर प्रख्यात, दानी, परिवार के लोगों के पोषण में कष्ट आदि के भोग का भागी सद्व्यवहार और कार्यों में अग्रगण्य होता है।
प्रकार दिया है- इस प्रकार दुरुधरा योग और केमद्रम योग का फल मानसार ने इस
उत्पन्नभोगसुखमुग्धनवाहनाढ्यः त्यागान्वितोदुरुधराप्रभवः सुभृत्यः। केमद्रुमे मलिन दुखितनीचनिःस्वाः प्रेष्याश्च तत्र नृपतेरपि वंशजाताः।।
वाला होता है। अर्थात् दुरुधरा योग में उत्पन्न जातक समस्त सुखों का उपभोग करने
वह जातक धन एवं वाहन से युक्त, त्यागी प्रवृत्ति वाला तथा अच्छे सेवकों से युक्त होता है। इसी प्रकार केमद्रम में उत्पन्न व्यक्ति मलिन आचरण वाला, सदा दुखी, नीच, निर्धन तथा सेवा कार्य करने वाला होता है। वह चाहे राजकुल में ही क्यों न उत्पन्न हुआ हो। जो जातक केमद्रम योग में उत्पन्न राजवंश में भी स्त्री अन्न, पान (दुग्धादि) गृह, वस्त्र, मित्रों से रहित, दारिद्र्य, दुःख, रोग, और दीनता के विकार से युत, मजदूरी करके जीने वाला, दुष्ट सबसे विरुद्ध व्यवहार वाला होता है। सुनफादि योगों का केन्द्र में प्रधानत्व -केन्द्रादि (१, ४, ७, १०) में ग्रहों के द्वारा जो अनफादि योग कहे गए हैं वे मुख्य हैं।
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७४६ चन्द्र-सूर्य कृत् योग प्रकरण उनके समान जातक और चन्द्रमा का स्वरूप समझना चाहिए। अर्थात् चन्द्रमा के स्वरूप (क्षीण पूर्ण) से विचार करना चाहिए। सुनफादि योग कारक भौमादि ग्रहों के बल देश कुल की अच्छी तरफ से ज्ञान करके ही ज्योतिषी को कहना चाहिए। सुनफा योग कारक भौम फल ज्ञान- यदि सुनफा योग कारक मङ्गल हो तो जातक पराक्रमी, धनी, सदा कठोर वाणी बोलने वाला, उग्र स्वभाव वाला, सेनापति, हिंसक तथा पाखण्ड का विरोध करने वाला होता है। मानसार ने अधोलिखित श्लोक में भौम कृत सुनफा योग का फल इस प्रकार बताया है- विक्रम वित्तप्रायोनिष्ठुरवचनश्चमूपतिश्चन्द्रे। हिंस्रो नित्य विरोधी सुनफायां भौम संयोगे।। अर्थात् यदि चन्द्रमा से द्वितीय स्थान में मंगल स्थित होकर सुनफा योग बना रहा है तो जातक पराक्रमी, निष्ठुर, राजा, हिंसक तथा नित्य लोगों से विरोध करने वाला होता है। सुनफा योग कारक बुध फल ज्ञान- पत्रिका में यदि सुनफा योग कारक बुध हो तो जातक वेद शास्त्र, संगीत विद्या में निपुण, धर्म में रत, काव्य बनाने वाला, मनस्वी सबका हित चाहने वाला और सुन्दर शरीर वाला होता है। मानसार द्वारा बुधकृत सुनफा योग- 'श्रुतिशास्त्रगेयकुशलो धर्मरतः काव्यकृन्मनस्वी च। सर्वहितो रुधिरतनुः सुनफायां सोमजे भवति।।' बुधकृत सुनफा योग हो तो वेदशास्त्र और गान विद्या में निपुण, धार्मिक, काव्यकर्त्ता, स्वाभिमानी, सबकी भलाई करने वाला लाल शरीर वाला होता है। सुनफा योग कारक गुरु फल ज्ञान- यदि जातक की जन्म कुण्डली में सुनफा योग कारक गुरु हो तो जातक विद्याओं में आचार्य, विख्यात राजा या राजा का प्रिय पात्र तथा सुन्दर परिवार और धन धान्य से परिपूर्ण होता है। मानसार कृत गुरु से उत्पन्न सुनफा योग का फल इस प्रकार हैं- नाना विद्याचार्यख्यातं नृपतिं वृषप्रियं चापि। सकुटुम्बधनसमृद्धं सुनफायां सुरगुरु: कुरुते।। बृहस्पति से उत्पन्न सुनफा योग में व्यक्ति विविध विषयों का विद्वान् विख्यात, राजा, न्यायप्रिय तथा कुटुम्बियों के साथ धन सम्पन्न होता है। बृहज्जातक में 'जीवोर्थधर्मसुखभाङ्नृपपूजितश्च' के अनुसार १३ अध्याय के ७वें श्लोक में गुरुकृत सुनफा का फल बताया है। सुनफा योग कारक शुक्र फल ज्ञान-जन्म कुण्डली में यदि सुनफा योग कारक शुक्र हो तो जातक स्त्री, जमीन, धन, गृह, वैभव, चतुष्पदों (हाथी,
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भृगु संहिता फल दर्पण ७४७ घोड़ा आदि) से युक्त सुन्दर पराक्रमी राजा से सम्मानित धैर्यवान और सभी कार्यों में कुशल होता है। सुनफा योग कारक शनि फल ज्ञा ।- जन्म कुण्डली में यदि सुनफा योग शनि के कारण बन रहा हो तो जातक चतुर, बुद्धिमान, ग्राम तथा नगर के मनुष्यों द्वारा पूजित, धनी, कार्यों में संलग्न और धैय धारण करने वाला होता है। अनफायोगकारक भौमफल ज्ञान-जन्म पत्रिका में यदि अनफा योगकारक मङ्गल हो तो जातक चोरों का स्वामी, नीडर, स्वतन्त्र अभिमानी, युद्धप्रिय, क्रोधी, श्रेष्ठ और सेवापरायण, प्रशंसनीय सुन्दर शरीर वाला और लाभकर्त्ता और प्रगल्भ होता है। आचार्य वाराहमिहिर ने सुनफा, अनफा, दुरुधरा योगों का अलग- अलग ग्रह के आधार पर एक ही फल कहा है। कहने का अभिप्राय यह है कि पञ्चतारा ग्रहों के सुनफा योग में जो फल कहे गए हैं वही अनफादि में भी हैं। यहाँ पर पृथक्-पृथक् वर्णन प्रस्तुत किया गया है। अनफ़ा योग कारक बुध फल ज्ञान- पत्रिका में अनफा योग कारक बुध हो तो जातक गान्धर्व (गान, नृत्य) विद्या और लेख लिखने में चतुर, कवि भाषण में निपुण राजा से आदर और सत्कार पाने वाला सुन्दर शरीर वाला और प्रसिद्ध कार्यकर्त्ता होता है। अनफा योग कारक गुरु फल ज्ञान- पत्रिका में यदि अनफा योग में गुरु हो तो उत्पन्न जातक गम्भीर प्रकृति का, बलवान्, मेधावी, शुभकार्यों में संलग्न, बुद्धिमान राजा निःयश प्राप्त करने वाला और उत्तम कवि होता है। अनफा योग कारक शुक्र फल ज्ञान- पत्रिका में यदि अनफा योगकारक शुक्र हो तो जातक स्त्रियों का प्रिय, नम्र राजा, गायों का स्वामी, भोगी, रूपवान् प्रसिद्ध, सुवर्ण सम्मति वाला और उग्र होता है। अनफा योग कारक शनि फल ज्ञान-जन्म पत्रिका में यदि अनफा योग करने वाला शनि हो तो विशाल हाथ वाला, नेता वचन को पालन करने
होता हैं। वाला, चतुष्पद सम्पति वाला, दुश्चरित्रा स्त्री का पति या भक्त, एवं गुणवान दुरुधरा योग कारक भौम-बुध फल ज्ञान-जन्म काल में यदि मङ्गल बुध से दुरुधरा योग हो तो जातक खेती करने वाला, अतिधनवान कार्यों में कुशल, लोभी, वृद्ध और कुलटा स्त्री में आसक्त, कुल में श्रेष्ठ होता है। दुरुधरा योग कारक भौम-गुरु फल ज्ञान-जन्म काल में यदि मङ्गल गुरु से योग हो तो कर्मों में विख्यात, धनी, बहुतों से बैर रखने वाला हृष्ट, कुलरक्षक और धन सञ्चय करने वाला होता है। दुरुधरा योग कारक भौम-शनि फल ज्ञान-जातक की जन्म कुण्डली में
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७४८ चन्द्र-सूर्य कृत् योग प्रकरण यदि मङ्गल शुक्र से दुरुधरा हो तो सुशील स्त्री वाला, सुन्दर, विवादी, पवित्र, कार्यकुशल, व्यायाम करने वाला, और रण में शूर (विजयी) होता है। जन्म काल में यदि मङ्गल शनि से दुरुधरा योग बन रहा हो तो कुरुप स्त्री से प्रेम और अधिक संचय करने वाला, व्यसन में आसक्त, क्रोधी, चुगलखोर और शत्रु के जीतने वाल होता है। दुरुधरा योग कारक बुध-शुक्र फल ज्ञान-जन्म काल में यदि बुध गुरु से दुरुधरा योग हो तो जातक धर्मपरायण, शास्त्रज्ञाता, वाचाल, सुन्दर, कवि, धनी, त्यागी और प्रसिद्ध होता है। दुरुधरा योग कारक बुध-गुरु फल ज्ञान- यदि बुध, शुक्र से दुरुधरा हो तो जातक मीठा वचन बोलने वाला सुन्दर ऐश्वर्य से युत, रूपवान्, नाच गान में प्रीति रखने वाला, सेवा करने वाला, पराक्रमी और मंत्री होता है। दुरुधरा योग कारक बुध-शनि फल ज्ञान-जन्म काल में यदि बुध, शनि से दुरुधरा योग हो तो जातक धनार्जन करने वाला, दूसरों से वन्दनीय और अपने मनुष्यों का विरोध करने वाला होता है। दुरुधरा योग कारक गुरु-शुक्र फल ज्ञान-जन्म काल में यदि गुरु शुक्र से दुरुधरा योग हों तो जातक धैर्यशाली, बुद्धिमान एवं पराक्रमी तथा नितिज्ञ, सुवर्ण रत्नों से परिपूर्ण, विख्यात राजा का कार्य करने वाला होता है। दुरुधरा योग कारक गुरु-शनि फल ज्ञान-जन्म काल में यदि गुरु शनि से दुरुधरा योग बन रहा हो तो जातक सुख, नीति तथा विज्ञान से युक्त, प्रियवाणी बोलने वाला, श्रेष्ठ विद्वान्, उत्तम, शान्त, धनवान और रूपवान् होता है। दुरुधरा योग कारक शुक्र-शनि फल ज्ञान-जन्म काल में यदि शुक्र शनि से दुरुधरा योग हो तो जातक वृद्ध के सदृश क्रियावान्, कुल में श्रेष्ठ, कार्य में कुशल, स्त्रियों का प्रिय, धनवान, राजा से सम्मानित होकर धन पाने वाला होता है। स्वल्प-मध्यम-उत्तम धनादि योग-जन्म कुण्डलि में यदि सूर्य से चन्द्रमा केन्द्र (१, ४, ७, १०) में हो तो धन, वृद्धि, निपुणता, विज्ञान विनय, सम्पन्न होता है। यदि पणफर में अर्थात् २,५,८, ११ में हो तो मध्यम धन होता है और आपोक्लीम में हो अर्थात् ३, ६, ९, १२ में हो तो उत्तम धन होता है। चन्द्रमा से उत्तमादि धन योग - जन्म कुण्डली के अनुसार रात्रि के समय में जन्म हो और चन्द्रमा क्षीण हो और अदृश्य (क्षितिज के नीचे) हो, दिव्यादि उत्पात सहित हो या वही उत्पात युत चन्द्रमा यदि दिन में दृश्य (क्षितिज से ऊपर अर्थात् सप्तम भाव से आगे लग्न पर्यन्त) हो तो मध्यम फल देता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७४९ यदि पूर्ण चन्द्रमा रात्रि में, दृश्य चक्र में होने पर अथवा दिन में अदृश्य चक्र में पूर्ण चन्द्रमा से होने पर जातक राजा होता है। जन्म कुण्डली में लग्नस्थान से सभी शुभ ग्रह उपचय (३, ६,१०, ११) में बैठे हो तो जातक अत्यन्त धनवान् होता है। दो शुभग्रह उपचय में हो तो मध्यम धनवान होता है। यदि एक शुभ ग्रह उपचय में हो तो अल्प धनवान होता है। इसी प्रकार चन्द्रमा से उपचय स्थान स्थित शुभ ग्रह से फल समझना चाहिए। लग्न से उपचय प्रबल योग और चन्द्रमा से उपचय साधारण योग होता है। इस प्रकार चन्द्रमा से अन्य ग्रह योगों से बनने वाले अधियोगादि का उल्लेख आगे राजयोग वर्णन में करेंगे। सूर्यकृत् वेशि, वाशि, उभयचरी योग ज्ञान- जन्म कुण्डली में चन्द्रमा को छोड़कर अन्य कोई भी ग्रह सूर्य से १२वें स्थान में हो तो वाशि नामक योग होता है। द्वितीय स्थान में चन्द्रातिरिक्त एक या एक से अधिक ग्रह हो तो वेशिनामक योग होता है। यदि दोनों स्थान (१२,२) में शुद्ध (चन्द्रवर्जित) हो तो उभयचरी नामक योग होता है। वेशि योग फल ज्ञान-जातक की पत्री में वेशि योग हो तो उत्पन्न जातक मन्ददृष्टि, दृढ़प्रतिज्ञ, परिश्रमी, शरीर के ऊपर भाग झुका हुआ होता है, शरीर से लम्बा होता है। ऐसा यवनाचार्य ने कहा है। वेशि योगकारक गुरु-शुक्र फल ज्ञान- यदि वेशि योग कर्त्ता बृहस्पति हो तो धनसंग्रह करने वाला, विद्वान्, अच्छे मित्रों से युत जातक होता है।
और परतंत्र होता है। यदि शुक्र हो तो डरपोक, कार्य में उद्विग्न, स्वल्प इच्छा करने वाला,
वेशि योग कर्त्ता बुध और भौम फल ज्ञान- यदि वेशि योग कर्त्ता बुध हो तो जातक अनेको कार्यों को करने वाला, निर्धन, कोमल, विनम्र, लज्जा करने वाला, होता है। यदि मंगल योग कर्त्ता हो तो द्रुतगामी और परोपकारी होता है। वेशि योग कर्त्ता शनि फल ज्ञान-यदि पत्री में वेशि योग कर्त्ता शनि हो तो वह जातक दूसरे की स्त्री में आसक्त रहने वाला, उग्र स्वभाव, बड़ी आकृति वाला, शठ (मूर्ख), घृणी (ग्लानि कर्त्ता) और धनवान होता है। वाशि योग फल ज्ञान- वाशि योग में उत्पन्न मनुष्य एक बात बोलने वाला, स्मरण शक्ति वाला, उद्योगी, तिरछी दृष्टि वाला, कमर के ऊपर स्थूल शरीर वाला, राजा के तुल्य और सत्व गुणी होता है।
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७५० दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण आचार्य पराशर ने अड़तीसवें अध्याय के तीसरे श्लोक में इसके विपरीत फल कहा है। वाशि योग कर्त्ता गुरु व शुक्र फल ज्ञान- जन्म कुण्डली में यदि वाशि योग में गुरु हो तो धैर्यबल और बुद्धि से युक्त तथा वचन को पालन करने वाला होता है। शुक्र हो तो शूर, लोक में विख्यात, गुणवान और यशस्वी होता है। वाशि योग कर्त्ता बुध व भौम फल ज्ञान- बुध हो तो प्रियवचन वक्ता सुन्दर और दूसरे की आज्ञा मानने वाला होता है। मङ्गल हो तो संग्राम में विनयी, अपने भाग्य से जीने वाला होता है। वाशि योग कर्त्ता शनि फल ज्ञान- योग कारक शनि हो तो व्यापारी, दृष्ट स्वभाव, परधन हरण करने वाला, गुरु जनों का द्वेषी तथा निर्जज्ज होता है। फलादेश में विशेष कथन- इस प्रकार रवि तथा योगकारक ग्रहों के बल
चाहिए। तथा शुभाशुभ राशि नवांश को ठीक से देखकर इन योगों का फल कहना
उभयचारी योग फल ज्ञान- जन्म काल में उभयचरी योग में उत्पन्न पुरुष समस्त भार (कार्यभार) को सहन करने वाला, कल्याण से युक्त, समान शरीर वाला, स्थिर, विशाल बल, अधिक उच्च नहीं, संतोषी, विद्वान् सुन्दर, बहुत नौकर वाला, बन्धुजनों का पालक, राजा के तुल्य, उत्साही, हृष्ट-पुष्ट और सुख भोग करने वाला होता है।
दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण यवनादि प्राचीनाचार्यों ने द्विग्रह योग के फल जो कहे हैं, उनको यहाँ अहङ्कार मुक्तभाव से विशेष रूप से आगे कहने जा रहे हैं- नोट :- यहाँ नीचे लिखे योग ज्ञान के लिए दिए गए कुण्डलियों के किसी भी भाव में दो, तीन, चार, पाँच, छः या सात ग्रह एक साथ स्थित होने से उस कुण्डलियों के साथ संलग्न ग्रह योग का फल समझना चाहिए न कि किसी भाव या घर में स्थित होने का।
१२ उदाहरणार्थ यहाँ आपको समझने मात्र के लिए २ ३ १ सू. चं. लग्न भाव में ग्रह योग प्रदर्शित किया गया है। ११ सूर्य चन्द्रमा योग फल ज्ञान ४ १० जन्माङ्ग में रवि और चन्द्रमा एक स्थान में 4 ७ ९ हों तो जातक स्त्री का वश विनय रहित कूट ६ ८ (सुवर्णादि धातुओं को मिश्रणपरिवर्तन क्रिया)
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१२ को जानने वाला, अधिक धनवान, मदिरादि बेचने २ ३ १ सू.म. ११ में चतुर होता है। सूर्य भौम योग फल ज्ञान- ४ १८
कुण्डली में सूर्य मङ्गल एक स्थान में हों तो ५ ७ ९
६ ८ तेजस्वी, साहसी, मूर्ख, बलवान, मिथ्या- भाषी, पापी, हिंसक और उग्रस्वभाव होता है। २ १२ ३ १ सू.बु. ११ सूर्य बुध योग फल ज्ञान- १० कुण्डली में रवि बुध का योग हो तो जातक 4 ७ ९ सेवा कार्य में निपुण, चञ्चल धन वाला, प्रियवक्ता, ६ ८
यशरूप धन वाला, श्रेष्ठ, राजा और सज्जनों का
२ १२ प्रिय, बल, रूप, धन और विद्या से युत होता है। ३ १ सू. गु. ११ सूर्य गुरु योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में रवि गुरु का योग हो तो ५ ९ जातक धर्मात्मा, राजमन्त्री, बुद्धिमान् मित्रों के ६ ८
आश्रय से धनलाभ करने वाला, और वेद शास्त्रों २ १२ का अध्यापक होता है। ३ १ सू.शु. ११ सूर्य शुक्र योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में रवि शुक्र का योग हो तो ५ ७ ९ ६ ८ शस्त्र प्रहार विद्या और शक्ति से युक्त वृद्धावस्था में क्षीण दृष्टि, नृत्य नाट्यादि कला को जानने वाला, २ १२ १ सू.श. स्त्री के आश्रय से अधिक धन पाने वाला होता है। ३ ११ सूर्य शनि योग फल ज्ञान- ४ १०
५ यदि कुण्डली में रवि, शनि का योग हो तो ७
८ जातक धातु क्रिया में कुशल, धर्मात्मा, स्वकर्मनिष्ठ,
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७५२ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
स्त्री एवं पुत्रादि से रहित, अपने कुल के गुणों से २ १२ ३ १ चं.मं. ११ प्रसिद्ध और हीनशील होता है।
१० चन्द्र भौम योग फल ज्ञान- ७ यदि कुण्डली में चन्द्र मङ्गल का योग हो ५ ९ ६ ८ तो वह व्यक्ति शूर, रण में विजयी, योद्धा, रक्तविकार से पीड़ित, मिट्टी, चर्म और धातुओं के वस्तु २ १२ बनाने वाला, कूट (धातु पर रंग चढ़ाने की क्रिया) ३ १ चं.बु. ११ को जानने वाला होता है। ४ १० चन्द्र बुध योग फल ज्ञान- ५ ९ यदि कुण्डली में चन्द्र बुध का योग हो तो ६ जातक काव्य करने में निपुण, धनवान स्त्री का प्रिय, सुरुपवान, हँसमुख, धर्मात्मा और विशेष गुण २ १२ ३ १ चं. गु. ११ वाला होता है।
चन्द्र गुरु योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में चन्द्र गुरु का योग हो तो ५ ७ ९ ६ ८ पुरुष स्थिर मैत्री वाला, विनययुक्त, बन्धुओं का आदर करने वाला धनवान, सुशील और देव २ १२ ब्राह्मणों का हित चिन्तक होता है। ३ १ चं.शु. ११ चन्द्र शुक्र योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में चन्द्र शुक्र का योग हो तो 4 ९ ६ ८ वह व्यक्ति माला सुगन्ध वस्त्रादि से युत कार्य प्रणाली को जानने वाला, अपने कुल का प्रिंय, २ १२ आलसी, क्रय विक्रय में कुशल होता है। ३ १ च.श. ११ चन्द्र शनि योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में चन्द्र शनि का योग हो तो ५ ७ ९ जातक वृद्धा स्त्री में आसक्त, हाथी एवं घोड़े आदि ६ ८ का सम्पालक, शीलहीन, दूसरे का अनुकरण करने
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वाला, निर्धन और विवादादि (झगड़ा) में हारने २ १२
३ १ मं.बु. ११ वाला होता है। भौम बुध योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में मङ्गल बुध का योग हो तो ५ ७ ९ स्त्रीजनों में तुच्छ (अपमानित), अल्प धन वाला, ६ ८ सोना और लोहा का कार्य करने वाला, कुलटा स्त्री और दुश्चरित्रा विधवा को रखने वाला और २ १२ औषधि बनाने में निपुण होता है। ३ १ मं. गु. ११ भौम गुरु योग फल ज्ञान- ४ १० यदि जातक की कुण्डली में मङ्गल गुरु का ५ ७ ९
६ ८ योग हो तो वह पुरुष शिल्प, वेद, शास्त्रों का ज्ञाता, मेधावी, बोलने में चतुर, बुद्धिमान तथा शस्त्र
२ १२ चलाने वालों में प्रधान (श्रेष्ठ) होता है। ३ १ म.शु. ११ भौम शुक्र योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में मङ्गल शुक्र का योग हो 4 ७ ९ तो लोकमें पूज्य, समाज में मुख्य, गणितज्ञ, परस्त्री ८ w में आसक्त, धूर्त, जुआ, मिथ्या तथा शठता में रत और विद् (परस्त्रीरत) होता है। २ १२ ३ १ मं.श. ११ भौम शनि योग फल ज्ञान-
४ १० यदि जातक की कुण्डली में मङ्गल शनि
५ ७ ९ का योग हो तो वह धातु क्रिया, इन्द्रजाल विद्या में ६ कुशल, वञ्चक, चोर विद्या में निपुण, धर्महीन शस्त्र और विष से आहत और कलह प्रिय होता है। २ १२ ३ १बु.गु. ११ बुध गुरु योग फल ज्ञान-
४ १० कुण्डली में बुध गुरु का योग हो तो नृत्य
५ ७ ९ कला को जानने वाला, पण्डित शान और वाद्य में ६ ८
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७५४ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
१२ निपुण, बुद्धिमान और सुखी होता है। २ ३ १ बु.शु. ११ बुध शुक्र योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में बुध शुक्र का योग हो तो 4 ७ अति धनवान, नीतिज्ञ, विविधशिल्प कला का ज्ञाता, ६ ८ वेद जानने वाला, प्रियवक्ता, शीतज्ञ, हास्य और २ १२ सुगन्ध मालादि में रुचि रखने वाला होता है। ३ १ बु.श. ११ बुध शनि योग फल ज्ञान- ४ १० यदि कुण्डली में बुध शनि का योग हो तो ५ ७ ९ जातक ऋण से युत, घमण्डी, प्रपञ्जी, कवि, घूमने ६ ८
वाला, कार्य में चतुर और प्रियभाषी होता है। २ १२ ३ १ गु.शु. ११ गुरु शुक्र योग फल ज्ञान-
४ १० यदि कुण्डली में गुरु शुक्र का योग हो तो
५ ७ ९ जातक विद्या, वाद से जिविका वाला सप्रमाण ६ ८ विशेष धर्म में रहने वाला, श्रेष्ठ स्त्री वाला तथा
१२ बुद्धिमान होता है। २ ३ १ गु.श. ११ गुरु शनि योग फल ज्ञान-
४ १० यदि कुण्डली में गुरु शनि का योग हो तो ५ ९ धनवान, नगराध्यक्ष, यशस्वी, श्रेणी, सभा ग्राम और ६ संस्था का प्रधान होता है।
२ १२ शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ १ शु.श. ११ यदि कुण्डली में शुक्र शनि का योग हो तो ४ १० लकड़ी चीरने में चतुर चौर कर्म, चित्ररचना, पत्थर ५ ७ ९ आदि से शिल्प क्रिया को करने में निपुण, योद्धा, ६ ८ भ्रमणशील, और पशुओं को पालन करने वाला
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होता है। इस प्रकार यहाँ दो ग्रहों के योग से फल का वर्णन किया गया है। इनमें ग्रह परस्पर वर्ग में हो तो अधमादि विकल्प से फल में न्यूनाधिकता भी होती है। आगे त्रिग्रहों के योग का फल कहते हैं। २ १ १२ सूर्य चन्द्र मंगल योग फल ज्ञान- ३ स. च. मं ११ जन्म कुण्डली में यदि सूर्य, चन्द्र मङ्गल ४ १०
७ का योग हो तो जातक लज्जारहित, पापी, यन्त्र ५ ९ ६ ८ बनाने वाला, शत्रु को जीतने वाला, सब कार्यों में दक्ष होता है। २ १ १२ ३ सू. च.बु. ११ सूर्य चन्द्र बुध योग फल ज्ञान-
४ १० यदि रवि चन्द्र बुध का योग हो अर्थात् एक
५ ७ ९ राशि में तो जातक तेजस्वी, पूर्ण बुद्धिमान शस्त्रकला ६ ८ में निपुण, सभा व पान (मदिरादि) में लीन, राजा का कार्य करने वाला और धैर्यवान् होता है। २ १ १२ ३ सू. च. गु. ११ सूर्य चन्द्र गुरु योग फल ज्ञान- 1
४ १० जन्म कुण्डली में यदि सूर्य, चन्द्रमा, गुरु ५ ७ ९ एक राशि में हों तो जातक क्रोधी मायाचार में ६ ८ चतुर, सेवा कर्म में निपुण, विदेश गमन में लीन
२ १२ अर्थात् परदेश में रहने वाला, अत्यन्त बुद्धिमान ३ सू. च.शु. ११ और चञ्चल होता है। 4.0
४ १० सूर्य चन्द्र शुक्र योग फल ज्ञान- ५ ७ ९ जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र और शुक्र एक ६ ८ राशि में हों तो जातक दूसरे के द्रव्य हरण करने पर चतुर, परस्त्री आसक्त रहने वाला और शास्त्र में चतुर होता है।
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- 4 ७५६ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
सूर्य चन्द्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ स. च.श ११ जन्म कुण्डली में यदि सूर्य, चन्द्रमा, शनि ४ १० एक राशि में हों तो जातक काम शास्त्र में चतुर, ५ ७ ९ मूर्ख पराधीन और दरिद्र होता है। V
सूर्य मंगल बुध योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू. मं. बु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, मङ्गल और बुध ये तीनों ग्रह यदि एक ही राशि में बैठे हो तो जातक ४ १० प्रसिद्ध, कुश्ती लड़ने वाला, साहसी, निठुर, निर्लज्ज ५ ७ ९ ६ ८ और धन पुत्र स्त्री से रहित होता है।
२ १ १२ सूर्य मंगल गुरु योग फल ज्ञान- ३ सू. मं. गु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य मङ्गल गुरु की युति ४ १० हो तो जातक बोलने में चतुर, बड़ा धनवान्, ५ ७ ९ सलाहकार, सत्यवादी और स्वभाव से उदार होता ६ ८ है।
२ १२ सूर्य भौम शुक्र योग फल ज्ञान- १ ३ सू. म.शु. ११ जिस जातक के जन्म काल में यदि सूर्य, ४ १० मङ्गल, शुक्र एक राशि में हों तो वह जातक नेत्ररोगी, ५ ७ ९ अच्छे कुल में उत्पन्न, भाग्यशाली, कठोर वचन ६ ८ बोलने वाला और सम्पतिशाली होता है।
२ १२ सूर्य भौम शनि योग फल ज्ञान- ३ सू. म.श. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, मङ्गल, शनि एक १० राशि में हों तो जातक अङ्गहीन, धनहीन, रोगी, 4 ७
८ स्वजन रहित, और अत्यन्त मूर्ख होता है। 3
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सूर्य बुध गुरु योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ सू.बु. गु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, बुध, गुरु की युति
४ १० हो तो जातक नेत्र रोगी, सम्पत्ति-शाली, मूर्ख,
५ ७ ९ शास्त्रादि शिल्पविद्या एवं काव्यादि कार्य करने में ६ ८ लीन और सुन्दर लेखक होता है।
१२ सूर्य बुध शुक्र योग फल ज्ञान- २ ३ सू.बु.शु. ११ जन्म पत्रिका में यदि सूर्य, बुध शुक्र एक ४ १० राशि में हों तो जातक अत्यन्त दुखी, वाचाल, घुमने
५ ७ ९ में प्रवृत्ति वाला, एवं स्त्री के लिए दुखी होता है। ६ ८
सूर्य बुध शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू.बु.श. जन्म काल में सूर्य, बुध, शनि युति हो तो ११ जातक नपुंसक की तरह आचरण करने वाला, ४ १० द्वेषे, सबसे पराजित, बन्धु बान्धवों से त्यागा हुआ ५ ७ ९ ६ ८ होता है। .
: सूर्य गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ जन्म काल में यदि सूर्य, गुरु तथा शुक्र एक सू. गु. श. ११ ही राशि में स्थित हों तो इस प्रकार का जातक ४ १० कमजोर नेत्रों वाला, वीर, पण्डित, निर्धन, राजा ५ ९ का मन्त्री तथा दूसरे के कार्य में लीन रहने वाला ६ ८ होता है।
२ सूर्य गुरु शनि योग फल ज्ञान- १ १२ ३ सू. गु.शु. ११. जन्म काल में यदि सूर्य गुरु शनि एक राशि
४ में हों तो जातक असमान शरीर वाला पूजनीय, १० अपने लोगों से अनाहत, सुन्दर स्त्री पुत्र तथा मित्र ५ ७ ९ ६ ८ वाला राजा का प्रिय तथा निर्भय होता है।
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७५८ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
१ १२ सूर्य शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ ३ सू. शु.श ११ जन्मकाल में यदि सूर्य, शुक्र तथा शनि एक
४ १० राशि में स्थित हों तो वह जातक शत्रु के भय से दुखी, सम्मान, कला एवं काव्य से रहित, दूषित ५ ७
६ आचरण वाला और कोढ़ी होता है।
चन्द्र भौम बुध योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ चं.मं.बु. ११ जन्म काल में यदि चन्द्रमा, भौम, बुध एक राशि में हों तो पाप करने वाला, दुष्ट आचरण में ४ १० लीन, जीवन पर्यन्त मित्र व अपने बन्धुओं से रहित ५ ७ होता है। ६
चन्द्र भौम गुरु योग फल ज्ञान- २ १ १२ जन्म काल में यदि चन्द्र, भौम, गुरु एक ३ चं.म.गु. ११ राशि में हों तो जातक नम्र देह (पाठान्तर से घावों ४ १० से युत) स्त्री लोलुप, चोर, सुन्दर, स्त्रियों का प्रिय 4 ७ ९ ६ ८ व महाक्रोधी होता है।
चन्द्र भौम शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२ 3 चं. म.शु. ११ जन्म कुण्डली में यदि चन्द्रमा, भौम एवं
४ शुक्र एक राशि में हों तो जातक दुःशीला अर्थात् १०
शील (नम्रता) रहित, पुत्र व पति, घूमने की रुचि ५ ७ ९ ६ ८ वाला और ठण्ड से डरने वाला होता है।
चन्द्र भौम शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ चं.म.श ११ यदि जातक की कुण्डली में चन्द्र, भौम तथा शनि एक ही राशि में स्थित हों तो वह जातक ४ १० बाल्यावस्था में मातृ सुख से रहित, क्षुद्र स्वभाव, ५ ७ ९ ८ विषम बुद्धि व लोक (संसार) द्वेषी होती है। ६
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भृगु संहिता फल दर्पण ७५९
१२ चन्द्र बुध गुरु योग फल ज्ञान- २ १ ३ चं.बु.गु. ११ जन्म काल में यदि चन्द्र, बुध, गुरु एक ४ १० राशि में हों तो जातक धनी, रोगी, वक्ता, तेजस्वी,
4 ७ ९ विख्यात, विशाल कीर्ति वाला एवं अधिक भाई ६ ८ और पुत्रों से युक्त होता है।
चन्द्र बुध शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ चं.बु.शु. ११ जन्म काल में यदि चन्द्र, बुध, गुरु एक ४ १० राशि में हों तो जातक विद्या से सुसंस्कृत बुद्धिमान ७ ९ होकर भी दुष्टाचरण करने वाला सौम्य स्वभाव ८ वाला और धन का लोभी होता है। 1 २ १ १२ चन्द्र बुध शनि योग फल ज्ञान- ३ चं.बु.श ११ जन्म काल में यदि चन्द्र, बुध, शनि एक ४ १० राशि में हों तो जातक रोगी, विकल शरीर वाला, ५ ७ ९ पण्डित, वक्ता, पूजनीय और राजा होता है। ६ ८
चन्द्र गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२ ३ चं.ग.शु. जन्म काल में यदि चन्द्र, बुध, शनि एक ११ राशि में हों तो जातक पतिव्रता स्त्री का पुत्र पण्डित, ४ १० कलाओं को जानने वाला, बहुज्ञ, सज्जन, 4 ७ ९ ६ भाग्यशाली होता है। चन्द्र गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १२ ३ च. गु.श. ११ जन्म काल में यदि चन्द्र, गुरु तथा शनि
४ १० एक ही राशि में स्थित हों तो जातक शास्त्र के तत्व
७ का ज्ञाता, वृद्धा स्त्री का सङ्ग रखने वाला, गतरोग ९ ६ और किसी ग्राम का प्रधान होता है।
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७६० दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
१२ चन्द्र शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ ३ चं.शु.श. ११ जन्म काल में यदि चन्द्र शुक्र शनि एक ४ १० राशि में हों तो जातक लेखक, कथा वाचक, पुरोहित, ५ ७ ९ और ज्योतिषी पूर्व जन्म के पुण्य से होता है। ६ ८
भौम बुध गुरु योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ मं.बु.गु. जन्म काल में यदि मङ्गल बुध, गुरु एक ११ राशि में हों तो जातक अच्छा कवि, राजा, सज्जन ४ १० स्त्री का स्वामी, दूसरों के उपकार करने में लीन 4 ७ ९ ६ ८ एवं गान विद्या में चतुर होता है। भौम बुध शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ मं.बु.शु. ११ जन्म काल में यदि कुण्डली में मङ्गल, बुध, ४ शुक्र एक राशि में हों तो जातक कुलहीन विकलाङ्ग, १०
५ ७ चञ्चल, दृष्ट, वाचाल और प्रतिदिन उत्साह युक्त ९ ६ होता है।
भौम बुध शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ मं.बु.श. ११ जन्म कुण्डली में यदि मङ्गल, बुध, शनि ४ १० एक राशि में हों तो जातक सेवक या दरिद्र, कृष्ण ५ ७ ९ नेत्र प्रवासी, मुख का रोगी एवं हास्य प्रेमियों के ६ ८ साथ रमण करने वाला होता है। भौम गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२ ३ मं.गु.शु. ११ जन्म कुण्डली में यदि मङ्गल, बुध, शुक्र, ४ १० शनि एक राशि में हों तो जातक राजा का प्रिय पात्र ५ ७ ९ सत्पुत्रों से युत, स्त्रियों से सदा बहुत सुख प्राप्त ६ ८ करने वाला एवं समस्त लोगों का सुख दाता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७६१ भौम गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ मं.गू.श. ११ जन्म कुण्डली में यदि मङ्गल, गुरु, शनि ४ १० एक राशि में हों तो जातक राजा से संमत, भग्न देह, दृष्ट आचरण करने वाला, मित्रों से निन्दनीय ५ ७ ९
६ एवं घृणा से रहित होता है। भौम शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १२
३ मं.शु.श. ११ यदि जन्माङ्ग में मङ्गल, एक, शनि एक राशि
४ १० में हों तो जातक चरित्रहीन स्त्री का पुत्र और पति
५ ७ ९ (अर्थात् चरित्रहीन स्त्री का पति भी), सुख-साधनों ६ ८ से रहित और परदेशवासी होता है।
बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ बु.गु.शु. ११ जन्म कुण्डली में यदि बुध, गुरु, शुक्र एक
४ १० साथ हों तो जातक सुन्दर शरीर वाला, शत्रुहीन,
५ ७ ९ राजा, भाग्यवान्, यशस्वी, और सत्यवक्ता होता V ६ है। 1 २ १२ बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- ३ बु.गु.श. ११ जन्म कुण्डली में यदि बुध, गुरु, शनि एक ४ १० राशि में हों तो जातक धन ऐश्वर्य युक्त, पण्डित, ५ ७ ९ बहुत सुखभोगी, अपने स्त्री से प्रेम करने वाला, ६ ८ धैर्ययुत और भाग्यवान् होता है।
२ १ १२ बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ बु.शु.श. ११ जन्म कुण्डली में बुध, शुक्र, शनि एक साथ हों तो वाचाल, धूर्त, मिथ्यावादी, परस्त्रीगामी, ५ ७ ९ कलाकार और स्वदेश प्रिय होता है। ६ ८
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७६२ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ बु. ग. श ११ जन्म काल में यदि गुरु, शुक्र, शनि का ४ १० योग हो तो नीच कुलोत्पन्न जातक भी यशस्वी ५ ७ ९ राजा और सुशील होता है। ६ माता व पिता के सुख विचार- जन्म के समय चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो तो जातक मातृसुख से हीन और सूर्य पापयुक्त हो तो जातक पितृसुख से हीन तथा दोनों शुभग्रह से युत हों तो माता और पिता का सुख समझना चाहिए। मिश्र अर्थात् शुभाशुभ दोनों प्रकार के ग्रह युक्त हों तो मिश्रफल कहना चाहिए। शुभ ग्रहों के योग फल ज्ञान- जन्म के समय यदि परस्पर ३ ग्रहों की युति हो तो जातक धन, ऐश्वर्य, यश से युत राजा सदृश पृथ्वी के भूषण रूप अति श्रेष्ठ पुरुष का जन्म होता है। पाप ग्रहों के योग फल ज्ञान- जन्म के समय यदि जन्म काल में तीन पाप ग्रहों की युति हो तो जातक भाग्यहीन दरिद्र, दुखी कुरूप और विनयहीन होता है। अब आगे चार ग्रहों के योग का फल कहते हैं-
२ १२ सूर्य चन्द्र मंगल बुध योग फल ज्ञान- ३ स. च.म. ११ यदि जन्म के समय सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध ४ १० एक साथ हों तो जातक लिपिकर्ता या लेखक, ५ ७ ९ चोर, वाचाल, रोगी व चतुर मायावी होता है। ६ ८ सूर्य चन्द्र भौम गुरु योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ स. च. म यदि जातक के जन्म के समय सूर्य, चन्द्र, ११ ग. भौम एवं गुरु एक साथ हों तो वह जातक धनी, ४ १० स्त्री से निन्दित, तेजस्वी, नितिज्ञ, शोक से रहित, ५ ७ ९ ६ ८ कार्य करने में सक्षम व चतुर होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७६३
सूर्य चन्द्र भौम शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ स. च. म ११ यदि सूर्य, चन्द्र, भौम, शुक्र एक साथ हों तो जातक श्रेष्ठ उचित वाणी व व्यवहार वाला, ४ १० (पाठान्तर से उग्र अर्थात् तीक्ष्ण, जठराग्नि वाला) ५ ७ ९ सुखभोगी, चतुर, धन संग्रहकर्ता, विद्या पुत्र व ६ ८ स्त्री से युक्त होता है।
२ सूर्य चन्द्र भौम शनि योग फल ज्ञान- १ १२
३ सू. च. म ११ श यदि सूर्य, चन्द्र, भौम, शनि एक साथ हों ४ १० तो जातक न्यूनाधिक शरीर वाला, वामन (लघु), ५ ७ ९ धन हीन, भिक्षाशी और सर्व विदित मूर्ख होता है। V ६ सूर्य चन्द्र बुध गुरु योग फल ज्ञान- २ १२ यदि सूर्य, बुध, गुरु, चन्द्रमा एक साथ हों ३ स. च. बु. ११ तो जातक सुवर्ण (सोना) का कार्य करने वाला ४ १० (सुनार), बड़े नेत्र वाला कला का ज्ञाता, बड़ा ७ ९ धनवान, धैर्यधारी, (पाठान्तर से वीर) व रोगहीन, ६ ८ देहधारी, (पाठान्तर से गम्भीर) होता है।
सूर्य चन्द्र बुध शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू. च.बु. ११ यदि सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र एक साथ हों श्. ४ १० तो जातक व्यग्र, सुन्दर भाग्य वाला, प्रवक्ता, छोटे
4 ७ ९ कद वाला, पाठान्तर से नेत्र रोगी व पीत नेत्र वाला V व राजा का प्यारा होता है।
सूर्य चन्द्र बुध शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू. च. बु ११ जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्र, बुध, शनि श एक साथ हों तो जातक माता पिता से हीन, धन १०
५ ७ सुख से रहित, घूमने वाला, भिक्षाशी व असत्य ९ ६ ८ भाषी होता है।
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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण ७६४
सूर्य चन्द्र गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२ ३ स. चनु ११ जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शुक्र ४ १० एक साथ हों तो जातक जल हिरन व जङ्गल का ५ ७ ९ स्वामी, सुख भागी (पाठान्तर से राजा से सम्मानित) ६ व कुशल होता है।
१२ सूर्य चन्द्र गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १ ३ स्. च. गु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि श. ४ १० एक साथ हों तो जातक लाल नेत्र वाला, क्रोध ५ ७ ९ दृष्टि वाला, उग्र, अधिक पुत्र धन से युक्त और ८ श्रेष्ठ स्त्रियों का प्रिय पात्र होता है।
२ सूर्य चन्द्र शुक्र शनि योग फल ज्ञान- १ १२
३ स. च.शु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि श्. ४ १० एक साथ हों तो जातक स्त्री के समान आचरण ७ करने वाला अर्थात् जनखा, आगे चलने वाला, अत्यन्त ५ ९ ६ दुर्बल देहधारी व सब जगह भयभीत होता है। सूर्य भौम बुध गुरु योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ स.म.बु ११ जन्म काल में यदि सूर्य, भौम, बुध, गुरु एक साथ हों तो जातक वीर, सूत बनाने वाला वा ४ १० चक्की चलाने वाला और (ग्रन्थान्तर से साइकिल ५ ७ ९ वगैरह पर चलने वाला) स्त्री व धन से रहित, दुःखी ६ ८ अथवा घूमने वाला होता है।
१२ सूर्य भौम बुध शुक्र योग फल ज्ञान- २ ३ म. म.बु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, भौम, बुध, शुक्र ४ १० एक साथ हों तो जातक दूसरों की स्त्री में लीन, ९ चोर, असमान शरीर धारी, दुर्जन व दुर्बल होता है। 6
६ ८
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भृगु संहिता फल दर्पण ७६५
सूर्य भौम बुध शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ सू. म. बु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, भौम, बुध, शनि श
४ १० एक राशि हों तो जातक युद्ध करने वाला पण्डित,
५ ७ ९ उग्र, बुरे आचरण करने वाला प्रधान कवि, उत्तम ६ ८ सलाहकार अर्थात् मन्त्री अथवा राजा होता है।
२ १२ सूर्य भौम गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- OV ३ म. मगु ११ जन्म काल में सूर्य, भौम, गुरु, शुक्र एक ४ १० भाव में हों तो जातक सुन्दर भाग्य वाला, संसार में ५ ७ ९ सम्मानित, धनी, राजा से सम्मत, संसार में विख्यात %. ६ ८ और नीति का ज्ञाता होता है।
२ १२ सूर्य भौम गुरु शनि योग फल ज्ञान- ३ स.म.गु ११ जन्म काल में यदि सूर्य, भौम, गुरु शनि ४ १० एक घर में हों तो जातक पागल, जन समुदाय में
4 ७ ९ सम्मानित, प्रयोजन सिद्ध कर्ता, बन्धु व मित्र से ६ ८ युत और राजा का प्रिय होता है। सूर्य भौम शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ स.म.शु ११ जन्म काल में यदि सूर्य, भौम, शुक्र, शनि
४ १० एक राशि में हों तो जातक अशान्त चित्त असत्कार्यकर्त्ता, असमान दृष्टि वाला, बन्धुद्वेषी व ५ ७ ९ ६ ८ सब से पराजित होता है। सूर्य बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२ ३ जन्म काल में यदि सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र स.0 ब.ग. ११ एक साथ हों तो जातक धनी पूर्ण सुखी, मतलब १०
५ सिद्ध करने वाला, बन्धुओं से युत व श्रेष्ठ पुरुष ७ ९ ६ ८ होता है।
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दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण ७६६
सूर्य बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ स्. बु. . ११ जन्म काल में यदि सूर्य, बुध, गुरु, शनि ४ एक भाव में हों तो उत्पन्न जातक नपुंसक के समान १०
७ ९ आचरण करने वाला, अभिमानी, क्लेश प्रिय भाई ५
६ ८ से युक्त व उत्साह से हीन होता है। सूर्य बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ स.ब. शु. ११ जन्म काल में यदि सूर्य, बुध, शुक्र, शनि प्रा एक भाव में हों तो जातक वाचाल, सुन्दर भाग्य ४ १० वाला, पण्डित, सरल, सुखी, सत्त्वगुण व पवित्रता ५ ७ ९ से युक्त, धीर व मित्रों की सहायता की सहायता U ६ करने वाला होता है। सूर्य गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ . शू ११ जन्म काल में यदि कुण्डली में सूर्य, गुरु, १० शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक लोभी कवि, ५ ९ अध्यक्ष, शिल्पकरों का स्वामी, नीच अर्थात् दुष्टों ६ ८ का मुखिया व राजाओं का प्रिय होता है। चन्द्र भौम बुध गुरु योग फल ज्ञान- २ २ १२ ३ चं.म, बु, ११ जन्म काल में यदि पत्रिका में चन्द्र, भौम, ग् ४ १० बुध, शुक्र एक साथ हों तो जातक शास्त्रों में निपुण ५ ७ ९ राजा, सुयोग्य महान् मन्त्री अथवा बड़ी बुद्धि वाला ६ ८ होता है।
चन्द्र भौम बुध शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ चं.मं.बु. ११ जन्म काल में यदि पत्रिका में चन्द्र, भौम, श् बुध, शुक्र एक साथ हों तो जातक कलहप्रिय, ४ १०
अधिक सोने वाला अर्थात् आलसी, दुष्ट, कुलटा का ५ ७ ९ ६ ८ पति, सुन्दर, बन्धु का विरोधी और दुःखी होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७६७
चन्द्र भौम बुध शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ चं.म.बु. ११ जन्म काल में यदि जन्मकुण्डली में चन्द्र, श भौम, बुध, शनि एक साथ हों तो जातक वीर, ४ १० माता पिता के सुख से रहित, नीच कुल में उत्पन्न, ५ ७ ९ अधिक स्त्री व मित्र एवं पुत्र से युक्त अच्छे कार्य ६ ८ करने वाला होता है। चन्द्र भौम गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२
३ चं.मं. गु. ११ यदि चन्द्र, भौम, गुरु एवं शुक्र एक साथ हों श् तो जातक विकलाङ्ग सुन्दरी स्त्री वाला, सबको ४ १० सहन करने वाला (पाठान्तर से कष्ट सहनकर्त्ता) ५ ७ ९ अत्यन्त सम्मान से युक्त, पण्डित व अधिक मित्रों ८ के सुख को भोगने वाला होता है।
२ १२ चन्द्र भौम गुरु शनि योग फल ज्ञान- ३ चं.मं. गु. ११ चन्द्र, मंङ्गल, गुरु, शनि के योग से जातक श. ४ १० बहिर, धनी, वीर, उन्माद रोगी, बोलने में चतुर, ५ ७ ९ स्थिर स्वभाव, बुद्धिमान और उदार हृदय वाला ६ ८ होता है। चन्द्र भौम शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १२ ३ चं.मं.शु. ११ यदि कुण्डली में चन्द्र, मङ्गल, शनि एक श ४ १० साथ हों तो वह पुरुष कुलटा का स्वामी प्रौढ़ सांप
५ ७ ९ के समान नेत्र वाला तथा सर्वदा उद्वेगयुक्त होता है। V ६ चन्द्र बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२ यदि जन्म चक्र में चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र ३ चं.बु.गु. ११ श् एक साथ में हों तो जातक विद्वान् माता-पिता से ४ १० रहित सुरूप धनवान, सौभाग्यवान् तथा शत्रु रहित ५ ७ ९ ८ होता है। ६
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७६८ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
चन्द्र बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ चं.ब्. गु. ११ यदि चन्द्र, बुध, गुरु, शनि एक साथ हों तो श. ४ १० जातक धर्मात्मा यशस्वी श्रेष्ठ, तेजस्वी, बन्धुओं ५ ७ ९ का प्रिय, बुद्धिमान्, राजमन्त्री और श्रेष्ठ कवि होता ६ ८ है।
२ १ १२ चन्द्र बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ च.बु.शु ११ यदि जन्माङ्ग में चन्द्र, बुध, शनि एक राशि श ४ १० में हों तो परस्त्रीगामी, दुःशीला स्त्री का पति, विपत्ति ५ ७ ९ से युक्त बन्धु वाला, पण्डित तथा संसार का द्वेषी V ६ होता है।
२ १ १२ चन्द्र गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ चं.गु.शु. ११ जन्माङ्ग में चन्द्र, गुरु, शुक्र, शनि के योग ४ १० होने से जातक मातृविहीन, सौभाग्य-शाली, चर्मरोगी, ५ ७ ९ ८ दुःखी, भ्रमणशील, बहुत बोलने वाला और सत्य ६ में रत होता है।
२ १ १२ भौम बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- ३ मं.बु.गु ११ शू. यदि जन्माङ्ग में मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र का ४ १० योग हो तो स्त्री से कलह करने वाला, धनी, ५ ७
८ लोकमान्य, सुशील एवं नीरोग शरीर वाला होता है। ६
भौम बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १२ OV ३ म.बु.ु. यदि मङ्गल, बुध, गुरु, शनि का योग हो तो ११ श जातक पण्डित, वक्ता, धनहीन, सत्य और शौच ४ १० से बोलने वाला, कष्ट सहनशील और बुद्धिमान ९ होता है। ६
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भृगु संहिता फल दर्षण ७६९ भौम बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ म.बु.शु ११ यदि जन्माङ्ग में मङ्गल, बुध, शुक्र, शनि का श ४ १० योग हो तो जातक योद्धा दूसरों से पोषित, कठिन
५ ७ ९ शरीर वाला, युद्ध में स्वाभिमान, रखने वाला विख्यात V ६ और कुत्तों से पालने वाला होता है। भौम गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १२
३ म.गु.शु. १६ यदि जन्माङ्ग में मङ्गल, गुरु, शुक्र, शनि के श ४ १० योग से जातक तेजस्वी, धनवान, स्त्रैण, साहसी, ५ ७ ९ चञ्चल और धूर्त होता है। ६ ८
बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १२ ३ बु.गु.शु. यदि बुध, गुरु, शुक्र, शनि का योग हो तो ११ जातक (जन्म लेने वाला) मेधावी, शास्त्राभ्यासी, ४ १० स्त्री में आसक्त और (आज्ञाकारी नौकरों वाला)
५ ७ ९ होता है।
६ अब आगे पञ्चग्रहयोग का फल जैसा महर्षियों V
ने कहा है, वैसा ही कहते हैं- २ १ १२ सूर्य चन्द्र भौम बुध गुरु योग फल ज्ञान- ३ सू.च. मं. ११ ब.गु यदि कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध एवं ४ १० गुरु एक भवन में हों तो जातक दुःखी, अधिक ५ ७ ९ ६ प्रपञ्ची व स्त्री के वियोग से तप्त देहधारी होता है। V
सूर्य चन्द्र भौम बुध शुक्र योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू. च.म. यदि कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गु. श्. ११ शुक्र एक भवन में हो तो जातक दूसरों के कार्य में ४ १० लीन, बन्धु और मित्रों के बल से हीन अर्थात् बन्धु ५ ७ ९ मित्रों से दुःखी एवं नपुंसकों से मित्रता करने वाला ६ ८ होता है। 5. सं. - ४९
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७७० दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
सूर्य चन्द्र भौम बुध शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२
३ स. च.म. ११ यदि कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, ब.श ४ १० शनि एक भवन में हो तो जातक थोड़ी आयु वाला
७ कारागार में वृद्ध, दीन, समस्त सुख से हीन एवं ५ ९
६ ८ स्त्री पुत्र धन से रहित होता है। सूर्य चन्द्र भौम गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २ १२
३ सू.चं. मं. ११ यदि जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, ब.श. गुरु, शुक्र एक भवन में हो तो जातक जन्म से ४ १० अन्ध, अत्यन्त दुःखी, माता-पिता से सदा संत्यक्त ५ ७ ९ अर्थात् माता पिता के सुख का अभाव तथा गान ६ ८ (संगीत) में अभिरुचि रखने वाला होता है।
सूर्य चन्द्र भौम गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १२ ३ सू. च. मं. ग.श. ११ यदि जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, गुरु, शनि एक भवन में हों तो जातक युद्ध में ४ १० निपुण, सामर्थ्यवान्, दूसरों के धन का हरण करने ५ ९ वाला, अन्य लोगों को कष्टदायी अथवा चुगलखोर ८ एवं दुष्ट स्वभाव का होता है।
२ १२ सूर्य चन्द्र भौम शुक्र शनि योग फल ज्ञान- १
३ सू. च. म. ११ श.श यदि कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, भौम, शुक्र तथा ४ १० शनि एक ही भवन में हों तो जातक सम्मान धन, ५ ७ ९ वैभव से रहित, दुष्ट आचरण कर्ता व दूसरों के स्त्री ६ ८ में लीन होता है।
२ २ १२ सूर्य चन्द्र बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- ३ सू. च. बु. ग. शु. ११ यदि जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, ४ १० शुक्र एक भवन में हो तो जातक मशीनरी का ज्ञाता, अधिक धनी, राजा का मन्त्री, न्यायाधीश, विख्यात ५ ७ ९ ६ ८ और अच्छे यश वाला होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७७१
१२ सूर्य चन्द्र बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १
३ सू. च. बु. ग.श. ११ जन्म पत्री में रवि, चन्द्र, बुध, गुरु तथा शनि ४ १० एक साथ हों तो वह जातक डरपोक, शुभ चिन्तकों ७ ९ से रहित, उन्मादी, रोग युक्त, कपट में निपुण, उग्र 5
६ ८ और परान्नभोक्ता होता है।
१२ सूर्य चन्द्र बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ ३ सू. च. बु. ११ श.श जन्माङ्ग में रवि, चन्द्र, बुध, शुक्र, शनि के ४ १० योग से जातक लम्बा कद रोम युक्त शरीर वाला, ५ ७ ९ मरने तक का उत्साह रखने वाला, सुख, धन एवं ६ पुत्र रहित होता है।
२ १२ सूर्य चन्द्र गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ सू.च. गु. ११ शू.श. यदि जन्माङ्ग में सूर्य, चन्द्र, गुरु, शुक्र, शनि ४ १० के योग से वक्ता, इन्द्रजाल जानने वाला, चञ्चलचित्त ५ ७ ९ स्त्री का प्रिय, बुद्धिमान, बहुत शत्रु वाला और निर्भय द ८
होता है।
२ १ १२ सूर्य भौम बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- ३ सू. मं. बु. गु.शु. ११ यदि जन्माङ्ग में सूर्य, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र ४ १० के योग से जातक कामी, बहुत घोड़ा रखने वाला, -
५ ७ ९ पुण्यवान्, सेनापति, शोकरहित राजा का प्रिय और ८ सौभाग्यवान् होता है। m
सूर्य मंगल बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू.म.बु. ११ यदि जन्माङ्ग में रवि, मङ्गल, बुध, गुरु, शनि ग. श ४ १० के एक राशि में होने से जातक सदा उद्विग्न, रोगी, घर-घर भीख माँगने वाला, पुराना मैला वस्त्र पहनने 4 ७ ९ ६ ८ वाला होता है।
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७७२ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
१२ चन्द्र मंगल बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १
३ च. मं. बु. ११ जन्माङ्ग में चन्द्र, मङ्गल, बुध, शुक्र, शनि के श.श.
४ १० योग होने पर जातक मृत्यु, बन्धन और रोग से ७ ९ पीड़ित लोक में मान्य और रोग से व्यथित, विद्वान्, ६ ८ निर्धन और विकल शरीर वाला होता है।
१२ सूर्य मंगल बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १
३ स.म. ब्. ११ श.श. जन्माङ्ग में रवि, मङ्गल, बुध, शुक्र एवं शनि ४ १० के योग से जातक रोग और शत्रु से पीड़ित, ५ ७ ९ स्थानहीन, दुःख से युक्त, सदा क्षोभ रहित होकर ६ भ्रमण करने वाला होता है।
२ १ १२ चन्द्र भौम गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञाने- ३ चं.म.गु. ११ श.श जन्माङ्ग में चन्द्र, मङ्गल, गुरु, शुक्र, शनि के ४ १० योग से जातक नपुंसक, नीच आचरण वाला, दुर्भाग्य ५ ७ ९ युक्त, विकल और धनहीन होता है। V
सूर्य भौम गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ जन्माङ्ग में सूर्य, मङ्गल, गुरु, शुक्र, शनि के ३ स.म. गु. ११ श.श. योग से जातक जलयन्त्र, धातु, पारा आदि रसायन ४ १० निर्माण क्रिया में निपुण और इन्हीं कार्यों को प्रसिद्ध ५ ७ ९ ६ ८ कार्य मानने वाला होता है। सूर्य बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू. बु. गु. जन्माङ्ग में रवि, बुध, गुरु, शुक्र, शनि के ११ श.श. योग से जातक बहुत शास्त्र जानने में निपुण, मित्र ४ १० और गुरुजनों का प्रिय, धर्मात्मा और दयालु होता ५ ७ ९ ६ है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७७३
१ १२ चन्द्र भौम बुध गुरु शुक्र योग फल ज्ञान- २
३ चं.मं.बु. गु.शु. ११ जन्माङ्ग में चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, ४ १० शुक्र के योग से जातक सज्जन, नीरोगी शरीर, विद्या, ५ ७ ९ धन और सुख से सम्पन्न, बन्धुओं का हित और V ६ बहुत मित्र वाला होता है। चन्द्र भौम बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ चं.म.बु. ११ गु.श जन्माङ्ग में चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शनि के ४ १० योग से जातक आँख का रोगी, दरिद्र, परान्नभोगी, ५ ७ ९ दीन और अपने बन्धु वर्गो को लज्जित करने वाला ६ होता है।
२ १२ चन्द्र भौम बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ चं.मं.बु. शू.श. ११ यदि कुण्डली में चन्द्र, भौम, बुध, शुक्र, ४ १० शनि एक भाव में हों तो जातक अधिक शत्रु व ५ ७ ९ ८ मित्रों से युक्त, परोपकारी, विपरीत स्वभाव वाला ६ 1 एवं अधिक अहंकारी होता है।
२ १२ चन्द्र बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ चं.बु. गु. श.श ११ यदि चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि एक साथ ४ १० हों तो जातक राज्य सचिव या राजा के समान, ५ ७ ९ समुदाय का स्वामी एवं सर्वमान्य होता है। ६ ८
भौम बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ म.वु. गु. यदि भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि एक ही ११ श.श भवन में हों तो जातक सुन्दर मन चित्त वाला, ४ १० उन्मादी, राजा का प्रिय पात्र, शोक से रहित, निद्रालु ५ ७ ९ ६. ८ एवं निर्धन होता है।
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७७४ दो तीन आदि ग्रह योग प्रकरण
अब आगे छः ग्रहों के योग का फल प्रस्तुत किया जा रहा है- एक राशि में सूर्य चन्द्र भौम बुध गुरु शुक्र २ १ १२ ३ योग फल ज्ञान- सू. चं. मं.बु. ११ गु. शु. यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, ४ १० शुक्र एक स्थान में हों तो जातक विद्या वित्त धर्म में ५ ९ लीन कृश, देहधारी अधिक भाषी (बहुभाषी) एवं ६ C विशिष्ट बुद्धिमान् होता है। २ १२ सूर्य चन्द्र भौम बुध गुरु शनि योग फल ज्ञान- १
३ सू. चं. मं. बु. ११ यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, ग.श. ४ १० शनि एक स्थान में हों तो जातक दानी, परोपकारी, ५ ७ ९ अस्थिर स्वभाव वाला, संत एवं गुणी, निर्जन स्थान ६ ८ में रमण करने वाला होता है। सूर्य चन्द्र भौम बुध शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ सू. चं. म.बु. ११ यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, शुक्र, श.श. शनि एक स्थान में हों तो जातक चोर, परस्त्रीगामी, ४ १० कोढ़ी, अपने मनुष्यों से निरादर पाने वाला, मूर्ख, ५ ७ ९ स्थान से च्युत एवं पुत्रहीन होता है। ६ सूर्य चन्द्र भौम गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ यदि सूर्य, चन्द्र, भौम, गुरु, शुक्र, शनि एक सू. च. म.गु. श.श. ११ स्थान में हों तो जातक दुष्ट, दूसरों के कार्य में लीन ४ १० वा करने वाला, क्षय रोगी (टी.वी. का रोगी), ५ ७ ९ श्वास व खाँसी से पीड़ित देहधारी और भाई बन्धुओं ६ ८ में निन्दित होता है। २ १२ सूर्य चन्द्र बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- ३ स. चं. बु. गु. ११ यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, श.श. ४ १० शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक राजा का मन्त्री, ५ सौभाग्यवान्, क्षमा से युक्त, शोक से पीड़ित एवं स्त्री ९ ६ ८ और धन से रहित होता है।
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१ १२ सूर्य मंगल बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- - २ ३ सू. म.बु. गु. ११ यदि जन्माङ्ग में सूर्य चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शु.श. शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक तीर्थ में सदा ४ १० रमण करने वाला, धन व पुत्र से हीन, वन या पर्वत ५ ७ ९ का सेवन करने वाला होता है। ६
चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि योग फल ज्ञान- २ १ १२ ३ चं.मं.बु. गु. ११ यदि जन्माङ्ग में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, श.श. ४ १० गुरु, शुक्र, शनि एक साथ हों तो जातक सदा
५ ७ पवित्र, प्रतापी, अधिक स्त्रियों में लीन, राजा का ९ ६ ८ प्यारा, राज्य मन्त्री, धन, पुत्र व सौभाग्य से युत होता है। कन्दल के मत से पांच या छः ग्रहों के योग फल ज्ञान- यदि जन्माङ्ग में पाँच या छः ग्रहों का योग हो तो जातक विशेष कर दरिद्र, दुःखी और मूर्ख होता है। जिस प्रकार ग्रहों की युति होने पर फल कथन किया है, उसी प्रकार परस्पर दृष्टि होने पर भी कन्दलाचार्यों के मत में फल होता है।
सन्यास योग प्रकरण सन्यास योगों का वर्णन- यदि जन्म के समय चार या चार से अधिक ग्रह एक स्थान में हों तो कितने मनुष्यों ने तापस (प्रव्राजक = सन्यासी आदि) योग के भेद विस्तार पूर्वक कहे हैं। उन योगों में तपस्वियों का जन्म होता है। उन सब योगों को यहाँ कहा जा रहा है। तपस्वी योग- यदि जन्माङ्ग में सूर्य, चन्द्र, बुध, भौम अथवा सूर्य, मङ्गल, शनि, बुध, शुक्र एक राशि में हों तो जातक तपस्वी होता है। प्रव्राजक योग- यदि मंगल, चन्द्र, सूर्य, बुध, गुरु, रवि, चन्द्र, शनि, बुध वा सूर्य, चन्द्र मंगल, शनि एक राशि में हों तो जातक सन्यासी होता है। अन्य तपस्वी योग- यदि रवि, गुरु, शनि, बुध अथवा मंगल, रवि, बुध, गुरु एक स्थान में हों तो तपस्वी का जन्म होता है। यदि शुक्र, रवि, मंगल, शनि, चन्द्र, गुरु, शनि सबल होकर एक साथ हों तो तपस्वी का जन्म होता है।
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७७६ सन्यास योग प्रकरण व्रती योग- यदि मंगल, शनि, बुध, गुरु ; मंगल, शनि, बुध, सूर्य, शुक्र अथवा सूर्य, चन्द्र, मंगल, शनि, शुक्र एक साथ हों तो जातक व्रती होता है। वनपर्वतस्थ तपस्वी योग- यदि शुक्र, मंगल, शनि, गुरु, रवि वा मंगल, शनि, चन्द्र, गुरु, बुध, शनि वा शुक्र, बुध, शनि, चन्द्र, मंगल एक राशि में हों तो जातक वन पर्वत पर रहने वाला तपस्वी होता है। अन्नत्यागी मुनि योग- यदि चन्द्र, बुध, मंगल, गुरु, सूर्य अथवा चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल एक स्थान में हों तो लोगो का वन्दनीय अन्नत्यागी मुनि होता है। व्रती योग- यदि सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र वा चन्द्र, मंगल, शनि, बुध, गुरु, रवि अथवा मंगल, चन्द्र, रवि, शनि, शुक्र, बुध एक साथ हों तो जातक व्रती होता है। यशस्वी मुनि योग- शुक्र, चन्द्र, बृहस्पति, शनि, रवि, मंगल अथवा शुक्र, सूर्य, बृहस्पति, शनि चन्द्र, बुध, एकत्र हों तो बहुत यशस्वी होता है। तपस्वी योग- यदि मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, रवि अथवा शुक्र, शनि गुरु, बुध, चन्द्र मंगल ये सबल होकर एक स्थान पर हो तो तपस्वी जन्म होता है। फल-मूल-भक्षक तपस्वी योग-सूर्य, चन्द्र, गुरु, शनि या शनि चन्द्र, रवि शुक्र इन योगों में जातक फल- मूलभक्षी, तपस्वी होता है। वल्कलधारी व्रती योग- मंगल, सूर्य, बुध, शुक्र अथवा मंगल, चन्द्र, गुरु, बुध एक स्थान में हों तो जातक वल्कलधारी तपस्वी होता है। शान्त तपस्वी योग- चन्द्र, बुध, मंगल, शनि वा बुध, मंगल, गुरु, शनि इन दोनों योग में जन्म लेने वाला परम शान्त, तपस्वी होता है। फल भक्षक व्रती योग- चन्द्र, रवि, शुक्र, बुध अथवा मंगल, बुध, शुक्र, शनि अथवा शनि, चन्द्र, गुरु एवं शुक्र बली होकर एकत्र हों तो जातक फल मात्र भोजन करने वाला तथा तपस्वी होता है। पर्वत वनवासी तपस्वी योग- रवि, मंगल, चन्द्र, शुक्र वा चन्द्र, मंगल बुध, रवि वा गुरु, शुक्र, रवि, शनि वा शुक्र, गुरु, चन्द्र, मंगल वा मंगल, बुध, शुक्र, चन्द्र एकत्र हो तो जातक पर्वत वन में वास करने वाला, सबों का वन्दनीय तपस्वी होता है। दुःखी मुनि योग- यदि शुक्र, चन्द्र, मंगल, गुरु, शनि अथवा चन्द्र, बुध, मंगल, गुरु अथवा सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु एक साथ हों तो इन योगों में जातक तपस्वी होकर भी दुःखी होता है। जटाधारी वल्कलवस्त्रधारी मुनि योग- सबल मंगल, शनि, गुरु, शुक्र, बुध वा शनि, रवि, बुध, चन्द्र, मंगल बलवान् होकर साथ हो तो जटा और
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भृगु संहिता फल दर्पण ७७७ वल्कलधारी होता है। तपस्वी योग- सूर्य, बुध, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र वा सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र, शनि एक राशि में हों तो इन दोनों में जातक अवश्य ही तपस्वी होता है। प्रव्रज्याभंग योग- यदि प्रव्रज्याकारक ग्रह सूर्य के साथ हो तो प्रव्रज्या में भक्ति (श्रद्धा) मात्र रखता है, उसमें आसक्त नहीं होता है। प्रव्रज्याकारक ग्रह आदि अन्य ग्रहों से पराजित हो तो प्रव्रज्या ग्रहण करके उसका त्याग कर देता है। यदि बहुत ग्रह प्रव्रज्याकारक हो तो बहुत प्रकार की प्रव्रज्या होती है परञ्च वे ग्रहों के बल के क्रम से होती है। अन्य प्रव्रज्या भंग योग- प्रव्रज्याकारक ग्रह यदि सूर्य के साथ अस्त (लुप्तविम्व) हो या अन्य ग्रहों से दृष्ट हो तो वह दीक्षा की याचना मात्र करता है किन्तु दीक्षित नहीं होता है, ऐसा यवनाचार्यों का कथन है। एकस्थ चार आदि ग्रहों के बिना प्रव्रज्या योग का ज्ञान- चन्द्रमा यदि शनि के द्रेष्काण में शनि, मंगल से दृष्ट हो अथवा भौम के नवांश से शनि से दृष्ट हो तो जातक तपस्वी होता है, वह नवांश पति की प्रव्रज्या को ग्रहण करता है। प्रकारान्तर से प्रव्रज्या योग- जन्म के राशि पर यदि शनि की दृष्टि हो अन्य किसी ग्रह की दृष्टि न हो तो राशीश अपनी प्रव्रज्या को करता है, किन्तु यहाँ पूर्वोक्त योग भी देखना चाहिये, अस्तत्व और सबलत्व का विचार करना चाहिए। भाग्यहीन प्रव्रज्या योग- जन्माङ्ग में जन्मराशीश यदि विपुल बिम्ब होकर केन्द्रगत बली होकर शनि को देखता हो तो जातक भाग्यहीन होकर प्रव्रजित अर्थात् सन्यासी होता है। दुःखी सन्यासी योग- जन्माङ्ग में यदि गुरु, चन्द्र, रवि में से एक भी निर्बल होकर लग्न या दशम या १२वें भाव में हो उस पर प्रबल शनि की दृष्टि हो तो जातक भाग्यहीन अर्थात् दुःखी सन्यासी होता है। नृप सन्यासी योग- जन्माङ्ग में यदि बली चन्द्रमा शुभ ग्रह के नवमांश में दशम भाव में हो और शेष ग्रह अपने उच्च में हो, उन सबको बली शनि देखता हो तो इस योग में जातक स्वतन्त्र राजा होकर दीक्षित होता है। दुःखित सन्यासी योग-जन्माङ्ग में शुक्लपक्ष में चन्द्रमा पूर्णबली होकर बलहीन लग्नेश को देखता हो तो जातक धन जनहीन, दुःखी, शोक से युत होकर तापस होता है और कष्ट से अन्नप्राप्त करता है। अन्य योग-जन्माङ्ग में यदि शनि शुभ ग्रह के नवांश में होकर कुम्भ नवांश गत चन्द्र तथा अन्य ग्रहों को देखता हो तो जातक सन्यासी होता है। अन्य सन्यास योग- यदि जन्मराशीश एक राशीश में होकर सभी ग्रहों
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७७८ नाभस योग प्रकरण से दृष्ट हो तो जातक अवश्य ही सन्यासी होता है। प्रव्रज्याकारक सूर्य फल ज्ञान- कुण्डली में सूर्य प्रवज्या कारक हो तो जातक पर्वत या नदी के तीर में अग्नि सेवन करने वाले सूर्य के उपासक गणेश तथा पार्वती के आराधक गायत्री जप करने वाले नित्य गंगा स्नान करने के नियम वाले और ब्रह्मचर्य व्रत सन्यासी होता है। प्रव्रज्याकारक चन्द्र फल ज्ञान- कुण्डली में प्रवज्या कारक चन्द्र हो तो शरीर में भस्म लगाने वाले वृद्ध श्रावक महादेव के व्रती और जो पतित रूप होकर समाज से बाहर होते हैं, जो पतित होकर भगवती के उपासक होते हैं, जो एकान्तवास करते हैं, जो सोम सिद्धान्त में रहते हैं, जो निष्ठुर कपालिक होते हैं। प्रव्रज्याकारक भौम फल ज्ञान- पत्री में मंगल प्रवज्या कारक हो तो बौद्धमतोपासक, शिखाविहीन, श्वेताम्बरधारी भिक्षु होते हैं, जो रक्ताम्बरधारी और जितेन्द्रिय होते है। प्रव्रज्याकारक बुध-जिनकी कुण्डली में प्रव्रज्याकारक बुध हो तो जातक भिक्षु, ऐन्द्रजालिक, सर्पविषहर्ता, मयूरपंखाधारी होता है। प्रव्रज्याकारक गुरु- यदि गुरु प्रवज्या कारक हो तो एक दण्डी, त्रिदण्डी, गेरुआ वस्त्रधारी, वानप्रस्थी, फलाहारी, जलाहारी, गृहस्थाश्रम में ही नियम रखने वाला ब्रह्मचारी, तीर्थसेवी होता है। प्रव्रज्याकारक शुक्र-यदि प्रवज्या कारक शुक्र हो तो शैव सम्प्रदाय, वैष्णवसम्प्रदाय एवं चक्रधारी होता है। प्रव्रज्याकारक शनि- यदि प्रवज्या कारक शनि हो तो पाखण्डव्रती (मिथ्यादम्भ करने वाले) नग्न होकर वन में वृक्ष के नीचे रहने वाला होता है। उपसंहार- उपरोक्त प्रव्रज्या योग में यदि राजयोग भी हो तो अशुभ फलों को नाश कर परम सुशील, सब राजाओं के वन्दनीय पृथ्वीपति होकर दीक्षित होता है।
नाभस योग प्रकरण यवनादि आचार्यों ने विस्तारपूर्वक १८०० प्रकार के नाभस योग कहे हैं, मैं उन योगों को ३२ प्रकार (भेद) से ही कहता हूँ। प्रिय पाठक! यहाँ ध्यान दें-यवनोक्त १८०० भेद इन ३२ योगों के अन्तर्गत ही होते हैं। बत्तीस नाभस योगों के नाम-१ नौ, २ छत्र, ३ कूट, ४ चाप, ५ शृङ्गाटक, ६ वज्र, ७ दामनी, ८ पाश, ९ वीणा, १० कमल, ११ मुसल, १२ वापी, १३ हल, १४ शर १५ समुद्र, १६ चक्र, १७ माला, १८ सर्प, १९ अर्धचन्द्र, २० यव, २१ केदार, २२ गदा, २३ पक्षी २४ यूप, २५ युग, २६ शकट,
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भृगु संहिता फल दर्पण ७७९ २७ शूल, २८ दण्ड, २९ रज्जु, ३० शक्ति, ३१ नल और ३२ गोल योग हैं; इन्हीं ३२ योगों में समस्त चराचर के जन्म होते हैं। इनमें-मुसल, रज्जु तथा नल ये ३ आश्रय नामक योग माणित्थाचार्यों ने कहे हैं। बत्तीस में से सात योगों का संख्या ज्ञान- गोल, युग, शूल, पाश, वीणा, केदार, दामनी ये ७ संख्या नामक योग सभी पूर्वाचार्यों ने कहे हैं। दल संज्ञक व आकृति संज्ञक योग का ज्ञान-सर्प, माला ये २ योग दल नाम से पराशर ऋषि द्वारा कहे गए हैं। तथा २० योग आकृति नाम से सवित्राचार्यों द्वारा कहे गए हैं। आश्रय योग फल ज्ञान- अन्य योगों से हीन (अमिश्रित) आश्रय योग में जन्म लेने वाला जातक सुख लाभ गुण से युक्त होता है। यदि आश्रय योग अन्य योगों से मिला हुआ हो तो आश्रय योगोक्त फल नहीं होता है। आकृति योगों में उत्पन्न फल ज्ञान- आकृति योगों में जन्म लेने वाला भाग्य से ही आनन्दित, राजा से धन प्राप्त करने वाला, राजा का प्रिय और प्रख्यात पुरुष होता है। सङ्ग्यायोग में उत्पन्न जातक फल ज्ञान-संख्यायोगों में उत्पन्न होने वाला पुरुष दूसरे के भाग्य से ही सुखी और दूसरे के भाग्याधीन अशान्त जीवन व्यतित करने वाला होता है। दल योग में उत्पन्न जातक फल ज्ञान-अर्ध (दल) योग में उत्पन्न पुरुष, कभी स्वभाग्य से, कभी दूसरों के द्वारा अनायास, कभी सुखी और कभी दुःखी होता है। पाठक ध्यान दें-यहाँ वास्तव में शुभ और पाप ग्रह से दो प्रकार के दल योग होते हैं उनमें शुभ ग्रह से उत्पन्न योग में सुख और पाप ग्रहोत्पन्न योग में दुःखी होता है। ऐसा पराशर का मत है। नौ कूट छत्र-चाप योगों के लक्षण- लग्नादि ४ चारों केन्द्र से आरम्भ कर सात ग्रह ७ स्थान में हों तो क्रम से नौका, कूट, छत्र और चाप योग होते हैं। अभिप्राय यह है कि कुण्डली में लग्न से सप्तम पर्यन्त लगातार ७ ग्रह हो तो नौका योग, चतुर्थ से दशम पर्यन्त लगातार ७ ग्रह हों तो कूट योग और सप्तम से लग्न तक ७ ग्रह होने पर छत्र योग एवं दशम से चतुर्थ तक लगातार ७ ग्रह हों तो चाप योग होता है। यह यवनाचार्यों का कथन है। वास्तव में मध्य भारत (काशी आदि प्रधान स्थान) में ऊर्ध्व याम्योत्तर वृत्त में दशम लग्न सर्वदा खस्वस्तिक से दक्षिण ही रहता है तथा चतुर्थ लग्न अधो याम्योत्तर वृत्त में उत्तर भाग में ही रहता है। इसलिये प्रथम (उदय) लग्न पूर्व, चतुर्थ लग्न उत्तर, सप्तम (अस्त) लग्न पश्चिम और दशम लग्न दक्षिण दिशा में (ऊपर) रहता है। राशि चक्र (कुण्डली) देखिये।
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७८० नाभस योग प्रकरण यूप-शर-शक्ति-दण्ड योग का ज्ञान- किसी भी जातक के पत्रिका में लग्न से चतुर्थ पर्यन्त सभी ग्रह हों तो यूपयोग होता है। चतुर्थ से सप्तम पर्यन्त सब ग्रह हों तो शरयोग होता है तथा सप्तम से दशम पर्यन्त सब ग्रह हों तो शक्ति योग और दशम से लग्न तक सभी ग्रह हों तो दण्डयोग होता है। ये योग सत्याचार्योक्त हैं। अर्द्धचन्द्र व गदा योग लक्षण- केन्द्र से भिन्न स्थान से आरम्भ करके ७ स्थान में लगातार ग्रह हों तो अर्धचन्द्र नामक योग होता है तथा समीपस्थ दो दो केन्द्र में सब ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है। यहाँ अर्धचन्द्र योग ८ प्रकार का होता है। (१) द्वितीय से अष्टम पर्यन्त, (२ ) तृतीय से नवम पर्यन्त, (३) पञ्चम से एकादश पर्यन्त, (४) षष्ठ से द्वादश पर्यन्त, (५) अष्टम से द्वितीय तक, (६) नवम से तृतीय, (७) एकादश से पञ्चम, (८) द्वादश से षष्ठ पर्यन्त ये आठ भेद कहे गए हैं। गदा योग ४ प्रकार का होता है। (१) लग्न से चतुर्थ तक सभी ग्रह, (२) चतुर्थ से सप्तम तक सभी ग्रह, ( ३ ) सप्तम से दशम तक सभी ग्रह, (४ ) दशम से लग्न पर्यन्त सभी ग्रह हो तो गदा नामक योग होता है। वज्र व यव योग का- यदि लग्न और सप्तम में केवल सब शुभ ग्रह हो, अथवा चतुर्थ दशम में केवल सब पाप हो तो दोनों स्थिति से वज्र योग होता है। इससे विपरीत (अर्थात् लग्न सप्तम में सब शुभ ग्रह) हो तो दोनों स्थिति में यव योग होता है। पूर्व (प्रथम) लग्न में सब शुभग्रह हों तो पूर्व वयस में तथा पश्चिम (सप्तम) लग्न में शुभ ग्रह हो तो पश्चिम (अन्त्य) वयस में शुभ फल को देता है। यदि दोनों में शुभ ग्रह हो तो दोनों वयस में शुभ फल देता है। अतः उसका नाम वज्र रक्खा गया क्योंकि वज्र के दोनों (मूल और अग्र) भाग में शक्ति रहती है। शकट, विहग, हल व शृंगाटक योग-यदि जन्माङ्ग में लग्न और सप्तम में सभी ग्रह हों तो शकट योग, चतुर्थ दशम में सभी ग्रह हों तो विहग योग होता है। लग्न से भिन्नस्थान त्रिकोण (१/५/९) में सब ग्रह हो तो हल और लग्न से त्रिकोण में सब ग्रह हो तो शृङ्गाटक होता है। चक्र व समुद्र योग- जन्माङ्ग में लग्न से आरम्भ कर १ राशि अन्तर करके ६ स्थानों में अर्थात् १, ३, ५, ७, ९, ११ में सब ग्रह हों तो चक्र योग तथा द्वितीय भाव से आरम्भ कर एक अन्तर करके ६ भावों में सब ग्रह हों अर्थात् २,४, ६,८, १२ में सभी ग्रह हों तो समुद्र योग होता है, इस प्रकार ये २० आकृति योग यहाँ कहा है। अब आगे वृद्ध गर्गादि का मत का आश्रय लेकर योगों को कहा जा रहा है-
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भृगु संहिता फल दर्पण ७८१ नल, मुसल, रज्जु, माला, सर्प योग-सब ग्रह द्विस्वभाव में हो तो नल, स्थिरराशि में हो तो मुसल और चर राशि में हो तो रज्जु योग होता है। तथा केन्द्र में केवल सब शुभ ग्रह हो तो माला योग, सब पाप ग्रह केन्द्र में हो तो सर्प योग होता है। सात सङ्घयायोगों के लक्षण- जन्माङ्ग में सब ग्रह यदि १ आदि राशि में स्थित हों तो क्रम से १ गोल, २ युग, ३ शूल, ४ केदार, ५ पाश, ६ दामनी, ७ वीणा नामक ७ संख्या योग होते है। नाभस योगों के फल ज्ञान- इन योगों के फल को जैसे मुनियों ने कहा है उसी प्रकार मैं कहता हूँ। इनके फल सब ग्रहों की दशा में होते हैं, इसको ध्यान में रखना चाहिये। नौका योग फल ज्ञान- नौका योग में जल से जीविका करने वाला और धन लाभ करने वाला, बहुत आय (लाभ) और विख्यात यश वाला, हृष्ट, कृपण, बली और लोभी होता है। कूंट योग फल ज्ञान- कूट योगोत्पन्न पुरुष मिथ्यावादी, धूर्त जेलखाना का रक्षक, निर्धन, शठ, क्रूर और पर्वत आदि दुर्ग स्थान में रहने वाला होता है। छत्र योग फल ज्ञान- छत्रयोग में उत्पन्न जातक अपने जन का आश्रय, दयालु, दाता, राजप्रिय, बुद्धिमान्, वाल्य और वृद्धावस्था में सुख सौभाग्य युत होता है। चाप योग फल ज्ञान- चापयोग में उत्पन्न मिथ्यावादी, जेलरक्षक, चोर, धूर्त, बन में रहने वाला, वयस के मध्य में भाग्यहीन होता है। अर्धचन्द्र योग फल ज्ञान-अर्धचन्द्र योगें में उत्पन्न सौभाग्यवान्, सेनापति, मनोहर शरीर, राजप्रिय, बली, मणि और सुवर्ण भूषण से युक्त होता है। वज्र योग फल ज्ञान- वज्र योग में जन्म लेने वाला जातक प्रथम और अन्तिम अवस्था में सुखी, शूर, सुन्दर, निरोग तथा मध्यवयस में दुखी, और अपने जन का विरोधी होता है। यव योग फल ज्ञान-यव योग में जातक व्रत, नियम और शुभ कार्य में तत्पर, मध्यवयस में सुखी, दाता स्थिर धन वाला होता है। कमल योग फल ज्ञान- कमल योग में उत्पन्न मनुष्य यशस्वी, गुणी, दीर्घायु, अति धनी, रूपवान्, राजा होता है। वापी योग फल ज्ञान- वापी योगोत्पन्न मनुष्य धन सञ्चय करने में निपुण, स्थिर धन और सुख से युक्त, रूपवान् और पुत्र सुख से प्रसन्न होता है। शकट योग फल ज्ञान-शकट योग में उत्पन्न जातक रोगी, भ्रष्ट स्त्री का
हीन होता है। पति, मूर्ख, गाड़ी से जीविका करने वाला, निर्धन तथा स्वजन और मित्र से
विहग योग फल ज्ञान-विहग योग में उत्पन्न जातक भ्रमणशील, नीचाचार,
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७८२ नाभस योग प्रकरण दूत, मैथुन से जीविका करने वाला, ढीठ, कलहप्रिय होता है। गदा योग फल ज्ञान-गदा योग में उत्पन्न जातक मान और धन चाहने वाला, यज्ञकर्ता, शास्त्र और सङ्गीत में निपुण, धन सुवर्ण रत्नादि सम्पति से युक्त पुरुष होता है। शृङ्गाटक योग फल ज्ञान- शृङ्गाटक योग में जातक कलहप्रिय, रणप्रिय, साहसी, सुखी, राजा का प्रिय, सौभाग्यवान, रूपवान, धनाढ्य और स्त्री द्वेषी होता है। हल योग फल ज्ञान- हल योग में उत्पन्न जातक बहुत खाने वाला, दरिद्र, खेती करने वाला, उद्विग्न, बन्धु और मित्र से त्यक्त, प्रेष्य (भृत्य) होता है। चक्र योग फल ज्ञान-चक्र नामक योग में उत्पन्न मनुष्य समस्त राजाओं से वन्दित चरण वाला भूपेन्द्र होता है। समुद्र योग फल ज्ञान- समुद्र योग में उत्पन्न व्यक्ति बहुत धन, रत्न, भोगों का प्रिय, स्थिरचित्त, सत्त्वगुण सम्पन्न राजा होता है। यूप योग फल ज्ञान- यूपयोग में उत्पन्न जातक अपनी रक्षा में तत्पर, दानी, धन सुख से सम्पन्न, व्रत नियम और सत्य का पालक तथा विशिष्ट पुरुष होता है। शर योग फल ज्ञान- शरयोग में उत्पन्न मनुष्य जातक शस्त्र बनाने, डाकुओं को पकड़ने, शिकार खेलने, धन में विहार करने में उन्मादयुत
वाला होता है। (पागल सदृश अर्थात् तल्लीन) होता है तथा हिंसक और नीच कर्म करने
शक्ति योग फल ज्ञान- शक्ति योग में उत्पन्न जातक धनहीन विकल, दुःखी, आलसी, अल्पायु, संग्रामप्रिय, स्थिर और सुभग (रूपवान्) होता है। दण्ड योग फल ज्ञान- दण्डयोग में उत्पन्न व्यक्ति स्त्री एवं पुत्र से हीन, निर्धन, सब लोगों से तिरस्कृत, अपने परिजन से बाहर, दुःखी और नीच होता है। माला योग फल ज्ञान- माला योग में जन्म लेने वाला. व्यक्ति नित्य सुखी, वाहन, वस्त्र, धनभोग से युक्त, रूपवान् और पत्नी वाला होता है। सर्प योग फल-सर्प योग में उत्पन्न जातक कुटिल, क्रूर, निर्धन, दुःख से पीड़ित, दीन, दूसरों के घर में खाकर जीने वाला होता है। रज्जु योग फल- रज्जुयोग में जन्म लेने वाला मनुष्य भ्रमणशील, रूपवान्, परदेश से धन लाभ करने वाला, क्रूर तथा दुष्ट स्वभाव वाला होता है। मुसल योग फल- मुसल योग में उत्पन्न जातक मान, धन, ज्ञान से युक्त, कार्य से आसक्त, राजा का प्रिय, विख्यात, स्थिरचित्त और वीर होता है। नल योग फल- नल योग में न्यूनाधिक अङ्गों वाला, धन संग्रकारी,
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भृगु संहिता फल दर्पण ७८३ कार्यों में निपुण, बन्धुओं का हित करने वाला और रूपवान् होता है। गोल योग फल- गोल योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति दरिद्र, आलसी, विद्या और मान से हीन, मलिन और नित्य दुखी होता है। युग योग फल- युग योग में उत्पन्न मनुष्य पाखण्डी, धनहीन, लोग से बहिष्कृत, पुत्र, सम्मान, धर्म से हीन होता है। शूल योग फल- शूल योग में उत्पन्न मनुष्य उग्र, आलसी, धनहीन, हिंसक, अपने जन से बाहर, महा बीर, रण में जय पाने वाला, भयानक होता है। केदार योग फल-केदार योग में जातक बहुतों में उपयोगी, खेती करने वाला, सत्यवक्ता, चञ्चल और धनवान होता है। पाश योग फल- पाशयोग में उत्पन्न जातक बन्धन भागी, कार्य में तत्पर, प्रपञ्ची, बहुत बोलने वाला, शीलहीन तथा बहुत नौकर रखने वाला होता है। दामिनी योग फल-दामिनीयोग में व्यक्ति परोपकारी, पशुओं को पालने वाला, धनवान, मूढ़, बहुत पुत्र और रत्न से युक्त, धीर और विद्वान् होता है। वीणा योग फल- वीणायोग में जन्म लेने वाला जातक बहुत मित्रों से युक्त, प्रियवक्ता, शास्त्रज्ञाता, गाने बजाने में निपुण, सुखी और बहुत नौकर वाला होता है।
ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल सूर्य का राशि व दृष्टिवश फल- समस्त जीवधारियों को सर्वदा ग्रह और राशि सम्बन्धी फल की प्राप्ति होती है, ऐसा महर्षियों व मनीषियों का मत है। इसलिये यहाँ सावधानतया शिष्टाचार्यों के मत का आश्रयण करके राशिस्थ फल को आगे कहा जा रहा है- मेषस्थ सूर्य फल-मेष में सूर्य हो तो शास्त्रों के अर्थ और विद्वत्कलाओं से विख्यात, युद्धप्रिय, उग्र, कार्यों में उद्यत, भ्रमणशील, मजबूत हड्डी वाला, साहस साध्य कार्य में लीन, पित्त और रक्त व्याधि से युत, रूपवान् और बलवान् होता है। यदि सूर्य अपने उच्चांश में हो तो जातक राजा होता है। भौम राशिस्थ सूर्य पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में मेष या वृश्चिक में सूर्य हो और उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो दानी, बहुत नौकर रखने वाला, मनोहर, स्त्रियों का प्रिय, कोमल देह होता है। यदि मङ्गल की दृष्टि हो तो युद्ध में अति बलवान्, क्रूर, लाल नेत्र और लाल पैर हाथ वाला और तेजस्वी होता है। बुध की दृष्टि हो तो भृत्य, दूसरों के कार्य करने वाला, अल्पधन,
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७८४ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल बलहीन, दुःखी, और मलिन शरीर वाला होता है।
श्रेष्ठ पुरुष होता है। गुरु की दृष्टि हो तो बहुत धनी, दानी, राजमन्त्री, न्यायाधीश, और शुक्र की दृष्टि हो तो नीच स्त्री का पति, बहुत शत्रु और अल्प बन्धु वाला, दीन और कोढ़ी होता है।
और मूर्ख होता है। शनि की दृष्टि हो तो कष्ट युत शरीर, कार्य में उन्माद वाला, बुद्धिहीन वृष राशि पर स्थित सूर्य फल- सूर्य वृष राशि में स्थित हो तो जातक मुख और नेत्र रोग से पीड़ित, क्लेश सहन करने वाला, योग्य, व्यवहार पटु, मतिमान, वन्ध्या स्त्री का द्वेषी, भोजन, माला, गन्ध, वस्त्र से पूर्ण, गीत, वाद्य, नृत्य जानने वाला तथा जल से भय करने वाला होता है। वृष एवं तुला में स्थित सूर्य पर ग्रहों की दृष्टि- वृष या तुला में स्थित सूर्य पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक वेश्यागामी, प्रियभाषी, बहुत स्त्रियों का पोषक तथा जल से जीविका करने वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि हो तो वीर, संग्राम प्रिय, तेजस्वी, साहस से धन और यश पाने वाला और विकल होता है। बुध की दृष्टि हो तो चित्र, लेख काव्य, गाना आदि में निपुण और सुन्दर होता है। गुरु की दृष्टि हो तो बहुत शत्रु और मित्रों वाला राजमन्त्री, सुन्दर नेत्र वाला, कान्तिमान् तुष्ट राजा होता है। शुक्र की दृष्टि हो तो राजा या राजमन्त्री, स्त्री, धन और भोग से युक्त, बुद्धिमान और भीरु होता है। शनि की दृष्टि हो तो नीच, आलसी, दरिद्र, वृद्धा स्त्री से प्रेम करने वाला, क्रूर स्वभाव और रोगों से पीड़ित होता है। मिथुन राशि में स्थित सूर्य फल- जन्मकाल में मिथुन में सूर्य हो तो जातक मेधावी, प्रिय वचन, वात्सल्य गुणों से युत, सदाचारी, विज्ञान और शास्त्र में निपुण, बहुत धनी, उदार हृदय, निपुण, ज्यौतिष का जानकार, मध्यमरूप, दो माता वाला, सुन्दर और विनययुक्त होता है। बुध राशिस्थ सूर्य पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में मिथुन या कन्या में स्थित सूर्य पर यदि चन्द्रमा की दृष्टि हो तो शत्रु और बन्धुओं से कष्ट, विदेशयात्रा से पीड़ित और बहुत विलाप करने वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि हो तो शत्रु से भय, कलहप्रिय, रण में अपयश आदि से दुःखी, विख्यात, बन्धुयुक्त, शत्रुहीन और नेत्र रोगी होता है। गुरु की दृष्टि से बहुत शास्त्रों का ज्ञाता, राजदूत, विदेशगामी, उग्र, उन्मादी होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७८५ शुक्र की दृष्टि से धन, स्त्री पुत्र से युक्त, अल्प स्नेह करने वाला, निरोग, सुखी और चञ्चल होता है। शनि की दृष्टि से बहुत भृत्य वाला, उद्विग्न हृदय, बन्धुओं के पालन में निरत और धूर्त होता है। कर्क राशिस्थ सूर्य फल- जन्माङ्ग में कर्क राशि में सूर्य हो तो जातक कार्यों में चञ्जल, राजासदृश गुणों से विख्यात, अपने जनों का द्वेषी, भाग्यहीन स्री वाला, रूपवान्, कफ पित्त से पीड़ित, श्रम से दुःखी, मदिरापान प्रिय, धर्मात्मा, मानी, प्रियवक्ता, देश काल एवं दिशा का ज्ञाता, स्थिर और माता पिता का द्वेषी होता है अर्थात् माता-पिता से शत्रुता करने वाला होता है। कर्क राशि में स्थित सूर्य पर ग्रहों की दृष्टि के फल- कर्क स्थित सूर्य पर चन्द्रमा की दृष्टि से जातक राजा या राजा के तुल्य जल व्यापार से धनवान और क्रूर होता है। मङ्गल की दृष्टि से क्षय और भगन्दर रोग से युत, बन्धुओं से विरक्त और चुगलखोर होता है। बुध की दृष्टि से विद्यमान यश से विख्यात, राजा का प्रिय, कार्य कुशल और शत्रुहीन होता है।
का ज्ञाता होता है। गुरु की दृष्टि से श्रेष्ठ, राजमन्त्री या सेनापति, प्रसिद्ध और कलाओं शुक्र की दृष्टि से स्त्रीभक्त, स्त्री के द्वारा धनवान, परोपकारी, रण में शूर और प्रियवक्ता होता है। शनि की दृष्टि हो तो कफ, वात से पीड़ित, परधनोपहारी, विपरीत बुद्धि और चेष्टा वाला तथा चुगली करने वाला होता है। सिंह राशिस्थ सूर्य फल- यदि सिंह राशि में सूर्य स्थित हो तो उत्पन्न जातक शत्रुहन्ता, क्रोधी, विशेष चेष्टावान्, वन, पर्वत और दुर्ग में चलने वाला, उत्साही, शूर, तेजस्वी, मांस का भक्षण करने वाला, भयानक, गम्भीर, स्थिर, बली, वाचाल, राजा, धनाढ्य और जग में विख्यात होता है। सिंह राशिस्थ सूर्य पर ग्रहों की दृष्टि के फल- यदि जन्मकाल में सिंह राशि में सूर्य हो एवं उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो इस योग में उत्पन्न जातक मेधावी, सुशीला स्त्री का पति, कफ से पीड़ित और राजा का प्रिय होता है। यदि मङ्गल की दृष्टि हो तो परस्त्रीगामी, शूर, साहसी, उद्योगी, उग्र और प्रधान पुरुष होता है। बुध की दृष्टि हो तो जातक विद्वान्, लेखक, नित्य धूर्तों के सङ्ग रहने वाला, भ्रमणशील, हीन (परिजन रहित) और अल्प बली होता है। गुरु की दृष्टि हो तो देवालय, बगीचा, जलाशय बनवाने वाला, एकान्त प्रिय और बहुत बड़ा बुद्धिमान् होता है।
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७८६ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल शुक्र की दृष्टि हो तो जातक कुष्ठादि दुष्ट रोग से पीड़ित, निर्दय एवं निर्लज्ज होता है। यदि शनि की दृष्टि हो तो स्वकार्यनाशक, नपुंसक और दूसरों को कष्ट देने वाला होता है। कन्या राशिस्थ सूर्य फल- यदि जन्म पत्रिका में कन्या राशि में सूर्य हो तो स्त्री समान देह वाला, लज्जायुक्त, लेखक दुर्बल, प्रियभाषी, मेधावी, अल्पबली, विद्वान्, देव और पितादि गुरुजनों की सेवा करने वाला, पैर दबाने आदि कार्यों में चतुर, वेद, गाने, बजाने में निपुण, कोमल और दीनवचन बोलने वाला होता है। तुला राशिस्थ सूर्य फल- जन्माङ्ग में यदि तुल में सूर्य हो तो भङ्ग (पराजय) क्षय (हानि) और व्यय (खर्च) से पीड़ित, विदेश और मार्ग में रहने वाला, दुष्ट, नीच, प्रीतिहीन, सुवर्ण लोहादि से जीविका करने वाला, द्वेषी, दूसरों का काम करने वला, परस्त्रीगामी, मलिन, राजा से तिरस्कृत एवं ढीठ होता है। वृश्चिक राशिस्थ सूर्य फल- जन्म कुण्डली में वृश्चिक राशि में सूर्य हो तो उत्पन्न जातक लड़ाई झगड़े में रोकने पर भी नहीं रुकने वाला, वैदिक धर्म में तत्पर, मिथ्याभाषी, मूर्ख, स्त्रीहीन या रुष्टा स्त्री वाला, खल, दुःशीला स्त्री की आज्ञा में रहने वाला, क्रोधी, दुष्ट आचरण वाला, लोभी, कलहप्रिय, मिथ्याभाषी, शस्त्र, अग्नि या विष से पीड़ित और माता पिता का शत्रु होता है। 4 धनुराशिस्थ सूर्य फल- जन्माङ्ग में धनु राशि में सूर्य हो तो धन युक्त, राजप्रिय, पण्डित, देवब्राह्मण का भक्त, शस्त्र अस्त्र और हाथी की शिक्षा में निपुण, व्यवहारोपयुक्त, सज्जनों में आदृत, शान्त, धनवान, विशाल मोटा और सुन्दर शरीर वाला, बन्धुओं का हित करने वाला और बली होता है। गुरु राशिस्थ ग्रहदृष्ट सूर्य फल- यदि जन्माङ्ग में धनु या मीन राशिस्थ सूर्य पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक वाक्य बुद्धि, वैभव, पुत्र से युक्त, राजतुल्य, शोकहीन, सुन्दर शरीर वाला होता है। मंगल की दृष्टि से संग्राम में विजय प्राप्त करने वाला, स्पष्टवक्ता, धन सुख से संयुक्त और धातुओं का ज्ञाता और लोकप्रिय होता है। गुरु की दृष्टि से राजा का सम्बन्धी वा राजा, हाथी, घोड़ा, धन से सम्पन्न और विद्वान् होता है। शुक्र की दृष्टि से दिव्य स्त्री, गन्धादि भोग से युक्त शान्त होता है।
र.ता है। शनि की दृष्टि से अपवित्र, परान्न भोजी, नीचसेवी और पशुपालक
मकर राशिस्थ सूर्य फल- जन्मकुण्डली में मकर राशि में सूर्य हो तो जातक लोभी, दुःशीला स्त्री और कुकर्म में रत, तृष्णा करने वाला, बहुत
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भृगु संहिता फल दर्पण ७८७ कार्य में लीन, डरपोक, बन्धुहीन, चञ्चल प्रकृति वाला, भ्रमणशील, अल्प बली तथा आत्मीयजनों के विक्षोभ से सर्वनाश करने वाला होता है। शनि राशिस्थ ग्रह दृष्ट सूर्य फल- जन्माङ्ग में मकर या कुम्भस्थित सूर्य पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो माया में निपुण, चञ्चल बुद्धि, स्त्री के संग से धन सुख नष्ट करने वाला होता है। मंगल की दृष्टि हो तो रोग और शत्रु से नपुंसक सदृश स्वभाव वाला, दूसरे का धन चुराने वाला और सारहीन देहधारी होता है। गुरु की दृष्टि से पुण्य कार्य करने वाला, बुद्धमान्, सबका आश्रय, सुविख्यात, यश और मनस्वी होता है। शुक्र की दृष्टि से शंख, मूंगा और मणि का व्यापारी, वेश्या और स्त्री द्वारा धन लाभकारी और सुखी होता है। शनि की दृष्टि से शत्रु को जीतने वाला, राजा के सम्मान से बर्धित आश्वासन वाला होता है। कुम्भ राशिस्थ सूर्य फल- जन्माङ्ग में कुम्भ राशि में सूर्य हो तो हृदय रोगी, बहुत बल और जन्तु वाला, सज्जनों से निन्दित, अति क्रोधी, परस्त्रीगामी, कार्यों में निपुण दुःखी, अल्पधन वाला, धूर्त, चंचल मैत्री वाला, मलिन, चुगला, अनुचित प्रलाप करने वाला अर्थात् असत् वक्ता होता है। मीन राशिस्थ सूर्य फल- जन्माङ्ग में मीन राशि में सूर्य हो तो बहुत मित्र वाला, स्त्री के प्रेम से सुखी, पण्डित, शत्रुओं को जीतने वाला, जन और यश से जय पाने वाला, अच्छे पुत्र और नौकरों से सुखी, जल के व्यापार से
होता है। धनी, प्रिय और मिथ्या बोलने वाला, गुप्त रोगी और बहुत सहोदर वाला
चन्द्र का राशि व दृष्टिवश फल मेष राशि में स्थित चन्द्र फल- यदि जन्मकाल में मेष राशि में चन्द्रमा हो तो जातक सुवर्ण समान गौर देह, स्थिर धनी, सहोदरहीन, साहसी, मान और कल्याण युत, कामी, दुर्बल घुटने वाला, खराब नख, थोड़े केश वाला, चञ्चल, मान को ही धन समझने वाला, कमल सदृश हाथ पैर वाला, अधिक पुत्र और परिजन वाला, गोल नेत्र वाला, स्नेह पूर्ण, जल से भीत, व्रण से अङ्कित मस्तक और स्त्री से पराजित होता है। मेष राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में यदि मेष राशिस्थ चन्द्र पर रवि की दृष्टि से क्रोधी राजा किन्तु विनम्रजनों के प्रति अति मृदु, धीर, संग्रामप्रिय होता है। मङ्गल की दृष्टि से दाँत और आँख के रोग से पीड़ित, विष, अग्नि, शस्त्र से विकृत देह, जिलाधीश और मूत्रकृच्छू रोग युक्त होता हैं।
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७८८ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल बुध की दृष्टि से अनेक विद्या का आचार्य, सत्यवक्ता, मनस्वी, सुकवि और यशस्वी होता है।
सेनापति होता है। गुरु की दृष्टि से बहुत नौकर और धन से युक्त, राजमन्त्री वा
शुक्र की दृष्टि से सौभाग्य, पुत्र और धन से युक्त, सुन्दरी स्त्री और भूषण सहित और भागशाली अर्थात् असत् वक्ता पुरुष होता है। शनि की दृष्टि से द्वेषी, दुखी, दरिद्र, मलिन और मिथ्याभाषी होता है। वृष राशि में चन्द्र फल- जन्मकाल में वृष में चन्द्रमा हो तो जातक विशाल वक्षस्थल, महादानी, सघन और घुँघराले बाल वाला, कामी, यशस्वी, मनोहर कन्या सन्तान वाला, बैल सदृश नेत्र वाला, हंस सदृश सदसद्विवेकी, मध्य और अन्तवयस में सुख भागी, स्थूल कटि, पैर कन्धा, घुटना मुख और जाँघ वाला, पाँजर मुख, पीठ और कन्धे पर चिह्न वाला, सुन्दर गति (चाल) वाला और क्षमावान् होता है। वृष राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में वृष स्थित चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि हो तो खेती आदि अनेक कार्य करने वाला, नौकर और चतुष्पद से लाभ करने वाला, धनाढ्य और प्रयोग जानने वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि से अति कामी, परस्त्री के कारण पत्नी मित्रजनों से हीन, स्त्रियों का मन हरने वाला और माता का अशुभ होता है।
युक्त होता है। बुध की दृष्टि से पण्डित, वक्ता, प्रसन्न, सबका हित, उत्कृष्ट गुणों से
गुरु की दृष्टि से स्थिर पुत्र, स्त्री, मित्र वाला, माता-पिता का भक्त, परम निपुण, धर्मात्मा और प्रविख्यात होता है। शुक्र की दृष्टि से भूषण, सवारी, गृह, शय्या, आसन, सुगन्ध वस्त्र माला का उपभोग करने वाला होता है। शनि की दृष्टि हो तो धनहीन, माता और स्त्रियों का अनिष्टकारक, पुत्र-बन्धु, मित्र से युक्त होता है। वृषस्थ चन्द्र के पूर्वार्ध व परार्ध फल- जन्मकाल में वृष राशि के पूर्वार्ध में चन्द्रमा हो तो जातक मातृहीन तथा उत्तरार्ध में हो तो पितृहीन पितृवियोग सूचक होता है। मिथुन राशिस्थ चन्द्र फल- जन्म के समय मिथुन राशि में चन्द्रमा हो तो जातक ऊँची नाक वाला, कृष्णनेत्र, सुरत विधि और कला काव्य को जानने वाला, सुख भोग करने वाला, हाथ में मत्स्यरेखा वाला, विषय सुख में लीन, बुद्धिमान्, नसों से युक्त, सुन्दर, सौभाग्यवान्, हास्यप्रिय, मृदुभाषी, स्त्री के वश, लम्बा शरीर, नपुंसकों से मैत्री करने वाला और दो माताओं से पालित होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७८९ मिथुन राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में मिथुन राशि स्थित · चन्द्रमा पर यदि सूर्य की दृष्टि हो तो बुद्धि रूप धन वाला, प्रसिद्ध, रूपवान्, धर्मात्मा, दुखी और अल्प धन वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि से, वीर, पण्डित, सुख, वाहन, ऐश्वर्य और रूप से युक्त होता है। बुध की दृष्टि से धनोपार्जन में निपुण, सदा विजयी, धीर अखण्डित आज्ञा वाला राजा होता है। गुरु की दृष्टि से शास्त्रविद्या का आचार्य, प्रसिद्ध, सत्यवक्ता, अति रूपवान्, मान्य, वाचाल होता है। शुक्र की दृष्टि हो तो सुन्दर स्त्री, माला एवं वस्त्रों वाला, श्रेष्ठ वाहन, भूषण, रत्नों का भोग करने वाला होता है। शनि की दृष्टि से बन्धु स्त्री और धन से रहित लोगों का द्वेषी होता है। कर्क राशिस्थ चन्द्र- जन्मकाल में यदि कर्क राशि में स्थित चन्द्रमा हो तो जातक सौभाग्य, धैर्य, गृह, मित्र, पर्यटन, ज्यौतिष विद्या का ज्ञान रखने वाला, शील से युक्त, कामी, कृतज्ञ, राजमन्त्री, सत्यवादी, परदेशवासी, उन्मादयुत, अधिक केश वाला, जल और पुष्प का प्रेमी, ह्रास और वृद्धि युत, मकान, बगीचा वापी आदि बनाने में तत्पर और स्थूल कण्ठ वाला होता है। कर्क राशिस्थ ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में कर्कस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से जातक राजा का छोटा कर्मचारी निर्धन, पत्रवाहक अथवा दुर्ग का रक्षक होता है। कर्क राशि पर चन्द्रमा मंगल से दृष्ट हो तो व्यक्ति वीर हतदेह, माता के लिये अनर्थकारी होता है। कर्क राशि पर चन्द्रमा बुध से दृष्ट हो तो वह व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला, नीतिज्ञ, धन-स्त्री व पुत्र से युत, राजमन्त्री, और सुखी होता है। यदि कर्क राशि पर चन्द्रमा गुरु से दृष्ट हो तो जातक राजकीय गुणों से युत राजा, सुखी, सुन्दर स्त्री का पति, नीति और पराक्रम से युत होता है। कर्क राशि में स्थित चन्द्र शुक्र से दृष्ट हो तो जातक धन सुवर्ण, वस्त्र स्त्री रत्नों का पात्र और वेश्या स्त्री का नायक और सुन्दर होता है। कर्कस्थ चन्द्रमा शनि से दृष्ट हो तो जातक भ्रमणशील सुख से रहित, दरिद्र, माता को कष्ट देने वाला, असत् वक्ता, पापी और दुष्ट होता है। सिंह राशिस्थ चन्द्र- जन्मकाल में सिंह राशि में चन्द्रमा हो तो वह व्यक्ति मोटी हड्डी वाला, अल्प रोम स्थूल मुख और गर्दन छोटी और पिङ्गल वर्ण आँख, स्त्री से द्वेष करने वाला, भूख, प्यास, उदर और दाँत के रोग से पीड़ित, मांसभक्षी, दाता, तीखे स्वभाव, अल्प पुत्र, वन और पर्वत में
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७९० ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल प्रेम करने वाला, माता का भक्त, विशाल वक्षस्थल, पराक्रमी, कार्य में तत्पर और सर्वत्र गहन दृष्टि वाला होता है। सिंह राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- यदि जन्मकाल में सिंह राशि पर चन्द्र सूर्य से दृष्ट हो तो जातक राजा से शत्रुता, करने वाला, पुत्रहीन राजा, उत्तम गुणों से युत महान् वीर, उच्चशब्द वाला, घोर पाप में लीन तथा प्रख्यात होता है। यदि सिंह राशिस्थ चन्द्र, बुध से दृष्ट हो तो जातक स्त्री के वश में, स्त्रीप्रिय, स्त्री से बली, युवतियों का सेवक धन भोग युक्त पुरुष होता है। यदि सिंहस्थ चन्द्र गुरु से दृष्ट हो तो जातक विख्यात कुलोत्पन्न, ज्ञानी, गुणों से युत राजा के तुल्य होता है। यदि सिंहस्थ चन्द्र पर शुक्र दृष्टि हो तो स्त्रीधन से युक्त रोगी, स्त्री का नौकर, रति क्रिया का ज्ञाता और पण्डित होता है। यदि सिंहस्थ चन्द्र, शनि से दृष्ट हो तो जातक खेती करने वाला, धनरहित झूठ बोलने वाला, दुर्गरक्षक, स्त्री सुख से हीन, शूद्र होता है। कन्या राशिस्थ चन्द्र- जन्म समय कन्या राशि में चन्द्रमा हो तो जातक स्त्री में आसक्त, दीर्घबाहु, सुन्दर मुख, दाँत, आँख और कान वाला, विद्वान्, वेदशास्त्रध्यापक, प्रियवक्ता, सत्य और शौच से युक्त, धीर, प्राणियों में दया रखने वाला, परदेश में रत, क्षमा और सौभाग्य वाला, अधिक कन्या और थोड़े पुत्र वाला होता है। कन्या राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्म समय में कन्या राशिस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से राजा का कोषाध्यक्ष, विख्यात, वचन का पालन और उत्तम कार्य करने वाला तथा स्त्रीहीन होता है। मङ्गल की दृष्टि हो तो शिल्प कला में निपुण, विख्यात, धनी, शिक्षित, धीर, माता का अहित करने वाला होता है। बुध की दृष्टि से ज्यौतिष और काव्य का ज्ञाता, विवाद और युद्ध में विजयी, और अति निपुण होता है। गुरु की दृष्टि से बन्धुजनों से युक्त, सुखी, राजकर्मचारी, वचन का पालक, धनी होता है। शुक्र की दृष्टि से बहुत स्त्री, अनेक प्रकार के भूषण, भोग और धन से युक्त, और नित्य भाग्योदय से युक्त होता है। शनि की दृष्टि हो तो स्मरण शक्ति रहित, दरिद्र, सुखहीन, मातृहीन, स्त्री के भाग्य से धनी होता है। तुला राशिस्थ चन्द्र- जन्मकाल में तुला राशि में चन्द्रमा हो तो ऊँची नाक वाला, विशाल नेत्र, कृश शरीर, बहुत स्त्री और बहुत बैल वाला, गाय और भूमि से धन बल प्राप्त करने वाला, वृष समान अण्डकोश वाला,
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भृगु संहिता फल दर्पण ७९१ पराक्रमी, कार्य कुशल, देव ब्राह्मण का भक्त, बहुत ऐश्वर्य से युक्त, स्त्री का वश, अन्न सञ्चय करने वाला और बन्धुओं का उपकार करने वाला होता है। तुला राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में तुला राशिस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से जातक निर्धन, रोगी, भ्रमणशील, अपमानित, भोगहीन, पुत्रहीन और निर्बल होता है। मङ्गल की दृष्टि से तीक्ष्ण स्वभाव वाला, चोर, उग्र, परस्त्रीगामी, सुगन्धभोगी, बुद्धिमान् और नेत्र रोग से युक्त होता है। बुध की दृष्टि से कलाओं में निपुण, अति धनवान, प्रियवक्ता, विद्वान्, देश में विख्यात होता है। गुरु की दृष्टि से सर्वत्र पूज्य रत्न आदि के क्रय विक्रय में निपुण होता है। शुक्र की दृष्टि हो तो सुन्दर, नीरोग, सौभाग्यवान्, पुष्ट शरीर वाला, धनी, पण्डित, अनेक उपायों को जानने वाला होता है। शनि की दृष्टि से धनी, प्रियभाषी, वाहन से चलने वाला, विषय का प्रेमी, सुखहीन और माता का हित करने वाला होता है। वृश्चिक राशिस्थ चन्द्र फल- जन्मकाल में वृश्चिक में चन्द्रमा हो तो जातक लोभी, गोलजङ््घा, कठोर देह वाला, नास्तिक, क्रूर, चोर, बाल्यावस्था में रोगी, दाढ़ी और नाखून में आघात, सुन्दर नेत्र, सम्पत्तिवान्, कार्यों में उद्यत और परस्त्रीगामी, बन्धुहीन, उन्मत्त, प्रतापी, राजा द्वारा नष्टधन धन, लम्बा पेट और स्थूल मस्तक से युत होता है। वृश्चिक राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में वृश्चिक राशि पर विद्यमान होने पर चन्द्र पर रवि की दृष्टि से दृष्ट हो तो लोगों का द्वेषी, विद्वान्, भ्रमणशील, धनवान किन्तु सुख से हीन पुरुष होता है। मङ्गल की दृष्टि से अति धैर्यवान्, राजतुल्य, ऐश्वर्ययुक्त, शूर, रण में विजयी, अधिक भोजन करने वाला होता है। बुध की दृष्टि से चतुरता से रहित, कटुभाषी, यमल (जुड़वा) सन्तान वाला, योग्य, नकली वस्तु बनाने वाला और संगीत विद्या का ज्ञाता होता है। गुरु की दृष्टि से कार्य में तत्पर, लोगों का द्वेषी, धन, सवारी भोग से युक्त, स्त्री द्वारा नष्ट बल होता है। शनि की दृष्टि से अघम सन्तान वाला, कृपण, रोगी, निर्धन, मिथ्याभाषी, अघम अर्थात् नीच कार्यकर्त्ता होता है। धनु राशिस्थ चन्द्र फल-जन्म समय धनु राशि में चन्द्रमा हो तो जातक कुबड़ा, गोलनेत्र, ऊँची छाती, मोटी कटि और मोटे बाहु वाला, वक्ता, लम्बे कन्धे और कण्ठ वाला, जल के किनारे निवास करने वाला, शिल्पज्ञ, गूढ़ विषय का ज्ञाता, शूर, प्रसन्न, मजबूत हड्डी वाला, बहुत बली, मोटा गर्दन, ओठ और नाक वाला, बन्धु का प्रेमी, कृतज्ञ, प्रगल्भ और मिले हुए पैर
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७९२ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल वाला होता है। धनु राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकालावधि धनु राशिस्थ चन्द्रमा पर रवि की दृष्टि से राजा, धनी, वीर, विख्यात, अद्वितीय सुखी और उत्तम सवारी वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि से सेना अध्यक्ष, धनाढ्य, सुन्दर, प्रविख्यात, पराक्रमी और उत्तम नौकर वाला होता है। बुध की दृष्टि से बहुत नौकर वाला, मजबूत त्वचा वाला, ज्यौतिष, शिल्प आदि में चतुर, और नृत्यविद्या का अध्यक्ष होता है। गुरु की दृष्टि से सुन्दर शरीर, राज मन्त्री, धन, कर्म और सुख से सम्पन्न होता है। शुक्र की दृष्टि से सुखी, सुन्दर, सौभाग्यवान, पुत्रवान्, धनी, कामी, उत्तम मित्र और सुन्दर स्त्री वाला होता है। शनि की दृष्टि से प्रिय और सत्यवक्ता, बहुत विषय का वेत्ता, सरल स्वभाव और राजपुरुष होता है। मकर राशिस्थ चन्द्र फल- जन्मकाल के समय मकर में चन्द्र हो तो जातक गीतज्ञ, ठण्ढा से डरने वाला, स्थूल मस्तक वाला, सत्य और धर्म का सेवक उन्नत, विख्यात, अल्प क्रोध, कामी, निर्दय, निर्लज्ज, सुन्दर नेत्र, कृश देह, गुरु-पत्नीगामी, सुकवि, गोल जंघा वाला, अल्पोत्साही, उत्साही, अत्यन्त लोभी, लम्बे कण्ठ और कान वाला होता है। कुम्भ राशिस्थ चन्द्र फल- यदि जन्म के समय मकरस्थ चन्द्रमा सूर्य से दृष्ट हो तो वह जातक धनहीन दुःखी, भ्रमण करने वाला, पर उपकाररत, मलिन और चित्रकारी करने वाला होता है। यदि मकर राशि में विद्यमान चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो तो वह व्यक्ति अत्यन्त धनी और उदार भाग्यशाली, धनी, वाहन सुख सम्पन्न और प्रतापी होता है। यदि मकरस्थ चन्द्रमा पर बुध की दृष्टि हो तो व्यक्ति मूर्ख, विदेश में रहने वाला, विधुर अस्थिर, उग्र, सुख में आसक्त, और निर्धन होता है। यदि मकरस्थ चन्द्र गुरु से देखा जाता हो तो जातक राजा, अत्यन्त वीर, राजकीय गुण सम्पन्न, वहु स्त्री पुत्र और मित्रों वाला होता है। यदि मकरस्थ चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो तो जातक श्रेष्ठ, परस्त्री, धन अलंकार, वाहन-माला से युत, क्रोधी और पुत्रहीन होता है। यदि मकरस्थ चन्द्र पर शनि की दृष्टि हो तो जातक आलसी, मलीन, धनी, कर्ण दोष से पीड़ित परस्त्री में लीन, झूठ बोलने वाला होता है। कुम्भराशिस्थ चन्द्र फल- यदि जन्म काल में कुंभ राशि में चन्द्रमा हो तो ऊँची नाक सुश्क देह, मोटा हाथ पैर वाला, शराबी सुन्दर, द्रोही, धर्म से
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भृगु संहिता फल दर्पण ७९३ रहित, दूसरे के पुत्र उत्पन्न कर्त्ता, विशाल मस्तक, बुरेनेत्र वाला, मूर्ख, आलसी विशालमुख वाला, शिल्पज्ञ, दुष्ट स्वभाव वाला, दुःखी और दरिद्र होता है। कुम्भ राशिस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में कुम्भस्थ चन्द्रमा पर- रवि की दृष्टि हो तो जातक अतिमलिन, शूर, राजा के सदृश, धर्मात्मा और खेती करने वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि से सत्त्यवक्ता, मातापिता और धन से रहित, आलसी, विपरीत स्वभाव वाला, दूसरे के कार्य करने वाला होता है। बुध की दृष्टि से भोजन विधि में निपुण, गीतज्ञ, स्त्रियों का प्रिय, थोड़े धन और थोड़े सुख वाला होता है।
श्रेष्ठ पुरुष होता है। गुरु की दृष्टि से गाँव, खेती, उपवन, उत्तम स्त्री का भोग करने वाला
कुम्भराशिस्थ चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि से नीच, पुत्र और मित्र से हीन, डरपोक, गुरुओं से तिरस्कृत, पापी, दुष्टा स्त्री का पति और अल्पसुखी होता है। शनि की दृष्टि से बड़े बड़े नख और रोमधारी मलिन, परस्त्रीगामी, शठ, अधर्मी, अचर (वृक्षादि) वस्तु से धनवान होता है। मीन राशिस्थ चन्द्र फल- जन्मकालावधि यदि मीन राशि में चन्द्रमा हो तो जातक शिल्प विद्या में कुशल, शत्रु को जीतने में निपुण, शास्त्रज्ञ, सुन्दर देह, गीतज्ञ, धर्मात्मा, बहुत स्त्री वाला, मृदुभाषी, राजा का सेवक, अल्पकोष (खजाना) वाला, विशाल मस्तक, धनवान, सुखी, स्त्री का वश, सुशील, समुद्रयात्रा करने वाला और दान देने वाला होता है। मीन राशिस्थ व ग्रह दृष्ट चन्द्र फल- जन्मकाल में मीनस्थ चन्द्रमा पर- रवि की दृष्टि हो तो जातक अत्यन्त कामी, सुखी, सेनापति, धनाढ्य, और प्रसन्न स्त्री वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि से लोक में अपमानित, सुखहीन, कुलटा का पुत्र, - पापी, और वीर होता है।
होता है। बुध की दृष्टि से राजा, अति सुखी, श्रेष्ठ स्त्रियों से युत और वश में
गुरु की दृष्टि से मनोहर, मण्डलेशों में श्रेष्ठ, अत्यन्त धनी, सुकुमार और बहुत स्त्रियों से युत होता है। शुक्र की दृष्टि से सुशील, रतिक्रिया में निपुण, नाचगान में रत, स्त्रियों के मन को हरने वाला होता है। शनि की दृष्टि से जातक विकल, माता का शत्रु, कामी, पुत्र स्त्री और बुद्धि से हीन, अधम और कुरूपा स्त्री में आसक्त होता है। कहे गए फलों का निर्णय- यदि जन्मराशि का स्वामी और राशि तथा
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७९४ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल चन्द्रमा ये तीनों बलवान् हों तो ऊपर कहे हुए सब फल पूर्णरूप से प्राप्त होते हैं। अर्थात् उच्च नीचादि में स्थिति के अनुसार फल में न्यूनाधिक्य तारतम्य से विचार कर फलादेश करना चाहिये। भौम राशि नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में चन्द्रमा मेष या वृश्चिक राशि के नवांश में स्थित हो तो और मंगल से दृष्ट हो तो जातक शत्रु जेता एवं उग्र होता है। यदि शनि की दृष्टि हो तो मायावी और ठग होता है। यदि सूर्य से दृष्ट हो तो चोर, हिंसक, रक्षा करने वाला वीर होता है। यदि गुरु से दृष्ट हो तो राजा, विख्यात पण्डितों द्वारा पूज्य होता है। यदि शुक्र से दृष्ट हो तो राजा का मंत्री, धनाठ्य और स्त्री के श्रृगांर करने में लीन होता है। यदि बुध से दृष्ट हो तो वह जातक शीघ्र वक्ता और अस्थिर होता है। शुक्र नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में शुक्र नवांश स्थित चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि से स्त्री, वस्त्र अन्न पान और धन से सुखी होता है। बुध की दृष्टि से वाद्य नृत्य और संगीत जानने वाला होता है। गुरु की दृष्टि से सुकवि, नीति शास्त्रज्ञ और राजमन्त्री होता है। मङ्गल की दृष्टि से परस्त्रीगामी, कामी और बहुत नौकर वाला होता है। सूर्य की दृष्टि से परम मूर्ख, प्रियभाषी, सतत् खाने पीने को इच्छुक होता है। शनि की दृष्टि से वर्धकी (लकड़ी चीरने वाला बढ़ई) के गुणों से सम्पन्न होता है। बुध नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- बुधनवांशस्थ चन्द्र पर बुध की दृष्टि से जातक शिल्पज्ञ और कवि होता है। शुक्र की दृष्टि से विशाल देह, संगीतज्ञ, वचनपालक होता है। गुरु की दृष्टि से राजमन्त्री, गुणी प्रतिष्ठित और मनोहर होता है। मङ्गल की दृष्टि से चोर, विवादी, भयानक होता है। शनि की दृष्टि हो तो शास्त्रज्ञ, कवि, बुद्धिमान्, शिल्पज्ञ होता है। रवि की दृष्टि से संग्राम में विजेता और सुप्रख्यात होता है। कर्क राशि नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- निज (कर्क) नवांशस्थ चन्द्रमा पर सूर्य की दृष्टि से कृश देह किन्तु नीरोग शरीर वाला होता है। मङ्गल की दृष्टि से दूसरे के धन लेने में चतुर, अति लोभी होता है। शनि की दृष्टि से कुकर्मी, वध बन्धन विवाद से दुखी होता है। शुक्र की दृष्टि से स्त्री का शत्रु, नपुंसक समान होता है। गुरु की दृष्टि से राजमन्त्री या राजा होता है। बुध की दृष्टि से पापासक्त, बहुत सोने वाला भ्रमणशील होता है। सिंह राशि नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्मकाल में सिंहनवांशस्थ चन्द्र पर सूर्य की दृष्टि से जातक क्रोधी, यशस्वी, धनी होता है। शनि की दृष्टि से पापी, निर्दय, हिंसक होता है। मङ्गल की दृष्टि से सुवर्ण से धनी, विख्यात, राजा से आदृत, प्रतापी होता है। गुरु की दृष्टि से सेनापति वा राजा
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भृगु संहिता फल दर्पण ७९५ होता है। शुक्र की दृष्टि से पुत्रहीन वा मृत पुत्र होता है। बुध की दृष्टि से ज्योतिषविद्या का ज्ञाता या इतिहासज्ञ और धन प्राप्त करने वाला होता है। गुरु राशि (धनु मीन) नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- यदि जन्मकाल गुरु नवमांशस्थ चन्द्र पर गुरु की दृष्टि हो तो अधिक, राजा का प्रिय, एवं अत्यधिक यशस्वी होता है। शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों के सुख से युक्त होता है। बुध की दृष्टि से हास्यप्रिय, राजा का प्रिय सेनापति होता है। मङ्गल की दृष्टि से शस्त्र चलाने में निपुण, विख्यात होता है। सूर्य की दृष्टि से वृद्ध स्वभाव, बलवान् लोगों से तिरस्कृत और अधम होता है। शनि राशि नवांशस्थ चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि- जन्म के समय में शनि नवांशस्थ चन्द्र पर शनि की दृष्टि से जातक कृपण, रोगी, मृत पुत्र होता होता है। सूर्य की दृष्टि से अल्प सन्तान, रोगी और कुरूप होता है। मङ्गल की दृष्टि से राजा के तुल्य, धनाढ्य, दुर्भगा स्त्री का पति, सुख से सम्पन्न होता है। शुक्र की दृष्टि से कुटिल स्वभाव, स्त्रियों में आसक्त, धैर्यवान् होता है। बुध की दृष्टि से मदिरापान करने वाला और दुश्चरित्र होता है। गुरु की दृष्टि से अपने कार्य में आसक्त और उदान्त पुरुष नहीं होता है। कथित फलों का निर्णय-यदि चन्द्रमा वर्गोत्तमनवांश, या अपने नवांश में हो तो शुभ फल जो कहे गये है उनमें क्रम से पूर्ण, मध्यम और अल्प समझना चाहिए तथा अशुभ फल विपरीत (अर्थात्-अल्प, मध्यम, पूर्ण) होता है। यदि राशिपति से नवांशपति बली हो तो राशि के फल नहीं होकर नवांश के ही फल होते है। राशि की अपेक्षा नवांशफल ही विशेषरूप से प्राप्त होते है। ऐसा प्राचीन यवनाचार्यों का मत है।
मंगल का राशि व दृष्टिवश फल मेष राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माङ्ग में मेष में मङ्गल हो तो जातक प्रतापी, सत्यवक्ता, वीर, राजा, रण प्रिय, साहसी, सेनापति, गाँव का मुखिया वा जनसमूह में मुख्य, प्रसन्नचित्त, दानी, बहुत गाय, बकरी, भेंड़ और अन्न संग्रह करने वाला, बहुत स्त्रियों के प्रेमी होता है। वृष राशिस्थ भौम फल-यदि जन्माङ्ग में वृष में मङ्गल हो तो पतिव्रता के व्रत को नष्ट करने वाला, अधिक बोलने वाला, अल्पधन और पुत्र वाला, द्वेषी, बहुतों के पोषण में रत, विश्वास हीन, उदण्ड से क्रीड़ा करने वाला,
होता है। अति अप्रिय वक्ता, संगीतज्ञ, पापी, बन्धु का विरोधी और कुल में कलङ्की
मिथुन राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माङ्ग में मिथुन में भौम हो तो सुन्दर, कष्ट सहन कर्त्ता, बहुत विषय का ज्ञाता, काव्य और शिल्पकला में चतुर,
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७९६ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल परदेशगमन प्रिय, धर्मात्मा बुद्धिमान्, पुत्र और मित्रों का शुभचिन्तक और अनेक कार्य में तत्पर रहता है। कर्क राशि में स्थित भौम फल- जन्माङ्ग में कर्क राशि में मङ्गल हो तो जातक दूसरे के घर में रहने वाला, रोग से पीड़ित, खेती से धनवान, बाल्यावस्था में उत्तम भोजन और वस्त्र चाहने वाला, सदा दूसरे का भोजन करने वाला, जलाशय से धनी, बार बार वेदना से पीड़ित, सरल स्वभाव वाला और दीन होता है। सिंहस्थ भौम फल- जन्माङ्ग में सिंह राशि में भौम हो तो असहनशील, प्रतापी, वीर, पराये धन और सन्तान को अपनाने वाला, जंगल में रहने वाला, गाय की सेवा और मांस खाने का प्रिय, प्रथम पत्नी से हीन, सर्प और मृग को मारने वाला, पुत्र और सुख से हीन, सदा कार्य में तत्पर रहता है। कन्या राशिस्थ भौम फल- जन्माङ्ग में कन्या राशि में मङ्गल हो तो साधुओं में पूज्य, अतिधनी, सुन्दर स्त्री और सङ्गीत प्रिय, कोमल और प्रियवक्ता, बहुत खर्च और थोड़े पराक्रम वाला, विद्वान् तथा दृढ़ पार्श्व वाला, शत्रुओं से अधिक डरने वाला, श्रुति स्मृतिधर्म को मानने वाला, शिल्पज्ञ, स्वच्छ रहने, और चन्दन पाउडर लगाने में तत्पर होता है। तुला राशिस्थ भौम फल- जन्माङ्ग में तुला राशि में मङ्गल हो तो भ्रमणशील, दूषित व्यापार में आसक्त, वक्ता, सुन्दर, किसी अङ्ग से हीन, अल्प परिवार वाला, युद्धप्रिय, दूसरे के भाग्य से जीने वाला, स्त्री, गुरुजन और मित्रों का · प्रिय, प्रथम स्त्री से रहित, मद्य विक्रेता के और वेश्या के सम्पर्क से उपार्जित धन को नाश करने वाला होता है। वृश्चिक राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माङ्ग में वृश्चिक में मङ्गल हो तो जातक व्यापारवार्ता में आसक्त, चोरों का स्वामी, कार्यों में कुशल, युद्धप्रिय, अत्यन्तपापी, अपराधी, शत्रुओं के प्रति धूर्त, द्रोह और हिंसा में कुबुद्धि वाला, चुगलखोर, भूमि का मालिक, पुत्रवान् स्त्री का प्रिय तथा विष, अग्नि, शस्त्र व्रण से पीड़ित होता है। धनु राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माङ्ग में धनु राशि में मङ्गल हो तो बहुत आघात से दुर्बल देह वाला, कटु भाषी, शठ, पराधीन, रथ, गज पर और पैदल युद्ध करने वाला, रथ पर से शर चलाने वाला, बहुत परिश्रम से सुखी क्रोध से धन सुख को नष्ट करने वाला, गुरुजनों का अभक्त होता है। मकर राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माङ्ग में अपने उच्च (मकर) में मङ्गल हो तो धन्यवाद का पात्र, धन सञ्चय करने वाला, सुख भोग से युक्त, स्वस्थ, श्रेष्ठबुद्धि, विख्यात, राजा वा सेनापति, सुशीला स्त्री का पति, युद्ध में विजयी, अपने देश में रहने वाला, स्वतन्त्र, लोगों का रक्षक, सुशील और बहुत उपचारों में लीन होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७९७ कुम्भ राशिस्थ भौम फल- जन्माङ्ग में कुम्भ में मङ्गल हो तो जातक प्रणय और पवित्रता से हीन, वृद्धाकृति, मरण समय में दुर्गति प्राप्त करने वाला, ईर्ष्या, असूया, मिथ्या भाषण दोष से धन को नष्ट करने वाला, रोम से युक्त देह, जूआ में धन हारने वाला, कुत्सित वेष वाला, दुखी, मदिरापान करने वाला और भाग्यहीन होता है। मीन राशिस्थ भौम फल- यदि जन्माङ्ग में मीन राशि में भौम हो तो जातक रोगी, अल्प पुत्र वाला, परदेशवासी, बन्धु से अपमानित, कपट औैर धूर्तता के कारण धन को नष्ट करने वाला, विषाद से युक्त, कुटिल, तीव्रशोक वाला, गुरुजन और बाह्मणों का अनादर करने वाला, दया रहित, अभीष्ट वस्तु का ज्ञाता, अपनी प्रशंसा से प्रसन्न होने वाला और विख्यात होता है। स्वराशिस्थ (मेष-वृश्चिक) भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- यदि जन्माङ्ग चक्र में स्वराशिस्थ मङ्गल पर रवि की दृष्टि होने से जातक धन स्त्री पुत्र से युक्त, राजमन्त्री वा न्यायाधीश, वा विख्यात राजा होता है। चन्द्र की दृष्टि से मातृहीन, क्षतदेह, अपने जनो का द्वेषी, मित्रहीन, ईर्ष्यावान् और कन्या सन्तान वाला होता है। बुध की दृष्टि से दूसरे के धन लेने में चतुर, मिथ्याभाषी, कामी, द्वेषी और वेश्याप्रिय होता है। गुरु की दृष्टि से पण्डित, कोमलवाक्य, सुन्दर, माता-पिता का भक्त, धनवान ऐश्वर्य सम्पन्न अनुपम राजा होता है।
करने वाला होता है। शुक्र की दृष्टि से स्त्री के कारण जेल जाने वाला, और धन को नष्ट
शनि की दृष्टि से बलहीन होने पर भी चोर को पकड़ने में चतुर, दूसरे के स्त्री का पोषण करने वाला होता है। शुक्रराशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में शुक्रराशि स्थित मंगल पर रवि की दृष्टि से जातक स्त्री से द्वेषकर वन पर्वत में विचरने वाला, बहुत शत्रु वाला, प्रचण्डवेषधारी और धैर्यवान् होता है। चन्द्रमा की दृष्टि से माता का अभक्त, कुटिल, बहुत पत्नी वाला, स्त्रियों का प्रिय, संग्राम से भीत होता है। बुध की दृष्टि से कलहप्रिय, वाचाल, कोमल देह, थोड़े पुत्र, थोड़े धन वाला, शास्त्रवेत्ता होता है। शुक्र की दृष्टि से राजमन्त्री, राजा का प्रिय, सेनापति, अपने नाम से प्रसिद्ध और सुखी होता है। शनि की दृष्टि से सुखी, विख्यात, धनी, मित्र और स्वजनों से युक्त, विद्वान्, नगर, ग्राम या जनसमूहों का नायक होता है। बुध राशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- यदि पत्रिका में बुध की राशि में
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७९८ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल मंगल सूर्य से दृष्ट हो तो जातक पण्डित, धनी, पराक्रमी, पर्वत, वन किले का प्रेमी और बलवान् होता है। यदि बुध राशिस्थ मंगल चन्द्रमा से दृष्ट हो तो वह जातक कन्या नगर का रक्षक स्त्रियों का अध्यक्ष, सुन्दर नम्रता से युक्त बुद्धिमान और राजगृह का रक्षक, सुखी, धनी, सुन्दर और स्त्रैण होता है। यदि बुध राशिस्थ मंगल बुध से दृष्ट हो तो जातक लेखक, गणितज्ञ, बड़े-बड़े काव्य का लेखक, अधिवक्ता, मधुर और मिथ्याभाषी, दूत तथा कष्ट सहने वाला होता है। बुधराशि में मंगल हो तो गुरु से दृष्ट हो तो जातक राजपुरुष, तेजस्वी, राजदूत, सभी कार्यों में चतुर और नेता होता है। यदि बुधराशि में मंगल शुक्र से देखा जाता हो तो जातक स्त्री कार्यकर्त्ता, धनी, सुन्दर अन्न वस्त्र भोक्ता होता है। यदि बुधराशि में मंगल, शनि से दृष्ट हो तो खान, पर्वत, किले में लीन, कृषक कष्ट पाने वाला, गन्दा रहने वाला, धनहीन होता है। कर्क राशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- कर्क राशिस्थ भौम पर रवि की दृष्टि हो तो पित्त रोग से पीड़ित, तेजस्वी, न्यायाधीश और धीर पुरुष होता है। कर्क राशिस्थ मंगल पर चन्द्र की दृष्टि से बहुत रोग से पीड़ित, नीच आचरण वाला, कुरूप और शोकयुत होता है। यदि बुध की दृष्टि से मलिन, पापी, क्षुद्र कुटुम्ब वाला, अपने जन से बहिष्कृत, निर्लज्ज होता है। एवं मेष, गुरु की दृष्टि से विख्यात, राजमन्त्री, विद्वान्, दानी, धन्य किन्तु भोगहीन होता है। शुक्र की दृष्टि से स्त्री के सङ्ग से उद्विग्न, उन्हीं के दोषों से अपमानित तथा धनहीन होता है। शनि की दृष्टि से समुद्रयात्रा से धनलाभ करने वाला, राजा के तुल्य, उत्तम चेष्टा वाला मनोहर स्वरूप होता है। सिंह राशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में सिंहस्थ मंगल पर सूर्य की दृष्टि हो तो विनयशील जनों का हितकर, मित्र और परिजनों से युक्त, गोशाला, वन, पर्वत में प्रेम रखने वाला होता है। चन्द्रमा की दृष्टि से माता का शत्रु, बुद्धिमान् कठोर देह, विशाल यश, स्त्री के द्वारा धन लाभ करने वाला हेता है।
निपुण होता है। बुध की दृष्टि से शिल्पज्ञ, लोभी, काव्य कला में कुटिल स्वभाव और
शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों के सुख से युत, स्त्रियों का प्रिय, सदा युवावस्थायुत, प्रसन्नचित्त होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ७९९ शनि की दृष्टि से वृद्ध समान आकृति, निर्धन, परगृह निवासकर्त्ता तथा दुखी होता है। गुरु राशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में गुरु राशिस्थ मङ्गल पर रवि की दृष्टि से लोक में पूज्य, सुन्दर, वन पर्वतदुर्ग में निवास करने वाला और क्रूर होता है। चन्द्रमा की दृष्टि से विकल, कलह प्रिय, पण्डित, राजा का विरोधी पुरुष होता है। बुध की दृष्टि से मेधावी, कार्य कुशल, शिल्पज्ञ और विद्वान् होता है। गुरु की दृष्टि से स्त्री और सुख से हीन, शत्रुओं से अजेय, धनी, व्यायाम (कसरत) करने वाला होता है। शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों का प्रिय, चित्रज्ञ, आभूषण भागी, उदार, विषय सुखभोगी सुन्दर होता है। शनि की दृष्टि से कुरूप शरीर, संग्रामप्रिय, पापी, भ्रमणंशील, सुखहीन, परम धर्भरत होता है। शनि राशिस्थ भौम पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में शनि राशि (मंकर कुम्भ) स्थित मंगल पर रवि की दृष्टि हो तो कृष्णवर्ण देह, शूर, बहुत स्त्री, पुत्र और धन से युक्त, अत्यन्त तेज स्वभाव वाला होता है। शनि राशिस्थ मंगल पर चन्द्रमा की दृष्टि से चञ्चल, माता का शत्रु, आभूषणभागी, उदार, चल मैत्री वाला, धनवान होता है।
अधर्मी होता है। बुध की दृष्टि से मन्दगामी निर्धन, कार्यों में असफल, निर्बल, कपटी,
होता है। शनि राशिस्थ मंगल पर गुरु की दृष्टि से सुन्दर, राजा के गुणों से युक्त
शनि राशिस्थ मंगल पर शुक्र की दृष्टि से विविध भोग का भोगी, धनाढ्य, स्त्रियों का पोषक, कलहप्रिय होता है। शनि की दृष्टि से राजा, बहुत धनी, स्त्री का द्वेषी, बहुत प्रजा वाला, पण्डित किन्तु सुखहीन और युद्ध में पराक्रम दिखाने वाला होता है।
बुध का राशि व दृष्टिवश फल मेष राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में मेष में बुध हो तो जातक संग्रामप्रिय, विज्ञ, आचार्य, धूर्त, कृशदेह, गान और नाच में रत, मिथ्याभाषी, सुन्दरियों का प्रिय, लेखक, नकली वस्तु बनाने वाला, बहुत भोजनकर्त्ता, श्रम से उपार्जित धन को नष्ट करने वाला, कर्ज करने वाला और कारागार के दुःखभोगी, चञ्चल और स्थिर दोनों स्वभाव से युत हैं।
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८००। ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल वृष राशिस्थ बुध फल-जन्म के समय वृष में बुध हो तो जातक चतुर, ढीठ, दानी, विख्यात, वेद शास्त्र के अर्थ ज्ञाता, व्यायाम, वस्त्र, भूषण का प्रेमी, स्थिर, स्वभाव वाला उत्तम स्त्री, धन से युक्त, मधुर और कोमल वचन, वचनपालक, संगीत हास्य, और सौन्दर्य का प्रेमी होता है। मिथुन राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में मिथुन राशिस्थ बुध हो तो उत्पन्न जातक सुन्दर वेषधारी, प्रियवक्ता, विख्यात, धनी, प्रवक्ता, मानी, सुखत्यागी, अल्परति वाला, दो स्त्रियों का पति, विवादी, वेद शास्त्र कला को जानने वाला, कवि, स्वतन्त्र, दानी, कर्मठ, बहुपुत्र और मित्रों वाला होता है। कर्क राशि में स्थित बुध फल- जन्म के समय कर्क में बुध हो तो जातक, पण्डित, परदेशवासी, स्त्री, और सङ्गीतादि में आसक्त, चञ्चल, व्यर्थ बात करने वाला, अपने बन्धुओं का द्वेषी, स्त्री से शत्रुता कर धन को नष्ट करने वाला, दुःशील, बहुत कार्य में लीन, कवि, और अपने कुल की कीर्ति से प्रसिद्ध होता है। सिंहस्थ बुध फल- जन्मकाल में सिंह राशि में बुध हो तो उत्पन्न जातक ज्ञान और कला से रहित, लोक में प्रख्यात असत्यभाषी, अल्प स्मरणशक्ति वाला, धनी, बलहीन, सहोदरों का द्वेषी, स्त्री सुखहीन, स्वतन्त्र, दुष्कर्मी, सेवक, सन्तानहीन, अपने कुल से विरुद्ध और दूसरों का मित्र होता है। कन्या राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में कन्या में बुध हो तो धर्मात्मा, प्रवक्ता, चतुर, लेख और काव्य का ज्ञाता, विज्ञान और शिल्प विद्या में रत, स्त्रियों का प्रिय, अल्प बली, श्रेष्ठ साधुओं में पूज्य, मानी, विनय उपचार और विवाद में तल्लीन, अपने गुणों से प्रसिद्ध उदार और बलवान् होता है। तुला राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में जन्म समय में बुध हो तो शिल्पज्ञ, विवादरत, वाक्यपटु, धन को इच्छानुसार खर्च करने वाला, अनेक देशों में व्यापार करने वाला, विप्र, अतिथि, देव गुरु का भक्त, विहित उपचारों में निपुण, लोक का प्रिय, देश का भक्त, धूर्त्त, चञ्चल, शीघ्र ही क्रोध और शान्ति धारण करने वाला पुरुष होता है। वृश्चिक राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में वृश्चिक में बुध हो तो श्रम, शोक और अनर्थ का भागी, द्वेषी, धर्म और लज्जा से रहित, मूर्ख, दुःस्वभाव, लोभी, दुष्ट स्त्री में आसक्त, कठोर दण्ड में रत, कपटी, निन्द्य कार्य में लीन, ऋणी, अधम जनों में प्रेम, दूसरों की वस्तु को लेने वाला होता है। धनु राशिस्थ बुध फल-जन्मकाल में धनु में बुध हो तो जातक विख्यात, उदार, श्रुति स्मृति और शास्त्र वेत्ता, शूर, सुशील, राजा का मन्त्री या पुरोहित, कुल में श्रेष्ठ, महाधनी, यज्ञ, अध्यापन में रत, मेधावी, वाक्पटु, व्रती, दानी, व्याकरणशास्त्र में चतुर होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८०१ मकर राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में मकर में बुध हो तो जातक अधम, मूर्ख, नपुंसक, दूसरों के कार्य में रत, कुल गुणों से हीन, अनेक दुःख से पीड़ित, सोने और घूमने वाला, चुगली करने वाला, असत्य वक्ता, बन्धुओं से त्यक्त, अव्यवस्थित, मलिन और डरपोक होता है। कुम्भ राशिस्थ बुध फल- जन्मकाल में कुम्भस्थित बुध हो तो सद्बुद्धि और सत्कर्म से हीन, अनेक धर्म में प्रवृत्त, विहित कार्य को छोड़ने वाला, शत्रुओं से अपमानित, अशुचि, शीलहीन, मूर्ख, अतिदृष्ट स्त्री का द्वेषी, अभोगी, गूँगा, दरिद्र, भीरु, मलिन और दूसरे की आज्ञा में रहने वाला होता है। मीन राशिस्थ बुध फल-जन्मकाल में मीन में बुध हो तो जातक सदाचारी, पवित्र, विदेशवासी, सन्तानहीन, दरिद्र, सती स्त्री का पति, निपुण, सज्जनों का प्रिय, अन्य धर्म को भी मानने वाला, सिलाई कार्य में निपुण, विज्ञान, वेदशास्त्र कला से रहित, पर धन लेने में उद्यत, तथापि धनहीन और मिलाजुला स्वभाव वाला होता है। भौम राशिस्थ (मेष-वृश्चिक) बुध पर ग्रहों की दृष्टि- जन्म के समय कुजराशि (मेष वृश्चिक) स्थित बुध पर रवि की दृष्टि से जातक सत्यवक्ता सुखी, राजा का मान्य और क्षमाशील होता है। भौम राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि से स्त्रियों का प्रिय, सेवा कार्य करने वाला, मलिन और शीलहीन होता है। एवं मङ्गल की दृष्टि होने से मिथ्या और प्रिय वक्ता, कलहप्रिय, • 'विद्वान्, धनी, राजा का प्रिय तथा शूर होता है। एवं मेष गुरु की दृष्टि से सुखी, कोमल रोमयुत देह और सुन्दर केश वाला, अति धनवान, लोगों पर आज्ञा पालन करने वाला एवं पापी होता है। शुक्र की दृष्टि होने से राजा का कार्य करने वाला, जन समूह या नगर का मुखिया, बोलने में चतुर, विश्वस्त और स्त्री सुख से युक्त होता है। शनि की दृष्टि से सुख से रहित, उग्र, हिंसक, कुटुम्बियों से रहित होता है। शुक्रराशिस्थ (वृष-तुला) बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में शुक्र राशि (वृष या तुला) में स्थित बुध पर रवि की दृष्टि होने से जातक दारिद्र दुख से पीड़ित, रोगी, दूसरों के कार्यों में रत होता है तथा लोक में निन्द्य होता है। यदि शुक्र राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि होने से लोक में विश्वस्त, धनी, ईश्वरभक्त, नीरोग, स्थिर परिजन वाला, विख्यात, राजमन्त्री होता है। मङ्गल की दृष्टि होने से रोग और शत्रु से पीड़ित, राजा से अपमानित होकर देश से बहिष्कृत होता है। गुरु की दृष्टि से पण्डित, अपने वचन का पालन कर्त्ता, देश नगर या जनों का मुखिया और विख्यात होता है। भृ. सं .- ५१
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८०२ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल एवं शुक्र की दृष्टि होने से सुन्दर, सुखी, वस्त्र एवं आभूषणों का भोगी तथा स्त्रियों का प्रिय होता है। तथा शनि की दृष्टि होने से सुख से हीन, बन्धु शोक से पीड़ित, रोगी, अनेक विपत्ति वाला तथा मलिन पुरुष होता है। स्वराशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- यदि जन्मकाल में स्वगृहे (मिथुन या कन्या) स्थित बुध पर रवि की दृष्टि से सत्य बोलने वाला, सुन्दर, राजा या राजा का प्रिय, सदाचारी, लोगों का प्रिय होता है।
नौकर होता है। मङ्गल की दृष्टि से भग्नदेहधारी, मलिन, प्रतिभाशाली, राजा का प्रिय
शूर होता है। गुरु की दृष्टि से राजमन्त्री, श्रेष्ठ, सुरूप, उदार धन परिजन से युक्त,
शुक्र की दृष्टि से पण्डित, राजसेवक या राजदूत, सन्धिपालक, दुष्ट स्त्री में आसक्त होता है। शनि की दृष्टि से उन्नतिशील, विनयी, कार्यसिद्ध करने वाला, धनवस्त्र सम्पन्न होता है। कर्क राशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में कर्क गत बुध पर रवि की दृष्टि से जातक धोबी, माली, घर बनाने वाला या मणि कर्त्ता (सोनार) होता है। कर्क राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि से स्त्री के कारण धन बल और सुख से हीन, असत्यभाषी, कूट (नकली वस्तु) बनोने वाला, चोर किन्तु प्रियवक्ता होता है। एवं गुरु की दृष्टि से मेधावी लोकप्रिय, भाग्यवान्, राजप्रिय, विद्या का पारङ्गत अर्थात् विद्वान् होता है। इसी प्रकार कर्क राशिस्थ बुध, शुक्र से दृष्ट हो तो जातक कामदेव के समान सुन्दर प्रियवक्ता, गामनवादन में दक्ष, भाग्यवान् और सुन्दर होता है। यदि कर्क राशिस्थ बुध, शनि से दृष्ट हो तो जातक आडम्बर में इच्छा रखने वाला, पाखण्डी, कारागार में रहने वाला, गुणहीन, भाई गुरुजनों का द्रोही होता है। सिंह राशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मपत्री में सिंहस्थ बुध पर रवि की दृष्टि से जातक सेवा करने से योग्य ईर्ष्यावान्, धनी, गुणी, हिंसक, क्षुद्र, चञ्चल स्वभाव और निर्लज्ज होता है। यदि सिंह राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि से रूपवान्, चतुर, काव्य, कला और संगीत में पटु, धनी, सुशील होता है। यदि सिंह राशिस्थ बुध पर मङ्गल की दृष्टि से नीच, दुखी क्षतदेह, चातुर्यहीन, लीला में सुन्दर और नपुंसक होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८०३ सिंह राशिस्थ बुध पर गुरु की दृष्टि से कोमलाङ्ग, पण्डित, वाक्पटु, विख्यात, भृत्य और वाहनों से युक्त होता है। सिंह राशिस्थ बुध पर शुक्र की दृष्टि से रूपवान्, प्रियवक्ता, वाहन से युत, धीर, राजा या सचिव होता है। सिंह राशिस्थ बुध पर शनि की दृष्टि से लम्बा शरीर, कान्तिहीन, कुरूप, पसीना के दुर्गन्ध से युक्त तथा सुख विहीन होता है। गुरु राशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्म के समय धनु या मीन स्थित बुध पर रवि की दृष्टि से शूर किन्तु प्रमेह और मृगी रोग से पीड़ित और शान्त स्वभाव होता है। गुरु राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि से लेखक, सुकुमार, विश्वस्त, लोकप्रिय, सुखी और अधिक धनी होता है। गुरु राशिस्थ बुध पर मङ्गल की दृष्टि से जनसमूह, नगर, या चोर अथवा वनवासी का अध्यक्ष और लेखक होता है। गुरु राशिस्थ बुध पर गुरु की दृष्टि से स्मरणशक्ति वाला, कुलीन, सुन्दर, श्रेष्ठ वैज्ञानिक, राजमन्त्री या कोषाध्यक्ष होता है। एवं शुक्र की दृष्टि से बालिका और बालक को लिखाने पढ़ाने वाला, धनवान, सुकुमार और शौर्यसम्पन्न पराक्रमी होता है गुरु राशिस्थ बुध पर शनि की दृष्टि से वन और दुर्गस्थान में रहने वाला, बहुत खाने वाला, दुष्टस्वभाव, मलिन और समस्त कार्यों में असफल होता है। शनि राशिस्थ बुध पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्म के समय यदि मकर या कुम्भ स्थित बुध पर रवि की दृष्टि हो तो जातक योद्धा, बली, बहुत भोजन करने वाला, निष्ठुर, प्रियवक्ता और विख्यात होता है। शनि राशिस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि होने से जल से जीविका करने स्थिर होता है। वाला, धनी, पुष्प, मद्य और कन्द का व्यापारी, भयानक रूप वाला और
शनि राशिस्थ बुध पर मङ्गल की दृष्टि से चञ्चल वचन वाला, सौम्य, शील, लज्जा करने वाला और सुखी होता है। शनि राशिस्थ बुध पर गुरु की दृष्टि से धन और अन्न वस्त्र से सम्पन्न, ग्राम, शहर और जनसमूहों से पूजित, सुखी और विख्यात होता है। शनि राशिग्थ बुध पर शुक्र की दृष्टि से कुशीला स्त्री का पति, कुरूप, बुद्धिहीन, कामी, बहुत पुत्र वाला और दुखी होता है। शनि राशिस्थ बुध पर शनि की दृष्टि हो तो जातक दरिद्र, कार्यकर्त्ता, दुःखी, और अत्यन्त गरीब होता है।
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८०४ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल गुरु की राशि व दृष्टिवश फल मेष राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में मेष में गुरु हो तो जातक विवादियों के गुण से युक्त, यत्न से रत्नादि लाभ करने वाला, पुत्र धन और बल से युक्त, प्रतिभा सम्पन्न, तेजस्वी, बहुत शत्रु वाला, बहुत व्यय करने वाला, क्षत शरीर, क्रोधी, उग्रदण्ड नायक होता है। वृष राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में वृष में गुरु हो तो विशाल शरीर, देव ब्राह्मण और गाय का भक्त, मनोहर रूप, स्वपत्नीरत, कृषि और गाय से धनी, उत्तम वस्तुओं से युक्त, उचित भाषी, सुबुद्धि, गुणी, नीतिज्ञ, विनयी और वैद्यक क्रिया में चतुर होता है। मिथुन राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में मिथुन में गुरु हो तो धनी, सुबुद्धि, वैज्ञानिक, सुन्दर आँख वाला, वक्ता, सरल, चतुर, धर्मशील, गुरुजन कवि होता है। तथा बन्धुओं से आदृत, मङ्गलशब्द प्रयोक्ता, कार्य में आसक्त और श्रेष्ठ
कर्क राशि में स्थित गुरु फल- जन्माङ्ग चक्र में कर्क में बृहस्पति हो तो पण्डित, रूपवान्, धर्मात्मा, सुशील, बली, यशस्वी, सुसम्पन्न और धन वाला, सत्यभाषी, स्थिर पुत्र वाला, लोक में मान्य, विख्यात राजा, सुकर्म करने वाला, मित्रों में आसक्त होता है। सिंहस्थ गुरु फल- जन्माङ्ग में सिंहस्थ वृहस्पति में शत्रुओं से दृढ़ शत्रुता और मित्रों से स्नेह करने वाला, विद्वान्, धनी, शिष्ट परिजनों से युक्त, राजा या राजतुल्य, पुरुषार्थ करने वाला, सभा का लक्ष्य, शत्रु को जीतने वाला, दृढ़देह और वन पर्वत दुर्ग में निवास वाला होता है। कन्या राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में कन्यास्थित गुरु हो तो बुद्धिमान्, धर्मात्मा, कार्यकुशल, सुगन्ध वस्त्र से सहित, कार्य में दृढ़ संकल्प, शास्त्र और शिल्प से धनी, दानी, सुशील, चतुर और अनेक अक्षर (लिपि) को जानने वाला धनी होता है। तुला राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में तुला राशि में गुरु हो तो जातक बुद्धिमान्, बहुत पुत्र वाला, विदेश भ्रमण से अति धनी, भूषण प्रिय, विनीत, नट नर्तकों द्वारा धन संग्रह करने वाला, सुन्दर, शास्त्रज्ञ, अपने साथी व्यापारियों में श्रेष्ठ, देवता और अतिथि के सत्कार में लीन और पण्डित होता है। वृश्चिक राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में वृश्चिक में गुरु हो तो जातक बहुत शास्त्रों में निपुण, राजा या ग्रन्थों का भाष्य करने वाला, चतुर, देव मन्दिर बनवाने वाला, बहुत स्त्री और पुत्र वाला, रोग से पीड़ित, बहुत परिश्रमी, अति क्रोधी, दम्भ युक्त कर्म करने वाला, निन्द्य आचरण करने वाला होता है। धनु राशिस्थ गुरु फल-जन्मकाल में धनु में गुरु हो तो व्रतोद्यापन,
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भृगु संहिता फल दर्पण ८०५ दीक्षा, यज्ञ आदि में आचार्य, स्थिर धन वाला, दानी, मित्रों का शुभ चाहने वाला, परोपकार और शास्त्र में आसक्त, मण्डलाधिप या राजमन्त्री, अनेक देश में घूमने वाला, एकान्त और तीर्थस्थान में निवास करने वाला होता है। मकर राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में मकर स्थित गुरु में जातक अल्प बल, बहुत श्रम और क्लेश से युक्त, नीचाचरण, मूर्ख, निर्धन, दूसरों का नौकर, दया, शौच, बन्धु प्रेम और धर्म से रहित, दुर्बल, डरपोक, विदेशवासी, विषादयुत होता है। कुम्भ राशिस्थ गुरु फल- जन्मकाल में कुम्भ राशिस्थ गुरु में जातक चुगुलखोर, दुःस्वभाव, नीच कार्य में रत, गण में मुखिया, क्रूर, लोभी, रोगी, अपने वचन के दोष से धन नाश करने वाला, बुद्धिहीन, गुरु पत्नी में आसक्त होता है। मीन राशिस्थ गुरु फल-जन्मकाल में मीनराशि में गुरु हो तो वेदशास्त्रज्ञ, मित्र और सजनों का मान्य, नेता, श्लाघ्य, धनी, किसी से डरने वाला नहीं, अति गर्वयुक्त, स्थिर संकल्प वाला, राजा की नीति, शिक्षा, व्यवहार, रण आदि के प्रयोग को जानने वाला, ख्यात और शांन्ति प्रिय होता है। भौम राशिस्थ (मेष-वृश्चिक) गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में मेष या वृश्चिक राशिस्थ गुरु पर रवि की दृष्टि हो तो जातक धर्मात्मा, सत्यवक्ता, ख्यात पुत्र वाला, भाग्यवान्, रोमयुक्त देह वाला होता है। भौम राशिस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से इतिहास और काव्यवेत्ता, बहुत रत्नवान्, स्त्रियों का प्रिय, राजा और पण्डित होता है। भौम राशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से राजपुरुष, वीर, उग्र, नीतिज्ञ, विनयी, धनी, कुभृत्य और कुशीला स्त्री वाला होता है। भौम राशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से मिथ्याभाषी, धूर्त, पापी, परछिद्रान्वेषी, सेवा और विनय जानने वाला और कपटी होता है। भौम राशिस्थ गुरु पर शुक्र की दृष्टि से गृह शय्या वस्त्र गन्ध भूषण आदि विभव से युक्त और डरपोक होता है। भौम राशिस्थ गुरु पर शनि से मलिन, लोभी, कठोर, साहसी, प्रसिद्ध, चञ्चल मैत्री और अधिक सन्तान वाला होता है। शुक्र राशिस्थ (वृष-तुला) गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में वृष या तुला में गुरु पर रवि की दृष्टि से जातक परिजन और पशुओं से युक्त, भ्रमणशील, लम्बा शरीर, पण्डित, राजमन्त्री होता है। शुक्र राशिस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से अति धनी, अति शान्त, माता का भक्त, स्त्रियों का प्रिय, अति भोगी होता है। शुक्र राशिस्थ गुरु पर मंगल की दृष्टि से युवतियों का प्रिय, पण्डित, वीर, धनवान, सुखी, राजपुरुष होता है।
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८०६ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल शुक्र राशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से अति मनोहर, महाधनी, आभूषण धारण करने वाला, दयालु, उत्तम शय्या और उत्तम वस्त्र वाला होता है। शुक्र राशिस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि से पण्डित बहुत धनी, गाँव और नगरवासियों में श्रेष्ठ, मलिन, कुरूप और स्त्रीहीन होता है। बुध राशिस्थ (मिथुन-कन्या) गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल-जन्मकाल में मिथुन या कन्यास्थित गुरु पर रवि की दृष्टि से श्रेष्ठ, गाँव का प्रमुख, परिवार स्त्री पुत्र धन से युक्त होता है। बुध राशिस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से धनी, माता का भक्त, सुख, स्त्री पुत्र से युत और अनुपम सुन्दर होता है। बुध राशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से सर्वत्र विजयी, विकृतदेह, धनी, लोक में मान्य होता है। बुध राशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से ज्यौतिषज्ञाता, बहुत स्त्री पुत्र वाला, अनेक रूप के वचन बोलने वाला, सूत्रकार होता है। बुध राशिस्थ गुरु पर शुक्र की दृष्टि से देवमन्दिर आदि कृत्य करने वाला, वेश्यागामी, स्त्रियों के हृदय को चुराने वाला होता है। बुध राशिस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि से, किसी जाति, या जनसमूह, या राष्ट्र, या ग्राम या नगर का प्रमुख्य सुन्दर शरीर वाला होता है। कर्क राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्म चक्र में कर्कस्थ गुरु पर रवि की दृष्टि से जातक लोक में विख्यात, जनसमूह, पूर्व अवस्था में सुख धन स्त्री से हीन पश्चात् इन सबों के सुख से युक्त होता है। कर्क राशिस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से अति सुन्दर, धन, सवारी, उत्तम स्त्रीपुत्र वाला राजा होता है। कर्क राशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से बाल्यावस्था में ही विवाहित, सुवर्ण भूषण से युक्त, धनी, कलहप्रिय, पापहीन, लोक में विश्वस्त राजमन्त्री होता है। कर्क राशिस्थ गुरु पर शुक्र से दृष्ट हो तो बहुत स्त्री, बहुत धन और भूषण से युत, सुखी और सुन्दर होता है। कर्क राशिस्थ गुरु पर शनि से दृष्ट हो तो गाँव, शहर या सेना का अध्यक्ष, वक्ता, धनवान और वृद्धावस्था में भोगो से युत होता है। सिंह राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्म चक्र में सिंहस्थ वृहस्पति पर रवि की दृष्टि से सज्जनों का प्रिय, विख्यात, राजा, अतिधनी, सुशील होता है। सिंहस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से सौभाग्यवान्, मलिन, स्त्री के भाग्य से धनवृद्धि वाला, जितेन्द्रिय होता है। सिंहस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से साधु और गुरुओं का भक्त सुकृत्य
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भृगु संहिता फल दर्पण ८०७ करने वाला, श्रेष्ठ, चतुर, शुद्ध, वीर, और क्रूर होता है। सिंहस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से गृह निर्माण में निपुण, वैज्ञानिक, प्रियवक्ता, राजा का प्रधान मन्त्री और शास्त्रज्ञ होता है। सिंहस्थ गुरु पर शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों का प्रिय, सुन्दर, राजा से आदृत, अधिक बली होता है। सिंहस्थ गुरु पर शनि की दृष्टि से अधिक और प्रियवचनवक्ता, सुखहीन, चित्रकार, निष्ठुर और देवाङ्गना के समान सुखी होता है। गुरु राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में धनु वा मीनस्थ गुरु पर रवि की दृष्टि से जातक राजा का विरोधी, धन और बन्धुओं से त्यक्त होकर दुखी होता है। स्वराशिस्थ गुरु पर चन्द्र की दृष्टि से सब सुखों से युक्त, स्त्रियों का प्रिय, मान धन ऐश्वर्य से गर्वित होता है। स्वराशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से संग्राम में क्षतदेह, हिंसक, परोपकारक, परिवारहीन होता है। स्वराशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से राजा या राजमन्त्री, पुत्र धन सौभाग्यसुख से युक्त, सबका हित साधक होता है। स्वराशिस्थ गुरु पर शुक्र की दृष्टि से सुखी, धनी, पण्डित, दोषहीन, दीर्घायु, सुन्दर, लक्ष्मीवान् पुरुष होता है। स्वराशिस्थ गुरु पर शनि की दृष्ट से मलिन, भीरु, लोक में निन्द्य, दीन सुखधर्मादि से हीन होता है। शनि राशिस्थ गुरु पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मचक्र में मकर या कुम्भस्थ गुरुपर रवि की दृष्टि से जातक विद्वान्, राजा, स्वभाव से हीन; धनी, भोगी और पराक्रमी होता है। शनि राशिस्थ गुरु पर चन्द्रमा की दृष्टि से पिता माता का भक्त, श्रेष्ठ, कुलीन, विद्वान्, धनी सुशील और धर्मात्मा होता है। - शनि राशिस्थ गुरु पर मङ्गल की दृष्टि से वीर, राजा का सेनापति, बलवान्, सुन्दर, विख्यात, लोक में मान्य होता है। शनि राशिस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि से कामी, गुणियों में श्रेष्ठ, धन वाहन से युत, विख्यात, मित्रों से युत होता है। शनि राशिस्थ गुरु पर शुक्र से दृष्ट हो तो जातक खाने योग्य अन्न का संग्रह कर्त्ता, उत्तम घर शय्या, आसन स्त्री, भूषण व वस्त्र से युक्त होता है। यदि शनि राशिस्थ गुरु शनि से दृष्ट होती अद्वितीय विद्या और स्वभाव वाला, सर्वश्रेष्ठ, भूपाल परिजन, पशुओं से सम्पन्न तथा भोग विलास में लीन होता है।
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ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल शुक्र का राशि व दृष्टिवश फल मेष राशिस्थ शुक्र फल-जन्माङ्ग में मेष राशि में शुक्र हो तो जातक रात्रि में अन्धा, दोषयुक्त, दुःस्वभाव, दूसरे की स्त्री को चुराने वाला, वेश्यागामी; वन में रहने वाला, स्त्री के कारण बन्धन में पड़ने वाला, कठोर, सेनापति या ग्राम का स्वामी, अविश्वासी, धृष्ट होता है। वृष राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में वृष में शुक्र हो तो बहुत स्त्री वाला, खेती करने वाला, रत्ना वस्त्रादि से युक्त, गो सेवा से जीविका वाला, दानी, बन्धुपालक, सुन्दर, धनी, बहुविद्य, प्राणीमात्र का शुभचिन्तक गुणवान् और परोपकारी होता है। मिथुन राशिस्थ शुक्र फल-जन्म के समय मिथुन में शुक्र हो तो विज्ञान, कला, शास्त्र में विख्यात, सुन्दर, कामी, टिप्पणीकर्त्ता, काव्य करने में चतुर और लोकप्रिय होता है। गीत और नृत्य से धन लाभ करने वाला, मित्रों से युत, देव ब्राह्मण का भक्त, स्थिर मैत्री वाला होता है। कर्क राशि में स्थित शुक्र फल- जन्मकाल में कर्क में शुक्र हो तो मतिमान्, धर्मात्मा, पण्डित, बली, शान्त, गुणियों में श्रेष्ठ, अभीष्ठ सुख से युक्त, सुन्दर, नीतिज्ञ, स्त्री मद्यपान के कारण रोग से पीड़ित तथा अपने वंश के दोष से दुःखी होता है। - सिंह राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में सिंह स्थित शुक्र हो तो स्त्री में आसक्त, सुख धन सहित, अल्पबल, बन्धु प्रिय, नानासुख होते भी कभी कभी दुःखी, परोपकारी, गुरुजनों का आज्ञाकारी, बहुत चिन्ता से रहित होता है। कन्या राशिस्थ शुक्र फल- पृथ्वी पर जन्म लेने के समय कन्या में शुक्र हो तो जातक थोड़ी चिन्ता वाला, सुकुमार, चतुर, परोपकारी, कला में निपुण, प्रियभाषी, नाना प्रकार के कार्य में यत्न करने वाला, दुष्टा स्त्री का पति, दीन, सुखभोगहीन, अधिक कन्या थोड़े पुत्र वाला तथा तीर्थ और सभा में पण्डित होता है। तुला राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में तुला राशिा में शुक्र हो तो श्रम से धनोपार्जन करने वाला, वीर, वस्त्र विभूषण प्रिय परदेशवासी, अपने जन का रक्षक, कठिन से कठिन कार्य में निपुण, धनी, पुण्यावन्, देव ब्राह्मण में भक्ति रखने वाला, पण्डित और सौभाग्यवान् होता है। वृश्चिक राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में वृश्चिक में शुक्र हो तो लोकद्वेषी, निर्दय, धर्महीन, विवादी, धूर्त, सहोदरों से विरक्त, भाग्यहीन, शत्रुजित, पापी, पीड़ित, कुलटा से द्वेष करने वाला, हिंसक, बहुत ऋण वाला, दरिद्र, नीच और गुप्ताङ्ग का रोगी होता है। धनु राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में यदि धनु में शुक्र हो तो वह जातक धर्म, अर्थ, काम के फल से युक्त, लोकप्रिय, सुन्दर, श्रेष्ठ, कुल
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भृगु संहिता फल दर्पण ८०९ कमल दिवाकर, विद्वान् एवं गोपालक होता है। वह भूषणप्रिय, धन स्त्री से युत, राजमन्त्री, चतुर, मोटा और लम्बा देह तथा लोक में पूजनीय होता है। मकर राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में मकर में शुक्र हो तो खर्च भय से दुखी, दुर्बल देह, वृद्धा स्त्री में आसक्त, हृदयरोगी, धनलोभी, मिथ्याभाषी, धूर्त, चतुर, नपुंसक, चेष्टाहीन, दूसरे के कार्य में रत, मूर्ख और क्लेश सहन करने वाला होता है। कुम्भ राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में कुम्भ में शुक्र हो तो उद्वेग रोग से दुखी, व्यर्थ कार्य में रत, परस्त्नीगामी, अधर्मी, गुरुजन और सन्तान का शत्रु, रत्नादि उपभोग तथा वस्त्रभूषणादि से हीन और मलिन होता है, इसमें संदेह नहीं है। मीन राशिस्थ शुक्र फल- जन्मकाल में मीन में शुक्र हो तो जातक चतुर, उदार, दानी, गुणी, धनी, शत्रुजेता, लोक में ख्यात, श्रेष्ठ, विशेष कार्यकर्ता, राजा का प्रिय, वक्ता, बुद्धिमान् साधुजनों से धन और मान लाभ करने वाला, वचन पालक, कुलपोषक और ज्ञानी होता है। भौम राशिस्थ (मेष-वृश्चिक) शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल-जन्मकाल के समय मेष या वृश्चिक स्थित शुक्र पर रवि की दृष्टि से स्त्री के कारण धन सुख से हीन, दुःख से पीड़ित किन्तु राजा और पण्डित होता है। भौम राशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि से बन्धन भागी, कामी, दुष्टा .. स्त्री का पति होता है। भौम राशिस्थ शुक्र पर मङ्गल की दृष्टि से धन सुख और मान से हीन, दूसरे का कार्यकर्ता, मलिन होता है। भौम राशिस्थ शुक्र पर बुध की दृष्टि से मूर्ख, ढीठा, नीच, भाई से लड़ने वाला, विनयहीन, चोर, क्षुद्र, क्रूर होता है। भौम राशिस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि से सुलोचन, उत्तम स्त्री वाला, सुन्दर और लम्बा शरीर, बहुत पुत्र वाला होता है। भौम राशिस्थ शुक्र पर शनि की दृष्टि से जातक अत्यन्त मलिन, आलसी, भ्रमणशील, अपने स्वभाव के मनुष्य का नौकर और चोर होता है। स्वराशिस्थ (वृष-तुला) शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में वृष या तुलास्थित शुक्र पर रवि की दृष्टि से सुन्दर स्त्री, धन सुख से युक्त, उत्तम पुरुष किन्तु स्त्री का वशीभूत होता है। स्वराशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि से कुलीना माता का पुत्र, सुख धन मान और पुत्र से युक्त, श्रेष्ठ और मनोहर रूप होता है। स्वराशिस्थ शुक्र पर मङ्गल की दृष्टि से दुःशीला स्त्री के कारण घर और धन का नाश करने वाला, कामी होता है। स्वराशिस्थ शुक्र पर बुध की दृष्टि से मनोहर, मृदुल, सुन्दर, सुख,
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८१० ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल धैर्य बुद्धि से युक्त, बली, सब गुणों से युत और विख्यात होता है। स्वराशिस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि से स्त्री पुत्र, गृह, सवारी आदि के सुख से युक्त, स्वाभीष्ट कार्य साधक होता है। स्वराशिस्थ शुक्र पर शनि की दृष्टि से थोड़े सुख और धन वाला, दुष्ट स्वभाव, कुशील स्त्री का पति और रोग से युत शरीर वाला होता है। बुध राशिस्थ (मिथुन-कन्या) शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में मिथुन या कन्या स्थित शुक्र पर रवि की दृष्टि से राजा, माता और स्त्री का उपकारक, पण्डित, धनी, सुखी होता है। बुध राशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि से कृष्ण नेत्र सुकेश शय्या, सवारी आदि का भोगी, मनोहर होता है। बुध राशिस्थ शुक्र पर मंगल की दृष्टि से कामी, सुन्दर, स्त्री के हेतु धन नाशक होता है। बुध राशिस्थ शुक्र पर बुध की दृष्टि से पण्डित, मृदु, धनी, परिजन और सवारी से युत, सुन्दर, समुदाय का स्वामी वा राजा होता है। बुध राशिस्थ शुक्र पर गुरु कीदृष्टि से अति सुखी, प्रतापी, नकली वस्तु बनाने में पटु, पण्डित और आचार्या होता है। बुध राशिस्थ शुक्र पर शनि की दृष्टि से जातक अति दुखी, लोक में तिरस्कृत, चञ्चल, लोगों का द्वेषी और मूर्ख होता है। कर्क राशिस्थ शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल के समय कर्कस्थ शुक्र पर रवि की दृष्टि हो तो जातक की स्त्री गृह कार्य में तत्परा, कोमलाङ्गी, रोषयुक्ता, राजपुत्री और धनवती होती है। चन्द्रमा की दृष्टि से सौतेली माता को सुख देने वाला, प्रथम कन्या सन्तान का जन्मदाता तथा अधिक पुत्र वाला, सौभाग्यवान् और सुन्दर होता है। कर्कराशिस्थ शुक्र पर मङ्गल की दृष्टि से कला को जानने वाला, अति धनवान, स्त्री के लिये दुखी, भ्रमणशील, धनी और पण्डित होता है। गुरु की दृष्टि से नौकर, पुत्र, भोग, बन्धु, मित्र इन सबों से युक्त और पण्डित होता है। गुरु की दृष्टि से नौकर, पुत्र, भोग, बन्धु, मित्र इन सबों से युक्त और राजा का प्रिय होता है। शनि की दृष्टि से स्त्री का वश, दरिद्र, नीच, कुरूप, चञ्चल और सुखहीन होता है। सिंह राशिस्थ शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल के समय सिंह राशिस्थ शुक्र पर रवि की दृष्टि हो तो जातक ईर्ष्यावान्, युवतियों का प्रिय, कामी, स्त्री के हेतु से धनी और हाथी रखने वाला होता है। सिंह राशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो सौतेली माता का पिण्ड दाता,
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भृगु संहिता फल दर्पण ८११ स्त्री के हेतु दुखी, धनवान, अनेक प्रकार की (चञ्चल) बुद्धि वाला होता है। सिंह राशिस्थ शुक्र पर मङ्गल की दृष्टि से राजपुरुष, विख्यात, स्त्रियों का प्रिय, धनी, सुन्दर, परस्त्रीगामी होता है। सिंह राशिस्थ शुक्र पर बुध की दृष्टि से धनसञ्चयकारक, लोभी, स्त्रैण, परस्त्रीगामी, योद्धा, धूर्त्त, मिथ्यावादी, धनी होता है। सिंह राशिस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि से सवारी, धन, और नौकरों से युक्त, बहुत स्त्री का पति, और राजमन्त्री होता है। सिंह राशिस्थ शुक्र पर शनि की दृष्टि से राजा या राजा के तुल्य, प्रख्यात, धन और अनेक सवारी से युक्त, विधवा स्त्री को रखने वाला, रूपवान् और दुखी होता है। गुरु राशिस्थ शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्मकाल में धनु या मीनस्थ शुक्रपर रवि की दृष्टि से जातक तीक्ष्ण बुद्धि, शूर, पण्डित, धनी, लोकप्रिय, विदेशगामी होता है। गुरु राशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि से विख्यात, राजपुरुष, भोजनादि विविध भोग से युक्त और अद्वितीय बलवान् होता है। गुरु राशिस्थ शुक्र पर मंङ्गल की दृष्टि से स्त्रियों का द्वेषी, नाना प्रकार के सुख, दुःख और धन से युक्त, गोपालक तथा श्रेष्ठ अग्रगण्य पुरुष होता है। गुरु राशिस्थ शुक्र पर बुध की दृष्टि से सब प्रकार के वस्त्र, विभूषण, अन्न, पानादि का भागी, और धन वाहनों से युक्त होता है। गुरु राशिस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि से हाथी, घोड़े, गाय, बहुत पुत्र स्त्री से युक्त, अति सुखी, बड़ा धनवान होता है। गुरु राशिस्थ शुक्र पर शनि की दृष्टि से नित्य धन लाभ करने वाला, सुखी, भोगी, धनाळ्य और सौभाग्यवान् होता है। शनि राशिस्थ शुक्र पर ग्रहों की दृष्टि फल- जन्माङ्ग में मकर या कुम्भ स्थित शुक्र पर रवि की दृष्टि से जातक स्त्रियों का परमप्रिय, महाधनवान; सत्य और सुखों से युक्त, वीर होता है।
होता है। शनि राशिस्थ शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि से तेजस्वी, शूर, धनी, भाग्यवान्
शनि राशिस्थ शुक्र पर मङ्गल की दृष्टि से स्त्रीहीन, अर्थहीन, रोगी, श्रम से युक्त होता हुआ अन्त में सुखी होता है। शनि राशिस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि से इच्छित वस्त्र माला सुगन्धादि से युत, सुकुमार शरीर, गानवाद्य में निपुण और सती स्त्री का पति होता है। शनि राशिस्थ शुक्र पर शनि की दृष्टि से नौकर, सवारी, धनभोग से युक्त, मलिन, काला शरीर, सुन्दर और विशाल देहधारी होता है।
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८१२ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल शनि का राशि व दृष्टिवश फल मेष राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भावकाल में मेष राशि में शनि हो तो जातक व्यसन और परिश्रम से खिन्न, प्रपञ्जी, बन्धुद्वेषी, निष्ठुर, ढीठ बहुत बोलने वाला, निन्द्, निर्धन, कुरूप, क्रोधी, नीच आचरण करने वाला, प्रियजानों का शत्रु, मूर्ख, दयाहीन और पापी होता है। वृष राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में वृष राशि में शनि हो तो जातक धनहीन, भृत्य, अनुचित वक्ता, सत्कर्महीन, वृद्धा स्त्री गामी, दुष्ट मित्र वाला, परस्त्री सेवक, कपटी, बहुत कार्य में आसक्त और मूर्ख होता है। मिथुन राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में मिथुन में शनि हो तो बहुत ऋण, बन्धन और परिश्रम से दुःखी, दम्भी, अच्छे गुणों से हीन, छिपकर रहने वाला, कामी, कपटी, क्रोधी, शठ, दुःशील, क्रीड़ा का अनुगमी होता है। कर्क राशि में स्थित शनि फल- प्रादुर्भाव काल में कर्क में शनि हो तो सुशीलास्त्री का पति, बाल्यावस्था में धनहीन, रोगयुक्त, माता से रहित, अत्यन्त मृदुस्वभाव, विशेषकार्य में रत, सदा रोग पीड़ित, तथा युवावस्था में शत्रु को जीतने वाला, ख्यात, बन्धुओं से विरुद्ध, कुटिल स्वभाव, राजा के समान दूसरे के सुख को वृद्धि कर्त्ता होता है। सिंह राशिस्थ शनि फल फल- प्रादुर्भाव काल में सिंह में शनि हो तो लिखने पढ़ने में तत्पर, विषयों को जानने वाला, लोक में निन्द्, शालीनता से रहित, स्त्रीहीन, नौकरी से जीने वाला, एकांकी, हर्षहीन, निन्ध कार्य में तत्पर, क्रोधी, अनेक प्रकार के मनोरथों से भ्रान्त, भार तथा मार्ग के श्रम से दुःखी, मध्यम शरीरधारी होता है। कन्या राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में कन्याराशि में शनि हो तो नपुंसकाकृति, शठ, परान्नभोगी, वेश्यागामी, अल्प मित्र वाला, शिल्प कला में अनभिज्ञ, विशिष्ट कार्य की इच्छुक, पुत्र और धन से युक्त, आलसी, परोपकारी, कन्याओं को दूषित करने वाले कार्य में तत्पर और शोचविचार कर कार्य करने वाला होता है। तुला राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में तुला में शनि हो तो जातक धनसङ््ग्रही, मृदुभाषी, विदेश यात्रा से धनमान प्राप्त करने वाला, राजा या पण्डित, स्वजनों से रक्षित धन वाला, समाज में श्रेष्ठ, वचन के प्रभाव से स्थान पाने वाला, साधु, कुलटा, नर्तकी और वेश्या स्त्री के प्रेम में आसक्त रहने वाला होता है। वृश्चिक राशिस्थ शनि फल- वृश्चिक में शनि हो तो लोकद्वेषी, कुटिल, विष या शस्त्र से हत, अति क्रोधी, लोभी, गौरवी, धनवान, दूसरों का धन हरने वाला, शुभ कृत्य से विमुख, नीच कर्म, हानि, खर्च और रोगों से दुखी होता है। धनु राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में धनुराशिस्थ शनि हो तो
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भृगु संहिता फल दर्पण ८१३ जातक व्यवहार, बोध (ज्ञान), अध्ययन, विद्या में निपुण, पुत्रों के गुणों से तथा अपने धर्म और सुशीलता से लोक में ख्यात, वृद्धावस्था में उत्कृष्ट सम्पति का भोग, लोक में आदर, थोड़े बोलने वाला, बहुत नाम वाला तथा सरल होता है। मकर राशिस्थ शनि फल-प्रादुर्भाव काल में मकर में शनि हो तो परस्त्री तथा अन्य स्थान का अधिपति, वेदज्ञ, गुणी, शिल्पज्ञ, श्रेष्ठ, कुलपूज्य, दूसरों से आदृत, विख्यात, स्नान और अलंकार का प्रेमी, कार्य में चतुर, विदेश में रहने वाला, शूरता से सम्पन्न होता है। कुम्भ राशिस्थ शनि फल- प्रादुर्भाव काल में कुम्भ में शनि हो तो जातक अधिक असत्य बोलने वाला, मदिरा तथा स्त्री के व्यसन में अति आसक्त, धूर्त, ठग, मित्रों को धोखा देने वाला, अति क्रोधी, ज्ञान कथा से बहिर्मुख, परस्त्रीगामी, कठोरभाषी, बहुत कार्य को आरम्भ करने वाला होता है। मीन राशिस्थ शनि फल- यदि जन्मकाल में मीन में शनि हो तो जातक यज्ञ तथा शिल्प विद्या का प्रेमी, अपने बन्धु और मित्रों में प्रधान, शान्त, स्वभाव, धनी, नीतिज्ञ, रत्न की परीक्षा में प्रयत्न करने वाला, धर्म व्यवहार में तल्लीन, विनयी तथा गुणों से युक्त तथा वृद्ध सदृश विचारशील होता है। भौम राशिस्थ (मेष-वृश्चिक) शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल-प्रादुर्भाव काल में मेष या वृश्चिकस्थित भौमराशि स्थित शनि पर रवि की दृष्टि से जातक खेती करने वाला, अत्यन्त धनी, गाय, भैंस, घोड़े आदि चतुष्पदों से युक्त, भाग्यवान्, कार्यों में सन्नद्ध होता है। भौमराशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि से जातक चञ्चल, नीच स्वभाव, - कुरूपा और कुशीला स्त्री में आसक्त, सुख और धन से हीन होता है। भौमराशिस्थ शनि पर मङ्गल की दृष्टि से हिंसक, क्षुद्र, चोरों का मुखिया, स्त्री, मांस, मदिरा सेवन करने वाला होता है। भौमराशिस्थ शनि पर बुध की दृष्टि से मिथ्यावादी, अधर्मी, बहुत खाने वाला, प्रसिद्ध चोर, सुख और धन से रहित होता है। भौमराशिस्थ शनि पर गुरु की दृष्टि से सुखी, धनी, भाग्यवान्, राजा का प्रधान मन्त्री होता है। भौमराशिस्थ शनि पर शुक्र की दृष्टि से जातक चञ्चल, कुरूप, परस्त्रीगामी, वेश्या का भक्त तथा सुख भोग से हीन होता है। शुक्र राशिस्थ (वृष-तुला) शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल-जन्मकाल में वृष या तुला राशिस्थ शनि पर सूर्य की दृष्टि हो तो जातक स्पष्ट वक्ता, निर्धन, विद्वान्, परान्नभोजी, कृशगात्र (दुर्बल) होता है। तुला वृष राशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो स्त्रियों के मदद से बली, राजमन्त्री सम्मानित, स्त्रियों का प्रिय, कुटुम्बों से युक्त होता है।
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८१४ ग्रहों का राशि व दृष्टिवश फल तुला वृष राशिस्थ शनि पर मङ्गल की दृष्टि से युद्ध क्रिया में कुशल होता हुआ भी युद्ध से हटने वाला, वक्ता, धन और जन से युक्त होता है। शुक्र राशिस्थ शनि पर बुध की दृष्टि से हास्य प्रिय, नपुंसक समान, स्त्रियों का भक्त, नीच प्रकृति होता है। शुक्र राशिस्थ शनि पर गुरु की दृष्टि से दूसरों के सुख से सुखी और दुखी, परोपकारी, लोगों का प्रिय, दाता, उद्यमी होता है। : शुक्र राशिस्थ शनि पर शुक्र की दृष्टि से मदिरा तथा स्त्रियों से सुखी, अनेक रत्नों वाला, महाबली, राजा का परम प्रिय होता है। बुध राशिस्थ (मिथुन-कन्या) शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- प्रादुर्भाव काल में मिथुन या कन्या स्थित शनि पर रवि की दृष्टि हो तो सुखहीन, धनहीन, धर्मात्मा, क्रोधरहित, क्लेश को सहने वाला और धैर्यवान् होता है। चन्द्रमा की दृष्टि से राजा के तुल्य, कान्तिमान्, स्त्रियों से धन और सत्कार पाने वाला, तथा स्त्रियों का कार्य कर्ता होता है। देह होता है। मङ्गल की दृष्टि से विख्यात योद्धा, मुग्धबुद्धि, भारवाही और विकृत बुध की दृष्टि से धनवान युद्ध में निपुण, नृत्य और गान में कुशल, शिल्प में परम निपुण होता है। गुरु की दृष्टि से राजकुल में विश्वस्त, सब गुणों से युत, साधुओं का प्रिय, गुण से धनार्जन् करने वाला होता है। शुक्र की दृष्टि से स्त्रियों के शृङ्गार बनाने में निपुण, योगशास्त्रज्ञ वा योगक्रिया का ज्ञाता और स्त्रियों का प्रेमी होता है। कर्क राशिस्थ शनि पर ग्रहों की दृष्टि- प्रादुर्भाव काल में कर्क राशिस्थ शनि पर सूर्य की दृष्टि हो तो जातक बाल्यावस्था में पितृहीन, धन सुख और स्त्री से भी रहित, कुत्सित भोजन से प्रसन्न और पापकर्त्ता होता है। कर्क राशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि से माता का अहित, धनी, सहोदरों से पिड़ित होता है। कर्क राशि में शनि मङ्गल की दृष्टि से राजा को धन समर्पण करने वाला, विकल देह, परिवार सहित कलह कारक, कुबन्धुवाली स्त्री का पति होता है। बुध की दृष्टि से निठुर, वाचाल, शत्रु को जीतने वाला, दम्म्भी और उत्तम कार्य को करने वाला होता है। गुरु की दृष्टि से खेती, घर, मित्र, पुत्र, धन, रत्न, स्त्री से युक्त होता है। होता है। शुक्र की दृष्टि से उत्तम कुल में जन्म लेकर रूप और सुख से हीन सिंह राशिस्थ शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- सिंह स्थित शनि पर सूर्य की
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भृगु संहिता फल दर्पण ८१५ दृष्टि हो तो जातक सुखधन से हीन, नीच, मिथ्यावादी, मद्यपायी, विकृत देह, नौकरी करने वाला, दुखी होता है।
का प्रिय होता है। चन्द्रमा की दृष्टि से विविध रत्न, धन और स्त्री से युक्त, यशस्वी, राजा
मङ्गल की दृष्टि से सदा घूमने वाला, भाग्यहीन, चोर, वन या पर्वत पर रहने वाला, क्षुद्र, स्त्री पुत्र रहित होता है। बुध की दृष्टि से कपटी, आलसी, निर्धन, स्त्रियों का कार्य करने वाला, मलिन और दुखी होता है। गुरु की दृष्टि से गाँव, नगर तथा समाज का मुखिया, पुत्रवान्, विश्वासभाजन और सुशील होता है। शुक्र की दृष्टि हो तो स्त्री का द्वेषी, सुन्दर, मन्द, सुखभागी, धनी और अन्त में सद्गति पाने वाला होता है। गुरु राशिस्थ शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- यदि जन्मकाल के समय धनु या मीन स्थित शनि पर सूर्य की दृष्टि हो तो जातक दूसरों के पुत्रों का पिता, उन्ही पुत्रों के द्वारा धन, यश और आदर पाने वाला होता है। गुरु राशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो मातृहीन, सुशील, दो नाम वाला, स्त्री पुत्र धन से युक्त होता है। गुरु राशिस्थ शनि पर मङ्गल की दृष्टि से वातरोगी, लोगों का द्वेषी, पापी, क्षुद्र, निन्द्य होता है। गुरु राशिस्थ शनि पर बुध की दृष्टि से राजा के समान, सुखी, शिक्षक, मान्य धनी, सुशील, सुन्दर या सौभाग्यवान् होता है। गुरु राशिस्थ शनि पर गुरु की दृष्टि से राजा या राजतुल्य या राजमन्त्री, सेनापति और आपत्ति से रहित होता है। यदि गुरु राशिस्थ शनि पर शुक्र की दृष्टि से दो माता या दो पिता वाला, वन पर्वतों में जिविका करने वाला, अनेक कार्यों में रत तथा कार्य को सम्पन्न करने वाला होता है। शनि राशिस्थ शनि पर ग्रहों की दृष्टि फल- यदि जन्मकाल के समय मकर या कुम्भ राशि स्थित शनि पर सूर्य की दृष्टि से जातक रोगी, कुरूपा स्त्री का पति, परान्नभोजी, अतिदुःखी, भ्रमणशील और भार ढोने वाला होता है। यदि स्वराशिस्थ शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि से जातक चञ्चल, मिथ्याभाषी, पापी, माता का द्वेषी, धनवान् और भ्रमण से अर्थात् देशाटन से दुःखी होता है। यदि स्वराशिस्थ शनि पर मङ्गल की दृष्टि से अति वीर, पराक्रमी, विख्यात, बड़े आदमी में अग्रण्य, क्रूर और साहसी होता है। शनि राशिस्थ अर्थात् सगृही शनि पर बुध की दृष्टि से भार सहन करने
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८१६ ग्रह भाव योग प्रकरण ' वाला, तामसी, सुन्दर, भ्रमणशील, विज्ञ, अल्पधनवान, भाग्यवान् होता है। स्वराशिस्थ शनि पर गुरु की दृष्टि से विख्यात गुण, राजा राजवंशी, दीर्घायु, नीरोग होता है। स्वराशिस्थ शनि पर शुक्र की दृष्टि से धनी, परस्त्रीगामी, सुन्दर, सुखी, उपस्थित पान का भोगी होता है।
ग्रह भाव योग प्रकरण जिससे समस्त जन्तुओं के शरीर, धन, भाई, माता, सन्तान, शत्रु, स्त्री इत्यादि पदार्थ के शुभाशुभ फल का ज्ञान करना सम्भव होता है। इसलिये अब आगे भाव और ग्रह से उत्पन्न फलों को विशेषरूप से वर्णन करते हैं। लग्नस्थ सूर्य फल- जन्मकुण्डली में लग्न में सूर्य हो तो जातक थोड़े केश वाला, कार्य करने में आलसी, क्रोधी, उच्चाकृति, मानी, रुक्षदृष्टि, कठोर देह, शूर, क्षमाहीन, दया से रहित होता है। यदि लग्न में कर्क राशि हो तो फूली नेत्र वाला, मेष हो तो मन्द दृष्टि, सिंह लग्न हो तो रतौंधी वाला और यदि तुला लग्न हो तो दरिद्र और पुत्रहीन होता है। द्वितीय भाव में स्थित सूर्य फल- यदि जन्मकुण्डली में द्वितीय भाव में सूर्य हो तो नौकर और पशुओं से युक्त, मुख का रोगी, ऐश्वर्य सुख से हीन, राजा या चोर से अपहृत धन वाला होता है। तृतीय भाव में स्थित सूर्य फल- जन्म कुण्डली में तृतीय भाव में रवि हो तो पराक्रमी, बली, भाईयों रहित, लोक में मान्य, मनोहर और पण्डित तथा शत्रु को जीतने वाला होता है। चतुर्थ भावस्थ सूर्य फल- यदि कुण्डली में चतुर्थभाव में सूर्य हो तो धन वाहन हीन, दुःखित हृदय, पैतृक घर, धन का नाश करने वाला और दृष्ट राजा का सेवा करने वाला होता है। पंचम भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मकुण्डली में जन्मलग्न से पञ्चम भाव में सूर्य हो तो सुख, पुत्र और मित्र से हीन, खेती करने वाला, पर्वतादि दुर्ग स्थान में रहने वाला, बुद्धिमान्, धनहीन और अल्पायु होता है। षष्ठ भावस्थ सूर्य- जन्मकुण्डली में षष्ठभाव में रवि हो तो अधिक कामी, प्रबल जठराग्नि वाला, बली, धनवान, राजा या न्यायधीश होता है। सप्तम भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मपत्री में सप्तम भाव में रवि हो तो कान्तिहीन, लोक में अनादृत, रोगी, बन्धनभागी, कुमार्गगामी और स्त्री से शत्रुता करने वाला होता है। अष्टम भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मपत्री में अष्टमभावगत सूर्य हो तो आँख का रोगी, धन और सुख से हीन, अल्पायु, अपने हित जनों के वियोग
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भृगु संहिता फल दर्पण ८१७ से दुखी रहता है। नवम भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मपत्री में नवमाव में रवि हो तो धनवान, पुत्रवान्, देव और ब्राह्मण का भक्त, पिता और स्त्री से शत्रुता करने वाला तथा दुःखी है। दशम भाव में स्थित सूर्य फल- यदि पत्रिका में दशम भाव में रवि हो तो बुद्धि, बल, वाहन और पुत्र से युक्त, कार्य को सम्पन्न करने वाला, अजेय और उत्तम पुरुष होता है। एकादश भावस्थ सूर्य फल- जन्म पत्रिका में एकादश भाव में रवि हो तो धन संग्रह करने वाला, बली, लोगों का द्वेषी नौकरहीन, स्वयं प्रेष्य, वचन पालने वाला, हितजनों से हीन, कार्य-साधक होता है। द्वादश भाव में स्थित सूर्य फल- जन्मपत्री में द्वादश भावस्थ सूर्य हो तो क्षीणदेह, काना, पतित, वन्ध्या स्त्री का पति, पिता का द्वेषी, बलहीन और नीच होता है। लग्नस्थ चन्द्र फल-जन्मपत्री में यदि लग्न कर्क, वृष या मेष हो, उसमें चन्द्रमा हो अथवा पूर्ण चन्द्रमा किसी लग्न में हो तो जातक उदारता, रूप, गुण, धन, और भोग से प्रधान होता है। शेष लग्न में चन्द्रमा हो तो नीच, बहिरा, गूँगा और विकल होता है। यदि क्षीण चन्द्रमा हो तो विशेष रूप से अशुभ फल प्रदान करने वाला होता है। द्वितीय भाव में स्थित चन्द्र फल-जन्म पत्री में द्वितीय भाव में चन्द्रमा हो तो अनुपम सुख, मित्र और धन से युक्त होता है। यदि पूर्ण चन्द्रमा हो तो थोड़े बोलने वाला और बहुत बड़े धन का स्वामी होता है। तृतीय भाव में स्थित चन्द्र फल- कुण्डली में तृतीय भाव में चन्द्रमा हो तो जातक भाइयों का पालन करने वाला, हर्ष से युक्त, शूर, विद्या, वस्त्र, अन्न का संग्रह करने में तत्पर होता है। चतुर्थ भावस्थ चन्द्र फल- जन्मपत्री में चतुर्थभावगत चन्द्रमा हो तो बन्धु, अन्न, वस्त्र, घर, वाहन से युक्त, नदी या समुद्र में व्यापार करने वाला, अति सुखी होता है। पंचम भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मपत्री में पञ्चमभाव में चन्द्र हो तो भीरु, विद्या, अन्न, वस्त्र का संग्रह करने वाला, बहुत पुत्र और सुशील मित्र से युक्त, तेजस्वी और बुद्धिमान् होता है। षष्ठ भावस्थ चन्द्र- जन्मपत्री में छठे भावगत चन्द्र हो तो जातक पेट के रोग से पीड़ित और क्षीण चन्द्रमा हो तो अल्पायु होता है। सप्तम भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मपत्री में सप्तम स्थान में पूर्ण चन्द्रमा हो तो सौम्य, घर्षणयोग्य (दमनीय), सुखी, सुरूप और कामी होता है। क्षीण चन्द्र हो तो दीन और रोगों से पीड़ित शरीर वाला होता है। भृ.सं .- ५२
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८१८ ग्रह भाव योग प्रकरण अष्टम भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मकाल में अष्टम स्थान में चन्द्रमा हो तो बुद्धिमान, तेजस्वी रोग से कृश शरीर होता है। यदि क्षीण चन्द्रमा हो तो अल्पायु होता है। नवम भाव में स्थित चन्द्र फल- जन्मकाल में नवम भाव में चन्द्र हो तो देवता और पितर का भक्त, सुख, बुद्धि और पुत्र से युक्त, स्त्रियों का मन हरने वाला प्रिय कार्यों में उद्योगी होता है। दशम भाव में स्थित चन्द्र फल-जन्मकाल में दशम भाव में चन्द्रमा हो तो विषाद से युक्त, कार्यों में तत्पर होकर सम्पन्न करने वाला, धनी, पवित्र, बली, शूर और दानी होता है। एकादश भावस्थ चन्द्र फल- जन्मकाल में एकादश भावगत चन्द्रमा हो तो धनी, अधिक पुत्र वाला, दीर्घायु, उत्तम मित्र और नौकर वाला, मनस्वी, तेजस्वी, शूर, कान्तिमान् होता है। द्वादश भाव में स्थित चन्द्र फल-जन्मकाल में द्वादश भाव में चन्द्रमा हो तो द्वेषी, नीच, क्षुद्र, आँख का रोगी, आलसी, अशान्त, दूसरे से उत्पन्न और लोक में सदादुःखी होता है। लग्नस्थ मंगल फल-जन्म पत्रिका में मङ्गल लग्न में हो तो जातक क्रूर, साहसी, मूढ़, अल्पायु, अभिमानी, शूर, क्षतदेह, सुन्दर रूप वाला और चञ्चल होता है। द्वितीय भाव में स्थित मंगल फल- जन्मपत्री में द्वितीय भाव में मङ्गल हो तो निर्धन, कदन्नभोजी, विकृत मुख वाला, नीच लोगों का सङ्ग करने वाला और विद्या से हीन होता है। तृतीय भाव में स्थित मंगल फल- जन्मपत्री में तृतीय भावगत मङ्गल हो तो शूर, अजेय, भ्रातृहीन, हृष्ट, सभी गुणों का निद्यान और सुप्रसिद्ध होता है। चतुर्थ भावस्थ मंगल फल- जन्मकाल में चतुर्भाव में भौम हो तो गृह, अन्न, वस्त्र और बन्धु से हीन, वाहनरहित, दुःखी, दूसरे के घर में रहने वाला होता है। पंचम भाव में स्थित मंगल फल-जन्मकुण्डली में पञ्चम भावगत भौम हो तो सुख धन और पुत्र से हीन, चञ्चलबुद्धि, चुगुलखोर, दुष्ट, अशान्त और नीच होता है। षष्ठ भावस्थ मंगल फल- जन्मकुण्डली में षष्ठभाव में मङ्गल हो तो अतिकामी, दीप्तजठराग्नि, सुन्दर और दीर्घदेह वाला बलवान्, बन्धुओं में श्रेष्ठ अर्थात् मुखिया होता है। सप्तम भाव में स्थित मंगल फल- जन्मकुण्डली में सप्तम भावगत भौम हो तो स्त्री का नाशक रोगी, कुमार्गगामी, दुःखी, पापी, सन्तार युत, निर्धन, निरस (पतला) शरीर वाला होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८१९ अष्टम भाव में स्थित मंगल फल- जन्मकुण्डली में अष्टमभाव में मङ्गल हो जो रोगी, अल्पायु, कुरूप, निन्द्यकर्म करने वाला और शोक से दुखी रहता है। नवम भाव में स्थित मंगल फल- जन्मकुण्डली में नवमभाव में मङ्गल हो तो कार्यों में अक्षम, द्वेष्य, हिंसक, धर्महीन, पापी, राजा से सम्मान पाने वाला होता है। दशम भाव में स्थित मंगल फल-जन्मकाल में दशम भाव में मङ्गल हो तो कार्य में दक्ष, शूर, अजेय, श्रेष्ठ पुरुष का सेवक, पुत्र सुख से युक्त और अधिक प्रतापी होता है। एकादश भावस्थ मंगल फल-जन्मकुण्डली में एकादश भाव में मङ्गल हो तो गुणी, सुखी, शूर, धनवान, पुत्रवान् और शोकरहित होता है। द्वादश भाव में स्थित मंगल फल-जन्मकुण्डली में द्वादश भावगत भौम हो तो आँख से रोगी, पतित, स्त्रीनाशक चुगलखोर, क्रूर, लोक में अनादृत और जेल भोगने वाला होता है। लग्नस्थ बुध फल- जन्मकुण्डली में लग्न में बुध हो तो जातक सुन्दर देह युक्त, सुबुद्धि, देश, कला, ज्ञान, काव्य और गणित को जानने वाला, चतुर, मधुर वचन बोलने वाला और दीर्घायु होता है। द्वितीय भाव में स्थित बुध फल-जन्मकुण्डली में द्वितीय भावगत बुध हो तो बुद्धि से धनोपार्जन करने वाला, अन्न पान का भोक्ता, प्रियभाषी, सुनीति प्रिय होता है। तृतीय भाव में स्थित बुध फल-जन्मकुण्डली में तृतीय भावगत बुध हो तो परिश्रमी, इष्ट मित्रों से हीन, कार्य में निपुण, सहोदर युक्त, मायावी और चञ्चल होता है। चतुर्थ भावस्थ बुध फल- जन्मकुण्डली में चतुर्थभाव गत बुध हो तो धन जन और वाहन, सुवस्त्र से युक्त, श्रेष्ठ बन्धु वाला और विद्वान् होता है। पंचम भाव में स्थित बुध फल- जन्मकुण्डली में पञ्चम भाव में बुध हो तो मन्त्रशास्त्री, मारण मोहन आदि क्रिया में कुशल, अधिक पुत्र, विद्या, सुख, प्रभुत्व और प्रसन्नता से युक्त होता है। षष्ठ भावस्थ बुध फल-जन्मकुण्डली में षष्ठभाव में बुध हो तो वाद विवाद और युद्ध में विजयी, रोग से युक्त आलसी, कोपहीन, निष्ठुरभाषी और पीड़ित होता है। सप्तम भाव में स्थित बुध फल- जन्मकुण्डली में सप्तम स्थान में बुध हो तो जातक की स्त्री बुद्धिमती, सुन्दरी, अकुलीना, कलढ़कारिणी धनवती होती है। स्वयं भी महान् पुरुष होता है। अष्टम भाव में स्थित बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में अष्ठम स्थान में
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८२० ग्रह भाव योग प्रकरण बुध हो तो विख्यात यश और बल वाला, दीर्घायु, कुलपोषक, राजा के तुल्य अथवा न्यायाधीश होता है। नवम भाव में स्थित बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में नवम भाव में बुध हो तो अतिधनी, विद्या से सम्पन्न, सदाचारी, वक्ता, कार्य में कुशल और धर्मात्मा होता है। दशम भाव में स्थित बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में दशमभाव में बुध हो तो श्रेष्ठबुद्धि, सत्कर्मी, कार्य को सफल करने वाला धैर्यशाली, बली, विविध आभूषणों के सुख का भोगी होता है। एकादश भावस्थ बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में एकादश स्थान में बुध हो तो धनी, आज्ञाकारी नौकर वाला, पण्डित, सुखी भोगी, दीर्घायु और प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला होता है। द्वादश भाव में स्थित बुध फल- यदि जन्मकुण्डली में द्वादशभाव में बुध हो तो वचन पालन करने वाला, आलसी, अपमानित, वक्ता, पण्डित, दीन और कठोर पुरुष होता है। लग्नस्थ बृहस्पति फल- यदि जन्मकुण्डली में लग्न में गुरु हो तो जातक सुन्दर देह वाला, दीर्घायु विचारकर कार्य करने वाला, पण्डित, धैर्यवान् और श्रेष्ठ होता है। द्वितीय भाव में स्थित बृहस्पति फल-जन्मकुण्डली में द्वितीय भाव में गुरु हो तो धनी, भोजनार्थी, वक्ता, सुन्दर, सुरूप, सुवचन, सुन्दर वस्न वाला और त्यागी होता है। तृतीय भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में तृतीय भाव में बृहस्पति हो तो लोक में अत्यधिक दुःखी, कृपण, सहोदरों में लघु, मन्दाग्नि, स्त्री से पराजित और पाप कर्म करने वाला होता है। चतुर्थ भावस्थ बृहस्पति फल- जन्मकुण्डलीं में चतुर्थ भाव में गुरु हो तो परिजन, भवन, वस्त्रवाहन, सुख, सुमति, भोग, धन से युक्त, श्रेष्ठ, शत्रु को जीतने वाला होता है। पंचम भाव में स्थित बृहस्पति फल-जन्मकुण्डली में पञ्चमभाव में गुरु हो तो पुत्र और मित्रों से सम्पन्न, पण्डित, धीर, स्थिर धन से युक्त और सदा सुखी होता है। षष्ठ भावस्थ बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में षष्ठ भावगत गुरु हो तो दुषित जठराग्नि और पुंस्त्व वाला, अपमानित, दुर्बल, आलसी, स्त्री द्वारा पराजित, शत्रुजेता और विख्यात होता है। सप्तम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मपत्रिका में सप्तमभाव में गुरु हो तो सुन्दर भाग्यवान्, सुन्दर स्त्री का पति, पिता से गुण में श्रेष्ठ, वक्ता, कवि, गाँव में मुख्य और सुविख्यात पण्डित होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८२१ अष्टम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में अष्टम भाव में गुरु हो तो अपमानित, दीर्घायु, नौकरी करने वाला, दीन और मलिना स्त्री का पति होता है। नवम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्मकुण्डली में नवम स्थान में गुरु हो तो देव पितर का भक्त, विद्वान्, सुन्दर, राजमन्त्री वा सेनापति और प्रधान होता है। दशम भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्म पत्रिका में दशम भाव में यदि गुरु हो तो जातक कार्य को सम्पन्न करने वाला, माननीय, सब उपाय और कुशलता से युक्त, सुख, धन, जन, वाहन और सुन्दर यश से युक्त होता है। एकादश भावस्थ बृहस्पति फल- जन्म पत्रिका में एकादश भाव में गुरु हो तो अत्यधिक लाभ, अधिक वाहन, नौकर से युक्त, साधु, थोड़ी विद्या और अल्प पुत्र वाला होता है। द्वादश भाव में स्थित बृहस्पति फल- जन्म पत्रिका में द्वादश भाव में गुरु हो तो आलसी, लोगों का द्वेषी, वाग्विहीन, अथवा भाग्यहीन तथा सेवा कार्य में निरत होता है। लग्नस्थ शुक्र फल-जन्मकुण्डली में लग्न में शुक्र हो तो सर्वाङ्गसुन्दर, ... सुखी, दीर्घायु, डरपोक स्त्रियों का प्रिय होता है। द्वितीय भाव में स्थित शुक्र फल-जन्मकुण्डली में द्वितीय भाव में शुक्र हो तो बहुत अन्न, पान, ऐश्वर्य, द्रव्य और उत्तम विलास तथा सुन्दर वचन बोलने वाला और अति धनी होता है। तृतीय भाव में स्थित शुक्र फल- जन्मपत्री में तृतीय स्थान में शुक्र हो तो सुख धन से युक्त, स्त्री से पराजित, कृपण, अल्प उत्साह वाला, सौभाग्यवान् और वस्त्रों से युत होता है। चतुर्थ भावस्थ शुक्र फल-जन्मकुण्डली में चतुर्थ भाव में शुक्र हो तो बन्धु मित्र सुख वाहन अन्न वस्त्र गृह से युक्त सुन्दर उदार पुरुष होता है। पंचम भाव में स्थित शुक्र फल-जन्म पत्रिका में पञ्चम भाव में शुक्र हो तो सुखी, पुत्रवान्, मित्रयुत, विलासी, अतिधनी, सब वस्तु से परिपूर्ण, राजमन्त्री या न्यायाधीश होता है। षष्ठ भावस्थ शुक्र फल- जन्मकुण्डली में षष्ठ भाव में शुक्र हो तो जातक स्त्री का द्वेषी, अधिक शत्रु वाला, ऐश्वर्य से हीन, अत्यन्त विह्वल और अधिक दुष्ट होता है। सप्तम भाव में स्थित शुक्र फल- सप्तम भाव में शुक्र हो तो अत्यन्त रूपवती स्त्री के सुख और विभव से युक्त, अजातशत्रु और सौभाग्य सम्पन्न होता है। अष्टम भाव में स्थित शुक्र फल-जन्मकुण्डली में अष्टम स्थान में शुक्र हो
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८२२ ग्रह भाव योग प्रकरण तो दीर्घायु, अतुलसुख से युत, धनाढ्य, राजा के तुल्य प्रतिक्षण संतोष प्राप्त करने वाला होता है। नवम भाव में स्थित शुक्र फल- यदि कुण्डली में नवम भाव में शुक्र हो तो पुष्ट, विशाल शरीर, धनवान, उदार, स्त्री सुख, मित्रों से युक्त, देव, अतिथि और गुरु की सेवा में तल्लीन होता है। दशम भाव में स्थित शुक्र फल- जन्मकुण्डली में दशम भाव में शुक्र हो तो उत्थान (पौरुष) और विवाद से सुख, रति, मान, धन और कीर्ति उपार्जित करने वाला तथा अत्यधिक बुद्धिमान और विख्यात पुरुष होता है। एकादश भावस्थ शुक्र फल-जन्मकुण्डली में एकादश भाव में शुक्र हो तो जातक अनुकूल नौकर वाला, अधिक लाभ करने वाला तथा समस्त दुःखों से रहित व्यक्ति होता है। द्वादश भाव में स्थित शुक्र फल-जन्म पत्रिका में द्वादश भाव में शुक्र हो तो आलसी, सुखी, स्थूलदेह, नीच, शोधित (साफ) अन्न खाने वाला, शय्या के उपचार में चतुर, स्त्री से पराजित होता है। लग्नस्थ शनि फल- जन्मकुण्डली में लग्न में स्वोच्च या स्वराशिस्थ शनि हो तो जातक राजा के तुल्य, देश या गाँव का अधिपति होता है, यदि अवशिष्ट राशियों में लग्नस्थ शनि लग्न में हो तो बाल्यावस्था में रोगाक्रान्त, दरिद्र, कार्यों के वश में दुषित तथा आलसी होता है। द्वितीय भाव में स्थित शनि फल- द्वितीय भाव में शनि हो तो विकृत मुख वाला, धन का भोगी, जनहित, न्यायी, पश्चात् परदेश में जाकर धन वाहन आदि का भोग करने वाला होंता है। तृतीय भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में तृतीय भाव में शनि हो तो संस्कार से युत शरीर वाला, नीच, आलसी परिवार वाला, शूर, दाता और विशाल बुद्धि वाला होता है। चतुर्थ भावस्थ शनि फल- जन्मकुण्डली में चतुर्थ भाव में शनि हो तो दुःखी हृदय, बन्धु, वाहन, धन, बुद्धि और सुख से हीन, बाल्यावस्था में रोगी, बड़े बड़े नख और रोम धारण करने वाला होता है। पंचम भाव में स्थित शनि फल-जन्मकुण्डली में पञ्चम भाव में शनि हो तो सुख पुत्र मित्र बुद्धि हृदय से हीन, पागल और गरीब होता है। षष्ठ भावस्थ शनि फल- जन्मपत्री में षष्ठ भाव में शनि हो तो कामी, सुन्दर, शूर, अधिक खाने वाला, कुटिल स्वभाव, बहुत शत्रुओं को जीतने वाला होता है। सप्तम भाव में स्थित शनि फल-जन्मकुण्डली में सप्तम भाव में शनि हो तो सदा रोगी, स्त्रीनाशक, धनहीन, खराब वेश-भूषा वाला, पापी और नीच काम को करने वाला होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८२३ अष्टम भाव में स्थित शनि फल-जन्म पत्री में अष्टम भाव में शनि हो तो कुष्ठ या भगन्दर रोग से दुःखी, थोड़ी आयु वाला, किसी भी कार्य को नहीं करने वाला होता है। नवम भाव में स्थित शनि फल-जन्मकुण्डली में नवम भाव में शनि हो तो धर्महीन, थोड़े धन वाला, सोदर और पुत्र से हीन, सुख रहित और दूसरों को दुःख देने वाला होता है। दशम भाव में स्थित शनि फल- जन्मकुण्डली में दशम भाव में शनि हो तो धनी, पण्डित, शूर, राजमन्त्री, या न्यायाधीश, समुदाय तथा नगर और ग्राम का प्रधान होता है। एकादश भावस्थ शनि फल- जन्मकुण्डली में एकादाशभाव में शनि हो तो जातक दीर्घायु, स्थिर धन वाला, शिल्पज्ञ, नीरोग, तथा धन मनुष्य सम्पत्ति से युत होता है। द्वादश भाव में स्थित शनि फल-जन्मकुण्डली में द्वादाश भाव में शनि हो तो अशान्त चित्त, पतित, बकवादी, कुटिल दृष्टि, निर्दय, निर्लज्ज, बहुत खर्चीला और पीड़ित होता है। भावों का शुभाशुभत्व विचार-लग्नादि भावों में शुभग्रह हो तो उस भाव की वृद्धि करते हैं तथा पाप ग्रह हो तो उस भाव के फल का नाश करते हैं। ६,८,१२ भावों में शुभ-अशुभ फल विपरीत होते हैं। अर्थात् त्रिक में स्थित शुभग्रह अशुभ फल और पाप ग्रह शुभ फल करता है। शुभग्रह से दृष्ट योग बलवान् होता है तथा उच्चस्थ ग्रहों से दृष्टयोग का फल विपरीत होता है।
भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण सूर्य से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर रवि की दृष्टि हो तो जातक पराक्रमी, स्त्री पर रोष करने वाला, क्रूर, पैतृक धन से युक्त तथा राजा के सेवक होता है। चन्द्र से दृष्ट लग्न फल-लग्न पर चन्द्रमा की दृष्टि होने से स्त्री के वश में रहने वाला, सुन्दर, सरल स्वभाव वाला, बहुत धनवान, जलीय वस्तु के व्यापार से लाभ करने वाला होता है। भौम से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर मङ्गल की दृष्टि से साहसी, युद्धप्रिय, क्रोधी, बन्धुओं से युत, धर्मात्मा और स्थूल लिङ्ग वाला होता है। बुध से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर बुध की दृष्टि से शिल्प और कला से धनोपार्जन करने वाला, बुद्धिमान्, यशस्वी और मानी होता है। गुरु से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर गुरु की दृष्टि से यज्ञ और व्रत में तत्पर, राजमान्य, यशस्वी, साधु, गुरु और अतिथि का भक्त होता है। शुक्र से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर शुक्र की दृष्टि से वेश्या स्त्री का प्रिय, सामर्थ्यवान्, धन-धान्य सुख से सम्पन्न और सुन्दर स्वरूप होता है।
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८२४ भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण शनि से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर शनि की दृष्टि से भार, मिर्गी रोग से पीड़ित, क्रोधी, वृद्धा स्त्री का पति, सुखहीन, मलिन और मूर्ख होता है। लग्नस्थ अपनी राशि को देखने का फल- यदि जातक के जन्मपत्रिका में कोई भी ग्रह लग्नगत अपनी राशि को देखे तो वह जातक सब प्रकार के धन और सुख से सम्पन्न तथा विशेष करके राजा का प्रिय पात्र होता है। पाप शुभ दृष्ट लग्न फल-लग्नगत अन्य राशि को यदि पापग्रह देखे तो अशुभफल और शुभग्रह देखे तो शुभफल होता है। किसी भी ग्रह से अदृष्ट लग्न फल- यदि लग्न पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो केवल लग्न राशिस्थ जो स्वभाव होता है उसी स्वभाव का जातक होता है और वह जातक सब गुणों से हीन होता है। दो आदि ग्रह से व एक शुभग्रह से दृष्ट लग्न फल- लग्न पर यदि दो या अधिक ग्रहों की दृष्टि हो अथवा एक भी शुभग्रह की दृष्टि हो तो जातक धनी और सुखी होता है। परन्तु एक भी पापग्रह की दृष्टि शुभप्रद नहीं होती है। समस्त ग्रहों से दृष्ट लग्न फल- यदि लग्न पर सब ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक राजा होता है। यदि सब ग्रह बली हों तो सब सुख सम्पन्न, नीरोग और दीर्घायु होता है। लग्नस्थ तीन शुभ ग्रह व पाप ग्रहों का फल-यदि लग्न में तीन शुभग्रह हों तो शोकादि से हीन राजा होता है। यदि तीन पापग्रहमात्र हो तो रोग, शोक, भय से युक्त, बहुत खाने वाला, लोक में निन्दित होता है। लग्न से ६, ७, ८ में पापग्रहों से अदृष्ट या अयुक्त, शुभ ग्रहों का फल-यदि लग्न से ६७८ भावों में शुभ ग्रह हो तो अधियोग होता है। इस योग में जातक राजमन्त्री, न्यायाधीश; या राजा तथा बहुत स्त्रियों का पति, दीर्घायु, नीरोग और निर्भय होता है। लग्नस्थ ग्रह के फल में न्यूनाधिक फल- ग्रह अपने गृह, उच्च और शुभवर्ग में हो तो फल पुष्टरूप से होता है। यदि नीच या शत्रु गृह में हो तो फल देने में विफल होता है। धनभाव में सूर्य शनि भौम फल-रवि, शनि तथा मङ्गल यदि ये धन भाव में हों या धन भाव को देखते हो तो धन नाशक होते हैं। उन पर क्षीण चन्द्रमा की दृष्टि हो तो विशेष कर धन नाश होता है। धन भाव में रवि और मङ्गल हो तो जातक चर्मरोग से युक्त और निर्धन होता है। यदि केवल शनि धन भाव में हो उस पर बुध की दृष्टि हो तो जातक महाधनवान होता है। द्वितीय भाव में सूर्य भी यदि शनि से दृष्ट हो तो जातक निर्धन होता है। यदि अन्य ग्रह से दृष्ट हो तो शुभ होता है। धन भाव में शुभ ग्रह हो तो अनेक प्रकार से जातक धनवान होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८२५ धनभाव में बुध से दृष्ट गुरु फल- परन्तु द्वितीय भाव गत गुरु बुध से दृष्टि हो अथवा धन भावस्थ बुध पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक निर्धन होता है। धनभाव में शुक्र फल- धन भावस्थ चन्द्रमा क्षीण हो उस पर बुध की दृष्टि हो तो पूर्व पुरुषोपार्जित धन का नाशक होता है और आगे भी धन में बाधक होता है। किन्तु द्वितीय भावगत शुक्र पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो प्रचुर धन होता है, अन्य शुभ ग्रह की दृष्टि से भी जातक धन-धान्य से सम्पन्न होता है। तृतीय भाव में पाप ग्रह राशि व पाप ग्रहों का फल-तृतीय भाव में पाप ग्रह की राशि हो और पापग्रहों से युत हो तो सोदर का नाशकारक होता है। यदि उस में शुभ राशि और शुभ ग्रह हो तो सहोदर का सुख होता है। आगे सहोदरों की संख्या भी कहता हूँ। भ्रातृ संख्या का ज्ञान- तृतीय भाव जितने नवांश का हो उतनी सहोदर की संख्या होती है। यदि अन्य ग्रहों की दृष्टि उस पर हो तो उससे भी अधिक सहोदर समझना। तृतीय भाव में शनि व शुक्र फल- यदि तृतीय भाव में शनि हो उस पर मङ्गल की दृष्टि हो तो सहोदर का विनाशक होता है। यदि सहज भाव में शुक्र हो उस पर गुरु की दृष्टि हो तो सहोदर का सुख होता है। तृतीय भाव में बुध फल- तृतीय भाव गत बुध पर मङ्गल की दृष्टि हो तो बन्धु और मित्रों का विनाशक होता है। और फल भावाध्याय में कहे हुए विधि के अनुसार समझना चाहिए। सन्तान प्राप्ति अथवा अप्राप्ति का विचार- यदि कुण्डली में पञ्चम भाव
होता है। यदि शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो निश्चित रूप से उस मनुष्य को सन्तान
इससे विपरीत (पाप ग्रह से युत दृष्ट और पाप राशि हो तो) सन्तान का अभाव होता है। पंचम भावस्थ शुभ राशि में गुरु के षड्वर्ग फल-लग्न अथवा चन्द्रमा से पञ्चम भाव में यदि एक भी गुरु का वर्ग (राशि द्रेष्काण, नवांशादि में एक
पुत्र होता है। भी) हो अथवा शुभ ग्रह की राशि हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो औरस
सन्तान संख्या का विचार- जन्म पत्रिका में पुत्रभाव में यदि शुभग्रह का नवांश हो उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो नवांश की संख्या के तुल्य सन्तान कहना चाहिए। यदि केवल शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उससे द्विगुणित सन्तान संख्या
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८२६ भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण होती है। यदि पाप ग्रह का नवांश और केवल पाप ग्रह से दृष्ट हो तो अल्प सन्तान समझना। क्षेत्रज्ञ पुत्र प्राप्ति योग ज्ञान-कुण्डली में यदि पुत्र भाव में शनि की राशि, या नवांशादि वर्ग हो उस पर बुध की दृष्टि हो अथवा बुध की राशि या नवांशादि वर्ग हो उस पर शनि की दृष्टि हो तो उस जातक को क्षेत्रज (अपनी स्त्री में दूसरे से उत्पन्न) सन्तान होती है। दत्तक व क्रीत पुत्र प्राप्ति योग ज्ञान- कुण्डली में यदि पञ्चमभाव शनि की राशि से युक्त हो अथवा बुध की राशि बुध से युत हो उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो दत्तक पुत्र या क्रीत (धन से खरीदा हुआ) पुत्र होता है। कृत्रिम पुत्र प्राप्ति योग ज्ञान- पञ्चभाव में मङ्गल का सप्तमांश और शनि से युत हो तथा अन्य ग्रहों से दृष्ट नहीं हो तो कृत्रिम पुत्र होता है। अधम पुत्र प्राप्ति योग ज्ञान- पञ्चमभाव में शनि का राश्यादि यदि सूर्य से युक्त और मङ्गल से दृष्ट हो तो उसका पुत्र परमनीच होता है। मूर्ख पुत्र प्राप्ति योग ज्ञान- जन्म कुण्डली में पञ्चमभाव में मङ्गल के नवांशगत चन्द्रमा यदि केवल शनि से दृष्ट हो तो मूर्ख और अधम पुत्र होता है। अपविद्ध पुत्र प्राप्ति योग ज्ञान- जन्म कुण्डली में पुत्रभाव में शनि के राश्यादि स्थित मङ्गल पर रवि की दृष्टि हो तो करण मुनि के मत से उस मनुष्य को भी अधम पुत्र होता है। पुनर्भू पुत्र योग ज्ञान- कुण्डली में पुत्र स्थान पें शनि के वर्ग और शनि से युक्त चन्द्रमा हो उस पर रवि शुक्र की दृष्टि हो तो उस जातक को पुनर्भू जिस स्त्री की दूसरी शादी पति मरने पर उसमें पुत्र होता है। कानीन पुत्र योग ज्ञान- कुण्डली में पुत्र स्थान में पाप ग्रह युक्त चन्द्रमा (कर्क) का द्वादशांश में यदि सूर्य से दृष्ट या युक्त जातक को कानीन पुत्र (कुमारी कन्या में उत्पन्न) होता है। सहोढ पुत्रप्राप्ति योग ज्ञान- कुण्डली में यदि पञ्चम स्थान में रवि और चन्द्रमा के वर्ग और रवि चन्द्रमा से युक्त और केवल शुक्र से दृष्ट हो तो सहोढ़ पुत्र होता है। सहोढ़ पुत्र का लक्षण गर्भिणी संस्क्रिता येन ज्ञाता द्रज्ञातापि वा सती। वोढुःसगर्मो भवति सहोढ़ इति चोच्यते। पुत्र अप्राप्ति योग ज्ञान- कुण्डली में पञ्चमभाव में पाप राशि और केवल बली पाप ग्रह हो तो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो जातक सन्तानहीन होता है। दासी पुत्रप्राप्ति योग ज्ञान- कुण्डली में यदि जातक के जन्मपत्र में सुत
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भृगु संहिता फल दर्पण ८२७ भाव में शुक्र नवांश शुक्र से दृष्ट हो तो वह जातक दासीपुत्र होता है। कोई-कोई आचार्य चन्द्रमा के नवांश पर चन्द्रमा की दृष्टि होने से भी इसी फल को कहते हैं। कंन्या सन्तति योग ज्ञान- कुण्डली में पञ्चमभाव में शुक्र और चन्द्रमा के ही वर्ग हो उस पर शुक्र और धन्द्रमा की ही दृष्टि या योग हो तथासमराशि के वर्ग हो तो उस मनुष्य को केवल कन्या सन्तति होती है। इससे विपरीत योग में (अर्थात् विषम राशि के वर्ग हों और शुक्र चन्द्रमा से अदृष्ट और अयुक्त हो तो) पुत्र होता है। सन्तानहीन योग ज्ञान- कुण्डली में लग्न से दशवें भाव में चन्द्रमा, सप्तम में शुक्र और चतुर्थ में पाप ग्रह हो तो जातक वंशहीन होता है। पञ्चमभाव में मङ्गल हो तो सन्तान उत्पन्न हो कर मर जाता है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल प्रथम सन्तान नष्ट होता है। यदि सब ग्रह की दृष्टि हो तो सन्तान का नाश नहीं होता है। पंचमस्थ शुभ-पाप ग्रह फल- यदि कुण्डली में पञ्चमभाव में केवल पाप ग्रह हो तो जातक धन जान और सुख से हीन होता है। यदि मङ्गल मात्र हो तो विकल होता है। शनि हो तो रोग से पीड़ित होता है। और बुध, गुरु, शुक्र हो तो धनपुत्रादि से सम्पन्न सुखी होता है। जन्म कुण्डली में शत्रु भाव में मङ्गल हो उस पर शनि की दृष्टि हो तो निश्चित रूप से उस जातक शत्रुओं से भय में बाधा होती है। यदि षष्ठभाव शुभ ग्रह से युत दृष्ट हो तो शत्रु से हानि नहीं होती है। षष्ठ भाव में जितने ग्रह हों उतने शत्रु प्रत्यक्ष होते हैं। भाव निरूपण में कहे हुए विधि से शत्रु जैसा आकार, स्वभाव, स्थानादि समझाना चाहिये। स्त्री लाभ योग का विचार-कुण्डली में यदि जातक के जन्मपत्र में स्त्री (सप्तम) भाव में शुक्र, मंगल, बृहस्पति, अथवा बुध इनमें से सब या ३ या दो अथवा एक भी ग्रह हो अथवा इन्हीं ग्रहों की राशि और वर्ग इन्हीं (शुभग्रहों) से दृष्ट हो तो उसी ग्रह और उसी राशि के स्वभाव गुणों से युक्त स्त्री की प्राप्ति होती है। स्त्री नाश व पुनर्भुस्त्री प्राप्ति- कुण्डली में यदि सप्तमभाव में पापग्रह (रवि मंगल, शुक्र) या इनके राश्यादि वर्ग इन्हीं पापों से दृष्ट हो तो स्त्री के नाशकारक होते हैं। लग्न और चन्द्रमा दोनों से सप्तम भाव से फल समझना। इन दोनों में बली हो उससे सप्तम से विशेष फल समझना चाहिए। यदि सप्तम भाव में चन्द्रमा के साथ शनि हो तो उस जातक को पुनर्भू स्त्री अर्थात् पति मरने के बाद द्वितीय विवाह जिसे विधवा कहते हैं, ऐसी पत्नी की प्राप्ति होती है।
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८२८ भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण स्त्री संख्या का विचार- सप्तम भाव पर जितने ग्रह की दृष्टि हो उतनी स्त्री संख्या होती है। यदि उस पर ग्रहों की दृष्टि नहीं हो तो सप्तमेश के नवांश की संख्यातुल्य स्त्री होती है। यदि सप्तमभाव में रवि मङ्गल का नवांश हो अथवा बुध गुरु का योग हो तो एक ही स्त्री होती है। प्रकारान्तर से स्त्री संख्या का विचार-जन्म पत्रिका में यदि सप्तम भाव में चन्द्रमा या शुक्र के वर्ग हो या इनका योग हो तो जातक को बहुत पत्नियाँ होती हैं। यदि सप्तम भाव में गुरु या शुक्र के योग या वर्ग हो तो अपने वर्ण की (गुण और स्वभाव में समान) स्त्री होती है। रवि, मंगल, चन्द्र या शनि के योग से न्यून (अर्थात् गुण में अपने से हीना) स्त्री होती है। केतुमाल आचार्य का मत है कि शुक्र और चन्द्र के वर्ग और योग हों तो जातक को वेश्या से प्रेम होता है। स्त्री विनाश योग ज्ञान-सप्तमभाव में मङ्गल हो तो जातक स्त्रीहीन होत है, या विवाह होने पर स्त्री मर जाती है। यदि उस पर केवल शनि की दृष्टि हो तो निश्चय स्त्रीरहित होता है। यदि मङ्गल और शुक्र दोनों सप्तम भाव में अथवा त्रिकोण भाव में हो तो उस जातक की स्त्री रोगपीड़ित होती है। कानी स्त्री प्राप्ति योग- यदि पत्रिका में लग्न से १२ व ६ में यदि सूर्य और चन्द्रमा हो तो जातक और उसकी स्त्री दोनों एकाक्ष (काणा) होते हैं। वन्ध्यापति योग-यदि पत्रिका में लग्न में शनि हो और गण्डान्त (राश्यन्त भाग) में स्थित शुक्र सप्तम भाव में हो और पञ्चम भाव पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो उस की स्त्री बन्ध्या होती है। स्त्री पुत्रहीन और स्त्री व्यभिचार योग- यदि लग्न १२ व ७ भाव में पापग्रह और पञ्चम में क्षीण चन्द्रमा हो तो वह जातक स्त्री और पुत्र से रहित होता है। सप्तम भाव में शनि और मङ्गल का वर्ग (राश्यादि) हो उस में शुक्र हो और शनि मङ्गल से दृष्ट हो तो वह पुँश्चल और उसकी स्त्री पुंश्चली होती है। पुत्र-स्त्रीहीन व अधिक आयु में स्त्रीलाभ और अधिक धनाढ्य योग ज्ञान- जन्म पत्रिका में सप्तमभाव में बुध और शुक्र दोनों हो तो जातक स्त्री-पुत्र से हीन होता है। यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वह स्त्री सहित बृद्धत्व प्राप्त करता है। यदि सप्तम भाव में बुध, बृहस्पति और शुक्र, इन में एक या सब यदि चन्द्रमा के साथ हो तो जातक बहुत सम्पत्ति वाला होता है। :
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भृगु संहिता फल दर्पण ८२९ लाभ भाव सूर्य से दृष्ट व युक्त होने पर फल- जन्म पत्रिका में लग्न से एकादश भाव में रवि की दृष्टि या योग हो तो उस जातक को राजा से तथा युद्ध करके, या चोरों के द्वारा, वन और चतुष्पद के द्वारा धन लाभ होता है। चन्द्र से दृष्ट युक्त एकादश भाव फल- यदि चन्द्रमा की दृष्टि या योग हो तो स्त्री जन द्वारा, तथा हाथी के व्यापार से धन लाभ होता है, परञ्च चन्द्रमा क्षीण हो तो अल्प और पूर्ण हो तो पूर्ण धन समझना चाहिये। भौम से दृष्ट युत एकादश भाव फल- जन्म पत्रिका में एकादश भाव यदि मङ्गल से दृष्ट या युक्त हो तो जातक को सोना, मूँगा, भूषण, माणिक्य के व्यापार, साहस और चलने फिरने तथा अग्नि और शस्त्र से धन लाभ होता है। बुध से दृष्ट युत व आयस्थ बुध वर्ग फल- यदि एकादश भाव में बुध के वर्ग का योग दृष्टि हो तो लेख, शिल्पकला, काव्य से धनलाभ, विशेष कर काँसा और पित्तलादि धातु से धनलाभ होता है। गुरु के वर्ग में गुरु से दृष्ट वा युत एकादश भाव फल- जन्म कुण्डली में एकादश भाव गुरु से दृष्ट युक्त हो तो जातक को शहर के मुखिया या राजा की सहायता से या और विशेष पुण्य कार्यों से धन लाभ होता है। उसमें सोना और घोड़ा अधिक होता है। शुक्र के वर्ग में शुक्र से दृष्ट वा युत एकादश भाव फल-यदि शुक्र से दृष्टि युक्त हो तो वेश्याओं के द्वारा तथा यातायात से धन लाभ होता है। उसमें मोती और चाँदी अधिक समझना चाहिये। शनि के वर्ग में शनि से दृष्ट वा युत एकादश भाव फल- जन्म कुण्डली में एकादश भाव में शनि की दृष्टि या योग वा वर्ग हो तो नगर और ग्रामवासियों के सहयोग से स्थिर कार्यों से धन लाभ होता हैं। उस में लोहा, गधा, महिष अधिक संख्या में होते हैं। एकादश में शुभ-पाप मिश्रग्रह योग फल- इस प्रकार उपर्युक्त योगों में शुभग्रह की दृष्टि हो तो विशेषरूप से फल तथा पापग्रह की दृष्टि से न्यून और पाप शुभ दोनों की दृष्टि हो तो मध्यम मान से फल लाभ होता है। मित्र-स्वगृहादिस्थ ग्रहों का फल- यदि कुण्डली में जो ग्रह अपने मित्र के गृह या स्वगृह में हो वह आधा, जो अपने उच्च में हो वह पूर्ण, जो अस्त हो वह बहुत थोड़ा तथा जो ग्रह शत्रु राशि में हो वह चतुथांश फल देता है। ऊपर कहे हुए एकादश भाव में जो फल हैं वह जन्म काल से ही (कुल क्रम के अनुसार) समझना। परञ्च राजा या मण्डलेश्वर आदि के जन्म पत्र में एकादश भाव में ग्रहों के योग से अपरिमित लाभ होता है। ऐसा लोकाक्ष नामक आचार्य का कहना है। व्यय में सूर्य-चन्द्र-भौम और द्वादशस्थ गुरु चन्द्र शुक्र फल- यदि जन्म
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८३० भावस्थ ग्रह दृष्टि प्रकरण कुण्डली में लग्न से व्ययभाव में सूर्य या क्षीण चन्द्रमा हो तो जातक का धन राजा ले लेता है। यदि द्वादश भाव में मङ्गल हो उस पर बुध की दृष्टि हो तो सब तरह से धन का नाश होता है। यदि द्वादश भाव में गुरु, पूर्ण चन्द्र, और शुक्र हो तथा उन पर मङ्गल की दृष्टि नहीं हो तो धन को पुष्ट करते हैं। इससे अतिरिक्त भावाध्याय के कथित योग के अनुसार भी व्यय भाव का फल समझना चाहिये। विशेष फल का विचार- जन्म कुण्डली में यदि लग्न में बुध का द्रेष्काण हो उस पर केन्द्रस्थ चन्द्रमा की दृष्टि हो तो राजकुलोत्पन्न भी शिल्प कर्म कारक होता है। प्रकारान्तर से तिशेष फल का विचार- जन्म कुण्डली में यदि शुक्र अपने नीच राशि में शनि के नवांश में होकर द्वादश भाव में हो और सप्तम भाव स्थित रवि चन्द्रमा पर शनि की दृष्टि हो तो बड़े कुल में जन्म लेने पर जातक की माता दासी होती है। पुनः प्रकारान्तर से विशेष फल का विचार-जन्म कुण्डली में यदि सूर्य से द्वितीय स्थान में शनि, दसवें स्थान में चन्द्रमा और सप्तम में में मङ्गल हो तो जातक सर्वदा विफल रहता है। पुनः प्रकारान्तर से विशेष फल का विचार- यदि दो पाप ग्रहों के बीच चन्द्रमा हो, तथा लग्न से सप्तम भाव में शनि हो तो जातक श्वास, क्षयादि, प्लीहादि रोग (मुलायम स्थान के रोग) से पीड़ित होता है। पुनः अन्य प्रकार से विशेष फल का विचार-जन्म कुण्डली में यदि सूर्य के नवमांश में चन्द्रमा और चन्द्रमा के नवमांश में सूर्य हो तो जातक कफ रोगी होता है। यदि रवि और चन्द्र दोनों एक ही राशि में तुल्य अंश में हो तो जातक दुर्बल होता है। नेत्र विनाश योग- यदि ८, २, ६ तथा १२ इन स्थानों में क्रम से रवि, चन्द्र, मंङ्गल और शनि हों तो इनमें जो बली हों उस ग्रह के दोष से जातक की आँख नष्ट हो जाती है। कर्ण व दन्त नाश योग-यदि ९, ११, ३, ५ स्थानों में पापग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो कर्ण घातक होते हैं। और सप्तम स्थान में पापग्रह हो तो दाँत में कष्ट होता है। उन्मादी योग- यदि कुण्डली में लग्न में शनि हो या ५, ९ तथा ७ स्थानों में मंगल हो अथवा क्षीण चन्द्रमा शनि के साथ द्वादश भाव में हो तो जातक उन्मादी अर्थात् पागल होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८३१ राजयोग प्रकरण यह ज्योतिष विशेषकर राजोपयोगी शास्त्र है, क्योंकि विशेष कर लोग राजाओं के जन्म समय के अनुसार राजयोगों का ही विचार करते हैं, इसलिये यहाँ भी उन्हीं कुछ राजयोगों को प्रस्तुत करता हूँ। राजकुलोत्पन्न राजयोग व निम्नकुलोत्पन्न राजयोग एवं धनवान् योग यदि जन्म समय में ३ या ४ ग्रह यदि हो तो अपने उच्च या मूल त्रिकोण में बली हो तो राजवंश में उत्पन्न मनुष्य अवश्य राजा होता है। तथा ५ या ६ ग्रह यदि उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हो तो दरिद्र कुलोत्पन्न भी राजा होता है।
होता है। यदि २, या एक ग्रह उच्चस्थ हो तो धनवान होता है, परन्तु राजा नहीं
क्रूरकर्मा व सत्कृत राजयोग- यदि केवल पापग्रह उच्च में हो तो क्रूरकर्मा राजा होता है, ऐसा यवनाचार्य का मत है। परञ्च पापग्रहों से राजयोग में उत्पन्न पुरुष राजा नहीं होता, किन्तु राजा के द्वारा सत्कृत होता है, अर्थात् मन्त्री आदि होता है। नीचकुल में उत्पन्न होने वाले राजयोग-जिन योगों में दरिद्र कुलोत्पन्न भी राजा होता है। उन राजयोगों को शास्त्रकारों के अनुसार यहाँ प्रस्तुत करते हैं। नीच कुलोत्पन्न राजयोगों के बत्तीस प्रकार- यदि जन्म कुण्डली में रवि, मंगल, शनि और गुरु इनमें चारों अथवा ३ यदि उच्च में हो और उन्हीं में से कोई एक लग्न में हो तो १६ प्रकार के योग होते हैं इनमें नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है यदि भौमादि दो में से उच्च में हो और एक लग्न में हो तथा चन्द्रमा अपने गृह (कर्क) में हो तब भी सोलह प्रकार के राजयोग होते हैं, ऐसा प्राचीन महर्षियों ने कहा है। अधमवंशोत्पन्न का राजयोग-लग्न अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांश में हो तो तथा चन्द्र छोड़ कर अन्य ४, ५ या ६ ग्रहों से दृष्ट हो तो नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है। अखिलभूमण्डल पालक योग- जन्म कुण्डली में जन्म समय मेष लग्न में चन्द्र, मङ्गल, गुरु हो तो जातक आसमुद्र पृथ्वी का पालक और समस्त शत्रु दल का संहारक राजा होता है। अन्य राजयोग- बृहस्पति अपने उच्च में तथा मङ्गल मेष में होकर लग्न में हो अथवा मेष लग्न में ही मङ्गल और गुरु दोनों हो तो राजा होता है, उसके सामने कभी कोई शत्रु नहीं होता है, उसका मन्त्री भी अपने अनुकूल होता है। विज्ञान कुशल राजयोग- एकादश भाव में चन्द्रमा, शुक्र, गुरु हो, मङ्गल मेष में शनि मकर में, कन्या में बुध यदि लग्न में हो तो निश्चय जातक विज्ञानी राजा होता है।
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८३२ राजयोग प्रकरण सद्भूपाल राजयोग- पूर्ण चन्द्रमा यदि कर्क लग्न में तथा बुध सप्तम भाव में छठे में सूर्य, चौथे में शुक्र, दसवें में गुरु और ३ में शनि मंगल हो तो राजा होता है। यदि कुण्डली में परिपूर्ण चन्द्रमा कर्क लग्न में हो तथा सप्तम भाव में बुध, छठवे भाव में सूर्य, चौथे में शुक्र, दशम में गुरु, शनि व भौम तृतीय भाव में हो तो जातक चन्द्रमा की किरणों के समान शुभ्र चामर तथा राजलक्ष्मी से युक्त सज्जन (श्रेष्ठ) राजा होता है। अधिक लक्ष्मी से युत राजयोग- वृष लग्न में पूर्ण चन्द्रमा हो, कुम्भ में शनि, सिंह में सूर्य, और वृश्चिक में गुरु हो तो अधिक सम्पत्ति और वाहन युक्त राजा होता है। इन्द्र तुल्य राजयोग- यदि कुण्डली में मकर लग्न में शनि, चन्द्रमा मीन राशि में तथा कन्या राशि को छोड़कर बुध के घर में अर्थात् मिथुन में भौम, कन्या में बुध, धनु राशि में गुरु हो तो जातक इन्द्र के समान महिमा पाने वाला होता है। शत्रु से अजेय राजयोग- यदि कुण्डली में मकर लग्न में मंगल और सप्तम भाष में पूर्ण चन्द्रमा हो तो शत्रुओं से अजेय तथा वेदार्थ का ज्ञाता होता है। शत्रु को पराजित कर्त्ता राजयोग-यदि अपने उच्च में स्थित सूर्य चन्द्रमा के साथ लग्न में हो तो जातक परमसुन्दर राजा होता है। जिसके स्मरण से शत्रुओं की स्त्री की शोकाग्नि नयन जल से सिक्त होने पर भी सर्वदा हृदय में प्रज्वलित ही होती है। अर्थात् वह जातक शत्रु को जीतने वाला होता है। जन्म कुण्डली में तुला में शुक्र मेष में मंगल, कर्क में गुरु हो तो जातक समस्त देश में विख्यात यश वाला राजा होता है। स्वभुजबल से पृथ्वीपति योग- जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण बली बृहस्पति कर्क लग्न में हो, सूर्य दशम भाव (मेष) में हो और वृष में चन्द्र, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो वह जातक अपने भुजबल से पृथ्वीपति होता है। जन्म कुण्डली में धनु में चन्द्रमा सहित गुरु हो, मंगल मकर में तथा शुक्र अथवा बुध अपने उच्च में होकर लग्न गत हो तो जातक राजा होता है। जन्म कुण्डली में धनु के पूर्वार्ध में सूर्य और चन्द्रमा हो, तथा बली (स्वोच्चगत) शनि लग्न में और मङ्गल भी स्वोच्च में हो तो जातक महाप्रतापी शत्रु को जीतने वाला राजा होता है शत्रु भय के कारण दूर से ही नमस्कार करते हैं। अधिराजयोग- जन्म कुण्डली में यदि चन्द्रमा से षष्ठ, सप्तम, अष्ठम स्थानों में सब शुभ ग्रह उदित हो और उनपर पापग्रह की दृष्टि नहीं हो तो
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भृगु संहिता फल दर्पण ८३३ अधियोग होता है। इस योग में जन्म लेने वाला आसमुद्र पृथ्वी के पालन करने वाला राजा होता है, सर्वदा अपने पराक्रम से युक्त रोगहीन, शत्रु के भय से रहित, धीर, सौभाग्यवान् और सुखी होता है। पत्रिका में बुध अपने उच्च में स्थित लग्न में हो और मीन में गुरु चन्द्रमा दोनों हो, मंगल सहित शनि मकर में हो तो मिथुन में शुक्र हो तो ऐसे योग में उत्पन्न राजा होता है, वह शत्रु का नाश करता हुआ अपनी सेनास्थित गजादि के संघर्ष से उत्पन्न धूलि से दिन में रात हो जाती है। अर्थात् प्रकाश में भी अन्धकार हो जाता है। जन्म कुण्डली में येद मेष लग्न हो, सिंह में सूर्य सहित गुरु, शनि
होता है। कुम्भ में, चन्द्रमा वृष में मङ्गल वृश्चिक में, बुध मिथुन में हो तो जातक राजा
अपारकीर्तियुत राजयोग- जन्म पत्रिका में मेष लग्न में सूर्य, धनु में गुरु तुला में शनि और चन्द्र दोनों हो तो अति कीर्तिमान राजा होता है। यदि जन्म कुण्डली में गुरु, बुध, शुक्र ये तीनों शनि, रवि और मङ्गल सहित अपने अपने घर या केन्द्र में हों और चन्द्रमा स्वोच्च में हो तो जातक यशस्वी राजा होता है। यदि रवि अपने परमोच्च (मेष के १० अंश) में हो तो वह आसमुद्र भूमि का पालक कठोर कार्यकारी राजा होता है। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण चन्द्र जलचरराशि के नवांश में चतुर्थभाव में हो और शुभग्रह अपने राशि के लग्न में हो तथा केन्द्र में पापग्रह नहीं हो तो जातक राजा होता है। जन्म कुण्डली में यदि शुक्र, गुरु, बुध ये पूर्ण चन्द्र को देखता हो, लग्नेश पूर्ण बली हो, तथा द्विस्वभाव लग्न में वर्गोत्तम नवमांश हो तो जातक राजा होता है। प्रसन्न राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि वर्गोत्तम नवांश में तीन या चार शुभग्रह केन्द्र में हों, यदि पापग्रह युत नहीं हो तथा अस्त या क्षीण नहीं हो तो राजा होता है। एक भी ग्रह यदि अपने उच्च में वर्गोत्तम नवांश में बलयुक्त हो और अपने मित्र से दृष्ट हो तो जातक राजा होता है। जन्म पत्रिका में सब ग्रह यदि शीर्षोदय राशि में हो तथा पूर्ण चन्द्रमा कर्कराशि में शत्रुवर्ग से भिन्न (सम या मित्र या स्वकीय) वर्ग में शुभ ग्रह से दृष्ट लग्न में हो तो तो जातक धन वाहन से परिपूर्ण पृथ्वीपति होता है। इन्द्रतुल्य बलशाली राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि जन्मराशीश चन्द्रमा से उपचप (३, ६, १०, ११) में हो और शुभ राशि या शुभ नवांश में केन्द्रगत शुभग्रह हो तथा पापग्रह सब निर्बल हो तो परम प्रतापी इन्द्र के समान बलशाली राजा होता है। १.सं .- ५३
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८३४ राजयोग प्रकरण पत्रिका में सब ग्रह बली होकर अपने अपने उच्च में हो और अपने मित्र से दृष्ट हों, उस पर शुत्र की दृष्टि नहीं हो तो ऐसे राजा का जन्म होता है जिसकी सेना (हाथी घोड़े की सवारी) के चलने से पृथ्वी चलित हो जाती है। (अर्थात् वह प्रतापी राजा होता है)। अखण्ड भूपतियोग- पत्रिका में यदि चन्द्रमापरमोच्च में हो उस पर शुक्र की दृष्टि हो और सब पापग्रह आपोक्लिम स्थान में हो तो जातक राजा होता है। पत्रिका में यदि जन्म लग्नेश और जन्म राशीश दोनों केन्द्र में हों तथा शुभ ग्रह और मित्र से दृष्ट हों, पापग्रह से अदृष्ट, शत्रु से पराजित न हो तथा जन्म राशीश से नवम स्थान में चन्द्रमा लग्न में पड़ता हो तो भी समृद्धिशाली राजा होता है। जन्म कुण्डली में जिस ग्रह की उच्च राशि लग्न में हो वह ग्रह यदि अपने नवांश या मित्र अथवा उच्च के नवांश में केन्द्रगत शुभग्रह से दृष्ट हो तो जातक राजा होता है। जन्म पत्रिका में बलवान् शनि मकर के उत्तरार्ध में, रवि सिंह में, शुक्र तुला में, मङ्गल मेष में, चन्द्रमा कर्क में तथा बुध कन्या में हो तो जातक चक्रवर्ती राजा होता है। प्रकारान्तर से राजयोग- सब ग्रह बली होकर अपने अपने गृह में वर्गोत्तम नवांश में हो तो शत्रु को जीतने वाला राजा होता है। लग्नेश केन्द्र में अपने मित्रों से दृष्ट हो तथा शुभ ग्रह लग्न में हो तो जातक राजा होता है। यशस्वी व समस्त शत्रुहन्ता राजयोग- जन्म पत्रिका में वृष लग्न में गुरु और चन्द्रमा हो, बली लग्नेश त्रिकोण में हो उस पर बलवान् रवि, शनि, मङ्गल की दृष्टि नहीं हो तो जातक शत्रु रहित यशस्वी राजा होता है। जन्म पत्रिका में जन्म समय सब ग्रह यदि नीच और शत्रु राशि में नहीं हो अर्थात् अपनी राशि अपने नवांश या उच्च के नवांश में मित्रों से दृष्ट हो तथा चन्द्रमा पूर्ण बली हो तो जातक राजा होता है। जन्म पत्रिका में वर्गोत्तम नवाांगत अपने उच्च राशि (वृष) स्थित पूर्ण चन्द्रमा को जो शुभग्रह देखता है वह अपनीदशा में जातक को राजा बना देता है। यदि जन्म काल में कोई बलवान् पापग्रह केन्द्र में न हो तो यह राजा संसार में प्रसिद्ध होता है। जन्म पत्रिका में यदि जन्म लग्नेश और जन्म राशीश बली होकर केन्द्र में हो और जलचर राशिगत चन्द्रमा त्रिकोण में हो तो जातक राजा होता है। सार्वभौम राजयोग- जन्म पत्रिका में जन्म समय में सब ग्रह अपनी राशि में मित्र के नवांश या मित्र की राशि में अपने नवांश में हो तो जातक सार्वभौम
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भृगु संहिता फल दर्पण ८३५ राजा होता है। देव-दानवों से वन्दित राजा-पत्रिका में सब ग्रह अपने अपने परमोच्च में हो और बुध अपने उच्च के नवांश में हो तो जातक समस्त सुरासुर से वन्दित त्रिलोकाधिप होता है। शत्रुरहित राजयोग- पत्रिका में जिस जातक उत्तर (चतुर्थ भाव) में वसिष्ठ (सप्तर्षि गत नक्षत्र), पूर्व ( प्रथम लग्न) में बृहस्पति पश्चिम (सप्तम भाव) में शुक, दक्षिण (दशम भाव) में अगस्त्य नक्षत्र हो तो वह शत्रुहीन पृथ्वीपति होता है। पत्रिका में पूर्ण चन्द्रमा अपने नवांश, अथवा अपनी राशि, वा स्वोच्च राशि में हो तथा बृहस्पति केन्द्र में शुक्र से दृष्ट, यदि सूर्य लग्नगत अपने नवांश को देखता हो तो आसमुद्र पृथ्वीपति राजा होता है। सार्वभौम राजयोग- पत्रिका में यदि पूर्ण चन्द्रमा पर सब ग्रहों की दृष्टि हो तो वह जातक दीर्घजीवी होता है। इस योग में केमद्रम या अन्य अशुभ फल न होकर जातक दीर्घजीवी राजा होता है। जन्म कुण्डली में उच्चाभिलाषी (मीन के अन्तिम अंशस्थ) सूर्य यदि त्रिकोण में हो, चन्द्रमा अपनी राशि (कर्क) में हो तथा बृहस्पति भी यदि कर्क ही में हो तो जातक पृथ्वीपति होता है। सगरादि तुल्य राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि निर्मल किरण युत सबल होकर अपने नवांशगत ६ ग्रह उच्च में हो तो जातक सगर, वेन, ययाति के समान चक्रवर्ती राजा होता है। तपस्वी राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि सब शुभग्रह परिपूर्ण किरण तथा शुभ राशि और शुभ नवांश में होकर लग्न में हो और पापग्रह अस्त (सूर्य से लुप्त किरण) होकर उनके साथ नहीं हो तो जातक राजा होकर वन, पर्वत में जाकर तपस्या करने वाला होता है। बृहस्पति की बुद्धितुल्य राजयोग- जन्म कुण्डली में सब शुभ ग्रह शुभराशिगत पणफर स्थान में हो और पापग्रह द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक शत्रुजेता और बृहस्पति तुल्य बुद्धिमान होता है। दुर्वार शत्रुमारक राजयोग- जन्म कुण्डली में लग्नेश यदि लग्न में हो अथवा मित्र की राशि में मित्र से दृष्ट हो तो जातक राजा होता है। यदि शुभ राशि लग्न हो तो निष्कण्टक राज भोग करता है। जन्म कुण्डली में सम्पूर्ण चन्द्र यदि मेष नवांश में हो उस पर गुरु की दृष्टि हो, अन्य ग्रह की दृष्टि नहीं हो तथा कोई भी ग्रह नीच में न हो तो जातक राजा होता है, ऐसा यवनाचार्यों का मत है। जन्म पत्रिका में पूर्ण चन्द्रमा लग्न से ३, ६, १०, ११, में गुरु से दृष्ट हो, अथवा चन्द्र राशीश १० वा ७ स्थान में गुरु से दृष्ट हो, अन्य ग्रहों से
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८३६ राजयोग प्रकरण अदृष्ट हो तो जातक राजा होता है। यशस्वी राजयोग- जन्म पत्रिका में पूर्ण चन्द्रमा अपने उच्च में हो और सब ग्रहों से दृष्ट हो तो हाथी, घोड़े और पदाति अनेकों सैन्य से युक्त परम यशस्वी राजा का जन्म होता है। जो समस्त पृथ्वी के भार से खिन्न शेष फणिराज के समान प्रजा का पालन करता है। अर्थात् चक्रवर्ती राजा होता है। अधिक हाथी रखने वाला राजा- जन्म पत्रिका में अति स्वच्छ बिम्ब चन्द्रमार यदिसूर्य के नवमांश में हो और सब शुभ ग्रह केन्द्र में हो उनको पापग्रहों का योगन नहीं हो तो बहुत हाथी (उपलक्षण से उत्तम उत्तम सवारी) रखने वाला राजा होता है। स्वकीर्ति से दिशाओं का शुभ्रकर्त्ता राजयोग- यदि चन्द्र, बुध, मंगल ये नीच भिन्न स्थान में अपने अपने नवमांश में हों और १२, ३ भाव में हों तथा अस्त नहीं हो तथा चन्द्रमा सहित गुरु पञ्चम भाव में हो तो संसार में विख्यात कीर्ति राजा होता है। शत्रुजेता राजयोग- जन्म पत्रिका में नीच और शत्रु के वर्ग से भिन्न स्थान में कोई भी ३ ग्रह अपने नवमांश में पूर्ण बली हो उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो तथा पूर्ण निर्मल बिम्ब हो तो जातक शत्रु को जीतने वाला राजा होता है। सार्वभौम राजयोग- कुण्डली में यदि वर्गोत्तम या स्व नवमांश स्थित चन्द्रमा को बलवान् ग्रह देखता हो तथा लग्न में कोई पापग्रह नहीं हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला चक्रवर्ती राजा होता है। अधिक हाथी वाला राजयोग- कुण्डली में चन्द्रमा यदि जलचर राशि नवमांश में हो तथा शुभग्रह अपने वर्ग में होकर लग्न में हो तथाकेन्द्र में पापग्रह नहीं हो तो जातक बहुत हाथी आदि सवारी रखने वाला राजा होता है। अपूर्व यशस्वी राजयोग- पत्रिका में यदिपूर्ण चन्द्र मा वर्गोत्तम नवमांश में हो तो जातक परम यशस्वी राजा होता है। जिसके हाथी, घोड़े के खुर के आघात के धूलियों से आच्छादित सूर्य भी प्रातः काल के चन्द्रमा सदृश (निष्प्रभ) हो जाते हैं। जन्म समय में सब ग्रह योगकारक हो तो जातक चक्रवर्ती होता है। एक, या दो ग्रह योग कारक हो तो मण्डल (प्रान्त या जिला) का अधिपति होता है। एक ग्रह भी अपने पञ्चमांश में स्थित हो तो जातक राजा होता है। यदि सब ग्रह बली हो तो निश्चय चक्रवर्ती होता है। यदि वृष राशिस्थ चन्द्रमा को जन्म समय में वृहस्पति देखता हो तो जातक समस्त पृथिवी का पालक होता है। निषाद कुलोत्पन्न राजयोग-अपने उच्च, त्रिकोण या स्वराशि में स्थित होकर कोई भी ग्रह चन्द्रमा को देखता है तो नीच कुलोत्पन्न भी जातक राजा
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भृगु संहिता फल दर्पण ८३७ होता है। महाराज योग- यदि चन्द्रमा अपनी राशि या द्रेष्काण में हो तो जातक राजा होता है। यदि इसी योग में शुभ ग्रह पूर्ण बली हो तो महाराजा होता है। जिसके जन्म समय में सूर्य अपने नवमांश में और चन्द्रमा अपनी राशि में हो तो जातक महादानी राजा होता है। ग्रामीण राजयोग- जन्म कुण्डली में लग्न में शनि और सप्तम भाव में नवोदित बृहस्पति हो, उन पर शुक्र की दृष्टि हो तो गाँव में जन्म लेने वाला भी राजा (मुखिया) होता है। जन्म कुण्डली में यदि बृहस्पति की राशि में स्थित शुक्र को बृहस्पति देखता हो और बुध स्वोच्च में जातक निश्चय राजा होता है। जन्म कुण्डली में यदि शुक्र रवि और चन्द्रमा तीनों एक भाव में केवल गुरु से दृष्ट हो तो जातक राजा होता है। अधिक यशस्वी राजयोग-जन्म कुण्डली में शुक्र बुध मंगल तीनों लग्न में और चन्द्रमा से युत गुरु सप्तम भाव में हों उस पर शनि की दृष्टि हो तो महायशस्वी राजा होता है। नीच कुलोत्पन्न राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण बली बृहस्पति मंगल के नवमांश में हो उस पर मंगल की दृष्टि हो तथा मेष स्थित सूर्य दशम भाव में हो तो नीच कुलोत्पन्न जातक भी राजा होता है। जन्म कुण्डली में यदि शुक्र, चन्द्र, सूर्य ये तृतीय भाव में हो मंगल सप्तम में, गुरु नवम में और लग्न में वर्गोत्तम नवमांश हो तो नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है। देवतुल्य राजयोग- कुण्डली में यदि जन्म समय में देदीप्यमान किरण बृहस्पति, बुध, शुक्र, या चन्द्रमा ये सब या एक भी बली होकर नवम भाव में हो और अपने मित्र से दृष्ट हो तो जातक देव तुल्य राजा होता है। जन्म पत्रिका में नवम भाव में जिन ग्रहों का उच्च हो उससे युत या दृष्ट नवम भाव हो तथा दो अन्य ग्रह अपनेउच्च में हो तो बहुत कुटुम्ब अर्थात् सतति वाला राजा होता है। नीच कुलोत्पन्न राजयोग- यदि कुण्डली में पञ्चम भाव में चन्द्रमा और बृहस्पति हो उन पर पञ्चमेश की दृष्टि हो और मीन में शुक्र हो तो नीच कुलोत्पन्न भी राजा होता है। लक्ष्मीयुत राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में चन्द्रमा तृतीय या दशम भाव में हो और गुरु अपने उच्च में हो तो लक्ष्मी युक्त समस्त पृथिवी का राजा होता है। प्रसिद्ध राजयोग- यदि कुण्डली में अपने उच्च का गुरु किसी केन्द्र में हो और शुक्र दशम भाव में हो तो जातक समस्त पृथिवी का सुप्रसिद्ध राजा
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८३८ राजयोग प्रकरण होता है। ब्राह्मणकुलोत्पन्न का राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में पूर्ण चन्द्रमा कर्क में हो तथा बली बुध, गुरु, शुक्र, ये अपने नवमांश में होकर चतुर्थ भाव में हो उन पर सूर्य की दृष्टि हो तो द्विज कुलोत्पन्न मनुष्य राजा होता है। गौपालक राजयोग- जन्म कुण्डली में अपने मूलत्रिकोणस्थिति सूर्य दशम भाव में हो, शुक्र, गुरु, चन्द्र ये अपने-अपने राशि स्थित होकर ३,६, ११ वें स्थान में हो तो गायों का पालन करने वाला अर्थात् ग्वाला भी राजा होता है। सकलनृप पालक राजयोग- पत्रिका में अपने मित्र के नवमांशगत शुभग्रह सप्तमभाव में अपने मित्र से दृष्ट हो और मंगल अपने उच्च में हो तो समस्त भूमि का पालक राजा होता है। जन्म पत्रिका में रवि चन्द्र, बुध, शुक्र ये अपने मित्र के नवमांश में दसवें स्थान में हो तथा ये अस्त और नीच में नहीं हों और शुक्र नवम भाव में हो तो जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला राजा होता है। यशस्वी राजयोग- जन्म पत्रिका में अपने नवमांश में बली होकर नवम भाव में हो, लग्न में शुभ वर्ग या शुभ ग्रह हो उस पर बुध की दृष्टि हो तो परम कीर्तिमान राजा होता है। अन्यजात का राजयोग-जन्म पत्रिका में पूर्ण चन्द्रमा वृष में हो उसको तुलास्थित शुक्र देखता हो तथा बुध चतुर्थ भाव में हो तो अन्यकुलोत्पन्न भी राजा होता है। कुत्सित राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि मंगल अपने उच्च में हो उस पर रवि चन्द्र और गुरु की दृष्टि हो तो नीच कुलोत्पन्न भी समस्त पृथिवी का रक्षक राजा होता है। नीचकुलोत्पन्न राजयोग-उक्त राजयोगों में अभिजित् (नक्षत्र या मुहूर्त) में जन्म हो तो नीच कुलोत्पन्न भी परमबलशाली राजा होता है, इसमें सन्देह नहीं। शत्रुजेता राजयोग- जन्म पत्रिका में कृत्तिका नक्षत्रस्थित चन्द्रमा यदि लग्न में हो तथा गण्डान्त, भद्रा, परिघ या व्यतिपात योग हो तो जातक शत्रुओं को नाश करने वाला होता है। निराकुल राजयोग- जन्म पत्रिका में लग्न में बुध, सप्तम बृहस्पति कर्कराशिस्थ चन्द्रमा चतुर्थ भाव में और शुक्र दशमभाव में हो तो जातक शासक होता है। चक्र व समुद्र राजयोग- यदि जन्म पत्रिका में एक राशि अन्तर करके ६ राशि में सब ग्रह हों तो चक्र योग होता है इसमें जन्म लेने वाला राजा होता है। यदि इसी योग में एक शुभ ग्रह लग्न में हो तो सम्पूर्ण भूमण्डल का राजा होता है। उक्त योग में ही यदि दो ग्रह लग्न में हो तो समुद्र
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भृगु संहिता फल दर्पण ८३९ योग होता है, इसमें जातक राजा होता है। यदि सब शुभग्रह केन्द्र में हो तो भी जातक राजा होता है। जन्म कुण्डली में लग्न से निरन्तर ६ राशियों में सब ग्रह हो तो जातक राजा होता है। चार राशियों में सब ग्रह हो तो राजमन्त्री होता है। अधिक सम्पत्तिवान् राजयोग- यदि सब ग्रह ५, ४, ३, १ भाव में हो तो धन पुत्र बन्धु और वाहनों से तथा बहुत नौकरों से युक्त राजा होता है ऐसा यवनादि आचार्यों का मत है। नगर नामक राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि १०,७, ४, १ इन सब ग्रह हों तो नगर नामक योग होता है। इस योग में उत्पन्न मनुष्य पृथ्वीपति होता है। प्रशान्त राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि सब ग्रह चतुर्थ, लग्न और सप्तम भाव में तथा मंगल, रवि एवं शनि ये तृतीय, षष्ठ और एकादश भाव में हों तो जातक न्यायप्रिय राजा होता है। यह राजयोग यवनाचार्यों ने कहा है। कलश संज्ञित राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि सब शुभ ग्रह ११, ९ भाव में हो तथा सभी पापग्रह दशमभाव में हों तो कलश नामक राजयोग कहा गया है। पूर्ण कुम्भ नामक राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि ३,५, ११, भाव में ३ ग्रह, षष्ठाभाव में २ ग्रह और शेष २ ग्रह सप्तम भाव में हो तो यह कुम्भ नामक राज योग होता है। इस प्रकार जन्म कुण्डली में ऊपर प्रायः नीच कुलोत्पन्न जातक के लिए भी अनेक प्रकार के राजयोग कहे हैं, इसके आगे केवल राजवंशियों के राजा होने वाला योग मुनियों द्वारा कहा गया है। सर्व वन्दित राजयोग- जन्म कुण्डली में सिंह लग्न में सूर्य, मेष में चन्द्रमा, कुम्भ में शनि, मकर में मंगल हो तो जातक सबका वन्दनीय होता है। स्थिर लक्ष्मीवान् राजयोग- जन्म कुण्डली में एक बलवान् शुभग्रह लग्न में और अन्य शुभग्रह ९, १, २ भाव में तथा शेष ग्रह ३, ११, ६, १० भाव में हो तो जातक स्थिर लक्ष्मी वाला राजा होता है। जिसकी विजय यात्रा में हाथियों का समूह अपने मद जल वृष्टि से लोक में मेघ का भ्रम उत्पन्न कर देता है। अति लक्ष्मीवान् राजयोग- जन्म काल में स्वराशिस्थ बृहस्पति चतुर्थ भाव में और पूर्ण चन्द्रमा नवें भाव में तथा शेष ग्रह १, ३ भाव में हो तो जातक बुद्धिमान्, सब सम्पत्ति और वाहनों से युक्त राजा होता है। चन्द्रांशतुल्य यशस्वी राजयोग- जन्म काल में अपने उच्च में स्थित चन्द्रमा यदि लग्न में हो, धन भाव में बृहस्पति हो, तुला में शुक्र, कन्या में बुध, मेष में मंगल तथा सिंह में सूर्य हो तो जातक अति यशस्वी राजा होता है। स्वगुण प्रख्यात राजयोग- जन्म कुण्डली में चन्द्रमा और रवि दशम
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८४० राजयोग प्रकरण भाव में, लग्न में शनि, चतुर्थ में गुरु, शुक्र, बुध, मंगल, ये एकादश भाव में हो तो गुणों से सुप्रसिद्ध राजा होता है। जन्म पत्रिका में मकर से भिन्न लग्न में बृहस्पति हो तो बहुत हाथी आदि वाहनों से युक्त राजा होता है। यशस्वी राजयोग- जन्म पत्रिका में लग्न में मंगल दशम में शनि और रवि, ७ में गुरु, ९ में शुक्र, ११ वें में बुध और चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो इस योग में जन्म लेने वाला यशस्वी राजा होता है। जन्म कुण्डली में क्षीण चन्द्रमा भी उच्चस्थ हो तो राजा का जन्म होता है। यदि पूर्ण चन्द्र उच्चस्थ हो तो कहना ही क्या है?। पराक्रम धन वाहन से युक्त राजयोग- पत्रिका में यदि पूर्ण चन्द्रमा लग्न से भिन्न केन्द्र में हो तो जातक धन, वाहन और पराक्रम से युक्त राजा होता है। सर्पराज के तुल्य प्रतापी राजयोग- जन्म समय में यदि शुक्र को बृहस्पति देखता हो तो जातक बहुत वाहनों से युक्त प्रतापी राजा होता है। राजराजेश्वर राजयोग- यदि जातक के जन्मपत्रिका में जन्म समय में 'बुध को गुरु देखता हो तो वह जातक राजाओं से वन्दनीय होता है। शत्रुजित राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि लग्नेश स्वोच्चगत होकर चन्द्रमा को देखता हो तो धन, वाहनों अर्थात् हाथी घोड़ा से युत से शत्रुओं को जितने वाला राजा होता है। जन्म पत्रिका में चन्द्रमा स्वोच्चस्थ होकर बुध और शुक्र को देखता हो तो जातक यशस्वी, भाग्यवान् शत्रुहन्ता राजा होता है। लक्ष्मीपति राजयोग- जन्म कुण्डली में अपने अधिमित्र के नवमांशस्थ चन्द्रमा को यदि शुक्र देखता है तो सदा धन-धान्यसम्पन्न लक्ष्मी का पति राजा का जन्म होता है। दिन में जन्म हो, चन्द्रमा स्वनवांश या अधिमित्र के नवांश में हो, उस पर गुरु की दृष्टि हो तो निश्चय ही राजा होता है। ब्राह्मणकुलोत्पन्न राजयोग- पत्रिका में जन्मराशि का स्वामी बली होकर केन्द्र में हो तो ब्राह्मण कुलोत्पन्न भी राजा होता है। फिर राजकुलोत्पन्न की तो बात ही क्या?। अंग देशाधिप राजयोग- जन्म कुण्डली में यदि सूर्य अपने अधिमित्र की राशि में हो, उस पर चन्द्रमा की दृष्टि हो तो जातक अङ्ग देश का राजा धन, धर्म से युक्त होता है। मगधाधिप राजयोग- जन्म पत्रिका में चन्द्रमा के साथ-बुध अपने उच्च में हो तो जातक मगध देश का राजा होता है। जिसके हाथियों के मदगन्ध से सब दिशा सुगन्धित होती है। शत्रुदमन राजयोग- जन्म पत्रिका में एक भी पूर्णिमा का चन्द्रमा यदि
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भृगु संहिता फल दर्पण ८४१ प्रधान (उच्च) बल से युक्त हो तो शत्रु को जीतने वाला राजा होता है। गोप कुलोत्पन्न राजयोग- जन्म पत्रिका में एक भी लग्नेश पूर्ण बली होकर केन्द्र में हो तो गोपकुलोत्पन्न भी राजा होता है। राजवंशियों की फिर क्या बात है?। समस्त भूमण्डल का स्वामी राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि चन्द्रमा से दशवें भाव में कर्क का बृहस्पति हो तो जातक समस्त पृथ्वी का स्वामी होता है। अन्य राजयोग- जन्म पत्रिका में चन्द्रमा सहित सूर्य यदि मेष में हो तो जातक केरल, कर्णाट, आन्ध्र, द्रविड़ या चोलप्रदेश का शासक होता है। कश्मीरमण्डलीय राजयोग-जन्म पत्रिका में यदि चन्द्रमा के साथ बृहस्पति कर्क राशि में हो तो जातक कश्मीर देश का राजा होता है। जन्म पत्रिका में अपने अपने उच्च में होकर गुरु शुक्र यदि ११, २, १, ४, ७, १०, ९वें में हो तो राजकुलोत्पन्न अवश्य राजा होता है। जन्म पत्रिका में शुभग्रह यदि दिग्बल, स्थानबल से युक्त होकर केन्द्र में हो उस पर पाप की दृष्टि या योग नहीं हो तो जातक राजा होता है अथवा ३ या अधिक ग्रह उक्त बली होकर केन्द्र में हो तो भी जातक राजा होता है। तीन ओर समुद्र से वेष्टित भूमि का राजयोग-रवि से द्वितीयस्थान में यदि बुध, गुरु, शुक्र हो उन पर पापग्रह की दृष्टि या योग नहीं हो तथा अस्त नहीं हो तो जातक ३ दिशाओं से आवृत्त समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का स्वामी होता है। प्रसिद्ध कीर्तिमान् राजयोग-स्वच्छकिरण पूर्णिमा का चन्द्रमा यदि राशीश और बली शुभग्रह से दृष्ट हो तो अति सुन्दर स्वरूप, प्रख्यात यश वाला राजा होता है। - - शत्रुजित राजयोग- गुरु और शुक्र दोनों यदि धन स्थान में हो तो शत्रुजेता राजा होता है। जन्म पत्रिका में मकर लग्न में मङ्गल और शनि हो तो चतुर्थ भाव में शुक्र, बृहस्पति, बुध, हो अथवा मकर लग्न में शनि का नवमांश हो, उसमें चतुर्थेश (मंगल) हो तो जातक राजा होता है। द्वीपाधिप राजयोग- जन्म पत्रिका में कर्कलग्न में गुरु और चन्द्रमा हो मीन में शुक्र, तुला में शनि, मेष का सूर्य और मङ्गल अपने वर्ग में हो तो जातक राजा होता है। जन्म पत्रिका में बली गुरु और शुक्र मीन में हो, पूर्ण चन्द्रमा वृष में, और सूर्य मेष में, बली क्रूर ग्रह से दृष्ट हो तो ऐसा राजा होता है, जिसके सेना के चलने से धूलि से सूर्य आच्छादित हो जाता है अतः दिन में ही कमलिनी संकुचित हो जाती है। त्रिभुवनाधिप राजयोग- जन्म पत्रिका में सब पाप ग्रह अपने नीच या शत्रुराशि में होकर ३, ६ स्थान में हो और बली शुभ ग्रह परमोच्च में होकर
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८४२ राजयोग प्रकरण केन्द्र में हो, कर्कस्थ चन्द्रमा दशमभाव में हो और रात्रि में जन्म हो तो चक्रवर्ती राजा होता है। जन्म पत्रिका में पूर्णकिरण बृहस्पति लग्न में, अर्धाधिक शुक्ल बिम्बचन्द्रमा एकादश भाव में बुध से दृष्ट हो, चन्द्रमा से द्वितीय स्थान में सूर्य हो इन पर मंगल की दृष्टि नहीं हो तो जातक बहुत वाहनों से युक्त राजा होता है। शत्रुजित राजयोग- जन्म पत्रिका में मेष लग्न में रवि, चन्द्र, मंगल हो, वृष में शुक्र शनि, बुध हों; धनुराशिस्थ स्वनवांश में गुरु हो अथवा केवल रवि पूर्ण बली होकर अपने परमोच्च में हो तो शत्रु को जीतने वाला और विद्वान् राजा होता है। विमल कीर्तिमान् राजयोग- जन्म पत्रिका में शुक्र बुध गुरु पञ्चम भाव में, षष्ठ भाव में सूर्य, अपने उच्च में मंगल, नवमभाव में शनि हो तो धर्मात्मा, यशस्वी और प्रतापी राजा होता है। प्रसिद्ध यशस्वी राजयोग- जन्म पत्रिका में गुरु से दृष्ट रवि, चन्द्रमा से दृष्ट शुक्र, मंगल से दृष्ट शनि, यदि चरराशि लग्न में हो तो शत्रुजेता यशस्वी राजा होता है। स्वभुज विजयी राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि जातक के जन्मपत्रिका में कन्या लग्न में बुध हो, मीन लग्न में बलवान् बृहस्पति हो, मेष लग्न में मंगल हो, शनि षष्ठ भाव में और शुक्र चतुर्थ स्थान में स्थित हो तो वह जातक अपने बाहुबल से सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने वाला राजा होता है। प्रसिद्ध राजयोग- मकर लग्न में शनि, सप्तम सूर्य, अष्टम शुक्र, वृश्चिक का मंगल, कर्क का चन्द्रमा हो तो लोक में ख्याति प्राप्त राजा होता है। अस्थिर स्वभावी राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि बली मंगल मकर लग्न में हो, नवम में शनि, सप्तम भाव में चन्द्रमा सहित सूर्य हो तो जातक अति चञ्चल स्वभाव का राजा होता है। अजेय राजयोग- जन्म पत्रिका में मकर लग्न में शनि, सप्तम भाव में चन्द्र और बृहस्पति हो, कन्या में बुध यदिशुक्र से दृष्ट हो तो जातक दुर्धर्ष (अजेय) राजा होता है। द्विज देवभक्त राजयोग- यदि कुण्डली में मित्र से दृष्ट गुरु धनु में हो, लग्न में शुक्र, कर्क में चन्द्रमा हो तो जातक तालाब, देवमन्दिर बनाने वाला ब्राह्मणों का परम भक्त राजा होता है। सर्ववन्दित राजयोग- जन्म पत्रिका में एक भी स्वच्छरश्मि शुभग्रह उच्च में होकर केन्द्र में हो अथवा केवल पूर्ण बली सूर्य केन्द्र में हो उस पर पञ्चम भावस्थ गुरु की दृष्टि हो तो जातक वन्दनीय भूपति होता है। स्वबाहुबल से शत्रु को जीतने वाले राजा का राजयोग-जन्म कुण्डली में मंगल शनि रवि षष्ठ या तृतीय भाव में हो, सिंह का गुरु एकादश भाव में हो
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भृगु संहिता फल दर्पण ८४३ उन पर शुभग्रह की दृष्टि हो और रवि चन्द्र की दृष्टि नहीं हो तो शत्रु पक्ष को पराजित करने वाला राजा होता है। जन्म पत्रिका में जन्म समय में सुखद वायु बहती हो, आकाश निर्मल हो और सब ग्रहों में तात्कालिक मैत्री हो गई हो, बृहस्पति लग्न में हो, शुक्र वृष में हो तो जातक पृथिवीपति होता है। कीर्तिमान् राजयोग- जन्म पत्रिका में चन्द्र बुध मंगल ये अपने नवमांशस्थ होकर १२, ३ भाव में हो और नीच राशि में वा अस्त नहीं हों, गुरु और चन्द्र पञ्चम भाव में हो तो परम यशस्वी राजा होता है। पुष्कल नामक राजयोग एवं फल- जन्म पत्रिका में पूर्ण बली जन्मराशिपति और लग्नेश अधिमित्र की राशि में स्थित केन्द्र में होकर लग्न को देखता हो तो पुष्कलयोग होता है। पुष्कलयोग में जन्म लेने वाला शत्रुजेता यशस्वी राजा होता है। उक्त राजयोगों में लग्नेश यदि राश्यादि में हो तो जातक राजाओं में श्रेष्ठ, राशि के मध्य में हो तो मण्डलाधिप, राशि के अन्त में हो जातक ग्राम का मालिक होता है। शतयोजन भूमि का स्वामी- रेवती, पू. फा. उ. फा. मूल या पुष्य में स्थित सूर्य लग्न में हो तो जातक सौ योजन भूमि अथवा देश का राजा होता है। यदि कुण्डली में कृत्तिका स्वा. पुष्य या अश्विनी में स्थित शुक्र लग्नगत हो तो जातक राजाओं में श्रेष्ठ अथवा राजाओं का राजा होता है। सार्वभौम राजयोग- यदि कुण्डली में लग्न के नवमांश का स्वामी अपने उच्च में होकर केन्द्र में हो तो जातक राजा होता है। जन्म राशीश या जन्म लग्नेश यदि केन्द्र में हो तो जातक धन सम्पन्न होता है। अन्य सार्वभौम राजयोग- यदि कुण्डली में मीन में पूर्ण चन्द्रमा अपने मित्र से दृष्टि हो तो सार्वभौम (चक्रवर्ती) राजा होता है। जिसकी आज्ञा सब मानते हैं। (कुण्डली में) मंगल दशम स्थान में, चन्द्र, शुक्र नवम स्थान में, स्वोच्च (मेष) गत सूर्य एकादश भाव में बृहस्पति से युक्त हो तो जातक राजा होता है। जिसके सैनिकों (हाथी, घोड़े) के चलने से दशों दिशाओं में फैली धूलियों से सूर्य के घोड़ों को पृथ्वी के सुगन्ध सुख प्राप्त होता है। वर्धितश्री राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में चन्द्रमा के साथ शनि केन्द्र में हो तो जातक परजात होकर भी धन वाहनों से परिपूर्ण राजा होता है। शत्रुजेता राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में शुक्र बृहस्पति बुध ये द्वितीय भाव में, चन्द्र रवि मंगल ये सप्तम भाव में हो तो जातक शत्रुहन्ता राजा होता है। यदि जन्म कुण्डली में बली रवि और चन्द्रमा कर्क में हो कोई एक अन्य ग्रह स्वच्छ रश्मियु अपने उच्च में हो, लग्न में गुरु, षष्ठभाव में मंगल
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८४४ राजयोग प्रकरण हो तो बहुत सेवाओं धन तथा वाहनों से युत राजा होता है। विश्व का कल्याण करने वाला राजा- यदि कुण्डली में कुम्भ के अष्टम अंश पर त्रिकोण (५,९) में चन्द्रमा हो तो समस्त प्रजा का हित साधक राजा होता है। यदि कुण्डली में मेष के सप्तम अंश में अथवा मिथुन के २१ वें अंश में मंगल हो तो दोनों योग में राजा होता है। प्रकारान्तर से राजयोग- जन्म के समय चन्द्रमा यदि कुम्भ के १५ वें अंश में अथवा कर्क के १० वें अंश में हो तो राजकुलोद्भव राजा होता है। प्रसिद्ध राजयोग- जन्म पत्रिका में धनु के २० वें अंश में गुरु हो तो विख्यात राजा होता है। सिंह के १५वें अंश में सूर्य या बुध हो तो भी विख्यात राजा होता है। वीर राजयोग- जन्म पत्रिका में किसी राशि के १५ वें अंश पर एक राशि के ५ वर्ग में चन्द्रमा हो तो अपने भुजबल से पृथ्वी को जीतने वाला वीर राजा होता है। जन्म पत्रिका में उपर्युक्त राजयोगों में चन्द्रमा यदि मकर के ५वें अंश में हो तो नीतिज्ञ, शास्त्रज्ञ धर्मात्मा राजा होता है। अजेय राजयोग- यदि कुण्डली में कर्क के ५ अंश में चन्द्र और गुरु हो तो जातक समस्त मनुष्यों का दुर्धर्ष राजा होता है। जैसे समस्त ग्रहों का राजा सूर्य हैं। सार्वभौम राजयोग- यदि कुण्डली में उक्त राजयोगों में यदि पूर्णचन्द्रमा पुष्य वर्गोत्तम नवांश, कृत्तिका या अश्विनी में हो वा त्रिपुष्करयोग हो तो चक्रवर्ती राजा होता है। यदि कुण्डली में अश्विनी अनुराधा या धनिष्ठा में अपने उच्च या वर्गोत्तम नवांश में मंगल हो तो राजा होता है अन्य स्थिति में नहीं। अतुल्य बलवान् राजयोग- यदि जन्म कुण्डली में पूर्ण रश्मि चन्द्रमा दशम भाव में, बली शुक्र नवम में, शेष ग्रह एकादश भाव में हो तो सर्वश्रेष्ठ पराक्रमी राजा होता है। अहंकारी राजयोग- जन्म पत्रिका में सब ग्रह यदि चन्द्रमा से उपचय (३, ६, १०, ११) में हो तो मानी समस्त भूमण्डल का राजा होता है। कुबेर के समान धनी राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि मंगल से गुरु, चन्द्र, सूर्य क्रम से ५,९,३ स्थान में हो तो धन में कुबेर तुल्य धन से सम्पन्न राजा होता है। त्रिसमुद्रपारग राजयोग- पत्री में बुध से यदि तृतीय भाव में सूर्य, चतुर्थ में शुक्र तथा अन्य ग्रह पञ्चम भाव में हो और कोई भी नीच शत्रु राशि में नहीं हो तो तीन समुद्र पर्यन्त पृथ्वीपति होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८४५ जन्म पत्रिका में बृहस्पति से, शनि, सूर्य, चन्द्र ये क्रम से २, ४, १० स्थान में तथा शेष ग्रह षष्ठ भाव में हो तो जातक राजकुलोत्पन्न राजा होता है। प्रकारान्तर से राजयोग- जन्म कुण्डली में शुक्र से यदि बुध और शनि क्रम से ४,८ स्थान में हो और शेष ग्रह तृतीय, एकादश में हो तो वह जातक जातक निश्चय ही राजा होता है। सिंहासनाधिशायी राजयोग- जन्म कुण्डली में शनि से यदि शुक्र और बुध केन्द्र में हो, शेष ग्रह उच्चस्थ हों तो सिंहासन पर सोने वाला राजा होता है। जन्म पत्रिका में सूर्य से यदि शेष सब ग्रह ३, ५, ११ में हो तो वह जातक राजा या मन्त्री अथवा सेनापति होता है। अपने बाहुबल से पृथ्वी को जीतने वाला राजा- जन्म पत्रिका में पूर्ण रश्मि लग्नेश से यदि पापग्रह एकादश स्थान में और शुभ ग्रह केन्द्र में हो तो अपने भुजबल से पृथ्वी के जीतने वाला पृथ्वी का राजा होता है। समस्त नृपों से वन्दित राजा- जन्म पत्रिका में जन्म राशिपति से ११, ३, ६ में सब पापग्रह हो उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो तो सर्वश्रेष्ठ वन्दनीय राजा होता है। जन्म पत्रिका में बृहस्पति मेष या सिंह में, मंगल अपनी राशि में सूर्य से दृष्ट हो और कोई भी ग्रह नीच में नहीं हो तो राजकुल में जन्म लेने पर वह पुरुष राजा होता है। सुनफादि योग में भी राजयोग का विचार- जन्म कुण्डली में चन्द्रमा से अगले पिछले तथा दोनों केन्द्र में सूर्य से भिन्न ग्रह हों तो क्रम से सुनफा, अनफा, दुरधरा योग होते हैं। इन योगों में राजकुल में जन्म लेने वाला अवश्य राजा होता है। अतुल कीर्तिमान् राजयोग- जन्म पत्रिका में यदि चन्द्र और बृहस्पति केन्द्र में शुक्र से देखे जाते हो और कोई ग्रह नीच में नहीं हो तो कीर्तिमान राजा होता है। सार्वभौम राजयोग- यदि जन्म पत्रिका में बली शुक्र अपने नवमांश में होकर लग्न में हो उन पर बुध शनि की दृष्टि हो तो तथा गुरु ५वें हो तो अपने बाहुबल से शत्रुओं को मारने वाला हाथियों से युक्त सार्वभौम राजा होता है। यदि सिंह में सूर्य, कर्क में चन्द्रमा हो तथा दोनों गुरु से दृष्ट हों तो जातक राजा होता है। स्फीत महीपति योग- पत्रिका में यदि कर्क में बुध हो, धनु में गुरु, दोनों रवि तथा मंगल से दृष्ट हो तो राजा होता है। पत्रिका में यदि मीन में चन्द्र हो, कर्क में गुरु तथा कुम्भ में शुक्र हो तो राजकुलोत्पन्न जातक राजा होता है। यदि जन्म पत्रिका में शनि कुम्भ में शुक्र से दृष्ट हो, एकादश सूर्य और
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८४६ ग्रह रश्मि प्रकरण जलचर राशि में चन्द्रमा हो तो जातक राजा होता है। प्रकारान्तर से राजयोग- जन्म कुण्डली में वृश्चिक या मेषस्थ मंगल को रवि गुरु देखते हों, वृष में स्थित बुध को गुरु देखता हो तो जातक राजा होता है। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण चन्द्र अपने गृह, नवांश या स्वोच्चराशि नवांश में हो और तात्कालिक मैत्री दृष्टि से पॉच ग्रहों से दृष्ट हो तथा कोई नीच में न हो तो जातक राजा होता है। एकादश भाव में शनि, लग्न में गुरु, शुक्र दशम में चन्द्रमा, चतुर्थ में सूर्य, द्वितीय भाव में बुध, मंगल हो तो जातक बहुत धन, वाहन और सैनिकों से युक्त सर्वश्रेष्ठ राजा होता है।
ग्रह रश्मि प्रकरण भारतीय ज्योतिषशास्त्रानुसार मणित्थ आचार्य यहाँ ग्रहों की रश्मि को प्रधान बताया है। इसलिये आगे अब रश्मिसाधन प्रकार को कहने के लिए उद्यत हैं- ग्रहों की रश्मि संख्या का विचार- सूर्य आदि ग्रह अपने अपने उच्च स्थान में रहते हैं तो क्रम से १०, ९, ५,५, ७, ८ और ५ ये रश्मि संख्या होती है। प्रकारान्तर से रश्मि संख्या का विचार- अथवा रश्मियों का योग ४९ है अतः प्रत्येक की रश्मिसंख्या ७ मानी गयी है। ये दोनों मत प्रमाण हैं। तथापि बहुतो के मत से ७ की संख्या मानी गई है। तथा अपने अपने नीच में रश्मिसंख्या शून्य कही गयी है। अभिमुख पराङ्मुख रश्मि का विचार-जब नीच से ग्रह आगे बढ़ता है तो उसकी सम्मुख रश्मि तथा उच्चे से आगे उतरता है तो पराङमुख रश्मि होती है। तथा उच्च और नीच के मध्य में अनुपात द्वारा रश्मि का साधन होता है। उस यहाँ विवेचित करते हैं- स्पष्ट रश्मि का आनयन- अभीष्ट राशि साधन हेतु ग्रह में नीच राशिअंश को घटाकर शेष ६ से अधिक हो तो अभीष्ट १२ राशि में घटाकर जो बचे उसको अपनी उच्चस्थरश्मि संख्या से गुनाकर ६ के भाग देने से लब्धि रश्मिसंख्या होती है। आनीत रश्मि संख्या में संस्कार विशेष- यदि स्पष्ट ग्रह मित्र के द्वादशांश में हो उसकी रश्मि को द्विगुणित और अपने द्वादशांश, वक्र, उच्च या अपनी राशि में हो उसकी राशि को त्रिगुणित करना चाहिये इस प्रकार स्पष्ट राशि संख्या होती है। प्रकारान्तर से संस्कार विशेष- वक्रतारम्भ स्थान में द्विगुणित और
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भृगु संहिता फल दर्पण ८४७ वक्रतात्याग स्थान में साधित रश्मि में अष्टमांश हीन कर देना। शत्रु के द्वादशांश में और नीच राशि में ग्रह हो जो षोडशांश हीन कर देना चाहिये। जो ग्रह अस्त हो उसकी रश्मिसंख्या शून्य कर देना चाहिये। जो ग्रह अस्त हो उसकी रश्मिसंख्या यथागत ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार रश्मिसाधन आचार्यों ने कहा है। ग्रहों की रश्मि योग संख्या से (१-५ तक) फल का विचार-इस प्रकार जन्म के समय ग्रहों के १ से ५ तक रश्मि होने से मनुष्य बहुत-सा दुःख वाला, कुलरहित, पराश्रित, दरिद्र और क्षुद्र कर्म करने वाला होता है। ६ से १० तक रश्मि योग संख्या फल- १ से ५ तक रश्मि संख्या योग हो तो जातक दुखी, कुलहीन, परतन्त्र, दरिद्र, नीच होता है। ११ से १० तक रश्मि योग हो तो मनुष्य मृतक (पराज्ञा-रत), विदेशनिरत, भाग्यहीन और मलिन होता है। ११-१५ तक फल- ११ से १५ तक रश्मि संख्या योग हो तो क्रम से बहुत विषयज्ञ, सज्जन, धर्मात्मा सुन्दर और अपने पिता के तुल्य होता है। १६-२० तक फल- १६ से २० तक रश्मि योग हो तो क्रम से कुल
होता है। में श्रेष्ठ, धनवान, लोक में विख्यात, यशस्वी और स्वजन में आदरीणय
२१-३५ तक रश्मि योग संख्या फल- २१ से २५ तक रश्मि हो तो जातक क्रम से पूज्य, सौभाग्यवान्, धीर, विद्वान, और राजा होता है। २६ हो तो जातक सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला होता है। २७ हो तो राजा का आश्रित हो कर जीता है। २८ हो तो राजा से धन और सुख लाभ करने वाला होता है। २९/३० हो तो राजमन्त्री और राज गुरु होता है। ३१ रश्मि में राजाओं का प्रिय श्रेष्ठ पुरुष, ३२ हो तो ५० गाँव का अधिप, ३३ हो तो सहस्त्रग्राम का अधिप, ३४ हो तो ३ सहस्त्र ग्राम का अधिप, ३५ हो तो बहुत धनवान, बलवान् और मण्डलेश्वर (प्रान्तपति), यशस्वी, सुरूप, लोगों का प्रिय होता है। ३६-३८ तक रश्मि योग संख्या फल- ३६ रश्मि हो तो लाखों ग्राम का अधिप होता है। ३७ या ३८ रश्मि हो तो ३ लाख ग्राम का पालक होता है। ३९ वीं रश्मि योग संख्या फल- यदि ३९ रश्मि हो तो वह जातक समस्त लोक को सुख देने वाला पृथ्वीपति राजा होता है। ४० वीं रश्मि योग संख्या फल- जिसके जन्मसमय ग्रहों की रश्मिसंख्या ४० हो वह अधिक भूमि का पालक होता है। जिसके भुजबल से निहत शत्रुओं की स्त्री के शोकार्त शब्दों से लोक में ख्याति होती है। ४१-४३ तक रश्मि योग संख्या फल- जिसकी रश्मि संख्या ४१ हो वह एक दिशा के समुद्र पर्यन्त पृथ्वीपति होता है। ४२ रश्मि हो तो दिशा के
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८४८ महापुरुष योग प्रकरण समुद्र तक, ४३ रश्मि हो तो ३ दिशा के समुद्र तक पृथ्वीपति होता है। ४४वीं रश्मि योग संख्या फल- ४४ रश्मि संख्या हो तो जातक सरल स्वभाव, देव-ब्राह्मण का भक्त, दीर्घायु, बलवान्, चक्रवर्ती राजा होता है। ४४ से जैसे जैसे अधिक रश्मि हो वैसे वैसे द्वीपों का भी पालक, विघ्न बाधाहीन, सबका वन्दनीय, इन्द्रतुल्य प्रतापी राजा होता है। ४५-४८ तक रश्मि योग संख्या फल- ४५ या ४६ रश्मि हो तो उसका सर्वथा कल्याण समझना तथा वह समस्त पृथ्वी का राजा होता है। ४९वीं रश्मि योग संख्या फल- यदि जन्म समय ग्रहों की रश्मि संख्या ४९ हो तो वह समस्त पृथ्वी के भार को सहन करने वाला, शत्रुरहित इन्द्रतुल्य पराक्रमी समस्त लोकों से वन्दित चक्रवर्ती राजा होता है। फल में विशेषता का विचार-अभिमुखरश्मि से पूर्ण फल और पराङ्मुख रश्मि से खण्डित फल होता है। जन्म समय में रश्मियों की अल्पता से हानि और अधिकता से वृद्धि होती है। रश्मि के अनुसार ही जातक की नीचता या श्रेष्ठता का ज्ञान करना चाहिये।
महापुरुष योग प्रकरण श्रीदेवकीर्तिराजा ने जिन पञ्चमहापुरुषों के लक्षण बताये हैं; उनको अब आगे स्पष्ट रूप से वर्णन करते हैं- पाँच महापुरुषों के लक्षण-यदि जन्म कुण्डली में शुक्र मंगल शनि गुरु बुध ये अपने गृह या उच्च में हो कर केन्द्र अर्थात् (१,४,७,१०) हो तो उक्त गह क्रम से मालव्य, रुचक, शश, हंस और भद्र नामक पाँच महापुरुष होते हैं। इन सबों के लक्षण अन्य आचार्यों द्वारा विस्तारपूर्वक कहे गए हैं। अब उन लक्षणों को संक्षेप में कहते हैं। मालव्य योग- मालव्य योग में उत्पन्न पुरुष का ओष्ठ पतला, शरीर सम होता है। गोधूमवर्ण, क्षीणकटि, चन्द्रमा के समान कान्ति, हाथियों के समान गम्भीर स्वर, सुगन्ध, तीक्ष्णदृष्टि, समान और स्वच्छ दाँत, आजानु (घुटने तक) बाहु और ७० वर्ष जीने वाला होता है। मालव्य पुरुष का मुखमण्डल १३ अंङ्गुल चौड़ा, दोनों कान १० अङ्गुल होता है। वह लाट मालव और सिन्धु देश का पालक होता है। रुचक योग- कुण्डली में रुचक योगोत्पन्न पुरुष का लम्बा मुख, निर्मल कान्ति, पूर्णबल, साहसी, सुन्दर भौंह, नीलकेश, संग्रामप्रिय, मन्त्रज्ञ, चोरों का अधिपति, रक्तश्यामवर्ण, अति शूर, शत्रुजेता, शंख सदृश कण्ठ, राजाओं में प्रधान, क्रूर, ब्राह्मण और गुरु का भक्त, पतली जंघा वाला, हाथ और पैर में खट्वाङ्ग, पाश, वृष, धनुष, वज्र, वीणा की रेखा वाला, लम्बाई
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भृगु संहिता फल दर्पण ८४९ में १०० अङ्गुल, मन्त्र और अभिचार कर्म में निपुण, तौल में १००० तुला और मुख की लम्बाई के बराबर उसका कटिप्रदेश होता है। रुचक योगोत्पन्न जातक विन्ध्य और सह्य पर्वत स्थित नगरों का पालन करके ७० वर्ष की आयु में शस्त्र या अग्नि के आघात से मृत्यु प्राप्त कर स्वर्ग जाता है। शश योग- ज्योतिष गणनानुसार शश योगोत्पन्न पुरुष छोटे छोटे दाँत और मुख वाला, शीघ्रगति, धूर्त, अति शूरवीर, प्रतापी, वन, पर्वत और नदी का प्रेमी, कृश कटि, लम्बा शरीर, लोक में प्रसिद्ध, सेनापति, सब कार्य में पटु कुछ ऊँचे दाँत वाला, धातुवादी, चञ्जल, कमल नेत्र, स्त्री में आसक्त, परधन का ग्रहणकर्त्ता, माता का भक्त, सुन्दर जङ्गा, क्षीण कटि, अनेक बुद्धि, दूसरों के दोष को देखने वाला होता है। शशयोग में उत्पन्न जातक के हाथ में खटिया, शंख, चक्र, मृदङ्ग, माला, वीणा की रेखा होती है। इस योग में उत्पन्न जातक किसी एक प्रान्त का राजा हो कर ७० वर्ष तक जीता है ऐसा ऋषियों ने कहा है। हंस योग- जातक शास्त्रानुसार हंस योगोत्पन्न पुरुष रक्त वर्ण और उन्नत नाक, सुन्दर पैर, प्रसन्न वित्त, गौरदेह, पुष्टगाल, लालनख, हंससमान शब्द, कफात्मा, हाथ और पैर में शंख, कमल, अङ्कुश, रज्जू, मछली, खटिया, धनुष की रेखा, मधुवर्ण नेत्र, गोलमस्तक, जलाशय का प्रेमी, स्त्रैण, कामातुर, तौल में १६०० तुला और लम्बाई में ९६ अङ्गुल होता है। हंस योगोत्पन्न सूरसेन, गान्धार, गङ्गा यमुना के मध्यप्रदेश का पालक होकर १०० वर्ष जीता है। अन्त में अर्थात् जीवन के अन्तिम काल में बनान्त में मृत्यु को प्राप्त होता है। भद्र योग- भद्र योग में उत्पन्न पुरुष व्याघ्र समान मुख, गजगति गामी, पुष्ट जंघा और वक्षस्थल, दीर्घ और पुष्ट बाहु, चतुरस्त्र देह, कामी, कोमल और सूक्ष्म दाढ़ी के केश वाला, विद्वान्, कमल सदृश हाथ पैर वाला, बलवान् और योगी होता है। उसके हाथ और पैर में शंख, हाथी, गदा, पुष्प, शर, ध्वजा, चक्र, कमल, हल की रेखा से चिह्नित, अगरू, गजमद, प्रथम जल वृष्टि से उत्पन्न भूमि और पुष्प के सुगन्ध समान गन्धयुत शरीर और सुन्दर नाक वाला होता है। अन्य फलों का विचार-शास्त्रतत्वज्ञ, धैर्यवान्, सुन्दर भौंह, गजोपम, सुन्दर पेट, धर्मात्मा, सुन्दर कपाल वाला, धीर, स्थिरचित्त, कृष्ण और औंठिया केश से शोभित, सब कार्य में स्वतन्त्र, परिवार का पालन करने वाला, मित्रों को धन देने वाला, तौल में २० तुला (१ भार) तुल्य, स्त्री आदि मुख्य मुख्य वस्तुओं से युक्त, सर्वदा सुखी होकर ८० वर्ष पर्यन्त मध्यदेश का राज्य करता है अर्थात् इस योग में उत्पन्न जातक की आयु ८०
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८५० महापुरुष योग प्रकरण साल की होती है। शत्रुजेता राजयोग- जिन मनुष्यों के स्वर (शब्द) सिंह, मृदुङ्ग (वाद्य विशेष) हाथी, रथ समुदाय भेरी, वृष वा मेघ के समान होते हैं वे जातक समस्त भूमि की रक्षा करने में समर्थ, शत्रुजेता राजा होते हैं। विशेष राजयोग- जिस मनुष्य के जिह्वा (जीभ), त्वचा (चर्म), दाँत, नेत्र, नख, केश, चिकने व चमकदार हों तो वह राजा होता है। जिसका जिह्वादि शुष्क व स्वर भी शुष्क हो तो मनुष्य निर्धन होता है। ऐसा जातक ग्रन्थों में कहा गया है। राजा का वर्ण-चिकना व तेज से युक्त शुद्ध वर्ण राजा का कहा है। इसके विपरीत अर्थात् रूक्ष व तेज हीन होने पर क्लेश दायक व सुत धन सुख का भोग मध्यम होता है। समस्त पृथ्वी पालक राजा- मनुष्यों की आधी भूमी का भोग करने वाला राजाओं का भार रूप जन होता है। जिन राजाओं के पास आधी भूमि होती है, वे समस्त भूमि के पालक होते हैं। पञ्चतारा से फल का विचार- भौम से बल-पराक्रम, बुध से गुरुता, गुरु से स्वर, शुक्र से स्नेह, शनि से वर्ण का विचार करना चाहिये, अर्थात् भौम बली हो तो पूर्ण बलवान् निर्बल हो तो लघु अल्प बलवान् इसी प्रकार से पूर्ण अल्प गुरुता का, गुरु से पूर्ण अल्प स्वर का, शुक्र और शनि से स्नेह और वर्ण का विचार करना चाहिये। सतोगुणी के प्रधान लक्षण- सरल स्वभावी, दयालु, अधिक स्त्री और नौकर वाला, स्थिर स्वभाव, प्रिय सत्यभाषी, देवता और ब्राह्मणों का पूजक, सहनशील, ये सत्व गुण की प्रधानता होने पर मनुष्यों में विद्यमान रहते हैं। रजोगुणी के प्रधान लक्षण- वीर, कला व काव्य का खजाना, सुन्दर बुद्धि, स्त्री भोग में आसक्त मन, चतुर, आडम्बरों (बहुरूपिया) हास्य अर्थात् हँसने में तत्पर, ढीठ, गानविद्या व अक्ष (पासा फेंकने की) विद्या का ज्ञाता, ये गुण रजोगुण की प्रधानता होने पर मनुष्यों में रहते हैं। तमोगुणी के प्रधान लक्षण- मूर्ख, आलसी, ठग, क्रोधी, विवादी, चुगलखोर, भूख से पीड़ित, आचार से हीन अर्थात् दुराचारी, अपवित्र, नशे में चूर, लोभी, प्रमादी, ये बातें तमोगुण की प्रधानता से होती हैं। तत्त्व विचार- जिसकी कुण्डली में गुरु बली हो तो वह आकाश स्वभाव, शुक्र बली हो तो जल तत्व की अधिकता, अर्थात् जल स्वभाव, शनि बली हो तो वायु स्वभाव, भौम बली हो तो अग्नि स्वभाव, बुध बली हो तो पृथ्वी स्वभाव, गुरु शुक्र से छाया स्वरूप, शनि से वायु, भौम से पित्त, बुध से कफ स्वरूप होता है। १, २ या अधिक बली हों तो मिश्र स्वभाव व स्वरूप होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८५१ आकाश तत्त्व फल- यदि आकाश प्रकृति जातक की हो तो जातक शब्दार्थ का ज्ञाता, न्याय में चतुर, ढीठ, विज्ञान से युक्त, खुला हुआ मुख, चित्रित देह की सन्धि, दुबले हाथ पाद (पाँय) व अधिक लम्बा होता है। जल तत्त्व फल- यदि जल प्रकृति हो तो जातक अधिक जल पीने वाला, प्रिय (मधुर) भाषी, स्निग्ध भोजी, चंचल स्वरूपी, अधिक मित्र वाला, राजा और अत्यन्त अधिक काल तक ढीठ नहीं होता है। वायु तत्त्व फल- यदि वायु प्रकृति हो तो जातक कृश (दुर्बल) काय (शरीर), जल्दी क्रोध के वशीभूत, कार्य में दत्तचित्त, घूमने में तत्पर, दानी, सफेद वर्ण और अजेय राजा होता है। अग्नि तत्त्व फल- यदि अग्नि प्रकृति हो तो जातक वीर, भूख से पीड़ित, चञ्चल, अधिक तीव्र या अधिक तृष्णा से युक्त, अधिक ज्ञाता, दुर्बल, सफेद वर्ण, विरोधकर्ता, पण्डित, सुन्दर हाथ वाला वा अभिमानी, अधिक भोजनकर्ता और विशाल देहधारी होता है। भूमि तत्त्व फल- यदि भूमि प्रकृति हो तो जातक कपूर एवं जाती व कमल के पुष्प के समान गन्ध वाला, भोगी, स्थिर सुखी, सिंह व मेघ के समान शब्द वाला, स्थिर चित्त वृत्ति वाला व बली होता है। आकाश छाया फल- जिसके आकाश तत्व का उदय होता है वह जातक स्फटिक मणि व कमल के समान निर्मल कान्ति वाला होता है। जैसे खजाने वाले पुरुषों को सर्व सुख की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार जातक को धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति होती है। जल छाया फल- जिसके जल तत्व का उदय होता है वह जातक सरस, शुभ्र, हरित वर्ण, माता के समान, सर्व सुख भोगी, अर्थात् जैसे माता सब सुख दायिनी होती है, उसी प्रकार सौभाग्यवान् व उन्नति कर्ता होता है। वायु छाया फल-जिसके शरीर में वायु तत्व (छाया) का उदय होता है वह जातक काले मेघ के समान कान्ति वाला, दुर्गन्धी, अधिक मूर्ख, दूषित कठोर देही, शोक व सन्ताप से पीड़ित, हिंसक, दरिद्री, रोगी, अनर्थी व धन नाशक होता है। अग्नि छाया फल- जिसके अग्नि छाया का उदय होता है वह जातक सुन्दर अग्नि के समान कान्ति वाला, उग्र (कठोर) दण्ड दाता, अधिक प्रसन्न, समस्त शत्रुओं से वन्दित, पराक्रम से भूमि को प्राप्त करने वाला, मणि व सुवर्ण से युक्त, समस्त कार्यों का साधक एवं रोग व शोक वा क्रोध से हीन होता है। भूमि छाया फल- जिसके भूमि छाया का उदय होता है वह जातक प्रथम जल की बूँद से भूमि में जो गन्ध उत्पन्न होती है, उसी गन्ध के समान सुगन्धित, सुन्दर चिकने दाँत, नख, रोम, शरीर, केश वाला, धर्म, धन,
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८५२ महापुरुष योग प्रकरण 'सुख का भोगी अर्थात् धर्मात्मा, धनी, सुखी और जनप्रिय होता है। वात प्रकृति फल- जिसकी वायु प्रकृति होती है वह जातक शीत (ठंड) से दुःखी, अधिक बोलने वाला, शीघ्र गामी, कहीं भी रुकने वाला नहीं, वीर, ईर्ष्यालु, रोगी, भाग्यहीन, अन्यायी, दाँतों को चबाने वाला अर्थात् क्रोधी, अधिक मित्रता बुद्धि से रहित, सङ्गीत का ज्ञाता, दुर्बल, मित्रों की प्राप्ति में अधिक चतुर, स्वूप्न में आकाश में उड़ने वाला, धैर्यता से रहित, शुष्क मूँछ व बाल वाला, कृतघ्नी, फटे पैर हाथ वाला, क्रोधी, कान्ति से रहित, धननाशक अैर निबन्ध (मल मूत्र का अवरोध) रोग से विलाप करने वाला होता है। पित्त प्रकृति फल- जिसकी पित्त प्रकृति होती है वह जातक दुर्गन्धी, थोड़ा सन्तापी, विशाल बुद्धि, जल्दी प्रसन्न होने वाला, मोटा, लाल नख व आँख, पैर और हाथ वाला, वृद्ध के तुल्य आकार वाला, जलन वाला, बुद्धिमान्, संग्राम में निर्भिक, शीत प्रिय, दूसरों को पकड़ कर बोलने वाला, अधिकों से डर कर शरण में नहीं जाने वला, नम्रता से युक्त मनुष्यों का प्रेमी होता है। तथा स्वप्न में सुवर्ण सूर्य, दीपक, दावाग्नि, पलाश पुष्प, मणि, कनईल पुष्प, लाल कमल, नपुंसक, खून के समूह व बिजली के समूहों को देखता है। कफ प्रकृति फल-जिसकी कफ प्रकृति होती है वह जातक लक्ष्मीवान्, गठित देह सन्धि, धैर्यवान्, बलवान्, चिकनी कान्ति वाला, सुन्दर देहधारी, ग्रहण कर्ता, सत्त्व गुणों वाला, मृदङ्ग व मेघ के शब्द से भी अधिक शब्द वाला, सहनशील, गौर वर्ण, लाल नेत्र प्रान्त वाला, मधुर रस का प्रेमी, शत्रु से शत्रुता करने वाला, कृतज्ञ अर्थात् उपकार मानने वाला, क्लेश में प्रसन्न, समस्त मनुष्य व मित्र एवं गुरुजनों का पूजक होता है। वह सोता हुआ स्वप्न में समुद्र, नदी, तालाब, मोती का समुदाय, हंस, सफेद कमल, शंख, नक्षत्र, कुन्द, पुष्य, चन्द्रमा और तुषारपात अर्थात् पाला पतन को देखता है। राजयोग में विशेष कथन- यदि कुण्डली में बली भौमादि ग्रह से राजयोग की सत्ता हो तथा सूर्य चन्द्रमा निर्बल हों तो राजयोग नहीं होता है, किन्तु राजयोग कारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा में धन पुत्रादि प्राप्ति होती है। इसके पूर्व अनेक राजयोगों का वर्णन किया गया है। यहाँ पर यह कहना है कि उन राजयोगों के फल कैसे भङ्ग हो जाते हैं, इसका वर्णन यहाँ 'राजयोगभङ्ग निरूपण' में किया जा रहा है। राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल, में मङ्गल, रवि, गुरु और शनि इन में सभी या ३ या २ अपने नीचराशि में हो और इन्हीं में कोई एक लग्न में पड़े तथा वृश्चिक में चन्द्रमा हो तो राजयोग का भङ्ग हो जाता है। अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में यदि क्षीण चन्द्रमा चर राशि
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-- भृगु संहिता फल दर्पण ८५३ के अन्तिम नवांश में, स्थिर राशि के अष्टम, द्विस्वभाव राशि के प्रथम नवांश में हो उस पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो राजयोग भङ्ग हो जाता है। पुनः राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में सब पापग्रह अपने नीच या शत्रु राशि में होकर केन्द्र में हो और सब शुभ ग्रह त्रिक अर्थात् १२, ६,८वें स्थान में हो तो राजयोग भङ्ग होता है। अन्य प्रकार से राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में यदि लग्न में वर्गोत्तम नवमांश न हो तथा किसी भी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो राजयोग भङ्ग हो जाता है और जातक दरिद्र होता है। अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में कुम्भ लग्न हो, ३ ग्रह नीच में, बृहस्पति अस्त और नीच में हो तथा एक भी ग्रह उच्च में नहीं हो, न शुभ ग्रह से युक्त ही हों तो सैकड़ों राजयोग भङ्ग हो जाता है। अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में केन्द्र में या चन्द्रमा के साथ शुभ ग्रह नहीं हो तथा चार ग्रह अस्त, नीच या शत्रु राशि में हो तो राजयोग का भङ्ग होता है। अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में सूर्य अपने नवमांश में हो, चन्द्रमा अस्त हो, पापग्रह से दृष्ट और शुभग्रह से अदृष्ट हो तो जातक कुछ दिन राज्यकर पश्चात् राज्यच्युत होकर दुखी होता है। प्रकारान्तर से राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में चन्द्रमा लग्नेश को शत्रु दृष्टि से देखता हो, रवि मङ्गल शनि ये ३, ६, ७ स्थान में हो, शुभग्रह अस्त हो और केन्द्र में नहीं हो तो राजयोग भङ्ग हो जाता है। अन्य राजयोगभङ्ग विचार- जन्म काल में यदि पाँच ग्रह नीच में या अस्त हों तो बताए हुए राजयोग का भङ्ग हो जाता है। अपशकुन से राजयोगभङ्ग विचार- जन्म समय में उल्कापात, निर्घात, व्यतीपात, या केतु का दर्शन हो तो राज योग भङ्ग हो जाता है। अन्य राजयोगभङ्ग विचार-जन्म समय त्रिशङ्कुतारा का उदय, और लग्न में शनि तथा अन्य भी कोई उत्पात हो तो राजयोग का भङ्ग होता है। अन्य भङ्ग विचार- यदि योगकारक ग्रहों में युद्ध की संभावना हो, वे ग्रह कान्तिहीन और क्षीणबल हो तो राजयोग के बाधक होते हैं। अन्य भङ्ग विचार- क्षीण चन्द्रमा परम नीच (वृश्चिक के १० अंश) में हो तो साधारण राजयोग नष्ट हो जाता है। प्रकारान्तर से राजयोगभङ्ग विचार- यदि सूर्य तुला राशि के दशवें अंश में हो तो जैसे लोभ से सब गुणों का नाश होता है ठीक उसी प्रकार सब राजयोगों का नाश हो जाता है। और यदि जन्म के समय तुला राशि के दशवें अंश में सूर्य हो तो हजार राजयोगों का भी नाश हो जाता है।
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८५४ विंशोत्तरी दशा प्रकरण अन्य राजयोगभङ्ग विचार- यदि अन्य ग्रह अपने मूलत्रिकोण, उच्च या राशि में हो तो तथापि केवल एक रवि अपने नीच में हो तो योग विफल हो जाता है। यदि मकर का गुरु लग्न में हो तो जैसे कामातुर निर्धन मनुष्य वेश्या के घर में दुखी होता है ठीक उसी प्रकार वह जातक दुखी होता है, यदि चन्द्रमा अपने घर का नहीं हो। केमद्रुम योग में चन्द्र पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो राजयोग नष्ट हो जाता है और जातक दुराचारी होता है। प्रकारान्तर से विचार- यदि तीन या अधिक ग्रह नीच में हों तो चक्रवर्ती राजा का पुत्र भी दरिद्र होता है। यदि पाँच ग्रह अधिशत्रु या नीच राशि में हो और रवि या चन्द्र उच्च में नहीं हो तो राजयोग नष्ट हो जाता है। अन्य राजयोगभङ्ग विचार- शुक्र यदि अपने नीच नवांश में हो तो राजयोग में उत्पन्न भी राज्यच्युत हो जाता है। फल में विशेष- पूर्व जो राजयोग कहें हैं, और ये प्रबल राजयोग भङ्ग जो कहे गए हैं, इन दोनों के बलाबल विचार कर योग या भङ्ग कहना चाहिये। राजयोग ज्ञान- जन्म कुण्डली में सूर्य कन्या में, मङ्गल और गुरु वृश्चिक में, चन्द्रमा मेष में हो इन पर अन्य ग्रहों की दृष्टि नहीं हो तो वह जातक राजा होता है। जिसकी युद्ध यात्रा में हाथी के पद्धूलि से आकाश आच्छादित हो जाता है।
विंशोत्तरी दशा प्रकरण जन्मनक्षत्र से दशेश ज्ञान प्रकार-जन्म नक्षत्र की संख्या में से २ घटाकर शेष में ९ से भाग दें, एकादि शेष से सूर्यादि दशेश जानना चाहिए। यथा १ शेष से सूर्य, २ शेष से चन्द्र, ३शेष से मंगल, ४ शेष से राहु, ५ शेष से गुरु, ६ शेष से शनि, ७ शेष से बुध, ८ शेष से केतु ९ या ० शेष से शुक्र की दशा समझनी चाहिए। ग्रहदशा वर्ष और भुक्त भोग्य वर्ष ज्ञान प्रकार-विंशोत्तरी दशा क्रम में सूर्य का दशा वर्ष = ६, चन्द्र = १० मंगल = ७, राहु=१८, गुरु = १६, शनि = १९, बुध = १७, केतु = ७ और शुक्र = २० वर्ष होता है। अब जन्म नक्षत्र के भयात व भभोग की पूर्ववत् गणना कर भयात में जन्म नक्षत्र वश ज्ञात दशेश ग्रह की दशा वर्ष से गुणा कर भभोग से भाग देने पर जो लब्धि होती है, उसे दशा वर्ष और शेष में १२ से गुणा कर भभोग से भाग देने पर लब्धि मास तथा शेष में क्रम से ३०, ६०, ६० से गुणा और भभोग से भाग देने पर दिन, घटि व पल भी प्रान हाते हैं। इस प्रकार प्राप्त
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भृगु संहिता फल दर्पण ८५५ वर्षादि ग्रह दशा भुक्तवर्षादि होती है। दशा वर्ष से घटाने पर भोग्य वर्षादि हो जाती है। जैसे- पूर्व उदाहरण (१५) में साधित पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का भयात = २१।०१ व भभोग = ६०।५३ हैं इससे शुक्र दशा का भुक्तवर्षादि इस प्रकार साधन करना चाहिए- भुक्तवर्षादि भयातपलात्मक x ग्रह दशा वर्ष = भभोगपलात्मक
शुक्र भुक्तवर्षादि = १२६१ x २० शुक्र दशा ३६५३ = ६ वर्ष १० मास २५ दिन २४ घटि ३३ पल अतः शुक्र भोग्यादि वर्ष = २० वर्ष - ६।१०।२५।२४।३३ = १३। १।४।३५।२७ इस प्रकार भुक्त व भोग्य वर्षादि साधन कर विंशोत्तरी दशा चक्र और अन्तर्दशा चक्र का लेखन करना चाहिए। विंशोत्तरी दशा में ग्रहों के नक्षत्र-क्रम-विंशोत्तरी दशा क्रम में कृत्तिकादि भरणी पर्यन्त २७ नक्षत्रों (अभिजित् को छोड़कर) को तीन आवृत्तियों में क्रम से सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु और शुक्र; इन ९ ग्रहों के कहे गए हैं। दशा व अन्तर्दशा, उसके स्वामियों के नाम, उनके नक्षत्र और वर्षादि संख्या अग्रलिखित चक्र से स्पष्ट ज्ञात होगा। सारिणी द्वारा विंशोत्तरी दशा साधन-साधारण प्रयास से दशासाधन के लिये सारिणी का उपयोग किया जाता है। इसके पहले गणित द्वारा दशा साधन दिखाया गया है। यहाँ सरलता से दशा साधन का क्रम दिखाया जायेगा। दशा साधन में स्पष्ट चन्द्र की आवश्यकता रहती है। सारिणी में ऊपर राशि तथा बांये तरफ अंश दिये हैं। अभीष्ट स्पष्टचन्द्र की राशि अंश के सम्मुख कोष्ठक में लब्ध फल दशा का भुक्त वर्षादि होगा। जो दशा दो अंशों के भीतर समाप्त होती है। अतः १३ अंश सम्बन्धि फल ६-६-२७ तथा उस दशा के समाप्ति के वर्ष ७ एक ही कोष्ठक में दिये हैं। इसका ध्यान दशा साधन में रखना चाहिये। इस दूसरी तालिका में कला-विकला सम्बन्धि दशा फल के लिये एक विस्तृत कला-विकला सारिणी दी है। इसमें प्रति कला-विकला सघ्म्बन्धि फल अनायास प्राप्त हो जाता है। इन सब फलों का योग दशा का भुक्तमान बन जाता है। इसे ग्रह दशा
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८५६ विंशोत्तरी दशा प्रकरण वर्ष में घटाने से दशा का भोग्यमान प्राप्त होगा। उदाहरण-स्पष्ट चन्द्र ४।१७।५६।९ पर से दशा साधन ऊपर लिखे नियमानुसार सारिणी द्वारा किया जाता है। जातक का जन्म भौम दशा में हुआ है। व. मा. दि. घ. प. ५ । ६।०।०० राशि ४ अंश १७ सम्बन्धि फल १६। २४। ०० कला ५६ सम्बन्धि फल + १।२४।० विकला ०९ सम्बन्धि फल ६।१०।२५।२४।० भौम भुक्त दशा वर्षादि इसे शुक्र के दशा वर्ष सात में घटाने से भोग्य दशा वर्षादि ३।९।१८।५।५१ प्राप्त हुए। इस प्रकार अन्य उदाहरणों का साधन करना चाहिये। अन्तर्दशा ज्ञान प्रकार-अपनी प्राप्त दशा वर्ष को ३ से गुणा कर प्राप्त फल में जिस ग्रह की अन्तर्दशा लानी हो, उसकी दशा वर्ष से पुनः गुणा करके ३० से भाग देने से अन्तर्दशा वर्ष, मास, दिन आदि में प्राप्त होता है और प्रत्यन्तर्दशा और प्रत्यन्दशा सारिणी देखनी चाहिए। सूर्य महादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल सूर्य महादशा में सूर्यान्तर का फल-सूर्य उच्चराशि में या अपनी राशि में या केन्द्र (१-४-७-१०) में या लाभ अथवा त्रिकोण (५-९) में रहे तो वह अपनी दशा और अन्तर्दशा में धन-धान्य का लाभ कराता है, यदि नीचादि अशुभ राशि में स्थित हो तो अशुभ फल देता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी दशा अन्तर्दशा में अपमृत्यु (मरणतुल्य कष्ट) का भय होता है। अपमृत्यु दोष के निवारण हेतु मृत्युञ्जय का जप तथा सूर्य की पूजा आदि शान्ति क्रिया करानी चाहिये। सूर्य महादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-चन्द्र यदि केन्द्र त्रिकोण (१- ४-७-१०) में हो तो सूर्यदशा में चन्द्र की अन्तर्दशा आने पर विवाहादि उत्सव एवं धन-सम्पत्ति-गृह-भूमि-पशु-वाहन आदि की वृद्धि होती है। चन्द्रमा यदि स्वोच्च, स्वराशि में हो तो स्त्रीसुख धन पुत्रादि का लाभ तथा राजा महाराजा की कृपा से अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है। चन्द्रमा यदि क्षीण या पापग्रह से युक्त हो तो स्त्री पुत्रादि को पीड़ा- कार्यहानि-लोगो से विवाद-नौकर सेवक का नाश-राजा से विरोध तथा धन धान्यादि का भी नाश होता है। यदि ६,८, १२ में चन्द्र रहे तो जलभय- मनोव्यथा-बन्धन-रोगभय-स्थानहानि-बन्धुओं से विवाद-कदन्नभोजन-
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होता है। चोर आदि से पीड़ा-राजा का कोप तथा मूत्र कृच्छादि रोग से शरीर में कष्ट
दशाधिपति से ११, ९ तथा केन्द्रस्थान में शुभग्रह हो तो सूर्यदशा के चन्द्रान्तर में भोग-भाग्योदय-सन्तोष-स्त्री व पुत्र सुख की वृद्धि-राज्यलाभ- स्थानलाभ-विवाहयज्ञोपवीतादि उत्सव-वस्त्र-भूषण-वाहन का लाभ तथा पुत्र पौत्रादि का सुख होता है।' दशेश से ६,८, १२ में चन्द्र हो अथवा बलहीन हो तो कदन्नभोजन तथा देशान्तरगमन होता है। मारकेश (द्वितीयेश-सप्तमेश) की अन्तर्दशा में अपमृत्युभय भी होता है। उसकी शान्ति के लिये श्वेता गौ एवं महिषी का दान करना चाहिए। सूर्यमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-मङ्गल यदि स्वोच्च-स्वराशि- केन्द्र या त्रिकोण में हो तो सूर्यदशा में मङ्गल की अन्तर्दशा आने पर भूमिलाभ- कृषि से धन धान्य की वृद्धि-गृह क्षेत्रादि का लाभ व रक्तवस्त्र की प्राप्ति होती है। भौम लग्नेश से युक्त हो तो सौख्य-शत्रुनाश-मन दृढ़ता-राजसम्मान- कुटुम्बसुख तथा भाईयों की वृद्धि होती है। दशेश से १२, ८ में भौम स्थित हो और पापग्रह से युत या दृष्ट होकर अधिकार तथा बल से हीन हो तो उसकी अन्तर्दशा में क्रूरबुद्धि-मानसिक रोग-कारागार-बन्धुनाश-भाईयों में विरोध और कार्यनाश होता है। भौम यदि नीचराशि में हो या दुर्बल हो तो राजा के द्वारा धननाश तथा यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शारीरिक और मानसिक कष्ट होता है। वेदपाठ-जप-दान-वृषोत्सर्ग आदि शान्ति कार्य करने से आयु-आरोग्य की वृद्धि और कार्य में सिद्धि प्राप्त होती है। सूर्यमहादशा में राहु अन्तर्दशाफल-सूर्य की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में रहे तो आरम्भ में २ मास तक धनहानि-चौर सर्प और व्रण का भय तथा स्त्री पुत्र को कष्ट होता है इसके बाद सुखलाभ होता है। राहु यदि शुभग्रह से युत हो या शुभनवांश में स्थित हो तो आरोग्य-सन्तोष-राजा से सम्मान प्राप्ति और सुख होता है। लग्न से उपचय (३,६,१०,११) स्थान में यदि राहु योग कारक ग्रह से युत हो या दशेश से शुभस्थान में स्थित हो तो राजा से सम्मानप्राप्ति-भाग्यवृद्धि- यशलाभ-स्त्रीपुत्र को कष्ट तथा पुत्र पौत्र जन्म आदि उत्सव से घर में कल्याण व शोभा होती है। सूर्य से १२, ८ में स्थित होकर राहु यदि बलहीन हो तो बन्धन- स्थाननाश-चोर व सर्प का भय तथा व्रण होता है। स्त्री पुत्र की उन्नति- पशु-घर-कृषि का नाश तथा गुल्म-क्षय-अतिसार आदि रोग से पीड़ा होती है। राहु यदि २, ७ में स्थित हो या इन स्थान के अधिपतियों से युक्त हो
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८५८ विंशोत्तरी दशा प्रकरण तो उसकी अन्तर्दशा में अपमृत्यु तथा सर्प का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु दुर्गा का पूजन-जप तथा छाग-कृष्णागौ-महिषी आदि का दान करना चाहिए। सूर्यमहादशा में गुरु अन्तर्दशा का फल-सूर्य महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो तथा गुरु लग्न से केन्द्र-त्रिकोण में या स्वोच्च-स्वगृह या मित्रगृह या मित्रके वर्ग में स्थित हो तो स्त्रीप्राप्ति, राजा की कृपा, धन धान्य-पुत्रसुख- महाराज की कृपा से अभीष्ट कार्यसिद्धि एवं विप्रों से सम्मान् और वस्त्रादि का लाभ होता है। यदि बृहस्पति भाग्येश और दशमेश हो तो राज्यलाभ-पालकी आदि वाहन का लाभ तथा स्थानप्राप्ति होती है। दशेश से शुभस्थान में गुरु रहे तो भाग्यवृद्धि-धर्मकार्य-देवपूजा-गुरुभक्ति आदि पुण्यकार्य एवं मनोकामना सिद्ध होती हैं। यदि दशापति से गुरु ६, ८ में हो या नीचस्थान में हो या पापग्रह से युत हो तो स्त्री-पुत्र को कष्ट-शरीर में पीड़ा-राजकोप-भय-इष्टकार्य की हानि-महाभय-पापकर्म से धननाश-शरीर में कष्ट तथा मानसिक व्यथा होती है। इसमें सुवर्ण दान, कपिला गौ का दान तथा इष्टदेव की पूजा करने से आरोग्य होता है। सूर्यमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-लग्न से केन्द्र त्रिकोण में शनि हो तो सूर्य की महादशा में शनि की अन्तर्दशा आने पर शत्रुनाश-पूर्णसुख- स्वल्प अन्न व द्रव्य का लाभ और घर में विवाहादि शुभ कार्य होते हैं। शनि यदि स्वोच्च-स्वगृह या मित्रराशि में या मित्रग्रह से युक्त हो तो कल्याण-
लाभ होता है। सम्पत्तिवृद्धि, राजा से सम्मान-कीर्ति तथा विविध प्रकार से वस्त्र व धन का
यदि शनि दशेश से ८, १२ में हो या पापग्रह से युत हो तो वात- शूल-ज्वर-अतिसार आदि रोग से पीड़ा-बन्धन-कार्यहानि-धननाश-कलह तथा स्वजनों से विग्रह होता है। सूर्यमहादशा में शनि की अन्तर्दशा हो तो प्रारम्भ में मित्रहानि, मध्य में शुभ तथा अन्त में क्लेश होता है। शनि नीचस्थ हो तो भी इसी प्रकार माता- पिता का वियोग तथा भ्रमण कार्य होता है। यदि शनि द्वितीयेश-सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु गौ-महिषी और छाग का दान तथा मृत्युञ्जय जप करना चाहिए। सूर्यमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-सूर्य महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध यदि उच्च-स्वगृह या लग्न से केन्द्र त्रिकोण में हो तो राज्यलाभ- उत्साह-स्त्री-पुत्रादि का सुख-राजा की कृपा से वाहन वस्त्र आभूषण की प्राप्ति-पुण्यतीर्थ दर्शन व गौ आदि पशुधन का लाभ होता है। ..
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भृगु संहिता फल दर्पण यदि बुध भाग्येश लाभेश से युक्त हो तो लाभ व वृद्धि कारक होता ८५९
है। ९-५-१० स्थान में बुध हो तो लोक में सम्मान-सुकर्म व धर्म की वृद्धि-गुरु व देवता में भक्ति-धनधान्य की वृद्धि-विवाह तथा पुत्र जन्म होता है। यदि उच्चराशि या त्रिकोणादि शुभस्थान बुध में हो तो विवाह-यज्ञ- दान-धर्मानुष्ठान-अपने नाम की कीर्ति या यश से दूसरा उपनाम-सुभोजन- वस्त्र-आभूषण की प्राप्ति सहित इन्द्र के समान वह मनुष्य सुखी होता है। बुध यदि दशेश से ६, ८, १२वें स्थान में या नीचराशि में हो तो शरीरकष्ट-मन में सन्ताप तथा स्त्री पुत्र को कष्ट होता है। इसकी अन्तर्दशा के प्रारम्भ में कष्ट, मध्य में स्वल्प सुख तथा अन्त में राजभय और देशान्तरगमनागमन होता है। बुध यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट व ज्वररोग होता है। इसकी शान्ति हेतु विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ, अन्न तथा चाँदी की प्रतिमा का दान करना चाहिये। सूर्यमहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-सूर्य की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो तो शरीर में पीड़ा-मनोव्यथा-धनहानि-राजभय और बन्धुओं से कष्ट होता है। केतु यदि लग्नेश से युत हो तो प्रारम्भ में सुख-मध्य म्रें कष्ट और अन्त में मृत्यु सम्बन्धि समाचार प्राप्त होता है। दशेश से ८, १२ स्थान में पापग्रह हो तो कपोल या दाँत में रोग, मूत्रकृच्छूरोग-स्थाननाश-धननाश-मित्र की हानि-पिता का मरण-विदेश यात्रा तथा शत्रु से कष्ट होता है। लग्न से उपचय स्थान ३, ६, १०, ११ में योगकारक ग्रह से युक्त अथवा शुभवर्ग से युक्त केतु हो तो शुभकर्म फलोदय-स्त्री-पुत्र सुख- सन्तोष-मित्रों की वृद्धि-वस्त्रादि का लाभ और सुयश की वृद्धि होती है। केतु यदि २, ७ स्थान के स्वामी से युत हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु दुर्गाजी की आराधना तथा छागदान करना चाहिये। सूर्यमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-केन्द्रत्रिकोणस्थित या स्वोच्च- स्ववर्ग-मित्रवर्ग-स्थित शुक्र हो तो सूर्य की महादशा में उसकी अन्तर्दशा आने पर इच्छानुसार स्त्रीसुख-सम्पत्ति-ग्रामान्तर गमन-विप्र और राजा का दर्शन-राज्यलाभ-उत्साह-वैभव-घर में शुभकृत्य-मिष्टान्न भोजन-मोती आदि रत्न-वस्त्र-पशु-धन-धान्य-उत्साह और सुयश की वृद्धि तथा विविध वाहनों का लाभ होता है। यदि शुक्र लग्न या दशापति से ६, ८, १२ में हो या निर्बल हो तो उसकी अन्तर्दशा में राजकोप-मन में सन्ताप और स्त्री-पुत्रादि को कष्ट होता है। इसकी अन्तर्दशारम्भ में मध्यमफल, दशामध्य में उत्तमफल और अन्त में अपयश-स्थाननाश-बन्धुओं में द्वेष तथा सुख की हानि होती है। शुक्र
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८६० विंशोत्तरी दशा प्रकरण सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट एवं रोगभय होता है। षष्ठेश-अष्टमेश से युक्त शुक्र हो तो अपमृत्यु का भय होता है। दोषों की शान्ति हेतु मृत्युञ्जयजप-कपिला गौ का दान-महिषीदान तथा रुद्र का जप करना चाहिए। इस तरह करने पर शंकर जी की प्रसन्नता से सुख शान्ति की प्राप्ति होती है।
चन्द्रमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल चन्द्रमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-यदि स्वोच्च-स्वराशि-केन्द्र त्रिकोण स्थित चन्द्र हो, अथवा दशमेश-नवमेश से युक्त हो तो उसकी महादशा अन्तर्दशा में हाथी-घोड़ा-वस्त्रादि का लाभ-देव और गुरुओं में भक्ति- भगवद्भजन-राज्यलाभ-परमसुख-यश की वृद्धि और शरीर सुख होता है। चन्द्रमा यदि पूर्णबली हो तो सेनापतित्व आदि का अधिकार एवं सुख प्राप्त होता है। चन्द्रमा यदि नीचराशि में हो, पापयुक्त हो, ६, ८, १२ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में धननाश-स्थानहानि-आलस्य-सन्ताप-राजा व मन्त्री से विरोध, माता को कष्ट-बन्धन व बन्धुओं का नाश होता है। चन्द्र यदि २, ١ ७ स्थान का स्वामी हो या १२, ८ के स्वामी से युक्त हो तो शरीर में कष्ट व अपमृत्युभय होता है। उसके निवारण हेतु कपिला गौ और महिषी का दान करना चाहिये। चन्द्रमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो तथा भौम केन्द्रत्रिकोण में हो तो भाग्यवृद्धि-राजा से सम्मान- वस्त्राभूषण का लाभ-यत्न से कार्य में सिद्धि होती है इसमें संशय नहीं, गृह और कृषि में वृद्धि तथा व्यवहार में विजय होता है, यदि स्वोच्च-स्वराशि में हो तो कार्यलाभ व महत्सौख्य होता है। भौम यदि ६,८, १२ में हो या पापयुक्त हो अथवा दशापति से अशुभ (६,८, १२) स्थान में शत्रु से दृष्ट हो तो शरीर में कष्ट-घर और कृषि में हानि, व्यवहार में हानि, सेवक और राजा से कलह, स्वजनों से बन्धुओं से वियोग तथा क्रोध की वृद्धि होती है। भौम यदि २,७ का स्वामी हो ८ स्थान में हो या अष्टमेश हो तो अशुभ फल होता है, उसके दोषशमन हेतु ब्राह्मणों का सत्कार करना चाहिये। चन्द्रमहादशा में राह्न्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में केन्द्र त्रिकोण में स्थित राहु की अन्तर्दशा हो तो प्रारम्भ में कुछ शुभ बाद में चोर सर्प और राजा का भय-पशुओं को कष्ट-बन्धु और मित्रों की हानि-माननाश और मनस्ताप होता है। राहु यदि शुभग्रह से दृष्ट युत हो अथवा लग्न से ३, ६, १०, ११
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भृगु संहिता फल दर्पण ८६१ स्थान में हो या योगकारक ग्रह से युक्त हो तो उसकी अन्तर्दशा में सभी कार्यों में सिद्धि, नैऋरत्य और पश्चिम दिशा में स्थित राजा आदि से वाहन- वस्त्रादि का लाभ तथा अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है। दशेश से राहु यदि ८, १२वें में हो और निर्बल हो तो स्थानहानि, मनोव्यथा, पुत्रकष्ट, कभी स्त्री को कष्ट तो कभी शरीर में रोगभय-बिच्छू सर्प चोर राजा आदि से भय और पीड़ा होती है। यदि दशेश से राहु केन्द्र, त्रिकोण या ३, ११ में हो तो तीर्थभ्रमण, देवदर्शन, परोपकार व धर्मकार्य में प्रवृत्ति होती है। राहु यदि २, ७ स्थान में हो तो शरीर में कष्ट होता है। दोष निवाराणार्थ रुद्रजप और छागदान करना चाहिये इससे शरीर निरोग रहता है। चन्द्रमहादशा में जीवान्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा हो और गुरु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या स्वगृह में या स्वोच्च में हो तो उसकी अन्तर्दशा में राज्यलाभ, घर में उत्सव, वस्त्र भूषण प्राप्ति राजा से प्रतिष्ठा, इष्टदेव की प्रसन्नता, पुत्रलाभ धन भूमि वाहन का लाभ, राजा की कृपा से सब कार्य की सिद्धि और सुखप्राप्ति होती है। गुरु यदि ६,८, १२वें स्थान में हो, अस्त हो नीचराशि में या पापयुत होकर अशुभ हो तो गुरु (पिता, चाचा आदि) या पुत्र का नाश, स्थानत्याग- मनोसन्ताप-कलह, गृह कृषि तथा वाहन का नाश होता है। यदि दशेश से केन्द्र-त्रिकोण या ३, ११ में गुरु हो तो अन्न, वस्त्र, पशु, भ्रातृसुख, सम्पत्ति, पराक्रम, धैर्य, यज्ञ, व्रत, विवाहादि उत्सव, राज्य लाभ आदि का योग होता है। गुरु यदि दशापति से ६, ८, १२वें स्थान में हो और बलहीन हो तो कुभोजन व परदेश गमन होता है। अन्तर्दशा के आरम्भ में शुभफल और बाद में कष्ट होता है। गुरु यदि लग्न से २, ७ स्थान का स्वामी रहे तो अपमृत्युभय होता है। इन दोषों के शमन हेतु शिवसहस्त्रनामजप तथा सुवर्ण का दान करने से सब कष्टों का नाश होता है। चन्द्रमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-चन्द्र की दशा में शनि की अन्तर्दशा हो और शनि यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या स्वराशि में या स्वनवांश में या स्वोच्च में शुभग्रह से दृष्टयुत हो या लाभस्थान में बली हो तो पुत्र, मित्र, धन सम्पत्ति का लाभ, शूद्र मित्रों के सहयोग से व्यवसाय में लाभ, गृह व कृषि की वृद्धि, पुत्रलाभ और राजा की कृपा से वैभववृद्धि होती है। यदि शनि ६,८, १२वें स्थान में हो या नीच स्थान में या धनस्थान में हो तो उसकी अन्तर्दशा में पुण्यतीर्थ का दर्शन व स्नानादि होता है। बहुत लोगों से संत्रास व शत्रुओं से पीड़ा होती है। दशेश से केन्द्र या त्रिकोण स्थान में शनि हो या बलवान हो तो कभी-कभी सुख, कभी धन का लाभ तथा कभी स्त्री पुत्र से विरोध भी
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८६२ विंशोत्तरी दशा प्रकरण होता है। यदि २, ७, ८ में शनि हो तो शारीरिक कष्ट होता है। उसके शान्त्यर्थ मृत्युञ्जय जप, कृष्णा गौ का दान और महिषदान करना चाहिये, इससे आरोग्य होता है। चन्द्रमहादशा में बुधान्तर्दशा फल-चन्द्र की महादशा में बुध की अर्न्दशा हो तथा बुध यदि केन्द्र त्रिकोण में या स्वराशि या स्वनवांश या शुभराशि या स्वोच्च में हो बलवान हो तो उसकी अन्तर्दशा में धनलाभ, राजा से सम्मान, वस्त्रादि लाभ, शास्त्रचर्चा, सत्सङ्ग से ज्ञानवृद्धि, सुख सन्तान की प्राप्ति, सन्तोष, व्यापार में लाभ तथा वाहन-छत्र और आभूषण का लाभ होता है। दशेश से बुध यदि केन्द्र या त्रिकोण या ११, २ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में विवाह-यज्ञ-दान-धर्म आदि शुभकार्य होते हैं। राजा से प्रेम, विद्वानों का संग, मोती, मणि, मूँगा, वाहन, वस्त्न, भूषण, आरोग्य, प्रीति, सुख और सोमरसपान आदि सुख होते हैं। दशेश से ६,८, १२ में या नीचराशि में बुध हो तो उसकी अन्तर्दशा में शरीर केष्ट, कृषि में हानि, बन्धन तथा स्त्री-पुत्र को कष्ट होता है। यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो ज्वर रोग से विशेष भय होता है। इसके शान्त्यर्थ छागदान और विष्णुसहस्त्रनाम का जप पाठ करना चाहिये। चन्द्रमहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो और केतु यदि लग्न से केन्द्र या त्रिकोण या तृतीय में हो या बली हो तो धनलाभ, सुख, पुत्र, स्त्री आदि को सुख तथा धर्मकार्य में प्रवृत्ति होती है। अन्तर्दशा के प्रारम्भ में कुछ हानि तथा बाद में सुखलाभ होता है। दशापति से केतु यदि केन्द्र त्रिकोण या एकादश में हो या बली हो तो अन्तर्दशारम्भ में सुख-धन, पशु आदि का लाभ होता है। दशा के अन्त में धननाश होता है। दशेश से ८, १२ में केतु हो या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो शत्रु द्वारा कार्यहानि और कलह होता है। यदि केतु २, ७ स्थान में हो तो शरीर में रोग का भय होता है। अतः सब सुख-सम्पत्ति देने वाला महामृत्युञ्जय का जप करना चाहिए इससे 'शंङ्कर' की कृपा से सुख शान्ति होती है। चन्द्रमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो तथा शुक्र यदि लग्न से केन्द्र या ११, ५, ९ में, स्वोच्च में या स्वराशि में हो तो राज्यलाभ, राजा की कृपा से वाहन-वस्त्र-भूषण-पशु आदि का लाभ, स्त्री-पुत्र को सुख-नूतनभवन, नित्य मिष्टान्न भोजन, सुगन्ध, सुन्दर स्त्री का सङ्ग तथा आरोग्य लाभ होता है। शुक्र यदि दशापति (चन्द्रमा) से युत हो तो शुक्र की अन्तर्दशा में शारीरिक सुख, सुयश-सम्पत्ति तथा गृहभूमि आदि की वृद्धि होती है।
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1⑈ भृगु संहिता फल दर्पण ८६३ शुक्र यदि नीचराशि में हो, अस्त हो, पापग्रह से युत दृष्ट हो तो भूमि- पुत्र-मित्र-स्त्री-पशु की हानि और राजा से विरोध होता है। शुक्र यदि द्वितीय भाव में स्वोच्च या स्वराशि में हो तो निधि (गड़ा हुआ धन), भूमि व सुख का लाभ तथा पुत्रोत्पत्ति होती है। नवमेश या एकादशेश से युत शुक्र हो तो भाग्य की वृद्धि, राजा की कृपा से सुख और लाभ होता है। अभीष्ट कार्य सिद्धि, देव-ब्राह्मण में भक्ति तथा मोती मूँगा आदि रत्नों का
दशेश से केन्द्र त्रिकोण में शुक्र हो तो गृह लाभ, कृषि की वृद्धि, धन का लाभ और सुख होता है। दशापति से ६, ८, १२ में शुक्र हो या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो विदेशवास से दुःख, मृत्यु और चोरभय होता है। शुक्र यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी अन्तर्दशा में अपमृत्यु (महाकष्ट) का भय होता है। इस दोष की शान्ति के लिये रुद्रीजप, कपिला गोदान तथा चाँदी का दान करने से शङ्कर की कृपा से सुख और शान्ति की -- प्राप्ति होती है। चन्द्रमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-चन्द्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च, स्वराशि-केन्द्र या ५, ९, ११, २, ३ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में नष्टराज्य और धन की प्राप्ति, घर में कल्याण, मित्र और राजा की कृपा से ग्राम और भूमि का लाभ, पुत्रजन्म तथा घर में लक्ष्मी की कृपा होती है। अन्तर्दशा के अन्त में शरीर में आलस्य और ज्वर से कष्ट होता है। दशेश से सूर्य यदि ८, १२ में हो या पापग्रह से युत हो तो राजा, चोर और सर्प से भय, ज्वर आदि रोग तथा विदेशगमन से कष्ट होता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी अन्तर्दशा में ज्वर से कष्ट होता है। इसके शान्त्यर्थ श्री शङ्कर की पूजा करनी चाहिए।
भौममहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल भौममहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-भौम की दशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम यदि लग्न से केन्द्र में या ५, ९, ११, ३, २ में हो, लग्नेश से युत हो, शुभग्रह से युत हो तो राजा की कृपा से धनलाभ, लक्ष्मी की कृपा, नष्टराज्य व धन का लाभ, पुत्रजन्म आदि उत्सव और गौ महिष आदि दुधारू पशुओं की वृद्धि होती है। भौम यदि स्वोच्च, स्वराशि, स्नवांश में रहकर, बली हो तो गृह, भूमि, गौ, महिष आदि का लाभ तथा राजा की कृपा से अभीष्टसिद्धि होती है। भौम यदि ८, १२ भाव में हो या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो मूत्रकृच्छ
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८६४ विंशोत्तरी दशा प्रकरण आदि रोग से कष्ट, व्रण, चौर, सर्प और राजा का भय तथा धन-धान्यादि का ह्रास होता है। भौम यदि द्वितीयेश-सप्तमेश हो तो देह में कष्ट और मन में व्यथा होती है। दोषशान्त्यर्थ रुद्र का जप तथा वृषभ दान करने पर शंकर की कृपा से आरोग्य व सब सम्पत्ति का लाभ होता है। भौममहादशा में राह्वन्तर्दशा का फल-भौम की दशा में राहु की अर्न्तदशा हो तथा राहु यदि अपने मूत्रत्रिकोण, स्वोच्चादि में हो या लग्न से केन्द्र में या ११, ५, ९ में हो और शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो उस समय में राजा से सम्मान, गृह, भूमि, आदि का लाभ, पुत्र स्त्री को सुख, व्यापार में अधिक लाभ, गङ्गा आदि तीर्थ में स्नान और विदेशगमन होता है। राहु यदि लग्न से ८, १२ में या पापग्रह से युत दृष्ट रहे तो उसकी अन्तर्दशा में चौर, सर्प, व्रणरोग, पशुओं की हानि, वात, पित्त से रोग तथा बन्धन होता है। द्वितीय स्थान में राहु हो तो धननाश, सप्तम भाव में हो तो अपमृत्यु का महाभय कहना चाहिये। इसमें नाग की पूजा, ब्राह्मण भोजन, मृत्युञ्जय का जप कराने से आयु तथा आरोग्य लाभ होता है। भौममहादशा में जीवान्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो तथा गुरु यदि लग्न से त्रिकोण में या केन्द्र में या ११ या २ में हो, अपने उच्चनवांश या स्वांश में हो तो सुयश, राजसम्मान, धन-धान्यवृद्धि, घर में कल्याण, सम्पत्ति तथा स्त्री-पुत्रादि को लाभ होता है। दशापति "भौम" से गुरु यदि त्रिकोण में या केन्द्र में या ११ में हो, नवमेश-दशमेश-चतुर्थेश या लग्नेश से युत हो, शुभ नवमांश आदि में स्थित हो तो उसकी अन्तर्दशा में गृह-भूमि की वृद्धि, कल्याण, सम्पत्ति, आरोग्य, सुयश, पशुओं का लाभ, व्यवसाय में वृद्धि, स्त्री पुत्र को सुख और राजा से आदर व धन का लाभ होता है। गुरु यदि ६,८, १२ में हो या नीचराशि में या अस्त हो, पापग्रह से युक्त हो, निर्बल हो तो चोर, सर्प, राजभय, पित्तरोग, प्रेतबाधा तथा नौकरों और सहोदरों का नाश होता है। यदि गुरु द्वितीयेश हो तो अपमृत्युभय व ज्वरपीड़ा होती है। दोषशान्त्यर्थ शिव सहस्रनाम का जप करना चाहिये। भौममहादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो तथा शनि यदि केन्द्र में त्रिकोण में या अपने मूलत्रिकोण, उच्च या स्वनवांश में हो, लग्नेश या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो राजा से आदर, यश की वृद्धि, धनधान्यवृद्धि, पुत्र पौत्रादि से सुख, गोधन की वृद्धि, विशेषकर शनिवार व शनि के मास (माघ-फाल्गुन) में पुत्रादि की वृद्धि होती है। शनि यदि नीच या शत्रुराशि में या ८, १२ भाव में हो तो उसकी
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भृगु संहिता फल दर्पण ८६५ अन्तर्दशा में म्लेच्छा राजाओं से भय, धननाश, कारागार में बन्धन, रोगभय तथा कृषि आदि की हानि होती है। यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश हो और पापग्रह से युत हो तो महाभय, धननाश, राजा का कोप, मनोव्यथा, चोर, अग्नि, राजा से पीड़ा, सहोंदरों का नाश, कुटुम्बों से द्वेष, पशुओं की हानि, मृत्युभय, पुत्र स्त्री को कष्ट तथा कारागारादि राजदण्ड होता है। शनि यदि दशेश से केन्द्र में या ११, ५, ९ में रहे तो विदेशयात्रा, अपयश, जीवहिंसादि दुष्कर्म, भूमि आदि के विक्रय से हानि, स्थाननाश, मनोव्यथा, युद्ध में पराजय तथा मत्रकृच्छू रोग का भय होता है। यदि दशेश से ८ या १२वाँ स्थान पापग्रह से युक्त हो तो उसकी अन्तर्दशा में मरण, राजा-चौर आदि से भय, वातरोग, शूलरोग और बन्धुओं तथा शत्रुओं से भय होता है। दोष शान्ति हेतु मृत्युञ्जय का जप करने पर शङ्कर की कृपा से सुखप्राप्त होता है। भौममहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में बुध का अन्तर हो और बुध यदि लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो तो सत्सङ्ग, अजपा जप, दान-धर्म में रत, सुयश-नीति में प्रवृत्ति, मिष्टान्न भोजन, वाहन- वस्त्र-पशु आदि का लाभ, राजा के दरबार में अधिकार से सुख तथा कृषिकार्य में सफलता प्राप्त होती है। बुध यदि नीचराशि में हो या अस्तङ्गत हो अथवा ६,८, १२ स्थान में हो तो उसकी अन्तर्दशा में हृदयरोग, बन्धन, बन्धुनाश, स्त्री-पुत्र को कष्ट तथा धन व पशुओं का नाश होता है। बुध यदि दशेश से युत हो तो शत्रुओं की वृद्धि, विदेशगमन, विविध रोग व राजा से विरोध तथा स्वजनों से कलह होता है। बुध यदि दशेश से केन्द्र-त्रिकोण में हो या अपने उच्चराशि-स्वराशि में हो तो अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि, धन धान्य लाभ, राजा से सम्मान, राज्यलाभ, वस्त्र, आभूषण की प्राप्ति, अनेक वाद्य (मृदङ्ग आदि) में प्रेम, सेनापतित्व, शास्त्रपुराण की चर्चा, घर में स्त्री-पुत्र आदि का सुख और लक्ष्मी की कृपा होती है। बुध यदि भौम से ६, ८, १२वें स्थान में हो या पापग्रह से युक्त हो तो उसकी अन्तर्दशा में माननाश, पापबुद्धि, कटुवाणी, चौर-अग्नि और राजा से भय, मार्ग में चोर डाकुओं का भय और अकारण कलह होता है इसमें कोई सन्देह नहीं। बुध यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी अन्तर्दशा में भयङ्कर रोग होता है। इसमें अश्वदान, विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने से सब सम्पत्तियों की प्राप्ति तथा कष्टों का नाश होता है। मृ. सं .- ५५
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८६६ विंशोत्तरी दशा प्रकरण भौममहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो तथा केतु यदि लग्न से केन्द्र, त्रिकोण या ३, ११ में हो या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो उस अन्तर्दशा में राजा की कृपा से सुख, धनलाभ, दशारम्भ में अल्पसुख, भूमिलाभ, पुत्रजन्म, राजकार्य और पशुओं का लाभ होता है। यदि बुध योगकारक स्थान में हो और बलवान हो तो उसकी अन्तर्दशा में पुत्रलाभ, यशोवृद्धि, लक्ष्मी की कृपा, नौकरों से धनलाभ, सेनापति का अधिकार, राजा से मैत्री, यज्ञक्रिया और वस्त्र आभूषण आदि का लाभ होता है। दशेश से ६,८, १२वें स्थान में अथवा पापग्रह से युत यदि केतु हो तो उसकी अन्तर्दशा में कलह, दन्तरोग, चौर से, हिंसक जीवों आदि से पीड़ा, ज्वर अतिसार, कुष्ठादि रोगभय तथा स्त्री पुत्रादि को कष्ट होता है। लग्न से २, ७ स्थान में केतु हो तो रोग, अपमान, मनोसन्ताप और धनहानि होती है। भौममहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो, शुक्र यदि लग्न से केन्द्रस्थान में, स्वोच्च में, स्वराशि में हो या शुभस्थान (१, ५, ९) का स्वामी हो तो उस अन्तर्दशा में राज्यलाभ, परमसुख, हाथी, घोड़ा, वस्त्र, आभूषण का लाभ, यदि लग्नेश से सम्बन्ध हो तो पुत्र स्त्री का सुख और आयु, ऐश्वर्य तथा भाग्य की वृद्धि होती है। दशेश से केन्द्र में या ५, ९, ११, २ में यदि शुक्र हो तो उसकी अन्तर्दशा में सम्पत्ति, पुत्रजन्मोत्सव, सुखवृद्धि अपने स्वामी से धनलाभ, सुख, राजा की कृपा से भूमि-गृह-ग्राम आदि का लाभ होता है। अन्तर्दशा के अन्त में गीत, नृत्य, तथा तीर्थस्नान का फल प्राप्त होता है। यदि दशमेश से शुक्र का सम्बन्ध हो तो कूप-तड़ाग आदि का निर्माण, पुण्य कार्य दया और धर्म में प्रवृति होती है। दशेश से ६,८, १२ में शुक्र हो या पापग्रह से युक्त हो तो दुःख, शरीर में कष्ट, धनहानि, राजा-चोर आदि का भय, गृह में कलह, स्त्री पुत्र को कष्ट और पशधन का नाश होता है। शुक्र यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो उसकी अन्तर्दशा में देहकष्ट होता है। दोषशान्त्यर्थ गोदान, महिषदान करने पर आयु, आरोग्य की वृद्धि होती है। भौममहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में या त्रिकोण में या लाभभाव में भाग्येश अथवा दशमेश से युक्त हो तो उस अन्तर्दशा में वाहनलाभ, सुयश, पुत्रजन्म, धनवृद्धि, गृह में कल्याण, आरोग्य, धैर्य, राजसम्मान, व्यापार में विशेषलाभ, विदेशयात्रा और राजदर्शन होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८६७ दशेश से ६,८, १२वें स्थान में सूर्य यदि पापग्रह से युत हो तो उसकी अन्तर्दशा में शरीरकष्ट, मनोसन्ताप, कार्यहानि, भय, मष्तिकरोग, ज्वर, अतिसार आदि रोग होता है। यदि पूर्य द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो सर्प, विष और ज्वर से भय तथा पुत्र को क्लेश होता है। यदि उससमय सूर्य की आराधना विधिपूर्वक की जाय तो निरोगता और धनलाभ होता है। भौममहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-भौम की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि उच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में हो अथवा ९, ४, १०, १ इन भावों के स्वामी से युत हो तो सुगन्ध, माल्य, वस्त्रादि का पूर्णलाभ, तालाब, गोशाला आदि का निर्माण, घर में विवाहादि उत्सवकार्य, स्त्री-पुत्र को सुख, माता-पिता से सुख, लक्ष्मी की कृपा, राजा की कृपा से अभीष्ट कार्यसिद्धि होती है। चन्द्रमा यदि पूर्ण हो तो पूर्णफल और क्षीण हो तो अल्पफल होता है। चन्द्र यदि नीचराशि में या शत्रुराशि में अथवा या लग्न या दशापति से ६,८ में हो तो मृत्यु, स्त्रीपुत्र को कष्ट, भूमि का नाश, पशु और धन की हानि तथा चौर व युद्धभय होता है। चन्द्र यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु, शरीर कष्ट तथा मन में सन्ताप होता है। दोषशान्त्यर्थ दुर्गाजी और लक्ष्मी जी का जप, गोदान और महिषदान करने पर आरोग्य और सुख होता है।
राहुमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल राहुमहादशा में राह्वन्तर्दशा का फल-कर्क, वृश्चिक, कन्या और धनु राशि में राहु हो तो उसकी दशा में राजसम्मान-वस्त्र वाहन भूषण की प्राप्ति, व्यापार में वृद्धि, चतुष्पद वाहन का लाभ, पश्चिम में यात्रा से वाहन वस्त्रादि -- का लाभ होता है। लग्न से ३, ६, १०, ११ में या योगकारक ग्रह के साथ -- अपने उच्चांश में या मित्रांश में राहु यदि शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो राहु की दशा और अन्तर्दशा में राज्यलाभ, उत्साह, राजा से प्रेम, स्त्री, पुत्र आदि से सुख तथा सम्पत्ति की वृद्धि होती है। राहु यदि लग्न से ८, १२ में हो या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो चौरभय, व्रण से कष्ट, राजाधिकारी से द्वेष, इष्ट बन्धुओं का नाश तथा स्त्री-पुत्रादि को कष्ट होता है। राहु यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो या इन दोनों (२,७) स्थान में हो
लाभ होता है। तो रोग और कष्ट होता है। उस समय जप दानादि शान्ति करने से आरोग्यादि
राहुमहादशा में गुर्वन्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो तथा गुरु यदि स्वोच्च या स्वराशि या स्वांश या उच्चांश में या लग्न से
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८६८ विंशोत्तरी दशा प्रकरण केन्द्र, त्रिकोण में हो तो स्थानलाभ, मानसिक स्थिरता, शत्रुनाश, सुख, राजा से प्रीति, शुक्लपक्ष के चन्द्र समान दिनोंदिन सम्पत्ति की वृद्धि, वाहन, गोधन का लाभ, नैऋत्य और पश्चिम दिशा की यात्रा, राजा का दर्शन, अभीष्ट कार्यसिद्धि, पुनः स्वदेश आगमन, ब्राह्मणों पर उपकार, तीर्थयात्रा, ग्राम का लाभ, देव-ब्राह्मण में भक्ति, पुत्र पौत्रादि से संतुष्टि और नित्य मिष्टान्न भोजन होता है। गुरु यदि नीचराशि में या, अस्त में, या लग्न से ६, ८, १२ में या शत्रुराशि में या पापग्रह से युक्त दृष्ट हो तो उसकी अन्तर्दशा में धनहानि, कार्य में बाधा, मानहानि, स्त्रीपुत्र को कष्ट, हृदयरोग और राज अधिकार प्राप्त होता है। दशेश से केन्द्र में या कोण में या ११, २, ३ में गुरु हो या बली अवस्था में हो तो उसकी अन्तर्दशा में भूमिप्राप्ति, सुभोजन,पशु आदि का लाभ और दान-धर्मादि में प्रवृत्ति होती है। अन्तर्दशा के अन्तसमय में दो मास तक शरीरकष्ट तथा बड़े भाई व माता-पिता को कष्ट होता है। दशेश से गुरु यदि ६,८, १२वें स्थान में हो या पापग्रह से युत हो तो उसकी अन्तर्दशा में धनहानि तथा शरीर को कष्ट होता है। यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय होता है। शान्ति हेतु शङ्कर की सोने की प्रतिमा बनाकर पूजा करनी चाहिए इससे शिवजी की कृपा से आरोग्य सुख होता है। राहुमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो और शनि यदि केन्द्र में या त्रिकोण में या स्वोच्च में या स्वराशि में या मूलत्रिकोण में या ३, ११ भाव में हो तो उसकी अन्तर्दशा में राजा की सेवा से कृपा प्राप्ति, घर में विवाहादि उत्सव कार्य, पुण्यकर्म, तालाबनिर्माण, शूद्र वर्ण के धनी व्यक्ति से पशु आदि का लाभ, पश्चिमदिशा की यात्रा से राजा द्वारा धनहानि, आलस्य से अल्पलाभ तथा पुनः स्वदेश में आगमन होता है। शनि यदि नीचराशि में, शत्रुराशि या लग्न स्थान से ८, १२ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में नीचलोगों से, शत्रु से और राजा से भय, स्त्री-पुत्र को कष्ट, अपने बन्धुओं में कलह, सन्ताप, दायादों से कलह, कार्य व्यापार में भी कलह तथा अचानक आभूषणलाभ भी होता है। दशेश से ६,८, १२ स्थान में या पापग्रह से युत शनि हो तो उसकी अन्तर्दशा में हृदय रोग, मानहानि, कलह, शत्रुभय, विदेशभ्रमण, गुल्मरोग, कुभोजन तथा जातिवर्ग से दुःख और भय होता है। शनि यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु होती है। दोषशमनार्थ कृष्णा गौ का तथा महिष का दान करने से आरोग्य होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८६९ राहुमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध अपने उच्चराशि में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र स्थान में या पंचम में हो या बली हो तो उस अन्तर्दशा में राजयोग, घर में कल्याण, व्यापार में धनलाभ, उत्तम वाहनसुख, विवाहादि उत्सव कार्य तथा पशुवृद्धि उत्तम रूप से होता है। बुध के मास तथा बुध के वार में सुख, राजा की कृपा से सुगन्ध-पुष्पशय्या-स्त्रीसुख, धन और यश का लाभ होता है। दशापति से बुध यदि केन्द्रस्थान में या ११, ३, ९, १०स्थान में हो तो शरीर में आरोग्य, इष्ट कार्य की सिद्धि, पुराण इतिहास का श्रवण, विवाह, यज्ञ, दान आदि कार्य तथा धर्म व दया का उदय होता है। यदि बुध ६,८, १२स्थान में हो और शनि से युत दृष्ट हो तो उस समय में देव और ब्राह्मणों की निन्दा, भाग्यहानि, मिथ्याभाषण, दुर्बुद्धि, चौर, सर्प और राजा से कष्ट, अकारण कलह, गुरु पुत्रादि का नाश, स्त्री पुत्रादि को कष्ट, राजकोप और धननाश होता है। बुध यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है। दोषशान्त्यर्थ विष्णु सहस्रनाम का जप करना चाहिये। राहुमहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो तो विदेशभ्रमण, राजभय, वातज्वर आदि रोग तथा पशुओं की हानि होती है। केतु यदि अष्टमेश से युक्त हो तो शरीर में पीड़ा व मनोव्यथा होती है तथा शुभग्रह से युक्त और दृष्ट हो तो सुख, धनलाभ, राजसम्मान, आभूषण लाभ एवं गृह में शुभकार्य होता है। यदि केतु का लग्नेश से सम्बन्ध हो तो इष्टकार्य सिद्धि और यदि लग्नेश से योग हो तो निश्चय ही धनलाभ होता है। यदि केन्द्र या त्रिकोण में केतु हो तो निश्चय ही पशुओं की वृद्धि होती है। केतु यदि लग्न से ८, १२ में बलहीन होकर रहे तो उसकी अन्तर्दशा में रोग चौर और सर्प का भय, व्रण से पीड़ा, माता-पिता का वियोग, बन्धुओं से द्वेष और मानसिकव्यथा होती है। यदि केतु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट होता है। दोष की शान्ति हेतु छागदान करना चाहिये। राहुमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्र, त्रिकोण या ११ में हो और बली हो तो ब्राह्मणों के द्वारा धनलाभ,पशुओं की वृद्धि, पुत्रजन्मोत्सव, कल्याण, राजसम्मान तथा राज्यलाभ आदि उत्तमसुख होता है। शुक्र यदि अपने उच्च में या स्वराशि में या उच्चांश में या स्वांश में हो तो नवीन गृहनिर्माण, मिष्टान्न भोजन, पुत्र-पुत्री से सुख, मित्र का सङ्ग, सुभोजन, अन्नदानादि धार्मिक कार्य, राजा की कृपा से वाहन-वस्त्रादि का लाभ, व्यवसाय से विशेष लाभ विवाह, उपनयन आदि उत्सव कार्य होता है।
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८७० विंशोत्तरी दशा प्रकरण यदि शुक्र लग्न से ६,८, १२वें स्थान में या नीच में अथवा शत्रुराशि में हो, शनि मङ्गल या राहु से युक्त हो तो उसकी अन्तर्दशा में रोग, कलह, पिता या पुत्र का वियोग, बन्धुओं को कष्ट, जाति वर्ग से कलह, स्वामी या अपनी ही मृत्यु, स्त्री-पुत्र को पीड़ा और शूल आदि रोग की सम्भावना होती है। शुक्र यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११, १० स्थानों में हो तो राजा से सुख, सुगन्ध शय्या गान आदि से सुख तथा छत्र चामर आदि अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है। यदि शुक्र दशेश से ६,८, १२ में हो या पापग्रह से युत हो तो विप्र, सर्प, चोर और राजा से भय, मूत्रकृच्छू, प्रमेह, रुधिरविकारादि रोग, कदन्न भोजन, शिर में कष्ट, कारावास तथा राजदण्ड से धननाश होता है। शुक्र यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो स्त्री-पुत्र को कष्ट तथा स्वयं को भी अपमृत्युभय होता है। शान्ति हेतु श्री दुर्गा व श्री लक्ष्मी जी का जप-पाठ करना चाहिए, इससे सुख प्राप्ति होती है। राहुमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ भाव में या उच्चांश में या स्वांश में शुभग्रह से दृष्ट युत रहे तो राजा से प्रेम, धन धान्य की वृद्धि, स्वल्प सम्मान, स्वल्पसुख, अल्पग्रामाधिपत्य एवं स्वल्पलाभ होता है। यदि सूर्य भाग्येश-लग्नेश अथवा कर्मेश से युत या दृष्ट हो तो राजाश्रय से सुयश, विदेशयात्रा, देश का आधिपत्य, हाथी, घोड़े, वस्त्र, आभूषण का लाभ, अभीष्ट सिद्धि तथा पुत्र को सुख होता है। दशेश से १२, ८, ६ स्थान में या स्वनीचराशि में सूर्य हो तो ज्वर, अतिसाररोग, कलह, राजा से विग्रह, व्यर्थ भ्रमण, शत्रुभय और राजा-चोर- अग्नि से पीड़ा होती है। सूर्य यदि दशेश से केन्द्र, त्रिकोण या ३, ११ भाव में रहे तो विदेश में राजा से सम्मान तथा सब प्रकार से कल्याण होता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो महारोग होता है। अशुभफल शान्त्यर्थ सूर्य की आराधना करनी चाहिये। राहुमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या मित्रकी राशि में शभग्रह से युत हो तो राज्यलाभ, राजा से सम्मान, धनलाभ, आरोग्य, वस्त्राभूषणलाभ, मित्र, स्त्री, पुत्रादि से सुख, वाहन से सुख तथा गृह-भूमि की वृद्धि होती है। चन्द्र यदि पूर्णबली हो तो पूर्णफल और क्षीण हो तो कुछ न्यूनफल होता है। चन्द्रमा यदि दशापति से ५,९ में या केन्द्र में या ११ में रहे तो घर में
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भृगु संहिता फल दर्पण ८७१ लक्ष्मी की कृपा से कल्याण, सर्वकार्य की सिद्धि, धनधान्य की वृद्धि, लोक में सुयश धनलाभ व सम्मान प्राप्ति तथा देव्याराधन होता है। दशेश से चन्द्र यदि ६, ८, १२ में हो और बलहीन हो तो उसकी अन्तर्दशा में पिशाच, व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं से गृह और कृषि में उपद्रव, मार्ग में चौरभय तथा व्रण और उदर रोग होता है। चन्द्र यदि द्वितीयेश या द्वादशेश हो तो अपमृत्यु भय होता है। दोषशान्ति हेतु श्वेत गौदान तथा महिषदान करना चाहिए इससे चन्द्रमा की प्रसन्नता द्वारा सुखप्राप्ति होती है। राहुमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-राहु की महादशा में भौम का अन्तर हो तथा भौम यदि लग्न से ११, ५, ९ या केन्द्र में हो या स्वोच्च में या स्वराशि में या शुभग्रह से युक्त हो तो नष्टराज्य व धन का लाभ, गृह और कृषि में वृद्धि, इष्टदेव की प्रसन्नता से सन्तानसुख, उत्तमभोजन तथा आभूषण वस्त्रादि से बहुत सुख होता है। भौम यदि दशेश से केन्द्र में या ५, ९, ३, ११ में रहे तो रक्तवस्त्र आदि का लाभ, यात्रा, राजदर्शन, पुत्रवर्ग और अपने स्वामीवर्ग को सुख, सेनापतित्व, उत्साह और बन्धुवर्ग द्वारा धनप्राप्ति होती है। -यदि भौम दशेश से ८, १२, ६ में स्थित होकर पापग्रह युत हो तो पुत्र, स्त्री और सहोदरों को कष्ट, स्थानच्युति, बन्धु-पुत्र-स्त्री से विरोध, चोर- सर्प और व्रण का भय तथा शरीर में पीड़ा होती है। अन्तर्दशा के प्रारम्भ काल में क्लेश तथा मध्य और अन्तकाल में सुख प्राप्त होता है। भौम यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीर में आलस्य और महाभय होता है। इसकी शान्ति हेतु वृषभदान और गोदान करनाा चाहिए इससे सुख की प्राप्ति होती है।
गुरुमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल गुरुमहादशा में गुर्वन्तर्दशा का फल-स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र में त्रिकोण में स्थित गुरु की महादशा में गुरु की ही अन्तर्दशा हो तो अनेक राजाओं का स्वामी या धन-धान्य से युक्त अथवा राजा से पूजित होता है। पशु-वस्त्र-भूषण-वाहनादि का लाभ, नवीनगृहनिर्माण, अनेक मंजिल का भवन निर्माण, समस्त ऐश्वर्य की प्राप्ति, भाग्योदय, कार्यों में सफलता, आदरपूर्वक ब्राह्मण और राजा का दर्शन, स्वामी से विशेष लाभ तथा स्त्री-पुत्रादि को सुख होता है। गुरु यदि नीचराशि में या नीच नवांश में या लग्न से ६, ८, १२ में रहे तो नीचजनों से मैत्री, महाकष्ट, जातिवर्ग से कलह, स्वामी का कोप, अपमृत्यु का भय, स्त्री-पुत्र से वियोग और धन-धान्य का नाश होता है। गुरु यदि सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट होता है। दोषशान्त्यर्थ
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८७२ विंशोत्तरी दशा प्रकरण शिवसहस्त्रनाम या रुद्र का जप तथा गोदान करना चाहिए इससे अभीष्ट (कार्य) सिद्ध होता है। गुरुमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में शनि का अन्तर हो और शनि यदि स्वराशि' या स्वोच्च में या लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में बली होकर रहे तो उस समय में राज्यलाभ-वस्त्र-आभूषण, धनधान्य- स्त्री-वाहन-पशु तथा स्थान का लाभ, पुत्र मित्रादि से सुख, नील अश्व एवं नील वस्त्रादि का लाभ, पश्चिम दिशा की यात्रा तथा राजा का दर्शन एवं धन का लाभ होता है। यदि शनि लग्न से ६,८, १२ में हो नीच अस्त या शत्रुराशि में स्थित हो तो धननाश, ज्वरपीड़ा, मनोव्यथा, स्त्री-पुत्र को व्रणादि से कष्ट, घर में अशुभकार्य, पशुओं और नौकरों की हानि तथा बन्धुवर्ग से द्वेष होता है। यदि शनि दशेश से केन्द्र, त्रिकोण या ११, २ स्थान में हो तो भूमि- धन-पुत्र-पशु आदि का लाभ तथा नीच जाति से धनप्राप्ति होती है। यदि दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युक्त शनि हो तो धननाश, बन्धुओं से विरोध, उद्योग में बाधा, शरीर में कष्ट तथा कुटुम्बादि से भी भय होता है। यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो अपमृत्यु से भय होता है। शान्ति हेतु विष्णुसहस्रनाम का जप, कृष्णा गौ का दान तथा महिषदान करना चाहिए। इससे शनि की प्रसन्नता से निश्चय ही आरोग्य लाभ होता है। गुरुमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो, बुध यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में या दशापति से युत हो तो धनलाभ, शरीरसुख, राज्यलाभ, राजा की कृपा से अभीष्ट सिद्धि, वाहन-वस्त्र तथा पशु आदि का लाभ होता है। बुध यदि भौम से दृष्ट हो तो उसकी अन्तर्दशा में शत्रुवृद्धि, सुखनाश, कार्यव्यापार में हानि, ज्वर तथा अतिसारजन्य पीड़ा होती है। बुध यदि दशेश से त्रिकोण में या केन्द्र में या स्वोच्च में हो तो स्वदेश में ही धनलाभ, पिता-माता से सुख तथा राजा की कृपा से वाहनादि का विशेष सुख होता है। बुध यदि दशेश से ६,८, १२ वें भाव में हो और पापग्रह से युक्त एवं शुभग्रह से अदृष्ट रहे तो धननाश, विदेशयात्रा, मार्ग में चौरभय, व्रण-दाह- नेत्रकष्ट और विदेश भ्रमण होता है। यदि बुध लग्न से ६,८, १२ में हो और पापग्रह से युत हो तो अकारण कलह, क्रोध, पशुहानि, व्यापार में क्षति और अपमृत्युभय होता है। बुध यदि शुभग्रह से दृष्ट और पापग्रह से युत हो तो अन्तर्दशा के प्रारम्भ में स्त्रीसुख, धनलाभ, वाहन-वस्न्न आदि का लाभ होता है। अन्तर्दशा
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भृगु संहिता फल दर्पण ८७३ के अन्त में धनहानि और शारीरिक कष्ट होता है। यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति हेतु सर्वसुखदायक, आयुवृद्धिकारक विष्णुसहस्त्रनाम का जप करना चाहिये। गुरुमहादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में केतु का अन्तर हो और केतु यदि शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो अल्पसुख, अल्पधनलाभ, कदन्न परान्न या श्राद्धान्न का भोजन तथा कुकर्म से धनप्राप्ति होती है। केतु यदि दशेश से ६,८, १२वें स्थान में पापग्रह से युत हो तो राजा के कोप से धनहानि, बन्धन, रोग व बल का नाश, पिता और बन्धु से द्वेष तथा मानसिक पीड़ा होती है। केतु यदि दशेश से ५, ९,४, १०वें स्थान में हो तो पालकी, हाथी- घोड़ा आदि सवारी का एवं वस्त्र का सुख, राजा की कृपा से इष्टकार्यसिद्धि, व्यवसाय में अधिक लाभ, पशुओं की वृद्धि तथा यवन राजा से धन- वस्त्रादि का लाभ होता है। यदि केतु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो कष्ट होता है। दोष शान्ति हेतु छागदान और विधिविधान से मृत्युञ्जय जप करना चाहिये। गुरुमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में शुक्र की अन्तर की दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या अपनी राशि में शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो उस समय पालकी हाथी आदि सवारी का सुख, राजा की कृपा से धनलाभ व बहुत सुख, पूर्व दिशा की यात्रा से विशेष धनलाभ, गृह में कल्याण, माता-पिता से सुख, देवता व गुरु में भक्ति, अन्नदान तथा जलाशय, गोशाला निर्माण आदि धर्मकार्य होता है। यदि शुक्र दशेश से या लग्न से ६,८, १२ में रहे या अपने नीच में रहे तो कलह, बन्धुविरोध तथा स्त्री-पुत्र को कष्ट होता है। शनि यदि राहु से युक्त हो तो कलह, राजभय, स्त्री से द्वेष, श्रशुर से कलह, सोदरविवाद और धनहानि होती है। शुक्र यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या द्वितीय में हो तो धनलाभ, स्त्री से सुख, राजदर्शन, वाहन, पुत्र और पशुओं की वृद्धि, गीत वाद्य सुख, विद्वान् से सङ्गति, मिष्टान्न भोजन तथा बन्धु पालन पोषण आदि का सुख होता है। शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो धनहानि, अपमृत्युभय तथा स्त्री से कलह होता है। शान्ति हेतु श्वेत गो का दान व महिषदान करना चाहिए इससे शुक्र की प्रसन्नता द्वारा सुखलाभ होता है। गुरुमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो, सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या
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८७४ विंशोत्तरी दशा प्रकरण ३,११,२ में बलयुक्त रहे तो धनलाभ, राजसम्मान, वाहन, वस्त्र, पशु, भूषण, पुत्र आदि से सुख तथा राजा की मैत्री से सभी कार्य की सिद्धि होती है। लग्न स्थान से या दशेश से ६,८, १२ में सूर्य हो तो उसकी अन्तर्दशा में शिरोव्यथा, ज्वर, सत्कर्म में आलस्य, पापर्कमवृद्धि, सभी से द्वेष, बन्धुवियोग और अकारण कलह होता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो शरीर में पीड़ा होती है। शान्ति हेतु आदित्यहृदय का पाठ करने से श्रीसूर्य की कृपा से सब कष्टों का निवारण होता है। गुरुमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या स्वोच्च में या स्वराशि में पूर्णबली हो और दशापति से शुभस्थान में हो तो उस समय राजा से सम्मान, ऐश्वर्य, स्त्री-पुत्रादि से सुख, पायस आदि सुभोजन, सत्कर्म से सुयश, पुत्र-पौत्रों की वृद्धि, राजा की कृपा से सर्वसुख और दान तथा धर्म में रूचि होती है। चन्द्र यदि लग्न से या दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युत व निर्बल रहे तो धन और बन्धुवर्ग की हानि, विदेश-भ्रमण, राजा और चोर का भय, बान्धवों से कलह, मामा का वियोग तथा माता को क्लेश होता है। चन्द्र यदि द्वितीयेश या षष्ठेश हो तो देहकष्ट होता है। दोष के शान्त्यर्थ सप्तशतीदुर्गापाठ करना चाहिये। गुरुमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या उच्च में या स्वनवांश में हो तो घर में विवाहादि उत्सव, ग्राम-भूमि का लाभ, जनसामर्थ्य की प्राप्ति और सर्वकार्य की सिद्धि होती है। दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११, २ भाव में शुभग्रह से युत दृष्ट यदि मङ्गल हो तो धन-धान्यादि की वृद्धि, मिष्टान्न भोजन, राजा की प्रसन्नता, स्त्री-पुत्र से सुखप्राप्ति और पुण्य कार्य होता है। दशेश से भौम यदि ८, १२ में या नीच में या पापग्रह से युत दृष्ट हो तो धन और गृह का नाश तथा नेत्ररोग आदि अनेक दुःख होते हैं। दशा के पूर्वार्ध में विशेष कष्ट होता है; परन्तु अन्त में सुख भी होता है। भौम यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट व मानसिक व्यथा होती है। शान्ति हेतु सर्व-सम्पत्तिप्रदायक वृषभ का दान करना चाहिये। गुरुमहादशा में राहुअन्तर्दशा का फल-गुरु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि स्वोच्च, स्वराशि, मूलत्रिकोण या लग्न से केन्द्र त्रिकोण में केन्द्रस्वामी से या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो योगक्रिया में रुचि, प्रारम्भ में पाँच मास तक धन-धान्य की वृद्धि, देश या ग्राम का आधिपत्य, अन्यजातीय
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भृगु संहिता फल दर्पण ८७५ राजा से भेंट, सेनापतित्व, गृह में कल्याण, दूर देश की यात्रा, तीर्थ स्नानादि पुण्यकार्य और सुख का संग्रह होता है। यदि दशेश से ८, १२ में पापग्रह से युत राहु हो तो चोर, सर्प और राजा का भय, व्रण से कष्ट, गृहकार्य में हानि, सहोदर और बन्धुवर्ग से विरोध, दुःस्वप्नदर्शन, अकारण कलह और रोग से क्लेश होता है। यदि द्वितीय या सप्तम स्थान में राहु हो तो शरीर में क्लेश होता है। राहु दोष शान्ति हेतु मृत्युञ्जय का जप व छागदान तथा देवपूजा करने पर राहु की प्रसन्नता से सब सुखों की प्राप्ति होती है।
शनिमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल शनिमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो, शनि यदि स्वराशि, उच्च या परमोच्चांश में अथवा लग्न से केन्द्र-त्रिकोण में हो अथवा राजयोगकारक हो तो उस समय राज्यलाभ, स्त्री-पुत्रादि का सुख, हाथी-घोड़ा आदि की सवारी, वस्त्रलाभ, राजा की कृपा से सेनापतित्व, पशु-ग्राम और भूमि-लाभ होता है। शनि यदि लग्न से ८-१२ में हो या नीचराशि में हो या पापग्रह से युत हो तो अन्तर्दशा के आरम्भ में राजभय, विष-शस्त्रभय तथा रक्तस्राव- गुल्म-अतिसारादि रोग होता है। दशा के मध्य में चोर आदि का भय, देशत्याग, मानसिकव्यथा होती है तथा दशा के अन्त में शुभफल प्राप्त होता है। यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु भय होता है। उस दोष के शान्ति हेतु मृत्यृञ्जय जप करना चाहिए इससे शंकर की प्रसन्नता से सुखप्राप्ति होती है। शनिमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध यदि केन्द्र-त्रिकोण में हो तो लोक में सम्मान-यश- विद्यालाभ-धनलाभ और वाहन आदि का सुख होता है साथ ही यज्ञादिकार्य में रुचि, राजसुख, देहसुख, उत्साह, घर में कल्याण, सेतुस्नान, तीर्थयात्रा, व्यापार से लाभ, धर्मानुष्ठान, पुराणकथाश्रवण, अन्नदानाादि धर्मकार्य तथा सुस्वादुभोजन की प्राप्ति होती है। बुध यदि लग्न या दशेश से ६, ८, १२ में अथवा सूर्य-भौम या राहु से युत हो तो अन्तर्दशा के आरम्भ में राज्यलाभ, धनलाभ और ग्राम का स्वामित्व होता है; किन्तु मध्य और अन्त में रोग से कष्ट, सभी कार्य में हानि, चित्त में व्यग्रता और भय होता है। यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो शरीर में कष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ विष्णुसहस्त्रनाम का जप तथा अन्नदान करने पर सभी सुखों की
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८७६ विंशोत्तरी दशा प्रकरण प्राप्ति होती है। शनिमहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो, केतु स्वोच्च या स्वराशि या शुभराशि में अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हो, शुभग्रह से युत दृष्ट हो तब भी उसकी दशा में स्थाननाश, भय, दरिद्रता, कष्ट, विदेशयात्रा आदि अशुभ फल होते हैं। यदि केतु का लग्नेश से सम्बन्ध हो तो दशारम्भ में सुख-धनलाभ-गङ्गादि तीर्थस्नान और देवदर्शन होता है। यदि केतु दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ३, ११ भाव में रहे तो, सामर्थ्यता, धर्म में रुचि, राजा का दर्शन तथा सर्वसुख होता है। यदि केतु दशेश या लग्न से ८, १२ में रहे तो अपमृत्युभय, कदन्न भोजन, शीतज्वर, अतिसार, व्रण, चौरभय तथा स्त्री-पुत्र का वियोग होता है। यदि केतु लग्न से द्वितीय या सप्तम स्थान में रहे तो शरीरकष्ट होता है। शान्ति हेतु छागदान करने पर केतु की प्रसन्नता से सुख और शान्ति प्राप्त होती है। शनिमहदशा में शुक्र अन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो, शुक्र यदि केन्द्र-त्रिकोण-स्वोच्च-स्वराशि में या११ भाव में शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो स्त्री-पुत्र-धनलाभ-आरोग्य-गृह में कल्याण, राज्यलाभ, राजा की कृपा से सुख-सम्मान, विविध वस्त्र, आभूषण, वाहनादि अभीष्ट वस्तुओं का लाभ होता है। उस समय बृहस्पति अनुकूल रहे तो भाग्योदय व सम्पत्ति की वृद्धि होती है। शनिगोचर से अनुकूल रहे तो योगक्रिया की सिद्धि होती है। यदि शुक्र नीचराशि में हो या अस्त हो या ६, ८, १२ में हो तो स्त्रीकष्ट, स्थाननाश, मानसिक व्यथा और स्वजनों से कलह होता है। यदि शुक्र दशेश से ९, ११ या केन्द्र में हो तो राजा की कृपा से अभीष्टसिद्धि, दान, धर्म, तीर्थयात्रा, शास्त्र में प्रवृत्ति, काव्यरचना, वेदान्तादि कथा श्रवण तथा स्त्री-पुत्रादि से सुखलाभ होता है। यदि शुक्र दशेश से १२, ६,८ में हो तो नेत्रकष्ट, ज्वर, आचरणहीनता, दन्तरोग, हृदय, गुह्यभाग में शूल, जल में डूबने और वृक्ष पर से गिरने का भय, राजपुरुष और सहोदर से कलह होता है। यदि शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गासप्तशती का पाठ-गोदान-महिषदान करने पर दुर्गा की प्रसन्नता से आरोग्य और सुख होता है। शनिमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य अपने उच्च में या गृह में या भाग्येश से युत हो या
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भृगु संहिता फल दर्पण ८७७ लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो स्वामी से सुख, गृह में कल्याण, पुत्रादि से सुख तथा वाहन, पशु आदि का लाभ होता है। यदि सूर्य लग्न से या दशेश से ८, १२ में हो तो हृदयरोग, मानहानि, स्थान-नाश, मानसिक व्यथा, बन्धुवियोग, उद्यम में अवरोध, ज्वर, ताप, व्याकुलता, भय, सम्बन्धियों का तथा प्रियवस्तु का नाश होता है। यदि सूर्य द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीर में कष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ सूर्य की पूजा करनी चाहिये। शनिमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्रमा स्वोच्च, स्वगृह या लग्न से केन्द्र-त्रिकोण या ११ में बलवान हो या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो राजा की कृपा से वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ, सुख-सौभाग्य की वृद्धि, नौकरों का पालन, मातृकुल- पितृकुल में सुख और पशुओं की वृद्धि एवं सुख होता है। यदि चन्द्रमा क्षीण हो या पापग्रह से युतदृष्ट हो, नीच-क्रूर ग्रह के नवांश या क्रूरग्रह की राशि में हो तो उसकी अन्तर्दशा में घोरकष्ट, राजकोप, धनहानि, मातृ-पितृ वियोग, सन्तानकष्ट, व्यापार में हानि, असमय भोजन और औषधसेवन होता है। दशारम्भ में धनलाभ और सुख होता है। यदि चन्द्र दशेश से केन्द्र में त्रिकोण में या ११ में हो तो वाहन, वस्त्र और बन्धुओं से सुख, पिता, माता, स्त्री, मित्र, स्वामी आदि से भी इष्ट सिद्धि और सर्वसुख होता है। यदि चन्द्र दशेश से १२, ८ में हो या निर्बल हो तो निद्रा, आलस्य, स्थाननाश, सुखनाश, शत्रुवृद्धि और बन्धुओं से द्वेष होता है। यदि चन्द्र द्वितीयेश या द्वादशेश हो तो शरीरकष्ट और आलस्य होता है। दोष शान्त्यर्थ तिल से हवन, गुड़, घी, दधिमिश्रित तण्डुल, गौ तथा महिष का दान करने से आयुवृद्धि होती है। शनिमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम स्वोच्च, स्वराशि में या दशेश से या लग्नेश से युत हो तो उस समय दशारम्भ से ही सुख, धनलाभ, राजसम्मान, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ, सेनापतित्व, कृषि, पशुओं की वृद्धि, नूतन गृहनिर्माण और भ्रातृवर्ग को सुख होता है। यदि भौम अपने नीच में हो अस्तङ्गत या लग्न से ८, १२ में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो उस समय धनहानि, चोर, सर्प, व्रण, शस्त्र तथा गठिया रोग से भय, पिता और भाई को कष्ट, बन्धुवर्ग में कलह, पशुओं की हानि, कदन्न भोजन, विदेशगमन और अनावश्यक खर्च होता है। यदि भौम अष्टमेश-सप्तमेश या द्वितीयेश हो तो अपमृत्युभय, विविध
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८७८ विंशोत्तरी दशा प्रकरण कष्ट और पराभव होता है। दोष शान्ति हेतु होम और वृष का दान करना चाहिये। शनिमहादशा में राह्वन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि उच्चादि स्थानों में नहीं हो तो कलह, मानसिक व्यथा, शरीरकष्ट, सन्ताप, पुत्रों से द्वेष, रोगभय, अपव्यय, राजभय, स्वजनों से कलह, विदेशयात्रा तथा गृह और कृषि में हानि होती है। यदि राहु लग्नेश या योगकारक ग्रह से युत हो या स्वोच्च में, स्वराशि में, लग्न या दशेश से केन्द्र में या, ११ भाव में हो तो अन्तर्दशारम्भ काल में सुख-धनलाभ-कृषि में वृद्धि-देव और ब्राह्मणों में भक्ति-तीर्थयात्रा-पशुओं की वृद्धि और घर में कल्याण होता है। दशा के मध्यकाल में राजा से भय और पुत्र-मित्रादि से विरोध होता है। राहु यदि मेष-कन्या-कर्क-वृष-मीन-धनु या कन्याराशि में हो तो पूर्ण ऐश्वर्य की वृद्धि, राजा से मित्रता तथा दिव्य वस्त्रादि से सुख होता है। राहु यदि द्वितीयेश या सप्तमेश से युत हो तो शरीरकष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ मृत्युञ्जय जप, छागदान तथा वृषदान करना चाहिये। शनिमहादशा में गुर्वन्तर्दशा का फल-शनि की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो और गुरु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या लग्नेश से युत हो या स्वक्षेत्र या स्वोच्च में हो तो सभी कार्यों की सिद्धि, घर में कल्याण, राजा की कृपा से धन-वाहन-भूषण-वस्त्रलाभ-सम्मान की प्राप्ति-देव व गुरु में भक्ति-विद्वानों का सङ्ग और स्त्री-पुत्रादि से सुख होता है। गुरु यदि लग्न से ६,८, १२ स्थानों में, स्वनीच में या पापग्रह से युत हो तो सम्बन्धियों का नाश, धनहानि, राजकर्मचारियों से द्वेष, कार्य में क्षति, विदेश गमन और कुष्ठादि रोग का भय होता है। यदि गुरु दशेश से केन्द्र में या ५, ९, २, ११ स्थानों में रहे तो ऐश्वर्य, स्त्रीसुख, राजा द्वारा धनलाभ, भोजन-वस्त्रादि का सुख तथा दान-धर्म में प्रवृत्ति होती है। साथ ही वेद-वेदान्त का ज्ञान, यज्ञकर्म, अन्नदान आदि से देश में कीर्ति होती है। यदि गुरु दशेश से ६,८, १२ में हो या बलहीन हो तो बन्धुओं से द्वेष, मानसिक व्यथा-कलह-स्थान-त्याग-कुभोजन-कार्य में क्षति-राजदण्ड से धनहानि-बन्धन तथा पुत्र-स्त्री को कष्ट होता है। यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट-मनसन्ताप और अपने परिजनों का नाश होता है। दोष शान्त्यर्थ शिवसहस्रनाम का जप और सुवर्णदान करना चाहिये।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८७९ बुधमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल बुधमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में बुध की ही अन्तर्दशा हो तथा बुध यदि स्वोच्चादि शुभस्थान में हो तो उस काल में मोती आदि रत्नों की प्राप्ति, ज्ञान-कर्म और सुख का विकाश, विद्या-कीर्ति की वृद्धि, नवीन राजाओं से भेंट तथा धन-स्त्री-पुत्र, पिता-माता आदि से सुख प्राप्त होता है। बुध यदि अपने नीचादि स्थान में या ६, ८, १२ में हो, पापग्रह से युत हो तो धन और पशु का नाश, बन्धुओं से वैर, शूल आदि रोग तथा राजकार्य में व्यग्रता होती है। यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो स्त्रीकष्ट, सम्बन्धियों का मरण तथा वात व शूल रोग होता है। दोष शान्त्यर्थ विष्णुसहस्रनाम का जप करना चाहिए। बुधमहादशा में केतु अन्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो और केतु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में हो अथवा शुभग्रह से या लग्नेश से या योगकारक ग्रह से युत दृष्ट हो तो अथवा दशेश से केन्द्र स्थान में या ११ में हो तो देहसुख, स्वल्पधन लाभ, बन्धुवर्ग से प्रेम, पशुओं की वृद्धि, उद्योग से धनलाभ, विद्या-कीर्ति-सम्मान, राजदर्शन और भोजन-वस्त्र आदि का सुख होता है। यदि केतु दशेश से ८-१२ में हो या पापग्रह से युत हो तो सवारी से पतन, पुत्र को कष्ट, चौर और राजा से भय, पापकर्म में प्रवृत्ति, विषैले जीवों से भय, नीचों से कलह, शोक-रोग आदि क्लेश और नीचों का सङ्गत होता है। यदि केतु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ छागदान करना चाहिये। बुधमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्रस्थान में या ११, ५, ९ में हो तो धर्मकार्य में रुचि, मित्र और राजा के द्वारा कार्यसिद्धि, कृषि और सुख में वृद्धि होती है। शुक्र यदि दशेश से केन्द्रस्थान में या ५, ९, ११ में हो तो राज्य-धन-सम्पत्ति का लाभ, जलाशय खनन, दान-धर्म में तत्परता और व्यवसाय से धन-धान्य का विशेष लाभ होता है। यदि शुक्र दशेश से ६, ८, १२ में होकर निर्बल रहे तो हृदयरोग- मानहानि-ज्वर-अतिसार-बन्धुवियोग-शरीरकष्ट और मनसन्ताप होता है। यदि शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गा मन्त्र का जप करने से सुख प्राप्त होता है। बुधमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च-स्वराशि-केन्द्र-त्रिकोण या २, ११ में या उच्चांश या स्वनवांश में हो तो राजा की कृपा से भाग्योदय और मित्रों से सुख होता
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८८० विंशोत्तरी दशा प्रकरण है। यदि सूर्य पर भौम की दृष्टि हो तो भूमिलाभ और लग्नेश की यदि दृष्टि हो तो भोजन व वस्त्र का सुख होता है। सूर्य यदि लग्न या दशेश से ६, ८, १२ में हो या शनि-भौम राहु से युत होकर बलहीन हो तो चोर-अग्नि और शस्त्र से भय, पित्तरोग, शिर में पीड़ा, मानसिक व्यथा तथा इष्ट-मित्रों से वियोग होता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ सूर्य की आराधना करनी चाहिये। बुधमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्रमा यदि लग्न से केन्द्र-त्रिकोण या स्वोच्च में या स्वराशि में या गुरु से दृष्ट हो या बुध से योग करे तो योग की प्रबलता होती है। उस समय में स्त्री-पुत्र-वस्त्र-आभूषण आदि का लाभ होता है। नूतनगृह, मधुरभोजन, गाना-बजाना, शास्त्र का अध्ययन, दक्षिण दिशा की यात्रा, विदेश से वस्त्रादि का लाभ तथा मोती आदि रत्नों की प्राप्ति होती है। यदि चन्द्र स्वनीच या शत्रुराशि में हो तो देह में कष्ट होता है। यदि दशेश से केन्द्र, त्रिकोण या ३, ११ में चन्द्र हो तो आरम्भ में तीर्थ-देवता का दर्शन, धैर्य, उत्साह, और विदेश से धनलाभ होता है। यदि चन्द्र दशेश से ६,८, १२ में पापग्रह से युत हो तो चौर, अग्नि व राजा से भय, स्त्री वर्ग से अपयश और धननाश तथा खेती व पशुओं का नाश होता है। यदि चन्द्र द्वितीयेश या सप्तगेश हो तो शरीर में क्लेश होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गाजप और वस्त्रदान करने पर दुर्गा की कृपा से आयुवृद्धि तथा सुखप्राप्ति होती है। बुधमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम यदि स्वोच्च, स्वराशि में या लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या लग्नेश से युत रहे तो राजा की कृपा से घर में कल्याण, धन की वृद्धि, नष्ट राज्यादि का लाभ, पुत्रजन्म, मन में सन्तोष, पशु, खेती, वाहन आदि का लाभ तथा स्त्रीसुख होता है। भौम यदि स्वनीचराशि में या लग्न से ८, १२ में हो या पापग्रह से दृष्ट हो तो शरीरकष्ट, मानसिक व्यथा, उद्योग में बाधा, धननाश, गठिया रोग, शस्त्र-व्रण का भय तथा ताप और ज्वर होता है। भौम यदि दशेश से केन्द्र स्थान में या ५, ९, ११ में या शुभग्रह से दृष्ट हो तो धनलाभ, शरीरसुख, पुत्रलाभ तथा बन्धुप्रेम होता है। दशेश से ८, १२ में भौम यदि पापग्रह से युत हो तो दशा के प्रारम्भ में कष्ट, बन्धुवर्ग में भय, राजा-चोर-अग्नि का प्रकोप, पुत्र से विरोध तथा
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भृगु संहिता फल दर्पण ८८१ स्थानहानि होती है। दशा के मध्य में सुख-धनलाभ और दशान्त में राजभय : व स्थाननाश होता है। यदि भौम द्वितीयेश या तृतीयेश हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ गोदान और मृत्युञ्जय जप करने पर शङ्कर की कृपा से सुख होता है। बुधमहादशा में राह्वन्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में हो या मेष-कुम्भ-कन्या- वृष राशि में हो तो राजा से सम्मान, सुयश, धनलाभ-तीर्थ-देव का दर्शन, यज्ञ, सम्मान और वस्त्रलाभ होता है। दशा के प्रारम्भ में कुछ कष्ट होता है; किन्तु दशान्त में सुख होता है। यदि राहु लग्न से ८, १२ में रहे तो उसकी अन्तर्दशा में धननाश, शरीर में कष्ट, वात-ज्वर और अजीर्ण रोग से क्लेश होता है। 'यदि राहु लग्नस्थान से ३, ६, १०, ११ में हो तो राजा से वार्ता, यदि शुभग्रह से युत हो तो नवीन राजा का दर्शन होता है। यदि राहु दशेश से ८, १२ में पापग्रह से युत हो तो राजकार्य में श्रम, स्थान की क्षति, भय, बन्धन, रोग, अपने और बन्धुओं को क्लेश, हृदयरोग, सम्माननाश और धनहानि होती है। यदि राहु द्वितीय या सप्तम भाव में हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गा और लक्ष्मी का मन्त्रजप, कपिला गौ का दान और महिषदान करने पर जगदम्बा की कृपा से सुख प्राप्त होता है। बुधमहादशा में गुर्वन्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो और गुरु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११, २ भाव में या स्वोच्च में या स्वराशि में हो तो शरीरसुख-धनलाभ-राजा की कृपा-घर में विवाहादि उत्सव-मिष्टान्न भोजन-पशुओं की वृद्धि-पुराणादिश्रवण-देव- गुरु में भक्ति-दान-धर्म-यज्ञ में प्रवृत्ति और शङ्कर की आराधना होती है। यदि गुरु नीचराशि में हो, अस्तङ्गत हो, लग्न से ६,८, १२ में हो या शनि-भौम से दृष्ट युत हो तो स्वजनों और राजा से कलह, चोर आदि से कष्ट, मातृ-पितृ मरण, मानहानि, राजदण्ड, धनहानि, विष-सर्प और ज्वर से कष्ट तथा कृषि और भूमि की क्षति होती है। यदि गुरु दशेश से केन्द्र में या, त्रिकोण में या ११ में होकर बली रहे तो बन्धु-पुत्र से सुख, उत्साह, धन-गौ महिष्यादि और यश की वृद्धि तथा अन्न-दानादि का पुण्य प्राप्त होता है। दशेश से ६, ८, १२ में निर्बल गुरु हो तो सन्ताप, विकलता, रोगभय,
होता है। स्त्री और बन्धु से द्वेष, राजकोप, अचानक कलह धनहानि और विप्र से भय
यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश हो या २, ७ भाव में हो तो कष्ट होता भृ.सं .- ५६
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८८२ विंशोत्तरी दशा प्रकरण है। दोष शान्त्यर्थ शिवसहस्त्रनाम का जप, गोदान तथा सुवर्णदान करने पर अरिष्टनाश होता है। बुधमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-बुध की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो और शनि यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में हो तो घर में कल्याण, राज्यलाभ, उत्साहवृद्धि, पशुवृद्धि, स्थानलाभ, तीर्थ-भ्रमण व दर्शन होता है। यदि शनि दशेश से ८, १२ में हो तो शत्रुभय, स्त्री-पुत्र को कष्ट, बुद्धिनाश, बन्धुनाश, कार्यहानि, मानसिक व्यथा, विदेशयात्रा और दुःस्वप्नदर्शन होता है। शानि यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय कहना चाहिए। इसमें मृत्युञ्जयजप, कृष्णा गौ और महिष का दान करने पर आरोग्यलाभ होता है।
केतुमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल केतुमहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में केतु की ही अन्तर्दशा हो और केतु यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या लग्नेश से युत हो तथा भाग्येश या कर्मेश या चतुर्थेश का सम्बन्धी हो तो धन-पुत्र-स्त्री से सुख, राजसम्मान; मानसिक व्यथा, ग्राम व भूमि आदि का लाभ होता है। यदि केतु अपनी नीचराशि में अस्तग्रह से युत हो या ८, १२ में हो तो
होता है। हृदयरोग, मानहानि, धन-पशु का नाश, स्त्री-पुत्र को कष्ट तथा मनोचाञ्चल्य
केतु यदि द्वितीयेश या सप्तमेश से सम्बन्धित हो अथवा २, ७ स्थान में हो तो रोगभय-कष्ट तथा अपने बन्धुओं का वियोग होता है। दोष शान्त्यर्थ सप्तशती का पाठ, मृत्युञ्जयजप करने पर सुख की प्राप्ति होती है। केतुमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र-त्रिकोण में या ११ में दशमेश से युत हो तो राजकृपा, सौभाग्य वृद्धि व वस्त्रादि का लाभ होता है। यदि नवमेश से युत हो तो भाग्योदय, नष्ट राज्य का लाभ, वाहनादि सुख, सेतुस्नान, देवदर्शन आदि पुण्य कार्य तथा राजा की कृपा से ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है। शुक्र यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ३, ११ में हो तो आरोग्य सुख घर में कल्याण व भोजन-वस्त्र-वाहन आदि की प्राप्ति होती है। यदि दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युत होकर शुक्र रहे तो अकारण कलह, धनहानि व पशुओं को पीड़ा होती है। यदि नीच में या
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भृगु संहिता फल दर्पण ८८३ नीचस्थग्रह के साथ या लग्न से ६, ८ में शुक्र रहे तो बन्धुओं से विवाद, मस्तक-नेत्र-हृदय में रोग, मानहानि, धननाश तथा पशु और स्त्री-पुत्र को पीड़ा होती है। यदि शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो शरीर में पीड़ा व मानसिकव्यथा होती है। शान्ति हेतु दुर्गासप्तशती पाठ, कपिला गौ और महिषी का दान करने पर आरोग्य प्राप्ति व आयुवृद्धि होती है। केतुमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र-त्रिकोण में या ११ में शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो धनलाभ, राजकृपा, पुण्यकार्य और अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है। यदि सूर्य लग्न से ८, १२ में पापग्रह से युत रहे तो उसकी अन्तर्दशा में राजभय, मातृ-पितृ वियोग, विदेशगमन, चौर, सर्प व विष से पीड़ा, राजदण्ड, मित्रों से वैर, शोक और ज्वरादि रोग होता है। यदि सूर्य दशेश से केन्द्र त्रिकोण में या २-११ में हो तो देहसुख, धनलाभ, पुत्रलाभ, सन्तोष, सब कार्यों की सिद्धि तथा लघु ग्राम का स्वामित्व प्राप्त होता है। यदि सूर्य दशेश से ८, १२ में पापग्रह से युत हो तो भोजन में व्यवधान, भय, धनहानि, पशुहानि, अन्तर्दशा के मध्य में कष्ट तथा दशान्त में कुछ शुभ भी होता है। सूर्य यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु भय होता है। दोष शान्त्यर्थ सुवर्ण और गोदान करने पर सूर्य की कृपा से सुख प्राप्त होता है। केतुमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र त्रिकोण में या ११-२ में हो तो राजा से सम्मान, उत्साह, कल्याण, सुख, गृह-भूमि आदि की प्राप्ति, भोजन, वस्त्र,वाहन, पशु आदि का लाभ, व्यापार में सिद्धि, जलाशय निर्माण आदि पुण्य कार्य तथा स्त्री-पुत्र को सुख होता है। यदि पूर्णचन्द्र हो तो पूर्ण सुख प्राप्त होता है। यदि क्षीण चन्द्र हो या नीच में हो या ६, ८, १२ वें भाव में हो तो सुख में बाधा, कार्य में विघ्न, मातृ-पितृ वियोग, शरीरकष्ट, मानसिक व्यथा, व्यवसाय में हानि तथा पशुओं का नाश होता है। यदि चन्द्र दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में बली रहे तो कृषि, गौ और भूमि की प्राप्ति, इष्टबन्धु समागम, उनके द्वारा कार्यसिद्धि, घर में दूध-दही आदि की वृद्धि, दशा के प्रारम्भ में शुभफल मध्य में राजा से प्रेम तथा दशान्त में राजभय, विदेशयात्रा या दूर यात्रा से बन्धुओं द्वारा
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८८४ विंशोत्तरी दशा प्रकरण सम्मान मिलता है। यदि चन्द्र दशेश से ६, ८, १२ में बलहीन हो तो धनहानि, चित्त में व्यग्रता, बन्धुवैर तथा भातृकष्ट होता है। चन्द्र यदि अष्टमेश हो या मारकेश से युत हो तो अपमृत्युभय होता है। शान्त्यर्थ चन्द्रमा की शान्ति (जप, दान) करनी चाहिए इससे आयुवृद्धि और आरोग्य सुख होता है। केतुमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम स्वोच्च में या स्वराशि में या शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो ग्राम-भूमि आदि का लाभ, धन-पशु की वृद्धि, नूतन गृह, बगीचा आदि का निर्माण तथा राजकृपा से धनलाभ होता है। यदि नवमेश या दशमेश से भौम का सम्बन्ध हो तो निश्चय ही भूमिलाभ और सुख होता है। दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ३, ११ में भौम हो तो राजा से सम्मान, लोक में सुयश तथा पुत्र-मित्रादि से सुख होता है। यदि दशेश से ८, १२, २ में भौम रहे तो मृत्युभय, विदेशयात्रा में बाधा, प्रमेह, मूत्रकृच्छ आदि रोग, चोर और राजा से भय, विवाद और मनोव्यथायुक्त कुछ सुख भी प्राप्त होता है। भौम यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो तापज्वर और विषभय, स्त्री को कष्ट, मानसिक व्यथा और अपमृत्युभय होता है। शान्ति हेतु वृषदान करने पर भौम की कृपा से सुख और सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। केतुमहादशा में राह्वन्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि अपने उच्च में या स्वराशि में या मित्रराशि में या लग्न से केन्द्र-त्रिकोण में या ११, ३, २ में हो तो धन की वृद्धि, यवन राजा से धन- धान्य, पशु, ग्राम, भूमि आदि प्राप्त होता है। अन्तर्दशा के आदि में कुछ क्लेश तथा मध्य व अन्त में सुख होता है। केतुमहादशा में गुरुअन्तर्दशा का फल-राहु ८ या १२ वें भाव में यदि पापग्रह से युत दृष्ट रहे तो बहुमूत्र रोग, देह दौर्बल्य, शीतज्वर, विषभय, चौथिया ज्वर, उपद्रव, कलह, प्रमेह तथा शूलरोग होता है। यदि २, ७ वें भाव में राहु हो तो क्लेश और भय होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गा पाठ या जप करना चाहिए। केतु की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो और गुरु यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र-त्रिकोण में या लग्नेश-नवमेश या दशमेश से युत हो तो उस अन्तर्दशा में धन-धान्य की वृद्धि, राजप्रेम, उंत्साह, वाहन आदि का लाभ, पुत्रजन्म आदि उत्सव, पुण्यकार्य, यज्ञ आदि शुभकार्य, शत्रु पर विजय और सुख होता है। यदि गुरु ६,८, १२ वें भाव में हो अथवा नीचराशि में हो तो चोर-
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भृगु संहिता फल दर्पण ८८५ सर्प व व्रण का भय, धननाश, पुत्र-स्त्री का वियोग तथा शरीरकष्ट होता है। दशा के प्रारम्भ में कुछ शुभफल होता है; परन्तु अन्त में निश्चय ही अशुभफल होता है। यदि गुरु दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ३, ११ में या शुभग्रह से युत हो तो राजकृपा से विविध प्रकार के वस्त्र, आभूषण का लाभ, विदेश गमन, बन्धुवर्ग का पालन तथा सुभोजन आदि का लाभ होता है। दशा के प्रारम्भ में कुछ शारीरिक कष्ट और अन्त में स्थान-हानि व कलह होता है। यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो अपमृत्यु का भय होता है। दोष शान्त्यर्थ शिवसहस्रनाम का पाठ तथा मृत्युञ्जय जप करने पर सब कष्टों का नाश होता है। केतुमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो तो पीड़ा, बन्धुकष्ट, मन सन्ताप, पशुओं की वृद्धि, राजकार्य से धन क्षय, स्थानभ्रष्टता, परदेश गमन तथा मार्ग में चोर का भय होता है। शनि यदि ८, १२ में हो तो आलस्य और धननाश होता है। यदि शनि मीन से त्रिकोण (कर्क-वृश्चिक) में, तुला में, अपनी राशि में, लग्न से केन्द्र-त्रिकोण में ३,११ में, शुभनवांश में अथवा शुभग्रह से युत दृष्ट हो तो सभी कार्य की सिद्धि, स्वामी से सुखलाभ, यात्रासुख, ग्रामसुख, सम्पत्ति की वृद्धि तथा अपने राजा का दर्शन होता है। यदि शनि दशेश से ६, ८, १२ में पापग्रह से युत हो तो शरीरकष्ट, मन में सन्ताप, कार्य में बाधा, आलस्य, मानहानि तथा मातृ-पितृ का मरण होता है। यदि शनि द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्यु भय होता है। दोष शान्त्यर्थ तिल से होम, काली गाय का दान तथा महिषदान करने पर आरोग्य होता है। केतुमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-केतु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या स्वोच्च में या स्वराशि में हो तो राज्यलाभ, सुख, सत्सङ्ग, दानादि धार्मिक कार्य, भूमि-पुत्र व धन का लाभ, विना प्रयास के हीं धर्म और विवाहादि शुभकृत्य, गृह में कल्याण तथा वस्त्र-आभूषण की प्राप्ति होती है। बुध यदि नवमेश या दशमेश के साथ हो तो भाग्योदय, विद्वानों के सङ्गत में सत्कथा द्वारा समय व्यतीत होता है। बुध यदि ६,८, १२ वें भाव में स्थित होकर शनि-भौम-राहु से युत दृष्ट हो तो अधिकारियों से वैर, पर गृहवास, वस्त्र, वाहन, पशु-धन आदि का नाश होता है। दशा के प्रारम्भ में कुछ शुभफल मध्य में विशेष सुख तथा अन्त में उपरोक्त अशुभफल अर्थात् स्त्री-पुत्रादि को कष्ट होता है।
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८८६ विंशोत्तरी दशा प्रकरण बुध यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ वें भाव में हो तो आरोग्यसुख, पुत्रसुख, ऐश्वर्यवृद्धि, भोजन-वस्त्र की प्राप्ति तथा व्यापार से अधिक लाभ होता है। बुध यदि दशेश से ६, ८, १२ वें भाव में स्थित होकर निर्बल रहे तो अन्तर्दशारम्भ में कष्ट स्त्री-पुत्र को पीड़ा व राजभय, मध्य में तीर्थयात्रा होती है। बुध यदि बुध द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो अपमृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ विष्णुसहस्त्रनाम का जप करने पर भगवान् की कृपा से सुख प्राप्त होता है।
शुक्रमहादशा में सभी ग्रहों की अन्तर्दशा फल शुक्रमहादशा में शुक्रान्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा हो और शुक्र यदि लग्न से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ भाव में होकर बली हो तो विप्र द्वारा धन-पशु (गौ) आदि की प्राप्ति, घर में पुत्रोत्सव, कल्याण, राजसम्मान तथा पद लाभादि से अधिक सुख होता है। यदि शुक्र स्वोच्च में या स्वराशि में या उच्चांश में या नवमांश में हो तो नूतन गृह का निर्माण, मिष्टान्न भोजन, स्त्री-पुत्र को सुख, मित्र का सङ्ग, अन्नदानादि धर्म कार्य, राजा की कृपा, वस्त्र, वाहन, आभूषण का लाभ, व्यापार में सिद्धि, पशुओं की वृद्धि और पश्चिमदिशा की यात्रा से वस्त्रादि का लाभ होता है। यदि शुक्र लग्न से ३, ६, ११ में हो और शुभग्रह से युत दृष्ट हो या मित्र के नवांश में हो उच्चस्थ हो लाभेश या योगकारक ग्रह से युत हो तो राज्यलाभ, उत्साह, राजकृपा, गृह में कल्याण और स्त्नी-पुत्र धन आदि की वृद्धि होती है। यदि शुक्र ६,८, १२ वें भाव में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो चोर व्रण आदि का भय, स्वजनों को कष्ट, राज्याधिकारियों से द्वेष, मित्र और बन्धुओं का नाश तथा स्त्री-पुत्र को कष्ट होता है। यदि शुक्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो मृत्युभय होता है। दोष शान्त्यर्थ दुर्गापाठ और गोदान करना चाहिए। शुक्रमहादशा में सूर्यान्तर्दशा का फल- शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा हो और सूर्य यदि अपने उच्च या नीच से अन्यत्र हो तो मनसन्ताप, राजकोप और बन्धुवर्ग से कलह होता है। सूर्य यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न अथवा शुक्र से केन्द्र- त्रिकोण में या २, ११ भाव में हो तो राज्य, धन, स्त्रीसुख, लाभ, स्वामी से सुखलाभ, मित्रों का समागम, माता-पिता और स्त्री से सुख, कीर्ति, सौभाग्य
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भृगु संहिता फल दर्पण ८८७ की वृद्धि और पुत्रलाभ होता है। सूर्य यदि ६,८, १२ वें भाव में या नीचराशि में या पापग्रह की राशि में हो तो कष्ट, सन्ताप, परिजनों को पीड़ा, कटुवाणी, पितृकष्ट, बन्धुहानि, राजकोप, गृह में भय, विविध रोग और कृषि आदि नष्ट होता है। सूर्य यदि सप्तमेश या द्वितीयेश हो तो ग्रह बाधा होती है। बाधा शान्त्यर्थ सूर्य की आराधना करनी चाहिये। शुक्रमहादशा में चन्द्रान्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा हो और चन्द्र यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र- त्रिकोण में या ११वें भाव में नवमेश से या शुभग्रह से या दशमेश से युत हो तो राजा की कृपा से वाहन-वस्त्र व धन का लाभ, गृह में सुख, ऐश्वर्यलाभ तथा देव-ब्राह्मण में भक्ति होती है। गायकों वादकों का एवं विद्वानों का संग तथा अलंकार-गौ-भैंस आदि पशुओं का लाभ, व्यवसाय में विशेष फल तथा भाइयों के साथ भोजन-वस्त्रादि का सुख होता है। चन्द्र यदि नीचराशि में या अस्त या लग्न अथवा दशेश से ६,८, १२ में हो तो उसकी अन्तर्दशा में धननाश, भय, शरीरकष्ट, मन सन्ताप, राजकोप, विदेश गमन या तीर्थयात्रा, स्त्री-पुत्रादि को कष्ट और बन्धुवियोग होता है। यदि दशेश से केन्द्र में या त्रिकोण में या ११, ३ में चन्द्र रहे तो राजा की कृपा से देश या ग्राम का स्वामित्व, धैर्य, सुयश, वस्त्रादि से सुख, जलाशय निर्माण और धन की वृद्धि होती है। दशा के प्रारम्भ में शरीरसुख होता है और दशा के अन्त में क्लेश होता है। शुक्रमहादशा में भौमान्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में भौम की अन्तर्दशा हो और भौम यदि केन्द्र में या त्रिकोण में या स्वोच्च में या स्वराशि में या लाभ भाव में बली हो या लग्नेश कर्मेश या भाग्येश से युत हो तो राज्यलाभ-सम्पत्ति-वस्त्र-आभूषण, भूमि आदि इच्छित वस्तु के लाभ से सुख होता है। भौम यदि लग्न या दशेश से ६, ८ में रहे तो शीतज्वर से कष्ट, माता- पिता को ज्वर रोग से कष्ट, स्थानहानि, कलह, राजा से विरोध, राजपुरुषों से द्वेष तथा धन का अपव्यय होता है। यदि भौम द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो व्यापार में क्षति, ग्राम-भूमि आदि का ह्रास और शरीरकष्ट होता है। शुक्रमहादशा में राह्वन्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में राहु की अन्तर्दशा हो और राहु यदि केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या स्वोच्च में या स्वराशि में होकर शुभग्रह से युत-दृष्ट हो तो अधिकसुख, धनलाभ, इष्टमित्रों का
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८८८ विंशोत्तरी दशा प्रकरण आगमन, यात्रा से कार्यसिद्धि तथा पशुलाभ व भूमिलाभ होता है। यदि राहु लग्न से ३,६, १०, ११ में हो तो सुख, शत्रुनाश, उत्साहवृद्धि, राजाकृपा, दशा के प्रारम्भ में ५ मास तक शुभफल होता है और अन्त में ज्वर तथा अजीर्ण रोग का भय, कार्य व्यापार व यात्रा में विघ्न एवं मन में चिन्ता होती है परन्तु राजा के तुल्य अन्य सुख होता है। नैरऋत्य दिशा में विदेश गमन से कार्यसिद्धि होती और वह कुशलपूर्वक घर आता है। ब्राह्मणों का उपकार और तीर्थयात्रा आदि का पुण्यफल प्राप्त होता है। राहु यदि दशेश से ८, १२ में पापग्रह से युत हो तो माता-पिता और स्वजनों का अशुभ होता है, लोगों से मनोमालिन्य होता है। यदि राहु द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो देह में आलस्य (रोग) होता है, दोष शान्त्यर्थ मृत्युञ्जय का जप करना चाहिए। शुक्रमहादशा में गुर्वन्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा हो और गुरु यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या लग्न से केन्द्र में या ९, ५ में हो तो नष्टराज्य की प्राप्ति, इच्छित अन्न-वस्त्र का लाभ तथा मित्र और राजा से सम्मान, धन प्राप्ति, सुयश लाभ, वाहन लाभ, विद्वान् का समागम, शास्त्र अध्ययन में विशेष परिश्रम, पुत्रजन्म, सन्तोष, इष्ट-मित्रों का आगमन, मातृ- पितृ सुख तथा पुत्रसुख होता है। दशेश से यदि ६,८, १२ में पापग्रह से युत होकर गुरु रहे तो राजा व चोर से पीड़ा, परिजनों को क्लेश, कलह, मनोव्यथा, स्थानहानि, विदेशगमन और अनेक रोगों का भय होता है। यदि गुरु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो कष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ - महामृत्युञ्जय का जप करना चाहिए। शुक्रमहादशा में शन्यन्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा हो और शनि यदि स्वोच्च में या स्वराशि में या केन्द्र त्रिकोण में या स्वनवांश में रहे तो विशेष सुख, मित्र-बन्धुओं का आगमन, राजा से सम्मान, कन्याजन्म-तीर्थस्नान दर्शन का फल तथा राजा से अधिकार प्राप्त होता है। यदि गुरु नीच राशि में रहे तो कष्ट होता है। (यदि नीच राशि में गुरु हो तो) आलस्य तथा लाभ रो अधिक व्यय होता है। दशेश से या लग्न से ८, १२ या ६ में गुरु हो तो प्रारम्भ में विविध कष्ट, मातृ-पितृ पीड़ा, स्त्री-पुत्र को क्लेश, विदेश यात्रा, व्यापार में हानि तथा पशुओं का नाश होता है। गुरु यदि द्वितीयेश या सप्तमेश रहे तो शरीर में क्लेश होता है। उपरोक्त दोष शान्त्यर्थ तिलहोम, मृत्युञ्जय का जप, दुर्गासप्तशती का पाठ, स्वयं अथवा ब्राह्मण द्वारा कराने पर शिव की कृपा से सुख होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८८९ शुक्रमहादशा में बुधान्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो और बुध यदि केन्द्र में या त्रिकोण में या ११ में या स्वोच्च में या स्वराशि में हो तो भाग्योदय, पुत्रजन्म, न्याय से धन प्राप्ति, पुराण कथा श्रवण, रसज्ञ लोगों का साथ, इष्ट-मित्रों का आगमन, अपने अधिकारी से सुख तथा मिष्टान्न भोजन होता है। यदि बुध दशेश से ६, ८, १२ में रहे तो बलहीनता, पापग्रह से युक्त हो तो पशुओं की हानि, परगृहवास तथा सभी कार्य व्यापार में अवश्य ही क्षति होती है। अन्तर्दशा के प्रारम्भ में शुभफल, मध्य में मध्यम फल और अन्त में शीतवातज्वरादि से क्लेश होता है। यदि बुध सप्तमेश या द्वितीयेश हो तो शरीर में पीड़ा होती है। दोषशान्त्यर्थ विष्णुसहस्त्रनाम का जप करना चाहिये। शुक्रमहादशा में केत्वन्तर्दशा का फल-शुक्र की महादशा में केतु की अन्तर्दशा हो और केतु यदि स्वोच्च में, स्वराशि में या योगकारक ग्रह से सम्बन्धित हो या स्थानबल से युत हो तो प्रारम्भ में शुभफल, मिष्टान्न भोजन, व्यापार में अधिक लाभ-पशुओं की वृद्धि, धन-धान्य की वृद्धि तथा युद्ध में विजय होती है। अन्तर्दशा के अन्त में शुभफल होता है। अन्तर्दशा के मध्य में मध्यम फल तथा बीच में कभी-कभी कष्ट होकर ठीक हो जाता है। यदि केतु दशेश से ८, ११ में या पापग्रह से युत हो तो चोर, सर्प और व्रण का भय, बुद्धिनाश, मस्तकपीड़ा, मनोसन्ताप, अनायास कलह, प्रमेहरोग, अधिक खर्च, स्त्री-पुत्र से कलह, विदेशगमन और कार्यनाश होता है। यदि केतु द्वितीयेश या सप्तमेश हो तो शरीरकष्ट होता है। दोष शान्त्यर्थ मृत्युञ्जय का जप तथा छागदान व शुक्र की शान्ति करने पर सुख होता है। इस सबका सारांश यह है कि, दशेश और अन्तर्दशेश दोनों की जन्मकालिक और दशारम्भकालिक स्थिति देखकर ही शुभाशुभ योग- अयोग का विचार करते हुए दोनों के सम्बन्धानुसार दशा-अन्तर्दशा का फल विचार करना चाहिये।
उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण पहले ही ग्रह प्रकरण में सूर्यादि ग्रहों की उच्चराशि, मूलत्रिकोण राशि, स्वराशि, मित्र-शत्रु-नीच आदि राशि बतलाये जा चुके हैं। यहाँ पर कुण्डली में जिस किसी भी भाव या घर में यदि गह अपनी उच्च, मूलत्रिकोण - आदि राशि में होकर किस प्रकार कैसा फल देता है, उसे प्रदर्शित किया जा रहा है-
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८९० उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण
उच्चस्थ सूर्य व चन्द्र फल- किसी भी जातक के जन्म काल में सूर्य उच्च राशि में स्थित हो तो जातक अत्यन्त उग्र स्वभाव, धनाढ्य और सर्वश्रेष्ठ होता है। यदि चन्द्रमा उच्चस्थ हो तो सुन्दर (सुखादु) भोजन करने वाला, सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से विभूषित होता है।
उच्चस्थ सूर्य उच्चस्थ चन्द्र
२ १२ ३ १ ३ १ सू. ११ ४ २ चं. १२
४ १० ५ ११
५ ७ ९ ६ ८ १०
६ ८ ७ ९
उच्चस्थ भौम व बुध फल- यदि जन्मपत्री में मंगल उच्चस्थ हो तो जातक तेजस्वी, कुत्सित पुत्रों वाला दुःसाहसी, घमण्डी और घर से बाहर रहने वाला (प्रवासी) होता है। यदि बुध अपने उच्च राशि में हो तो वह व्यक्ति अत्यन्त बुद्धिमान्, कुलाढ्य धनी, वाक् पटु होता है।
उच्चस्थ मङ्गल उच्चस्थ बुध
११ ७ ५
१२ १०मं. ८ ८ ६ बु
१ ७ ३
२ ४ ६ १० १२ २
३ 4 ११ १
उच्चस्थ गुरु व शुक्र फल- यदि जन्मकाल में गुरु उच्चस्थ हो तो वह जातक सुविख्यात, वैभव वाला, विद्वान्, मान्य और चतुर (चालक) होता है। यदि शुक्र उच्चस्थ दहो तो वह जातक विलासी (भोगस्त) हास्यप्रिय, गायन और नृत्य में लीन होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८९१ उच्चस्थ गुरु उच्चस्थ शुक्र
५ ३ १ ११
६ ४ गु. २ २ १२ शु. १०
७ १ ३ ९
८ १० १२ ४ ६ ८ ९ ११ ५ ७
उच्चस्थ शनि फल- यदि जन्मकालावधि शनि उच्चस्थ हो तो जातक राज पक्ष से नियुक्ति का अधिकार प्राप्त करने वाला, ग्राम और नगर का स्वामी तथा जंगली अन्न तथा दुःवरित्रा स्त्री वाला होता है। उच्चस्थ शनि
८ ६
९ ७ श. ५
१० ४
११ ३ 2
१२ २
मूलत्रिकोणस्थ सूर्य व चन्द्र फल- यदि जन्म काल में सूर्य मूल त्रिकोण में हो तो जातक धनवान, प्रधान और अधिक चतुर होता है।
और गुणी होता है। इसी प्रकार चन्द्रमा मूल त्रिकोण में हो तो वह व्यक्ति भोग करने वाला
मूलत्रिकोणस्थ सूर्य मूलत्रिकोणस्थ चन्द्र
४ ३ १ ६
७ ५ सू. ३ ४ २ चं. १२
८ २ ५ ११
६ ८ १० ९ ११ १
१० १२ ७ ९
मूलत्रिकोणस्थ भौम व बुध फल- यदि जन्म काल में मंगल मूल त्रिकोण में हो तो जातक चौराधिपति,
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८९२ उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण
वीर और दया रहित होता है। यदि बुध हो तो हास्यप्रिय और विजय श्री प्राप्त करने वाला होता है। मूलत्रिकोणस्थ मंगल मूलत्रिकोणस्थ बुध
२ १२ ७ ५ ३ १ मं. ११ ८ ६ बु. ४
४ १० ९ ३
९ १० १२ ५ ७ २
६ ८ ११ १
मूलत्रिकोणस्थ गुरु व शुक्र फल- यदि जन्म काल में गुरु अपने मूल त्रिकोण में हो तो जातक अच्छा कार्यकर्त्ता सर्वश्रेष्ठ नीतिज्ञ और सुखी होता है। यदि शुक्र हो तो गाँव, नगर का प्रधान धनाढ्य और भाग्यशाली होता है। मूलत्रिकोणस्थ गुरु मूलत्रिकोणस्थ शुक्र
६ ९ ७ L
१० ८ गु. ९ ७ शु ५
१० ११ ५ ४
४ ११ १ ३ १२ २ १ ३ १२ २
मूलत्रिकोणस्थ शनि फल- यदि जन्म काल में शनि मूल त्रिकोणस्थ हो तो वह व्यक्ति धन से धनवान कुल से युत और वीर होता है। मूलत्रिकोणस्थ शनि
११ ९
१२ १०श. ८
१ ७
२ ४ ६ ३ ५
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भृगु संहिता फल दर्पण ८९३ स्वराशिस्थ सूर्य, चन्द्र व भौम फल- यदि जन्म काल में सूर्य स्वराशिगत हो तो जातक बड़ा उग्र तथा श्रेष्ठ कार्य करने वाला होता है। यदि चन्द्रमा स्वराशि में हो तो जातक धर्मात्मा, मनस्वी, रूपवान् होता है। यदि मंगल अपनीराशि अर्थात् मेषवृश्चिक में हो तो वह व्यक्ति धनी क्रोधी और स्थिर स्वभाव वाला होता है।
स्वराशिस्थ सूर्य स्वराशिस्थ चन्द्र स्वराशिस्थ मङ्गल
२ १२ २ १२ २ १२ ३ ११ 3 १ ११ ३ १ मं. ११
४ १० ४ चं. १० ४ १०
५ सू. ७ ९ ५ ७ ९ ५ ९ ६ ८ ८ ६ ८ म.
स्वराशिस्थ बुध व गुरु फल- यदि जन्म काल में बुध स्वराशि (३, ६) में हो तो वह व्यक्ति सुन्दर वाणी वाला, पण्डित (विद्वान्) होता है। यदि गुरु स्वराशि में हो तो वह व्यक्ति वेद शास्त्र का ज्ञाता, धनाढ्य, उच्च कामनाओं वाला होता है।
स्वराशिस्थ बुध स्वराशिस्थ गुरु
२ १२ २ १२गु.
३ बु. १ ११ ३ १ ११
४ १० ४ १०
५ ७ ५ ७ ९ ९गु. ८ ६ बु. ८ ६
स्वराशिस्थ शुक्र व शनि फल- यदि जन्म काल में शुक्र स्वराशिगत हो तो जातक कृषक और
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८९४ उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण धनाढ्य होता है। यदि शनि स्वराशि में हो तो जातक सम्माननीय दुःख रहित होता है। स्वराशिस्थ शुक्र स्वराशिस्थ शनि
१२ २ २ २ शु. श ३ १ ११ ३ १ ११
४ १०
५ ९ ५ ७ शू. ६ ८ ६ ८
मित्रगृहस्थ सूर्य व चन्द्र फल- यदि जन्म काल में सूर्य मित्र ग्रह हो तो स्थायी मित्रता करने वाला, धनदाता होता है। यदि चन्द्रमा अपने मित्र गृह में हो तो जातक बहुत सुख और सम्मान प्राप्त करने वाला होता है। मित्रगृहस्थ भौम व बुध फल- यदि जन्म काल में मंगल अपने मित्रग्रह में हो तो वह व्यक्ति धनरक्षक होता है। तथा यदि बुध मित्र ग्रह में हो तो जातक चतुर हँसने वाला और धनवान होता है। मित्रगृहस्थ गुरु व शुक्र फल- यदि जन्म काल में यदि गुरु मित्र ग्रहों की राशि में हो तो वह जातक सत्पुरुषों द्वारा सम्मान पाने वाला और सुन्दर विशिष्ट कार्य करने वाला होता है। मित्रगृहस्थ शनि फल-यदि जन्म काल में शनि मित्र गृह में बैठा हो तो जातक परात्र भोक्ता और नीच कार्यों में आसक्त होता है। यदि उक्तकाल में सूर्य नीच राशि में हो तो जातक सेवक और अपने भाई-बन्धुओं से तिरस्कार पाने वाला होता है। नीचस्थ सूर्य, चन्द्र व भौम फल-यदि चन्द्रमा नीचराशि अर्थात् वृश्चिक राशि में हो तो जातक स्वरूप पुण्य वाला, रोगग्रस्त और भाग्यहीन होता है। यदि मंगल नीच राशि में हो तो जातक अनर्थकर्त्ता व्यसनी और नीच होता है। नीच राशिस्थ सूर्य नीच राशिस्थ चन्द्र नीच राशिस्थ मङ्गल
२ १२ २ १२ २ १२ ११ ३ १ १६ १ मं. ३ ११
१० ४ मं. १० १० ४ ४
९ ५ ७ ९ ५ ७ सू. ५ ७ ९ ८ ८ चं. ६ ८ ६ ६
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भृगु संहिता फल दर्पण ८९५ नीचस्थ बुध गुरु फल- यदि जन्म काल में बुध अपनी नीच राशि में हो अर्थात् मीन राशि में बैठा हो तो वह जातक क्षुद्र तथा स्वजनों का शत्रु होता है। यदि गुरु नीचस्थ हो तो वह जातक मलिन, अपमानित और अत्यन्त दरिद्र होता है। नीच राशिस्थ बुध नीच राशिस्थ गुरु
२ १२बु २ १२ ३बु. १ ११ ३ १ ११
४ १० ४ १० गु.
५ ७ ९ 4 ७ ९ ६ ८ ६ ८
नीचस्थ शुक्र शनि फल- यदि जन्म काल में शुक्र नीचस्थ हो अर्थात् कन्या राशि में बैठा हो तो जातक पराधीन, पत्नीहीन विषम स्वभाव वाला होता है। यदि शनि नीचस्थ हो तो वह जातक विपत्तियों से परिब्याप्त निन्दित आचरण करने वाला और अर्थ से हीन होता है। नीच राशिस्थ शुक्र नीच राशिस्थ शनि
२ श १२ २ १२ ३ ११ ३ १ श. ११
४ १० ४ १०
५ ५ ७ ७ ९ ९ शु.६ ८ ६
शत्रुराशिस्थ सूर्य व चन्द्र फल- यदि जन्म काल में सूर्य शत्रु गृह में हो तो वह जातक धनहीन कामासक्त होता है। यदि चन्द्रमा शत्रुगृह में हो तो वह जातक हृदय रोग से पीड़ित होता है। शत्रुराशिस्थ भौम व बुध फल-जन्म काल में मंगल शत्रु गृह में हो तो वह जातक बन्धन (कारागार) शत्रुद्वारा आघात सहने वाला धनहीन, अशान्त और भाग्यहीन होता है। यदि बुध शत्रुगृह में हो तो जातक अज्ञानी दुःखी और दरिद्र होता है। शत्रुराशिस्थ गुरु व शुक्र व शनि फल- यदि जन्म काल में गुरु रिपुराशि में
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८९६ उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण हो तो जातक नपुंसक, नीतिरहित, वधिर और अर्थहीन होता है। यदि शुक्र रिपुराशि में हो तो जातक नौकर खराब आचरण वाला, शोक संतप्त होता है। यदि शनि अपने शत्रु राशि में हो तो जातक कल्पुषित हृदय वाला, रोग दुख तथा शोक से सन्तप्त होता है। उच्च नीचादि नवांश में फल का न्यूनाधिक्य-अपने उच्च राशि के नवांश में बैठा हुआ ग्रह पूर्ण फल प्रदान करता है तथा अपने नवांश में स्थित ग्रह स्वराशि तुल्य फल अर्थात् पूर्ण फल प्रदान करता है।
देता है। अपने नीच अथवा शत्रु ग्रह के नवांश में विद्यमान ग्रह अशुभ फल
इसी प्रकार अपने मित्र ग्रह के राशि के नवांश में बैठा हुआ ग्रह मध्यम फल देता है। उच्च दो तीन ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में दो ग्रह उच्चस्थ हो तो जातक धनाद्य, यशस्वी होता है। यदि ३ ग्रह उच्चस्थ हो तो नगर का रक्षक, धनवान, सेनापति और यशस्वी होता है। उच्चस्थ चार पांच ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में चार ग्रह उच्चस्थ हो तो जन्म लेने वाला व्यक्ति धनाढ्य राजा से यश प्राप्त करने वाला राज धर्म से युक्त होता है। यदि पाँच ग्रह उच्चस्थ हो तो वह अत्यन्त सुविख्यात, राजप्रिय अनेक प्रकार से धन को वृद्धि करने वाला होता है। उच्चस्थ छः ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में छः ग्रह उच्च राशिगत हो तो वह जातक दान, मान और अनेक वाहनों से युक्त राजा होता है। समस्त ग्रह उच्चस्थ होने से फल- यदि जन्म कुण्डली में सभी ग्रह उच्चराशि में बैठे हो तो जातक समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का पालन कर्त्ता चक्रवर्ति सम्राट् होता है। स्वमूलत्रिकोण राशिस्थ दो ग्रहों के फल- यदि जन्म काल में २ ग्रह स्वमूल त्रिकोण में स्थित हो तो जन्म लेने वाला व्यक्ति बहुत परिवार वाला, कुल का विकास कर्त्ता, सर्वश्रेष्ठ और प्रख्यात यशस्वी होता है। स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ तीन व चार ग्रहों का फल-यदि जन्म काल में तीन अपने मूल त्रिकोण में हो तो जातक धनाढ्य समरूप ग्राम का प्रधान होता है। यदि ४ ग्रह अपने मूल त्रिकोणस्थ हो तो वह व्यक्ति, राजपक्ष से सम्मानित और संसार का प्रिय होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ८९७ स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ पाँच ग्रहों का फल-जन्म काल में पाँच अपने मूल त्रिकोण में हो तो जातक सेना ग्राम, नगर तथा राजा के खजाने का प्रधान रक्षक, बहुत परिवार वाला, बहुत सुखों से युत होता है। स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ छः ग्रहों का फल- जन्म के समय ६ ग्रह अपने मूल त्रिकोणस्थ हो तो जातक विद्वान्, दानी, धनी गोपवंशोत्पन्न और निश्चय ही प्रशासक होता है। समस्त ग्रह स्वमूलत्रिकोणराशिस्थ फल- यदि जन्म काल में सभी ग्रह मूल त्रिकोण में हो तो जातक अर्थ, पत्नी और शक्ति सम्पन्न, विद्या-शास्त्र विशारद होता है। स्वराशिस्थ दो व तीन ग्रहों का फल- जन्म काल के समय दो ग्रह स्वराशिस्थ हो तो वह व्यक्ति अपने कुल का श्रेष्ठ भाई बन्धुओं से आदर पाने वाला और श्लाघ्य होता है। यदि तीन ग्रह स्वराशिस्थ हो तो कुल वृद्धि करने वाला, धनाढ्य पद प्रतिष्ठा से सम्मानित होता है। स्वराशिस्थ चार व पांच ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में ४ ग्रह अपनी राशि में हो तो जातक विख्यात उच्च विचार वाला ग्राम नगर का प्रतिपालक होता है। यदि पाँच ग्रह स्वराशिस्थ हो तो गाय, भूमि और स्त्रियों से युक्त राजा के समान होता है। स्वराशिस्थ छः ग्रहों का फल- जन्म काल में ६ ग्रह स्वराशिस्थ हो तो वह जातक विख्यात यश वाला, कान्ति, अर्थ, स्वजन, अश्व सम्मान से युक्त राजकुलोत्पन्न सम्राट होता है। यदि ७ ग्रह हो तो शत्रु पक्ष को पराजय करने वाला राजा होता है। मित्रराशिस्थ दो, तीन व चार ग्रहों का फल- यदि जन्म कालावधि में दो ग्रह अपने मित्र राशि में हो तो वह व्यक्ति मित्र के आश्रय में रहने वाला और उत्तम चरित्र वाला होता है। यदि तीन ग्रह अपने मित्र की राशि में हो तो वह व्यक्ति भाई-बन्धु और मित्रों का उपकारी और अपने गुणों से सुप्रसिद्ध होता है। यदि चार ग्रह अपने मित्र गृह में हो तो देव द्विज की आराधना में तल्लीन धुरन्धर और सुप्रख्यात होता है। स्वमित्रराशिस्थ पांच, छः व सात ग्रहों का फल- यदि ५ ग्रह स्वमित्र गृह में हो तो वह व्यक्ति राजा का उपसेवक, राजा का कार्य करने वाला और धनाठ्य होता है। 5ै. सं .- ५७
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८९८ उच्चादिस्थ ग्रह प्रकरण यदि छः ग्रह स्वमित्र राशि में बैठे हो तो जातक भोगी, वाहन धन से युत राजतुल्य होता है। यदि सभी ग्रह स्वमित्र गृह में हो तो बहुत से वाहनों, नौकरों और साधन सम्पन्न सम्राट् होता है। स्वनीचराशिस्थ दो, तीन व चार ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में दो ग्रह अपने नीच राशि में हो तो वह व्यक्ति चिन्ता से तथा आग्रह से युक्त होता है। यदि तीन ग्रह नीचस्थ हो तो मूर्ख, अधार्मिक, धनहीन पर्यटन करने वाला भृत्य होता है। यदि चार ग्रह नीचस्थ हो तो आलसी, चेष्टारहित, और नौकर होता है। स्वनीचराशिस्थ पांच व छः ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में ५ ग्रह नीचस्थ हो तो जातक गृह-पत्नी रहित सेवक होता है। यदि ६ ग्रह नीचस्थ हो तो वह व्यक्ति घातभय से संन्तप्त; श्रम से दुःखी होता है। स्वनीचराशिस्थ सात ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में सात ग्रह नीचस्थ हो तो जातक भिखारी, उच्छिष्ट भोगी, नग्न रहने वाला, जीर्ण वस्त्र धारक धनहीन होता है। स्वशत्रु राशिस्थ दो ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में दो ग्रह अपने शत्रु गृह में हो तो जातक क्लेश से पीड़ित, नित्य कलह अथवा लड़ाई की इच्छा वाला तथा अपमान प्राप्त करने वाला होता है। स्वशत्रु राशिस्थ तीन व चार ग्रहों का फल- यदि कालावधि यदि तीन ग्रह स्वशत्रुराशि में हो तो वह अनेक प्रकार के व्यय से तङ्ग, दुखभोगकर्त्ता तथा श्रमोत्पादक धन को नष्ट करने वाला होता है। यदि जन्म काल की अवधि में ४ ग्रह शत्रुराशिगत हो तो वह जातक मित्र, पत्नी पुत्र, धन विनाश से संतप्त हृदय वाला होता है। स्वशत्रु राशिस्थ पांच व छः ग्रहों का फल-यदि ५ ग्रह अपने शत्रु ग्रह के गृह में बैठे हो तो वह व्यक्ति व्यसन और अभिघात से पीड़ित होता है। यदि ६ ग्रह स्वशत्रु राशिगत हो तो वह व्यक्ति रोगाक्रान्त और अत्यन्त दुःखी होता है। स्वशत्रु राशिस्थ सात ग्रहों का फल- यदि जन्म काल में ७ ग्रह स्वशत्रु गृह में विद्यमान हो तो जातक दुष्ट कुलोत्पन्न शय्या, वस्त्र तथा भोजन से रहित होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण स्त्रीजातक प्रकरण ८९९
पुरुष के लिये जिन फलों को कहा गया है, वे स्त्री के जन्म कुण्डली में भी समझना चाहिये। यहाँ स्त्रियों के जन्म कुण्डली का विशेषफल को सविस्तार प्रस्तुत करते हैं। भाव विशेषों से विशेष फल का ज्ञान- स्त्री की जन्म पत्री में अष्टम भाव से वैधव्य, लगन से शरीर, सप्तम से पति सौख्य और पञ्चम भाव से सन्तान का विचार करना चाहिए। पतिव्रता, सुशीला व रूपवती योग- किसी भी स्त्री की पत्री में लग्न और चन्द्रमा दोनों सम राशि में हो तो स्त्री सुशीला (पतिव्रता) और रूपवती होती है। यदि लग्न चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो सब सद्गुणों और आभूषणों से सुशोभित होती है। पुरुषाकृति योग- यदि लग्न चन्द्र विषम राशि में हो तो वह स्त्री पुरुष समान स्वभाव और आकृति वाली कुशीला और दुःख भागिनी होती है। यदि पापग्रह की दृष्टि या योग हो तो पापिनी और गुणहीना होती है। बली त्रिशांश फल-स्त्री की कुण्डली में लग्न और चन्द्रमा में से जो बलवान् हो वह यदि मंगल, शुक्र, बुध, गुरु या शनि के त्रिंशांभ में हो तो क्रम से आगे कहे गये फल को जानना चाहिये। भौम राशिस्थ त्रिंशांशों का फल- यदि स्त्री के पत्री में लग्न और चन्द्रमा मेष वृश्चिक अर्थात् मंगल की राशि में हो या मंगल के त्रिशांश में हो तो वह कुमारी अवस्था में ही दुषिता होती है। यदि भौमराशि में शुक्र के त्रिशांश में लग्न या चन्द्र हो तो गलत आचरण वाली तथा मंगल राशि में बुध के त्रिंशांश में लग्न चन्द्र हो तो स्त्री माया चार करने वाली होती है। बुध की राशि में त्रिशांशों का फल- यदि स्त्री की कुण्डली में इन दोनों में
है। बलवान् मंगल की राशि में, गुरु के त्रिंशांश में हो तो वह स्त्री सुशीला होती
यदि मंगल के घर में शनि का त्रिंशांश हो तो स्त्री दासी होती है। यदि बलवान् लग्नेश या चन्द्रमा बुध की राशि मिथुन, कन्या में मंगल के त्रिशांश - में हो तो वह नारी कष्ट करने वाली होती है। यदि शुक्र के त्रिंशांश में हो तो अधिक काम की इच्छा करने वाली, बुध के त्रिंशांश में गुणवती होती है। शुक्र की राशि में त्रिशांशों का फल- यदि गुरु का त्रिंशांश हो तो सती अर्थात् पतिव्रत धर्म को निर्वाह करने वाली, एवं बुध की राशि में बली
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९०० स्त्रीजातक प्रकरण लग्नेश या चन्द्रमा शनि के त्रिंशांश में हो तो स्त्री नपुंसक (क्लेश) होती है। इसी प्रकार यदि बलवान् लग्नेश या चन्द्रमा शुक्र की राशि अर्थात् वृष और तुला में मंगल के त्रिंशांश में हो तो स्त्री दुष्टा तथा शुक्र के त्रिंशांश में हो तो अत्यन्त गुणवती होती है। यदि बुध का त्रिंशांश हो तो सभी कलाओं में चतुर होती है। कर्क व सिंह राशि में त्रिशांशों का फल- यदि गुरु का त्रिंशांश हो तो गुणों से युक्ता और राशि में लग्नेश और चन्द्रमा के होने पर यदि शनि का त्रिंशांश हो तो पतिधातिनी होती है। यदि लग्नेश और चन्द्र दोनों मंगल के त्रिंशांश में हो तो अधिक बोलने वाली होती है तथा शुक्र के त्रिंशांश में हो तो पतिव्रता होती है। इसी प्रकार यदि बुध के त्रिंशांश में हो तो पुरुष की तरह इच्छा वाली तथा गुरु के त्रिंशांश में रानी और सिंह राशि में शनि का त्रिंशांश हो तो अपने कुल से पृथक् होती है तथा गुरु की राशि में बली लग्नाधीश या चन्द्रमा मंगल के त्रिंशांश में हो तो अधिक गुण वाली होती है। इसी प्रकार शुक्र में अधिक बोलने का व्यसन रखने वाली होती है। गुरु व शनि की राशि में त्रिशांशों का फल- यदि बुध के त्रिंशांश में हो तो विज्ञान की जानकारी रखने वाली अर्थात् विज्ञानवेत्ता, गुरु में गुण वाली, तथा शनि में अल्प काम सुख देने वाली होती है। इसी प्रकार यदि कोई स्त्री शनि राशि अर्थात् मकर कुम्भ में हो तो वह दासी होती है। यदि शुक्र के त्रिंशांश में लग्नेश और चन्द्र हो तो बुद्धिमति, बुध में दुष्टा, गुरु में पतिव्रता तथा शनि में दुष्टों का सेवन करने वाली होती है। स्त्री-स्त्री संभोग ज्ञान-यदि कन्या की पत्री में शुक्र, शनि के नवमांश में हो और शनि, शुक्र के नवमांश में हो तथा दोनों की परस्पर दृष्टि हो तो वह कामातुर होकर दूसरी स्त्री के भग के ऊपर रबर का लिंङ्ग बॉध कर अपनी काम की अग्नि को शमन करती है। सप्तम भाव का फल-सप्तम भाव में कोई ग्रह नहीं हो तो उस स्त्री का पति तुच्छ पुरुष होता है। सप्तमभाव पर शुभग्रह की दृष्टि नही हो तो पति बलहीन, सप्तम भाव में चर राशि हो तो पति बाहर रहने वाला, बुध, शनि हो तो नपुंसक होता है। अन्य सप्तम भाव का फल-सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसे पति छोड़ देता है। मङ्गल हो तो बालविधवा, शनि हो तो कुमारी ही वृद्धा हो जाती है। सप्तम भाव में बलहीन पापग्रह हो उस पर पाप की दृष्टि हो तो पति से छोड़ दी जाती है। सबल पाप ग्रह हो तो विधवा होती है, शुभ और पाप दोनों हो
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भृगु संहिता फल दर्पण ९०१ तो पुनर्भू होती है। परपुरुषासक्त योग- मङ्गल और शुक्र एक दूसरे नवमांश में चन्द्रमा हो तो पति की आज्ञा से परमुरुष गामिनी होती है। माता के साथ कुलटा योग- शनि या मङ्गल की राशि में शुक्र के साथ चन्द्रमा यदि लग्न में हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो वह स्त्री माता सहित कुलटा होती है। सरोग नीरोग भोग का ज्ञान-सप्तम भाव में मङ्गल का नवांश हो और चन्द्रमा से दृष्ट हो तो वह स्त्री रोग युक्त योनि वाली होती है। शुक्र का नवमांश हो तो सुन्दर भग वाली और पति की प्रिया होती है। सप्तम भावस्थ शनि, भौम राशि व नवांश फल- यदि किसी भी स्त्री की पत्री में सप्तम भाव में शनि के घर में अर्थात् मकर, कुम्भ राशि अथवा नवमांश हो तो उस स्त्री का पति वृद्ध या मूर्ख होता है। यदि मंगल की राशि अर्थात् मेष, वृश्चिक के नवांश में हो तो स्त्री का पति स्त्री के तरह आचरण करने वाला और क्रोधी होता है। सप्तम भावस्थ शुक्र, बुध राशि व नवांश फल- यदि किसी भी स्त्री की पत्री में सप्तम में शुक्र की राशि अर्थात् वृष, तुला हो या नवांश हो तो उसका पति रूपवान् और भाग्यशाली होता है। यदि उक्त सप्तम भाव में बुध के गृह (मिथुन कन्या) में या इनके नवांश में हो तो स्त्री का भर्त्ता अत्यन्त चतुर और वैज्ञानिक होता है। सप्तम भावस्थ चन्द्र, गुरु राशि व नवांश फल-किसी भी स्त्री जातक के पत्री में सप्तम में चन्द्रमा की राशि कर्क या इसका ही नवांश हो तो स्त्री का पति काम से पीड़ित और सत्यन्त सरल स्वभाव वाला होता है। यदि धनु, मीन अर्थात् गुरु के घर में या गुरु के नवांश में हो तो स्त्री का पति गुणवान् और अपने इन्द्रियों को वश में रखने वाला होता है। सप्तम भावस्थ सूर्य राशि व नवांश फल- यदि किसी भी स्त्री के जन्म पत्री में सप्तम भाव में सूर्य राशि या सूर्य का नवांश हो तो उस स्त्री का पति अधिक परिश्रम करने वाला अत्यधिक तीक्ष्ण अर्थात् तीखा स्वभाव वाला होता है। लग्नस्थ ग्रहों का फल- यदि किसी भी स्त्री के पत्री में लग्नस्थ शुक्र के साथ चन्द्रमा हो तो ईर्ष्या वाली और अपना ही सुख चाहने वाली होती है। बुध सहित चन्द्रमा लग्न में हो तो वह स्त्री सुखी, कलाओं में निपुणा, गुणवती यदि बुध, शुक्र लग्नस्थ हो तो सुन्दरी, सौभाग्यवती, कलाओं में निपुण होती है। लग्न में शुभग्रह हो तो अन्न वस्त्र और दासियों से युक्त होती
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९०२ नष्ट जातक प्रकरण है, पापग्रह लग्न में हो तो दुःखभागिनी कुरूपा, कुशीला होती है। लग्नस्थ ग्रहों का फल- यदि स्त्री के जन्माङ्ग में अष्टभाव में पापग्रह बैठे हो तो वह स्त्री विधवा होती है। अष्टमेश ग्रह जिस ग्रह के नवांश में हो उसी ग्रह की दशान्तर्दशा में आने पर वह स्त्री विधवा होती है। यदि पापग्रह अष्टमस्थ हो और शुभ ग्रह द्वितीयस्थ हो तो पति के पूर्व स्त्री का मरण होता है। अल्पपुत्र योग- यदि स्त्री के जन्म पत्रिका में पंचम भाव में शुभग्रह से युक्त चन्द्रमा कन्या या वृश्चिक अथवा वृष या सिंह में राशि में हो तो स्त्री थोड़े पुत्र वाली होती है। यदि शुभ ग्रह से दृष्ट चन्द्रमा हो तो भी अल्प पुत्र वाली होती है। पुरुषाकृति योग- यदि स्त्री के पत्री में विषमराशि लग्न हो बुध, चन्द्र, शुक्र निर्बल हो, शनि मध्यबली और शेष ग्रह बलवान् हो तो स्त्री पुरुषाकृति और पुरुष सदृश आचरण वाली विश्व में विख्याता होती है। संन्यासिनी योग- यदि स्त्री के पत्री में सप्तमभाव में पापग्रह हो तथा नवम भाव में यदि कोई ग्रह हो तो सप्तमस्थ पापग्रहजनित प्रव्रज्या होती है अर्थात् वह स्त्री संन्यासिनी होती है। ब्रह्मवादिनी योग- यदि स्त्री के जन्मकाल में बली बुध, गुरु, शुक्र और चन्द्रमा समराशिगत लग्न में हो तो वह स्त्री ब्रह्मवादिनी (वेद) और अनेक शास्त्र को जानने वाली होती है। इस प्रकार उपर्युक्त योग स्त्री के जन्मकाल, विवाह और प्रश्नादिकाल में विचार करना चाहिये।
नष्टजातक प्रकरण जिसका जन्म या गर्भाधान काल अज्ञात हो उसके लिये प्रश्नकाल से आगे कहे हुए विकल्प द्वारा जन्म समय कल्पना करना चाहिये। सूतिका निरूपण के लग्न तथा ९ ग्रह इन दशों के लक्षण से जातक के स्वरूप और स्वभाव के जो चिह्न (लक्षण) कहे गये हैं, उन लक्षणों को देखकर तदनुसार जन्मकालिक लग्नादि का ज्ञान करना चाहिये। मेष लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान-मेष लग्न में जन्म लेने वाला जातक अत्यन्त क्रोधी, प्रवासप्रिय, लोभी, शरीर से दुर्बल, अल्पसुखी, ईर्ष्यालु, चञ्चल, पित्त, वात और अधर रोग से युक्त, कार्यकुशल एवं भीरु (डरपोक) होता है। मेष राशि में जातक धर्मात्मा, चञ्चल, अल्प बुद्धि, परोपकारी, भोगी,
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भृगु संहिता फल दर्पण ९०३ विख्यात, खराब नख वाला, भातृहीन, पिता से त्यक्त, शीघ्रगामी, अल्पपुत्र, अनेक प्रकार के धन वाला, सुशील होता है। कुलहीना स्त्री का पति, अनुचित रीति से धन और सुख चाहने वाला होता है। वृष लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- वृष लग्न में जन्म लेने वाला वीर, कष्ट सहने वाला, सुखी, शत्रुजेता, बाल्यावस्था से ही धन संग्राही, विस्तार और पुष्ट नासिका, कपोल और ओष्ठ वाला, कार्य में तत्पर, सुन्दर, माता पिता का भक्त, दानी, व्ययशील, भयानक, कफ और वात प्रकृत वाला, अधिक कन्या सन्तान वाला, अपने कुटुम्ब का अपमान करने वाला, धर्मविमुख, स्त्री प्रिय, चञ्चल, खाने पीने का शौकीन, विविध प्रकार के वस्त्र आभूषणों से युक्त होता है। मिथुन लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- मिथुन लग्न में जातक भूषण वस्त्रादि में स्त्री में प्रेम रखने वाला, लोक में मान्य, प्रिय वचन बोलने वाला, दो माता वाला, शत्रुओं से भी प्रेम करने वाला, सङ्गीत और शिल्प जानने वाला, वेद शास्त्रज्ञ, हास्यप्रिय, कवि, प्रसन्नचित्त, अलंकार प्रिय, गौरववान्, सत्यवक्ता, किसी की बात न सहने वाला, कुत्सित पुत्र वाला, कठोर चित्त, थोड़े भाई वाला, न्यूनाधिक अङ्ग (अङ्गुली आदि) वाला, विनीत और गोल नेत्रवाला, चण्ड (सकोप) आकार वाला, लोगों का वश्य, बड़े शत्रुओं को जीतने वाला, भूमि, रत्न, सुवर्ण और जलोत्पन्न धन का भागी होता है। कर्क लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- कर्क लग्न में जातक डरपोक, अनेक स्थान में वास करने वाला, चञ्चल बुद्धि, मेधावी, अधिक भार ढ़ोने वाला, गुप्तरोग से पीड़ित शत्रु को जीतने वाला, हृदय का कुटिल, कामी, ब्राह्मण और देवता का भक्त, दानी, धर्मात्मा, कफ प्रकृति, स्त्री सदृश शरीर वाला, गुणों से पूज्य, अपनी बहनों से छोटा, सहोदर भाई से रहित, अल्प पुत्र, कुत्सित परिवार वाला, परधन भागी, दृढ़ प्रतिज्ञ, परदेशी, धैर्यवान्, साहसी जल से धन लाभ करने वाला, स्त्री सुख भोग से संयुक्त होता है। सिंह लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- सिंह लग्न में जातक मांसप्रिय, राजा से आदर और धन पाने वाला, धर्मविमुख, अपने कुटुम्बो के कार्य करने में अशक्त, सिंह के समान मुख वाला, स्थिर, गम्भीर, बली, ढीठ, मितभाषी, लोभी दूसरे का आघात करने वाला, सर्वदा भोजन की इच्छा वाला, वन और पर्वत पर विहार करने वाला, रोषवान्, दृढ़मैत्री वाला, असावधान, दुर्धर्ष, शत्रु जेता, विख्यात पुत्र वाला, साधुओं का भक्त,
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९०४ नष्ट जातक प्रकरण कृषि आदि कर्म से धनी, व्यापारी, वेश्या, नदी आदि से प्रेम में तथा अपनी स्त्री के कारण एवं दाँत के रोग के हेतु बहुत खर्च करने वाला होता है। कन्या लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- कन्या लग्न में उत्पन्न जातक साधु, सङ्गीत, काव्य, चित्रकला में निपुण, प्रियभाषी, विनीत, दानी, कुमारियों के साथ विलास करने वाला, सत्वगुणी, दयालु, परधनभोगी, रोग से आक्रान्त, विदेश भ्रमणशील, स्त्रीस्वभाव, मृदुभाषी, धूर्त, भूमि को बढ़ाने (उपार्जन करने) वाला, सौभाग्यशाली, कामी, यशस्वी, धर्मात्मा, सुन्दर, मनोहर, गुरुजनों का भक्त, पापकर्मरत, सहोदरों से विरुद्ध, कन्या सन्तति वाला, बात कफ प्रकृति वाला, नीच और शत्रुओं से बात करने वाला होता है। तुला लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान-तुला लग्न में जन्म लेने वाला मनुष्य कुटिल देह, दुष्ट स्वभाव, चञ्चल, धन में ह्रास और वृद्धि वाला, शरीर सुख से हीन, कफ, वात प्रकृति, कलहप्रिय, लम्बा मुख शरीर वाला, धर्मवान्, मतिमान्, दुःखी, मेधावी, शत्रु को जीतने वाला, सुन्दर नेत्र, अतिथि, विप्र और देव का भक्त, यज्ञकर्त्ता, गुरु भक्त, अनाथों का धर्मपिता (पालक), सत्य प्रिय, कोमल देह, गौरवर्ण, भाइयों का स्नेही, धनवान, पवित्र, किन्तु पापाचरण बन्धु वाला, दाता, निन्द्य व्यापार करने वाला तथा धर्म व्यापारी और अल्प बुद्धि वाला होता है। वृश्चिक लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान-वृश्चिक लग्न में उत्पन्न जातक मोटा, लम्बा चौड़ा शरीर, तेजस्वी, हृदय का कुटिल, माता का भक्त, सग्रामप्रिय, दाता, गम्भीर, पिङ्गल नेत्र विस्तृत वक्ष:स्थल संकुचित पेट, चिंपटा नाक, साहसी, स्थिर, क्रोधी, विश्वासी, हास्यप्रिय, पित्तरोग से पीड़ित, परिवार से परिपूर्ण, गुरुजनों का द्रोही, परस्त्रीगामी, सुन्दर मुख, राजा का सेवक, शत्रु वाला, संयमी, धनी, सुन्दरी स्त्री वाला, धर्म प्रिय परन्तु क्रूर होता है। धनु लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान-धनु लग्न में उत्पन्न जातक मोटे दाँतों वाला, उच्च और विस्तृत ललाट, आश्रित जनों का पालक, धैर्य बल से युक्त, न्यायी, मलिन नाक और ओठ वाला, कुनख वाला, सलज्ज, अति स्थूल जंघा और उदर वाला, विज्ञानी, शास्त्रज्ञ, श्रेष्ठ बुद्धि, क्रोधी, बलियों के बीच रोष पूर्ण, कुल श्रेष्ठ, शत्रुजेता, रण में यशस्वी, कपटी, बन्धुओं के गुण को छिद्रन्वेषणकर्ता, चित्रकार, स्वकर्म तत्पर, परिजनों को सुख देने वाला, मनोहर, मुख और नेत्र का रोगी, राजा द्वारा अपहृत धन वाला एवं धर्म में तत्पर रहने वाला होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ९०५ मकर लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- मकर लग्न में जन्म लेने वाला मनुष्य शरीर से दुर्बल, डरपोक, हरिण सदृश मुख वाला, वात रोगी, उच्च नाक वाला, अल्प बल, अनेक पुत्र वाला, रोगयुक्त शरीर, विस्तृत हाथ पैर वाला, आचार और गुणों से हीन, तृषा से पीड़ित, युवतियों का प्रिय, वन और पर्वत पर भ्रमण करने वाला, शूर, वेद, शास्त्र, चित्र, सङ्गीत-वाद्य आदि का जानने वाला, अल्प बल, परिवार से युक्त, दुष्ट हृदय, बन्धुओं के प्रति कठोर, कुचरित्र, सुरूप एवं दुःशीला का पति,
होता है। गुणज्ञ, धनी, धर्मात्मा, राजकार्यकर्ता, महादानी, सुखी और सौभाग्यवान्
कुम्भ लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान- कुम्भ लग्न में जन्म लेने वाला पुरुष नीच कर्म करने वाला, कुल में मुखिया, मूर्ख, कटी नाक वाला, क्रोधी, नीच, आलसी, कलहप्रिय, अप्रसन्न, कठोर, जूआ और नीच स्त्री से सङ्ग करने वाला, बन्धुओं का द्रोही, क्षोभयुक्त, हास वृद्धि वाला, धनागम करने वाला, चुगलखोर, धूर्त, कृपण, बन्धुहीन, लोक से त्यक्त, दूसरों का अप्रिय, उत्कृष्ट सम्पत्ति वाला और गुरुजनों का भक्त होता है। सत्याचार्य के मतानुसार कुम्भ लग्न में जन्म सर्वथा प्रशस्त नहीं होता है। यवनचार्य के मतानुसार किसी भी लग्न में कुम्भ राशि का वर्ग प्रशस्त नहीं माना जाता है। परन्तु चाणक्य ऋषि के मत में कुम्भ राशि के वर्ग में दोष नहीं माना जाता है। मीन लग्न में जन्म लेने वाले के स्वभावादि का ज्ञान-मीन लग्न में उत्पन्न जातक भाग्यवान्, स्पष्ट नाक वाला, अस्पष्ट नेत्र, विज्ञान और काव्य में निपुण, मानी, लोक में आदृत, कीर्तिमान्, खुले हुए ओठ और दाँत वाला, कुष्ठ रोगी, विस्तृत मुख, लोभी, सरल स्वभाव, विश्वासी, भेंड़ बकरा आदि पालने वाला, पवित्र, आचारवान्, धैर्यवान्, कन्या सन्तान वाला, विनम्र, सद्बुद्धि, बलवान्, सङ्गीत और स्त्रीरति का ज्ञाता सुशील, उदार, भाई से धन पाने वाला, सुबन्धु वाला होता है। लग्न राशि या लग्नेश बलवान् हो तो ये फल पूर्ण होता है। मेष लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल-मेष की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला व्यक्ति निरर्थक ही आँख टेढ करने वाला, क्रूर, धनवान, कामाधिक, कुटिला स्त्री का पति, मोटा और लम्बाकद, क्रोधी और चोरों का सरदार होता है। मेष की द्वितीय होरा में जन्म लेने वाला चोर, प्रमादी, गधा के समान पैर और अंगुली वाला, बड़े बड़े सुन्दर नेत्र वाला, चतुर, विस्तार और मोटा
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९०६ नष्ट जातक प्रकरण शरीर एवं बुद्धिमान होता है। वृष लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल-वृष की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला श्यामवर्ण, विशाल नेत्र, शिर और छाती वाला, प्रगल्भ, रतिप्रिय, मोटी हड्डी से बने शरीर वाला होता है। द्वितीय होरा में उत्पन्न जातक मोटा लम्बा, और सुडौल शरीर वाला, उदार, सुन्दर केश वाला, कमजोर कमर एवं बैल सदृश नेत्र वाला होता है। मिथुन लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- मिथुन की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला विस्तृत कमर, सामर्थ्यवान्, मध्यम शरीर, कोमल केश और चरण वाला, वीर, सुरतप्रिय, धनी और पण्डित होता है। द्वितीय होरा में सुन्दर दीर्घ नेत्र वाला, कामी, वीर, कोमल चित्त, कार्य में रत, वक्ता एवं परस्त्री से प्रेम करने वाला होता है। कर्क लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- कर्क की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला उद्धत स्वरूप, सुन्दर मस्तक, प्रौढ़ बुद्धि, अल्पदृष्टि, चञ्चल, धूर्त, श्यामवर्ण, कृतघ्न, टूटे दाँत वाला होता है। द्वितीय होरा में जूआ का प्रेमी, भ्रमणशील, विस्तृत छाती, सत्यवादी, कठोर देह वाला और क्रोधी होता है। सिंह लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- सिंह की प्रथम होरा में लाल नेत्र वाला, प्रौढ़ मति, श्रेष्ठ लम्बा शरीर, कुटिल स्वभाव, सुखी, कार्य में स्थिर होता है। स्त्री, मिठाई, जलपान, भोजन एवं वस्त्र का प्रेमी, बहुत उद्योगी और कठोर शरीर वाला, दाता, भ्रमणशील, अल्पपुत्र वाला भोगी और दृढ़ मैत्री वाला, द्वितीय होरा में जन्म लेने वाला व्यक्ति होता है। कन्या लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- कन्या की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला कोमल और मनोहर शरीर, प्रियवक्ता, संगीत और स्त्रियों का प्रेमी और श्रेष्ठ होता है। द्वितीय होरा में छोटे शरीर वाला, हठी, पण्डित, विस्तृत मस्तक लोकमान्य, विवादी, सेवा, चित्र और लेखन में पटु, ह्रास वृद्धि से युक्त और सुखी होता है। तुला लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- तुला की प्रथम होरा में गोल जन्म लेने वाला मुख, उच्च नाक, कृष्णवर्ण, बड़े नेत्र वाला, क्रीड़ाप्रिय, स्थूल और लम्बाशरीर, मजबूत हड्डी वाला, धनी और परिजन का प्रेमी होता है। द्वितीय होरा में बहुत धनी, स्थिर सम्पत्ति वाला, काले और घुँघराले
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भृगु संहिता फल दर्पण ९०७ केश वाला, धूर्त, गोल नेत्र, सुन्दर त्वचा वाला और पैरों के अग्रभाग से हीन होता है। वृश्चिक लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- वृश्चिक की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला प्रान्त में लालिमा से युक्त और पिंगलवर्ण नेत्र वाला, साहसी, रणप्रिय, दुष्ट प्रकृति, स्त्रीप्रिय धनवान होता है। द्वितीय होरा में लम्बा चौड़ा और पुष्ट शरीर वाला, राजसेवक, बहुत ऋण और बहुत मित्र तथा आँख में फूली वाला होता है। धनु लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल-धनु की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला असम्पुटित मुख और विस्तृत छाती वाला, टेढ़ नेत्र और गाल वाला, बाल्यावस्था में ही मातादि से त्यक्त और तपस्वी होता है। द्वितीय होरा में जन्म लेने वाला कमल नेत्र, दीर्घबाहु, शास्त्रार्थवेत्ता, सुन्दर, प्रियवक्ता, भाग्यवान् और यशस्वी होता है। मकर लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- मकर की प्रथम होरा में, श्वामवर्ण, हरिणसदृश नेत्र, भागयवान्, स्त्री को वश में रखने वाला, सुन्दर, मूर्ख, धनवान, मिष्टान्नभोजी, सत्कार्यरत, पतली और ऊँची नाक वाला होता है। द्वितीय होरा में लाल नेत्र प्रान्त वाला, आलसी, लम्बा सफर करने वाला, मूर्ख, श्यामवर्ण, रोम से व्याप्त देह, तीव्र, बिना विचारे कठिन कार्य करने वाला होता है। कुम्भ लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- कुम्भ की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला स्त्री मित्रादि से युत्क, रसज्ञ, कोमल शरीर, अल्प पुत्र, सद्गुण, वीर, ताम्रवर्ण, तेजस्वी, भ्रमणशील होता है। द्वितीय होरा में रक्त नेत्र, कृश देह, स्थिर, छोटा कद, आलसी, कपटी, विषाद युक्त, कृपण और धूर्त होता है। मीन लग्नस्थ प्रथम व द्वितीय होरा फल- मीन की प्रथम होरा में जन्म लेने वाला ऊँचाई में छोटा-पुष्ट और सुन्दर शरीर, विस्तृत ललाट, मुख और छाती वाला, स्त्री का प्रेमी, यशस्वी, कार्य कुशल और शूर होता है। द्वितीय होरा में जन्म लेने वाला दाता, ऊँची नाक, कार्यों में कुशल, मेधावी और सुन्दर नेत्र वाला होता है। होरा फल प्राप्ति का ज्ञान- सूर्य और चन्द्रमा में एक बलवान् हो और उसको होरा का स्वामी देखता हो अथवा होरापति केन्द्र में हो तो जातक को होरा का पूर्णफल प्राप्त होता है। मेष लग्नस्थ प्रथम द्वितीय व तृतीय द्रेष्काण फल- मेष के प्रथम द्रेष्काण
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९०८ नष्ट जातक प्रकरण में उत्पन्न जातक दान करने वाला, दान लेने वाला, तेजस्वी, हास वृद्धि से युक्त, रण में वीर, कलहप्रिय, बन्धुओं को दण्ड देने वाला होता है। द्वितीय द्रेष्काण में स्त्री में आसक्त, भ्रमणशील, सुरत और संगीत प्रिय, मनस्वी, मित्र से धन पाने वाला, सुन्दर और स्त्री के धन का लोभी होता है। तृतीय द्रेष्काण में गुणी, दूसरों का दोषोद्घाटन करने वाला, चञ्चल, राजसेवक, अपने परिवार का प्रिय, धर्मात्मा, आदर का इच्छुक और मूर्ख होता है। वृष राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- वृष के प्रथम द्रेष्काण में उत्पन्न जातक अभीष्ट भोजन-पान, स्त्री के वियोग से दुखी, वस्त्रादि के सहित, स्त्री के अनुकूल कार्य करने वाला होता है। द्वितीय द्रेष्काण में मनोहर रूप, स्त्री का प्रिय, मोटा ओठ, धनवान, स्थिर और मनस्वी होता है। तृतीय द्रेष्काण में चतुर, अल्पभाग्यवान्, वीर, मलिन, धन का उपयोग कर बाद में पछताने वाला होता है। मिथुन राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- मिथुन के प्रथम द्रेष्काण में जन्म लेने वाला जातक विशाल मस्तक, धनवान, उन्नत, धूर्त, गुणी, विलासप्रिय, राजा से आदृत और वक्ता होता है। द्वितीय द्रेष्काण में जन्म लेने वाला छोटा मुख, मनोहर शरीर, अल्प केश, भाग्यवान्, कोमल चित्त, बहुत बड़ा बुद्धिमान्, प्रतापी और यशस्वी होता है। तृतीय द्रेष्काण में स्त्री का द्वेषी होता है, विशाल मस्तक, शत्रु से युक्त, लम्बा शरीर, रूखे नख पैर और हाथ वाला, चल सम्पत्ति से युक्त तथा दृढ़ प्रतिज्ञ होता है। कर्क राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- कर्क के प्रथम द्रेष्काण में जन्म लेने वाला देवता और विप्र का भक्त, चञ्चल, गौरवर्ण, परोपकारी, बुद्धिमान्, सुन्दररूप, सुन्दरी स्त्री वाला और भाग्यवान् होता है। द्वितीय द्रेष्काण में लोभी, मिष्टान्नप्रिय, अधिक शयन करने वाला, स्त्री का वश, अभिमानी, अधिक सोदर वाला, विलासी, चञ्चल और अनेक रोगों से युक्त होता है। तृतीय द्रेष्काण में स्त्री प्रिय, धनी, परदेशी, मदिराप्रिय, सज्जन, वन और जल का प्रिय एवं सुन्दर नेत्र वाला होता है। सिंह राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- सिंह के प्रथम द्रेष्काण में जन्म
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भृगु संहिता फल दर्पण ९०९ लेने वाला दानी, जनपोषक, शत्रुजेता, बहुत धन और पत्नी वाला, सुन्दर मित्र वाला, राजसेवक और बलवान् होता है। द्वितीय द्रेष्काण में सत्कार्यकर्ता, दाता, स्थिर, रणप्रिय, सुखी, वेदधर्म को मानने वाला और बुद्धिमान् होता है। तृतीय द्रेष्काण में परधन का लोभी, बुद्धिमान्, धूर्त, मध्यम कद, अधिक सन्तान वाला और ढीठ होता है। कन्या राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- कन्या के प्रथम द्रेष्काण में उत्पन्न जातक श्यामवर्ण, प्रियवक्ता, विनीत, लम्बाकद, मनोहर रूप, स्त्री के द्वारा धनी, लम्बा मस्तक, मधुसदृश पिंगल नेत्र वाला होता है। द्वितीय द्रेष्काण में धीर, विदेशी, शिल्पकला में चतुर, रणप्रिय, वक्ता, मेधावी और वनवासियों का प्रिय होता है। तृतीय द्रेष्काण में संगीत प्रिय, संगीत तत्त्वज्ञ, राजा का प्रिय, छोटा कद, विशाल मस्तक और विशाल दृष्टि वाला होता है। तुला राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल-तुला के प्रथम द्रेष्काण में कामदेव के समान सुन्दर, कार्यकुशल, देशाटन करने वाला, श्यामवर्ण, कला और व्यापार को जानने वाला, नियोग कर्म में निपुण और मेधावी होता है। द्वितीय द्रेष्काण में उत्पन्न होने वाला कमल सदृश नेत्र, सुन्दर, प्रियवक्ता, साहसी, भूषणप्रिय, विख्यात्, अपने कुलोत्पन्न श्रेष्ठ पूर्वजों का अनुकरण करने वाला होता है। तृतीय द्रेष्काण में चञ्चल, धूर्त, कृतघ्न, कुरूप, कुटिल, मित्र-धन और यश से हीन, स्वल्पबुद्धि होता है। वृश्चिक राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- वृश्चिक के प्रथम द्रेष्काण में गौरवर्ण, स्थिर, क्रोधी, युद्धप्रिय, विशालनेत्र, स्थूल और लम्बा शरीर वाला, कलहप्रिय होता है। द्वितीय द्रेष्काण में मिष्टान्नप्रिय, चञ्चल दृष्टि, साने के सदृश्य आभा वाला, मनोहर, परधन भोगी, सुशील, कला को जानने वाला होता है। तृतीय द्रेष्काण में दाढ़ी मूँछ से हीन, हिंसक, पिंगल नेत्र, बड़ा पेट वाला, सोदरहीन, स्थूल बाहु, धीरह्ृदय होता है। धनु राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- धनु के प्रथम द्रेष्काण में उत्पन्न व्यक्ति गोल मुख और नेत्र वाला, समाज में मुख्य, स्वयं पोषित, सुन्दर आचार वाला, कोमल हृदय होता है। द्वितीय द्रेष्काण में शास्त्रार्थवेत्ता, प्रवक्ता, अनेक यज्ञ करने वाला विवेकियों में श्रेष्ठ, अनेक तीर्थों में भ्रमण करने वाला होता है।
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९१० नष्ट जातक प्रकरण तृतीय द्रेष्काण में कुटुम्बों में मुख्य, चतुर, साधु, धर्मात्मा, कामी, परस्त्रीगामी, सुन्दर, यशस्वी होता है। मकर राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- मकर के प्रथम द्रेष्काण में जन्म लेने वाला व्यक्ति लम्बे हाथ वाला, श्यामवर्ण, ख्यातकीर्ति, सुन्दर, धूर्त, हँसमुख, स्त्री का वश्य, सुन्दर चेष्टा और धन से युक्त होता है। द्वितीय द्रेष्काण में छोटा मुख, चञ्चल, परस्त्री-परधनहर्ता, चतुर, साधुओं को मारने वाला, दानी, पैर में कष्ट वाला होता है। तृतीय द्रेष्काण में वक्ता, पापी, कृश और दीर्घ शरीर, पितृहीन, विदेश गमन से दुःखी होता है। कुम्भ राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल-कुम्भ के प्रथम द्रेष्काण में उत्पन्न व्यक्ति स्त्री, मान, यश, ऐश्वर्य, पराक्रम से युक्त, उन्नत, कर्मठ धनी और राजसेवक होता है। द्वितीय द्रेष्काण में लोभी, समर्थ, मनोहर, गौरवर्ण, पिंगलनेत्र, हास्य से धनोपार्जन करने वाला, संकोचहीन बात बोलने वाला, बुद्धिमान् और बहुत मित्रों वाला होता है। तृतीय द्रेष्काण में लम्बा, कुटिल हृदय, प्रतापवान्, दुबला, छोटा हाथ, पुत्र और धन से युक्त, स्तब्ध, बहुत मिथ्याभाषी, विस्तृतनेत्र, कामशास्त्र का ज्ञाता होता है। मीन राशिस्थ तीनों द्रेष्काणों का फल- मीन के प्रथम द्रेष्काण में जन्म लेने वाला मधु समान पिंगल नेत्र, गौरवर्ण, बुद्धिमान्, सत्कर्मकर्ता, पण्डित, सुखी, जलयात्रा प्रिय और विनययुक्त होता है। द्वितीय द्रेष्काण में स्त्रियों का सेवक, मिष्ठान्नप्रिय, दूसरे के धन का लोभी, कामातुर, स्त्री और साधुओं का प्रिय और वक्ता होता है। तृतीय द्रेष्काण में श्यामवर्ण, कला में कुशल, मोटे पैर वाला, मित्रों का सहायक, मधुर भोजन पेय पदार्थ ग्रहण करने वाला होता है। इस प्रकार द्रेष्काणों के गुण जानने वाले ज्योतिष के आचार्यों ने द्रेष्काणों के अनुसार गुण और स्वभाव कहे हैं। द्रेष्काण की राशि बलवान् हो और अपने स्वामी से दृष्ट हो तो द्रेष्काण सम्बन्धी पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। अब यहाँ लग्नगत नवमांश वश-वर्ण-स्वभाव-आकार आदि लक्षण कहते हैं। चन्द्र समान ही लग्नगत नवांश बलवान् हो तो नवांश राशि सदृश, यदि लग्न बली हो तो लग्न राशि सदृश फल प्राप्त करता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ९११ मेष राशिस्थ प्रथमाद्वि नवांशों का फल- जन्म काल सें मेष के प्रथम नवांश में उत्पन्न पुरुष भेंड़ सदृश मुख, छोटा नाक, छोटा भुज, कठोरशब्द, कुरूप, संकुचित आँख, हृष्ट और मजबूत शरीर वाला होता है। द्वितीय नवमांश में श्यामवर्ण, स्थूल कन्धा और बाहु, छोटा ललाट (मस्तक), सुन्दर कन्धा और बाहु का जोड़ वाला, तीक्ष्ण दृष्टि, लम्बा मुख और नाक, प्रियवक्ता, दुर्बल पैर वाला होता है। तृतीय नवांश मे लुप्तकेश, गौरवर्ण, शिथिलबाहु, सुन्दर नेत्र और नाक, बोलने में चतुर, दुर्बल पैर वाला होता है। जन्म काल में मेष के चतुर्थ नवमांश में भ्रान्तदृष्टि, क्रोधी, छोटा नाक, भ्रमणशील, कठोर पैर और रोम वाला, सहोदर भाइयों से हीन, और दुर्बल होता है। मध्य (पञ्चम) नवमांश में उग्र, हाथी के सदृश नेत्र, स्थूल नाक, भौंह और ललाट, मोटा शरीर, कठोर रोम और केश वाला होता है। छठे नवांश में श्यामवर्ण, कोमल हृदय, हरिण समान नेत्र, लम्बा, दुर्बल पश्चात् भाग, कठोर पैर, शिथिल पेट और बाहु, नपुंसक, डरपोक और बहुत बोलने वाला होता है। मेष के सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला श्यामवर्ण, चञ्चल, श्वेत नेत्र, कुलटा का पति, धूर्त, मोटा शरीर वाला होता है। अष्टम नवांश में वानर सदृश मुख, प्रवक्ता, कठोर और पिङ्गल शरीर, गुप्तरोगी, हिंसक, मिथ्यावादी, मित्रों का प्रिय, उग्रस्वभाव होता है। नवम नवांश में उत्पन्न जातक लम्बा, दुबला शरीर, भ्रमणशील, छोटा ललाट और कान, घोड़े के समान मुख, बहुत नाम वाला और कुटिल होता है। वृष राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- वृष के प्रथम नवांश में उत्पन्न जातक मझोला कद, कृष्णवर्ण, प्रथम अवस्था में कुछ करने में अक्षम्, अन्त्यावस्था में नीचकर्म करने वाला, नीच, आचरण करने वाला और कुटिल दृष्टि वाला होता है। द्वितीय नवांश में गम्भीर दृष्टि, आलसी, नतमस्तक और मुख वाला, अल्पबुद्धि, उल्टा कार्य करने वाला, अधिक मिथ्या बोलने वाला होता है। तृतीय नवांश में कोमलदेह, सुन्दर नाक, विशाल नेत्र, लम्बा कद, यज्ञादि कर्म में निरत, मजबूत (पुष्ट) पैर और हाथ वाला होता है। चतुर्थ नवांश में जन्म लेने वाला छोटा कद, भ्रमणशील, क्रोधी, भेड़ के सदृश नेत्र वाला, पिङ्गल वर्ण, निर्धन, परधनहर्ता होता है।
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९१२ नष्ट जातक प्रकरण पञ्चम नवांश में शठ, उच्च नाक वाला, महावृष सदृश आकार, घुघराले केश वाला, विलासी, स्थूलभुज, कन्धा और कमर वाला तथा गौरवर्ण होता है। षष्ठ नवांश में सुन्दर नेत्र वाला, स्थिर, सुन्दरकेश, कान्तिमान्, प्रियवक्ता, प्रौढ़ हास्यप्रिय, कृशदेह, सब कार्यों में निपुण होता है। सप्तम नवमांश में उत्पन्न जातक मृतवत्सा स्त्री का प्रेमी, कुछ लम्बा नाक और आँख वाला, दृढ़ देह, स्वजन द्वेषी, लम्बा पैर, सूक्ष्म केश वाला होता है। अष्टम नवांश में बाघ के समान नेत्र, सुन्दर दाँत, अजेय, फटी हुई नाक वाला, थोड़े काम करने वाला, कुञ्चित और कृष्णवर्ण केश, तीक्ष्ण नख तथा बहुत बोलने वाला होता है। नवम नवमांश में उत्पन्न जातक लोक में मान्य, अल्प बल, भीरु, क्रोधी, सम और सुन्दर शरीर, धूर्त, धन संग्रह करने वाला, विख्यात, अधोभाग से दुर्बल और बाद में प्रलाप करने वाला होता है। मिथुन राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- मिथुन के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक भुज और कन्धे पर रोम वाला, सुन्दर कृष्णवर्ण नेत्र; उन्नत नाक, दुर्बा सदृश हरितवर्ण, कृश पैर और हाथ वाला होता है। द्वितीय नवांश में घड़ा सदृश मस्तक वाला, अपवित्र कार्य कर्त्ता, हिंसक, बीच में चिपटी नाक वाला, बहुत बोलने वाला, बहुत चेष्टा वाला तथा विग्रह करने में मुख्य होता है। तृतीय नवमांश में उत्पन्न जातक गौर वर्ण, लाल नेत्र, सुन्दर नाक, सम शरीर, मेघावी, लम्बा मुख, काला भौंह बोलने में निपुण होता है। चतुर्थ नवांश में उत्पन्न सुन्दर भौंह और मस्तक वाला, कामी, श्यामवर्ण, विशाल छाती, स्वच्छदन्त, प्रियभाषी, सुन्दर रोम वाला होता है। पञ्चम नवांश में विशाल मुख, उन्नतनितम्ब, पुष्ट छाती, स्थूल मस्तक वाला, खल, मायावी, स्वच्छ और समदृष्टि वाला होता है। षष्ठ नवांश में उत्पन्न जातक मधुवर्ण नेत्र वाला, व्यर्थ बोलने वाला, विस्तृत ललाट, मझोला कद, सुन्दर देह, धूर्त, चञ्चल, सुन्दर ओठ और दांत वाला तथा बलवान् होता है। सप्तम नवांश में उत्पन्न जातक लाल, और उच्च नेत्र, विशाल छाती, शिक्षा और चित्रकारी में चतुर, हास्य प्रिय होता है। अष्टम नवांश में श्यामवर्ण, श्रेष्ठ, मनस्वी, सुन्दर, प्रियवक्ता, लम्बा शरीर, विशाल और कृष्णवर्ण नेत्र वाला, कला को जानने वाला होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ९१३ नवम नवांश में गोल और कृष्ण नेत्र, सुन्दर देह, कार्यसाधक, मेधावी, प्रेमी, विज्ञान और काव्य में निपुण होता है। कर्क राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- कर्कराशि के प्रथम नवमांश में उत्पन्न होने वाला जातक स्वच्छ गौर वर्ण, सुन्दर केश, विशाल पेट, सुन्दर मुख, ऊँची आँख, कृश देह और भुज वाला होता है। द्वितीय नवांश में रक्तगौर, संग्रामप्रिय, कला जानने वाला, बिड़ाल सदृश मुख और नेत्र वाला, दाता और दुर्बल जङ्गा वाला होता है। तृतीय नवांश में गौर, सुन्दर नेत्र, वक्ता, स्त्रीसदृश कोमल देह, बुद्धिमान्, हल्का काम करने वाला, आलसी होता है। चतुर्थ नवांश में उत्पन्न जातक श्यामवर्ण, नम्र भौंह, स्थूल और लम्बा कद, सुन्दर नाक और आँख वाला, धीर, हीन, अपने जाति का द्वेषी होता है। पञ्चम नवांश में घण्टासदृश शब्दोच्चरण करने वाला, नतमुख, सम्मिलित भौंह, दीर्घ बाहु, सेवा में तत्पर, निन्द्य कार्य करने वाला, दुर्धर्ष, अल्पबुद्धि होता है। षष्ठ नवांश में लम्बा विशाल देह, सुन्दर आँख, बड़ा प्रतापी, गौर वर्ण, सुन्दर नाम वाला, वक्ता और स्थूल दाँत वाला होता है। - सप्तम नवमांश में उत्पन्न जातक पृथक्-पृथक् केश और रोम वाला, विशाल देह, शिरा से व्याप्त जाँघ वाला, परभवनवासी, कौआ सदृश आकार वाला होता है। अष्टम नवांश में घण्टाकृति मस्तक वाला, निन्द्य कार्यकर्ता, सुन्दर मुख, और भुज वाला, कछुए की समान गति, नतनासिका वाला कृष्णवर्ण होता है। नवम नवांश में गौर, मछली सदृश नेत्र, श्रेष्ठ, कोमल पेट, विशाल छाती, लम्बी ओठ और दाढ़ी वाला, स्थूल जङ्ा और कृश घुटने वाला होता है। सिंह राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- सिंह राशि के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक कृश उदर, प्रतापी, रक्तनासिका, विशाल मस्तक, उच्च और :74 पुष्ट छाती वाला होता है। द्वितीय नवांश में उत्पन्न जातक उन्नत और विशाल ललाट, चतुरस्त्र देह, विशाल नेत्र, लम्बा भुज, ऊँची छाती, स्थूल नाक वाला होता है। तृतीय नवमांश में रोमयुक्त विशाल भुज, चकोर सदृश नेत्र वाला, चञ्चल, साधु, दाता, ऊँची नाक वाला, कोमल देह और गोल गला वाला भ सं -५ I
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९१४ नष्ट जातक प्रकरण होता है। चतुर्थ नवांश में उत्पन्न जातक का मक्खन सदृश गौर वर्ण, लम्बी और कृष्णवर्ण आँख, कोमल केश, काकस्वरी, स्थूल हाथ पैर और मेढक समान पेट वाला होता है। पञ्चम नवांश में घण्टाकृति मस्तक, थोड़े केश, सुन्दर नाक और नेत्र, रोम युक्त देह, लम्बा पेट, उग्र स्वभाव, विकृत दाँत, विशाल छाती वाला होता है। षष्ठ नवांश में मृदु और थोड़े रोमयुत शरीर, स्वच्छ और विशाल नेत्र, लम्बा कद, श्यामवर्ण, स्त्रियों का प्रिय, वक्ता और पण्डित होता है। सप्तम नवांश में उत्पन्न जातक का लम्बे मुख, शिरा से व्याप्त स्थूल देह, स्त्री का द्वेषी, कृष्णवर्ण उग्रस्वभाव, रोमयुत शरीर, कपटयुक्त कठोर भाषी होता है। अष्टम नवांश में प्रियवक्ता, स्थिर देह, सुन्दर, गम्भीर दृष्टि, निन्द् कर्मकर्ता, निर्धन, नकली चीज बनाने वाला होता है। नवम नवांश में गदहे के समान मुख, काला नेत्र लम्बा भुज, सुन्दर जाँघ और श्वास रोग से पीड़ित होता है। कन्या राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- कन्या के प्रथम नवमांश में' उत्पन्न जातक का मृग समान नेत्र वाला, वक्ता, दानी, भोगी, धनवान, कृष्ण वर्ण तथा विशाल हृदय वाला होता है। द्वितीय नवांश में सुन्दर नेत्र, कान्तिमान्, कोमल भाषी, लम्बा पेट और विशाल जाँघ वाला होता है। तृतीय नवांश में फटी नाक, सुन्दर पैर, विशाल भुज, अस्पष्ट वाणी वाला, गौरवर्ण एवं सुहृदय होता है। चतुर्थ नवांश में जन्म लेने वाला जातक पण्डित, स्त्री में आसक्त, कोमलाङ्ग, प्रियदर्शन, रक्तगौर, उग्र, बुद्धिमान्, दुर्बल जाँघ वाला, सुन्दर मस्तक और केश वाला होता है। पञ्चम नवांश में स्थूल ओठ और बाहु, उच्च देह, स्थूल केश और कन्धा, विशाल छाती, पराश्रय और मजबूत जड्डा वाला होता है। षष्ठ नवांश में सुन्दर रूप, प्रियवक्ता, कान्तिमान् देह, शास्त्रकर्ता, बुद्धिमान्, लेखादिकला में निपुण, प्रसन्नचित्त और देशाटन करने वाला होता है। कन्या के सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला छोटा मुख, उन्नत कन्धा, पुष्ट भुज, अत्यन्त गौरवर्ण, लम्बा पेट, पैर, हाथ वाला और जल से डरने
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भृगु संहिता फल दर्पण ९१५ वाला होता है। अष्टम नवांश में कोमल और गौरवर्ण देह, लम्बा कद, ऊँची आँख, उग्र, मानी, लम्बा और मोटा भुज, पिङ्गलवर्ण रोम वाला होता है। नवम नवांश में जन्म हो तो विख्यात, कोमल शरीर, सुन्दर रूप,
होता है। विशाल नेत्र, अतुल बलशाली, चतुर, नतकन्धर और लेखादि में प्रवीण
तुला राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- तुला के प्रथम नवांश में उत्पन्न व्यक्ति गौरवर्ण, विशाल नेत्र, उन्नतिशील, लम्बा मुख, धन का संग्रह करने वाला, व्यापार में चतुर, लोक में विख्यात होता है। द्वितीय नवांश में तिरछा और गोल नेत्र, ऊँचे दाँत, टेढ़ी कमर, सुन्दर गला, विशाल हृदय, कुत्सित देह और मिली हुई भौंह वाला होता है। तृतीय नवांश में गौरवर्ण, घोड़े के समान मुख, सुन्दर दाँत, ऊँची
है। आँख वाला, दुबर्ल, यशस्वी, लम्बा केश और नाक, सुन्दर पैर वाला होता
चतुर्थ नवमांश में जन्म लेने वाला जातक दुर्बल भुज, डरपोक, उठे दाँत वाला, दुर्बल देह, चञ्चल नेत्र, छोटी नाक वाला, विषादयुक्त, श्यामवर्ण, शीलहीन होता है। पञ्चम नवांश में गम्भीर दृष्टि, स्थिर बुद्धि, मित्रों का प्रिय, गर्वरहित, रुक्षकेश, समनेत्र, सुन्दर नाक वाला होता है। षष्ठ नवांश में पुष्ट शरीर गौरवर्ण, विशाल नेत्र, सुन्दर नाक, स्वच्छ नख, नीतिज्ञ और शास्त्रज्ञ होता है। सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला रक्तगौर, बुद्धिमान्, लम्बादेह और हाथ, विशाल मस्तक, लोभी, उग्रस्वभाव और मनस्वी होता है। अष्टम नवांश में जन्म लेने वाला ऊँचे कन्धा और गाल वाला, भोगी, कठोर देह, दीर्घ और कृष्णवर्ण भौंह वाला, शान्त निश्चित कथा बोलने वाला, सुन्दर छाती और खण्डित मस्तक वाला होता है। नवम नवांश में जन्म लेने वाला सुन्दर नेत्र, प्रसन्नचित्त, गौरवर्ण, सुन्दर शरीर वाला, चतुर, कलाविज्ञ, सरल हास्यप्रिय, क्षुद्र स्वभाव होता है। वृश्चिक राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- वृश्चिक के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक ह्रस्व अर्थात् छोटाकर तथा उन्नत ओठ और नाक, सुन्दर ललाट, मजबूत शरीर वाला, गौर, मेढ़क के समान पेट वाला और दलाल होता है। द्वितीय नवांश में उत्पन्न जातक गौरवर्ण, पुष्ट और विशाल हृदय, भुज,
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९१६ नष्ट जातक प्रकरण लाल नेत्र, शत्रु सेना को जीतने वाला, साहसी, अधिक केश वाला होता है। तृतीय नवांश में विद्वान, पुष्ट कन्धा और भुज, सुन्दर केश, स्पष्टवक्ता, कानीन (कुमारी का पुत्र), गौरवर्ण और सुन्दर ओठ वाला होता है। चतुर्थ नवमांश में जायमान पुरुष परस्त्री और विद्रोह में चित्त रखने वाला, लोगों को कार्य में प्रेरित करने वाला, धीर, दीर्घ देह, श्यामवर्ण, कृष्णवर्ण केश और आँख वाला, नृत्य में प्रौढ़, मोटे रोम और पुष्ट कन्धा वाला होता है। पञ्चम नवांश में, गम्भीर, लाल नेत्र, चिपटी नाक वाला, धीर, गर्वयुक्त, कठिन कार्य को करने वाला, मजबूत देह और यशस्वी होता है। षष्ठ नवांश में ढीठ, बुद्धिमान, उच्च नाक, बलवान्, नीतिज्ञ, उग्र कार्य करने वाला, कार्यकुशल, थोड़े केश, सघन भौंह वाला होता है। सप्तम नवांश में उत्पन्न जातक खुला मुख, मजबूत देह, छोटे बड़े दाँत, नशों से युक्त शरीर वाला, सङ्कचित उदर, वक्र, दृष्टि, सुन्दर कान्ति वाला होता है। वृश्चिक राशि का अष्टम नवांश में जन्म लेने वाला फटी नाक, कृष्णवर्ण, शीलहीन, मलिन वेष, उत्कट केश, बुद्धिहीन होता है। नवम नवांश में उत्पन्न जातक गौर वर्ण, मृग के समान सरल स्वभाव, शान्तचित्त, पिङ्गलदृष्टि, मजबूत और पुष्ट देह वाला होता है। धनु राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- धनु राशि के प्रथम नवांश में जायमान व्यक्ति लम्बी नाक, विषम दृष्टि, स्पष्ट वक्ता, सुन्दर दाँत और रोम वाला, गौरवर्ण, दृढ़ अण्डकोश वाला और उग्र होता है। द्वितीय नवांश में ऊँचा मस्तक, स्थिरबुद्धि, दीर्घनेत्र, पुष्ट कटि भाग और जाँघ, विकृत नासिका, लम्बा कद और स्थूल दाढ़ी वाला होता है। तृतीय नवांश में जन्म हो तो शिक्षा, शास्त्र का ज्ञाता, प्रौढ़, गम्भीर, नीतिज्ञ, स्त्री का प्यारा, मनस्वी, हास्यप्रिय और शिल्पशास्त्रज्ञ होता है। चतुर्थ नवांश में उत्पन्न जातक कार्यकुशल, मधुवर्ण, गोल नेत्र, गौर देह, कछुए के सदृश पेट वाला, बुद्धिमान्, भ्रमणशील, सुन्दर केश, विशाल देह और सुन्दर रूप होता है। पञ्चम नवांश में जन्म हो तो विस्तृत कर्ण, नेत्र और मुख वाला, सिंह सदृश शरीर, लम्बी भौंह, पुष्ट कन्धा और बाहु, रोम रहित देह और स्थिर बुद्धि होता है। षष्ठ नवांश में सुन्दर कृष्णवर्ण विशाल नेत्र, विसतृत ललाट, काव्यकर्ता, पुष्ट और विसतृत मुख, असहाय और विद्वान् की बात में श्रद्धा रखने वाला
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भृगु संहिता फल दर्पण ९१७ होता है। सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला जातक श्यामवर्ण, सरल स्वभाव, वाणी का पालक, उच्च मस्तक बाला, सङ्ग्रहकर्ता, दीर्घ देह, विशाल नेत्र, तथा उदार होता है। अष्टम नवांश में जायमान पुरुष चिपटी हुई नाक, लम्बा मस्तक, लोगों से शत्रुता करने वाला, भ्रान्त दृष्टि, बहुत बोलने वाला, गुरुजनों का प्रियपात्र होता है। नवम् नवांश में गौर वर्ण, घोड़े के समान मुख, विशाल और कृष्ण नेत्र, मितभाषी, सत्यव्रती, विषादयुक्त, टेढ़े पैर जाँघ वाला होता है। मकर राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल-मकर के प्रथम नवांश में उत्पन्न जातक पतले दाँत, श्यामवर्ण, अल्प बोलने वाला, कठोर केश, विख्यात, सङ्गीत और हास्य का प्रिय, अस्थिर धन और दुर्बल देह वाला होता है। मकर के द्वितीय नवांश में आलसी, धूर्त, टेढ़ी नाक वाला, गीत प्रिय, विशाल देह, अधिक स्त्रियों का प्रेमी, बहुभाषी और चतुर होता है। मकर के तृतीय नवांश में सङ्गीत में निपुण, विख्यात, गौरवर्ण, स्वच्छ नेत्र, सुन्दर नाक, बहुत मित्र और बन्धुओं से प्रेम करने वाला, अभीष्ट कार्य को सिद्ध करने में तत्पर रहने वाला होता है। चतुर्थ नवांश में जन्म लेने वाला जातक लाल और कृष्णवर्ण गोल नेत्र, विशाल भाल (ललाट) तथा दुर्बल देह, हाथ वाला, बिखरे हुए केश, पतले दाँत और अल्प बोलने वाला होता है। पञ्चम नवांश में उच्च कपोल, नासिका और पेट वाला, भोगी, युवती स्त्री में आसक्त, श्यामवर्ण, गोल जाँघ और भुज वाला, कार्य को आरम्भ कर सम्पन्न करने वाला होता है। षष्ठ नवांश में जन्म लेने वाला कान्तिमान्, सुन्दर रूप, कामी, सूक्ष्म और समान दाँत वाला, प्रियवक्ता, विशाल दाढ़ी और ललाट वाला होता है। . - सप्तम नवांश में जन्म लेने वाला जातक श्यामवर्ण, आलसी, सुन्दर बोलने वाला, घुँघुँराले केश, विशाल देह वाला, कठोर चित्त, तथा कोमल हाथ पैर वाला, बुद्धिमान्, सुशील होता है। अष्टम नवांश में उत्पन्न जातक गम्भीर दृष्टि, सुन्दर नाक, लाल मुख, छिन्न नह और केश, बेढङ्ग शरीर,घड़ा सदृश ललाट वाला होता है। नवम नवांश में विशाल नेत्र और हृदय, मेधावी, सुन्दर मुख, गायन बादन में तल्लीन, प्रिय दर्शन, बलवान् तथा सज्जन, और नीतिज्ञ होता है। कुम्भ राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- कुम्भ के प्रथम नवमांश में,
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९१८ नष्ट जातक प्रकरण जन्म लेने वाला श्यामवर्ण, कोमल, कृश देह, स्थूल दाढ़ी, शास्त्र वेत्ता और काव्यज्ञ, कामी, प्रेमी, सुन्दररूप वाला होता है। द्वितीय नवांश में कठोर त्वचा, नख, नेत्र और केश वाला, दुखियों का सहायक, सज्जन, लम्बा कद, विचित्र मस्तक वाला और मूर्ख होता है। तृतीय नवांश दृढ़ देह, स्त्रियों का प्रिय, सुन्दर कान्ति, शास्त्र को जानने और प्रवक्ता होता है। कुम्भ के चतुर्थ नवांश में स्त्री का वश, गौर वर्ण, विस्तृत मुख, शत्रुनाशक, गम्भीर, धैर्यवान्, बलवान्, भोगी और प्रेमी होता है। पञ्चम नवांश में स्पष्टार्थज्ञ, कलाकुशल, तीक्ष्ण, रोम युत पैर वाला, उग्र स्वभाव, सङ्कचित कपोल और कान वाला एवं कृष्णवर्ण होता है। षष्ठ नवांश में बाघ समान मुख वाला, प्रौढ़, घुँघराले केश वाला, दृढ़ संकल्प रखने वाला, बाघ, हरिण और सर्प को मारने वाला और राजा का प्रिय पात्र होता है। सप्तम नवमांश में उत्पन्न जातक बकरा के समान नेत्र मुख वाला, तीक्ष्ण स्वभाव, गाँव में प्रेम करने वाला, स्त्री का वश, पित्तरोगी, बल और धैर्य वाला होता है। अष्टम नवांश में स्थिर बल, बुद्धि और प्रेम वाला, राजसैनिक या राजा, सुन्दर, स्थूल दाँत, विशाल नेत्र वाला होता है। नवम नवांश में, श्यामवर्ण, श्याम दन्त, धन-स्त्री और पुत्र से सम्पन्न रहने वाला, प्रियवक्ता, विख्यात और सामर्थ्यशाली होता है। मीन राशिस्थ प्रथमादि नवांशों का फल- मीन के प्रथम नवमांश में उत्पन्न जातक रक्त गौर कान्ति, कोमल हृदय, स्त्री का प्रिय, चञ्चल चित्त, छोटा गला, और पतली कमर वाला होता है। द्वितीय नवांश में जायमान पुरुष स्थूल और विस्तृत नाक वाला, कार्यकुशल, मांस का आहार करने वाला, सुन्दर देह, वन, पर्वत में भ्रमण करने वाला, स्थूल मस्तक वाला होता है। तृतीय नवांश में गौरवर्ण, धूर्त, सुन्दर नेत्र, सुन्दर देह, धर्मात्मा, विद्वान्, उदार, विनययुक्त और सुन्दर स्वरूप वाला होता है। मीन के चतुर्थ नवांश में उत्पन्न जातक गुणी, दीनजनों का सहायक, वृद्धों का सेवक, कार्यकुशल, बली, नीतिज्ञ, उच्च नाक वाला होता है। मीन के पञ्चम नवांश में उत्पन्न जातक लम्बा कद, श्यामवर्ण, प्रतापी, अशान्त चित्त, छोटी नाक, सुन्दर नेत्र वाला, हिंसक, सुन्दर दाँत वाला, असह्य और व्यर्थ बोलने वाला होता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ९१९ मीन के षष्ठ नवांश में जन्म लेने वाला दर्शनीय, प्रतापी, गुणी, कुलीन, छोटी नाक वाला, अभिमानी, टेढ़ा मुख, विख्यात और चतुर होता है। सप्तम नवमांश में जन्म लेने वाला अभिमानी, अन्यधर्म में प्रेम करने वाला, श्रेष्ठ, राजमन्त्री, बली, विषादी, क्रूर, चञ्चल होता है। अष्टम नवांश में उत्पन्न जातक लम्बा, बड़ा मस्तक, दुर्बल शरीर, आलसी, रूक्ष नेत्र और केश वाला, अल्प संतान वाला, धन सञ्चय में तत्पर, युद्ध में निपुण होता है। नवम नवमांश में उत्पन्न जातक छोटा कद, सरल स्वभाव, धैर्यवान्, विस्तृत वक्ष, आँख और नाक वाला, कान्तिमान्, विशाल शरीर और सुन्दर i बुद्धि वाला, गुणी तथा विख्यात होता है। द्वादशांश फल का ज्ञान- इस प्रकरण पूर्व द्वादश राशियों के जो फल कहे गये हैं, तदनुसार ही प्रत्येक राशि में द्वादशांश के भी फल कहना चाहिये तथा शेष वर्गों (त्रिशांशादि) में भी सप्तमांश के समान विद्वानों को फल कहना चाहिये। प्रश्न लग्न से जन्म के अयन का ज्ञान- प्रश्नकाल में लग्न १५ अंश के भीतर हो तो उत्तरायण, यदि १५ अंश से ऊपर हो तो दक्षिणायन में प्रश्नकर्ता का जन्म समझना चाहिये। जिस व्यक्ति का जन्म काल ज्ञात न हो उसके जीवन भर के शुभाशुभ जानने के लिये प्रश्न के द्वारा जन्म-समय का आधार मानकर उस पर से जो तात्कालिक स्पष्ट ग्रह, लग्नादि भाव बना कर प्रश्न कुण्डली बनाकर फलादेश किया जाता है उसको 'नष्टजन्मपत्र' कहते हैं अर्थात् जिसका जन्म काल ज्ञात नहीं रहता है वह 'नष्ट जातक' कहलाता है। ऋतु व मास का ज्ञान- प्रश्नकालिक लग्न में जो ग्रह हो उस ग्रह की ऋतु में जन्म कहना चाहिये। जैसे प्रश्न लग्न में सूर्य हो तो ग्रीष्म, चन्द्रमा हो तो वर्षा, भौम हो तो ग्रीष्म, बुध हो तो शरद, गुरु हो तो हेमन्तु, शुक्र हो तो बसन्त और शनि हो तो शिशिर ऋतु कहना चाहिये। इसी प्रकार एक से अधिक ग्रहों के होने पर जो बलवान् हो उसकी ऋतु पूर्वोक्तानुसार कहना चाहिये। लग्न में ग्रहाभाव हो तो लग्न के द्रेष्काण, राशिस्वामी ग्रह की ऋतु समझना चाहिये। तिथि और जन्म काल का ज्ञान- द्रेष्काण के गतांश से अनुपात द्वारा तिथि का ज्ञान करना चाहिये। कुछ आचार्य अनुपात द्वारा सूर्य के गतांश मानते हैं।
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९२० नष्ट जातक प्रकरण ५ अंश में ३० तिथि, या ३० सूर्यांश तो द्रेष्काण के गत, पूर्वार्ध या उत्तरार्ध के अंश में क्या? इस प्रकार त्रैराशिक को अनुपात कहते हैं। अर्थात् द्रेष्काण पूर्वार्ध या उत्तरार्ध के गतांश को ३० से गुना कर गुणनफल में ५ के भाग देने से लब्धि गत तिथि या सूर्य के भुक्तांश होते हैं। शेष को ६० से गुना कर फिर ५ से भाग देकर (अथवा शेष को १२ से गुना कर देने से) घट्यादि या सूर्य की भुक्त कलादि समझना चाहिए। इस घट्यादिच के द्वारा अथवा मुक्त कलादि से इष्ट घटी का ज्ञान कर लेना चाहिये। जन्म संवत् का ज्ञान- प्रश्नकालिक लग्न के अंशादि को २ से गुना कर ५ का भाग देकर जो राश्यादि फल प्राप्त होता है, वही जन्म कालिक मध्यम बृहस्पति होता है। उसके द्वारा वर्तमान (प्रश्नकालिक) पञ्चाङ्गस्थ गुरु से प्रश्नकर्ता के वयस के अनुसार जन्म कालिक संवत्सर समझना। बृहस्पति, एक एक राशि में एक एक संवत्सर भोग करता है। इसलिये १२, १२ वर्ष बाद फिर उसी राशि पर आता है। अतः अनुमान से १२, १२ वर्ष जोड़ कर जन्म संवत् स्थिर करना चाहिये। प्रकारान्तर से जन्मेष्ट ज्ञान- पूर्वोक्त दिन संज्ञक अर्थात् कतु. वृ.फु. मीन राशि प्रश्नलग्न हो तो रात्रि में और रात्रि संज्ञक अर्थात् में वृ.मि.क.ध.म. राशि हो तो दिन में जन्म कहना चाहिए एवं लग्न के भुक्तांशों से दिनगत या रात्रिगत इष्टघटी का ज्ञान करना चाहिये। दिन में जन्म निश्चित हो तो दिनमान को, रात्रि में रात्रिमान को लग्न के भुक्तांशादि से गुनाकर ३० का भाग देनेसे दिन या रात्रि की गतघटी होती है। उस पर से स्पष्ट ग्रह लग्नादि साधनकर नष्ट जन्मपत्र बनाना चाहिये। मतान्तर से जन्म राशि का ज्ञान- प्रश्न लग्न तथा उस से ५, ९ भाव में जो राशिबली हो वही प्रश्नकर्ता की जन्मराशि कहना चाहिये, अथवा प्रश्नकर्ता अपने मस्तक आदि जिस अङ्ग का स्पर्श करता हुआ प्रश्न करे उसी अङ्ग की मेषादि राशि को जन्मराशि कहना चाहिए। अथवा लग्न से प्रश्नकालिक चन्द्रमा जितने राश्यादि मान से आगे हो उतने ही आगे चन्द्रमा से जो राशि हो वही जन्मराशि समझना चाहिये। विशेष यह है किेंमीन लग्न प्रश्नकाल में हो तो मीन ही जन्म राशि समझना चाहिए। जन्म लग्न का ज्ञान-प्रश्नकालिक लग्न में जो नवमांश हो उसी राशि को जन्म लग्न विद्वानों को समझना चाहिए। अथवा लग्न द्रेष्काण से जितने द्रेष्काण में सूर्य हो, फिर सूर्य से उतने ही द्रेष्काण सम्बन्धी राशि को जन्मलग्न समझना चाहिये, यह ज्योतिषशास्त्र का सिद्धान्त है। प्रथम प्रकार का उदाहरण-प्रश्न लग्न ३।७।२०।० राश्यादि। कर्क में
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भृगु संहिता फल दर्पण ९२१ तृतीय (कन्या) राशि का नवांश है अतः कन्या लग्न में जन्म निश्चित हुआ। लग्न भुक्तांश जानने के लिये तृतीय नवांश के भुक्तकला ४० को ३० से गुना कर २०० के भाग देकर लब्ध लग्न के भुक्तांश ६ हुए अतः जन्म लग्न राश्यादि ५।६।०।०। हुआ। द्वितीय प्रकार का उदाहरण-एक राशि में ३ द्रेष्काण होते हैं अतः लग्न को सूर्य में घटा कर शेष राश्यादि को ३ से गुना करने से द्रेष्काण संख्या होगी उसको प्रश्नकालिक सूर्य में जोड़कर जो राश्यादि हो वही जन्म लग्न समझना चाहिए। राशि १२ से अधिक हो तो १२ से शोषित कर लेना चाहिये। प्रकारान्तर से जन्म लग्न का ज्ञान- यदि प्रश्नकालिक लग्न में ग्रह हो तो उस ग्रह के राश्यादि को कलात्मक बनावे, यदि लग्न में अनेक ग्रह हो तो उनमें जो बली हो उसको कलात्मक करके प्रश्नकालिक छाया (अङ्गलादि) संख्या से गुनाकर गुणनफल में १२ के भाग देकर जो शेष बचे उसी को जन्म लग्न समझना। नक्षत्र ज्ञान- यदि प्रश्नकर्ता खड़ा होकर प्रश्न करे तो प्रश्न लग्न को, यदि बिछौने पर पड़ा हुआ प्रश्न करे तो, प्रश्नलग्न से चतुर्थ को, यदि बैठा हुआ प्रश्न करें तो सप्तम भाव को यदि चलता हुआ प्रश्न करे तो प्रश्नलग्न से १० वाँ राशि को जन्म लग्न समझना चाहिये। जिस प्रकार प्रश्नकर्त्ता प्रश्न करे तदनुसार लग्नादि केन्द्र भाव को जन्म लग्न मानकर फलादेश करना चाहिये। नक्षत्र ज्ञान-प्रश्नकर्त्ता नामकरण संस्कार द्वारा माता पिता ने जो नाम करण किया हो उस नाम की मात्राओं की संख्या को २ से गुनाकर प्रश्नकालिक द्वादशाङ्गलशङ्क अर्थात् पलभा की छायाङ्गल संख्या जोड़ कर २७ से भाग देने से जो शेष बचे वह घनिष्ठा से नक्षत्र जानना चाहिये। समस्त नष्ट जातक का विचार- सर्वप्रथम प्रश्न लग्न का कला पिण्ड बनाकर राशि के गुणकों से गुणा करना चाहिए। यदि कोई प्रश्नकर्त्ता का लग्न वृष या सिंह हो तो तुला लग्न कला पिण्ड को १० से गुणा करें, तथा मिथुन या वृश्चिक हो तो ८ से तुला और मो लग्न हो तो ७ से, कन्या और मकर राशि का प्रश्न लग्न हो तो ५ से तथा शेष राशियों का लग्न होने पर अपनी अपनी राशि संख्या से अर्थात् कर्क राशि हो तो ४ से, धनुराशि हो तो ९ से कुम्भ राशि हो तो ११ से तथा मीनराशि हो तो १२ से गुणा करना चाहिए। यदि प्रश्न काल के लग्न में कोई ग्रह हो तो राशि से गुणित पिण्ड को
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९२२ नष्ट जातक प्रकरण ग्रह के गुणक से गुणा करना चाहिए। ग्रहों के अर्थात् सू०, च०, बु०, श० का ५ तथा मंगल का ८ गुरु का १० और शुक्र का ७ गुणक बताया गया है। इस प्रकार पिण्ड बनेगा। यदि वर्ष ऋतु, मास का ज्ञान अभीष्ट हो तो पुनः पिण्ड को १० से गुणा करना चाहिये। पक्ष, तिथि का ज्ञान करना हो तो ७ से गुणा करना चाहिए। इसी प्रकार लग्न का नवांश या इष्टकाल ज्ञान हेतु ५ से गुणा कर अपने विकल्प से भाग देने पर शेष तुल्य वर्ष मासादि होता है। विकल्प वर्ष के लिये १२०, ऋतु का ६, मास और पक्ष का २, तिथि का १५, नक्षत्र का २७, लग्न का १२, नवांश का ९ तथा दिन या रात्रि की जानकारी हेतु २ विकल्प होता है। इस प्रकार असंभव में ९ को धनर्ण करके अभीष्ट की सिद्धि कर लेना चाहिए। यवन, इन्द्र दर्शन आदि प्राचीनाचार्यों ने जो नष्ट जातक का वर्णन किया हैं, उन सब प्रकारों को मैंने इस प्रकारण में बताया। परञ्च सब प्रकार वास्तव स्पष्ट नहीं हैं। इन में जो प्रकार श्रेष्ठ समझने में आवे उसको स्वतः (स्वयं अपने बुद्धि के अनुकूल) ग्रहण करना चाहिये। चन्द्र राशि से कालादि का ज्ञान-प्रश्नकालिक में चन्द्र राशि दिन बली हो तो रात्रिमान तथा रात्रिबली हो तो दिनमान का १/४ या १/३ या १/२ भाग समाप्त हुआ समझना चाहिये। चन्द्रराशि का व्यतीतभाग के आधार पर चतुर्थाशादि की जानकारी करके राशि के कला पिण्ड को पूर्वोक्त 'वृष सिंहा' इत्यादि गुणक से गुणा कर ७ से पुनः गुणाकर २७ से भाग देने पर शेषक्रम से अश्विन्यादि नक्षत्र समझना चाहिए। यदि ९ घटाने से अभीष्ट सिद्धि हो तो मघा से शेष नक्षत्र (जो २७ से भाग देने पर आया है) तक गिनें। यदि ९ जोड़ने पर अभीष्ट की सिद्धि हो तो मूल नक्षत्र शेष नक्षत्र तक गणना करना चाहिए। इस प्रकार पिण्ड को ७ से भाजित करने पर जो शेष मिले उसे प्रश्न दिन के बार से गिन कर जन्मवार समझना चाहिए।
करना चाहिए। इस प्रकार नष्ट जातक का ज्ञान करके सूर्यादि ग्रहों का स्पाष्टिकरण
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भृगु संहिता फल दर्पण ९२३ इसके बाद महादशा आदि भुक्तभोग्यादि का ज्ञान करना उचित होगा। तथा विलोम क्रिया से लग्न से सूर्य का या इष्टकाल का ज्ञान करना चाहिए। जब तक काल ज्ञान न हो तब तक ९ जोड़कर अभीष्ट की सिद्धि करनी चाहिए।
गोचर ग्रह प्रकरण फलादेश में गोचर अर्थात् जन्मराशि से विभिन्न स्थानों में ग्रहों का तात्कालिक भ्रमण बहुत महत्त्वपूर्ण है। जो दैवज्ञ दशाफल व होराफल पर पूर्णतया निर्भर रहते हैं तथा गोचर की उपेक्षा करते हैं, वे निश्चय ही बहुत चूक करते हैं। वशिष्ठ संहिता में ऐसा ही कहा गया है कि- 'गोचरबलानभिज्ञास्त्वति लोके यान्ति हास्यतां सुजनैः।' इसके विपरीत दशान्तर्दशा के साथ गोचर फल का भी समन्वय करके फलादेश करने वाला ज्योतिषी सर्वत्र सम्मान पाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी जन्म लग्न से राशि की भी गोचर देखते हैं तथा वहाँ जन्मराशि सायन सूर्य की राशि मानी जाती है। हमने भी अनुभव में गोचर विचार को जन्म लग्न व जन्म चन्द्र से विशेष प्रभावी पाया है। गोचर विषय विभाग- राजपक्ष के कार्यों में सूर्य का, युद्ध मुकदमा आदि में मंगल का, विद्याभ्यास में बुध का, विवाह व मंगल कार्यों में गुरु का, यात्रा में शुक्र का, तन्त्र-मन्त्र दीक्षा व सुख विचार में शनि का एवं सब कार्यों में चन्द्रमा का गोचर विशेषतया देखना चाहिए। गोचर में अंग विधान- गोचर विचार में सिर व मुख प्रदेश का स्वामी, सूर्य, छाती व गले का चन्द्रमा, पीठ व पेट का स्वामी मंगल, हाथ, पाँव व नसों-नाड़ियों का बुध, कमर व जाँघ का गुरु, गुप्त स्थानों का शुक्र व घुटनों व पिण्डलियों का शनि स्वामी होता है। इन ग्रहों का अशुभ गोचर उक्त अंगों में पीड़ा देता है। साथ ही यह पूर्वोक्त ग्रह प्रकरण में वर्णित ग्रहों की अवस्था, वर्ण, रस आदि का भी समन्वय गोचर में करके तत्तत् वस्तुओं का विचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त भी मंगल से रक्त का, शुक्र से वीर्य का, बुध से बुद्धि व चेतना का, गुरु से जीवन का, चन्द्रमा से मन का, सूर्य से स्नायु, सत्त्व, बल, सुख आदि का विचार एवं शनि से सब प्रकार के कष्टों का विचार
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९२४ गोचर ग्रह प्रकरण करना चाहिए। ग्रह भोगकाल मासं शुक्रबुधादित्याः सार्द्धमासं तु मङ्गलः । त्रयोदश गुरुश्चैव सपादद्विदिनं शशी।। राहुरष्टादशान्मासान् त्रिंशन् मासान् शनैश्चरः । राहुवत्केतुरुक्तस्तु राशिभोगा: प्रकीर्त्तिताः । सूर्य: पञ्चदिनं शशी त्रिघटिका भौमोऽष्टं वै वासरं सप्ताहं ह्युशना बुधस्त्रयदिनं मासद्वयं वै गुरुः। षड्मासं रविजस्तथैव सततं स्वर्भानुमासद्वये केतोश्चैव तथा फलं परिमितं ज्ञेयं ग्रहाणां फलम् ॥ राशिप्रवेशे सूर्यारौ मध्ये शुक्रवृहस्पती। राहुश्चन्द्रः शनिश्चान्ते सौम्यश्चैव सदा शुभः ॥ सूर्यादि नवग्रहों के द्वारा एक राशि को भोगने में जितना समय लगता है, उसे और उनके फलदान काल को कहा जा रहा है- सूर्य- एक राशि का एक माह में भोग करते हैं, उसमें प्रथम पाँच दिन फल देते हैं। चन्द्र- एक राशि को सवा दो दिन में भोग करते हैं, उसमें अन्त के ३ घटी फल देते हैं। मंगल-एक राशि को ४५ दिन में भोग करते हैं, उसमें प्रथम आठ दिन फल देते हैं। बुध- एक राशि को १ मास में भोग करते हैं, उसमें प्रत्येक दिन फल देते हैं। गुरु- एक राशि को १३ मास में भोग करते हैं, उसमें मध्य के दो मास में फल देते हैं। शुक्र- एक राशि को एक मास में भोग करते हैं, उसमें मध्य के सात दिन फल देते हैं। शनि- एक राशि को तीस माह में भोग करते हैं, उसमें अन्त के ६ मास फल देते हैं। राहु या केतु-एक राशि को १८ मास में भोग करते हैं, उसमें अन्त के दो मास फल देते हैं। द्वादश भावों के नाम तत्रादौ तनुधनसहज सुहृत्सुतरिपवश्च। जायामृत्युधर्मकर्माSऽयव्ययाख्यानि द्वादश भवनानि।।
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भृगु संहिता फल दर्पण ९२५ जातक, प्रश्न या गोचर कुण्डली में १२ स्थान होते हैं, जिन्हें सिद्धान्त विद् महर्षियों ने द्वादश भाव कहा है। क्रमशः उनके नाम हैं-तनु, सहज, धन, सुहृत, सुत, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय। गोचर ग्रहों के द्वादश भाव स्थिति फल सूर्य: स्थानविनाशं भयं श्रियं मानहानिमथ दैन्यम्। विजयं मार्गं पीडां सुकृतं हन्ति सिद्धिमायमथ हानिम्। चन्द्रोन्नं च धनं सौख्यं रोगं कार्यक्षति श्रियम्। स्त्रियं मृत्युं नृपभयं सुखमायव्ययं क्रमात्।। भौमोऽरिभीतिं धननाशमर्थं भयं तथाऽर्थं क्षतिमर्थलाभम्। धनात्ययं शत्रुभयं च पीडां शोकं धनं हानिमनुक्रमेण। बुधस्तु बन्धं धनमन्यभीतिं धनं रुजं स्थानमथो च पीडाम्। अर्थं रुजं सौख्यमथात्म सौख्यमर्थक्षतिं जन्मगृहात्करोति। गुरुर्भयं धनं क्लेशं धननाशं सुखं शुचम्। मानं रोगं सुखं दैन्यं लाभं पीडां च जन्मभात्।। कविः शत्रुनाशं धनं सौख्यमर्थं सुताप्तिं रिपो: साध्वसंशोकमर्थम्। वृहद्वस्त्रलाभं विपत्तिं धनाप्तिं धनाप्तिं तनोत्यात्मनो जन्मराशे: ॥ शनि: सर्वनाशं तथा वित्तनाशं धनं शत्रुवृद्धिं सुतादेः प्रवृद्धिम्। श्रियं दोषसन्धिं रिपुं द्रव्यनाशं तथा दौर्मनस्यं दिशेद्वह्वनर्थम् ।। राहुर्हानिं तथा नैःस्वं धनं वैरं शुचं श्रियम्। कलिं वसुं च दुरितं वैरसौख्यं शुचं क्रमात्।। केतुः क्रमाद्रजं वैरं सुखं भीतिं शुचं धनम्। गति गदं दुष्कृतं च शोकं कीर्ति च शत्रुताम्।। प्रायः अर्थ स्पष्ट है। सुविधा के लिए चक्र का अवलोकन करना चाहिए। गोचर में अंग विभाग- गोचर विचार में सिर व मुखप्रदेश का स्वामी सूर्य, छाती व गले का चन्द्रमा, पीठ व पेट का स्वामी मंगल, हाथ पाँव व नसों-नाड़ियों का बुध, कमर व जाँघ का गुरु, गुप्त स्थानों का शुक्र व घुटनों व पिण्डलियों का शनि स्वामी होता है।
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९२६ गोचर ग्रह प्रकरण
गोचर ग्रह स्थिति स्पष्टार्थ चक्र
नाम रवि चन्द्र मङ्गल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु तनु नाश अन प्रा. शत्रुभय वन्धन भय शत्रुनाश सर्वनाश हानि रोग धन भय धन प्रा. धननाश धन प्राप्ति धन प्राप्ति धन प्राप्ति वित्तनाश धनलाभ वैर रहज धन सुख प्राप्ति धन प्राप्ति भीति द्लेश सौख्य धन लाभ धन प्राप्ति सुख सुहत मानह रोग भय धन प्राप्ति धन नाश धन प्राप्ति शत्रु वृद्धि वैर भय
सुत देन्य कार्य क्षय अर्थ प्राप्ति रोग सुख पुत्र प्राप्ति सुत प्राप्ति शोक शोक रिपु विजय लक्ष्मी लाभ स्थान लाभ शोक रिपु भय धन प्राप्ति लक्ष्मी धन प्राप्ति
पाया मार्ग कए लक्ष्मी खर्च पीड़ा मान शोक दोष कलह मार्गक्रम
मृत्यु पीड़ा मृत्यु शत्रु भय अर्थ प्राप्ति रोग धन प्राप्ति रिपु धन लाभ रोग धर्म पुणय नाश राज भय पीड़ा रोग सुख वस लाभ धन नाश पाप कर्म दृष्टकर्म कर्म सिद्धि सुख शोक सौख्य दैन्य विपत्ति शत्रु वृद्धि वैर शोक
आय लाभ आय धन प्राप्ति सौख्य लाभ धन प्राप्ति धन प्राप्ति साख्य कार्ति
व्यय हानि खर्च हानि नाश पीडा धन प्राप्ति धन नाश शोक शत्रुता
इन ग्रहों का अशुभ गोचर उक्त अंगों में पीड़ा देता है। साथ ही ग्रहों की अवस्था, वर्ण, रस आदि का भी समन्वय गोचर में करके तत्तत् वस्तुओं का विचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त भी मंगल से रक्त का, शुक्र से वीर्य का, बुध से बुद्धि व चेतना का, गुरु से जीवन का, चन्द्रमा से मन का, सूर्य से स्नायु, सत्त्व, बल, सुख आदि का विचार एवं शनि से सब प्रकार के कष्टों का विचार करना चाहिए। शुभाशुभ गोचर का सामान्य विचार- (क) जन्मराशि (चन्द्रराशि) से ग्यारहवें स्थान में सभी ग्रहों का गोचर शुभ है। (ख) सूर्य जन्म राशि से ३.६१०.११ में शुभ फलप्रद होता है। मंगल व शनि ३.६.११ स्थानों में चन्द्रमा १.३.६.७.१०.११ में, शुक्र १.२.३.४.५८.९.११.१२ स्थानों में, गुरु २.५.७.९.११ स्थानों में, बुध २.४.६.८.१०.११ में शुभ फलप्रद होते हैं। स्वोच्च मूल त्रिकोण मित्र राशि में व उदित सभी ग्रह प्रायः शुभ व अन्य स्थिति में अशुभ फल देते हैं। (ग) सामान्यतः क्रूर ग्रह ३.६.११ में व शुभ ग्रह अन्य स्थानों में फलप्रद होते हैं। गोचर वेध सूर्यो रसान्त्ये खयुगेऽग्निनन्दे शिवाक्षयोर्भौमशनी तमश्च। रसांकयोर्लाभशरे गुणान्त्ये चन्द्रोऽम्बराब्धौ गुणनन्दयोश्च॥।
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भृगु संहिता फल दर्पण ९२७ लाभाष्टमे चाद्यशरे रसान्त्ये नगद्वये ज्ञो द्विशरेऽब्धिरामे। रसांकयोर्नागविधौ खनागे लाभव्यये देवगुरुः शराब्धौ।। द्वयन्त्ये नवांशेऽद्रिगुणे शिवाहौ शुक्रः कुनागे द्विनगेऽग्निरूपे। वेदांबरे पञ्चनिधौ गजेषो नन्देशयोर्भानुरसे शिवाग्नौ।। क्रमाच्छुभो विद्ध इति ग्रहः स्यात् पितुः सुतस्याऽत्र न वेधमाहुः। दुष्टोऽपि खेटो विपरीतवेधाच्छुभो द्विकोणे शुभदः सितेऽब्जः ॥ स्वजन्मराशेरिह वेधमाहुरन्ये ग्रहाधिष्ठितराशितः सः । हिमाद्रिविन्ध्यान्तर एव वेधो न सर्वदेशेष्विति काश्यपोक्ति: । जन्म राशि से गोचर ग्रह का द्वादश भाव स्थिति वश शुभाशुभ फल ज्ञान कर अधोलिखित चक्र के अनुसार अन्य ग्रह से वेध का परीक्षण करना चहिए। जैसे कि सूर्य जन्म राशि से षष्ठ स्थान में हो, तो शुभ फल करता है, लेकिन वहीं से द्वादश स्थान में भी कोई ग्रह हो, तो वेधित होने के कारण सूर्य अशुभ फल ही देता है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के लिए भी विचार करना चाहिए। विशेषता मात्र इतना ही है कि पिता और पुत्र का परस्पर वेध नहीं माना जाता है। जैसे सूर्य का शनि से, चन्द्र का बुध से अथवा शनि का सूर्य से, बुध का चन्द्र से वेध नहीं होता। इसी तरह यदि सूर्य द्वादश स्थान में हो और कोई ग्रह तृतीय स्थान में भी हो, तो इसे विपरीत वेध कहा गया है। यह ग्रहों की शुभदा में वृद्धि ही करता है। इस वेध का विचार हिमाद्रि और विन्ध्याचल के मध्य में ही करना चाहिए, अन्यत्र नहीं, जैसा काश्यप महर्षि ने कहा है। गोचर ग्रह वेधचक्र रवे: मं.श.रा.के. चन्द्रस्य बधस्य ६१० ३ ११ ६ ११ ३ १० ३१११६७२४६८ 1१० ११ शुभस्थान १२४९५९५१२४९८५१२२५३९१८ १२ वेध स्थान गुरो: शुक्रस्य
५ २ ९ ७| ११ । १ २ ३४५८९ १२ ११ शुभ स्थान ४ १२१० ३ ८ ८७११०९५११ ६ ३ वेध स्थान विपरीत (वाम) वेध विचार- सूर्य ३.६१०.११ स्थानों में शुभ है, इन स्थानों के वेध भाव ९.१२.४.५ हैं। अतः जन्म राशि से इन स्थानों में जब सूर्य जाएगा तो अशुभ फल ही देगा।
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९२८ गोचर ग्रह प्रकरण शुभ फल देने वाले स्थान विपरीत वेधस्थान कहे जाएंगे। उदाहरणार्थ जन्म राशि से १२वें स्थान में सूर्य अशुभ फल देगा, लेकिन १२वें का वेध स्थान छठा है। अतः छठे स्थान में (सूर्य राशि से) कोई ग्रह शनि को छोड़कर स्थित हो तो १२वें सूर्य का अशुभ फल नहीं होगा। इसी प्रकार जन्मराशि से चतुर्थ में गुरु अशुभ है तो गुरु राशि से पंचम (चतुर्थ का विपरीत वेध स्थान) में कोई ग्रह हो तो गुरु अशुभ फल नहीं दे सकेगा। जिन स्थानों का शुभ वेधस्थानों में ग्रहण नहीं हुआ है उनका फल सामान्य नियम से जानना चाहिए। जन्मतः क्रमवेधः स्यात् वामवेधो ग्रहालयात्। शानि का विशेष गोचर- सोढ़ेसाती विचार-जन्म चन्द्र राशि से १२।१ व २ स्थानों में शनि का गोचर साढ़े सात वर्षों का होने पर साढ़ेसाती कही जाती है। यह गोचर प्रायः कष्टप्रद होता है। जिनकी कुण्डलियों में शनि बलवान्, शुभ भावों का स्वामी, ३।६।११ स्थानों में स्थित या शुभ दृष्ट, कारक ग्रहों से युक्त, राशि बली या नवांश बली हो तो उन्हें विशेष अशुभ फल नहीं होता। बल्कि कारक शनि की साढ़ेसाती अपने योग कारकत्व से राजयोग करती है। इसके विपरीत यदि शनि शत्रुक्षेत्री, शत्रु या पाप दृष्ट युक्त, उसके भावेश, अशुभ भावस्थ, नीच, अस्त आदि हो तो बहुत कष्ट देता है।
होता है। परिवार में एक साथ कई सदस्यों को साढ़ेसाती आना अधिक कष्टकारक
फल होता है। यदि साढ़ेसाती के साथ दशान्तर्दशा भी खराब हो तो अधिक अशुभ
प्रायः अल्पायु लोग एक साढ़ेसाती, मध्यायु लोग दो तथा दीर्घायु लोग तीन साढ़ेसाती भोगते हैं। साढ़ेसाती के पाये (पाद विचार)- शनि जब राशि बदले उस दिन अपनी जन्मराशि से चन्द्रमा यदि १।६।११ भाव में हो तो सोने के पाये, २।५/९ में हो तो चाँदी के पाये, ३।१०।१० में ताँबे के पाये व ४।८।१२ भाव में लोहे के पाये से शनि का गोचर होता है। इसमें सुवर्णपाद में सब प्रकार का सुख, चाँदी केपाये में शुभ, ताम्रपाद में शुभाशुभ समान फल तथा लोहपाद में बहुत अनिष्ट फल होता है। ढैया विचार (लघु कल्याण)-इसी प्रकार जन्मराशि से ४ या ८ राशियों में शनि रहने से ढ़ाई वर्ष तक अशुभ फल देता है।
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भृगु संहिता फल दर्पण ९२९ इसमें भी पाये, उच्च, नीच आदि का विचार करके फलादेश करना चाहिए। लग्नों की साढ़ेसाती विचार-मेष जन्मराशि या लग्न वालों की साढ़ेसाती 1 का शनि द्वादश मीन में समक्षेत्री होने पर सम व द्वितीय वृषभ में मित्र क्षेत्री होने पर साधारण कष्टकारक, लेकिन मेष राशि में नीचस्थ शनि अपना अशुभ फल विशेष देगा। अतः विभिन्न राशि वाले लोगों का साढ़ेसाती का निम्नोक्त समय अधिक कष्ट कारक होगा। मेष-मध्य के ढ़ाई वर्ष। मिथुन-अन्त के दो वर्ष। वृष-प्रथम के ढ़ाई वर्ष। कर्क-मध्य के ढ़ाई वर्ष। सिंह-प्रथम पाँच वर्ष। कन्या-प्रथम ढ़ाई वर्ष। तुला-अन्त के ढ़ाई वर्ष। धनु-प्रथम ढ़ाई वर्ष। वृश्चिक-मध्य के ढ़ाई वर्ष। मकर-प्रथम ढ़ाई वर्ष। कुम्भ-अन्त के ढ़ाई वर्ष। मीन-अन्त के ढ़ाई वर्ष। परस्पर दोषहर्ता ग्रह- राहु के दोष को बुध, इन दोनों के दोष को शनि, इन तीनों के दोष को मंगल, इन चारों के दोष को शुक्र, इन पाँचों के दोष को गुरु, इन छहों के दोष को चन्द्रमा व सब के दोष को (विशेषतया उत्तरायण में) सूर्य दूर कर देता है। दोषशामक ग्रह बली होना चाहिए। आशय यह है कि किसी को शनि का गोचर अनिष्ट कारक है तो बलवान् मंगल या बलवान् चन्द्रमा या बली सूर्य का जब तक शुभ गोचर रहेगा, तब तक शनि का अशुभ गोचर फल स्थगति रहेगा। इसी प्रकार सब ग्रहों के विषय में समझना चाहिए। दोष शान्ति के उपाय- (१ ) अनिष्ट कारक ग्रह के व्रत, मन्त्र का जप, हवन व सम्बन्धित जड़ी-बूटी के जस से स्नान करना सबसे अच्छा है। तत्पश्चात् केवल दान, तत्पश्चात् केवल मन्त्र से तर्पण भर करना चाहिए। उक्त तीनों कर्म साथ हो जाएं तो काफी हद तक अशुभ फल शान्त हो जाता है। अशुभ ग्रह के वैदिक या तान्त्रिक मन्त्र की निश्चित संख्या का जप करना या कराना चाहिए। (२ ) संक्षिप्त विधि अपनानी हो तो सूर्य की शान्ति के लिए प्रति रविवार या प्रतिदिन लगे हुए पान का, चन्द्रमा के लिए चन्दन का, मंगल के लिए भोजन का, शुक्र के लिए चावल या सफेद वस्त्र का, शनि के लिए तेल का, राहु व केतु के लिए प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व स्नान या काले तिल या नमक का दान करना चाहिए। भृ. सं .- ५९
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९३० गोचर ग्रह प्रकरण (३) सामान्यतः ईश्वराराधना, सत्कार्य, देव ब्राह्मण पूजन, यज्ञ करने से सभी ग्रह दोष शान्त होते हैं।
होता है। अन्न व वस्त्र का दान, दक्षिणा सहित करने से भी ग्रहों का अरिष्ट दूर
दैनिक गोचर ज्ञान- (१) अपने जन्म नक्षत्र से दिन नक्षत्र तक गिन कर उस संख्या में ९ का भाग दें। शेष से निम्न दशा वाहन चक्र में दिया फल जानें। दिन दशा वाहन चक्र
शेषांक १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ 0
वाहन गर्दभ अश्व गज महिष शृगाल सिंह काक मयूर हंस
फल कलह यात्रा लाभ व्याधि भय विजय चिन्ता सम्पत्ति जय
(२) जन्मनक्षत्र को चार से गुणा करके उसमें वार संख्या (रविवार १, सोमवार २) व शुक्लपक्ष से प्रश्न दिन की उदय तिथि संख्या जोड़कर ९ का भाग दें। यदि २।४।५।६ शेष बचें तो लाभ व सुख तथा अन्य संख्या शेष होने पर कष्ट तथा ० बचने पर महाकष्ट होता है। शनि चक्र द्वारा गोचर विचार-इसमें पुरुषाकार शनि चक्र बनाकर फल देखा जाता है। जिस नक्षत्र में शनि चल रहा हो, उस नक्षत्र से पीछे की ओर गिनते हुए नक्षत्रों को स्थापित कर फल जानें। शनि चक्र
अंग दायाँ हाथ दोनो पैर बायाँ हाथ पेट सिर नेत्र गुदा
शनि नक्षत्र से उल्टे क्रम ४ ६ ४ ५ ३ ४ १
से नक्षत्र फल रोग लाभ यात्रा या दरिद्रता लाभ सौभाग्य अल्पमृत्यु उदाहरणार्थ शनि धनिष्ठा में है तथा आर्द्रा नक्षत्रोत्पन्न बालक का गोचर फल जानना है तो धनिष्ठा से उल्टे क्रम से गिना तो आर्द्रा नक्षत्र १८वाँ है। यह पेट पर है, अतः दरिद्रता या बन्धन का द्योतक है। यह मानसागरी का मत है। कुछ विद्वान् शनि चक्र में उल्टे क्रम से नक्षत्र न गिन कर शनि जिस नक्षत्र में हो, उससे सीधी गणना द्वारा, जहाँ जन्म नक्षत्र या नाम नक्षत्र पड़े, तदुनसार फल कहते हैं। हमारे विचार से भी सीधी गणना द्वारा फल अधिक सटीक बैठता है। अन्य शनि चक्र- जिस नक्षत्र में गोचर में शनि हो, वहाँ से सीधी गणना द्वारा निम्न प्रकार से नक्षत्र स्थापित कर, जहाँ नाम नक्षत्र पा जन्म नक्षत्र पड़े,
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भृगु संहिता फल दर्पण ९३१ तदनुसार फल कहना चाहिए। अंग नक्षत्र संख्या फल सिर १ रोग मुख ३ लाभ गुप्तांग ४ हानि नेत्र २ धन हृदय ३ बाँया हाथ सुखी ४ बन्धन बायाँ पैर ३ पीड़ा दायाँ पैर ३ श्रेष्ठ यात्रा दायाँ हाथ ४ लाभ उदाहरणार्थ शनि नक्षत्र धनिष्ठा से जन्म नक्षत्र आर्द्रा तक गिना तो उक्त नक्षत्र हृदय पर पड़ता है, अतः सुख होगा। शनि व बृहस्पति का गोचर जीवन में प्रायः सभी मुख्य अच्छे या बुरे परिवर्तनों को बताता है। अतः इनका विचार जन्मपत्र की दशा-अन्तर्दश के अतिरिक्त भी करते रहना चाहिए। दोनों का एक साथ अशुभ गोचर प्रायः नाशक होता है। गुरु चक्र- बृहस्पति के गोचर नक्षत्र से जन्म नक्षत्र तक गिनकर निम्नांकित गुरु चक्र द्वारा फल जाने। गुरु चक्र अंग मस्तक कन्धे गला छाती पैर हाथ आँखे नक्षत्र ४ ४ १ ५ ६ ४ 3
फल राजयोग धन ऐश्वर्य सुख व पीड़ा मृत्यु राजसी प्राप्ति सुख
जन्म के चन्द्र में वर्जित पञ्चकर्म जन्मस्थर्क्षे शशाङ्के तु पञ्च कर्माणि वर्जयेत्। यात्रा युद्धं विवाहं च क्षौरं च गृहवेशनम्।। यात्रा करना, युद्ध में जाना, विवाह करना, क्षौर करना और गृह प्रवेश करना ये पाँच कर्म जन्म राशि में करना (जन्म के चन्द्र में करना) वर्जित किया गया है। चन्द्र तारा बल कथन द्विपञ्चनवमे शुक्ले श्रेष्ठश्चन्द्रो हि उच्यते। अष्टमे द्वादशे कृष्णे चतुर्थे श्रेष्ठ उच्यते। शुक्लपक्षे बलीचन्द्रः कृष्णे तारा बलीयसी।।
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९३२ गोचर ग्रह प्रकरण शुक्लपक्ष में जन्म राशि से २-५-९ स्थान स्थित चन्द्र शुभ और कृष्ण पक्ष में ४-८-१२ स्थान स्थित चन्द्र भी शुभ कहा गया है। श्रेष्ठ कहा गया है। शुक्ल पक्ष में चन्द्र का बल और कृष्ण पक्ष में तारा का बल
ग्रहों के शान्ति के उचित काल ये खेचरा गोचरतोऽष्टवर्गाद्दशा क्रमाद्वाप्यशुभा भवन्ति। दानादिना ते सुतरां प्रसन्नास्ते नाधुना दानविधिं प्रवक्ष्ये।। प्रत्येक ग्रह की शान्ति, तब करनी चाहिए, जब वह गोचर से, अष्टक वर्ग से अथवा दशा क्रम से अशुभ हो। उसके प्रसन्नता के लिए दानादि-शान्ति कार्य उचित है, अतः अब यहाँ दान आदि की विधि को कहा जा रहा है। वासरोत्थदोषशमनोपाय भानुस्तांबूलदानादपहरति नृणां वैकृतं वासरोत्थं सोम: श्रीखण्डदानादवनिवरसुतो भोजनात्पुष्पदानात्। सौम्यः शास्त्रस्य मन्त्राद्गुरुहरभजनाद्भार्गवः शुभ्रवस्त्रा- त्तैलस्नानात्प्रभाते दिनकरतनयो ब्रह्मनत्या परे च।। सूर्य ताम्बुल दान से, चन्द्र चन्दन दान से, मंगल भोजन व पुष्पदान से, बुध शास्त्रोक्त मन्त्र-जप से, गुरु शिबाराधन और भोजन से, शुक्र श्वेत वस्त्र से और शनि प्रातः काल तैलस्नान और विप्र सम्मान से ये ग्रह अपने- अपने वारों के अशुभ फलों को दूर कर शुभफल के दाता हो जाते हैं। ग्रहों के दानवस्तु और जप माणिकय गोधूमसवत्सधेनुः कौसुम्भवासो गुडहेमताम्रम्। आरक्तकं चन्दनमम्बुजं च वदन्ति दानं हि विरोचनाय। सद्वंशपात्रस्थिततण्डुलांश्च कर्पूरमुक्ताफलशुभ्रवस्त्रम्। युगोपयुक्तं वृषभं च रौप्यं चन्द्राय दद्यात् घृतपूर्णकुम्भम्।। प्रवालगोधूममसूरिकाश्च वृषोरुणश्चापि गुडः सुवर्णम्। आरक्तवस्त्रं करवीरपुष्पं ताम्रं च भौमाय वदन्ति दानम्।। जृषं च नीलं कलधौतकांस्यं मुद्राज्यगारुत्मत सर्वपुष्पम्। दासीं च दन्तं द्विरदस्य नूनं वदन्ति दानं विधुनन्दनाय।। शर्करा च रजनी तुरङ्गमः पीतधान्यमपि पीतमम्बरम् । पुष्परागलवणं सकाञ्चनं प्रीतये सुरगुरोः प्रदीयते।। चित्रांबरं शुभ्रतुरङ्गमं च धनुश्च वज्रं रजतं सुवर्णम्। सतंडुलानुत्तमगन्धयुक्तं वदन्ति दानं भृगुनन्दनाय।। माषाश्च तैलं विमलेन्द्रनीलं तिला: कुलत्था महिषी च लोहम्। कृष्णा च धेनुः प्रवदन्ति नूनं तुष्टयै च दानं रविनन्दनाय।।
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गोमेदरत्नं च तुरङ्गमश्च सुनीलचैलामलकम्बलं च। तिलाश्च तैलं खलु लोहमिश्रं स्वर्भानवेदानमिदं वदन्ति। वैडूर्यरत्नं सतिलं च तैलं सुकम्बलश्चापि मदो मृगस्य।
रवे: शस्त्रं च केतो: परितोषहेतोश्छागस्य दानं कथितं मुनीन्द्रैः ।। सप्तसहस्त्राणि चन्द्रस्यैकादशैव तु। भौमे दशसहस्त्राणि बुधे चाष्टसहस्रकम् ॥। एकोन विंशतिर्जीवे त्रयोविंशतिमन्दे शुक्र एकादशैव तु। राहोरष्टादशैव केतौ सप्तसहस्राणि जपसंख्या प्रकीर्तिता। च तु।।
पूर्वोदितं ग्रहाणां तु कोष्ठकेषु च द्रष्टव्यम्।। अर्थ प्रायः स्पष्ट है। सुविधा के लिए दानवस्तु और जप संख्या सम्बन्धी चक्र अवलोकन करना चाहिए। ग्रह पीडा शमनार्थ सामान्योपाय देवब्राह्मणवन्दनाद् गुरुवचः सम्पादनात्प्रत्यहं साधूनामपि भाषणाच्छुतिरवश्रेयः कथाकारणात्। होमादध्वरदर्शनाच्छुचिमनो भावाज्जपाद्दानतो कुर्वन्तीह कदाचिदेव पुरुषस्यैवं ग्रहाः पीडनम्॥ ग्रह दान वस्तु और जप संख्या स्पष्टार्थ चक्र
नाम रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु
माणिक वेणुपात्र मूँगा कालाबैल शर्करा चित्रवस्त्र उडद गोमेद वैडूर्य युक्ततन्दुल गेहूँ कर्पूर गेहूँ सोना हल्दी श्वेत अ. तेल घोड़ा रत्न
गोवत्स मोती मसूर कांस्यपा घोड़ा गाय नीलम् नीलवस्न तिल
रक्तवसत्र श्वेतवस्त्र ताम्रबैल मूँगा पीत अत्र वज्र तिल कम्बल तेल
दान- गुड़ श्वेत बैल गुड़ घृस पीत वस्त्र रूपा कुलथी तिल कम्बल
वस्तु सोना रौप्य सोना गारुत्मत पुष्प रा. सोना भैंस तेल कस्तूरी
ताँबा रूपा लाल वस्त्नर सर्वपुष्प नमक ताम्बूल लोहा लोहा शस्त्र
रत्तचन्द्र घृत कुम्भ कनेरपुष्प दासी सोना चन्दन कृष्णगौ क० पू० मेढा
हस्तिदन्त ० कमल 0 ताँना 0
८००० २३००० जप ७००० ११००० १००० १९००० ११००० १८००० ७०००
देव और ब्राह्मण की प्रीति के लिए उनकी वन्दना करें और प्रतिदिन गुरु और सज्जनों के सद्वचन तथा उत्तम-उत्तम कथा श्रवण करे। होम व यज्ञ के दर्शन करें, शुद्ध मन से जप दान करें। इस प्रकार जो ग्रहों के निमित्त ऐसे उपाय करेंगे, तो उसकी ग्रहपीड़ा
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९३४ गोचर ग्रह प्रकरण निवृत्ति होगी और उसका शुभ फल प्राप्त होगा। मन्त्र से ग्रह-उपचार-मंत्र से ग्रहों के दोषों व रोगों का निदान किया जाता है। यहाँ सूर्यादि नवग्रहों की उपासना, पूजा, ध्यान, दानादि द्वारा शान्ति तथा उनकी प्रसन्नता से समृद्धि का उपाय बताया गया है। इसमें प्रत्येक ग्रह की प्रसन्नता हेतु वैदिक, तांत्रिक, पौराणिक, नाम तथा जैन मन्त्रों का उल्लेख तथा उनकी जप-संख्या भी बतायी गयी है। सूर्य- सूर्य के लिए निम्न मंत्र का जाप किया जाता है। वैदिक मंत्र : ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यञ्च। हिरण्येन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्। तांत्रिक मंत्र : १. ॐ घृणिः सूर्यादित्योम। २. ॐ घृणि: सूर्य आदित्योम श्रीं। ३. ॐ हरां हीं हौं सः सूर्याय नमः। ४. ॐ ह्रीं हीं सूर्याय नमः। नाम मंत्र-ॐ घृणि सूर्याय नमः। पौराणिक मंत्र : ॐ जवाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽस्मि दिवाकरम् ।। जैन मंत्र : ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीं सूर्यग्रह अरिष्टनिवारक श्री पदम्प्रभ जिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा। जप संख्या : ७००० चन्द्रमा- चन्द्र हेतु इस मंत्र का जाप किया जाता है- वैदिक मंत्र : ॐ इमं देवाअसपत्ना सुहवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष््याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य। पुत्रममुष्यै पुत्रमष्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकम्ब्राह्मणानां राजा। तांत्रिक मंत्र : १.ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः। २.ॐ श्रां श्रीं श्रौं चन्द्रमसे नमः। ३. ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नमः। नाम मंत्र : ॐ सों सोमाय नमः। पौराणिक मंत्र: ॐ दधिशङ्गतुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम्। नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुटभूषणम्।। जैन मंत्र : ॐहीं क्रौ श्रीं क्लीं चन्द्रारिष्टनिवारक श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा। जप संख्या : ११००० मंगल-मंगल हेतु यह मंत्र जाप करना चाहिए- वैदिक मंत्र : ॐ अग्निर्मूर्द्धादिवः ककुत्पतिः पृथिव्याअयम्। अपारेता v सिजिन्वति। तांत्रिक मंत्र : १. ॐ हां हंस: खं खः। २.ॐ हूं श्रीं मंगलाय नमः। ३. ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः। नाम मंत्र: ॐ अं अङ्गारकाय नमः। पौराणिक मंत्र : ॐ धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमार शक्ति हस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम्।। जैन मंत्र : ॐ आं क्रौं हीं श्री क्लीं। भौमारिष्टनिवारक
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भृगु संहिता फल दर्पण ९३५ श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा। जप संख्या : १००००- बुध- बुध हेतु निम्न मंत्र का जाप करें- वैदिक मंत्र : ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्तेस सृजेथामयञ्च। अस्मिन्त्सधस्थेऽध्युत्तरस्मिन्विश्चे देवा यजमानश्च सीदत।। तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं श्रीं श्रीं बुधाय नमः। २. ॐ ब्रां बरीं ब्रौं सः बुधाय नमः। ३.ॐ स्त्रीं स्त्रीं बुधाय नमः। नाम मंत्र : ॐ बुं बुधाय नमः पौराणिक मंत्र : ॐ प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्। सौमयं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ जैन मंत्र : ॐह्रीं क्रौं आं श्रीं बुधग्रहारिष्टनिवारक श्रीविमल अनंतधर्मशान्ति कुन्थअरहनमिवर्धमान अष्टजिनेन्द्रेभ्यो नमः शांतिं कुरुत कुरुत स्वाहा। जप संख्या : ८००० गुरु- गुरु हेतु इन मंत्रों में से किसी का जाप करना चाहिए- वैदिक मंत्र : ॐ बृहस्पते ऽअतियदर्योऽअर्हाद्युमद्वभातिक्रतुमज्जनेषु यद्दीदयच्छवसSऋत प्रजात तदस्मासु द्रविंन्धेहि चित्रम्। तांत्रिक मंत्र: १.ॐ ऐं क्रीं बृहस्पतये नमः। २.ॐग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः। ३. ॐ श्रीं श्रीं गुरदे नमः। नाम मंत्र : ॐ बृं बृहस्पतये नमः। पौराणिक मंत्र : ॐ देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।। जैन मंत्र : ॐ औं क्रौं हीं श्रीं क्लीं ऐं गुरु अरिष्ट निवारकऋषभअजित संभव अभिनंदनसुमति सुपारसशीतल श्रेयांसअष्टजिनेन्द्रेभ्यो नमः शान्तिं कुरुत कुरुत स्वाहा। जप संख्या : १९०००-शुक्र-शुक्र हेतु प्रस्तुत मन्त्र का जाप उत्तम होता;है- वैदिक मंत्र : ॐ अन्नात्परिस्त्रुतोरसं ब्रह्मणाव्यपिवत्क्षत्रं पयः सोमं प्रजापतिः। ऋतेनसत्यमिन्द्रियं विपान् शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदंम्पयोऽमृतम्मधुः॥ तांत्रिक मंत्र : १. ॐ हीं श्रीं शुक्राय नमः। २. ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः। ३. ॐ वस्त्रं मे देहि शुक्राय स्वाहा। नाम मंत्र : ॐ शुं शुक्राय नमः। पौराणिक मंत्र : ॐ हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्। - जैन मंत्र : ॐह्ीं श्रीं क्लीं हीं शुक्र अरिष्टनिवारक श्रीपुष्पदन्तजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा। जप संख्या : ११०००- शनि- यह मन्त्र शनि की प्रसन्नता प्रदान करवाते हैं तथा उपकृत करते हैं- वैदिक मंत्र : ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शंयोरभिस्त्रवन्तुनः।।
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९३६ गोचर ग्रह प्रकरण तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं हीं श्रीं शनैश्चराय नमः। २.ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः। ३. ॐ क्लीं क्लीं शनये नमः। नाम मंत्र : ॐ शं शनैश्चराय नमः। पौराणिक मंत्र: ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमग्रजम्। छायामार्त्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।। जैन मंत्र : ॐ हीं क्रौं ह्रः श्रीं शनिग्रहअरिष्टनिवारक श्रीमुनि- सुव्रतनाथजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा। राहु- राहु के लिए निम्नलिखित मंत्र का जाप करें- वैदिक मंत्र : ॐ कयानश्चित्र आभुवदूतीसदा वृधः सखा। कया- शचिस्टुयाव्वृता। तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ऐं हीं राहवे नमः। २.ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं राहवे नमः। ३.ॐ ह्रीं ह्रीं राहवे नमः। नाम मंत्र : ॐरां राहवे नमः। पौराणिक मंत्र : ॐ अर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम्। सिंहकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥ जैन मंत्र : ॐ ह्रीं क्लीं हूं राहुग्रहारिष्टनिवारकश्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय नमः शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा। जप संख्या : १८०००- केतु- केतु हेतु प्रस्तुत मन्त्र का जाप उत्तम होता है- वैदिक मंत्र : ॐ केतु कृण्वन्नकेतवे पेशोमर्या अपेशसे समुषद्भिरजायथाः। तांत्रिक मंत्र : १. ॐ ह्रीं केतवे नमः। २. ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः। ३. ॐ क्रीं क्रीं केतवे नमः। नाम मंत्र : ॐ कें केतवे नमः। पौराणिक मंत्र : ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।। जैन मंत्र : ॐ हीं क्लीं ऐं केतुअरिष्टनिवारक-श्रीमल्लिनाथ पार्श्वनाथ- जिनेन्द्रभ्यां नमः शान्तिं कुरुत कुरुत स्वाहा। जप संख्या : १७००० इस प्रकार योगों, दशा महादशा एवं गोचर के माध्यम से जीवन में आने वाले कष्टों का पूर्वानुमान कर, अनिष्टकारक ग्रहों की शांति के लिए उक्त मंत्रों का अनुष्ठान करे। 'मंत्र-शास्त्र' में इसको पुरश्चरण कहा जाता है।
।। इस प्रकार डा. सुरकान्त 'सुमन' द्वारा भृगु संहिता : फलित सर्वाङ्ग दर्शन ग्रन्थ में भृगु संहिता फल दर्पण भाग का लेखन सम्पादन कर्म सुसम्पन्न हुआ।। 2 रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन प्रकाशक
कचौड़ीगली, वाराणसी-२२१००१
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लोसंकम २०१७ सक ११३ २ ययो भम सेवत्सर
श डाकुर प्रसाद प्रकाशन
प्रकाशक : ISBN 219-542-2392548 रुपेश ठाकुर प्रसाद प्रकाशन कचौड़ीगली, वाराणसी-1 2 195422 392548 Rs. 500/-